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पश्चिम बंगालचे राज्यपाल हे पश्चिम बंगाल राज्याचे भारताच्या राष्ट्रपतींचे नाममात्र प्रमुख आणि प्रतिनिधी आहेत. राज्यपालांची नियुक्ती राष्ट्रपती ५ वर्षांच्या कालावधीसाठी करतात आणि राज्यपालांचे अधिकृत निवासस्थान हे राजभवन, कोलकाता (प्राथमिक) आणि राजभवन, दार्जिलिंग (उन्हाळा) येथे आहे. जगदीप धनखर यांनी २३० जुलै २०१९ रोजी केरळचे राज्यपाल म्हणून पदभार स्वीकारला.
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| 2 |
+
(अतिरिक्त कार्यभार)[२]
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पाश्चिमी विभागीय परिषद ही एक भारतीय विभागीय परिषद आहे. हिच्यात ज्यात पश्चिमी भारताच्या गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र आणि केंद्रशासित प्रदेश दादरा आणि नगर हवेली आणि दमण आणि दीव या राज्यांचा समावेश आहे.[१][२]
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| 2 |
+
या राज्यांमध्ये सहकार्य वाढविण्यासाठी सल्लागार समिती असलेल्या सहा विभागांमध्ये या राज्यांच्या गट करण्यात आला होता. राज्य पुनर्रचना कायदा ,१९५६ च्या भाग-IIIच्या अंतर्गत पाच विभागीय परिषदा स्थापन झाल्या.[१][३]
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पश्चिम रेल्वे हे भारतीय रेल्वेच्या १७ क्षेत्रांपैकी एक क्षेत्र आहे. १९५२ साली स्थापन झालेल्या पश्चिम रेल्वेचे मुख्यालय मुंबईच्या चर्चगेट रेल्वे स्थानक येथे असून महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान व मध्य प्रदेश ही राज्ये पश्चिम रेल्वेच्या अखत्यारीत येतात. वडोदरा रेल्वे स्थानक हे पश्चिम रेल्वेवरील सर्वात वर्दळीचे जंक्शन आहे.
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| 2 |
+
मुंबईमध्ये मुंबई सेंट्रल व वांद्रे टर्मिनस ह्या स्थानकांवरून बहुतेक सर्व लांब पल्ल्याच्या गाड्या सुटतात. मुंबई उपनगरी रेल्वेचा पश्चिम मार्ग पश्चिम रेल्वेद्वारे चालवला जातो.
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| 3 |
+
पश्चिम रेल्वेचे सहा विभाग आहेत.
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| 4 |
+
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| 5 |
+
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| 6 |
+
रेल्वे मंत्रालय • रेल्वे बोर्ड
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| 7 |
+
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| 8 |
+
उत्तर •
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| 9 |
+
उत्तर पश्चिम •
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| 10 |
+
उत्तर पूर्व •
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| 11 |
+
उत्तर पूर्व सीमा •
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| 12 |
+
उत्तर मध्य •
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| 13 |
+
दक्षिण •
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| 14 |
+
दक्षिण पश्चिम •
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| 15 |
+
दक्षिण पूर्व •
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| 16 |
+
दक्षिण पूर्व मध्य •
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| 17 |
+
दक्षिण मध्य •
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| 18 |
+
पश्चिम •
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| 19 |
+
पश्चिम मध्य •
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| 20 |
+
पूर्व •
|
| 21 |
+
पूर्व तटीय •
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| 22 |
+
पूर्व मध्य •
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| 23 |
+
मध्य •
|
| 24 |
+
कोकण
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| 25 |
+
भारतीय कंटेनर निगम लिमिटेड •
|
| 26 |
+
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया •
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| 27 |
+
इंडियन रेल्वे फायनान्स कॉर्पोरेशन •
|
| 28 |
+
इंडियन रेल्वे केटरिंग अँड टुरिझम कॉर्पोरेशन •
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| 29 |
+
इरकॉन इंटरनॅशनल लिमिटेड •
|
| 30 |
+
कोकण रेल्वे कॉर्पोरेशन •
|
| 31 |
+
मुंबई रेल्वे विकास प्राधिकरण •
|
| 32 |
+
रेल विकास निगम लिमिटेड •
|
| 33 |
+
रेलटेल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया •
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| 34 |
+
राइट्स लिमिटेड
|
| 35 |
+
बनारस रेल्वे इंजिन कारखाना •
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| 36 |
+
चित्तरंजन लोकोमोटिव्ह कार्यशाळा •
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| 37 |
+
डीझेल रेल्वे इंजिन आधुनिकीकरण कारखाना •
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| 38 |
+
इंटिग्रल कोच कारखाना •
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| 39 |
+
रेल डबा कारखाना •
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| 40 |
+
रेल चाक कारखाना •
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| 41 |
+
रेल स्प्रिंग कारखाना
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| 42 |
+
दिल्ली–हावडा मुख्य रेल्वेमार्ग •
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| 43 |
+
दिल्ली–गया–हावडा रेल्वेमार्ग •
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| 44 |
+
दिल्ली−चेन्नई रेल्वेमार्ग •
|
| 45 |
+
दिल्ली–मुंबई रेल्वेमार्ग •
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| 46 |
+
हावडा−नागपूर−मुंबई रेल्वेमार्ग •
|
| 47 |
+
हावडा−अलाहाबाद−मुंबई रेल्वेमार्ग •
|
| 48 |
+
हावडा−चेन्नई रेल्वेमार्ग •
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| 49 |
+
मुंबई–चेन्नई रेल्वेमार्ग
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| 50 |
+
चेन्नई उपनगरी रेल्वे •
|
| 51 |
+
दिल्ली उपनगरी रेल्वे •
|
| 52 |
+
हैदराबाद एम.एम.टी.एस. •
|
| 53 |
+
कोलकाता उपनगरी रेल्वे •
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| 54 |
+
कोलकाता मेट्रो •
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| 55 |
+
मुंबई उपनगरी रेल्वे
|
| 56 |
+
वंदे भारत एक्सप्रेस •
|
| 57 |
+
गतिमान एक्सप्रेस •
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| 58 |
+
शताब्दी एक्सप्रेस •
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| 59 |
+
राजधानी एक्सप्रेस •
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| 60 |
+
हमसफर एक्सप्रेस •
|
| 61 |
+
दुरंतो एक्सप्रेस •
|
| 62 |
+
संपर्क क्रांती एक्सप्रेस •
|
| 63 |
+
जन शताब्दी एक्सप्रेस •
|
| 64 |
+
विवेक एक्सप्रेस •
|
| 65 |
+
राज्यराणी एक्सप्रेस •
|
| 66 |
+
दार्जिलिंग हिमालय रेल्वे •
|
| 67 |
+
निलगिरी पर्वतीय रेल्वे •
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| 68 |
+
कालका-सिमला रेल्वे •
|
| 69 |
+
पॅलेस ऑन व्हील्स •
|
| 70 |
+
डेक्कन ओडिसी •
|
| 71 |
+
गोल्डन चॅरियट
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पाहांग (देवनागरी लेखनभेद: पहांग; भासा मलेशिया: Pahang; जावी लिपी: ڨهڠ ;) हे मलेशियामधील एक राज्य असून साबा व सारावाक यांच्या पाठोपाठ मलेशियातील तिसरे मोठे, तर द्वीपकल्पीय मलेशियातील सर्वांत मोठे राज्य आहे. हे राज्य द्वीपकल्पीय मलेशियाच्या पूर्व किनाऱ्यावर वसले आहे. याच्या उत्तरेस कलांतान, पश्चिमेस पराक, सलांगोर, नगरी संबिलान, दक्षिणेस जोहोर व ईशान्येस तरेंगानू ही मलेशियाची राज्ये असून पूर्व किनाऱ्यास दक्षिण चीन समुद्र पसरला आहे. क्वांतान येथे पाहांगाची राजधानी आहे.
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| 2 |
+
प्रामुख्याने डोंगराळ मुलूख असलेल्या पाहांगाचा २/३ हिस्सा उष्णकटिबंधीय सदाहरित वनांनी व्यापला आहे. तमन नगरा नावाने ओळखले जाणारे मलेशियातील सर्वाधिक विस्तीर्ण राष्ट्रीय उद्यान राज्याच्या उत्तरेला वसले आहे. द्वीपकल्पीय मलेशियातील सर्वोच्च शिखर गुनुंग ताहान याच राष्ट्रीय उद्यानात आहे.
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| 3 |
+
पाहांगाच्या पूर्वेस दक्षिण चीन समुद्रास भिडलेली किनारपट्टी आहे. क्वांतान हे राजधानीचे शहर याच किनारपट्टीवर वसले आहे. प्रवाळ बेटांसाठी व सागरी निसर्ग पर्यटनासाठी प्रसिद्ध असलेले पुलाऊ तिओमान व अन्य बेटे पाहांगाच्या किनाऱ्यापासून समुद्रात वसलेली आहेत.
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| 4 |
+
पाहांग घटनात्मक राजतंत्र आहे. २६ फेब्रुवारी, इ.स. १९५९ रोजी पाहांगाची विद्यमान राज्यघटना लागू झाली. राज्यघटनेनुसार सुलतान हयातभर पाहांगाचा शासनप्रमुख असतो.
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| 5 |
+
देवान उंदांगान नगरी, अर्थात राज्य विधिमंडळ, हे पाहांग प्रशासनाची वैधानिक यंत्रणा असून राज्य कार्यकारी परिषद शासन व्यवस्थेची कार्यकारी यंत्रणा असते. सुलतानाने निवडलेला मंत्री बसार, अर्थात मुख्यमंत्री, दहा जणांच्या कार्यकारी परिषदेचा प्रमुख असतो.
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| 6 |
+
राजकीय दृष्ट्या पाहांगाचे खालील जिल्ह्यांमध्ये विभाजन होते : बरा, बंतोंग, ताना तिंगी कॅमेरोन, जरांतुत, क्वांतान, क्वाला लिपिस, मारान, पकान, राउब, रोंपिन व तमेर्लो
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| 7 |
+
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| 8 |
+
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| 9 |
+
कदा · कलांतान · जोहोर · तरेंगानू · नगरी संबिलान · पराक · पर्लिस · पाहांग · पेनांग · मलाक्का · सलांगोर · साबा · सारावाक
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| 10 |
+
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| 11 |
+
क्वालालंपूर · पुत्रजय · लाबुआन
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| 1 |
+
पहिला कृष्णराज वोडेयार तथा दोड्डा कृष्णराज (१८ मार्च, १७०२ - ५ मार्च, १७३२) हा मैसुरुचा १६वा राजा होता. हा यदुराय वोडेयारचा शेवटचा थेट वंशज होता. पहिला कृष्णराज १७१४-१७३२ अशी १८ वर्षे सिंहासनावर होा.
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| 2 |
+
पहिल्या कृष्णराजाचा जन्म १८ मार्च १७०२ रोजी झाला. हा दुसरा कांतीरव नरसराज आणि त्याची दुसरी पत्नी महाराणी चेल्वजा अम्मानी देवी यांचा पहिला मुलगा होता. आपल्या वडिलांच्या मृत्यूनंतर ९ वर्षे वयात कृष्णराज मैसुरुचा राजा झाला. याला ९ बायका होत्या. याला स्वतःला एक मुलगा झाला परंतु तो सहा महिन्यांतच मृत्यू पावला. मैसुरुच्या सिंहासनावर कृष्णराय हा यदुरायाचा शेवटचा थेट वंशज होता. याच्यानंतर त्याच्या दत्तक मुलांपैकी एक सातवा चामराज नावाने राजा झाला.
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| 3 |
+
दोड्डा कृष्णराजाच्या राज्यारोहणाच्या आधी, मैसुरुच्या उत्तर आणि ईशान्येकडे असलेल्या मुघल साम्राज्याच्या सिरा प्रांतात प्रशासकीय बदल झाला होता. [१] यांत मैसुरुच्या आसपास असलेल्या सुपीक प्रदेशाचा महसूल गमावल्यामुळे आर्कोटच्या प्रशासक सादतउल्ला खान याने कडप्पा, कुर्नूल, सावनूर येथील राजे तसेच गुट्टीचा मराठा राजा यांच्या संगनमताने त्याने कृष्णराजाविरुद्ध मोर्चा उभारला. [१] तथापि, हा प्रदेश आणि महसूल या युतीच्या घशात पडू नये म्हणून सीराच्या नवाबाने श्रीरंगपट्टणवर स्वतःच चाल केली. [१] दोघांचाही मतलब एकच (मैसुरुचा प्रदेश गिळंकृत करणे) असल्याने आर्कोट आणि सिरा या दोन्ही नवाबांनी श्रीरंगपट्टणवर संयुक्त आक्रमण केले. [१] आपल्या पूर्वजांप्रमाणे अशा चढाईला प्रत्युत्तर देउन शत्रूला हाकलून देण्याऐवजी कृष्णराजाने १ कोटी रुपयांची खंडणी मान्य केली व मैसुरुवरील हे संकट टाळले.[१] परंतु यामुळे मैसुरु हतबल असल्याचे शत्रूला वाटले आणि शत्रू सोकावला. यानंर दोन वर्षांनी मराठा सैन्याने थेट श्रीरंगपट्टणवर हल्ला करून लुटून नेले. [१] या सगळ्यामुळे मैसुरुचा खजिना रिकामा होऊ लागला. तो भरण्यासाठी कृष्णराजने उत्तरेच्या मगादीच्या पाळेगारावर हल्ला करून त्याचा प्रदेश मैसुरुमध्ये लावून घेतला. [१]
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| 4 |
+
कृष्णराजाला राज्याच्या कारभारात फारसा रस नव्हता. हे पाहून त्याचा दिवाण आणि चुलतभाऊ नंजरजा आणि सेनापती देवराज यांनी कारभार हाती घेतला. १७३२मध्ये कृष्णराजाच्या मृत्यूनंतर त्यांनी सिंहासनावर आपल्या ह��तात राहतील असे राजे बसवले. हे हैदर अलीच्या उदयापर्यंत सुरू राहिले.
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dataset/scraper_5/batch_2/wiki_s5_10106.txt
ADDED
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@@ -0,0 +1,3 @@
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| 1 |
+
चामराजा वोडेयार पहिला (बेट्टाडा चामराजा; १४०८ - १४५९) हा १४२३पासून मृत्यूपर्यंत मैसुरुचा दुसरा राजा होता. तो वडियार घराण्याचा यदुरायाचा मोठा मुलगा होता.
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| 2 |
+
चामराज सत्तेवर आला तेव्हा यदुरायाने स्थापलेली जहागीर २४ वर्षे जुनी होती आणि विजयनगर साम्राज्याला आधीन होती. विजयनगरचे साम्राज्या या सुमारास भरभराटीत असले तरीही तेथील राजकीय अस्थिरतेचा फायदा घेत यदुरायानंतर चामराजाने मैसुरुच्या आसपासच्या वाड्या-वस्त्या आणि छोटी शहरे आपल्या जहागिरीत शामिल करून घेतली.
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| 3 |
+
चामराजने, विजय बुक्का राय, देवराया दुसरा आणि मल्लिकार्जुन राया अशा तीन सम्राटांना आधीन राहून ३६ वर्षे राज्य केले. यदुराय आणि चामराजाच्या ६० वर्षांच्या सततच्या अंमलामुळे राज्याला स्थैर्य आले आणि विजयनगर साम्राज्याील एक समर्थ घटक बनले.
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| 1 |
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चामराजा वोडेयार पहिला (बेट्टाडा चामराजा; १४०८ - १४५९) हा १४२३पासून मृत्यूपर्यंत मैसुरुचा दुसरा राजा होता. तो वडियार घराण्याचा यदुरायाचा मोठा मुलगा होता.
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| 2 |
+
चामराज सत्तेवर आला तेव्हा यदुरायाने स्थापलेली जहागीर २४ वर्षे जुनी होती आणि विजयनगर साम्राज्याला आधीन होती. विजयनगरचे साम्राज्या या सुमारास भरभराटीत असले तरीही तेथील राजकीय अस्थिरतेचा फायदा घेत यदुरायानंतर चामराजाने मैसुरुच्या आसपासच्या वाड्या-वस्त्या आणि छोटी शहरे आपल्या जहागिरीत शामिल करून घेतली.
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| 3 |
+
चामराजने, विजय बुक्का राय, देवराया दुसरा आणि मल्लिकार्जुन राया अशा तीन सम्राटांना आधीन राहून ३६ वर्षे राज्य केले. यदुराय आणि चामराजाच्या ६० वर्षांच्या सततच्या अंमलामुळे राज्याला स्थैर्य आले आणि विजयनगर साम्राज्याील एक समर्थ घटक बनले.
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dataset/scraper_5/batch_2/wiki_s5_10161.txt
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| 1 |
+
पहिला सेलीम (ओस्मानी तुर्की: سليم اوّل ; तुर्की: I.Selim ;) (ऑक्टोबर १०, इ.स. १४६५/इ.स. १४६६/इ.स. १४७० - सप्टेंबर २२, इ.स. १५२०) हा इ.स. १५१२ ते इ.स. १५२० या कालखंडादरम्यान ओस्मानी साम्राज्यावर अधिकारारूढ असलेला सुलतान होता. इस्लामाचा खलिफा हे बिरूद धारण करणारा तो पहिला ओस्मानी सुलतान होता. मध्यपूर्वेचा बहुतांश भूप्रदेश जिंकत त्याने ओस्मानी साम्राज्याकडे सुन्नी इस्लामाचे धुरिणत्व आणले. त्यापूर्वी मुख्यत्वेकरून पाश्चात्य ख्रिश्चन जगाविरुद्ध व बेय्लिकांविरुद्ध आक्रमक विस्ताराचे धोरण राखणाऱ्या ओस्मानी साम्राज्याच्या विस्तारवादी धोरणांमध्ये या पूर्वाभिमुख मोहिमा म्हणजे मोठेच परिवर्तन होते. इ.स. १५२० साली पहिल्या सेलिमाच्या मृत्युपावेतो ओस्मानी साम्राज्य तिपटीने विस्तारून १ अब्ज एकरांवर पसरले होते.
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ब्रिक्स देशांची पहिली शिखर परिषद इ.स. २००९ मध्ये येकातेरिनबुर्ग येथे पार पडली. या परिषदेला भारत, ब्राझील, रशिया, चीन या चार राष्ट्रांचे प्रतिनिधी उपस्थित होते.[१][२]
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कंबोडिया
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लाओस
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यांच्या पाठिंब्याने:
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अमेरिका
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ख्मेर इसाराक
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पॅथेट लाओ
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यांच्या पाठिंब्याने:
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सोव्हियेत संघ
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चीन
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पहिले इंडोचीन युद्ध (फ्रेंच इंडोचीन युद्ध, फ्रान्स-व्हियेतनाम युद्ध; व्हियेतनामी: Chiến tranh Đông Dương) हे इ.स. १९४६ ते १९५४ दरम्यान फ्रेंच इंडोचीनमध्ये लढले गेलेले एक युद्ध होते. ह्या युद्धात फ्रान्स विरुद्ध व्हियेतनाममधील व्हियेत मिन्ह ह्या स्वातंत्र्यवादी गटादरम्यान लढत झाली.
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इ.स. १८८७ सालापर्यंत फ्रान्सने संपूर्ण व्हियेतनाम ताब्यात घेऊन येथे फ्रेंच इंडोचीन ही वसाहत स्थापन केली होती. दुसऱ्या महायुद्धादरम्यान हा भूभाग जपानने बळकावला होता. महायुद्ध संपण्याच्या सुमारास व्हियेतनाममधील स्वातंत्र्य चळवळीने जोर धरला. हो चि मिन्ह ह्या व्हियेतनामी कम्युनिस्ट पुढाऱ्याने व्हियेत मिन्ह नावाची आघाडीची निर्मिती केली. महायुद्धात जपानचा पराभव झाल्यानंतर जेव्हा फ्रान्सने पुन्हा इंडोचीनवर ताबा मिलवण्याचा प्रयत्न केला तेव्हा व्हियेत मिन्ह व कंबोडिया व लाओसमधील कम्युनिस्ट पक्षांनी फ्रान्सविरोधात लष्करी बंड पुकारले व ह्या युद्धाची सुरुवात झाली.
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७ वर्षांहून अधिक काळ चाललेल्या ह्या युद्धात फ्रान्सला अमेरिकेचा तर व्हियेत मिन्हला सोव्हिएत संघ व चीनचा पाठिंबा होता. अखेरीस उत्तर व्हियेतनामच्या गनिमी काव्यापुढे फ्रान्सला शरणागती पत्कारावी लागली व मार्च १९५४ मध्ये सुरू झालेल्या दियेन बियेन फुच्या लढाईमध्ये फ्रान्सचा सपशेल पराभव झाला व हे युद्ध संपुष्टात आले.
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२१ जुलै १९५४ रोजी जिनिव्हा येथे झालेल्या एका परिषदेत इंडोचीनची फाळणी करण्याचे ठरले. उत्तर व्हियेतनाममध्ये हो चि मिन्हच्या नेतृत्वाखाली कम्युनिस्ट राजवटीची तर दक्षिण व्हियेतनाममध्ये सम्राट बाओ दाईच्या नेतृत्वाखाली प्रजासत्ताकाची स्थापना झाली. दोन्ही तुकड्यांनी एकत्रीकरणाचे प्रयत्न करणे अपेक्षित होते. परंतु १९५६ साली सत्तेवर आलेल्या दक्षिण व्हियेतनामच्या गो डिन यीमने उत्तरेसोबत वाटाघाटीस नकार दिला. ह्यामध्येच व्हियेतनाम युद्धाची मुळे रोवली गेली.
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पहिले मेक्सिकन साम्राज्य (स्पॅनिश:Imperio Mexicano) हे स्वतंत्र मेक्सिकोचे अधिकृत नाव होते. १८२१ - १८२३ या कालावधीतील हे साम्राज्य राजेशाही साम्राज्य होते. सध्याचा मेक्सिको, मध्य अमेरिका व अमेरिकेच्या संयुक्त संस्थानांचा पश्चिम भाग मिळून हे साम्राज्य तयार होत असे.
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१९२४ हिवाळी ऑलिंपिक ही हिवाळी ऑलिंपिक क्रीडा स्पर्धा स्पर्धेची पहिली आवृत्ती होती. ही स्पर्धा फ्रान्स देशाच्या ओत-साव्वा विभागामधील शॅमोनी ह्या शहरामध्ये जानेवारी २५ ते फेब्रुवारी ४ दरम्यान खेळवण्यात आली. १९२४ ते १९९२ सालांदरम्यान हिवाळी व उन्हाळी ऑलिंपिक स्पर्धा एकाच वर्षी खेळवण्यात येत असत. १९२४ उन्हाळी ऑलिंपिक देखील फ्रान्सच्या पॅरिस शहरामध्येच भरवली गेली होती.
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खालील सहा खेळ ह्या स्पर्धेत समाविष्ट केले गेले होते.
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पाँडीचेरी हा सचिन कुंडलकर दिग्दर्शित मराठी चित्रपट आहे. यांनी या बॅनर अंतर्गत या चित्रपटाची निर्मिती केली. या चित्रपटाला यांनी संगीत दिले असून यामध्ये हे या नवोदित कलाकारांची प्रमुख भूमिका आहे. फेब्रुवारी ४ २०२२ मध्ये हा चित्रपट भारतात प्रदर्शित होईल.[१]
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गुणक: 40°45′N 14°30′E / 40.750°N 14.500°E / 40.750; 14.500
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पॉंपेई हे इटली देशाच्या काम्पनिया ह्या प्रदेशामधील एक गाव आहे. पॉम्पेई हे नष्ट झालेले प्राचीन शहर ह्याच गावाजवळ स्थित आहे.
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पांगरखेड हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वाशिम जिल्ह्यातील मालेगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.दिवसा उष्ण आणि रात्री थंड असे वर्षभर तापमान असते. पावसाळ्यात येथे मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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पांगरी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील संगमेश्वर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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+
१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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+
४.https://www.incredibleindia.org/
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+
५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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+
६.https://www.mapsofindia.com/
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पांगरीनवघरे हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वाशिम जिल्ह्यातील मालेगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.दिवसा उष्ण आणि रात्री थंड असे वर्षभर तापमान असते. पावसाळ्यात येथे मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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दोमेनिको क्रिश्चितो (इटालियन: Domenico Criscito; ३० डिसेंबर १९८६ (1986-12-30)) हा एक इटालियन फुटबॉलपटू आहे. २००९ पासून इटली राष्ट्रीय संघाचा भाग असलेला क्रिश्चितो २०१० फिफा विश्वचषक स्पर्धेमध्ये खेळला होता. क्लब पातळीवर क्रिश्चितो २००७-०८ दरम्यान सेरी आमधील युव्हेन्तुस एफ.सी., २००८-११ दरम्यान जेनोवा सी.एफ.सी. तर २०११ पासून रशियन प्रीमियर लीगमधील एफ.सी. झेनित सेंट पीटर्सबर्ग ह्या क्लबांसाठी खेळत आहे.
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पांजरवाडी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील येवला तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३७ ते ३९ सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान १,००० मि.मी.पर्यंत असते.
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पांजरा हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वर्धा जिल्ह्यातील आर्वी तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान कोरडे व उन्हाळ्यात अतिउष्ण असते.हिवाळा व उन्हाळा हे दोन्ही ऋतू तीव्र असतात.उन्हाळ्यात दिवसाच्या व रात्रीच्या तापमानात जास्त फरक असतो. मे हा अतिउष्णतेचा आणि जानेवारी हा कडाक्याच्या थंडीचा महिना असतो. वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान १०९ सेंमी.पर्यंत असते.
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महाराष्ट्र हे बौद्ध लेण्यांसाठी प्रसिद्ध असणारे राज्य आहे. महाराष्ट्रातील त्रिरश्मी लेणी ही नाशिकमधील लेणी आहेत.[१]
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त्रिरश्मी बौद्ध लेणी ही सुमारे इ.स. पूर्व २००च्या दरम्यान खोदलेली बौद्ध लेणी आहेत. भारत सरकारने या लेण्यांना महाराष्ट्रातील राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक म्हणून दिनांक ३ एप्रिल, इ.स. १९१६ रोजी घोषित केले आहे.[२] सातवाहन राजांनी ही लेणी खोदण्यासाठी वेळोवेळी दान दिले असा उल्लेख येथील शिलालेखांत आढळून येतो.
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सातवाहन आणि क्षत्रप या राजवंशाने त्रिरश्मी लेणी कोरण्यास मदत केली होती. येथील शिलालेख हे त्रिरश्मी लेण्यांचा इतिहास सांगणारा मोलाचा स्रोत आहे. नाशिक या भूभागावर सातवाहन राजांचे अधिराज्य असल्याचे पुरावे पाहायला मिळतात. नाशिकचा उल्लेख शिलालेखांतून वाचायला मिळतो.
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त्रिरश्मी लेणीसमूहात अनेक लेणी असून काही लेण्यांत स्त्रियांचे अलंकार आणि वस्त्रे अतिशय कलाकुसरीनी कोरलेली आहेत. या गुहांमध्ये संपूर्ण सुस्थितीतले एक प्रमुख चैत्यगृह आहे. त्याचे पूर्व दिशेचे प्रवेशद्वार चांगल्या स्थितीत आहे.पश्चिमेकडील काही लेण्यांचे बांधकाम अर्धवट राहिलेले आहे.
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या लेणी पाहण्यास फी आकारली जाते. या टेकडीवर प्राचीन पाण्याची टाकी आहेत, परंतु ही पिण्याच्या पाण्याची सोय नसू शकते.
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या टेकडीवर आता वनखात्याने वृक्षराजी वाढवली आहे.
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त्रिरश्मी लेण्यांवरून नाशिक शहराचे विहंगम दृश्य दिसते.
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टेकडीखाली बुद्ध विहार व दादासाहेब फाळके स्मारक आहे. त्रिरश्मी बौद्ध लेण्यांवर जाण्यासाठी पायऱ्यांची बांधलेली वाट आहे. वर चढण्यास सुमारे ३० मिनिटे वेळ लागतो.
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पंचवटी, मध्यवर्ती बसस्थानक तसेच नाशिकरोड येथून बौद्ध लेण्यांसाठी बसेस सुटतात.
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अंबडला जाणाऱ्या बसने येथे उतरता येते.
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तसेच नाशिक दर्शन ही बसही येथे आपला थांबा घेते.
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| 13 |
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धामदरी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नांदेड जिल्ह्यातील अर्धापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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नैऋत्य मान्सूनमुळे पडणाऱ्या पावसाळ्याचा ऋतू वगळता येथील हवामान सर्वसाधारणपणे कोरडेच असते. येथे वर्षात चार ऋतू असतात. हिवाळा हा नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी अखेरपर्यंत असतो. त्यानंतर येणारा उन्हाळा मात्र जूनच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत खेचला जातो. नैऋत्य मान्सूनचा पाऊस त्याच्या पाठोपाठ येतो आणि ऑक्टोबरच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत टिकतो. शेष ऑक्टोबर आणि नोव्हेंबरचा पूर्वार्ध हा मान्सूनोत्तर गरमीचा काळ असतो. सरासरी वार्षिक पर्जन्यमान ९९० मि.मी.आहे. नैऋत्य मोसमी वाऱ्यापासून पडणाऱ्या पावसाचे प्रमाण एकूण वार्षिक पर्जन्याच्या ८६ टक्के आहे. जुलै आणि ऑगस्ट हे वर्षातील सर्वाधिक पर्जन्याचे महिने आहेत.
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| 3 |
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==प्रेक्षणीय स्थळे==जिजाउ स्रुष्टी
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==जवळपासची गावे== मालेगाव
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पांडुरंग श्रीधर आपटे (६ एप्रिल, इ.स. १८८७ - १९ डिसेंबर, इ.स. १९५६) हे एक मराठी साहित्यिक होते. ते गांधीवादी होते. आपटे गुरुजी या नावाने ते ओळखले जात. भारतातली पहिली राष्ट्रीय शाळा आपटे गुरुजींनी येवला येथे काढली होती.
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श्वेतबलाक किव्हा बहादा ढोक हा बलाकाद्य पक्षिकुळातील एक मोठा पक्षी आहे.
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पांढऱ्या गळ्याची भू कस्तुरिका, लंगली, हरदुली किंवा पानपतारा गुळफा (इंग्लिश:whitethroted ground thrush) हा एक पक्षी आहे.
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| 2 |
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पांढऱ्या गळ्याची भू कास्तुरिका हा पक्षी आकाराने मैनेपेक्षा लहान, गळा व कानाभोवतालचा रंग पांढुरका असतो त्यावर गर्द तपकिरी रंगाच्या दोन पट्ट्या, खांद्यावर पांढरा पट्टा पंखाची किनार पांढुरखी असते. डोक्याचा काळा पांढरा रंग छान उठून दिसतो.
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| 3 |
+
निवासी, स्थानिक स्तलांतर करणारे, गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र तामिळनाडू, कर्नाटक व केरळ येथे विलीन असतात .
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| 4 |
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वने, दर्या , व नाल्याकाठची झाडे ,जंगले, कॉफीच्या लागवडीचा प्रदेश आणि बांबूमिश्रीत वने येथे आढळून येतात.
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पांढऱ्या छातीची पाणकोंबडी, टरकू किंवा कुंवा कोंबडी (इंग्लिश:Ceylonese Whitebreasted Waterhen; हिंदी:जलमुर्गी, डौक, दवक) हा एक पाणपक्षी आहे.
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| 2 |
+
हा पक्षी आकाराने अंदाजे तित्तिराएवढा असून याचा रंग दगडी पाटीसारखा करडा असतो, शेपटी भुंडी असते. हा लांब पायांचा जलचर पक्षी आहे. याची चेहरा व छाती पांढरी असते, शेपटीखाली गंजासारखा लालभडक डाग असतो. नर-मादी दिसायला सारखे असतात. ते एकटे किंवा जोडीने जमिनीवर आढळतात.
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| 3 |
+
ते भारतीय उपखंड, श्रीलंका आणि मालदीव बेटावर निवासी असतात.
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| 4 |
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जून ते ऑक्टोबर हा त्यांच्या विणीचा हंगाम असतो.
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| 5 |
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ते झिलाणी, भातशेती, खाजणी आणि झुडूपी दलदली अश्या भागात आढळतात.
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| 1 |
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† खेळलेले सामने (गोल).
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| 1 |
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घुसखोरांनी ताब्यात घेतलेला प्रदेश भारताला पुन्हा मिळवण्यात यश.
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| 2 |
+
८ युद्धकैदी.[७]
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| 3 |
+
कारगिल युद्ध हे भारत व पाकिस्तान यांच्या दरम्यान सन १९९९च्या उन्हाळ्यात लढले गेलेले मर्यादित युद्ध होते. या युद्धाची व्याप्ती भारताच्या कारगिल व आजूबाजूच्या परिसरापुरतीच मर्यादित राहिली, त्यामुळे याला मर्यादित युद्ध म्हणतात. तसेच या पूर्वीच्या भारत-पाक युद्धांप्रमाणेच याही युद्धात, युद्ध सुरू झाल्याची व संपल्याची कोणतीही घोषणा करण्यात आलेली नव्हती. उलट पाकिस्तानतर्फे युद्धादरम्यान त्यांचा देश अलिप्त आहे असा कांगावा करण्यात आला होता. पुढे अनेक वर्षांनंतर हळूहळू पाकिस्तान सरकारने व अनेक लष्करी अधिकाऱ्यांनी हे युद्धच होते असे जाहीर केले. सन १९९९च्या उन्हाळ्यात, पाकिस्तानी घुसखोरांनी भारतीय सीमा ओलांडून भारताच्या हद्दीतील अनेक ठाणी कब्जा केल्याचे भारताच्या लक्षात आले व या घुसखोरांना हुसकावण्यासाठी कारगिलचे युद्ध सुरू झाले. ही ठाणी कारगिल व द्रास परिसरातील अतिउंच दुर्गम जागी होती. अनेक महिन्यांच्या प्रयत्नांनंतर भारताला ही ठाणी परत मिळवण्यात यश मिळाले.
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हे युद्ध आधुनिक इतिहासातील अतिउंचीवरच्या युद्धाचे अत्युत्कृष्ट उदाहरण आहे. यात युद्धाला लागणारी सामग्री व मनुष्यबळ ने-आण करण्याचा चांगलाच अनुभव भारतीय सैन्याला मिळाला. हे युद्ध दोन्ही देश अण्वस्त्रसज्ज झाल्यानंतरचे पहिलेच युद्ध होते त्यामुळे सर्व जगाचे लक्ष या युद्धाकडे लागले होते. परंतु भारताने हे युद्ध कारगिलपुरतेच मर्यादित ठेवले. त्यामुळे दाखवलेल्या संयमाबद्दल भारताचे जगभर कौतुक झाले. म्हणूनच, भारताला आंतरराष्ट्रीय स्तरावर पाठिंबा मिळाला व याउलट, सैन्य मागे घ्यावे यासाठी पाकिस्तानवर अमेरिकेसह अनेक देशांनी दबाव आणला. या युद्धानंतर भारताने आपल्या संरक्षण खर्चात अनेक पटीने वाढ केली. तर पाकिस्तानात राजकीय अस्थिरता माजली. परिणामी, काही महिन्यांतच (ऑक्टोबर, १९९९मध्ये) पाकिस्तानात जनरल परवेझ मुशर्रफ यांनी नवाझ शरीफ यांचे सरकार उलथून लष्करशाही लागू केली. कारगिल युद्ध भारताने जिंकले.
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कारगिल शहर जम्मू आणि काश्मीरची राजधानी श्रीनगरपासून २०५ किमी अंतरावर भारत-पाक आंतरराष्ट्रीय नियंत्रण रेषेपासून जवळ आहे.[८] हिमालयाच्या इतर भागात प्रमाणे, कारगिलंमध्ये���ी थंड वातावरण असते. उन्हाळा हा सौम्य तर हिवाळा अतिशय दीर्घ व कडक असतो व बऱ्याचदा तापमान -४० °C पर्यंतही उतरू शकते.[९]
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राष्ट्रीय महामार्ग लेह ते श्रीनगर या रस्त्यावर कारगिल वसलेले आहे. कारगिलचे युद्ध होण्याचे प्रमुख कारण हा रस्ता हे होय. घुसखोरांनी पाकव्याप्त काश्मीरच्या जवळच्या आणि रस्त्याला समांतर अशा १६० किलोमीटरच्या पट्यातच साधारणपणे घुसखोरी केली.[१०] लष्कराच्या अनेक चौक्या या भागात आहेत. त्यातील काही चौक्या समुद्रसपाटीपासून ५,००० मीटरपेक्षाही अधिक उंचावर आहेत.[११] नुसतेच कारगिल नव्हे तर आग्नेयेकडील द्रास व नैर्ऋत्येकडील मश्को खोऱ्यातील, तसेच बटालिक विभागातील चौक्यांवरही घुसखोरी झाली.
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वर नमूद केल्याप्रमाणे कारगिल, द्रास व मश्को खोऱ्यातील चौक्या ह्या अतिउंचीवर आहेत. अतिउंचावरील चौक्यांवर कडक हिवाळ्याच्या महिन्यांत सैन्य तैनात करून ठेवणे अतिशय अवघड असल्याने, हिवाळ्यापूर्वी दोन्ही बाजूने सैन्याची माघार व्हावी आणि उन्हाळ्यात बर्फ वितळल्यावर व हवामान मानवी रहाण्यास स्थिर झाल्यानंतर, ते ते सैन्य आपापल्या चौक्यांमध्ये परतावे, असा अलिखित समझौता भारत-पाकिस्तानमध्ये, कारगिल युद्धाच्या आधीपर्यंत होता. मात्र १९९९ साली भारतीय सैन्य भारतीय चौक्यांवर परतण्यापूर्वीच पाकिस्तानी घुसखोरांनी ऐन हिवाळ्यात चौक्यांचा ताबा घेतला. त्यामुळे, कारगिलचे युद्ध भडकण्यास ठिणगी पडली.[१२] या चौक्यांचा ताबा घेतला गेल्याने राष्ट्रीय महामार्ग १ए (NH1) हा पाकिस्तानी तोफगोळ्यांच्या आणखी जवळच्या टप्प्यांत आला. तसेच, उंचावरील चौक्यांचा ताबा घुसखोरांकडे गेल्याने त्यांना उतारावरील चौक्यावर नियंत्रण ठेवणे सोपे गेले. या चौक्या डोंगरमाथ्यावरील किल्ल्यांप्रमाणे होत्या. त्यांचा ताबा मिळवण्यास मोठ्या प्रमाणावर फौजेची गरज लागते.[१३] त्यातच अतिउंची व कडाक्याची थंडी हे काम अजूनच अवघड करते.[१४]
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इ.स. १९७१ च्या युद्धानंतर भारत व पाकिस्तानमध्ये थेट मोठे युद्ध झाले नाही. तरी सातत्याने छोट्या छोट्या चकमकी होत आहेत.[१५] सियाचीन हिमनदी वर भारतीयांचे नियंत्रण तसेच सभोवतालचा परिसरावर नियंत्रण मिळवण्यात दोन्ही बाजू सातत्याने प्रयत्नशील असतात. इ.स. १९८० च्या सुमारास पाकपुरस्कृत दहशतवाद्यांनी पंजाबात खलिस्तानच्या नावावर दंगा घातला तसेच इ.स. १९९० च्या सुमारास काश्मीरमध्ये दहशतवादाने मूळ धरले परिणामी भारताने काश्मीरमध्ये कायमस्वरूपी सैन्य तैनात केले. हे दहशतवादी सुरुवातीच्या काळात काश्मीरमधील असत व त्यांना प्रशिक्षित करून पाठवले जात असे. काही काळानंतर पाकिस्तानी सैनिक, अधिकारी व तालिबानी अफगाणिस्तानातील भाडोत्री अतिरेक्यांनाही काश्मीरमध्ये पाठवले जाऊ लागले. पाकिस्तानने नेहमीच या बाबतीत आपला सहभाग असल्याचा इन्कार केला. कारगिलच्या युद्धातदेखील पाकिस्तानने हीच खेळी वापरली व घुसखोर हे काश्मिरी स्वातंत्र्यसैनिक आहेत असे जगाला सांगण्याचा प्रयत्न केला. इ.स. १९९८मध्ये भारत पाकिस्तानने अणु चाचण्या केल्यानंतर दोन्ही देशातील संबंध चांगलेच ताणले गेले. परंतु वाजपेयी यांनी मैत्रीचा हात पुढे करून संबंध निवळण्याचा प्रयत्न केला व त्यासाठी ते स्वतः लाहोरला जाऊन आले होते.
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इ.स. १९९८-९९ च्या हिवाळ्यात पाकिस्तानी लष्करातून अनेक तुकड्यांना मुजाहिदीनच्या वेषात भारतात नियंत्रण रेषेपलीकडे पाठवण्यात आले. या कारवाईला ऑपरेशन बद्र असे नाव देण्यात आले व कुणाच्याही लक्षात न येता त्यांनी रिकाम्या भारतीय चौक्यांचा ताबा घेतला. (वर नमूद केल्याप्रमाणे हिवाळ्यात प्रचंड थंडीमुळे सैन्य माघारी घेतले गेले होते.)[१६] नियंत्रण रेषेच्या जास्तीत जास्त आत घुसखोरी करून राष्ट्रीय महामार्ग १ च्या जवळ यायचे. असे केले की, महामार्गावर कायमस्वरूपी ताबा मिळवता येईल आणि नंतर राजकीय वजन वापरून काश्मीरच्या प्रश्नाचे आंतरराष्ट्रीयीकरण करणे पाकिस्तानला सोपे पडेल असा हा या कारवाईचा मुख्य उद्देश होता. भारताला नवीन नियंत्रण रेषा मान्य करायला भाग पाडले की. लडाख व सियाचीनला भारतापासून तोडणे सोपे जाईल असा पाकिस्तानी युद्धनीतिज्ञांचा कयास होता. तसेच घुसखोरीदरम्यान कारगील/काश्मीर परिसरात अंतर्गंत बंडखोरी भडकावून भारताला अजून बुचकळ्यात पाडण्याचा पाकिस्तानी व्यूह होता. भारतीयांनी सियाचीन हिमनदीवर नियंत्रण मिळवण्यात जी क्ऌप्ती वापरली तसाच काहीसा प्रकार पाकिस्तानने केला असा काही लेखकांचा सूर होता.[१७]
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कडक हिवाळ्यातील महिन्यांमध्ये मनुष्यहानी कमी व्हावी म्हणून, अतिउंचावरील चौक्या रिकाम्या करायचा प्रघात भारत व पाकिस्तान हे दोघेही पाळत. हवामान पुन्हा ठीकठाक झाल्यानंतर दोन्ही बाजूंचे सैन्य आपापल्या चौक्यांमध्ये परतून संरक्षणाची जवाबदारी घेत असे.
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फेब्रुवारी, इ.स. १९९९मध्ये पाकिस्तानी लष्कराने कडक हिवाळ्यातच भारतीय चौक्यांचा ताबा घेणे आरंभले. पाकिस्तानने ही कारवाई अतिशय सूत्रबद्धरीत्या व थांगपत्ता लागू न देता पार पाडली. यांतच भर म्हणजे, भारतीय गुप्तहेर खात्याला या घटनेची माहिती अजिबात मिळाली नाही त्यामुळे भारतीय गुप्तहेर खात्याच्या कार्यक्षमतेवर सर्वत्र भारतातून व जगातूनही चांगलीच टीका झाली.[१८] स्पेशल सर्व्हिसेसच्या सर्वोत्कृष्ट तुकड्या, तसेच नॉर्दर्न लाइट इन्फट्रीच्या ४ ते ७ बटालियन तुकड्या या कामात गुंतल्या होत्या.[१९][२०] रिकाम्या चौक्यांव्यतिरिक्त भारतीय सैन्याला हल्ला करायला अवघड जावे म्हणून मोक्याच्या जागाही ताब्यात घेण्यात आल्या. साधारणपणे, अतिउंचावरील एक मुख्य चौकी व त्याला टेका देणाऱ्या दुय्यम उतारावरील व कमी उंचीवरील चौक्या पाकिस्तानी सैन्याने ताब्यात घेतल्या. पाकिस्तानी मुख्य सैनिकांबरोबरच अफगाणी मुजाहिदीन, काश्मिरी मुजाहिदीन यांनाही या कार्यवाहीत समाविष्ट केले गेले.[२१]
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सुरुवातीला, अनेक कारणांमुळे कारगिलची घुसखोरीचा पत्ता लागण्यास उशीर झाला. मुख्यत्वे पाकिस्तानने अनेक भागात तोफांचा मारा केल्यामुळे शोधपथक पाठवण्यास दिरंगाई झाली. भारतीय लष्कराच्या मते, हा तोफखान्याचा मारा नेहेमीचा असतो, त्यात नवे काही नाही. पाकिस्तानने हा मारा नियंत्रण रेषेपलीकडील सैनिकांना/घुसखोरांना संरक्षण देण्यासाठी केला. मेच्या दुसऱ्या आठवड्यात स्थानिक मेंढपाळ यांनी घुसखोरीची सूचना भारतीय सैन्याला दिली. त्यानुसार भारतीय सैनिकांनी टेहळणीसाठी तुकडी पाठवली. तिच्यावर हल्ला करण्यात आला व घुसखोरी झाल्याचे सिद्ध झाले. सुरुवातीला ही मुजाहिदीन स्वरूपाची भासल्याने घुसखोरी लवकरच संपवता येईल असे वाटले. परंतु लगेचच नियंत्रण रेषेच्या बऱ्याच लांबीवर ही घुसखोरी झाल्याचे लक्षात आले. घुसखोरांकडून आलेले प्रत्युत्तर वेगळ्याच प्रकारचे होते व वरवर घुसखोरी वाटणारी घटना मोठ्या नियोजनाचा भाग आहे असे लक्षात आले. अशा रितीने कारगिल येथे युद्ध सुरू झाले आहे यावर शिक्कामोर्तब झाले. पाकिस्तानने एकूण सुमारे १३० ते २०० चौरस किलोमीटर प्रदेश ताब्यात घेतला होता.[२२] तर मुशर्रफ यांच्या मते १३०० चौरस किलोमीटर इतका प्रदेश ताब्यात घेण्यात आला होता.[१९]
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भारतीय सरकारने 'ऑपरेशन विजय' या नावाखाली कारगिलच्या युद्धासाठी कार्यवाही चालू केली. त्यासाठी संख्येने मुळात सुमारे २,००,००० इतक्या फौजेचा आधार घेण्यात आला. परंतु भौगोलिक परिस्थिती लक्षात घेता मोठ्या प्रमाणावर युद्ध करणे शक्य नव्हते. त्यामुळे रेजिमेंटल व बटालियन पुरतीच कारवाई शक्य होती. अर्थातच फौजेची गणसंख्या २०,००० पर्यंत मर्यादित ठेवण्यात आली.[२३] अर्धसैनिक व वायुदल मिळून भारताने एकूण ३०,००० पर्यंत सैनिक कारगिलच्या युद्धात वापरले. घुसखोरांची संख्या पाकिस्तानी सूत्रांप्रमाणे साधारणपणे ५,००० होती.[१०][२१] यांत पाकव्याप्त काश्मीरमधील तोफखान्यामधील सैनिकही समाविष्ट होते.
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भारतीय वायुसेनेकडूनही 'ऑपरेशन सफेद सागर' सुरू झाले. या ऑपरेशनाद्वारे पायदळ सैन्याची ने-आण करण्याची मोठी भूमिका वायुसेनेने निभावली. मोठे बॉम्ब वाहून नेण्यासाठी लागणारे मोठे विमानतळ, भौगोलिक परिस्थितीमुळे या भागात नसल्याने इथेही वायुसेनेचीही व्याप्ती मर्यादित होती.
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भारतीय नौदलानेही पाकिस्तानी बंदरांना आपले लक्ष्य केले व त्यामध्ये येणाऱ्या जहाजांची कोंडी केली. कराची बंदर हे खासकरून लक्ष्य करण्यात आले.[२४] या कृत्याने पाकिस्तानला आवश्यक अशा जीवनावश्यक वस्तूंची रसद थांबली.[२५] काही काळाने नवाज शरीफ यांनी उलगडवून सांगितले की पाकिस्तानकडे या काळात फक्त ६ दिवसांचाच इंधन साठा राहिला होता व जर पूर्ण युद्ध सुरू झाले असते तर पाकिस्तानची बरीच नाचक्की झाली असती.[१०]
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कारगिलचे युद्ध सुरू झाल्यानंतर केवळ रसद तोडण्यासाठी पाकिस्तानचा श्रीनगर-लेह मार्ग कापून काढायचा इरादा आहे हे नक्की झाले. भारताने सैन्य जमवाजमवीचे प्रयत्न सुरू केल्यानंतर पाकिस्तानकडून श्रीनगर-लेह मार्गावर मोठ्या प्रमाणावर उखळी तोफांचा मारा केला.[२६] प्रत्युत्तरादाखल भारताकडून श्रीनगर-लेह या राष्ट्रीय महामार्गाच्या जवळचा भाग ताब्यात घेण्यास जास्त महत्त्व दिले. असे केले की हा महामार्ग सुकर होणार होता.[२७]
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घुसखोरांनी, आधुनिक शस्त्रास्त्रांनी चौक्या सुरक्षित केल्या होत्या. बंदुका, स्वयंचलित मशीनगन, छोट्या उखळी तोफा व विमानभेदी क्षेपणास्त्रे यांनी चौक्या सज्ज होत्या. तसेच, चौक्यांचा सभोवतालचा परिसर पेरलेल्या सुरूंगांनी संरक्षित केला होता. यातील ८,००० सुरूंग भारतीय सेनेने युद्ध संपल्यावर निकामी केले.[२८] या चौक्यांना पाठीमागून पाकिस्तानी हद्दीतून मोठ्या प्रमाणावर तोफखान्याचे संरक्षण मिळाले होते. पाकिस्तानने या युद्धाआधी त्या परिसराची चालकरहित विमानांमधून टेहळणीदेखील केली होती.[२९] वर नमूद केल्याप्रमाणे भारतातर्फे आधी महामार्गलगतच्या चौक्यांवर हल्ले करण्यात आले. हा मारा बहुतांश कारगिलच्या जवळच्या भागावर केंद्रित करण्यात आला. या चौक्यांवर ताबा मिळाल्याने भारताने काबीज केलेल्या जागेत भर पडली व महामार्गही सुरक्षित होत गेला. जसा महामार्ग सुरक्षित होत गेला तसे पुढील हल्ल्यांचे नियोजन सूत्रबद्ध रितीने होत गेले.
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महामार्गाच्या जवळच्या चौक्यांवरील भारतीय आक्रमणांत टायगर हिल व तोलोलिंग शिखर या दोन चौकीवजा शिखरांवरील आक्रमणे नोंद घेण्याजोगी होती.[३०] यानंतर बटालिक व तुर्तुक या सियाचीन लगतच्या भागाला लक्ष्य करण्यात आले. यातील काही जागा गमावणे पाकिस्तानी संरक्षणाच्या दृष्टीने परवडणारे नव्हते. पॉईंट ४५९० व पॉइंट ५३५३ या त्यापैकी काही महत्त्वाच्या जागा होत्या. (या भागात शिखरांना नावे त्यांच्या उंचीप्रमाणे असतात). ४५९० हा महामार्गाला सर्वात जवळचा पॉइंट होता तर ५३५३ हे युद्धातील सर्वात अधिक उंचीचे शिखर होते.[३१] पॉइंट ४५९० वर १४ जून १९९९ रोजी भारतीय सेनेने ताबा मिळवला व युद्धाचे पारडे हळूहळू भारताच्या बाजूने झुकू लागले. याच शिखराच्या ताब्यासाठी भारतीय सेनेला सर्वाधिक मनुष्यहानी सोसावी लागली.[३२] जरी भारतीय सेनेने जूनच्या मध्यापर्यंत महामार्गासाठी महत्त्वाची ठिकाणे ताब्यात घेण्यात यश मिळवले असले तरी पाकिस्तानी बाजूने युद्धाच्या अंतापर्यंत, तोफखान्याचा भडिमार चालूच होता.
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भारताने जेव्हा महामार्गालगतच्या महत्त्वाच्या चौक्यांवर ताबा मिळवला तेव्हा भारतीय सैन्याने घुसखोरांना नियंत्रण रेषेपलीकडे पिटाळायचे धोरण आखले. तोलोलिंगची लढाई व टायगर हिलची लढाई ही या युद्धातील सर्वात महत्त्वाची घटना मानली जाते. अनेक शूर भारतीय अधिकारी व सैनिक या लढायांमध्ये मरण पावले. तोलोलिंगच्या लढाईनंतर सामरिक तसेच राजनैतिकही पारडे पूर्णपणे भारताच्या बाजूने झुकले. टायगर हिलवर उशीरा नियंत्रण मिळवले गेले तरी ती सर्वात महत्त्वाची लढाई होती असे म���नतात. टायगर हिलच्या लढाईत दोन्ही बाजूने जबरदस्त प्रयत्न झाले. पाकिस्ताननेही खंदक वगैरे खोदून भारतीय सैनिकांना चांगलेच झुंजावयाला लावले. सरतेशेवटी ४ जुलै रोजी टायगर हिल भारताच्या ताब्यात आली. या लढाईत भारताचे ५ सैनिक व पाकिस्तानचे १० सैनिक मृत्युमुखी पडल्याचे कळते.
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या युद्धात भारतीय सैन्याने नवनवीन क्ऌप्त्यांचा चांगलाच वापर केला. काही लढायांमध्ये भारतीय सैनिकांनी रात्रीच्या अंधारात हजारो फूट सरळसोट कड्यांवर गिर्यारोहण करून शत्रूवर अनपेक्षित ठिकाणांवरून हल्ले चढवले व चौक्या ताब्यात घेतल्या. काही ठिकाणी भारतीय सैन्यातील काही मुसलमान तुकड्यांनी आक्रमण करताना अल्ला हू अकबर असा नारा देत हल्ला केला, त्यामुळे शत्रूपक्ष आपलेच सैनिक आहेत या भ्रमात राहिले व चौक्या गमवाव्या लागल्या. बहुतांशी चौक्या या खूप उंचीवर होत्या व काश्मीरमधील हा भाग दगडी व रेताड आहे त्यामुळे लपायची फारशी जागा उपलब्ध नव्हती. त्यासाठी भारतीय सैन्याने मनुष्यहानी कमी व्हावी म्हणून बहुतेक हालचाल रात्रीच्या वेळेसच करण्याचे धोरण आखले होते. परंतु रात्रीच्या हालचाली ह्या वेळखाऊ होत्या. तसेच या उंचीवरील अतिशय कमी तापमान व जबरदस्त उतारावरील लढाया ह्या सर्वच गोष्टी भारताच्या विरोधात होत्या. या भागात सर्व चौक्यांना वेढा देऊन घुसखोरांचा रसद पुरवठा तोडून कमी जोखमीचे युद्ध करणे भारताला शक्य होते. तसेच पूर्णपणे हवाई हल्ले चढवून घुसखोरांच्या ताब्यातील चौक्या मिळवणेही शक्य होते. परंतु यासाठी भारताला नियंत्रण रेषेपलीकडचा भाग मिळवणे आवश्यक होते. जर तसे केल्यास पूर्ण युद्ध होण्याची शक्यता होती व भारत सरकार यासाठी तयार नव्हते. जर असे झाल्यास या युद्धात मिळालेली आंतरराष्ट्रीय सहानुभूती भारत गमावेल अशी त्यांना भीती होती.
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भारताने इ.स. १९९९ सालच्या जुलैच्या दुसऱ्या आठवड्यापर्यंत अनेक महत्त्वाच्या लढाया केल्या व अनेक जागा ताब्यात मिळवल्या. युद्धात ५२७ भारतीय जवान शहीद झाले तर २७०० पाकिस्तानी सैनिक मरण पावले.
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कारगिलचे युद्ध हे भारतीय लोकसभा बरखास्त झाल्यानंतर झाले होते, तरीही युद्धाच्या सुरुवातीला विरोधी पक्षानेही सत्तारूढ पक्षाला लष्करी कारवाईसाठी चांगलाच प्रतिसाद दिला, त्यामुळे भारतीय राजकारणात फारशी न दिसणारी एकता कारगिल युद्धाच्या निम���त्ताने दिसली. मात्र, आगामी निवडणुकांच्या दृष्टीने सत्ताधारी पक्षाला विजयाचे श्रेय घेणे लाभदायक ठरणार होते, म्हणून सैनिक कारवाई सुरू करण्यास विलंब लावला, असा आरोप युद्ध पार पडल्यावर विरोधी पक्षाने केला. या आरोपानंतरही भारतीय जनता पक्षाच्या राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीने पुढील निवडणुकीत भरघोस यश मिळवले. निवडणूकपूर्व आघाडीने संपूर्ण बहुमत मिळवले असे हे इ.स. १९८४ नंतर प्रथमच घडले..
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कारगिलचे युद्ध भारतातील प्रसारमाध्यमांमध्ये मोठ्या प्रमाणात चर्चिले गेले. अनेक वाहिन्यांची युद्धक्षेत्रात जाऊन बातम्यांचे संकलन करण्यात चढाओढ झाली. त्यामुळे भारतीय नागरिकांना प्रथमच भारतातील युद्धाची क्षणचित्रे टीव्हीवर पहायला मिळाली. यामुळे भारतात एकंदर राष्ट्रीयत्वाच्या विचारसरणीने चांगलेच मूळ धरले. या युद्धानंतर भरलेल्या कित्येक सैन्य भरती शिबिरांना अनेक राज्यात अफाट प्रतिसाद मिळाला.
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या युद्धात भारतीय गुप्तहेर खात्याचे कच्चे दुवे स्पष्ट झाले, संपूर्ण जगातून गुप्तहेर खात्याच्या अकार्यक्षमतेमुळे हे युद्ध झाल्याचे मत प्रदर्शित झाले होते. तसेच युद्धादरम्यान भारतीय सैन्याकडे अतिउंचीवर लढण्यासाठी पुरेशी साधने नव्हती. त्यामुळे युद्धानंतर भारताने सैन्यखर्चामध्ये मोठ्या प्रमाणावर वाढ केली.
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कारगिलच्या युद्धानंतर पाकिस्तानी राज्यकर्त्यांमधील कच्चे दुवे बाहेर आले. पाकिस्तानातील नवाज शरीफ यांचे लोकशाही सरकार व लष्कर यांच्यात कोणत्याही प्रकारचा ताळमेळ नव्हता हे सिद्ध झाले. सूत्रांनुसार नवाज शरीफ यांना या युद्धाबद्दल फारशी माहिती नव्हती असे कळते. तसेच युद्धादरम्यानही पाकिस्तानी लष्कराने शरीफ यांना अद्यतने दिली नाहीत. त्यामुळे नवाज शरीफ यांना आंतराष्ट्रीय स्तरावर या युद्धासाठी मान्यता मिळवणे अवघड गेले. अगदी युद्धाच्या काळात नवाज शरीफ यांना, त्यांच्या अगदी जुना लष्करी मित्र असलेल्या अमेरिकेनेही सैन्य माघारीचा सल्ला दिला. पाकिस्तानने सुरुवातीपासूनच हे सैनिक आमचे नाहीत हा पवित्रा घेतल्याने शहीद सैनिकांचा स्वीकार करण्यास नकार दिला. ज्या सैनिकांना मानाने अंत्यसंस्कार मिळायला पाहिजे होते, त्यांचे संस्कार भारतीय सैन्याने केले. त्यामुळे पाकव्याप्त काश्मीरमध्येही पाकिस्तान सरकारविरुद्ध जनमताची लाट उसळली.
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पाकि��्तान सरकार व पाक लष्कर यांच्यातील दरी वाढत गेली. असे कळते की मु्शर्रफ यांच्यावर कारवाईची तयारी शरीफ यांनी केली होती परंतु मु्शर्रफ यांनी शरीफ यांचे प्रयत्न फोल पाडले. यादरम्यान एका घटनेत मु्शर्रफ यांचे विमान इस्लामाबाद येथे उतरून देण्यास नकार दिला, परंतु त्यांचे विमान त्यांच्या निष्ठावंतानी दुसऱ्या विमानतळावर उतरवून मु्शर्रफ यांचा जीव वाचवला. मु्शर्रफ यांनी हत्येचा प्रयत्न या आरोपाखाली शरीफ यांचे लोकशाही सरकार उलथून लावले व पाकिस्तानात आणीबाणी लागू केली. त्यानंतर काही दिवसातच पाकिस्तानच्या भल्यासाठी आपले सत्तेत राहणे गरजेचे आहे, असे दूरचित्रवाणीवर सांगत लष्करी राजवट लागू केली.
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कारगिलचे युद्ध हे भारतीय माध्यमांसाठी एक मैलाचा दगड ठरले. कारगिलच्या युद्धाच्या वेळेस भारतीय माध्यमांनी जागतिकीकरणात उडी घेतली होती व बी.बी.सी, सी.एन.एन. या आंतरराष्ट्रीय दर्जाच्या वाहिन्यांचा दर्जा गाठण्यास सुरुवात केली होती. कारगिल युद्धाच्या निमित्ताने या वाहिन्यांनी युद्धाच्या जास्तीत जास्त बातम्या सादर करण्यात पुढाकार घेतला. भारतीय सैन्यानेही यात मागे न रहाता, माध्यमांचा वापर काळजीपूर्वक आपल्या सोयींकरता करून घेतला. त्यामुळे युद्धाबाबत भारतीय सैन्याला सहानूभूती मिळवणे सोपे गेले.[३३] तसेच युद्धदृश्ये व त्यांच्या यथायोग्य विश्लेषणामुळे भारतीयांमध्ये ऐक्याची भावना वाढीस लागली.[३४]
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जसजसे युद्ध पुढे सरकत गेले तसतसे माध्यमांनी प्रक्षेपण अजून वाढवले. प्रक्षेपणाची व्याप्ती भारतात पाकिस्तानपेक्षा खूप जास्ती होती.[३५] काही वाहिन्यांनी सरळसरळ युद्धक्षेत्रात जाऊन युद्धाचे थेट प्रक्षेपण केले. भारतीय सैन्यांच्या तोफांचा मारा काही खास करून दाखवला गेला. यामुळे बोफोर्स तोफांबद्दलचा भारतीय जनमानसातील राग कमी झाला. सीएन्एन्ने आखाती युद्धाचे जसे प्रक्षेपण दाखवले तसेच काहीसे भारतीय माध्यमांनी दाखवले.[३६] भारतीय माध्यमांचे यश पाकिस्तानी माध्यमानीही कबूल केले, कराची येथे झालेल्या कॉन्फरन्समध्ये पाकिस्तानी पत्रकारांनी नमूद केले की भारतीय सरकारने माध्यमांना व जनतेला विश्वासात घेतले तर पाकिस्तानने एकदम विरुद्ध अशी भूमिका घेतली.[३७]
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भारतातील व जगभरातील वृत्तपत्रेही भारताच्या बाजूने सहानूभूतिमय होती. पाश्चिमात्य द��शांनी सरळसरळ सहानूभूती प्रदर्शित न करता हे युद्ध भडकवल्याचा ठपका पाकिस्तानवरच ठेवला. काही तज्ज्ञांच्या मते भारतातील माध्यमांनी या युद्धासाठी लागणाऱ्या बाह्य शक्तींचे काम केले व भारतीय सैन्याचा उत्साह दुणावणारी कामगिरी केली.[३८] जसे युद्ध पुढे सरकत गेले तसतसा पाकिस्तान या पातळीवर मागे पडू लागला व भारताने महत्त्वाची अशी आंतरराष्ट्रीय राजनैतिक आघाडी मिळवली.
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पाकिस्तान क्रिकेट संघ मे २०१८ मध्ये एक कसोटी सामना खेळण्यासाठी आयर्लंडच्या दौऱ्यावर जाणार आहे. जून २०१७ मध्ये आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघटनाने आयर्लंडला कसोटी दर्जा दिल्यानंतरची ही आयर्लंडची पहिलीवहिली आंतरराष्ट्रीय कसोटी असणार आहे. आयसीसीने ऑक्टोबर २०१७ मध्ये ऑकलंड येथे पार पडलेल्या सर्वसाधारण सभेत सामन्याची तारीख जाहीर केली. एकमेव कसोटी सामना पाकिस्तानच्या इंग्लंड दौऱ्याआधी होणार आहे.
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वॉरन ड्युट्रोम, आयर्लंड क्रिकेट बोर्डाचे सीईओ, यांनी आयर्लंडच्या कसोटी पदार्पणासाठी संघाला अभिनंदन केले व पाकिस्तान क्रिकेट संघचे आभार मानले. क्रिकेट आयर्लंडचे डायरेक्टर, रिचर्ड हॉल्ड्सवर्थ, यांनी भविष्यात पाकिस्तानात जाऊन सामने खेळण्याची इच्छा व्यक्त केली.
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पाकिस्तान पुरुष क्रिकेट संघाने मे २०२४ मध्ये आयर्लंडविरुद्ध तीन ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय (टी२०आ) सामने खेळण्यासाठी आयर्लंडचा दौरा केला.[१][२] ही मालिका २०२४ आयसीसी पुरुष टी-२० विश्वचषकपूर्वी दोन्ही संघांच्या तयारीचा एक भाग बनली होती.[३] दोन्ही संघांमधील ही पहिली द्विपक्षीय टी२०आ मालिका आहे.[४] जुलै २०२३ मध्ये, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने पाकिस्तानच्या सुधारित २०२३-२०२५ फ्यूचर टूर्स प्रोग्रामचा भाग म्हणून द्विपक्षीय मालिका जाहीर केली.[५] मार्च २०२४ मध्ये, क्रिकेट आयर्लंडने दौऱ्याचे वेळापत्रक निश्चित केले.[६] २०१८ मध्ये पाकिस्तानने शेवटचा आयर्लंडचा दौरा केला होता.[७]
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आयर्लंडने सलामीचा सामना ५ गडी राखून जिंकला.[८] पाकिस्तानने दुसरा सामना ७ गडी राखून जिंकून मालिकेत बरोबरी साधली.[९] पाकिस्तानने तिसरा सामना ६ गडी राखून जिंकला[१०] आणि मालिका २-१ ने जिंकली.[११]
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पाकिस्तान क्रिकेट संघाने जुलै-सप्टेंबर १९७४ दरम्यान तीन कसोटी सामने आणि दोन आंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय सामने खेळण्यासाठी इंग्लंडचा दौरा केला. इंग्लंडच्या भूमीवर पाकिस्तानने प्रथमच एकदिवसीय मालिका खेळली. कसोटी मालिका ०-० अशी बरोबरीत सुटली. एकदिवसीय मालिकेत पाकिस्तानने २-० असा विजय संपादन केला. इंग्लंडने मायदेशात पहिल्यांदा एकदिवसीय मालिका हरली.
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धायंगडेवाडी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सोलापूर जिल्ह्यातील मोहोळ तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मध्यम आणि चांगले हवामान असते. हे कोरड्या हवामान श्रेणीत येते. उन्हाळा, पावसाळा आणि हिवाळा हे ऋतू असतात. मार्च ते मे हे महिने उन्हाळ्याच्या काळात येतात आणि या काळात कमाल तापमान ३० ते ४० अंश सेल्सियस पर्यंत असते. एप्रिल आणि मे महिन्याचा कालावधी सर्वात उष्ण असतो. येथे पाऊस अल्प आणि अनिश्चित प्रमाणात पडतो. जूनच्या दुसऱ्या पंधरवड्यापासून ते सप्टेंबर अखेरपर्यंत मान्सूनचा कालावधी असतो. सरासरी ५४५ मि.मी. पाऊस पडतो. येथे हिवाळा नोव्हेंबरमध्ये सुरू होतो आणि फेब्रुवारी महिन्यात तापमान कधीकधी १० अंश सेल्सियसपेक्षा कमी होते. हिवाळ्याच्या हंगामातील किमान तापमान जानेवारीत सुमारे ९ अंश सेल्सियस असते.
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पाकिस्तानच्या राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने डिसेंबर २०२३ आणि जानेवारी २०२४ मध्ये तीन कसोटी सामने खेळण्यासाठी ऑस्ट्रेलियाचा दौरा केला.[३] संघांनी बेनॉ-कादिर ट्रॉफी लढवली आणि ही मालिका २०२३-२०२५ आयसीसी वर्ल्ड टेस्ट चॅम्पियनशिपचा भाग होती.[४][५][६]
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डिसेंबर २०२३ मध्ये, ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट खेळाडू उस्मान ख्वाजा याने ऑस्ट्रेलियाच्या पहिल्या कसोटी सामन्यादरम्यान त्याच्या जोड्यांमध्ये "सर्व जीवन समान आहे" हे घोषवाक्य समाविष्ट करून आंतरराष्ट्रीय समुदायाला आवाहन करण्याचा प्रयत्न केला.[७] इस्त्रायली सैन्याने मारले गेलेल्या पॅलेस्टाईनच्या नागरिकांसोबत एकता दाखवण्याचा निर्णय त्यांनी घेतला, जरी त्यांचा एका विशिष्ट पक्षाकडे निर्देशित करणारा कोणताही राजकीय संदेश हेतू नव्हता. त्याचे सामाजिक संदेश "सर्व जीवन समान आहेत" आणि "स्वातंत्र्य हा मानवी हक्क आहे" हे दोन्ही क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) आणि आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आयसीसी) यांना राजकीय समजले आणि दोन्ही संघटनांनी ख्वाजा यांना अशा घोषणा वापरण्यास बंदी घातली.[८] ख्वाजाने पर्थ येथे पाकिस्तान विरुद्धच्या पहिल्या कसोटी सामन्यात काळ्या हातपट्ट्या देखील घातल्या होत्या ज्याने आयसीसी कडून तीव्र टीका केली होती ज्याने अखेरीस शरीराच्या कपड्यांचे आणि उपकरणाच्या नियमांचे उल्लंघन केल्याचे नाकारून काळ्या हातपट्ट्या घातल्याबद्दल त्याला फटकारले.[९] ख्वाजा यांनी आवर्जून सांगितले की त्यांनी त्यांच्या वैयक्तिक शोकासाठी काळ्या हाताची पट्टी घातली होती आणि गाझाकडे असलेल्या भावनांकडे झुकत नाही.[१०][११][१२] ख्वाजा यांनी असेही उघड केले की ते काळ्या हातपट्ट्या घालण्याबाबत आयसीसीच्या आरोपांना आव्हान देतील परंतु मेलबर्न येथे पाकिस्तानविरुद्धच्या बॉक्सिंग डे कसोटी सामन्यासाठी ते घालणार नाहीत असे वचन दिले.[१३]
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१० डिसेंबर २०२३ रोजी, साजिद खानला अनफिट अबरार अहमदसाठी कव्हर म्हणून पाकिस्तानच्या संघात समाविष्ट करण्यात आले.[१६]
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१३ डिसेंबर २०२३ रोजी, ट्रॅव्हिस हेड आणि स्टीव्ह स्मिथ यांना ऑस्ट्रेलियाचे संयुक्त-उपकर्णधार म्हणून नियुक्त करण्यात आले.[१७][१८]
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२१ डिसेंबर २०२३ रोजी, पाकिस्तानच्या खुर्रम शहजादला पहिल्या कसोटीदरम्यान बरगडीच्या ताणाचे फ्रॅक्चर आणि पोटाच्या स्नायूंना त्रास झाल्यामुळे शेवटच्या दोन कसोटीमधून बाहेर काढण्यात आले.[१९]
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२३ डिसेंबर २०२३ रोजी, पाकिस्तानच्या नौमन अलीला तीव्र ॲपेन्डिसाइटिसमुळे शेवटच्या दोन कसोटीमधून वगळण्यात आले होते,[२०] त्याच्या जागी मोहम्मद नवाजचे नाव देण्यात आले होते.[२१]
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हा सामना मूळ वेळापत्रकाचा भाग नव्हता आणि पाकिस्तानच्या विनंतीनुसार नंतर जोडला गेला.[२२] तो प्रथम श्रेणी सामना नव्हता.[२३]
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पाकिस्तान क्रिकेट संघाने एप्रिल - मे २०२१ मध्ये तीन आंतरराष्ट्रीय ट्वेंटी२० सामने आणि दोन कसोटी सामने खेळण्यासाठी झिम्बाब्वेचा दौरा केला. सर्व सामने हे हरारे येथील हरारे स्पोर्ट्स क्लब मैदानावर खेळवले गेले.
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पाकिस्तानने पहिला ट्वेंटी२० सामना जिंकत दौऱ्याची विजयी सुरुवात केली. दुसऱ्या सामन्यात पाकिस्तानचा दणदणीत पराभव करत झिम्बाब्वेने मालिकेत जोरदार पुनरागमन केले. हा पाकिस्तानवर झिम्बाब्वेने मिळवलेला पहिला ट्वेंटी२० विजय होता. दोन सामने झाल्यानंतर मालिकेत १-१ अशी बरोबरी झाली होती. तिसरा आणि शेवटचा सामन्यात पाकिस्तानने विजय मिळवत तीन सामन्यांची ट्वेंटी२० मालिका २-१ ने जिंकली.
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कसोटी मालिका पाकिस्तानने २-० ने जिंकली.
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पाकिस्तान राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने ६ जानेवारी ते १४ फेब्रुवारी २००७ या कालावधीत तीन कसोटी, पाच एकदिवसीय आणि एक टी२०आ साठी दक्षिण आफ्रिकेचा दौरा केला.
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दक्षिण आफ्रिकेने कसोटी मालिका २-१ ने जिंकली.
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दक्षिण आफ्रिकेने टी-२०ही जिंकली.
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दक्षिण आफ्रिकेने ५ सामन्यांची एकदिवसीय मालिका ३-१ ने जिंकली आणि एका सामन्याचा निकाल लागला नाही.
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पाकिस्तानने नाणेफेक जिंकून प्रथम फलंदाजीचा निर्णय घेतला.
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दिवस १: पाकिस्तान २४२/५.
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दिवस २: पाकिस्तान ३१३, दक्षिण आफ्रिका २५४/४.
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दिवस ३: पाकिस्तान ३१३ आणि १०३/२, दक्षिण आफ्रिका ४१७.
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दिवस ४: पाकिस्तान ३१३ आणि ३०२, दक्षिण आफ्रिका ४१७ आणि ६९/२.
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दक्षिण आफ्रिकेने नाणेफेक जिंकून प्रथम फलंदाजी करण्याचा निर्णय घेतला.
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दिवस १: दक्षिण आफ्रिका १२४, पाकिस्तान १३५/६.
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दिवस २: दक्षिण आफ्रिका १२४ आणि ११५/३, पाकिस्तान २६५. मखाया एनटिनी हा ३०० कसोटी बळी घेणारा २२वा आणि दक्षिण आफ्रिकेचा तिसरा गोलंदाज ठरला आहे.
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दिवस ३: दक्षिण आफ्रिका १२४ आणि ३३१, पाकिस्तान २६५ आणि ८/०.
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दक्षिण आफ्रिकेने नाणेफेक जिंकून प्रथम क्षेत्ररक्षणाचा निर्णय घेतला.
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दिवस १: पाकिस्तान १५७, दक्षिण आफ्रिका १३१/५.
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दिवस २: पाकिस्तान १५७ आणि १८६, दक्षिण आफ्रिका १८३ आणि ३६/२.
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पाकिस्तान क्रिकेट संघाने तीन आंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय सामने (वनडे) खेळण्यासाठी ऑगस्ट २०२२ मध्ये नेदरलँड्सचा दौरा केला. एकदिवसीय मालिका २०२०-२२ आयसीसी क्रिकेट विश्वचषक सुपर लीग अंतर्गत खेळवली गेली. मूलत: सदर सामने मे २०२१ मध्ये नियोजीत होते. परंतु कोव्हिड-१९मुळे मालिका पुढे ढकलण्यात आली. सर्व सामने रॉटरडॅम शहरातील हझेलारवेग स्टेडियम या मैदानावर झाले. ही पहिलीच अशी वेळ होती जेव्हा पाकिस्तान आंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय मालिका खेळण्यासाठी नेदरलँड्सचा दौरा केला.
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पाकिस्तानने तीनही सामन्यात विजय मिळवत वनडे मालिका ३-० ने जिंकली.
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पाकिस्तान क्रिकेट संघाने जानेवारी २०१८ मध्ये पाच एकदिवसीय आंतरराष्ट्रीय (वनडे) आणि तीन ट्वेंटी२० आंतरराष्ट्रीय (टी२०आ) सामने खेळण्यासाठी न्यू झीलंडचा दौरा केला.[२][३][४] न्यू झीलंडने एकदिवसीय मालिका ५-० ने जिंकली, त्यांचा दुसरा ५-० द्विपक्षीय मालिका विजय, २००० मध्ये वेस्ट इंडीजविरुद्ध पहिला विजय.[५][६] पाकिस्तानने टी२०आ मालिका २-१ ने जिंकली. हा पाकिस्तानचा न्यू झीलंडमधील पहिला टी२०आ मालिका विजय होता आणि परिणामी, पाकिस्तान आयसीसी टी२०आ चॅम्पियनशिप क्रमवारीत अव्वल स्थानी पोहोचला.[७][८]
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पाकिस्तान क्रिकेट संघाने जानेवारी २०२४ मध्ये पाच ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय (टी२०आ) सामने खेळण्यासाठी न्यू झीलंडचा दौरा केला.[१][२] ही मालिका २०२४ आयसीसी पुरुष टी-२० विश्वचषक स्पर्धेसाठी दोन्ही संघांच्या तयारीचा भाग बनली.[३][४]
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बेन सियर्सला पहिल्या दोन टी२०आ सामन्यांसाठी न्यू झीलंडच्या संघात स्थान देण्यात आले होते,[७] त्याच्या जागी शेवटच्या तीन टी२०आ सामन्यांसाठी लॉकी फर्ग्युसनला स्थान देण्यात आले होते.[८]
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तिसऱ्या टी२०आ साठी मिचेल सँटनरची न्यू झीलंडच्या कर्णधारपदी निवड करण्यात आली होती,[९] केन विल्यमसनला त्याच्या कामाचा भार सांभाळण्यासाठी त्या सामन्यासाठी विश्रांती देण्यात आली होती.[१०] विल्यमसनच्या जागी जोश क्लार्कसनची निवड करण्यात आली.[११] तथापि, १३ जानेवारी २०२४ रोजी, क्लार्कसन खांद्याच्या दुखापतीमुळे बाहेर पडला आणि त्याच्या जागी विल यंग आला.[१२] १६ जानेवारी २०२४ रोजी, विल्यमसनला हॅमस्ट्रिंगच्या किरकोळ ताणामुळे शेवटच्या दोन टी२०आ सामन्यांमधून बाहेर काढण्यात आले [१३] आणि त्या सामन्यांसाठी यंगला न्यू झीलंडच्या संघात स्थान देण्यात आले.[१४]
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शेवटच्या टी२०आ साठी, रचिन रवींद्रने डॅरिल मिचेलच्या जागी न्यू झीलंडच्या संघात समावेश केला.[१५]
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९ जानेवारी २०२४ रोजी, मोहम्मद रिझवानची टी२०आ मध्ये पाकिस्तानचा उपकर्णधार म्हणून नियुक्ती करण्यात आली.[१६]
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पाकिस्तान क्रिकेट संघ डिसेंबर २०१० ते फेब्रुवारी २०११ पर्यंत दोन कसोटी, तीन ट्वेंटी२० (टी२०आ) आणि सहा एकदिवसीय आंतरराष्ट्रीय (वनडे) खेळण्यासाठी न्यू झीलंडचा दौरा करतो. सुरुवातीला तीन कसोटीचे नियोजन करण्यात आले होते परंतु २०११ क्रिकेट विश्वचषक फेब्रुवारी ते एप्रिल दरम्यान आयोजित करण्यात आला असल्याने एक कसोटी वगळण्यात आली आणि एक वनडे आणि तीन टी२०आ जोडण्यात आले.[१]
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न्यू झीलंडचा गोलंदाज टिम साऊदीने हॅट्ट्रिकसह आठ चेंडूंत पाच विकेट घेतल्या. टी२०आ सामन्यात पाच विकेट घेणारा तो पहिला न्यू झीलंडर ठरला.[२]
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तन्वीर अहमदला बाद करून न्यू झीलंडचा गोलंदाज क्रिस मार्टिनने प्रथम वर्गीय क्रिकेटमधील ५०० वी विकेट घेतली.[३]
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डॅनियल व्हिटोरीचे पहिल्या डावातील ११० धावांचे कसोटी क्रिकेटमधील सहावे शतक होते.[४] पाकिस्तानचा यष्टिरक्षक अदनान अकमलने पहिल्या डावात सहा झेल घेतले.[४]
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दोन कसोटी आणि एक तीन दिवसीय प्रथम श्रेणी सामन्याच्या मालिकेसाठी पाकिस्तान क्रिकेट संघाने नोव्हेंबर २०१६ मध्ये न्यू झीलंड दौरा केला.[१][२] दोन कसोटी सामन्यांसाठी ख्राईस्टचर्च आणि हॅमिल्टन या दोन स्थळांची निवड करण्यात आली होती.[३][४]
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१४ नोव्हेंबरच्या मध्यरात्रीनंतर ख्राईस्टचर्चमध्ये आलेल्या ७.५ तीव्रतेच्या भूकंपानंतरसुद्धा १७ नोव्हेंबरची कसोटी ठरलेल्या वेळेनुसार पार पडली.[५] परंतु पहिल्या दिवशी पावसामुळे फक्त २१ षटकांचाच खेळ होऊ शकला.
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दुसऱ्या कसोटीसहित मालिका २-० अशी जिंकून, १९८५ नंतर पहिल्यांदाच न्यू झीलंडने पाकिस्तानवर मालिका विजय मिळवला.[६][७]
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धारकारंजी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वाशिम जिल्ह्यातील मालेगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.दिवसा उष्ण आणि रात्री थंड असे वर्षभर तापमान असते. पावसाळ्यात येथे मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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पाकिस्तानी महिला क्रिकेट संघाने २०१४ च्या हंगामात ऑस्ट्रेलियाचा दौरा केला होता.[१] या दौऱ्यात ४ एकदिवसीय आणि ४ टी२०आ आंतरराष्ट्रीय सामन्यांची मालिका होती. पाच पैकी पहिले तीन एकदिवसीय सामने चालू २०१४-१६ आयसीसी महिला चॅम्पियनशिपचा भाग बनले. ऑस्ट्रेलियाने दोन्ही मालिका ५-० आणि ३-० ने जिंकल्या.
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पाकिस्तान महिला राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने ऑक्टोबर २०१५ मध्ये वेस्ट इंडीजचा दौरा केला होता. या दौऱ्यात चार एकदिवसीय आंतरराष्ट्रीय (वनडे) आणि तीन ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय (टी२०आ) मालिका समाविष्ट आहेत. ४ पैकी नंतरचे ३ एकदिवसीय सामने २०१४-१६ आयसीसी महिला चॅम्पियनशिपचा भाग होते.[१]
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पाकिस्तान राष्ट्रीय महिला क्रिकेट संघ मार्च २०१८ मध्ये ३ एकदिवसीय आणि ३ टी२० सामने खेळायला श्रीलंका दौऱ्यावर जाणार आहे. मालिकेनंतर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्डाने लाहोरमध्ये होणाऱ्या प्रशिक्षण सत्रातसाठी २१ महिला क्रिकेटपटुंची निवड केली.
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अफगाणिस्तान राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने १० फेब्रुवारी २०१२ रोजी पाकिस्तान राष्ट्रीय क्रिकेट संघाविरुद्ध एकच एकदिवसीय आंतरराष्ट्रीय (वनडे) क्रिकेट सामना खेळला.[१][२] हा सामना अशा वेळी झाला जेव्हा पाकिस्तानला कसोटी मालिकेत ३-० ने पराभूत केल्यानंतर संयुक्त अरब अमिरातीमध्ये फॉलो-अप वनडे मालिकेत इंग्लंडशी खेळायचे होते.
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संयुक्त अरब अमिरातीतील शारजाह क्रिकेट असोसिएशन स्टेडियमवर आयोजित, औपचारिक आंतरराष्ट्रीय स्तरावरील क्रिकेट मालिकेत पाकिस्तानी क्रिकेट संघाचा अफगाणिस्तानशी सामना होण्याची ही पहिलीच वेळ होती.[३] २००९ क्रिकेट विश्वचषक पात्रता स्पर्धेत त्यांचा स्वतःचा एकदिवसीय दर्जा प्राप्त केल्यानंतर अफगाणिस्तान कसोटी खेळणाऱ्या राष्ट्राविरुद्ध आणि आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषदेच्या पूर्ण सदस्याविरुद्ध खेळण्याची ही पहिलीच वेळ होती.
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अफगाणिस्तानने नाणेफेक जिंकून प्रथम फलंदाजी करताना ४९व्या षटकात १९५ धावा केल्या. पाकिस्तानने तेरा षटके बाकी असताना सात विकेट्स राखून आपले लक्ष्य आरामात गाठले. अफगाणिस्तानसाठी हा सामना महत्त्वपूर्ण होता, ज्याने मागील पाच वर्षांत आंतरराष्ट्रीय क्रिकेटमध्ये झपाट्याने प्रगती केली होती, तसेच राजकीयदृष्ट्या, अफगाणिस्तान आणि पाकिस्तानचे शेजारी देशांमधील तणावपूर्ण संबंध सामायिक केले होते.
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पाकिस्तानचा ध्वज (उर्दू: پاکستان کا قومی پرچم) हा ११ ऑगस्ट १९४७ रोजी, म्हणजे ज्या दिवशी देशाला स्वातंत्र्य मिळाले त्याच्या तीन दिवस आधीपासून वापरात आणला गेला.
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सुमारे २,३०० वर्षांपूर्वी पाकिस्तानमधील बौद्ध धर्माचे मूळ मौर्य राजा सम्राट अशोकच्या काळात होते.[१] पाकिस्तानच्या इतिहासामध्ये बौद्ध धर्माची प्रमुख भूमिका होती - कालांतराने ही भूमी मुख्यत्वे बौद्ध साम्राज्यांचा एक भाग राहिली आहे जसे की इंडो-ग्रीक राज्य, कुषाण साम्राज्य, अशोकाचे मौर्य साम्राज्य, पाला साम्राज्य इ..
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२०१२ मध्ये, राष्ट्रीय डेटाबेस आणि नोंदणी प्राधिकरणाने (एनएडीआरए) असे सूचित केले होते की पाकिस्तानची तत्कालीन बौद्ध लोकसंख्या राष्ट्रीय ओळखपत्रे (सीएनआयसी)च्या १,४९२ प्रौढ धारक आहेत. बौद्धांची एकूण लोकसंख्या काही हजारांपेक्षा जास्त असण्याची शक्यता आहे.[२] २०१७ मध्ये बौद्ध मतदारांची संख्या १,८८४ असल्याचे सांगितले गेले होते आणि ते बहुधा सिंध आणि पंजाबमध्ये आहेत.[३]
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इस्लामाबादमधील डिप्लोमॅटिक एन्क्लेव्हमध्ये पाकिस्तानमधील एकमेव कार्यात्मक बौद्ध मंदिर आहे, ज्याचा वापर श्रीलंकेसारख्या देशांमधील बौद्ध मुत्सद्दी करतात.[४]
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बौद्ध विद्वानांची यादी जे सध्याच्या पाकिस्तानच्या भागातील होते
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पाकिस्तान हा आशिया खंडातील एक इस्लामिक देश आहे. लोकसंखेच्या दृष्टीने जगात पाकिस्तानचा सहावा क्रमांक लागतो. पाकिस्तानची राजधानी “ इस्लामाबाद “ आहे. या देशाची लोकसंख्या जुलै २०१५ नुसार एकोणीस कोटी नव्वद लाख पंचाऐऺशी हजार आठशे सत्तेचाळीस (१९,९०,८५,८४७) इतकी गणण्यात आली आहे. तशेच देशाचे क्षेत्रफळ सातशे शहाण्णव शुन्य पंचाण्णव (७९६.०९५) चौरस किलो मीटर इतकी आहे. पाकिस्तान मध्ये चलन पाकिस्तानी रूपी आहे.
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पाकिस्तानमधील सामाजिक रचनेचा, संस्कृतीचा अभ्यास करताना प्रामुख्याने भाषा तेथील वांशिक गट, धार्मिक संप्रदायिक गट, धार्मिक अल्पसंख्याकच्या अशा स्वरूपात पहावे लागते पाकिस्तान मध्ये मोठ्या प्रमाणात सांस्कृतिक विविधता आढळून येते. पाकिस्तान मध्ये बलुचिस्तान मुहाजिर पंजाबी रस्थून्स आणि सिंधी तसेच लहान गट जसे धार्मिक आणि संप्रदाएक गट आहे अहमदिस ख्रिस्ती हिंदू कलश फारशी शीख आणि रशियन मुस्लिम पंथ ismailis and bohars यांचा समावेश आहे. आधुनिक राष्ट्र म्हणून पाकिस्तानचा इतिहास जवळ जवळ आर्धा लष्करी नियम पळणारा आहे . एकूणच पाकिस्तान्मंध्ये धार्मिक सांप्रदायिक ethno भाषिक विविधता आढळून येते .
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पारंपरिक गट
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पाकिस्तान मध्ये इराणी लोक आणि दरडीक भाषिकांचा गट प्रामुख्याने आहे . या व्यतिरिक्त अनेक लहान गट वेगवेगळ्या भाषा बोलणारे आहेत . पाकिस्तान मध्ये बुरूषो बोलणारे लोक राहतात. पाकिस्तान मधील मुख्य पारंपरिक गट खलील प्रमाणे –
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२००९ च्या आकडेवारीनुसार
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१) पंजाबी -४२.१५%
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२) पाष्टून्स -१७.४२%
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३) सिंधी -१४.१%
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४) सेराइकीस -१०.५३%
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५) मुहजिर -१०.५७%
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६) बलोच -३.५७%
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७) इतर -६.६%
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तसेच काश्मिरी, कलश, बुरशो, ब्रहुई, खोवऱ, शिना, तुवळीस, बाल्टि या प्रामूख्याने देशाच्या उत्तर भागात आढळतात ॰
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इतर पारंपरिक गट
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१)राजपूत -
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राजपूत पंजाब आणि सिंध एक प्रमुक पारंपरिक मूळ आहेत. ते कधी राजपूत म्हणून ओळखले जातात . पंजाबी राजपूत पंजाब मनध्ये राजपूत लोकसंख्या सर्वात जास्त संख्येने आहे, सकेसार, खुशाब खोऱ्यात आढळते. फाईजदाबाद, रावळपिंडी,गुजरणवला, झेलम, ओकरा, शेखुपुरा आणि बहवलपूर इ. सिंध प्रांतातील लोकसंख्या ही ठरपारकर आणि सुक्कुर राजपुती जमातींमध्ये विभागला गेला आहे.
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२) अवांस -
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एक प्रमुख पारंपरिक गट असून प्रामुख्याने पंजाब आणि खैबर पाखतुंखवा व मुख्यता तेथे असे म्हटले जाते की पंजाब मध्ये ��ाळीक आणि खान हे खैबर पाखतुंखवा मध्ये अवांस मुळात इस्लामचा चौथ्या मुसलमान लोकांचा धर्मगुरू विषयक अरब वाड वडील आहेत अवांस हा गट प्रामुख्याने झेलम, गुजरात, सियालकोट, लाहोर, रावळपिंडी आणि काही आझाद जम्मू –कश्मीर येते आढळतात.
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३) जाट -
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जाट हा पंजाब आणि आझाद कश्मीर येते आढळनारा प्रमुख पारंपरिक गट आहे .
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४) हिंद्कोवांस -
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हिंद्कोवांस यांना ट्रन्सीशनल गट असेल असे समजले जाते . पंजाबी आणि पंजाबी पठाण म्हणून ओळखले जातात.
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५) कंबोह -
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कंबोह हा पंजाब आणि सिंध मधील एक मुख्य पारपरिक गट आहे यामुळे पाकीस्थान मुहाजिर समुदाय असलेला एक मुख्य गट तयार झालेला आहे.
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लघु पारंपरिक गट
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१) रंघर आणि मेओ -
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हे विविध कुळे यांचे मिश्रण आहे. ते हरियाणा पूर्व पंजाब आणि राजस्थान त्यांना बहुतेक दावा राजपूत मूल रंघर समुदाय हा स्वतः एक बोली आहे ते लोक रंघरी भाषा बोलतात.
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2) हजारा -
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हजारा लोक स्थानिक बामयान प्रांतात आढळतात. पर्शियन बोलणारे लोक मुखता पाकिस्तान आणि विशेष म्हणजे स्वेटा मध्ये राहतात, व त्यामध्ये इतर निर्वशीत आहेत, पाकिस्तानी नागरिकांचाही त्यामध्ये समावेश होतो.
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3) पामिरीस -
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पामिरिस यांना अंतर संबंधित लोकांचा एक वैशिस्टपूर्ण गट आहे, परमिरीसची जन्मभूमी ही पूर्व पाकिस्तान, पूर्व अफगाणिस्तान ,पूर्व तजकीस्थान आणि पश्चिम चीन मध्ये आढळून येतात,
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4) कलश -
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कलश ही पाकिस्तान मधील उत्तर पश्चिम प्रांतामधील हिंडकुश एक अद्वितीय गट आहे त्याची भाषा दारडीक आहे, हे आसपासच्या विविध वंशिक गटापासून वेगळे आहेत, ते दईनंदीन जीवनात आध्यात्मिक भूमिका बजावतात.
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भाषा:-
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पाकिस्तानमध्ये राष्ट्रीय , प्रादेशिक भाषा मोठ्या प्रमाणात आहेत, इंग्रजी ही काऱ्यालाईन भाषा असून उर्दू ही पाकिस्तानची राष्ट्रीय भाषा आहे, या व्यतिरिक्त पंजाबी, सिंधी, बलूची, काश्मिरी, बाहूर्या, सिना, बाल्ठि, खोवर, भटकी, मारवाडी इत्यादी प्रादेशिक भाषा मानल्या जातात.
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राष्ट्रीय भाषा –
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१) उर्दू- 8%
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उर्दू ही पाकिस्तानची राष्ट्रीय भाषा आहे पण फक्त 8% लोकांकडून ही भाषा बोलली जाते. जी उर्दू बोलली जाते तीचावर पाश्तो, पंजाबी आणि सिंधी या भाषण चा प्रभाव दिसून येतो
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२) पंजाबी- 44%
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ही भाषा पाक मध्ये प्रथम भाषा म्हणून वापरली जाते पाक मधील विशेसता पंजाब प्रांतातील लोक ही भाषा बोलतात ही भाषा तुरीष शहा या लेखकाने हीर-रांझा या पुस्तकासाठी व���परली आहे. पंजाबी भाषेची निर्मिती संस्कृत या भाषेपासून झाली आहे.
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३) पाश्तो-15.48%
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पाश्तो ही भाषा पाकिस्तान मधील 15.48% लोकांकडून बोलली जाते. विशेषता ख्येबर व क्जुंखा आदिवासी भाग आणि दक्षिण बलूचीस्थान त्याचबरोबर पारंपरिक पाश्तुन लोक समुदाय म्हणजेच शहरी, कराची हा जगातील एकमेव आसे शहर आहे जेथे सरवट जस्था पाश्तो भाषा बोलली जाते.
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४) सिंधी- 4.5%
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पाकिस्तानमध्ये सिंधी ही भाषा प्रथम भाषा म्हणून 4.5% लोकांकडून बोलली जाते विशेषता सिंध, बलुच्चा काही भाग उत्तर पंजाब येथे ही भाषा बोलली जाते या भाषेत उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध असून ही शाळेमध्ये ही शिकवली जाते
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घटनात्मक तरतुदी
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पाकिस्तानच्या राज्यघटनेनुसार इस्लाम हा देशाचा धर्म आहे राज्यघटना येथील मुस्लिम नसलेल्या लोकांचे हक्क मर्यादित करते, कारण फक्त मुस्लिम व्यक्तिच त्या देशच राष्ट्रराध्यक्ष किवा पंतप्रधान होऊ शकतो येवढेच नाही तर न्यायालयातील मुख्य न्यायाधीश हे देखील इस्लामी मुसलमान आसने अवश्यक आहे.
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१) इस्लाम -
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इस्लाम हा पाकिस्तान मधील मुख्य धर्म आसून 95% ते 98% पाकिस्तानी लोक हे इस्लामी आहेत, यामधेही मुस्लिम दोन भागात विभागले आहेत ते म्हणजे सुनी आणि शिया.
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२) सूफी -
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इस्लाम मधेच सूफी हा वेगळा प्रभाग आहे, सुफि ही प्राचीन इस्लामिक परंपरा आहे . या धर्माला मोठा इतिहास आहे सुफीजमच प्रभाव 1970च्या दशकात पाकिस्तान मध्ये कमी व्हायला सुरुवात झाली 1970 चा निवडणुकीत पाकिस्तानमध्ये पारंपरिक मुस्लिम पक्षाचा उदय झाला आणि सूफी परंपरेला उतरती कला लागली.
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३) अहमदीया -
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अहमदीया हा एक मुस्लिम धर्माचा भाग आहे, आणि तो अल्पसंख्यक आहे अहमदियाचा विश्वास आहे की पाईगबर प्रमाणेच आजी गुलाम अहमद मुस्लिमांचा गुरू आहे पण पाकिस्तानच्या राज्यघटणेनुसार अहमदीया लोक मुस्लिम नाहीत.
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धार्मिक अल्पसंख्यांक
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पाकिस्तानच्या स्थिति विशलेशन मध्ये धार्मिक अल्पसंख्याक हा अहवाल तपासणे मनत्वपूर्ण ठरते नागरिक म्हणून भेदभावला तोड द्यावे लागते, लष्करी भूमीका राजकीय वापर सरकार कमकुवत असल्या कारनाणे नागरी समाज सर्व धर्म पाकिस्तान अल्पसंकयकाची प्रचंड आव्हाने ठरू शकतात, पाकीस्थांमध्ये अल्पसंख्यांना मोठ्या प्रमाणात सांप्रदायिक बळी केले जाते, जहालमतवदी सुन्नी गट हा प्रमुख्याने हिंसेचा वापर करतो तेथे वारंवारसुन्नी आणि शिया या गटात सतत स���घर्ष होत आसतात.
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पाकुर भारताच्या झारखंड राज्यातील एक शहर आहे.
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हे शहर पाकुर जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे.
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पाखर संकुल ही महाराष्ट्राच्या सोलापूर शहरातील लहान मुलांचे संगोपन करणारी संस्था आहे.
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या संस्थेची सुरुवात धर्मादाय आयुक्त, सहाय्यक आयुक्त, महिला व बालविकास अधिकारी यांची विधिवत अनुमती घेऊन ८ मे २००३ मध्ये एका बाळाच्या नामकरण संस्काराने सुरू झाली. ही संस्था शून्य ते सहा वयोगटातील बालकांचा सांभाळ करते. शहर तसेच ग्रामीण भागात झोपडपट्टी तसेच वाड्यावस्त्यांवर राहणाऱ्या आणि अनाथ मुलांचा शोध घेऊन त्यांना शिक्षण आणि संस्कार देण्याचा प्रयत्न करते. या संस्थेत शुभसंस्कार वर्ग, बाल संगोपन आणि विद्यादायिनी योजना, किशोर-किशोरी प्रकल्प, कलाकौशल्य प्रशिक्षण वर्ग, उन्मेष प्रकल्प विध्याकोश, कुटुंब सल्ला केंद्र, महिला समुपदेशन केंद्र, हितगुज केंद्र यासारखे कार्यक्रम घेतले जातात.
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