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व्हॉलीबॉल हा खेळ उन्हाळी ऑलिंपिक स्पर्धांमध्ये १९६४ पासून सतत खेळवला जात आहे.
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तिरंदाजी •
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अॅथलेटिक्स •
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+
बॅडमिंटन •
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+
बेसबॉल •
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| 7 |
+
बास्केटबॉल •
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| 8 |
+
बीच व्हॉलीबॉल •
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| 9 |
+
बॉक्सिंग •
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| 10 |
+
कनूइंग •
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| 11 |
+
सायकलिंग •
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| 12 |
+
डायव्हिंग •
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| 13 |
+
इकेस्ट्रियन •
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| 14 |
+
हॉकी •
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| 15 |
+
तलवारबाजी •
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| 16 |
+
फुटबॉल •
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| 17 |
+
जिम्नॅस्टिक्स •
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| 18 |
+
हँडबॉल •
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| 19 |
+
ज्युदो •
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| 20 |
+
मॉडर्न पेंटॅथलॉन •
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| 21 |
+
रोइंग •
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| 22 |
+
सेलिंग •
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| 23 |
+
नेमबाजी •
|
| 24 |
+
सॉफ्टबॉल •
|
| 25 |
+
जलतरण •
|
| 26 |
+
तालबद्ध जलतरण •
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| 27 |
+
टेबल टेनिस •
|
| 28 |
+
ताईक्वांदो •
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| 29 |
+
टेनिस •
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| 30 |
+
ट्रायथलॉन •
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| 31 |
+
व्हॉलीबॉल •
|
| 32 |
+
वॉटर पोलो •
|
| 33 |
+
वेटलिफ्टिंग •
|
| 34 |
+
कुस्ती
|
| 35 |
+
आल्पाइन स्कीइंग •
|
| 36 |
+
बायॅथलॉन •
|
| 37 |
+
बॉबस्ले •
|
| 38 |
+
क्रॉस कंट्री स्कीइंग •
|
| 39 |
+
कर्लिंग •
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| 40 |
+
फिगर स्केटिंग •
|
| 41 |
+
फ्रीस्टाईल स्कीइंग •
|
| 42 |
+
आइस हॉकी •
|
| 43 |
+
लुज •
|
| 44 |
+
नॉर्डिक सामायिक •
|
| 45 |
+
शॉर्ट ट्रॅक स्पीड स्केटिंग •
|
| 46 |
+
स्केलेटन •
|
| 47 |
+
स्की जंपिंग •
|
| 48 |
+
स्नोबोर्डिंग •
|
| 49 |
+
स्पीड स्केटिंग
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| 50 |
+
बास्क पेलोटा •
|
| 51 |
+
क्रिकेट •
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| 52 |
+
क्रोके •
|
| 53 |
+
गोल्फ •
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| 54 |
+
जु दे पौमे •
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| 55 |
+
लॅक्रॉस •
|
| 56 |
+
पोलो •
|
| 57 |
+
रॅकेट्स •
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| 58 |
+
रोक •
|
| 59 |
+
रग्बी युनियन •
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| 60 |
+
रस्सीखेच •
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+
वॉटर मोटोस्पोर्ट्स
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केन्या राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने ३० जून २०१३ ते १० जुलै २०१३ या कालावधीत स्कॉटलंडचा दौरा केला. या दौऱ्यात आयसीसी इंटरकॉन्टिनेंटल कपमधील एक सामना, आयसीसी वर्ल्ड क्रिकेट लीग चॅम्पियनशिपचे दोन एकदिवसीय सामने आणि दोन ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय सामन्यांचा समावेश होता.
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केनेथ केन जेम्स फन्स्टन (डिसेंबर ३, इ.स. १९२५:प्रिटोरिया, दक्षिण आफ्रिका - एप्रिल १५, इ.स. २००५:केप टाउन) हा दक्षिण आफ्रिकेकडून कसोटी क्रिकेट खेळलेला खेळाडू होता.
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फन्स्टन इ.स. १९५२ ते इ.स. १९५८ दरम्यान १८ कसोटी सामने खेळला.
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ओटो फॉन बिस्मार्क (जर्मन: Otto von Bismarck; ऑटो एडुआर्ड लिओपोल्ड, बिस्मार्कचा युवराज व लॉरेनबर्गचा ड्यूक; १ एप्रिल १८१५ - ३० जुलै १८९८) हा जर्मन साम्राज्याचा पहिला चान्सेलर व तत्कालीन युरोपातील एक प्रभावी नेता होता. प्रशियाचा राष्ट्रप्रमुख असणाऱ्या बिस्मार्कने इ.स. १७७१ साली संपलेल्या युद्धात फ्रान्सचा पराभव केल्यानंतर अनेक जर्मन भाषिक राज्यांचे एकत्रीकरण करून शक्तिशाली जर्मन साम्राज्याची स्थापना करण्यात पुढाकार घेतला.
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आपल्या त्याच्या धोरणी व प्रभावी नेतृत्व तसेच शांतताप्रिय परराष्ट्रधोरणांमुळे युरोपात शांततेचे वातावरण टिकून राहिले. सम्राट पहिल्या विल्हेल्मच्या मृत्यूनंतर काही काळातच इ.स. १८८८ साली सत्तेवर आलेल्या दुसऱ्या विल्हेल्मला बिस्मार्कचे शांतीवादी विचार पटले नाहीत व त्याने १८९० साली त्याने बिस्मार्कला चान्सेलरपदाचा राजीनामा देण्यास भाग पाडले. त्यानंतरच्या काळात वसाहतवादी विचारांच्या विल्हेल्मने झपाट्याने लष्करबळ वाढवून जर्मनीला पहिल्या महायुद्धाकडे ढकलले.
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केनेथ हनेल वीक्स (जानेवारी २४, इ.स. १९१२:बॉस्टन, मॅसेच्युसेट्स, अमेरिका - फेब्रुवारी ९, इ.स. १९९८:ब्रूकलिन, न्यू यॉर्क, अमेरिका) हा वेस्ट इंडीजकडून १९३९साली दोन कसोटी सामने खेळलेला क्रिकेट खेळाडू आङे.
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मे ४, इ.स. २००७
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दुवा: [---] (इंग्लिश मजकूर)
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केनेथ विल्यम हाऊ (२४ ऑक्टोबर, १९२८:ऑस्ट्रेलिया - २० सप्टेंबर, २००९:क्वीन्सलंड, ऑस्ट्रेलिया) हा न्यूझीलंडकडून १९५९ मध्ये २ कसोटी सामने खेळलेला क्रिकेट खेळाडू आहे.
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केनेरी प्रवाह हा एक उत्तर अटलांटिक जायर मधील समुद्री प्रवाह आहे.
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ओटो फॉन बिस्मार्क (जर्मन: Otto von Bismarck; ऑटो एडुआर्ड लिओपोल्ड, बिस्मार्कचा युवराज व लॉरेनबर्गचा ड्यूक; १ एप्रिल १८१५ - ३० जुलै १८९८) हा जर्मन साम्राज्याचा पहिला चान्सेलर व तत्कालीन युरोपातील एक प्रभावी नेता होता. प्रशियाचा राष्ट्रप्रमुख असणाऱ्या बिस्मार्कने इ.स. १७७१ साली संपलेल्या युद्धात फ्रान्सचा पराभव केल्यानंतर अनेक जर्मन भाषिक राज्यांचे एकत्रीकरण करून शक्तिशाली जर्मन साम्राज्याची स्थापना करण्यात पुढाकार घेतला.
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आपल्या त्याच्या धोरणी व प्रभावी नेतृत्व तसेच शांतताप्रिय परराष्ट्रधोरणांमुळे युरोपात शांततेचे वातावरण टिकून राहिले. सम्राट पहिल्या विल्हेल्मच्या मृत्यूनंतर काही काळातच इ.स. १८८८ साली सत्तेवर आलेल्या दुसऱ्या विल्हेल्मला बिस्मार्कचे शांतीवादी विचार पटले नाहीत व त्याने १८९० साली त्याने बिस्मार्कला चान्सेलरपदाचा राजीनामा देण्यास भाग पाडले. त्यानंतरच्या काळात वसाहतवादी विचारांच्या विल्हेल्मने झपाट्याने लष्करबळ वाढवून जर्मनीला पहिल्या महायुद्धाकडे ढकलले.
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केन्या राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने ३० जून २०१३ ते १० जुलै २०१३ या कालावधीत स्कॉटलंडचा दौरा केला. या दौऱ्यात आयसीसी इंटरकॉन्टिनेंटल कपमधील एक सामना, आयसीसी वर्ल्ड क्रिकेट लीग चॅम्पियनशिपचे दोन एकदिवसीय सामने आणि दोन ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय सामन्यांचा समावेश होता.
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जयंतीलाल हिरजी केणिया.
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जुलै १४, इ.स. २००६
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दुवा: [१] (इंग्लिश मजकूर)
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केन्या महिला क्रिकेट संघाने डिसेंबर २०१९ मध्ये सात सामन्यांची महिला टी-२० आंतरराष्ट्रीय (मटी२०आ) मालिका खेळण्यासाठी बोत्सवानाचा दौरा केला.[१] सर्व सामन्यांचे ठिकाण गॅबोरोन येथील बोत्सवाना क्रिकेट असोसिएशन ओव्हल हे होते.[१] मुळात हा दौरा तिरंगी मालिका होणार होता, मात्र नामिबियाने मालिकेपूर्वी माघार घेतली.[२] द्विपक्षीय मालिका केन्याने ४-१ ने जिंकली, दोन सामने पावसामुळे रद्द झाले.
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केप ऑफ गुड होप (आफ्रिकान्स: Kaap die Goeie Hoop, डच: Kaap de Goede Hoop, पोर्तुगीज: Cabo da Boa Esperança) हा दक्षिण आफ्रिकेतील अटलांटिक महासागराच्या किनाऱ्यावरील भूशिर आहे. अनेकदा चुकीने केप ऑफ गुड होपचा आफ्रिकााचे सर्वात दक्षिणेकडील टोक असा उल्लेख केला जातो, पण वास्तविकपणे केप अगुलास हे आफ्रिका खंडाचे सर्वात दक्षिणेकडील टोक आहे.
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| 2 |
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ऐतिहासिक काळात सुएझचा कालवा तयार होईपर्यंत युरोपातुन भारतीय उपखंडाकडे प्रवास करणाऱ्या सागरी बोटींना आफ्रिका खंडाला वळसा घालून यावे लागत असे. केप ऑफ गुड होप भूशिरापर्यंत पोचणे हा ह्या प्रवासातील एक मोठा टप्पा मानला जात असे. इ.स. १४८८ सालातल्या मे महिन्यात बार्तुलुम्यू दियास हा पोर्तुगीज खलाशी या भूशिरापर्यंत सर्वप्रथम पोचला.
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{{{लोकसंख्या_गणना_वर्ष}}}
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काबो व्हर्देचे प्रजासत्ताक (पोर्तुगीज: República de Cabo Verde; लोकप्रिय नाव: केप व्हर्दे) हा पश्चिम आफ्रिकेच्या किनाऱ्याजवळ १० बेटांच्या द्वीपसमूहावर वसलेला एक देश आहे. हा द्वीपसमूह अटलांटिक महासागरामध्ये पश्चिम आफ्रिकेच्या ५७० किमी पश्चिमेस स्थित आहे. १५व्या शतकापर्यंत पूर्णपणे निर्मनुष्य असलेला हा द्वीपसमूह १४६० साली पोर्तुगीजांनी शोधुन काढला व तिथे वसाहत स्थापन केली. आफ्रिकेतील गुलामांना युरोपामध्ये नेणारी जहाजे येथे थांबा घेत असत. ह्यामुळे १७व्या व १८व्या शतकात केप व्हर्देची भरभराट झाली. १९व्या शतकात गुलागिरीवर बंदी घालण्यात आल्यानंतर केप व्हर्देची अर्थव्यवस्था खालावत गेली. १९७५ मध्ये पोर्तुगालने केप व्हर्देला स्वातंत्र्य मंजूर केले. सध्या केप व्हर्दे संयुक्त राष्ट्रे, आफ्रिकन संघ इत्यादी आंतरराष्ट्रीय संघटनांचा सदस्य आहे. २०१५ साली ५.२५ लाख लोकसंख्या असलेल्या केप व्हर्देचे बहुसंख्य रहिवासी मिश्र युरोपीय व आफ्रिकन वंशाचे आहे.
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| 4 |
+
केप व्हर्दे आफ्रिकेमधील प्रगत व संपूर्ण लोकशाही असलेल्या देशांपैकी एक आहे. येथे फारशी नैसर्गिक संपत्ती उपलब्ध नसल्यामुळे केप व्हर्देची अर्थव्यवस्था पर्यटन व परकीय गुंतवणुकीवर अवलंबून आहे. २००७ साली केप व्हर्देला अविकसित देशांच्या गटातून विकसनशिल देशांच्या गटात बढती देण्यात आली. आफ्रिकेत हुकुमशाही व अराजकता वाढीस लागली असताना केप व्हर्देला येथील राजकीय व सामाजिक स्थैर्य व आर्थिक प्रगतीसाठी कौतुकाचे प्रमाणपत्र दिले जाते. २०१४ सालच्या लोकशाही निर्देशांकानुसार येथील लोकशाही जगात ३१व्या क्रमांकाची बळकट मानली जाते.
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| 5 |
+
टी.ए.सी.व्ही. काबो व्हेर्दे एरलाइन्स ही केप व्हर्देची राष्ट्रीय विमानकंपनी आहे. ही कंपनी केप व्हर्देला युरोपातील पॅरिस, मिलान, लिस्बन, माद्रिद, ॲम्स्टरडॅम इत्यादी प्रमुख विमानतळांसोबत जोडते. काबो व्हर्दे एरलाइन्सद्वारे अमेरिकेतील प्रॉव्हिडन्स तसेच ब्राझीलमधील रेसिफे व फोर्तालेझा ही शहरे देखील केप व्हर्देसोबत जॉडली गेली आहेत.
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| 6 |
+
केप व्हर्दे फुटबॉल संघ देशाचा राष्ट्रीय फुटबॉल संघ आहे. केप व्हर्देने आजवर २०१३ व २०१५ सालच्या आफ्रिकन देशांचा चषक स्पर्धांमध्ये पात्रता मिळवली आहे. ऑलिंपिक खेळात केप व्हर्दे १९९६ पासून सामील होत आहे.
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पानकोंबडा किंवा केमकुकडी किंवा टूमटूम (इंग्लिश:Kora, Watercock ; हिंदी:कांगरा, कोरा) हा एक पाणपक्षी आहे.
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| 2 |
+
हा पक्षी आकाराने गाव-तित्तीरापेक्षा मोठा असतो. तांबडी चोच (टोक पिवळे). कपाळावर लहान त्रिकोणी आकाराचे पिवळट शिंगासारखे कवच. काळा रंग. शेपाटीखालचा भाग पिवळट. तांबडे पाय. मादीचा तसेच विणीचा हंगाम सोडून इतर वेळी नराचा वर्ण पिंगट तपकिरी. गर्द व रुंद रेषा आणि गर्द पट्टे. चोच आणि पाय हिरवट असतात.
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| 3 |
+
ते स्थायिक आणि कमी अंतरावर स्थलांतर करणारे पक्षी आहेत. पाकिस्तान तसेच भारतात दक्षिण हिमालयापासून आसाम आणि बांगला देश आणि श्रीलंका या प्रदेशात ते आढळतात.
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| 4 |
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ते दलदल, भातशेती आणि तळी अश्या ठिकाणी राहतात.
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ऑगस्ट १, इ.स. २००६
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| 2 |
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दुवा: [---] (इंग्लिश मजकूर)
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३० ऑक्टोबर, इ.स. २०१०
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दुवा: [CricketArchive] (इंग्लिश मजकूर)
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केमार आंद्रे जमाल रोच (जून ३०, इ.स. १९८८:सेट लुसी, बार्बाडोस - ) हा वेस्ट इंडीजकडून आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेळणारा खेळाडू आहे.
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केमेरोवो ओब्लास्त (रशियन: Кемеровская область) हे रशियाच्या संघातील एक ओब्लास्त आहे. नैऋत्य सायबेरियामध्ये वसलेले केमेरोवो ओब्लास्त रशियाच्या औद्योगिक दृष्ट्या प्रगत प्रांतांपैकी एक असून येथे जगातील सर्वात मोठ्या कोळश्याच्या खाणी आहेत. केमेरोवो ओब्लास्तमधील २७% लोकसंख्या शहरांमध्ये राहते. केमेरोवो हे ह्या ओब्लास्तचे राजधानीचे शहर असून नोवोकुझ्नेत्स्क हे येथील सर्वात मोठे शहर आहे.
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मॉस्को • सेंट पीटर्सबर्ग
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केंपेगौडा आंतरराष्ट्रीय विमानतळ (आहसंवि: BLR, आप्रविको: VOBG) हा भारताच्या कर्नाटक राज्यातील बंगळूर येथे असलेला एक आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे. २३ मे २००८ रोजी वाहतूकीस खुला करण्यात आलेला हा विमानतळ बंगळूर शहरापासून ३० किमी अंतरावर देवनहळ्ळी ह्या गावामध्ये स्थित आहे.
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हा विमानतळ सुरू होण्यापूर्वी बंगळूरमधील हवाई वाहतूक एच.ए.एल बंगळूर आंतरराष्ट्रीय विमानतळ हा विमानतळ सांभाळत असे. परंतु बंगळूरमधील वाढती वाहतूक हाताळण्यास तो अपूरा पडू लागला. ह्या कारणास्तव देवनहल्ळी येथे २००५ साली नव्या विमानतळाचे बांधकाम सुरू झाले. मार्च २००८ मध्ये कार्यरत होण्याची अपेक्षा असताना काही विलंबांमुळे अखेर मे मध्ये येथून वाहतूक सुरू करण्यात आली. २०१२ साली १२.७ दशलक्ष प्रवासी वाहतूक सांभाळणारा बंगळूरू आंतरराष्ट्रीय हा एका सर्वेक्षणानुसार भारतामधील सर्वोत्तम विमानतळ होता.
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एक मोठा टर्मिनल व ३६ गेट्स असलेल्या ह्या विमानतळामध्ये हज यात्रेसाठी प्रवास करणाऱ्या प्रवाशांसाठी वेगळी व्यवस्था आहे.
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गुणक: 10°30′N 66°55′W / 10.500°N 66.917°W / 10.500; -66.917
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काराकास (स्पॅनिश: Santiago de León de Caracas, सांतियागो दे लिओन दे काराकास; इंग्लिश उच्चारः केरकस) ही दक्षिण अमेरिकेतील व्हेनेझुएला देशाची राजधानी व सर्वात मोठे शहर आहे. काराकास शहर व्हेनेझुएलाच्या उत्तर भागात आन्देस पर्वतरांगेच्या ईशान्येकडील कॅरिबियन समुद्र किनाऱ्याजवळ पसरलेल्या पर्वतराजींमध्ये वसले आहे.
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काराकास शहराची लोकसंख्या सुमारे १८ लाख तर महानगर क्षेत्राची लोकसंख्या ४१ लाख आहे. काराकास महानगर क्षेत्रामध्ये व्हेनेझुएला राजधानी जिल्हा (काराकास शहर) व मिरांदा राज्यातील चार महानगरपालिकांचा समावेश होतो.
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काराकास खोऱ्यामध्ये स्थानिक लोक अनेक शतके वसले होते. १५६२ साली दक्षिण अमेरिकेत दाखल स्पॅनिश लोकांनी येथे वसाहत निर्माण करण्याचा प्रयत्न केला परंतु स्थानिक लोकांनी तो हाणून पाडला. ५ वर्षांनंतर २५ जुलै १५६७ रोजी दियेगो दे लोसादा ह्या स्पॅनिश योद्ध्याने तामांको ह्या स्थानिक अदिवासी नेत्याच्या सैन्याला पराभूत केले व सांतियागो दे लिओन दे काराकासची स्थापना केली. १८व्या शतकात येथील कोकोच्या शेतीमुळे काराकासची भरभराट झाली व १७७७ साली काराकासला व्हेनेझुएला स्पॅनिश वसाहतीचे (Capitanía General de Venezuela) राजधानीचे शहर बनवण्यात आले. फ्रांसिस्को दे मिरांदा व सिमोन बॉलिव्हार ह्या काराकासमध्ये जन्मलेल्या क्रांतिकाऱ्यांच्या मदतीने ५ जुलै १८११ रोजी व्हेनेझुएलाला स्वातंत्र्यप्राप्ती झाली.
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विसाव्या शतकात व्हेनेझुएलामध्ये मोठ्या प्रमाणावर खनिज तेलाच्या साठ्यांचा शोध लागल्यानंतर दक्षिण अमेरिकेचे काराकास हे मोठे आर्थिक केंद्र बनले ज्यामुळे काराकासचा विकास झपाट्याने झाला.
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काराकास शहर व्हेनेझुएलाच्या सागरी पर्वतरांगेच्या खोऱ्यात वसले आहे. कॅरिबियन समुद्र जवळ असून देखील काराकासची समुद्रसपाटीपासूनची साधारण उंची २,८५४ - ३४२२ फूट इतकी आहे. काराकास खोरे अतिशय उंचसखल असल्यामुळे शहराची वाढ भौगोलिक रचनेला अनुसरून झाली आहे.
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क्योपेन हवामान वर्गीकरणानुसार काराकासचे हवामान उष्णकटिबंधी असून येथे वर्षाकाठी ९०० ते १,३०० मिमी पाउस पडतो. उंचावर वसले असल्यामुळे काराकासमधील तापमान ह्या भागातील इतर स्थानांपेक्षा सौम्य असते.
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काराकासचे जगातील खालील शहरांसोबत सांस्कृतिक व व्यापारी संबंध आहेत.
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केरळचे राज्यपाल हे केरळ राज्याचे भारताच्या राष्ट्रपतींचे नाममात्र प्रमुख आणि प्रतिनिधी आहेत. राज्यपालांची नियुक्ती राष्ट्रपती ५ वर्षांच्या कालावधीसाठी करतात आणि राज्यपालांचे अधिकृत निवासस्थान हे तिरुवनंतपुरम, केरळ येथे स्थित राजभवन आहे. आरिफ मोहम्मद खान यांनी २२ जुलै २०१९ रोजी केरळचे राज्यपाल म्हणून पदभार स्वीकारला.
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केरूर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नांदेड जिल्ह्यातील मुखेड तालुक्यातील एक गाव आहे.
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नैऋत्य मान्सूनमुळे पडणाऱ्या पावसाळ्याचा ऋतू वगळता येथील हवामान सर्वसाधारणपणे कोरडेच असते. येथे वर्षात चार ऋतू असतात. हिवाळा हा नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी अखेरपर्यंत असतो. त्यानंतर येणारा उन्हाळा मात्र जूनच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत खेचला जातो. नैऋत्य मान्सूनचा पाऊस त्याच्या पाठोपाठ येतो आणि ऑक्टोबरच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत टिकतो. शेष ऑक्टोबर आणि नोव्हेंबरचा पूर्वार्ध हा मान्सूनोत्तर गरमीचा काळ असतो. सरासरी वार्षिक पर्जन्यमान ९९५ मि.मी.आहे. नैऋत्य मोसमी वाऱ्यापासून पडणाऱ्या पावसाचे प्रमाण एकूण वार्षिक पर्जन्याच्या ८५ टक्के आहे. जुलै आणि ऑगस्ट हे वर्षातील सर्वाधिक पर्जन्याचे महिने आहेत.
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केरोपंती अथवा पटवर्धनी पंचांग हे दृक्प्रत्यय देणारे हिंदू मराठी पंचांग आह. हे पंचांग महाराष्ट्रात शके १७८७ पासून छापून प्रसिद्ध होऊ लागले. यात मुंबईचे अक्षांश आणि रेखांश प्रमाण म्हणून घेतले होते. सुप्रसिद्ध गणितज्ञ केरो लक्ष्मण छत्रे हे याचे कर्ते असून आबासाहेब पटवर्धन हे प्रवर्तक होते. या पंचांगास आधी नवीन पंचाग हे नाव होते.
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या केरोपंती पंचांगाचे गणित प्रथम काही वर्षे स्वतः केरोपंतांनी केले असावे. परंतु पुढे त्यांच्या देखरेखीखाली हे गणित वसई येथील आबा जोशी-मोघे हे करीत असत. शेवटी शेवटी केरोपंतांचे वंशज नीलकंठ विनायक छत्रे यांच्या देखरेखीखाली हे पंचांग बनत असे.
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या पंचांगाच्या गणिताचा खर्च आबासाहेब पटवर्धन करीत. म्हणून शके १७९९ पासून पटवर्धनांच्या स्मरणार्थ ह्या पंचांगास पटवर्धनी पंचांग असे नांव ठेवण्यात आले. आबासाहेब यांस खगोलशास्त्राची आवड असल्यामुळे त्यांनी स्वखर्चाने आकाशाचा वेध घेण्याचे साहित्य विकत घेतले होते.
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शके १७९१ पासून १८११ पर्यंत रत्नागिरी येथील जगन्मित्र छापखान्याचे मालक जनार्दन हरि आठले यांना केरोपंती पंचांगाचा अभिमान असल्यामुळे, ते स्वतःच्या खर्चाने ते पंचांग छापवीत. शके १८१२ पासून पुणे येथील चित्रशाळेचे मालक वासूकाका जोशी हे पंचांग छापू लागले. स्वखर्चाने छापले गेल्याने या पंचांगाचे प्रकाशन चालू राहिले.
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त्या काळच्या इतर पंचांगांहून केरोपंती पंचांग वेगळे होते. या पंचांगाच्या गणितासाठी रेवती नक्षत्रातला मुख्य तारा हा शके ४९६ मध्ये संपाती होता असे मानले होते.. म्हणून त्या वर्षी अयनांश शून्य मानून गणित केले जात असे.
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या पंचांगात दाखविलेली ग्रहस्थिती प्रत्यक्षात जवळपास तशीच दिसे. म्हणून हे पंचांग दृक्प्रत्यय देणारे पंचांग म्हणून ओळखले जाई.
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केरोपंती अथवा पटवर्धनी पंचांग हे दृक्प्रत्यय देणारे हिंदू मराठी पंचांग आह. हे पंचांग महाराष्ट्रात शके १७८७ पासून छापून प्रसिद्ध होऊ लागले. यात मुंबईचे अक्षांश आणि रेखांश प्रमाण म्हणून घेतले होते. सुप्रसिद्ध गणितज्ञ केरो लक्ष्मण छत्रे हे याचे कर्ते असून आबासाहेब पटवर्धन हे प्रवर्तक होते. या पंचांगास आधी नवीन पंचाग हे नाव होते.
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या केरोपंती पंचांगाचे गणित प्रथम काही वर्षे स्वतः केरोपंतांनी केले असावे. परंतु पुढे त्यांच्या देखरेखीखाली हे गणित वसई येथील आबा जोशी-मोघे हे करीत असत. शेवटी शेवटी केरोपंतांचे वंशज नीलकंठ विनायक छत्रे यांच्या देखरेखीखाली हे पंचांग बनत असे.
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या पंचांगाच्या गणिताचा खर्च आबासाहेब पटवर्धन करीत. म्हणून शके १७९९ पासून पटवर्धनांच्या स्मरणार्थ ह्या पंचांगास पटवर्धनी पंचांग असे नांव ठेवण्यात आले. आबासाहेब यांस खगोलशास्त्राची आवड असल्यामुळे त्यांनी स्वखर्चाने आकाशाचा वेध घेण्याचे साहित्य विकत घेतले होते.
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शके १७९१ पासून १८११ पर्यंत रत्नागिरी येथील जगन्मित्र छापखान्याचे मालक जनार्दन हरि आठले यांना केरोपंती पंचांगाचा अभिमान असल्यामुळे, ते स्वतःच्या खर्चाने ते पंचांग छापवीत. शके १८१२ पासून पुणे येथील चित्रशाळेचे मालक वासूकाका जोशी हे पंचांग छापू लागले. स्वखर्चाने छापले गेल्याने या पंचांगाचे प्रकाशन चालू राहिले.
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त्या काळच्या इतर पंचांगांहून केरोपंती पंचांग वेगळे होते. या पंचांगाच्या गणितासाठी रेवती नक्षत्रातला मुख्य तारा हा शके ४९६ मध्ये संपाती होता असे मानले होते.. म्हणून त्या वर्षी अयनांश शून्य मानून गणित केले जात असे.
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या पंचांगात दाखविलेली ग्रहस्थिती प्रत्यक्षात जवळपास तशीच दिसे. म्हणून हे पंचांग दृक्प्रत्यय देणारे पंचांग म्हणून ओळखले जाई.
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केर्नेल किंवा केर्नल अथवा गाभा (इंग्लिश: Operating System Kernel, ऑपरेटिंग सिस्टम कर्नेल ;) हा कार्यप्रणालीचा (संचालन प्रणाली) गाभा असतो. गाभा हा बहुतेक सर्व कार्यप्रणालींचा मध्यावर्ती हिस्सा असतो. गाभ्याचे महत्त्वाचे कार्य म्हणजे संगणकाच्या संसाधनांचा योग्य उपयोग करणे तसेच संगणकाच्या वरच्या थरातील विविध उपयोजन सॉफ्टवेअरे आणि खालच्या थरातील हार्डवेर ह्यांच्यात समन्वय साधणे.
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६ सप्टेंबर, इ.स. २०१६
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दुवा: [] (इंग्लिश मजकूर)
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काइल जॉन ॲबट (१८ जून, इ.स. १९८७:एम्पांजेनी, नाताल प्रांत, दक्षिण आफ्रिका - ) हा दक्षिण आफ्रिकाकडून आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेळणारा खेळाडू आहे.
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१ अमला •
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५ अनुरीत •
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६ साहा (†) •
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७ विजय (क) •
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१० मिलर •
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+
१४ मार्श •
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| 11 |
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१६ नाईक (†) •
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| 12 |
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१७ स्टोइनिस •
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| 13 |
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१८ मोहित •
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| 14 |
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१९ धवन •
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| 15 |
+
२० अक्षर •
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| 16 |
+
२१ साहू •
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| 17 |
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२५ जॉनसन •
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| 18 |
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२८ बेहारदीन •
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| 19 |
+
२९ गुरक्रीत •
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| 20 |
+
३२ मॅक्सवेल •
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| 21 |
+
५४ वोहरा •
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| 22 |
+
६६ संदीप •
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| 23 |
+
८७ अॅबट •
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| 24 |
+
९४ करिअप्पा •
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| 25 |
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ठाकुर •
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+
जाफ़र •
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स्वप्निल सिंग •
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प्रशिक्षक: संजय बांगर
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कॅलेब केसी मॅकगुयर ॲफ्लेक-बोल्ट (जन्म १२ ऑगस्ट १९७५) एक अमेरिकन अभिनेता आहे. एक अकादमी पुरस्कार, एक ब्रिटिश अकादमी चित्रपट पुरस्कार आणि एक गोल्डन ग्लोब पुरस्कार यासह विविध पुरस्कारांचा तो प्राप्तकर्ता आहे. अभिनेता बेन ॲफ्लेकचा धाकटा भाऊ,[१][२] त्याने बाल कलाकार म्हणून आपल्या कारकिर्दीला सुरुवात केली, व पीबीएस टेलिव्हिजन चित्रपट लेमन स्काय (१९८८) मध्ये दिसला. नंतर तो तीन गुस व्हॅन संत चित्रपटांमध्ये दिसला: टू डाय फॉर (१९९५), गुड विल हंटिंग (१९९७), गेरी (२००२). स्टीव्हन सोडरबर्गच्या ओशनस मालिकेत (२००१-०७) मध्ये त्याने काम केले.[३]
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२००७ मध्ये ॲफ्लेकची प्रगती झाली, जेव्हा रॉबर्ट फोर्डच्या वेस्टर्न ड्रामा द असॅसिनेशन ऑफ जेसी जेम्स बाय द कॉर्ड रॉबर्ट फोर्डच्या भूमिकेसाठी त्याला सर्वोत्कृष्ट सहाय्यक अभिनेत्याच्या अकादमी पुरस्कारासाठी नामांकन मिळाले. २०१० मध्ये, त्यांनी आय एम स्टिल हिअर हा मॉक्युमेंटरी दिग्दर्शित केला. त्याने इंटरस्टेलर (२०१४) आणि ओपेनहाइमर (२०१३) मध्ये देखील काम केले. २०१६ मध्ये, ॲफ्लेकने मँचेस्टर बाय द सी या नाट्यचित्रपटात अभिनय केला, ज्यामध्ये एक शोकाकुल माणूस म्हणून त्याच्या अभिनयामुळे त्याला सर्वोत्कृष्ट अभिनेत्याचा अकादमी पुरस्कार मिळाला.[४][५][६][७]
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केळघर हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील मध्य कोकणातील रायगड जिल्ह्यातील रोहा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते.उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते.
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केळणे हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील खेड तालुक्यातील एक गाव आहे.
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==भौगोलिक स्थान==हे गांव जरी खेड तालुक्यामध्ये असले तरी येथिल सर्व कारभार हा जवळच्या चिपळूण तालुका शहरातून होतो, लोकांना चिपळूण सोयस्कर पडते.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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केळणे गाव आकाराने लहान असले तरी या गावातील प्रत्येक वाडीत देऊळ आहे.
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नुकतेच २१ ते २३ में रोजी केळणे ग्रामदेवता श्री रामवरदायिनी, श्री केदारनाथ, श्री काळकाई, श्री पद्मावती, श्री महादेव व श्री गणपती मंदिराचा जिर्णोद्धार ग्रामस्थ, चाकरमानी, माहेरवाशिणींच्या देणगीतून केलाज्ञगेला. हे गावाच्या मध्यभागी असे भव्यदिव्य मंदिर पर्यटन व भाविकांना आकर्षणाचे केंद्रबिंदू आहे. गावातील शाळा क्रमांक १ चा यावर्षी अमृतमहोत्सवी वर्ष आहे.
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+
-- संतोष बाळाजीराव कदम
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+
==जवळपासची गावे= काडवली, भेलसई, आंबडस, कासई, ही गावे सीमा लागुन आहेत तसेंच, कावळे, निरबाडे, पाली, चिरणी, शेल्डी,लोटे, गुणदे, आवाशी, मुसाड, धामणंद, ही जवळपासची ० ते १२ kmच्या आतील गांव.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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| 13 |
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६.https://www.mapsofindia.com/
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केळवण हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील सुरगाणा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४० सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान २,००० मि.मी.पर्यंत असते.
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केळवली हे रायगड जिल्ह्यातील गाव आहे. हे गाव मुंबई उपनगरी रेल्वेचे एक स्थानक आहे असून महाराष्ट्र राज्य महामार्ग ३५वर आहे.
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केळवली हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील मध्य कोकणातील रायगड जिल्ह्यातील खालापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते.उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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केळवली हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सातारा जिल्ह्यातील सातारा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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हे गाव समुद्रसपाटीपासून साधारणपणे ७०० मीटर उंचीवर वसलेले आहे. येथे उष्णकटिबंधीय वातावरण आहे. येथे पावसाळ्यात भरपूर पाऊस पडतो.वार्षिक पर्जन्यमान १०४२ मिलीमीटर आहे.हिवाळ्यात इथे सुखद गारवा असतो.सरासरी वार्षिक तापमान २४.४ अंश सेल्सियस आहे.येथील वाऱ्याचा सरासरी वेग २.८ मीटर प्रति सेकंद आहे.वाऱ्याचा कमाल वेग सुमारे १० मीटर प्रति सेकंद आहे.हिवाळ्यात तापमान १०.९ अंश सेल्सियसपर्यंत खाली जाते तर उन्हाळ्यात ते ३७.६ अंश सेल्सियसपर्यंत वर चढते.
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केळुस हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील सिंधुदुर्ग जिल्ह्यातील वेंगुर्ला तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती केली जाते.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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केव्हिन मायकेल रुड ( सप्टेंबर २१, १९५७) हा ऑस्ट्रेलिया देशामधील एक राजकारणी, देशाचा विद्यमान पंतप्रधान व मजूर पक्षाचा विद्यमान पक्षनेता आहे. ह्यापूर्वी रुड २००७ ते २०१० दरम्यान पंतप्रधानपदावर होता. ज्युलिया जिलार्डने २४ जून २०१० रोजी ऑस्ट्रेलियाच्या मजूर पक्षाचे नेतृत्वपद स्वीकारले आणि पंतप्रधानपदाची शपथ घेतली. ३ वर्षे पंतप्रधानपदावर राहिल्यानंतर २६ जून २०१३ रोजी घेण्यात आलेल्या मजूर पक्षाच्या आंतरिक निवडणुकीमध्ये केव्हिन रुडने जिलार्डचा ५७ विरुद्ध ४५ अशा मतफरकाने पराभव केला व मजूर पक्षाचे नेतृत्व पटकावले. ही निवडणुक हरल्यास राजकारणामधून निवृत्त होऊ अशी घोषणा करणाऱ्या जिलार्डने पराजयानंतर पंतप्रधानपदाचा राजीनामा दिला व केव्हिन रूडने ह्या पदाची सुत्रे स्वीकारली. परंतु सप्टेंबर २०१३ मध्ये झालेल्या सार्वत्रिक निवडणुकीत रूडच्या मजूर पक्षाला बहुमत मिळवण्यात आले व लिबरल पार्टीला सर्वाधिक मते मिळाली.
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समलिंगी विवाहाला पाठिंबा देणारा रुड हा पहिलाच ऑस्ट्रेलियन पंतप्रधान होता.
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एक केशरचना, केशभूषा किंवा धाटणी सामान्यतः मानवी टाळूवर केसांच्या स्टाईलचा संदर्भ देते. कधीकधी, याचा अर्थ चेहऱ्यावरील किंवा शरीराच्या केसांचे संपादन देखील होऊ शकते. केसांची फॅशिंग वैयक्तिक सौंदर्य, फॅशन आणि सौंदर्यप्रसाधनांचा एक पैलू मानली जाऊ शकते, जरी व्यावहारिक, सांस्कृतिक आणि लोकप्रिय विचारांवर काही केशरचना देखील प्रभावित करतात. [1]
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केसांच्या स्टाईलिंगचे सर्वात प्राचीन ज्ञात चित्रण म्हणजे केसांची ब्रेडिंग जे सुमारे 30,000 वर्षांपूर्वीचे आहे. इतिहासात, महिलांचे केस बहुधा विस्तृत आणि काळजीपूर्वक विशेष प्रकारे कपडे घातलेले होते. रोमन साम्राज्याच्या काळापासून [उद्धरणांची आवश्यकता] मध्य युगापर्यंत बहुतेक स्त्रिया नैसर्गिकरित्या वाढत येईपर्यंत केस वाढवत असत. 15 व्या शतकाच्या उत्तरार्ध आणि 16 व्या शतकाच्या दरम्यान, कपाळावर एक अतिशय उंच केशरचना आकर्षक मानली जात होती. त्याच कालावधीत, युरोपियन पुरुष बहुतेक वेळा खांद्याच्या लांबीशिवाय केस कापतात. 17 व्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळात पुरुषांच्या केशरचना जास्त वाढल्या, लाटा किंवा कर्ल इष्ट मानले जात.
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१ w२24 मध्ये फ्रान्सचा किंग लुई चौदावा (१–०१-११643 by) यांनी पुरुष विगची सुरुवात केली. पुरुषांसाठी पेरुक्स किंवा पेरीविग्स १6060० मध्ये इंग्रजी भाषेच्या इतर फ्रेंच शैलींसह परिचित झाले. १th व्या शतकाच्या उत्तरार्धातील विग खूप लांब व लहरी होते, परंतु 18 व्या शतकाच्या मध्यभागी ते लहान झाले, ज्यावेळी ते सामान्यत: पांढरे होते. फॅशनेबल पुरुषांसाठी लहान केस हे निओक्लासिकल चळवळीचे उत्पादन होते. १ thव्या शतकाच्या सुरुवातीला नर दाढी, आणि मिशा आणि साइडबर्न देखील मजबूत दिसू लागल्या. 16 व्या ते 19 व्या शतकापर्यंत, युरोपियन महिलांचे केस अधिक प्रमाणात दिसू लागले तर केसांचे आवरण कमी वाढले. 18 व्या शतकाच्या मध्यभागी पाउफ शैली विकसित झाली. पहिल्या महायुद्धाच्या काळात, जगभरातील स्त्रिया व्यवस्थापित करणे सोपे असलेल्या लहान केशरचनांमध्ये बदलू लागले. 1950च्या दशकाच्या सुरुवातीस स्त्रियाचे केस सामान्यपणे विविध शैली आणि लांबीमध्ये वक्र केलेले आणि परिधान केलेले होते. १ 60 s० च्या दशकात, ब women्याच महिलांनी पिक्सी कट सारख्या शॉर्ट मॉडर्न कटमध्ये आपले केस घालायला सुरुवात केली, तर १ 1970 s० च्या दशकात केस जास्त लांब आणि सैल झाले. १ 60 s० आणि १ 1970 s० च्या दशकात बरेच पुरुष व स्त्रिया आपले केस फार लांब व सरळ घालतात. [२] १ 1980 s० च्या दशकात स्त्रिया स्क्रिचीने त्यांचे केस मागे खेचत. १ 1980 During० च्या दशकात अनेक लोकांकडून पंक हेअरस्टाईलचा अवलंब करण्यात आला.
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[[वर्ग :स्त्रियांचे सोळा शृंगार */केशरचना ]]
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dataset/scraper_2/batch_3/wiki_s2_105.txt
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पोर्तुगाल देश १९१२ सालापासून सर्व उन्हाळी ऑलिंपिक व एकूण ६ हिवाळी ऑलिंपिक क्रीडा स्पर्धा स्पर्धांमध्ये सहभागी झाला असून त्याने आजवर एकूण २२ पदके जिंकली आहेत. ह्यांपैकी १० पदके अॅथलेटिक्समध्ये तर उर्वरित इतर खेळांत मिळाली आहेत.
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| 2 |
+
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| 3 |
+
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| 4 |
+
अल्जीरिया •
|
| 5 |
+
अँगोला •
|
| 6 |
+
बेनिन •
|
| 7 |
+
बोत्स्वाना •
|
| 8 |
+
बर्किना फासो •
|
| 9 |
+
बुरुंडी •
|
| 10 |
+
कामेरून •
|
| 11 |
+
केप व्हर्दे •
|
| 12 |
+
मध्य आफ्रिकेचे प्रजासत्ताक •
|
| 13 |
+
चाड •
|
| 14 |
+
कोमोरोस •
|
| 15 |
+
काँगो •
|
| 16 |
+
डीआर काँगो •
|
| 17 |
+
कोत द'ईवोआर •
|
| 18 |
+
जिबूती •
|
| 19 |
+
इजिप्त •
|
| 20 |
+
इक्वेटोरीयल गिनी •
|
| 21 |
+
इरिट्रिया •
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| 22 |
+
इथियोपिया •
|
| 23 |
+
गॅबन •
|
| 24 |
+
गांबिया •
|
| 25 |
+
घाना •
|
| 26 |
+
गिनी •
|
| 27 |
+
गिनी-बिसाउ •
|
| 28 |
+
केनिया •
|
| 29 |
+
लेसोथो •
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| 30 |
+
लायबेरिया •
|
| 31 |
+
लिबिया •
|
| 32 |
+
मादागास्कर •
|
| 33 |
+
मलावी •
|
| 34 |
+
माली •
|
| 35 |
+
मॉरिटानिया •
|
| 36 |
+
मॉरिशस •
|
| 37 |
+
मोरोक्को •
|
| 38 |
+
मोझांबिक •
|
| 39 |
+
नामिबिया •
|
| 40 |
+
नायजर •
|
| 41 |
+
नायजेरिया •
|
| 42 |
+
रवांडा •
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| 43 |
+
साओ टोमे आणि प्रिन्सिप •
|
| 44 |
+
सेनेगल •
|
| 45 |
+
सेशेल्स •
|
| 46 |
+
सियेरा लिओन •
|
| 47 |
+
सोमालिया •
|
| 48 |
+
दक्षिण आफ्रिका •
|
| 49 |
+
सुदान •
|
| 50 |
+
स्वाझीलँड •
|
| 51 |
+
टांझानिया •
|
| 52 |
+
टोगो •
|
| 53 |
+
ट्युनिसिया •
|
| 54 |
+
युगांडा •
|
| 55 |
+
झांबिया •
|
| 56 |
+
झिंबाब्वे
|
| 57 |
+
अँटिगा आणि बार्बुडा •
|
| 58 |
+
आर्जेन्टीना •
|
| 59 |
+
अरुबा •
|
| 60 |
+
बहामा •
|
| 61 |
+
बार्बाडोस •
|
| 62 |
+
बेलिझ •
|
| 63 |
+
बर्म्युडा •
|
| 64 |
+
बोलिव्हिया •
|
| 65 |
+
ब्राझील •
|
| 66 |
+
ब्रिटिश व्हर्जिन आयलँड्स •
|
| 67 |
+
कॅनडा •
|
| 68 |
+
केमन द्वीपसमूह •
|
| 69 |
+
चिली •
|
| 70 |
+
कोलंबिया •
|
| 71 |
+
कोस्टा रिका •
|
| 72 |
+
क्युबा •
|
| 73 |
+
डॉमिनिका •
|
| 74 |
+
डॉमिनिकन प्रजासत्ताक •
|
| 75 |
+
इक्वेडर •
|
| 76 |
+
एल साल्वाडोर •
|
| 77 |
+
ग्रेनाडा •
|
| 78 |
+
ग्वाटेमाला •
|
| 79 |
+
गयाना •
|
| 80 |
+
हैती •
|
| 81 |
+
होन्डुरास •
|
| 82 |
+
जमैका •
|
| 83 |
+
मेक्सिको •
|
| 84 |
+
नेदरलँड्स •
|
| 85 |
+
निकाराग्वा •
|
| 86 |
+
पनामा •
|
| 87 |
+
पेराग्वे •
|
| 88 |
+
पेरू •
|
| 89 |
+
पोर्तो रिको •
|
| 90 |
+
सेंट किट्टस आणि नेव्हिस •
|
| 91 |
+
सेंट लुसिया •
|
| 92 |
+
सेंट व्हिंसेंट आणि ग्रेनेडिन्स •
|
| 93 |
+
सुरिनाम •
|
| 94 |
+
त्रिनिदाद-टोबॅगो •
|
| 95 |
+
अमेरिका •
|
| 96 |
+
उरुग्वे •
|
| 97 |
+
व्हेनेझुएला •
|
| 98 |
+
व्हर्जिन आयलँड्स •
|
| 99 |
+
ऐतिहासिक: ब्रिटिश वेस्ट इंडीझ
|
| 100 |
+
अफगाणिस्तान •
|
| 101 |
+
इस्रायल •
|
| 102 |
+
बहारिन •
|
| 103 |
+
बांग्लादेश •
|
| 104 |
+
भूतान •
|
| 105 |
+
ब्रुनेई •
|
| 106 |
+
कंबोडिया •
|
| 107 |
+
चीन •
|
| 108 |
+
चिनी ताइपेइ •
|
| 109 |
+
हाँग काँग •
|
| 110 |
+
भारत •
|
| 111 |
+
इंडोनेशिया •
|
| 112 |
+
इराण •
|
| 113 |
+
इराक •
|
| 114 |
+
जपान •
|
| 115 |
+
जॉर्डन •
|
| 116 |
+
कझाकस्तान •
|
| 117 |
+
उत्तर कोरिया •
|
| 118 |
+
दक्षिण कोरिया •
|
| 119 |
+
कुवैत •
|
| 120 |
+
किर्गिझिस्तान •
|
| 121 |
+
लाओस •
|
| 122 |
+
लेबेनॉन •
|
| 123 |
+
मलेशिया •
|
| 124 |
+
मालदीव •
|
| 125 |
+
मंगोलिया •
|
| 126 |
+
म्यानमार •
|
| 127 |
+
नेपाळ •
|
| 128 |
+
ओमान •
|
| 129 |
+
पाकिस्तान •
|
| 130 |
+
पॅलेस्टाइन •
|
| 131 |
+
फिलिपाइन्स •
|
| 132 |
+
कतार •
|
| 133 |
+
सौदी अरेबिया •
|
| 134 |
+
सिंगापूर •
|
| 135 |
+
श्रीलंका •
|
| 136 |
+
सिरिया •
|
| 137 |
+
ताजि��िस्तान •
|
| 138 |
+
थायलंड •
|
| 139 |
+
पूर्व तिमोर •
|
| 140 |
+
तुर्कमेनिस्तान •
|
| 141 |
+
संयुक्त अरब अमिराती •
|
| 142 |
+
उझबेकिस्तान •
|
| 143 |
+
व्हियेतनाम •
|
| 144 |
+
येमेन •
|
| 145 |
+
ऐतिहासिक: उत्तर बोमियो
|
| 146 |
+
आल्बेनिया •
|
| 147 |
+
आंदोरा •
|
| 148 |
+
आर्मेनिया •
|
| 149 |
+
ऑस्ट्रिया •
|
| 150 |
+
अझरबैजान •
|
| 151 |
+
बेलारूस •
|
| 152 |
+
बेल्जियम •
|
| 153 |
+
बॉस्निया आणि हर्झगोव्हिना •
|
| 154 |
+
बल्गेरिया •
|
| 155 |
+
क्रोएशिया •
|
| 156 |
+
सायप्रस •
|
| 157 |
+
चेक प्रजासत्ताक •
|
| 158 |
+
डेन्मार्क •
|
| 159 |
+
एस्टोनिया •
|
| 160 |
+
फिनलंड •
|
| 161 |
+
फ्रान्स •
|
| 162 |
+
जॉर्जिया •
|
| 163 |
+
जर्मनी •
|
| 164 |
+
ग्रेट ब्रिटन •
|
| 165 |
+
ग्रीस •
|
| 166 |
+
हंगेरी •
|
| 167 |
+
आइसलँड •
|
| 168 |
+
आयर्लँड •
|
| 169 |
+
इटली •
|
| 170 |
+
लात्विया •
|
| 171 |
+
लिश्टनस्टाइन •
|
| 172 |
+
लिथुएनिया •
|
| 173 |
+
लक्झेंबर्ग •
|
| 174 |
+
मॅसिडोनिया •
|
| 175 |
+
माल्टा •
|
| 176 |
+
मोल्दोव्हा •
|
| 177 |
+
मोनॅको •
|
| 178 |
+
माँटेनिग्रो •
|
| 179 |
+
नेदरलँड्स •
|
| 180 |
+
नॉर्वे •
|
| 181 |
+
पोलंड •
|
| 182 |
+
पोर्तुगाल •
|
| 183 |
+
रोमेनिया •
|
| 184 |
+
रशिया •
|
| 185 |
+
सान मरिनो •
|
| 186 |
+
सर्बिया •
|
| 187 |
+
स्लोव्हाकिया •
|
| 188 |
+
स्लोव्हेनिया •
|
| 189 |
+
स्पेन •
|
| 190 |
+
स्वीडन •
|
| 191 |
+
स्वित्झर्लंड •
|
| 192 |
+
तुर्कस्तान •
|
| 193 |
+
युक्रेन •
|
| 194 |
+
ऐतिहासिक: बोहेमिया •
|
| 195 |
+
चेकोस्लोव्हाकिया •
|
| 196 |
+
पूर्व जर्मनी •
|
| 197 |
+
सार •
|
| 198 |
+
सोव्हियेत संघ •
|
| 199 |
+
युगोस्लाव्हिया
|
| 200 |
+
अमेरिकन सामोआ •
|
| 201 |
+
ऑस्ट्रेलिया •
|
| 202 |
+
कूक द्वीपसमूह •
|
| 203 |
+
फिजी •
|
| 204 |
+
गुआम •
|
| 205 |
+
किरिबाटी •
|
| 206 |
+
मायक्रोनेशिया •
|
| 207 |
+
नौरू •
|
| 208 |
+
न्यू झीलंड •
|
| 209 |
+
पलाउ •
|
| 210 |
+
पापुआ न्यू गिनी •
|
| 211 |
+
सामोआ •
|
| 212 |
+
सॉलोमन द्वीपसमूह •
|
| 213 |
+
टोंगा •
|
| 214 |
+
व्हानुआतू •
|
| 215 |
+
ऐतिहासिक: ऑस्ट्रेलेशिया
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+
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+
केशव सीताराम ठाकरे ऊर्फ प्रबोधनकार ठाकरे (जन्म : १७ सप्टेंबर १८८५; - २० नोव्हेंबर १९७३) हे मराठी पत्रकार, समाजसुधारक, वक्ते, संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीचे पुढारी होते. शिवसेनेचे संस्थापक बाळ ठाकरे हे केशव सीताराम ठाकरे यांचे पुत्र आहेत.
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| 3 |
+
रायगड जिल्ह्यातील पनवेल येथे जन्मलेल्या केशव ठाकरे यांचे महात्मा फुले हे आदर्श होते. महात्मा फुलेंच्या क्रांतिकारी साहित्याचा अभ्यास केल्यानंतर समाजसुधारणांबाबतच्या त्यांच्या संकल्पना अधिक स्पष्ट झाल्या. म्हणूनच महात्मा फुले यांचा पुण्यातील कट्टर सनातन्यांकडून छळ झाल्यानंतरच्या काळात त्यांचा लढा पुढे चालविण्यासाठीच प्रबोधनकार पुण्यात स्थायिक झाले. या कार्यात त्यांच्या विरोधकांनी आणलेले अडथळे पार करत त्यांनी साऱ्यांची दाणादाण उडवून दिली.
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| 4 |
+
सामाजिक सुधारणा हेच त्यांच्या जीवनाचे ध्येय होते. त्यांनी ध्येयप्राप्तीसाठी कधीच कोणतीही तडजोड केली नाही. मग भले बालविवाह व विधवांच्या केशवपनाची अभद्र रूढी असो, देवळांमधील ब्राह्मण पुजाऱ्यांची अरेरावी, हुकूमशाही असो, अस्पृश्यतेचा प्रश्र्न असो किंवा हुंडाप्रथेचा प्रश्र्न असो; ते या सर्व आघाड्यांवर अखेरपर्यंत त्वेषाने लढत राहिले. त्यांच्या लढ्यापासून, तत्त्वांपासून त्यांना परावृत्त करण्याचा अनेकांनी प्रयत्न केला, अनेक आमिषे दाखविली पण प्रबोधनकारांनी कशालाही दाद दिली नाही. अन्याय्य रूढी, जाति-व्यवस्था आणि अस्पृश्यता दूर करण्यासाठी वक्तृत्व, लेखन व प्रत्यक्ष कृती ही तीन शस्त्रे वापरून त्यांनी पुराणमतवाद्यांशी लढा दिला.
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| 5 |
+
समाजातील सर्व विकारांचे मर्म ब्राह्मणी कर्मकांडांत आहे असे त्यांचे मत होते. धार्मिक पूजेचे विधी, उपासतापास, व्रतवैकल्ये आणि धर्म या नावाखाली सर्व जातींमध्ये जे रूढ परिपाठ आहेत, ते सर्व परिपाठ ब्राह्मणांनी आपल्या स्वतःच्या फायद्यासाठी प्रस्थापित केले आहेत. या दुष्ट रूढींमुळेच स्त्रियांवर अन्याय होतो. विशेष अधिकारांपासून वंचित अशा बहुजन समाजावर अन्याय होतो. सारांश सर्व अशिक्षित जनता या रूढींखाली भरडली जाते असे वाटल्याने त्यांनी या सर्व घटकांच्या मुळावर, म्हणजेच ब्राह्मणशाहीवर घाला घातला. पुरोगामी, उदारमतवादी, सुधारक विचारांच्या ब्राह्मणांविषयी त्यांच्या मनात द्वेषभावना नव्हती. पण धंदेवाईक भट-भिक्षुकशाही व्यवस्थेचे ते टीकाकार होते. संत एकनाथांच्या जीवनावरील ’खरा ब्राह्मण’ या नाटकाच्या माध्यमातून त्यांनी खऱ्या ब्राह्मणांची भूमिका मांडली.
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| 6 |
+
त्यांच्या कार्यख्यातीमुळे ते राजर्षी शाहू महाराजांच्या संपर्कात आले. शाहू महाराज हे स्वतः सुधारणावादी व महात्मा फुलेंच्या सत्यशोधक चळवळीचे पुरस्कर्ते होते. त्यामुळे ते प्रबोधनकारांचे चाहते झाले. त्यांनी प्रबोधनकारांची परीक्षाही घेतली व नंतर जाहीरपणे सांगितले की, लाच देऊन ज्याला वश करता येणार नाही किंवा विकत घेता येणार नाही अशी एकच व्यक्ती मी पाहिली आहे, ती म्हणजे प्रबोधनकार होय.
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| 7 |
+
मुंबईत स्थायिक झाल्यानंतर त्यांनी हुंडाप्रतिबंधक चळवळ हाती घेतली. सर्व जातींची हुंडाप्रतिबंधक स्वयंसेवक सेना स्थापन करून अनेक वरपित्यांना त्यांनी घेतलेल्या हुंड्याच्या रकमा परत देण्यास भाग पाडले. त्या काळी विवाहाआधी प्रेम करणे हा गुन्हा, व्यभिचार समजला जाई. अशा काळात त्यांनी अनेक प्रेमी युगुलांचे विवाह लावून दिले. आजच्या काळात हे संदर्भ वाचताना आपणास या गोष्टी सहज वाटतात, या समस्यांची तीव्रता आपल्या लक्षात येत नाही. त्या काळच्या कर्मठ वातावरणात समाजसुधारणांचा केवळ उच्चार करणेही अवघड होते. आजही हुंड्याविरोधात अनेक कायदे आहेत, पण हुंडा घेण्याच्या प्रवृत्तीचा समूळ नाश झालेला नाही. स्त्रियांवर अत्याचार होतच आहेत. विसाव्या शतकाच्या पूर्वार्धात या समस्येची काय तीव्रता असेल याची केवळ कल्पनाच केलेली बरी! यावरून प्रबोधनकारांचे द्रष्टेपण सिद्ध होते.
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| 8 |
+
प्रबोधनकार हे लेखक, पत्रकार व इतिहास संशोधकही होते. त्यांनी सारथी, लोकहितवादी व प्रबोधन या नियतकालिकांच्या माध्यमातून आधुनिक विचारांचा प्रसार केला. कोदंडाचा टणत्कार, भिक्षुकशाहीचे बंड, देवांचा धर्म की धर्माची देवळे, ग्रामधान्याचा इतिहास, कुमारिकांचे शाप, वक्तृत्वशास्त्र इत्यादी ग्रंथासह समर्थ रामदास, संत गाडगे महाराज, रंगो बापूजी, पंडिता रमाबाई, माझी जीवनगाथा (आत्मचरित्र) ही चरित्रे - अशा साहित्यसंपदेची त्यांनी निर्मिती केली. त्यांची ’खरा ब्राह्मण’ आणि ’टाकलेले पोर’ ही दोन्ही नाटके समाजसुधारणांसाठी क्रांतिकारकच ठरली. खरा ब्राम्हण या नाटकाच्या प्रयोगाला परवानगी देऊ नये अशी मागणी पुण्यातील ब्राम्हणांनी न्यायालयाकडे केली असता, न्यायाधीशांनी प्रबोधनकारांच्या बाजूने निकाल दिला होता.
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| 9 |
+
संयुक्त महाराष्ट्राची चळवळ हा त्यांच्या जीवनातील सर्वांत महत्त्वाचा लढा होता. या वेळी त्यांचे वयही बरेच झाले होते. अशा प्रतिकूल परिस्थितीतही त्यांनी या चळवळीला नेतृत्व दिले, काही काळ कारावासही भोगला. या चळवळीतील त्यांच्या योगदानाची बरोबरी फक्त प्रल्हाद केशव अत्रे आणि कॉम्रेड डांगे यांच्याशीच करता येईल. या चळवळीत त्यांनी वेगवेगळ्या विचारांच्या व्यक्ती आणि पक्ष यांना एकत्र बांधून ठेवण्यात यश मिळवले. ते कुशल संघटकही होते.
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| 10 |
+
तत्त्वविवेचक या छापखान्यात इ.स. १९०८ च्या सुमारास असिस्टंट शास्त्री अर्थात मुद्रितशोधक या नात्याने ठाकरे यांचा वृत्तपत्राशी प्रथम संबंध आला. तेथे लक्ष्मण नारायण जोशी हेडशास्त्री होते. त्या काळात रोज निघणाऱ्या आणि सरकारी दडपशाहीने लगेच गायब होणाऱ्या हंगामी वृत्तपत्रांचे ते छुप्या ररीतीने लेखन करत. अशा छुप्या लेखनाची दीक्षा त्यांनीच ठाकरे यांना दिली. त्याआधी विद्यार्थी असताना ठाकरे यांनी विद्यार्थी हे मासिक चालवण्याचा प्रयत्न केला होता. त्यानतंर, दोन-तीन साप्ताहिके, विविध वृत्त व इंदुप्रकाश पत्रात ते लेखन करत असत. ठाण्याच्या जगत्समाचार साठीही ते लेख लिहित असत. जलशांच्या निमित्ताने ठाकरे जळगावला गेले. तेथेकाव्यरत्नावलीकार नारायण नरसिंह फडणीस यांच्याशी त्यांचा परिचय झाला. ठाकरे यांनी तेथे सारथी हे मासिक सुरू केले. पत्रव्यवसायातील आपल्या या आगमनाचे श्रेय ठाकरे फडणिसांनाच देतात.
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| 11 |
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प्रबोधन
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प्रबोधन पाक्षिक काढण्यापूर्वी ठाकरे यांच्या सार्वजनिक कार्यांची चर्चा सर्वत्र झाली होती. सामाजिक अन्यायाविरुद्ध उभे राहण्याचा ठाकरे यांचा निर्णय अभ्यासपूर्ण होता. इतिहाससंशोधक वि.का. राजवाडे यांनी कायस्थ प्रभूंबाबत काही विधाने केली होती. त्यावर कोदण्डाचा टणत्कार (१९१८) हा ग्रंथ लिहून त्यांनी राजवाडे यांची विधाने ऐतिहासिक पुरावे देऊन खोडून काढली होती. या प्रकरणी जागृतीसाठी महाराष्ट्रभर ठाकरे यांनी दौराही केला होता. ब्राम्हणेतर चळवळीकडेही ते त्यानंतर वळले. चळवळी, प्रचार करायचा, इतरांच्या प्रचाराला उत्तर द्यायचे, तर हाती वृत्तपत्रासारखे साधन हवे. या जाणिवेतून वृत्तपत्र सुरू करण्याचा निर्णय ठाकरे यांनी घेतला. त्यावेळी ते सरकारच्या सार्वजनिक बांधकाम खात्यात नोकरी करत होते. सरकारी नोकरांना वृत्तपत्र चालविण्यास बंदी होती. पण ठाकरे यांनी तशी परवानगी मिळवली. त्यानंतर १६ ऑक्टोबर १९२१ रोजी केशव सीताराम ठाकरे यांच्या प्रबोधन पत्राचा पहिला अंक प्रसिद्ध झाला. पत्र पाक्षिक होते. पत्राच्या नावाबरोबरच उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत असे संस्कृत वचन होते. त्याबरोबरच सामाजिक, धार्मिक आणि नैतिक गोष्टींना हे पत्र वाहिले असल्याचा उल्लेखही इंग्रजीत होता.
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अधिक मूलभूत सुधारणा म्हणून सामाजिक सुधारणांना प्रबोधनने प्राधान्य दिले. प्रि. गो. चि. भाटे, गोपाळराव देवधर, गो. म. चिपळूणकर, भाऊराव पाटील आदींनी या पत्राला पाठिंबा दिला. त्यापैकी अनेकांचे लेखही पत्रात प्रसिद्ध होत.
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या प्रबोधन मासिकामुळे के.सी. ठाकरे यांना प्रबोधनकार ठाकरे म्हणून ओळखले जाऊ लागले.
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क्षात्रजगदगुरूंचे पीठ शाहू महाराजांनी निर्माण केले. त्यावेळी ठाकरे यांनी मानसिक दास्याविरुद्ध बंड (१९९२) असा टीकात्मक लेख लिहिला. रोखठोक भाषेत लिहिणे, हे ठाकरे यांचे वैशिष्ट्य होते. त्यांचे विचार आजच्या काळालाही लागू पडतील असे आहेत. त्याच लेखात ते म्हणतात, मठ आला, की मठाधिपती आले, की संपद्राय सुरू झाला, संप्रदायाच्या मागोमाग सांप्रदायिक गुलामगिरी ठेवलेलीच.
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परप्रातीयांना विरोध
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मुंबईत परप्रांतीय, विशेषत दाक्षिणात्य मंडळी मोठ्या संख्येने येऊ लागली. त्यामुळे मराठी माणसांची गैरसोय होऊ लागली. त्याला प्रबोधनने १९२२मध्ये सर्वप्रथम तोंड फोडले. तसेच, पत्राच्या पहिल्या अंकापासूनच कवी वसंतविहार यांच्या समाजहितवादी कविता त्यात प्रसिद्ध होत असत. प्रबोधनचा अल्पावधीतच संपूर्ण महाराष्ट्रात प्रसार झाला. १९२३मध्ये मुंबईत बसलेले बस्तान मोडून प्रबोधन साताऱ्यात स्थलांतरित झाले. तेथील काही कटु घटनानंतर ठाकरे पुण्यात आले. तेथे ब्राह्मण-ब्राह्मणेत्तर वादात तेही पडले. काही ब्राह्मण मंडळींनी डिवचल्यामुळे पुण्यात छापखाना उभारून ठाकरे यांनी प्रबोधन मासिक स्वरूपात आणि लोकहितवादी हे साप्ताहिक सुरू केले. साहजिकच, पुण्यातल्या वादात ठाकरेही उतरले. महात्मा ज्योतिबा फुले यांच्या पुतळ्याच्या प्रकरणात ठाकरे यांनी परखडपणे पुतळाविरोधकांचा समाचार घेतला. पण अखेर कंटाळून त्यांनी पुणे सोडले. मासिक व साप्ताहिकही १९२६मध्���े बंद पडले. ते मुंबईला परतले. त्यानंतर त्यांनी स्वत वर्तमानपत्र काढले नाही. पण अनेक वृत्तपत्रांत ते वेळोवेळी लिहीत राहिले.
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प्रबोधनकार ठाकरे विचार साहित्य संमेलन नावाचे एक संमेलन पुण्यात २३-२४ मार्च २०१३रोजी झाले. संमेलनाध्यक्ष संपत जाधव होते. या संमेलनात उत्तम बंडू तुपे यांना साहित्यगौरव हा आणि मोहन अडसूळ यांना कलागौरव हा पुरस्कार देण्यात आला. या प्रकारचे २रे संमेलन २३-२-२०१४ला पुणे शहरात झाले. साहित्यिक रा.रं. बोराडेअध्यक्षस्थानी होते.
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प्रबोधनकार ठाकरे यांच्या नावाने अनेक पुरस्कार दिले जातात, त्यांपैकी काही हे -
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केशवचैतन्य (बाबाजी चैतन्य) हे संत तुकारामांचे गुरू मानले जातात. त्याचे मूळ नाव विश्वनाथ. जन्म पुनवाडी किंवा पुणेवाडी (पुणे) येथे. पित्याचे नाव नृसिंह आईचे आनंदी. उपनाम राजर्षी किंवा राजऋषी. गिरिजा नामक स्त्रीशी त्याचा विवाह झाला होता. त्याशिवाय त्याच्यावर मोहित झालेल्या झबुन्नीसा आणि रोशन ह्या यवन स्त्रियांचाही त्याने भार्या म्हणून स्वीकार केला होता. पुढे आलेल्या एका आपत्तीत झबुन्निसा आणि रोशन ह्यांना मरण आले व गिरिजेसह तो ओतुरास (जि.पुणे) आला. तेथे राघव चैतन्य ह्या सत्पुरुषाची गाठ पडून विश्वानाथाने त्यांचे शिष्यत्व पतकरले आणि संन्यास घेतला. केशव चैतन्य हे त्याचे संन्यास धर्मातील नाव होय. त्याची समाधी ओतूर येथेच आहे. कृष्णदास बैरागीकृत चैतन्यलीला ह्या अप्रकाशित ग्रंथात केशव चैतन्याने पुढील पाच ग्रंथ लिहिल्याचे म्हटले आहे :भक्तिप्रकाश, वैकुंठपद, वासनामय देह, गीताभागवतसार आणि परमार्थविचार तथापि ते सर्व अनुपलब्ध आहेत. त्याच्या नावावर असलेले एक पद आढळते. त्यात ‘नवविधा भक्ति निरंतर करवावी । केशव चैतन्य शरण तुला रे ।।’ अशी ओळ आहे. तथापि तीत उल्लेखिलेला केशव चैतन्य हाच होय, असे मानण्यास पुरावा नाही. केशव चैतन्याने अनेक अद्भुत चमत्कार केल्याच्या आख्यायिका आहेत. तुकाराम महाराजांचे गुरू बाबाजी चैतन्य आणि हा एकच होत, असे काही विद्वान मानतात तथापि बाबाजी चैतन्य हा त्याचा शिष्य होता, असे काही विद्वानांनी निदर्शनास आणून दिले आहे.त्यांची समाधी ओतूर येथे असून त्यांचा समाधिकाल सन १५७१ असावा. समाधी स्थानाच्या शेजारी 'मांडवी' नदीचा प्रवाह वाहतो.[१]
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तुकारामांना केशवचैतन्यांचे प्रत्यक्ष दर्शन घडले नाही, तर स्वप्नात त्यांना दृष्टांत झाला. याला प्रमाण म्हणून तुकारामांचा खालील अभंग सांगितला जातो.
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सदगुरूराये कृपा केली मज । परी नाही घडली सेवा काही ॥धृ॥
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सापडविले वाटे जाता गंगास्नाना । मस्तकी तो जाणा ठेविला कर ॥१॥
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भोजना मागती तूप पावशेर । पडला विसर स्वप्नामाजी ॥२॥
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राघवचैतन्य केशवचैतन्य । सांगितली खूण मालिकेची ॥३॥
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बाबाजी आपुले सांगितले नाम । मंत्र दिला रामकृष्णहरी ॥४॥
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माघ शुद्ध दशमी पाहुनी गुरुवार । केला अंगीकार तुका म्हणे ॥५॥
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केशवराजुगरी अंजली सरवाणी (जन्म २८ जुलै १९९७) ही एक भारतीय क्रिकेट खेळाडू आहे.[१] ती देशांतर्गत सामन्यांमध्ये रेल्वेकडून खेळते.[२] ९ डिसेंबर २०२२ रोजी तिने ऑस्ट्रेलियाविरुद्ध भारतासाठी महिला टी२०आ पदार्पण केले.[३]
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ओडिशा या भारतीय राज्याचे मुख्यमंत्री हे ओडिशा सरकारचे प्रमुख आहेत. भारतीय राज्यघटनेनुसार, राज्यपाल हे राज्याचे न्यायमूर्ती प्रमुख आहेत, परंतु वास्तविक कार्यकारी अधिकार मुख्यमंत्र्यांकडे आहे. ओडिशा विधानसभेच्या निवडणुकांनंतर, राज्यपाल सहसा बहुमत असलेल्या पक्षाला (किंवा युती) सरकार स्थापन करण्यासाठी आमंत्रित करतात. राज्यपाल मुख्यमंत्र्यांची नियुक्ती करतात, ज्यांचे मंत्री परिषद एकत्रितपणे विधानसभेला जबाबदार असते. त्यांना विधानसभेचा विश्वास आहे हे पाहता मुख्यमंत्रिपदाचा कार्यकाळ हा पाच वर्षांचा असतो आणि त्याला मुदतीची मर्यादा नसते. [१]
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| 2 |
+
१ एप्रिल १९३६ रोजी ओरिसा प्रांताची निर्मिती झाली. या प्रांतावर परळखेमुंडीचा राजा महाराजा कृष्णचंद्र गजपती नारायण देव यांचे नियंत्रण होते. त्यांनी जुलै १९३७ पर्यंत येथे राज्य केले. त्यानंतर अखिल भारतीय काँग्रेस पक्षाचे नेते विश्वनाथ दास यांनी आणखी दोन वर्षांसाठी पदभार स्वीकारला. १९४६ मध्ये शेवटी डॉ. हरेकृष्ण महाताब यांच्याकडे सोपवण्यापूर्वी राजाने पुन्हा ताबा घेतला.
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| 3 |
+
भारताला स्वातंत्र्य मिळाल्यानंतर आणि राज्यघटना लागू झाल्यानंतर राज्याने लोकशाहीच्या तत्त्वांनुसार काम सुरू केले. पहिल्या निवडणुकीपर्यंत डॉ. हरेकृष्ण महाताब हे ओडिशाचे मुख्यमंत्री राहिले आणि नंतर ते नबकृष्ण चौधरी यांनी घेतले. १९४६ पासून ओडिशाच्या मुख्यमंत्र्यांची यादी येथे आहे. १९४६ पासून ओडिशाचे १४ मुख्यमंत्री झाले. २००० पासून सेवा करत असलेले, बिजू जनता दलाचे नवीन पटनायक हे विद्यमान मुख्यमंत्री आहेत, आणि ओडिशाच्या इतिहासातील सर्वात जास्त काळ सेवा देणारे मुख्यमंत्री आहेत.
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| 4 |
+
(1952-1957)
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केशवराव मारोतराव जेधे (२१ एप्रिल, इ.स. १८९६ - नोव्हेंबर १२, १९५९) हे मराठी राजकारणी, बहुजन समाजोद्धार चळवळीचे नेते होते. जेधे कुटूंब कान्होजी नाईक यांचे वंशज होते. केशवराव जेधे यांचा जन्म २१ एप्रिल, इ.स. १८९६ रोजी पुणे येथे झाला.
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केशवरावांना तात्यासाहेब या नावाने ओळखले जाते. केशवराव जेधे यांचा संबंध ब्राह्मणेतर चळवळीशी होता. पुणे येथील जेधे मॅन्शन हे या चळवळीचे केंद्र होते. पुण्यातील प्रसिद्ध स्वारगेट चौक हे त्यांच्या नावावर आहे. केशवरावांनी शिवाजी मराठा हायस्कूल, पुणे येथे शिक्षकाची नोकरी केली. केशवराव जेधे यांनी छत्रपती मेळावा काढून टिळकांच्या शिवजयंतीला आव्हान दिले होते. त्यांनी "शांतीचा गांधी पुतळा। देशा प्यारा जाहला।" ही कविता लिहली.
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जेधे हे पुण्यातील देशमुख वंशाचे एक सधन मराठा कुटुंब होते. कुटुंबातील सदस्य सत्यशोधक समाजाचे होते आणि विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळात सामाजिक कार्यात त्यांनी सक्रिय सहभाग घेतला.[१] जेथे कुटुंबाकडे पुण्यात एक पितळ कारखान्याची मालकी होती. हा कारखाना जेधे यांच्या सर्वात मोठ्या भावाने चालविला होता. केशवराव सत्यशोधक समाजात सक्रिय कार्य करत असताना, त्यांचे एक भाऊ बाबुराव ब्राह्मणेतर चळवळीत सक्रिय होते. बाबुराव हे कोल्हापूर संस्थांचे छत्रपती शाहू महाराज यांचे निकटवर्तीय होते.[२]
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कृष्णाजी केशव दामले (टोपणनाव: केशवसुत) ( ७ ऑक्टोबर १८६६:मालगुंड - ०७ नोव्हेंबर १९०५) हे मराठी कवी होते. मराठीत संतकाव्य आणि पंतकाव्य ही परंपरा होती. ती मोडून अन्य विषयांवर कविता करणारे केशवसुत हे आद्य मराठी कवी समजले जातात.
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वर्षानुवर्षे एकाच विशिष्ट पद्धतीने रचल्या जाणा-या कवितेला स्वच्छंद आणि मुक्त रूपात केशवसुतांनी प्रथम सर्वांसमोर आणले. त्यामुळे त्यांना आधुनिक मराठी काव्याचे जनक संबोधले जाते.[२] आम्ही कोण?, नवा शिपाई, तुतारी, सतारीचे बोल, झपुर्झा, हरपले श्रेय, मूर्तिभंजन, गोफण या काही त्यांच्या उल्लेखनीय कविता आहेत.
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इंग्रजी काव्य परंपरेतील रोमॅण्टिक समजला जाणारा सौंदर्यवादी दृष्टीकोन प्रथम मराठी साहित्यात आणि काव्यात आणण्याचा मान केशवसुतांकडे जातो. कवीप्रतिभा स्वतंत्र असावी, कवीच्या अंतःस्फूर्तीखेरीज ती अन्य बाह्य प्रभावात ती असू नये, असे त्यांचे म्हणणे होते. काव्य हुकुमानुसार नसते, नसावे, हा वास्तववाद मराठीत त्यांनीच आधुनिक परिभाषेत मांडला. त्यांच्या काव्य विचारांवर वर्डस्वर्थ, शेली, किटस् यांसारख्या इंग्रजी कवींचा मोठा प्रभाव होता, पण त्यांची आविष्कार शैली भारतीय होती.
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इंग्रजी काव्यातील चौदा ओळींचा सॉनेट हा काव्यप्रकार ‘सुनीत’ या नावाने त्यांनी मराठीत लोकप्रिय केला. त्यांनी लिहिलेल्या कवितांपैकी फक्त १३५ कविताच आज उपलब्ध आहेत. पण त्यांच्या या अल्पसंख्य कवितांमध्ये अनेक विषय दिसून येतात. अन्याय, विषमता, अंधश्रद्धा, परस्पर स्नेहभाव, स्त्रीपुरुषांमधील प्रेम, त्याचबरोबर सामाजिक बंडखोरी, मानवतावाद, राष्ट्रीयत्त्व, गूढ अनुभवांचे प्रकटीकरण, आणि निसर्ग असे अनेक विषय त्यांनी सहजी हाताळले आहेत..[३]
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गोविंदाग्रज (राम गणेश गडकरी), बालकवी, रेंदाळकर यांसारखे सुप्रसिद्ध कवीसुद्धा स्वतःला केशवसुतांचे शिष्य म्हणवून घेत असत..[४][ दुजोरा हवा][ संदर्भ हवा ]
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मालगुंड येथे केशवसुत स्मारक उभे करण्यात आले असून कवी कुसुमाग्रज यांच्या हस्ते ०८ मे १९९४ रोजी स्मारकाचे उद्घाटन झाले. [५]
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सर्वसाधारण सजगतेच्या दृष्टीने वाचकांनी हेही लक्षात घ्यावे कि काही वेळा काही अधिकृत संकेतस्थळे अनधिकृतपणे कोणत्याही क्षणी कोणत्याही कालावधीकरिता हॅक अथवा उत्पातित झालेली असण्याची शक्यता नाकारता येत नाही.त्यामुळे तेथील माहितीची पडताळणी तुमच्या स्वतःच्या जबाबदारीवर तुम्ही स्वतः दक्षतेने करणे नेहमीच गरजेचे असते.
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बर्याचदा मराठी विकिपीडिया आणि विश्वकोश संकल्पनेची कल्पना नसलेले लोक गूगल सारख्या शोध संकेतस्थळावरून मराठी विकिपीडियातील ते शोधत असलेल्या संस्थेबद्दलच्या लेखावर पोहोचतात तो लेख म्हणजे अधिकृत संकेतस्थळ नाही हे न समजल्यामुळे त्याच पानावर/चर्चा पानावर अथवा विकिपीडिया मदतकेंद्रावर आपल्या शंका आणि समस्या अनवधानाने मांडताना आढळून येतात.(त्यानंतर बहूतेक वेळा मराठी विकिपीडिया संपादक तो मजकुर उत्पात म्हणून वगळून टाकतात आणि मराठी विकिपीडिया बद्दल विनाकारण गैरसमज निर्माण होऊ शकतात)
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हे टाळण्याच्या दृष्टीने संस्था विषयक लेखात लावण्या करिता {{कोशीयलेख/संस्था}} लघुपथ {{संकोले}} हा साचा बनवला आहे तो सर्व संस्था खासकरून सर्व महाराष्ट्रासंबधी सर्व संस्था विषयक लेखात आवर्जून लावण्यात वाचक आणि सदस्यांनी सहकार्य करावे.
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केसरी हे महाराष्ट्रातील पुणे शहरातून प्रकाशित होणारे मराठी भाषेतील दैनिक वृत्तपत्र आहे. जानेवारी ४, इ.स. १८८१ रोजी बाळ गंगाधर टिळकांनी या वृत्तपत्राची सुरुवात केली.
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लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळकांनी जनतेला स्वातंत्र्य चळवळीस उद्युक्त करावयाच्या व सामाजिक परिवर्तनांसाठी जनजागृतीचा एक महत्त्वाचा भाग या विचारांनी १८८१ मध्ये 'केसरी' हे वृत्तपत्र सुरू केले. 'केसरी'चे प्रथम संपादक गोपाळ गणेश आगरकर यांनी १८८८ पर्यंत काम केले.
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गोपाळ गणेश आगरकर हे बुद्धिवादी होते. त्यांनी प्रारंभीच्या काळात जनतेच्या विचार परिवर्तनाविषयक लिखाणांवर भर दिला. समाज सुधारणांच्या मूलगामी विचारांतून सामाजिक सुधारणा वेग धरू शकतील याबाबत त्यांनी जागरूकतेने सामाजिक सुधारणांवर आग्रही राहून 'केसरी'त लिखाण केले. त्याचबरोबर राजकीय स्वातंत्र्याचाही पुरस्कार केला. आगरकरांचा सडेतोडपणा, वैविध्य यामुळे 'केसरी'ची लोकप्रियता वाढली खरी; परंतु पुढे टिळक व आगरकर यांच्यात वैचारिक मतभेद वाढत गेल्यामुळे १८९० पासून 'केसरी'चे काम लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक पाहू लागले.[१]
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भारतीय स्वातंत्र्यलढ्यात टिळक व गांधी या दोन्ही पर्वात आणि त्यानंतरच्या कालखंडात संयुक्त महाराष्ट्राच्या चळवळीत, राज्यातील जी वैचारिक वर्तमानपत्रे समाज जागृतीच्या कार्यात अग्रेसर होती, त्यात 'केसरी' वृत्तपत्रास जनमानसाने सातत्याने प्रातिनिधिकरीत्या वैशिष्ट्यपूर्ण स्थान दिले, ही या वृत्तपत्राची खासीयत आहे. 'केसरी'ने राज्यातील जनतेच्या विविध प्रश्न व समस्यांना वाचा फोडण्याचे कामही केले आहे.
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'केसरी' वृत्तपत्राने वर उल्लेखिल्याप्रमाणे त्या कालखंडात जे महत्त्वपूर्ण योगदान दिले त्यास तोड नाही. 'केसरी', 'ज्ञानप्रकाश' व 'नवा काळ' ही वृत्तपत्रे साधारणतः तालुका वजा शहरात येत असत; परंतु दळणवळणांच्या सीमित सोयीमुळे त्या काळच्या मुंबई राज्यात सर्वच ठिकाणी वृत्तपत्रे उपलब्ध नसत. त्या काळात हल्ली इतके वर्तमानपत्र वाचावयास मिळणे हे सहज सुलभ नव्हते. ठरावीक व्यक��तींकडेच व वर्तमानपत्रांच्या दुकानांतही मोजक्याच प्रती असत. राजकीय संक्रमणाचा कालखंड असल्यामुळे उपलब्ध वर्तमानपत्रांवर वाचकांची गर्दी होत असे.
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'केसरी'च्या वृत्तपत्रीय कार्याचा आजपर्यंतच्या १३० वर्षांच्या या प्रदीर्घ काळातील वाटचालीचे अवलोकन करता इतिहासाचा अधिक धांडोळा घेणे मला क्रमप्राप्त वाटते. यातील जवळ जवळ ८० वर्षांच्या कालावधीत प्राधान्याने स्वातंत्र्यप्राप्ती व त्यानंतरचे मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्राची चळवळ या वातावरणात 'केसरी'चा काळ व्यतीत झाला आहे.
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त्या काळात दृक्श्राव्य माध्यमे उपलब्ध नव्हती. अगदी १९६० पर्यंत रेडिओसुद्धा ग्रामीण भागात फारच दुर्मिळ होते. त्यामुळे जनसामान्यांसाठी प्रसारमाध्यमांचे काम 'केसरी' व इतर काही वृत्तपत्रांनी पार पाडले. स्वातंत्र्यप्राप्ती व संयुक्त महाराष्ट्राची चळवळ या व्यतिरिक्त देशात व राज्यात इतरही खूपच समस्या व प्रश्न होते. या प्रश्नांना ऐरणीवर आणण्याचे काम 'केसरी'ने केले. मुंबई-पुण्यासारखी मोठी शहरे वगळता तालुकास्तरीय व ग्रामीण भागात बहुसंख्य जनतेला जीवन जगतांना प्लेग, देवी, नारू यांसारख्या रोगांच्या साथी, वैद्यकीय सुविधांचा अभाव, वारंवार पडणारे तीव्र दुष्काळ, तगाई, चारा खावटी, कर्जवसुली, सावकारी पाश, चलनांची टंचाई, अत्यंत अपुऱ्या शैक्षणिक सुविधा, दळणवळणांसाठी आवश्यक असणाऱ्या पक्क्या रस्त्यांची आवश्यकता, अंधश्रद्धा, जुन्या कालबाह्य चालीरीती, रूढी परंपरा, बालविवाह, केशवपन, सतीची चाल, पुनर्विवाह व सामाजिक विषमता, तुटपुंजे संशोधन, लोकजागृतीमधील अभाव इत्यादी भीषण परिस्थितीचा सामना करावा लागत होता. ग्रामीण भागातून मुख्यत्वे धान्यटंचाई, अपुरे चलन व निरक्षरता या सर्वांत मोठ्या समस्या होत्या. एकूण समाजातील मूठभर सधन व थोडाफार शिक्षित नोकरवर्ग सोडला तर सर्वत्र सामाजिक समस्यांनी, प्रश्नांनी घेरलेले, अशी राज्य व राष्ट्राची परिस्थिती होतीच होती. या सर्व सामाजिक, आरोग्य विषयक, शैक्षणिक व आर्थिक पातळ्यांवर बहुसंख्य सामान्य जनतेचे जीवनमान असहाय स्थितीत होते. याचीही आजच्या चंगळवादी जीवनशैलीत जगणाऱ्यांना व जगू पाहणाऱ्या समाजाला कल्पना करता येणार नाही; परंतु यातील काही थोडाफार काळ मी पाहिलेला आहे. 'केसरी'ने त्या काळातील या समाज जीवनाच्या स्थितीवर सातत्याने, प��रसारमाध्यमाची जी अत्यावश्यक भूमिका असावी लागते, ती 'केसरी' या वृत्तपत्राने सातत्याने मांडलेली आहे. मी या बाबीत माझ्या विद्यार्थिदशेपासून साक्षीदार राहिलेलो आहे.
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लोकमान्यांची 'केसरी'बाबतची भूमिका, राजकीय चळवळीस हातभार लागून राजकीय स्वातंत्र्याच्या उद्दिष्टपूर्तीनंतर सामाजिक व आर्थिक स्वातंत्र्याचे प्रवाह या राष्टात व राज्यात वाहू लागणे अपेक्षित होती. 'केसरी'ने केवळ वृत्त किंवा लोकशिक्षण हे उद्दिष्ट न ठेवता जनतेला राष्टअभ्युदयासाठी कार्यप्रवण करणे हेही महत्त्वाचे कार्य पार पाडले आहे. 'केसरी'ने विचारवंतांवर छाप पाडली असे खास करून म्हणता येईल. टिळक युगात वृत्तपत्रातून ब्रिाटिश साम्राज्यशाही विरुद्ध स्वातंत्र्यचळवळीस अनुकूल विचार मांडीत राहणे ही खासच धैर्याची बाब होती. भारतात ब्रिाटिश राज्यकर्त्यांची भूमिका वृत्तपत्र स्वातंत्र्याला खुलेपणाची नव्हती. टिळकांनी ब्रिाटिशांशी झगडून वृत्तपत्र स्वातंत्र्य मिळविले. त्याबाबत त्यांच्यावर खटलेही झाले. या बिकट परिस्थितीतून 'केसरी'ची वाटचाल सुरूच होती.
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टिळक युगानंतर 'केसरी'ने गांधीयुगातून जात स्वातंत्र्य मिळेपर्यंत कठीण परिस्थितीतून लोकजागृतीचे महत्त्वाचे कार्य सुरूच ठेवले. न. चि. केळकरांनीही विविध विषयांशी संबंधित वैचारिक लिखाण करून 'केसरी'ची प्रतिष्ठा वाढविली. त्याद्वारे सामाजिक विचारधनात मोलाची भर घातली. आचार्य जावडेकर यांनी गांधी आणि टिळक या दोन्ही महत्त्वाच्या नेत्यांच्या विचारांचा सुयोग्य समन्वय घडवून समाजवादी विचारसरणीचा पुरस्कार केला.
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देशाला स्वातंत्र्य मिळाले. 'केसरी' व इतर बऱ्याच वृत्तपत्रांची जनजागृतीच्या पर्वाची विजयी सांगता झाली. लोकमान्यांचे नातू जयंतराव टिळक तसे १९४५ पासून 'केसरी'च्या कामात संपादन करीत होते; परंतु देशात फाळणीच्या दंगली, गांधीहत्या या घटना घडून राष्टाला स्थिरतेचे वातावरण मिळाले नव्हते. तशातच १९६० च्या दशकात 'मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्र झालाच पाहिजे' या चळवळीने जोर धरला. त्या काळात 'केसरी'ने संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीसह महाराष्ट्रातील जनतेच्या भावभावना प्रतिबिंबित केल्या. १ मे १९४६ रोजी झालेल्या बेळगाव येथील साहित्य संमेलनात ग. त्र्यं. माडखोलकर यांच्या अध्यक्षतेखाली झालेला संयुक्त महाराष्ट्र निर्मितीचा प्रथम ��राव सर्वप्रथम १४ मे १९४६ला प्रकाशित केला. त्यानंतरची ही चळवळ पुढे सुरू राहून १ नोव्हेंबर १९५६ला गुजरात-महाराष्ट्राचे संयुक्त द्विभाषक राज्य स्थापन झाले. या चळवळीत एकंदर १०५ जण हुतात्मा झाले. नंतर १ मे १९६० रोजी मुंबईसह स्वतंत्र मराठी भाषकांचे महाराष्ट्र राज्य निर्माण झाले. हा इतिहास एवढ्या विस्ताराने सांगण्याचे कारण, की स्वातंत्र्य चळवळीनंतर स्वतंत्र महाराष्ट्र राज्य निर्मितीची चळवळ हीदेखील महत्त्वाची चळवळ होती. यासाठीही 'केसरी'ने मोठी भूमिका बजावली.
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'केसरी'च्या कार्यभारात दीपक जयवंतराव टिळक व त्यांचे पुत्र रोहित टिळक यांचा मोठा वाटा आहे. जयंतराव टिळकांनी किल्ल्यांच्या परिक्रमाची आवड जोपासली होती. वाचकांमध्येही किल्ल्याविषयीच्या पर्यटनासाठीची आवड त्यांनी निर्माण केली. दीपक टिळकांनी जयंतरावांची विचारधारा टिकवून ठेवत, आधुनिक तंत्रज्ञानाचा अवलंब करत 'केसरी'चे रूप पालटविले. व हा केसरी लोकांना खूप उपयोगी झाला[२]
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लोकमान्य टिळकांचे केसरीतील लेख हे इतिहासाच्या अवलोकनासाठी आणि संशोधनाच्या दृष्टीने अतिशय महत्त्वाचे आहेत. त्यांचे हे संदर्भमूल्य जाणून केसरी-मराठा संस्था आणि राज्य मराठी विकास संस्था यांनी संयुक्त प्रकल्प हाती घेऊन या १९२२ पासून १९३० पर्यंत प्रसिद्ध झालेलल्या लेखांचे ४ खंड डिजिटल स्वरूपात संकेतस्थळावर उपलब्ध करून दिले आहेत.[३][४][५][६]
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केसांची निगा म्हंटल की सगळ्यात पहिल्यांदा विचार करायला पाहिजे तो म्हणजे" केसांची स्वच्छता ".केसांची काळजी ही वयक्तिक बाब आहे.तरीही केसांच्या प्रकारानुसार काळजी घेण्याच्या पद्धतीतही बदल होतो.
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केस हा आपलया आरोग्याचा आरसा आहे. शरीरामधे अनेक रोग होत असताना त्यांचा परिणाम होत असतो. म्हणून केसांची चिकित्सा करताना ईतर आजार बघून त्यांची चिकित्सा प्रथम करावी.
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केसी उइडेस कार्टी (१९ मार्च, १९९७:त्रिनिदाद - हयात) ही वेस्ट इंडीजचा क्रिकेट खेळाडू आहे. वेस्ट इंडीजच्या राष्ट्रीय क्रिकेट स्पर्धांमध्ये तो खेळतो. हा उजव्या हाताने फलंदाजी आणि मध्यमगती गोलंदाजी करतो.
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केशिराज बास यांना केसोबास नावानेही ओळखले जाते. हे महानुभव पंथातील ज्येष्ठ ग्रंथकार, व संस्कृत पंडित होत.
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महानुभाव पंथाचे दुसरे आचार्य नागदेवाचार्य यांचे हे पट्टशिष्य. यांच्या सूचनेवरून केशीराज बास यांनी मराठी भाषेत ग्रंथ रचना केली.
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महानुभाव पंथांचे संस्थापक श्री चक्रधर स्वामी यांनी रचलेल्या लीळाचरित्र या ग्रंथातील उपदेश केशीराज बास यांनी इ.स. १२८५च्या सुमारास संकलीत केला. याचा प्रथम सूत्र, दृष्टांत व दार्ष्टांतिक असा रचनाक्रम आहे.
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दृष्टांत पाठात अनेक लोककथा गुंफल्या आहेत. प्रकार1अंशग्राह्य 2 समग्रांश 3 अन्वय 4 अप्रत्यान्वय 5 योगज 6 वास्तव
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जनगणना स्थल निर्देशांक ५३८९३४ असलेले केहकावाही हे गाव, गडचिरोली या जिल्ह्यातील ९०६.० हेक्टर क्षेत्राचे गाव असून २०११ च्या जनगणनेनुसार [१] ह्या गावात ३४ कुटुंबे आहेत व एकूण लोकसंख्या १७७ आहे.ह्याच्या सर्वात जवळचे शहर गडचिरोली हे ७० किलोमीटर अंतरावर आहे.
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गावात असणाऱ्या सुविधा - पूर्व-प्राथमिक शाळा-१. प्राथमिक शाळा-१. स्थानिक नसलेल्या सुविधांची अंतरे -
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५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर : कनिष्ठ माध्यमिक शाळा मुरुमगाव येथे आहे. ५ ते १० किमी अंतरावर : काही नाही१० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर : माध्यमिक शाळा मुरुमगाव येथे आहे. उच्च माध्यमिक शाळा मुरुमगाव येथे आहे. पदवी महाविद्यालय धानोरा येथे आहे. अभियांत्रिकी महाविद्यालय गडचिरोली येथे आहे. वैद्यकीय महाविद्यालय मुरुमगाव येथे आहे. मॅनेजमेन्ट इन्स्टिट्युट मुरुमगाव येथे आहे. पॉलिटेक्निक गडचिरोली येथे आहे. व्यावसायिक प्रशिक्षण शाळा गडचिरोली येथे आहे. अनौपचारिक प्रशिक्षण केन्द्र मुरुमगाव येथे आहे. अपंगांसाठी खास शाळा मुरुमगाव येथे आहे.
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असलेल्या सुविधा- काही नाही
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नसलेल्या सुविधा -
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कम्युनिटी हेल्थ सेंटर, प्राथमिक आरोग्य केन्द्र, प्राथमिक आरोग्य उपकेन्द्र, प्रसूति व शिशुसंगोपन केन्द्र, क्षयरोग रुग्णालय, अॅलोपॅथिक रुग्णालय, अन्य उपचार पद्धतीचे रुग्णालय, दवाखाने, गुरांचे दवाखाने, फिरते दवाखाने, कुटुंब कल्याण केन्द्र,
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असलेल्या सुविधा- काही नाही
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नसलेल्या सुविधा -
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बाह्य रोगी विभाग, बाह्य व भरती असलेले रोगी विभाग, धर्मादाय बिगर-सरकारी रुग्णालय, एमबीबीएस पदवीधर डॉक्टर, इतर पदवीधर डॉक्टर, पदवी नसलेले डॉक्टर, पारंपरिक वैद्य व वैदू, औषधाची दुकाने, इतर बिगरसरकारी वैद्यकीय सुविधा,
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असलेल्या सुविधा-
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झाकण नसलेल्या विहिरीच्या पाण्याचा पुरवठा,
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नसलेल्या सुविधा -
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शुद्ध केलेल्या पाण्याचा नळातून पुरवठा, शुद्ध न केलेल्या पाण्याचा नळातून पुरवठा, झाकलेल्या विहिरीच्या पाण्याचा पुरवठा, हँड पंपच्या पाण्याचा पुरवठा, बारमाही सुरू असलेल्या हँड पंपच्या पाण्याचा पुरवठा, बोअर वेलच्या पाण्याचा पुरवठा, बारमाही सुरू असलेल्या बोअरवेल पाण्याचा पुरवठा, झऱ्यांच्या पाण्याचा पुरवठा, नदी /कालवे यातील पाण्याचा पुरवठा, तलाव / तळी यातील पाण्याचा पुरवठा, इतर पाण्याचा पुरवठा,
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असलेल्या सुविधा-
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सांडपाणी शुद्धीकरणाच्या सयंत्रात सोडले जाते.
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नसलेल्या सुविधा -
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उघडी गटारे, न्हाणीघरासह सार्वजनिक स्वच्छता गृह, न्हाणीघर नसलेले सार्वजनिक स्वच्छता गृह, ग्रामीण सॅनिटरी हार्डवेरचे दुकान, सामूहिक बायोगॅस किंवा कचऱ्याच्या उत्पादक पुनर्वापराची व्यवस्था,
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गावात असणाऱ्या सुविधा -
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कच्चे रस्ते, पाण्यासाठी नाल्या असणारे डांबरी रस्ते, बारमाही रस्ते, स्थानिक नसलेल्या सुविधांची अंतरे -
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पोस्ट ऑफिस, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. उपपोस्ट ऑफिस, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. मोबाइल फोन सुविधा, - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. इंटरनेट कॅफे / सर्व्हिस सेंटर, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. खाजगी कूरियर, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. सार्वजनिक बस सेवा, - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. खाजगी बस सेवा, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. रेल्वे स्थानक, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. ऑटो व टमटम, - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. टॅक्सी, - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. ट्रॅक्टर - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. सायकल रिक्षा (पायचाकी), - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. बैल व इतर जनावरांनी ओढलेल्या गाड्या, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. राष्ट्रीय महामार्गाला जोडलेले रस्ते, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. राज्य महामार्गाला जोडलेले रस्ते, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. जिल्ह्यातील मुख्य रस्त्याला जोडलेले रस्ते, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. जिल्ह्यातील दुय्यम रस्त्याना जोडलेले रस्ते, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. डांबरी रस्ते, - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. तळटीप- शिरगिणतीत असलेल्या पुढील सुविधांच्या उपलब्धततेची माहिती नाही - सायकल रिक्षा (यांत्रिक), समुद्र व नदीवरील बोट वाहतूक, बोट वाहतुकीयोग्य जलमार्ग,
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गावात असणाऱ्या सुविधा - शेतमाल विक्री संस्था,
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स्थानिक नसलेल्या सुविधांची अंतरे -
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ए टी एम, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. व्यापारी बँका, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. सहकारी बँका, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. शेतकी कर्ज संस्था, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. स्वसहाय्य गट (SHG), - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. रेशनचे दुकान, - ५ किमीपेक्षा कमी अंतरावर. मंडया / कायम बाजार, - ५ ते १० किमी अंतरावर. आठवड्याचा बाजार, - ५ ते १० किमी अंतरावर. शेतमाल विक्री संस्था,
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गावात असणाऱ्या सुविधा -
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शिशुविकास पौष्टिक आहार केन्द��र (ICDS), अंगणवाडी पौष्टिक आहार केन्द्र, अंगणवाडी पौष्टिक आहार केन्द्र, इतर पौष्टिक आहार केन्द्र, आशा, जन्म व मृत्यु नोंदणी केन्द्र,
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स्थानिक नसलेल्या सुविधांची अंतरे -
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समुदाय भवन (दूरचित्रवाणी सह अथवा विरहित), - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. क्रीडांगण, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. खेळ / करमणूक क्लब, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. सिनेमा/ व्हिडियो थियेटर, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. सार्वजनिक ग्रंथालय, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. सार्वजनिक वाचनालय, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. वृत्तपत्र पुरवठा, - १० किमी पेक्षा अधिक अंतरावर. विधानसभा मतदान केन्द्र, - ५ ते १० किमी अंतरावर.
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घरगुती वापरासाठी वीजपुरवठा - आहे.
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शेतीसाठी वीजपुरवठा - नाही.
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व्यापारी वापरासाठी वीजपुरवठा - नाही.
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सर्व प्रकारच्या वापरासाठी वीजपुरवठा - नाही.
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कैकाडी भाषा ही तमिळशी संबंधित द्रविडीयन भाषा आहे, जी महाराष्ट्रातील पूर्वीच्या भटक्या कैकाडी जमातीतील सुमारे २३,००० लोक बोलतात.
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कैदी वसाहत किंवा निर्वासित वसाहत म्हणजे कैद्यांना निर्वासित करण्यासाठी आणि सामान्य लोकांपासून दूर ठेवण्यासाठी तयार केलेली वसाहत होय. अशा जागा बहुतेकदा बेटावरील किंवा दूरच्या वसाहतींच्या प्रदेशात असतात. या शब्दाचा उपयोग दुर्गम ठिकाणी असलेल्या जागा जेथे गुन्हेगारांना सुधारण्यासाठी ठेवले जाते. परंतु सामान्यत: अशा ठिकाणी वॉर्डन किंवा संपूर्ण अधिकारी असलेले राज्यपाल यांच्या देखरेखीखाली असलेल्या कैद्यांच्या समुदायाचा संदर्भ वापरला जातो. ऐतिहासिकदृष्ट्या दंडात्मक वसाहती बहुधा एखाद्या राज्याच्या आर्थिकदृष्ट्या अविकसित भागामध्ये आणि तुरूंगातील फार्मपेक्षा जास्त मोठ्या प्रमाणात दंडात्मक कामगारांसाठी वापरल्या जात असत.
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ब्रिटिशांनी उत्तर अमेरिकेत असलेल्या वसाहतींचा उपयोग कैदी वसाहती म्हणून केला. येथे सक्तमजुरी साठी गुलामांना पाठवण्यात येत असे. वसाहतींमध्ये आगमन झाल्यावर व्यापारी दोषीं व्यक्तिंना तेथील शेत मालकांसाठी लिलाव करून विकत असे. असा अंदाज आहे की ब्रिटिशांनी सुमारे ५०,००० दोषींना अमेरिकेतील वसाहतीत पाठविण्यात आले होते. यातील बहुतेक मेरीलॅंड आणि व्हर्जिनियाच्या चेझापीक वसाहतींमध्ये पाठविले होते. १८ व्या शतकातील सर्व ब्रिटिश स्थलांतरितांपैकी एक चतुर्थांश लोक हे कैदी व्यक्ती होते. [१] उदाहरणार्थ जॉर्जियाच्या वसाहतीची स्थापना सर्वप्रथम जेम्स एडवर्ड ओगलेथोर्पे यांनी केली होती ज्यांचे मूळतः कर्जदारांच्या तुरूंगातून मोठ्या प्रमाणात घेतलेल्या कैद्यांचा वापर करण्याचा हेतू होता आणि तेथे कर्जदारांची कॉलनी तयार केली गेली जेथे कैदी व्यवहार शिकू शकतील आणि त्यांची कर्जे फेडतील. जरी हे मोठ्या प्रमाणात अयशस्वी झाले, तरीही लोकप्रिय इतिहास आणि स्थानिक विद्या या दोन्ही ठिकाणी कैदी वसाहत म्हणून राज्य सुरू झाले ही कल्पना कायम आहे. [२]
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गुणक: 46°28′0″N 30°44′0″E / 46.46667°N 30.73333°E / 46.46667; 30.73333
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ओदेसा (युक्रेनियन: Одеса; रशियन: Одесса) हे युक्रेन देशामधील एक प्रमुख शहर आहे व ओदेसा ओब्लास्तची राजधानी आहे. हे शहर युक्रेनच्या दक्षिण भागात काळ्या समुद्राच्या किनाऱ्यावर वसले असून ते युक्रेनमधील चौथ्या क्रमांकाचे शहर व प्रमुख बंदर आहे.
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