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२०° ३८′ १२.१२″ N, ७९° ५९′ ०९.२४″ E
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देसाईगंज (वडसा) हा महाराष्ट्र राज्यातील गडचिरोली जिल्ह्यातील एक तालुका आहे.
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या तालुक्यात वडसा येथे दक्षिण पूर्व मध्य रेल्वेचे स्थानक असून तेथे २ फलाट आहेत. रेल्वे स्थानकाच्या बाहेरच बस स्थानक आहे.
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धामणपे हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील राजापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
+
पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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| 3 |
+
१.https://villageinfo.in/
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+
२.https://www.census2011.co.in/
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+
३.http://tourism.gov.in/
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| 6 |
+
४.https://www.incredibleindia.org/
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| 7 |
+
५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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| 8 |
+
६.https://www.mapsofindia.com/
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10009.txt
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भिवंडी पश्चिम विधानसभा मतदारसंघ - १३६ हा महाराष्ट्र राज्य विधानसभेच्या २८८ मतदारसंघांपैकी एक आहे. लोकसभा आणि विधानसभा मतदारसंघ परिसीमन आदेश, २००८ नुसार केलेल्या मतदारसंघांच्या रचनेनुसार, भिवंडी पश्चिम मतदारसंघात ठाणे जिल्ह्याच्या १. भिवंडी तालुक्यातील भिवंडी महानगरपालिका वॉर्ड क्र. १ ते ५, १८ ते ३५ आणि ५१ ते ६१. खोणी सीटी, शेलार सीटी, काटई सीटी, कारीवली सीटी यांचा समावेश होतो. भिवंडी पश्चिम हा विधानसभा मतदारसंघ भिवंडी लोकसभा मतदारसंघात मोडतो.[१][२]
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| 2 |
+
भारतीय जनता पक्षाचे महेश प्रभाकर चौघुले हे भिवंडी पश्चिम विधानसभा मतदारसंघाचे विद्यमान आमदार आहेत.[३]
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10014.txt
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पश्चिम मिडलंड्स हा इंग्लंड देशामधील ९ भौगोलिक प्रदेशांपैकी एक आहे. हा प्रदेश ग्रेट ब्रिटन बेटाच्या मध्य भागात मिडलंड्स भागामध्ये आयरिश समुद्राच्या किनाऱ्यावर स्थित आहे. क्षेत्रफळानुसार इंग्लंडमध्ये सातव्या तर लोकसंख्येनुसार पाचव्या क्रमांकावर असलेल्या पश्चिम मिडलंड्समध्ये सहा काउंटी आहेत.
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10018.txt
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पश्चिम युरोपीय हवामान हे मुख्यत्वे ४५ ते ५० ° अक्षांशावर समुद्रकिनाऱ्याजवळील भूप्रदेशात आढळून येते. इंग्लंड, आयर्लंड, फ्रान्स, नेदरलँड्स, बेल्जियम, जर्मनी, डेन्मार्क, पोलंड या युरोपातील देशात, तसेच अमेरिकेतील पुर्वोत्तर राज्ये, कॅनडाचा पूर्व किनारा, दक्षिण गोलार्धातील न्यूझिलंड या देशात आढळून् येते.
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| 2 |
+
या हवामान प्रकारचे वैशिट्य म्हणजे, बारामाही पाऊस, सौम्य ते कडक हिवाळा व सौम्य उन्हाळा हे आहे. या भूप्रदेशातील बहुतेक सर्व देश अतिश्रीमंत देशात गणले जातात.
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_1002.txt
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धामणवाणे हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील चिपळूण तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
+
पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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| 3 |
+
१.https://villageinfo.in/
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| 4 |
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२.https://www.census2011.co.in/
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| 5 |
+
३.http://tourism.gov.in/
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| 6 |
+
४.https://www.incredibleindia.org/
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| 7 |
+
५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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| 8 |
+
६.https://www.mapsofindia.com/
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10020.txt
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पश्चिम रेल्वे हे भारतीय रेल्वेच्या १७ क्षेत्रांपैकी एक क्षेत्र आहे. १९५२ साली स्थापन झालेल्या पश्चिम रेल्वेचे मुख्यालय मुंबईच्या चर्चगेट रेल्वे स्थानक येथे असून महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान व मध्य प्रदेश ही राज्ये पश्चिम रेल्वेच्या अखत्यारीत येतात. वडोदरा रेल्वे स्थानक हे पश्चिम रेल्वेवरील सर्वात वर्दळीचे जंक्शन आहे.
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| 2 |
+
मुंबईमध्ये मुंबई सेंट्रल व वांद्रे टर्मिनस ह्या स्थानकांवरून बहुतेक सर्व लांब पल्ल्याच्या गाड्या सुटतात. मुंबई उपनगरी रेल्वेचा पश्चिम मार्ग पश्चिम रेल्वेद्वारे चालवला जातो.
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| 3 |
+
पश्चिम रेल्वेचे सहा विभाग आहेत.
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| 4 |
+
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| 5 |
+
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| 6 |
+
रेल्वे मंत्रालय • रेल्वे बोर्ड
|
| 7 |
+
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| 8 |
+
उत्तर •
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| 9 |
+
उत्तर पश्चिम •
|
| 10 |
+
उत्तर पूर्व •
|
| 11 |
+
उत्तर पूर्व सीमा •
|
| 12 |
+
उत्तर मध्य •
|
| 13 |
+
दक्षिण •
|
| 14 |
+
दक्षिण पश्चिम •
|
| 15 |
+
दक्षिण पूर्व •
|
| 16 |
+
दक्षिण पूर्व मध्य •
|
| 17 |
+
दक्षिण मध्य •
|
| 18 |
+
पश्चिम •
|
| 19 |
+
पश्चिम मध्य •
|
| 20 |
+
पूर्व •
|
| 21 |
+
पूर्व तटीय •
|
| 22 |
+
पूर्व मध्य •
|
| 23 |
+
मध्य •
|
| 24 |
+
कोकण
|
| 25 |
+
भारतीय कंटेनर निगम लिमिटेड •
|
| 26 |
+
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया •
|
| 27 |
+
इंडियन रेल्वे फायनान्स कॉर्पोरेशन •
|
| 28 |
+
इंडियन रेल्वे केटरिंग अँड टुरिझम कॉर्पोरेशन •
|
| 29 |
+
इरकॉन इंटरनॅशनल लिमिटेड •
|
| 30 |
+
कोकण रेल्वे कॉर्पोरेशन •
|
| 31 |
+
मुंबई रेल्वे विकास प्राधिकरण •
|
| 32 |
+
रेल विकास निगम लिमिटेड •
|
| 33 |
+
रेलटेल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया •
|
| 34 |
+
राइट्स लिमिटेड
|
| 35 |
+
बनारस रेल्वे इंजिन कारखाना •
|
| 36 |
+
चित्तरंजन लोकोमोटिव्ह कार्यशाळा •
|
| 37 |
+
डीझेल रेल्वे इंजिन आधुनिकीकरण कारखाना •
|
| 38 |
+
इंटिग्रल कोच कारखाना •
|
| 39 |
+
रेल डबा कारखाना •
|
| 40 |
+
रेल चाक कारखाना •
|
| 41 |
+
रेल स्प्रिंग कारखाना
|
| 42 |
+
दिल्ली–हावडा मुख्य रेल्वेमार्ग •
|
| 43 |
+
दिल्ली–गया–हावडा रेल्वेमार्ग •
|
| 44 |
+
दिल्ली−चेन्नई रेल्वेमार्ग •
|
| 45 |
+
दिल्ली–मुंबई रेल्वेमार्ग •
|
| 46 |
+
हावडा−नागपूर−मुंबई रेल्वेमार्ग •
|
| 47 |
+
हावडा−अलाहाबाद−मुंबई रेल्वेमार्ग •
|
| 48 |
+
हावडा−चेन्नई रेल्वेमार्ग •
|
| 49 |
+
मुंबई–चेन्नई रेल्वेमार्ग
|
| 50 |
+
चेन्नई उपनगरी रेल्वे •
|
| 51 |
+
दिल्ली उपनगरी रेल्वे •
|
| 52 |
+
हैदराबाद एम.एम.टी.एस. •
|
| 53 |
+
कोलकाता उपनगरी रेल्वे •
|
| 54 |
+
कोलकाता मेट्रो •
|
| 55 |
+
मुंबई उपनगरी रेल्वे
|
| 56 |
+
वंदे भारत एक्सप्रेस •
|
| 57 |
+
गतिमान एक्सप्रेस •
|
| 58 |
+
शताब्दी एक्सप्रेस •
|
| 59 |
+
राजधानी एक्सप्रेस •
|
| 60 |
+
हमसफर एक्सप्रेस •
|
| 61 |
+
दुरंतो एक्सप्रेस •
|
| 62 |
+
संपर्क क्रांती एक्सप्रेस •
|
| 63 |
+
जन शताब्दी एक्सप्रेस •
|
| 64 |
+
विवेक एक्सप्रेस •
|
| 65 |
+
राज्यराणी एक्सप्रेस •
|
| 66 |
+
दार्जिलिंग हिमालय रेल्वे •
|
| 67 |
+
निलगिरी पर्वतीय रेल्वे •
|
| 68 |
+
कालका-सिमला रेल्वे •
|
| 69 |
+
पॅलेस ऑन व्हील्स •
|
| 70 |
+
डेक्कन ओडिसी •
|
| 71 |
+
गोल्डन चॅरियट
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10030.txt
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|
@@ -0,0 +1,2 @@
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| 1 |
+
पश्चिम सुमात्रा (बहासा इंडोनेशिया: Sumatera Barat) हा सुमात्रा बेटावर वसलेला इंडोनेशिया देशाचा एक प्रांत आहे.
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| 2 |
+
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10035.txt
ADDED
|
@@ -0,0 +1 @@
|
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| 1 |
+
पश्चिमोत्तानासन हे एक योगासन आहे. 'पश्चिम' या शब्दाचा एक अर्थ 'पाठीमागची बाजू' असाही होतो. या आसनात मानेपासून पायांच्या घोट्यापर्यंतच्या सर्व पाठीमागच्या शरीराच्या भागास ताण मिळतो म्हणून याला पश्चिमोत्तानासन म्हणतात.
|
dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10041.txt
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@@ -0,0 +1,9 @@
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| 1 |
+
२२° ३४′ ००″ N, ८८° २२′ ००″ E
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| 2 |
+
पश्चिम बंगाल / wɛst bɛŋɡɔ ː लसिथ / (बांग्ला: পশ্চিমবঙ্গ) हे भारतातील पूर्व भागात असलेले एक राज्य आहे आणि लोकसंख्येच्या घनतेनुसार देशातील चौथ्या क्रमांकाचे राज्य आहे. तसेच जगातील सातव्या सर्वात दाट लोकवस्ती असलेला प्रदेश आहे. ९१ दशलक्ष रहिवासी . [ ३४ ] .२६७ चौरस मैल ( ८८,७५० चौकिमी) पसरलेल्या , या राज्याच्या सीमा नेपाळ , भूतान , आणि बांगलादेश या देशांना आणि ओडिशा , झारखंड , बिहार , सिक्कीम , आसाम या भारतातील राज्यांना लागून आहेत . या राज्याची राजधानी कोलकाता आहे . पश्चिम बंगाल दोन ब्रॉड नैसर्गिक प्रदेशात करतात : दक्षिणभागात गंगा नदीचा प्रदेश व उत्तरभागात हिमालयाचे क्षेत्र.
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| 3 |
+
प्राचीन बंगाल अनेक प्रमुख वैदिक राज्यांच्या सत्तेखाली होते . आणि प्रादेशिक पाल साम्राज्य ( 11 शतक आठव्या ) आणि शिवसेना राजवंश ( 11 - 12 शतक ) भाग ; बंगाल प्रदेश अशा मौर्य साम्राज्य ( दुसरे शतक इ.स.पू. ) आणि गुप्त साम्राज्य ( चौथ्या शतकापासून ) म्हणून मोठ्या भारतीय empires भाग होता . पुढे 13 व्या शतकात पासून , प्रदेश १८ व्या शतकात ब्रिटिश नियम सुरुवातीला होईपर्यंत , अनेक sultans , हिंदू राजे आणि Baro - Bhuyan landlords राज्य आले. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इ.स. १७५७ मध्ये प्लासीच्या लढाई खालील प्रदेशात सुटीच्या धरून सिमेंटची , आणि कलकत्ता शहराने ब्रिटिश भारताची राजधानी म्हणून अनेक वर्षे काम केले . ब्रिटिश प्रशासनासाठी लवकर आणि प्रदीर्घ प्रदर्शनासह पाश्चात्य शिक्षण विस्तार , विज्ञाननिष्ठ विकास culminating , संस्थात्मक शिक्षण , आणि बंगाल १४ १५ व १६ व्या शतकांतील विद्येचे पुनरुज्जीवन म्हणून ओळखले झाले काय समावेश विभागाचे सामाजिक सुधारणा , परिणत . नव्याने तयार पाकिस्तान - नंतर भारत आणि पूर्व बंगाल - एक भाग पश्चिम बंगाल - राज्य : २० व्या शतकाच्या माध्यमातून भारतीय स्वातंत्र्य चळवळीचा एक वाढीला अनुकूल अशी जागा , बंगाल दोन वेगळे घटक मध्ये धार्मिक ओळी बाजूने १९४७ मध्ये भारताच्या स्वातंत्र्य दरम्यान वाटून करण्यात आला 1971 मध्ये बांगलादेश होत .
|
| 4 |
+
मुख्य कृषी उत्पादक , पश्चिम बंगाल भारतातील निव्वळ घरगुती उत्पादनाच्या सहाव्या क्रमांकाचा वर्गणीदार आहे . [ 6 ] त्याच्या राजकीय कृतिवाद साठी , राज्य तीन दशके लोकशाही मार्गाने/पद्धतीने निवडून साम्यवादी सरकार राज्य करण्यात आली असावी. पश्चिम बंगाल त्याच्या स��ंस्कृतिक उपक्रम आणि सांस्कृतिक आणि शैक्षणिक संस्था उपस्थिती साठी नोंद आहे ; राज्याची राजधानी कोलकाता " भारत सांस्कृतिक राजधानी " म्हणून ओळखले जाते . राज्याचे सांस्कृतिक वारसा , बदलेला लोकसाहित्याचा परंपरा याशिवाय , नोबेल - इंग्लंडमध्ये राजकवी ही पदवी रवींद्रनाथ टागोर समावेश साहित्य पासून संगीतकारच्या स्कोअर , चित्रपट निर्मात्यांना आणि कलाकारांचे श्रेण्या . पश्चिम बंगाल देखील त्याचे कौतुक आणि राष्ट्रीय आवडत्या खेळात क्रिकेट याशिवाय फुटबॉल खेळतानाचा सराव सर्वात इतर भारतीय राज्यांच्या पेक्षा वेगळी आहे .
|
| 5 |
+
पश्चिम बंगाल दक्षिण बंगालचा उपसागर उत्तर हिमालयाच्या पासून stretching , भारत पूर्व अडचण आहे . राज्य 88.752 चौरस किलोमीटर ( 34,267 चौरस मैल ) एकूण क्षेत्र आहे .राज्याच्या उत्तर भागात दार्जिलिंग,हिमालयातील थंड हवेचे ठिकाण आहे.हा प्रदेश Sandakfu ( 3,636 मीटर किंवा 11.929 फूट) - राज्यातील सर्वोच्च शिखर . [ 46 ] अरुंद Terai प्रदेश कोणत्या वळण संक्रमणे दक्षिण दिशेला गंगेचा त्रिभुज प्रदेश आहे, ते हा प्रदेश वेगळे समाविष्टीत आहे. Rarh प्रदेश पूर्वेला गंगा त्रिभुज आणि पश्चिम पठार आणि उच्च जमिनी दरम्यान हस्तक्षेप . Sundarbans पाणथळ प्रदेशातील झाड जंगले गंगा त्रिभुज एक उल्लेखनीय भौगोलिक शोध तयार करताना एक लहान सागरी किनारपट्टी प्रदेश , अत्यंत दक्षिणेला आहे .
|
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गंगा पश्चिम बंगाल मध्ये विभाजीत करते मुख्य नदी आहे . इतर भागीरथी नदी व हुगळी नदी म्हणून पश्चिम बंगाल वाहते करताना एक शाखा , पद्मा किंवा Pôdda म्हणून बांगलादेश प्रवेश . गंगा प्रती Farakka मोठे धरण एक विमान कालवा करून नदी हुगळी शाखा फीड आणि त्याच्या पाणी प्रवाह व्यवस्थापन भारत आणि बांगलादेश यांच्यातील प्रदीर्घ वाद एक स्रोत केले आहे . [ 47 ] तीस्ता , Torsa , Jaldhaka आणि Mahananda नद्या उत्तर आहेत डोंगराळ प्रदेश. पाश्चिमात्य पठार प्रदेश अशा दामोदर , अजय आणि Kangsabati म्हणून नद्या आहेत . गंगा डेल्टा व Sundarbans क्षेत्र असंख्य नद्या आणि creeks आहेत . नदी मध्ये पणे स्वैर कचरा पासून गंगा प्रदूषण ही मोठी समस्या आहे . [ 48 ] दामोदर , गंगा आणि एकदा ( संपुष्टात त्याच्या वारंवार पूर करण्यासाठी ) " बंगालच्या दुः ख " म्हणून ओळखले आणखी उपनदी , दामोदर अंतर्गत अनेक धरणे आहेत व्हॅली प्रकल्प . राज्यात किमान नऊ जिल्ह्यांमध्ये भूच्या जालीम विषकारी द्रव्य घाण ग्रस्त , आणि अंदाजे 8.7 दशलक्ष लोक वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनायझेशन वरील जालीम विषकारी द्रव्य असलेली पाणी 10 μg / लक्ष्मीपती [ 49 ] मर्यादा शिफारस प्यावे
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पश्चिम बंगाल वातावरणात उत्तर subtropical दमट करण्यासाठी दक्षिणेकडील भाग मध्ये उष्णदेशीय (विशेषतः आफ्रिकेच्या) उष्ण प्रदेशातील गवताळ प्रदेश पासून बदलते. मुख्य हंगाम उन्हाळ्यात , पावसाळ्यात , अल्प शरद ऋतूतील , आणि हिवाळा आहेत . त्रिभुज प्रदेशातील उन्हाळ्यात अति आर्द्रता साठी नोंद असताना , पश्चिम हाईलॅंड्स 38 ° क ( 100 ° फॅ ) 45 ° क ( 113 ° फॅ ) ह्या सर्वोच्च दिवस तापमान सह , उत्तर भारतासारख्या कोरड्या उन्हाळ्यात अनुभव . [ 50 ] रात्री एक थंड दक्षिणेकडून ब्रीझ बंगालचा उपसागर पासून ओलावा आहे. लवकर उन्हाळ्यात Kalbaisakhi , किंवा Nor'westers म्हणून ओळखले संक्षिप्त squalls आणि प्रचंड वादळे , अनेकदा घडतात . [ 51 ] पश्चिम बंगाल एक वायव्य दिशेने आणले जाते की हिंदी महासागरावरील मोसमी बंगाल शाखेच्या बे मिळते. Monsoons जून ते सप्टेंबर संपूर्ण स्थितीवर पाऊस आणणे . 250 सें.मी. वरील मिसळलेल्या पाऊस दार्जिलिंग , Jalpaiguri आणि Cooch Behar जिल्ह्यात साजरा केला जातो . Monsoons येण्याच्या दरम्यान , बंगाल प्रदेश उपसागर मध्ये कमी दाब अनेकदा किनारपट्टीच्या भागात वादळच्या घटना ठरतो . हिवाळी ( डिसेंबर जानेवारी ) सेवनाने आर्द्रता पातळी कमी 15 ° क ( 59 °F ) . हिवाळ्यात [ 50 ] एक थंड आणि कोरड्या उत्तर वारा एकेरीवर सरासरी किमान तापमान , सह प्लेस प्रती सौम्य आहे . तथापि , दार्जिलिंग Himalayan हिल प्रदेश ठिकाणी अधूनमधून एका वेळी होणारा (किंवा विशिष्ट कलखंडात होणारा) एकून हिमवर्षाव एक असह्य हिवाळा अनुभव .
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यावरील विस्तृत लेख पहा - पश्चिम बंगालमधील जिल्हे
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पश्चिम बंगाल राज्यात २३ जिल्हे आहेत.
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संत ज्ञानेश्वर विरचित ज्ञानेश्वरी या ग्रंथातील शेवटच्या -(ओवी १७९४ ते १८०२)- १८ व्या अध्यायाचे समापन पसायदान या प्रार्थनेने होते.
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ज्ञानेश्वरीच्या सुरुवातीला वेदांनी सांगितलेल्या आणि आत्मरूपात वसलेल्या ज्या रूपाचे वर्णन करता करता, शेवटच्या अध्यायात ज्ञानेश्वर त्याच विश्वात्मक (विश्व व्यापक असून विश्वाहून निराळ्या) देवाला आपण केलेल्या ज्ञानेश्वरीरूपी वाग् यज्ञाचे फल स्वरूप म्हणून पसायदान (प्रसाद) मागताना म्हणतात .........
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जे खळांची व्यंकटी सांडो | तयां सत्कर्मीं रती वाढो ||
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भूतां परस्परें जडो | मैत्र जीवांचें ||
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ज्या व्यक्ती खळ (वाईट प्रवृत्तीच्या) आहेत त्यांच्यातील खलत्व (वाईट प्रवृत्ती) नुसतीच जावो (नष्ट होवो) नव्हे, तर त्यांची प्रवृत्ती सत्प्रवृत्तीत परावर्तित व्हावी आणि ह्याची फलश्रुती म्हणजे सर्वच व्यक्ती सर्वांचे मित्र होवोत ! { जेथे भगवंताने "विनाशायच दुष्कृताम्" ( दुष्टांचा नाश करण्यासाठी) मी जन्म घेतो असे म्हंटले, त्याच भगवंताकडे ज्ञानेश्वरांनी प्रेमबुद्धीने असा "प्रसाद" मागितला}
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पसायदानामध्ये सर्व प्राणिमात्रांमध्ये प्रेमाची भावना निर्माण व्हावी व मनातील दुष्ट भावनांचा नाश व्हावा अशी विनंती ज्ञानेश्वर महाराज करतात. Archived 2016-08-25 at the Wayback Machine.
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दुरिताचें तिमिर जावो | विश्व स्वधर्म सूर्यें पाहो || जो जे वांछील तो ते लाहो | प्राणिजात ||३||
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वेदांनी गायलेल्या "तमसो मा सद्गमय |" ज्याप्रमाणे आगीचा धर्म जाळणे, नदीचा प्रवाहित राहणे, त्याच प्रमाणे मानवाचा माणुसकीचा धर्म आपण मानला आणि त्याचा प्रत्यय प्रत्येकाच्या जीवनात आला तर त्या धर्मरूपी सूर्याच्या प्रकाशाने विश्वातील प्रत्येकाचे जीवन उजळून निघेल. ह्याचा परिणाम असा होईल की, ज्याला ज्याला जे जे हवे ते मिळेल, कारण जर एका व्यक्तीची मागणी ही जर धार्मिक असेल तर, ती दुसऱ्या व्यक्तीचे कर्तव्य असेल आणि येथे तर "माउलींनी" 'प्राणिजात' असे बोलून जगातील यच्चयावत प्राणिमात्रांच्या धर्माची ग्वाही दिली आहे !
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निर्मळ मनाने अखिल विश्वाच्या कल्याणासाठी, एका भक्ताने हात जोडून प्रत्यक्ष जगन्नीयंत्याकडे केलेली विश्वप्रार्थना म्हणजे पसायदान. मनात व्यक्तींचीतही आपपरभाव न ठेवता शुद्ध आणि निरागसतेने परमेश्वराकडे विश्व कल्याणासाठी केलेले आर्त मागणे म्हणजे पसायदान. आपले इवलेसे हात पसरून त्या ओंजळीत परमेश्वराकडे असं देणं मागणं की ज्यामुळे अखिल विश्वात शांती, समृद्धी, ज्ञान आणि समाधान कायमस्वरूपी नंदावे, यासाठी केलेली प्रार्थना म्हणजे पसायदान.
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आतां विश्वात्मकें देवें । येणें वाग्यज्ञें तोषावें । तोषोनि मज द्यावें । पसायदान हें ॥ १ ॥
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जे खळांची व्यंकटी सांडो । तयां सत्कर्मीं रती वाढो । भूतां परस्परें जडो। मैत्र जीवांचें ॥ २ ॥
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दुरिताचें तिमिर जावो । विश्व स्वधर्म सूर्यें पाहो । जो जें वांच्छील तो तें लाहो । प्राणिजात ॥ ३ ॥
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वर्षत सकळमंगळीं । ईश्वर निष्ठांची मांदियाळी । अनवरत भूमंडळीं । भेटतु या भूतां ॥ ४ ॥
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चलां कल्पतरूंचे आरव । चेतना चिंतामणीचें गांव । बोलते जे अर्णव । पीयूषाचे ॥ ५ ॥
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चंद्रमे जे अलांछन । मार्तंड जे तापहीन । ते सर्वांही सदा सज्जन । सोयरे होतु ॥ ६ ॥
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किंबहुना सर्वसुखीं । पूर्ण होऊनि तिहीं लोकीं । भजिजो आदिपुरुखीं । अखंडित ॥ ७ ॥
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आणि ग्रंथोपजीविये । विशेषीं लोकीं इयें । दृष्टादृष्ट विजयें । होआवें जी ॥ ८ ॥
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येथ म्हणे श्रीविश्वेश्वरावो । हा होईल दानपसावो । येणें वरें ज्ञानदेवो । सुखिया झाला ॥ ९ ॥
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आता विश्वात्मक देवाने, या माझ्या वाग्यज्ञाने संतुष्ट व्हावे आणि मला हे पसायदान ( प्रसाद ) द्यावे. ॥ १ ॥
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दुष्टांचे दुष्टपण नाहीसे होवो, त्यांना सत्कर्मे करण्या मध्ये स्वारस्य वाढो. सर्व प्राणीमात्रांमध्ये मित्रत्वाची भावना निर्माण होवो. ॥ २ ॥
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पापी माणसाचा अज्ञानरुपी अंधार नाहीसा होवो, विश्वात स्वधर्मरूपी सूर्याचा उदय होवो. प्राणमात्रांच्या मंगल इच्छा पूर्ण होवोत. ॥ ३ ॥
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सर्व प्रकारच्या मंगलांचा वर्षाव करणारे ईश्वरनिष्ठ संत पृथ्वीवर अवतरत जावोत आणि प्राणिमात्रांना भेटत जावोत. ॥ ४ ॥
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जे (संत) कल्पतरूंची चालती बोलती उद्याने आहेत, चेतनारूपी चिंतामणी रत्नांची जणू गावेच आहेत, अमृताचे बोलणारे समुद्रच आहेत, ॥ ५ ॥
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जे कोणताही डाग नसलेले निर्मळ चंद्रच आहेत, तापहीन सूर्यच आहेत असे संतसज्जन सर्व प्राणिमात्रांचे मित्र होवोत. ॥ ६ ॥
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तिन्ही लोकांनी सर्व सुखांनी परिपूर्ण होऊन अखंडितपणे विश्वाच्या आदिपुरुषाची सेवा करावी. ॥ ७ ॥
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हा ग्रंथ ज्यांचे जीवन आहे, त्यांनी या जगातील दृष्य आणि अदृष्य भोगांवर विजयी व्हावे. ॥८ ॥
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यावर विश्वेश्वर गूरु श्री निवृत्तीनाथ म्हणाले की हा प्रसाद तुला लाभेल. या वराने ज्ञानदेव सुखी झाले. ॥ ९ ॥
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१.सारांशाने एखाद्या ग्रंथातील विचार जसा समजतो तसा ज्ञानेश्वरीतील विचार सारांशरूपाने "पसायदानात" मांडलेला आहे. पसायदान ही प्रार्थना आहे. या प्रार्थनेचे वैशिष्ट्य हे की ती धर्म, पंथ, काल या सर्वांच्या पलीकडे आहे. सर्व आणि सर्वकालीन मानवांसाठी केली गेलेली ती प्रार्थना आहे. संत ज्ञानेश्वर यांनी चराचर व्यापलेल्या परमेश्वराकडे मागणे मागितले आहे. येथे कोणाही विशिष्ट देवतेचे नाव घेतलेले नाही. कोणत्या विशिष्ट पंथाचाही निर्देश केलेला नाही. हा ईश्वर "विश्वात्मक" आहे.ज्ञानेश्वरांची ईश्वरासंबंधी कल्पना या प्रार्थनेत साररूपाने आलेली आहे.
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मानवजातीच्या व्यवहारातील सर्व अनिष्टे ज्या प्रवृत्तीतून उत्पन्न होतात ते खलत्व. माणसांची ही खलवृत्ती व्यक्तिगत व सांघिक स्वरूपात कार्य करीत असते. सर्वत्र मंगलाची स्थापना व्हायची असेल तर हे खलत्व नष्ट व्हायला हवे. ज्ञानेश्वर मानतात की ही खलवृत्ती निसर्गदत्त नसून परिस्थितजन्य आहे. माणसाची वृत्ती ही एक सचेतन शक्ती आहे. तिला योग्य कार्य मिळायला हवे.त् यासाठी खलत्व नाहीसे व्हायला हवे. मैत्र म्हणजे निःस्वार्थी, सर्वव्यापी प्रेम. हेच मानवी जीवनाचे, संस्कृतीचे आधारभूत सूत्र होईल. इतिहासातील सर्व प्रेषितांनी आणि संतांनी हाच संदेश जगाला दिला आहे, आणि प्रसंगी त्यासाठी प्राणार्पणासह सर्व प्रकारचे शासनही स्वीकारलेले आहे.
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दुष्कर्म नाहीसे होऊन सर्व विश्व आपापल्या कर्तव्याच्या जाणिवेने कार्यरत असणे अपेक्षित आहे. इच्छा कोणतीही असो, ऐहिक वा आध्यात्मिक, व्यक्तीच्या वा समाजाच्या जीवनात त्यामुळे संघर्ष होता कामा नयेत. असे सज्जन सर्वांचे आप्त होवोत आणि विश्वात्मकाची उपासना करोत असा आशय यामध्ये आहे.[१]
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२.ज्ञानेश्वरांचा भाव हृदय परिवर्तनावर दिसतो. मानवी मनाला आंतरिक आनंद लाभावा, सर्वांना अनन्य साधारण शांती मिळावी यासाठी ही प्रार्थना आहे.
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देवाला येथे "विश्वात्मक" असे विशेषण लावले आहे. जगाला परमवस्तूवाचून वेगळे अस्तित्व नाही असे दर्शन ज्ञानेश्वरीत अखंडपणे आलेले आहे. यामध्ये गुरू हाच परमेश्वर असाही एक विचार दिसून येतो. पापी, दुराचारी याऐवजी यामध्ये "खल" हा प्रवृत्तिवाचक शब्द वापरलेला दिसतो. ज्याला आत्मोन्नती साधायची आहे त्याने आपल्यातील वाईट वृत्तींचा बीमोड करायला हवा. सत्संगतीने स्व��ावदोष दूर होऊ शकतात. व्यक्तीच्या विकृतींवरील सोपा आणि सहज उपचार सुसंस्कारांचा आहे. तयां सत्कर्मीं रती वाढो म्हणताना त्यात कर्माविषयीचा शास्त्र-चर्चित अर्थ सूचित करायचा आहे. वैयक्तिक स्तरावर सत्कर्माचे प्रेम आणि सामाजिक स्तरावर सर्वांबद्दल प्रीती वाटली पाहिजे. हे घडले तर व्यक्ती आणि समाज यांचे ऐक्य होण्यास उपयोगी ठरेल.[२]
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३.दुरिताचें तिमिर जावो |विश्व स्वधर्मसूर्यें पाहो |जो जें वांछील तो तें लाहो | प्राणिजात|
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दुरित म्हणजे पाप, तिमिर म्हणजे अंधार, पापरूपी अंधाराचा नाश होवो. सगळ्या विश्वाने स्वधर्मरूपी सूर्याच्या प्रकाशात पाहावे, मग सर्व प्राण्यांना ज्याला जे हवे असेल ते मिळेल.
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पाप म्हणजे काय?
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सत्त्व, रज आणि तम या तीन गुणांच्या कमी-अधिक प्राबल्याने मनुष्याचे आचरण बनते. `रज-तम'च्या जोराने काम आणि त्यामुळे लोभ, मद, मोह, मत्सर हे शत्रू बलवान होतात, मानव पापाचरणास प्रवृत्त होतो. म्हणून स्वधर्म म्हणजे निष्कामवृत्तीने कर्माचरण. हा गीतेचा मुख्य विषय आहे. भागवतधर्माचे सारही हेच आहे. स्वधर्म आचरणाच्या प्रकाशात सर्वाना पाहिजे ते मिळेल असे ज्ञानेश्वर म्हणतात.[३]
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राग पहाडी हा भारतीय शास्त्रीय संगीतातील एक राग आहे.
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पहारे हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील ठाणे जिल्ह्यातील भिवंडी तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उन्हाळ्यात फारच उष्ण व दमट असते. हिवाळ्यात शीतल व कोरडे असते. पावसाळ्यात भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो व हवामान समशीतोष्ण व दमट असते.पावसाळ्यात भरपूर पाऊस पडत असल्याने मुख्य खरीप पीक म्हणून भाताची लागवड केली जाते.
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कुमारगुप्त (इस. ४१४ ते ४५५) हा गुप्त साम्राज्याचा राज्यकर्ता सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य याचा वारसदार होता व एक सक्षम राज्यकर्ता देखील. याने परंपरागत मिळालेले गुप्त साम्राज्य टिकवून ठेवण्यात मोठा वाटा उचलला.
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कुमारगुप्त याने दिल्ली येथे उभारलेला लोहस्तंभ १७०० वर्षांनंतरही शाबूत आहे. व त्यावर कुमारगुप्तचा लेख आहे. हा लोहस्तंभ धातुशास्त्र या शास्त्रातील एक आश्चर्य मानले जाते. हा स्तंभ सुरुवातीला एका देवळाचा भाग होता व त्यावर गरुड मुद्रा होती. आज देवळाचा फक्त स्तंभ सोडल्यास कोणतेही अवशेष शिल्लक नाहीत व इस्लामी आक्रमणानंतर याला मशीदीत समावण्यात आले. असे मानतात की हा स्तंभ इस्लामी तोफखानाच्या माराही सहन करून आजही शाबूत उभा आहे.
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पहिला कृष्णराज वोडेयार तथा दोड्डा कृष्णराज (१८ मार्च, १७०२ - ५ मार्च, १७३२) हा मैसुरुचा १६वा राजा होता. हा यदुराय वोडेयारचा शेवटचा थेट वंशज होता. पहिला कृष्णराज १७१४-१७३२ अशी १८ वर्षे सिंहासनावर होा.
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पहिल्या कृष्णराजाचा जन्म १८ मार्च १७०२ रोजी झाला. हा दुसरा कांतीरव नरसराज आणि त्याची दुसरी पत्नी महाराणी चेल्वजा अम्मानी देवी यांचा पहिला मुलगा होता. आपल्या वडिलांच्या मृत्यूनंतर ९ वर्षे वयात कृष्णराज मैसुरुचा राजा झाला. याला ९ बायका होत्या. याला स्वतःला एक मुलगा झाला परंतु तो सहा महिन्यांतच मृत्यू पावला. मैसुरुच्या सिंहासनावर कृष्णराय हा यदुरायाचा शेवटचा थेट वंशज होता. याच्यानंतर त्याच्या दत्तक मुलांपैकी एक सातवा चामराज नावाने राजा झाला.
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दोड्डा कृष्णराजाच्या राज्यारोहणाच्या आधी, मैसुरुच्या उत्तर आणि ईशान्येकडे असलेल्या मुघल साम्राज्याच्या सिरा प्रांतात प्रशासकीय बदल झाला होता. [१] यांत मैसुरुच्या आसपास असलेल्या सुपीक प्रदेशाचा महसूल गमावल्यामुळे आर्कोटच्या प्रशासक सादतउल्ला खान याने कडप्पा, कुर्नूल, सावनूर येथील राजे तसेच गुट्टीचा मराठा राजा यांच्या संगनमताने त्याने कृष्णराजाविरुद्ध मोर्चा उभारला. [१] तथापि, हा प्रदेश आणि महसूल या युतीच्या घशात पडू नये म्हणून सीराच्या नवाबाने श्रीरंगपट्टणवर स्वतःच चाल केली. [१] दोघांचाही मतलब एकच (मैसुरुचा प्रदेश गिळंकृत करणे) असल्याने आर्कोट आणि सिरा या दोन्ही नवाबांनी श्रीरंगपट्टणवर संयुक्त आक्रमण केले. [१] आपल्या पूर्वजांप्रमाणे अशा चढाईला प्रत्युत्तर देउन शत्रूला हाकलून देण्याऐवजी कृष्णराजाने १ कोटी रुपयांची खंडणी मान्य केली व मैसुरुवरील हे संकट टाळले.[१] परंतु यामुळे मैसुरु हतबल असल्याचे शत्रूला वाटले आणि शत्रू सोकावला. यानंर दोन वर्षांनी मराठा सैन्याने थेट श्रीरंगपट्टणवर हल्ला करून लुटून नेले. [१] या सगळ्यामुळे मैसुरुचा खजिना रिकामा होऊ लागला. तो भरण्यासाठी कृष्णराजने उत्तरेच्या मगादीच्या पाळेगारावर हल्ला करून त्याचा प्रदेश मैसुरुमध्ये लावून घेतला. [१]
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कृष्णराजाला राज्याच्या कारभारात फारसा रस नव्हता. हे पाहून त्याचा दिवाण आणि चुलतभाऊ नंजरजा आणि सेनापती देवराज यांनी कारभार हाती घेतला. १७३२मध्ये कृष्णराजाच्या मृत्यूनंतर त्यांनी सिंहासनावर आपल्या ह��तात राहतील असे राजे बसवले. हे हैदर अलीच्या उदयापर्यंत सुरू राहिले.
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चामराजा वोडेयार पहिला (बेट्टाडा चामराजा; १४०८ - १४५९) हा १४२३पासून मृत्यूपर्यंत मैसुरुचा दुसरा राजा होता. तो वडियार घराण्याचा यदुरायाचा मोठा मुलगा होता.
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चामराज सत्तेवर आला तेव्हा यदुरायाने स्थापलेली जहागीर २४ वर्षे जुनी होती आणि विजयनगर साम्राज्याला आधीन होती. विजयनगरचे साम्राज्या या सुमारास भरभराटीत असले तरीही तेथील राजकीय अस्थिरतेचा फायदा घेत यदुरायानंतर चामराजाने मैसुरुच्या आसपासच्या वाड्या-वस्त्या आणि छोटी शहरे आपल्या जहागिरीत शामिल करून घेतली.
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चामराजने, विजय बुक्का राय, देवराया दुसरा आणि मल्लिकार्जुन राया अशा तीन सम्राटांना आधीन राहून ३६ वर्षे राज्य केले. यदुराय आणि चामराजाच्या ६० वर्षांच्या सततच्या अंमलामुळे राज्याला स्थैर्य आले आणि विजयनगर साम्राज्याील एक समर्थ घटक बनले.
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तलाल इब्न अब्दुल्ला (लेखनभेद: तलाल इब्न अब्दल्ला ; अरबी: طلال بن عبد الله ; रोमन लिपी: Talal I bin Abdullah ;) (२६ फेब्रुवारी, इ.स. १९०९ - ७ जुलै, इ.स. १९७२) हा जॉर्डनाचा दुसरा राजा होता. याने २० जुलै, इ.स. १९५१ ते ११ ऑगस्ट, इ.स. १९५२ या कालखंडात सिंहासनस्थ होता. याच्या अल्प कारकिर्दीत जॉर्डनाच्या हाशेमी राज्याची आधुनिक व उदारमतवादी राज्यघटना बनवली गेली. प्रकृतिअस्वास्थ्यामुळे (वृत्तांनुसार छिन्नमनस्कतेमुळे[१]) याला राजेपदावरून पायउतार व्हावे लागले. याच्यानंतर याचा मुलगा हुसेन राजा बनला.
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तलालाचा जन्म अब्दुल्ला व त्याची पहिली पत्नी मुस्बा बिंती नासर यांच्या पोटी २६ फेब्रुवारी, इ.स. १९०९ रोजी तत्कालीन ओस्मानी साम्राज्यात मोडणाऱ्या मक्केत झाला. त्याचे सैनिकी शिक्षण रॉयल मिलिटरी अकॅडमी ऑफ सॅंडहर्स्ट या ब्रिटिश सैन्यप्रशिक्षण विद्यालयात झाले. इ.स. १९२९ साली पदवी मिळवल्यानंतर तो अल-जैश अल-अरबी सैन्याच्या घोडदळात द्वितीय लेफ्टनंट पदावर रुजू झाला.
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जॉर्डनाचा राजा असलेला त्याचा पिता पहिला अब्दुल्ला याचा जेरूसालेम येथे खून झाल्यानंतर तलाल सिंहासनावर बसला. याच्या अल्प कारकिर्दीत जॉर्डनाच्या हाशेमी राजतंत्राची आधुनिक व उदारमतवादी राज्यघटना रचली गेली. या राज्यघटनेद्वारे सामुदायिक पातळीवर जॉर्डेनियन शासन व वैयक्तिक पातळीवर मंत्री जॉर्डेनियन संसदेस जबाबदार ठरले. १ जानेवारी, इ.स. १९५२ रोजी ही नवी राज्यघटना संमत होऊन स्वीकारण्यात आली.
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ब्राझीलचा पहिला पेद्रो (पोर्तुगीज: Pedro I) (ऑक्टोबर १२, इ.स. १७९८ - सप्टेंबर २४, इ.स. १८३४ हा ब्राझीलचा सम्राट होता.
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पेद्रोने ब्राझीलला पोर्तुगालपासून स्वतंत्र जाहीर केले व स्वतःला तेथील सम्राट घोषित केले. याआधी पेद्रो अल्पकाळाकरता चौथा पेद्रो या नावाने पोर्तुगालचा राजा होता.
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याचे पूर्ण नाव पेद्रो दि अल्कांतारा फ्रांसिस्को ॲंतोनियो होआव कार्लोस हाविये दि पॉला मिगेल रफायेल होआकिम होजे गॉन्झागा पास्कोल सिप्रियानो सेराफिम दि ब्रागांसा इ बर्बन असे होते. याला दॉम पेद्रो प्रायमेरो या नावानेही ओळखतात.
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भारतीय राज्यघटनेच्या कलम ३४० चे पालन करून, २९ जानेवारी १९५३ रोजी राष्ट्रपतींच्या आदेशाने काका कालेलकर यांच्या अध्यक्षतेखाली प्रथम मागासवर्ग आयोगाची स्थापना करण्यात आली. हा 'पहिला मागासवर्गीय आयोग, १९५५' किंवा 'काका कालेलकर आयोग' म्हणूनही ओळखला जातो. [१]
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त्याच्या संदर्भाच्या अटी होत्या:
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सामाजिक आणि शैक्षणिकदृष्ट्या मागास वर्ग ओळखण्यासाठी, आयोगाने खालील निकषांचा अवलंब केला:
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शैक्षणिक आणि सामाजिकदृष्ट्या मागास म्हणून विविध समुदायांच्या वर्गीकरणासाठी खालील वर्णने वापरली गेली:
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आयोगाने ३० मार्च १९५५ रोजी आपला अहवाल सादर केला. याने संपूर्ण देशासाठी २,३९९ मागास जाती किंवा समुदायांची यादी तयार केली होती आणि त्यापैकी ८३७ (* तारांकित समुदाय) यांना 'सर्वात मागास' म्हणून वर्गीकृत केले होते, आयोगाच्या काही उल्लेखनीय शिफारसी होत्या:
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या आयोगाने अनुसूचित जाती आणि अनुसूचित जमातींच्या विद्यमान सूचीचे परीक्षण केले आणि या यादींमध्ये काही जोडण्याची आणि हटवण्याची शिफारस केली. या शिफारशींची राज्य सरकारे, अनुसूचित जमाती आयुक्त आणि उपनिबंधक जनरल यांच्याशी सल्लामसलत करून तपासणी करण्यात आली आणि सरकारने या शिफारशी अनुसूचित जाती आणि अनुसूचित जमाती आदेश (सुधारणा) कायदा, 1956 पारित करून स्वीकारल्या. (1956 चा LXIII कायदा).
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मागासवर्गीय ओळखण्यासाठी कोणत्याही वस्तुनिष्ठ चाचण्या लागू केल्या नसल्याच्या कारणावरून केंद्र सरकारने हा अहवाल फेटाळला होता. त्यामुळे दुसऱ्या मागासवर्गीय आयोगाची गरज होती. [२]
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हुआन कार्लोस पहिला (स्पॅनिश: Juan Carlos Alfonso Víctor María de Borbón y Borbón-Dos Sicilias, ५ जानेवारी १९३८) हा स्पेन देशाचा माजी राजा आहे. नोव्हेंबर १९७५ ते जून २०१४ दरम्यान राज्यपदावर राहिलेल्या हुआन कार्लोसने १९ जून २०१४ रोजी पदत्याग केला व त्याचा मुलगा फेलिपे सहावा स्पेनचा नवा राजा बनला.
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१९३९ मधील स्पॅनिश गृहयुद्धानंतर सत्तेवर आलेल्या हुकुमशहा फ्रांसिस्को फ्रांकोच्या १९७५ मधील मृत्यूनंतर केवळ दोन दिवसांनी हुआन कार्लोस राज्यपदावर आला. त्याने फ्रांकोच्या जुलुमी राजवटीनंतर स्पेनमध्ये लोकशाहीवादी सरकार आणण्यामध्ये मोठा वाटा उचलला.
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एलिझाबेथ पहिली (७ सप्टेंबर १५३३ - २४ मार्च १६०३) ही १७ नोव्हेंबर १५५८ ते मृत्यूपर्यंत इंग्लंडची व आयर्लंडची राणी होती.
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१(सशस्त्र) डिव्हीजन - भारत ही भारताच्या सैन्यातील एक डिव्हीजन आहे.
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भारतीय सेनामध्ये सात कमांड्स आहेत. लेफ्टनेंट जनरल डिव्हीजनचे नेतृत्व करतो. डिव्हीजन नेतृत्व करत आहेत.
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पहिले चीन–जपान युद्ध प्रामुख्याने कोरियाच्या अधिपत्यावरून चीन व जपान ह्या राष्ट्रांदरम्यान १८९४-९५ साली लढले गेले. सहा महिने चाललेल्या ह्या युद्धात जपानने सातत्याने विजय मिळवले व अखेर फेब्रुवारी १८९५ मध्ये चीनने सपशेल शरणागती पत्कारली. ह्या पराभवामुळे चीनमधील छिंग राजवंशाची जगभर नाचक्की झाली व त्याचवेळी पूर्व आशियामधील प्रादेशिक वरचष्मा प्रथमच चीनकडून जपानकडे आला.
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१८६८ सालच्या जपानमधील मैजी पुनर्स्थापनेनंतर जपानची झपाट्याने प्रगती व आधुनिकीकरण होत होते. अनेक शतकांचे एकाकी राहण्याचे धोरण बदलून जपानने जागतिक घडामोडींमध्ये लक्ष घालण्यास सुरुवात केली व त्याचसोबत साम्राज्यवादाचा देखील अंगिकार केला. तुलनेत शेजारील कोरिया देश मागासलेलाच राहिला होता. जपानला कोरियावर दुसऱ्या महासत्तेचे नियंत्रण नको होते व कोरियामधील नैसर्गिक संपत्तीवर व कृषी उत्पन्नावर जपानचा डोळा होता. पारंपारिक काळापासून कोरियामधील चोसून राजवंशावर चीनचा अंमल होता. १८८० च्या दशकामधील कोरियात घडलेल्या अनेक घटनांमुळे चीन व जपानमध्ये तणाव कायम राहिला.
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जून १८९४ मध्ये सोलमधील एक बंडखोरी मोडून काढण्यासाठी कोरियन सरकारने चीनची मदत मागितली. चीनने ४,८०० सैनिक कोरियामध्ये धाडल्यामुळे खवळलेल्या जपानने ८,००० बळ असलेली एक सैन्य तुकडी सोलमध्ये धाडली व कोरियन राजाची सत्ता उलथवून लावून जपानी कळसुत्री असलेले सरकार स्थापन केले. नव्या सरकारने कोरिया-चीन दरम्यानचे सर्व करार रद्द केले व जपानला चीनी सैन्याला कोरियामधून हाकलून लावण्याची परवानगी दिली. अखेर २५ जुलै १८९४ रोजी युद्धास सुरुवात झाली. सरस व आधुनिक जपानी पायदळ व आरमारापुढे अविकसित छिंग सेनेचा टिकाव लागला नाही. १७ एप्रिल १८९५ रोजी चीन व जपानदरम्यान तह झाला ज्यामध्ये चीनने कोरियाला संपूर्ण स्वातंत्र्य मंजूर केले व आपला बराचसा भूभाग जपानच्या स्वाधीन केला.
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ह्या युद्धानंतर १० वर्षांनी मांचुरिया व लायोडॉंग द्वीपकल्पाच्या अधिपत्यावरून रशिया–जपान युद्ध घडले.
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जोर्ज क्लेमेन्सो
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फेर्डिनॉंड फॉश
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| 3 |
+
एच.एच. आस्क्विथ
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| 4 |
+
डेव्हिड लॉइड जॉर्ज
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| 5 |
+
डग्ल्स हेग
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| 6 |
+
दुसरा निकोलाय
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| 7 |
+
निकोलाय निकोलायव्हिच
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| 8 |
+
आंतोन्यो सालांद्रा
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| 9 |
+
वित्तोरियो ओर्लांडो
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| 10 |
+
लुइजी कादोर्ना
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| 11 |
+
वूड्रो विल्सन
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| 12 |
+
जॉन पर्शिंग
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| 13 |
+
पाउल फॉन हिंडनबुर्ग
|
| 14 |
+
एरीख लूडेनडॉर्फ
|
| 15 |
+
पहिला फ्रांत्स योसेफ
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| 16 |
+
पहिला कार्ल
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| 17 |
+
कोनराड फॉन ह्यॉट्झेनडोर्फ
|
| 18 |
+
पाचवा मेहमेद
|
| 19 |
+
एन्वेर पाशा
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| 20 |
+
मुस्तफा कमाल अतातुर्क
|
| 21 |
+
पहिला फेर्डिनान्ड
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| 22 |
+
निकोला शेकोव्ह
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| 23 |
+
ब्रिटिश साम्राज्य ८,८४१,५४१
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| 24 |
+
फ्रान्स ८,६६०,०००
|
| 25 |
+
इटलीचे राज्य ५,०९३,१४०
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| 26 |
+
अमेरिका ४,७४३,८२६
|
| 27 |
+
रोमेनियाचे राज्य १,२३४,०००
|
| 28 |
+
जपानी साम्राज्य ८००,०००
|
| 29 |
+
सर्बियाचे राज्य ७०७,३४३
|
| 30 |
+
बेल्जियम ३८०,०००
|
| 31 |
+
ग्रीसचे राज्य २५०,०००
|
| 32 |
+
पोर्तुगाल २००,०००
|
| 33 |
+
मॉंटेनग्रो ५०,०००
|
| 34 |
+
एकूण:४२,९५९,८५०
|
| 35 |
+
१३,२५०,०००
|
| 36 |
+
७,८००,०००
|
| 37 |
+
२,९९८,३२१
|
| 38 |
+
१,२००,०००
|
| 39 |
+
एकूण: २५,२४८,३२१
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पहिले महायुद्ध, पहिले महायुद्ध, ग्रेट वॉर, किंवा वॉर टू ॲन्ड ऑल वॉर्स या नावानेही ओळखले जाते. हे युद्ध २८ जुलै१९१४ पासून ११ नोव्हेंबर १९१८ पर्यंत चालले. इतिहासातील सर्वात मोठ्या युद्धांपैकी एक अश्या या युद्धात ७ कोटी सैनिकांनी भाग घेतला ज्यापैकी ६ कोटी सैनिक युरोपियन होते. भांडखोर देशांची तांत्रिक आणि औद्योगिक प्रगती आणि प्रदीर्घ खंदक लढायांतून निर्माण झालेली 'जैसे थे' परिस्थिति यामुळे या युद्धात आणि त्याबरोबर झालेल्या विविध शिरकाणांमध्ये ९ लाखांपेक्षा जास्त सैनिक व ७ लाख नागरिक ठार झाले. हा इतिहासातील सर्वात घातक संघर्षांपैकी एक होता, आणि त्यात सामील असलेल्या अनेक देशांमध्ये क्रांती किवा मोठ्या राजकीय बदलांसाठी कारणीभूत झाला. युद्धापूर्वीच्या सुप्त संघर्षांचे पूर्ण निराकरण न झाल्याने या युद्धाअखेरीस एकवीस वर्षांनंतर झालेल्या दुसऱ्या महायुद्धाची बीजे रोवली गेली.
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दोस्त राष्ट्रे किंवा ट्रिपल ऑंतॉंत (रशियन साम्राज्य, फ्रेंच तिसरे प्रजासत्ताक आणि ग्रेट ब्रिटन व आयर्लंडचे संयुक्त राजतंत्र) आणि केन्द्रीय सत्ता (जर्मनी आणि ऑस्ट्रिया-हंगेरी) या दोन गटात झालेल्या या युद्धात जगातील सर्व आर्थिक महासत्ता ओढल्या गेल्या. जरी इटली हा जर्मनी आणि ऑस्ट्रिया-हंगेरी यांच्याबरोबर तिहेरी युतीचा सदस्य असला तरी, ऑस्ट्रिया-हंगेरीने युतीच्या अटींविरुद्ध जाऊन आक्रमण केल्यामुळे त्याने केन्द्रीय सत्तांच्या बाजून�� युद्धात भाग घेतला नाही. जसजसे अधिकाधिक देश या युद्धात सामील झाले तसतशी युद्धपूर्व आघाड्यांची वाढ आणि पुनर्रचना झाली. इटली, जपान आणि अमेरिकेची संयुक्त संस्थाने दोस्त राष्ट्रांत सामील झाले, तर ओस्मानी साम्राज्य आणि बल्गेरिया केन्द्रीय सत्तांमध्ये सामील झाले.
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२८ जून् १९१४ रोजी सारायेव्होमध्ये जहाल युगोस्लाव्ह राष्ट्रवादी गॅव्ह्रिलो प्रिन्सिप यांनी ऑस्ट्रिया-हंगेरीच्या सिंहासनचा वारसदार असलेल्या ऑस्ट्रियाचे आर्चड्यूक फ्रांझ फर्डिनांड यांची हत्या केली आणि या युद्धाची ठिणगी पडली. फ्रान्झ फर्डिनांडच्या मृत्यूनंतर जर्मन साम्राज्याच्या चिथावणीवरून ऑस्ट्रिया-हंगेरीने सर्बियासोबत युद्धाची घोषणा केली. या आधीच्या दशकात झालेल्या विविध करारांनी युरोपातील सर्वच देश परस्परांशी बांधले गेले होते. त्यामुळे जेव्हा २३ जुलै रोजी ऑस्ट्रिया-हंगेरीने सर्बियाला निर्वाणीचा इशारा पाठवला, तेव्हा एक राजनैतिक पेचप्रसंग निर्माण झाला. काही आठवड्यांतच प्रमुख सत्ता युद्धात उतरल्या, आणि जुलै १९१४ मध्ये बाल्कन भागात सुरू झालेले हे युद्ध झपाट्याने पूर्ण युरोपभर पसरले.
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सर्वात आधी २४-२५ जुलै रोजी रशियाने आपलया सैन्याची अंशतः जमवाजमव सुरू केली. २८ जुलै रोजी ऑस्ट्रो-हंगेरियन लोकांनी सर्बियाविरुद्ध युद्ध घोषित केले त्यापाठोपाठ रशियाने ३० जुलै रोजी जाहीरपणे सैन्याची जमवाजमव सुरू केली. जर्मनीने ही जमवाजमव थांबवण्यासाठी रशियाला ३१ जुलैच्या मध्यरात्री रशियाला निर्वाणीचा खलिता पाठवला. रशियाने ही मागणी अमान्य केल्यानंतर १ ऑगस्ट रोजी जर्मनीने रशियाविरुद्ध युद्ध जाहीर केले. रशियाबरोबरच जर्मनीने फ्रान्सलादेखील निर्वाणीचा खलिता पाठवला, आणि फ्रान्सच्या तटस्थतेची हमी म्हणून फ्रेंचांच्या ताब्यातील दोन किल्ले जर्मनीच्या ताब्यात् देण्याची मागणी केली. ही मागणी पूर्ण करण्यास फ्रान्सने असमर्थता दर्शवली आणि १ ऑगस्ट रोजी सैन्याची जमवाजमव सुरू केली.३ ऑगस्ट रोजी जर्मनीने फ्रान्सविरुद्ध युद्ध जाहीर केले. फ्रान्स आणि जर्मनी यांच्यातील सीमा दोन्ही बाजूंनी मजबूत होती. त्यामुळे श्लिफेन योजनेनुसार, जर्मनीने तटस्थ बेल्जियम आणि लक्झेंबर्गवर आक्रमण करून उत्तरेकडून फ्रान्सवर चढाईची तयारी केली. यात बेल्जियन तटस्थतेचे उल्लंघन झाल्यामु���े ब्रिटनने ४ ऑगस्ट रोजी जर्मनीविरुद्ध युद्ध घोषित केले. मार्नच्या लढाईत जर्मन सैन्याची आगेकूच थोपवण्यात दोस्त राष्ट्रांना यश आले. त्यानंतर पश्चिम आघाडीवरच्या लढाईला एका प्रचंड वेढ्याचे स्वरूप आले आणि दोन्ही सैन्यांकडून खंदकांची एक मोठी साखळी तयार झाली. १९१७ सालापर्यंत या साखळीत फारसा फरक पडला नाही. पूर्व आघाडीवर रशियाने ऑस्ट्रिया-हंगेरीविरुद्ध यश मिळवले, पण जर्मन सैन्याने टॅनबेनबर्ग आणि मासुरियन लेक्सच्या युद्धात रशियाचे पूर्व प्रशियावरील आक्रमण परतवून लावले. नोव्हेंबर १९१४ मध्ये, ओस्मानी साम्राज्य केन्द्रीय सत्तांच्या बाजूने सामील झाले आणि कॉकेशस, मेसोपोटेमिया आणि सिनाई येथे नव्या आघाड्यांवर युद्धाला सुरुवात झाली. १९१५ मध्ये इटलीने दोस्त राष्ट्रांच्या बाजूने भाग घेतला आणि बल्गेरिया केन्द्रीय सत्तांच्या बाजूने सामील झाला; १९१६ मध्ये रोमेनिया आणि १९१७ साली अमेरिकेची संयुक्त संस्थाने दोस्त राष्ट्रांत सामील झाले.
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मार्च १९१७ मध्ये रशियन सरकार कोसळले आणि नोव्हेंबरमध्ये एक क्रांती झाली आणि पुढील लष्करी पराभवानंतर रशियाला ब्रेस्ट लिटोव्हस्कच्या तहनीद्वारे सेंट्रल पॉवर्सशी संबंधित अटींचा लाभ झाला, ज्यामुळे जर्मनांना महत्त्वपूर्ण विजय मिळाला.१९१८ च्या वसंत ऋतू मध्ये वेस्टर्न फ्रंटला एक आश्चर्यकारक जर्मन आक्षेपार्ह साम्राज्य निर्माण केल्यानंतर, मित्र राष्ट्रांनी प्रतिस्पर्धी हल्ल्यांच्या मालिकेमध्ये जर्मन सैन्याला परतवून लावले. ४ नोव्हेंबर १९१८ रोजी, ऑस्ट्रो-हंगेरी साम्राज्य एक युद्धकलापात मान्य झाले आणि जर्मनीला क्रांतिकारकांशी स्वतःची समस्या होती, ११ नोव्हेंबर १९१८ रोजी युद्धनौकेवर सहमती दर्शवली, ज्यामुळे मित्र राष्ट्रांच्या विजयाची लढाई संपली.
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युद्धाच्या अखेरीस किंवा काही काळानंतर जर्मन साम्राज्य, रशियन साम्राज्य, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य आणि ऑट्टोमन साम्राज्य अस्तित्वात नव्हते. नॅशनल बॉर्डरची पुनर्मुद्रण करण्यात आली, अनेक स्वतंत्र राष्ट्रांनी पुनर्संचयित केले किंवा तयार केले, आणि जर्मनीच्या वसाहतींना व्हिक्टर्समध्ये फेकून दिले गेले. १९१९ च्या पॅरिस शांतता परिषदेदरम्यान, बिग फोर (ब्रिटन, फ्रान्स, अमेरिका व इटली) यांनी त्यांच्या करारांची एक श्रृंखला दिली. अशा संघर्षाच�� पुनरावृत्ती टाळण्याच्या उद्देशाने संघटनेची स्थापना झाली. हा प्रयत्न अयशस्वी झाला, आणि आर्थिक उदासीनता, नूतनीकरण नवीकरण झालेली उत्तराधिकारी राज्ये, आणि अपमान (विशेषतः जर्मनीमध्ये)च्या भावनांनी अखेरीस द्वितीय जागतिक महायुद्धाच्या सुरुवातीला योगदान दिले.
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ऑक्टोबर - पहिल्या बाल्कन युद्धाची सुरुवात
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पहिले बाल्कन युद्ध इ.स. १९१२ ते १९१३ दरम्यान सर्बिया, ग्रीस, मॉंटेनिग्रो व बल्गेरिया विरुद्ध ओस्मानी साम्राज्य असे झाले, ह्या युद्धात संख्येने अधिक व डावपेचात निपुण असलेल्या बाल्कन राष्ट्रांनी ओस्मानी सैन्याला पराभूत केले. ह्या पराभवामुळे ओस्मानी साम्राज्याचा युरोपामधील जवळजवळ सर्व सत्ता संपुष्टात आली. ह्याची परिणती स्वतंत्र आल्बेनिया देशात झाली.
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युद्धात विजय मिळवून देखील बल्गेरियाच्या वाट्याला मॅसिडोनियामधील फारसा भूभाग न आल्यामुळे बल्गेरिया नाराज झाला. ह्यातच दुसऱ्या बाल्कन युद्धाची मुळे रोवली गेली. तसेच १९१० च्या दशकामधील इतर घटनांचा विचार करता पहिल्या महायुद्धाच्या कारणांमध्ये बाल्कन युद्ध हे एक प्रमुख कारण मानले जाते.
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+
युरोपामधील तत्कालीन बलाढ्य राष्ट्रे ह्या युद्धामध्ये सहभागी नसली तरीही येथील घडामोडींवर त्यांचे बारीक लक्ष होते.
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जून - दुसरे बाल्कन युद्ध
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दुसरे बाल्कन युद्ध इ.स. १९१३ साली बल्गेरिया विरुद्ध सर्बिया, ग्रीस, मॉंटेनिग्रो व रोमेनिया असे झाले. पहिल्या बाल्कन युद्धातील विजयादरम्यान ओस्मानी साम्राज्याकडून काबीज केलेल्या भूभागाची वाटणी करण्यात आली. ही वाटणी बल्गेरियाला मान्य नव्हती. ह्यावरून जून १९१३ मध्ये बल्गेरियाने ग्रीस व सर्बियावर आक्रमण केले. बल्गेरियाच्या रोमेनियासोबतच्या वादामुळे रोमेनियाने देखील ह्या युद्धात सामील होण्याचे ठरवले. युद्धाचा फायदा घेऊन ओस्मानी साम्राज्याने पहिल्या युद्धादरम्यान गमावलेला काही भूभाग परत मिळवला.
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सुमारे दीड महिन्यांच्या संघर्षानंतर बल्गेरियाने माघार घेतली. रशियाने ह्या युद्धात न पडण्याचे ठरवल्यामुळे रशिया-बल्गेरिया दोस्ती संपुष्टात आली. ह्याची परिणती रशिया-सर्बिया संबंध बळकट होण्यात झाली ज्यामुळे बाल्कन प्रदेशामध्ये सर्बियाचे वर्चस्व वाढले. ह्यामधूनच ऑस्ट्रिया-हंगेरी व सर्बियामधील संघर्षाला सुरुवात झाली ज्याचे रूपांतर पहिल्या ��हायुद्धामध्ये झाले. ह्या कारणास्तव दुसरे बाल्कन युद्ध साधारणपणे पहिल्या महायुद्धासाठी कारणीभूत मानले जाते.
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जून - ऑस्ट्रियाचा आर्कड्युक फ्रान्झ फर्डिनांड याची सर्बियामध्ये हत्या झाली. हा ऑस्ट्रिया-हंगेरीचा वारसदार होता.
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जुलै - ऑस्ट्रिया-हंगेरी ने याचा प्रतिकार म्हणून सर्बियावर हल्ला केला. फ्रान्स, जर्मन साम्राज्य व रशिया यांनी युद्धासाठी सैन्य सज्ज केले.
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ऑगस्ट - प्रशियाने रशिया व फ्रान्सवर युद्धाची घोषणा केली. व बेल्जियमवर हल्ला केला. ब्रिटिश साम्राज्य यामुळे युद्धात ओढले गेले.
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सप्टेंबर - मार्न नदी येथे प्रशियाला ब्रिटिश व फ्रेन्चांनी रोखले.
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ऑक्टोबर - ओस्मानी साम्राज्य प्रशियाच्या बाजूने युद्धात उतरले.
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एप्रिल - प्रशियाने य्प्रेस येथे प्रथमच विषारी वायूचा वापर केला. गल्लीपोल्ली द्वीपकल्पावर हल्ला करून दोस्त राष्ट्रांनी ओस्मानी साम्राज्याला युद्धाबाहेर काढण्याचा प्रयत्न केला.
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मे - इटली दोस्त राष्ट्रांच्या बाजूने युद्धात उतरले.
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फेब्रुवारी - प्रशियाने फ्रान्सचा वेर्डन हा किल्ला १० महिने युद्ध करून घेतला.
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मे - जटलॅंडच्या युद्धात ब्रिटन व जर्मनीच्या नौका लढल्या.
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जुलै ते नोव्हेंबर - सोमच्या युद्धात प्रथमच रणगाड्याचा वापर करण्यात आला.
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एप्रिल - अमेरिका युद्धात दोस्त राष्ट्रांच्या बाजूने युद्धात उतरले.
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जुलै ते नोव्हेंबर - पास्सकेन्नडायलचे युद्ध.
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मार्च - प्रशिया व रशिया यांनी ब्रेस्ट-लिटोव्हस्क येथे युद्धबंदी केली. प्रशियाने पश्चिमेकडे जबरदस्त आघाडी घेतली.
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जुलै - प्रशियाची घोडदौड थांबली.
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ऑगस्ट - अमेरिकेच्या मदतीने दोस्त राष्ट्रे जर्मनीच्या सीमेपार गेली.
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ऑक्टोबर - इटलीने ऑस्ट्रिया-हंगेरीला हरवले. ऑस्ट्रिया-हंगेरी व ओस्मानी साम्राज्याने शांततेची मागणी केली.
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नोव्हेंबर - प्रशिया व दोस्त राष्ट्रे यांनी युद्धबंदी केली.
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जून - व्हर्सायचा तह
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व्हर्सायचा तह हा ११ नोव्हेंबर, इ.स. १९१८ रोजी फ्रान्समधील व्हर्साय (Versailles) येथे पहिल्या महायुद्धात जर्मनीने शरणागती स्वीकारल्यावर दोस्त राष्ट्रांनी जर्मनीवर दबाव आणण्यासाठी अटी लादल्या. जर्मनीच्या त्यातील काही अटी अपमानास्पद असल्याची जर्मन लोकांमध्ये भावना होती. या तहाप्रमाणे जर्मनीला हरण्याची युद्ध लादल्याबद्द्ल शिक्षा म्हणून प्रंचड पैसा दोस्त राष्ट्रांना द्यावा ���ागला तसेच लष्करी, आर्थिक नुकसान सोसावे लागले. याचा परिणाम म्हणून जर्मनीत पुढील काळात प्रंचड आर्थिक मंदी आली. अपमानास्पद भावनांमुळे आपोआपच दुसऱ्या महायुद्धाची बीजे या तहात रोवली गेली.
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व्हर्सायच्या तहातील अटींमध्ये एक अट अशी होती की जर्मनीच्या ताब्यातील सार प्रांत पंधरा वर्षांसाठी फ्रान्सला द्यावा तसेच ऱ्हाइन नदीलगतच्या पन्नास किलोमीटर प्रदेशात जर्मनीने लष्कर ठेऊ नये.
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कंसात राष्ट्रे युद्धात सहभागी झाली तो दिवस
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२८ जून, इ.स. १९१४ रोजी ऑस्ट्रियाच्या राजपदाचा वारस आर्चड्यूक फ्रान्सिस फर्डिनांड याची सर्बियात हत्या झाली. या खुनाच्या कारस्थानासाठी सर्बियास जबाबदार ठरवण्यात आले व ऑस्ट्रिया-हंगेरीने सर्बियावर आक्रमण केले. तेव्हा रशियन साम्राज्य सर्बियाच्या मदतीस धावून आले. प्रशियाने ऑस्ट्रियाचा पक्ष घेतला आणि बेल्जियम व फ्रान्सवर हल्ला केला. यामुळे ब्रिटिश साम्राज्याने प्रशियाविरुद्ध युद्ध पुकारले.
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प्रशियाला बेल्जियम जिंकून फ्रान्समध्ये घुसायचे होते व त्यानंतर पॅरिस जिंकून फ्रान्सचा पाडाव करायचा होता. पण मार्ने नदीच्या युद्धात फ्रान्सने प्रशियाला रोखले.
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१ जुलै, इ.स. १९१६ रोजी दोस्त राष्ट्रांनी सोम येथे प्रशियाशी लढून प्रशियन सीमा ओलांडण्याचा प्रयत्न केला. चार महिन्यांच्या युद्धानंतर दोस्तांचे सैन्य केवळ ८ किलोमीटर खोल पोचू शकले. या लढाईत १० लाख बळी पडले.
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जुलै इ.स. १९१७मध्ये दोस्त राष्ट्रांनी पासंडाले, बेल्जियम येथे प्रशियाशी लढून प्रशियन सीमा ओलांडण्याचा पुन्हा प्रयत्न केला. या खेपेस ३ लाख सैनिक मृत्युमुखी पडले. परंतु या लढाईतून दोस्तांच्या पदरी फारसे काहीही पडले नाही.
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वेर्डनची लढाई ही पहिल्या महायुद्धातील एक मोठी लढाई होती. प्रशिया व फ्रान्सच्या सैन्यांमध्ये ही लढाई झाली. २१ फेब्रुवारी ते १८ डिसेंबर १९१६ या कालावधीत ही लढाई झाली. वेर्डन शहराच्या उत्तरेला टेकड्यांमध्ये ही लढाई झाली.
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विमी ब्रिजची लढाई फ्रान्सच्या नोर-पा-द-कॅले या प्रदेशात लढली गेली. ब्रिटन व प्रशियामध्ये ही लढाई झाली. ९ ते १२ एप्रिल १९१७ या कालावधीत ही लढाई झाली.
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युद्ध सुरू झाले तेव्हा नेहमीच्या सैनिकांना युद्धावर पाठवण्यात आले. पण सैनिकांचे मोठ्या प्रमाणात होऊ लागल्याने सक्तीची लष्करभरती करण्यात आली.
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युरोपाच्या पूर्व आघाडीवरील युद्ध मुख्यतः प्रशिया, ऑस्ट्रिया-हंगेरी व रशिया या देशांमध्ये झाले. हे युद्ध पश्चिम आघाडीकडील युद्धापेक्षा भयानक होते. येथील युद्ध मुख्यतः उघड्या मैदानात खेळले गेले. इ.स. १९१४ साली ओस्मानी साम्राज्याने रशियावर हल्ला केल्यानंतर युद्ध आशिया खंडापर्यंत पोहोचले. ओस्मानी साम्राज्याने सीरिया व पॅलेस्टाईनवर हल्ला चढवण्याची धमकी दिली, तेव्हा ब्रिटिश साम्राज्याने इजिप्तमधील आपले सैन्य सीरिया व पॅलेस्टाईन भूप्रदेशांत उतरवले.
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मुख्य लेख:टानेन्नबर्गची लढाई
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युद्धाच्या सुरुवातीला प्रशिया व रशियन साम्राज्य यांमध्ये ही लढाई झाली. २६ ऑगस्ट ते ३० ऑगस्ट १९१४ यांदरम्यान ही लढाई झाली. यात रशियाचे ४,१६,००० सैन्य मृत्युमुखी पडले व प्रशियाचा विजय झाला.
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मुख्य लेख:मासुरियन तलावाची पहिली लढाई, मासुरियन तलावाची दुसरी लढाई
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प्रशियाने ही लढाई सुरू केली होती. यामुळे रशियाचे सैन्य माघार घेऊ लागले.
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केंद्रवर्ती सत्तांनी ही लढाई सुरू केली होती. यामुळे रशिया युद्धाबाहेर गेला..
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मुख्य लेख:रशियन क्रांती (१९०७)
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१९१६ साली ब्रुसिलोव्हमध्ये विजय मिळवूनही रशियात सरकार विरोधी असंतोष वाढत होता. झारची राजवट नावापुरती होती. खरी सत्ता महाराणी अलेक्झांड्रा हिच्या व ग्रिगोरी रास्पुतिन याच्या हातात होती. असंतोष वाढत गेल्यावर ग्रिगोरी रास्पुतिन याचा १९१६ च्या अखेरीस खून करण्यात आला.
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मार्च १९१७ साली, पेट्रोग्राडमध्ये झारविरुद्ध निदर्शने करण्यात आली. यामुळे झारने सिंहासनाचा त्याग केला व एक कमकुवत हंगामी सरकार स्थापण्यात आले. या गोंधळात आघाडीवरचे लष्कर निकामी ठरले.
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हंगामी सरकारबद्दलचा असंतोष वाढत असतानाच व्लादिमिर इलिच लेनिनच्या बोलशेव्हिक पक्षाची ताकद व लोकप्रियता वाढत होती. लेनिनने सरकारला युद्ध थांबवण्याची मागणी केली. बोल्शेव्हिकांनी केलेला सशस्त्र उठाव यशस्वी ठरला. लेनिनने लगेच प्रशियाला युद्ध थांबवण्याची मागणी केली. ही मागणी प्रशियाला पटली नाही. नंतर ब्रेस्ट-लिटोव्हस्कचा तह झाला. यानुसार फिनलॅंड, बाल्टिक देश, पोलंड व युक्रेन केंद्रवर्ती सत्तांना देण्यात आले.
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आफ्रिका खंडात प्रशिया, फ्रान्स व युनायटेड किंग्डम इत्यादी युरोपीय देशांच्या वसाहती होत्या. पहिल्या महायुद्धात या वसाहतींमध्ये लढाया होत असत. ७ ऑगस्ट, इ.स. १९१४ रोजी फ्रान्स व ब्रिटनने प्रशियाच्या आधिपत्याखालील टोगोलॅंड जिंकून घेतले. १० ऑगस्ट, इ.स. १९१४ रोजी जर्मन नैर्ऋत्य आफ्रिकेतील प्रशियाचे सैन्य दक्षिण आफ्रिकेत शिरले.
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न्यू झीलंडने जर्मन सामोआ (वर्तमान सामोआ) ३० ऑगस्ट, इ.स. १९१४ रोजी जिंकून घेतले. ११ सप्टेंबर, इ.स. १९१४ रोजी ऑस्ट्रेलियाने जर्मन न्यू गिनीच्या न्यू ब्रिटन बेटावर हल्ला केला.
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रशियाविरुद्ध लढत असल्यामुळे ऑस्ट्रीया-हंगेरीने स्वतःचे एक तृतीयांश सैन्य सर्बियात घुसवले व सर्बियाची राजधानी बेलग्रेड जिंकून घेतली. कोलुबाराच्या लढाईत सर्बियाने यशस्वीपणे ऑस्ट्रिया-हंगेरीला हरवले. यामुळे १९१४ च्या शेवटी ऑस्टिया-हंगेरीचे सैन्य सर्बियातून परतले.
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पहिल्या महायुद्धाआधीचे सैनिकी डावपेच व युद्धतंत्रे पहिल्या महायुद्धात निष्फळ ठरली. यामुळे नवीन डावपेच शोधणे आवश्यक ठरले. कुंपणासाठीच्या काटेरी तारा, आधुनिक तोफखाना, मशीन गन यांमुळे खुल्या मैदानात लढणे कठीण झाले. प्रशियाने प्रथमच विषारी वायू वापरला, व या घटनेनंतर सर्वच राष्ट्रांची सैन्ये विषारी वायूंचा वापर करू लागली.
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युद्धकाळात नवीन शस्त्रे व युद्धसाहित्य शोधण्याकडे दोन्ही बाजूंचा कल होता. रणगाडे हे यांतील ठळक उदाहरण होय. ब्रिटन व फ्रान्स या राष्ट्रांनी प्रथमच रणगाडे वापरले. प्रशियाने दोस्त सैन्यांकडून जप्त केलेले रणगाडे व स्वतःचे काही रणगाडे, यांचा वापर युद्धात केला.
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मार्ने नदीच्या पहिल्या लढाईनंतर दोस्त राष्ट्रांच्या व केंद्रवर्ती सत्तांच्या सैन्यांनी मोठ्या प्रमाणावर युद्धाभ्यास सुरू केला.
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ब्रिटिशांनी या युद्धात रणगाड्याचा शोध लावला. खंदकापलीकडे जाण्यासाठी रणगाड्याचा शोध लावला गेला. रणगाड्यात बसलेले सैन्य मशीनगनने शत्रूवर हल्ला करत असे व शत्रूसैन्यापलीकडे जात असे.
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युद्धात विमानाचा वापर पहिल्या महायुद्धात करण्यात आला. तत्कालीन विमानांमध्ये एक वैमानिक व एक बंदुकधारी सैनिक बसू शके. बंदुकधाऱ्याचे काम शत्रूवर मशीनगनने गोळीबार करणे व बॉम्बगोळ्याचा भडिमार करणे हे होते.
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मशीनगनमुळे पहिले महायुद्ध इतर युद्धांपेक्षा प्राणघातक ठरले. या बंदुकीमुळे सतत गोळ्या झाडणे शक्य होते.
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युद्धाच्या सुरुवातीच्या काळात प्रशियाने जगभरातील समुद्रांत क्रुझर नौका तैनात केल्या होत्या. यांतील काही क्रुझर नौका दोस्त राष्ट्रांच्या व्���ापारी जहाजांना उपद्रव देऊ लागल्या. यामुळे ब्रिटनच्या रॉयल नेव्हीने पद्धतशीरपणे क्रुझर नौकांचे पारिपत्य केले.
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युद्ध सुरू झाल्यानंतर ब्रिटनने प्रशियाची नाविक नाकेबंदी केली. हे तंत्र भलतेच परिणामकारक ठरले, यामुळे प्रशियाची सैनिकी नाकेबंदी झाली. आंतरराष्ट्रीय नियमांनुसार हे डावपेच चुकीचे होते. ब्रिटनने समुद्रात पाणसुरूंग पेरून ठेवले पण त्यामुळे शत्रुनौकांसह तटस्थांच्या नौकांसही हानी पोहचे.
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इ.स. १९१६ साली झालेली जुटलॅंडची लढाई पहिल्या युद्धातील सर्वांत मोठी लढाई होती. ही लढाई ३१ मे, इ.स. १९१६ ते १ जून, इ.स. १९१६ या कालखंडात उत्तर समुद्रात लढली गेली.
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इतर कोणत्याही युद्धाचे परिणाम या युद्धाएवढे मोठे नव्हते. या युद्धामुळे प्रशियन साम्राज्य, ऑस्ट्रिया-हंगेरीयन साम्राज्य, ओस्मानी साम्राज्य व रशियन साम्राज्य ही साम्राज्ये नामशेष झाली. बेल्जियम व सर्बिया या राष्ट्रांना भरपूर हानी पोहोचली होती. फ्रान्सचे १४ लाख सैनिक या युद्धात मृत्युमुखी पडले, रशिया व प्रशियाचे जवळपास एवढेच सैन्य मरण पावले.
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१९१४ ते १९१८ या काळात ८० लाख सैनिक युद्धात मृत्यू पावले, ७० लाख कायमचे जायबंदी झाले, तर १.५ कोटी सैनिक जखमी झाले. प्रशियातील १५.१%, ऑस्ट्रिया-हंगेरीतील १७.१% व फ्रान्समधील १०.५% पुरुष मृत्युमुखी पडले. ७,५०,००० प्रशियन नागरिक ब्रिटनने केलेल्या नाकाबंदीत उपासमारीने मेले. युद्धसमाप्तीच्या काळात १ लाख नागरिक लेबेनानमध्ये दुष्काळामुळे मृत्युमुखी पडले होते.
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धामणी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील मध्य कोकणातील रायगड जिल्ह्यातील पनवेल तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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पांडुरंग नथुजी राजभोज उर्फ बापूसाहेब राजभोज (१५ मार्च १९०५ - २ जुलै १९८४) हे एक भारतीय राजकारणी होते आणि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांचे सहकारी होते. त्यांनी १९५७-६२ दरम्यान राज्यसभेमध्ये बॉम्बे स्टेटचे प्रतिनिधित्व केले.[१]
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१९४२ मध्ये डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी स्थापन केलेल्या अखिल भारतीय शेड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशनचे ते सरचिटणीस होते.[२]
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महाराष्ट्र विधान परिषदेत आमदार असताना पा.ना. राजभोज यांनी मराठवाडा विद्यापीठाचे नामांतर करावे, आणि त्यास डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांचे नाव द्यावे, अशी मागणी लावून धरली होती.[३]
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त्यांनी मराठीमध्ये लष्करी पेशा हे पुस्तक लिहिले. १९८४ मध्ये त्यांचे निधन झाले आणि त्यांना दोन मुलगे व दोन मुलगी होती.[१]
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पांजरा हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील कामठी तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पांडवगड हा भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील, सातारा जिल्ह्यातील एक किल्ला आहे.[१]
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सातारा जिल्ह्यातील वाई तालुका हा कृष्णा नदीच्या खोऱ्यात वसलेला आहे. कृष्णा नदीच्या उत्तरबाजूस रायरेश्वरापासून निघणारी महादेव रांग आहे. सह्याद्रीच्या या उपरांगेतील एका शृंगावर पांडवगड नावाचा किल्ला बांधलेला आहे. शिलाहार राजा भोज याने सातारा जिल्ह्यात जे काही दुर्ग बांधले त्यांतला पांडवगड हा एक आहे.
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साधारणपणे इसवी सन ११७८ ते ११९३ या काळात राजा भोज याने हा किल्ला बांधला असावा. पुढे तो किल्ला आदिल्शाहीत गेला. छत्रपती शिवाजी महाराजांनी १६७३ मध्ये पुन्हा स्वराज्यात आणला,त्यावेळी गडकरी म्हणून सरनौबत पिलाजी गोळे यांची नियुक्ती छत्रपती शिवाजी महाराज यांनी केलेली नोंद आढळून येते, १६९९ पर्यंत पिलाजी गोळे यांच्या खास पथककडे हा गड होता आणि १७०१ मध्ये तो मोगलांकडे गेला. मोगलांच्या कडून १७०९ला पुन्हा स्वराज्यात आला,१७३२ला आनंदाजी गोळे बाबतीत रसद पुरवलेले एक पत्र आढळून येते, अखेर मेजर थॅचरने १८१८मध्ये तो कंपनी सरकारच्या ताब्यात आणला.
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या किल्ल्याची समुद्रसपाटीपासून उंची ४१७०फूट आहे.
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वाई हे पुणे-बंगलोर या महामार्गाच्या पश्चिमेला आहे.वाई मांढरदेव मार्गावर वाईहून ७ किलोमीटरवर धावडी हे गाव आहे.पांडवगडाला जाण्यासाठी दोन मार्ग सध्या प्रचलित आहेत. दक्षिणेकडील म्हणजे मेणवली मार्गे असलेला मार्ग खड्या चढाईचा आहे तर उत्तरेकडील धावडी गावाच्या हद्दीतून जाणारा मार्ग सोपा आहे.[२]
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पांडवगडाच्या उत्तर अंगाला असलेल्या भग्न दरवाजाने गडामध्ये प्रवेश होतो. वाटेमध्ये पाण्याची दोन टाकी आहेत. गडामध्ये हनुमंताचे मंदिर आहे. मंदिर बांधलेले नसल्यामुळे मूर्ती उघड्यावर आहे. गडावर गडाची देवी पांडवजाईचे मंदिर आहे. गडाच्या चारही बाजूंना नैसर्गिक कातळकडे असल्यामुळे गडावर फारशी तटबंदी बांधलेली नाही. गडावर घरांची जोती तसेच कोरडी पडलेली पाण्याची टाकी आढळतात.
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गडावर असलेले पांडजाईचे मूळ मंदिर पडून गेले आहे, मूर्तीची झीज झाली आहे.
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गडावरून धोम धरणाचा जलाशय दिसतो. जलाशयामागे कमलगड दिसून येतो. त्यामागे महाबळेश्वराचे तसेच पाचगणीचे पठार दिसते. पांडवगडाच्या माथ्यावरून खाली वाई तसेच कृष्णा नदीही दिसते. केंजळगड, मांढरदेव, चंदन वंदन किल्ले तसेच वैराटगड हा प��रदेश दिसतो.[३]
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महाराष्ट्र हे बौद्ध लेण्यांसाठी प्रसिद्ध असणारे राज्य आहे. महाराष्ट्रातील त्रिरश्मी लेणी ही नाशिकमधील लेणी आहेत.[१]
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त्रिरश्मी बौद्ध लेणी ही सुमारे इ.स. पूर्व २००च्या दरम्यान खोदलेली बौद्ध लेणी आहेत. भारत सरकारने या लेण्यांना महाराष्ट्रातील राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक म्हणून दिनांक ३ एप्रिल, इ.स. १९१६ रोजी घोषित केले आहे.[२] सातवाहन राजांनी ही लेणी खोदण्यासाठी वेळोवेळी दान दिले असा उल्लेख येथील शिलालेखांत आढळून येतो.
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सातवाहन आणि क्षत्रप या राजवंशाने त्रिरश्मी लेणी कोरण्यास मदत केली होती. येथील शिलालेख हे त्रिरश्मी लेण्यांचा इतिहास सांगणारा मोलाचा स्रोत आहे. नाशिक या भूभागावर सातवाहन राजांचे अधिराज्य असल्याचे पुरावे पाहायला मिळतात. नाशिकचा उल्लेख शिलालेखांतून वाचायला मिळतो.
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त्रिरश्मी लेणीसमूहात अनेक लेणी असून काही लेण्यांत स्त्रियांचे अलंकार आणि वस्त्रे अतिशय कलाकुसरीनी कोरलेली आहेत. या गुहांमध्ये संपूर्ण सुस्थितीतले एक प्रमुख चैत्यगृह आहे. त्याचे पूर्व दिशेचे प्रवेशद्वार चांगल्या स्थितीत आहे.पश्चिमेकडील काही लेण्यांचे बांधकाम अर्धवट राहिलेले आहे.
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या लेणी पाहण्यास फी आकारली जाते. या टेकडीवर प्राचीन पाण्याची टाकी आहेत, परंतु ही पिण्याच्या पाण्याची सोय नसू शकते.
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या टेकडीवर आता वनखात्याने वृक्षराजी वाढवली आहे.
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त्रिरश्मी लेण्यांवरून नाशिक शहराचे विहंगम दृश्य दिसते.
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टेकडीखाली बुद्ध विहार व दादासाहेब फाळके स्मारक आहे. त्रिरश्मी बौद्ध लेण्यांवर जाण्यासाठी पायऱ्यांची बांधलेली वाट आहे. वर चढण्यास सुमारे ३० मिनिटे वेळ लागतो.
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पंचवटी, मध्यवर्ती बसस्थानक तसेच नाशिकरोड येथून बौद्ध लेण्यांसाठी बसेस सुटतात.
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अंबडला जाणाऱ्या बसने येथे उतरता येते.
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तसेच नाशिक दर्शन ही बसही येथे आपला थांबा घेते.
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पांडुरंग गोविंदशास्त्री पारखी उर्फ भावगुप्तपद्म (जन्म : कडूस - तालुका खेड - पुणे जिल्हा), २४ नोव्हेंबर १८४४; - पुणे, २९मार्च १९११)हे मराठीतील निबंधकार व कवी होते. पांडुरंग गोविंदशास्त्री पारखी ह्यांनी पुण्यातील पंडित बाळशास्त्री देव ह्यांच्या संस्कृत पाठशाळेत व्याकरण, व्युत्पत्ती, अलंकार इत्यादी विषयांचे अध्ययन केले होते.
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त्यांची कालिदासाच्या ऋतुसंहारावर आधारित "षड्ऋतुवर्णन" ही रचना इ.स. १८८७साली पुस्तकरूपाने प्रकाशित झाली. त्यांनी विविध प्रकारच्या अन्योक्ती आणि काही काव्यकूटे भावगुप्तपद्म या नावाने लिहिली. पांडुरंग पारखींनी लिहिलेले निबंध, हे उपलब्ध ताम्रपट, शिलालेख, चिनी प्रवाशांचे ग्रंथ आदींचा अभ्यास करून ऐतिहासिक दृष्टीने लिहिले आहेत.
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डॉ. पांडुरंग सखाराम शेणवी - पिसुर्लेकर (३० मे, १८९४; (पिसुर्ले) - १० जुलै, १९६९; पणजी) हे गोवेकर इतिहास संशोधक व मराठी-कोंकणी लेखक होते. मराठा साम्राज्य व भारतातील पोर्तुगीज वसाहतींच्या परस्परसंबंधांवर त्यांनी लिहिलेला "पोर्तुगीज मराठे संबंध: अर्थात पोर्तुगीजांचा दप्तरातील मराठ्यांचा इतिहास" हा ऐतिहासिक ग्रंथ मराठ्यांच्या इतिहास-साधनांमध्ये महत्त्वाचा ग्रंथ मानला जातो.
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पांडुरंग सखाराम पिसुर्लेकर यांचा जन्म ३० मे १८९४ रोजी गोव्यातल्या सत्तरी तालुक्यातल्या पिसुर्ले या गावी झाला. त्यांचे वडील एका गावाचे वतनदार कुलकर्णी होते, तरी ते सरकारी नोकरी करत होते. पांडुरंग पिसुर्लेकरांचे शिक्षण पोर्तुगीज भाषेत झाले. त्यांचे उच्च व माध्यमिक शिक्षण गोव्यातील 'साखळी' (Sanquelim) येथे झाले. सामान्य शिक्षण पूर्ण झाल्यावर त्यांनी कायद्याचे शिक्षण घेतले. दोन वर्षे त्यांनी पोर्तुगीज भाषेचे शिक्षण घेतले. त्यांना शिक्षकी पेशाची आवड असल्यामुळे त्यांनी पोर्तुगीज शाळेत प्राथमिक शिक्षकाची नोकरी पत्करली.[२]
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इतिहासाचार्य वि.का. राजवाडे यांच्यामुळे पिसुर्लेकरांच्या जीवनात आमूलाग्र बदल घडून आला. संशोधनासाठी विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे एकदा गोव्यात आले होते. पिसुर्लेकारांनी त्यांना पाहिले, त्यांचे संशोधन कार्य पाहिले व त्याचा ठसा त्यांच्या मनावर उठला. राजवाडेंपासून त्यांनी प्रेरणा घेतली व ते इतिहाससंशोधनाच्या क्षेत्रात उतरले.[१]
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पिसुर्लेकरांना संशोधनाची कितीही इच्छा असली तरी पोर्तुगीज दफ्तरखान्यात प्रवेश मिळणे अतिशय कठीण होते. त्यांनी अनेक विनंत्या सरकारला केल्या, परंतु नकारच मिळत होता. अखेर, मोठ्या मिनतवारीने त्यांना १९२४मध्ये विनावेतन दफ्तरात काम करण्याची परवानगी मिळाली व त्यांनी ते मान्य केले. पोर्तुगीज सरकारच्या या दफ्तरखान्यात पोर्तीगीज, डच, फारसी, कन्नड, तमिळ, मराठी, बंगाली इत्यादी भाषांतील कागदपत्रांचे ढीग होते. पण त्यांची कोणतीही व्यवस्था नव्हती. या कागदपत्रांची योग्य मांडणी करण्यासाठी ज्या भाषेत ती कागदपत्रे आहेत त्या भाषा शिकणे आवश्यक होते, म्हणून पिसुर्लेकरांनी उर्दू व कन्नड भाषा व मोडी लिपीचे शिक्षण घेतले. अनेक खराब कागदपत्रांच्या स्वतःच्या हाताने नकला उतरवून घेतल्या. अहोरात्र खपून त्यांनी या दप्तराची सूची तयार केली, व ती 'गोवा अर्काइव्हज् मार्गदर्शक' नावाने पोर्तुगीज भाषेत प्रकाशित केली.[३]
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पोर्तुगीज सरकारने पिसुर्लेकरांनी वर्षभर बिनपगारी केलेले काम पाहून त्यांना १९२५पासून तीस रुपयांचे वेतन सुरू केले. त्यानंतरही पिसुर्लेकरांचे काम चालूच होते व पोर्तुगीज सरकारदेखील त्यांच्या कामांची नोंद घेत होते. अखेर १९३० साली सरकारने त्यांना दफ्तरखान्याचे प्रमुख केले. तसेच सरकारने त्यांना अधिक संशोधनासाठी लिस्बन व पॅरिसला पाठवले.[४]
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कोकणी, मराठी, पोर्तुगीज, इंग्लिश, संस्कृत, फ्रेंच इत्यादी भाषांचे जाणकार असलेल्या पिसुर्लेकरांनी पोर्तुगीज दप्तरांतील कागदपत्रांवरून इतिहास संशोधन केले व ते शोधनिबंध, पुस्तके इत्यादी प्रकारे प्रकाशित केले.
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त्यांचे पुढील ग्रंथ महत्त्वाचे आहेत :
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यांखेरीज त्यांनी अनेक पोर्तुगीज कागदपत्रे प्रसिद्ध केली. अ आन्तिगिदादि दु क्रिश्नाईज्मु या पुस्तकाद्वारे कृष्णसंप्रदाय हा इसवी सनापूर्वीपासून अस्तित्वात होता, हे सिद्ध करण्याचा त्यांनी प्रयत्न केला आहे.
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याशिवाय पिसुर्लेकर यांच्या १२५ वी जयंती व ५० वी पुण्यतिथी चे निमित्ताने २०१९ मध्ये "डॉ. पांडुरंग पिसुर्लेकर स्मारक ग्रंथ" (Dr. Pandurang Pisurlencar Commemoration Book) प्रसिद्ध करण्यात आला आहे.[५]
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१० जुलै १९६९ रोजी पणजी येथे कर्करोगामुळे पिसुर्लेकरांचे निधन झाले.
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पांडुरंग पुंडलिक तथा भाऊसाहेब फुंडकर (२१ ऑगस्ट, १९५०:खामगांव - ३१ मे, २०१८:मुंबई) हे भारतीय राजकारणी होते. शांत संयमी अशी प्रतिमा जपत त्यांनी संघ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ते भाजपा असा प्रवास केला महाविद्यालयीन शिक्षण घेत असतानांच ते अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मध्ये सक्रिय झाले होते. ते भारतीय जनता पक्षाचे उमेदवार म्हणून नवव्या, दहाव्या आणि अकराव्या लोकसभेत महाराष्ट्र राज्यातील अकोला लोकसभा मतदारसंघातून निवडून गेले. ते महाराष्ट्र राज्याचे कृषिमंत्री होते.
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यांचा मुलगा आकाश पांडुरंग फुंडकर महाराष्ट्राच्या १३व्या आणि १४व्या विधानसभेवर निवडुन गेला.[ संदर्भ हवा ]
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1989 ते 1998 या कालावधी मध्ये अकोला लोकसभा मतदार संघातून खासदार होऊन काँग्रेस च्या वर्चस्वाला सुरुंग लावण्यात त्यांना यश आले. आणि याच काळात अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण अडवाणी या दिग्गज नेत्यांशी संपर्क वाढला. 11 एप्रिल 2005 ला विरोधी पक्षनेते म्हणून निवड करण्यात आली. तसेच 25 एप्रिल 2008 रोजी दुसऱ्यांदा विरोधी पक्षनेता म्हणून बिनविरोध निवड करण्यात आली.[ संदर्भ हवा ]
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जून 2009 मध्ये तत्कालीन राष्ट्रपती प्रतिभाताई पाटील यांच्या हस्ते सन 2006-2007 या कालावधीतील उत्कृष्ट संसदपटू पुरस्कार देऊन त्यांना सन्मानित करण्यात आले.[ संदर्भ हवा ]
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पांड्य राजवंश, ज्याला मदुराईचे पांड्य असेही संबोधले जाते, ते दक्षिण भारतातील एक प्राचीन तमिळ राजवंश होते आणि तमिळकमच्या चार महान राज्यांपैकी, इतर तीन राज्ये पल्लव, चोल आणि चेरा होते.
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पांढरा वाघ किंवा ब्लीचड वाघ हा बंगालच्या वाघाचा रंगद्रव्य आहे, ज्याची सुंदरबन प्रदेशातील मध्य प्रदेश, आसाम, पश्चिम बंगाल, बिहार आणि ओडिशा या भारतीय राज्यांमध्ये वेळोवेळी जंगलात नोंद केली जाते.[१] अशा वाघाला बंगालच्या वाघाच्या काळ्या रंगाचे पट्टे असतात पण त्यात पांढरा किंवा जवळ पांढरा कोट असतो.
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पांढरेवाडी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सोलापूर जिल्ह्यातील पंढरपूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मध्यम आणि चांगले हवामान असते. सोलापूर कोरडे हवामानाच्या श्रेणीत येते. उन्हाळा, पावसाळा आणि हिवाळा हे ऋतू असतात. मार्च ते मे हे महिने उन्हाळ्याच्या काळात येतात आणि या काळात कमाल तापमान ३० ते ४० अंश सेल्सियस पर्यंत असते. एप्रिल आणि मे महिन्याचा कालावधी सर्वात उष्ण असतो. येथे पाऊस अल्प आणि अनिश्चित प्रमाणात पडतो. जूनच्या दुसऱ्या पंधरवड्यापासून ते सप्टेंबर अखेरपर्यंत मान्सूनचा कालावधी असतो. सरासरी ५४५ मि.मी. पाऊस पडतो. सोलापुरात हिवाळा नोव्हेंबरमध्ये सुरू होतो आणि फेब्रुवारी महिन्यात तापमान कधीकधी १० अंश सेल्सियसपेक्षा कमी होते. हिवाळ्याच्या हंगामातील किमान तापमान जानेवारीत सुमारे ९ अंश सेल्सियस असते.
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पांढऱ्या कंठाची मनोली (इंग्लिश:White throated munia; हिंदी:चरका, चरचरा) हा एक पक्षी आहे.
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हा पक्षी आकाराने चिमणीपेक्षा लहान असतो.त्याची चोच मातट तपकिरी रंगाची,जाड आणि निमुळती काळी शेपूट असते .त्याचा शेपटीवरील भाग पांढरा असून खालील भागाचा रंग असतो.नर-मादी दिसायला सारखे असतात.
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शुष्क आणि विरळ झुडपांचा प्रदेश.
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पांढऱ्या शेपटीचा गरुड (शास्त्रीय नाव: हॅलिएईटस ॲल्बिसिला) हा एक मोठा पक्षी आहे. हा घार, ससाणे आणि गरुड कुळात मोडतो.
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पांढुर्ली हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील सिन्नर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४१ सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ९८० मि.मी.पर्यंत असते.
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पांथस्थ (Ravenala madagascariensis) हे एक केळीच्या कुळाशी जवळचा संबंध असलेले झाड आहे. परंतु याचे खोड केळीप्रमाणे नसून ताड-माडाच्या झाडाप्रमाणे खडबडीत असते. पांथस्थच्या झाडाचे मूळ जन्मस्थान मादागास्कर असून याची केळीच्या पानांसारखी पाने पंख्याच्या आकारात रचल्यासारखी दिसतात. प्रत्येक पानाला लांबलचक देठ असतो. ४० फूट उंच वाढू शकणाऱ्या या झाडाला एकेका दांड्यावर होडीच्या आकाराची फुले येतात. दोन पानांमधून वाट काढत हा फुलोरा येतो. फुलांतील बिया निळसर आणि सहज रुजून येणाऱ्या असतात.
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पांथस्थच्या डौलदार आकारामुळे हे झाड अनेक उद्योग समूहांच्या उद्यानांत लावलेले दिसते.
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मुंबईची वृक्षराजी (पुस्तक, लेखिका - मुग्धा कर्णिक)
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पांधरी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील यवतमाळ जिल्ह्यातील नेर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.पावसाळ्यात मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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धामापूर तर्फे देवरुख हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील संगमेश्वर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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पाइक काउंटी, मिसूरी ही अमेरिकेच्या मिसूरी राज्यातील ११४ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र येथे आहे.
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२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या इतकी होती.
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पाइक काउंटी, मिसूरी काउंटीची रचना रोजी झाली. या काउंटीला यांचे नाव दिलेले आहे.
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पाईन वृक्ष हे सरळ उंच वाढणारे सुचिपर्णी झाड आहे.
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पाऊस ही एक हवामानविषयक घटना आहे, जी पृथ्वीच्या पृष्ठभागावरील ढगांमधून पाण्याचे द्रव किंवा घन थेंबांच्या वर्षावमुळे उद्भवते. पाऊस पडला की जल प्राप्ती होते. पावसामुळे धरती हिरवीगार होते.सगळीकडे हिरवळ पसरते. नद्या, विहिरी तुडूंब भरतात.
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पाऊस पडणे ही एक नैसर्गिक घटना आहे.वातावरणातील ढगांमधील बाष्पाचे (वाफेचे) द्रवीभवन होऊन पृथ्वीवर पाण्याचे थेंब पडू लागतात. हवा थंड झाल्याने किंवा आर्द्रतेचे प्रमाण वाढल्याने (संपृक्त saturated झाल्याने) पाऊस पडतो.
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पृथ्वीवर दरवर्षी साधारण ५०५,००० घन किमी पाऊस पडतो, त्यातील ३९८,००० घन किमी पाऊस समुद्रावर पडतो. तरी, सर्वात जास्त पाऊस ठरावीक प्रदेशांतच पडतो.पाऊस पडतो तिथे समृद्धता असते.पाऊस ह्या शब्दाचे अनेक समानार्थी शब्द आहेत .
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| 4 |
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१. अतिशय जास्त पाऊस ३०० ते ७५० सें.मी.
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(किंवा त्याहून अधिक अपवादात्मक पर्जन्यमान)
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२ जास्त पाऊस २०० ते ३०० सें.मी.
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३ मध्यम पाऊस १०० ते २०० सें.मी.
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४ कमी पाऊस ५० ते १०० सें.मी. ( किंवा अपवादात्मक कमी पर्जन्यमान.)
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पाऊस (Rain), रिमझिम (किंवा झिमझिम) पाऊस (Drizzle), पर्जन्य (Rainfall), पावसाच्या धारा (किंवा सरी) (Rain Showers), मुसळधार पाऊस (Heavy Rain)/(Heavy Downpour)/(Torrential Rain), पावसाची रिपरिप/पिरपिर (Incessant Light Rain), संततधार/पावसाची झड (Incessant Heavy Rain, Downpour), नागडा पाऊस (Rain and Sunshine together), शिरवे/धावता पाऊस (Passing Showers), गारांचा पाऊस/गारपीट (Hailstorm), अतिवृष्टी (Excessive Rainfall), हिमवर्षा (Snowfall), हिमवर्षाव (Rain of Snow Flakes), बर्फमिश्रित पाण्याचा पाऊस (Sleet), हिमवादळ (Snow Storm), हलका पाऊस (Light Rain), तुरळक पाऊस (Isolated Rainfall,), विखुरलेला पाऊस (Scattered Rain), थांबून थांबून पडणारा पाऊस (Intermittent Rain), सार्वत्रिक पाऊस (Widespread Rain), गडगडाटी पाऊस/मेघगर्जनेसहित पाऊस (Thunder Showers), वादळी पाऊस/पावसाचे वादळ (Stormy Rain/Rain Storm), मोसमी पाऊस (Monsoon), नैर्ऋत्य मोसमी पाऊस (Southwest Monsoon Rain), ईशान्य मोसमी पाऊस/हस्ताचा पाऊस, (Northeast Monsoon, Post-Monsoon), उन्हाळी पाऊस (Summer Rain), हिवाळी पाऊस (Winter Rain), बारमाही पाऊस (Year Long Rain), अवकाळी (किंवा अवकाळ्या) पाऊस (Un-seasonal Rain), रात्रीचा पाऊस (Night Rain), धडकवणी/मृगाचा पाऊस/वळवाचा पाऊस/वळीव (Pre-Monsoon showers), हस्ताचा पाऊस/पर्जन्य ( heavy rainfall ) ,सरासरी पाऊस/पर्जन्यमान (Average Rainfall), वार्षिक पाऊस (Annual Rainfall), पर्जन्यछाया/पर्जन्य छायेचा प्रदेश (Rain Shadow), पावसाळी दिवस (Rainy Day), उत्तरेचा पाऊस (Northerly Rain); कृत्रिम पाऊस (Artificial Rain), ढग फवारणी/मेघारोपण (Cloud seeding)
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अखंडपणे मुसळधार पाऊस पडणे यास 'झड लागणे' म्हणतात. याचा कालावधी तीन दिवस अथवा कधीकधी सात दिवसही असतो. अशा झडीचा शेतीला फायदा होतो पण क्वचित प्रमाणात नुकसानही होते.परिणामतः झड लागल्यावर ओला दुष्काळ पडतो.
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१. मौसीनराम (सरासरी वार्षिक पाऊस ११,८७३ मिलीमीटर )
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२. चेरापुंजी (सरासरी ११,७७७ मिमी.)
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३. अगुंबे (सरासरी ७६४० मिमी)
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४. आंबोली (७५०० मिमी
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५. ताम्हिणी (सरासरी वार्षिक पाऊस ६४९८ मिलिमीटर )
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इ.स. १९७६, १९७८, १९९०, १९९४, २००५, २००६, २०११, आणि २०१४ या वर्षी ताम्हिणी घाटात चेरापुंजीपेक्षा जास्त पाऊस पडला होता.
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पावसावर लिहिला गेलेल्या काही मराठी कविता आणि गाणी पुढीलप्रमाणे आहेत.
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पाकणी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सोलापूर जिल्ह्यातील उत्तर सोलापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
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येथे मध्यम आणि चांगले हवामान असते. सोलापूर कोरडे हवामानाच्या श्रेणीत येते. उन्हाळा, पावसाळा आणि हिवाळा हे ऋतू असतात. मार्च ते मे हे महिने उन्हाळ्याच्या काळात येतात आणि या काळात कमाल तापमान ३० ते ४० अंश सेल्सियस पर्यंत असते. एप्रिल आणि मे महिन्याचा कालावधी सर्वात उष्ण असतो. येथे पाऊस अल्प आणि अनिश्चित प्रमाणात पडतो. जूनच्या दुसऱ्या पंधरवड्यापासून ते सप्टेंबर अखेरपर्यंत मान्सूनचा कालावधी असतो. सरासरी ५४५ मि.मी. पाऊस पडतो. सोलापुरात हिवाळा नोव्हेंबरमध्ये सुरू होतो आणि फेब्रुवारी महिन्यात तापमान कधीकधी १० अंश सेल्सियसपेक्षा कमी होते. हिवाळ्याच्या हंगामातील किमान तापमान जानेवारीत सुमारे ९ अंश सेल्सियस असते.
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dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10543.txt
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| 1 |
+
पाकयॉंग विमानतळ हा भारताच्या सिक्कीम राज्यात असलेला एक विमानतळ आहे. याला सिक्कीम विमानतळ असेही म्हणता येते. या विमानतळाला हवाईसेवा सुरू करण्यास दि. २६-०८-२०१८ला परवानगी देण्यात आली. यामुळे सिक्कीम भारताच्या इतर राज्यांशी वायुमार्गाने जोडले गेले.
|
| 2 |
+
अतिशय खडकाळ प्रदेशात समुद्रसपाटीपासून सुमारे ४,५०० फुटावर या विमानतळाचे बांधकाम करण्यात आले आहे. हा विमानतळ भारतातील १००वा विमानतळ असून सर्वात उंच जागी असलेल्या पाच विमानतळांपैकी एक आहे.
|
| 3 |
+
यापूर्वी सिक्कीमला जाण्यास थेट विमानसेवा उपलब्ध नव्हती. गंगटोक या सिक्कीममधील गावापासून सुमारे १२५ किमी अंतर असलेल्या बागडोग्रा येथे ती उपलब्ध आहे. नंतरचा प्रवास रस्ते मार्गाने करावा लागत होता.
|
| 4 |
+
सध्या स्पाईसजेट या हवाई सेवा पुरविण्यात येणाऱ्या कंपनीतर्फे कोलकाता ते पाकयॉंग अशी सेवा सुरू करण्यात येत आहे.
|
| 5 |
+
|
| 6 |
+
|
| 7 |
+
आग्रा •
|
| 8 |
+
अराक्कोणम •
|
| 9 |
+
अंबाला •
|
| 10 |
+
बागडोगरा •
|
| 11 |
+
भूज रुद्रमाता •
|
| 12 |
+
कार निकोबार •
|
| 13 |
+
चबुआ •
|
| 14 |
+
छत्तीसगढ •
|
| 15 |
+
दिमापूर •
|
| 16 |
+
दुंडिगुल •
|
| 17 |
+
गुवाहाटी •
|
| 18 |
+
हलवारा •
|
| 19 |
+
कानपूर •
|
| 20 |
+
लोहगांव •
|
| 21 |
+
कुंभिरग्राम •
|
| 22 |
+
पालम •
|
| 23 |
+
सफदरजंग •
|
| 24 |
+
तंजावर •
|
| 25 |
+
येलहंका
|
| 26 |
+
|
| 27 |
+
|
| 28 |
+
बेगमपेट (हैदराबाद) • एचएएल बंगळूर (एचएएल/हिंदुस्थान)
|
| 29 |
+
|
| 30 |
+
|
| 31 |
+
जोगबनी विमानतळ •
|
| 32 |
+
मुझफ्फरपूर विमानतळ •
|
| 33 |
+
पाटना: लोकनायक जयप्रकाश विमानतळ •
|
| 34 |
+
पूर्णिया विमानतळ •
|
| 35 |
+
रक्सौल विमानतळ
|
| 36 |
+
|
| 37 |
+
|
| 38 |
+
बिलासपूर विमानतळ •
|
| 39 |
+
जगदलपूर विमानतळ •
|
| 40 |
+
Raipur: विमानतळ
|
| 41 |
+
|
| 42 |
+
|
| 43 |
+
चकुलिया विमानतळ •
|
| 44 |
+
जमशेदपूर: सोनारी विमानतळ •
|
| 45 |
+
|
| 46 |
+
|
| 47 |
+
बारवानी विमानतळ •
|
| 48 |
+
भोपाळ: राजा भोज विमानतळ •
|
| 49 |
+
ग्वाल्हेर विमानतळ •
|
| 50 |
+
इंदूर: देवी अहिल्याबाई होळकर विमानतळ •
|
| 51 |
+
जबलपूर विमानतळ •
|
| 52 |
+
खजुराहो विमानतळ •
|
| 53 |
+
ललितपूर विमानतळ •
|
| 54 |
+
पन्ना विमानतळ •
|
| 55 |
+
सतना विमानतळ
|
| 56 |
+
|
| 57 |
+
|
| 58 |
+
भुवनेश्वर: बिजु पटनायक विमानतळ •
|
| 59 |
+
हिराकुद विमानतळ •
|
| 60 |
+
झरसुगुडा विमानतळ •
|
| 61 |
+
रूरकेला विमानतळ
|
| 62 |
+
|
| 63 |
+
|
| 64 |
+
आग्रा: खेरीया विमानतळ •
|
| 65 |
+
अलाहाबाद: बमरौली विमानतळ •
|
| 66 |
+
गोरखपूर विमानतळ •
|
| 67 |
+
झांसी विमानतळ •
|
| 68 |
+
कानपूर: चकेरी विमानतळ •
|
| 69 |
+
ललितपूर विमानतळ
|
| 70 |
+
|
| 71 |
+
|
| 72 |
+
अलाँग विमानतळ •
|
| 73 |
+
दापोरिजो विमानतळ •
|
| 74 |
+
पासीघाट विमानतळ •
|
| 75 |
+
तेझू विमानतळ •
|
| 76 |
+
झिरो विमानतळ
|
| 77 |
+
|
| 78 |
+
|
| 79 |
+
दिब्रुगढ: मोहनबारी विमानतळ •
|
| 80 |
+
जोरहाट: रौरिया विमानतळ •
|
| 81 |
+
उत्तर लखिमपूर: लिलाबारी विमानतळ •
|
| 82 |
+
सिलचर: कुंभीरग्राम विमानतळ •
|
| 83 |
+
तेझपूर: सलोनीबारी विमानतळ
|
| 84 |
+
|
| 85 |
+
|
| 86 |
+
इंफाल: तुलिहाल विमानतळ
|
| 87 |
+
|
| 88 |
+
|
| 89 |
+
रुपसी विमान���ळ •
|
| 90 |
+
शेला विमानतळ •
|
| 91 |
+
शिलाँग: उमरोई विमानतळ
|
| 92 |
+
|
| 93 |
+
|
| 94 |
+
ऐझ्वाल: लेंगपुई विमानतळ
|
| 95 |
+
|
| 96 |
+
|
| 97 |
+
दिमापूर विमानतळ
|
| 98 |
+
|
| 99 |
+
|
| 100 |
+
पाकयाँग विमानतळ
|
| 101 |
+
|
| 102 |
+
|
| 103 |
+
अगरतला: सिंगरभिल विमानतळ •
|
| 104 |
+
कैलाशहर विमानतळ •
|
| 105 |
+
कमलपूर विमानतळ •
|
| 106 |
+
खोवै विमानतळ
|
| 107 |
+
|
| 108 |
+
|
| 109 |
+
बालुरघाट विमानतळ •
|
| 110 |
+
बेहाला विमानतळ •
|
| 111 |
+
कूच बिहार विमानतळ •
|
| 112 |
+
इंग्लिश बझार: मालदा विमानतळ
|
| 113 |
+
|
| 114 |
+
|
| 115 |
+
चंदिगढ विमानतळ
|
| 116 |
+
|
| 117 |
+
|
| 118 |
+
धरमशाला: गग्गल विमानतळ •
|
| 119 |
+
कुलू: भुंतार विमानतळ •
|
| 120 |
+
शिमला विमानतळ
|
| 121 |
+
|
| 122 |
+
|
| 123 |
+
जम्मू: सतवारी विमानतळ •
|
| 124 |
+
कारगिल विमानतळ •
|
| 125 |
+
लेह: कुशोक बकुला रिम्पोचे विमानतळ
|
| 126 |
+
|
| 127 |
+
|
| 128 |
+
लुधियाना: साहनेवाल विमानतळ •
|
| 129 |
+
पठाणकोट विमानतळ
|
| 130 |
+
|
| 131 |
+
|
| 132 |
+
अजमेर विमानतळ •
|
| 133 |
+
बिकानेर: नाल विमानतळ •
|
| 134 |
+
जेसलमेर विमानतळ •
|
| 135 |
+
जोधपूर विमानतळ •
|
| 136 |
+
कोटा विमानतळ •
|
| 137 |
+
उदयपूर: महाराणा प्रताप विमानतळ (दबोक)
|
| 138 |
+
|
| 139 |
+
|
| 140 |
+
देहराडून: जॉली ग्रँट विमानतळ •
|
| 141 |
+
पंतनगर विमानतळ
|
| 142 |
+
|
| 143 |
+
|
| 144 |
+
पोर्ट ब्लेर: वीर सावरकर विमानतळ
|
| 145 |
+
|
| 146 |
+
|
| 147 |
+
कडप्पा विमानतळ •
|
| 148 |
+
दोनाकोंडा विमानतळ •
|
| 149 |
+
काकिनाडा विमानतळ •
|
| 150 |
+
नादिरगुल विमानतळ •
|
| 151 |
+
पुट्टपार्थी: श्री सत्य साई विमानतळ •
|
| 152 |
+
राजमुंद्री विमानतळ •
|
| 153 |
+
तिरुपती विमानतळ •
|
| 154 |
+
विजयवाडा विमानतळ •
|
| 155 |
+
विशाखापट्टणम विमानतळ •
|
| 156 |
+
वारंगळ विमानतळ
|
| 157 |
+
|
| 158 |
+
|
| 159 |
+
बेळगाव: सांबरे विमानतळ •
|
| 160 |
+
बेळ्ळारी विमानतळ •
|
| 161 |
+
विजापूर विमानतळ •
|
| 162 |
+
हंपी विमानतळ •
|
| 163 |
+
हस्सन विमानतळ •
|
| 164 |
+
हुबळी विमानतळ •
|
| 165 |
+
मैसुर: मंडकळ्ळी विमानतळ •
|
| 166 |
+
विद्यानगर विमानतळ
|
| 167 |
+
|
| 168 |
+
|
| 169 |
+
अगत्ती विमानतळ
|
| 170 |
+
|
| 171 |
+
|
| 172 |
+
पाँडिचेरी विमानतळ
|
| 173 |
+
|
| 174 |
+
|
| 175 |
+
मदुरै विमानतळ •
|
| 176 |
+
सेलम विमानतळ •
|
| 177 |
+
तुतिकोरिन विमानतळ •
|
| 178 |
+
वेल्लोर विमानतळ
|
| 179 |
+
|
| 180 |
+
|
| 181 |
+
दमण विमानतळ •
|
| 182 |
+
दीव विमानतळ
|
| 183 |
+
|
| 184 |
+
|
| 185 |
+
भावनगर विमानतळ •
|
| 186 |
+
भूज: रुद्र माता विमानतळ •
|
| 187 |
+
जामनगर: गोवर्धनपूर विमानतळ •
|
| 188 |
+
कंडला विमानतळ •
|
| 189 |
+
केशोद विमानतळ •
|
| 190 |
+
पालनपूर विमानतळ •
|
| 191 |
+
पोरबंदर विमानतळ •
|
| 192 |
+
राजकोट विमानतळ •
|
| 193 |
+
सुरत विमानतळ •
|
| 194 |
+
उत्तरलाई विमानतळ •
|
| 195 |
+
वडोदरा: हरणी विमानतळ
|
| 196 |
+
|
| 197 |
+
|
| 198 |
+
अकोला विमानतळ •
|
| 199 |
+
औरंगाबाद: चिकलठाणा विमानतळ •
|
| 200 |
+
हडपसर विमानतळ •
|
| 201 |
+
कोल्हापूर विमानतळ •
|
| 202 |
+
लातूर विमानतळ •
|
| 203 |
+
मुंबई: जुहू विमानतळ •
|
| 204 |
+
नांदेड विमानतळ •
|
| 205 |
+
नाशिक: गांधीनगर विमानतळ •
|
| 206 |
+
रत्नागिरी विमानतळ •
|
| 207 |
+
शिर्डी विमानतळ •
|
| 208 |
+
सोलापूर विमानतळ
|
dataset/scraper_5/batch_12/wiki_s5_10558.txt
ADDED
|
@@ -0,0 +1,80 @@
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
कसोटी किट
|
| 2 |
+
वनडे किट
|
| 3 |
+
टी२०आ किट
|
| 4 |
+
पाकिस्तान राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने १९५२ पासून आंतरराष्ट्रीय क्रिकेटमध्ये पाकिस्तानचे प्रतिनिधित्व केले आहे.
|
| 5 |
+
ऑस्ट्रेलिया · इंग्लंड · दक्षिण आफ्रिका · भारत · न्यू झीलंड · वेस्ट इंडीज · पाकिस्तान · श्रीलंका · झिम्बाब्वे · बांगलादेश · अफगानिस्तान · आयर्लंड
|
| 6 |
+
बर्म्युडा · कॅनडा · केन्या · नेदरलँड्स · स्कॉटलंड
|
| 7 |
+
आर्जेन्टीना ·
|
| 8 |
+
डेन्मार्क ·
|
| 9 |
+
नामिबियन ·
|
| 10 |
+
युगांडा ·
|
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पाकिस्तान क्रिकेट संघाने ३ जुलै ते ७ सप्टेंबर २०१६ दरम्यान इंग्लंड आणि आयर्लंड दौरा केला. या दौऱ्यावर इंग्लंडविरूद्ध ४-कसोटी, ५-एकदिवसीय आणि १-टी२० सामन्यांची मालिका खेळवली गेली.[१] त्याशिवाय कसोटी मालिकेआधी सॉमरसेट आणि ससेक्सविरूद्ध ३-दिवसीय कसोटी आणि वूस्टरशायरविरूद्ध २-दिवसीय सामने खेळवले गेले. तसेच एकदिवसीय मालिकेआधी आयर्लंडविरूद्ध २-एकदिवसीय सामन्यांची मालिका खेळवली गेली.[२][३]
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इंग्लंडच्या पाकिस्तानविरूद्धच्या एकदिवसीय सामन्यांमध्ये पहिल्यांदाच मैदानावरील पंचांऐवजी टीव्ही पंचांच्या मदतीने पुढच्या पावलाचा नो-बॉल ठरवण्याच्या पद्धतीची चाचणी घेण्यात आली. [४] तिसऱ्या एकदिवसीया सामन्यात, इंग्लंडने ४४४ धावा करून एकदिवसीय क्रिकेटमधील सर्वोच्च धावसंख्येचा नवीन विक्रम प्रस्थापित केला. ॲलेक्स हेल्सने १७१ धावा करून इंग्लिश फलंदाजातर्फे सर्वोच्च वैयक्तिक धावसंख्येचा विक्रम मोडला.[५]
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कसोटी मालिका २-२ अशी बरोबरीत सुटली. इंग्लंडने एकदिवसीय मालिकेत ४-१ असा विजय मिळवला आणि एकमेव टी२० सामना पाकिस्तानने ९ गडी राखून जिंकला. ह्या सामन्यांसाठी मे २०१६ मधील श्रीलंकेविरूद्धच्या मालिकेत सुरू झालेली गुण-पद्धत वापरली गेली.[६] इंग्लंडने सुपर सिरिज १६-१२ अशी जिंकली.
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