{"text": "5. Connectivity is the most vital component of Indo-Bangladesh bilateral ties. Comment. Also discuss the ongoing initiatives on this front and their potential in ensuring better regional trade and investment.\nभारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों में 'संपर्क' सबसे महत्वपूर्ण घटक है। टिप्पणी करें। साथ ही बेहतर क्षेत्रीय व्यापार और निवेश सुनिश्चित करने में इस दिशा में चल रहे प्रयासों और उनकी क्षमताओं पर भी चर्चा करें।\n"} {"text": "जाची-परखी दोस्त बनाए जंदे न ।\n गीत ते सज्जनें दे गै गाए जंदे न ।\n ताह्म्मी ते घर-बाह्र सजाए जंदे न ।\n घर दे मसले घर नपटाए जंदे न ।\n इत्थै बर्छे की पलेआए जंदे न ?\n बस राई दे प्हाड़ बनाए जंदे न ।\n सिद्धे-सच्चे लोक सताए जंदे न ।\n दिन-रातीं चेह्रे चमकाए जंदे न । "} {"text": "जम्मू दी चिड़ी !\n ना झगड़ा ना बैर,\nप्रशादै आह्ली बर्फी लग्गी बड़ी शैल !\n बक्खरी ऐ डैह्ल,\nलब्दियां उत्ह्थे हज़ार !\n दिक्खी उलै ठाठ,\nठंडी ठंडी ब्हा उत्ह्थूं दी,\nउत्ह्थूं दे नज़ारे लगे लाजवाब !\n जम्मूआं बाहर जाइऐ मिगी कक्ख नी थोैह्ना ! "} {"text": "महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन ने पांच खिलाड़ियों के खिलाफ धोखाधड़ी का पुलिस केस दर्ज कराया है। रिपोर्ट के मुताबिक इन सभी खिलाड़ियों ने एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन के समय फर्जी दस्तावेज जमा करवाए थे। सोहम पनवालकर, मोहम्मद फैज राठोड़, अमे चेंबुरकर, गोविंद यादव और अल्तमाश खान नाम के इन क्रिकेटरों को मुंबई के लिए क्रिकेट खेलने के लिए महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन में अपना नाम रजिस्टर करवाना था। इस दौरान पांचों ने जो दस्तावेज जमा करवाए वह जाली निकले।\nएमसीए ने इन पाचों खिलाड़ियों के खिलाफ मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। इससे बाकी खिलाड़ियों को भी सबक मिलेगा, ताकि भविष्य में ऐसी कोई घटना दोबारा ना हो।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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This means that every time you visit this website you will need to enable or disable cookies again.\n"} {"text": "टीम इंडिया के खिलाफ वनडे सीरीज के लिए ऑस्ट्रेलियाई टीम के ऐलान के तुरंत बाद ही उसके पूर्व कप्तान माइकल क्लार्क ने अपनी टीम को आगाह कर दिया है। मुंबई में माइकल क्लार्क ने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई टीम के लिए टीम इंडिया के खिलाफ वनडे सीरीज मुश्किल होगी क्योंकि भारत को उसकी धरती पर हराना बेहद मुश्किल काम है।\nऑस्ट्रेलिया की टीम भले ही दुनिया की नंबर 2 वनडे टीम हो लेकिन पिछले 8 सालों से वो भारत को भारत में सीरीज नहीं हरा पाई है। पिछली सीरीज साल 2013 में हुई थी जिसमें उसे 2-3 से हार का सामना करना पड़ा था। ऑस्ट्रेलिया ने साल 2009 में भारत में वनडे सीरीज जीती थी। 6 मैचों की वनडे सीरीज में ऑस्ट्रेलिया 4-2 से जीता था। भारत में उसकी ही सरजमीं पर ऑस्ट्रेलिया ने कुल 51 वनडे खेले हैं जिसमें वो 25 मैच जीता और 21 में उसे हार का सामना करना पड़ा है।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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This means that every time you visit this website you will need to enable or disable cookies again.\n"} {"text": "छोटी सी नेहा उसे शार्ट पैंट पहनना बहुत पसंद है ,गर्मी भी इतनी होती है मुम्बई में कि बस जाती ही नहीँ।दिसंबर भी तो यहाँ मार्च के समान।उसने जिद किया और पापा ने अब मना कर दिया । वो रो रही है माँ ने कहा मुझे बीच मे नहीँ आना,तेरी मर्ज़ी ।\nपापा ने कहा..You look more graceful even in Saree Anuradha but I think I missed to see you before.\nपार्टी में सब एक दूसरे को सर्व कर रहे थे,नेहा उदास सी दिख रही थी उसने कॉम्पलिमेंट भी नहीँ दिया;वैसे उसका कॉम्पलिमेंट उसके जैसा क्यूट होता है वो खुद शर्माती है और अनुराधा का ख़्याल रखती है।\nअनुराधा ने उसकी मम्मा को देखा जो बहुत ही प्रसिद्ध Gyanecologist है और पापा India के बेहतरीन Paediatrician.\nमम्मा ने बताया कि आज sir ने मना किया है शार्ट lenght के कपड़ो के लिए इसलिए उदास है।\nअनुराधा...Sir,it's not fair at all.She is too small ;moreover there is nothing to hide atleast for 2 more years.\nI agree with you Doc...but..एक दिन में तो नहीँ होगा न दो साल तो दो साल बाद आ ही जाना है।I just told her to take care of cloths upto 18 ..then she can go for what she like.Well it's my view as father and Paeditrician.Both of you may have different opinion and it's okay for me.\nDoc..can you deny for biological process and changes every female have to go in this age group.There are lots of things to take care of in this age one is clothing too.\nअनुराधा...I got your point and am not comfortable as well.I want people think of me for my attitude and for the person I am.And am modern enough by brain and deed then why to show my less important part than my brain and face.I agree with you Sir..and Sorry.\nIt's all about the so called freedom of choice in the name of slavery.\nअनुराधा...मैं भी धूम कर देखती हूँ अगर सड़क पर भी होती हूँ,हाँ मैं समझती हूँ कि आपलोगो के पास भी आँखे होती है।\nनेहा के पापा ने उसे Swimmer बनाया ,classical डांसर और ब्लैक बेल्ट होल्डर ऑफ कराटे।\nअब नेहा बड़ी हो गयी है कॉलेज जाती है और अक्सर खुद ही जीन्स के ऊपर कुर्ते या सलवार कुर्ती पहनती है।\nSo running 18 now..\n"} {"text": "।উচ্চমানের তুঁত পাতা উৎপাদন (প্রশস্ত ব্যবধান এবং যথাযথ ছাঁটাই এর মাধ্যমে)\n।গুড়া পলুপালন (সফল রেশমচাষের জন্য)\n।Improved Nistari lines (Higher survival & silk productivity)\nউচ্চ রেশম উত্পাদনকারী নতুন সংকর প্রজাতি M6DPC x (SK6.7)\nসুভর্ণা (মোটর চালিত চরখা) সাথে সৌরনীড় (সৌর জল গরম করার যন্ত্র)\nसुवर्णा (मोटर चालित चरखा) के साथ सौरोनीर (सौर जल तापन इकाई)\nSUVARNA (MOTORIZED CHARKHA) with SOURONEER (SOLAR WATER HEATING UNIT)\nজৈবিক নিয়ন্ত্রণ পদ্ধতিতে তুঁত পাতাকে ক্ষতিকারক পোকা-মাকড় থেকে রক্ষার উপায় (মিলিবাগ এবং থ্রিপ্স)\nजैव नियंत्रण एजेंट : शहतूत पीड़क प्रबंधन (चूर्णी मत्कुण एवं थ्रिप्स)\nBiological Control Agents : Mulberry Pest Management(Mealybugs & Thrips)\nशेल्फ रेशम कीटपालन (प्ररोह अशन)\n।Silkworm Shelf Rearing (Shoot Feeding)\nNew promising Multi x Multivoltine hybrid - Nistari X (SK6 x SK7)\nशहतूत पौध में होनेवाले मुख्य रोग एवं कीट का पूर्ब सूचना एवं निदान तथा सावधानी विवरणी।\n"} {"text": "2. Do you think industrial expansion is an effective strategy to bring in economic growth in the hill states of India? Critically comment.\nक्या आपको लगता है कि भारत के पहाड़ी राज्यों में आर्थिक विकास लाने के लिए औद्योगिक विस्तार एक प्रभावी रणनीति है? समालोचनात्मक टिप्पणी करें।\n"} {"text": "डोगरी साहित्य,Dogri literature, History of Dogri literature, Growth of Dogri literature, Dogri Poetry, Book review & Shayri, Dr. Chanchal Bhasin, dogri Writers.\n Posted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 4:07 PM 1 comment:\nपरमात्मा की मर्जी के आगे हमेशा नतमस्तक. . . . ! !\n Posted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 9:05 PM No comments:\nन्यारा आदि कताबेँ दा डोगरी च रूपांतर कीते दा ऎ।\n गी दिँदे न जिँदी प्ररेणा जां मार्गदर्शन करी एह् इत्थूं तगर पुज्जी सके न।\n इंदे इस संग्रैह च जेह्ड़ियां क्हानियां न ओह् समाजक मान-मुल्ल,\nनेईँ मिला दी, फ्ही बी ओह् जीवनै गी अग्गै त्रीड़े दा ऎ।\n 1.\n नेईं जंदे। अधिकार प्राप्त करने तांई अपने गै हत्थ-पैर चलाने पौँदे न।\n ते मनुक्खेँ दी कदर नेईँ करने दे दुक्खै कन्नै अपने ग्रां परतोई औँदा ऎ।\n करदा। पर तुसेँ साढे कन्नै कोओप्रेटिव ते रौह्ना चाहिदा ऎ। \" (सफा -25 )\nते नक्क कटाने गै पौना ऎ कीजे जिँदगी च हर कोई नक्क कटांदा ऎ।\n 3.\n प्राकृतक संतुलन ठीक रखेआ जा। मते बूह्टे लाए जान।\n खबरै की अपने इन्ने रुप दस्सदे न। ओह्दे मनै च बार-बार इक सुआल औँदा ऎ,\nआई जंदा ऎ-बेचारी बे?\n होने कारण लत्त सडना शुरू होई जंदी ऎ जिस कारण लत्तै गी कप्पना पेई जंदा ऎ।\n असेँगी इ'यै सिक्खमत दिँदे न जे इकमिक होइयै रौह्ना ते फ्ही एह् किस लेई ऎ।\n करियै जोडने दी कोशिश कीति जा।\n सकदा। बल्के किश करियै दसदे अर्थात कर्मे कन्नै गै इंसान बड्डा बनदा ऎ।\n हिरख करदी ऎ कीजे ओह्दा बी कोई नेईँ ऎ ते दोए इक-दूए दे दुक्खेँ दे भाली न।\n बी जाने आस्तै आक्खदे न ते बेबू गी फौजी गड्डी च ब्हालियै भेजी दिँदा ऎ।\n दसने दी सराह्ना जिस करी ओह्दा कद्द सब्भने थमां बड्डा होई जंदा ऎ।\n किश नेईँ सकदे। इत्थै तगर सोचदे न जे उ'नेँगी कोई भिक्ख बी नेईँ दिँदा।\n )\nदिक्खदा ऎ ते सगुआं खुश होँदा ऎ।\n जेह्डियां कुसै बेल्लै बी खुल्ली जंदियां न। ओह् रिश्ते नेईँ रौँह्दे।\n जंदा ऎ जेह्डा घरै आह्ले गी लब्भदा नेईँ ऎ।\n 11. टोडी बच्चा हाय!\n सुनबाई नेईँ ऎ। उसगी उसलै थ्होडी उमीँद लगदी ऎ जिसलै मैँत्री उंदे ग्रां,\nहाल्ली किश बी नेईँ बदलें दा उ'यै ज'नेह् गै राज ऎ जनेह् 47 ( संताली )\nबी उ'यै किश ऎ।\n जख्मी हालती च हास्पताल भर्ती कराया जंदा ऎ जित्थै उसगी लहू चढाया जंदा ऎ।\n आया ऎ पर इसी धरती पर जीना की नेईँ आवा दा। \" (सफा -96 )\n13.\n मनै दे भाव व्यक्त करने आस्तै कैँवस दा स्हारा लैँदा ऎ ते ओह्दा मनना ऎ,\"\nधरातल पर पुज्जना चाहिदा ऎ। सारेँ मनुक्खेँ आस्तै इक आम सच्च केह् ऎ,\nसाहित्य च इसी उजागर करना चाहिदा ऎ। \" ( सफा-103 )\nजीऎँ तूं-समाजै च संघडोँदे रिशतेँ जिँदे च पैहेँ दी भुक्ख गै सब्भ किश ऎ।\n बी रिश्तेँ दी कडी गी त्रुटने थमां बचाने दी कोशिश गै करदी ऎ।\n थमां बचाई लैंदा ऎ।\n बारी ऎसी फाइयेँ च फसी जंदा ऎ जिसदा छुटकारा पूरी उमर तगर नेईँ होँदा।\n उस दिन पाकीजा अपने घरैआह्ले ते बच्ची कन्नै कुतै दूर चली जंदी ऎ।\n गी पूरी चाल्ली कन्नै डोगरी भाशा गी समर्पित करी ओडेदा ऎ।\n तारा दानपुरी होर डोगरी दे सोह्गे-सेआने ते बहुमुखी प्रतिभा आह्ले साहित्यकार जि'नेँ अज्जै तगर केईँ साहित्यक विधाएं गी अपनी सूझ-बूझ आह्ली पैनी का'न्नी रा'हेँ कलमबद्ध कीते दा ऎ। इंदी कृतियेँ दे विशेँ बडे निग्गर समाजै दी नुमांयदगी करने आह्ले न। चाहे इंदियेँ क्हानी दी गल्ल कीती जां भामेँ उपन्यासेँ दी, उंदे पात्तर समाजिक परिवेश चा गै लैते गेदे न जेह्ड़े अपने-अपने किरदारेँ च रूझे दे जीवनै दा निर्वाह करदे से'ई होँदे न। इ'नेँ फौज ते शिक्षा दे विभाग थमां सेवानिवृत होने दे बाद अपना सफर होर मता तेज कीता। इस च इ'नेँ अपने जीवनै दे सब्भै खट्टे-मिट्ठे अनुभव जेह्ड़े दिक्खे-भाले दे न उब्भी चित्रत कीते दे न। इ'नेँ साहित्य लेखन दी शुरुआत बशक्क क्हानी कन्नै कीती पर प्रकाशत रुपै च जेह्ड़ी कृति सभनेँ थमां पैह्ले आई ओह् उपन्यास दे तौर पर ही। इ'न्दा पैह्ला उपन्यास जीवनदान जेह्ड़ा मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक शैली च लिखेआ गेदा ऎ। जिसदा डोगरी साहित्य च खासा थाह्र ऎ। इस बाद इंदा पैह्ला क्हानी संग्रैह् केईँ जनम सन् 1998 च, जिस च नौ (9) क्हानियां हियां। दूआ उपन्यास चेतना सन् 2000 च प्रकाशत होआ, जिसी रचनाकार अपनी श्रेश्ठ रचना समझदा ऎ। लेखक लोकेँ दे हितेँ ते उंदे कन्नै होने आह्ली बेन्याई दी गल्ल करदे न। इ'नेँ मूल रचनाएं दे कन्नै-कन्नै किश रचनाएं दा दूई भाशाएं थमां रूपांतर बी कीते दा ऎ जि'यां बंगला उपन्यास दा सादा लिफाफा नां कन्नै, न्यारी भगती, सैह्जे-सैह्जे पाओ ते करां जगत कोला न्यारा आदि कताबेँ दा डोगरी च रूपांतर कीते दा ऎ।\n हून क्हानीकार दे रूपै च इक बारी फ्ही साढ़े सामने आए न। अपना दूआ क्हानी संग्रैह लहुऎ दा रंग लेइयै जिस च सौह्ला ( 16 ) क्हानियां न। लेखक मताबक इस संग्रैह च संकलत क्हानियां किश मतियां परानियाँ न यानि सखेतरू गैँईँ दियां सन् 1985 थमां लेइयै 2000 तगर लिखी गेदियां क्हानियां। पर उच्च कोटि दियां न जि'यां इस संग्रैह च उब्भी क्हानी शामल ऎ जेह्ड़ी इ'नेँ सभनेँ थमां पैह्ले लिखी ही। पुल क्हानी, जिस पर टैली फिल्म बी बनी चुकी दी ऎ। इ'यां गै नौ गज्जियां बामना क्हानी दा हिँदी रूपांतर हो चुके दा ऎ। दानपुरी होर क्हानीकार दे रूपै च इस मकाम तगर पुज्जने दा श्रेय विजय वर्मा ते डॉ. ओम गोस्वामी होरेँ गी दिँदे न जिँदी प्ररेणा जां मार्गदर्शन करी एह् इत्थूं तगर पुज्जी सके न।\n 1. मोह्-भंग:-संग्रैह दी पैह्ली क्हानी उस समाजै दी नशानदेही करदी ऎ जेह्ड़ा खिट्टां पेदा तरक्की आह्ली भेट्ठा बद्धा जा दा ऎ उसी मनुक्खी कदरेँ दी परवाह नेईँ ऎ। पैहे दी भुक्ख इन्नी बद्धी गेदी ऎ उसी मनुक्खी जानेँ दी बी कोई फिकर नेईँ ऎ। इ'यां इस क्हानी च सोमू जिस दा ञ्यांना हस्पताल च दाखल करांदा ऎ। दवाई लैन गेदे ओह्दी मलाटी ग्राँऽ दे दोस्त कन्नै होँदी ऎ जिन्नै शैह्र आनियै अपनी इक चंगी पंछान बनाई लेदी ऎ ते सोमू दी माली हालत दिक्खियै उसी बी उत्थै गै किश कम्मकाज करी लैने आस्तै आखदा ऎ ते समझदा ऎ,\"एह् लोकतंत्र ऎ भाई इत्थै जनता आस्तै सिर्फ अधिकार बनाए जंदे न दित्ते नेईं जंदे। अधिकार प्राप्त करने तांई अपने गै हत्थ-पैर चलाने पौँदे न। अधिकारेँ दी लुट्ट ऎ पेई दी। जिन्ना कोई लुट्टी लै ओह्दी हिम्मत ऎ। इस करी आक्खना तुम्मी शैह्र टुरी आ तुगी बी लुट्टने दे दाऽ आई जाङन, वरना एह् सरकार तेरा हत्थ पकडियै, तुगी ठुआलने आस्तै ग्रां नेईँ लगी जान। \" (सफा - 20 ) सोमू अजेँ जक्को-तक्के च गै फसे दा हा जे जिस हस्पतालै च ञ्यांने दा इलाज चला दा हा ओह् इमारत डिग्गी पौँदी ऎ ओह्दी त्रीमत ते जागत थल्लै गै दबोई जंदे न। पर हस्पतालै दे डिग्गी पौंने करी लोकेँ दे पैहे पिच्छै नट्ठने ते मनुक्खेँ दी कदर नेईँ करने दे दुक्खै कन्नै अपने ग्रां परतोई औँदा ऎ।\n 2. नक्क कटे लोक:-भ्रश्टाचार ते रिश्वतखोरी पर अधारत क्हानी ऎ जे अज्ज अस सब्भै इस समस्या कन्नै लड़ा दे आं कीजे इस ने असेँगी अंदरो-अंदरी भुग्गा करी ओड़ेदा दे। ईमानदार लोकेँ आस्तै इक नासूर बनी चुके दा ऎ। इस दमघोटू म्हौल च अपने-आप गी पूरी चाल्ली कन्नै कटोए दा मसूस करदे न। बशक्क इस कबैह्तै गी रोकने आस्तै जि'न्ना मर्जी बरोध करन जां रिश्वत लैने आह्ले गी समझान पर इस च कामयाव नेईँ होई सकदे। सगुआं इस दी मुखालफत करने आह्ले दी गै सूली पर चढाई दित्ता जंदा ऎ। जिंदगी भर रगडे खंदे रौँह्दे न। उ'नेँगी अपनी नौकरी ते घर परिवार दी पालमा करना मुश्कल होई जंदा ऎ। इ'यां गै इस क्हानी च जि'नेँगी अपने नक्कै दी इज्जतू दी कोई परवाह नेईँ ऎ ओह् ऎसे नक्क कटे न जि'नेँगी तन्खाही कन्नै किश नेईँ बनदा ते पैहे पिच्छै इन्ने अन्ने न जे दौनेँ-दौनेँ हत्थेँ लोकेँ गी त्रुक्कै दे न। क्हानी च बाबू राम सरन अपने दफ्तरै च बद्धी रिश्वतखोरी थमां बडा गै परेशान ऎ इसी रोकने दे बडे जतन करदा ऎ पर इसगी रोकी पाना ओह्दे आस्तै इ'न्ना आसान नेईँ ऎ कीजे दफ्तरै दे बड्डे अफसर बी रिश्वत दे हिमायती न। ओह् बाबू राम सरन होरेँगी बी इयै समझांदे न, \"ठीक ऎ अगर तुस रिश्वत नेईँ लैना चांह्दे ते तुस नेईँ लैओ मेँ तुसेँ-ई कम्पैल नेईँ करदा। पर तुसेँ साढे कन्नै कोओप्रेटिव ते रौह्ना चाहिदा ऎ। \" (सफा -25 ) उंदे कम्मै च पूरा सहैजोग करन इ'यां कम्मै च आडिग नेईँ बनन। पर जिसलै उंदी मर्जी मताबक नेईँ चलदा तां बाबू राम सरन दे खलाफ फौजदारी ते अनुशासनहीनता दा केस बनाइयै फसाई ओडदे न। बशक्क त्र'ऊं ब'रेँ मगरा बाह्ल होई जंदा ऎ पर इस दौरान उसी ते ओह्दे परिवारै दी पालमा अद्धी तन्खाही कन्नै उब्भी त्र'ऊं-च'ऊं म्हीनेँ मगरा मिलदी ही। घरै दा गुजारा मुश्कल होई जंदा ऎ। जिस दिन बापस दफ्तर औँदा ऎ तां दिक्खदा जे ओह् लोक ते पैह्ले थमां बी ज्यादा खुल्ले होई गेदे न उ'नेँ सगुआं कम्मेँ दे रेट रक्खी लेदे न एह् सब्भ किश दिक्खियै ओह् चिँतत रौँह्दा ऎ। जे सब्भ लोक किस बक्खी जा करदे न ते ओह्दी घरैआह्ली इयै समझांदी ऎ जे उब्भी उंदे गै रंग च रंगोई जा जेकर जिँदगी जीनी ऎ ते नक्क कटाने गै पौना ऎ कीजे जिँदगी च हर कोई नक्क कटांदा ऎ।\n 3. हरे जंगल दा कत्ल:-क्हानीकार लगातार बडोँदे जंगल-जाड ते इस कारण होँदे पर्यावरण गी खतरे करी फिकरमंद लभदे न। कीजे इसदा असर पूरी कायनात पर पवै दा ऎ। करसान अम्बरै आह्ली बक्खी ताडी लाइयै बैठे दा ऎ जिसलै फसल राह्ने दी बारी औँदी ऎ तां पानी दी लोड ऎ ओह् मिलदा नेईँ ऎ बेमौके ब'रियै तबाई पुट्टी जंदा ऎ। सारा पर्यावरण गै हिली गेदा ऎ। अज्ज शैह्रीकरण होने करी जंगलेँ दे जंगल तवाऽ करी दित्ते गे न जेकर सरकार बी कोई पंजबरी योजना बनांदी ऎ तां बी कोई हल नेईँ निकलियै नेईँ औँदा ऎ। इस बक्खी ध्यान देने दी लोड ऎ जे प्राकृतक संतुलन ठीक रखेआ जा। मते बूह्टे लाए जान।\n 5. पुल-उस परिवारै दी क्हानी जेह्डा बेकसूर होंदे होई आंतकबाद दी बली चढी जंदा ऎ। एह् परिवार पैह्ले खुशी-खुशी मेह्नत करियै अपने बाल-बच्चे दी पालमा ते उंदे खुशहाल भविक्ख बारै बडा गै जाग्रत सेई होँदा ऎ पर उंदे बुने दे सुखने उसलै त्रुट्टी जंदे न जिसलै घरै दा कमाऊ सदस्य आंतकवादियेँ आसेआ चलाई गेदी गोलियेँ च घालऽ होई जंदा ऎ। घालऽ केह् होँदा ऎ बल्के गोलियां पूरी लत्तै गी त्रुप्पी ओडदियां न। जख्म ठीक नेईँ होने कारण लत्त सडना शुरू होई जंदी ऎ जिस कारण लत्तै गी कप्पना पेई जंदा ऎ। ओह् ओह्दे आस्तै इक नासूर बनियै कैँसर दा रूप धारण करी लैँदा ऎ। घरै आस्तै दिक्खे दे सुक्खने रेशे-रेशे होई जंदे न। जेह्डे अपने मुडे गी इंजिनियर बनाने दे होँदे न। उंदी हालत अर्श थमां फर्श उप्पर आने आह्ली बक्खी दिक्खना पौँदा ऎ। जिसलै संजू दा डैडी ठीक हा तां ञ्यांने गी प्राइवेट स्कूलै च पढदा हा पर हून सरकारी स्कूलै च बी पढाने दी थबीक नेईँ रेई। कुडी गी पढाई गै छोडना पेई जंदी ऎ। सब्भ किश ठीक करने आस्तै लाई ओडदे न पर ओह् फ्ही बी बची नेईँ सकदा। संजू इयै सोचदा ऎ जे मास्टर होर ते इयै आक्खदे न जे सब्भै धर्म असेँगी इ'यै सिक्खमत दिँदे न जे इकमिक होइयै रौह्ना ते फ्ही एह् किस लेई ऎ। एह् सब्भ सोचियै ओह् उस चेतेँ च भुल्ली जंदा ऎ जित्थै ओह्दे डैडी ने उसी इंजिनियर बनाने आस्तै सोचे दा हा जेह्डा पुल बनांदे न पर ओह् सोचदा ऎ जे इसलै जरूरी ऎ जे इ'नेँ धर्मेँ च बनी दी खाई उप्पर इक पुल आह्ला लेखा कम्म करियै जोडने दी कोशिश कीति जा।\n 6. नौ गज्जिया बामना:-एह् क्हानी दा नां पढदे गै लगदा ऎ नौ गज्जिया ते बामना कि'यां होई सकदा ऎ? जि'यां इस गी पढन लग्गो तां समझ आई जंदा ऎ जे सिर्फ कद्दै कन्नै कोई बड्डा नेईँ होई सकदा। बल्के किश करियै दसदे अर्थात कर्मे कन्नै गै इंसान बड्डा बनदा ऎ। इ'यां गै किशन इस क्हानी दा पात्तय कद्द बुत्त निक्का होने करी ग्रां दे सब्भै उसी बामना-बामना करियै कुआलदे न। इसदी कद्द-काट्ठी निक्की होने दा कारण इब्बी होई सकदा जे ओह् जतीम ञ्यांना ऎ जेह्डा अपने चाचे दे टुकडेँ पर पलदा ऎ। ते उंदे ते ग्रां दे डंगर चारियै, लोकेँ दे घरै च कम्म करियै जित्थै रूट्टी दा टुकडा मिली जा गुजारा करी लैँदा ऎ। कोई उस कन्नै हिरख नेईँ करदा सगुआं टबौके गै लांदे न। ग्रां दी इक बुड्ढी बेबू गै जेह्डी उसी हिरख करदी ऎ कीजे ओह्दा बी कोई नेईँ ऎ ते दोए इक-दूए दे दुक्खेँ दे भाली न। ओह् रोज रातीँ इक दुद्धै दा गलास पीने आस्तै दिँदी ऎ। सन् 1971 दी लडाई च सब्भै नट्ठियै कुतै अरामै आह्ली थाह्र चली जंदे न पर उ'नेँगी कोई बी अपने कन्नै लेइयै नेईँ जंदा। बेबू उसी बी कुतै चली जाने दी सलाह् दिंदी ऎ पर बामने च इ'न्नी हमदर्दी ऎ जे ओह् उसी छोडियै नेईँ जंदा। जिसलै फौजी उ'नेँगी बी जाने आस्तै आक्खदे न ते बेबू गी फौजी गड्डी च ब्हालियै भेजी दिँदा ऎ। पर उसदा मन हून चाचे आह्ली दुनिया अर्थात मतलबी दुनिया थमां चढी गेदा हा ओह् मौत चाहंदा हा आत्महत्या नेईँ ओह् मौत जिसी लोक बाद च बी याद रखन। ओह् फौजियें कन्नै रली जंदा ऎ कीजे डंगर चरांह्दे होई चप्पे-चप्पे दा बाकफ हा ते छुत कीते दा दुश्मन दा पता लाई आनदा। इ'यां फौजियेँ दी मदाद करदा। ते 26 जनवरी पर शौर्यचक्र दित्ता जंदा ऎ। निक्के कद्दे करी बड्डी ब्हादुरी करी दसने दी सराह्ना जिस करी ओह्दा कद्द सब्भने थमां बड्डा होई जंदा ऎ।\n 7. उस दिन:-अमीर आदमी दा स्तर जिसलै घटदा ऎ ते ओह् गरीब बनदा ऎ पर जिसलै गरीबै दा स्तर घटदा ऎ ते ओह् भिक्ख मंगा बनी जंदा ऎ। क्हानी दियां एह् पंक्तियां इंसानै गी सोचने पर मजबूर करी दिँदियां न जे गरीबी कारण माह्नू किन्ना बेबस लाचार होई जंदा ऎ। तारा दानपुरी होँदी इस क्हानी च गरीब परिवार दी व्यथा गै बखान कीती दी ऎ। इस घरै दा कमाने आह्ला जिसलै बमारी कारण मंझी पर पेई जंदा ऎ तां सब्भै अपना लड छडकाने दी कोशिश करदे न। उ'नेँगी कोई बी दुआर बी नेईँ दिँदा तां सभनेँ गी चब्भन लगी पौँदे न जे इ'नेँगी दुआर दित्ता तां लैना कोह्दे कोला ऎ। प्रकाश जेह्डा फेरी लाइयै घरै दा गजारा टोरदा उसी इस गल्लै दी कोई चैँता नेईँ जे कल आस्तै बी किश जोडना ऎ कीजे ओह्दी औँदन गै इस थमां बद्ध नेईँ जे ओह् जोडी सकै। मंझी पर पौँदे गै घरै दी हालत ऎसी होई जंदी ऎ जे ञ्यांनें लूसडियां लैन लगी पौँदे न, उ'नेँगी कोई टोह् नेईँ टुकदा। जिसकरी ञ्यांनें गी भुक्खै कन्नै बिलखदे दिक्खी होल पौँदे न पर करी किश नेईँ सकदे। इत्थै तगर सोचदे न जे उ'नेँगी कोई भिक्ख बी नेईँ दिँदा।\n 8. दरेडेँ दी पीड:-दरेड जेह्डी इक चीजै गी दूई चीजै थमां बक्ख करी दिँदी ऎ भामेँ ओह् रिश्तेँ दी होवै जां कुसै दीवार दी। जित्थै रिश्तेँ दी गल्ल ऎ उब्भी आपूं-चेँ जेकर जुडे दे रौह्न ते सुक्ख दिँदे न पर जेकर इंदे च दरेड पेई जा तां कालजा रूक्कदे रौँह्दे न। इ'नेँगी बेल्लै रौँहदे गै साम्भी लैना चाहिदा ऎ। क्हानीकार दे शब्देँ च,\" भारत भूमि बी केईँ बारी तिडकी ऎ, पर दरेड नेईँ पेई। दरेड पौने गी होई जे उसलै गै मानसून दी बरखा ब'रन लगी पौँदी जे । दरेड पौने'शा बचाऽ होई जंदा। तिडकी दियां पपडियां बरखा दे पानियै कन्नै रूडी जंदियां जे धरत फ्ही साफ़ लिश्कन लगी पौँदी। ( सफा-67 )\n9. मुर्गीखाना:-मुर्गीखाना क्हानी च क्हानीकार ने अपनी बडी खट्टी पलेटी दी भाशा च आक्खी दी ऎ जे समाज एक मुर्गीखाना गै ऎ जित्थै सब्भै माह्नू बक्ख-बक्ख वृति दे अपने-अपने स्वार्थ साधनेँ च लग्गे दे न। लोक इक-दूएं गी ठुंग्गै दे न पर शासक फिकरमंद नेईँ बल्के तमाशबीन बने दा दिक्खदा ऎ ते सगुआं खुश होँदा ऎ।\n 10. तिलांजलि:-पति-पत्नी दे रिश्ते दी क्हानी जिस च इ'यै बांदे कीते दा ऎ जे एह् रिश्ते दे धागे मजबूत गै होने चाहिदे न पर जेकर मजबूत नेईँ होँगन तां लडी च परोए दे बंधनेँ दे मोती खिलरी जांगन ते फ्ही इ'नेँगी परोने बेल्लै बी ऎसियां गंढां लाने पौँदियां न जेह्डियां कुसै बेल्लै बी खुल्ली जंदियां न। ओह् रिश्ते नेईँ रौँह्दे। प्रेम चौकीदार अपनी निक्की सारी नौकरी ते लौह्के परिवार च बडा खुश हा पर पत्नी दी बेबफाई कारण घरै दा बाह्र रौँह्न लगी पौँदा ऎ ते खीर रिटायर्ड होने पर जिसलै उसदा जागत घर परतोई आने आस्तै जोर पांदा ऎ तां कुतै दूर चली जंदा ऎ जेह्डा घरै आह्ले गी लब्भदा नेईँ ऎ।\n 11. टोडी बच्चा हाय! हाय! ! :-क्हानी नजाम दी काली करतूतेँ गी गोआड़दी ऎ जिस च लुकाई अपने हक्क-हकूकेँ थमां मैहरूम ऎ उसी एह् सियासी लोक छडे लारेँ कन्नै गै पतेआई जा दे न। जे उ'नेँगी ओह् चांह्दे न पर कुसलै मिलग इसदा कोई बक्त मुकरर नेईँ ऎ। क्हानी च चित्रत इक स्वतंत्रता सनानी जेह्ड़ा 45-46 ब'रेँ थमां सरकार आसेआ थ्होने आह्ली मदाद लेई इक दफतर थमां दूए दफतर खजल होआ दा ऎ पर ओह्दी कोई सुनबाई नेईँ ऎ। उसगी उसलै थ्होडी उमीँद लगदी ऎ जिसलै मैँत्री उंदे ग्रां, स्कूलै दे 26 जनवरी दे समारोह च औँदा ऎ। पर ओह्दे भाशन बी छडे लोकेँ दी झूठै दे उच्चे झूटे गै दिँदे न। जिसलै मंत्री कोल अपनी फरियाद रखदा ऎ तां मंत्री एह् आक्खियै टाली दिँदा ऎ जे अजेँ ओह्दी बारी नेईं आई,\" तुस हिखी रक्खो बल्लेँ-बल्लेँ तुंदी बारी बी आई जाग। \"( सफा-89 ) उसी इ'यां लगदा ऎ हाल्ली किश बी नेईँ बदलें दा उ'यै ज'नेह् गै राज ऎ जनेह् 47 ( संताली ) थमां पैह्ले हा सिर्फ नजाम गै बदलें दा ऎ सोच उ'यै गै लुट्टने आह्ली। अज्ज बी उ'यै किश ऎ।\n 12. लहुऎ दा रंग:-संग्रैह् दी शीर्शक आह्ली क्हानी ऎ जेह्ड़ी समाजै दे स्वार्थी बैह्रुपियेँ दी सूरत सामनै आह्नी खडेरदी ऎ। ओह् मनुक्खी दर्द दी नेईँ पंशानदा ते अपने स्वार्थ दी अग्गै करी कदेँ गली-म्हल्ले, मजहब जां धर्म दी आड लेइयै इक-दूए दे लहुऎ दा दुश्मन बनी ऎ उसलै उसगी कोई ध्यान नेईँ रौँह्दा जे एह् लहू भामेँ कुसै बी कौम जां जाति दा ऎ एह्दा रंग ते होने आह्ली पीड इक बरोबर ऎ। इस क्हानी दा किरदार रामरसूल जतीम खाने च पलदा ऎ जित्थै सभने धर्म दे ञ्यांने पलदे न पर फ्ही बी उंदा कोई धर्म नेईँ ऎ जेकर कोई धर्म ऎ तां इंसानियत, हिरख-समोधै दा, जित्थै कोई नफरत दा पाठ नेईँ पढाया जंदा। पढाया जंदा ऎ तां इक-दूएं कन्नै प्यार-हिरख करना। रामरसूल जतीम खाने दे ञ्यांने गाई-गाई हिँदू-मुस्लमान सभनेँ दे घरेँ चंदा ग्राइयै आनदा ऎ पर कोई उसदे अंदर इंसानी बंड नेईँ ही ते ना गै कदेँ कुसै उसी इस नजरी कन्नै दिक्खेआ हा पर फसाद होने पर मारिया ते रामरसूल गी कोई घालऽ करी जंदा ऎ। मारिया उत्थै गै दम त्रोडी दिँदी ऎ ते रामरसूल गी जख्मी हालती च हास्पताल भर्ती कराया जंदा ऎ जित्थै उसगी लहू चढाया जंदा ऎ। पर जिसलै होश औँदी ऎ तां लहू चढाने आह्ली पाईप खोली दिँदा ऎ जिस कन्नै लहू शरीरै च चढने दी वजाए पूरेँ विस्तरे पर बिछी जंदा ऎ ओह्दे प्राण-पखेरू उडरी जंदे न। उसलै उस लहुए दा रंग कोई नेईं पंशानी सकेआ जे एह् कुस धर्म दा ऎ जां जाति दा ऎ। इत्थै क्हानीकार चिँतत ऎ जे,\" माह्नू चन्न तारेँ परा होई आया ऎ पर इसी धरती पर जीना की नेईँ आवा दा। \" (सफा -96 )\n13. ओह्दी तस्वीर:-क्हानी उस हाडै गी बांदे करदी ऎ जिस च हर इक माह्नू अपने-आपै गी लेखक साबत करने च लग्गे दा ऎ ओह् समाजै च व्यापी दी सचाई थमां बडी दूर ऎ सच्च लिखने दी ओह्दे च हिम्मत नेईँ ऎ ते बाह्-बाही बटोरने आस्तै किश बी लिखने लेई तैयार नेईँ ऎ सच्च-झूठ जिस कन्नै छडा उसी गै लाऽ मिली सकै। पर जेकर कोई लिखने दी कोशिश बी करदा ऎ तां उसदे खलाफ लोक मोर्चा खोली ओडदे न। दुक्खी मनै कन्नै लेखक ने क्हानी रा'हेँ अपने मनै दी भडास बी कड्ढी लेदी ऎ। ते सूझाऽ बी दित्ते दा जे चित्रकारी रा'हेँ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कीती जा तां माह्नू अपने मनै दे भाव बी व्यक्त करी लैँदा ऎ उसी दिक्खने आह्ला अपने-अपने साह्बेँ कन्नै गै ओह्दी व्याख्या करदा ऎ। जि'यां इस क्हानी दा पात्तर बंसी लाल इक टीचर, लेखक ऎ ते जिसलै अपने भाव पत्रेँ पर उकेरदा ऎ तां उसी पता लगदा ऎ लोकेँ गी सच्ची गल्लै पर रोह् चढदा ऎ। जिसकरी अपने मनै दे भाव व्यक्त करने आस्तै कैँवस दा स्हारा लैँदा ऎ ते ओह्दा मनना ऎ,\" साहित्यकार गी साम्प्रदायगत परिधि दा अतिक्रमण करियै सामान्य मनुक्खता दी धरातल पर पुज्जना चाहिदा ऎ। सारेँ मनुक्खेँ आस्तै इक आम सच्च केह् ऎ, साहित्य च इसी उजागर करना चाहिदा ऎ। \" ( सफा-103 )\n14. जुग-जुग जीऎँ तूं-समाजै च संघडोँदे रिशतेँ जिँदे च पैहेँ दी भुक्ख गै सब्भ किश ऎ। मां-बब्ब धियेँ-पुत्तरेँ आस्तै म्हेशां सीसां गै दिँदे न बशक्क उं'दी औलाद उ'नेँगी भुल्ली जा भामेँ उ'नेँगी जि'न्ना मर्जी दुत्कारै पर दंदे मूहां च कदेँ बी उं'दे आस्तै निखिंद शब्द जां बदसीस नेईँ निकलदी। तूं जुग-जुग जीऎँ च बी रिश्तेँ दी कडी गी त्रुटने थमां बचाने दी कोशिश गै करदी ऎ।\n 15. बतन परस्त-इक ऎसी क्हानी जेह्डी अपने देस दे प्रति जवानेँ दा जज्बा दिक्खियै हर इक देसवासी नाज मसूस करदा ऎ। एह् जवान अपनी जानेँ दी बाजी लाइयै देसै दी रक्षा करदे न। बशक्क घरै दूर रौँहदेँ न पर घरै दी याद बी सतांदी ऎ तां बी इक-दूए कन्नै मजाक टिचकौलियां करियै खुश रौँह्दे न कोई आपसी बैर-बरोध नेईँ ऎ। इस क्हानी च नजीर पवन ञ्यांनपुनेँ दे यार किट्ठे पढी-लिखियै फौजै च इक दिन लांस नायक बी बने पर नजीर बडा गै होशयार, नशाना बी ओह्दा इ'न्ना पक्का जे ओह्दे दोस्त-मित्र उसी उग्रवादी आक्खियै मजाक करदे न जे पाकिस्तान थमां ट्रेनिँग लेइयै आए दा ऎ। नजीर मनै च सोचदा ऎ जे मौका औह्ने पर ओह् दस्सी देग जे ओह् सच्चा देस भगत ऎ। ते मौका औह्ने पर सच्च गै अपनी जिँदू दी बाजी लाई दिँदा ऎ ते देसै पर औह्ने आह्ली मुसिबत थमां बचाई लैंदा ऎ।\n 16. संजोग-संजोग संग्रैह् दी खीरी क्हानी ऎ जेह्दे च दस्सेआ गेदा ऎ जे संजोग माह्नू गी कुत्थै लेई जाग ते केह्डी परिस्थितियेँ च पाई ओडग इस गल्लै दा कुसै गी पता नेईँ ऎ। माह्नू उस कर्ता दे हत्थेँ दी कठपुतली ऎ जेह्डा ओह्दे बनाए दे रस्तेँ पर चलदा ऎ। पर केँईँ बारी ऎसी फाइयेँ च फसी जंदा ऎ जिसदा छुटकारा पूरी उमर तगर नेईँ होँदा। इ'यां गै इंदी क्हानी संजोग च गुज्जर परिवार जेह्डा ञ्यांनेँ दी किलकारियेँ थमां वंचत ऎ। चौधरी मेह्रदीन दी त्रीमत इस कमी गी बडा मसूस करदी ऎ। इ'यै ईश्वर दा निजम ऎ जे ओह् कुसै बी रूपै च कुसै गी मलाई दिँदा ऎ। इक बारी उंदे डंगर पानी पीँदे कुडी गी सिँडेँ. पर चुक्कियै सुटदा ऎ जिसकरी कुडी बेहोश होने करी अपनी जैदाशत बी भुल्ली जंदी ऎ। जिसकरी मैह्री दी नियत बेईमान होई जंदी ऎ ते बजाए अपने कन्नै रखने दा फैसला करी लैँदे न ते फ्ही उत्थुआं अपना डेरा दूई थांह् लेई जंदे न जित्थै उ'नेँगी कोई पंशानदा नेईँ। इ'यां कुडी दे घरै आह्ले तुप्पी-तुप्पियै ना उमीँद होई जंदे न ते इधर चौधरी-मैह्री दी धीऽ पाकीजा होई जंदी ऎ जुआन होने पर ओह्दा व्याह् मोबाइल स्कूलै दे मास्टर कन्नै करवाई दिँदे न। पाकीजा अपनी जिँदगी च बडी खुश ते इक बच्ची दी जनम दिँदी ऎ। रकसीना इक ध्याडे घोडे पर चढी दी दूर ग्रां आई जंदी ऎ जित्थै पिच्छे-पिच्छे पाकीजा बी पुज्जी जंदी ऎ इक बुड्ढी उसी पंशानी लैँदी ऎ जे ओह् ओह्दी कुडी ऎ। पुलसै आह्ले उंदा निपटारा करवाइयै पाकीजा गी ओह्दे माऊ-बब्बै गी सौँपन आस्तै करदे न पर जिस ध्याडै सवेरे उसी लैन औह्ना होँदा ऎ उस दिन पाकीजा अपने घरैआह्ले ते बच्ची कन्नै कुतै दूर चली जंदी ऎ।\n Posted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 3:29 PM No comments:\nडोगरी साहित्य लगातार अपनी गैँ अगडी बधांदा जा करदा ऎ जित्थै पराने साहित्यकारेँ दी सोच ते तजरबे न उत्थै गै नमीँ पीढी दे लखारी बी अपनी का'न्नी गी आधुनिकता दी सोच कन्नै पुखता करदे आवा दे न। जिस कन्नै डोगरी साहित्य दी हर इक विधा च लगातार इजाफा होआ दा ऎ।\n सन् 2010 ई. च डोगरी लेखन दे सखेतरू ते तजरबेँ दे गूढे दे नौजुआन लखारी शैलेन्द्र सिँह हुंदा \"हाशिये पर\" 161सफेँ दा पैह्ले प्रकाशत उपन्यास, जेह्डा डोगरी साहित्य दी उपन्यास विधा च आई रलेआ। एह् एक समाजक-यर्थाथवादी उपन्यास ऎ जेह्डा अज्ज दे समाजै दी नशानदेही करदा ऎ। उपन्यासकार दा बशक्क प्रकाशत रूपै च औह्ने आह्ला पैह्ला उपन्यास ऎ पर पढियै नेईँ लगदा जे एह् इंदी पैह्ली कृति ऎ। इस उपन्यास दा कथानक सशक्त ते अज्जै दे समाजै च लोकेँ कन्नै होने आह्ली बेन्याई ते ओह् परोआर जेह्डा रोज-मर्रा दी जिँदगी च संघर्श करियै बी द'ऊं बेल्लेँ दी रूट्टी दा जुगाड नेईँ करी सकदा, जेह्डा ध्याडी च सौ बारी जींदा ते मरदा ऎ। उसदी जीवनै दी गड्डी दी ओह् गति नेईँ मिलदी जे ओह् कम्म करियै चैन कन्नै सेई सकै। ओह् हर बेल्लै इस्सै सोच च पेआ रौह्न्दा ऎ जे हून ते मेह्नत करियै खाई लेई ऎ, अगले पैह्र बी उस्सी नसीब होई सकग? \"हाशिये पर\" उपन्यास दा एह् परोआर मेह्नत ते सभने थमां मती करदा ऎ पर उसगी उसदी मेह्नत दा मेह्नताना इ'न्ना नेईँ मिलदा जे ओह् अपनी गुजर-बसर ठीक चाल्ली करी सकै।\n उपन्यासै दे नायक मदन च'ऊं ञ्यांनेँ दा बब्ब ऎ जेह्दे दो जागत ( काम्बा/ कमल, लौह्कू ) ते दो धीआं ( कमलेश ते उषा ) न। ओह् परोआर दी पालमा दरेआ थमां सोहा-सेआल मच्छियां फडिये करदा ऎ। पर, अपनी इस कमाई कन्नै ओह्दे घरै दा गुजारा बडा गै मुश्कल होँदा ऎ जिसगी पूरने आस्तै ओह् कदेँ मिस्त्रियेँ कन्नै बी ध्याडियां लाई लैँदा ऎ। मदन दी त्रीमत कान्ता बी हर बेल्लै उसदा साथ छाए आह्ला लेखा दिँदी ऎ। कोई बी परोआरै पर जिसलै औक्खी-भारी बनी औँदी ऎ तां उ'नेँगी तत्ती ब्हा नेईँ लग्गन दिँदी ऎ। पर उसदी माली हालत फ्ही नेईँ सुधरदी। सरकार आसेआ बी गरीब-गुरबेँ लेई बथ्हेरियां स्कीमां अमल च आंदियां जंदियां न पर, एह् योजनां लागू होने थमां उ'नेँ आम माह्नू तगर नेईँ पुज्जदा ऎ। इसदा फैदा उ'नेँ लोकेँ दी गै थ्होँदा ऎ जेह्डे चत्तर-चनार न। इ'यां गै कच्चे कोठे आह्लेँ लोकेँ गी पक्के कमरे पाने आस्तै चैक मिलने होँदे न। मदन इस्सै हिक्खी सभने थमां पैह्ले उस थाह्र पर बे'ई जंदा ऎ कुश्बा बाद च भीड होई जानी ऎ ते उसी जगाऽ नेईँ मिलन लगी। जिसलै चैक मिलना शुरू होँदे न ते सभनेँ दे नां बारो-बारी लैते जंदे न। पर मदन दा नां उस च नेईँ बोलदे। चैक उ'नेँ लोकेँ गी बी मिली जंदे न जेह्डे इसदे हक्कदार नेईँ हे। मदन बशक्क ग्रां च सभनेँ थमां गरीब ऎ पर उसी चैक नेईँ मिलदा ऎ। ओह् बडा सिद्धा ते ईमानदार माह्नू ऎ। उसनै ओह् कार्ड गै नेईँ बनोआए दा जेह्डा सरकार गरीबी रेखा थमां थल्लै रौह्ने आह्ले लोकेँ दे बनोआंदी ऎ। उ'नेँ दी गै इस सुविधा दा फैदा थ्होँदा ऎ। पर, मदन इ'नेँ सब्भै गल्लेँ थमां अन्जान हा कीजे उन्नै इ'यै ज'नेइयेँ गल्लेँ आह्ली बक्खी ते कदेँ धेआन गै नेईँ दित्ता जां इ'यां आक्खी लैओ जे उसी कम्मै थमां कदेँ बे'ल गै नेईँ लग्गी ते लोकेँ जे लोकेँ च जाइयै ते उंदे कन्नै गल्ल-बात करी सकै।\n उपन्यासै मताबक इ'यां दूई योजना नरेगा ( National Rural Employment Guarantee Scheme ) जिसलै ग्रां च औंदी ऎ जिस दे तैह्त सौ दिन मजदूरी थ्होने दे बारे च मदन गी पता चलदा ऎ तां इ'न्ना खुश होँदा ऎ जे उसी किश बी सुझदा नेईँ ऎ। ओह्दी उम्मीँदेँ दी गुड्डी ऎसी शमानै पर चढन लगी पौँदी ऎ जे इथूं तगर उम्मीँद लाई बौह्न्दा ऎ जे हून उब्बी सरकारी ध्याडीदार बनने परैँत पेँशन नौकरी थमां गै सेवानिवृत होग। पर, उसी अखीर च उत्थुआ बी ना-उम्मीँदी गै हत्थ लगदी ऎ। इस योजना दे अंतर्गत जेह्डे बी कम्म ग्रां च ठेकेदार मुख्तयार सिँह शुरू करोआंदा उंदी सूची बी उस्सै आसेआ गै बनाई जंदी ऎ। ओह् मते ठेकेदार दे गै लोक न जेह्डे कदेँ मिट्टी कन्नै छोह्ते दे बी नेईँ हैन। ओह् सिर्फ ठेकेदार कन्नै रे'इयै बदमाशी गै करदे न। उ'नेँगी पैहेँ दी कोई परवाह नेईँ ऎ। ओह् मजदूरेँ दे पैहे कट्टियै गै अपने शुभचिँतकेँ गी दिँदे न। ठेकेदार जेह्डे बी मजदूरेँ गी ध्याडी उप्पर लांदा ऎ उ'नेँगी 70 रपेऽ दे स्हावे ध्याडी दिँदा ऎ। पर, सरकार आसेआ 100 रपेऽ ध्याडी इक मजदूर दी मुकरर कीती गेदी ऎ। मदन बी इस योजना दे तैह्त इक दिन मजदूरी करन जंदा ऎ पर उसी किश एह् गल्ल रास नेईँ औँदी कीजे इस कम्मै च इक ते रोज ध्याडी दे पैहे नेईँ मिलदे ते दूआ ओह् चैक दे रूपै च। इ'यां ओह्दे घरै दा गजारा नेईँ चली सकदा। उसी ते रोज ध्याडी लाने परैँत पैहे चाहिदे न जिस कन्नै ओह्दे घरै दा सरिस्ता चली सकै। इ'यां इक रोज मदन जिसलै ध्याडी लाई ते लैँदा ऎ पर ओह्दे घर उस दिन रुट्टी आस्तै मुश्कल होई जंदा ऎ। तरकालेँ सोद्धा-पत्तर आनने आस्तै मंगे मिस्त्री दे घरै 50 रपेऽ दोआर लेइयै आनदा ऎ तां करी ओह्दे घरै दा गजारा चलदा ऎ। बाद च जेह्डे मदन गी उस ध्याडी दे पैहे मिलदे न ओह् ओह्दे कोई कारी नेईँ औँदे कीजे ओह् 70 रपेऽ दा चैक, जिस आस्तै उसी बैँक च चैक जमा कराइयै ते मिलने हे। ओह् ऎ ओह्दे बस्स दा रोग नेईँ हा। कीजे ओह्दे आस्तै बी उसी बैँक च खाता खलाने आस्तै 40-50 रपेऽ दा खर्च करना पौना हा जिसकरी उन्नै इ'नेँ पैहेँ दे बारै च खेआल गै छोडी ओडेआ।\n मदन हर बेल्लै चौरे-पैह्र झूरेँ च फसेँ दा रौंह्दा ऎ। सोचदा ऎ उ'न्नै ते अपनी पूरी उमर ना-समझी च कड्ढी ओडी ऎ। ओह्दे ञ्यांने बी इ'यां गै पूरी उमर कड्ढगन? उसी इब्बी मनै च बेचैनी रौह्न्दी ऎ जे ओह् आपूं जे पढी नेईँ सकेआ, पर अपने ञ्यांनेँ गी ज़रूर गै पढाग। मदन ञ्यांनेँ दी पढाई आस्तै कदेँ बी पिच्छै नेईँ रौँह्दा। भामेँ इंदे आस्तै कुतूआं बी मदद की नेईँ लैनी पवै। उसदे ञ्यांनेँ बी बडे सेआने ते मेह्नती जेह्डे मां-बब्बै दी माली हालत कन्नै बाकफ हे। उ'ब्बी इस गल्लै गी धेआने च रक्खियै पढाई च शैल मेह्नत करदे न। मदन दे घर उसलै थ्होडी ज'नेईँ खुशी दी रिश्म लिश्कदी लब्भदी ऎ जिसलै ओह्दा बड्डा जागत कमल ( काम्बा ) पढाई च अब्बल औह्न लगदा ऎ ते इंजीनियरिँग दे दाखले आस्तै पेपर बी पास करी लैँदा ऎ। उसदे घर खुशी च फसाई लैँदा ऎ। जागतै नै पेपर ते पास करी लेआ पर इसदे दाखले आस्तै फीस कुतूआं औह्ग? उसी कोई बत्त नेईँ लब्भदी ते फ्ही इक बारी अपने शरीक भ्रा तरसेम कोल गै जंदा ऎ। तरसेम शुरू थमां गै मदन दे परोआरै दे दु'थड कट्टदा आवा दा ऎ। तरसेम फ्ही इक बारी ओह्दी मदाद करने च पिच्छै नेईँ रौँह्दा ऎ। मदन दा बड्डा जागत कमल जिसलै श्रीनगर इंजीनियरिँग दी पढाई आस्तै जंदा ऎ ओह् अपनी पढाई च कोई फर्क नेईँ पौह्न दिँदा। सगुआं पैह्ले थमां बी खूब दिलचस्पी कन्नै पढदा ऎ। पैह्ले समैस्टर च गै सभनेँ जागतेँ थमां अब्बल नम्बर लेइयै पास होँदा ऎ। जेह्डी उसी चैँता सता दी ही जे दूए समैस्टर च फीस कि'यां देनी ऎ? ओह्दी फीस दा जुगाड बी बनी जंदा ऎ। कमल गी अब्बल औह्ने पर सरकारी बजीफा बी मिलन लगी पौँदा ऎ। उंदे घरै च खुशी दी इक किरण लब्भना शुरु होई जंदी ऎ। हून कमल दी बी उम्मीँद जागी पौँदी ऎ जे उंदे दिन बी फिरी जागन। उज्जल भविक्ख लब्भन लगदा ऎ। इ'यां गै खीरै च उपन्यासकार दे शब्देँ च बी इयै जे \" अजेँ हून शुरूआत होई ऎ। \" लगदा ऎ जे इक नमां जुग बनग जिस च एह् परोआर खुशी-खुशी रौह्ग।\n उपन्यासै च विवेचत-वर्ग:-\"हाशिये पर\" उपन्यास गी समाजक-यर्थाथवादी उपन्यासेँ दी श्रेणी च रक्खेआ जाई सकदा ऎ। उपन्यासकार ने अज्जै दे दौर च वर्गेँ बश्कार होने आह्ली तनोतनी दा बखूबी कन्नै वर्णन कीते दा ऎ। इस समाजै च अजेँ बी मतेँ सारेँ ऎसे माह्नू हैन जेह्डे अपने फैदे आस्तै लोकेँ गी गुलाम गै बनाइयै रक्खना चाह्न्दे न। इत्थूं तगर जे अपने स्वार्थ लेई इंदा बजूद तगर खत्म करने च बी कोई नेईँ छोडदे। ओह् नित्त नमेँ हरबेँ कन्नै लोकेँ गी दबाइयै रखदे न। इस उपन्यास च दो वर्गेँ बश्कार गै टाकरा ऎ। एह् वर्ग न: 1. शोशक वर्ग, 2. शोशत वर्ग।\n 1. शोशक वर्ग:-उपन्यासै च चित्रत शोशक वर्ग दे अंतर्गत जिमीँदार, ठेकेदार, मंत्री वर्ग वगैरा औंदे न जेह्डे जुरम बे-न्याई ज'नेह् हरबेँ बरतियै लोकेँ गी लुट्टे-धरूडै दे न।\n जिमीँदार वर्ग:- \"हाशिये पर\" उपन्यासै च जैलदार दयाराम इलाके दा सभनेँ थमां सौक्खा (अमीर) रुतबे आह्ला जिमीँदार ऎ। एह्दा ग्रां दे गरीब काम्मेँ उप्पर खासा दबदबा ऎ जेह्डे उंदे घर कम्म करदे न। एह् कम्म चाहे जिमीँदारी दा करदे न भामेँ घरै च काम्मेँ न। एह् उ'नेँ मजलूम काम्मेँ पर दब्बियै शोशन करदा ऎ। इत्थूं तगर जे अपने घर लग्गे दे काम्मेँ दे जागतेँ गी बी पढन नेईँ दिँदा ऎ। एह्दा इयै सोचना ऎ जे इंदे जागत पढी-लिखी गे तां उंदे घरेँ च कम्म करने आस्तै काम्मेँ नेईं लब्भगन। इ'यां गै जदूं उपन्यासै दा इक चरित्र शैलोराम दा जागत अठमीँ पास करी लैँदा ऎ तां ओह् जैलदार दयाराम गी जागतै दी नौकरी लोआने आस्तै आक्खदा ते उसदे तेबर गै बदली जंदे न। ओह्दा द'बकजन निकली जंदा ऎ ते आक्खदा ऎ,\" पढना-लिखना ते ठीक ऎ पर तेरा मुडा बी नौकरी करन लगुग ते ग्रां च झीरेँ दा कम्म कु'न करग? चल इत्थूं दा। लेई जा अपने मुडे गी बी। इसी अपने कन्नै कम्मै पर ला। जे इ'यां गै तुंदे जागत पढी-लिखियै नौकरियां करन लगे ते तां तौले गै ग्रां दे सारे काम्मी खत्म होई जाड. न। \" ( सफा-29 ) उसी इयै डर लगी पौँदा ऎ जे जिसलै इंदे घरै च कोई पौह्ग तां ते काम्मेँ गै नेईँ लब्भड. न? जेह्डा इ'न्ना कम्म करदे न।\n ठेकेदार वर्ग:-इस उपन्यासै दा ठेकेदार वर्ग दा खुल्लियै शोशन करदा ऎ। उस कश ओह् सब्भै चालां हैन बरतने आस्तै जेह्दे कन्नै लोकेँ दा शोशन कीता जाई सकता ऎ। जि'यां उपन्यासै च ठेकेदार अपने मजदूरेँ थमां कम्म ते डट्टियै लैँदा ऎ पर उ'नेँगी उजरत पूरी नेईँ दिँदा ऎ। इस करी इ'नेँ लोकेँ दा गजारा बी बडा गै मुश्कल होँदा ऎ। उपन्यासै दा ठेकेदार मुख्तयार सिँह ते सरपंच गुलचैन सिँह दे अंदर भ्रश्टाचार दी वृति इ'न्नी प्रबल ऎ जे ओह् कुसै हद्दा तगर बी जाई सकदे न। इ'नेँगी इ'न्ना बी धेआन नेईँ रौँह्दा जे जिनेँ मजदूरेँ दे पैहे उप्पर एह् ऎश करदे न, उंदे ञ्यांनेँ गी एह् जुक्केँ आंगर चूस्सै दे न। उ'नेँ मजदूरेँ दे ञ्यांनेँ गी ओह् स्हूलतां नेईँ मिलदियां जेह्डियां ओह् चांह्दे न। जि'यां नरेगा योजना दे तैह्त सरकार मजदूरेँ दी ध्याडी 100 रपेऽ मुकरर करदी ऎ पर उ'नेँगी सौ रपेऽ मिलदी नेईँ ऎ। ठेकेदार सब्भै मजदूरेँ गी 70 रपेऽ दिँदा ऎ। इ'यां हर इक मजदूर थमां 30 रपेऽ कट्टी लैते जंदे न। एह् गल्ल मजदूरेँ गी बी पता ऎ पर बोलने दी हिम्मत कोई नेईँ करदा। सगुआं ठेकेदार अग्गै कम्म कराने आह्ला मेट रशपाल मजदूर उप्पर झूठा गै रोब पाइयै आक्खदा ऎ,\" सरकार द्वारा इक दिनै दी मजदूरी सत्तर रपेऽ तैह् होई ऎ। एह्दे कोला जादै मजदूरी कुसै गी बी नेईँ दित्ती जाई सकदी ते नरेगा योजना दे मैह्त कीते जाने आह्ले कम्मेँ च ते अस लिखा-पढी च जादै मजदूर दस्सियै बी जादै पैसे कड्ढियै तुसेँगी सौ रपेऽ धियाडी नेईँ देई सकदे कीजे एह्दे च तुंदी मजदूरी दा भुगतान बैँकेँ दे जरिये होना ऎ। \"( सफा-73 ) मुख्तयार सिँह ते सरपंच गुलचैन सिँह ग्रां च औह्ने आह्ली कुसै बी सरकारी योजना दे तैह्त जेह्डे बी कम्म करोआंदे न उसदे ठेके कुसै होर गी लैन नेईं दिँदे, कीजे ग्रां च उंदा गै रसूक ऎ। इत्थूं तगर जे सरकार तगर उंदी पौंह्च ऎ। जिसकरी ग्रां दे लोक उंदे अग्गै बोलने दी जुरत नेईँ करदे। एह् ठेकेदार अपनी मनमर्जी गै करदे न जेह्डे ठेके लैँदे न, जेह्डे मनेआद थमां पैह्ले गै भज्जी-त्रुट्टी जंदे न। जि'यां,\"डेढ साल पैह्ले गुलचैन सिँह न अपने ग्रां नैह्रै दी इक पुली बनोआई ही। ओह्दे च सीमेँट ते नां-मातर गै लाए दा हा। इसकरी डेढ सालेँ च गै पुली त्रुट्टी गेई। पुली दे बक्खियेँ आह्ली अट्ठ इंच उच्ची ब'न्नी ते कदुंएं दी घस्सी गेई दी ऎ। ( सफा-45 )\nमंत्री वर्ग:-नेता लोकेँ दा शुमार बी शोशक वर्ग च गै होँदा ऎ कीजे एह् लोक बी आम-लुकाई गी सुलझे दे ढंगै कन्नै मत्तू बनांदे न। भलोके लोक इंदी मिट्ठी-मिट्ठी गल्लेँ च पलचोई जंदे न। एह् मंत्री लोक गल्लेँ दा ऎसा मकडजाल बनांदे न जे लोक इस च फसी जंदे न। उ'नेँगी पता गै नेईँ लगदा जे एह् मंत्री लोक उ'नेँगी अपनी गल्लेँ दे जाल च फसा दे न जेह्डियां ओह् गल्लां करियै लोकेँ गी पलचांदे न दरअसल ओह इक छलावा ऎ, छडा लोकेँ गी पतेआने दा हरबा ऎ। ना गै उ'ने गल्लें गी पूरा करने दी उंदी कोई मंशा होँदी ऎ। भलोके लोक मंत्रियेँ दे झूठेँ कोल-करारेँ च फसी जंदे न, ओह् उंदे उप्पर पूरा भरोसा करन लगी पौँदे न, जे हून असेँगी इ'नेँ सब्भै किश देई ओडना ऎ पर जिसलै एह् सब्भ किश नेईँ मिलदा तां शोशत वर्ग दे मनेँ च इक खिँझ भरोचन लगी पौँदी ऎ। जि'यां जिसलै मदन गी पक्का कोठा बनाने आस्तै चैक नेईँ मिलदा ते उसदे मनै च केँईँ सुआल कुरबल-कुरबल करन लगी पौँदे न। सोचदा ऎ,\" अजेँ थोह्डा चिर पैह्ले गै ते मंत्री जी होरेँ आक्खेआ ऎ जे उंदे राज च कोई बी बगैर कोठे जां कच्चे कोठे च नेईँ रौह्ग। सारे कच्चे कोठे च रौह्ने आह्ले परिवारेँ गी पक्का कमरा बनाने आस्तै रपे दित्ते जाड. न। मेँ ते कुल्ली च गै रौह्ना। मेरी कुल्ली ते कच्चे कोठे कोला बी नफिट्ट ऎ। \" ( सफा-54 ) जिनेँगी पक्के कमरे दा घर बनाने आह्ली योजना च चैक मिलदे न ओह् सब्भै मदन थमां थोह्डे बेह्तर गै होँदे न।\n शोशत वर्ग:-शोशत वर्ग ओह् वर्ग जेह्डा इस उप्पर होने आह्ले जुरम बे-न्याई गी कुदरत दी मार ते भागेँ दा अंश समझियै अपनी झोल्ली च पाई लैँदा ऎ। \"हाशिये पर\" उपन्यासै च इस वर्ग दे अंतर्गत मजदूर ते काम्मेँ औँदे न जेह्डे अपने हाकमेँ दे इशारेँ पर कठपुतली आह्ला लेखा नचदे रौँह्दे न। एह् इस गल्ल थमां अंजान न जे शोशक वर्ग गी सिनकू आह्ला लेखा लग्गे दा ऎ जि'न्नै इ'नेँगी अंदरोँ-अंदरी भुग्गा करी ओडेदा ऎ।\n मजदूर ते काम्मेँ:-इस उपन्यासै च मजदूर ते काम्मेँ दिन-काट्टी गै करा दे न इ'नेँगी ओह् आह्ले हक्क-हकूक नेईँ मिलदे जेह्डे इक आम आदमी गी मिलने चाहिदे न। जि'यां उपन्यासै मताबक सन् 1971ई. गी जिसलै सरकार आसेआ काम्मी-करसानेँ गी जेह्डे जिमीँदारेँ दे घर राही-बाही दा कम्म करदे हे उ'नेँगी जिमीँ दे पट्टे दित्ते गे हे तां तरखान, लोहार ते झीर-कमेहार बगैरा मते सारेँ काम्मियेँ गी पट्टे नेईँ हे मिले कीजे एह् जमीनेँ दी राही-बाही नेईँ हे करदे बशक्क खेतरेँ च कम्म करने आह्ले थमां नखिँद्द समझेआ जंदा ऎ। मदन दा बब्ब सरदारी लाल ग्रां दा मन्ने दा काम्मी पर जमीनेँ दे पट्टे नेईँ मिलदे कीजे उन्नै सारी उमर खेतरेँ च कम्म करने आह्ले काम्मी-करसानेँ गी पानी ते रुट्टी गै बनाइयै खलाई ऎ। उसी म्हेशां इस गल्लै दा अफसोस रौँह्दा ऎ,\" अस बी खेतरै च कम्म करदे रेह् आं पर फरक सिरफ इ'न्ना गै हा जे असेँ अपने हत्थै च दराटी निही पकडी। दराटी आह्ले ते हल बाह्ने आह्लेँ हर करसानेँ गी पानी पलेआंदे हे। व्याहेँ-कारजेँ च कम्म करदे हे। इब्बी सरकार दा कोई न्यांऽ नेईं ते इक ग्रां च इक गी जमीन दित्ती ते इक गी किश बी नेईँ। \" (सफा- 94)\nइस उपन्यासै च लोकराज च बी सुआर्थी सुआतम आह्ले लोक अपना रुतबा बनाई रखने आस्तै गरीब-गुरबेँ गी अपनी मर्जी कन्नै जीन बी नेईँ दिँदे। इत्थूं तगर जे एह् लोक इंदा कम्म जां इंदे आक्खे मताबक नेईँ चलन तां कुतै-ना-कुतै ऎसी मार देई जंदे न जे पूरी उमर इ'नेँगी भुगतना पेई जंदा ऎ। उपन्यासकार मताबक जिसलै कच्चे कोठे दे थाह्रै पक्के कोठे बनाई देने आह्ली योजना सरकार बजूद च आनदी ऎ तां फिमू ते बलदेव उपन्यासै दे पात्तरेँ दे नां उस सूची च शामल नेईं कीते जंदे कीजे इ'नेँ, ठेकेदार गुलचैन सिँह दे आक्खने मताबक चुनांऽ च बोट नेईँ हे पाए। जि'यां,\" फिमू ते बलदेव दा नां गरीबी रेखा कोला थल्लै रौह्ने आह्ले परिवारेँ दी सूची च इसकरी नेईँ आया कीजे इ'नेँ सरपंच गुलचैन सिँह दे आक्खने उप्पर बी पिच्छले चुनांए च बोट दूए उम्मीँदवार गी दित्ते हे। (सफा- 108)\nउपन्यासै च संघर्श दे कारण:-उपन्यासै च संघर्श दे मूल कारण पात्तरेँ दी अनपढता ते उंदी पसमांदी आर्थक स्थिति गै ऎ। जिस कारण लोकेँ गी सैह्कदे-छडकदे दुक्ख-कसाले जरदे होई दिनै गी धक्का देआ दे न। रसूक आह्ले लोक इ'नेँगी कुतै सूखै दा साह् बी नेईँ लैन दिँदे। ओह् हर इक चाल ते अपनी शैतानी सूझबूझ कन्नै, केईँ बारी लताडियै, ते केँईँ बारी मिट्ठी-मिट्ठी गल्लेँ च फसाई लैँदे न। पर जिसलै अनपढ लोकेँ गी लगदा ऎ जे हून इ'नेँ चालबाजेँ अग्गै इंदी कोई पेश नेईँ चलन लगी तां इंदा बरोघ करने दी बजाए अपने भागेँ दी गै दोश दिँदे होई सबर गी गले लाई लैँदे न। जि'यां मदन गी चैक नेईँ मिलने पर सबर गै करना पौँदा ऎ ते सोचदा ऎ,\" मेरे कोला पिच्छले जनम पता नेईँ केह्डे कुतै माडे कर्म होए दे न, जेहडा भगवान साढे पर नाराज ऎ। जौह्ले ओह् देग, औह्लै गै मिलना। जिसलै ओह् साढा पक्का घर बनाग, उसलै गै घर बनना ऎ। \" (सफा -61)\nएह् लोक पढे-लिखे दे नेईँ हैन जिसकरी कुसै बी चाल्ली दी सरकारी योजना दा इ'नेँगी कोई लाऽ नेईँ होँदा। इ'यां गै सरदारी लाल इक मेह्नती काम्मा ऎ ते पर अनपढ होने करी उसी ओह् दाबपेच नेईँ औँदे उ'ब्बी अपने नां दी गरदौरी मिसलेँ पर चढाई लैँदा जेह्दे कन्नै उसी बी जिमीँ दा पट्टा मिलदा। सरदारी लाल आंपू ते अनपढ हा उ'न्न अपने जागत मदन गी बी नेईँ पढाया। सगुआं उस्सी बी उयै कम्म सखाई ओडदा ऎ जेह्डा आंपू करदा हा। इक बारी जैलदार दयाराम आसेआ शाबाशी दिँदा ऎ। उपन्यासै अनुसार,\" जैलदार दयाराम कोला शाबाशी सुनियै सरदारी लाल ते मदन दी कोई हद्द नेईँ रेही। सरदारी लाल दी छाती फुल्लियै चैडी होई गेई। जैलदार दयाराम कोला शाबाशी कुसै बिरले काम्मी-कम्मे दी गै मिलदी ऎ उब्बी उसलै जिसलै जैलदार बडा खुश होयै। \" (सफा -28) लगदा ऎ जे कदेँ कुसै ने इंदे कम्मै दी कदर गै नेईँ पाई जिसकरी सरदारी लाल किश मती गै उम्मीँद लाई लैँदा ऎ। लोकेँ दी अनपढता कारण गै इंदी आर्थक स्थिति बडी गै माडी ऎ।\n निश्कर्श:-मुकदी गल्ल एह् ऎ जे हर इक साहित्यकार अपने जुगै थमां प्रभावत होँदा ऎ। ओह् उस बेल्ले दा परिस्थितियेँ दा गुलाम नेईँ होँदा ऎ। सगुआं ओह् उ'नेँ चंगी-माडी परिस्थितियेँ दा नचोड कड्ढियै, उस च उ'नेँ हालातेँ गी बदलनेँ गी समर्थ बी रखदा ऎ। इ'यां गै \"हाशिये पर\" उपन्यासै दे उपन्यासकार शैलेन्द्र सिँह होर अपनी अभिव्यक्ति दे आधार पर मनुक्खी हिरदेँ गी छूनेँ च सफल होए दे न। इ'नेँ इ'न्नी मसरुफियत, हर बेल्लै हाजर ते खडुत्त रौह्ने आह्ली नौकरी दे बाबजूद, अपनी मां बोल्ली च उपन्यास रचियै इक सराह्नेजोग कम्म कीते दा ऎ। एह् उ'नेँ लखारियेँ आस्तै इक मार्गदर्शन बी ऎ जे भामेँ जिन्नी मर्जी मसरुफियत की नेईँ होवै फ्ही बी समां कड्ढियै भाशा दी सेवा कीती जाई सकदी ऎ। अग्गै बी डोगरी भाशा दे पाठक इंदे थमां इयै उम्मीँद करड. न जे इयै ज'नेह् जीवंत विशेँ पर उ'नेँगी अग्गै बी पढने लेई बिना बकफे किश-ना-किश मिलदा गै र'वै। शैलेन्द्र सिँह होरेँ गी मेरी तरफै इयै शुभकामनां न जे एह् अपनी नौकरी ते साहित्य खेतरै च उच्चकोटि पर विराजमान होन।\n Posted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 7:46 AM No comments:\nPosted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 5:56 PM No comments:\nचेत्तर नराते दा सांस्कृतिक म्हत्व ( डॉ. चंचल भसीन )\nडुग्गर धरती रिशियेँ-मुनियेँ दी धरती जित्थै हर धर्म दे देवी-देवता बास करदे न। इत्थै थांह्-थांह् पर धार्मक स्थल न। इस थाह्र पर हिँदुएं दी अबादी मती होने करी चप्पे-चप्पे पर मंदर मिलदे न जिसकरी इस धरती गी मंदरेँ आह्ला शैह्र बी आक्खदे न। खास करी इत्थै बाह्बे आह्ली माता ते त्रिकुटा प्हाडियेँ च बास करने आह्ली बैष्णो माता ऎ। जिँदी चमत्कारी मैह्मा कारण पूरा ब'रा श्रदालुएं दा आना-जाना लग्गेआ रौँह्दा ऎ। दूरै-दूरै थमां लोक अपनी मनेँ दियां मुरादां पाने आस्तै औँदे न ते इंदे आर्शीवाद कन्नै खुशहाल जीवन व्यतीत करदे न। जिनेँ दिनेँ इत्थै मती चैह्ल-पैह्ल होँदी ऎ ओह् न माता दे नराते जिसलै चबक्खै रौनकां गै रौनकां लब्भदियां न। बाजार सज्जी जंदे न।\n नराते दी जित्थै गल्ल ऎ इंदा अपना खास म्हत्व ऎ। ऊ'आं ते नराते ब'रे च चार बारी औँदे न। पर द'ऊं नराते चेत्तर ते अस्सूं आह्ले दा गै मता म्हत्व ऎ। इंदा बी एक विज्ञानक कारण ऎ जे मौसम विज्ञान मूजब दो म्हीने सोए ते स्यालै कारण म्हत्वपूर्ण मन्ने जंदे न। दिक्खेआ जा ते रूतां बी छे (6) मन्नी जंदियां न पर प्रमुख द'ऊं गै न। इ'यां गै नराते बी द'ऊं गुप्त न जि'न्दा कोई इ'न्ना म्हत्व नेईँ मनेआ जंदा ऎ।\n स्यालै दी शुरुआत अस्सूं म्हीने थमां ते सोए दी चेत्तर म्हीने थमां मन्नी जंदी ऎ। जि'यां गै मौसम बदलोन लगदा ऎ तां पूरे भौतक जगत च हलचल होना शुरु होई जंदी ऎ। रुक्ख-बूह्टे, जल ते पूरा वायुमंडल तगर सभनेँ च तबदीली होन लगी पौँदी ऎ। माह्नू सेहत पर बी खासा असर पौँदा ऎ। चेत्तर म्हीने थमां सोआ शुरु होने कन्नै माह्नू शरीरै च पिछलेँ केँई म्हीनेँ दे लहुऎ दी गति जेह्डी घट्ट होई दी होँदी ऎ ओह् नाडियेँ च त्रिक्खी द्रौडन लगी पौँदी ऎ। सिर्फ रक्त दी गै गल्ल नेईं बल्के पूरे शरीरै दी गतिविधि गै बदली जंदी ऎ। इत्थूं तगर जे मूहां दे स्वाद मौसमै दे स्हावै कन्नै बदलोई जंदे न। इ'यै कारण ऎ जे संसारै दे ज्यादातर रोगी इ'नेँ म्हीनेँ च जां ते जल्दी नरोए होई जंदे न जां फ्ही परमात्मा गी प्यारे होई जंदे न। शास्त्रकारेँ बी इ'नेँ म्हीनेँ शरीर गी पूरी चाल्ली कन्नै स्वस्थ रखने आस्तै नौ ध्याडेँ तगर बशेश रुप च वर्त आदि रखने दा विधान दस्से दा ऎ। इस कन्नै इब्बी आक्खेआ जंदा ऎ जे पराने जमाने च फसलां बी द'ऊं गै राईयां जंदियां हियां खरीफ ते रबी। ते नराते बी इ'नेँ फसलेँ दे कोल-कश गै औँदे न। नराते दा अनुश्ठानक म्हत्व इ'ब्बी लगदा ऎ जे नमीँ फसलेँ दा मुंढ कंजकेँ दे हत्थेँ मंगलपूर्वक होई जा ते इसदे कन्नै राह्ने आह्ली फसल दे बींऽ दी परख बी होई जंदी ऎ। चेत्तर म्हीने आह्ले नराते दे बेल्लै खरीफ ते अस्सूं आह्ले नराते दे बेल्लै रबी फसल राही जंदी ऎ। असल च चेत्तर म्हीने आह्ली फसल दा सरबंध बसंत आह्ली फसल कन्नै ऎ। चेत्तर बसंती नराते दा आरम्भ चेत्तर म्हीने दी शुल्क पक्ख कन्नै होँदा ऎ। चेत्तर च औँह्ने आह्ले नराते च अपने कुल देवी-देवताएं दी पूजा दा बी प्रावधान मनेआ जंदा ऎ। अज्ज कल्लै दी खीट्टै पेदी जिँदगी च ज्यादातर लोक कुल कुल देवी-देवताएं गी भुल्लदे जा दे न ते किश समेँ दी कमी कारण बी पूजा पाठ आह्ली बक्खी ध्यान नेईँ दिँदे न।\n आवो भैनोँ साख राह्चै,\nसाख, राह्चै कन्नै भेट गाचै।\n साढै प्हाडेँ आह्ली नै अज्ज औह्ना। ।\n आवो भैनोँ न्होमन चलचै,\nन्होमन चलचै, कन्नै भेट गाचै,\nसाढै बाह्वे आह्ली नै अज्ज औह्ना,\nआवो भैनोँ चूटी करचै,\nचूटी करचै, कन्नै भेट गाचै।\n साढै लाटां बाली नै अज्ज औह्ना।\n पचैलन फिरदी गली-गली।\n तेल पायो पा-पा,\nपचैलन फिरदी राह्-राह्,\nपचैलन फिरदी हट्टी-हट्टी। ।\n फ्ही इस तेल कन्नै माता दी अखण्ड जोत जगाई जंदी ऎ ते एह् जोत पूरे नराते तगर जगदी रौँह्दी ऎ।\n अलसी दा तेल बलै दिन-रातीं।\n काएं भरेआ गडबा माता काएं भरी ऎ डोरी,\nजमना दा जल राजा भर लेआया चोरी।\n कंजकां आइयां तेरे दोआर।\n सौ-सौ माता सुत्तडियेँ,\nछैनेँ दी घनघोर ऎ,\nसारेँ लोक सेई गे,\nपचैलन तेरे कोल ऎ।\n लोक इ'नेँ नरातेँ च अपनेँ मनेँ पर काबू रखदे होई पूरे वर्त रखदे न ते किश अपनी सुवधा अनुसार सत्त, पञ्ज, त्रै, इक जिन्ने रक्खी सकदे न ते रखदे न। नरातेँ च हर एक चौक म्हल्ले च रोज कुते-न- कुते माता दा जगराता चलदा ऎ। ते खीरी नराते अश्ठमी. जां नौमनी गी कुडियां काह्न-सखियां बनदियां न ते लोक उ'न्दी पूजा करदे न ते पैहे चढांदे न। जेह्डे साखा अग्गै जां काह्न- सखियेँ अग्गै पैहे होंदे न ते कुडियां आपूं-चे बण्डी लैँदियां न। इस रातीँ कुडियां पूरी रात साखै कोल जगराता करदियां न। अठमीँ जां नौमीँ गी कंजकेँ दी पूजा कीती जंदी ऎ। जिसलै कडाह्-पूरी पकादियां न ते मंगल-कामना करदियां न।\n स्रिश्टी गी बचाने आस्तै बिनती कीती। तां मां भगवती ने दुर्गम कन्नै युद्ध करियै पापी गी मारी टकाया। तदूं कोला गै दुर्गा दे वर्त शुरू होए।\n 1. शैलपुत्री:- नरातें दी शुरूआत मां शैलपुत्री दी पूजा कन्नै कीती जंदी ऎ। शैल अर्थात प्हाड। पर्वतराज हिमालय दी बेटी पार्वती दे रुप च शैलपुत्री गी मन्नेआ जंदा ऎ। माता दा एह् रुप सखांदा ऎ जे किस चाल्ली मुश्कल परिस्थितियेँ च बी डट्टियै मकाबला कीता जाई सकदा ऎ।\n 2. व्रह्मचारिणी:- दूए ध्याडे मां व्रह्मचारिणी दी पूजा, ते एह् शक्ति संदेश दिँदी ऎ जे तप शक्ति कन्नै विजय प्राप्त कीती जाई सकदी ऎ।\n 3. चंद्रघंटा:- त्रिये ध्याडे चंद्रघंटा मां दी आराधना जेह्दी कृपा कन्नै भक्त अपने शत्रु पर जित्त हासल कीती जाई सकदी ऎ।\n 4. कूष्माण्डा:- चौथे नराते कुष्माण्डा मां जेह्दी उपासना कन्नै समस्त रोगेँ दा नाश होँदा ऎ जिस कन्नै माह्नू दी बरेस, यश, बल आदि दी वृदि होँदी ऎ।\n 5. स्कंदमाता:- स्कंदमाता दी पूजा पञ्जमेँ रोज इस च एह् संदेश मिलदा ऎ जे बुराइयेँ गी कि'यां नश्ट कीता जा।\n 6. कात्यायिनी:- छेमे ध्याडे मां कात्यायिनी दी आराधना, एह् सखांदी ऎ जे क्रठन तपस्या कन्नै सुक्ख प्राप्त कीता जाई सकदा ऎ।\n 7. कालरात्री:- मां दुर्गा दी सतमीँ शक्ति दा नां कालरात्री ऎ। एह् कालरात्री सखांदी ऎ जे मुश्कल घड़ी बी की नेईँ होवै असेँगी बिना कुसै डर त्राह दे व्यतीत करना चाहिदा ऎ।\n 8. महागौरी:- महागौरी माता संदेश दिँदी ऎ जे वगैर उत्साह दे किश बी प्राप्त नेईं कीता जाई सकदा। इस शक्ति दी उपासना दे बगैर किश बी सम्भव नेईँ ऎ।\n 9. सिद्धिदात्री:- नौमै ते खीरी रोज सिद्धिदात्री दी उपासना होँदी ऎ। शिव जी इस पूरे व्रह्मांड दे पालनकर्ता न ते मां सिद्धिदात्री उंदे कन्नै इस व्रह्मांड गी चलांदी ऎ। इस करी दुर्गा दा एह् रुप कार्य कुशलता दा संदेश दिँदा ऎ।\n इ'नेँ नरातेँ च सब्भै शुभ कम्म कीते जंदे न जि'यां व्याह् कारज, मूनन आदि बी इ'नेँ दिनेँ बगैर कुसै पंडित गी पुच्छे दे सम्पन्न कीते जंदे न। ऊ'आं गै चेत्तर नराते गी सिद्धियेँ आस्तै बी बशेश मन्नेआ जंदा ऎ। इ'नेँ नराते च कीती गेदी पूजा जपतप साधना, जैँत्र सिद्धियेँ आस्तै बडी सिद्ध सावत होंदी ऎ। कीजे इ'नेँ दिनेँ दुर्गा आपूं साक शात विराजमान होँदी ऎ। ते अपने उपासकेँ गी बल दिँदी ऎ। जैँत्र-मैँत्र दियां सब्भै सिद्धियां इस धरती पर सकारात्मक ते नकारात्मक ऊर्जा कन्नै जुडी दियां न ते नरातें च नकारात्मक शक्ति कमजोर होई जंदी ऎ। ऎसा इसकरी कीजे चबक्खै पूजा ते मैँत्रेँ दे उच्चारण कन्नै तैँत्र सिद्धि बडी असानी ते घट्ट समेँ च मिली जंदी ऎ।\n इ'यां चेत्तर नरातेँ मनाने दे बक्ख-बक्ख पह्लूएं गी जिसलै दिखने आं ते पता चलदा ऎ जे इ'न्दा साढे जीवनै च बडा म्हत्व ऎ। ओह् पक्ख भामेँ समाजक होवै जां सांस्कृतक माह्नू दे जीवन कन्नै गै जुडे दा ऎ।\n डुग्गर धरती रिशियेँ-मुनियेँ दी धरती जित्थै हर धर्म दे देवी-देवता बास करदे न। इत्थै थांह्-थांह् पर धार्मक स्थल न। इस थाह्र पर हिँदुएं दी अबादी मती होने करी चप्पे-चप्पे पर मंदर मिलदे न जिसकरी इस धरती गी मंदरेँ आह्ला शैह्र बी आक्खदे न। खास करी इत्थै बाह्बे आह्ली माता ते त्रिकुटा प्हाडियेँ च बास करने आह्ली बैष्णो माता ऎ। जिँदी चमत्कारी मैह्मा कारण पूरा ब'रा श्रदालुएं दा आना-जाना लग्गेआ रौँह्दा ऎ। दूरै-दूरै थमां लोक अपनी मनेँ दियां मुरादां पाने आस्तै औँदे न ते इंदे आर्शीवाद कन्नै खुशहाल जीवन व्यतीत करदे न। जिनेँ दिनेँ इत्थै मती चैह्ल-पैह्ल होँदी ऎ ओह् न माता दे नराते जिसलै चबक्खै रौनकां गै रौनकां लब्भदियां न। बाजार सज्जी जंदे न।\n नराते दी जित्थै गल्ल ऎ इंदा अपना खास म्हत्व ऎ। ऊ'आं ते नराते ब'रे च चार बारी औँदे न। पर द'ऊं नराते चेत्तर ते अस्सूं आह्ले दा गै मता म्हत्व ऎ। इंदा बी एक विज्ञानक कारण ऎ जे मौसम विज्ञान मूजब दो म्हीने सोए ते स्यालै कारण म्हत्वपूर्ण मन्ने जंदे न। दिक्खेआ जा ते रूतां बी छे (6) मन्नी जंदियां न पर प्रमुख द'ऊं गै न। इ'यां गै नराते बी द'ऊं गुप्त न जि'न्दा कोई इ'न्ना म्हत्व नेईँ मनेआ जंदा ऎ।\n स्यालै दी शुरुआत अस्सूं म्हीने थमां ते सोए दी चेत्तर म्हीने थमां मन्नी जंदी ऎ। जि'यां गै मौसम बदलोन लगदा ऎ तां पूरे भौतक जगत च हलचल होना शुरु होई जंदी ऎ। रुक्ख-बूह्टे, जल ते पूरा वायुमंडल तगर सभनेँ च तबदीली होन लगी पौँदी ऎ। माह्नू सेहत पर बी खासा असर पौँदा ऎ। चेत्तर म्हीने थमां सोआ शुरु होने कन्नै माह्नू शरीरै च पिछलेँ केँई म्हीनेँ दे लहुऎ दी गति जेह्डी घट्ट होई दी होँदी ऎ ओह् नाडियेँ च त्रिक्खी द्रौडन लगी पौँदी ऎ। सिर्फ रक्त दी गै गल्ल नेईं बल्के पूरे शरीरै दी गतिविधि गै बदली जंदी ऎ। इत्थूं तगर जे मूहां दे स्वाद मौसमै दे स्हावै कन्नै बदलोई जंदे न। इ'यै कारण ऎ जे संसारै दे ज्यादातर रोगी इ'नेँ म्हीनेँ च जां ते जल्दी नरोए होई जंदे न जां फ्ही परमात्मा गी प्यारे होई जंदे न। शास्त्रकारेँ बी इ'नेँ म्हीनेँ शरीर गी पूरी चाल्ली कन्नै स्वस्थ रखने आस्तै नौ ध्याडेँ तगर बशेश रुप च वर्त आदि रखने दा विधान दस्से दा ऎ। इस कन्नै इब्बी आक्खेआ जंदा ऎ जे पराने जमाने च फसलां बी द'ऊं गै राईयां जंदियां हियां खरीफ ते रबी। ते नराते बी इ'नेँ फसलेँ दे कोल-कश गै औँदे न। नराते दा अनुश्ठानक म्हत्व इ'ब्बी लगदा ऎ जे नमीँ फसलेँ दा मुंढ कंजकेँ दे हत्थेँ मंगलपूर्वक होई जा ते इसदे कन्नै राह्ने आह्ली फसल दे बींऽ दी परख बी होई जंदी ऎ। चेत्तर म्हीने आह्ले नराते दे बेल्लै खरीफ ते अस्सूं आह्ले नराते दे बेल्लै रबी फसल राही जंदी ऎ। असल च चेत्तर म्हीने आह्ली फसल दा सरबंध बसंत आह्ली फसल कन्नै ऎ। चेत्तर बसंती नराते दा आरम्भ चेत्तर म्हीने दी शुल्क पक्ख कन्नै होँदा ऎ। चेत्तर च औँह्ने आह्ले नराते च अपने कुल देवी-देवताएं दी पूजा दा बी प्रावधान मनेआ जंदा ऎ। अज्ज कल्लै दी खीट्टै पेदी जिँदगी च ज्यादातर लोक कुल कुल देवी-देवताएं गी भुल्लदे जा दे न ते किश समेँ दी कमी कारण बी पूजा पाठ आह्ली बक्खी ध्यान नेईँ दिँदे न।\n आवो भैनोँ साख राह्चै,\nसाख, राह्चै कन्नै भेट गाचै।\n साढै प्हाडेँ आह्ली नै अज्ज औह्ना। ।\n आवो भैनोँ न्होमन चलचै,\nन्होमन चलचै, कन्नै भेट गाचै,\nसाढै बाह्वे आह्ली नै अज्ज 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जिसलै कडाह्-पूरी पकादियां न ते मंगल-कामना करदियां न।\n स्रिश्टी गी बचाने आस्तै बिनती कीती। तां मां भगवती ने दुर्गम कन्नै युद्ध करियै पापी गी मारी टकाया। तदूं कोला गै दुर्गा दे वर्त शुरू होए।\n 1. शैलपुत्री:- नरातें दी शुरूआत मां शैलपुत्री दी पूजा कन्नै कीती जंदी ऎ। शैल अर्थात प्हाड। पर्वतराज हिमालय दी बेटी पार्वती दे रुप च शैलपुत्री गी मन्नेआ जंदा ऎ। माता दा एह् रुप सखांदा ऎ जे किस चाल्ली मुश्कल परिस्थितियेँ च बी डट्टियै मकाबला कीता जाई सकदा ऎ।\n 2. व्रह्मचारिणी:- दूए ध्याडे मां व्रह्मचारिणी दी पूजा, ते एह् शक्ति संदेश दिँदी ऎ जे तप शक्ति कन्नै विजय प्राप्त कीती जाई सकदी ऎ।\n 3. चंद्रघंटा:- त्रिये ध्याडे चंद्रघंटा मां दी आराधना जेह्दी कृपा कन्नै भक्त अपने शत्रु पर जित्त हासल कीती जाई सकदी ऎ।\n 4. कूष्माण्डा:- चौथे नराते कुष्माण्डा मां जेह्दी उपासना कन्नै समस्त रोगेँ दा नाश होँदा ऎ जिस कन्नै माह्नू दी बरेस, यश, बल आदि दी वृदि होँदी ऎ।\n 5. स्कंदमाता:- स्कंदमाता दी पूजा पञ्जमेँ रोज इस च एह् संदेश मिलदा ऎ जे बुराइयेँ गी कि'यां नश्ट कीता जा।\n 6. कात्यायिनी:- छेमे ध्याडे मां कात्यायिनी दी आराधना, एह् सखांदी ऎ जे क्रठन तपस्या कन्नै सुक्ख प्राप्त कीता जाई सकदा ऎ।\n 7. कालरात्री:- मां दुर्गा दी सतमीँ शक्ति दा नां कालरात्री ऎ। एह् कालरात्री सखांदी ऎ जे मुश्कल घड़ी बी की नेईँ होवै असेँगी बिना कुसै डर त्राह दे व्यतीत करना चाहिदा ऎ।\n 8. महागौरी:- महागौरी माता संदेश दिँदी ऎ जे वगैर उत्साह दे किश बी प्राप्त नेईं कीता जाई सकदा। इस शक्ति दी उपासना दे बगैर किश बी सम्भव नेईँ ऎ।\n 9. सिद्धिदात्री:- नौमै ते खीरी रोज सिद्धिदात्री दी उपासना होँदी ऎ। शिव जी इस पूरे व्रह्मांड दे पालनकर्ता न ते मां सिद्धिदात्री उंदे कन्नै इस व्रह्मांड गी चलांदी ऎ। इस करी दुर्गा दा एह् रुप कार्य कुशलता दा संदेश दिँदा ऎ।\n इ'नेँ नरातेँ च सब्भै शुभ कम्म कीते जंदे न जि'यां व्याह् कारज, मूनन आदि बी इ'नेँ दिनेँ बगैर कुसै पंडित गी पुच्छे दे सम्पन्न कीते जंदे न। ऊ'आं गै चेत्तर नराते गी सिद्धियेँ आस्तै बी बशेश मन्नेआ जंदा ऎ। इ'नेँ नराते च कीती गेदी पूजा जपतप साधना, जैँत्र सिद्धियेँ आस्तै बडी सिद्ध सावत होंदी ऎ। कीजे इ'नेँ दिनेँ दुर्गा आपूं साक शात विराजमान होँदी ऎ। ते अपने उपासकेँ गी बल दिँदी ऎ। जैँत्र-मैँत्र 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The Company accordingly focuses on all emerging areas of IT/ICT applications in the sector.\nFollowing key services are provided as part of the Digital Education Systems vertical:\n।UGC (Anti-ragging helpline)\n।Chaudhary Charan Singh Institute (Online Admission Management System)\n।Assam Engg College (ERP)\nकंपनी का दृढ़ विश्वास है कि डिजिटलीकरण स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों में ही गुणवत्ता, परिमाण और अभिशासन की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। तदनुसार कंपनी इस सेक्टर में आईटी / आईसीटी अनुप्रयोगों के सभी उभरते क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।\nडिजिटल शिक्षा प्रणाली के एक भाग के रूप में निम्नलिखित महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान की जाती हैंः\n।यूजीसी (एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन)\n।चौधरी चरण सिंह संस्थान (ऑनलाइन प्रवेश प्रबंधन प्रणाली)\n।असम इंजीनियरिंग कॉलेज (ईआरपी)\n"} {"text": "\"Mai Ni Meriye\" is the song from Mai Ni Meriye.\nMai Ni Meriye Lyrics (हिंदी)\nमायें मेरिये, शिमले दी रावें (राहें )\nचम्बा कितनी दूर,\nमायें मेरिये, शिमले दी रावें (राहें )\nचम्बा कितनी दूर,\nशिमले नी वसणा,\nकसौली नी वसणा चम्बे जाणां जरूर,\nहाय, चम्बे जाणां जरूर,\nमायें मेरिये, शिमले दी रावें,\nचम्बा कितनी दूर, चम्बा कितनी दूर,\nलाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे,\nअँखियों तां होया कसूर,\nहाय,अँखियों तां होया कसूर,\nमायें मेरिये, शिमले दी रावें,\nचम्बा कितनी दूर, चम्बा कितनी दूर, हाय चम्बा कितनी दूर,\nMai Ni Meriye Lyrics (English / Translation)\nMai Ni Meriye Song meta information regarding the creative artists involved in the making of this song including the video.\n।Mai Ni Meriye (hindi)\n।Song Duration: 02:52)\nWatch the video.\n"} {"text": "हिरदै ब्हाली चाएं, ओह् बी भुरदी होई।\n नीहें सिर सोआके, धरत खुरदी होई।\n खुंझ जो बी होई, बुरदो-बुरदी होई।\n औंदी-औंदी लैह्र कनारै टुरदी होई।\n ज़िंदगी खुरै दी ‘दोषी’ खुरदी होई। "} {"text": "1. What are the advantages of direct benefit transfers (DBT)? Critically evaluate the performance of DBT in recent years.\nप्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के क्या फायदे हैं? हाल के वर्षों में डीबीटी के प्रदर्शन का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें।\n"} {"text": "1. How did federalism evolve as a guiding principle in the Indian constitution? Discuss.\nभारतीय संविधान में मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में संघवाद कैसे विकसित हुआ? चर्चा करें।\n"} {"text": "3. What do you understand by the term 'privilege'? Why is it important to be aware of one's privileges? Discuss.\n'विशेषाधिकार' शब्द से आप क्या समझते हैं? किसी के विशेषाधिकारों के बारे में जानना क्यों महत्वपूर्ण है? चर्चा करें।\n"} {"text": "डोगरी साहित्य,Dogri literature, History of Dogri literature, Growth of Dogri literature, Dogri Poetry, Book review & Shayri, Dr. Chanchal Bhasin, dogri Writers.\n My article published in 'The Earth News' newspaper (17. 10. 22)\nPosted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 10:16 PM No comments:\nदुखेआरी मां-- (डॉ. चंचल भसीन)\n(डॉ. चंचल भसीन)\nकरी दिंदा ऐ एह् घरै दी तबाही।\n टब्बर फुल्ली-फुल्ली लगा पसोन।\n दुख लगी पे हे दूर नस्सन।\n दोस्त ने इसगी आन चटाई।\n अंदरों-अंदरी लगा घटोन।\n स्हेई-गल्त दी इस्सी बत्त भुल्ली गेई।\n जीना इसदा अपना मुहाल गेआ होई ।\n फ्ही निं एह् कुसै नै जुड़ेआ।\n रोंदे सभनें गी एह् छोड़ी गेआ।\n दुखेआरी मां दी सुनी जाएओ।\n Posted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 6:13 PM No comments:\nSubscribe to: Posts (Atom)"} {"text": "टीम इंडिया ने इस मैच के साथ हील ऋषभ पंत को मौका दिया है। पंत को वनडे सीरीज में मौका नहीं मिला था। ऐसे में उनके पास बहुत कुछ कर दिखाने को जरूर होगा।\nपिच के बारे में बात करें तो यह वही पिच है जो पांचवें वनडे में इस्तेमाल की गई थी। इसमें कुछ दरारे हैं लेकिन उतनी चौड़ी नहीं जितनी वनडे मैच के शुरू होने के दौरान थीं। विकेट पर ज्यादा नमी होगी और विकेट वैसा ही खेलेगा जैसे वनडे मैच में खेला था। इस तरह के मैच के लिए यह बेहतरीन परिस्थिति है।\nभारत (प्लेइंग इलेवन): शिखर धवन, विराट कोहली (कप्तान), ऋषभ पंत, दिनेश कार्तिक, एमएस धोनी (विकेटकीपर), केदार जाधव, रविंद्र जडेजा, रविचंद्रन अश्विन, कुलदीप यादव, मोहम्मद शमी, भुवनेश्वर कुमार।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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Critically examine.\nपर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) के प्रमुख सिद्धांतों पर चर्चा करें? क्या वास्तविक जीवन में इन सिद्धांतों का पालन करना अव्यावहारिक है? समालोचनात्मक जांच करें।\n"} {"text": "सज्जी जंदे न।\n नराते दी जित्थै गल्ल ऎ इंदा अपना खास म्हत्व ऎ।\n बी द'ऊं गुप्त न जि'न्दा कोई इ'न्ना म्हत्व नेईँ मनेआ जंदा ऎ।\n आह्ली बक्खी ध्यान नेईँ दिँदे न।\n दुर्गा सप्तशती च भगवती न इस समेँ च शक्ति पूजा गी महा पूजा दस्से दा ऎ।\n होँदा ऎ उसगी तोआरेआ जंदा ऎ। ते कुसै पतीले जां डब्बे कन्नै खट्टदियां न।\n आवो भैनोँ साख राह्चै,\nसाख, राह्चै कन्नै भेट गाचै।\n साढै प्हाडेँ आह्ली नै अज्ज औह्ना। ।\n आवो भैनोँ न्होमन चलचै,\nन्होमन चलचै, कन्नै भेट गाचै,\nसाढै बाह्वे आह्ली नै अज्ज औह्ना,\nआवो भैनोँ चूटी करचै,\nचूटी करचै, कन्नै भेट गाचै।\n साढै लाटां बाली नै अज्ज औह्ना।\n पचैलन फिरदी गली-गली।\n तेल पायो पा-पा,\nपचैलन फिरदी राह्-राह्,\nपचैलन फिरदी हट्टी-हट्टी। ।\n फ्ही इस तेल कन्नै माता दी अखण्ड जोत जगाई जंदी ऎ ते एह् जोत पूरे नराते तगर जगदी रौँह्दी ऎ।\n अलसी दा तेल बलै दिन-रातीं।\n काएं भरेआ गडबा माता काएं भरी ऎ डोरी,\nजमना दा जल राजा भर लेआया चोरी।\n कंजकां आइयां तेरे दोआर।\n सौ-सौ माता सुत्तडियेँ,\nछैनेँ दी घनघोर ऎ,\nसारेँ लोक सेई गे,\nपचैलन तेरे कोल ऎ।\n न। नरातेँ च हर एक चौक म्हल्ले च रोज कुते-न- कुते माता दा जगराता चलदा ऎ।\n पूजा कीती जंदी ऎ। जिसलै कडाह्-पूरी पकादियां न ते मंगल-कामना करदियां न।\n गी मारी टकाया। तदूं कोला गै दुर्गा दे वर्त शुरू होए।\n परिस्थितियेँ च बी डट्टियै मकाबला कीता जाई सकदा ऎ।\n 2.\n दिँदी ऎ जे तप शक्ति कन्नै विजय प्राप्त कीती जाई सकदी ऎ।\n 3. चंद्रघंटा:- त्रिये ध्याडे चंद्रघंटा मां दी आराधना जेह्दी कृपा कन्नै भक्त अपने शत्रु पर जित्त हासल कीती जाई सकदी ऎ।\n होँदी ऎ।\n 5. स्कंदमाता:- स्कंदमाता दी पूजा पञ्जमेँ रोज इस च एह् संदेश मिलदा ऎ जे बुराइयेँ गी कि'यां नश्ट कीता जा।\n 6. कात्यायिनी:- छेमे ध्याडे मां कात्यायिनी दी आराधना, एह् सखांदी ऎ जे क्रठन तपस्या कन्नै सुक्ख प्राप्त कीता जाई सकदा ऎ।\n त्राह दे व्यतीत करना चाहिदा ऎ।\n उपासना दे बगैर किश बी सम्भव नेईँ ऎ।\n करी दुर्गा दा एह् रुप कार्य कुशलता दा संदेश दिँदा ऎ।\n तैँत्र सिद्धि बडी असानी ते घट्ट समेँ च मिली जंदी ऎ।\n सांस्कृतक माह्नू दे जीवन कन्नै गै जुडे दा ऎ। "} {"text": "1. What are the challenges and issues regarding the functioning of NGOs in India? Analyse.\nभारत में गैर सरकारी संगठनों के कामकाज के बारे में क्या चुनौतियां और मुद्दे हैं? विश्लेषण करें।\n"} {"text": "यह बहुत ही बेहतरीन विषय है इस पर जरुर कार्यवाही होनी चाहिए।\nBy logging in or continuing, you accept Change.org's Terms of Service and Privacy Policy.\nयह बहुत ही बेहतरीन विषय है इस पर जरुर कार्यवाही होनी चाहिए।\n"} {"text": "2. Why do state led services falter in quality and efficiency? Critically analyse.\nराज्य के नेतृत्व वाली सेवाएं गुणवत्ता और दक्षता में क्यों लड़खड़ाती हैं? समालोचनात्मक विश्लेषण करें।\n"} {"text": "डोगरी साहित्य च कुंडलियेँ दा पैह्ला संग्रैह् लिखने दा श्रेय 'पूर्ण चंद बडगोत्रा' होरें गी जंदा ऎ जिँदे सोचे दा सरलाऽ संग्रैह् च कोतरा सौ (101) कुंडलियां न जेह्ड़ियां समाजै दे हर विशेँ गी छूंह्दियाँ न। लगदा ऎ जे बडगोत्रा' होरें अपने सभनेँ तजरबेँ गी एक लड़ी च परोइयै पाठकेँ आस्तै एह् सौगात पेश कीती दी ऎ। संग्रैह् दे शीर्शक थमां गै लगदा ऎ जे सोचां कवि दे अंदर इ'यां सरलाऽ दियां हियां, जि'यां कोई जख्म जिसलै पाक्कू कन्नै भरोची जंदा ऎ तां ओह् टकाई नेईं लैन दिँदा जिसलै तगर ओह्दा लाज नेईँ कीता जा। इ'यां गै लगदा कवि दे मनै च सुरकने आह्ले दुक्ख-सुक्ख जेह्डे उ'नेँ भोगे-भाले दे न ओह् तजरबेँ, ओह्दी सोचेँ च सरलाऽ दे हे। जेह्डे उ'नेँ कुंडलियेँ दे राहेँ पाठकेँ सामने पुजाई दित्ते न। कोई बी ऎसा विशे नेईँ ऎ जेह्दी नब्ज कवि ने नेईँ पकड़ी दी ऎ। कुंडलियेँ दा विशे ऊ'आं ते उपदेशात्मक होँदा ऎ पर इस संग्रैह् च असेँ गी सभनेँ विशेँ कन्नै सरबन्धत कुंडलियां मिलदियां न, जि'यां समाजक, राजनीतिक, वनस्पतियेँ, पक्खरू-पखेरूयेँ, रूत्तेँ-ब्हारेँ, पर्व-ध्यारेँ आदि। इंदेँ थमां पैह्ले बी किश कवियेँ इस विधा च हत्थ अजमाए दे न पर कुसै बी कवि दा कुंडलियेँ दा संग्रैह् पाठकेँ तगर नेईँ पुज्जा। टामीँ-टामियां कुंडलियां अजेँ बी छपदियां रौह्दियां न।\n सब्भै अक्खी मूंदरी, नित्त भजन भगवान,\nमनै बसाई मूरती, रज्जी दर्शन पा'न।\n रज्जी दर्शन पा'न, प्रभु दे चौह्ने कूटेँ,\nभात-सभांते फुल्ल, अमर-फल लडके बूह्टेँ।\n अमरत तुल्ले नीर, बगै दे सज्जै-खब्बै,\nसब ओह्दे परमान, नुआंदे सिर तां सब्भै।\n (सफा-1)\nपापेँ दा चेता जदूं, सोचेँ च सरलाऽ,\nखंदा रुक्की-रुक्कियै, बनी जा पच्छोता,\nबनी जा पच्छोता, दान तां करै बत्हेरे,\nबाले मंदर जोत, शिवेँ दे स'ञ-सवेरे।\n नांऽ दिया सिलां-लुआऽ, पराह्चित संतापेँ दा,\nपच्छोताऽ पर मिटै, भोगियै फल पापेँ दा।\n (सफा-17)\nइक्क घरै दे जीव फ्ही, बक्क-बक्खरी सार,\nरौँह्दे थूरे-ईँगरे, बुद्धिमान-गुआर।\n बुद्धिमान-गुआर, भुलाइयै हानी-लाभ,\nकरन निरंतर हेर, पूरने बिसले ख्वाव।\n ऎवेँ समां मुहान, पा'न रिश्ते च फिक्क ,\nसब्भै होन खुआर,बारि-बारि इक्क-इक्क।\n (सफा-37)\nइस भ्रश्ट समाजै पर कवि ने व्यंग कीते दा ऎ जे कोई बी हक्क जां इंसाफ अड़े बगैर नेईँ मिली सकदा। दफ्तरेँ च होने आह्ली लोकेँ कन्नै बदसलूकी दी अकासी कुंडलियेँ च कीती दी ऎ जे लोकेँ दियां फाइलां विजन वजह गै दबाई दित्ती जंदियां न जद् तगर उंदी तली पर मूहं दखाई नेईँ दित्ती जंदी तद् तगर उंदा कम्म नेईँ उस्सरी सकदा।\n काज निँ सौरै अडे बिन, नां गै बद्धै-बास,\nहोऎ भाएं आम ओ, भाए कोई खास,\nभाए कोई खास, दडी जा 'फायल' गुट्ठा,\nपवै डं'बनी तली, जां मूहं दखाई रवाज,\nलैन खूसियै लग्ग, होऎ ना होऎ काज।\n (सफा-13)\nखन्नी-लप्पर खाइयै, मान तरक्कडी जोख,\nरिश्वत जैह्र बरोबरी, बार-बार एह् घोख।\n बार-बार एह् घोख, निँ पचदी औतर जानी,\nएक दिन पवै ज़रूर, सने सूद परतानी।\n सिक्खमत अनमोल, अज्ज लै गंढी बन्नी,\nआदर-मान बस्स, खाइयै लप्पर-खन्नी।\n ( सफा-21 )\nतज्जे चिट्ठी-तार, खत, सेपे टेलीफून,\nकल्लै तक हे बैठमेँ, चले चलामेँ हून।\n खबर घरै दी देन, भरी सभा इच्च, जाई,\nलिखी सनेह् बी देन, सदा हुकमै दे बज्जे,\nबटन दबाने सैह्ल कश्ट, लिखने दे तज्जे।\n ( सफा-42 )\nलखदे गे भलखोई न, कलयुगियेँ इंसान,\nगौ सेवा गी तज्जियै, कुत्तेँ टैह्ल कमान।\n कुत्तेँ टैह्ल कमान, बिस्कुटां, मास खलाई,\nग्हांदे फ्ही वे-गुरे, दुआर पराए जाई।\n गमां भुक्खियां सुढन, रूग्ग भर भोऎ उगदे,\nअमरत तुल्ला दुद्ध, पीऎ भुल्ली गे लगद।\n ( सफा-61 )\nजरम-ध्याड़ा माह्नू दा, होन पशु कुर्बान,\nबकरे भाऽ दा न्हेर पे, कुक्कड निम्मोझान।\n कुक्कड निम्मोझान, सुनेँ निँ कोई फर्याद,\nबडे सुआदे खान, फ्ही देन मबारकवाद।\n कुक्कड-बकरेँ सोग, जां उंदा मरन-ध्याड़ा,\nजदूं-जदूं बी अवै, माह्नू दा जन्म-ध्याड़ा।\n ( सफा-60 )\nकवि गी डुग्गर बसनीक होने दा फक्र ऎ। ओह् अपने डुग्गर देसै पर जान-कुर्बान करी देना चांह्दा ऎ। ओह्दा मन्नना ऎ जे जान कुर्बान करियै बी इस देसै दा कर्ज नेईँ तोआरेआ जाई सकदा ऎ।\n डुग्गर दा बसनीक औँ, डुग्गर मेरी जान,\nम्हान ऎ मीँ, होने दा, डुग्गर दी संतान।\n डुग्गर दी संतान, मिगी थ्होई ऎ पंछान,\nकरा जिंद कुर्बान, बी नेईँ, उल्लै सहान।\n औँ जारेँ दा जार, बैरियै ते अति उग्गर,\nनेहा होर निँ थाह्र, जनेहा मेरा डुग्गर।\n ( सफा-36 )\nखीरै च इ'यै आक्खेआ जाई सकदा ऎ जे एह् कुंडलियेँ दे संग्रैह् भाशा दी द्रिश्टी कन्नै बी सराह्नेजोग ऎ ते इस पोथी दा डोगरी साहित्य च सुआगत ऎ। "} {"text": "साढ़े बारे च\\nलक्ष्य ते उद्देश\\nकु'न कु'न शामल ऐ?\\nकु'न केह् ऐ?\\nपरियोजना दा तफसीली ब्यौरा\\nराश्ट्री अनुवाद मिशन भारत सरकार दी इक परियोजना ऐ जेह्दा उद्देश अनुवाद गी इक उद्योग दे रूपै च स्थापत करना ते भारती भाशाएं च विद्यार्थियें ते शिक्षकें गी ज्ञान दियां पाठ पुस्तकां उपलब्ध करोआइयै उच्च शिक्षा गी सैह्ज बनाना ऐ। लक्ष्य एह् ऐ जे भाशिक रकौटें गी पार करियै इक ज्ञानवान समाज दी रचना कीती जा। एन.टी.एम. दा उद्देश अनुवाद राहें भारती संविधान दी अठमीं अनुसूची च शामल सभ'नें भारती भाशाएं च ज्ञान दा प्रचार-प्रसार करना ऐ।\\nरली-मिली कोशिशें कन्नै अनुवादकें गी सखलाई देना, प्रकाशकें गी अनूदित कताबें दे प्रकाशन आस्तै प्रेरना, भारती भाशाएं च अनूदित ते इक भारती भाशा थमां दूई भारती भाशा च अनूदित समग्गरी दे डेटाबेस दी सांभ-सम्हाल ते रख-रखाऽ करियै अनुवाद कन्नै सरबंधत सारी सरगर्मियें गी इक थाह्र उपलब्ध करोआना। इ'नें कोशिशें कन्नै एन.टी.एम. अनुवाद गी भारत च इक उद्योग दे रूपै च स्थापत करना चांह्दा ऐ। मेद ऐ जे अनुवाद राहें नमीं तकनीकी शब्दावली ते भाशा शैली दे निर्माण कन्नै भाशाएं दा रचनात्मक आधुनिकीकरण होग। भारती भाशाएं दे आधुनिकीकरण दी प्रक्रिया, खास तौर पर शैक्षणिक संवाद च अनुवादकें दी म्हत्तवपूर्ण भूमका रौह्ग।\\nअनुवाद गी उद्योग दे रूप च स्थापत करने आस्तै ज्ञान-अधारत पाठ पुस्तकें दा अनुवाद इस दिशा च पैह्ली गैंऽ ऐ। सारी पाठ समग्गरी जेह्ड़ी ज्ञान दे प्रसार आस्तै बरती जंदी ऐ राश्ट्री अनुवाद मिशन च ज्ञान-अधारत पाठ पुस्तकें दे मतैह्त औंदी ऐ। इस बेल्लै राश्ट्री अनुवाद मिशन उच्च शिक्षा कन्नै सरबंधत सबूरी शैक्षणिक समग्गरी गी 22एं भारती भाशाएं च अनुवाद करोआने च रूज्जे दा ऐ। राश्ट्री अनुवाद मिशन दा लक्ष्य ऐ जे ज्ञान दे बशाल भंडार गी अनुवाद राहें भारती भाशाएं च उच्च शिक्षा दियें पाठ पुस्तकें राहें उपलब्ध करोआया जा जेह्ड़ियां ज्यादातर अंगरेज़ी च गै उपलब्ध न। मेद ऐ जे एह् प्रक्रिया इक समावेशी ज्ञान-अधारत समाज दे निर्माण दी दिशा तैह् करग।\n"} {"text": "2. Why doesn't India have globally competitive institutions of education? Examine. What would it take to transform higher education in India? Analyse.\nभारत में शिक्षा के विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी संस्थान क्यों नहीं हैं? जांच करें। भारत में उच्च शिक्षा को बदलने के लिए क्या करना होगा? विश्लेषण करें।\n"} {"text": "1. How did internal rivalries lead to early British expansion and control in India? Discuss.\nकिस प्रकार आंतरिक प्रतिद्वंद्विता ने भारत में शुरुआती ब्रिटिश विस्तार की ओर योगदान दिया? चर्चा करें।\n"} {"text": "मिगी मेरे जीने दा सार देई दे।\n मिगी मेरी जिंदगी दी ब्हार देई दे।\n मिगी मेरी जिंदगी दी ब्हार देई दे।\n द’ऊं बेल्ले दी रूट्टी दा जुगाड़ देई दे,\nमिगी मेरी जिंदगी दी ब्हार देई दे।\n माऊ दा प्यार ते बब्बै दा दुलार देई दे। ।\n (डॉ. चंचल भसीन)\nडोगरी साहित्य,Dogri literature, History of Dogri literature, Growth of Dogri literature, Dogri Poetry, Book review & Shayri, Dr. Chanchal Bhasin, dogri Writers.\n 'देई दे' (डॉ. चंचल भसीन)\nPosted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 10:39 PM No comments:\nSubscribe to: Posts (Atom)"} {"text": "(याचिका का हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी के पश्चात है। )\nThe recent project to redevelop the Central Vista in New Delhi, and the tender process calling for ( inappropriately) \" Procurement of Service' conducted to launch this project, involves remaking the spatial epicenter of India's democracy.\nGiven its significance, the project leaves unanswered several questions of key significance:\n1. A Vision for India's Democracy:\nWhat is the vision for the future of India's democracy that this space should represent, given that it houses the key institutions that will sustain that democracy - as also that in the mind of most Indians it embodies that very democracy?\nWhy was this vision not articulated through a transparent and democratic debate in advance of the project launch?\nWhy was this vision considered of such little importance that it was left to the interpretation of participating architects - that too to articulate within a short period of three weeks?\n2. Respect for Heritage:\nGiven the historical significance of Central Vista and its surroundings, why did a detailed heritage audit not take place prior to the design selection?\nHow does this project relate to the heritage guidelines of the Delhi Master Plan?\nWhy indeed have various governmental bodies not prepared a Zonal plan for this crucial zone despite being called upon in 2016 in the \" Master Plan 2021 \" to do so?\nWhy does it appear that Heritage buildings of Grade 1 and Grade 2 category are being demolished, or even worse, being called upon ( in the very brief ) to be tampered with - beyond the scope of what is allowed?\nHow does the project relate to India's submission to UNESCO seeking recognition of this precinct as a World Heritage City?\n3. The Impact on Environment:\nWhy has an environmental impact analysis not been done, and published, as a precursor to the project?\nConsidering the scant information in the public domain about the building program, the best guess assessment of the construction area is:\nThe Impact of such a building program during construction would mean:\nWhat is the level of study on the impact on Air Pollution levels during construction with the additional trucks and construction dust? In this already choking city.\nWhat will be the impact on daily Traffic in the NDMC area for 5 years from construction traffic and the road diversions due to general Infrastructure upgrade in surrounding areas? Is every citizen of Delhi to live with the restrictive traffic plans that are put in place every Republic day ( which is anyway a holiday ) for a whole 5 years - with traffic backed up all the way to Sonepat, Ghaziabad, Faridabad and beyond?\n4. The Procedure for the Design Selection:\nWhy was the project not conducted as an open competition inviting as many ideas as possible? Is that not the correct way forward for a change envisaged to such a core national space - to collect all the best ideas, no matter its source?\nThere is ample precedent on how to reconcile open ideas with the technical proficiency to execute a large project.\nWhy was such precedent ignored?\nWhy were the eligibility criteria for bidders to participate in this set such that it ensured that only a small handful of firms could participate? Was this right?\nWhy was the list of jury members who would assess the design entries, with credentials demonstrating unimpeachable eminence and integrity, not declared in advance of the announcement? Is this not normal in such an initiative, given just National precedent, if not international ones?\nHow do we know as a nation that the best has been chosen for us by the best qualified to judge?\nSignificant public design competitions select a professional advisor, an eminent architect or an urban designer, who oversees the conducting of the design selection to ensure it is a fair process aimed at the best possible result? Was such a person appointed? If so, why was the name not declared in advance?\nWhy have the design entries not been subject to open scrutiny and debate?\nWhy is a project of such scale and significance being conducted in such extreme haste?\nAs concerned citizens of India, we draw attention to the national significance of Central Vista and its surroundings and ask that this project be placed on hold until the important questions above have been answered, the answers subjected to democratic scrutiny and debate, and the subsequent concerns addressed.\nDownload LokPATH India's complete appeal here.\nसेंट्रल विस्टा ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गयी नई दिल्ली की राजधानी का एक अहम् हिस्सा है। राजधानी का निर्माण ब्रिटिश सरकार ने बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में किया जिससे पहले कलकत्ता शहर ब्रिटिश भारत की राजधानी के रूप में जाना जाता था। नई दिल्ली सुनियोजित प्लानिंग और डिज़ाइन का एक शानदार नमूना है जिसे ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एड्विन लूट्यन्स और हर्बर्ट बेकर ने बनाया। खुली सड़के, शानदार इमारतें, छायादार दरख़्तों के साथ खुले लाॅन, पानी के फ़व्वारे और बाग़ों में बसे बंगले एक ख़ूबसूरत शहर की तस्वीर बनाते हैं। आज़ादी के बाद से सेंट्रल विस्टा दिल्ली शहर का एक सांस्कृतिक केंद्र बिंदु रहा है। आज के समय में यह जगह देश के आम आवाम के लिए बेहद ख़ास और मश़्ाहूर है।\nसरकार ने हाल ही में नई दिल्ली की राजधानी के सेंट्रल विस्टा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पुनर्विकास के लिए अपनी योजनाओं की घोषणा की है। इसके अंतर्गत ष्चतवबनतमउमदज व िेमतअपबमेष् टेंडर आमंत्रित किया गया है। इस स्थान की महत्वता को ध्यान में रखते हुए इस पूरी प्रक्रिया पर कई सवाल उठाये जा रहे हैं, जिसमे से कुछ ख़ास मुद्दों पर यहाँ विचार किया गया है।\nनयी परियोजना भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की तस्वीर को कैसे दर्शाएगी ? इस जगह की महत्वता को समझने के लिए क्या यहाँ के राष्ट्रीय उत्सवों (गणतंत्र दिवस परेड, बीटिंग रिट्रीट), इस के इतिहास तथा इसकी सांस्कृतिक विरासत को भी समझा गया है? इस स्थान का देश के हर नागरिक के ह्रदय में एक खास महत्त्व है। नए डिज़ाइन को सोचने के लिए एक लोकतान्त्रिक तथा पारदर्शी व्यवस्था का चयन क्यों नहीं किया गया ? इन महत्वपूर्ण तथ्यों को सोचने समझने के लिए पर्याप्त समय क्यों नहीं दिया गया ? इस इलाके की तारीख़ी और आवामी अहमियत को नज़र अंदाज़ कर सरकार बिना किसी संगीन और गहरी सोच के डिज़ाइन के चयन और काम के पुरस्कार के साथ आगे बढ़ रही है।\nनई दिल्ली सुनियोजित प्लानिंग और डिज़ाइन का एक शानदार नमूना है जिसे ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एड्विन लूट्यन्स और हर्बर्ट बेकर ने बनाया। खुली सड़के, शानदार इमारतें, छायादार दरख़्तों के साथ खुले लाॅन, पानी के फ़व्वारे और बाग़ों में बसे बंगले एक ख़ूबसूरत शहर की तस्वीर बनाते हैं। आज़ादी के बाद से सेंट्रल विस्टा दिल्ली शहर का एक सांस्कृतिक केंद्र बिंदु रहा है। ऐसे स्थान के पुनर्निर्माण से पहले किसी प्रकार का ऑडिट क्यों नहीं क्या गया ? दिल्ली मास्टरप्लान, एन.सी.आर. के क्षेत्रीय स्केल पर इस योजना का क्या मायने है? इसके बनने के दौरान और इसके बाद शहर की अन्य नई परियोजनाओं पर भी गहन असर होगा ? क्या इस बात का कोई नाप तोल किया गया है कि आम आवाम और उसकी ज़रूरतों पर इसका क्या असर होगा ? मास्टरप्लान २०१६ और २०२१ के सुझावों के अनुसार इस जगह का छोटे स्तर का जोनल प्लान क्यों नहीं बनाया गया ? ग्रेड-१ और ग्रेड-२ की ऐतिहासिक इमारतों को ध्वंस करने का विचार कहाँ तक उचित है? न्छम्ैब्व् के विश्व विरासत शहर की नामांकन प्रक्रिया में दिल्ली भी शामिल है। नयी व्यवस्था में इस तथ्य की क्या जगह होगी ?\nइस स्तर की परियोजना का अगले पांच वर्षों में नगरपालिका के क्षेत्र में क्या असर होगा? क्या इस परियोजना से वाहनों के चलन का असर सोनीपत, ग़ज़िआबाद, फरीदाबाद और बाहरी इलाकों पर भी होगा ?\nविस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में इन संगीन मुद्दों और इनको सुलझने की गहरी और नियोजित सोच का कोई ज़िक्र नहीं है। रिपोर्ट में मंत्रालय की बढ़ती ज़रूरतें,ं बजट, असर का आकलन आदि की रूपरेखा सहित सार्वजनिक दस्तावेज़ों का उत्पादन नहीं किया गया है। इस प्रक्रिया के अनुसार देश के कई होनहार पर छोटे दफ़्तरों के आर्किटेक्ट इसमें भाग नहीं ले पाए। अगर सरकार विचारों की तलाश कर रही है तो क्या उसे देश भर के डिज़ाइन पेशेवरों, कलाकारों, छात्रों के लिए इस प्रक्रिया को खोलने की बजाय इसे मुट्ठी भर तक सीमित करना चाहिए? और सिर्फ वो जो बड़े बयाना में २५ लाख रुपए जमा कर सके? देश के इतिहास में अंतरास्ट्रीय स्तर के कई प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ है। ऐसे उदाहरणों का कोई उल्लेख इस प्रतियोगिता में क्यों नहीं है? इस स्तर की प्रतियोगिता में चयन समिति का एक महत्वपूर्ण योगदान है। पारदर्शिता के आदर्शों को मानते हुए इसका ऐलान प्रतियोगिता से न पहले किया गया और न बाद में। मंत्रालय द्वारा डिज़ाइन की फर्म के चयन की प्रक्रिया के लिए प्रासंगिक संस्थाओं और समाजों से मदद और रहनुमाई जैसे वास्तुकला परिषद (CoA) और भारतीय आर्किटेक्ट संस्थान (IIA) के प्रस्ताव की कोई पेशकश नहीं की गई। इन्टैक (INTACH) (दिल्ली), और अन्य समाजों जैसे कि इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन डिजाइनर्स ऑफ इंडिया (IUDI) और इंडियन सोसाइटी ऑफ लैंडस्केप आर्किटेक्ट्स (ISOLA) जो संस्थाएं सालों से विरासत, प्रकृति और भवन निर्माण के शोध कार्यों में जुटी हैं, इस परियोजना में भागीदार नहीं है।\nपरियोजना के अनेक प्रस्तावों को सार्वजनिक ज्ञानक्षेत्र में वाद विवाद तथा गहन विचार के लिए क्यों नहीं रखा गया? इतने महत्वपूर्ण तथा विस्तृत परियोजना के लिए इतनी ज़ल्दबाज़ी क्यों ?\nभारत के चिंताजनक नागरिकों की हैसियत से हम चाहते हैं कि जबतक इन संगीन मुद्दों तथा सवालों के जवाब नहीं दिए जाते इस परियोजना पर रोक लगाई जाये।\n"} {"text": "3. Global warming is a reality, that is affecting the glacial landforms, flora & fauna across the globe. Do you agree? Substantiate with the help of suitable examples.(15 Marks)\nग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविकता है, जो दुनिया भर में हिमनदों, वनस्पतियों और जीवों को प्रभावित कर रही है। क्या आप सहमत हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से पुष्टि कीजिए।\n"} {"text": "2. Do you think reservation in jobs and higher education has resulted in the socio-economic upliftment of backward classes? Critically examine.\nक्या आपको लगता है कि नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण के परिणामस्वरूप पिछड़े वर्गों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान हुआ है? समालोचनात्मक जांच करें।\n"} {"text": "4. Mission Karmayogi is a crucial step towards the modernisation of civil services in India. Comment.\nभारत में नागरिक सेवाओं के आधुनिकीकरण की दिशा में मिशन कर्मयोगी एक महत्वपूर्ण कदम है। टिप्पणी करें।\n"} {"text": "अनिल अंबानी की कर्ज़ में डूबी एक कंपनी खरीद सकते हैं कुमार मंगलम बिड़ला!\nಈ ವರ್ಷ ರಾಜ್ಯದ ಒಲವು AI,ML ಕಡೆಗಾ?\nಭಾರತದ ಐಟಿ ಉದ್ಯಮವು ಸೇವೆಗಳಿಂದ ಉತ್ಪನ್ನಗಳೆಡೆಗೆ ಏಕೆ ಹೋಗಬೇಕು?\nಏನಿದು ಬ್ಲಾಕ್ಚೈನ್ ತಂತ್ರಜ್ಞಾನ?\n"} {"text": "Sushmita Sen gave a befitting reply to the trolls about affair with Lalit Modi, said- when the boy would do this...! - सुष्मिता सेन ने ललित मोदी संग अफेयर को लेकर ट्रोल करने वालों को दिया करारा जवाब, कहा- जब लड़का ऐसा करता...!\n"} {"text": "कच्छ-कोल अश्कें कुतै अतरै दी शीशी डु’ल्ली ।\n मां ,एह् केह् झुल्लेआ जे रात उट्ठी मैह्की ।\n उसी छपैलने खातर सोह्ल,\nकुंगली कलियें ओठ ले मीटी, साह् लेआ हा घोटी ।\n पर दिन घरोंदे तगर दम लगा घटोन ,जिंद लगी छरोन ,\nतां लज्ज गेई ही भुल्ली , मूंह् गेआ खुऱल्ली,\nओठ पे खिड़ी ते खश्बो गेई डुऱल्ली ।\n ब्हाऊ ने झट्ट दित्ती खलारी ते रात उट्ठी ही मैह्की ।\n जदूं तगर रात दी रानी ते रजनीगंधा रौह्ङन । "} {"text": "सुरेश रैना ने मुंबई इंडियंस के खिलाफ 28 रन बनाए। इस मुकाबले में उनका स्ट्राइक रेट सिर्फ 96.55 रहा, जिसकी सबसे बड़ी वजह हरभजन सिंह ही थे। हरभजन की 11 गेंदों पर सुरेश रैना सिर्फ 6 ही रन बना सके। हरभजन की 5 गेंदों पर सुरेश रैना एक भी रन नहीं बना सके और 6 गेंदों पर उन्होंने एक-एक रन लिया। मतलब ये कि हरभजन सिंह की गेंदों पर सुरेश रैना एक चौका तक नहीं लगा सके।\nमैच के दौरान मुंबई इंडियंस के गेंदबाजी कोच शेन बॉन्ड ने भी खुलासा किया कि हरभजन सिंह के साथ मिलकर टीम ने सुरेश रैना के खिलाफ खास रणनीति बनाई थी जिसका नतीजा मैच के दौरान दिखाई दिया। गुजरात लायंस के खिलाफ हरभजन सिंह ने 4 ओवर में सिर्फ 22 रन दिए और उन्होंने एक विकेट अपने नाम किया। आपको बता दें सुरेश रैना का विकेट लेते ही हरभजन सिंह के टी-20 में 199 विकेट हो गए हैं।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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Discuss.\nमानवीय गलियारे क्या हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से स्पष्ट कीजिए। हाल ही में यह खबरों में क्यों था? चर्चा करें।\n"} {"text": "एक जून से इंग्लैंड में शुरू होने वाली चैंपियंस ट्रॉफी से पहले ऑस्ट्रेलिया के पूर्व खिलाड़ी माइकल हसीने बड़ा बयान दिया है। माइकल हसी ने कहा है कि इंग्लैंड के ऑलराउंडर बेन स्टोक्सचैंपियंस ट्रॉफी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हो सकते हैं। माइकल हसी के मुताबिक टूर्नामेंट में ठीक वैसा ही असर डाल सकते हैं जैसा 1999 वर्ल्ड कप में द.अफ्रीका के ऑलराउंडर लांस क्लूजनर ने डाला था।\nपुणे सुपरजायंट में बेन स्टोक्स के साथी खिलाड़ी और ऑस्ट्रेलियाई लेग स्पिनर एडम जंपा ने भी एक बयान में कहा कि स्टोक्स गेंद पर बड़ा तेज प्रहार करते हैं, मौजूदा दौर में उनसे ज्यादा खतरनाक बल्लेबाज शायद ही कोई दूसरा है, स्टोक्स को नेट्स पर बॉलिंग करने में भी डर सा लगता है।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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(10 Marks)\n'व्यापार करने में आसानी औद्योगिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है'। इस प्रकाश में, भारत में व्यापार करने में आसानी में सुधार के लिए सरकार द्वारा उठाए गए उपायों के प्रदर्शन का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें।\n"} {"text": "आपको बता दें बापू नादकर्णी टेस्ट क्रिकेट में भारत के सबसे किफायती गेंदबाज हैं, जबकि दुनिया के किफायती गेंदबाजों की लिस्ट में वो चौथे नंबर पर आते हैं। इंग्लैंड के विलियम एटवेल (10 टेस्ट मैच, इकॉनमी रेट 1.31), इंग्लैंड के ही क्लिफ ग्लैडविन (8 टेस्ट मैच, इकॉनमी रेट 1.60) और दक्षिण अफ्रीका के ट्रेवर गॉडर्ड (41 टेस्ट मैच, इकॉनमी रेट 1.64) ही इस लिस्ट में नादकर्णी से ऊपर हैं। बापू नादकर्णी ने भारत के लिए 41 टेस्ट मैच खेले थे जिसमें उन्होंने 29.07 की औसत से 88 विकेट चटकाए। इस दौरान उनका इकॉनमी रेट सिर्फ 1.67 का रहा। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर में 4 बार टेस्ट मैच की एक पारी में पांच या अधिक विकेट और दो बार 4 विकेट लिये। वहीं, बापू नादकर्णी के नाम 191 फर्स्ट क्लास मैचों में 21.37 की औसत और 1.64 की इकॉनमी रेट से 500 विकेट दर्ज हैं।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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Comment.\nसूफीवाद वास्तव में गहन भक्ति का एक धर्म था, प्रेम उसका जुनून था; कविता, गीत और नृत्य, इसकी पूजा और ईश्वर में समा जाना उसका आदर्श। टिप्पणी करें।\n"} {"text": "भामें अजमाई दिक्खी लैओ ।\n खुट्टा पैसा चलाई दिक्खी लैओ ।\n तां चाल अपनी बधाई दिक्खी लैओ।\n हिरख-आरती बी सजाई दिक्खी लैओ ।\n कदें तुस बी अजमाई दिक्खी लैओ । "} {"text": "। Jugasankha Special measures taken by 'CIFRI', for the betterment of Sundarban fishers .\n(সুন্দরবনের মত্স্যজীবীদের উন্নয়নে বিশেষ উদ্যোগ নিল সিফরী )\n।Different species of fishes are being ranched in reservoirs: a special initiative by 'CIFRI' (কেন্দ্রীয় মত্স্য গবেষণা কেন্দ্রর উদ্যোগে ভিন্ন প্রজাতির মাছ জলাশয়ে ছাড়ার কাজ চলছে)\n।Special initiative by 'CIFRI' for the betterment of Sundarban fishers.\n(সুন্দরবনের মত্স্যজীবীদের উন্নয়নে সিফরী)\n।Inputs provided by 'CIFRI' for the SC ST fishers of Sundarbans.\n(সুন্দরবনের তফসিলী উপজাতির মত্স্যজীবীদের হাতে তুলে দেওয়া হল মাছের চারা, খাবার , ওষুধ ও চুন )\n।CIFRI steps in to aid distressed Sunderbans fish farmers.\n।मणिपुर की लोकटक झील में राजकीय मछली पेंगबा का मेगा रेंचिंग कार्यक्रम ,\n।सिफरी ने किया पश्चिम बंगाल के डूमा आद्रभूमि में मत्स्य हार्वेस्ट मेला का आयोजन,\n"} {"text": "Discuss the factors that have led to record-breaking exports from India in the Fy 2021-22. What are the major challenges to India's export promotion? Analyse.\nवित्त वर्ष 2021-22 में भारत से रिकॉर्ड तोड़ निर्यात करने वाले कारकों पर चर्चा करें। भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख चुनौतियां क्या हैं? विश्लेषण कीजिए।\n"} {"text": "1. What are the critical issues due to which the the contribution of industrial sector to GDP is low in India? Examine.\nवो महत्वपूर्ण मुद्दे क्या हैं जिनके कारण भारत के में सकल घरेलु उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान कम है? जांच करें।\n"} {"text": "आईपीएल 10 में भी सनराइजर्स हैदराबाद जीत की सबसे बड़ी दावेदारों में से एक है क्योंकि इस टीम में टी-20 के स्पेशलिस्ट खिलाड़ियों की भरमार है। टीम में डेविड वॉर्नर, युवराज सिंह, बेन कटिंग, शिखर धवन, मोजेज हेनरिक्स, केन विलियमसन जैसे स्टार बल्लेबाज हैं तो वहीं गेंदबाजी में भी भुवनेश्वर कुमार, क्रिस जॉर्डन, प्रवीण तांबे, आशीष नेहरा जैसे गेंदबाज हैं। इस सीजन में अफगानिस्तान के लेग स्पिनर राशिद खान भी हैदराबाद के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं क्योंकि राशिद खान मौजूदा वक्त में टी-20 क्रिकेट में किसी भी गेंदबाज से अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। वैसे कप्तान डेविड वॉर्नर की फॉर्म और मुस्तफिजुर रहमान के आईपीएल में ना खेलने की आशंका जरूर हैदराबाद के लिए चिंता का सबब है।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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India's freedom struggle had participation from people of all walks of life irrespective of caste, creed, sex, and religion, and was not exclusively controlled by any particular group. Do you agree? Critically comment.\nभारत के स्वतंत्रता संग्राम में जाति, पंथ, लिंग और धर्म के बावजूद जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों की भागीदारी थी, और यह किसी विशेष समूह द्वारा विशेष रूप से नियंत्रित नहीं था। क्या आप सहमत हैं? समालोचनात्मक टिप्पणी करें।\n"} {"text": "\" सेवाधनी-समाजै दा अक्स\"\nकुसै बी साहित्य च उसलै संदोख बुझेआ जंदा ऎ जिसलै उसगी लिखने आहले साहित्यकार समाजै च घटने आह्ली घटनाएं गी विशे बनाइयै कृति दे रूपै च प्रस्तुत करदा ऎ। उसलै समझेआ जंदा ऎ साहित्य रचने दी जिम्मेदारी हून उनेँ सौह्गे-सेआनेँ लोकेँ दे हत्थै च ऎ जेह्डे समाजै च व्यापी दी कुरीतियेँ दे प्रति चिँतित न ते इसदी असली तस्वीर, लुकाई अग्गै नित-नमेँ विशे राहेँ पेश करा'दा ऎ। डोगरी साहित्य च बी एह् बडी खुशी आह्ली गल्ल ऎ जे इसदे साहित्यकार बी हर ओह् चंगे-मडे विशे लेइयै लिखा'दा ऎ। फिकरमंद ऎ। अज्ज आक्खी सकनेआ जे डोगरी भाशा दा साहित्य हून दुनिया दे बाकी साहित्य कन्नै मकाबला करदा ऎ। इसदी एक मसाल शैलेँद्र सिँह हुंदा उपन्यास \"हाशिए पर\" जेह्डा अपने निग्गर कथानक करी चबक्खै चर्चा दा बिशे बने दा ऎ। कोई ऎसा साहित्यकार जां पाठक नेईँ जेह्डा इस उपन्यासै गी पढने परैंत चुप्प रे'आ होग उ'न्न किश-न-किश प्रतिक्रिया दित्ती गै। इयै कारण ऎ जे अज्ज केईँ भाशाएं च इस उपन्यास दा अनुवाद होआ ऎ। सभनेँ थमां खुशी आह्ली गल्ल एह् जे \"आक्सफोर्ड यूनिवसिर्टी\" ने इसगी अंग्रेजी भाशा च अनुवाद करने दी जिम्मेवारी अपने उप्पर लैती ऎ। इसदे बाद दुनिया दे हर एक कोने च एह् उपन्यास पढेआ जाग।\n उपन्यासकार शैलेँद्र सिँह होर हून दूआ उपन्यास सेवाधनी लेइयै आए न जेह्डा इंदे पैह्ले उपन्यास आह्ला लेखा समाजिक ते समस्या प्रधानै। इस उपन्यासै दा कथानक 240एं सफेँ पर केँद्रित, बाल-मजदूरी समस्या गी उजागर करदा ऎ। डुग्गर दा प्हाडी इलाका रामनगर जित्थूं दी लुकाई गुरबत दी जिँदगी गै जीआ दी ऎ उस कोल अजेँ औह् बसीले नेईँ हैन जिस कन्नै अपना जीवन सुखी व्यतीत करी सकन। उत्थै सूरजै दी लो ते सभनेँ थमां पैह्ले पुज्जदी ऎ पर इल्म दी रोशनी अजेँ तगर नेईँ पुज्जी सकी। ते एह्दा सभनेँ थमां माडा असर नमीँ पौँद उप्पर पौँदा ऎ जेह्डी समाजै दा भविक्ख ऎ। जित्थै उंदे उज्जल भविक्ख दी बक्खी ध्यान होना चाहिदा ऎ। उत्थै गै ओह् गरीबी दे घेरे च फसे दा उ'नेँ लोकेँ दे हत्थै चढे दा जित्थै उसदे बकास आह्ली भेठा कोई ध्यान नेईँ दित्ता जंदा ते हर बेल्लै ओह् कोह्लू दे बैल आह्ला लेखा जुटे दा रौँह्दा ऎ। उसी समाजै च होने आह्ली कुसै बी चाल्ली दी चंगी-माडी गल्लै दा पता गै नेईँ लगदा। ओह्दे जीवनै दी गति रूकी दी गै लगदी ऎ। ओह् कुसैँ दे हत्थेँ पर गै निर्भर ऎ पर एह् हत्थ कदेँ बी मेहरबान नेईं होँदे बल्के इ'नेँगी निक्की-निक्की गल्लेँ उप्पर जातनां गै सैह्न करनी पौँदियां न।\n कथानक:-सेवाधनी उपन्यासै च उ'नेँ ञ्यानेँ दी गै आधार बनाया गेदा ऎ जेह्डे अपनियां अक्खां गै गुरबत दी गुदडी च खोलदे न ते सारी उमर मेह्नत करने दे बाद बी सिर चुक्कियै जी नेईँ सकदे। एह् लोकेँ दे घरेँ, होटलेँ-ढाबेँ जां इट्टेँ दे भट्ठेँ उप्पर अपने बजूद थमां मता कम्म करी-करी ऎसी बमारियें दे शकार होई जंदे न ते केँई बारी इलाज दी कमी कारण सबेलै गै अपना लेखा खत्म करी जंदे न। सरकार आसेआ बी बत्थेहरियां योजनां बनाई जंदियां न पर उ'नेँगी लागू करने च इ'न्ने झमेले होँदे न जे ओह् उत्थै दियां उत्थै गै रे'ई जंदियां न। इस उपन्यास च बलदेव च'ऊं ञ्यानेँ दा बब्ब ते ओह्दी त्रीमत जेह्डी सताइयेँ-ठाइयेँ(27-28) ब'रेँ दी पर उप्परो-तली ञ्यानेँ होने करी बमार ऎ छडी हड्डियेँ दी मुट्ठ गै रे'ई गेदी ऎ। ओह् अपनी त्रीमत दी बमारी कारण म्हेशां परेशान रौँह्दा ऎ। ओह्दा इ'न्ना कोई कम्म-रूजगार बी नेईँ ऎ। ओह् ग्रांऽ थमां रामनगर बसाठियां बेचन जंदा ऎ जिसदी कमाई कन्नै मसां गुजारा गै होँदा ऎ। पर उ'नेँगी अपने जागत राजू (राजकुमार) उप्पर बडियां हीखियां-मेदां न जे एह् जुआन होइयै मदाद करग। इस्सै उमीँदै च राजू शैहर उधमपुर आई जंदा ऎ। जित्थै उस्सै दे ग्रांऽ दे दो होर बी जागत कम्म करदे न। कीजे डुग्गर दे प्हाडी इलाके च गुरबत बडी गै जादा ऎ इत्थै कम्मकाज दे साधन खासे नेईं हैन जिसकरी उ'नेगी शैह्रै आह्ली भेठा मूहं करना पौंदा ऎ। गरीबी कारण ञ्यानेँ गी पढाई बी नेईँ सकदे। ञ्यानेँ कोल सारी ध्याडी डंगर चारने ते खुल्ले-दलानेँ च दौडां लाने दे सिवा होर कोई चारा नेईँ ऎ गरीबी च पूरी चाल्ली गल्तान न। इस्सै हीखी च शैह्रै बक्खी चली पौँदे न। दसेँ-ञारेँ (10-11) ब'रेँ दी फौए ज'नेही जान, सारी ध्याडी कम्म करी-करी फाह्मेँ होई जंदा ऎ ते रातीँ'लै उसी कोई होश गै नेईँ रौँह्दी जे कुत्थै पेदा ऎ? सारा कम्म ओह् उड्डरी-उड्डरी इ'यां करदा ऎ जि'यां उसी कोई इनाम मिलना ऎ। थोह्डे जनेह् समेँ च गै सब्भै कम्म सिक्खी जंदा ऎ जि'यां होटलै पर आए दे ग्राह्केँ दी सेवा, जूठेँ भांडेँ मांझना होर सौत-फंड करना सब्भ करी लैँदा ऎ। ते एक ध्याडे जि'यां गै भांडे मांझन लगदा ऎ, उत्थै कढाई च पेदी गर्म पिच्छू कन्नै दवै हत्थ ते पैर सडी जंदे न, घरै थमां दूर, पीडै कन्नै तडफदा ऎ। पर बुआसरदा नेईँ ऎ। ठीक होने पर डा. सुशील चंद्र अपने घर कम्मै पर रखी लैँदा ऎ। उत्थै बी अपने कम्मै च कोई कसर नेईँ रौँह्न दिँदा। जिसकरी डा. दी घरैआह्ली ते ओह्दी धीऽ दा मन बी ओह्दे कन्नै लग्गी जंदा ऎ ते उसी घरै दे जीवै आह्ला लेखा गै समझदे न। .\n उपन्यास च गै इक समाज सेवक धनी राम इ'नेँ ञ्यानेँ दे उज्जल भविक्ख बारै बडा फिकरमंद ऎ ते उ'न्न आधुनिक भारत समाज निर्माण दा जिम्मा लेदा ऎ जिस च बाल-मजदूरी गी खत्म करना चांह्दा ऎ ते ओह्दी गै कोशिशेँ करी सरकार आसेआ इक कानून बनाया जंदा ऎ जे जित्थै बी 14 ब'रेँ थमां निक्की बरसै दे जागत कम्म करै दे न उंदे मालकेँ उप्पर सख्त कारवाई कीती जा ते इ'यां इक खडमल्ली ज'नेही पेई जंदी ऎ जित्थै इट्टेँ दे भट्ठेँ उप्पर जां घरेँ, होटलेँ-ढाबेँ उप्पर कम्म करै दे गी, कम्मै थमां कड्डी दित्ता जंदा ऎ। जि'यां इक इट्टेँ दे भट्ठेँ पर कम्म करने आह्ले ञ्यानेँ गी कठुए थमां ट्रक च पाइयै जम्मू दे बस स्टैड पर इ'यां गै छोडी दित्ता जंदा ऎ जे बड्डलै परतियै उ'नेँगी बापस लेता जाग पर कोई बी उंदी सुरत नेईँ लैँदा ते उंदा द'ऊं-त्र'ऊं म्हीनेँ दा मेह्नताना बी नेईं दित्ता जंदा। इस कानून दे तैह्त राजू गी बी अपने घर ग्रां जाना पेई जंदा ऎ। जित्थै उसी लगदा हा जे हून ओह्दी जिँदगी किश उसरी जाग पर परतियै ग्रां आनियै उ'यै डंगर ते खुल्ले दलान गै लब्भदे न। राजू दी जिंदगी च परतियै इक मोड औँदा ऎ जित्थै इक होर डा. रामपाल दे घर कुसै दे आखने पर कम्म करन लग्गी पौँदा ऎ उत्थै ओह्दा छडा मानसक शोशन गै नेईँ होँदा बल्की शारीरिक जातनां बी सैह्न करनी पौँदियां न। जिसलै अति गै होई जंदी ऎ तां घर पेई दी दुआई खाई लैंदा ऎ। बलदेव अपने जागतै गी बापस ली आनदा ऎ। सोचदे न बशक्क उंदे घर गरीबी ऎ पर अपनी औलाद कन्नै बेसम्भ हिरख करदा ऎ। धनी राम हुंदे जतनेँ मूजब इक बारी फ्ही बाल-मजदूरी कनून च थोह्डा संसोधन कीता जंदा ऎ जे जित्थै ञ्यानेँ कम्म करदे न उंदे मालक गी उ'नेँगी किश घंटे पढाना बी होग। कीजे एह् ञ्यानेँ बी पढाई-लखाई थमां पिच्छै नेईँ रे'ई जान। जिसलै इस संसोधन दे बारे च डा. सुशील चंद्र गी पता लगदा ऎ तां ओह् परतियै राजू गी अपने घर ली आनदा ऎ। इत्थै उसी घरै आहला म्हौल गै मिलदा ऎ। डा . सुशील चंद्र ओह्दा दाखला सरकारी स्कूलै च करोआई ओडदा ऎ जित्थै ओह् मतेहान देन गै जंदा ऎ। राजू गी जिसलै बी बे'ल लगदी पढन लगी पौँदा ऎ। जि'यां-जि'यां एह् पढन लगदा ऎ ते बधन-मठोन लगदा ऎ इ'यां-इ'यां गै उसी दुनियादारी दी समझ आन लगी पौँदी ऎ। ते अपने भविक्ख बारै बी सौह्गा होई जंदा ऎ। धनी राम समाज सेवक दी लोकेँ दे प्रति कम्म करने दी लगन थमां राजू इ'न्ना प्रभावत होँदा ऎ। जेह्दा नारा शोशन थमां पढाई-लखाई आह्ली भेठै ऎ। ओह् बी उस्सै गैर-सरकारी संस्था च शामल होई जंदा ऎ। उ'न्न हून दिनै-रातीँ मेह्नत करियै बकील दी पढाई बी पास करी लेई ऎ। शैहर दे मश्हूर बकील चौधरी मसूद दी सरपरस्ती च होर बी मता सेआना बनी जंदा ऎ। आधुनिक भारत समाज दे सब्भै मुकद्दमेँ मुख्त गै लडदा ऎ। थोह्डे समेँ च गै ओह्दी शौह्रत इ'न्नी होई जंदी ऎ जे मन्ने-परमन्ने दे बकीलेँ च ओह्दा शुमार होँदा ऎ। अपने हत्थेँ च सच्चे मुकद्दमेँ गै लैँदा ऎ जिसकरी ओह्दी ईमानदारी ते कबलियत गी दिखदे होई उच्च न्यायधीश राजकुमार दे नां गी उच्च न्यायालय च न्यायधीश बनाने दी सफारश भेजदा ऎ जेह्डी मंजूर बी होई जंदी ऎ। न्यायधीश दी कुर्सी पर बौह्ने कन्नै खुशी ते होई पर मनै च संदोख नेईँ मिली सकेआ जिस कन्नै ओह् चैन दी जिँदगी बतीत करदा। उस कुर्सी पर आनियै उसी इ'यां लग्गा जि'यां ओह्दे ओह् सब्भै कम्म अधूरे गै रे'ई गे न जेह्डे उ'न्न करने दा प्रण कीते दा हा। दिनेँ-रातीँ धनी राम हुंदे चलाए दे मिशन गी पूरा करने दा सपना किश पिच्छै पौँदा से'ई होँदा ऎ। जिसकरी उसी बेचैनी ज'नेही सतांदी ऎ। इक दिन फैसला करी लैँदा ऎ जे ओह् इस कुर्सी उप्पर बेइयै कम्म नेईँ करी सकदा ते नौकरी थमां इस्तीफा देइयै धनी राम हुंदी गैर-सरकारी संस्था आधुनिक भारत समाज कन्नै परतियै जुडी जंदा ऎ। धनी राम बी संस्था दी भागडोर इक ईमानदार ते लगन कन्नै कम्म करने आह्ले नौजुआन दे हत्थै थमाइयै सुरखडू होई जंदा ऎ जे हून न्यांऽ गै होग।\n 1. उपन्यासै च चित्रत बाल पात्तर- उपन्यासै च चित्रत बाल पात्तर राजू (राजकुमार) बीरी, काला, रोशन, मंगल बचपन थमां गै ऎसे गुंझलेँ च पलचोए दे न जेह्डे जिँदगी भर दरोडने पर बी नेईँ खुलदे। सारी ध्याडी कम्म करी-करी उट्टी जंदे न पर उंदे आस्तै सुखै दी घड़ी नेईँ औँदी। बचपन च जित्थै ञ्यानेँ मस्ती च खेढां खेढी-खेढी गुजारदे न पर इ'नेँगी बालपुनेँ दी मौज-मस्ती नेईँ मिलदी। इ'यां इस उपन्यासै च बीरी जेह्डा चाई आह्ली हट्टी पर कम्म करदा, नित्त रोज औह्दा मालक निक्की- निक्की गल्लेँ उप्पर उसी मारदा-कुट्टदा ऎ। उपन्यासै मताबक बीरी इक बारी जागतेँ गी ब्हांटेँ खेढदे दिक्खियै आंपू बी उंदे कन्नै खेलन लगी पौँदा ऎ ते दकान दा मालक सरदारी शाह उसी सजा दे तौर पर ऎसी मार मारदा जिस कन्नै ओह्दे मूहं उप्पर फलियां पेई जंदियां न। उपन्यासै मताबक,\"एह् हट्टियै पिच्छै दूए जागतें कन्नै ब्हांटेँ खेढै कर'दा हा। सरदारी शाह ने फगडियै द'ऊं-चार सुट्टी टकाइयां। \" (सफा- 28) एह् मार उसी जरा सारी गलती पर बी पौन लगी पौंदी ऎ। इ'यां गै सरदारी लाल इक बारी लफ्फडै दी ऎसी लांदा ऎ जिस कन्नै उसलै गै ओह्दा दंद भज्जी जंदा ऎ। जि'यां,\" इसदे मालक सरदारी ने इक ध्याडे रोहै च आनियै बडलै-बडलै गै लफ्फडै दी लाई ते बीरी मूहै दे भार भुंजै, ओह् जाई पेआ हा। सारा मूहं खूनो-खून होई गेआ हा। \" (सफा-161) एह् सब्भै अपने मालकेँ दे सताए दे गै न, राजू बी अपनी मालकन दी जातनाएं थमां तंग होए दा दवाइयां खाई लैँदा ऎ। उसदे शरीर उप्पर बी मारै दे नशान पेदे न। जेह्डी उंदे कन्नै इंदे मालकेँ दी बदसलूकी ऎ। जिसकरी एह् जागत किश सैह्मेँ-सैह्मेँ ते डरे-डरे दे रौँह्दे न।\n 2. लाचारी:-उपन्यासै च इंसान दी लाचारी ते बेबसी दा मार्मक चित्रण होए दा लब्भदा ऎ। मजदूरी च ओह्दी कुसै दे अग्गै बी नेईँ चलदी। राजू, काला इ'न्ने बेबस न जे ओह् कम्म खत्म करियै जिसलै किट्ठे बौँह्दे न तां अपने मनेँ दे दुक्ख-सुक्ख इक-दूए कन्नै फरोलदे होई मनै दे गब्बार कडढदे न। कदेँ उ'नेँगी अपने ग्रां दे ओह् खुल्ले दब्बड, जंगल-जाड चेता औँदे न ते कदेँ घर ते घरेँ दे अपने जीऽ जिँदे सुखी भविक्ख आस्तै घरै दा बाहर आए दे न। राजू ते काला आनो-आनी (हमउमर) होने करी उंदी आपूं चेँ बनदी खासी ही जिसलै बी कम्म निब्बडदा निक्कियां- निक्कियां गल्लां करन लगी पौँदे कीजे उत्थै उंदी सुनने आह्ला कोई नेईँ हा। इ'यां इक रोज भांडे मांझदे होई घरै दियां गल्लां करदे न। उ'नेँगी स्कूल नेईँ जाने दा मलाल बी ऎ पर सभनेँ थमां मता झोरा ते ओह् ग्रांऽ जित्थै पूरी ध्याडी खेढदे रौँह्दे हे कोई रोक-टोक नेईँ ही,\"खेढने दा ते सच्चेँ गै बडा मजा औंदा हा पर दिनै जाडै च ते भुक्खे-भाने गै फिरदे रौँह्दे हे ते जां फ्ही ग'रने चुनियै खंदे रे'ह् आं। इत्थै ते पूरा-पूरा दिन कम्म गै करदे रौँह्ने आं। केँई बारी घरै दा बडा चेता औंदा ऎ। पर इक गल्ल ऎ जे इत्थै अस रूट्टी ते शैल बन्न-सबन्नी खन्ने आं। घर ते बस उ'ऎ मक्कै दे ढोडे ते कन्नै दाल-सलूना। \" (सफा-37) पर राजू गी घरै आह्ले दा चेता औँदे गै चेह्रा हिस्सी जंदा ऎ जे इत्थै ते आपूं शैल खंदा ऎ। घरै आह्लेँ गी किश नेईँ मिलदा,\" एह् सब्भै किश अस आपूं गै खन्ने आं, घरै आह्लेँ गी ते नेईँ देई सकै दे। \" (सफा-37)\n3. शोशन :-उपन्यासै च इ'नेँ जागतेँ उप्पर होने आह्ले शोशन दा जिकर बी बखूबी कन्नै होए दा ऎ जे इंदे मालक इंदे कम्मै दे गाह्की ते हैन पर चम्मै दे नेई। ओह् उ'नेँगी जरा-जरा गल्लां पर चंड-तफ्फा लाने थमां बी पिच्छै नेईँ होँदे। एह् मालक ते इंदे कन्नै इ'यां सलूक करदे न जि'यां इ'नेँगी कम्मै पर नेईँ रक्खे दा बल्के खरीदी लेदा ऎ। पर एह् दिनै-रातीँ उंदी सेवा च हाजर रौँह्दे न। जि'यां राजू, काला, रोशन, बीरी बगैरा इ'नेँ होटलेँ-ढाबेँ उप्पर कोई 7-8 घंटे नेईँ बल्के 17-18 घंटे कम्म करदे न। इसदे बाबजूद बी इंदे कन्नै खुश नेईँ हैन सगुंआ इंदे उप्पर रोह् गै छंडदे न। इ'नेँगी ओह् प्यार नेईँ मिलदा जिसदे हकदार न। इस्सै उपन्यासै च राजू कन्नै ओह्दी मालकन रेखा इ'यां सलूक करदी ऎ जि'यां कुसै जानवरै गी रातीँ'लै घरै बाहर बन्नेआ जंदा ऎ। इस गल्लै दा ध्यान बी नेईँ रक्खेआ जंदा जे इस कन्नै उंदी ऎशोआराम दा पूरा दरोमदर जुडे दा ऎ। एह् इक अह्म जीऽ होना चाहिदा ऎ पर इसगी गै बदसलूकी दा शकार बनाया जाग तां उंदे कम्म कि'यां उसरने न। सेवाधनी उपन्यास दा एह् प्रसंग बडा गै हैरानी पैदा करने आह्ला ऎ जे निक्के जागत थमां पूरा दिन कम्म कराने दे परैँत जिसलै रातीँ'लै ओह्दे अराम करने दी बारी औँदी ऎ तां उसदी मालकन रेखा इक परानी ज'नेही खिँध ते चादर बालकनी च बछाने आस्तै आखदी ऎ ते अंदरै भित्त बंद करी लैँदी ऎ,\" सरकारी क्वाटरेँ दे बाहर, हास्पतालै दी चारदवारी अंदर कूडा-करकट ते क्वाटरेँ दे पानियै कन्नै जंगली घा बी शैल फैले दा ऎ। विस्तरा बछाइयै राजू हाल्ली लेटेआ बी निहा जे अग्गूं-पिच्छूं दा मच्छर पैह्ले गै पुज्जी गे। (सफा-105) एह् सब्भ पढने दे बाद इ'नेँ लोकेँ दे बतीरे पर रोह् चढन लगी पौँदा ऎ। राजू रेखा दे अडब सभाऽ करी हर बेल्लै मसोसे च रौँह्दा ऎ। इत्थुं तगर जे उसी मारी बी लैँदी ऎ। राजू इत्थुआं जाने दे बाद बी इ'न्ना त्राही ते मानसक बमारी दा शकार होई जंदा ऎ जिसलै कोई ओह्दे सिरै उप्पर प्यार कन्नै हत्थ बी फेरदा ऎ तां डरी जंदा ऎ। जि'यां,\" भारती दा हत्थ अपने सिरै कन्नै छ्होंदे गै राजू त्र'बकियै छटापा मारियै पिच्छेँ होई गेआ। उसी लग्गा जि'यां ओह्दे बालेँ गी फगडियै उसगी कोई मारन लगा होए। \" (सफा-105) एह् लक्ष्ण मानसकता दे गै न।\n 4. स्वाभिमान:- इस गल्लै थमां नकार नेईं कीता जाई सकदा जे माहनू मूढां थमां गै लालची वृति आह्ला रेहा ऎ बशक्क जि'न्ना मर्जी समेँ दे फेर कन्नै नरमी आह्ला फरेब करै पर अपना मतलब आह्ने पर ओह्दे अंदर स्वार्थ दे बी कुजरदे गै न। इ'यां गै राजू दे स्वाभिमान गी उसलै जोऽ पुज्जदा ऎ जिसलै भारती दी स्हेली पिँकी ओह्दे घर औँह्दी ऎ तां राजू दा कम्म दिक्खियै ट'ऊ होई जंदी ऎ ते राजू गी अपने ज'नेआ गै कम्म करने आह्ला नौकर आनी देने दी गल्ल करदी ऎ। जां ओह्दी निक्की भैन गी नौकर रखने पर जोर पांदी ऎ। राजू दे मनै च ओह्दे प्रति नफरत होन लगी पौँदी ऎ। सोचदा ऎ,\" ग्रांऽ च हाल्ली बी अगर कोई कंजकां पूजदा ऎ ते उषा गी बी ते ओह्दे थमां बड्डी-बड्डी कुडियेँ गी बी बलाइयै पूजदे न। ते फ्हिरी कंजकेँ गी नौकर रखना 'पाप' निं होग ते होर केह् होग। \" (सफा-95) एह् आह्ली गल्ल अजेँ ओह्दे मनेँ च निकली दी नेईँ ही जे इक ध्याडे भारती बी ऎसी गै गल्ल करी ओडदी ऎ. जिसलै राजू अपनी ते भविक्ख दे प्रति जागरूक होई जंदा तां भारती गी लगदा ऎ जे एह् पढी-लिखी गेआ ऎ जिस कन्नै कम्मकाजै च बी फर्क पाबै दा ऎ। भारती दे मनै च औँदा ऎ जे राजू दा व्याह् कराई दित्ता जा तां जे राजू दी घरैआह्ली बी घरै दे कम्मै च हत्थ पोआग। पर इंदियां गल्लां राजू दे स्वाभिमान गी हलाइयै रखी ओडदियां न ते गूढी सोच च पेई जंदा ऎ। \"मेँ ते इत्थै कम्म करनां ते तुसेँ मिगी स्हारा दित्ता पर इसदा एह् मतलब ते नेईँ जे मेरी घरैआह्ली नौकरानी गै बनै। मेँ ते अपनी जिँदगी च इ'न्ने उतार-चढो दिक्खे न पर मेरी घरैआह्ली बी इ'यां जून भोगै, इ'यां. ते मेँ कदेँ बी नेईँ चाह्ङ। \" (सफा-116) इ'यां उसी भारती उप्पर खिँझ चढन लगदी ऎ ते आखर मैडम बी ओह्दी घरैआह्ली उप्पर नौकरानी आह्ला गै हक्क रखना चांह्दी ऎ।\n 5. ञ्यांनेँ दे बधने-मठोने दी चैँता;-ईश्वर दी लीला बी बडी न्यारी ऎ जे जिसलै अमीरेँ दी औलाद बधन-मठोन लगदी ऎ तां उंदियां बासां खुशी कन्नै खिडी जंदियां न उत्थै गै बलदेव दे परिवार च उंदे चेहरे पर परेशानी ते फिकर दियां लकीरां गुढियां खचोई जंदियां न जे ञ्यांनेँ बड्डे माह्नू आंगर गै खंदे न। शकुंतला अपने घरैआह्लै कन्नै घरै दी चैँता करदे होई आखदी ऎ,\" जागत बी हून बड्डे होई गेदे न। माह्नू आंगर जि'न्ना गै खंदे न। \" (सफा-11) कीजे बलदेव दा कम्म बी इ'न्ना नेईँ ऎ उ'यां बी जित्थै ञ्यांनेँ जुआन होवै दे न उत्थै आपूं ढलदी बरेसा च आवै दा ऎ जिसकरी उंदी चैँता जायज ऎ। इस थमां बी बधीक शकुंतला दा बमार होना ऎ। जित्थै बमारी करी घरै च पैह्ले गै पूरी नेईँ पौँदी।\n 6. माऊ दी ममता:- माऊ दी ममता गी कुसै बी त्ररकडी पर तोलेआ नेईँ जाई सकदा भामेँ ओह् अमीरेँ दी मां ऎ चाहे गरीबेँ दी। मां दी ममता दी कोई हद्द नेईँ, एह् सीर उमर भर बगने आह्ली ऎ जेह्डी कदेँ नेईँ सुकदी। सेवाधनी उपन्यासै च राजू जिसलै ग्रांऽ थमां शैहर जाने आस्तै अपने परिवार थमां बक्ख होँदा ऎ तां एह् सतरां पढदे होई पाठक बडा गै भावुक होई जंदा ऎ जिस चाल्ली उंदे मनेँ च घरमोल पौँदे न, इक-दूए थमां खिँडना, परिवारै दा इक्कला जागत, त्र'ऊं भैनेँ दा भ्रा ते उ'ब्बी अज्ज शैहर जाइयै इक्कला रौह्ग। जि'यां,\" घर निकलने कोला पैह्ले शकुंतला ने राजू गी घोटियै अपने गले कन्नै लाई लेआ ते ओह्दी अक्खी च अत्थरुं टपकी आए। शकुंतला दा गला बी भरी आएदा हा ते इस लेई मुट्टी बाजै च गै ओह् राजू गी आखै करदी ही,\" राजू पुत्तर अपना ध्यान गै रखेआ ते कन्नै मन लाइयै कम्म करेआं। \" (सफा-17) फ्ही बी अपना कालजा बड्डा करियै उसी मन लाइयै कम्म करने आस्तै सिक्खमत गै दिँदी ऎ।\n 7. आत्मविश्वास:-सेवाधनी उपन्यासै दा नायक राजू (राजकुमार) जेह्डा बचपन च मुंडू बनियै शैहर उधमपुर कम्म करने आस्तै आया हा उ'न्न कदेँ सोचेआ बी नेईँ हा जे उ'ब्बी इक दिन कुतै ऎसी कुर्सी उप्पर बौह्ग जित्थै ओह् फैसलेँ दा नबेडा करियै लोकेँ गी न्यांऽ दोआग करग। जि'यां-जि'यां बक्ख-बक्ख थाह्रेँ पर कम्म करन लगदा ऎ इ'यां-इ'यां गै ओह्दे अंदर इक आत्मविश्वास पनपन लगी पौँदा ऎ ते एह् सब्भ पढाई-लखाई दी बदौलत गै ऎ जिसलै धनी राम ज'नेआ समाज सेवक बाल-मजदूरी दे खलाफ मुहिम चलाइयै इ'नेँ बाल-मजदूरेँ गी पढने दा हक्क बी दुआंदे न जे कम्म दे कन्नै-कन्नै इ'नेँगी इंदे मालक पढान बी ज़रुर। इसदा फैदा राजू गी बी होँदा ऎ। राजू घरै दे कम्मै दे कन्नै-कन्नै लगन ते मेहनत कन्नै पढी-लिखियै बकील बनी जंदा ऎ। ओह्दे अंदर आत्मविश्वास आई जंदा ऎ जिसकरी धनी राम समाज सेवक दी गैर-सरकारी संस्था कन्नै जुडने करी उत्तरी भारत दे सब्भै बाल-मजदूरेँ मुकद्दमेँ दी जिम्मेबारी अपने उप्पर लेई लैँदा ऎ। ओह्दे ञ्यांनेँ गी इंसाफ दुआना जेह्डे ओह्दे आंगर इस दलदल च फसे दे न। उंदा दुखडा सुनदे गै उसी अपना बचपन चेता औह्न लगी पौँदि ऎ। उपन्यासै मताबक,\" उसदे सामनै जिसलै बी कोई बाल-मजदूरेँ ते शोशन दी गल्ल छेडदा तां उसी अपना बचपन चेता आई जंदा ऎ। \"( सफा-17) राजू दे अंदर आत्मविश्वास गी दिखदे गै धनी राम समाज सेवक अपनी संस्था आधुनिक भारत समाज दी जिम्मेबारी राजू दी गै सौँपी दिँदा ऎ।\n 8. बाल-मजदूरी गी खत्म करने दे सुझाऽ:-इस गल्लै गी नकारेआ नेईँ जाई सकदा जे साहित्यकार जित्थै साहित्य रचेता ऎ उत्थै गै समाजै च व्यापी दी समस्याएं कन्नै निबडने दे सुझाऽ बी दिँदा ऎ। जि'यां इस उपन्यास च उपन्यासकार शैलेँद्र सिँह होर बाल-मजदूरी समस्या गी लेइयै पाठकेँ सामनै आए न तां उ'नेँ फैली दी समस्या दे तत्थ-आंकडे शीशे आह्ला लेखा स्पश्ट दस्से दे न जे दुनिया च 24 करोड थमां बी जादा ञ्यांने कम्म करै दे न ते सभने थमां मती संख्या भारत च ऎ। संयुक्त राष्ट्र दी ञ्यांने आह्ली शाखा दा मनना ऎ जे अस्सी (80) प्रतिशत थमां जादा बाल- मजदूर ऎसी थाह्रें उप्पर कम्म करदे न जित्थै पुज्जना बी मुशकल ऎ जि'यां खेतरेँ, जंगल-जाडेँ च जित्थै डंगर चारन जंदे न। एह् अपने घरेँ च बाल-मजदूरी दे शकार न इंदे उप्पर प्रतिबंध लाना बडा मुशकल ऎ। पर जेकर एह् 14 ब'रेँ थमां लौह्के ञ्यांनेँ कम्म करदे न तां एह् इल्म थमां मैह्रुम होई जंदे न ते एह् गरीबी करी पढाई-लखाई थमां कम्मै गी जादा तबज्जो दिँदे न। लेखक दा एह् मनना ऎ जेकर एह् बाल-मजदूर पढन जाने थमां पैह्ले निक्के-निक्के कम्म करी लैन तां इंदी विकास वृति आस्तै बी फैदेमंद ऎ जि'यां स्कूल जाने थमां पैह्ले लोकेँ दे घरेँ च अखबार सु'ट्टना, स्कूलै दियेँ छुट्टियेँ च कोई होर निक्का-मुट्टा कम्म करी लैना एह्दे च कोई हर्ज बी नेईँ ऎ सगुआं उंदे शरीरिक ते मानसक विकास च बादा गै होँदा ऎ। ते इक-दम बाल-मजदूरी खत्म करने कन्नै केँइयेँ दे घरेँ दे चु'ल्ले सिल्ली सकदे न। एह् द'ऊं धारी तलबार ऎ। जि'यां ,\" जागतेँ दे कम्म करने गी अस इ'यां दिखचै जे एह् इक लैन (line) ऎ जिसदे इक सिरे उप्पर इ'नेँ निरा शोशन ते नकारात्मक कम्म न। ते दूए सिरे उप्पर इ'नेँ ञ्यांने आस्तै पढाई-लखाई, खेढने-कुद्दने गी बिना कुसै रुकाबट दे बढाबा देना ते बाकी उ'ब्बी सारे कम्म जेह्डे विकास-वृद्धि आस्तै फैदेमंद होँदे न। इ'नेँ दौँने सिरेँ दे विच होर बाकी सारे कम्म उं'दी नोइत दे स्हावै कन्नै रक्खे जाई सकदे न। \" (सफा-115) उ'नेँ सबभै गल्लेँ दा ध्यान रक्खेआ जा जिस कन्नै कोई नक्सान नेईँ होवै।\n 9. शीर्शक दी व्याख्या:- सेवाधनी दा शाब्दिक अर्थ सेवा करने च धनी अर्थात सेवा च कोई कसर छोडने आह्ला नेईँ। उपन्यास दा शीर्शक अपने कथानक मताबक पूरा न्यांऽ करदा ऎ। राजू (राजकुमार) जेह्डा बचपन च ते पैह्ले लोकें दी सेवा छडी तन, मन कन्नै करदा ऎ पर जुआन होइयै बकील बनने पर ओह् धन कन्नै बी लुकाई दी सेवा करन लगदा ऎ। जेह्डे लोकेँ कोल पैहे दी तंगी होँदी ऎ उंदे मुकद्दमें मुख्त गै लडदा ऎ। इ'यां तन, मन, धन कन्नै सेवा करदे होई सेवाधनी खुआने दा हक्क रखदा ऎ। उपन्यास दा शीर्शक बिल्कुल सार्थक ते कथानक कन्नै मेल खंदा ऎ।\n 10. भाशा:-उपन्यास च बरतोई दी भाशा आम बोलचाल दी भाशा ऎ। कुतै बी अश्लील जां कलिश्ट शब्देँ दी बरतून नेईँ होई दी सगुआं सरल भाशा दा प्रवा कथानक गी गति दिँदे होई कडी कन्नै कडी जोडदे होई मकाम तगर लेई जंदा ऎ।\n निश्कर्श:-निश्कर्श दे तौर पर जे एह् आक्खेआ जा जे एह् विशे बडा गम्भीर ऎ जे अज्ज कनून लागू होने दे बाद बी ओह् ञ्यांने उ'आं गै ढाबेँ उप्पर जां अफसरेँ दे घरेँ मुंडू बने दे कम्म करै दे न। एह्दे च सरकार ते अस लोक जदूं तगर थोह्डे इ'यै ज'नेह् विशे उप्पर गम्भीर नेईँ होगे तदूं तगर एह् समस्या बनी दी गै रौह्नी ऎ। सरकार ते शायद गम्भीर ऎ इस बाल-मजदूरी गी रोकने लेई पर हून इक बारी फ्ही सर्वे करोआया जा'रदा ऎ जे कोई बच्चा अनपढ नेईँ रौँह्ना चाहिदा इस च इत्थै बी साढा अपना गै दोश ऎ अस उ'नेँगी कोई स्हेई जानकारी नेईँ दिंदे जिसकरी सैह्जोग नेईँ होने करी दिक्कत आवै दी ऎ।\n उपन्यासकार शैलेँद्र सिँह हुंदे अग्गै गुजारिश ऎ जे इ'यै जनेए विशे लेइयै औँदे रौँह्न जिसकरी पाठकेँ गी नित-नमेँ विशे पढने गी मिलङन।\n डोगरी साहित्य,Dogri literature, History of Dogri literature, Growth of Dogri literature, Dogri Poetry, Book review & Shayri, Dr. Chanchal Bhasin, dogri Writers.\n Posted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 12:16 PM No comments:\nPosted by Dr. Chanchal Bhasin, Author at 9:28 PM No comments:\nSubscribe to: Posts (Atom)"} {"text": "जिम्बाब्वे टीम को अक्सर स्पिन के खिलाफ जूझने के लिए जाना जाता है वहीं भारतीय उप महाद्वीप में तो वो और भी जूझते हैं लेकिन इस बार वो अपना होमवर्क करके आए थे और जमकर स्वीप शॉट खेले। वैसे इस जीत के बावजूद जिम्बाब्वे वनडे रैंकिंग में अफगानिस्तान के पीछे 11वें नंबर पर बनी हुई है। वहीं श्रीलंका आठवें नंबर पर है।\nजिम्बाब्वे श्रीलंका के खिलाफ दौरे का एकमात्र टेस्ट शुक्रवार से कोलंबो में खेलेगी। जिम्बाब्वे के कोच को उम्मीद है कि उनकी टीम वनडे की सफलता को दोहराएगी। स्ट्रीक ने कहा, \"श्रीलंका एक अच्छी टीम है और इस फॉर्मेट में खासी सफल है। हमारा मकसद टेस्ट मैच में सकारात्मक क्रिकेट खेलने का होगा और उम्मीद करते हैं कि हम अच्छे परिणाम हासिल कर पाएंगे।\nThis website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. 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