| जनमेजय उवाच | |
| कथं विराटनगरे मम पूर्वपितामहाः | |
| अज्ञातवासमुषिता दुर्योधनभयार्दिताः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथा तु स वराँल्लब्ध्वा धर्माद्धर्मभृतां वरः | |
| गत्वाश्रमं ब्राह्मणेभ्य आचख्यौ सर्वमेव तत् | |
| कथयित्वा तु तत्सर्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिरः | |
| अरणीसहितं तस्मै ब्राह्मणाय न्यवेदयत् | |
| ततो युधिष्ठिरो राजा धर्मपुत्रो महामनाः | |
| संनिवर्त्यानुजान्सर्वानिति होवाच भारत | |
| द्वादशेमानि वर्षाणि राष्ट्राद्विप्रोषिता वयम् | |
| त्रयोदशोऽयं संप्राप्तः कृच्छ्रः परमदुर्वसः | |
| स साधु कौन्तेय इतो वासमर्जुन रोचय | |
| यत्रेमा वसतीः सर्वा वसेमाविदिताः परैः | |
| अर्जुन उवाच | |
| तस्यैव वरदानेन धर्मस्य मनुजाधिप | |
| अज्ञाता विचरिष्यामो नराणां भरतर्षभ | |
| किं तु वासाय राष्ट्राणि कीर्तयिष्यामि कानिचित् | |
| रमणीयानि गुप्तानि तेषां किंचित्स्म रोचय | |
| सन्ति रम्या जनपदा बह्वन्नाः परितः कुरून् | |
| पाञ्चालाश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटच्चराः | |
| दशार्णा नवराष्ट्रं च मल्लाः शाल्वा युगंधराः | |
| एतेषां कतमो राजन्निवासस्तव रोचते | |
| वत्स्यामो यत्र राजेन्द्र संवत्सरमिमं वयम् | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| एवमेतन्महाबाहो यथा स भगवान्प्रभुः | |
| अब्रवीत्सर्वभूतेशस्तत्तथा न तदन्यथा | |
| अवश्यं त्वेव वासार्थं रमणीयं शिवं सुखम् | |
| संमन्त्र्य सहितैः सर्वैर्द्रष्टव्यमकुतोभयम् | |
| मत्स्यो विराटो बलवानभिरक्षेत्स पाण्डवान् | |
| धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धश्च सुमहाधनः | |
| विराटनगरे तात संवत्सरमिमं वयम् | |
| कुर्वन्तस्तस्य कर्माणि विहरिष्याम भारत | |
| यानि यानि च कर्माणि तस्य शक्ष्यामहे वयम् | |
| कर्तुं यो यत्स तत्कर्म ब्रवीतु कुरुनन्दनाः | |
| अर्जुन उवाच | |
| नरदेव कथं कर्म राष्ट्रे तस्य करिष्यसि | |
| विराटनृपतेः साधो रंस्यसे केन कर्मणा | |
| मृदुर्वदान्यो ह्रीमांश्च धार्मिकः सत्यविक्रमः | |
| राजंस्त्वमापदा क्लिष्टः किं करिष्यसि पाण्डव | |
| न दुःखमुचितं किंचिद्राजन्वेद यथा जनः | |
| स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| शृणुध्वं यत्करिष्यामि कर्म वै कुरुनन्दनाः | |
| विराटमनुसंप्राप्य राजानं पुरुषर्षभम् | |
| सभास्तारो भविष्यामि तस्य राज्ञो महात्मनः | |
| कङ्को नाम द्विजो भूत्वा मताक्षः प्रियदेविता | |
| वैडूर्यान्काञ्चनान्दान्तान्फलैर्ज्योतीरसैः सह | |
| कृष्णाक्षाँल्लोहिताक्षांश्च निर्वर्त्स्यामि मनोरमान् | |
| आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा | |
| इति वक्ष्यामि राजानं यदि मामनुयोक्ष्यते | |
| इत्येतद्वो मयाख्यातं विहरिष्याम्यहं यथा | |
| वृकोदर विराटे त्वं रंस्यसे केन कर्मणा | |
| भीम उवाच | |
| पौरोगवो ब्रुवाणोऽहं बल्लवो नाम नामतः | |
| उपस्थास्यामि राजानं विराटमिति मे मतिः | |
| सूपानस्य करिष्यामि कुशलोऽस्मि महानसे | |
| कृतपूर्वाणि यैरस्य व्यञ्जनानि सुशिक्षितैः | |
| तानप्यभिभविष्यामि प्रीतिं संजनयन्नहम् | |
| आहरिष्यामि दारूणां निचयान्महतोऽपि च | |
| तत्प्रेक्ष्य विपुलं कर्म राजा प्रीतो भविष्यति | |
| द्विपा वा बलिनो राजन्वृषभा वा महाबलाः | |
| विनिग्राह्या यदि मया निग्रहीष्यामि तानपि | |
| ये च केचिन्नियोत्स्यन्ति समाजेषु नियोधकाः | |
| तानहं निहनिष्यामि प्रीतिं तस्य विवर्धयन् | |
| न त्वेतान्युध्यमानान्वै हनिष्यामि कथंचन | |
| तथैतान्पातयिष्यामि यथा यास्यन्ति न क्षयम् | |
| आरालिको गोविकर्ता सूपकर्ता नियोधकः | |
| आसं युधिष्ठिरस्याहमिति वक्ष्यामि पृच्छतः | |
| आत्मानमात्मना रक्षंश्चरिष्यामि विशां पते | |
| इत्येतत्प्रतिजानामि विहरिष्याम्यहं यथा | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| यमग्निर्ब्राह्मणो भूत्वा समागच्छन्नृणां वरम् | |
| दिधक्षुः खाण्डवं दावं दाशार्हसहितं पुरा | |
| महाबलं महाबाहुमजितं कुरुनन्दनम् | |
| सोऽयं किं कर्म कौन्तेयः करिष्यति धनंजयः | |
| योऽयमासाद्य तं दावं तर्पयामास पावकम् | |
| विजित्यैकरथेनेन्द्रं हत्वा पन्नगराक्षसान् | |
| श्रेष्ठः प्रतियुधां नाम सोऽर्जुनः किं करिष्यति | |
| सूर्यः प्रतपतां श्रेष्ठो द्विपदां ब्राह्मणो वरः | |
| आशीविषश्च सर्पाणामग्निस्तेजस्विनां वरः | |
| आयुधानां वरो वज्रः ककुद्मी च गवां वरः | |
| ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठः पर्जन्यो वर्षतां वरः | |
| धृतराष्ट्रश्च नागानां हस्तिष्वैरावतो वरः | |
| पुत्रः प्रियाणामधिको भार्या च सुहृदां वरा | |
| यथैतानि विशिष्टानि जात्यां जात्यां वृकोदर | |
| एवं युवा गुडाकेशः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् | |
| सोऽयमिन्द्रादनवरो वासुदेवाच्च भारत | |
| गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वो बीभत्सुः किं करिष्यति | |
| उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षस्य वेश्मनि | |
| दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्तानि देवरूपेण भास्वता | |
| यं मन्ये द्वादशं रुद्रमादित्यानां त्रयोदशम् | |
| यस्य बाहू समौ दीर्घौ ज्याघातकठिनत्वचौ | |
| दक्षिणे चैव सव्ये च गवामिव वहः कृतः | |
| हिमवानिव शैलानां समुद्रः सरितामिव | |
| त्रिदशानां यथा शक्रो वसूनामिव हव्यवाट् | |
| मृगाणामिव शार्दूलो गरुडः पततामिव | |
| वरः संनह्यमानानामर्जुनः किं करिष्यति | |
| अर्जुन उवाच | |
| प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते | |
| ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ | |
| कर्णयोः प्रतिमुच्याहं कुण्डले ज्वलनोपमे | |
| वेणीकृतशिरा राजन्नाम्ना चैव बृहन्नडा | |
| पठन्नाख्यायिकां नाम स्त्रीभावेन पुनः पुनः | |
| रमयिष्ये महीपालमन्यांश्चान्तःपुरे जनान् | |
| गीतं नृत्तं विचित्रं च वादित्रं विविधं तथा | |
| शिक्षयिष्याम्यहं राजन्विराटभवने स्त्रियः | |
| प्रजानां समुदाचारं बहु कर्मकृतं वदन् | |
| छादयिष्यामि कौन्तेय माययात्मानमात्मना | |
| युधिष्ठिरस्य गेहेऽस्मि द्रौपद्याः परिचारिका | |
| उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टो राज्ञा च भारत | |
| एतेन विधिना छन्नः कृतकेन यथा नलः | |
| विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटभवने सुखम् | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| किं त्वं नकुल कुर्वाणस्तत्र तात चरिष्यसि | |
| सुकुमारश्च शूरश्च दर्शनीयः सुखोचितः | |
| नकुल उवाच | |
| अश्वबन्धो भविष्यामि विराटनृपतेरहम् | |
| ग्रन्थिको नाम नाम्नाहं कर्मैतत्सुप्रियं मम | |
| कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षायां तथैवाश्वचिकित्सिते | |
| प्रियाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव | |
| ये मामामन्त्रयिष्यन्ति विराटनगरे जनाः | |
| तेभ्य एवं प्रवक्ष्यामि विहरिष्याम्यहं यथा | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| सहदेव कथं तस्य समीपे विहरिष्यसि | |
| किं वा त्वं तात कुर्वाणः प्रच्छन्नो विचरिष्यसि | |
| सहदेव उवाच | |
| गोसंख्याता भविष्यामि विराटस्य महीपतेः | |
| प्रतिषेद्धा च दोग्धा च संख्याने कुशलो गवाम् | |
| तन्तिपाल इति ख्यातो नाम्ना विदितमस्तु ते | |
| निपुणं च चरिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः | |
| अहं हि भवता गोषु सततं प्रकृतः पुरा | |
| तत्र मे कौशलं कर्म अवबुद्धं विशां पते | |
| लक्षणं चरितं चापि गवां यच्चापि मङ्गलम् | |
| तत्सर्वं मे सुविदितमन्यच्चापि महीपते | |
| वृषभानपि जानामि राजन्पूजितलक्षणान् | |
| येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते | |
| सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र हि मे सदा | |
| न च मां वेत्स्यति परस्तत्ते रोचतु पार्थिव | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| इयं तु नः प्रिया भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी | |
| मातेव परिपाल्या च पूज्या ज्येष्ठेव च स्वसा | |
| केन स्म कर्मणा कृष्णा द्रौपदी विचरिष्यति | |
| न हि किंचिद्विजानाति कर्म कर्तुं यथा स्त्रियः | |
| सुकुमारी च बाला च राजपुत्री यशस्विनी | |
| पतिव्रता महाभागा कथं नु विचरिष्यति | |
| माल्यगन्धानलंकारान्वस्त्राणि विविधानि च | |
| एतान्येवाभिजानाति यतो जाता हि भामिनी | |
| द्रौपद्युवाच | |
| सैरन्ध्र्योऽरक्षिता लोके भुजिष्याः सन्ति भारत | |
| नैवमन्याः स्त्रियो यान्ति इति लोकस्य निश्चयः | |
| साहं ब्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणि | |
| आत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि | |
| सुदेष्णां प्रत्युपस्थास्ये राजभार्यां यशस्विनीम् | |
| सा रक्षिष्यति मां प्राप्तां मा ते भूद्दुःखमीदृशम् | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| कल्याणं भाषसे कृष्णे कुले जाता यथा वदेत् | |
| न पापमभिजानासि साधु साध्वीव्रते स्थिता | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| कर्माण्युक्तानि युष्माभिर्यानि तानि करिष्यथ | |
| मम चापि यथाबुद्धि रुचितानि विनिश्चयात् | |
| पुरोहितोऽयमस्माकमग्निहोत्राणि रक्षतु | |
| सूदपौरोगवैः सार्धं द्रुपदस्य निवेशने | |
| इन्द्रसेनमुखाश्चेमे रथानादाय केवलान् | |
| यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मतिः | |
| इमाश्च नार्यो द्रौपद्याः सर्वशः परिचारिकाः | |
| पाञ्चालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवैः सह | |
| सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्रज्ञायन्त पाण्डवाः | |
| गता ह्यस्मानपाकीर्य सर्वे द्वैतवनादिति | |
| धौम्य उवाच | |
| विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्भिरनुरागतः | |
| अतोऽहमपि वक्ष्यामि हेतुमात्रं निबोधत | |
| हन्तेमां राजवसतिं राजपुत्रा ब्रवीमि वः | |
| यथा राजकुलं प्राप्य चरन्प्रेष्यो न रिष्यति | |
| दुर्वसं त्वेव कौरव्या जानता राजवेश्मनि | |
| अमानितैः सुमानार्हा अज्ञातैः परिवत्सरम् | |
| दिष्टद्वारो लभेद्द्वारं न च राजसु विश्वसेत् | |
| तदेवासनमन्विच्छेद्यत्र नाभिषजेत्परः | |
| नास्य यानं न पर्यङ्कं न पीठं न गजं रथम् | |
| आरोहेत्संमतोऽस्मीति स राजवसतिं वसेत् | |
| अथ यत्रैनमासीनं शङ्केरन्दुष्टचारिणः | |
| न तत्रोपविशेज्जातु स राजवसतिं वसेत् | |
| न चानुशिष्येद्राजानमपृच्छन्तं कदाचन | |
| तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजयन् | |
| असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिनः | |
| तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा | |
| नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञः कथंचन | |
| अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहिताश्च ये | |
| विदिते चास्य कुर्वीत कार्याणि सुलघून्यपि | |
| एवं विचरतो राज्ञो न क्षतिर्जायते क्वचित् | |
| यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद्देववच्च ह | |
| अनृतेनोपचीर्णो हि हिंस्यादेनमसंशयम् | |
| यच्च भर्तानुयुञ्जीत तदेवाभ्यनुवर्तयेत् | |
| प्रमादमवहेलां च कोपं च परिवर्जयेत् | |
| समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च | |
| संवर्णयेत्तदेवास्य प्रियादपि हितं वदेत् | |
| अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च | |
| अप्रियं चाहितं यत्स्यात्तदस्मै नानुवर्णयेत् | |
| नाहमस्य प्रियोऽस्मीति मत्वा सेवेत पण्डितः | |
| अप्रमत्तश्च यत्तश्च हितं कुर्यात्प्रियं च यत् | |
| नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितैः सह संवसेत् | |
| स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत् | |
| दक्षिणं वाथ वामं वा पार्श्वमासीत पण्डितः | |
| रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चाद्विधीयते | |
| नित्यं विप्रतिषिद्धं तु पुरस्तादासनं महत् | |
| न च संदर्शने किंचित्प्रवृद्धमपि संजपेत् | |
| अपि ह्येतद्दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् | |
| न मृषाभिहितं राज्ञो मनुष्येषु प्रकाशयेत् | |
| यं चासूयन्ति राजानः पुरुषं न वदेच्च तम् | |
| शूरोऽस्मीति न दृप्तः स्याद्बुद्धिमानिति वा पुनः | |
| प्रियमेवाचरन्राज्ञः प्रियो भवति भोगवान् | |
| ऐश्वर्यं प्राप्य दुष्प्रापं प्रियं प्राप्य च राजतः | |
| अप्रमत्तो भवेद्राज्ञः प्रियेषु च हितेषु च | |
| यस्य कोपो महाबाधः प्रसादश्च महाफलः | |
| कस्तस्य मनसापीच्छेदनर्थं प्राज्ञसंमतः | |
| न चोष्ठौ निर्भुजेज्जातु न च वाक्यं समाक्षिपेत् | |
| सदा क्षुतं च वातं च ष्ठीवनं चाचरेच्छनैः | |
| हास्यवस्तुषु चाप्यस्य वर्तमानेषु केषुचित् | |
| नातिगाढं प्रहृष्येत न चाप्युन्मत्तवद्धसेत् | |
| न चातिधैर्येण चरेद्गुरुतां हि व्रजेत्तथा | |
| स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शयेत प्रसादजम् | |
| लाभे न हर्षयेद्यस्तु न व्यथेद्योऽवमानितः | |
| असंमूढश्च यो नित्यं स राजवसतिं वसेत् | |
| राजानं राजपुत्रं वा संवर्तयति यः सदा | |
| अमात्यः पण्डितो भूत्वा स चिरं तिष्ठति श्रियम् | |
| प्रगृहीतश्च योऽमात्यो निगृहीतश्च कारणैः | |
| न निर्बध्नाति राजानं लभते प्रग्रहं पुनः | |
| प्रत्यक्षं च परोक्षं च गुणवादी विचक्षणः | |
| उपजीवी भवेद्राज्ञो विषये चापि यो वसेत् | |
| अमात्यो हि बलाद्भोक्तुं राजानं प्रार्थयेत्तु यः | |
| न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशयम् | |
| श्रेयः सदात्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत् | |
| विशेषयेन्न राजानं योग्याभूमिषु सर्वदा | |
| अम्लानो बलवाञ्शूरश्छायेवानपगः सदा | |
| सत्यवादी मृदुर्दान्तः स राजवसतिं वसेत् | |
| अन्यस्मिन्प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद्यः समुत्पतेत् | |
| अहं किं करवाणीति स राजवसतिं वसेत् | |
| उष्णे वा यदि वा शीते रात्रौ वा यदि वा दिवा | |
| आदिष्टो न विकल्पेत स राजवसतिं वसेत् | |
| यो वै गृहेभ्यः प्रवसन्प्रियाणां नानुसंस्मरेत् | |
| दुःखेन सुखमन्विच्छेत्स राजवसतिं वसेत् | |
| समवेषं न कुर्वीत नात्युच्चैः संनिधौ हसेत् | |
| मन्त्रं न बहुधा कुर्यादेवं राज्ञः प्रियो भवेत् | |
| न कर्मणि नियुक्तः सन्धनं किंचिदुपस्पृशेत् | |
| प्राप्नोति हि हरन्द्रव्यं बन्धनं यदि वा वधम् | |
| यानं वस्त्रमलंकारं यच्चान्यत्संप्रयच्छति | |
| तदेव धारयेन्नित्यमेवं प्रियतरो भवेत् | |
| संवत्सरमिमं तात तथाशीला बुभूषवः | |
| अथ स्वविषयं प्राप्य यथाकामं चरिष्यथ | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| अनुशिष्टाः स्म भद्रं ते नैतद्वक्तास्ति कश्चन | |
| कुन्तीमृते मातरं नो विदुरं च महामतिम् | |
| यदेवानन्तरं कार्यं तद्भवान्कर्तुमर्हति | |
| तारणायास्य दुःखस्य प्रस्थानाय जयाय च | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमुक्तस्ततो राज्ञा धौम्योऽथ द्विजसत्तमः | |
| अकरोद्विधिवत्सर्वं प्रस्थाने यद्विधीयते | |
| तेषां समिध्य तानग्नीन्मन्त्रवच्च जुहाव सः | |
| समृद्धिवृद्धिलाभाय पृथिवीविजयाय च | |
| अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा ब्राह्मणांश्च तपोधनान् | |
| याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य षडेवाथ प्रवव्रजुः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ते वीरा बद्धनिस्त्रिंशास्ततायुधकलापिनः | |
| बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः कालिन्दीमभितो ययुः | |
| ततस्ते दक्षिणं तीरमन्वगच्छन्पदातयः | |
| वसन्तो गिरिदुर्गेषु वनदुर्गेषु धन्विनः | |
| विध्यन्तो मृगजातानि महेष्वासा महाबलाः | |
| उत्तरेण दशार्णांस्ते पाञ्चालान्दक्षिणेन तु | |
| अन्तरेण यकृल्लोमाञ्शूरसेनांश्च पाण्डवाः | |
| लुब्धा ब्रुवाणा मत्स्यस्य विषयं प्राविशन्वनात् | |
| ततो जनपदं प्राप्य कृष्णा राजानमब्रवीत् | |
| पश्यैकपद्यो दृश्यन्ते क्षेत्राणि विविधानि च | |
| व्यक्तं दूरे विराटस्य राजधानी भविष्यति | |
| वसामेह परां रात्रिं बलवान्मे परिश्रमः | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| धनंजय समुद्यम्य पाञ्चालीं वह भारत | |
| राजधान्यां निवत्स्यामो विमुक्ताश्च वनादितः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तामादायार्जुनस्तूर्णं द्रौपदीं गजराडिव | |
| संप्राप्य नगराभ्याशमवतारयदर्जुनः | |
| स राजधानीं संप्राप्य कौन्तेयोऽर्जुनमब्रवीत् | |
| क्वायुधानि समासज्य प्रवेक्ष्यामः पुरं वयम् | |
| सायुधाश्च वयं तात प्रवेक्ष्यामः पुरं यदि | |
| समुद्वेगं जनस्यास्य करिष्यामो न संशयः | |
| ततो द्वादश वर्षाणि प्रवेष्टव्यं वनं पुनः | |
| एकस्मिन्नपि विज्ञाते प्रतिज्ञातं हि नस्तथा | |
| अर्जुन उवाच | |
| इयं कूटे मनुष्येन्द्र गहना महती शमी | |
| भीमशाखा दुरारोहा श्मशानस्य समीपतः | |
| न चापि विद्यते कश्चिन्मनुष्य इह पार्थिव | |
| उत्पथे हि वने जाता मृगव्यालनिषेविते | |
| समासज्यायुधान्यस्यां गच्छामो नगरं प्रति | |
| एवमत्र यथाजोषं विहरिष्याम भारत | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमुक्त्वा स राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् | |
| प्रचक्रमे निधानाय शस्त्राणां भरतर्षभ | |
| येन देवान्मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजयत् | |
| स्फीताञ्जनपदांश्चान्यानजयत्कुरुनन्दनः | |
| तदुदारं महाघोषं सपत्नगणसूदनम् | |
| अपज्यमकरोत्पार्थो गाण्डीवमभयंकरम् | |
| येन वीरः कुरुक्षेत्रमभ्यरक्षत्परंतपः | |
| अमुञ्चद्धनुषस्तस्य ज्यामक्षय्यां युधिष्ठिरः | |
| पाञ्चालान्येन संग्रामे भीमसेनोऽजयत्प्रभुः | |
| प्रत्यषेधद्बहूनेकः सपत्नांश्चैव दिग्जये | |
| निशम्य यस्य विस्फारं व्यद्रवन्त रणे परे | |
| पर्वतस्येव दीर्णस्य विस्फोटमशनेरिव | |
| सैन्धवं येन राजानं परामृषत चानघ | |
| ज्यापाशं धनुषस्तस्य भीमसेनोऽवतारयत् | |
| अजयत्पश्चिमामाशां धनुषा येन पाण्डवः | |
| तस्य मौर्वीमपाकर्षच्छूरः संक्रन्दनो युधि | |
| दक्षिणां दक्षिणाचारो दिशं येनाजयत्प्रभुः | |
| अपज्यमकरोद्वीरः सहदेवस्तदायुधम् | |
| खड्गांश्च पीतान्दीर्घांश्च कलापांश्च महाधनान् | |
| विपाठान्क्षुरधारांश्च धनुर्भिर्निदधुः सह | |
| तामुपारुह्य नकुलो धनूंषि निदधत्स्वयम् | |
| यानि तस्यावकाशानि दृढरूपाण्यमन्यत | |
| यत्र चापश्यत स वै तिरो वर्षाणि वर्षति | |
| तत्र तानि दृढैः पाशैः सुगाढं पर्यबन्धत | |
| शरीरं च मृतस्यैकं समबध्नन्त पाण्डवाः | |
| विवर्जयिष्यन्ति नरा दूरादेव शमीमिमाम् | |
| आबद्धं शवमत्रेति गन्धमाघ्राय पूतिकम् | |
| अशीतिशतवर्षेयं माता न इति वादिनः | |
| कुलधर्मोऽयमस्माकं पूर्वैराचरितोऽपि च | |
| समासजाना वृक्षेऽस्मिन्निति वै व्याहरन्ति ते | |
| आ गोपालाविपालेभ्य आचक्षाणाः परंतपाः | |
| आजग्मुर्नगराभ्याशं पार्थाः शत्रुनिबर्हणाः | |
| जयो जयन्तो विजयो जयत्सेनो जयद्बलः | |
| इति गुह्यानि नामानि चक्रे तेषां युधिष्ठिरः | |
| ततो यथाप्रतिज्ञाभिः प्राविशन्नगरं महत् | |
| अज्ञातचर्यां वत्स्यन्तो राष्ट्रे वर्षं त्रयोदशम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो विराटं प्रथमं युधिष्ठिरो; राजा सभायामुपविष्टमाव्रजत् | |
| वैडूर्यरूपान्प्रतिमुच्य काञ्चना;नक्षान्स कक्षे परिगृह्य वाससा | |
| नराधिपो राष्ट्रपतिं यशस्विनं; महायशाः कौरववंशवर्धनः | |
| महानुभावो नरराजसत्कृतो; दुरासदस्तीक्ष्णविषो यथोरगः | |
| बलेन रूपेण नरर्षभो महा;नथार्चिरूपेण यथामरस्तथा | |
| महाभ्रजालैरिव संवृतो रवि;र्यथानलो भस्मवृतश्च वीर्यवान् | |
| तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाण्डवं; विराटराडिन्दुमिवाभ्रसंवृतम् | |
| मन्त्रिद्विजान्सूतमुखान्विशस्तथा; ये चापि केचित्परिषत्समासते | |
| पप्रच्छ कोऽयं प्रथमं समेयिवा;ननेन योऽयं प्रसमीक्षते सभाम् | |
| न तु द्विजोऽयं भविता नरोत्तमः; पतिः पृथिव्या इति मे मनोगतम् | |
| न चास्य दासो न रथो न कुण्डले; समीपतो भ्राजति चायमिन्द्रवत् | |
| शरीरलिङ्गैरुपसूचितो ह्ययं; मूर्धाभिषिक्तोऽयमितीव मानसम् | |
| समीपमायाति च मे गतव्यथो; यथा गजस्तामरसीं मदोत्कटः | |
| वितर्कयन्तं तु नरर्षभस्तदा; युधिष्ठिरोऽभ्येत्य विराटमब्रवीत् | |
| सम्राड्विजानात्विह जीवितार्थिनं; विनष्टसर्वस्वमुपागतं द्विजम् | |
| इहाहमिच्छामि तवानघान्तिके; वस्तुं यथा कामचरस्तथा विभो | |
| तमब्रवीत्स्वागतमित्यनन्तरं; राजा प्रहृष्टः प्रतिसंगृहाण च | |
| कामेन ताताभिवदाम्यहं त्वां; कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः | |
| गोत्रं च नामापि च शंस तत्त्वतः; किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| युधिष्ठिरस्यासमहं पुरा सखा; वैयाघ्रपद्यः पुनरस्मि ब्राह्मणः | |
| अक्षान्प्रवप्तुं कुशलोऽस्मि देविता; कङ्केति नाम्नास्मि विराट विश्रुतः | |
| विराट उवाच | |
| ददामि ते हन्त वरं यमिच्छसि; प्रशाधि मत्स्यान्वशगो ह्यहं तव | |
| प्रिया हि धूर्ता मम देविनः सदा; भवांश्च देवोपम राज्यमर्हति | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| आप्तो विवादः परमो विशां पते; न विद्यते किंचन मत्स्य हीनतः | |
| न मे जितः कश्चन धारयेद्धनं; वरो ममैषोऽस्तु तव प्रसादतः | |
| विराट उवाच | |
| हन्यामवध्यं यदि तेऽप्रियं चरे;त्प्रव्राजयेयं विषयाद्द्विजांस्तथा | |
| शृण्वन्तु मे जानपदाः समागताः; कङ्को यथाहं विषये प्रभुस्तथा | |
| समानयानो भवितासि मे सखा; प्रभूतवस्त्रो बहुपानभोजनः | |
| पश्येस्त्वमन्तश्च बहिश्च सर्वदा; कृतं च ते द्वारमपावृतं मया | |
| ये त्वानुवादेयुरवृत्तिकर्शिता; ब्रूयाश्च तेषां वचनेन मे सदा | |
| दास्यामि सर्वं तदहं न संशयो; न ते भयं विद्यति संनिधौ मम | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवं स लब्ध्वा तु वरं समागमं; विराटराजेन नरर्षभस्तदा | |
| उवास वीरः परमार्चितः सुखी; न चापि कश्चिच्चरितं बुबोध तत् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथापरो भीमबलः श्रिया ज्वल;न्नुपाययौ सिंहविलासविक्रमः | |
| खजं च दर्वीं च करेण धारय;न्नसिं च कालाङ्गमकोशमव्रणम् | |
| स सूदरूपः परमेण वर्चसा; रविर्यथा लोकमिमं प्रभासयन् | |
| सुकृष्णवासा गिरिराजसारवा;न्स मत्स्यराजं समुपेत्य तस्थिवान् | |
| तं प्रेक्ष्य राजा वरयन्नुपागतं; ततोऽब्रवीज्जानपदान्समागतान् | |
| सिंहोन्नतांसोऽयमतीव रूपवा;न्प्रदृश्यते को नु नरर्षभो युवा | |
| अदृष्टपूर्वः पुरुषो रविर्यथा; वितर्कयन्नास्य लभामि संपदम् | |
| तथास्य चित्तं ह्यपि संवितर्कय;न्नरर्षभस्याद्य न यामि तत्त्वतः | |
| ततो विराटं समुपेत्य पाण्डवः; सुदीनरूपो वचनं महामनाः | |
| उवाच सूदोऽस्मि नरेन्द्र बल्लवो; भजस्व मां व्यञ्जनकारमुत्तमम् | |
| विराट उवाच | |
| न सूदतां मानद श्रद्दधामि ते; सहस्रनेत्रप्रतिमो हि दृश्यसे | |
| श्रिया च रूपेण च विक्रमेण च; प्रभासि तातानवरो नरेष्विह | |
| भीम उवाच | |
| नरेन्द्र सूदः परिचारकोऽस्मि ते; जानामि सूपान्प्रथमेन केवलान् | |
| आस्वादिता ये नृपते पुराभव;न्युधिष्ठिरेणापि नृपेण सर्वशः | |
| बलेन तुल्यश्च न विद्यते मया; नियुद्धशीलश्च सदैव पार्थिव | |
| गजैश्च सिंहैश्च समेयिवानहं; सदा करिष्यामि तवानघ प्रियम् | |
| विराट उवाच | |
| ददामि ते हन्त वरं महानसे; तथा च कुर्याः कुशलं हि भाषसे | |
| न चैव मन्ये तव कर्म तत्समं; समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि | |
| यथा हि कामस्तव तत्तथा कृतं; महानसे त्वं भव मे पुरस्कृतः | |
| नराश्च ये तत्र ममोचिताः पुरा; भवस्व तेषामधिपो मया कृतः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथा स भीमो विहितो महानसे; विराटराज्ञो दयितोऽभवद्दृढम् | |
| उवास राजन्न च तं पृथग्जनो; बुबोध तत्रानुचरश्च कश्चन | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः केशान्समुत्क्षिप्य वेल्लिताग्राननिन्दितान् | |
| जुगूह दक्षिणे पार्श्वे मृदूनसितलोचना | |
| वासश्च परिधायैकं कृष्णं सुमलिनं महत् | |
| कृत्वा वेषं च सैरन्ध्र्याः कृष्णा व्यचरदार्तवत् | |
| तां नराः परिधावन्तीं स्त्रियश्च समुपाद्रवन् | |
| अपृच्छंश्चैव तां दृष्ट्वा का त्वं किं च चिकीर्षसि | |
| सा तानुवाच राजेन्द्र सैरन्ध्र्यहमुपागता | |
| कर्म चेच्छामि वै कर्तुं तस्य यो मां पुपुक्षति | |
| तस्या रूपेण वेषेण श्लक्ष्णया च तथा गिरा | |
| नाश्रद्दधत तां दासीमन्नहेतोरुपस्थिताम् | |
| विराटस्य तु कैकेयी भार्या परमसंमता | |
| अवलोकयन्ती ददृशे प्रासादाद्द्रुपदात्मजाम् | |
| सा समीक्ष्य तथारूपामनाथामेकवाससम् | |
| समाहूयाब्रवीद्भद्रे का त्वं किं च चिकीर्षसि | |
| सा तामुवाच राजेन्द्र सैरन्ध्र्यहमुपागता | |
| कर्म चेच्छाम्यहं कर्तुं तस्य यो मां पुपुक्षति | |
| सुदेष्णोवाच | |
| नैवंरूपा भवन्त्येवं यथा वदसि भामिनि | |
| प्रेषयन्ति च वै दासीर्दासांश्चैवंविधान्बहून् | |
| गूढगुल्फा संहतोरुस्त्रिगम्भीरा षडुन्नता | |
| रक्ता पञ्चसु रक्तेषु हंसगद्गदभाषिणी | |
| सुकेशी सुस्तनी श्यामा पीनश्रोणिपयोधरा | |
| तेन तेनैव संपन्ना काश्मीरीव तुरंगमा | |
| स्वरालपक्ष्मनयना बिम्बोष्ठी तनुमध्यमा | |
| कम्बुग्रीवा गूढसिरा पूर्णचन्द्रनिभानना | |
| का त्वं ब्रूहि यथा भद्रे नासि दासी कथंचन | |
| यक्षी वा यदि वा देवी गन्धर्वी यदि वाप्सराः | |
| अलम्बुसा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ मालिनी | |
| इन्द्राणी वारुणी वा त्वं त्वष्टुर्धातुः प्रजापतेः | |
| देव्यो देवेषु विख्यातास्तासां त्वं कतमा शुभे | |
| द्रौपद्युवाच | |
| नास्मि देवी न गन्धर्वी नासुरी न च राक्षसी | |
| सैरन्ध्री तु भुजिष्यास्मि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते | |
| केशाञ्जानाम्यहं कर्तुं पिंषे साधु विलेपनम् | |
| ग्रथयिष्ये विचित्राश्च स्रजः परमशोभनाः | |
| आराधयं सत्यभामां कृष्णस्य महिषीं प्रियाम् | |
| कृष्णां च भार्यां पाण्डूनां कुरूणामेकसुन्दरीम् | |
| तत्र तत्र चराम्येवं लभमाना सुशोभनम् | |
| वासांसि यावच्च लभे तावत्तावद्रमे तथा | |
| मालिनीत्येव मे नाम स्वयं देवी चकार सा | |
| साहमभ्यागता देवि सुदेष्णे त्वन्निवेशनम् | |
| सुदेष्णोवाच | |
| मूर्ध्नि त्वां वासयेयं वै संशयो मे न विद्यते | |
| नो चेदिह तु राजा त्वां गच्छेत्सर्वेण चेतसा | |
| स्त्रियो राजकुले पश्य याश्चेमा मम वेश्मनि | |
| प्रसक्तास्त्वां निरीक्षन्ते पुमांसं कं न मोहयेः | |
| वृक्षांश्चावस्थितान्पश्य य इमे मम वेश्मनि | |
| तेऽपि त्वां संनमन्तीव पुमांसं कं न मोहयेः | |
| राजा विराटः सुश्रोणि दृष्ट्वा वपुरमानुषम् | |
| विहाय मां वरारोहे त्वां गच्छेत्सर्वचेतसा | |
| यं हि त्वमनवद्याङ्गि नरमायतलोचने | |
| प्रसक्तमभिवीक्षेथाः स कामवशगो भवेत् | |
| यश्च त्वां सततं पश्येत्पुरुषश्चारुहासिनि | |
| एवं सर्वानवद्याङ्गि स चानङ्गवशो भवेत् | |
| यथा कर्कटकी गर्भमाधत्ते मृत्युमात्मनः | |
| तथाविधमहं मन्ये वासं तव शुचिस्मिते | |
| द्रौपद्युवाच | |
| नास्मि लभ्या विराटेन न चान्येन कथंचन | |
| गन्धर्वाः पतयो मह्यं युवानः पञ्च भामिनि | |
| पुत्रा गन्धर्वराजस्य महासत्त्वस्य कस्यचित् | |
| रक्षन्ति ते च मां नित्यं दुःखाचारा तथा न्वहम् | |
| यो मे न दद्यादुच्छिष्टं न च पादौ प्रधावयेत् | |
| प्रीयेयुस्तेन वासेन गन्धर्वाः पतयो मम | |
| यो हि मां पुरुषो गृध्येद्यथान्याः प्राकृतस्त्रियः | |
| तामेव स ततो रात्रिं प्रविशेदपरां तनुम् | |
| न चाप्यहं चालयितुं शक्या केनचिदङ्गने | |
| दुःखशीला हि गन्धर्वास्ते च मे बलवत्तराः | |
| सुदेष्णोवाच | |
| एवं त्वां वासयिष्यामि यथा त्वं नन्दिनीच्छसि | |
| न च पादौ न चोच्छिष्टं स्प्रक्ष्यसि त्वं कथंचन | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवं कृष्णा विराटस्य भार्यया परिसान्त्विता | |
| न चैनां वेद तत्रान्यस्तत्त्वेन जनमेजय | |
| वैशंपायन उवाच | |
| सहदेवोऽपि गोपानां कृत्वा वेषमनुत्तमम् | |
| भाषां चैषां समास्थाय विराटमुपयादथ | |
| तमायान्तमभिप्रेक्ष्य भ्राजमानं नरर्षभम् | |
| समुपस्थाय वै राजा पप्रच्छ कुरुनन्दनम् | |
| कस्य वा त्वं कुतो वा त्वं किं वा तात चिकीर्षसि | |
| न हि मे दृष्टपूर्वस्त्वं तत्त्वं ब्रूहि नरर्षभ | |
| स प्राप्य राजानममित्रतापन;स्ततोऽब्रवीन्मेघमहौघनिःस्वनः | |
| वैश्योऽस्मि नाम्नाहमरिष्टनेमि;र्गोसंख्य आसं कुरुपुंगवानाम् | |
| वस्तुं त्वयीच्छामि विशां वरिष्ठ; तान्राजसिंहान्न हि वेद्मि पार्थान् | |
| न शक्यते जीवितुमन्यकर्मणा; न च त्वदन्यो मम रोचते नृपः | |
| विराट उवाच | |
| त्वं ब्राह्मणो यदि वा क्षत्रियोऽसि; समुद्रनेमीश्वररूपवानसि | |
| आचक्ष्व मे तत्त्वममित्रकर्शन; न वैश्यकर्म त्वयि विद्यते समम् | |
| कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः; किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् | |
| कथं त्वमस्मासु निवत्स्यसे सदा; वदस्व किं चापि तवेह वेतनम् | |
| सहदेव उवाच | |
| पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः | |
| तस्याष्टशतसाहस्रा गवां वर्गाः शतं शताः | |
| अपरे दशसाहस्रा द्विस्तावन्तस्तथापरे | |
| तेषां गोसंख्य आसं वै तन्तिपालेति मां विदुः | |
| भूतं भव्यं भविष्यच्च यच्च संख्यागतं क्वचित् | |
| न मेऽस्त्यविदितं किंचित्समन्ताद्दशयोजनम् | |
| गुणाः सुविदिता ह्यासन्मम तस्य महात्मनः | |
| आसीच्च स मया तुष्टः कुरुराजो युधिष्ठिरः | |
| क्षिप्रं हि गावो बहुला भवन्ति; न तासु रोगो भवतीह कश्चित् | |
| तैस्तैरुपायैर्विदितं मयैत;देतानि शिल्पानि मयि स्थितानि | |
| वृषभांश्चापि जानामि राजन्पूजितलक्षणान् | |
| येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते | |
| विराट उवाच | |
| शतं सहस्राणि समाहितानि; वर्णस्य वर्णस्य विनिश्चिता गुणैः | |
| पशून्सपालान्भवते ददाम्यहं; त्वदाश्रया मे पशवो भवन्त्विह | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथा स राज्ञोऽविदितो विशां पते; उवास तत्रैव सुखं नरेश्वरः | |
| न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन; प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथापरोऽदृश्यत रूपसंपदा; स्त्रीणामलंकारधरो बृहत्पुमान् | |
| प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले; दीर्घे च कम्बू परिहाटके शुभे | |
| बहूंश्च दीर्घांश्च विकीर्य मूर्धजा;न्महाभुजो वारणमत्तविक्रमः | |
| गतेन भूमिमभिकम्पयंस्तदा; विराटमासाद्य सभासमीपतः | |
| तं प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले; सत्रप्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् | |
| विराजमानं परमेण वर्चसा; सुतं महेन्द्रस्य गजेन्द्रविक्रमम् | |
| सर्वानपृच्छच्च समीपचारिणः; कुतोऽयमायाति न मे पुरा श्रुतः | |
| न चैनमूचुर्विदितं तदा नराः; सविस्मितं वाक्यमिदं नृपोऽब्रवीत् | |
| सर्वोपपन्नः पुरुषो मनोरमः; श्यामो युवा वारणयूथपोपमः | |
| विमुच्य कम्बू परिहाटके शुभे; विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले | |
| शिखी सुकेशः परिधाय चान्यथा; भवस्व धन्वी कवची शरी तथा | |
| आरुह्य यानं परिधावतां भवा;न्सुतैः समो मे भव वा मया समः | |
| वृद्धो ह्यहं वै परिहारकामः; सर्वान्मत्स्यांस्तरसा पालयस्व | |
| नैवंविधाः क्लीबरूपा भवन्ति; कथंचनेति प्रतिभाति मे मनः | |
| अर्जुन उवाच | |
| गायामि नृत्याम्यथ वादयामि; भद्रोऽस्मि नृत्ते कुशलोऽस्मि गीते | |
| त्वमुत्तरायाः परिदत्स्व मां स्वयं; भवामि देव्या नरदेव नर्तकः | |
| इदं तु रूपं मम येन किं नु त;त्प्रकीर्तयित्वा भृशशोकवर्धनम् | |
| बृहन्नडां वै नरदेव विद्धि मां; सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम् | |
| विराट उवाच | |
| ददामि ते हन्त वरं बृहन्नडे; सुतां च मे नर्तय याश्च तादृशीः | |
| इदं तु ते कर्म समं न मे मतं; समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि | |
| वैशंपायन उवाच | |
| बृहन्नडां तामभिवीक्ष्य मत्स्यरा;ट्कलासु नृत्ते च तथैव वादिते | |
| अपुंस्त्वमप्यस्य निशम्य च स्थिरं; ततः कुमारीपुरमुत्ससर्ज तम् | |
| स शिक्षयामास च गीतवादितं; सुतां विराटस्य धनंजयः प्रभुः | |
| सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा; प्रियश्च तासां स बभूव पाण्डवः | |
| तथा स सत्रेण धनंजयोऽवस;त्प्रियाणि कुर्वन्सह ताभिरात्मवान् | |
| तथागतं तत्र न जज्ञिरे जना; बहिश्चरा वाप्यथ वान्तरेचराः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभु;र्विराटराज्ञस्तुरगान्समीक्षतः | |
| तमापतन्तं ददृशे पृथग्जनो; विमुक्तमभ्रादिव सूर्यमण्डलम् | |
| स वै हयानैक्षत तांस्ततस्ततः; समीक्षमाणं च ददर्श मत्स्यराट् | |
| ततोऽब्रवीत्ताननुगानमित्रहा; कुतोऽयमायाति नरोऽमरप्रभः | |
| अयं हयान्वीक्षति मामकान्दृढं; ध्रुवं हयज्ञो भविता विचक्षणः | |
| प्रवेश्यतामेष समीपमाशु मे; विभाति वीरो हि यथामरस्तथा | |
| अभ्येत्य राजानममित्रहाब्रवी;ज्जयोऽस्तु ते पार्थिव भद्रमस्तु च | |
| हयेषु युक्तो नृप संमतः सदा; तवाश्वसूतो निपुणो भवाम्यहम् | |
| विराट उवाच | |
| ददामि यानानि धनं निवेशनं; ममाश्वसूतो भवितुं त्वमर्हसि | |
| कुतोऽसि कस्यासि कथं त्वमागतः; प्रब्रूहि शिल्पं तव विद्यते च यत् | |
| नकुल उवाच | |
| पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो राजा युधिष्ठिरः | |
| तेनाहमश्वेषु पुरा प्रकृतः शत्रुकर्शन | |
| अश्वानां प्रकृतिं वेद्मि विनयं चापि सर्वशः | |
| दुष्टानां प्रतिपत्तिं च कृत्स्नं चैव चिकित्सितम् | |
| न कातरं स्यान्मम जातु वाहनं; न मेऽस्ति दुष्टा वडवा कुतो हयाः | |
| जनस्तु मामाह स चापि पाण्डवो; युधिष्ठिरो ग्रन्थिकमेव नामतः | |
| विराट उवाच | |
| यदस्ति किंचिन्मम वाजिवाहनं; तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै | |
| ये चापि केचिन्मम वाजियोजका;स्त्वदाश्रयाः सारथयश्च सन्तु मे | |
| इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम; ब्रवीहि यत्ते प्रसमीक्षितं वसु | |
| न तेऽनुरूपं हयकर्म विद्यते; प्रभासि राजेव हि संमतो मम | |
| युधिष्ठिरस्येव हि दर्शनेन मे; समं तवेदं प्रियदर्श दर्शनम् | |
| कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने; वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथा स गन्धर्ववरोपमो युवा; विराटराज्ञा मुदितेन पूजितः | |
| न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन; प्रियाभिरामं विचरन्तमन्तरा | |
| एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा; यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः | |
| अज्ञातचर्यां व्यचरन्समाहिताः; समुद्रनेमीपतयोऽतिदुःखिताः | |
| जनमेजय उवाच | |
| एवं मत्स्यस्य नगरे वसन्तस्तत्र पाण्डवाः | |
| अत ऊर्ध्वं महावीर्याः किमकुर्वन्त वै द्विज | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः | |
| आराधयन्तो राजानं यदकुर्वन्त तच्छृणु | |
| युधिष्ठिरः सभास्तारः सभ्यानामभवत्प्रियः | |
| तथैव च विराटस्य सपुत्रस्य विशां पते | |
| स ह्यक्षहृदयज्ञस्तान्क्रीडयामास पाण्डवः | |
| अक्षवत्यां यथाकामं सूत्रबद्धानिव द्विजान् | |
| अज्ञातं च विराटस्य विजित्य वसु धर्मराट् | |
| भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथार्हं स्म प्रयच्छति | |
| भीमसेनोऽपि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च | |
| अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणाति युधिष्ठिरे | |
| वासांसि परिजीर्णानि लब्धान्यन्तःपुरेऽर्जुनः | |
| विक्रीणानश्च सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति | |
| सहदेवोऽपि गोपानां वेषमास्थाय पाण्डवः | |
| दधि क्षीरं घृतं चैव पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति | |
| नकुलोऽपि धनं लब्ध्वा कृते कर्मणि वाजिनाम् | |
| तुष्टे तस्मिन्नरपतौ पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति | |
| कृष्णापि सर्वान्भ्रातॄंस्तान्निरीक्षन्ती तपस्विनी | |
| यथा पुनरविज्ञाता तथा चरति भामिनी | |
| एवं संपादयन्तस्ते तथान्योन्यं महारथाः | |
| प्रेक्षमाणास्तदा कृष्णामूषुश्छन्ना नराधिप | |
| अथ मासे चतुर्थे तु ब्रह्मणः सुमहोत्सवः | |
| आसीत्समृद्धो मत्स्येषु पुरुषाणां सुसंमतः | |
| तत्र मल्लाः समापेतुर्दिग्भ्यो राजन्सहस्रशः | |
| महाकाया महावीर्याः कालखञ्जा इवासुराः | |
| वीर्योन्नद्धा बलोदग्रा राज्ञा समभिपूजिताः | |
| सिंहस्कन्धकटिग्रीवाः स्ववदाता मनस्विनः | |
| असकृल्लब्धलक्षास्ते रङ्गे पार्थिवसंनिधौ | |
| तेषामेको महानासीत्सर्वमल्लान्समाह्वयत् | |
| आवल्गमानं तं रङ्गे नोपतिष्ठति कश्चन | |
| यदा सर्वे विमनसस्ते मल्ला हतचेतसः | |
| अथ सूदेन तं मल्लं योधयामास मत्स्यराट् | |
| चोद्यमानस्ततो भीमो दुःखेनैवाकरोन्मतिम् | |
| न हि शक्नोति विवृते प्रत्याख्यातुं नराधिपम् | |
| ततः स पुरुषव्याघ्रः शार्दूलशिथिलं चरन् | |
| प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिहर्षयन् | |
| बबन्ध कक्ष्यां कौन्तेयस्ततस्तं हर्षयञ्जनम् | |
| ततस्तं वृत्रसंकाशं भीमो मल्लं समाह्वयत् | |
| तावुभौ सुमहोत्साहावुभौ तीव्रपराक्रमौ | |
| मत्ताविव महाकायौ वारणौ षष्टिहायनौ | |
| चकर्ष दोर्भ्यामुत्पाट्य भीमो मल्लममित्रहा | |
| विनदन्तमभिक्रोशञ्शार्दूल इव वारणम् | |
| तमुद्यम्य महाबाहुर्भ्रामयामास वीर्यवान् | |
| ततो मल्लाश्च मत्स्याश्च विस्मयं चक्रिरे परम् | |
| भ्रामयित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् | |
| प्रत्यपिंषन्महाबाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः | |
| तस्मिन्विनिहते मल्ले जीमूते लोकविश्रुते | |
| विराटः परमं हर्षमगच्छद्बान्धवैः सह | |
| संहर्षात्प्रददौ वित्तं बहु राजा महामनाः | |
| बल्लवाय महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा | |
| एवं स सुबहून्मल्लान्पुरुषांश्च महाबलान् | |
| विनिघ्नन्मत्स्यराजस्य प्रीतिमावहदुत्तमाम् | |
| यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित्तत्र विद्यते | |
| ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधयत् | |
| पुनरन्तःपुरगतः स्त्रीणां मध्ये वृकोदरः | |
| योध्यते स्म विराटेन सिंहैर्मत्तैर्महाबलैः | |
| बीभत्सुरपि गीतेन सुनृत्तेन च पाण्डवः | |
| विराटं तोषयामास सर्वाश्चान्तःपुरस्त्रियः | |
| अश्वैर्विनीतैर्जवनैस्तत्र तत्र समागतैः | |
| तोषयामास नकुलो राजानं राजसत्तम | |
| तस्मै प्रदेयं प्रायच्छत्प्रीतो राजा धनं बहु | |
| विनीतान्वृषभान्दृष्ट्वा सहदेवस्य चाभिभो | |
| एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः पुरुषर्षभाः | |
| कर्माणि तस्य कुर्वाणा विराटनृपतेस्तदा | |
| वैशंपायन उवाच | |
| वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा | |
| महारथेषु छन्नेषु मासा दश समत्ययुः | |
| याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशां पते | |
| अवसत्परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय | |
| तथा चरन्तीं पाञ्चालीं सुदेष्णाया निवेशने | |
| सेनापतिर्विराटस्य ददर्श जलजाननाम् | |
| तां दृष्ट्वा देवगर्भाभां चरन्तीं देवतामिव | |
| कीचकः कामयामास कामबाणप्रपीडितः | |
| स तु कामाग्निसंतप्तः सुदेष्णामभिगम्य वै | |
| प्रहसन्निव सेनानीरिदं वचनमब्रवीत् | |
| नेयं पुरा जातु मयेह दृष्टा; राज्ञो विराटस्य निवेशने शुभा | |
| रूपेण चोन्मादयतीव मां भृशं; गन्धेन जाता मदिरेव भामिनी | |
| का देवरूपा हृदयंगमा शुभे; आचक्ष्व मे का च कुतश्च शोभना | |
| चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे; न चान्यदत्रौषधमद्य मे मतम् | |
| अहो तवेयं परिचारिका शुभा; प्रत्यग्ररूपा प्रतिभाति मामियम् | |
| अयुक्तरूपं हि करोति कर्म ते; प्रशास्तु मां यच्च ममास्ति किंचन | |
| प्रभूतनागाश्वरथं महाधनं; समृद्धियुक्तं बहुपानभोजनम् | |
| मनोहरं काञ्चनचित्रभूषणं; गृहं महच्छोभयतामियं मम | |
| ततः सुदेष्णामनुमन्त्र्य कीचक;स्ततः समभ्येत्य नराधिपात्मजाम् | |
| उवाच कृष्णामभिसान्त्वयंस्तदा; मृगेन्द्रकन्यामिव जम्बुको वने | |
| इदं च रूपं प्रथमं च ते वयो; निरर्थकं केवलमद्य भामिनि | |
| अधार्यमाणा स्रगिवोत्तमा यथा; न शोभसे सुन्दरि शोभना सती | |
| त्यजामि दारान्मम ये पुरातना; भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि | |
| अहं च ते सुन्दरि दासवत्स्थितः; सदा भविष्ये वशगो वरानने | |
| द्रौपद्युवाच | |
| अप्रार्थनीयामिह मां सूतपुत्राभिमन्यसे | |
| विहीनवर्णां सैरन्ध्रीं बीभत्सां केशकारिकाम् | |
| परदारास्मि भद्रं ते न युक्तं त्वयि सांप्रतम् | |
| दयिताः प्राणिनां दारा धर्मं समनुचिन्तय | |
| परदारे न ते बुद्धिर्जातु कार्या कथंचन | |
| विवर्जनं ह्यकार्याणामेतत्सत्पुरुषव्रतम् | |
| मिथ्याभिगृध्नो हि नरः पापात्मा मोहमास्थितः | |
| अयशः प्राप्नुयाद्घोरं सुमहत्प्राप्नुयाद्भयम् | |
| मा सूतपुत्र हृष्यस्व माद्य त्यक्ष्यसि जीवितम् | |
| दुर्लभामभिमन्वानो मां वीरैरभिरक्षिताम् | |
| न चाप्यहं त्वया शक्या गन्धर्वाः पतयो मम | |
| ते त्वां निहन्युः कुपिताः साध्वलं मा व्यनीनशः | |
| अशक्यरूपैः पुरुषैरध्वानं गन्तुमिच्छसि | |
| यथा निश्चेतनो बालः कूलस्थः कूलमुत्तरम् | |
| तर्तुमिच्छति मन्दात्मा तथा त्वं कर्तुमिच्छसि | |
| अन्तर्महीं वा यदि वोर्ध्वमुत्पतेः; समुद्रपारं यदि वा प्रधावसि | |
| तथापि तेषां न विमोक्षमर्हसि; प्रमाथिनो देवसुता हि मे वराः | |
| त्वं कालरात्रीमिव कश्चिदातुरः; किं मां दृढं प्रार्थयसेऽद्य कीचक | |
| किं मातुरङ्के शयितो यथा शिशु;श्चन्द्रं जिघृक्षुरिव मन्यसे हि माम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| प्रत्याख्यातो राजपुत्र्या सुदेष्णां कीचकोऽब्रवीत् | |
| अमर्यादेन कामेन घोरेणाभिपरिप्लुतः | |
| यथा कैकेयि सैरन्ध्र्या समेयां तद्विधीयताम् | |
| तां सुदेष्णे परीप्सस्व माहं प्राणान्प्रहासिषम् | |
| तस्य तां बहुशः श्रुत्वा वाचं विलपतस्तदा | |
| विराटमहिषी देवी कृपां चक्रे मनस्विनी | |
| स्वमर्थमभिसंधाय तस्यार्थमनुचिन्त्य च | |
| उद्वेगं चैव कृष्णायाः सुदेष्णा सूतमब्रवीत् | |
| पर्विणीं त्वं समुद्दिश्य सुरामन्नं च कारय | |
| तत्रैनां प्रेषयिष्यामि सुराहारीं तवान्तिकम् | |
| तत्र संप्रेषितामेनां विजने निरवग्रहाम् | |
| सान्त्वयेथा यथाकामं सान्त्व्यमाना रमेद्यदि | |
| कीचकस्तु गृहं गत्वा भगिन्या वचनात्तदा | |
| सुरामाहारयामास राजार्हां सुपरिस्रुताम् | |
| आजौरभ्रं च सुभृशं बहूंश्चोच्चावचान्मृगान् | |
| कारयामास कुशलैरन्नपानं सुशोभनम् | |
| तस्मिन्कृते तदा देवी कीचकेनोपमन्त्रिता | |
| सुदेष्णा प्रेषयामास सैरन्ध्रीं कीचकालयम् | |
| सुदेष्णोवाच | |
| उत्तिष्ठ गच्छ सैरन्ध्रि कीचकस्य निवेशनम् | |
| पानमानय कल्याणि पिपासा मां प्रबाधते | |
| द्रौपद्युवाच | |
| न गच्छेयमहं तस्य राजपुत्रि निवेशनम् | |
| त्वमेव राज्ञि जानासि यथा स निरपत्रपः | |
| न चाहमनवद्याङ्गि तव वेश्मनि भामिनि | |
| कामवृत्ता भविष्यामि पतीनां व्यभिचारिणी | |
| त्वं चैव देवि जानासि यथा स समयः कृतः | |
| प्रविशन्त्या मया पूर्वं तव वेश्मनि भामिनि | |
| कीचकश्च सुकेशान्ते मूढो मदनदर्पितः | |
| सोऽवमंस्यति मां दृष्ट्वा न यास्ये तत्र शोभने | |
| सन्ति बह्व्यस्तव प्रेष्या राजपुत्रि वशानुगाः | |
| अन्यां प्रेषय भद्रं ते स हि मामवमंस्यते | |
| सुदेष्णोवाच | |
| नैव त्वां जातु हिंस्यात्स इतः संप्रेषितां मया | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्यस्याः प्रददौ कांस्यं सपिधानं हिरण्मयम् | |
| सा शङ्कमाना रुदती दैवं शरणमीयुषी | |
| प्रातिष्ठत सुराहारी कीचकस्य निवेशनम् | |
| द्रौपद्युवाच | |
| यथाहमन्यं पाण्डुभ्यो नाभिजानामि कंचन | |
| तेन सत्येन मां प्राप्तां कीचको मा वशे कृथाः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| उपातिष्ठत सा सूर्यं मुहूर्तमबला ततः | |
| स तस्यास्तनुमध्यायाः सर्वं सूर्योऽवबुद्धवान् | |
| अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत् | |
| तच्चैनां नाजहात्तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम् | |
| तां मृगीमिव वित्रस्तां दृष्ट्वा कृष्णां समीपगाम् | |
| उदतिष्ठन्मुदा सूतो नावं लब्ध्वेव पारगः | |
| कीचक उवाच | |
| स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम | |
| स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता प्रकुरुष्व मम प्रियम् | |
| सुवर्णमालाः कम्बूश्च कुण्डले परिहाटके | |
| आहरन्तु च वस्त्राणि कौशिकान्यजिनानि च | |
| अस्ति मे शयनं शुभ्रं त्वदर्थमुपकल्पितम् | |
| एहि तत्र मया सार्धं पिबस्व मधुमाधवीम् | |
| द्रौपद्युवाच | |
| अप्रैषीद्राजपुत्री मां सुराहारीं तवान्तिकम् | |
| पानमानय मे क्षिप्रं पिपासा मेति चाब्रवीत् | |
| कीचक उवाच | |
| अन्या भद्रे नयिष्यन्ति राजपुत्र्याः परिस्रुतम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्येनां दक्षिणे पाणौ सूतपुत्रः परामृशत् | |
| सा गृहीता विधुन्वाना भूमावाक्षिप्य कीचकम् | |
| सभां शरणमाधावद्यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपक्षे परामृशत् | |
| अथैनां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदावधीत् | |
| ततो योऽसौ तदार्केण राक्षसः संनियोजितः | |
| स कीचकमपोवाह वातवेगेन भारत | |
| स पपात ततो भूमौ रक्षोबलसमाहतः | |
| विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः | |
| तां चासीनौ ददृशतुर्भीमसेनयुधिष्ठिरौ | |
| अमृष्यमाणौ कृष्णायाः कीचकेन पदा वधम् | |
| तस्य भीमो वधप्रेप्सुः कीचकस्य दुरात्मनः | |
| दन्तैर्दन्तांस्तदा रोषान्निष्पिपेष महामनाः | |
| अथाङ्गुष्ठेनावमृद्नादङ्गुष्ठं तस्य धर्मराट् | |
| प्रबोधनभयाद्राजन्भीमस्य प्रत्यषेधयत् | |
| सा सभाद्वारमासाद्य रुदती मत्स्यमब्रवीत् | |
| अवेक्षमाणा सुश्रोणी पतींस्तान्दीनचेतसः | |
| आकारमभिरक्षन्ती प्रतिज्ञां धर्मसंहिताम् | |
| दह्यमानेव रौद्रेण चक्षुषा द्रुपदात्मजा | |
| द्रौपद्युवाच | |
| येषां वैरी न स्वपिति पदा भूमिमुपस्पृशन् | |
| तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् | |
| ये दद्युर्न च याचेयुर्ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः | |
| तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् | |
| येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोषः श्रूयतेऽनिशम् | |
| तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् | |
| ये ते तेजस्विनो दान्ता बलवन्तोऽभिमानिनः | |
| तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् | |
| सर्वलोकमिमं हन्युर्धर्मपाशसितास्तु ये | |
| तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् | |
| शरणं ये प्रपन्नानां भवन्ति शरणार्थिनाम् | |
| चरन्ति लोके प्रच्छन्नाः क्व नु तेऽद्य महारथाः | |
| कथं ते सूतपुत्रेण वध्यमानां प्रियां सतीम् | |
| मर्षयन्ति यथा क्लीबा बलवन्तोऽमितौजसः | |
| क्व नु तेषाममर्षश्च वीर्यं तेजश्च वर्तते | |
| न परीप्सन्ति ये भार्यां वध्यमानां दुरात्मना | |
| मयात्र शक्यं किं कर्तुं विराटे धर्मदूषणम् | |
| यः पश्यन्मां मर्षयति वध्यमानामनागसम् | |
| न राजन्राजवत्किंचित्समाचरसि कीचके | |
| दस्यूनामिव धर्मस्ते न हि संसदि शोभते | |
| न कीचकः स्वधर्मस्थो न च मत्स्यः कथंचन | |
| सभासदोऽप्यधर्मज्ञा य इमं पर्युपासते | |
| नोपालभे त्वां नृपते विराट जनसंसदि | |
| नाहमेतेन युक्ता वै हन्तुं मत्स्य तवान्तिके | |
| सभासदस्तु पश्यन्तु कीचकस्य व्यतिक्रमम् | |
| विराट उवाच | |
| परोक्षं नाभिजानामि विग्रहं युवयोरहम् | |
| अर्थतत्त्वमविज्ञाय किं नु स्यात्कुशलं मम | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततस्तु सभ्या विज्ञाय कृष्णां भूयोऽभ्यपूजयन् | |
| साधु साध्विति चाप्याहुः कीचकं च व्यगर्हयन् | |
| सभ्या ऊचुः | |
| यस्येयं चारुसर्वाङ्गी भार्या स्यादायतेक्षणा | |
| परो लाभश्च तस्य स्यान्न स शोचेत्कदाचन | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवं संपूजयंस्तत्र कृष्णां प्रेक्ष्य सभासदः | |
| युधिष्ठिरस्य कोपात्तु ललाटे स्वेद आसजत् | |
| अथाब्रवीद्राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् | |
| गच्छ सैरन्ध्रि मात्र स्थाः सुदेष्णाया निवेशनम् | |
| भर्तारमनुरुध्यन्त्यः क्लिश्यन्ते वीरपत्नयः | |
| शुश्रूषया क्लिश्यमानाः पतिलोकं जयन्त्युत | |
| मन्ये न कालं क्रोधस्य पश्यन्ति पतयस्तव | |
| तेन त्वां नाभिधावन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः | |
| अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विधावसि | |
| विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि | |
| गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रियम् | |
| द्रौपद्युवाच | |
| अतीव तेषां घृणिनामर्थेऽहं धर्मचारिणी | |
| तस्य तस्येह ते वध्या येषां ज्येष्ठोऽक्षदेविता | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्युक्त्वा प्राद्रवत्कृष्णा सुदेष्णाया निवेशनम् | |
| केशान्मुक्त्वा तु सुश्रोणी संरम्भाल्लोहितेक्षणा | |
| शुशुभे वदनं तस्या रुदन्त्या विरतं तदा | |
| मेघलेखाविनिर्मुक्तं दिवीव शशिमण्डलम् | |
| सुदेष्णोवाच | |
| कस्त्वावधीद्वरारोहे कस्माद्रोदिषि शोभने | |
| कस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रियं कृतम् | |
| द्रौपद्युवाच | |
| कीचको मावधीत्तत्र सुराहारीं गतां तव | |
| सभायां पश्यतो राज्ञो यथैव विजने तथा | |
| सुदेष्णोवाच | |
| घातयामि सुकेशान्ते कीचकं यदि मन्यसे | |
| योऽसौ त्वां कामसंमत्तो दुर्लभामभिमन्यते | |
| द्रौपद्युवाच | |
| अन्ये वै तं वधिष्यन्ति येषामागः करोति सः | |
| मन्ये चाद्यैव सुव्यक्तं परलोकं गमिष्यति | |
| वैशंपायन उवाच | |
| सा हता सूतपुत्रेण राजपुत्री समज्वलत् | |
| वधं कृष्णा परीप्सन्ती सेनावाहस्य भामिनी | |
| जगामावासमेवाथ तदा सा द्रुपदात्मजा | |
| कृत्वा शौचं यथान्यायं कृष्णा वै तनुमध्यमा | |
| गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा | |
| चिन्तयामास रुदती तस्य दुःखस्य निर्णयम् | |
| किं करोमि क्व गच्छामि कथं कार्यं भवेन्मम | |
| इत्येवं चिन्तयित्वा सा भीमं वै मनसागमत् | |
| नान्यः कर्ता ऋते भीमान्ममाद्य मनसः प्रियम् | |
| तत उत्थाय रात्रौ सा विहाय शयनं स्वकम् | |
| प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती | |
| दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी | |
| सा वै महानसे प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता | |
| सर्वश्वेतेव माहेयी वने जाता त्रिहायनी | |
| उपातिष्ठत पाञ्चाली वाशितेव महागजम् | |
| सा लतेव महाशालं फुल्लं गोमतितीरजम् | |
| बाहुभ्यां परिरभ्यैनं प्राबोधयदनिन्दिता | |
| सिंहं सुप्तं वने दुर्गे मृगराजवधूरिव | |
| वीणेव मधुराभाषा गान्धारं साधु मूर्च्छिता | |
| अभ्यभाषत पाञ्चाली भीमसेनमनिन्दिता | |
| उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन यथा मृतः | |
| नामृतस्य हि पापीयान्भार्यामालभ्य जीवति | |
| तस्मिञ्जीवति पापिष्ठे सेनावाहे मम द्विषि | |
| तत्कर्म कृतवत्यद्य कथं निद्रां निषेवसे | |
| स संप्रहाय शयनं राजपुत्र्या प्रबोधितः | |
| उपातिष्ठत मेघाभः पर्यङ्के सोपसंग्रहे | |
| अथाब्रवीद्राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् | |
| केनास्यर्थेन संप्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् | |
| न ते प्रकृतिमान्वर्णः कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे | |
| आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा | |
| सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् | |
| यथावत्सर्वमाचक्ष्व श्रुत्वा ज्ञास्यामि यत्परम् | |
| अहमेव हि ते कृष्णे विश्वास्यः सर्वकर्मसु | |
| अहमापत्सु चापि त्वां मोक्षयामि पुनः पुनः | |
| शीघ्रमुक्त्वा यथाकामं यत्ते कार्यं विवक्षितम् | |
| गच्छ वै शयनायैव पुरा नान्योऽवबुध्यते | |
| द्रौपद्युवाच | |
| अशोच्यं नु कुतस्तस्या यस्या भर्ता युधिष्ठिरः | |
| जानन्सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि | |
| यन्मां दासीप्रवादेन प्रातिकामी तदानयत् | |
| सभायां पार्षदो मध्ये तन्मां दहति भारत | |
| पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवेत मादृशी | |
| अनुभूय भृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो | |
| वनवासगतायाश्च सैन्धवेन दुरात्मना | |
| परामर्शं द्वितीयं च सोढुमुत्सहते नु का | |
| मत्स्यराज्ञः समक्षं च तस्य धूर्तस्य पश्यतः | |
| कीचकेन पदा स्पृष्टा का नु जीवेत मादृशी | |
| एवं बहुविधैः क्लेशैः क्लिश्यमानां च भारत | |
| न मां जानासि कौन्तेय किं फलं जीवितेन मे | |
| योऽयं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत | |
| सेनानीः पुरुषव्याघ्र स्यालः परमदुर्मतिः | |
| स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि | |
| नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै | |
| तेनोपमन्त्र्यमाणाया वधार्हेण सपत्नहन् | |
| कालेनेव फलं पक्वं हृदयं मे विदीर्यते | |
| भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्द्यूतदेविनम् | |
| यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् | |
| को हि राज्यं परित्यज्य सर्वस्वं चात्मना सह | |
| प्रव्रज्यायैव दीव्येत विना दुर्द्यूतदेविनम् | |
| यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत्सारवद्धनम् | |
| सायंप्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान्बहून् | |
| रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्यमजाविकम् | |
| अश्वाश्वतरसंघांश्च न जातु क्षयमावहेत् | |
| सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रिया प्रत्यवरोपितः | |
| तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तयन् | |
| दश नागसहस्राणि पद्मिनां हेममालिनाम् | |
| यं यान्तमनुयान्तीह सोऽयं द्यूतेन जीवति | |
| तथा शतसहस्राणि नृणाममिततेजसाम् | |
| उपासते महाराजमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम् | |
| शतं दासीसहस्राणि यस्य नित्यं महानसे | |
| पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन्भोजयन्त्युत | |
| एष निष्कसहस्राणि प्रदाय ददतां वरः | |
| द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपावृतः | |
| एनं हि स्वरसंपन्ना बहवः सूतमागधाः | |
| सायंप्रातरुपातिष्ठन्सुमृष्टमणिकुण्डलाः | |
| सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन्सभासदः | |
| तपःश्रुतोपसंपन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः | |
| अन्धान्वृद्धांस्तथानाथान्सर्वान्राष्ट्रेषु दुर्गतान् | |
| बिभर्त्यविमना नित्यमानृशंस्याद्युधिष्ठिरः | |
| स एष निरयं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः | |
| सभायां देविता राज्ञः कङ्को ब्रूते युधिष्ठिरः | |
| इन्द्रप्रस्थे निवसतः समये यस्य पार्थिवाः | |
| आसन्बलिभृतः सर्वे सोऽद्यान्यैर्भृतिमिच्छति | |
| पार्थिवाः पृथिवीपाला यस्यासन्वशवर्तिनः | |
| स वशे विवशो राजा परेषामद्य वर्तते | |
| प्रताप्य पृथिवीं सर्वां रश्मिवानिव तेजसा | |
| सोऽयं राज्ञो विराटस्य सभास्तारो युधिष्ठिरः | |
| यमुपासन्त राजानः सभायामृषिभिः सह | |
| तमुपासीनमद्यान्यं पश्य पाण्डव पाण्डवम् | |
| अतदर्हं महाप्राज्ञं जीवितार्थेऽभिसंश्रितम् | |
| दृष्ट्वा कस्य न दुःखं स्याद्धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् | |
| उपास्ते स्म सभायां यं कृत्स्ना वीर वसुंधरा | |
| तमुपासीनमद्यान्यं पश्य भारत भारतम् | |
| एवं बहुविधैर्दुःखैः पीड्यमानामनाथवत् | |
| शोकसागरमध्यस्थां किं मां भीम न पश्यसि | |
| द्रौपद्युवाच | |
| इदं तु मे महद्दुःखं यत्प्रवक्ष्यामि भारत | |
| न मेऽभ्यसूया कर्तव्या दुःखादेतद्ब्रवीम्यहम् | |
| शार्दूलैर्महिषैः सिंहैरागारे युध्यसे यदा | |
| कैकेय्याः प्रेक्षमाणायास्तदा मे कश्मलो भवेत् | |
| प्रेक्षासमुत्थिता चापि कैकेयी ताः स्त्रियो वदेत् | |
| प्रेक्ष्य मामनवद्याङ्गी कश्मलोपहतामिव | |
| स्नेहात्संवासजान्मन्ये सूदमेषा शुचिस्मिता | |
| योध्यमानं महावीर्यैरिमं समनुशोचति | |
| कल्याणरूपा सैरन्ध्री बल्लवश्चातिसुन्दरः | |
| स्त्रीणां च चित्तं दुर्ज्ञेयं युक्तरूपौ च मे मतौ | |
| सैरन्ध्री प्रियसंवासान्नित्यं करुणवेदिनी | |
| अस्मिन्राजकुले चेमौ तुल्यकालनिवासिनौ | |
| इति ब्रुवाणा वाक्यानि सा मां नित्यमवेदयत् | |
| क्रुध्यन्तीं मां च संप्रेक्ष्य समशङ्कत मां त्वयि | |
| तस्यां तथा ब्रुवत्यां तु दुःखं मां महदाविशत् | |
| शोके यौधिष्ठिरे मग्ना नाहं जीवितुमुत्सहे | |
| यः सदेवान्मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजयत् | |
| सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा | |
| योऽतर्पयदमेयात्मा खाण्डवे जातवेदसम् | |
| सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः | |
| यस्माद्भयममित्राणां सदैव पुरुषर्षभात् | |
| स लोकपरिभूतेन वेषेणास्ते धनंजयः | |
| यस्य ज्यातलनिर्घोषात्समकम्पन्त शत्रवः | |
| स्त्रियो गीतस्वनं तस्य मुदिताः पर्युपासते | |
| किरीटं सूर्यसंकाशं यस्य मूर्धनि शोभते | |
| वेणीविकृतकेशान्तः सोऽयमद्य धनंजयः | |
| यस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि महात्मनि | |
| आधारः सर्वविद्यानां स धारयति कुण्डले | |
| यं स्म राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै | |
| समरे नातिवर्तन्ते वेलामिव महार्णवः | |
| सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा | |
| आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः | |
| यस्य स्म रथघोषेण समकम्पत मेदिनी | |
| सपर्वतवना भीम सहस्थावरजङ्गमा | |
| यस्मिञ्जाते महाभागे कुन्त्याः शोको व्यनश्यत | |
| स शोचयति मामद्य भीमसेन तवानुजः | |
| भूषितं तमलंकारैः कुण्डलैः परिहाटकैः | |
| कम्बुपाणिनमायान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः | |
| तं वेणीकृतकेशान्तं भीमधन्वानमर्जुनम् | |
| कन्यापरिवृतं दृष्ट्वा भीम सीदति मे मनः | |
| यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् | |
| प्रभिन्नमिव मातङ्गं परिकीर्णं करेणुभिः | |
| मत्स्यमर्थपतिं पार्थं विराटं समुपस्थितम् | |
| पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दिशो नश्यन्ति मे तदा | |
| नूनमार्या न जानाति कृच्छ्रं प्राप्तं धनंजयम् | |
| अजातशत्रुं कौरव्यं मग्नं दुर्द्यूतदेविनम् | |
| तथा दृष्ट्वा यवीयांसं सहदेवं युधां पतिम् | |
| गोषु गोवेषमायान्तं पाण्डुभूतास्मि भारत | |
| सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तयन्ती पुनः पुनः | |
| न विन्दामि महाबाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् | |
| यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुयात्सत्यविक्रमः | |
| दूयामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रियम् | |
| गोषु गोवृषसंकाशं मत्स्येनाभिनिवेशितम् | |
| संरब्धं रक्तनेपथ्यं गोपालानां पुरोगमम् | |
| विराटमभिनन्दन्तमथ मे भवति ज्वरः | |
| सहदेवं हि मे वीरं नित्यमार्या प्रशंसति | |
| महाभिजनसंपन्नो वृत्तवाञ्शीलवानिति | |
| ह्रीनिषेधो मधुरवाग्धार्मिकश्च प्रियश्च मे | |
| स तेऽरण्येषु बोद्धव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि | |
| तं दृष्ट्वा व्यापृतं गोषु वत्सचर्मक्षपाशयम् | |
| सहदेवं युधां श्रेष्ठं किं नु जीवामि पाण्डव | |
| यस्त्रिभिर्नित्यसंपन्नो रूपेणास्त्रेण मेधया | |
| सोऽश्वबन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् | |
| अभ्यकीर्यन्त वृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्षताम् | |
| विनयन्तं जवेनाश्वान्महाराजस्य पश्यतः | |
| अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम् | |
| विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शयन्तं च वाजिनः | |
| किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखितेति परंतप | |
| एवं दुःखशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्ततः | |
| अतः प्रतिविशिष्टानि दुःखान्यन्यानि भारत | |
| वर्तन्ते मयि कौन्तेय वक्ष्यामि शृणु तान्यपि | |
| युष्मासु ध्रियमाणेषु दुःखानि विविधान्युत | |
| शोषयन्ति शरीरं मे किं नु दुःखमतः परम् | |
| द्रौपद्युवाच | |
| अहं सैरन्ध्रिवेषेण चरन्ती राजवेश्मनि | |
| शौचदास्मि सुदेष्णाया अक्षधूर्तस्य कारणात् | |
| विक्रियां पश्य मे तीव्रां राजपुत्र्याः परंतप | |
| आसे कालमुपासीना सर्वं दुःखं किलार्तवत् | |
| अनित्या किल मर्त्यानामर्थसिद्धिर्जयाजयौ | |
| इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तॄणामुदयं पुनः | |
| य एव हेतुर्भवति पुरुषस्य जयावहः | |
| पराजये च हेतुः स इति च प्रतिपालये | |
| दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा वध्यन्ति चापरे | |
| पातयित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम् | |
| न दैवस्यातिभारोऽस्ति न दैवस्यातिवर्तनम् | |
| इति चाप्यागमं भूयो दैवस्य प्रतिपालये | |
| स्थितं पूर्वं जलं यत्र पुनस्तत्रैव तिष्ठति | |
| इति पर्यायमिच्छन्ती प्रतीक्षाम्युदयं पुनः | |
| दैवेन किल यस्यार्थः सुनीतोऽपि विपद्यते | |
| दैवस्य चागमे यत्नस्तेन कार्यो विजानता | |
| यत्तु मे वचनस्यास्य कथितस्य प्रयोजनम् | |
| पृच्छ मां दुःखितां तत्त्वमपृष्टा वा ब्रवीमि ते | |
| महिषी पाण्डुपुत्राणां दुहिता द्रुपदस्य च | |
| इमामवस्थां संप्राप्ता का मदन्या जिजीविषेत् | |
| कुरून्परिभवन्सर्वान्पाञ्चालानपि भारत | |
| पाण्डवेयांश्च संप्राप्तो मम क्लेशो ह्यरिंदम | |
| भ्रातृभिः श्वशुरैः पुत्रैर्बहुभिः परवीरहन् | |
| एवं समुदिता नारी का न्वन्या दुःखिता भवेत् | |
| नूनं हि बालया धातुर्मया वै विप्रियं कृतम् | |
| यस्य प्रसादाद्दुर्नीतं प्राप्तास्मि भरतर्षभ | |
| वर्णावकाशमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम् | |
| यादृशो मे न तत्रासीद्दुःखे परमके तदा | |
| त्वमेव भीम जानीषे यन्मे पार्थ सुखं पुरा | |
| साहं दासत्वमापन्ना न शान्तिमवशा लभे | |
| नादैविकमिदं मन्ये यत्र पार्थो धनंजयः | |
| भीमधन्वा महाबाहुरास्ते शान्त इवानलः | |
| अशक्या वेदितुं पार्थ प्राणिनां वै गतिर्नरैः | |
| विनिपातमिमं मन्ये युष्माकमविचिन्तितम् | |
| यस्या मम मुखप्रेक्षा यूयमिन्द्रसमाः सदा | |
| सा प्रेक्षे मुखमन्यासामवराणां वरा सती | |
| पश्य पाण्डव मेऽवस्थां यथा नार्हामि वै तथा | |
| युष्मासु ध्रियमाणेषु पश्य कालस्य पर्ययम् | |
| यस्याः सागरपर्यन्ता पृथिवी वशवर्तिनी | |
| आसीत्साद्य सुदेष्णाया भीताहं वशवर्तिनी | |
| यस्याः पुरःसरा आसन्पृष्ठतश्चानुगामिनः | |
| साहमद्य सुदेष्णायाः पुरः पश्चाच्च गामिनी | |
| इदं तु दुःखं कौन्तेय ममासह्यं निबोध तत् | |
| या न जातु स्वयं पिंषे गात्रोद्वर्तनमात्मनः | |
| अन्यत्र कुन्त्या भद्रं ते साद्य पिंषामि चन्दनम् | |
| पश्य कौन्तेय पाणी मे नैवं यौ भवतः पुरा | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्यस्य दर्शयामास किणबद्धौ करावुभौ | |
| द्रौपद्युवाच | |
| बिभेमि कुन्त्या या नाहं युष्माकं वा कदाचन | |
| साद्याग्रतो विराटस्य भीता तिष्ठामि किंकरी | |
| किं नु वक्ष्यति सम्राण्मां वर्णकः सुकृतो न वा | |
| नान्यपिष्टं हि मत्स्यस्य चन्दनं किल रोचते | |
| वैशंपायन उवाच | |
| सा कीर्तयन्ती दुःखानि भीमसेनस्य भामिनी | |
| रुरोद शनकैः कृष्णा भीमसेनमुदीक्षती | |
| सा बाष्पकलया वाचा निःश्वसन्ती पुनः पुनः | |
| हृदयं भीमसेनस्य घट्टयन्तीदमब्रवीत् | |
| नाल्पं कृतं मया भीम देवानां किल्बिषं पुरा | |
| अभाग्या यत्तु जीवामि मर्तव्ये सति पाण्डव | |
| ततस्तस्याः करौ शूनौ किणबद्धौ वृकोदरः | |
| मुखमानीय वेपन्त्या रुरोद परवीरहा | |
| तौ गृहीत्वा च कौन्तेयो बाष्पमुत्सृज्य वीर्यवान् | |
| ततः परमदुःखार्त इदं वचनमब्रवीत् | |
| भीमसेन उवाच | |
| धिगस्तु मे बाहुबलं गाण्डीवं फल्गुनस्य च | |
| यत्ते रक्तौ पुरा भूत्वा पाणी कृतकिणावुभौ | |
| सभायां स्म विराटस्य करोमि कदनं महत् | |
| तत्र मां धर्मराजस्तु कटाक्षेण न्यवारयत् | |
| तदहं तस्य विज्ञाय स्थित एवास्मि भामिनि | |
| यच्च राष्ट्रात्प्रच्यवनं कुरूणामवधश्च यः | |
| सुयोधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौबलस्य च | |
| दुःशासनस्य पापस्य यन्मया न हृतं शिरः | |
| तन्मे दहति कल्याणि हृदि शल्यमिवार्पितम् | |
| मा धर्मं जहि सुश्रोणि क्रोधं जहि महामते | |
| इमं च समुपालम्भं त्वत्तो राजा युधिष्ठिरः | |
| शृणुयाद्यदि कल्याणि कृत्स्नं जह्यात्स जीवितम् | |
| धनंजयो वा सुश्रोणि यमौ वा तनुमध्यमे | |
| लोकान्तरगतेष्वेषु नाहं शक्ष्यामि जीवितुम् | |
| सुकन्या नाम शार्याती भार्गवं च्यवनं वने | |
| वल्मीकभूतं शाम्यन्तमन्वपद्यत भामिनी | |
| नाडायनी चेन्द्रसेना रूपेण यदि ते श्रुता | |
| पतिमन्वचरद्वृद्धं पुरा वर्षसहस्रिणम् | |
| दुहिता जनकस्यापि वैदेही यदि ते श्रुता | |
| पतिमन्वचरत्सीता महारण्यनिवासिनम् | |
| रक्षसा निग्रहं प्राप्य रामस्य महिषी प्रिया | |
| क्लिश्यमानापि सुश्रोणी राममेवान्वपद्यत | |
| लोपामुद्रा तथा भीरु वयोरूपसमन्विता | |
| अगस्त्यमन्वयाद्धित्वा कामान्सर्वानमानुषान् | |
| यथैताः कीर्तिता नार्यो रूपवत्यः पतिव्रताः | |
| तथा त्वमपि कल्याणि सर्वैः समुदिता गुणैः | |
| मादीर्घं क्षम कालं त्वं मासमध्यर्धसंमितम् | |
| पूर्णे त्रयोदशे वर्षे राज्ञो राज्ञी भविष्यसि | |
| द्रौपद्युवाच | |
| आर्तयैतन्मया भीम कृतं बाष्पविमोक्षणम् | |
| अपारयन्त्या दुःखानि न राजानमुपालभे | |
| विमुक्तेन व्यतीतेन भीमसेन महाबल | |
| प्रत्युपस्थितकालस्य कार्यस्यानन्तरो भव | |
| ममेह भीम कैकेयी रूपाभिभवशङ्कया | |
| नित्यमुद्विजते राजा कथं नेयादिमामिति | |
| तस्या विदित्वा तं भावं स्वयं चानृतदर्शनः | |
| कीचकोऽयं सुदुष्टात्मा सदा प्रार्थयते हि माम् | |
| तमहं कुपिता भीम पुनः कोपं नियम्य च | |
| अब्रुवं कामसंमूढमात्मानं रक्ष कीचक | |
| गन्धर्वाणामहं भार्या पञ्चानां महिषी प्रिया | |
| ते त्वां निहन्युर्दुर्धर्षाः शूराः साहसकारिणः | |
| एवमुक्तः स दुष्टात्मा कीचकः प्रत्युवाच ह | |
| नाहं बिभेमि सैरन्ध्रि गन्धर्वाणां शुचिस्मिते | |
| शतं सहस्रमपि वा गन्धर्वाणामहं रणे | |
| समागतं हनिष्यामि त्वं भीरु कुरु मे क्षणम् | |
| इत्युक्ते चाब्रुवं सूतं कामातुरमहं पुनः | |
| न त्वं प्रतिबलस्तेषां गन्धर्वाणां यशस्विनाम् | |
| धर्मे स्थितास्मि सततं कुलशीलसमन्विता | |
| नेच्छामि कंचिद्वध्यन्तं तेन जीवसि कीचक | |
| एवमुक्तः स दुष्टात्मा प्रहस्य स्वनवत्तदा | |
| न तिष्ठति स्म सन्मार्गे न च धर्मं बुभूषति | |
| पापात्मा पापभावश्च कामरागवशानुगः | |
| अविनीतश्च दुष्टात्मा प्रत्याख्यातः पुनः पुनः | |
| दर्शने दर्शने हन्यात्तथा जह्यां च जीवितम् | |
| तद्धर्मे यतमानानां महान्धर्मो नशिष्यति | |
| समयं रक्षमाणानां भार्या वो न भविष्यति | |
| भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता | |
| प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः | |
| वदतां वर्णधर्मांश्च ब्राह्मणानां हि मे श्रुतम् | |
| क्षत्रियस्य सदा धर्मो नान्यः शत्रुनिबर्हणात् | |
| पश्यतो धर्मराजस्य कीचको मां पदावधीत् | |
| तव चैव समक्षं वै भीमसेन महाबल | |
| त्वया ह्यहं परित्राता तस्माद्घोराज्जटासुरात् | |
| जयद्रथं तथैव त्वमजैषीर्भ्रातृभिः सह | |
| जहीममपि पापं त्वं योऽयं मामवमन्यते | |
| कीचको राजवाल्लभ्याच्छोककृन्मम भारत | |
| तमेवं कामसंमत्तं भिन्धि कुम्भमिवाश्मनि | |
| यो निमित्तमनर्थानां बहूनां मम भारत | |
| तं चेज्जीवन्तमादित्यः प्रातरभ्युदयिष्यति | |
| विषमालोड्य पास्यामि मा कीचकवशं गमम् | |
| श्रेयो हि मरणं मह्यं भीमसेन तवाग्रतः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा भीमस्योरः समाश्रिता | |
| भीमश्च तां परिष्वज्य महत्सान्त्वं प्रयुज्य च | |
| कीचकं मनसागच्छत्सृक्किणी परिसंलिहन् | |
| भीमसेन उवाच | |
| तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे | |
| अद्य तं सूदयिष्यामि कीचकं सहबान्धवम् | |
| अस्याः प्रदोषे शर्वर्याः कुरुष्वानेन संगमम् | |
| दुःखं शोकं च निर्धूय याज्ञसेनि शुचिस्मिते | |
| यैषा नर्तनशाला वै मत्स्यराजेन कारिता | |
| दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति यथागृहम् | |
| तत्रास्ति शयनं भीरु दृढाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् | |
| तत्रास्य दर्शयिष्यामि पूर्वप्रेतान्पितामहान् | |
| यथा च त्वां न पश्येयुः कुर्वाणां तेन संविदम् | |
| कुर्यास्तथा त्वं कल्याणि यथा संनिहितो भवेत् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथा तौ कथयित्वा तु बाष्पमुत्सृज्य दुःखितौ | |
| रात्रिशेषं तदत्युग्रं धारयामासतुर्हृदा | |
| तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय कीचकः | |
| गत्वा राजकुलायैव द्रौपदीमिदमब्रवीत् | |
| सभायां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदाहनम् | |
| न चैवालभथास्त्राणमभिपन्ना बलीयसा | |
| प्रवादेन हि मत्स्यानां राजा नाम्नायमुच्यते | |
| अहमेव हि मत्स्यानां राजा वै वाहिनीपतिः | |
| सा सुखं प्रतिपद्यस्व दासो भीरु भवामि ते | |
| अह्नाय तव सुश्रोणि शतं निष्कान्ददाम्यहम् | |
| दासीशतं च ते दद्यां दासानामपि चापरम् | |
| रथं चाश्वतरीयुक्तमस्तु नौ भीरु संगमः | |
| द्रौपद्युवाच | |
| एकं मे समयं त्वद्य प्रतिपद्यस्व कीचक | |
| न त्वां सखा वा भ्राता वा जानीयात्संगतं मया | |
| अवबोधाद्धि भीतास्मि गन्धर्वाणां यशस्विनाम् | |
| एवं मे प्रतिजानीहि ततोऽहं वशगा तव | |
| कीचक उवाच | |
| एवमेतत्करिष्यामि यथा सुश्रोणि भाषसे | |
| एको भद्रे गमिष्यामि शून्यमावसथं तव | |
| समागमार्थं रम्भोरु त्वया मदनमोहितः | |
| यथा त्वां नावभोत्स्यन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः | |
| द्रौपद्युवाच | |
| यदिदं नर्तनागारं मत्स्यराजेन कारितम् | |
| दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति यथागृहम् | |
| तमिस्रे तत्र गच्छेथा गन्धर्वास्तन्न जानते | |
| तत्र दोषः परिहृतो भविष्यति न संशयः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तमर्थं प्रतिजल्पन्त्याः कृष्णायाः कीचकेन ह | |
| दिवसार्धं समभवन्मासेनैव समं नृप | |
| कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः | |
| सैरन्ध्रीरूपिणं मूढो मृत्युं तं नावबुद्धवान् | |
| गन्धाभरणमाल्येषु व्यासक्तः स विशेषतः | |
| अलंचकार सोऽऽत्मानं सत्वरः काममोहितः | |
| तस्य तत्कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् | |
| अनुचिन्तयतश्चापि तामेवायतलोचनाम् | |
| आसीदभ्यधिका चास्य श्रीः श्रियं प्रमुमुक्षतः | |
| निर्वाणकाले दीपस्य वर्तीमिव दिधक्षतः | |
| कृतसंप्रत्ययस्तत्र कीचकः काममोहितः | |
| नाजानाद्दिवसं यान्तं चिन्तयानः समागमम् | |
| ततस्तु द्रौपदी गत्वा तदा भीमं महानसे | |
| उपातिष्ठत कल्याणी कौरव्यं पतिमन्तिकात् | |
| तमुवाच सुकेशान्ता कीचकस्य मया कृतः | |
| संगमो नर्तनागारे यथावोचः परंतप | |
| शून्यं स नर्तनागारमागमिष्यति कीचकः | |
| एको निशि महाबाहो कीचकं तं निषूदय | |
| तं सूतपुत्रं कौन्तेय कीचकं मददर्पितम् | |
| गत्वा त्वं नर्तनागारं निर्जीवं कुरु पाण्डव | |
| दर्पाच्च सूतपुत्रोऽसौ गन्धर्वानवमन्यते | |
| तं त्वं प्रहरतां श्रेष्ठ नडं नाग इवोद्धर | |
| अश्रु दुःखाभिभूताया मम मार्जस्व भारत | |
| आत्मनश्चैव भद्रं ते कुरु मानं कुलस्य च | |
| भीमसेन उवाच | |
| स्वागतं ते वरारोहे यन्मा वेदयसे प्रियम् | |
| न ह्यस्य कंचिदिच्छामि सहायं वरवर्णिनि | |
| या मे प्रीतिस्त्वयाख्याता कीचकस्य समागमे | |
| हत्वा हिडिम्बं सा प्रीतिर्ममासीद्वरवर्णिनि | |
| सत्यं भ्रातॄंश्च धर्मं च पुरस्कृत्य ब्रवीमि ते | |
| कीचकं निहनिष्यामि वृत्रं देवपतिर्यथा | |
| तं गह्वरे प्रकाशे वा पोथयिष्यामि कीचकम् | |
| अथ चेदवभोत्स्यन्ति हंस्ये मत्स्यानपि ध्रुवम् | |
| ततो दुर्योधनं हत्वा प्रतिपत्स्ये वसुंधराम् | |
| कामं मत्स्यमुपास्तां हि कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| द्रौपद्युवाच | |
| यथा न संत्यजेथास्त्वं सत्यं वै मत्कृते विभो | |
| निगूढस्त्वं तथा वीर कीचकं विनिपातय | |
| भीमसेन उवाच | |
| एवमेतत्करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे | |
| अदृश्यमानस्तस्याद्य तमस्विन्यामनिन्दिते | |
| नागो बिल्वमिवाक्रम्य पोथयिष्याम्यहं शिरः | |
| अलभ्यामिच्छतस्तस्य कीचकस्य दुरात्मनः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| भीमोऽथ प्रथमं गत्वा रात्रौ छन्न उपाविशत् | |
| मृगं हरिरिवादृश्यः प्रत्याकाङ्क्षत्स कीचकम् | |
| कीचकश्चाप्यलंकृत्य यथाकाममुपाव्रजत् | |
| तां वेलां नर्तनागारे पाञ्चालीसंगमाशया | |
| मन्यमानः स संकेतमागारं प्राविशच्च तम् | |
| प्रविश्य च स तद्वेश्म तमसा संवृतं महत् | |
| पूर्वागतं ततस्तत्र भीममप्रतिमौजसम् | |
| एकान्तमास्थितं चैनमाससाद सुदुर्मतिः | |
| शयानं शयने तत्र मृत्युं सूतः परामृशत् | |
| जाज्वल्यमानं कोपेन कृष्णाधर्षणजेन ह | |
| उपसंगम्य चैवैनं कीचकः काममोहितः | |
| हर्षोन्मथितचित्तात्मा स्मयमानोऽभ्यभाषत | |
| प्रापितं ते मया वित्तं बहुरूपमनन्तकम् | |
| तत्सर्वं त्वां समुद्दिश्य सहसा समुपागतः | |
| नाकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगताः स्त्रियः | |
| सुवासा दर्शनीयश्च नान्योऽस्ति त्वादृशः पुमान् | |
| भीमसेन उवाच | |
| दिष्ट्या त्वं दर्शनीयोऽसि दिष्ट्यात्मानं प्रशंससि | |
| ईदृशस्तु त्वया स्पर्शः स्पृष्टपूर्वो न कर्हिचित् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः | |
| समुत्पत्य च कौन्तेयः प्रहस्य च नराधमम् | |
| भीमो जग्राह केशेषु माल्यवत्सु सुगन्धिषु | |
| स केशेषु परामृष्टो बलेन बलिनां वरः | |
| आक्षिप्य केशान्वेगेन बाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् | |
| बाहुयुद्धं तयोरासीत्क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः | |
| वसन्ते वाशिताहेतोर्बलवद्गजयोरिव | |
| ईषदागलितं चापि क्रोधाच्चलपदं स्थितम् | |
| कीचको बलवान्भीमं जानुभ्यामाक्षिपद्भुवि | |
| पातितो भुवि भीमस्तु कीचकेन बलीयसा | |
| उत्पपाताथ वेगेन दण्डाहत इवोरगः | |
| स्पर्धया च बलोन्मत्तौ तावुभौ सूतपाण्डवौ | |
| निशीथे पर्यकर्षेतां बलिनौ निशि निर्जने | |
| ततस्तद्भवनश्रेष्ठं प्राकम्पत मुहुर्मुहुः | |
| बलवच्चापि संक्रुद्धावन्योन्यं तावगर्जताम् | |
| तलाभ्यां तु स भीमेन वक्षस्यभिहतो बली | |
| कीचको रोषसंतप्तः पदान्न चलितः पदम् | |
| मुहूर्तं तु स तं वेगं सहित्वा भुवि दुःसहम् | |
| बलादहीयत तदा सूतो भीमबलार्दितः | |
| तं हीयमानं विज्ञाय भीमसेनो महाबलः | |
| वक्षस्यानीय वेगेन ममन्थैनं विचेतसम् | |
| क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः | |
| जग्राह जयतां श्रेष्ठः केशेष्वेव तदा भृशम् | |
| गृहीत्वा कीचकं भीमो विरुराव महाबलः | |
| शार्दूलः पिशिताकाङ्क्षी गृहीत्वेव महामृगम् | |
| तस्य पादौ च पाणी च शिरो ग्रीवां च सर्वशः | |
| काये प्रवेशयामास पशोरिव पिनाकधृक् | |
| तं संमथितसर्वाङ्गं मांसपिण्डोपमं कृतम् | |
| कृष्णायै दर्शयामास भीमसेनो महाबलः | |
| उवाच च महातेजा द्रौपदीं पाण्डुनन्दनः | |
| पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽयं यथा कृतः | |
| तथा स कीचकं हत्वा गत्वा रोषस्य वै शमम् | |
| आमन्त्र्य द्रौपदीं कृष्णां क्षिप्रमायान्महानसम् | |
| कीचकं घातयित्वा तु द्रौपदी योषितां वरा | |
| प्रहृष्टा गतसंतापा सभापालानुवाच ह | |
| कीचकोऽयं हतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम | |
| परस्त्रीकामसंमत्तः समागच्छत पश्यत | |
| तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या नर्तनागाररक्षिणः | |
| सहसैव समाजग्मुरादायोल्काः सहस्रशः | |
| ततो गत्वाथ तद्वेश्म कीचकं विनिपातितम् | |
| गतासुं ददृशुर्भूमौ रुधिरेण समुक्षितम् | |
| क्वास्य ग्रीवा क्व चरणौ क्व पाणी क्व शिरस्तथा | |
| इति स्म तं परीक्षन्ते गन्धर्वेण हतं तदा | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तस्मिन्काले समागम्य सर्वे तत्रास्य बान्धवाः | |
| रुरुदुः कीचकं दृष्ट्वा परिवार्य समन्ततः | |
| सर्वे संहृष्टरोमाणः संत्रस्ताः प्रेक्ष्य कीचकम् | |
| तथा सर्वाङ्गसंभुग्नं कूर्मं स्थल इवोद्धृतम् | |
| पोथितं भीमसेनेन तमिन्द्रेणेव दानवम् | |
| संस्कारयितुमिच्छन्तो बहिर्नेतुं प्रचक्रमुः | |
| ददृशुस्ते ततः कृष्णां सूतपुत्राः समागताः | |
| अदूरादनवद्याङ्गीं स्तम्भमालिङ्ग्य तिष्ठतीम् | |
| समवेतेषु सूतेषु तानुवाचोपकीचकः | |
| हन्यतां शीघ्रमसती यत्कृते कीचको हतः | |
| अथ वा नेह हन्तव्या दह्यतां कामिना सह | |
| मृतस्यापि प्रियं कार्यं सूतपुत्रस्य सर्वथा | |
| ततो विराटमूचुस्ते कीचकोऽस्याः कृते हतः | |
| सहाद्यानेन दह्येत तदनुज्ञातुमर्हसि | |
| पराक्रमं तु सूतानां मत्वा राजान्वमोदत | |
| सैरन्ध्र्याः सूतपुत्रेण सह दाहं विशां पते | |
| तां समासाद्य वित्रस्तां कृष्णां कमललोचनाम् | |
| मोमुह्यमानां ते तत्र जगृहुः कीचका भृशम् | |
| ततस्तु तां समारोप्य निबध्य च सुमध्यमाम् | |
| जग्मुरुद्यम्य ते सर्वे श्मशानमभितस्तदा | |
| ह्रियमाणा तु सा राजन्सूतपुत्रैरनिन्दिता | |
| प्राक्रोशन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती | |
| द्रौपद्युवाच | |
| जयो जयन्तो विजयो जयत्सेनो जयद्बलः | |
| ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् | |
| येषां ज्यातलनिर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः | |
| व्यश्रूयत महायुद्धे भीमघोषस्तरस्विनाम् | |
| रथघोषश्च बलवान्गन्धर्वाणां यशस्विनाम् | |
| ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तस्यास्ताः कृपणा वाचः कृष्णायाः परिदेविताः | |
| श्रुत्वैवाभ्यपतद्भीमः शयनादविचारयन् | |
| भीमसेन उवाच | |
| अहं शृणोमि ते वाचं त्वया सैरन्ध्रि भाषिताम् | |
| तस्मात्ते सूतपुत्रेभ्यो न भयं भीरु विद्यते | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्युक्त्वा स महाबाहुर्विजजृम्भे जिघांसया | |
| ततः स व्यायतं कृत्वा वेषं विपरिवर्त्य च | |
| अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य निर्जगाम बहिस्तदा | |
| स भीमसेनः प्राकारादारुज्य तरसा द्रुमम् | |
| श्मशानाभिमुखः प्रायाद्यत्र ते कीचका गताः | |
| स तं वृक्षं दशव्यामं सस्कन्धविटपं बली | |
| प्रगृह्याभ्यद्रवत्सूतान्दण्डपाणिरिवान्तकः | |
| ऊरुवेगेन तस्याथ न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकाः | |
| भूमौ निपतिता वृक्षाः संघशस्तत्र शेरते | |
| तं सिंहमिव संक्रुद्धं दृष्ट्वा गन्धर्वमागतम् | |
| वित्रेसुः सर्वतः सूता विषादभयकम्पिताः | |
| तमन्तकमिवायान्तं गन्धर्वं प्रेक्ष्य ते तदा | |
| दिधक्षन्तस्तदा ज्येष्ठं भ्रातरं ह्युपकीचकाः | |
| परस्परमथोचुस्ते विषादभयकम्पिताः | |
| गन्धर्वो बलवानेति क्रुद्ध उद्यम्य पादपम् | |
| सैरन्ध्री मुच्यतां शीघ्रं महन्नो भयमागतम् | |
| ते तु दृष्ट्वा तमाविद्धं भीमसेनेन पादपम् | |
| विमुच्य द्रौपदीं तत्र प्राद्रवन्नगरं प्रति | |
| द्रवतस्तांस्तु संप्रेक्ष्य स वज्री दानवानिव | |
| शतं पञ्चाधिकं भीमः प्राहिणोद्यमसादनम् | |
| तत आश्वासयत्कृष्णां प्रविमुच्य विशां पते | |
| उवाच च महाबाहुः पाञ्चालीं तत्र द्रौपदीम् | |
| अश्रुपूर्णमुखीं दीनां दुर्धर्षः स वृकोदरः | |
| एवं ते भीरु वध्यन्ते ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् | |
| प्रैहि त्वं नगरं कृष्णे न भयं विद्यते तव | |
| अन्येनाहं गमिष्यामि विराटस्य महानसम् | |
| पञ्चाधिकं शतं तच्च निहतं तत्र भारत | |
| महावनमिव छिन्नं शिश्ये विगलितद्रुमम् | |
| एवं ते निहता राजञ्शतं पञ्च च कीचकाः | |
| स च सेनापतिः पूर्वमित्येतत्सूतषट्शतम् | |
| तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नरा नार्यश्च संगताः | |
| विस्मयं परमं गत्वा नोचुः किंचन भारत | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ते दृष्ट्वा निहतान्सूतान्राज्ञे गत्वा न्यवेदयन् | |
| गन्धर्वैर्निहता राजन्सूतपुत्राः परःशताः | |
| यथा वज्रेण वै दीर्णं पर्वतस्य महच्छिरः | |
| विनिकीर्णं प्रदृश्येत तथा सूता महीतले | |
| सैरन्ध्री च विमुक्तासौ पुनरायाति ते गृहम् | |
| सर्वं संशयितं राजन्नगरं ते भविष्यति | |
| तथारूपा हि सैरन्ध्री गन्धर्वाश्च महाबलाः | |
| पुंसामिष्टश्च विषयो मैथुनाय न संशयः | |
| यथा सैरन्ध्रिवेषेण न ते राजन्निदं पुरम् | |
| विनाशमेति वै क्षिप्रं तथा नीतिर्विधीयताम् | |
| तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विराटो वाहिनीपतिः | |
| अब्रवीत्क्रियतामेषां सूतानां परमक्रिया | |
| एकस्मिन्नेव ते सर्वे सुसमिद्धे हुताशने | |
| दह्यन्तां कीचकाः शीघ्रं रत्नैर्गन्धैश्च सर्वशः | |
| सुदेष्णां चाब्रवीद्राजा महिषीं जातसाध्वसः | |
| सैरन्ध्रीमागतां ब्रूया ममैव वचनादिदम् | |
| गच्छ सैरन्ध्रि भद्रं ते यथाकामं चराबले | |
| बिभेति राजा सुश्रोणि गन्धर्वेभ्यः पराभवात् | |
| न हि तामुत्सहे वक्तुं स्वयं गन्धर्वरक्षिताम् | |
| स्त्रियस्त्वदोषास्तां वक्तुमतस्त्वां प्रब्रवीम्यहम् | |
| अथ मुक्ता भयात्कृष्णा सूतपुत्रान्निरस्य च | |
| मोक्षिता भीमसेनेन जगाम नगरं प्रति | |
| त्रासितेव मृगी बाला शार्दूलेन मनस्विनी | |
| गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा | |
| तां दृष्ट्वा पुरुषा राजन्प्राद्रवन्त दिशो दश | |
| गन्धर्वाणां भयत्रस्ताः केचिद्दृष्टीर्न्यमीलयन् | |
| ततो महानसद्वारि भीमसेनमवस्थितम् | |
| ददर्श राजन्पाञ्चाली यथा मत्तं महाद्विपम् | |
| तं विस्मयन्ती शनकैः संज्ञाभिरिदमब्रवीत् | |
| गन्धर्वराजाय नमो येनास्मि परिमोचिता | |
| भीमसेन उवाच | |
| ये यस्या विचरन्तीह पुरुषा वशवर्तिनः | |
| तस्यास्ते वचनं श्रुत्वा अनृणा विचरन्त्युत | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः सा नर्तनागारे धनंजयमपश्यत | |
| राज्ञः कन्या विराटस्य नर्तयानं महाभुजम् | |
| ततस्ता नर्तनागाराद्विनिष्क्रम्य सहार्जुनाः | |
| कन्या ददृशुरायान्तीं कृष्णां क्लिष्टामनागसम् | |
| कन्या ऊचुः | |
| दिष्ट्या सैरन्ध्रि मुक्तासि दिष्ट्यासि पुनरागता | |
| दिष्ट्या विनिहताः सूता ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् | |
| बृहन्नडोवाच | |
| कथं सैरन्ध्रि मुक्तासि कथं पापाश्च ते हताः | |
| इच्छामि वै तव श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् | |
| सैरन्ध्र्युवाच | |
| बृहन्नडे किं नु तव सैरन्ध्र्या कार्यमद्य वै | |
| या त्वं वससि कल्याणि सदा कन्यापुरे सुखम् | |
| न हि दुःखं समाप्नोषि सैरन्ध्री यदुपाश्नुते | |
| तेन मां दुःखितामेवं पृच्छसे प्रहसन्निव | |
| बृहन्नडोवाच | |
| बृहन्नडापि कल्याणि दुःखमाप्नोत्यनुत्तमम् | |
| तिर्यग्योनिगता बाले न चैनामवबुध्यसे | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः सहैव कन्याभिर्द्रौपदी राजवेश्म तत् | |
| प्रविवेश सुदेष्णायाः समीपमपलायिनी | |
| तामब्रवीद्राजपुत्री विराटवचनादिदम् | |
| सैरन्ध्रि गम्यतां शीघ्रं यत्र कामयसे गतिम् | |
| राजा बिभेति भद्रं ते गन्धर्वेभ्यः पराभवात् | |
| त्वं चापि तरुणी सुभ्रु रूपेणाप्रतिमा भुवि | |
| सैरन्ध्र्युवाच | |
| त्रयोदशाहमात्रं मे राजा क्षमतु भामिनि | |
| कृतकृत्या भविष्यन्ति गन्धर्वास्ते न संशयः | |
| ततो मां तेऽपनेष्यन्ति करिष्यन्ति च ते प्रियम् | |
| ध्रुवं च श्रेयसा राजा योक्ष्यते सह बान्धवैः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| कीचकस्य तु घातेन सानुजस्य विशां पते | |
| अत्याहितं चिन्तयित्वा व्यस्मयन्त पृथग्जनाः | |
| तस्मिन्पुरे जनपदे संजल्पोऽभूच्च सर्वशः | |
| शौर्याद्धि वल्लभो राज्ञो महासत्त्वश्च कीचकः | |
| आसीत्प्रहर्ता च नृणां दारामर्शी च दुर्मतिः | |
| स हतः खलु पापात्मा गन्धर्वैर्दुष्टपूरुषः | |
| इत्यजल्पन्महाराज परानीकविशातनम् | |
| देशे देशे मनुष्याश्च कीचकं दुष्प्रधर्षणम् | |
| अथ वै धार्तराष्ट्रेण प्रयुक्ता ये बहिश्चराः | |
| मृगयित्वा बहून्ग्रामान्राष्ट्राणि नगराणि च | |
| संविधाय यथादिष्टं यथादेशप्रदर्शनम् | |
| कृतचिन्ता न्यवर्तन्त ते च नागपुरं प्रति | |
| तत्र दृष्ट्वा तु राजानं कौरव्यं धृतराष्ट्रजम् | |
| द्रोणकर्णकृपैः सार्धं भीष्मेण च महात्मना | |
| संगतं भ्रातृभिश्चापि त्रिगर्तैश्च महारथैः | |
| दुर्योधनं सभामध्ये आसीनमिदमब्रुवन् | |
| कृतोऽस्माभिः परो यत्नस्तेषामन्वेषणे सदा | |
| पाण्डवानां मनुष्येन्द्र तस्मिन्महति कानने | |
| निर्जने मृगसंकीर्णे नानाद्रुमलतावृते | |
| लताप्रतानबहुले नानागुल्मसमावृते | |
| न च विद्मो गता येन पार्थाः स्युर्दृढविक्रमाः | |
| मार्गमाणाः पदन्यासं तेषु तेषु तथा तथा | |
| गिरिकूटेषु तुङ्गेषु नानाजनपदेषु च | |
| जनाकीर्णेषु देशेषु खर्वटेषु पुरेषु च | |
| नरेन्द्र बहुशोऽन्विष्टा नैव विद्मश्च पाण्डवान् | |
| अत्यन्तभावं नष्टास्ते भद्रं तुभ्यं नरर्षभ | |
| वर्त्मान्यन्विष्यमाणास्तु रथानां रथसत्तम | |
| कंचित्कालं मनुष्येन्द्र सूतानामनुगा वयम् | |
| मृगयित्वा यथान्यायं विदितार्थाः स्म तत्त्वतः | |
| प्राप्ता द्वारवतीं सूता ऋते पार्थैः परंतप | |
| न तत्र पाण्डवा राजन्नापि कृष्णा पतिव्रता | |
| सर्वथा विप्रनष्टास्ते नमस्ते भरतर्षभ | |
| न हि विद्मो गतिं तेषां वासं वापि महात्मनाम् | |
| पाण्डवानां प्रवृत्तिं वा विद्मः कर्मापि वा कृतम् | |
| स नः शाधि मनुष्येन्द्र अत ऊर्ध्वं विशां पते | |
| अन्वेषणे पाण्डवानां भूयः किं करवामहे | |
| इमां च नः प्रियामीक्ष वाचं भद्रवतीं शुभाम् | |
| येन त्रिगर्ता निकृता बलेन महता नृप | |
| सूतेन राज्ञो मत्स्यस्य कीचकेन महात्मना | |
| स हतः पतितः शेते गन्धर्वैर्निशि भारत | |
| अदृश्यमानैर्दुष्टात्मा सह भ्रातृभिरच्युत | |
| प्रियमेतदुपश्रुत्य शत्रूणां तु पराभवम् | |
| कृतकृत्यश्च कौरव्य विधत्स्व यदनन्तरम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो दुर्योधनो राजा श्रुत्वा तेषां वचस्तदा | |
| चिरमन्तर्मना भूत्वा प्रत्युवाच सभासदः | |
| सुदुःखा खलु कार्याणां गतिर्विज्ञातुमन्ततः | |
| तस्मात्सर्वे उदीक्षध्वं क्व नु स्युः पाण्डवा गताः | |
| अल्पावशिष्टं कालस्य गतभूयिष्ठमन्ततः | |
| तेषामज्ञातचर्यायामस्मिन्वर्षे त्रयोदशे | |
| अस्य वर्षस्य शेषं चेद्व्यतीयुरिह पाण्डवाः | |
| निवृत्तसमयास्ते हि सत्यव्रतपरायणाः | |
| क्षरन्त इव नागेन्द्राः सर्व आशीविषोपमाः | |
| दुःखा भवेयुः संरब्धाः कौरवान्प्रति ते ध्रुवम् | |
| अर्वाक्कालस्य विज्ञाताः कृच्छ्ररूपधराः पुनः | |
| प्रविशेयुर्जितक्रोधास्तावदेव पुनर्वनम् | |
| तस्मात्क्षिप्रं बुभुत्सध्वं यथा नोऽत्यन्तमव्ययम् | |
| राज्यं निर्द्वन्द्वमव्यग्रं निःसपत्नं चिरं भवेत् | |
| अथाब्रवीत्ततः कर्णः क्षिप्रं गच्छन्तु भारत | |
| अन्ये धूर्ततरा दक्षा निभृताः साधुकारिणः | |
| चरन्तु देशान्संवीताः स्फीताञ्जनपदाकुलान् | |
| तत्र गोष्ठीष्वथान्यासु सिद्धप्रव्रजितेषु च | |
| परिचारेषु तीर्थेषु विविधेष्वाकरेषु च | |
| विज्ञातव्या मनुष्यैस्तैस्तर्कया सुविनीतया | |
| विविधैस्तत्परैः सम्यक्तज्ज्ञैर्निपुणसंवृतैः | |
| अन्वेष्टव्याश्च निपुणं पाण्डवाश्छन्नवासिनः | |
| नदीकुञ्जेषु तीर्थेषु ग्रामेषु नगरेषु च | |
| आश्रमेषु च रम्येषु पर्वतेषु गुहासु च | |
| अथाग्रजानन्तरजः पापभावानुरागिणम् | |
| ज्येष्ठं दुःशासनस्तत्र भ्राता भ्रातरमब्रवीत् | |
| एतच्च कर्णो यत्प्राह सर्वमीक्षामहे तथा | |
| यथोद्दिष्टं चराः सर्वे मृगयन्तु ततस्ततः | |
| एते चान्ये च भूयांसो देशाद्देशं यथाविधि | |
| न तु तेषां गतिर्वासः प्रवृत्तिश्चोपलभ्यते | |
| अत्याहितं वा गूढास्ते पारं वोर्मिमतो गताः | |
| व्यालैर्वापि महारण्ये भक्षिताः शूरमानिनः | |
| अथ वा विषमं प्राप्य विनष्टाः शाश्वतीः समाः | |
| तस्मान्मानसमव्यग्रं कृत्वा त्वं कुरुनन्दन | |
| कुरु कार्यं यथोत्साहं मन्यसे यन्नराधिप | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथाब्रवीन्महावीर्यो द्रोणस्तत्त्वार्थदर्शिवान् | |
| न तादृशा विनश्यन्ति नापि यान्ति पराभवम् | |
| शूराश्च कृतविद्याश्च बुद्धिमन्तो जितेन्द्रियाः | |
| धर्मज्ञाश्च कृतज्ञाश्च धर्मराजमनुव्रताः | |
| नीतिधर्मार्थतत्त्वज्ञं पितृवच्च समाहितम् | |
| धर्मे स्थितं सत्यधृतिं ज्येष्ठं ज्येष्ठापचायिनम् | |
| अनुव्रता महात्मानं भ्रातरं भ्रातरो नृप | |
| अजातशत्रुं ह्रीमन्तं तं च भ्रातॄननुव्रतम् | |
| तेषां तथा विधेयानां निभृतानां महात्मनाम् | |
| किमर्थं नीतिमान्पार्थः श्रेयो नैषां करिष्यति | |
| तस्माद्यत्नात्प्रतीक्षन्ते कालस्योदयमागतम् | |
| न हि ते नाशमृच्छेयुरिति पश्याम्यहं धिया | |
| सांप्रतं चैव यत्कार्यं तच्च क्षिप्रमकालिकम् | |
| क्रियतां साधु संचिन्त्य वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम् | |
| यथावत्पाण्डुपुत्राणां सर्वार्थेषु धृतात्मनाम् | |
| दुर्ज्ञेयाः खलु शूरास्ते अपापास्तपसा वृताः | |
| शुद्धात्मा गुणवान्पार्थः सत्यवान्नीतिमाञ्शुचिः | |
| तेजोराशिरसंख्येयो गृह्णीयादपि चक्षुषी | |
| विज्ञाय क्रियतां तस्माद्भूयश्च मृगयामहे | |
| ब्राह्मणैश्चारकैः सिद्धैर्ये चान्ये तद्विदो जनाः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः शांतनवो भीष्मो भरतानां पितामहः | |
| श्रुतवान्देशकालज्ञस्तत्त्वज्ञः सर्वधर्मवित् | |
| आचार्यवाक्योपरमे तद्वाक्यमभिसंदधत् | |
| हितार्थं स उवाचेमां भारतीं भारतान्प्रति | |
| युधिष्ठिरे समासक्तां धर्मज्ञे धर्मसंश्रिताम् | |
| असत्सु दुर्लभां नित्यं सतां चाभिमतां सदा | |
| भीष्मः समवदत्तत्र गिरं साधुभिरर्चिताम् | |
| यथैष ब्राह्मणः प्राह द्रोणः सर्वार्थतत्त्ववित् | |
| सर्वलक्षणसंपन्ना नाशं नार्हन्ति पाण्डवाः | |
| श्रुतवृत्तोपसंपन्नाः साधुव्रतसमन्विताः | |
| वृद्धानुशासने मग्नाः सत्यव्रतपरायणाः | |
| समयं समयज्ञास्ते पालयन्तः शुचिव्रताः | |
| नावसीदितुमर्हन्ति उद्वहन्तः सतां धुरम् | |
| धर्मतश्चैव गुप्तास्ते स्ववीर्येण च पाण्डवाः | |
| न नाशमधिगच्छेयुरिति मे धीयते मतिः | |
| तत्र बुद्धिं प्रणेष्यामि पाण्डवान्प्रति भारत | |
| न तु नीतिः सुनीतस्य शक्यतेऽन्वेषितुं परैः | |
| यत्तु शक्यमिहास्माभिस्तान्वै संचिन्त्य पाण्डवान् | |
| बुद्ध्या प्रवक्तुं न द्रोहात्प्रवक्ष्यामि निबोध तत् | |
| सा त्वियं साधु वक्तव्या न त्वनीतिः कथंचन | |
| वृद्धानुशासने तात तिष्ठतः सत्यशीलिनः | |
| अवश्यं त्विह धीरेण सतां मध्ये विवक्षता | |
| यथामति विवक्तव्यं सर्वशो धर्मलिप्सया | |
| तत्र नाहं तथा मन्ये यथायमितरो जनः | |
| पुरे जनपदे वापि यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| नासूयको न चापीर्षुर्नातिवादी न मत्सरी | |
| भविष्यति जनस्तत्र स्वं स्वं धर्ममनुव्रतः | |
| ब्रह्मघोषाश्च भूयांसः पूर्णाहुत्यस्तथैव च | |
| क्रतवश्च भविष्यन्ति भूयांसो भूरिदक्षिणाः | |
| सदा च तत्र पर्जन्यः सम्यग्वर्षी न संशयः | |
| संपन्नसस्या च मही निरीतीका भविष्यति | |
| रसवन्ति च धान्यानि गुणवन्ति फलानि च | |
| गन्धवन्ति च माल्यानि शुभशब्दा च भारती | |
| वायुश्च सुखसंस्पर्शो निष्प्रतीपं च दर्शनम् | |
| भयं नाभ्याविशेत्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| गावश्च बहुलास्तत्र न कृशा न च दुर्दुहाः | |
| पयांसि दधिसर्पींषि रसवन्ति हितानि च | |
| गुणवन्ति च पानानि भोज्यानि रसवन्ति च | |
| तत्र देशे भविष्यन्ति यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| रसाः स्पर्शाश्च गन्धाश्च शब्दाश्चापि गुणान्विताः | |
| दृश्यानि च प्रसन्नानि यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| स्वैः स्वैर्गुणैः सुसंयुक्तास्तस्मिन्वर्षे त्रयोदशे | |
| देशे तस्मिन्भविष्यन्ति तात पाण्डवसंयुते | |
| संप्रीतिमाञ्जनस्तत्र संतुष्टः शुचिरव्ययः | |
| देवतातिथिपूजासु सर्वभूतानुरागवान् | |
| इष्टदानो महोत्साहः शश्वद्धर्मपरायणः | |
| अशुभद्विट्शुभप्रेप्सुर्नित्ययज्ञः शुभव्रतः | |
| भविष्यति जनस्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| त्यक्तवाक्यानृतस्तात शुभकल्याणमङ्गलः | |
| शुभार्थेप्सुः शुभमतिर्यत्र राजा युधिष्ठिरः | |
| भविष्यति जनस्तत्र नित्यं चेष्टप्रियव्रतः | |
| धर्मात्मा स तदादृश्यः सोऽपि तात द्विजातिभिः | |
| किं पुनः प्राकृतैः पार्थः शक्यो विज्ञातुमन्ततः | |
| यस्मिन्सत्यं धृतिर्दानं परा शान्तिर्ध्रुवा क्षमा | |
| ह्रीः श्रीः कीर्तिः परं तेज आनृशंस्यमथार्जवम् | |
| तस्मात्तत्र निवासं तु छन्नं सत्रेण धीमतः | |
| गतिं वा परमां तस्य नोत्सहे वक्तुमन्यथा | |
| एवमेतत्तु संचिन्त्य यत्कृतं मन्यसे हितम् | |
| तत्क्षिप्रं कुरु कौरव्य यद्येवं श्रद्दधासि मे | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः शारद्वतो वाक्यमित्युवाच कृपस्तदा | |
| युक्तं प्राप्तं च वृद्धेन पाण्डवान्प्रति भाषितम् | |
| धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं तत्त्वतश्च सहेतुमत् | |
| तत्रानुरूपं भीष्मेण ममाप्यत्र गिरं शृणु | |
| तेषां चैव गतिस्तीर्थैर्वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम् | |
| नीतिर्विधीयतां चापि सांप्रतं या हिता भवेत् | |
| नावज्ञेयो रिपुस्तात प्राकृतोऽपि बुभूषता | |
| किं पुनः पाण्डवास्तात सर्वास्त्रकुशला रणे | |
| तस्मात्सत्रं प्रविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु | |
| गूढभावेषु छन्नेषु काले चोदयमागते | |
| स्वराष्ट्रपरराष्ट्रेषु ज्ञातव्यं बलमात्मनः | |
| उदये पाण्डवानां च प्राप्ते काले न संशयः | |
| निवृत्तसमयाः पार्था महात्मानो महाबलाः | |
| महोत्साहा भविष्यन्ति पाण्डवा ह्यतितेजसः | |
| तस्माद्बलं च कोशं च नीतिश्चापि विधीयताम् | |
| यथा कालोदये प्राप्ते सम्यक्तैः संदधामहे | |
| तात मन्यामि तत्सर्वं बुध्यस्व बलमात्मनः | |
| नियतं सर्वमित्रेषु बलवत्स्वबलेषु च | |
| उच्चावचं बलं ज्ञात्वा मध्यस्थं चापि भारत | |
| प्रहृष्टमप्रहृष्टं च संदधाम तथा परैः | |
| साम्ना भेदेन दानेन दण्डेन बलिकर्मणा | |
| न्यायेनानम्य च परान्बलाच्चानम्य दुर्बलान् | |
| सान्त्वयित्वा च मित्राणि बलं चाभाष्यतां सुखम् | |
| सकोशबलसंवृद्धः सम्यक्सिद्धिमवाप्स्यसि | |
| योत्स्यसे चापि बलिभिररिभिः प्रत्युपस्थितैः | |
| अन्यैस्त्वं पाण्डवैर्वापि हीनस्वबलवाहनैः | |
| एवं सर्वं विनिश्चित्य व्यवसायं स्वधर्मतः | |
| यथाकालं मनुष्येन्द्र चिरं सुखमवाप्स्यसि | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथ राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा रथयूथपः | |
| प्राप्तकालमिदं वाक्यमुवाच त्वरितो भृशम् | |
| असकृन्निकृतः पूर्वं मत्स्यैः साल्वेयकैः सह | |
| सूतेन चैव मत्स्यस्य कीचकेन पुनः पुनः | |
| बाधितो बन्धुभिः सार्धं बलाद्बलवता विभो | |
| स कर्णमभ्युदीक्ष्याथ दुर्योधनमभाषत | |
| असकृन्मत्स्यराज्ञा मे राष्ट्रं बाधितमोजसा | |
| प्रणेता कीचकश्चास्य बलवानभवत्पुरा | |
| क्रूरोऽमर्षी स दुष्टात्मा भुवि प्रख्यातविक्रमः | |
| निहतस्तत्र गन्धर्वैः पापकर्मा नृशंसवान् | |
| तस्मिंश्च निहते राजन्हीनदर्पो निराश्रयः | |
| भविष्यति निरुत्साहो विराट इति मे मतिः | |
| तत्र यात्रा मम मता यदि ते रोचतेऽनघ | |
| कौरवाणां च सर्वेषां कर्णस्य च महात्मनः | |
| एतत्प्राप्तमहं मन्ये कार्यमात्ययिकं हितम् | |
| राष्ट्रं तस्याभियात्वाशु बहुधान्यसमाकुलम् | |
| आददामोऽस्य रत्नानि विविधानि वसूनि च | |
| ग्रामान्राष्ट्राणि वा तस्य हरिष्यामो विभागशः | |
| अथ वा गोसहस्राणि बहूनि च शुभानि च | |
| विविधानि हरिष्यामः प्रतिपीड्य पुरं बलात् | |
| कौरवैः सह संगम्य त्रिगर्तैश्च विशां पते | |
| गास्तस्यापहरामाशु सह सर्वैः सुसंहताः | |
| संधिं वा तेन कृत्वा तु निबध्नीमोऽस्य पौरुषम् | |
| हत्वा चास्य चमूं कृत्स्नां वशमन्वानयामहे | |
| तं वशे न्यायतः कृत्वा सुखं वत्स्यामहे वयम् | |
| भवतो बलवृद्धिश्च भविष्यति न संशयः | |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कर्णो राजानमब्रवीत् | |
| सूक्तं सुशर्मणा वाक्यं प्राप्तकालं हितं च नः | |
| तस्मात्क्षिप्रं विनिर्यामो योजयित्वा वरूथिनीम् | |
| विभज्य चाप्यनीकानि यथा वा मन्यसेऽनघ | |
| प्रज्ञावान्कुरुवृद्धोऽयं सर्वेषां नः पितामहः | |
| आचार्यश्च तथा द्रोणः कृपः शारद्वतस्तथा | |
| मन्यन्ते ते यथा सर्वे तथा यात्रा विधीयताम् | |
| संमन्त्र्य चाशु गच्छामः साधनार्थं महीपतेः | |
| किं च नः पाण्डवैः कार्यं हीनार्थबलपौरुषैः | |
| अत्यर्थं वा प्रनष्टास्ते प्राप्ता वापि यमक्षयम् | |
| यामो राजन्ननुद्विग्ना विराटविषयं वयम् | |
| आदास्यामो हि गास्तस्य विविधानि वसूनि च | |
| ततो दुर्योधनो राजा वाक्यमादाय तस्य तत् | |
| वैकर्तनस्य कर्णस्य क्षिप्रमाज्ञापयत्स्वयम् | |
| शासने नित्यसंयुक्तं दुःशासनमनन्तरम् | |
| सह वृद्धैस्तु संमन्त्र्य क्षिप्रं योजय वाहिनीम् | |
| यथोद्देशं च गच्छामः सहिताः सर्वकौरवैः | |
| सुशर्मा तु यथोद्दिष्टं देशं यातु महारथः | |
| त्रिगर्तैः सहितो राजा समग्रबलवाहनः | |
| प्रागेव हि सुसंवीतो मत्स्यस्य विषयं प्रति | |
| जघन्यतो वयं तत्र यास्यामो दिवसान्तरम् | |
| विषयं मत्स्यराजस्य सुसमृद्धं सुसंहताः | |
| ते यात्वा सहसा तत्र विराटनगरं प्रति | |
| क्षिप्रं गोपान्समासाद्य गृह्णन्तु विपुलं धनम् | |
| गवां शतसहस्राणि श्रीमन्ति गुणवन्ति च | |
| वयमपि निगृह्णीमो द्विधा कृत्वा वरूथिनीम् | |
| स स्म गत्वा यथोद्दिष्टां दिशं वह्नेर्महीपतिः | |
| आदत्त गाः सुशर्माथ घर्मपक्षस्य सप्तमीम् | |
| अपरं दिवसं सर्वे राजन्संभूय कौरवाः | |
| अष्टम्यां तान्यगृह्णन्त गोकुलानि सहस्रशः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततस्तेषां महाराज तत्रैवामिततेजसाम् | |
| छद्मलिङ्गप्रविष्टानां पाण्डवानां महात्मनाम् | |
| व्यतीतः समयः सम्यग्वसतां वै पुरोत्तमे | |
| कुर्वतां तस्य कर्माणि विराटस्य महीपतेः | |
| ततस्त्रयोदशस्यान्ते तस्य वर्षस्य भारत | |
| सुशर्मणा गृहीतं तु गोधनं तरसा बहु | |
| ततो जवेन महता गोपाः पुरमथाव्रजत् | |
| अपश्यन्मत्स्यराजं च रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली | |
| शूरैः परिवृतं योधैः कुण्डलाङ्गदधारिभिः | |
| सद्भिश्च मन्त्रिभिः सार्धं पाण्डवैश्च नरर्षभैः | |
| तं सभायां महाराजमासीनं राष्ट्रवर्धनम् | |
| सोऽब्रवीदुपसंगम्य विराटं प्रणतस्तदा | |
| अस्मान्युधि विनिर्जित्य परिभूय सबान्धवान् | |
| गवां शतसहस्राणि त्रिगर्ताः कालयन्ति ते | |
| तान्परीप्स मनुष्येन्द्र मा नेशुः पशवस्तव | |
| तच्छ्रुत्वा नृपतिः सेनां मत्स्यानां समयोजयत् | |
| रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् | |
| राजानो राजपुत्राश्च तनुत्राण्यत्र भेजिरे | |
| भानुमन्ति विचित्राणि सूपसेव्यानि भागशः | |
| सवज्रायसगर्भं तु कवचं तप्तकाञ्चनम् | |
| विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारयत् | |
| सर्वपारसवं वर्म कल्याणपटलं दृढम् | |
| शतानीकादवरजो मदिराश्वोऽभ्यहारयत् | |
| शतसूर्यं शतावर्तं शतबिन्दु शताक्षिमत् | |
| अभेद्यकल्पं मत्स्यानां राजा कवचमाहरत् | |
| उत्सेधे यस्य पद्मानि शतं सौगन्धिकानि च | |
| सुवर्णपृष्ठं सूर्याभं सूर्यदत्तोऽभ्यहारयत् | |
| दृढमायसगर्भं तु श्वेतं वर्म शताक्षिमत् | |
| विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीरः शङ्खोऽभ्यहारयत् | |
| शतशश्च तनुत्राणि यथास्वानि महारथाः | |
| योत्स्यमानाभ्यनह्यन्त देवरूपाः प्रहारिणः | |
| सूपस्करेषु शुभ्रेषु महत्सु च महारथाः | |
| पृथक्काञ्चनसंनाहान्रथेष्वश्वानयोजयन् | |
| सूर्यचन्द्रप्रतीकाशो रथे दिव्ये हिरण्मयः | |
| महानुभावो मत्स्यस्य ध्वज उच्छिश्रिये तदा | |
| अथान्यान्विविधाकारान्ध्वजान्हेमविभूषितान् | |
| यथास्वं क्षत्रियाः शूरा रथेषु समयोजयन् | |
| अथ मत्स्योऽब्रवीद्राजा शतानीकं जघन्यजम् | |
| कङ्कबल्लवगोपाला दामग्रन्थिश्च वीर्यवान् | |
| युध्येयुरिति मे बुद्धिर्वर्तते नात्र संशयः | |
| एतेषामपि दीयन्तां रथा ध्वजपताकिनः | |
| कवचानि विचित्राणि दृढानि च मृदूनि च | |
| प्रतिमुञ्चन्तु गात्रेषु दीयन्तामायुधानि च | |
| वीराङ्गरूपाः पुरुषा नागराजकरोपमाः | |
| नेमे जातु न युध्येरन्निति मे धीयते मतिः | |
| एतच्छ्रुत्वा तु नृपतेर्वाक्यं त्वरितमानसः | |
| शतानीकस्तु पार्थेभ्यो रथान्राजन्समादिशत् | |
| सहदेवाय राज्ञे च भीमाय नकुलाय च | |
| तान्प्रहृष्टास्ततः सूता राजभक्तिपुरस्कृताः | |
| निर्दिष्टान्नरदेवेन रथाञ्शीघ्रमयोजयन् | |
| कवचानि विचित्राणि दृढानि च मृदूनि च | |
| विराटः प्रादिशद्यानि तेषामक्लिष्टकर्मणाम् | |
| तान्यामुच्य शरीरेषु दंशितास्ते परंतपाः | |
| तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वे युद्धविशारदाः | |
| विराटमन्वयुः पश्चात्सहिताः कुरुपुंगवाः | |
| चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः | |
| भीमाश्च मत्तमातङ्गाः प्रभिन्नकरटामुखाः | |
| क्षरन्त इव जीमूताः सुदन्ताः षष्टिहायनाः | |
| स्वारूढा युद्धकुशलैः शिक्षितैर्हस्तिसादिभिः | |
| राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः | |
| विशारदानां वश्यानां हृष्टानां चानुयायिनाम् | |
| अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च | |
| षष्टिश्चाश्वसहस्राणि मत्स्यानामभिनिर्ययुः | |
| तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ | |
| संप्रयातं महाराज निनीषन्तं गवां पदम् | |
| तद्बलाग्र्यं विराटस्य संप्रस्थितमशोभत | |
| दृढायुधजनाकीर्णं गजाश्वरथसंकुलम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| निर्याय नगराच्छूरा व्यूढानीकाः प्रहारिणः | |
| त्रिगर्तानस्पृशन्मत्स्याः सूर्ये परिणते सति | |
| ते त्रिगर्ताश्च मत्स्याश्च संरब्धा युद्धदुर्मदाः | |
| अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोषु गृद्धा महाबलाः | |
| भीमाश्च मत्तमातङ्गास्तोमराङ्कुशचोदिताः | |
| ग्रामणीयैः समारूढाः कुशलैर्हस्तिसादिभिः | |
| तेषां समागमो घोरस्तुमुलो लोमहर्षणः | |
| देवासुरसमो राजन्नासीत्सूर्ये विलम्बति | |
| उदतिष्ठद्रजो भौमं न प्रज्ञायत किंचन | |
| पक्षिणश्चापतन्भूमौ सैन्येन रजसावृताः | |
| इषुभिर्व्यतिसंयद्भिरादित्योऽन्तरधीयत | |
| खद्योतैरिव संयुक्तमन्तरिक्षं व्यराजत | |
| रुक्मपृष्ठानि चापानि व्यतिषक्तानि धन्विनाम् | |
| पततां लोकवीराणां सव्यदक्षिणमस्यताम् | |
| रथा रथैः समाजग्मुः पादातैश्च पदातयः | |
| सादिभिः सादिनश्चैव गजैश्चापि महागजाः | |
| असिभिः पट्टिशैः प्रासैः शक्तिभिस्तोमरैरपि | |
| संरब्धाः समरे राजन्निजघ्नुरितरेतरम् | |
| निघ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः | |
| न शेकुरभिसंरब्धाः शूरान्कर्तुं पराङ्मुखान् | |
| कॢप्तोत्तरोष्ठं सुनसं कॢप्तकेशमलंकृतम् | |
| अदृश्यत शिरश्छिन्नं रजोध्वस्तं सकुण्डलम् | |
| अदृश्यंस्तत्र गात्राणि शरैश्छिन्नानि भागशः | |
| शालस्कन्धनिकाशानि क्षत्रियाणां महामृधे | |
| नागभोगनिकाशैश्च बाहुभिश्चन्दनोक्षितैः | |
| आकीर्णा वसुधा तत्र शिरोभिश्च सकुण्डलैः | |
| उपशाम्यद्रजो भौमं रुधिरेण प्रसर्पता | |
| कश्मलं प्राविशद्घोरं निर्मर्यादमवर्तत | |
| शतानीकः शतं हत्वा विशालाक्षश्चतुःशतम् | |
| प्रविष्टौ महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथौ | |
| आर्च्छेतां बहुसंरब्धौ केशाकेशि नखानखि | |
| लक्षयित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टौ रथव्रजम् | |
| जग्मतुः सूर्यदत्तश्च मदिराश्वश्च पृष्ठतः | |
| विराटस्तत्र संग्रामे हत्वा पञ्चशतान्रथान् | |
| हयानां च शतान्यत्र हत्वा पञ्च महारथान् | |
| चरन्स विविधान्मार्गान्रथेषु रथयूथपः | |
| त्रिगर्तानां सुशर्माणमार्च्छद्रुक्मरथं रणे | |
| तौ व्यावहरतां तत्र महात्मानौ महाबलौ | |
| अन्योन्यमभिगर्जन्तौ गोष्ठे गोवृषभाविव | |
| ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतियाय समन्ततः | |
| शरान्व्यसृजतां शीघ्रं तोयधारा घनाविव | |
| अन्योन्यं चातिसंरब्धौ विचेरतुरमर्षणौ | |
| कृतास्त्रौ निशितैर्बाणैरसिशक्तिगदाभृतौ | |
| ततो राजा सुशर्माणं विव्याध दशभिः शरैः | |
| पञ्चभिः पञ्चभिश्चास्य विव्याध चतुरो हयान् | |
| तथैव मत्स्यराजानं सुशर्मा युद्धदुर्मदः | |
| पञ्चाशता शितैर्बाणैर्विव्याध परमास्त्रवित् | |
| ततः सैन्यं समावृत्य मत्स्यराजसुशर्मणोः | |
| नाभ्यजानंस्तदान्योन्यं प्रदोषे रजसावृते | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तमसाभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत | |
| व्यतिष्ठन्वै मुहूर्तं तु व्यूढानीकाः प्रहारिणः | |
| ततोऽन्धकारं प्रणुदन्नुदतिष्ठत चन्द्रमाः | |
| कुर्वाणो विमलां रात्रिं नन्दयन्क्षत्रियान्युधि | |
| ततः प्रकाशमासाद्य पुनर्युद्धमवर्तत | |
| घोररूपं ततस्ते स्म नावेक्षन्त परस्परम् | |
| ततः सुशर्मा त्रैगर्तः सह भ्रात्रा यवीयसा | |
| अभ्यद्रवन्मत्स्यराजं रथव्रातेन सर्वशः | |
| ततो रथाभ्यां प्रस्कन्द्य भ्रातरौ क्षत्रियर्षभौ | |
| गदापाणी सुसंरब्धौ समभ्यद्रवतां हयान् | |
| तथैव तेषां तु बलानि तानि; क्रुद्धान्यथान्योन्यमभिद्रवन्ति | |
| गदासिखड्गैश्च परश्वधैश्च; प्रासैश्च तीक्ष्णाग्रसुपीतधारैः | |
| बलं तु मत्स्यस्य बलेन राजा; सर्वं त्रिगर्ताधिपतिः सुशर्मा | |
| प्रमथ्य जित्वा च प्रसह्य मत्स्यं; विराटमोजस्विनमभ्यधावत् | |
| तौ निहत्य पृथग्धुर्यावुभौ च पार्ष्णिसारथी | |
| विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमगृह्णताम् | |
| तमुन्मथ्य सुशर्मा तु रुदतीं वधुकामिव | |
| स्यन्दनं स्वं समारोप्य प्रययौ शीघ्रवाहनः | |
| तस्मिन्गृहीते विरथे विराटे बलवत्तरे | |
| प्राद्रवन्त भयान्मत्स्यास्त्रिगर्तैरर्दिता भृशम् | |
| तेषु संत्रास्यमानेषु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| अभ्यभाषन्महाबाहुं भीमसेनमरिंदमम् | |
| मत्स्यराजः परामृष्टस्त्रिगर्तेन सुशर्मणा | |
| तं मोक्षय महाबाहो न गच्छेद्द्विषतां वशम् | |
| उषिताः स्मः सुखं सर्वे सर्वकामैः सुपूजिताः | |
| भीमसेन त्वया कार्या तस्य वासस्य निष्कृतिः | |
| भीमसेन उवाच | |
| अहमेनं परित्रास्ये शासनात्तव पार्थिव | |
| पश्य मे सुमहत्कर्म युध्यतः सह शत्रुभिः | |
| स्वबाहुबलमाश्रित्य तिष्ठ त्वं भ्रातृभिः सह | |
| एकान्तमाश्रितो राजन्पश्य मेऽद्य पराक्रमम् | |
| सुस्कन्धोऽयं महावृक्षो गदारूप इव स्थितः | |
| एनमेव समारुज्य द्रावयिष्यामि शात्रवान् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् | |
| अब्रवीद्भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिरः | |
| मा भीम साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पतिः | |
| मा त्वा वृक्षेण कर्माणि कुर्वाणमतिमानुषम् | |
| जनाः समवबुध्येरन्भीमोऽयमिति भारत | |
| अन्यदेवायुधं किंचित्प्रतिपद्यस्व मानुषम् | |
| चापं वा यदि वा शक्तिं निस्त्रिंशं वा परश्वधम् | |
| यदेव मानुषं भीम भवेदन्यैरलक्षितम् | |
| तदेवायुधमादाय मोक्षयाशु महीपतिम् | |
| यमौ च चक्ररक्षौ ते भवितारौ महाबलौ | |
| व्यूहतः समरे तात मत्स्यराजं परीप्सतः | |
| ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदयन् | |
| दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणास्त्रिगर्तान्प्रत्यमर्षणाः | |
| तान्निवृत्तरथान्दृष्ट्वा पाण्डवान्सा महाचमूः | |
| वैराटी परमक्रुद्धा युयुधे परमाद्भुतम् | |
| सहस्रं न्यवधीत्तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| भीमः सप्तशतान्योधान्परलोकमदर्शयत् | |
| नकुलश्चापि सप्तैव शतानि प्राहिणोच्छरैः | |
| शतानि त्रीणि शूराणां सहदेवः प्रतापवान् | |
| युधिष्ठिरसमादिष्टो निजघ्ने पुरुषर्षभः | |
| भित्त्वा तां महतीं सेनां त्रिगर्तानां नरर्षभ | |
| ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः | |
| अभिद्रुत्य सुशर्माणं शरैरभ्यतुदद्भृशम् | |
| सुशर्मापि सुसंक्रुद्धस्त्वरमाणो युधिष्ठिरम् | |
| अविध्यन्नवभिर्बाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् | |
| ततो राजन्नाशुकारी कुन्तीपुत्रो वृकोदरः | |
| समासाद्य सुशर्माणमश्वानस्य व्यपोथयत् | |
| पृष्ठगोपौ च तस्याथ हत्वा परमसायकैः | |
| अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपाहरत् | |
| चक्ररक्षश्च शूरश्च शोणाश्वो नाम विश्रुतः | |
| स भयाद्द्वैरथं दृष्ट्वा त्रैगर्तं प्राजहत्तदा | |
| ततो विराटः प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मणः | |
| गदामस्य परामृश्य तमेवाजघ्निवान्बली | |
| स चचार गदापाणिर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा | |
| भीमस्तु भीमसंकाशो रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली | |
| त्रिगर्तराजमादत्त सिंहः क्षुद्रमृगं यथा | |
| तस्मिन्गृहीते विरथे त्रिगर्तानां महारथे | |
| अभज्यत बलं सर्वं त्रैगर्तं तद्भयातुरम् | |
| निवर्त्य गास्ततः सर्वाः पाण्डुपुत्रा महाबलाः | |
| अवजित्य सुशर्माणं धनं चादाय सर्वशः | |
| स्वबाहुबलसंपन्ना ह्रीनिषेधा यतव्रताः | |
| संग्रामशिरसो मध्ये तां रात्रिं सुखिनोऽवसन् | |
| ततो विराटः कौन्तेयानतिमानुषविक्रमान् | |
| अर्चयामास वित्तेन मानेन च महारथान् | |
| विराट उवाच | |
| यथैव मम रत्नानि युष्माकं तानि वै तथा | |
| कार्यं कुरुत तैः सर्वे यथाकामं यथासुखम् | |
| ददान्यलंकृताः कन्या वसूनि विविधानि च | |
| मनसश्चाप्यभिप्रेतं यद्वः शत्रुनिबर्हणाः | |
| युष्माकं विक्रमादद्य मुक्तोऽहं स्वस्तिमानिह | |
| तस्माद्भवन्तो मत्स्यानामीश्वराः सर्व एव हि | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथाभिवादिनं मत्स्यं कौरवेयाः पृथक्पृथक् | |
| ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः | |
| प्रतिनन्दाम ते वाक्यं सर्वं चैव विशां पते | |
| एतेनैव प्रतीताः स्मो यत्त्वं मुक्तोऽद्य शत्रुभिः | |
| अथाब्रवीत्प्रीतमना मत्स्यराजो युधिष्ठिरम् | |
| पुनरेव महाबाहुर्विराटो राजसत्तमः | |
| एहि त्वामभिषेक्ष्यामि मत्स्यराजोऽस्तु नो भवान् | |
| मनसश्चाप्यभिप्रेतं यत्ते शत्रुनिबर्हण | |
| तत्तेऽहं संप्रदास्यामि सर्वमर्हति नो भवान् | |
| रत्नानि गाः सुवर्णं च मणिमुक्तमथापि वा | |
| वैयाघ्रपद्य विप्रेन्द्र सर्वथैव नमोऽस्तु ते | |
| त्वत्कृते ह्यद्य पश्यामि राज्यमात्मानमेव च | |
| यतश्च जातः संरम्भः स च शत्रुर्वशं गतः | |
| ततो युधिष्ठिरो मत्स्यं पुनरेवाभ्यभाषत | |
| प्रतिनन्दामि ते वाक्यं मनोज्ञं मत्स्य भाषसे | |
| आनृशंस्यपरो नित्यं सुसुखः सततं भव | |
| गच्छन्तु दूतास्त्वरितं नगरं तव पार्थिव | |
| सुहृदां प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् | |
| ततस्तद्वचनान्मत्स्यो दूतान्राजा समादिशत् | |
| आचक्षध्वं पुरं गत्वा संग्रामे विजयं मम | |
| कुमाराः समलंकृत्य पर्यागच्छन्तु मे पुरात् | |
| वादित्राणि च सर्वाणि गणिकाश्च स्वलंकृताः | |
| ते गत्वा केवलां रात्रिमथ सूर्योदयं प्रति | |
| विराटस्य पुराभ्याशे दूता जयमघोषयन् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| याते त्रिगर्तं मत्स्ये तु पशूंस्तान्स्वान्परीप्सति | |
| दुर्योधनः सहामात्यो विराटमुपयादथ | |
| भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च कृपश्च परमास्त्रवित् | |
| द्रौणिश्च सौबलश्चैव तथा दुःशासनः प्रभुः | |
| विविंशतिर्विकर्णश्च चित्रसेनश्च वीर्यवान् | |
| दुर्मुखो दुःसहश्चैव ये चैवान्ये महारथाः | |
| एते मत्स्यानुपागम्य विराटस्य महीपतेः | |
| घोषान्विद्राव्य तरसा गोधनं जह्रुरोजसा | |
| षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति ते | |
| महता रथवंशेन परिवार्य समन्ततः | |
| गोपालानां तु घोषेषु हन्यतां तैर्महारथैः | |
| आरावः सुमहानासीत्संप्रहारे भयंकरे | |
| गवाध्यक्षस्तु संत्रस्तो रथमास्थाय सत्वरः | |
| जगाम नगरायैव परिक्रोशंस्तदार्तवत् | |
| स प्रविश्य पुरं राज्ञो नृपवेश्माभ्ययात्ततः | |
| अवतीर्य रथात्तूर्णमाख्यातुं प्रविवेश ह | |
| दृष्ट्वा भूमिंजयं नाम पुत्रं मत्स्यस्य मानिनम् | |
| तस्मै तत्सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् | |
| षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति ते | |
| तद्विजेतुं समुत्तिष्ठ गोधनं राष्ट्रवर्धनम् | |
| राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि वै स्वयम् | |
| त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् | |
| त्वया परिषदो मध्ये श्लाघते स नराधिपः | |
| पुत्रो ममानुरूपश्च शूरश्चेति कुलोद्वहः | |
| इष्वस्त्रे निपुणो योधः सदा वीरश्च मे सुतः | |
| तस्य तत्सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम् | |
| आवर्तय कुरूञ्जित्वा पशून्पशुमतां वर | |
| निर्दहैषामनीकानि भीमेन शरतेजसा | |
| धनुश्च्युतै रुक्मपुङ्खैः शरैः संनतपर्वभिः | |
| द्विषतां भिन्ध्यनीकानि गजानामिव यूथपः | |
| पाशोपधानां ज्यातन्त्रीं चापदण्डां महास्वनाम् | |
| शरवर्णां धनुर्वीणां शत्रुमध्ये प्रवादय | |
| श्वेता रजतसंकाशा रथे युज्यन्तु ते हयाः | |
| ध्वजं च सिंहं सौवर्णमुच्छ्रयन्तु तवाभिभोः | |
| रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा मुक्ता हस्तवता त्वया | |
| छादयन्तु शराः सूर्यं राज्ञामायुर्निरोधिनः | |
| रणे जित्वा कुरून्सर्वान्वज्रपाणिरिवासुरान् | |
| यशो महदवाप्य त्वं प्रविशेदं पुरं पुनः | |
| त्वं हि राष्ट्रस्य परमा गतिर्मत्स्यपतेः सुतः | |
| गतिमन्तो भवन्त्वद्य सर्वे विषयवासिनः | |
| स्त्रीमध्य उक्तस्तेनासौ तद्वाक्यमभयंकरम् | |
| अन्तःपुरे श्लाघमान इदं वचनमब्रवीत् | |
| उत्तर उवाच | |
| अद्याहमनुगच्छेयं दृढधन्वा गवां पदम् | |
| यदि मे सारथिः कश्चिद्भवेदश्वेषु कोविदः | |
| तमेव नाधिगच्छामि यो मे यन्ता भवेन्नरः | |
| पश्यध्वं सारथिं क्षिप्रं मम युक्तं प्रयास्यतः | |
| अष्टाविंशतिरात्रं वा मासं वा नूनमन्ततः | |
| यत्तदासीन्महद्युद्धं तत्र मे सारथिर्हतः | |
| स लभेयं यदि त्वन्यं हययानविदं नरम् | |
| त्वरावानद्य यात्वाहं समुच्छ्रितमहाध्वजम् | |
| विगाह्य तत्परानीकं गजवाजिरथाकुलम् | |
| शस्त्रप्रतापनिर्वीर्यान्कुरूञ्जित्वानये पशून् | |
| दुर्योधनं शांतनवं कर्णं वैकर्तनं कृपम् | |
| द्रोणं च सह पुत्रेण महेष्वासान्समागतान् | |
| वित्रासयित्वा संग्रामे दानवानिव वज्रभृत् | |
| अनेनैव मुहूर्तेन पुनः प्रत्यानये पशून् | |
| शून्यमासाद्य कुरवः प्रयान्त्यादाय गोधनम् | |
| किं नु शक्यं मया कर्तुं यदहं तत्र नाभवम् | |
| पश्येयुरद्य मे वीर्यं कुरवस्ते समागताः | |
| किं नु पार्थोऽर्जुनः साक्षादयमस्मान्प्रबाधते | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तस्य तद्वचनं स्त्रीषु भाषतः स्म पुनः पुनः | |
| नामर्षयत पाञ्चाली बीभत्सोः परिकीर्तनम् | |
| अथैनमुपसंगम्य स्त्रीमध्यात्सा तपस्विनी | |
| व्रीडमानेव शनकैरिदं वचनमब्रवीत् | |
| योऽसौ बृहद्वारणाभो युवा सुप्रियदर्शनः | |
| बृहन्नडेति विख्यातः पार्थस्यासीत्स सारथिः | |
| धनुष्यनवरश्चासीत्तस्य शिष्यो महात्मनः | |
| दृष्टपूर्वो मया वीर चरन्त्या पाण्डवान्प्रति | |
| यदा तत्पावको दावमदहत्खाण्डवं महत् | |
| अर्जुनस्य तदानेन संगृहीता हयोत्तमाः | |
| तेन सारथिना पार्थः सर्वभूतानि सर्वशः | |
| अजयत्खाण्डवप्रस्थे न हि यन्तास्ति तादृशः | |
| येयं कुमारी सुश्रोणी भगिनी ते यवीयसी | |
| अस्याः स वचनं वीर करिष्यति न संशयः | |
| यदि वै सारथिः स स्यात्कुरून्सर्वानसंशयम् | |
| जित्वा गाश्च समादाय ध्रुवमागमनं भवेत् | |
| एवमुक्तः स सैरन्ध्र्या भगिनीं प्रत्यभाषत | |
| गच्छ त्वमनवद्याङ्गि तामानय बृहन्नडाम् | |
| सा भ्रात्रा प्रेषिता शीघ्रमगच्छन्नर्तनागृहम् | |
| यत्रास्ते स महाबाहुश्छन्नः सत्रेण पाण्डवः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| स तां दृष्ट्वा विशालाक्षीं राजपुत्रीं सखीं सखा | |
| प्रहसन्नब्रवीद्राजन्कुत्रागमनमित्युत | |
| तमब्रवीद्राजपुत्री समुपेत्य नरर्षभम् | |
| प्रणयं भावयन्ती स्म सखीमध्य इदं वचः | |
| गावो राष्ट्रस्य कुरुभिः काल्यन्ते नो बृहन्नडे | |
| तान्विजेतुं मम भ्राता प्रयास्यति धनुर्धरः | |
| नचिरं च हतस्तस्य संग्रामे रथसारथिः | |
| तेन नास्ति समः सूतो योऽस्य सारथ्यमाचरेत् | |
| तस्मै प्रयतमानाय सारथ्यर्थं बृहन्नडे | |
| आचचक्षे हयज्ञाने सैरन्ध्री कौशलं तव | |
| सा सारथ्यं मम भ्रातुः कुरु साधु बृहन्नडे | |
| पुरा दूरतरं गावो ह्रियन्ते कुरुभिर्हि नः | |
| अथैतद्वचनं मेऽद्य नियुक्ता न करिष्यसि | |
| प्रणयादुच्यमाना त्वं परित्यक्ष्यामि जीवितम् | |
| एवमुक्तस्तु सुश्रोण्या तया सख्या परंतपः | |
| जगाम राजपुत्रस्य सकाशममितौजसः | |
| तं सा व्रजन्तं त्वरितं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् | |
| अन्वगच्छद्विशालाक्षी शिशुर्गजवधूरिव | |
| दूरादेव तु तं प्रेक्ष्य राजपुत्रोऽभ्यभाषत | |
| त्वया सारथिना पार्थः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् | |
| पृथिवीमजयत्कृत्स्नां कुन्तीपुत्रो धनंजयः | |
| सैरन्ध्री त्वां समाचष्ट सा हि जानाति पाण्डवान् | |
| संयच्छ मामकानश्वांस्तथैव त्वं बृहन्नडे | |
| कुरुभिर्योत्स्यमानस्य गोधनानि परीप्सतः | |
| अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दयितः पुरा | |
| त्वयाजयत्सहायेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः | |
| एवमुक्ता प्रत्युवाच राजपुत्रं बृहन्नडा | |
| का शक्तिर्मम सारथ्यं कर्तुं संग्राममूर्धनि | |
| गीतं वा यदि वा नृत्तं वादित्रं वा पृथग्विधम् | |
| तत्करिष्यामि भद्रं ते सारथ्यं तु कुतो मयि | |
| उत्तर उवाच | |
| बृहन्नडे गायनो वा नर्तनो वा पुनर्भव | |
| क्षिप्रं मे रथमास्थाय निगृह्णीष्व हयोत्तमान् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| स तत्र नर्मसंयुक्तमकरोत्पाण्डवो बहु | |
| उत्तरायाः प्रमुखतः सर्वं जानन्नरिंदम | |
| ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य कवचं शरीरे प्रत्यमुञ्चत | |
| कुमार्यस्तत्र तं दृष्ट्वा प्राहसन्पृथुलोचनाः | |
| स तु दृष्ट्वा विमुह्यन्तं स्वयमेवोत्तरस्ततः | |
| कवचेन महार्हेण समनह्यद्बृहन्नडाम् | |
| स बिभ्रत्कवचं चाग्र्यं स्वयमप्यंशुमत्प्रभम् | |
| ध्वजं च सिंहमुच्छ्रित्य सारथ्ये समकल्पयत् | |
| धनूंषि च महार्हाणि बाणांश्च रुचिरान्बहून् | |
| आदाय प्रययौ वीरः स बृहन्नडसारथिः | |
| अथोत्तरा च कन्याश्च सख्यस्तामब्रुवंस्तदा | |
| बृहन्नडे आनयेथा वासांसि रुचिराणि नः | |
| पाञ्चालिकार्थं सूक्ष्माणि चित्राणि विविधानि च | |
| विजित्य संग्रामगतान्भीष्मद्रोणमुखान्कुरून् | |
| अथ ता ब्रुवतीः कन्याः सहिताः पाण्डुनन्दनः | |
| प्रत्युवाच हसन्पार्थो मेघदुन्दुभिनिःस्वनः | |
| यद्युत्तरोऽयं संग्रामे विजेष्यति महारथान् | |
| अथाहरिष्ये वासांसि दिव्यानि रुचिराणि च | |
| एवमुक्त्वा तु बीभत्सुस्ततः प्राचोदयद्धयान् | |
| कुरूनभिमुखाञ्शूरो नानाध्वजपताकिनः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| स राजधान्या निर्याय वैराटिः पृथिवींजयः | |
| प्रयाहीत्यब्रवीत्सूतं यत्र ते कुरवो गताः | |
| समवेतान्कुरून्यावज्जिगीषूनवजित्य वै | |
| गाश्चैषां क्षिप्रमादाय पुनरायामि स्वं पुरम् | |
| ततस्तांश्चोदयामास सदश्वान्पाण्डुनन्दनः | |
| ते हया नरसिंहेन चोदिता वातरंहसः | |
| आलिखन्त इवाकाशमूहुः काञ्चनमालिनः | |
| नातिदूरमथो यात्वा मत्स्यपुत्रधनंजयौ | |
| अवेक्षेताममित्रघ्नौ कुरूणां बलिनां बलम् | |
| श्मशानमभितो गत्वा आससाद कुरूनथ | |
| तदनीकं महत्तेषां विबभौ सागरस्वनम् | |
| सर्पमाणमिवाकाशे वनं बहुलपादपम् | |
| ददृशे पार्थिवो रेणुर्जनितस्तेन सर्पता | |
| दृष्टिप्रणाशो भूतानां दिवस्पृङ्नरसत्तम | |
| तदनीकं महद्दृष्ट्वा गजाश्वरथसंकुलम् | |
| कर्णदुर्योधनकृपैर्गुप्तं शांतनवेन च | |
| द्रोणेन च सपुत्रेण महेष्वासेन धीमता | |
| हृष्टरोमा भयोद्विग्नः पार्थं वैराटिरब्रवीत् | |
| नोत्सहे कुरुभिर्योद्धुं रोमहर्षं हि पश्य मे | |
| बहुप्रवीरमत्युग्रं देवैरपि दुरासदम् | |
| प्रतियोद्धुं न शक्ष्यामि कुरुसैन्यमनन्तकम् | |
| नाशंसे भारतीं सेनां प्रवेष्टुं भीमकार्मुकाम् | |
| रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् | |
| दृष्ट्वैव हि परानाजावात्मा प्रव्यथतीव मे | |
| यत्र द्रोणश्च भीष्मश्च कृपः कर्णो विविंशतिः | |
| अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः | |
| दुर्योधनस्तथा वीरो राजा च रथिनां वरः | |
| द्युतिमन्तो महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः | |
| दृष्ट्वैव हि कुरूनेतान्व्यूढानीकान्प्रहारिणः | |
| हृषितानि च रोमाणि कश्मलं चागतं मम | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अवियातो वियातस्य मौर्ख्याद्धूर्तस्य पश्यतः | |
| परिदेवयते मन्दः सकाशे सव्यसाचिनः | |
| त्रिगर्तान्मे पिता यातः शून्ये संप्रणिधाय माम् | |
| सर्वां सेनामुपादाय न मे सन्तीह सैनिकाः | |
| सोऽहमेको बहून्बालः कृतास्त्रानकृतश्रमः | |
| प्रतियोद्धुं न शक्ष्यामि निवर्तस्व बृहन्नडे | |
| अर्जुन उवाच | |
| भयेन दीनरूपोऽसि द्विषतां हर्षवर्धनः | |
| न च तावत्कृतं किंचित्परैः कर्म रणाजिरे | |
| स्वयमेव च मामात्थ वह मां कौरवान्प्रति | |
| सोऽहं त्वां तत्र नेष्यामि यत्रैते बहुला ध्वजाः | |
| मध्यमामिषगृध्राणां कुरूणामाततायिनाम् | |
| नेष्यामि त्वां महाबाहो पृथिव्यामपि युध्यताम् | |
| तथा स्त्रीषु प्रतिश्रुत्य पौरुषं पुरुषेषु च | |
| कत्थमानोऽभिनिर्याय किमर्थं न युयुत्ससे | |
| न चेद्विजित्य गास्तास्त्वं गृहान्वै प्रतियास्यसि | |
| प्रहसिष्यन्ति वीर त्वां नरा नार्यश्च संगताः | |
| अहमप्यत्र सैरन्ध्र्या स्तुतः सारथ्यकर्मणि | |
| न हि शक्ष्याम्यनिर्जित्य गाः प्रयातुं पुरं प्रति | |
| स्तोत्रेण चैव सैरन्ध्र्यास्तव वाक्येन तेन च | |
| कथं न युध्येयमहं कुरून्सर्वान्स्थिरो भव | |
| उत्तर उवाच | |
| कामं हरन्तु मत्स्यानां भूयांसं कुरवो धनम् | |
| प्रहसन्तु च मां नार्यो नरा वापि बृहन्नडे | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इत्युक्त्वा प्राद्रवद्भीतो रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली | |
| त्यक्त्वा मानं स मन्दात्मा विसृज्य सशरं धनुः | |
| बृहन्नडोवाच | |
| नैष पूर्वैः स्मृतो धर्मः क्षत्रियस्य पलायनम् | |
| श्रेयस्ते मरणं युद्धे न भीतस्य पलायनम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमुक्त्वा तु कौन्तेयः सोऽवप्लुत्य रथोत्तमात् | |
| तमन्वधावद्धावन्तं राजपुत्रं धनंजयः | |
| दीर्घां वेणीं विधुन्वानः साधु रक्ते च वाससी | |
| विधूय वेणीं धावन्तमजानन्तोऽर्जुनं तदा | |
| सैनिकाः प्राहसन्केचित्तथारूपमवेक्ष्य तम् | |
| तं शीघ्रमभिधावन्तं संप्रेक्ष्य कुरवोऽब्रुवन् | |
| क एष वेषप्रच्छन्नो भस्मनेव हुताशनः | |
| किंचिदस्य यथा पुंसः किंचिदस्य यथा स्त्रियः | |
| सारूप्यमर्जुनस्येव क्लीबरूपं बिभर्ति च | |
| तदेवैतच्छिरोग्रीवं तौ बाहू परिघोपमौ | |
| तद्वदेवास्य विक्रान्तं नायमन्यो धनंजयात् | |
| अमरेष्विव देवेन्द्रो मानुषेषु धनंजयः | |
| एकः कोऽस्मानुपायायादन्यो लोके धनंजयात् | |
| एकः पुत्रो विराटस्य शून्ये संनिहितः पुरे | |
| स एष किल निर्यातो बालभावान्न पौरुषात् | |
| सत्रेण नूनं छन्नं हि चरन्तं पार्थमर्जुनम् | |
| उत्तरः सारथिं कृत्वा निर्यातो नगराद्बहिः | |
| स नो मन्ये ध्वजान्दृष्ट्वा भीत एष पलायति | |
| तं नूनमेष धावन्तं जिघृक्षति धनंजयः | |
| इति स्म कुरवः सर्वे विमृशन्तः पृथक्पृथक् | |
| न च व्यवसितुं किंचिदुत्तरं शक्नुवन्ति ते | |
| छन्नं तथा तं सत्रेण पाण्डवं प्रेक्ष्य भारत | |
| उत्तरं तु प्रधावन्तमनुद्रुत्य धनंजयः | |
| गत्वा पदशतं तूर्णं केशपक्षे परामृशत् | |
| सोऽर्जुनेन परामृष्टः पर्यदेवयदार्तवत् | |
| बहुलं कृपणं चैव विराटस्य सुतस्तदा | |
| शातकुम्भस्य शुद्धस्य शतं निष्कान्ददामि ते | |
| मणीनष्टौ च वैडूर्यान्हेमबद्धान्महाप्रभान् | |
| हेमदण्डप्रतिच्छन्नं रथं युक्तं च सुव्रजैः | |
| मत्तांश्च दश मातङ्गान्मुञ्च मां त्वं बृहन्नडे | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमादीनि वाक्यानि विलपन्तमचेतसम् | |
| प्रहस्य पुरुषव्याघ्रो रथस्यान्तिकमानयत् | |
| अथैनमब्रवीत्पार्थो भयार्तं नष्टचेतसम् | |
| यदि नोत्सहसे योद्धुं शत्रुभिः शत्रुकर्शन | |
| एहि मे त्वं हयान्यच्छ युध्यमानस्य शत्रुभिः | |
| प्रयाह्येतद्रथानीकं मद्बाहुबलरक्षितः | |
| अप्रधृष्यतमं घोरं गुप्तं वीरैर्महारथैः | |
| मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रियोऽसि परंतप | |
| अहं वै कुरुभिर्योत्स्याम्यवजेष्यामि ते पशून् | |
| प्रविश्यैतद्रथानीकमप्रधृष्यं दुरासदम् | |
| यन्ता भूस्त्वं नरश्रेष्ठ योत्स्येऽहं कुरुभिः सह | |
| एवं ब्रुवाणो बीभत्सुर्वैराटिमपराजितः | |
| समाश्वास्य मुहूर्तं तमुत्तरं भरतर्षभ | |
| तत एनं विचेष्टन्तमकामं भयपीडितम् | |
| रथमारोपयामास पार्थः प्रहरतां वरः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तं दृष्ट्वा क्लीबवेषेण रथस्थं नरपुंगवम् | |
| शमीमभिमुखं यान्तं रथमारोप्य चोत्तरम् | |
| भीष्मद्रोणमुखास्तत्र कुरूणां रथसत्तमाः | |
| वित्रस्तमनसः सर्वे धनंजयकृताद्भयात् | |
| तानवेक्ष्य हतोत्साहानुत्पातानपि चाद्भुतान् | |
| गुरुः शस्त्रभृतां श्रेष्ठो भारद्वाजोऽभ्यभाषत | |
| चलाश्च वाताः संवान्ति रूक्षाः परुषनिःस्वनाः | |
| भस्मवर्णप्रकाशेन तमसा संवृतं नभः | |
| रूक्षवर्णाश्च जलदा दृश्यन्तेऽद्भुतदर्शनाः | |
| निःसरन्ति च कोशेभ्यः शस्त्राणि विविधानि च | |
| शिवाश्च विनदन्त्येता दीप्तायां दिशि दारुणाः | |
| हयाश्चाश्रूणि मुञ्चन्ति ध्वजाः कम्पन्त्यकम्पिताः | |
| यादृशान्यत्र रूपाणि संदृश्यन्ते बहून्यपि | |
| यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु स्याद्युद्धं समुपस्थितम् | |
| रक्षध्वमपि चात्मानं व्यूहध्वं वाहिनीमपि | |
| वैशसं च प्रतीक्षध्वं रक्षध्वं चापि गोधनम् | |
| एष वीरो महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतां वरः | |
| आगतः क्लीबवेषेण पार्थो नास्त्यत्र संशयः | |
| स एष पार्थो विक्रान्तः सव्यसाची परंतपः | |
| नायुद्धेन निवर्तेत सर्वैरपि मरुद्गणैः | |
| क्लेशितश्च वने शूरो वासवेन च शिक्षितः | |
| अमर्षवशमापन्नो योत्स्यते नात्र संशयः | |
| नेहास्य प्रतियोद्धारमहं पश्यामि कौरवाः | |
| महादेवोऽपि पार्थेन श्रूयते युधि तोषितः | |
| कर्ण उवाच | |
| सदा भवान्फल्गुनस्य गुणैरस्मान्विकत्थसे | |
| न चार्जुनः कला पूर्णा मम दुर्योधनस्य वा | |
| दुर्योधन उवाच | |
| यद्येष पार्थो राधेय कृतं कार्यं भवेन्मम | |
| ज्ञाताः पुनश्चरिष्यन्ति द्वादशान्यान्हि वत्सरान् | |
| अथैष कश्चिदेवान्यः क्लीबवेषेण मानवः | |
| शरैरेनं सुनिशितैः पातयिष्यामि भूतले | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तस्मिन्ब्रुवति तद्वाक्यं धार्तराष्ट्रे परंतपे | |
| भीष्मो द्रोणः कृपो द्रौणिः पौरुषं तदपूजयन् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तां शमीमुपसंगम्य पार्थो वैराटिमब्रवीत् | |
| सुकुमारं समाज्ञातं संग्रामे नातिकोविदम् | |
| समादिष्टो मया क्षिप्रं धनूंष्यवहरोत्तर | |
| नेमानि हि त्वदीयानि सोढुं शक्ष्यन्ति मे बलम् | |
| भारं वापि गुरुं हर्तुं कुञ्जरं वा प्रमर्दितुम् | |
| मम वा बाहुविक्षेपं शत्रूनिह विजेष्यतः | |
| तस्माद्भूमिंजयारोह शमीमेतां पलाशिनीम् | |
| अस्यां हि पाण्डुपुत्राणां धनूंषि निहितान्युत | |
| युधिष्ठिरस्य भीमस्य बीभत्सोर्यमयोस्तथा | |
| ध्वजाः शराश्च शूराणां दिव्यानि कवचानि च | |
| अत्र चैतन्महावीर्यं धनुः पार्थस्य गाण्डिवम् | |
| एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् | |
| व्यायामसहमत्यर्थं तृणराजसमं महत् | |
| सर्वायुधमहामात्रं शत्रुसंबाधकारकम् | |
| सुवर्णविकृतं दिव्यं श्लक्ष्णमायतमव्रणम् | |
| अलं भारं गुरुं वोढुं दारुणं चारुदर्शनम् | |
| तादृशान्येव सर्वाणि बलवन्ति दृढानि च | |
| उत्तर उवाच | |
| अस्मिन्वृक्षे किलोद्बद्धं शरीरमिति नः श्रुतम् | |
| तदहं राजपुत्रः सन्स्पृशेयं पाणिना कथम् | |
| नैवंविधं मया युक्तमालब्धुं क्षत्रयोनिना | |
| महता राजपुत्रेण मन्त्रयज्ञविदा सता | |
| स्पृष्टवन्तं शरीरं मां शववाहमिवाशुचिम् | |
| कथं वा व्यवहार्यं वै कुर्वीथास्त्वं बृहन्नडे | |
| बृहन्नडोवाच | |
| व्यवहार्यश्च राजेन्द्र शुचिश्चैव भविष्यसि | |
| धनूंष्येतानि मा भैस्त्वं शरीरं नात्र विद्यते | |
| दायादं मत्स्यराजस्य कुले जातं मनस्विनम् | |
| कथं त्वा निन्दितं कर्म कारयेयं नृपात्मज | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमुक्तः स पार्थेन रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली | |
| आरुरोह शमीवृक्षं वैराटिरवशस्तदा | |
| तमन्वशासच्छत्रुघ्नो रथे तिष्ठन्धनंजयः | |
| परिवेष्टनमेतेषां क्षिप्रं चैव व्यपानुद | |
| तथा संनहनान्येषां परिमुच्य समन्ततः | |
| अपश्यद्गाण्डिवं तत्र चतुर्भिरपरैः सह | |
| तेषां विमुच्यमानानां धनुषामर्कवर्चसाम् | |
| विनिश्चेरुः प्रभा दिव्या ग्रहाणामुदयेष्विव | |
| स तेषां रूपमालोक्य भोगिनामिव जृम्भताम् | |
| हृष्टरोमा भयोद्विग्नः क्षणेन समपद्यत | |
| संस्पृश्य तानि चापानि भानुमन्ति बृहन्ति च | |
| वैराटिरर्जुनं राजन्निदं वचनमब्रवीत् | |
| उत्तर उवाच | |
| बिन्दवो जातरूपस्य शतं यस्मिन्निपातिताः | |
| सहस्रकोटि सौवर्णाः कस्यैतद्धनुरुत्तमम् | |
| वारणा यस्य सौवर्णाः पृष्ठे भासन्ति दंशिताः | |
| सुपार्श्वं सुग्रहं चैव कस्यैतद्धनुरुत्तमम् | |
| तपनीयस्य शुद्धस्य षष्टिर्यस्येन्द्रगोपकाः | |
| पृष्ठे विभक्ताः शोभन्ते कस्यैतद्धनुरुत्तमम् | |
| सूर्या यत्र च सौवर्णास्त्रयो भासन्ति दंशिताः | |
| तेजसा प्रज्वलन्तो हि कस्यैतद्धनुरुत्तमम् | |
| शालभा यत्र सौवर्णास्तपनीयविचित्रिताः | |
| सुवर्णमणिचित्रं च कस्यैतद्धनुरुत्तमम् | |
| इमे च कस्य नाराचाः सहस्रा लोमवाहिनः | |
| समन्तात्कलधौताग्रा उपासङ्गे हिरण्मये | |
| विपाठाः पृथवः कस्य गार्ध्रपत्राः शिलाशिताः | |
| हारिद्रवर्णाः सुनसाः पीताः सर्वायसाः शराः | |
| कस्यायमसितावापः पञ्चशार्दूललक्षणः | |
| वराहकर्णव्यामिश्रः शरान्धारयते दश | |
| कस्येमे पृथवो दीर्घाः सर्वपारशवाः शराः | |
| शतानि सप्त तिष्ठन्ति नाराचा रुधिराशनाः | |
| कस्येमे शुकपत्राभैः पूर्वैरर्धैः सुवाससः | |
| उत्तरैरायसैः पीतैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः | |
| कस्यायं सायको दीर्घः शिलीपृष्ठः शिलीमुखः | |
| वैयाघ्रकोशे निहितो हेमचित्रत्सरुर्महान् | |
| सुफलश्चित्रकोशश्च किङ्किणीसायको महान् | |
| कस्य हेमत्सरुर्दिव्यः खड्गः परमनिर्व्रणः | |
| कस्यायं विमलः खड्गो गव्ये कोशे समर्पितः | |
| हेमत्सरुरनाधृष्यो नैषध्यो भारसाधनः | |
| कस्य पाञ्चनखे कोशे सायको हेमविग्रहः | |
| प्रमाणरूपसंपन्नः पीत आकाशसंनिभः | |
| कस्य हेममये कोशे सुतप्ते पावकप्रभे | |
| निस्त्रिंशोऽयं गुरुः पीतः सैक्यः परमनिर्व्रणः | |
| निर्दिशस्व यथातत्त्वं मया पृष्टा बृहन्नडे | |
| विस्मयो मे परो जातो दृष्ट्वा सर्वमिदं महत् | |
| बृहन्नडोवाच | |
| यन्मां पूर्वमिहापृच्छः शत्रुसेनानिबर्हणम् | |
| गाण्डीवमेतत्पार्थस्य लोकेषु विदितं धनुः | |
| सर्वायुधमहामात्रं शातकुम्भपरिष्कृतम् | |
| एतत्तदर्जुनस्यासीद्गाण्डीवं परमायुधम् | |
| यत्तच्छतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् | |
| येन देवान्मनुष्यांश्च पार्थो विषहते मृधे | |
| देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः | |
| एतद्वर्षसहस्रं तु ब्रह्मा पूर्वमधारयत् | |
| ततोऽनन्तरमेवाथ प्रजापतिरधारयत् | |
| त्रीणि पञ्चशतं चैव शक्रोऽशीति च पञ्च च | |
| सोमः पञ्चशतं राजा तथैव वरुणः शतम् | |
| पार्थः पञ्च च षष्टिं च वर्षाणि श्वेतवाहनः | |
| महावीर्यं महद्दिव्यमेतत्तद्धनुरुत्तमम् | |
| पूजितं सुरमर्त्येषु बिभर्ति परमं वपुः | |
| सुपार्श्वं भीमसेनस्य जातरूपग्रहं धनुः | |
| येन पार्थोऽजयत्कृत्स्नां दिशं प्राचीं परंतपः | |
| इन्द्रगोपकचित्रं च यदेतच्चारुविग्रहम् | |
| राज्ञो युधिष्ठिरस्यैतद्वैराटे धनुरुत्तमम् | |
| सूर्या यस्मिंस्तु सौवर्णाः प्रभासन्ते प्रभासिनः | |
| तेजसा प्रज्वलन्तो वै नकुलस्यैतदायुधम् | |
| शलभा यत्र सौवर्णास्तपनीयविचित्रिताः | |
| एतन्माद्रीसुतस्यापि सहदेवस्य कार्मुकम् | |
| ये त्विमे क्षुरसंकाशाः सहस्रा लोमवाहिनः | |
| एतेऽर्जुनस्य वैराटे शराः सर्पविषोपमाः | |
| एते ज्वलन्तः संग्रामे तेजसा शीघ्रगामिनः | |
| भवन्ति वीरस्याक्षय्या व्यूहतः समरे रिपून् | |
| ये चेमे पृथवो दीर्घाश्चन्द्रबिम्बार्धदर्शनाः | |
| एते भीमस्य निशिता रिपुक्षयकराः शराः | |
| हारिद्रवर्णा ये त्वेते हेमपुङ्खाः शिलाशिताः | |
| नकुलस्य कलापोऽयं पञ्चशार्दूललक्षणः | |
| येनासौ व्यजयत्कृत्स्नां प्रतीचीं दिशमाहवे | |
| कलापो ह्येष तस्यासीन्माद्रीपुत्रस्य धीमतः | |
| ये त्विमे भास्कराकाराः सर्वपारशवाः शराः | |
| एते चित्राः क्रियोपेताः सहदेवस्य धीमतः | |
| ये त्विमे निशिताः पीताः पृथवो दीर्घवाससः | |
| हेमपुङ्खास्त्रिपर्वाणो राज्ञ एते महाशराः | |
| यस्त्वयं सायको दीर्घः शिलीपृष्ठः शिलीमुखः | |
| अर्जुनस्यैष संग्रामे गुरुभारसहो दृढः | |
| वैयाघ्रकोशस्तु महान्भीमसेनस्य सायकः | |
| गुरुभारसहो दिव्यः शात्रवाणां भयंकरः | |
| सुफलश्चित्रकोशश्च हेमत्सरुरनुत्तमः | |
| निस्त्रिंशः कौरवस्यैष धर्मराजस्य धीमतः | |
| यस्तु पाञ्चनखे कोशे निहितश्चित्रसेवने | |
| नकुलस्यैष निस्त्रिंशो गुरुभारसहो दृढः | |
| यस्त्वयं विमलः खड्गो गव्ये कोशे समर्पितः | |
| सहदेवस्य विद्ध्येनं सर्वभारसहं दृढम् | |
| उत्तर उवाच | |
| सुवर्णविकृतानीमान्यायुधानि महात्मनाम् | |
| रुचिराणि प्रकाशन्ते पार्थानामाशुकारिणाम् | |
| क्व नु स्विदर्जुनः पार्थः कौरव्यो वा युधिष्ठिरः | |
| नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पाण्डवः | |
| सर्व एव महात्मानः सर्वामित्रविनाशनाः | |
| राज्यमक्षैः पराकीर्य न श्रूयन्ते कदाचन | |
| द्रौपदी क्व च पाञ्चाली स्त्रीरत्नमिति विश्रुता | |
| जितानक्षैस्तदा कृष्णा तानेवान्वगमद्वनम् | |
| अर्जुन उवाच | |
| अहमस्म्यर्जुनः पार्थः सभास्तारो युधिष्ठिरः | |
| बल्लवो भीमसेनस्तु पितुस्ते रसपाचकः | |
| अश्वबन्धोऽथ नकुलः सहदेवस्तु गोकुले | |
| सैरन्ध्रीं द्रौपदीं विद्धि यत्कृते कीचका हताः | |
| उत्तर उवाच | |
| दश पार्थस्य नामानि यानि पूर्वं श्रुतानि मे | |
| प्रब्रूयास्तानि यदि मे श्रद्दध्यां सर्वमेव ते | |
| अर्जुन उवाच | |
| हन्त तेऽहं समाचक्षे दश नामानि यानि मे | |
| अर्जुनः फल्गुनो जिष्णुः किरीटी श्वेतवाहनः | |
| बीभत्सुर्विजयः कृष्णः सव्यसाची धनंजयः | |
| उत्तर उवाच | |
| केनासि विजयो नाम केनासि श्वेतवाहनः | |
| किरीटी नाम केनासि सव्यसाची कथं भवान् | |
| अर्जुनः फल्गुनो जिष्णुः कृष्णो बीभत्सुरेव च | |
| धनंजयश्च केनासि प्रब्रूहि मम तत्त्वतः | |
| श्रुता मे तस्य वीरस्य केवला नामहेतवः | |
| अर्जुन उवाच | |
| सर्वाञ्जनपदाञ्जित्वा वित्तमाच्छिद्य केवलम् | |
| मध्ये धनस्य तिष्ठामि तेनाहुर्मां धनंजयम् | |
| अभिप्रयामि संग्रामे यदहं युद्धदुर्मदान् | |
| नाजित्वा विनिवर्तामि तेन मां विजयं विदुः | |
| श्वेताः काञ्चनसंनाहा रथे युज्यन्ति मे हयाः | |
| संग्रामे युध्यमानस्य तेनाहं श्वेतवाहनः | |
| उत्तराभ्यां च पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यामहं दिवा | |
| जातो हिमवतः पृष्ठे तेन मां फल्गुनं विदुः | |
| पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभैः | |
| किरीटं मूर्ध्नि सूर्याभं तेन माहुः किरीटिनम् | |
| न कुर्यां कर्म बीभत्सं युध्यमानः कथंचन | |
| तेन देवमनुष्येषु बीभत्सुरिति मां विदुः | |
| उभौ मे दक्षिणौ पाणी गाण्डीवस्य विकर्षणे | |
| तेन देवमनुष्येषु सव्यसाचीति मां विदुः | |
| पृथिव्यां चतुरन्तायां वर्णो मे दुर्लभः समः | |
| करोमि कर्म शुक्लं च तेन मामर्जुनं विदुः | |
| अहं दुरापो दुर्धर्षो दमनः पाकशासनिः | |
| तेन देवमनुष्येषु जिष्णुनामास्मि विश्रुतः | |
| कृष्ण इत्येव दशमं नाम चक्रे पिता मम | |
| कृष्णावदातस्य सतः प्रियत्वाद्बालकस्य वै | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः पार्थं स वैराटिरभ्यवादयदन्तिकात् | |
| अहं भूमिंजयो नाम नाम्नाहमपि चोत्तरः | |
| दिष्ट्या त्वां पार्थ पश्यामि स्वागतं ते धनंजय | |
| लोहिताक्ष महाबाहो नागराजकरोपम | |
| यदज्ञानादवोचं त्वां क्षन्तुमर्हसि तन्मम | |
| यतस्त्वया कृतं पूर्वं विचित्रं कर्म दुष्करम् | |
| अतो भयं व्यतीतं मे प्रीतिश्च परमा त्वयि | |
| उत्तर उवाच | |
| आस्थाय विपुलं वीर रथं सारथिना मया | |
| कतमं यास्यसेऽनीकमुक्तो यास्याम्यहं त्वया | |
| अर्जुन उवाच | |
| प्रीतोऽस्मि पुरुषव्याघ्र न भयं विद्यते तव | |
| सर्वान्नुदामि ते शत्रून्रणे रणविशारद | |
| स्वस्थो भव महाबुद्धे पश्य मां शत्रुभिः सह | |
| युध्यमानं विमर्देऽस्मिन्कुर्वाणं भैरवं महत् | |
| एतान्सर्वानुपासङ्गान्क्षिप्रं बध्नीहि मे रथे | |
| एतं चाहर निस्त्रिंशं जातरूपपरिष्कृतम् | |
| अहं वै कुरुभिर्योत्स्याम्यवजेष्यामि ते पशून् | |
| संकल्पपक्षविक्षेपं बाहुप्राकारतोरणम् | |
| त्रिदण्डतूणसंबाधमनेकध्वजसंकुलम् | |
| ज्याक्षेपणं क्रोधकृतं नेमीनिनददुन्दुभि | |
| नगरं ते मया गुप्तं रथोपस्थं भविष्यति | |
| अधिष्ठितो मया संख्ये रथो गाण्डीवधन्वना | |
| अजेयः शत्रुसैन्यानां वैराटे व्येतु ते भयम् | |
| उत्तर उवाच | |
| बिभेमि नाहमेतेषां जानामि त्वां स्थिरं युधि | |
| केशवेनापि संग्रामे साक्षादिन्द्रेण वा समम् | |
| इदं तु चिन्तयन्नेव परिमुह्यामि केवलम् | |
| निश्चयं चापि दुर्मेधा न गच्छामि कथंचन | |
| एवं वीराङ्गरूपस्य लक्षणैरुचितस्य च | |
| केन कर्मविपाकेन क्लीबत्वमिदमागतम् | |
| मन्ये त्वां क्लीबवेषेण चरन्तं शूलपाणिनम् | |
| गन्धर्वराजप्रतिमं देवं वापि शतक्रतुम् | |
| अर्जुन उवाच | |
| भ्रातुर्नियोगाज्ज्येष्ठस्य संवत्सरमिदं व्रतम् | |
| चरामि ब्रह्मचर्यं वै सत्यमेतद्ब्रवीमि ते | |
| नास्मि क्लीबो महाबाहो परवान्धर्मसंयुतः | |
| समाप्तव्रतमुत्तीर्णं विद्धि मां त्वं नृपात्मज | |
| उत्तर उवाच | |
| परमोऽनुग्रहो मेऽद्य यत्प्रतर्को न मे वृथा | |
| न हीदृशाः क्लीबरूपा भवन्तीह नरोत्तमाः | |
| सहायवानस्मि रणे युध्येयममरैरपि | |
| साध्वसं तत्प्रनष्टं मे किं करोमि ब्रवीहि मे | |
| अहं ते संग्रहीष्यामि हयाञ्शत्रुरथारुजः | |
| शिक्षितो ह्यस्मि सारथ्ये तीर्थतः पुरुषर्षभ | |
| दारुको वासुदेवस्य यथा शक्रस्य मातलिः | |
| तथा मां विद्धि सारथ्ये शिक्षितं नरपुंगव | |
| यस्य याते न पश्यन्ति भूमौ प्राप्तं पदं पदम् | |
| दक्षिणं यो धुरं युक्तः सुग्रीवसदृशो हयः | |
| योऽयं धुरं धुर्यवरो वामं वहति शोभनः | |
| तं मन्ये मेघपुष्पस्य जवेन सदृशं हयम् | |
| योऽयं काञ्चनसंनाहः पार्ष्णिं वहति शोभनः | |
| वामं सैन्यस्य मन्ये तं जवेन बलवत्तरम् | |
| योऽयं वहति ते पार्ष्णिं दक्षिणामञ्चितोद्यतः | |
| बलाहकादपि मतः स जवे वीर्यवत्तरः | |
| त्वामेवायं रथो वोढुं संग्रामेऽर्हति धन्विनम् | |
| त्वं चेमं रथमास्थाय योद्धुमर्हो मतो मम | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो निर्मुच्य बाहुभ्यां वलयानि स वीर्यवान् | |
| चित्रे दुन्दुभिसंनादे प्रत्यमुञ्चत्तले शुभे | |
| कृष्णान्भङ्गीमतः केशाञ्श्वेतेनोद्ग्रथ्य वाससा | |
| अधिज्यं तरसा कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद्धनुः | |
| तस्य विक्षिप्यमाणस्य धनुषोऽभून्महास्वनः | |
| यथा शैलस्य महतः शैलेनैवाभिजघ्नुषः | |
| सनिर्घाताभवद्भूमिर्दिक्षु वायुर्ववौ भृशम् | |
| भ्रान्तद्विजं खं तदासीत्प्रकम्पितमहाद्रुमम् | |
| तं शब्दं कुरवोऽजानन्विस्फोटमशनेरिव | |
| यदर्जुनो धनुःश्रेष्ठं बाहुभ्यामाक्षिपद्रथे | |
| वैशंपायन उवाच | |
| उत्तरं सारथिं कृत्वा शमीं कृत्वा प्रदक्षिणम् | |
| आयुधं सर्वमादाय ततः प्रायाद्धनंजयः | |
| ध्वजं सिंहं रथात्तस्मादपनीय महारथः | |
| प्रणिधाय शमीमूले प्रायादुत्तरसारथिः | |
| दैवीं मायां रथे युक्त्वा विहितां विश्वकर्मणा | |
| काञ्चनं सिंहलाङ्गूलं ध्वजं वानरलक्षणम् | |
| मनसा चिन्तयामास प्रसादं पावकस्य च | |
| स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा ध्वजे भूतान्यचोदयत् | |
| सपताकं विचित्राङ्गं सोपासङ्गं महारथः | |
| रथमास्थाय बीभत्सुः कौन्तेयः श्वेतवाहनः | |
| बद्धासिः सतनुत्राणः प्रगृहीतशरासनः | |
| ततः प्रायादुदीचीं स कपिप्रवरकेतनः | |
| स्वनवन्तं महाशङ्खं बलवानरिमर्दनः | |
| प्राधमद्बलमास्थाय द्विषतां लोमहर्षणम् | |
| ततस्ते जवना धुर्या जानुभ्यामगमन्महीम् | |
| उत्तरश्चापि संत्रस्तो रथोपस्थ उपाविशत् | |
| संस्थाप्य चाश्वान्कौन्तेयः समुद्यम्य च रश्मिभिः | |
| उत्तरं च परिष्वज्य समाश्वासयदर्जुनः | |
| मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रियोऽसि परंतप | |
| कथं पुरुषशार्दूल शत्रुमध्ये विषीदसि | |
| श्रुतास्ते शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः | |
| कुञ्जराणां च नदतां व्यूढानीकेषु तिष्ठताम् | |
| स त्वं कथमिहानेन शङ्खशब्देन भीषितः | |
| विषण्णरूपो वित्रस्तः पुरुषः प्राकृतो यथा | |
| उत्तर उवाच | |
| श्रुता मे शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः | |
| कुञ्जराणां च निनदा व्यूढानीकेषु तिष्ठताम् | |
| नैवंविधः शङ्खशब्दः पुरा जातु मया श्रुतः | |
| ध्वजस्य चापि रूपं मे दृष्टपूर्वं न हीदृशम् | |
| धनुषश्चैव निर्घोषः श्रुतपूर्वो न मे क्वचित् | |
| अस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो निस्वनेन च | |
| रथस्य च निनादेन मनो मुह्यति मे भृशम् | |
| व्याकुलाश्च दिशः सर्वा हृदयं व्यथतीव मे | |
| ध्वजेन पिहिताः सर्वा दिशो न प्रतिभान्ति मे | |
| गाण्डीवस्य च शब्देन कर्णौ मे बधिरीकृतौ | |
| अर्जुन उवाच | |
| एकान्ते रथमास्थाय पद्भ्यां त्वमवपीडय | |
| दृढं च रश्मीन्संयच्छ शङ्खं ध्मास्याम्यहं पुनः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तस्य शङ्खस्य शब्देन रथनेमिस्वनेन च | |
| गाण्डीवस्य च घोषेण पृथिवी समकम्पत | |
| द्रोण उवाच | |
| यथा रथस्य निर्घोषो यथा शङ्ख उदीर्यते | |
| कम्पते च यथा भूमिर्नैषोऽन्यः सव्यसाचिनः | |
| शस्त्राणि न प्रकाशन्ते न प्रहृष्यन्ति वाजिनः | |
| अग्नयश्च न भासन्ते समिद्धास्तन्न शोभनम् | |
| प्रत्यादित्यं च नः सर्वे मृगा घोरप्रवादिनः | |
| ध्वजेषु च निलीयन्ते वायसास्तन्न शोभनम् | |
| शकुनाश्चापसव्या नो वेदयन्ति महद्भयम् | |
| गोमायुरेष सेनाया रुवन्मध्येऽनुधावति | |
| अनाहतश्च निष्क्रान्तो महद्वेदयते भयम् | |
| भवतां रोमकूपाणि प्रहृष्टान्युपलक्षये | |
| पराभूता च वः सेना न कश्चिद्योद्धुमिच्छति | |
| विवर्णमुखभूयिष्ठाः सर्वे योधा विचेतसः | |
| गाः संप्रस्थाप्य तिष्ठामो व्यूढानीकाः प्रहारिणः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथ दुर्योधनो राजा समरे भीष्ममब्रवीत् | |
| द्रोणं च रथशार्दूलं कृपं च सुमहारथम् | |
| उक्तोऽयमर्थ आचार्यो मया कर्णेन चासकृत् | |
| पुनरेव च वक्ष्यामि न हि तृप्यामि तं ब्रुवन् | |
| पराजितैर्हि वस्तव्यं तैश्च द्वादश वत्सरान् | |
| वने जनपदेऽज्ञातैरेष एव पणो हि नः | |
| तेषां न तावन्निर्वृत्तं वर्तते तु त्रयोदशम् | |
| अज्ञातवासं बीभत्सुरथास्माभिः समागतः | |
| अनिवृत्ते तु निर्वासे यदि बीभत्सुरागतः | |
| पुनर्द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः | |
| लोभाद्वा ते न जानीयुरस्मान्वा मोह आविशत् | |
| हीनातिरिक्तमेतेषां भीष्मो वेदितुमर्हति | |
| अर्थानां तु पुनर्द्वैधे नित्यं भवति संशयः | |
| अन्यथा चिन्तितो ह्यर्थः पुनर्भवति चान्यथा | |
| उत्तरं मार्गमाणानां मत्स्यसेनां युयुत्सताम् | |
| यदि बीभत्सुरायातस्तेषां कः स्यात्पराङ्मुखः | |
| त्रिगर्तानां वयं हेतोर्मत्स्यान्योद्धुमिहागताः | |
| मत्स्यानां विप्रकारांस्ते बहूनस्मानकीर्तयन् | |
| तेषां भयाभिपन्नानां तदस्माभिः प्रतिश्रुतम् | |
| प्रथमं तैर्ग्रहीतव्यं मत्स्यानां गोधनं महत् | |
| सप्तमीमपराह्णे वै तथा नस्तैः समाहितम् | |
| अष्टम्यां पुनरस्माभिरादित्यस्योदयं प्रति | |
| ते वा गावो न पश्यन्ति यदि व स्युः पराजिताः | |
| अस्मान्वाप्यतिसंधाय कुर्युर्मत्स्येन संगतम् | |
| अथ वा तानुपायातो मत्स्यो जानपदैः सह | |
| सर्वया सेनया सार्धमस्मान्योद्धुमुपागतः | |
| तेषामेव महावीर्यः कश्चिदेव पुरःसरः | |
| अस्माञ्जेतुमिहायातो मत्स्यो वापि स्वयं भवेत् | |
| यद्येष राजा मत्स्यानां यदि बीभत्सुरागतः | |
| सर्वैर्योद्धव्यमस्माभिरिति नः समयः कृतः | |
| अथ कस्मात्स्थिता ह्येते रथेषु रथसत्तमाः | |
| भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव विकर्णो द्रौणिरेव च | |
| संभ्रान्तमनसः सर्वे काले ह्यस्मिन्महारथाः | |
| नान्यत्र युद्धाच्छ्रेयोऽस्ति तथात्मा प्रणिधीयताम् | |
| आच्छिन्ने गोधनेऽस्माकमपि देवेन वज्रिणा | |
| यमेन वापि संग्रामे को हास्तिनपुरं व्रजेत् | |
| शरैरभिप्रणुन्नानां भग्नानां गहने वने | |
| को हि जीवेत्पदातीनां भवेदश्वेषु संशयः | |
| आचार्यं पृष्ठतः कृत्वा तथा नीतिर्विधीयताम् | |
| जानाति हि मतं तेषामतस्त्रासयतीव नः | |
| अर्जुनेनास्य संप्रीतिमधिकामुपलक्षये | |
| तथा हि दृष्ट्वा बीभत्सुमुपायान्तं प्रशंसति | |
| यथा सेना न भज्येत तथा नीतिर्विधीयताम् | |
| अदेशिका महारण्ये ग्रीष्मे शत्रुवशं गता | |
| यथा न विभ्रमेत्सेना तथा नीतिर्विधीयताम् | |
| अश्वानां हेषितं श्रुत्वा का प्रशंसा भवेत्परे | |
| स्थाने वापि व्रजन्तो वा सदा हेषन्ति वाजिनः | |
| सदा च वायवो वान्ति नित्यं वर्षति वासवः | |
| स्तनयित्नोश्च निर्घोषः श्रूयते बहुशस्तथा | |
| किमत्र कार्यं पार्थस्य कथं वा स प्रशस्यते | |
| अन्यत्र कामाद्द्वेषाद्वा रोषाद्वास्मासु केवलात् | |
| आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापायदर्शिनः | |
| नैते महाभये प्राप्ते संप्रष्टव्याः कथंचन | |
| प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीष्वावसथेषु च | |
| कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभनाः | |
| बहून्याश्चर्यरूपाणि कुर्वन्तो जनसंसदि | |
| इष्वस्त्रे चारुसंधाने पण्डितास्तत्र शोभनाः | |
| परेषां विवरज्ञाने मनुष्याचरितेषु च | |
| अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः | |
| पण्डितान्पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः | |
| विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्येत वै परः | |
| गावश्चैव प्रतिष्ठन्तां सेनां व्यूहन्तु माचिरम् | |
| आरक्षाश्च विधीयन्तां यत्र योत्स्यामहे परान् | |
| कर्ण उवाच | |
| सर्वानायुष्मतो भीतान्संत्रस्तानिव लक्षये | |
| अयुद्धमनसश्चैव सर्वांश्चैवानवस्थितान् | |
| यद्येष राजा मत्स्यानां यदि बीभत्सुरागतः | |
| अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् | |
| मम चापप्रमुक्तानां शराणां नतपर्वणाम् | |
| नावृत्तिर्गच्छतामस्ति सर्पाणामिव सर्पताम् | |
| रुक्मपुङ्खाः सुतीक्ष्णाग्रा मुक्ता हस्तवता मया | |
| छादयन्तु शराः पार्थं शलभा इव पादपम् | |
| शराणां पुङ्खसक्तानां मौर्व्याभिहतया दृढम् | |
| श्रूयतां तलयोः शब्दो भेर्योराहतयोरिव | |
| समाहितो हि बीभत्सुर्वर्षाण्यष्टौ च पञ्च च | |
| जातस्नेहश्च युद्धस्य मयि संप्रहरिष्यति | |
| पात्रीभूतश्च कौन्तेयो ब्राह्मणो गुणवानिव | |
| शरौघान्प्रतिगृह्णातु मया मुक्तान्सहस्रशः | |
| एष चैव महेष्वासस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः | |
| अहं चापि कुरुश्रेष्ठा अर्जुनान्नावरः क्वचित् | |
| इतश्चेतश्च निर्मुक्तैः काञ्चनैर्गार्ध्रवाजितैः | |
| दृश्यतामद्य वै व्योम खद्योतैरिव संवृतम् | |
| अद्याहमृणमक्षय्यं पुरा वाचा प्रतिश्रुतम् | |
| धार्तराष्ट्रस्य दास्यामि निहत्य समरेऽर्जुनम् | |
| अन्तरा छिद्यमानानां पुङ्खानां व्यतिशीर्यताम् | |
| शलभानामिवाकाशे प्रचारः संप्रदृश्यताम् | |
| इन्द्राशनिसमस्पर्शं महेन्द्रसमतेजसम् | |
| अर्दयिष्याम्यहं पार्थमुल्काभिरिव कुञ्जरम् | |
| तमग्निमिव दुर्धर्षमसिशक्तिशरेन्धनम् | |
| पाण्डवाग्निमहं दीप्तं प्रदहन्तमिवाहितान् | |
| अश्ववेगपुरोवातो रथौघस्तनयित्नुमान् | |
| शरधारो महामेघः शमयिष्यामि पाण्डवम् | |
| मत्कार्मुकविनिर्मुक्ताः पार्थमाशीविषोपमाः | |
| शराः समभिसर्पन्तु वल्मीकमिव पन्नगाः | |
| जामदग्न्यान्मया ह्यस्त्रं यत्प्राप्तमृषिसत्तमात् | |
| तदुपाश्रित्य वीर्यं च युध्येयमपि वासवम् | |
| ध्वजाग्रे वानरस्तिष्ठन्भल्लेन निहतो मया | |
| अद्यैव पततां भूमौ विनदन्भैरवान्रवान् | |
| शत्रोर्मयाभिपन्नानां भूतानां ध्वजवासिनाम् | |
| दिशः प्रतिष्ठमानानामस्तु शब्दो दिवं गतः | |
| अद्य दुर्योधनस्याहं शल्यं हृदि चिरस्थितम् | |
| समूलमुद्धरिष्यामि बीभत्सुं पातयन्रथात् | |
| हताश्वं विरथं पार्थं पौरुषे पर्यवस्थितम् | |
| निःश्वसन्तं यथा नागमद्य पश्यन्तु कौरवाः | |
| कामं गच्छन्तु कुरवो धनमादाय केवलम् | |
| रथेषु वापि तिष्ठन्तो युद्धं पश्यन्तु मामकम् | |
| कृप उवाच | |
| सदैव तव राधेय युद्धे क्रूरतरा मतिः | |
| नार्थानां प्रकृतिं वेत्थ नानुबन्धमवेक्षसे | |
| नया हि बहवः सन्ति शास्त्राण्याश्रित्य चिन्तिताः | |
| तेषां युद्धं तु पापिष्ठं वेदयन्ति पुराविदः | |
| देशकालेन संयुक्तं युद्धं विजयदं भवेत् | |
| हीनकालं तदेवेह फलवन्न भवत्युत | |
| देशे काले च विक्रान्तं कल्याणाय विधीयते | |
| आनुकूल्येन कार्याणामन्तरं संविधीयताम् | |
| भारं हि रथकारस्य न व्यवस्यन्ति पण्डिताः | |
| परिचिन्त्य तु पार्थेन संनिपातो न नः क्षमः | |
| एकः कुरूनभ्यरक्षदेकश्चाग्निमतर्पयत् | |
| एकश्च पञ्च वर्षाणि ब्रह्मचर्यमधारयत् | |
| एकः सुभद्रामारोप्य द्वैरथे कृष्णमाह्वयत् | |
| अस्मिन्नेव वने कृष्णो हृतां कृष्णामवाजयत् | |
| एकश्च पञ्च वर्षाणि शक्रादस्त्राण्यशिक्षत | |
| एकः सांयमिनीं जित्वा कुरूणामकरोद्यशः | |
| एको गन्धर्वराजानं चित्रसेनमरिंदमः | |
| विजिग्ये तरसा संख्ये सेनां चास्य सुदुर्जयाम् | |
| तथा निवातकवचाः कालखञ्जाश्च दानवाः | |
| दैवतैरप्यवध्यास्ते एकेन युधि पातिताः | |
| एकेन हि त्वया कर्ण किं नामेह कृतं पुरा | |
| एकैकेन यथा तेषां भूमिपाला वशीकृताः | |
| इन्द्रोऽपि हि न पार्थेन संयुगे योद्धुमर्हति | |
| यस्तेनाशंसते योद्धुं कर्तव्यं तस्य भेषजम् | |
| आशीविषस्य क्रुद्धस्य पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् | |
| अविमृश्य प्रदेशिन्या दंष्ट्रामादातुमिच्छसि | |
| अथ वा कुञ्जरं मत्तमेक एव चरन्वने | |
| अनङ्कुशं समारुह्य नगरं गन्तुमिच्छसि | |
| समिद्धं पावकं वापि घृतमेदोवसाहुतम् | |
| घृताक्तश्चीरवासास्त्वं मध्येनोत्तर्तुमिच्छसि | |
| आत्मानं यः समुद्बध्य कण्ठे बद्ध्वा महाशिलाम् | |
| समुद्रं प्रतरेद्दोर्भ्यां तत्र किं नाम पौरुषम् | |
| अकृतास्त्रः कृतास्त्रं वै बलवन्तं सुदुर्बलः | |
| तादृशं कर्ण यः पार्थं योद्धुमिच्छेत्स दुर्मतिः | |
| अस्माभिरेष निकृतो वर्षाणीह त्रयोदश | |
| सिंहः पाशविनिर्मुक्तो न नः शेषं करिष्यति | |
| एकान्ते पार्थमासीनं कूपेऽग्निमिव संवृतम् | |
| अज्ञानादभ्यवस्कन्द्य प्राप्ताः स्मो भयमुत्तमम् | |
| सह युध्यामहे पार्थमागतं युद्धदुर्मदम् | |
| सैन्यास्तिष्ठन्तु संनद्धा व्यूढानीकाः प्रहारिणः | |
| द्रोणो दुर्योधनो भीष्मो भवान्द्रौणिस्तथा वयम् | |
| सर्वे युध्यामहे पार्थं कर्ण मा साहसं कृथाः | |
| वयं व्यवसितं पार्थं वज्रपाणिमिवोद्यतम् | |
| षड्रथाः प्रतियुध्येम तिष्ठेम यदि संहताः | |
| व्यूढानीकानि सैन्यानि यत्ताः परमधन्विनः | |
| युध्यामहेऽर्जुनं संख्ये दानवा वासवं यथा | |
| अश्वत्थामोवाच | |
| न च तावज्जिता गावो न च सीमान्तरं गताः | |
| न हास्तिनपुरं प्राप्तास्त्वं च कर्ण विकत्थसे | |
| संग्रामान्सुबहूञ्जित्वा लब्ध्वा च विपुलं धनम् | |
| विजित्य च परां भूमिं नाहुः किंचन पौरुषम् | |
| पचत्यग्निरवाक्यस्तु तूष्णीं भाति दिवाकरः | |
| तूष्णीं धारयते लोकान्वसुधा सचराचरान् | |
| चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि विहितानि मनीषिभिः | |
| धनं यैरधिगन्तव्यं यच्च कुर्वन्न दुष्यति | |
| अधीत्य ब्राह्मणो वेदान्याजयेत यजेत च | |
| क्षत्रियो धनुराश्रित्य यजेतैव न याजयेत् | |
| वैश्योऽधिगम्य द्रव्याणि ब्रह्मकर्माणि कारयेत् | |
| वर्तमाना यथाशास्त्रं प्राप्य चापि महीमिमाम् | |
| सत्कुर्वन्ति महाभागा गुरून्सुविगुणानपि | |
| प्राप्य द्यूतेन को राज्यं क्षत्रियस्तोष्टुमर्हति | |
| तथा नृशंसरूपेण यथान्यः प्राकृतो जनः | |
| तथावाप्तेषु वित्तेषु को विकत्थेद्विचक्षणः | |
| निकृत्या वञ्चनायोगैश्चरन्वैतंसिको यथा | |
| कतमद्द्वैरथं युद्धं यत्राजैषीर्धनंजयम् | |
| नकुलं सहदेवं च धनं येषां त्वया हृतम् | |
| युधिष्ठिरो जितः कस्मिन्भीमश्च बलिनां वरः | |
| इन्द्रप्रस्थं त्वया कस्मिन्संग्रामे निर्जितं पुरा | |
| तथैव कतमं युद्धं यस्मिन्कृष्णा जिता त्वया | |
| एकवस्त्रा सभां नीता दुष्टकर्मन्रजस्वला | |
| मूलमेषां महत्कृत्तं सारार्थी चन्दनं यथा | |
| कर्म कारयिथाः शूर तत्र किं विदुरोऽब्रवीत् | |
| यथाशक्ति मनुष्याणां शममालक्षयामहे | |
| अन्येषां चैव सत्त्वानामपि कीटपिपीलिके | |
| द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षन्तुं पाण्डवोऽर्हति | |
| दुःखाय धार्तराष्ट्राणां प्रादुर्भूतो धनंजयः | |
| त्वं पुनः पण्डितो भूत्वा वाचं वक्तुमिहेच्छसि | |
| वैरान्तकरणो जिष्णुर्न नः शेषं करिष्यति | |
| नैष देवान्न गन्धर्वान्नासुरान्न च राक्षसान् | |
| भयादिह न युध्येत कुन्तीपुत्रो धनंजयः | |
| यं यमेषोऽभिसंक्रुद्धः संग्रामेऽभिपतिष्यति | |
| वृक्षं गरुडवेगेन विनिहत्य तमेष्यति | |
| त्वत्तो विशिष्टं वीर्येण धनुष्यमरराट्समम् | |
| वासुदेवसमं युद्धे तं पार्थं को न पूजयेत् | |
| दैवं दैवेन युध्येत मानुषेण च मानुषम् | |
| अस्त्रेणास्त्रं समाहन्यात्कोऽर्जुनेन समः पुमान् | |
| पुत्रादनन्तरः शिष्य इति धर्मविदो विदुः | |
| एतेनापि निमित्तेन प्रियो द्रोणस्य पाण्डवः | |
| यथा त्वमकरोर्द्यूतमिन्द्रप्रस्थं यथाहरः | |
| यथानैषीः सभां कृष्णां तथा युध्यस्व पाण्डवम् | |
| अयं ते मातुलः प्राज्ञः क्षत्रधर्मस्य कोविदः | |
| दुर्द्यूतदेवी गान्धारः शकुनिर्युध्यतामिह | |
| नाक्षान्क्षिपति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च | |
| ज्वलतो निशितान्बाणांस्तीक्ष्णान्क्षिपति गाण्डिवम् | |
| न हि गाण्डीवनिर्मुक्ता गार्ध्रपत्राः सुतेजनाः | |
| अन्तरेष्ववतिष्ठन्ति गिरीणामपि दारणाः | |
| अन्तकः शमनो मृत्युस्तथाग्निर्वडवामुखः | |
| कुर्युरेते क्वचिच्छेषं न तु क्रुद्धो धनंजयः | |
| युध्यतां काममाचार्यो नाहं योत्स्ये धनंजयम् | |
| मत्स्यो ह्यस्माभिरायोध्यो यद्यागच्छेद्गवां पदम् | |
| भीष्म उवाच | |
| साधु पश्यति वै द्रोणः कृपः साध्वनुपश्यति | |
| कर्णस्तु क्षत्रधर्मेण यथावद्योद्धुमिच्छति | |
| आचार्यो नाभिषक्तव्यः पुरुषेण विजानता | |
| देशकालौ तु संप्रेक्ष्य योद्धव्यमिति मे मतिः | |
| यस्य सूर्यसमाः पञ्च सपत्नाः स्युः प्रहारिणः | |
| कथमभ्युदये तेषां न प्रमुह्येत पण्डितः | |
| स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः | |
| तस्माद्राजन्ब्रवीम्येष वाक्यं ते यदि रोचते | |
| कर्णो यदभ्यवोचन्नस्तेजःसंजननाय तत् | |
| आचार्यपुत्रः क्षमतां महत्कार्यमुपस्थितम् | |
| नायं कालो विरोधस्य कौन्तेये समुपस्थिते | |
| क्षन्तव्यं भवता सर्वमाचार्येण कृपेण च | |
| भवतां हि कृतास्त्रत्वं यथादित्ये प्रभा तथा | |
| यथा चन्द्रमसो लक्ष्म सर्वथा नापकृष्यते | |
| एवं भवत्सु ब्राह्मण्यं ब्रह्मास्त्रं च प्रतिष्ठितम् | |
| चत्वार एकतो वेदाः क्षात्रमेकत्र दृश्यते | |
| नैतत्समस्तमुभयं कस्मिंश्चिदनुशुश्रुमः | |
| अन्यत्र भारताचार्यात्सपुत्रादिति मे मतिः | |
| ब्रह्मास्त्रं चैव वेदाश्च नैतदन्यत्र दृश्यते | |
| आचार्यपुत्रः क्षमतां नायं कालः स्वभेदने | |
| सर्वे संहत्य युध्यामः पाकशासनिमागतम् | |
| बलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः | |
| मुख्यो भेदो हि तेषां वै पापिष्ठो विदुषां मतः | |
| अश्वत्थामोवाच | |
| आचार्य एव क्षमतां शान्तिरत्र विधीयताम् | |
| अभिषज्यमाने हि गुरौ तद्वृत्तं रोषकारितम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो दुर्योधनो द्रोणं क्षमयामास भारत | |
| सह कर्णेन भीष्मेण कृपेण च महात्मना | |
| द्रोण उवाच | |
| यदेव प्रथमं वाक्यं भीष्मः शांतनवोऽब्रवीत् | |
| तेनैवाहं प्रसन्नो वै परमत्र विधीयताम् | |
| यथा दुर्योधनेऽयत्ते नागः स्पृशति सैनिकान् | |
| साहसाद्यदि वा मोहात्तथा नीतिर्विधीयताम् | |
| वनवासे ह्यनिर्वृत्ते दर्शयेन्न धनंजयः | |
| धनं वालभमानोऽत्र नाद्य नः क्षन्तुमर्हति | |
| यथा नायं समायुज्याद्धार्तराष्ट्रान्कथंचन | |
| यथा च न पराजय्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् | |
| उक्तं दुर्योधनेनापि पुरस्ताद्वाक्यमीदृशम् | |
| तदनुस्मृत्य गाङ्गेय यथावद्वक्तुमर्हसि | |
| भीष्म उवाच | |
| कलांशास्तात युज्यन्ते मुहूर्ताश्च दिनानि च | |
| अर्धमासाश्च मासाश्च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा | |
| ऋतवश्चापि युज्यन्ते तथा संवत्सरा अपि | |
| एवं कालविभागेन कालचक्रं प्रवर्तते | |
| तेषां कालातिरेकेण ज्योतिषां च व्यतिक्रमात् | |
| पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासावुपजायतः | |
| तेषामभ्यधिका मासाः पञ्च द्वादश च क्षपाः | |
| त्रयोदशानां वर्षाणामिति मे वर्तते मतिः | |
| सर्वं यथावच्चरितं यद्यदेभिः परिश्रुतम् | |
| एवमेतद्ध्रुवं ज्ञात्वा ततो बीभत्सुरागतः | |
| सर्वे चैव महात्मानः सर्वे धर्मार्थकोविदाः | |
| येषां युधिष्ठिरो राजा कस्माद्धर्मेऽपराध्नुयुः | |
| अलुब्धाश्चैव कौन्तेयाः कृतवन्तश्च दुष्करम् | |
| न चापि केवलं राज्यमिच्छेयुस्तेऽनुपायतः | |
| तदैव ते हि विक्रान्तुमीषुः कौरवनन्दनाः | |
| धर्मपाशनिबद्धास्तु न चेलुः क्षत्रियव्रतात् | |
| यच्चानृत इति ख्यायेद्यच्च गच्छेत्पराभवम् | |
| वृणुयुर्मरणं पार्था नानृतत्वं कथंचन | |
| प्राप्ते तु काले प्राप्तव्यं नोत्सृजेयुर्नरर्षभाः | |
| अपि वज्रभृता गुप्तं तथावीर्या हि पाण्डवाः | |
| प्रतियुध्याम समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् | |
| तस्माद्यदत्र कल्याणं लोके सद्भिरनुष्ठितम् | |
| तत्संविधीयतां क्षिप्रं मा नो ह्यर्थोऽतिगात्परान् | |
| न हि पश्यामि संग्रामे कदाचिदपि कौरव | |
| एकान्तसिद्धिं राजेन्द्र संप्राप्तश्च धनंजयः | |
| संप्रवृत्ते तु संग्रामे भावाभावौ जयाजयौ | |
| अवश्यमेकं स्पृशतो दृष्टमेतदसंशयम् | |
| तस्माद्युद्धावचरिकं कर्म वा धर्मसंहितम् | |
| क्रियतामाशु राजेन्द्र संप्राप्तो हि धनंजयः | |
| दुर्योधन उवाच | |
| नाहं राज्यं प्रदास्यामि पाण्डवानां पितामह | |
| युद्धावचारिकं यत्तु तच्छीघ्रं संविधीयताम् | |
| भीष्म उवाच | |
| अत्र या मामकी बुद्धिः श्रूयतां यदि रोचते | |
| क्षिप्रं बलचतुर्भागं गृह्य गच्छ पुरं प्रति | |
| ततोऽपरश्चतुर्भागो गाः समादाय गच्छतु | |
| वयं त्वर्धेन सैन्येन प्रतियोत्स्याम पाण्डवम् | |
| मत्स्यं वा पुनरायातमथ वापि शतक्रतुम् | |
| आचार्यो मध्यतस्तिष्ठत्वश्वत्थामा तु सव्यतः | |
| कृपः शारद्वतो धीमान्पार्श्वं रक्षतु दक्षिणम् | |
| अग्रतः सूतपुत्रस्तु कर्णस्तिष्ठतु दंशितः | |
| अहं सर्वस्य सैन्यस्य पश्चात्स्थास्यामि पालयन् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तथा व्यूढेष्वनीकेषु कौरवेयैर्महारथैः | |
| उपायादर्जुनस्तूर्णं रथघोषेण नादयन् | |
| ददृशुस्ते ध्वजाग्रं वै शुश्रुवुश्च रथस्वनम् | |
| दोधूयमानस्य भृशं गाण्डीवस्य च निस्वनम् | |
| ततस्तत्सर्वमालोक्य द्रोणो वचनमब्रवीत् | |
| महारथमनुप्राप्तं दृष्ट्वा गाण्डीवधन्विनम् | |
| एतद्ध्वजाग्रं पार्थस्य दूरतः संप्रकाशते | |
| एष घोषः सजलदो रोरवीति च वानरः | |
| एष तिष्ठन्रथश्रेष्ठो रथे रथवरप्रणुत् | |
| उत्कर्षति धनुःश्रेष्ठं गाण्डीवमशनिस्वनम् | |
| इमौ हि बाणौ सहितौ पादयोर्मे व्यवस्थितौ | |
| अपरौ चाप्यतिक्रान्तौ कर्णौ संस्पृश्य मे शरौ | |
| निरुष्य हि वने वासं कृत्वा कर्मातिमानुषम् | |
| अभिवादयते पार्थः श्रोत्रे च परिपृच्छति | |
| अर्जुन उवाच | |
| इषुपाते च सेनाया हयान्संयच्छ सारथे | |
| यावत्समीक्षे सैन्येऽस्मिन्क्वासौ कुरुकुलाधमः | |
| सर्वानन्याननादृत्य दृष्ट्वा तमतिमानिनम् | |
| तस्य मूर्ध्नि पतिष्यामि तत एते पराजिताः | |
| एष व्यवस्थितो द्रोणो द्रौणिश्च तदनन्तरम् | |
| भीष्मः कृपश्च कर्णश्च महेष्वासा व्यवस्थिताः | |
| राजानं नात्र पश्यामि गाः समादाय गच्छति | |
| दक्षिणं मार्गमास्थाय शङ्के जीवपरायणः | |
| उत्सृज्यैतद्रथानीकं गच्छ यत्र सुयोधनः | |
| तत्रैव योत्स्ये वैराटे नास्ति युद्धं निरामिषम् | |
| तं जित्वा विनिवर्तिष्ये गाः समादाय वै पुनः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमुक्तः स वैराटिर्हयान्संयम्य यत्नतः | |
| नियम्य च ततो रश्मीन्यत्र ते कुरुपुंगवाः | |
| अचोदयत्ततो वाहान्यतो दुर्योधनस्ततः | |
| उत्सृज्य रथवंशं तु प्रयाते श्वेतवाहने | |
| अभिप्रायं विदित्वास्य द्रोणो वचनमब्रवीत् | |
| नैषोऽन्तरेण राजानं बीभत्सुः स्थातुमिच्छति | |
| तस्य पार्ष्णिं ग्रहीष्यामो जवेनाभिप्रयास्यतः | |
| न ह्येनमभिसंक्रुद्धमेको युध्येत संयुगे | |
| अन्यो देवात्सहस्राक्षात्कृष्णाद्वा देवकीसुतात् | |
| किं नो गावः करिष्यन्ति धनं वा विपुलं तथा | |
| दुर्योधनः पार्थजले पुरा नौरिव मज्जति | |
| तथैव गत्वा बीभत्सुर्नाम विश्राव्य चात्मनः | |
| शलभैरिव तां सेनां शरैः शीघ्रमवाकिरत् | |
| कीर्यमाणाः शरौघैस्तु योधास्ते पार्थचोदितैः | |
| नापश्यन्नावृतां भूमिमन्तरिक्षं च पत्रिभिः | |
| तेषां नात्मनिनो युद्धे नापयानेऽभवन्मतिः | |
| शीघ्रत्वमेव पार्थस्य पूजयन्ति स्म चेतसा | |
| ततः शङ्खं प्रदध्मौ स द्विषतां लोमहर्षणम् | |
| विस्फार्य च धनुःश्रेष्ठं ध्वजे भूतान्यचोदयत् | |
| तस्य शङ्खस्य शब्देन रथनेमिस्वनेन च | |
| अमानुषाणां तेषां च भूतानां ध्वजवासिनाम् | |
| ऊर्ध्वं पुच्छान्विधुन्वाना रेभमाणाः समन्ततः | |
| गावः प्रतिन्यवर्तन्त दिशमास्थाय दक्षिणाम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| स शत्रुसेनां तरसा प्रणुद्य; गास्ता विजित्याथ धनुर्धराग्र्यः | |
| दुर्योधनायाभिमुखं प्रयातो; भूयोऽर्जुनः प्रियमाजौ चिकीर्षन् | |
| गोषु प्रयातासु जवेन मत्स्या;न्किरीटिनं कृतकार्यं च मत्वा | |
| दुर्योधनायाभिमुखं प्रयान्तं; कुरुप्रवीराः सहसाभिपेतुः | |
| तेषामनीकानि बहूनि गाढं; व्यूढानि दृष्ट्वा बहुलध्वजानि | |
| मत्स्यस्य पुत्रं द्विषतां निहन्ता; वैराटिमामन्त्र्य ततोऽभ्युवाच | |
| एतेन तूर्णं प्रतिपादयेमा;ञ्श्वेतान्हयान्काञ्चनरश्मियोक्त्रान् | |
| जवेन सर्वेण कुरु प्रयत्न;मासादयैतद्रथसिंहवृन्दम् | |
| गजो गजेनेव मया दुरात्मा; यो योद्धुमाकाङ्क्षति सूतपुत्रः | |
| तमेव मां प्रापय राजपुत्र; दुर्योधनापाश्रयजातदर्पम् | |
| स तैर्हयैर्वातजवैर्बृहद्भिः; पुत्रो विराटस्य सुवर्णकक्ष्यैः | |
| विध्वंसयंस्तद्रथिनामनीकं; ततोऽवहत्पाण्डवमाजिमध्ये | |
| तं चित्रसेनो विशिखैर्विपाठैः; संग्रामजिच्छत्रुसहो जयश्च | |
| प्रत्युद्ययुर्भारतमापतन्तं; महारथाः कर्णमभीप्समानाः | |
| ततः स तेषां पुरुषप्रवीरः; शरासनार्चिः शरवेगतापः | |
| व्रातान्रथानामदहत्स मन्यु;र्वनं यथाग्निः कुरुपुंगवानाम् | |
| तस्मिंस्तु युद्धे तुमुले प्रवृत्ते; पार्थं विकर्णोऽतिरथं रथेन | |
| विपाठवर्षेण कुरुप्रवीरो; भीमेन भीमानुजमाससाद | |
| ततो विकर्णस्य धनुर्विकृष्य; जाम्बूनदाग्र्योपचितं दृढज्यम् | |
| अपातयद्ध्वजमस्य प्रमथ्य; छिन्नध्वजः सोऽप्यपयाज्जवेन | |
| तं शात्रवाणां गणबाधितारं; कर्माणि कुर्वाणममानुषाणि | |
| शत्रुंतपः कोपममृष्यमाणः; समर्पयत्कूर्मनखेन पार्थम् | |
| स तेन राज्ञातिरथेन विद्धो; विगाहमानो ध्वजिनीं कुरूणाम् | |
| शत्रुंतपं पञ्चभिराशु विद्ध्वा; ततोऽस्य सूतं दशभिर्जघान | |
| ततः स विद्धो भरतर्षभेण; बाणेन गात्रावरणातिगेन | |
| गतासुराजौ निपपात भूमौ; नगो नगाग्रादिव वातरुग्णः | |
| रथर्षभास्ते तु रथर्षभेण; वीरा रणे वीरतरेण भग्नाः | |
| चकम्पिरे वातवशेन काले; प्रकम्पितानीव महावनानि | |
| हतास्तु पार्थेन नरप्रवीरा; भूमौ युवानः सुषुपुः सुवेषाः | |
| वसुप्रदा वासवतुल्यवीर्याः; पराजिता वासवजेन संख्ये | |
| सुवर्णकार्ष्णायसवर्मनद्धा; नागा यथा हैमवताः प्रवृद्धाः | |
| तथा स शत्रून्समरे विनिघ्न;न्गाण्डीवधन्वा पुरुषप्रवीरः | |
| चचार संख्ये प्रदिशो दिशश्च; दहन्निवाग्निर्वनमातपान्ते | |
| प्रकीर्णपर्णानि यथा वसन्ते; विशातयित्वात्यनिलो नुदन्खे | |
| तथा सपत्नान्विकिरन्किरीटी; चचार संख्येऽतिरथो रथेन | |
| शोणाश्ववाहस्य हयान्निहत्य; वैकर्तनभ्रातुरदीनसत्त्वः | |
| एकेन संग्रामजितः शरेण; शिरो जहाराथ किरीटमाली | |
| तस्मिन्हते भ्रातरि सूतपुत्रो; वैकर्तनो वीर्यमथाददानः | |
| प्रगृह्य दन्ताविव नागराजो; महर्षभं व्याघ्र इवाभ्यधावत् | |
| स पाण्डवं द्वादशभिः पृषत्कै;र्वैकर्तनः शीघ्रमुपाजघान | |
| विव्याध गात्रेषु हयांश्च सर्वा;न्विराटपुत्रं च शरैर्निजघ्ने | |
| स हस्तिनेवाभिहतो गजेन्द्रः; प्रगृह्य भल्लान्निशितान्निषङ्गात् | |
| आकर्णपूर्णं च धनुर्विकृष्य; विव्याध बाणैरथ सूतपुत्रम् | |
| अथास्य बाहूरुशिरोललाटं; ग्रीवां रथाङ्गानि परावमर्दी | |
| स्थितस्य बाणैर्युधि निर्बिभेद; गाण्डीवमुक्तैरशनिप्रकाशैः | |
| स पार्थमुक्तैर्विशिखैः प्रणुन्नो; गजो गजेनेव जितस्तरस्वी | |
| विहाय संग्रामशिरः प्रयातो; वैकर्तनः पाण्डवबाणतप्तः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अपयाते तु राधेये दुर्योधनपुरोगमाः | |
| अनीकेन यथास्वेन शरैरार्च्छन्त पाण्डवम् | |
| बहुधा तस्य सैन्यस्य व्यूढस्यापततः शरैः | |
| अभियानीयमाज्ञाय वैराटिरिदमब्रवीत् | |
| आस्थाय रुचिरं जिष्णो रथं सारथिना मया | |
| कतमद्यास्यसेऽनीकमुक्तो यास्याम्यहं त्वया | |
| अर्जुन उवाच | |
| लोहिताक्षमरिष्टं यं वैयाघ्रमनुपश्यसि | |
| नीलां पताकामाश्रित्य रथे तिष्ठन्तमुत्तर | |
| कृपस्यैतद्रथानीकं प्रापयस्वैतदेव माम् | |
| एतस्य दर्शयिष्यामि शीघ्रास्त्रं दृढधन्विनः | |
| कमण्डलुर्ध्वजे यस्य शातकुम्भमयः शुभः | |
| आचार्य एष वै द्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः | |
| सुप्रसन्नमना वीर कुरुष्वैनं प्रदक्षिणम् | |
| अत्रैव चाविरोधेन एष धर्मः सनातनः | |
| यदि मे प्रथमं द्रोणः शरीरे प्रहरिष्यति | |
| ततोऽस्य प्रहरिष्यामि नास्य कोपो भविष्यति | |
| अस्याविदूरे तु धनुर्ध्वजाग्रे यस्य दृश्यते | |
| आचार्यस्यैष पुत्रो वै अश्वत्थामा महारथः | |
| सदा ममैष मान्यश्च सर्वशस्त्रभृतामपि | |
| एतस्य त्वं रथं प्राप्य निवर्तेथाः पुनः पुनः | |
| य एष तु रथानीके सुवर्णकवचावृतः | |
| सेनाग्र्येण तृतीयेन व्यवहार्येण तिष्ठति | |
| यस्य नागो ध्वजाग्रे वै हेमकेतनसंश्रितः | |
| धृतराष्ट्रात्मजः श्रीमानेष राजा सुयोधनः | |
| एतस्याभिमुखं वीर रथं पररथारुजः | |
| प्रापयस्वैष तेजोभिप्रमाथी युद्धदुर्मदः | |
| एष द्रोणस्य शिष्याणां शीघ्रास्त्रः प्रथमो मतः | |
| एतस्य दर्शयिष्यामि शीघ्रास्त्रं विपुलं शरैः | |
| नागकक्ष्या तु रुचिरा ध्वजाग्रे यस्य तिष्ठति | |
| एष वैकर्तनः कर्णो विदितः पूर्वमेव ते | |
| एतस्य रथमास्थाय राधेयस्य दुरात्मनः | |
| यत्तो भवेथाः संग्रामे स्पर्धत्येष मया सदा | |
| यस्तु नीलानुसारेण पञ्चतारेण केतुना | |
| हस्तावापी बृहद्धन्वा रथे तिष्ठति वीर्यवान् | |
| यस्य तारार्कचित्रोऽसौ रथे ध्वजवरः स्थितः | |
| यस्यैतत्पाण्डुरं छत्रं विमलं मूर्ध्नि तिष्ठति | |
| महतो रथवंशस्य नानाध्वजपताकिनः | |
| बलाहकाग्रे सूर्यो वा य एष प्रमुखे स्थितः | |
| हैमं चन्द्रार्कसंकाशं कवचं यस्य दृश्यते | |
| जातरूपशिरस्त्राणस्त्रासयन्निव मे मनः | |
| एष शांतनवो भीष्मः सर्वेषां नः पितामहः | |
| राजश्रियावबद्धस्तु दुर्योधनवशानुगः | |
| पश्चादेष प्रयातव्यो न मे विघ्नकरो भवेत् | |
| एतेन युध्यमानस्य यत्तः संयच्छ मे हयान् | |
| ततोऽभ्यवहदव्यग्रो वैराटिः सव्यसाचिनम् | |
| यत्रातिष्ठत्कृपो राजन्योत्स्यमानो धनंजयम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तान्यनीकान्यदृश्यन्त कुरूणामुग्रधन्विनाम् | |
| संसर्पन्तो यथा मेघा घर्मान्ते मन्दमारुताः | |
| अभ्याशे वाजिनस्तस्थुः समारूढाः प्रहारिभिः | |
| भीमरूपाश्च मातङ्गास्तोमराङ्कुशचोदिताः | |
| ततः शक्रः सुरगणैः समारुह्य सुदर्शनम् | |
| सहोपायात्तदा राजन्विश्वाश्विमरुतां गणैः | |
| तद्देवयक्षगन्धर्वमहोरगसमाकुलम् | |
| शुशुभेऽभ्रविनिर्मुक्तं ग्रहैरिव नभस्तलम् | |
| अस्त्राणां च बलं तेषां मानुषेषु प्रयुज्यताम् | |
| तच्च घोरं महद्युद्धं भीष्मार्जुनसमागमे | |
| शतं शतसहस्राणां यत्र स्थूणा हिरण्मयाः | |
| मणिरत्नमयाश्चान्याः प्रासादमुपधारयन् | |
| तत्र कामगमं दिव्यं सर्वरत्नविभूषितम् | |
| विमानं देवराजस्य शुशुभे खेचरं तदा | |
| तत्र देवास्त्रयस्त्रिंशत्तिष्ठन्ति सहवासवाः | |
| गन्धर्वा राक्षसाः सर्पाः पितरश्च महर्षिभिः | |
| तथा राजा वसुमना बलाक्षः सुप्रतर्दनः | |
| अष्टकश्च शिबिश्चैव ययातिर्नहुषो गयः | |
| मनुः क्षुपो रघुर्भानुः कृशाश्वः सगरः शलः | |
| विमाने देवराजस्य समदृश्यन्त सुप्रभाः | |
| अग्नेरीशस्य सोमस्य वरुणस्य प्रजापतेः | |
| तथा धातुर्विधातुश्च कुबेरस्य यमस्य च | |
| अलम्बुसोग्रसेनस्य गन्धर्वस्य च तुम्बुरोः | |
| यथाभागं यथोद्देशं विमानानि चकाशिरे | |
| सर्वदेवनिकायाश्च सिद्धाश्च परमर्षयः | |
| अर्जुनस्य कुरूणां च द्रष्टुं युद्धमुपागताः | |
| दिव्यानां तत्र माल्यानां गन्धः पुण्योऽथ सर्वशः | |
| प्रससार वसन्ताग्रे वनानामिव पुष्पताम् | |
| रक्तारक्तानि देवानां समदृश्यन्त तिष्ठताम् | |
| आतपत्राणि वासांसि स्रजश्च व्यजनानि च | |
| उपशाम्यद्रजो भौमं सर्वं व्याप्तं मरीचिभिः | |
| दिव्यान्गन्धानुपादाय वायुर्योधानसेवत | |
| प्रभासितमिवाकाशं चित्ररूपमलंकृतम् | |
| संपतद्भिः स्थितैश्चैव नानारत्नावभासितैः | |
| विमानैर्विविधैश्चित्रैरुपानीतैः सुरोत्तमैः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एतस्मिन्नन्तरे तत्र महावीर्यपराक्रमः | |
| आजगाम महासत्त्वः कृपः शस्त्रभृतां वरः | |
| अर्जुनं प्रति संयोद्धुं युद्धार्थी स महारथः | |
| तौ रथौ सूर्यसंकाशौ योत्स्यमानौ महाबलौ | |
| शारदाविव जीमूतौ व्यरोचेतां व्यवस्थितौ | |
| पार्थोऽपि विश्रुतं लोके गाण्डीवं परमायुधम् | |
| विकृष्य चिक्षेप बहून्नाराचान्मर्मभेदिनः | |
| तानप्राप्ताञ्शितैर्बाणैर्नाराचान्रक्तभोजनान् | |
| कृपश्चिच्छेद पार्थस्य शतशोऽथ सहस्रशः | |
| ततः पार्थश्च संक्रुद्धश्चित्रान्मार्गान्प्रदर्शयन् | |
| दिशः संछादयन्बाणैः प्रदिशश्च महारथः | |
| एकच्छायमिवाकाशं प्रकुर्वन्सर्वतः प्रभुः | |
| प्रच्छादयदमेयात्मा पार्थः शरशतैः कृपम् | |
| स शरैरर्पितः क्रुद्धः शितैरग्निशिखोपमैः | |
| तूर्णं शरसहस्रेण पार्थमप्रतिमौजसम् | |
| अर्पयित्वा महात्मानं ननाद समरे कृपः | |
| ततः कनकपुङ्खाग्रैर्वीरः संनतपर्वभिः | |
| त्वरन्गाण्डीवनिर्मुक्तैरर्जुनस्तस्य वाजिनः | |
| चतुर्भिश्चतुरस्तीक्ष्णैरविध्यत्परमेषुभिः | |
| ते हया निशितैर्विद्धा ज्वलद्भिरिव पन्नगैः | |
| उत्पेतुः सहसा सर्वे कृपः स्थानादथाच्यवत् | |
| च्युतं तु गौतमं स्थानात्समीक्ष्य कुरुनन्दनः | |
| नाविध्यत्परवीरघ्नो रक्षमाणोऽस्य गौरवम् | |
| स तु लब्ध्वा पुनः स्थानं गौतमः सव्यसाचिनम् | |
| विव्याध दशभिर्बाणैस्त्वरितः कङ्कपत्रिभिः | |
| ततः पार्थो धनुस्तस्य भल्लेन निशितेन च | |
| चिच्छेदैकेन भूयश्च हस्ताच्चापमथाहरत् | |
| अथास्य कवचं बाणैर्निशितैर्मर्मभेदिभिः | |
| व्यधमन्न च पार्थोऽस्य शरीरमवपीडयत् | |
| तस्य निर्मुच्यमानस्य कवचात्काय आबभौ | |
| समये मुच्यमानस्य सर्पस्येव तनुर्यथा | |
| छिन्ने धनुषि पार्थेन सोऽन्यदादाय कार्मुकम् | |
| चकार गौतमः सज्यं तदद्भुतमिवाभवत् | |
| स तदप्यस्य कौन्तेयश्चिच्छेद नतपर्वणा | |
| एवमन्यानि चापानि बहूनि कृतहस्तवत् | |
| शारद्वतस्य चिच्छेद पाण्डवः परवीरहा | |
| स छिन्नधनुरादाय अथ शक्तिं प्रतापवान् | |
| प्राहिणोत्पाण्डुपुत्राय प्रदीप्तामशनीमिव | |
| तामर्जुनस्तदायान्तीं शक्तिं हेमविभूषिताम् | |
| वियद्गतां महोल्काभां चिच्छेद दशभिः शरैः | |
| सापतद्दशधा छिन्ना भूमौ पार्थेन धीमता | |
| युगमध्ये तु भल्लैस्तु ततः स सधनुः कृपः | |
| तमाशु निशितैः पार्थं बिभेद दशभिः शरैः | |
| ततः पार्थो महातेजा विशिखानग्नितेजसः | |
| चिक्षेप समरे क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान् | |
| अथास्य युगमेकेन चतुर्भिश्चतुरो हयान् | |
| षष्ठेन च शिरः कायाच्छरेण रथसारथेः | |
| त्रिभिस्त्रिवेणुं समरे द्वाभ्यामक्षौ महाबलः | |
| द्वादशेन तु भल्लेन चकर्तास्य ध्वजं तथा | |
| ततो वज्रनिकाशेन फल्गुनः प्रहसन्निव | |
| त्रयोदशेनेन्द्रसमः कृपं वक्षस्यताडयत् | |
| स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः | |
| गदापाणिरवप्लुत्य तूर्णं चिक्षेप तां गदाम् | |
| सा तु मुक्ता गदा गुर्वी कृपेण सुपरिष्कृता | |
| अर्जुनेन शरैर्नुन्ना प्रतिमार्गमथागमत् | |
| ततो योधाः परीप्सन्तः शारद्वतममर्षणम् | |
| सर्वतः समरे पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् | |
| ततो विराटस्य सुतः सव्यमावृत्य वाजिनः | |
| यमकं मण्डलं कृत्वा तान्योधान्प्रत्यवारयत् | |
| ततः कृपमुपादाय विरथं ते नरर्षभाः | |
| अपाजह्रुर्महावेगाः कुन्तीपुत्राद्धनंजयात् | |
| अर्जुन उवाच | |
| यत्रैषा काञ्चनी वेदी प्रदीप्ताग्निशिखोपमा | |
| उच्छ्रिता काञ्चने दण्डे पताकाभिरलंकृता | |
| तत्र मां वह भद्रं ते द्रोणानीकाय मारिष | |
| अश्वाः शोणाः प्रकाशन्ते बृहन्तश्चारुवाहिनः | |
| स्निग्धविद्रुमसंकाशास्ताम्रास्याः प्रियदर्शनाः | |
| युक्ता रथवरे यस्य सर्वशिक्षाविशारदाः | |
| दीर्घबाहुर्महातेजा बलरूपसमन्वितः | |
| सर्वलोकेषु विख्यातो भारद्वाजः प्रतापवान् | |
| बुद्ध्या तुल्यो ह्युशनसा बृहस्पतिसमो नये | |
| वेदास्तथैव चत्वारो ब्रह्मचर्यं तथैव च | |
| ससंहाराणि दिव्यानि सर्वाण्यस्त्राणि मारिष | |
| धनुर्वेदश्च कार्त्स्न्येन यस्मिन्नित्यं प्रतिष्ठितः | |
| क्षमा दमश्च सत्यं च आनृशंस्यमथार्जवम् | |
| एते चान्ये च बहवो गुणा यस्मिन्द्विजोत्तमे | |
| तेनाहं योद्धुमिच्छामि महाभागेन संयुगे | |
| तस्मात्त्वं प्रापयाचार्यं क्षिप्रमुत्तर वाहय | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अर्जुनेनैवमुक्तस्तु वैराटिर्हेमभूषितान् | |
| चोदयामास तानश्वान्भारद्वाजरथं प्रति | |
| तमापतन्तं वेगेन पाण्डवं रथिनां वरम् | |
| द्रोणः प्रत्युद्ययौ पार्थं मत्तो मत्तमिव द्विपम् | |
| ततः प्राध्मापयच्छङ्खं भेरीशतनिनादितम् | |
| प्रचुक्षुभे बलं सर्वमुद्धूत इव सागरः | |
| अथ शोणान्सदश्वांस्तान्हंसवर्णैर्मनोजवैः | |
| मिश्रितान्समरे दृष्ट्वा व्यस्मयन्त रणे जनाः | |
| तौ रथौ वीर्यसंपन्नौ दृष्ट्वा संग्राममूर्धनि | |
| आचार्यशिष्यावजितौ कृतविद्यौ मनस्विनौ | |
| समाश्लिष्टौ तदान्योन्यं द्रोणपार्थौ महाबलौ | |
| दृष्ट्वा प्राकम्पत मुहुर्भरतानां महद्बलम् | |
| हर्षयुक्तस्तथा पार्थः प्रहसन्निव वीर्यवान् | |
| रथं रथेन द्रोणस्य समासाद्य महारथः | |
| अभिवाद्य महाबाहुः सान्त्वपूर्वमिदं वचः | |
| उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेयः परवीरहा | |
| उषिताः स्म वने वासं प्रतिकर्म चिकीर्षवः | |
| कोपं नार्हसि नः कर्तुं सदा समरदुर्जय | |
| अहं तु प्रहृते पूर्वं प्रहरिष्यामि तेऽनघ | |
| इति मे वर्तते बुद्धिस्तद्भवान्कर्तुमर्हति | |
| ततोऽस्मै प्राहिणोद्द्रोणः शरानधिकविंशतिम् | |
| अप्राप्तांश्चैव तान्पार्थश्चिच्छेद कृतहस्तवत् | |
| ततः शरसहस्रेण रथं पार्थस्य वीर्यवान् | |
| अवाकिरत्ततो द्रोणः शीघ्रमस्त्रं विदर्शयन् | |
| एवं प्रववृते युद्धं भारद्वाजकिरीटिनोः | |
| समं विमुञ्चतोः संख्ये विशिखान्दीप्ततेजसः | |
| तावुभौ ख्यातकर्माणावुभौ वायुसमौ जवे | |
| उभौ दिव्यास्त्रविदुषावुभावुत्तमतेजसौ | |
| क्षिपन्तौ शरजालानि मोहयामासतुर्नृपान् | |
| व्यस्मयन्त ततो योधाः सर्वे तत्र समागताः | |
| शरान्विसृजतोस्तूर्णं साधु साध्विति पूजयन् | |
| द्रोणं हि समरे कोऽन्यो योद्धुमर्हति फल्गुनात् | |
| रौद्रः क्षत्रियधर्मोऽयं गुरुणा यदयुध्यत | |
| इत्यब्रुवञ्जनास्तत्र संग्रामशिरसि स्थिताः | |
| वीरौ तावपि संरब्धौ संनिकृष्टौ महारथौ | |
| छादयेतां शरव्रातैरन्योन्यमपराजितौ | |
| विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपृष्ठं दुरासदम् | |
| संरब्धोऽथ भरद्वाजः फल्गुनं प्रत्ययुध्यत | |
| स सायकमयैर्जालैरर्जुनस्य रथं प्रति | |
| भानुमद्भिः शिलाधौतैर्भानोः प्रच्छादयत्प्रभाम् | |
| पार्थं च स महाबाहुर्महावेगैर्महारथः | |
| विव्याध निशितैर्बाणैर्मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् | |
| तथैव दिव्यं गाण्डीवं धनुरादाय पाण्डवः | |
| शत्रुघ्नं वेगवद्धृष्टो भारसाधनमुत्तमम् | |
| विससर्ज शरांश्चित्रान्सुवर्णविकृतान्बहून् | |
| नाशयञ्शरवर्षाणि भारद्वाजस्य वीर्यवान् | |
| तूर्णं चापविनिर्मुक्तैस्तदद्भुतमिवाभवत् | |
| स रथेन चरन्पार्थः प्रेक्षणीयो धनंजयः | |
| युगपद्दिक्षु सर्वासु सर्वशस्त्राण्यदर्शयत् | |
| एकच्छायमिवाकाशं बाणैश्चक्रे समन्ततः | |
| नादृश्यत तदा द्रोणो नीहारेणेव संवृतः | |
| तस्याभवत्तदा रूपं संवृतस्य शरोत्तमैः | |
| जाज्वल्यमानस्य यथा पर्वतस्येव सर्वतः | |
| दृष्ट्वा तु पार्थस्य रणे शरैः स्वरथमावृतम् | |
| स विस्फार्य धनुश्चित्रं मेघस्तनितनिस्वनम् | |
| अग्निचक्रोपमं घोरं विकर्षन्परमायुधम् | |
| व्यशातयच्छरांस्तांस्तु द्रोणः समितिशोभनः | |
| महानभूत्ततः शब्दो वंशानामिव दह्यताम् | |
| जाम्बूनदमयैः पुङ्खैश्चित्रचापवरातिगैः | |
| प्राच्छादयदमेयात्मा दिशः सूर्यस्य च प्रभाम् | |
| ततः कनकपुङ्खानां शराणां नतपर्वणाम् | |
| वियच्चराणां वियति दृश्यन्ते बहुशः प्रजाः | |
| द्रोणस्य पुङ्खसक्ताश्च प्रभवन्तः शरासनात् | |
| एको दीर्घ इवादृश्यदाकाशे संहतः शरः | |
| एवं तौ स्वर्णविकृतान्विमुञ्चन्तौ महाशरान् | |
| आकाशं संवृतं वीरावुल्काभिरिव चक्रतुः | |
| शरास्तयोश्च विबभुः कङ्कबर्हिणवाससः | |
| पङ्क्त्यः शरदि खस्थानां हंसानां चरतामिव | |
| युद्धं समभवत्तत्र सुसंरब्धं महात्मनोः | |
| द्रोणपाण्डवयोर्घोरं वृत्रवासवयोरिव | |
| तौ गजाविव चासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् | |
| शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः | |
| तौ व्यवाहरतां शूरौ संरब्धौ रणशोभिनौ | |
| उदीरयन्तौ समरे दिव्यान्यस्त्राणि भागशः | |
| अथ त्वाचार्यमुख्येन शरान्सृष्टाञ्शिलाशितान् | |
| न्यवारयच्छितैर्बाणैरर्जुनो जयतां वरः | |
| दर्शयन्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः | |
| इषुभिस्तूर्णमाकाशं बहुभिश्च समावृणोत् | |
| जिघांसन्तं नरव्याघ्रमर्जुनं तिग्मतेजसम् | |
| आचार्यमुख्यः समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः | |
| अर्जुनेन सहाक्रीडच्छरैः संनतपर्वभिः | |
| दिव्यान्यस्त्राणि मुञ्चन्तं भारद्वाजं महारणे | |
| अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य फल्गुनः समयोधयत् | |
| तयोरासीत्संप्रहारः क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः | |
| अमर्षिणोस्तदान्योन्यं देवदानवयोरिव | |
| ऐन्द्रं वायव्यमाग्नेयमस्त्रमस्त्रेण पाण्डवः | |
| द्रोणेन मुक्तं मुक्तं तु ग्रसते स्म पुनः पुनः | |
| एवं शूरौ महेष्वासौ विसृजन्तौ शिताञ्शरान् | |
| एकच्छायं चक्रतुस्तावाकाशं शरवृष्टिभिः | |
| ततोऽर्जुनेन मुक्तानां पततां च शरीरिषु | |
| पर्वतेष्विव वज्राणां शराणां श्रूयते स्वनः | |
| ततो नागा रथाश्चैव सादिनश्च विशां पते | |
| शोणिताक्ता व्यदृश्यन्त पुष्पिता इव किंशुकाः | |
| बाहुभिश्च सकेयूरैर्विचित्रैश्च महारथैः | |
| सुवर्णचित्रैः कवचैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः | |
| योधैश्च निहतैस्तत्र पार्थबाणप्रपीडितैः | |
| बलमासीत्समुद्भ्रान्तं द्रोणार्जुनसमागमे | |
| विधुन्वानौ तु तौ वीरौ धनुषी भारसाधने | |
| आच्छादयेतामन्योन्यं तितक्षन्तौ रणेषुभिः | |
| अथान्तरिक्षे नादोऽभूद्द्रोणं तत्र प्रशंसताम् | |
| दुष्करं कृतवान्द्रोणो यदर्जुनमयोधयत् | |
| प्रमाथिनं महावीर्यं दृढमुष्टिं दुरासदम् | |
| जेतारं देवदैत्यानां सर्पाणां च महारथम् | |
| अविश्रमं च शिक्षां च लाघवं दूरपातिताम् | |
| पार्थस्य समरे दृष्ट्वा द्रोणस्याभूच्च विस्मयः | |
| अथ गाण्डीवमुद्यम्य दिव्यं धनुरमर्षणः | |
| विचकर्ष रणे पार्थो बाहुभ्यां भरतर्षभ | |
| तस्य बाणमयं वर्षं शलभानामिवायतम् | |
| न च बाणान्तरे वायुरस्य शक्नोति सर्पितुम् | |
| अनिशं संदधानस्य शरानुत्सृजतस्तदा | |
| ददृशे नान्तरं किंचित्पार्थस्याददतोऽपि च | |
| तथा शीघ्रास्त्रयुद्धे तु वर्तमाने सुदारुणे | |
| शीघ्राच्छीघ्रतरं पार्थः शरानन्यानुदीरयत् | |
| ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् | |
| युगपत्प्रापतंस्तत्र द्रोणस्य रथमन्तिकात् | |
| अवकीर्यमाणे द्रोणे तु शरैर्गाण्डीवधन्वना | |
| हाहाकारो महानासीत्सैन्यानां भरतर्षभ | |
| पाण्डवस्य तु शीघ्रास्त्रं मघवान्समपूजयत् | |
| गन्धर्वाप्सरसश्चैव ये च तत्र समागताः | |
| ततो वृन्देन महता रथानां रथयूथपः | |
| आचार्यपुत्रः सहसा पाण्डवं प्रत्यवारयत् | |
| अश्वत्थामा तु तत्कर्म हृदयेन महात्मनः | |
| पूजयामास पार्थस्य कोपं चास्याकरोद्भृशम् | |
| स मन्युवशमापन्नः पार्थमभ्यद्रवद्रणे | |
| किरञ्शरसहस्राणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् | |
| आवृत्य तु महाबाहुर्यतो द्रौणिस्ततो हयान् | |
| अन्तरं प्रददौ पार्थो द्रोणस्य व्यपसर्पितुम् | |
| स तु लब्ध्वान्तरं तूर्णमपायाज्जवनैर्हयैः | |
| छिन्नवर्मध्वजः शूरो निकृत्तः परमेषुभिः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तं पार्थः प्रतिजग्राह वायुवेगमिवोद्धतम् | |
| शरजालेन महता वर्षमाणमिवाम्बुदम् | |
| तयोर्देवासुरसमः संनिपातो महानभूत् | |
| किरतोः शरजालानि वृत्रवासवयोरिव | |
| न स्म सूर्यस्तदा भाति न च वाति समीरणः | |
| शरगाढे कृते व्योम्नि छायाभूते समन्ततः | |
| महांश्चटचटाशब्दो योधयोर्हन्यमानयोः | |
| दह्यतामिव वेणूनामासीत्परपुरंजय | |
| हयानस्यार्जुनः सर्वान्कृतवानल्पजीवितान् | |
| स राजन्न प्रजानाति दिशं कांचन मोहितः | |
| ततो द्रौणिर्महावीर्यः पार्थस्य विचरिष्यतः | |
| विवरं सूक्ष्ममालोक्य ज्यां चिच्छेद क्षुरेण ह | |
| तदस्यापूजयन्देवाः कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् | |
| ततो द्रौणिर्धनूंष्यष्टौ व्यपक्रम्य नरर्षभम् | |
| पुनरभ्याहनत्पार्थं हृदये कङ्कपत्रिभिः | |
| ततः पार्थो महाबाहुः प्रहस्य स्वनवत्तदा | |
| योजयामास नवया मौर्व्या गाण्डीवमोजसा | |
| ततोऽर्धचन्द्रमावृत्य तेन पार्थः समागमत् | |
| वारणेनेव मत्तेन मत्तो वारणयूथपः | |
| ततः प्रववृते युद्धं पृथिव्यामेकवीरयोः | |
| रणमध्ये द्वयोरेव सुमहल्लोमहर्षणम् | |
| तौ वीरौ कुरवः सर्वे ददृशुर्विस्मयान्विताः | |
| युध्यमानौ महात्मानौ यूथपाविव संगतौ | |
| तौ समाजघ्नतुर्वीरावन्योन्यं पुरुषर्षभौ | |
| शरैराशीविषाकारैर्ज्वलद्भिरिव पन्नगैः | |
| अक्षय्याविषुधी दिव्यौ पाण्डवस्य महात्मनः | |
| तेन पार्थो रणे शूरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः | |
| अश्वत्थाम्नः पुनर्बाणाः क्षिप्रमभ्यस्यतो रणे | |
| जग्मुः परिक्षयं शीघ्रमभूत्तेनाधिकोऽर्जुनः | |
| ततः कर्णो महच्चापं विकृष्याभ्यधिकं रुषा | |
| अवाक्षिपत्ततः शब्दो हाहाकारो महानभूत् | |
| तत्र चक्षुर्दधे पार्थो यत्र विस्फार्यते धनुः | |
| ददर्श तत्र राधेयं तस्य कोपोऽत्यवीवृधत् | |
| स रोषवशमापन्नः कर्णमेव जिघांसया | |
| अवैक्षत विवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां कुरुपुंगवः | |
| तथा तु विमुखे पार्थे द्रोणपुत्रस्य सायकान् | |
| त्वरिताः पुरुषा राजन्नुपाजह्रुः सहस्रशः | |
| उत्सृज्य च महाबाहुर्द्रोणपुत्रं धनंजयः | |
| अभिदुद्राव सहसा कर्णमेव सपत्नजित् | |
| तमभिद्रुत्य कौन्तेयः क्रोधसंरक्तलोचनः | |
| कामयन्द्वैरथे युद्धमिदं वचनमब्रवीत् | |
| अर्जुन उवाच | |
| कर्ण यत्ते सभामध्ये बहु वाचा विकत्थितम् | |
| न मे युधि समोऽस्तीति तदिदं प्रत्युपस्थितम् | |
| अवोचः परुषा वाचो धर्ममुत्सृज्य केवलम् | |
| इदं तु दुष्करं मन्ये यदिदं ते चिकीर्षितम् | |
| यत्त्वया कथितं पूर्वं मामनासाद्य किंचन | |
| तदद्य कुरु राधेय कुरुमध्ये मया सह | |
| यत्सभायां स्म पाञ्चालीं क्लिश्यमानां दुरात्मभिः | |
| दृष्टवानसि तस्याद्य फलमाप्नुहि केवलम् | |
| धर्मपाशनिबद्धेन यन्मया मर्षितं पुरा | |
| तस्य राधेय कोपस्य विजयं पश्य मे मृधे | |
| एहि कर्ण मया सार्धं प्रतिपद्यस्व संगरम् | |
| प्रेक्षकाः कुरवः सर्वे भवन्तु सहसैनिकाः | |
| कर्ण उवाच | |
| ब्रवीषि वाचा यत्पार्थ कर्मणा तत्समाचर | |
| अतिशेते हि वै वाचं कर्मेति प्रथितं भुवि | |
| यत्त्वया मर्षितं पूर्वं तदशक्तेन मर्षितम् | |
| इति गृह्णामि तत्पार्थ तव दृष्ट्वापराक्रमम् | |
| धर्मपाशनिबद्धेन यदि ते मर्षितं पुरा | |
| तथैव बद्धमात्मानमबद्धमिव मन्यसे | |
| यदि तावद्वने वासो यथोक्तश्चरितस्त्वया | |
| तत्त्वं धर्मार्थवित्क्लिष्टः समयं भेत्तुमिच्छसि | |
| यदि शक्रः स्वयं पार्थ युध्यते तव कारणात् | |
| तथापि न व्यथा काचिन्मम स्याद्विक्रमिष्यतः | |
| अयं कौन्तेय कामस्ते नचिरात्समुपस्थितः | |
| योत्स्यसे त्वं मया सार्धमद्य द्रक्ष्यसि मे बलम् | |
| अर्जुन उवाच | |
| इदानीमेव तावत्त्वमपयातो रणान्मम | |
| तेन जीवसि राधेय निहतस्त्वनुजस्तव | |
| भ्रातरं घातयित्वा च त्यक्त्वा रणशिरश्च कः | |
| त्वदन्यः पुरुषः सत्सु ब्रूयादेवं व्यवस्थितः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| इति कर्णं ब्रुवन्नेव बीभत्सुरपराजितः | |
| अभ्ययाद्विसृजन्बाणान्कायावरणभेदिनः | |
| प्रतिजग्राह तान्कर्णः शरानग्निशिखोपमान् | |
| शरवर्षेण महता वर्षमाण इवाम्बुदः | |
| उत्पेतुः शरजालानि घोररूपाणि सर्वशः | |
| अविध्यदश्वान्बाह्वोश्च हस्तावापं पृथक्पृथक् | |
| सोऽमृष्यमाणः कर्णस्य निषङ्गस्यावलम्बनम् | |
| चिच्छेद निशिताग्रेण शरेण नतपर्वणा | |
| उपासङ्गादुपादाय कर्णो बाणानथापरान् | |
| विव्याध पाण्डवं हस्ते तस्य मुष्टिरशीर्यत | |
| ततः पार्थो महाबाहुः कर्णस्य धनुरच्छिनत् | |
| स शक्तिं प्राहिणोत्तस्मै तां पार्थो व्यधमच्छरैः | |
| ततोऽभिपेतुर्बहवो राधेयस्य पदानुगाः | |
| तांश्च गाण्डीवनिर्मुक्तैः प्राहिणोद्यमसादनम् | |
| ततोऽस्याश्वाञ्शरैस्तीक्ष्णैर्बीभत्सुर्भारसाधनैः | |
| आकर्णमुक्तैरभ्यघ्नंस्ते हताः प्रापतन्भुवि | |
| अथापरेण बाणेन ज्वलितेन महाभुजः | |
| विव्याध कर्णं कौन्तेयस्तीक्ष्णेनोरसि वीर्यवान् | |
| तस्य भित्त्वा तनुत्राणं कायमभ्यपतच्छरः | |
| ततः स तमसाविष्टो न स्म किंचित्प्रजज्ञिवान् | |
| स गाढवेदनो हित्वा रणं प्रायादुदङ्मुखः | |
| ततोऽर्जुन उपाक्रोशदुत्तरश्च महारथः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो वैकर्तनं जित्वा पार्थो वैराटिमब्रवीत् | |
| एतन्मां प्रापयानीकं यत्र तालो हिरण्मयः | |
| अत्र शांतनवो भीष्मो रथेऽस्माकं पितामहः | |
| काङ्क्षमाणो मया युद्धं तिष्ठत्यमरदर्शनः | |
| आदास्याम्यहमेतस्य धनुर्ज्यामपि चाहवे | |
| अस्यन्तं दिव्यमस्त्रं मां चित्रमद्य निशामय | |
| शतह्रदामिवायान्तीं स्तनयित्नोरिवाम्बरे | |
| सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं द्रक्ष्यन्ति कुरवो मम | |
| दक्षिणेनाथ वामेन कतरेण स्विदस्यति | |
| इति मां संगताः सर्वे तर्कयिष्यन्ति शत्रवः | |
| शोणितोदां रथावर्तां नागनक्रां दुरत्ययाम् | |
| नदीं प्रस्यन्दयिष्यामि परलोकप्रवाहिनीम् | |
| पाणिपादशिरःपृष्ठबाहुशाखानिरन्तरम् | |
| वनं कुरूणां छेत्स्यामि भल्लैः संनतपर्वभिः | |
| जयतः कौरवीं सेनामेकस्य मम धन्विनः | |
| शतं मार्गा भविष्यन्ति पावकस्येव कानने | |
| मया चक्रमिवाविद्धं सैन्यं द्रक्ष्यसि केवलम् | |
| असंभ्रान्तो रथे तिष्ठ समेषु विषमेषु च | |
| दिवमावृत्य तिष्ठन्तं गिरिं भेत्स्यामि धारिभिः | |
| अहमिन्द्रस्य वचनात्संग्रामेऽभ्यहनं पुरा | |
| पौलोमान्कालखञ्जांश्च सहस्राणि शतानि च | |
| अहमिन्द्राद्दृढां मुष्टिं ब्रह्मणः कृतहस्तताम् | |
| प्रगाढं तुमुलं चित्रमतिविद्धं प्रजापतेः | |
| अहं पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरमारुजम् | |
| जित्वा षष्टिसहस्राणि रथिनामुग्रधन्विनाम् | |
| ध्वजवृक्षं पत्तितृणं रथसिंहगणायुतम् | |
| वनमादीपयिष्यामि कुरूणामस्त्रतेजसा | |
| तानहं रथनीडेभ्यः शरैः संनतपर्वभिः | |
| एकः संकालयिष्यामि वज्रपाणिरिवासुरान् | |
| रौद्रं रुद्रादहं ह्यस्त्रं वारुणं वरुणादपि | |
| अस्त्रमाग्नेयमग्नेश्च वायव्यं मातरिश्वनः | |
| वज्रादीनि तथास्त्राणि शक्रादहमवाप्तवान् | |
| धार्तराष्ट्रवनं घोरं नरसिंहाभिरक्षितम् | |
| अहमुत्पाटयिष्यामि वैराटे व्येतु ते भयम् | |
| एवमाश्वासितस्तेन वैराटिः सव्यसाचिना | |
| व्यगाहत रथानीकं भीमं भीष्मस्य धीमतः | |
| तमायान्तं महाबाहुं जिगीषन्तं रणे परान् | |
| अभ्यवारयदव्यग्रः क्रूरकर्मा धनंजयम् | |
| तं चित्रमाल्याभरणाः कृतविद्या मनस्विनः | |
| आगच्छन्भीमधन्वानं मौर्वीं पर्यस्य बाहुभिः | |
| दुःशासनो विकर्णश्च दुःसहोऽथ विविंशतिः | |
| आगत्य भीमधन्वानं बीभत्सुं पर्यवारयन् | |
| दुःशासनस्तु भल्लेन विद्ध्वा वैराटिमुत्तरम् | |
| द्वितीयेनार्जुनं वीरः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे | |
| तस्य जिष्णुरुपावृत्य पृथुधारेण कार्मुकम् | |
| चकर्त गार्ध्रपत्रेण जातरूपपरिष्कृतम् | |
| अथैनं पञ्चभिः पश्चात्प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे | |
| सोऽपयातो रणं हित्वा पार्थबाणप्रपीडितः | |
| तं विकर्णः शरैस्तीक्ष्णैर्गार्ध्रपत्रैरजिह्मगैः | |
| विव्याध परवीरघ्नमर्जुनं धृतराष्ट्रजः | |
| ततस्तमपि कौन्तेयः शरेणानतपर्वणा | |
| ललाटेऽभ्यहनत्तूर्णं स विद्धः प्रापतद्रथात् | |
| ततः पार्थमभिद्रुत्य दुःसहः सविविंशतिः | |
| अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णैः परीप्सन्भ्रातरं रणे | |
| तावुभौ गार्ध्रपत्राभ्यां निशिताभ्यां धनंजयः | |
| विद्ध्वा युगपदव्यग्रस्तयोर्वाहानसूदयत् | |
| तौ हताश्वौ विविद्धाङ्गौ धृतराष्ट्रात्मजावुभौ | |
| अभिपत्य रथैरन्यैरपनीतौ पदानुगैः | |
| सर्वा दिशश्चाभ्यपतद्बीभत्सुरपराजितः | |
| किरीटमाली कौन्तेयो लब्धलक्षो महाबलः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथ संगम्य सर्वे तु कौरवाणां महारथाः | |
| अर्जुनं सहिता यत्ताः प्रत्ययुध्यन्त भारत | |
| स सायकमयैर्जालैः सर्वतस्तान्महारथान् | |
| प्राच्छादयदमेयात्मा नीहार इव पर्वतान् | |
| नदद्भिश्च महानागैर्हेषमाणैश्च वाजिभिः | |
| भेरीशङ्खनिनादैश्च स शब्दस्तुमुलोऽभवत् | |
| नराश्वकायान्निर्भिद्य लोहानि कवचानि च | |
| पार्थस्य शरजालानि विनिष्पेतुः सहस्रशः | |
| त्वरमाणः शरानस्यन्पाण्डवः स बभौ रणे | |
| मध्यंदिनगतोऽर्चिष्माञ्शरदीव दिवाकरः | |
| उपप्लवन्त वित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा | |
| सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातयः | |
| शरैः संताड्यमानानां कवचानां महात्मनाम् | |
| ताम्रराजतलोहानां प्रादुरासीन्महास्वनः | |
| छन्नमायोधनं सर्वं शरीरैर्गतचेतसाम् | |
| गजाश्वसादिभिस्तत्र शितबाणात्तजीवितैः | |
| रथोपस्थाभिपतितैरास्तृता मानवैर्मही | |
| प्रनृत्यदिव संग्रामे चापहस्तो धनंजयः | |
| श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः | |
| त्रस्तानि सर्वभूतानि व्यगच्छन्त महाहवात् | |
| कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपस्रजानि च | |
| पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि रणमूर्धनि | |
| विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बाहुभिश्च सकार्मुकैः | |
| सहस्ताभरणैश्चान्यैः प्रच्छन्ना भाति मेदिनी | |
| शिरसां पात्यमानानामन्तरा निशितैः शरैः | |
| अश्मवृष्टिरिवाकाशादभवद्भरतर्षभ | |
| दर्शयित्वा तथात्मानं रौद्रं रुद्रपराक्रमः | |
| अवरुद्धश्चरन्पार्थो दशवर्षाणि त्रीणि च | |
| क्रोधाग्निमुत्सृजद्घोरं धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः | |
| तस्य तद्दहतः सैन्यं दृष्ट्वा चैव पराक्रमम् | |
| सर्वे शान्तिपरा योधा धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः | |
| वित्रासयित्वा तत्सैन्यं द्रावयित्वा महारथान् | |
| अर्जुनो जयतां श्रेष्ठः पर्यवर्तत भारत | |
| प्रावर्तयन्नदीं घोरां शोणितौघतरङ्गिणीम् | |
| अस्थिशैवलसंबाधां युगान्ते कालनिर्मिताम् | |
| शरचापप्लवां घोरां मांसशोणितकर्दमाम् | |
| महारथमहाद्वीपां शङ्खदुन्दुभिनिस्वनाम् | |
| चकार महतीं पार्थो नदीमुत्तरशोणिताम् | |
| आददानस्य हि शरान्संधाय च विमुञ्चतः | |
| विकर्षतश्च गाण्डीवं न किंचिद्दृश्यतेऽन्तरम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अथ दुर्योधनः कर्णो दुःशासनविविंशती | |
| द्रोणश्च सह पुत्रेण कृपश्चातिरथो रणे | |
| पुनरीयुः सुसंरब्धा धनंजयजिघांसया | |
| विस्फारयन्तश्चापानि बलवन्ति दृढानि च | |
| तान्प्रकीर्णपताकेन रथेनादित्यवर्चसा | |
| प्रत्युद्ययौ महाराज समस्तान्वानरध्वजः | |
| ततः कृपश्च कर्णश्च द्रोणश्च रथिनां वरः | |
| तं महास्त्रैर्महावीर्यं परिवार्य धनंजयम् | |
| शरौघान्सम्यगस्यन्तो जीमूता इव वार्षिकाः | |
| ववर्षुः शरवर्षाणि प्रपतन्तं किरीटिनम् | |
| इषुभिर्बहुभिस्तूर्णं समरे लोमवाहिभिः | |
| अदूरात्पर्यवस्थाय पूरयामासुरादृताः | |
| तथावकीर्णस्य हि तैर्दिव्यैरस्त्रैः समन्ततः | |
| न तस्य द्व्यङ्गुलमपि विवृतं समदृश्यत | |
| ततः प्रहस्य बीभत्सुर्दिव्यमैन्द्रं महारथः | |
| अस्त्रमादित्यसंकाशं गाण्डीवे समयोजयत् | |
| स रश्मिभिरिवादित्यः प्रतपन्समरे बली | |
| किरीटमाली कौन्तेयः सर्वान्प्राच्छादयत्कुरून् | |
| यथा बलाहके विद्युत्पावको वा शिलोच्चये | |
| तथा गाण्डीवमभवदिन्द्रायुधमिवाततम् | |
| यथा वर्षति पर्जन्ये विद्युद्विभ्राजते दिवि | |
| तथा दश दिशः सर्वाः पतद्गाण्डीवमावृणोत् | |
| त्रस्ताश्च रथिनः सर्वे बभूवुस्तत्र सर्वशः | |
| सर्वे शान्तिपरा भूत्वा स्वचित्तानि न लेभिरे | |
| संग्रामविमुखाः सर्वे योधास्ते हतचेतसः | |
| एवं सर्वाणि सैन्यानि भग्नानि भरतर्षभ | |
| प्राद्रवन्त दिशः सर्वा निराशानि स्वजीविते | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः शांतनवो भीष्मो दुराधर्षः प्रतापवान् | |
| वध्यमानेषु योधेषु धनंजयमुपाद्रवत् | |
| प्रगृह्य कार्मुकश्रेष्ठं जातरूपपरिष्कृतम् | |
| शरानादाय तीक्ष्णाग्रान्मर्मभेदप्रमाथिनः | |
| पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि | |
| शुशुभे स नरव्याघ्रो गिरिः सूर्योदये यथा | |
| प्रध्माय शङ्खं गाङ्गेयो धार्तराष्ट्रान्प्रहर्षयन् | |
| प्रदक्षिणमुपावृत्य बीभत्सुं समवारयत् | |
| तमुद्वीक्ष्य तथायान्तं कौन्तेयः परवीरहा | |
| प्रत्यगृह्णात्प्रहृष्टात्मा धाराधरमिवाचलः | |
| ततो भीष्मः शरानष्टौ ध्वजे पार्थस्य वीर्यवान् | |
| समपर्यन्महावेगाञ्श्वसमानानिवोरगान् | |
| ते ध्वजं पाण्डुपुत्रस्य समासाद्य पतत्रिणः | |
| ज्वलन्तः कपिमाजघ्नुर्ध्वजाग्रनिलयांश्च तान् | |
| ततो भल्लेन महता पृथुधारेण पाण्डवः | |
| छत्रं चिच्छेद भीष्मस्य तूर्णं तदपतद्भुवि | |
| ध्वजं चैवास्य कौन्तेयः शरैरभ्यहनद्दृढम् | |
| शीघ्रकृद्रथवाहांश्च तथोभौ पार्ष्णिसारथी | |
| तयोस्तदभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् | |
| भीष्मस्य सह पार्थेन बलिवासवयोरिव | |
| भल्लैर्भल्लाः समागम्य भीष्मपाण्डवयोर्युधि | |
| अन्तरिक्षे व्यराजन्त खद्योताः प्रावृषीव हि | |
| अग्निचक्रमिवाविद्धं सव्यदक्षिणमस्यतः | |
| गाण्डीवमभवद्राजन्पार्थस्य सृजतः शरान् | |
| स तैः संछादयामास भीष्मं शरशतैः शितैः | |
| पर्वतं वारिधाराभिश्छादयन्निव तोयदः | |
| तां स वेलामिवोद्धूतां शरवृष्टिं समुत्थिताम् | |
| व्यधमत्सायकैर्भीष्मो अर्जुनं संनिवारयत् | |
| ततस्तानि निकृत्तानि शरजालानि भागशः | |
| समरेऽभिव्यशीर्यन्त फल्गुनस्य रथं प्रति | |
| ततः कनकपुङ्खानां शरवृष्टिं समुत्थिताम् | |
| पाण्डवस्य रथात्तूर्णं शलभानामिवायतिम् | |
| व्यधमत्तां पुनस्तस्य भीष्मः शरशतैः शितैः | |
| ततस्ते कुरवः सर्वे साधु साध्विति चाब्रुवन् | |
| दुष्करं कृतवान्भीष्मो यदर्जुनमयोधयत् | |
| बलवांस्तरुणो दक्षः क्षिप्रकारी च पाण्डवः | |
| कोऽन्यः समर्थः पार्थस्य वेगं धारयितुं रणे | |
| ऋते शांतनवाद्भीष्मात्कृष्णाद्वा देवकीसुतात् | |
| आचार्यप्रवराद्वापि भारद्वाजान्महाबलात् | |
| अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य क्रीडतः पुरुषर्षभौ | |
| चक्षूंषि सर्वभूतानां मोहयन्तौ महाबलौ | |
| प्राजापत्यं तथैवैन्द्रमाग्नेयं च सुदारुणम् | |
| कौबेरं वारुणं चैव याम्यं वायव्यमेव च | |
| प्रयुञ्जानौ महात्मानौ समरे तौ विचेरतुः | |
| विस्मितान्यथ भूतानि तौ दृष्ट्वा संयुगे तदा | |
| साधु पार्थ महाबाहो साधु भीष्मेति चाब्रुवन् | |
| नेदं युक्तं मनुष्येषु योऽयं संदृश्यते महान् | |
| महास्त्राणां संप्रयोगः समरे भीष्मपार्थयोः | |
| एवं सर्वास्त्रविदुषोरस्त्रयुद्धमवर्तत | |
| अथ जिष्णुरुपावृत्य पृथुधारेण कार्मुकम् | |
| चकर्त भीष्मस्य तदा जातरूपपरिष्कृतम् | |
| निमेषान्तरमात्रेण भीष्मोऽन्यत्कार्मुकं रणे | |
| समादाय महाबाहुः सज्यं चक्रे महाबलः | |
| शरांश्च सुबहून्क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये | |
| अर्जुनोऽपि शरांश्चित्रान्भीष्माय निशितान्बहून् | |
| चिक्षेप सुमहातेजास्तथा भीष्मश्च पाण्डवे | |
| तयोर्दिव्यास्त्रविदुषोरस्यतोरनिशं शरान् | |
| न विशेषस्तदा राजँल्लक्ष्यते स्म महात्मनोः | |
| अथावृणोद्दश दिशः शरैरतिरथस्तदा | |
| किरीटमाली कौन्तेयः शूरः शांतनवस्तथा | |
| अतीव पाण्डवो भीष्मं भीष्मश्चातीव पाण्डवम् | |
| बभूव तस्मिन्संग्रामे राजँल्लोके तदद्भुतम् | |
| पाण्डवेन हताः शूरा भीष्मस्य रथरक्षिणः | |
| शेरते स्म तदा राजन्कौन्तेयस्याभितो रथम् | |
| ततो गाण्डीवनिर्मुक्ता निरमित्रं चिकीर्षवः | |
| आगच्छन्पुङ्खसंश्लिष्टाः श्वेतवाहनपत्रिणः | |
| निष्पतन्तो रथात्तस्य धौता हैरण्यवाससः | |
| आकाशे समदृश्यन्त हंसानामिव पङ्क्तयः | |
| तस्य तद्दिव्यमस्त्रं हि प्रगाढं चित्रमस्यतः | |
| प्रेक्षन्ते स्मान्तरिक्षस्थाः सर्वे देवाः सवासवाः | |
| तद्दृष्ट्वा परमप्रीतो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम् | |
| शशंस देवराजाय चित्रसेनः प्रतापवान् | |
| पश्येमानरिनिर्दारान्संसक्तानिव गच्छतः | |
| चित्ररूपमिदं जिष्णोर्दिव्यमस्त्रमुदीर्यतः | |
| नेदं मनुष्याः श्रद्दध्युर्न हीदं तेषु विद्यते | |
| पौराणानां महास्त्राणां विचित्रोऽयं समागमः | |
| मध्यंदिनगतं सूर्यं प्रतपन्तमिवाम्बरे | |
| न शक्नुवन्ति सैन्यानि पाण्डवं प्रतिवीक्षितुम् | |
| उभौ विश्रुतकर्माणावुभौ युद्धविशारदौ | |
| उभौ सदृशकर्माणावुभौ युधि दुरासदौ | |
| इत्युक्तो देवराजस्तु पार्थभीष्मसमागमम् | |
| पूजयामास दिव्येन पुष्पवर्षेण भारत | |
| ततो भीष्मः शांतनवो वामे पार्श्वे समर्पयत् | |
| अस्यतः प्रतिसंधाय विवृतं सव्यसाचिनः | |
| ततः प्रहस्य बीभत्सुः पृथुधारेण कार्मुकम् | |
| न्यकृन्तद्गार्ध्रपत्रेण भीष्मस्यामिततेजसः | |
| अथैनं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे | |
| यतमानं पराक्रान्तं कुन्तीपुत्रो धनंजयः | |
| स पीडितो महाबाहुर्गृहीत्वा रथकूबरम् | |
| गाङ्गेयो युधि दुर्धर्षस्तस्थौ दीर्घमिवातुरः | |
| तं विसंज्ञमपोवाह संयन्ता रथवाजिनाम् | |
| उपदेशमनुस्मृत्य रक्षमाणो महारथम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| भीष्मे तु संग्रामशिरो विहाय; पलायमाने धृतराष्ट्रपुत्रः | |
| उच्छ्रित्य केतुं विनदन्महात्मा; स्वयं विगृह्यार्जुनमाससाद | |
| स भीमधन्वानमुदग्रवीर्यं; धनंजयं शत्रुगणे चरन्तम् | |
| आकर्णपूर्णायतचोदितेन; भल्लेन विव्याध ललाटमध्ये | |
| स तेन बाणेन समर्पितेन; जाम्बूनदाभेन सुसंशितेन | |
| रराज राजन्महनीयकर्मा; यथैकपर्वा रुचिरैकशृङ्गः | |
| अथास्य बाणेन विदारितस्य; प्रादुर्बभूवासृगजस्रमुष्णम् | |
| सा तस्य जाम्बूनदपुष्पचित्रा; मालेव चित्राभिविराजते स्म | |
| स तेन बाणाभिहतस्तरस्वी; दुर्योधनेनोद्धतमन्युवेगः | |
| शरानुपादाय विषाग्निकल्पा;न्विव्याध राजानमदीनसत्त्वः | |
| दुर्योधनश्चापि तमुग्रतेजाः; पार्थश्च दुर्योधनमेकवीरः | |
| अन्योन्यमाजौ पुरुषप्रवीरौ; समं समाजघ्नतुराजमीढौ | |
| ततः प्रभिन्नेन महागजेन; महीधराभेन पुनर्विकर्णः | |
| रथैश्चतुर्भिर्गजपादरक्षैः; कुन्तीसुतं जिष्णुमथाभ्यधावत् | |
| तमापतन्तं त्वरितं गजेन्द्रं; धनंजयः कुम्भविभागमध्ये | |
| आकर्णपूर्णेन दृढायसेन; बाणेन विव्याध महाजवेन | |
| पार्थेन सृष्टः स तु गार्ध्रपत्र; आ पुङ्खदेशात्प्रविवेश नागम् | |
| विदार्य शैलप्रवरप्रकाशं; यथाशनिः पर्वतमिन्द्रसृष्टः | |
| शरप्रतप्तः स तु नागराजः; प्रवेपिताङ्गो व्यथितान्तरात्मा | |
| संसीदमानो निपपात मह्यां; वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य | |
| निपातिते दन्तिवरे पृथिव्यां; त्रासाद्विकर्णः सहसावतीर्य | |
| तूर्णं पदान्यष्टशतानि गत्वा; विविंशतेः स्यन्दनमारुरोह | |
| निहत्य नागं तु शरेण तेन; वज्रोपमेनाद्रिवराम्बुदाभम् | |
| तथाविधेनैव शरेण पार्थो; दुर्योधनं वक्षसि निर्बिभेद | |
| ततो गजे राजनि चैव भिन्ने; भग्ने विकर्णे च सपादरक्षे | |
| गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैः प्रणुन्ना;स्ते योधमुख्याः सहसापजग्मुः | |
| दृष्ट्वैव बाणेन हतं तु नागं; योधांश्च सर्वान्द्रवतो निशम्य | |
| रथं समावृत्य कुरुप्रवीरो; रणात्प्रदुद्राव यतो न पार्थः | |
| तं भीमरूपं त्वरितं द्रवन्तं; दुर्योधनं शत्रुसहो निषङ्गी | |
| प्राक्ष्वेडयद्योद्धुमनाः किरीटी; बाणेन विद्धं रुधिरं वमन्तम् | |
| अर्जुन उवाच | |
| विहाय कीर्तिं विपुलं यशश्च; युद्धात्परावृत्य पलायसे किम् | |
| न तेऽद्य तूर्याणि समाहतानि; यथावदुद्यान्ति गतस्य युद्धे | |
| युधिष्ठिरस्यास्मि निदेशकारी; पार्थस्तृतीयो युधि च स्थिरोऽस्मि | |
| तदर्थमावृत्य मुखं प्रयच्छ; नरेन्द्रवृत्तं स्मर धार्तराष्ट्र | |
| मोघं तवेदं भुवि नामधेयं; दुर्योधनेतीह कृतं पुरस्तात् | |
| न हीह दुर्योधनता तवास्ति; पलायमानस्य रणं विहाय | |
| न ते पुरस्तादथ पृष्ठतो वा; पश्यामि दुर्योधन रक्षितारम् | |
| परैहि युद्धेन कुरुप्रवीर; प्राणान्प्रियान्पाण्डवतोऽद्य रक्ष | |
| वैशंपायन उवाच | |
| आहूयमानस्तु स तेन संख्ये; महामना धृतराष्ट्रस्य पुत्रः | |
| निवर्तितस्तस्य गिराङ्कुशेन; गजो यथा मत्त इवाङ्कुशेन | |
| सोऽमृष्यमाणो वचसाभिमृष्टो; महारथेनातिरथस्तरस्वी | |
| पर्याववर्ताथ रथेन वीरो; भोगी यथा पादतलाभिमृष्टः | |
| तं प्रेक्ष्य कर्णः परिवर्तमानं; निवर्त्य संस्तभ्य च विद्धगात्रः | |
| दुर्योधनं दक्षिणतोऽभ्यगच्छ;त्पार्थं नृवीरो युधि हेममाली | |
| भीष्मस्ततः शांतनवो निवृत्य; हिरण्यकक्ष्यांस्त्वरयंस्तुरंगान् | |
| दुर्योधनं पश्चिमतोऽभ्यरक्ष;त्पार्थान्महाबाहुरधिज्यधन्वा | |
| द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च; दुःशासनश्चैव निवृत्य शीघ्रम् | |
| सर्वे पुरस्ताद्विततेषुचापा; दुर्योधनार्थं त्वरिताभ्युपेयुः | |
| स तान्यनीकानि निवर्तमाना;न्यालोक्य पूर्णौघनिभानि पार्थः | |
| हंसो यथा मेघमिवापतन्तं; धनंजयः प्रत्यपतत्तरस्वी | |
| ते सर्वतः संपरिवार्य पार्थ;मस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः | |
| ववर्षुरभ्येत्य शरैः समन्ता;न्मेघा यथा भूधरमम्बुवेगैः | |
| ततोऽस्त्रमस्त्रेण निवार्य तेषां; गाण्डीवधन्वा कुरुपुंगवानाम् | |
| संमोहनं शत्रुसहोऽन्यदस्त्रं; प्रादुश्चकारैन्द्रिरपारणीयम् | |
| ततो दिशश्चानुदिशो विवृत्य; शरैः सुधारैर्निशितैः सुपुङ्खैः | |
| गाण्डीवघोषेण मनांसि तेषां; महाबलः प्रव्यथयां चकार | |
| ततः पुनर्भीमरवं प्रगृह्य; दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् | |
| व्यनादयत्स प्रदिशो दिशः खं; भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता | |
| ते शङ्खनादेन कुरुप्रवीराः; संमोहिताः पार्थसमीरितेन | |
| उत्सृज्य चापानि दुरासदानि; सर्वे तदा शान्तिपरा बभूवुः | |
| तथा विसंज्ञेषु परेषु पार्थः; स्मृत्वा तु वाक्यानि तथोत्तरायाः | |
| निर्याहि मध्यादिति मत्स्यपुत्र;मुवाच यावत्कुरवो विसंज्ञाः | |
| आचार्य शारद्वतयोः सुशुक्ले; कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् | |
| द्रौणेश्च राज्ञश्च तथैव नीले; वस्त्रे समादत्स्व नरप्रवीर | |
| भीष्मस्य संज्ञां तु तथैव मन्ये; जानाति मेऽस्त्रप्रतिघातमेषः | |
| एतस्य वाहान्कुरु सव्यतस्त्व;मेवं हि यातव्यममूढसंज्ञैः | |
| रश्मीन्समुत्सृज्य ततो महात्मा; रथादवप्लुत्य विराटपुत्रः | |
| वस्त्राण्युपादाय महारथानां; तूर्णं पुनः स्वं रथमारुरोह | |
| ततोऽन्वशासच्चतुरः सदश्वा;न्पुत्रो विराटस्य हिरण्यकक्ष्यान् | |
| ते तद्व्यतीयुर्ध्वजिनामनीकं; श्वेता वहन्तोऽर्जुनमाजिमध्यात् | |
| तथा तु यान्तं पुरुषप्रवीरं; भीष्मः शरैरभ्यहनत्तरस्वी | |
| स चापि भीष्मस्य हयान्निहत्य; विव्याध पार्श्वे दशभिः पृषत्कैः | |
| ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे; विद्ध्वास्य यन्तारमरिष्टधन्वा | |
| तस्थौ विमुक्तो रथवृन्दमध्या;द्राहुं विदार्येव सहस्ररश्मिः | |
| लब्ध्वा तु संज्ञां च कुरुप्रवीरः; पार्थं समीक्ष्याथ महेन्द्रकल्पम् | |
| रणाद्विमुक्तं स्थितमेकमाजौ; स धार्तराष्ट्रस्त्वरितो बभाषे | |
| अयं कथं स्विद्भवतां विमुक्त;स्तं वै प्रबध्नीत यथा न मुच्येत् | |
| तमब्रवीच्छांतनवः प्रहस्य; क्व ते गता बुद्धिरभूत्क्व वीर्यम् | |
| शान्तिं पराश्वस्य यथा स्थितोऽभू;रुत्सृज्य बाणांश्च धनुश्च चित्रम् | |
| न त्वेव बीभत्सुरलं नृशंसं; कर्तुं न पापेऽस्य मनो निविष्टम् | |
| त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत्स्वधर्मं; तस्मान्न सर्वे निहता रणेऽस्मिन् | |
| क्षिप्रं कुरून्याहि कुरुप्रवीर; विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थः | |
| दुर्योधनस्तस्य तु तन्निशम्य; पितामहस्यात्महितं वचोऽथ | |
| अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी; राजा विनिःश्वस्य बभूव तूष्णीम् | |
| तद्भीष्मवाक्यं हितमीक्ष्य सर्वे; धनंजयाग्निं च विवर्धमानम् | |
| निवर्तनायैव मनो निदध्यु;र्दुर्योधनं ते परिरक्षमाणाः | |
| तान्प्रस्थितान्प्रीतमनाः स पार्थो; धनंजयः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरान् | |
| आभाषमाणोऽनुययौ मुहूर्तं; संपूजयंस्तत्र गुरून्महात्मा | |
| पितामहं शांतनवं स वृद्धं; द्रोणं गुरुं च प्रतिपूज्य मूर्ध्ना | |
| द्रौणिं कृपं चैव गुरूंश्च सर्वा;ञ्शरैर्विचित्रैरभिवाद्य चैव | |
| दुर्योधनस्योत्तमरत्नचित्रं; चिच्छेद पार्थो मुकुटं शरेण | |
| आमन्त्र्य वीरांश्च तथैव मान्या;न्गाण्डीवघोषेण विनाद्य लोकान् | |
| स देवदत्तं सहसा विनाद्य; विदार्य वीरो द्विषतां मनांसि | |
| ध्वजेन सर्वानभिभूय शत्रू;न्स हेमजालेन विराजमानः | |
| दृष्ट्वा प्रयातांस्तु कुरून्किरीटी; हृष्टोऽब्रवीत्तत्र स मत्स्यपुत्रम् | |
| आवर्तयाश्वान्पशवो जितास्ते; याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो विजित्य संग्रामे कुरून्गोवृषभेक्षणः | |
| समानयामास तदा विराटस्य धनं महत् | |
| गतेषु च प्रभग्नेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वशः | |
| वनान्निष्क्रम्य गहनाद्बहवः कुरुसैनिकाः | |
| भयात्संत्रस्तमनसः समाजग्मुस्ततस्ततः | |
| मुक्तकेशा व्यदृश्यन्त स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा | |
| क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसः | |
| ऊचुः प्रणम्य संभ्रान्ताः पार्थ किं करवाम ते | |
| अर्जुन उवाच | |
| स्वस्ति व्रजत भद्रं वो न भेतव्यं कथंचन | |
| नाहमार्ताञ्जिघांसामि भृशमाश्वासयामि वः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| तस्य तामभयां वाचं श्रुत्वा योधाः समागताः | |
| आयुःकीर्तियशोदाभिस्तमाशिर्भिरनन्दयन् | |
| ततो निवृत्ताः कुरवः प्रभग्ना वशमास्थिताः | |
| पन्थानमुपसंगम्य फल्गुनो वाक्यमब्रवीत् | |
| राजपुत्र प्रत्यवेक्ष समानीतानि सर्वशः | |
| गोकुलानि महाबाहो वीर गोपालकैः सह | |
| ततोऽपराह्णे यास्यामो विराटनगरं प्रति | |
| आश्वास्य पाययित्वा च परिप्लाव्य च वाजिनः | |
| गच्छन्तु त्वरिताश्चैव गोपालाः प्रेषितास्त्वया | |
| नगरे प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| उत्तरस्त्वरमाणोऽथ दूतानाज्ञापयत्ततः | |
| वचनादर्जुनस्यैव आचक्षध्वं जयं मम | |
| वैशंपायन उवाच | |
| अवजित्य धनं चापि विराटो वाहिनीपतिः | |
| प्राविशन्नगरं हृष्टश्चतुर्भिः सह पाण्डवैः | |
| जित्वा त्रिगर्तान्संग्रामे गाश्चैवादाय केवलाः | |
| अशोभत महाराजः सह पार्थैः श्रिया वृतः | |
| तमासनगतं वीरं सुहृदां प्रीतिवर्धनम् | |
| उपतस्थुः प्रकृतयः समस्ता ब्राह्मणैः सह | |
| सभाजितः ससैन्यस्तु प्रतिनन्द्याथ मत्स्यराट् | |
| विसर्जयामास तदा द्विजांश्च प्रकृतीस्तथा | |
| ततः स राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः | |
| उत्तरं परिपप्रच्छ क्व यात इति चाब्रवीत् | |
| आचख्युस्तस्य संहृष्टाः स्त्रियः कन्याश्च वेश्मनि | |
| अन्तःपुरचराश्चैव कुरुभिर्गोधनं हृतम् | |
| विजेतुमभिसंरब्ध एक एवातिसाहसात् | |
| बृहन्नडासहायश्च निर्यातः पृथिवींजयः | |
| उपयातानतिरथान्द्रोणं शांतनवं कृपम् | |
| कर्णं दुर्योधनं चैव द्रोणपुत्रं च षड्रथान् | |
| राजा विराटोऽथ भृशं प्रतप्तः; श्रुत्वा सुतं ह्येकरथेन यातम् | |
| बृहन्नडासारथिमाजिवर्धनं; प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान् | |
| सर्वथा कुरवस्ते हि ये चान्ये वसुधाधिपाः | |
| त्रिगर्तान्निर्जिताञ्श्रुत्वा न स्थास्यन्ति कदाचन | |
| तस्माद्गच्छन्तु मे योधा बलेन महता वृताः | |
| उत्तरस्य परीप्सार्थं ये त्रिगर्तैरविक्षताः | |
| हयांश्च नागांश्च रथांश्च शीघ्रं; पदातिसंघांश्च ततः प्रवीरान् | |
| प्रस्थापयामास सुतस्य हेतो;र्विचित्रशस्त्राभरणोपपन्नान् | |
| एवं स राजा मत्स्यानां विराटोऽक्षौहिणीपतिः | |
| व्यादिदेशाथ तां क्षिप्रं वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् | |
| कुमारमाशु जानीत यदि जीवति वा न वा | |
| यस्य यन्ता गतः षण्ढो मन्येऽहं न स जीवति | |
| तमब्रवीद्धर्मराजः प्रहस्य; विराटमार्तं कुरुभिः प्रतप्तम् | |
| बृहन्नडा सारथिश्चेन्नरेन्द्र; परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ताः | |
| सर्वान्महीपान्सहितान्कुरूंश्च; तथैव देवासुरयक्षनागान् | |
| अलं विजेतुं समरे सुतस्ते; स्वनुष्ठितः सारथिना हि तेन | |
| अथोत्तरेण प्रहिता दूतास्ते शीघ्रगामिनः | |
| विराटनगरं प्राप्य जयमावेदयंस्तदा | |
| राज्ञस्ततः समाचख्यौ मन्त्री विजयमुत्तमम् | |
| पराजयं कुरूणां चाप्युपायान्तं तथोत्तरम् | |
| सर्वा विनिर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः | |
| उत्तरः सह सूतेन कुशली च परंतप | |
| कङ्क उवाच | |
| दिष्ट्या ते निर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः | |
| दिष्ट्या ते जीवितः पुत्रः श्रूयते पार्थिवर्षभ | |
| नाद्भुतं त्वेव मन्येऽहं यत्ते पुत्रोऽजयत्कुरून् | |
| ध्रुव एव जयस्तस्य यस्य यन्ता बृहन्नडा | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो विराटो नृपतिः संप्रहृष्टतनूरुहः | |
| श्रुत्वा तु विजयं तस्य कुमारस्यामितौजसः | |
| आच्छादयित्वा दूतांस्तान्मन्त्रिणः सोऽभ्यचोदयत् | |
| राजमार्गाः क्रियन्तां मे पताकाभिरलंकृताः | |
| पुष्पोपहारैरर्च्यन्तां देवताश्चापि सर्वशः | |
| कुमारा योधमुख्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः | |
| वादित्राणि च सर्वाणि प्रत्युद्यान्तु सुतं मम | |
| घण्टापणवकः शीघ्रं मत्तमारुह्य वारणम् | |
| शृङ्गाटकेषु सर्वेषु आख्यातु विजयं मम | |
| उत्तरा च कुमारीभिर्बह्वीभिरभिसंवृता | |
| शृङ्गारवेषाभरणा प्रत्युद्यातु बृहन्नडाम् | |
| श्रुत्वा तु तद्वचनं पार्थिवस्य; सर्वे पुनः स्वस्तिकपाणयश्च | |
| भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च; वेषैः परार्ध्यैः प्रमदाः शुभाश्च | |
| तथैव सूताः सह मागधैश्च; नन्दीवाद्याः पणवास्तूर्यवाद्याः | |
| पुराद्विराटस्य महाबलस्य; प्रत्युद्ययुः पुत्रमनन्तवीर्यम् | |
| प्रस्थाप्य सेनां कन्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः | |
| मत्स्यराजो महाप्राज्ञः प्रहृष्ट इदमब्रवीत् | |
| अक्षानाहर सैरन्ध्रि कङ्क द्यूतं प्रवर्तताम् | |
| तं तथा वादिनं दृष्ट्वा पाण्डवः प्रत्यभाषत | |
| न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति नः श्रुतम् | |
| न त्वामद्य मुदा युक्तमहं देवितुमुत्सहे | |
| प्रियं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि मन्यसे | |
| विराट उवाच | |
| स्त्रियो गावो हिरण्यं च यच्चान्यद्वसु किंचन | |
| न मे किंचित्त्वया रक्ष्यमन्तरेणापि देवितुम् | |
| कङ्क उवाच | |
| किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद | |
| देवने बहवो दोषास्तस्मात्तत्परिवर्जयेत् | |
| श्रुतस्ते यदि वा दृष्टः पाण्डवो वै युधिष्ठिरः | |
| स राज्यं सुमहत्स्फीतं भ्रातॄंश्च त्रिदशोपमान् | |
| द्यूते हारितवान्सर्वं तस्माद्द्यूतं न रोचये | |
| अथ वा मन्यसे राजन्दीव्याव यदि रोचते | |
| वैशंपायन उवाच | |
| प्रवर्तमाने द्यूते तु मत्स्यः पाण्डवमब्रवीत् | |
| पश्य पुत्रेण मे युद्धे तादृशाः कुरवो जिताः | |
| ततोऽब्रवीन्मत्स्यराजं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| बृहन्नडा यस्य यन्ता कथं स न विजेष्यति | |
| इत्युक्तः कुपितो राजा मत्स्यः पाण्डवमब्रवीत् | |
| समं पुत्रेण मे षण्ढं ब्रह्मबन्धो प्रशंससि | |
| वाच्यावाच्यं न जानीषे नूनं मामवमन्यसे | |
| भीष्मद्रोणमुखान्सर्वान्कस्मान्न स विजेष्यति | |
| वयस्यत्वात्तु ते ब्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे | |
| नेदृशं ते पुनर्वाच्यं यदि जीवितुमिच्छसि | |
| युधिष्ठिर उवाच | |
| यत्र द्रोणस्तथा भीष्मो द्रौणिर्वैकर्तनः कृपः | |
| दुर्योधनश्च राजेन्द्र तथान्ये च महारथाः | |
| मरुद्गणैः परिवृतः साक्षादपि शतक्रतुः | |
| कोऽन्यो बृहन्नडायास्तान्प्रतियुध्येत संगतान् | |
| विराट उवाच | |
| बहुशः प्रतिषिद्धोऽसि न च वाचं नियच्छसि | |
| नियन्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद्धर्ममाचरेत् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततः प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद्भृशम् | |
| मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सयन् | |
| बलवत्प्रतिविद्धस्य नस्तः शोणितमागमत् | |
| तदप्राप्तं महीं पार्थः पाणिभ्यां प्रत्यगृह्णत | |
| अवैक्षत च धर्मात्मा द्रौपदीं पार्श्वतः स्थिताम् | |
| सा वेद तमभिप्रायं भर्तुश्चित्तवशानुगा | |
| पूरयित्वा च सौवर्णं पात्रं कांस्यमनिन्दिता | |
| तच्छोणितं प्रत्यगृह्णाद्यत्प्रसुस्राव पाण्डवात् | |
| अथोत्तरः शुभैर्गन्धैर्माल्यैश्च विविधैस्तथा | |
| अवकीर्यमाणः संहृष्टो नगरं स्वैरमागमत् | |
| सभाज्यमानः पौरैश्च स्त्रीभिर्जानपदैस्तथा | |
| आसाद्य भवनद्वारं पित्रे स प्रत्यहारयत् | |
| ततो द्वाःस्थः प्रविश्यैव विराटमिदमब्रवीत् | |
| बृहन्नडासहायस्ते पुत्रो द्वार्युत्तरः स्थितः | |
| ततो हृष्टो मत्स्यराजः क्षत्तारमिदमब्रवीत् | |
| प्रवेश्यतामुभौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तयोः | |
| क्षत्तारं कुरुराजस्तु शनैः कर्ण उपाजपत् | |
| उत्तरः प्रविशत्वेको न प्रवेश्या बृहन्नडा | |
| एतस्य हि महाबाहो व्रतमेतत्समाहितम् | |
| यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याच्छोणितं वापि दर्शयेत् | |
| अन्यत्र संग्रामगतान्न स जीवेदसंशयम् | |
| न मृष्याद्भृशसंक्रुद्धो मां दृष्ट्वैव सशोणितम् | |
| विराटमिह सामात्यं हन्यात्सबलवाहनम् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो राज्ञः सुतो ज्येष्ठः प्राविशत्पृथिवींजयः | |
| सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजमपश्यत | |
| स तं रुधिरसंसिक्तमनेकाग्रमनागसम् | |
| भूमावासीनमेकान्ते सैरन्ध्र्या समुपस्थितम् | |
| ततः पप्रच्छ पितरं त्वरमाण इवोत्तरः | |
| केनायं ताडितो राजन्केन पापमिदं कृतम् | |
| विराट उवाच | |
| मयायं ताडितो जिह्मो न चाप्येतावदर्हति | |
| प्रशस्यमाने यः शूरे त्वयि षण्ढं प्रशंसति | |
| उत्तर उवाच | |
| अकार्यं ते कृतं राजन्क्षिप्रमेव प्रसाद्यताम् | |
| मा त्वा ब्रह्मविषं घोरं समूलमपि निर्दहेत् | |
| वैशंपायन उवाच | |
| स पुत्रस्य वचः श्रुत्वा विराटो राष्ट्रवर्धनः | |
| क्षमयामास कौन्तेयं भस्मच्छन्नमिवानलम् | |
| क्षमयन्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत | |
| चिरं क्षान्तमिदं राजन्न मन्युर्विद्यते मम | |
| यदि ह्येतत्पतेद्भूमौ रुधिरं मम नस्ततः | |
| सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशयः | |
| न दूषयामि ते राजन्यच्च हन्याददूषकम् | |
| बलवन्तं महाराज क्षिप्रं दारुणमाप्नुयात् | |
| शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नडा | |
| अभिवाद्य विराटं च कङ्कं चाप्युपतिष्ठत | |
| क्षमयित्वा तु कौरव्यं रणादुत्तरमागतम् | |
| प्रशशंस ततो मत्स्यः शृण्वतः सव्यसाचिनः | |
| त्वया दायादवानस्मि कैकेयीनन्दिवर्धन | |
| त्वया मे सदृशः पुत्रो न भूतो न भविष्यति | |
| पदं पदसहस्रेण यश्चरन्नापराध्नुयात् | |
| तेन कर्णेन ते तात कथमासीत्समागमः | |
| मनुष्यलोके सकले यस्य तुल्यो न विद्यते | |
| यः समुद्र इवाक्षोभ्यः कालाग्निरिव दुःसहः | |
| तेन भीष्मेण ते तात कथमासीत्समागमः | |
| आचार्यो वृष्णिवीराणां पाण्डवानां च यो द्विजः | |
| सर्वक्षत्रस्य चाचार्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः | |
| तेन द्रोणेन ते तात कथमासीत्समागमः | |
| आचार्यपुत्रो यः शूरः सर्वशस्त्रभृतामपि | |
| अश्वत्थामेति विख्यातः कथं तेन समागमः | |
| रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतस्वा वणिजो यथा | |
| कृपेण तेन ते तात कथमासीत्समागमः | |
| पर्वतं योऽभिविध्येत राजपुत्रो महेषुभिः | |
| दुर्योधनेन ते तात कथमासीत्समागमः | |
| उत्तर उवाच | |
| न मया निर्जिता गावो न मया निर्जिताः परे | |
| कृतं तु कर्म तत्सर्वं देवपुत्रेण केनचित् | |
| स हि भीतं द्रवन्तं मां देवपुत्रो न्यवारयत् | |
| स चातिष्ठद्रथोपस्थे वज्रहस्तनिभो युवा | |
| तेन ता निर्जिता गावस्तेन ते कुरवो जिताः | |
| तस्य तत्कर्म वीरस्य न मया तात तत्कृतम् | |
| स हि शारद्वतं द्रोणं द्रोणपुत्रं च वीर्यवान् | |
| सूतपुत्रं च भीष्मं च चकार विमुखाञ्शरैः | |
| दुर्योधनं च समरे सनागमिव यूथपम् | |
| प्रभग्नमब्रवीद्भीतं राजपुत्रं महाबलम् | |
| न हास्तिनपुरे त्राणं तव पश्यामि किंचन | |
| व्यायामेन परीप्सस्व जीवितं कौरवात्मज | |
| न मोक्ष्यसे पलायंस्त्वं राजन्युद्धे मनः कुरु | |
| पृथिवीं भोक्ष्यसे जित्वा हतो वा स्वर्गमाप्स्यसि | |
| स निवृत्तो नरव्याघ्रो मुञ्चन्वज्रनिभाञ्शरान् | |
| सचिवैः संवृतो राजा रथे नाग इव श्वसन् | |
| तत्र मे रोमहर्षोऽभूदूरुस्तम्भश्च मारिष | |
| यदभ्रघनसंकाशमनीकं व्यधमच्छरैः | |
| तत्प्रणुद्य रथानीकं सिंहसंहननो युवा | |
| कुरूंस्तान्प्रहसन्राजन्वासांस्यपहरद्बली | |
| एकेन तेन वीरेण षड्रथाः परिवारिताः | |
| शार्दूलेनेव मत्तेन मृगास्तृणचरा वने | |
| विराट उवाच | |
| क्व स वीरो महाबाहुर्देवपुत्रो महायशाः | |
| यो मे धनमवाजैषीत्कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे | |
| इच्छामि तमहं द्रष्टुमर्चितुं च महाबलम् | |
| येन मे त्वं च गावश्च रक्षिता देवसूनुना | |
| उत्तर उवाच | |
| अन्तर्धानं गतस्तात देवपुत्रः प्रतापवान् | |
| स तु श्वो वा परश्वो वा मन्ये प्रादुर्भविष्यति | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवमाख्यायमानं तु छन्नं सत्रेण पाण्डवम् | |
| वसन्तं तत्र नाज्ञासीद्विराटः पार्थमर्जुनम् | |
| ततः पार्थोऽभ्यनुज्ञातो विराटेन महात्मना | |
| प्रददौ तानि वासांसि विराटदुहितुः स्वयम् | |
| उत्तरा तु महार्हाणि विविधानि तनूनि च | |
| प्रतिगृह्याभवत्प्रीता तानि वासांसि भामिनी | |
| मन्त्रयित्वा तु कौन्तेय उत्तरेण रहस्तदा | |
| इतिकर्तव्यतां सर्वां राजन्यथ युधिष्ठिरे | |
| ततस्तथा तद्व्यदधाद्यथावत्पुरुषर्षभ | |
| सह पुत्रेण मत्स्यस्य प्रहृष्टो भरतर्षभः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततस्तृतीये दिवसे भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः | |
| स्नाताः शुक्लाम्बरधराः समये चरितव्रताः | |
| युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य सर्वाभरणभूषिताः | |
| अभिपद्मा यथा नागा भ्राजमाना महारथाः | |
| विराटस्य सभां गत्वा भूमिपालासनेष्वथ | |
| निषेदुः पावकप्रख्याः सर्वे धिष्ण्येष्विवाग्नयः | |
| तेषु तत्रोपविष्टेषु विराटः पृथिवीपतिः | |
| आजगाम सभां कर्तुं राजकार्याणि सर्वशः | |
| श्रीमतः पाण्डवान्दृष्ट्वा ज्वलतः पावकानिव | |
| अथ मत्स्योऽब्रवीत्कङ्कं देवरूपमवस्थितम् | |
| मरुद्गणैरुपासीनं त्रिदशानामिवेश्वरम् | |
| स किलाक्षातिवापस्त्वं सभास्तारो मया कृतः | |
| अथ राजासने कस्मादुपविष्टोऽस्यलंकृतः | |
| परिहासेप्सया वाक्यं विराटस्य निशम्य तत् | |
| स्मयमानोऽर्जुनो राजन्निदं वचनमब्रवीत् | |
| इन्द्रस्याप्यासनं राजन्नयमारोढुमर्हति | |
| ब्रह्मण्यः श्रुतवांस्त्यागी यज्ञशीलो दृढव्रतः | |
| अयं कुरूणामृषभः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| अस्य कीर्तिः स्थिता लोके सूर्यस्येवोद्यतः प्रभा | |
| संसरन्ति दिशः सर्वा यशसोऽस्य गभस्तयः | |
| उदितस्येव सूर्यस्य तेजसोऽनु गभस्तयः | |
| एनं दश सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् | |
| अन्वयुः पृष्ठतो राजन्यावदध्यावसत्कुरून् | |
| त्रिंशदेनं सहस्राणि रथाः काञ्चनमालिनः | |
| सदश्वैरुपसंपन्नाः पृष्ठतोऽनुययुः सदा | |
| एनमष्टशताः सूताः सुमृष्टमणिकुण्डलाः | |
| अस्तुवन्मागधैः सार्धं पुरा शक्रमिवर्षयः | |
| एनं नित्यमुपासन्त कुरवः किंकरा यथा | |
| सर्वे च राजन्राजानो धनेश्वरमिवामराः | |
| एष सर्वान्महीपालान्करमाहारयत्तदा | |
| वैश्यानिव महाराज विवशान्स्ववशानपि | |
| अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् | |
| उपजीवन्ति राजानमेनं सुचरितव्रतम् | |
| एष वृद्धाननाथांश्च व्यङ्गान्पङ्गूंश्च मानवान् | |
| पुत्रवत्पालयामास प्रजा धर्मेण चाभिभो | |
| एष धर्मे दमे चैव क्रोधे चापि यतव्रतः | |
| महाप्रसादो ब्रह्मण्यः सत्यवादी च पार्थिवः | |
| श्रीप्रतापेन चैतस्य तप्यते स सुयोधनः | |
| सगणः सह कर्णेन सौबलेनापि वा विभुः | |
| न शक्यन्ते ह्यस्य गुणाः प्रसंख्यातुं नरेश्वर | |
| एष धर्मपरो नित्यमानृशंस्यश्च पाण्डवः | |
| एवंयुक्तो महाराजः पाण्डवः पार्थिवर्षभः | |
| कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपतिः | |
| विराट उवाच | |
| यद्येष राजा कौरव्यः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| कतमोऽस्यार्जुनो भ्राता भीमश्च कतमो बली | |
| नकुलः सहदेवो वा द्रौपदी वा यशस्विनी | |
| यदा द्यूते जिताः पार्था न प्राज्ञायन्त ते क्वचित् | |
| अर्जुन उवाच | |
| य एष बल्लवो ब्रूते सूदस्तव नराधिप | |
| एष भीमो महाबाहुर्भीमवेगपराक्रमः | |
| एष क्रोधवशान्हत्वा पर्वते गन्धमादने | |
| सौगन्धिकानि दिव्यानि कृष्णार्थे समुपाहरत् | |
| गन्धर्व एष वै हन्ता कीचकानां दुरात्मनाम् | |
| व्याघ्रानृक्षान्वराहांश्च हतवान्स्त्रीपुरे तव | |
| यश्चासीदश्वबन्धस्ते नकुलोऽयं परंतपः | |
| गोसंख्यः सहदेवश्च माद्रीपुत्रौ महारथौ | |
| शृङ्गारवेषाभरणौ रूपवन्तौ यशस्विनौ | |
| नानारथसहस्राणां समर्थौ पुरुषर्षभौ | |
| एषा पद्मपलाशाक्षी सुमध्या चारुहासिनी | |
| सैरन्ध्री द्रौपदी राजन्यत्कृते कीचका हताः | |
| अर्जुनोऽहं महाराज व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः | |
| भीमादवरजः पार्थो यमाभ्यां चापि पूर्वजः | |
| उषिताः स्म महाराज सुखं तव निवेशने | |
| अज्ञातवासमुषिता गर्भवास इव प्रजाः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| यदार्जुनेन ते वीराः कथिताः पञ्च पाण्डवाः | |
| तदार्जुनस्य वैराटिः कथयामास विक्रमम् | |
| अयं स द्विषतां मध्ये मृगाणामिव केसरी | |
| अचरद्रथवृन्देषु निघ्नंस्तेषां वरान्वरान् | |
| अनेन विद्धो मातङ्गो महानेकेषुणा हतः | |
| हिरण्यकक्ष्यः संग्रामे दन्ताभ्यामगमन्महीम् | |
| अनेन विजिता गावो जिताश्च कुरवो युधि | |
| अस्य शङ्खप्रणादेन कर्णौ मे बधिरीकृतौ | |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मत्स्यराजः प्रतापवान् | |
| उत्तरं प्रत्युवाचेदमभिपन्नो युधिष्ठिरे | |
| प्रसादनं पाण्डवस्य प्राप्तकालं हि रोचये | |
| उत्तरां च प्रयच्छामि पार्थाय यदि ते मतम् | |
| उत्तर उवाच | |
| अर्च्याः पूज्याश्च मान्याश्च प्राप्तकालं च मे मतम् | |
| पूज्यन्तां पूजनार्हाश्च महाभागाश्च पाण्डवाः | |
| विराट उवाच | |
| अहं खल्वपि संग्रामे शत्रूणां वशमागतः | |
| मोक्षितो भीमसेनेन गावश्च विजितास्तथा | |
| एतेषां बाहुवीर्येण यदस्माकं जयो मृधे | |
| वयं सर्वे सहामात्याः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् | |
| प्रसादयामो भद्रं ते सानुजं पाण्डवर्षभम् | |
| यदस्माभिरजानद्भिः किंचिदुक्तो नराधिपः | |
| क्षन्तुमर्हति तत्सर्वं धर्मात्मा ह्येष पाण्डवः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| ततो विराटः परमाभितुष्टः; समेत्य राज्ञा समयं चकार | |
| राज्यं च सर्वं विससर्ज तस्मै; सदण्डकोशं सपुरं महात्मा | |
| पाण्डवांश्च ततः सर्वान्मत्स्यराजः प्रतापवान् | |
| धनंजयं पुरस्कृत्य दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रवीत् | |
| समुपाघ्राय मूर्धानं संश्लिष्य च पुनः पुनः | |
| युधिष्ठिरं च भीमं च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ | |
| नातृप्यद्दर्शने तेषां विराटो वाहिनीपतिः | |
| संप्रीयमाणो राजानं युधिष्ठिरमथाब्रवीत् | |
| दिष्ट्या भवन्तः संप्राप्ताः सर्वे कुशलिनो वनात् | |
| दिष्ट्या च पारितं कृच्छ्रमज्ञातं वै दुरात्मभिः | |
| इदं च राज्यं नः पार्था यच्चान्यद्वसु किंचन | |
| प्रतिगृह्णन्तु तत्सर्वं कौन्तेया अविशङ्कया | |
| उत्तरां प्रतिगृह्णातु सव्यसाची धनंजयः | |
| अयं ह्यौपयिको भर्ता तस्याः पुरुषसत्तमः | |
| एवमुक्तो धर्मराजः पार्थमैक्षद्धनंजयम् | |
| ईक्षितश्चार्जुनो भ्रात्रा मत्स्यं वचनमब्रवीत् | |
| प्रतिगृह्णाम्यहं राजन्स्नुषां दुहितरं तव | |
| युक्तश्चावां हि संबन्धो मत्स्यभारतसत्तमौ | |
| विराट उवाच | |
| किमर्थं पाण्डवश्रेष्ठ भार्यां दुहितरं मम | |
| प्रतिग्रहीतुं नेमां त्वं मया दत्तामिहेच्छसि | |
| अर्जुन उवाच | |
| अन्तःपुरेऽहमुषितः सदा पश्यन्सुतां तव | |
| रहस्यं च प्रकाशं च विश्वस्ता पितृवन्मयि | |
| प्रियो बहुमतश्चाहं नर्तको गीतकोविदः | |
| आचार्यवच्च मां नित्यं मन्यते दुहिता तव | |
| वयःस्थया तया राजन्सह संवत्सरोषितः | |
| अतिशङ्का भवेत्स्थाने तव लोकस्य चाभिभो | |
| तस्मान्निमन्त्रये त्वाहं दुहितुः पृथिवीपते | |
| शुद्धो जितेन्द्रियो दान्तस्तस्याः शुद्धिः कृता मया | |
| स्नुषाया दुहितुर्वापि पुत्रे चात्मनि वा पुनः | |
| अत्र शङ्कां न पश्यामि तेन शुद्धिर्भविष्यति | |
| अभिषङ्गादहं भीतो मिथ्याचारात्परंतप | |
| स्नुषार्थमुत्तरां राजन्प्रतिगृह्णामि ते सुताम् | |
| स्वस्रीयो वासुदेवस्य साक्षाद्देवशिशुर्यथा | |
| दयितश्चक्रहस्तस्य बाल एवास्त्रकोविदः | |
| अभिमन्युर्महाबाहुः पुत्रो मम विशां पते | |
| जामाता तव युक्तो वै भर्ता च दुहितुस्तव | |
| विराट उवाच | |
| उपपन्नं कुरुश्रेष्ठे कुन्तीपुत्रे धनंजये | |
| य एवं धर्मनित्यश्च जातज्ञानश्च पाण्डवः | |
| यत्कृत्यं मन्यसे पार्थ क्रियतां तदनन्तरम् | |
| सर्वे कामाः समृद्धा मे संबन्धी यस्य मेऽर्जुनः | |
| वैशंपायन उवाच | |
| एवं ब्रुवति राजेन्द्रे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| अन्वजानात्स संयोगं समये मत्स्यपार्थयोः | |
| ततो मित्रेषु सर्वेषु वासुदेवे च भारत | |
| प्रेषयामास कौन्तेयो विराटश्च महीपतिः | |
| ततस्त्रयोदशे वर्षे निवृत्ते पञ्च पाण्डवाः | |
| उपप्लव्ये विराटस्य समपद्यन्त सर्वशः | |
| तस्मिन्वसंश्च बीभत्सुरानिनाय जनार्दनम् | |
| आनर्तेभ्योऽपि दाशार्हानभिमन्युं च पाण्डवः | |
| काशिराजश्च शैब्यश्च प्रीयमाणौ युधिष्ठिरे | |
| अक्षौहिणीभ्यां सहितावागतौ पृथिवीपते | |
| अक्षौहिण्या च तेजस्वी यज्ञसेनो महाबलः | |
| द्रौपद्याश्च सुता वीराः शिखण्डी चापराजितः | |
| धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः सर्वशस्त्रभृतां वरः | |
| समस्ताक्षौहिणीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणाः | |
| सर्वे शस्त्रास्त्रसंपन्नाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः | |
| तानागतानभिप्रेक्ष्य मत्स्यो धर्मभृतां वरः | |
| प्रीतोऽभवद्दुहितरं दत्त्वा तामभिमन्यवे | |
| ततः प्रत्युपयातेषु पार्थिवेषु ततस्ततः | |
| तत्रागमद्वासुदेवो वनमाली हलायुधः | |
| कृतवर्मा च हार्दिक्यो युयुधानश्च सात्यकिः | |
| अनाधृष्टिस्तथाक्रूरः साम्बो निशठ एव च | |
| अभिमन्युमुपादाय सह मात्रा परंतपाः | |
| इन्द्रसेनादयश्चैव रथैस्तैः सुसमाहितैः | |
| आययुः सहिताः सर्वे परिसंवत्सरोषिताः | |
| दश नागसहस्राणि हयानां च शतायुतम् | |
| रथानामर्बुदं पूर्णं निखर्वं च पदातिनाम् | |
| वृष्ण्यन्धकाश्च बहवो भोजाश्च परमौजसः | |
| अन्वयुर्वृष्णिशार्दूलं वासुदेवं महाद्युतिम् | |
| पारिबर्हं ददौ कृष्णः पाण्डवानां महात्मनाम् | |
| स्त्रियो रत्नानि वासांसि पृथक्पृथगनेकशः | |
| ततो विवाहो विधिवद्ववृते मत्स्यपार्थयोः | |
| ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च गोमुखाडम्बरास्तथा | |
| पार्थैः संयुज्यमानस्य नेदुर्मत्स्यस्य वेश्मनि | |
| उच्चावचान्मृगाञ्जघ्नुर्मेध्यांश्च शतशः पशून् | |
| सुरामैरेयपानानि प्रभूतान्यभ्यहारयन् | |
| गायनाख्यानशीलाश्च नटा वैतालिकास्तथा | |
| स्तुवन्तस्तानुपातिष्ठन्सूताश्च सह मागधैः | |
| सुदेष्णां च पुरस्कृत्य मत्स्यानां च वरस्त्रियः | |
| आजग्मुश्चारुसर्वाङ्ग्यः सुमृष्टमणिकुण्डलाः | |
| वर्णोपपन्नास्ता नार्यो रूपवत्यः स्वलंकृताः | |
| सर्वाश्चाभ्यभवत्कृष्णा रूपेण यशसा श्रिया | |
| परिवार्योत्तरां तास्तु राजपुत्रीमलंकृताम् | |
| सुतामिव महेन्द्रस्य पुरस्कृत्योपतस्थिरे | |
| तां प्रत्यगृह्णात्कौन्तेयः सुतस्यार्थे धनंजयः | |
| सौभद्रस्यानवद्याङ्गीं विराटतनयां तदा | |
| तत्रातिष्ठन्महाराजो रूपमिन्द्रस्य धारयन् | |
| स्नुषां तां प्रतिजग्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| प्रतिगृह्य च तां पार्थः पुरस्कृत्य जनार्दनम् | |
| विवाहं कारयामास सौभद्रस्य महात्मनः | |
| तस्मै सप्त सहस्राणि हयानां वातरंहसाम् | |
| द्वे च नागशते मुख्ये प्रादाद्बहु धनं तदा | |
| कृते विवाहे तु तदा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः | |
| ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं यदुपाहरदच्युतः | |
| गोसहस्राणि रत्नानि वस्त्राणि विविधानि च | |
| भूषणानि च मुख्यानि यानानि शयनानि च | |
| तन्महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनावृतम् | |
| नगरं मत्स्यराजस्य शुशुभे भरतर्षभ | |