diff --git "a/metadata.csv" "b/metadata.csv" --- "a/metadata.csv" +++ "b/metadata.csv" @@ -1,4 +1,4 @@ -audio_file|transcript|speaker|language +audio_file|transcript|speaker|language audio/indic_hi_male_1_00001.wav|प्रसिद्द कबीर अध्येता, पुरुषोत्तम अग्रवाल का यह शोध आलेख, उस रामानंद की खोज करता है|indic_hi_male_1|hi audio/indic_hi_male_1_00002.wav|किन्तु आधुनिक पांडित्य, न सिर्फ़ एक ब्राह्मण रामानंद के, एक जुलाहे कबीर का गुरु होने से, बल्कि दोनों के समकालीन होने से भी, इनकार करता है|indic_hi_male_1|hi audio/indic_hi_male_1_00003.wav|उस पर, इन चार कवियों का गहरा असर है|indic_hi_male_1|hi @@ -9,3 +9,993 @@ audio/indic_hi_male_1_00007.wav|दूसरी तरफ़, साक्षा audio/indic_hi_male_1_00008.wav|उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, भारतीय संगीत ही नहीं, समूचे कला संसार में, एक विलक्षण उपस्थिति रहे|indic_hi_male_1|hi audio/indic_hi_male_1_00009.wav|अपने व्यक्तित्व, और वाद, दोनों से वे, शास्त्रीय संगीत में, एक नए टाईप थे|indic_hi_male_1|hi audio/indic_hi_male_1_00010.wav|उन पर दो हिन्दी कवियों का गद, इस फ़ीचर में शामिल है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00011.wav|यतीन्द्र मिश्र का, सुर की बारादरी, इस नाम से, पेंग्विन यात्रा से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक से लिया गया है, जो उनकी कला, स्थानीय परम्परा, उनके व्यक्तित्व को एक साथ पढ़ती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00012.wav|उस्ताद को, ट्रिब्यूट की तरह, लिखा गया, व्योमेश शुक्ल का गद्य, उनकी कला को, सांस्कृतिक राजनीति के, प्रतिरोध के, संकेतों की तरह देखता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00013.wav|इस अंक से हम, एक नया खंड उन कला रूपों पर आरंभ कर रहे हैं, जिन्हें लोक प्रिय, या पॉपुलर कहा जाता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00014.wav|बस इतना पता है, कि उस ज़माने में, एशिया, यूरोप, अफ़्रीका, और शायद अमेरिका महाद्वीप भी, आपस में जुड़े हुए थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00015.wav|यूरोप का बायाँ हिस्सा, अफ़्रीका के दाहिने में, और आस्ट्रेलिया का ऊपरी पश्चिमी किनारा, आज के तमिलनाडु के बगल में था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00016.wav|मतलब कि, यू एन ओ जो सपना हमारे भविष्य के लिए देखता है, वो हमारे इतिहास में, पहले ही पूरा हो चुका है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00017.wav|मतलब कि, भाषा एक एक्शन नहीं, प्रकृति को देखकर दिया गया, हमारा रिएक्शन मात्र है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00018.wav|सूरज को देखकर, हर प्रजाति के मनुष्य के मुँह से, रा ही निकला|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00019.wav|इसलिए, मिस्र में भी, सूर्य भगवान, रा हैं, और सिंधु के इस पार भी, सूर्यवंशी भगवान का नाम, राम है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00020.wav|उसमें कहा गया है कि, एक ज़माना था, जब पूरी दुनिया, बाबिलू नाम के एक शहर में बसती थी, और एक ही भाषा बोलती थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00021.wav|इस शहर के लोगों ने, एक बार, एक बड़ी सी मीनार बनाने की कोशिश की, इतनी ऊँची, कि जिस पे चढ़ के, इंसान भगवान के पास पहुँच जाए|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00022.wav|उसके दोस्त, प्रेमिकाएँ, और रिश्तेदार, उसे इसी नाम से बुलाते थे, और वो भी, अक्सर समझ जाता था, कि क्वैं, उसी को संबोधित है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00023.wav|क्वैं की उम्र, करीबन अठारह साल रही होगी, यानि कि, वो नवकिशोर था, आज का टीनेजर|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00024.wav|शिकार करना अनिवार्य था, लेकिन इस मामले मे, क्वैं, थोडा कमज़ोर था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00025.wav|उसे, जंगली जान वरों से डर लगता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00026.wav|मतलब कि, क्वैं सिर्फ़ मछलियाँ पकड कर, बहुत दिन चैन से नहीं रह सकता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00027.wav|उसके अंदर, जाने कहाँ से, एक अजीब सा गुस्सा पनपने लगा था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00028.wav|कबीले में भी झगड़े बढ़ने लगे, और क्वैं के मूक समर्थक, यानि कि, कबीले के बड़े लोग भी, अब धीरे धीरे, उससे कटने लगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00029.wav|वो रात को देर तक जागता, झाड़ियों की आवाज़ में, नए नए स्वर सुनता, और उन्हें जोड़कर, कुछ बनाने की कोशिश करता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00030.wav|पर झाड़ियों से आई एक आवाज़, दुबारा नहीं आती, हर बार, नई तरह का स्वर निकलता, और क्वैं उन्हें याद करते करते, जोड़ते जोड़ते परेशान हो जाता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00031.wav|जिन दिनों बारिश होती, क्वैं की ये उलझन, और बढ़ जाती|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00032.wav|इसलिए अब वो, दिन भर आवाज़ें इकठ्ठी करता फिरता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00033.wav|जहाँ भी कोई नई ध्वनि सुनता, तुरंत उसे दोहराता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00034.wav|नदी किनारे, दो काले गोल पत्थर थे, जो एक दूसरे से रगड़कर, वही आवाज़ दे रहे थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00035.wav|क्वैं बड़ी देर तक वहाँ बैठा, उनको र गड़ता रहा, उसके सामने एक खज़ाना खुल गया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00036.wav|पत्थरों में वो आवाज़ें कैद थीं, जिन्हें वो, दुनिया भर में ढूँढता फिरता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00037.wav|अब, क्वैं का दिन, दो हिस्सों में बँट गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00038.wav|इसके बाद वो, आज की आवाज़ वाले पत्थरों को, अलग अलग गुच्छों में बाँधता, और उन्हें अपने कँधे पर लटका लेता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00039.wav|कई दिन तो ऐसा होता, कि शाम को, कबीले की ओर लौटते वक़्त, उसके पास, पत्थरों के, पचास से ज़्यादा समूह होते|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00040.wav|कुछ लोगों को तो डर था, कि क्वैं, किसी काले देवता की आराधना करता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00041.wav|इस बीच, क्वैं ने अपने कबीले वालों के साथ, खाना बिल्कुल ही बंद कर दिया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00042.wav|अब वो कच्ची मछली, और फलों पर ही ज़िंदा रहता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00043.wav|महीने बीतते गए, और क्वैं का पत्थरों वाला खज़ाना, बड़ा होता गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00044.wav|खूँ बेढंग से उन्हें बजाता, और अजीब सी आवाज़ सुनकर, खूब हँसता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00045.wav|कभी कभी, क्वैं गुस्से में पत्थर उठाकर, फेंक भी देता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00046.wav|ऐसे ही एक झगड़े में, एक दिन, क्वैं ने खूँ को मार डाला|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00047.wav|गुस्से में आकर उसने, ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना शुरु कर दिया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00048.wav|खूँ का गुस्सा, अभी भी हरा था, और वो फिर से, क्वैं पे ही झपट पड़ा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00049.wav|लेकिन इस बार, क्वैं के हाथ में, वो बारिश वाले पत्थर थे, काले गोल पत्थर, जो टप टप करते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00050.wav|खूँ के नज़दीक आते ही, ये पूरी ताकत से, उसके माथे पर जा पड़े|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00051.wav|शायद, एक ही वार में खूँ, अंधा हो गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00052.wav|उसके बाद क्वैं ने, नुकीले पत्थर उठा कर, खूँ की एक एक नस काट डाली|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00053.wav|तीन कबीलेवाले, बीच में आए, लेकिन वो भी मारे गए|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00054.wav|सुबह होते होते पूरा कबीला खाली हो गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00055.wav|मान लिया गया, कि क्वैं, सचमुच, रात की ही आराधना करता हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00056.wav|उसके अंदर कोई काली शक्ति आ गई, जो पूरे कबीले को खाने पे आमादा थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00057.wav|जिन पत्थरों पे खून लग गया था, उन्हें वो, डैन्यूब में धो लाया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00058.wav|कबीले में अब अजीब सी शांति थी, सिर्फ़ क्वैं और उसके पत्थर ही बोलते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00059.wav|पर उसे ऐसे ही अच्छा लगता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00060.wav|उन्होंने, अपनी राग अदायगी में, जिस एक चीज़ पर सर्वाधिक मेहनत की है, वह उनका मींड़ का काम है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00061.wav|प्रसिद्ध संगीत विद्वान, चेतन करनानी लिखते हैं, बिस्मिल्ला खान की कला की सबसे बड़ी खूबी यह है, कि उनके ध्वनि विन्यास की शुद्धता, उत्तेजना जगाती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00062.wav|उनकी सांगीतिक प्रतिभा, अप्रतिम है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00063.wav|वे, राग का विस्तार करने, उसकी संरचना के ब्यौरों को उभारने में, हमेशा बेहद सधे हुए, और जागरूक रहे हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00064.wav|बिस्मिल्ला खान की मींड़, जो उनकी वादन कला का सबसे सशक्त पक्ष बन गयी है, देखने लायक है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00065.wav|वादन के समय, मींड़ लेते वक्त, वे सुरों में जो मोड़, घुमाव, और दैवीय स्पर्श महसूस कराते हैं, वह सुनने वाले को अपूर्व अ���ुभव देता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00066.wav|लगता है कि, बिस्मिल्ला खान, मींड़ लेते वक्त, शहनाई नहीं बजा रहे, बल्कि शरीर के किसी घाव पर, मरहम कर रहे हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00067.wav|शहनाई में मींड़ भरने की यह दिव्यता, उनकी कला यात्रा का सबसे प्रमुख बिन्दु बन गयी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00068.wav|शहनाई में मींड़ के काम पर चेतन करनानी की यह बात, बिस्मिल्ला खान के उस घनघोर रियाज़ की ओर इशारा करती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00069.wav|यदि एक सुर का कोई कण सही पकड़ में आ गया, तो समझो कि, सारा संगीत, तुम्हारी फूँक में उतर आयेगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00070.wav|सा, और रे का फ़र्क करने की तमीज़, उन्हें मींड़ को बरतने के व्याकरण के सन्दर्भ में ही, बचपन से सिखायी गयी थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00071.wav|संगीत के व्या करण का अनुशासन मिला हुआ है, और पूरब की लोक लय व देसी धुनें, शहनाई के प्याले में आकर, ठहर गयी हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00072.wav|वह इसी बात की ओर बार बार इशारा करती हैं, कि संगीत के मींड़, व तान की तरह ही, उनके जीवन में कला और रस, एक सुर से दूसरे सुर तक, बिना टूटे हुए पहुँचे हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00073.wav|वे एक साधारण इन्सान हैं, जिनके भीतर, आपको अनायास ही, सहज मानवीयता के दर्शन होते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00074.wav|ये खान साहब, कोई दूसरे हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00075.wav|उनसे मिलना, मोमिन के उस शेर से मिलना है, जहाँ वे यह दर्ज करते हैं, तुम मेरे पास होते हो, जब कोई दूसरा नहीं होता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00076.wav|यह कोई दूसरा न होने जैसा व्यक्ति, एक उस्ताद हैं, जो प्रेम में पगे हुए हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00077.wav|उन्हें काशी से, बेपनाह मुहब्बत है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00078.wav|वे शहनाई को, अपनी प्रस्तुति का एक वाद्य यन्त्र नहीं मानते, बल्कि, उसे सखी, और महबूबा कहते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00079.wav|अपनी पत्नी के गुजर जाने के बाद से, उनकी यह महबूबा ही, उनके सिरहाने बिस्तर पर, साथ सोती है, और अपने प्रेमी को दो एक क्षण, खुद की खुशी, बटोरने का बहाना देती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00080.wav|वे आज भी, बचपन में कचौड़ी खिलाने वाली, कुलसुम को, पूरी व्यग्रता से याद करते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00081.wav|अपने बड़े भाई, शम्सुद्दीन का जब भी ज़िक्र करते हैं, भीतर का जज़्बात, दोनों आँखों की कोरों में, पानी बनकर ठहर जाता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00082.wav|हड़हा सराय से अलग वे कहीं जाना नहीं चाहते, फिर वो लाहौर हो, या लन्दन, कोई फ़र्क नहीं पड़ता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00083.wav|अपने भरे पूरे कुनबे के साथ रहन��, और पाँचों वक्त की नमाज़ में संगीत की शुद्धता को मिला देना, उन्हें बखूबी आता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00084.wav|गंगा के पानी के लिये, उनकी श्रद्धा देखते बनती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00085.wav|देश में, जब भी कोई फ़साद होता है, तो हर एक से उस्ताद कहने लगते हैं, कि भैया, गंगा के पानी को छू लो, और सुरीले बन जाओ, फिर लड़ नहीं पाओगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00086.wav|वे प्रेम को इतने नज़दीक से महसूस करते हैं, कि प्रेम का वितान रचने वाले, रागों के पीछे पगलाये से घूमते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00087.wav|अपने कमरे में जब बैठते हैं, तब ऊपर आसमान की ओर ताकना, उनकी फ़ितरत में शामिल है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00088.wav|लगता है, उनकी शहनाई के सात, सुरों ने ही, ऊपर सात आसमान रचा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00089.wav|खुदा और सुर, संगीत और अज़ान, जैसे उनके शरीर का पानी, और रूह है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00090.wav|उनका पूरा शरीर, और व्यक्तित्व ही, जैसे लय का बागीचा है, जिसे उन्होंने, ढेरों घरानों से, अच्छे अच्छे फूल तोड़कर, सजाया हुआ है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00091.wav|इस बागीचे में आप शुरू से अन्त तक घूम आइये, तो दुनिया भर की सुन्दर चीज़ों के साथ, एक अनन्यता महसूस करेंगें|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00092.wav|कुल मिलाकर, किस्सा कोताह, यह कि, बिस्मिल्ला खान, सिर्फ़ एक कलाकार नहीं हैं, वह मानवीय गरिमा की सबसे सरलतम अभि व्यक्ति हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00093.wav|उनके साथ होने में, हमें अपने को, थोड़ा बड़ा करने में, मदद मिलती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00094.wav|आधा गाँव उपन्यास की पहली पंक्ति है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00095.wav|गाज़ीपुर के पुराने क़िले में, अब एक स्कूल है, जहां, गंगा की लहरों की आवाज़ तो आती है, लेकिन, इतिहास के गुनगुनाने, या ठंडी सांसें, लेने की आवाज़, नहीं आती|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00096.wav|अजीब सी पंक्ति नहीं है, गंगा की लहरें, जितनी मूर्त और यथार्थ हैं, इतिहास, उतना ही अमूर्त|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00097.wav|गंगा की लहरों का क्या कोई इतिहास नहीं, बिलाशक है, राही मासूम रज़ा, तीसरी ही पंक्ति में बता देते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00098.wav|गंदले पानी की इन महान धाराओं को, न जाने, कितनी कहानियाँ याद होंगी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00099.wav|इस्लाम और अन्य किसी भी धार्मिक अस्मिता के संदर्भ में, यह देखा जा सकता है कि, वे इलाकाई आधार पर बदलती रहती हैं, और दूसरे, उनके भीतर के कई द्वंद देखे जा सकते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00100.wav|राष्ट्रवाद सामुदायिक पहचान की तलाश में, आसानी से धर्म की ओर मुड़ता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00101.wav|राही मासूम रज़ा, उस सांस्कृतिक पहचान को तलाशने का प्रयास करते हैं, जो ज़मीन से उपजी है, धर्म से नहीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00102.wav|लौंडा ठिठोली और हँसी कर रहा था, तो फुन्नन मियाँ ने उठकर, एक ऐसा तमाचा मारा, कि उस्ताद जी के बायें की गमक दब गई|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00103.wav|महफ़िल में सन्नाटा छा गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00104.wav|तब फुन्नन मियाँ, शांति से कहते हैं, वह गालिब की गज़ल गा रही थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00105.wav|इसके बाद, खान साहब को, लाख समझाया जाता है, कि फुन्नन मियाँ का थप्पड, उस लौंडे के मुँह पर नहीं पडा था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00106.wav|शायद उसे, गांधी जी से अधिक, इस टोपी की ज़रूरत थी, जिसकी वजह से, सरकारी लोग, उससे डरने लगे थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00107.wav|वह कोई काम नहीं करता था, और आराम से था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00108.wav|पहले, वह दिन रात काम किया करता था, और बेआराम था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00109.wav|अब वह, एक लीडर था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00110.wav|गंगौली में तो, कभी कोई अंग्रेज़ देखा नहीं गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00111.wav|वहाँ जब, राष्ट्रवादी आन्दोलन की लहर आई, तो लोग, आज़ादी के ख़याल से नहीं, अपने अपने, और बहुत वाजिब कारणों से उससे जुड़े|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00112.wav|भारत छोडो आन्दोलन के आसपास भीड़, थाने को घेर लेती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00113.wav|इस मज़मे में, ऐसे लोग कम थे, जिन्हें, हिन्दुस्तान छोड़ दो के नारे की खबर रही हो|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00114.wav|उनमें, ऐसे लोग भी नहीं थे, जिन्हें, आज़ादी का महफ़ूम पता हो|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00115.wav|गोदान, छत्तीस में आया था, लेकिन, चूंकि रायसाहब, कांग्रेस की मेम्बरी में, जेल भी हो आए थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00116.wav|इसलिए, सैंतालीस के बाद भी, उनकी रियासत, बदले रूप में चलती रही होगी, ऐसा हम मान सकतें हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00117.wav|फुन्नन मियाँ, इसे झेल नहीं पाते, और बीच तकरीर में, खड़े हो जाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00118.wav|उनकी वह गूँजती आवाज़, इस उपन्यास से बाहर निकलकर आती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00119.wav|फुन्नन मियाँ का लड़का, बहादुरी से लड़ते लड़ते हुए, काम आ गया, तो इसमें कौन सी ताज्जुब की बात है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00120.wav|गुलज़ार की स्मृति दंश की यह कविताएँ, दरअसल, उनकी भाषा में, भरोसा करने की वजह से ही, लिखी गयी हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00121.wav|वे चाहते तो, आसानी से, ढेरों कविताओं को, किसी फ़िल्म की पटकथा की शक्ल देकर, चित्रित कर सकते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00122.wav|इस बात से, गुलज़ार का कहानीकार भी, गहराई से भी��ा हुआ है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00123.wav|उनकी गज़लें भी, इस बात से, अछूती नहीं हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00124.wav|कुछ गज़लों की पंक्तियाँ, इसी सन्दर्भ में, ध्यान देने योग्य हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00125.wav|वे अपने आरम्भिक जीवन की, नितान्त सहज, और आत्मीय चीज़ों को, शायरी के परिवार का सदस्य बनाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00126.wav|यह सब मिलकर, गुलज़ार की कविता, और शायरी का, आनन्दलोक गढ़ती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00127.wav|इन बिम्बों के द्वारा, वे बेहद मामूली सी लगती बात में भी, जीवन का एक बड़ा फ़ल सफ़ा दर्ज करते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00128.wav|इस अर्थ में वे, हिन्दी और उर्दू की, मिलनभूमि पर खड़े हुए, अकेले ऐसे लोकधर्मी शायर हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00129.wav|एक अनूठे ढंग की रूमानियत, और बेगानेपन के मिश्रण के बावजूद, गुलज़ार की कविताएँ, साधारण आदमी के संवाद में, अपनी पहचान ढूँढ़ती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00130.wav|एक हद तक, हम यह आसानी से कह सकते हैं कि, निहायत साधारण जीवन जीने वाले समाज की चौखट पर जाकर, गुलज़ार की कविता, अपना शिखर पाती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00131.wav|यह अपनत्व, और उत्कर्ष, गुलज़ार की पूरी ज़िदगी, और उनके अनेक अन्य कार्यों में, आसानी से, लक्षित हो जा सकती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00132.wav|यह सारे तथ्य मिलकर, गुलज़ार की कविता का, ऐसा करिश्माई स्थापत्य रचते हैं, जिसका कोई दूसरा विकल्प, जल्दी ढूँढ़े नहीं मिलता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00133.wav|तो कभी बनारस में, गंगा की घाट पर, कबीरी ठाठ ओढ़े हुए, नज़र आती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00134.wav|कभी ये नज़्में, सूफ़ी कवियों की बिरादरी में, बैठे हुए, उदासी का रंग ढूँढती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00135.wav|गुलज़ार की कविता की कई परतें हैं, और उन परतों के बीच में, जीवन, और उसकी विसंगतियों की अनगिनत रंगते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00136.wav|हम इन नज़्मों की परतों को, एक एक कर, अलग करते चलते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00137.wav|इस शायर का अपना फ़ल सफ़ा, पूरी रूमानियत, और जज़्बात के साथ खिलता जाता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00138.wav|अनगिनत नज़्मों, कविताओं, और ग़ज़लों की दुनिया है, गुलज़ार के यहाँ, जो अपना सूफ़ियाना रंग लिये हुए, शायर का जीवन दर्शन, व्यक्त करती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00139.wav|इस अभिव्यक्ति में जहाँ, एक ओर हमें, कवि के अन्तर्मन की महीन बुनावट की जानकारी मिलती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00140.wav|वहां दूसरी ओर, सूफ़ियाना रंगत लिये हुए, लगभग, निर्गुण कवियों की बोली बानी के करीब पहुँचने वाली, उनकी आवाज़, या कविता का स्थायी फक्कड़ स्वभाव, हमें एकबारगी उदासी में, तब्दील होता हुआ, नज़र आता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00141.wav|इन नज़्मों की सबसे बड़ी ताकत बनकर, हमारे सामने आता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00142.wav|ज़ाहिर है, इस तरह की कविता में, दुख, और उदासी, उस तरह से अपना आश्रय पाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00143.wav|जिस तरह, निर्गुण पदों, और सूफ़ियाना कलामों में, प्रेम, व आत्मीय क्षण, पीड़ा का रूप धरकर, अपनी परिभाषा गढ़ते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00144.wav|यह अकारण नहीं है, कि गुलज़ार के लिखे, फ़िल्म गीत भी, इसी कारण, अपना संवेदात्मक उत्कर्ष, गहरी मार्मिकता में पाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00145.wav|एक दो गीतों के उदाहरण से, यह मार्मिकता, समझी जा सकती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00146.wav|एक हद तक, काव्य रूढ़ि की तरह, जिस साहित्यशास्त्र में, हम मोटिफ़ के तौर पर, जानते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00147.wav|वह चाँद की उपस्थिति है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00148.wav|वह अकेले में ही कभी, पूरा का पूरा दृश्य बनता है, या किसी नज़्म में, अपने प्रवेश के साथ, सारी दृश्यावली को, एक विशिष्ट किस्म का, गुलज़ारटैप बना देता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00149.wav|एक तरह से चाँद, उनका सर्वप्रिय प्रत्यय है, जिस पर, वे अपने से भी ज़्यादा भरोसा करते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00150.wav|इस बिम्ब को लेकर, उनका आग्रह इतना गाढ़ा, और मुखर है, कि एकाक, यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है, कि बाकी के अन्य सारे प्राकृतिक बिम्ब, उनके शायर के लिए, कुछ कम महत्त्व के हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00151.wav|हालाँकि, यह गुलज़ार ही हैं, जिनके यहाँ, सर्वाधिक प्राकृतिक प्रतीकों की, भरमार रही है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00152.wav|फिर वह, सूरज, तारे, पहाड़, बारिश, पतझड़, दिन रात, शाम, नदी, बर्फ़, समुद्र, धुंध, हवा, कुछ भी हो सकती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00153.wav|मगर, चाँद शायद अकेला ही ऐसा, वज़नी, व अर्थवान प्रतीक है, जो उनके साहित्य के रसायन को, और गाढ़ा बनाता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00154.wav|आप उनकी ग़ज़लें लें, या कोई कविता, किसी गीत को टटोलें, या त्रिवेणियों की छोटी छोटी सार्थक उपस्थितियाँ, सभी जगह, चन्द्रमा पर आस्था, गहरायी ही है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00155.wav|गुलज़ार का, बुखार की हद तक पहुँचा हुआ, यह चाँद प्रेम, उनके फ़िल्मी गीतों में भी, कुछ बहुत नये ढंग के दृश्य ले आया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00156.wav|जैसे, बिम्ब और प्रतीकों, खासकर, प्राकृतिक रूपकों से सादृश्य रचने में, महारत पाये हुए गुलज़ार के यहाँ, एक अजीब बात|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00157.wav|एक तरीके से, रूढ़िगत अर्थों में, गुलज़ार ऐसे क्षण, उर्दू शायरी की उसी परम्परा का अनुगमन करते, नज़र आते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00158.wav|हज़ार सालों से, अनगिनत नज़्में, अपने दर्द व तड़प को, तफ़सील से बयाँ करने में, लिखी गयी हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00159.wav|ज़ाहिर है, उदासी का यह आलम, कविता में ऐश्वर्य, और चकाचौंध रचने की जगह, संवेदना और करुणा से, धार पैदा करता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00160.wav|गुलज़ार के रचना कर्म में, विशेषकर उनकी कविता, और गज़लों के सन्दर्भ में, प्रेम, बहुत गरिमा के साथ, प्रतिष्ठित हुआ है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00161.wav|उनके स्वभाव में जो एक अजीब सा बेगानापन है, संकोच का ठहरा हुआ सा पर्दा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00162.wav|यह जानना, दिलचस्प है कि, सूफ़ी कविता, व सूफ़ी संगीत में भी, प्रेम की उपस्थिति लगभग, एक सत्य के रूप में, उजागर होती रही है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00163.wav|फिर बात जब गुलज़ार की हो रही हो, जो स्वयं अपनी अभिव्यक्ति की सहज छायाएँ, बाबा फ़रीद, कुतुब कुलीशाह, शम्स तबरेज़ी, एवं नानक में ढूँढते हों|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00164.wav|खुद की लिखी नज़मों में, प्रेम का इतना बड़ा वितान रचते हैं, जो अन्यत्र, मुश्किल से मिलता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00165.wav|प्रेम में, उस अनसुनी आवाज़ को, जो बोलना नहीं जानती, गुलज़ार, बखूबी सुन पाये हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00166.wav|यह, उनके किरदार की, सबसे बड़ी कैफ़ियत है, कि वे प्रेम में, इन अलक्षित अन्तरालों को, बड़ी शिद्दत से पहचानते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00167.wav|वरिष्ठ लेखिका, अमृता प्रीतम ने, उनके इसी पक्ष को, बहुत सुन्दर ढंग से पकड़ा, और कहा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00168.wav|गुलज़ार, एक बहुत प्यारे शायर हैं, जो अक्षरों के अन्तराल में बसी हुई, ख़ामोशी की अज़मत को जानते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00169.wav|एक ऐसी ख़ामोशी, जो अक्षरों को पाकर भी, बोलना नहीं जानती|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00170.wav|इसी ख़ामोशी को, साधने के जतन में, उम्र भर लगे रहे गुलज़ार, शायद इन्हीं वजहों से, प्रेम की स्थापना में, उन अन्धेरे दायरों की ओर भी, चले गये हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00171.wav|जहाँ सिर्फ़, एहसास की रोशनी से, उजाला किया जाता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00172.wav|वे प्रेम को अपनी कविता में, इतनी पूर्णता बख़्शते हैं, कि उनके लिए फिर यह बात आसान हो जाती है, किस तरह, कायनात और सय्यारों में भटकते हुए, किसी रूह में उतरा जाये|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00173.wav|यह सिद्धस्तता, गुलज़ार की गज़लों का, एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00174.wav|उन्होंने इतने दशकों में, फैले अपने समृद्ध रचनात्मक जीवन में, ढेरों ऐसे सृजन के क्षण जुटाये हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00175.wav|जहाँ प्रेम, कई कई कोणों से, परखा, व सँवारा गया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00176.wav|उन्होंने अपना फ़िल्मी कॅरियर, प्रेम गीत को लिखकर शुरू किया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00177.wav|वह, विशुद्ध प्रेम में डूबा हुआ गीत था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00178.wav|बन्दिनी का वह प्रसिद्ध गाना, नायिका कल्याणी के झिझक, और उसकी मनोदशा का, मनोहारी चित्रण था, कि कैसे वह अपने प्रेम में भीगी हुई, चाँदनी रात को, घर के आँगन से बाहर पाँव रख देती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00179.wav|वह बरसों बीत जाने के बाद भी, आज उतनी ही नज़ाकत, और बेचैनी के साथ, उनकी रचनात्मक यात्रा में मौजूद है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00180.wav|गुलज़ार की कविता में प्रेम, विरह, उदासी, और सब कुछ गँवा कर, सामान्य बने रहने की फ़ितरत, इतनी सहजता के साथ दर्ज हुई है कि, जानकर हैरत होती है, कि किस तरह कोई शायर, इतनी सामान्य सी जमापूँजी पर, सृजन का इतना बड़ा मायालोक, रच सकता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00181.wav|प्रेम से बिल्कुल अलग, मृत्यु भी, अपने में ऐसा, विशिष्ट, और विचार भरा शब्द है, जो, गुलज़ार के यहाँ, पूरी शिद्दत से, अपनी उपस्थिति को, व्यंजित करता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00182.wav|वे, अपने जीवन संघर्ष में, इतना तपे हुए हैं, कि मृत्यु जैसे पड़ाव को भी, बहुत उदारता से कविता में बरतते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00183.wav|उनके जीवन से निकले हुए, तमाम संघर्ष के क्षण, इस बात को व्यक्त करने में, ज़रा भी नहीं चूकते, कि किस तरह, मृत्यु को हराकर, एक मनुष्य, अपने लिए, टतस्थ किस्म की दृढ़ता, अर्जित करता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00184.wav|मृत्यु के रूपक को गौरव दिलाने वाली, कुछ पंक्तियाँ, यहाँ इसी बात की नुमाइंदगी के लिए, पढ़ी जा सकती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00185.wav|यह आलेख, वाणी प्रकाशन द्वारा, साल के आखिर तक, यतींद्र मिश्र के संपादन में प्रकाश्य, नज़्मों के दीवान, यार जुलाहे की भूमिका का, संक्षिप्त रूप है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00186.wav|किस्सा, एक नाकाम संपादकीय मंसूबे का|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00187.wav|आन येदरलुण्ड की कविता ने, समकालीन स्वीडिश कविता को, अपने काव्य उद्यम से, प्रतिकृत, और समृद्ध किया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00188.wav|वागीश शुक्ल पिछले कई वर्षों से, एक उपन्यास लिख रहे हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00189.wav|पिछले अंक में, सुधीर चंद्र ने, अपने आलेख में, बौद्धिक उत्तरजीवन को, विष��� बनाया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00190.wav|इस बार, हिन्दी कवि और समाज विज्ञानी, बद्री नारायण, इसी क्रांति में, दलित जातियों के योगदान के विषय में बात कर रहे है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00191.wav|पैंतीस बरस पुराने, इस संवाद के अंश उपलब्ध कराने के लिए, हम, कवि कथाकार, अनिरुद्ध उमट के कृतज्ञ हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00192.wav|कृष्ण बलदेव वैद की, सात हिन्दी कहानियाँ, जिन्हें शायद, एक कहानी भी कहा जा सकता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00193.wav|स्वीड कविता में, आधुनिकतावाद का सोता लगभग, एक शताब्दी पूर्व, एक अकेली कवि, एडिथ स्यदरग्रान की कृतियों से फूट पड़ा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00194.wav|अपनी कुछ ही किताबों से, स्यदरग्रान ने, सन्निष्ठा, और मोहभंग के, आधुनिक अनुभव हेतु, एक नयी काव्य भाषा आविष्कृत की|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00195.wav|यह भाषा, निडर रूप से, रूपकात्मक, रतिमयी, आध्यात्मिक, एवं दृष्टा भाषा थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00196.wav|पहले पहल तो, पुरुषों द्वारा रची हुई, साहित्यिक सत्ता ने, इस कविता का मज़ाक उड़ाया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00197.wav|लेकिन, एडिथ की कविता, उसके समकालीन पाठकों के लिए, प्रायः, एक बौद्धिक चुनौती लेकर उपस्थित हुई, और अभी तक, कवियों और विद्वानों की गहन जिज्ञासा का, विषय बनी हुई है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00198.wav|एडिथ की कविता ने, स्कान्दिनेविया के साहित्य को, काफ़ी हद तक प्रभावित किया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00199.wav|इस प्रक्रिया का ठीक ठीक जायज़ा नहीं लगाया जा सकता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00200.wav|लेकिन आठवें दशक में, एक अनपेक्षित बदलाव पैदा हुआ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00201.wav|साहित्यिक परिदृश्य में, भाषा और काव्य रूप की एक बिलकुल अलग अवधारणा लिये, कुछ स्त्री कविताओ का प्रवेश हुआ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00202.wav|जिन्होंने, हमारे देश में, लिखी जा रही कविता की दृष्टि, और अस्मिता पर, बड़ा गेहरा प्रभाव छोड़ा, और उसे, प्रायः बदल ही डाला|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00203.wav|उनकी कविता ने, अलग अलग, और व्यक्तिगत युक्तियों से, इन ढाँचों को गलाया, और क्षरित किया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00204.wav|इसके परिणाम स्वरूप, बीसवीं सदी के स्कान्दिनेविया में, एक अलग सौन्दर्य शास्त्र प्रतिफलित हुई|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00205.wav|यह वैकल्पिक परम्परा, कई दशक तक, स्त्रियों के माध्यम से ही, प्रतिफलित हुई|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00206.wav|नवें दशक तक आते आते, यह स्पष्ट होता चला गया, कि अब, स्वीड कविता की प्रथम पंक्ति, स्त्रियों की निर्मित बनती चली जा रही थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00207.wav|एक दहाके से, कुछ ही अधिक समय में, स्वीडी कविता का, भूदृश्य एकदम बदल चुका था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00208.wav|इस बदलाव का सौन्दर्य, और इसकी चुनौती, क्रमशः, समृद्ध, अधिक जटिल, और परिपक्व होती चली गयी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00209.wav|आन येदरलुण्ड, इस नयी कविता के भीतर, एक बिलकुल अपूर्व धरातल पर खड़ी हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00210.wav|उनके दस काव्य संग्रह आ चुके हैं, और बहुत से लोग़, ऐसा मानने लगे हैं, कि वे स्वीडन की, सबसे महत्वपूर्ण समकालीन कवि हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00211.wav|जो भी हो, आन येदरलुण्ड के लेखन से, काव्यात्मक सोच के भीतर, एक नाटकीय उछाल पैदा हुई है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00212.wav|निश्चित ही, आधुनिक कविता के कूट, कुछ हद तक, जान की कविता का वर्णन कर सकते हैं, कि वे, अपना काव्य संसार, स्वयं रचती हैं, अज्ञात एहसासों की ज़मीन को, टटोलती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00213.wav|यह बात भी निश्चित है, कि उनकी कविता के, विचित्र सौन्दर्य में, कामुकता का गहन बोध है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00214.wav|उनका सम्पूर्ण संवेदन, भाषा की सामान्य संरचनाओं की, सीमाओं से परे का सवंदेन है, उन संरचनाओं से परे का, जो मानवीय अभिव्यक्ति का, संचालन करती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00215.wav|उनकी वाणी की प्रशान्तता, और उत्कंठा को अलगाना, अ सम्भव जान पड़ता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00216.wav|शायद, कहा जा सकता है कि, उनकी कविताएँ, एक ऐसे मानवीय दृष्टान्त के भीतर, पठनीय हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00217.wav|जहाँ भाषा सत्ता का, माध्यम बनने से साफ़ मुकर जाती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00218.wav|कविता को, भाषिक व्यवहार का सबसे, करूणामयी अवयय बन जाना होता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00219.wav|इस किताब की समीक्षा, एक रेडियो पत्रिका में हुई|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00220.wav|उन कविताओं से, मुझे एक झटका लगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00221.wav|मैं एकदम समझ गया, कि उन कविताओं के प्रकाश में, कविता को लेकर, मेरे अपने शिल्प गत प्रयासों की कोई भी प्रासंगिकता, नहीं रह जाती|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00222.wav|शिवगढ़ी गाँव, एक बड़ा गाँव था, और उसमेँ सबसे बड़ा मकान, पण्डित दुर्गाशङ्कर श्रीमुख का था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00223.wav|जिसमे वे मृत्यु के समय, अपने उस कमरे में अकेले बैठे हुए थे, जो उनका पुस्तकालय कहलाता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00224.wav|माउज़र से निकल कर गोली, उनके सीने में घुसी, और वे, एक चीख़ मार कर, उस कुरसी पर, लुढ़क गये, जिस पर वे बैठे थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00225.wav|एक पुस्तक पर उनकी मुट्ठी, कसी की कसी रह गयी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00226.wav|इस किताब को, योँ तो, एक सबूत के तौर पर थाने में जमा कर लिया गया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00227.wav|क़त्ल के वक़्त, वह मक़तूल के हाथ में थी, बल्कि मक़तूल के ख़ून के छीँटे भी, उस किताब पर पड़े हुए थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00228.wav|क़त्ल की जाँच करने वाले पुलिस के, सभी छोटे बड़े हाकिमोँ का कहना वाजिब था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00229.wav|उससे क़ातिल के बारे में, कोई सुराग़ मिलना नामुमकिन था, क्योँकि वह, कालिदास की मशहूर एपिक रघुवंश थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00230.wav|मक़तूल की उँगलियोँ के निशानोँ के अलावा, किसी और की उँगलियोँ के निशान उस पर नहीँ मिले|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00231.wav|फिर भी, शक की गुंजाइश थी, क्योँकि, यह बात ग़ौरतलब थी, कि हालाँकि इस किताब की छपी हुई ज़िल्देँ, बाज़ार में, बे आसानी मिलती हैँ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00232.wav|पण्डित दुर्गाशङ्कर श्रीमुख की हत्या के समाचार का, स्थानीय से बढ़ कर, अन्तरराष्ट्रीय हो जाना, कई कारणोँ से था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00233.wav|जिनमेँ कुछ प्रमुख राजनीतिक, ऐतिहासिक, और सामाजिक कारणोँ को ही, गिना पाना, यहाँ सम्भव हो पायेगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00234.wav|पहले, राजनीतिक कारणोँ की बात की जाये|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00235.wav|जब एक लंबे विचार विमर्श के बाद, केन्द्रीय सरकार, और केन्द्रीय विपक्ष के बीच, यह तय हुआ कि अयोध्या, मथुरा, और वाराणसी को, केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा दे दिया जाये, तथा पूर्वांचल, पश्चिमांचल, और मध्यांचल नाम से, तीन नये राज्य, बनाये जाये|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00236.wav|तो पूर्वांचल वालोँ के सारे, स्वाभाविक, सांस्कृतिक, अधिकार के बावुजूद, मध्यांचल वाले इस बात पर अड़ गये, कि लखनऊ तो मध्यांचल की ही राजधानी होगी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00237.wav|केन्द्रीय सरकार, और केन्द्रीय विपक्ष के बीच, यह तय हो गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00238.wav|पूर्वांचल वाले, फिर इलाहाबाद को अपनी राजधानी बनाने को उध्वत हुए|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00239.wav|किन्तु पिछले माघ, मेले में प्रतिदिन, सत्तर तीर्थयात्रियोँ को, मौत के घाट उतारने की अपनी घोषणा को, जब आतंकवादियोँ ने, बिना किसी बाधा के, पूरे माघ महीने पूरा कर दिखाया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00240.wav|जो केन्द्रीय सरकार, और केन्द्रीय विपक्ष के बीच सहमति का एक और बिंदु बन चुकी थी, कि पण्डित, दुर्गाशङ्कर श्रीमुख, इस प्रस्ताव के मुखर विरोधी के रूप में सामने आये|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00241.wav|ऐसी परिस्थिति में, इस हत्या के पीछे, राजनीतिक कारणोँ की सम्भावना से इन्कार नहीँ किया जा सकता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00242.wav|शिव गढ़ी, राजधानी न बने, इस सहमति के पीछे, पण्डित दुर्गाशङ्कर श्रीमुख का, व्यक्तित्व अवश्य प्रभावी रहा होगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00243.wav|किन्तु राजधानी के रूप में, शिवगढ़ी के चयन का विरोध, पुरातत्त्व विभाग, पर्यावरण मन्त्रालय, और रक्षा मन्त्रालय ने भी किया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00244.wav|पुरातत्त्व विभाग का कहना था, कि शिवगढ़ी, देश का सबसे पुराना गाँव है, अतः, वहाँ उस अंधाधुंध खुदाई की अनुमति, नहीँ मिलनी चाहिए|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00245.wav|जो, राजधानी बनने के बाद, पुनर्निर्माण के सिलसिले में, अवश्यम्भावी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00246.wav|पर्यावरण मन्त्रालय का कहना था, कि शिवगढ़ी में, ऐसे पेड़ोँ की बहुतायत है, जो हज़ारोँहज़ार साल पुराने हैँ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00247.wav|अतः, वहाँ उस अंधाधुंध पेड़ कटाई की अनुमति, नहीँ मिलनी चाहिए, जो राजधानी बनने के बाद, पुनर्निर्माण के सिलसिले में, अवश्यम्भावी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00248.wav|रक्षा मन्त्रालय का कहना था, कि शिवगढ़ी में, देश की सबसे आधुनिक अनुसन्धान शाला, उसके द्वारा खोली गयी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00249.wav|अतः, उसके इर्दगिर्द, बेमतलब आबादी बढ़ाने से, अनुसन्धान शाला की वर्तमान, सुरक्षा व्य वस्था में, बाधा पहुंचेगी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00250.wav|क्रान्तिकारी हिरावल पार्टी के बयान पर, लोगों ने, कुछ विस्मय अवश्य प्रकट किया, क्योँकि, विविध भूमिसुधारोँ का, कोई प्रभाव, पण्डित दुर्गाशङ्कर की पैतृक ज़मीँदारी पर, नहीँ पड़ा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00251.wav|हत्या किसने की, यह तो नहीँ पता लगा, किन्तु बहुत सी संभावनाओँ में से, सी बी आई जाँच तक पहुँचते पहुँचते, एक ही स्वीकार्य रह गई थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00252.wav|इस पक्ष की ओर, टाइम पत्रिका की कवर स्टोरी ने ध्यान दिलाया, कि पण्डित दुर्गाशङ्कर श्रीमुख, पच्चीस वर्ष पहले तक, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में, फ़िज़िक्स के प्रोफ़ेसर थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00253.wav|श्रीमुख वहाँ से इस्तीफ़ा दे कर, अचानक एक दिन भारत चले आये थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00254.wav|दबी ज़बान से, उस रिपोर्ट में, यह इशारा भी किया गया था, कि इस इस्तीफ़े का कुछ सम्बन्ध, रक्षा मन्त्रालय की उस अनुसन्धान शाला से भी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00255.wav|जो पण्डित जी की, घर वापसी के पाँच साल बाद, शिव गढ़ी में बनायी गयी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00256.wav|जो भी हो, जाँच एजेंसियोँ के काम की बात यह थी, कि हत्या के दिन, एक विदेशी, जो अपने को एक अमरीकी पत्रिका का पत्रका��� बताता था, शिव गढ़ी में मौजूद था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00257.wav|जिस समय पण्डित दुर्गाशङ्कर श्रीमुख की हत्या हुई, वे उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, क्योँकि उसे एक इं टर व्यू देने के लिए, वे स्वीकृति दे चुके थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00258.wav|यह माना गया, कि यह पत्रकार उनसे, हार्वर्ड के दिनोँ के बारे में जानना चाहेगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00259.wav|उनके इस्तीफ़े के कारणोँ के बारे में, और उनकी वर्त्तमान शोध गतिविधियोँ के बारे में, कुछ सवाल ज़रूर करेगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00260.wav|स्थानीय पुलिस की कुछ, लानत मलामत भी, इस बात के लिए हुई, कि उसने मामूली पूछताछ के बाद, उसे जाने दिया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00261.wav|किन्तु, यह सच है, कि शक की सुई को, इस पत्रकार के चारोँ ओर घुमाया जाना, बंद नहीँ हुआ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00262.wav|सी.बी.आई. को भी, उसके विरुद्ध, कोई प्रमाण नहीँ मिल पाये थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00263.wav|उस पत्रकार ने भी, अपने को छिपाने की कोई कोशिश नहीँ की थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00264.wav|विदेशी मीडिया का ध्यान, इस हत्या की ओर, उस छोटी सी रिपोर्ट के नाते भी गया, जो उसने फ़्रांस के, ल माँद में छपवायी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00265.wav|देवदत्त पण्डित की मौत, एक हादसा मानी गयी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00266.wav|एक पंचनामे के बाद, लाश उनके पट्टीदार, हरिदत्त पण्डित को दे दी गयी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00267.wav|देवदत्त पण्डित की जमा पूँजी में, यद्यपि, थोड़ा बहुत इज़ाफ़ा हुआ था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00268.wav|क्योँकि, हादसे के वक़्त, वह महादेवपुरा के ग्रामीण बैंक से, सूखा राहत के मुआवज़े वाले, चार सौ बयालीस रूपये, नक़द ले कर लौट रहे थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00269.wav|यह, सर्व स्वीकृत था, कि हरिदत्त पण्डित के ऊपर, देवदत्त पण्डित के क्रिया कर्म का बोझ आ पड़ा था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00270.wav|उसको देखते हुए, यह रक़म तो क्या, वह डेढ़ बीघे ज़मीन भी नाकाफ़ी थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00271.wav|जो देवदत्त पण्डित के मर जाने के नाते, अब हरिदत्त पण्डित की जोत में आने वाली थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00272.wav|उनकी चेलाही, और उपरोहिती के कुछ घर ज़रूर, हरिदत्त पण्डित को मिलेँगे, लेकिन, ये घर भी, मामूली किसानोँ के थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00273.wav|यद्यपि, यह नहीँ कहा जा सकता, कि हरिदत्त पण्डित ने, देवदत्त पण्डित के प्रति, अपने बैर में, कोई कमी दिखायी थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00274.wav|आख़िर तो उन्हेँ ही यह ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी, क्योँकि, अब तो जो थे, वही थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00275.wav|लिहाज़ा, जब देवदत्त पण्डित के घर में, ���ीवाल पर बेठन में, लिपटी पोथी की ओर उँगली दिखा कर, हरिदत्त पण्डित ने, कुछ व्यंग्य से ये कहा, कि कोदर ई अगर यहाँ कभी लौटे भी, तो इस पोथी को छोड़ कर, कुछ नहीँ पायेँगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00276.wav|उनके मुँह पर, गाँव में इस बात को अनुचित कहने वाला, कोई नहीँ था, यद्यपि, हरिदत्त पण्डित से भी, लोग वैसे ही डरते थे, जैसे वे, देवदत्त पण्डित से डरते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00277.wav|जो जानते थे, वे जानते थे, कि यह पोथी देवदत्त पण्डित के पिता, रविदत्त पण्डित के हाथोँ से लिखी गयी, मेघदूत की एक प्रति थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00278.wav|जिसके पहले पन्ने पर, मोटे अक्षरोँ में, सिर्फ़, क्लीं लिखा हुआ था, क्योँकि, रविदत्त पण्डित की देवभक्ति को, भला कौन नहीँ जानता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00279.wav|देवदत्त पण्डित ने, प्रथमा परीक्षा में, प्रथम प्रयास में असफल होने के बाद, घर में पड़ी किसी पोथी को, हाथ लगाने की क़सम खा ली थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00280.wav|जिस समय, देवदत्त पण्डित ने चिल्लाते हुए, यह क़सम खायी, उस समय रविदत्त पण्डित के हाथ में, यही पोथी थी, जिसे चुपचाप उन्होँने, दीवाल में बने आले पर रख दिया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00281.wav|बाद में, वे अपनी पुस्तकोँ को, कहीँ और रख आये थे, किन्तु न जाने क्योँ, यह पुस्तक घर में रह गयी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00282.wav|रविदत्त पण्डित की मृत्यु के बाद, प्रतिवर्ष उनके श्राद्ध के अवसर पर, इस पुस्तक को, देवदत्त पण्डित, एक बार नियम से धूप दिखाते, और नया मोरपंख उसके पन्नोँ के बीच रखते|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00283.wav|उनसे पहले, कई सन्तानों के दिवंगत हो जाने से, चोट खायी उनकी माँ ने, ग्राम वृद्धाओं की सलाह पर, उन्हें तुरन्त बुधिया कारवारी के हाथ, पारम्परिक मूल्य सवा सेर कोदो की क़ीमत पर बेँच दिया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00284.wav|अनिष्टकारी ग्रह, अब बच्चों का कुछ बिगाड़ न सकते थे, क्योंकि, वह बुधिया का बेटा था, राज मती पंडितायन का नहीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00285.wav|जब राज मती पंडिताइन ने, बच्चों को वापस चाहा, तो बुधिया ने, पारम्परिक मूल्य, ढाई सेर कोदो पर बच्चा वापस करने से इन्कार कर दिया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00286.wav|फलतः, देवदत्त पण्डित को, विवश हो कर, अपनी ज़मीन में, उसे झोंपड़ी डालने की अनु मति देनी पड़ी, और तब जा कर, उन्हें अपना वंशधर पुत्र मिला|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00287.wav|इसके पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00288.wav|अस्तु, कोदई की व्यथा कथा पर लौटते हुए, अख़बार में छिपा था कि, कोदई के पित��मह, पण्डित रविदत्त शुक्ल ने, यदि पाँच बरस की उम्र में ही, कोदई का जनेऊ कर दिया, तो इसके पीछे उनका, बुधिया का बेटा होना, प्रमुख कारण था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00289.wav|किन्तु, कोदई ने, स्वीकार भाषण में, सगर्व कहा, कि वे बुधिया की बेटी, सिधिया को, जो कोदई से दस वर्ष बड़ी थी, अपनी बड़ी बहन मानते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00290.wav|उन्होंने यह भी बताया, कि छोटी बहन के नाम पर, उनके पास बुधिया की दूसरी बेटी, रिधिया है, जो उनसे तीन बरस छोटी है, और इस प्रकार, अब अठारह बरस की होगी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00291.wav|इन दो बहनों को छोड़ दिया जाये, तो कोदई इकलौती सन्तान थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00292.wav|कोदई ने बताया, कि वे ग्यारहवे बरस की उम्र, और छठी कक्षा तक, पास के शिव गढ़ी गाँव में पढ़े|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00293.wav|एक दिन उन्हें प्रेरणा मिली, कि वे गाँव छोड़ कर, सीधे इलाहाबाद चले जाँयें, ताकि वहाँ अच्छी पढ़ाई कर सकें|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00294.wav|इलाहाबाद का चुनाव इसलिए स्वाभाविक था, कि उनके बेहनोई थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00295.wav|सिधिया के पति, सिवदीन मास्टर, वहाँ सन्त रैदास विद्यामन्दिर में, प्रिंसिपल थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00296.wav|वे, रातोंरात भागे, और आख़िरकार सिवादीन मास्टर का घर, ढूंढ़ निकालने में कामयाब रहे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00297.wav|वहाँ उनका स्वागत हुआ, किन्तु दो शर्तों पर|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00298.wav|पहली यह, कि सिधिया, किसी भी तरह, अपने जनेऊधारी भाई को, अपनी रसोई में, शामिल करने को राज़ी न हुई|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00299.wav|यह तय हुआ, कि कोदई, अपना भोजन स्वयं बनायेँगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00300.wav|दूसरी शर्त यह थी, कि सिवदीन मास्टर ने साफ़ कर दिया, कि कोदई बाबू का नाम तो, वे सन्त रैदास विद्यामन्दिर में लिख लेंगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00301.wav|मगर पास करवाने का ज़िम्मा, उनका नहीँ है, और अगर कोदई बाबू ने ठीक से पढ़ाई नहीँ की, तो रिश्तेदारी का कोई लिहाज़ न करते हुए, वे उनकी ख़बर, अपनी बेँत से लेँगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00302.wav|जो सन्त रैदास विद्यामन्दिर में, मशहूर थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00303.wav|नाम लिखने के लिए उन्होँने, कोदई जैसे गँवारू नाम से भरती करने से, अरुचि दिखायी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00304.wav|दूसरे दिन, सिवदीन मास्टर, विश्वविद्यालय में, अंग्रेज़ी के अपने गुरु रह चुके, डाक्टर लालता प्रसाद वर्मा से मिलने गये थे, और कोदई बाबू को भी अपने साथ लेते गये थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00305.wav|उस समय, डाक्टर लालता प्रसाद वर्मा के मित्र, श्रीनिवास सुब्र मनियन भी वहाँ मौजूद थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00306.wav|जो गणित विभाग में प्रोफ़ेसर थे, तथा उनके साथ, बाब किंग भी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00307.wav|जो प्रिंसटन में फ़िज़िक्स के प्रोफ़ेसर थे, और इस विश्वविद्यालय में, भाषण देने के लिए आये हुए थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00308.wav|शिष्टाचारवश, कोदई बाबू से डाक्टर लालता प्रसाद वर्मा ने, कुछ उनकी पढ़ाई लिखाई के बारे में, पूछताछ की, जिसमें थोड़ी देर बाद, प्रोफ़ेसर श्रीनिवास सुब्र मनियम, और प्रोफ़ेसर बाब किंग ने भी, दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00309.wav|यह बातचीत, पूरे साढ़े तीन घंटे चली, जिसके बाद, प्रोफ़ेसर बाब किंग, डिनर के लिए, अपने होटेल की और चले, किन्तु, कोदई को, अपने साथ लेते गये|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00310.wav|इसके बाद, कोदई का कुछ पता न लगा, किन्तु कोई एक सप्ताह के बाद, वे प्रोफ़ेसर बाब किंग के साथ, प्रिंसटन में दिखे,|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00311.wav|उन्नीस वर्ष की उम्र में, उन्हें प्रिंसटन में, फ़िज़िक्स के प्रोफ़ेसर पद पर, पदारूढ देखा गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00312.wav|यहाँ लेखक अपना कर्तव्य समझता है, कि स्वीकार भाषण में, एक क्षेपक डालते हुए, पाठकोँ को यह बताये, कि इस घटनाचक्र का, एक दुष्परिणाम यह हुआ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00313.wav|सिवदीन मास्टर अपने इस मूल सङ्कल्प से, विचलित होने को बाध्य हुए, कि वे तत्काल दुर्गागंज ख़बर भेज कर, देवदत्त पण्डित को आश्वस्त कर देँगे, कि कोदई बाबू उनके यहाँ हैँ, और वे उनको लेकर चिन्तित न होँ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00314.wav|वस्तुतः, दुर्गागंज में एकमात्र टेलीफ़ोन, मौलाना रफ़ीक़ुद्दीन के घर पर था, और उसका नंबर, सिवदीन मास्टर के पास न था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00315.wav|इसके नाते, वे अपने सङ्कल्प को, तत्काल, कार्यरूप में परिनाम न कर सके थे, और अब उन्होँने पत्र लिखा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00316.wav|तो उसमेँ, सखेद यह बताने के अतिरिक्त वे कुछ न कर सके, कि कोदई उनके यहाँ आये, फिर न जाने कहाँ चले गये|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00317.wav|इस शोक में, घुलती हुई राज मती पंडिताईन का, एक वर्ष के भीतर, देहान्त हो गया, और सिधिया उसके बाद से, शर्म के मारे, दुर्गागंज में, न आती थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00318.wav|क्षेपक, यहाँ समाप्त होता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00319.wav|अभी, कुछ वर्ष पहले तक, भारतीय मुख्यधारा में, एक प्रमुख युवा तिब्बती स्वर रहे, और भारत में ही जन्मे इस युवा कवि को, इन दिनों, साहित्यिक संपादक कम, और गुप्तकार संस्थाएं, और पुलिस ज़्यादा तलाश करते है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00320.wav|और फ़िर, हमें हिन्दी कवि कथाकार, उदय प्रकाश मिले, जिन्होंने अपने ब्लॉग पर, अपनी कविता, तिब्बत, उन्हीं दिनों पोस्ट की, वह कविता, जिससे कवि के रूप में उनकी पहचान बनी थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00321.wav|इसी कविता पर, उन्हें भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार मिला था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00322.wav|उदय ने, इस कविता के नेपथ्य के बारे में, उन प्रक्रियाओं, और प्रेरणाओं के बारे में लिखना शुरू किया, जो तीन दशक पहले, उनके आस पास मंडरा रही थीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00323.wav|यही गद्य, हमारी शीर्ष कथा, बनना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00324.wav|अब लगता है, यह फ़ोकस कर सकने में मिली नाकामी ही, पिछले कुछ महीनों का, असल हासिल है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00325.wav|मध्य मई में, जयपुर में, सीरियल बम धमाके हुए, और अचानक ही, यह संसार हमारे लिए बदल गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00326.wav|वह शहर, जिसे हम दूसरी जगह से ज़्यादा प्रेम और घृणा करते हैं, उस शहर की ज्यामिति बिगड़ गयी थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00327.wav|मुख्यधारा मीडिया में, हमारी शान्ति, और उनका हमला का मुहावरा, हर तरफ़ फैल गया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00328.wav|यह बात आज से कई साल पुरानी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00329.wav|मेरा जन्म, मध्य प्रदेश के एक बहुत छोटे से गांव, सीतापुर में, सन में हुआ था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00330.wav|तब तक हमारे यहां बिजली नहीं आई थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00331.wav|मैंने खुद भी लिखना पढ़ना, चित्र आदि बनाना, बिना बल्ब, और बिजली के सीखा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00332.wav|बल्कि आज तक मुझे लालटेनें, और ढिबरियां अच्छी लगती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00333.wav|हालांकि इस उम्र में, और शहरों में, इतने वर्षो से रहने के बाद, उनकी रोशनी में, अब कुछ लिख पढ़ पाना संभव नहीं होता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00334.wav|दियों को मैं दीवाली, और पूजा त्यौहार के अलावा, कभी पसंद नहीं कर पाया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00335.wav|क्योंकि उनकी रुई की बाती को, बार बार बढ़ाना पड़ता है, ऐसे में, उंगलियों में तेल लग जाता है,|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00336.wav|अगर आप कागज़ पर लिख रहे हैं, या कोई किताब पढ़ रहे हैं, तो वे तेल के धब्बे, हमेशा के लिए वहां आ जाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00337.wav|हमारे घर में, भारत नाम का अखबार, इलाहाबाद से आता था, और कभी कभी, नव भारत भी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00338.wav|पत्रिकाएं, बहुत सी आती थीं, जिन्हें कभी नये घर की परछी, बारामदे में, तो कभी घर से ज़रा सा बाहर, कटहल के पेड़ के नीचे फेंक देते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00339.wav|बेंत की आराम कुर्सी पर बैठे हुए, पिता जी पढ़���े रहते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00340.wav|पिता जी को किताबें, और बेंत की कुर्सियां बहुत पसंद थीं, जिन्हें वे इलाहाबाद से मंगाते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00341.wav|हमारे घर में, एक ग्रामोफ़ोन भी था, जो खराब पड़ा था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00342.wav|एक हैंडिल से, उसमें चाभी भरने पर, रिकॉर्ड घूमता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00343.wav|लेकिन, चूंकि उसका स्प्रिंग टूटा हुआ था, और साउंड बॉक्स भी, जंग खाकर बेकार हो चुका था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00344.wav|इसलिए, वह ग्रामोफ़ोन, अटारी के स्टोर रूम में रख दिया गया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00345.wav|रेडियो आ चुका था, इसलिए, उसे हमारे घर ने, त्याग दिया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00346.wav|टेक्नॉलॉजी के साथ हमेशा यही होता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00347.wav|मैं और मेरे भाई, दोनों ऐसी त्यागी जा चुकी पुरानी चीज़ों को, दुबारा जीवित और ठीक करने में, दिन रात लगे रहते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00348.wav|अनमोल घड़ी, आह, आग, जाल, पता नहीं कितनी फ़िल्मों के गाने, उन तवों की बारीक लकीरों में बंद थे, जो सुई रखते ही, जिंदा हो जाते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00349.wav|मकांदो में किये जा रहे, वैज्ञानिक तकनीकी आविष्कारों से, कम रोमांचक, हमारे बचपन की उपलब्धियां नहीं थीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00350.wav|बैटरी और चुंबक और टिन की पट्टी से, बार बार जलने बुझने वाला बल्ब, तांबे के तारों को, मोम में डुबाकर, इंसुलेट करके, और आर्मेचर बाइंडिंग करके, घूमने वाली छोटी सी पंखी बनायीं थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00351.wav|जिसे देख कर, मां हैरत में पड़ गईं थीं, शायद थोड़ा सा, डर भी गईं थीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00352.wav|पतंगी धागे के दोनों सिरों पर, दो खाली डिब्बे जोड़कर, अपने घर से टिर्रा किरपाल के घर को, कनेक्ट करने वाली टेलिफ़ोन लाइन|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00353.wav|हमारे गांव से तीन किलोमीटर दूर, अनूपपुर रेल्वे जंक्शन था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00354.wav|आप में से शायद किसी ने मेरे पहले कविता संग्रह, सुनो कारीगर में, वह कविता पढ़ी हो|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00355.wav|यह एक छोटा सा जंक्शन है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00356.wav|जहां से सरगुजा, यानी अंबिकापुर की ओर जाने के लिए, आज भी गाडी बदलनी पड़ती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00357.wav|हम तो, तिब्बत के शरणार्थियों की बात कर रहे थे, जिन्हें हम सब, लामा ही कहते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00358.wav|तो लामा, अपने परिवारों के साथ, उसी अनूपपुर के प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00359.wav|अगली गाड़ी के लिए, उन्हें वहां कई घंटे इंतज़ार करना पड़ता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00360.wav|कई बार, ख��सतौर पर बरसात के दिनों में, सरगुजा की ओर जाने वाली, वह अकेली गाड़ी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00361.wav|रास्ते में पड़ने वाली नदियों में बाढ़ आ जाने, या पटरियों पर पानी भर जाने के कारण, कई कई दिनों के लिए, रद्द हो जाती थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00362.wav|तब लामा, हमारी नदी के किनारे की रेत पर, आ जाते, वहीं खाते, नहाते|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00363.wav|उन्हें वहां देखना, हम बच्चों के लिए, एक बिल्कुल नया दृश्य बनता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00364.wav|हमारे गांव, और आस पास के लोग तो, ज़्यादातर काले रंग के थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00365.wav|लेकिन, लामा लोग खूब गोरे और सुंदर होते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00366.wav|उनके बच्चे और स्त्रियां तो, इतनी सुंदर होतीं, कि उन्हें देखते, हमारी आंखें पलक झपकना, बंद कर देतीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00367.wav|हम बच्चों को, लामा लोग प्यार करते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00368.wav|अपने कंधे पर लटकते, गेरुआ झोले में से, लेमंचूस, और रंगीन मीठीगोलियां देते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00369.wav|राक्षस जैसे त्रिपुंडधारी, राजमती सिंह, उर्फ़ राजमटा सिंह की तुलना में, तिब्बत से आये हुए लामा, देवदूत लगते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00370.wav|हम बच्चों के लिए दया, वत्सलता, करुणा, और प्रेम से भरे देवदूत जैसे लगते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00371.wav|हम इन चींटियों को, पतंगों के नाम से, उनके जीवन के कुछ पलों में जानते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00372.wav|जहां कहीं उजाला दिखे, कोई बिजली का बल्ब, लालटेन या कंदील, ये पतंगे, झुण्ड के झुण्ड वहां टूट पड़ते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00373.wav|आषाढ़ की पहली बारिश की शीतलता, और कंदील या बल्ब की जिस रोशनी ने, उनके जीवन में भविष्य की नयी आशाएं जगाईं थीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00374.wav|हर सुबह, हम अपनी देह पर उगे, निर्बल पंखों के साथ, आकाश की ओर उड़ती, और किसी उजाले को देख कर, एक साथ किसी सामूहिक आशावाद में, टूट पड़ने वाली, इन चींटियों के अनगिनत शव, झाड़ू लगाकर बाहर फेंक देते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00375.wav|उनका वह कुछ पलों के कौतुक, और उल्लास से भरा जीवन, सुबह तक कचड़े के ढेर में तब्बील हो चुका होता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00376.wav|उनकी सभ्यता के इतिहास में, किसी यूटोपिया के बनने, और फिर उसके टूटने का मार्मिक अध्याय होता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00377.wav|ठीक मनुष्यों की सभ्यता के इतिहास के किसी खण्ड की तरह है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00378.wav|रात में, घर में, हर ओर, नदी की धार के साथ, बह कर आने वाले, सांप, गोजर, कनखजूरे, और कछुए टहलने लगेंगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00379.wav|ध��ती की दरारों में, महीनों से, समाधि लगाए, या हाइबरनेट करते, ये तरह तरह के मेंढक भी, पहली बरसात के साथ ही, बाहर निकल आते हैं, और रात भर, हम उनकी आवाज़ सुनते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00380.wav|झींगुरों के गिटार, पहरुए पक्षी की टनक, किसी रात्रि पक्षी की, दूर तक जाती, मेंडोलिन या बांसुरी की संगत में, लगातार चलता संगीत, बहुत मनमोहक प्रतीत होता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00381.wav|हम जूतों के भीतर, रात में पांव डालते डरते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00382.wav|एक बार फूफा जी ने, आधी रात, अपने सिरहाने रखी टॉर्च उठानी चाही, तो वह अजीब सी आवाज़ निकालता भाग गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00383.wav|इस पूरे इलाके में अब भी, बुद्ध की बहुत सी खंडित, टूटी फूटी प्रतिमाएं, यहां वहां मिलती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00384.wav|उस इलाके में जब कोई कुआं खोदता है, या अपने नये घर की नींव, तो ऐसी मूर्तियों का मिलना, एक सामान्य सी बात है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00385.wav|कलिंग का वह क्षेत्र, जहां अतिक्रमणकारी, सम्राट् अशोक की सेना ने, निहत्थे गरीब, शांत लोगों के अहिंसक प्रतिरोध के उत्तर में, भयावह जनसंहार किया था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00386.wav|और फिर जहां से, पूरब दक्षिण, राजगीर उदयगीर तक पहुँचते पहुँचते, उसे स्वयं अपनी हिंसा से, ग्लानि हुई थी, और वह बौद्ध हो गया था, उस उत्कल कलिंग क्षेत्र का, सीमांत विंध्य पर्वत की, इसी श्रृंखला के पास है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00387.wav|मैं कई बार सोचने लगता हूं, कि बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड़कर, जगह जगह मंदिर खड़ी कर देने वाले लोग, आखिर कौन थे, ब्राह्मण, प्राचीन इतिहास के हिंदू तालिबान, या कोई और, उस रात, बाढ़ में उफनती नदी के दूसरे पार, आग की लाल पीली नीली लपटें, किसी क्रम में टहल रहीं थीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00388.wav|जैसे कुछ लोग, अपने हाथों में, नन्हीं नन्हीं मशालें लिए, एक वृत्त में घूम रहे हों|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00389.wav|बचपन में, हम में से बहुतों की फ़ैंटेसी में, चितावर को पाना, उसी तरह उपस्थित था, जैसे बहुत पहले, अरब, इजिप्ट, और मेसोपोटामिया के, अलकीमियागरों, अलकेमिस्ट की फ़ैंटेसी में, किसी ऐसे रासायनिक फ़ार्मूले की खोज, जो किसी भी धातु, या पदार्थ को सोने में बदल दे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00390.wav|क्योंकि, हर पदार्थ मैटर तो, असल में एक ही होता है, उसकी आंतरिक संरचना ही, उसे दूसरों से भिन्न बना डालती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00391.wav|पदार्थ की उसी आंतरिक संरचना को, बदलने वाले सूत्र को खोज निकालने के, शताब्दियों तक चलने वाले प्रयत्नों के बीच ही, उस विज्ञान का जन्म हुआ, जिसे हम केमिस्ट्री के नाम से आज जानते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00392.wav|मेरी स्मृति में तो, यह दृश्य इसलिए भी अमिट रह गया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00393.wav|क्योंकि, मां की मृत्यु के बाद ही, मैंने गांव का वह घर छोड़ दिया था, और फिर, पिताजी की मृत्यु के बाद तो, वहां लौटने का विकल्प ही नहीं था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00394.wav|इस घटना के वर्षों बाद में, मैं, जी एन यू में शोधछात्र था, जहां बाद में, कुछ समय के लिए अध्यापक भी हुआ|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00395.wav|तब मैंने, वहां की लाइब्रेरी में, विश्वप्रसिद्ध कथाकार, असिमोव की एक कहानी पढ़ी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00396.wav|अमेरिका के दो, भाषा वैज्ञानिक को, कहीं से पता चलता है कि, लहासा के प्राचीन बौद्धमठ में, तिब्बत की प्राचीन लिपि में, लिखी गई एक ऐसी पांडुलिपि है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00397.wav|जिसमें सृष्टि के निर्माण, और विनाश का सारा रहस्य बंद है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00398.wav|लेकिन समस्या यह है, कि मोहन जो दाड़ो की लिपि की तरह ही, उस अज्ञात लिपि को भी, अभी तक संसार का कोई भाषा वैज्ञानिक, डिकोड नहीं कर पाया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00399.wav|जिसे तिब्बत के एक बूढ़े लामा ने, सैम्युएल टर्नर को दिया था, और जो, द रसल एक याक था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00400.wav|वैसे तिब्बत का वह बूढ़ा लामा, दिल्ली के, मजनूं का टीलानाम के इलाके में, शरणार्थी के रूप में अब भी रहता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00401.wav|रहस्य भरी झुर्रियों में मुस्कुराता हुआ वह लामा कहता है, वह सांड अभी मरा नहीं है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00402.wav|उस आयोजन में, भारतीय भाषाओँ के अलावा, मुख्यतः फ़्रांं सीसी, और ब्रिटानी अनुवादकों, और साहितिक एजेंटो ने, हिस्से दारी की|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00403.wav|पिछले महीने, स्विट्ज़रलैंड के, लोज़ान विश्वविद्यालय में, एक आयोजन हुआ, जिसका शीर्षक था, ट्रांसलेटिंग इंडिया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00404.wav|इसमें हिन्दी लेखकों, आलोचकों, और इतिहासकारों के साथ साथ, स्विस, फ्रांसीसी, जर्मन, और अमरिकन अकादमियों ने, हिस्सेदारी की|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00405.wav|सियाही के आयोजन के उद्देश्यों में, आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरे देश, और ग्लोबल हो रहे संसार में, भारत से अनुवाद की संभावनाओं का पता लगाना|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00406.wav|अनुवाद कर्म, और अनुवाद उद्योग की समस्याओं पर विचार करना, और भारतीय भाषाओं से, अंग्रेज़ी, एवं यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद कर्म से जुड़े, विभिन्न व्य���वसायिकों को, एक नेटवर्किंग प्लेटफ़ार्म उपलब्ध करना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00407.wav|इसी क्रम में, इस बार प्रस्तुत है, नागार्जुन विष्णु खेर, विनोद कुमार शुक्ल, और अरुण कमल|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00408.wav|अन्तिम तीन, बहु अनूदित कवि हैं, और नागार्जुन, बहुत कम अनूदित|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00409.wav|नागार्जुन की कविता की महानता का स्वीकार, देर से हुआ, जब मानों, एक तरह से प्रगतिशीलता ने, सर्वहारा कवित्त को देखा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00410.wav|हमें खुशी है, युवा शोधकर्ता और कवि, मनोज कुमार झा ने, यह अनुवाद हमारे लिए किया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00411.wav|देवयानी, जो एक हिन्दी राजस्थानी लेखक की बेटी थी, उसे कविता लिखते लिखते, पत्रकारिता, प्रेम, गृहस्थी, अनुवाद, शोध की ओर चले जाना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00412.wav|ग्रुप के आलोचक, मनोज कुमार मीणा को, बहुत सोच विचार के बाद, भारतीय प्रशासनिक सेवा में चले जाना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00413.wav|विशाल कपूर को, इतिहास की पढ़ाई पूरी करके, गाइड बन जाना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00414.wav|शिवकुमार गाँधी को, एक पेंटर के रूप में, विख्यात होना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00415.wav|वे, प्रकाशन और चर्चा के रोज़मर्रा से परे, अपने ढंग से लिख रहे थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00416.wav|हिमांशु पंड्या, जिन्हें जे एन यू से पढ़ाई करके, हिन्दी पढ़ना था, और संस्कृति कर्मी, आलोचक बनना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00417.wav|विश्वंभर, जिन्हें हिन्दी में शिक्षा की सबसे, महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में से एक का, यशस्वी संपादक होना था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00418.wav|इस बार से, हम एक, अन्यतकालिक स्तम्भ किताब शुरू कर रहे हैं, जिसे हम, इस समीक्षा सीमत स्पेस नहीं बनाना चाहते|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00419.wav|इस बार, दो हिन्दी पुस्तकों पर, समीक्षा लिखी गयी है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00420.wav|युवा शोधकर्ता, गिरिराज किराडू, और गगन गिल के, कैलाश मान सरोवर यात्रा, वृतांत अवाक् पर लिखा गया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00421.wav|तेजस्विनी निरंजन की पुस्तक, साईटिंग ट्रांसलेशन, हिस्ट्री, पोस्ट स्ट्रक्च्रलिज़्म, एंड द कॉलोनियल कन्टेक्स्ट की एक पढ़त है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00422.wav|मणिपुर में, एक महिला की हत्या के विरोध में, जुलाई दो हज़ार चार में, बारह महिलाओं द्वारा किए गए, न्यूड प्रोटेस्ट को, मुख्यधारा मीडिया में, एक उत्तेजक ख़बर को देखना, सबको याद होगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00423.wav|कविता, अपनी फ़िल्म, टेल्स फ़्रॉम मार्जिन्स में, उस ख़बर के आर पार जाती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00424.wav|मणिपुर में जारी अशांति को, मू ल तः, राष्ट्र के महाख्यान में, उपेक्षित हाशिये की त्रासदी की तरह देखती हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00425.wav|फ़िल्म के स्क्रीनिंग इतिहास पर बात करते हुए, वे एक ऐसे बिन्दु पर पहुँचते है, जहाँ अब नहीं रुका जा सकता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00426.wav|महमूद फ़ारूकी, अपनी रोड्स स्कालरशिप ख़त्म करके हिंदुस्तान लौटे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00427.wav|तो उन्हें अंदाज़ा नहीं था, कि आने वाले सालों में उनकी ज़िंदगी, किस्सा कहने की एक लुप्त हो चुकी परम्परा को, दास्ताँ सुनाने की एक चलन बहार कला शैली को, फिर से जीवित करने के एक, दिलचस्प कारोबार में उलझ जायेगी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00428.wav|महमूद ने अपने दम पर, इस दास्तानगोई को पुनर्जीवित कर दिया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00429.wav|पहले अकेले, और बाद में अंग्रेज़ी कवि, दानिश हुसैन के साथ, देश विदेश के कई शहरों में, उन्होंने दास्तान ए हम्ज़ा के, हैरतंगेज़ किस्सों, कारनामों को पेश किया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00430.wav|अगर वही टुंडी बाँह के साथ बुलायेंगे, तो टुंडी बाँह लेकर जायेंगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00431.wav|घबराइये नहीं, अब आप काफ़ी ठीक हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00432.wav|इसके बाद, आपकी चोट को स्वस्थ होने का रास्ता, खुद तय करना हैं, अब नहीं रुका जा सकता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00433.wav|युधिष्ठिर, इसी स्वर्ग में, सशरीर गए थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00434.wav|रावण ने, यहीं शिव आराधना की थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00435.wav|बाद में, उसकी आसुरी शक्तियों का पता चलने पर, उससे वरदान वापस लेने का उपक्रम, पार्वती गणेश को करना पड़ा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00436.wav|भस्मासुर का काण्ड यही हुआ था, छू कर भस्म कर देने का वरदान लेकर, असुर, शिव पर ही, उसका प्रयोग करना चाहता था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00437.wav|सागा, यानी शाक्य, दावा, यानी चाँद, शाक्य मुनि का चाँद, बुद्ध पूर्णिमा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00438.wav|एक दिन नहीं, पूरे एक मास का, कृतज्ञता उत्सव, सारा माह पवित्र है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00439.wav|विशेषकर कैलाश पर्वत की हिन्दुओं, बौद्ध के लिए, कैलाश मानसरोवर के दर्शन ही, पुण्यकारी हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00440.wav|कई मेल, अलग अलग विदेश, संस्थाओं के नाम से आए|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00441.wav|जिनमें एक, सुखद सूचना होती है कि, मेरे ईमेल पते को, लकी ड्रा के आधार पर, अलां या फ़लां पुरस्कार के लिए चुना गया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00442.wav|पुरस्कार की राशि, लाखों डॉलर या पाउंड में होती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00443.wav|पिछले महीने, एक मेल आया, जिसमें लंदन के पते वाली एक संस्था ने मुझे सूचित किया, कि उनकी पुरस्कार समिति ने, मुझे पाँच मिलियन पाउंड की पुरस्कार राशि के लिए चुना है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00444.wav|अगला मेल आया, कि इतनी बड़ी पुरस्कार राशि, विदेश में आपके पास भेजने के लिए, कुछ कागज़ात बनवाने पड़ेंगे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00445.wav|पुरस्कार की राशि, चूँकि आपको चेकस्वरूप दी जा रही है, इसलिए कागज़ात आदि बनवाने का खर्च, आपको वेहन करना पड़ेगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00446.wav|यह खर्च, नकद में करना होगा, इसलिए भारत में आप हमारे निम्न बैंक खाते में, पचास हज़ार रुपए जमा करवा दें|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00447.wav|तुम तो जानते हो, एल आई सी की नौकरी में, इतना पैसा बचता कहाँ है, कि नकद भिजवा सकूं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00448.wav|तभी मैंने, दिल्ली के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में समाचार पढ़ा, कि इंटरनेट के माध्यम से, दिल्ली से सटे गुड़गांव में, छह महीने के दौरान, करीब दर्जन भर लोग ठगे जा चुके हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00449.wav|मु ज़फ़्फ़रपुर के, एस आर ओरिएंटल स्कूल से, हमने मैट्रिक की परीक्षा, साथ ही पास की थी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00450.wav|बरसों बाद, एक दिन, ट्रेन में उनसे भेंट हो गई|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00451.wav|कहते हैं काफ़्का की ज़्यादात रचनाएँ, उसके मरने के बाद ही छपीं, आज उसकी गिनती, दुनिया के महानतम लेखकों में की जाती है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00452.wav|अभी मैंने, उसी दिन एक वेबसाइट पर पढ़ा, कि शेक्सपियर के बाद, संसार में, सबसे अधिक शोध, काफ़्का की रचनाओं को लेकर ही हो रहे हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00453.wav|फिर वे, मुस्कुराते हुए कुसुमाकर जी से कहते, एक दोस्त के कारण ही, काफ़्का की रचनाएं, पाठकों के समक्ष, प्रकाशित होकर आ सकीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00454.wav|नहीं नहीं, यह कहानी इतनी सहज इतनी सरल होती तो, न कुसुमाकर ने मुझे सुनाई होती, न ही मैं इसे आपको सुना रहा होता|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00455.wav|क्या करूं, वक्त ही ऐसा आन पड़ा है, कि कुछ भी सहज सरल नहीं रह गया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00456.wav|उस समय, मु ज़फ़्फ़रपुर में, एसडीओ बनकर आए हुए थे, हरिनारायण गौतम|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00457.wav|जिसने, यहाँ आने के बाद, एक मुस्लिम परिवार के साथ, साझेदारी में, व्यापार आरंभ किया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00458.wav|धारावाहिक में, उनके व्यापार के, उत्थान पतन के साथ ही, देश में आज़ादी के बाद, हिंदू मुस्लिम संबंधों में आए बदलावों की कहानी भी, साथ साथ चलेगी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00459.wav|जबकि उन्होंने जो भी कहानी, या उनके शब्दों में साहित्य लिखा, उसे मुझे पढ़वाए बिना, उन्होंने पूरा नहीं समझा, कुसुमाकर ने बड़े आश्चर्य के साथ बताया|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00460.wav|मॉर्टेन की निगाहें, इंडीज़ को फिर, जीतदिलाने पर|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00461.wav|माइकल वॉन ने, क्रिकेट को अलविदा कहा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00462.wav|कप्तानी के लिए ही पैदा हुए वॉन, फ़्लिंटाफ़|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00463.wav|बुकानन ने, फ़्लॉवर को बताए, ऑस्ट्रेलिया के राज़|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00464.wav|वेस्ट इंडीज़ टीम में, कोई बदलाव नहीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00465.wav|अगले वर्ल्ड कप तक खेलना चाहते हैं जयसूर्या|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00466.wav|पॉन्टिंग करेंगे कैंसर पीड़ित बच्चों की मदद|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00467.wav|पाठक चाहें तो, इन निबंधों को, तीन एक दो के मूल क्रम में पढ़ सकते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00468.wav|क्रम का यह कौतुक अनायास हुआ है, पर दो तीन एक क्रम से पढने पर, इबारत कुछ बदल जाती है, यह पाठकों से छुपा न रहेगा|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00469.wav|यहाँ प्रस्तुत, माँडणा भित्ति चित्रों का संचयन, उनके द्वारा किए गए, फ़ोटोग्राफ़ीय दस्तावेज़ीकरण का एक नमूना है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00470.wav|माँडणा कोरने वाली स्त्रियाँ, जो संसार बनाती है, वह लगभग, मनुष्येतर संसार है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00471.wav|इसमें, पशु पक्षी हैं, वस्तुएं हैं, अमूर्त डिज़ाईनें हैं, मनुष्य नहीं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00472.wav|इसके बिल्कुल बगल में, देवी देवताओं, और बॉलीवुड की अभिनेत्रियों के पोस्टर भी, दृश्य का हिस्सा बन जाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00473.wav|चित्रकार, हकु शाह एवं लेखक सम्पादक, पीयूष दरिया की, प्रकाशनाधीन वार्ता, रूप, मानुष के कुछ अंश|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00474.wav|अनिवार्य कविता की धारणा, और ब्राज़ीली कवि, मैनुएल बान्दिएरा की एक कविता पर, तेजी ग्रोवर का अंग्रेज़ी निबंध|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00475.wav|उनकी हंसमुख जिजीविषा में, निरहंकारी नम्रता, व लाक्षणिक सज्जनता का रूपायन है, और उनका, कलात्मक अन्तःकरण, ऋजुछन्दों में, सांस लेता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00476.wav|गहरा आत्मानुशासन, उनका बीजकोष है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00477.wav|दरअसल हकु शाह स्वदेशी पहचान के जौहरी, व मरमवेत्ता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00478.wav|वे अकादमिक धारणाओं के रूढ़ चौखटों, तथा कथित कोष्ठकों के बाहर आकर, सृजना का अपना उर्वर उपजीव्य पाते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00479.wav|जिसमें, सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर, अडिग आग्रह, अहिंसा, प्रेम, व आनन्द का संदेश, यूं उजागर है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00480.wav|गोया उनके वजूद क�� शिलालेख हो, जिसे बांचने का मतलब, स्वावलम्बी समाज रचना, व जीवन के सहज, चित्रार्थन के सुंदर काव्य में खिलना, व सांस लेना है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00481.wav|जनवरी से जून दो हज़ार सात के दरमियान, हकु शाह के साथ, उनके कृतित्व, व व्यक्तित्व पर, लगभग सत्तर घण्टे का वार्तालाप, सम्पन्न हुआ था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00482.wav|जो राज कमल प्रकाशन, दिल्ली से शीध्र प्रकाश्य पुस्तक का एक सम्पादित हिस्सा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00483.wav|हालाकि, दुनिया की नज़रों में, वे कोई बहुत व्यावहारिक व्यक्ति नहीं थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00484.wav|अलसुबह, दो या तीन बजे, आप उन्हें गीता पढ़ते, या दो पहर में, अपने किसी मुस्लिम दोस्त के घर की आराम कुर्सी पर, नींद लेते देख पा सकते थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00485.wav|कभी कभी आधीरात के क़रीब उन्हें खोजते हुए, नदी तट की रेत पर, जब एक सफ़ेद कपड़ा, फर फराता दिखता, तो आप यह समझ जाते थे, कि वहां जो सोये हैं, वह बादशाह हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00486.wav|आदिवासियों को वे, अपना दोस्त मानते थे, और उन्हीं के साथ, चाय बनाते, खिचड़ी पकाते, वहीं खाते सोते, उठते बैठते|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00487.wav|मेरी तीसरी बहन दक्षा भी, वही वनस्थली, सूरत में जनजातीय विद्यार्थियों को पढ़ाती रही|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00488.wav|मेरे भाई, बाबूभाई, और भाभी तरला ने, अपने जीवन का ज़्यादातर समय, जनजातीय समुदाय में पढ़ाते हुए ही बिताया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00489.wav|उनके दोनों बच्चे, उर्विन, व स्वाति, वहीं आदि वासी बच्चों संग ही पढ़ते हैं|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00490.wav|उन्हें चिकित्सकीय मदद सुलभ करना, नृत्यनाटिका व गरबा करना, गांव गांव घूमना, चरखा चलाना, प्रार्थना करना शामिल था,|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00491.wav|समाजवादी गीतकार व चित्रकार, कुलिन पंड्या, हमारी प्रेरणा के मुख्य स्त्रोत थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00492.wav|कुछ देर बाद, मङ्गला श्रीमुख ने कहा, मेरे खयाल में, आपका शोध तर्क संगत तो है, किँतु उससे वह लक्ष्य प्राप्त न होगा, जो आप चाहते है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00493.wav|कोदई चौँके, इस तरह की बात सुनने के वे आदि न थे|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00494.wav|ऐसी आशंकाओं का एक अर्थ, अपनी रूग्ण वास्तविकता का दोष गल्प, व्यवसायिक सिनेमा पर मढना भी हो सकता है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00495.wav|हमारे पॉपुलर, सांस्कृतिक प्रतिबिम्नों ने, संभवतः, उस वास्तविकता को बहुत करीब से सामने रंगा है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00496.wav|जिसे हमने स्वयं निर्मित किया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00497.wav|लेकिन जो ऐसी भूतहा वास्तविकता है, कि हम इसके होने को नकारते हैं, और इसको निर्मित करने में, हमारी संलग्न ज़िम्मेवारी को भी|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00498.wav|तेजाजी के बलिदान की मूल कथा, संक्षेप में कहने का मौका आ गया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00499.wav|एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में, तेजाजी का जन्म, भाद्रपद की शुक्ल पक्षीय दशमी, तदानुसार उनतीस, जनवरी एक हजार चौहत्तर को, धुलिया गोत्र के जाट परिवार में हुआ था|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_male_1_00500.wav|यहाँ, यह भी बता दूँ, कि तेजाजी के जन्म की अंग्रेजी तिथि, उनतीस जनवरी, एक हजार चौहत्तर के अन्त में, इतिहासकार महोदय ने, स्वयं अपनी तरफ़ से, कोष्ठकों के घेरे में, एक प्रश्नवाचक चिह्न भी अंकित किया है|indic_hi_male_1|hi +audio/indic_hi_female_3_00001.wav|इसके पहले ही, हर रोज़ की तरह, टोकरियों में भरकर, ले जानेवाले, दो कांवरिये, घर के अंदर से बाहर आये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00002.wav|नगर की सर हदों को पार करने के बाद, शिवाजी और उनका पुत्र, घोड़ों पर सवार होकर, स्व स्थल की ओर निकल पड़े, जिसका प्रबंध, उनके अनुचरों ने पहले ही कर रखा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00003.wav|सरदार की बातों को सुनते ही, औरंगज़ेब को लगा, मानों उसे हज़ार बिच्छुओं ने, एक साथ डंक मारा हो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00004.wav|उसे लगा, कि राज भवन में ही रहूँ तो, मन पसंद कन्या को चुनना असंभव है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00005.wav|उस कुटीर के आगे, तरह तरह के रंगबिरंगे पुष्पों के बीच में, दो सुंदर कन्याएँ घूम रहीं थीं, और पुष्प तोड़ रहीं थीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00006.wav|पर्वत के शिखरों पर चढ़कर, पत्थरों को, गेन्द की तरह उछालकर पकड़ लेता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00007.wav|बड़े बड़े ठूँठों को, वह आसानी से चीर फाड़ सकता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00008.wav|भैंसे के रूप में, दुन्दभि नाम का एक बलशाली राक्षस हुआ करता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00009.wav|फिर भी, भिक्षु अपनी पत्नी को याद दिलाते हुए, सान्त् वना देता था, याद है न, बच्चे तो हमें, एक टोकरी में रखे, नदी में बहते हुए मिले थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00010.wav|मैं अन्तिम सांस लेने से पूर्व, तुम्हें क्या दूँ, उसकी खाट के पास खड़े सेल्जा, और मधु ने, उसके हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहा, अप्पा जी, आपने बहुत प्यार और स्नेह से, हम दोनों की देखभाल की है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00011.wav|खड्ग भी नहीं, भाला भी नहीं, तोप भी नहीं, तो तुम्हारी दृष्टि में, उत्तम आयुध है क्या, बीरबल, बादशाह अकबर ने पूछा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00012.wav|उसका बेटा प्रसाद अक्लमंद था, पर वह अव्वल दर्जे का सुस्त था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00013.wav|व्यास मुनि, अर्ध निमीलित नेत्रों के साथ, ध्यान मग्न हो, धाराप्रवाह सुनाने लगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00014.wav|बचपन से ही, पांडव और कौरवों के बीच, ईर्ष्या बढ़ती गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00015.wav|बानीकान्त के हाते में, एक दालान, एक गोशाला, केले का कुंज, तथा अनेक वृक्ष थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00016.wav|और जब भी, घर के कामों से, सुभा थोड़ी फ़ुर्सत में होती, बिल्ली दौड़ कर, उसकी गोद में लेट जाती, और उसके कोमल हाथों की, पुचकार की आशा करती|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00017.wav|वह कडालुण्डी नाम के गाँव का रहनेवाला था, जो जैमरिन राजा की राजधानी के पास ही था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00018.wav|कोमन, या तो अपने ग्रहकों से ही शीशा माँग लेता था, या अपने थैले में से, एक छोटा सा आइना निकालकर, उन्हें दे देता था, जिसमें, वे देख कर तसल्ली कर लेते थे, अथवा, अन्तिम रूप देने के लिए, कुछ निर्देश दे दिया करते थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00019.wav|मैं इसे देखकर इतना घबरा गई, कि मुझे चक्कर आ गया, और बेहोश होकर, फ़र्श पर गिर पड़ी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00020.wav|लेकिन, यह देख कर मुझे आश्चर्य हुआ, कि इसमें, सचमुच एक पुस्तक थी, नैंसी ड्रिव एण्ड द ब्लूबियर्ड रूम|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00021.wav|किताबी कीड़ा होने के कारण, मैं तुरन्त अपने कमरे में गई, और साइकोज़ तथा मर्डरर्स के बारे में, बेहद रुचि के साथ पढ़ने लगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00022.wav|मेरे मन में, सन्देह उठा, और दिमाग ने तुरन्त सन्देश भेजा, आज अप्रैल फ़ूल्स डे है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00023.wav|जब अड़ोस पड़ोस के शत्रु राजाओं को मालूम हो जायेगा, कि होनेवाली महारानी के पति के पास, एक महिमावान खड्ग है, तब वे हमारी ओर, आँख उठाकर देखने की भी जुर्रत नहीं करेंगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00024.wav|वज्रदष्ट ने, गुस्सा उगलते, लोहे की गदा हाथ में लेकर कहा, आधी रात के समय, चोर की तरह आये हुए हनुमान की क्या बात है, मैं जाकर, उस शूर राम को, लक्ष्मण, और सुग्रीव के साथ मार दूँगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00025.wav|शायद चीता भूल गया है, मगर मच्छ ने तल्ख आवाज़ में कहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00026.wav|उस महाराज शूरसेन और उस गुरु की कहानी तुम्हें सुनाऊँगा, जिन्होंने, दुष्ट अग्रज को हटाकर, अनुज को राज्याधिकार सौंपने की समस्या को, अनावश्यक ही, जटिल बना दिया.|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00027.wav|दोनों की बातें सुन चुकने के बाद, कमलनाथ ने कहा, महाशयों, मानता हूँ कि, ज्योतिष शास्त्र महान शास्त्र है.|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00028.wav|मत्स्यावतार, अपने चार पंखों को, फड़ फड़ाते, ऊँची लहरों को चीरते, समुद्र के अन्दर चला गया.|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00029.wav|अर्थहीन प्रश्नों से, हमें नाराज़ करनेवाले, उन दोनों की जीभों को, हमने काट दिया है, जिससे वे ऐसे प्रश्न हमसे, फिर से न पूछें, और उन्हें इस पेय को बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है.|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00030.wav|वे किसी भी समस्या को, सुलझाने में, निष्णात थे, किसी भी बीमारी को वे, जड़ीबूटी के द्वारा, दूर करने में सिद्ध हस्त थे, और उन्हें जो पसंद आते थे, उन्हें वरदान भी देते थे.|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00031.wav|चाहूँ तो अयोध्या ही क्या, सारा संसार जीत सकता हूँ, लेकिन, पिता की बात पर, धर्म के लिए, पट्टाभिषेक ही ठुकरा दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00032.wav|जनता के आनंद, व उत्साह के बीच, राणा उदयसिंह, मेवाड़ सिंघासन पर आसीन हुए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00033.wav|दोबारा खूँखार जान वरों के समुद्र से रूबरू होना था, जिनमें से हरेक, बहुत ही कड़वा, बहुत ही न्यायोचित, एक पुराने वै मनस्य को समेटे हुए थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00034.wav|वह एक राजा की भाँति, हम जैसों में से, एक के ऊपर बैठा हुआ है, दाँत पीसते हुए, निकली आवाज़, बेशक नील मगर मच्छ की थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00035.wav|यदि मैं अयोध्या में होता, तो क्या मैं, भ्राता राम को वन में जाने देता, मेरे लिए, माता से भी अधिक प्रिय, और पूज्य भ्राता राम हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00036.wav|इस बड़ के वृक्ष के नीचे ही, राम लक्ष्मण ने, जटाजूट पहने थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00037.wav|भरत माताओं से विदा लेकर, शत्रुघ्न के साथ, रथ पर सवार हो, मन्त्रियों और वषिष्ठ को लेकर, वह, नन्दीग्राम गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00038.wav|उसकी माता के कारण, उसकी जो अपकीर्ति हुई थी, उसको दूर करने के लिए, प्रायश्चित के रूप में, भरत ने जटायें बढ़ाईं, वल्कल पहनकर, मुनि वेष धारण कर, वह नन्दीग्राम से ही, कोशल देश का परिपालन करने लगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00039.wav|तारा और वर्षा ने, उस ज़ोर की भयभीत चीख पहचान ली|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00040.wav|रात को जब वे वहीं सो गये, तब सपने में, श्रीराम प्रत्यक्ष हुए, और माधव पांडे से कहा, तुम्हारी भक्ति श्रद्धा पर, मैं बहुत संतुष्ट हूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00041.wav|बर्फ़ का एक और मशहूर होटल, उत्तरी नॉर्वे का, केरेन्स स्नो होटल है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00042.wav|यदि आधी रात को आप, सहन शक्ति जवाब दे जाए, और आपको ऐसा लगे, कि आप पूरी रात उस बर्फ़ में नहीं सो सकते, तो आप पास ही के लैवो रेस्टॉरें��� में सो सकते हैं, जिसमें कुछ पलंगों के साथ, एक कमरा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00043.wav|बुज़ुर्ग कहा करते हैं, न दामाद के साथ खाओ, पुत्र के साथ पढ़ो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00044.wav|यों विचार कर, व्यास मुनि पुत्र पाने के विचार से, तपस्या करने, कांचनाद्रि पहुँचे, और सोचने लगे, कि किस देवता की आराधना करने से, उनकी इच्छा की पूर्ति, जल्दी हो सकती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00045.wav|रास्ते में, धनुर्विद्या की गूढ़ बातों पर, प्रकाश डालते हुए, विश्वामित राम लक्ष्मण के साथ, सिद्धाश्रम पहुँचे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00046.wav|राम ने, गुरु के आशीर्वाद के समान, पहले उस बाण को, अपनी आँखों से लगाया, फिर अपने तरकश में रख कर, गुरु के चरण स्पर्श किये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00047.wav|न्याय सभा क्या कहती है, उसने मैमथ, नील मगर मच्छ रैंगलर की ओर, और, जो मैं समझता हूँ, सिंध नदी की डॉल्फ़िन की ओर देख कर पूछा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00048.wav|हम साक्ष्यों की जाँच करना चाहते हैं, नील मगर मच्छ, बुरा मानते हुए बोला|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00049.wav|उनकी अनेक हाथों में थे, अंकुश, परशु, पाश, कलश, और इनके साथ साथ थे, त्रिमूर्तियों के शंख चक्र गदा त्रिशूल वज्रायुध|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00050.wav|तब इंद्र के कानों में, गजेंद्र की कही बातें गूंज उठीं, इस सिर के सम्मुख, तुम्हें शायद अपना सिर झुकाना पड़े|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00051.wav|उसे ज्ञात था, कि पुत्र, गण पति के धड़ से जो सिर जोड़ा गया है, वह गजेंद्र का ही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00052.wav|पूर्ण चंद्रमा की कांतियों को, बिखेरते हुए, विघ्नेश्वर प्रकट हुए, और उन्हें, मेरे सुपुर्द किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00053.wav|इसके बाद, हस्तिनापुर में, शकुनि, और युधिष्ठिर के बीच, जुआ शुरू हुआ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00054.wav|उसमें युधिष्ठिर, अपने साथ अपने छोटे भाइयों, और द्रौपदी को भी, दाँव पर रखकर, हार गए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00055.wav|ख़ासकर कई बंधनों और मुसीबतों में फँसकर, तड़पने वाले मानव जीवन से संबंधित लगती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00056.wav|इसके जवाब में, सूत महर्षि बोले, हाँ गजेंद्र मोक्ष की कहानी, श्लेषार्थ से भरी हुई है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00057.wav|हम जानते हैं कि व यस्क स्टेम सेल कम संख्या में हैं, लेकिन, मेसेंकायमल स्टेम सेल्स, उनमें अपवाद हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00058.wav|एक ऐसी दुनिया की कल्पना कीजिए, जिसमें आपके कई क्लोन, आसपास चलते फिरते नज़र आएँगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00059.wav|एक दिन उसने, कहीं से चावल का चूर्ण, और नारयल के कुछ ट���कड़ों का इन्तज़ाम कर लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00060.wav|किचकिच नामक पिशाचिनी, वहाँ नयी नयी आयी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00061.wav|नारद सोचने लगे, मुझे यह विद्या, किसके पास सीखनी होगी, तभी विघ्नेश्वर ने दर्शन देकर कहा, जांब वती के यहाँ, वीणा वादन की खूबियों को सीख लो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00062.wav|श्री कृष्ण सत्यभामा को मना कर, उसे गरुड़ वाहन पर, साथ ले इंद्र के स्वर्ग में पहुँचे, और उन्होंने नंदवन से पराजित वृक्ष को उखाड़ लाकर, सत्यभामा के आंगन में रोप दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00063.wav|प्रह्लाद का विद्याभ्यास कराने के लिए, हिरण्य कश्यप ने, उसको अपने गुरुपुत्र, चण्ड और मार्क के हाथ सौंप दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00064.wav|उन्होंने प्रतिज्ञा की, कि भारत देश की दास्य शृँखलाओं को तोड़ने के लिए, वे अपना जीवन समर्पित करेंगे, एवं युवकों में स्वतंत्रता की दीप्ति प्रज्वलित करेंगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00065.wav|सन् में स्नातक बनने के बाद, इंग्लैण्ड में कानून की शिक्षा के लिए वे चुने गये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00066.wav|ये अद्भुत चमत्कार देख, भक्त तन्मय हो जाते, और छोटे राघवेन्द्र स्वामी को भेंट चढ़ा देते|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00067.wav|इस कारण, जंगल में बड़ी दूर स्थित, राघव के आश्रम में लोग कम आने लगे, और अधिकांश भक्त, सुन्दर के आश्रम में जाने लगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00068.wav|शीघ्र ही, वह शंकरन के लिए, एक स्नेहिल पत्नी, पिता के लिए एक कर्त्तव्यनिष्ठ बेटी, और छोटे शिवन के लिए, एक ममता मयी माँ सिद्ध हुई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00069.wav|सीता को मैंने, पुष्पक विमान पर, जिस पर, राम और लक्ष्मण सवार थे, उत्तर की ओर जाते देखा, और रावण, गन्नेर फूल पहनकर, सारे शरीर पर तेल पोतकर, लाल कपड़े पहन कर, नशे में चूर भूमि पर लुढ़कता हुआ दिखाई दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00070.wav|बेटे, क्या लकड़ी के इस गट्ठर को उठा कर मेरे सिर पर रख दोगे, एक पेड़ के नीचे बैठी एक बुढ़िया, यामर से मदद मांगती हुई बोली|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00071.wav|डूम्स डे फ़ोर्सेस, कयामत सेना|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00072.wav|वे प्रत्येक टीवी चैनल पर, लोगों से अपने निकट तम अन्तरिक्ष यान पकड़्ने की प्रार्थना कर रहे हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00073.wav|पम्पा सरोवर का पानी, स्वच्छ और निर्मल था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00074.wav|कोयलें, कूक रही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00075.wav|उन दोनों को, स्वच्छन्द घूमता देख, सुग्रीव ने सोचा, कि उन दोनों को, बाली ने उसको मारने के लिए भेजा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00076.wav|शवल नामक कामधेनु को बुलाकर, उससे कहा, भक्ष्य भोज्य, लेह्य पेय के साथ, सब के लिए, षड्रस भोजन की व्य वस्था करो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00077.wav|यदि तुम्हें बल प्रदर्शन का इतना ही शौक है, तो किष्किन्धा पर्वत पर चला जा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00078.wav|बड़ी बड़ी शिलाओं को, सींगो से उछालने लगा, और ग रजता हुआ बोला, कौन है बाली, किधर है बाली, किधर है वह वानर, निकल रे वानर, कहाँ छिपा है, देखें तुममें कितना भुजबल है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00079.wav|लेकिन रोनेधोने या जंगल में भ टकने से, भयभीत होने की अपेक्षा, वे सूर्योदय की भव्यता, और समुद्र की लु ढ़कती स्वर्णिम लहरों को देख कर, मुग्ध होने लगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00080.wav|यह वह समय था, जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, एक एक करके भारत के छोटे छोटे राज्यों को, किसी न किसी बहाने, अपने अधीन करती जा रही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00081.wav|जगदीशपुर भी, उनकी गिद्ध दृष्टि से बच नहीं पाया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00082.wav|उसकी व्यूह रचना और गोरिल्ला पद्धति अनोखी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00083.wav|इण्डियन म्यूटिनी के लेखक, कर्नल सी बी मेलसन के अनुसार, गवर्नर जनरल, लॉर्ड कैनिंग, इस बात से आतंकित थे, कि शेर ने अपना जबड़ा बहुत फैला लिया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00084.wav|लॉर्ड कैनिंग ने, भारतीय सेना के विशेषज्ञ, लॉर्ड मार्क केर को, तुरन्त अजिमगढ़ मार्च करने, तथा अपराजेय बूढ़े शेर को पिंजड़े में बन्द करने का हुक्म दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00085.wav|लाखों लोग, रोम में प्रार्थना घरों की दीवारों, तथा भीतरी छतों पर, और अजायब घरों में उसकी कृतियो को बड़े ध्यान से देखते हैं, और उसकी उत्कृष्टता पर, चमत्कृत रह जाते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00086.wav|सत्यभामा रुष्ट होकर बोली, पिताजी, मुझसे भी बढ़कर यह शमंतक मणि, आपके लिए प्यारा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00087.wav|बहुत कुछ कहने के बाद भी, केशव को छोड़ने से, कोतवाल ने जब इनकार किया, तब प्रज्वल ने डटकर उसका विरोध किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00088.wav|स्वर्गीय डॉक्टर हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने, यह तब लिखा, जब साल पहले, मेरी प्रिय कहानी शृंखला में प्रकाशित करने के लिए, चन्दामामा के निमन्त्रण पर, अपनी कहानी भेजी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00089.wav|अपनी बहन सरोजिनी नायडू के समान ही, लब्ध प्रतिष्ठ, हरीन्द्रनाथ रंगमंच के कलाकार, चित्रकार, और वक्ता थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00090.wav|इनकी कोई औपचारिक उपाधि नहीं होते हुए भी, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने, इन्हें पी एच डी उप���धि के लिए शोध करने की स्वीकृति दे दी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00091.wav|कुछ अध्यापको ने, इसे पसन्द नहीं किया, जैसे चौथी कक्षा के क्लास टीचर, मिपात्रो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00092.wav|राज्य की परम्परा के अनुसार, जनता के आशीर्वाद पाने के लिए जब हम निकले, तब सुधाम नामक एक दरिद्र बालक, अपनी एकमात्र पटिया, युवराज को देने के लिए लालायित था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00093.wav|उसके दुर्व्यवहार को जानते हुए भी, उससे विवाह रचाना क्या, अनुचित नहीं था, या|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00094.wav|कभी कभी वे, कज़ाक परिकर्तो परिकर्ताओ के हीरोज़, अल्डर कोसेझिरेन्शी और सुन्दर काराशश की तरह भी सजते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00095.wav|इस रोशनी में, जीवदत्त ने सुरंग मार्ग को, सु स्पष्ट रूप से देखा, और कहा, खड्ग, हमने ग़लत समझा था, कि वह बिल छोटा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00096.wav|भेड़ियो की चट्टान से अगर, तुम दोनों एक ह़फ़्ते के अंदर बच निकले, और इस सुरंग मार्ग तक पहुँच सके, तो गुरु भल्लूक की सेवा में, अपनी ज़िन्दगियाँ काट पाओगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00097.wav|राजा शरनिधि ने, नख से शिख तक, उसे ग़ौर से देखा, और आश्चर्य भरे स्वर में उससे पूछा, जान सकता हूँ आप कौन हैं, मैं इस गं धर्व की पत्नी हूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00098.wav|बायें पैर का उनका अंगूठा, रक्त सिक्त हो गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00099.wav|उसने तुरंत यह रिश्ता स्वीकार कर लिया, और एक हफ़्ते के अंदर ही, बिना किसी की जानकारी के, भूषण के घर में ही सीता, और गोविंद के मिलने का प्रबंध किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00100.wav|कहानी समाप्त करने के बाद, दादी ने कहा, देखा बच्चो, धोखेबाज़ श्याम पर क्या गुज़रा, वह खुद एक धोखेबाज़ के चंगुल में फंस गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00101.wav|उस हालत में, मंत्रियो ने महारानी के पास जाकर निवेदन किया, महारानी जी, हमारे पट्ट, हाथी का लड़ाई में मैदान में प्रवेश करने पर ही, हमारी विजय हो सकती है, लेकिन महाराजा के स्वर्गवास के दिन से लेकर, पट्ट, हाथी खानापीना व नींद को भी, तज कर दुख में डूबा हुआ है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00102.wav|शिक्षिकाः, अगर मैं तुम्हें दो कुत्ते, और दो कुत्ते, और दो और कुत्ते देती हूँ, तो तुम्हारे पास, कितने कुत्ते होँगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00103.wav|अब अमरकोश सहित, कितने ही ग्रंथो का अध्ययन, तुम पाँचो ने बड़ी ही खूबी के साथ किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00104.wav|उसका सुहाग शाश्वत हो, इसका उसने देवी से वरदान पाया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00105.wav|धवला ने, त्रस्त पति को ढाढ़स बंधाया, और प्राप्त वरदान के बारे में, उससे कहते हुए पूछा, कि इस दुर्घटना का कारण क्या है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00106.wav|त्योहार वो चाहे जहाँ के हो, हमेशा आशा, खुशियाँ, और समृद्धि लेकर आते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00107.wav|वे चंद्रमास के वें दिन, कई परिवार, लाबा दलिया बनाते हैं, जो ग्लूटिनस चावल, जुवार, जॉब्स, टियर्स के बीज, जुजुबे झड़बेरियो, कमल के बीज, सेम लॉन्गन, और ज़िंगको से बना, बहुत स्वादिष्ट दलिया होता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00108.wav|बाघ की, थोड़ी सी मूँछ हैं, भरे न्यानी लेकिन, यह तो अ सम्भव है, मनुष्य की प्रकृति को बदलने से, अधिक अ सम्भव नहीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00109.wav|सौदामिनी, यह सोचकर बहुत ख़ुश हुई, कि विघ्नेश्वर की कृपा से, उसकी सास का हृदय परि वर्तन हो गया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00110.wav|मंथरा, अपने कुबड़े को ढोते, मन ही मन गुनगुनाते चली जा रही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00111.wav|शीघ्र, शीघ्र ही पुलिस, लॉकहीड कारखाने के कर्मचारियों की रिकाडर्स की, पड़वाल करने लगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00112.wav|उसने देखा, कि कोई अपने सर पर, तौलिया डाले, पेड़ो की ओट में से चला जा रहा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00113.wav|एक ने कहा, हमारे गाँव में, तुलसी के पौधे नहीं हैं, क्या मैं उनके बदले, आंवले के पत्ते खा सकता हूँ, एक और ने कहा, मेरी स्मरण शक्ति कमज़ोर है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00114.wav|जब उसका निर्माण पूरा होने जा रहा था, तब एक ऐसे बढ़ई की ज़रूरत आ पड़ी, जो भवन के अंदर, काठ को छीलकर, सुंदर रूप से अलंकार करे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00115.wav|प्यास के मारे, वह एक सरोवर ढूँढ़ रहा था, तो उसने अचानक, मनो हरी को देखा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00116.wav|मुड़ने पर उसने देखा, कि एक आदमी, एक उजड़े कुएँ के बाहर खड़ा है, और गिडगिडा रहा है, महाशय, मेरा बेटा कुएँ में गिर गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00117.wav|सैनिको से उसने पूछा, कि इसने क्या अपराध किया, प्रभु, आभूषणो के व्यापारी, पुण्यगुप्त के घर में, सेंद लगाते समय यह पकड़ा गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00118.wav|रत्नाकर ने सोचा, कि शायद उसकी बहू पागल है, पर शीलवती कहती ही गई, कुछ दिन पूर्व, अर्द्ध रात्रि के समय, एक मादा सियार चिल्ला रही थी, कि नदी में एक औरत की लाश बही जा रही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00119.wav|फिर, सभी बच्चों को, नए साल के उपहार स्वरूप, लाल कागज़ में लपेटकर पैसे दिए जाते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00120.wav|इसके अलावा, डंपलिंग का आकार, प्राचीन चीन के, सोने के इंगोट जैसा होता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00121.wav|नारद स��स्वती से बोले, हे माता वाग्देवी, न मालूम आप जगत के कल्याण के हेतु, मंथरा के मुंह से कैसे वचन प्रकट करवायेंगी, यह सब, आपकी कृपा पर ही निर्भर है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00122.wav|प्रमथ गणो के प्रमुख व्यक्ति, भृंगीश्वर, शृंगीश्वर, चंडीश्वर, और नंदीश्वर ने इसका विरोध किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00123.wav|कुछ लोगों के हाथों में, हँसियाँ, हथौड़े, तलवार, करौत, छेनियाँ आदि थीं, तो कुछ लोग, वीणा, मृदंग, मुरली, और डफ़लियाँ बजा रहे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00124.wav|आफ़त क्या, तुम गुलाब पुष्पो से जुड़े कांटो का, ज़िक्र कर रहे हो, कांटे, गुलाब पुष्पो के सहज कवच हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00125.wav|मुख्य तया अड़ोस पड़ोस के राजा, भय के कारण, अथवा ईर्ष्यावश, आपको पदच्युत करने की ताक़ में हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00126.wav|डॉकटर, अपने सेवको के द्वारा, उसके हाथ बंधवा दिये, इसके बाद, उसे एक गोदाम में ढकेल कर, उसके आगे, एक हज़ार गन्नों वाला बंडल डलवा दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00127.wav|अनावश्यक ही हस्तक्शेप किया, तो तुम्हें भी जेल में ठूँस दूँगा, कोतवाल ने क्रोध भरे स्वर में कहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00128.wav|वरपक्ष का बुज़ुर्ग समझकर, गोरख प्रसाद ने, उसकी बड़ी आव भगत की|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00129.wav|कहानी, संन्यासियो के एक समूह के बारे में है, जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध, षड्यन्त्र रचने के लिए, गुप्त रूप से मिलते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00130.wav|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सितम्बर में आयोजित, बनारस वार्षिक सम्मेलन में, कवि, रबीन्द्रनाथ टैगोर ने, कविता को संगीत बद्ध किया था, और इसे स्वयं गाया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00131.wav|लेकिन क्या आपको मालूम है, कि मुफ़्तसौर ऊर्जा के रूप में, प्रचुर, और अखण्ड रूप से उपलब्ध यह स्रोत, कितना शक्तिशाली है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00132.wav|आज कल की दुनिया में, ऊर्जा की खपत अत्यधिक हो गई है, और इसके ग्रीन हाउस प्रभाव जैसे परिणाम, हमारे इस ग्रह के अस्तित्व के लिए, खतरा बन गए हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00133.wav|उसके बाद, ब्लादिमीर ने, उस सेब से, बहुत रोगियों की चिकित्सा की, और उसे इसमें, शत प्रतिशत स फलता मिली|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00134.wav|उस अलौकिक प्राणी ने कहा, और एक दूसरे विडियो के साथ, वह अदृश्य हो गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00135.wav|इस पर उन मेंढ़को में से एक कह रहा था, ये कौए, जैसे हमें ज़िंदा रहते नोच नोच कर खा रहे हैं, वैसे ही पांचाल राजा, और उसकी संतान को, दुश्मन नोचकर खा जाये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00136.wav|यह ढिंढ़ोरा सुनकर, सुतनु ने सोचा, वाह, यह कितने आश्चर्य की बात है, मैं हड्डी तोड़ मेहनत करूँ, तो भी तांबे के चार सिक्के हाथ नहीं लगते|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00137.wav|उसमें आशा जगी, कि इन फलो की गुठलियो को, ज़मीन में गाड़ दूँ, तो वे देखते देखते बड़े पेड़ हो जायेंगे, और उनके मीठे फल, मैं खा सकूँगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00138.wav|क्षीर सागर से, चंद्र, लक्ष्मी, कल्पवृक्ष, कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैश्रवा घोड़ा, सुरा नामक नशा, व उत्तेजना प्रदान करने वाले पेय, और कितने ही पदार्थ उत्पन्न हुए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00139.wav|थोड़े दिन बाद, शतध्वनु ने, प्रतिकार की भावना से, सत्राजित को मार डाला, और श्यमंतक मणि लेकर, कृतवर्मा और अक्रूर के साथ भाग गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00140.wav|अंगद, द्विविद, मैन्द, जाम्ब वन्त, मनस नल, और सेनापति नील, काफ़ी हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00141.wav|भाग्य के उतार चढ़ाव के मध्य, बिल्ली बारबार दीपक को उलटती रही, हर बार, बत्ती गुल होती रही, और खेल महिला के पक्ष में खत्म होता रहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00142.wav|मैंने, दयालु लड़की, तथा मेरी सबसे प्यारी दोस्त मालू को, एक बार यह कहते सुना है, कि वे हम लोगो को, स्पॉटबिल्ड पेलिकन्स कहते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00143.wav|हमारी कॉलोनी में, सैकड़ो पेलिकन्स, और जांघिल रहते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00144.wav|ग्रीष्मगृहों से, इस स्थान तक की उड़ान, खतरो से भरी होती है, पर जैसे ही कोकरे बेल्यूर पहुँचते हैं, हम सुरक्षित महसूस करते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00145.wav|हम जानते हैं, कि वे किसी को हमें हानि पहुँचाने नहीं देंगे, और उन वृक्षो को भी काटने नहीं देंगे, जिन पर हम घोसले बनाते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00146.wav|तुम्हारी माँ के कहने का मतलब तरबूज़ से है, इसमें खाने और पीने के लिए भी है, इसका बीज बोने, और उगाने के लिए है, और छिलका, गाय के लिए भोजन है, मैं तो यह नहीं समझ पाया था, भागी रथी भाग्य ने, शिला पर से, उठते हुए कहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00147.wav|कुछ बदमाश, धोखेबाज़, व खुदगर्ज़ लोग हैं, जो ऐसा झूठा प्रचार कर रहे हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00148.wav|दंडकारण्य की पूर्वी दिशा में, मार्तांड नामक भील जाति का एक गाँव हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00149.wav|पंद्रह दिनों के बाद, एक दिन रात को जब, युवराज भोजन कर चुकने के बाद, सोने की तैयारी कर रहा था, तब, परिचारिका पीने के लिए दूध ले आयी, और पलंग के बग़ल में, एक मेज़ पर रखकर चली गयी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00150.wav|एक और इतिहास का पाठ, इस पर्यटन में यही ���ो होने जा रहा है, मालूम है, राहुल भी, जैसे कराहता हुआ बोला, और वह भी, क्लास रूम में नहीं, तपते हुए रेगिस्तान के बीचोंबीच, मोहन शान्त रहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00151.wav|शशांक, पोटैटो वेफ़र्स के चबाने की तेज़ आवाज़ में, अपनी बात को दबाने की कोशिश कर रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00152.wav|धोलाविरा, ग्रेट कच्छ रण में, पहाड़ी पौधो के साथ, ऊंची भूमिखादिर द्वीप पर, बसा हुआ है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00153.wav|कितने ही कष्ट झेलकर, मयूर ध्वज की प्रेयसी, उसके पास पहुँच पायी, पर उसने, बडी ही अनुदारता से, उसका तिरस्कार किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00154.wav|तदंतर समुद्र में मछलियों, ज़मीन पर जान वरों, और कृमिकीट, तथा पक्षियों की सृष्टि की|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00155.wav|बोधि सत्व की पत्नी ने पूछा, आपके दिल दोस्त ने क्या क्या दिया है, मित्र श्रीवत्स ने, अंजुली भर अनाज देकर, हमारा पिंड छुड़ा लिया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00156.wav|गीदड़ को रास्ते में, एक दूसरा मोटा तगड़ा गीदड़ मिला|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00157.wav|यह भी कोई बैंगन की सब्ज़ी है, थोड़ा सा अदरक और कच्ची मिर्च कूटकर डाले जाएँ, तो उसका स्वाद ही कुछ और होता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00158.wav|उसके पास जो रोगी आते थे, उनकी चालढ़ाल के आधार पर, वे कुछ कहें, इसके पहले ही वह बता देता था, कि किस उम्र में, कैसे कैसे रोगों से, उनके पीड़ित होने की संभावना थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00159.wav|सबसे पहले, उसकी मुठभेड़, लक्ष्मण से हुई, जिसके हाथों, उसके बेटे इंद्रजित की मृत्यु हुई थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00160.wav|यदि मं जरी को कोई आपत्ति न होती, तो उसे अपने साथ ले, रुद्रपुर जाना होगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00161.wav|पर उस मूर्ख की समझ में यह बात न आई, कि उसकी पत्नी, उसके बरा बर तेज़ी के साथ चल नहीं सकती, और उसके कष्टों में, पत्नी ने भी समान रूप से भाग लिया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00162.wav|तब झाँसी के, दुर्ग के बुर्ज से, एक कंठ स्वर, बिजली की तरह कड़क उठी, झाँसी को छोड दो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00163.wav|बलि चक्रवर्ती के वंशज, पल्लव राजाओं ने, उनके नाम पर शिल्प चित्रों के वैभव के साथ, महा बलिपुरम का निर्माण किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00164.wav|उस काल में, धरती पर शासन करने वाले शासकों के सिरमौर है, हेय चक्रवर्ती, कार्त, वीर्यार्जुन, सुदर्शन चक्र के, अंश को लेकर पैदा हुए थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00165.wav|बादशाह ने अपनी जली, जीभ को बारंबार देखते हुए कहा, शौकत अली, अभी जाओ, और अपनी थैली में, चूना भर कर ले आओ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00166.wav|अ ���स्मात, राजा के अ स्वस्थ हो जाने के कारण, बालिग़ मं जरी देवी को, शासन का भार सौपा गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00167.wav|भवानी के चातुर्य, सामयिक स्फूर्ति, तथा इमानदारी से प्रसन्न ज़मींदार ने, उसे कितनी ही भेंटें दीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00168.wav|अयोध्या नगर में, चक्रवर्ती दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र का जन्म दिन, बड़ी धूमधाम से मनाया गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00169.wav|उस राज्य की, दक्षिणी सरहद के, त्रिशृँग नामक प्रांत में, कलाधर नामक, एक असाधारण शिल्पी रहता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00170.wav|अश्वमेध यज्ञ, जैसे ही पूरा हुआ, ऋश्यशृंज ने, दशरथ से पुत्र कामेष्टि विधि पूरी करवायी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00171.wav|साधु, जैसे ही भोजन करने बैठे, मैंने उनके पत्तलों में, चावल और कच्ची तरकारियाँ परोसे, और कहा, साधुओं के लिए चावल और अन्न में फ़र्क ही क्या है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00172.wav|विष्णु भगवान, उनका चेहरा देख, क्यों हँस पड़े, क्या उनका मुँह ऐसा भद्दा है, या उससे भी अधिक रूप वती नारी को देख, वे उस पर मोहित हो गये हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00173.wav|जटाभूत गुफा के अंदर, घुस गया, और मांत्रिक से कहने लगा, गुरु, एक सींग वाले महिषो पर सवार, उन यमकिंकारों की सहायता करने वाले, दो मानव आये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00174.wav|नीमा डोल्मा चीखती हुई बोली, तुम अपने को क्या समझते हो, स्पीति का देवता, और तुम चाहते हो, कि मैं सोने के प्याले में, हुज़ूर की सेवा में, गरम शोरबा परोस कर दूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00175.wav|राजा ने जब उस नारी के बारे में दार्यफ़्त किया, तब पता चला, कि वह अमुक गृ हस्थ की पुत्री है, और गाड़ी पर सवार व्यक्ति ही उसका पति है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00176.wav|उसे आश्चर्य हुआ, क्या ये इतने विशाल भवन के वासी हैं, या इसके रखवाले, जब कुत्ता भौकने लगा, और बिल्ली म्याऊँ म्याऊँ करने लगी, तब उसे यह विचित्र नहीं लगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00177.wav|वह उस अनोखे बीज पर्वोत्सव की शाम की बेला थी, जिसका आतिथ्य, कर्नाटक में पश्चिमी घाट में स्थित, उसका नागिन कोप्पा गाँव कर रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00178.wav|शरभ को वहाँ बुलाया, और गरुड पक्षी पर बैठ कर, हवा में उड़ने की उसकी इच्छा पूरी की|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00179.wav|हठात् सुधेंद्र, बहुत ही क्रोधित होकर, फुफकारते हुए, उस सैनिक के सामने आ गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00180.wav|हाथ, आँख, तथा मन के सन्तुलन का प्रौढ़, बन्दर सख्ती से निरीक्षण करते|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00181.wav|इसी कारण वह सर्व ब्रह्म, शिवशास्त्री ��े पास, सहर्ष गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00182.wav|यहाँ के जुश्नेर के समीप, शिवनेर दुर्ग में, शाहजी भोसले, व जीजाबाई दंपत्ति ने, एक लड़के को जन्म दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00183.wav|जीवदत्त, ना ना कह ही रहा था, कि इतने में, एक रीछवाला दौड़ा दौड़ा गया, बड़े वृक्ष पर चढ़ गया रेंगता हुआ, आख़री टहनी तक पहुँच गया, और कहने लगा, गुरु भल्लूक, मेरा अंतिम नमस्कार स्वीकार कीजिए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00184.wav|महेन्द्र का पुत्र जितेन्द्र, जादू गरी विद्या में अपने पिता से, अधिक प्रवीण था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00185.wav|दूसरे ही क्षण, पुजारिनी के, दसपंद्रह सेवक, ज़ोरज़ोर से चिल्लाने लगे, क़ैदी भागने की कोशिश में हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00186.wav|बड़ी ही फुर्ती से, जीवदन्त सिंह के पास आया, और मंत्रदंड दिखाते हुए, सेवकों की तरफ़ बढ़ने के लिए उसे उकसाया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00187.wav|बाक़ी छःसात सेवक, दीवार को फांदकर, अपने प्राणो को हथेली में लिये, दुम दबाकर भाग गये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00188.wav|इस वजह से, मेवाड़ में अराजक परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गयीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00189.wav|इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए, गुजरात सुल्तान, बहादुरशाह ने, मेवाड़ की राजधानी, चित्तौड़ को घेर लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00190.wav|जल्द बाज़ी में आकर, अहल्या को शाप देने के कारण, गौतम पछताने लगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00191.wav|दण्डकारण्य में, मत्स्य ध्वज के राज्य में वै ज यन्त के पास, शम्बर नामक बलशाली असुर से लड़ते लड़ते, आपके पति घायल हुए, और मूर्छित हो गये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00192.wav|उस समय खेतो की निगरानी के बाद, ज़मींदार, सूर्य भू पति बग्घी में लौट रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00193.wav|युवको में से एक ने कहा, महोदय पहाड़ के पास के हमारे ज्वार के खेतों में, कुछ नये लोग घुस आये, और भुट्टों को तोड़कर ले जा रहे हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00194.wav|रंगनाथ ने, सारा समाचार अपने दोस्त, वसंतराज को कह सुनाया, और बताया, कि श्रीगुप्त को अच्छा सबक़ सिखलाना चाहिए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00195.wav|जब वानर, फल और पानी पीकर सन्तुष्ट हुए, तो हनुमान ने स्वयं प्रभा को, अपना वृत्तान्त यो बताया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00196.wav|मेरी ही आज्ञा की अपेक्षा, बच्ची की रुलाई को रोकना, क्या इतना कठिन काम है, मैंने तो समझ रखा था, कि बीरबल अकलमंद है, और हर समस्या के परिष्कार को ढूंढने में सक्षम है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00197.wav|पिंजड़े को लेकर घर आये, शौहर को देखकर, फ़यिज़खान की बीवी ने पूछा, यह क्या है, क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता बेग़म साहिबा, यह पिंजड़ा है, और इसमें तोता है, फ़यिज़खान ने मुस्कुराते हुए कहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00198.wav|खाद्य पदार्थों, तथा फ़सलो को नष्ट करने वाले मृत हाथी जैसे विघ्नो को, मैं अपने तेज़ अंकुश से, क़ाबू में रखता हूँ, और उन्हें अपने पाश नामक मज़बूत रस्से से बांध देता हूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00199.wav|ऐसा हो जाए, तो कोई भी अफ़सर यहाँ आने का साहस ही नहीं करेगा, विमला ने बड़े ही आनंद के साथ कहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00200.wav|ल्यूक अंडरवुड ने, पिछले चार साल में, पोस्टर्स, हैप्पी मील बॉक्सेस, और खिलौनो के, से, अधिक पीसेस इकट्ठे किए थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00201.wav|कुमार स्वामी, ज्योंज्यों बड़े होते गये, त्योंत्यों, तारकासुर डर के मारे दुस्वप्न देखने लगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00202.wav|महा पर्वत पर रहकर, वह रूधिरभैरवी की उपासना कर रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00203.wav|गणेशखर ने, रुधिरभैरवी की मूर्ति को प्रणाम किया, उसके हाथ से शूल निकाला, और एक ही वार में, मित्रबिंद का सिर काट दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00204.wav|दिन में सवेरे सवेरे लोग, नीम की पत्ती, आजवायन, इमली, और गुड़ के मिश्रण की परम्परा गत चटनी बनाकर खाते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00205.wav|जरासन्ध और शिशुपाल, यह सोच कर बिगुल बजाते वापस लौट रहे थे, कि कृष्ण और बलराम, उस अग्नि कुण्ड में जलभुन कर भस्म हो गये होंगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00206.wav|फिर केहने लगा, यक्ष पर्वत, व उसके प्रार्श्व वर्ती प्रांतो का अधिपति है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00207.wav|हरे भरे खेत और वृक्ष, उसे अच्छे लगते थे, जो लगता था, जैसे वर्षा की अभीप्सा, और आशा में ऊपर निहार रहे हों|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00208.wav|बालक रुक गया, और क्षितिजो को स्पर्श करते हुए, बृहत आकाश की ओर टक टकी लगाकर देखने लगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00209.wav|सिदिंगी ने, सुलेन की कमीज़ के पॉकेट में रुमाल रखर, उस पर उस का नाम, और मृत्य का कारण लिख दिया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00210.wav|वर्णमाला का अभ्यास करने के पूर्व, बच्चों के द्वारा, हल्दी के ढेले, याने विघ्नेश्वर की पूजा करा कर, ओम नमः लिखना होगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00211.wav|ये बातें सुन, विष्णु बोले, अरे भोले, ऐसी बात नहीं है, है अणिमा आदि सिद्धियो, तथा आठ प्रकार के ऐश्वर्यों के लिए, मूल बनी सिद्धियाँ, आठ हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00212.wav|शरनिधि ने प्रश्न को गंभीरता से न लेते हुए पूछा, तो हारना क्या होगा, तब गं धर्व ने कहा, अगर होड़ में मैं हार गया, तो अपनी गं धर्व महिमा से, अधेड़ उम्र के तुम्हें, फिर से युवक बना दूँगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00213.wav|उस समय उनके हविष्यन्द, मधुश्यन्द, दृढ़नेत्र, और महारथ नाम के चार लड़के हुवे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00214.wav|क्या तुम्हें मालूम है, कि ट्रावनकोर के विश्व विख्यात राज कलाकार, राजा रविवर्मा ने ही, हिन्दू देवगण के अनेक दिव्य चरित्रों को, मानव आकृति प्रदान की|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00215.wav|वहाँ चार महीनों के प्रवास की अवधि में, उन्होने स रस्वती, लक्ष्मी, दम यन्ती, सीता, तथा सै रन्ध्री के चित्र बनाने के अतिरिक्त, राज घराने के सदस्यो के चित्र बनाये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00216.wav|महाराज पिंगल वर्मा, गँजा सिर, और पोपले मुँहावले एक ब्राह्मण की बलि चढ़ानी होगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00217.wav|सवेरा होते ही, वे किश्तियों में, जिनमें दूब के आसन बिछे हुए थे, नदी पार कर, उसके उत्तर तट पर पहुंचे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00218.wav|वह उसकी भक्तिपूर्वक सेवा, शुश्रूषा किया करता, तथा पानी समिधायें, दूब कन्द मूल फल, आदि दिया करता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00219.wav|पुरोहित ने, वह उपाय, रोमपाद को यों सुनाया, महाराज, ऋश्य शृंग, बचपन से ही लेकर, अरण्य में ही रहा, और वेदों का अध्य यन किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00220.wav|आन्ध्र प्रदेश की नाज़विद निवासी, मालती चेन्दूर मुख्यतः स्वयं शिक्षित थीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00221.wav|शुक्राचार्य ने सूक्ष्म रूप में, जल कलश की सूंड में छिपे रहकर, जल को गिरने से रोक रखा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00222.wav|इस पर वामन ने, दाभ का तिनका निकाल कर, जल कलश की सूंड में घुसेड़ दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00223.wav|हम लोगों ने उसे गिरवी व्यापारी को बेच दिया, एक सैनिक, दोनों आदमियों में से एक को लेकर, गिरवी व्यापारी के पास गया, और उसके पैसे लौटाकर, रत्न वापस ले लिये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00224.wav|ये एक टेक्नोक्रैट शिक्षिका, लेखिका, तथा एक सामाजिक कार्यकर्त्री हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00225.wav|इन्होने, में इण्डियन इंस्टि ट्यूट ऑफ़ साइंस से, एमटेक की स्ना तकोत्तर उपाधि प्राप्त की|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00226.wav|इन्हें पद्मश्री, चार डॉक्टॅरेट, मानोपधियाँ, तथा भिन्नभिन्न राष्ट्रीय, व अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार, अर्जित करने का भी श्रेय प्राप्त है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00227.wav|छिप कलियों और हाथियों के बीच, जो प्रेम व एकता है, वे मनुष्यों में पाये नहीं जाते, मैंने, भीलो को यह समझाया, और ज़ोर देकर कहा, कि आपस में लड़ना झगड़ना अच्छा नहीं है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00228.wav|अचानक उसे याद आया, कि पैसों की उसकी मखमली थैली घर पर छूट गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00229.wav|जब हरिनारायण के दोनों बेटो को मालूम हुआ, कि उनके पिता शमशान के एक रखवाले को लेकर हरिद्वार गये हुए हैं, और इस विषय को लेकर गाँव के लोग, उनके बारे में तरह तरह की बातें कर रहे हैं, तो शर्म के मारे उन्होने सिर झुका लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00230.wav|भारत की एनिड ब्लाइटन के रूप में, प्रख्यात, श्रीमती दत्ता की पुस्तकें, चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट, तथा अन्य के द्वारा प्रकाशित की गई हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00231.wav|उन्होने, भूमिहीनों को भूमि का दान दिया, गरीबों को, अश्न रोज़गार के लिए, पूंजी, और वृद्धजनों के लिए, तीर्थयात्रा का प्रबन्ध किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00232.wav|बड़े शिकारी, पोतों के वे, घिनौने जाल जो समुद्र की हर सामनेवाली चीज़ को घसीट लेते हैं, मोटरबोटों के, खूनी प्रोपेलर्स, तथा यदा कदा टकरानेवाले हत्यारे व्हेल, हालांकि, मैं मानती हूँ, वे प्रायः, हमें छोड़ देते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00233.wav|वेताल ने कहानी पूरी की, और राजा विक्रमार्क से पूछा, राजन्, चक्रि ने अपनी प्रेयसी विमला के लिए, प्रमुख रत्न व्यापारी पिता, व परिवार को छोड़कर, नाना कष्ट सहे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00234.wav|मध्य प्रदेश की राजधानी, भोपाल से करीब, किलोमीटर दूर, भीमबेटका है, जो वहाँ की लगभग गुफाओ में, शैल भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00235.wav|इन लगभग, एक वर्ष पुरानी चित्र कलाओं को देखकर, कोई भी इनके रूपों और आकारों की, यथा तथ्यता पर विस्मित रह जायेगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00236.wav|उसके पैर, बलिष्ठ थे, उसका चर्म इस्पात जैसा कठोर था, वज्र जैसे उसके जबड़े थे, उसकी आँखो से, अरुण कांति आ रही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00237.wav|वराह रूपधारी, विष्णु के साथ, हिरण्याक्ष, पराक्रम पूर्वक लड़ते हुए, विष्णु के गदा को उड़ा कर, ताल ठोकता हुआ खड़ा हो गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00238.wav|धृतराष्ट्र के आदेश पर संजय दूत बनकर, पांडवों के पास आए, और उन्हें शांति का संदेश सुनाया, कि युद्ध करना, किसी भी दृष्टि से हितकर नहीं है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00239.wav|उन्होने कौरवों को समझाया, कि यदि वे लोग पांडवों को आधा राज्य भी न दें, तो कम से कम इन्द्र प्रस्थ आदि पांच गाँव ही दे दें|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00240.wav|श्री कृष्ण के मुँह से, ये वचन सुन कर दुर्यो धन क्रोधावेश में आकर बोला, हे कृष्ण, तुम दूत बन कर आए हो, या पांडवों की वीरता की डींग हाँक कर, हमें धमकी देने आये हो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00241.wav|इसदिन होने वाले प्रोग्राम्स में, सुबह के गीत, भाषण, ध्वज वंदन, और स्थानीय स्तर पर, मनोरंजन, जैसे संगीत, लोक नृत्य, और कायाकिंग की कुशलता का प्रदर्शन शामिल होते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00242.wav|उफ़, यह कैसे आश्चर्य की बात है, मैं समझ रहा था, कि रुक्मिणी देवी, मितिभाषिणी है, पर आज वह बड़ी चतुरोक्तियाँ कर रही है, कृष्ण ने आश्चर्य प्रकट किया, इस समाचार ने काली चरण को हिला डाला|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00243.wav|विश्वामित्र के पास, एक अक्षौहिणी सेना है, मेरे पास बल नहीं है, मैं क्या कर सकता हूँ, आपकी तपःशक्ति के सामने, इन विश्वामित्र की क्या शक्ति है, इनकी सेना का संघार करने के लिए, मैं सेना की सृष्टि करती हूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00244.wav|ऋषि वषिष्ठ का आदेश मिलते ही, कामधेनु रम्भाने लगी, और उसके शरीर से, अनन्त म्लेच्छ पैदा होने लगे, और विश्वामित्र की सेना का संघार करने लगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00245.wav|एक समय उस झील के पास एक ढोलकिया रहता था, जिसे गाँवों के लिए, शादी व्याहों, और त्योहारों पर पैसे देकर, ढोल बजाने के लिए बुलाया करते थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00246.wav|अच्छ बेटे, उम्मीद है, मेरे मर जाने पर, मेरे मृत शरीर की, अन्तिम क्रिया का इन्तज़ाम कर दोगे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00247.wav|सूर्य चंद्र ने, उसकी यह धूर्तता देखी, और उन्होने मंदर पर्वताग्र पर, आसीन बहुरूपी विष्णु को, यह विषय सूचित किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00248.wav|राजपूत योद्धाओं ने डटकर सामना किया, पर जीतने की आशा न थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00249.wav|इसके उपरांत, यद्यपि मुगलों ने विक्रमजीत को सिंघासन सौपा, पर प्रजा उसके दुःशासन को सह न पायी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00250.wav|उस समय उत्तमकुमार रोते हुए आ पहुँचा, और ध्रुव के सामने हाथ फैला कर, उनको रोकते हुए बोला, भैया, आप कृपया जंगल में मत जाइये, आप जंगल में चले जायेंगे, तो मैं किसके साथ मिलकर, हरि का भजन करूँगा, मेरी माताजी ने, आप को डांटा, पर मैंने क्या किया है, मुझ पर आप क्यों नाराज़ होते हैं, आप रुक जाइये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00251.wav|सारंगधर राज्य में, आंजनेय शर्मा नामक, एक दैवज्ञ ज्योतिषी रहा करता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00252.wav|जिन नृत्य शैलियों में, कलारी प यत्तु के तत्व देखे जाते हैं, वे हैं, कोलॅ कली, वेलॅ कली, तथा यात्राकली|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00253.wav|यह बड़ी रोचक बात है, कि एक बौद्ध भिक्षु, बोधि धर्मा, इस क���ारी प यत्तु कला को, पाँचवीं शताब्दी में चीन ले गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00254.wav|गोरख प्रसाद, एक संदूक के सामने बैठकर, घबराये हुए, कपड़े लत्ते, संदूक़ से निकालकर बाहर फेंक रहा था, और चीख़ चीख़ कर कह रहा था, दहेज के रुपये दिखाई नहीं देते, हज़ार दो हज़ार नहीं, पूरे दस हज़ार रुपये, हमारे समधी ने, अभी रुपये भिजवाने को कहला भेजा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00255.wav|खांसी के बहाने मुझे कमरे से बाहर भेजकर, सारे रुपये हड़प लिये हैं, वह चोर है, बदमाश है, उसे पकड़ लो, भागो, इसी समय उधर से, राजनाथ भी चिल्लाते हुए वहाँ पर आ पहुँचा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00256.wav|छद्म वेष में छिपकर, विघ्न की बुरी हालत देख, दांत मींच लिया, तब अपने निज रूप में विघ्नेश्वर के सामने खड़े हो, सिंघनाद कर उठा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00257.wav|शरभ ने सिंघ के मुँह पर, अपनी सूँड का ऐसा प्रहार किया, कि उसका चेहरा सूझ गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00258.wav|इसके बाद पकी फ़सल का खेत आया, तब शील वती ने कहा, इस ख़ेत का मालिक, अपनी फ़सल बेचकर धन का सदुपयोग करेगा, तभी सचमुच उसे लाभ पहुँचेगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00259.wav|धुन का पक्का विक्रमार्क, पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा, उसे अपने कंधे पर ड़ाल लिया, और शमशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00260.wav|गंगा ने, बड़े ही आतुरता भरे स्वर में पूछा, कहीं इनके दिमाग़ को चोट तो नहीं लगी, घबराने की कोई बात नहीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00261.wav|इस पर, सुगोप ने हँसते हुए कहा, दिन भर भी मेहनत करोगे, तब भी तुम्हें एक अशर्फ़ी भी नहीं मिलेगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00262.wav|किसी व्यक्ति ने, शिवनाथ को सलाह दी, पहले तुम थोड़ा बहुत धन कमाओगे, तो बड़प्पन तुम्हारी खोज करते अपने आप आ जाएगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00263.wav|मन कर रहा था, कि झिंझोड क़र उठा दे खर्राटे लेते इस निष्ठुर व्यक्ति को, और चीख कर कहे, कि वह जा रही है हमेशा के लिए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00264.wav|एक वह भी तो वक्त था, जब निमिष चार साल का था, और उन्हें पता चला था, कि उसके हार्ट में एक होल है, तब वो दोनों, नन्हें निमिष को लेकर मद्रास भागे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00265.wav|पर वह चाहता था, कि उसे मुज़फ़्फ़र नगर के आसपास है, कहीं उसे नौकरी मिले, ताकि वह, पिता की देखभाल कर सके, और उपेक्षित पडी गाँव की थोडी सी ज़मीन, और ढहते हुए मिट्टी के, छोटे से मकान की भी साज संभाल करें|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00266.wav|पर एक जानलेवा निषिध्द सवाल के पंजे में, उसका मन हमेशा फड फ़डाता रहता, कि क्या वाकई वह, पिता के न रहने से इतना दुखी है, या उसका असली दुख यह है, कि पिता की मौत के रूप में, पिता के सामने, अपने को एक आज्ञाकारी, और आदर्श बेटा सिध्द करने का सुनहरा अवसर, उससे छीन लिया गया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00267.wav|बर्फ़ गिर रही होती, सांभर का मांस पक रहा होता, बांज की लकडियों से रेस्ट हाउस के कमरे गर्म हो रहे होते, और पहाड़ी क़िशोरिया, अफ़सरों की बांहो में किलोले कर रही होती|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00268.wav|बहरहाल, दो घंटे की जद्दोजहद के बाद, यह तय हुआ, कि सामंत को दस हज़ार रुपये देगा, और सामंत, जस का तस, चार्ज मेमो पर हस्ताक्षर कर देगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00269.wav|उसने रात में ही कैम्प क्लर्क को बुलाया, पांच सौ रुपये उसके हाथ पर रखे, और चार्ज मेमो की, एक प्रति उसे देकर रसीद प्राप्त कर ली, और सुबह को अपना सामान उठा कर, बिना किसी को बताए चलता बना, और जाकर मेरठ में जॉइन कर लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00270.wav|हमरी बहू ने, कल रात, अरहर की दाल में, ज़ीरे को छौक लगा दियो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00271.wav|सो तो है, जिया हम तो, देस के रए न बिदेस के थलिया के, बैंगन से बस्स, खुदै बुलौवा भेजा था, कि आजाओ बिलैत, मरे घर की चौकसी करबे को|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00272.wav|वहाँ भी अब, मैकडॉ नल्ड, पिट्ज़ा हट्स, और फ़ास्ट फ़ूड की कई चेन्स खुल गई हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00273.wav|संजना दीदी कहतीं, यह मेरा लडक़ा पता नहीं कैसा है, इसने कभी, शिकायत का कोई मौका नहीं दिया, घर हो, स्क़ूल हो, या पास पडोस, कहीं तो कोई बदमाशी कभी करे, क़ोई तो इसकी शिकायत लाए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00274.wav|उन्होने घबराकर पूछा, तो मैंने फ़टा फ़ट आँसूं पोछते हुए, ऐसे ही झूठ मूठ कह दिया, नहीं कोई बात नहीं है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00275.wav|ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार में, जब कभी मम्मी का स्वर, किसी भी वजह से बदला, या उखडा लगता, तो वह किसी न किसी बहाने, कावेन्ट्री जा कर, उनसे लाड दुलार भी कर करा आती थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00276.wav|मेरे पति ने कहा था, कि इस बार, अपने फ़्रेंड से मिल कर आना|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00277.wav|अपने पत्र का उत्तर न पाकर, कुछ दिन दारू के नशे में, शायद मित्रों के संग, गुनगुनाता रहा था, जब छोड दिया रिश्ता, तेरी ज़ुल्फ़े, स्याह का अब सैकडो बल खाया करे मेरी बला से|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00278.wav|इधर, उपाध्याय सर कक्षा में प्रवेश करते, उधर स्कूल के समीप स्थित, मदीना मस्जिद से, दुपहर की नमाज़ की अज़ान गूंजती|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00279.wav|अव्वल तो स्कूल के पीछे की झाड़ियो में घुसकर बेशरम की हरी टहनियां तोड़ लाना, और दूजा मिश्र सर के लिए खैनी का इंतज़ाम करना|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00280.wav|इन पाठशालाओं में स्कूल यूनीफ़ार्म, क्लास वर्क, होम वर्क, यूनिट टेस्ट जैसे बेहूदा चोंचले कहां थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00281.wav|उन्होने मूसा के लिए, चीनी मिट्टी की तश् तरी में, घुघनी भिजवाई, और मेरे लिए स्टील के प्लेट में|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00282.wav|दलितों और मुस्लिमों की छोटी जातियों के बीच, कांशी मायावती, ब्राण्ड बसपा, उत्तर प्रदेश से इधर आ बसे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00283.wav|यादवों और पटेलों के बीच, मुलायम वाली सपा, बहुसंख्यक नौजवानों में, बाला साहेब वाली शिवसेना, कटियार वाली बजरंग दल, सिंघल वाली विहिप, और बनिया बामनों के बीच, अडवाणी अटल की बीजेपी जैसी पार्टियों का अस्तित्व, साफ़ दिखलाई देता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00284.wav|विजय स्तम्भ चौक में, स्कूलों के बच्चे, प्रभात फ़ेरी के बाद आ जाते, और नगर के गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति में, वहां झण्डारोहण की कार्यक्रम सम्पन्न होता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00285.wav|मैंने तो आवाज़ भी दी थी, अंकल, अंकल, लेकिन शायद उनको सुने नहीं पड़ी, मैं अब तक, अपनी जांघों तक धस चुकी थी, क्या करुँगी, मैं अब क्या सचमुच इस दल दल में दबकर मर जाउंगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00286.wav|आरोग् यम् शरणम गच्छामि, निसर् गम् शरणम् गच्छामि, कुछ देर मैं उन दिव्य से लगते प्रार्थना के स्वरों को सुनता रहा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00287.wav|आखिर क्या सोचकर उसने मुझे, ठेल ठाल कर इस यात्रा के प्रस्ताव को स्वीकार करने पर मजबूर किया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00288.wav|चौबीस घंटों की भागदौड़ और तनाव है, झुग्गी झोपड़ियों का नरक और जीवन का विराट तथा अनवरत संग्राम है, और जिसके कारण ही, बड़े बड़े रोग हैं, निधन हैं, लाचारियां हैं, आत्म हत्याएं हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00289.wav|काउंटर के उस पार जाकर, वह चीखी, तुम्हारा आज का चार्ट आ गया है, राइटर, आज तुमको दो पहर के खाने में एक प्लेट सलाद, सोयाबीन का दही, और आधा प्लेट उबला हुआ पालक मिलने वाला है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00290.wav|एक खुशी जैसे उसको, कुछ मिल गया हो, मगर क्या इसी उधे डबुन में, वह तैरती, उ तरती प्लाज़ा की तरफ़ चल पडी, जिसकी सारी सजावट, उसी को करनी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00291.wav|उस समय उसको ऊपरवाले ने कैसा वरदान दिया, जो दिल दोबारा धडक़ा, और जीवन में अनुराग ताज़ा कोपल की तरह फूटा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00292.wav|सलमा अपने ग्��ाहको की फ़रमाईश दिल लगाकर पूरा करती, ताकि मुहल्ले के लोग, उसकी चक्की पर ही गेहूं पिसवाएं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00293.wav|लड़कियां दब्बू शर्मीली डरपोक वाचाल बनावटी और कमज़ोर सी होती हैं, जबकि इसके बरक्स, लड़के दबंग बिंदास निडर उद्दण्ड शातिर और जिस्मानी तौर पर मज़बूत होते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00294.wav|ईद बकरीद के मौक़े पर, बख्षीश बतौर सलमा के सारे परिवार के लिए, कपड़े हाजी जी के घर से आया करते थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00295.wav|यह स्वेटर किसका है, मेरी निगाहें सामने सोफ़ा पर टिक गईं, जहां हल्कि सलेटी रंग के ऊन की लच्छियां, और उनमें उलझी सलाइयां पडीं थीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00296.wav|एक शाम अपने नौकर के संग सैर करती हुई, शिमले में संजौली की सिमेट्री तक चली गई थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00297.wav|विन्नी के बालों का झोटा पकड़कर, उन्होनें गुड्डन के सामने ही उसे झिंझोड़ दिया था, देखो तो, वित्ता भरे की छोरी, कैसे बुराई कर रही है मेरी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00298.wav|गोल मटाल, सुन्दर सी गुड़िया सरीखी सौम्या का पा, वह अपने मातृत्व पर, फूली न समाती, और उसे एहसास होता, कि मातृत्व सुख प्रत्येक नारी के लिए एक अद्भुद और अनिवर्चनीय सुख होता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00299.wav|उसने नवीन की सहमति से चुपचाप इन्टर का फ़ार्म भर दिया था, तथा प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा भी दे आई थी, चुपके से, पर जब ननद ने उसकी अंकतालिका ससुर जी को दिखाई, तो वे आग बबूला हो उठे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00300.wav|कुछ कबूतर भीगते हुए भी, चहार दीवारी पर पड़े गेहूँ के दानो को चुगने में व्यस्त थे, एक दा गुटरगूं करते हुवे गोल गोल घूमकर नाच रहे थे, जैसे कई दिनों की भीषण गर्मी के बाद, इन नन्हीं नन्हीं बूदों, और शीतल हवा के झौकों का भरपूर आनन्द वे भी लेना चाहते हो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00301.wav|नवीन कलकत्ता से फ़ोन पर तो बोहोत मीठी मीठी बाते करता, पर जब एक दो हफ़्ते के अवकाश पर घर आता, तो प्यार की सारी बाते भूल कर, बात बात पर विनीता से झल्ला उठता था, उसे डाँट देता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00302.wav|तभी छोटे छोटे रोशनदानों से, चांदनी कमरे में कूद पडती है, अप्सरा की भांति, किसी तपस्वी को चटखा कर, पथ भ्रष्ट कर देने के लिये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00303.wav|आज के परिप्रक्ष्य में, जब मैं अफ़गानी औरत के बारे में सोचता हूं, कि अब ये, कैसे अपनी प्रति क्रिया ज़ाहिर करेंगी, या तो ये शोक में डूबी रहेंगी, इस लम्बे युध्द में खोये अपने परिजनो का, या उ��्तरी गठबंधन का स्वागत करेंगी, जिन्होने हाल ही में काबुल पर कब्ज़ा किया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00304.wav|शशांक ने कहा, आण्टी, आपकी बहेन बहुत ही प्रतिभाशाली है, दीदी ने कहा, शशांक, लेकिन तुम्हारी प्रतिभा का भी मुकाबला नहीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00305.wav|हर सांस के साथ, जैसे ज़ख्मो पर से किसी ने तेज़ छुरी की बाढ चला दी, और वह घड घडा हट जैसे, किसी पुराने खंडहर में लू चलने की आवाज़ होती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00306.wav|भूखा मरूं, हड्डियों का एक ढांचा, उस पर एक खोपडी, ख़ट खट करती सडक़ पर चली जा रही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00307.wav|अकबर साहब, आपके जिस्म का गोश्त, क्या हुआ, आपका चमडा किधर गया, जी मैं भूखा मर रहा हूं, गोश्त अपना मैनें गिध्दों को खिला दिया, चमडे क़े तबले बनवाकर, बी मुन्नी जान को तोफ़े में दे दिये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00308.wav|लेकिन कुछ ऐसी स्थितियां उपजीं, कि उनकी गर्वोक्तीयों से, वहां सबका मन ऊब गया, और उनसे संबंध न के बरा बर रह गया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00309.wav|उसने एक नज़र लिकर शॉप की ओर देखते हुए, सदाचारी जी से कहा, मंत्रीजी से मेरी मुलाकात हुई थी, पिछले साल अगस्त में, बडी रद्द मुलाकात थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00310.wav|हर चीज़ पर शंका और प्रश्न कर सकूँ, यह भी कह बैठूं कि सिद्ध करो, कि यह संसार, सच में है कि मैं हूं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00311.wav|मगर मैं तो हूं ही, चाहे कुछ हाथ न आए, समूचे संघर्ष और उत्कर्ष के बाद, खाली हाथ, जहां मैं लौटता हूं, वह कौन है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00312.wav|मैं सोहम् अस्तित्व का सबसे बड़ा सच, जहां से सब शुरू होता है, और जहां सब लौट आता है, अना सक्त प्रेम की तरह|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00313.wav|क्या है इन जगहों पर, कि वह बार बार चली आती है, अकेली बिना थके, बिना रुके|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00314.wav|ये ऊंचे नीचे पहाड़ी रास्ते, अपनी पीठों पर घास के गट्ठर लादे, ढलानों से उ तरती हंसती मुस्कराती स्त्रियां, जन्म से ही पहाड़ की ज़िंदगी, या पहाड़ सी ज़िंदगी को सहज स्वीकृति देतीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00315.wav|तुझ में किसी भी बहाने, यह ही नहीं सीखी है, तुमने यहां की ज़ुबानें, यों ही नहीं छान मारे हैं तुमने, सोहनी महिवाल के मानीखेज़ अफ़साने, यों ही नहीं आ गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00316.wav|दस मिनिट के भीतर, स्पैन रिसार्ट आ गया, जहां के विपाषतट पर, दुनिया भर के संगठित अहंकार द्वारा बहिकृष्त, अमीर फ़कीर ओशो ने, कुछ दिन बर्फ़ बारी के नीचे डेरा डाला था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00317.wav|पुल के बाद सीधी सपाट पक्की ���ड़क, दोनों तरफ़ देवदार और कैल के लंबे घने पेड़, उनसे छन कर आती गुनगुनी घूप, जो कुछ देर पहले नीचे उ तरती, ठिठुर रही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00318.wav|उसने उसकी हंसी को सलज्ज और रक्तिम कर दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00319.wav|ज़रूरत नहीं है, वह हम सदा से हैं, स्त्रीपुरुष असाध्य अजनबी, एंड दिस इज़ द ब्यूटी ऑंफ़ अवर एनकाउंटर, इसी में यात्रा है, नवनीत बहुत तड़पेंगे हम मिले और विछोह में|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00320.wav|अरण्या आशु कविता करने लगी, होश वालों को अगर होश होते, तो सारे शादीशुदा, ख़ाना बदोश होते, देर तक रक्स करते, तीन ठहाके गूंजते रहे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00321.wav|इतने वर्षों के बाद, ज़िंदगी की जद्दोजहद, और ज़िम्मेदारियों के बीच, कभी कभी मन भी बहुत ज़िद के बाद, जब भी मैंने अतीत की ढीठ खिडक़ी खोली है, नन्हे दस वर्षीय रघु को वहां, उस मोड पर खडे पाया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00322.wav|तब नहीं समझ सका था रघु, हज़ार अम्मा के समझाने के बाद भी, कि इतने बडे क़ुटुम्ब में होने के बावजूद, एक प्रौढ होता आदमी, अपनी अम्मा और बच्चों के होते हुए भी, कैसे अकेला हो सकता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00323.wav|सच्चा सयाना होशियार रघु, वहीं छूट गया ज़िंदगी ने जिसके कान पकड क़र राह पर लाने की कोशिश की, वो विद्रोही जिद्दी राघव था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00324.wav|लगा कि कोई सर्द आवाज़, झुर झरी बनकर, रीढ क़ी हड्डी में उतर गयी हो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00325.wav|मम्मी औसत से भी, उन्नीस चेहरे, और अपने विवेक के कारण, इस हीनताबोध ग्रंथि से ग्रस्त रहीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00326.wav|आपने तीसरी बार रंगीन टी वी खरीदा है, पांचवी बार बुकशेल्फ़ के शीशे बदलवाये हैं, चौथी बार, फ़्रिज की रिपेयरिंग करवाई है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00327.wav|दीमक मारने वाले पाउडर लाकर, पेड क़ी जडों में डाला, फिर स्प्रे मशीन से पूरे गाछ पर दवाई का छिडक़ाव किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00328.wav|आप पर छायी सुस्ती, खिन्नता, और निराशा की बदली छटने लगी है, और निखरा हुआ आलाहादित आकाश, छाने लगा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00329.wav|खुल जा सिमसिम, खुल जा सिमसिम के बोल, मेरे दिमाग में, झन झना रहे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00330.wav|गोरीगोरी कलाइयों पर, कांच की ढेरों चूडियां, बदन पर हरी छींट की कमीज़, सफ़ेद सलवार, और लेस लगी सफ़ेद चुन्नी, सिर पर ओढे हुए, माथे पर बडी सी सिंदूर की बिंदी, कुल मिलाकर, वो फ़िल्मों की हीरोईन, मीनाकुमारी जैसी सौन्दर्य की प्रतिमा लगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00331.wav|दोनो की गाडी पटरी पर दौड रही थी, कि अचानक, एक दिन प्रकाशो के पति को, पेट दर्द उठा, और वो फ़ैक्टरी से छुट्टी लेकर, सांझ होते ही घर लौट आया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00332.wav|ये पैर किस ताल पर थिरक रहे हैं, तुमने ज्वार देखा है, क्यूं उठता है, ज्वार किसके इशारे पर, और अगर मैं, ये सारे किनारे तोड दूं, जो तुम्हारे चारों तरफ़ हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00333.wav|तो संजय, आओ आओ, हम इस समंदर में, एक साथ उतरें, वो देखो, दूर उस किनारे पर मेरे कपडे रखे हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00334.wav|संजय, मैं यहां तक कैसे आ पहुँची, ये भी क्या, तुम्हें समझाना पडेग़ा, मेरे महबूब देखो, पानी मेरे घुटनों तक आ गया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00335.wav|बारिश फिर तेज़ हो गई, गड ग़डाते हुए बादल का शोर, बरसते पानी में भागता, टूवीलर चेहरे पर पानी की बौछार|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00336.wav|हमारी सलवारों के पांयचे, कीचड में लथपथ हो गए हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00337.wav|अंदर कोई अदृश्य टेपरिकॉर्डर फ़िट है, उनकी आवाज़ बार बार उस कैसेट पर सुनती हूँ, और अपनी शानदार रिकॉर्डिंग पर फ़ख्र मेहसूस करती हूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00338.wav|दादा जी को लकवा मार गया था, और वह एक भिखारी को दोष दे रहीं थीं, जिसे दादाजी ने, एक थप्पड ज़ड दिया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00339.wav|कार्यालय के सभी विभाग में यह खब़र, कार्यालय अधीक्षिका, मिसेज़ रंगारे के जूडे में लगे, मोगरे के फूल की बेनी की खुशबु की तरह फैल गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00340.wav|शूल केवल फूलों के संग ही नही उगते, बल्कि ये हर समाज में, शब्दों या अपशब्दों के रूप में, अपने विषाक्त डेने फैलाए, चाहे अनचाहे अपनी परिधि मे जकड कर, अपने डंक चुभाते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00341.wav|टापूदार भद्दी नासिका, और भरे मानसल, थुलथुल होंठ उसके चेहरे पर, मरूभूमि पर उग आए, कैक्टस की भांति चमक रहे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00342.wav|श्रीफल के वृक्षों से घिरी थी, वह खुरदुरी ईंट की दिवारों, व फ़र्श पर अद्भुत चित्र, अनूठे किन्तु रहस्य मयी प्राणरक्षा के लिये चौकडी मार भागता, थर थराता हुआ हिरन|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00343.wav|उसके पीत वर्ण के मलिन मुख पर, सूखे सफ़ेद होंठ देख कर प्रतीत होता था, जैसे बूढी क़ी बांहो में, कोई व्याधवेधित कबूतर छट पटा रहा हो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00344.wav|उसकी तुडी मुडी वेशभूषा, और गर्द, और पसीने में लथ पथ चेहरे से कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता, कि अभी तीन दिन पहले, फ़्रेंकफ़र्ट की कांफ़्रेन्स में उसने पेपर पढा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00345.wav|हलो, हलो, औरत की आवाज़ ऊपर उठी, और तब उसे पता चला, कि यह उस स्त्री की आवाज़ है जो उसकी पत्नी थी, वह उसे बरसों बाद भी, सैकडों आवाज़ों की भीड में पहचान सकता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00346.wav|ऊंची पिच पर, हल्के से कांपती हुई हमेशा से सख्त आहत, परेशान उसकी देह की एकमात्र चीज़, जो देह से परे, आदमी की आत्मा पर खून की खरोंच खींच जाती थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00347.wav|वैसे उस आयोजन में, वह स्वयं भी, कुछ अलग सी लगी, अन्दर श्री मति जैन की मदद कराते हुए, उसने एक बार, ड्रेसिंग टेबल के आईने में, ज़रा सा झाँक लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00348.wav|जब ठीक आठवें दिन, उसे एम्पलॉयमेन्ट न्यूज़ में आँख गडाए देखा, तो सब आश्वस्त हो गए थे, कि यह वही केतकी है, जिसने बचपन में भी, कमज़ोर और पतले पैरों को, निरन्तर अभ्यास से चलने के लिये ढाल ही लिया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00349.wav|खूब खिले हुए पलाश के नीचे पार्थ का कुक हनीफ़, अपना संक्षिप्त सा चौका जोडे क़ुछ पका रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00350.wav|लौटते ही उसने संबधित सब इन्सपेक्टर को ससपेंड कर दिया, और गाँव के सरपन्च को वार्निंग ही दिलवा सका, राजनैतिक दबाव की वजह से, पर, अच्छा खासा हंगामा खडा हो गया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00351.wav|चौथा कदकाठी से, सामान्य मगर पट्ठा, मज़बूत तीखे तेवरों, बेधती आंखों, और दहाड क़े लिए ख्यातनाम|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00352.wav|ऐसे खाकी वर्दी वाले मेरी बांयीं जेब में थोक के भाव में रहते हैं, और ज़्यादा स्याण पट्टी करी, तो तुम साले किस दिन के लिए हो, धिक् है, तुम्हें जेड ने अपने चंपुओं को धिक्कारा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00353.wav|हॉक गश्तीदल के चार सिपाहियों को लाइनहाज़िर कर दिया, क्योंकि वे रात को पौने दो बजे तरकीब से घर चले गए थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00354.wav|शहर में हैण्डपंप पानी की कमी, बिजली की कटौती, डैड टेलीफ़ोन्स, पेट्रोल के बढे दाम मंहगाई, आदि टुच्ची और व्यर्थ की समस्याएं, गौण हो गईं, और कानून में बढती अरा जकता मुख्य हो गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00355.wav|ये सारे के सारे लोग जो बेरोज़ग़ार थे, और काम करना चाहते थे, अरसे से खाली पेट और लगभग सुन्न दिमाग लिये, अब तक पस्त होने को आये थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00356.wav|बॉटनी का गोल्ड मेडलिस्ट, बैंक के काउंटर पर बैठा, दिन भर नोट गिनता था, और फ़िज़िक्स का फ़र्स्ट क्लास, कहीं सडे हुए सरकारी दफ़्तर में, घुन लगी कुर्सी पर बैठा, आलतू फ़ालतू की चिट्ठियों को दर्ज कर रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00357.wav|फ़रज़ाना से फिर नहीं मिल सकी, वो शारजाह चली गई, पर उसकी साँवली परछांई सी फ़िरदौस दादी से, मैं अपनी शादी के बाद एक बार फिर मिली, मम्मी के ऑफ़िस में|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00358.wav|अध्यापकों, प्रिंसीपल, थानेदार, और राजनीतिज्ञों के चक्रव्यूह में, वह अकेला घिर गया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00359.wav|पहले तो ऐसी स्थिति में, सुमित्रा एक ही जगह बैठी, घंटों गुज़ार देती थी, लेकिन आज तो वह अपने काम में व्यस्त हो गई, रसोई में जाकर, साबुत मूंग की दाल चढा दी, जो गिरजा को बहुत पसन्द है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00360.wav|सुबह करेलों को छील कर, उन पर नमक लगा कर रखा था, उन्हें सरसों के तेल में छोंक दिया, गिरजा बाहर आए, तो वह गरम गरम फुलका उतार देगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00361.wav|इसके अलावा, जेरिन के मामले में और क्या हो सकता है, अभी कुछ दिन पहले स्कूल के चार एक्स स्टूडेण्ट, केनेडा, अमेरिका, और न्यूज़ीलैण्ड से, अपने पेरेंट्स के पास, विज़िट पर आए थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00362.wav|एक सप्ताह बाद छूटे थे, और पॉसपोर्ट पर ज़िन्दगी भर के लिए, बैन लग गया था, नो एण्ट्री|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00363.wav|सिक्योरिटी रूम में, एक लध्दड सा, पांच फ़ुट और दो तीन इंच का, गहरा सांवला मोटा सा लडक़ा कुर्सी पर बैठा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00364.wav|यज्ञोपवीत धारण, करवा कर उसे द्विज बना दिया गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00365.wav|इसीलिए ठाठ बाठ देख कर, उनके वरिष्ठ अफ़सरों का, भीतर ही भीतर, फूंके रहना स्वभाविक था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00366.wav|उसकी पत्नी के भीतर, जो अथाह दर्द, और भयानक भय पसरा था, उसका न कोई चश्मदीद था, न ही कोई उसके आंसूओं को पोंछने वाला था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00367.wav|किसी भी होटल, या रेस्ट्रोन्ट में, दो घण्टे बैठकर खाना खाने में जो आनन्द मिलता है, वह कहीं न कहीं, एक संर्घष शील चेतना से उपजा आनन्द होता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00368.wav|पारम्परिक पोशाक पहन कर, तो वह अभिभूत हो गईं थीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00369.wav|सोने चाँदी के तारों की कढाई, वाले लहँगा, ओढनी, बाजूबंद, तगडी, नथ, बोरला, और भी न जाने, कितने पारम्परिक गहने, उसकी सास ने बडे आग्रह से पहनाए थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00370.wav|सुमेधा तैयार हुई, मोरपंखी ब्रोकेड का लंहगा, और एक हीरे का हल्का सा सेट चुन कर पहन लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00371.wav|वह उत्सुकतावश, उस गोखडे में, ओट लेकर खडी हो गई, जहाँ से नीचे वाली मर्दाना बैठक का कुछ हिस्सा, और प्रवेश द्वार के बाद, पडने वाला चौक साफ़ दिखता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00372.wav|मैं जानती नही, कि एक को चार कर��ा, रामा का प्रिय शौक है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00373.wav|उस दिन मैं कोई रोचक उपन्यास पढ़ने में तल्लीन थी, कि सुषी ने, किसी आंधी के समान आ कर उसे झिंझोड़ दिया था, तू यहां कोने में पड़ी किताब पढ़ रही है, और मैं तुझे पूरे घर में ढूंढ आयी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00374.wav|उपन्यास के पात्रों में खोई, मुझे उसका यूं आ टपकना, अखर गया, पर उसे मेरे मूड से क्या लेना देना था, वह तो इस समय अपनी ही धुन में थी, उसका उछाह, तेज़ आंच पर उबल आए दूध के समान छलका पड़ रहा था, मैंने पूछा, क्या हो गया, जो इस प्रकार हांफ़ रही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00375.wav|उसने चमकती आँखों से बताया, कि उसका विवाह तय हो गया है, दो दिनों बाद उसकी सगाई, और अगले माह, विवाह था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00376.wav|सच कहूं, तो कुछ क्षणों के लिये तो मेरे मन में इर्ष्या का भाव जग गया था, पर मैंने, अपने श्रुद्द मनोंभावनाओं के लिये, मन ही मन स्वयं को ही धिक्कारते हुए, अपनी सखी की प्रसन्नता में प्रसन्न होते हुए कहा, अरे नही, तू रूप की परी नही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00377.wav|तो क्या हुआ, गुणों की खान तो है, यह सुन कर सुषी भी आश्वस्त हो गई, मैने पूछा, हमारे जीजा जी क्या करते हैं, तो सुषी ने बताया, कि जतिन उसके पापा के अधी नस्थ हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00378.wav|वह आटे की परात, काचरियों, फुलियों, और हरी साग और दराती लेकर, वह पेड़ के नीचे बने इस चौतरे पर आ बैठती, और खाना बनाने की पूरी तैयारी यहीं करती|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00379.wav|पहला जो काम उसने किया, वह यही था, कि एक पक्की, एक कच्ची, कोठरी वाले घर के आंगन में लगे इस खेजड़े के पेड़ को, चारों तरफ़ भाटे लगाकर, चूना गारा थोप कर, ऊपर से लीप कर, उसने गोल सुघड़ चौतरा बना लिया था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00380.wav|अब वह नैसर्गिक आकांक्षाओं से भरपूर नदी में बदल जाती है, और इन्हीं आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु, प्रसन्न, प्रछन्न क्षमताओं से परिपूर्ण होकर बहती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00381.wav|राम किसन के लिये मुश्किल हो जाता है, इस, उफन्ती नदी को बांहों में भर कर तैरना|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00382.wav|सब कुछ, ठीक ही चलता, तो कठपुतली वाले रामकिसन की लुगाई सुगना की कहानी, चार दिशाओं में क्यों भागती|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00383.wav|धणी धोरे ढाबरों, और सासरे वालों के चलते, सुगना यूं अकेली पड़ जाती, वो गयी ही क्यों|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00384.wav|कुल धरा के उन खण्ड हर मकानों, और मन्दिरों की तरफ़ उस दिन भी टाबर स्कूल भेजकर, सुगना धम्म से, कठपुतलियों वाले कोने में गुड़ियों को ढेर पर ढह गई थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00385.wav|मनख माणस की भारी आवाज़, सुन सुगना ने झट गीला घूंघट काढ़ लिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00386.wav|ये कौव्वे और कोयल वाली कहानी खेलने को रामकिसन कठपुतली वाले का ही घर बचा था, रांड, लंगड़ा कर वह घिसटा, सुगना की तरफ़ हाथ भी उठे रामकिसन के, सुगना की पीठ पर, बरसने पर अगले पल ही गिर गये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00387.wav|साले रामकिसन लंगड़े, तू आग नहीं बुझा सका इस रांड की, कहकर रामकिसन क्रोध में मेंड़ की झरती, दीवार पर अपना हाथ मारने लगा, आंख से आंसू बहते थे, मुंह से लार|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00388.wav|लेकिन झोंपड़े में रात का अंधेरा जब गेहरा, और नीरव होता जाता, और फूस के फ़र्श पर, खेस बिछा कर लेटे हुए, उसकी चेतना जाग उठती, तो गर्भ में, वो नन्हा चूज़ा हल्के हल्के पंख फड़ फड़ाता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00389.wav|जोगी ने सर को झटका दिया, और बड़ बड़ाता हुआ बड़े बड़े डग भरता हुआ, पीछे को चला गया, जहां उसकी काली राज दूत, फट फटी खड़ी थी, सुगना को ले जाने के लिये|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00390.wav|एक पंच ने, पान का एक एक पत्ता, उन नाज़ुक हथेलियों पर रखा, और उन पर लाल गरम इंट रख दी गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00391.wav|अगले दिन सुबह कार्यालय के इंचार्ज, यानी कि तनु के बॉस, पदमन साहब और शुक्ला, सिर से सिर भिढ़ाये बैठे, मिले तो तनु का मन कांप गया, छटनी वाले कर्मचारियों के नाम पर ही चर्चा चल रही है शायद|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00392.wav|जीसस क्राइस्ट के काल में ही भारत से एक प्रतिभाशाली ब्राह्मण, कौडिण्य ने, मीकॉग के तट पर पदार्पण किया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00393.wav|अपने रूप दर और पिता के धनमान से अछूती सोमावीरा के हावभाव बोल चाल में, एक अपना ही लुभावना ओज था, एक आत्मविश्वास, जो उसकी ओर बाँध लेता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00394.wav|राज सम्मानित कम्बोज देश के जाने माने एक श्रेष्ठी के पुत्र, रूद्रक से, एक समारोह में मिले, तो बेहद प्रभावित हुए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00395.wav|राजकुमारी की भॉति, बहुत सारी लड़कियाँ, सोमवीरा के ईर्दगिर्द आने में जुट गयीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00396.wav|राज भवन के उद्यान से, ये सब मनोरम दृश्य पेश करते थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00397.wav|अगर टायपिस्ट, यह तुकबन्दी टायप करने से मना कर दे, कैन्टीन से चाय मिलने में तीन मिनिट से ज़्यादा लग जायें, कोई बिल, एक ही दिन में पास न किया जाये, तो वह तुरन्त इस्तीफ़ा दे देता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00398.wav|एक पलंग, एक टेबिल कुर्सी, और गैस सिलेण्डर, स्टोव्ह के अलावा, किताबें, जूते चप्पल, तमाम अटरम शटरम भी वहीं मौजूद रहता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00399.wav|अब सहारा सिटी होम्स, भीलवाड़ा में मुलाज़िम है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00400.wav|बड़ बड़ बड़, और ख़ड ख़ड करके, ताला खोल कर चली गई|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00401.wav|तटके फ़ुटपाथ, और पार्क, रंग बिरंगे बच्चों, और युवा जोड़ों से भरे, चिड़ियों से चह चहा रहे थे, सारी बोटें, सारी बैंचें, हथिया लीं उन्होंने|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00402.wav|वह झेंपता सा बोला, तुम जाकर चेंज वेंज करलो, तब तक मैं व्य वस्थित करता हूँ|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00403.wav|एक वृध्द कंधे पर लटकाने वाला खादी का झोला, टांगे है, ट्रेन में चढने का बहुत प्रयास कर रहा है, और संघाती धक्कों, और कोंचती कोहनियों के ज़ोर से चढ नहीं पा रहा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00404.wav|पांच छ: वर्ष का बालक, जो नीली धारीदार शर्ट और सफ़ेद हॉफ़ पैण्ट पहना है, अपने पिता का नाम, तिलक गो स्वामी बताता है, इन्क्वायरी दफ़्तर में है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00405.wav|चाय चाय, गरम इलायची वाली चाय, आवाज़ लगाता, पेन्ट्री कार का बेयरा, दूसरी तरफ़ से डब्बे में घुसा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00406.wav|झूठ फ़रेब में, कोई कितना ही उस्ताद बन ले, मगर हर पेशेवर मुखबिर, इस सवाल का जवाब देने से कतराता है, क्योंकि इससे उसकी रोज़ी रोटी ही नहीं, साख प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00407.wav|सीधे सीधे, एवज़ी में, कोई दलील काम नहीं करती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00408.wav|इसलिए निमिष भर को, वह झिझका, एक अलिखित काय़दे के मुताबिक़, रत्ती भर से ज़्यादा की झिझक मेहनत से बनाए, आपके ढांचे को, भुरभुरा कर सकती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00409.wav|शक की वजह से इसलिए भटकती पुतलियों को दबोच कर, उसने लम्बी सांस खींची|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00410.wav|मगर कागज़ पर, पठान को मुखबिर के तौर पर डाल दिया, ताकि उसका अतिरिक्त उत्साह वर्धन हो सके|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00411.wav|महीने भर बाद, महीने भर बाद, उसे पचास पचास हज़ार का अंतरिम इनाम भी दिलवा दिया, रकम पकड़ाने के बाद, मैंने उसे आड़े हाथों ले धरा, जीवतराम खिलाड़ी नं, दो ने, मेरी लाज बचा ली, वरना पठान तुम तो मुझे ले डूबे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00412.wav|सारा ट्रेड कमीशन के आधार पर चलता है, जिसकी तयशुदा दर, छह प्रतिशत है, मगर यह तो सिक्के का दिखावटी पहलू है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00413.wav|यह भी खूब होता, कि एक बारात से लौटे नहीं, और उधर दूसरी में भागना पड़ रहा है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00414.wav|मगर उस दुनिया में, हम प्रसन्न सुखी थे, तो इसलिए, कि एक क़िस्म के परपीड़ा सुख को, सलीके से बगल में दबोचने के बावजूद, बेडौल ही सही, मगर न्याय के एक नामुराद से बच्चे को, हम हर रोज़ डिलीवर होते देखते थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00415.wav|खिलाड़ी नम्बर दो की जानकारी मैंने, अपने कंप्यूटर से ही जुटाई थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00416.wav|इसलिए, हर हफ़्ते ही, किसी न किसी की बारात निकलती थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00417.wav|पठान, थोड़ी देर झिझका था, क्योंकि अक्सर तो मैं, स्वयं उसे कुछ नया लाने को प्रोम्प्ट करता था, और फिर भी मेहनत से सुझाए, उसके पांच सात प्रपोज़ल्स में, एकाध को ही तवज्जो देता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00418.wav|मैंने तो कभी चींटी भी नहीं मारी, की सुबकियां भरता जाता, बहुत जल्द वह गुत्थी, मेरे हाथ लग गई, जो उसके पांव तले की ज़मीन को, इस क़दर पोला किए दे रही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00419.wav|उसके चेम्बर से, एक कम उम्र, और यक़ीनन खूबसूरत हसीना के साथ, उसकी रंगीनी पर मुहर लगाती खतो, किताबत, और चंद तस्वीरें, यानी तस्वीरें बुतां, और खातूनों के खत़, मरने से पहले ही कौन बचाएगा, तुझे, मेरी मियां मजनू जोशी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00420.wav|यूं हर बार, एक नया मुर्गा पकड़ने की आदिम इच्छा, खून के बहाव में शामिल रहती थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00421.wav|मगर पौने तीन साल से, वही पंचनामा बनवाते, कैवटीज़ ढूंढते, झूठ के मनोगत औज़ारों से, धन्नासेठों, को धराशायी करते, काफ़ी ऊब भी होने लगी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00422.wav|इसके यहां एक डॉक्टर हैं, मित्रा, उसका भाई पुलिस में है, उसके कारण, मित्रा पुलिस को संभाल लेता है, और जमकर वसूलता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00423.wav|यह काम समझो कोई नब्बे बानवे साल से हो रहा है, ज़्यादातर बेहिसाबी, मगर पिछले चार पांच साल से, डॉक्टर जोशी ने, घुटने बदलने, नी रिप्लेसमेंट की शल्य चिकित्सा में, खूब नाम और नामा कमाया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00424.wav|यानी साल के तीन सौ दिन भी गिनो, तो नौ करोड़ की बिक्री, डॉक्टरों के संदर्भ में, बिक्री शब्द कहते, मैं इसके अट पटे प्रयोग पर हँसा, इम्प्लांट समेत, कितने ही खर्चे डालो, तीन करोड़ से ऊपर का मुनाफ़ा तो बैठेगा ही|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00425.wav|मुंह बिचकाकर, मैंने उसे आदतन खारिज करना चाहा, मगर उसकी जवाबी कारावाई ने मेरे शक का पलीता कर दिया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00426.wav|एक मार्मिक आशु कथा के सहारे इलाज करवाकर बाहर निकल रहे, क़स्बाई मरीज़ के बिल की फ़ोटोकॉपी, उसने अलग से करवा ली थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00427.wav|वार्ड बॉइज़ और नर्सों के सामने, अपनी मालिका का मुल्लमा उतार, वह बार बार मेरे घुटने पकड़कर, फूट फूटकर रोने लगा, और मैंने तो, कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00428.wav|दुनिया जहां के राज़ बटोरकर, जब वह मुझसे मिलना चाहता, तो मैं उसे किसी नए रेस्त्रां, पार्क, या स्टेशन पर आने को कहता, न कि दफ्त़र या घर, फ़ोन पर उसे अपना, या मेरा नाम लेने की मनाही थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00429.wav|क्योंकि निजी तौर पर हमने, अविश्वास की यह घुट्टी पी रखी थी, कि वंस एन इन्फ़ोरमेंट, आल्वेज़ एन इन्फ़ोरमेंट|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00430.wav|मैं हर क़ीमत उसके फुसलाने में नहीं आना चाहता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00431.wav|सोने जागने की असामान्यता, और खाने पीने की अनियमितता ने, अजीब तरह से, तोंदियल, और नती जतन, हवाबाज़ बना छोड़ा था, मोर्चे पर आक्रमण करने के इस मजबूर दस्ते में, हम आठ लोग थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00432.wav|किसी विदग्ध लती की तरह एक पखवाड़े के भीतर ही, मैं उसके साथ मामले की, निटी ग्रिटीज़ में उतरता जा रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00433.wav|यह एक हडिड्यों के डॉक्टरों का गेंग था, जो ट्रौमा अस्पताल चलाता था, पांच, सम व यस्क डॉक्टरों की भागेदारी, जिसकी रहनुमाई डॉक्टर आकाश जोशी के सुपुर्द थी, ऑपरेशन की कागज़ी तसल्ली के लिए, ज़रूरी बातें, वहां पहले से ही मौजूद थीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00434.wav|क्रीम कलर की छह मंज़िला भव्य इमारत के अंदर, बाहर के फ़ोटोग्राफ़्स, सभी भागीदार डॉक्टरों का सांझा नोट पैड, सभी डॉक्टरों के घर के पते, और मोबायल नंबर, उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली, चमाचम गाड़ियां|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00435.wav|तरीका तो जी बड़ा सीधा है, ट्रौमा के केसिज़ को हाथ लगाने में, दूसरे अस्थि विशेषज्ञ डरते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00436.wav|रोज़ के दो घुटने ऑपरेट करता है, एक सुबह, एक शाम, हरेक का डेढ़ लाख लेता है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00437.wav|पठान इस शहर में, क्या इतने बेवकूफ़ लोग हैं, जो अपनी गाढ़ी कमाई को, आधे दिन के इलाज में उड़ा देंगे, हर चीज़ में तो डिस्काउंट मांगते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00438.wav|इन्फ़ोसिस में कार्यरत, अपने काल्पनिक चाचा के घुटने के आरोपण के सिलसिले में, वह आकाश जोशी की घसीट लिखावट में, संभावित खर्च का हस्ताक्षरित पर्चा मुझे दिखा रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00439.wav|मेरे सामने, सब कुछ दिन के उजाले सा उज्ज्वल था, या इतनी रोशनी तो दे ही रहा था, कि डॉक्टर जोशी के खड़े किए, अंधेरे चुहचुहा जाएं, अब कोई गुंजाइश नहीं थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00440.wav|मिशन की एक मज़ेदार बात, डॉक्टर आकाश जोशी के बचपन की सरेआम वापसी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00441.wav|मुखबिर के लिहाज़ से पठान मेरा मुंह लगा था, मगर हमारे आपसी ताल्लुक़ात पेशेवर ही थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00442.wav|मेरे साथ किए, उसके केसेज़ के हिसाब से, मैं उसे एक संख्या पकड़ा देता था, जो उसकी तात्कालिक पहचान का काम करती, किसी मुखब़िर को हमारा फ़ोन करना तो, उसूलन ही नहीं बनता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00443.wav|आर्थिक विषमताएं पटाने के रास्ते, संसाधन जुटाने की राज्य की घोषित नीति के हम, हरवाल पुर्ज़े थे, तो पठान की बिरा दरी मानव के सामाजिक व्यवहार से उत्पन्न, एक कुटिल पूंजीवादी ल्यूब्रीकेंट, उसका इनाम तो ज़ाहिर था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00444.wav|गर्मजोशी तो दूर, ढंग से बात करने तक की ज़रूरत ही नहीं समझी गयी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00445.wav|उसे पापा के क्लब ने स्पॉन्सर किया है, स्पेशल ट्रेनिंग के लिए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00446.wav|मैं अपना पावड़ाल, हंगानुमा वस्त्र झाड़ते हुए द्वार पर रंगोली डाल कर फ़र्श से उठी ही थी, कि एक ऑटो था, तुम ऑटो वाले से हिन्दी में फिर अंग्रेज़ी में, दोनों में झगड़ चुके थे, तब मैंने बीच में व्यवधान डाला था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00447.wav|तूफ़ान तो उठा था, पर एक प्रतिष्ठित परिवार की मर्यादा की परंती में दबा ढ़का|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00448.wav|और आज भोर के मटमैले धुंधलके में, धुंआ होती, तुम्हारी छाया से, फिर वही आवाज़ उठी है, चलता हूँ वनजा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00449.wav|इन महीनों में, रबी फ़सल की, कटनी दौनी की, अफ़रा तफ़री मची होती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00450.wav|दरवाज़े पर, जीप है, ट्रैक्टर है, थ्रेशर है, पम्पिंग सेट है, एक जोड़ी बैल हैं, भैंस है, जर्सी गाय है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00451.wav|पूरा जीवन ही जड़ से उखड़ कर, इस तूफ़ान में उड़ गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00452.wav|रेगिस्तानी भटकावों, और प्यास से त्रस्त, मैं मानो उन सरोवरों में कूद पड़ा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00453.wav|लेकिन मेरे खय़ाल से नब्बे प्रतिशत लोग, इस इलाके में ऐसे थे, जो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी चलाने के कष्टों के मारे ही, सर नहीं उठा पाते थे, तो वे, ऐसा कब सोचते या कर पाते, जो स्मगलिंग या जासूसी से जुड़ा हो|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00454.wav|अब हमारे बच्चे, बाहर पढ़ने लगे हैं, तो देर से ब्याह करते हैं, पढ़ी लिखी बहुएं आ गयी हैं, तो उन्होंन�� गांव आना ही कम कर दिया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00455.wav|सजे संवरे, गठरी बने मासूम बच्चे, अपने भविष्यों और गृहस्थी समस्याओं से बे खबर, नींद में डूबे, या निंदासे, अधजगे, फेरों के साथ घूम रहे थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00456.wav|इतने हंगामे और ख़बर भेजे जाने के बावजूद, वे गीदड की तरह, चुपचाप रावले नामक अपनी नांद में दुबके रहे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00457.wav|निष्क्रियता और गैरज़िम्मेदारी दिखाई थी, सरकारी तंत्र ने, और रावले में रहने वाले, गांव के तथा कथित मालिकों ने, जिनके सारा गांव पैर पूजता था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00458.wav|चांदनी का फीका आलोक, झौंपड़ी की टूटे कूवले की छत में से रिसता हुआ, चमकीली, कटी चिप्पियों की शक्ल में, कुरजां के आधे उघड़े भूरे घायल शरीर पर छिटका हुआ था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00459.wav|जाते जाते ताकीद करना नहीं भूली, मेहराजी, एक बात कहूं, हमारे पीर साहिब से, तावीज़ बनवा लीजिए, पूनम जी बिल्कुल ठीक हो जायेंगी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00460.wav|जो लोग मुझे और गुरू को जानते हैं, उन्हें इस रिश्ते की मासूमियत पता है, जिन्हें कुछ नहीं मालूम, उनके लिए थोडा सा इण्ट्रो डकशन ज़रूरी है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00461.wav|ताज्जुब की बात, क़ि बात करने का यह ढंग, उन्हें किसी ने सिखाया नहीं है, न उनकी बातें, दादी अम्मा के अन्दाज़ क़ी होती हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00462.wav|और न वह बिगडे बच्चों की तरह देखते हैं, क़ुछ अलग बात ही दिखती है उनमें, हर बात त्वरित, और प्रत्युनमति की उपज जैसी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00463.wav|बडी मुश्किल से पॉर्किंग मिली, हवा तेज़ थी, समुद्र की लहरें, फेन उगलती, दूर तक बाहर निकलकर लौटलौट जातीं, रेत का एक बडा भाग, भीगता सूखता हुआ, एकसी नियति को सह रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00464.wav|हममें से हर कोई, इधर उधर देखकर ही केसीना पर निशाना लगा रहा था|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00465.wav|जब हम अपनी नाकाम कोशिशों से लगभग हार से गए थे, तभी एक लम्बा तगडा, और झक गोरा नौ जवान, जो केवल शॉर्ट्स पहने था, हमारे करीब आया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00466.wav|वालेकूम असल्लाम क़ेफ़त, आलसब तीक तो अय, दोनों पुलिसवाले सूडानी थे, और उनकी तीक अय सुनकर लगा, कि उन्हें हिन्दी, थोडी थोडी तो आती ही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00467.wav|वैसे भी जहां उन्होंने बीच सडक़ पर कार पॉर्क की थी, उसके पीछे लम्बी कतार लग चुकी थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00468.wav|सभी अपने कारों का, हज़ार्ड बटन ऑन करके खडे थे, क़िसकी हिम्मत थी, कि वह पुलिस की कार को हॉर्न देता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00469.wav|मैं किसी ज़मात में नहीं पढता, नमाज़ी नहीं हूं, ज़मात तो मॉस्क में, अज़ान के बाद होती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00470.wav|जब सभी मुसलमान नमाज़ पढने के लिए भागते हैं, मैं तो थर्ड स्टैण्डर्ड में पढता हूं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00471.wav|एह मुण्डेयां नाल, घुमणा फिरणा बन्द कर दे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00472.wav|हर महीने पांच सौ पाउण्ड तो, मॉर्गेज की किश्तों में निकल जाती हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00473.wav|पहले सैफ़ अमृता हुए, फिर लारा दत्ता, कैली दोरजी, करीना शाहिद, विक्रम भट्ट अमीषा पटेल, और तो और, इस बुढापे में आमिर खान के माँ बाप भी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00474.wav|खाली टैम में अपने पैट्स के साथ खेलती है, और कंम्प्यूटर का, क ख नहीं जानती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00475.wav|यह ठंड की किक्याहट नहीं, दूसरी सूँघ है, जो बोल रही है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00476.wav|पश्चात, ठिलिया, ठिनगाते हुए, वापस बस्ती में आँखें खोजती हुई, कहाँ कौन मृत उपेक्षित पड़ा हुआ है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00477.wav|इस कमरे में, और बस स्टैण्ड की उस सीमेन्ट की बैंच में क्या फ़र्क है, फिर उन्हें लगा, कि वे किसी रेलवे प्लेटफ़ार्म पर हों|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00478.wav|कम्प्यूटर की नित नई तकनीक ने, मनुश्य की नैसिग्रिक क्रिया कलापों, सूक्ष्म ध्वनियों, सिंफ़नियों को समाप्त कर, उसकी मेधा को अपने हाथ में ले लिया है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00479.wav|चण्डीगढ़, मोहाली, नोयडा, मुम्बै से लेकर, बंगलूर तक की यात्राएं कर चुका है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00480.wav|छोटे अर्ज़ की टूल के दो पाट तो जोड लिये गये, मगर अभी सफ़ेद गजी क़ा निशान, ब्योंतने की किसी की हिम्मत न पडती थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00481.wav|कुबरा की मां, कपड़े क़े कान निकालती, कलफ़ तोडतीं, कभी चौखूंटा करतीं, और दिल ही दिल में कैंची चलाकर, आंखों से नाप थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00482.wav|ऐसे में, कोई मन चली, कोई सुहाग, या बन्ना छेड देती, कोई और, चार हाथ आगे वाली सम धनों को, गालियां सुनाने लगती, बेहूदा गन्दे मज़ाक, और चुहलें शुरु हो जातीं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00483.wav|मणिपुरी और भरतनाटयम की मुद्रा न दिखा सकेंगे, इन्हें प्यानो पर, रक्स करना नहीं सिखाया गया|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00484.wav|इन्हें फूलों से खेलना नहीं नसीब हुआ, मगर ये हाथ, तुम्हारे जिस्म पर चरबी चढाने के लिये, सुबह शाम सिलाई करते हैं, साबुन और सोडे में डुबकियां लगाते हैं, चूल्हे की आंच सहते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00485.wav|एक झटके से, उसका हाथ, पहाड क़ी खोह में डूबता चला गय���, नीचे, अफ़्फ़ुन और तारीकी से अथाह ग़ार की गहराइयों में, एक बडी सी चट्टान ने उसकी चीख को घोंटा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00486.wav|जब भी मैंने तन्मय को राहुल के अंतरंग मित्र की तरह पाया, तो न जाने क्यों, मैं ईष्या से भर गई, वह जब राहुल के कंधों पर हाथ रख बतियाता, मैं चिढ जाती, और इस बात को लेकर राहुल से झगड पडती, और उसके बारे में फैली बुरी बातों का ज़िक्र करती|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00487.wav|अजीत के छिटपुट, वह अब तक सहजता से स्वीकार करती आई थी, पर वह जानती थी, कि अजीत इसे, आत्मसात न कर पाता|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00488.wav|अगले ही दिन पल्लव, शलभ सर के ऑफ़िस में जा कर आई, सर मेरी कोई रूचि नहीं है, मॉरिशस जाने में, मेरी थीसिस का अंतिम अध्याय चल रहा है, जल्दी ही सबमिट करवा दूंगी, आप वायवा की डेट फ़िक्स करवा दें|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00489.wav|प्राय दृढता के अतिआग्रही व्यक्तित्व, जब कमज़ोर पडकर भुरभुराने लगते हैं, अन्तश्चेतना उन्हें, अपने ही बनाये कन्ट्रोलरूम में ले जाकर सताने लगती है|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00490.wav|ऐसी आंधी, और इससे जुडी आवाज़ें, क़िसी अनिष्ट की आशंका क्यों जगाती हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00491.wav|खिडक़ियों में बने, घोंसलों में बैठी चिडियां, पंख फड फडाने लगी, खिडक़ियों के पल्ले खुल चुके थे, और खिडक़ियों के सींखचों के बीच, बामुश्किल अटके घोंसले, तेज़ हवा से अब गिरे, कि तब गिरे की हालत में थे|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00492.wav|डार्विन के सिध्दान्त पर, चिडियां अपने आप को परखती हैं क्या|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00493.wav|इसीलिए, अब इतनी देर बाद, पीडा के अतिरेक से आंसू छल छला उठे हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00494.wav|सब कुछ ऐसी जल्दी में हुआ, कि उसे तो याद है, बस रिक्शा में, नौरंगी के दोस्त, सदाकत अली की बहन का बुरका, पहन के स्टेशन तक आना, और वहाँ नौरंगी का मिलना|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00495.wav|दुख, कितना छोटा शब्द है यह, पर कितना ज़बर्दस्त फैलाव है इसमें, कि बडी से बडी ज़िंदगी, और छोटे से छोटे लम्हे भी, इसके भीतर समाकर, झंझावत बन जाते हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00496.wav|जो ज़िंदगी वो रही होती है, समतल नदी की शक्ल में उसमें अचानक इस तरह बाढ आ जाती है, कि फिर छोटी बडी ख़ुशी हसरतें आशाए|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00497.wav|कार लोन की किश्त, अगले साल खत्म हो जाऐगी, तब दूसरी ढूंढूंगा|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00498.wav|मुख्य पृष्ठ पर कुछ पाकिस्तान से आए सिख परिवारों की थी, जो स्वात घाटी जहां, तालीबान के कहर से बचने के लिए, अमृतसर आ गए, और भारत सरकार से भारत में बसने के लिए अनुरोध कर रहे हैं|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00499.wav|यही एक ऊम्मीद थी, जो इस निम्न मध्य वर्गीय घर को, भविष्य में उबार सकती थी|indic_hi_female_3|hi +audio/indic_hi_female_3_00500.wav|पिंक सिटी दिल्ली के सरायरोहिल्ला स्टेशन से, सीधे छः बजे चलती है, और दो पहर तीन बजे जयपुर पहुंचती है|indic_hi_female_3|hi