{"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nटेसा जॉवल का कहना है कि मृतकों और लापता लोगों के परिजनों की मदद के लिए एक केंद्र स्थापित किया जा रहा है. उन्होंने इस हादसे के तीन के बाद भी मृतकों की सूची जारी करने में हो रही देरी के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा है शवों की ठीक पहचान होना ज़रूरी है. पुलिस के अनुसार धमाकों में मारे गए लोगों की संख्या अब 49 हो गई है और अब भी 20 से ज़्यादा लोग लापता हैं. पुलिस के अनुसार लंदन पर हमले योजनाबद्ध तरीके से हुए और भूमिगत रेलगाड़ियों में विस्फोट तो 50 सैकेंड के भीतर हुए. पहचान की प्रक्रिया किंग्स क्रॉस स्टेशन के पास सुरंग में धमाके से क्षतिग्रस्त रेल कोचों में अब भी पड़े शवों के बारे में स्थिति साफ नहीं है और पुलिस ने आगाह किया है कि हताहतों की संख्या बढ़ सकती है. पुलिस, न्यायिक अधिकारियों, चिकित्सकों और अन्य विशेषज्ञों का एक आयोग बनाया गया है जिसकी देख-रेख में शवों की पहचान की प्रक्रिया पूरी होगी. महत्वपूर्ण है कि गुरुवार को लंदन में मृतकों के सम्मान में सार्वजनिक समारोह होगा जिसमें उन्हें श्रद्धाँजलि दी जाएगी और दो मिनट का मौन रखा जाएगा. पुलिस का कहना है कि वह इस्लामी चरमपंथी संगठन अबू हफ़्स अल-मासरी ब्रिगेड्स का इन धमाकों के बारे में किए गए दावे को गंभीरता से ले रही है. 'धमाके पचास सेकेंड में हुए' पुलिस के अनुसार लंदन पर हुए हमले योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे. पुलिस के अनुसार भूमिगत रेलों में तीन बम अलग-अलग जगहों लगभग अचानक फटे थे. इसलिए पुलिस को संदेह है कि धमाकों में टाइमिंग उपकरणों का उपयोग किया गया होगा. यह भी तथ्य सामने आया है कि धमाकों में आधुनिक किस्म के विस्फोटकों का उपयोग किया गया था. पहले माना जा रहा था कि हमलों में देसी विस्फोटकों का इस्तेमाल किया गया होगा. पुलिस मुख्यालय स्कॉटलैंड यार्ड में सहायक उपायुक्त ब्रायन पैडिक ने बताया कि भूमिगत रेलों में तीन धमाके 50 सेकेंड के अंतराल के भीतर हुए थे. धमाके गुरुवार सुबह आठ बजकर पचास मिनट पर हुए थे. लंदन अंडरग्राउंड से मिली विस्तृत तकनीकी सूचनाओं से यह तथ्य सामने आया है. इससे पहले बम धमाकों में अच्छे खासे अंतराल की बात की जा रही थी.\n\nSummary:", "target": "ब्रितानी सरकार ने लंदन के बम धमाकों में मारे गए लोगों के परिजनों की मदद करने की ज़िम्मेदारी एक मंत्री टेसा जॉवल को दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nटेसा जॉवल का कहना है कि मृतकों और लापता लोगों के परिजनों की मदद के लिए एक केंद्र स्थापित किया जा रहा है. उन्होंने इस हादसे के तीन के बाद भी मृतकों की सूची जारी करने में हो रही देरी के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा है शवों की ठीक पहचान होना ज़रूरी है. पुलिस के अनुसार धमाकों में मारे गए लोगों की संख्या अब 49 हो गई है और अब भी 20 से ज़्यादा लोग लापता हैं. पुलिस के अनुसार लंदन पर हमले योजनाबद्ध तरीके से हुए और भूमिगत रेलगाड़ियों में विस्फोट तो 50 सैकेंड के भीतर हुए. पहचान की प्रक्रिया किंग्स क्रॉस स्टेशन के पास सुरंग में धमाके से क्षतिग्रस्त रेल कोचों में अब भी पड़े शवों के बारे में स्थिति साफ नहीं है और पुलिस ने आगाह किया है कि हताहतों की संख्या बढ़ सकती है. पुलिस, न्यायिक अधिकारियों, चिकित्सकों और अन्य विशेषज्ञों का एक आयोग बनाया गया है जिसकी देख-रेख में शवों की पहचान की प्रक्रिया पूरी होगी. महत्वपूर्ण है कि गुरुवार को लंदन में मृतकों के सम्मान में सार्वजनिक समारोह होगा जिसमें उन्हें श्रद्धाँजलि दी जाएगी और दो मिनट का मौन रखा जाएगा. पुलिस का कहना है कि वह इस्लामी चरमपंथी संगठन अबू हफ़्स अल-मासरी ब्रिगेड्स का इन धमाकों के बारे में किए गए दावे को गंभीरता से ले रही है. 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प्रमुख खगेन सर्मा ने बताया है कि उल्फ़ा ने पिछली कुछ घटनाओं की तरह इस बार भी हिंदी भाषी लोगों को अपना निशाना बनाया है. ग़ौरतलब है कि इसी वर्ष सितंबर महीने में भारत सरकार और उल्फ़ा के बीच बातचीत टूट गई थी. इसके बाद से रविवार की घटना अभी तक की सबसे बड़ी हिंसक घटना है.\n\nSummary:", "target": "भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम के अधिकारियों ने बताया है कि राज्य की राजधानी गुवाहाटी में हुए तीन बम विस्फोटों में 15 लोगों की मौत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइन विस्फोटों में कम से कम 30 लोगों के घायल होने की भी ख़बर मिली है. पुलिस के मुताबिक पहला धमाका गुवाहाटी के भीड़-भाड़ वाले इलाके फ़ैंसी बाज़ार में हुआ है. फ़ैंसी बाज़ार में जहाँ पर विस्फोट हुआ है वहाँ असम से लगे हिंदी भाषी राज्य बिहार के कुछ लोग कीर्तन करने के लिए इकट्ठा हुए थे. इस समारोह में हुए धमाके में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई. दूसरा धमाका शहर के दक्षिणी हिस्से में एक ऐसी जगह पर हुआ जहाँ पर पत्थर तोड़ने का काम किया जाता है. इस धमाके में दो लोगों की मौत हो गई. तीसरा धमाका गुवाहाटी के एक 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following text in Hindi.\n\nText:\nइस मामले में एयर इंडिया और फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (एफआईए) ने बयान जारी किया है. इस फेडरेशन में इंडिगो, जेट एयरवेज़, स्पाइसजेट और गो एयर शामिल हैं. सबने इस वाकये की कड़ी निंदा की है. इन्होंने गायकवाड़ पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है. एफआईए के असोसिएट निदेशक उज्ज्वल डे ने बयान में कहा है, ''हमारे किसी भी कर्मचारी पर हमला हम सब पर हमला है.'' एयर इंडिया और एफआईए सदस्यों ने गायकवाड़ को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित करने का फ़ैसला किया है. एफआईए ने कहा, ''हमारा मानना है कि यह कार्रवाई मिसाल की तरह होगी ताकि आगे कोई हमारे कर्मचारियों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करे. यह लोगों की सुरक्षा के हक़ में है. हम ऐसे यात्रियों को 'नो फ्लाई' लिस्ट में डालने का प्रस्ताव रखते हैं. ऐसे यात्रियों का हम स्वागत नहीं करेंगे और हमें इस मामले में सरकार के साथ सुरक्षा एजेंसियों की मदद चाहिए. एयर इंडिया ने गायकवाड़ के पुणे का टिकट भी रद्द कर दिया है. पीटीआई ने एयरलाइन के सूत्रों को हवाले से यह ख़बर दी है. इससे पहले रविंद्र गायकवाड़ा ने एयर इंडिया के ऑफिसर पर हमले के मामले में माफी मांगने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि 'काहे का पाश्चाताप'. गायकवाड़ पर आरोप है कि उन्होंने एयर इंडिया के मैनेजर पर प्लेन में हमला किया. वह हमले के बाद ख़ुद ही बता रहे थे कि उन्होंने उस अधिकारी को चप्पल से 25 बार मारा. वह एक वीडियो में ऐसा कहते हुए ख़ुश दिख रहे हैं. गायकवाड़ ने अपने व्यवहार के लिए माफी मांगने से साफ़ इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि वह ख़राब सेवा के लिए एयर इंडिया की शिकायत करेंगे. गायकवाड़ का कहना है कि उनके साथ एयर इंडिया के मैनेजर ने दुर्व्यवहार किया था. महाराष्ट्र में ओसमानबाद से सांसद गायकवाड़ फ़्लाइट में बिज़नेस क्लास के टिकट नहीं मिलने से नाराज़ थे. वह पुणे से दिल्ली आ रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस फ़्लाइट में कोई बिज़नेस क्लास की सीट नहीं थी और इसकी सूचना उन्हें पहले ही दे दी गई थी. उन्हें वीआईपी सुविधा मिले इसके लिए वह पहली पंक्ति में बैठाया गया था. गायकवाड़ इतने भर से ख़ुश नहीं थे. जब फ़्लाइट दिल्ली पहुंची तो उन्होंने उतरने से इनकार कर दिया. इसके बाद ड्यूटी मैनेजर शिव कुमार केबिन में पहुंचे और उन्होंने उन्हें मनाने की कोशिश की. इसी दौरान गायकवाड़ ने उन पर हमला बोल दिया. एयर इंडिया के कर्मचारी ने अपनी शिकायत में लिखा है कि इस देश को भगवान ही बचा सकता है. शिव सेना का कहना है कि वह तथ्यों को देखने के बाद ही कुछ कहेगी. हालांकि पार्टी ने कहा कि वह हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेगी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "एयर इंडिया के कर्मचारी पर हमला करने के आरोप में शिवसेना सांसद रविंद्र गायकवाड़ पर एयर इंडिया और फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (एफआईए) ने प्रतिबंध लगा दिया है. इस प्रतिबंध के बाद अब गायकवाड़ कई एयरलाइंस में हवाई सफर नहीं कर पाएंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस मामले में एयर इंडिया और फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (एफआईए) ने बयान जारी किया है. इस फेडरेशन में इंडिगो, जेट एयरवेज़, स्पाइसजेट और गो एयर शामिल हैं. सबने इस वाकये की कड़ी निंदा की है. इन्होंने गायकवाड़ पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है. एफआईए के असोसिएट निदेशक उज्ज्वल डे ने बयान में कहा है, ''हमारे किसी भी कर्मचारी पर हमला हम सब पर हमला है.'' एयर इंडिया और एफआईए सदस्यों ने गायकवाड़ को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित करने का फ़ैसला किया है. एफआईए ने कहा, ''हमारा मानना है कि यह कार्रवाई मिसाल की तरह होगी ताकि आगे कोई हमारे कर्मचारियों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करे. यह लोगों की सुरक्षा के हक़ में है. हम ऐसे यात्रियों को 'नो फ्लाई' लिस्ट में डालने का प्रस्ताव रखते हैं. ऐसे यात्रियों का हम स्वागत नहीं करेंगे और हमें इस मामले में सरकार के साथ सुरक्षा एजेंसियों की मदद चाहिए. एयर इंडिया ने गायकवाड़ के पुणे का टिकट भी रद्द कर दिया है. पीटीआई ने एयरलाइन के सूत्रों को हवाले से यह ख़बर दी है. इससे पहले रविंद्र गायकवाड़ा ने एयर इंडिया के ऑफिसर पर हमले के मामले में माफी मांगने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि 'काहे का पाश्चाताप'. गायकवाड़ पर आरोप है कि उन्होंने एयर इंडिया के मैनेजर पर प्लेन में हमला किया. वह हमले के बाद ख़ुद ही बता रहे थे कि उन्होंने उस अधिकारी को चप्पल से 25 बार मारा. वह एक वीडियो में ऐसा कहते हुए ख़ुश दिख रहे हैं. गायकवाड़ ने अपने व्यवहार के लिए माफी मांगने से साफ़ इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि वह ख़राब सेवा के लिए एयर इंडिया की शिकायत करेंगे. गायकवाड़ का कहना है कि उनके साथ एयर इंडिया के मैनेजर ने दुर्व्यवहार किया था. महाराष्ट्र में ओसमानबाद से सांसद गायकवाड़ फ़्लाइट में बिज़नेस क्लास के टिकट नहीं मिलने से नाराज़ थे. वह पुणे से दिल्ली आ रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस फ़्लाइट में कोई बिज़नेस क्लास की सीट नहीं थी और इसकी सूचना उन्हें पहले ही दे दी गई थी. उन्हें वीआईपी सुविधा मिले इसके लिए वह पहली पंक्ति में बैठाया गया था. गायकवाड़ इतने भर से ख़ुश नहीं थे. जब फ़्लाइट दिल्ली पहुंची तो उन्होंने उतरने से इनकार कर दिया. इसके बाद ड्यूटी मैनेजर शिव कुमार केबिन में पहुंचे और उन्होंने उन्हें मनाने की कोशिश की. इसी दौरान गायकवाड़ ने उन पर हमला बोल दिया. एयर इंडिया के कर्मचारी ने अपनी शिकायत में लिखा है कि इस देश को भगवान ही बचा सकता है. शिव सेना का कहना है कि वह तथ्यों को देखने के बाद ही कुछ कहेगी. हालांकि पार्टी ने कहा कि वह हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेगी. 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(सांसद की नौकरानी अस्पताल में भर्ती) हैप्पी होम केयर नाम की प्लेसमेंट एजेंसी चलाने वाले जॉर्ज ने बीबीसी को बताया कि दक्षिण एशियाई देशों में घरों में काम करने वालों का न्यूनतम मानदंड तय है. उनका कहना है कि सिर्फ भारत ही ऐसा देश है जहाँ घरेलू नौकरों की न्यूनतम मज़दूरी के बारे में कोई चर्चा नहीं की जाती. जो जैसे चाहता है वैसे नौकरों से काम लेता है. एजेंसियों की भूमिका हाल ही में उनके जानने वाली एक एजेंसी ने सिंगापुर में घरेलू काम करने के लिए किसी को भेजा तो उसे 250 सिंगापुरी डॉलर मिल रहे हैं. वो कहते हैं, \"अमरीका और यूरोपीय देशों में तो ये दर ज़्यादा है. मगर ज़्यादातर एजेंसियों को पता ही नहीं है कि हमारे देश में ही घरेलू काम करने वालों के लिए भी न्यूनतम मज़दूरी लागू है.\" वहीं ह्यूमन हेल्पिंग हैंड्स नाम की एजेंसी चलाने वाले विमल मेहता का कहना है कि घरेलू नौकर उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां विदेश भेजने का काम नहीं करतीं. वो कहते हैं कि घरेलू नौकर भेजने का काम सिर्फ वो पंजीकृत एजेंसियां करती हैं जो अमूमन विदेशों में मज़दूर भेजने का काम करती हैं. इसके लिए अलग से लाइसेंस लेना पड़ता है. जॉर्ज और मेहता का कहना है कि घरेलु नौकर उपलब्ध कराने वाली ज़्यादातर एजेंसियों को पता ही नहीं है कि न्यूनतम मज़दूरी क्या है और क्या दिया जा रहा है. जॉर्ज ने बताया, \"हमें पता है कि नियुनतम मज़दूरी क्या है, इस लिए हम महानगरों में भी सात से आठ हज़ार रूपए प्रति महीना से नीचे नौकरों को नहीं भेजते. आस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो हम 35 से 40 हज़ार रुपये तक दिलवाते हैं घरों में काम करने वाले नौकरों को.\" न्यूनतम मज़दूरी लंबे अरसे से घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे झारखण्ड निवासी गौतम बोस कहते हैं कि वर्ष 2010 में न्यूनतम मज़दूरी क़ानून लागू किया गया था, मगर कई राज्य ऐसे हैं जहाँ इस क़ानून को लागू नहीं किया गया है. यही कारण है कि शोषण थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है. उनका कहना है कि ज़्यादातर राज्यों में इस क़ानून की अधिसूचना ही जारी नहीं की गई है जबकि कुछ राज्यों ने इसे न्यूनतम मज़दूरी के दायरे में रखा है. वो कहते हैं, \"काफ़ी संघर्ष के बाद ये क़ानून लाया तो गया मगर श्रम विभाग के लोगों ने इसे सख़्ती के साथ लागू करने की कोशिश ही नहीं की. न्यूनतम मज़दूरी की दर 180 रुपए प्रतिदिन तय की गई है. मगर ऐसे भी मामले हैं जब घर में काम करने वालों को महीने में 200 रुपए भी नहीं मिल पाते हैं.\" (इनके पास न तो संगठन है...) घरेलू काम करने के क्षेत्र में मज़दूरी की अनियमितता ने मानव तस्करी को ही बढ़ावा दिया है. बड़े बड़े महानगरों में छोटे शहरों, कस्बों और गावों से बड़ी संख्या में लड़कियां घरेलू नौकरानियों के रूप में काम कर रही हैं. आयोग इनमें से ज़्यादातर लड़कियां औने पौने मजदूरी में ही काम करने को मजबूर हैं. कई मामलों में इनके साथ हुए शोषण के किस्से अख़बारों की सुर्ख़ियां बने. बढ़ रहे शोषण और तस्करी के मामलों के बाद झारखंड की सरकार ने इसे रोकने के लिए एक आयोग का गठन किया है. इस आयोग के उपाध्यक्ष संजय मिश्रा ने बीबीसी से बात करते हुए स्वीकार किया कि न्यूनतम मज़दूरी के क़ानून के बारे में किसी को कुछ पता नहीं है और महानगरों से काम करने वाली प्लेसमेंट एजेंसियां ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ही काम कर रही हैं. वो कहते हैं कि यही एजेंसियां घरेलू काम के लिए लोगों को अन्य देशों में भेजने का काम भी कर रही हैं. काम की न्यूनतम उम्र को लेकर अभी विचार चल रहा है. निर्धारण होने के बाद अभियान चलाया जाएगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका में रह रहीं भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के मामले के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ गई है कि भारत से विदेश ले जाए जा रहे घरेलू नौकरों की तनख्वाह और वहाँ के न्यूनतम वेतन के बारे में प्लेसमेंट एजेंसियों को कोई जानकारी भी है या नहीं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी नें जिन कुछ एक प्लेसमेंट एजेंसियों से बात की उनमे से ज़्यादातर को न तो देश में लागू किये नियुनतम मज़दूरी के क़ानून के बारे में जानकारी है और ना ही विदेशों के श्रम क़ानूनों के बारे में ही कोई मालूमात है. कुछ एक एजेंसियों के संचालकों नें गोपनीयता की शर्त पर बताया कि कई मामलों में घरेलु काम के लिए विदेश ले जाए जा रहे लोगों को जिस क़रार के तहत ले जाया जाता है, उनपर कोई खरा नहीं उतरता. यानि मिसाल के तौर पर अगर किसी घरेलू नौकर को तीस हज़ार रूपए देने का क़रार किया जाता है तो उन्हें सिर्फ दस हज़ार तक ही मिल पाते हैं. (सांसद की नौकरानी अस्पताल में भर्ती) हैप्पी होम केयर नाम की प्लेसमेंट एजेंसी चलाने वाले जॉर्ज ने बीबीसी को बताया कि दक्षिण एशियाई देशों में घरों में काम करने वालों का न्यूनतम मानदंड तय है. उनका कहना है कि सिर्फ भारत ही ऐसा देश है जहाँ घरेलू नौकरों की न्यूनतम मज़दूरी के बारे में कोई चर्चा नहीं की जाती. जो जैसे चाहता है वैसे नौकरों से काम लेता है. एजेंसियों की भूमिका हाल ही में उनके जानने वाली एक एजेंसी ने सिंगापुर में घरेलू काम करने के लिए किसी को भेजा तो उसे 250 सिंगापुरी डॉलर मिल रहे हैं. वो कहते हैं, \"अमरीका और यूरोपीय देशों में तो ये दर ज़्यादा है. मगर ज़्यादातर एजेंसियों को पता ही नहीं है कि हमारे देश में ही घरेलू काम करने वालों के लिए भी न्यूनतम मज़दूरी लागू है.\" वहीं ह्यूमन हेल्पिंग हैंड्स नाम की एजेंसी चलाने वाले विमल मेहता का कहना है कि घरेलू नौकर उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां विदेश भेजने का काम नहीं करतीं. वो कहते हैं कि घरेलू नौकर भेजने का काम सिर्फ वो पंजीकृत एजेंसियां करती हैं जो अमूमन विदेशों में मज़दूर भेजने का काम करती हैं. इसके लिए अलग से लाइसेंस लेना पड़ता है. जॉर्ज और मेहता का कहना है कि घरेलु नौकर उपलब्ध कराने वाली ज़्यादातर एजेंसियों को पता ही नहीं है कि न्यूनतम मज़दूरी क्या है और क्या दिया जा रहा है. जॉर्ज ने बताया, \"हमें पता है कि नियुनतम मज़दूरी क्या है, इस लिए हम महानगरों में भी सात से आठ हज़ार रूपए प्रति महीना से नीचे नौकरों को नहीं भेजते. आस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो हम 35 से 40 हज़ार रुपये तक दिलवाते हैं घरों में काम करने वाले नौकरों को.\" न्यूनतम मज़दूरी लंबे अरसे से घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे झारखण्ड निवासी गौतम बोस कहते हैं कि वर्ष 2010 में न्यूनतम मज़दूरी क़ानून लागू किया गया था, मगर कई राज्य ऐसे हैं जहाँ इस क़ानून को लागू नहीं किया गया है. यही कारण है कि शोषण थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है. उनका कहना है कि ज़्यादातर राज्यों में इस क़ानून की अधिसूचना ही जारी नहीं की गई है जबकि कुछ राज्यों ने इसे न्यूनतम मज़दूरी के दायरे में रखा है. वो कहते हैं, \"काफ़ी संघर्ष के बाद ये क़ानून लाया तो गया मगर श्रम विभाग के लोगों ने इसे सख़्ती के साथ लागू करने की कोशिश ही नहीं की. न्यूनतम मज़दूरी की दर 180 रुपए प्रतिदिन तय की गई है. मगर ऐसे भी मामले हैं जब घर में काम करने वालों को महीने में 200 रुपए भी नहीं मिल पाते हैं.\" (इनके पास न तो संगठन है...) घरेलू काम करने के क्षेत्र में मज़दूरी की अनियमितता ने मानव तस्करी को ही बढ़ावा दिया है. बड़े बड़े महानगरों में छोटे शहरों, कस्बों और गावों से बड़ी संख्या में लड़कियां घरेलू नौकरानियों के रूप में काम कर रही हैं. आयोग इनमें से ज़्यादातर लड़कियां औने पौने मजदूरी में ही काम करने को मजबूर हैं. कई मामलों में इनके साथ हुए शोषण के किस्से अख़बारों की सुर्ख़ियां बने. बढ़ रहे शोषण और तस्करी के मामलों के बाद झारखंड की सरकार ने इसे रोकने के लिए एक आयोग का गठन किया है. इस आयोग के उपाध्यक्ष संजय मिश्रा ने बीबीसी से बात करते हुए स्वीकार किया कि न्यूनतम मज़दूरी के क़ानून के बारे में किसी को कुछ पता नहीं है और महानगरों से काम करने वाली प्लेसमेंट एजेंसियां ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ही काम कर रही हैं. वो कहते हैं कि यही एजेंसियां घरेलू काम के लिए लोगों को अन्य देशों में भेजने का काम भी कर रही हैं. काम की न्यूनतम उम्र को लेकर अभी विचार चल रहा है. निर्धारण होने के बाद अभियान चलाया जाएगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 3, "source_item_id": "3", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3677, "clean_index": 3, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:3"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबिल क्लिंटन ने घोषणा की है कि वे चाहते हैं कि विकासशील देशों में एचआईवी-एड्स दवाओं की कीमत में 25 से 50 फ़ीसदी तक की कमी हो. क्लिंटन फ़ाउंडेशन ने भारत की दो दवा कंपनियों सिपला और मैट्रिक्स लेबोरेटरीज़ के साथ एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के लिए समझौता किया है. दूसरी श्रेणी की ये एंटीरेट्रोवायरल दवाएँ तब इस्तेमाल होती हैं जब एचआईवी-एड्स का सस्ती दवाओं से इलाज संभव नहीं होता है. ये दवाएँ अफ़्रीका, एशिया, लातिनी अमरीका और कैरिबियाई 60 से अधिक देशों में उपलब्ध होंगी. सस्ती दवाएँ बिल क्लिंटन ने कहा कि इन देशों में सात करोड़ लोगों को एचआईवी-एड्स के इलाज की आवश्कता है लेकिन महंगी दवाओं के कारण लोग इलाज नहीं करा पाते हैं. उनका कहना था,'' कोई कंपनी एड्स की दवाओं में कमी से ख़त्म नहीं होगी लेकिन इससे पीड़ित रोगी की मौत हो सकती है.'' साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वो बौद्धिक संपदा में विश्वास रखते हैं और चाहते हैं कि दवा निर्माता अपनी दवा की खोज की लागत और लाभ निकालें. क्लिंटन फ़ाउंडेशन यूनिटेड नामक संगठन के सहयोग से काम कर रहा है जिसे फ्रांस, ब्राज़ील, चिली, नॉर्वे और ब्रिटेन जैसे देशों ने स्थापित किया है और वह इस कार्यक्रम को वित्तीय सहयोग प्रदान कर रहा है. उल्लेखनीय है कि भारत एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए सस्ती जेनेरिक दवाएँ बनाता है जो कई देशों में निर्यात भी की जाती हैं. लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बौद्धिक संपदा क़ानूनों के तहत जेनरिक दवाए बनाए जाने का विरोध करती हैं. ग़ौरतलब है कि दुनिया भर में लगभग चार करोड़ 20 लाख लोग एचआईवी का शिकार हैं. उनमें से दो तिहाई तो अफ़्रीकी देशों में रहते हैं और जिन देशों में इसका संक्रमण सबसे ज़्यादा है वहाँ हर तीन में से एक वयस्क इसका शिकार है.\n\nSummary:", "target": "पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने घोषणा की है कि उनकी फ़ाउंडेशन ने दो भारतीय दवा कंपनियों से समझौता किया है ताकि एचआईवी या एड्स से पीड़ित लोगों को कम क़ीमत पर दवाएँ उपलब्ध हो सकें.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबिल क्लिंटन ने घोषणा की है कि वे चाहते हैं कि विकासशील देशों में एचआईवी-एड्स दवाओं की कीमत में 25 से 50 फ़ीसदी तक की कमी हो. क्लिंटन फ़ाउंडेशन ने भारत की दो दवा कंपनियों सिपला और मैट्रिक्स लेबोरेटरीज़ के साथ एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के लिए समझौता किया है. दूसरी श्रेणी की ये एंटीरेट्रोवायरल दवाएँ तब इस्तेमाल होती हैं जब एचआईवी-एड्स का सस्ती दवाओं से इलाज संभव नहीं होता है. ये दवाएँ अफ़्रीका, एशिया, लातिनी अमरीका और कैरिबियाई 60 से अधिक देशों में उपलब्ध होंगी. सस्ती दवाएँ बिल क्लिंटन ने कहा कि इन देशों में सात करोड़ लोगों को एचआईवी-एड्स के इलाज की आवश्कता है लेकिन महंगी दवाओं के कारण लोग इलाज नहीं करा पाते हैं. उनका कहना था,'' कोई कंपनी एड्स की दवाओं में कमी से ख़त्म नहीं होगी लेकिन इससे पीड़ित रोगी की मौत हो सकती है.'' साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वो बौद्धिक संपदा में विश्वास रखते हैं और चाहते हैं कि दवा निर्माता अपनी दवा की खोज की लागत और लाभ निकालें. क्लिंटन फ़ाउंडेशन यूनिटेड नामक संगठन के सहयोग से काम कर रहा है जिसे फ्रांस, ब्राज़ील, चिली, नॉर्वे और ब्रिटेन जैसे देशों ने स्थापित किया है और वह इस कार्यक्रम को वित्तीय सहयोग प्रदान कर रहा है. उल्लेखनीय है कि भारत एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए सस्ती जेनेरिक दवाएँ बनाता है जो कई देशों में निर्यात भी की जाती हैं. लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बौद्धिक संपदा क़ानूनों के तहत जेनरिक दवाए बनाए जाने का विरोध करती हैं. ग़ौरतलब है कि दुनिया भर में लगभग चार करोड़ 20 लाख लोग एचआईवी का शिकार हैं. उनमें से दो तिहाई तो अफ़्रीकी देशों में रहते हैं और जिन देशों में इसका संक्रमण सबसे ज़्यादा है वहाँ हर तीन में से एक वयस्क इसका शिकार है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 5, "source_item_id": "5", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1611, "clean_index": 4, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:4"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुतीउर रहमान निज़ामी की दया याचिका सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दी थी. अधिकारियों का कहना है कि मुतिउर रहमान निज़ामी को ढाका की केंद्रीय जेल में फांसी दी गई. जमाते इस्लामी के नेता निज़ामी को 1971 में पाकिस्तान से आजा़दी के लिए हुई जंग में मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों का दोषी पाया गया थाय साल 2013 से लेकर अबतक फांसी दिए जाने वाले वो पांचवे बड़े नेता हैं. पहले दी गई फ़ांसियों का मुल्क में विरोध हुआ है. समाप्त बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निज़ामी की दया याचिका ख़ारिज कर दी थी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी के नेता को युद्ध अपराध के लिए फांसी पर लटका दिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुतीउर रहमान निज़ामी की दया याचिका सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दी थी. अधिकारियों का कहना है कि मुतिउर रहमान निज़ामी को ढाका की केंद्रीय जेल में फांसी दी गई. जमाते इस्लामी के नेता निज़ामी को 1971 में पाकिस्तान से आजा़दी के लिए हुई जंग में मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों का दोषी पाया गया थाय साल 2013 से लेकर अबतक फांसी दिए जाने वाले वो पांचवे बड़े नेता हैं. पहले दी गई फ़ांसियों का मुल्क में विरोध हुआ है. समाप्त बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निज़ामी की दया याचिका ख़ारिज कर दी थी. 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मोगादीशू के साथ-साथ दक्षिणी सोमालिया में भी इस इस्लामी गठबंधन का नियंत्रण है. जबकि अंतरिम सरकार बैदोवा और इसके आसपास के छोटे इलाक़े पर भी नियंत्रण रख पाई है. अमरीका का आरोप है कि द यूनियन और इस्लामिक कोर्ट का संबंध अल क़ायदा से है. लेकिन यह गुट इन आरोपों से इनकार करता है. बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि इन धमाकों के कारण युद्ध से ग्रस्त सोमालिया में और तनाव बढ़ने की आशंका है. सोमालिया में पिछले 15 वर्षों से पूर्ण कामकाज संभालने वाली राष्ट्रीय सरकार नहीं है. दस दिन पहले ही बैदोवा के विद्रोही नेता मोहम्मद इब्राहिम हबसदे ने बीबीसी को बताया था कि अगर सरकार के सदस्य शांतिपूर्वक बैदोवा छोड़कर नहीं जाएँगे, तो विद्रोही उन्हें वहाँ से निकाल बाहर करेंगे.\n\nSummary:", "target": "सोमालिया के अंतरिम राष्ट्रपति अब्दुल्लाही युसूफ़ पर जानलेवा हमला हुआ है. राष्ट्रपति युसूफ़ के काफ़िले के पास हुए एक कार बम धमाके में पाँच लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन राष्ट्रपति युसूफ़ को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा है. सोमालिया के विदेश मंत्री इस्माईल हूरे ने कहा 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शियाओं के प्रभाव वाला आंतरिक मंत्रालय सुन्नियों को गिरफ़्तार करने का अभियान चला रहा है ताकि वो संविधान पर होने वाले जनमतसंग्रह में हिस्सा न ले सकें. सुन्नी नेताओं ने संघीय ढाँचे के मुद्दे को लेकर संविधान का मसौदा तैयार करने में सहयोग न करने की बात कही है. हिंसा का दौर उधर इराक़ की राजधानी बग़दाद में हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. पुलिस के अनुसार बुधवार को बग़दाद में एक कार बम धमाके समेत हिंसा की विभिन्न घटनाओं में कम से कम 17 लोगों की मौत हो गई है. कार बम धमाके में पुलिस को निशाना बनाया गया था. उसके बाद नकाबपोश बंदूकधारियों ने जम कर गोलियाँ चलाईं. पुलिस सूत्रों के अनुसार इस हमले में मारे गए लोगों में कम से कम तीन पुलिसकर्मी शामिल थे. इस घटना में 50 से ज़्यादा लोग घायल भी हुए.\n\nSummary:", "target": "इराक़ के दक्षिणी शहर नजफ़ में कट्टरपंथी शिया नेता मुक़्तदा अल सद्र समर्थकों की एक प्रतिद्वंद्वी शिया समूह के लोगों से भिड़ंत में कम से कम पाँच लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंघर्ष के दौरान सद्र के दफ़्तर में आग लगा दी गई. नजफ़ 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रही है. पुलिस इस तथ्य पर ध्यान दे रही है कि सभी धमाके पाँच-पाँच मिनट के अंतराल पर हुए. पहले पुलिस ने समझा था कि चारों धमाके 25 मिनट के भीतर हुए. फ़ोरेंसिक जाँच दल भूमिगत रेल सुरंगों और अन्य घटनास्थलों पर तेज़ी से काम कर रहे हैं और वहाँ से जाँच क लिए नमूने इकट्ठे कर रहे हैं. ये दल यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन धमाकों के लिए कौन से विस्फोटक और तरीक़ा इस्तेमाल किया गया. मैट्रोपोलिटन पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा, \"अगले कुछ दिनों में बहुत कुछ काम होगा और फ़ोरेंसिक जाँच के लिए बहुत से नमूने इकट्ठे किए जाएंगे.\" कैमरों की जाँच लंदन में बड़ी संख्या में ऐसे कैमरे लगे हैं जिनमें हर समय रिकॉर्डिंग चलती रहती है और कोई भी संदिग्ध गतिविधि उनमें रिकॉर्ड हो जाती है. पुलिस सभी घटनास्थलों के आसपास लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग की जाँच में लग गई है. पुलिस ने आम लोगों से कोई भी सूचना तुरंत देने की अपील की है जिसके लिए एक आतंकवाद निरोधक हॉटलाइन बनाई गई है. मैट्रोपोलिटन पुलिस के आयुक्त सर इयन ब्लेयर ने कहा कि पुलिस इन बम धमाकों के ज़िम्मेदार लोगों का पता लगाने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ काम कर रही है. उन्होंने कहा, \"ऐसी कोई भी ठोस सूचना या सबूत नहीं है जिसके आधार पर इसे आत्मघाती हमला बताया जा सके या इस संभावना को नकारा जा सके.\" बीबीसी के सुरक्षा मामलों के संवाददाता फ्रेंक गार्डिनर का कहना है कि जाँच अधिकारी बहुत से सवालों का विश्लेषण कर रहे हैं. \"सबसे अहम सवाल ये है कि क्या हमलावर ब्रितानी ही थे, ब्रितानी आतंकवादी या फिर ये लोग हमला करने के लिए किसी अन्य देश से आए थे.\" इस संभावना की भी जाँच की जा रही है कि बम बनाने वाला कोई विशेषज्ञ रहा होगा जिसने हमलावरों को समुचित दिशा निर्देश दिए होंगे. तलाश इस बीच धमाकों के बाद से लापता लोगों के परिजन अपने प्रियजनों की तलाश में लगे हैं और जगह-जगह भटक रहे हैं. लंदन में बने आपात केंद्र में ऐसे परिजनों के अब तक एक लाख से ज़्यादा टेलीफ़ोन आ चुके हैं. रिश्तेदार और दोस्त अपने प्रियजनों की तलाश के लिए अस्पतालों में जा रहे हैं और उनके फ़ोटो घटनास्थल पर भी ले जाकर लोगों को दिखा रहे हैं. इस बीच देश भर में प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया गया और लंदन में भी श्रद्धांजलि सभाएँ हुईं जिनमें हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया. इस बीच लंदन में परिवहन व्यवस्था सामान्य 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बताया कि हिंदुओं को इस्लामाबाद के सेक्टर-एच में एक प्लॉट दिया गया है और हिंदू समुदाय के परामर्श से ही यहां निर्माण कार्य किया जाएगा. नक़वी ने बताया कि हिंदू समुदाय के लोग अब तक अंतिम संस्कार के लिए बौद्धधर्मियों के श्मशान घाट का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन अब उनके पास अपना श्मशान घाट और अन्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी. इन्हें भी देख सकते हैं: समाप्त पाकिस्तान में हिंदू होने का मतलब... पाकिस्तान के हिंदू मंदिरों पर एक किताब किस हाल में हैं पाकिस्तान के हिंदू मंदिर? इस्लामाबाद में हिंदू पंचायत के महासचिव अशोक चंद के अनुसार शहर में हिंदुओं की धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जगह देने की मांग काफी पुरानी है. बेनज़ीर भुट्टो की सरकार में भी इस मुद्दे को उठाया गया था लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. हालांकि बीते सात-आठ सालों में इस मांग ने बहुत तेज़ी पकड़ी है. अशोक ने कहा कि इस समय इस्लामाबाद में करीब 125 हिंदू परिवार बसे हैं और कुल एक हज़ार के करीब लोग हैं. लाहौर के एक मंदिर में प्रार्थना करता हिंदू परिवार. (फ़ाइल फ़ोटो) अशोक चंद ने जगह मिलने पर हिंदू समुदाय की ओर से खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि इसके लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी, जिसमें नेशनल कमीशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ने उनकी बहुत मदद की. उन्होंने बताया कि पहले उन्हें कहा गया था कि बौद्धधर्मियों के लिए आरक्षित जगह को ही हिंदू अपने अंतिम धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन मानवाधिकार आयोग ने इसका विरोध किया और कहा कि बौद्धधर्मियों के अधिकारों को मारा नहीं जाए. साथ ही हिंदू भी पाकिस्तान के नागरिक हैं, इसलिए उन्हें उनके अधिकार दिए जाएं. अशोक की मानें, तो इस्लामाबाद स्थित हिंदू समुदाय के ज्यादातर लोगों को अंतिम संस्कार के लिए सिंध जाना पड़ता है. इसके अलावा रावलपिंडी और अटक में एक श्मशान घाट है, जो जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जाता है. अशोक चंद ने बताया कि जल्द ही आवंटित ज़मीन पर सामुदायिक केंद्र, मंदिर और श्मशान घाट बनाए जाएंगे. अगर सरकार की ओर से कोई वित्तीय मदद नहीं मिली, तो हिंदू समाज चंदा इकट्ठा करके यहां मंदिर और अन्य सुविधाएं तैयार करेगा. तस्वीरों में: पाकिस्तान के हिंदू मंदिर शरणार्थी वक्फ संपत्ति बोर्ड के चेयरमेन रशीद ने बीबीसी को बताया कि वह इस्लामाबाद में हिंदुओं को मंदिर और अन्य सुविधाएं तैयार करने में मदद करेंगे. स्थानीय लोगों की मानें, तो इस फैसले के बाद पाकिस्तान को उस नकारात्मक प्रचार से छुटकारा मिल सकेगा, जिसके तहत उसे दुनिया के 'अल्पसंख्यकों के प्रति कट्टर' देशों में शामिल किया गया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद की एक प्रशासनिक इकाई ने बताया है कि हिंदू समुदाय के लोगों को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ख़ास जगह मुहैया कराई गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी से बात करते हुए इस्लामाबाद के डिप्टी मेयर ज़ीशान नक़वी ने बताया, \"हिंदू समुदाय की लंबे समय से यह मांग थी कि राजधानी में उन्हें कुछ जगह दी जाए, ताकि अंतिम संस्कार के लिए वे श्मशान घाट बना सकें. साथ ही एक सामुदायिक केंद्र और मंदिर भी बना सकें.\" ज़ीशान नक़वी ने बताया कि हिंदुओं को इस्लामाबाद के सेक्टर-एच में एक प्लॉट दिया गया है और हिंदू समुदाय के परामर्श से ही यहां निर्माण कार्य किया जाएगा. नक़वी ने बताया कि हिंदू समुदाय के लोग अब तक अंतिम संस्कार के लिए बौद्धधर्मियों के श्मशान घाट का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन अब उनके पास अपना श्मशान घाट और अन्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी. इन्हें भी देख सकते हैं: समाप्त पाकिस्तान में हिंदू होने का मतलब... पाकिस्तान के हिंदू मंदिरों पर एक किताब किस हाल में हैं पाकिस्तान के हिंदू मंदिर? इस्लामाबाद में हिंदू पंचायत के महासचिव अशोक चंद के अनुसार शहर में हिंदुओं की धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जगह देने की मांग काफी पुरानी है. बेनज़ीर भुट्टो की सरकार में भी इस मुद्दे को उठाया गया था लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. हालांकि बीते सात-आठ सालों में इस मांग ने बहुत तेज़ी पकड़ी है. अशोक ने कहा कि इस समय इस्लामाबाद में करीब 125 हिंदू परिवार बसे हैं और कुल एक हज़ार के करीब लोग हैं. लाहौर के एक मंदिर में प्रार्थना करता हिंदू परिवार. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "धर्मस्थलों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर सवाल उठाने वाले गायक सोनू निगम से एक लड़की ने सवाल किया है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nख़ुद का नाम यासमीन अरोड़ा मुंशी बताने वाली इस लड़की ने 17 अप्रैल को अपने फ़ेसबुक पेज पर सोनू निगम से सवाल करते हुए एक लाइव वीडियो पोस्ट किया था. 8 लाख बार देखा जा चुका है और डेढ़ लाख लोगों ने इसे शेयर किया है. इस लड़की ने सवाल किया था, \"सोनू निगम जी, आप करीब 50 साल के हो गए हैं. आपको पचास साल बाद अचानक कैसे याद आया कि आपको अज़ान से तकलीफ़ होती है. क्या यह सवाल देश की हुकूमत देखकर उठाया गया है.\" सोनू निगम ने ट्विटर पर अपने पोस्ट में धर्मस्थलों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे, जिसमें सबसे पहले अज़ान का ज़िक्र किया गया था. सोनू निगम ने कहा था कि ये 'धार्मिक गुंडागर्दी है बस'. अपने वीडियो में यासमीन ने कहा, \"जब गोमांस खाने के नाम पर महिलाओं से बलात्कार कर दिया जाता है, क्या उसे गुंडागर्दी नहीं कहते?\" यासमीन ने अपने वीडियो में कहा कि गौरक्षा के नाम पर पहलू ख़ान और अख़लाक़ की हत्या गुंडागर्दी नहीं थी? लेकिन तब आपने ट्वीट नहीं किया. अपने वीडियो में यासमीन ने अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया. वहीं सोशल मीडिया पर कई अन्य मुस्लिम महिलाओं ने भी सोनू निगम के ट्वीट पर प्रतिक्रिया दी. इनमें लोगों ने सोनू के पक्ष और विपक्ष में राय पेश की. एरीना अकबर ने फ़ेसबुक पर लिखा, ''मैं सोनू निगम से इस बात पर सहमत हूं कि सुबह की अज़ान के लिए लाउडस्पीकर इस्तेमाल नहीं होना चाहिए लेकिन इसको गुंडागर्दी का नाम देना कुछ ज़्यादा हो गया. गुंडागर्दी का मतलब होता है लूट-मार करना, ख़ून-ख़राबा करना, लेकिन किसी को नींद से उठाना गुंडागर्दी में शामिल नहीं है.'' एक और पोस्ट में एरीना सोनू निगम के ज़रिए गुंडागर्दी शब्द के इस्तेमाल की कड़ी निंदा करते हुए लिखती हैं, ''एक ग़लत शब्द का इस्तेमाल एक उचित दलील को भी नष्ट कर देता है. हां, मुसलमानों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करना चाहिए. लाउडस्पीकर का इस्तेमाल रात 10 बजे से सुबह छह बजे के बीच नहीं करना चाहिए. लेकिन अज़ान को गुंडागर्दी कहना अत्यंत असंवेदनशील है.'' एरीना अक़बर के सवाल लेकिन इसी के साथ वो आगे ये भी लिखती हैं, ''जहां अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं वहां मुसलमानों को अपने पड़ोसियों की नींद का ख़्याल रखना चाहिए और सुबह को लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ये मामूली सा शिष्टाचार है.'' उनके अनुसार रमज़ान में ख़ासकर सुबह की अज़ान से पहले बार-बार घोषणा करना कि अब रोज़े में 10 या पांच मिनट बाक़ी हैं, ग़ैर-मुस्लिम लोगों को परेशान करना है. वो आगे लिखती हैं, ''क़ुरान में भी मुसलमानों को पड़ोसियों के अधिकारों के बारे में नसीहत दी जाती है, लेकिन रमज़ान में लाउडस्पीकर से लगातार घोषणा करते रहने से हम अपने पड़ोसियों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं. मैं खाड़ी के एक देश में रही हूं और लाउडस्पीकर का ऐसा इस्तेमाल मैंने वहां नहीं देखा. तमाशाबाज़ी तो हम भारतीयों को ही आती है, चाहे वो जागरण हो या रमज़ान में बार-बार की जाने वाली घोषणाएं.'' 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली के विज्ञान भवन में सरकार और किसान नेताओं के बीच शनिवार की बातचीत में ये तय हुआ है कि दोनों पक्ष अगले दौर की बातचीत अब 9 दिसंबर को करेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसियों के मुताबिक, सरकार ने 9 दिसंबर को फिर बैठक की पेशकश करते हुए किसान यूनियनों से समय मांगा ताकि आगे की बातचीत के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार किया जा सके. बैठक के बाद विज्ञान भवन से बाहर निकले किसान नेताओं के मुताबिक, केंद्र सरकार का कहना है कि वो उन्हें 9 दिसंबर को एक प्रस्ताव भेजेगी. किसान नेता उस प्रस्ताव पर किसानों के बीच चर्चा के बाद उसी दिन बैठक में हिस्सा लेकर अपनी बात रखेंगे. किसान नेताओं से बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संवाददाताओं से कहा, \"हमने किसानों से कहा है कि सरकार उनके सभी पक्षों पर विचार करेगी. यदि हमें किसान नेताओं से सुझाव मिलें तो समाधान खोजना आसान होता. हमने किसान यूनियंस से कहा है कि ठंड और कोरोना वायरस को ध्यान में रखते हुए बुजुर्गों और बच्चों को घर वापस भेज दें.\" साइलेंट प्रोटेस्ट इस नतीजे पर पहुंचने से पहले विज्ञान भवन के भीतर सरकार से बातचीत के दौरान किसान नेताओं ने कठोर रुख़ दिखाया और सरकार से जानना चाहा कि किसानों की मांग पर 'हाँ' या 'ना' में से उनका क्या कहना है. समाप्त बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा के मुताबिक, बैठक में मौजूद किसान नेता ने बताया कि सरकार ने पुरानी बातें दोहराई, जिसके बाद किसान नेताओं ने चुप रहकर \"साइलेंट प्रोटेस्ट' किया.\" इससे पहले, किसान नेताओं ने केंद्र सरकार से कहा कि वो पिछली बैठक के बारे में बिंदुवार जवाब दे. सरकार ने इस पर सहमति जताई. बातचीत के दौरान किसान नेताओं ने केंद्र सरकार से कहा कि उन्हें समाधान चाहिए, सरकार की प्रतिबद्धता चाहिए. किसान नेताओं ने बैठक के दौरान कहा कि वो इस बारे में और चर्चा नहीं करना चाहते और ये जानना चाहते हैं कि सरकार ने किसानों की मांग के बारे में क्या फ़ैसला किया है. बैठक में सरकार ने कहा कि वो पंजाब के किसानों की भावनाएं समझती है और उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए तैयार है. विज्ञान भवन में दोनों पक्ष शनिवार को दूसरी बार बैठक कर रहे थे. इससे पहले गुरुवार को दोनों पक्षों में बातचीत हुई थी जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी. प्रदर्शनकारी 'किसान विरोधी काले क़ानून' वापस लेने की बात कर रहे हैं जबकि सरकार उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश कर रही है. सरकार की ये कोशिश शनिवार को नाकाम हुई और अब दोनों पक्ष नौ दिसंबर को एक बार फिर बैठक करेंगे. दूसरी ओर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की पड़ोसी राज्यों से लगने वाली सीमाओं पर आज भी किसान डटे रहे. हरियाणा-दिल्ली के बीच सिंघु बॉर्डर पर जानेमाने सिंगर-एक्टर दिलजीत दोसांझ ने प्रदर्शनकारी किसानों को संबोधित करते हुए कहा है कि किसानों ने नया इतिहास रच दिया है. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक दिलजीत दोसांझ ने कहा, \"केंद्र से हमारा एक ही आग्रह है... प्लीज़ हमारे किसानों की मांगें पूरी करो. यहां हर कोई शांतिपूर्ण तरीक से बैठा है और पूरा देश किसानों के साथ है.\" विज्ञान भवन में बातचीत के पिछले दौर की तरह इस बार भी किसान नेताओं ने अपना लाया खाना खाया. इस दौरान दिल्ली की सीमाओं पर जुटे किसान अपने नेताओं के रूख़ को लेकर काफ़ी उत्साहित नज़र आए. टिकरी बॉर्डर पर बीबीसी संवाददाता पीयूष नागपाल ने प्रदर्शनकारी किसानों से बात की जो पूरी तैयारी के साथ आए हुए हैं. बीबीसी संवाददाता ने बताया कि बैठक के दौरान किसान साफ़-सफ़ाई और खाना बनाने में जुटे हुए थे, साथ ही बैठक के नतीजों का इंतज़ार कर रहे थे. दिल्ली की सीमाओं पर जुटे किसानों का कहना है कि वो अपने साथ कई दिनों के लिए खाना-पानी लेकर आए हैं और मांगें पूरी होने तक इसी तरह डटे रहेंगे. बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा को मिली जानकारी के मुताबिक अब किसान यूनियनों के नेताओं ने रविवार की सुबह 10 बजे बैठक करने का फ़ैसला किया है. दिल्ली की सीमाओं पर जुटे किसानों के विरोध प्रदर्शन का शनिवार को दसवां दिन था. इतने दिनों से हरियाणा, पंजाब और अन्य प्रदेशों के किसान दिल्ली के बॉर्डर इलाक़ों पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. किसान संगठनों ने आठ दिसंबर को भारत बंद का एलान किया है और कहा है कि उस दिन वे दिल्ली के सभी टोल प्लाज़ा को घेरेंगे. 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'दोनों को फ़ायदा' बुधवार को @हिडनकैश_यूके नाम का नया अकाउंट शुरू करने वाले व्यक्ति कहते हैं, \"मैंने इसे इंटरनेट पर वायरल होते हुए देखा और सोचा 'यह सचमुच में एक बहुत मज़ेदार आइडिया है'.\" ब्रिटेन में ट्विटर, खजाने की खोज, का इनाम जीतने वाले बिजली मिस्त्री हैरी मैकक्यावेन को पहले-पहल इस पर विश्वास ही नहीं हुआ. उन्होंने बीबीसी ट्रेंडिंग को बताया कि वह पैसे से भरे लिफ़ाफ़े को देश के दूसरे कोने में छुपाने की योजना बना रहे हैं. पहली बार- 50 पौंड (क़रीब 4940.96 रुपये) भरा लिफ़ाफ़ा- लीड्स में छुपाया गया था जो एक बिजली मिस्त्री हैरी मैकक्योवन को मिला. उन्हें इस छुपाए गए पैसे के बारे में एक डेंटिस्ट के पास टीवी देखते हुए पता चला. पांच मिनट बाद ही उन्हें ट्विटर पर पहला सुराग़ मिला. वह कहते हैं, \"मेरे दोस्त ने कहा कि 'किसी ने मज़े लेने के लिए यह किया होगा' और मैंने सोचा कि मैं ढूंढते हुए थोड़ा मूर्ख लगूंगा. लेकिन यह तो सही निकला.\" \"और मुझे लगा 'यह नहीं हो सकता'.\" अगला लिफ़ाफ़ा कहीं मैनचेस्टर में छुपा होगा और और उसके बाद शुक्रवार को अगला लंदन में. सैन फ़्रांसिस्को वाले व्यक्ति की तर्ज़ पर ब्रिटेन में इस अकाउंट का संचालने करने वाले व्यक्ति भी अनाम रहना चाहते हैं. वह कहते हैं कि वह पैसे छुपाने के लिए नज़दीकी दोस्तों और देश भर में मौजूद पहचान वाले लोगों पर भरोसा कर रहे हैं. लेकिन वह ऐसा कर क्यों रहे हैं? उनका जवाब है, \"मेरे लिए यह मज़ेदार है, और इससे लोगों को मदद मिलती है- इसलिए इससे दोनों को फ़ायदा है.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका के सैन फ्रांसिस्को में एक अज्ञात ट्वीटर ने एक ऐसा चलन शुरू किया है जो दुनिया भर में फैलना शुरू हो गया है- ट्विटर ख़ज़ाने, नक़द पैसे की खोज.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआख़िर कौन नहीं चाहेगा कि उसे रुपयों से भरा लिफ़ाफ़ा मिल जाए? शायद यही वजह है कि क़रीब 2,50,000 लोगों ने @हिडेनकैश (@HiddenCash) अकाउंट को फ़ॉलो करना शुरू कर दिया है. जैसे कि इस ख़बर में पहले भी बताया गया है कि इस अकाउंट का संचालक अनाम रहना चाहता है. वह सैन फ़्रांसिस्को में घर में किसी अज्ञात जगह पर कुछ पैसे छुपा रहा है और उन्हें ढूंढने के सुराग़ ट्विटर पर दे रहा है. एक हफ़्ते पहले जब इस अकाउंट से पहला सुराग़ ट्वीट किया गया तो इसी तरह के और अकाउंट तुरंत पैदा हो गए. इनमें से ज़्यादातर अमरीका-फ़्लोरिडा, कोलोराडो, टेक्सस और अन्य जगह हैं लेकिन ऐसा लगता है कि यह चलन विश्व भर में फैल रहा है. नाइजीरिया, भारत, हॉंग-कॉंग, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन सभी जगह इस तरह के अकाउंट खोले जा रहे हैं. 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'उधार की सीमा बढ़ी' स्पाइस जेट रोज़ क़रीब 5.5 करोड़ रुपये का ईँधन भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) से ख़रीदा करता था लेकिन छह महीने पहले उसने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ से भी कुछ ख़रीदना शुरू कर दिया. समाप्त लेकिन तबसे स्पाइसजेट के अपनी उडानों में कटौती करने और बेड़े में कमी करने के चलते यह उपभोग कम हो गया. बुधवार सुबह भुगतान समस्या के चलते स्पाइसजेट का कोई भी विमान उड़ान नहीं भर पाया. नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने मंगलवार को कहा था कि एयरपोर्ट संचालकों को विमान कंपनियों को भुगतान के लिए 15 दिन का समय देने को कहा जाएगा और सरकारी तेल कंपनियों को भी 15 दिन का उधार देने को कहा जाएगा. सूत्रों के अनुसार तेल कंपनियों ने लेटर ऑफ़ क्रेडिट या बैंक गारंटी के ज़रिए भुगतान सुरक्षित होने के बाद ही उधार की सीमा बढ़ाई है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत की एक एयरलाइंस स्पाइस जेट के नक़द भुगतान करने के बाद तेल कंपनियों ने बुधवार को उसे ईंधन की आपूर्ति शुरू कर दी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की एक तेल कंपनी में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, \"हमने ईंधन की आपूर्ति बंद की ही नहीं थी. हमने कल (मंगलवार) दोपहर बाद तक उन्हें ईंधन की आपूर्ति की थी.\" \"उसके बाद वह ईंधन ख़रीदने आए ही नहीं इसलिए हमने उन्हें दिया भी नहीं. वह आज (बुधवार) दोपहर आए इसलिए हम आपूर्ति कर रहे हैं.\" उन्होंने कहा कि स्पाइस जेट को छह महीने पहले ही 'पैसे दो और ले जाओ' की श्रेणी में डाल दिया गया था. इसका अर्थ यह है कि विमान कंपनी को तभी ईंधन आपूर्ति होती थी जब वह इसके लिए भुगतान करते थे. 'उधार की सीमा बढ़ी' स्पाइस जेट रोज़ क़रीब 5.5 करोड़ रुपये का ईँधन भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) से ख़रीदा करता था लेकिन छह महीने पहले उसने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ से भी कुछ ख़रीदना शुरू कर दिया. समाप्त लेकिन तबसे स्पाइसजेट के अपनी उडानों में कटौती करने और बेड़े में कमी करने के चलते यह उपभोग कम हो गया. बुधवार सुबह भुगतान समस्या के चलते स्पाइसजेट का कोई भी विमान उड़ान नहीं भर पाया. नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने मंगलवार को कहा था कि एयरपोर्ट संचालकों को विमान कंपनियों को भुगतान के लिए 15 दिन का समय देने को कहा जाएगा और सरकारी तेल कंपनियों को भी 15 दिन का उधार देने को कहा जाएगा. सूत्रों के अनुसार तेल कंपनियों ने लेटर ऑफ़ क्रेडिट या बैंक गारंटी के ज़रिए भुगतान सुरक्षित होने के बाद ही उधार की सीमा बढ़ाई है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ग्रीस के अधिकारियों का कहना है कि भूमध्यसागर में एक नौका के डूबने के बाद लगभग 340 प्रवासियों को बचाया गया है. अभी तक नौ शव भी समुद्र से निकाले गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग्रीस के क्रेट द्वीप से दक्षिण में 75 समुद्री मील की दूरी पर मिली इस नौका में सवार बाकी लोग लापता माने जा रहे हैं. हवाई जहाज़, पानी के जहाज़ और हेलीकाप्टर्स की मदद से राहत और बचाव कार्य चलाया जा रहा है. समचार एजेंसी एपी के मुताबिक, एक अन्य घटना में, लीबिया के तट से 100 से अधिक शव बरामद किए गए हैं. अधिकारियों का कहना है कि क्रेट द्वीप के तट पर डूबी नौका संभवत: अफ्रीका से रवाना हुई होगी. हालांकि अभी स्पष्ट नहीं हुआ है कि ये नौका कहां से चली थी. समाप्त प्रवासियों के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन के प्रमुख डेनियल एसड्रास ने बीबीसी को बताया कि इस विशाल नौका की लंबाई 25 मीटर है जिस पर कम से कम 700 लोग सवार हो सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि वर्ष 2016 में अभी तक पश्चिमी यूरोप की ओर जाते हुए 2500 से अधिक लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. मौसम में हाल में आए सुधार की वजह से भूमध्यसागर को पार करने वाली नौकाओं की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है. 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'ट्रेन का डिब्बा उछलकर मेरे घर पर गिरा, जैसे फ़िल्मों में होता है' '.... आवाज़ सुनकर लगा कि हम मर जाएंगे' पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश प्रभु ने 9 नवंबर 2014 को रेलमंत्री का पदभार संभाला था. उसके बाद से अभी तक देश में करीब 6 बड़े रेल हादसे हो चुके हैं. इन हादसों में सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई है. सुरेश प्रभु के रेल मंत्री बनने के बाद हुए रेल हादसे: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फ़रनगर ज़िले में ख़तौली के पास हुए रेल हादसे पर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने सेंट्रल रेलवे बोर्ड को आज शाम तक हादसे की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरेल मंत्री ने ट्वीट किया कि 'रेलवे बोर्ड की तरफ से किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी. आज का दिन पूरा होने तक सेंट्रल रेलवे बोर्ड प्रथम दृष्ट्या सबूतों के आधार पर हादसे की जिम्मेदारी तय करे.' मुज़फ्फ़नगर रेल हादसे में अभी तक 23 लोगों के मारे जाने की ख़बर है जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए हैं. प्रभु के इस्तीफे की मांग इस हादसे के बाद से रेल मंत्री सुरेश प्रभु विपक्ष के निशाने पर हैं. उनके इस्तीफ़े की मांग उठने लगी है. आरजेडी प्रमुख और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब लोगों को रेलवे में सुरक्षा की गारंटी ही नहीं है तो वे कैसे रेल में सफ़र कर सकते हैं. वहीं कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया कि मोदी सरकार बनने के बाद से अभी तक सैकड़ों लोग रेल हादसों में अपनी जान गवां चुके हैं, सरकार कब जागेगी. सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने ट्वीट किया कि रेल बजट को आम बजट के साथ मिला दिया गया, नतीजा हमारे सामने है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "विवादों में घिरे सेप ब्लैटर अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष पद का चुनाव फिर से जीतने के बाद शनिवार को पहली बैटक की अध्यक्षता करेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस दौरान 2018 और 2022 के विश्व कप आयोजनों पर चर्चा होने की उम्मीद है. अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी और ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़रीफ़ स्विटज़रलैंड के जेनेवा शहर में मुलाक़ात करेंगे. माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों देश परमाणु समझौते को लेकर चर्चा करेंगे. ख़बरों के अनुसार आज रूस की राजधानी मॉस्को में 'गे प्राइड मार्च' निकाला जा सकता है. समाप्त हालांकि प्रशासन ने रैली की इजाज़त नहीं दी है लेकिन आयोजनकर्ताओं का कहना है कि वे किसी न किसी रूप में यह इसे ज़रूर निकालेंगे. मिस्र की एक अदालत 73 अभियुक्तों पर फ़ैसला सुनाएगी. इन पर 74 लोगों की हत्या के आरोप हैं. आरोपों के अनुसार इन सभी ने 2012 में पोर्ट सईद स्टेडियम में स्थानीय फ़ुटबॉल टीमों के मैच के दौरान भड़के दंगों के बीच हत्या की थी. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत का बजट सोमवार को आ रहा है. लगभग हर टीवी चैनल, हर अख़बार बजट की ख़बरों से रंगे हुए हैं. पर आम आदमी के लिए यह कवरेज और बजट बेतुका है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपर क्यों? इसके पाँच बड़े कारण निम्न हैं. वित्तीय घाटा: सारे वित्तमंत्री और विशेषज्ञ बजट में वित्तीय घाटे के बारे में ख़ूब बोलते हैं. भारत की सभी सरकारें साल 2008 तक क़ानूनन देश के वित्तीय घाटे को कम कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फ़ीसदी के बराबर लाने के लिए बाध्य थीं. ऐसा फ़िस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट 2003 के तहत किया जाना था. लेकिन सरकारें ऐसा नहीं करतीं. वो संसद से इस सीमा को लांघने की इजाज़त ले लेती हैं. पिछली बार जेटली ने भी यही किया था. वो इस बार फिर ऐसा कर सकते हैं. उनके पहले भी ऐसा हुआ है. जब संसद के पास किए क़ानून को सांसद आगे खिसका देते हैं और साल भर में वित्तीय घाटे के टारगेट रिवाइज़ होते हैं, बजट कि ओर क्यों ताकें? समाप्त महंगाई: सरकारें साल के बीच में सेस या अधिभार लागू कर पैसा वसूलती हैं. इससे महंगाई बढ़ती है. हालिया उदाहरण है स्वच्छ भारत अधिभार. सरकार ने यह सेस नवंबर में लगाया. जनता की जेब से फ़रवरी तक 1,917 करोड़ रुपए निकल कर सरकार की तिजोरी में चले गए. इसी तरह से बीते दिसंबर में किराए बढ़ा दिए गए. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में आई भारी गिरावट से हो रही बचत का 70-75 फ़ीसद हिस्सा (डीज़ल और पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाकर) सरकार ख़ुद अपनी तिजोरी में रख रही है. जबकि इसका 25-30 फ़ीसद हिस्सा पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में कम करके जनता को दिया जा रहा है. अगर क़ीमतें और कम की जातीं तो इससे महंगाई भी कम होती, खाद्य पदार्थों की, क्योंकि ट्रांसपोर्ट लागत में डीज़ल की क़ीमतों का अहम हिस्सा होता है. भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स पिछले 15 महीनों से नकारात्मक रहा है. लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़ रहा है. सरकार ने ये सब तो नहीं बताया था बजट में कि ऐसा करेंगे. अब बताइए, बेचारे आम आदमी के लिए बजट हुआ ना बेमतलब का. आयकर: लेकिन हर अख़बार, टीवी यहाँ तक की एफ़एम तक टैक्स में छूट...टैक्स में छूट चिल्लाते हैं. लेकिन 120 करोड़ से ज़्यादा लोगों के इस मुल्क में 97 फ़ीसदी लोग आयकर या इनकम टैक्स नहीं देते हैं. अप्रत्यक्ष कर: आम आदमी के लिए उत्पादन कर, सेवा कर जैसे या इस तरह की दूसरी ड्यूटी महत्व रखती है. इससे उसके इस्तेमाल की चीज़ें सस्ती या महंगी होती हैं. इससे इतर समझने की बात यह है कि हर वित्त मंत्री बताता है कि देंगे क्या, पर ये सब छुपा जाते हैं कि लेंगे क्या. मसलन उत्पादन कर सरकार ने बार-बार बढ़ाया. पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच अप्रत्यक्ष करों से वसूली क़रीब 33 फ़ीसदी बढ़ी. ऐसा नहीं कि इस दौरान देश में उत्पादन बढ़ा हो. सरकार ने ख़ुद बताया कि देश में उत्पादन कम हुआ है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था: इस बार तय है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली जी बजट में ज़ोर शोर से बताएंगे कि वो किसानों के लिए, गाँवों में रहने वाले भूमिहीन मज़दूरों के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए क्या हैं. पिछली बार भी बताया था लेकिन बाद में हुआ क्या? बजट में वित्त मंत्री ने कहा था कि महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार योजना (मनरेगा) बजट में भले कम पैसे का प्रावधान किया हो. लेकिन बाद में पैसे की कमी नहीं होगी. हुआ क्या? राज्यों ने जब पैसा माँगा तो सरकार ने दिया आधे से भी कम. नतीजा मज़दूरों को सूखा प्रभावित इलाक़ों में भी लंबे समय तक मज़दूरी नहीं मिली. मज़दूर अब इस योजना से भागने लगा है. बजट में यह तो नहीं बताया था. मज़दूरों और गाँवों में काम करने वाले कहते हैं कि यूपीए-2 और एनडीए दोनों इस योजना को मारना चाहते हैं. बजट की हक़ीक़त पता लगती हैं आठ-दस महीने बाद. उसके पहले बजट में जो प्रावधान करते हैं, उसे ख़र्चते नहीं हैं. नए-नए बहानों तरीक़ों से पैसे जनता से निकालते रहते हैं. आम लोग अब समझते हैं कि बजट में सरकारें बात बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हैं. लेकिन असलियत और कुछ होती है. 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इलाकों में इसलिए बने हुए हैं ताकि लोगों का पता चल सके कि यहाँ आम लोग किन कठिनाइयों में रह रहे हैं. इसी कड़ी का एक नाम था समद रोहानी का. रोहानी वर्ष 2006 में बीबीसी से जुड़े और वो केवल पस्तो भाषा में ही काम नहीं करते थे बल्कि बीबीसी के अंग्रेज़ी स्टाफ़ को भी ख़ास मदद औऱ जानकारी मुहैया कराते थे. एक चुनौतीपूर्ण मोर्चा हेलमंद प्रांत का इलाका तालेबान लड़ाकों के सर्वाधिक प्रभाव वाले इलाकों में है. यहाँ बड़े पैमाने पर ब्रितानी सैनिक तैनात हैं और ऐसे में यह जगह ब्रिटेन में बीबीसी के दर्शकों, श्रोताओं के लिए ख़ास महत्व की हो जाती है. रोहानी की ख़ास बात यह थी कि हेलमंद के बारे में उनको जितनी जानकारी थी, उतनी जानकारी वाला आदमी मुझे दूसरा नहीं मिला. रोहानी हेलमंद में ही पैदा हुए और यहाँ एक पत्रकार ही नहीं रहे, स्थानीय स्तर पर एक अच्छे कवि बनकर भी उभरे. हेलमंद में शायद ही कोई दिन किसी घटना के बिना बीतता है और रोहानी तो अक्सर मेरे साथ फोन के ज़रिए दिनभर जुड़ा रहता था. मुझे इस व्यक्ति की बहादुरी हमेशा याद रहेगी. वो चाहते थे कि तालेबान के नियंत्रण वाले इलाके के लोगों की ज़िंदगी जो कुछ देख रही है, उसे दूसरों तक पहुँचाया जाए. अक्सर ऐसा हुआ जब रोहानी काबुल में हमारे घर पर रुके. जब भी वो घर पर होते, मेरा और मेरे दोस्तों का अपनी रोमांटिक पश्तो कविताओं से दिल बहलाते थे. पर रोहानी के साथ शाम का वक्त बहुत सारी रुकावटों भरा होता था. उन्हें लगातार सरकारी मुलाज़िमों, कबायली नेताओं और स्थानीय व्यापारियों के फोन आते रहते थे. ऐसा भी कई बार हुआ कि उनसे दिनभर कोई संपर्क ही नहीं हो पाता था. कारण, कि वो किसी ज़िले के दौरे पर होते थे जहाँ नेटवर्क नहीं होता था और इस तरह हमारा उनसे संपर्क नहीं हो पाता था. आजकल मेरा काफी वक्त अमरीका में कुछ अध्ययन करते हुए बीत रहा है. इस दौरान भी समद का लगातार फोन आता रहता था. अक्सर तब जब में रात को सो रहा होता था और ऐसा उन्हें याद दिलाने पर वो बहुत सरलता से कहते थे- अफ़ग़ानिस्तान में तो दिन निकल आया है न. इस सारी बातों से यह हुआ कि हम केवल एक साथ काम करने वाले साथी भर नहीं रह गए बल्कि एक गहरी दोस्ती भी विकसित हो गई हमारे बीच. अलविदा दोस्त...अलविदा मैं जब भी काबुल आता था, समद सबसे पहले फोन करने वालों में होते थे. वो कहते थे, \"हमारे अफ़ग़ानिस्तान में आपका स्वागत है. मैं हेलमंद के एक गाँव से आपको शुभकामनाएं भेज रहा हूँ.\" पर शनिवार को ऐसा नहीं हुआ. मुझसे उनकी बात नहीं हुई तो मैंने उनसे संपर्क करना चाहा. रोहानी का पता नहीं चल रहा था और उनके फोन भी स्विच ऑफ़ थे. मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है पर आशा कर रहा था कि रोहानी किसी अंदरूनी इलाके में ख़बर खोजने गए होंगे. इसके बाद एक अशुभ समाचार मिला.... एक अनजान व्यक्ति ने हेलमंद में मौजूद बीबीसी के एक अन्य सदस्य से फोन पर कहा कि रोहानी के शव को ले जाने की व्यवस्था करें. यह मुझे अंदर तक हिलाकर रख देने वाली ख़बर थी. ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया ही बिखर गई हो. रोहानी की स्मृतियाँ हमेशा मेरे साथ रहेंगी. एक अफ़ग़ान के रूप में मैं सदा इस बात पर गर्व करूंगा कि रोहानी मेरे मित्र थे और सहयोगी भी. समद ने अपनी ज़िंदगी लोगों तक सच बताने और अफ़ग़ानिस्तान की सहायता करने के नाम कर दी थी. मुझे यह तो नहीं मालूम कि रोहानी की हत्या किसने की पर एक बात विश्वास के साथ कह सकता हूँ- हममें से और भी ज़्यादा लोग सच को सामने लाते रहेंगे और सच हमेशा अपनी रक्षा करता रहेगा.\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान के कई इलाकों में ख़बरों को खोजते और 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जाना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें जाना ही पड़ा. उनके अनुसार ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मुखर्जी की सरकार और गठबंधन के कारोबार को संभालने में अहम भूमिका रही है और उनकी राजनीतिक अहमियत तो है ही. वे कहते हैं कि राजनीतिक दृष्टिकोण से मनमोहन सिंह इतने अनुभवी नेता नहीं है और भारत को जिस तरह की विदेश नीति की ज़रूरत है, उसके लिए सक्रिय विदेश मंत्री होना ज़रूरी था. लेकिन काँग्रेस में किसी भी नाम पर सर्वसम्मति नहीं थी, चाहे एक-दो अन्य नामों पर भी विचार हुआ और मुखर्जी को विदेश मंत्रालय में जाना ही पड़ा. विदेश मंत्री का दायित्व पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि आज के दिन विदेश मंत्रालय के लिए लगातार चुनौतियाँ आती रहती हैं. कुछ प्रमुख मुद्दों की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि 'आतंकवाद' का सामना करने के विषय पर आगे कैसे बढ़ा जाए, चीन के साथ संबंध और बेहतर कैसे हों और अमरीका के साथ असैनिक परमाणु समझौता कुछ अहम मुद्दे हैं. पूर्व विदेश सचिव शशांक से पूछा गया कि क्या विदेश मंत्री के होने से परिस्थियों कुछ और होतीं? उनका कहा था कि मंत्रिमंडल की संयुक्त ज़िम्मेदारी तो होती ही है, लेकिन विदेश मंत्री की अपनी अहम भूमिका होती है. विदेश मंत्री के दायित्वों में शिखर वार्ता के दौरान कूटनीति, कूटनीतिक दृष्टिकोण से अन्य देशों, विशेष तौर पर पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क साधना इसमें शामिल हैं. ईमानदार छवि वाले एंटनी रक्षा मंत्री बनाए गए, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी की ईमानदार नेता की छवी रही है वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के अनुसार यही उनकी सबसे बड़ी योग्यता है. उनका मानना है कि रक्षा मंत्रालय ऐसा है कि भले ही मंत्री भ्रष्ट न हो लेकिन व्यवस्था ऐसी बनी हुई है जिसपर नियंत्रण पाना बहुत ज़रूरी है. वरदराजन का कहना है कि रक्षा मंत्रालय के हथियारों संबंधित सौदों में ऐसा ढांचा बनाना ज़रूरी है जिससे इन सौदों में बिचौलियों और भ्रष्टाचार की भूमिका कम से कम किया जा सके. सिद्धार्थ वरदराजन के मुताबिक कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि यदि रक्षा मंत्रालय की छवि सुधारनी है तो एंटनी से बेहतर व्यक्ति नहीं है. हालाँकि उन्होंने ये भी कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि एंटनी फ़ैसला आसानी से नहीं लेते लेकिन रक्षा मंत्री के लिए जल्द फ़ैसला करने की क्षमता होना ज़रूरी है. वे कहते हैं कि आगे चल कर ही पता चलेगा 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इसे कामयाब बनाने के लिये ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहा है. पूरा शहर पोस्टर और होर्डिंग से पटा पड़ा है. लेकिन, कांग्रेस नेता महेश मकवाना के पोस्टर ने सभी का ध्यान खींचा है जिसमें वह दावा कर रहे हैं कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण राहुल गांधी ही करेंगे. कांग्रेस ने किया अलग महेश मकवाना ने बताया, \"हमें यह विश्वास है कि राहुल गांधी जी ही राम मंदिर का निर्माण करवायेंगे और यह निर्माण वह सर्वसम्मति से करेंगे. इसलिये उनके स्वागत के लिये यह पोस्टर लगाया गया है.\" वही कांग्रेस पार्टी ने अपने आप को इस पोस्टर से अलग कर लिया है. पार्टी प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा ने कहा, \"उनके स्वागत के लिये पूरी पार्टी लगी हुई है. हर कोई अपनी तरह से उनका स्वागत करना चाह रहा है. यही वजह है कि कुछ उत्साही कार्यक्रताओं ने इसे लगा दिया है.\" ख़ास बात यह है कि प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो पार्टी ने राहुल गांधी को शिव भक्त के तौर पर प्रचारित किया था. लेकिन, अब इस पोस्टर में उन्हें राम भक्त बताया जा रहा है. दोनों दलों में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं वहीं, भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा, \"इस पोस्टर से कुछ भी साबित नहीं होता है. अगर सही में कांग्रेस राम मंदिर को लेकर गंभीर है तो वह उसे बनाने का प्रयास करे और उनसे जुड़े वक़ीलों से कहे कि वह सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में अड़ंगा न डाले.\" राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का मानना है कि इस मामले में कांग्रेस और भाजपा में सिर्फ इतना फ़र्क है कि कांग्रेस अदालत के फैसले के बाद राम मंदिर बनवाने की बात करती है जबकि भाजपा इसे आस्था का मुद्दा मानती है. वो कहते हैं, \"यह वही प्रदेश है जहां पर कांग्रेस कार्यालय में गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है और सभी कर्मकांड किये जाते हैं. इसलिये कांग्रेस और भाजपा में बहुत ज़्यादा फ़र्क है, यह कहना ग़लत होगा. पार्टी लोकसभा चुनाव के लिये तैयार है और उसे इस तरह की चीज़ों से परहेज़ नहीं है.\" मध्यप्रदेश में पिछले चार दिनों में पांच लोगों पर रासुका के तहत कारवाई की गई है. तीन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने गौवध किया है तो दो लोगों पर अवैध रुप से उन्हें ले जाने का आरोप है. यह बताता है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के आने के बाद स्थिती ज़्यादा नहीं बदली है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी की शुक्रवार की सभा से पहले लगे पोस्टर ने विवाद पैदा कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस पोस्टर में राहुल गांधी को राम भक्त बताते हुये लिखा है कि वह अयोध्या में सर्वसम्मति से भव्य राम मंदिर बनवायेंगे. मध्यप्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी है और कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी किसानों के एक सम्मेलन को संबोधित करने के लिये आ रहे हैं. माना जा रहा है कि इस सम्मेलन के ज़रिये राहुल गांधी प्रदेश में लोकसभा चुनाव की मुहिम की शुरुआत करेंगे. पार्टी ने इस कार्यक्रम के लिये 2 लाख लोगों का लक्ष्य रखा है. यही वजह है कि पार्टी का हर नेता इसे कामयाब बनाने के लिये ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहा है. पूरा शहर पोस्टर और होर्डिंग से पटा पड़ा है. लेकिन, कांग्रेस नेता महेश मकवाना के पोस्टर ने सभी का ध्यान खींचा है जिसमें वह दावा कर रहे हैं कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण राहुल गांधी ही करेंगे. कांग्रेस ने किया अलग महेश मकवाना ने बताया, \"हमें यह विश्वास है कि राहुल गांधी जी ही राम मंदिर का निर्माण करवायेंगे और यह निर्माण वह सर्वसम्मति से करेंगे. इसलिये उनके स्वागत के लिये यह पोस्टर लगाया गया है.\" वही कांग्रेस पार्टी ने अपने आप को इस पोस्टर से अलग कर लिया है. पार्टी प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा ने कहा, \"उनके स्वागत के लिये पूरी पार्टी लगी हुई है. हर कोई अपनी तरह से उनका स्वागत करना चाह रहा है. यही वजह है कि कुछ उत्साही कार्यक्रताओं ने इसे लगा दिया है.\" ख़ास बात यह है कि प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो पार्टी ने राहुल गांधी को शिव भक्त के तौर पर प्रचारित किया था. लेकिन, अब इस पोस्टर में उन्हें राम भक्त बताया जा रहा है. दोनों दलों में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं वहीं, भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा, \"इस पोस्टर से कुछ भी साबित नहीं होता है. अगर सही में कांग्रेस राम मंदिर को लेकर गंभीर है तो वह उसे बनाने का प्रयास करे और उनसे जुड़े वक़ीलों से कहे कि वह सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में अड़ंगा न डाले.\" राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का मानना है कि इस मामले में कांग्रेस और भाजपा में सिर्फ इतना फ़र्क है कि कांग्रेस अदालत के फैसले के बाद राम मंदिर बनवाने की बात करती है जबकि भाजपा इसे आस्था का मुद्दा मानती है. वो कहते हैं, \"यह वही प्रदेश है जहां पर कांग्रेस कार्यालय में गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है और सभी कर्मकांड किये जाते हैं. इसलिये कांग्रेस और भाजपा में बहुत ज़्यादा फ़र्क है, यह कहना ग़लत होगा. पार्टी लोकसभा चुनाव के लिये तैयार है और उसे इस तरह की चीज़ों से परहेज़ नहीं है.\" मध्यप्रदेश में पिछले चार दिनों में पांच लोगों पर रासुका के तहत कारवाई की गई है. तीन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने गौवध किया है तो दो लोगों पर अवैध रुप से उन्हें ले जाने का आरोप है. यह बताता है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के आने के बाद स्थिती ज़्यादा नहीं बदली है. 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बिल्लियों के भाग से कंपनी के लिए छींका टूटा है एक बिल्ली की क़ीमत है लगभग चार हज़ार डॉलर यानी तकरीबन दो लाख रूपए से अधिक. अगर आप इतनी रक़म खर्च करने को तैयार भी हों तो ऐसी नायाब बिल्ली आपके हाथ आसानी से नहीं आने वाली, इसके लिए आपको ऑर्डर देना होगा तब आपके लिए विशेष बिल्ली तैयार होगी. कंपनी ने स्पष्ट किया है कि बिल्लियों के जीन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है बल्कि ऐसी बल्लियों को चुनकर उनका प्रजनन किया जा रहा है जिनमें ग्लाइकोप्रोटीन डी-वन नहीं है. एलेर्का के स्टीव मे का कहना है कि यह वैज्ञानिक विधि से बिल्लियों की गहन जाँच करके उनका प्राकृतिक प्रजनन करने का कार्यक्रम है. उनका कहना है कि तकरीबन पचास हज़ार बिल्लियों में से एक बिल्ली ऐसी होती जिसमें ग्लाइकोप्रोटीन डी-वन नहीं पाया जाता है. कंपनी का कहना है कि ऐसी बिल्लियों को ढूँढकर निकालना और उनका प्रजनन करना एक कठिन और समय लेने वाला काम था इसलिए इनकी क़ीमत इतनी अधिक है. कंपनी का मानना है कि ऐसे लोग बड़ी तादाद में हैं जो बिल्लियों से तो प्यार करते हैं लेकिन उससे होने वाली एलर्जी से घबराते हैं, ऐसे ही लोगों पर कंपनी की उम्मीदें टिकी 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बचपन पेरिस के बाहरी इलाके में बीता मगर शुरू से उन्होंने अपनी प्रतिभा से लोगों का ध्यान खींचा 20 दिसंबर 1998 को फ़्रांस की राजधानी पेरिस में जन्मे एमबापे के पिता विल्फ़्राइड मूलत: कैमरून से हैं. वह फ़ुटबॉल कोच हैं और एमबापे के एजेंट भी. एमबापे की मां फ़ाएजा लमारी अल्जीरिया से हैं. वह हैंडबॉल की खिलाड़ी रह चुकी हैं. एमबापे ने अपने करियर की शुरुआत पेरिस के फ़ुटबॉल क्लब एएस बॉन्डी से की थी, जहां पर उनके पिता विल्फ़्राइड भी कोच थे. यहां एमबापे ने एक अन्य कोच एन्टोनियो रिकार्डी से भी कोचिंग ली थी. एमबापे के बारे में रिकॉर्डी ने बीबीसी से कहा था, \"एमबापे उस समय छह साल के थे जब मैंने पहली बार उन्हें कोचिंग दी. उसी वक्त महसूस हुआ था कि वह कुछ अलग हैं. वह बाकी बच्चों से बढ़कर थे.\" एमबापे के चर्चित होने के बाद एएस बॉन्डी क्लब की सदस्यता लेने की होड़ मच गई थी रिकॉर्डी ने एमबापे की प्रतिभा के बारे में बताया, \"उनकी ड्रिबलिंग कमाल की थी और वह बाकियों से काफ़ी तेज़ भी थे. मैंने यहां पर 15 साल कोचिंग दी है और इस दौरान मैंने उनसे बेहतर और कोई खिलाड़ी नहीं देखा. पेरिस में वैसे तो बहुत सारी प्रतिभाएं हैं, मगर उनके जैसी कोई नहीं. वो सर्वश्रेष्ठ हैं.\" दुनिया हुई मुरीद एएस बॉन्डी के बाद एमबापे क्लेयरफोन्टेन अकादमी में चले गए थे. बाद में उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें कई फ्रांसीसी क्लबों, रियाल मैड्रिड, चेल्सी, लिवरपूल और मैनचेस्टर सिटी तक ने साइन करने की कोशिश की थी. एमबापे 12 से 15 साल की उम्र में क्लेयरफॉन्टेन अकादमी के लिए खेल रहे थे मगर शुरुआत बॉन्डी के लिए ही की थी फ़ुटबॉल क्लबों में उन्हें साइन करने को लेकर किस तरह की होड़ रहती है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के दूसरे सबसे महंगे एसोसिएशन फ़ुटबॉल ट्रांसफ़र का रिकॉर्ड भी एमबापे के नाम है. इसी साल 135 मिलियन यूरो में उनका ट्रांसफ़र मोनाको से फ़्रांसीसी क्लब पैरिस सेंट जर्मेन के लिए हुआ था. जर्मनी के पूर्व स्ट्राइकर औऱ मैनेजर जर्गन क्लिन्समन कहते हैं, \"अभी तो एमबापे की ओर से और बहुत कुछ आना बाकी है. उन्होंने मार्केट को हिलाकर रख दिया है.\" सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का ताज 33 साल के रोनाल्डो और 31 साल के मेसी को पिछले एक दशक से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है. फ़ुटबॉल के पिछले 10 प्रतिष्ठित बैलन डोर अवॉर्डों का बंटवारा उन्हीं के बीच हुआ है. मगर इंग्लैंड के पूर्व डिफ़ेंडर रियो फ़र्डिनेंड कहते हैं, \"लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का ताज फ़्रांस के टीनेजर काइलियान एमबापे को सौंप रहे हैं.\" मैनचेस्टर युनाइटेड के लिए खेल चुके फ़र्डिनेंड कहते हैं, \"आने वाले कई सालों तक एमबापे बैलन डोर के मंच पर दिखाई देंगे.\" फ़र्डिनेंड कहते हैं कि एमबापे में उम्र से ज़्यादा परिपक्वता दिखाई देती है. वहीं जर्मनी के पूर्व स्ट्राइकर क्लिन्समन कहते हैं कि एमबापे को देखकर ऐसा लगता है मानो वह 10 साल से फ़्रांस की टीम में खेल रहे हों. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रविवार को मॉस्को में खेले गए विश्व कप फ़ाइनल में जब फ़्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से हराया तो उसमें 19 साल के फ़ॉरवर्ड किलियान एमबापे का गोल भी शामिल था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़्रांस की तरफ़ से मैच में चौथा गोल करने के साथ ही एमबापे के नाम एक उपलब्धि भी जुड़ गई. वह फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में गोल करने वाले दूसरे टीनेजर बन गए हैं. उनसे पहले 1958 के विश्व कप फ़ाइनल में पेले ने गोल किया था. उस समय पेले की उम्र 18 साल थी और उस मैच में उनके दो गोलों की मदद से ब्राज़ील ने स्वीडन को 5-2 से हराया था. पेले ने इस उपलब्धि के लिए ट्वीट करके एमबापे को बधाई भी दी है. बचपन से ही प्रतिभावान रूस में हुए इस वर्ल्ड कप टूर्नामेंट में एमबापे ने चार गोल दागे. वह सबसे ज़्यादा गोल करने वाले टॉप तीन खिलाड़ियों में तो शामिल नहीं हैं, मगर उन्हें फ़ीफा यंग प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट का ख़िताब मिला है यानी उन्हें विश्वकप का सर्वश्रेष्ठ युवा खिलाड़ी चुना गया है आज उनकी प्रतिभा और क्षमता का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है, लेकिन किलियान एमबापे बचपन से ही प्रभावित करनेवाले शख़्स रहे हैं. एमबापे का बचपन पेरिस के बाहरी इलाके में बीता मगर शुरू से उन्होंने अपनी प्रतिभा से लोगों का ध्यान खींचा 20 दिसंबर 1998 को फ़्रांस की राजधानी पेरिस में जन्मे एमबापे के पिता विल्फ़्राइड मूलत: कैमरून से हैं. वह फ़ुटबॉल कोच हैं और एमबापे के एजेंट भी. एमबापे की मां फ़ाएजा लमारी अल्जीरिया से हैं. वह हैंडबॉल की खिलाड़ी रह चुकी हैं. एमबापे ने अपने करियर की शुरुआत पेरिस के फ़ुटबॉल क्लब एएस बॉन्डी से की थी, जहां पर उनके पिता विल्फ़्राइड भी कोच थे. यहां एमबापे ने एक अन्य कोच एन्टोनियो रिकार्डी से भी कोचिंग ली थी. एमबापे के बारे में रिकॉर्डी ने बीबीसी से कहा था, \"एमबापे उस समय छह साल के थे जब मैंने पहली बार उन्हें कोचिंग दी. उसी वक्त महसूस हुआ था कि वह कुछ अलग हैं. वह बाकी बच्चों से बढ़कर थे.\" एमबापे के चर्चित होने के बाद एएस बॉन्डी क्लब की सदस्यता लेने की होड़ मच गई थी रिकॉर्डी ने एमबापे की प्रतिभा के बारे में बताया, \"उनकी ड्रिबलिंग कमाल की थी और वह बाकियों से काफ़ी तेज़ भी थे. मैंने यहां पर 15 साल कोचिंग दी है और इस दौरान मैंने उनसे बेहतर और कोई खिलाड़ी नहीं देखा. पेरिस में वैसे तो बहुत सारी प्रतिभाएं हैं, मगर उनके जैसी कोई नहीं. वो सर्वश्रेष्ठ हैं.\" दुनिया हुई मुरीद एएस बॉन्डी के बाद एमबापे क्लेयरफोन्टेन अकादमी में चले गए थे. बाद में उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें कई फ्रांसीसी क्लबों, रियाल मैड्रिड, चेल्सी, लिवरपूल और मैनचेस्टर सिटी तक ने साइन करने की कोशिश की थी. एमबापे 12 से 15 साल की उम्र में क्लेयरफॉन्टेन अकादमी के लिए खेल रहे थे मगर शुरुआत बॉन्डी के लिए ही की थी फ़ुटबॉल क्लबों में उन्हें साइन करने को लेकर किस तरह की होड़ रहती है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के दूसरे सबसे महंगे एसोसिएशन फ़ुटबॉल ट्रांसफ़र का रिकॉर्ड भी एमबापे के नाम है. इसी साल 135 मिलियन यूरो में उनका ट्रांसफ़र मोनाको से फ़्रांसीसी क्लब पैरिस सेंट जर्मेन के लिए हुआ था. जर्मनी के पूर्व स्ट्राइकर औऱ मैनेजर जर्गन क्लिन्समन कहते हैं, \"अभी तो एमबापे की ओर से और बहुत कुछ आना बाकी है. उन्होंने मार्केट को हिलाकर रख दिया है.\" सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का ताज 33 साल के रोनाल्डो और 31 साल के मेसी को पिछले एक दशक से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है. फ़ुटबॉल के पिछले 10 प्रतिष्ठित बैलन डोर अवॉर्डों का बंटवारा उन्हीं के बीच हुआ है. मगर इंग्लैंड के पूर्व डिफ़ेंडर रियो फ़र्डिनेंड कहते हैं, \"लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का ताज फ़्रांस के टीनेजर काइलियान एमबापे को सौंप रहे हैं.\" मैनचेस्टर युनाइटेड के लिए खेल चुके फ़र्डिनेंड कहते हैं, \"आने वाले कई सालों तक एमबापे बैलन डोर के मंच पर दिखाई देंगे.\" फ़र्डिनेंड कहते हैं कि एमबापे में उम्र से ज़्यादा परिपक्वता दिखाई देती है. वहीं जर्मनी के पूर्व स्ट्राइकर क्लिन्समन कहते हैं कि एमबापे को देखकर ऐसा लगता है मानो वह 10 साल से फ़्रांस की टीम में खेल रहे हों. 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केंद्र सरकार पर लगभग 17 हज़ार करोड़ रुपए का वार्षिक बोझ पड़ा था. राज्य सरकारों पर बोझ पत्रकारों से बातचीत में सूचना-प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने बताया कि आयोग केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की सेवा के कुछ पहलुओं पर भी ध्यान देगा. महत्वपूर्ण है कि 12वें वित्त आयोग ने सरकार को सलाह दी थी कि वह समय-समय पर वेतन आयोग के गठन से परहेज़ करे क्योंकि पाँचवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के बाद अनेक राज्य सरकारों पर भी गंभीर वित्तीय बोझ पड़ा था. केंद्रीय वेतन आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर ही राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों के वेतन बढ़ाती हैं. महत्वपूर्ण है कि भाजपा की सरकार वाले मध्यप्रदेश और गुजरात ने छठे वेतन आयोग के गठन का विरोध किया था.\n\nSummary:", "target": "भारत में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 55 लाख सरकारी कर्मचारियों के लिए छठे केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को मंज़ूरी दे दी है. ये आयोग अंतरिम राहत की सिफ़ारिश भी करेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसियों के अनुसार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में तय हुआ 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दूर है, इससे पहले वह भुबनेश्वर से कटक तक 35 किलोमीटर की दौड़ लगा चुका है. पिछले दिनों उड़ीसा के दौरे पर गईं ओलंपियन पीटी उषा ने भी कहा था कि इतनी लंबी दूरी तक दौड़ना दीर्घकाल में बुधिया के लिए नुक़सानदेह हो सकता है. लेकिन बिरंची कहते हैं, \"तीन डॉक्टरों का एक दल बुधिया की नियमित जाँच करता है, बुधिया पूरी तरह स्वस्थ है, मुझे समझ में नहीं आता कि लोगों को इतनी चिंता क्यों है.\" भत्ता राज्य सरकार ने बुधिया को हर महीने 500 रूपए का भत्ता देने की घोषणा की है लेकिन पेशे से जूडो कोच दास का कहना है कि \"इतने पैसे तो दो दिन के लिए भी काफ़ी नहीं हैं.\" स्थानीय जूडो एसोसिएशन के अध्यक्ष बिरंची दास का कहना है कि बुधिया जन्मजात तौर पर विलक्षण है और उसमें अपार ऊर्जा है. उन्होंने अब बुधिया के लिए बहुत ही अनुशासित दिनचर्या तैयार की है, जिसमें उनके खानपान और अभ्यास का विशेष ध्यान रखा गया है. बुधिया को अपनी माँ के साथ रहने पर सिर्फ़ भात ही खाने को मिलता था लेकिन अब उसे अंडे, दूध और माँस सहित संतुलित भोजन दिया जा रहा है.\n\nSummary:", "target": "भारत के उड़ीसा राज्य के अधिकारियों ने आशंका व्यक्त की है कि तीन वर्षीय मैराथन धावक बुधिया सिंह का शोषण हो रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाल ही में दिल्ली में हुए मैराथन में दौड़ लगाने वाले बुधिया सिंह कई टीवी विज्ञापनों में भी नज़र आने लगे हैं. राज्य सरकार का कहना है कि इतनी लंबी दूरी तक दौड़ने की वजह से इस बालक के हृदय और फेफड़ों पर बुरा असर पड़ सकता है. लेकिन बुधिया के कोच बिरंची दास ने इन आशंकाओं को निराधार बताया है और कहा है कि उसकी नियमित मेडिकल जाँच की जाती है. उड़ीसा के खेल मंत्री देवाशीष नायक का कहना है कि \"सरकार बच्चे के शोषण की मूक दर्शक नहीं बनी रहेगी और ज़रूरत पड़ी तो उसके भविष्य को बचाने के लिए हस्तक्षेप करेगी.\" हाल ही में बुधिया ने तीर्थनगर पुरी से भुबनेश्वर तक की दौड़ लगाई है जो लगभग 60 किलोमीटर दूर है, इससे पहले वह भुबनेश्वर से कटक तक 35 किलोमीटर की दौड़ लगा चुका है. पिछले दिनों उड़ीसा के दौरे पर गईं ओलंपियन पीटी उषा ने भी कहा था कि इतनी लंबी दूरी तक दौड़ना दीर्घकाल में बुधिया के लिए नुक़सानदेह हो सकता है. लेकिन बिरंची कहते हैं, \"तीन डॉक्टरों का एक दल बुधिया की नियमित जाँच करता है, 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"Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमोज़िल्ला ने फ़ायरफ़ॉक्स के लिए अब साइलेंट बटन बनाया है, जिसके इस्तेमाल से आप ख़ुद चलने वाले वीडियो को म्यूट कर सकते हैं. सबसे पहले फ़ायरफ़ॉक्स पर ब्राउज़र खोल लीजिए और साइलेंट टैब्स ऐड-ऑन डाउनलोड करके इनस्टॉल कर लीजिए. अगर आप फ़्लैश नहीं चला रहे हैं तो एचटीएमएल-5 से चलने वाले वेबसाइट जैसे यूट्यूब को खोलकर देख लीजिए. गूगल ने भी दी सहूलियत जब भी एचटीएमएल-5 कंटेंट वाली वेबसाइट खुलेगी, आपके स्क्रीन पर एक ऑडियो आइकॉन आ जाएगा. ऐप पर क्लिक कर दीजिए और एक क्रॉस का निशान आएगा, जिससे आपको पता लगेगा कि आपने वेबसाइट की आवाज़ बंद कर दी है. समाप्त कुछ समय पहले गूगल ने भी ऐसी सहूलियत क्रोम के लिए दी थी. नॉइज़ कंट्रोल नाम का ये क्रोम एक्सटेंशन, फ़्लैश पर चलने वाले वीडियो के मामले में काम नहीं करता है और सिर्फ एचटीएमएल-5 वाली साइट्स पर ही काम करता है. आपकी सहूलियत के नज़र से देखें तो फ़ायरफ़ॉक्स का साइलेंट टैब आपके लिए बेहतर है लेकिन अगर आप ब्राउज़िंग के लिए क्रोम को पसंद करते हैं तो आपको नॉइज़ कंट्रोल से ही काम चलाना पड़ेगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अक्सर ऐसा होता है कि वेब ब्राउज़र में कोई वीडियो अपने आप चलने लगता है. ये आपकी सर्फिंग को ये धीमा तो करता ही है, आपके इंटरनेट डेटा की भी फ़ालतू खपत होती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमोज़िल्ला ने फ़ायरफ़ॉक्स के लिए अब साइलेंट बटन बनाया है, जिसके इस्तेमाल से आप ख़ुद चलने वाले वीडियो को म्यूट कर सकते हैं. सबसे पहले फ़ायरफ़ॉक्स पर ब्राउज़र खोल लीजिए और साइलेंट टैब्स ऐड-ऑन डाउनलोड करके इनस्टॉल कर लीजिए. अगर आप फ़्लैश नहीं चला रहे हैं तो एचटीएमएल-5 से चलने वाले वेबसाइट जैसे यूट्यूब को खोलकर देख लीजिए. गूगल ने भी दी सहूलियत जब भी एचटीएमएल-5 कंटेंट वाली वेबसाइट खुलेगी, आपके स्क्रीन पर एक ऑडियो आइकॉन आ जाएगा. ऐप पर क्लिक कर दीजिए और एक क्रॉस का निशान आएगा, जिससे आपको पता लगेगा कि आपने वेबसाइट की आवाज़ बंद कर दी है. समाप्त कुछ समय पहले गूगल ने भी ऐसी सहूलियत क्रोम के लिए दी थी. नॉइज़ कंट्रोल नाम का ये क्रोम एक्सटेंशन, फ़्लैश पर चलने वाले वीडियो के मामले में काम नहीं करता है और सिर्फ एचटीएमएल-5 वाली साइट्स पर ही काम करता है. आपकी सहूलियत के नज़र से देखें तो फ़ायरफ़ॉक्स का साइलेंट टैब आपके लिए बेहतर है लेकिन अगर आप ब्राउज़िंग के लिए क्रोम को पसंद करते हैं तो आपको नॉइज़ कंट्रोल से ही काम चलाना पड़ेगा. 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था कि जिस देश में करोड़ो लोग ग़रीब हैं और इससे मर रहे हैं वहाँ सरकार को आम लोगो की चिंता कैसे हो सकती है. सरकार सिर्फ राजनीति कर रही है. धमाकों की उसे चिंतो नहीं. जब दिल्ली सुरक्षित नहीं है तो देश का कौन सा हिस्सा सुरक्षित हो सकता है.' जबकि एक दूसरे शख़्स का कहना था कि चरमपंथी हमारे देश और लोगो के हौसलो को कम नहीं कर सकते हैं. दिल्ली के लोग अब नए सिरे से ज़िंदगी शुरु करेंगे लेकिन शनिवार को जो कुछ हुआ उसकी तल्ख़ यादें दिल्ली वालो का बहुत दिन तक पीछा करेंगे. दिल्ली का दर्द अभी ख़त्म नहीं हुआ है. गौरतलब है कि शनिवार की शाम दिल्ली के तीन विभिन्न स्थानों पर बम धमाके हुए जिसमें 20 लोग मारे गए और लगभग 90 से ज़्यादा लोग घायल हुए.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली में बम धमाकों के एक दिन बाद जहां किसी घटनास्थल पर सन्नाटा है तो कहीं तमाशबीनों की भीड़ लगी हुई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क और बाराखंभा रोड पर धमाका हुआ था. रविवार की सुबह जहां सेंट्रल पार्क बिल्कुल खाली था वहीं बाराखंभा पर कई लोग मौजूद थे. साथ ही थी मीडिया और 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सेल्सियस पहुँच गया. पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश में 50 से ज़्यादा लोग लू की भेंट चढ़े हैं. ग़ैरसरकारी सूत्रों के अनुसार राज्य में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत तेज़ गर्मी से हुई है. सरकारी सूत्रों के अनुसार उत्तरप्रदेश में तेज़ गर्मी के कारण 70 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है. पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड से भी मौतों के समाचार मिले हैं. समाचार एजेंसी एपी के अनुसार बिहार और झारखंड राज्य सरकारों ने बच्चों को तेज़ गर्मी से बचाने के लिए स्कूलों में गर्मियों की छुट्टी सप्ताह भर और बढ़ा दी है. अब इन राज्यों में स्कूल इस महीने के अंत तक बंद रहेंगे.\n\nSummary:", "target": "भारत के विभिन्न हिस्सों में भीषण गर्मी और लू का कहर जारी है. इस मौसमी मार से अब तक 200 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहालाँकि ग़ैरसरकारी सूत्रों के अनुसार मरने वालों की संख्या कहीं ज़्यादा है. इसबीच मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों में देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून के पहुँचने की उम्मीद व्यक्त की है. उल्लेखनीय है कि मानसून इसबार सप्ताह भर देर से केरल पहुँचा था 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कोलंबो में बातचीत की है और इसमें देश के उत्तरी भाग में स्थिति पर चर्चा हुई है. हज़ारों का बार-बार पलायन अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था रेडक्रॉस के अनुसार भीषण जंग के कारण तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई के कब्ज़े वाले इलाक़े में फँसे हुए हज़ारों लोगों को जान बचाने के लिए बार-बार एक जगह से दूसरी जगह भटकना पड़ा है और उनके लिए खाद्य पदार्थों की आपूर्ति और चिकित्सा संबंधी समस्याएँ खड़ी हो गई हैं. रेडक्रॉस के अधिकारी पॉल कैसटेलो ने बीबीसी को बताया कि लड़ाई के कारण एक हफ़्ते से तमिल विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़े में राहत सामग्री नहीं पहुँच पाई है जिससे खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है. लेकिन श्रीलंका के सैन्य प्रवक्ता ने ज़ोर देकर कहा है कि खाद्य सामग्री से लदे वाहनों का एक काफ़िला विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़े में भेजा गया है और वहाँ पर्याप्त खाद्य सामग्री मौजूद है. 'सुरक्षित रास्ते नहीं' रेडक्रॉस ने इस विषय पर भी चिंता जताई है कि दोनों पक्षों ने आम नागरिकों के बचकर निकलने के कोई 'सुरक्षित रास्तों' पर सहमति नहीं बनाई है. रेडक्रॉस के एक बयान में कहा गया है - \"सुरक्षित रास्ते न होने के कारण उन मरीज़ों की जान के लिए ख़तरा पैदा हो गया है जिन्हें घटनास्थल पर उचित चिकित्सा नहीं दी जा सकती और जिन्हें वावूनिया में सरकार के कब्ज़े वाले इलाक़े में अस्पताल में ले जाने की ज़रूरत है.\" बुधवार को श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि कुल 1707 लोगों ने जनवरी के दो हफ़्तों में सरकार के कब्ज़े वाले इलाक़ों में प्रवेश किया है जहाँ उन्हें आपात मदद और राहत सामग्री दी गई. रेडक्रॉस के अधिकारी पॉल कैसटेलो का कहना था, \"बार-बार विस्थापन में कई बार लोगों को बार-बार अपने सब कुछ गँवाना पड़ा है और इसका असर साफ़ दिख रहा है.\" रेडक्रॉस के अनुसार पलायन करने वाले हज़ारों लोगों को इतने छोटे से इलाक़े में रखा गया है कि उनकी सुरक्षा और हालात के बारे में गंभीर चिंता पैदा हो गई है.\n\nSummary:", "target": "उत्तरी श्रीलंका में सेना और तमिल विद्रोहियों के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है और हताहतों के बारे में परस्पर विरोधी खबरें आ रही हैं. उधर रेडक्रॉस ने इस लड़ाई के दौरान विस्थापित हुए हज़ारों लोगों की देखरेख के बारे में चिंता जताई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतमिल विद्रोहियों की वेबसाइट के मुताबिक विद्रोहियों ने धर्मापुरम के पास सेना को खदेड़ दिया है और इस कार्रवाई में 50 से ज़्यादा सैनिक मारे गए हैं. लेकिन सेना ने इस दावे का खंडन किया है. उधर सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर उदय नानायाकारा ने बीबीसी को बताया है कि सेना ने विद्रोहियों को खदेड़ दिया है और बीस विद्रोही मारे गए हैं. उन्होंने ये भी कहा है कि सात सैनिक भी मारे गए हैं. श्रीलंका की सेना ने पिछले कई हफ़्तों से एलटीटी के कब्ज़े वाले इलाक़ों में भीषण सैन्य अभियान चलाया है और एलटीटीई विद्रोही अब उत्तर-पूर्वी तटवर्ती शहर मुल्लईटिवू में घिर गए हैं. दूसरी ओर भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने श्रीलंका के राष्ट्रपति महेंदा राजपक्षे से कोलंबो में बातचीत की है और इसमें देश के उत्तरी भाग में स्थिति पर चर्चा हुई है. हज़ारों का बार-बार पलायन अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था रेडक्रॉस के अनुसार भीषण जंग के कारण तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई के कब्ज़े वाले इलाक़े में फँसे हुए हज़ारों लोगों को जान बचाने के लिए बार-बार एक जगह से दूसरी जगह भटकना पड़ा है और उनके लिए खाद्य पदार्थों की आपूर्ति और चिकित्सा संबंधी समस्याएँ खड़ी हो गई हैं. रेडक्रॉस के अधिकारी पॉल कैसटेलो ने बीबीसी को बताया कि लड़ाई के कारण एक हफ़्ते से तमिल विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़े में राहत सामग्री नहीं पहुँच पाई है जिससे खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है. लेकिन श्रीलंका के सैन्य प्रवक्ता ने ज़ोर देकर कहा है कि खाद्य सामग्री से लदे वाहनों का एक काफ़िला विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़े में भेजा गया है और वहाँ पर्याप्त खाद्य सामग्री मौजूद है. 'सुरक्षित रास्ते नहीं' रेडक्रॉस ने इस विषय पर भी चिंता जताई है कि दोनों पक्षों ने आम नागरिकों के बचकर निकलने के कोई 'सुरक्षित रास्तों' पर सहमति नहीं बनाई है. रेडक्रॉस के एक बयान में कहा गया है - \"सुरक्षित रास्ते न होने के कारण उन मरीज़ों की जान के लिए ख़तरा पैदा हो गया है जिन्हें घटनास्थल पर उचित चिकित्सा नहीं दी जा सकती और जिन्हें वावूनिया में सरकार के कब्ज़े वाले इलाक़े में अस्पताल में ले जाने की ज़रूरत है.\" बुधवार को श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि कुल 1707 लोगों ने जनवरी के दो हफ़्तों में सरकार के कब्ज़े वाले इलाक़ों में प्रवेश किया है जहाँ उन्हें आपात मदद और राहत सामग्री दी गई. रेडक्रॉस के अधिकारी पॉल कैसटेलो का कहना था, \"बार-बार विस्थापन में कई बार लोगों को बार-बार अपने सब कुछ गँवाना पड़ा है और इसका असर साफ़ दिख रहा है.\" रेडक्रॉस के अनुसार पलायन करने वाले हज़ारों लोगों को इतने छोटे से इलाक़े में रखा गया है कि उनकी सुरक्षा और हालात के बारे में गंभीर चिंता पैदा हो गई है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 33, "source_item_id": "33", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2417, "clean_index": 31, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:31"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक्वेटा में बीबीसी संवाददाता मोहम्मद काज़िम के अनुसार पुलिस अधिकारियों का कहना है कि धमाका शहर के भीड भीड़ वाले चौराहे सरयाब रोड पर बस टर्मिनल के क़रीब हुआ है. पुलिस अधीक्षक अब्दुल वहीद खटक ने बताया कि शुरूआती जानकारी से पता चला है कि विस्फोटक सामग्री बस की छत पर रखा हुआ था. उनके अनुसार इस बात की आशंका जताई जा रही है कि धमाका टाइम डिवाइस की मदद से किया गया है. धमाके के समय बस में लगभग 40 यात्री सवार थे. समाप्त घायलों को सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया है. सुरक्षाकर्मियों ने पूरे इलाक़े को अपने घेरे में ले लिया है. फ़िलहाल किसी संगठन ने धमाके की ज़िम्मेदारी क़ुबूल नहीं की है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के क्वेटा शहर में एक यात्री बस में हुए धमाके में कम के कम 10 लोग मारे गए हैं और 20 से ज़्यादा घायल हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक्वेटा में बीबीसी संवाददाता मोहम्मद काज़िम के अनुसार पुलिस अधिकारियों का कहना है कि धमाका शहर के भीड भीड़ वाले चौराहे सरयाब रोड पर बस टर्मिनल के क़रीब हुआ है. पुलिस अधीक्षक अब्दुल वहीद खटक ने बताया कि शुरूआती जानकारी से पता चला है कि विस्फोटक सामग्री बस की छत पर रखा हुआ था. उनके अनुसार इस बात की आशंका जताई जा रही है कि धमाका टाइम डिवाइस की मदद से किया गया है. धमाके के समय बस में लगभग 40 यात्री सवार थे. समाप्त घायलों को सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया है. सुरक्षाकर्मियों ने पूरे इलाक़े को अपने घेरे में ले लिया है. फ़िलहाल किसी संगठन ने धमाके की ज़िम्मेदारी क़ुबूल नहीं की है. 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समाप्त करने की घोषणा की थी. एआईजी बड़ी इंश्योरेंस कंपनी एआईजी को अमरीकी सरकार और आर्थिक सहायता देने जा रही है, कंपनी को बर्बादी से बचाने के लिए सरकार अब तक 150 अरब डॉलर लगा चुकी है. सरकार कंपनी के 40 अरब डॉलर के शेयर ख़रीदने जा रही है जिसके बाद उसके पास कंपनी का स्वामित्व आ जाएगा. अमरीकी सरकार देश के वित्तीय संस्थानों को उबारने के लिए 700 अरब डॉलर सरकारी ख़ज़ाने से ख़र्च कर रही है और एआईजी पर लगने वाले 150 डॉलर उसी पैकेज का हिस्सा है. तीसरी तिमाही में एआईजी ने 24 अरब डॉलर के घाटे की घोषणा की है. पिछले साल तक उसे 3 अरब डॉलर का फ़ायदा हुआ था. सर्किट सिटी अमरीका में इलेक्ट्रॉनिक सामानों की बिक्री करने वाली मशहूर चेन सर्किट सिटी दिवालिया होने के कगार पर है, कंपनी सरकार से मदद की गुहार लगाई है. पूरे अमरीका में 700 से अधिक बड़े दुकान चलाने वाली कंपनी ने पिछले दिनों घोषणा की थी कि वह 155 दुकानों को बंद करने जा रही है जिसकी वजह से 20 प्रतिशत लोग अपनी नौकरियाँ गँवाने वाले हैं. कंपनी ने 1.1 अरब डॉलर का कर्ज़ लिया है ताकि किसी तरह कामकाज चलता रहे.\n\nSummary:", "target": "अमरीका की सबसे बड़ी कार 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राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख़्तार अब्बास नक़वी ने बीबीसी को बताया कि पार्टी के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी के लिए खुराना को अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत प्राथमिक सदस्यता से निलंबित किया गया है. नक़वी ने बताया कि खुराना को भी इसकी जानकारी दे दी गई है. इससे पहले राजस्थान के राज्यपाल रह चुके मदनलाल खुराना ने कहा था कि वह भाजपा से निष्कासित नेता उमा भारती की रैली में जाने की घोषणा की थी. मदद लाल खुराना ने कहा था, \"मैं कोई लल्लू पंजू नहीं हूँ, मैं राज्यपाल था लेकिन वह पद छोड़कर पार्टी के लिए काम करना चाहता था. अगर मुझे घर में ही बैठना था तो राजनिवास में बैठे रह सकता था. पार्टी ने जो वायदे किए थे वो पूरे नहीं हुए हैं, अफ़सोस तो मुझे यही है.\" खुराना से जब यह पूछा गया कि उनके इस बयान को पार्टी विरोधी गतिविधि माना जा सकता है और उन्हें नुक़सान भी उठाना पड़ सकता है तो खुराना ने कहा यह राजनीति से ऊपर का मामला है. खुराना ने कहा, \"दिल्ली मेरे लिए एक मंदिर जैसी है और मंदिर के पुजारी के रूप में मेरा कर्तव्य है कि मैं दिल्ली में हो रही तोड़फोड़ और आम लोगों की परेशानियाँ दूर करने के लिए कुछ करूँ. दिल्ली की सेवा 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लिखनेवालों की बेहद कमी है. पढ़ें बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से उनकी बातचीत के अंश. बॉब डिलन तो बहुत बड़ी शख़्सियत हैं और उनका संदर्भ अमरीका रहा है पर उनके जैसे ही सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भारत में लिखे जा रहे गीतों को वैसी लोकप्रियता नहीं मिली है. पीयूष मिश्रा ने 'गुलाल' फ़िल्म के गीत लिखे और उन्हें संगीतबद्ध किया बड़ी तक़लीफ़ से ये मानना पड़ता है कि विदेश से अलग भारत में लोकप्रिय होने के लिए बॉलीवुड से जुड़ना पड़ता है. रिकॉर्ड की बिक्री या यूट्यूब पर गाने डालने से वो व्यापक असर नहीं होता जैसा फ़िल्मों से जुड़कर हो सकता है. मैंने भी अपने गीत नाटकों के लिए लिखे और बाद में उन्हें बॉलीवुड में इस्तेमाल किया तो लोगों ने थोड़ा पहचानना शुरू किया. उसके बावजूद मैं व्यावसायिक तौर पर गीतकार नहीं बन पाया. पीयूष मिश्रा ने फ़िल्म 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' के दो गीत लिखे हैं. लेकिन ये समझना मुश्किल है कि बिना सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ लाए, गीत कैसे लिखे जा सकते हैं. अगर प्यार का गीत भी है तो उसके पीछे कोई घटनाक्रम होगा. मेरा एक गीत है जिसके बोल हैं, 'उजला उजला शहर होगा, जिसमें हम-तुम बनाएंगे घर, 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "1960 के दशक में अपने गीतों से सामाजिक क्रांतियों में बड़ी भूमिका निभाने वाले अमरीकी पॉप गायक बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबॉब डिलन के गीतों में उनके दौर की राजनीति की बारीक़ समझ झलकती थी. गीतकार, संगीतकार, लेखक और अभिनेता पीयूष मिश्रा के मुताबिक भारत में ऐसी सोच और समझ के साथ गीत लिखनेवालों की बेहद कमी है. पढ़ें बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से उनकी बातचीत के अंश. बॉब डिलन तो बहुत बड़ी शख़्सियत हैं और उनका संदर्भ अमरीका रहा है पर उनके जैसे ही सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भारत में लिखे जा रहे गीतों को वैसी लोकप्रियता नहीं मिली है. पीयूष मिश्रा ने 'गुलाल' फ़िल्म के गीत लिखे और उन्हें संगीतबद्ध किया बड़ी तक़लीफ़ से ये मानना पड़ता है कि विदेश से अलग भारत में लोकप्रिय होने के लिए बॉलीवुड से जुड़ना पड़ता है. रिकॉर्ड की बिक्री या यूट्यूब पर गाने डालने से वो व्यापक असर नहीं होता जैसा फ़िल्मों से जुड़कर हो सकता है. मैंने भी अपने गीत नाटकों के लिए लिखे और बाद में उन्हें बॉलीवुड में इस्तेमाल किया तो लोगों ने थोड़ा पहचानना शुरू किया. उसके बावजूद मैं व्यावसायिक तौर पर गीतकार नहीं बन पाया. पीयूष मिश्रा ने फ़िल्म 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' के दो गीत लिखे हैं. लेकिन ये समझना मुश्किल है कि बिना सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ लाए, गीत कैसे लिखे जा सकते हैं. अगर प्यार का गीत भी है तो उसके पीछे कोई घटनाक्रम होगा. मेरा एक गीत है जिसके बोल हैं, 'उजला उजला शहर होगा, जिसमें हम-तुम बनाएंगे घर, दोनों रहेंगे क़बूतर से, जिसमें होगा ना बाज़ों का डर'. ये अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरने के माहौल में एक मुसलमान लड़की और हिंदू लड़के के बीच के प्रेम पर आधारित था. पहले मुझे लगता था कि इस तरह के गीत कुछ ही लोग सुनना चाहेंगे. पर ये गीत लोकप्रिय हो रहे हैं और ख़ास तौर पर युवा वर्ग इनसे बहुत प्रभावित है. बॉब डिलन ने अपनी आवाज़ के लिए कभी कोई पुरस्कार नहीं जीता है. मेरा दुर्भाग्य यह है कि जब मैं जवान हो रहा था मैंने तब बॉब डिलन को पढ़ा और सुना नहीं. जब मेरी विचारधारा ने वामपंथी मोड़ लिया और डिलन ने शांति के मुद्दे पर काम किया तब मैंने उन्हें साक्षात सुना और उनसे बहुत प्रभावित हुआ. तब तक मैं क़रीब 30 साल का हो चुका था और काफ़ी कुछ लिख चुका था. उस मायने में मेरा लेखन उनसे प्रेरित नहीं है, पर उनके काम को समझकर मैंने जाना कि मेरी और उनकी सोच काफ़ी एक सी है. शुभा मुद्गल ने ग़ैर-बॉलीवुड संगीत को बढ़ावा देने के लिए रिकॉर्ड लेबल 'अंडरस्कोर रिकॉर्ड्स' की शुरुआत की. भारत में ऐसा लगता है कि गीत लिखनेवाले आंख, नाक, कान खोलकर नहीं सोते हैं. क्योंकि अगर वो इतने सजग रहें तो हमारे आसपास लिखने के लिए मुद्दे भी बहुत है और शब्द भी. और आज का युवा जानना समझना चाहता है कि उसकी दुनिया के मसले क्या हैं, उनका संदर्भ क्या है. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोकटोक की बातें ख़ूब हो रही हैं पर अगर ऐसा होता तो मेरे गीत बैन हो गए होते. पिछले सालों में इस तरह के लेखन को गीतों में ढालने की एक जगह ज़रूर बन रही है, पर इसे अभी और बहुत खुलने की ज़रूरत है. 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वे सक्रिय रहे होते तो उत्तर प्रदेश ही नहीं अपनी पूरी राजनीति को थोड़ा और मजबूत करते. ऐसी कामनाओं और चाहों का होना यह बताता है कि कांशीराम और उनकी राजनीति की प्रासंगिकता अभी बाकी है और उनके जाने से समाज का, खासकर दलित समाज का काफी नुकसान हो गया है. अकेले दम पर और आरक्षण के ज़रिए निकले दलित अधिकारियों-कर्मचारियों की थोड़ी सी मदद से उन्होंने जो मशाल जलाई उसने मुल्क की राजनीति में भारी बदलाव ला दिया है. लेकिन जाहिर तौर पर उनका मिशन अधूरा है और अगर इसे ढंग से आगे नहीं बढ़ाया गया तो यह बड़ा नुकसान होगा. कांशीराम ने सबसे बड़ा काम तो मुल्क में और खास तौर से हिंदीभाषी प्रदेशों में दलित समाज में प्राण फूंकने का किया है. उपलब्धियाँ हजारों साल से दबा यह समाज आज न सिर्फ मुख्यधारा में आया है बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रांत के शासन की बागडोर तीन-तीन बार एक दलित महिला के हाथ में आई है. दलितों में कांशीराम और बसपा के लिए जो ललक और प्रेम दिखता है वह विलक्षण है. बसपा के नेतृत्व की अगली चुनौती इन आकांक्षाओं को राजनीतिक हथियार में बदलकर उत्तर प्रदेश जैसी स्थिति बाक़ी राज्यों में 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चक्र से प्रभावित होता है और यह बाहरी तत्वों से अप्रभावित रहता है. शोध शोधकर्ताओं ने चूहों पर प्रयोग किया जिसमें उन्हें 12 घंटे के सामान्य दिन या रात के बजाय 11 घंटे के दिन-रात में रखा गया. प्रयोग में पाया गया कि चूहों ने रात में भी दिन की ही तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया. इस प्रक्रिया में चूहों में दो तरह के प्रोटीन पाए गए. एक था पर्ल नामक जो आमतौर पर दिन में सक्रिय होता है और दूसरा बीमाल नामक जो आमतौर पर रात में सक्रिय होता है. जब उन्हें रौशनी करके दिन का वातावरण दिया जाता था तो उनके दिमाग़ में पर्ल नाम का प्रोटीन सक्रिय होता था और अंधेरा करने पर बीमाल नामक प्रोटीन सक्रिय हो जाता था. लेकिन जब चूहे रात में भी दिन का माहौल मिलने पर उसी के अनुरूप बर्ताव करना शुरू कर देते थे तो उनके अंदर दोनों तरह के प्रोटीन मौजूद होते थे. पर्ल दिमाग़ के ऊपरी आधे हिस्से में और बीमाल निचले हिस्से में होता था. इससे यह नतीजा निकाला गया कि दिमाग़ का तलहटी वाला हिस्सा 24 घंटे वाले समयचक्र पर चलता है और रौशनी मिलने पर इसी हिस्से में सक्रियता होती है. इसका यह मतलब भी निकाला गया कि ऊपरी आधा हिस्सा दिन निकलने और रात होने जैसे बाहरी कारणों के ज़्यादा प्रभाव में रहता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि जब दिमाग़ के इन दोनों हिस्सों में तालमेल नहीं बैठ पाता तो आदमी जैटलैग यानी समयचक्र बदलने से थकान महसूस करता है.\n\nSummary:", "target": "क्या आपने कभी इस तह में जाने की कोशिश की है कि जैटलैग क्यों होता है यानी अलग-अलग समय चक्र वाले देशों में जाने पर थकान ज़्यादा क्यों महसूस होती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवैज्ञानिकों ने इस बारे में कुछ ठोस कारण जानने का दावा किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि आदमी के दिमाग़ में दो समय केंद्र होते हैं जिनमें से एक तो घड़ी के मुताबिक़ चलता है और दूसरा दिन निकलने और रात होने के प्रभाव में रहता है. पत्रिका 'करेंट बॉयोलॉजी' में कुछ वैज्ञानिकों ने लिखा है कि जब दिमाग़ के ये दोनों केंद्र आपस में तालमेल नहीं बिठा पाते तो जैट लैग महसूस होता है. यह शोध करने वाले वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि इन कारणों का पता लगाए जाने के बाद ऐसी दवाई बनाई जा सकती है जिससे जैटलैग पर क़ाबू पाया जा सके. शोधकर्ता डॉक्टर होराशियो दा ला इगलेशिया का कहना है, \"अगर हम यह पता लगाने में कामयाब हो जाए कि दिमाग़ के दोनों केंद्र किस तरह से तालमेल बिठाते हैं तो जैटलैग के इलाज का रास्ता खोजा जा सकता है.\" अलग हिस्से दिमाग़ में सुपराशियास्मेटिक न्यूक्लियस नाम का एक छोटा सा हिस्सा होता है जो नींद, हारमोन और शरीर के तापमान के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करता है. कहा जाता है कि दिमाग़ का यही हिस्सा दिन निकलने और ढलने जैसे बाहरी तत्वों के असर में रहता है. दिमाग़ का दूसरा छोटा हिस्सा 24 घंटे के चक्र से प्रभावित होता है और यह बाहरी तत्वों से अप्रभावित रहता है. शोध शोधकर्ताओं ने चूहों पर प्रयोग किया जिसमें उन्हें 12 घंटे के सामान्य दिन या रात के बजाय 11 घंटे के दिन-रात में रखा गया. प्रयोग में पाया गया कि चूहों ने रात में भी दिन की ही तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया. इस प्रक्रिया में चूहों में दो तरह के प्रोटीन पाए गए. एक था पर्ल नामक जो आमतौर पर दिन में सक्रिय होता है और दूसरा बीमाल नामक जो आमतौर पर रात में सक्रिय होता है. जब उन्हें रौशनी करके दिन का वातावरण दिया जाता था तो उनके दिमाग़ में पर्ल नाम का प्रोटीन सक्रिय होता था और अंधेरा 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यहाँ पर बीफ़ बिरयानी खाने या पैक कराने वालों में हिंदू-मुसलमान दोनों हैं. अभी तो भूख मिटानी थी, इसलिए छोड़ दिया. लेकिन दो किलोमीटर बाद फिर से बीफ़ बिरयानी के बोर्ड दिखने लगे, तो ट्रिप्लीकेन मोहल्ले की एक दुकान पर रुक ही गए. रहमत बीफ़ बिरयानी के मालिक एेहतशाम ने कहा, \"50 रुपए प्लेट है और चावल की क्वालिटी भी अच्छी है. दिन में 80-100 किलो बिकती है और इलाके के हिंदू-मुसलमान और ईसाई हमारे यहाँ बीफ़ खाने आते हैं. मेरे तमाम हिंदू दोस्त हैं, जिनके घर रोज़ के एक-डेढ़ किलो पैक हो कर भी जाती है.\" तामिलनाडु राज्य के लगभग हर शहर में ऐसे इलाके हैं, जहाँ बीफ़ और उसके पकवान बिकते हैं और राज्य में अगर मटन 500 रुपए प्रति किलो बिक रहा है, तो बीफ़ का दाम 240 रुपए है. एक दूसरे इलाके परियमएट में तीन दोस्तों, सुशील, रामकुमार और किशोर से मुलाक़ात हुई, जो असम और पश्चिम बंगाल से चार साल पहले चेन्नई आए थे. बीफ़ बिरयानी के मज़े लेकर काम पर जा रहे सुशील ने बताया, \"40-50 रुपए में नॉन-वेज खाने को मिलता है और साफ-सुथरा. अच्छी बात यही है कि यहाँ बीफ़ के नाम पर कोई आपको घूर कर नहीं देखता\". चेन्नई के ज़ाम बाज़ार इलाके में भी बीफ़ बिरयानी की लगभग सभी दुकानें खचाखच भरी दिखीं और कुछ में बीफ़ के बोटी कबाब भी मिल रहे थे. चेन्नई बीफ़ बिरयानी के मालिक अमीर ने बताया कि तमिलनाडु में बीफ़ मतलब बीफ़ है, गोमांस नहीं. उन्होंने कहा, \"देखिए बीफ़ में प्रोटीन होता है और ये सस्ता भी है. साधारण लोग चाहे वो हिंदू, मुसलमान कोई हो, सभी का पेट भी भरता है और पौष्टिकता भी मिलती है. यही इसके हिट होने का राज़ है\". स्थानीय लोगों को भी लगता है कि उत्तर प्रदेश के दादरी में 2015 में कथित रूप से बीफ़ रखने पर हुई हत्या और उसके बाद की राजनीति का चेन्नई पर शायद ही कोई असर पड़ा हो. वरिष्ठ पत्रकार वलियप्पन बताते हैं, \"दादरी की घटना और दूसरे राज्यों में हो रही राजनीति के चलते चेन्नई में कई संगठनों ने एक दिन का बीफ़ फेस्टिवल आयोजित किया और मद्रास हाई कोर्ट में वकीलों ने उस हत्या के विरोध में बीफ़ खाया और बांटा. तमिलनाडु में इस तरह एक मुद्दे से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता\". मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया हूँ कि स्कूल के दिनों में हफ़्ते में कम से कम एक बार, बड़े का कबाब खाने के बाद भी कभी पीछे पलट कर नहीं सोचा कि कोई क्या कहेगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दोपहर के ढाई बजे हैं और सुबह नाश्ते में सिर्फ़ एक सेब खाने से मेरी भूख ने अब सुनना-समझना बंद कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nचेन्नई में बीफ़ बिरयानी की दुकान पर हिन्दू भी आते हैं. तमिलनाडु चुनाव कवर करने के चक्कर में पिछले कई दिनों से इडली-डोसा और उत्थप्पम खाने के बाद अब मुझे ज़ायका भी बदलना है. टैक्सी ऐसे इलाके से गुज़रती है, जिसकी हवा में सिर्फ़ खड़े मसालों और शोरबेदार खानों की ख़ुशबू है. अब भूख हिंसक भी हो सकती है, इसलिए मैं गाड़ी रुकवा कर सबसे पहली दुकान पर ही ऑर्डर दे बैठता हूँ. बड़ी से डेग में बिरयानी बिक रही है और नीचे बैनर पर 40 रुपए प्लेट लिखा है. समाप्त मुझे पता है कि ये बीफ़ बिरयानी ही हो सकती है, क्योंकि इतने में अगर दुकानदार मटन बिरयानी बेचेगा तो जल्दी दिवालिया हो सकता है. वैसे भी, लखनऊ शहर में हुई परवरिश के चलते आप 'बड़े की बिरयानी और बड़े का कबाब' से दर्जनों बार, दो चार होते रहते हैं. स्कूल के दिनों में सहारा 'बड़े' का ही था, क्योंकि पॉकेट मनी में दस्तरख़्वान तो सजा नहीं सकते. लौटिए चेन्नई में जहाँ बीफ़ बिरयानी परोसने पर, मैं उस पर टूट तो पड़ा हूँ, लेकिन ध्यान मेरा कहीं और है. अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि यहाँ पर बीफ़ बिरयानी खाने या पैक कराने वालों में हिंदू-मुसलमान दोनों हैं. अभी तो भूख मिटानी थी, इसलिए छोड़ दिया. लेकिन दो किलोमीटर बाद फिर से बीफ़ बिरयानी के बोर्ड दिखने लगे, तो ट्रिप्लीकेन मोहल्ले की एक दुकान पर रुक ही गए. रहमत बीफ़ बिरयानी के मालिक एेहतशाम ने कहा, \"50 रुपए प्लेट है और चावल की क्वालिटी भी अच्छी है. दिन में 80-100 किलो बिकती है और इलाके के हिंदू-मुसलमान और ईसाई हमारे यहाँ बीफ़ खाने आते हैं. मेरे तमाम हिंदू दोस्त हैं, जिनके घर रोज़ के एक-डेढ़ किलो पैक हो कर भी जाती है.\" तामिलनाडु राज्य के लगभग हर शहर में ऐसे इलाके हैं, जहाँ बीफ़ और उसके पकवान बिकते हैं और राज्य में अगर मटन 500 रुपए प्रति किलो बिक रहा है, तो बीफ़ का दाम 240 रुपए है. एक दूसरे इलाके परियमएट में तीन दोस्तों, सुशील, रामकुमार और किशोर से मुलाक़ात हुई, जो असम और पश्चिम बंगाल से चार साल पहले चेन्नई आए थे. बीफ़ बिरयानी के मज़े लेकर काम पर जा रहे सुशील ने बताया, \"40-50 रुपए में नॉन-वेज खाने को मिलता है और साफ-सुथरा. अच्छी बात यही है कि यहाँ बीफ़ के नाम पर कोई आपको घूर कर नहीं देखता\". चेन्नई के ज़ाम बाज़ार इलाके में भी बीफ़ बिरयानी की लगभग सभी दुकानें खचाखच भरी दिखीं और कुछ में बीफ़ के बोटी कबाब भी मिल रहे थे. चेन्नई बीफ़ बिरयानी के मालिक अमीर ने बताया कि तमिलनाडु में बीफ़ मतलब बीफ़ है, गोमांस नहीं. उन्होंने कहा, \"देखिए बीफ़ में प्रोटीन होता है और ये सस्ता भी है. साधारण लोग चाहे वो हिंदू, मुसलमान कोई हो, सभी का पेट भी भरता है और पौष्टिकता भी मिलती है. यही इसके हिट होने का राज़ है\". स्थानीय लोगों को भी लगता है कि उत्तर प्रदेश के दादरी में 2015 में कथित रूप से बीफ़ रखने पर हुई हत्या और उसके बाद की राजनीति का चेन्नई पर शायद ही कोई असर पड़ा हो. वरिष्ठ पत्रकार वलियप्पन बताते हैं, \"दादरी की घटना और दूसरे राज्यों में हो रही राजनीति के चलते चेन्नई में कई संगठनों ने एक दिन का बीफ़ फेस्टिवल आयोजित किया और मद्रास हाई कोर्ट में वकीलों ने उस हत्या के विरोध में बीफ़ खाया और बांटा. तमिलनाडु में इस तरह एक मुद्दे से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता\". मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया हूँ कि स्कूल के दिनों में हफ़्ते में कम से कम एक बार, बड़े का कबाब खाने के बाद भी कभी पीछे पलट कर नहीं सोचा कि कोई क्या कहेगा. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "केरल के कोल्लम ज़िले से 25 किमी दूर पारावुर में पुत्तिंगल देवी मंदिर में आग लग गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस हादसे में कम से कम 108 लोगों की मौत हो गई है. हादसे में 200 से ज़्यादा घायल हुए हैं. कोल्लम के ज़िलाधिकारी ए शाइनामोल ने बीबीसी को बताया कि मंदिर में आतिशबाज़ी की अनुमति नहीं दी गई थी. सुनें ऑडियो. प्रधानमंत्री कार्यालय ने पीड़ितों के परिजनों के लिए मुआवज़ा देने की घोषणा की है. समाप्त मारे गए लोगों के परिवारों को दो लाख रुपए और घायलों को 50 हज़ार रुपए दिए जाएंगे. पुलिस अधिकारियों ने बताया कि आतिशबाज़ी के दौरान कुछ चिंगारियां उस जगह जाकर गिरीं जहां पटाख़े रखे हुए थे. इससे भीषण विस्फोट हुआ जिससे पास स्थित देवासम बोर्ड ऑफ़िस की इमारत ढह गई. इसकी चपेट में आने से कई श्रद्धालुओं की मौत हो गई. 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क्राउन पहले ही जीत चुकी हैं. उन्होंने कहा, \"मुझे मिस इंग्लैंड के फ़ाइनल में पहुँच कर काफ़ी खुशी हो रही है. मेरे लिए यह एक प्रतिष्ठा की बात है.\" 'पार्ट-टाइम' मॉडल इराक़ में जब हॉज का वाहन उलट गया था तब एक इराक़ी विद्रोही ने बंदूक की नोक पर उनके दस्ते को बंधक बना लिया. लेकिन कारपोरल कैटरिना हॉज ने उस चरमपंथी पर घूस्से से वार करते हुए उससे बंदूक छीन ली थी. उन्होंने कहा, \"दुर्घटना की वजह से हमारा वाहन तीन बार पलटा था और हम किसी भी सुरक्षा के लिए तैयार नहीं थे. जैसे ही हमने इधर-उधर देखा तो पाया कि इराक़ी चरमपंथी बंदूक लेकर खड़ा है. मैं समझ गई कि यदि मैंने ज़ल्दी कोई कार्रवाई नहीं की तो जीवन ख़तरे में है.\" उन्होंने कहा, \"पार्ट टाइम मॉडल और एक सैनिक की दुनिया काफ़ी अलग हैं. सेना जो काम कर रही है और इस देश के लिए किया है उसे मैं इस प्रतियागित के जरिए सबके सामने लाना चाहती हूँ.\" वर्तमान में हॉज इंग्लैंड के कैंबरले स्थित फ़र्मली पार्क अस्पताल में काम कर रही हैं और वह एक पार्ट टाइम मॉडल भी हैं. शुक्रवार को मिस इंग्लैंड फ़ाइनल प्रतियागिता होना है.\n\nSummary:", "target": "स्त्रियों में सुंदरता और बुद्धिमता के एक साथ होने की कहानी अब पुरानी हो गई है. यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है जो सौंदर्य और शौर्य की एक अद्भुत मिसाल है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइंग्लैंड की 21 वर्षीय महिला सैनिक कैटरीना हॉज ने मिस इंग्लैंड प्रतियोगिता के फ़ाइनल में पहुँच कर सब को चौंका दिया है. उल्लेखनीय है कि हॉज ने इराक़ में एक संदिग्ध इराक़ी चरमपंथी का साहसपूर्ण मुकाबला कर अपने दस्ते के कई सैनिकों की जान बचाई थी. वर्ष 2005 में उन्हें इस बहादुरी के बाद 'कामबैट बार्बी' के नाम से जाना जाने लगा था. यदि हॉज यह प्रतियागिता जीत लेती हैं तो वह वर्ष 2008 की विश्व सुंदरी प्रतियोगिता में इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व करेंगी. वे मिस टनब्रिज वेल्स क्राउन पहले ही जीत चुकी हैं. उन्होंने कहा, \"मुझे मिस इंग्लैंड के फ़ाइनल में पहुँच कर काफ़ी खुशी हो रही है. मेरे लिए यह एक प्रतिष्ठा की बात है.\" 'पार्ट-टाइम' मॉडल इराक़ में जब हॉज का वाहन उलट गया था तब एक इराक़ी विद्रोही ने बंदूक की नोक पर उनके दस्ते को बंधक बना लिया. लेकिन कारपोरल कैटरिना हॉज ने उस चरमपंथी पर घूस्से से वार करते 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"Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बैठक में वैश्विक आर्थिक मंदी और इससे निपटने के उपायों पर चर्चा होगी. बैठक ऐसे समय में हो रही है जब यूरोपीय संघ के वैसे देश मंदी की चपेट में आ चुके हैं जहाँ यूरो साझा मुद्रा के रुप में स्वीकार्य है. भारतीय समयानुसार रविवार से शुरु हो रहे दो दिवसीय बैठक में भारत को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया है. माना जा रहा है कि भारत विकासशील देशों की ओर से अपनी बात रखेगा. लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने स्पष्ट किया है कि मंदी से निपटने के लिए पश्चिमी देशों की संरक्षणवादी कारगर साबित नहीं होगी. उन्होंने मंदी से जूझ रही कंपनियों को सरकारी संरक्षण देने की बज़ाए वस्तुओं, सेवाओं और पूँजी के मुक्त प्रवाह को बढ़ावा देने पर बल दिया. भारतीय प्रधानमंत्री इस राय से अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के प्रतिनिधियों को अवगत कराएंगे. भारतीय वित्त मंत्री का कहना है कि संरक्षण देने की रणनीति मौजूदा संकट से निपटने का सबसे ख़राब तरीका साबित होगी. उन्होंने कहा, \"अगर हम साझा नियामक मानकों पर सहमत हो जाएँ और सदस्य देश इस पर अमल करें तो ये एक दूरदर्शी क़दम होगा.\" 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कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी. विधायक समरेश सिंह पहले भी इस तरह की हरकत कर चुके हैं. झारखंड विकास मोर्चा प्रजातांत्रिक से बोकारो सीट जीत कर विधानसभा में आए समरेश सिंह और फिर प्रदीप यादव के नेतृत्व में कांग्रेस-आरजेडी विधायक नारेबाज़ी करने लगे. वे राज्य में पार्ट-टाईम काम कर रहे शिक्षकों की सेवाएँ नियमित करने, विस्थापितों की समस्याओं के लिए आयोग बनाने और रांची के बाहरी इलाके स्थित नागड़ी गांव के लोगों की अधिगृहित ज़मीन उन्हें लौटाने की मांग कर रहे थे. कार्यवाही शुरु होते ही हंगामा ये लोग सुबह 11 बजे सदन की कार्यवाही शुरु होने के साथ ही अपनी मांगों को लेकर हल्ला करते हुए सदन के बीचोंबीच चले आए और विधानसभा अध्यक्ष के सामने अपनी मांगें रखने लगे. विधानसभा अध्यक्ष कुछ कहते इससे पहले ही झारखंड विकास मोर्चा प्रजातांत्रिक के विधायक समरेश सिंह ने अपना कुर्ता फाड़ लिया. जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह को दोपहर 12 बजे तक सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी. समाचार एजंसी पीटीआई के अनुसार दोपहर12 बजे जब सदन की बैठक दोबारा शुरु हुई तो भी विपक्षी विधायकों का हंगामा जारी रहा जिस कारण सदन की कार्यवाही 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यहाँ हिंसक झड़पें हुई थी. मुसलमान इस दरगाह को हटाए जाने का विरोध कर रहे थे. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को गोलियाँ चलानी पड़ी थी, जिसमें मरने वालों की संख्या बढ़कर तीन हो गई है.\n\nSummary:", "target": "गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सार्वजनिक स्थानों से सभी ग़ैर क़ानूनी धार्मिक अतिक्रमण को हटा दिया जाए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअदालत का कहना है कि यह राज्य के कई हिस्सों में चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान का हिस्सा होना चाहिए. हाई कोर्ट ने सोमवार को वडोदरा की एक स्थानीय अदालत पर हुए हमले के बारे में पुलिस से रिपोर्ट मांगी है. अदालत ने राज्य पुलिस को भी यह निर्देश दिया कि वह अतिक्रमण हटाने का काम कर रहे अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराए. कार्रवाई अदालत ने अधिकारियों से यह भी कहा है कि वे इन इलाक़ों में असमाजिक तत्त्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें. अदालत ने वडोदरा में हुई हिंसा के बारे में मीडिया रिपोर्टों के आधार पर संज्ञान लेते हुए यह निर्देश जारी किया है. वडोदरा में एक दरगाह को हटाए जाने पर रोक 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ए-380 दुनिया का सबसे बड़ा यात्री विमान है. माना जा रहा है कि एमिरेट्स का चार और विमान ख़रीदने का ऑर्डर 1.22 अरब डॉलर का है. इस हिसाब से एक विमान की क़ीमत है 28 करोड़ अमरीकी डॉलर. हालाँकि कंपनी छूट भी देती है लेकिन इसकी जानकारी नहीं दी जाती है. पहली खेंप एमिरेट्स को एयरबस ए-380 विमानों की पहली खेंप अगले साल के शुरू में मिलेगी. ए-380 विमानों को समय पर ना दे पाने की वजह से एयरबस को काफ़ी नुक़सान हुआ है. हालाँकि कंपनी ने ये नहीं बताया है कि वे विमान देने में देरी की भरपाई कैसे करेगी या कितने पैसे हर्जाने के रूप में देगी. एयरबस की भरपाई करने की घोषणा और एमिरेट्स की और विमान ख़रीदने का ऑर्डर देने से लगता है कि दोनों के बीच तनाव कम हुआ है. एयरबस के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी लुईस गैलोस ने एक बयान जारी करके कहा है कि एमिरेट्स की ओर से नए विमानों के ऑर्डर के कारण कंपनी का उत्साह बढ़ा है. एमिरेट्स के चेयरमैन शेख़ अहमद बिन सईद अल मकतूम पहले कह चुके हैं कि एयरबस की ओर से हो रही देरी के कारण विमान सेवा में विस्तार करने की उनकी योजना प्रभावित हुई है. दूसरी ओर एमिरेट्स के अध्यक्ष टिम क्लार्क ये भी कह चुके हैं कि कंपनी एयरबस की प्रतिद्वंद्वी बोइंग से भी विमान ख़रीदने की योजना बना रही है.\n\nSummary:", "target": "एयरबस के साथ रिश्तों में खटास के बीच संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी विमान सेवा एमिरेट्स एयरलाइंस ने चार और ए-380 ख़रीदने का फ़ैसला किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएमिरेट्स एयरलाइंस की ये घोषणा ऐसे समय आई है जब यूरोप की विमान बनाने वाली कंपनी एयरबस ने कहा है कि विमान देने में हुई देरी के लिए वह भरपाई देने को तैयार है. चार और विमान ख़रीदने की घोषणा के साथ ही एमिरेट्स की कुल मांग 47 एयरबस ए-380 की हो गई है. एयरबस ए-380 दुनिया का सबसे बड़ा यात्री विमान है. माना जा रहा है कि एमिरेट्स का चार और विमान ख़रीदने का ऑर्डर 1.22 अरब डॉलर का है. इस हिसाब से एक विमान की क़ीमत है 28 करोड़ अमरीकी डॉलर. हालाँकि कंपनी छूट भी देती है लेकिन इसकी जानकारी नहीं दी जाती है. पहली खेंप एमिरेट्स को एयरबस ए-380 विमानों की पहली खेंप अगले साल के शुरू में मिलेगी. ए-380 विमानों को समय पर ना दे पाने की वजह से एयरबस को काफ़ी नुक़सान हुआ है. हालाँकि कंपनी ने ये 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नायपॉल और अडिगा- या सलमान रुश्दी जैसे लेखकों ने- इन जगहों के बारे में जो मान्यताएं गढ़ी हैं, वो सच हैं. लेकिन मैं कुछ दूसरी चीजों और लोगों को भी देखता हूँ. मसलन, मैं इस आधे-अधूरे शहर के उपनगरीय इलाके में काम कर रहे एक हिंदी के दाढ़ीवाले लेखक शैवालजी को देखता हूँ. वो भारतीय साहित्य और राजनीति के एक चतुर पाठक हैं, और उनकी लिखी कहानियों में से एक पर बॉम्बे में फ़िल्म भी बनी, जिसे पुरस्कार भी मिला. क़िताबें मैं कलाम हैदरी को देखता हूँ जिनका निकाह संयोग से मेरी चाची के साथ हुआ था. उन्होंने कई दशकों तक एक उर्दू साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया और फ्रांसिसी साहित्य और मार्क्सवाद के बारे में जो कुछ भी पढ़ा जाना चाहिए, पढ़ा. मैं देखता हूँ कि अपनी आधी-अधूरी सोच के बावजूद वे पुश्किन, शेक्सपीयर, ग़ालिब या कालीदास का उदाहरण देते हैं. 1970 के दशक में गया में किताबों की सिर्फ़ दो दुकानें थीं. इनमें से एक गया के रेलवे स्टेशन के मुख्य प्लेटफॉर्म पर लगी रेहड़ी थी, यहीं मुझे आरके नारायण की 'दि गाइड' मिली थी. और दूसरी ‘साहित्य सदन’ थी जहां कोर्स की किताबें मिलती थी, हालाँकि इसमें विज्ञान और साहित्य की पुस्तकों का ऑर्डर भी दिया जा सकता था. पुस्तकों के बिना... दुकान के अंदर घुसकर किताबें देखने का पहला मौका मुझे 17-18 साल की उम्र में पटना में मिला. वहाँ हिंदी और उर्दू किताबों के ढेर लगे थे, लेकिन डेल कार्नेगी और रॉबर्ट लडलम जैसे लेखकों की किताबों का वहां होना किसी आश्चर्य से कम नहीं था. वहां आर्ची कॉमिक्स, अल्फ्रेड हिचकॉक और एनिड ब्लाइटन की किताबों की भरमार थी, और मैं मानता हूँ कि इनके बिना मेरा बचपन कैसा होता? इसके अलावा वहां प्रेमचंद, शेक्सपीयर, हार्डी, टैगोर, ग़ालिब, डिकेन्स की भारी-भरकम किताबें भी थीं. बाद में वहां आरके नारायण, रस्किन बॉन्ड, सलमान रुश्दी और अनिता देसाई की किताबें भी आनें लगीं. इसके अलावा कुछ पुस्तकालय भी थे. मेरे दादाजी के पुस्तकालय में मुझे निकोलाई गोगोल की डेड सोल्स मिली. कमी मैं उस समय हाईस्कूल में था और मुझे गोगोल के बारे में कुछ भी पता नहीं था. उन दिनों इंटरनेट नहीं हुआ करता था. टीवी था पर ट्रांसमिशन नहीं के बराबर था और टीवी पर वीसीआर के माध्यम से फ़िल्में देखी जाती थी. लेकिन वहाँ गोगोल था और जब मैंने इसे पढ़ा तो बिल्कुल नई तरह का साहित्य पाया. मुझे लगता है कि आप अब समझ गए होंगे कि इन आधे-अधूरे शहरों में मुझे किस चीज़ की कमी खल रही थी. मैं समझता हूँ कि अब आप समझ गए होंगे कि आधे-अधूरे शहरों की विविधता में मुझे क्या कमी लगती है. रुश्दी और उनके बाद की पीढ़ी के लेखकों के उभरने से अब विविधताओं को बड़े शहरों से जोड़कर देखने की बात आम हो गई है. इस बात में सच्चाई तो है तो कि गया में देसीपन है. लेकिन मैं फिर कहूँगा कि ऐसा समझने वाले लोग इन छोटे शहरों और कस्बों की जटिलता को नहीं समझते. बड़े-छोटे शहर का भेद मैं महसूस करता हूँ कि मैं उन लोगों के बीच पला बढ़ा जो इस विविधता को उन लोगों से बेहतर समझते थे, जिन्हें मैं बाद में बड़े शहरों और महानगरों में मिला. छोटे शहरों और कस्बों में पलने-बढ़ने से ही आप बाहरी दुनिया के बारे में सोचते-समझते हैं. बड़े शहरों में जीवन अपने आप तक ही सिमटा होता है. आधे-अधूरे शहरों में जीवन हर चीज़ के लिए खुला होता है. बड़े शहरों से ये छोटे शहरों की इस विविधता को नहीं देखा जा सकता. मैं गया जैसे आधे-अधूरे शहर से होने के बावजूद इस विविधता को बेहतर तरीके से देखता समझता हूँ. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अडिगा के उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ में एक आधे-अधूरे शहर के बारे में बताया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवास्तव में उपन्यास के नायक के जन्मस्थान गया में ही पले-पढ़े होने के नाते मैं उनके विचारों की सच्चाई को पहचानता हूँ. आधे-अधूरे शहर से मतलब ऐसी जगहों से है जिनमें बड़े शहरों जैसा इतिहास, नियोजन और भव्यता तो नहीं होती, लेकिन प्रदूषण, शोर और यातायात वैसा ही होता है. ये आधे-अधूरे शहर, आधे-अधूरे आदमियों के लिए ही बने हैं. पढ़ें, विस्तार से इन आधे-अधूरे शहरों में मुझे महान लेखक वीएस नायपॉल के औपनिवेशिक उपनगरों के बारे में महसूस किए अनुभव भी हुए. समाप्त मैं गया में बड़ा हुआ और यहां के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मेरी पढ़ाई हुई. मैं तब 25 साल का रहा होउंगा, जब मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में ‘स्टाफ रिपोर्टर’ की नौकरी के लिए शहर छोड़ दिया. मैं तब लगभग 30 बरस का था जब मैं पहली बार विदेश गया. आधे अधूरे शहर जब मैं पीछे मुड़कर अपने शुरुआती 24 सालों को देखता हूँ- तो मैं पाता हूँ गया का आधा-अधूरा शहर, जिसके विचार और अरमान भी आधे-अधूरे ही हैं. मैं उन्हें पहचानता हूँ. नायपॉल और अडिगा- या सलमान रुश्दी जैसे लेखकों ने- इन जगहों के बारे में जो मान्यताएं गढ़ी हैं, वो सच हैं. लेकिन मैं कुछ दूसरी चीजों और लोगों को भी देखता हूँ. मसलन, मैं इस आधे-अधूरे शहर के उपनगरीय इलाके में काम कर रहे एक हिंदी के दाढ़ीवाले लेखक शैवालजी को देखता हूँ. वो भारतीय साहित्य और राजनीति के एक चतुर पाठक हैं, और उनकी लिखी कहानियों में से एक पर बॉम्बे में फ़िल्म भी बनी, जिसे पुरस्कार भी मिला. क़िताबें मैं कलाम हैदरी को देखता हूँ जिनका निकाह संयोग से मेरी चाची के साथ हुआ था. उन्होंने कई दशकों तक एक उर्दू साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया और फ्रांसिसी साहित्य और मार्क्सवाद के बारे में जो कुछ भी पढ़ा जाना चाहिए, पढ़ा. मैं देखता हूँ कि अपनी आधी-अधूरी सोच के बावजूद वे पुश्किन, शेक्सपीयर, ग़ालिब या कालीदास का उदाहरण देते हैं. 1970 के दशक में गया में किताबों की सिर्फ़ दो दुकानें थीं. इनमें से एक गया के रेलवे स्टेशन के मुख्य प्लेटफॉर्म पर लगी रेहड़ी थी, यहीं मुझे आरके नारायण की 'दि गाइड' मिली थी. और दूसरी ‘साहित्य सदन’ थी जहां कोर्स की किताबें मिलती थी, हालाँकि इसमें विज्ञान और साहित्य की पुस्तकों का ऑर्डर भी दिया जा सकता था. पुस्तकों के बिना... दुकान के अंदर घुसकर किताबें देखने का पहला मौका मुझे 17-18 साल की उम्र में पटना में मिला. वहाँ हिंदी और उर्दू किताबों के ढेर लगे थे, लेकिन डेल कार्नेगी और रॉबर्ट लडलम जैसे लेखकों की किताबों का वहां होना किसी आश्चर्य से कम नहीं था. वहां आर्ची कॉमिक्स, अल्फ्रेड हिचकॉक और एनिड ब्लाइटन की किताबों की भरमार थी, और मैं मानता हूँ कि इनके बिना मेरा बचपन कैसा होता? इसके अलावा वहां प्रेमचंद, शेक्सपीयर, हार्डी, टैगोर, ग़ालिब, डिकेन्स की भारी-भरकम किताबें भी थीं. बाद में वहां आरके नारायण, रस्किन बॉन्ड, सलमान रुश्दी और अनिता देसाई की किताबें भी आनें लगीं. इसके अलावा कुछ पुस्तकालय भी थे. मेरे दादाजी के पुस्तकालय में मुझे निकोलाई गोगोल की डेड सोल्स मिली. कमी मैं उस समय हाईस्कूल में था और मुझे गोगोल के बारे में कुछ भी पता नहीं था. उन दिनों इंटरनेट नहीं हुआ करता था. टीवी था पर ट्रांसमिशन नहीं के बराबर था और टीवी पर वीसीआर के माध्यम से फ़िल्में देखी जाती थी. लेकिन वहाँ गोगोल था और जब मैंने इसे पढ़ा तो बिल्कुल नई तरह का साहित्य पाया. मुझे लगता है कि आप अब समझ गए होंगे कि इन आधे-अधूरे शहरों में मुझे किस चीज़ की कमी खल रही थी. मैं समझता हूँ कि अब आप समझ गए होंगे कि आधे-अधूरे शहरों की विविधता में मुझे क्या कमी लगती है. रुश्दी और उनके बाद की पीढ़ी के लेखकों के उभरने से अब विविधताओं को बड़े शहरों से जोड़कर देखने की बात आम हो गई है. इस बात में सच्चाई तो है तो कि गया में देसीपन है. लेकिन मैं फिर कहूँगा कि ऐसा समझने वाले लोग इन छोटे शहरों और कस्बों की जटिलता को नहीं समझते. बड़े-छोटे शहर का भेद मैं महसूस करता हूँ कि मैं उन लोगों के बीच पला बढ़ा जो इस विविधता को उन लोगों से बेहतर समझते थे, जिन्हें मैं बाद में बड़े शहरों और महानगरों में मिला. छोटे शहरों और कस्बों में पलने-बढ़ने से ही आप बाहरी दुनिया के बारे में सोचते-समझते हैं. बड़े शहरों में जीवन अपने आप तक ही सिमटा होता है. आधे-अधूरे शहरों में जीवन हर चीज़ के लिए खुला होता है. बड़े शहरों से ये छोटे शहरों की इस विविधता को नहीं देखा जा सकता. मैं गया जैसे आधे-अधूरे शहर से होने के बावजूद इस विविधता को बेहतर तरीके से देखता समझता हूँ. 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सुरक्षा परिषद में पारित प्रस्ताव का अनेक देशों के नेताओं ने स्वागत किया है. यह प्रस्ताव अमरीका और ब्रिटेन ने पेश किया था. लेकिन राष्ट्रपति शिराक़ ने इसे इराक़ से जल्द बाहर निकलने की रणनीतिक बताया. उधर अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कॉंडोलीज़ा राइस ने अमरीका के इराक़ में और विदेशी सैनिकों की तैनाती चाहने के सुझाव को ज़्यादा तूल नहीं दिया. उन्होंने कहा कि कुछ ख़ास मकसदों के लिए विदेशी सैनिक लाए जा सकते हैं लेकिन बड़ी संख्या में विदेशी सैनिक इराक़ में लाने से इराक़ी सुरक्षा सेवाओं को बढ़ावा देने की प्राथमिकता पर असर पड़ेगा.\n\nSummary:", "target": "फ़्रांस के राष्ट्रपति ज्याक शिराक़ ने इराक़ में नैटो की सक्रिय भूमिक के बारे में अमरीका की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअमरीकी राष्ट्रपति बुश ने टिप्पणी की थी कि नैटो की सेना को इराक़ में तीस जून को सत्ता हस्तांतरण के बात सक्रिय भूमिक निभानी चाहिए. लेकिन राष्ट्रपति शिराक़ ने कहा कि नैटो सैनिक अभियान तब ही चला सकता है यदि इराक़ी सरकार इस बारे में ख़ास तौर पर अनुरोध करती है. उन्होंने कहा, \"मुझे इस बारे में कोई पहल किए जाने पर आपत्ति है.\" राष्ट्रपति बुश ने जी-8 के सम्मेलन के दौरान ऐसा सुझाव दिया था. इराक़ में 30 जून को सत्ता हस्तांतरण के बाद इराक़ के भविष्य के बारे में सुरक्षा परिषद में पारित प्रस्ताव का अनेक देशों के नेताओं ने स्वागत किया है. यह प्रस्ताव अमरीका और ब्रिटेन ने पेश किया था. लेकिन राष्ट्रपति शिराक़ ने इसे इराक़ से जल्द बाहर निकलने की रणनीतिक बताया. उधर अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कॉंडोलीज़ा राइस ने अमरीका के इराक़ में और विदेशी सैनिकों की तैनाती चाहने के सुझाव को ज़्यादा तूल नहीं दिया. उन्होंने कहा कि कुछ ख़ास मकसदों के लिए विदेशी सैनिक लाए जा सकते हैं लेकिन बड़ी संख्या में विदेशी सैनिक इराक़ में लाने से इराक़ी सुरक्षा सेवाओं को बढ़ावा देने की प्राथमिकता पर असर पड़ेगा.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 50, "source_item_id": "50", "source_lang": "hin_Deva", 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जनवरी, 2029 के बीच भेज दिया जाएगा. उगाओ और खाओ नासा की इस प्रस्तुति को बीबीसी ने देखा है. इसमें अंतरिक्षयात्री रास्ते में ही फल और सब्ज़ियाँ उगा पाएंगे. वहाँ पहुँच कर मंगल ग्रह की ज़मीन पर अंतरिक्षयात्री 16 महीने तक गुज़ार सकते हैं. वे अपने आवास को बिजली देने के लिए नाभिकीय ऊर्जा का प्रयोग करेंगे. लेकिन कागज़ात संकेत देते हैं कि मिशन को समाप्त करने या मानव दल को नए सामान से सुसज्जित करने के विकल्प कम ही होंगे. सामान की दोबारा आपूर्ति में समस्या आएगी और अंतरिक्षयात्रियों को असाधारण रूप से आत्मनिर्भर होना होगा. उन्हें उपकरणों की देखरेख और मरम्मत की पूरी जानकारी और यहाँ तक कि नए पुर्ज़े बनाना भी आना चाहिए. हवा और पानी अंतरिक्षयान ख़ुद भी जीवन रक्षक प्रणाली से सुसज्जित होगा जिसमें हवा और पानी का फिर से इस्तेमाल किया जा सकेगा. मानव दल के भोजन के लिए यान पर ही पौधे उगाए जाएंगे. इससे अंतरिक्षयात्रियों के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का भी ख़याल रखा जा सकेगा. लेकिन एजेंसी की रोबॉटिक्स एंड ह्यूमन लूनर एक्सपीडिशंस स्ट्रेटेजिक रोडमैप कमेटी में बैठने वाले नासा के एक अधिकारी ब्रेट ड्रेक की रिपोर्ट कहती है कि अभी इस दल की सुरक्षित यात्रा के लिए बहुत सी चुनौतियाँ बाकी हैं.\n\nSummary:", "target": "अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी संस्थान नासा ने अगले कुछ दशकों में मंगल ग्रह पर एक मानव दल भेजने की रणनीति का विस्तृत विस्तृत ब्यौरा जारी किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनासा इस दल को करीब 30 महीनों के लिए चार लाख किलोग्राम के अंतरिक्षयान में मंगल ग्रह पर भेजने के लिए विचार कर रही है. जनवरी, 2004 में राष्ट्रपति जार्ज बुश ने 2020 तक मानव के चंद्रमा पर जाने और अनिश्चित तिथि तक मंगल ग्रह पर जाने के कार्यक्रम के बारे में एक कार्यक्रम की घोषणा की थी. यह मंगल यान पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जाएगा. इसमें नए “हैवी लिफ़्ट लांच व्हीकल” का भी प्रयोग किया जाएगा जिन्हें नासा विकसित कर रहा है. ये विहाकल तीन से चार वर्ग मीटर क्षेत्र के रॉकेट होते हैं. योजना है कि फ़रवरी, 2031 में इसका प्रक्षेपण होगा. मिशन की यह यात्रा उन्नत क्रायोजेनिक ईंधन व्यवस्था से चालित अंतरिक्षयान में छह से सात महीने का समय लेगी. एक अंदाज़ के अनुसार मंगल ग्रह पर मानव भेजने के इस मिशन पर 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व्यापार और आर्थिक मंत्री जर्मन ग्रेफ़ ने कहा कि इस समझौते से रूस को विश्व बाज़ार में 'समान रूप' से प्रतिस्पर्धा का मौक़ा मिलेगा. उन्होंने कहा, \"यह एक अति महत्वपूर्ण मौक़ा है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रक्रिया में रूस की जुड़ने का संकेत है. यह एक ऐतिहासिक क़दम है जो विश्व बाज़ार के क़ायदे-क़ानूनों में रूस की वापसी की और इशारा करता है.\" रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने कहा कि रूस को डब्लूटीओ सदस्यता दिलाने के लिए ज़रूरी यह व्यापार समझौता अमरीका की राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं था. अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि सूज़ैन श़्वाब ने भी इस समझौते का स्वागत किया. उन्होंने कहा, \"रूस का पूरी तरह से विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ जाना रूस के साथ-साथ अमरीका के लिए भी फ़ायदेमंद है.\" इस समझौते की पुष्टि दोनों देशों में होनी ज़रूरी है. इसके अलावा रूस को डब्लूटीओ के साथ एक बहुपक्षीय समझौते को भी मंज़ूरी देनी होगी. यानी इसका मतलब ये हुआ कि रूस को डब्लूटीओ की पूर्ण सदस्यता मिलने में अभी छह महीने का समय और लग सकता है. प्रतिरोध विश्व व्यापार संगठन के 149 सदस्य देशों में केवल अमरीका ही ऐसा सदस्य था जिसने डब्लूटीओ में रूस की सदस्यता पर अपनी सहमति नहीं दी थी. रूस के मानवाधिकारों से संबंधित आँकड़े, मुख्य ऊर्जा स्त्रोतों पर सरकारी नियंत्रण, बौद्धिक संपत्ति का अधिकार और विदेशी कंपनियों की गतिविधियों पर रोक जैसी कुछ ऐसी आपत्तियाँ थीं जिनकी वजह से इस समझौते में देरी होती रहीं. इसके अलावा ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं की वजह से रूस ने ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध का भी विरोध किया था जो अमरीका को पसंद नहीं आया था. इस बीच रूस ने अमरीका से होने वाले मीट के आयात के दौरान उसकी साफ़-सफ़ाई के प्रति चिंता जताई है.\n\nSummary:", "target": "बारह साल चली बातचीत के बाद रूस और अमरीका ने द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके बाद रूस के विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) में शामिल होने का रास्ता खुल गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहनोई में एशिया प्रशांत के नेताओं के सम्मेलन के दौरान 800 पन्नों के एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. डब्लूटीओ में रूस की सदस्यता कई तरह के उद्योगों में शुल्क को कम करने से जुड़े इस महत्वपूर्ण समझौते पर निर्भर थी. इससे पहले जुलाई 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क़दीर ख़ान के परमाणु कार्यक्रम की जानकारी बेचे जाने का सवाल है तो वो बात अब पुरानी हो गई है. राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने बार-बार कहा है कि पहले जो हुआ सो हुआ और अब पाकिस्तान ज़िम्मेदारी के साथ इस मसले पर काम कर रहे हैं. यह मामला वैसे भी बहुत गंभीर नहीं था क्योंकि अगर क़दीर ख़ान ने जानकारी देना पाँच-सात साल और जारी रखा होता तो ये चिंता की बात होती. मुझे लगता है कि अब पाकिस्तान सरकार ज़िम्मेदारी के साथ काम कर रही है. भारत की भूमिका अमरीका और यूरोप भारत को एक उभरती हुई ताक़त के रुप में देख रहे हैं. लेकिन जहाँ तक पड़ोसी देशों का सवाल हैं तो वे दुर्भाग्यजनक रुप से भारत से डरे हुए नज़र आते हैं. यदि भारत ने कूटनयिक स्तर पर और राजनीतिक स्तर पर अपने पड़ोसियों से संबंध ठीक नहीं किए तो यह अच्छा नहीं होगा. भारत को निश्चित तौर पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी से काम करना होगा वरना उसके आसपास मुश्किलें दिखाई देती रहेंगी.\n\nSummary:", "target": "भारत और अमरीका के बीच हुई परमाणु सहमति के बाद निश्चित तौर पर पाकिस्तान भी चाहेगा कि उससे भी अमरीका इसी तरह का समझौता करे और उसे भी वही सुविधाएँ मिले जो भारत को 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की पचास बरस बाद' जैसे विषयों पर विशेष सामग्री अपने पाठकों को देता रहा है. इसके बाद वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक ने वेब दुनिया की कार्यप्रणाली का विवरण दिया और इंटरनेट के लिए सामग्री जुटाने की प्रक्रिया की जानकारी दी. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के प्रोड्यूसर आशुतोष चतुर्वेदी ने छात्र-छात्राओं को बताया कि इस विधा का व्यावहारिक पहलू क्या है. इसके बाद सलमा ज़ैदी और जयदीप कार्णिक ने छात्र-छात्राओं के तमाम सवालों के जवाब दिए. कार्यशाला में वेब पत्रकारिता के तमाम पहलुओं पर चर्चा के बाद छात्रों को '2020 का भारत' और 'कितने भरोसेमंद हैं समाचार माध्यम' विषयों पर वेबसाइट के लिए एक फ़ीचर लेख लिखने को कहा गया. ग़ौरतलब है कि इन लेखों में से सर्वश्रेष्ठ को बीबीसी हिंदी डॉट कॉम और वेब दुनिया पर प्रकाशित किया जाएगा. कार्यशाला के आखिर में इसमें शामिल होने वाले छात्र-छात्राओं को प्रमाण पत्र वितरित किए गए.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान में शुक्रवार को बीबीसी हिंदी डॉट कॉम और वेब दुनिया ने पत्रकारिता के छात्र-छात्राओं के लिए वेब पत्रकारिता पर एक कार्यशाला का आयोजन किया.", 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text in Hindi.\n\nText:\nपहली बार विश्व स्तर पर की गई इस स्टडी के मुताबिक़ साल 2016 में लंबे समय तक ऑफ़िस का काम करने के कारण स्ट्रोक और दिल की बीमारी से 7 लाख 45 हज़ार लोगों की मौत हो गई. कोरोना महामारी में सेक्स को लेकर दिलचस्पी क्यों कम हुई? गूगल के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई जीतने वाली महिला की कहानी रिपोर्ट के मुताबिक़ दक्षिण-पूर्वी एशिया और पश्चिमी पैसिफिक के इलाक़े इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. समाप्त विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोरोना मारामारी के कारण हालात और ख़राब हो सकते हैं. रिसर्च में पाया गया है कि हर हफ़्ते 35 से 40 घंटे काम करने की तुलना में हर हफ़्ते में 55 घंटे से अधिक काम करने से स्ट्रोक का ख़तरा 35 फ़ीसदी बढ़ जाता है और दिल की बीमारी से मरने का ख़तरा 17 फ़ीसदी बढ़ जाता है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ (आईएलओ) के साथ मिलकर कराई की गई इस स्टडी में पाया गया है मरने वालों में एक तिहाई बूढ़े या मध्यम आयु वर्ग के लोग थे. ज़्यादातर मौतें उस दौर से कई सालों या दशकों के बाद हुईं, जब वो व्यक्ति काफ़ी देर तक काम करता था. कोरोना के कारण ख़राब हो सकती है स्थिति विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस स्टडी में महामारी के आने बाद के समय को नहीं लिया गया. लेकिन उनका कहना है कि घर से काम करने की व्यवस्था और आर्थिक मंदी के कारण भी लोग लंबे समय तक काम कर रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के टेक्निकल ऑफ़िसर फ्रैंक पेगा के मुताबिक, \"कुछ सबूत हैं जो ये दिखाते हैं कि अगर देशव्यापी लॉकडाउन होता है, तो वहाँ पर काम करने के घंटों में 10 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है.\" कोरोना वायरस के लक्षण क्या हैं और कैसे कर सकते हैं बचाव कोरोना वैक्सीन: क्या वैक्सीन लेने के बाद भी मुझे कोविड हो सकता है? रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़्यादा देर तक काम करना काम से जुड़े तनाव का एक तिहाई हिस्सा है. ये इसे काम के कारण होने वाले तनाव का सबसे बड़ा कारण बना देता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक़ देर तक काम करने के कारण दो मुख्य समस्याएँ सामने आतीं हैं - पहला सीधे आपके दिमाग़ पर तनाव का असर और दूसरा ज़्यादा देर तक काम करने के कारण तंबाकू, शराब जैसे नशे की लत लगना, कम सोना, व्यायाम नहीं करना और अच्छा खाना नहीं खाना जैसी समस्याएँ होती हैं. मानसिक बीमारी दुनिया के लिए कितनी बड़ी चुनौती? Duniya Jahan मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर इंग्लैंड के लीड्स में काम करने वाले 32 साल के इंजीनियर, एंड्र्यू फॉल्स बताते हैं कि उनके पिछले ऑफ़िस में उन्हें काफ़ी देर तक काम करना पड़ता था जिसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा. वो कहते हैं, \"वहाँ 50 से 55 घंटे काम करना आम था. मैं कई हफ़्तों तक घर से बाहर रहता था.\" \"तनाव, डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी, ख़राब फीडबैक, ये सब भी आम था. मैं हमेशा परेशान रहता था.\" पाँच साल काम करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुझाव दिया है कि कंपनियों को अपने यहाँ काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य और काम के कारण उनके स्वास्थ्य पर होने वाले असर के बारे सोचना चाहिए. स्पुतनिक V: भारत के कोविड-19 टीकों के बारे में हम क्या जानते हैं कोविन (Co-Win) ऐप: कैसे करें डाउनलोड और वैक्सीनेशन के लिए कैसे कराएं पंजीयन काम करने की समय सीमा तय होनी चाहिए. इससे काम बेहतर होगा. पेगा के मुताबिक़, \"इस आर्थिक मंदी के दौर में काम करने का समय नहीं बढ़ाना फ़ायदेमंद साबित होगा.\" बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ देर तक ऑफ़िस का काम करने के कारण हर साल लाखों लोगों की मौत हो रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपहली बार विश्व स्तर पर की गई इस स्टडी के मुताबिक़ साल 2016 में लंबे समय तक ऑफ़िस का काम करने के कारण स्ट्रोक और दिल की बीमारी से 7 लाख 45 हज़ार लोगों की मौत हो गई. कोरोना महामारी में सेक्स को लेकर दिलचस्पी क्यों कम हुई? गूगल के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई जीतने वाली महिला की कहानी रिपोर्ट के मुताबिक़ दक्षिण-पूर्वी एशिया और पश्चिमी पैसिफिक के इलाक़े इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. समाप्त विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोरोना मारामारी के कारण हालात और ख़राब हो सकते हैं. रिसर्च में पाया गया है कि हर हफ़्ते 35 से 40 घंटे काम करने की तुलना में हर हफ़्ते में 55 घंटे से अधिक काम करने से स्ट्रोक का ख़तरा 35 फ़ीसदी बढ़ जाता है और दिल की बीमारी से मरने का ख़तरा 17 फ़ीसदी बढ़ जाता है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ (आईएलओ) के साथ मिलकर कराई की गई इस स्टडी में पाया गया है मरने वालों में एक तिहाई बूढ़े या मध्यम आयु वर्ग के लोग थे. ज़्यादातर मौतें उस दौर से कई सालों या दशकों के बाद हुईं, जब वो व्यक्ति काफ़ी देर तक काम करता था. कोरोना के कारण ख़राब हो सकती है स्थिति विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस स्टडी में महामारी के आने बाद के समय को नहीं लिया गया. लेकिन उनका कहना है कि घर से काम करने की व्यवस्था और आर्थिक मंदी के कारण भी लोग लंबे समय तक काम कर रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के टेक्निकल ऑफ़िसर फ्रैंक पेगा के मुताबिक, \"कुछ सबूत हैं जो ये दिखाते हैं कि अगर देशव्यापी लॉकडाउन होता है, तो वहाँ पर काम करने के घंटों में 10 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है.\" कोरोना वायरस के लक्षण क्या हैं और कैसे कर सकते हैं बचाव कोरोना वैक्सीन: क्या वैक्सीन लेने के बाद भी मुझे कोविड हो सकता है? रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़्यादा देर तक काम करना काम से जुड़े तनाव का एक तिहाई हिस्सा है. ये इसे काम के कारण होने वाले तनाव का सबसे बड़ा कारण बना देता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक़ देर तक काम करने के कारण दो मुख्य समस्याएँ सामने आतीं हैं - पहला सीधे आपके दिमाग़ पर तनाव का असर और दूसरा ज़्यादा देर तक काम करने के कारण तंबाकू, शराब जैसे नशे की लत लगना, कम सोना, व्यायाम नहीं करना और अच्छा खाना नहीं खाना जैसी समस्याएँ होती हैं. मानसिक बीमारी दुनिया के लिए कितनी बड़ी चुनौती? 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(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मैंने बहुत सी कविताएं पढ़ी हैं और बहुत सी पसंद भी हैं, लेकिन अगर मुझे किसी एक कविता का नाम लेना पड़े तो कहूंगा कि कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘रश्मिरथी’ मुझे बहुत प्रिय है. ये एक लंबा-चौड़ा महाकाव्य है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरामधारी सिंह 'दिनकर' ने कुरुक्षेत्र, संस्कृति के चार अध्याय जैसी रचनाएं की थीं. उसकी एक सतर मैंने ‘गुलाल’ फ़िल्म में इस्तेमाल की है क्योंकि वो मुझे बेहद पसंद थी. ‘रश्मिरथी’ कर्ण की ज़िंदगी पर लिखी गई थी. उसमें एक प्रसंग है कि कृष्ण भगवान को जब दुर्योधन हस्तिनापुर में बातचीत के लिए बुलाते हैं ज़मीन के बंटवारे के विषय में. वो कृष्ण को बांधने की कोशिश करते हैं. पंक्तियां कुछ इस तरह हैं – हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है? दिनकर जी ने 1954 में 'रश्मिरथी' की रचना की थी. एक तो कर्ण मेरे बड़े प्रिय चरित्र हैं और दूसरे इसे मैं अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल कर चुका था. फिल्म ‘गुलाल’ मेरी ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण आयाम है. और सबसे अहम बात ये कि जिस तरह ये कविता लिखी गई है, इसमें हिंदी के शब्द हैं और उन्हीं शब्दों से अभिव्यक्ति को एक औदात्य प्रदान किया गया है. लोगबाग कहते हैं कि हिन्दी बहुत ही सहमी सिकुड़ी हुई भाषा है, लेकिन ये कविता बताती है कि हिंदी कितनी ज़बर्दस्त कितनी तीखी भाषा है. ये उर्दू जैसी ही समृद्ध भाषा है. बशर्ते कि किसी को इसका ज्ञान हो और उसे भाषा का सही इस्तेमाल करना भी आता हो. आधे-अधूरे ज्ञान वाले जब हिंदी का इस्तेमाल करते हैं तो बात नहीं बन पाती. इस कविता में जो लय है, जो छंद है, जो ताल है वो बहुत सुंदर है. इसे आप किसी ऐसे व्यक्ति को सुनाएंगे जिसे हिंदी नहीं आती है तो वो भी इसका पूरा आनंद उठा सकता है. दिनकर जी की एक और श्रेष्ठ रचना ‘कुरुक्षेत्र’ भी है लेकिन मुझे ‘रश्मिरथी’ बहुत प्रिय है. मैं तो लोगों से अपील करूंगा कि वो इस किताब को ख़रीदें. मेरे हिसाब से ये इकलौती ऐसी कविता है जिसका पाठ किया जा सकता है. इसीलिए ये कविता मुझे बेहद पसंद है. 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उत्तर-पश्चिम रेलवे ने सात हज़ार यात्रियों की टिकट रद्द की है जिसके एवज में रेलवे को इक्कीस लाख रूपए का भुगतान करना पड़ा है. ये गूजर सरकार से पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे हैं. सरकार से नाराज़ गूजर समुदाय जगह-जगह पर पंचायत कर रहा है और पंचायत में फ़ैसले लेने के बाद वे जगह-जगह सड़कों पर भी यातायात अवरुद्ध कर रहे हैं. बातचीत की पेशकश मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गूजर नेताओं से रेल मार्गों को छोड़ कर बातचीत की टेबल पर आने का आग्रह किया है लेकिन आंदोलनकारी टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं. पिछले पांच दिनों से भरतपुर ज़िले के पिलुकापुरा में दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर डेरा डाले बैठे गूजर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''जब तक हमारी मांगें नहीं मान ली जातीं हम रेल पटरियों से नहीं हटेगें. मेरी राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बात हुई है, देखते हैं आगे क्या होता है.'' इस आंदोलन ने तब तेज़ी पकड़ी थी जब भाजपा के विधायक हेम सिंह भड़ाना एक भीड़ को लेकर दौसा ज़िले के बांदीकुई रेलवे स्टेशन के समीप उस मार्ग पर जा डटे जो दिल्ली को जयपुर से जोड़ता है. पुलिस ने जब आंदोलनकारियों को रोकने की कोशिश की तो वे उन पर पथराव करने लगे. इसके बाद पुलिस पीछे हट गई थी. इस मार्ग के बाधित होने से रेलवे को 55 गाड़ियों का मार्ग बदलना पड़ा था. इससे यात्रियों को भी ख़ासी परेशानी हुई. इस आंदोलन के कारण दिल्ली-मुंबई मार्ग पर हर रोज़ तीस गाड़ियों को अपना रास्ता बदलना पड़ा है.\n\nSummary:", "target": "राजस्थान में आरक्षण की मांग कर रहे गूजरों ने शनिवार को भी रेल और सड़क मार्गों को अवरूद्ध किया हुआ है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nगूजर पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे हैं गूजरों का आंदोलन छठे दिन प्रवेश कर चुका है और उनके तेवर अभी भी तीखे बने हुए हैं. इन आंदोलनकारियों के रेल पटरियों की घेरेबंदी करने से रेल यातायात बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. गूजरों के पटरियों पर आ जाने से भीलवाड़ा और अजमेर के बीच गाड़ियों का आवगमन रुक गया है. इन आंदोलनकारियों ने दिल्ली -मुंबई और जयपुर-दिल्ली मार्ग पहले से ही रोक रखा है. इसकी वजह से यात्री अपनी टिकटें रद्द करा रहे हैं. उत्तर-पश्चिम रेलवे ने सात हज़ार यात्रियों की टिकट रद्द की है जिसके एवज में रेलवे 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तालिबान ने एक वक्तव्य जारी करके कहा कि हमले के बाद उन्होंने हथियार और गाड़ियां ज़ब्त कर ली हैं और कुछ मृतकों के शवों को इलाक़े के वरिष्ठ लोगों को सौंप दिया गया है. इस वक्तव्य में यह भी कहा गया है कि इस सप्ताह क्षेत्र में पुलिस ऑपरेशन में 47 विद्रोही मारे गए. गृह मंत्रालय ने पुलिस अधिकारियों की मौत के जाँच का आदेश दे दिया है. दुर्गम क्षेत्र इसी साल मार्च महीने में वारदूज ज़िले में 16 सैनिकों की हत्या कर दी गई थी, जबकि 2010 में ब्रिटिश डॉक्टर कारेन वू की बदख़्शाँ प्रांत में छह अमरीकी, एक जर्मन और दो अफ़गान अनुवादकों के साथ हत्या कर दी गई थी. बदख़्शाँ पामीर और हिंदुकुश पहाड़ियों की पर्वत श्रंखला में स्थित है. काबुल में बीबीसी संवाददाता बिलाल सरवरी ने बताया कि यह इलाक़ा काफी दुर्गम होने के कारण विद्रोहियों के लिए बहत सुरक्षित है. 2014 के पहले अफ़गानिस्तान से विदेशी सेनाओं की वापसीहोनी है. बहुत से लोगों को आशंका है कि इससे तालिबान और उनके समर्थकों को मजबूती मिलेगी. नेटो सेनाएं धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी अफ़गानिस्तान के सैनिकों को सौंप रही हैं, जो वर्तमान में 90 फीसदी सुरक्षा ऑपरेशनों के नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. (बीबीसी हिन्दी के क्लिक करें एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़गानिस्तान के गृह मंत्रालय के अनुसार बदख़्शाँ प्रांत में तालिबानी लड़ाकों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में 18 अफगान पुलिस अधिकारियों की मौत हो गई और 13 अन्य घायल हो गए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबदख़्शाँ प्रांत में तालिबानी लड़ाकों की तरफ से घात लगाकर हुए हमले में 18 पुलिस अधिकारियों की मौत हो गई. उस समय ये अधिकारी प्रांत की राजधानी से घुसपैठियों के ख़िलाफ़ कारर्वाई करने के बाद वारदूज ज़िले के रास्ते से वापस लौट रहे थे. हालांकि पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाके अपेक्षाकृत शांत रहते हैं, लेकिन वारदूज ज़िला काफी अस्थिर हो गया है. इस हमले की जिम्मेदारी तालिबानने ली है. तालिबान ने एक वक्तव्य जारी करके कहा कि हमले के बाद उन्होंने हथियार और गाड़ियां ज़ब्त कर ली हैं और कुछ मृतकों के शवों को इलाक़े के वरिष्ठ लोगों को सौंप दिया गया है. इस वक्तव्य में यह भी कहा गया है कि इस सप्ताह क्षेत्र में पुलिस ऑपरेशन में 47 विद्रोही मारे गए. गृह मंत्रालय ने पुलिस अधिकारियों की मौत के जाँच का आदेश दे दिया है. दुर्गम क्षेत्र इसी साल मार्च महीने में वारदूज ज़िले में 16 सैनिकों की हत्या कर दी गई थी, जबकि 2010 में ब्रिटिश डॉक्टर कारेन वू की बदख़्शाँ प्रांत में छह अमरीकी, एक जर्मन और दो अफ़गान अनुवादकों के साथ हत्या कर दी गई थी. बदख़्शाँ पामीर और हिंदुकुश पहाड़ियों की पर्वत श्रंखला में स्थित है. काबुल में बीबीसी संवाददाता बिलाल सरवरी ने बताया कि यह इलाक़ा काफी दुर्गम होने के कारण विद्रोहियों के लिए बहत सुरक्षित है. 2014 के पहले अफ़गानिस्तान से विदेशी सेनाओं की वापसीहोनी है. बहुत से लोगों को आशंका है कि इससे तालिबान और उनके समर्थकों को मजबूती मिलेगी. नेटो सेनाएं धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी अफ़गानिस्तान के सैनिकों को सौंप रही हैं, जो वर्तमान में 90 फीसदी सुरक्षा ऑपरेशनों के नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. 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गया है. तालेबान ने प्रतिनिधियों से इस जिरगा के बहिष्कार का आहवान किया है. पाकिस्तान के उत्तर और दक्षिणी वज़ीरिस्तान के क़बायली नेताओं ने भी सम्मेलन में आने का निमंत्रण ठुकरा दिया है. निराशा करज़ई ने अपने संबोधन में कहा, \"हमें बहुत गर्व है कि यह शांति जिरगा दो देशों, दो भाइयों और दो पड़ोसियों को पास लाया है.\" उनका कहना था, \"मुझे विश्वास है अगर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दोनों अपने हाथ मिला लें तो हम एक दिन में ही दोनों देशों के ख़िलफ़ हो रहे दमन को दूर कर सकते हैं\". उन्होंने कहा, \"इसमें शक नहीं होना चाहिए कि ये जिरगा सफल होगा.\" राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने अपनी जगह प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़ को सम्मेलन में भेजा है और राष्ट्रपति करज़ई को 'पूर्ण समर्थन' का भरोसा दिलाया है. अफ़ग़ानिस्तान सरकार का कहना है कि मुशर्रफ़ का न आना निराशाजनक है. करज़ई के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने सम्मेलन में लोगों को शामिल होने के लिए राज़ी करने में अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि मुशर्रफ़ के नहीं आने से जिरगा का महत्व कम होगा. वजह बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हो सकता है कि मुशर्रफ़ ने सम्मेलन में न जाने का फ़ैसला अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के उस बयान के बाद लिया हो, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' में विफल रहा है. हालाँकि अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता सीन मैककोरमैक ने मुशर्रफ़ के सम्मेलन में किसी भी दिन हिस्सा लेने की संभावना से इनकार नहीं किया है. चरमपंथी हिंसा से निपटने के उपाय तलाशने के लिए इस जिरगा का आयोजन किया गया है और इसमें अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुख्य भूमिका रही है. बुश की मंशा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को एक मंच पर लाना था ताकि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जारी चरमपंथी हिंसा से निपटा जा सके. जिरगा जिरगा अफ़ग़ानिस्तान की एक अनूठी संस्था है जिसमें सभी पख़्तून, ताजिक, हज़ारा और उज़्बेक कबायली नेता एक साथ बैठते हैं, इनमें शिया और सुन्नी दोनों शामिल होते हैं. यहाँ देश के मामलों पर विचार विमर्श कर फ़ैसले लिए जाते हैं. अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान संयुक्त शांति जिरगा का विचार अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने अमरीकी राष्ट्रपति बुश के साथ पिछले दिनों हुई मुलाकात में दिया था. हामिद करज़ई का कहना था कि वे जिरगा को सीमा के दोनों ओर पश्तून समाज को दोबारा शुरु करने की कोशिश मानते हैं ताकि तालेबान के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके. तालेबान के समर्थकों का कहना है कि उनके बगैर की गई बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं होगा. पाकिस्तान की जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के महासचिव अब्दुल गफ़ूर हैदरी ने एपी को कहा, \"ये सिर्फ़ दिखावा है, ये अफ़गान लोगों के असल विचार नहीं दर्शाता.\" बीबीसी के बिलाल सरवरी का कहना है कि काबुल में जिरगा को लेकर लोगों को कुछ उम्मीदें हैं. उन्होंने बताया कि काबुल में पाकिस्तानी झंडों का दिखना असामान्य सी बात है क्योंकि दोनों देश के बीच संबंध अच्छे नहीं है.\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में कबायली नेताओं का सम्मलेन यानी लोया जिरगा शुरू हो गया है. सम्मेलन में तालेबान से लड़ने की रणनीति पर चर्चा होगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को भी इस तीन दिवसीय सम्मेलन में हिस्सा लेना था, लेकिन वह किन्हीं वजहों से इसमें हिस्सा नहीं ले रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने सम्मेलन 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प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने सम्मेलन में लोगों को शामिल होने के लिए राज़ी करने में अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि मुशर्रफ़ के नहीं आने से जिरगा का महत्व कम होगा. वजह बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हो सकता है कि मुशर्रफ़ ने सम्मेलन में न जाने का फ़ैसला अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के उस बयान के बाद लिया हो, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' में विफल रहा है. हालाँकि अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता सीन मैककोरमैक ने मुशर्रफ़ के सम्मेलन में किसी भी दिन हिस्सा लेने की संभावना से इनकार नहीं किया है. चरमपंथी हिंसा से निपटने के उपाय तलाशने के लिए इस जिरगा का आयोजन किया गया है और इसमें अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुख्य भूमिका रही है. बुश की मंशा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को एक मंच पर लाना था ताकि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जारी चरमपंथी हिंसा से निपटा जा सके. जिरगा जिरगा अफ़ग़ानिस्तान की एक अनूठी संस्था है जिसमें सभी पख़्तून, ताजिक, हज़ारा और उज़्बेक कबायली नेता एक साथ बैठते हैं, इनमें शिया और सुन्नी दोनों शामिल 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जयमहल पैलेस में अपना हिस्सा चाहता है. जगत सिंह जयमहल पैलेस के मालिक थे. पूर्व राजमाता गायत्री देवी इस समय विदेश में हैं और इस बारे में उनके विचारों का पता नहीं चल सका है. अपने पिता की तरह ही ख़ूबसूरत और आकर्षक, 25 वर्षीय देवराज ने ब्रिटेन से प्रबंधन में शिक्षा ग्रहण की है जबकि उनकी बहन लालित्या ने बैंकॉक से राजनीतिशास्त्र में एमए किया है. देवराज कहते हैं कि उन्हें तब झटका लगा जब पिता की मौत के नौ साल बाद एकाएक एक वसीयत पेश कर उन्हें संपत्ति से वंचित कर दिया गया. 23 जून 1996 की तिथि वाली इस वसीयत में जगत सिंह ने अपनी ही संतान को संपत्ति से वंचित करने की बात कही है. लेकिन देवराज इस वसीयत की सच्चाई को चुनौती देते हैं. सवाई मानसिंह द्वितीय जयपुर के अंतिम राजा थे. बाद में सभी राजवंशों का राजस्थान में विलय हो गया था. मानसिंह ने तीन शादियाँ की थी. पहली रानी मरूधर कंवर से ब्रिगेडियर भवानी सिंह पुत्र हैं, तो दूसरी रानी किशोर कंवर से पृथ्वीराज और जयसिंह दो पुत्र हैं. मानसिंह ने तीसरी शादी गायत्री देवी से किया था और जगत सिंह उन्हीं की संतान थे. देवराज की अपनी दादी गायत्री देवी से अच्छे रिश्ते थे. लेकिन अब देवराज कहते हैं कि प्रयासों के बाद भी बात नहीं हो पा रही है. तीन साल पहले देवराज अपनी बहन लालित्या के साथ जयपुर आए थे. तब उन्हें सिटी पैलेस का आतिथ्य मिला जहां भवानी सिंह परिवार सहित रहते हैं. भवानी सिंह की भी अपने भाइयों से ख़ास नहीं बनती. देवराज कहते हैं कि उनके पिता के सौतेले भाई ने संपत्ति पर अधिकार जमाया है. देवराज ने जय महल पैलेस को लेकर भारत के कंपनी लॉ बोर्ड में कार्रवाई की है. भारत के पूर्व राजघरानों में धन संपत्ति को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. जयपुर राजघराने की संपत्ति एक हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा की आंकी जाती है.\n\nSummary:", "target": "भारत के प्रतिष्ठित पूर्व राजघरानों में से एक - जयपुर के पूर्व राज परिवार में संपत्ति को लेकर कलह अब जग ज़ाहिर हो गई है. पूर्व राजमाता गायत्री देवी के पोते देवराज सिंह ने जायदाद में हिस्सा माँगा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदेवराज सिंह पूर्व राजमाता गायत्री देवी के एक मात्र पुत्र स्वर्गीय जगत सिंह की संतान हैं. देवराज की माँ और थाई राजवंश की प्रियवंदना रंगसित भी अपने बेटे को विरासत का 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विस्फोट करके रेलपटरी को उड़ा दिया. उन्होंने साथ में मालगाड़ी के एक इंजन और चार डिब्बों को भी उड़ा दिया. इस विस्फोट से ऊपर से जाने वाली बिजली के तार भी उड़ गए हैं और इस इलाक़े में बिजली ठप्प हो गई है. झारखंड के बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के अनुसार माओवादियों ने ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड का अपहरण कर लिया है. इसके अलावा उन्होंने दुमका के अमरापाड़ा में एक कोयला ख़दान में छह ट्रकों को जला दिया और चार कर्मचारियों का अपहरण कर लिया. बाद में सुपरवाइज़र के अलावा बाक़ी तीन कर्मचारियों को छोड़ दिया गया है. माओवादियों ने पटरी पर आकर रात हावड़ा जोधपुर एक्सप्रेस को रोक लिया. इससे यात्री बेहद घबरा गए थे. लेकिन इसे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया गया है. धनबाद मंडल के रेल प्रबंधक अजय शुक्ला ने बीबीसी को बताया, \"इन घटनाओं के बाद रेल प्रशासन ने 20 ट्रेनों को रद्द कर दिया है और कई ट्रेनों के मार्ग बदल दिए गए हैं.\" बीबीसी संवाददाता के अनुसार माओवादियों की नाकेबंदी के चलते राँची-गढ़वा राष्ट्रीय राजमार्ग सहित सभी राजमार्गों पर यातायात बंद है. उनका कहना है कि बसें नहीं चल रही हैं. राँची के बस स्टैंड से बसों को रवाना नहीं किया गया है. उधर बिहार के संवाददाता मणिकांत ठाकुर ने ख़बर दी है कि आर्थिक नाकेबंदी की शुरुआत करते हुए माओवादियों ने मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में रेल पटरी के किनारे दो विस्फोट किए हैं. उनका कहना है कि इससे किसी नुक़सान की ख़बरें नहीं हैं. सुरक्षा इंतज़ाम माओवादियों की आर्थिक नाकेबंदी को ध्यान में रखते हुए बिहार, झारखंड और उड़ीसा के आला पुलिस अधिकारियों की एक बैठक सोमवार को पटना में हुई थी. इसमें सुरक्षा इंतज़ाम को लेकर व्यापक चर्चा हुई. इसके बाद झारखंड में जगह-जगह सुरक्षा-बलों को तैनात किया गया है. तीनों राज्यों के अधिकारियों ने फ़ैसला किया है कि नक्सलियों का पीछा करते हुए एक राज्य की पुलिस को दूसरे राज्य की सीमा लाँघने की अनुमति दी जाएगी और इसको लेकर अधिकार क्षेत्र का सवाल नहीं उठाया जाएगा. बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि घने जंगलों और ग्रामीण इलाक़ों में सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम करना सरकार के लिए संभव नहीं दिखता और वहाँ अभी भी सुरक्षा व्यवस्था नहीं के बराबर है.\n\nSummary:", "target": "माओवादियों ने तीन राज्यों बिहार, झारखंड और उड़ीसा में विशेष आर्थिक क्षेत्रों और सरकारों की 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लिया. बाद में सुपरवाइज़र के अलावा बाक़ी तीन कर्मचारियों को छोड़ दिया गया है. माओवादियों ने पटरी पर आकर रात हावड़ा जोधपुर एक्सप्रेस को रोक लिया. इससे यात्री बेहद घबरा गए थे. लेकिन इसे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया गया है. धनबाद मंडल के रेल प्रबंधक अजय शुक्ला ने बीबीसी को बताया, \"इन घटनाओं के बाद रेल प्रशासन ने 20 ट्रेनों को रद्द कर दिया है और कई ट्रेनों के मार्ग बदल दिए गए हैं.\" बीबीसी संवाददाता के अनुसार माओवादियों की नाकेबंदी के चलते राँची-गढ़वा राष्ट्रीय राजमार्ग सहित सभी राजमार्गों पर यातायात बंद है. उनका कहना है कि बसें नहीं चल रही हैं. राँची के बस स्टैंड से बसों को रवाना नहीं किया गया है. उधर बिहार के संवाददाता मणिकांत ठाकुर ने ख़बर दी है कि आर्थिक नाकेबंदी की शुरुआत करते हुए माओवादियों ने मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में रेल पटरी के किनारे दो विस्फोट किए हैं. उनका कहना है कि इससे किसी नुक़सान की ख़बरें नहीं हैं. सुरक्षा इंतज़ाम माओवादियों की आर्थिक नाकेबंदी को ध्यान में रखते हुए बिहार, झारखंड और उड़ीसा के आला पुलिस अधिकारियों की एक बैठक सोमवार को पटना में हुई थी. इसमें सुरक्षा इंतज़ाम को लेकर व्यापक चर्चा हुई. इसके बाद झारखंड में जगह-जगह सुरक्षा-बलों को तैनात किया गया है. तीनों राज्यों के अधिकारियों ने फ़ैसला किया है कि नक्सलियों का पीछा करते हुए एक राज्य की पुलिस को दूसरे राज्य की सीमा लाँघने की अनुमति दी जाएगी और इसको लेकर अधिकार क्षेत्र का सवाल नहीं उठाया जाएगा. बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि घने जंगलों और ग्रामीण इलाक़ों में सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम करना सरकार के लिए संभव नहीं दिखता और वहाँ अभी भी सुरक्षा व्यवस्था नहीं के बराबर है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 63, "source_item_id": "63", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2357, "clean_index": 59, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:59"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये आंकड़े केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने शुक्रवार शाम हुई प्रेस कान्फ्रेस में दी है. इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में गृह मंत्रालय की अधिकारी पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने बताया कि सरकार की कोशिश है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में जो मज़दूर, छात्रों और पर्यटकों फंसे हुए हैं उन्हें उनके घर पहुंचाया जाए. इसके लिए सरकार ने विशेष बसें और ट्रेनें चलाने की इजाज़त दी है. विदेश से फंसे भारतीयों को लाने की क्या है याजना? इसकी कड़ी में सरकार की दूसरे बड़ी प्राथमिकता है विदेशों में फंसे लोगों को चरणबद्ध तरीके से देश वापस लाना. इसके लिए यात्रा की व्यवस्था नॉन-शेड्यूल्ड कमर्शियल फ्लाइट्स और नौसेना के जहाज़ों के द्वारा की गई है. समाप्त 7 मई से ये काम शुरु हो चुका है. इस कड़ी में नौसेना का एक जहाज़ मालदीव से 700 से ज़्यादा नागरिकों को वापस लाने का मिशन शुरू कर चुका है. इसके लिए विदेशों में फंसे लोगों को वहां मौजूद भारतीय दूतावास में अपना पंजीकरण कराना होगा. इसमें गर्भवती महिलाओं, छात्रों, वीज़ा अवधि समाप्त हो चुके लोगों और मेडिकल इमर्जेंसी वाले मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी. पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने बताया कि यात्रा शुरु होने से पहले कोरोना के लिए यात्रियों की जांच की जाएगी और जिन यात्रियों में लक्षण नहीं होंगे केवल उन्हीं को यात्रा करने की इजाज़त दी जाएगी. सभी यात्रियों को सरकार को ये लिखित में देना होगा कि भारत आने पर कम से कम 14 दिनों के लिए अपने खर्चे पर क्वारंटीन सेंटर पर अनिवार्य क्वारंटीन में रहना होगा. भारत पहुंचने पर सभी यात्रियों की जांच की जाएगी और उन्हें आरोग्य सेतु ऐप पर खुद को रजिस्टर करना होगा. इस स्टेज पर यदि किसी व्यक्ति में कोरोना के लक्षण दिखाई देते हैं तो उन्हें अस्पताल ले जाया जाएगा और बाकी यात्रियों को क्वारंटीन सेंटर जाना होगा. 14 दिनों के बाद कोरोना के लिए इस यात्रियों की फिर से जांच होगी. जो लोग किसी ज़रूरी कारण से विदेश जाना चाहते हैं उनके लिए भी व्यवस्था की गई है. उन्होंने बताया कि जिन विदेशी नागरिक वीज़ा अवधि ख़त्म हो रही है वो इसके लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं, इसके लिए उनसे कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कान्फ्रेस में कहा कि देश में अब तक कोरोना के कुल 56,342 मामले सामने आए हैं. इलाज के बाद अब तक कुल 16,539 लोग ठीक हो चुके हैं और देश में कोरोना के कुल 37,916 सक्रिय मामले हैं. लव अग्रवाल ने बताया कि कोरोना की मौजूदा रिकवरी रेट 29.36 फ़ीसदी है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि भारतीय रेलवे ने 5,231 कोच विशेष 'कोविड केयर सेंटर' में बदल दिए हैं. इन सभी कोच को 215 स्टेशनों पर लगाया जाएगा और इनका इस्तेमाल कोरोना के 'माइल्ड और वेरी माइल्ड' मामलों के इलाज के लिए किया जाएगा. इनमें से 85 स्टेशनों पर स्वास्थ्यकर्मी और ज़रूरी दवाएं भी रेलवे मुहैया कराएगा. बाकी स्टेशनों पर राज्य सरकारें डॉक्टर और दवाएं उपलब्ध कराएंगी. इस योजना के लिए रेलवे ने 2,500 डॉक्टर और 35 हज़ार पैरा मेडिकल स्टाफ़ भी नियुक्त किए हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अभी रेड, ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन्स की स्थिति की समीक्षा की जा रही है और आने वाले एक-दो दिनों में इस लिस्ट के बदलाव के बारे में जानकारी दे दी जाएगी. एम्स के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया के उस बयान के बारे में पूछे जाने पर जिसमें जून में भारत में संक्रमण का 'पीक' आने की बात कही गई थी, लव अग्रवाल ने कहा कि अगर हम फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करें और हर तरह के एहतियात बरतें तो हो सकता है कि पीक को अवॉइड किया जा सके. लव अग्रवाल ने ये भी कहा कि हमें अभी वायरस के साथ ही जीना पड़ेगा और अपनी आदतें बदलनी होंगी. 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अफ़वाह ही रह गई. तब जूलिया ने कहा था,\"मुझे लगता है कि बच्चे स्वर्ग की देन होते हैं और मेरे पास उसकी समयसारिणी नहीं है\". मगर इस बार फिर उनके माँ बनने की हवा उड़ी इटली में उनकी एक तस्वीर के आने के बाद जिसमें वे गर्भवती लग रही थीं. अभिनय जूलिया रॉबर्ट्स को हॉलीवुड में साफ़ सुथरी और सशक्त अभिनय के लिए जाना जाता है. उनकी सादगी भरे अंदाज़ के कारण कई बार उन्हें गर्ल नेक्स्ट डोर का नाम भी दिया गया. जूलिया ने इरिन ब्रोकोविच फ़िल्म में अपने अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ऑस्कर पुरस्कार हासिल किया था. 1990 में उन्हें प्रेटी वूमैन फ़िल्म के लिए सर्वेश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. 1989 में स्टील मैग्नोलिआज़ फ़िल्म में उन्हें ऑस्कर पुरस्कार में सह अभिनेत्री वर्ग में नामांकित किया गया. हाल ही में उन्होंने मोनालिसा स्माइल में मुख्य रोल निभाया और फ़िलहाल वे 2001 की हिट फ़िल्म ओशन्स एलेवन की अगली कड़ी ओशन्स ट्वेल्व में काम कर रही हैं.\n\nSummary:", "target": "प्रेटी वूमन,माई बेस्ट फ़्रेंड्स वेडिंग और अमेरिकन स्वीटहार्ट जैसी फ़िल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री जूलिया 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और बंदूक रखने का अधिकार रखने के क़ानून की वकालत करने वाले समूह आमने-सामने आ गए हैं. इन प्रस्तावों में हथियारों और उच्च क्षमता वाली गोलियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ बंदूक खरीदने वाले लोगों की पृष्ठभूमि की जांच करना शामिल है. डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति ओबामा ने इसी मुद्दे पर 23 ऐसे फैसले लिए हैं जिसके लिए अमरीकी संसद की सहमति की जरुरत नहीं है. पिछले महीने कनेक्टीकट राज्य में एक बंदूकधारी ने न्यूटाउन के सैंडी हुक एलिमेन्टरी स्कूल में 26 लोगों को गोलियों से भून डाला था. इस हमले में मारे जाने वालो में 20 बच्चे और छह लोग शामिल थे. इसके बाद से वहाँ बंदूकों की आसानी से उपलब्धता पर सवाल उठने लगे थे. प्रस्ताव इस हमले के बाद बराक ओबामा को कई बच्चों ने चिट्ठी भी लिखी थी. बुधवार को व्हाइट हाउस में इन प्रस्तावों को पेश करते समय ये बच्चे भी वहां मौजूद थे. इस घटना के एक महीने बाद बराक ओबामा ने कहा कि बंदूक के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए तुरंत काम करना होगा. उनका कहना था, ''इस हिंसा को कम करने के लिए हम ये एक काम तो कर ही सकते हैं, अगर एक जिंदगी बचाई जा सकती है तो हमारा दायित्व है हम इसके लिए कोशिश करें.'' लेकिन अमरीका में बंदूक रखने की वकालत करने वाले समूह नेशनल राइफ़ल एसोसिएशन का कहना है, '' हमारा देश जिस तरह के संकंट को झेल रहा है उसे देखते हुए ये प्रस्ताव कोई समाधान नहीं पेश करता.'' इस समूह ने वक्तव्य जारी करके कहा,'' इन प्रस्तावों से बंदूक रखने वाले केवल ईमानदार और क़ानून का पालन करने वाले लोगों पर ही प्रभाव पड़ेगा और हमारे बच्चे ऐसी त्रासदियों में असुरक्षित ही रहेंगे.'' ओबामा ने संसद से अपील की वो सेना के इस्तेमाल में आने वाले घातक हथियारों, जिनका पिछली शूटिंग में इस्तेमाल किया गया था उनकी खरीदारी पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाए. मुश्किल गोलियों की संख्या कम करने और सुरक्षा कवच को भेद कर जानी वाली गोलियों को रखने और उनकी ब्रिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाए. जो भी व्यक्ति हथियारों की तस्करी करता है उस पर सख्त जुर्माना लगाया जाए विशेषतौर पर उन गैर लाइसेंसधारी डीलरों के खिलाफ जो अपराधियों के लिए ये खरीदते हैं. लेकिन इन प्रस्तावों को पेश करते हुए उन्होंने ये भी माना कि इन पर संसद में सहमति पाने के लिए काफी विरोध का सामना भी करना पड़ेगा. उनका कहना था, ''ये काफी मुश्किल होगा.'' अगर आकड़ो को देखा जाए तो अमरीका में बंदूक रखने वालों की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है. अमरीकी संविधान में किए गए दूसरे संशोधन के मुताबिक लोगों के बंदूक रखने के अधिकार है और उसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए.\n\nSummary:", "target": "अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बंदूकों के इस्तेमाल पर नियंत्रण के लिए नए प्रस्ताव सामने रखे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nओबामा ने कहा था कि वे बंदूकों पर नियंत्रण के लिए कोई उपाय करेंगे पिछले दो दशकों में ये सबसे व्यापक प्रस्ताव है और इन प्रस्तावों के बाद ही ओबामा और बंदूक रखने का अधिकार रखने के क़ानून की वकालत करने वाले समूह आमने-सामने आ गए हैं. इन प्रस्तावों में हथियारों और उच्च क्षमता वाली गोलियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ बंदूक खरीदने वाले लोगों की पृष्ठभूमि की जांच करना शामिल है. डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति ओबामा ने इसी मुद्दे पर 23 ऐसे फैसले लिए हैं जिसके लिए अमरीकी संसद की सहमति की जरुरत नहीं है. पिछले महीने कनेक्टीकट राज्य में एक बंदूकधारी ने न्यूटाउन के सैंडी हुक एलिमेन्टरी स्कूल में 26 लोगों को 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'थ्री इडियट्स' में मेरा किरदार अलग था इसके बावजूद मेरी यह इमेज ख़त्म नहीं हुई. मैं 44 साल का हो गया हूं और मुझे लगता है कि यह इमेज मेरे लिए अच्छी नहीं है. ऐंक्टिंग की भूख अब भी किसी स्कूल जाता हूँ तो 16 साल की लड़कियाँ मुझे मैडी कहकर पुकारती हैं और हॉट कहती हैं. मेरे लिए यह कोई ख़ुशी की बात नहीं, सोचने की बात है कि मैं कर क्या रहा हूँ? मैं अपने अंदर ऐक्टिंग की उसी भूख को दोबारा पैदा करना चाहता हूं. फिर से अपने काम को लेकर असुरक्षित रहना चाहता हूं इसलिए जब लंबे अंतराल के बाद ये फ़िल्म, 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' की तो उसी घबराहट और उसी सोच के साथ की जैसे ये मेरी पहली फ़िल्म हो. कहानी ज़रूरी हैं बॉडी नहीं सिक्स पैक बनाने पर माधवन कहते हैं, ''मरी अगली फ़िल्म है 'साला खडूस' जो पहलवानों पर है.\" वो कहते हैं, \"फ़िल्म में आपको मेरी बॉडी दिख जायेगी. रही बात 6 या 8 पैक की तो वो मैंने नहीं बनाये क्योंकि मेरा मानना हैं कि फिल्म के लिए कहानी ज़रूरी होती है 6 पैक नहीं.'' (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आर माधवन ने कई सफल फ़िल्मों में काम करने के बाद तीन साल के लिए फ़िल्मों से भला दूरी क्यों बनाए रखी?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n'रहना है तेरे दिल में', 'रंग दे बसंती', 'तनु वेड्स मनु' और 'थ्री इडियट्स' जैसी फ़िल्मों में उनके काम की ख़ासी चर्चा हुई थी. माधवन ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ के साथ अपने बॉलीवुड करियर को एक बार फिर से शुरू कर रहे हैं. 44 वर्षीय अभिनेता ने फिल्मों से इसलिए दूरी बनाकर रखी क्योंकि वो अपने काम से खुश नहीं थे. पर क्यों? पसंद नहीं लवरबॉय इमेज बीबीसी से खास बातचीत में आर माधवन ने बताया,\" मैं अपने चाहने वालों का मनोरंजन अच्छे से कर सकूं इसलिए मैंने तीन साल का ब्रेक लिया. समाप्त जब से मैं बॉलीवुड में आया हूं, अपनी पहली फ़िल्म, 'रहना है तेरे दिल में' से लेकर अब तक सब लोग मुझे मेरे उस फिल्म के किरदार के नाम 'मैडी' से ही बुलाते हैं. लोग मुझे रोमांटिक फ़िल्मों के साथ ही जोड़ते हैं. 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(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.) (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बॉलीवुड हीरोइन नरगिस फाखरी के एक उर्दू अख़बार में छपे विज्ञापन से पाकिस्तान में हंगामा मच गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोग इसके लिए अख़बार और नरगिस फाखरी की आलोचना कर रहे हैं तो वहीं कई इस पर चटखारे भी ले रहे हैं. उर्दू अख़बार 'जंग' के 20 दिसंबर के अंक में नरगिस एक मोबाइल फ़ोन के विज्ञापन में पहले पन्ने पर नज़र आ रही हैं. वह लेटी हुई हैं और उनके हाथ में फ़ोन है. पाकिस्तान के कई ट्विटर यूज़र इसे सस्ता और भद्दा विज्ञापन बता रहे हैं. जंग मीडिया ग्रुप के ही एक वरिष्ठ संपादक अंसार अब्बासी ने लिखा, \"पहले पन्ने पर छपे इस बेहूदा विज्ञापन पर मैं जंग ग्रुप के टॉप मैनेजमेंट से अपना विरोध जताता हूं.\" समाप्त वक़्त टीवी के एंकर मतिउल्लाह जन ने ट्वीट किया, \"मैं अंसार अब्बासी से सहमत हूं. नरगिस के ख़ूबसूरत फ़िगर का भला इस मोबाइल फ़ोन और उसके सस्ते होने से क्या वास्ता.\" मोहम्मद आमेर नाम के ट्विटर यूज़र ने लिखा, \"एक प्रतिष्ठित अख़बार प्लेबॉय जैसी पत्रिका बनने की कोशिश क्यों कर रहा है. ऐसे विज्ञापन पत्रिकाओं में अच्छे लगते हैं, अख़बारों में नहीं.\" मानवाधिकार कार्यकर्ता जिबरान नासिर ने ट्वीट किया, \"एक तरफ़ तो 'जंग' महिला सशक्तीकरण की बात करता है, दूसरी तरफ़ पैसे कमाने के लिए ऐसे बेहूदा विज्ञापन छापता है. कहां गए आपके मूल्य.\" इस मामले पर नरगिस फाखरी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है, \"मैं पिछले तीन साल से इस मोबाइल कंपनी की ब्रांड एंबेसडर हूं और इससे पहले ऐसा होहल्ला कभी नहीं हुआ. मैंने इस कंपनी के टीवी विज्ञापन के लिए काम किया था. मुझे नहीं पता था कि वो इस विज्ञापन को उर्दू अख़बार में भी इस्तेमाल करेंगे. ये मोबाइल कंपनी पाकिस्तान में ख़ासी प्रतिष्ठित है. तो मैंने और मेरी टीम ने विज्ञापन को किस तरह से इस्तेमाल करना है, ये उन पर छोड़ दिया था.\" सैयद अली अब्बास ज़ैदी ने क्रिकेटर शाहिद अफ़रीदी की बिलकुल नरगिस फाखरी वाले अंदाज़ में एक अख़बार के पहले पन्ने पर लेटी हुई तस्वीर डाली और लिखा, \"नरगिस फाखरी के विज्ञापन पर पाकिस्तान में हास्यास्पद प्रतिक्रियाएं.\" पाकिस्तान मीडिया वॉच नाम के ट्विटर हैंडल से ट्वीट हुआ, \"नरगिस फाखरी ने अकेले ही पाकिस्तान में उर्दू अख़बारों की रीडरशिप एकदम से बढ़ा दी.\" फ़वाद हुसैन का ट्वीट था, \"नरगिस फ़ाखरी के ख़ूबसूरत फ़िगर से जलने के बजाय जिम जाओ और अपनी बॉडी को दुरुस्त करो.\" ट्विटर यूज़र सैयद अली अब्बास ज़ैदी ने ट्वीट किया, \"एक ख़ूबसूरत फ़िगर वाली लड़की का विज्ञापन छपने पर लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और मुमताज़ क़ादरी जैसे हत्यारे का सम्मान करने से लोगों की शान बढ़ती है.\" मुमताज़ क़ादरी एक पूर्व पुलिस अधिकारी थे जिन्हें पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई थी. पाकिस्तान में कई लोगों ने सलमान तासिर पर ईशनिंदा का आरोप लगाया था और उनकी हत्या को जायज़ ठहराते हुए क़ादरी को अपना हीरो बताया था. 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वर्ष की रिपोर्ट ने बताया कि दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और शौचालय की उपलब्धता वगैरह के मामले में 126वें नंबर पर है, स्लोवेनिया और टोंगा से जैसे देशों से काफ़ी पीछे. मॉल, मल्टीप्लेक्स, मोबाइल फ़ोन के बीच आरामदेह जीवन गुज़ार रहा इंडिया अक्सर यह भ्रम पाल लेता है कि उसका देश सचमुच दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी आ गया है, या बस अब आने ही वाला है. मगर सच यही है कि भारत आज भी इंडिया से बहुत बड़ा है. मीडिया, सरकार, शहरी मध्य वर्ग सभी जाने-अनजाने इंडिया की चादर को भारत के ऊपर तान देना चाहते हैं, लेकिन उस चादर में 70 करोड़ ग़रीब, अशिक्षित, बीमार, बेरोज़गार लोग नहीं लपेटे जा सकते. भारत क्रय क्षमता के मामले में दुनिया की पाँचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, जब यह ख़बर आई तो कई समाचारपत्रों ने इसे इस तरह प्रकाशित किया जैसे भारत दुनिया का पाँचवा सबसे समृद्ध देश बन गया हो. यह कहना मुश्किल है कि इसमें ख़बर को समझने की भूल कितनी थी और 'राइजिंग इंडिया' का नया जोश कितना था, जोश जो कई ठोस सचाइयों और कई भ्रमों पर बराबर-बराबर टिका है. एकबारगी लगने लगा है कि अर्थव्यवस्था ही जीती-जागती चीज़ है और लोग आँकड़ों में तब्दील हो गए हैं. देश की एक अरब से अधिक की आबादी का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा एक सक्षम उपभोक्ता वर्ग है जो अमरीका की कुल आबादी के बराबर है. लेकिन बाक़ी के सत्तर प्रतिशत लोगों कब गिना जाता है और किस खाते में रखा जाता है? देश का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है यह तो रोज़ बताया जाता है लेकिन हम कैसे भूल सकते हैं उसे एक अरब से विभाजित करने पर ही प्रति व्यक्ति आय निकलती है जो लगभग 700 डॉलर सालाना यानी तीस हज़ार रुपए है. इसमें अंबानी, टाटा, बिड़ला, प्रेमजी जैसे अरबपतियों की कमाई भी शामिल है. किसी देश के विकास का सही पैमाना क्या है, उसमें कितने अरबपति हैं या फिर वहाँ कितने लोगों को पीने का साफ़ पानी मिलता है? संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में पिछले पाँच वर्षों से दुनिया का पहले नंबर का देश है नॉर्वे जहाँ सिर्फ़ चार अरबपति हैं जबकि 126वें नंबर के देश भारत में 23 अरबपति हैं. अब तय करना है कि अमरीका के कुल अरबपतियों की संख्या (313) का मुक़ाबला करना है या नॉर्वे का, जहाँ सबको शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पक्की गारंटी है.\n\nSummary:", "target": "इंडिया 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हर देश ने अपने-अपने हिसाब से तय की हुई थी लेकिन अब विश्व व्यापार संगठन ने उसे बीस साल कर दिया है. इसके साथ प्रौसैस पेटेंट भी होता है जिसका संबंध नई प्रौद्योगिकी से है. किसी भी नई तकनोलॉजी पर भी पेटेंट लिया जा सकता है. हरेक देश में पेटेंट कार्यालय हैं. अपने उत्पाद या तकनोलॉजी पर पेटेंट लेने के लिए इस कार्यालय में अर्ज़ी दें और साथ ही अपनी नई खोज का ब्योरा दें. उसके बाद पेटेंट कार्यालय उसकी जांच करेगा और अगर वह उत्पाद या तकनोलॉजी नई है तो पेटेंट का आदेश जारी कर देगा. लेकिन पेटेंट का ये आदेश जिस देश में जारी किया जाता है उसकी सीमाओं के भीतर ही लागू माना जाता है. जहां तक कॉपीराइट का सवाल है तो कॉपीराइट किसी मौलिक लेखन, संगीत, कलाकृति, डिज़ाइन, फ़िल्म या तस्वीरों पर होता है. इलाहबाद उत्तर प्रदेश से अजित कुमार पांडेय जानना चाहते हैं कि कार्बन ट्रेडिंग क्या होती है. कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए क्योतो संधि में एक तरीक़ा सुझाया गया है जिसे कार्बन ट्रेडिंग कहते हैं. यानी कार्बन डाइऑक्साइड का व्यापार. ये योजना केवल विकसित देशों पर ही लागू है. इसमें होता ये है कि कोई विकसित देश किसी विकासशील देश में ऐसी योजना अपनाता है जिससे ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाई जा सके. वह इसके लिए धनराशि और तकनीकि सहायता भी देगा और इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में जो कमी आएगी उसका लाभ उसे मिलेगा. उदाहरण के लिए ब्रिटेन, भारत में कोयले की जगह सौर ऊर्जा की कोई परियोजना शुरु करे. इससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम होगा जिसे आंका जाएगा और फिर उसका मुनाफ़ा ब्रिटेन को मिलेगा. विश्व में सबसे अधिक दिनों तक किसने प्रधानमंत्री पद सँभाला. ग्राम लक्ष्मीपुर, सुपौल बिहार से संजय खिरहारी. सिंगापुर के प्रथम प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने सबसे लंबे समय तक ये पद सँभाला है. वो 1959 से 1990 तक लगातार इस पद पर बने रहे. उनका जन्म 16 सितम्बर 1923 को सिंगापुर में हुआ था. उन्होंने ब्रिटेन के केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री हासिल की और 1949 में सिंगापुर की एक कंपनी में वकील की हैसियत से काम करने लगे. फिर उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर पीपल्स एक्शन पार्टी के नाम से एक दल का गठन किया और सिंगापुर को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने की मुहिम छेड़ दी. 1959 में जब सिंगापुर आज़ाद हुआ तो ली कुआन यू पहले प्रधानमंत्री बने. उनके नेतृत्व में सिंगापुर का आर्थिक और औद्योगिक विकास हुआ और वो एक मामूली बंदरगाह से एक धनी देश में बदल गया. ब्रिटेन का ईटन कॉलिज कहाँ है, कब स्थापित हुआ और क्या ये यूरोप का सबसे पुराना कॉलेज है. गोलपहाड़ी जमशेदपुर से जंगबहादुर सिंह और उमा सिंह. ईटन कॉलेज की स्थापना इंग्लैंड के राजा हैनरी षष्ठम ने सन 1440 में की थी. इसका उद्देश्य था 70 छात्रों को निशुल्क शिक्षा देना. ये सब कॉलेज में ही रहते थे. कुछ छात्र ईटन शहर में भी रहते थे और फ़ीस देकर पढ़ते थे. ईटन कॉलेज लंदन से कोई बीस मील पश्चिम में इंग्लैंड के बार्कशायर इलाक़े में है. ईटन एक सैकेन्डरी स्कूल है जहाँ आमतौर पर तेरह साल की उम्र में छात्र प्रवेश करते हैं और अठ्ठारह साल की उम्र तक पढ़ते हैं. ये सभी छात्र स्कूल परिसर में ही रहते हैं. यहाँ पढ़ने के लिए कोई 23 हज़ार पाउंड सालाना का ख़र्च आता है. कुछ छात्रों को वज़ीफ़ा भी मिलता है. इस स्कूल की शुरुआत 70 छात्रों से हुई थी लेकिन अब यहाँ लगभग 1290 छात्र पढ़ते हैं. ब्रिटेन के राजपरिवार के सदस्य और दुनिया के बड़े घरानों के बच्चे यहाँ पढ़ते रहे हैं. फ़ॉरबिडन सिटी क्या है और क्यों मशहूर है. आरा बिहार से राम कुमार नीरज. फ़ॉरबिडन सिटी चीन की राजधानी बेइजिंग के केन्द्र में है, थियाननमैन चौक के ठीक उत्तर में. ये मिंग और चिंग राजवंशों का राजप्रासाद हुआ करता था. इसका निर्माण सन् 1406 में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में चौदह साल लगे. कहते हैं कि कोई दो लाख लोगों ने इसके निर्माण कार्य में हिस्सा लिया. ये 720 हज़ार वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है, इसमें 800 इमारतें हैं और 9999 कमरे. दस हज़ार कमरे इसलिए नहीं बनाए गए क्योंकि यह संख्या स्वर्ग के कमरों की है. संयुक्त राष्ट ने सन् 1987 में इसे विश्व विरासत घोषित किया. यह दुनिया के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है.\n\nSummary:", "target": "पेटेंट क्या है और पेटेंट और कॉपीराइट में क्या अन्तर है. जानना चाहते हैं गुमला झारखंड से आइज़ैक बेस्तर तमगड़िया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपेटेंट एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत किसी भी नई खोज से बनने वाले उत्पाद पर एकाधिकार दिया जाता है. उसके बाद कोई भी उस उत्पाद को न बना सकता है न बेच सकता है. अगर बनाना चाहे तो 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर में गोमांस पर प्रतिबंध लागू करने संबंधी हाईकोर्ट के फ़ैसले के विरोध में प्रदर्शन दोबारा शुरू हो गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअधिकारियों ने गौवध और जुलूस रोकने के इरादे से घाटी के कुछ हिस्सों में शनिवार को कर्फ्यू लगा दिया है. शुक्रवार को घाटी में हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे थे जहां पुलिस के साथ उनका टकराव हुआ था. भारत प्रशासित कश्मीर में गोमांस पर प्रतिबंध संबंधी क़ानून वैसे तो 83 वर्ष पुराना है, लेकिन उस पर पूरी तरह से अमल नहीं हो पाता था. क़ानून भारतीय जनता पार्टी से सम्बद्ध परिमोक्ष सेठ नामक एक वक़ील की जनहित याचिका पर कश्मीर हाईकोर्ट ने बीते बुधवार आदेश दिया था कि प्रतिबंध को कड़ाई से लागू किया जाए. समाप्त तभी से घाटी में मज़हबी और अलगाववादी नेताओं समेत आम लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं. इसी विरोध के तहत शनिवार को घाटी में बंद का आह्वान किया गया है. घाटी में यह मांग ज़ोर पकड़ रही है कि वर्ष 1932 के गोमांस पर प्रतिबंध संबंधी क़ानून को अब बदला जाना चाहिए. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दुनिया भर में महिलाओं को उनके समकक्ष पुरुषों के मुकाबले कम वेतन में असमानता का शिकार होना पड़ता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n20 मार्च को पड़ने वाले इक्वल पे डे के अवसर पर होने वाली रैलियों में पूरी दुनिया में महिलाएं हिस्सा लेती हैं. भारत की स्थिति तो दुनिया के उन देशों जैसी है जहां वेतन के मामले में सबसे अधिक गैर बराबरी है. लेकिन लैंगिक आधार पर वेतन में भेदभाव का मामला केवल भारत जैसे विकासशील में ही नहीं है, विकसित यूरोपीय देश भी इससे अछूते नहीं है. पढ़ें विस्तार से हाल ही में ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक ही पीढ़ी में पे गैप (लैंगिक आधार पर वेतन में असमानता) ख़त्म करने का वादा किया है. कैमरन ने द टाइम्स में अपने लेख में लिखा, “जब मेरी बेटियां नैंसी और फ़्लोरेंस नौकरी शुरू करें तो, मैं चाहता हूँ कि वो पे गैप को वैसे ही बीते जमाने की बात के रूप में देखें जैसे किसी जमाने में महिलाओं को वोट का अधिकार नहीं था और वो काम भी नहीं करती थीं.” समाप्त लैंगिक आधार पर वेतन को इतिहास में दफ़न करने की डेविड कैमरन की कोशिश तब सामने आई है, जब ब्रिटेन लैंगिक असमानता को लेकर वैश्विक रैंकिंग में आठ स्थान नीचे खिसक गया है. अब उसका स्थान 26वां हो गया है, जो इक्वेडोर, बुरुंडी और फ़िलिपींस जैसे देशों और अन्य यूरोपीय देशों से 14 स्थान नीचे है. बढ़ी है असमानता लेकिन लिंग के आधार पर वेतन में असमानता का नक्शा क्या दिखाता है? इस मामले में दुनिया आज कहां है? अंकड़े बताते हैं कि लैंगिक असमानता (जिसमें वेतन में गैरबराबरी शामिल है) पिछले दशक से कम हो रही है लेकिन बहुत धीमें और असमान रूप से. विश्व आर्थिक फ़ोरम में लैंगिक समानता के वरिष्ठ निदेशक सादिया ज़ाहिदी कहती हैं, “लैंगिक समानता में सबसे अधिक असर श्रमशक्ति में महिलाओं के शामिल होने से हुआ है.” साल 2005 के बाद से केवल छह देश ऐसे हैं जहां लैंगिक असमानता बढ़ी है. ये हैं- श्रीलंका, माली, क्रोएशिया, मकदूनिया और ट्यूनीशिया. आर्थिक हिस्सेदारी और महिलाओं के लिए अवसरों के मामले में अभी 60 प्रतिशत लैंगिक गैरबराबरी है. यह 2006 के आंकड़े से 4 प्रतिशत ही कम है. ख़त्म हो पाएगी असमानता? अगर इसी रफ़्तार से लैंगिक गैरबराबरी कम हुई तो इसे ख़त्म करने में दुनिया को 81 साल लगेंगे, यानी 2095 तक ही कार्यस्थलों में लैंगिक भेद ख़त्म हो पाएगा. किसी देश में कुल लैंगिक असमानता का आकलन कई वजहों को ध्यान में रख कर किया जाता है. जैसे- आर्थिक कारक, स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीति में पुरुषों के मुकाबले हिस्सेदारी. इस रैंकिंग में शीर्ष पांच देश उत्तरी यूरोप के हैं. उसके बाद निकारागुआ का छठा स्थान है, क्योंकि महिलाओं का स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और राजनीतिक हिस्सेदारी की दर यहां अधिक है. हालांकि वेतन बराबरी के मामले में इसका बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है. ज़ाहिदी के मुताबिक़, रवांडा का स्थान सातवां है, क्योंकि यहां लगभग उतनी ही महिलाएं नौकरी करती हैं, जितने पुरुष. इसी कारण यह पूरे अफ़्रीका में सबसे कम लैंगिक असमानता वाला देश है. एशिया में सबसे ऊपर नौवीं रैंकिंग फ़िलीपींस की है. और इसका सबसे मुख्य कारण है, पुरुषों और महिलाओं के बीच एक ही काम के लिए समान वेतनमान का होना. सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में माली, सीरिया, चाड, पाकिस्तान और यमन हैं. भारत 114वें नंबर पर इस मामले में भारत का रिकॉर्ड भी ख़राब है. 142 देशों की सूची में भारत 114वें नंबर पर है. दुनिया में 14 देश ऐसे हैं जो आर्थिक हिस्सेदारी और अवसर के मामले में लैंगिक गैरबराबरी का 80 फीसदी ख़त्म कर चुके हैं. इनमें चार अफ़्रीकी देश हैं, पांच देश यूरोप और मध्य एशिया के और बाकी पांच हैं- बुरुंडी, नॉर्वे, मलावी, अमरीका और बहामास. ये कहने की ज़रूरत नहीं कि आम तौर पर देशों में संघर्ष और लोगों के विस्थापन के कारण महिलाओं को सबसे अधिक नुकसान सहना पड़ता है. लेकिन, समावेशी आर्थिक विकास और वेतन बराबरी के मामले में कौन सा देश अच्छा प्रदर्शन कर रहा है? आकलन विशेषज्ञ महिलाओं की आर्थिक हिस्सेदारी और खास तौर पर उनके लिए आर्थिक अवसरों का आकलन करते हैं. यानी देश की कुल श्रमशक्ति में उनकी संख्या और कामकाजी महिलाओं को मिलने वाली नौकरी की गुणवत्ता. विश्व आर्थिक फ़ोरम के अनुसार, उन विकसित देशों में यह खास तौर पर प्रासंगिक है, जहां महिलाएं आसानी से नौकरी पा सकती हैं लेकिन उन्हें और और बेहतर नौकरी और तनख्वाह पाने का मौका नहीं मिलता. विशेषज्ञों का कहना है कि वेतन में असमानता उम्मीदें को दर्शाता है. उदाहरण के लिए यह महिलाओं को मानने के लिए प्रेरित करता है कि एक ही काम के लिए पुरुष सहकर्मियों के मुक़ाबले उन्हें कम वेतन किया जाएगा, यहां तक कि विकसित देशों में भी. 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मैक्सिको के पहले गोल से अर्जेंटीना पर काफ़ी दबाव बन गया था लेकिन क्रेस्पो के गोल के बाद अर्जेंटीना ने कुछ राहत की साँस ली और उसके बाद खेल ने एक सधी हुई रफ़्तार पकड़ ली. कड़ा मुक़ाबला मैक्सिको ने अपनी रक्षा पंक्ति काफ़ी मज़बूत रखते हुए आक्रामक रणनीति भी अपनाई जबकि अर्जेंटीना का ज़्यादा वक़्त गेंद को छीनने और उसे अपने क़ब्ज़े में रखने में गुज़रा. अर्जेंटीना के क्रेस्पो को 23वें मिनट में भी गोल करने का एक बेहतरीन मौक़ा मिला लेकिन गेंद मैक्सिको के गोलकीपर ओसवाल्दो सांचेज़ के ऊपर से होकर निकल गई. 25वें मिनट में बोरगेट्टी ने क़लीब 20 मीटर की दूरी से शॉट मारा लेकिन उसे रोबर्तो ने बार के ऊपर से निकाल दिया. मैक्सिको को 38वें मिनट में एक उस समय झटका लगा जब हुनरमंद खिलाड़ी पावेल पार्दो को टांग की चोट की वजह से बाहर भेजना पड़ा और उनके स्थान पर गैराडो तोरादो को बुलाया गया. उसके बाद तो दोनों टीमों के बीच जैसे आँख मिचौली का खेल चलता रहा, मौक़े मिलते रहे और ख़ाली जाते रहे. दो बार के विश्व चैम्पियन रह चुके अर्जेंटीना ने 1998 में क्वार्टर फाइनल में हार का सामना किया था और चार साल पहले तो यह टीम पहले दौर 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'देशद्रोही मुर्दाबाद...बुश मुर्दाबाद...' उन्होंने नए मुख्य जज राऊफ़ अब्दुल रहमान पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है. न्यायालय द्वारा नियुक्त सरकारी वकील उन वकीलों की जगह मुकदमें को दौरान मौजूद रहे. महत्वपूर्ण है कि जनवरी 29 को इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति और उनके साथियों ने न्यायालय से वॉकआउट किया था. इसके बाद उन्होंने अदालत का बहिष्कार जारी रखने की धमकी दी थी. लेकिन अदालत में सद्दाम और उनके सहयोगियों को पेश करने और यदि ज़रूरी हो तो बलपूर्वक लाने की बात उठी थी और फिर सोमवार को वे अदालत में पेश हुए. अदालत में पेश होने पर सद्दाम हुसैन ने कहा, \"वे मुझे बलपूर्वक यहाँ लाए हैं. आप मेरी ग़ैर-मौजूदगी में मेरे ख़िलाफ़ मुकदमा चलाएँ. क्या आप ऐसा करने में ख़ुद को सक्षम नहीं मानते?\" उनका नारे लगाए, \"देशद्रोही मुर्दाबाद, देशद्रोही मुर्दाबाद, बुश मुर्दाबाद. उम्माह (इस्लामी क़ौम) ज़िंदाबाद...इस्लामी क़ौम ज़िंदाबाद...\" उनके क़रीबी रिश्तेदार बर्ज़ान इब्राहीम अल-तिकरीती की अदालत में सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई. सद्दाम और बर्ज़ान दोनो ही जज को कार्यवाही के दौरान परेशान करते रहे और चुप होने और बैठ जाने के आदेशों को नज़रअंदाज़ करते रहे. सद्दाम फिर चीख़े, \"ये अदालत नहीं है. ये अदालत नहीं है. ये तो खेल हो रहा है.\" जज रहमान का कहना था कि वे उन्हीं क़ानून का पालन कर रहे हैं जो सद्दाम हुसैन के शासनकाल में बनाए गए थे.\n\nSummary:", "target": "इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अपने ख़िलाफ़ चल रहे मुकदमे का पिछले महीने से बहिष्कार करने के बाद, सोमवार को बग़दाद में न्यायालय में पेश हुए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजैसे ही वे न्यायालय में दाख़िल हुए उन्होंने 'बुश मुर्दाबाद' का नारा लगाया. उनका कहना था कि उन्हें अपनी इच्छा के ख़िलाफ़ न्यायालय में सुनवाई के लिए पेश होने पर मजबूर किया गया है. इसके बाद जज और प्रतिवादियों के बीच तीख़ी नोकझोंक हुई और प्रतिवादियों ने अपने वकीलों की अनुपस्थिति पर शिकायत दर्ज की. ग़ौरतलब है कि सद्दाम हुसैन और उनके सात अन्य सहयोगियों पर 1982 में दुजैल गाँव में 148 लोगों की हत्या के सिलसिले में मुक़दमा चल रहा है. अगर उन्हें दोषी पाया जाता है तो फाँसी की सज़ा हो सकती है. प्रतिवादी पक्ष की टीम मुकदमे से इसलिए पीछे हट गई है क्योंकि वह मुकदमे की प्रक्रिया और कार्रवाई की शैली से नाराज़ हैं. 'देशद्रोही मुर्दाबाद...बुश मुर्दाबाद...' उन्होंने नए मुख्य जज राऊफ़ अब्दुल रहमान पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है. न्यायालय द्वारा नियुक्त सरकारी वकील उन वकीलों की जगह मुकदमें को दौरान मौजूद रहे. महत्वपूर्ण है कि जनवरी 29 को इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति और उनके साथियों ने न्यायालय से वॉकआउट किया था. इसके बाद उन्होंने अदालत का बहिष्कार जारी रखने की धमकी दी थी. लेकिन अदालत में सद्दाम और उनके सहयोगियों को पेश करने और यदि ज़रूरी हो तो बलपूर्वक लाने की बात उठी थी और फिर सोमवार को वे अदालत में पेश हुए. अदालत में पेश होने पर सद्दाम हुसैन ने कहा, \"वे मुझे बलपूर्वक यहाँ लाए हैं. आप मेरी ग़ैर-मौजूदगी में मेरे ख़िलाफ़ मुकदमा चलाएँ. क्या आप ऐसा करने में ख़ुद को सक्षम नहीं मानते?\" उनका नारे लगाए, \"देशद्रोही मुर्दाबाद, देशद्रोही मुर्दाबाद, बुश मुर्दाबाद. उम्माह (इस्लामी क़ौम) ज़िंदाबाद...इस्लामी क़ौम ज़िंदाबाद...\" उनके क़रीबी रिश्तेदार बर्ज़ान इब्राहीम अल-तिकरीती की अदालत में सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई. सद्दाम और बर्ज़ान दोनो ही जज को कार्यवाही के दौरान परेशान करते रहे और चुप होने और बैठ जाने 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सच्चाई देखने के लिए सिनेमाघरों में गए थे. वह कहते हैं, \"जब मैं डिज़्नी के साथ इसके वितरण को लेकर परेशान था, उस समय यदि कोई मुझसे यह कहता कि यह फ़िल्म इस साल डिज़्नी की किसी भी फ़िल्म से ज़्यादा का कारोबार करेगी तो शायद मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ\". डिज़्नी समूह ने मीरामैक्स को इस फ़िल्म को रिलीज़ करने से रोक दिया था, कंपनी का कहना था कि फ़िल्म का विषय राजनीतिक है. लेकिन मीरामैक्स ने इस फ़िल्म को ख़रीदा और स्वंतत्र रूप से इसका वितरण किया. मूर का कहना है, \"मुझे लगता है अब लाखों ऐसे लोग जो शायद वोट देने नहीं आते, अब मतदान केंद्रों पर जाएँगे\". मूर की फ़िल्म फ़ारेनहाइट 9/11 ने मई में कान फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का सम्मान हासिल किया था.\n\nSummary:", "target": "माइकल मूर की विवादास्पद फ़िल्म फ़ारेनहाइट 9/11 पहली ऐसी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बन गई है जिसने अमरीका में दस करोड़ डॉलर की कमाई की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस फ़िल्म में इराक़ पर राष्ट्रपति बुश की नीति की आलोचना की गई है. अभी एक महीना पहले ही इसे 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बहुत-सी बातें कही जाती हैं. कुछ सही होती हैं, बाकी ग़लत. जिसने कोई अपराध नहीं किया हो, उसे गिरफ़्तार करना भी एक अपराध है.'' नेता सबक़ लें सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल को याद करते हुए जस्टिस काटजू ने कहा, ''मैं अक्सर कहता था कि लोग मुझे कोर्ट या कोर्ट के बाहर बेवक़ूफ़ या कुटिल कह सकते हैं, लेकिन मैं कभी भी अदालत की अवमानना का मामला शुरू करने का क़दम नहीं उठाऊंगा, क्योंकि आरोप सही होने पर मैं इसी लायक़ हूं और ग़लत होने पर मैं उन्हें नज़रअंदाज़ कर दूंगा.'' \"मेरे विचार से कार्टूनिस्‍ट ने कुछ भी ग़लत या अवैध नहीं किया है. लोकतंत्र में बहुत सी बातें कहीं जाती हैं. कुछ सही होती हैं, बाकी ग़लत. जिसने कोई अपराध नहीं किया हो, उसे गिरफ़्तार करना भी एक अपराध है.\" जस्टिस काटजू उन्होंने कहा कि नेताओं को भी यह सबक़ सीख लेनी चाहिए. मुंबई के जाने-माने वकील माजिद मेमन ने भी असीम की गिरफ़्तारी को विरोध करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित क़रार दिया. राजद्रोह के मामले को लेकर उनके ख़िलाफ़ दायर एफ़आईआर के आधार पर उन्हें शनिवार रात आठ बजे के क़रीब मुंबई में बांद्रा कुर्ला इलाक़े से गिरफ़्तार किया गया था. बाद में बांद्रा की एक अदालत ने उन्हें 16 सितंबर तक के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्य अमित कतरनयी ने त्रिवेदी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की थी कि उन्होंने पिछले साल यानि कि 2011 में अन्ना हजारे की रैली के दौरान बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स में ऐसे पर्चे लगाए थे जिसमें भारतीय संविधान का मज़ाक उड़ाया जा रहा था. त्रिवेदी के ख़िलाफ़ ये आरोप भी लगाया गया था कि उन्होंने अपनी वेबसाइट पर आपत्तिजनक सामग्री डाली है. असीम राजनीतिक विषयों पर कार्टून बनाते हैं और इंटरनेट पर सेंसरशिप के ख़िलाफ़ सक्रिय रहे हैं. अदालत ने पिछले महीने त्रिवेदी के ख़िलाफ़ एक ग़ैर-ज़मानती वारंट जारी किया था. गौरतलब है कि त्रिवेदी को कार्टूनिस्ट बनाने की कला से जुड़ा एक अवॉर्ड हासिल करने के लिए बुधवार को सीरिया के लिए रवाना होना था. इससे जुड़ी और सामग्रियाँ इसी विषय पर और पढ़ें\n\nSummary:", "target": "प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया यानि पीसीआई के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने कथित 'देशद्रोह' के मामले में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी का विरोध किया है.", "probe_text": "Summarize the following 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में ये कत्लेआम हुआ, ये वही चर्च था जिसे 1820 के दशक में शहर के गोरे नागरिकों ने जला कर राख कर दिया था क्योंकि वहां काले गुलामों के विद्रोह की साज़िश रची जा रही थी. इतिहास में नस्लभेद चार्ल्सटन का ऐतिहासिक चर्च जहां ये घटना हुई. इस चर्च की नींव रखनेवाले डेनमार्क वेसी और उनके कई काले साथियों को फांसी पर लटका दिया गया. वेसी ख़ुद भी गुलाम रह चुके थे और लॉटरी में जीती रकम से उन्होंने अपने मालिक से अपनी आज़ादी खरीद ली थी. समाप्त लेकिन अपनी पत्नी को आज़ाद नहीं करवा पाए थे और तब के कानून के अनुसार उनके जो भी बच्चे हुए वो उस मालिक की संपत्ति थे यानी गुलाम थे. बुधवार की रात को जब एक गोरा नौजवान उस चर्च में घुसा तो वहां बैठे लोगों में थीं, 87 साल की सूज़ी जैकसन, 74 साल के रेवरेंड डैनियल सिमंस और 70 साल की इथल लैंस भी, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में देखा होगा उन जगहों को, जहां लिखा होता था - कालों के लिए यहां घुसना मना है. उन लोगों ने पानी पिया होगा काले और गोरों के लिए बने अलग-अलग नलकों से, तस्वीरें देखी होंगी साल 1963 में पास के ही अलबामा राज्य में एक काले चर्च पर हुए बम धमाके की, जिसमें चार बच्चियां मारी गई थीं. आज भी कायम नस्लभेद लेकिन क्या उन्हें ये डर रहा होगा कि इक्कीसवीं सदी में जब देश का राष्ट्रपति काला है, इंसाफ़ की बागडोर संभालने वाली एटॉर्नी जनरल काली हैं, राज्य की गवर्नर भारतीय मूल की हैं, कांग्रेस में राज्य का प्रतिनिधित्व करनेवाला एक सेनेटर काला है, वहां उनके अपने ही चर्च में घुसकर कोई उनकी जान ले लेगा? इस सवाल का जवाब वो अब नहीं दे सकते लेकिन शायद उन्हें डरना चाहिए था. दो महीने पहले ही पड़ोस के ही एक शहर में एक गोरे पुलिसवाले ने एक निहत्थे काले इंसान को गोली मार दी थी. न्यूयॉर्क में एक काला इंसान चिल्लाता रहा “मैं सांस नहीं ले पा रहा” लेकिन पुलिस ने उसे दबोचे रखा और उसकी मौत हो गई. कभी फ़र्गसन तो कभी बाल्टीमोर, हर रोज़ हो रहे विरोध प्रदर्शन—उन्हें शायद समझना चाहिए था कि अमरीका अभी भी रंग, नस्ल और मज़हब की दीवारों को तोड़ नहीं पाया है. बंदूकों की बिक्री आम और इस माहौल में अगर बंदूक तेल-साबुन की तरह दुकानों में बिके तो फिर तो करेला नीम चढ़ा. इस हमले के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार नौजवान डिलन रूफ़ को उनके एक रिश्तेदार ने हाल ही में उनके जन्मदिन के तोहफ़े के तौर पर एक 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ज़ोया अख़्तर कहती हैं, \"सच्चाई तो ये है कि इस स्टार कल्चर ने ही हमारी इंडस्ट्री को ज़िंदा रखा है. जिन फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ में सितारे नहीं है वो ख़त्म हो रही हैं. हॉलीवुड, बॉलीवुड और चीनी फ़िल्म इंडस्ट्री में ज़बरदस्त स्टार कल्चर है. और देखिए, ये तीनों ही इंडस्ट्री ना सिर्फ़ ज़िंदा हैं, बल्कि लगातार प्रगति करती जा रही हैं.\" स्टार सिस्टम का नुकसान ज़ोया, इस महीने के आख़िर में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म तलाश की सहलेखिका हैं. तलाश में आमिर ख़ान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी जैसे बड़े सितारे हैं. ज़ोया के मुताबिक़ फ़िल्म में बड़ा सितारा हो तो लोग उसे देखने के लिए सिनेमाहॉल में खिंचे चले आते है. इससे फ़िल्म व्यापार को ज़बरदस्त फ़ायदा होता है और इंडस्ट्री में लगातार पैसा आता रहता है. लेकिन ज़ोया इस सिस्टम में एक कमी भी पाती हैं. वो कहती हैं, \"बड़े सितारे जोखिम नहीं उठाना चाहते. वो वही करते हैं जो उनके प्रशंसक उनसे चाहते हैं या जो वो पसंद करते आए हैं. फ़िल्म में कुछ मारधाड़ वाले सीन डाल दो. आइटम सॉन्ग डाल दो. लो बन गई फ़िल्म. अब सितारे प्रयोग नहीं करेंगे तो अच्छी फ़िल्में कहां से बनेंगी.\" लेकिन ज़ोया अपने आपको इस मामले में ख़ुशनसीब मानती हैं कि उनकी फ़िल्म 'तलाश' में आमिर ख़ान जैसे बड़े सितारे हैं जो बाक़ी स्टार्स से अलग हैं और जोखिम लेने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते. कामयाबी का भरोसा 'तलाश' एक सस्पेंस ड्रामा है. इस तरह की फ़िल्में बनाने में क्या ख़तरा नहीं होता क्योंकि एक बार जो ये फ़िल्म देख ले उसे सस्पेंस का पता चल जाता है और वो दोबारा फ़िल्म को देखने से हिचकिचाएगा. ये सवाल पूछने पर ज़ोया बोलीं, \"फ़िल्म सस्पेंस ड्रामा है. लेकिन हमने इसके किरदारों को काफ़ी इमोशनल स्ट्रेंथ यानी भावनात्मक शक्ति दी है. क्योंकि मुझे लगता है कि दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ना बेहद ज़रूरी है. तभी आपकी फ़िल्म कामयाब हो सकती है. हमने ऐसा किया है इसलिए फ़िल्म की सफलता को लेकर हम आशान्वित हैं.\" फ़िल्म 'तलाश' ज़ोया अख्तर और रीमा कागती ने मिलकर लिखी है. इसका निर्माण ज़ोया के भाई फ़रहान अख़्तर की एक्सेल इंटरटेनमेंट कंपनी और आमिर ख़ान मिलकर कर रहे हैं. फ़िल्म का निर्देशन रीमा कागती ने किया है और ये 30 नवंबर को रिलीज़ हो रही है.\n\nSummary:", "target": "हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री ने 70 और 80 के दशक में 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समिति बनाकर घटना की जांच के आदेश दिए हैं. समाज कल्याण मंत्रालय की सचिव इसकी जानकारी जुटा रही हैं. अगर ऐसी कोई जानकारी सामने आती है जिसके मुताबिक जाति के आधार पर उत्पीड़न का मामला बनता है तो उचित कार्रवाई की जाएगी. अगर बंडारू दत्तात्रेय के पास कुछ छात्र (अखिल भारतीय छात्र परिषद) शिकायत लेकर आए कि उनके साथ मारपीट हुई है तो उन्हें उस पर कार्रवाई तो करनी ही थी. अगर वो कार्रवाई ना करते तो भी उन पर सवाल उठते. अगर मारपीट का आरोप किसी और जाति के छात्र पर लगा होता तो उसके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई होती, इसका जवाब विश्वविद्यालय दे तो बेहतर होगा, मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहता. देश भर में विरोध कर रहे छात्रों में भारतीय जनता पार्टी या सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी नहीं है. भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारें और नरेंद्र मोदी की सरकार ही अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग की सर्वाधिक हितैशी है. पिछले डेढ़ साल में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें एक नहीं अनेक योजनाएं पिछले डेढ़ साल से उनके लिए लेकर आई हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इंग्लैंड में खेले जा रहे 12वें आईसीसी विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में शनिवार को खेले गए दूसरे मुक़बले में दक्षिण अफ्रीका ने बेहद आसानी से अफ़ग़ानिस्तान को नौ विकेट से हरा दिया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाशिम अमला ने नाबाद 41 रन बनाए दक्षिण अफ्रीका के सामने डकवर्थ लूइस नियम के आधार पर जीत के लिए 48 ओवर में 127 रनों का लक्ष्य था. इसे दक्षिण अफ्रीका ने 28.4 ओवर में ही केवल एक विकेट खोकर हासिल कर लिया. दक्षिण अफ्रीका के सलामी बल्लेबाज़ क्विंटन डी कॉक ने 68 और उनके जोड़ीदार हाशिम आमला ने नाबाद 41 रन बनाए. इन दोनों बल्लेबाज़ों ने पहले विकेट के लिए 104 रनों की साझेदारी की. अफ़ग़ान टीम हुई ढेर इससे पहले टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर अफ़ग़ानिस्तान की टीम दक्षिण अफ्रीका के गेंदबाज़ों का सामना नहीं कर सकी. उसकी पूरी पारी महज़ 34.1 ओवर में केवल 125 रन पर ढेर हो गई. अफ़ग़ानिस्तान के सलामी बल्लेबाज़ नूर अली ज़ारदान ने 32 और आलराउंडर राशिद ख़ान ने 35 रन बनाए. इनके अलावा हज़रतुल्लाह ज़ज़ाई ने भी 22 रन बनाए लेकिन बाकि कोई अन्य बल्लेबाज़ दहाई तक भी नहीं पहुंचा. दक्षिण अफ्रीका के स्पिनर इमरान ताहिर ने 29 रन देकर चार और क्रिस मॉरिस ने 13 रन देकर तीन विकेट हासिल किए. यह विश्व कप में अफ़ग़ानिस्तान की लगातार चौथी हार रही जबकि दक्षिण अफ्रीका के खाते में पहली जीत आई. 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अपराध के आरोप हैं. लोकतंत्र को ख़तरा कांग्रेस पार्टी के मौजूदा 206 सांसदों में से 44 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि पूरे देश में सभी पार्टियों को मिलाकर छह विधायकों पर बलात्कार के मामले दर्ज हैं. दिल्ली बलात्कार के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमेटी के सदस्य गोपाल सुब्रमण्यम कहते हैं कि 'भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है.' वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सिफ़ारिश की थी कि गंभीर आरोप झेल रहे सभी राजनेताओं को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. लेकिन उनकी सिफ़ारिश को सरकार ने मानने से इनकार कर दिया है. एडीआर के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रोफ़ेसर जगदीप चोकर कहते हैं, ''राजनीतिक पार्टियां केवल इस बात में विश्वास रखती हैं कि चुनाव जीतना ही असल मुद्दा है. चुनाव कैसे जीते जाएं इससे कोई लेना देना नहीं.''\n\nSummary:", "target": "मनोज कुमार पारस उत्तर प्रदेश सरकार में स्टैंप ड्यूटी के मंत्री हैं. नगीना विधानसभा क्षेत्र से चुने गए विधायक मनोज कुमार पारस पर एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के आरोप हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिल्ली बलात्कार की घटना के बाद पूरे देश 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फिल्मों में हीरोइन फिल्मों में अभिनेत्रियों के चित्रण पर बात करते हुए शाहरुख़ ने कहा \"महिलाएं हमारे काम में रीढ़ की हड्डी का काम करती हैं और उन्हें उचित श्रेय दिया जाना चाहिए. मैं अपनी सभी फिल्मों में ध्यान रखता हूं कि हीरोइन को अच्छी तवज्जो मिले. मैं सिर्फ दिखावे के लिए महिलाओं पर फिल्म बनाना नहीं चाहूंगा.\" वहीं एक दफे बीबीसी से बातचीत में शबाना आज़मी ने भी हिंदी फिल्मों में महिलाओं के चित्रण और दकियानूसी सोच के बारे में चर्चा की थी जिसमें उन्होंने अपनी ही एक फिल्म का ज़िक्र किया था जिसे करने के लिए उन्हें महिला संस्थाओं में कड़ी डांट भी पड़ी. उस फिल्म का नाम था थोड़ी सी बेवफाई. अवार्ड समारोह में भी पीछे वहीं शाहरुख़ ने अवार्ड समारोह में भी अभिनेत्रियों को कम अहमियत दिए जाने पर आपत्ति जताई. शाहरुख़ के अनुसार अवार्ड समारोह में हीरो का पुरस्कार आखिरी में घोषित किया जाता है जिसे सबसे ज़्यादा तालियां मिलती हैं, क्यों नहीं हीरोइन के अवार्ड की घोषणा आखिरी में की जाती है. वहीं पिछले दिनों स्क्रीन अवार्ड समारोह में लगातार चौथी साल पुरस्कार जीतने वाली विद्या बालन का मानना है कि ये वक्त है जब ऐसे कार्यक्रमों में स्त्री और उसके योगदान की बात की जाए और स्त्रीत्व का जश्न मनाया जाए. देखना होगा कि विद्या की फिल्मों के चयन और शाहरुख़ की फिल्मों में उनसे पहले हीरोइन का नाम दिखाने की पहल, क्या ये वाकई में फिल्मों की भीड़ में महिलाओं को आगे ला पाएगी?\n\nSummary:", "target": "महिला दिवस के दिन जहां चारों ओर औरत के हालातों पर चर्चा हो रही है, वहीं शाहरुख़ ख़ान ने भी इस मौके पर अपनी तरफ से एक कदम उठाया है जो थोड़ा अनूठा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' में शाहरुख ख़ान और दीपिका पादुकोण मु्ख्य भूमिका में है मीडिया से बात करते हुए शाहरुख़ ने कहा कि अब से उनकी हर फिल्म के क्रेडिट रोल्स में उनसे पहले हीरोइन का नाम आएगा. ये पहल शाहरुख़ अपनी नई फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस से शुरु करना चाहते हैं जिसमें उनके साथ दीपिका पादुकोण है. शाहरुख़ का कहना है \"जिन लोगों के साथ मैं काम कर रहा हूं उनसे मेरी दरख़्वास्त है कि वो ऐसा अभी से करना शुरु कर दें. मुझे नहीं पता इससे कुछ बदलाव आएगा लेकिन ये सोचने लायक बात है. \" फिल्मों में हीरोइन फिल्मों 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सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई में छह चरमपंथी मारे गए. इस दौरान सात सुरक्षाकर्मी भी मारे गए जबकि 20 अन्य घायल हो गए. समाप्त इस घटना से एक हफ्ते पहले मोदी ने पाकिस्तान का आकस्मिक दौरा कर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से मुलाकात की थी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पठानकोट पहुंच गए हैं जहां वह एयरबेस पर हुए चरमपंथी हमले के बाद वहां के हालात का जायज़ा लेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ मोदी के दौरे को लेकर पठानकोट में तैयारी पूरी हो गई है. माना जा रहा है कि इस दौरान वह सीमावर्ती इलाक़ों का हवाई निरीक्षण भी कर सकते हैं. पठानकोट में सुरक्षा बलों का तलाशी अभियान पूरा हो गया है और एयरबेस को पूरी तरह सुरक्षित घोषित कर दिया है. गत दो जनवरी को चरमपंथियों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला किया था. सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई में छह चरमपंथी मारे गए. इस दौरान सात सुरक्षाकर्मी भी मारे गए जबकि 20 अन्य घायल हो गए. समाप्त इस घटना से एक हफ्ते पहले मोदी ने पाकिस्तान का आकस्मिक दौरा कर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से मुलाकात की थी. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन में आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक़ संसद में पिछले साल पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स को खोलने की 3 लाख से ज़्यादा बार कोशिश की गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअधिकारियों ने यह नहीं बताया कि उन्होंने किन वेबसाइट को पोर्न की श्रेणी में रखा है. हाउस ऑफ़ कॉमंस के अधिकारियों का कहना है कि ये साफ नहीं है कि सांसदों ने ये कोशिश की या उनके स्टाफ ने. उनका कहना है कि इन आंकड़ों का मतलब ये नहीं है कि हर बार जानबूझकर पोर्न साइट देखने की कोशिश की गई. संभव है कि ख़ुद-ब-ख़ुद लोड होने वाले थर्ड पार्टी सॉफ्टवेयर या बेवसाइट ने इसे बढ़ाचढ़ाकर पेश किया हो. ब्रितानी संसद में करीब पांच हज़ार लोग काम करते हैं. सूचना 'हफिंगटन पोस्ट यूके' ने सूचना की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत ये जानकारी मांगी थी जिसके बाद ये आंकड़े जारी किए गए हैं. हफिंगटन पोस्ट यूके ने इसे 'ओह यस मिनिस्टर!' शीर्षक से प्रकाशित किया है. आंकड़ों के मुताबिक़ नवंबर में पोर्न वेबसाइट देखने की 114,844 कोशिश की गई जबकि फरवरी में केवल 15 बार ऐसा करने की कोशिश की गई. हाउस ऑफ कॉमंस की प्रवक्ता ने कहा, \"हम नहीं मानते हैं कि ये आंकड़े सही हैं.\" उनका कहना था कि कई बार ऐसी वेबसाइट एक ही बार में कई हिट दर्ज कर लेती है या कुछ वेबसाइट पॉप-अप के ज़रिए दूसरी वेबसाइट से जोड़ लेती हैं. घोषणा प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने जुलाई में ऐलान किया था कि इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियां घरों में पोर्नोग्राफी को ब्लॉक कर देंगी जब तक कि कोई पोर्न वेबसाइट देखना न चाहे. उन्होंने कहा था कि ऑनलाइन पोर्नोग्राफी से बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है और सेक्स और संबंधों के बारे में उनकी समझ खराब हो रही है. ब्रिटेन की सबसे बड़ी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों ने उस फिल्टर स्कीम पर सहमति जताई है जिसके तहत 95 फीसदी घरों में पोर्न बेवसाइट ब्लॉक हो जाएंगी. लेकिन कैमरन के एक सलाहकार और विकीपीडिया के सह संस्थापक जिमी वेल्स ने इस योजना को बेतुका बताया है. 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'धर्मनिरपेक्ष' बनाम 'पंथनिरपेक्ष' लोकसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी ने एक बार फिर 'धर्मनिरपेक्षता' का मुद्दा उठा लिया है. इस बार यह मुद्दा 'धर्मनिरपेक्ष' बनाम 'पंथनिरपेक्ष' का है. भाजपा का कहना है कि भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता है.क्योंकि 'सेक्युलर' शब्द का सही अनुवाद 'पंथनिरपेक्ष' होता है, 'धर्मनिरपेक्ष' नहीं. भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का कहना है इसे देखते हुए अब धर्मनिरपेक्ष शब्द के प्रयोग पर रोक लगाई जानी चाहिए. पहले उम्मीद लगाई जा रही थी कि बैठक में राजस्थान का गुर्जर आंदोलन का मुद्दा छाया रहेगा और शायद गुजर नेता बैठक में बाधा पहुँचाएँ. इसे देखते हुए बैठक स्थल पार्लियामेंट एनेक्सी से भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय तक तगड़ा पुलिस बंदोबस्त किया गया है. दरअसल इस बैठक का मक़सद कर्नाटक में मिली जीत पर अपनी पीठ थपथपाने की है. पार्टी पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में मिली जीत के बाद अब मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और छत्तीसगढ़ में भी अपना परचम फहराना चाहती है, दिल्ली की कुर्सी पर उसकी नज़र तो पहले से ही है. भले ही पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा का ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा नहीं चल पाया हो, लेकिन पार्टी को उम्मीद है कि इस बार भाजपा शाइनिंग का नारा चल निकलेगा.\n\nSummary:", "target": "कर्नाटक में मिली जीत से उत्साहित भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कार्यकर्ताओं से दिल्ली पर कब्ज़े और लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने के लिए कमर कसने को कहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोकसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी इस बार 'धर्मनिरपेक्षता' बनाम 'पंथनिरपेक्षता' को मुद्दा बनाएगी. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारणी की दो दिन की बैठक रविवार सुबह पार्लियामेंट एनेक्सी में शुरू हुई. दिल्ली पर नज़र इसमें पार्टी के सभी पदाधिकारी और भाजपा शासित राज्यों में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को छोड़कर सभी राज्यों के मुख्यमंत्री उपस्थित थे. पहले यह बैठक राजस्थान की राजधानी जयपुर में होने वाली थी. लेकिन वहाँ हुए बम विस्फोटों के बाद बैठक का स्थान बदलकर दिल्ली कर दिया गया. अपने भाषण में राजनाथ सिंह ने यूपीए सरकार को हर मोर्चे पर विफल बताते हुए उसपर तगड़ा प्रहार किया. उन्होंने महँगाई, खाद्य संकट, किसानों की आत्महत्या, देश में बढ़ती चरमपंथी घटनाओं और बांग्लादेशी घुपैठियों के लिए सरकार की ढुलमुल नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया. 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'गोरे रंग का रोब' उन्होंने कहा कि भारत में लोग गोरी चमड़ी की धाक में है. उन्होंने कहा कि शादी के रिश्तों के लिए दिए जाने वाले इश्तिहार में लोग गोरे रंग की कन्या की मांग करते देखे जा सकते हैं. समाप्त शरद यादव अचानक भाषण के दौरान दक्षिण भारतीय महिलाओं के सांवले रंग और उनके जिस्म की बनावट के बारे में कहने लगे. हालांकि उन्होंने उनके शरीर की बनावट को लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया लेकिन उनके हाथ का इशारा बहुत कुछ कह रहा था. उनके इस बयान की निंदा करते हुए कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि उन्हें बयान के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए. सीपीएम नेता वृंदा करात ने इसे शर्मनाक और अनुचित बताया और कहा कि उसे रिकार्ड से हटा दिया जाना चाहिए. 'पुरुषवादी मानसिकता ...' वामपंथी पार्टी के एक और नेता पी राजीव का कहना था कि जब बहस बीमा विधेयक पर हो रही थी लेकिन मुझे नहीं बताया कि उसमें उन्हें महिलाओं को जिस्म पर कमेंट करने की क्या ज़रूरत पेश आ गई. ये उस तरह के सांसदों के पुरूषवादी मानसिकता को दर्शाता है. बीजेडी सदस्य जय पांडा ने कहा कि इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. प्रजांतत्र के मंदिर में इन मामलों पर संवेदनशील होना चाहिए. इधर जनता दल यूनाइटेंड के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने कहा है कि अगर पार्टी नेता के इस बयान से किसी को दुख हुआ है तो उन्हें इसका खेद है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "राज्यसभा सांसद शरद यादव के दक्षिण भारतीय महिलाओं के रंग पर दिए गए एक बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशरद यादव सदन में बीमा विधेयक पर जारी बहस पर बोल रहे थे. इसी क्रम में वो गोरे रंग के प्रति भारतीयों की दीवानगी के बारे में बोलने लगे. उनके मुताबिक़, जैसा कि उन्होंने गुरूवार को अपने भाषण में कहा, बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को 26 से 49 प्रतिशत करने के पीछे यही पागलपन काम कर रहा है. 'गोरे रंग का रोब' उन्होंने कहा कि भारत में लोग गोरी चमड़ी की धाक में है. उन्होंने कहा कि शादी के रिश्तों के लिए दिए जाने वाले इश्तिहार में लोग गोरे रंग की कन्या की मांग करते देखे जा सकते हैं. समाप्त शरद यादव अचानक भाषण के दौरान दक्षिण भारतीय महिलाओं के सांवले रंग और उनके जिस्म की बनावट के बारे में कहने लगे. हालांकि उन्होंने उनके शरीर की बनावट को लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया लेकिन उनके हाथ का इशारा बहुत कुछ कह रहा था. उनके इस बयान की निंदा करते हुए कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि उन्हें बयान के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए. सीपीएम नेता वृंदा करात ने इसे शर्मनाक और अनुचित बताया और कहा कि उसे रिकार्ड से हटा दिया जाना चाहिए. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "5 अप्रैल को सोने का मेडल गले में लटकाए 4 फुट 11 इंच की मीराबाई चानू पोडियम पर खड़ीं थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराष्ट्रमंडल खेलों में वेटलिफ़्टिंग में महिलाओं के 48 वर्ग के फ़ाइनल में प्रदर्शन करतीं मीराबाई चानू अब तक तो आपको पता भी चल गया है कि 23 साल की चानू ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाया है. ये भी कि वेटलिफ़्टिंग खेल के महिलाओं के 48 किलो वर्ग में कुल 196 किलो ( स्नैच में 86 और क्लीन एंड जर्क में 110 किलो) का वज़न उठाया. लेकिन ऐसे बड़े-बड़े कारनामे कर दिखाने वाली चानू के क़द पर गौर किया? दरअसल जीत के बाद बीबीसी से ख़ास बातचीत के दौरान मीराबाई चानू ने एक ऐसी बात कही जिसने हमे उनके क़द पर गौर करने को मजबूर कर दिया. बीबीसी संवाददाता रेहान फ़जल ने जब मीराबाई चानू से पूछा कि 'आप क़द में इतनी छोटी हैं तो खेल में आपको दिक़्कत नहीं होती?' जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि छोटे क़द का तो उन्हे अपने खेल में नुकसान नहीं बल्कि फ़ायदा मिलता है. अमूमन जितने भी खेल होते हैं उसमें खिलाड़ी का बड़ा क़द उसको खेल में आगे बढ़ने में काफ़ी मदद करता है लेकिन वेटलिफ़्टिंग में इसका उल्टा है. 1988 सियोल ओलंपिक में वेटलिफ़्टिंग के पुरुष वर्ग के 60 किलो स्पर्धा में भाग लेते नईम सुलेमानोग्लू (स्नैच प्रतियोगिता) जो जितना छोटा, इस खेल में उतना ऊंचा! जब वेटलिफ़्टिंग के खेल में छोटे क़द और ऊंचे पद की बात होती है तो तुर्की में राष्ट्रीय हीरो का दर्जा प्राप्त वेटलिफ़्टर स्वर्गीय नईम सुलेमानोग्लू का ज़िक्र ज़रूर होता है. नब्बे के दशक में वेटलिफ़्टिंग के खेल में सबसे लोकप्रिय रहे नईम सुलेमानोग्लू का क़द केवल 4 फुट, 10 इंच था. लेकिन क्लीन एंड जर्क की प्रतिस्पर्धा में एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने अपने वज़न से 3 गुना अधिक भार उठाया था. उन्होंने 1988, 1992 और 1996 में आयोजित हुए ओलंपिक के खेलों में लगातार 3 गोल्ड मेडल जीते थे. वह अपने क़द और अच्छे प्रदर्शन के कारण लोगों में 'द पॉकेट हरक्यूलिस' के नाम से प्रसिद्ध थे. 18 नवंबर 2017 में उनका देहांत हो गया था. 1988 के सियोल ओलंपिक खेलों में नईम सुलेमानोग्लू स्वर्ण पदक के साथ छोटे क़द के फ़ायदे अब ज़रा मीराबाई चानू पर वापस आते हैं और आपको समझाते हैं कि आखिर ये क़द का चक्कर है क्या? मीराबाई चानू के कोच, विजय शर्मा ने बीबीसी से बातचीत के दौरान इसके पीछे के विज्ञान को समझाया. उनके मुताबिक़, छोटा क़द होने से इस खेल में मूल रूप से दो फ़ायदे होते हैं : 1. छोटे क़द के खिलाड़ी को भार उठाते समय गुरुत्वाकर्षण बल कम महसूस होता है. सरल भाषा में कहें तो वज़न को उठाने की प्रक्रिया में धरती के विरुद्ध लगने वाला बल कम लगाना पड़ता है. 2. इस खेल में बॉडी वेट को संतुलित रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है. छोटे क़द के खिलाड़ी को बॉडी वेट संतुलित करने में ख़ासा परेशानी नहीं होती इसके अलावा वरिष्ठ खेल पत्रकार राजेश राय का कहना है कि मांसपेशियों में इस खेल से खींचतान ज़्यादा होती है और वज़न उठाते समय मांसपेशियों का फटना सबसे ज़्यादा आम है. ऐसे में बड़े क़द के खिलाड़ी छोटे क़द के खिलाड़ी की अपेक्षा इस समस्या से ज़्यादा जूझते है. स्वर्ण पदक के साथ भारत की स्वर्ण परी मीराबाई चानू मीराबाई चानू ने जीत के बाद और क्या कहा... तो अब आपको समझ आया कि क्यों मीराबाई चानू छोटा पैकेट बड़ा धमाका हैं. उनके कौशल और प्रतिभा को जितना उनके कोच ने ट्रेनिंग के द्वारा निखारा है उतना ही साथ उनको अपनी प्राकृतिक बनावट से भी मिला है. रेहान फ़जल से बात करते दौरान उन्होंने इस बात का ज़िक्र भी किया कि वो इस जीत के बाद और प्रोत्साहित हैं और भविष्य में होने वाले एशियन गेम्स में कुल 200 किलो से ज़्यादा वज़न उठाकर दिखाएंगी. यही नहीं उन्होंने 2020 टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने की भी मंशा जताई. राष्ट्रमंडल खेलों के पहले दिन वेटलिफ़्टिंग में महिलाओं के 48 किलो वर्ग की प्रतियोगिता के निर्णय के बाद की तस्वीर क्या है मीराबाई चानू की निजी पसंद राष्ट्रमंडल खेल और इस जीत से आगे बढ़ते हुए जब उनसे ये पूछा गया कि उनको किस तरह का खाना पसंद है, किस तरह का संगीत वह सुनती हैं, तो इन प्रश्नों का एक मासूम सी मुस्कान के साथ उन्होंने उत्तर दिया. उन्होंने बताया कि मणिपुर में उनके गांव में एक चटनी मिलती है- इरोम्बा, जो उन्हे बेहद पसंद है. खाने के साथ-साथ गाना सुनना पसंद करती हैं मीराबाई चानू. नेहा कक्कड़ की आवाज़ की दीवानी हैं. 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या फिर पुरानी रागिनी अलापते रहते हैं कि ये अटूट अंग है तो फिर बड़े सारे मसले हैं.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के सूचना मंत्री शेख रशीद ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बयान पर स्पष्टीकरण दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशेख रशीद ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा था कि बुनियादी तौर पर तो हमारा संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव है. लेकिन भारत कोई संजीदा बात करे और इस मसले को हल करना चाहे तो हमारे जहन में और भी खाके हैं. पाकिस्तान के सूचना मंत्री का कहना था कि हम उसमें लचक दिखा सकते हैं क्योंकि 50 साल हो गए, ऐसी कुछ बातें हैं जिन पर अमल करने में दिक्कतें हों, तो हम कश्मीरियों से बात कर उन्हें बेहतर तौर पर पेश कर सकते हैं. ये इस फलसफे की बुनियाद है. शेख रशीद का कहना था कि अमरीका और पश्चिमी देशों ने इसका स्वागत कर दिया लेकिन देखना है कि भारतीय प्रधानमंत्री इसको कैसे देखते हैं. वो चार जनवरी को सार्क की बैठक में यहाँ आ भी रहे हैं. उनका कहना था कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने 'बोल्ड' बयान दे दिया है. और कश्मीर का मसला हल करने में कोई 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विरोधी लहर को लेकर आम धारणा को तोड़ दिया है. वो ऐसे कि जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उसमें से तीन में सत्ता विरोधी लहर का कोई असर नहीं रहा और वो राज्य रहे, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश. पर कांग्रेस इन तीन में से सिर्फ़ एक ही राज्य जीत पाई और वहाँ भी यानि राजस्थान में कांग्रेस, बीजेपी की वह गत बनाने में असमर्थ रही जो पिछली बार कांग्रेस की बनी थी या वर्ष 1998 में भैरोसिंह शेखावत की बीजेपी का हश्र हुआ था. याद रहे पिछली बार कांग्रेस 200 सदस्यीय विधानसभा में 50 के आसपास सिमट गई थी और 1998 में बीजेपी 200 मे से 40 सीटें भी नहीं जीत पाई थी. जीत का सेहरा पर मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ नहीं जीत पाने का ग़म काफ़ी हद तक दिल्ली की जीत से कम हो जाता है. हालांकि दिल्ली की जीत कितनी कांग्रेस की और कितनी शीला दीक्षित की जीत है उस पर जनता की राय शायद ही किसी से छिपी है. फिर दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सेहरा काफ़ी हद तक बीजेपी के सिर पर भी बंधना चाहिए जिन्होंने शीला दीक्षित के सामने वीके मल्होत्रा को उम्मीदवार बना कर एक तरह से चुनावी मुहिम शुरु होने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली थी. खैर, अगर हम चुनावी नतीजों से उभरने वाली तस्वीर पर नज़र डाले तो कुछ बातें ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है. पहला- आतंकवाद का मुद्दा किसी पार्टी, दल या राजनीतिक सोच का विशेषाधिकार नहीं है. इस मुद्दे पर समुचित संवेदना नहीं दिखाने और कहीं राजनीति खेलने का ख़ामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा ख़ासकर दिल्ली में जहाँ मतदाता ज़्यादा सयाना और राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व है. चरमपंथ पर राजनीति अगर इस मुद्दे पर बीजेपी ज़्यादा चतुरता और एक दीर्घकालीक सोच के साथ कांग्रेस को घेरती तो उसको ज़्यादा लाभ मिलता पर जनता ने उस की इस मुद्दे पर खुल्मखुल्ला राजनीति करने कि कोशिश को नकार दिया. दूसरा- शीला दीक्षित और शिवराज चौहान दोनों अपने काम और विकास के नारे पर जीत कर आए. दिल्ली में कांग्रेस कि विजय शायद कांग्रेस आलाकमान को अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत है जनता का कि अगर पार्टी आलाकमान क्षेत्रीय नेताओं को सशक्त बनाती है और उनके लोकप्रिय होने कि स्थिति मे उनकी जड़े नहीं कटवाती है तो उससे पार्टी को लाभ मिलता है और आलाकमान और मजबूत होता है. तीन, बीजेपी का बढ़ता प्रभाव भी इन चुनावों के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण भाग है. दिल्ली, मध्य प्रदेश एवँ राजस्थान सभी जगह बहुजन समाज पार्टी का मत-प्रतिशत बढ़ा है. पर एक नई बात जो निकल कर सामने आई है वह है कि बीएसपी चाहे कांग्रेस के वोट बैंक में अधिक सेंध लगाती हो पर वोट बीजेपी के खाते से भी लेती है. जरा सोचिए बीजेपी का मत-प्रतिशत दिल्ली मे वर्ष 2003 में चुनावों के मुक़ाबले लगभग दोगुना हो गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो शायद कांग्रेस का आंकड़ा 50 पार कर जाता. और अंत में इन चुनावों का शायद सबसे सकारात्म पहलू. आम तौर पर चुनावी नतीजे प्रेक्षकों कि आशा के अनुरुप ही रहे. 19-20 का फ़र्क़ चलता है. लेकिन वह प्रेक्षक और राजनेता जिनकी हर गणित जातीय समीकरणों पर आधारित थी उनको कहीं मतदाता ने एक बार फिर यह दिखलाने का प्रयास किया है कि वह इन मुद्दों पर उतना बँटा नहीं है जितना कि शायद हमारे नेता एवँ प्रेक्षक सोचते हैं और कुछ चाहते भी हैं.\n\nSummary:", "target": "लोकसभा चुनावों की लगभग पूर्व संध्या में हुए इन चुनावों के नतीजों का अगर हम आकलन करते हैं तो कम से कम अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों कि दृष्टि से कोई स्पष्ट विजेता उभर कर सामने नहीं आता है.", "probe_text": "Summarize the following 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नहीं जीत पाने का ग़म काफ़ी हद तक दिल्ली की जीत से कम हो जाता है. हालांकि दिल्ली की जीत कितनी कांग्रेस की और कितनी शीला दीक्षित की जीत है उस पर जनता की राय शायद ही किसी से छिपी है. फिर दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सेहरा काफ़ी हद तक बीजेपी के सिर पर भी बंधना चाहिए जिन्होंने शीला दीक्षित के सामने वीके मल्होत्रा को उम्मीदवार बना कर एक तरह से चुनावी मुहिम शुरु होने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली थी. खैर, अगर हम चुनावी नतीजों से उभरने वाली तस्वीर पर नज़र डाले तो कुछ बातें ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है. पहला- आतंकवाद का मुद्दा किसी पार्टी, दल या राजनीतिक सोच का विशेषाधिकार नहीं है. इस मुद्दे पर समुचित संवेदना नहीं दिखाने और कहीं राजनीति खेलने का ख़ामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा ख़ासकर दिल्ली में जहाँ मतदाता ज़्यादा सयाना और राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व है. चरमपंथ पर राजनीति अगर इस मुद्दे पर बीजेपी ज़्यादा चतुरता और एक दीर्घकालीक सोच के साथ कांग्रेस को घेरती तो उसको ज़्यादा लाभ मिलता पर जनता ने उस की इस मुद्दे पर खुल्मखुल्ला राजनीति करने कि कोशिश को नकार दिया. दूसरा- शीला दीक्षित और शिवराज चौहान दोनों अपने काम और विकास के नारे पर जीत कर आए. दिल्ली में कांग्रेस कि विजय शायद कांग्रेस आलाकमान को अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत है जनता का कि अगर पार्टी आलाकमान क्षेत्रीय नेताओं को सशक्त बनाती है और उनके लोकप्रिय होने कि स्थिति मे उनकी जड़े नहीं कटवाती है तो उससे पार्टी को लाभ मिलता है और आलाकमान और मजबूत होता है. तीन, बीजेपी का बढ़ता प्रभाव भी इन चुनावों के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण भाग है. दिल्ली, मध्य प्रदेश एवँ राजस्थान सभी जगह बहुजन समाज पार्टी का मत-प्रतिशत बढ़ा है. पर एक नई बात जो निकल कर सामने आई है वह है कि बीएसपी चाहे कांग्रेस के वोट बैंक में अधिक सेंध लगाती हो पर वोट बीजेपी के खाते से भी लेती है. जरा सोचिए बीजेपी का मत-प्रतिशत दिल्ली मे वर्ष 2003 में चुनावों के मुक़ाबले लगभग दोगुना हो गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो शायद कांग्रेस का आंकड़ा 50 पार कर जाता. और अंत में इन चुनावों का शायद सबसे सकारात्म पहलू. आम तौर पर चुनावी नतीजे प्रेक्षकों कि आशा के अनुरुप ही रहे. 19-20 का फ़र्क़ चलता है. लेकिन वह प्रेक्षक और राजनेता जिनकी हर गणित जातीय समीकरणों पर आधारित थी उनको कहीं मतदाता ने एक बार फिर यह दिखलाने का प्रयास किया है कि वह इन मुद्दों पर उतना बँटा नहीं है जितना कि शायद हमारे नेता एवँ प्रेक्षक सोचते हैं और कुछ चाहते भी हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 97, "source_item_id": "97", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3087, "clean_index": 91, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:91"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक बड़ा धमाका दियाला प्रांत में शिया बहुल कस्बे खालिस में हुआ जहाँ कम से कम 40 लोगों की मौत हुई है. एक और धमाका अल ज़ुबैर कस्बे में हुआ जो बसरा से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर है. वहाँ 10 लोगों के मारे जाने की ख़बर है. तीसरे बम धमाके में कम से कम 13 लोग मारे गए हैं. एपी के अनुसार राजधानी बग़दाद में हुए एक धमाके में कम से कम 25 लोग घायल हुए हैं. समाप्त बसरा धमाके की ज़िम्मेदारी चरमपंथी गुट आईएस ने कहा है कि बसरा के पास धमाका उन्होंने किया, लेकिन दूसरे धमाकों की ज़िम्मेदारी किसी ने नहीं ली है. आईएस चरमपंथियों ने कई बार शिया इलाक़ों और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया है. चरमपंथी शियाओं को काफ़िर समझते हैं. संवाददाताओं का कहना है कि बसरा में धमाके की ख़बर सबके लिए हैरान करने वाली थी क्योंकि ये शिया बहुल इलाका है और यहाँ सुन्नी चरमपंथियों के लिए हमला करना उतना आसान नहीं रहा है जितना कि बग़दाद या अन्य हिस्सों में है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इराक़ में पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि सिलसिलेवार बम धमाकों में कम से कम 63 लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक बड़ा धमाका दियाला प्रांत में शिया बहुल कस्बे खालिस में हुआ जहाँ कम से कम 40 लोगों की मौत हुई है. एक और धमाका अल ज़ुबैर कस्बे में हुआ जो बसरा से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर है. वहाँ 10 लोगों के मारे जाने की ख़बर है. तीसरे बम धमाके में कम से कम 13 लोग मारे गए हैं. एपी के अनुसार राजधानी बग़दाद में हुए एक धमाके में कम से कम 25 लोग घायल हुए हैं. समाप्त बसरा धमाके की ज़िम्मेदारी चरमपंथी गुट आईएस ने कहा है कि बसरा के पास धमाका उन्होंने किया, लेकिन दूसरे धमाकों की ज़िम्मेदारी किसी ने नहीं ली है. आईएस चरमपंथियों ने कई बार शिया इलाक़ों और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया है. चरमपंथी शियाओं को काफ़िर समझते हैं. संवाददाताओं का कहना है कि बसरा में धमाके की ख़बर सबके लिए हैरान करने वाली थी क्योंकि ये शिया बहुल इलाका है और यहाँ सुन्नी चरमपंथियों के लिए हमला करना उतना आसान नहीं रहा है जितना कि बग़दाद या अन्य हिस्सों में है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सिकंदर का नाम इतिहास के सबसे बड़े सैन्य कमांडरों में दर्ज है. सिकंदर को दुनिया सिकंदर महान, या 'अलेक्ज़ेंडर द ग्रेट' कहती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउनका जन्म 356 ईपू के दौरान मेसेडोनिया के शाही परिवार में हुआ था. सिकंदर को महान इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने बहुत कम उम्र में यूरोप से लेकर एशिया तक अपनी सत्ता का विस्तार कर लिया था. उनका साम्राज्य ग्रीस से लेकर तुर्की, सीरिया, मिस्र, ईरान, इराक, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और भारतीय सीमा तक फैला था. उस वक्त ग्रीस की संस्कृति और भाषा दुनिया के कई इलाकों तक पहुंची. सिकंदर को कई शहरों की स्थापना करने का श्रेय भी दिया जाता है. इतिहास की किताबों में उनका नाम एक महान विजेता और एक ऐसे शख्स के रूप में दर्ज है जो धरती की सबसे रहस्यमयी और अनदेखी जगहों पर गया. समंदर की गहराईयों में जाने वाले पहले शख़्स? सिकंदर ने कई बड़े युद्ध लड़े. अपनी पूरी ज़िंदगी में उन्होंने कई ऐसे काम किए जिन्हें महान कहा जाता है. लेकिन इस बीच उन्होंने रोमांच के लिए भी जगह रखी. वो समंदर के अंदर की दुनिया को देखना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने समुद्र की गहराईयों में जाने का फ़ैसला किया. कहा जाता है कि दार्शनिक और सिकंदर के उस्ताद अरस्तू ने ही पहली बार चौथा शताब्दी ईसा पूर्व में पनडुब्बी का ज़िक्र किया था. जिस घटना का उन्होंने ज़िक्र किया था वो सिकंदर महान से जुड़ी थी. लेकिन ऐसी ज़्यादातर घटनाओं का ज़िक्र मध्यकालीन युग में आता है. उस वक्त के कई हस्तलेख और चित्र भी मौजूद हैं. इनमें कई कहानियां हैं, कुछ में कहा जाता है कि सिकंदर की जिज्ञासा उन्हें वहां ले गई. वो समंदर के नीचे की दुनिया को देखना चाहते थे. वहीं कई दूसरों का कहना है कि ये उनकी सैन्य रणनीति का हिस्सा था. वो आक्रमण करने के लिए समुद्र के रास्ते होकर जाया करते थे. जब सिकंदर की प्रेमिका ने दिया धोखा मछलियों के बीच समुद्र की गहराई में मौजूद सिकंदर ऊपर नाव में बैठे जोड़े को देख रहे हैं. सिकंदर की प्रेमिका अपने नए प्रेमी की आंखों में आंखे डाले हाथ पकड़कर बैठी है सिकंदर के समुद्री रोमांच से जुड़ा एक किस्सा काफ़ी दिलचस्प है. कहते हैं एक बार सिकंदर कांच के एक बड़े से जार में बैठकर समुद्र के नीचे गए. वो जार बिल्कुल बंद था. उसमें पानी नहीं जा सकता था और कांच होने की वजह से सिकंदर उसके पार देख सकते थे. वो अपने साथ एक कुत्ते, एक बिल्ली और एक मुर्गे को भी लेकर गए थे. कांच का ये जार एक ज़ंजीर से जुड़ा था. इस ज़ंजीर की मदद से ही वो दोबारा बाहर आ सकते थे. वो ये ज़ंजीर अपने सबसे विश्वस्त व्यक्ति के हाथ में देना चाहते थे. उन्होंने ये ज़ंजीर अपनी प्रेमिका को दी और खुद पानी में उतर गए. जैसे ही सिकंदर कांच के जार में बैठकर समुद्र की गहराई में चले गए, तभी उनकी प्रेमिका के एक नए प्रेमी ने आकर प्रस्ताव दिया कि वो ये ज़ंजीर पानी में फेंक दे और उनके साथ भाग चले. उस शख़्स ने वो ज़ंजीर सिकंदर की प्रेमिका के हाथ से लेकर समुद्र में ही फेंक दी. जंजीर अब समुद्र में गिर चुकी थी और सिकंदर को खुद ही समुद्र से बाहर निकलना था पर वे निकल आए. कांच का जार सिकंदर महान ने कई लड़ाईयां लड़ी और जीतीं एक और कहानी कई अध्ययनों के बाद सामने आई है. कहते हैं सिकंदर ने ट्रॉय द्वीप पर चढ़ाई कर दी थी. लेकिन ट्रॉय के सैनिकों ने सिकंदर को द्वीप में घुसने ही नहीं दिया. कई महीनों की कोशिश के बाद सिकंदर ने अपने सैनिकों को एक समुद्री रास्ता बनाने का निर्देश दिया. इस समुद्री रास्ते के ज़रिए सिकंदर ने ट्रॉय द्वीप पर चढ़ाई की. कहते हैं सिकंदर को रोकने वाले ट्रॉय के हज़ारों लोगों को बाद में मार डाला गया या गुलाम के तौर पर बेच दिया गया. लेकिन एक मध्यकालीन हस्तलेख के मुताबिक, ट्रॉय की लड़ाई के दौरान सिकंदर महान ने कांच का एक बड़ा सा जार बनवाया था, जिसके ज़रिए वो कुछ देर के लिए पानी में उतरते और बिना गीले हुए वापस आ जाते. हस्तलेख के मुताबिक सिकंदर के जहाज़ों का बेड़ा ऊपर होता और वो नीचे कांच के जार में बैठकर सफ़र तय करते. वो जार उन्हें इतना पसंद आया कि चढ़ाई के दौरान उन्होंने अपने सैनिकों के लिए भी कई सारे वैसे ही जार बनवा दिए. हालांकि इन चित्रों की कोई प्रमाणिकता नहीं है. ये बहुत ही पुराने हैं, हो सकता है इन्हें ऐसे ही बनाया गया हो. लेकिन इस तरह का कांच का जार कोई साहित्यिक आविष्कार नहीं था. इस तरह के उपकरण एजियन समुद्र में जाने वाले मछुआरे सदियों से इस्तेमाल करते रहे थे. दूसरी बात सिकंदर वो पहले शख़्स थे जिसने इतिहास की पहली पनडुब्बी का इस्तेमाल किया. देखना होगा कि ये दावा कितना सच है, लेकिन एक बात ज़रूर है कि सिकंदर के समुद्री रोमांच और सैन्य रणनीति से जुड़ी कई बेहतरीन किस्से कहानियां हमें सुनने को मिली हैं. सिकंदर महान ने सिर्फ़ 32 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया था. उनकी ज़िंदगी की तरह ही उनकी मौत को लेकर भी कई किस्से कहानियां हैं. कुछ का कहना है कि उन्हें ज़हर देकर मारा गया था. लेकिन कई इतिहासकार कहते हैं कि उनकी लंबी बीमारी (मलेरिया) से मौत हुई थी. ये भी पढ़ें... 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(कैंपस हैंगआउट इस लिंक पर उपलब्ध होगा) मगर भाजपा के इन दावों को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे उनके विरोधी दल सिरे से खारिज करते रहे हैं. उनका कहना है कि विकास का ये ‘गुजरात मॉडल’ सबको साथ लेकर चलने वाला मॉडल नहीं है. ऐसे में ख़ुद गुजरात का युवा इस मुद्दे पर क्या सोच रखता है? उनके मुताबिक़ क्या विकास का ये मॉडल वास्तव में पूरे देश पर लागू हो सकता है? यही जानने की मंशा से बीबीसी कैंपस हैंगआउट की टीम मौजूद है अहमदाबाद के गुजरात विद्यापीठ में. गुजरात विद्यापीठ गुजरात विद्यापीठ की स्थापना ख़ुद महात्मा गाँधी ने 1920 में की थी. विश्वविद्यालय के इस कैंपस में महात्मा गाँधी की एक छाप साफ़ महसूस होती है. विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार अपने कमरे में कुर्सी मेज़ पर नहीं बल्कि ज़मीन पर गद्दी पर बैठते हैं और उनके सामने मेहमान भी यूँ ही बैठाए जाते हैं. रोज़ सुबह 11 बजे प्रार्थना के बाद लोग चरखे पर सूत कातते हैं. मगर ऐसा नहीं कि विश्वविद्यालय या उसके छात्र समय में कहीं रुक गए हैं. टेक्नॉलॉजी को अपनाकर आगे बढ़ने की कोशिश भी है. इसी निराले कैंपस से शुक्रवार 18 अप्रैल को भारतीय समयानुसार दोपहर एक बजे से दो बजे तक आप बीबीसी हिंदी के यू-ट्यूब चैनल पर कैंपस हैंगआउट देख पाएँगे. ‘मोदी के गुजरात’ का मॉडल इस हैंगआउट के ज़रिए हमारी ये समझने की कोशिश है कि जिस राज्य को विकास के एक मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है ख़ुद वहाँ का युवा वर्ग इस मॉडल को लेकर कितना आश्वस्त है. क्या इस मॉडल का मतलब उन्हें उद्योगों को प्राथमिकता देना और उस प्रक्रिया में ग़रीबों की अनदेखी करना लगता है या ग़रीबी पर सिर्फ़ बात न करके उन्हें विकास की प्रक्रिया के ज़रिए बेहतर हालात में पहुँचाने के नरेंद्र मोदी के दावे में दम है? विकास को लेकर नरेंद्र मोदी की जिस कथित लहर की चर्चा मीडिया में इतने ज़ोर-शोर से हो रही है, उसकी सच्चाई क्या है? क्या यही एक उजली तस्वीर है या इसके दाग़ों को लीप-पोत कर शक़्ल बेहतर दिखाई जा रही है. वैसे इस मुद्दे पर सिर्फ़ राजनीतिक दल ही नहीं अर्थशास्त्री भी भिड़ रहे हैं. कुछ को लगता है कि विकास की ये कथित कहानी सिर्फ़ एक मरीचिका है. तो वहीं कई ऐसे भी हैं जो इसके लिए नरेंद्र मोदी को ही श्रेय देना चाहते हैं बीबीसी कैंपस हैंगआउट ऐसे में देशभर में अगर इस मुद्दे पर बहस हो रही है तो शायद वह लाज़िमी भी है. मगर इस कैंपस हैंगआउट के ज़रिए बीबीसी हिंदी इस मॉडल और उसकी ख़ूबियाँ या नाकामियाँ समझने की कोशिश कर रही है गुजरात विद्यापीठ के छात्र-छात्राओं से. इस हैंगआउट में आप भी शरीक़ हो सकते हैं बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पन्ने पर जाकर. वहाँ भी इस हैंगआउट की जानकारी उस दौरान आप तक लाइव आती रहेगी. आप अपने सवाल या टिप्पणियाँ #CampusHangout और #Election2014 के साथ ट्विटर या फ़ेसबुक पर हमें भेज सकते हैं. वो टिप्पणियाँ आपके नाम के साथ कार्यक्रम में शामिल की जाएंगी. (बीबीसी हिंदी का मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "चुनाव के इस गर्म माहौल में अक़सर ये आवाज़ सुनने को मिल रही है कि प्रधानमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने गुजरात का जिस तरह विकास किया वैसा उनके सत्ता में आने के बाद पूरे देश का होगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविकास का नारा भाजपा की ओर से चुनाव मैनेज करने वालों ने कुछ यूँ गढ़ा है कि वो इस चुनाव का एक अहम मुद्दा बन गया है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इस साल मार्च-अप्रैल में बांग्लादेश में होने वाले आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप क्रिकेट टूर्नामेंट के लिए 30 संभावित भारतीय खिलाड़ियों के दल की घोषणा हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशुक्रवार को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) द्वारा घोषित संभावित खिलाड़ियों की सूची में युवराज सिंह और ऑफ़ स्पिनर हरभजन सिंह के नाम हैं. लेकिन गौतम गंभीर और वीरेंद्र सहवाग के नाम इस लिस्ट में नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि युवराज सिंह ने कैंसर जैसी भयंकर बीमारी से उबरने के बाद पिछले साल भारत दौरे पर आई ऑस्ट्रेलियाई टीम के ख़िलाफ एकदिवसीय क्रिकेट सिरीज़ में वापसी की थी. युवराज-हरभजन की वापसी इससे पहले, ऑस्ट्रेलिया के ही ख़िलाफ़ टी-20 मैच में उन्होंने अकेले अपने दम पर ही भारत को जीत दिलाई थी लेकिन फिर वे एकदिवसीय सिरीज़ में प्रदर्शन बरक़रार नही रख सके. उसके बाद भारत दौरे पर आई वेस्टइंडीज़ टीम के ख़िलाफ़ खेली गई एकदिवसीय सिरीज़ में भी युवराज का प्रदर्शन साधारण ही रहा. इस सिरीज़ में वे केवल एक अर्ध-शतक ही लगा सके. इसके बाद दक्षिण अफ्रीका के दौरे में युवराज सिंह को केवल पहला एकदिवसीय मैच खेलने का अवसर मिला जिसका लाभ वह नही उठा सके. इसी वजह से उन्हें दूसरे मैच के लिए टीम में जगह नहीं मिली. तीसरे मैच में उन्हें एक बार फिर टीम में जगह मिली लेकिन इससे पहले कि भारत बल्लेबाज़ी करने के लिए मैदान में उतरता, बारिश में खेल बिगाड़ दिया और मैच रद्द करना पड़ा. इसका ख़ामियाज़ा युवराज सिंह को भुगतना पड़ा और इन दिनों न्यूज़ीलैंड का दौरा कर रही भारतीय टीम में उन्हें जगह नहीं मिली. संभावित खिलाड़ी हरभजन सिंह ने 2013 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ टेस्ट मैच खेला था. राष्ट्रीय चयनकर्ताओं ने संभावित खिलाड़ियों में अंडर-19 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के कप्तान रहे उन्मुक्त चंद, स्टुअर्ट बिन्नी, केदार जाधव, मनदीप सिंह, करन शर्मा, ईश्वर पांडेय, रजत भाटिया, संजू सैमसन और शाहबाज़ नदीम को भी संभावित खिलाड़ियों में जगह दी है. इनमें से किसी भी खिलाड़ी को अभी तक भारत की तरफ़ से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने का अवसर नही मिला है. ट्वेंटी-20 विश्व कप में पुरुष वर्ग के मुक़ाबले 16 मार्च से जबकि महिला वर्ग के मुक़ाबले 23 मार्च से आरंभ होंगे. भारत के संभावित खिलाड़ी है: महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान, विकेटकीपर), शिखर धवन, रोहित शर्मा, विराट कोहली, सुरेश रैना, अजिंक्य रहाणे, अंबाती रायडू, दिनेश कार्तिक, रवींद्र जडेजा, आर अश्विन, भुवनेश्वर कुमार, मोहम्मद शामी, ईशांत शर्मा, विनय कुमार, स्टुअर्ट बिन्नी, मोहित शर्मा, केदार जाधव, युवराज सिंह, अमित मिश्रा, रजत भाटिया, संजू सैमसन, ईश्वर पांडेय, उमेश यादव, मनदीप सिंह, वरूण ऐरोन, शहबाज़ नदीम, पार्थिव पटेल और करन शर्मा. 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में कोई टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि अभी जाँच जारी है. लेकिन समाचार एजेंसी एपी ने बाज़ार में बिक रहे पेन ड्राइव में से 40 को कंप्यूटर पर लगाकर देखा. एजेंसी का कहना था कि इनमें से अधिकांश तो खाली थे और कुछ काम नहीं कर रहे थे लेकिन तीन में डेटा था. एजेंसी के अनुसार इसमें कुछ सैनिकों का परिचय था और एक में हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति की अफ़ग़ानिस्तान यात्रा के दौरान उनके विमान की एयर फ़ोर्स-वन की तस्वीरें थीं. एक दूकानदार ने बताया कि कुछ अमरीकी सैनिक एक बक्से में अफ़गानी रुपए लेकर आए थे और उन्होंने वो सब पेन ड्राइव ख़रीद लिए जो उपलब्ध थे. दुकानदारों का कहना है कि सैनिक कोई भी क़ीमत अदा करने को तैयार थे.\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान में एक अहम हवाई अड्डे के नज़दीक के एक बाज़ार में अमरीकी सैन्य अधिकारी इन दिनों ख़रीददारी में जुटे हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवे कंप्यूटर के पुराने पेन ड्राइव ख़रीद रहे हैं. दरअसल ये पेन-ड्राइव कभी चोरी चले गए थे और इनमें से कई में सेना की संवेदनशील जानकारियाँ हैं. ऊँगलियों के आकार के ये पेन ड्राइव काबुल 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कई देशों में प्रदर्शन किए. अफ़ग़ानिस्तान के प्रदर्शन के दौरान तीन लोगों की मौत हो गई. वहाँ सोमवार को भी पाँच व्यक्तियों की जान चली गई थी. सोमालिया में भी एक व्यक्ति मारा गया था. अफ़ग़ानिस्तान में प्रदर्शनकारियों ने सैनिक संगठन नैटो के शांतिरक्षकों के एक वायुसेना अड्डे पर हमले का प्रयास किया जिसके बाद अब ब्रिटेन के और सैनिकों को वहाँ भेजा जा रहा है. इस बीच नॉर्वे ने शनिवार को सीरिया की राजधानी में अपने दूतावास को जलाए जाने के लिए सीरिया सरकार से हर्जाने की माँग की है. उधर जोर्डन में उन दो समाचारपत्रों के संपादकों के ख़िलाफ़ धर्म के अपमान का आरोप लगाया गया है. अगर ये आरोप साबित होते हैं तो उन्हें कम-से-कम एक वर्ष की जेल की सज़ा हो सकती है. प्रदर्शन मंगलवार को अफ़ग़ानिस्तान में राजधानी काबुल समेत कई शहरों, ईरान की राजधानी तेहरान, इंडोनेशिया में जकार्ता और सुराबाया और फ़िलीपींस में विरोध प्रदर्शन हुए. ईरान की राजधानी तेहरान में लगातार दूसरे दिन प्रदर्शनकारी डेनमार्क के दूतावास में चले गए और उन्होंने वहाँ पथराव किया. पाकिस्तान के पेशावर शहर में भी प्रदर्शन हुए. भारत प्रशासित कश्मीर में कार्टूनों के विरोध में आम हड़ताल बुलाई गई जिसका जनजीवन पर व्यापक असर पड़ा. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मुज़फ़्फ़राबाद में भी बड़े प्रदर्शन हुए. काबुल में भी कई यूरोपीय देशों के दूतावासों पर पत्थरबाज़ी की गई जिसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों को पीटा. अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद और हेरात शहर में भी प्रदर्शन हुए हैं. दक्षिणी फ़िलीपींस के कोटाबाटो शहर में सैकड़ों मुसलमानों ने प्रदर्शन कर डेनमार्क सरकार से उस समाचारपत्र को दंडित किए जाने की माँग की है जिसमें सबसे पहले विवादास्पद कार्टून प्रकाशित किए गए थे. इंडोनेशिया में देश के दूसरे सबसे बड़े शहर सुराबाया में डेनमार्क और अमरीका के वाणिज्यिक दूतावासों पर प्रदर्शन किए हैं. राजधानी जकार्ता में भी प्रदर्शन हुए हैं. भारत प्रशासित कश्मीर में भी कार्टूनों के प्रकाशन के विरोध में मंगलवार को आम हड़ताल बुलाए जाने के कारण दूकानें आदि बंद रहीं. अफ़ग़ानिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में लगातार तीसरे दिन कार्टून विरोधी प्रदर्शन हुए और इस दौरान हिंसा भी हुई. मेमनेह शहर में तीन प्रदर्शनकारी मारे गए लेकिन वे कैसे मरे इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. अफ़ग़ानिस्तान के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मोहम्मद नईम ने बीबीसी को बताया कि एक व्यक्ति की गोली लगने से मौत हो गई है और दो व्यक्ति घायल हैं. अधिकारी ने बताया कि देश के उत्तर पश्चिम में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने एक ऐसे अड्डे पर हमला किया जहाँ नॉर्वे के शांतिरक्षक सैनिक रह रहे थे. अधिकारी का कहना है कि मारे गए प्रदर्शनकारी पर पुलिस ने गोली नहीं चलाई. वहीं नैटो की एक प्रवक्ता ने कहा है कि नैटो सैनिकों ने भी हवा में गोलियाँ चलाईं और भीड़ को निशाना नहीं बनाया. फ़रयाब प्रांत के निदेशक ने बीबीसी को बताया है कि मेमनेह में तीन लोग मारे गए हैं जबकि 30 लोग घायल हैं. अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभालनेवाले संगठन नैटो की एक प्रवक्ता ने बताया कि मंगलवार को सैकड़ों लोगों ने एक ऐसे वायुसैनिक ठिकाने पर हमला करने की कोशिश की जिसका नेतृत्व नॉर्वे के सैनिकों के हाथ में था. प्रवक्ता ने बताया कि नैटो सैनिकों ने इसके बाद हवा में गोलियाँ दागीं और आँसू गैस का इस्तेमाल किया लेकिन उन्होंने भीड़ पर गोली नहीं चलाई. प्रांत के डिप्टी गवर्नर सैयद अहमद सैयद ने समाचार एजेंसी एएफ़पी से कहा है कि अफ़ग़ान 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"Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्थानीय पुलिस के अनुसार, मुक्तसर ज़िले के भुट्टीवाला गांव के रहने वाले गुरुतेज सिंह ने फेसबुक लाइव पर आत्महत्या करने की कोशिश की. खुद को गोली मारने से पहले पांच मिनट के फेसबुक लाइव में गुरुतेज सिंह ने बताया कि उनका किसी के साथ ज़मीन को लेकर विवाद है. उन्होंने दावा किया कि उनके साथ धोखा हो रहा है और उन्हें इंसाफ नहीं मिल रहा है. उन्होंने ख़ुद को गोली मारने से पहले अदालत में अपना भरोसा जताते हुए उन्होंने न्याय करने की अपील भी की है. कोटभाई पुलिस स्टेशन के प्रभारी कृष्ण कुमार ने बीबीसी से घटना की पुष्टि की है. पुलिस के अनुसार 35 वर्षीय गुरतेज सिंह ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर से ख़ुद को गोली मारी, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. उन्हें पास के अस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है. इस घटना का वीडियो फेसबुक पर लगातार शेयर किया जा रहा है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पंजाब के मुक्तसर ज़िले में फेसबुक पर एक वीडियो वायरल रहा है जिसमें एक व्यक्ति ने 'फेसबुक लाइव' के दौरान आत्महत्या की कोशिश की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्थानीय पुलिस के अनुसार, मुक्तसर ज़िले के भुट्टीवाला गांव के रहने वाले गुरुतेज सिंह ने फेसबुक लाइव पर आत्महत्या करने की कोशिश की. खुद को गोली मारने से पहले पांच मिनट के फेसबुक लाइव में गुरुतेज सिंह ने बताया कि उनका किसी के साथ ज़मीन को लेकर विवाद है. उन्होंने दावा किया कि उनके साथ धोखा हो रहा है और उन्हें इंसाफ नहीं मिल रहा है. उन्होंने ख़ुद को गोली मारने से पहले अदालत में अपना भरोसा जताते हुए उन्होंने न्याय करने की अपील भी की है. कोटभाई पुलिस स्टेशन के प्रभारी कृष्ण कुमार ने बीबीसी से घटना की पुष्टि की है. पुलिस के अनुसार 35 वर्षीय गुरतेज सिंह ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर से ख़ुद को गोली मारी, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. उन्हें पास के अस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है. इस घटना का वीडियो फेसबुक पर लगातार शेयर किया जा रहा है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रोमन साम्राज्य के पहले सम्राट ऑगस्टस अपने 40 साल के शासन के पहले कुछ वर्षों में शक्तिशाली सीनेटरों को कमज़ोर करने के बजाय साथ लेकर चले. प्रशासन के ढाँचे के साथ छेड़छाड़ नहीं की. सीनेटरों को ऐसा लगा कि वो अब भी शक्तिशाली हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन, धीरे-धीरे उन्हें समझ में आया कि ऑगस्टस उन्हें केवल बोलने देते थे, करते वही थे जो वह चाहते थे. सीनेटरों के बीच वह तानाशाह थे लेकिन जनता के दरबार में एक लोकप्रिय सम्राट. इसके दो सबसे बड़े कारण थे. एक तो वह 20 साल के गृहयुद्ध के बाद शांति लाए और दूसरे रोम को आर्थिक स्थिरता दी. दोनों ने एनेस्थीसिया का काम किया. शांति और आर्थिक समृद्धि के नशे में चूर जनता को पता भी नहीं चला कि ऑगस्टस कब तानाशाह बन गए. नरेंद्र मोदी का काल अभी शुरू ही हुआ है. लेकिन पिछले ढाई महीने में उनकी निजी उपलब्धियों में मोदीत्व यानी तानाशाही के इशारे मिलने लगे हैं, जिनमें अपनी पार्टी पर पूरा कब्ज़ा सबसे महत्वपूर्ण है. पार्टी के बड़े कद के नेताओं का सफाया तो वो पहले ही कर चुके थे. पार्टी की बागडोर जब अमित शाह को सौंपी गई तो उस समय ये साफ़ हो गया कि अब पार्टी में किसकी चलेगी. गुरु-चेला जोड़ी अमित शाह को उत्तर प्रदेश में चुनाव के समय भारी सफलता का श्रेय देते हुए शनिवार को प्रधानमंत्री ने भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में कहा वह चुनाव के ‘मैन ऑफ़ द मैच’ थे. गुरु और चेले की जोड़ी गुजरात के बाद दिल्ली में भी बनी रहेगी. पार्टी का बॉस कौन है इसका संकेत हैं वो बैठकें जो इन दिनों मोदी पार्टी के नए चुने सांसदों के साथ बारी-बारी से कर रहे हैं. इन बैठकों की तस्वीरों को देखकर नरेंद्र मोदी की अपनी महत्ता की सोच का ठोस सुबूत भी मिलता है. दबंग अंदाज़ प्रधानमंत्री एक गद्देदार कुर्सी पर एक ऊंचे प्लेटफार्म में बैठे नज़र आते हैं. उनके सामने और उनसे थोड़ा नीचे सांसदों का दल आम कुर्सियों पर बैठा दिखाई देता है. जिन लोगों को सवाल करना होता है वो अपनी कुर्सी से खड़े होकर करते हैं. बैठकों में शामिल सांसद सहमे से लगते हैं और अपनी बात धीमे अंदाज़ में कहते हैं मुगलों के दरबार भी कुछ इसी तरह के होते थे जहाँ बादशाह तख़्त पर ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बैठते थे और वज़ीर और सीनियर दरबारी उनके सामने थोड़ा नीचे बैठा करते थे. पार्टी और प्रशासन जहाँ मोदी की गिरफ़्त पार्टी में मज़बूत हो गई है, वहीं ख़बरें हैं कि प्रशासन पर भी वो हावी हो गए हैं. कहते हैं कि वो सुनते सभी मंत्रियों की हैं लेकिन फैसला खुद लेते हैं और असहमति का मौक़ा नहीं देते. एक तरह से ये उनका गुजरात मॉडल है जहाँ पार्टी और मंत्रिमंडल को जाहरी तौर पर काम करने देते थे, लेकिन दोनों मंचों पर चलती केवल उनकी ही थी. प्रधानमंत्री का ये ‘राष्ट्रपति’ वाला अंदाज़ आने वाले दिनों में तानाशाही की तरफ इशारा करता है. इतिहास के विषयों में वह कमज़ोर ज़रूर हैं लेकिन ऐतिहासिक रूप से ऐसे लोग लंबा शासन करते हैं. ठीक सम्राट ऑगस्टस की तरह. 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'बंधक हैं सांसद' उन्होंने कहा, \"मैं उन लोगों को चुनौती देता हूँ कि वे मरे ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों को साबित करें और सांसदों की ख़रीदफरोख़्त वाली सीडी सार्वजनिक की जाए.\" उनका कहना था, \"यदि पैसे का लेन-देन करते मेरी तस्वीर दिखा दी जाए या इसके बारे में बात करते हुए मेरी आवाज़ भी सुना दी जाए तो मैं सार्वजनिक जीवन छोड़ दूँगा.\" सपा नेता ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के छह सांसदों को नई दिल्ली स्थित उत्तर प्रदेश भवन में बंधक बना कर रखा गया है. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उनके सांसदों पर नज़र रखे हुए हैं. संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने व्हिप का उल्लंघन करने और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल छह सांसदों को पार्टी से निष्कासित कर दिया है. उन्होंने बताया कि सपा संसदीय दल के नेता प्रोफ़ेसर रामगोपाल यादव शनिवार को लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर उन्हें इसकी जानकारी देंगे. सपा ने अपने जिन सांसदों को निलंबित किया है, उनमें जयप्रकाश (मोहनलालगंज), एसपी सिंह बघेल (जालेसर), राजनरायण बुधौलिया (हमरीपुर), अफ़जल अंसारी (गाज़ीपुर), अतीक अहमद (फूलपुर) और मुनव्वर हुसैन (मुज़फफ़्रनगर) के नाम शामिल हैं. सपा के इन सांसदों ने लोकसभा में 22 जुलाई को विश्वासमत प्रताव पर हुए मतदान में पार्टी के व्हिप का उल्लंघन कर विश्वासमत के ख़िलाफ़ वोट दिया था.\n\nSummary:", "target": "समाजवादी पार्टी (सपा) के महासचिव अमर सिंह ने यूपीए सरकार को बचाने के लिए सांसदों की ख़रीदफरोख़्त में शामिल होने के आरोपों को निराधार बताया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा है कि वे इसका सबूत पेश करें. शुक्रवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा, \"हमने भी अपने सांसद खोए हैं, लेकिन हमने किसी को भी पैसे नहीं दिए.\" उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने वाले छह सांसदों को पार्टी से निष्कासित करने की भी घोषणा की है. उल्लेखनीय है कि भाजपा के तीन सांसदों ने लोकसभा में औपचारिक रुप से शिकायत दर्ज करवाते हुए उसमें अमर सिंह का नाम लिया है. इन सांसदों ने समाजवादी पार्टी के सांसद रेवती रमण सिंह और कांग्रेस के नेता अहमद पटेल का भी नाम लिया है. 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दलित वर्ग के लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए संविधान संशोधन की मांग कर रहें हैं. किसने क्या किया वर्ष 1994 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की साझा सरकार ने एक कानून बनाकर सरकारी नौकरियों में में पदोन्नति में दलित वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू कर की थी. बाद में वर्ष 2002 में बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की साझा सरकार ने एक कदम आगे जाते हुए दलित वर्ग के अधिकारी को और तेजी से पदोन्नति दिलाने के लिए परिणामी ज्येष्ठता भी प्रदान कर दी. इस व्यवस्था से दलित वर्ग के अधिकारी अपने सीनियर को लांघते हुए पदोन्नति पाकर काफी ऊपर पहुँचने लगे. वर्ष 2005 में मुलायम सरकार ने जूनियर को सीनियर बनाने वाले इस परिणामी ज्येष्ठता के नियम को रद्द कर दिया. मगर साल 2007 में मायावती ने दलित वर्ग को तेजी से प्रमोशन दिलाने के लिए फिर से परिणामी ज्येष्ठता का नियम लागू कर दिया. हाईकोर्ट का आदेश लेकिन गैर-दलित अधिकारियों की अपील पर हाईकोर्ट ने इसे स्थगित कर दिया. हाईकोर्ट के स्थगन से पदोन्नति की प्रक्रिया रुक गयी और इस समय उत्तर प्रदेश में पदोन्नति के एक लाख तीस हजार पद खाली हैं. मायावती सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. पिछले विधान सभा चुनाव में यह एक अहम मुद्दा था. समाजवादी पार्टी ने पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करने का वादा किया था. चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल के अपने आदेश में कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के कानून में दलित वर्ग के लोगों को पदोन्नति में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता का प्रावधान अवैधानिक है. अदालत की राय में संविधान में आरक्षण की व्यवस्था नौकरी में भर्ती के लिए है न कि बाद में होने वाली पदोन्नति के लिए. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एम नागराज के मामले में अदालत के एक पुराने निर्णय का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है कि केवल तीन परिस्थितियों में पदोन्नति में आरक्षण दिया जा सकता है. पहला यह कि सरकारी सेवा में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व कम हो, दूसरा दलित वर्ग के अधिकारी पिछड़े हों और तीसरा इस पदोन्नति से संबंधित विभाग की कार्य-कुशलता पर प्रतिकूल असर न पड़े. सरकार की फुर्ती अखिलेश यादव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को तुरंत लागू कर दिया, जिससे हर विभाग में तेजी से पदोन्नति हो रही है. अब दलित वर्ग के अधिकारी मांग कर रहें हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए संविधान में संशोधन किया जाए. अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल कहते हैं, ''हम लोग तो पूरे प्रदेश में या यह कहिये कि पूरे देश में यह माहौल बनाने की कोशिश कर रहें हैं कि एक जन दबाव लोक सभा पर पड़े और लोक सभा संविधान संशोधन लाकर इस मामले को हल करे.'' लेकिन दूसरी ओर सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे का कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण से गैर- दलित अधिकारी कुंठित होते हैं और सरकारी सेवाओं पर इसका उलटा असर पड़ता है. दुबे इसे मौलिक अधिकारों का हनन करार देते हैं. वे कहते हैं, ''देश भर के तमाम सरकारी कर्मचारी और अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने की किसी भी कोशिश का विरोध करेंगे.'' उत्तर प्रदेश के अठारह लाख सरकारी कर्मचारी पदोन्नति में आरक्षण के इस विवाद में दलित और गैर दलित खेमों में बंट गए हैं. दोनों खेमे सभा-जुलूस और रैली करके राजनीतिक दलों को अपने-अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहें हैं. बहुजन समाज पार्टी दलित वर्ग के साथ खड़ी है तो समाजवादी पार्टी गैर-दलित अधिकारियों के साथ है. कांग्रेस और भारतीय 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की हवा सितंबर महीने में पिछले 9 साल में सबसे ज़्यादा साफ इस बार हुई है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार 2011 से 2019 सितंबर महीने के पीएम 2.5 और पीएम 10 के डेटा का निरीक्षण किया गया और यह पाया कि इस साल सबसे ज़्यादा साफ हवा हुई है. इस साल सितंबर महीने में औसत पीएम10 की मात्रा 99 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रही, जबकि औसत पीएम 2.5 की मात्रा 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटरदर्ज हुई. वहीं पिछले साल पीएम 10 की मात्रा 121 जबकि पीएम 2.5 की मात्रा 44 थी. डीपीसीसी के एयर डिविजन के प्रमुख मोहन जॉर्ज ने बताया है कि पीएम 10 और पीएम 2.5 की सबसे ज़्यादा मात्रा साल 2015 में दर्ज हुई थी, उसके बाद इसमें धीरे-धीरे गिरावट आती गई है. पराली जलाने की रिपोर्ट रोजाना भेजनी होगी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मंगलवार को दिल्ली और पड़ोसी राज्यों के मुख्य सचिवों के कार्यालय में विशेष इकाइयां बनाने का निर्देश दिया. इस इकाई का काम अगले एक महीने रोजाना पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की समस्या पर नज़र रखना होगा. अमर उजाला ने लिखा है एनजीटी ने केंद्र में कृषि मंत्रालय के संबंधित संयुक्त सचिव और पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कृषि सचिवों को 15 अक्तूबर को स्थिति रिपोर्ट के साथ पेश होने को कहा है. एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण की समस्या से प्रभावी कदम उठाये बिना नहीं निपटा जा सकता. उन्होंने सुझाव दिया कि राज्यों को हालात की समीक्षा के लिए जिला स्तर पर भी ऐसे प्रकोष्ठ बनाने चाहिए. पराली से कैसे निपटे पाकिस्तान? भारत-चीन ने खोली सीमाएं भारत-चीन की सीमा पर मंगलवार को दोनों देशों के सैनिक आपस में गले मिलते नज़र आए. इस मुलाकात में न सिर्फ सैनिक बल्कि आम लोग भी शामिल हुए. यह मौका था लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारतीय सेना और चीन की सेना के बीच बॉर्डर पर्सनेल मीटिंग (BPM) का. इस ख़बर के बारे में नवभारत टाइम्स ने लिखा है, इस बार यह मीटिंग LAC के दूसरी तरफ यानी चीन की सीमा में हुई. लगभग एक दशक बाद भारतीय मीडिया को भी यहां जाने का मौका मिला. 1 अक्टूबर को चीन अपना राष्ट्रीय दिवस भी मना रहा है. चीनी सेना ने भारतीय सेना के अधिकारियों और दोनों तरफ के आम लोगों के साथ अपना 70वां नेशनल डे मनाया. पीड़िता के पिता ने जताई परिवार को फंसाए जाने की आशंका पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद के मामले में कथित पीड़ित लड़की के पिता ने आरोप लगाया कि बेटी को न्याय दिलाने की लड़ाई में बाधा पैदा की जा रही है. जनसत्ता में प्रकाशित समाचार में लिखा गया गया है कि पीड़िता के पिता ने कहा है कि चिन्मयानंद पक्ष उनके परिवार को झूठे मामले में फंसा सकता है. पीड़िता के पिता ने यह भी कहा कि उनकी बेटी पीड़िता होने के बावजूद जेल में बंद है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "झारखंड के खूंटी ज़िला में अदालत के आंकड़ों की जांच से पता चला कि बीते छह सालों में जिन 53 लोगों पर गोहत्या का मामला दर्ज हुआ वे सभी बाद में बरी कर दिए गए. यानी एक भी शख़्स को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सका.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ख़ास रिपोर्ट में लिखा है कि बीते छह साल में गोहत्या या इसकी मंशा के तहत कुल 16 मामले दर्ज किए गए जिसमें 53 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, लेकिन पिछले साल तक इन सभी को बरी कर दिया गया. इन्हें बरी इसलिए किया गया कि जो तथाकथित गोमांस ज़ब्त किया गया, उसे जांच के लिए भी भेजा नहीं जा सका. कुछ मामलों में तो चश्मदीद ही अदालत में पेश नहीं हुए. इनमें से दो मामले में चश्मदीद बजरंग दल के सदस्य थे लेकिन वो भी अदालत के सामने पेश नहीं हुए. अख़बार लिखता है कि इन मामलों में जिन लोगों को हिरासत में लिया गया, उन्हें उत्पीड़न सहना पड़ा. कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़े और ज़मानत पाने के लिए कई हज़ार रुपये भी भरने पड़े. 9 साल बाद सितंबर में दिल्ली की हवा सबसे ज़्यादा साफ़ इस साल सितंबर महीने में दिल्ली का आसमान काफी नीला और साफ नज़र आया था. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमिटी यानी डीपीसीसी के डेटा के मुताबिक दिल्ली की हवा सितंबर महीने में पिछले 9 साल में सबसे ज़्यादा साफ इस बार हुई है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार 2011 से 2019 सितंबर महीने के पीएम 2.5 और पीएम 10 के डेटा का निरीक्षण किया गया और यह पाया कि इस साल सबसे ज़्यादा साफ हवा हुई है. इस साल सितंबर महीने में औसत पीएम10 की मात्रा 99 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रही, जबकि औसत पीएम 2.5 की मात्रा 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटरदर्ज हुई. वहीं पिछले साल पीएम 10 की मात्रा 121 जबकि पीएम 2.5 की मात्रा 44 थी. डीपीसीसी के एयर डिविजन के प्रमुख मोहन जॉर्ज ने बताया है कि पीएम 10 और पीएम 2.5 की सबसे ज़्यादा मात्रा साल 2015 में दर्ज हुई थी, उसके बाद इसमें धीरे-धीरे गिरावट आती गई है. पराली जलाने की रिपोर्ट रोजाना भेजनी होगी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मंगलवार को दिल्ली और पड़ोसी राज्यों के मुख्य सचिवों के कार्यालय में विशेष इकाइयां बनाने का निर्देश दिया. इस इकाई का काम अगले एक महीने रोजाना पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की समस्या पर नज़र रखना होगा. अमर उजाला ने लिखा है एनजीटी ने केंद्र में कृषि मंत्रालय के संबंधित संयुक्त सचिव और पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कृषि सचिवों को 15 अक्तूबर को स्थिति रिपोर्ट के साथ पेश होने को कहा है. एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण की समस्या से प्रभावी कदम उठाये बिना नहीं निपटा जा सकता. उन्होंने सुझाव दिया कि राज्यों को हालात की समीक्षा के लिए जिला स्तर पर भी ऐसे प्रकोष्ठ बनाने चाहिए. पराली से कैसे निपटे पाकिस्तान? भारत-चीन ने खोली सीमाएं भारत-चीन की सीमा पर मंगलवार को दोनों देशों के सैनिक आपस में गले मिलते नज़र आए. इस मुलाकात में न सिर्फ सैनिक बल्कि आम लोग भी शामिल हुए. यह मौका था लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारतीय सेना और चीन की सेना के बीच बॉर्डर पर्सनेल मीटिंग (BPM) का. इस ख़बर के बारे में नवभारत टाइम्स ने लिखा है, इस बार यह मीटिंग LAC के दूसरी तरफ यानी चीन की सीमा में हुई. लगभग एक दशक बाद भारतीय मीडिया को भी यहां जाने का मौका मिला. 1 अक्टूबर को चीन अपना राष्ट्रीय दिवस भी मना रहा है. चीनी सेना ने भारतीय सेना के अधिकारियों और दोनों तरफ के आम लोगों के साथ अपना 70वां नेशनल डे मनाया. पीड़िता के पिता ने जताई परिवार को फंसाए जाने की आशंका पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद के मामले में कथित पीड़ित लड़की के पिता ने आरोप लगाया कि बेटी को न्याय दिलाने की लड़ाई में बाधा पैदा की जा रही है. जनसत्ता में प्रकाशित समाचार में लिखा गया गया है कि पीड़िता के पिता ने कहा है कि चिन्मयानंद पक्ष उनके परिवार को झूठे मामले में फंसा सकता है. पीड़िता के पिता ने यह भी कहा कि उनकी बेटी पीड़िता होने के बावजूद जेल में बंद है. 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'इंडियन' के प्रवक्ता ने कहा है कि उड़ानों में विलंब हो सकता है लेकिन कोई बाधा नहीं आएगी. हालांकि उन्होंने यात्रियों को सलाह दी है कि वे कम से कम सामान लेकर यात्रा करने का प्रयास करें.\n\nSummary:", "target": "भारत सरकार ने अचानक हड़ताल पर चले गए घरेलू एयरलाइन 'इंडियन' के कर्मचारियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वे काम पर नहीं लौटे तो उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवैसे कार्रवाई की शुरुआत करते हुए सरकार ने 23 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है. केंद्र सरकार ने कर्मचारियों को काम पर लौटने के लिए एक दिन का समय दिया है. उधर 'इंडियन' के 12 हज़ार से अधिक कर्मचारियों के मंगलवार की रात से अचानक देशव्यापी हड़ताल पर चले जाने से विमानतलों पर अफ़रातफ़री का माहौल है और उड़ाने बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. हड़ताल पर जाने वाले कर्मचारी 'ग्राउंड-स्टाफ़' हैं और इनके न होने से चेक-इन से लेकर बैगेज संभालने वालों तक कोई भी काम पर नहीं है. ये कर्मचारी अपने लिए बेहतर वेतन और तरक्की की बेहतर नीति की माँग कर रहे हैं. उनका मानना है कि यदि सरकार को 'इंडियन' और 'एयर इंडिया' का विलय करना है तो दोनों सेवाओं के कर्मचारियों को समान सुविधाएँ देनी होंगी. चेतावनी केंद्रीय नागरिक उड्डयन एवं विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा है कि कर्मचारियों को अपने और एयरलाइन के भविष्य को ध्यान में रखते हुए काम पर लौट आना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर कर्मचारी काम पर नहीं लौटे तो सरकार को सख़्त क़दम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. उन्होंने कर्मचारियों को सीधी चेतावनी देते हुए कहा, \"हड़ताल जारी रहने की स्थिति में सरकार को 267 करोड़ रुपए के उस पैकेज पर भी विचार करना होगा जिसे सरकार ने संसाधनों की कमी के बावजूद स्वीकृत किया था.\" उनका कहना था कि इस पैकेज की घोषणा कर्मचारियों की सहमति के बाद की गई थी और इसके बाद कर्मचारियों ने अपनी प्रस्तावित हड़ताल वापस ले ली थी. उन्होंने कहा कि कर्मचारी बिना नोटिस दिए अचानक ही हड़ताल पर चले गए हैं और यह ग़ैरक़ानूनी है. केंद्रीय मंत्री का कहना था कि एयरलाइन को यात्रियों की सुविधा के लिए कुछ तो क़दम उठाने ही होंगे और एकाध दिन का समय देने के बाद प्रबंधन वैकल्पिक व्यवस्था करने पर विचार करेगा. प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि कर्मारियों को समझना चाहिए कि अब प्रतियोगिता का ज़माना है और यात्रियों के पास विकल्प मौजूद हैं. उड़ानों पर असर इस हड़ताल के चलते दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, बैंगलोर और कोलकाता, सभी क्षेत्रों में घरेलू उड़ानों पर असर पड़ा है. यात्री विमानतल पर अटके पड़े हैं और उन्हें लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है. बाहर से आने वाले विमानों के सामान के लिए भी कई घंटे इंतज़ार करना पड़ रहा है. दुबई, कुआलालम्पुर, बैंकॉक और सिंगापुर सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी इसका असर पड़ने के आसार हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार एयर कॉर्पोरेशन एम्प्लाइज़ यूनियन (एसीईयू) के महासचिव जेके बडोला ने कहा, \"प्रबंधन के साथ हमारी बातचीत टूट गई है. उन्होंने वेतनमान फिर से निर्धारित करने का अपना वादा नहीं निभाया है इसलिए हम मंगलवार की रात साढ़े नौ बजे से हड़ताल पर हैं.\" बडोला ने कहा है कि यह हड़ताल अनिश्चितकाल तक चलेगी. 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'डायन' के शक में भी हत्याएं हो रही हैं. खूंटी के कनसीली गांव में डायन के शक में एक वृद्ध दंपती की हत्या के आरोप में पुलिस ने पिछले दिनों उनके दो भतीजों और बहू को गिरफ़्तार किया है. झारखंड में किसने फैलाई, बच्चा चोरी की अफवाह झारखंड: बकरा जी हाजिर हों! झारखंड: बच्चा चोरी की अफ़वाह में 6 लोगों की पीट-पीटकर हत्या डायन प्रथा के ख़िलाफ़ सालों से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता पूनम टोप्पो बताती हैं कि शिक्षा और जन जागरूकता के अभाव में जोदू-टोना, ओझा-गुनी के चक्कर में आदिवासी परिवार बिखर रहे हैं. उन्होंने कहा कि इन मामलों में सरकारी स्तर पर जो प्रयास हो रहे हैं, वे नाकाफ़ी हैं. टोप्पो ने कहा कि पंचायतों और ग्रामसभा को भी ज़िम्मेवारी लेनी होगी, वरना इन घटनाओं पर रोक मुश्किल है. हाल के दो ख़ौफ़नाक मामले सुर्खियों में हैं. बीस अप्रैल को झारखंड की राजधानी रांची के सुदूर गांव पुरनाटोली में एक आदिवासी ने कुल्हाड़ी से अपने तीन साल के मासूम बेटे के कथित तौर पर तीन टुकड़े कर दिए. बुढ़मू पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर जेल भेजा है, जबकि एक मई को खूंटी में एक आदिवासी को सात साल के बेटे की कथित हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है. चाईबासा के पुलिस अधीक्षक अनीष गुप्ता बताते हैं जांच में ये तथ्य सामने आते रहे हैं कि इस तरह की अधिकतर घटनाएं देर शाम या रात में होती हैं. हड़िया-शराब भी इसकी बड़ी वजह रही है जबकि हथियार के तौर पर कुल्हाड़ी, लोढ़ा, दउली, लाठी जैसे पांरपरिक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं. कोल्हान की घटनाओं की चर्चा करते हुए वो बताते हैं कि कई मौक़े पर वे दो-तीन हत्याएं एक साथ कर देते हैं, लेकिन अब सुदूर इलाक़े से भी पुलिस तक ये मामले पहुंच रहे हैं, तब त्वरित कार्रवाई की जाती है. चाईबासा से पहले खूंटी में तैनात रहे ये पुलिस अधिकारी इस बात से इनकार नहीं करते कि गिरफ़्तारी और सज़ा जैसी क़ानूनी प्रक्रिया के बीच आदिवासी परिवार मुश्किलों में पड़ जाता है. टूटते-बिखरते परिवार रांची से 50 किलोमीटर दूर उबड़-खाबड़ रास्तों और जंगलों से गुजरते हम पुरनाटोली गांव में सुकरा उरांव के घर का हाल जानने पहुंचे थे. उरांव को मासूम बेटे की कथित हत्या के आरोप में पुलिस ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा है. बेटे की कथित हत्या के बाद उरांव की पत्नी बेटी को लेकर मायके चली गई है. घटना से चार दिन पहले यानी सोलह अप्रैल को सुकरा उरांव ने बहन की शादी की थी. सुकरा की ब्याही बहन भी इस घटना के बाद मायके चली आई हैं. वो बताती हैं कि उनता भतीजा बहुत सुंदर था और भाई भी समझदार था. आख़िर ये सब हुआ कैसे? इस सवाल पर सुकरा के भाई सुखदेव उरांव बताते हैं कि बहन की शादी के बाद वो बेचैनी से इधर-उधर घूमता चल रहा था. 20 अप्रैल की सुबह बेटे को नहलाने की बात कहकर खेतों के बीच बने कुएं पर ले गया और यह हादसा हुआ. सुकरा की भाभी नागो उरांव ज़ोर देकर कहती हैं कि ज़रूर किसी ने जादू-टोना कर दिया. रांची विश्विद्यालय के समाजशास्त्री डॉ प्रदीप कुमार सिंह बताते हैं कि बेशक झारखंड में आदिवासी परिवारों को पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और आधुनिक परिवेश के बीच संघर्ष परेशान कर रहा है. मासूम बच्चों और पत्नी की हत्या के सवाल पर वे कहते हैं कि कई घटनाओं की गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि पति को पत्नी के चरित्र पर संदेह है. उसे लगता है कि बच्चा किसी और से है. उन्होंने कहा, ''इसका वे प्रत्यक्ष तौर पर अहसास नहीं कराते, लेकिन परोक्ष तौर पर वे भयावह घटना को अंजाम देते हैं.'' काटकर थैली में रखा सिर पिछले दिनों कोल्हान के एक सुदूर गांव बांगरटोला में पत्नी की हत्या करने के बाद थैली में सिर लेकर सरेंडर करने कोर्ट पहुंचे एक आदिवासी को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. तब पुलिस तफ्तीश में ये बातें सामने आईं कि उसे चरित्र पर संदेह था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "झारखंड के आदिवासी इलाक़ों में क़त्ल की बढ़ती घटनाओं से इस समुदाय को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता चिंता में हैं. ये सारी हत्याएं शक और जागरूकता के अभाव के कारण हो रही हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदरअसल इन घटनाओं की वजह से आदिवासी परिवार टूट-बिखर रहे हैं. इससे सामाजिक तानाबाना बिगड़ने के ख़तरे भी बढ़े हैं. पिछले तीन महीने के दौरान पारिवारिक हत्या में कम से कम तीन दर्जन लोग मारे गए हैं. पुलिस के मुताबिक अधिकतर घटनाओं में पत्नी, बच्चे, मां-बाप मारे जा रहे हैं. चाईबासा, खूंटी, रांची, दुमका, गुमला, पूर्वी सिंहभूम, सिमडेगा, पाकुड़ जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों के गांवों में इन घटनाओं का सिलसिला जारी है. चार जून को रांची में एक युवक ने सौतेले पिता की कथित तौर पर हत्या इसलिए कर दी कि उसे शराब पीने के लिए पैसे नहीं दिए. 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'गोल्डन बियर' की दौड़ में ऑस्कर के लिए नामांकित 'देयर विल बी बल्ड' और हास्य फ़िल्म 'हैप्पी गो लकी' को पछाड़कर 'द एलीट स्कवैड' ने यह पुरस्कार झटका. 'गोल्डन बियर' उन फ़िल्म पुरस्कारों में एक है जिन्हें ऑस्कर से पहले घोषित करने की परंपरा रही है. हैट्रिक नहीं बना सके माइक 'हैप्पी गो लकी' के निर्देशक माइक ली अपनी दूसरी फ़िल्मों के लिए कान्स फ़िल्म महोत्सव में 'पाम डी-ओर' और वेनिस महोत्सव में 'गोल्डन लॉयन' जीत चुके थे. बर्लिन में 'गोल्डन बियर' जीतकर वे मुख्य तीन यूरोपीय फ़िल्म महोत्सवों में हैट्रिक जमाना चाहते थे लेकिन कामयाब नहीं रहे. अमरीकी फ़िल्म निर्माता पॉल थॉमस एंडरसन ने अपनी फ़िल्म 'देयर विल बी ब्लड' के लिए बर्लिन का 'सिल्वर बियर' पुरस्कार जीत लिया. लंदन में जन्मीं 31 वर्षीय सैली हॉकिंस को गर्भपात पर बनाई गई माइक ली की हास्य फ़िल्म 'हैप्पी गो लकी' में बेहतरीन काम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला. सैली ने लंबे समय तक छोटे पर्दे पर भी काम किया है. समलैंगिक महिलाओं पर बना विवादास्पद कार्यक्रम 'टिपिंग द वेलवेट' से उन्हें ख़ूब नाम मिला. जर्मनी का राजधानी में आयोजित 58वें बर्लिन महोत्सव में कुल 21 फ़िल्में दिखाई गईं. हालाँकि शीर्ष आलोचकों के बीच 'गोल्डन बियर' के मसले पर स्पष्ट आम राय नहीं थी. फ़िल्म पत्रिका 'वैरायटी' ने तो यहाँ तक कहा कि महोत्सव के दौरान कुछ निराशा हाथ लगी. पत्रिका ने लिखा, \"प्रतियोगिता पिछले सालों के मुक़ाबले कागज़ पर ज़्यादा प्रभावी नज़र आ रही थी लेकिन असल में कुछ नाम चुनौतीपूर्ण और नए तरह का काम पेश कर पाने में विफल रहे.\" क़ैदियों पर बनी फ़िल्म भी जीती महोत्सव में आई प्रमुख फ़िल्मों में फ़्राँस की 'आई हैव लव्ड यू सो लॉंग' भी शामिल थी. इस फ़िल्म में क्रिस्टिन स्कॉट थॉमस अहम भूमिका में हैं. 'एलेगी' भी गोल्डन बियर की दावेदार मानी जा रही थी. बुढ़ापा, असुरक्षा और मौत पर बनी इस फ़िल्म में पेनेलोप क्रुज़ और सर बेन किंग्सले ने अभिनय किया है. एक अमरीकी वृत्तचित्र को जूरी पुरस्कार दिया गया. यह फ़िल्म इराक़ के अबु ग़रेब जेल में क़ैदियों के साथ दुर्व्यवहार पर आधारित है. पिछले साल का 'गोल्डन बियर' मंगोलियाई महिलाओं के एक समूह पर बनी चीनी फ़िल्म 'तुयास मैरिज' को दिया गया था.\n\nSummary:", "target": "बर्लिन फ़िल्म महोत्सव में तमाम श्रेणियों के पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nब्राज़ील की 'द एलीट स्कवैड' सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुनी गई और उसे 'गोल्डन बियर' पुरस्कार मिला है. यह फ़िल्म ब्राज़ील के उन भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों पर बनी है जिनसे नशीली चीज़ों के तस्करों से लड़ने उम्मीद की जाती है. ब्रिटेन की सैली हॉकिंस 'हैप्पी गो लकी' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुनी गईं जबकि ईरान के रेज़ा नजी को 'द सॉंग ऑफ़ स्पैरोज़' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया है. 'गोल्डन बियर' की दौड़ में ऑस्कर के लिए नामांकित 'देयर विल बी बल्ड' और हास्य फ़िल्म 'हैप्पी गो लकी' को पछाड़कर 'द एलीट स्कवैड' ने यह पुरस्कार झटका. 'गोल्डन बियर' उन फ़िल्म पुरस्कारों में एक है जिन्हें ऑस्कर से पहले घोषित करने की परंपरा रही है. हैट्रिक नहीं बना सके माइक 'हैप्पी गो लकी' के निर्देशक माइक ली अपनी दूसरी फ़िल्मों के लिए कान्स फ़िल्म महोत्सव में 'पाम डी-ओर' और वेनिस महोत्सव में 'गोल्डन लॉयन' जीत चुके थे. बर्लिन में 'गोल्डन बियर' जीतकर वे मुख्य तीन यूरोपीय फ़िल्म महोत्सवों में हैट्रिक जमाना चाहते थे लेकिन कामयाब नहीं रहे. अमरीकी फ़िल्म निर्माता पॉल थॉमस एंडरसन ने अपनी फ़िल्म 'देयर विल बी ब्लड' के लिए बर्लिन का 'सिल्वर बियर' पुरस्कार जीत लिया. लंदन में जन्मीं 31 वर्षीय सैली हॉकिंस को गर्भपात पर बनाई गई माइक ली की हास्य फ़िल्म 'हैप्पी गो लकी' में बेहतरीन काम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला. सैली ने लंबे समय तक छोटे पर्दे पर भी काम किया है. समलैंगिक महिलाओं पर बना विवादास्पद कार्यक्रम 'टिपिंग द वेलवेट' से उन्हें ख़ूब नाम मिला. जर्मनी का राजधानी में आयोजित 58वें बर्लिन महोत्सव में कुल 21 फ़िल्में दिखाई गईं. हालाँकि शीर्ष आलोचकों के बीच 'गोल्डन बियर' के मसले पर स्पष्ट आम राय नहीं थी. फ़िल्म पत्रिका 'वैरायटी' ने तो यहाँ तक कहा कि महोत्सव के दौरान कुछ निराशा हाथ लगी. पत्रिका ने लिखा, \"प्रतियोगिता पिछले सालों के मुक़ाबले कागज़ पर ज़्यादा प्रभावी नज़र आ रही थी लेकिन असल में कुछ नाम चुनौतीपूर्ण और नए तरह का काम पेश कर पाने में विफल रहे.\" क़ैदियों पर बनी फ़िल्म भी जीती महोत्सव में आई प्रमुख फ़िल्मों में फ़्राँस की 'आई हैव लव्ड यू सो लॉंग' भी शामिल थी. इस फ़िल्म में क्रिस्टिन स्कॉट थॉमस अहम भूमिका में हैं. 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तेज़ कर दिए हैं. यहाँ तमिल विद्रोही संगठन, एलटीटीई का प्रभाव है. सेना ने एलटीटीई के ठिकानों को निशाना बनाकर इस इलाके में हमले किए हैं पर इससे स्थानीय लोगों में घबराहट है और वे बड़ी तादाद में अपने घरों को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुए हैं. श्रीलंका की सेना लड़ाकू जेट विमानों की मदद से इस इलाके में तेज़ी से हमले कर रही है. अभियान तेज़ पिछले कुछ समय में सेना के तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान में काफी तेज़ी आई है. इस दौरान एलटीटीई को काफी नुकसान भी हुआ है. किलिनोच्चि के इलाके में श्रीलंका पुलिस का मुख्यालय अभी तक तमिल विद्रोहियों के नियंत्रण में है और सेना ने अपने ताज़ा अभियान के दौरान इसपर बमबारी की है. एक स्थानीय अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि सेना के हवाई हमले में दो दिन पहले कम से कम छह लोगों की मौत हो गई थी. सेना और तमिल विद्रोहियों की इस लड़ाई में सबसे ज़्यादा आम नागरिक प्रभावित हो रहे हैं. राहत एजेंसियों ने इस क्षेत्र में रह रहे लोगों की स्थिति पर चिंता जताई है. राहत एजेंसियों ने यह भी बताया कि सरकार की ओर से उन्हें तमिल विद्रोहियों के प्रभाव वाले इलाके में जाने की अनुमति मिल गई 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नॉर्थ कोस्ट 500'. इसे दुनिया के 6 सबसे ख़ूबसूरत तटीय हाइवे की फ़ेहरिस्त में शामिल किया गया है. ग्रेट ब्रिटेन का स्कॉटलैंड सूबा एक ठंडा और पहाड़ी इलाक़ा है. इन पहाड़ों में क़ुदरती ख़ूबसूरती के कई ख़ज़ाने छिपे हैं. लेकिन मुश्किल रास्तों की वजह से यहाँ तक आम लोगों का पहुँचना मुश्किल होता था. मक़सद- नए मौक़े पैदा करना यहाँ के लोग बाहरी दुनिया से कटे रहते थे. इन इलाक़ों तक सैलानियों को पहुँचाने और स्थानीय लोगों के लिए कारोबार के नए मौक़े पैदा करने के मक़सद से ही साल 2015 में ये रूट बनाया गया था. एनसी-500 का सफ़र इनवारनेसशायर काउंटी से शुरू होता है और ये ऊंचे-नीचे पहाड़ी इलाक़ों से होता हुआ आगे बढ़ता है. रास्ते भर में बहुत से ख़ूबसूरत पहाड़, हरे-भरे मैदान और सफ़ेद चमचमाते समुद्री किनारे मिलते हैं. एनसी-500 के आइडिया पर काम करने वाले टॉम कैंपबेल का कहना है कि जब वो इन पहाड़ी इलाक़ों में आये तो उन्हें लगा कि अगर एक अच्छा रास्ता बना दिया जाए तो इन इलाक़ों को टूरिज़म के लिहाज़ से विकसित किया जा सकता है. इससे ना सिर्फ़ पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि रोज़गार के लिए जूझ रहे यहाँ के लोगों को कमाने 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(नोटः ये बीबीसी ट्रेवल की मूल कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है.) (मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रेवल पर उपलब्ध है.) 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अलगाववादी संगठन, अल्फ़ा का हाथ है. अल्फ़ा इससे साफ़ इनकार करता है. एक नए संगठन, इस्लामिक सिक्योरिटी फ़ोर्स (आईएसएफ़) का नाम सामने आया है जो इन धमाकों की ज़िम्मेदारी ले रहा है पर पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग इस तरह के किसी संगठन की जानकारी से इनकार कर रहा है. इस बीच भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी धमाकों के बाद हालात का जायज़ा लेने के लिए शनिवार को असम दौरे पर जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि उनके साथ यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के भी असम पहुँचने की संभावना है. गुरुवार को असम में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था. इन धमाकों में अबतक 76 लोगों की मौत हो चुकी है. डेढ़ सौ से ज़्यादा लोग इन धमाकों में घायल हो गए हैं. फ़ॉरेंसिक विशेषज्ञ मलबे से धमाकों के सूत्र की तलाश में जुटे हैं. पुलिस अधिकारी और गृह मंत्रालय फिलहाल कुछ भी साफ़ तौर पर कह पाने की स्थिति में नहीं हैं. अनसुलझी गुत्थी गुरुवार को धमाकों में गुवाहाटी, पश्चिमी शहर कोकराझार और असम के निचले हिस्से के बारपेटा और बोंगाईगाँव इलाकों को निशाना बनाया गया था. पर धमाकों को दो दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक पुलिस या 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राज्य में पनपे जनाक्रोश से चिंतित और दबाव में है और इसीलिए इन हमलों से पल्ला झाड़ रहा है. पर पुलिस की दलील से उलट अल्फ़ा की ओर से जारी एक बयान में गुरुवार को ही कह दिया गया था कि उनका इन धमाकों से कोई ताल्लुक नहीं है. प्रधानमंत्री का दौरा बम विस्फोटों के बाद स्थिति का जायज़ा लेने के लिए शनिवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह असम पहुँच रहे हैं. मनमोहन सिंह असम से ही राज्यसभा के सदस्य हैं. संभावना है कि उनके साथ यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी भी जाएँगीं, हालांकि इसकी अधिकृत रुप से घोषणा नहीं की गई है. केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल पहले से ही गुवाहाटी में हैं. गृहमंत्री ने शुक्रवार को राज्य की स्थिति का आकलन करने के लिए एक बैठक भी ली है. अधिकारियों का कहना है कि मनमोहन सिंह असम के राज्यपाल शिवचरण माथुर, मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनके मंत्रियों सहित राज्य के कई आला अधिकारियों से मिलेंगे. संभव है कि प्रधानमंत्री गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज जाकर विस्फोट में घायल हुए लोगों से भी मुलाक़ात करेंगे. इससे पहले विस्फोट की कड़ी निंदा करते हुए मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि इन विस्फोटों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को 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सरकार ने इन प्रस्तावों पर असंतोष तो व्यक्त किया है लेकिन उम्मीद भी जताई है कि इसके आधार पर बातचीत फिर से शुरु हो सकती है. इन प्रस्तावों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वागत हुआ था क्योंकि वर्षों के ख़ून-ख़राबे के बाद शांति की किरण नज़र आ रही है. लेकिन पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक अंतरिम प्रशासन की स्थापना के लिए संविधान में संशोधन की ज़रूरत होगी जिसके लिए सरकार को विपक्ष के सहयोग लेना ज़रूरी होगा. फ्रीडम पार्टी फ्रीडम पार्टी ने इन प्रस्तावों पर चिंता तो जताई है लेकिन ऐसा लगता है कि इस मुद्दे पर ख़ुद पार्टी में भी मतभेद हैं. पार्टी ने इन प्रस्तावों पर मीडिया के सामने अपनी राय रखने के लिए दो बार संवाददाता सम्मेलन की घोषणा की लेकिन स्थगित कर दिया गया. अब पार्टी ने एक लंबा बयान जारी किया है जिसमें चिंता व्यक्त की गई है कि तमिल विद्रोही अंतरिम प्रशासन को अपना एक स्वतंत्र राज्य बनाने की दिशा में एक साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. फ्रीडम पार्टी का कहना है कि तमिल विद्रोही सरकार चलाने के लिए बिना किसी रोकटोक के अधिकार चाहते हैं जिससे एक आज़ाद राज्य का रास्ता निकल सकता है. पार्टी का कहना है कि अगर विद्रोहयों को समुद्री क्षेत्र पर भी अधिकार दिया गया तो इससे अंतरराष्ट्रीय जन परिवहन और भारतीय क्षेत्र की सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो सकता है. लेकिन पार्टी ने इस बारे में सिर्फ़ अपनी चिंताएं जताई हैं और सरकार को क्या रूख़ अपनाना चाहिए, इस बारे में कुछ नहीं कहा है.\n\nSummary:", "target": "श्रीलंका के मुख्य विपक्षी दल ने फ्रीडम पार्टी ने जातीय समस्या को हल करने के लिए एक अंतरिम प्रशासन की स्थापना के तमिल विद्रोहियों के प्रस्तावों पर गहरी चिंता जताई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nश्रीलंका फ्रीडम पार्टी ने हालाँकि यह नहीं कहा है कि क्या इन प्रस्तावों के आधार पर सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच कोई बातचीत होनी चाहिए या फिर इन प्रस्तावों को सिरे से ख़ारिज कर देना चाहिए. ग़ौरतलब है कि तमिल विद्रोहियों के संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) ने पिछले सप्ताह एक दस्तावेज़ नॉर्वे के दूत के माध्यम से सरकार तक पहुँचाया है जिसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक अंतरिम प्रशासन का प्रस्ताव रखा गया है. दस्तावेज़ के अनुसार पूर्वोत्तर क्षेत्र में तमिल विद्रोहियों 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खेल के दौरान इस तरह के दुर्व्यवहार पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के नियम काफ़ी सख़्त हैं. आईसीसी के नियमों के मुताबिक़ क्रिकेट में थप्पड़ मारना लेबल-4 की श्रेणी वाला अपराध है और इसके लिए हरभजन सिंह पर आजीवन प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है. सोमवार को यह सुनवाई दिल्ली स्थित मौर्या शेरेटन होटल में हो रही है. दोपहर तक इस मामले में सुनवाई का काम शुरू हो जाएगा. जाँचकर्ताओं ने इस मारपीट के मामले में हरभजन सिंह और श्रीसंत, दोनों को ही तलब किया है. कड़ी सज़ा हरभजन की मुश्किल इसलिए भी बढ़ सकती है क्योंकि मैच रेफ़री का रुख़ इस पूरे मामले में निर्णायक है और मैच के रेफ़री थे फ़ारुख़ इंजीनियर, जो अपने कड़े तेवर के लिए जाने जाते हैं. फ़ारुख़ इंजीनियर को जानने वाले बताते हैं कि उनकी छवि एक कठिन, ईमानदार और उसूलों वाले क्रिकेटर की रही है इसलिए उनसे किसी तरह की नरमी की उम्मीद रखना बेकार ही साबित होगा. फ़ारुख़ इंजीनियर कह भी चुके हैं कि हरभजन सिंह के मामले में तथ्यों को छुपाया नहीं जाएगा. ऐसे मामलों में आरोप साबित होने पर खिलाड़ी के खेलने पर जीवन भर का प्रतिबंध लगाया जा सकता है या उसे पाँच टेस्ट मैच या 10 एक दिवसीय मैचों के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है. शुक्रवार को श्रीसंत को थप्पड़ मारने के कथित आरोप के बाद हरभजन को आईपीएल के मैचों से निलंबित कर दिया गया था. आयोजकों की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि मुंबई इंडियंस टीम के कोच लालचंद राजपूत और टीम के मैनेजर भी सुनवाई के दौरान उपस्थित रहेंगे. किंग्स इलेवन पंजाब की ओर से मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नील मैक्सवेल, कप्तान युवराज सिंह और एस श्रीसंत भी सुनवाई के दौरान उपस्थित रहेंगे. सुनवाई के दौरान आईपीएल के अध्यक्ष और कमिश्नर ललित मोदी भी उपस्थित रहेंगे.\n\nSummary:", "target": "हरभजन सिंह की श्रीसंत से झड़प के मामले में आज यानी सोमवार को दिल्ली में सुनवाई होनी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस सुनवाई के दौरान अगर हरभजन सिंह पर यह दोष साबित होता है कि उन्होंने श्रीसंत को थप्पड़ मारा था तो उन्हें कड़ी सज़ा भी हो सकती है. आरोप है कि हरभजन सिंह ने शुक्रवार को आईपीएल के मैच के बाद श्रीसंत को तमाचा मारा था. हालाँकि हरभजन इससे इनकार करते हैं. मैदान पर खेल के दौरान इस तरह के दुर्व्यवहार पर 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ओवरों में सात विकेट खोकर 151 रन बनाए. इसके जवाब में कोलकाता नाइट राइडर्स ने दो गेंदें शेष रहते ही सात विकेट पर 153 रन बना लिए. कोलकाता की तरफ से एस यादव ने 43 रनों की नाबाद पारी खेली जबकि मनीष पांडे ने 24 और रोबिन उथप्पा ने 23 रनों का योगदान दिया. पर्थ स्कार्चर्स की शुरुआत अच्छी रही और उन्होंने पहले विकेट की साझेदारी में 68 रन बनाए. सलामी बल्लेबाज़ एसी वोज्स ने 52 गेंदों में 71 रन बनाए. कोलकाता की शुरुआथ अच्छी नहीं रही और गंभीर सिर्फ दो रन बनाकर आउट हो गए लेकिन इसके बाद मनीष पांड ने पारी संभाली और आगे चलकर एस यादव ने टीम को जीत दिला दी. कोलकाता की ओर से सुनील नारायण ने चार विकेट लिए और कुलदीप यादव ने तीन. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "चैंपियंस लीग टी-20 के एक मैच में कोलकाता नाइटराइडर्स ने पर्थ स्कार्चर्स को तीन विकेट से हरा दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहैदराबाद में खेले गए इस मैच में पर्थ स्कार्चर्स ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में सात विकेट खोकर 151 रन बनाए. इसके जवाब में कोलकाता नाइट राइडर्स ने दो गेंदें शेष रहते ही सात विकेट पर 153 रन बना लिए. कोलकाता की तरफ से एस यादव ने 43 रनों की नाबाद पारी खेली जबकि मनीष पांडे ने 24 और रोबिन उथप्पा ने 23 रनों का योगदान दिया. पर्थ स्कार्चर्स की शुरुआत अच्छी रही और उन्होंने पहले विकेट की साझेदारी में 68 रन बनाए. सलामी बल्लेबाज़ एसी वोज्स ने 52 गेंदों में 71 रन बनाए. कोलकाता की शुरुआथ अच्छी नहीं रही और गंभीर सिर्फ दो रन बनाकर आउट हो गए लेकिन इसके बाद मनीष पांड ने पारी संभाली और आगे चलकर एस यादव ने टीम को जीत दिला दी. कोलकाता की ओर से सुनील नारायण ने चार विकेट लिए और कुलदीप यादव ने तीन. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन में दवाओं की नियामक संस्था एमएचआरए ने कहा है कि 30 साल के कम उम्र के लोगों को एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन नहीं दी जाएगी और उन्हें इसका कोई दूसरा विकल्प दिया जाएगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनियामक संस्था का कहना है कि एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन लेने के बाद ब्लड क्लॉटिंग (ख़ून का थक्का जमना) की शिकायत मिलने के बाद ऐसा किया गया है. नियामक संस्था ने अपनी जाँच में पाया है कि मार्च के आख़िर तक यूके में जिन लोगों को भी एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन दी गई थी उनमें से 79 लोग ब्लड क्लॉटिंग के शिकार हुए थे और उनमें से 19 लोगों की मौत हो गई है. हालांकि एमएचआरए ने कहा कि इस बात के कोई पुख़्ता सबूत नहीं हैं कि कोरोना की एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन के कारण ही ब्लड क्लॉटिंग हुई है लेकिन ये भी सच है कि ब्लड क्लॉटिंग और वैक्सीन के बीच संबंध और गहरे होते जा रहे हैं. ब्लड क्लॉटिंग के मामले जिन लोगों में देखे गए हैं, उनमें तकरीबन दो तिहाई महिलाएं हैं. मरने वाले लोगों की उम्र 18 साल से 79 साल के बीच थी. समाप्त एमएचआरए की सिफ़ारिश ब्रिटेन में एस्ट्रेज़ेनेका वैक्सीन की अब तक दो करोड़ ख़ुराक दिए जा चुके हैं. इससे पहले यूरोपीय संघ में दवाओं का नियमन करने वाली एजेंसी ने कहा था कि ख़ून के थक्के बनने की घटना को एस्ट्रेज़ेनेका वैक्सीन इक्का-दुक्का मामलों में होने वाले साइड इफ़ेक्ट के रूप में देखा जाना चाहिए. एमएचआरए की डॉक्टर जूनी रैनी ने कहा कि इस वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट बहुत दुर्लभ हैं. और इस बारे में और खोज हो रही है कि क्या इस वैक्सीन से ख़ून के थक्के जमते हैं. हालांकि उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोगों के लिए इस वैक्सीन के नुक़सान से ज्यादा फ़ायदे हैं. लेकिन उनकी राय में युवाओं के लिए यह ज्यादा फ़ायदेमंद है. नियामक संस्था ने कहा कि ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट बहुत ही दुर्लभ हैं और वैक्सीन के प्रभावी होने में कोई कमी नहीं है. एमएचआरए ने कहा कि ज़्यादातर लोगों के लिए इस वैक्सीन को लेने के फ़ायदे अभी भी बहुत ज़्यादा हैं. उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों ने भी इसका पहला डोज़ लिया है उन्हें इसका दूसरा डोज़ भी लेना चाहिए, लेकिन जो लोग ख़ून के थक्का जमने के शिकार हुए हैं उन्हें इसकी दूसरी ख़ुराक नहीं लेनी चाहिए. नियामक संस्था की इस रिपोर्ट के बाद सरकार की सलाहकार संस्था जेसीवीई ने सिफ़ारिश की है कि 18 से 29 साल की उम्र के लोगों को एस्ट्राज़ेनेका के बजाए कोई और वैक्सीन दी जाए. ब्रितानी सरकार को वैक्सीन पर सलाह देने वाली संस्था जेसीवीआई के के प्रोफ़ेसर लिम वेई शेन का कहना है कि ये कदम किसी गहन चिंता की वजह से नहीं बल्कि एहतियात के तौर पर उठाया गया है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए भारत के आइस हॉकी खिलाड़ियों को चंदे का सहारा लेना पड़ रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअगले हफ़्ते होने वाले इंटरनेशनल आइस हॉकी फ़ेडरेशन चैलेंज कप में हिस्सा लेने कुवैत जाने के लिए इन खिलाड़ियों के पास पैसे नहीं हैं. 25 खिलाड़ियों के इस दल को उम्मीद है कि हफ़्ते भर तक चलने वाले इस टूर्नामेंट के लिए वे 20 लाख रुपए इकट्ठा कर लेंगे. भारत के क्रिकेट स्टार कई लाख डॉलर कमा सकते हैं, लेकिन जब बाकी खेलों की बात आती है तो खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए पर्याप्त पैसा इकट्ठा करने के लिए जूझना पड़ता है. बिज़नेस ग्रुप आगे आए पैसा इकट्ठा करने के लिए पिछले सप्ताह देश के आइस हॉकी एसोसिएशन ने ट्विटर हैशटैग ##SupportIceHockey से एक अभियान शुरू किया है और इसके लिए एक वेबसाइट बनाई है. समाप्त एसोसिएशन के डायरेक्टर अक्षय कुमार ने बीबीसी को बताया कि बीते बुधवार तक छह लाख़ रुपए इकट्ठा हो गए थे. इसमें एक बड़ा हिस्सा दक्षिण भारत के एक बिज़नेस ग्रुप द्वारा दिया गया अनुदान है. खिलाड़ियों को एक और अग्रणी कारोबारी समूह महिंद्रा की ओर से पांच लाख रुपए का भरोसा मिला है. समूह के मालिक आनंद महिंद्रा ने ट्वीट कर 'इन उत्साही खिलाड़ियों के हौसले' का समर्थन करने की घोषणा की थी. लोगों का समर्थन अक्षय कुमार कहते हैं, \"बहुत से लोग फोन कर रहे हैं और चंदा देने में रुचि दिखा रहे हैं. लोगों की अच्छी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं.\" भारत की आइस हॉकी टीम साल 2009 से ही अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेती रही है. कुमार के मुताबिक़, \"लेकिन फंड की दिक्कत बनी रहती है. टीम को आगे बढ़ते रहने के लिए हम हमेशा ही अपनी जेब से खर्च करते हैं लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चल सकता.\" उन्होंने कहा, \"सरकार कहती है कि पदक जीतो, उसके बाद हम आपको फंड देंगे. यह बड़ी अजीबो ग़रीब स्थिति है.\" एक सदी पुराना खेल हालांकि भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से में आइस हॉकी अपेक्षाकृत कम जाना पहचाना खेल है. एक शताब्दी पहले इस खेल की शुरुआत शिमला में अंग्रेज़ों ने की थी. बाद में 1970 के दशक में भारत प्रशासित लद्दाख क्षेत्र में भारतीय सेना ने इसे अपने खेलों में दोबारा शामिल किया और तबसे इसकी लोकप्रियता बढ़ी है. वर्तमान में भारत में 2500 आइस हॉकी खिलाड़ी पंजीकृत हैं. यह संख्या 2002 में 300 थी. इसी दौरान इस खेल के एसोसिएशन का गठन किया गया. भारत में लद्दाख में इस खेल के लायक कई बर्फीले मैदान हैं लेकिन केवल एक ऐसा मैदान है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर ख़रा उतरता है और यह देहरादून में है. अक्षय कुमार कहते हैं, \"लेकिन इच्छा शक्ति की कमी की वजह से देहरादून का मैदान 2012 से ही बंद पड़ा हुआ है.\" खिलाड़ी मुंबई, गुड़गांव, कोचीन और बैंगलुरु में मौजूद अपेक्षाकृत छोटे बर्फीले मैदानों पर अभ्यास करते हैं. 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ब्रांड्स में निवेश करने की दीर्घकालीन प्रतिबद्धता है और ये निवेश उसी का हिस्सा है. इससे हम अपना व्यापार टिकाऊ और ज़िम्मेदार तरीके से बढ़ा सकेंगे.\" उन्होंने आगे कहा, \"भारत की जनसंख्या, यहां के आर्थिक और सामाजिक मापदंड, ये सभी विकास को बढ़ावा देते हैं और हम ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हम इन मौकों का फ़ायदा उठा पाएंगे.\" अहम बाज़ार तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और पहले के मुक़ाबले में ज़्यादा समृद्ध मध्य वर्ग के चलते भारत आज दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते उपभोक्ता बाज़ारों में से एक है. इसका फ़ायदा कोका कोला को भी हुआ है. कंपनी ने पिछली 21 तिमाहियों में से 15 में दस प्रतिशत या इससे ज़्यादा की विकास दर दर्ज की है. कोका कोला के यूरेशिया और अफ़्रीका समूह के अध्यक्ष अहमद सी बोज़र कहते हैं कि कंपनी की दिलचस्पी भारत के बढ़ते बाज़ार का फ़ायदा उठाने की है. उन्होंने कहा, \"कंपनी का वर्ष 2020 तक अपनी आय और सेवाएं दुगुनी करने का लक्ष्य है और इसके लिए भारत एक अहम बाज़ार है.\" बोज़र ने ये भी कहा, \"अगर हम प्रतिदिन और हर बार सही कदम उठाएं तो मुझे हैरानी नहीं होगी कि इस दशक के अंत तक भारत हमारी कंपनी 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ने कहा है, टोनी ब्लेयर के दौरे का मकसद सभी पक्षों की बात सुनना है, इसलिए हम फ़लस्तनी राष्ट्रपति की बात सुनने के लिए आएँ हैं. फ़लस्तीनी चुनावों में इस बार हमास विजयी रहा है और फ़िलहाल हमास की ही सरकार है. रमल्ला पहुँचने से पहले टोनी बल्येर ने इसराइल के प्रधानमंत्री एहुद ओलमर्ट से मुलाकात की थी. एहुद ओलमर्ट ने कहा है कि कि शांति के प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए वे बिना शर्त फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास से मुलाकात के लिए तैयार हैं. अपने पहले दिए गए बयानों से पलटते हुए उन्होंने कहा कि वे इस मुलाकात से पहले ये शर्त नहीं रखेंगे कि इसराइली जवान गिलाद शालित, जिन्हें फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने पकड़ रखा है, उन्हें रिहा किया जाए. प्रधानमंत्री ओलमर्ट फ़लस्तीनी नेता अब्बास से जून में मिले थे लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद इसराइली सैनिक को फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने पकड़ लिया और तनाव बढ़ गया. तब से अब तक ग़ज़ा में इसराइली छापों में 200 से ज़्यादा फ़लस्तीनी मारे गए हैं.\n\nSummary:", "target": "फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास ने कहा है कि वे इसराइली प्रधानमंत्री एहुद ओलमर्ट से 'बिना किसी शर्त' के मिलने को तैयार 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ग़ज़ा पट्टी में जारी इसराइली हवाई हमले से पैदा संकट को ख़त्म करने के लिए मिस्र ने संघर्षविराम का प्रस्ताव दिया है, जिसे इसराइल ने स्वीकार कर लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमंगलवार को इसराइल के कैबिनेट की बैठक में इस बारे में फ़ैसला लिया गया. हमास की तरफ़ से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है, लेकिन उसके हथियारबंद गुट ने इसे 'आत्मसमर्पण' क़रार दिया है. मिस्र की राजधानी क़ाहिरा में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों की लंबी बैठकों के बाद ये प्रस्ताव सामने आया है. इसराइल और ग़ज़ा में शासन करने वाले हमास, के बीच संघर्ष विराम से ग़ज़ा के लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है. इससे ग़ज़ा पट्टी पर मंगलवार से जारी इसराइली हमला थम जाएगा. जिसमें अब तक कम से कम 192 लोगमारे गए हैं, जबकि इसराइल का कहना है कि इस दौरान उसकी तरफ ग़ज़ा पट्टी से लगभग एक हज़ार रॉकेट दाग़े गए हैं. इस संकट के कारण जहां हज़ारों फ़लस्तीनी ग़ज़ा पट्टी को छोड़ कर भाग रहे हैं, वहीं इसराइल ने सीमा के नज़दीक अपने हज़ारों सैनिकों को तैनात कर दिया है जिससे ग़ज़ा में ज़मीनी हमले की अटकलें लगाई जा रही हैं. 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(अरमान को मिली ज़मानत) महिला सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी के मुताबिक़ 'बिग बॉस' शो में इस तरह की हरक़तें बिलकुल अक्षम्य हैं. महिलाओं के साथ शो में बदतमीज़ी की जा रही है. शो को फ़ौरन बंद करना चाहिए और अरमान ही नहीं बल्कि इसके निर्माता को भी जेल में बंद कर देना चाहिए. सोशल मीडिया पर भी शो के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगी हैं. कई लोगों का मानना है कि शो का फॉर्मेट ही इस तरह का है जो लोगों को बुरा बरताव करने पर मजबूर करता है. शो में महिलाओं का ग़लत चित्रण होता है और उनके साथ ग़लत व्यवहार भी हो रहा है. इससे लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कहा ये भी जा रहा है कि जब अरमान वापस अपनी कार में बिग बॉस हाउस जा रहे थे तो कथित तौर पर कुछ महिलाओं ने उनकी कार पर सड़े टमाटर फेंके. 10 करोड़ के रोहित शेट्टी बतौर निर्देशक कई सुपरहिट फ़िल्में देने वाले रोहित शेट्टी अब टीवी रियलिटी शो 'ख़तरों के खिलाड़ी' की मेज़बानी करेंगे. इस शो को पहले अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारे होस्ट कर चुके हैं. ख़बरें हैं कि शो के नए सत्र के लिए रोहित के अलावा उनके क़रीबी दोस्त और अभिनेता अजय देवगन और सोनू सूद को भी अप्रोच किया गया था लेकिन बाद में रोहित शेट्टी के नाम पर सहमति बन गई. कथित तौर पर रोहित शेट्टी को शो की मेज़बानी के लिए 10 करोड़ रुपए फ़ीस दी जाएगी. फ़रवरी 2014 में इस शो को अर्जेंटीना में शूट किया जाएगा. आमिर का सचिन को तोहफ़ा आमिर ख़ान और सचिन तेंदुलकर की दोस्ती के किस्से नए नहीं है. सचिन तेंदुलकर के करियर का आख़िरी टेस्ट देखने आमिर ख़ान भी तीनों दिन मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मौजूद रहे. अब ख़बरों के मुताबिक़ वो अपनी आने वाली फ़िल्म 'धूम-3' की स्पेशल स्क्रीनिंग का आयोजन ख़ास सचिन तेंदुलकर के लिए कर रहे हैं. (आमिर का अफ़सोस) ग़ौरतलब है कि फ़िल्म की रिलीज़ से पहसे इसका सस्पेंस ना खुले इसके लिए आमिर ने कोई प्रीमियर या प्रेस शो भी नहीं रखा है लेकिन सचिन तेंदुलकर के लिए वो 'धूम-3' की स्पेशल स्क्रीनिंग रख रहे हैं. इस दौरान आमिर का पूरा परिवार भी मौजूद रहेगा. (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं)\n\nSummary:", "target": "टीवी रियलिटी शो 'बिग बॉस' में अरमान कोहली के वापस जाने पर किसे है सख़्त एतराज़, निर्देशक रोहित शेट्टी की नई भूमिका और सचिन तेंदुलकर को आमिर ख़ान का ख़ास तोहफ़ा. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसोफ़िया हयात से झगड़े के बाद अरमान कोहली की बड़े पैमाने पर आलोचना हो रही है. अरमान कोहली पर हंगामा अभिनेता अरमान कोहली के टीवी रियलिटी शो 'बिग बॉस' में दोबारा जाने पर हंगामा हो गया है. दरअसल शो की प्रतियोगी अभिनेत्री सोफ़िया हयात ने अरमान पर शो के दौरान मारपीट करने और बदसलूकी का आरोप लगाया था और उनकी शिक़ायत पर पुलिस ने उन्हें बिग बॉस हाउस से सोमवार को ग़िरफ़्तार कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई और वो दोबारा 'बिग बॉस' हाउस में आ गए. इस पर कई समाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरा विरोध जताया है. (अरमान को मिली ज़मानत) महिला सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी के मुताबिक़ 'बिग बॉस' शो में इस तरह की हरक़तें बिलकुल अक्षम्य हैं. महिलाओं के साथ शो में बदतमीज़ी की जा रही है. शो को फ़ौरन बंद करना चाहिए और अरमान ही नहीं बल्कि इसके निर्माता को भी जेल में बंद कर देना चाहिए. सोशल मीडिया पर भी शो के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगी हैं. कई लोगों का मानना है कि शो का फॉर्मेट ही इस तरह का है जो लोगों को बुरा बरताव करने पर मजबूर करता है. शो में महिलाओं का ग़लत चित्रण होता है और उनके साथ ग़लत व्यवहार भी हो रहा है. इससे लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कहा ये भी जा रहा है कि जब अरमान वापस अपनी कार में बिग बॉस हाउस जा रहे थे तो कथित तौर पर कुछ महिलाओं ने उनकी कार पर सड़े टमाटर फेंके. 10 करोड़ के रोहित शेट्टी बतौर निर्देशक कई सुपरहिट फ़िल्में देने वाले रोहित शेट्टी अब टीवी रियलिटी शो 'ख़तरों के खिलाड़ी' की मेज़बानी करेंगे. इस शो को पहले अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारे होस्ट कर चुके हैं. ख़बरें हैं कि शो के नए सत्र के लिए रोहित के अलावा उनके क़रीबी दोस्त और अभिनेता अजय देवगन और सोनू सूद को भी अप्रोच किया गया था लेकिन बाद में रोहित शेट्टी के नाम पर सहमति बन गई. कथित तौर पर रोहित शेट्टी को शो की मेज़बानी के लिए 10 करोड़ रुपए फ़ीस दी जाएगी. फ़रवरी 2014 में इस शो को अर्जेंटीना में शूट किया जाएगा. आमिर का सचिन को तोहफ़ा आमिर ख़ान और सचिन तेंदुलकर की दोस्ती के किस्से नए नहीं है. सचिन तेंदुलकर के करियर का आख़िरी टेस्ट देखने आमिर ख़ान भी तीनों दिन मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मौजूद रहे. अब ख़बरों के मुताबिक़ वो अपनी आने वाली फ़िल्म 'धूम-3' की स्पेशल स्क्रीनिंग का आयोजन ख़ास सचिन तेंदुलकर के लिए कर रहे हैं. 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'साई' खोलेगा अकादमी भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के निदेशक जीजी थॉम्पसन ने बीबीसी से बातचीत में माना कि यह चिंता का विषय है. उनका कहना था, \"यह दुख़द है कि आने वाले समय में भारत के पास उसके स्टार खिलाड़ियों की जगह भरने वाले खिलाड़ी नहीं हैं. अगर वो कहीं हैं भी तो उनकी ख़ोज के लिए संसाधन इकट्ठे करने ज़रूरी हैं. इसके प्रयास हमने शुरू किए हैं.\" उन्होंने बताया, \"भारतीय खेल प्राधिकरण देश के कोने-कोने में प्रतिभाएं निखारने के लिए 10 से ज़्यादा खेल अकादमी बनाने जा रहा है. साथ ही यहां विशिष्ट खेल प्रशिक्षण संस्थान भी बनाए जाएंगे ताकि एशिया भर से खिलाड़ी यहां आकर खेलें. पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका से खिलाड़ियों के आने से न केवल भारत में खेलों का स्तर बढ़ेगा बल्कि हमारी आय भी बढ़ेगी.\" अभी तो ये अकादमियां प्रस्ताव के स्तर पर हैं और जो काम कर रहीं हैं, वो ज़रूरतें देखते हुए पूरी नहीं कही जा सकती. ऐसे में, अगर भारत के सितारे खिलाड़ियों ने खेल को अलविदा कहा तो भारत को भी मेडल तालिका में कई मेडलों से हाथ धोना पड़ सकता है. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें. आप हमसे फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "23 जुलाई से ग्लासगो में शुरू हो रहे कॉमनवेल्थ खेलों की मेडल तालिका पर दावेदारी की बात करें, तो भारत काफ़ी अच्छी स्थिति में नज़र आता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत के पास कई अच्छे खिलाड़ी हैं जैसे बैडमिंटन में- पीवी सिंधू, पी कश्यप वहीं एथलेटिक्स में ट्रिपल जंप के राष्ट्रीय रिकॉर्डधारक अरपिंदर सिंह, मुक्केबाज़ी में विजेंदर सिंह, धावकों में टिंटू लूका. कुश्ती तो अपने स्वर्णिम काल में है. सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त, अमित कुमार, बजरंग पूनिया विश्व के टॉप 10 पहलवानों में से हैं. मगर भारत के लिए जितना यह गर्व करने वाली बात है, उतना ही परेशानी का सबब. सेकेंड लाइन को मौक़ा नहीं कुश्ती के राष्ट्रीय कोच और द्रोणाचार्या अवार्ड से सम्मानित यशवीर सिंह कहते हैं, \"हम अपने टॉप खिलाड़ियों पर इस कदर निर्भर हैं कि सेकेंड लाइन की तरफ़ देखना ही नहीं चाहते. अगर कभी कोई बड़ा खिलाड़ी चोटिल हो जाए, तो हमारे पास दूसरा खिलाड़ी नहीं है उसकी जगह लेने के लिए.\" यह बात इसलिए ग़ौर करने लायक है क्योंकि देश में जूनियर लेवल की प्रतियोगिताएं तो बहुत होती हैं लेकिन इन्हें ज्यादा प्रचार नहीं मिलता. दिल्ली सरकार में खेल निदेशक, पद्मश्री महाबली सतपाल ने बताया, \"हम राष्ट्रीय स्तर पर रोज़ नए रिकॉर्ड बनते देखते हैं. वो बच्चे देश के कई हिस्सों से आते हैं लेकिन उनका टैलेंट अभी तराशा जाना बाक़ी है और इसके लिए हमारे पास संसाधन नहीं हैं. हमारे संसाधन हमारे चैंपियनों के लिए ही कम पड़ जाते हैं.\" पहले यह बात चिंता का विषय नहीं थी लेकिन खेलों में भारत की सुधरती स्थिति देखते हुए अब इस ओर अधिकारियों का ध्यान गया है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "क्या आपको 'हुदहुद' चक्रवात के बारे में पता है कि इसकी जड़ें ओमान में हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहम चक्रवात के नाम की बात कर रहे हैं न कि तूफ़ान की. यह चक्रवात बंगाल की खाड़ी में उत्तरी अंडमान के पास उठा है और अब यह आंध्रप्रदेश और ओडिशा की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है. मगर इसका नाम ओमान में रखा गया है. हुदहुद अरबी भाषा में हूपु नाम की चिड़िया को कहा जाता है. पढ़ें पूरी ख़बर: कैसे रखे जाते हैं चक्रवातों के नाम 1953 से मायामी नेशनल हरीकेन सेंटर और वर्ल्ड मेटीरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (डब्लूएमओ) तूफ़ानों और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नाम रखता आ रहा है. डब्लूएमओ जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसी है. मगर उत्तरी हिंद महासागर में उठने वाले चक्रवातों का कोई नाम नहीं रखा गया था क्योंकि ऐसा करना काफ़ी विवादास्पद काम था. भारत के चक्रवात चेतावनी केंद्र के प्रमुख डॉक्टर एम माहापात्रा के मुताबिक़ इसके पीछे कारण यह था कि जातीय विविधता वाले इस क्षेत्र में हमें काफ़ी सावधान और निष्पक्ष रहने की ज़रूरत थी ताकि यह लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाए. डब्ल्यूएमओ मगर 2004 में तब स्थिति बदल गई, जब डब्लूएमओ की अगुवाई वाली अंतरराष्ट्रीय पैनल भंग कर दी गई और अपने-अपने क्षेत्र में आने वाले चक्रवात का नाम ख़ुद रखने को कहा गया. इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, श्रीलंका और थाईलैंड को मिलाकर कुल आठ देशों ने हिस्सा लिया. इन देशों ने 64 नामों की एक सूची सौंपी. हर देश ने आने वाले चक्रवात के लिए आठ नाम सुझाए. यह सूची हर देश के वर्ण क्रम के अनुसार है. इस क्षेत्र में आने वाला आख़िरी चक्रवात जून में आने वाला नानुक था, जिसका नाम म्यांमार ने रखा था. सदस्य देशों के लोग भी नाम सुझा सकते हैं. मसलन भारत सरकार इस शर्त पर लोगों की सलाह मांगती है कि नाम छोटे, समझ आने लायक, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और भड़काऊ न हों. वर्ण क्रम के अनुसार इस बार ओमान की बारी थी. लंबी सूची पिछले साल भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर आए पायलिन चक्रवात का नाम थाईलैंड ने रखा था. इस सूची में शामिल भारतीय नाम काफ़ी आम नाम हैं, जैसे मेघ, सागर, और वायु. अगली बार इस इलाक़े में चक्रवात के नामकरण की बारी पाकिस्तान की होगी. इसे नीलोफ़र कहा जाएगा. पिछली बार पाकिस्तान ने नवंबर 2012 में जिस चक्रवात का नाम रखा था उसे 'निलम' कहते हैं. डॉक्टर महापात्रा का कहना है कि हुदहुद संभवतः इस सूची का 34वां नाम है. इसका मतलब है कि अभी इस सूची में 30 नाम और हैं. चक्रवात विशेषज्ञों का पैनल हर साल मिलता है और ज़रूरत पड़ने पर सूची फिर से भरी जाती है. विवाद ऐसा नहीं कि 64 नामों की इस सूची को लेकर कोई विवाद नहीं रहा. 2013 में श्रीलंका की ओर से रखे 'महासेन' नाम को लेकर श्रीलंका के राष्ट्रवादियों और अधिकारियों ने विरोध जताया था जिसे बाद में बदलकर 'वियारु' कर दिया गया. उनके मुताबिक़ राजा महासेन श्रीलंका में शांति और समृद्धि लाए थे. इसलिए आपदा का नाम उनके नाम पर रखना ग़लत है. 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जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने भारतीय परिवारों को वहाँ आने की अनुमति दी है. ये लोग एक से 13 जून के बीच पाकिस्तान की कई जेलों का दौरा कर अपने परिजनों को ढूंढने की कोशिश करेंगे. उम्मीद गुजरात के दिलीप सिंह राठौर इन्हीं लोगों में से एक हैं. उनका कहना है, \"मेरा भाई कैप्टन कल्याण सिंह राठौर 1971 की लड़ाई लड़ा था. सेना का टेलीग्राम आया कि वो लापता है. इसके बाद शिमला समझौता हुआ और युद्धबंदियों की अदला-बदली हुई लेकिन मेरा भाई नहीं लौटा.\" उन्हें लगता है कि उनका भाई अभी भी पाकिस्तान की किसी न किसी जेल में क़ैद है. इन लोगों ने गुरुवार को भारत के रक्षा मंत्री एके एंटनी से भी मुलाक़ात की. दूसरी ओर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तसनीम असलम कहती हैं कि ऐसा कोई युद्धबंदी वहाँ की जेलों में नहीं है. फिर पाकिस्तान ने इस तरह की अनुमति क्यों दी, इस पर उनका कहना है, \"भारत की ओर से बार-बार इस तरह का अनुरोध किया गया. इसलिए मानवीय आधार पर यह फ़ैसला किया गया ताकि संबंधित लोग जेलों में जाकर ख़ुद बंदियों की सूची वगैरह देख लें.\" आरोप-प्रत्यारोप गुमशुदा सैनिकों के परिजनों का संगठन बनाने वाले लेफ़्टिनेंट कर्नल 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की जिसमें एक रेल लाइन का निर्माण और पन-बिजली परियोजनाओं से बिजली उत्पादन की क्षमता दोगुनी करना शामिल है. भारतीय प्रधानमंत्री ने ज़ोर देकर कहा कि भारत दोनों देशों के बीच व्यापक हितों के विषय पर भूटान के साथ सहयोग जारी रखेगा. उच्चस्तरीय बैठकों के बाद विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने कहा कि भारत भूटान तक रेलवे लाइन बिछाने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि संपर्क बढ़ सके और दोनों अर्थव्यवस्थाओं को इकट्ठे विकसित होने में मदद मिल सके. मनमोहन सिंह शनिवार को 1020 मेगावाट की तला पन-बिजली परियोजना भूटानी जनता को समर्पित करेंगे और 1095 मेगावाट की पुनात्सांग्छू पन-बिजली संयंत्र की आधारशिला रखेंगे.\n\nSummary:", "target": "भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उम्मीद जताई है कि भूटान अपनी सरज़मीं पर भारत विरोधी तत्वों को जड़ें जमाने की अनुमति नहीं देगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभूटान की दो दिन की यात्रा पर गए मनमोहन सिंह ने वहाँ के प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले से मुलाक़ात कर द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की. उन्होंने कहा, \"हम चाहते हैं कि हमारे राष्ट्रीय हितों पर परस्पर सहयोग 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जहाज पर कुल 273 लोग फंसे हुए हैं, जबकि एक दूसरे जहाज पर 137 लोग फंसे हुए हैं. फंसे हुए लोगों को बचाने के लिए नौसेना के युद्धपोत आईएनएस कोच्चि और आईएनएस कोलकाता को रवाना किया गया है. वीडियो रिपोर्ट: मधु पाल, सुप्रिया सोगले और आमिर ख़ान, बीबीसी के लिए (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अरब सागर में उठे तौक्ते तूफ़ान से महाराष्ट्र में जनजीवन प्रभावित है. भारतीय मौसम विभाग ने अगले कुछ घंटों के लिए मुंबई में भारी बारिश की चेतावनी दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमौसम विभाग ने ये भी कहा है कि बारिश के साथ तेज हवाएं भी चलेंगी. अगले कुछ घंटों के लिए चक्रवात का केंद्र मुंबई से 160 किलोमीटर दूर समुद्र में बताया गया है. इस तूफान के प्रभाव से रायगढ़, पालघर, मुंबई, ठाणे और रत्नागिरी में तेज हवाएं चल रही हैं. मुंबई में भारी बारिश हो रही है.मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को तूफान के कारण बंद कर दिया गया है. 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संभावनाओं पर विचार करना है. लेकिन फ़तह पार्टी में इस मुद्दे पर सहयोगकरने के लिए ज़्यादा उत्साह नहीं है. पिछले महीने हुए फ़लस्तीनी चुनाव में हमास ने फ़तह पार्टी को हराकर जीत हासिल की थी. संभावना है कि फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास अगले दो हफ़्ते में हमास से सरकार बनाने के लिए कहेंगे. हमास पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से इसराइल को मान्यता देने और हिंसा त्यागने का दबाव है और हमास के नेता ये भी विचार करेंगे कि इन मुद्दों का सामना कैसे किया जाए. बीबीसी संवाददाता लूसी विलियम्स के अनुसार हमास अब तक इसराइल को तबाह करने के अपने इरादे से पीछे नहीं हटा है और दूसरी ओर इसराइल के साथ-साथ कई पश्चिमी देश हमास को आतंकवादी संगठन मानते हैं.\n\nSummary:", "target": "नई फ़लस्तीनी सरकार के गठन पर बातचीत के लिए फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट हमास के नेता मिस्र की राजधानी काहिरा में उच्च स्तरीय बैठक कर रहे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग़ज़ा से कई नेता काहिरा में अपने संगठन के निर्वासित नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं. उनका मकसद फ़तह पार्टी के साथ मिलकर एक गठबंधन सरकार बनाने के 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{"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअयोध्या के कारसेवकपुरम में अभी भी मंदिर निर्माण की कोशिशें चल रही हैं. राजनीतिक हिंदुत्व के इतिहास में ये दोनों महत्वपूर्ण माने जाते हैं. जहां अयोध्या ने एक राजनीतिक दल को सत्ता में पहुंचाया वहीं गोधरा ने इसे सत्ता से बेदखल करने में एक बड़ी भूमिका निभाई. राजनीतिक हिंदुत्व पर सुनिए सुशील झा की रिपोर्ट.... तो क्या इन दोनों घटनाओं को राजनीतिक हिंदुत्व के उत्थान और पतन के प्रतीकों के रुप में देखा जा सकता है. पत्रकार मधुकर उपाध्याय कहते हैं, ‘‘ ये दोनों प्रतीक हैं और महत्वपूर्ण बात ये है कि इन दोनों घटनाओं से पहले ही इन्हें प्रतीक बनाने की शुरुआत हुई थी.’’ राजनीतिक नफा-नुकसान अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद गिराए जाने का राजनीतिक फायदा हुआ लेकिन क्या गोधरा का भी फ़ायदा हुआ. मधुकर कहते हैं, ‘‘ अयोध्या का फायदा तो राजनीतिक था केंद्र में सरकार बनने का. गोधरा की घटना ने भी राजनीति को परिभाषित किया कि आपको चीज़ों को वैसे ही देखना होगा जैसा हम चाहते हैं.’’ अयोध्या या गोधरा में ऐसी परिभाषा खोजने पर तो नहीं मिलती है लेकिन दिखाई ज़रुर देती है. अयोध्या में बाबरी की घटना होने से पहले रामजन्मभूमि की बात ज़रुर होती थी लेकिन ये सबसे बड़ा आकर्षण नहीं था लेकिन अब अयोध्या का सबसे बड़ा आकर्षण तिरपाल के नीचे रामलला की मूर्ति है. ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अयोध्या ने हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को फायदा पहुंचाया लेकिन क्या गोधरा का नुकसान नहीं हुआ. जेएनयू के छात्र यशवंत कहते हैं, ‘‘ बाबरी कांड के साथ लोगों ने खुद को जोड़ा. कांग्रेस और बीजेपी ने भी एक कोज़ीनेस दिखाई लेकिन गोधरा के साथ ऐसा नहीं हुआ.’’ एक अन्य छात्र अमृत कहते हैं कि गोधरा की घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक आंतरिक सफाई की प्रक्रिया भी थी जिसने हिंदुत्व की सीमाएं दिखाई और ये सोचने पर मज़बूर किया कि हम चाहते क्या हैं. छात्रों और लोगों की राय अलग अलग है हिंदुत्व की राजनीति पर. लेकिन ये मुद्दा जटिल है जहां मिथ निर्माण और राष्ट्र निर्माण को एक कर दिया गया है. हिंदुत्ववादी दलों का प्रभाव जहां अयोध्या में आज भी कारसेवकपुरम में मंदिर के लिए शिलाओं का निर्माण जारी है वहीं गुजरात या गोधरा में मुसलमानों के साथ भेदभाव भी चरम पर है. हालांकि देखने वाली बात ये भी है कि जहां भारत में हिंदुत्ववादी दलों का प्रभाव घट रहा है वहीं गुज़रात में यह प्रभाव बढ़ रहा है. गुजरात के समाजशास्त्री अच्युत याग्निक कहते हैं कि इसमें भी मध्यम वर्ग की भूमिक बड़ी है. वो कहते हैं, ‘‘ गुजरात में औद्योगीकरण और शहरीकरण तेज़ी से हुआ जिसने मध्य वर्ग को शक्तिशाली बनाया लेकिन साथ ही इसे पहचान का संकट भी होने लगा. जाति की दीवारें मिटीं तो संप्रदायों ने इनके मानस पर कब्ज़ा किया जिसका परिणाम हम देखते हैं कि गुजरात का मध्य वर्ग हिंदुत्व का समर्थक है. यहां मुसलमानों को घृणा के भाव से देखा जाता है. लेकिन पूरे भारत में ऐसा संभव नहीं हो सकता है.’’ यानि कि जहां औद्योगीकरण होगा, विकास होगा वहां पहचान का संकट बढ़ेगा और हिंदुत्व या इस तरह की ताकतों को भी बढ़ावा मिलेगा. जेएनयू के छात्र कहते हैं हिंदुत्व को ही पुर्नपरिभाषित करने की ज़रुरत है. जेएनयू के कुछ छात्र मानते हैं कि हिंदुत्व की फिर से परिभाषा होनी चाहिए यशवंत कहते हैं, ‘‘ यशवंत कहते हैं कि गोधरा के बाद विकल्प नहीं मिला है वरना परिभाषा बदलने की कोशिश हो रही है.’’ अमृत कहते हैं कि हिंदुत्व की सीमाएं पता चलीं लेकिन और परिभाषाएं तो संभव है हीं. हिंदुत्व की परिभाषा कई छात्र हिंदुत्व की अच्छी परिभाषा की भी बात करते हैं. इसका अर्थ ये हुआ कि फिर परिभाषाएं गढ़ी जाएंगी फिर मिथ निर्माण होगा. मधुकर चेतावनी के लहज़े में कहते हैं कि ऐसा होगा लेकिन इसके स्वरुप का ढांचा अभी तैयार नहीं हुआ है. वो कहते हैं, ‘‘ हिंदुत्व राजनीतिक ही होता है. इन्हें एक मैग्नीफाइंग ग्लास चाहिए जिसके जरिए वो सारी बातों को एक जगह फोकस कर सकें. जहां फोकस होगा वो जलेगा. अयोध्या और गोधरा अंतिम नहीं है. ऐसा फिर हो सकता है लेकिन स्वरुप क्या होगा ये साफ नहीं है.’’ तो फिर तैयार रहना होगा सभी को चाहे वो हिंदुत्व के विरोधी हों या समर्थक हिंदुत्व की एक और राजनीतिक लहर के लिए जो न जाने इसे उत्थान की ओर ले जाएगी या पतन की ओर.\n\nSummary:", "target": "अयोध्या और गोधरा राजनीतिक हिंदुत्व के दो बड़े प्रतीक के रुप में उभरे हैं लेकिन लोग मानते हैं कि अभी भी राजनीतिक हिंदुत्व के घृणित रुप की वापसी का खतरा बरकरार है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअयोध्या के कारसेवकपुरम में अभी भी मंदिर निर्माण की कोशिशें चल रही हैं. राजनीतिक हिंदुत्व के इतिहास 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दस्तख़त हुए. बुखारेस्ट में राइस ने रोमानिया की सराहना की और कहा कि रोमानिया अमरीका का अच्छा मित्र है और दोनों देश एक-दूसरे के मूल्यों को समझते हैं. ऐसा पहली बार हुआ है कि पूर्वी यूरोप के किसी पूर्व कम्युनिस्ट देश ने अमरीका के साथ इस तरह का समझौता किया है. आरोप हाल ही में अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए पर ये आरोप लगा था कि वह संदिग्ध चरमपंथियों से पूछताछ के लिए यूरोपीय देशों की हवाई सीमा का इस्तेमाल करता है और कई यूरोपीय देशों में उसके गुप्त हिरासत केंद्र भी हैं. इनमें से एक देश रोमानिया भी है. इस समझौते के बाद अमरीकी सैनिक रोमानिया में सैनिक अड्डों का इस्तेमाल कर पाएँगे जिनमें से एक के बारे में आरोप है कि इसका इस्तेमाल सीआईए संदिग्ध चरमपंथियों से पूछताछ के लिए करती है. लेकिन अमरीका और रोमानिया इससे इनकार करते रहे हैं. समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जब पत्रकारों ने विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस से इस बाबत सवाल पूछे तो वे इसे टाल गईं. यूरोपीय देशों की यात्रा पर गईं राइस ने ये तो स्वीकार किया कि अमरीका संदिग्ध चरमपंथियों से पूछताछ के लिए उन्हें बाहर के देशों में ले जाती है लेकिन उन्होंने किसी तरह की प्रताड़ना से इनकार किया. रोमानिया और अमरीका के बीच हुए इस नए समझौते के तहत अमरीका रोमानिया में चार नए सैनिक अड्डे बनाएगा. इनमें से एक काले सागर तट के निकट मिहैल कोगलनिचेनू अड्डा भी है जिसका इस्तेमाल अमरीकी सैनिकों ने इराक़ पर हमले के दौरान भी किया था.\n\nSummary:", "target": "यूरोप में गुप्त हिरासत केंद्र चलाने के आरोपों के बीच अमरीका ने रोमानिया के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत वह रोमानिया में चार नए सैनिक अड्डे बनाएगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस के रोमानिया दौरे के दौरान इस समझौते पर दस्तख़त हुए. बुखारेस्ट में राइस ने रोमानिया की सराहना की और कहा कि रोमानिया अमरीका का अच्छा मित्र है और दोनों देश एक-दूसरे के मूल्यों को समझते हैं. ऐसा पहली बार हुआ है कि पूर्वी यूरोप के किसी पूर्व कम्युनिस्ट देश ने अमरीका के साथ इस तरह का समझौता किया है. आरोप हाल ही में अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए पर ये आरोप लगा था कि वह संदिग्ध चरमपंथियों से पूछताछ के लिए यूरोपीय देशों की हवाई सीमा का इस्तेमाल करता है और कई यूरोपीय देशों में उसके गुप्त हिरासत केंद्र भी हैं. इनमें से एक देश रोमानिया भी है. इस समझौते के बाद अमरीकी सैनिक रोमानिया में सैनिक अड्डों का इस्तेमाल कर पाएँगे जिनमें से एक के बारे में आरोप है कि इसका इस्तेमाल सीआईए संदिग्ध चरमपंथियों से पूछताछ के लिए करती है. लेकिन अमरीका और रोमानिया इससे इनकार करते रहे हैं. समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जब पत्रकारों ने विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस से इस बाबत सवाल पूछे तो वे इसे टाल गईं. यूरोपीय देशों की यात्रा पर गईं राइस ने ये तो स्वीकार किया कि अमरीका संदिग्ध चरमपंथियों से पूछताछ के लिए उन्हें बाहर के देशों में ले जाती है लेकिन उन्होंने किसी तरह की प्रताड़ना से इनकार किया. रोमानिया और अमरीका के बीच हुए इस नए समझौते के तहत अमरीका रोमानिया में चार नए सैनिक अड्डे बनाएगा. इनमें से एक काले सागर तट के निकट मिहैल कोगलनिचेनू अड्डा भी है जिसका इस्तेमाल अमरीकी सैनिकों ने इराक़ पर हमले के दौरान भी किया था.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": 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हुए नेशनल एथलेटिक्स में तीसरे नंबर पर आई.\" उन्होंने बताया, \"लेकिन 'कास' के निर्णय के बाद एक बार फिर उम्मीद बंधी है कि मैं अपना पुराना प्रदर्शन वापस ला सकती हूं.\" महिला एथलीट दुती का लक्ष्य अब अगले साल रियो डी जेनेरियो में होने वाले ओलिंपिक खेल हैं. वे कहती हैं कि इस मुक़ाबले में हिस्सा लेने के लिए जो योग्यता रखी गई है (100 मीटर दौड़ के लिए 11.32 सेकंड और 200 मीटर के लिए 23.20 सेकंड) उसे हासिल करने के लिए वे एड़ी चोटी एक कर देंगी. दुती चंद ने कहा, \"मुझे पूरा विश्वास है की अंतिम फ़ैसला भी मेरे पक्ष में जाएगा. केवल मेरे पक्ष में ही नहीं, बल्कि उन तमाम खिलाडियों के पक्ष में जो इस नियम का शिकार बने हैं.\" टेस्टोस्टेरोन हार्मोन आईएएफ़ ने शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य से ज़्यादा पाए जाने के कारण दुती चंद को खेलों से बेदख़ल कर दिया था. टेस्टोस्टेरोन वो हार्मोन है जो पुरुषोचित गुणों को नियंत्रित करता है. हारमोन टेस्ट में फेल होने के कारण 19 साल की दुती चंद कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में हिस्सा नहीं ले सकी थीं. वे ऐसी पहली एथलीट हैं जिन्होंने आईएएफ़ के लिंग परीक्षण से जुड़े नियम को चुनौती दी. दो साल के लिए स्थगित कोर्ट ऑफ़ आरबिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स (कास) ने दुती चंद के मामले में आईएएफ़ के \"हाइपरएंड्रोजेनिज़्म\" से जुड़े फ़ैसले को दो साल के लिए स्थगित कर दिया है. हाइपरएंड्रोजेनिज़्म वो स्थिति है जिसमें किसी महिला के शरीर में जीन विविधिताओं के कारण सामान्य से अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरोन बनता है. यहां ये भी अहम है कि यदि आईएएफ़ भविष्य में नए सबूत नहीं ला सका तो उसे अपना फ़ैसला वापस लेना होगा. आईएएफ़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लिंग परीक्षण से जुड़े नियम-क़ायदों को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के साथ 'लंबे और व्यापक विचार-विमर्श' के बाद अपनाया गया. भेदभाव से भरा फ़ैसला कास ने अपने फ़ैसले में आईएएफ़ से अपील की है कि वो ऐसी प्रक्रिया अपनाए जिसमें एथलीट महिला या पुरुष श्रेणी में से किसी एक में हिस्सा ले सके और उन्हें उनके 'शरीर के क़ुदरती और स्थाई गुणों के कारण' प्रतियोगिता से दूर ना रखा जाए. चांद को आईएएएफ़ के नियमों का पालन करते हुए भारतीय एथलेटिक संघ ने भी टेस्टोस्टेरोन का स्तर सामान्य से अधिक होने के कारण निलंबित कर दिया था. फ़ैसले को चुनौती देते हुए दुती चांद के वकील ने मार्च में सुनवाई के दौरान इसे 'भेदभावपूर्ण' और 'दोषपूर्ण' कहा. लिंग परीक्षण आईएएफ़ और आईओसी की नीतियों के मुताबिक़, किसी एथलीट के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की क्या सीमा हो, यह तय किया गया है. आईएएफ़ का मानना है कि हाइपरएंड्रोजेनिज़्म की वजह से खिलाड़ियों को अनुचित फ़ायदा मिलता है और यह सभी खिलाड़ियों को बराबर का मौक़ा दिए जाने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है. लिंग परीक्षण से जुड़े नियम की शुरुआत साल 2009 में कास्टर सेमेन्या प्रसंग के समय हुई थी. दरअसल दक्षिण अफ़्रीका की एक किशोरी सेमेन्या को बर्लिन में 2009 के विश्व एथलेटिक्स चैंपियन में 800 मीटर की रेस के जीतने के ठीक पहले लिंग परीक्षण करवाने के लिए कहा गया था. सेमेन्या ने बाद में लंदन 2012 ओलंपिक में रजत पदक जीता और खेलों में वापसी की. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "\"इस फ़ैसले से मानों मुझे नया जन्म मिला गया हो.\" ये कहना है भारतीय महिला एथलीट दुती चंद का.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत की स्टार धाविका दुती चंद को एथलेटिक संगठनों के अंतरराष्ट्रीय संघ (आईएएफ़) ने जुलाई 2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों के कुछ दिन पहले ही अयोग्य करार दिया था. ये पाबंदी दुती के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य से ज़्यादा पाए जाने के कारण लगाई गई थी. धाविका दुती चंद ने आईएएफ़ के फ़ैसले को चुनौती देते हुए लड़ाई लड़ी. और अब वे लड़ाई जीत गई हैं. कोर्ट ऑफ़ आरबिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स (कास) ने दुती चंद के मामले में आईएएफ़ के पाबंदी के फ़ैसले को दो साल के लिए स्थगित कर दिया है. समाप्त दुती बताती हैं, \"प्रतिबन्ध के बाद मैं पूरी तरह टूट गई थी और दोबारा अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में हिस्सा लेने की उम्मीद लगभग छोड़ चुकी थी. यही कारण है कि पाबंदी के बाद मेरा प्रदर्शन लगातार ख़राब होता गया और मैं चेन्नई में हुए नेशनल एथलेटिक्स में तीसरे नंबर पर आई.\" उन्होंने बताया, \"लेकिन 'कास' के निर्णय के बाद एक बार फिर उम्मीद बंधी है कि मैं अपना पुराना प्रदर्शन वापस ला सकती हूं.\" महिला एथलीट दुती का लक्ष्य अब अगले साल रियो डी जेनेरियो में होने वाले ओलिंपिक खेल हैं. वे कहती हैं कि इस मुक़ाबले में हिस्सा लेने के लिए जो योग्यता रखी गई है (100 मीटर दौड़ के लिए 11.32 सेकंड और 200 मीटर के लिए 23.20 सेकंड) उसे हासिल करने के लिए वे एड़ी चोटी एक कर देंगी. दुती चंद ने कहा, \"मुझे पूरा विश्वास है की अंतिम फ़ैसला भी मेरे पक्ष में जाएगा. केवल मेरे पक्ष में ही नहीं, बल्कि उन तमाम खिलाडियों के पक्ष में जो इस नियम का शिकार बने हैं.\" टेस्टोस्टेरोन हार्मोन आईएएफ़ ने शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य से ज़्यादा पाए जाने के कारण दुती चंद को खेलों से बेदख़ल कर दिया था. टेस्टोस्टेरोन वो हार्मोन है जो पुरुषोचित गुणों को नियंत्रित करता है. हारमोन टेस्ट में फेल होने के कारण 19 साल की दुती चंद कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में हिस्सा नहीं ले सकी थीं. वे ऐसी पहली एथलीट हैं जिन्होंने आईएएफ़ के लिंग परीक्षण से जुड़े नियम को चुनौती दी. दो साल के लिए स्थगित कोर्ट ऑफ़ आरबिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स (कास) ने दुती चंद के मामले में आईएएफ़ के \"हाइपरएंड्रोजेनिज़्म\" से जुड़े फ़ैसले को दो साल के लिए स्थगित कर दिया है. हाइपरएंड्रोजेनिज़्म वो स्थिति है जिसमें किसी महिला के शरीर में जीन विविधिताओं के कारण सामान्य से अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरोन बनता है. यहां ये भी अहम है कि यदि आईएएफ़ भविष्य में नए सबूत नहीं ला सका तो उसे अपना फ़ैसला वापस लेना होगा. आईएएफ़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लिंग परीक्षण से जुड़े नियम-क़ायदों को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के साथ 'लंबे और व्यापक विचार-विमर्श' के बाद अपनाया गया. भेदभाव से भरा फ़ैसला कास ने अपने फ़ैसले में आईएएफ़ से अपील की है कि वो ऐसी प्रक्रिया अपनाए जिसमें एथलीट महिला या पुरुष श्रेणी में से किसी एक में हिस्सा ले सके और उन्हें उनके 'शरीर के क़ुदरती और स्थाई गुणों के कारण' प्रतियोगिता से दूर ना रखा जाए. चांद को आईएएएफ़ के नियमों का पालन करते हुए भारतीय एथलेटिक संघ ने भी टेस्टोस्टेरोन का स्तर सामान्य से अधिक होने के कारण निलंबित कर दिया था. फ़ैसले को चुनौती देते हुए दुती चांद के वकील ने मार्च में सुनवाई के दौरान इसे 'भेदभावपूर्ण' और 'दोषपूर्ण' कहा. लिंग परीक्षण आईएएफ़ और आईओसी की नीतियों के मुताबिक़, किसी एथलीट के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की क्या सीमा हो, यह तय किया गया है. आईएएफ़ का मानना है कि हाइपरएंड्रोजेनिज़्म की वजह से खिलाड़ियों को अनुचित फ़ायदा मिलता है और यह सभी खिलाड़ियों को बराबर का मौक़ा दिए जाने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है. लिंग परीक्षण से जुड़े नियम की शुरुआत साल 2009 में कास्टर सेमेन्या प्रसंग के समय हुई थी. दरअसल दक्षिण अफ़्रीका की एक किशोरी सेमेन्या को बर्लिन में 2009 के विश्व एथलेटिक्स चैंपियन में 800 मीटर की रेस के जीतने के ठीक पहले लिंग परीक्षण करवाने के लिए कहा गया था. सेमेन्या ने बाद में लंदन 2012 ओलंपिक में रजत पदक जीता और खेलों में वापसी की. 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वे इसमें विश्वास नहीं रखती. उन्होंने कहा, \"शहार और मैं अच्छी दोस्त हैं. वो अच्छा टेनिस खेलती है. उसका बैंक हैंड अच्छा है और मेरा फ़ोर हैंड. इससे मुझे कोई मतलब नहीं कि वो इसराइल की है या कहीं और की.\" विंबलडन में सानिया और शहारा को 16वीं वरीयता मिली हुई है.\n\nSummary:", "target": "विंबलडन के चौथे दिन डबल्स में जहाँ भारत के लिएंडर पेस और चेक गणराज्य के मार्टिन डैम की जोड़ी जीत गई वहीं सिंगल्स में सानिया मिर्ज़ा हार गईं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलिएंडर पेस और मार्टिन डैम की जोड़ी ने पहले दौर में दक्षिण अफ़्रीका के क्रिस हैगार्ड और पोलैंड के मारचिन मत्कोवस्की को सीधे सेटों में 7-6, 6-3 और 7-5 से हरा दिया. पेस और डैम की जोड़ी ने शुरुआत ज़रा धीमे की. इसका असर ये हुआ कि पहला सेट टाई ब्रेकर में गया. लेकिन दूसरे सेट में उन्होंने 6-3 से जीत हासिल की. तीसरे सेट में एक बार फिर पेस और डैम थोड़ा धीमे हो गए लेकिन आख़िरकार वे तीसरा सेट 7-5 से जीतने में सफल रहे. सानिया मिर्ज़ा का मैच भारत की सानिया मिर्ज़ा विंबलडन में महिलाओं के सिंगल्स वर्ग से बाहर हो गई हैं. 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लेकिन भाजपा ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी. भाजपा से जुड़े कई स्थानीय नेताओं का कहना है कि इससे लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी. भाजपा के नेताओं का कहना था कि सरकार को किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पहले देखना चाहिये कि उनका क़दम किसी धर्म के ख़िलाफ़ तो नहीं है. भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा, \"यह निर्णय बिना सोचे विचारे लिया गया था. गाय और उसके दूध का हिंदू धर्म में क्या स्थान है यह सरकार को नहीं मालूम क्या. सरकार ने उसके बावजूद इसे चिकन के साथ शुरु कर दिया.\" वो कहते हैं, \"जो व्यक्ति चिकन बेच रहा है वही दूध कैसे बेच सकता है. आख़िर एक ही व्यक्ति के हाथ से जो चिकन को भी छू रहा हो और जो दूध भी बेच रहा हो, कोई कैसे ख़रीद सकता है.\" वह आरोप लगाते हैं, \"यह कोशिश थी हिंदुओं को नज़र अंदाज़ करने की.\" वही जैन समाज से ताअल्लुक़ रखने वाले रविंद्र जैन भी इसके ख़िलाफ़ थे. उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिये मुहिम चलाई थी. गाय का दूध और चिकन को एक ही पार्लर से बेचा जा रहा था. उन्होंने सरकार से सवाल किया, \"क्या आपको मप्र की जनता ने इसीलिए चुना था कि आप दूध की दुकानों से कड़कनाथ मुर्ग़े का मांस बेचें? यह सब तब हो रहा है जब आपकी सरकार महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती मनाने का ढोंग कर रही है.\" उन्होंने कहा कि सरकार को इस तरह के निर्णय नहीं लेने चाहिये. इसका विरोध करने वालों की मांग थी कि चिकन और दूध के पार्लर अलग-अलग खोले जाने चाहिये और बेचने वालों को भी अलग-अलग होना चाहिये. प्रदेश के पशुपालन मंत्री लाखन सिंह यादव ने विपक्ष की मांग को ख़ारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था, \"चिकन पार्लर और दूध पार्लर के बीच में पार्टीशन रखा गया है. लेकिन विपक्ष बेवजह का मुद्दा बना रहा है.\" लेकिन अब सरकार ने आदेश निकाल कर अपने निर्णय को बदल दिया है. अब चिकन और दूध दोनों ही अलग पार्लर से बेचे जायेंगे और दोनों अलग-अलग स्थान पर होगें. भोपाल में शनिवार को आरएसएस से जुड़ी संस्था सहकार भारती ने भी इस पार्लर के विरोध में प्रदर्शन किया और सरकार से मांग की कि इसे बंद किया जाये. शहर में पहला पार्लर पिछले महीने मध्य प्रदेश राज्य पशुधन और कुक्कुट विकास निगम प्रबंध संचालक टी एस तोमर ने एक आदेश निकाल कर चिकन बेचने की योजना को फ़िलहाल बंद कर दिया है. नये आदेश के मुताबिक़ जब तक दूध का नया पार्लर नहीं बन जाता तब तक चिकन पार्लर को बंद रखा जाएगा. अब सरकार चिकन पार्लर और दूध पार्लर को दूरी पर खोलेंगी ताकि किसी को भी कोई दिक़्क़त न आये. कड़कनाथ में प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. इस योजना के तहत चिकन बेचने के पीछे सरकार की मंशा थी कि आदिवासियों को रोज़गार मिले और उन्हें अपने उत्पाद का सही दाम मिले. इसमें प्रदेश के झाबुआ, धार और अलीराजपुर में मिलने वाले कड़कनाथ मुर्गे का मांस और अंडे उपलब्ध कराए जा रहे थे. यह पार्लर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत खोले जा रहे थे. कड़कनाथ मध्यप्रदेश के आदिवासी झाबुआ झाबुआ, धार और अलीराजपुर इलाक़े में मिलता है. हालांकि अब यह छत्तीसगढ़ और दूसरे राज्यों में भी मांग की वजह से पहुंच चुका है. प्रदेश का यह वह इलाक़ा है जहां पर बहुत ज्यादा ग़रीबी है. कड़कनाथ की मांग होने के बावजूद इसका फ़ायदा वहां के आदिवासियों को नहीं हो पाता है इसलिये सरकार का तर्क था कि भोपाल जैसे शहर में जब इसका चिकन बेचा जाएगा तो इन लोगों को उसकी उचित क़ीमत मिलेगी. इससे फ़ायदा उन्हीं आदिवासियों को होगा जो इसको पालने का काम करते है. कड़कनाथ की ख़ासियत यह है कि इसका मांस और पूरा मुर्गा काला होता है. इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. यह मुर्ग़ा कई बीमारियों से भी बचाता है. आमतौर पर मांग अधिक होने की वजह से इस मुर्ग़े का मांस दूसरे चिकन की अपेक्षा काफ़ी महंगा बिकता है. ये भी पढ़ें— (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मध्यप्रदेश की सरकार ने एक ही जगह से गाय का दूध और कड़कनाथ मुर्ग़े के मांस को बेचने की योजना को बंद कर दिया है. इस योजना के तहत गाय का दूध और चिकन को एक ही पार्लर से बेचा जा रहा था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकड़कनाथ की ख़ासियत यह है कि इसका चिकन और पूरा मुर्गा काला होता है. हालांकि इसमें एक पार्टिशन किया गया था. लेकिन पिछले महीने शुरु हुई इस योजना का विरोध विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जैन समाज के लोग कर रहे थे. जब इस योजना की शुरुआत की गई थी तो सरकार का दावा था कि उसके पार्लर में मिलने वाले चिकन और गाय के दूध की शुद्धता की पूरी गारंटी रहेंगी. लेकिन भाजपा 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चिकन पार्लर को बंद रखा जाएगा. अब सरकार चिकन पार्लर और दूध पार्लर को दूरी पर खोलेंगी ताकि किसी को भी कोई दिक़्क़त न आये. कड़कनाथ में प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. इस योजना के तहत चिकन बेचने के पीछे सरकार की मंशा थी कि आदिवासियों को रोज़गार मिले और उन्हें अपने उत्पाद का सही दाम मिले. इसमें प्रदेश के झाबुआ, धार और अलीराजपुर में मिलने वाले कड़कनाथ मुर्गे का मांस और अंडे उपलब्ध कराए जा रहे थे. यह पार्लर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत खोले जा रहे थे. कड़कनाथ मध्यप्रदेश के आदिवासी झाबुआ झाबुआ, धार और अलीराजपुर इलाक़े में मिलता है. हालांकि अब यह छत्तीसगढ़ और दूसरे राज्यों में भी मांग की वजह से पहुंच चुका है. प्रदेश का यह वह इलाक़ा है जहां पर बहुत ज्यादा ग़रीबी है. कड़कनाथ की मांग होने के बावजूद इसका फ़ायदा वहां के आदिवासियों को नहीं हो पाता है इसलिये सरकार का तर्क था कि भोपाल जैसे शहर में जब इसका चिकन बेचा जाएगा तो इन लोगों को उसकी उचित क़ीमत मिलेगी. इससे फ़ायदा उन्हीं आदिवासियों को होगा जो इसको पालने का काम करते है. कड़कनाथ की ख़ासियत यह है कि इसका मांस और पूरा मुर्गा काला होता है. इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. यह मुर्ग़ा कई बीमारियों से भी बचाता है. आमतौर पर मांग अधिक होने की वजह से इस मुर्ग़े का मांस दूसरे चिकन की अपेक्षा काफ़ी महंगा बिकता है. ये भी पढ़ें— (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 142, "source_item_id": "142", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3635, "clean_index": 132, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:132"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनेपाल में लागू नए संविधान को लेकर देश के दक्षिणी हिस्से में भारत की सीमा से लगे इलाक़ों में प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं. मधेसी आंदोलनकारियों की मांग है कि उन्हें नेपाल में उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए. ये हैं मधेसियों की 5 मांगें मधेसियों का प्रदर्शन नेपाल के तराई इलाक़े में मधेसियों का प्रदर्शन जारी है. बुधवार और गुरुवार को मधेसियों ने भारतीय सीमा से ट्रकों की आवाजाही रोक दी थी. समाप्त काठमांडू स्थित नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारतीय राजदूत को तलब कर पूछा है कि भारत सामान लदे ट्रकों को नेपाल सीमा में आने से क्यों रोक रहा है. हालाँकि भारत का कहना है कि भारत से नेपाल को सामान की आपूर्ति करने वाले ट्रांसपोर्टर्स नेपाल सीमा में प्रवेश करने से डर रहे हैं. उधर, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्होंने गुरुवार रात को भारतीय सीमा पर ट्रकों को नेपाल सीमा में नहीं घुसने दिया. नेपाल के तराई इलाके में आंदोलन कर रहे लोगों का आरोप है कि 40 दिन से चल रहे आंदोलन को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नेपाल में भारतीय सीमा से सामान की आवाजाही बाधित होने से ख़फ़ा नेपाल ने भारतीय राजदूत को तलब किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनेपाल में लागू नए संविधान को लेकर देश के दक्षिणी हिस्से में भारत की सीमा से लगे इलाक़ों में प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं. मधेसी आंदोलनकारियों की मांग है कि उन्हें नेपाल में उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए. ये हैं मधेसियों की 5 मांगें मधेसियों का प्रदर्शन नेपाल के तराई इलाक़े में मधेसियों का प्रदर्शन जारी है. बुधवार और गुरुवार को मधेसियों ने भारतीय सीमा से ट्रकों की आवाजाही रोक दी थी. समाप्त काठमांडू स्थित नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारतीय राजदूत को तलब कर पूछा है कि भारत सामान लदे ट्रकों को नेपाल सीमा में आने से क्यों रोक रहा है. हालाँकि भारत का कहना है कि भारत से नेपाल को सामान की आपूर्ति करने वाले ट्रांसपोर्टर्स नेपाल सीमा में प्रवेश करने से डर रहे हैं. उधर, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्होंने गुरुवार रात को भारतीय सीमा पर ट्रकों को नेपाल सीमा में नहीं घुसने दिया. नेपाल के तराई इलाके में आंदोलन कर रहे लोगों का आरोप है कि 40 दिन से चल रहे आंदोलन को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात और त्रिपुरा में भाजपा की जीत का श्रेय दिया जा रहा था और उन्हें कर्नाटक में पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जा रहा था, वही आदित्यनाथ अपनी लोकसभा सीट को जिताने में असफल रहे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवहीं, दूसरा चुनाव फूलपुर में था जहां से भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य 52 फीसदी वोट पाकर जीते थे. जिस व्यक्ति ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन चौथाई बहुमत से जिताया और उपमुख्यमंत्री बना, वह अपनी सीट पर पार्टी को नहीं जिता पाया. आश्चर्यजनक इसलिए भी था क्योंकि पिछले तीस सालों के दौरान देश में या राज्य में लहर चाहें किसी भी दल की हो, गोरखपुर में जीत भाजपा की ही होती थी. पहले 1989 से 1996 तक महंत अवैद्यनाथ सांसद रहे और उसके बाद से 2017 तक उनके शिष्य रहे योगी आदित्यनाथ. उनके समर्थकों ने नारा गढ़ लिया था - यूपी में रहना है, तो योगी-योगी कहना है. तो आखिर ये अप्रत्याशित नतीजे आए क्यों? इन दोनों सीटों पर भाजपा के तीन से साढे़ तीन लाख वोट कम कैसे हो गए? इसके कई कारण हैं. पहला कि प्रत्याशी चयन में ग़लती हुई, दूसरी बात जाति समीकरण उल्टे बैठे, तीसरी बात पार्टी संगठन से कार्यकर्ता नाराज था, चौथी बात सरकार के कामकाज से लोग नाराज थे और पांचवी बात मोदी व अमित शाह चुनाव प्रचार में गए ही नहीं. गलत कैंडीडेट विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार योगी ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साफ तौर पर बताया था कि गोरखपुर में केवल गोरखपुर पीठ का व्यक्ति ही जीत सकता है. लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने चुना उपेन्द्र शुक्ला को जो गोरखपुर के क्षेत्रीय अध्यक्ष थे. गोरखपुर के आसपास के इलाक़े में जगदंबिका पाल को छोड़कर अन्य सभी सांसद ब्राह्मण हैं. ऐसे में एक अन्य ब्राह्मण को चुनाव लड़ाना जातिगत समीकरणों के लिहाज़ से भी ठीक नहीं था. वैसे भी गोरखपुर में निषाद सहित पिछड़ी जातियां काफ़ी संख्या में हैं. यही वजह है समाजवादी पार्टी ने कभी फूलन देवी को सांसद बनाया था. इसी वजह से सपा के निषाद उम्मीदवार को सजातीय वोट काफ़ी संख्या में मिले. जाति समीकरण इनका महत्व मुलायम सिंह ने पहचाना था. तभी 1999 में उन्होंने गोरखपुर से गोरख निषाद को उम्मीदवार बनाया था. एक जनसभा में उन्होंने यादवों की भारी संख्या देखकर कहा था - जब यादव, निषाद यहाँ है तो मुसलमान कहां जाएगें? ऐसे ही फूलपुर में मौर्य अपनी पत्नी को टिकट दिलाना चाहते थे. लेकिन पार्टी इसके लिए तैयार नहीं थी. पार्टी ने कौशलेंद्र सिंह पटेल को टिकट दिया जो स्थानीय नहीं थे जबकि सपा के उम्मीदवार को स्थानीय होने का लाभ मिला. इलाहाबाद के तीन मंत्रियों - नंद कुमार गुप्ता नंदी, सिद्धार्थ नाथ सिंह और मौर्य में आपस में नहीं बनती है. पटेल इनमें से किसी की भी पसंद नहीं थे. मौर्य ने भले ही 11 दिन फूलपुर में रुककर सौ से ज्यादा सभाएं संबोधित की, लेकिन नतीजा कुछ और निकला. फूलपुर में दलितों और पिछड़ी जातियों की संख्या लगभग सत्तर प्रतिशत है. सपा और बसपा के साथ आने से सभी ने साझा उम्मीदवार को जमकर वोट दिए. नाराज लोग, कार्यकर्ता वहीं, राज्य सरकार के कामकाज से लोग नाराज थे. एक साल के अंदर राज्य सरकार ने किसानों, छात्रों और बुज़ुर्गों संभालकर नाराज किया. बुज़ुर्गों की पेंशन बंद की, छात्रों की स्कॉलरशिप और किसानों की उपज पर चोट की. इसके अलावा पार्टी का कार्यकर्ता नेतृत्व से नाराज था. नेता उनसे मिलते ही नहीं थे. उनके कोई काम ही नहीं हो रहे थे. इससे संदेश गया कि सत्ता मिलने के बाद नेता मद में चूर हो गए हैं. यही नहीं संगठन का दायित्व संभाल रहे लोग भी कार्यकर्ताओं से कन्नी काचने लगा थे. आखिर कोई भी पार्टी उतनी ही मज़बूत होती है जितनी उसके कार्यकर्ता. यही वजह है कि बीजेपी की हार के जश्न में सपा और बसपा के अलावा कई भाजपा कार्यकर्ता भी शामिल थे. पार्टी की केंद्रीय और प्रदेश इकाई ने इन चुनावों को कितनी गंभीरता से लिया यह इसी बात से जाहिर है कि न तो मोदी प्रचार के लिए यहाँ गए और न ही अमित शाह. यहाँ तक कि चुनाव के प्रभारी अनूप गुप्ता और शिव नारायण शुक्ला जैसे लाइटवेट लोग बनाए गए थे. से दोनों राज्य इकाई में मंत्री और महामंत्री हैं. इसी से बीजेपी के अंदर ही कई अफ़वाहें गर्म हो गई हैं. क्या पार्टी योगी और मौर्य का क़द कम करना चाहती थी. गठजोड़ वजह नहीं यह कहना सही नहीं होगा कि सपा और बसपा के साथ आने से बीजेपी हार गई. पिछले जो चुनावों में इन दोनों पार्टियों को मिले वोट को जोड़ लिया जाए, तब भी वे बीजेपी उम्मीदवार को नहीं हरा पाते. गोरखपुर में 2009 में सपा उम्मीदवार मनोज तिवारी (जो अब दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष हैं) को 11 फीसदी वोट मिले थे और बसपा के विनय शंकर तिवारी को 24.4 फीसदी वोट मिले थे. हालांकि दोनों मिल कर भी योगी आदित्यनाथ को हरा नहीं पाते क्योंकि उन्हें लगभग 54 फीसदी वोट मिले थे. 2014 में मोदी लहर के बावजूद योगी को पिछली बार से दो फीसदी वोट कम मिले लेकिन सपा के 22 और बसपा के 17 फीसदी वोटों को मिला दिया जाए तो भी उन्हें हराने में नाकामयाब रहते. यही हालत फूलपुर की भी थी. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की खोज में सीआईए की मदद करने वाले डॉक्टर शकील आफ़रीदी पर फिर से मुक़दमा चलेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशकील आफ़रीदी पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया था. उन कब़ीलाई न्यायिक व्यवस्था के तहत जानकारी जुटाने के लिए जाली टीकाकरण अभियान चलाने का मुक़दमा चलाया गया था. शकील आफ़रीदी को मई 2012 में 33 साल की सज़ा मिली थी तभी से वो पेशावर सेंट्रल जेल में बंद हैं. ओसामा बिन लादेन अमरीका सेना के हाथों पाकिस्तान के एबटाबाद में मई, 2011 में मारे गए थे. ओसामा की हत्या के बाद अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते तल्ख़ हो गए थे. पाकिस्तान का मानना था कि अमरीका की सैनिक कार्रवाई पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन थी. न्यायिक प्रक्रिया पाकिस्तान के फ्रंटियर क्राइम रेगुलेशन के एक न्यायिक अधिकारी ने फ़ैसला दिया कि पुराने जज ने शकील आफ़रीदी के मामले में अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सज़ा दी थी इसलिए उनकी सज़ा ख़त्म करके फिर से मुक़दमा चलाया जाएगा. पिछले मुक़दमे की सुनवाई मजिस्ट्रेट स्तर के एक अधिकारी ने की थी. नए आदेश में कहा गया है कि शकील आफ़रीदी के नए मुक़दमे की सुनवाई जज स्तर के अधिकारी करें. ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तान और अमरीका के रिश्ते बिगड़ गए थे. जब तक नया मुक़दमा पूरा नहीं हो जाता तब तक डॉक्टर शकील आफ़रीदी जेल में ही रहेंगे. उन पर दोबारा मुक़दमा चलाए जाने की कोई तारीख़ तय नहीं की गई है. ओसामा बिन लादेन के घर पर अमरीकी कार्रवाई के कुछ दिन बाद डॉक्टर आफ़रीदी को पाकिस्तान सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. हालांकि डॉक्टर आफ़रीदी पर सीआईए के साथ काम करने का आरोप लगा था उन्हें जेल एक चरमपंथी संगठन के साथ मिलकर काम करने के लिए भेजा गया. संवाददाताओं का कहना है कि उन पर जिस संगठन के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगा था वो एक बार उनका अपहरण कर चुका था. डॉक्टर आफ़रीदी अपने मुक़दमे के दौरान मौजूद नहीं रहे थे. उन्हें मानक न्यायायिक प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए कमोबेश कब़ीलाई तरीक़े से बहुत ही कम समय में सज़ा सुना दी गई थी. डॉक्टर आफ़रीदी का कहना था कि उन्हें नहीं पता था कि सीआईए के निशाने पर ओसामा बिन लादेन थे. अमरीकी अधिकारियों ने उनकी गिरफ्तारी और सज़ा की आलोचना करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की थी. जिसके जवाब में पाकिस्तान सरकार ने कहा था कि कोई भी सरकार वही करती जो पाकिस्तान ने किया है. 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में हुए व्यापारिक समझौते के चलते अगले पाँच सालों में द्विपक्षीय व्यापार तीन गुना होकर 15 अरब डॉलर हो सकता है. पिछले दस सालों में किसी चीनी राष्ट्रपति की ये पहली पाकिस्तान यात्रा है और इसके लिए कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किए गए हैं. चीन-पाकिस्तान समीकरण चीनी राष्ट्रपति गुरुवार को पाकिस्तान पहुँच थे. गुरुवार शाम को रात्रिभोज के दौरान पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशरर्फ़ ने ही जिंताओ से कहा था कि विश्व में बदलती परिस्थितियों के बावजूद चीन के साथ दोस्ती बरकरार है. चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक पाकिस्तान के साथ अभूतपूर्व समझौते होने के संकेत मिले थे. हालांकि इस बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी गई थी. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि पाकिस्ताना चाहता है कि चीन ज़्यादा परमाणु रिएक्टर बनाने में उसकी मदद करे ,ख़ासकर जब अमरीका ने उसकी मदद करने से इनकार कर दिया है. परमाणु मामलों को लेकर पाकिस्तान और चीन के बीच लंबे समय से सहयोग चला आ रहा है और चीन पाकिस्तान को पारंपरिक हथियार देने वाला मुख्य देश है. दोनों देश मिलकर एक लड़ाकू हवाईजहाज़ भी बना रहे हैं. इसके अलावा दक्षिण-पश्चिचम पाकिस्तान में चीन ने एक बंदरगाह में लाखों डॉलर का निवेश किया है ताकि उसे अरब सागर तक मार्ग मिल सके. बीबीसी संवाददाता के मुताबिक चीन और पाकिस्तान ने हमेशा से भारत के ख़िलाफ़ एक खेमा बनाए रखा है पर वर्तमान में शायद आर्थिक हालात पुरानी प्रतिद्वंद्विता पर भारी पड़ रहे हैं. पाकिस्तान से पहले चीनी राष्ट्रपति भारत दौरा पर थे और उन्होंने भारत के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए है. माना जा रहा है कि पाकिस्तानी दौरे के दौरान चीनी राष्ट्रपति पाकिस्तान को भरोसा दिलाएँगे कि भारत से बढ़ते सहयोग के बावजूद चीन उसे सामरिक और आर्थिक सहयोग देता रहेगा.\n\nSummary:", "target": "चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ के पाकिस्तान दौरे के तहत शुक्रवार को दोनों देशों के बीच कुछ अहम व्यापारिक और सामरिक समझौते हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन दोनों देशों के बीच परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हुआ. इस बारे में सिर्फ़ इतना ही कहा गया कि मौजूदा योजनाओं को जारी रखा जाएगा. हालांकि कुछ जानकारों का मानना था कि इस यात्रा के दौरान भारत और अमरीका की तरह ही दोनों देशों के बीच परमाणु समझौता 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "वो कथित इस्लामिक स्टेट के एक चरमपंथी के प्यार में पड़ी और यहीं से शुरू हो गया उसका प्लान.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलंदन की 18 साल की सफ़ा बुलर ब्रिटेन में दोषी ठहराई गईं सबसे युवा महिला हैं. कोर्ट ने सफ़ा को लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम पर चरमपंथी हमले की साजिश रचने का दोषी ठहराया है. ब्रिटिश म्यूज़ियम में रोज़ाना बहुत से पर्यटक आते हैं, ऐसे में वहां हमला होने पर जान-माल का भारी नुक़सान हो सकता था. सफ़ा बुलर कथित इस्लामिक स्टेट की पहली महिला सेल की सदस्य हैं. उन्हें दो तरह के जुर्म के लिए दोषी ठहराया गया है. पहला चरमपंथी हमले की साज़िश रचने और दूसरे सीरिया जाने की कोशिश करते पकड़े जाने के लिए. समाप्त बुलर जब 16 साल की थी तो उन्होंने सीरिया जाने की कोशिश की थी. उनपर आरोप था कि वो कथित इस्लामिक स्टेट में भर्ती होने के लिए सीरिया जा रही थीं. बुलर ने जज से कहा कि हिरासत के दौरान उन्होंने अपने धर्म को छोड़ दिया और अब वो वेस्टर्न कपड़े पहनती हैं. बाद में जब सफ़ा के चरमपंथी मंगेतर की मौत हो गई तो उन्होंने लंदन में हमला करने का प्लान बनाया. कोर्ट में सुनवाई के दौरान सफ़ा ने इन सारे आरोपों से इनकार किया है. सोशल मीडिया और कट्टरता सिर्फ़ 16 साल की सफ़ा ने कैसे चरमपंथ का रास्ते पकड़ लिया? सफ़ा ने ये राह सोशल मीडिया के ज़रिए पकड़ी. इस सब की शुरुआत 2015 में पेरिस हमलों के बिल्कुल बाद हुई. उस वक्त सफ़ा 16 साल की थीं. तब सफ़ा इंस्टाग्राम के ज़रिए एक आईएस लड़ाके नवीद हुसैन के संपर्क में आई. नवीद, सफ़ा से लगभग दोगुनी उम्र के थे. कई महीनों तक बातों का सिलसिला चलता रहा और एक दिन सफ़ा ने इंटरनेट के ज़रिए ही नवीद से अपने प्यार का इज़हार कर दिया. मैसेजिंग एप के ज़रिए दोनों ने शादी भी कर ली. कोर्ट को मिले सबूतों के मुताबिक हुसैन से मिलने के लिए सफ़ा सीरिया जाना चाहती थी, लेकिन ब्रिटिश सिक्योरिटी सर्विस के अधिकारियों ने सफ़ा को एयरपोर्ट पर ही हिरासत में ले लिया. उनका पासपोर्ट और फोन भी जब्त कर लिया गया. बाद में सफ़ा को छोड़ दिया गया. लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने सफ़ा पर कड़ी नज़र रखी. पुलिस के सामने सफ़ा ने कबूला था कि वो नवीद से बात करती हैं और मिलने के लिए सीरिया जा रही थीं. लेकिन सफा ने पुलिस से शादी की बात छिपाई. निगरानी इसके बाद एम-15 के अंडरकवर एजेंट्स ने हुसैन पर नज़र रखना शुरू किया. वो उसके बारे में और जानकारी जुटाना चाहते थे. अंडरकवर एजेंट्स ने ऑनलाइन आईडी बनाई और खुद को ब्रिटिश चरमपंथियों के तौर पर पेश किया. उन्होंने हुसैन से संपर्क किया और कहा कि वो ब्रिटेन में हमला करना चाहते हैं. अंडरकवर एजेंट्स ये पता करना चाहते थे कि हुसैन के साथ ब्रिटेन में और कौन-कौन जुड़ा है. हुसैन ने एजेंट्स को सलाह दी कि वो लंदन के ओ2 एरीना और ब्रिटिश म्यूज़ियम को निशाना बना सकते हैं. हुसैन ने उनसे कहा कि उनके पास ऐसे कुछ और लोग हैं जो ब्रिटेन में रहते हैं और हमला करने में मदद कर सकते हैं. हुसैन ने उनको सफ़ा के बारे में बताया और कहा कि वो ब्रिटेन में हमला करेगी. अनजाने में हुसैन ने अंडरकवर एजेंट्स को ये बता दिया था कि वो ब्रिटिश म्यूज़ियम को निशाना बनाने वाले हैं. सफ़ा ने कोर्ट के सामने माना था कि वो हुसैन के प्लान का हिस्सा थीं. कुछ दिन बाद हुसैन एक ड्रोन हमले में मारे गए. अंडरकवर एजेंट्स ने सफ़ा को चरमपंथी हमले की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. सफ़ा तो गिरफ्तार हो गई, लेकिन उसने अपनी मां और बहन को अपना मिशन को पूरा करने को कहा. मां और बहन भी शामिल इसके बाद सफ़ा की मां और बहन भी हमले की साजिश में शामिल हो गई. इसके बाद सफ़ा की मां और बहन ने हमले वाले इलाके की रेकी की. उन्होंने चाकू भी खरीदे. एक दिन बाद ही दोनों को गिरफ़्तार कर लिया गया. पुलिस के मुताबिक वो उसी दिन चरमपंथी हमला करने वाली थीं. कोर्ट में सुनवाई के दौरान सफ़ा की बहन ने माना कि वो चाकू से हमले की तैयारी में थीं और इसमें उसकी मां ने मदद की. मां और बहन की सज़ा का ऐलान 15 जून को होगा. वहीं सफा की सज़ा करीब छह हफ्तों में तय की जाएगी. 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(आलोक कुमार के साथ बातचीत पर आधारित)\n\nSummary:", "target": "विशेष आर्थिक ज़ोन (एसईजेड) एक ऐसा क्षेत्र होगा जिसका अपना अलग क़ानून होगा, अपनी न्यायपालिका होगी, अपनी प्राइवेट पुलिस होगी यानी कि ऐसा क्षेत्र होगा जो आम क़ानून के दायरे से बाहर होंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक़ानून की धारा 49 के तहत जितने भी केन्द्रीय कानून हैं वे इससे अलग रहेंगे, लेकिन ये बिल्कुल असंवैधानिक प्रावधान है. कानून बनाने का काम संसद का है और संसद अपनी जिम्मेदारी सरकार को नहीं दे सकती. एसईजेड बनाने का काम कॉरपोरेट घराने करेंगे. इनका प्रबंधन पूरी तरह से निजी कंपनियों के हाथों में होगा. इस मायने में ये और जितने लोग भी वहाँ काम करेंगे उनकी देखरेख की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी. लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं है कि वे अपने अधिकारों की रक्षा किस कानून के तहत करेंगे. कई बातें की जा रही हैं. करों में छूट की बात है, श्रम क़ानून लागू नहीं करने की भी चर्चा है. हायर एंड फायर इन क़ानूनों का एसईजेड में काम करने वाले श्रमिकों पर सीधा नकारात्मक असर ये पड़ेगा कि वहाँ पर हायर एँड फायर की नीति होगी. मज़दूर ठेके पर होंगे. चूँकि औद्योगिक विवाद अधिनियम, फैक्टरी काऩून के कई नियम वहाँ लागू नहीं होंगे. यानी श्रमिकों की सुरक्षा के जितने क़ानून देश में फिलहाल मौजूद हैं, ये वहाँ लागू नहीं होंगे. सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी हाल में श्रमिकों के हितों के नुकसान न पहुँचे और उनका शोषण न हो. पर्यावरण जहाँ तक पर्यावरण का सवाल है तो अभी एसईजेड के लिए ये भी स्पष्ट नहीं है कि इन्हें पर्यावरण के क़ानूनों के दायरे से बाहर रखा जाएगा कि नहीं. कहा तो ये भी जा रहा है कि इन्हें राज्य सरकार के अधीन लाया जाएगा. यानी कि पर्यावरण मंत्रालय से इन्हें मंजूरी लेने की ज़रूरत नहीं होगी. पर्यावरण के मसले का जितना विकेन्द्रीकरण होगा, उतनी ही उसकी अनदेखी होगी. टाटानगर जमशेदपुर के अनुभवों को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि एसईजेड मे रहने वाले लोगों को बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार मिलेंगे कि नहीं. ये सही है कि 74वें संविधान संशोधन के क़ानून एसईजेड में लागू नहीं होंगे और एसईजेड की सारी योजनाएं इसका लाइसेंसधारी ही बनाएगा. लेकिन एसईजेड में काम करने वाले हज़ारों लोगों के उनके मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार तो मिलने ही चाहिए. हालाँकि एसईजेड क़ानून में खास ऐसी बातें नहीं हैं जिनसे भविष्य में राज्य और केन्द्र के बीच टकराव जैसी गुंजाइश होगी. लेकिन आम क़ानून से उन्हें मुक्त करने का राज्य सरकारों को दिया गया अधिकार ही सबसे ख़तरनाक है. 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'मुझे नहीं पता था कि मेरा रेप करेंगे' रोहिंग्या मुसलमान संकट की आख़िर जड़ क्या है? 'रोहिंग्या मुसलमानों के लिए फ़ेसबुक बना जानवर' फाइल फोटो म्यांमार की सरकार का कहना है कि वो रखाइन प्रांत में रोहिंग्या उग्रवादियों के ख़िलाफ़ न्यायसंगत अभियान चला रही है. म्यामांर की एक अदालत ने 10 रोहिंग्याओं की हत्या में शामिल सात सैनिकों को जेल की सज़ा भी सुनाई है. रोहिंग्याओं का ये कहना रहा है कि म्यांमार में उनके साथ बलात्कार और हिंसा होती रही है, उनके गांवों को जला दिया जाता है. म्यांमार में अधिकतर रोहिंग्या अल्पसंख्यक मुसलमान हैं जिन्हें नागरिक नहीं बल्कि बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासी के तौर पर देखा जाता है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "म्यांमार का कहना है कि बांग्लादेश से पहला रोहिंग्या शरणार्थी परिवार वापस आ गया है. ऐसा तब हुआ है जब संयुक्त राष्ट्र चेतावनी दे चुका है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यांमार वापसी ख़तरे से खाली नहीं है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थियों के शिविर म्यांमार से पिछले साल अगस्त में लगभग सात लाख रोहिंग्याओं ने बर्बर सैन्य अभियान से बचने के लिए सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण ली थी. रोहिंग्या कैंपों में देह व्यापार में धकेली जा रही हैं बच्चियाँ संयुक्त राष्ट्र का आरोप है कि म्यांमार रोहिंग्याओं का 'जातीय सफाया' करना चाहता था, लेकिन म्यांमार इस आरोप से इंकार करता है. वतन वापसी म्यांमार का कहना है कि शनिवार को बांग्लादेश से पांच सदस्यों वाला एक रोहिंग्या परिवार वापस आया है जिसे पहचान पत्र दिए गए हैं. म्यांमार ने पुष्टि की है कि संकट शुरू होने के बाद रोहिंग्याओं का ये पहला समूह है जिसकी वतन वापसी हुई है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सोमवार को बीजेपी के प्रदर्शन के दौरान घायल पुलिस के घोड़े 'शक्तिमान' का पैर एक आपातकालीन जीवन रक्षक सर्जरी में काटना पड़ा है. इस मामले में बीजेपी के एक कार्यकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक बीएस सिद्धू ने कहा है गैंगरीन फैलने के डर से घोड़े का पांव काटना पड़ा है. उन्होंने बताया कि घोड़े के घायल पैर में खून का पहुंचना बंद हो गया था और ऐसी हालत में अगर तत्काल टांग नहीं काटी जाती तो घो़ड़े में गैंगरीन फैल जाता और इससे घोड़े की मौत हो सकती थी. इस बीच, घोड़े के घायल होने के मामले में एक भाजपा कार्यकर्ता को गिरफ़्तार किया गया है. उत्तराखंड पुलिस के आईजी संजय गुंज्याल ने बीबीसी को बताया कि 14 तारीख़ की घटना के तीन दिन बाद नैनीताल ज़िले के हल्द्वानी के भाजपा कार्यकर्ता प्रमोद बोरा को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है. समाप्त उन पर जबरन घोड़े की लगाम खींचने का आरोप है जिसके बाद घोड़ा शक्तिमान गिर गया था. मसूरी से भाजपा के विधायक गणेश जोशी पर आरोप है कि उन्होंने लाठी से पीट-पीटकर घोड़े की टांग तोड़ डाली. लेकिन जोशी इससे साफ़ इनकार करते हैं और कांग्रेस पर घोड़े को बलि का बकरा बनाने का आरोप लगा रहे हैं. हालांकि इस मामले पर घिरी भाजपा हालात को डैमेज कंट्रोल में जुट गई है. भाजपा ने पार्टी के उत्तराखंड प्रभारी श्याम जाजू को देहरादून भेजा गया हैं जहां वो विधायकों की बैठक ले रहे हैं. 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इनाम देंगे. पद पर बन रहेंगे रेल मंत्री प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने अनुसार संघीय रेल मंत्री का संबंध सत्ताधारी गठबंधन में शामिल एएनपी पार्टी से है और प्रधानमंत्री उनके खिलाफ संभावित कदम उठाए के बारे में अपनी इस सहयोगी पार्टी से बात करेंगे. जलीली ने बिलौर के खिलाफ कार्रवाई किए जाने से इनकार नहीं किया लेकिन ये भी कहा कि वो फिलहाल अपने पद काम करते रहेंगे. आवामी नेशनल पार्टी ने भी खुद को बिल्लौर के बयान से ये कहते हुए अलग कर लिया है कि ये उनकी निजी राय है और पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं है. इस्लाम विरोधी फ़िल्म के खिलाफ विश्व भर में मुसलमानों का विरोध जारी है. इसमें एक अमरीकी राजदूत समेत लगभग 50 लोगों की जाने गई हैं. पाकिस्तानी रेल मंत्री के बयान पर विवाद बढ़ा. पाकिस्तान में भी उग्र प्रदर्शनों हो रहे हैं जहां सरकार ने शुक्रवार को 'यौम-ए-इश्क-ए-रसूल' यानी पैगंबर के प्रति मुहब्बत का इज़हार करने का दिन, मनाने के लिए मुल्क भर में छुट्टी की घोषणा की थी. लेकिन इस दौरान हुए प्रदर्शनों में 19 लोगों की मौत हो गई. विरोध जारी इस बीच, बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शनिवार को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में कई लोग घायल हो गए. समाचार एजेंसी एपी के अनुसार कई वाहनों को आग लगाने वाले प्रदर्शनकारियों को तितर बितर करने के लिए आंसू गैस और लाठी चार्ज का इस्तेमाल किया. उधर नाजीरिया में हजारों मुसलमानों ने कानो शहर में शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन किया. कई किलोमीटर तक मार्च करते हुए लोगों ने “अमरीका मुर्दाबाद, इसराइल मुर्दाबाद और इस्लाम के दुश्मन मुर्दाबाद” के नारे लगाए और अमरीका और इसराइल के झंडे जलाए. बेहद कम बजट में बनने वाली इस फिल्म 'इंनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' को किसने बनाया है, ये अभी पूरी तरह साफ नहीं है. अमरीकी सरकार इस फिल्म की कड़े शब्दों में निंदा करती है. इससे जुड़ी और सामग्रियाँ इसी विषय पर और पढ़ें\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ ने अपनी सरकार के एक मंत्री की उस घोषणा की निंदा की है, जिनमें उन्होंने अमरीका में बनी इस्लाम विरोधी फिल्म के निर्माता की हत्या करने वाले को एक लाख डॉलर का इनाम देने की घोषणा की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस फिल्म को लेकर दुनिया भर में 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पर बने रहने से राज्यपाल पद की गरिमा पर विपरीत असर होता है. याचिकाकर्ता बीपी सिंघल ने अपनी याचिका में कहा था कि राज्यपालों को उनके कार्यकाल से पहले हटाना असंवैधानिक है. हालांकि सोमवार को इस मुद्दे पर लोकसभा में हुई चर्चा के दौरान गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा था कि राज्यपालों को कार्यकाल समाप्त होने से पहले हटाना केंद्र सरकार के संवैधानिक और क़ानूनी अधिकारों में आता है.\n\nSummary:", "target": "चार भारतीय राज्यों के राज्यपालों को हटाने के मामले को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयह जनहित याचिका भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बीपी सिंघल ने दायर की थी. बुधवार को मुख्य न्यायाधीश आरसी लोहाटी की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया. गत दो जुलाई को केंद्र की यूपीए सरकार ने उत्तरप्रदेश के राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री, हरियाणा के राज्यपाल बाबू परमानंद, गुजरात के राज्यपाल कैलाशपति मिश्रा और गोवा के राज्यपाल केदारनाथ साहनी को बर्खास्त कर 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से कम 18 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 13 बांग्लादेशी हैं और पांच भारतीय हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने ये भी आरोप लगाए हैं कि कोई कड़ी सज़ा न होने की वजह से ही बीएसएफ के जवानों के मन में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का कोई डर नहीं रहता है. मानवाधिकार संगठन के अनुसार सरकार और बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ़ से बार-बार इस पर लगाम लगाने की बात कहने के बाद भी भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात बीएसएफ के जवानों के जरिए स्थानीय लोगों पर अत्याचार जारी हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2010 में 'ट्रीगर हैप्पी' नाम से एक रिपोर्ट जारी किया था जिसके अनुसार पिछले दस साल में बीएसएफ ने कम से कम एक हजार नागरिकों की गोलीमार कर हत्या कर दी थी. 'नया तरीका' उस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद बीएसएफ के जरिए गोलीबारी की घटना में तो कमी आ गई है लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार जवानों ने प्रताड़ना का अब एक नया तरीका ढूंढ लिया है. ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगूली ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''पहले बीएसएफ गोलीबारी करती थी जिसे हम अंधाधुंध और अत्यधिक बल प्रयोग कहते थे लेकिन हम देख रहें हैं कि बीएसएफ अब संदिग्ध लोगों की पिटाई करती है और लोगों के साथ इतनी ज्यादा मार-पीट होती है कि उनकी मौत हो जाती है.'' मीनाक्षी के अनुसार ढाका स्थित गैर-सरकारी संगठन 'अधिकार' ने साल 2012 में बीएसएफ के जरिए अब तक 13 बांग्लादेशी नागरिकों के मारे जाने के सबूत इकट्ठा किए हैं, जबकि कोलकाता स्थित गैर-सरकारी संगठन 'मासूम' ने इसी दौरान पांच भारतीय नागरिकों के मारे जाने का दावा किया है. ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मानवाधिकार उल्लंघन करते समय बीएसएफ के जवान के दिलों में कोई डर नहीं होता क्योंकि उनको पता होता है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी. मीनाक्षी गांगूली कहती है, ''दिल्ली में गृह मंत्रालय कहता है कि भारत सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में किसी भी तरह नरमी नहीं बर्तेगी लेकिन हम देखते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों या जवानों को कभी सज़ा नहीं मिलती. अगर कोई शिकायत करने जाता है तो पहले तो पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करती, फिर जांच ठीक से नहीं होती और पीड़ित के परिजनों को कभी भी मुआवज़ा नहीं मिलता.'' ह्यूमन राइट्स वॉच की इस ताजा रिपोर्ट पर बीएसएफ मुख्यालय से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है लेकिन दक्षिण बंगाल में तैनात बीएसएफ के आईजी रवि पनोठ ने बीबीसी को बताया कि बीएसएफ पर लगाए गए सारे आरोप बेबुनियाद हैं. रवि पनोठ का कहना था, ''सीमा पर बसे लोगों के लिए बीएसएफ कई योजनाएं चलाती है, उनसे बीएसएफ का कोई विरोध नहीं है. बीएसएफ केवल गैर-कानूनी काम को रोकने के लिए तैनात है. फिर भी बीएसएफ अपने अधिकारियों और जवानों को मानवाधिकार के बारे में नियमित रूप से जानकारी देती रहती है.'' पनोठ के अनुसार दक्षिण बंगाल सीमा पर जहां से सबसे ज्यादा मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे हैं वहां एक वरिष्ठ अधिकारी को मानवाधिकार पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि बीएसएफ को अब और भी अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है क्योंकि अब उन्हें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी तैनात किया जा रहा है.\n\nSummary:", "target": "अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि भारत की सीमा सुरक्षा बल यानि बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर प्रताड़ना के नए तरीके निकाले हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत-बांग्ला सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान संगठन के अनुसार जनवरी से अब तक बीएसएफ के अत्याचार से कम से कम 18 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 13 बांग्लादेशी हैं और पांच भारतीय हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने ये भी आरोप लगाए हैं कि कोई कड़ी सज़ा न होने की वजह से ही बीएसएफ के जवानों के मन में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का कोई डर नहीं रहता है. मानवाधिकार संगठन के अनुसार सरकार और बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ़ से बार-बार इस पर लगाम लगाने की बात कहने के बाद भी भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात बीएसएफ के जवानों के जरिए स्थानीय लोगों पर अत्याचार जारी हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2010 में 'ट्रीगर हैप्पी' नाम से एक रिपोर्ट जारी किया था जिसके अनुसार पिछले दस साल में बीएसएफ ने कम से कम एक हजार नागरिकों की गोलीमार कर हत्या कर दी थी. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका के बास्केटबॉल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट का अमरीकी प्रांत कैलिफॉर्निया में एक हेलिकॉप्टर हादसे में निधन हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस हादसे में ब्रायंट के साथ उनकी 13 साल की बेटी गियाना समेत कुल 9 लोगों की मौत हुई है. हादसे के दौरान 41 वर्षीय ब्रायंट अपने निजी हेलिकॉप्टर में यात्रा कर रहे थे. कोबे को महान क्यों कहा जाता है? दुनियाभर में अगर बास्केटबॉल के कुल पाँच महानतम खिलाड़ियों का नाम लिया जाए तो कोबे ब्रायंट का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा. दुनियाभर में बास्केटबॉल फैंस के बीच कोबे कितने लोकप्रिय थे, इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोबे की मौत के बाद ट्विटर से लेकर फेसबुक के टॉप ट्रेंड्स में एक से लेकर दस स्थानों में ज़्यादातर जगह कोबे और इस दुर्घटना का ज़िक्र है. समाप्त कोबे की मौत पर प्रीति जिंटा, करण जौहर जैसी बॉलीवुड हस्तियों से लेकर बराक ओबामा और डोनल्ड ट्रंप जैसी बड़ी हस्तियां शामिल हैं. बराक ओबामा ने लिखा है, \"बास्केटबॉल खेल के कोर्ट में कोबे एक महान शख़्सियत थे. और वह अपनी ज़िंदगी के दूसरे पड़ाव की शुरुआत करने जा रहे थे. गियाना को खोना एक माँ-बाप के रूप में और ज़्यादा दिल तोड़ने वाला है. मिशेल और मैं वेनेसा समेत पूरे ब्रायंट परिवार के साथ हमारी दुआएं हैं.\" बास्केटबॉल के जादूगर कोबे पाँच बार नेशनल बास्केटबॉल एसोशिएसन यानी एनबीए के चैंपियन रहने वाले कोबे ब्रांयट को बास्केटबॉल के इतिहास में सबसे सफल महान खिलाड़ियों में से एक गिना जाता था. ब्रांयट की मौत के बाद एनबीए ने बयान जारी करके कहा है, \"कोबे ब्रायंट और उनकी 13 साल की बेटी गियाना की दुखद अंत से हम सभी अकल्पनीय शोक में हैं. 20 सालों तक कोबे ने हमें दिखाया कि जब बेहतरीन प्रतिभाएं जीत के लिए पूरे समर्पण लिए एक साथ आती हैं तो क्या संभव है.\" ब्रायंट ने अपने 20 साल लंबे करियर में हमेशा लॉस एंजेल्स लाकेर्स के साथ खेला. साल 2016 के अप्रैल महीने में रिटायर होने वाले कोबे ने साल 2008 में एनबीए के सबसे अहम खिलाड़ी का ख़िताब हासिल किया था. इसके साथ ही दो बार एनबीए फाइनल्स में एमवीपी की उपाधि हासिल की. कोबे के नाम दो बार एनबीए स्कोरिंग चैंपियन का ख़िताब और दो बार ओलंपिक खेलों में चेंपियन बनने का ख़िताब दर्ज है. कोबे ने साल 2006 में टोरंटो रैपटर्स के ख़िलाफ़ एक मैच में 81 अंक हासिल करने का मुक़ाम हासिल किया था जो कि उनके करियर की एक अहम कामयाबियों में शामिल है. बास्केटबॉल से ऑस्कर तक ब्रायंट ने बास्केटबॉल की दुनिया में अवॉर्ड और सम्मान हासिल करने के साथ-साथ एक ऑस्कर अवॉर्ड भी हासिल किया है. कोबे ने साल 2015 में बास्केटबॉल को एक प्रेम पत्र लिखा था. जब इस प्रेम पत्र पर डियर बास्केट बॉल नाम से एक शॉर्ट एनिमेटेड फ़िल्म बनाई गई तो इसे ऑस्कर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. 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'यूएसएस जॉन एस मैकेन' उसकी समुद्री सीमा के 'पीटर द ग्रेट गल्फ़' के क्षेत्र में दो किलोमीटर भीतर तक चला आया था. हालांकि अमेरिकी नौसेना ने इन आरोपों से इनकार किया है. देखिए यह रिपोर्ट. स्टोरीः टीम बीबीसी आवाज़ः नवीन नेगी (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रूस ने कहा है कि उसके समुद्री इलाके में घुसने वाले अमेरिकी जहाज़ को वो तबाह कर देगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउसका कहना है कि उसके युद्धपोत ने जापान सागर के उसके इलाक़े में घुस आए अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक जहाज़ का का पीछा किया. अमेरिकी नौसेना के इस विध्वंसक जहाज़ का नाम 'यूएसएस जॉन एस मैकेन' है. 'यूएसएस जॉन एस मैकेन' उसकी समुद्री सीमा के 'पीटर द ग्रेट गल्फ़' के क्षेत्र में दो किलोमीटर भीतर तक चला आया था. हालांकि अमेरिकी नौसेना ने इन आरोपों से इनकार किया है. देखिए यह रिपोर्ट. स्टोरीः टीम बीबीसी आवाज़ः नवीन नेगी (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 158, "source_item_id": "158", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 637, "clean_index": 147, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:147"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक़रीब एक दर्जन भारतीय मूल की फ़िल्में इस फ़िल्म महोत्सव में दिखाई जा रही हैं. इस फ़िल्म समारोह को रॉबर्ट डी नीरो ने 11 सितंबर के हमलों के बाद निचले मैनहटन के व्यापारिक और मनोरंजन के माहौल को फिर से जीवंत करने के मक़सद से शुरू किया था. दो हफ़्ते तक चलने वाले इस समारोह में कुल 4000 फ़िल्मों में से चुनी गईं 275 फ़िल्में ही दिखाई जा रही हैं जिनमें फीचर फ़िल्मों के साथ-साथ वृतचित्र और लधु फ़िल्में भी शामिल हैं. इस बार पांचवे ट्राईबेका फ़िल्म समारोह में भारतीय मूल के फ़िल्मकारों और कलाकारों की कई फ़िल्में भी ख़ासी चर्चा में हैं. भारतीय फ़िल्में भारत से जुड़े विषयों पर आधारित फ़िल्मों में एक पुरानी अनोखी फ़िल्म भी चर्चा में है. वर्ष 1951 में भारत में एक फ़्रांसीसी निर्देशक जॉं गेनोआ द्वारा बनाई गई फ़िल्म, 'द रिवर' को 55 वर्षों के बाद तकनीकी मदद के सहारे मरम्मत करके फिर से दिखाए जाने की भी चर्चा है. 'द रिवर' इसलिए भी अहम है क्योंकि यह भारत में बनने वाली पहली रंगीन फ़िल्म थी. एक घंटा 40 मिनट लंबी इस फ़िल्म में अंग्रेज़ी और बंगाली भाषाओं का प्रयोग किया गया है. इस फ़िल्म की कहानी ब्रिटिश राज के दौर के बंगाल में रहने वाले एक ब्रिटिश परिवार के बारे में है. फ़िल्म में गंगा किनारे बसे इस परिवार की तीन जवान लड़कियों की ज़िंदगियों में आने वाले उतार-चढ़ाव का चित्रण किया गया है. पश्चिम और पूरब के बीच सांस्कृतिक मूल्यों के मिश्रण को भी इस फ़िल्म में शायद पहली बार दिखाया गया है. कहा जाता है कि भारत के मशहूर फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने निर्देशक जॉं गेनोआ से इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान दोस्ती कर ली थी और इनसे फ़िल्म बनाने के कई गुर भी सीखे थे. न्यूयॉर्क में इस वार्षिक समारोह में फ़िल्मों के शौकीन बड़ी तादाद में शामिल हो रहे हैं. समारोह के आयोजक क्रेग हैटक्रॉफ़ कहते हैं, \"न्यूयॉर्क के लोग किसी भी फ़िल्मकार और किसी भी फ़िल्म को सहर्ष गले से लगा लेते हैं. हज़ारों की संख्या में लोग फ़िल्मों का आनंद ले रहे हैं. हमें तो टिकटों की खिड़कियां भी बढ़ानी पड़ गई हैं.\" देशी भी, विदेशी भी अन्य भारतीय फ़िल्मों में जो ज़्यादा चर्चा में है, वह है नंदा आनंद की 'रिटर्न टू राजापुर' जिसमें बॉलीवुड सितारे मनोज बाजपई ने मुख्य भूमिका निभाई है. अपनी फ़िल्म की दो देशों की मिली-जुली कहानी के बारे में नंदा आनंद कहती हैं, \"मेरे पास क़रीब 20 स्क्रिप्ट थीं लेकिन मैने अपनी जन्मभूमि भारत में ही स्थित कहानी पर आधारित फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया. मैं यह भी चाहती थी कि अमरीका की संस्कृति की भी झलक इस फ़िल्म में आए. ख़ासकर उन अमरीकियों के बारे में जो भारतीय संस्कृति को जानना चाहते हैं.\" एक और भारतीय मूल के निर्देशक तनुज चोपड़ा की 'पंचिंग एट द सन' की भी चर्चा हो रही है. न्यूयॉर्क शहर पर ही आधारित उनकी फ़िल्म में 11 सितंबर के हमलों के बाद लोगों में पैदा होने वाली विभिन्न भावनाओं को दर्शाया गया है. इस कहानी में एक 17 वर्षीय भारतीय मूल के लड़के को उसके भाई की हत्या हो जाने के बाद उसके गुस्से, उसमें उपजी हिंसात्मक भावनाएं और साथ ही उसकी उम्मीद भरी ज़िंदगी को दर्शाया गया है.\n\nSummary:", "target": "भारतीय मूल के फ़िल्मकारों और कलाकारों की कई फ़िल्मों के साथ भारत से जुड़े विषयों पर आधारित फ़िल्मों ने भी न्यूयॉर्क में चल रहे ट्राईबेका फ़िल्म समारोह में धूम मचा दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक़रीब एक दर्जन भारतीय मूल की फ़िल्में इस फ़िल्म महोत्सव में दिखाई जा रही हैं. इस फ़िल्म समारोह को रॉबर्ट डी नीरो ने 11 सितंबर के हमलों के बाद निचले मैनहटन के व्यापारिक और मनोरंजन के माहौल को फिर से जीवंत करने के मक़सद से शुरू किया था. दो हफ़्ते तक चलने वाले इस समारोह में कुल 4000 फ़िल्मों में से चुनी गईं 275 फ़िल्में ही दिखाई जा रही हैं जिनमें फीचर फ़िल्मों के साथ-साथ वृतचित्र और लधु फ़िल्में भी शामिल हैं. इस बार पांचवे ट्राईबेका फ़िल्म समारोह में भारतीय मूल के फ़िल्मकारों और कलाकारों की कई फ़िल्में भी ख़ासी चर्चा में हैं. भारतीय फ़िल्में भारत से जुड़े विषयों पर आधारित फ़िल्मों में एक पुरानी अनोखी फ़िल्म भी चर्चा में है. वर्ष 1951 में भारत में एक फ़्रांसीसी निर्देशक जॉं गेनोआ द्वारा बनाई गई फ़िल्म, 'द रिवर' को 55 वर्षों के बाद तकनीकी मदद के सहारे मरम्मत करके फिर से दिखाए जाने की भी चर्चा है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मुंबई पर 26/11 हमलों के अभियुक्त पाकिस्तानी मूल के अमरीकी चरपमंथी डेविड कोलमैन हेडली को मुंबई की अदालत ने गवाह बनने के बदले कुछ शर्तों पर माफ़ी दे दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्थानीय पत्रकार अश्विन अघोर के मुताबिक, हेडली को अमरीका से मुंबई की अदालत में गुरुवार शाम वीडियो लिंक के ज़रिए पेश किया गया था जहां हेडली ने गवाह बनने के बदले माफ़ी की मांग की थी. अदालत ने हेडली को माफ़ी देते हुए कहा है कि उसे मुंबई हमलों में अपनी और अन्य साज़िशकर्ताओं की भूमिका के बारे में भी बताना होगा. इस मामले में सरकारी वकील उज्जवल निकम का कहना है, ''हेडली सरकारी गवाह बन गया है. अदालत ने उसे माफ करने का फैसला किया है क्योंकि उसकी गवाही से कई तथ्यों की जानकारी मिलेगी. इस मामले में अगली सुनवाई अगले साल आठ फ़रवरी को होगी.'' समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, \"डेविड हेडली को मुंबई हमलों के सिलसिले में 11 मामलों में अभियुक्त बनाया गया है जिसे हेडली ने स्वीकार किया है.\" समाप्त डेविड हेडली का कहना था, ''मैं इन अपराधों में अपनी भूमिका स्वीकार करता हूं. मैं अदालत में गवाह के तौर पर हाज़िर होने के लिए भी तैयार हूं.'' हेडली ने कहा, ''अगर अदालत से मुझे माफ़ी मिले तो मैं इस पूरी घटना के संबंध में सवालों का जबाव देने के लिए तैयार हूं.'' मुंबई हमलों के लिए हेडली को अमरीकी अदालत पहले ही दोषी पाकर 35 साल कैद की सज़ा सुना चुकी है. अमरीका में डेविड हेडली के वकील जॉन थाईस ने भी इस बात की पुष्टि की है कि डेविड हेडली वीडियो लिंक के ज़रिए अदालत में पेश हुए. बीबीसी के वॉशिंगटन संवाददाता ब्रजेश उपाध्याय से बात करते हुए उन्होंने कहा कि हेडली अब तक जो कह चुके हैं उसके आगे कुछ नई बात कहेंगे, उन्हें उसकी उम्मीद नहीं है. थाईस का कहना था कि हो सकता है भारतीय अधिकारी उनसे अबू जंदाल के बारे में और जानना चाहें. जंदाल को मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. हेडली के वकील का कहना था कि उन्होंने जब अमरीका में अपना जुर्म स्वीकार किया था उसी वक्त उन्होंने आगे किसी पूछताछ में अमरीकी और विदेशी अधिकारियों के साथ सहयोग करने की रज़ामंदी दे दी थी. वकील का कहना था,\"अगर वो वीडियो लिंक के ज़रिए नहीं पेश होते तब वो उस करारनामे का उल्लंघन होता जिसके लिए उन्होंने अमरीकी सरकार के सामने हामी भरी थी.\" गुरूवार की इस पेशी से अमरीका में उनकी सज़ा पर कोई असर नहीं होने जा रहा है. मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए हमलों में लगभग 170 लोग मारे गए थे. भारत ने एक पाकिस्तानी हमलावर अज़मल कसाब को पकड़ लिया था, जिसे बाद में फांसी दे दी गई. हेडली अमरीकी सुरक्षा एजेंसियों और अदालत के सामने पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि उन्होंने कई बार मुंबई का दौरा किया था और ये दौरे मुंबई हमलों की योजना से जुड़े थे. 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अख़बार कहता है कि भारत की मोदी सरकार सीमा पर तनाव बढ़ा रही है और घुसपैठ के आरोप पाकिस्तान पर लगाए जा रहे हैं, इससे लगता है कि वो अपने कार्यकाल में कश्मीर के मुद्दे को ताक़त के दम पर हल करना चाहती है. वहीं एक्सप्रेस कहता है कि जब से मोदी सरकार में आए हैं, उनकी तमाम तवज्जो रक्षा तैयारियों पर है. अख़बार के मुताबिक़ मोदी की सोच यह है कि क्षेत्र में चीन का बढ़ता असर रोका जाए और पाकिस्तान को सीमित किया जाए. इसीलिए भारत सरकार की कोशिश है कि सेना को ज़्यादा से ज़्यादा हथियारों से लैस किया जाए. इसी संदर्भ में भारत के रक्षा बजट में की गई वृद्धि का ज़िक्र भी किया गया है. ताकि बत्ती न हो गुल बिजली संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में ईद पर बत्ती कम गुल हो, इसके लिए सरकार ने 20 अरब रुपए जारी किए हैं. दैनिक ख़बरें की संपादकीय टिप्पणी है कि इससे पहले सहरी और इफ़्तारी के वक़्त बिजली कटौती रोकने के लिए 40 अरब रुपए जारी हुए थे, फिर भी रमज़ान के पूरे महीने में ख़ूब बिजली गई. इसी से मिलता जुलता संपादकीय है रोज़नामा उम्मत का- बिजली और पानी से महरूम इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान की जनता. उधर जंग अख़बार ने अपने संपादकीय में पाकिस्तान में जनगणना न कराने के सरकार के फ़ैसले और इसमें आने वाली मुश्किलों का ज़िक्र किया है. सानिया पर सवाल भारत के उर्दू अख़बारों में टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा को तेलंगाना का ब्रांड एंबेसडर बनाने पर विवाद सुनाई पड़ा. अख़बार-ए-मशरिक कहता है कि सानिया मिर्ज़ा को पाकिस्तानी की बहू बताकर उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो तेलंगाना में नहीं रहतीं, लेकिन अमिताभ बच्चन जब गुजरात के ब्रांड एंबेसडर बनते हैं तो किसी को आपत्ति नहीं होती. इस बारे में तेलंगाना के एक भाजपा विधायक की आपत्ति पर हैदराबाद के अख़बार सियासत ने लिखा कि सानिया की शादी पर सवाल उठाने वालों को याद रखना चाहिए कि जहां उनके नेता लालकृष्ण आडवाणी पैदा हुए, वह जगह भी आज पाकिस्तान में है. कई उर्दू अख़बारों में जहां गज़ा पट्टी में जारी इसराइली कार्रवाई से पैदा हालात पर नाराज़गी जताई गई है. वहीं भारत से वहां दखल देने को कहा गया है. इसी पर उर्दू टाइम्स के संपादकीय का विषय है- सुषमा जी ज़रा इस पर भी ग़ौर करें. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप हमसे फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार बराबर सुर्खियों में बने हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनियंत्रण रेखा पर गोलीबारी की घटनाओं के संदर्भ में नवाए वक़्त का संपादकीय है- क्या मोदी सरकार कश्मीर को जबरन भारत में शामिल करने का मंसूबा बना रही है? अख़बार कहता है कि भारत की मोदी सरकार सीमा पर तनाव बढ़ा रही है और घुसपैठ के आरोप पाकिस्तान पर लगाए जा रहे हैं, इससे लगता है कि वो अपने कार्यकाल में कश्मीर के मुद्दे को ताक़त के दम पर हल करना चाहती है. वहीं एक्सप्रेस कहता है कि जब से मोदी सरकार में आए हैं, उनकी तमाम तवज्जो रक्षा तैयारियों पर है. अख़बार के मुताबिक़ मोदी की सोच यह है कि क्षेत्र में चीन का बढ़ता असर रोका जाए और पाकिस्तान को सीमित किया जाए. इसीलिए भारत सरकार की कोशिश है कि सेना को ज़्यादा से ज़्यादा हथियारों से लैस किया जाए. इसी संदर्भ में भारत के रक्षा बजट में की गई वृद्धि का ज़िक्र भी किया गया है. ताकि बत्ती न हो गुल बिजली संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में ईद पर बत्ती कम गुल हो, इसके लिए सरकार ने 20 अरब रुपए जारी किए हैं. दैनिक ख़बरें की संपादकीय टिप्पणी है कि इससे पहले सहरी और इफ़्तारी के वक़्त बिजली कटौती रोकने के लिए 40 अरब रुपए जारी हुए थे, फिर भी रमज़ान के पूरे महीने में ख़ूब बिजली गई. इसी से मिलता जुलता संपादकीय है रोज़नामा उम्मत का- बिजली और पानी से महरूम इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान की जनता. उधर जंग अख़बार ने अपने संपादकीय में पाकिस्तान में जनगणना न कराने के सरकार के फ़ैसले और इसमें आने वाली मुश्किलों का ज़िक्र किया है. सानिया पर सवाल भारत के उर्दू अख़बारों में टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा को तेलंगाना का ब्रांड एंबेसडर बनाने पर विवाद सुनाई पड़ा. अख़बार-ए-मशरिक कहता है कि सानिया मिर्ज़ा को पाकिस्तानी की बहू बताकर उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो तेलंगाना में नहीं रहतीं, लेकिन अमिताभ बच्चन जब गुजरात के ब्रांड एंबेसडर बनते हैं तो किसी को आपत्ति नहीं होती. इस बारे में तेलंगाना के एक भाजपा विधायक की आपत्ति पर हैदराबाद के अख़बार सियासत ने लिखा कि सानिया की शादी पर सवाल उठाने वालों को याद रखना चाहिए कि जहां उनके नेता लालकृष्ण आडवाणी पैदा हुए, वह जगह भी आज पाकिस्तान में है. कई उर्दू अख़बारों में जहां गज़ा पट्टी में जारी इसराइली कार्रवाई से पैदा हालात पर नाराज़गी जताई गई है. वहीं भारत से वहां दखल देने को कहा गया है. इसी पर उर्दू टाइम्स के संपादकीय का विषय है- सुषमा जी ज़रा इस पर भी ग़ौर करें. 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ये लोग सोचते होंगे कि मैंने इनको बेवकूफ बनाया. हम सारे अधिकारियों से मिल चुके हैं पर कुछ नहीं हुआ और अब हारकर धरने पर बैठे हैं.\" हालांकि सरकार की ओर से कहा गया है कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं है. सरगुजा में रोज़गार गारंटी के प्रमुख अधिकारी पीसी प्रसाद कहते हैं,\"ऊपर से पैसा न आने के कारण ऐसा हुआ है. हम जल्दी ही इस समस्या को निपटा लेंगे.\" अच्छा काम भी लेकिन कुछ जगह उदाहरण प्रस्तुत करने वाला काम भी हुआ है और आंध्रप्रदेश में कुछ जगह हुआ काम उनमें से एक है. आंध्रप्रदेश ने टीसीएस कंपनी की मदद से एक सॉफ्ट्वेयर विकसित किया है जिसके इस्तेमाल से इस क़ानून के तहत आने वाले काम की अर्ज़ी से लेकर भुगतान तक का सारा काम होता है. आंध्रप्रदेश में रोज़गार गारंटी कानून के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मुरली कहते हैं, \"इस सॉफ्ट्वेयर के कारण पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की गुंजाइश लगभग समाप्त हो गई है.\" आंध्रप्रदेश के रंगारेड्डी ज़िले के बसई रेड्डी पल्ली गांव के पूर्व सरपंच डी भीमैया कहते हैं, \"इस क़ानून के आने के बाद लोगों को काम मिला है और इस इलाक़े में आम खेती मज़दूरी की दर भी अब पिछले साल की तुलना में लगभग दुगुनी हो गई है.\" काम की गुणवत्ता हालांकि अभी इस योजना के देश भर में लागू होने के बारे में पूरी रिपोर्ट आनी बाक़ी है. सरकार की ओर से अलग-अलग इलाक़ों में इस परियोजना की निगरानी का काम, जिसे 'सोशल-ऑडिट' भी कहा जा रहा है, अलग-अलग स्वयंसेवी संगठनों को दिया गया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायरनमेंट, दिल्ली के रिचर्ड महापात्र जो पिछले एक साल से रोज़गार गारंटी कानून के कार्यांवयन पर नज़र रखी है. वे कहते हैं, \"पहले काम काफ़ी ढीला था पर पिछले पाँच महीने से योजना ने गति पकड़ी है.\" रिचर्ड कहते हैं, \"इस क़ानून की परख सिर्फ़ इस आंकड़े से नहीं होनी चाहिए कि इसके तहत कितने काम शुरू हुए और कितने लोगों को काम मिला. ये देखने की ज़रूरत है कि इस क़ानून के तहत शुरू हुए काम ने गांवों में कितने स्थाई संसाधन तैयार किए जो भविष्य में भी लोगों को रोज़गार दे सकें.\" रोज़गार गारंटी कानून में गांवों में स्थाई संसाधन तैयार करने के लिये पानी रोकने, तालाब बनाने, पेड़ लगाने जैसे कामों को विशेष अहमियत दी गई है. भारत सरकार के आंकडों के अनुसार सारे देश में इस कानून के अंतर्गत अब तक हुए काम में लगभग 65 प्रतिशत काम पानी से जुड़े हैं. राज्यों से मिल रहे आंकडों पर नज़र दौडाएँ तो 10 राज्यों में 90 प्रतिशत से अधिक काम भविष्य में भी रोज़गार देने वाले संसाधन तैयार करने में हुए हैं तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश भी हैं जहाँ 70 प्रतिशत काम सड़क बनाने का रहा है.\n\nSummary:", "target": "केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक - रोज़गार गारंटी योजना के लागू होने के एक साल पूरे होने पर जहाँ कुछ जगह लोग संतुष्ट हैं वहीं कुछ अन्य जगह पर लोग सड़कों पर उतर आए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस योजना को पिछले साल दो फ़रवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हरी झंडी दिखाई थी. छत्तीसगढ के सरगुजा ज़िले में बतौली गाँव के 68 लोग इस योजना के तहत मज़दूरी करने के बाद, संतुष्ट होने की जगह गुस्से में हैं. उन्होंने इस योजना के तहत 25 दिनों तक जो काम किया था. लेकिन उसकी मज़दूरी उन्हें नौ महीने बाद भी नहीं मिली है. हो सकता है कि यह कोई अपवाद का उदाहरण हो क्योंकि कुछ दूसरी जगहों पर इस योजना में तारीफ़ योग्य काम की ख़बरें भी मिली हैं. भारत सरकार के आंकडों के अनुसार पिछले एक साल में रोज़गार गारंटी कानून के तहत लगभग छह लाख काम देश भर में शुरू किए जा चुके हैं जिसमें देश की लगभग एक प्रतिशत जनता को काम मिला है. मज़दूरी नहीं मिली सरगुज़ा ज़िले के चंद्रिका प्रसाद गुप्ता और गाँव के कई लोग धरने पर बैठे हैं. वे कहते हैं कि उनके गाँव के लोग तो इस रोज़गार गारंटी योजना में काम करने के कारण फँस ही गए हैं. वह कहते हैं, \"पिछली फ़रवरी जब मैंने रोज़गार गारंटी क़ानून के बारे में सुना तो मुझे लगा कि यह एक क्रांतिकारी क़ानून है और इसकी सफलता के लिये मुझे योगदान देना चाहिए.\" बतौली गाँव में परचून की दुकान चलाने वाले चंद्रिका प्रसाद गुप्ता को इस नए क़ानून की पेचीदगियाँ समझने में दो महीने का समय लग गया. फिर अप्रैल में उन्होंने उनके गाँव के 69 लोगों की ओर से काम की अर्ज़ी दी. आवेदन के एक हफ्ते बाद काम भी शुरू हो गया. सड़क बनाने के काम में बतौली के 68 लोगों ने 25 दिन काम किया. पर आज नौ महीने बाद भी उनको मज़दूरी का पैसा नहीं मिला है. चन्द्रिका प्रसाद गुप्ता पूछते हैं,\"अब इस अनुभव के बाद अगली बार रोज़गार गारंटी के तहत कौन काम मांगेगा? 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "साल 2016 में कई विमान हादसे हुए. एक नज़र पाँच बड़े हादसों पर", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n18 दिसंबरः इंडोनेशिया का सैन्य विमान हर्कुलस सी-130 पपुआ में क्रैश हो गया. इस हादसे में तीन पायलटों समेत तेरह लोगों की मौत हो गई. ये विमान इसी साल ऑस्ट्रेलिया ने इंडोनेशिया को दिया था. 07 दिसंबरःपाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस का विमान पीके-661 देश के उत्तर में हवेलियां के नज़दीक क्रैश हो गया. इस हादसे में पाकिस्तान के मशहूर गायक जुनैद जमशेद समेत 40 यात्री और चालक दल के पाँच सदस्यों की मौत हो गई. 29 नवंबरःब्राज़ील के ख़िलाड़ियों समेत 81 लोगों को ले जा रहा विमान कोलंबिया में क्रैश. इस हादसे में सात लोग ज़िंदा बचे जिनमें से दो की बाद में मौत हो गई. 19 मई 2016: पेरिस से क़ाहिरा जा रहा इजिप्ट एयर का विमान भूमध्यसागर के ऊपर क्रैश. विमान में सवार 56 यात्रियों और चालक दल के दस सदस्यों की मौत. 19 मार्च 2016: फ्लाई दुबई की दुबई से रूस के रोस्तोफ़-ऑन-डोन जा रही उड़ान लैंडिंग के वक़्त क्रैश. सभी 55 यात्री और चालक दल के सात सदस्यों की मौत. 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'प्लूटॉइड' की परिभाषा भी तय कर दी गई है और इसके लिए आकाशीय पिंड में गुरुत्वाकर्षण, गोलाकार होने जैसे गुणों के अलावा न्यूनतम चमक की शर्त भी रखी गई है. सेरेस को 'प्लूटॉइड' की श्रेणी में नहीं रखा गया है क्योंकि यह मंगल और गुरु ग्रहों के बीच स्थित है और यह 'प्लूटॉइड' की परिभाषा की शर्तें पूरी नहीं करता. हालांकि कुछ वैज्ञानिक आईएयू की इस अवधारणा को ख़ारिज करते हैं. प्लूटो के अभियान पर काम कर रहे नासा के वैज्ञानिक एलन स्टर्न कहते हैं, \"वे इसे प्लूटॉइड कह लें या हेमेरॉइड्स, यह अप्रासंगिक है.\"\n\nSummary:", "target": "प्लूटो को सौर मंडल के नवें ग्रह की श्रेणी से हटाने के बाद अब खगोलशास्त्रियों ने उस जैसे कई ग़ैर-ग्रहों के लिए एक नई श्रेणी बना दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस नई श्रेणी का नाम दिया गया है 'प्लूटॉइड'. दो साल पहले खगोलशास्त्रियों की अंतरराष्ट्रीय संस्था (आईएयू) ने प्लूटो को सौरमंडल के नौ ग्रहों से अलग करते हुए उससे ग्रह की पदवी छीन ली थी और कहा था कि उसमें ग्रह जैसे पूरे गुण नहीं हैं. अब आईएयू ने ओस्लो में हुई एक बैठक के बाद कहा है कि नेप्च्यून के बाद या उससे दूर की कोई भी गोलाकार वस्तु होगी उसे 'प्लूटॉइड' कहा जाएगा. आईएयू ही वह संस्था है जो सभी खगोलकीय नामों और उनकी श्रेणियों को अंतिम रुप देती है. कारण वर्ष 2006 में जब इस संस्था ने प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाने का फ़ैसला किया था तो इस पर पूरी दुनिया में बहुत शोर मचा था. लेकिन संस्था का कहना था कि ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि खगोलशास्त्रीय दुनिया नई तकनीक, ख़ासकर नए तरह के टेलीस्कोप आने से बदल गई है और दूर की चीज़ें भी आसानी से देखी जा रही हैं. संस्था के वैज्ञानिकों का कहना था कि यदि ग्रहों और ग़ैर-ग्रहों या क्षुद्र-ग्रहों के बीच अगर विभाजन रेखा न खींची गई तो जल्दी ही सौर मंडल में 50 से ज़्यादा ग्रह हो जाएँगे. इसके चलते ही खगोलशास्त्रियों ने सौरमंडल में नौ की जगह आठ ही ग्रह कर दिए थे. अब सौरमंडल में बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु या वृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून ही रह गए हैं. वैज्ञानिकों ने 'प्लूटॉइड' की श्रेणी में प्लूटो के अलावा इरिस को भी रखा है जो प्लूटो की तुलना में और दूर की कक्षा में रहते हुए सूर्य की परिक्रमा करता है. संस्था ने कहा है कि जैसे-जैसे विज्ञान प्रगति करेगा और नई खोज होंगी और 'प्लूटॉइड' इसमें शामिल होते जाएँगे. 'प्लूटॉइड' की परिभाषा भी तय कर दी गई है और इसके लिए आकाशीय पिंड में गुरुत्वाकर्षण, गोलाकार होने जैसे गुणों के अलावा न्यूनतम चमक की शर्त भी रखी गई है. सेरेस को 'प्लूटॉइड' की श्रेणी में नहीं रखा गया है क्योंकि यह मंगल और गुरु ग्रहों के बीच स्थित है और यह 'प्लूटॉइड' की परिभाषा की शर्तें पूरी नहीं करता. हालांकि कुछ वैज्ञानिक आईएयू की इस अवधारणा को ख़ारिज करते हैं. प्लूटो के अभियान पर काम कर रहे नासा के वैज्ञानिक एलन स्टर्न कहते हैं, \"वे इसे प्लूटॉइड कह लें या हेमेरॉइड्स, यह अप्रासंगिक है.\"\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 165, "source_item_id": "165", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1904, "clean_index": 154, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:154"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहालांकि उनके विरोधी इसे 'उधार लेकर घी पीने' की संज्ञा दे रहे हैं. उधार लेने का इशारा छह हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ की तरफ़ है जो राज्य सरकार ने पिछले छह महीने के दौरान लिया है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि सरकार को अपनी उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने का पूरा हक़ है और किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए कर्ज़ लेना नई बात नहीं है. पढ़िए विस्तार से पिछले दिनों राज्य के आला अफ़सरों से वीडियो कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सत्ता में अपने दस सालों के जश्न को नाम दिया- \"दस साल-बेमिसाल.\" समाप्त अधिकारियों से कहा गया कि वे शिवराज सरकार की दस साल की उपलब्धियों का ब्यौरा इकट्ठा करें और अगले दस साल क्या करने वाले हैं, इसका विज़न डॉक्यूमेंट जनता के सामने पेश करें. इसके लिए घर-घर बांटने के लिए कोई लगभग 4 करोड़ पर्चे छपवाए जा रहे हैं. कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि जश्न का बजट लगभग 25 करोड़ रुपए रखा गया है. बताया जाता है कि ये उत्सव एक नवंबर से 29 नवंबर तक चलेगा. इस दौरान ग्राम, जनपद और जिला पंचायत स्तर पर कार्यक्रम होंगे. भोपाल में 29 तारीख को मुख्य जलसा होगा, इसी दिन 2005 में शिवराज ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. मोदी से बराबरी? बताया जाता है कि इस मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी को सुनिश्चित करने की कोशिशें भी की जा रही हैं, ताकि शिवराज के नेतृत्व पर मुहर लग सके. लेकिन विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि इस आयोजन के ज़रिए मुख्यमंत्री अपनी छवि चमकाने पर करोड़ों रुपए ख़र्च करने जा रहे हैं ताकि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी कर सकें. राज्य कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा ने कहा कि राज्य के पुनर्गठन से पहले संयुक्त मध्य प्रदेश पर 33 हजार करोड़ का कर्ज़ था जो अब बढ़ कर लगभग डेढ लाख करोड़ रुपए हो गया है. उन्होंने कहा, \"शिवराज सरकार न सिर्फ़ उधार लेकर घी पी रही है बल्कि जनता की आहों पर काली पट्टी भी बांध रही है.\" कांग्रेस प्रवक्ता शिवराज सरकार के विकास के दावों पर सवाल उठाते हुए उनके दस साल के कार्यकाल में अरबों रुपए के घोटालों का आरोप लगाते हैं. शिवराज का ख़तरा टला वहीं भाजपा प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं कि पार्टी और सरकार को जश्न मनाने का पूरा हक़ है. वो कहते हैं, \"शिवराज लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. दस साल में राज्य ने हर क्षेत्र में प्रगति की है. आर्थिक हालत मज़बूत हैं. दस साल पहले सूबे का बजट 21 हजार करोड़ था, जो अब लाखों में पहुंच गया है. विकासोन्मुखी अर्थव्यवस्था कर्ज लेती है.\" राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता, लेकिन व्यापमं घोटाले की गूंज के बाद शिवराज की कुर्सी पर जो ख़तरा मंडरा रहा था, वो अब टल गया लगता है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि शिवराज की हालिया बॉडी लैंग्वेज भी बता रही है कि वह दिग्विजय सिंह का रिकॉर्ड तोड़कर नया इतिहास रचने के लिए आतुर हैं. व्यापमं से लेकर डीमेट, खनिज, डंपर (इसमें क्लीन चिट मिल गई), दवा खरीद, जमीन आवंटन में गड़बड़ी के तमाम आरोपों के बावजूद शिवराज रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "व्यापमं घोटाले को लेकर विवादों में रहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जल्द ही सत्ता में अपने दस साल पूरे करने का जश्न मनाने जा रहे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहालांकि उनके विरोधी इसे 'उधार लेकर घी पीने' की संज्ञा दे रहे हैं. उधार लेने का इशारा छह हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ की तरफ़ है जो राज्य सरकार ने पिछले छह महीने के दौरान लिया है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि सरकार को अपनी उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने का पूरा हक़ है और किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए कर्ज़ लेना नई बात नहीं है. पढ़िए विस्तार से पिछले दिनों राज्य के आला अफ़सरों से वीडियो कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सत्ता में अपने दस सालों के जश्न को नाम दिया- \"दस साल-बेमिसाल.\" समाप्त अधिकारियों से कहा गया कि वे शिवराज सरकार की दस साल की उपलब्धियों का ब्यौरा इकट्ठा करें और अगले दस साल क्या करने वाले हैं, इसका विज़न डॉक्यूमेंट जनता के सामने पेश करें. इसके लिए घर-घर बांटने के लिए कोई लगभग 4 करोड़ पर्चे छपवाए जा रहे हैं. कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि जश्न का बजट लगभग 25 करोड़ रुपए रखा गया है. बताया जाता है कि ये उत्सव एक नवंबर से 29 नवंबर तक चलेगा. इस दौरान ग्राम, जनपद और जिला पंचायत स्तर पर कार्यक्रम होंगे. भोपाल में 29 तारीख को मुख्य जलसा होगा, इसी दिन 2005 में शिवराज ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. मोदी से बराबरी? बताया जाता है कि इस मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी को सुनिश्चित करने की कोशिशें भी की जा रही हैं, ताकि शिवराज के नेतृत्व पर मुहर लग सके. लेकिन विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि इस आयोजन के ज़रिए मुख्यमंत्री अपनी छवि चमकाने पर करोड़ों रुपए ख़र्च करने जा रहे हैं ताकि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी कर सकें. राज्य कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा ने कहा कि राज्य के पुनर्गठन से पहले संयुक्त मध्य प्रदेश पर 33 हजार करोड़ का कर्ज़ था जो अब बढ़ कर लगभग डेढ लाख करोड़ रुपए हो गया है. उन्होंने कहा, \"शिवराज सरकार न सिर्फ़ उधार लेकर घी पी रही है बल्कि जनता की आहों पर काली पट्टी भी बांध रही है.\" कांग्रेस प्रवक्ता शिवराज सरकार के विकास के दावों पर सवाल उठाते हुए उनके दस साल के कार्यकाल में अरबों रुपए के घोटालों का आरोप लगाते हैं. शिवराज का ख़तरा टला वहीं भाजपा प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं कि पार्टी और सरकार को जश्न मनाने का पूरा हक़ है. वो कहते हैं, \"शिवराज लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. दस साल में राज्य ने हर क्षेत्र में प्रगति की है. आर्थिक हालत मज़बूत हैं. दस साल पहले सूबे का बजट 21 हजार करोड़ था, जो अब लाखों में पहुंच गया है. विकासोन्मुखी अर्थव्यवस्था कर्ज लेती है.\" राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता, लेकिन व्यापमं घोटाले की गूंज के बाद शिवराज की कुर्सी पर जो ख़तरा मंडरा रहा था, वो अब टल गया लगता है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि शिवराज की हालिया बॉडी लैंग्वेज भी बता रही है कि वह दिग्विजय सिंह का रिकॉर्ड तोड़कर नया इतिहास रचने के लिए आतुर हैं. व्यापमं से लेकर डीमेट, खनिज, डंपर (इसमें क्लीन चिट मिल गई), दवा खरीद, जमीन आवंटन में गड़बड़ी के तमाम आरोपों के बावजूद शिवराज रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं. 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'कुछ नहीं छिपाएँगे' दस्तावेज़ के जवाब को लेकर कई तरह के बयानों के बीच एक बयान प्रधानमंत्री का आया है. उन्होंने सोमवार-मंगलवार को रिपोर्ट प्रकाशित करने की बात कही है. प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने शुक्रवार को कहा, \"हम कुछ भी नहीं छिपाएँगे.\" उनका कहना था, \"हम नहीं चाहते कि पाकिस्तान की ज़मींन का उपयोग आतंकवाद के लिए किया जाए.\" इस बीच पाकिस्तान ने इन आरोपों का भी खंडन किया है कि मुंबई हमलों के पीछे ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का भी हाथ था. उन्होंने इस आरोप को पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए किया जा रहा दुष्प्रचार बताया है. उल्लेखनीय है कि पेरिस में एक सम्मेलन में बोलते हुए भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने कहा था मुंबई हमलों के पीछे आईएसआई का हाथ था.\n\nSummary:", "target": "मुंबई में हुए चरमपंथी हमले के सबूतों की जाँच को लेकर भारत के बढ़ते दबाव के बीच पाकिस्तान ने कहा है कि जाँच पूरी कर ली गई है और सोमवार या मंगलवार को रिपोर्ट प्रकाशित कर दी जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने शुक्रवार को कहा कि मुंबई हमले पर जाँच रिपोर्ट प्रकाशित करने के बाद पाकिस्तान पूरी दुनिया को विश्वास में लेगा कि सच क्या है. उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान ने भारत के दस्तावेज़ के आधार पर जाँच के लिए एक तीन सदस्यीय टीम बनाई थी. वैसे तो इस टीम को पिछले 26 जनवरी को रिपोर्ट दे देनी थी लेकिन इसे अब तक प्रकाशित नहीं किया गया है. इस बीच भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाता रहा है कि मुंबई हमले के जो सबूत भारत ने दिए हैं उसकी जाँच में पाकिस्तान सहयोग करे. 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शामिल थे. दलाई लामा ने इन नेताओं से चीन सीमा की तरफ़ जारी संगठनों के मार्च को रद्द करने के लिए कहा है. हांलाकि दलाई लामा के प्रवक्ता का कहना है अब ये संगठनों की ज़िम्मेदारी है की वो दलाई लामा की बात को मानते हैं या नहीं. संगठनों में मतभेद दलाई लामा के क़रीबी लोगों को आशा है की ये संगठन बात मान लेंगें. तिब्बत बौद्ध दर्शन विश्वविद्यालय के अध्यापक लोपचांग दावा कहते हैं,\" हम ये मानते हैं कि अहिंसक तरीक़े से कुछ देर लग सकती है लेकिन अगर हम अहिंसात्मक रास्ता अपनाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र संघ हमारे समर्थन में आएगा और हम अपना मक़सद हासिल कर सकते हैं. और जो लोग आज इस सिद्वांत से सहमत नही हैं वो भी हमारे साथ आएँगें. \" दलाई लामा ने तिब्बत में प्रदर्शनकारियों से हिंसक और टकराव के रास्ते को छोड़ने को कहा है. इसके साथ ही दलाई लामा ने कहा है की वो चीन में होने वाले ओलंपिक खेलों के ख़िलाफ़ भी नहीं हैं. उनका मानना है की तिब्बत की आज़ादी की बात आज के समय में बेमानी है और फ़िलहाल तिब्बत की स्वायत्तता की बात की जानी चाहिए. लेकिन निर्वासित तिब्बतियों के कई संगठन हैं जो दलाई लामा 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लामा के प्रवक्ता का कहना है अब ये संगठनों की ज़िम्मेदारी है की वो दलाई लामा की बात को मानते हैं या नहीं. संगठनों में मतभेद दलाई लामा के क़रीबी लोगों को आशा है की ये संगठन बात मान लेंगें. तिब्बत बौद्ध दर्शन विश्वविद्यालय के अध्यापक लोपचांग दावा कहते हैं,\" हम ये मानते हैं कि अहिंसक तरीक़े से कुछ देर लग सकती है लेकिन अगर हम अहिंसात्मक रास्ता अपनाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र संघ हमारे समर्थन में आएगा और हम अपना मक़सद हासिल कर सकते हैं. और जो लोग आज इस सिद्वांत से सहमत नही हैं वो भी हमारे साथ आएँगें. \" दलाई लामा ने तिब्बत में प्रदर्शनकारियों से हिंसक और टकराव के रास्ते को छोड़ने को कहा है. इसके साथ ही दलाई लामा ने कहा है की वो चीन में होने वाले ओलंपिक खेलों के ख़िलाफ़ भी नहीं हैं. उनका मानना है की तिब्बत की आज़ादी की बात आज के समय में बेमानी है और फ़िलहाल तिब्बत की स्वायत्तता की बात की जानी चाहिए. लेकिन निर्वासित तिब्बतियों के कई संगठन हैं जो दलाई लामा के मत से सहमत नही हैं. इन संगठनों की मांग है कि तिब्बत की आज़ादी के साथ ही बीजिंग में होने वाले ओलंपिक रद्द किए जाएँ. 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लेकिन वह इस विद्रोह में अकेला नहीं है. जिहादी गुटों के विश्लेषक एयमन जवाद अल-तामिनि बता रहे हैं कि इस विद्रोह में कौन-कौन शामिल हैं. जिहादी इस्लामिक स्टेट इन इराक़ और शाम (आईएसआईएस) आईएसआईएस का एक नारा है, 'बने रहो और विस्तार करो'. इसने यही सीरिया और इराक़ में किया है. शुरुआती मीडिया कवरेज में यह कहा गया था कि इसने अकेले ही फ़ालुजा और मोसूल पर क़ब्ज़ा कर लिया है, जो कि सोशल मीडिया पर दिखने की वजह से था. हालांकि यह सच है कि आइएसआइएस बाक़ी संगठनों से आगे है क्योंकि इसके पास पिछले कुछ सालों में सुरक्षा बलों से हथियाए गए बेहतर हथियार और वर्दियां हैं. इसके पास इसके पास पैसा भी बाक़ी संगठनों से ज़्यादा है. मोसूल में यह मुख्य ताक़त है इसने वहां शहर का शासनपत्र लागू कर दिया है. लेकिन फ़ालुजा में इसने ऐसा शासनपत्र लागू नहीं किया है क्योंकि वहां यह अकेले राज नहीं कर रहा. वहां एक सैन्य परिषद भी है, जिसमें कई विद्रोही गुट हैं और उनका बड़े इलाक़े पर क़ब्ज़ा है. अनुमान है कि इराक़ में आईएसआईएस के 2,000-3,000 से लेकर संभवतः 10,000 लड़ाके हो सकते हैं. जमात अन्सार अल-इस्लाम (जेएआइ) जेएआइ आईएसआईएस का विरोधी गुट है और मुख्यतः निनेवेह (विशेषकर मोसूल), किर्कुक और सलाहुद्दीन प्रांतों में सक्रिय है. हालांकि इसके लड़ाकुओं की संख्या का पता नहीं है. पिछले साल इराक़ में आईएसआईएस के इस्लामिक स्टेट बनाने के ऐलान के बाद दोनों संगठन पूरे साल लड़ते रहे हैं. बाथिस्ट नक्शबंदी ऑर्डर नक्शबंदी ऑर्डर या जेआरटीएन (जैश रिजाल अल-तरीका अल-नक्शबंदिया) के लड़ाकुयों की संख्या भी पता नहीं है लेकिन संभवतः यह आईएसआईएस के बाद दूसरा सबसे बड़ा विद्रोही गुट है. सद्दाम हुसैन के दाहिने हाथ, इज़्ज़त इब्राहिम अल-दौरी, जेआरटीएन का नेतृत्व कर रहे हैं. चूंकी ज़्यादातर सुन्नी अरब नक्शबंदी नहीं होते इसलिए जेआरटीएन ने बाथिस्टों का एक संगठन 'जनरल मिलिट्री काउंसिह फ़ॉर इराक्स रिवोल्यूशनरीज़' (जीएमसी) बनाया है. हालांकि आईएआईएस से सहयोग की बात यह स्वीकारता नहीं है लेकिन साफ़ है कि मोसूल, तिर्कित और दियाला प्रांतों में जेआरटीएन और इसके अग्रणी गुट आईएसआईएस के साथ रहे हैं. हालांकि दोनों के बीच गहरा अविश्वास और वैचारिक मतभेद हैं. इस्लामिस्ट जैश अल-मुजाहिदीन (जेएएम) साल 2003 की घुसपैठ से सक्रिय इस गुट का उद्देश्य इराक़ की सरकार को उखाड़ फेंकना है और यह शिया विरोधी है. हालिया सबूत इशारा करते हैं कि आईएसआईएस का मुक़ाबला करने के लिए इसने जेएआइ के साथ ख़ास गठबंधन किया है. जेएएम स्थानीय कबीलों के साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर देता है और करमा में इसकी मज़बूत पकड़ मानी जाती है. इस्लामिक आर्मी ऑफ़ इराक़ (आइएआइ) यह एक और पारंपरिक विद्रोही दस्ता है. यह बाक़ियों से इस मायने में अलग है कि 2011 में अमरीका के जाने के बाद आइएआइ ने एक कार्यकर्ता संगठन- सुन्नी पॉपुलर मूवमेंट- बनाया और राजनीति में उतरने की कोशिश की. इसके लिए जेएएम ने इसकी आलोचना भी की. इस साल की शुरुआत में यह फिर से सशस्त्र संघर्ष पर उतर आया है. इसकी उपस्थिति मुख्य रूप से दियाला और सलाहुद्दीन प्रांतों में है. संगटन के प्रवक्ता इसके पास बड़ी संख्या में लड़ाके होने का दावा करते हैं लेकिन दरअसल यह कमज़ोर है. अन्य गुट इन पांच मुख्य विद्रोही गुटों के अलावा कई अन्य गुट भी हैं. इनमें 1920 की रिवोल्यूशन ब्रिगेड, फ़ालुजा का एक छोटा गुट सराया अल-मदीना अल मुनावारा भी हैं, जो आईएसआईएस से जुड़े होने का दावा करते हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इराक़ की सरकार चरमपंथी विद्रोहियों से एक मुश्किल जंग लड़ रही है और देश के सुन्नी प्रभाव वाले उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों पर क़ब्ज़ा खोती जा रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमाना जा रहा है कि चरमपंथी समूह आईएसआईएस इस विद्रोह का नेतृत्व कर रहा है लेकिन वह इस विद्रोह में अकेला नहीं है. जिहादी गुटों के विश्लेषक एयमन जवाद अल-तामिनि बता रहे हैं कि इस विद्रोह में कौन-कौन शामिल हैं. जिहादी इस्लामिक स्टेट इन इराक़ और शाम (आईएसआईएस) आईएसआईएस का एक नारा है, 'बने रहो और विस्तार करो'. इसने यही सीरिया और इराक़ में किया है. शुरुआती मीडिया कवरेज में यह कहा गया था कि इसने अकेले ही फ़ालुजा और मोसूल पर क़ब्ज़ा कर लिया है, जो कि सोशल मीडिया पर दिखने की वजह से था. हालांकि यह सच है कि आइएसआइएस बाक़ी संगठनों से आगे है क्योंकि इसके पास पिछले कुछ सालों में सुरक्षा बलों से हथियाए गए बेहतर हथियार और वर्दियां हैं. इसके पास इसके पास पैसा भी बाक़ी संगठनों से ज़्यादा है. मोसूल में यह मुख्य ताक़त है इसने वहां शहर का शासनपत्र लागू कर दिया है. लेकिन फ़ालुजा में इसने ऐसा शासनपत्र लागू नहीं किया है क्योंकि वहां यह अकेले राज नहीं कर रहा. वहां एक सैन्य परिषद भी है, जिसमें कई विद्रोही गुट हैं और उनका बड़े इलाक़े पर क़ब्ज़ा है. अनुमान है कि इराक़ में आईएसआईएस के 2,000-3,000 से लेकर संभवतः 10,000 लड़ाके हो सकते हैं. जमात अन्सार अल-इस्लाम (जेएआइ) जेएआइ आईएसआईएस का विरोधी गुट है और मुख्यतः निनेवेह (विशेषकर मोसूल), किर्कुक और सलाहुद्दीन प्रांतों में सक्रिय है. हालांकि इसके लड़ाकुओं की संख्या का पता नहीं है. पिछले साल इराक़ में आईएसआईएस के इस्लामिक स्टेट बनाने के ऐलान के बाद दोनों संगठन पूरे साल लड़ते रहे हैं. बाथिस्ट नक्शबंदी ऑर्डर नक्शबंदी ऑर्डर या जेआरटीएन (जैश रिजाल अल-तरीका अल-नक्शबंदिया) के लड़ाकुयों की संख्या भी पता नहीं है लेकिन संभवतः यह आईएसआईएस के बाद दूसरा सबसे बड़ा विद्रोही गुट है. सद्दाम हुसैन के दाहिने हाथ, इज़्ज़त इब्राहिम अल-दौरी, जेआरटीएन का नेतृत्व कर रहे हैं. चूंकी ज़्यादातर सुन्नी अरब नक्शबंदी नहीं होते इसलिए जेआरटीएन ने बाथिस्टों का एक संगठन 'जनरल मिलिट्री काउंसिह फ़ॉर इराक्स रिवोल्यूशनरीज़' (जीएमसी) बनाया है. हालांकि आईएआईएस से सहयोग की बात यह स्वीकारता नहीं है लेकिन साफ़ है कि मोसूल, तिर्कित और दियाला प्रांतों में जेआरटीएन और इसके अग्रणी गुट आईएसआईएस के साथ रहे हैं. हालांकि दोनों के बीच गहरा अविश्वास और वैचारिक मतभेद हैं. इस्लामिस्ट जैश अल-मुजाहिदीन (जेएएम) साल 2003 की घुसपैठ से सक्रिय इस गुट का उद्देश्य इराक़ की सरकार को उखाड़ फेंकना है और यह शिया विरोधी है. हालिया सबूत इशारा करते हैं कि आईएसआईएस का मुक़ाबला करने के लिए इसने जेएआइ के साथ ख़ास गठबंधन किया है. जेएएम स्थानीय कबीलों के साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर देता है और करमा में इसकी मज़बूत पकड़ मानी जाती है. इस्लामिक आर्मी ऑफ़ इराक़ (आइएआइ) यह एक और पारंपरिक विद्रोही दस्ता है. यह बाक़ियों से इस मायने में अलग है कि 2011 में अमरीका के जाने के बाद आइएआइ ने एक कार्यकर्ता संगठन- सुन्नी पॉपुलर मूवमेंट- बनाया और राजनीति में उतरने की कोशिश की. इसके लिए जेएएम ने इसकी आलोचना भी की. इस साल की शुरुआत में यह फिर से सशस्त्र संघर्ष पर उतर आया है. इसकी उपस्थिति मुख्य रूप से दियाला और सलाहुद्दीन प्रांतों में है. संगटन के प्रवक्ता इसके पास बड़ी संख्या में लड़ाके होने का दावा करते हैं लेकिन दरअसल यह कमज़ोर है. अन्य गुट इन पांच मुख्य विद्रोही गुटों के अलावा कई अन्य गुट भी हैं. इनमें 1920 की रिवोल्यूशन ब्रिगेड, फ़ालुजा का एक छोटा गुट सराया अल-मदीना अल मुनावारा भी हैं, जो आईएसआईएस से जुड़े होने का दावा करते हैं. 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में लगे हेलिकॉप्टर की उड़ानें फिलहाल रोक दी गई हैं क्योंकि बारिश हो रही है और बादल भी काफ़ी नीचे उड़ रहे हैं. सुल्तान ने कहा कि तमाम उड़ानें तभी शुरू की जाएंगी जब मौसम में कुछ सुधार हो जाएगा. भूकंप पीड़ितों की सहायता में हेलिकॉप्टर अहम भूमिका अदा कर रहे हैं क्योंकि ज़्यादातर इलाक़ों में ज़मीनी रास्ते ख़राब हो गए हैं जिससे वाहनों के ज़रिए राहत सामग्री पहुँचना मुश्किल हो रहा है. इससे पहले पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री सिकंदर हयात ख़ान ने भारत के साथ नियंत्रण रेखा को खोले जाने की हिमायत की थी ताकि राहत कार्यों में आसानी सके. पाकिस्तानी अधिकारी कह चुके हैं कि आठ अक्तूबर को आए भूकंप में मारे गए लोगों की संख्या 38 हज़ार पर पहुँच गई है. विनाशकारी भूकंप में घायलों की संख्या 60 हज़ार से ऊपर बताई गई है. मौसम की मार संयुक्त राष्ट्र के राहत अभियानों के प्रबंधक रौबर्ट होल्डेन ने कहा है कि ख़राब मौसम ने हालात को और मुश्किल बना दिया है. उन्होंने कहा, \"बहुत से लोग खुले में रह रहने के लिए विवश हैं. वहाँ राहत कार्य शुरू करना ही बहुत मुश्किल भरा काम है लेकिन अगर मौसम ऐसा रहा तो हालात और ख़राब होंगे.\" रौबर्ट होल्डेन ने कहा कि ख़राब मौसमसे और इमारतों के धँसने का ख़तरा पैदा हो गया है और लगातार हो रही बारिश की वजह से स्थिति बहुत कठिन हो रही है. पाकिस्तान के मौसम विभाग ने सोमवार को और बारिश होने का अनुमान जताया है और उसके बाद सर्दी बढ़ने की भी संभावना जताई है.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में अधिकारियों ने कहा है कि सेना का एक हेलिकॉप्टर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया है जिससे उसमें सवार सभी छह सैनिकों की मौत हो गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये हेलिकॉप्टर भूकंप प्रभावितों को मदद पुहँचाने के बाद वापस आ रहा था. दुर्घटना का कारण ख़राब मौसम बताया जा रहा है. ये दुर्घटना बाग़ इलाक़े के पास हुई. एमआई-17 नामक हेलिकॉप्टर पर सवार सभी छह सैनिकों की मौत हो गई. सेना ने कहा है कि विमान के साथ शनिवार रात को संपर्क टूट गया था जब वह बाग़ शहर के आसपास से गुज़र रहा था. पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल शौकत सुल्तान ने कहा कि हेलिकॉप्टर का मलबा छपरी गाँव के नज़दीक पाया गया है. ख़राब मौसम की वजह से राहत कार्यों में लगे हेलिकॉप्टर की उड़ानें फिलहाल रोक दी गई हैं क्योंकि बारिश हो रही है और बादल भी काफ़ी नीचे उड़ रहे हैं. सुल्तान ने कहा कि तमाम उड़ानें तभी शुरू की जाएंगी जब मौसम में कुछ सुधार हो जाएगा. भूकंप पीड़ितों की सहायता में हेलिकॉप्टर अहम भूमिका अदा कर रहे हैं क्योंकि ज़्यादातर इलाक़ों में ज़मीनी रास्ते ख़राब हो गए हैं जिससे वाहनों के ज़रिए राहत सामग्री पहुँचना मुश्किल हो रहा है. इससे पहले पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री सिकंदर हयात ख़ान ने भारत के साथ नियंत्रण रेखा को खोले जाने की हिमायत की थी ताकि राहत कार्यों में आसानी सके. पाकिस्तानी अधिकारी कह चुके हैं कि आठ अक्तूबर को आए भूकंप में मारे गए लोगों की संख्या 38 हज़ार पर पहुँच गई है. विनाशकारी भूकंप में घायलों की संख्या 60 हज़ार से ऊपर बताई गई है. मौसम की मार संयुक्त राष्ट्र के राहत अभियानों के प्रबंधक रौबर्ट होल्डेन ने कहा है कि ख़राब मौसम ने हालात को और मुश्किल बना दिया है. उन्होंने कहा, \"बहुत से लोग खुले में रह रहने के लिए विवश हैं. वहाँ राहत कार्य शुरू करना ही बहुत मुश्किल भरा काम है लेकिन अगर मौसम ऐसा रहा तो हालात और ख़राब होंगे.\" रौबर्ट होल्डेन ने कहा कि ख़राब मौसमसे और इमारतों के धँसने का ख़तरा पैदा हो गया है और लगातार हो रही बारिश की वजह से स्थिति बहुत कठिन हो रही है. पाकिस्तान के मौसम विभाग ने सोमवार को और बारिश होने का अनुमान जताया है और उसके बाद सर्दी बढ़ने की भी संभावना जताई है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 174, "source_item_id": "174", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1799, "clean_index": 162, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:162"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजम्मू-कश्मीर के दौरे के बाद रविवार को श्रीनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजनाथ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ, उस पर उन्हें अफ़सोस है. उन्होंने कहा, \"हम कश्मीर के साथ जज़्बाती संबंध बनाना चाहते हैं और कश्मीर की जम्हूरियत में सिर्फ़ इंसानियत का स्थान रहेगा.\" गृहमंत्री ने कहा कि पूरे हिंदुस्तान के लोगों की ख़्वाहिश है कि कश्मीर फिर से फ़िरदौस (यानी जन्नत) बनना चाहिए. कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में हिज़्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद घाटी में हुई हिंसक झड़पों में कई लोगों की मौत हुई थी. समाप्त राजनाथ ने कहा कि हर मतभेद को बातचीत के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए, क्योंकि इसके अलावा कोई दूसरा समाधान नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि कश्मीर के मसले में तीसरे पक्ष की दख़लअंदाज़ी नहीं चलेगी. उन्होंने कहा, \"कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका पाक नहीं है. कश्मीर पर पाकिस्तान को अपनी सोच बदलनी चाहिए.\" राजनाथ ने घाटी में सुरक्षाकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की घटनाओं पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों में वे 30 से अधिक प्रतिनिधिमंडलों से मिले हैं. राजनाथ ने कहा, \"मेरी जानकारी के मुताबिक़ इन झड़पों में 2228 पुलिस के जवान, 1100 सीआरपीएफ़ के जवान और 2259 आम नागरिक घायल हुए हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य और शांतिपूर्ण होने चाहिए, उसके बाद ही जिससे भी बातचीत की आवश्यकता होगी, बातचीत की जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजम्मू-कश्मीर के दौरे के बाद रविवार को श्रीनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजनाथ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ, उस पर उन्हें अफ़सोस है. उन्होंने कहा, \"हम कश्मीर के साथ जज़्बाती संबंध बनाना चाहते हैं और कश्मीर की जम्हूरियत में सिर्फ़ इंसानियत का स्थान रहेगा.\" गृहमंत्री ने कहा कि पूरे हिंदुस्तान के लोगों की ख़्वाहिश है कि कश्मीर फिर से फ़िरदौस (यानी जन्नत) बनना चाहिए. कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में हिज़्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद घाटी में हुई हिंसक झड़पों में कई लोगों की मौत हुई थी. समाप्त राजनाथ ने कहा कि हर मतभेद को बातचीत के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए, क्योंकि इसके अलावा कोई दूसरा समाधान नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि कश्मीर के मसले में तीसरे पक्ष की दख़लअंदाज़ी नहीं चलेगी. उन्होंने कहा, 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शहज़ाद मलिक को अभियोजकों ने बताया कि रावलपिंडी की आडियाला जेल में न्यायाधीश चौधरी हबीब-उर-रहमान की विशेष अदालत के समक्ष बंद कमरे में हुई सुनवाई में एक गवाह ने अभियुक्त शाहिद जमील रियाज की पहचान की है. शहज़ाद मलिक के मुताबिक गवाह ने न्यायाधीश को बताया कि रियाज और 10 अन्य लोगों ने मछली पकड़ने की बात कहकर 11 नौकाएं खरीदी थीं. गवाह ने न्यायाधीश को यह भी बताया कि उन्होंने इन लोगों को कभी समुद्र से मछली के साथ लौटते हुए नहीं देखा था. सुनवाई के दौरान कुल चार गवाहों से जिरह की गई. एक अन्य गवाह ने न्यायाधीश को बताया कि उसने अभियुक्त को 1.6 लाख रुपए में यामाहा बोट इंजन बेचा था जबकि दूसरे गवाह ने बताया कि उसने अभियुक्त को छह पंप बेचे थे. साज़िश में शामिल गवाहों ने अमजद खान और अतीकुर रहमान सहित 10 लोगों की पहचान की है. ये सभी कथित तौर पर 26 नवंबर 2008 में हुए मुंबई हमले की साजिश और उसके क्रियान्वयन में शामिल थे. पाकिस्तान की आतंकवाद-निरोधी अदालत ने इन 10 लोगों को पहले ही भगोड़ा घोषित कर रखा है. मुख्य अभियोजक चौधरी जुल्फिकार अली का कहना था, ‘‘10 भगोड़े अपराधी मुंबई हमले को अंजाम देने के अभियुक्तों के प्रशिक्षक या फिर सहायक थे.’’ अदालत को एक गवाह ने बताया कि अमजद खान अल-हुसैनी नामक नौका के लिए उसने बंदरगाह के उपयोग की इजाज़त ली थी. मुख्य अभियोजक जुल्फिकार अली ने चारों निजी गवाहों की पहचान हम्जा बिन तारिक, मोहम्मद अली, मोहम्मद सैफुल्ला खान और उमर दराज खान के तौर पर की है. सभी गवाह कराची के रहने वाले हैं. अदालत में इस सुनवाई के दौरान मुंबई हमले की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संघीय जांच एजेंसी के अतिरिक्त निदेशक अल्ताफ हुसैन भी मौजूद थे लेकिन उनकी गवाही नहीं हो सकी. बचाव पक्ष ने मांग की कि निजी गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद हुसैन का बयान दर्ज किया जाए. अभियोजकों ने बताया कि बचाव पक्ष के मुख्य वकील की अनुपस्थिति के कारण चारों निजी गवाहों से जिरह नहीं हो सकी जिसकी वजह से मामले की सुनवाई को 27 अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दिया गया.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में एक गवाह ने साल 2008 के मुंबई हमलों में शामिल सात लोगों में से एक की पहचान कर ली है. इस व्यक्ति की पहचान हमले में शामिल चरमपंथियों के लिए नाव खरीदने वाले के रूप में की गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुंबई में हुए हमलों में करीब 166 लोग मारे गए थे बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक को अभियोजकों ने बताया कि रावलपिंडी की आडियाला जेल में न्यायाधीश चौधरी हबीब-उर-रहमान की विशेष अदालत के समक्ष बंद कमरे में हुई सुनवाई में एक गवाह ने अभियुक्त शाहिद जमील रियाज की पहचान की है. शहज़ाद मलिक के मुताबिक गवाह ने न्यायाधीश को बताया कि रियाज और 10 अन्य लोगों ने मछली पकड़ने की बात कहकर 11 नौकाएं खरीदी थीं. गवाह ने न्यायाधीश को यह भी बताया कि उन्होंने इन लोगों को कभी समुद्र से मछली के साथ लौटते हुए नहीं देखा था. सुनवाई के दौरान कुल चार गवाहों से जिरह की गई. एक अन्य गवाह ने न्यायाधीश को बताया कि उसने अभियुक्त को 1.6 लाख रुपए में यामाहा बोट इंजन बेचा था जबकि दूसरे गवाह ने बताया कि उसने अभियुक्त को छह पंप बेचे थे. साज़िश में शामिल गवाहों ने अमजद खान और अतीकुर रहमान सहित 10 लोगों की पहचान की है. ये सभी कथित तौर पर 26 नवंबर 2008 में हुए मुंबई हमले की साजिश और उसके क्रियान्वयन में शामिल थे. पाकिस्तान की आतंकवाद-निरोधी अदालत ने इन 10 लोगों को पहले ही भगोड़ा घोषित कर रखा है. 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उसके बाद उन्होंने नवाज़ शरीफ के इस्तीफे की बात कही. उसके बाद चुनावों में धांधली की बात दोबारा से की गई. राजनीतिक विरोध फिर उन्होंने कहा कि हम धरना देंगे लेकिन वो भी आखिरकार खत्म हो गया. ये उनका प्लान ए था. उसके बाद इमरान खान ने प्लान बी के तहत रैलियां निकालीं और प्लान सी के तहत उन्होंने घोषणा कि वे देश में सिलसिलेबार तरीके से हड़ताल और तालाबंदी करेंगे. सियासी जानकारों का कहना है कि इमरान खान ने धरने और राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों का एक बेहद जटिल घालमेल बना दिया है और लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इमरान चाहते क्या हैं. और क्या वह पूरा हो भी रहा है कि नहीं या सिर्फ देश में अफरातफरी फैलाना का माहौल बनता जा रहा है. धांधली के आरोप यहां यह भी एक बड़ा सवाल है कि जिन चुनावों में इमरान खान धांधली की बात कर रहे हैं, उससे संबंधित केवल चार सीटें हैं, जिनको लेकर ये आरोप लगाए गए हैं. अगर सरकार इन सीटों पर चुनाव के लिए तैयार हो जाती है और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी इन पर चुनाव जीत भी जाती है तो सरकार की सेहत पर इसका कोई असर पड़ने वाला नहीं है. चुनावों में धांधली के आरोप को किनारे रखकर इमरान खान कह रहे हैं कि ये सिस्टम ही पूरा करप्ट है और हम इसमें तब्दीली लाएंगे और इसके लिए मौजूदा हुकूमत को सत्ता छोड़नी होगी. कदम दर कदम इमरान खान के स्टैंड में बदलाव देखने को मिल रहा है. बॉडी लैंग्वेज राजनीतिक प्रेक्षकों इन परिस्थितियों पर नवाज़ शरीफ पर पड़े रहे सियासी दबाव का आकलन भी कर रहे हैं. सार्क सम्मेलन या अन्य सार्वजनिक मौकों पर नवाज़ शरीफ के बॉडी लैंग्वेज़ में दबाव देखा भी जा रहा है. इमरान खान का मुख्य राजनीतिक जनाधार देश के युवाओं के बीच है. युवाओं का कहना भी है कि उन्हें बदलाव चाहिए, वे पुराने निज़ाम से मायूस भी हैं. इमरान के समर्थकों की तादाद बढ़ी है. लोगों को इकट्ठा करने के इमरान के तौर तरीके कारगर रहे हैं. इससे अच्छी तादाद में लोग इकट्ठे होते हैं. कानून व्यवस्था जिन जिन शहरों में वे जाते हैं, वहां उनकी ताकत बढ़ती है और वहां की कानून व्यवस्था पर भी इसका दबाव पड़ता है. पंजाब सूबे में उनका ये पहला बंद था, हिंसा कुछ छिट पुट घटनाएं हुईं और कहा ये भी जा रहा है कि इन झड़पों की वजह से इमरान खान को एक नई ऊर्जा मिल गई है. इमरान के प्लान सी के तहत पंजाब के चयन के भी अपने सियासी मतलब हैं, फैसलाबाद के बाद उनका अगला ठिकाना लाहौर होगा. (बीबीसी हिंदी के सहयोगी निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान ने फैसलाबाद के लोगों को ये दावत दी थी कि वे आएं और हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करें.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन जितने लोगों के आने की उम्मीद की गई थी, उतने लोग नहीं आए और इसकी बड़ी वजह ये है कि फैसलाबाद वज़ीर-ए-आज़म नवाज़ शरीफ का गढ़ माना जाता है. और जैसा कि इमरान खान ने दावा किया था कि वे शहर को पूरी तरह से बंद कर देंगे, वो भी देखने को नहीं मिला. लोगों ने दफ्तर, स्कूल, कॉलेज और कारोबार खुले रखे और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पहले की तरह बरकरार रही. पढ़ें विस्तार से इमरान खान काफी समय से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार ने उनकी मांगों को लेकर एक आयोग भी बना दिया है. लेकिन कई लोगों के मन में ये भी धारणा बन रही है कि इमरान खान किसी भी मुद्दे पर तैयार नहीं हो रहे हैं. किसी की सुन नहीं रहे हैं. तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के अपने रवैए में भी कई यू-टर्न्स दिखाई देते हैं. पहले उन्होंने चुनावों में हेराफेरी का मुद्दा उठाया, उसके बाद उन्होंने नवाज़ शरीफ के इस्तीफे की बात कही. उसके बाद चुनावों में धांधली की बात दोबारा से की गई. राजनीतिक विरोध फिर उन्होंने कहा कि हम धरना देंगे लेकिन वो भी आखिरकार खत्म हो गया. ये उनका प्लान ए था. उसके बाद इमरान खान ने प्लान बी के तहत रैलियां निकालीं और प्लान सी के तहत उन्होंने घोषणा कि वे देश में सिलसिलेबार तरीके से हड़ताल और तालाबंदी करेंगे. सियासी जानकारों का कहना है कि इमरान खान ने धरने और राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों का एक बेहद जटिल घालमेल बना दिया है और लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इमरान चाहते क्या हैं. और क्या वह पूरा हो भी रहा है कि नहीं या सिर्फ देश में अफरातफरी फैलाना का माहौल बनता जा रहा है. धांधली के आरोप यहां यह भी एक बड़ा सवाल है कि जिन चुनावों में इमरान खान धांधली की बात कर रहे हैं, उससे संबंधित केवल चार सीटें हैं, जिनको लेकर ये आरोप लगाए गए हैं. अगर सरकार इन सीटों पर चुनाव के लिए तैयार हो जाती है और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी इन पर चुनाव जीत भी जाती है तो सरकार की सेहत पर इसका कोई असर पड़ने वाला नहीं है. चुनावों में धांधली के आरोप को किनारे रखकर इमरान खान कह रहे हैं कि ये सिस्टम ही पूरा करप्ट है और हम इसमें तब्दीली लाएंगे और इसके लिए मौजूदा हुकूमत को सत्ता छोड़नी होगी. कदम दर कदम इमरान खान के स्टैंड में बदलाव देखने को मिल रहा है. बॉडी लैंग्वेज राजनीतिक प्रेक्षकों इन परिस्थितियों पर नवाज़ शरीफ पर पड़े रहे सियासी दबाव का आकलन भी कर रहे हैं. सार्क सम्मेलन या अन्य सार्वजनिक मौकों पर नवाज़ शरीफ के बॉडी लैंग्वेज़ में दबाव देखा भी जा रहा है. इमरान खान का मुख्य राजनीतिक जनाधार देश के युवाओं के बीच है. युवाओं का कहना भी है कि उन्हें बदलाव चाहिए, वे पुराने निज़ाम से मायूस भी हैं. इमरान के समर्थकों की तादाद बढ़ी है. लोगों को इकट्ठा करने के इमरान के तौर तरीके कारगर रहे हैं. इससे अच्छी तादाद में लोग इकट्ठे होते हैं. कानून व्यवस्था जिन जिन शहरों में वे जाते हैं, वहां उनकी ताकत बढ़ती है और वहां की कानून व्यवस्था पर भी इसका दबाव पड़ता है. पंजाब सूबे में उनका ये पहला बंद था, हिंसा कुछ छिट पुट घटनाएं हुईं और कहा ये भी जा रहा है कि इन झड़पों की वजह से इमरान खान को एक नई ऊर्जा मिल गई है. इमरान के प्लान सी के तहत पंजाब के चयन के भी अपने सियासी मतलब हैं, फैसलाबाद के बाद उनका अगला ठिकाना लाहौर होगा. 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उन्हे चुप रहने के लिए कहा. पीड़ित महिला घबरा गई लेकिन घर से बाहर निकलने में कामयाब रही. महिला ने पड़ोसियों का दरवाज़ा भी खटखटाया लेकिन वहां कोई नहीं था. इस बीच लुटेरा महिला को घर घसीट कर घर में ले गया और चाकू की नोंक पर कथित रूप से बलात्कार किया. इसके बाद महिला ने अपने आप को बाथरुम में बंद कर लिया और पड़ोसियों से मदद की गुहार लगाई. पीड़ित महिला की आवाज़ सुनकर पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची. पुलिस जबतक पहुंची तबतक लुटेरा भाग चुका था. पुलिस घर का मुख्य दरवाज़ा तोडते हुए अंदर घुसी. पीड़ित बाथरुम से तभी निकली जब उन्हें भरोसा हो गया है कि पुलिस आ गई है. महिला के बयान के आधार पर पुलिस ने बलात्कार और लूट का मामला दर्ज किया है. महिला को स्वास्थ्य परिक्षण के लिए ले जाया गया, अभी जांच के नतीजे नहीं आए हैं. इसे भी पढ़ें\n\nSummary:", "target": "मुंबई के बांद्रा इलाके में रहने वाली स्पेनिश मूल की एक महिला ने आरोप लगाया है कि लूट के मकसद से घर में घुसे एक चोर ने उनके साथ चाकू की नोंक पर बलात्कार किया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस ने बलात्कार का मामला दर्ज कर जांच शुरु कर दी है पुलिस अधिकारियों के अनुसार पीड़ित महिला 27 वर्षीय एक संगीतकार है जो बांद्रा वेस्ट में पेरी क्रॉस रोड के एक अपार्टमेंट में रहती हैं. सोमवार रात के 3.30 से 4.30 के बीच हुई वारदात के वक्त महिला घर पर अकेली थी. शिकायक के अनुसार लुटेरा खिड़की से घर में घुसा और यूरो, रुपये और कैमरा चुराया. इस दौरान जब पीड़ित जाग गई तो लुटेरे ने चाकू दिखाते हुए उन्हे चुप रहने के लिए कहा. पीड़ित महिला घबरा गई लेकिन घर से बाहर निकलने में कामयाब रही. महिला ने पड़ोसियों का दरवाज़ा भी खटखटाया लेकिन वहां कोई नहीं था. इस बीच लुटेरा महिला को घर घसीट कर घर में ले गया और चाकू की नोंक पर कथित रूप से बलात्कार किया. इसके बाद महिला ने अपने आप को बाथरुम में बंद कर लिया और पड़ोसियों से मदद की गुहार लगाई. पीड़ित महिला की आवाज़ सुनकर पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची. पुलिस जबतक पहुंची तबतक लुटेरा भाग चुका था. पुलिस घर का मुख्य दरवाज़ा तोडते हुए अंदर घुसी. पीड़ित बाथरुम से तभी निकली जब उन्हें भरोसा हो गया है कि पुलिस आ गई है. 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है. इस लिहाज से उत्तराखंड का कोई भी इलाक़ा भूकंप के ख़तरे से बाहर नहीं है और यहां 7-8 तीव्रता के भूकंप की संभावना बनी रहती है. तीन साल के अध्ययन के बाद जारी की गई जीएसआई की रिपोर्ट के अनुसार भूकंप के लिहाज से उत्तराखंड के चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी और पिथौरागढ़ जिले जोन-5 में हैं जो कि अति संवेदनशील हैं. और देहरादून,चंपावत, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जोन-4 में हैं जो कि संवेदनशील माना जाता है. भूकंप का ख़तरा गौरतलब है कि 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंप में सैकड़ों लोग मारे गये थे और करोड़ों की संपत्ति का नुक़सान हुआ था. इस भूकंप की दहशत आज भी यहां के लोगों के चेहरे पर देखी जा सकती है. इसीलिए भूकंप का हलका झटका भी यहां अफ़रातफ़री मचा देता है और फिर कई-कई दिनों तक लोग घरों के बाहर सोना शुरू कर देते हैं. भूवैज्ञानिकों के अनुसार बार-बार भूकंप आने का कारण हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में जमा अवसाद है जोकि भूकंपीय कंपन को और बढ़ाता है. इसके बावजूद यहाँ सरकार और प्रशासन में भूकंपरोधी निर्माण को लेकर कोई सोच नज़र नहीं आती. जीएसआई के निदेशक पीसी नोवानी का कहना है,'' हमारी बार-बार चेतावनी के बावजूद ध्यान नहीं दिया जा रहा है और आज राज्य के आधे से ज्यादा मकान और इमारतें भूकंप के लिहाज से ख़तरनाक हैं और भूकंप से यहां बड़े पैमाने पर तबाही हो सकती है.'' उनका कहना है कि भूकंप यहां की सच्चाई है और उसे रोका नहीं जा सकता. नोवानी कहते हैं कि जिस तरह जापान के लोगों ने भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल कर अपने-आपको सुरक्षित कर लिया है, यहां भी वैसी ही सजगता ज़रूरी है. वो कहते हैं कि अनियोजित विकास और बहुमंजिली इमारतों पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए और इसी तरह से पहाड़ी इलाकों में पत्थरों के मकान का भी विकल्प ढूंढा जाना चाहिए. साथ ही पुरानी जर्जर इमारतों को गिरा दिया जाना चाहिए.\n\nSummary:", "target": "उत्तराखंड के गोमुख केंद्र में सोमवार को आए भूकंप ने नीति-निर्माताओं और भूवैज्ञानिकों की पेशानी पर बल डाल दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाल ही में जारी की गई एक रिपोर्ट में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने आगाह किया है कि उत्तराखंड शत-प्रतिशत भूकंप के ख़तरे की जद में है और बढ़ते अनियोजित विकास से हलकी तीव्रता का भूकंप 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नेहा की फिल्म 'रश' रिलीज़ हो रही है, जिसमें इमरान हाशमी की भी मुख्य भूमिका है. फिल्म में नेहा एक बेहद महत्तवाकांक्षी लड़की की भूमिका निभा रही हैं जो एक मीडिया टायकून के लिए काम करती है. इसके अलावा नेहा, जिमी शेरगिल के साथ पंजाबी फिल्म 'रंगीले' में भी काम कर रही हैं. नेहा कहती हैं, \"मुझे ये फिल्म करते वक्त बहुत मज़ा आया. मैं इसकी शूटिंग के सिलसिले में 40-45 दिनों तक पंजाब में थी और ये मेरे लिए शानदार अनुभव था. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि पंजाबी फिल्मों का भविष्य बेहद सुनहरा है.\" नेहा, इमरान हाशमी के ही साथ एक और फिल्म 'उंगली' में भी काम कर रही हैं.\n\nSummary:", "target": "मॉडल से एक्टर बनी नेहा धूपिया अभिनेत्री शबाना आज़मी को अपना रोल मॉडल मानती हैं और उनकी चाहत शबाना जैसा बनने की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी से खास बात करते हुए नेहा कहती हैं, \"शबाना जी लंबे समय से फिल्मों में काम कर रही हैं. उन्होंने काफी कम उम्र से ही अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवा दिया और चाहे कला फिल्में हों, व्यवसायिक हों या किसी भी तरह की फिल्में हों. हर तरह 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मित्रता ग़ज़ल गायिका बेगम अख़्तर और रेशमी मुलायम आवाज़ के धनी तलत महमूद से हुई. यह दोनों दोस्तियां इस मायने में इस संगीतकार के लिए बेहतर रहीं कि आगे भविष्य में आने वाली बहुतेरी फ़िल्मों में, जिन्हें मदन मोहन ने संगीतबद्ध किया था, तलत महमूद की अप्रतिम गायिकी अपने उरूज पर हमें देखने को मिलती है. इस बात का सौभाग्य भी कि फ़िल्मों के लिए बनाई जाने वाली बेशुमार धुनों को सबसे पहले सुनने का मौक़ा बेगम अख़्तर को मिलता था. आसान नहीं था मदन मोहन का संगीत आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि मदन मोहन का संगीत भी उतना आसान या सहज संगीत नहीं था. उनका संगीत, दरअसल एक ऐसी अंतरंग महफ़िल के गलीचों पर रचा गया निहायत व्यक्तिगत क़िस्म का संगीत था, जिसकी कलात्मक श्रेष्ठता की चुनौती भी स्वयं मदन मोहन के भीतर से निकलकर ही आकार लेती थी. एक हद तक हम यह कह सकते हैं कि मदन मोहन का संगीत उनका स्वयं को सम्बोधित संगीत है, जिसमे किसी भी रसिक या दीवाने को साथ बैठकर सुनने का आमंत्रण मौजूद है. विशेष वर्ग के संगीतकार? कई बार मदन मोहन के संगीत को लेकर यह आरोप भी लगाया जाता रहा कि वे एक ख़ास क़िस्म के वर्ग के लिए ही अपना संगीत रचते थे. या कि उनका संगीत घर में मेहमानों के बैठक कक्ष के लिए रचा जाने वाला संगीत है. या कि मदन मोहन का संगीत एक हद तक अभिजात वर्ग के लिए रचा गया है. लेकिन इस तरह के सारे आक्षेप न तो पूरी तरह मदन मोहन के ऊपर चस्पा ही होते हैं और ना ही यह सारी स्थापनाएं पूरी तरह से ख़ारिज़ की जा सकती हैं. मदन मोहन जैसे विलक्षण संगीतकार के सम्पूर्ण रचनात्मक अवदान को ध्यान में रखते हुए यह मानना पड़ेगा कि उनका संगीत बाकी के प्रचलित लोकप्रिय संगीत की धारा से थोड़ी दूरी बरतता हुआ संगीत था. बौद्धिक था मदन मोहन का संगीत वे एक ऐसे मुकाम पर खड़े होकर अपना संगीत तैयार करते थे, जहाँ से फ़िल्मी दुनिया की आकांक्षाओं पर रचे जाने वाले रोचक संगीत से उनका बनाया हुआ संगीत, एक समानांतर अन्तराल बनाए रखता था. यहीं एक ऐसी बारीक़ सी पेचीदगी है, जो मदन मोहन के संगीत को तमाम अन्य समकालीन संगीत से पृथक करते हुए उसे थोड़ा जटिल, थोड़ा गंभीर और थोड़ा एक्सपेरीमेंटल बनाती है. पाश्चात्य शैली की धुनों के जादूगर: सी रामचन्द्र अवध की 'तवायफ़ी ग़ज़ल' मिज़ाज वाले नौशाद यह कहना उचित होगा कि साठ-सत्तर के दशक में मिलने वाली तमाम सारी विविधवर्णी सांगीतिक दुनिया में मदन मोहन का संगीत एक बौद्धिक ढंग का सांगीतिक स्पर्श लेकर हमारे सामने आता है. ठीक उसी तरह जिस तरह शास्त्रीय गायन की दुनिया में थोड़े परिष्कृत और बौद्धिक भाव से उस्ताद अमीर ख़ां या पण्डित कुमार गन्धर्व का संगीत दिखाई देता है. मदन मोहन की संश्लिष्ट शैली और गंभीर ढंग की स्वर-संगति को व्याख्यायित करने के लिए हम उनकी आठ-दस फ़िल्मों को चुन सकते हैं, जो उनके सम्पूर्ण कृतित्व की सबसे मुखर अभिव्यक्तियां हैं. यह फ़िल्में हैं- 'बागी', 'रेलवे-प्लेटफार्म', 'ग़ज़ल', 'आप की परछाईयाँ', 'एक कली मुस्कायी', 'रिश्ते-नाते', 'अदालत', 'वो कौन थी', 'दुल्हन एक रात की', 'संजोग', 'अनपढ़', 'देख कबीरा रोया', 'बहाना', 'पूजा के फूल', 'जेलर', 'जहाँआरा', 'मेरा साया', 'दस्तक', 'हीर-राँझा' और 'हँसते जख़्म'. यह सारी फ़िल्में मिलकर समवेत ढंग से एक ऐसा अनोखा मदन मोहन टाईप बनाती हैं, जो शोर और हड़बड़ी के दौर में राहत का संगीत रचता हुआ नज़र आता है. (यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं) (फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में बीबीसी हिंदी की 'संग संग गुनगुनाओगे' सिरीज़ की सातवीं कड़ी मदन मोहन को समर्पित है.) संग- संग गुनगुनाओगे की सभी एपीसोड़ देखें (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ़िल्मिस्तान जैसे प्रतिष्ठित बैनर के सर्वेसर्वा राय बहादुर चुन्नीलाल की संतान के रूप में मदन मोहन को अपने जीवन में जितनी सुविधाएं मिलीं, उससे अधिक सम्मान और प्रतिष्ठा का संसार स्वयं मदन मोहन ने एक गंभीर संगीतकार के रूप में अर्जित किया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमदन मोहन का जादुई संगीत सैनिक जो बन गया संगीतकार अपने पिता की गरिमा के अनुरूप उन्होंने अंग्रेज़ी तबीयत की शिक्षा ली थी और सेना में नौकरी के लिए भी गए थे. 1945 में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ मदन मोहन ने अपनी सेना की नौकरी से त्याग-पत्र दिया और लखनऊ आकाशवाणी में कार्यक्रम सहायक के तौर पर नौकरी कर ली. रोशन : संगीत से बना मिठास का झरना हेमन्त कुमार: सदाबहार गीतों के शहंशाह 'आकाशवाणी' जहां मिले दो बेमिसाल दोस्त आकाशवाणी लखनऊ में रहने के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात मदन मदन मोहन के जीवन में यह हुई कि उनकी मित्रता ग़ज़ल गायिका बेगम अख़्तर और रेशमी मुलायम आवाज़ के धनी तलत महमूद से हुई. यह दोनों दोस्तियां इस मायने में इस संगीतकार के लिए बेहतर रहीं कि आगे भविष्य में आने वाली बहुतेरी फ़िल्मों में, जिन्हें मदन मोहन ने संगीतबद्ध किया था, तलत महमूद की अप्रतिम गायिकी अपने उरूज पर हमें देखने को मिलती है. इस बात का सौभाग्य भी कि फ़िल्मों के लिए बनाई जाने वाली बेशुमार धुनों को सबसे पहले सुनने का मौक़ा बेगम अख़्तर को मिलता था. आसान नहीं था मदन मोहन का संगीत आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि मदन मोहन का संगीत भी उतना आसान या सहज संगीत नहीं था. उनका संगीत, दरअसल एक ऐसी अंतरंग महफ़िल के गलीचों पर रचा गया निहायत व्यक्तिगत क़िस्म का संगीत था, जिसकी कलात्मक श्रेष्ठता की चुनौती भी स्वयं मदन मोहन के भीतर से निकलकर ही आकार लेती थी. एक हद तक हम यह कह सकते हैं कि मदन मोहन का संगीत उनका स्वयं को सम्बोधित संगीत है, जिसमे किसी भी रसिक या दीवाने को साथ बैठकर सुनने का आमंत्रण मौजूद है. विशेष वर्ग के संगीतकार? कई बार मदन मोहन के संगीत को लेकर यह आरोप भी लगाया जाता रहा कि वे एक ख़ास क़िस्म के वर्ग के लिए ही अपना संगीत रचते थे. या कि उनका संगीत घर में मेहमानों के बैठक कक्ष के लिए रचा जाने वाला संगीत है. या कि मदन मोहन का संगीत एक हद तक अभिजात वर्ग के लिए रचा गया है. लेकिन इस तरह के सारे आक्षेप न तो पूरी तरह मदन मोहन के ऊपर चस्पा ही होते हैं और ना ही यह सारी स्थापनाएं पूरी तरह से ख़ारिज़ की जा सकती हैं. मदन मोहन जैसे विलक्षण संगीतकार के सम्पूर्ण रचनात्मक अवदान को ध्यान में रखते हुए यह मानना पड़ेगा कि उनका संगीत बाकी के प्रचलित लोकप्रिय संगीत की धारा से थोड़ी दूरी बरतता हुआ संगीत था. बौद्धिक था मदन मोहन का संगीत वे एक ऐसे मुकाम पर खड़े होकर अपना संगीत तैयार करते थे, जहाँ से फ़िल्मी दुनिया की आकांक्षाओं पर रचे जाने वाले रोचक संगीत से उनका बनाया हुआ संगीत, एक समानांतर अन्तराल बनाए रखता था. यहीं एक ऐसी बारीक़ सी पेचीदगी है, जो मदन मोहन के संगीत को तमाम अन्य समकालीन संगीत से पृथक करते हुए उसे थोड़ा जटिल, थोड़ा गंभीर और थोड़ा एक्सपेरीमेंटल बनाती है. पाश्चात्य शैली की धुनों के जादूगर: सी रामचन्द्र अवध की 'तवायफ़ी ग़ज़ल' मिज़ाज वाले नौशाद यह कहना उचित होगा कि साठ-सत्तर के दशक में मिलने वाली तमाम सारी विविधवर्णी सांगीतिक दुनिया में मदन मोहन का संगीत एक बौद्धिक ढंग का सांगीतिक स्पर्श लेकर हमारे सामने आता है. ठीक उसी तरह जिस तरह शास्त्रीय गायन की दुनिया में थोड़े परिष्कृत और बौद्धिक भाव से उस्ताद अमीर ख़ां या पण्डित कुमार गन्धर्व का संगीत दिखाई देता है. मदन मोहन की संश्लिष्ट शैली और गंभीर ढंग की स्वर-संगति को व्याख्यायित करने के लिए हम उनकी आठ-दस फ़िल्मों को चुन सकते हैं, जो उनके सम्पूर्ण कृतित्व की सबसे मुखर अभिव्यक्तियां हैं. यह फ़िल्में हैं- 'बागी', 'रेलवे-प्लेटफार्म', 'ग़ज़ल', 'आप की परछाईयाँ', 'एक कली मुस्कायी', 'रिश्ते-नाते', 'अदालत', 'वो कौन थी', 'दुल्हन एक रात की', 'संजोग', 'अनपढ़', 'देख कबीरा रोया', 'बहाना', 'पूजा के फूल', 'जेलर', 'जहाँआरा', 'मेरा साया', 'दस्तक', 'हीर-राँझा' और 'हँसते जख़्म'. यह सारी फ़िल्में मिलकर समवेत ढंग से एक ऐसा अनोखा मदन मोहन टाईप बनाती हैं, जो शोर और हड़बड़ी के दौर में राहत का संगीत रचता हुआ नज़र आता है. 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पड़ेगी. राजस्थान के सिंचाई राज्य मंत्री सुरेंद्र सिंह राठौर ने बीबीसी से कहा है कि वह निर्दोष हैं और उन्होंने इस सज़ा के ख़िलाफ़ अपील कर दी है. उनका कहना है कि खदान में जिस समय दुर्घटना हुई थी उस समय मार्बल खदान की लीज़ उनके पास नहीं थी और वह किसी और के नाम थी. अदालत से मिली जानकारियों के अनुसार अधिकारियों ने सुरेंद्र सिंह राठौर के खदान का निरीक्षण करते हुए पाया था कि वहाँ सुरक्षा के समुचित उपाय नहीं किए गए हैं. उनके ख़िलाफ़ खनन अधिनियम की धारा 72-ए के तहत इसे अपराध माना गया और अदालत में एक शिकायत दायर कराई गई थी. न्यायिक मजिस्ट्रेट रणधीर मिर्धा ने मामले की सुनवाई के बाद मंत्री राठौर को दोषी पाया और सज़ा सुनाई. यह फ़ैसला गत मंगलवार को आया है.\n\nSummary:", "target": "राजस्थान के राजसमंद ज़िले की एक अदालत ने राज्य की भाजपा सरकार के एक मंत्री सुरेंद्र सिंह राठौर को छह महीने की जेल की सज़ा सुनाई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयह सज़ा मंत्री के निजी खदान में सुरक्षा के उपाय न करने के लिए उन्हें दोषी पाते हुए सुनाई गई है. अदालत ने सज़ा से साथ दो हज़ार रुपए का जुर्माना भी किया है जिसके अदा न करने पर उन्हें चार दिन की सज़ा और भुगतनी पड़ेगी. राजस्थान के सिंचाई राज्य मंत्री सुरेंद्र सिंह राठौर ने बीबीसी से कहा है कि वह निर्दोष हैं और उन्होंने इस सज़ा के ख़िलाफ़ अपील कर दी है. उनका कहना है कि खदान में जिस समय दुर्घटना हुई थी उस समय मार्बल खदान की लीज़ उनके पास नहीं थी और वह किसी और के नाम थी. अदालत से मिली जानकारियों के अनुसार अधिकारियों ने सुरेंद्र सिंह राठौर के खदान का निरीक्षण करते हुए पाया था कि वहाँ सुरक्षा के समुचित उपाय नहीं किए गए हैं. उनके ख़िलाफ़ खनन अधिनियम की धारा 72-ए के तहत इसे अपराध माना गया और अदालत में एक शिकायत दायर कराई गई थी. न्यायिक मजिस्ट्रेट रणधीर मिर्धा ने मामले की सुनवाई के बाद मंत्री राठौर को दोषी पाया और सज़ा सुनाई. यह फ़ैसला गत मंगलवार को आया है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 182, "source_item_id": "182", "source_lang": "hin_Deva", 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अंधाधुंध गोली चलाई, छह सिखों को मार डाला, कुछ को घायल कर दिया तो उन्हें ये एहसास हुआ कि उनके आसपास के लोगों को भी इस क़ौम के बारे में कितनी कम जानकारी है. इस हफ़्ते वो अमरीकी कांग्रेस में एक लंगर की मेज़बानी करने पहुंचीं. मक़सद था अमरीका में सिखों के बारे में बेहतर समझ पैदा करना. विरोध प्रदर्शन वो कहती हैं, \"मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि सिख मूल्य और अमरीकी मूल्य अलग-अलग नहीं हैं. कांग्रेस में हम जो लंगर कर रहे हैं वो एक तरह से उसी तरह की समानता को दिखाता है जैसा हमारे सिख धर्म में है.\" ओक क्रीक पर हुए हमले के बाद सिखों ने दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन किया था. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अमरीकी हुकूमत से इस मामले पर बात की थी. सिख अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था के प्रमुख जसजीत सिंह कहते हैं कि हमले ने सिख समुदाय को अंदर तक झकझोर दिया. वो कहते हैं, \"ओक क्रीक अमरीकी सिख समुदाय के लिए वाक़ई एक निर्णायक घटना थी... किसी धार्मिक स्थल पर किया गया अमरीकी इतिहास का सबसे दहला देने वाला हमला. वो ऐसा मौक़ा था जिसने हमें सोचने पर मजबूर किया कि हमने इस देश में अब तक आख़िर क्या हासिल किया है?\" एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत अमरीकी अभी भी एक तस्वीर के ज़रिए किसी सिख की पहचान नहीं कर सकते और आधे, सिखों को मुसलमान समझते हैं. उनकी दाढ़ी और पगड़ी बहुतों के मन में घबराहट पैदा करती है. शिकायत सिख बच्चों को स्कूलों में चिढ़ाए जाने और परेशान किए जाने की शिकायतें अक्सर सुनने में आती हैं. कुछ महीने पहले जब जानीमानी अमरीकी कंपनी गैप ने यहां के सिख डिज़ाइनर और एक्टर वारिस अहलूवालिया को अपने मॉडल के तौर पर इस्तेमाल किया तो न्यूयॉर्क में कुछ जगह उनके पोस्टरों पर काला रंग पोता गया. पोस्टरों पर \"ओसामा वापस जाओ, आतंकवादी वापस जाओ\" जैसी बातें भी लिखी गईं. अब एक नई मुहिम के तहत वही वारिस अहलूवालिया टीवी विज्ञापनों के ज़रिए अमरीकियों को सिखों के बारे में बता रहे हैं. इन विज्ञापनों में वो कह रहे हैं कि अमरीकी सिख की ज़िंदगी दूसरे अमरीकियों से कोई अलग नहीं है. परेशानी अमरीकी क़ानून बनाने वालों में यहां की सिख क़ौम की परेशानियों के बारे में समझ बढ़ी है. लेकिन कैलिफ़ोर्निया से डेमोक्रैट सांसद माइकल होंडा का कहना है कि रास्ता अभी काफ़ी मुश्किल है. वो कहते हैं, \"जो सिख धर्म के बारे में नहीं जानते उनके लिए थोड़ी मुश्किल होती है. अगर आप इस देश के चर्चों में जाएं तो आप देखेंगे कि लोग कितने गर्माहट से गले मिलते हैं. अगर उसी आसानी से हम चर्च के बाहर के लोगों को गले लगा सकें तो फिर ये ज्यादा मुश्किल नहीं होगा.\" ज़ाहिर है अभी हरलीन कौर और वारिस अहलूवालिया जैसे कई और ब्रांड ऐंबसडर्स को आगे आना होगा, अमरीका को समझाने के लिए कि इस देश में उनका इतिहास 125 साल पुराना है. और यह कि हर पगड़ी पहनने है और दाढ़ी रखने वाले इनसान को ख़तरे की तरह न देखा जाए. (बीबीसी हिंदी के क्लिक करें एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दो साल पहले अमरीका में ओक ग्रीक गुरुद्वारे में जब एक बंदूकधारी ने अंधाधुंध गोलीबारी की, तो ठीक दो हफ़्ते बाद, हरलीन कौर ने अपनी ज़िंदगी का एक अहम फ़ैसला किया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअपनी सिख पहचान को जताने के लिए उन्होंने पगड़ी पहननी शुरू कर दी. उनका कहना है कि कॉलेज हो या एयरपोर्ट, लोग अब उन्हें अलग नज़रों से देखते हैं. वो कहती हैं, \"अब मैं जब एयरपोर्ट पर जाती हूं तो मुझे दो बार स्क्रीनिंग से गुज़रना पड़ता है जो कि पहले नहीं होता था.\" लेकिन वो इससे परेशान नहीं हैं. उनका कहना है कि उन्हें एक मौक़ा मिला है दूसरों को सिख मूल्यों के बारे में बताने का और उनकी पगड़ी से हर पल ये ज़ाहिर भी होता रहता है. पढ़िए पूरी रिपोर्ट अमरीका पर ग्यारह सितंबर को हुए हमले के बाद यहां रहने वाले सिखों को मुसलमान समझकर उन पर कई बार क़ातिलाना हमले हुए हैं. लेकिन विस्कॉंसिन राज्य के ओक क्रीक इलाक़े में गुरुद्वारे पर हुए हमले ने सिख समुदाय को दहला कर रख दिया. अब वो अमरीका को अपनी पहचान बताने के लिए कमर कस रहे हैं. हरलीन ओक क्रीक में ही पली बढ़ी थीं, और उस गुरुद्वारे से उनका एक ख़ास लगाव था. जब एक अमरीकी बंदूकधारी ने वहां घुसकर अंधाधुंध गोली चलाई, छह सिखों को मार डाला, कुछ को घायल कर दिया तो उन्हें ये एहसास हुआ कि उनके आसपास के लोगों को भी इस क़ौम के बारे में कितनी कम जानकारी है. इस हफ़्ते वो अमरीकी कांग्रेस में एक लंगर की मेज़बानी करने पहुंचीं. मक़सद था अमरीका में सिखों के बारे में बेहतर समझ पैदा करना. विरोध प्रदर्शन वो कहती हैं, \"मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि सिख मूल्य और अमरीकी मूल्य अलग-अलग नहीं हैं. कांग्रेस में हम जो लंगर कर रहे हैं वो एक तरह से उसी तरह की समानता को दिखाता है जैसा हमारे सिख धर्म में है.\" ओक क्रीक पर हुए हमले के बाद सिखों ने दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन किया था. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अमरीकी हुकूमत से इस मामले पर बात की थी. सिख अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था के प्रमुख जसजीत सिंह कहते हैं कि हमले ने सिख समुदाय को अंदर तक झकझोर दिया. वो कहते हैं, \"ओक क्रीक अमरीकी सिख समुदाय के लिए वाक़ई एक निर्णायक घटना थी... किसी धार्मिक स्थल पर किया गया अमरीकी इतिहास का सबसे दहला देने वाला हमला. वो ऐसा मौक़ा था जिसने हमें सोचने पर मजबूर किया कि हमने इस देश में अब तक आख़िर क्या हासिल किया है?\" एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत अमरीकी अभी भी एक तस्वीर के ज़रिए किसी सिख की पहचान नहीं कर सकते और आधे, सिखों को मुसलमान समझते हैं. उनकी दाढ़ी और पगड़ी बहुतों के मन में घबराहट पैदा करती है. शिकायत सिख बच्चों को स्कूलों में चिढ़ाए जाने और परेशान किए जाने की शिकायतें अक्सर सुनने में आती हैं. कुछ महीने पहले जब जानीमानी अमरीकी कंपनी गैप ने यहां के सिख डिज़ाइनर और एक्टर वारिस अहलूवालिया को अपने मॉडल के तौर पर इस्तेमाल किया तो न्यूयॉर्क में कुछ जगह उनके पोस्टरों पर काला रंग पोता गया. पोस्टरों पर \"ओसामा वापस जाओ, आतंकवादी वापस जाओ\" जैसी बातें भी लिखी गईं. अब एक नई मुहिम के तहत वही वारिस अहलूवालिया टीवी विज्ञापनों के ज़रिए अमरीकियों को सिखों के बारे में बता रहे हैं. इन विज्ञापनों में वो कह रहे हैं कि अमरीकी सिख की ज़िंदगी दूसरे अमरीकियों से कोई अलग नहीं है. परेशानी अमरीकी क़ानून बनाने वालों में यहां की सिख क़ौम की परेशानियों के बारे में समझ बढ़ी है. लेकिन कैलिफ़ोर्निया से डेमोक्रैट सांसद माइकल होंडा का कहना है कि रास्ता अभी काफ़ी मुश्किल है. वो कहते हैं, \"जो सिख धर्म के बारे में नहीं जानते उनके लिए थोड़ी मुश्किल होती है. अगर आप इस देश के चर्चों में जाएं तो आप देखेंगे कि लोग कितने गर्माहट से गले मिलते हैं. अगर उसी आसानी से हम चर्च के बाहर के लोगों को गले लगा सकें तो फिर ये ज्यादा मुश्किल नहीं होगा.\" ज़ाहिर है अभी हरलीन कौर और वारिस अहलूवालिया जैसे कई और ब्रांड ऐंबसडर्स को आगे आना होगा, अमरीका को समझाने के लिए कि इस देश में उनका इतिहास 125 साल पुराना है. और यह कि हर पगड़ी पहनने है और दाढ़ी रखने वाले इनसान को ख़तरे की तरह न देखा जाए. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दशकों तक चीन के नेता माओत्से तुंग के नेतृत्व में सरकार ने अर्थव्यवस्था पर काबू रखने की नीति अपनाई. निजी क्षेत्र लगभग ध्वस्त हो गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nऐसे में निजी कंपनियों और कारोबारियों की स्थिति मज़बूत रखने के लिए अनोखी पहल हुई. एक ऐसा क्लब शुरू हुआ, जिसमें आज शीर्ष के कारोबारी शामिल हैं. आखिर एक मामूली क्लब की ऐसी पहचान कैसे बनी और क्यों चीन के अरबपति इसका सदस्य बनने में गर्व महसूस करते हैं? पढ़ें क्लब के प्रोड्यूसर नील कोइंग का आकलन चीन की राजधानी बीजिंग के उत्तर-पश्चिमी छोर पर एक इलाक़ा दिग्गज तकनीकी कंपनियों के लिए मशहूर है. यहां एक बहुमंज़िला इमारत चुपचाप खड़ी है. अंदर एक साधारण सा दिखने वाला दफ़्तर है, पर इसके उलट यह जगह कुछ बेहद असाधारण गतिविधियों का केंद्र है. यह एक ऐसा क्लब है जिसके कई सदस्य अरबपति हैं. बीबीसी टीवी डॉक्यूमेंट्री 'चाइना बिलियनेयर्स क्लब' (सीबीसी) के प्रस्तुतकर्ता स्टीव टैपिन कहते हैं, \"दुनिया भर में ऐसी मिसाल कहीं नहीं मिलेगी.\" साझा मंच चीनी कारोबारियों के इस क्लब में 46 शीर्ष कारोबारी नेता शामिल हैं. उनके साथ राजनेता, अकादमिक शख्सियतें और दूसरे सलाहकार भी जुड़ रहे हैं. कुछ सदस्य तो अरबपति हैं. इनमें चीन की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी 'अलीबाबा' के जैक मा भी हैं. माना जा रहा है कि उन्होंने चीन के सबसे धनी शख्स वांग जियानलिन की जगह ले ली है. इस क्लब में कंपनी निर्माता मिल सकते हैं, आइडिया साझा कर सकते हैं और एक-दूसरे की सलाह ले सकते हैं. क्लब की शुरुआत साल 2006 में हुई. तब से इसने बड़े पैमाने पर इवेंट किए हैं. चीन कारोबारी क्लब (सीईसी) के सदस्यों ने देश-विदेश जाकर उन प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों से भी मुलाकात की हैं, जो कारोबारियों के बारे में जानना चाहते हैं. प्रतिस्पर्धा मगर मुसीबत यह है कि इस क्लब में प्रवेश पाना बेहद मुश्किल है. नए सदस्यों की तो शायद ही कभी भर्ती की जाती है. उम्मीदवार के पास सफल कारोबार का रिकॉर्ड और क्लब के मूल्य अनुसरण करने की क़ाबलियत होनी चाहिए. क्लब कैसे काम करता है? इसके जवाब में इंटरनेट कंपनी सिना के मुख्य कारोबारी चार्ल्स चाओ बताते हैं कि क्लब सदस्य अलग अलग उद्यम क्षेत्रों से हैं, इसलिए उनका आपस में कोई मुक़ाबला नहीं होता. सहयोग सदस्य एक दूसरे की मदद भी करते हैं. चाओ का कहना है कि यह सहयोग 'उम्मीद से परे' है. क्लब कैसे अस्तित्व में आया? इसका जवाब चीन में कारोबारी समूहों की अनिश्चितता में छिपा है. क्लब के संस्थापक लुई डोंगुआ ने बताया, \"समाज कई बार कारोबारियों के साथ बुरा बर्ताव करता है. यही नहीं, इनके बारे में कई ग़लत धारणाएं भी मौजूद हैं.\" लुई डोंगुआ एक ऐसी मैगज़ीन भी निकालते हैं, जो कारोबारियों की कहानियां छापता है. 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सबसे बड़ी समस्या है. आयोग के महासचिव और पूर्व मंत्री इक़बाल हैदर ने बताया, \"पिछले साल स्थिति अच्छी नहीं रही है. अपील, विरोध, मांग के बावजूद सैकड़ों लोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है.\" इक़बाल हैदर ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियाँ, पुलिस और सेना कई नागरिकों के ग़ायब होने के पीछे हैं. उन्होंने कहा कि कई लोगों को तो बुरी तरह प्रताड़ित किया गया है. हालाँकि कुछ लोगों की गिरफ़्तारी के बारे में पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वे संदिग्ध चरमपंथी थे और आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में देश की कोशिशों के तरह उन्हें पकड़ा गया था. लेकिन मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष असमा जहाँगीर का कहना है कि ग़ायब हुए लोगों की सूची में कुछ ही संदिग्ध चरमपंथी थे. चरमपंथी आयोग के मुताबिक़ लापता लोगों में ज़्यादातर संदिग्ध चरमपंथी नहीं थे. आयोग का कहना है कि इनमें से कई लोग बलूचिस्तान और सिंध प्रांत के थे, जिन्हें सरकार अपने लिए ख़तरा समझती थी. असमा जहाँगीर का तो यहाँ तक कहना है कि जितने लोगों के ग़ायब होने के बारे में बताया जा रहा है, स्थिति उससे भी ख़राब हो सकती है. उन्होंने कहा, \"बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो सामने नहीं आना चाहते. मेरा मानना है कि कई मामलों के बारे में तो हमें जानकारी ही नहीं है. मुझे उम्मीद है कि रिपोर्ट आने के बाद और भी लोग सामने आएँगे.\" पहले भी सरकारी अधिकारियों ने ग़ैर क़ानूनी रूप से लोगों को हिरासत में लेने से इनकार किया है. लेकिन बीबीसी संवाददाता बारबारा प्लेट का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के दबाव में कुछ लापता लोगों का पता चल पाया है. मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में पाकिस्तान की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई है. देश में क़ानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति की भी बात की गई है. रिपोर्ट में उन क़ानूनी संशोधनों का स्वागत किया गया है जिसके तहत बलात्कार के मामले में महिलाएँ आसानी से मुक़दमा दर्ज करा सकती हैं. हालाँकि यह भी कहा गया है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा में कोई कमी नहीं आई है.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि सरकार विरोधी सैकड़ों लोगों का लापता होना देश में सबसे बड़ा मानवाधिकार मुद्दा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअपनी वार्षिक रिपोर्ट में ग्रुप ने ये बातें कही है. पाकिस्तान 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कोशिशों का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा, \"जब हम सत्ता में आए तो मेरी प्रथामिकता पाकिस्तान को ऐसा देश बनाने की थी जो शांति स्थापित करने में आगे हो. 9/11 के बाद हम आतंकवाद के ख़िलाफ जंग में शामिल हुए.\" इमरान ख़ान ने दावा किया कि उन्होंने भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने के लिए लगातार कोशिश की. उन्होंने कहा, \"हमने पहली चीज़ ये की कि हमने भारत से संपर्क बनाने की कोशिश की. मैंने मोदी से कहा कि हमारी समस्याएं एक सी हैं. गरीबी और जलवायु परिवर्तन. चलिए हम भरोसे पर आधारित रिश्ते बनाते हैं. चलिए हम आगे बढ़ते हैं.\" इमरान ख़ान ने दावा किया कि उन्हें भारत की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला. उन्होंने कहा, \"दुर्भाग्य से उन्होंने प्रगति के लिए कोई क़दम नहीं बढ़ाया. हमने सोचा कि चुनाव का वक़्त है और वो पाकिस्तान के साथ क़रीबी रिश्ते नहीं बनाना चाहते.\" ख़ास एजेंडे पर बढ़ी मोदी सरकार \"उसके बाद एक 20 साल के लड़के ने खुद को पुलवामा में उड़ा लिया. उनके पिता ने कहा कि वो कट्टवादी ताक़तों के असर में था. मैंने भारत से कहा कि वो हमें सबूत दें. सबूत देने के बजाए उन्होंने विमान भेज दिए. हमने दो को गिरा दिया. एक पायलट को पकड़ा लेकिन उन्हें वापस कर दिया.\" इमरान ख़ान ने आगे कहा,\"इसे शांति की पहल मानने के बजाए मोदी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ चुनाव अभियान चलाया.\" इमरान ने कहा कि जब भारत ने पाँच अगस्त को कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया और 80 लाख लोगों पर हर तरह की पाबंदी लगा दी तो उन्हें समझ में आया कि दरअसल इसके पीछे मोदी सरकार का ख़ास एजेंडा है. उन्होंने कहा कि भारत ने शिमला समझौते और अपने ही संविधान के ख़िलाफ़ ये क़दम उठाया है. 'कश्मीर में क़त्ले-आम होगा' उन्होंने कहा कि जब भारत प्रशासित कश्मीर में पाबंदी हटेगी तो वहां क़त्ले-आम होने की आशंका है. इमरान ने कहा कि 80 लाख कश्मीरी जानवरों की तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि भारत प्रशासित कश्मीर में हो रही कथित ज़्यादतियों पर दुनिया इसलिए ख़ामोश है क्योंकि भारत एक बड़ा बाज़ार है. इमरान ने कहा कि इस बात की बहुत आशंका है कि भारत में कश्मीरी युवक किसी हिंसा में शामिल हों और भारत इसके लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराए. उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान में जंग होगी तो एक छोटा देश होने के नाते पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार के इस्तेमाल के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होगा. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन के ज़रिए पूरी दुनिया को ख़बरदार किया कि अगर ऐसा होता है तो इसका असर सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान आज वहीं खड़े हैं जहां 1939 में यूरोप खड़ा था. उन्होंने कहा कि 1939 में यूरोप ने हिटलर का तुष्टिकरण किया जिसका नतीजा ये हुआ कि दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध से गुज़रना पड़ा. उन्होंने दुनिया से अपील की कि आज कश्मीर में यही हालात हैं और दुनिया को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र निभाए ज़िम्मेदारी इमरान ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के आजीवन सदस्य हैं, वो हिटलर और मुसोलीनी को अपना आइडियल मानते हैं. इमरान के मुताबिक़ आरएसएस की विचारधारा ने ही महात्मा गांधी की हत्या की थी. इमरान ख़ान ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए और उसे कश्मीर के मामले में अपने ही प्रस्तावों को लागू करना चाहिए. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया को इस बात के लिए भारत पर दबाव डालना चाहिए कि भारत सबसे पहले कश्मीर में लगी पाबंदी हटाए. इमरान ने कहा कि कश्मीरी राजनेता और हज़ारों बच्चे और नौजवान जो हिरासत में हैं उनको फ़ौरन रिहा किया जाए. उन्होंने कहा कि कश्मीरियों को आत्म-निर्णय का अधिकार मिलना ही चाहिए. इमरान ख़ान ने तक़रीबन 50 मिनट का लंबा भाषण दिया. उन्होंने कश्मीर के अलावा जलवायु परिवर्तन, दुनिया में बढ़ती ग़रीबी और इस्लामोफ़ोबिया का ज़िक्र किया. इससे पहले इमरान ख़ान ने कहा कि आतंकवाद का किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं है. शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा कि 9/11 की घटना के बाद इस्लामोफ़ोबिया में बढ़ोत्तरी हुई है और इसका ख़ात्मा होना चाहिए. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में आरोप लगाया कि भारत ने उनकी तरफ से की गई शांति की सभी कोशिशों को नकार दिया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइमरान ख़ान ने क़रीब 50 मिनट के अपने भाषण में दुनिया को आगाह किया कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग होती है तो 'कुछ भी हो सकता है.' उन्होंने कहा,\"जब आकार में सात गुना छोटे देश के सामने ये विकल्प हो कि वो सरेंडर कर दे या फिर मौत तक संघर्ष करे. तब हम आख़िर तक लड़ेंगे और जब जंग का अंत होगा तो इसके नतीजे सीमा के परे तक होंगे. ये धमकी नहीं है. ये एक स्वाभाविक चिंता है.\" भारत ने नहीं दिया सकारात्मक जवाब इमरान ख़ान ने शांति के लिए की गईं अपने कोशिशों का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा, \"जब हम सत्ता में आए तो मेरी प्रथामिकता पाकिस्तान को ऐसा देश बनाने की थी जो शांति स्थापित करने में आगे हो. 9/11 के बाद हम आतंकवाद के ख़िलाफ जंग में शामिल हुए.\" इमरान ख़ान ने दावा किया कि उन्होंने भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने के लिए लगातार कोशिश की. उन्होंने कहा, \"हमने पहली चीज़ ये की कि हमने भारत से संपर्क बनाने की कोशिश की. मैंने मोदी से कहा कि हमारी समस्याएं एक सी हैं. गरीबी और जलवायु परिवर्तन. चलिए हम भरोसे पर आधारित रिश्ते बनाते हैं. चलिए हम आगे बढ़ते हैं.\" इमरान ख़ान ने दावा किया कि उन्हें भारत की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला. उन्होंने कहा, \"दुर्भाग्य से उन्होंने प्रगति के लिए कोई क़दम नहीं बढ़ाया. हमने सोचा कि चुनाव का वक़्त है और वो पाकिस्तान के साथ क़रीबी रिश्ते नहीं बनाना चाहते.\" ख़ास एजेंडे पर बढ़ी मोदी सरकार \"उसके बाद एक 20 साल के लड़के ने खुद को पुलवामा में उड़ा लिया. उनके पिता ने कहा कि वो कट्टवादी ताक़तों के असर में था. मैंने भारत से कहा कि वो हमें सबूत दें. सबूत देने के बजाए उन्होंने विमान भेज दिए. हमने दो को गिरा दिया. एक पायलट को पकड़ा लेकिन उन्हें वापस कर दिया.\" इमरान ख़ान ने आगे कहा,\"इसे शांति की पहल मानने के बजाए मोदी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ चुनाव अभियान चलाया.\" इमरान ने कहा कि जब भारत ने पाँच अगस्त को कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया और 80 लाख लोगों पर हर तरह की पाबंदी लगा दी तो उन्हें समझ में आया कि दरअसल इसके पीछे मोदी सरकार का ख़ास एजेंडा है. उन्होंने कहा कि भारत ने शिमला समझौते और अपने ही संविधान के ख़िलाफ़ ये क़दम उठाया है. 'कश्मीर में क़त्ले-आम होगा' उन्होंने कहा कि जब भारत प्रशासित कश्मीर में पाबंदी हटेगी तो वहां क़त्ले-आम होने की आशंका है. इमरान ने कहा कि 80 लाख कश्मीरी जानवरों की तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि भारत प्रशासित कश्मीर में हो रही कथित ज़्यादतियों पर दुनिया इसलिए ख़ामोश है क्योंकि भारत एक बड़ा बाज़ार है. इमरान ने कहा कि इस बात की बहुत आशंका है कि भारत में कश्मीरी युवक किसी हिंसा में शामिल हों और भारत इसके लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराए. उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान में जंग होगी तो एक छोटा देश होने के नाते पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार के इस्तेमाल के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होगा. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन के ज़रिए पूरी दुनिया को ख़बरदार किया कि अगर ऐसा होता है तो इसका असर सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान आज वहीं खड़े हैं जहां 1939 में यूरोप खड़ा था. उन्होंने कहा कि 1939 में यूरोप ने हिटलर का तुष्टिकरण किया जिसका नतीजा ये हुआ कि दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध से गुज़रना पड़ा. उन्होंने दुनिया से अपील की कि आज कश्मीर में यही हालात हैं और दुनिया को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र निभाए ज़िम्मेदारी इमरान ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के आजीवन सदस्य हैं, वो हिटलर और मुसोलीनी को अपना आइडियल मानते हैं. इमरान के मुताबिक़ आरएसएस की विचारधारा ने ही महात्मा गांधी की हत्या की थी. इमरान ख़ान ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए और उसे कश्मीर के मामले में अपने ही प्रस्तावों को लागू करना चाहिए. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया को इस बात के लिए भारत पर दबाव डालना चाहिए कि भारत सबसे पहले कश्मीर में लगी पाबंदी हटाए. इमरान ने कहा कि कश्मीरी राजनेता और हज़ारों बच्चे और नौजवान जो हिरासत में हैं उनको फ़ौरन रिहा किया जाए. उन्होंने कहा कि कश्मीरियों को आत्म-निर्णय का अधिकार मिलना ही चाहिए. इमरान ख़ान ने तक़रीबन 50 मिनट का लंबा भाषण दिया. उन्होंने कश्मीर के अलावा जलवायु परिवर्तन, दुनिया में बढ़ती ग़रीबी और इस्लामोफ़ोबिया का ज़िक्र किया. इससे पहले इमरान ख़ान ने कहा कि आतंकवाद का किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं है. शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा कि 9/11 की घटना के बाद इस्लामोफ़ोबिया में बढ़ोत्तरी हुई है और इसका ख़ात्मा होना चाहिए. 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मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में उत्तरने की घोषणा की है. उधर कांग्रेस कहना है कि वो इस सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार, फ़िजूल खर्चों और सामाजिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने जैसे मुद्दों को जनता के सामने रख कर वोट मांगेगी. राज्य में विधानसभा की 200 सीटें हैं. पिछली बार भाजपा ने इनमें से 120 सीटों पर कब्जा किया था जबकि कांग्रेस को महज 56 सीटों पर संतोष करना पड़ा था. लेकिन इन पाँच सालों में भाजपा की सरकार और मुख्यमंत्री का विवादों ने पीछा नहीं छोड़ा. इन पाँच सालों में ऐसे अनेक अवसर आए जब जनता और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ और कई लोग गोलीबारी मे मरे गए. राजस्थान ने अपने इतिहास का सबसे गंभीर जातिगत तनाव देखा जब गूजर सड़कों पर निकले और अपनी बिरादरी के लिए जनजाति का दर्जा मांगने लगे. इस आंदोलन के दौरान रेलें रुकीं, सड़कें जाम हुईं और जनजीवन पटरी से उतर गया. पुलिस और गूजर अंदोलनकारियों के बीच हुए संघर्ष में कोई 70 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा. इसमें कुछ पुलिस वाले भी थे. लेकिन विरोधी कुछ भी कहें, मुख्यमंत्री के समर्थक उनमें एक देवी की तस्वीर देखते रहे. लेकिन जब उनके एक समर्थक ने वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाते हुए कैलेंडर छपवाया तो उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह की पत्नी शीतल कँवर इस मामले को अदालत में ले गईं. वैसे तो सरकार के कामकाज को लेकर हुए विवाद की सूची लंबी है लेकिन सच यह भी है कि विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन भी खड़ा नहीं कर पाया. शायद इसीलिए मुख्यमंत्री ने कभी इन विवादों की परवाह नहीं की और अपना काम जारी रखा. अभी योजना आयोग ने रोजगार गारंटी में अच्छे कामकाज के लिए राजस्थान सरकार की तारीफ की है. हालांकि केंद्र के पंचायत मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि ग्राणीण विकास और पंचायती राज सुधार के लिए जो वादा वसुंधरा राजे ने किया था उसे बिलकुल नहीं निभाया.\n\nSummary:", "target": "वैसे तो राजस्थान में रजवाड़ों के दौर में भी राज्य में एक तरह से संसदीय लोकतंत्र चल रहा था और वहाँ पहले मुख्यमंत्री के रुप में हीरालाल शास्त्री की नियुक्ति अप्रैल 1949 में ही हो गई थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन वहाँ औपचारिक विधानसभा का औपचारिक गठन मार्च 1952 में हुआ और पहले मुख्यमंत्री बने टीकाराम पालीवाल. राजस्थान में भी 1977 तक 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महत्वपूर्ण सूचनाएँ मुहैया कराईं. कमियाँ और राजनीतिक हस्तक्षेप अब यह साफ़ हो चुका है कि वहाँ ख़ुफ़िया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल का अभाव था. इसमें पुलिस और नौसेना भी शामिल है. प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि चरमपंथ से लड़ने के लिए एक संघीय जाँच एजेंसी का गठन किया जाएगा. इस बीच दिमाग में एक एक बात जो उभर कर सामने आ रही है वह यह कि मौज़ूदा जाँच एजेंसियों के काम में राजनीतिक दख़लंदाज़ी होती है. मुझे केंद्रीय जाँच आयोग (सीबीआई) के एक पूर्व निदेशक ने बताया था कि राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस एजेंसी को दबाव बनाने वाला एक सरकारी हथियार बनाकर रख दिया है. क्या नई बनने वाली संघीय जाँच एजेंसी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होगी? इस पर मुझे संदेह है. अगर मैं ग़लत साबित होता हूँ तो राजनीतिज्ञों की डुबो देने वाली अपनी नीतियाँ बदलनी होंगी.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 193, "source_item_id": "193", "source_lang": 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पैगाम फैलाना का फ़ैसला किया है. इसके लिए 20 कलाकारों ने एक वीडियो एलबम के लिए गाया है जिसके निर्देशक संजीव कोहली हैं. कोहली कहते हैं, \"यह आतंकवाद से लड़ने का कलाकारों का एक तरीका है.\" संगीत निर्देशक संजीव कोहली ने ही इस एलबम के लिए गीत भी लिखा है जिनमें हाल में हुए बम धमाकों के प्रभावितों की तस्वीर उभरती है. कोहली कहते हैं कि इस गीत में सिर्फ़ मुंबईवासियों का दर्द भर नहीं है बल्कि दुनिया भर के लोगों की आवाज़ की नुमाइंदगी करता है. कोहली का कहना है, \"हम गीतकारों ने यह पैग़ाम देने की कोशिश की है कि जब भी आतंकवादी हमारे शहर निशाना बनाने की कोशिश करेंगे, उतनी ही बार हम शांति और साहस से उनका मुक़ाबला करेंगे.\" संजीव कोहली बताते हैं कि उन्होंने जब यह घोषणा की थी कि वह 'आतंकवाद' की निंदा करने वाली एक वीडियो एलबम बनाने जा रहे हैं तो नामी-गिरामी गायक कलाकारों की ढेर सारी अर्ज़ियाँ उनके पास आईं कि वे भी उस एलबम में काम करना चाहेंगे. कोहली बताते हैं कि उन्हें 20 गायकों ने संपर्क किया जिनमें ऊषा मंगेश्कर से लेकर सुनीधि चौहान तक शामिल हैं. यह एलबम जल्दी ही बाज़ार में जारी की जाएगी.\n\nSummary:", "target": "मुंबई के कुछ अग्रणी संगीतकारों और गायक कलाकारों ने 11 जुलाई के धमाकों के बाद के माहौल में \"आतंकवाद\" के ख़िलाफ़ एक नए अंदाज़ में अपनी आवाज़ उठाई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग़ौरतलब है कि उन धमाकों में 180 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और लगभग 700 ज़ख़्मी हुए थे. भारत के 20 अग्रणी गायक कलाकारों ने मुंबई धमाकों की निंदा करते हुए एक वीडियो एलबम में गाने गाए हैं. इस वीडियो एलबम पर अभी काम किया जा रहा है और अगले कुछ ही सप्ताह में यह बाज़ार में आने वाली है. मुंबई के लोगों कै भावनात्मक धैर्य की काफ़ी सराहना हुई है. चाहें वो तीन साल पहले एक साथ हुए दो बम धमाकों की घटना हो, पिछले साल भीषण बाढ़ का बात हो, मुंबईवासियों ने चुनौती का सामना किया और आगे चल निकले. लेकिन 11 जुलाई के सिलसिलेवार बम धमाकों ने मुंबईवासियों में शांति की ललक को और जगा दिया है. उन्होंने चुनौती का सामना किया और बहादुरी के साथ आगे बढ़ते रहे. पूरे शहर में शांति की अपीलों की गूंज सुनाई दी. घटना के एक सप्ताह बाद 18 जुलाई को दो मिनट का मौन भी रखा गया. इसी प्रक्रिया में मुंबई के कुछ 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अनुसार दोपहर बाद चार बजकर चालीस मिनट पर नियंत्रण रेखा पार की. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से चले यात्री पहले ही नियंत्रण रेखा पार करके भारत प्रशासित कश्मीर में दाख़िल हुए तो जैसे एक बड़ा सपना पूरा हुआ. मुज़फ़्फ़राबाद से चले यात्रियों ने चकोटी पहुँचने के बाद पैदल ही लालपुल पार किया और वहाँ से भारतीय बस में बैठकर श्रीनगर गए. नियंत्रण रेखा पर उनका स्वागत भारतीय सैनिकों ने किया, इन यात्रियों के साथ मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना है कि दृश्य बेहद भावुक था, ज्यादातर लोगों की आँखों में आँसू थे. नियंत्रण रेखा पर जहाँ अब से दो वर्ष पहले तक गोलाबारी होती थी वहीं सैनिक बैंड यात्रियों के स्वागत मे खुशनुमा धुनें बजा रहे थे. श्रीनगर से भारतीय यात्रियों को लेकर चली बस भी कमान पोस्ट की ओर बढ़ रही है जहाँ से वे नियंत्रण रेखा पार करके मुज़फ़्फ़राबाद की ओर एक अन्य बस में बैठकर जाएँगे. श्रीनगर के शेरे कश्मीर स्टेडियम से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तय कार्यक्रम के अनुसार रवाना किया था. बस को रवाना करने से ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, \"अमन का कारवाँ चल पड़ा है और अब दुनिया की कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती.\" दोनों तरफ़ से उनके स्थानीय समय के अनुसार 11 बजे बसों को रवाना किया गया. पाकिस्तान स्टैंडर्ड टाइम भारत से आधा घंटे पीछे है इसलिए मुज़फ़्फ़राबाद वाली बस आधे घंटे बाद चली. श्रीनगर से बीबीसी संवाददाता अल्ताफ़ हुसैन ने ख़बर दी कि बस के रवाना होने के बाद उसके ऊपर एक हथगोला फेंका गया लेकिन धमाका बस से थोड़ी दूर पर हुआ और बस को क्षति नहीं पहुँची. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री सरदार सिकंदर हयात ख़ान ने मुज़फ़्फ़राबाद से चली बस को रवाना किया था. 'कारवाँ-ए-अमन' इस समारोह में बस यात्रा को 'कारवाँ ए अमन' कहा जा रहा है, केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई मंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री और प्रमुख राजनीतिक नेता शेरे कश्मीर स्टेडियम में मौजूद थे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी बस यात्रियों को विदा करने के लिए स्टेडियम पहुँची. राज्य की सत्ताधारी पार्टी पीडीपी की नेता महबूबा मुफ़्ती ने इसे 'एक नई सुबह का आगाज़' बताया है और उम्मीद ज़ाहिर की है कि कश्मीर के दोनों हिस्सों के लोगों का आपस में संपर्क बना रहेगा. इस कार्यक्रम के लिए स्टेडियम में सुरक्षा की बहुत ही कड़ी व्यवस्था की गई थी, नेताओं के भाषण बुलेटप्रूफ़ मंच से हुए. बुधवार को इस बस के यात्रियों के ठहरने के स्थान पर हुए हमले के बाद से सुरक्षा और सख़्त कर दी गई थी.\n\nSummary:", "target": "यह सिर्फ़ दक्षिण एशिया के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास में एक बड़ा दिन था जब कश्मीर के दोनों तरफ़ के लोगों को आधी सदी से भी ज़्यादा समय के बाद सरहद पार करने का मौक़ा मिला.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बीच चली बस के यात्री सरहद के पार ज़मीन को छूकर अभिभूत थे. दोनों तरफ़ से चली बसों के अपनी-अपनी मंज़िलों पर पहुँचने पर यात्रियों का ज़ोरदार स्वागत हुआ. इस पहल का संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने स्वागत करते हुए कहा कि श्रीनगर और मुज़फ़्फ़राबाद के बीच चली बस सेवा को शांति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक कहा है. भारत में अमरीका के राजदूत डेविड मलफ़र्ड ने कहा कि उनका देश भारत और पाकिस्तान का अपने मतभेद सुलझाने में पूरा समर्थन करेगा. सपना पूरा हुआ श्रीनगर से चली बस के यात्रियों ने भारतीय समय के अनुसार दोपहर बाद चार बजकर चालीस मिनट पर नियंत्रण रेखा पार की. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से चले यात्री पहले ही नियंत्रण रेखा पार करके भारत प्रशासित कश्मीर में दाख़िल हुए तो जैसे एक बड़ा सपना पूरा हुआ. मुज़फ़्फ़राबाद से चले यात्रियों ने चकोटी पहुँचने के बाद पैदल ही लालपुल पार किया और वहाँ से भारतीय बस में बैठकर श्रीनगर गए. नियंत्रण रेखा पर उनका स्वागत भारतीय सैनिकों ने किया, इन यात्रियों के साथ मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना है कि दृश्य बेहद भावुक था, ज्यादातर लोगों की आँखों में आँसू थे. नियंत्रण रेखा पर जहाँ अब से दो वर्ष पहले तक गोलाबारी होती थी वहीं सैनिक बैंड यात्रियों के स्वागत मे खुशनुमा धुनें बजा रहे थे. श्रीनगर से भारतीय यात्रियों को लेकर चली बस भी कमान पोस्ट की ओर बढ़ रही है जहाँ से वे नियंत्रण रेखा पार करके मुज़फ़्फ़राबाद की ओर एक अन्य बस में बैठकर जाएँगे. श्रीनगर के शेरे कश्मीर स्टेडियम से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तय कार्यक्रम के अनुसार रवाना किया था. बस को रवाना करने से ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, \"अमन का कारवाँ चल पड़ा है और अब दुनिया की कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती.\" दोनों तरफ़ से उनके स्थानीय समय के अनुसार 11 बजे बसों को रवाना किया गया. पाकिस्तान स्टैंडर्ड टाइम भारत से आधा घंटे पीछे है इसलिए मुज़फ़्फ़राबाद वाली बस आधे घंटे बाद चली. श्रीनगर से बीबीसी संवाददाता अल्ताफ़ हुसैन ने ख़बर दी कि बस के रवाना होने के बाद उसके ऊपर एक हथगोला फेंका गया लेकिन धमाका बस से थोड़ी दूर पर हुआ और बस को क्षति नहीं पहुँची. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री सरदार सिकंदर हयात ख़ान ने मुज़फ़्फ़राबाद से चली बस को रवाना किया था. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.\n\nSummary:", "target": "कोरोना वायरस की वजह से चल रहे लॉकडाउन की वजह से देश के अलग-अलग इलाक़ों में मज़दूर फंसे हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमिक्सर से निकलते मज़दूर सरकार ने 29 अप्रैल को इन मज़दूरों को बड़ी राहत दी थी ताकि यह मज़दूर, छात्र और पर्यटक अपने घरों पर वापस हो सकें. इसके बावजूद फंसे मज़दूर अपनी जान जोखिम में डालकर एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचने की कोशिश कर रहे है. ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के इंदौर में सामने आया है जहां पर एक सीमेंट मिक्सर में 18 मज़दूर छिपकर महाराष्ट्र से लखनऊ जा रहे थे. पुलिस ने चैकिंग के दौरान इन लोगों को उज्जैन रोड के पंथ पिपलाई गांव के पास पकड़ा. मिक्सर से एक के बाद एक मज़दूर बाहर निकले तो पुलिस भी हैरान रह गई. कोरोना वायरस: इंदौर में 18 लोगों को सीमेंट मिक्सर से निकाला गया महाराष्ट्र से आ रहा था ट्रक ये मिक्सर ड्राइवर इन मज़दूरों को भरकर महाराष्ट्र से लेकर इंदौर तक आ गया. चेक पॉइंट पर रोका गया तो ड्राइवर घबरा गया. उसके बाद वहां मौजूद सूबेदार ने उसे चेक किया तो अंदर लोग नज़र आये. उन्हें बाहर निकाला गया. समाप्त उसके बाद पुलिस ने मिक्सर को ज़ब्त कर लिया है. मिक्सर में मौजूद मज़दूरों को एक गार्डन में रुकवाया गया है. डीएसपी ट्रैफिक उमाकांत चौधरी ने बताया, \"शनिवार को सुबह इंदौर-उज्जैन सीमा के पंथ पिपलाई चेक पोस्ट पर पुलिस वालों ने एक मिक्सर मशीन को निकलते देखा. वहां मौजूद सूबेदार अमित यादव ने जब उसे देखा तो सोचा कि आख़िर जब सारे निर्माण बंद कर दिये गये हैं तो यह कहां जा रही है.\" उन्होंने आगे बताया, \"उसके बाद ड्राइवर से जब बात की गई तो उसने बताया कि वह लोग लखनऊ जा रहे है. फिर मिक्सर के क़रीब जब गये तो उसमें से आवाज़ आ रही थी. साइट का ढक्कन खोला गया तो देखा कि उसमें लोग मौजूद हैं. उसके बाद उन्हें बाहर निकाला गया.\" घर न पहुंच पाने से निराश हैं मज़दूर महाराष्ट्र से आ रहे यह मज़दूर लॉकडाउन की वजह से अपने घर नहीं जा पा रहे थे और बहुत परेशान थे. वहीं इन्हें किसी भी तरह से कोई काम भी नहीं मिल रहा था जिसकी वजह से इनका जीवनयापन और मुश्किल होता जा रहा था. मिक्सर चालक पर सांवेर थाने में मामला दर्ज किया गया है. वहीं प्रशासन इन्हें एक बस के ज़रिए लखनऊ भेजने की तैयारी कर रहा है. इससे पहले शुक्रवार को मध्य प्रदेश के बड़वानी में महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश साइकिल से जा रहे एक मज़दूर की मौत हो गई थी. मज़दूर का नाम तबरेज़ अंसारी बताया गया था. वो महाराष्ट्र के भिवंडी से दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के लिए रवाना हुआ था. लेकिन उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. प्रशासन का मानना है कि थकान, गर्मी और शरीर में पानी की कमी होने की वजह से उसकी जान चली गई. मौत की असली वजह पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चलेगी. बड़वानी ज़िला महाराष्ट्र सीमा पर है. इससे पहले भी बड़वानी में एक मज़दूर की मौत चैकपोस्ट पार करते हुये हो गई थी. वहीं 21 अप्रैल को एक पैदल जा रहे मज़दूर की मौत हो गई थी. हालांकि सरकार ने बुधवार को लॉकडाउन में छूट देते हुये फंसे हुए प्रवासी मज़दूर को और छात्रों को घर जाने की इजाज़त दे दी थी. इसके लिये राज्य सरकारों को बसों का इंतज़ाम करने के लिये कहा था. वहीं कई राज्य सरकारों ट्रेनों के ज़रिये अपने प्रदेश के मज़दूरों को ला रही है. लेकिन कई दिनों से फंसे ये मज़दूर खाने पीने की दिक्क़तों और काम न होने की वजह से अपने प्रदेश में जल्द से जल्द पहुंचना चाहते हैं. इसलिये वो ऐसे सफ़र करके अपनी जान भी जोख़िम में डाल रहे हैं. वहीं, मध्य प्रदेश में कोरोना मरीज़ों का संख्या लगातार बढ़ रही है. प्रदेश में अब तक 2770 मरीज़ पॉज़िटिव पाये गये हैं. 129 लोगों की मौत हो चुकी है. इंदौर में कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ों की संख्या 1545 पहुंच चुकी है. भोपाल में 523, उज्जैन में 151 मरीज़ संक्रमित पाये गये हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अगले साल ब्राज़ील में होने वाले फ़ुटबॉल विश्व कप में अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए टिकट के दामों की घोषणा हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग्रुप मैचों में टिकट 90 डॉलर या लगभग 5350 रुपए से शुरु होंगे. फ़ुटबॉल का प्रबंधन करने वाली संस्था फीफ़ा ने कहा है कि 13 जुलाई को होने वाले फ़ाइनल मैच का सबसे सस्ता टिकट 440 डॉलर या 26,130 रुपए और सबसे मंहगा टिकट 990 डॉलर या लगभग 58,800 रुपए का होगा. विश्व कप अगले साल 12 जून से शुरू होगा और पहला मैच साओ पाउलो में खेला जाएगा. टिकटों की बिक्री इस साल 20 अगस्त से शुरू हो जाएगी. स्थानीय लोगों के लिए सस्ते टिकट फ़ुटबॉल प्रेमी 10 अक्तूबर तक टिकट के लिए आवेदन दे सकते हैं और फिर मतदान के ज़रिए ये तय किया जाएगा कि किसे टिकट बेचा जाए. इसके बाद ही पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर टिकटों की बिक्री होगी. कुल मिलाकर फ़ैन्स के लिए 30 लाख टिकट उपलब्ध होंगे. ब्राज़ील के नागरिकों के लिए सबसे सस्ते टिकटों की कीमत मात्र 15 डॉलर से शुरु होगी. लेकिन ये टिकट सिर्फ़ छात्रों, 60 साल से बड़ी उम्र के लोगों और सरकारी सहायता पाने वाले लोगों के लिए होंगे. बाकी ब्राज़ीलियाई लोगों को न्यूनतम 30 डॉलर खर्च करना पड़ेगा. दक्षिण अफ़्रीका में साल 2010 विश्व कप में सबसे सस्ता टिकट 20 डॉलर का था. वो टिकट भी विशेष वर्ग के स्थानीय लोगों के लिए शुरुआती ग्रुप स्टेज के मैचों के थे. इससे पहले फ़ीफ़ा ने कहा था कि ब्राज़ील में विश्व कप के टिकट अब तक के सबसे सस्ते टिकट होंगे. स्टेडियम का नक्शा फ़ीफ़ा की टिकट वेबसाइट में स्टेडियम का नक्शा भी बना होगा जिसमें अलग-अलग क़ीमत वाले टिकटों की जगह दिखाई गई होगी. संस्था के मार्केटिंग निदेशक थियरे वेल का कहना था कि इस तरह से दर्शकों को पहले से ही पता होगा कि वो कहां बैठेंगे. दर्शक हर मैच के लिए अधिकतम चार टिकट और ज़्यादा से ज़्यादा सात मैचों के लिए टिकट ख़रीद सकते हैं. थियरे वेल ने ये भी बताया जो लोग टिकट ख़रीद कर किसी वजह से मैच के लिए नहीं आ सकते, ऐसे में फ़ीफ़ा ने टिकटों की दोबारा बिक्री का भी इंतज़ाम किया है. ब्राज़ील के लोगों के लिए कम से कम चार लाख टिकट अलग से रखे गए हैं. इनमें से 50 हज़ार टिकट मैदानों का निर्माण कार्य करने वाले लोगों के लिए होंगे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने अंतरिम बजट 2019 के दौरान इनकम टैक्स छूट की सीमा को ढाई लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशुक्रवार से ही सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर केंद्र सरकार की सभी नौकरियों में 10 फ़ीसदी आरक्षण भी लागू हो गया है. इस आरक्षण का लाभ पाने के लिए सालाना आय 8 लाख रुपये से कम होनी चाहिए, यह शर्त रखी गई है. जब 10 फ़ीसदी आरक्षण के प्रावधान लाए गये थे तब भी यह सवाल उठा था कि जब 8 लाख रुपये तक की आमदनी वाले 10 फ़ीसदी आरक्षण का लाभ ले सकते हैं तो आयकर की छूट केवल ढाई लाख तक की आय पर क्यों है. अब बजट 2019 में आयकर की सीमा को बढ़ाकर 5 लाख रुपये तो कर दिया गया लेकिन आयकर देने वालों में फिर भी यह असमंजस की स्थिति बनी कि ग़रीब के तौर पर आरक्षण का फ़ायदा लेने वाले उन लोगों को टैक्स देना पड़ेगा जिनकी आय पांच लाख सालाना से ऊपर है. कैसे करें टैक्स छूट की गणना? आपको इस असमंजस में रहने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हम आपको बताने जा रहे हैं कि इनकम टैक्स छूट पांच लाख रुपये तक तो मिलेगा ही. सरकार ने बजट 2019 में स्टैंडर्ड डिडक्शन को भी 40 हज़ार से बढ़ाकर 50 हज़ार रुपये कर दिया है. इसके बाद विभिन्न निवेशों पर धारा 80सी के तहत डेढ़ लाख रुपये तक की छूट मिलती है. नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में निवेश से आप सेक्शन 80C के तहत 1.5 लाख रुपये के निवेश से अलग टैक्स छूट का फ़ायदा उठा सकते हैं. इसमें 50,000 रुपये का निवेश कर सेक्शन 80CCD(1b) के तहत टैक्स छूट का लाभ उठा सकते हैं. इसके अलावा सेक्‍शन 80डी के तहत 25 हज़ार रुपये तक मेडिकल ख़र्च पर टैक्‍स छूट क्‍लेम कर सकने की सुविधा भी दी गई है. इसके अलावा राजीव गांधी इक्विटी सेविंग स्कीम का इस्तेमाल कर 25 हज़ार रुपये तक की अलग छूट पा सकते हैं. यानी आपको पांच लाख की आय + पचास हज़ार स्टैंडर्ड डिडक्शन + डेढ़ लाख 80सी के तहत + एनपीएस में 50 हज़ार के निवेश पर + 25 हज़ार मेडिकल ख़र्च पर क्लेम + 25 हज़ार राजीव गांधी इक्विटी स्कीम में. यानी कुल 8 लाख रुपये पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा. इसके अलावा अगर आपने होम लोन भी ले रखा है तो उसके ब्याज पर 2 लाख रुपये छूट का अलग से प्रावधान है. 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शांति ने बीए की अपनी प्रैक्टिकल परीक्षा भी छोड़ दी. पढ़ने की चाह शांति के अध्यापक उनकी अनुपस्थिति का कारण जानने उनके घर तक पहुंच गए. शांति ने बताया कि कुछ लड़कियां तो स्कूल ही नही गईं. \"पहले मैं बेफिक्र घर से बाहर चली जाती थी. अगर शाम को छह बजे भी बाहर जाना होता था तो पापा के बिना बाहर चली जाती थी, लेकिन अब पापा के साथ ही बाहर जाती हूं.\" प्रियंका, पीड़ित के गांव की एक लड़की इस बेहद पिछड़े इस गांव में दूर-दूर तक स्कूल नहीं है. लेकिन यहां की लड़कियां पढ़ना चाहती हैं. हमने गांव की मुश्किल राहों से गुजरकर अपनी साइकिलों पर स्कूल जाती कई लड़कियों को देखा. शांति का कॉलेज 16 किलोमीटर दूर है, और वो भी ये सफर साइकिल से तय करती हैं. रास्ता इतना खराब और ऊबड़-खाबड़ है कि यहां से गाड़ी का निकलना भी मुश्किल हो जाता है. एक गांव वाले ने बताया कि बरसात में रास्ता इतना खराब हो जाता है कि कई मरीजों की तो रास्ते में ही मौत हो गई क्योंकि उन्हें सही समय पर अस्पताल नहीं ले जाया जा सका. पढ़ाई पर असर कक्षा दस में पढ़ने वाली प्रियंका भी डरी हुई हैं. उन्होंने बताया कि घटना के बाद रास्ते में लड़कों के एक गुट को खेलते हुए देखने मात्र से उनमें दहशत बैठ जाती है. प्रियंका के माता-पिता को भी समझ में नहीं आ रहा है कि इस स्थिति से कैसे निपटें. प्रियंका की माँ कहती हैं, “सरकार को महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए जरूर कुछ न कुछ करना चाहिए.” ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा अब भी बहुत आसान नहीं है उनके पिता कहते हैं कि असुरक्षा के इस माहौल का असर लड़कियों की पढ़ाई पर पड़ेगा. बलात्कार पीड़ित छात्रा की तरह यहां की तमाम लड़कियां अपना भविष्य बनाना चाहती हैं. कड़ी सजा की मांग गांव के पुरूषों को मैंने बार-बार ये कहते सुना कि इस इलाके में छेड़छाड़ की घटनाएं नहीं होतीं, लेकिन जब मैंने पुरुषों के सामने लड़कियों से पूछा कि क्या ये सच है तो एक लड़की ने अलग ही कहानी बताई. उसका कहना था कि गांव में उन्हें भी छेड़खानी का सामना करना पड़ता है, और ऐसी कई बातें है जो दबा दी जाती हैं. इस बात पर आसपास के युवकों ने आश्चर्य जताया. गांव वालों ने बताया कि कुछ हफ्तों पहले ही एक सात साल की बच्ची के कथित बलात्कार को लेकर यहां बहुत हल्ला मचा था. दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के अभियुक्तों के लिए यहां के लोग कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं. गांव में गुस्सा है और लोग चाहते हैं कि दोषियों को मृत्यु दंड मिले. कई लोग तो ऐसी भयानक सजा दिए जाने की बात करते हैं जिसका वर्णन करना भी मुश्किल है. गांव वाले इन खबरों को सुनकर भी नाराज़ हो जाते हैं कि छह अभियुक्तों में से एक नाबालिग है और उसे कम कठोर सज़ा मिल सकती है. इसे भी पढ़ें टॉपिक\n\nSummary:", "target": "बीए में पढ़ने वाली शांति को जब से दिल्ली सामूहिक बलात्कार और बाद में पीड़ित की मौत के बारे में पता चला है, तब से उनके भीतर डर बैठ गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविनीत खरे बीबीसी संवाददाता, बलिया से बलात्कार को लेकर विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में शांति का घर 23 वर्षीय बलात्कार पीड़ित छात्रा के परिवार के घर से थोड़ी ही दूर है. शांति का कहना है, “पहले मैं बेफिक्र घर से बाहर चली जाती थी. अगर शाम को छह बजे भी बाहर जाना होता था तो पापा के बिना बाहर चली जाती थी, लेकिन अब पापा के साथ ही बाहर जाती हूं.” डर इतना गहरा था कि शांति ने बीए की अपनी प्रैक्टिकल परीक्षा भी छोड़ दी. पढ़ने की चाह शांति के अध्यापक उनकी अनुपस्थिति का कारण जानने उनके घर तक पहुंच गए. शांति ने बताया कि कुछ लड़कियां तो स्कूल ही नही गईं. \"पहले मैं बेफिक्र घर से बाहर चली जाती थी. अगर शाम को छह बजे भी बाहर जाना होता था तो पापा के बिना बाहर चली जाती थी, लेकिन अब पापा के साथ ही बाहर जाती हूं.\" प्रियंका, पीड़ित के गांव की एक लड़की इस बेहद पिछड़े इस गांव में दूर-दूर तक स्कूल नहीं है. लेकिन यहां की लड़कियां पढ़ना चाहती हैं. हमने गांव की मुश्किल राहों से गुजरकर अपनी साइकिलों पर स्कूल जाती कई लड़कियों को देखा. शांति का कॉलेज 16 किलोमीटर दूर है, और वो भी ये सफर साइकिल से तय करती हैं. रास्ता इतना खराब और ऊबड़-खाबड़ है कि यहां से गाड़ी का निकलना भी मुश्किल हो जाता है. एक गांव वाले ने बताया कि बरसात में रास्ता इतना खराब हो जाता है कि कई मरीजों की तो रास्ते में ही मौत हो गई क्योंकि उन्हें सही समय पर अस्पताल नहीं ले जाया जा सका. पढ़ाई पर असर कक्षा दस में पढ़ने वाली प्रियंका भी डरी हुई हैं. उन्होंने बताया कि घटना के बाद रास्ते में लड़कों के एक गुट को खेलते हुए देखने मात्र से उनमें दहशत बैठ जाती है. प्रियंका के माता-पिता को भी समझ में नहीं आ रहा है कि इस स्थिति से कैसे निपटें. प्रियंका की माँ कहती हैं, “सरकार को महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए जरूर कुछ न कुछ करना चाहिए.” ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा अब भी बहुत आसान नहीं है उनके पिता कहते हैं कि असुरक्षा के इस माहौल का असर लड़कियों की पढ़ाई पर पड़ेगा. बलात्कार पीड़ित छात्रा की तरह यहां की तमाम लड़कियां अपना भविष्य बनाना चाहती हैं. कड़ी सजा की मांग गांव के पुरूषों को मैंने बार-बार ये कहते सुना कि इस इलाके में छेड़छाड़ की घटनाएं नहीं होतीं, लेकिन जब मैंने पुरुषों के सामने लड़कियों से पूछा कि क्या ये सच है तो एक लड़की ने अलग ही कहानी बताई. उसका कहना था कि गांव में उन्हें भी छेड़खानी का सामना करना पड़ता है, और ऐसी कई बातें है जो दबा दी जाती हैं. इस बात पर आसपास के युवकों ने आश्चर्य जताया. गांव वालों ने बताया कि कुछ हफ्तों पहले ही एक सात साल की बच्ची के कथित बलात्कार को लेकर यहां बहुत हल्ला मचा था. दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के अभियुक्तों के लिए यहां के लोग कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं. गांव में गुस्सा है और लोग 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'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए अजीत वाडेकर और कमल मोरारका दोनों ने कहा कि बोर्ड के चुनाव में जो कुछ हुआ वह लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरुप था. कार्यक्रम का विषय था- 'क्या क्रिकेट अब खेल के मैदान से ज़्यादा अदालतों और राजनीति के अखाड़े में खेली जा रही है?' कमल मोरारका का कहना था कि यदि चुनाव होंगे तो इसी तरह हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि मैचों के प्रसारण के अधिकार के मामले में चैनलों के साथ जो मामला चल रहा है वह भी प्रतिस्पर्धा के कारण हो रहा है. उनका कहना था, \"पाँच चैनल हैं और उनमें से प्रसारण का अधिकार किसी एक को ही मिलेगा फिर दूसरे उसके लिए कोशिश करेंगे. अब इसे रोकने के लिए तानाशाही चलाकर किसी एक को अधिकार तो नहीं दिया जा सकता.यदि मामला अदालत में चला गया है तो इसमें ग़लत क्या है.\" पैसे का खेल इस सवाल पर कि क्रिकेट खिलाड़ी अब देश के लिए नहीं पैसे के लिए खेलते हैं, पूर्व कप्तान वाडेकर ने कहा, \"यह ठीक है कि पहले पैसा नहीं था और हम लोग सिर्फ़ देश के लिए खेलते थे. अब पैसा आ गया है, लेकिन यह कहना ठीक नहीं है कि अब खिलाड़ी देश के लिए नहीं खेलते.\" बीसीसीआई के पैसे और उसके कारण राजनीति के सवाल पर वाडेकर ने कहा कि बोर्ड के पास पैसा आ गया है इससे खेल को सुधारने की कोशिश होनी चाहिए और बोर्ड में अनुभवी खिलाड़ियों को मनोनीत करना चाहिए. कमल मोरारका ने कहा कि यह सही नहीं है कि पैसे के कारण राजनेता और उद्योगपति बोर्ड की ओर आकर्षित हो रहे हैं. उनका कहना था कि इसका कारण ग्लैमर ज़रुर हो सकता है क्योंकि मीडिया क्रिकेट को जिस तरह महत्व देता है उससे लोगों के मन में एक आकर्षण हो सकता है. पैसों के बारे में उन्होंने कहा, \"जब इंसान पैसों से दूर नहीं रह सकता तो फिर बोर्ड इससे दूर कैसे हो सकता है.\" खिलाड़ियों को बोर्ड में लेने के सवाल पर कमल मोरारका का कहना था कि राज्य की इकाइयों को खिलाड़ियों को चुनकर भेजना होगा तभी वे बोर्ड में चुनाव लड़ सकेंगे. दोनों ने ही स्वीकार किया कि भारतीय टीम के प्रदर्शन में एकरुपता नहीं होती और उनमें 'किलिंग इंस्टिंक्ट' की ज़रुरत है.\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट टीम के सफलतम कप्तानों में से एक अजीत वाडेकर का कहना है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में कुछ पुराने खिलाड़ियों को भी मनोनीत किया जाना चाहिए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदूसरी तरफ़ बोर्ड के उपाध्यक्ष कमल मोरारका का कहना है कि जहाँ भी खिलाड़ियों के चयन का सवाल है वहाँ यह काम सिर्फ़ खिलाड़ियों के ही हाथों में हैं. 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए अजीत वाडेकर और कमल मोरारका दोनों ने कहा कि बोर्ड के चुनाव में जो कुछ हुआ वह लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरुप था. कार्यक्रम का विषय था- 'क्या क्रिकेट अब खेल के मैदान से ज़्यादा अदालतों और राजनीति के अखाड़े में खेली जा रही है?' कमल मोरारका का कहना था कि यदि चुनाव होंगे तो इसी तरह हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि मैचों के प्रसारण के अधिकार के मामले में चैनलों के साथ जो मामला चल रहा है वह भी प्रतिस्पर्धा के कारण हो रहा है. उनका कहना था, \"पाँच चैनल हैं और उनमें से प्रसारण का अधिकार किसी एक को ही मिलेगा फिर दूसरे उसके लिए कोशिश करेंगे. अब इसे रोकने के लिए तानाशाही चलाकर किसी एक को अधिकार तो नहीं दिया जा सकता.यदि मामला अदालत में चला गया है तो इसमें ग़लत क्या है.\" पैसे का खेल इस सवाल पर कि क्रिकेट खिलाड़ी अब देश के लिए नहीं पैसे के लिए खेलते हैं, पूर्व कप्तान वाडेकर ने कहा, \"यह ठीक है कि पहले पैसा नहीं था और हम लोग सिर्फ़ देश के लिए खेलते थे. अब पैसा आ गया है, लेकिन यह कहना ठीक नहीं है कि अब खिलाड़ी देश के लिए नहीं खेलते.\" बीसीसीआई के पैसे और उसके कारण राजनीति के सवाल पर वाडेकर ने कहा कि बोर्ड के पास पैसा आ गया है इससे खेल को सुधारने की कोशिश होनी चाहिए और बोर्ड में अनुभवी खिलाड़ियों को मनोनीत करना चाहिए. कमल मोरारका ने कहा कि यह सही नहीं है कि पैसे के कारण राजनेता और उद्योगपति बोर्ड की ओर आकर्षित हो रहे हैं. उनका कहना था कि इसका कारण ग्लैमर ज़रुर हो सकता है क्योंकि मीडिया क्रिकेट को जिस तरह महत्व देता है उससे लोगों के मन में एक आकर्षण हो सकता है. पैसों के बारे में उन्होंने कहा, \"जब इंसान पैसों से दूर नहीं रह सकता तो फिर बोर्ड इससे दूर कैसे हो सकता है.\" खिलाड़ियों को बोर्ड में लेने के सवाल पर कमल मोरारका का कहना था कि राज्य की इकाइयों को खिलाड़ियों को चुनकर भेजना होगा तभी वे बोर्ड में चुनाव लड़ सकेंगे. दोनों ने ही स्वीकार किया कि भारतीय टीम के प्रदर्शन में एकरुपता नहीं होती और उनमें 'किलिंग इंस्टिंक्ट' की ज़रुरत है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 204, "source_item_id": "204", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1954, "clean_index": 185, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:185"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनेपियर में हुए इस मैच में पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 50 ओवरों में छह विकेट के नुक़सान पर 339 रन बनाए. जवाब में यूएई की टीम आठ विकेट पर 210 रन ही बना पाई. यूएई की ओर से शैमन अनवर ने सर्वाधिक 62 रन बनाए जबकि ख़ुर्रम ख़ान ने 43 रनों का योगदान दिया. प्रदर्शन पाकिस्तान की ओर से सलामी बल्लेबाज़ अहमद शहज़ाद ने 93 और हारिस सोहेल ने 70 रनों की पारी खेली. दूसरे विकेट के लिए दोनों ने 160 रन जोड़े. समाप्त कप्तान मिसबाहुल हक़ ने 65 और शोएब मक़सूद ने 45 रन बनाए. पाकिस्तान की टीम की विश्व कप में शुरुआत अच्छी नहीं रही थी. उसे भारत और वेस्टइंडीज़ के हाथों हार मिली थी, लेकिन अब उसने लगातार दूसरी जीत दर्ज की है. पहले उसने ज़िम्बाब्वे को हराया और अब उसने यूएई को मात दी है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "विश्व कप के एक मैच में पाकिस्तान ने यूएई को 129 रनों से हराकर क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँचने की उम्मीद बरकरार रखी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनेपियर में हुए इस मैच में पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 50 ओवरों में छह विकेट के नुक़सान पर 339 रन बनाए. जवाब में यूएई की टीम आठ विकेट पर 210 रन ही बना पाई. यूएई की ओर से शैमन अनवर ने सर्वाधिक 62 रन बनाए जबकि ख़ुर्रम ख़ान ने 43 रनों का योगदान दिया. प्रदर्शन पाकिस्तान की ओर से सलामी बल्लेबाज़ अहमद शहज़ाद ने 93 और हारिस सोहेल ने 70 रनों की पारी खेली. दूसरे विकेट के लिए दोनों ने 160 रन जोड़े. समाप्त कप्तान मिसबाहुल हक़ ने 65 और शोएब मक़सूद ने 45 रन बनाए. पाकिस्तान की टीम की विश्व कप में शुरुआत अच्छी नहीं रही थी. उसे भारत और वेस्टइंडीज़ के हाथों हार मिली थी, लेकिन अब उसने लगातार दूसरी जीत दर्ज की है. पहले उसने ज़िम्बाब्वे को हराया और अब उसने यूएई को मात दी है. 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इवानोविच भी अपना मैच आराम से जीत गईं तो रूस की येलेना देमेन्तिएवा का विंबलडन में सफ़र ख़त्म हो गया. लेकिन रूस की स्वेतलाना कुज़नेत्सोवा अपना मैच जीतने में सफल रहीं. पुरुषों के वर्ग में साइप्रस के मार्कोस बैगदातिस ने अर्जेंटीना के डेविड नलबैंडियन को प्रतियोगिता से बाहर किया. तो स्वीडन के योनस ब्यौर्कमैन ने ऑस्ट्रेलिया के वेन ऑर्थर्स के ख़िलाफ़ सीधे सेटों में जीत दर्ज की. मैच विंबलडन में सातवीं वरीयता प्राप्त सरीना विलियम्स का मुक़ाबला था स्लोवाकिया की डेनिएला हंतुकोवा से. पहला सेट आराम से 6-2 से जीतने के बाद दूसरे सेट में सरीना बैक फ़ुट पर आ गईं. दूसरे सेट में जब स्कोर 5-5 था, उसी समय सरीना कोर्ट पर गिर गईं. उनके बाएँ पैर की मांसपेशियों में खिंचाव आ गया. इसके कारण देर तक कोर्ट में ही सरीना अपनी ट्रेनर की मदद लेती रहीं. बाद में बारिश के कारण मैच रोकना पड़ा. मैच जब शुरू हुआ तो दूसरा सेट टाई ब्रेकर में गया और हंतुकोवा ने दूसरा सेट 7-6 से जीत लिया. लेकिन बारिश के व्यवधान के बीच सरीना को आराम का मौक़ा मिला और उन्हें बेहतर चिकित्सा भी मिली. तीसरे और निर्णायक सेट में तो सरीना ने शानदार खेल दिखाया और सेट 6-2 से जीतकर मैच 6-2, 6-7 और 6-2 से जीत लिया और क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँचीं. इससे पहले जस्टिन हेना हार्डिन ने स्विट्ज़रलैंड की पैटी श्निडर को सीधे सेटों में 6-2, 6-2 से हराकर क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई. क्वार्टर फ़ाइनल में हेना हार्डिन और सरीना विलियम्स आमने-सामने होंगी. वीनस विलियम्स का मैच भी तीन सेटों में गया लेकिन आख़िरकार उन्होंने जापान की अकीको मोरीगामी को 6-2, 3-6 और 7-5 से जीत हासिल करने में सफलता पाई. सर्बिया की एना इवानोविच ने फ़्रांस की अर्वेन रेज़ई को सीधे सेटों में6-3, 6-2 से मात दी तो स्वेतलाना कुज़नेत्सोवा और मिशेला क्राइजसेक भी अपने-अपने मैच जीत गईं. लेकिन रूस की येलेना देमेन्तिएवा को पोलैंड की एग्निज़का पास्ज़ेक ने 3-6, 6-2, 6-3 से हरा दिया. पुरुषों के वर्ग में योनस ब्यौर्कमैन ने ऑस्ट्रेलिया के वेन ऑर्थर्स को सीधे सेटों में 6-2, 6-1 और 6-4 से मात दी. लेकिन अर्जेंटीना के डेविड नलबैंडियन हार गए. उन्हें साइप्रस के मार्कोस बैगदातिस ने 6-2, 7-5, 6-0 से हराकर प्रतियोगिता से बाहर कर दिया.\n\nSummary:", "target": "विंबलडन के सातवें दिन तो जम कर बारिश होती रही. लेकिन बारिश के बावजूद जो मैच पूरे हुए, उनमें सबसे रोमांचक रहा अमरीका की सरीना विलियम्स और स्लोवाकिया की डेनिएला हंतुकोवा के बीच का मैच. जिसमें आख़िरकार सरीना विलियम्स जीतीं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसाथ ही स्पेन के रफ़ाएल नडाल और स्वीडन के रॉबिन सोडरलिंग के बीच चल रहा रोमांचक मैच पूरा नहीं हो पाया है. पहले दो सेट 6-4, 6-4 से जीतने वाले नडाल अगले दोनों सेट 6-7 और 4-6 से हार गए. लेकिन पाँचवें सेट में वे 2-0 से आगे हैं. इसके अलावा दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बेल्जियम की जस्टिन हेना हार्डिन ने भी अपना मैच जीता और आसानी से जीता. लेकिन बहन सरीना की तरह वीनस विलियम्स का मैच तीन सेट तक गया और आख़िरकार वे जीतने में सफल रहीं. तीसरी वरीयता प्राप्त सर्बिया की एना इवानोविच भी अपना मैच आराम से जीत गईं तो रूस की येलेना देमेन्तिएवा का विंबलडन में सफ़र ख़त्म हो गया. लेकिन रूस की स्वेतलाना कुज़नेत्सोवा अपना मैच जीतने में सफल रहीं. पुरुषों के वर्ग में साइप्रस के मार्कोस बैगदातिस ने अर्जेंटीना के डेविड नलबैंडियन को प्रतियोगिता से बाहर किया. तो स्वीडन के योनस ब्यौर्कमैन ने ऑस्ट्रेलिया के वेन ऑर्थर्स के ख़िलाफ़ सीधे सेटों में जीत दर्ज की. मैच विंबलडन में सातवीं वरीयता प्राप्त सरीना विलियम्स का मुक़ाबला था स्लोवाकिया की डेनिएला हंतुकोवा से. पहला सेट आराम से 6-2 से जीतने के बाद दूसरे सेट में सरीना बैक फ़ुट पर आ गईं. दूसरे सेट में जब स्कोर 5-5 था, उसी समय सरीना कोर्ट पर गिर गईं. उनके बाएँ पैर की मांसपेशियों में खिंचाव आ गया. इसके कारण देर तक कोर्ट में ही सरीना अपनी ट्रेनर की मदद लेती रहीं. बाद में बारिश के कारण मैच रोकना पड़ा. मैच जब शुरू हुआ तो दूसरा सेट टाई ब्रेकर में गया और हंतुकोवा ने दूसरा सेट 7-6 से जीत लिया. लेकिन बारिश के व्यवधान के बीच सरीना को आराम का मौक़ा मिला और उन्हें बेहतर चिकित्सा भी मिली. तीसरे और निर्णायक सेट में तो सरीना ने शानदार खेल दिखाया और सेट 6-2 से जीतकर मैच 6-2, 6-7 और 6-2 से जीत लिया और क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँचीं. इससे पहले जस्टिन हेना हार्डिन ने स्विट्ज़रलैंड की पैटी श्निडर को सीधे सेटों में 6-2, 6-2 से हराकर क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई. क्वार्टर फ़ाइनल में हेना हार्डिन और सरीना विलियम्स आमने-सामने होंगी. वीनस 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(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं. बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर में मौजूद एनआईटी में कश्मीरी और ग़ैरकश्मीरी छात्रों की झड़प के बाद इस मसले को वहां के अंग्रेज़ी और उर्दू के अख़बारों ने प्रमुखता से छापा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग्रेटर कश्मीर ने अपनी ख़बर में दक्षिणपंथी हिंदुत्व ताकतों के इस मसले को अपने पक्ष में भुनाने की बात कही है. राइज़िंग कश्मीर ने छात्रों के हवाले से ख़बर छापी है. यह छात्र इस मसले को स्थानीय और बाहरी छात्रों के बीच संघर्ष के तौर पर पेश करने पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं. कश्मीर रीडर अख़बार ने अपने संपादकीय में इन कश्मीरी छात्रों की तुलना फ़लस्तीनियों से की है. अख़बार के अनुसार राष्ट्रीय स्तर का शैक्षिक संस्थान होने के बावजूद एनआईटी में केवल 20 फ़ीसदी छात्र ही जम्मू कश्मीर से आते हैं. समाप्त कश्मीर रीडर अख़बार ने आरोप लगाया है- 'कश्मीर में राष्ट्रीय स्तर के संस्थान फ़ासीवाद को आयात करने वाले ट्रोज़न हॉर्स बनते जा रहे हैं और राज्य के शिक्षा मंत्री को इस मसले पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए. वे इसे प्रशासानिक मसला बताकर टाल नहीं सकते.' 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उन्होंने कहा कि हिज़्बुल्ला बातचीत के लिए तैयार है और अपने साथी लेबनानियों से नहीं लड़ेगा. सरकार समर्थकों और सरकार विरोधियों के बीच छिटपुट झड़पों के बीच हज़ारों की तादाद में हिज़्बुल्ला के समर्थक पिछले एक सप्ताह से मध्य बेरूत में प्रदर्शन कर रहे हैं. इल्ज़ाम नसरल्ला ने लोगों से कहा कि वे रविवार को विशाल प्रदर्शन के लिए तैयार रहें. उन्होंने लेबनान के प्रधानमंत्री सिन्यूरा की जमकर आलोचना की और पूछा, “क्या लेबनान के प्रधानमंत्री ने सप्लाई लाइनें काटने का काम नहीं किया है.” उन्होंने बिना किसी का नाम लिए सिन्यूरा सरकार के एक प्रतिनिधि पर इसराइल के साथ मिलकर हिज़्बुल्ला को हराने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया. संघर्ष नहीं बेरूत से बीबीसी संवाददाता ने बताया कि यह सरकार के ख़िलाफ़ नसरल्ला के सबसे तीखे भाषणों में से एक था. हिज़्बुल्ला ने पिछले माह सरकार में शामिल अपने मंत्रियों को हटा दिया था. हिज़्बुल्ला प्रमुख ने कहा कि वे और उनके सहयोगी स्वतंत्र सरकार चाहते हैं जो विदेशी ताक़तों के एजेंडे पर नहीं चलेगी. लेकिन उन्होंने गृह युद्ध की संभावना को खारिज़ कर दिया और लेबनान के शिया मुसलमानों को चेतावनी दी कि सुन्नी मुसलमानों या ईसाइयों से लड़ने के कोई ज़रूरत नहीं है.\n\nSummary:", "target": "हिज़्बुल्ला नेताओं ने फ़ुआद सिन्यूरा के नेतृत्व वाली लेबनान सरकार पर पश्चिम परस्त होने का आरोप लगाते हुए जनप्रदर्शन जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहिज़्बुल्ला नेताओं ने सिन्यूरा से इस्तीफ़ा देने का माँग की है. मध्य बेरूत में एकत्रित अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए हिज़्बुल्ला के प्रमुख शेख हसन नसरल्ला ने कहा कि लेबनान को नई और विदेशी प्रभाव से मुक्त सरकार की ज़रूरत है. वीडियो लिंक के ज़रिए उन्होंने कहा कि हिज़्बुल्ला बातचीत के लिए तैयार है और अपने साथी लेबनानियों से नहीं लड़ेगा. सरकार समर्थकों और सरकार विरोधियों के बीच छिटपुट झड़पों के बीच हज़ारों की तादाद में हिज़्बुल्ला के समर्थक पिछले एक सप्ताह से मध्य बेरूत में प्रदर्शन कर रहे हैं. इल्ज़ाम नसरल्ला ने लोगों से कहा कि वे रविवार को विशाल प्रदर्शन के लिए तैयार रहें. उन्होंने लेबनान के प्रधानमंत्री सिन्यूरा की जमकर आलोचना की और पूछा, “क्या लेबनान के प्रधानमंत्री ने 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में रोकटोक करना जारी रखा, तो मृतकों की संख्या कहीं ज़्यादा हो सकती है. राहतकार्यों में तेज़ी उधर सोमवार को पहली बार बर्मा ने अमरीकी सहायता स्वीकार करने की अनुमति दे दी है लेकिन राहत एजेंसियों का अभी भी कहना है कि तबाही को देखते हुए सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं है. तूफ़ान की तबाही के नौ दिन बाद राहत सामग्री से लदा पहली अमरीकी विमान सोमवार को पड़ोसी देश थाइलैंड से बर्मा पहुँचा है. अब ऐसा लग रहा है कि बर्मा की सरकार तूफ़ान पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आने वाली विदेशी सरकारों और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों से धीरे-धीरे ही सही सहयोग बढ़ा रही है. ब्रिटेन ने भी सोमवार को बताया कि पहली बार उसके एक आपदा आकलन दल को बर्मा जाने की अनुमति मिली है. हालाँकि लगभग सारी सहायता संस्थाएँ यही चाहती हैं कि बर्मा में राहत कार्य चलाने पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया जाए. इन संस्थाओं का कहना है कि पर्याप्त संख्या में कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की मौजूदगी के बिना हर तूफ़ान पीड़ित तक सहायता नहीं पहुँचाई जा सकती है.\n\nSummary:", "target": "बर्मा में पिछले सप्ताह आए तूफ़ान के पीड़ितों को जिस गति से राहत 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लुसियन ब्रिटेन की महारानी की भी पेंटिंग बना चुके हैं. इस तरह की पेंटिंग बनाने में छह महीने से एक साल तक का समय लगता है लेकिन केट ने कहा कि उन्हें समय का ध्यान नहीं रहा था. पेंटिंग बनने के समय गर्भवती रही केट को लड़की पैदा हुई थी जो अब दो साल की है. कुछ लोगों का मानना है कि केट ने ही फोन पर इस पेंटिंग को खरीदा है.\n\nSummary:", "target": "प्रसिद्ध सुपरमॉडल केट मॉस की एक नग्न पेंटिंग क़रीब सात लाख डॉलर में नीलाम हुई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयूरोप के जाने माने चित्रकार लूसियन फ्रायड ने केट की यह पेंटिंग उस समय बनाई थी जब केट गर्भवती थी. पेंटिंग का नाम ही है नेकेड पोर्ट्रेट 2002. पांच फुट से ऊंची इस पेंटिंग में केट मॉस को अधलेटी अवस्था में दिखाया गया है. लंदन के क्रिस्टी हाउस नीलामघर में इसकी बोली लगी 7.29 लाख डॉलर. इसे खरीदने वाले के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है क्योंकि इस खरीदार ने फोन पर बोली लगाई थी. प्रसिद्ध मॉडल अधिकतर लोगों का कहना है कि केट मॉस ने डेज़्ड एंड कन्फ्यूज़्ड पत्रिका के लिए इस भंगिमा में पेंटिंग बनवाई थी. पेंटिंग बनाने 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विकास मंत्रालय ने आईआईटी-एम से इस मामले में सफाई मांगी है. यह एक अज्ञात व्यक्ति की ओर से की गई शिकायत पर आधारित है. इसमें कहा गया है कि स्टडी सर्कल की ओर से परिसर में वितरित किए जा रहे पर्चे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुओं के प्रति नफरत फैल रही है. इस पर्चे पर मंत्रालय ने आईआईटी-एम से सफाई मांगी जिसके बाद संस्थान ने स्टडी सर्कल को प्रतिबंधित कर दिया. आचार संहिता का सवाल आईआईटी-एम की डीन शिवकुमार श्रीनिवासन ने मीडिया से कहा कि छात्रों के इस संगठन ने आचार संहिता का उल्लंघन किया था, इसलिए तकनीकी कारणों की वजह से इसे इजाजत नहीं दी गई. समाप्त लेकिन स्टडी सर्कल के एक प्रवक्ता ने अपना नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बीबीसी से कहा, ''जो बात की जा रही है, उसमें कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है. हमने किसी आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया है. वहां धार्मिक मामलों के और भी स्टडी ग्रुप हैं, जो पोस्टर लगा सकते हैं या बैठक कर सकते हैं, अगर हमने किया है तो इसमें ग़लत क्या है.'' प्रवक्ता ने कहा, ''हमारे पर्चे में उन आर्थिक नीतियों की आलोचना की गई है जिनका सरकार पालन कर रही है. हम समसामयिक मुद्दों पर चर्चा कर रहें और इन मुद्दों पर डॉ. आंबेडकर औऱ पेरियार के विचार रख रहे हैं.'' अभिव्यक्ति की आज़ादी आईआईटी-एम ने एक बयान में कहा है, ''आईआईटी मद्रास छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम नहीं करती है. छात्र संगठनों से उम्मीद की जाती है कि वो दिशा निर्देशों का पालन करेंगे.\" बयान में कहा गया है, \"इन दिशा निर्देशों के मुताबिक़ छात्र संगठन आईआईटी मद्रास के नाम और इसके आधिकारिक प्रविष्टियों का बिना वैध अनुमति के किसी भी रूप में अपनी गतिविधियों के प्रचार या समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे. इस संगठन ने अपनी बैठक के दौरान इन दिशा निर्देशों का उल्लंघन किया है.'' इस स्टडी सर्कल के एक और सदस्य ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, ''यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हमारे संवैधानिक अधिकार का हनन है. कोई आचार संहिता संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकती है.'' दूूसरी ओर कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया ने इस पर सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया है. एनएसयूआई ने दिल्ली में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के घर के बाहर प्रदर्शन किया. पुलिस ने कुछ छात्रों को हिरासत में ले लिया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास (आईआईटी-एम) में छात्रों के एक संगठन पर प्रतिबंध लगाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआईआईटी के छात्रों के अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल ने कथित तौर पर एक पर्चा जारी किया था. इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों की आलोचना की गई थी. मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आईआईटी-एम से इस मामले में सफाई मांगी है. यह एक अज्ञात व्यक्ति की ओर से की गई शिकायत पर आधारित है. इसमें कहा गया है कि स्टडी सर्कल की ओर से परिसर में वितरित किए जा रहे पर्चे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुओं के प्रति नफरत फैल रही है. इस पर्चे पर मंत्रालय ने आईआईटी-एम से सफाई मांगी जिसके बाद संस्थान ने स्टडी सर्कल को प्रतिबंधित कर दिया. आचार संहिता का सवाल आईआईटी-एम की डीन शिवकुमार श्रीनिवासन ने मीडिया से कहा कि छात्रों के इस संगठन ने आचार संहिता का उल्लंघन किया था, इसलिए तकनीकी कारणों की वजह से इसे इजाजत नहीं दी गई. समाप्त लेकिन स्टडी सर्कल के एक प्रवक्ता ने अपना नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बीबीसी से कहा, ''जो बात की जा रही है, उसमें कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है. हमने किसी आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया है. वहां धार्मिक मामलों के और भी स्टडी ग्रुप हैं, जो पोस्टर लगा सकते हैं या बैठक कर सकते हैं, अगर हमने किया है तो इसमें ग़लत क्या है.'' प्रवक्ता ने कहा, ''हमारे पर्चे में उन आर्थिक नीतियों की आलोचना की गई है जिनका सरकार पालन कर रही है. हम समसामयिक मुद्दों पर चर्चा कर रहें और इन मुद्दों पर डॉ. आंबेडकर औऱ पेरियार के विचार रख रहे हैं.'' अभिव्यक्ति की आज़ादी आईआईटी-एम ने एक बयान में कहा है, ''आईआईटी मद्रास छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम नहीं करती है. छात्र संगठनों से उम्मीद की जाती है कि वो दिशा निर्देशों का पालन करेंगे.\" बयान में कहा गया है, \"इन दिशा निर्देशों के मुताबिक़ छात्र संगठन आईआईटी मद्रास के नाम और इसके आधिकारिक प्रविष्टियों का बिना वैध अनुमति के किसी भी रूप में अपनी गतिविधियों के प्रचार या समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे. इस संगठन ने अपनी बैठक के दौरान इन दिशा निर्देशों का उल्लंघन किया है.'' इस स्टडी सर्कल के एक और सदस्य ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, ''यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हमारे संवैधानिक अधिकार का हनन है. कोई आचार संहिता संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकती है.'' दूूसरी ओर कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया ने इस पर सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया है. एनएसयूआई ने दिल्ली में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के घर के बाहर प्रदर्शन किया. पुलिस ने कुछ छात्रों को हिरासत में ले लिया है. 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प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए ताकि कदीमा प्राटी अपना काम जारी रख सके. इसराइली अख़बार हारेट्ज़ ने ख़बर छापी है कि एविगडोर यित्ज़ाकी ने यह भी कहा है कि अगर प्रधानमंत्री ओल्मर्ट इस्तीफ़ा नहीं देते हैं तो वह ख़ुद ही इस्तीफ़ा दे देंगे. बुधवार को कई अख़बारों में जनमत सर्वेक्षणों के नतीजे छपे हैं जिनमें इसराइलियों की भारी संख्या चाहती है कि प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट पद से हट जाएँ. बड़े पैमाने पर पढ़े जाने वाले अख़बार येडियट अहारोनोट के सर्वे के अनुसार क़रीब 65 प्रतिशत लोगों का कहना था कि ओल्मर्ट को प्रधानमंत्री पद छोड़ देना चाहिए जबकि सिर्फ़ दस प्रतिशत का ख़याल था कि उन्हें प्रधानमंत्री बने रहना चाहिए.\n\nSummary:", "target": "लेबनान युद्ध के मामले पर आई रिपोर्टों के बाद इसराइल के प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट के ख़िलाफ तेल अवीव में ज़बर्दस्त विरोध प्रदर्शन हुआ है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहज़ारों की संख्या में लोगो ने ओल्मर्ट के विरोध में नारे लगाए और उनके इस्तीफ़े की मांग की. लोगों के हाथों में बैनर थे जिसमें लिखा हुआ था कि ओल्मर्ट 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सुरक्षा विशेषज्ञ भी वहाँ इंतज़ामों का जायजा लेंगे और स्थिति पर नज़र रखेंगे. समाचार एजेंसी यूएनआई के अनुसार त्रिनिदाद और टोबेगो में भारतीय टीम के बेस कैंप की सुरक्षा के प्रभारी एनएसजी के कर्नल हरजीत सिंह पठानिया समन्वय के लिए पहुँच चुके हैं. कर्नल पठानिया के अनुसार, '' मैच शुरू होने से पहले एनसीजी की टीम स्टेडियमों का निरीक्षण करेगी.'' उन्होंने 'त्रिनिदाद एक्सप्रेस' को बताया कि आयोजन के दौरान कहीं कोई विस्फोटक मिलता है तो एनएसजी की टीम उसे दूर से ही निष्क्रिय करने में सक्षम है.\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट टीम को विश्व कप क्रिकेट के दौरान वेस्टइंडीज़ में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी कमांडो की सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत सरकार ने यह फ़ैसला कैरेबियाई द्वीपों में सुरक्षा इंतज़ामों को पर्याप्त न मानते हुए किया है. ऐसा पहली बार है जब देश से बाहर जाने पर भारतीय टीम को सुरक्षा के लिए एनएसजी कमांडो की सुविधा मुहैया कराई गई है. समाचार एजेंसियों के अनुसार वेस्टइंडीज़ के अधिकारियों ने राजनयिक माध्यम से भारत को 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जाएँगे. पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के एकमात्र हिंदू जज राणा भगवान दास से शाहज़ेब जिलानी ने इमरजेंसी लगाए जाने के बाद बातचीत की. पाकिस्तान में इमरजेंसी लगाने के फ़ैसले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? हमने तो पहले ही इसे सरासर ग़लत और ग़ैर क़ानूनी करार दिया था. हमारे सात जजों के बेंच ने शनिवार को ही ये कह दिया था कि अगर प्रोविज़नल कॉन्स्टीट्यूशनल ऑर्डर (पीसीओ) के तहत इमरजेंसी लगाई जाती है तो ग़लत होगा. हमने अपने फ़ैसले की कॉपी भी मीडिया को दे दी थी, उसके बाद हम घर आ गए. फिर जो हुआ वह हमने टीवी पर देखा. क्या सरकार ने आपको बताया है कि आपकी छुट्टी हो गई है? जी नहीं, सरकार से कोई संपर्क नहीं हुआ है. आपके घर पर सरकारी सुरक्षा मौजूद है या हटा ली गई है? वे अब भी मौजूद हैं. जहाँ तक आपको मालूम है, आप अभी तक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हैं? क़ानूनी और संवैधानिक तौर पर तो मेरा यही मानना है. आपको तो पता है कि देश में संविधान मुअत्तल है, पीसीओ के तहत देश चल रहा है. ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? ये तो आने वाला वक़्त बताएगा. आपकी इस मामले पर चीफ़ जस्टिस चौधरी से कोई मुलाक़ात या बात हुई है? हाँ, बस ख़ैर-ख़बर तक बात हुई है, फिलहाल सारे जज अपने-अपने घर पर हैं. क्या आपको अंदाज़ा था कि ऐसा कोई क़दम उठाया जा सकता है, इस तरह अचानक? नहीं, मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था, हमें नहीं लग रहा था कि इतनी जल्दी और इस तरह से यह ऑर्डर होगा. मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगाने के जो कारण बताए हैं उनमें से एक यह भी था कि न्यायपालिका अपनी हद से बाहर जाकर काम कर रही थी. नहीं, यह बिल्कुल ग़लत है, अदालतें अपने संवैधानिक दायरे के भीतर ही काम कर रही थीं. वो ये भी कह रहे हैं कि अदालत ने अपनी तरफ़ से 100 से ज्यादा मामलों में कार्रवाई की, इस तरह सरकार कैसे चल सकती थी? ये तो जनता बता सकती है कि फ़ैसले सही थे या ग़लत. जज के तो निर्णय ही बताते हैं कि वह सही था या ग़लत. जज ख़ुद नहीं बोलता, उसके ऑर्डर और जजमेंट बोलते हैं. लेकिन आपके ही कई साथी जजों ने सरकार का साथ दिया और नए पीसीओ के तहत शपथ भी ले ली है, उनके बारे में क्या कहेंगे? सबका अपना-अपना ख़याल है, अपने अपने विचार हैं और अपना अपना ज़मीर है, इस बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है. कल आप क्या करेंगे? कल हम चाहेंगे कि अदालत जाएँ. अगर आपको अदालत जाने से रोका गया तो? हम वापस आ जाएँगे, जज सड़क पर प्रदर्शन तो नहीं कर सकते. तो क्या आप ख़ामोश होकर बैठ जाएँगे. ये तो आने वाला वक़्त बताएगा. आपके इतने लंबे करियर का इस तरह अंत, आपका निजी अनुभव कैसा रहा है? मैंने अपनी क़ानूनी और संवैधानिक भूमिका बखूबी निभाई है, मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, कोई शर्मिंदगी नहीं है, जो लोग क़ानून और संविधान का सम्मान नहीं करते वे मौजूदा सूरतेहाल के लिए ज़िम्मेदार हैं.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस और देश के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रह चुके राणा भगवान दास पाकिस्तान के उन जजों में से हैं जिन्होंने इमरजेंसी को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइससे पहले पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने जब परवेज़ मुशर्रफ़ को राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की अनुमति दी थी तब भी राणा भगवान दास उन तीन जजों में से थे जो इस फ़ैसले से सहमत नहीं थे. वे उन जजों में से हैं जिन्होंने नई व्यवस्था के तहत शपथ नहीं ली है जिसका सीधा मतलब है कि इमरजेंसी के दौरान वे जज नहीं माने जाएँगे. पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के एकमात्र हिंदू जज राणा भगवान दास से शाहज़ेब जिलानी ने इमरजेंसी लगाए जाने के बाद बातचीत की. पाकिस्तान में इमरजेंसी लगाने के फ़ैसले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? हमने तो पहले ही इसे सरासर ग़लत और ग़ैर क़ानूनी करार दिया था. हमारे सात जजों के बेंच ने शनिवार को ही ये कह दिया था कि अगर प्रोविज़नल कॉन्स्टीट्यूशनल ऑर्डर (पीसीओ) के तहत इमरजेंसी लगाई जाती है तो ग़लत होगा. हमने अपने फ़ैसले की कॉपी भी मीडिया को दे दी थी, उसके बाद हम घर आ गए. फिर जो हुआ वह हमने टीवी पर देखा. क्या सरकार ने आपको बताया है कि आपकी छुट्टी हो गई है? जी नहीं, सरकार से कोई संपर्क नहीं हुआ है. आपके घर पर सरकारी सुरक्षा मौजूद है या हटा ली गई है? वे अब भी मौजूद हैं. जहाँ तक आपको मालूम है, आप अभी तक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हैं? क़ानूनी और संवैधानिक तौर पर तो मेरा यही मानना है. आपको तो पता है कि देश में संविधान मुअत्तल है, पीसीओ के तहत देश चल रहा है. ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? ये तो आने वाला वक़्त बताएगा. आपकी इस मामले पर चीफ़ जस्टिस चौधरी से कोई मुलाक़ात या बात हुई है? हाँ, बस ख़ैर-ख़बर तक बात हुई है, फिलहाल सारे जज अपने-अपने घर पर हैं. क्या आपको अंदाज़ा था कि ऐसा कोई क़दम उठाया जा सकता है, इस तरह अचानक? नहीं, मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था, हमें नहीं लग रहा था कि इतनी जल्दी और इस तरह से यह ऑर्डर होगा. मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगाने के जो कारण बताए हैं उनमें से एक यह भी था कि न्यायपालिका अपनी हद से बाहर जाकर काम कर रही थी. नहीं, यह बिल्कुल ग़लत है, अदालतें अपने संवैधानिक दायरे के भीतर ही काम कर रही थीं. वो ये भी कह रहे हैं कि अदालत ने अपनी तरफ़ से 100 से ज्यादा मामलों में कार्रवाई की, इस तरह सरकार कैसे चल सकती थी? ये तो जनता बता सकती है कि फ़ैसले सही थे या ग़लत. जज के तो निर्णय ही बताते हैं कि वह सही था या ग़लत. जज ख़ुद नहीं बोलता, उसके ऑर्डर और जजमेंट बोलते हैं. लेकिन आपके ही कई साथी जजों ने सरकार का साथ दिया और नए पीसीओ के तहत शपथ भी ले ली है, उनके बारे में क्या कहेंगे? सबका अपना-अपना ख़याल है, अपने अपने विचार हैं और अपना अपना ज़मीर है, इस बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है. कल आप क्या करेंगे? कल हम चाहेंगे कि अदालत जाएँ. अगर आपको अदालत जाने से रोका गया तो? हम वापस आ जाएँगे, जज सड़क पर प्रदर्शन तो नहीं कर सकते. तो क्या आप ख़ामोश होकर बैठ जाएँगे. ये तो आने वाला वक़्त बताएगा. आपके इतने लंबे करियर का इस तरह अंत, आपका निजी अनुभव कैसा रहा है? मैंने अपनी क़ानूनी और संवैधानिक भूमिका बखूबी निभाई है, मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, कोई शर्मिंदगी नहीं है, जो लोग क़ानून और संविधान का सम्मान नहीं करते वे मौजूदा सूरतेहाल के लिए ज़िम्मेदार हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 217, "source_item_id": "217", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2710, "clean_index": 197, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:197"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबंधक अब्दुल रहमान की माँ पॉल कासिग ने ट्वीटर पर आईएस प्रमुख अबु बकर अल बग़दादी के लिए पोस्ट लिखी है. कासिग ने पूछा है कि उनसे संपर्क कैसे किया जा सकता है. उन्होंने लिखा है, ''मैं एक बुज़ुर्ग महिला हूं और अब्दुल रहमान मेरा इकलौता बेटा है. मैं और मेरे पति जो कर रहे हैं, वह अपने दम पर कर रहे हैं.'' धर्म परिवर्तन अब्दुल रहमान ने स्पेशल इमरजेंसी रिस्पांस एंड असिसटेंस नाम का संगठन बनाया था पिछले हफ़्ते आईएस ने ब्रितानी नागरिक और सहायताकर्मी एलन हेनिंग का सिर कलम करने का वीडियो जारी किया था. इसमें कासिग के साथ भी ऐसा ही करने की धमकी दी गई थी. वीडियो आने के बाद ही उन्होंने यह पत्र लिखा है. अब्दुल रहमान इस्लाम स्वीकार करने से पहले पीटर कासिग के नाम से जाने जाते थे. पिछले साल सीरिया में उन्हें बंधक बना लिया गया था. उनकी माँ के ट्विटर पर यह कहने के बाद कि उनके परिवार को सरकार से कोई सहायता नहीं मिल रही है, जबकि अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ज़ेन पास्कि ने संवाददाताओं से कहा कि कासिग की सुरक्षित रिहाई के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है. उन्होंने कहा, ''पीटर को घर लाने के लिए हम अपने सभी सैन्य, खुफिया, क़ानून और राजनयिक क्षमताओं का उपयोग कर रहे हैं.'' पिछले हफ़्ते जारी एक वीडियो में कासिग की माँ ने आईएस चरमपंथियों से उनके बेटे को रिहा करने की अपील की थी. उन्होंने बताया कि उनके बेटे को पिछले साल उस समय बंधक बनाया गया, जब वो पश्चिम सीरिया में डेर एज्जूर जा रहे थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सीरिया में पिछले साल बंधक बनाए गए एक अमरीकी नागरिक अब्दुल रहमान कासिग की माँ ने इस्लामिक स्टेट (आईएस) के चरमपंथियों से उनके बेटे की सुरक्षित रिहाई की अपील की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबंधक अब्दुल रहमान की माँ पॉल कासिग ने ट्वीटर पर आईएस प्रमुख अबु बकर अल बग़दादी के लिए पोस्ट लिखी है. कासिग ने पूछा है कि उनसे संपर्क कैसे किया जा सकता है. उन्होंने लिखा है, ''मैं एक बुज़ुर्ग महिला हूं और अब्दुल रहमान मेरा इकलौता बेटा है. मैं और मेरे पति जो कर रहे हैं, वह अपने दम पर कर रहे हैं.'' धर्म परिवर्तन अब्दुल रहमान ने स्पेशल इमरजेंसी रिस्पांस एंड असिसटेंस नाम का संगठन बनाया था पिछले हफ़्ते आईएस ने ब्रितानी नागरिक और सहायताकर्मी एलन हेनिंग का सिर कलम करने का वीडियो जारी किया था. इसमें कासिग के साथ भी ऐसा ही करने की धमकी दी गई थी. वीडियो आने के बाद ही उन्होंने यह पत्र लिखा है. अब्दुल रहमान इस्लाम स्वीकार करने से पहले पीटर कासिग के नाम से जाने जाते थे. पिछले साल सीरिया में उन्हें बंधक बना लिया गया था. उनकी माँ के ट्विटर पर यह कहने के बाद कि उनके परिवार को सरकार से कोई सहायता नहीं मिल रही है, जबकि अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ज़ेन पास्कि ने संवाददाताओं से कहा कि कासिग की सुरक्षित रिहाई के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है. उन्होंने कहा, ''पीटर को घर लाने के लिए हम अपने सभी सैन्य, खुफिया, क़ानून और राजनयिक क्षमताओं का उपयोग कर रहे हैं.'' पिछले हफ़्ते जारी एक वीडियो में कासिग की माँ ने आईएस चरमपंथियों से उनके बेटे को रिहा करने की अपील की थी. उन्होंने बताया कि उनके बेटे को पिछले साल उस समय बंधक बनाया गया, जब वो पश्चिम सीरिया में डेर एज्जूर जा रहे थे. 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'इंडिया बिड टू वॉर्म अप टू ईरान, एज़ इट स्टेप्स आउट ऑफ कोल्ड'. इसमें बताया गया है कि ईरान से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के चार महीने बाद हो रहा मोदी का दौरा भारत के लिहाज से कितना अहम है. सीबीएसई के 12वीं कक्षा के नतीजे शनिवार को घोषित हुए थे. अधिकतर अखबारों ने इसे पहली खबर बनाया है. 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' ने अपनी लीड खबर में जानकारी दी है कि 90 हज़ार से ज्यादा छात्रों ने 90 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल किए हैं. समाप्त 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने जानकारी दी है कि दिल्ली की छात्रा सुकृति गुप्ता ने 99.4 फीसदी अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया है. भारत दौरे पर आए एप्पल के सीईओ टिम कुक ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. 'द हिंदू' ने इसे अपनी पहली खबर बनाया है. हिंदुस्तान टाइम्स ने भी इस खबर को पहले पन्ने पर जगह दी है और बताया है कि मोदी चाहते हैं कि एप्पल भारत में आई फोन बनाए. द इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेटसमैन ने पहले पन्ने पर मोदी और कुक की तस्वीर छापी है. आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि महाराष्ट्र के मंत्री एकनाथ खड़से दाऊद इब्राहिम के संपर्क में थे. 'द हिंदू' ने इस खबर को पहले पन्ने पर जगह दी है. हालाँकि कुछ मीडिया ख़बरों में एकनाथ खड़से के हवाले से इसका खंडन किया गया है. पांच विधानसभा चुनाव के नतीजों की समीक्षा भी जारी है. 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने लोकनीति और सीएसडीएस के विश्लेषण के हवाले से बताया कि पश्चिम बंगाल में वामदलों और कांग्रेस का गठजोड़ 'अरिथमेटिक' और 'केमिस्ट्री' के लिहाज से कमजोर था. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 25 वीं पुण्यतिथि पर शनिवार को आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विधानसभा चुनाव में हार से हताश पार्टी कार्यकर्ताओं को दिलासा दिया. 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने पहले पन्ने पर इस खबर को जगह दी है. इसमें सोनिया के हवाले से बताया गया है कि कोई भी नाकामी स्थाई नहीं होती है. 'द इंडियन एक्सप्रेस' के पहले पन्ने पर एक और खबर है जो ध्यान खींचती है. इसमें बताया गया है कि मानव संसाधन मंत्रालय सीबीएसई की तर्ज पर वैदिक एजुकेशन बोर्ड बनाने की तैयारी कर रहा है. दिल्ली में एक अफ्रीकी युवक की हत्या की खबर भी अखबारों के पहले पन्ने पर है. चैंपियन मुक्केबाज मेरी कॉम का ओलंपिक में हिस्सा लेने का सपना टूट गया. वो कज़ाख़स्तान में जारी विश्व महिला बॉक्सिंग चैम्पियनशिप के दूसरे दौर में जर्मनी की अज़ीज़ी निमानी से हार गईं. इस खबर को भी कई अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह मिली है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार से दो दिन के ईरान दौरे पर हैं. दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने मोदी के दौरे से जुड़ी खबर को प्रमुखता से जगह दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nखबर का हेडिंग दिया है. 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राज्य के कई ज़िलों में प्रदर्शकारियों ने कर्फ़्यू का उल्लंघन किया है. बारामूला और सोपोर में रात प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पे हुई है. अफ़ज़ल गुरू के गृहनगर सोपोर और बारामूला जैसे संवेदनशील इलाकों में पुलिस काफी सतर्कता बरत रही है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पूरी घाटी में अलग अलग जगहों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान 36 लोग घायल हुए हैं. इनमें कम से कम 23 पुलिसकर्मी शामिल है. सुरक्षा इंतजाम को लेकर कोर-कसर बाकी न रहे इसके लिए राज्य के सभी ज़िलों में बड़ी तादाद में पुलिस बल और केंद्रीय रिर्जव पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों को तैनात किया गया है. जिन जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों की मुठभेड़ हुई थीं उन जगहों पर अतिरिक्त पुलिस तैनाती की गई है. हड़ताल वहीं जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासिन मलिक अफज़ल गुरू का शव सौंपने की मांग पर 24 घंटे की भूख हड़ताल पर हैं. गौरतलब है कि अफज़ल गुरू का परिवार दिल्ली में मौजूद है. ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस एमके अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारुक़ ने अफ़जल को फाँसी दिए जाने पर जम्मू-कश्मीर में चार दिन के बंद का ऐलान किया है. राज्य के 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जस्टिस ने क्या कहा? चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. संवैधानिक पीठ ने माना कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और इसे लेकर लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी. आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मौत को आमंत्रित करना है. व्यक्तित्व को बदला नहीं जा सकता. यह खुद को परिभाषित करता है, यह व्यक्तित्व का गौरवशाली रूप है. शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या है. वास्तव में इसका मतलब था कि जो मायने रखता है वो महत्वपूर्ण गुण और मौलिक विशेषताएं हैं न कि किसी व्यक्ति को क्या कहा जाता है. नाम व्यक्ति की पहचान का एक सुविधाजनक तरीका हो सकता है लेकिन उसके गुण ही उसकी पहचान है. धारा 377 किस जज ने क्या कहा? जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि आज का फ़ैसला इस समुदाय को उनका हक देने के लिए एक छोटा सा कदम है. एलजीबीटी समुदाय के निजी जीवन में झांकने का अधिकार किसी को नहीं है. जस्टिस इंदु मल्होत्रा में कहा कि इस समुदाय के साथ पहले जो भेदभाव हुए हैं उसके लिए किसी को माफ़ नहीं किया जाएगा. जस्टिस नरीमन ने कहा ये कोई मानसिक बीमारी नहीं है. केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ठीक से समझाए ताकि एलजीबीटी समुदाय को कलंकित न समझा जाए. याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा? समलैंगिकों से जुड़े मिथक और उनके जवाब फ़ैसले का स्वागत करते हुए आईआईटी मुंबई के याचिकाकर्ता कृष्णा ने कहा, \"आईआईटी में दाखिला मिलने पर भी इतनी खुशी नहीं हुई थी, जितनी आज हो रही है. मैं इतना खुश हूं कि आंखों से आंसू रोके नहीं रुक रहे. फिलहाल ये नहीं पता कि इस फैसले से मेरे जीवन में क्या फ़र्क पड़ने वाला है, लेकिन इतना जरूर है कि अब बिना किसी डिप्रेशन, बिना किसी डर के हम भी जीवन जी सकेंगे.\" ललित ग्रुप ऑफ होटल के केशव सूरी ने फैसले का स्वागत करते हुए बीबीसी से बात की. उनके मुताबिक लड़ाई अभी बाकी है. आगे अपने अधिकारों की लड़ाई हमे लड़नी होगी. लेकिन इसे अपराध के दायरे से बाहर निकलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. सुप्रीम कोर्ट और समुदाय को हमसे माफी मांगने की जरूरत है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध माना गया था. आईपीसी 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"target": "देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की. धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी. 24 साल और कई अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अंतिम फ़ैसला दिया है. चीफ़ जस्टिस ने क्या कहा? चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. संवैधानिक पीठ ने माना कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और इसे लेकर लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी. आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मौत को आमंत्रित करना है. व्यक्तित्व को बदला नहीं जा सकता. यह खुद को परिभाषित करता है, यह व्यक्तित्व का गौरवशाली रूप है. शेक्सपियर ने कहा था 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Hindi.\n\nText:\nराज्यसभा सांसद स्मृति ईरानी को पहली बार मंत्री बनाया गया है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें एक बेहद अहम मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी है. वैसे 2004 में स्मृति ईरानी ने तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी की बहुत तीखी आलोचना की थी. उन्होंने गुजरात दंगों के लिए मोदी से इस्तीफ़े तक की मांग कर डाली थी और कहा था कि वह इसके लिए भूख हड़ताल करेंगी. हालांकि वह अनशन पर बैठी नहीं. उससे पहले ही उन्होंने एक बयान जारी कर कहा, “मैंने गुजरात के बारे में जो बयान दिया था, मैं उसे वापस लेती हूं, मुझे लगता है कि पार्टी की एक ज़िम्मेदार सदस्य होने के नाते मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था.” साल 2004 की खटास समय के साथ मिठास में बदली और एक दशक बाद साल 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान स्मृति ईरानी ज़ोर-शोर से नरेंद्र मोदी की बड़ाई करती दिखीं. अमेठी में अपनी चुनावी सभा में उन्होंने कहा, “गुजरात दंगों के बाद मैंने मोदी जी की आलोचना की, उसके बावजूद उन्होंने मुझे यहां से लड़ने के लिए टिकट दिया, ये उनका बड़प्पन दिखाता है.” हालांकि हाल में बीबीसी से हुई बातचीत में स्मृति ईरानी ने साफ़ कहा था कि उन पर मोदी की आलोचना करने के आरोप लगाना ग़लत है. बारहवीं पास मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर शिक्षा और शिक्षण संस्थानों से जुड़े कई नीतिगत फ़ैसले अब स्मृति ईरानी का कार्यक्षेत्र होंगे. चुनाव आयोग को जमा किए अपने नामांकन पत्र में स्मृति ईरानी ने लिखा है कि वह बारहवीं पास हैं और उसके बाद उन्होंने 'स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग' से कॉमर्स की एक साल की पढ़ाई पूरी की है. एनसीईआरटी के निदेशक रहे डॉक्टर जे एस राजपूत स्मृति की अधूरी पढ़ाई को बतौर मंत्री उनके काम में बाधा नहीं मानते. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “मंत्रालय तो विषयों की जानकारी रखने वाले कई एक्सपर्ट्स की मदद से चलता है, वह युवा हैं और इस वजह से वह स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों से ज़्यादा जुड़ पाएंगी और क्या मालूम ये उनके काम को आगे ले जाने में ज़्यादा मदद करे.” 1998 से 2004 के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय मुरली मनोहर जोशी के ज़िम्मे था. उस दौर में इतिहास की स्कूली किताबों में दिए गए तथ्यों में फेरबदल किया गया जिससे काफ़ी विवाद हुआ. उस दौर में इस नीति की आलोचना करने वाली इतिहासकार रोमिला थापर 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भूमिका में काम करने का मौक़ा मिला. स्मृति ईरानी अमेठी में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव हार गईं. राजनीति सीरियल की कामयाबी ने स्मृति को आम लोगों के बीच पहचान दी. समय के साथ उन्होंने अभिनय के अलावा लेखन में भी क़दम रखा और फिर कई टीवी धारावाहिकों में निर्माता की भूमिका निभाई. साल 2003 में स्मृति ईरानी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं और उसके अगले ही साल पार्टी ने उन्हें 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए दिल्ली की चांदनी चौक सीट से टिकट भी दिया. स्मृति ईरानी हार गईं और उसके बाद उन्होंने गुजरात दंगों के बाद पार्टी की छवि ख़राब होने का आरोप लगाते हुए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की. आज माहौल दूसरा है, और स्मृति ईरानी को नरेंद्र मोदी के ख़ास लोगों में से एक माना जाता है. इस दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला है और राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी की सांसद हैं. 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'जय हिंद' ओबामा के नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने ट्वीट किया है, “राष्ट्रपति ओबामा को भारत में गणतंत्र दिवस समारोह मनाने का गौरव मिला है. जय हिंद.” समाप्त अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसन राइस ने भी भारत दौरे में ओबामा के साथ आने पर अपने उत्साह का इज़हार किया है. प्रोटोकॉल को दरकिनार कर मोदी ने ख़ुद हवाई अड्डे पर ओबामा की अगवानी की और गर्मजोशी के साथ दोनों नेता एक दूसरे से गले मिले. अनूप एस नामक व्यक्ति ने ट्वीट किया है, “नमो ने ओबामा के स्वागत में प्रोटोकॉल तोड़ा. पर्सनल कैमेस्ट्री अपने चरम पर...अतिथि देवो भव!” राष्ट्रपति भवन में कमांडिंग ऑफ़िसर पूजा ठाकुर की गार्ड ऑफ़ ऑनर की अगुवाई पर भी कई ट्वीट हुए हैं. दिलचस्प ट्वीट सुपर्णा सिंह ने ट्वीट किया है, “ओबामा के गार्ड ऑफ़ ऑनर की अगुवाई कर आपने हम सभी को गौरवान्वित किया है.” ओबामा की यात्रा पर कई लोगों ने दिलचस्प ट्वीट भी किए हैं. एक व्यक्ति थॉमस जॉर्ज ने ट्वीट किया, “ओबामा का यात्रा में अपने साथ कार लाना ठीक वैसा ही है जैसा डिनर पार्टी में अपनी प्लेट लाना.” हिंदी फ़िल्म अभिनेता वीर दास का ट्वीट भी दिलचस्प है. उन्होंने लिखा, “डियर ओबामा, क्या आप मुंबई आ सकते हैं?....आप आते हो तो घर साफ़ हो जाता है.” बात अगर फ़ेसबुक की करें तो फ़ेसबुक पर भी 'ताजमहल' ट्रेंडिंग में है. ओबामा को पहले ताजमहल देखने जाना था, लेकिन बाद में उनका ये कार्यक्रम टल गया. यूट्यूब पर भी ओबामा की भारत यात्रा से जुड़े वीडियो टॉप ट्रेंड में हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तीन दिन की यात्रा पर भारत पहुँचे हैं. वे इस साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपहली बार कोई अमरीकी राष्ट्रपति भारत के गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनने जा रहा है. मीडिया के अलावा सोशल मीडिया पर भी ओबामा की यात्रा छाई हुई है. ट्वीटर पर हैश टैग#NamastePOTUS ट्रेंड कर रहा है. इसके अलावा, हैश टैग#ObamaInIndia,Welcome to India भी ट्वीटर पर ट्रेंड कर रहा है. 'जय हिंद' ओबामा के नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने ट्वीट किया है, “राष्ट्रपति ओबामा को भारत में गणतंत्र दिवस समारोह मनाने का गौरव मिला है. जय हिंद.” समाप्त अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसन राइस ने भी भारत दौरे में ओबामा के साथ आने पर अपने उत्साह का इज़हार किया है. प्रोटोकॉल को दरकिनार कर मोदी ने ख़ुद हवाई अड्डे पर ओबामा की अगवानी की और गर्मजोशी के साथ दोनों नेता एक दूसरे से गले मिले. अनूप एस नामक व्यक्ति ने ट्वीट किया है, “नमो ने ओबामा के स्वागत में प्रोटोकॉल तोड़ा. पर्सनल कैमेस्ट्री अपने चरम पर...अतिथि देवो भव!” राष्ट्रपति भवन में कमांडिंग ऑफ़िसर पूजा ठाकुर की गार्ड ऑफ़ ऑनर की अगुवाई पर भी कई ट्वीट हुए हैं. दिलचस्प ट्वीट सुपर्णा सिंह ने ट्वीट किया है, “ओबामा के गार्ड ऑफ़ ऑनर की अगुवाई कर आपने हम सभी को गौरवान्वित किया है.” ओबामा की यात्रा पर कई लोगों ने दिलचस्प ट्वीट भी किए हैं. एक व्यक्ति थॉमस जॉर्ज ने ट्वीट किया, “ओबामा का यात्रा में अपने साथ कार लाना ठीक वैसा ही है जैसा डिनर पार्टी में अपनी प्लेट लाना.” हिंदी फ़िल्म अभिनेता वीर दास का ट्वीट भी दिलचस्प है. उन्होंने लिखा, “डियर ओबामा, क्या आप मुंबई आ सकते हैं?....आप आते हो तो घर साफ़ हो जाता है.” बात अगर फ़ेसबुक की करें तो फ़ेसबुक पर भी 'ताजमहल' ट्रेंडिंग में है. ओबामा को पहले ताजमहल देखने जाना था, लेकिन बाद में उनका ये कार्यक्रम टल गया. यूट्यूब पर भी ओबामा की भारत यात्रा से जुड़े वीडियो टॉप ट्रेंड में हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 224, "source_item_id": "224", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1661, "clean_index": 204, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:204"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवैसे तो बनारस के संकट मोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर पर पिछले 90 से भी अधिक वर्षों से संगीत समारोह का आयोजन किया जाता रहा है और देश-दुनिया के नामचीन कलाकारों ने हाज़िरी लगाई है. लेकिन ये पहला मौक़ा था जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के बनारस में पाकिस्तान के किसी फनकार ने अपने सुरों से समां बांधा था. साध हुई पूरी पाकिस्तान के जाने माने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली की आवाज़ के जादू से बनारस अनजान नहीं, लेकिन, उन्हें रुबरु देखने और सुनने की साध इस शहर ने बरसों से छुपाई हुई थी. और जब ये आवाज़ बनारस के संकट मोचन मंदिर में गूंजी तो सुनने वाले वाह-वाह करते नहीं थक रहे थे. समाप्त कभी ठुमरी... कभी गज़ल... ऐसा लगा मानो ग़ुलाम अली सुरों का ख़ज़ाना बनारस के नाम करने आए हों. पत्रकारों के राजनीतिक सवालों से तो ग़ुलाम अली बचते रहे, लेकिन इस ख़ास मौके पर उन्होंने संगीत में रुझान रखने वाली नई पीढ़ी को कुछ टिप्स ज़रूर दिए. ग़ुलाम अली का कहना था, \"पहले उर्दू सीखनी चाहिए, फिर क्लासिकल सीखना चाहिए. फिर जो ग़ज़ल जानता हो उससे तालीम लेनी चाहिए.\" हनुमान के दरबार में सब एक संकट मोचन मंदिर के महंत वीएन मिश्रा संकट मोचन मंदिर के महंत वीएन मिश्रा ने कहा कि इस संगीत समारोह की ख़ास बात ये है कि समाज की ऊंच-नीच, भेद-भाव और जाति-धर्म भुलाकर भगवान हनुमान के दरबार में सभी एक हो जाते हैं. महंत वीएन मिश्रा के अनुसार इस समारोह में फ़नकार और श्रोता के बीच की दूरी न के बराबर ही रहती है. इस यादगार लम्हे का गवाह बनने स्थानीय के अलावा दूर-दराज़ से लोग खिंचे चले आए और सारी रात हज़ारों की संख्या में इस मौक़े का लुत्फ़ उठाया. इस समारोह में शामिल होने के लिए ख़ास दिल्ली से बनारस जाने वाली एक श्रोता संजिनी ने बीबीसी से अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए कहा, \"ये अवसर बड़ी मुश्किल से मिलता है कि संकट मोचन में हम उनको सुन पाए. एक बहुत ही अलग माहौल है. हम बहुत भाग्यशाली हैं कि उनको लाइव सुन पा रहे हैं.\" बनारस को बनाया मुरीद एक और श्रोता विशाल ने कहा, \"बहुत अच्छा लगा रहा है और आप देख सकते हैं कि कितने उनके चाहने वाले हैं. वो शायद पहली बार बनारस आए हैं हम उन्हें पहली बार सुन रहे हैं.\" ऐसा लग रहा था कि ग़ुलाम अली के सुरों ने सरहद और मज़हब की हर दीवार को ख़त्म कर दिया है और इस ख़ास शाम को पूरा बनारस उनकी जादुई आवाज़ का मुरीद हो गया हो. (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान से आए ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली ने जैसे ही बनारस के संकट मोचन मंदिर में 'गोरी तोरे नैना' ठुमरी गाना शुरू किया वहां बैठे लोगों की ख़ुशियों को ठिकाना नहीं रहा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवैसे तो बनारस के संकट मोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर पर पिछले 90 से भी अधिक वर्षों से संगीत समारोह का आयोजन किया जाता रहा है और देश-दुनिया के नामचीन कलाकारों ने हाज़िरी लगाई है. लेकिन ये पहला मौक़ा था जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के बनारस में पाकिस्तान के किसी फनकार ने अपने सुरों से समां बांधा था. साध हुई पूरी पाकिस्तान के जाने माने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली की आवाज़ के जादू से बनारस अनजान नहीं, लेकिन, उन्हें रुबरु देखने और सुनने की साध इस शहर ने बरसों से छुपाई हुई थी. और जब ये आवाज़ बनारस के संकट मोचन मंदिर में गूंजी तो सुनने वाले वाह-वाह करते नहीं थक रहे थे. समाप्त कभी ठुमरी... कभी गज़ल... ऐसा लगा मानो ग़ुलाम अली सुरों का ख़ज़ाना बनारस के नाम करने आए हों. पत्रकारों के राजनीतिक सवालों से तो ग़ुलाम अली बचते रहे, लेकिन इस ख़ास मौके पर उन्होंने संगीत में रुझान रखने वाली नई पीढ़ी को कुछ टिप्स ज़रूर दिए. ग़ुलाम अली का कहना था, \"पहले उर्दू सीखनी चाहिए, फिर क्लासिकल सीखना चाहिए. फिर जो ग़ज़ल जानता हो उससे तालीम लेनी चाहिए.\" हनुमान के दरबार में सब एक संकट मोचन मंदिर के महंत वीएन मिश्रा संकट मोचन मंदिर के महंत वीएन मिश्रा ने कहा कि इस संगीत समारोह की ख़ास बात ये है कि समाज की ऊंच-नीच, भेद-भाव और जाति-धर्म भुलाकर भगवान हनुमान के दरबार में सभी एक हो जाते हैं. महंत वीएन मिश्रा के अनुसार इस समारोह में फ़नकार और श्रोता के बीच की दूरी न के बराबर ही रहती है. इस यादगार लम्हे का गवाह बनने स्थानीय के अलावा दूर-दराज़ से लोग खिंचे चले आए और सारी रात हज़ारों की संख्या में इस मौक़े का लुत्फ़ उठाया. इस समारोह में शामिल होने के लिए ख़ास दिल्ली से बनारस जाने वाली एक श्रोता संजिनी ने बीबीसी से अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए कहा, \"ये अवसर बड़ी मुश्किल से मिलता है कि संकट मोचन में हम उनको सुन पाए. एक बहुत ही अलग माहौल है. हम बहुत भाग्यशाली हैं कि उनको लाइव सुन पा रहे हैं.\" बनारस को बनाया मुरीद एक और श्रोता विशाल ने कहा, \"बहुत अच्छा लगा रहा है और आप देख सकते हैं कि कितने उनके चाहने वाले हैं. वो शायद पहली बार बनारस आए हैं हम उन्हें पहली बार सुन रहे हैं.\" ऐसा लग रहा था कि ग़ुलाम अली के सुरों ने सरहद और मज़हब की हर दीवार को ख़त्म कर दिया है और इस ख़ास शाम को पूरा बनारस उनकी जादुई आवाज़ का मुरीद हो गया हो. 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पाटिल ने मृतकों की संख्या 37 बताई. हालांकि महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक पीएस पसरीचा ने शनिवार को बताया कि मृतकों की संख्या 32 है. गृह राज्यमंत्री ने घटना की निंदा करते हुए कहा, \"यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है और हम समझते हैं कि महाराष्ट्र की राज्य सरकार इस तरह की घटनाओं से निपटने में पूरी तरह से सक्षम है.\" उन्होंने कहा कि वो उम्मीद करते हैं कि इस तरह की घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार वो सभी ज़रूरी क़दम उठाएगी जो उसे उठाने चाहिए. अंदेशा? गृह राज्यमंत्री से पूछा गया कि क्या मालेगांव की घटना उसी अंदेशे के तौर पर देखी जा सकती है जिसमें प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पहले कहा था कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा ख़तरे में हैं और आशंका जताई थी कि धार्मिक और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर चरमपंथियों के हमले हो सकते हैं. इसके जवाब में गृह राज्यमंत्री ने कहा, \"इसे उसी अंदेशे से जोड़कर देखा जाए या न देखा जाए पर जिस तरह की सूचना हमारे पास थी, उन्हीं सूचनाओं के आधार पर हमने राज्य सरकार को आगाह किया था.\" उन्होंने कहा, \"ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारें आगाह नहीं थीं. बहुत से कार्यक्रमों को 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मुझे बहुत खुशी है कि आप इस बात से सहमत हैं कि दो पुरुष एक-दूसरे से मोहब्बत कर सकते हैं.'' सोफिया ने आगे लिखा है, ''मेरे दो-दो पापा हैं और वो एक-दूसरे से मोहब्बत करते हैं. लेकिन स्कूल में पढ़ने वाले और बच्चे इसे ठीक नहीं मानते जिससे मेरी भावनाओं को ठेस पहुंचती है.'' सोफिया ने लिखा है, ''मैं आपको खत लिख रही हूं क्योंकि आप मेरे हीरो हो. यदि आप मेरी जगह होते और आपके दो-दो पापा होते और स्कूल में बच्चे आपको चिढ़ाते तो आप क्या करते?'' सोफिया ने ओबामा से आग्रह किया था कि वे उसके खत का जवाब दें और उम्मीद जताई थी कि वे दोबारा अमरीका के राष्ट्रपति बनेंगे. ओबामा का जवाब हफिंगटन पोस्ट के मुताबिक, ओबामा ने अपने जवाब में कहा कि सोफिया, विचारों से परिपूर्ण ऐसा पत्र भेजने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. पत्र में ओबामा कहते हैं- इस पत्र को पढ़कर मुझे तुम्हारा राष्ट्रपति होने पर गर्व है, मैं तुम्हारे और हमारे देश के भविष्य के प्रति पहले से ज्यादा आशावान हो गया हूं. सोफिया के नाम ओबामा के खत में लिखा है, ''अमरीका में कोई भी दो परिवार एक जैसे नहीं दिखते. यही हमारी विविधता है. तुम्हारे चाहे दो पिता हो या एक मां, 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प्रधानमंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता की सलाह से किया जाएगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "लोकसभा ने न्यायिक नियुक्ति विधेयक को दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने ऐलान किया कि विधेयक के पक्ष में 300 से अधिक मत पड़े हैं, जबकि विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा. उन्होंने कहा कि विधेयक ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत से पास हो गया है. हाल के दिनों में न्यायपालिका में उठे भ्रष्टाचार के मुद्दे और नियुक्ति को लेकर पुरानी कॉलेजियम सिस्टम में खामियों के आरोप के बाद इस विधेयक पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं. इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रस्ताव है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो अन्य वरिष्ठ जज, दो जानी मानी हस्तियां और केंद्रीय क़ानून मंत्री शामिल होंगे. आयोग की संरचना को संवैधानिक दर्जा हासिल होगा. आयोग का नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे. जबकि जानी मानी हस्तियों का चयन न्यायपालिका, प्रधानमंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता की सलाह से किया जाएगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 229, "source_item_id": "229", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 911, "clean_index": 209, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:209"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस ने कथित तौर पर विरोधी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार बताया है. पिछले महीने शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों में अब तक 70 लोगों की जान जा चुकी है. पिछले साल हुए विवादित चुनावों की पहली वर्षगांठ पर विरोधी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जनवरी में आम हड़ताल का आह्वान किया था. बीएनपी ने धांधली का आरोप लगाते हुए इस चुनाव का बहिष्कार कर दिया था और पार्टी प्रधानमंत्री शेख़ हसीना पर इस्तीफ़ा देने और नए सिरे चुनाव कराने का दबाव बना रही है. समाप्त प्रदर्शन पुलिस के मुताबिक़, शुक्रवार को गाईबांधा से ढाका जा रही यात्रियों से भरी बस पर हुए पेट्रोल बम हमले में छह लोग मारे गए. जबकि शनिवार को दक्षिणी ज़िला बरीसाल में एक ट्रक पर हुए हमले में तीन लोग मारे गए. पिछले हफ़्ते पुलिस ने बीएनपी की नेता ख़ालिदा ज़िया पर आगज़नी भड़काने और एक अन्य बस पर हुए हमले में मरने वाले सात लोगों की मौत के आरोप लगाए हैं. हालांकि ख़ालिदा ज़िया ने इन आरोपों से इनकार किया और हिंसा की निंदा की है. प्रदर्शन शुरू होने के बाद विपक्षी पार्टी के क़रीब 7000 समर्थकों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बांग्लादेश में बस और ट्रक पर पेट्रोल बम से हुए हमले में नौ लोग मारे गए जबकि 30 अन्य घायल हो गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस ने कथित तौर पर विरोधी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार बताया है. पिछले महीने शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों में अब तक 70 लोगों की जान जा चुकी है. पिछले साल हुए विवादित चुनावों की पहली वर्षगांठ पर विरोधी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जनवरी में आम हड़ताल का आह्वान किया था. बीएनपी ने धांधली का आरोप लगाते हुए इस चुनाव का बहिष्कार कर दिया था और पार्टी प्रधानमंत्री शेख़ हसीना पर इस्तीफ़ा देने और नए सिरे चुनाव कराने का दबाव बना रही है. समाप्त प्रदर्शन पुलिस के मुताबिक़, शुक्रवार को गाईबांधा से ढाका जा रही यात्रियों से भरी बस पर हुए पेट्रोल बम हमले में छह लोग मारे गए. जबकि शनिवार को दक्षिणी ज़िला बरीसाल में एक ट्रक पर हुए हमले में तीन लोग मारे गए. पिछले हफ़्ते पुलिस ने बीएनपी की नेता ख़ालिदा ज़िया पर आगज़नी भड़काने और एक अन्य बस पर हुए हमले में मरने वाले सात लोगों की मौत के आरोप लगाए हैं. हालांकि ख़ालिदा ज़िया ने इन आरोपों से इनकार किया और हिंसा की निंदा की है. प्रदर्शन शुरू होने के बाद विपक्षी पार्टी के क़रीब 7000 समर्थकों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इकोनॉमिक टाइम्स में ख़बर है कि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में पेश हलफ़नामे में कहा है कि बिहार के मुज़फ़्फरपुर बालिक आश्रय गृह मामले के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर और उसके साथियों ने 11 लड़कियों की हत्या की थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकेंद्रीय जांच एजेंसी ने इस मामले में पीड़ित कई लड़कियों के बयान रिकॉर्ड किए हैं और उसका कहना है कि इन 11 लड़कियों के नाम भी इसी बातचीत के ज़रिए सामने आए. सीबीआई ने अपने हलफ़नामे में कहा है, \"जांच के दौरान जांच अधिकारियों और निमहंस (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरो-साइंसेज़) की टीम की पूछताछ में पीड़ित लड़कियों ने उन 11 लड़कियों ने नाम लिए जिनका हत्या कथित तौर पर ब्रजेश ठाकुर और उसके साथियों ने की थी.\" सीबीआई ने कोर्ट को ये भी बताया कि उसकी टीम को इस मामले की जांच के दौरान हड्डियों का एक बंडल मिला है. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में एक एनजीओ द्वारा चलाए जा रहे बालिका आश्रय गृह में कई लड़कियों के यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले सामने आए थे. ये मामला टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ (TISS) की एक रिपोर्ट के बाद प्रकाश में आया था. इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई है और सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में ब्रजेश ठाकुर समेत 21 अन्य के नाम शामिल किए हैं. ये भी पढ़ें: हाथों में हथकड़ी, चेहरे पर हँसी, इतनी हिम्मत आती कहाँ से है? मसूदकी संपत्तियां ज़ब्त करेगा पाकिस्तान जनसत्ता में ख़बर है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद पाकिस्तान ने उनकी संपत्ति ज़ब्त करने और यात्रा पर प्रतिबंध लगाने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है. मसूद अज़हर के हथियार खरीदने और बेचने पर भी पाबंदी है. पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद फ़ैसल ने कहा है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय का पूरा सहयोग करेगा और अज़हर पर लागू प्रतिबन्धों को तत्काल प्रभाव से लागू करेगा. पाकिस्तान गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि मसूद अज़हर पहले से ही आतंक रोधी क़ानून की चौथी अनुसूची में हैं इसलिए वो पुलिस की अनुमति के बिना कहीं यात्रा नहीं कर सकेंगे. ये भी पढ़ें: क्या कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री हो सकता है? सांकेतिक तस्वीर बुरहान गुट के आख़िरी सदस्य की मौत इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर ख़बर है कि हिज़्बुल मुजाहिदीन के लतीफ़ अहमद डार उर्फ़ टाइगर शोपियां में हुए एक एनकाउंटर में भारतीय सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए हैं. वो हिज़्बुल के पूर्व कमांडर बुरहान वानी के गुट के आख़िरी सदस्य थे. अहमद डार साल 2015 में बुरहान वानी के साथ एक ग्रुप फ़ोटो में भी नज़र आए थे. पुलिस ने बताया कि दक्षिण कश्मीर के शोपियां में हुए इस एनकाउंटर में एक जवान भी घायल हुआ है और उनका इलाज चल रहा है. जम्मू-कश्मीर के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस गोलीबारी में 40 नागरिक भी घायल हुए हैं. मिली जानकारी के मुताबिक़ एक शख़्स को गोली लगी है और सात पेलेट गन का शिकार हुए हैं. उन्हें इलाज के लिए श्रीनगर ले जाया गया है. ये भी पढ़ें: मोदी के इस इंटरव्यू को गै़र सियासी मान लेता अगर... चुनाव के ऐलान के बाद से पीएम ने कीं 100 से ज़्यादा रैलियां टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 10 मार्च को लोकसभा चुनाव की तारीख़ों के ऐलान के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक 100 से ज़्यादा चुनावी रैलियां कर चुके हैं. अख़बार लिखता है कि पिछले 125 दिनों में पीएम मोदी ने 100 से ज़्यादा चुनावी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है. 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'आतंकवादी नही' जब अमरीकी अधिकारी आफ़िया को गिरफ़्तार करने गए तब उन्होंने उन पर दो गोलियाँ चलाईं. उनकी चलाई गोली तो किसी को नहीं लगी लेकिन जवाब में अमरीकी अधिकारी की गोली आफ़िया की छाती में लगी. अधिकारियों के हवाले से ये कहा गया है कि जब आफ़िया को गिरफ़्तार किया गया तब उनके पास से ऐसे दस्तावेज़ मिले जिनमें विस्फोटक बनाने की जानकारी और प्रमुख अमरीकी इमारतों की जानकारी इत्यादि थी. आफ़िया सिद्दीक़ी पर अमरीकी अधिकारियों और कर्मचारियों पर हमला करने और जान से मार देने की कोशिश करने के आरोप हैं और यदि उन्हें दोषी पाया जाता है तो उन्हें 20 साल तक की जेल हो सकती है. लेकिन आफ़िया की वकील ने उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों को 'एक कहानी' बताया है. वकील एलेन विट्फ़ील्ड का कहना था, \"मुझे लगता है कि आफ़िया अमरीकी अधिकारियों के लिए बहुत शर्मिंदगी का कारण बन गई है. लेकिन वो कोई आतंकवादी नहीं है. जब सच सार्वजनिक होगा, जनता को समझ में आ जाएगा कि उसने कुछ भी ग़लत नहीं किया.\" अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि आफ़िया ने 9/11 को हुए हमले का षडयंत्र रचने वाले ख़ालिद शेख़ मोहम्मद के भतीजे से शादी की है.\n\nSummary:", "target": "अल क़ायदा संगठन से जुड़े होने के शक पर गिरफ़्तार की गई पाकिस्तानी महिला आफ़िया सिद्दीक़ी को न्यूयॉर्क की अदालत में पेश किया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्हें अफ़ग़ानिस्तान में गिरफ़्तार करके अमरीका भेजा गया है. उन पर अमरीकी सैनिकों को जान से मारने की कोशिश करने के आरोप हैं. पहले अमरीका की नागरिक रहीं 36 वर्षीय आफ़िया सिद्दीक़ी के बारे में अदालत में बताया गया कि उन्हें 17 जुलाई को अफ़ग़ानिस्तान के ग़ाज़ी प्रांत से गिरफ़्तार किया गया. वो जाने-माने अमरीकी संस्थान 'मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेकनॉलॉजी' (एमआईटी) की छात्रा रह चुकी हैं. वर्ष 2004 में अमरीकी गुप्तचर एजेंसी एफ़बीआई ने उनका नाम लिया था और मंशा ज़ाहिर की थी कि अल क़ायदा के साथ संबंध होने के शक के कारण वे आफ़िया से पूछताछ करना चाहते हैं. बताया गया है कि वे पिछले पाँच साल से लापता थीं. ख़बरों में बताया गया है कि वर्ष 2003 में अपने तीन बच्चों के साथ कराची में अपने माता-पिता से मिलने गईं आफ़िया ग़ायब हो गई थीं. आफ़िया का परिवार और मानवाधिकार गुट ये मानते हैं कि उन्हें अमरीकी अधिकारियों ने गुप्त तौर पर किसी अज्ञात स्थान पर क़ैद कर रखा था. 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खाना बनाने की भी ट्रेनिंग दें. •बच्चों के साथ पड़ोसियों के घर जाने, अपने ऑफिस ले जाने तक की सलाह दी गई है. •टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रोनिक आइटम से बच्चों को दूर रखें. स्कूल द्वारा जारी किए गए इस सर्कुलर पर बीबीसी ने स्कूल प्रबंधन से बात की. स्कूल के अकेडमिक इंचार्ज डॉ थिरुसेलवी एडविल ने माना कि स्कूल ने वाकई में ऐसा सर्कुलर निकाला है. इसके पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, \"इन दिनों पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है. माता पिता ऑफिस में और बच्चे दिन भर मोबाइल में बिजी रहते है. इसलिए हमने इस बार पेरेंट्स से गुजारिश कि है कि बच्चों के साथ ज़्यादा वक्त गुज़ारे.\" उनके मुताबिक पेरेंट्स 'वीकऐंड पेरेन्ट' बनते जा रहे हैं. केवल सप्ताह के अंत में बच्चों से बातचीत करते हैं. इसलिए हमने काम का तरीका थोड़ा बदलने की सोची. उसी क्रम में ये सर्कुलर जारी किया गया है. लेकिन क्या स्कूल ने अभिभावकों के आलावा बच्चों को भी होमवर्क दिया है? इस सवाल के जवाब में डॉ थिरुसेलवी कहती हैं, \"इसकी ज़रुरत नहीं है. हमारी कोशिश है कि बच्चे किताबों से परे सोशल होना सीखें.\" डॉ थिरुसेलवी खुद एक टीचर है और पेरेंट भी. उनके मुताबिक स्कूल में केवल पढ़ाई की बात होती है तो पेरेंट भी किताबी पढ़ाई के लिए ही घर में बच्चों पर दवाब डालते हैं. अगर स्कूल बच्चों को पढ़ाई से अलग करने की पहल करेगा तो स्वाभाविक है कि पेरेंट्स भी ऐसा करेंगे. दक्षिण भारत के इस स्कूल की पहल पर मुंबई में बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था एपीस्टोर.कॉम से बात की. एपीस्टोर से जुड़ी पूर्णिमा झा ने हमे बताया कि आज पढ़ाई से ज़्यादा ज़रुरी है बच्चों को सोशल स्किल सिखाना. अन्नाई वायलेट मेट्रीकूलेशन स्कूल के सर्कुलर का उदाहरण देते हुए पूर्णिमा ने कहा, \"पहले के ज़माने में साथ खाना खाते वक्त कोई पहले उठ जाता था, तो उसे तमीज़दार नहीं मानते थे.\" लेकिन उसके पीछे भी यही सोच हुआ करती थी. ये सोच ये थी कि पूरा परिवार एक साथ खाना खाने बैठे और उठे. खाना खाने का वक्त वो वक्त होता था जब परिवार एक साथ होता था. लेकिन भाग दोड़ भरी ज़िंदगी में ये वक्त हमें अब नहीं मिलता. उसी को अब सहेजने की ज़रुरत है. वो आगे कहतीं हैं, \" छह से दस साल की उम्र के बच्चों में डेवलेपमेंट और लर्निंग दोनों को साथ साथ में चलना चाहिए.\" आजकल मां बाप बच्चों को छुट्टियों में समर कैंप भेज देते हैं और सोचते हैं बिजी रखने का यही सबसे बेहतर तरीका है. लेकिन ऐसा नहीं है. पूर्णिमा बताती है कि आजकल बच्चों में आबर्जवेशन स्किल, इमोशनल इंटेलिजेंशन सब कम होते जा रहे हैं. ये केवल नए अग्रेज़ी के टर्म नहीं है. इस पर बच्चों के साथ पेरेंट्स को वाकइ में काम करने की ज़रुरत है. वो आगे बताती है, \"हमने भी इसलिए ऑन लाइन समर कैंप की शुरूआत की है. इस समर कैंम्प में 30 दिन में माता पिता को बच्चों के हर दिन नया काम करना है. दोनों एक दूसरे को बेहतर समझ सके\" रोज़ाना जो हम सुनते हैं कि बच्चे ने क्लास में दूसरे बच्चे को मार डाला, मां पर बच्चे ने हाथ उठाया. पूर्णिमा का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि बच्चों में 'एम्पेथी' यानी सहानुभूति की कमी है. पेरेंट्स के लिए जो होमवर्क दिया गया है, ये एक सराहनीय प्रयास है सोशल स्किल बढ़ाने में. दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद में रहने वाली अमृता को भी लगता है कि ये एक अच्छा प्रयास है. वो कहती हैं, ये होमवर्क कम से कम उन बेतुके होमवर्क से तो अच्छा है जिसमें बच्चे सारा काम माता-पिता से कराते हैं. इससे बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का वक्त मिलता है. ये भी पढ़ें: कोई बेटा माँ का और भाई बहन का रेप क्यों करता है? कपिल शर्मा: आसमान से ज़मीन तक का सफ़र (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "स्कूल में बच्चों के लिए गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने वाली है. इन छुट्टियों में बच्चों के लिए होमवर्क आम बात है. अक्सर जो होमवर्क स्कूलों में दिए जाते है वो बच्चों के लिए कम और अभिभावकों के लिए ज़्यादा होते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन इन दिनों सोशल मीडिया में एक स्कूल द्वारा पेरेंट्स को दिए गए होमवर्क का सर्कुलर वायरल हो रहा है. ये होमवर्क तमिलनाडु के अन्नाई वायलेट मेट्रीकुलेशन एंड हायर सेकेंड्री स्कूल ने अपने यहां पढ़ने वाले पहली से पांचवी क्लास के छात्रों के माता-पिता के लिए जारी किया है. इस सर्कुलर में अभिभावकों के लिए 17 प्वाइंट का काम दिया गया है, जैसे •पेरेंट्स को दिन में दो वक्त का खाना बच्चों के साथ खाना चाहिए. •खाने के बाद अपना बरतन खुद धोना बच्चों को सीखाएं. •छुट्टियों के दौरान पेरेंट्स बच्चों को खाना बनाने की भी ट्रेनिंग दें. •बच्चों के साथ पड़ोसियों के घर जाने, अपने ऑफिस ले जाने तक की सलाह दी गई है. •टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रोनिक आइटम से बच्चों को दूर रखें. स्कूल द्वारा जारी किए गए इस सर्कुलर पर बीबीसी ने स्कूल प्रबंधन से बात की. स्कूल के अकेडमिक इंचार्ज डॉ थिरुसेलवी एडविल ने माना कि स्कूल ने वाकई में ऐसा सर्कुलर निकाला है. इसके पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, \"इन दिनों पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है. माता पिता ऑफिस में और बच्चे दिन भर मोबाइल में बिजी रहते है. इसलिए हमने इस बार पेरेंट्स से गुजारिश कि है कि बच्चों के साथ ज़्यादा वक्त गुज़ारे.\" उनके मुताबिक पेरेंट्स 'वीकऐंड पेरेन्ट' बनते जा रहे हैं. केवल सप्ताह के अंत में बच्चों से बातचीत करते हैं. इसलिए हमने काम का तरीका थोड़ा बदलने की सोची. उसी क्रम में ये सर्कुलर जारी किया गया है. लेकिन क्या स्कूल ने अभिभावकों के आलावा बच्चों को भी होमवर्क दिया है? इस सवाल के जवाब में डॉ थिरुसेलवी कहती हैं, \"इसकी ज़रुरत नहीं है. हमारी कोशिश है कि बच्चे किताबों से परे सोशल होना सीखें.\" डॉ थिरुसेलवी खुद एक टीचर है और पेरेंट भी. उनके मुताबिक स्कूल में केवल पढ़ाई की बात होती है तो पेरेंट भी किताबी पढ़ाई के लिए ही घर में बच्चों पर दवाब डालते हैं. अगर स्कूल बच्चों को पढ़ाई से अलग करने की पहल करेगा तो स्वाभाविक है कि पेरेंट्स भी ऐसा करेंगे. दक्षिण भारत के इस स्कूल की पहल पर मुंबई में बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था एपीस्टोर.कॉम से बात की. एपीस्टोर से जुड़ी पूर्णिमा झा ने हमे बताया कि आज पढ़ाई से ज़्यादा ज़रुरी है बच्चों को सोशल स्किल सिखाना. अन्नाई वायलेट मेट्रीकूलेशन स्कूल के सर्कुलर का उदाहरण देते हुए पूर्णिमा ने कहा, \"पहले के ज़माने में साथ खाना खाते वक्त कोई पहले उठ जाता था, तो उसे तमीज़दार नहीं मानते थे.\" लेकिन उसके पीछे भी यही सोच हुआ करती थी. ये सोच ये थी कि पूरा परिवार एक साथ खाना खाने बैठे और उठे. खाना खाने का वक्त वो वक्त होता था जब परिवार एक साथ होता था. लेकिन भाग दोड़ भरी ज़िंदगी में ये वक्त हमें अब नहीं मिलता. उसी को अब सहेजने की ज़रुरत है. वो आगे कहतीं हैं, \" छह से दस साल की उम्र के बच्चों में डेवलेपमेंट और लर्निंग दोनों को साथ साथ 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महिला मित्र अनुष्का शर्मा भी काफ़ी चर्चा में रहीं. ऑस्ट्रेलिया से लौटते वक्त विराट अनुष्का शर्मा का हाथ थामकर एयरपोर्ट से बाहर निकलते देखे गए. समाप्त रविंद्र जडेजा को टीम के कुछ खिलाड़ियों ने सर जडेजा कहकर ट्वीट किए थे. भारतीय ऑल राउंडर रविंद्र जडेजा भी अब तक कुंवारे हैं. 26 वर्षीय जडेजा के लिए ये विश्व कप कुछ ख़ास नहीं रहा. जडेजा अपनी स्टाइल के लिए मीडिया में कई बार चर्चा में आ चुके हैं. यहाँ तक कि भारतीय टीम के कुछ खिलाड़ी भी सोशल मीडिया पर उन्हें सर जडेजा कहकर चुटकी लेते देखे गए हैं. अक्षर पटेल को विश्व कप में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिला था. गुजरात के आनंद के रहने वाले 21 वर्षीय अक्षर पटेल विश्व कप के भारतीय दल के सबसे युवा सदस्य थे. हालांकि बाएँ हाथ के इस बल्लेबाज को विश्व कप में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिल पाया. साल 2012-13 में पटेल को बीसीसीआई ने 19 साल से कम उम्र के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी का ख़िताब दिया था. भुवनेश्वर कुमार को विश्व कप में बस एक मैच खेलने का मौका मिला था. 25 वर्षीय तेज़ गेंदबाज़ भुवनेश्वर कुमार भी अब तक कुंवारे हैं. कुमार विश्व कप खेलने गए भारतीय दल में 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी सुरेश रैना, प्रियंका चौधरी से शादी कर रहे हैं. रैना के शादीशुदा खिलाड़ियों की टीम में शामिल हो जाने के बाद भारतीय क्रिकेट के चर्चित कुंवारों में कौन से खिलाड़ी रह गए हैं?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुरेश रैना ने यह सेल्फ़ी अपने फ़ेसबुक पर पोस्ट की. आइए डालते हैं एक नज़र... मुम्बई में एयरपोर्ट से बाहर निकलते विराट कोहली और अनुष्का शर्मा. विराट कोहली हैं भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे एलिजिबल बैचलर. 26 वर्ष के कोहली ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में सिर्फ़ एक ही रन बना कर पवेलियन लौट गए थे. उन्होंने इस टूर्नामेंट में आठ मैचों में 305 रन बनाए. विश्व कप के दौरान विराट की महिला मित्र अनुष्का शर्मा भी काफ़ी चर्चा में रहीं. ऑस्ट्रेलिया से लौटते वक्त विराट अनुष्का शर्मा का हाथ थामकर एयरपोर्ट से बाहर निकलते देखे गए. समाप्त रविंद्र जडेजा को टीम के कुछ खिलाड़ियों ने सर जडेजा कहकर ट्वीट किए थे. भारतीय ऑल राउंडर रविंद्र जडेजा भी अब तक कुंवारे हैं. 26 वर्षीय जडेजा के लिए ये विश्व कप कुछ ख़ास नहीं रहा. जडेजा अपनी स्टाइल के लिए मीडिया में कई बार चर्चा में आ चुके हैं. यहाँ तक कि भारतीय टीम के कुछ खिलाड़ी भी सोशल मीडिया पर उन्हें सर जडेजा कहकर चुटकी लेते देखे गए हैं. अक्षर पटेल को विश्व कप में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिला था. गुजरात के आनंद के रहने वाले 21 वर्षीय अक्षर पटेल विश्व कप के भारतीय दल के सबसे युवा सदस्य थे. हालांकि बाएँ हाथ के इस बल्लेबाज को विश्व कप में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिल पाया. साल 2012-13 में पटेल को बीसीसीआई ने 19 साल से कम उम्र के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी का ख़िताब दिया था. भुवनेश्वर कुमार को विश्व कप में बस एक मैच खेलने का मौका मिला था. 25 वर्षीय तेज़ गेंदबाज़ भुवनेश्वर कुमार भी अब तक कुंवारे हैं. कुमार विश्व कप खेलने गए भारतीय दल में शामिल थे. भुवनेश्वर ने विश्व कप में एक ही मैच खेला और एक विकेट लिया. कुमार ट्विटर पर अपनी ही तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं. सुरेश रैना के साथ मोहित शर्मा. हरियाणा के बल्लभगढ़ के रहने वाले 26 वर्षीय मोहित शर्मा भी कुंवारे हैं. मोहित के लिए ये विश्व कप काफ़ी सफल रहा. विश्व कप में उन्होंने आठ मैच खेलकर 13 विकेट लिए. वो 2011-12 की रणजी ट्राफ़ी में अपने प्रदर्शन से चर्चा में आए थे. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. विश्व कप के एक मैच में आउट होकर पवेलियन लौटते रोहित शर्मा नागपुर में जन्मे 27 वर्षीय भारतीय ओपनर रोहित शर्मा भी हैं एलिजिबल बैचलर. रोहित ने विश्व कप में आठ मैच खेलकर 330 रन बनाए. रोहित ने विश्व कप में एक शतक भी बनाया था. रोहित के माता-पिता विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश से हैं और रोहित धाराप्रवाह तेलुगू बोलते हैं. ये हैं शादी-शुदा खिलाड़ी धोनी ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर ये तस्वीर पोस्ट की थी. भारतीय टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का विवाह 2010 में साक्षी रावत से हुआ. 2015 फरवरी में धोनी की बेटी ज़ीवा का जन्म हुआ. विश्व कप के बाद कई प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर कहा कि अब धोनी अपनी बेटी को देख पाएँगे. 29 वर्ष के शिखर धवन ने 2012 में आयशा मुखर्जी से शादी की है. उनकी दो बेटियां है. धवन आयशा से फ़ेसबुक पर ही मिले थे. धवन कभी-कभी अपने परिवार की तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट करते हैं. धवन विश्व कप में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज़ रहे. उन्होंने आठ मैचों में 412 रन बनाए. अजिंक्य रहाणे भी शादीशुदा हैं. अजिंक्य रहाणे ने 2014 में राधिका धोपावकर से शादी की थी. दाएं हाथ के बल्लबाज़ रहाणे टी-20 में मुंबई इंडियंस और राजस्थान रॉयल्स की तरफ से ख़ेल चुके हैं. 2012 की इस तस्वीर में अश्विन अपनी पत्नी प्रीति नारायणन के साथ. भारतीय फिरकी गेंदबाज़ आर अश्विन भी शादीशुदा हैं. उनकी पत्नी हैं प्रीति नारायणन. अश्विन टेस्ट क्रिकेट में सबसे तेज़ 50 और 100 विकेट लेने वाले खिलाड़ी हैं. अक्तूबर 2014 में अजमेर शरीफ में अपनी पत्नी के साथ मोहम्मद शामी विश्व कप में जाने से पहले 2014 जून में तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद शमी की शादी हुई. कोलकाता में रहने वाले शमी की शादी मॉडल हसीन जहान से हुई. शामी उस वक्त 24 वर्ष के थे. 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से अपने भाषण में बलूचिस्तान और गिलगित बल्तिस्तान का ज़िक्र किया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबलोच नेताओं ने इसका स्वागत किया तो पाकिस्तान की तरफ़ से इस पर गहरी नाराज़गी जताई गई है. आइए जानते हैं इन दोनों इलाक़ों के बारे में: बलूचिस्तान क्षेत्रफल के हिसाब से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, हालांकि चारों प्रांतों के मुक़ाबले वहां की आबादी सबसे कम है. इसकी सीमाएं ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से मिलती है और ये प्राकृतिक संसाधनों से माला माल है. वहां गैस, कोयला, तांबा और कोयला के बड़े भंडार है. लेकिन अब भी बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे ग़रीब प्रांत है. समाप्त बलोच राष्ट्रवादी नेताओं का आरोप है कि पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार उनका उत्पीड़न कर रही है और उन्हें उनके वाजिब अधिकार उन्हें नहीं दे रही है. पाकिस्तान का कहना है कि वो बलूचिस्तान में अलगावादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई जीत रहा है जबकि बलोच कार्यकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्तानी सेना वहां अपहरण, उत्पीड़न और हत्याएं कर रही है जिसके कारण वहां पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भावनाएं भड़क रही हैं. बलूचिस्तान के लोगों में नाराज़गी दशकों से रही है लेकिन चरमपंथ की ताज़ा लहर 2006 में उस वक़्त शुरू हुई जब पाकिस्तानी सेना ने बलोच क़बायली नेता नवाब अकबर बुगती को मार दिया था. अलगाववादियों का कहना है कि वो आज़ाद बलूचिस्तान के लिए लड़ रहे हैं. मुख्यत: पहाड़ों में इन लोगों के ठिकाने हैं और वहीं से ये काम करते हैं, लेकिन बताया जाता है कि आम लोगों में भी उन्हें अच्छा ख़ासा समर्थन प्राप्त है. बहुत से पाकिस्तानी राजनेता बलूचिस्तान को एक राजनीतिक समस्या मानते हैं और बातचीत के ज़रिए उसके शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में हैं. लेकिन पाकिस्तान में आने वाली सरकारें इस दिशा में बहुत ज़्यादा कोशिश नहीं कर पाई हैं. ऐसे में, पाकिस्तानी सेना पर ताक़त के दम पर अलगावादियों को कुचलने के आरोप लगते हैं. कई बलोच संगठन पाकिस्तान और चीन की आर्थिक कोरिडोर से जुड़ी महत्वाकांक्षी परियोजना का भी विरोध कर रहे हैं जिसके तहत चीन के शिनचियांग प्रांत को बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जोड़ा जाना है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की सरकार और सेना भारत पर बलूचिस्तान में गड़बड़ी फैलाने के आरोप लगाती है, जिससे भारत इनकार करता है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से अपने भाषण में बलूचिस्तान का जिक्र किया तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों से सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने कहा कि इससे वहां हालात बिगाड़ने में भारत के हाथ की पुष्टि होती है. बलूचिस्तान लिबेरशन आर्मी, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट, यूनाइटेड बलोच आर्मी, लश्कर-ए-बलूचिस्तान, बलूचिस्तान लिबेरशन यूनाइटेड फ्रंट जैसे कई संगठन बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. गिलगित-बल्तिस्तान भारत जिस हिस्से को 'पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर' कहता है, उसे पाकिस्तान में दो अलग अलग हिस्सों में बांटा गया है - एक है गिलगित-बल्तिस्तान का इलाक़ा, जिसे पहले नॉर्दन एरिया के नाम से जाना जाता था और दूसरा वो जिसे पाकिस्तान 'आज़ाद कश्मीर' कहता है. गिलगित-बल्तिस्तान की सीमाएं एक तरफ़ पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तून ख्वाह प्रांत से लगती हैं तो दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर से. यह इलाका चीन और अफ़ग़ानिस्तान से भी सटा हुआ है. गिलगित बल्तिस्तान शिया बहुल इलाक़ा है. जबकि पाकिस्तान सुन्नी बहुल देश है. इस इलाके से भी पाकिस्तान-चीन आर्थिक कोरिडोर परियोजना के विरोध की खबरें हैं. इस इलाके में 2009 में पहली बार चुनाव हुए थे. फिलहाल वहां प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी की सत्ता में है. 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत की साइना नेहवाल ने विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में अपने अभियान की शुरुआत जीत के साथ की है. वे महिला एकल के तीसरे दौर में पहुंच गई हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमंगलवार को दूसरे दौर में साइना ने रूस की नतालिया पर्मिनोवा को 31 मिनट तक चले मुक़ाबले में आसानी से 21-11, 21-9 से मात दी. ये टूर्नामेंट डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 25 अगस्त को शुरू हुआ है. भारतीय चुनौती अपनी फ़िटनेस को बेहतर बनाने के लिए साइना नेहवाल ने पिछले दिनों ग्लास्गो में संपन्न राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा नही लिया था. मौजूदा चैंपियनशिप में साइना नेहवाल को महिला एकल वर्ग में सातवीं वरीयता दी गई है. पहले दौर में उन्हें बाय मिला था. मंगलवार को ही पुरुष एकल वर्ग के पहले दौर में भारत के के श्रीकांत ने स्लोवेनिया के इज़तोक उटरोसा को 21-11, 11-21, 21-12 से हराकर दूसरे दौर में जगह बनाई. महिला एकल वर्ग में ही भारत की उम्मीदें पिछली चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाल पीवी सिंधू पर भी लगी हैं. ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं. इस बार विश्व चैंपियनशिप में सिंधू को 11वीं वरीयता मिली है. पहले दौर में उन्हें भी बाय मिला. दूसरे दौर में उनका सामना रूस की ओल्गा गोलोवानोवा से होगा. मिले-जुले नतीजे इससे पहले भारत के लिए पहला दिन मिले-जुले परिणाम वाला रहा. भारत को सबसे बड़ा झटका पुरूष एकल वर्ग में स्टार खिलाड़ी पी कश्यप की हार से लगा. उन्हें जर्मनी के दिएतेर दोम्के ने पहले ही दौर में 26-24, 13-21, 21-18 से हराया. ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में पी कश्यप ने स्वर्ण पदक जीता था. भारत की महिला युगल जोड़ी अश्विनी पोनप्पा और तरूण कोना भी पहले दौर में हारकर बाहर हो चुकी हैं. 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प्रसिद्ध बंजारा हिल्स इलाके में रहती हैं और अब वहां सुरक्षा गार्ड तैनात कर दिए गए हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार सानिया के पिता इमरान मिर्ज़ा ने बताया कि कुछ समय से समस्या आ रही थी. ऑटोग्राफ़ चाहने वाले लगातार पीछे लगे थे. सानिया आराम के लिए भी वक्त चाहिए. कामयाबी हाल ही में उन्होंने हैदराबाद में डब्ल्यूटीए ख़िताब जीतकर एक और बड़ी कामयाबी हासिल की थी. डब्ल्यूटीए ख़िताब जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला टेनिस खिलाड़ी हैं. इससे पहले वह ऑस्ट्रेलियाई ओपन में तीसरे दौर में अपनी जगह बनाकर टेनिस जगत में भारत के नाम रिकॉर्ड दर्ज करा चुकी है हालाँकि तीसरे दौर के मैच में वह सरीना विलियम्स से हार गई थीं. ऑस्ट्रेलियन ओपन के तीसरे दौर तक पहुँचकर सानिया मिर्ज़ा भारत में बहुत लोकप्रिय हो गई हैं.\n\nSummary:", "target": "भारत की जानी-मानी टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा को कामयाबी की क़ीमत चुकानी पड़ रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्हें ऑटोग्राफ़ चाहने वालों ने घेरना शुरू कर दिया है और उनकी भारी भीड़ से बचाने के लिए सुरक्षा मुहैया कराई गई है. सानिया के माता- 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क्या जरूरत थी. कई लोगों का ये भी मानना है कि मेट्रो के किराए में एक बार वृद्धि करना ठीक था लेकिन एक ही साल में दो बार किराया उनकी जेब पर बहुत भारी पड़ रहा है. मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के अंदर जा रहीं सुमन ने बताया कि वो पहले बस में सफर करती थीं लेकिन मेट्रो सहूलियत के कारण उसमें सफर करने लगी. एक बार किराया बढ़ाया तो ठीक था लेकिन फिर से बढ़ाने की क्या जरूरत थी. अगर इस तरह किराया बढ़ेगा तो फिर से बस में जाना पड़ेगा. 'मेट्रो का किराया बढ़ा...और चाहिए अच्छे दिन?' 'डीएमआरसी दे घाटे का हिसाब' मंडी हाउस पर ही खड़े एक शख्स से जब बातचीत की तो उन्होंने किराया बढ़ोतरी को बिल्कुल गलत बताया. उन्होंने कहा कि हम जसोला विहार से कश्मीरी गेट आते हैं. पहले 28 रुपये किराया लगता था और अब ये मंडी हाउस तक 40 रुपये किराया लेते हैं. आखिर में वहीं होगा जो मेट्रो आते हैं वो ऑटो, बस या कैब से जाएंगे. वहीं, अक्षरधाम से बाराखम्बा तक मेट्रो से रोजाना सफर करने राजीव कुमार कहते हैं कि डीएमआरसी ने किराया तो बढ़ाया लेकिन अपने नुकसान के बारे में नहीं बताया. लोगों को ये समझ नहीं आ रहा है कि मेट्रो का कितना नुकसान हुआ है कि इतना किराया बढ़ाया गया है. डीएमआरसी को मुनाफे के दूसरे तरीकों पर भी विचार करना चाहिए. बाराखम्बा मेट्रो स्टेशन से बाहर निकल रहीं एक महिला ने बताया कि उनका किराया डबल हो गया है. जहां पहले 23 रुपये किराया लगता था वहां अब उनके 45 रुपये कटे हैं. साकेत से नोएडा रोज ऑफिस जाने वालीं पूनम मिश्रा कहती हैं कि हमारी सैलरी जितनी नहीं बढ़ पाती उससे कहीं ज्यादा रफ्तार से मेट्रो का किराया बढ़ा है. अब लगभग दुगना किराया देना पड़ेगा. 'हर बात पर हंगामा होता है पर इस पर सब चुप हैं ' प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन से निकल रहे एक स्टूडेंट ने बताया कि वह पढ़ाई के साथ-साथ ट्यूशन भी पढ़ाता है और इससे अपनी पॉकेट मनी निकालता है. अब उसकी पॉकेट पर काफी असर पड़ने वाला है. और कुछ होता है तो उसके विरोध में कोई न कोई खड़ा हो जाता है लेकिन किराया बढ़ने पर कोई विरोध नहीं हुआ. कनॉट प्लेस में काम करने वाले आमिर कहते हैं कि अगर डीएमआरसी किराया बढ़ा रही है तो मेट्रो की फ्रिक्वेंस भी बढ़ानी चाहिए ताकि समय पर आॅफिस पहुंच सकें. हालांकि, आमिर के ही मित्र ने कहा कि किराया बढ़ाने का फैसला कुछ सोच समझकर ही लिया गया होगा. किराए में हुए इजाफे की बात करें तो अब मेट्रो का न्यूनतम किराया 20 रुपये हो गया है जो पिछली बार की बढ़ोतरी के बाद 50 रुपये था. वहीं, अधिकतम किराया 50 से 60 रुपये हो गया है. लोगों को अब लगभग हर यात्रा में 10 रुपये ज्यादा देने होंगे. ​किराए में बढ़ोतरी को लेकर दिल्ली सरकार और डीएमआरसी के बीच टकराव भी चल रहा था. दिल्ली सरकार लगातार किराया वृद्धि का विरोध करती रही वहीं, शहरी विकास मंत्री ने मेट्रो के सही संचालन के लिए किराया बढ़ाने को सही बताया. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली मेट्रो का किराया मंगलवार से बढ़ गया है. यह साल भर में हुई दूसरी बढ़ोतरी है. इस बार डीएमआरसी ने किराए में 50 प्रतिशत तक का इजाफा कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकिराया बढ़ने से लोग खासे नाराज और परेशान दिखे. लोगों ने किराये के साथ मेट्रो में सुविधाओं पर सवाल किए. दिल्ली मेट्रो का किराया फिर बढ़ा, क्या कहते हैं यात्री? बुराड़ी से नोएडा का सफर करने वालीं ज्योति राघव कहती हैं कि किराया बढ़ने से सबसे ज्यादा नुकसान कम आय वाले लोगों को होगा. प्राइवेट बसों के बंद होने और मेट्रो की सुविधाओं को देखते हुए गरीब तबका भी मेट्रो में आने लगा था लेकिन अब वो फिर से बस का रुख कर लेगा. दोबारा किराया बढ़ने से गुस्से में लोग वैशाली से कनॉट प्लेस जाने वालीं नेहा का कहना है कि मेट्रो में बढ़ रही लोगों की भीड़ और विज्ञापनों को देखकर तो नहीं लगता कि डीएमआरसी नुकसान में है तो अचानक से इतना किराया बढ़ाने की क्या जरूरत थी. कई लोगों का ये भी मानना है कि मेट्रो के किराए में एक बार वृद्धि करना ठीक था लेकिन एक ही साल में दो बार किराया उनकी जेब पर बहुत भारी पड़ रहा है. मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के अंदर जा रहीं सुमन ने बताया कि वो पहले बस में सफर करती थीं लेकिन मेट्रो सहूलियत के कारण उसमें सफर करने लगी. एक बार किराया बढ़ाया तो ठीक था लेकिन फिर से बढ़ाने की क्या जरूरत थी. अगर इस तरह किराया बढ़ेगा तो फिर से बस में जाना पड़ेगा. 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ऐसी ख़बरें हैं कि रॉयल बैंक ऑफ़ स्कॉटलैंड सरकार से भारी आर्थिक सहायता मिलने के कुछ महीने बाद डेढ़ अरब डॉलर के बोनस बाँटने की तैयारी में है. बुधवार को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी सरकार से आर्थिक सहायता लेने वाले कंपनियों के अधिकारियों की वेतन सीमा निर्धारित करने की घोषणा की थी. मंदी की मार उल्लेखनीय है कि दिसंबर महीने में आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन को मंदीग्रस्त घोषित कर दिया गया था. 1991 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि ब्रिटेन को मंदी का सामना करना पड़ रहा है. मंदी की एक परिभाषा ये भी है कि लगातार दो तिमाहियों में आर्थिक विकास की दर ऋणात्मक हो जाए तो उस स्थिति को मंदी मान लिया जाता है. इधर, पाउंड डॉलर के मुक़ाबले 24 वर्षों के अपने न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है. ब्रिटेन में मंदी का दौर गुज़रने में अक्सर साल-सवा साल का समय लगता है इसलिए विश्लेषक कह रहे हैं कि 2010 से सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती. आशंका व्यक्त की जा रही है कि ब्रितानी अर्थव्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास उठ रहा है इसलिए सरकार अधिक से अधिक रियायतें दे रही है ताकि विदेशी निवेश बना रहे.\n\nSummary:", 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मौक़ा है, जब हम अपने देश के लिये थोड़ा-बहुत योगदान दे सकते हैं.'' अकबर की राजनीति में यह पहली पारी नहीं है. इससे पहले वे बिहार में किशनगंज सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. वे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नज़दीकी भी थे. बाड़मेर पर अड़े जसवंत उधर, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह बाड़मेर से लोकसभा चुनाव लड़ने के अपने फ़ैसले से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं. पार्टी ने जसवंत सिंह की जगह बाग़ी कांग्रेसी सोनाराम चौधरी को बाड़मेर से टिकट दिया है. जसवंत सिंह ने मीडिया से कहा कि वे रविवार को बाड़मेर पहुंच रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी आगे की योजना के बारे में कुछ नहीं बताया. उन्होंने कहा, ''मैं बाड़मेर जाकर अपने समर्थकों के साथ विचार-विमर्श करूंगा और फिर सब कुछ तय किया जाएगा.'' जसवंत सिंह का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी में संविधान के ख़िलाफ़ फ़ैसले लिए जा रहे हैं. जसवंत सिंह अभी दार्जिलिंग से सांसद हैं और पार्टी में उन्हें आडवाणी का नज़दीकी माना जाता है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की मौजूदगी में शनिवार को भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, किसी ज़माने में कांग्रेस से नज़दीक रखने वाले अकबर का कहना है कि वे अपनी नीतियों की वजह से राजनीति में वापस आए हैं और देश को बेहतरी की राह पर लाने के लिए काम करेंगे. भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद अकबर ने कहा, ''मैं राजनीति में नीति के लिये वापस आया हूं. देश के सामने जो संकट है, वह सबको पता है. ये एक मौक़ा है, जब हम अपने देश के लिये थोड़ा-बहुत योगदान दे सकते हैं.'' अकबर की राजनीति में यह पहली पारी नहीं है. इससे पहले वे बिहार में किशनगंज सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. वे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नज़दीकी भी थे. बाड़मेर पर अड़े जसवंत उधर, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह बाड़मेर से लोकसभा चुनाव लड़ने के अपने फ़ैसले से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं. पार्टी ने जसवंत सिंह की जगह बाग़ी कांग्रेसी सोनाराम चौधरी को बाड़मेर से टिकट दिया है. जसवंत सिंह ने मीडिया से कहा कि वे रविवार को बाड़मेर पहुंच रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी आगे की योजना के बारे में कुछ नहीं बताया. उन्होंने कहा, ''मैं बाड़मेर जाकर अपने समर्थकों के साथ विचार-विमर्श करूंगा और फिर सब कुछ तय किया जाएगा.'' जसवंत सिंह का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी में संविधान के ख़िलाफ़ फ़ैसले लिए जा रहे हैं. जसवंत सिंह अभी दार्जिलिंग से सांसद हैं और पार्टी में उन्हें आडवाणी का नज़दीकी माना जाता है. 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'' किरण बेदी के इस ट्वीट को सोशल मीडिया पर कुछ लोग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. ट्वीट पर रिप्लाई करने वालों का कहना है कि इस वीडियो में दिख रही बुज़ुर्ग महिला मोदी की मां नहीं हैं. किरण बेदी ने इस ट्वीट पर खिचाई के चार घंटे बाद सफाई पेश की. किरण ने लिखा, ''मुझे गलत पहचान बताई गई. लेकिन इस शक्तिशाली मां को मैं सलाम करती हूं. उम्मीद करती हूं कि मैं जब 96 साल की होऊंगी, तब मैं उनके जैसी हो पाऊंगी.'' इस वीडियो को अगर यू-ट्यूब पर सर्च करें तो ये बीते महीने में दो अलग चैनलों से अपलोड हुआ था. एक वीडियो 30 सितंबर और दूसरा तीन अक्टूबर को अपलोड हुआ था. इन वीडियो के कैप्शन में कहीं भी इस महिला के मोदी की मां होने का कैप्शन में ज़िक्र नहीं है. दूसरा किरण बेदी अपने ट्वीट में इस वीडियो के लिए इशा फाउंडेशन के सदगुरु शुक्रिया कहती हैं. लेकिन अगर किरण बेदी के मेंशन किए ट्विटर अकाउंट पर जाएं, तो वहां ये वीडियो नहीं मिलता है. किरण के ट्वीट पर क्या बोले लोग? @sbala13 ट्विटर पर लिखते हैं, ''किरण बेदी जी, ये वीडियो तीन अक्टूबर से ट्विटर पर है.'' एमपी शर्मा लिखते हैं, ''सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है, जहां अगर आप असली चीज़ नहीं देंगे तो आप फौरन पकड़े जाएंगे. ऐसे लोगों से सावधान रहिए, जो ज़िंदगी भर एक ही तस्वीर बेचते रहते हैं.'' कांग्रेस से जुड़े गौरव हीराबेन की तस्वीरों के साथ ट्विटर पर लिखते हैं, ''किरण बेदी ये बेहद ख़राब तरीका है. एक गर्वनर का ऐसा करना बुरा लग रहा है. पीएम का पीआर करने के लिए आप झूठ क्यों बोल रही हैं. ये महिला हीराबेन की तरह बिलकुल नहीं दिखती हैं.'' @BeVoterNotFan ने लिखा- ये देखो, इनको दिल्ली का मुख्यमंत्री बनना था. राज मौली लिखते हैं, ''ये वीडियो नवरात्रों से शेयर की जा रही है. किरण बेदी ज़रा सोर्स चेक कीजिए.'' उत्पल पाठक लिखते हैं, ''ये ख़ूबसूरत वीडियो प्रेरणादायक है लेकिन ये मोदी की मां नहीं हैं.'' के चंद्रकुमार ने लिखा- ये मोदी की मां नहीं हैं, ज़रा चेक करके ट्वीट किया कीजिए. हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस वीडियो को सही मानते हुए बुज़ुर्ग महिला को मोदी की मां मान रहे हैं. राजदीप लिखते हैं, 'अब हमें मालूम चला कि मोदी को इतना ताक़त कहां से मिलती है. मोदी की मां प्रेरण देती हैं.' मुरलीधरण ने लिखा- ये प्रशंसा योग्य है. 97 साल की उम्र में ऐसी स्पिरिट. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पुडुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी का ट्विटर पर शेयर किया एक वीडियो चर्चा में है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस वीडियो में एक बुज़ुर्ग महिला गुजराती गाने पर नाचती हुईं दिख रही हैं. किरण बेदी इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखती हैं, ''97 साल की उम्र में दीपावली की स्पिरिट. ये नरेंद्र मोदी की मां हीराबेन मोदी हैं, वो अपने घर पर दिवाली मना रही हैं. 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निगम को फ्लाईओवर के हिस्से का निर्माण करने के दौरान अपने कर्मचारियों को ट्रैफिक के सुरक्षित संचालन पर लगाना चाहिए था या फिर वो पुलिस की मदद भी मांग सकते थे. पुलिस ने 19 फ़रवरी को निगम के परियोजना प्रबंधक के ख़िलाफ़ प्राथमिकी भी दर्ज की थी. ये होता... तो शायद बनारस हादसा न हुआ होता.. वाराणसी पुल हादसा: वो जिन्हें मौत छूकर निकल गई केजरीवाल को समन इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पर कथित हमले के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पुलिस ने समन जारी किया है. बुधवार को सिविल लाइंस थाना पुलिस ने मुख्यमंत्री को नोटिस भेजकर पूछताछ के संबंध में सूचना दे दी है. पुलिस ने उनसे 18 मई को सुबह 11 बजे घर अथवा अपने कार्यालय में मौजूद रहने के लिए कहा है. उनकी सुविधा के अनुसार पुलिस ने घर अथवा कार्यालय जाकर पूछताछ करने का निर्णय लिया है. इसी साल 19 फ़रवरी की आधी रात 12 बजे मुख्यमंत्री केजरीवाल के सिविल लाइंस स्थित आवास पर मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को बुलाया गया था. वहां पहले से एक कमरे में अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, आप के 11 विधायक व वीके जैन मौजूद थे. मुख्य सचिव का आरोप है कि बैठक के दौरान आप के विधायकों ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट की. माफ़ियों से केजरी की साख दांव पर, 'आप' का क्या? चेक से एक करोड़ की रिश्वत टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक सीबीआई ने पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में दूसरी चार्जशीट दाखिल कर दी है. इसमें आरोप लगाया गया है कि बैंक के रिटायर्ड मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी ने रिश्वत के रूप में एक करोड़ रुपए का चेक लिया. सीबीआई ने आरोप पत्र में ये भी कहा कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी अभी फ़रार हैं. घोटाले में इलाहाबाद बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऊषा अनंतसुब्रमण्यम को भी अभियुक्त बनाया गया है. पीएनबी घोटाला कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम करेगा? फ़ेसबुक पर 58 करोड़ फ़र्जी अकाउंट बंद जनसत्ता के मुताबिक सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक ने 2018 के पहले तीन महीने में 58 करोड़ से अधिक फ़र्जी अकाउंट बंद किए हैं. इसके अलावा फ़ेसबुक भड़काऊ या हिंसक चित्र, आतंकवादी दुष्प्रचार या घृणा फैलाने वाले अकाउंट के ख़िलाफ़ भी क़दम उठा रहा है. कंपनी ने कहा है कैंब्रिज एनालिटिका डेटा कांड के बाद पारदर्शिता की दिशा में क़दम उठाते हुए ये कार्रवाई की गई है. अब 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विधायकों ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट की. माफ़ियों से केजरी की साख दांव पर, 'आप' का क्या? चेक से एक करोड़ की रिश्वत टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक सीबीआई ने पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में दूसरी चार्जशीट दाखिल कर दी है. इसमें आरोप लगाया गया है कि बैंक के रिटायर्ड मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी ने रिश्वत के रूप में एक करोड़ रुपए का चेक लिया. सीबीआई ने आरोप पत्र में ये भी कहा कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी अभी फ़रार हैं. घोटाले में इलाहाबाद बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऊषा अनंतसुब्रमण्यम को भी अभियुक्त बनाया गया है. पीएनबी घोटाला कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम करेगा? फ़ेसबुक पर 58 करोड़ फ़र्जी अकाउंट बंद जनसत्ता के मुताबिक सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक ने 2018 के पहले तीन महीने में 58 करोड़ से अधिक फ़र्जी अकाउंट बंद किए हैं. इसके अलावा फ़ेसबुक भड़काऊ या हिंसक चित्र, आतंकवादी दुष्प्रचार या घृणा फैलाने वाले अकाउंट के ख़िलाफ़ भी क़दम उठा रहा है. कंपनी ने कहा है कैंब्रिज एनालिटिका डेटा कांड के बाद पारदर्शिता की दिशा में क़दम उठाते हुए ये कार्रवाई की गई है. अब फ़ेसबुक पर कर सकेंगे पुरानी हिस्ट्री को डिलीट 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विरोधी बयान दिए हैं जिसमें 'इसराइल को नष्ट करने' जैसे बयान भी शामिल हैं. उन्होंने हाल ही में कहा था कि 'इसराइल का अस्तित्व एक स्थाई खतरा' है. महमूद अहमदीनेजाद ये भी कह चुके हैं कि 'नाज़ी जनसंहार एक मिथक' था. इसराइली रक्षा मंत्री ने कहा है कि इरोस-बी उपग्रह की मदद से इसराइल को ज़्यादा ख़ुफ़िया जानकारी मिल पाएगी. इस उपग्रह के निर्माण में इमेजसैट इंटरनेशनल फ़र्म ने मदद की है. इस कंपनी के अधिकारी शिमोन ने रॉयटर्स को बताया, \"सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ.\" उन्होंने बताया कि इस उपग्रह की पहुँच ईरान समेत दुनिया भर में है.\n\nSummary:", "target": "इसराइल ने इरोस-बी नाम के एक उपग्रह का प्रक्षेपण किया है और अधिकारियों के मुताबिक इस उपग्रह के ज़रिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम की जासूसी की जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये उपग्रह रूस से छोड़ा गया. माना जा रहा है कि ये उपग्रह ज़मीन पर पड़ी 70 सेंटीमीटर आकार की छोटी चीज़ों की भी स्पष्ट तस्वीरें ले सकता है. एक अधिकारी के मुताबिक इसे चालू होने में अभी कुछ दिन लगेंगे. इसराइल के रक्षा मंत्री शॉल मोफ़ाज़ ने कहा है 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भारत कठोर क़दम उठाने को तैयार है. उनका कहना है कि भारत को कम से कम अपने राजदूत को वापस बुलाना चाहिए और ये संदेश देना चाहिए की भारत पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक संबध तोड़ लेगा. लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स के विदेशी मामलों के संपादक अमित बरुआ मानते हैं कि मुद्दा आतंकवाद है युद्ध नहीं. उनके अनुसार पाकिस्तान ने बड़ी सफ़ाई से और काफ़ी हद तक कामयाबी से मुंबई के चरमपंथी हमलों के बाद आतंकवाद पर चली बहस को युद्ध की बहस में बदल दिया. उनका मानना है कि भारत को अब भी कूटनीतिक दबाव के रास्ते पर ही चलना चाहिए और फोकस आतंकवाद पर ही होना चाहिए. और दबाव की ज़रूरत हालांकि पार्थसारथी मानते हैं कि भारत पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तभी बढ़ा पाएगा जब वो पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाने की बात के बजाए, कुछ क़दम उठा कर दिखाए और उसके आगे के विकल्प भी खुले रखे यानि नौबत युद्ध की आए तो आए. उनके अनुसार सरकार ने अभी तक ऐसी इच्छाशक्ति नही दिखाई है. अमित बरुआ एक हद तक पार्थसारथी की बात का समर्थन करते हैं. वो भी मानते हैं कि जब तक पाकिस्तान मुंबई पर हुए हमलों के संदर्भ में भारत की मांगों पर ठोस क़दम नही उठाता है तब तक भारत और पाकिस्तान के संबंध सामान्य नहीं होने चाहिए. यहां तक कि भारत पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक संबध भी तोड़ ले. लेकिन वो मानते हैं कि युद्ध कम से कम अभी की सूरत में भारत के लिए सही विकल्प नहीं है पर कहते हैं कि पाकिस्तान को भी समझना होगा कि अगर उसने अपनी ज़मीन से भारत पर होने वाले हमले नहीं रोके तो सरकार सीधी कार्रवाई करने के दबाव को ज़्यादा नहीं टाल पाएगी. अमित बरुआ कहते हैं कि उनकी ये राय अभी के हालात में है, लेकिन अगर भारत पर कोई और चरमपंथी हमला हो जाता है, तो कहना मुश्किल होगा की भारत सरकार क्या विकल्प चुनेगी. वो कहते हैं कि हमें ये नही भूलना चाहिए कि भारत में मुंबई हमला अकेला हमला नहीं हुआ है, उससे पहले भी कई हमले हुए हैं और देश में भारी गुस्सा है और अगर ये हमले नहीं रूकते तो फिर सरकार सीधी कार्रवाई के दबाव को कितना झेल पाएगी, कहना मुश्किल है. कुल मिलाकर भारत में इस बात पर अब भी बहस चल रही है कि मुंबई पर हुए हमलों के बाद पाकिस्तान के साथ किस तरह के संबंध रखे जाएं, कूटनीतिक दबाव के रास्ते पर चला जाए या फिर सीधी कार्रवाई का विकल्प चुना जाए. लेकिन एक बात कही जा सकती है कि वो लोग भी 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'पक्के' सबूतों का दावा उसाडा के मुख्य कार्यकारी ट्राविस टी टायगार्ट ने एक बयान में कहा कि आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम के खिलाफ डोपिंग के \"पक्के और ठोस सबूत\" हैं. वे आर्मस्ट्रॉन्ग के मामले में अपना \"तार्किक फैसला\" अंतरराष्ट्रीय साइकलिंग संघ (यूसीआई), विश्व एंटी डोपिंग एजेंसी (वाडा) और विश्व ट्रायथलॉन निगम को भेजेंगे. यूसीआई के पास उसाडा के फैसले के खिलाफ वाडा से शिकायत करने के लिए 21 दिन का समय है. ऐसा न करने पर उसे आर्मस्टॉन्ग के सभी सात टूर डे फ्रांस खिताब छीनने के फैसले पर अमल करना होगा और उन पर आजीवन प्रतिबंध भी लगाना होगा. आर्मस्ट्रॉ़न्ग अभी ट्रायथलॉन में हिस्सा ले रहे हैं. अपने बयान में टायगर्ट ने कहा कि एक हजार से ज्यादा पन्नों वाली रिपोर्ट में आर्मस्ट्रॉन्ग के खिलाफ “जबरदस्त” सबूत हैं. इसमें 26 लोगों की गवाहियां हैं जिनमें 15 लोगों को यूएस पोस्टल सर्विस टीम और डोपिंग की गतिविधियों की जानकारी रही है. यूसीआई पर आरोप आर्मस्ट्रॉन्ग के नाम कई रिकॉर्ड हैं उन्होंने कहा कि टीम की डोपिंग साजिश \"पेशेवर तरीके से तैयार की गई जिसमें खिलाड़ियों को इस तरह खतरनाक दवाएं लेने के लिए तैयार और मजबूर किया जाता है ताकि वे पकड़े न जा सके. इससे उनके बारे में किसी को पता भी नहीं चलता था और प्रतियोगिताओं में कामयाबी पाते रहे.\" आर्मस्ट्रॉन्ग के जिन पूर्व साथियों ने गवाही दी है उनमें ग्रेओर्ग हिनकैपी, टेलर हैमिल्टन और फ्लोयड लैंडिस शामिल हैं. डोपिंग के कारण ही लैडिंस का 2006 का टूर डे फ्रांस खिताब छीन लिया गया था. उन्हें हाल ही में स्विस अदालत ने अंतरराष्ट्रीय साइकलिंग यूनियन की मानहानि का दोषी करार दिया था. लैंडिस ने आरोप लगाया कि यूसीआई ने आर्मस्ट्रॉन्ग को डोपिंग के आरोपों से बताया.\n\nSummary:", "target": "अमरीका की एंटी डोपिंग एजेंसी (उसा़डा) का कहना है कि मशहूर साइकलिस्ट लांस आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम ने डोपिंग का सबसे \"अत्याधुनिक, पेशेवर और सफल तरीका अपनाया, जो अब तक खेल की दुनिया में देखने को नहीं मिला.\"", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nडोपिंग से दागदार हुई आर्मस्ट्रॉन्ग की महानता उसाडा ने बुधवार को कहा है कि वो 41 वर्षीय आर्मस्ट्रॉन्ग के खिलाफ मामले की पूरी रिपोर्ट सौंपेगी. इस रिपोर्ट में आर्मस्ट्रॉन्ग के उन पूर्व 11 साथियों के गवाही भी शामिल हैं जो यूएस पोस्टल सर्विस की टीम में उनके साथ रहे हैं. वैसे आर्मस्ट्रॉन्ग डोपिंग के आरोपों को गलत बताते हैं लेकिन उन्होंने उसाडा के आरोप का प्रतिवाद भी नहीं किया है. 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ही दो बेटे थे. एक पाँच साल का और दूसरा एक साल का. ग़रीबी का यह हाल था कि छोटे बेटे को पानी में चीनी घोल कर पिलाती थी, दूध के पैसे ही नहीं थे. न मेरी कोई नौकरी थी और न ही परिवार. जब मैंने बच्ची के पिता को अपने गर्भवती होने की ख़बर दी तो उसका कहना था, जो चाहे करो, मेरा इससे कोई लेनादेना नहीं है. फिर वह एक दूसरी औरत के साथ अमरीका चला गया. तीन बच्चों को पालना मेरे बस की बात नहीं थी. एक महिला जिससे मैं अपना दुख बांटती थी, उसीने मुझे इस गोद देने की प्रक्रिया के बारे में बताया. मुझे भी लगा, मेरी बेटी को सहारे और अच्छे परिवार की ज़रूरत है जो मैं नहीं दे पाऊँगी. अब मैं ख़ुद उसी एजेंसी में काम कर रही हूँ और अपने दो बच्चों का पेट भर रही हूँ. अब हालात कुछ बेहतर हैं. मेरे बेटे स्कूल भी जाने लगे हैं. मैं अधिकारियों से काग़ज़ात ले कर उन माँओं के हस्ताक्षर कराती हूँ जो अपना बच्चा गोद देना चाहती हूँ. मैं जान सकती हूँ मैं समझ सकती हूँ वे किन हालात से गुज़र रही हूँ क्योंकि यह मुझ पर भी बीत चुका है. मैं जानती हूँ इन बच्चों का जीवन बेहतर होगा क्योंकि उनका घर होगा और वे इसलिए बीमार नहीं पड़ेंगे या उनकी जान नहीं जाएगी क्योंकि उनके पास खाने को कुछ नहीं है. मैं झूठ नहीं बोलूँगी, अपनी बच्ची को देखने को मेरा दिल तरसता है. लेकिन मैं यह भी जानती हूँ कि वह मेरे पास रहती तो ज़िंदा नहीं रहती. उसे एक अमरीकी माँ ने गोद लिया है. मुझे कुछ काग़ज़ों पर दस्तख़त करने पड़े. फिर मेरी डीएनए जाँच हुई यह देखने के लिए कि मैं ही उस बच्ची की माँ हूँ. मुझे नहीं पता वह अब कहाँ है. मैं उसे वापस नहीं लाना चाहती लेकिन उसे देखना चाहती हूँ. या कम से कम उसकी तस्वीर देखना चाहती हूँ कि वह अब कैसी लगती है. मैं रोज़ प्रार्थना करती हूँ कि वह कभी न कभी मुझे दिखे. चाहे उस समय वह 15 या 20 साल की क्यों न हो चुकी हो. अब मेरा कोई पति नहीं है. सिर्फ़ दो बेटे हैं. मेरे माता-पिता को इस बच्ची के बारे में कभी पता नहीं चला. मैंने ये सब अपने तक ही सीमित रखा. बस मेरा बड़ा बेटा इस बारे में जानता है. वह मुझसे पूछता है कि मैंने ऐसा क्यों किया. वह सोचता है कि काश आज उसकी बहन उसके साथ होती. लेकिन वह यह भी जानता है कि हम सब किस मुश्किल दौर से गुज़रे हैं. मैं अपनी बच्ची को अपने पास रखती तो उसे खिलाती क्या. मेरे पास और कोई चारा ही नहीं 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में इस योजना पर विपक्ष ने कई सवाल उठाए और संसद के बाहर भी इसकी आलोचना की जा रही है. एक तर्क ये है कि सरकार का घाटा पहले ही काफी ज़्यादा है, ऊपर से इस योजना पर अरबों डॉलर का खर्च देश की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख देगा. पक्ष-विपक्ष के तर्क कांग्रेस पर आरोप लगे हैं कि वो चुनावों को ध्यान में रखकर खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आई है. इस योजना के पक्ष में अभियान चलाने वालों में से एक रीतिका खेड़ा कहती हैं कि इस योजना पर होने वाले खर्च को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है. उनका कहना है, \"इस बिल के तहत तीन योजनाएं पहले ही चालू हैं जिन पर सरकार पैसे खर्च कर रही है. इस बिल पर सरकार का जो खर्च बढ़ेगा वो केवल 30 हज़ार करोड़ का है. सरकार हर साल पाँच लाख करोड़ के टैक्स माफ कर देती है. हर साल सिर्फ सोना और हीरा उद्योग को 60 हज़ार करोड़ की टैक्स माफ़ी का लाभ मिलता है. इस लाभ को आधा क्यों नहीं कर सकते?\" विपक्ष ने सरकार की नीयत पर भी शक जताया है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सरकार की एक निगाह आम चुनाव पर टिकी है. दूसरे अन्य नेताओं ने सवाल उठाया है कि ये बिल चार साल पहले क्यों नहीं लाया गया. इस पर रीतिका खेड़ा कहती हैं, \"देर आयद, दुरुस्त आयद. देर से आया लेकिन ठीक तरह से आया.\" सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व नौकरशाह हर्ष मंदर का कहना है, \"अगर कोई सरकार चुनाव में वोट हासिल करने के लिए कोई क़दम उठाती है तो लोकतंत्र में ये चलता है.\" हर्ष मंदर भी इस बात को मानते हैं कि बिल देर से आया लेकिन कम से कम आया तो. कालाबाज़ारी इस योजना के तहत राशन की दुकानों से अनाज आम लोगों को दिया जाएगा. लेकिन आम धारणा ये है कि राशन की दुकानों से अनाज की कालाबाज़ारी होती है. भ्रष्टाचार का ये हाल है तो आम लोगों को लाभ आखिर किस तरह से मिल सकेगा. रीतिका खेड़ा कहती हैं राशन की दुकानों के सिस्टम में सुधार लाने की ज़रूरत है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इस योजना में कोई खामी है. सरकार ये दावा करती है कि इस योजना से 82 करोड़ लोगों को फायदा होगा लेकिन क्या बेघर लोगों को इस का लाभ होगा? क्या उन लाखों लोगों के पेट भरेंगे जो सड़कों पर या ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगते हैं? रीतिका के अनुसार इस बिल में ऐसे लोगों के पेट भरने का कोई प्रावधान नहीं है और ये \"इस बिल की एक बड़ी कमजोरी है.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकतें हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटरपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "यूपीए सरकार का ऐतिहासिक लेकिन विवादास्पद खाद्य सुरक्षा विधेयक सोमवार रात लोकसभा में पारित हो गया. राज्य सभा से भी इस बिल के पारित होने की पूरी संभावना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक के पारित होने के बाद एक से तीन रुपए प्रति किलो की रियायती दर पर देश की दो तिहाई आबादी को हर महीने 5 किलो तक अनाज मिल सकेगा. इस महत्वाकांक्षी योजना में 82 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने का प्रावधान है. लोकसभा में इस योजना पर विपक्ष ने कई सवाल उठाए और संसद के बाहर भी इसकी आलोचना की जा रही है. एक तर्क ये है कि सरकार का घाटा पहले ही काफी ज़्यादा है, ऊपर से इस योजना पर अरबों डॉलर का खर्च देश की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख देगा. पक्ष-विपक्ष के तर्क कांग्रेस पर आरोप लगे हैं कि वो चुनावों को ध्यान में रखकर खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आई है. इस योजना के पक्ष में अभियान चलाने वालों में से एक रीतिका खेड़ा कहती हैं कि इस योजना पर होने वाले 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द्वारा हर पल किए जा रहे हिंसा के प्रतिरोध में और पीड़ित जनता के पक्ष में खड़े होकर अनिवार्यतः हिंसा को अंजाम देने के लिए हम बाध्य हैं.\" छत्तीसगढ़: माओवादी हमले में सीआरपीएफ़ के 25 जवान मारे गए माओवादी प्रवक्ता ने सुकमा के ताज़ा हमले को पिछले साल सुकमा में 9 माओवादियों और ओडिशा में कथित रूप से 9 ग्रामीणों समेत 21 माओवादियों की हत्या के जवाब में की गई कार्रवाई बताया है. माओवादियों ने कहा है कि सुरक्षा बलों के मिशन 2017 को परास्त करने के लिए ही यह हमला किया गया है. विकल्प ने अपने बयान में कहा है कि पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के हमलों में मारे गए पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों के शवों के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं करते हैं. विकल्प ने उन ख़बरों का खंडन किया है, जिसमें कहा गया था कि सुकमा के ताज़ा हमलों में मारे गए जवानों के गुप्तांग काट दिए गए थे. इसके उलट विकल्प ने आरोप लगाया है कि बस्तर में माओवादियों के शवों के साथ पुलिस हमेशा दुर्व्यवहार करती रही है. विकल्प ने महिला माओवादियों के शवों की अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए जाने और उन्हें सोशल मीडिया में प्रसारित करने का भी आरोप लगाया है. विकल्प ने कहा, \"सशस्त्र बलों के जवान व्यक्तिगत तौर पर हमारे दुश्मन नहीं हैं, वर्ग दुश्मन तो कतई नहीं हैं.'' उन्होंने कहा, ''शोषणमूलक राज सत्ता के दमनकारी राज्य मशीनरी के हिस्से के तौर पर जन दमन के औजार के रूप में वे क्रांतिकारी आंदोलन के आगे बढ़ने के रास्ते में प्रत्यक्ष रूप से आड़े आ रहे हैं.'' उन्होंने कहा, ''पार्टी, पीएलजीए, जनताना सरकारों और जनता पर हमलों को अंजाम दे रहे हैं, इसलिए अनिवार्य रूप से पीएलजीए के हमलों का शिकार बन रहे हैं.\" विकल्प ने सुरक्षाबल के जवानों से अपनी नौकरियां छोड़ कर राज्य के ख़िलाफ़ खड़े होने का आह्वान किया है. दूसरी तरफ इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है कि सुरक्षाबल के जवानों के लगातार बढ़ते दबाव के कारण माओवादी बौखला गए हैं. मुख्यमंत्री ने सुकमा को माओवादियों की अंतिम लड़ाई करार दिया है. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है कि घात लगाकर हमला करना नक्सलियों की कायरतापूर्ण हरकत है. हमारे बहादुर जवानों का आमने-सामने मुकाबला करने की हिम्मत नक्सलियों में नहीं है. उन्होंने कहा, \"सुरक्षा बलों का दबाव नक्सलियों पर लगातार बढ़ रहा है. इस वजह से वे 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थी. रियाज़ खोखर ने कहा था, \" हम दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए लगातार और गंभीर बातचीत करना चाहते हैं.\" उनका कहना था,\" हम उम्मीद करते हैं कि भारत बातचीत के बारे में अपने रुख़ की फिर समीक्षा करेगा.\"\n\nSummary:", "target": "भारत ने इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि पाकिस्तान ने उसके प्रस्तावों पर जो शर्तें लगाईं हैं वो शांति प्रक्रिया में विलंब करने वाली और अव्यावहारिक हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसाथ ही पाकिस्तान के कुछ प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने का स्वागत किया है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नवतेज सरना ने कहा कि पाकिस्तान एक तरह से विभिन्न मार्गों पर बसें चलाने के प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुआ है उनका कहना था, \"हमें अफ़सोस है कि पाकिस्तान ने दिल्ली-लाहौर के रास्ते में अतिरिक्त बसें चलाने के प्रस्ताव के साथ ही मुंबई-कराची, खोकरापार-मुनाबाओ और श्रीनगर-मुज़फ़्फ़राबाद के बीच नई सेवा शुरू करने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है.\" दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी ने बीबीसी हिंदी सेवा से हुई बातचीत में कहा है कि वे दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने के उपायों के पक्ष में हैं. मैं दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने के पक्ष में हूँ ख़ुर्शीद महमूद कसूरी पाकिस्तान ने बुधवार को भारत के शांति के लिए रखे 12 सूत्री प्रस्तावों का स्वागत किया था लेकिन सीधे बातचीत न किए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया था. पाकिस्तान ने कहा था कि वह यातायात के नए संपर्कों को विकसित करने के लिए कार्य करेगा. भारत के दोनों कश्मीर के बीच बस सेवा चालू करने किए जाने के प्रस्ताव को पाकिस्तान के विदेश सचिव रियाज़ खोखर ने 'नेक ख्याल' बताया लेकिन इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की निगरानी की बात कही. भारत ने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की दिशा में पिछले सप्ताह बुधवार को 12 सूत्री पहल की थी. रियाज़ खोखर ने कहा था, \" हम दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए लगातार और गंभीर बातचीत करना चाहते हैं.\" उनका कहना था,\" हम उम्मीद करते हैं कि भारत बातचीत के बारे में अपने रुख़ की फिर समीक्षा करेगा.\"\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": 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चाहिए था उतना नहीं दबाया. इसी वजह से यहां की सरकार उनकी नज़र में अपना सम्मान कम नहीं करना चाहती. इसी कारण चीन की सरकार भारत और डोकलाम पर ज़ोर-शोर से बोलती है. दूसरा यह है कि चीन परेशान है कि भारत सीमा पर पाकिस्तान को दबा रहा है. पाकिस्तान को मोहरे के रूप में चीन इस्तेमाल करता रहा है लेकिन हाल के दिनों में वह कमज़ोर हुआ है. भारतीय सेना का दबाव तो पाकिस्तान पर है ही उसके अलावा अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने आर्थिक राशि को भी रोक दिया है जिससे चीन नाराज़ है. ...तो क्या भारत-चीन युद्ध टल सकता था? बाढ़ पीड़ितों के लिए काल बना भारत-चीन विवाद जनरल को चुप रहना चाहिए था? लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत की इतनी मज़बूती के चलते भी क्या जनरल रावत को ऐसी बात कहनी चाहिए थी? मुझे लगता है कि ये सोची समझी रणनीति है और चीन को कितना भी होशियार समझा जाए लेकिन वह इस जाल में फंस रहा है. मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री से मशविरे के बाद ही ऐसी बात कही गई है. प्रधानमंत्री अगर इस पूरे घटनाचक्र में शामिल नहीं होते तो वो सख़्त कदम नहीं उठाए जा सकते थे जो अब तक पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उठाए गए हैं. वो यह देखना चाहते हैं कि किस हद तक चीन जाता है और कितना आपा खोता है? तो अंजाम के लिए तैयार रहे भारत: पाकिस्तान चीन ने अब अफ़ग़ानिस्तान पर खेला बड़ा दांव? मोदी और शी जिनपिंग ये भी देखा गया है कि हालत हद से बदतर होते हुए भी चीन-भारत के बीच शांति बरकरार है और शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच एक अच्छा रिश्ता बना हुआ है. चीन रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहता है. आगे बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा क्योंकि दोनों देश युद्ध नहीं चाहते हैं. जनरल रावत के बयान से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. इस वक़्त सभी देश अपनी परेशानियों को झेल रहे हैं. जनरल रावत को भी अपने तरीके को सीमित करना ज़रूरी है क्योंकि भारत एक साथ दो मोर्चे नहीं खेल सकता है. पाकिस्तान और चीन दोनों को एक साथ नहीं दबाया जा सकता है. (बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत पर आधारित. यह उनके निजी विचार हैं.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "डोकलाम विवाद पर भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि यह क्षेत्र विवादित है और उत्तरी सीमा पर इस तरह का तनाव बड़े संघर्ष का रूप ले सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बयान के बाद चीन ने कई बातें कही हैं. एक तो यह कहा है कि जनरल रावत का बयान सही नहीं है और इस बयान से दोनों देशों के रिश्तों के बीच अड़चन आ सकती है. दूसरी बात उन्होंने यह कही है कि डोकलाम उनका है और इसमें कोई दो राय नहीं. उनका कहना है कि वह राष्ट्रीय एकता के लिए पूरा दम लगा देंगे और ज़्यादा से ज़्यादा डोकलाम का विवाद भूटान और चीन के बीच है जिसमें भारत की कोई भूमिका नहीं है. जम्मू-कश्मीर की शिक्षा से सेना प्रमुख का क्या लेना-देना? क्या फिर पैदा हो सकता है डोकलाम का विवाद? पुराना राग ही अलाप रहा चीन चीन ने ऐसी कोई नई बात नहीं की है और दो बातें साफ़ हैं. पहली ये कि चीन के अंदर ही कई विशेषज्ञों और नागरिकों का मानना है कि चीन पीछे हटा है और भारत को जितना दबाना चाहिए था उतना नहीं दबाया. इसी वजह से यहां की सरकार उनकी नज़र में अपना सम्मान कम नहीं करना चाहती. इसी कारण चीन की सरकार भारत और डोकलाम पर ज़ोर-शोर से बोलती है. दूसरा यह है कि चीन परेशान है कि भारत सीमा पर पाकिस्तान को दबा रहा है. पाकिस्तान को मोहरे के रूप में चीन इस्तेमाल करता रहा है लेकिन हाल के दिनों में वह कमज़ोर हुआ है. भारतीय सेना का दबाव तो पाकिस्तान पर है ही उसके अलावा अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने आर्थिक राशि को भी रोक दिया है जिससे चीन नाराज़ है. ...तो क्या भारत-चीन युद्ध टल सकता था? बाढ़ पीड़ितों के लिए काल बना भारत-चीन विवाद जनरल को चुप रहना चाहिए था? लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत की इतनी मज़बूती के चलते भी क्या जनरल रावत को ऐसी बात कहनी चाहिए थी? मुझे लगता है कि ये सोची समझी रणनीति है और चीन को कितना भी होशियार समझा जाए लेकिन वह इस जाल में फंस रहा है. मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री से मशविरे के बाद ही ऐसी बात कही गई है. प्रधानमंत्री अगर इस पूरे घटनाचक्र में शामिल नहीं होते तो वो सख़्त कदम नहीं उठाए जा सकते थे जो अब तक पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उठाए गए हैं. वो यह देखना चाहते हैं कि किस हद तक चीन जाता है और कितना आपा खोता है? तो अंजाम के लिए तैयार रहे भारत: पाकिस्तान चीन ने अब अफ़ग़ानिस्तान पर खेला बड़ा दांव? मोदी और शी जिनपिंग ये भी देखा गया है कि हालत हद से बदतर होते हुए भी चीन-भारत के बीच शांति बरकरार है और शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच एक अच्छा रिश्ता बना हुआ है. चीन रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहता है. आगे बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा क्योंकि दोनों देश युद्ध नहीं चाहते हैं. जनरल रावत के बयान से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. इस वक़्त सभी देश अपनी परेशानियों को झेल रहे हैं. जनरल रावत को भी अपने तरीके को सीमित करना ज़रूरी है क्योंकि भारत एक साथ दो मोर्चे नहीं खेल सकता है. पाकिस्तान और चीन दोनों को एक साथ नहीं दबाया जा सकता है. 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चीमेने से आपकी ख़ुराक कैसे अलग है? जापान के लोगों पर चर्बी क्यों नहीं चढ़ती इसका मतलब है- युवा औरतों में होता है अजीब किस्म का हार्ट अटैक यूँ ही नहीं बढ़ जाती है पुलिस वालों की तोंद यहां मर्द प्रति दिन 17,000 क़दम, जबकि महिलाएं 16,000 क़दम चलती हैं. 60 साल से ऊपर के लोगों का औसत चलना भी 15,000 क़दम होता है. शोधकर्ताओं में से एक कैलीफ़ोर्निया में लॉन्ग बीच मेमोरियल मेडिकल सेंटर से जुड़े डॉ ग्रीगोरी थॉमस कहते हैं, \"इससे वो व्यायाम का अधिकतम स्तर हासिल कर लेते हैं.\" दिल कितना मजबूत? जाम हुई धमनियों के कारण होने वाले दिल के दौरे के लिए कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम (सीएसी) प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार होता है. 10 बार फल-सब्जी खाइए, उमर बढ़ाइए! ज्यादा तेल-घी वाला खाना भी करता है लिंग भेद 705 लोगों पर किए गए अध्ययन में पता चला कि 45 साल की उम्र तक किसी चीमेने की धमनियों में सीएसी बिल्कुल नहीं था, जबकि इसी उम्र के 25% अमरीकियों में ये पाया जाता है. 75 साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते दो तिहाई चीमेने लोगों में सीएसी बिल्कुल नहीं होता, जबकि इसी उम्र के 80% अमरीकियों में ये पाया जाता है. कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी के प्रोफ़ेसर माइकल गुर्वेन ने बीबीसी को बताया, \"उपलब्ध आंकड़ों में किसी भी आबादी के मुक़ाबले यह बहुत ज़्यादा कम है.\" चार हफ्तों में दो इंच तोंद कम करना मुमकिन है? कई महिलाओं को ही नहीं पता फीमेल कंडोम के बारे में उनके मुताबिक, \"इस आंकड़े के नज़दीक केवल जापानी महिलाएं हैं.\" प्रो गुर्वेन ने कहते हैं, \"हफ़्ते में एक बार व्यायाम से काम नहीं चलेगा, साइकिल से काम पर जाएं, सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.\" एसेक्स यूनिवर्सिटी में क्लीनिकल साइकोलॉजी में रीडर डॉ गेविन सैंडरकॉक कहते हैं, \"यह शानदार अध्ययन है. अभी तक यही समझा जाता था कि कार्बोहाइड्रेट्स सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "शोधकर्ताओं ने बोलीविया के जंगलों में रहने वाले चीमेने लोगों के दिल को दुनिया का सबसे सेहतमंद दिल पाया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलांसेट में छपे एक अध्ययन के अनुसार, बूढ़े होने पर भी चीमेने लोगों के दिल की धमनियां बंद नहीं होतीं. शोधकर्ताओं का कहना है कि बिल्कुल अलग ख़ुराक और रहने के तौर तरीक़ों के कारण 'यह बेहद असाधारण आबादी' है. बोलीविया में अमेज़न के बारिश वाले जंगलों में चीमेने लोगों की क़रीब 16,000 की आबादी है. ये मैनीक्वी नदी के किनारे शिकार, मछली और खेती-बारी पर निर्भर है. उनकी ज़िंदगी के तौर तरीक़े, हज़ारों साल पहले इंसानी सभ्यता से मिलते जुलते हैं. यहां पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को लंबी यात्रा करनी पड़ी. दिल के मरीज़ों के लिए एक बहुत अच्छी ख़बर क्या आपको खाने में सुपरफूड की जरूरत है? 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(टाइटल 18, यूनाइटेड स्टेट्स कोड, सेक्शन 1546(ए) और 2) दूसरा आरोपः ग़लतबयानी खोबरागड़े ने चालबाजी करके ग़लत सूचनाएं और बयान दिए. उन्होंने नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास में एक दूसरे व्यक्ति को भी वीज़ा आवेदन के लिए जानबूझकर ग़लत बयान देने पर मजबूर किया. (टाइटल 18, यूनाइटेड स्टेट्स कोड, सेक्शन 1001 और 2) पढेंः देवयानी खोबरागड़े के मामले में अमरीकी अदालत में प्रस्तुत अभियोग पत्र स्पेशल एजेंट ने अमरीकी अदालत को यह भी बताया है कि उन्होंने ये आरोप किस आधार पर लगाए हैं. उनके द्वारा कोर्ट को बताए गए कुछ प्रमुख कारण निम्न हैं– (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका की अदालत में प्रस्तुत अभियोग पत्र अनुसार भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े पर धोखाधड़ी और ग़लतबयानी का आरोप है. अदालत में प्रस्तुत इस अभियोग पत्र के कुछ ख़ास बिंदु.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअमरीकी विदेश मंत्रालय के डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी सर्विसेज़ के स्पेशल एजेंट मार्क जे स्मिथ के हवाले से. पहला आरोपः वीज़ा में धोखाधड़ी खोबरागड़े ने अमरीकी विदेश मंत्रालय को जानबूझकर ऐसा रोज़गार अनुबंध दिया जिसमें ग़लत सूचना दी गई थी, जिसमें ग़लतबयानी की गई थी. यह अनुबंध खोबरागड़े ने एक अन्य व्यक्ति के लिए वीज़ा पाने के लिए प्रस्तुत किया था. 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डेरा सच्चा सौदा समर्थकों के बीच राज्य के कुछ स्थानों पर हिंसक झड़पें हुईं और बिगड़ती स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार को भारी तादाद में अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी थी. विवाद के ज़ोर पकड़ने के बाद 17 मई को तलवंडी में सिख समुदाय की एक बड़ी सभा में हुकुमनामा जारी किया गया था कि डेरा सच्चा सौदा का सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक बहिष्कार किया जाए. इसके अलावा पंजाब सरकार को चेतावनी दी गई थी कि डेरा प्रमुख बाबा राम रहीम को तीन दिनों के भीतर गिरफ़्तार किया जाए और पंजाब में स्थित डेरा के सभी केंद्र सील किए जाएं. शनिवार को चंडीगढ़ में कुछ गरमपंथी सिख संगठनों ने एक पत्रकार वार्ता में घोषणा की थी कि पंजाब सरकार को दी गई यह समयावधि रविवार की दोपहर 12 बजे ख़त्म हो रही है. इसके बाद सिख समुदाय की अकाल तख़्त में बैठक होगी. माना जा रहा है कि इस बैठक में सिख समुदाय की ओर से इस पूरे विवाद पर आगे की रणनीति तैयार की जा सकती है.\n\nSummary:", "target": "पंजाब पुलिस ने रविवार को डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह के ख़िलाफ़ धार्मिक भावना आहत करने के आरोप में भठिंडा में मामला 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उल्लेखनीय है कि शनिवार की देर रात गुप्तचर एजेंसियों ने सूचना दी थी कि मोदी की जान को खतरा हो सकता है जिसके बाद उनके आवास के आस पास कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि वो अगले कुछ घंटों में एक बयान जारी कर सकते हैं. हालांकि कल मोदी ने सभी पत्रकारों से कहा था कि वो आज यानी मतगणना के दिन उन्हें परेशान न करें. अभी तक सारी सीटों यानी 182 सीटों पर रुझान आ चुके हैं जिसमें से बीजेपी को 117सीटों पर बढ़त मिली हुई है.\n\nSummary:", "target": "गुजरात विधानसभा चुनावों में बीजेपी के अच्छे प्रदर्शन के बीच मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एसएमएस के ज़रिए अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकुछ पत्रकारों के मोबाईल पर आए इस संदेश में कहा गया है कि वो मुख्यमंत्री थे और आगे भी मुख्यमंत्री बने रहेंगे. हालांकि अंग्रेज़ी में लिखे गए इस एसएमएस में कहा गया है कि वो सीएम थे और सीएम रहेंगे, लेकिन आगे यह भी लिखा है कि सीएम का मतलब कॉमन मैन यानी आम आदमी भी होता है. हालांकि ये स्पष्ट है कि एसएमएस मुख्यमंत्री का ही है और वो अपनी जीत पर फिलहाल खुल कर नहीं बोल रहे हैं. मुख्यमंत्री के आवास के बाहर बड़ी संख्या में पत्रकार जमा है लेकिन अभी मोदी बाहर नहीं आए हैं. उल्लेखनीय है कि शनिवार की देर रात गुप्तचर एजेंसियों ने सूचना दी थी कि मोदी की जान को खतरा हो सकता है जिसके बाद उनके आवास के आस पास कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि वो अगले कुछ घंटों में एक बयान जारी कर सकते हैं. हालांकि कल मोदी ने सभी पत्रकारों से कहा था कि वो आज यानी मतगणना के दिन उन्हें परेशान न करें. अभी तक सारी सीटों यानी 182 सीटों पर रुझान आ चुके हैं जिसमें से बीजेपी को 117सीटों पर बढ़त मिली हुई है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 261, "source_item_id": "261", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 969, "clean_index": 240, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:240"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअफ़ग़ानिस्तान के फरयाब प्रांत के मयमाना शहर में हुए इस धमाके में 27 अन्य लोग घायल हुए हैं. यह जानकारी इस प्रांत के गवर्नर मोहम्मदुल्लाह बातश ने दी. अफ़ग़ानिस्तानः सोशल मीडिया के निशाने पर राष्ट्रपति चुनाव माना जा रहा है कि आत्मघाती हमलावर ने एक व्यस्त बाज़ार के प्रवेश द्वार पर ख़ुद को डेटोनेटर वाले बम से उड़ा दिया. अफ़ग़ानिस्तान में पाँच अप्रैल को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने वाले हैं. अभी तक किसी समूह ने इस हमले की जानकारी नहीं ली है. हालांकि तालिबान चरमपंथी और अल-क़ायदा से जुड़ा समूह 'इस्लामी मूवमेंट ऑफ़ उज़्बेकिस्तान' इस अशांत इलाक़े में काफ़ी सक्रिय है. बताश ने कहा कि विस्फोट के समय आत्मघाती हमलावर एक तिपहिया मोटरसाइकिल चला रहा था. उन्होंने कहा, \"यह एक स्थानीय बाज़ार था. सैकड़ों स्थानीय किसान और ग्रामीण यहाँ अपना सामान बेचने आते हैं. मारे गए और घायल हुए सभी लोग आम नागरिक थे.\" इस घटना के एक प्रत्यक्षदर्शी सैयद आग़ा ने बीबीसी को बताया, \"मैं रोटी ख़रीदने में व्यस्त था तभी मैंने ज़ोर का धमाका सुना. मैंने मृतकों को शव देखे. चारो तरफ़ ख़ून फैला हुआ था.\" चुनाव के लेकर विरोध अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव के बारे में लगा एक पोस्टर अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद बीबीसी संवाददाता के अनुसार चुनावों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि चुनाव में 1990 के दशक में हुए गृहयुद्ध में भाग ले चुके पुराने कबायली सरदार और गुरिल्ला समूहों के नेता हिस्सा ले रहे हैं. तालिबान ने चुनाव में हिस्सा लेने वालों को निशाना बनाने की धमकी दी है. अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान ने कहा, जनता रहे चुनाव से दूर काबुल में मौजूद बीबीसी संवाददाता बिलाल सरवरी के अनुसार देश के चुनाव आयोग ने 15 प्रांतों के 396 मतदान केंद्रों को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया है. सबसे अधिक मतदान केंद्र फरयाब प्रांत में ही बंद किए गए हैं. नेटो के नेतृत्व वाली सेना का आख़िरी दस्ता इस साल के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देगा. इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा पूरी तरह देश की सेनाओं के हाथ में होगी. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछले एक साल में अफ़ग़ानिस्तान में 2,959 आम नागरिक मारे गए हैं और 5,656 नागरिक घायल हुए हैं. इससे पहले के तुलना में मरने वालों और घायलों की संख्या 14 प्रतिशत बढ़ गई है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी हिस्से में एक आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 15 लोग मार गए हैं. मरने वालों में महिलाएँ और बच्चे भी हैं. यह जानकारी बीबीसी को अफ़ग़ान अधिकारियों ने दी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअफ़ग़ानिस्तान के फरयाब प्रांत के मयमाना शहर में हुए इस धमाके में 27 अन्य लोग घायल हुए हैं. यह जानकारी इस प्रांत के गवर्नर मोहम्मदुल्लाह बातश ने दी. अफ़ग़ानिस्तानः सोशल मीडिया के निशाने पर राष्ट्रपति चुनाव माना जा रहा है कि आत्मघाती हमलावर ने एक व्यस्त बाज़ार के प्रवेश द्वार पर ख़ुद को डेटोनेटर वाले बम से उड़ा दिया. अफ़ग़ानिस्तान में पाँच अप्रैल को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने वाले हैं. अभी तक किसी समूह ने इस हमले की जानकारी नहीं ली है. हालांकि तालिबान चरमपंथी और अल-क़ायदा से जुड़ा समूह 'इस्लामी मूवमेंट ऑफ़ उज़्बेकिस्तान' इस अशांत इलाक़े में काफ़ी सक्रिय है. बताश ने कहा कि विस्फोट के समय आत्मघाती हमलावर एक तिपहिया मोटरसाइकिल चला रहा था. उन्होंने कहा, \"यह एक स्थानीय बाज़ार था. सैकड़ों स्थानीय किसान और ग्रामीण यहाँ अपना सामान बेचने आते हैं. मारे गए और घायल हुए सभी लोग आम नागरिक थे.\" इस घटना के एक प्रत्यक्षदर्शी सैयद आग़ा ने बीबीसी को बताया, \"मैं रोटी ख़रीदने में व्यस्त था तभी मैंने ज़ोर का धमाका सुना. मैंने मृतकों को शव देखे. चारो तरफ़ ख़ून फैला हुआ था.\" चुनाव के लेकर विरोध अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव के बारे में लगा एक पोस्टर अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद बीबीसी संवाददाता के अनुसार चुनावों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि चुनाव में 1990 के दशक में हुए गृहयुद्ध में भाग ले चुके पुराने कबायली सरदार और गुरिल्ला समूहों के नेता हिस्सा ले रहे हैं. तालिबान ने चुनाव में हिस्सा लेने वालों को निशाना बनाने की धमकी दी है. अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान ने कहा, जनता रहे चुनाव से दूर काबुल में मौजूद बीबीसी संवाददाता बिलाल सरवरी के अनुसार देश के चुनाव आयोग ने 15 प्रांतों के 396 मतदान केंद्रों को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया है. सबसे अधिक मतदान केंद्र फरयाब प्रांत में ही बंद किए गए हैं. नेटो के नेतृत्व वाली सेना का आख़िरी दस्ता इस साल के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देगा. इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा पूरी तरह देश की सेनाओं के हाथ में होगी. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछले एक साल में अफ़ग़ानिस्तान में 2,959 आम नागरिक मारे गए हैं और 5,656 नागरिक घायल हुए हैं. इससे पहले के तुलना में मरने वालों और घायलों की संख्या 14 प्रतिशत बढ़ गई है. 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बीसीसीआई भी इस मामले पर 27 अक्तूबर को अपनी समीक्षा समिति की बैठक कर रहा है. इस बैठक में कोच और कप्तान के बीच चल रहे तकरार पर चर्चा की जाएगी. इस समिति के सामने कप्तान सौरभ गांगुली और कोच ग्रेग चैपल पेश होंगे. इस समिति में सुनील गावसकर, रवि शास्त्री और श्रीनिवास वेंकटराघवन भी शामिल हैं. 56 वर्षीय ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान ग्रेग चैपल ने इस साल जून में ही भारतीय क्रिकेट टीम के कोच का पद संभाला है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 264, "source_item_id": "264", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1364, "clean_index": 242, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:242"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजब वो 90 के दशक में हुए विस्फोटों को बुरी याद की तरह भुला चुके थे तो 2006 में रेल में हुए विस्फोटों ने मुंबई को एक बार फिर ज़ख़्मी कर दिया. वो ज़ख्म अभी भरे नहीं थे कि वहाँ देश का सबसे बड़ा 'सुनियोजित आतंकी हमला' हो गया. 24 घंटों से अधिक समय से अधिक समय बीत जाने के बाद भी चरमपंथियों के साथ सुरक्षा बलों की मुठभेड़ चल रही है और लोगों को बचाने की कोशिशें जारी है. असुरक्षा ओबराय होटल के बाहर अपने 12 साल के बच्चे के साथ आए केतन वखारिया कहते हैं कि जो हो रहा है वो ठीक नहीं हो रहा है और मुंबई में अब असुरक्षा की भावना घर कर रही है. वो कहते हैं, \"मेरा आफिस बिल्कुल ओबराय के पास में है. अब मुझे डर लगने लगा है. कोई सुरक्षित नहीं है इस शहर में. कब किसके साथ क्या हो जाए किसी को पता नहीं. घर से निकलो तो पता नहीं घर पहुंचेंगे या नहीं.\" केतन व्यावसायिक कंपनी में अच्छे पद पर काम करते हैं और उन्हें लगता है कि इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं है. वो कहते हैं, \"ग़ुस्सा भी आता है दुख भी होता है लेकिन किसको बोलें क्या बोलें. कोई कुछ करता थोड़े है. कोई समाधान दिखाई नहीं देता है. पहले बंगलौर में हुआ, दिल्ली में हुआ. मुंबई में पहले हो चुका है. लेकिन कोई कुछ कर नहीं रहा है कि ये सब रुके. मुंबई सुरक्षित नहीं रह गई है.\" केतन जहाँ हताश दिखते हैं वहीं ज़ुबैर बड़े नाराज़. वो मुंबई पुलिस से भी ख़ासे नाराज़ दिखे. उनका कहना था, \"मुंबई पुलिस इतने बड़े बड़े दावे करती है लेकिन काम देख लो उनका आप. एटीएस का प्रमुख मारा जाता है. करकरे जैसा ईमानदार अधिकारी मारा जा रहा है. पुलिस को कुछ पता नहीं क्या हो रहा है. पूरे देश में पिछले छह महीने में धमाके हुए और मुंबई का नाम सबसे ऊपर था लेकिन फिर चूक हो गई.\" ज़ुबैर जवान हैं शायद इसलिए नाराज़ भी लेकिन नरीमन प्वाइंट के पास ही रहने वाली कोठारी दंपत्ति अत्यंत संयत प्रतिक्रिया देते हैं और साथ ही सुझाव भी. हताशा योगेन कोठारी कहते हैं कि ये सब काम भटके हुए लोगों का है जिन्हें ग़लत पाठ पढ़ाया गया है. योगेन सुझाव देते हुए कहते हैं, \"हमें इसराइल और अमरीका से सीखना चाहिए कि आतंकवाद से कैसे निपटा जाता है. सीखने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि अगर ये नहीं रुकेगा तो सोचिए क्या होगा. हम तो कभी कभी बिल्कुल हताश हो जाते हैं.\" योगेन की पत्नी वेणु कहती हैं कि उन्हें पहली बार लगा कि ऐसी कोई घटना उनके साथ भी हो सकती है. वो कहती हैं, \"हम पास में रहते हैं. जब पता चला तो पहली प्रतिक्रिया तो यही थी कि बिल्कुल झटका लगा और विश्वास नहीं हुआ. हम अख़बार में पढ़ते थे कि फलां जगह हमला हुआ. अब लगता है कि ये मेरे साथ भी हो सकता है. ये बहुत डरावनी फीलिंग है.\" वेणु इस बात पर नाराज़ हो जाती हैं कि लोग बार बार ये क्यों कहते हैं कि मुंबई को टारगेट किया गया. उनका अपना तर्क है. वो कहती हैं, \"आतंकवाद नई बात नहीं है दुनिया के लिए या भारत के लिए. न्यूयार्क में पहले हुआ. ओलंपिक में ऐसी घटना हो चुकी है अब मुंबई में बंधक बनाया गया लोगों को तो इसके कारण मुंबई को बदनाम करना ठीक नहीं है.\" मुंबई के लोग अपनी बात रखने से चूकते नहीं हैं. अपनी प्रतिक्रिया देने से रुकते नहीं हैं और उनसे बात करने पर यही लगता है कि उनके लिए मुंबई की सरकार, पुलिस, प्रशासन, ट्रैफ़िक सबकुछ ख़राब हो सकता है लेकिन मुंबई से उनका प्यार कभी कम नहीं होगा.\n\nSummary:", "target": "मुंबई में हुए हमलों के बाद लोगों में गुस्सा, दुख और हताशा दिखती है साथ ही झलकती है उनकी आंखों से बेबसी कि कब तक वो ऐसे हमलों का सामना करते रहेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजब वो 90 के दशक में हुए विस्फोटों को बुरी याद की तरह भुला चुके थे तो 2006 में रेल में हुए 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'गड़बड़ी गैलेक्सी नोट 7 की बैटरी में थी' विमान में नहीं इस्तेमाल होगा गैलेक्सी नोट-7 असीम वारसी, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, सैमसंग इंडिया मोबाइल बिज़नेस 8-पॉइंट बैटरी चेक सैमसंग इंडिया मोबाइल बिज़नेस के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट असीम वारसी ने बीबीसी को बताया, \"सैमसंग ने एक नया गुणवत्ता परीक्षण '8-पॉइंट बैटरी चेक' को लागू किया है. ये मोबाइल उद्योग का मानक नहीं है. लेकिन यह गुणवत्ता जांच मापदंड बहुत कठिन है. इस प्रक्रिया से होकर ही गैलेक्सी एस 8 को लॉन्च किया गया था जो दुनिया भर के साथ ही भारत में भी काफ़ी सफ़ल रहा है.\" एप्पल के अगले आईफ़ोन के आस-पास सैमसंग ने अपने फ़ोन के लॉन्च की तारीख़ क्यों रखी यह पूछने पर असीम वारसी ने कहा, \"हम मार्च-अप्रैल के महीने में सैमसंग गैलेक्सी सिरीज़ का स्मार्टफ़ोन लॉन्च करते हैं. सितंबर में हम नोट सिरीज़ लॉन्च करते हैं. तारीख़ का टकराना महज़ संयोग है.\" भारतीय बाज़ार में सैमसंग नोट 8, 6 जीबी रैम और 64 जीबी इंटरनल मेमरी के साथ 67,900 रुपये में उतारा गया है. नोट 8 की ख़ासियत इसका बड़ा डिस्प्ले, डुअल रियर कैमरा, इंटेलिजेंट एस-पेन, 10 नैनोमीटर प्रोसेसर और बिक्सबी वॉयस असिस्टेंट है. डुअल रियर कैमरा क्या है नोट 8 की ख़ासियत? डिस्प्लेः सैमसंग ने नोट 8 को अब तक के सबसे बड़े डिस्प्ले के साथ उतारा है. इसमें 6.3 इंच का क्वॉड एचडी (2960x1440) रिज़ॉल्यूशन सुपर एमोलेड डिस्प्ले दिया गया है. इसके गोरिल्ला ग्लास डिस्प्ले की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि एक साथ इस पर दो एप्लिकेशन चलाए जा सकते हैं. कैमराः नोट 8 डुअल रियर कैमरा सेटअप वाला सैमसंग का पहला स्मार्टफ़ोन है. डुअल कैमरे 12 मेगापिक्सल के हैं तो फ़्रंट कैमरा 8 मेगापिक्सल का है. एस पेन एस-पेनः नोट सिरीज़ के एस-पेन जिससे ग्राहकों को शिकायत रहती थी उसे भी पहले से बेहतर बनाया गया है. कंपनी ने इस बार इंटेलिजेंट एस-पेन उतारा है. जिसे काफ़ी बेहतर बनाया गया है और इसके प्रेशर की सेंसिटिविटी में भी सुधार किया गया है. बिक्सबीः नोट 8 में वॉयस असिस्टेंट बिक्सबी है जो पलक झपकते ही आपके आदेश का पालन करता है. यह अनुवाद भी करता है आधे घंटे तक पानी में नुकसान नहीं वॉटर रेसिस्टेंसः कंपनी का दावा है कि नोट 8 को आधे घंटे तक डेढ़ मीटर गहरे पानी में रखने पर उसे नुकसान नहीं होगा. सुरक्षा फ़ीचर्सः फ़िंगर प्रिंट सेंसर और फ़ेस रिकग्निशन के साथ ही नोट 8 में आइरिस स्कैनर भी है. सिम कार्डः हाइब्रिड. एक नैनो सिम और नैनो सिम या माइक्रोएसडी (256 जीबी तक) के लिए जगह. बैटरीः 3,300 एमएएच बैटरी के साथ ही वायरलेस चार्जिंग. सैमसंग के गैलेक्सी एस 8 में क्या है ख़ास? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "साल 2016 में सैमसंग स्मार्टफ़ोन नोट 7 की बैटरी के अधिक गर्म होने और इसमें आग लगने की घटनाओं के बाद कंपनी को लॉन्च के दो महीने बाद ही इसकी बिक्री रोकनी पड़ी थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत में सैमसंग गैलेक्सी नोट 8 की क़ीमत 67,900 रुपये रखी गई है अमरीका और दक्षिण कोरिया में चार्ज करने के दौरान कई नोट 7 फ़ोन में धमाका हो गया. इस फ़ोन को हवाई जहाज तक में ले जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया. कंपनी को क़रीब 25 लाख नोट 7 बाज़ार से वापस बुलाने पड़े. इससे कंपनी को जहां 5.3 अरब डॉलर का नुकसान हुआ वहीं इसकी छवि को भी काफ़ी नुकसान हुआ. कंपनी ने जांच के बाद नोट 7 में आग के लिए बैटरी की ख़ामियों को ज़िम्मेदार ठहराया. अब बैटरी को 8 सुरक्षा चक्रों से गुज़ारे जाने के दावे के साथ मंगलवार को सैमसंग ने अपना नया स्मार्टफ़ोन नोट 8 भारतीय बाज़ार में उतारा है. 'गड़बड़ी गैलेक्सी नोट 7 की बैटरी में थी' विमान में नहीं इस्तेमाल होगा गैलेक्सी नोट-7 असीम वारसी, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, सैमसंग इंडिया मोबाइल बिज़नेस 8-पॉइंट बैटरी चेक सैमसंग इंडिया मोबाइल बिज़नेस के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट असीम वारसी ने बीबीसी को बताया, \"सैमसंग ने एक नया गुणवत्ता परीक्षण '8-पॉइंट बैटरी चेक' को लागू किया है. ये मोबाइल उद्योग का मानक नहीं है. लेकिन यह गुणवत्ता जांच मापदंड बहुत कठिन है. इस प्रक्रिया से होकर ही गैलेक्सी एस 8 को लॉन्च किया गया था जो दुनिया भर के साथ ही भारत में भी काफ़ी सफ़ल रहा है.\" एप्पल के अगले आईफ़ोन के आस-पास सैमसंग ने अपने फ़ोन के लॉन्च की तारीख़ क्यों रखी यह पूछने पर असीम वारसी ने कहा, \"हम मार्च-अप्रैल के महीने में सैमसंग गैलेक्सी सिरीज़ का स्मार्टफ़ोन लॉन्च करते हैं. सितंबर में हम नोट सिरीज़ लॉन्च करते हैं. तारीख़ का टकराना महज़ संयोग है.\" भारतीय बाज़ार में सैमसंग नोट 8, 6 जीबी रैम और 64 जीबी इंटरनल मेमरी के साथ 67,900 रुपये में उतारा गया है. नोट 8 की ख़ासियत इसका बड़ा डिस्प्ले, डुअल रियर कैमरा, इंटेलिजेंट एस-पेन, 10 नैनोमीटर प्रोसेसर और बिक्सबी वॉयस असिस्टेंट है. डुअल रियर कैमरा क्या है नोट 8 की ख़ासियत? डिस्प्लेः सैमसंग ने नोट 8 को अब तक के सबसे बड़े डिस्प्ले के साथ उतारा है. इसमें 6.3 इंच का क्वॉड एचडी (2960x1440) रिज़ॉल्यूशन सुपर एमोलेड डिस्प्ले दिया गया है. इसके गोरिल्ला ग्लास डिस्प्ले की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि एक साथ इस पर दो एप्लिकेशन चलाए जा सकते हैं. कैमराः नोट 8 डुअल रियर कैमरा सेटअप वाला सैमसंग का पहला स्मार्टफ़ोन है. डुअल कैमरे 12 मेगापिक्सल के हैं तो फ़्रंट कैमरा 8 मेगापिक्सल का है. एस पेन एस-पेनः नोट सिरीज़ के एस-पेन जिससे ग्राहकों को शिकायत रहती थी उसे भी पहले से बेहतर बनाया गया है. कंपनी ने इस बार इंटेलिजेंट एस-पेन उतारा है. जिसे काफ़ी बेहतर बनाया गया है और इसके प्रेशर की सेंसिटिविटी में भी सुधार किया गया है. बिक्सबीः नोट 8 में वॉयस असिस्टेंट बिक्सबी है जो पलक झपकते ही आपके आदेश का पालन करता है. यह अनुवाद भी करता है आधे घंटे तक पानी में नुकसान नहीं वॉटर रेसिस्टेंसः कंपनी का दावा है कि नोट 8 को आधे घंटे तक डेढ़ मीटर गहरे पानी में रखने पर उसे नुकसान नहीं होगा. सुरक्षा फ़ीचर्सः फ़िंगर प्रिंट सेंसर और फ़ेस रिकग्निशन के साथ ही नोट 8 में आइरिस स्कैनर भी है. सिम कार्डः हाइब्रिड. एक नैनो सिम और नैनो सिम या माइक्रोएसडी (256 जीबी तक) के लिए जगह. बैटरीः 3,300 एमएएच बैटरी के साथ ही वायरलेस चार्जिंग. सैमसंग के गैलेक्सी एस 8 में क्या है ख़ास? 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'आधारहीन' शार्ल पसकवा ने इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार से तेल मिलने के आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि ये आरोप अमरीका की अगुआई में चल रहे अभियान के तहत लगाए गए हैं जिसमें वे फ़्रांसीसी राष्ट्रपति ज़्याक शिराक की छवि खराब करना चाहते हैं. शार्ल पसकवा का कहना है कि ये आरोप बिल्कुल आधारहीन हैं. ये पहली बार नहीं है जब तेल के बदले अनाज कार्यक्रम के सिलसिले में शार्ल पसकवा का नाम सामने आया हो. इससे पहले हुई संयुक्त राष्ट्र की जाँच में भी उनका नाम सामने आया था. संयुक्त राष्ट्र ने जाँच के बाद कहा था कि शार्ल पसकवा ने सद्दाम हुसैन की सरकार से करीब एक करोड़ बैरल तेल रिश्वत के तौर पर लिया. शार्ल पसकवा 80 और 90 के दशक में दो बार फ़्रांस के आंतरिक मामलों के मंत्री रह चुके हैं. भ्रष्ट्राचार के कई अन्य मामलों में भी उनके ख़िलाफ़ जाँच चल रही है.\n\nSummary:", "target": "फ़्रांस के पूर्व आंतरिक मामलों के मंत्री शार्ल पसकवा ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र के तेल के बदले अनाज कार्यक्रम के सिलसिले में उनके ख़िलाफ़ औपचारिक रूप से जाँच शुरू हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी संवाददाता के मुताबिक इराक़ में चले तेल के बदले अनाज कार्यक्रम में कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते शार्ल पसकवा को जाँच के दायरे में लाया गया है. शार्ल पसकवा फ़्रांसीसी सीनेट के सदस्य है और पिछले साल संयुक्त राष्ट्र ने कार्यक्रम से जुड़ी जो जाँच शुरू की थे उसमें पूर्व मंत्री का भी नाम था. जाँच के दायरे में लाए जाने की बात पूर्व फ़्रांसीसी मंत्री ने ख़ुद बताई है. शार्ल पसकवा ने बताया कि एक फ़्रांसीसी मजिस्ट्रेट के साथ हुई डेढ़ घंटे की बातचीत के बाद उनके ख़िलाफ़ जाँच की कार्रवाई शुरू की गई. 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इस हैशटैग के तहत एक व्यक्ति ने ट्वीट किया, \"इससे न्याय और समानता आयी हो इसका एक भी उदाहरण नहीं मिलता.\" हालांकि इस हैशटैग का प्रयोग करने वालों में ज़्यादातर लोग शरिया क़ानून की बहुत ज़्यादा तीखे स्वर में आलोचना करने से परहेज कर रहे थे. शरिया की अलग-अलग व्याख्या एक अन्य व्यक्ति ने ट्वीट किया, \"आईएस, सोमालिया और अफ़ग़ानिस्तान में ये लागू हुआ और हम देख सकते हैं कि इसका क्या नतीजा हुआ.\" कई लोगों ने अलग-अलग देशों में शरिया की भिन्न-भिन्न व्याख्या पर भी सवाल उठाया. मिस्र के एक व्यक्ति ने लिखा, \"मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए शरिया का एक मतलब है, सलाफियों के लिए दूसरा, आईएस, बोको हराम और अल-क़ायदा के लिए तीसरा.\" इस्लाम का विरोध! कुछ लोगों को यह हैशटैग इस्लाम विरोधी भी लगा. एक व्यक्ति ने डॉ गैड पर टिप्पणी की, \"आप शरिया नहीं चाहती क्योंकि आप समलैंगिकता, शराब और व्याभिचार चाहती हैं.\" डॉक्टर गैड के अनुसार उन्होंने यह हैशटैग इसलिए शुरू किया क्योंकि वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल्य समझती हैं. वो कहती हैं, \"अगर मैं मिस्र में रह रही होती तो मुझमें इसकी आधी हिम्मत भी नहीं होती जितनी कि आज है.\" (मायी नोमान की रिपोर्ट पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अरब देशों के सोशल मीडिया में आजकल इस्लामी शरिया क़ानून हटाने की माँग पर बहस हो रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nट्विटर पर एक अरबी हैशटैग जिसका अर्थ है ' हम शरिया क्यों नहीं चाहते', 24 घंटे में पाँच हज़ार से भी ज़्यादा बार प्रयोग हुआ. यह हैशटैग ख़ासतौर पर सऊदी अरब और मिस्र में प्रयोग हो रहा है. बहस इस बात पर हो रही है कि अरब देशों के लिए इस्लामी शरिया क़ानून बेहतर है या आधुनिक न्याय व्यवस्था. स्विटज़रलैंड में रहने वाली मिस्र की डॉक्टर अलिया गैड ने इस हैशटैग को शुरू किया. उन्होंने बीबीसी ट्रेंडिंग से कहा, \"मैं धर्म के ख़िलाफ़ नहीं हूँ.\" राजनीतिक इस्लाम डॉक्टर गैड धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल के ख़िलाफ़ हैं. राजनीतिक इस्लामी अक्सर माँग करते रहे हैं कि मुस्लिम देशों में न्याय व्यवस्था इस्लामी शरिया क़ानून के अनुसार होनी चाहिए. डॉक्टर गैड कहती हैं कि वह नौजवानों के चरमपंथी विचारों के 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निकलने के बाद दिए अपने पहले इंटरव्यू में पेरिस हिल्टन ने कहा कि वो चाहती थीं कि लोगों को पता चले कि वो किस दौर से गुजरीं. एक घंटे चली बातचीत में उन्होंने कहा,“इस अपराध के हिसाब से मुझे दिया गया दंड ठीक नहीं था. मुझे जेल नहीं भेजा जाना चाहिए था.” पुर्नमूल्यांकन का अवसर हिल्टन ने कहा कि एक तरह से जो हुआ उनकी बेहतरी के लिए हुआ क्योंकि इसने उन्हें अपनी अब तक की ज़िंदगी पर एक और नज़र डालने का अवसर दिया. पेरिस हिल्टन ने कहा,“मैंने महसूस किया कि ये मेरे लिए एक नई शुरुआत है. जेल में बैठकर मैंने ख़ुद को जानने की कोशिश की और सोचा कि मैं कौन हूँ और मैं क्या करना चाहती हूँ.” उन्होंने कहा कि अपने प्रशंसकों के पत्र मिलने से वो बहुत उत्साहित हुईं. इन प्रशंसकों में इराक़ में काम कर रहे अमरीकी सैनिक भी शामिल थे. उन्होंने बातचीत के दौरान बताया,“इस अनुभव से मैं परिपक्व हुईं हूँ. मुझे कई लड़कियों और उनकी माताओं के भी पत्र मिले हैं. मैं इन लड़कियों के लिए अच्छी ‘रोल मॉडल’ बनना चाहती हूँ.” पेरिस हिल्टन ने कहा कि भविष्य में वो जेल से रिहा हुई औरतों के लिए एक आश्रय स्थल खोलना चाहती हैं. टेलीविज़न की दुनिया में जानामाना नाम लैरी किंग ने हिल्टन के बर्ताव को उलझन और घबराहटभरा बताया और कहा कि हिल्टन अपना अपराध मानने को तैयार नहीं थी. हिल्टन को तीन जून को 45 दिन की सज़ा सुनाई गई थी लेकिन जेल की भीड़भाड़ और अच्छे व्यवहार की वजह से उन्हें जल्दी रिहा कर दिया गया. पेरिस हिल्टन को पिछले साल सितंबर में शराब पीकर गाड़ी चलाने के आरोप में पकड़ा गया था. इसके बाद उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था और उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया गया था. लेकिन लाइसेंस निलंबित किए जाने के बावजूद वे फिर गाड़ी चलाते हुए पकड़ी गईं और उन्हें सज़ा सुनाई गई.\n\nSummary:", "target": "जेल से रिहा होने के बाद सीएनएन को दिए अपने पहले इंटरव्यू में पेरिस हिल्टन ने कहा कि जेल में उन्होंने ‘मानसिक यंत्रणा’ से भरे दिन बिताए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसीएनएन टीवी चैनल के मशहूर कार्यक्रम ‘लैरी किंग लाइव’ में बातचीत के दौरान पेरिस हिल्टन ने कहा,\"वो क्षण बहुत पीड़ादायक थे लेकिन मेरा मानना है कि भगवान हर चीज़ किसी वजह से ही करता है.\" पेरिस हिल्टन ने कहा कि अब वो पार्टियों में कम जाएंगी और एक 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Hindi.\n\nText:\nफ्रांस की समाचार एजेंसी को जारी किए गए एक बयान में अमिदी कॉलिबली की मां और बहनों ने मारे गए लोगों के परिजनों के प्रति अपनी संवेदना जाहिर की है. कॉलिबली शुक्रवार को पुलिस की कार्रवाई में मारे गए थे. उनकी मां और बहनों ने कहा है कि वे इस्लाम के प्रति कट्टरपंथी सोच रखने वालों से इत्तिफाक नहीं रखतीं. फ़र्क़ वे उम्मीद करती हैं कि लोग इस्लाम धर्म और इस हमले, जिन्हें वे 'घिनौना काम' बताती हैं, के बीच के फ़र्क़ को समझेंगे. समाप्त अमिदी कॉलिबली पुलिस की कार्रवाई में मारे गए. कॉलिबली ने पूर्वी पेरिस के एक यहूदी सुपरमार्केट में कई लोगों को बंधक बनाकर रखा और चार बंधकों की हत्या भी कर दी. स्टोर में काम करने वाले माली के एक युवक ने सात लोगों को कोल्ड स्टोरेज में छिपाकर उनकी जान बचाई. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ्रांस की राजधानी पेरिस के एक सुपरमार्केट में लोगों को बंधक बनाने वाले बंदूकधारी के परिजनों ने देश में हुए चरमपंथी हमलों की निंदा की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ्रांस की समाचार एजेंसी को जारी किए गए एक बयान में अमिदी कॉलिबली की मां और बहनों ने मारे गए लोगों के परिजनों के प्रति अपनी संवेदना जाहिर की है. कॉलिबली शुक्रवार को पुलिस की कार्रवाई में मारे गए थे. उनकी मां और बहनों ने कहा है कि वे इस्लाम के प्रति कट्टरपंथी सोच रखने वालों से इत्तिफाक नहीं रखतीं. फ़र्क़ वे उम्मीद करती हैं कि लोग इस्लाम धर्म और इस हमले, जिन्हें वे 'घिनौना काम' बताती हैं, के बीच के फ़र्क़ को समझेंगे. समाप्त अमिदी कॉलिबली पुलिस की कार्रवाई में मारे गए. कॉलिबली ने पूर्वी पेरिस के एक यहूदी सुपरमार्केट में कई लोगों को बंधक बनाकर रखा और चार बंधकों की हत्या भी कर दी. स्टोर में काम करने वाले माली के एक युवक ने सात लोगों को कोल्ड स्टोरेज में छिपाकर उनकी जान बचाई. 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एक अमरीकी इस्लामी धर्म गुरु फ़ैतुल्ला गुलेन से संबंध रखने का भी आरोप लगाया. फ़ैतुल्ला तुर्की के राष्ट्रपति रेचैप तैय्यप एर्दोगन के पूर्व सहयोगी हैं और स्वघोषित निर्वासित आध्यात्मिक नेता हैं. उन पर तुर्की में समानांतर सरकार चलाने का आरोप है. बयान के बाद छापे राष्ट्रपति एर्दोगन ने हाल ही में गुलेन के समर्थकों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ने की बात कही थी. उनके बयान के बाद ही मीडिया प्रतिनिधियों पर कार्रवाई की गई. ज़मन के प्रधान संपादक ने गि़रफ़्तारी के बाद कहा, \"हम इससे नहीं डरेंगे क्योंकि डरते वे लोग हैं, जो अपराध करते हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तुर्की में बड़े पैमाने पर पत्रकारों की गिरफ़्तारी की यूरोपीय संघ के शीर्ष अधिकारियों ने कड़ी निंदा की है और तुर्की सरकार के क़दम को 'लोकतंत्र विरोधी' बताया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयूरोपीय संघ के विदेश मामलों के प्रमुख फ़ेडरीका मोगेरीने ने कहा, \"ये गिफ़्तारियां यूरोपीय मूल्यों के ख़िलाफ़ हैं.\" उन्होंने कहा कि ये घटना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक 'मीडिया की स्वतंत्रता' को ठेस पहुंचाती है. समानांतर सरकार तुर्की पुलिस ने देश के प्रमुख अख़बारों और टीवी चैनलों के कम से कम 24 लोगों को गिरफ़्तार किया है. इन पर विपक्षी दल के साथ सांठगांठ कर सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का आरोप लगाया गया है. समाप्त सरकार ने अख़बार ज़मन और समनयोलू टीवी चैनल पर एक अमरीकी इस्लामी धर्म गुरु फ़ैतुल्ला गुलेन से संबंध रखने का भी आरोप लगाया. फ़ैतुल्ला तुर्की के राष्ट्रपति रेचैप तैय्यप एर्दोगन के पूर्व सहयोगी हैं और स्वघोषित निर्वासित आध्यात्मिक नेता हैं. उन पर तुर्की में समानांतर सरकार चलाने का आरोप है. बयान के बाद छापे राष्ट्रपति एर्दोगन ने हाल ही में गुलेन के समर्थकों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ने की बात कही थी. उनके बयान के बाद ही मीडिया प्रतिनिधियों पर कार्रवाई की गई. ज़मन के प्रधान संपादक ने गि़रफ़्तारी के बाद कहा, \"हम इससे नहीं डरेंगे क्योंकि डरते वे लोग हैं, जो अपराध करते हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": 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अर्जुन कपूर से बातचीत आगे बढ़ी और हिंदी के अलावा उन्होंने अपने चाचा अनिल कपूर और बहन सोनम कपूर की बात भी की. चाचा से सलाह नहीं लेता अपने चाचा अनिल कपूर की बात करते हुए अर्जुन ने कहा, \"हमारा रिश्ता एकदम चाचा-भतीजे वाला ही है. मज़ाक-मस्ती चलती रहती है. हम घर पर बैठकर एक दूसरे को सलाह-वलाह नहीं देते रहते हैं. उनके सामने बड़ा हुआ हूं और कभी कभी एकदम मेरे दोस्त बन जाते हैं.\" अर्जुन कहते हैं \"वो इतने ईमानदार हैं कि अगर मेरा काम उन्हें पसंद नहीं आता तो वो मीडिया के सामने बोल देते हैं कि अभी उसे और मेहनत करने की ज़रुरत है. बाकी तो ये मेरी खुशनसीबी है कि मैं उन्हें देख पाया कि कैसे वो अपना काम करते हैं.\" सोनम नज़र रखती है अर्जुन कपूर की चचेरी बहन सोनम कपूर हैं अपनी चचेरी बहन सोनम कपूर के बारे में अर्जुन कहते हैं, \"मैं और सोनम एक ही क्लास में पढ़े हैं. वो मुझ पर एकदम नज़र रखती है. खाने-पीने से लेकर,मैं कैसे कपड़े पहनता हूं हर चीज़ पर वो अपनी राय देती है. उसके सूत्र बड़े तगड़े हैं.\" वहीं अपने पिता बोनी कपूर के साथ काम करने की बात करते हुए अर्जुन ने कहा, \"मैं बहुत जल्द अपने पिता के साथ काम करुंगा. मैं उनके लायक बनना चाहता था. अपने बेटे को लॉंच करना उनके लिए बहुत भावुक काम होता लेकिन आज उनके साथ काम करने के लिए मै बेहतर स्थिति में हूं.\" अर्जुन ने बताया कि अपने पिता बोनी कपूर के साथ वो एक दक्षिण भारतीय फिल्म 'ओकड्डू' का रिमेक बना रहे हैं. 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सड़क ठीक करते ग्रामीण सबने सहयोग किया पंचायत समिति के सदस्य पिंटू रजक ने बीबीसी से कहा, \"कुछ सालों से यह सड़क काफ़ी ख़राब हो चुकी थी. बार-बार आग्रह के बाद भी जब सरकार ने इसकी मरमम्त नहीं कराई तो हम लोगों ने पिछले सप्ताह इसकी मरमम्त ख़ुद कराने का निर्णय लिया. दो दिन गांव वालों की बैठक हुई. इसमें श्रमदान की तारीख़ तय कर ली गई. फिर हमलोग जुटे और टुकड़ियों में बंटकर सड़क पर मोरंग, सुरखी आदि भरकर इसे चलने लायक बना दिया.\" क्यों उतरवाई जा रही है लोगों की लुंगी? सड़क निर्माण के दौरान ग्रामीण निंदिर गांव के सरफ़ुद्दीन मियां ने बताया कि ग्रामीणों की बैठक के दौरान ही सहयोग की बात तय हो गई. जिसके पास जो था, उन्होंने वो दिया. तुरीडीह के अनिल गुप्ता ने चार जेसीबी मशीन और 23 ट्रैक्टरों की व्यवस्था करा दी. गांव वाले कुदाल और टोकरी लेकर आ गए. मोरंग और सुरखी (पक्की ईटों का बुरादा) का इंतज़ाम हुआ और सड़क मरम्मत का काम शुरू हो गया. सबके खाने का इंतजाम भी गांव वालों ने आपसी सहयोग से किया. सोना मुर्मू को क्यों नहीं मिलता राशन का चावल 300 मज़दूर, 12 घंटे मैंने इस सड़क पर पूरे 13 किलोमीटर तक सफ़र कर इसका हाल जाना. इस दौरान मिले उमानाथ सिंह और कन्हाई सिंह ने मुझे बताया कि इस अभियान में 300 ग्रामीणों ने एक साथ श्रमदान किया. क़रीब 12 घंटे के अभियान के दौरान इस सड़क के टूट चुके हिस्सों को मोरंग, सुरखी, मिट्टी आदि से भरकर समतल कर दिया गया. ठीक हो चुकी सड़क औरंगा नदी इस सड़क को मोंगर गांव में दो हिस्से में बांटती है. इस पर बना पुल का कुछ हिस्सा धंस गया है. यहां मिले मथुरा प्रजापति ने बीबीसी को बताया कि इस पुल की मरम्मत अति आवश्यक है. यह कभी भी टूट सकता है. ऐसे में इस सड़क की मरम्मत का कोई फ़ायदा नहीं मिल सकेगा. सरकार बनवाएगी सड़क लातेहार के उप विकास आयुक्त अनिल कुमार सिंह ने कहा कि वो ग्रामीणों के अभियान की सराहना करते हैं, लेकिन लातेहार-रिचुगुटू सड़क की मरमम्त का डीपीआर तैयार कराया जा चुका है. बहुत जल्दी हम इसका टेंडर करने वाले हैं. इसके बाद इसका निर्माण शुरू करा देंगे. क्या KBC 9 की पहली करोड़पति को जानते हैं आप? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बिहार के दशरथ मांझी तो याद ही होंगे आपको, जिन्होंने पहाड़ तोड़कर सड़क बना दी थी. कुछ इससे मिलता-जुलता झारखंड में भी हुआ है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमरम्मत के बाद सड़क वह अलसायी-सी सुबह थी. लातेहार के शहरी इलाक़े में रहने वाले लोग अभी जगे भी नहीं थे. तभी रांची-लातेहार हाइवे से सटे केंद्रीय विद्यालय के पास ट्रैक्टर पर सवार कुछ लोग पहुंचे. फिर दूसरा ट्रैक्टर आया, फिर तीसरा, चौथा और यह गिनती बढ़ती चली गई. देखते ही देखते वहां सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई. इन लोगों ने आपस में बातचीत की. हंसी-ठहाके लगे और फिर शुरू हो गया वह अभियान, जिस कारण यहां की तीन पंचायतों के लोग इन दिनों चर्चा में हैं. दरअसल, लातेहार प्रखंड की मोंगर, डेमू और पेशरार पंचायतों के अधीन आने वाले एक दर्जन गांवों के लोगों ने श्रमदान की बदौलत लातेहार-रिचुगुटू सड़क की मरम्मत सिर्फ़ एक दिन में कर ली. इस दौरान भोज भी हुआ. वह तारीख़ थी चार अक्टूबर, दिन-बुधवार. झारखंड की भाजपा सरकार बनाएगी नया रिकॉर्ड ऐसा था सड़क का हाल कैसे चला अभियान इस काम में लगने वाले लोग निंदिर, हरखा, मोंगर, सेमरी, पेशरार, रिचुगुटू, कुदाग, तुरीडीह, बारीहातू, रेहलदाग आदि गांवों के थे. यह सड़क इन्हीं गांवों से गुज़रती है. मुखिया जी के उपनाम से प्रसिद्ध मोंगर के राजेंद्र साह ने बीबीसी को बताया कि ग्रामीण अभियंत्रण विभाग (आरइओ) ने सालों पहले लातेहार-रिचुगुटू सड़क का निर्माण कराया था. यह लातेहार को लोहरदगा ज़िले से जोड़ने का सबसे संक्षिप्त रूट है. रांची-लातेहार हाइवे के बगल में स्थित केंद्रीय विद्यालय से शुरू होने वाली यह सड़क 13 किलोमीटर लंबी है. इससे रोज़ हज़ारों लोगों का आवागमन होता है, क्योंकि इस सड़क से लोहरदगा जाने मे समय और पेट्रोल दोनों की बचत होती है, लिहाज़ा इस पर ट्रैफिक अधिक है. आख़िर बीजेपी ने ज्यां द्रेज को बोलने क्यों नहीं दिया? सड़क ठीक करते ग्रामीण सबने सहयोग किया पंचायत समिति के सदस्य पिंटू रजक ने बीबीसी से कहा, \"कुछ सालों से यह सड़क काफ़ी ख़राब हो चुकी थी. बार-बार आग्रह के बाद भी जब सरकार ने इसकी मरमम्त नहीं कराई तो हम लोगों ने पिछले सप्ताह इसकी मरमम्त ख़ुद कराने का निर्णय लिया. दो दिन गांव वालों की बैठक हुई. इसमें श्रमदान की तारीख़ तय कर ली गई. फिर हमलोग जुटे और टुकड़ियों में बंटकर सड़क पर मोरंग, सुरखी आदि भरकर इसे चलने लायक बना दिया.\" क्यों उतरवाई जा रही है लोगों की लुंगी? सड़क निर्माण के दौरान ग्रामीण निंदिर गांव के सरफ़ुद्दीन मियां ने बताया कि ग्रामीणों की बैठक के दौरान ही सहयोग की बात तय हो गई. जिसके पास जो था, उन्होंने वो दिया. तुरीडीह के अनिल गुप्ता ने चार जेसीबी मशीन और 23 ट्रैक्टरों की व्यवस्था करा दी. गांव वाले कुदाल और टोकरी लेकर आ गए. मोरंग और सुरखी (पक्की ईटों का बुरादा) का इंतज़ाम हुआ और सड़क मरम्मत का काम शुरू हो गया. सबके खाने का इंतजाम भी गांव वालों ने आपसी सहयोग से किया. सोना मुर्मू को क्यों नहीं मिलता राशन का चावल 300 मज़दूर, 12 घंटे मैंने इस सड़क पर पूरे 13 किलोमीटर तक सफ़र कर इसका हाल जाना. इस दौरान मिले उमानाथ सिंह और कन्हाई सिंह ने मुझे बताया कि इस अभियान में 300 ग्रामीणों ने एक साथ श्रमदान किया. क़रीब 12 घंटे के अभियान के दौरान इस सड़क के टूट चुके हिस्सों को मोरंग, सुरखी, मिट्टी आदि से भरकर समतल कर दिया गया. ठीक हो चुकी सड़क औरंगा नदी इस सड़क को मोंगर गांव में दो हिस्से में बांटती है. इस पर बना पुल का कुछ हिस्सा धंस गया है. यहां मिले मथुरा प्रजापति ने बीबीसी को बताया कि इस पुल की मरम्मत अति आवश्यक है. यह कभी भी टूट सकता है. ऐसे में इस सड़क की मरम्मत का कोई फ़ायदा नहीं मिल सकेगा. सरकार बनवाएगी सड़क लातेहार के उप विकास आयुक्त अनिल कुमार सिंह ने कहा कि वो ग्रामीणों के अभियान की सराहना करते हैं, लेकिन लातेहार-रिचुगुटू सड़क की मरमम्त का डीपीआर तैयार कराया जा चुका है. बहुत जल्दी हम इसका टेंडर करने वाले हैं. इसके बाद इसका निर्माण शुरू करा देंगे. क्या KBC 9 की पहली करोड़पति को जानते हैं आप? 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डॉलर की सहायता के अतिरिक्त होगा. यह भारत के सबसे बड़े सहायता कार्यक्रम में से एक है. भारत अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव में भी सहायता कर रहा है. इसके अलावा भारत अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में भी सहायता दे रहा है. श्याम सरन ने बताया कि भारत अब स्थानीय सामुदायिक विकास की योजनाओं को प्राथमिकता दे रहा है. भारतीय विदेश सचिव ने बताया कि प्रधानमंत्री काबुल के नज़दीक स्थित बाबर की मज़ार पर भी जाएँगे. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री के साथ जा रहे संसदीय प्रतिनिधिमंडल में राहुल गाँधी भी शामिल हैं. दो दशक बाद यात्रा यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की 29 साल बाद अफ़ग़ानिस्तान यात्रा होगी. इसके पहले 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने काबुल की यात्रा की थी. अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता संभालने के बाद राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने पिछले तीन वर्षों में तीन बार भारत की यात्रा कर चुके हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वहाँ राष्ट्रपति करज़ई से बातचीत करेंगे और अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व शासक ज़ाहिर शाह से भी मुलाक़ात करेंगे. भारत के सहायता कार्यक्रम से निर्मित हबीबिया स्कूल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति करज़ई अफ़ग़ानिस्तान प्रशासन को सौंपेगे. कुछ अर्से पहले भारत के विदेश मंत्री नटवर सिंह काबुल गए थे और उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत के सहयोग का वादा किया था.\n\nSummary:", "target": "भारत अफ़ग़ानिस्तान के संसद भवन का निर्माण करवा रहा है जिसकी आधारशिला भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अफ़ग़ानिस्तान यात्रा के दौरान रखी जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारतीय विदेश सचिव श्याम सरन ने शुक्रवार को मनमोहन सिंह की अफ़ग़ानिस्तान यात्रा के बारे में जानकारी दी और बताया कि संसद भवन की आधारशिला अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व शासक ज़ाहिर शाह रखेंगे लेकिन यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में होगा. भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दो दिन की यात्रा पर 28 अगस्त को अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल जा रहे हैं. विदेश सचिव ने बताया कि प्रधानमंत्री 50 मिलियन डालर के वित्तीय पैकेज की घोषणा करेंगे. यह 500 मिलियन डॉलर की सहायता के अतिरिक्त होगा. यह भारत के सबसे बड़े सहायता कार्यक्रम में से एक है. भारत अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव में भी सहायता 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सत्यजीत रे की फ़िल्म 'अपूर संसार' से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने 'जॉय बाबा फेलूनाथ' में फेलूदा का किरदार निभाया. समाप्त कई बार अपने अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड पा चुके सौमित्र चटर्जी को साल 2012 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था. साल 2004 में उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान लीज़न द'ऑनर से भी सम्मानित किया गया था. फेलूदा के किरदार में सौमित्र चटर्जी नाटक के मंच से रहा विशेष स्नेह सौमित्र चटर्जी का जन्म 19 जनवरी 1935 को पश्चिम बंगाल में नादिया ज़िले के कृष्णानगर में हुआ था. उनकी प्राथमिक शिक्षा कृष्णानगर में ही हुई थी. स्कूल में पढ़ने की उम्र से ही सौमित्र ने एक्टिंग शुरू कर दी थी. बीबीसी बांग्ला को दिए एक साक्षात्कार में सौमित्र चटर्जी ने कहा था कि कृष्णानगर में बचपन में ही उन्होंने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था. सौमित्र चटर्जी ने कहा था, \"बचपन में हम घर में तख्तों से मंच बनाते थे और बेड शीट से पर्दे बनाते थे. हम भाई-बहनों और दोस्तों के साथ मिलकर नाटक करते 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'शोनार किल्ला' में वो शरलॉक होम्स की तरह के एक जासूस के किरदार में नज़र आए, 'देवी' में वो नियमों का पालन करने वाला दूल्हा बने, 'अभिजान' में ग़ुस्से में रहने वाला उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवर बने तो 'अशनि संकट' में एक शांत रहने वाले पुजारी के किरदार में दिखे. नोबल सम्मान पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'चारूलता' पर बनी सत्यजीत रे की फ़िल्म में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ये भी पढ़ें: कपिल देव ने अपने बारे में अफ़वाह के बाद पोस्ट किया वीडियो हॉलीवुड की फ़िल्म 'द बंगाली नाइट' के सेट पर हू ग्रांट के साथ 'सत्यजीत रे मेरे लिए प्रेरणा रहे' सौमित्र चटर्जी, सत्यजीत रे के पसंदीदा एक्टर थे और सत्यजीत उन्हें सिनेमा पर लिखी किताबें पढ़ने के लिए देते थे. रविवार को दोनों साथ मिलकर हॉलीवुड की फ़िल्में देखते थे और चर्चा करते थे. चटर्जी ने एक बार कहा था, \"वो जो भी करते थे वो बिना कारण नहीं था, ऐसे नहीं था कि रविवार को मुझे एंटरटेंमेन्ट के लिए साथ में लेकर जाते थे.\" ये भी पढ़ें: 'लक्ष्मी' को 'महारानी' और 'शबनम मौसी' से आगे ले जा पाएंगे अक्षय कुमार? सत्यजीत रे का कहना था कि सौमित्र बेहतरीन एक्टर हैं लेकिन अगर उन्हें \"बुरी कहानी दी जाएगी तो उनका अभिनय भी वैसा ही होगा.\" साल 1992 में सत्यजीत रे की मौत हो गई. उस दौरान सौमित्र ने एक इंटरव्यू में कहा था, \"एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने सत्यजीत रे को याद न किया हो या उनके बारे में बात न की हो. प्रेरणा के तौर पर मेरी ज़िंदगी में वो हमेशा ही मौजूद रहे हैं. मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूं मुझे प्रेरणा मिलती है.\" सत्यजीत रे के अलावा सौमित्र चटर्जी ने तपन सिन्हा, मृणाल सेन, असित सेन, अजॉय कर, रितुपर्णो घोष और अपर्णा सेन के साथ भी काम किया. साल 1988 में उन्होंने हॉलीवुड की फ़िल्म 'द बंगाली नाइट' में हू ग्रांट और जॉन हर्ट के साथ काम किया. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बंगाली सिनेमा जगत के जाने-माने अभिनेता सौमित्र चटर्जी की रविवार को मौत हो गई है. वह 85 साल के थे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकोलकाता में मौजूद बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली ने बताया है कि कोलकाता के बेले व्यू क्लिनिक में रविवार दोपहर 12.15 बजे उनकी मौत हुई. उनका कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद 6 अक्टूबर को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनकी सेहत में पहले कुछ सुधार दिखा और उनकी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव भी आई. लेकिन बाद में उनकी शारीरिक जटिलताएँ बढ़ने के कारण उन्हें अक्तूबर के अख़िरी सप्ताह में वेंटिलेटर पर रखा गया. रविवार को उनकी मौत हो गई. सौमित्र चटर्जी ने 200 से अधिक फ़िल्मों में काम किया. उन्होंने जाने-माने निर्देशक सत्यजीत रे की फ़िल्म 'अपूर संसार' से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने 'जॉय बाबा फेलूनाथ' में फेलूदा का किरदार निभाया. समाप्त कई बार अपने अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड पा चुके सौमित्र चटर्जी को साल 2012 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था. साल 2004 में उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान लीज़न द'ऑनर से भी सम्मानित किया गया था. फेलूदा के किरदार में सौमित्र चटर्जी नाटक के मंच से रहा विशेष स्नेह सौमित्र चटर्जी का जन्म 19 जनवरी 1935 को पश्चिम बंगाल में नादिया ज़िले के कृष्णानगर में हुआ था. उनकी प्राथमिक शिक्षा कृष्णानगर में ही हुई थी. स्कूल में पढ़ने की उम्र से ही सौमित्र ने एक्टिंग शुरू कर दी थी. बीबीसी बांग्ला को दिए एक साक्षात्कार में सौमित्र चटर्जी ने कहा था कि कृष्णानगर में बचपन में ही उन्होंने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था. सौमित्र चटर्जी ने कहा था, \"बचपन में हम घर में तख्तों से मंच बनाते थे और बेड शीट से पर्दे बनाते थे. हम भाई-बहनों और दोस्तों के साथ मिलकर नाटक करते थे. इसके लिए घर के बुज़ुर्गों ने भी हमें बहुत हौसला दिया.\" नाटकों का उनका शौक बाद में भी उनके साथ रहा और वो फ़िल्मों के साथ-साथ मंच पर नज़र आते. बाद में उनके पिता काम के लिए कलकत्ता चले गए, फिर कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए सौमित्र भी कलकत्ता चले आए. कॉलेज के अपने दिनों के दौरान उनके एक मित्र ने उनका परिचय सत्यजीत रे से करवाया. उस वक़्त हुई ये छोटी मुलाक़ात बाद में दोनों के बीच गहरी दोस्ती में बदल गई. सत्यजीत रे की फ़िल्म के साथ शुरुआत करने के बाद उन्होंने उनके साथ कई और फ़िल्मों में काम किया. ये भी पढ़ें: मुथैया मुरलीधरन अपनी बायोपिक फ़िल्म के विरोध पर क्या बोले सत्यजीत रे ने 14 फ़िल्मों में सौमित्र चटर्जी के साथ काम किया. फ़िल्म आलोचक जीवनी लेखिका मैसी सेटॉन को एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, \"जब सत्यजीत रे ने मुझसे पूछा कि मैं क्या करना चाहता हूं तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं था. मुझे उस वक़्त स्टेज पर और फ़िल्मों में ऐक्टिंग के फ़र्क़ के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. मुझे डर था कि मैं ओवरऐक्ट न करूं.\" उन्होंने फ़िल्मों में कई तरह के किरदार निभाए. 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की शुरुआत में सोलर पैनल बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी सनटैक पावर होल्डिंग्स कर्ज़ चुकाने में नाकाम रही. कर्ज़ इसके बाद सोलर वेफ़र्स बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एलडीके सोलर कंपनी भी अपना कर्ज़ नहीं चुका सकी. हाल के वर्षों में दुनियाभर के देशों, खासकर विकसित देशों में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का प्रचलन बढ़ा है. चीन की कंपनियों ने इस बाज़ार के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा जमा रखा है और अग्रणी बनकर उभरी हैं. मगर कीमतों में कमी के साथ-साथ मांग घटने से दुनियाभर में सोलर पैनल बनाने वाली कंपनियां प्रभावित हुई हैं और चीन की कंपनियों को भी इसकी मार झेलनी पड़ रही है. अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों ने इसके लिए चीन की कंपनियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. उनका आरोप है कि चीन की कंपनियों ने सस्ते दामों पर माल बेचकर यह हालात पैदा किए. आरोप ऐसे दावे भी किए जा रहे हैं कि चीन सरकार ने अपनी कंपनियों को सब्सिडी दी, ताकि वो अपने उत्पादों की क़ीमत कम रख सकें. परिणामस्वरूप अमरीका जैसे देशों ने उन पर टेरिफ़ लगा दिया. हालांकि चीन ने इन आरोपों का खंडन किया है. लेकिन इन विवादों और गिरती क़ीमतों ने चीन की कंपनियों 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "चीन ने संकट से जूझ रहे सौर ऊर्जा सेक्टर को सहारा देने और प्रदूषण में कमी लाने के उद्देश्य से सौर ऊर्जा उपकरण बनाने वाली कंपनियों को कर में छूट देने की पेशकश की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसरकारी न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक़ सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण बनाने वाली कंपनियों को एक अक्टूबर 2013 से 31 दिसंबर 2015 के दौरान उनके मूल्य संवर्द्धित कर का 50 प्रतिशत हिस्सा वापस किया जाएगा. हाल के सालों में चीन की कंपनियां सौर ऊर्जा क्षेत्र में अहम ताक़त बनकर उभरी हैं, लेकिन कमज़ोर मांग और व्यापार संबंधी विवाद के चलते इन पर भारी कर्ज़ चढ़ा है. शिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक़ सोलर पैनल बनाने वाली देश की दस शीर्ष कंपनियों पर 100 अरब युआन यानी 16.3 अरब कर्ज़ है. इस साल की शुरुआत में सोलर पैनल बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी सनटैक पावर होल्डिंग्स कर्ज़ चुकाने में नाकाम रही. कर्ज़ इसके बाद सोलर वेफ़र्स बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एलडीके सोलर कंपनी भी अपना कर्ज़ नहीं चुका सकी. हाल के वर्षों में दुनियाभर के देशों, खासकर विकसित देशों में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का प्रचलन बढ़ा है. चीन की कंपनियों ने इस बाज़ार के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा जमा रखा है और अग्रणी बनकर उभरी हैं. मगर कीमतों में कमी के साथ-साथ मांग घटने से दुनियाभर में सोलर पैनल बनाने वाली कंपनियां प्रभावित हुई हैं और चीन की कंपनियों को भी इसकी मार झेलनी पड़ रही है. अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों ने इसके लिए चीन की कंपनियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. उनका आरोप है कि चीन की कंपनियों ने सस्ते दामों पर माल बेचकर यह हालात पैदा किए. आरोप ऐसे दावे भी किए जा रहे हैं कि चीन सरकार ने अपनी कंपनियों को सब्सिडी दी, ताकि वो अपने उत्पादों की क़ीमत कम रख सकें. परिणामस्वरूप अमरीका जैसे देशों ने उन पर टेरिफ़ लगा दिया. हालांकि चीन ने इन आरोपों का खंडन किया है. लेकिन इन विवादों और गिरती क़ीमतों ने चीन की कंपनियों को प्रभावित किया है और कुछ कंपनियों का भविष्य भी संदेह के घेरे में आ गया है. इन चिंताओं और देश में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनज़र चीन सोलर पैनल की आंतरिक मांग बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है. शिन्हुआ की रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि सरकारी मदद के बावजूद देश में इस इंडस्ट्री की हालत चिंताजनक है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 278, "source_item_id": "278", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1935, "clean_index": 256, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:256"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअब छत्तीसगढ़ में एक समाचार चैनल के पत्रकार आवेश तिवारी ने भारत में फ़ेसबुक की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर (दक्षिण और मध्य एशिया) अंखी दास के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए, 505 (1) (सी), 506, 500 और 34 के तहत एफ़आईआर दर्ज़ कराई है. एफआईआर में अंखी दास के अलावा दो अन्य व्यक्तियों विवेक सिन्हा और राम साहू को भी नामजद किया गया है. अंखी दास के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज कराने वाले पत्रकार आवेश तिवारी पिछले कई सालों से पत्रकारिता के पेशे में हैं और वे छत्तीसगढ़ सरकार की 'फेक न्यूज़ कमेटी' के भी सदस्य हैं. उनका कहना है कि हाल में 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में फ़ेसबुक इंडिया को लेकर जो जानकारी प्रकाशित हुई है, उससे पता चलता है कि फेसबुक भारत के सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने वालों को प्रोत्साहित करता रहा है. आवेश तिवारी ने इसी ख़बर को आधार बना कर अंखी दास के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज़ कराई है. समाप्त आवेश तिवारी ने बीबीसी हिंदी से कहा,\"फ़ेसबुक भारत में व्यापार करना चाहता है तो बेशक़ करे लेकिन उसे भारत में राजनीति करने का हक़ नहीं है. यह कॉर्पोरेट घराने और पत्रकार की लड़ाई नहीं है. यह भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है.\" रायपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय यादव का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और पुलिस नियम के अनुसार ही कार्रवाई करेगी. हाल ही में 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फ़ेसबुक भारत में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की कथित वैमनस्य फैलाने वाली पोस्ट पर रोक लगाने को लेकर 'कोताही बरतता' है. इस रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि फ़ेसबुक ने भाजपा कार्यकर्ताओं के वैमनस्य फ़ैलाने वाली पोस्ट को हटाए जाने से 'भारत में कंपनी के कारोबार पर प्रभाव' पड़ने की आशंका जताई थी. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद कांग्रेस पार्टी ने फ़ेसबुक और भाजपा को निशाने पर लिया है. इसके अलावा एआईसीसी ने फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग को पत्र लिख कर इस मामले की जांच की भी बात कही है. हालांकि 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' की रिपोर्ट के बाद फ़ेसबुक प्रवक्ता की ओर से इन आरोपों को ख़ारिज़ करते हुए कहा गया है कि फ़ेसबुक घृणा फ़ैलाने और हिंसा भड़काने वाली सामग्री पर रोक लगाता है और यह किसी पार्टी या राजनीतिक सम्बन्धों को बिना देखे अपनी नीतियों को लागू करता है. अंखी दास की शिकायत वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस ख़बर को लेकर जब देश भर में फ़ेसबुक को लेकर विवाद हुआ तो 16 अगस्त की रात भारत में फ़ेसबकु की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर (मध्य और दक्षिण एशिया) आंखी दास ने दिल्ली पुलिस की साइबर सेल को रायपुर के पत्रकार आवेश तिवारी समेत पांच लोग और अन्य अज्ञात के ख़िलाफ़ एक शिकायत भेजी. इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इन लोगों ने अंखी दास को हिंसक धमकियों वाली पोस्ट सोशल मीडिया पर साझा की. इसके बाद अगले ही दिन आवेश तिवारी ने अंखी दास के ख़िलाफ़ रायपुर पुलिस में एफआईआर दर्ज़ कराई. हालांकि एफआईआर में अंखी दास की शिकायत का उल्लेख नहीं है. एफ़आईआर के अनुसार आवेश तिवारी ने 16 अगस्‍त को अमरीकी अख़बार वॉल स्‍ट्रीट जर्नल में छपे एक लेख के आधार पर एक पोस्‍ट लिखी थी जिसमें कहा गया था कि 'अंखी दास लोकसभा चुनाव से पूर्व फ़ेसबुक के राजनैतिक हित के लिए तमाम तरह के हेट स्‍पीच से जुड़ी पोस्‍ट को न हटाने के लिए अपने अधीनस्‍थों पर दबाव डाल रही थीं. उनका कहना था कि इससे केंद्र सरकार से राजनैतिक सम्‍बन्ध खराब हो सकते हैं.' आवेश तिवारी के अनुसार, \"फेसबुक यूज़र राम साहू ने मुझे और मेरा घर जला डालने की बात कही है. इस पोस्‍ट के बाद मुझे जगह जगह से वॉट्सएप कॉल और मैसेज आ रहे हैं. मुझे धमकियां दी जा रही हैं जिसमें फेसबुक की निदेशक अंखी दास का नाम लेकर मुझे जाने से मारने और बर्बाद करने की धमकी दी जा रही है.\" आवेश तिवारी ने एफ़आईआर में कहा है कि राम साहू, अंखी दास और विवेक सिन्‍हा मिलकर धार्मिक वैमनस्‍यता फैलाकर उन्‍हें बदनाम कर रहे हैं, जिससे उनकी जान को ख़तरा पैदा हो गया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत में फ़ेसबुक के कथित पक्षपात को लेकर शुरू हुआ विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअब छत्तीसगढ़ में एक समाचार चैनल के पत्रकार आवेश तिवारी ने भारत में फ़ेसबुक की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर (दक्षिण और मध्य एशिया) अंखी दास के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए, 505 (1) (सी), 506, 500 और 34 के तहत एफ़आईआर दर्ज़ कराई है. एफआईआर में अंखी दास के अलावा दो अन्य व्यक्तियों विवेक सिन्हा और राम साहू को भी नामजद किया गया है. अंखी दास के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज कराने वाले पत्रकार आवेश तिवारी पिछले कई सालों से पत्रकारिता के पेशे में हैं और वे छत्तीसगढ़ सरकार की 'फेक न्यूज़ कमेटी' के भी सदस्य हैं. उनका कहना है कि हाल में 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में फ़ेसबुक इंडिया को लेकर जो जानकारी प्रकाशित हुई है, उससे पता चलता है कि फेसबुक भारत के सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने वालों को प्रोत्साहित करता रहा है. आवेश तिवारी ने इसी ख़बर को आधार बना कर अंखी दास के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज़ कराई है. समाप्त आवेश तिवारी ने बीबीसी हिंदी से कहा,\"फ़ेसबुक भारत में व्यापार करना चाहता है तो बेशक़ करे लेकिन उसे भारत में राजनीति करने का हक़ नहीं है. यह कॉर्पोरेट घराने और पत्रकार की लड़ाई नहीं है. यह भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है.\" रायपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय यादव का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और पुलिस नियम के अनुसार ही कार्रवाई करेगी. हाल ही में 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फ़ेसबुक भारत में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की कथित वैमनस्य फैलाने वाली पोस्ट पर रोक लगाने को लेकर 'कोताही बरतता' है. इस रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि फ़ेसबुक ने भाजपा कार्यकर्ताओं के वैमनस्य फ़ैलाने वाली पोस्ट को हटाए जाने से 'भारत में कंपनी के कारोबार पर प्रभाव' पड़ने की आशंका जताई थी. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद कांग्रेस पार्टी ने फ़ेसबुक और भाजपा को निशाने पर लिया है. इसके अलावा एआईसीसी ने फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग को पत्र लिख कर इस मामले की जांच की भी बात कही है. हालांकि 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' की रिपोर्ट के बाद फ़ेसबुक प्रवक्ता की ओर से इन आरोपों को ख़ारिज़ करते हुए कहा गया है कि फ़ेसबुक घृणा फ़ैलाने और हिंसा भड़काने वाली सामग्री पर रोक लगाता है और यह किसी पार्टी या राजनीतिक सम्बन्धों को बिना देखे अपनी नीतियों को लागू करता है. अंखी दास की शिकायत वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस ख़बर को लेकर जब देश भर में फ़ेसबुक को लेकर विवाद हुआ तो 16 अगस्त की रात भारत में फ़ेसबकु की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर (मध्य और दक्षिण एशिया) आंखी दास ने दिल्ली पुलिस की साइबर सेल को रायपुर के पत्रकार आवेश तिवारी समेत पांच लोग और अन्य अज्ञात के ख़िलाफ़ एक शिकायत भेजी. इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इन लोगों ने अंखी दास को हिंसक धमकियों वाली पोस्ट सोशल मीडिया पर साझा की. इसके बाद अगले ही दिन आवेश तिवारी ने अंखी दास के ख़िलाफ़ रायपुर पुलिस में एफआईआर दर्ज़ कराई. हालांकि एफआईआर में अंखी दास की शिकायत का उल्लेख नहीं है. एफ़आईआर के अनुसार आवेश तिवारी ने 16 अगस्‍त को अमरीकी अख़बार वॉल स्‍ट्रीट जर्नल में छपे एक लेख के आधार पर एक पोस्‍ट लिखी थी जिसमें कहा गया था कि 'अंखी दास लोकसभा चुनाव से पूर्व फ़ेसबुक के राजनैतिक हित के लिए तमाम तरह के हेट स्‍पीच से जुड़ी पोस्‍ट को न हटाने के लिए अपने अधीनस्‍थों पर दबाव डाल रही थीं. उनका कहना था कि इससे केंद्र सरकार से राजनैतिक सम्‍बन्ध खराब हो सकते हैं.' आवेश तिवारी के अनुसार, \"फेसबुक यूज़र राम साहू ने मुझे और मेरा घर जला डालने की बात कही है. इस पोस्‍ट के बाद मुझे जगह जगह से वॉट्सएप कॉल और मैसेज आ रहे हैं. मुझे धमकियां दी जा रही हैं जिसमें फेसबुक की निदेशक अंखी दास का नाम लेकर मुझे जाने से मारने और बर्बाद करने की धमकी दी जा रही है.\" आवेश तिवारी ने एफ़आईआर में कहा है कि राम साहू, अंखी दास और विवेक सिन्‍हा मिलकर धार्मिक वैमनस्‍यता फैलाकर उन्‍हें बदनाम कर रहे हैं, जिससे उनकी जान को ख़तरा पैदा हो गया है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के दक्षिणी शहर कराची के भीड़भाड़ वाले इलाक़ों में हुए दो बम धमाकों में कम से कम सात लोगों की मौत की खबर है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्थानीय मीडिया के मुताबिक़ शिया आबादी की अधिकता वाले इलाक़े अंचोली में हुए इन बम विस्फोट में कम से कम 18 लोग घायल हुए हैं. धमाकों के तुरंत बाद मौक़े पर जमा भीड़ में काफ़ी ग़ुस्सा देखा गया. लोगों ने धमाकों के विरोध में नारेबाज़ी भी की. स्थानीय पुलिस अधिकारी जावेद ओधो ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि विस्फोट तेज़ आवाज़ के साथ हुए. शिया-सुन्नी तनाव जावेद ओधो के मुताबिक़ फिलहाल यह कहना कठिन है कि शिया लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया गया क्योंकि जिस इलाक़े में विस्फोट हुए हैं, वहां सुन्नी भी रहते हैं. पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के बाद तनाव बना हुआ है. ख़बरों के मुताबिक़ घायलों में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं. विस्फोट से दुकानों और बिजली के तारों को नुक़सान पहुंचा और इस वजह से पूरे इलाक़े में अंधेरा छा गया. हालांकि बाद में बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई. सिंध प्रांत के सूचना मंत्री शारजील मेमन ने हमलों की निंदा की और इन्हें कायरतापूर्ण हरकत बताया है. सांप्रदायिक हिंसा शिया समूहों ने भी इसका विरोध किया है और उन्होंने शनिवार को एक दिन के शोक की घोषणा की है. पाकिस्तान में हाल के दिनों में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा के कारण काफ़ी तनाव बना हुआ है. इस कारण सरकार को कई जगह कर्फ़्यू लगाना पड़ा और मोबाइल फ़ोन नेटवर्क को भी जाम किया गया है. इससे पहले रावलपिंडी में हुए सांप्रदायिक दंगों के विरोध में शुक्रवार को सुन्नी समुदाय के दलों ने एक दिन के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था. रावलपिंडी में तब हिंसा भड़की थी, जब शिया मुसलमान धार्मिक पर्व आशुरा के आयोजन की तैयारी कर रहे थे. इन दंगों में आठ लोगों की मौत हुई जबकि दर्जनों घायल हो गए. 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भी आपस में जोड़ती है. संपन्न घरों के नौजवान \"अभी इस रिंग रोड के कई भागों का निर्माण चल रहा है और उस पर कई काम होने बाक़ी हैं. इस रिंग रोड की ज़िम्मेवारी कई दूसरी एजंसियों पर भी है, इसलिए मैं कुछ कैसे कह सकता हूँ.\" यादगिरी राव, साइबराबाद के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (ट्राफिक) लेकिन यह भी एक अजीब बात है की इस एक्सप्रेस वे पर दुर्घटनाओं में मरने वाले अधिकतर संपन्न घरानों के सदस्य या जानी-मानी हस्तियों के नौजवान पुत्र ही हैं. 11 सितम्बर 2011 को जिस मोटर साइकल दुर्घटना में अज़हर के पुत्र की मृत्यु हुई थी वो 1000 सीसी की इम्पोर्टेड सुज़ूकी मोटर साइकिल थी जो अजहर ने अपने बेटे को जन्मदिन पर तोहफे में दी थी. साइबराबाद पुलिस के अनुसार अयाज़ 150 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रहे थे इसलिए नियंत्रण खो बैठे और डिवाइडर से टकरा गए. इससे पहले 20 जून 2010 को एक तेलुगु फिल्म अभिनेता और भाजपा के पूर्व सांसद कोटा श्रीनिवास राव के पुत्र और अभिनेता कोटा प्रसाद की तेज़ गति से चलने वाली इम्पोर्टेड मोटर साइकिल से इसी सड़क पर जाते हुए एक बड़े वाहन से टकराकर मौत हो गई. लापरवाही? एक पुलिस अधिकारी का कहना था, \"इस 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'अधबनी' सड़क वेंकट रेड्डी के पुत्र प्रतीक रेड्डी की मृत्यु उनकी स्कोडा कार के बेहद तेज़ गति से दौड़ते हुए उलटने से हुई. साइबराबाद के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (ट्राफिक) यादगिरी राव ने इन दुर्घटनाओं के कारण पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए बीबीसी से कहा, \"अभी इस रिंग रोड के कई भागों का निर्माण चल रहा है और उस पर कई काम होने बाक़ी हैं. इस रिंग रोड की ज़िम्मेवारी कई दूसरी एजंसियों पर भी है, इसलिए मैं कुछ कैसे कह सकता हूँ. रिंग रोड का निर्माण पूरा होने के बाद ही इसका नियंत्रण पूरे तरह से हमारे हाथ में आएगा\". इस रिंग रोड का निर्माण वर्ष 2005 में शुरू हुआ. अभी तक इस रिंग रोड के जिन भागों का निर्माण पूरा हुआ है उन्हें ट्राफिक के लिए खोल दिया गया है. अधिकारी मानते हैं की इस रिंग रोड के जिन भागों को खोला गया है उन पर भी रोशनी का पूरा प्रबंध पूरा नहीं हुआ है और कई बाधाएं लगाना भी अभी बाक़ी है. इस सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त हो कर मरने वाले एक युवा के पिता ने अपनी पहचान न बताने की शर्त पर कहा, \"सरकार को लोगों की जान की परवाह नहीं है. इसलिए केवल रिंग रोड के कुछ भागों को खोल दिया, ताकि सात वर्ष के बाद भी उसका निर्माण पूरा नो होने पर कोई आलोचना न करे\". इस सड़क का उद्देश हैदराबाद नगर के अंदर ट्राफिक के बोझ को कम करना और नगर के किसी भी भाग से जल्द से जल्द नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंचने की सुविधा उपलब्ध करवाना था. यह हैदराबाद से जाने वाले तीन राष्ट्रीय मार्गों और कई राज्य मार्गों को भी आपस में जोड़ती है. संपन्न घरों के नौजवान \"अभी इस रिंग रोड के कई भागों का निर्माण चल रहा है और उस पर कई काम होने बाक़ी हैं. इस रिंग रोड की ज़िम्मेवारी कई दूसरी एजंसियों पर भी है, इसलिए मैं कुछ कैसे कह सकता हूँ.\" यादगिरी राव, साइबराबाद के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (ट्राफिक) लेकिन यह भी एक अजीब बात है की इस एक्सप्रेस वे पर दुर्घटनाओं में मरने वाले अधिकतर संपन्न घरानों के सदस्य या जानी-मानी हस्तियों के नौजवान पुत्र ही हैं. 11 सितम्बर 2011 को जिस मोटर साइकल दुर्घटना में अज़हर के पुत्र की मृत्यु हुई थी वो 1000 सीसी की इम्पोर्टेड सुज़ूकी मोटर साइकिल थी जो अजहर ने अपने बेटे को जन्मदिन पर तोहफे में दी थी. साइबराबाद पुलिस के अनुसार अयाज़ 150 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रहे थे इसलिए नियंत्रण खो बैठे और डिवाइडर से टकरा गए. इससे पहले 20 जून 2010 को एक तेलुगु फिल्म अभिनेता और भाजपा के पूर्व सांसद कोटा श्रीनिवास राव के पुत्र और अभिनेता कोटा प्रसाद की तेज़ गति से चलने वाली इम्पोर्टेड मोटर साइकिल से इसी सड़क पर जाते हुए एक बड़े वाहन से टकराकर मौत हो गई. लापरवाही? एक पुलिस अधिकारी का कहना था, \"इस रिंग रोड पर अगर सबसे ज्यादा सेलिब्रिटिस के युवा लड़के मर रहे हैं तो इसका करण यह है की वो अपनी शक्तिशाली मोटर साइकलों और कारों को इस रिंग रोड पर अंधाधुंध दौड़ाते हैं. इस पर ट्राफिक नहीं है, कोई बाधा नहीं है और इसकी दोनों और तार लगा देने से कोई जानवर भी यहां नहीं आता.\" इसके अलावा शुरूआत में युवाओं की टोली रात में इस रिंग रोड का उपयोग \"रेस ट्राक\" की तरह कर रही थी. मोटर साइकलों की रेस हुआ करती थी, एक पहिए पर बाइक चलाने, या सीट पर खड़े होकर चलाने जैसे करतब भी किए जाते थे. अजहरुद्दीन के पुत्र की मौत के बाद जब शोर शराबा हुआ तो पुलिस ने युवाओं के रात में इस रोड पर मोटरसाइकल चलाने पर रोक लगा दी. इसे भी पढ़ें\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", 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लेकिन साथ में वेबसाइट पर मॉन्स्टर का ब्रांड भी लगेगा. इस वेब साइट पर 25 लाख लोगों का बायोडेटा और 55 लाख लोगों के बारे में आँकड़े उपलब्ध होंगे.\n\nSummary:", "target": "अमरीका की एक बड़ी करियर वेबसाइट मॉन्स्टर ने भारत की वेबसाइट जॉब्सअहेड डॉटकॉम को 40 करोड़ रुपए में ख़रीद लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसके साथ ही मॉन्स्टर इंडिया देश की सबसे बड़ी नौकरी दिलाने वाली ऑनलाइन एजेंसी बन गई है. जॉब्सअहेड डॉटकॉम के चेयरमैन पुनीत डालमिया ने पत्रकारों को बताया, \"यह सौदा लगभग 40 करोड़ रुपए का है.\" स्वीकृति मॉन्स्टर एशिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अरुण तणाकी ने कहा कि अभी कंपनी को अधिकारियों की स्वीकृति मिलनी बाक़ी है और इसके बाद ही वे इसका विवरण दे पाएँगे. सरकारी तौर पर इस सौदे को मंज़ूरी मिलने में कम से कम तीन महीने लग जाएँगे. भारत में अब इस साझा कंपनी का नाम भी मॉन्स्टर होगा. इसमें कुल 200 कर्मचारी होंगे जिनमें से 135 जॉब्सअहेड डॉट कॉम के होंगे. अरुण तणाकी का कहना है कि अगले छह से बारह महीने तक जॉब्सअहेड डॉट कॉम का अलग अस्तित्त्व बना रहेगा लेकिन 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धाँधली होने की ख़बरें मिलीं. उन्होंने बताया कि सुरक्षा के पक्के इंतज़ामों के दावों के बावजूद केंद्रीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति बहुत कम थी. उत्तर प्रदेश लखनऊ से बीबीसी संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी के अनुसार मतदान के दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश की 30 सीटों के लिए मतदान शांतिपूर्वक रहा. कहीं-कहीं वोटिंग मशीन में ख़राबी के कारण मतदान में देरी हुई. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ के बिशन नारायण इंटर कॉलेज पोलिंग स्टेशन पर मतदान किया जहाँ देश-विदेश के पत्रकार और छायाकार बड़ी संख्या में मौजूद थे. प्रधानमंत्री ने कहा कि अधिक से अधिक लोगों को मताधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए. यह पूछे जाने पर कि क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार फिर से बनने की संभावना है तो वाजपेयी ने हँसते हुए कहा, \"विश्वास तो है\". एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि एक्ज़िट पोल के रुझान से वह कोई मुश्किल महसूस नहीं करते. उधर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इटावा में अपने गाँव सैफ़ई के मतदान केंद्र पर मतदान किया. उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि इस चुनाव में सांप्रदायिक शक्तियों का देश से 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वर्षीय अकिरा हारागुची जापान के चिबा शहर में रहते हैं और उन्हें पाइ का मूल्य सुनाने में कई घंटे लगे. टोक्यो के एक हॉल में उनको रिकॉर्ड बनाता देखने आए लोगों से उन्होंने कहा,\"मैं आप सबका आभार प्रकट करता हूँ\". हारागुची ने पिछले वर्ष सितंबर तक 54,000 अंक सुना दिए थे लेकिन तब रात को आयोजन बंद कर दिए जाने के कारण उनको रूकना पड़ा.\n\nSummary:", "target": "जापान में एक मनोरोग सलाहकार ने गणित में पाइ के मूल्य को याद करने का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअकिरा हारागुची नाम के इस व्यक्ति ने दशमलव के बाद 83,241 अंकों को याद कर लिया है. इसके पहले पाइ का मूल्य याद करने का रिकॉर्ड भी एक जापानी व्यक्ति के ही नाम था लेकिन हारागुची ने पिछले विश्व रिकॉर्ड से दोगुना अंक याद कर लिए हैं. पाइ का मूल्य याद करने का रिकॉर्ड अभी तक हिरोयुकी गोतो के नाम है जिन्होंने 1995 में 42,195 अंक याद कर लिए थे, जब वे 21 वर्षीय छात्र थे. पाई पाइ किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात होता है जिसमें दशमलव के बाद अनगिनत अंक होते हैं और ये अंक भी किसी एक आधार पर नहीं 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ख़त्म हुई मगर शीर्ष पंक्ति का कोई भी बल्लेबाज़ अच्छा स्कोर नहीं कर सका. वहीं गेंदबाज़ी में मोहम्मद समी और दानिश कानेरिया एक भी विकेट नहीं झटक सके. इस बीच पाकिस्तान के कोट बॉब वूलमर ने कहा है कि पाकिस्तान अगर श्रृंखला जीतना चाहता है तो उसके बल्लेबाज़ों को लंबी पारी खेलनी होगी. वूलमर ने कहा,\"भारत में या कहीं भी टेस्ट मैच में, जीत का मंत्र है बड़े स्कोर करना, विशेष तौर पर पहली पारी में\". खिलाड़ी मोहाली टेस्ट के लिए 14 सदस्यों वाली भारतीय टीम सौरभ गांगुली (कप्तान), वीरेंदर सहवाग, गौतम गंभीर, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण, युवराज सिंह, दिनेश कार्तिक, इरफ़ान पठान, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, ज़हीर ख़ान, आशीष नेहरा और लक्ष्मीपति बालाजी भारत दौरे पर आई 16 सदस्यों वाली पाकिस्तानी टीम इंज़मामुल हक़ (कप्तान), युनूस ख़ान (उपकप्तान), तौफ़ीक़ उमर, सलमान बट, यासिर हमीद, युसूफ़ योहाना, आसिम कमाल, शोएब मलिक, कामरान अकमल, शाहिद अफ़रीदी, अब्दुल रज़्ज़ाक़, दानिश कनेरिया, अरशद ख़ान, राना नवीद उल हसन, मोहम्मद समी और मोहम्मद ख़लील\n\nSummary:", "target": "भारत और पाकिस्तान के बीच की रोमाँचक क्रिकेट श्रृंखला शुरू होने में अब अधिक समय नहीं रह गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला का पहला टेस्ट मैच मंगलवार से पंजाब के मोहाली शहर में शुरू हो रहा है जिसके लिए दोनों ही टीमें वहाँ पहुँच चुकी हैं. रविवार को दोनों ही टीमों के खिलाड़ियों ने नेट अभ्यास शुरू किया. एक ओर सौरभ गांगुली के नेतृत्व में जहाँ भारतीय टीम ने अभ्यास किया वहीं इंज़मामुल हक़ के नेतृत्व में पाकिस्तानी दल भी नेट पर उतरा. पिछले कुछ अर्से से कोहनी की चोट से परेशान भारतीय स्टार बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर ने भी अभ्यास किया. भारतीय खिलाड़ी लगभग तीन महीने बाद एक बार फिर साथ जुटे हैं. इंज़माम को भरोसा पाकिस्तान टीम के कप्तान इंज़मामुल हक़ ने कहा है कि धर्मशाला में अभ्यास मैच पर मौसम के असर के बावजूद उनकी टीम मोहाली के पहले टेस्ट मैच के लिए तैयार है. धर्मशाला में भारतीय बोर्ड एकादश के विरूद्ध मैच में पाकिस्तानी टीम ने एक पारी में बल्लेबाज़ी की और केवल 34 ओवर गेंद फेंक सके. इंज़माम ने कहा,\"अच्छा होता अगर मैच पूरा होता क्योंकि सभी टीमों को टेस्ट से पहले अभ्यास अच्छा लगता है. मगर मुझे विश्वास है कि इससे बहुत असर नहीं पड़ेगा\". अभ्यास मैच में पाकिस्तान की पारी 273 पर ख़त्म हुई मगर शीर्ष पंक्ति का कोई भी बल्लेबाज़ अच्छा स्कोर नहीं कर सका. वहीं गेंदबाज़ी में मोहम्मद समी और दानिश कानेरिया एक भी विकेट नहीं झटक सके. इस बीच पाकिस्तान के कोट बॉब वूलमर ने कहा है कि पाकिस्तान अगर श्रृंखला जीतना चाहता है तो उसके बल्लेबाज़ों को लंबी पारी खेलनी होगी. वूलमर ने कहा,\"भारत में या कहीं भी टेस्ट मैच में, जीत का मंत्र है बड़े स्कोर करना, विशेष तौर पर पहली पारी में\". खिलाड़ी मोहाली टेस्ट के लिए 14 सदस्यों वाली भारतीय टीम सौरभ गांगुली (कप्तान), वीरेंदर सहवाग, गौतम गंभीर, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण, युवराज सिंह, दिनेश कार्तिक, इरफ़ान पठान, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, ज़हीर ख़ान, आशीष नेहरा और लक्ष्मीपति बालाजी भारत दौरे पर आई 16 सदस्यों वाली पाकिस्तानी टीम इंज़मामुल हक़ (कप्तान), युनूस ख़ान (उपकप्तान), तौफ़ीक़ उमर, सलमान बट, यासिर हमीद, युसूफ़ योहाना, आसिम कमाल, शोएब मलिक, कामरान अकमल, शाहिद अफ़रीदी, अब्दुल रज़्ज़ाक़, दानिश कनेरिया, अरशद ख़ान, राना 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नज़र आए थे और तब आमिर खान को महाराष्ट्र सरकार ने 'जल संरक्षण' के काम में मदद का काम दिया था. तब समझा गया था कि असहिष्णुता पर दिए आमिर के बयान के बाद भाजपा और आमिर के बीच पनपा तनाव ख़त्म हो गया है. समाप्त आमिर ख़ान ने बीते साल भी महाराष्ट्र सरकार को जल संरक्षण योजना के लिए 11 लाख़ रुपए का योगदान दिया था. (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अभिनेता आमिर ख़ान का कहना है कि उन्होंने सूखा प्रभावित किसी गांव को गोद नहीं लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमीडिया में ख़बरें आ रहीं थीं कि आमिर ने सूखे से प्रभावित दो गांवों को गोद लेने का फ़ैसला किया है, लेकिन आमिर ख़ान के ऑफ़िस ने हमारी सहयोगी मधु पाल को भेजे संदेश में कहा कि कि मीडिया में आ रही ये ख़बरें सही नहीं हैं. संदेश में आगे लिखा है, \"आमिर ख़ान अपने एनजीओ पानी फ़ाउंडेशन के साथ सूखे से प्रभावित गांवों की बेहतरी के लिए पहले से ही काम कर रहे हैं जो 120 गांवों के लिए कार्यरत है. इसके अलावा आमिर ने किसी नए गांव को गोद नहीं लिया है.\" फ़रवरी में आमिर ख़ान, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र सिंह फड़नवीस के साथ एक मंच पर नज़र आए थे और तब आमिर खान को महाराष्ट्र सरकार ने 'जल संरक्षण' के काम में मदद का काम दिया था. तब समझा गया था कि असहिष्णुता पर दिए आमिर के बयान के बाद भाजपा और आमिर के बीच पनपा तनाव ख़त्म हो गया है. समाप्त आमिर ख़ान ने बीते साल भी महाराष्ट्र सरकार को जल संरक्षण योजना के लिए 11 लाख़ रुपए का योगदान दिया था. 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पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान यानी पीडीपीए का विभाजन हो गया और गई गुट उभरने लगे. कठोर नेता उस वक़्त प्रधानमंत्री बने हफ़ीज़ुल्ला ख़ान राष्ट्रपति नूर मोहम्मद तराकी के विरोधी बन गए थे और अक्तूबर 1979 में गुप्त रूप से तराकी की हत्या कर दी गई. उसके बाद अमीन नए राष्ट्रपति बन गए. अमीन अपने स्वतंत्र और राष्ट्रवादी इरादों के लिए जाने जाते थे लेकिन वह भी एक कठोर नेता थे. उन पर हज़ारों अफ़ग़ान लोगों की हत्या कराने के आरोप लगे थे. दूसरी तरफ़ सोवियत संघ की सरकार उन्हें एक ऐसे शासक के रूप में देखती थी जो मध्य एशिया से मिलने वाले अफ़ग़ानिस्तान में एक आज्ञाकारी कम्युनिस्ट सरकार बनने की संभावनाओं के लिए ख़तरा था. दिसंबर 1979 में हुए नाटकीय घटनाक्रम में अमीन की हत्या कर दी गई और सोवियत संघ की लाल सेना अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल हो गई. बबराक करमाल को राष्ट्रपति का पद संभालने के लिए चेकोस्लोवाकिया से वापिस बुलाया गया, वह वहाँ अफ़ग़ान राजदूत थे. उन्हें सोवियत संघ के इशारों पर चलने वाले कठपुतली शासक के रूप में देखा गया. लाखों मारे गए अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप 1989 तक चला और इस दौर को देश के लिए बहुत ख़राब दौर कहा जाता है. सोवियत संघ ने अपनी कठपुतली सरकार का नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की जिसमें लाख़ों अफ़ग़ान लोगों को जान गँवानी पड़ी. लाखों अन्य देश छोड़कर ही भाग गए. सोवियत प्रभाव के विरोधी लड़ाकों (मुजाहिदीन) ने लाल सेना को देश से बाहर निकालने के लिए भारी लड़ाई की और इसमें उन्हें अमरीका का गुप्त और भरपूर सहयोग मिला. क़रीब दस साल के संघर्ष के बाद मई 1989 में सोवियत संघ ने आख़िरकार अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेनाएँ हटा लीं और सत्ता राष्ट्रपति नजीबुल्ला के हाथों में सौंप दी. नजीबुल्ला बबराक करमाल के बाद राष्ट्रपति बने थे. नजीबुल्ला सोवियत सेनाओं के हटने के बाद क़रीब तीन साल यानी 1992 तक सत्ता में रहे और संयुक्त राष्ट्र उस समय सत्ता के शांतिपूर्ण स्थानांतरण की कोशिश कर रहा था.\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान का हाल का जो संघर्ष भरा इतिहास रहा है उसकी शुरूआत 1973 में तब हुई थी जब वहाँ के राजा ज़ाहिर शाह को गद्दी से हटा दिया गया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nज़ाहिर शाह अपनी आँख़ का इलाज कराने के लिए इटली गए हुए थे और उनके चचेरे भाई मोहम्मद दाऊद ने ही उनके पीछे ही बग़ावत करके राजमहल पर क़ब्जा कर लिया. मोहम्मद दाऊद ने अफ़ग़ानिस्तान को एक गणराज्य घोषित करते हुए ख़ुद को राष्ट्रपति बना दिया. मोहम्मद दाऊद ने अपना सत्ता केंद्र स्थापित करने के लिए वामपंथियों पर भरोसा किया और उभरते हुए इस्लामी आंदोलन को दबा दिया. निर्णायक घड़ी लेकिन मोहम्मद दाऊद ने अपनी सत्ता के आख़िरी दिनों तक आते-आते अपने वामपंथी समर्थकों को सत्ता के पदों से हटाना शुरू कर दिया और अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के प्रभाव को भी कम करने की कोशिश की. बस यहीं से अफ़ग़ानिस्तान के हाल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दौर की शुरूआत हुई यानी 1978 में कम्यूनिस्ट विद्रोह हुआ जिसे देश के अप्रैल क्रांति के नाम से जाना जाता है. राष्ट्रपति मोहम्मद दाऊद और उनके परिवार की हत्या कर दी गई और नूर मोहम्मद तराकी ने देश की पहली मार्क्सवादी सरकार के मुखिया के तौर पर ज़िम्मेदारी संभाली. बस इसके साथ ही क़रीब 200 साल से चला आ रहा वह दौर समाप्त हो गया जिसमें ज़ाहिर शाह और मोहम्मद दाऊद का परिवार बिना किसी रूकावट के सत्ता चलाता आ रहा था. लेकिन इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी - 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अपने महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अभियान मंगलयान को सही पथ पर बनाए रखने के लिए उसकी गति की दिशा में सुधार किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसरो ने एक बयान में कहा है, \"यान के पहले पथ सुधार कवायद (टीसीएम) को सुबह छह बजकर 30 मिनट पर पूरा कर लिया गया. इसके लिए 22 न्यूटन थ्रस्टर्स को 40.5 सेकेंड तक दागा गया. अंतरिक्ष यान इस समय पृथ्वी से करीब 29 लाख किलोमीटर की दूरी पर है.\" यह कवायद अंतरिक्ष यान को लाल ग्रह की ओर सही दिशा में बनाए रखने के लिए की गई है. इसरो ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि मार्स ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) के प्रचालक अंतरिक्ष यान की गति को माप रहे हैं और आवश्यक संशोधनों के जरिए उसे सही रास्ते पर बनाए रखने का काम कर रहे हैं. इसरो ने आगे कहा है, \"इस आधार पर फाइरिंग की अवधि और डेल्टा-वी की गणना की गई, ताकि विचलन को सही किया जा सके. पथ सुधार कवायद के दौरान एमओएम के ऐक्सेलरोमीटर ने डेल्टा-वी के हासिल होने की सूचना दी.\" महत्वाकांक्षी परियोजना इसरो ने कहा कि इस कवायद को यान के कंप्यूटर ने ही पूरा किया और इस दौरान अंतरिक्ष यान तक संकेतों के जाने और वापस लौटने में कुल 20 सेकेंड का समय लगा. इस मिशन के जरिए इस लाल ग्रह की कक्षा तक पहुंचने की भारत की क्षमताएं साबित होंगी. करीब 450 करोड़ रुपये की लागत वाला यह यान मंगल के वायुमंडल में मीथेन गैस का पता लगाने के साथ ही कई अन्य प्रयोग भी करेगा. इससे पहले एक दिसंबर को यह यान मंगल ग्रह की 68 करोड़ किमी लंबी यात्रा पर निकला था. इसे 24 सितंबर 2014 को अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचना है. 1350 किग्रा वज़नी मंगलयान के पांच नवंबर को प्रक्षेपित किया गया था और उसके बाद कई बार इंजन चलाकर उसकी कक्षा को बढ़ाया गया था. मंगलयान की कक्षा को बढ़ाने के दौरान चौथे दौर में कुछ दिक़्क़त आई थी क्योंकि तरल ईंधन थ्रस्टर में समस्या के कारण यान को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई थी. हालांकि इस समस्या को दूर कर लिया गया. 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(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे के साथ बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "15वीं लोकसभा का आख़िरी सत्र बेहद हंगामेदार साबित हुआ.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोकसभा के सीधे प्रसारण को रोककर तेलंगाना विधेयक को पारित किया गया. इस फ़ैसले को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपने विदाई भाषण में काफी मुश्किल भरा बताया. बतौर प्रधानमंत्री वे सदन में आख़िरी बार नज़र आए. उन्होंने संसद के सभी सदस्यों का शुक्रिया भी अदा किया. लेकिन संसद के इस कार्यकाल की आलोचना भी ख़ूब हुई है. आलोचकों के मुताबिक भारतीय संसदीय इतिहास में बीते पांच साल सबसे बुरे रहे. हालांकि दूसरी ओर इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान सरकार ने कई अहम विधेयकों को पारित किया. हालांकि हमें ऐसे देखना चाहिए कि इस दौरान क्या काम हुए और क्या काम नहीं हो पाए. यह हकीकत है कि बीते पांच सालों के दौरान संसद जितना काम कर सकती थी, उतना नहीं किया गया, लेकिन बहुत सारे काम हुए भी हैं. काम कम, हंगामा ज़्यादा 2009 में जब 15वीं लोकसभा आई थी. सरकार ने आते ही शिक्षा का अधिकार क़ानून पास करा दिया था. फिर बात आई महिलाओं के आरक्षण बिल की जिसे 2010 में राज्यसभा में पास करा लिया गया. 2010 के शीतकालीन सत्र से संसद के कामकाज में कुछ कमी आनी शुरू हो गई. व्यवधान ज़्यादा होने लगे, राजनीति ज़्यादा शुरू हो गई जिससे काम कम होने लगे. इस वजह से 2010 का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से बर्बाद हो गया. दोबारा काम की प्रक्रिया बढ़ी 2013 में जब खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण बिल, और दिसंबर आते-आते लोकपाल विधेयक भी पास हो गया. हालांकि इन विधेयकों को पास कराने के दौरान उन पर कभी राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई. जब महिला आरक्षण बिल पास हो रहा था तो समाजवादी पार्टी के 7-8 सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा, तब जाकर बिल पास हो पाया था. लोकतंत्र पर सवाल उसी तरह तेलंगाना बिल पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा से सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा. सदन में चर्चा कम और हंगामा ज़्यादा हुआ. विपक्ष बार-बार विधेयक पास कराने पर ज़ोर देता रहा है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि बिना चर्चा के विधेयक पास कराए जाए. यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. राष्ट्रपति जी ने भी इस महीने की शुरुआत में कहा है कि संसद बहस-मुबाहिसों के लिए है ना कि हंगामा खड़ा करने के लिए. बावजूद इसके बीते पांच साल के दौरान चर्चा कम हुई है और विरोधाभास ज़्यादा रहे. कई लोग मानते हैं कि टीवी पर सीधे प्रसारण के चलते हंगामा ज़्यादा होने लगे हैं. लेकिन लगता नहीं है कि ऐसी कोई बात है. हंगामे के पीछे दो या तीन कारण हो सकते हैं. पहला कि कोई सदस्य कोई विषय उठाना चाहते हैं और उन्हें मौका नहीं मिल रहा है. इसलिए सदन की कार्यवाही में रूकावट डाल कर अपनी बात कहना चाहते हैं. दूसरी वजह यह हो सकती है कि राजनीतिक कारणों से पहले से तय कर लिया गया हो कि रुकावट डालनी है. इसको रोकने का एक तरीका यह है कि सदन की कार्यवाही से पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों बैठकर यह फैसला लें कि किस विषय पर चर्चा करनी है और किस पर नहीं. संसद की गरिमा इसमें कैमरे की कोई भूमिका नहीं है. आप कैमरा रखें या ना रखें अगर आपस में राजनीतिक समझ नहीं बनी है तो रुकावट आएगी ही. एक अहम बात यह भी देखने को मिली है कि संसद सदस्यों की गरिमा कम हुई है. इसके लिए संसद सदस्य ही जिम्मेवार हैं. अगर पिछले सालों में लोगों के अंदर संसद के प्रति यह इमेज बनी है कि यहां सिर्फ तू-तू, मैं-मैं ही होती है तो यह सही भी है क्योंकि यहां सिर्फ तू-तू, मैं-मैं ही हो रही थी काम नहीं हो रहा था. अगर काम हो रहा होता तो यह इमेज नहीं बनती. उपराष्ट्रपति जी ने एक सत्र में कहा भी था कि हम लोगों के बीच क्या इमेज दे रहे हैं. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने एक बार सदन में खड़े होकर कहा था कि सदन में जितने सदस्य हंगामा कर रहे हैं मैं अपेक्षा करता हूं कि वह अगले चुनाव में हार जाएँ. इसलिए अगर संसद को अपनी मर्यादा रखनी है तो संसद सदस्यों को उस हिसाब से बर्ताव करना होगा. आशा करता हूं कि 16वीं लोकसभा ये कर पाए. जब 15वीं लोकसभा चुन कर आई थी तो 543 में से 307 लोकसभा सदस्य पहली बार चुन कर आए थे. उम्मीद थी कि ये लोग बेहतर करेंगे, ऐसा हुआ नहीं. अब जब 16वीं लोकसभा आएगी तो यह मंथन फिर से हो कि कुछ नए चेहरे चुन कर आएँ और संसद को सशक्त बनाने पर विचार हो. 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का नाम हाशिए पर ही है. हालांकि तमाम राजनीतिक दल राज्य में इन्हें प्रतिद्वंदी नहीं मानते पर इनका मानना है कि इस बार विधानसभा में इनकी तादाद में सुधार होगा और सरकार बनाने में इनकी भी भूमिका हो सकती है. कौन से लाल वामपंथ की मशाल लिए चल रहे एक जुलूस से हमारी बेगूसराय के रास्ते में मुलाकात हो गई. पूछा, कौन से वामपंथी दल के है तो किसी ने बताया कि ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वाले हैं. हम जुलूस के पास गए और लोगों से बातचीत की. उन्होंने बताया कि वो राज्य की क़ानून व्यवस्था को लेकर ख़ासे चिंतित हैं और इसबार एक साफ़ प्रशासन देने के वादे पर लोगों से वोट माँग रहे हैं. कुछ देर तक राज्य पर गरमा-गरम चर्चा चलती रही पर वहाँ बात ज़्यादा देर नहीं ठहरी और सवाल केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर आकर अटक गया. हमने पूछा कि क्या क्षेत्र में काम कर रहे वामपंथी इस वर्तमान सरकार की नीतियों से ख़ुश हैं तो उनमें से एक ने कहा, \"आर्थिक नीतियों के सवाल पर तो भाजपा और काँग्रेस में कोई फ़र्क नहीं है पर मुद्दा सांप्रदायिकता और जातिवाद का है.\" पार्टी के एक स्थानीय नेता ने बताया, \"राज्य में अगर यूपीए के नेतृत्व वाली सरकार बनने की नौबत आती है तो केंद्र की ही तरह यहाँ भी समर्थन देंगे.\" कब लहराएगा बेगूसराय शहर का नज़ारा कुछ दूसरा ही था. नीचे लाल झंडा लगाए साइकिल जुलूस निकल रहा था और ऊपर हवा में किसी बड़ी पार्टी के नेता का उड़नखटोला. केवल शहर ही नहीं, बल्कि राज्य के तमाम हिस्सों में मिट्टी में वाम की महक तो आई पर मानने और जानने वालों की तादाद इतनी नहीं है कि राज्य की राजनीति के ठीकरे को ठोकर भी लगा सकें. राज्य में वाम की स्थिति पहले तो ऐसी नहीं थी. दो दशक पहले के दौर को देखें तो राज्य में वामदलों का ख़ासा सामाजिक प्रभाव था और राजनीतिक दख़ल भी. विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों के लिए वामपंथी आंदोलन एक अहम भूमिका निभा सकता था पर ऐसा नहीं हुआ. राज्य में वर्ग संघर्ष का जातीय संघर्ष में बदलना इसकी एक वजह हो सकती है. कुछ लोग इस दौरान वामदलों में मुद्दों पर हावी होती जातीयता को भी इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं. पश्चिम बंगाल से सटे होने के बावजूद दोनों ही राज्यों से वाम का नारा, मुख्यधारा से बाहर ही है. कारण क्या रहे, राज्यों की अपनी सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ या फिर वामपंथी दलों 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लगाना था लेकिन यह जिस पैसे की स्विस बैंकों में जाने की बात की जा रही है वो हो सकता है कि सरकार की कड़ी नीतियों के डर से बाहर भेजा गया है. भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने लेबलाइस रेमेटेंस (एलआरएस) नामक एक स्कीम शुरू की थी जिसमें ढाई लाख डॉलर अपने परिजनों के नाम पर देश से बाहर भेजा जा सकता था. ऐसा हो सकता है कि यह पैसा उसमें गया है. आरबीआई ने एलआरएस योजना को बहुत सख़्त कर दिया है. अब इसके तहत केवल माता-पिता, पत्नी और बच्चों के लिए पैसा भेजा जा सकता है बाकी किसी के लिए नहीं. इसके कारण हो सकता है सरकार की पकड़-धकड़ के डर से लोगों ने पैसा बाहर भेजा हो. कई अमीर लोग देश से फ़रार हैं तो उनका पैसा हो सकता है वहां जमा हो. तो यह एक वैध पैसा है. व्यापार करने में मुश्किल आई है, पैसा बाहर जाने का एक कारण यह भी है. इस डर के कारण कई करोड़पति एनआरआई भी बन सकते हैं. भारत से अभी काफ़ी पैसा और भी बाहर जा सकता है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "स्विस बैंको में जमा भारतीय धन में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. स्विस नेशनल बैंक ने जारी किए आंकड़ों में बताया है कि स्विस बैंकों में भारतीयों का पैसा 50 फ़ीसदी बढ़कर क़रीब सात हज़ार करोड़ पहुंच गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्विस बैंक के मुताबिक़, सभी विदेशी ग्राहकों का पैसा साल 2017 में 3 फ़ीसदी बढ़कर 1.46 लाख करोड़ स्विस फ़्रैंक या क़रीब 100 लाख करोड़ रुपए हो गया. स्विस बैंक में जमा भारतीय पैसे में बढ़ोतरी कैसे हुई है? इसी सवाल पर बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर अरुण कुमार से बात की. पढ़ें, प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का नज़रिया स्विस बैंकों में 50 फ़ीसदी भारतीय धन बढ़ने की ख़बर जो आई है, उससे पता चलता है कि ये रकम सात से दस हज़ार करोड़ रुपये है. लेकिन ऐसा नहीं है कि क्योंकि ये पैसा स्विट्ज़रलैंड के बैंक में जमा है, इसलिए ये काला धन ही होगा. स्विस बैंक ख़ातों में जो काला धन जाता है, वो सीधे नहीं जाता है. भारत से भेजा जाने वाला धन शेल यानी फ़र्जी कंपनियों के द्वारा भेजा जाता है. काला धन भेजने की प्रक्रिया कई परतों में सिमटी है. उदाहरण के तौर पर पहले यह फ़र्जी कंपनियों के माध्यम से बहमास या पनामा पहुंचता है और फिर वहाँ से स्विस बैंक के खातों में पहुंचता है. यानी स्विस बैंकों के खातों में भारतीयों का पैसा तो है, लेकिन ये पैसा वहाँ सीधे भारत से न पहुँचकर टैक्स हैवन देशों के ज़रिये पहुँचा है. ज़ाहिर है स्विस बैंक अगर खाताधारकों की जानकारी देता भी है तो वो सीधे भारत से वहाँ पहुँचे भारतीयों के बारे में ही बताएगा. एक मिसाल के तौर पर अगर स्विस बैंक में मिस्टर एक्स ने जर्सी आईलैंड से पैसा भेजा है तो उसके बारे में पूछने पर पता चलेगा कि वह ब्रिटिश पैसा है. इसी कारण सबसे ज़्यादा ब्रिटिश धन स्विस खातों में है, न कि भारतीय धन. स्विस बैंकों में अभी भारतीय धन के आंकड़े जो आए हैं, वे बहुत कम हैं. इससे बहुत अधिक पैसा स्विस बैंक अकाउंट में होगा क्योंकि वह सीधे भारत से गए पैसे का आंकड़ा दे रहे हैं. चार साल पहले 14 हज़ार करोड़ का आंकड़ा था जो साल दर साल कम होता रहा. इसके बाज तीन साल बाद ये बढ़ कर अब सात हज़ार करोड़ (50 फ़ीसदी) बढ़ने की ख़बर आई है तो यह मामूली पैसा है. स्विस बैंक में असली भारतीय धन का पूरी तरह नहीं पता है. नोटबंदी से नहीं हुआ फ़ायदा नोटबंदी का उद्देश्य काले धन पर लगाम लगाना था लेकिन यह जिस पैसे की स्विस बैंकों में जाने की बात की जा रही है वो हो सकता है कि सरकार की कड़ी नीतियों के डर से बाहर भेजा गया है. भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने लेबलाइस रेमेटेंस (एलआरएस) नामक एक स्कीम शुरू की थी जिसमें ढाई लाख डॉलर अपने परिजनों के नाम पर देश से बाहर भेजा जा सकता था. ऐसा हो सकता है कि यह पैसा उसमें गया है. आरबीआई ने एलआरएस योजना को बहुत सख़्त कर दिया है. अब इसके तहत केवल माता-पिता, पत्नी और बच्चों के लिए पैसा भेजा जा सकता है बाकी किसी के लिए नहीं. इसके कारण हो सकता है सरकार की पकड़-धकड़ के डर से लोगों ने पैसा बाहर भेजा हो. कई अमीर लोग देश से फ़रार हैं तो उनका पैसा हो सकता है वहां जमा हो. तो यह एक वैध पैसा है. व्यापार करने में मुश्किल आई है, पैसा बाहर जाने का एक कारण यह भी है. इस डर के कारण कई करोड़पति एनआरआई भी बन सकते हैं. भारत से अभी काफ़ी पैसा और भी बाहर जा सकता है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के लाहौर हाई कोर्ट में कोहिनूर हीरे को वापस लौटाने की मांग करते हुए एक याचिका दायर की गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकोहिनूर हीरा लंबे समय से ब्रिटेन के शाही ख़ज़ाने में रखा हुआ है. कोहिनूर दुनिया के सबसे महँगे हीरों में गिना जाता है और इसकी क़ीमत हज़ारों करोड़ रुपए आंकी जाती है. ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब 1849 में पंजाब को अपने अधिकार में लिया था तभी ये हीरा उनके हाथ लग गया था. मुकदमा दायर करने वाले वकील ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को जानकारी दी कि कोहिनूर पंजाब की विरासत का हिस्सा था. पंजाब भारत की आजादी के बाद 1947 में भारत और नए देश पाकिस्तान के बीच बंट गया था. समाप्त पाकिस्तानी अदालत इस मामले की सुनवाई करेगी या नहीं, यह अभी तय नहीं है. जानकारों का मानना है कि अगर इस याचिका पर सुनवाई होती भी है तो उसके किसी नतीजे पर पहुंचने की संभावना नहीं है. कुछ हफ्ते पहले कोहिनूर को लौटाने की मांग करते हुए लंदन के हाई कोर्ट में एक भारतीय संगठन की ओर से कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई थी. पिछले कई सालों से भारत की ओर से कोहिनूर हीरे की वापसी की मांग की जाती रही है. वे मानते हैं कि कोहिनूर का असली हकदार भारत है. 2010 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने राजनेताओं की मांग को खारिज करते हुए कहा था कि कोहिनूर भारत को लौटाया नहीं जाएगा. कोहिनूर हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा हुआ है. इतिहासकार बताते हैं कि कोहिनूर के मालिक कई बार बदले. इनमें मुगल राजा, फारसी लड़ाके, अफगान शासक और पंजाबी महाराजा शामिल हैं. लाहौर हाई कोर्ट में जावेद इकबाल जाफरी की ओर से ब्रिटेन की महारानी के खिलाफ याचिका दर्ज की गई है. जावेद इकबाल जाफरी ने रॉयटर्स को बताया, \"किसी भी कानून में कब्जा करना या छीनना गैरकानूनी है.\" उनके हवाले से कहा गया है कि उन्होंने कोहिनूर को लौटाने के बारे में पाकिस्तानी अधिकारियों और महारानी को अब तक 786 पत्र लिखे हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सीरिया के प्रमुख विपक्ष धड़े का प्रतिनिधिमंडल वार्ता के लिए जिनेवा पहुंच गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसऊदी अरब के समर्थन वाली उच्च स्तरीय कमेटी ने संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में चल रही वार्ता का बहिष्कार करने की धमकी दी थी लेकिन शुक्रवार देर रात वो इसके लिए सहमत हो गई. हालांकि सीरियाई विपक्ष के एक प्रवक्ता ने कहा कि वे अब भी अपनी इस मांग पर अडिग हैं कि जब तक हवाई हमले और घेराबंदी ख़त्म नहीं होती है तब तक सीरिया की सरकार से कोई बात नहीं करेंगे. इस समूह का प्रतिनिधिमंडल रविवार को संयुक्त राष्ट्र के दूत स्टेफ़ान डी मिस्तूरा से मिलेगा. सीरियाई सरकार का प्रतिनिधिमंडल इससे कई घंटे पहले जिनेवा पहुंच चुका था और उसने मिस्तूरा के साथ शुरुआती बातचीत की थी. समाप्त सीरिया में पिछले पांच साल से जारी गृहयुद्ध में लगभग ढाई लाख लोग मारे गए हैं और एक करोड़ दस लाख लोग विस्थापित हुए हैं. यूरोप में चल रहे शरणार्थी संकट के लिए भी सीरिया का गृहयुद्ध सबसे बड़ा कारण है. शनिवार को कम से कम 39 प्रवासी तुर्की से ग्रीस के लेस्बॉस द्वीप पहुंचने की कोशिश में एजियन सागर में डूब गए थे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप में संदिग्ध इस्लामी चरमपंथियों ने सेना के दो नाकों पर हमला किया है और कम से कम पांच सैनिक मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमिस्र के सुरक्षा सूत्रों ने कहा है कि बंदूकधारियों ने उत्तरी शहर शेख़ ज़ुवैद के पास दो चेक प्वाइंट्स पर हमला किया. ये वही जगह है, जहां दो हफ़्ते पहले इस्लामिक स्टेट से जुड़े लोगों ने सेना के ठिकानों पर हमला किया था, जिसमें कम से कम 17 लोग मारे गए थे. हमले की ऑनलाइन तस्वीर सिनाई प्रायद्वीप (फ़ाइल फोटो) चरमपंथियों ने भूमध्य सागर में मिस्र की नौसेना के जहाज़ों पर मिसाइल दागने का दावा किया है. ख़ुद को सिनाई प्रोविंस कहने वाले चरमपंथियों ने एक तस्वीर ऑनलाइन पोस्ट की है. इस तस्वीर में एक मिसाइल जैसा हथियार दिखाया गया है और उसके बाद जहाज़ पर एक बड़ा धमाका दिखाया गया है. समाप्त नौसेना की जहाज़ में आग सिनाई प्रायद्वीप (फ़ाइल फोटो) मिस्र के अधिकारियों ने कहा है कि कोस्ट गार्ड्स ने कहा है कि चरमपंथियों के साथ झड़प में एक जहाज़ में आग लग गई. पहले सिनाई प्रांत को ‘अंसार बेत अल मक़दिस’ कहा जाता था. पर नवंबर 2014 में इस्लामिक स्टेट के प्रति अपनी निष्ठा जताने के बाद इसने अपना नाम बदल लिया. 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'कुछ-कुछ होता है' फ़िल्म में रानी मुखर्जी कहती हैं-औरत जब तक मां न बने, उसका औरत होना पूरा ही नहीं होता. तो क्या वो सभी औरतें जो किसी बच्चे की मां नहीं हैं, अधूरी हैं? मुंबई में रहने वाली इला जोशी ये सवाल सुनकर हंस पड़ती हैं. वो कहती हैं,\"ये पितृसत्ता की साज़िश है जो बड़ी चालाकी से औरतों को ब्लैकमेल कर लेती है.\" 31 साल की इला, सेल्स के पेशे में हैं और उनकी शादी को चार साल हो चुके हैं. इला ने भी बच्चे पैदा न करने का फ़ैसला किया है. वो कहती हैं,\"मैं बच्चा तभी पैदा करूंगी जब मुझे लगेगा कि मेरा पार्टनर भी बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए उतना ही तैयार है, जितनी मैं.'' इला का मानना है कि मां बनने के बाद औरत की ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है. प्रेग्नेंसी से लेकर बच्चे के बड़े होने तक, उसका ध्यान सिर्फ अपने बच्चे पर अटक कर रह जाता है. पूर्व पीएम की सचिव बनीं कुष्ठ रोगियों की 'मां' 14 बच्चों की मां कैसे बनी करोड़पति? उन्होंने कहा,\"आप देखेंगे कि सेल्स में बहुत कम महिला एक्जिक्यूटिव हैं. वजह, करियर में थोड़ा ऊपर आते-आते वो मां बन जाती हैं और उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.\" इला जोशी इला कहती हैं कि वो अगर बच्चा गोद लेने की भी सोचेंगी तो ये तभी होगा जब वो और उनके पति दोनों मानसिक तौर पर इसके लिए तैयार होंगे. कुछ दिनों पहले भारत की मानुषी छिल्लर ने मां की भूमिका को सबसे ज्यादा इज़्जत का हक़दार बताकर मिस वर्ल्ड का ताज अपने नाम कर लिया. बेशक़ मां की भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण है लेकिन उन तमाम औरतों का क्या जो मां बनना ही नहीं चाहतीं? इसके जवाब में इला बड़ी ही बेबाकी से कहती हैं,\"लोग हमें स्वार्थी कहते हैं, महात्वाकांक्षी कहते हैं. मैं कहती हूं कि हां, मैं स्वार्थी हूं. महात्वाकांक्षी भी हूं. मैं मां नहीं बनना चाहती. इसमें क्या ग़लत है?\" वो कहती हैं, \"मुझे नहीं लगता कि बच्चा न होने की वजह से मैं कुछ मिस कर रही हूं. मैं बेफ़िक्र होकर ट्रैवल कर पाती हूं, किताबें पढ़ पाती हूं और अपनी ज़िंदगी जी पाती हूं.\" मानुषी छिल्लर 'मां बनना ही काफ़ी नहीं' अमृता नंदी अपनी किताब 'मदरहुड ऐंड चॉइस: अनकॉमन मदर्स, चाइल्डफ़्री वुमेन' में लिखती हैं कि भारत में औरतों की भूमिका मां बनने के बाद ख़त्म नहीं हो जाती. बच्चा होने के बाद उनके सामने 'अच्छी मां' बनने की चुनौती होती हैं. उनसे बच्चे के लिए पूरी तरह समर्पित होकर इस चुनौती पर खरा उतरने की उम्मीद की जाती है. औरतों की इस बीमारी के बारे में जानते हैं? 'मेरी मां ने कभी गंगाजल शब्द नहीं बोला' शादी के 8 साल बाद तक मां न बनने वाली सुदीप्ति कहती हैं,\"ऐसा नहीं है कि बच्चा न होने से औरत की ज़िंदगी पर कोई असर नहीं पड़ता. बिल्कुल पड़ता है. हमें और ज़्यादा मज़बूत और सतर्क रहना पड़ता है.'' उन्होंने बताया, \"दूसरे के बच्चों को दुलार करते वक़्त मेरे मन में हमेशा ये बात रहती है कि कहीं वो ये न सोचें कि मेरे अपने बच्चे नहीं हैं, इसलिए मैं ऐसा कर रही हूं.\" अपनी मर्जी से मां न बनने का चलन धीरे-धीरे दुनिया भर में बढ़ रहा है. अमरीकी जनगणना की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में 44 साल तक की 47.6% महिलाएं ऐसी थीं जिनके बच्चे नहीं थे. साल 2011 में यह 46.5% था. सर्वे में ये भी पाया गया कि 20-34 साल की 28.9% महिलाओं के बच्चे नहीं हैं. तो क्या इन्हें बाद की ज़िंदगी के बारे में सोचकर डर नहीं लगता? इन्हें ये डर नहीं सताता कि बुढ़ापे में इनकी देखभाल कौन करेगा? 41 साल की लोकेश इसके जवाब में कहती हैं,\"मुझे ये सही नहीं लगता कि हम अपनी देखभाल का बोझ अकेले बच्चों पर डाल दें. ये राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए.\" वो पूछती हैं कि जिनके बच्चे नहीं हैं या जिनकी शादी नहीं हुई है क्या उन्हें अकेले छोड़ दिया जाना चाहिए? लोकेश कहती हैं,\"ऐसी औरतें भी हैं जिन्होंने अपना करियर और बच्चे साथ-साथ संभाला है लेकिन सब ऐसा कर पाएं, ऐसी उम्मीद करना बेमानी होगी. प्रज्ञा 23 साल की प्रज्ञा श्रीवास्तव कहती हैं,\"मैं नहीं चाहूंगी कि बच्चे के लिए मेरी ज़िंदगी पहले नौ महीने और फ़िर उसके बाद सालों तक ठहर जाए. मैं अपने बच्चे को जन्म देने के बजाय बच्चा गोद लेना ज्यादा पसंद करूंगी.\" प्रज्ञा चाहती हैं कि उनका होने वाला पार्टनर उनकी बात समझे और दोनों आपसी सहमति से बच्चा गोद लें.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "47 साल की सुधा वासन दिल्ली यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफ़ेसर काम करती हैं. उनकी शादी को 20 साल हो चुके हैं और ज़िंदगी हंसी-खुशी कट रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइला जोशी कुछ लोगों को लगता है सुधा की ज़िंदगी में कुछ कमी है. कमी इसलिए क्योंकि उनके बच्चे नहीं हैं. लेकिन सुधा को ऐसा नहीं लगता. वो बताती हैं,\"जब लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने बच्चे क्यों नहीं पैदा किए तो मैं उनसे पूछती हूं कि उन्होंने बच्चे क्यों पैदा किए. फिर मुझे जो जवाब सुनने को मिलते हैं, मैं उनसे संतुष्ट नहीं होती.\" मां बने बिना औरत अधूरी? 'कुछ-कुछ होता है' फ़िल्म में रानी मुखर्जी कहती हैं-औरत जब तक मां न बने, उसका औरत होना पूरा ही नहीं होता. तो क्या वो सभी औरतें जो किसी बच्चे की मां नहीं हैं, अधूरी हैं? मुंबई में रहने वाली इला जोशी ये सवाल सुनकर हंस पड़ती हैं. वो कहती हैं,\"ये पितृसत्ता की साज़िश है जो बड़ी चालाकी से औरतों को ब्लैकमेल कर लेती है.\" 31 साल की इला, सेल्स के पेशे में हैं और उनकी शादी को चार साल हो चुके हैं. इला ने भी बच्चे पैदा न करने का फ़ैसला किया है. वो कहती हैं,\"मैं बच्चा तभी पैदा करूंगी जब मुझे लगेगा कि मेरा पार्टनर भी बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए उतना ही तैयार है, जितनी मैं.'' इला का मानना है कि मां बनने के बाद औरत की ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है. प्रेग्नेंसी से लेकर बच्चे के बड़े होने तक, उसका ध्यान सिर्फ अपने बच्चे पर अटक कर रह जाता है. पूर्व पीएम की सचिव बनीं कुष्ठ रोगियों की 'मां' 14 बच्चों की मां कैसे बनी करोड़पति? उन्होंने कहा,\"आप देखेंगे कि सेल्स में बहुत कम महिला एक्जिक्यूटिव हैं. वजह, करियर में थोड़ा ऊपर आते-आते वो मां बन जाती हैं और उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.\" इला जोशी इला कहती हैं कि वो अगर बच्चा गोद लेने की भी सोचेंगी तो ये तभी होगा जब वो और उनके पति दोनों मानसिक तौर पर इसके लिए तैयार होंगे. कुछ दिनों पहले भारत की मानुषी छिल्लर ने मां की भूमिका को सबसे ज्यादा इज़्जत का हक़दार बताकर मिस वर्ल्ड का ताज अपने नाम कर लिया. बेशक़ मां की भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण है लेकिन उन तमाम औरतों का क्या जो मां बनना ही नहीं चाहतीं? इसके जवाब में इला बड़ी ही बेबाकी से कहती हैं,\"लोग हमें स्वार्थी कहते हैं, महात्वाकांक्षी कहते हैं. मैं कहती हूं कि हां, मैं स्वार्थी हूं. महात्वाकांक्षी भी हूं. मैं मां नहीं बनना चाहती. इसमें क्या ग़लत है?\" वो कहती हैं, \"मुझे नहीं लगता कि बच्चा न होने की वजह से मैं कुछ मिस कर रही हूं. मैं बेफ़िक्र होकर ट्रैवल कर पाती हूं, किताबें पढ़ पाती हूं और अपनी ज़िंदगी जी पाती हूं.\" मानुषी छिल्लर 'मां बनना ही काफ़ी नहीं' अमृता नंदी अपनी किताब 'मदरहुड ऐंड चॉइस: अनकॉमन मदर्स, चाइल्डफ़्री वुमेन' में लिखती हैं कि भारत में औरतों की भूमिका मां बनने के बाद ख़त्म नहीं हो जाती. बच्चा होने के बाद उनके सामने 'अच्छी मां' बनने की चुनौती होती हैं. उनसे बच्चे के लिए पूरी तरह समर्पित होकर इस चुनौती पर खरा उतरने की उम्मीद की जाती है. औरतों की इस बीमारी के बारे में जानते हैं? 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कितना जायज़ है सीरिया पर अमरीकी मिसाइल हमला? ओपीसीडब्ल्यू का कहना है कि उसके नौ सदस्यीय जांच दल को दमिश्क में सीरिया और रूस के अधिकारियों ने कहा कि वहां अभी भी सुरक्षा को लेकर कुछ चिंताएं हैं जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है. डूमा में सात अप्रैल को जब संदिग्ध रासायनिक हमला हुआ था, तब वहां विद्रोहियों का नियंत्रण था. अब वहां सीरियाई सरकार और रूसी सैनिकों का नियंत्रण है. सीरिया में 'ज़हरीली गैस के हमले में 70 की मौत' 'सीरिया में ज़रूरत पड़ने पर अमरीका दोबारा हमले के लिए तैयार' अमरीका, फ़्रांस और ब्रिटेन ने शनिवार सुबह सीरिया में अलग-अलग सरकारी ठिकानों पर बमबामी शुरू (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रूस ने सीरिया में संदिग्ध रासायनिक हमले वाली जगह पर सबूतों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ करने के आरोप से इंकार किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव बीबीसी के कार्यक्रम हार्ड टॉक में दिए एक साक्षात्कार में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा, ''मैं गारंटी दे सकता हूं कि रूस ने उस जगह पर कोई छेड़छाड़ नहीं की है.'' ब्रिटेन और अमरीका का आरोप है कि रूस डूमा में संदिग्ध रासायनिक हमले के सबूत छिपाने के लिए सीरियाई सरकार की मदद कर रहा है. अंतराष्ट्रीय जांचकर्ता डूमा कस्बे तक नहीं पहुंच पाए हैं. इस पर रूस ने कहा है कि सीरिया में संदिग्ध रासायनिक हमले वाली जगह का निरीक्षण बुधवार को किया जा सकता है. पुतिन की वॉर्निंग, सीरिया पर फिर हमला हुआ तो होगा बवाल हमले के बाद सीरिया छोड़ना चाहता है अमरीका संदिग्ध रासायनिक हमले का शिकार हुआ एक बच्चा अमरीका ने रासायनिक हथियारों की निगरानी करने वाले अंतरराष्ट्रीय समूह को चेताया था कि संदिग्ध रासायनिक हमले वाली जगह पर रूस सबूतों के साथ हेराफेरी कर सकता है. ओपीसीडब्ल्यू यानी 'ऑगनाइज़ेशन फ़ॉर प्रोहिबिशन ऑफ़ केमिकल वेपंस' दुनिया भर में रासायनिक हथियारों को नष्ट करने और उनकी रोकथाम के लिए काम करती है. सीरिया पर अमरीकी हमलों से असद झुक जाएंगे? 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "वियतनाम युद्ध के हीरो और अमरीकी सीनेटर जॉन मैक्केन को आख़िरी श्रद्धांजलि देने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और जॉर्ज डब्ल्यू बुश दोनों पहुंचे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमैक्केन के राष्ट्रपति उम्मीदवार होने के कारण एक वक़्त में बुश और ओबामा दोनों उनके प्रतिद्वंद्वी रहे थे. बुश और ओबामा दोनों ने जॉन मैक्केन की जमकर तारीफ़ की. वॉशिंगटन नेशनल कैथेड्रल में जॉन मैक्केन की आख़िरी विदाई में उनकी बेटी मेगेन मैक्केन भी थीं. मैक्केन को आख़िरी श्रद्धांजलि देने राष्ट्रपति ट्रंप नहीं पहुंचे थे. ट्रंप के नहीं आने पर मेगेन मैक्केन ने बिना नाम लिए राष्ट्रपति पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ''हमलोग अमरीका के एक महान सपूत को आख़िरी विदाई देने आए हैं. इस मौक़े पर हम उनकी बात नहीं करेंगे जो समर्पण की इस सीमा तक कभी पहुंच नहीं सकते. वो वैसे लोग हैं जो हमेशा एक ख़ास और आरामतलब दुनिया में रहे. लोग अमरीका को फिर से महान बनाना चाहते हैं, लेकिन मैक्केन का अमरीका हमेशा से महान था.'' एक अमरीकी राजनेता जो वियतनाम युद्ध का हीरो था ट्रंप और मैक्केन के रिश्ते अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और मैक्केन के बीच सालों से संबंध ख़राब थे. हाल के दिनों में मैक्केन भी ट्रंप की नीतियों को लेकर हमलावर रहे थे. अरिज़ोन के पूर्व रिपब्लिकन सीनेटर जॉन मैक्केन का 25 अगस्त को ब्रेन कैंसर से निधन हो गया था. अमरीका के लगभग सारे बड़े राजनेता इस शोक सभा में मौजूद थे, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप नहीं आए. शोक सभा में ट्रंप का नहीं आना चर्चा का विषय बना हुआ है. हालांकि मैक्केन के परिवारवालों ने भी साफ़ कर दिया था कि ट्रंप के आने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं है. इस मौक़े पर ओबामा ने मैक्केन की बहादुरी की जमकर तारीफ़ की. मैक्केन अमरीकी नौसेना के बमवर्षक विमान के पायलट, एक युद्धबंदी, सीनियर सीनेटर और राष्ट्रपति के उम्मीदवार रहे थे. उन्हें अमरीका में किसी हीरो की तरह देखा जाता था. मैक्केन अमरीकी राज्य अरिज़ोना के प्रभावी नेता थे. मैक्केन स्किन कैंसर से पीड़ित थे. जुलाई 2017 में पता चला कि वो मस्तिष्क में ट्यूमर की समस्या से भी जूझ रहे हैं. इसके बाद उन्हें वॉशिंगटन में इलाज के लिए शिफ़्ट किया गया था. युद्धबंदी से राष्ट्रपति उम्मीदवार तक अरिज़ोना से मैक्केन छह बार सीनेटर चुने गए. वो 2008 में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से राष्ट्रपति के उम्मीदवार भी बनाए गए. मैक्केन के पिता और दादा दोनों नेवी में एडमिरल थे. वियतनाम युद्ध में वो लड़ाकू विमान के पायलट थे. इस युद्ध में मैक्केन के विमान को जब मार गिराया गया तो वो ख़ुद को बचाने में कामयाब रहे थे. वो वियतनाम में पांच सालों तक युद्धबंदी भी रहे थे. युद्धबंदी के दौरान उन्हें कई तरह की प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ा था. सीरिया के गृह युद्ध में अमरीका के हस्तक्षेप नहीं करने पर मैक्केन ने तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा की आलोचना की थी. हालांकि मैक्केन ने अपनी राय रखने में पार्टी लाइन की भी परवाह नहीं की. वो ट्रंप की भी ख़ूब आलोचना करते थे. मैक्केन ट्रंप की सख़्त प्रवासी नीति के ख़िलाफ़ थे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज दिल्ली में अपनी रैली के दौरान गांधी परिवार, दिल्ली की कांग्रेस सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार पर जमकर कटाक्ष किए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक घंटे चले इस भाषण में मोदी ने प्रधानमंत्री को भी कटघरे में लिया और देश की सरकार बदलने की मांग की. रैली में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी मौजूद नहीं थे. मोदी ने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यूपीए सरकार उन्हीं विभागों में अच्छा कर रही है जो राज्यों के हवाले हैं और राज्यों के विकास का जोड़ लगाकर वह ख़ुद वाहवाही लूटती है. पीएम पर निशाना मोदी का आरोप था कि यूपीए सरकार की प्राथमिकताएं ग़रीब विरोधी हैं. उन्होंने उड्डयन मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा, ‘एविएशन में सरकार ने 31 हज़ार करोड़ का पैकेज दिया है.’ मोदी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर अमरीका में देश की ग़रीबी की मार्केटिंग करने का आरोप लगाया. उनका कहना था, ‘अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा के सामने 125 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री गिड़गिड़ाते हैं और कहते हैं कि मैं ग़रीब देश का प्रधानमंत्री हूं.’ मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की ओर से कुछ पत्रकारों के सामने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कथित तौर पर \"देहाती औरत\" कहने का आरोप लगाया. मोदी का कहना था कि पत्रकारों से अपेक्षा थी कि वो नवाज़ शरीफ़ के सत्कार को ठुकरा कर चल देते. उनका कहना था, \"हमारे राजनीतिक विरोध हैं, वैचारिक विरोध हैं. हम लड़ेंगे घर में, पर दुनिया के किसी देश को हमारे देश पर उंगली उठाने का अधिकार नहीं.\" मोदी का आरोप था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उनकी ही पार्टी में इज़्ज़त नहीं रह गई है. उन्होंने कहा, \"आज देश में परिवारशाही और लोकशाही के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया है. परिवारशाही लोकशाही का गला घोंटने पर उतारू है. अब देश की जनता को फ़ैसला करना है कि यह देश संविधान के अनुसार चलेगा या शहज़ादे की इच्छा के अनुसार चलेगा. शहज़ादे की बीन पर चलेगा.\" 'ड्रीम टीम चाहिए' मोदी का कहना था, ‘दस साल से देश यूपीए को झेल रहा है. दिल्ली में हमने डर्टी टीम के कारनामे देखे हैं. देश को ड्रीम टीम चाहिए न कि डर्टी टीम.’ मोदी ने प्रधानमंत्री से मांग की कि वो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के दौरान सीमा पर भारतीय सैनिकों की हत्या, पाकिस्तानी कश्मीर के भारत में विलय और आतंकवाद के मुद्दों को उठाएं. मोदी ने यह भी कहा कि कुछ साल बाद देश की आज़ादी की 75वीं सालगिरह मनाई जाएगी. उन्होंने लोगों से पूछा, ‘हमें तय करना है कि हम देश को अमृत महोत्सव तक पहुंचते-पहुंचते कहां से कहां तक ले जाना चाहते हैं.’ रैली में आए लोगों का आभार जताते हुए मोदी ने ख़ुद के बारे में कहा, ‘बचपन में जो इंसान रेल के डिब्बे में चाय बेचकर गुज़ारा करता था, ऐसे ग़रीब परिवार के बच्चे को आज आपने यहां बिठा दिया है. मैं मन से न कभी शासक था, न शासक हूं और न शासक बनने के सपने देखता हूं.’ 'मां-बेटे-दामाद की सरकार' उन्होंने कांग्रेस को लक्ष्य कर यह भी कहा, ''अकेले दिल्ली में कई सरकारें हैं. एक मां की सरकार है, एक बेटे की नई सरकार है, एक दामाद की सरकार है.'' अपने भाषण में मोदी ने भ्रष्टाचार, कथित कॉमनवेल्थ घोटाले और दिल्ली के बलात्कार कांड का हवाला भी लिया और कांग्रेस सरकारों की कार्यशैली पर उंगली उठाई. कॉमनवेल्थ खेलों में कथित घोटाले को लेकर उनका कहना था, ‘हमें अच्छा अवसर मिला था, जिसे हमने गंवा दिया. यह डाका तिजोरी पर ही नहीं, उन्होंने हिंदुस्तान के भाग्य पर ताला लगा दिया है.’ मोदी के भाषण में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी निशाने पर रहीं. उनका आरोप था कि ‘दिल्ली की मुख्यमंत्री के पास रिबन काटने के सिवा कोई काम नहीं है. यह शायद अकेली मुख्यमंत्री हैं, जो हर गड़बड़ी की ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल देती हैं.'' मोदी की दिल्ली में यह पहली रैली थी. रैली के दौरान हज़ारों लोग पहुंचे. रैली को पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, नवजोत सिंह सिद्धू और स्थानीय नेताओं ने भी संबोधित किया. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय हॉकी टीम के कोच पॉल फ़ान एस का कहना है कि उन्हें हटा दिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nडच कोच को भारतीय टीम से जुड़े हुए सिर्फ़ पांच महीने हुए हैं. पॉल फ़ान एस हिमाचल प्रदेश में रविवार को ही शुरू हुए राष्ट्रीय टीम के शिविर में नहीं पहुंचे थे. इसी के बाद उन्हें हटाए जाने की अटकलें लगने लगी थीं. फ़ान एस को इसी साल फरवरी में भारतीय हॉकी टीम का कोच नियुक्त किया गया था. समाप्त वो पिछले दस साल में भारतीय हॉकी टीम के छठे विदेशी कोच हैं. फ़ान एस ने बतौर भारतीय कोच ऑस्ट्रेलिया के टैरी वाल्श का स्थान लिया था जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में वेतन से जुड़े विवाद के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था. 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रूस ने कहा है कि उत्तरी सीरिया में विद्रोहियों ने उसके एक हेलीकॉप्टर को मार गिराया है जिससे उसमें सवार पांच लोगों की मौत हो गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमरने वालों में तीन क्रू मेंबर और सेना के दो अफ़सर शामिल हैं. एमआई-8 हेलीकॉप्टर पर इदलिब प्रांत में विद्रोहियों ने हमला किया. हेलीकॉप्टर युद्धग्रस्त अलेप्पो शहर में फंसे नागरिकों को राहत सामग्री बांटकर लौट रहा था. अभी ये साफ़ नहीं हो पाया है कि विद्रोहियों के किस गुट ने ये हमला किया. समाप्त रूस ने कहा है कि सीरिया में विद्रोहियों ने उसके हेलीकॉप्टर को मार गिराया इदलिब में कट्टरपंथी जेहादी ग्रुप समेत विद्रोहियों के गठबंधन का दबदबा है. सोशल मीडिया पर जलते हुए हेलीकॉप्टर और उसमें सवार लोगों की तस्वीरें वायरल हो रही हैं. वीडियो फ़ुटेज में दो जली हुई लाशें भी दिखाई दे रही हैं. रूस ने पिछले साल के आख़िर में सीरिया के राष्ट्रपति असद की सहायता के लिए विद्रोहियों पर हवाई हमले शुरू किए थे. तब से लेकर अब तक ये किसी एक हमले में रूस को पहुंचा सबसे बड़ा नुकसान है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने राष्ट्रीय सेवक संघ (आरएसएस) पर एक बार फिर हमला किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत में इस समय सरकार सत्तारुढ़ बीजेपी की है. ये पार्टी संघ परिवार का एक हिस्सा है, यानी दोनों की विचारधारा एक है. इससे पहले गुरुवार को तेलंगाना में आरएसएस ने एक मार्च निकाला था. सुचित्र विजयन नाम के एक व्यक्ति ने आरएसएस के उस मार्च की वीडियो क्लिप को ट्वीटर पर शेयर किया था. इमरान ख़ान ने सुचित्र विजयन के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए लिखा है, \"आरएसएस के कारण मुसलमानों का नरसंहार हो उससे पहले अंतरराष्ट्रीय जगत को जग जाना चाहिए. मुसलमानों के नरसंहार के सामने दुनिया के दूसरे नरसंहार बहुत छोटे साबित होंगे. किसी धर्म विशेष से नफ़रत के आधार पर जब कभी भी हिटलर के ब्राउन शर्ट्स या आरएसएस जैसे मिलिशिया संगठन बनते हैं, उनका अंत हमेशा नरसंहार पर होता है.\" समाप्त इमरान ख़ान पहले भी आरएसएस पर हमला करते रहे हैं. इमरान ख़ान जब भी भारत की मौजूदा नरेंद्र मोदी की सरकार पर हमला करते हैं वो इसमें आरएसएस को ज़रूर शामिल करते हैं साथ ही वो भारत की बीजेपी सरकार की तुलना जर्मन की नाज़ी सरकार से करते हैं. इसी साल अगस्त 30 को इमरान ख़ान ने एक ट्वीट में कहा था कि \"कश्मीर के लोगों के दूत के तौर पर मैं कश्मीरियों पर फासिस्ट मोदी सरकार की ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघनों के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बताता रहूंगा. पश्चिमी दुनिया को नहीं पता है कि आरएसएस का एजेंडा जर्मन के नाज़ीवाद से प्रेरित है.\" पाँच अगस्त को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान धारा 370 को ख़त्म करने का फ़ैसला किया था. इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र प्रशासित राज्यों में विभाजित करने का फ़ैसला किया था. मोदी सरकार के इस फ़ैसले का विरोध करने के लिए भी इमरान ख़ान ने आरएसएस को निशाना बनाया था. संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भी इमरान ख़ान ने अपने भाषण में आरएसएस पर हमला किया था. इमरान आरएसएस की तुलना जर्मनी के तानाशाह हिटलर से कई बार कर चुके हैं. 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में पंचमों से मुलाक़ात के बाद महात्मा गांधी को दक्षिण अफ़्रीका के अपने वो दिन याद आए जब वो दलितों को अपने घर खाने के लिए बुलाते थे और महसूस करते थे कि कोई उनका विरोध नहीं कर रहा है. लेकिन एक तरह का दबा हुआ विरोध ख़ुद कस्तूरबा गांधी की तरफ़ से होता था. समाप्त कस्तूरबा को लगता था कि शायद भारत में पहुंचकर यह समस्या और बड़ी और विकराल होगी. दक्षिण अफ़्रीका में घर से ज़्यादा दूरी होने की वजह से शायद लोग एकसाथ आसानी से आ जाते हैं लेकिन भारत में यह काम कठिन होगा. कस्तूरबा गांधी का यह अनुमान ग़लत नहीं था. गांधी को बाहर वाले कमरे में ठहराया जब गांधी चंपारण जाने वाले थे और बांकीपुर स्टेशन उतरे जो पटना का पुराना नाम था. उन्हें कुछ लोग राजेंद्र प्रसाद के घर ले गए. उस समय राजेंद्र प्रसाद घर पर नहीं थे और वहां मौजूद नौकर गांधी को पहचानते नहीं थे. इसलिए उन्हें बाहर वाले कमरे में ठहरा दिया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यह शख़्स पता नहीं किस जाती या धर्म से होगा. इस व्यवहार से गांधी बहुत ही खिन्न हो गए. बाद में गांधी ने जब अहमदाबाद के पास अपना आश्रम बनाया तब ठक्कर बापा का पत्र लेकर एक आदमी उनके पास आया. उस पत्र में ठक्कर बापा ने लिखा था, ''आप कहते हैं कि सभी लोग बराबर हैं और अगर आश्रम के नियमों का पालन करेंगे तो उन्हें आश्रम में रहने की जगह दी जाएगी. इसलिए मैं एक आदमी को आपके आश्रम में रहने के लिए भेज रहा हूं. वो एक दलित हैं और आपको उन्हें आश्रम में रखने पर विचार करना है.'' दलित को रखने पर हंगामा गांधी ठक्कर बापा को मना नहीं कर सकते थे. मना ना करने एक वजह यह भी थी कि गांधी के प्रयोग का यह पहला चरण था और गांधी देखना चाहते थे कि उन्हें क्या हासिल होता है. जो व्यक्ति आश्रम में रहने आए उनका नाम दूदा भाई था और साथ में उनकी पत्नी दानी बेन और एक छोटी बच्ची थी. इन तीनों को गांधी ने आश्रम में जगह दी तो अहमदाबाद में हंगामा हो गया. जुलूस निकला और नारे लगे. जो सवर्ण आश्रम को चंदा देते थे उन्होंने चंदा देना बंद कर दिया. आश्रम बंद होने की नौबत आ गई. आसपास के लोगों ने गाली देना शुरू कर दिया और दूदा भाई का जीना हराम कर दिया. लेकिन गांधी अपने फ़ैसले से टस से मस नहीं हुए. जब गांधी को यह पता चला कि कस्तूरबा जाने-अनजाने आश्रम की अन्य महिलाओं का केंद्र बन गई हैं और दूदा भाई को आश्रम में रखने का विरोध कर रही 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(फ़्रीडा पिंटो ने उतारे कपड़े !) अब चर्चा है कि उदय औरनरगिस ने विदेश में छुट्टियां मनाने का फ़ैसला किया है. उदय सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर नरगिस के प्रति अपनी पसंद कई बार स्वीकार कर चुके हैं. लेकिन नरगिस ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है. क्या बनेगी 'कृष-4' ? अभी राकेश रोशन निर्देशित और ऋतिक रोशन अभिनीत 'कृष-3' रिलीज़ भी नहीं हुई है और इसके सीक्वल की तैयारियां होने लगी हैं. फ़िल्म के निर्देशक राकेश रोशन ने फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर शुरुआती तैयारी कर ली है. उन्होंने कहा कि 'कृष-3' अगर लोगों को पसंद आई तो वो कृष-4 भी ज़रूर बनाएंगे. 'कृष-3' एक नवंबर को रिलीज़ हो रही है. इसमें ऋतिक के अलावा प्रियंका चोपड़ा, कंगना रनाउत और विवेक ओबेरॉय की मुख्य भूमिका है. 'सिंघम-2' से करीना आउट अजय देवगन की साल 2011 में रिलीज़ हुई सुपरहिट फ़िल्म 'सिंघम' के सीक्वल 'सिंघम-2' से करीना कपूर बाहर हो गई हैं. फ़िल्म के निर्देशक रोहित शेट्टी ने तय किया है कि उनकी जगह किसी नई हीरोइन को लिया जाएगा. (बाल-बाल बचीं दीपिका !) दरअसल रोहित ने 'चेन्नई एक्सप्रेस' की शूटिंग से पहले ही करीना को 'सिंघम-2' के लिए अप्रोच किया था और बताया जाता है कि करीना ने इसके लिए हामी भी भर दी थी लेकिन अब रोहित का मानना है कि फ़िल्म में हीरोइन का रोल बेहद छोटा है और करीना जैसी स्थापित हीरोइन के साथ ये इंसाफ़ नहीं होगा. (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उदय चोपड़ा और नरगिस फ़ाख़री के साथ-साथ छुट्टियों पर जाने की ख़बरें, क्या बनेगी कृष-4 और सिंगम-2 से क्यों बाहर हुईं करीना कपूर. पढ़िए ख़बरें मुंबई डायरी में.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउदय-नरगिस साथ-साथ ! बॉलीवुड में इस वक़्त उदय चोपड़ा और अभिनेत्री नरगिस फ़ाख़री के कथित रोमांस की चर्चा ज़ोरों पर है. कुछ दिन पहले नरगिस के जन्मदिन पर दोनों ही काम की व्यस्तता की वजह से साथ में वक़्त नहीं गुज़ार पाए. 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(बाल-बाल बचीं दीपिका !) दरअसल रोहित ने 'चेन्नई एक्सप्रेस' की शूटिंग से पहले ही करीना को 'सिंघम-2' के लिए अप्रोच किया था और बताया जाता है कि करीना ने इसके लिए हामी भी भर दी थी लेकिन अब रोहित का मानना है कि फ़िल्म में हीरोइन का रोल बेहद छोटा है और करीना जैसी स्थापित हीरोइन के साथ ये इंसाफ़ नहीं होगा. 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''इसके बाद ये आग यूपी, हैदराबाद, केरल में लगती रही. आज वो आग दिल्ली के एक कोने में लग गई है. ये आग कभी भी दिल्ली वालों के घरों में पहुंच सकती हैं.'' परवेश वर्मा ने कहा, ''दिल्ली वालों को सोच समझकर फ़ैसला करना पड़ेगा. ये लोग आपके घरों में घुसेंगे. आपकी बहन, बेटियों को उठाएंगे, उनका रेप करेंगे. उनको मारेंगे. इसलिए आज समय है. कल मोदीजी और अमित शाह जी बचाने नहीं आएंगे.'' परवेश वर्मा के इन दोनों ही बयानों की सोशल मीडिया पर चर्चा है. ज़्यादातर लोग परवेश के बयानों की आलोचना कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर किसने क्या कहा? काज़िम नाम के यूज़र ने लिखा, ''प्रधानमंत्री जी, अगर मन की बात से फुर्सत मिल गई हो तो प्लीज़ इंडिया आपके एक्शन का इंतज़ार कर रहा है.'' पल्लवी नाम की यूज़र ने लिखा, ''अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा को इस्तीफ़ा देना चाहिए. ये बीजेपी का असली चेहरा है. भड़काऊ भाषण देना और हिंसा के लिए उकसाना.'' @Lukky_Vaishnav ने परवेश के बयान का समर्थन करते हुए लिखा- हम आपके साथ हैं. अमित चौबे ने लिखा, ''परवेश वर्मा जी जीडीपी और बेरोज़गारी के बारे में बात कीजिए. ये आपकी भी मदद करेगा और हमारी भी.'' शाहरुख सिद्दीक़ी ने लिखा, ''बीजेपी सांसद परवेश वर्मा खुले आम मस्जिद को गिराने के नाम पर वोट मांग रहे हैं. इनके लिए भी कोई क़ानून है? चुनाव आयोग को ये दिख नहीं रहा?'' बीजेपी नेताओं के हालिया विवादित बयान 20 दिसंबर 2019 तब बीजेपी नेता और अब दिल्ली के मॉडल टाउन से बीजेपी उम्मीदवार कपिल मिश्रा ने नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में रैली निकाली. इस रैली में कपिल मिश्रा कुछ भड़काऊ नारे लगाते दिखे थे. ये नारा था, ''देश के गद्दारों को, गोली मारों **** को.'' 22 जनवरी नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में लखनऊ में बीजेपी की एक रैली हुई. इस रैली में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, ''अब इन्होंने क्या किया है. अपने घर की महिलाओं को चौराहे-चौराहे पर बैठाना शुरू कर दिया है. कितना बड़ा अपराध कि पुरुष घर में सो रहा है रजाई ओढ़कर और महिलाओं को आगे करके चौराहे-चौराहे पर बैठाया जा रहा है.\" 23 जनवरी दिल्ली के मॉडल टाउन से बीजेपी उम्मीदवार कपिल मिश्रा का एक ट्वीट चर्चा में रहा. इस ट्वीट में कपिल मिश्रा ने लिखा था- 8 फरवरी को दिल्ली में इंडिया बनाम पाकिस्तान मैच होगा. इस ट्वीट के बाद कपिल को चुनाव आयोग ने नोटिस भी भेजा था. 26 जनवरी दिल्ली की एक चुनावी रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ''बटन इतने ग़ुस्से से दबाना कि बटन यहां बाबरपुर में दबे. करंट तुरंत शाहीन बाग़ के अंदर लगे.'' इसी रैली में नागरिकता क़ानून का विरोध करने वाले लड़के को बीजेपी के कार्यकर्ताओं के पीटने का वीडियो वायरल हुआ था. 27 जनवरी केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिल्ली की एक सभा में भड़काऊ नारे लगवाए. अनुराग ठाकुर का एक वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में अनुराग ठाकुर कहते हैं- \"देश के गद्दारों को...\" चुनावी सभा में जुटे लोग इसके बाद कहते हैं, \"गोली मारो **** को.\" ये सुनकर अनुराग कहते हैं- ''पीछे तक आवाज़ आनी चाहिए. गिरिराज जी को सुनाई दे.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली चुनावों में बीजेपी नेताओं की ओर से विवादास्पद बयान देने की कड़ी में नया नाम सांसद परवेश वर्मा का है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपरवेश वर्मा बीजेपी सांसद परवेश वर्मा का दिल्ली की एक चुनावी सभा और समाचार एजेंसी ANI को दिया इंटरव्यू चर्चा में है. परवेश वर्मा ने एक चुनावी रैली में कहा था, ''ये बात नोट करके रख लेना. ये चुनाव कोई छोटा-मोटा चुनाव नहीं है. ये देश की अस्मिता, एकता का चुनाव है. अगर 11 फरवरी को बीजेपी की सरकार बन गई तो एक घंटे के अंदर शाहीन बाग़ में आपको एक भी आदमी दिखे तो मैं भी यही हूं और आप भी यहीं हैं.'' परवेश वर्मा ने कहा, ''बीजेपी सरकार आने के बाद शाहीन बाग़ में एक आदमी दिखाई नहीं देगा. मैं आपको वादा करके जा रहा हूं अगर दिल्ली में मेरी सरकार बन गई तो मुझे एक महीने का वक़्त दे देना. मेरे लोकसभा क्षेत्र में जितनी मस्जिद सरकारी ज़मीन पर बनी हैं, एक महीने के अंदर एक मस्जिद नहीं छोड़ूंगा.'' इस बयान पर चर्चा शुरू ही हुई थी, तब तक परवेश वर्मा का एक और बयान विवादों में आ गया. समाप्त 'बहन, बेटियों को उठाएंगे...रेप करेंगे' परवेश वर्मा ने समाचार एजेंसी ANI को एक इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में भी परवेश ने एक और विवादास्पद बयान दिया. परवेश वर्मा ने कहा, ''देखिए अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया भी कहते हैं कि वो शाहीन बाग़ के साथ हैं. आज से कुछ साल पहले जो आग कश्मीर में लगी थी. वहां कश्मीरी पंडितों की बहन, बेटियों के साथ रेप हुआ था.'' 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पानी की आपूर्ति होती है और न बिजली आती है. यह साफ़-सफ़ाई की भी कोई व्यवस्था नहीं है. 16 साल की पामेला अपनी मां और 7 महीने की बेटी के साथ उस इमारत में रहती हैं जिसमें कभी ब्राज़ील का इंस्टीट्यूट ऑफ़ जियोग्राफ़ी एंड स्टेटि्स्टिक्स (आईबीजीई) था. इस इमारत को संस्थान ने 17 साल पहले खाली कर दिया था. अब यहां क़रीब सौ परिवार रहते हैं. पामेला इस इमारत में 15 साल से रह रही हैं. उनकी मां यहां आकर रहने वाली दूसरी महिला थीं. लेकिन ऐसे लोग जो अब फ़ेवाल में किराया देने में असमर्थ हैं यहां आकर रह रहे हैं. हर सप्ताह यहां नए परिवार पहुंच रहे हैं. रियो में क़रीब बीस लाख लोग जो कुल आबादी के 30 प्रतिशत हैं फ़वेला में रहते हैं. ऐसी बस्तियों में सफ़ाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के पर्याप्त इंतेज़ाम नहीं होते हैं. इन बस्तियों में रह रहे लोगों के जीवन में सुधार के लिए 2.6 अरब डॉलर का कार्यक्रम चलाया गया लेकिन इसका कोई ख़ास असर नहीं हुआ. खाली कर दी गई आईबीजीई की इमारत में 2012 तक सांस्कृतिक केंद्र खोलने की योजना थी. लेकिन अभी तक यहां कुछ नहीं बदला है. 12 वरषीय टायना आईबीजीई इमारत में चार-पांच साल से रह रही 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के डाटा के मुताबिक फ़वेला में रहने वाले 42 फ़ीसदी परिवारों में प्रमुख महिला हैं. अंतिम छोर पर होने के बावजूद ये समुदाय सहभागिता और सहयोग पर आधारित समाज बनाने की कोशिश कर रहा है. इस घर पर बनी इस ग्राफ़िटी में संदेश लिखा है- \"हम सब इंसान हैं.\" बजट की भारी कटौती का सामना कर रहे रियो में लोगों के जीवन में सुधार की गुंज़ाइश बहुत कम ही नज़र आती है. तमाम मुश्किलों के बावजूद शोध में शामिल हो दो-तिहाई लोगों का कहना था कि वो अपना इलाका छोड़कर नहीं जाएंगे. वो आपसी सौहार्द, सम्मान और अपने घर के प्रति गर्व की भावना को यहीं रहने की अहम वजह बताते हैं. सभी तस्वीरें © Tariq Zaidi ने ली हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मौजूदा आईपीएल चैंपियन कोलकाता नाइटराइडर्स शनिवार को पुणे में किंग्स इलेवन पंजाब का सामना करेगी. पर उसके लिए सबसे बड़ी चिंता की बात कप्तान गौतम गंभीर का बीमार होना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकोलकाता ने इस सीज़न के पहले ही मैच में मुंबई इंडियंस को सात विकेट से मात दी थी. दूसरे मुक़ाबले में उसे रॉयल चैंलेंजर्स बैंगलौर से 3 विकेट से हार का सामना करना पड़ा था. ख़राब फिल्डिंग का ख़ामियाज़ा बैंगलौर के ख़िलाफ़ कोलकाता को ख़राब फ़िल्डिंग का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा, ख़ासकर क्रिस गेल का कैच छोडना और उन्हें रन आउट करने के मौक़े गंवाना उसके लिए काफ़ी महंगा साबित हुआ था. गेल ने इसका फ़ायदा उठाते हुए नाबाद 96 रन बनाकर अपनी टीम को जीत की राह दिखाई. कोलकाता लगभग एक सप्ताह बाद मैदान में उतरेगी, इसलिए उसके खिलाड़ी तो तरो-ताज़ा होंगे लेकिन उन्हे लय पकडने में समय लग सकता हैं. समाप्त गंभीर का फ़िट होना ज़रूरी कप्तान गौतम गंभीर को पिछले दिनों बुखार था जबकि वह टीम के आक्रामक सलामी बल्लेबाज़ हैं. उनका फ़िट होना टीम के लिए ज़रूरी हैं. गंभीर ने बैंगलोर के ख़िलाफ़ 58 और मुंबई इंडियंस के ख़िलाफ़ 57 रन बनाए. उनका साथ देने के लिए रॉबिन उथप्पा हैं. मध्य क्रम में मनीष पांडेय और युसुफ़ पठान भी तेज़-तर्रार बल्लेबाज़ी कर सकते हैं. इनके बाद साकिब-अल-हसन और आंद्रे रसेल हैं. साफ़ है कि कोलकाता की बल्लेबाज़ी में दम है. गेंदबाज़ी में मोर्ने मोर्कल पिछले सीज़न में तुरूप का इक्का साबित हुए थे. वही स्पिन में सुनील नारायन की रहस्यमयी बॉलिंग अब पहले जैसी नहीं रहा. मोर्केल की धार कुंद? चकिंग का आरोप लगने के बाद आईपीएल में नारायन की वापसी से पहले जो गेंदबाज़ी परीक्षण हुआ उससे उनकी धार में थोड़ी कमी आई है. पंजाब की टीम कब अच्छा खेले और कब खराब, यह कहना मुश्किल हैं. डेविड मिलर और ग्लेन मैक्सवैल अभी छोटी-छोटी पारी ही खेल सके हैं. सहवाग अब तक अपना चिर-परिचित अंदाज़ नहीं दिखा पाए हैं. कप्तान जॉर्ज बैली ने मुंबई इंडियंस के ख़िलाफ़ नाबाद 61 रन बनाए जो जीत में सहायक साबित हुए. गेंदबाज़ी में मिचेल जॉनसन दिल्ली के ख़िलाफ़ ना सिर्फ महंगे साबित हुए. उन्हे कोई विकेट भी नहीं मिला. स्पिन में सारा भार अक्षर पटेल पर हैं. 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'बदलाव की जरूरत' \"ब्रिटेन की सभी पार्टियों के राजनेताओं ने प्रेस के साथ ऐसी नजदीकियां गांठ ली हैं जो जनहित में नहीं हैं.\" लॉर्ड जस्टिस लेवेसन रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन में प्रेस की आजादी तीन सौ वर्षों में बड़ी मेहनत से हासिल की गई और इसे जोखिम में नहीं डाला जाना चाहिए. लॉर्ड जस्टिस लेवेसन ने कहा कि प्रेस संबंधी नियमों में भी बदलाव की जरूरत है. इस जांच की घोषणा ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पिछले साल उस वक्त की थी जब पता चला कि 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड' अखबार के लिए काम करने वाले पत्रकारों ने सरे में एक ऐसे स्कूली लड़की मिली डोवलर का मोबाइल फोन हैक कर दिया था जिसकी हत्या कर दी गई थी. इस मामले पर विवाद बढ़ने के बाद इस अखबार को ही बंद कर दिया गया. लॉर्ड जस्टिस लेवेसन की जांच आठ महीनों तक चली और इसमें राजनेताओं, पत्रकारों और मीडिया संस्थानों से जुड़े लोगों से बातचीत कर सबूत जुटाए गए. जस्टिस लॉर्ड लेवेसन ने कहा कि वो अखबारों के लिए एक स्वतंत्र स्व-नियामक तंत्र की स्थापना से जुड़े नए कानून का प्रस्ताव रख रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस मामले में सरकार की ये कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वो प्रेस की स्वतंत्रता की पूरी तरह रक्षा करे. इसे भी पढ़ें टॉपिक\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन में फोन हैकिंग कांड और इस सिलसिले में प्रेस मानकों से जुड़े मुद्दों की छानबीन की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट आ गई है. रिपोर्ट में कुछ अखबारों पर लापरवाही बरतने और बेहद अनुचित तरीके से व्यवहार करने के आरोप लगे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलॉर्ड जस्टिस लेवेसन की ये जांच आठ महीने तक चली इस जांच की अगुवाई करने वाले लॉर्ड जस्टिस लेवेसन ने कहा है कि प्रेस को खुद अपने लिए नए नियम बनाने होंगे. गुरुवार को लंदन में अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए लॉर्ड जस्टिस लेवेसन ने कहा है कि ब्रितानी अखबारों ने खुद अपनी ही आचार संहिता की अनदेखी की है जिसकी वजह से निर्दोष लोगों की जिंदगियां तबाह हुईं. उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटेन की सभी पार्टियों के राजनेताओं ने प्रेस के साथ ऐसी नजदीकियां गांठ ली हैं जो जनहित में नहीं हैं. 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'संघर्ष विराम को तैयार' हकीमुल्ला का कहना है कि अगर सरकार की तरफ से बातचीत की औपचारिक घोषणा की जाती है तो वो इसके लिए तैयार हैं. लेकिन सरकार सीधी बातचीत करना ही नहीं चाहती और मीडिया के मार्फत अपनी मंशा और शर्तों का इजहार करती है. पाकिस्तान के कुछ उलेमा द्वारा संघर्ष विराम की अपील किए जाने को लेकर उन्होंने कहा, ''हम संघर्ष विराम को तैयार हैं लेकिन ड्रोन हमलों को भी बंद करना होगा.'' कबीलाई इलाके में तहरीक़-ए-तालिबान जैसे संगठनों और सरकार के बीच हुए समझौतों के विफल होने में अपनी भूमिका से हकीमुल्ला ने इनकार करते हुए कहा कि कबीलाई इलाके के अन्य संगठनों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है. उन्होंने कहा कि अमरीका के इशारे पर कबीलाई जनता पर बमबारी कर और मदरसों व मस्जिदों को निशाना बना कर सरकार ने ख़ुद वादाख़िलाफी की है. माना जाता है कि तहरीक़-ए-तालिबान की वादाख़िलाफी की वजह से यह समझौता परवान नहीं चढ़ सका. 'पाक में शरिया लागू करेंगे' अमरीका अफगानिस्तान से 2014 में अपने सारे सैनिक वापस बुला लेगा. इस हालत में क्या तहरीक़-ए-तालिबान के नजरिए पर कोई असर पड़ेगा? हकीमुल्ला का कहना है कि, उनका संगठन, सिर्फ अमरीका के साथ पाकिस्तान की दोस्ती के कारण जिहाद नहीं छेड़े हुए है. अमरीकी इशारे पर मुसलमानों का कत्लेआम भी इसका एक प्रमुख कारण है. अमरीकी सेनाओं के चले जाने के बाद उनका अगला मक़सद पाकिस्तान में गैर इस्लामिक सरकार को उखाड़ फेंकना और वहां शरिया क़ानून लाना होगा. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफगानिस्तान से सटे पाकिस्तान के कबायली इलाक़ों में सक्रिय तहरीक़-ए-तालिबान के मुखिया हकीमुल्ला महसूद ने कहा है कि वह पाकिस्तान सरकार से बातचीत को तैयार हैं मगर साथ ही उन्होंने कहा है कि उनका गुट अमरीकियों को निशाना बनाते रहेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान में सार्वजनिक जगहों पर लगातार हो रहे धमाकों में हाथ होने से उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार किया. हकीमुल्ला मसूद ने बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में कहा, ''हम सार्वजनिक जगहों पर धमाकों को ग़लत समझते हैं और इसकी निंदा करते हैं. हम उन सभी हमलों की निंदा करते हैं जिसमें मुसलमानों की जान और माल को नुकसान पहुंचता है.'' सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि पाकिस्तान में धमाके के कारण हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार यही संगठन है. हकीमुल्ला पर एफबीआई ने 30 करोड़ रुपए का ईनाम घोषित कर रखा है. आरोप महसूद का आरोप है कि इन धमाकों के पीछे पाकिस्तानी हुक़ूमत का हाथ है और इसके लिए तहरीक़-ए-तालिबान को ज़िम्मेदार ठहराकर वह जनता के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है. महसूद ने कहा, ''हम केवल काफिरों और अमरीकियों को निशाना बनाते हैं और बनाते रहेंगे. लेकिन जहां तक धमाकों की बात है, हमने इसमें हाथ होने से कल भी इनकार किया था और आज भी इनकार कर रहे हैं.'' उनका कहना है कि पाकिस्तानी सरकार अगर संजीदा बातचीत करना चाहती है तो वे बात करने को तैयार हैं. हालांकि महसूद ने यह भी बताया कि सरकार ने ऑल पार्टी कान्फ्रेंस के बाद अभी तक ऐसी कोई पेशकश नहीं की है और न ही अपना कोई नुमाइंदा भेजा. पाकिस्तानी सरकार और कबीलाई इलाकों में सक्रिय आतंकी संगठनों के बीच समझौते की कोशिश हुई थी. करीब एक महीना पहले सरकार ने तहरीक़-ए-तालिबान से ताज़ा बातचीत की मंशा जताई थी. 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लोगों का कहना था कि क़रीब 40 लोगों को अगवा किया गया लेकिन उच्च शिक्षा मंत्री ने अगुवा किए गए लोगों की संख्या 100 से 150 के बीच बताई थी. बाद में शाम होने तक संख्या के बारे में ख़बरें आई हैं कि चालीस लोगों को अगवा किया गया. आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस घटना के सिलसिले में अनेक वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से पूछताछ की गई. पाँच पुलिस कमांडरों को गिरफ़्तार भी किए जाने की ख़बरें हैं. ख़बरों के अनुसार अपहर्ता कोई बीस कारों में आए थे और उन्होंने इराक़ी सुरक्षाकर्मियों की तरह की वर्दी पहन रखी थी. अपहरणकर्ता उच्चा शिक्षा मंत्रालय के संग्रहालय वाले कक्ष के सामने रुके जहाँ मंत्रालय का रिकॉर्ड रखा जाता है. महिलाओं को एक किनारे करने के बाद अपहरणकर्ता उन सब पुरुषों को अपने साथ ले गए जितने वहाँ मौजूद थे. इनमें सुरक्षा गार्ड और वे लोग भी शामिल थे जो मंत्रालय से रिकॉर्ड लेने के लिए पहुँचे हुए थे. संसद की शिक्षा समिति के प्रमुख अल्ला मक्की ने बताया है कि अपहरण का शिकार लोगों में शिया और सुन्नी दोनों हैं. मक्की ने संसद की कार्यवाही को रोकते हुए यह ख़बर संसद को दी. उन्होंने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षामंत्री से अनुरोध किया है कि तत्काल कोई क़दम उठाएँ. इससे पहले भी चरमपंथी विश्वविद्यालय के शिक्षकों को निशाना बना चुके हैं. बीबीसी संवाददाता डेविड लॉयन का कहना है कि इस ताज़ा हमले के बाद सवाल पूछे जा रहे हैं कि सुरक्षाकर्मी सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करने में कितने सक्षम हैं.\n\nSummary:", "target": "अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षाबलों ने इराक़ में अपह्त किए गए सभी लोगों को मुक्त करा लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइराक़ के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार इराक़ी पुलिस के विभिन्न अभियानों के बाद बंधकों को मुक्त कराया जा सका. ग़ौरतलब है कि मंगलवार को बग़दाद के केंद्रीय इलाक़े में स्थित उच्चशिक्षा मंत्रालय की इमारत से अनेक सरकारी कर्मचारियों को अगवा कर लिया गया था. ख़बरों के अनुसार लगभग 40 लोगों को बंधक बनाया गया था. कितने कर्मचारियों का अपहरण किया गया इस बारे में विरोधाभासी ख़बरें मिली थीं. कुछ लोगों का कहना था कि क़रीब 40 लोगों को अगवा किया गया लेकिन उच्च शिक्षा मंत्री ने अगुवा किए गए लोगों की संख्या 100 से 150 के बीच 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बना चुके हैं. बीबीसी संवाददाता डेविड लॉयन का कहना है कि इस ताज़ा हमले के बाद सवाल पूछे जा रहे हैं कि सुरक्षाकर्मी सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करने में कितने सक्षम हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 313, "source_item_id": "313", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1666, "clean_index": 289, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:289"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे, कभी खुशी कभी ग़म, मुझसे दोस्ती करोगे, नमस्ते लंदन... कई हिंदी फ़िल्में का ताना-बाना इस शहर के इर्द-गिर्द बुना जा चुका है. लंदन और बॉलीवुड का रिश्ता काफ़ी गहरा है. इसी रिश्ते को और मज़बूत करने के लिए विज़िट लंदन और फ़िल्म लंदन ने बॉलीवुड मूवी मैप नाम से एक विशेष नक्शा तैयार किया है. इस नक्शे में लंदन के मुख्य आकर्षणों को दिखाया गया है लेकिन साथ ही नक्शे में ये भी लिखा गया है कि किस मुख्य आकर्षण या स्थान पर किस हिंदी फ़िल्मों की शूटिंग हुई है. लंदन आई, ट्रैफ़ेल्गर स्क्वेयर, वाटरलू ब्रिज, पिकैडली सकर्स.. लंदन की कुछ ऐसी जानी-मानी जगहें हैं जो कई फ़िल्मों में आपको दिख जाएँगी. मिनी पंजाब कहे जाने वाले लंदन के साउथहॉल इलाक़े में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे (डीडीएलजे) के कई दृश्य फ़िल्माए गए थे. काजोल का घर यहाँ दिखाया गया था. जबकि यहाँ का ऐतिहासिक ट्रैफ़ेल्गर स्क्वेयर सलामे इश्क़, डीडीएलजे, आप की ख़ातिर में दिखाई दिया है. जबकि कभी खुशी कभी ग़म हाइड पार्क, पिकैडली सर्कस, ब्रिटिश म्यूज़ियम, ऑस्टरली पार्क जैसी जगहों पर शूट हुई थी. लंदन पसंदीदा जगह अगर थोड़ा और पीछे जाएँ तो यश चोपड़ा की श्रीदेवी-अनिल कपूर अभिनीत लम्हे में भी लंदन की झलक देखने को मिलती है. इस वर्ष आने वाली फ़िल्म झूम बराबर झूम में अभिषेक बच्चन और प्रीति ज़िंटा भी लंदन के वाटरलू ब्रिज पर नाचते-गाते नज़र आएँगे. हिंदी फ़िल्मों में विदेशों में शूटिंग करने का चलन पुराना है. दिल्ली के चाँदनी चौक या मुंबई की चौपाटी से सीधे हीरो-हीरोइन स्विट्ज़रलैंड की वादियों में पहुँच जाते हैं. साठ के दशक में राज कपूर ने विदेशों में फ़िल्मों की शूटिंग के चलन को बढ़ावा दिया और 90 के दशक में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे ने इस रुझान को एक बार फिर हवा दी. विदेशी लोकेशनों में लंदन भारतीय फ़िल्मों का पसंदीदा शहर बन कर उभरा है. पिछले वर्ष ही लंदन में क़रीब 40 हिंदी फ़िल्मों की शूटिंग लंदन में हुई है. लंदन में बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय मूल के लोगों के चलते हिंदी फ़िल्में यहाँ काफ़ी लोकप्रिय हैं. ब्रिटेन के वित्त मंत्री गॉर्डन ब्राउन भी हाल के अपने भारत दौरे के तहत ख़ास तौर पर मुंबई के यशराज़ स्टूडियो गए और काफ़ी वक्त बिताया था. लंदन में अक्सर बॉलीवुड के बड़े सितारों का आना-जाना लगा रहता है. पिछले एक हफ़्ते के दौरान ही हिंदी फ़िल्मों के कई बड़े सितारे- अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान और ऐश्वर्या राय लंदन में थीं. 'फ़िल्म लंदन' के मुताबिक़ पिछले वर्ष ब्रिटेन में में रिलीज़ होने वाली कुल फ़िल्मों में से 16 फ़ीसदी भारतीय फ़िल्में थीं जिनमें कुल एक करोड़ बीस लाख पाउंड की कमाई हुई. लंदन में आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर बॉलीवुड के योगदान को देखते हुए ही फ़िल्म लंदन और विज़िट लंदन ने मिलकर बॉलीवुड मैप तैयार किया है. लंदन में फ़िल्माई जाने वाली भारतीय फ़िल्मों की शूटिंग में फ़िल्म लंदन मदद करता है. जबकि विज़िट लंदन शहर की आधिकारिक पर्यटक संस्था है.\n\nSummary:", "target": "अगर आप लंदन आएँ और उसी जगह घूमना चाहें या फ़ोटो खिंचवाना चाहें जहाँ शाहरुख़ या सलमान ख़ान ने शूटिंग की हो, तो आपके लिए ख़ास 'बॉलीवुड मूवी मैप' तैयार किया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे, कभी खुशी कभी ग़म, मुझसे दोस्ती करोगे, नमस्ते लंदन... कई हिंदी फ़िल्में का ताना-बाना इस शहर के इर्द-गिर्द बुना जा चुका है. लंदन और बॉलीवुड का रिश्ता काफ़ी गहरा है. इसी रिश्ते को और मज़बूत करने के लिए विज़िट लंदन और फ़िल्म लंदन ने बॉलीवुड मूवी मैप नाम से एक विशेष नक्शा तैयार किया है. इस नक्शे में लंदन के मुख्य आकर्षणों को दिखाया गया है लेकिन साथ ही नक्शे में ये भी लिखा गया है कि किस मुख्य आकर्षण या स्थान पर किस हिंदी फ़िल्मों की शूटिंग हुई है. लंदन आई, ट्रैफ़ेल्गर स्क्वेयर, वाटरलू ब्रिज, पिकैडली सकर्स.. लंदन की कुछ ऐसी जानी-मानी जगहें हैं जो कई फ़िल्मों में आपको दिख जाएँगी. मिनी पंजाब कहे जाने वाले लंदन के साउथहॉल इलाक़े में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे (डीडीएलजे) के कई दृश्य फ़िल्माए गए थे. काजोल का घर यहाँ दिखाया गया था. जबकि यहाँ का ऐतिहासिक ट्रैफ़ेल्गर स्क्वेयर सलामे इश्क़, डीडीएलजे, आप की ख़ातिर में दिखाई दिया है. जबकि कभी खुशी कभी ग़म हाइड पार्क, पिकैडली सर्कस, ब्रिटिश म्यूज़ियम, ऑस्टरली पार्क जैसी जगहों पर शूट हुई थी. लंदन पसंदीदा जगह अगर थोड़ा और पीछे जाएँ तो यश चोपड़ा की श्रीदेवी-अनिल कपूर अभिनीत लम्हे में भी लंदन की झलक देखने को मिलती है. इस वर्ष आने वाली फ़िल्म झूम बराबर झूम में अभिषेक बच्चन और प्रीति ज़िंटा भी लंदन के वाटरलू ब्रिज पर नाचते-गाते नज़र आएँगे. हिंदी फ़िल्मों में विदेशों में शूटिंग करने का चलन पुराना है. दिल्ली के चाँदनी चौक या मुंबई की चौपाटी से सीधे हीरो-हीरोइन स्विट्ज़रलैंड की वादियों में पहुँच जाते हैं. साठ के दशक में राज कपूर ने विदेशों में फ़िल्मों की शूटिंग के चलन को बढ़ावा दिया और 90 के दशक में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे ने इस रुझान को एक बार फिर हवा दी. विदेशी लोकेशनों में लंदन भारतीय फ़िल्मों का पसंदीदा शहर बन कर उभरा है. पिछले वर्ष ही लंदन में क़रीब 40 हिंदी फ़िल्मों की शूटिंग लंदन में हुई है. लंदन में बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय मूल के लोगों के चलते हिंदी फ़िल्में यहाँ काफ़ी लोकप्रिय हैं. ब्रिटेन के वित्त मंत्री गॉर्डन ब्राउन भी हाल के अपने भारत दौरे के तहत ख़ास तौर पर मुंबई के यशराज़ स्टूडियो गए और काफ़ी वक्त बिताया था. लंदन में अक्सर बॉलीवुड के बड़े सितारों का आना-जाना लगा रहता है. पिछले एक हफ़्ते के दौरान ही हिंदी फ़िल्मों के कई बड़े सितारे- अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान और ऐश्वर्या राय लंदन में थीं. 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हैं. अर्जेंटीना के क़ानून के तहत न्यायाधीश दस्तावेज़ प्राप्त होने के पंद्रह दिनों के भीतर सुनवाई की अगली तारीख़ रख सकते हैं. समाचार एजेंसियों के अनुसार क्वात्रोकी के वकील अलेजांद्रो फ्रीलैंड का कहना है कि उन्हें अभी तक सीबीआई द्वारा भेजे गए दस्तावेज़ देखने को नहीं मिले हैं और वो बिना देखे कोई टिप्पणी नहीं कर सकते. फ्रीलैंड ने यह भी कहा कि हो सकता है कि सीबीआई ने 2004 और 2005 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसलों की प्रति अपने दस्तावेज़ में नहीं दी होगी. फ्रीलैंड ने दावा किया कि इन फ़ैसलों के अनुसार बोफोर्स मामला झूठ पर आधारित है और ऐसे में सीबीआई क्वात्रोकी को दुनिया भर में परेशान नहीं कर सकती. उधर सीबीआई ने दिल्ली में कहा है कि उन्होंने अर्जेंटीना में एक वकील की सेवाएं लेने की प्रक्रिया शुरु कर दी है.\n\nSummary:", "target": "बोफ़ोर्स मामले के अभियुक्त ओत्तावियो क्वात्रोकी के प्रत्यर्पण से जुड़े सारे दस्तावेज़ अर्जेंटीना के एक न्यायाधीश के समक्ष रखे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविभिन्न समाचार एजेंसियों के अनुसार सीबीआई ने क्वात्रोकी के प्रत्यर्पण 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विश्व अर्थव्यवस्था की मंदी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ने जा रहा है. इसके बाद बाज़ार में बिकवाली का क्रम रुका और निवेशकों ने ख़रीदी की. बीएसई बुधवार को लगभग 255 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ था. जबकि गुरुवार को इसमें सुधार हुआ था और बीएसई 52.7 अंकों के साथ बंद हुआ था.\n\nSummary:", "target": "भारत के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के इस आश्वासन के बाद कि विश्व बाज़ार की उथलपुथल का असर भारतीय बाज़ार पर नहीं होने वाला है, भारतीय शेयर बाज़ार में विश्वास लौटा हुआ दिखता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूंजी बाज़ार में चल रही उठापटक को एक तरह से अनदेखा करते हुए भारतीय शेयर बाज़ार ने अच्छा व्यावसाय किया. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के 30 संवेदी शेयरों के सूचकांक सेंसेक्स में शुक्रवार को 726.26 अंकों का उछाल दर्ज़ किया गया. इससे गुरुवार के मुक़ाबले 5.46 प्रतिशत ऊपर जाकर सेंसेक्स 14042.32 पर बंद हुआ. एक समय था जब यह आंकड़ा 14097.44 तक जा पहुँचा था लेकिन बाद में कुछ नीचे आ गया. जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के 50 संवेदी सूचकांक 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"Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोकार्नो में रानी ने बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत में आमिर और शाहरूख़ के प्रति असीम सम्मान के भाव का खुलकर इज़हार किया. बातचीत के मुख्य अंश-- ‘द राइज़िंग’ में आपकी बहुत ही छोटी भूमिका है. क्यों आपने इतना छोटा रोल स्वीकार किया? दरअसल, जब मैंने ये फ़िल्म साइन की थी तो मैंने अपना ‘कैमियो रोल’ समझकर साइन की थी. मैं स्कूल में अपने प्रिय विषय पर बनने वाली फ़िल्म का हिस्सा बनना चाहती थी. भारत के पहले क्रांतिकारी की कहानी पर बनने वाली फ़िल्म का स्क्रिप्ट मुझे दिया गया तो मुझे लगा कि हीरा की भूमिका बहुत ही रोचक है और मैं एक मेहमान कलाकार के रूप में फ़िल्म में शामिल होने को तैयार हो गई. लेकिन जब फ़िल्म बनने लगी तो दो-तीन अतिरिक्त दृश्यों में हीरा को लिया गया और वह कहानी का एक पूर्ण पात्र बन गई. मेरा तो यह मानना रहा है कि फ़िल्म में कितनी बड़ी भूमिका है इसका महत्व नहीं है. महत्व इस बात का होता है कि किसी किरदार का काम क्या है और क्या फ़िल्म देखने के बाद उसे याद रखा जाता है. यदि आपने फ़िल्म देखने के बाद भी मेरे किरदार को याद रखा है तो मैं समझती हूँ कि मैं क़ामयाब रही. एक और बात यह है कि हर फ़िल्म नायिका प्रधान नहीं हो सकती. यदि आप मंगल पांडे पर फ़िल्म देखने जाते हैं तो ज़ाहिर है आप मंगल पांडे के किरदार को देखने जा रहे हैं. फ़िल्म में अपने किरदार के बारे में कुछ बताएँ? जहाँ तक हीरा के किरदार की बात है तो मैंने कभी एक वेश्या की भूमिका नहीं की थी. और इस फ़िल्म में अठारहवीं सदी की एक वेश्या की भूमिका निभाना बड़ा ही रोचक अनुभव रहा. यह आमिर की चार साल बाद आ रही फ़िल्म है. वो मेरे निकट मित्र हैं. इसलिए भी इस फ़िल्म से एक भावनात्मक जुड़ाव रहा और काम करने में मज़ा आया. आमिर के साथ काम करने और शाहरूख़ के साथ काम करने के अनुभव में आप किस तरह का अंतर पाती हैं? शाहरूख़ और आमिर दोनों महत्वपूर्ण हैं मेरे करियर और मेरे जीवन में. मेरे करियर की शुरूआत इन्हीं दोनों के साथ हुई. मैंने दोनों से बहुत कुछ सीखा है. दोनों ने शुरूआत में बड़े प्यार से मुझे बहुत कुछ सिखाया. तब मैं बहुत छोटी थी. मुझे ज़्यादा समझ नहीं थी फ़िल्मों के बारे में या एक्टिंग के बारे में. दोनों ने ठीक उसी तरह मुझे सिखाया जैसे किसी बच्चे का हाथ पकड़ उसे चलना सिखाते हैं. उस समय दोनों बहुत बड़े स्टार थे और मैं एक ‘न्यूकमर’ थी. मेरे मन में उनके प्रति एक ‘सॉफ़्टकॉर्नर’ है. मैं उनको बहुत प्यार करती हूँ, बहुत सम्मान करती हूँ इसलिए आमिर और शाहरूख़ जब भी मुझे कुछ बोलते हैं मैं बिना सोचे, बिना झिझक हाँ कर देती हूँ. अगर आमिर और शाहरूख़ की पिक्चर में मुझे दूर एक खंभे की तरह खड़े होने के लिए भी कहेंगे तो मैं खड़ी हो जाऊँगी. क्योंकि मेरा उनके लिए प्यार इतना ज़्यादा है कि वो कुछ भी मुझे कहें, मैं कर दूँगी. आपने कहा कि आप रोचक और एक चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ करना चाहती हैं. तो ऐसे और कौन से किरदार हैं जिन्हें निभाने का मौक़ा आपको नहीं मिला है, जिन्हें आप निभाना चाहती हैं? मैं हमेशा कहती हूँ कि ये एक्टर के भाग्य में होता है कि निर्देशक किस कहानी के लिए उसे चुनता है. मैं इंतज़ार करती हूँ कि किसी निर्देशक के दिमाग में कोई अभिनव विचार हो और वो उसके लिए मुझे सही पाए. जैसे संजय लीला भंसाली ने ‘ब्लैक’ बनाने की सोची तो किसी ने ज़िंदगी में नहीं सोचा होगा कि संजय ऐसी फ़िल्म करेंगे. लेकिन उन्होंने ‘ब्लैक’ बनाने की सोची और उसके लिए मुझे चुना. तो ये सब एक्टर के भाग्य पर निर्भर करता है. आपकी आने वाली फ़िल्में कौन-कौन सी हैं? मेरी आने वाली फ़िल्में हैं करन जौहर की ‘कभी अलविदा न कहना’ जिसमें शाहरूख़ ख़ान, अभिषेक बच्चन और प्रीति ज़िंटा हैं मेरे साथ. ये फ़िल्म अगले साल अप्रैल-मई तक आ जाएगी. दूसरी फ़िल्म है रवि चोपड़ा की ‘बाबुल’. उसमें अमिताभ बच्चन, हेमा जी, सलमान और जॉन हैं मेरे साथ. वो भी अगले साल मई तक आ जाएगी.\n\nSummary:", "target": "बॉलीवुड की सफल अभिनेत्री रानी मुखर्जी आमिर ख़ान और शाहरूख़ ख़ान की इतनी एहसानमंद हैं कि यदि इन अभिनेताओं की फ़िल्मों में उन्हें दूर खड़े खंभे की भूमिका मिले तो वे भी करेंगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोकार्नो में रानी ने बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत में आमिर और शाहरूख़ के प्रति असीम सम्मान के भाव का खुलकर इज़हार किया. बातचीत के मुख्य अंश-- ‘द राइज़िंग’ में आपकी बहुत ही छोटी भूमिका है. क्यों आपने इतना छोटा रोल स्वीकार किया? दरअसल, जब मैंने ये फ़िल्म साइन की थी तो मैंने अपना ‘कैमियो रोल’ समझकर साइन की थी. मैं स्कूल में अपने प्रिय विषय पर बनने वाली फ़िल्म का हिस्सा बनना चाहती थी. भारत के पहले क्रांतिकारी की 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भूमिकाएँ करना चाहती हैं. तो ऐसे और कौन से किरदार हैं जिन्हें निभाने का मौक़ा आपको नहीं मिला है, जिन्हें आप निभाना चाहती हैं? मैं हमेशा कहती हूँ कि ये एक्टर के भाग्य में होता है कि निर्देशक किस कहानी के लिए उसे चुनता है. मैं इंतज़ार करती हूँ कि किसी निर्देशक के दिमाग में कोई अभिनव विचार हो और वो उसके लिए मुझे सही पाए. जैसे संजय लीला भंसाली ने ‘ब्लैक’ बनाने की सोची तो किसी ने ज़िंदगी में नहीं सोचा होगा कि संजय ऐसी फ़िल्म करेंगे. लेकिन उन्होंने ‘ब्लैक’ बनाने की सोची और उसके लिए मुझे चुना. तो ये सब एक्टर के भाग्य पर निर्भर करता है. आपकी आने वाली फ़िल्में कौन-कौन सी हैं? मेरी आने वाली फ़िल्में हैं करन जौहर की ‘कभी अलविदा न कहना’ जिसमें शाहरूख़ ख़ान, अभिषेक बच्चन और प्रीति ज़िंटा हैं मेरे साथ. ये फ़िल्म अगले साल अप्रैल-मई तक आ जाएगी. दूसरी फ़िल्म है रवि चोपड़ा की ‘बाबुल’. उसमें अमिताभ बच्चन, हेमा जी, सलमान और जॉन हैं मेरे साथ. वो भी अगले साल मई तक आ जाएगी.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", 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'एल क्लासिको' समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक मैच से पहले संवाददाता सम्मेलन में विलानोवा ने कहा, \" हम एक दूसरे के खिलाफ़ कई दफा़ खेल चुके हैं. मैच में दोनों ही टीमें कोशिश करेंगी की विपक्ष को हैरान किया जा सके लेकिन हमें पता है कि वो कोशिशें किस तरह की होंगी. इसके अलावा टीम के खिलाड़ी कुछ गलती कर सकते हैं जिससे मैच का रूख पलट सकता है. दोनों ही टीमों के पास लाजवाब खिलाड़ी हैं जो बेहतरीन शॉट्स खेल सकते हैं.\" वहीं रियाल मैड्रिड के मैनेजर होज़े मोरिन्यो का मानना है कि इन दो टीमों का मैच देखने के लिए 'दुनिया थम जाती है' और उनकी टीम सीज़न में धीमा शुरुआत करने के बाद अब बढ़िया खेलने लगी है. उन्होंने कहा, \"हर किसी को बड़े मैच का इंतज़ार रहता है. इस मैच के लिए दुनिया थम जाती है. ऐसे में दोनों ही टीमों की और रैफरी की भी ये ज़िम्मेदारी रहती है कि वो दुनिया को ऐसा खेल दिखाएं जिसका वो बेसब्री से इंतज़ार कर रही है.\" 'मेसी बनाम रोनाल्डो' दोनों ही टीमों में दो ऐसे खिलाड़ी हैं जो दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी होने का दावा ठोंकते हैं. मैड्रिड के क्रिस्टियानो रोनाल्डो ज़बर्दस्त फॉर्म में हैं और इस सीज़न सभी प्रतिगोतियाओं में मिलाकर 12 गोल ठोंक चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ होंगे बार्सिलोना के लियोनेल मेसी जिन्होंने पिछले सीज़न स्पैनिश लीग में रिकॉर्ड 50 गोल दागे थे और इस सत्र वो 10 गोल कर चुके हैं. मैड्रिड की टीम स्पैनिश लीग में बार्सिलोना से पीछे चल रही है. मैच भारतीय समयानुसार रविवार रात 11.15 से शुरु होगा.\n\nSummary:", "target": "स्पैनिश फुटबॉल लीग के एक बहुप्रतिक्षित मुकाबले में रविवार रात बार्सिलोना की टक्कर रियाल मैड्रिड से होगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्पेन के फुटबॉल जगत में इस मैच को 'एल क्लासिको' के नाम से पेश किया जा रहा है. इस मैच को 'मेसी बनाम रोनाल्डो' भी कहा जा रहा है. बार्सिलोना ने इस सीज़न अपने सभी छह मैच जीते हैं और अगर वो अपने चिर-परिचित प्रतिद्वंदी रियाल से जीतते हैं तो वो उनसे 11 अंक आगे निकल जाएंगे. बार्सिलोना के मैनेजर टिटो विलानोवा का कहना है कि इस 'एल क्लासिको' मैच को कोई भी टीम जीत सकती है. 'एल क्लासिको' समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक मैच से पहले संवाददाता सम्मेलन में विलानोवा ने कहा, \" हम एक दूसरे के खिलाफ़ कई दफा़ खेल चुके हैं. मैच में दोनों ही टीमें कोशिश करेंगी की विपक्ष को हैरान किया जा सके लेकिन हमें पता है कि वो कोशिशें किस तरह की होंगी. इसके अलावा टीम के खिलाड़ी कुछ गलती कर सकते हैं जिससे मैच का रूख पलट सकता है. दोनों ही टीमों के पास लाजवाब खिलाड़ी हैं जो बेहतरीन शॉट्स खेल सकते हैं.\" वहीं रियाल मैड्रिड के मैनेजर होज़े मोरिन्यो का मानना है कि इन दो टीमों का मैच देखने के लिए 'दुनिया थम जाती है' और उनकी टीम सीज़न में धीमा शुरुआत करने के बाद अब बढ़िया खेलने लगी है. उन्होंने कहा, \"हर किसी को बड़े मैच का इंतज़ार रहता है. इस मैच के लिए दुनिया थम जाती है. ऐसे में दोनों ही टीमों की और रैफरी की भी ये ज़िम्मेदारी रहती है कि वो दुनिया को ऐसा खेल दिखाएं जिसका वो बेसब्री से इंतज़ार कर रही है.\" 'मेसी बनाम रोनाल्डो' दोनों ही टीमों में दो ऐसे खिलाड़ी हैं जो दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी होने का दावा ठोंकते हैं. मैड्रिड के क्रिस्टियानो रोनाल्डो ज़बर्दस्त फॉर्म में हैं और इस 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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, ‘हमें ऐसे खतरों को ध्यान में रखना होगा और उनसे निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है.’ याद रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच इस्लामाबाद में 20 और 21 मई को वार्ताएं होंगी. 20 मई को भारत औऱ पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की वार्ताएं होंगी औऱ अगले दिन दोनो देशों के विदेश मंत्रियों के बीच विचार विमर्ष होगा. दोनो देशों के बीच ये वार्ताएं करीब सात महीनों के अंतराल के बाद हो रही हैं. जयपुर धमाकों के बाद भारत औऱ पाकिस्तान के बीच होने वाली इस बैठक में आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा होगा. भारत हमेशा से पाकिस्तान की ओऱ से होने वाली कथित घुसपैठ की ओर ध्यान आकर्षित करता रहा है.\n\nSummary:", "target": "जयपुर बम धमाकों के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि कहा है कि चरमपंथी नहीं चाहते हैं कि भारत औऱ पाकिस्तान के रिश्ते सामान्य हों.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्होंने कहा कि चरमपंथियों के ‘मंसूबों को कामयाब होने से रोकने के लिए कदम उठाने की ज़रूरत है.’ दो दिनों की अपनी भूटान यात्रा समाप्त होने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए 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बॉक्साइट की खुदाई करके वहीं बने एक रिफ़ाइनरी में उससे अल्यूमीनियम बनाने की है और उनका कहना है कि उससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलेगी. वेदांता राजस्थान मे तेल और गैस उत्पादन से जुड़ी ब्रिटिश कंपनी केन एनर्जी में मालिकाना हक़ के लिए दस अरब डॉलर तक की कीमत अदा करने को तैयार है. केन इंडिया राजस्थान में हर दिन एक लाख 25 हज़ार बैरल तेल निकालती है और भारत की सबसे बड़ी तेल और गैस कंपनियों में से एक है. वेदांता का कहना है कि वो इसे दोगुना कर सकते हैं यदि केन इंडिया के 51 से 61 प्रतिशत तक के शेयर खरीदने के उनके प्रस्ताव को मंज़ूरी मिल जाती है. यदि ऐसा होता है तो वेदांता भारत का एक चौथाई तेल उत्पादन उनके हिस्से में आ जाएगा और अंदाज़ा है कि ये भी काफ़ी विवादास्पद होगा. साल 2009 में ब्रिटेन की सरकार ने कहा था कि वेदांता अपने खदान साइट के पास रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा करने में असफल रहा है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": 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है कि चुनाव प्रचार और मतदान में दिक़्कत आएगी इसलिए चुनाव टाल देना चाहिए. लेकिन चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके पास घाटी में चुनाव करवाने के लिए आपात योजना तैयार है और चुनाव नहीं टाले जाएँगे. पहले चरण में बांदीपुरा ज़िले के तीन विधानसभा सीटों, जम्मू क्षेत्र के पुँछ ज़िले की तीन सीटों और लेह-करगिल ज़िलों की चार विधानसभा सीटों पर मतदान होना है.\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित राज्य जम्मू कश्मीर में 17 नवंबर को होने वाले पहले चरण के मतदान के लिए शनिवार को चुनाव प्रचार थम गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर में सात चरणों में मतदान होना है और सोमवार को पहले चरण में दस विधानसभा क्षेत्रों के लिए मत डाले जाएँगे. ये सीटें हैं पुँछ-हवेली, सूरनकोट, मेंधर, गुरेज, बांदीपुरा, सोनावाड़ी, नोबरा, लेह, करगिल, और जांस्कार. इनमें दो विधानसभा क्षेत्रों पुँछ-हवेली और मेंधर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सीमा से लगते हैं. पुँछ के उपायुक्त मोहम्मद अफज़ाक ने बट ने जानकारी दी कि इन ज़िलों में पिछले कुछ दिनों में कोई चरमपंथी अथवा चुनावी संबंधी 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में शांति बहाल नहीं हो सकती और चुनाव केवल ध्यान बाँटने का षड्यंत्र हैं. अधिकतर अलगाववादी नेता या तो नागरिक सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार हैं या फिर नज़रबंद हैं. बेरोज़गारी, स्वशासन के मुद्दे राजनीतिक मुख्यधारा की पार्टियों में नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने बेरोज़गारी दूर करने और मृतक चरमपंथियों के परिवारों को मदद देने का वादा किया है. पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी 'स्वशासन और ग्रेटर जम्मू-कश्मीर' का मुद्दा उठाया है. उधर कांग्रेस ने विकास, पारदर्शी प्रशासन और युवाओं की बेरोज़गारी के मुद्दे उठाए हैं और भारतीय जनता पार्टी ने अनुच्छेद 370 पर ज़्यादा कुछ न कहते हुए जम्मू-कश्मीर के हिंदू बहुल क्षेत्र के साथ कथित भेदभाव के मसले उठाए हैं. चुनाव आयुक्त का आश्वासन उधर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी ने कहा है कि सुरक्षा बलों को चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह का दख़ल देने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. उनका कहना था, \"हमनें सभी ज़िला कलेक्टरों और पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट कर दिया है कि हमे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं होगा.\" उन्होंने कहा, \"हमने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाने पर बल दिया है. चुनाव प्रक्रिया में किसी पुलिसकर्मी या सैन्य अधिकारी को दख़ल देने की इजाज़त नहीं होगी.\"\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों के पहले चरण में सोमवार को चार ज़िलों की दस विधानसभा सीटों में मतदान होगा. ये ज़िले हैं पुँछ, बांदीपुरा, करगिल और लेह.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइन जगहों पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं और सिर्फ़ पुँछ में ही अर्धसैनिक बलों की 80 कंपनियाँ तैनात की गई हैं. जम्मू कश्मीर में सात चरणों में मतदान होना है. जिन दस विधानसभा क्षेत्रों के लिए मत डाले जाएँगे, वे हैं - पुँछ-हवेली, सूरनकोट, मेंधर, गुरेज़, बांदीपुरा, सोनावाड़ी, नोबरा, लेह, करगिल, और जांस्कार. इन सीटों के 1038 केंद्रों पर छह लाख से ज़्यादा मतदाताओं के वोट डालने का प्रावधान किया गया है. इन चुनाव क्षेत्रों में 102 उम्मीदवार मैदना में हैं और सबसे ज़्यादा 22 उम्मीदवार सोनावाड़ी में हैं. चुनाव का बहिष्कार भी बीबीसी के श्रीनगर संवाददाता अल्ताफ़ हुसैन के अनुसार जुलाई-अगस्त में 'आज़ादी' के समर्थन 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विज्ञापन में तो इमरजंसी के दौरान बदनाम हुए एक नारे को फिर से उछाल दिया गया है. काँग्रेसी नेता देवकांत बरुआ ने इमरजंसी में ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा दिया था, जिसे चाटुकारिता की इंतिहा माना गया था. दिल्ली सरकार की ओर से छपवाए गए विज्ञापन में इंदिरा लिख कर आर को काला कर दिया गया है जिससे ये शब्द इंडिया बन जाता है. इंदिरा गाँधी की हत्या 31 अक्तूबर 1984 को दिल्ली में उनके 1, सफ़दरजंग रोड वाले निवास पर उन्हीं के सुरक्षा गार्डों ने कर दी थी. इसी पुण्यतिथि को मनाने के लिए भारत सरकार के तमाम मंत्रालयों ने अपने बजट से पैसा निकाल कर अखबारों में आधे आधे पन्ने के महँगे विज्ञापन छपवाए हैं. सिख विरोधी दंगे दिवंगत नेताओं की याद में महँगे विज्ञापन छपवाने की परंपरा पर पहले भी विवाद हुआ है. इंदिगा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली शहर सहित देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर सिख विरोधी दंगे भड़क उठे. काँग्रेस के कई नेताओं पर दंगाइयों का नेतृत्व करने के आरोप हैं और तत्कालीन केंद्र सरकार पर दंगाइयों को पुलिस के ज़रिए मदद करने का आरोप भी लगा. दिवंगत नेताओं के जन्मदिन और पुण्यतिथियों के दिन अखबारों में विज्ञापन देने के मुद्दे पर पहले भी विवाद हो चुके हैं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के जन्मदिन यानी 20 अगस्त को भी इसी तरह के विज्ञापनों की बाढ़ आ गई थी. तब प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने सत्ताधारी कांग्रेस को 'सीमित ख़र्च' या समझदारी के साथ ख़र्च की बात याद दिलाई है. पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा था, \"अगर समझदारी से ख़र्च करने की बात की जाती है तो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को जन्मदिवस की शुभकामनाएँ देना एक बेहतर तरीक़े से किया जा सकता था. सब मिलकर श्रद्धांजलिस्वरूप एक विज्ञापन देते न कि सभी अख़बारों के सभी पन्नों पर सार्वजनिक क्षेत्र के सभी उपक्रम विज्ञापनों की बाढ़ के साथ श्रद्धांजलि दे रहे हैं.\" इस बार इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि पर मंत्रालयों और विभागों के साथ साथ काँग्रेस शासन वाले राज्यों की ओर से भी विज्ञापन जारी किए गए हैं.\n\nSummary:", "target": "इंदिरा गाँधी की 28 वीं पुण्यतिथि के दिन दिल्ली से छपने वाले तमाम अखबार उनकी तस्वीरों के बड़े बड़े विज्ञापनों से भरे हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकाँग्रेसी नेता देवकांत बरुआ ने इमंरजंसी के दौरान इंदिरा इज़ इंडिया का नारा लगाया था. पर दिल्ली सरकार की ओर से छपवाया गया एक विज्ञापन सबसे अलग है. इस विज्ञापन में तो इमरजंसी के दौरान बदनाम हुए एक नारे को फिर से उछाल दिया गया है. काँग्रेसी नेता देवकांत बरुआ ने इमरजंसी में ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा दिया था, जिसे चाटुकारिता की इंतिहा माना गया था. दिल्ली सरकार की ओर से छपवाए गए विज्ञापन में इंदिरा लिख कर आर को काला कर दिया गया है जिससे ये शब्द इंडिया बन जाता है. इंदिरा गाँधी की हत्या 31 अक्तूबर 1984 को दिल्ली में उनके 1, सफ़दरजंग रोड वाले निवास पर उन्हीं के सुरक्षा गार्डों ने कर दी थी. इसी पुण्यतिथि को मनाने के लिए भारत सरकार के तमाम मंत्रालयों ने अपने बजट से पैसा निकाल कर अखबारों में आधे आधे पन्ने के महँगे विज्ञापन छपवाए हैं. सिख विरोधी दंगे दिवंगत नेताओं की याद में महँगे विज्ञापन छपवाने की परंपरा पर पहले भी विवाद हुआ है. इंदिगा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली शहर सहित देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर सिख विरोधी दंगे भड़क उठे. काँग्रेस के कई नेताओं पर दंगाइयों का नेतृत्व करने के आरोप हैं और तत्कालीन 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यादव दस हज़ार वोट से हार गई थीं. इसके पहले बांका लोकसभा उपचुनाव में पुतुल कुमारी बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीती थीं. यासीन मलिक जमात के बाद अब जेकेएलएफ़ पर लगा प्रतिबंध भारत सरकार ने अलगाववादी नेता यासिन मलिक के नेतृत्व वाले संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी जेकेएलएफ़ पर प्रतिबंध लगा दिया है. केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा ने बताया कि संगठन को ग़ैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत प्रतिबंधित किया गया है. इसके प्रमुख यासिन मलिक गिरफ़्तार हैं और फ़िलहाल वह जम्मू की कोट बलवल जेल में बंद हैं. यह जम्मू-कश्मीर में दूसरा संगठन है, जिसे इस महीने प्रतिबंधित किया गया है. इससे पहले, केंद्र ने जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर पर प्रतिबंध लगा दिया था. कर्नाटकः इमारत के गिरने से अब तक 15 की मौत उत्तर कर्नाटक के धारवाड़ में गिरी एक निर्माणाधीन इमारत हादसे में मरने वालों की संख्या शुक्रवार को बढ़कर 15 हो गई. शुक्रवार को इसके मलबे में मंगलवार की शाम से दबे एक कपल को बाहर निकाला गया. एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस सुनील अग्रवाल के मुताबिक़ कपल की स्थिति स्थिर है और उनका इलाज चल रहा है. बेंगलुरु से क़रीब 400 किलोमीटर दूर धारवाड़ के कुमारेश्वरनगर में ध्वस्त हुई चार मंजिला निर्माणाधीन इमारत के मलबे से राहतकर्मियों ने अब तक 60 लोगों को बाहर निकाला है. ओला छह महीने के लिए बेंगलुरु में प्रतिबंधित ऐप टैक्सी बुकिंग सर्विस कंपनी ओला पर कर्नाटक में छह महीने के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है. प्रतिबंध कर्नाटक के परिवहन विभाग ने लगाया है. परिवहन विभाग का कहना है कि कंपनी को प्रतिबंध की इसकी सूचना मिलने के तीन दिन के भीतर अपना लाइसेंस जमा कराना होगा. ओला पर परिवहन विभाग ने बाइक टैक्सियों के अवैध संचालन को लेकर यह कार्रवाई की है. परिवहन विभाग ने ओला का संचालन करने वाली कंपनी एनी टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड बेंगलुरु ने कर्नाटक ऑन-डिमांड ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी एग्रीगेटर्स रूल्स, 2016 का उल्लंघन किया है. उधर ओला ने कहा है कि वो क़ानून मानने वाली कंपनी है और सौहार्दपूर्ण तरीक़े से इस मसले के हल के लिए सभी विकल्पों पर काम कर रही है. अमरीका का दावाः आईएस के क़ब्ज़े से छीना आख़िरी गढ़ अमरीका ने कहा है कि उसकी अगुवाई वाली सेना ने सीरिया में कथित इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों से उनका आखिरी इलाक़ा भी छीन लिया है. फ्लोरिडा में राष्ट्रपति ट्रंप ने संवाददाताओं को इराक़ और सीरिया के नक्शा दिखाते हुए कहा कि कभी इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के क़ब्ज़े में रहा बड़ा इलाक़ा अब लगभग मुक्त है. उन्होंने कहा, \"देखिए चुनाव के दिन आईएसआईएस कहाँ था और आज कहाँ पहुँच गया है. आप सभी के पास नक्शा मौजूद है आप देख सकते हैं कि आईएसआईएस किस हाल में पहुँच गया है. मुबारकबाद.... जाइए और इसका चारों ओर प्रचार कीजिए.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बिहार बीजेपी उपाध्यक्ष और पूर्व लोकसभा सांसद पुतुल कुमारी ने लोकसभा चुनाव 2019 में निर्दलीय प्रत्याशी उतरने का ऐलान किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुतुल कुमारी पिछला लोकसभा चुनाव हार गई थीं पुतुल बांका से ही सांसद रही हैं लेकिन आगामी चुनाव के लिए हुए सीटों के बंटवारे में यह सीट जेडीयू को दिया गया है. हालांकि पुतुल कुमारी ने यह भी कहा है कि वो बीजेपी छोड़ नहीं रही हैं बल्कि अपनी 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\"यदि शाहरुख़ के मन में मेरे व्यवहार के बारे मे थोड़ा भी शक है तो मैं उनसे सैकड़ों बार माफ़ी माँग लूँगा.\" कुछ दिनों पहले ही आमिर ख़ान ने अपने ब्लॉग में अपने एक कुत्ते का जिक्र किया था जिसका नाम शाहरुख़ है. उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा, \"शाहरुख़ मेरे घर की देखभाल करने वाले के कुत्ते का नाम है. जब मैं ने यह घर ख़रीदा तो देखभाल करने वाले के साथ यह कुत्ता भी आ गया.\" टिप्पणी की आलोचना उनकी इस टिप्पणी की बाद में काफ़ी आलोचना भी हुई थी जिसके बाद आमिर ने शाहरुख़ से माफ़ी माँग ली है. ये माफ़ी उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान मांगी. आमिर ने कहा कि शाहरुख़ उनके बहुत अच्छे दोस्त हैं और उनका इरादा बिल्कुल उनका अपमान करने का नहीं था. इस मसले को शाहरुख़ ख़ान ने हँस कर टाल दिया. उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि उनके पास ब्लॉग लिखने की फ़ुरसत नहीं है. लेकिन सवाल उठता है कि आख़िरकार फ़िल्म अभिनेताओं को ब्लॉगिंग की क्यों सूझी? अपने ब्लॉग में वे और किन चीज़ों की बात करते हैं. आमिताभ कहते हैं, \"मुझे इस माध्यम के बारे में पता नहीं था. मैं ने इसके बारे में मीडिया में पढ़ा और फिर ब्लॉगिंग के बारे में सीखा.\" ब्लॉग के प्रति प्रतिबद्धता बच्चन कहते हैं कि उन्हें जब भी फ़ुरसत मिलता है वे ब्लॉगिंग करते हैं. वे कहते हैं, \"मैंने ब्लॉग के लिए कोई अलग से समय निर्धारित नहीं कर रखा है. इसे मैं अपनी प्रतिबद्धता के तौर पर लेता हूँ.\" हाल के अपने पोस्ट पर उन्होंने कान फ़िल्म समारोह के बारे में लिखा है और दुख व्यक्त किया है कि भारत की ओर से समारोह में किसी फ़िल्म का प्रतिनिधित्व नहीं है. वह मुबंई के एक अख़बार में छपी इस ख़बर का खंडन करते हैं कि उन्हें ब्लॉगिंग के लिए मोटी रक़म मिली है. वे कहते हैं कि हाल ही में राजस्थान के जयपुर में हुए बम विस्फोट की निंदा उन्होंने अपने ब्लॉग में की, जब उन्हें एक पाठक ने इस घटना की ओर उनकी उदासीनता का इशारा किया. आमिर ख़ान ने अपने ब्लॉग पोस्ट में लिखा है कि क्यों दिल्ली में हुई ओलंपिक मशाल दौड़ में उन्होंने हिस्सेदारी की जबकि उनकी संवेदना तिब्बत की आज़ादी के लिए विरोध प्रदर्शन करने वालों के साथ है. फ़िल्म निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं, \"यह भविष्य है. इसके माध्यम से आप ख़ुद को व्यक्त कर सकते हैं. अपनी बात लोगों तक पहुँचा सकते हैं. इसी वजह से मैं ने ब्लॉग पर 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मामलों के प्रमुख माइकल चेरटॉफ़ ने वादा किया था कि 11 सिंतबर को हुए हमलों के अभियुक्तों को अपने बचाव का पूरा मौका दिया जाएगा. इन्हें ग्वांतानामों बे के सैन्य शिविर में हिरासत में रखा गया है. इन हमलों के मामले में छह लोगों पर हत्या और षडयंत्र के आरोप औपचारिक रुप से तय किए जाने के बाद चेरटॉफ़ ने बीबीसी से बातचीत में ये विचार व्यक्त किए. आतंकवाद के आरोपों का सामना करने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व कर रही संस्था सेंटर फ़ॉर कॉन्स्टिच्यूशनल राइट्स ने सैन्य आयोग की व्यवस्था को अनैतिक व्यवस्था की संज्ञा दी है. एक अन्य मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि यह ग़लत है कि यातनाएँ देकर एकत्र किए गए सबूत के आधार पर किसी को मृत्युदंड दिया जा सकता है. मृत्युदंड की मांग जिन लोगों पर आरोप तय किए गए हैं उनमें इन हमलों के कथित रुप से मुख्य षडयंत्रकारी खालिद शेख मोहम्मद भी शामिल हैं और अभियोजकों का कहना है कि वो इन सभी के ख़िलाफ़ मृत्युदंड की मांग करेंगे. ये सभी अभियुक्त इस समय ग्वांतानामो बे सैन्य शिविर में बंद है जहां अगले कुछ महीनों में इनके ख़िलाफ़ विशेष सैन्य कमीशन सुनवाई शुरु कर सकता है. हालांकि ग्वांतानामो बे में क़ैदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार की आलोचना होती रही है और यह भी कहा जाता रहा है कि इन क़ैदियों को अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया जाता है. शायद इसी कारण चेरटॉफ ने कहा है कि ख़ालिद मोहम्मद के साथ-साथ अन्य अभियुक्तों के ख़िलाफ जो भी सबूत जुटाए गए हैं उनकी जांच-परख न्यायाधीश करेंगे. उल्लेखनीय है कि जांचकर्ताओं ने जिन तरीकों से ये सबूत जुटाए हैं उनकी भी आलोचना हुई है और आलोचकों के अनुसार ये तरीके प्रताड़ना के वर्ग में आते हैं. वाशिंगटन से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि वकील मान रहे हैं कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं जिनसे इन अभियुक्तों को सज़ा दिलाई जा सकती है.\n\nSummary:", "target": "अमरीका में सरकारी दावों के बावजूद मानवाधिकार संगठनों और वकीलों ने ग्यारह सितंबर 2001 के हमलों के छह अभियुक्तों पर विशेष सैन्य आयोग के ज़रिए मुकदमा चलाने के फ़ैसले की आलोचना की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग्यारह सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर समेत पेंटागन के दफ्तर पर हमले हुए थे जिसमें लगभग तीन हज़ार लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे. इससे पहले अमरीका में आंतरिक सुरक्षा मामलों के प्रमुख माइकल चेरटॉफ़ ने वादा किया था कि 11 सिंतबर को हुए हमलों के अभियुक्तों को अपने बचाव का पूरा मौका दिया जाएगा. इन्हें ग्वांतानामों बे के सैन्य शिविर में हिरासत में रखा गया है. इन हमलों के मामले में छह लोगों पर हत्या और षडयंत्र के आरोप औपचारिक रुप से तय किए जाने के बाद चेरटॉफ़ ने बीबीसी से बातचीत में ये विचार व्यक्त किए. आतंकवाद के आरोपों का सामना करने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व कर रही संस्था सेंटर फ़ॉर कॉन्स्टिच्यूशनल राइट्स ने सैन्य आयोग की व्यवस्था को अनैतिक व्यवस्था की संज्ञा दी है. एक अन्य मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि यह ग़लत है कि यातनाएँ देकर एकत्र किए गए सबूत के आधार पर किसी को मृत्युदंड दिया जा सकता है. मृत्युदंड की मांग जिन लोगों पर आरोप तय किए गए हैं उनमें इन हमलों के कथित रुप से मुख्य षडयंत्रकारी खालिद शेख मोहम्मद भी शामिल हैं और अभियोजकों का कहना है कि वो इन सभी के ख़िलाफ़ मृत्युदंड की मांग करेंगे. ये सभी अभियुक्त इस समय ग्वांतानामो बे सैन्य शिविर में बंद है जहां अगले कुछ महीनों में इनके ख़िलाफ़ विशेष सैन्य कमीशन सुनवाई शुरु कर सकता है. हालांकि ग्वांतानामो बे में क़ैदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार की आलोचना होती रही है और यह भी कहा जाता रहा है कि इन क़ैदियों को अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया जाता है. शायद इसी कारण चेरटॉफ ने कहा है कि ख़ालिद मोहम्मद के साथ-साथ अन्य अभियुक्तों के ख़िलाफ जो भी सबूत जुटाए गए हैं उनकी जांच-परख न्यायाधीश करेंगे. उल्लेखनीय है कि जांचकर्ताओं ने जिन तरीकों से ये सबूत जुटाए हैं उनकी भी आलोचना हुई है और आलोचकों के अनुसार ये तरीके प्रताड़ना के वर्ग में आते हैं. वाशिंगटन से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि वकील मान रहे हैं कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं जिनसे इन अभियुक्तों को सज़ा दिलाई जा सकती है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 331, "source_item_id": "331", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1871, "clean_index": 302, "clean_language_index": 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ब्राज़ील में सैलानियों से भरी एक बस के गहरी खाई में गिरने से कम से कम 32 लोगों की मौत हो गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के मुताबिक़ बस में 50 लोग सवार थे. बस सांता कैटेरीना राज्य के ज्वॉयनविला शहर के पास 1,300 फ़ीट गहरी खाई में जा गिरी. आपात सेवा के कर्नल नेल्सन कोएलो ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि 12 घायलों को जॉइनविले और कैंपो अलेग्रे के अस्पतालों में दाखिल कराया गया है. बचाव दल दुर्घटनास्थल पर पहुंच गया है. कुछ लोग अब भी बस के मलबे में फंसे हुए हैं लेकिन उनके बचने की संभावना कम ही है. दुर्घटना का कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है. हालांकि ब्राज़ील की जी1 न्यूज़ वेबसाइट ने आशंका जताई है कि मोड़ पर चालक ने बस पर नियंत्रण खो दिया था. समाप्त स्थानीय मीडिया के मुताबिक़ एक बचाव हेलीकॉप्टर को घटनास्थल पर भेजा गया था लेकिन इलाक़े के दुर्गम होने के कारण वह उतर नहीं पाया. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत के निर्वाचन आयोग ने भारतीय जनता पार्टी के गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ को चुनाव आचार संहिता का दोषी करार देते हुए फटकार लगाई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआयोग ने योगी आदित्यनाथ को भविष्य में किसी भी चुनावी सभा में भाषण देते वक्त सावधानी बरतने की भी हिदायत भी दी है. इससे पहले योगी पर वोटों के लिए नोएडा में एक चुनावी सभा में धार्मिक भावनाएँ भड़काने का आरोप लगाया गया था. आचार संहिता उल्लघंन के इस मामले में योगी आदित्यनाथ ने वकील के जरिए अपना जवाब दाखिल किया था जिस पर भी आयोग ने आपत्ति की है. आयोग का कहना है कि निर्वाचन आयोग एक संविधानिक संस्था है और योगी को अपना जवाब कमीशन के नाम सीधे संबोधित करके देना चाहिए था. इसके अलावा चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को चिट्ठी लिखकर ये पूछा है कि आचार संहिता उल्लघंन इस मामले में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज हुआ है कि नहीं और अगर नहीं हुआ है तो संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई जाए. इस मामले में आयोग ने योगी को नौ सितंबर को नोटिस जारी किया था. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गुरूवार को न्यूज़ की दुनिया में क़दम रखते हुए फ़ेसबुक ने 'फ़ेसबुक न्यूज़वायर' नाम से पेज शुरू किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपत्रकारों और न्यूज़रूम की सुविधा के लिए ख़ासतौर पर शुरू किए गए इस पेज पर वास्तविक समय में ऑनलाइन, घटनाओं की जानकारी, घटनास्थल से रिपोर्टिंग या किसी कहानी पर विस्तार से रिपोर्ट पढ़ी जा सकता है. न्यूज़ कॉर्प स्वामित्व वाली स्टोरीफूल के साथ साझेदारी में शुरू किए गए फ़ेसबुक न्यूज़वायर पर सोशल नेटवर्क पर शेयर की गई कहानियां, रिपोर्ट, फ़ोटो, वीडियों, ऑडियो तथा उसपर लोगों के कमेंट को देखा व पढ़ा जा सकता है. स्टोरीफूल और फ़ेसबुक की साझेदारी वॉल स्ट्रीट जर्नल के मालिक न्यूज़ कॉर्परेशन ने पिछले साल दिसबर में 25 लाख डॉलर के सौदे में स्टोरीफूल को हासिल किया था. न्यूज़ कॉर्प के अनुसार, डबलिन स्थित स्टोरीफूल अपने साझेदारों के लिए ख़बरों की ख़ोज कर, उसकी पुष्टि कर सही समय पर ताज़ा जानकारी, संबंधित वीडियों और उपयोगी सामाग्री प्रदान करने में माहिर है. इसके साझेदारों में अख़बार भी शामिल हैं. फ़ेसबुक न्यूज़वायर पर चुनाव, विरोध प्रदशर्न या खेल जगत या अन्य ख़बरों की जानकारी सीधे घटना स्थल से मिल सकती है. फ़ेसबुक के ग्लोबल मीडिया साझेदारी के निर्देशक एंडी मिशेल ने अपने ब्लाग पर लिखा, \"ख़बरों को फ़ेसबुक पर सबसे बड़ा दर्शक मिल रहा है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.\" उन्होंने यह भी लिखा कि पत्रकार और मीडिया संगठन फ़ेसबुक का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं. पत्रकार फ़ेसबुक का अभिन्न अंग हैं उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा, \"हम आने वाले दिनों में मीडिया संगठनों और पत्रकारों के साथ हमारे संबंधों को गहरा करने के लिए उत्साहित हैं.\" कैलिफोर्निया स्थित सामाजिक नेटवर्क फ़ेसबुक द्वारा ताज़ा घटनाओं की जानकारी देने और उससे साझा करने का मौका देने जैसा बड़ा कदम ट्विटर के लिए चुनौती बन सकता है. फिलहाल ट्विटर तुरंत ही ख़बरों को साझा करने का विश्व स्तर पर सबसे बड़ा मंच है. फ़ेसबुक न्यूज़वायर को फ़ेसबुक डॉट कॉम/फ़ेसबुकन्यूज़वायर पर देखा जा सकता है. ट्विट्टर पर यह @एफ़बीन्यूज़वायर के नाम से मौज़ूद है. 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'ईरान पुराने रास्ते पर जा सकता है' अमरीका में ब्रिटेन के एक पूर्व राजदूत पीटर वेस्टमेकॉट का कहना है कि अमरीका ने यदि इस समझौते को तोड़ा तो ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू कर सकता है. वे कहते हैं, ''ये संभव है कि कट्टरपंथी, ख़ासतौर पर रेवॉल्यूशनरी गार्ड और उनकी तरह के अन्य लोग, जो पश्चिमी देशों के साथ कभी इस तरह का समझौता नहीं करना चाहते थे, वो अयातुल्लाह और अन्य को राज़ी कर सकते हैं कि परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू करना ईरान के हित में होगा.'' इससे पहले, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी कह चुके हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु समझौता खत्म किया तो अमरीका को ऐतिहासिक रूप से पछताना होगा. ईरान के पास क्या है? परमाणु समझौते पर अमरीका और ईरान की ओर से आ रहे बयानों के क्या मायने हैं? इस सवाल पर वॉशिंगटन में इस मामले के जानकार डॉक्टर अहसान एहरारी कहते है, ''हर तरफ़ से कहा जा रहा है अमरीका को, इस डील को मत छोड़िए आप. ईरान के पास संसाधन हैं, ज्ञान है. ईरान का जो न्यूक्लियर रिसर्च प्रोग्राम चल रहा है वो उसकी रफ़्तार बढ़ा देंगे.'' वो कहते हैं, ''ट्रंप न सिर्फ़ धमकी देंगे मिलिट्री ऐक्शन लेने की, बल्कि मैं समझता हूं कि ट्रंप के दौर में अमरीका कोशिश कर रहा है मिलिट्री ऐक्शन लिया जाए ईरान के ख़िलाफ़, जैसे जॉर्ज बुश ने किया था सद्दाम के समय.'' ईरान के साथ परमाणु समझौते पर दस्तख़त करने वाले देश हैं- अमरीका, रूस, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस. अमरीका को छोड़कर बाकी सभी देश चाहते हैं कि ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौता बना रहे. ये समझौता तीन वर्ष पहले हुआ था. इस समझौते के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को रोक दिया था, जिसके बदले में अमरीका ने ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी थी. ये समझौता राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुआ था. लेकिन डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही इस पर ख़तरा मंडरा रहा है. ट्रंप और मैक्रों ने नए ईरान परमाणु समझौते के दिए संकेत 'सीरिया, ईरान और रूस को बड़ी कीमत चुकानी होगी' (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका में ब्रिटेन के राजदूत सर किम डैरोक ने कहा है कि उन प्रस्तावों पर काम किया जा रहा है, जिनसे ईरान के साथ परमाणु समझौते पर अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की चिंताओं को कम किया जा सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते के मुखर आलोचक रहे हैं. आशंका जताई जा रही है कि राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ इस समझौते को रद्द करने की घोषणा कर सकते हैं. अमरीका में ब्रिटेन के राजदूत सर किम डैरोक ने कहा है कि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी उन उपायों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे अमरीका को इस समझौते को रद्द करने से रोका जा सके. उन्होंने कहा, ''इस मुद्दे पर हमारे कुछ विचार हैं. हमें लगता है कि हम कोई भाषा तलाश सकते हैं, कुछ ऐसा कर सकते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप की चिंताओं को दूर किया जा सके. हम फ्रांस और जर्मनी में अपने सहयोगियों के साथ बातचीत कर रहे हैं. जब तक ईरान इस समझौते का पालन कर रहा है, हमारे कोशिश रहेगी कि समझौता कायम रहे.'' 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रविवार को भारत में भी मदर्स डे मनाया जा रहा है. लोग सोशल मीडिया पर अपनी मां की तस्वीर पोस्ट कर रहे हैं और अपनी मां को अलग-अलग तरह से याद कर रहे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nट्विटर और फ़ेसबुक पर मदर्स डे हैशटैग भी ट्रेंड कर रहा है. बैडमिंटन ख़िलाड़ी साइना नेहवाल ने मां के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट कर लिखा, \"मदर्स डे मुबारक हो.\" अभिनेता सलमान ख़ान ने अपनी मां सलमा ख़ान और बालीवुड अभिनेत्री और कैबरे क्वीन हेलेन के साथ तस्वीर पोस्ट की है. अभिनेत्री आलिया भट्ट ने मां सोनी राज़दान के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट कर लिखा, \"ट्विटर में इतनी जगह नहीं कि उसमें आपके लिए मेरे शब्द समा सकें. इसलिए मैं कहती हूं, धन्यवाद.\" समाप्त सोनी राज़दान ने ट्विटर पर लिखा, \"मेरी 87 साल की जवान मां ट्विटर नहीं देखती, इसीलिए मैंने उन्हें ख़ुद बधाई दी. लेकिन उनके लिए जो यह पढ़ सकते हैं, आपको मदर्स डे मुबारक हो. मां बनना एक अद्भुत अहसास है.\" बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन ने लिखा \"मां के बिना कुछ भी संभव नहीं होता.\" अभिनेता वरुण धवन ने अपने बचपन की एक पुरानी तस्वीर पोस्ट की और लिखा, \"मां हर किसी की जगह ले सकती है, लेकिन उसकी जगह कोई नहीं ले सकता.\" अभिनेता अनुपम खेर ने लिखा, \"बच्चे के बिना कुछ कहे एक मां सब समझ जाती है.\" 'काइ पो चे' से बॉलीवुड जगत में कदम रखने वाले सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी मां को याद किया और लिखा, \"आपको याद करता हूं, मिस करता हूं.\" जैकलीन फर्नांडीज़ ने भी अपनी मां के साथ अपने बचपन की तस्वीर शेयर की. क्रिकेट के मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लिखा, \"आपने हमेशा मुझे अपना प्यार और आशीर्वाद दिया. मेरे साथ रहने के लिए धन्यवाद\" क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने अपने बचपन की तस्वीर के साथ लिखा, \"जब दवा काम न करे, तो एक ही चीज़ काम आती है- मां की दुआ.\" कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उन मांओं को बधाई दी, \"जो हमारी प्रेरणा का स्रोत बनी हैं, राह दिखाती हैं और जो हमें वो बनाती हैं जो हम हैं.\" राजद नेता और लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी ने अपनी मां और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के साथ एक तस्वीर पोस्ट की. उन्होंने लिखा, \"रोज मदर्स डे मनाएं क्योंकि आप उन्हीं की वजह से यहां हैं.\" ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पट्टनायक, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने भी लोगों को बधाई दी. 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पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. पिछले महीने 25 अप्रैल को भी इस सीरियल किलर ने तिहाड़ जेल के गेट नंबर तीन के बाहर एक शव फेंका था. इसके पहले दो लाशें 20 अक्टूबर, 2006 और 29 दिसंबर, 2005 में मिली थीं. तिहाड़ के पास मिले सभी शव पुरुष के हैं और पुलिस का कहना है कि मृतकों की आयु 25 से 35 वर्ष के बीच रही होगी. पुलिस के लिए अपशब्द पुलिस अधिकारियों के अनुसार इस बार भी शव के साथ एक चिट्ठी भी मिली है, जिसमें हत्यारे ने पुलिस के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है और आरोप लगाया है कि वह ग़लत तरीके से लोगों को फँसाती है. चिट्ठी में हत्यारे ने लिखा है,''मुझे भी दो मामले में ग़लत तरीके से फंसाया गया था और अब मैं हत्या कर रहा हूँ और आगे भी करता रहूंगा, हिम्मत हो, तो पकड़ कर दिखाओ.'' पश्चिमी दिल्ली के पुलिस उपायुक्त रोबिन हिबू के हवाले से अख़बारों में कहा गया है कि पहले की तरह ही इस बार भी किसी ने हरि नगर थाने में फोन करके शव के बारे में सूचना दी और पुलिसवालों को भद्दी गालियाँ भी दीं. बताया जा रहा है कि सूचना देने वाला हत्यारा ही था. बाद में पुलिस छानबीन में पता चला कि यह फोन किसी एसटीडी बूथ से किया गया 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से उसकी जिंदगी में बड़ी दिक्कतें आती हैं. एक कामयाब पति, दो प्यारे बच्चे और एक संपूर्ण परिवार है उसका. उसे महसूस होता है कि अंग्रेजी ना आने की वजह से उसे अपने परिवार से वो इज्जत नहीं मिल पा रही है जिसकी वो हकदार है. कहानी में मोड़ तब आता है जब अमरीका में रह रही उसकी बहन की बेटी की शादी का न्यौता उसे मिलता है. वो खुशी से झूम उठती है और उसे लगता है कि चलो इस बहाने उसके एकाकी जीवन में कुछ रोमांच आएगा. शादी की तैयारी के सिलसिले में उसे अपने बाकी परिवार से पहले अमरीका जाना पड़ता है लेकिन वहां पहुंचकर उसे करना पड़ता है कई मुश्किलों का सामना, क्योंकि इंग्लिश तो उसे आती नहीं. अपने घर से पहली बार इतनी दूर आई शशि को अपने बच्चों और पति की याद सताने लगती है. तब अमरीकी सभ्यता और अंग्रेजी भाषा से अनजान शशि तय करती है कि अब वो अपनी पहचान खुद बनाएगी और वो तय करती है अंग्रेजी भाषा सीख कर रहेगी. चंद ही हफ्तों में अपनी कड़ी मेहनत और लगन से शशि इतनी अच्छी इंग्लिश सीख जाती है कि जब इसका खुलासा उसके परिवार वालों के बीच होता है तो सब भौंचक्के रह जाते हैं. दिल को छू जाती है फिल्म फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले ना दिखाया गया हो, लेकिन जिस सादगी और ईमानदारी से फिल्म बनाई गई है वो दिल को छू जाती है. निर्देशक गौरी शिंदे के साथ श्रीदेवी. गौरी ने पहली ही फिल्म में अपनी प्रतिभा दिखा दी है. कई दृश्य बड़े अच्छे बन पड़े हैं, जैसे अपने बच्चों के स्कूल में पैरेंट्स टीचर मीटिंग के दौरान अंग्रेजी ना आने पर शशि का शर्माना या उसके पति का उसे सिर्फ अच्छे लड्डू बनाने वाली समझना और उस पर शशि की प्रतिक्रिया वाले दृश्य काबिले तारीफ हैं. श्रीदेवी का दमदार अभिनय श्रीदेवी की जितनी तारीफ की जाए कम है. उन्होंने अपने किरदार के साथ इस कदर न्याय किया है कि फिल्म के अंत में आप भूल जाते हो कि वो श्रीदेवी हैं, आप उन्हें शशि गोडबोले ही समझने लगते हो. साथी कलाकारों के रूप में उनके पति की भूमिका में आदिल हुसैन बहुत जमे हैं. कुछ कुछ दृश्यों में तो वो श्रीदेवी से भी बाजी मार ले गए हैं. बाकी के कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है. हां, कहीं कहीं पर फिल्म प्रिडिक्बल जरूर हो जाती है लेकिन दृश्यों को जरूरत से ज्यादा नहीं खींचा गया है इसलिए निराशा नहीं होती. कुल मिलाकर इंग्लिश विंग्लिश आपके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में कामयाब 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ही हफ्तों में अपनी कड़ी मेहनत और लगन से शशि इतनी अच्छी इंग्लिश सीख जाती है कि जब इसका खुलासा उसके परिवार वालों के बीच होता है तो सब भौंचक्के रह जाते हैं. दिल को छू जाती है फिल्म फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले ना दिखाया गया हो, लेकिन जिस सादगी और ईमानदारी से फिल्म बनाई गई है वो दिल को छू जाती है. निर्देशक गौरी शिंदे के साथ श्रीदेवी. गौरी ने पहली ही फिल्म में अपनी प्रतिभा दिखा दी है. कई दृश्य बड़े अच्छे बन पड़े हैं, जैसे अपने बच्चों के स्कूल में पैरेंट्स टीचर मीटिंग के दौरान अंग्रेजी ना आने पर शशि का शर्माना या उसके पति का उसे सिर्फ अच्छे लड्डू बनाने वाली समझना और उस पर शशि की प्रतिक्रिया वाले दृश्य काबिले तारीफ हैं. श्रीदेवी का दमदार अभिनय श्रीदेवी की जितनी तारीफ की जाए कम है. उन्होंने अपने किरदार के साथ इस कदर न्याय किया है कि फिल्म के अंत में आप भूल जाते हो कि वो श्रीदेवी हैं, आप उन्हें शशि गोडबोले ही समझने लगते हो. साथी कलाकारों के रूप में उनके पति की भूमिका में आदिल हुसैन बहुत जमे हैं. कुछ कुछ दृश्यों में तो वो श्रीदेवी से भी बाजी मार ले गए हैं. बाकी के कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है. हां, कहीं कहीं पर फिल्म प्रिडिक्बल जरूर हो जाती है लेकिन दृश्यों को जरूरत से ज्यादा नहीं खींचा गया है इसलिए निराशा नहीं होती. कुल मिलाकर इंग्लिश विंग्लिश आपके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में कामयाब होती है और नई पीढ़ी के लोगों को महसूस कराती है कि आखिर क्यों कभी श्रीदेवी इतनी बड़ी स्टार थीं. अब निश्चित तौर पर लोगों को उनकी अगली फिल्म का बेसब्री से इंतजार रहेगा.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 341, "source_item_id": "341", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2956, "clean_index": 310, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:310"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये ख़ुद को राष्ट्रवादी कहते हैं. विरोधियों को लोकतांत्रिक तरीक़े से हराने के बजाए कुचलने की बातें करते हैं. हर बात को राष्ट्रहित से जोड़ने का चलन है. ऐसे ही नियो नाज़ियों के विरोध की प्रतीक बन गई है एक तस्वीर. ये तस्वीर पिछले हफ़्ते दुनिया भर में सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. ये तस्वीर एक महिला की है, जिसने अकेले आगे बढ़कर खुलेआम, तीन सौ नियो नाज़ियों को चुनौती दी. ये तस्वीर, बहादुरी की मिसाल बन गई. जिसमें एक महिला, हाथ उठाए, मुट्ठी ताने, तीन सौ लोगों की भीड़ के सामने जा खड़ी होती है. अपना विरोध जताती है. जबकि आस-पास खड़े लोग तमाशबीन बने रहते हैं. ये तस्वीर, 1830 में फ्रेंच पेंटर यूजीन डेला क्वा की बनाई पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिंग द पीपुल' की याद दिलाती है. समाप्त वाक़िया 1 मई का है. जब स्वीडन के एक शहर में तीन सौ नियो नाज़ियों ने यूरोप में एशिया से आ रहे शरणार्थियों के ख़िलाफ़ मार्च निकाला. जब ये लोग शहर के बीचो-बीच से गुज़र रहे थे, तभी अफ्रीकी मूल की स्विडिश महिला टेस एसप्लंड बीच सड़क पर नियो-नाज़ियों के सामने आ खड़ी हुई. उसके होंठ भिंचे थे. हाथ तना था. मुट्ठी बंद थी. शराणार्थियों के ख़िलाफ़, नियो नाज़ियों के इस मार्च का विरोध करने से टेस ख़ुद को रोक नहीं पायी. टेस की इस बहादुरी को पास ही खड़े एक शख़्स, डेविड लैगरलॉफ ने कैमरे में क़ैद करके सोशल मीडिया पर डाल दिया. अगले कुछ दिनों तक टेस की बहादुरी की कहानी कहती ये तस्वीर पूरी दुनिया में सोशल मीडिया पर वायरल रही. टेस एस्प्लंड का ये विरोध, किसी योजना के तहत नहीं, अचानाक दर्ज कराया गया था. मगर इसने 1830 में बनी पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिग पीपुल' की याद दिला दी. इस पेंटिंग में फ्रेंच कलाकार यूजीन डेला क्वा ने एक महिला को आज़ादी का प्रतीक बनाकर पेश किया था. वो महिला, फ्रेंच इंक़िलाब का तिरंगा उठाए, बारूद के धुएं के बीच से गुज़रती दिखाई देती है. उसके पीछे हथियारबंद लोगों की भीड़ है, जो फ्रांस के राजा चार्ल्स दशम का विरोध कर रही है. 1830 में फ्रेंच राजा चार्ल्स दशम को जनता के विरोध के चलते गद्दी छोड़नी पड़ी थी. उस पर आरोप था कि वो कट्टरपंथी नीतियों को लागू कर रहा है. इसमें पत्रकारों के लिखने और बोलने पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला भी शामिल था. टेस एस्प्लंड के विरोध की फोटो हो या फिर यूजीन डेला क्वा की पेंटिंग. दोनों ही आम लोगों के विरोध की मिसाल हैं. दोनों के उठे हाथ, तनी, बंद मुट्ठियां, जनता के विरोध की ताक़त का एहसास कराती हैं. (अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दुनिया में इन दिनों दक्षिणपंथ की लहर सी चल रही है. अमरीका में डोनल्ड ट्रम्प, यूरोपीय देशों में नियो नाज़ी आंदोलन या फिर भारत में बीजेपी का बढ़ता असर, इस बात की मिसाल हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये ख़ुद को राष्ट्रवादी कहते हैं. विरोधियों को लोकतांत्रिक तरीक़े से हराने के बजाए कुचलने की बातें करते हैं. हर बात को राष्ट्रहित से जोड़ने का चलन है. ऐसे ही नियो नाज़ियों के विरोध की प्रतीक बन गई है एक तस्वीर. ये तस्वीर पिछले हफ़्ते दुनिया भर में सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. ये तस्वीर एक महिला की है, जिसने अकेले आगे बढ़कर खुलेआम, तीन सौ नियो नाज़ियों को चुनौती दी. ये तस्वीर, बहादुरी की मिसाल बन गई. जिसमें एक महिला, हाथ उठाए, मुट्ठी ताने, तीन सौ लोगों की भीड़ के सामने जा खड़ी होती है. अपना विरोध जताती है. जबकि आस-पास खड़े लोग तमाशबीन बने रहते हैं. ये तस्वीर, 1830 में फ्रेंच पेंटर यूजीन डेला क्वा की बनाई पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिंग द पीपुल' की याद दिलाती है. समाप्त वाक़िया 1 मई का है. जब स्वीडन के एक शहर में तीन सौ नियो नाज़ियों ने यूरोप में एशिया से आ रहे शरणार्थियों के ख़िलाफ़ मार्च निकाला. जब ये लोग शहर के बीचो-बीच से गुज़र रहे थे, तभी अफ्रीकी मूल की स्विडिश महिला टेस एसप्लंड बीच सड़क पर नियो-नाज़ियों के सामने आ खड़ी हुई. उसके होंठ भिंचे थे. हाथ तना था. मुट्ठी बंद थी. शराणार्थियों के ख़िलाफ़, नियो नाज़ियों के इस मार्च का विरोध करने से टेस ख़ुद को रोक नहीं पायी. टेस की इस बहादुरी को पास ही खड़े एक शख़्स, डेविड लैगरलॉफ ने कैमरे में क़ैद करके सोशल मीडिया पर डाल दिया. अगले कुछ दिनों तक टेस की बहादुरी की कहानी कहती ये तस्वीर पूरी दुनिया में सोशल मीडिया पर वायरल रही. टेस एस्प्लंड का ये विरोध, किसी योजना के तहत नहीं, अचानाक दर्ज कराया गया था. मगर इसने 1830 में बनी पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिग पीपुल' की याद दिला दी. इस पेंटिंग में फ्रेंच कलाकार यूजीन डेला क्वा ने एक महिला को आज़ादी का प्रतीक बनाकर पेश किया था. वो महिला, फ्रेंच इंक़िलाब का तिरंगा उठाए, बारूद के धुएं के बीच से गुज़रती दिखाई देती है. उसके पीछे हथियारबंद लोगों की भीड़ है, जो फ्रांस के राजा चार्ल्स दशम का विरोध कर रही है. 1830 में फ्रेंच राजा चार्ल्स दशम को जनता के विरोध के चलते गद्दी छोड़नी पड़ी थी. उस पर आरोप था कि वो कट्टरपंथी नीतियों को लागू कर रहा है. इसमें पत्रकारों के लिखने और बोलने पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला भी शामिल था. टेस एस्प्लंड के विरोध की फोटो हो या फिर यूजीन डेला क्वा की पेंटिंग. दोनों ही आम लोगों के विरोध की मिसाल हैं. दोनों के उठे हाथ, तनी, बंद मुट्ठियां, जनता के विरोध की ताक़त का एहसास कराती हैं. 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उन्हें जो अच्छा लगा उन्होंने वही किया है. आयरिन के पति इयान एक फ़ोटोग्राफर थे जिनकी पिछले साल दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी. पेशे से टीचर आयरिन इसके बाद से ही दुनिया भर में घूम रही हैं. वो बताती है, \" पिछले दिनों मैं हिमालय गई थी जहां मैने अपने पति के पुराने कपड़े छोड़ दिए. उनकी राख लेकर मैं यहां आई और पूजा की. मौनी अमावस्या के दिन एक और पूजा करुंगी.\" आयरिन हिंदी गानों की शौकीन है और नगा संन्यासियों के साथ काफ़ी समय बिताती हैं और उन्हें गाना भी सुनाती हैं. कुंभ से लगाव कुंभ से लगाव कैसे हुआ यह पूछने पर वो बहुत खुश होती हैं और कहती हैं, \" मैं अपने पति के साथ 2001 के महाकुंभ में आई थी और बस एक रिश्ता सा बन गया. मैं उज्जैन के कुंभ में भी आई हूं लेकिन आज मेरे पति मेरे साथ नहीं हैं.\" तो क्या वो कहीं संन्यास लेने की तो नहीं सोच रही हैं वो कहती हैं ,\" नहीं, नहीं बिल्कुल नहीं. मुझे अभी सांसारिक दुनिया में रहना है और बहुत कुछ देखना है. मैं संन्यास नहीं ले सकती.\" हिंदी फ़िल्मों की शौकीन आयरिन को ऋतिक रोशन सबसे अधिक पसंद है और उन्हें अभिषेक बच्चन कतई सुंदर नहीं लगते. अभिषेक और ऐश्वर्या की शादी के बारे में उनका अलग ही नज़रिया है. वो मजाकिया अंदाज़ में कहती है, \" हिंदी फ़िल्मों में सबसे सुंदर हैं ऐश्वर्या और सबसे हैंडसम है ऋतिक. इसलिए इन दोनों की शादी होनी चाहिए और अगर ऐश को ऋतिक न मिलें तो उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए.\" कई विदेशी साधुओं के बीच आयरिन सामान्य सी विदेशी लगती हैं लेकिन उनकी आंखें बताती हैं कि उन्होंने भारत की संस्कृति के साथ एक अटूट और अनकहा रिश्ता बना लिया है जिसे वो सबके साथ बाँटना नहीं चाहतीं.\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन की नागरिक आयरिन के लिए अर्ध कुंभ साधु संन्यासियों का जमावड़ा मात्र नहीं बल्कि अपने दिवंगत पति की यादों का मेला है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपहली नज़र में वो किसी और सामान्य विदेशी टूरिस्ट की तरह दिखती हैं जो नगा संन्यासियों के साथ बैठते हैं, हँसते गाते हैं लेकिन बातचीत में पता चलता है कि उनका कुंभ से लगाव इतना सरल नहीं है. आयरिन मेरे हाथ में बीबीसी का माइक देखकर मेरे पास आईं और फिर हमारी बातचीत शुरु हुई. आयरिन के लिए कुंभ का विशेष महत्व है क्योंकि उन्होंने अपने मृत पति का 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प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक वे उनके विधानसभा क्षेत्र रतलाम को झुग्‍गीमुक्‍त नहीं कर देते और अनाथालय का निर्माण नहीं करवा देते तब तक नंगे पैर रहेंगे. प्रतिज्ञा लेने के समय वे प्रदेश में कैबिनेट रैंक के मंत्री थे. कोठारी को उम्‍मीद थी कि वे अगली बार भी विधायक बनेंगे, लिहाजा तब अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेंगे, लेकिन दुर्भाग्‍य से वे एक निर्दलीय उम्‍मीदवार से पिछला चुनाव हार गए. पांच साल घर बैठने के बाद इस चुनाव में उनकी चप्‍पल पहनने की हसरत पूरी होने का मौका था,लेकिन भाजपा ने टिकट काटकर अडंगा लगा दिया. उनके समर्थकों को पार्टी का फैसला रास नहीं आया और सबने हिम्‍मत को निर्दलीय उम्‍मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने को मनाया. हिम्‍मत भाई नंगे पैर जुलूस लेकर फार्म भरने घर से निकल भी गए, लेकिन बीच रास्‍ते में उनकी हिम्‍मत जवाब दे गई और उन्‍होने चुनाव लडने से पैर पीछे खींच लिए. जब चुनाव ही नहीं लड़ना तो संकलप कैसे पूरा होगा, लिहाजा उन्‍होंने उसी समय चप्‍पल पहनने का फैसला भी ले लिया. घर से निकले थे तब नंगे पैर थे लेकिन जब वापस घर पहुंचे तब पैरों में चप्‍पलें थीं. भला हो भाजपा का जो उसकी वजह से हिम्‍मत भाई को सात साल से भीषण गर्मी, कीचड़ सनी सड़कों पर नंगे पैर चलने की मजबूरी से निजात मिल गयी. वरना अगला चुनाव आते आते हिम्‍मत कोठारी सत्‍तर की उमर पार कर जाते. तब न तो पार्टी उन्‍हें टिकट देने की हिम्‍मत जुटा पाती और न वे लड़ने की हिम्‍मत दिखा पाते. किन्‍नर भी ताल ठोंकते हैं यहां मध्‍यप्रदेश के चुनाव हो और किन्‍नरों का जिक्र न हो ये भला कैसे संभव है. देश को पहला किन्‍नर विधायक देने का गौरव मध्‍यप्रदेश के हिस्‍से ही आता है. शबनम मौसी नामक यह किन्‍नर वर्ष 2000 में एक उपचुनाव में 18 हजार से ज्‍यादा मतों के अंतर से जीत कर ऐसी सुर्खियों में आईं कि बॉलीवुड भी उनकी जिन्‍दगी पर फिल्‍म बनाने से खुद को रोक नहीं पाया. शबनम ने तीन साल तक विधानसभा में बड़े-बड़े नेताओं के साथ बैठकर भाषण दिए. सवाल उठाए और अपनी छवि को नेता के तौर पर ढालने की भरसक कोशिश की. हालांकि अगले चुनाव में वे सफल नहीं हो पाईं लेकिन तब से किन्‍नरों को चुनाव मैदान में सफलता मिलने का क्रम जरूर शुरू हो गया. मध्‍यप्रदेश ही वह राज्य है जहां दो-दो बड़े शहरों के मेयर पद पर जनता ने भाजपा और कांग्रेस के उम्‍मीदवारों को नकारते हुए किन्‍नरों को बैठाया. इस चुनाव में भी एक किन्‍नर उम्‍मीदवार भाग्‍य आजमा रही हैं. जबलपुर उत्‍तर से हीराबाई. वे निर्दलीय नहीं लड़ रही हैं बल्कि समाजवादी पार्टी ने उन्‍हें अपना प्रत्‍याशी बनाया है. हीराबाई जबलपुर में लोकप्रिय हैं. वे 1999 और 2004 में पार्षद का चुनाव भी जीत चुकी हैं. देखना दिलचस्‍प होगा कि मुहल्‍ले के नेता के तौर पर स्‍वीकार की जा चुकीं हीराबाई को जनता अपने शहर का प्रतिनिधि चुनने योग्‍य मानती है या नहीं. 'जप तप अनुष्‍ठान' धर्म ताकत है तो धर्मांधता सबसे बडी कमजोरी. यह बात किताबी ज्ञान से ज्‍यादा कुछ नहीं है. राज नेताओं खासतौर पर चुनाव लड़़ने वाले नेता इतने भयभीत रहते हैं कि वे अपने भय को मिटाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. चुनावी मौसम में प्रदेश के ऐसे अनेक मंदिर हैं जहां उम्‍मदवारों के भय निवारण का काम होता है. कहीं जप हो रहे हैं, कहीं तप तो कहीं विशेष अनुष्‍ठान. दतिया की पीताम्‍बर शक्ति पीठ भक्‍त नेताओं की आस्‍था का प्रमुख के्न्‍द्र है. राजस्‍थान में मुख्‍यमंत्री पद की दावेदार वसुंधरा राजे सिंधिया से लेकर मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमत्री शिवराज सिंह चौहान, दिग्विजय सिंह, ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया समेत तमाम नेता इस मंदिर पर मत्‍था टेकने जरूर आते हैं. शक्ति पीठ होने के कारण यहां विशेष अनुष्‍ठान भी किए जाते हैं. उज्‍जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर में भी नेताओं का तांता लगा रहता है. इंदौर का खजराना गणेश मंदिर, नलखेड़ा की बगलामुखी देवी का मंदिर, मंदसौर का पशुपतिनाथ मंदिर, मैहर की शारदा देवी मंदिर और देवास में चामुंडा मंदिर भी ऐसे केन्‍द्र हैं जहां नेताओं की जीत के लिए जप-तप हो रहे हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सियासत इम्‍तहान लेती है. मध्‍यप्रदेश के पूर्व गृह मंत्री हिम्‍मत कोठारी ऐसा ही एक इम्‍तहान पिछले सात सालों से दे रहे थे,लेकिन जब पार्टी ने उनके साथ दग़ाबाज़ी की तो वे भी इम्‍तहान बीच में छोड़ कर चल दिए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्‍होंने एक प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक वे उनके विधानसभा क्षेत्र रतलाम को झुग्‍गीमुक्‍त नहीं कर देते और अनाथालय का निर्माण नहीं करवा देते तब तक नंगे पैर रहेंगे. प्रतिज्ञा लेने के समय वे प्रदेश में कैबिनेट रैंक के मंत्री थे. कोठारी को उम्‍मीद थी कि वे अगली बार भी विधायक बनेंगे, लिहाजा तब अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेंगे, लेकिन दुर्भाग्‍य से वे एक निर्दलीय उम्‍मीदवार से पिछला चुनाव हार गए. पांच साल घर बैठने के बाद इस चुनाव में उनकी चप्‍पल पहनने की हसरत पूरी होने का मौका था,लेकिन भाजपा ने टिकट काटकर अडंगा लगा दिया. उनके समर्थकों को पार्टी का फैसला रास नहीं आया और सबने हिम्‍मत को निर्दलीय उम्‍मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने को मनाया. हिम्‍मत भाई नंगे पैर जुलूस लेकर फार्म भरने घर से निकल भी गए, लेकिन बीच रास्‍ते में उनकी हिम्‍मत जवाब दे गई और उन्‍होने चुनाव लडने से पैर पीछे खींच लिए. जब चुनाव ही नहीं लड़ना तो संकलप कैसे पूरा होगा, लिहाजा उन्‍होंने उसी समय चप्‍पल पहनने का फैसला भी ले लिया. घर से निकले थे तब नंगे पैर थे लेकिन जब वापस घर पहुंचे तब पैरों में चप्‍पलें थीं. भला हो भाजपा का जो उसकी वजह से हिम्‍मत भाई को सात साल से भीषण गर्मी, कीचड़ सनी सड़कों पर नंगे पैर चलने की मजबूरी से निजात मिल गयी. वरना अगला चुनाव आते आते हिम्‍मत कोठारी सत्‍तर की उमर पार कर जाते. तब न तो पार्टी उन्‍हें टिकट देने की हिम्‍मत जुटा पाती और न वे लड़ने की हिम्‍मत दिखा पाते. किन्‍नर भी ताल ठोंकते हैं यहां मध्‍यप्रदेश के चुनाव हो और किन्‍नरों का जिक्र न हो ये भला कैसे संभव है. देश को पहला किन्‍नर विधायक देने का गौरव मध्‍यप्रदेश के हिस्‍से ही आता है. शबनम मौसी नामक यह किन्‍नर वर्ष 2000 में एक उपचुनाव में 18 हजार से ज्‍यादा मतों के अंतर से जीत कर ऐसी सुर्खियों में आईं कि बॉलीवुड भी उनकी जिन्‍दगी पर फिल्‍म बनाने से खुद को रोक नहीं पाया. शबनम ने तीन साल तक विधानसभा में बड़े-बड़े नेताओं के साथ बैठकर भाषण दिए. सवाल उठाए और अपनी छवि को नेता के तौर पर ढालने की भरसक कोशिश की. हालांकि अगले चुनाव में वे सफल नहीं हो पाईं लेकिन तब से किन्‍नरों को चुनाव मैदान में सफलता मिलने का क्रम जरूर शुरू हो गया. मध्‍यप्रदेश ही वह राज्य है जहां दो-दो बड़े शहरों के मेयर पद पर जनता ने भाजपा और कांग्रेस के उम्‍मीदवारों को नकारते हुए किन्‍नरों को बैठाया. इस चुनाव में भी एक किन्‍नर उम्‍मीदवार भाग्‍य आजमा रही हैं. जबलपुर उत्‍तर से हीराबाई. वे निर्दलीय नहीं लड़ रही हैं बल्कि समाजवादी पार्टी ने उन्‍हें अपना प्रत्‍याशी बनाया है. हीराबाई जबलपुर में लोकप्रिय हैं. वे 1999 और 2004 में पार्षद का चुनाव भी जीत चुकी हैं. देखना दिलचस्‍प होगा कि मुहल्‍ले के नेता के तौर पर स्‍वीकार की जा चुकीं हीराबाई को जनता अपने शहर का प्रतिनिधि चुनने योग्‍य मानती है या नहीं. 'जप तप अनुष्‍ठान' धर्म ताकत है तो धर्मांधता सबसे बडी कमजोरी. यह बात किताबी ज्ञान से ज्‍यादा कुछ नहीं है. राज नेताओं खासतौर पर चुनाव लड़़ने वाले नेता इतने भयभीत रहते हैं कि वे अपने भय को मिटाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. चुनावी मौसम में प्रदेश के ऐसे अनेक मंदिर हैं जहां उम्‍मदवारों के भय निवारण का काम होता है. कहीं जप हो रहे हैं, कहीं तप तो कहीं विशेष अनुष्‍ठान. दतिया की पीताम्‍बर शक्ति पीठ भक्‍त नेताओं की आस्‍था का प्रमुख के्न्‍द्र है. राजस्‍थान में मुख्‍यमंत्री पद की दावेदार वसुंधरा राजे सिंधिया से लेकर मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमत्री शिवराज सिंह चौहान, दिग्विजय सिंह, ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया समेत तमाम नेता इस मंदिर पर मत्‍था टेकने जरूर आते हैं. शक्ति पीठ होने के कारण यहां विशेष अनुष्‍ठान भी किए जाते हैं. उज्‍जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर में भी नेताओं का तांता लगा रहता है. इंदौर का खजराना गणेश मंदिर, नलखेड़ा की बगलामुखी देवी का मंदिर, मंदसौर का पशुपतिनाथ मंदिर, मैहर की शारदा देवी मंदिर और देवास में चामुंडा मंदिर भी ऐसे केन्‍द्र हैं जहां नेताओं की जीत के लिए जप-तप हो रहे हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 345, "source_item_id": "345", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3555, "clean_index": 313, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:313"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजब पाकिस्तान बना तो उस वक़्त अहमदी समूदाय के लोग मुसलमान समझे जाते थे और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ भी सरकारी स्तर पर कोई भेदभाव नहीं था. इसलिए पाकिस्तान की पहली असेंबली के पहले स्पीकर और क़ानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल एक बंगाली हिंदू और पहले विदेश मंत्री सर ज़फ़रुल्लाह ख़ान एक अहमदी मुसलमान थे. फ़ौज में ईसाइयों का प्रतिनिधित्व भी था और अहमदियों की एक अच्छी ख़ासी तादाद थी. इसका कारण पूर्वी पाकिस्तान भी था जहां 20 प्रतिशत हिंदू आबादी को दरकिनार नहीं किया जा सकता था और एक उदार कल्चर या माहौल को पूरी तरह से ख़ुदा हाफ़िज़ नहीं कहा जा सकता था. लेकिन पूर्वी पाकिस्तान जब बंगलादेश बन गया तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या अचानक 25 प्रतिशत से घट कर साढ़े तीन प्रतिशत रह गई. इसलिए हम देखते हैं कि अल्पसंख्यकों के साथ पहला काम ये हुआ कि ज़ुल्फ़िक़्क़ार अली भुट्टो की सरकार ने 1970 के चुनाव में अल्पसंख्यकों के काफ़ी वोट प्राप्त करने के बावजूद, जिन शिक्षा संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया उनमें ईसाइयों के शिक्षा संस्थान भी शामिल थे जिनका स्तर सबसे अच्छा होता था. संविधान में बड़ा बदलाव उसके बाद 1973 के संविधान में साफ़-साफ़ लिखा गया कि पाकिस्तान का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सिर्फ़ मुसलमान ही बन सकता है. यह बात भुट्टो की उदारवादी और समाजवादी छवि के बिलकुल विपरीत थी. 1974 में अहमदियों को धार्मिक पार्टियों के दबाव में अल्पसंख्यक क़रार दिया गया और इस प्रकार अल्पसंख्यकों की जनसंख्या तीन प्रतिशत से बढ़ कर पांच प्रतिशत तक पहुंच गई. लेकिन अच्छी बात ये थी कि संविधान के तहत अल्पसंख्यकों के लिए न सिर्फ़ संसद और प्रांतीय असेंबलीयों में सुरक्षित सीटें रहीं बल्कि वह आम सीटों पर भी उम्मीदवार बन सकते थे और वोट दे सकते थे. लेकिन जब जनरल ज़ियाउलहक़ ने धार्मिक गुटों को अफ़ग़ान युद्ध के दौरान आपना समर्थक बनाने की नीति अपनाई तो अल्पसंख्यकों के लिए मुसीबतों का सबसे मुश्किल दौर शुरू हो गया. उन्हें आम चुनाव में वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया वह सिर्फ़ सुरक्षित सीटों के लिए मतदान कर सकते थे. हिंदू सिर्फ़ हिंदू उम्मीदवारों और ईसाई सिर्फ़ ईसाई उम्मीदवारों को वोट डाल सकते थे. नतीजे में अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सौदेबाज़ी की स्थिति और देश की राजनीतिक पार्टियों के नज़दीक अल्पसंख्यकों के वोट की जो थोड़ी बहुत अहमियत थी वह भी ख़त्म हो गई. अल्पसंख्यक अपने ऐसे नेताओं के रहमो-करम पर रह गए जो बार बार निर्वचित होकर हर सरकार का समर्थन करते थे और बदले में निजी लाभ उठाते थे. इस प्रणाली के तहत 1985 से 1997 तक पांच चुनाव हुए. राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार को कम से कम यह श्रेय ज़रूर जाता है कि उन्होंने 2002 के आम चुनाव से पहले जो फ़ैसले किए उनमें से एक यह भी था कि 1973 के बाद पहली बार अल्पसंख्यकों के लिए न सिर्फ़ संसद और प्रांतीय असेंबलियों में सुरक्षित सीटें रखी गईं बल्कि उनके प्रतिनिधि किसी भी राजनीतिक पार्टी के टिकट पर आम सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकते थे और वोट डाल सकते थे. 2002 के चुनाव में कुल 77 पार्टियों ने भाग लिया और उनमें से 15 पार्टियों का संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से था. इन सुधारों के नतीजे में पिछले चुनाव में मुस्लिम लीग (क्यू) को अल्पसंख्यकों ने धन्यवाद करने के लिए काफ़ी वोट डाले थे. लेकिन 18 फ़रवरी के चुनाव में जिस तरह किसी चीज़ के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती उसी तरह अल्पसंख्यकों के बारे ये भी कहना मुश्किल है कि उनके वोट का ऊंट किस करवट बैठेगा.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में कितने ईसाई, हिंदू और पारसी या सिख रहते हैं कभी राष्ट्रीय जनगणना के ज़रिए उनकी संख्या तीन प्रतिशत बताई जाती है तो कभी पांच प्रतिशत तक कह दी जाती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजब पाकिस्तान बना तो उस वक़्त अहमदी समूदाय के लोग मुसलमान समझे जाते थे और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ भी सरकारी स्तर पर कोई भेदभाव नहीं था. इसलिए पाकिस्तान की पहली असेंबली के पहले स्पीकर और क़ानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल एक 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अल्पसंख्यक क़रार दिया गया और इस प्रकार अल्पसंख्यकों की जनसंख्या तीन प्रतिशत से बढ़ कर पांच प्रतिशत तक पहुंच गई. लेकिन अच्छी बात ये थी कि संविधान के तहत अल्पसंख्यकों के लिए न सिर्फ़ संसद और प्रांतीय असेंबलीयों में सुरक्षित सीटें रहीं बल्कि वह आम सीटों पर भी उम्मीदवार बन सकते थे और वोट दे सकते थे. लेकिन जब जनरल ज़ियाउलहक़ ने धार्मिक गुटों को अफ़ग़ान युद्ध के दौरान आपना समर्थक बनाने की नीति अपनाई तो अल्पसंख्यकों के लिए मुसीबतों का सबसे मुश्किल दौर शुरू हो गया. उन्हें आम चुनाव में वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया वह सिर्फ़ सुरक्षित सीटों के लिए मतदान कर सकते थे. हिंदू सिर्फ़ हिंदू उम्मीदवारों और ईसाई सिर्फ़ ईसाई उम्मीदवारों को वोट डाल सकते थे. नतीजे में अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सौदेबाज़ी की स्थिति और देश की राजनीतिक पार्टियों के नज़दीक अल्पसंख्यकों के वोट की जो थोड़ी बहुत अहमियत थी वह भी ख़त्म हो गई. अल्पसंख्यक अपने ऐसे नेताओं के रहमो-करम पर रह गए जो बार बार निर्वचित होकर हर सरकार का समर्थन करते थे और बदले में निजी लाभ उठाते थे. इस प्रणाली के तहत 1985 से 1997 तक पांच चुनाव हुए. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ्रांस के लड़ाकू विमानों ने सीरिया में इस्लामिक स्टेट का गढ़ माने जाने वाले रक़्क़ा शहर पर हवाई हमले किए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपेरिस में आईएस के चरमपंथी हमलों के बाद ये फ्रांस की पहली बड़ी कार्रवाई है. फ्रांस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस कार्रवाई में फ्रांस के दस लड़ाकू विमानों ने हिस्सा लिया और आईएस के ठिकानों पर बीस बम गिराए गए. इस दौरान कई ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें आईएस का एक कमांड सेंटर, एक गोला बारूद का डिपो और लड़ाकों का शिविर भी शामिल है. फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद ने शुक्रवार को पेरिस में हुए हमलों को आईएस की तरफ़ से युद्ध की घोषणा वाला कदम बताया था. समाप्त इन हमलों में 129 लोग मारे गए जिनकी ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी. 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का ये हस्तांतरण 2002 में शुरू हुआ था जबकि उन्होंने पार्टी प्रमुख का पद छोड़ दिया था. मगर सुरक्षा और विदेश नीति जैसे मसलों पर जियांग झेमिन की पकड़ अब भी थी क्योंकि चीन की सेना के प्रमुख का पद उन्हीं के पास था. इसके बाद पिछले कुछ महीनों से ये भी अटकलें लगाई जा रही थीं कि जियांग झेमिन की तबियत ठीक नहीं है. उनके पद छोड़ने के फ़ैसले का ताइवान में भी अधिकारियों ने स्वागत किया है.\n\nSummary:", "target": "चीन के पूर्व राष्ट्रपति जियांग झेमिन ने देश के शक्तिशाली केंद्रीय सैनिक आयोग या सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के प्रमुख का पद छोड़ दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअब ये पद वर्तमान राष्ट्रपति हू जिंताओ सँभालेंगे और विश्लेषक मान रहे हैं कि इससे उनकी संपूर्ण नेतृत्व की छवि और सुदृढ़ होगी. कम्युनिस्ट पार्टी की उच्च स्तरीय बैठक के बाद ये घोषणा की गई और इस तरह ये 1949 की क्रांति के बाद पहली बार शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता का हस्तांतरण हुआ है. विश्लेषकों के अनुसार इससे नीतियों में कुछ परिवर्तन की अपेक्षा की जा सकती है. बीजिंग में मौजूद बीबीसी संवाददाता लुइसा जिम के 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से बात कर रही है. कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि दोनों के बीच हुई होगी कोई कूटनीतिक स्तर की बातचीत, जी नहीं, बातें हुईं, दोनों के मिलते जुलते शौक की, सारकोज़ी की पत्नी कार्ला ब्रूनी की खूबसूरती की और साथ साथ शिकार का मज़ा लेने की. बाद में पेलिन के प्रवक्ता ने कहा कि इस शरारत से पेलिन का भी 'थोड़ा मनोरंजन' हुआ. पहले तो सारा पेलिन ये जान कर अभिभूत हो गईं कि निकोला सारेकोज़ी ख़ुद फ़ोन पर उनसे बात कर रहे हैं. पूरा-पूरा भक्ति भाव उमड़ पडा और सारा पेलिन ने झट से बता डाला कि वे और जॉन मेकेन उन्हें कितना चाहते हैं. बातचीत के आगे बढ़ते ही निकोला सारकोज़ी बने मार्क ने कह दिया कि वे भविष्य मे सारा पेलिन को राष्ट्रपति बने हुए देख रहे हैं, और उसके बाद जिस तरह की उन्मुक्त हंसी में सैरा पेलिन ने अपनी स्वीकारोक्ति दी, वो सुनने के क़ाबिल थी. पुलकित भाव से पेलिन ने जवाब दिया, \"हां हां क्यों नहीं, अगले आठ सालों में तो मैं अमरीकी राष्ट्रपति बन ही सकती हूँ.\" शिकार के मज़े इसके बाद तो बातचीत कुछ और दिलचस्प होने लगी, यानी साथ साथ शिकार पर जाने की योजनाएँ बनने लगीं. सारकोज़ी बने हुए मार्क ने जब सारा पेलिन को 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एंतोनियो ऑडेटे ने उन्हें पूरी तरह आश्वस्त कर दिया, कि वे फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी से बात कर रही है. कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि दोनों के बीच हुई होगी कोई कूटनीतिक स्तर की बातचीत, जी नहीं, बातें हुईं, दोनों के मिलते जुलते शौक की, सारकोज़ी की पत्नी कार्ला ब्रूनी की खूबसूरती की और साथ साथ शिकार का मज़ा लेने की. बाद में पेलिन के प्रवक्ता ने कहा कि इस शरारत से पेलिन का भी 'थोड़ा मनोरंजन' हुआ. पहले तो सारा पेलिन ये जान कर अभिभूत हो गईं कि निकोला सारेकोज़ी ख़ुद फ़ोन पर उनसे बात कर रहे हैं. पूरा-पूरा भक्ति भाव उमड़ पडा और सारा पेलिन ने झट से बता डाला कि वे और जॉन मेकेन उन्हें कितना चाहते हैं. बातचीत के आगे बढ़ते ही निकोला सारकोज़ी बने मार्क ने कह दिया कि वे भविष्य मे सारा पेलिन को राष्ट्रपति बने हुए देख रहे हैं, और उसके बाद जिस तरह की उन्मुक्त हंसी में सैरा पेलिन ने अपनी स्वीकारोक्ति दी, वो सुनने के क़ाबिल थी. पुलकित भाव से पेलिन ने जवाब दिया, \"हां हां क्यों नहीं, अगले आठ सालों में तो मैं अमरीकी राष्ट्रपति बन ही सकती हूँ.\" शिकार के मज़े इसके बाद तो बातचीत कुछ और दिलचस्प होने 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मिर्ज़ापुर में सोलर प्लांट का उद्घाटन करने के बाद वाराणसी आएंगे, जिसके बाद पीएम मोदी बनारस की हस्तकला से मैक्रों को बड़ालालपुर स्थित ट्रेड फ़ैसीलिटेशन सेंटर में रूबरू कराएंगे. मैक्रों और मोदी बेड़े पर सवार होकर अस्सी घाट से दशाश्वमेध घाट तक गंगा के पक्के घाटों और उस पर आयोजित तमाम सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों का अवलोकन करेंगे. फिर होटल गेटवे ताज में दोनों एक साथ लंच करेंगे. बताया जाता है कि मैक्रों यहां से दिल्ली के लिए रवाना हो जाएंगे. वहीं पीएम मोदी मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से वाराणसी-पटना एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाएंगे. इसके अलावा मोदी डीरेका में आयोजित सभा में शिरकत, विभिन्न योजनाओं का लोकार्पण और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को प्रमाणपत्र बांटेंगे. स्वागत की तैयारियां पीएम मोदी और फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के आगमन को लेकर बनारस में काफ़ी तैयारियां की गई हैं. गंगा किनारे पक्के घाट पर रंगारंग सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम भी होने हैं. तुलसी घाट पर तैयारियों में जुटे लोगों में संकटमोचन महंत परिवार के सदस्य और बीएचयू के प्रोफ़ेसर विजयनाथ मिश्र भी हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, ''रामचरितमानस की चौपाइयों की रचना इसी तुलसी घाट पर गोस्वामी तुलसी दास जी ने की और यहीं से दोनों नेताओं के गुज़रने के दौरान रामलीला का मंचन होगा और पुरूष पहलवानों के अलावा महिला पहलवान भी कुश्ती करती दिखाई देंगी. इस दौरान पूरे माहौल में बनारस की विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के माहौल को भी घोलने की कोशिश होगी.'' प्रोफ़ेसर विजयनाथ मिश्र कहते हैं कि मैक्रों को बनारस की झलक एक जगह दिखानी है तो वहीं बीएचयू में फ़ाइन आर्ट के छात्र रहे अजय प्रकाश विशाल हनुमान के मुखौटों को जानकी घाट पर बनाने में व्यस्त नज़र आए. उनके मुताबिक, बनारस में होने वाली रामलीलाओं और कथाओं से जुड़े नाट्य मंचन में मुखौटों की बड़ी भूमिका होती है. इसी से लोगों को रूबरू कराना उनका मकसद है. कलाकार अजय ने बीबीसी को बताया, ''कोई वीआईपी आता है तो उससे काफ़ी कुछ अच्छा हो जाता है- जैसे गंगा, सड़कों की साफ-सफाई. लेकिन ये चीज़ें एक दिन के लिए न होकर लगातार ऐसी ही होती रहनी चाहिए.'' मेयर सिंह नेगी 'मैक्रों को बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में बताया जाएगा' वहीं, चेतसिंह किला घाट तैयारी के दौरान पूरी तरह बौद्ध संस्कृति में रंगा नजर आया. एक तरफ़ सारनाथ तिब्बती विश्वविद्यालय से आए 350 बौद्ध भिक्षु और आस्थावान बौद्ध मंगल पाठ कर रहे थे. तो वहीं इसी घाट के दूसरी तरफ़ नाट्य कला के ज़रिए रंगकर्मी भगवान बुद्ध पर आधारित नाटक 'बौद्ध मुक्ति देने नहीं' के मंचन की तैयारी में जुटे थे. बौद्ध मंगल पाठ का संचालन कर रहे बौद्ध भिक्षु मेयर सिंह नेगी ने बताया कि बनारस में महत्वपूर्ण बौद्ध धर्मस्थल सारनाथ के बारे में प्रदर्शन किया जा रहा है तो नाटक के निर्देशक धीरेंद्र मोहन के मुताबिक सारनाथ में भगवान बुद्ध की प्रथम दीक्षा को इस नाटक के ज़रिए दिखाया जा रहा है. इन सभी कार्यक्रमों का मक़सद राष्ट्रपति मैक्रों को बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में बताना है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत के दौरे पर आए फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 12 मार्च को वाराणसी में रहेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये दूसरा मौका होगा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के बाद किसी दूसरे मुल्क के राष्ट्रपति की मेहमाननवाज़ी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कर रहे हैं. ज़ाहिर है कि इस दौरे के लिए बीते कुछ दिनों से वाराणसी में जमकर तैयारियां की गईं. ताकि फ़्रांसीसी राष्ट्रपति को बनारस दिखाकर आकर्षित किया जा सके. लेकिन इन तैयारियों से बनारस में कुछ लोग नाखुश भी हैं. वाराणसी के हरेंद्र शुक्ला ने बीबीसी को बताया, ''दोनों नेताओं का आना तो अच्छा है, लेकिन इससे वाराणसी के अधिकारियों का नाकारापन दिख रहा है. काशी का संदेश ग़लत जा रहा है. अगर आप वाराणसी में गंगा घाटों का दौरा करें तो आपको ऐसे होर्डिंग्स दिखाई दिखेंगे, जिनकी मदद से घाटों की गंदगी ढकने की कोशिश की गई है. नदी में भी पोस्टर लगा दिए गए हैं क्या है मोदी-मैक्रों का वाराणसी कार्यक्रम? दोनों नेता मिर्ज़ापुर में सोलर प्लांट का उद्घाटन करने के बाद वाराणसी आएंगे, जिसके बाद पीएम मोदी बनारस की हस्तकला से मैक्रों को बड़ालालपुर स्थित ट्रेड फ़ैसीलिटेशन सेंटर में रूबरू कराएंगे. मैक्रों और मोदी बेड़े पर सवार होकर अस्सी घाट से दशाश्वमेध घाट तक गंगा के पक्के घाटों और उस पर आयोजित तमाम सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों का अवलोकन करेंगे. फिर होटल गेटवे ताज में दोनों एक साथ लंच करेंगे. बताया जाता है कि मैक्रों यहां से दिल्ली के लिए रवाना हो जाएंगे. वहीं पीएम मोदी मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से वाराणसी-पटना एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाएंगे. इसके अलावा मोदी डीरेका में आयोजित सभा में शिरकत, विभिन्न योजनाओं का लोकार्पण और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को प्रमाणपत्र बांटेंगे. स्वागत की तैयारियां पीएम मोदी और फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के आगमन को लेकर बनारस में काफ़ी तैयारियां की गई हैं. गंगा किनारे पक्के घाट पर रंगारंग सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम भी होने हैं. तुलसी घाट पर तैयारियों में जुटे लोगों में संकटमोचन महंत परिवार के सदस्य और बीएचयू के प्रोफ़ेसर विजयनाथ मिश्र भी हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, ''रामचरितमानस की चौपाइयों की रचना इसी तुलसी घाट पर गोस्वामी तुलसी दास जी ने की और यहीं से दोनों नेताओं के गुज़रने के दौरान रामलीला का मंचन होगा और पुरूष पहलवानों के अलावा महिला पहलवान भी कुश्ती करती दिखाई देंगी. इस दौरान पूरे माहौल में बनारस की विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के माहौल को भी घोलने की कोशिश होगी.'' प्रोफ़ेसर विजयनाथ मिश्र कहते हैं कि मैक्रों को बनारस की झलक एक जगह दिखानी है तो वहीं बीएचयू में फ़ाइन आर्ट के छात्र रहे अजय प्रकाश विशाल हनुमान के मुखौटों को जानकी घाट पर बनाने में व्यस्त नज़र आए. उनके मुताबिक, बनारस में होने वाली रामलीलाओं और कथाओं से जुड़े नाट्य मंचन में मुखौटों की बड़ी भूमिका होती है. इसी से लोगों को रूबरू कराना उनका मकसद है. कलाकार अजय ने बीबीसी को बताया, ''कोई वीआईपी आता है तो उससे काफ़ी कुछ अच्छा हो जाता है- जैसे गंगा, सड़कों की साफ-सफाई. लेकिन ये चीज़ें एक दिन के लिए न होकर लगातार ऐसी ही होती रहनी चाहिए.'' मेयर सिंह नेगी 'मैक्रों को बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में बताया जाएगा' वहीं, चेतसिंह किला घाट तैयारी के दौरान पूरी तरह बौद्ध संस्कृति में रंगा नजर आया. एक तरफ़ सारनाथ तिब्बती विश्वविद्यालय से आए 350 बौद्ध भिक्षु और आस्थावान बौद्ध मंगल पाठ कर रहे थे. तो वहीं इसी घाट के दूसरी तरफ़ नाट्य कला के ज़रिए रंगकर्मी भगवान बुद्ध पर आधारित नाटक 'बौद्ध मुक्ति देने नहीं' के मंचन की तैयारी में जुटे थे. बौद्ध मंगल पाठ का संचालन कर रहे बौद्ध भिक्षु मेयर सिंह नेगी ने बताया कि बनारस में महत्वपूर्ण बौद्ध धर्मस्थल सारनाथ के बारे में प्रदर्शन किया जा रहा है तो नाटक के निर्देशक धीरेंद्र मोहन के मुताबिक सारनाथ में भगवान बुद्ध की प्रथम दीक्षा को इस नाटक के ज़रिए दिखाया जा रहा है. इन सभी कार्यक्रमों का मक़सद राष्ट्रपति मैक्रों को बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में बताना है. 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आपदा सर्वेक्षण के दौरान 15 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पिछले 12 महीने के दौरान सूनामी सबसे बड़ी घटना थी. जबकि नौ फ़ीसदी लोगों ने हरिकेन कैटरीना और रीटा का नाम लिया. 15 प्रतिशत लोगों ने इराक़ युद्ध को इस अवधि की बड़ी घटना माना. इराक़ युद्ध को इराक़ के अलावा दक्षिण कोरिया, स्पेन, अमरीका और तुर्की में सबसे बड़ी घटना बताया गया. सर्वेक्षण में इस अवधि के दौरान चौथी बड़ी घटना बनी पोप जॉन पॉल द्वितीय की मृत्यु और उनके उत्तराधिकारी का नया पोप बनना. जुलाई में हुए लंदन बम धमाकों को सिर्फ़ चार प्रतिशत लोगों ने बड़ी घटना माना. ब्रितानी लोगों में से सिर्फ़ सात फ़ीसदी लोगों ने ही इस हमले का उल्लेख किया. सबसे ज़्यादा संख्या में घाना, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरियाई लोगों ने लंदन बम धमाकों को बड़ी घटना माना. इस सर्वेक्षण से सबसे बड़ी बात ये निकलकर आई कि दुनियाभर में जिन तीन घटनाओं की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई, वही इस सर्वेक्षण में भी सामने आई. जानकार इसे भी वैश्वीकरण का एक संकेत मान रहे हैं. रोचक नतीजे इस सर्वेक्षण में कई रोचक नतीजे भी सामने आए. लंदन बम धमाके को मात्र सात प्रतिशत लोगों ने बड़ी घटना माना. लेकिन रोचक बात ये रही कि इनमें से मात्र चार फ़ीसदी ब्रिटेन के लोग थे. वहीं सूनामी से सबसे ज़्यादा प्रभावित इंडोनेशिया में लोगों ने बाली बमकांड को सबसे बड़ी घटना माना. सूनामी वहाँ के लोगों की नज़र में दूसरी बड़ी घटना रही. इस साल कई समुद्री तूफ़ानों की मार झेलने वाले अमरीका में लोगों ने इराक़ युद्ध को सबसे बड़ी घटना माना. सर्वेक्षण के मुताबिक़ भारत में पाकिस्तान के भूकंप को कोई बड़ी घटना मानने वाला नहीं था. भारत में सूनामी को लोगों ने सबसे बड़ी घटना बताया. जबकि ग्लोबल वॉर्मिग और इराक़ युद्ध को आठ-आठ फ़ीसदी लोगों ने सबसे बड़ी घटना बताया. लेकिन सूनामी प्रभावित श्रीलंका में 57 प्रतिशत लोगों ने सूनामी को साल की सबसे बड़ी घटना बताया.\n\nSummary:", "target": "बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के एक सर्वेक्षण में दुनियाभर के ज़्यादातर लोगों ने प्राकृतिक आपदाओं और इराक़ के मामले को पिछले 12 महीनों की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ माना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसर्वेक्षण में शामिल 24 प्रतिशत लोगों ने एशियाई देशों में आए सूनामी और अमरीका में आए समुद्री तूफानों को मुख्य घटना बताया 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फ़रार समाचार एजेंसी पीटीआई ने हरियाणा के गृहसचिव केएस भोरिया के हवाले से कहा है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक आरएस दलाल की रिपोर्ट के आधार पर सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश की जा रही है. राज्य सरकार ने कहा है कि उनका मानना है कि चूंकि यह मामला कई राज्यों से जुड़ा हुआ है और इसके तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जुड़े हुए दिखते हैं इसलिए इसकी जाँच सीबीआई से करवाना ठीक होगा. गृहसचिव ने स्पष्ट किया है कि जब तक सीबीआई जाँच के आदेश नहीं हो जाते हरियाणा पुलिस इस मामले की जाँच जारी रखेगी. इस मामले में अब तक चार लोगों को गिरफ़्तार किया गया है लेकिन मामले का मुख्य अभियुक्त डॉ अमित कुमार अभी भी गिरफ़्त से बाहर है. पुलिस ने डॉक्टर के ख़िलाफ़ अलर्ट जारी किया है. गुड़गाँव के पुलिस कमिश्नर मोहिंदर लाल ने बीबीसी को बताया था कि संदिग्ध डॉक्टर को देश छोड़ कर भागने से रोकने के लिए हवाई अड्डों पर अलर्ट जारी कर दिया गया है. पिछले हफ़्ते दिल्ली से सटे गुड़गाँव स्थित उस घर पर पुलिस ने छापा मारा था जहाँ से ग़ैर-क़ानूनी तरीके से गुर्दा प्रतिरोपण का धंधा चल रहा था. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक़ सैकड़ों ग़रीब मज़दूरों को बहला-फुसला कर गुर्दा बेचने के लिए राज़ी किया जाता था. धोखाधड़ी पुलिस का कहना है कि गुड़गाँव के इस गुमनाम से मकान में उत्तरी भारत के कई मज़दूरों को धोखाधड़ी से गुर्दा बेचने को राज़ी किया जाता था. तथाकथित रूप से मज़दूरों को इसके लिए क़रीब एक लाख रूपए तक दिए जाते थे. एक पीड़ित व्यक्ति से मिली सूचना के बाद पुलिस ने पिछले हफ़्ते गुडगाँव स्थित उस अवैध क्लिनिक पर छापा मारा था. माना जा रहा है कि गुर्दा के ख़रीदार धनी भारतीय और कुछ विदेशी नागरिक होते हैं जिन्हें गुर्दा प्रतिरोपण की शीघ्र ज़रूरत होती है. वे इसके लिए मोटी रक़म भी देने को तैयार रहते हैं. वैसे इस संगठित अपराध का भांडा मुरादाबाद से फूटा था. मुरादाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रेमप्रकाश ने आरंभिक जाँच के बाद कहा है कि यह अपराध कई भारतीय राज्यों सहित 48 देशों में फैला हुआ है. समाचार एजेंसी यूएनआई के अनुसार उन्होंने अमरीका, रूस, कनाडा और ग्रीस का नाम भी लिया. मानव अंगों की ख़रीद-फ़रोख़्त पर भारत में क़ानूनी प्रतिबंध है.\n\nSummary:", "target": "हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार से किडनी चोरी मामले की जाँच केंद्रीय जाँच एजेंसी 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Hindi.\n\nText:\nसेना के एनएसजी दस्ते में कमांडो हवलदार गजेंद्र सिंह नरीमन हाउस में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ मोर्चा लेते हुए शहीद हो गए थे. उनके भरे-पूरे परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, एक बेटी, दो बड़े भाई और उनकी विधवा मां हैं. उनके पिता का अगस्त में देहांत हो गया था. गजेंद्र के भाई रो रो कर सूज गई आंखों और बुझी हुई आवाज़ के साथ बताते हैं, \"पिछले हफ़्ते ही फोन पर गजेंद्र ने कहा था कि पिताजी की बरसी पर आऊंगा.\" \"हमें पता भी नहीं था कि गजेंद्र मुंबई के एनएसजी ऑपरेशन में गया है. बस जब फोन आया तो उसकी मौत का.\" पिछले 18 वर्षों से फौज की सेवा कर रहे गजेंद्र की भर्ती गढ़वाल राइफल्स में हुई थी लेकिन जल्दी ही उसके जज्बे और काबिलियत को देखते हुए उसे सेना की बेहद प्रतिष्ठित बटालियन 10 पैरा कमांडो में तैनाती मिल गई थी. इसी बटालियन के हवलदार और गजेंद्र के दोस्त करण कहते हैं, \"वो कारगिल युद्ध में गया, जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कुछ ऑपरेशन को उसने खुद लीड किया था लेकिन उसे कभी एक खरोंच भी नहीं आई थी. वो जांबाज़ था, उसकी मौत नहीं हुई है वो शहीद हुआ है.\" उमड़ा जन सैलाब शहीद हवलदार गजेंद्र के 12 साल के बेटे गौरव के पास अपने पिता पर गर्व करने के लिए उनकी बहादुरी दिलेरी और हौसले की कहानियां होंगी. फिलहाल तो वो ऐसे दुख से घिरा है जो उसका बाल मन ही समझ सकता है. अपने ताऊ की मदद से जब उसने अपने पिता को मुखाग्नि दी, अंतिम संस्कार के वक़्त उमड़े जन सैलाब की आंखों में बरबस ही आंसू भर आए. कमांडो गजेंद्र की पत्नी गहरे सदमे में है और बात करने की हालत में नहीं है. गजेंद्र के पड़ोसी दोस्त का कहना था, \"वो एक दिलदार इंसान था. फौज में जाने से पहले भी उसकी दिलेरी की सभी तारीफ करते थे. जहां किसी को मदद चाहिए वो आगे आता. जहां कोई मुश्किल काम होता वो फौरन कूद पड़ता.\" शायद यही ख़ूबी थी जिसकी वजह से गजेंद्र को एनएसजी की इस अहम मुहिम में शामिल किया गया था. उसकी यूनिट के दोस्तो का कहना है कि नरीमन हाउस में आतंकियों से लोहा लेने में भी वो आगे था. अपनी जान की परवाह किए बिना. शहीद को आखिरी सलामी देने के लिए देहरादून के गणेशपुर गांव में सेना के बड़े अफसर आए थे. फौजी का दायित्व देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल आरएस सुजरावाला ने गजेंद्र के परिवार के साथ हार्दिक 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के इस पहाड़ को संभालने और आगे बढ़ने के लिये मनोबल दे.\n\nSummary:", "target": "पिता की बरसी पर घर आने का वादा करनेवाले वाले कमांडो गजेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर जब देहरादून स्थित उनके घर पर लाया गया तो एकबारगी उनके परिजनों को लगा ही नहीं कि उनके घर का चिराग़ देश के लिए एक रोशन ज़िंदगी कुरबान कर चुका है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसेना के एनएसजी दस्ते में कमांडो हवलदार गजेंद्र सिंह नरीमन हाउस में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ मोर्चा लेते हुए शहीद हो गए थे. उनके भरे-पूरे परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, एक बेटी, दो बड़े भाई और उनकी विधवा मां हैं. उनके पिता का अगस्त में देहांत हो गया था. गजेंद्र के भाई रो रो कर सूज गई आंखों और बुझी हुई आवाज़ के साथ बताते हैं, \"पिछले हफ़्ते ही फोन पर गजेंद्र ने कहा था कि पिताजी की बरसी पर आऊंगा.\" \"हमें पता भी नहीं था कि गजेंद्र मुंबई के एनएसजी ऑपरेशन में गया है. बस जब फोन आया तो उसकी मौत का.\" पिछले 18 वर्षों से फौज की सेवा कर रहे गजेंद्र की भर्ती गढ़वाल राइफल्स में हुई थी लेकिन जल्दी ही उसके जज्बे और काबिलियत को देखते हुए उसे सेना की बेहद प्रतिष्ठित बटालियन 10 पैरा कमांडो में तैनाती मिल गई थी. इसी बटालियन के हवलदार और गजेंद्र के दोस्त करण कहते हैं, \"वो कारगिल युद्ध में गया, जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कुछ ऑपरेशन को उसने खुद लीड किया था लेकिन उसे कभी एक खरोंच भी नहीं आई थी. वो जांबाज़ था, उसकी मौत नहीं हुई है वो शहीद हुआ है.\" उमड़ा जन सैलाब शहीद हवलदार गजेंद्र के 12 साल के बेटे गौरव के पास अपने पिता पर गर्व करने के लिए उनकी बहादुरी दिलेरी और हौसले की कहानियां होंगी. फिलहाल तो वो ऐसे दुख से घिरा है जो उसका बाल मन ही समझ सकता है. अपने ताऊ की मदद से जब उसने अपने पिता को मुखाग्नि दी, अंतिम संस्कार के वक़्त उमड़े जन सैलाब की आंखों में बरबस ही आंसू भर आए. कमांडो गजेंद्र की पत्नी गहरे सदमे में है और बात करने की हालत में नहीं है. गजेंद्र के पड़ोसी दोस्त का कहना था, \"वो एक दिलदार इंसान था. फौज में जाने से पहले भी उसकी दिलेरी की सभी तारीफ करते थे. जहां किसी को मदद चाहिए वो आगे आता. जहां कोई मुश्किल काम होता वो फौरन कूद पड़ता.\" शायद यही ख़ूबी थी जिसकी वजह से गजेंद्र को एनएसजी की इस अहम मुहिम में 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दूरसंचार यूनियन के अनुसार 2011 के अंत तक विश्व में करीब छह अरब मोबाइल फोन कनेक्शन थे. शोध में ये भी पाया गया कि लगभग एक अरब सबस्क्रिप्शन केवल चीन में ही है. घटाने होंगी कीमतें रिपोर्ट में 155 देशों का अध्ययन किया गया है. एजेंसी की डाटा डिविज़न की प्रमुख सूज़न कहती हैं, “हम सिम कार्ड गिनते हैं- ये नहीं देखते कि कितने मोबाइल सेट हैं या लोग हैं. अगर एक व्यक्ति के पास एक ही मोबाइल सेट में दो सिम हैं तो उसे दो सबस्क्रिप्शन माना जाएगा. हम मासिक सबस्क्रिप्शन भी गिनते हैं.” उन्होंने ये भी बताया कि टैबलेट या लैपटॉप पर इंटरनेट सुविधा के लिए इस्तेमाल होने वाले सिम कार्ड भी इस गिनती में शामिल नहीं किए गए हैं. जेनेवा से काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार यूनियन (आईटीयू) का ये भी कहना है कि दुनिया के एक तिहाई लोग यानी करीब दो अरब लोग 2011 के अंत तक इंटरनेट इस्तेमाल करने लगे हैं. विकसित देशों में 70 फीसदी जनसंख्या ऑनलाइन थी जबकि विकासशील देशों में 24 फीसदी. आईटीयू में दूरसंचार विकास ब्यूरो के निदेशक ब्राहिमा सानऊ कहते हैं, \"विकासशील देशों में मोबाइल-ब्रॉडबैंड सबस्क्रिप्शन में हो रही वृद्धि के कारण नए लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा पहुँच रही है. लेकिन कम आमदनी वाले कई देशों में इसकी कीमत अब भी बहुत ज़्यादा है.\" उनका कहना है कि अगर मोबाइल ब्रॉडबैंड को विकसशील देशों में पहुंचना है तो थ्री जी सेवा को बढ़ाना होगा और कीमतें कम करनी होगी.\n\nSummary:", "target": "आजकल हर दूसरे व्यक्ति के हाथ में मोबाइल सेट होना आम बात है. क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया में कुल कितने मोबाइल कनेक्शन हैं ?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंयुक्त राष्ट्र टेलीकॉम एजेंसी के मुताबिक दुनिया में जितने लोग हैं तकरीबन उतने ही मोबाइल फोन कनेक्शन हैं. दुनिया की आबादी करीब सात अरब है. अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार यूनियन के अनुसार 2011 के अंत तक विश्व में करीब छह अरब मोबाइल फोन कनेक्शन थे. शोध में ये भी पाया गया कि लगभग एक अरब सबस्क्रिप्शन केवल चीन में ही है. घटाने होंगी कीमतें रिपोर्ट में 155 देशों का अध्ययन किया गया है. एजेंसी की डाटा डिविज़न की प्रमुख सूज़न कहती हैं, “हम सिम कार्ड गिनते हैं- ये नहीं देखते कि कितने मोबाइल सेट हैं या लोग हैं. अगर एक व्यक्ति के पास एक ही मोबाइल सेट में 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पाकिस्तान ने मिल कर बातचीत का एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाया था. इस बातचीत में यह तय हुआ था कि दोनों देशों के विदेश सचिव जून में मिल कर कश्मीर और सुरक्षा के मुद्दों पर बातचीत करेंगे. ये भी फ़ैसला हुआ था कि इसके बाद विदेश मंत्री अगस्त में मिल कर बातचीत में हुई प्रगति की समीक्षा करेंगे. बयान पाकिस्तानी विदेश विभाग के बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान इस बातचीत में हिस्सा लेने का इंतज़ार कर रहा है. बयान में ये भी कहा गया है, \"पाकिस्तान भारत के साथ बातचीत की पूरी प्रक्रिया को अहमियत देता है और वो चाहता है कि परमाणु मसले के अलावा विदेश सचिव स्तर की बातचीत के लिए भी तारीख़ें जल्दी तय हो जाएँ.\" शनिवार को पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी कहा था कि वो भारत की नई सरकार के साथ फ़ौरन बातचीत को तैयार हैं जिसमें ख़ासतौर पर कश्मीर का मुद्दा शामिल है.\n\nSummary:", "target": "भारत में मनमोहन सिंह की नई सरकार के अनुरोध पर पाकिस्तान के साथ परमाणु मसले पर पहले से निर्धारित बातचीत फ़िलहाल टाल दी गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदोनों देशों के बीच मंगलवार और 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इस बात पर बहुत भरोसा नहीं था कि ध्वस्त बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम जन्मभूमि मंदिर बन जाएगा. इस मुद्दे की सियासत उसके सामने साफ़ थी इसलिए सवाल न उसने पूछे, न बाहरवालों ने. बात जहां थी, बनी रही. बीच में कुछ फुटकर ख़बरें थीं कि मामला शायद अदालत से बाहर सुलझाने का प्रयास हो पर दोनों ओर के अक्खड़पंथी अड़ गए. समाप्त अपना नज़रिया बदलने को तैयार नहीं थे और बात घूम-फिरकर वहीं पहुंच गई. एक कहानी पढ़ी गई, जिसका शीर्षक था ‘पुनर्मूषकोभव.’ सुगबुगाहट केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह दस मई को अयोध्या गए तो इशारों में लोगों को तीन बातें समझ आईं. एक, कि मामला अदालत में है, प्रतीक्षा करिए और दूसरी, कि सरकार के पास बहुमत लोकसभा में है, राज्यसभा में नहीं. मतलब साफ़ था कि दोनों संभावनाएं बीरबल की खिचड़ी हैं. उनपर बहुत आस न रखी जाए. यह संभावना भी खारिज मान ली जाए कि सरकार मंदिर निर्माण के लिए क़ानून बनाएगी या कि उसके लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाएगा. तीसरी बात इससे अलग थी और वही ताज़ा सुगबुगाहट की वजह बनी. लगा कि जैसे अंदर-अंदर कुछ पक रहा है और इस राह चलना मंज़िल को क़रीब ले आएगा. हो सकता है इससे दशकों से चल रहे विवाद की चौखट लांघी जा सके. दस तारीख़ को, अपने कुछ घंटे के अयोध्या प्रवास के दौरान, राजनाथ सिंह ‘रामलला’ के दर्शन के बाद हनुमान गढ़ी के महंत और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ज्ञानदास से अकेले मिले. दोनों के बीच क़रीब पौन घंटा बातचीत हुई. एक समय विश्व हिंदू परिषद के ‘धुर विरोधी’ कहे जाने वाले महंत ज्ञानदास की राय परिषद और उसके नेताओं के बारे में बदली नहीं है. आलोचना उतनी ही मुखर है. संकेत गृहमंत्री की ज्ञानदास से भेंट को ‘संकेत’ की तरह देखा जा रहा है और ख़ुद ज्ञानदास का कहना है, ‘हो सकता है यह विवाद कुछ महीने में हल हो जाए. शायद इस साल के अंत तक.’ ज्ञानदास ने कहा, \"प्रयास यह है कि राम मंदिर के निर्माण के लिए गारा दूध से बने, ख़ून से नहीं. यह संभव है, हो सकता है.\" यह पूछने पर कि मस्जिद का क्या होगा, उन्होंने कहा \"अयोध्या में कई मस्जिदें हैं जहां नमाज़ पढ़ी जाती है. एक तो अधिग्रहीत भूमि के बिलकुल बगल में है. बीच में सिर्फ़ एक सड़क है. कहीं भी आलीशान मस्जिद बन सकती है.\" इस विवाद के दूसरे पक्षकार हाशिम अंसारी इस दौरान महंत ज्ञानदास से मिलते रहे हैं. बानवे वर्ष के हाशिम अंसारी को गोद में उठाकर हनुमान गढ़ी ले जाया जाता है. दस मई को भी उन्हें जाना था लेकिन उस दिन मुलाक़ात हो नहीं पाई. हाशिम अंसारी ने कहा, \"यह विवाद हल हो सकता है लेकिन पहले वे अपने मुक़दमे वापस ले लें. मुक़दमे उन्होंने दायर किए हैं, हमने नहीं.\" नीयत इस सवाल पर कि क्या यह मामला आपके जीते जी सुलझ सकता है, अंसारी ने कहा, \"क्यों नहीं. बिल्कुल सुलझ सकता है.\" हाशिम अंसारी इस बात से नाराज़ थे कि राजनाथ सिंह उनसे मिलने नहीं आए. कहा, \"नीयत का सवाल है. किसने रोका था उन्हें? उनको आना चाहिए था.\" अंसारी का एक-मंज़िला छोटा सा घर अयोध्या-फ़ैज़ाबाद मुख्य मार्ग से बमुश्किल पचास मीटर दूर है. सड़क से साफ़ दिखता है. उनका दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है. सामने एक तंबू के नीचे बंदूकधारी पुलिसवाले बैठे रहते हैं. राजनाथ सिंह उसी सड़क से दो बार गए लेकिन वहां रुके नहीं. रुकते तो शायद सुगबुगाहट और बड़ी हो गई होती. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भजन-कीर्तन-आरती के अलावा अक्सर उनींदे रहने वाले अयोध्या को मई महीने के पहले हफ़्ते से अचानक लगने लगा है कि जैसे कुछ होने वाला है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसरयू की तलहटी में थोड़ी-सी हलचल है लेकिन फ़िलहाल इतनी नहीं कि सतह पर दिखाई पड़े. साल भर पहले, केंद्र में सरकार बदलने के बाद भी अयोध्या को इस बात पर बहुत भरोसा नहीं था कि ध्वस्त बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम जन्मभूमि मंदिर बन जाएगा. इस मुद्दे की सियासत उसके सामने साफ़ थी इसलिए सवाल न उसने पूछे, न बाहरवालों ने. बात जहां थी, बनी रही. बीच में कुछ फुटकर ख़बरें थीं कि मामला शायद अदालत से बाहर सुलझाने का प्रयास हो पर दोनों ओर के अक्खड़पंथी अड़ गए. समाप्त अपना नज़रिया बदलने को तैयार नहीं थे और बात घूम-फिरकर वहीं पहुंच गई. एक कहानी पढ़ी गई, जिसका शीर्षक था ‘पुनर्मूषकोभव.’ सुगबुगाहट केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह दस मई को अयोध्या गए तो इशारों में लोगों को तीन बातें समझ आईं. एक, कि मामला अदालत में है, प्रतीक्षा करिए और दूसरी, कि सरकार के पास बहुमत लोकसभा में है, राज्यसभा में नहीं. मतलब साफ़ था कि दोनों संभावनाएं बीरबल की खिचड़ी हैं. उनपर बहुत आस न रखी जाए. यह संभावना भी खारिज मान ली जाए कि सरकार मंदिर निर्माण के लिए क़ानून बनाएगी या कि उसके लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाएगा. तीसरी बात इससे अलग थी और वही ताज़ा सुगबुगाहट की वजह बनी. लगा कि जैसे अंदर-अंदर कुछ पक रहा है और इस राह चलना मंज़िल को क़रीब ले आएगा. हो सकता है इससे दशकों से चल रहे विवाद की चौखट लांघी जा सके. दस तारीख़ को, अपने कुछ घंटे के अयोध्या प्रवास के दौरान, राजनाथ सिंह ‘रामलला’ के दर्शन के बाद हनुमान गढ़ी के महंत और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ज्ञानदास से अकेले मिले. दोनों के बीच क़रीब पौन घंटा बातचीत हुई. एक समय विश्व हिंदू परिषद के ‘धुर विरोधी’ कहे जाने वाले महंत ज्ञानदास की राय परिषद और उसके नेताओं के बारे में बदली नहीं है. आलोचना उतनी ही मुखर है. संकेत गृहमंत्री की ज्ञानदास से भेंट को ‘संकेत’ की तरह देखा जा रहा है और ख़ुद ज्ञानदास का कहना है, ‘हो सकता है यह विवाद कुछ महीने में हल हो जाए. शायद इस साल के अंत तक.’ ज्ञानदास ने कहा, \"प्रयास यह है कि राम मंदिर के निर्माण के लिए गारा दूध से बने, ख़ून से नहीं. यह संभव है, हो सकता है.\" यह पूछने पर कि मस्जिद का क्या होगा, उन्होंने कहा \"अयोध्या में कई मस्जिदें हैं जहां नमाज़ पढ़ी जाती है. एक तो अधिग्रहीत भूमि के बिलकुल बगल में है. बीच में सिर्फ़ एक सड़क है. कहीं भी आलीशान मस्जिद बन सकती है.\" इस विवाद के दूसरे पक्षकार हाशिम अंसारी इस दौरान महंत ज्ञानदास से मिलते रहे हैं. बानवे वर्ष के हाशिम अंसारी को गोद में उठाकर हनुमान गढ़ी ले जाया जाता है. दस मई को भी उन्हें जाना था लेकिन उस दिन मुलाक़ात हो नहीं पाई. हाशिम अंसारी ने कहा, \"यह विवाद हल हो सकता है लेकिन पहले वे अपने मुक़दमे वापस ले लें. मुक़दमे उन्होंने दायर किए हैं, हमने नहीं.\" नीयत इस सवाल पर कि क्या यह मामला आपके जीते जी सुलझ सकता है, अंसारी ने कहा, \"क्यों नहीं. बिल्कुल सुलझ सकता है.\" हाशिम अंसारी इस बात से नाराज़ थे कि राजनाथ सिंह उनसे मिलने नहीं आए. कहा, \"नीयत का सवाल है. किसने रोका था उन्हें? उनको आना चाहिए था.\" अंसारी का एक-मंज़िला छोटा सा घर अयोध्या-फ़ैज़ाबाद मुख्य मार्ग से बमुश्किल पचास मीटर दूर है. सड़क से साफ़ दिखता है. उनका दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है. सामने एक तंबू के नीचे बंदूकधारी पुलिसवाले बैठे रहते हैं. राजनाथ सिंह उसी सड़क से दो बार गए लेकिन वहां रुके नहीं. रुकते तो शायद सुगबुगाहट और बड़ी हो गई होती. 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के परमाणु ठिकाने हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वायुसेना पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों का पता लगाने और हमला कर उन्हें उड़ाने में सक्षम हैं. एयरचीफ आगे कहते हैं, ''चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध की संभावनाएं कम लगती हैं लेकिन दुश्मन की नीयत रातों रात बदल सकती है. इसलिए हमें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए. डोकलाम के मुद्दे पर धनोआ कहते हैं कि विवाद भले ही ख़त्म हो गया हो लेकिन चुनौती बरक़रार है. सांकेतिक तस्वीर पहली क्लास की छात्रा के साथ दुष्कर्म अमर उजाला की खबर के मुताबिक, दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर थाना इलाके के एक निजी स्कूल में पहली क्लास की छात्रा के साथ टॉयलेट में दुष्कर्म का मामला सामने आया है. स्कूल प्रशासन ने आरोपी स्वीपर को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया है, जिसे बाद में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने मुख्य सचिव को मामले की मजिस्ट्रेटी जांच कराने का निर्देश दिया है. प्रद्मुम्न की हत्या जनसत्ता की खबर के मुताबिक, सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के बच्चे प्रद्युम्न की हत्या स्कूल प्रशासन की लापरवाही की वजह से हुई. अख़बार लिखता है कि बस के चालकों, सहचालकों को केवर बच्चों और स्टाफ़ के लिए तय वॉशरूमों की इजाजत दी गई. सीबीएसई ने कहा कि सात साल के लड़के की मौत की जानकारी पुलिस को नहीं दी गई और बच्चे के मां-बाप ने ही पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई. इस साल कितनी बढ़ी मुकेश अंबानी की संपत्ति? 5 वजहें: हथियार क़ानून नहीं बदलता अमरीका (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दैनिक भास्कर की खबर के मुताबिक , भाजपा के वरिष्ठ नेता और वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने पीएम मोदी पर फिर तंज किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयशवंत सिन्हा ने कहा, ''मैं शल्य नहीं भीष्म हूं. महाभारत में भीष्म पितामाह का अच्छा चरित्र था लेकिन उन्हें आज भी द्रोपदी के चीरहरण के वक्त की खामोशी को लेकर उन्हें दोषी ठहराया जाता है. अर्थव्यवस्था के चीरहरण पर चुप नहीं रहूंगा.'' सिन्हा ने आगे कहा, ''नकुल सहदेव के माम शल्य पांडवों के साथ रहना चाहते थे लेकिन दुर्योधन की ठगी का शिकार हो गए. हम आशावादी हैं या निराशावादी. ये ज़रूरी नहीं. ज़रूरी ये है कि हमारे उठाए मुद्दों पर सरकार विचार करे.'' पाकिस्तान के परमाणु ठिकाने हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वायुसेना पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों का पता लगाने और हमला कर उन्हें उड़ाने में सक्षम हैं. एयरचीफ आगे कहते हैं, ''चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध की संभावनाएं कम लगती हैं लेकिन दुश्मन की नीयत रातों रात बदल सकती है. इसलिए हमें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए. डोकलाम के मुद्दे पर धनोआ कहते हैं कि विवाद भले ही ख़त्म हो गया हो लेकिन चुनौती बरक़रार है. सांकेतिक तस्वीर पहली क्लास की छात्रा के साथ दुष्कर्म अमर उजाला की खबर के मुताबिक, दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर थाना इलाके के एक निजी स्कूल में पहली क्लास की छात्रा के साथ टॉयलेट में दुष्कर्म का मामला सामने आया है. स्कूल प्रशासन ने आरोपी स्वीपर को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया है, जिसे बाद में न्यायिक हिरासत में भेज दिया 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ये मात्रा पहले की तुलना में अधिक हैं. विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने एक अध्ययन के आधार पर ये आरोप लगाए हैं. सीएसई ने तीन साल पहले एक सर्वेक्षण करके शीतल पेयों में ज़हरीले कीटनाशक होने की बात कही थी और सीएसई का कहना है कि ये मात्रा पहले की तुलना में और अधिक पाई गई है. उल्लेखनीय है कि सीएसई के आरोपों के बाद काफी बहस हुई थी और जाँच के लिए संसदीय समिति का भी गठन किया गया था. सीएसई की प्रमुख सुनीता नारायण का कहना था कि शीतल पेय की बड़ी कंपनियां कीटनाशकों को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं हैं. सीएसई की मांग है कि इसके लिए मानक बनाए जाएं. उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय पर भी इस मामले में ढिलाई बरतने का आरोप लगाया था. सीएसई की नई रिपोर्ट के अनुसार शीतल पेयों के 11 ब्रांडों के 57 नमूनों में से सभी में तीन से छह कीटनाशक पाए गए.\n\nSummary:", "target": "कोका कोला ने ब्रितानी वैज्ञानिकों की मदद से साबित करने की कोशिश की है कि भारत में बिकनेवाले शीतलपेय पूरी तरह से 'सुरक्षित' हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत के छह राज्यों ने शीतलपेयों पर यह कहते हुए 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है. हैदराबाद में छात्रों के बीच पहुंचे राहुल गांधी हैदराबाद के अलावा दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए. राहुल गांधी के साथ रोहित की माँ भी धरने पर बैठी थी. उन्होंने कहा, \"हैदराबाद में जो हुआ, वही महात्‍मा गांधी के साथ हुआ था, उन्‍हें ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने नहीं दी गई.\" 30 जनवरी को ही महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी. समाप्त इस पर राहुल गांधी ने कहा कि ये अजीब बात है कि आज रोहित का जन्मदिन है और आज ही के दिन महात्मा गांधी की हत्या की गई थी. राहुल गांधी ने मोदी सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, \"मिस्टर मोदी और आरएसएस से मेरा मुख्य विरोध इस पर है कि वे ऊपर से एक विचारधारा थोपकर भारतीय युवकों की भावनाओं को कुचल रहे हैं.\" कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि देश की संस्थाओं में व्यापक उत्पीड़न है. उन्होंने छात्रों से कहा कि रोहित के साथ जो कुछ हुआ, अगर वे उसे जाने देंगे, तो एक दिन उनके साथ भी ऐसा हो सकता है. उधर, भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी पर मौत पर राजनीति करने का आरोप लगाया. भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि राहुल गांधी अपनी राजनीति चमकाने के लिए हैदराबाद की घटना को इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने बिहार में क़ानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत का आरोप लगाते हुए कहा कि वहां के बारे में राहुल गांधी क्यों नहीं बोलते हैं. इस पर कांग्रेस ने भाजपा का पलटवार किया. पार्टी प्रवक्ता अजय माकन ने कहा, ''घबराहट भाजपा की यह है कि सरकार अपने धनाढ्य मित्रों की आवाज़ बनी हुई है, जबकि हमारे नेता राहुल गांधी दलित और ग़रीबों की आवाज़ बने हुए हैं.'' उधर, केंद्रीय मंत्री नेता नितिन गडकरी ने कहा, ''सरकार ने जांच गठित कर दी है. ऐसे में राहुल वहां गए हैं और विश्वविद्यालय को राजनीति का अड्डा बना रहे हैं. उन्हें कुछ कहना है तो वह संसद में आकर कहें.'' रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर कांग्रेस समेत विपक्षी दल हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कुलपति, केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का इस्तीफा मांग रहे हैं. इससे पहले, हैदराबाद यूनिवर्सिटी के कैंपस में रोहित वेमुला के जन्मदिन के मौक़े पर छात्रों ने आधी रात को कैंडल मार्च निकाला और उसके बाद धरने पर बैठ गए. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी शनिवार को धरने पर बैठे और भूख हड़ताल की.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशनिवार 30 जनवरी को रोहित वेमुला का जन्मदिन भी है. हैदराबाद में छात्रों के बीच पहुंचे राहुल गांधी हैदराबाद के अलावा दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए. राहुल गांधी के साथ रोहित की माँ भी धरने पर बैठी थी. उन्होंने कहा, \"हैदराबाद में जो हुआ, वही महात्‍मा गांधी के साथ हुआ था, उन्‍हें ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने नहीं दी गई.\" 30 जनवरी को ही महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी. समाप्त इस पर राहुल गांधी ने कहा कि ये अजीब बात है कि आज रोहित का जन्मदिन है और आज ही के दिन महात्मा गांधी की हत्या की गई थी. राहुल गांधी ने मोदी सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, \"मिस्टर मोदी और आरएसएस से मेरा मुख्य विरोध इस पर है कि वे ऊपर से एक विचारधारा थोपकर भारतीय युवकों की भावनाओं को कुचल रहे हैं.\" कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि देश की संस्थाओं में व्यापक उत्पीड़न है. उन्होंने छात्रों से कहा कि रोहित के साथ जो कुछ हुआ, अगर वे उसे जाने देंगे, तो एक दिन उनके साथ भी ऐसा हो सकता है. उधर, भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी पर मौत पर राजनीति करने का आरोप लगाया. भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि राहुल गांधी अपनी राजनीति चमकाने के लिए हैदराबाद की घटना को इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने बिहार में क़ानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत का आरोप लगाते हुए कहा कि वहां के बारे में राहुल गांधी क्यों नहीं बोलते हैं. इस पर कांग्रेस ने भाजपा का पलटवार किया. पार्टी प्रवक्ता अजय माकन ने कहा, ''घबराहट भाजपा की यह है कि सरकार अपने धनाढ्य मित्रों की आवाज़ बनी हुई है, जबकि हमारे नेता राहुल गांधी दलित और ग़रीबों की आवाज़ बने हुए हैं.'' उधर, केंद्रीय मंत्री नेता नितिन गडकरी ने कहा, ''सरकार ने जांच गठित कर दी है. ऐसे में राहुल वहां गए हैं और विश्वविद्यालय को राजनीति का अड्डा बना रहे हैं. उन्हें कुछ कहना है तो वह संसद में आकर कहें.'' रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर कांग्रेस समेत विपक्षी दल हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कुलपति, केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का इस्तीफा मांग रहे हैं. इससे पहले, हैदराबाद यूनिवर्सिटी के कैंपस में रोहित वेमुला के जन्मदिन के मौक़े पर छात्रों ने आधी रात को कैंडल मार्च निकाला और उसके बाद धरने पर बैठ गए. 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दिल्ली में 'आप' के रूप में एक अच्छा विकल्प मिला जिसे लोगों ने चुना. लेकिन अभी उनको राष्ट्रीय स्तर पर पकड़ बनाने में वक़्त है.\" समाप्त सपा और बसपा बसपा के महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, \"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता को अच्छे दिनों के नाम पर ठगा है. जिसके चलते दिल्ली के लोगों ने उनकी सरकार को नकार दिया.\" उन्होंने कहा, \"जहां तक आप को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विपक्ष के रूप में देखने का सवाल है, यह कहना अभी काफ़ी जल्दी होगा. अभी उन्हें बहुत काम करना है.\" सपा के मंत्री शिव कुमार बेरिया कहते हैं, \"दिल्ली में लोगों के पास कोई भी विकल्प नहीं था. लोग भाजपा से नाराज़ थे जिस वजह से उन्होंने आप को चुना.\" कांग्रेस कांग्रेस युवा नेता और पूर्व मंत्री सचिन पायलट ने कहा, \"आप ने दिल्ली में जीत दर्ज ज़रूर की है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का क्या होगा यह कहना अभी बहुत जल्दी होगा.\" उन्होंने कहा, \"हालांकि पार्टी ने काफ़ी वादे किए हैं. अब यह देखना है कि उन वादों का क्या होता है.\" तृणमूल तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन कहते हैं, \"भाजपा की सरकार को दिल्ली की जनता ने 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अपने पति का काम बहुत रोमांचित करता था. इसमें करियर बनाने के लिए उन्होंने नागपुर जाकर 48 दिन की सिविल डिफेन्स की ट्रेनिंग ली. तब उनका बेटा महज 20 दिन का था. घर वाले नाराज़ हुए लेकिन पति ने उनका साथ दिया. वह भी छुट्टी लेकर साथ रहे और बच्चे का ध्यान रखा. लेकिन सिविल डिफेन्स सेवा में वेकेंसी ही नहीं निकली पर जब राज्य सरकार ने 2011 में अग्नि शमन सेवा में महिलाओं से आवेदन मांगे तो सीता ने देर नहीं की. इसी बीच उन्होंने फायर फाइटिंग का भी छह माह का कोर्स किया. मार्च से अब तक जयपुर में लगी पांच प्रमुख आग की घटनाओं में सीता एवं अन्य महिला फायर फाइटर्स ने बड़ी मुस्तैदी से हिस्सा लिया है. वह बताती हैं कि एक केमिकल फैक्ट्री में लगी आग में कुछ सेकण्ड की भी देर हो जाती तो हम सब आग की चपेट में आ जाते. प्रेरणा जयपुर में सीता सहित छह महिलाओं को नियुक्ति मिली है. उन्हीं के साथ काम कर रहीं सुनीता कहती हैं कि सीता से सबको प्रेरणा मिलती है, क्योंकि वह बिलकुल डरती नहीं हैं. निर्मला भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं. आठ घंटे की शिफ्ट में खुद को फिट रखने के लिए नियमित व्यायाम जरूरी है. हॉज़ रील को निकालना, समेटना और लैडर ड्रिल आदि के अलावा हॉज़ रील से पानी छोड़ते वक्त काफी कुशलता की ज़रूरत होती है. महिला फायर फाइटर्स यह सभी काम होशियारी से कर रही हैं. मुख्य अग्नि शमन अधिकारी ईश्वर लाल जाट कहते हैं कि महिला फायर फाइटर्स बहुत ही अच्छा काम कर रही हैं. उम्मीद से कहीं बेहतर. इन महिला फ़ायर फ़ाइटर्स को गर्व है कि किसी का जान-माल बचाने में ये योगदान दे पा रही हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "राजस्थान में इसी साल मार्च में अग्निशमन सेवाओं के लिए पहली बार 155 महिलाओं की भर्ती की गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआग की लपटें बुझाना आसान काम नहीं है. यह शारीरिक क्षमता, फुर्ती और साहस का इम्तिहान है. राजनीति विज्ञान में एमए और बीएड पास सीता खटीक पहले मेडिकल इंश्योरेंस का काम करती थीं. उनकी तनख्वाह भी अच्छी-ख़ासी थी लेकिन उन्हें शुरू से ही कुछ साहसिक करने की तमन्ना थी. उन्हें जयपुर के बनीपार्क स्थित अग्नि शमन कार्यालय में नियुक्ति मिली है. वह कहती हैं, \"दिल में हिम्मत हो, तो जोखिम को भी पार किया जा सकता है.\" घर और प्रोफ़ेशन शादी के वक्त सीता के पति होम गार्ड्स और सिविल डिफेन्स में काम करते थे. सीता को अपने पति का काम बहुत रोमांचित करता था. इसमें करियर बनाने के लिए उन्होंने नागपुर जाकर 48 दिन की सिविल डिफेन्स की ट्रेनिंग ली. तब उनका बेटा महज 20 दिन का था. घर वाले नाराज़ हुए लेकिन पति ने उनका साथ दिया. वह भी छुट्टी लेकर साथ रहे और बच्चे का ध्यान रखा. लेकिन सिविल डिफेन्स सेवा में वेकेंसी ही नहीं निकली पर जब राज्य सरकार ने 2011 में अग्नि शमन सेवा में महिलाओं से आवेदन मांगे तो सीता ने देर नहीं की. इसी बीच उन्होंने फायर फाइटिंग का भी छह माह का कोर्स किया. मार्च से अब तक जयपुर में लगी पांच प्रमुख आग की घटनाओं में सीता एवं अन्य महिला फायर फाइटर्स ने बड़ी मुस्तैदी से हिस्सा लिया है. वह बताती हैं कि एक केमिकल फैक्ट्री में लगी आग में कुछ सेकण्ड की भी देर हो जाती तो हम सब आग की चपेट में आ जाते. प्रेरणा जयपुर में सीता सहित छह महिलाओं को नियुक्ति मिली है. उन्हीं के साथ काम कर रहीं सुनीता कहती हैं कि सीता से सबको प्रेरणा मिलती है, क्योंकि वह बिलकुल डरती नहीं हैं. निर्मला भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं. आठ घंटे की शिफ्ट में खुद को फिट रखने के लिए नियमित व्यायाम जरूरी है. हॉज़ रील को निकालना, समेटना और लैडर ड्रिल आदि के अलावा हॉज़ रील से पानी छोड़ते वक्त काफी कुशलता की ज़रूरत होती है. महिला फायर फाइटर्स यह सभी काम होशियारी से कर रही हैं. मुख्य अग्नि शमन अधिकारी ईश्वर लाल जाट कहते हैं कि महिला फायर फाइटर्स बहुत ही अच्छा काम कर रही हैं. उम्मीद से कहीं बेहतर. इन महिला फ़ायर फ़ाइटर्स को गर्व है कि किसी का जान-माल बचाने में ये योगदान दे पा रही हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मंगलवार को पाकिस्तान की संसद नेशनल असेंबली को संबोधित करने की योजना से बहुत से पाकिस्तानियों के सपने जैसे पूरे हो गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nचीनी राष्ट्रपति की यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारतीय प्रधानमंत्री की मई के मध्य में चीन यात्रा से पहले शी जिनपिंग के भारत के बारे में विचार का पता चल सकता है. पढ़िए पूरा विश्लेषण पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान की यात्रा रद्द होने के बाद काफ़ी हिचकिचाहट के बाद जिनपिंग का पाकिस्तान दौरा सोमवार को शुरू हुआ. सितंबर में शी जिनपिंग को भारत के साथ पाकिस्तान भी जाना था लेकिन वह दिल्ली में कई दौर की वार्ता और गुजरात में मोदी के साथ परंपरागत झूले में उलझकर रह गए. शी जिनपिंग का एक लक्ष्य चीन-पाकिस्तान के प्रस्तावित आर्थिक गलियारे के लिए कई अनुबंध करने का है. यह आर्थिक गलियारा पाकिस्तीन के पश्चिमी सीमांत शहर कशगर से हिमालय में कराकोरम दर्रे और बलूचिस्तान प्रांत में ग्वादर बंदरगाह तक होगा. समाप्त कुछ विश्लेषकों का कहना है कि शी जिनपिंग का पाकिस्तान का दौरा दक्षिण एशिया की शक्ल बदलने वाला हो सकता है क्योंकि चीन अरब सागर तक पाकिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल मध्य पूर्व से तेल हासिल करने के लिए कर रहा है. यह देखना मज़ेदार होगा कि पाकिस्तान और चीन के लिए यह नियति से एक मुलाक़ात हो सकती है और भारत के लिए चिंता का विषय. चीन का दृष्टिकोण चीन की योजना है कि मध्य पूर्व से आने वाला तेल पहले ग्वादर बंदरगाह तक और फिर वहां से प्रस्तावित रास्ते से सड़क और रेल मार्ग से इसकी सीमा तक पहुंचाया जा सकेगा. इसके लिए अभी तक उसे 12,000 किलोमीटर लंबे समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करना पड़ता है. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, \"होरमुज़ की जलसंधि के एकदम बाहर यह बंदरगाह अरब खाड़ी के मुख्य तेल रास्तों से लगा हुआ है. यह गर्म पानी का समुद्री बंदरगाह है जो ज़मीन से घिरे, लेकिन ऊर्जा से भरपूर मध्य एशिया के देशों के सबसे नज़दीक है.\" पाकिस्तान का दृष्टिकोण चीनी सरकार ने औपचारिक रूप से घोषणा कर दी है कि उन्हें आर्थिक गलियारे पर 46 अरब डॉलर (28.97 ख़रब रुपए से ज़्यादा) के अनुबंधों पर शी के हस्ताक्षर करने की उम्मीद है. इस सड़क मार्ग के साथ ही इस गलियारे में बिजली पैदा करने वाले संयत्रों की एक शृंखला भी होगी, जिसकी पाकिस्तान को सख़्त ज़रूरत है. इसमें से 90% चीन या तो मुफ़्त आर्थिक सहायता के रूप में देगा या सस्ती दर के ऋण के रूप में. एक दशक से भी ज़्यादा वक़्त से पाकिस्तान चीन को ग्वादर योजना बेचना चाहता था. यहां आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए चीनी कंपनियों की निर्माण क्षमता और पैसे दोनों की ज़रूरत है. चीनी पैसे से ग्वादर बंदरगाह का पहला चरण 2006 में पूरा हो गया था लेकिन अब तक कोई कमाल नहीं हुआ है. अब तक इसकी क्षमताओँ का ठीक से दोहन नहीं हुआ है. अंततः चीन ने एक बार इसे आज़माने का फ़ैसला किया है. शिन्हुआ ने इस्लामाबाद काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स के ख़ालिद महमूद के हवाले से कहा है, \"पाकिस्तान का फ़ायदा यह है कि इससे क्षेत्र में उद्योग और व्यापारिक क्रियाकलाप बढ़ेंगे. पाकिस्तान खाड़ी से ऊर्जा हस्तांतरण का केंद्र भी बन जाएगा.\" उन्होने कहा, \"इससे चीन खाड़ी क्षेत्र, अफ़्रीका, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों से आसानी से और कम वक्त में जुड़ सकेगा.\" भारत की चिताएं भारत को सुरक्षा कारणों से भी चिंतित होने की ज़रूरत है. विश्लेषकों का मानना है कि ग्वादर जैसे गहरे समुद्र के बंदरगाह में चीन की उपस्थिति आज तो सिर्फ़ व्यापारिक कारणों से लग सकती है लेकिन इसकी आशंका बहुत प्रबल है कि यह चीन की नौसेना के लिए एक अड्डा बन जाए और भविष्य में चीन पाकिस्तानी नौसेना के साथ मिलकर काम करे. अरब सागर का विस्तार भारत के मुंबई जैसे शहरों तक है. पहले भी मुंबई हमलों के दौरान चरमपंथी पाकिस्तान से वहां तक का रास्ता अरब सागर से तय कर चुके हैं. कुछ भारतीय विश्लेषकों का मानना है कि भारत को इतना ज़्यादा डरने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि इस प्रोजेक्ट में अभी बहुत समय लगना है. इसकी राह में पाकिस्तान में राजनीतिक अशांति, पूरे मार्ग पर चरमपंथी संकट और चीनी प्रांत शिनजेंग (जहां से यह रास्ता शुरू होना है) में इस्लामिक अलगाववादी आंदोलन जैसे रोड़े आ सकते हैं. लेकिन ऐसा करना चीनी बिल्डरों की वित्तीय ताकत और उनकी ज़िद को कम करने आंकना होगा. कई आलोचक, जिन्होंने कहा था कि चीनी प्रयास नाकाम होंगे या बुलबुले की तरह फूट जाएंगे, अतीत में भी ग़लत साबित हो चुके हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत की सरकार ने गिरते हुए रूपए को थामने और अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए आधारभूत संरचना के क्षेत्र में 1.83 लाख करोड़ की अनेक परियोजनाओं को मंज़ूरी दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि तेल, गैस, सड़क और रेलवे के क्षेत्र में अटकी 36 परियोजनाओं को हरी झंडी मिल गई है. उन्होंने कहा, \"हम संदेश देना चाहते हैं कि निवेश का चक्र फिर से शुरू हो रहा है और हम इसको आगे बढ़ा रहे हैं.\" यह घोषणा ऐसे समय में की गई है, जब मंगलवार को रूपए की क़ीमत एक डॉलर के मुकाबले 65.60 रुपए तक पहुंच गई. बाज़ार में गिरावट के रुख़ को कम करने में अब तक सरकार के प्रयास बेहतर परिणाम देने में विफल रहे हैं. धैर्य और मजबूती की जरूरत वित्त मंत्री ने कहा कि रुपया अपने वास्तविक स्तर से काफी कमज़ोर हुआ है, लेकिन भारत इकलौता देश नहीं है, जो इस तरह की समस्या का सामना कर रहा है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, वित्त मंत्री ने कहा, \"विश्व की सभी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं चुनौतियों का सामना कर रही हैं. उसी तरीके से भारतीय अर्थव्यवस्था भी चुनौती के दौर से गुज़र रही है, जिसका प्रभाव शेयर बाज़ार के साथ-साथ मुद्रा बाज़ार पर भी पड़ रहा है.\" उन्होंने कहा, \"मेरा मानना है कि हमें धैर्य और मजबूती बनाए रखने की जरूरत है, हम जरूरी कदम उठा रहे हैं और मुद्रा की क़ीमतें अपने वास्तविक स्तर पर पहुंच जाएंगी.\" खाद्य सुरक्षा पी चिदंबरम ने अर्थव्यस्था के मजबूत होने और रुपए में सुधार के प्रयासों से उम्मीद जताई पी चिदंबरम ने खाद्य सुरक्षा विधेयक से देश की वित्तीय स्थिति पर प्रभाव से जुड़ी आशंकाओं को भी दूर करने का प्रयास किया. सोमवार की रात यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है. अब इसे राज्यसभा में लाया जाएगा. इससे भारत की दो तिहाई आबादी को सस्ते दामों पर अनाज उपलब्ध कराया जाएगा ताकि भूखमरी और कुपोषण की स्थिति से निपटा जा सके. लेकिन इस महत्वाकांक्षी क़ानून को लागू करने में हर साल 1.3 खरब रुपए की लागत आएगी. घाटा बढ़ने का डर आलोचकों का कहना है कि इस योजना से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा. हालांकि वित्त मंत्री का कहना है कि इससे सरकार के वित्तीय घाटे में बहुत ज़्यादा बढ़ोत्तरी नहीं होगी. उन्होंने कहा, \"खाद्य सुरक्षा विधेयकके लिए आवंटन करते समय बजट की सीमाओं का ध्यान रखा जाएगा.\" भारत पहले ही वृद्धि में गिरावट और वित्तीय घाटे की समस्या से जूझ रहा है. भारत की अर्थव्यवस्था, एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसकी विकास दर 2012-13 के वित्तीय वर्ष में 5 फीसदी के आसपास रही है, जो पिछले दस सालों में सबसे कम विकास दर है. 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'नहीं ली राय' शर्मा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, \"न तो हमारी राय ली गई है और न ही इस फ़ैसले से पर हमारी सहमति है. अगर हमसे पूछा जाता तो हम इसके लिए तैयार नहीं होते. ऐसे लोगों को रिहा नहीं किया जाना चाहिए जो हर वक़्त भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं.\" मसर्रत आलम पर आरोप है कि उन्होंने 2010 में भारत विरोधी हिंसा भड़काई थी जिसमें 100 से अधिक लोगों की जान गई थी. नई गठबंधन सरकार के काम संभालने के सप्ताह भर के भीतर पैदा हुए इस विवाद ने न सिर्फ़ राज्य सरकार बल्कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी मुश्किल में डाल दिया है. समाप्त शर्मा ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी अपनी एक बैठक कर रही है जिसके बाद गठबंधन की साझीदार पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को अपने रुख़ से अवगत कराया जाएगा. भाजपा का कहना है कि सरकार चलाने के लिए जो साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय किया गया है उसमें ऐसे अलगाववादियों की रिहाई की बात नहीं है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर सरकार में साझीदार भारतीय जनता पार्टी ने अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई की कड़ी आलोचना की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजम्मू-कश्मीर भाजपा के प्रमुख और सांसद जुगल किशोर शर्मा ने कहा है कि इस फ़ैसले के बारे में उनकी पार्टी से कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया था, यह 'एकतरफ़ा फ़ैसला' है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "लंदन ओलंपिक 2012 का वक्त. मेकएला मैरोनी नाम की अमरीकी जिमनास्ट के गले में मेडल था लेकिन चेहरे पर असंतुष्टि साफ झलक रही थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुंह बनाते हुए तब मेकएला मैरोनी की वो तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई. लोगों ने इस तस्वीर के मीम बनाए. ये तस्वीर इतनी वायरल रही कि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब मेकएला से मिले तो तस्वीर खिचाते हुए वैसे ही एक्सप्रेशन दिए, जैसे मेडल जीतने के बाद मेकएला ने दिए थे. ओलंपिक मेडल जीतने वाली जिम्नास्ट के साथ उत्पीड़न मेकएला मैरोनी फिर चर्चा में हैं. वजह सोशल मीडिया पर बीते दिनों से चल रहा अभियान #MeToo मेकएला ने ट्विटर पर #MeToo के साथ अपने अनुभव साझा किए हैं. ये अनुभव एक ऐसी महिला जिमनास्ट की तरफ से आ रहे हैं, जिसने अपने देश के लिए ओलंपिक मेडल जीते हैं. समाप्त मेकएला ने लिखा, ''मैं 13 साल की उम्र से लेकर जब तक खेल से रिटायर नहीं हो गई, इस दौरान सात साल तक मैं यौन उत्पीड़न का शिकार रही. मेरा उत्पीड़न वूमेन जिम्नास्टिक्स टीम के डॉक्टर लैरी नस्सार ने किया था.'' आगे पढ़िए मैकएला की पूरी कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी डॉ नस्सार पर 120 महिलाओं के आरोप डॉ नस्सार उत्पीड़न के आरोपों को ख़ारिज करते हैं. मिशेगन में उन पर चाइल्ड प्रॉनोग्राफी के आरोप में ट्रायल चल रहा है. डॉ नस्सार पर 120 महिलाओं ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है, इनमें कई जिम्नास्ट भी शामिल हैं. डॉक्टर नस्सार तीस सालों तक अमरीकी जिम्नास्ट टीम के साथ जुड़े रहे. वो चार ओलंपिक खेलों में भी हिस्सा ले चुके हैं. ये मामला कुछ महीनों पहले उठा था, तब अमरीकी जिम्नास्ट टीम के प्रेसिडेंट स्टीव पैनी को इस्तीफा देना पड़ा था. लड़कियों के साथ #MeToo पोस्ट पर लड़के क्यों? 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जर्मन चांसलर एंगेला मैरकल ने एक बार फिर कहा है कि हमास के नेतृत्व वाली सरकार अगर इसराइल को मान्यता नहीं देती या हिंसा नहीं त्यागती तो यूरोपीय संघ उसे वित्तीय सहायता नहीं देगा. एंगेला मैरकल फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मिलेंगी मगर वे किसी अन्य फ़लस्तीनी नेता से मुलाक़ात नहीं करेंगी. अमरीका की विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने भी अमरीका द्वारा दी जानेवाली आर्थिक सहायता में कटौती करने की अमरीका की धमकी दोहराई है. यूरोपीय संघ फ़लस्तीनी प्रशासन को सबसे अधिक आर्थिक सहायता देता है. वह हर साल फ़लस्तीनियों को 60 करोड़ 60 लाख डॉलर की आर्थिक मदद देता है. अन्य दाता शक्तियों के साथ अब जापान और कुछ अरब देशों ने भी सहायता जारी रखने पर दोबारा विचार शुरू कर दिया है. इसराइल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट ने कहा है कि इसराइल फ़लस्तीनियों को ऐसी कोई राशि नहीं देगा जिसका इस्तेमाल आतंकवाद के लिए हो सकता हो. लेकिन उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया कि इसराइल टैक्स से होनेवाली आय में से फ़लस्तीनी प्रशासन को भुगतान करना जारी रखेगा या नहीं.\n\nSummary:", "target": "फ़लस्तीनी चुनाव में चरमपंथी गुट हमास 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Hindi.\n\nText:\nबाद में उप वाणिज्य दूत को निजी बांड पर रिहा कर दिया गया. उप वाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े पर आरोप है कि उन्होंने एक भारतीय नागरिक के लिए ग़लत दस्तावेज़ और जानबूझ कर ग़लत जानकारी पेश करके वीज़ा हासिल किया. अमरीकी सरकारी वकील प्रीत भरारा का कहना है कि घरेलू सहायक के तौर पर अमरीका लाए गए विदेशी नागरिकों को भी शोषण के ख़िलाफ़ वही अधिकार प्राप्त हैं जो किसी अमरीकी नागिरक को मिलते हैं. प्रीत भरारा का कहना था, “ये ग़लत बयानी और धोखाधड़ी इसलिए की गई जिससे कि इस घरेलू सहायक को अमरीका में जो मेहनताना क़ानून के तहत मिलता है उससे काफ़ी कम रकम पर रखा जा सके. इस तरह की धोखाधड़ी और किसी इंसान का इस तरह से शोषण यहां बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.” बयान न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने इस मामले पर फ़िलहाल कोई बयान नहीं दिया है. अमरीकी ऐटॉर्नी कार्यालय की तरफ़ से जारी जानकारी के अनुसार खोबरागड़े को दो लाख पचास हज़ार डॉलर के निजी बॉंड पर रिहा कर दिया गया है और उन्हें अपने सभी यात्रा दस्तावेज़ अदालत में जमा करने का आदेश दिया गया है. उन पर घरेलू सहायक या उसके परिवार के किसी सदस्य के 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "न्यूयॉर्क में अमरीका के सरकारी वकील का कहना है कि भारतीय वाणिज्य दूतावास की उप वाणिज्य दूत को अपने घरेलू सहायक के लिए ग़लत दस्तावेजों और ग़लतबयानी के ज़रिए वीज़ा हासिल करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबाद में उप वाणिज्य दूत को निजी बांड पर रिहा कर दिया गया. उप वाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े पर आरोप है कि उन्होंने एक भारतीय नागरिक के लिए ग़लत दस्तावेज़ और जानबूझ कर ग़लत जानकारी पेश करके वीज़ा हासिल किया. अमरीकी सरकारी वकील प्रीत भरारा का कहना है कि घरेलू सहायक के तौर पर अमरीका लाए गए विदेशी नागरिकों को भी शोषण के ख़िलाफ़ वही अधिकार प्राप्त हैं जो किसी अमरीकी नागिरक को मिलते हैं. प्रीत भरारा का कहना था, “ये ग़लत बयानी और धोखाधड़ी इसलिए की गई जिससे कि इस घरेलू सहायक को अमरीका में जो मेहनताना क़ानून के तहत मिलता है उससे काफ़ी कम रकम पर रखा जा सके. इस तरह की धोखाधड़ी और किसी इंसान का इस तरह से शोषण यहां बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.” बयान न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने इस मामले पर फ़िलहाल कोई बयान नहीं दिया है. अमरीकी ऐटॉर्नी कार्यालय की तरफ़ से जारी जानकारी के अनुसार खोबरागड़े को दो लाख पचास हज़ार डॉलर के निजी बॉंड पर रिहा कर दिया गया है और उन्हें अपने सभी यात्रा दस्तावेज़ अदालत में जमा करने का आदेश दिया गया है. उन पर घरेलू सहायक या उसके परिवार के किसी सदस्य के साथ संपर्क स्थापित करने पर भी पाबंदी लगा दी गई है. अमरीकी विदेश विभाग की तरफ़ से अदालत में पेश दस्तावेज़ के अनुसार 2012 में इस सहायक के लिए वीज़ा हासिल करने के लिए जो दस्तावेज़ पेश किए गए उनमें कहा गया कि उसे अमरीकी क़ानून के अनुसार प्रति घंटे 9.75 डॉलर का मेहनताना दिया जाएगा. लेकिन दस्तावेज़ों के अनुसार खोबरागड़े ने घरेलू सहायक के साथ एक और अनुबंध किया जिसमें उसकी मासिक आमदनी 25,000 रूपए और 5,000 रूपए ओवरटाइम रखी गई. वीज़ा आवेदन के समय अमरीकी डॉलर में ये रकम प्रति घंटे के हिसाब से 3.31 डॉलर ही बनती है. अमरीकी विदेश विभाग के दस्तावेज़ के अनुसार, “खोबरागड़े ने इस सहायक को निर्देश दिया कि वो वीज़ा इंटरव्यू के दौरान अपनी आमदनी 9.75 डॉलर प्रति घंटे ही बताए और 30,000 रूपए के वेतन का ज़िक्र नहीं करे.” खोबरागड़े पर ये भी आरोप है कि उन्होंने अमरीकी क़ानून के तहत कामगारों को दी जानेवाली दूसरी सुविधाओं का भी उल्लंघन किया. उनपर वीज़ा धोखाधड़ी और ग़लत बयान देने के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ है और अगर आरोप साबित हो जाते हैं तो पहले आरोप के तहत दस साल और दूसरे आरोप में पांच साल की सज़ा हो सकती है. 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बिज़नेसवुमैन और फ़िल्म निर्माता के तौर पर सक्रिय ट्विंकल अब लेखिका बन गई हैं. किताब की लांच पर पति अक्षय कुमार के अलावा मां डिंपल कपाड़िया और ट्विंकल के अच्छे दोस्त आमिर ख़ान और करण जौहर मौजूद थे. मज़ाक 'मिसेज़ फ़नीबोन्स' नाम से अख़बारों में लिखने वाली ट्विंकल ने इसी नाम से अपनी क़िताब का अंग्रेज़ी संस्करण मुंबई में हुए एक समारोह में लांच किया. ट्विंकल इस समारोह में भी उतना ही मज़ाक कर रही थी जितना वो अपने लेखन में करती हैं. उन्होनें कहा,\"राधे मां पर एक रिएलिटी शो बनाया जाना चाहिए वो कमाल करेंगी.\" ट्विंकल के मज़ाकिया अंदाज़ से आमिर और अक्षय भी नहीं बच सके. जहां ट्विंकल ने आमिर के क़द को अपने मज़ाक का निशाना बनाते हुए कहा,\"मेला के दौरान बतौर हीरो आमिर की हाईट पर मुझे हंसी आ जाती थी और अक्सर मैं उनके क़द को याद कर मुस्कुरा लेती हूं.\" वहीं अपने पति के राज़ खोलते हुए ट्विंकल ने बताया कि अक्षय भावुक फ़िल्में देखते वक्त रो पड़ते हैं. जवाब वैसे मज़ाक करने में आमिर भी पीछे नही रहे. वे कहते हैं, \"हम सभी में कुछ न कुछ क़ाबलियत होती है और इसी तरह ट्विंकल माहिर हैं लोगों को बेइज़्ज़त करने में.\" आमिर कहते हैं, \"वैसे ट्विंकल की अक्षय से शादी होने की बड़ी वजह मैं भी हूं क्योंकि 'मेला' फ़्लॉप हो गई थी और ऐसे में ट्विंकल को शादी करना ही सही लगा.\" आमिर ने यह भी कहा, \"मुझे नहीं लगता था कि यह लेखिका बन पाएगी और मैं इसे (ट्विंकल) कहता रहता था कि ज़रूरी नहीं कि अगर तुम क्रिकेट पसंद करते हो तो अच्छा खेल भी सकते हो.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "\"कई लोग ये बात नहीं मानते लेकिन मैं मोटी हूं और ख़ुद को स्क्रीन के लिए फ़िट नहीं मानती.\"", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये कहना है पूर्व अभिनेत्री ट्विंकल ख़न्ना का, जिन्होनें कई सालों पहले अभिनय को अलविदा कह दिया था. अब उनकी एक किताब आई है. हालांकि वो अख़बारों में वो काफ़ी समय से लिखती रही हैं. राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की बेटी ट्विंकल ने फ़िल्म 'बरसात' से अपना करियर शुरू किया था और उन्होंने सर्वश्रेष्ठ डेब्यू कलाकार का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड भी जीता था. उन्होंने बॉलीवुड के तीनों ख़ान सलमान, आमिर 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ख़िलाफ़ कथित आर्थिक घपलों के लिए वारंट जारी किया गया है जबकि उनके भतीजे सलेम चलाबी को हत्या के एक मामले में अभियुक्त बनाया गया है. दिलचस्प बात ये है कि सलेम चलाबी उस न्यायाधिकरण के प्रमुख हैं जो सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे की सुनवाई कर रहा है. इस समय अहमद और सलेम चलाबी, दोनों ही देश से बाहर हैं और उन्होंने आरोपों को बेबुनियाद करार देते हुए, इसे राजनीति से प्रेरित क़दम बताया है. अहमद चलाबी सद्दाम हुसैन के सत्ता से हटने के बाद कुछ समय तक इराक़ी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के क़रीबी थे और माना जा रहा था कि रक्षा मंत्री डॉनल्ड रम्सफ़ेल्ड उन्हें इराक़ का राष्ट्रपति बनवाना चाहते हैं. लेकिन कट्टरपंथी ईरानी नेतृत्व से निकटता और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों को ग़लत जानकारी उपलब्ध कराने के शक के कारण अमरीकी प्रशासन ने अपने विश्वसनीय लोगों में सूची में से उनका नाम काट दिया. अहमद चलाबी ने कहा कि उन्होंने वारंट के बारे में आधिकारिक तौर पर सूचित नहीं किया गया है लेकिन उन्हें इसकी ख़बर समाचार माध्यमों के ज़रिए मिली है. इस समय ईरान का दौरा कर रहे चलाबी ने अमरीकी टीवी चैनल सीएनएन को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा, \"मैं हर मोर्चे पर मुक़ाबला करूँगा और इन आरोपों को झूठा साबित कर दूँगा.\" आरोप वारंट जारी करने वाले जज मोहम्मद मालिकी ने एक रेडियो स्टेशन को इंटरव्यू देते हुए कहा कि अहमद चलाबी पर नकली नोट छापने और चलाने का आरोप है, जज के शब्दों में अहमद चलाबी इस मामले में मुख्य अभियुक्त हैं. जज ने कहा, \"इन लोगों को गिरफ्तार करके पूछताछ की जाएगी और सबूतों की पड़ताल होगी, उसके बाद अगर पर्याप्त सबूत हुए तो मुक़दमा चलाया जाएगा.\" अहमद चलाबी के ख़िलाफ़ जारी किए गए वारंट को उनकी कमज़ोर राजनीतिक स्थिति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. इराक़ पर अमरीकी हमले के बाद पेंटागन ने जिन चंद लोगों को बग़दाद पहुँचाया था उनमें चलाबी प्रमुख थे, इससे पहले वे लगभग दो दशक तक अमरीका में निर्वासन में रहे थे. लेकिन सद्दाम हुसैन को अपदस्थ किए जाने के बाद सत्ता के लिए शुरू हुई होड़ में उनके संबंध अमरीकी अधिकारियों से ख़राब होते चले गए. दो महीने पहले इराक़ी पुलिस और अमरीकी सैनिकों ने चलाबी के घर और उनकी पार्टी के दफ़्तर पर छापा मारा था, इसके बाद उनकी राजनीतिक पार्टी इराक़ी नेशनल काँग्रेस को मिलने वाली मोटी 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सरकार ने राजीव गांधी की हत्या के मामले के सात दोषियों की रिहाई की घोषणा की थी. ये सात अभियुक्त हैं, पेरारिवलन, संथन और मुरुगन, नलिनी, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन. केंद्र सरकार तमिलनाडु सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय गई कि राज्य सरकार को इन दोषियों की सज़ा माफ करने का क़ानूनी अधिकार नहीं है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत के उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के तीन दोषियों की मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल देने के निर्णय पर पुनर्विचार करने से मना कर दिया है. यह याचिका केंद्र सरकार ने दायर की थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा देने में अत्यधिक देरी के कारण उसे आजीवन कारावास में बदला था. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की पीठ ने याचिका को ख़ारिज किया. सुप्रीम कोर्ट ने फ़रवरी में राजीव गांधी की हत्या के लिए फांसी की सज़ा पा चुके तीन दोषियों पेरारिवलन, संथन और मुरुगन को सज़ा देने में 11 साल की देरी होने के कारण सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया था. राजीव हत्याकांड से जुड़े मामले में याचिका मंज़ूर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मई, 1991 में तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती हमले में हत्या की गई थी. उनके साथ कम से कम अन्य 14 लोग मारे गए थे. विचार योग्य नहीं राजीव गांधी की मृत्यु 1991 में एक चुनावी रैली के दौरान हुए एक आत्मघाती हमले में हुई थी. केंद्र सरकार की पुनर्विचार पर न्यायालय ने कहा कि यह पुनर्विचार याचिका विचार योग्य नहीं है. न्यायालय ने कहा है कि राष्ट्रपति के पास लंबे समय तक पुनर्विचार के लिए पड़े रहने का कोई ठोस आधार नहीं. राजीव हत्याकांडः दोषियों की रिहाई पर रोक हालांकि न्यायालय को अभी तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार के बीच चल रहे मामले पर फ़ैसला देना है. केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच इस बात को लेकर तक़रार है कि मौत की सज़ा पा चुके दोषियों की सज़ा बदलने का अधिकार किसे है. उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के बाद तमिलनाडु सरकार ने राजीव गांधी की हत्या के मामले के सात दोषियों की रिहाई की घोषणा की थी. ये सात अभियुक्त हैं, पेरारिवलन, संथन और मुरुगन, नलिनी, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन. केंद्र सरकार तमिलनाडु सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय गई कि राज्य सरकार को इन दोषियों की सज़ा माफ करने का क़ानूनी अधिकार नहीं है. 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चाहते हैं जो अपनी बात निडरता से सत्तासीन लोगों के सामने कह सके. नई दुनिया ‘बच्चों की पहल’ ने ग्रामीण बच्चों के लिए ख़बरें लिखने के तरीके, फ़ोटोग्राफी और कार्टूनों की एक नई दुनिया ही खोल दी है. नवलगाँव के चौकीदार के बेटे दयाशंकर जहाँ अख़बार के लिए संवाददाता और कार्टूनिस्ट दोनों की भूमिका निभा रहे हैं, वहीं मज़दूर के बेटे हरिओम अपने विचार कार्टून की आड़ी-तिरछी लकीरों के माध्यम से सामने रखने लगे हैं. होशंगाबाद के सोहागपुर तहसील के दूरदराज़ इलाकों में रह रहे ये किशोर संवाददाता अपनी रिपोर्टें, लेख और प्रकाशन के लिए दूसरी सामग्रियां दलित संघ कार्यकर्ताओं या डाक के माध्यम से सोहागपुर भेजते हैं. जहाँ ख़बरों के संकलन और संपादन के बाद उन्हें प्रकाशित किया जाता है. दलित संघ कार्यकर्ता सुनील कहते हैं कि न्यूज़ लेटर की ख़बरें कई मामलों में अपनी छाप भी छोड़ रही हैं. मसलन गुंदरई स्कूल में खेल मैदान न होने की ख़बर प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री ने जिल़ा कलेक्टर को इस बाबत निर्देश दिए. मगर जहाँ दलित सशक्तीकरण, बच्चों में सामयिक विषयों पर होनेवाली चर्चाएं, उनके बढ़ते शब्दकोष और अभिव्यक्ति में आया पैनापन खुशी का विषय है, वहीं शिक्षक तरवर सिंह पटेल चिंतित हैं कि कहीं बार-बार समस्याओं की बात उठाने से बच्चे शक्तिशाली लोगों को अपना दुश्मन न बना लें. लेकिन मास्टर साहब की चिंताओं से बेख़बर स्वभाव से शर्मीली मीना जहाँ नारी अधिकार पर अपनी कविता सुना रही हैं, वहीं पूजा रघुवंशी ‘भगवान ने पेट किस लिए दिया है, पायजामा बाँधने के लिए’ जैसे चुटकुले सुनाकर ठहाके लगवा रही है.\n\nSummary:", "target": "मध्य प्रदेश में एक स्वयंसेवी संस्था ने 'बच्चों की पहल' नामक त्रिमासिक अख़बार शुरू किया है. ख़ास बात ये है कि इस अख़बार के सभी रिपोर्टर स्कूली बच्चे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहोशंगाबाद ज़िले की सोहागपुर तहसील में यूनीसेफ़ की पहल पर दलित संघ नामक स्थानीय स्वयंसेवी संस्था ने यह पहल की है. तीन कमरों वाले स्कूलों में जहाँ कक्षा एक से आठ तक की पढ़ाई होती है, वहाँ पढ़ने वाले इन बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है. वे अपना परिचय कुछ इस अंदाज़ में देते हैं. “मेरा नाम ज्योति है. मैं आठवीं में पढ़ती हूँ और दलित संघ की पत्रकार हूँ...या “ मैं शिवकुमार हूँ और मैं पत्रकार 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पढ़े-लिखे लोगों की कमी थी और दूसरे वह भविष्य के लिए एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते हैं जो अपनी बात निडरता से सत्तासीन लोगों के सामने कह सके. नई दुनिया ‘बच्चों की पहल’ ने ग्रामीण बच्चों के लिए ख़बरें लिखने के तरीके, फ़ोटोग्राफी और कार्टूनों की एक नई दुनिया ही खोल दी है. नवलगाँव के चौकीदार के बेटे दयाशंकर जहाँ अख़बार के लिए संवाददाता और कार्टूनिस्ट दोनों की भूमिका निभा रहे हैं, वहीं मज़दूर के बेटे हरिओम अपने विचार कार्टून की आड़ी-तिरछी लकीरों के माध्यम से सामने रखने लगे हैं. होशंगाबाद के सोहागपुर तहसील के दूरदराज़ इलाकों में रह रहे ये किशोर संवाददाता अपनी रिपोर्टें, लेख और प्रकाशन के लिए दूसरी सामग्रियां दलित संघ कार्यकर्ताओं या डाक के माध्यम से सोहागपुर भेजते हैं. जहाँ ख़बरों के संकलन और संपादन के बाद उन्हें प्रकाशित किया जाता है. दलित संघ कार्यकर्ता सुनील कहते हैं कि न्यूज़ लेटर की ख़बरें कई मामलों में अपनी छाप भी छोड़ रही हैं. मसलन गुंदरई स्कूल में खेल मैदान न होने की ख़बर प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री ने जिल़ा कलेक्टर को इस बाबत निर्देश दिए. मगर जहाँ दलित सशक्तीकरण, बच्चों में सामयिक विषयों पर होनेवाली चर्चाएं, उनके बढ़ते शब्दकोष और अभिव्यक्ति में आया पैनापन खुशी का विषय है, वहीं शिक्षक तरवर सिंह पटेल चिंतित हैं कि कहीं बार-बार समस्याओं की बात उठाने से बच्चे शक्तिशाली लोगों को अपना दुश्मन न बना लें. लेकिन मास्टर साहब की चिंताओं से बेख़बर स्वभाव से शर्मीली मीना जहाँ नारी अधिकार पर अपनी कविता सुना रही हैं, वहीं पूजा रघुवंशी ‘भगवान ने पेट किस लिए दिया है, पायजामा बाँधने के लिए’ जैसे चुटकुले सुनाकर ठहाके लगवा रही है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 379, "source_item_id": "379", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2811, "clean_index": 340, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:340"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमाना जा रहा है कि अमरीकी फ़ौजें सद्दाम हुसैन की सरकार में दो नंबर के नेता रह चुके इज़्ज़त इब्राहीम अल-दौरी को ढूँढ रहे हैं. चाहे इराक़ की अंतरिम शासकीय परिषद के दो सदस्यों ने पहले कहा था कि वे मानते हैं कि अल-दौरी पकड़े जा चुके हैं लेकिन एक अमरीकी सैनिक प्रवक्ता ने इस ख़बर का खंडन किया गया है. पिछले महीने अमरीकी अधिकारियों ने अल-दौरी के बारे में जानकारी देने पर एक करोड़ डॉलर का इनाम देने की घोषणा की थी. बीबीसी के मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ रॉजर हार्डी का कहना है कि इस समय इराक़ में अमरीका कोई बड़ी सफलता चाहता है. अमरीका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेनाओं पर लगातार हो रहे हमलों के कारण अमरीकी अधिकारी मानते हैं कि सैनिकों का हौसला बढ़ाना बहुत ज़रूरी हो गया है. रॉजर हार्डी के अनुसार यदि अल-दौरी को जिंदा पकड़ लिया जाता है तो अमरीकी अधिकारी मानते हैं कि उन्हें सद्दाम हुसैन के ठिकाने का भी पता चल सकता है. ये भी कहा जाता है कि अल-दौरी को कैंसर है और वे ही अमरीकी सेनाओं के ख़िलाफ़ विद्रोह का नेतृत्व कर रहे हैं. इराक़ में ही समारा नगर में अमरीकी वाहनों पर एक ताज़ा बम हमले में एक अमरीकी सैनिक मारा गया है.\n\nSummary:", "target": "इराक़ में अमरीकी फ़ौजों ने किरकुक नगर के पास एक नया सुरक्षा अभियान छेड़ दिया है.", 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'कारोबार का चेहरा बदला' कंपनी का कहना था कि इन महिलाओं को 'मुनाफ़े कमाने वाली कंपनियों के बेहतरीन प्रबंधन' के लिए चुना गया है. ये पहला मौक़ा है जब फ़ोर्ब्स ने एशिया की शीर्ष 50 कारोबारी महिलाओं की सूची जारी की है. इस सूची में सम्मानित की गई महिलाओं में सबसे बड़ी उम्र की 77-वर्षीय जापानी महिला हैं. ऑस्ट्रेलिया की सबसे अमीर व्यक्ति और महिला खनन कारोबारी जीना राइनहार्ट के साथ ही वियतनाम की सबसे बड़ी दूध कंपनी की अध्यक्ष शामिल हैं. इसके बावजूद एशिया में अब भी कई महिलाओं को कार्यलायों और नौकरियों में भेदभाव और असमानता के मुद्दों का सामना करना पड़ता है. फ़ोर्ब्स विमेन पत्रिका की अध्यक्ष और प्रकाशक मोइरा फ़ोर्ब्स ने एक वक्तव्य में कहा, \"ये इस तरह की पहली सूची है और ये जश्न है उन गतिशील तरीकों का जिनसे एशिया की ये कारोबारी महिलाएं इस क्षेत्र में विकास को बढ़ावा दे रही हैं.\" वक्तव्य में आगे कहा गया है, \"ये महिलाएं विभिन्न उद्योग, देश और पीढ़ियों से हैं और इनके प्रभाव क्षेत्र भी अलग-अलग हैं, लेकिन इनमें से हर एक ने एशियाई कारोबार का चेहरा बदल दिया है और साथ ही भविष्य के नेताओं के लिए अवसर बनाए हैं.\" फ़ोर्ब्स की सूची में चीन, ताइवान, हॉंगकॉंग और मकाउ की महिला कारोबारियों का बोलबाला है. सूची में शामिल 50 महिलाओं में से 21 चीन, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और मकाउ से हैं. भारत की आठ और सिंगापुर की पांच महिलाएं इस सूची में हैं. बाक़ी महिलाएं दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ़िलिपींस, और वियतनाम से हैं.\n\nSummary:", "target": "जानी-मानी भारतीय फ़िल्म और धारावाहिक निर्माता, एकता कपूर, एशिया की सबसे ताक़तवर कारोबारी महिलाओं की सूची में शामिल हो गई हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़ोर्ब्स एशिया की एशिया की 50 सबसे ताक़तवर कारोबारी महिलाओं की सूची में एकता कपूर सबसे छोटी हैं. बिज़नेस पत्रिका फ़ोर्ब्स की एशिया की 50 सबसे ताक़तवर बिज़नेसविमेन यानी कारोबारी महिलाओं में बालाजी टेलिफ़िल्मस की सहनिदेशक 36-वर्षीय एकता सबसे कम उम्र की महिला हैं. भारत में ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ की विनिता बाली, एचटी मीडिया की शोभना भारतीय, आईसीआईसीआई की चंदा कोचर, बायोकॉन कंपनी की किरण मज़ुमदार शॉ, एज़ेडबी एंड पार्टनर्स की ज़िया मोदी, एक्सिस बैंक की शिखा शर्मा और ट्रैक्टर्स एंड फ़ार्म इक्विपमेंट की मल्लिका श्रीनिवासन इस सूची का हिस्सा हैं. एकता कपूर द्वारा निर्मित फ़िल्म 'द डर्टी पिक्चर' है जो पिछले साल न सिर्फ़ बॉक्सऑफ़िस पर बेहद सफल रही बल्कि फ़िल्म की हीरोईन विद्या बालन को इसके लिए अब तक कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं. इसके अलावा एकता की कंपनी ने 'रागिनी एमएमएस', 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसी सफल फ़िल्में और 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' और 'कहानी घर घर की' जैसे लोकप्रिय धारावाहिक भी बनाए हैं. 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घटना को अंजाम दिया है वह अमन और शांति के ख़िलाफ़ और भारत की पड़ोसी देशों से बढ़ती दोस्ती में बाधाएँ पैदा करना चाहता है.\" भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ दोनों ने इस हमले की कड़ी निंदा की. पाकिस्तान के विदेश मंत्री क़सूरी अपने तय कार्यक्रम के अनुसार भारत आ रहे हैं. उन्होंने कहा, \"विस्फोट के लिए जो समय चुना गया है वह हमला करने वालों की सोच को बताता है. लेकिन मैं शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली जा रहा हूँ.\" उन्होंने कहा, \"मुझे लगता है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारों को हमलावरों को उनके उद्देश्य में सफल नहीं होने देना चाहिए.\" और जो ताज़ा ख़बर है उसके अनुसार पाकिस्तान से चलने वाली समझौता एक्सप्रेस भी समय पर चल रही है. ख़बर है कि दिल्ली आने वाली ट्रेन लाहौर से रवाना हो चुकी है. बीबीसी के दक्षिण एशिया संपादक संजय दासगुप्ता के अनुसार सोमवार की हिंसा का उद्देश्य भले ही शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारना रहा हो, इसका असर बिल्कुल विपरीत हुआ है और हो सकता है कि इसकी वजह से ही क़सूरी को भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी से वार्ता अब 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी लाल क़िले से अपना पहला भाषण देने वाले हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपंद्रह अगस्त का कार्यक्रम कई मामलों में पिछले समारोहों से अलग है. नरेंद्र मोदी लाल क़िले से देश को संबोधित करने वाले पहले प्रधानमंत्री होंगे जो आज़ादी के बाद पैदा हुए हैं. इस बार के भाषण को सुनने के लिए आम जनता को ख़ास तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है, दिल्ली मेट्रो अपनी सेवाएँ आम दिनों से कुछ घंटे पहले ही, सुबह साढ़े चार बजे से शुरू कर देगी ताकि लोग लाल क़िला पहुँच सकें. लाल क़िले के सामने दस हज़ार लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई है. वे भारत के पहले प्रधानमंत्री होंगे जिनका स्वतंत्रता दिवस का भाषण लिखित नहीं होगा, बताया जा रहा है कि उन्होंने टेलीप्राम्पटर का इस्तेमाल करने से मना कर दिया है. पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के अधिकारी उनके भाषण को सुनकर बाद में उसकी लिखित प्रति जारी करेंगे. प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश की जनता के नाम यह उनका पहला विस्तृत भाषण होगा जिसके लिए काफ़ी तैयारियाँ की गई हैं. भले ही उनका भाषण लिखित नहीं होगा लेकिन इस भाषण के लिए सभी मंत्रालयों से जानकारी मँगाई गई है. यह पहला मौक़ा है जब भारत के प्रधानमंत्री का लाल क़िले से दिया गया भाषण इंटरनेट पर लाइव स्ट्रीम किया जाएगा. बताया जा रहा है कि सरकारी अधिकारी पिछले स्वतंत्रता दिवस समारोहों की तुलना में बड़ी संख्या में मौजूद रहेंगे क्योंकि उन्हें ऐसे निर्देश दिए गए हैं. सरकारी के नज़दीकी लोग बता रहे हैं कि वे अपने घंटे भर के भाषण में कोई नई घोषणा नहीं करेंगे लेकिन सरकार के कामकाज की अब तक की प्रगति का विवरण देंगे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान में दो मस्जिदों पर आत्मघाती हमले हुए हैं. एक अधिकारी ने बताया कि इनमें कम से कम 60 लोगों की मौत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपहली घटना में राजधानी काबुल में एक शिया मस्जिद में हमलावर घुस गए और गोलीबारी शुरू कर दी और इसके बाद ख़ुद को विस्फ़ोटकों से उड़ा लिया. इस घटना में 40 लोग मारे गए जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. दूसरी घटना में एक आत्मघाती हमलावर ने ग़ोर प्रांत की एक मस्जिद में घुसकर ख़ुद को उड़ा लिया, जिसमें 20 लोगों की मौत हो गई. एक चश्मदीद ने बीबीसी को बताया कि इमाम ज़ामन मस्जिद युद्ध मैदान की तरह दिख रही है. शुक्रवार को मस्जिद में जुम्मे की नमाज़ पढ़ने लोग बड़ी संख्या में जुटे थे. कथित इस्लामिक स्टेट पूरे अफ़ग़ानिस्तान में शिया मस्जिदों पर हमला कर रहा है. अगस्त महीने में भी एक मस्जिद पर हमला हुआ था, जिसमें 20 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. अफ़ग़ानिस्तान के गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि जांचकर्ता हमले की प्रकृति की जांच कर रहे हैं. इससे पहले काबुल में आत्मघाती ट्रक बॉम्बर को गिरफ़्तार किया गया था. कहा जा रहा है कि इस गिरफ़्तारी से एक बड़े हमले को टालने में मदद मिली है. 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वो क्यों हमसे कट जाती है. क्यों उन चार दिनों में वो सिर्फ बर्तन धोती है? क्यों उनके धोए बर्तनों पर दादी गंगाजल छिड़कती है? मां से पूछती तो वो टाल देती. हिम्मत करके दादी से पूछा तो उन्होंने बताया कि तुम्हारी मां को कौआ छू गया है. फिर एक दिन हमारी 12 साल की केयर टेकर को भी कौआ छू गया. दादी उस पर चीख रही थी कि घर की चीजों को हाथ क्यों लगाया. पर वो बेचारी चुपचाप रोते हुए अपनी अंडरवियर धो रही थी, कुछ ही दिनों बाद वो काम छोड़कर चली गई. मुझे हमेशा इस बात का डर रहता था कि कौआ किसी दिन मुझे भी छूकर न चला जाए. कई बार ये भी सोचती थी कि अगर दादी को नहीं छूता है तो हो सकता है कि मुझे भी न छूए. एक दिन स्कूल के टॉयलेट में पैंटी में कुछ लाल दिखा. उस समय तो कुछ नहीं किया. जल्दी-जल्दी घर आयी और मां को बताया. वो किचन में गईं और लाकर शक्कर खिला दी. इसके बाद मां ने मुझे माहवारी के बारे में सबकुछ समझाया. कौए को लेकर मेरा डर जा चुका था. मैंने और मम्मी ने डील की थी कि दादी को इस बारे में नहीं बताएंगे और वाकई दादी को इस बारे में कभी पता नहीं चला. पूजा दास पीरियड के बारे में न तो किसी ने घर में बताया था और न ही किसी बाहरी ने. उस समय मैं 13 साल की थी. दादी के घर गई हुई थी और एक दिन खून से कपड़े लाल हो गए. मुझे लगा ब्लड कैंसर है और परेशान हो गई. पूजा दास मम्मी को बताया तो उन्होंने घर के पुराने कपड़ों से तैयार पैड दिया. पहला पीरियड जब बीता तो लगा कि चलो मुसीबत टली, लेकिन बाद में मालूम हुआ कि ये तो सिर्फ़ शुरुआत है. शिवानी पांडेय उस वक्त सातवीं क्लास मे थी. गांव में थी तो मां ने पैड की जगह कपड़ा यूज़ करने को दिया. पहला पीरियड था तो ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हुई. बार-बार कपड़ा गंदा हो रहा था. उस दिन से मां ने दादी के साथ सोने पर पाबंदी लगा दी. शिवानी पांडेय सोने से पहले बिस्तर पर पुरानी चादरें बिछा दिया करती थीं ताकि अच्छी वाली चादर खराब न हो. फिर भी खून के धब्बे पड़ ही जाते थे. छुआछूत क्या होता है और जिसके साथ होता है, उसे कैसा लगता है, इसका एहसास मुझे पहली बार हुआ. मुझे समझ नहीं आया कि पीरियड की वजह से दादी का प्यार, मेरे लिए कैसे कम हो गया. जागृति पांडेय मेरा पीरियड 13वें साल में आया था. उस समय सर्दियों की छुट्टियां चल रही थीं. मुझे पीरियड के बारे में सबकुछ पहले से ही पता था, क्योंकि मेरे स्कूल में कई वर्कशॉप हुआ करती थीं. बावजूद इसके जब मुझे पहली बार ब्लीडिंग हुई तो मैं रोने लगी. वहीं मेरी मां मुझे बार-बार समझाने की कोशिश कर रही थीं. जागृति पांडेय मैं बार-बार यही कह रही थी कि भगवान ने मेरे साथ बेईमानी की है. भाई को क्यों नहीं होता ये सब? लेकिन आज जब मैं ये पुरानी बातें याद करती हूं तो अपनी नासमझी पर खूब हंसी आती है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "माहवारी पर आधारित सिरीज़ #PehlaPeriod की छठी किस्त में आज पढ़िए ऋचा साकल्ले, पूजा दास, शिवानी पांडेय और जागृति पांडेय के अनुभव.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nऋचा साकल्ले ऋचा साकल्ले मुझे कभी समझ नहीं आता था कि मेरी मां को हर महीने क्या हो जाता है? वो क्यों हमसे कट जाती है. क्यों उन चार दिनों में वो सिर्फ बर्तन धोती है? क्यों उनके धोए बर्तनों पर दादी गंगाजल छिड़कती है? मां से पूछती तो वो टाल देती. हिम्मत करके दादी से पूछा तो उन्होंने बताया कि तुम्हारी मां को कौआ छू गया है. फिर एक दिन हमारी 12 साल की केयर टेकर को भी कौआ छू गया. दादी उस पर चीख रही थी कि घर की चीजों को हाथ क्यों लगाया. पर वो बेचारी चुपचाप रोते हुए अपनी अंडरवियर धो रही थी, कुछ ही दिनों बाद वो काम छोड़कर चली गई. मुझे हमेशा इस बात का डर रहता था कि कौआ किसी दिन मुझे भी छूकर न चला जाए. कई बार ये भी सोचती थी कि अगर दादी को नहीं छूता है तो हो सकता है कि मुझे भी न छूए. एक दिन स्कूल के टॉयलेट में पैंटी में कुछ लाल दिखा. उस समय तो कुछ नहीं किया. जल्दी-जल्दी घर आयी और मां को बताया. वो किचन में गईं और लाकर शक्कर खिला दी. इसके बाद मां ने मुझे माहवारी के बारे में सबकुछ समझाया. कौए को लेकर मेरा डर जा चुका था. मैंने और मम्मी ने डील की थी कि दादी को इस बारे में नहीं बताएंगे और वाकई दादी को इस बारे में कभी पता नहीं चला. पूजा दास पीरियड के बारे में न तो किसी ने घर में बताया था और न ही किसी बाहरी ने. उस समय मैं 13 साल की थी. दादी के घर गई हुई थी और एक दिन खून से कपड़े लाल हो गए. मुझे लगा ब्लड कैंसर है और परेशान हो गई. पूजा दास मम्मी को बताया तो उन्होंने घर के पुराने कपड़ों से तैयार पैड दिया. पहला पीरियड जब बीता तो लगा कि चलो मुसीबत टली, लेकिन बाद में मालूम हुआ कि ये तो सिर्फ़ शुरुआत है. शिवानी पांडेय उस वक्त सातवीं क्लास मे थी. गांव में थी तो मां ने पैड की जगह कपड़ा यूज़ करने को दिया. पहला पीरियड था तो ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हुई. बार-बार कपड़ा गंदा हो रहा था. उस दिन से मां ने दादी के साथ सोने पर पाबंदी लगा दी. शिवानी पांडेय सोने से पहले बिस्तर पर पुरानी चादरें बिछा दिया करती थीं ताकि अच्छी वाली चादर खराब न हो. फिर भी खून के धब्बे पड़ ही जाते थे. छुआछूत क्या होता है और जिसके साथ होता है, उसे कैसा लगता है, इसका एहसास मुझे पहली बार हुआ. मुझे समझ नहीं आया कि पीरियड की वजह से दादी का प्यार, मेरे लिए कैसे कम हो गया. जागृति पांडेय मेरा पीरियड 13वें साल में आया था. उस समय सर्दियों की छुट्टियां चल रही थीं. मुझे पीरियड के बारे में सबकुछ पहले से ही पता था, क्योंकि मेरे स्कूल में कई वर्कशॉप हुआ करती थीं. बावजूद इसके जब मुझे पहली बार ब्लीडिंग हुई तो मैं रोने लगी. वहीं मेरी मां मुझे बार-बार समझाने की कोशिश कर रही थीं. जागृति पांडेय मैं बार-बार यही कह रही थी कि भगवान ने मेरे साथ बेईमानी की है. भाई को क्यों नहीं होता ये सब? लेकिन आज जब मैं ये पुरानी बातें याद करती हूं तो अपनी नासमझी पर खूब हंसी आती है. 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'स्टेप' नाम से जाने जाते ये 'ट्रायल' वर्ष 2004 में उन 3000 लोगों के सहयोग से शुरु हुए थे जो एचआईवी वायरस से संक्रमित नहीं थे और 18 से 25 साल की उम्र के थे. मर्क के अनुसार अपनी इच्छा से इस प्रयोग में भाग लेने वाले लोगों में से जब 741 को टीका लगाया गया तब उनमें से 24 एचआईवी वायरस से संक्रमित हो गए. स्वतंत्र निरीक्षकों ने टीके के प्रयोग को बंद करने की सिफ़ारिश की और कहा कि ये प्रयोग सफल नहीं होंगे. एचआईवी वेक्सीन ट्रायल नेटवर्क की सारा एलेक्सांडर का कहना था, \"इस उद्योग के लिए ये बहुत ही दुखद दिन है क्योंकि मर्क के टीके ने ऐसी क़ाबिलियत दिखाई थी जिससे शरीर का इम्यून सिस्टम यानि प्रतिरक्षी तंत्रसक्रिय हो जाता है. इससे कई लोगों को उम्मीद की किरण दिखाई दी थी.\"\n\nSummary:", "target": "दवाएँ बनाने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी मर्क ने एचआईवी से निपटने के लिए टीका बनाने के प्रयोग बंद कर दिए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअब तक एड्स के ख़िलाफ़ की जा रही कोशिशों में एचआईवी से निपटने के लिए बनाया जा रहे टीके पर ख़ासी उम्मीदें टिकी हुई थीं. दस साल से इस टीके को बनाने में जुटी मर्क कंपनी ने एचआईवी टीके के 'ट्रायल' इसलिए रोक दिए हैं क्योंकि ये पाया गया है कि ये एचआईवी संक्रमण रोकने में कारगर नहीं हैं. मर्क के 'ट्रायल' के दौरान जो लोग इस प्रयोग में हिस्सा ले रहे थे उनपर इस टीके का इस्तेमाल उन्हें एचआईवी संक्रमण एचआईवी संक्रमण से बचा नहीं पाया. 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सरकार द्वारा जारी प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़ ड्राई रन का उद्देश्य नए को-विन मोबाइल एप के इस्तेमाल को ज़मीन पर देखना है. इसके अलावा प्लानिंग और वैक्सीन देने की प्रक्रिया के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश की जाएगी. इससे फ़ील्ड पर काम कर रहे लोगों का कॉन्फ़िडेंस भी बढ़ेगा. समाप्त सबकुछ 20 दिसंबर को जारी की गई ऑपरेशनल गाइडलाइन के मुताबिक़ किया जाएगा. ऑफ़िसर इन चार्ज को 25 लोगों की पहचान करनी होगी, जिन्हें वैक्सीन देने के लिए चुना जाएगा. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन सभी की जानकारियां को-विन एप पर अपलोड करने के लिए कहा जाएगा. ये सब एक मॉक ड्रिल की तरह होगा, किसी को भी असल वैक्सीन नहीं दी जाएगी. भारत में अभी तक किसी वैक्सीन को मंज़ूरी नहीं मिली. ड्राई रन का मक़सद किसी को वैक्सीन देना नहीं है, जब वैक्सीन आ जाएगी, तो ये प्रक्रिया सही से काम करेगी या नहीं और इसमें क्या सुधार लाने होंगे, ड्राई रन में इसे समझने की कोशिश है. सरकार की प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़ देशभर में क़रीब 96,000 वैक्सीन देने वालों को इसके लिए ट्रेन किया गया है. सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर शेखर माडे ने कहा, \"जब देश के सबसे बड़े ऑफ़िस से ये कहा जाता है कि हम वैक्सीन की डिलीवरी के लिए तैयार हैं, तो ये आत्मविश्वास देता है. मुझे लगता है कि सभी हेल्थकेयर वर्कर और वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर उत्साह है कि हम कर सकते हैं.\" चार राज्यों में पहले हुआ था ड्राई रन देश के चार राज्यों- असम, आंध्र प्रदेश, गुजरात और पंजाब में कोविड-19 वैक्सीन का ड्राई रन सोमवार, 28 दिसंबर से शुरू कर दिया गया था, जो कि दो दिन चला. आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले, गुजरात में राजकोट और गांधीनगर, पंजाब में लुधियाना और शहीद भगत सिंह नगर (नवांशहर) और असम के सोनितपुर और नलबाड़ी में ये मुहिम चलाई गई. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ ये ड्राई रन सफल रहा था और राज्यों द्वारा दिए गए कुछ सुझावों को शामिल किया जाएगा. क्या है ड्राई रन? यह एक रिहर्सल की तरह है. इसमें कोविड-19 वैक्सीन आने के बाद इसे किस तरह से लगाया जाना है? इसकी क्या तैयारियां होनी हैं? इन तमाम चीज़ों का परीक्षण किया जाना है. इसके ज़रिए यह भी देखा जाएगा कि वैक्सीनेशन के दौरान क्या-क्या अड़चनें आ रही हैं और उन्हें किस तरह से दूर किया जाना चाहिए. इसे मॉक ड्रिल भी कहा जा रहा है. इसके बाद 50 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों और उसके बाद पहले से दूसरी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को यह वैक्सीन लगाई जानी है. साल 2020: कोरोनाकाल में उम्मीद जगाने वाले कुछ पल राज्यों में इसे लेकर डेटाबेस बन रहे हैं. लोगों का रजिस्ट्रेशन होगा और फिर उन्हें मैसेज भेजकर वैक्सीन लगाने की तारीख़, वक़्त और सेंटर की जानकारी दी जाएगी. ट्रांसपोर्टेशन के लिए पहले राज्य और फिर वहां से क्षेत्रों और ज़िला मुख्यालयों और फिर स्वास्थ्य केंद्रों तक इन्हें पहुँचाया जाना है. को-विन नाम से एक आईटी प्लेटफ़ॉर्म तैयार किया गया है. इसी प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए वैक्सीन लगाने का पूरा काम अंजाम दिया जाएगा. वैक्सीनेशन के इस ड्राई रन में वास्तविक वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. वैक्सीन को छोड़कर इससे जुड़ी पूरी प्रक्रियाओं का वास्तविक आधार पर परीक्षण किया जाएगा. कैसे होगा लोगों का रजिस्ट्रेशन? 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "केंद्र सरकार ने पूरे देश में कोविड वैक्सीन टीकाकरण के लिए सभी राज्यों और केंद्र प्रशासित राज्यों को पूरी तरह तैयार रहने के लिए कहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसरकार ने बताया है कि दो जनवरी को सभी राज्यों और केंद्र प्रशासित राज्यों में ड्राई रन किया जाएगा. हर प्रदेश की राजधानी में कम से कम तीन जगहों पर ड्राई रन किया जाएगा. कुछ प्रदेशों ने ज़िलों को भी शामिल किया है जो मुश्किल इलाक़ों में स्थित हैं. केंद्र सरकार ने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने प्रधान सचिवों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और राज्यों के स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ वीडियो कांफ्रेंस की और तैयारियों का जायज़ा लिया. क्यों होगा ड्राय रन? सरकार द्वारा जारी प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़ ड्राई रन का उद्देश्य नए को-विन मोबाइल एप के इस्तेमाल को ज़मीन पर देखना है. इसके अलावा प्लानिंग और वैक्सीन देने की प्रक्रिया के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश की जाएगी. इससे फ़ील्ड पर काम कर रहे लोगों का कॉन्फ़िडेंस भी बढ़ेगा. समाप्त सबकुछ 20 दिसंबर को जारी की गई ऑपरेशनल गाइडलाइन के मुताबिक़ किया जाएगा. ऑफ़िसर इन चार्ज को 25 लोगों की पहचान करनी होगी, जिन्हें वैक्सीन देने के लिए चुना जाएगा. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन सभी की जानकारियां को-विन एप पर अपलोड करने के लिए कहा जाएगा. ये सब एक मॉक ड्रिल की तरह होगा, किसी को भी असल वैक्सीन नहीं दी जाएगी. भारत में अभी तक किसी वैक्सीन को मंज़ूरी नहीं मिली. ड्राई रन का मक़सद किसी को वैक्सीन देना नहीं है, जब वैक्सीन आ जाएगी, तो ये प्रक्रिया सही से काम करेगी या नहीं और इसमें क्या सुधार लाने होंगे, ड्राई रन में इसे समझने की कोशिश है. सरकार की प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़ देशभर में क़रीब 96,000 वैक्सीन देने वालों को इसके लिए ट्रेन किया गया है. सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर शेखर माडे ने कहा, \"जब देश के सबसे बड़े ऑफ़िस से ये कहा जाता है कि हम वैक्सीन की डिलीवरी के लिए तैयार हैं, तो ये आत्मविश्वास देता है. मुझे लगता है कि सभी हेल्थकेयर वर्कर और वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर उत्साह है कि हम कर सकते हैं.\" चार राज्यों में पहले हुआ था ड्राई रन देश के चार राज्यों- असम, आंध्र प्रदेश, गुजरात और पंजाब में कोविड-19 वैक्सीन का ड्राई रन सोमवार, 28 दिसंबर से शुरू कर दिया गया था, जो कि दो दिन चला. आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले, गुजरात में राजकोट और गांधीनगर, पंजाब में लुधियाना और शहीद भगत सिंह नगर (नवांशहर) और असम के सोनितपुर और नलबाड़ी में ये मुहिम चलाई गई. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ ये ड्राई रन सफल रहा था और राज्यों द्वारा दिए गए कुछ सुझावों को शामिल किया जाएगा. क्या है ड्राई रन? यह एक रिहर्सल की तरह है. इसमें कोविड-19 वैक्सीन आने के बाद इसे किस तरह से लगाया जाना है? इसकी क्या तैयारियां होनी हैं? इन तमाम चीज़ों का परीक्षण किया जाना है. इसके ज़रिए यह भी देखा जाएगा कि वैक्सीनेशन के दौरान क्या-क्या अड़चनें आ रही हैं और उन्हें किस तरह से दूर किया जाना चाहिए. इसे मॉक ड्रिल भी कहा जा रहा है. इसके बाद 50 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों और उसके बाद पहले से दूसरी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को यह वैक्सीन लगाई जानी है. साल 2020: कोरोनाकाल में उम्मीद जगाने वाले कुछ पल राज्यों में इसे लेकर डेटाबेस बन रहे हैं. लोगों का रजिस्ट्रेशन होगा और फिर उन्हें मैसेज भेजकर वैक्सीन लगाने की तारीख़, वक़्त और सेंटर की जानकारी दी जाएगी. ट्रांसपोर्टेशन के लिए पहले राज्य और फिर वहां से क्षेत्रों और ज़िला मुख्यालयों और फिर स्वास्थ्य केंद्रों तक इन्हें पहुँचाया जाना है. को-विन नाम से एक आईटी प्लेटफ़ॉर्म तैयार किया गया है. इसी प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए वैक्सीन लगाने का पूरा काम अंजाम दिया जाएगा. वैक्सीनेशन के इस ड्राई रन में वास्तविक वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. वैक्सीन को छोड़कर इससे जुड़ी पूरी प्रक्रियाओं का वास्तविक आधार पर परीक्षण किया जाएगा. कैसे होगा लोगों का रजिस्ट्रेशन? कोरोना की वैक्सीन जिन्हें दी जानी है पहले उनका रजिस्ट्रेशन को-विन प्लेटफ़ॉर्म पर होगा. को-विन एक वेबसाइट और ऐप दोनों की शक्ल में रहेगा. कितना ख़तरनाक है कोरोना वायरस का नया स्ट्रेन? जिन लोगों को सबसे पहले ये वैक्सीन लगाई जानी है उनका डेटा हर राज्य में तक़रीबन तैयार है. रजिस्ट्रेशन में एक मोबाइल नंबर और एक फ़ोटो आईडी ज़रूरी होगा. आईडी में कई विकल्प दिए जा रहे हैं. इस मॉक ड्रिल में लाभार्थियों का को-विन एप पर रजिस्ट्रेशन कराया जा रहा है. इसके ज़रिए इस एप में रजिस्ट्रेशन के दौरान कहीं कोई दिक्क़त न आए इन चीज़ों को देखा जा रहा है. वैक्सीनेशन के बाद इसी ऐप पर सर्टिफिकेट भी जनरेट हो जाएगा. इसके अलावा, ड्राई रन में वैक्सीनेशन कहां किया जाएगा और इन सेंटरों को कैसे चिह्नित किया जाएगा, इसकी भी पड़ताल हो रही है. इस ड्रिल के ज़रिए वैक्सीनेशन करने की पूरी प्रक्रियाओं को जाँचा और परखा जाएगा. 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'रेडियो 5 लाइव' के प्रस्तोता स्टीफ़न नोलन के साथ बातचीत में शाह ने बलात्कार पर ताज़ा टिप्पणी तब दी जब स्नेयरब्रुक क्राउन अदालत के मुकदमे में एक 13 साल की लड़की को ‘हिंसक’ और यौन संबंधी विषयों में ‘अनुभवी’ करार देने पर एक अभियोक्ता को निलंबित कर दिया गया और एक न्यायाधीश पर जांच शुरू कर दी गई. शाह ने कहा, “एक निश्चित उम्र के बाद बलात्कार काफ़ी तकनीकी हो जाता है. ये लड़कियां मशहूर लोगों के पास जाती हैं और ख़ुद ही अपने आपको उनके हवाले कर देती हैं.” उनके अनुसार, “युवक और युवतियां अपनी ज़िंदगी को काफी रोमांचक तरीक़े से जीना चाहते हैं. वे व्यस्क दिखना चाहते हैं और उसी उम्र के लोगों की तरह चीजे़ करना चाहते हैं.” हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी कई संगठनों का कहना है कि नाबालिग बच्चे भले ही मनमर्जी से कोई काम करें लेकिन क़ानून की ज़िम्मेदारी उनकी हिफ़ाज़त करना है उन्होंने कहा, “जब हम उन लड़कियों की बात करते हैं जो बाहर जाती हैं और सचमुच उनका बलात्कार किया जाता है तब मुझे महसूस होता है कि नहीं, इसके ख़िलाफ़ कुछ होना चाहिए.” उन्होंने बताया कि जब इस मामले में उनकी गिरफ़्तारी हुई तब उनके मन में आत्महत्या का विचार भी आया. उन्होंने कहा, “मैं हर रात आत्महत्या करने के विभिन्न तरीकों के बारे में सोचा करता था.” हालांकि 'नेशनल एसोसिएशन ऑफ पीपुल अब्यूज़्ड इन चाइल्डहुड' के मुख्य कार्यकारी पीटे सॉन्डर्स ने शाह के बयान की आलोचना की है. रेडियो 5 लाइव से बातचीत में सॉन्डर्स ने कहा, “मैं एडी से मिलना चाहूंगा और मैं उनसे कहूंगा कि वो मुझे या किसी बलात्कार पीड़िता को यह समझाएं कि ‘बलात्कार’ से वह क्या समझते हैं क्योंकि मेरी समझ से बलात्कार हमेशा एक अपराध होता है. ” 'चाइल्ड एक्सप्लॉयटेसन ऐंड ऑनलाइन प्रोटेक्शन' के पूर्व मुख्य कार्यकारी जिम गैंबल ने भी उनके विचारों का समर्थन करते हुए कहा है, “आख़िरकार एक बच्चा तो बच्चा ही होता है और क़ानून बच्चे की हिफ़ाज़त करने के लिए होता है.” (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)\n\nSummary:", "target": "एक ब्रितानी अख़बार के पूर्व मालिक एडी शाह का कहना है कि सहमति से यौन संबंध बनाने वाली कम उम्र की लड़कियों को अगर किसी दुर्व्यवहार या यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तो उसके लिए उन्हें भी दोषी ठहराया जा सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएडी शाह बलात्कार के मामले में हुए हैं बरी हाल ही में शाह को एक स्कूली लड़की का बलात्कार करने के आरोपों से बरी किया गया है. उन पर आरोप था कि लंदन के होटल में कथित तौर पर बलात्कार के समय लड़की की उम्र 12 और 15 वर्ष के बीच थी. पढ़िएः ब्रितानी महिला पत्रकार को ट्विटर पर धमकी शाह का कहना है कि खुद को सेलिब्रिटीज़ के सामने ‘फेंकने वाली’ 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के बलात्कार के आरोप 'तकनीकी' हो सकते हैं. लेकिन ‘नेशनल एसोसिएशन ऑफ पीपल अब्यूज़्ड इन चाइल्डहुड’ नाम की संस्था का कहना है कि बलात्कार हमेशा से एक अपराध है. लेकिन शाह ने बीबीसी से कहा, “अगर हम उन लड़कियों के बारे में बात करें जो बाहर जाती हैं और अच्छा वक्त बिताती हैं तो उन्हें भी दोषी ठहराया जाना चाहिए.” लड़कियों की मनमर्जी शाह ने बलात्कार के मामले में जूरी के सामने कहा कि उनके और स्कूली छात्रा के बीच कोई संपर्क नहीं था. पिछले महीने ओल्ड बेली की अदालत में उन्हें दोषमुक़्त कर दिया गया. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के धोबाटोला गाँव में मंगलवार रात एक हाथी का बच्चा गड्ढे में गिर गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाथी के बच्चे को देखने के लिए बड़ी संख्या में आसपास के ग्रामीण एकत्रित हो गए. हाथी के बच्चे को निकालने वाले दल का नेतृत्व किया वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया से जुड़े हाथी विशेष डॉक्टर अभिजीत बालवा ने. इस बच्चे को किसी तरह से गुरुवार शाम निकाला जा सका. हाथी का यह बच्चा दो दिनों तक भूखा प्यासा रहा. जिसके कारण यह काफ़ी कमज़ोर हो गया था. डिविज़नल फॉरेस्ट ऑफ़िसर(डीएफओ) संजय स्वैन ने बताया कि हाथी के बच्चे का इलाज बारीपाड़ा के ज़िला मुख्यालय के पशु चिकित्सालय में किया जा रहा है. भुबनेश्वर से वन्यजीव विशेषज्ञों का दल इस शावक के स्वास्थ्य की जाँच के लिए जा रहा है. हाथी के बच्चे के बाहर आने के बाद गाँववालों में उसकी तस्वीर लेने की होड़ सी लग गयी. डीएफओ के अनुसार स्वास्थ्य जाँच के बाद इसे सिमिलीपाल एलीफैंट सैंक्चुअरी में पहुँचाया जाएगा. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बिहार के सीतामढ़ी में पुलिस हिरासत में दो मुस्लिम युवकों की 'प्रताड़ना' से मौत का मामला सामने आया है. इन दोनों को लूट और हत्या के आरोप में पकड़ा गया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबिहार पुलिस महानिदेशक गुप्तेशवर पांडे मृतकों के परिवार ने दोनों को ​हिरासत में प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि प्रताड़ना के चलते ही दोनों की मौत हुई है. हालांकि, पुलिस इसे हत्या नहीं बता रही है. इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है. बिहार पुलिस महानिदेशक गुप्तेशवर पांडे ने बीबीसी को बताया, ''दो अभियुक्तों को पकड़कर पुलिस हिरासत में रखा गया था. उनकी मौत हो गई है. उनके परिजनों का आरोप है कि प्रताड़ना के कारण इनकी मौत हुई है. उनका पोस्टमॉर्टम कराया गया है और मेडिकल बोर्ड बैठाया गया है.'' पुलिस महानिदेशक ने कहा, ''इस मामले में थाना इंचार्ज समेत पांच पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई है. हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ है. पांचों पुलिसकर्मी फ़रार हैं और उनकी गिरफ्तारी के लिए एसआईटी (स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम) बनाई गई है. पांचों को निलंबित कर दिया गया है.'' मीडिया रिपोर्ट्स में मृतकों गुफ़रान आलम और तस्लीम अंसारी के शरीर पर कील ठोके जाने के निशान मिले हैं. उनके परिजन इन निशानों पर सवाल उठा रहे हैं. परिजनों ने वीडियो और तस्वीरों के जरिए मृतकों के शरीर पर चोटों के निशान पुलिस को दिखाए. इसके बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया है. प्रतीकात्मक तस्वीर चोरी और हत्या का आरोप गुफ़रान और तस्लीम को 6 मार्च को रमदीहा गांव से बाइक चोरी और अपने मकान मालिक की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. तस्लीम पर पहले से ही आपराधिक मामले दर्ज हैं लेकिन गुफ़रान का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं बताया जा रहा है. गुफ़रान के पिता मुनव्वर अली ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है, ''जब हम सोए हुए थे तो स्थानीय चाकिया पुलिस स्टेशन से पुलिस की पांच जीप आईं. उन्होंने कहा कि वो एक मामले में गुफ़रान से पूछताछ करना चाहते हैं. हम कुछ पूछ पाते इससे पहले ही वो गुफ़रान को ले गए और बाद में गांव के ही उसके साथी तस्लीम को भी ले गए.'' प्रतीकात्मक तस्वीर हिरासत के दिन ही मौत गुफ़रान और तस्लीम के परिजनों ने मीडिया में बताया है कि जब वो 6 मार्च की शाम को दुमरा पुलिस स्टेशन पहुंचे तो गुफ़रान और तस्लीम वहां नहीं थे. परिजनों को सदर अस्पताल भेज दिया गया. जहां उन्हें बताया गया कि दोनों की मौत हो चुकी है और उनका पोस्टमॉर्टम किया जा रहा है. जब शवों को दफ़नाने के लिए साफ़ किया जा रहा था तब परिजनों को उनके शरीर पर चोट के निशान दिखे और उन्होंने उसका वीडियो बना लिया. गुफ़रान क़तर में इलैक्ट्रिशियन का काम करते थे और एक साल पहले ही भारत लौटे हैं. वह दोहा जाना चाहते थे जहां उनके दो भाई काम करते हैं. उनके दो बच्चे भी हैं. परिवार ने 50 लाख मुआवज़े और गुफ़रान की पत्नी के लिए नौकरी की मांग की है. 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1994 में जब गर्भ में पल रहे भ्रूण की लिंग जांच को ग़ैर-क़ानूनी बनाने वाला पीसीपीएनडीटी क़ानून लाया गया, तब भ्रूण पहली बार परिभाषित हुआ. एक औरत के गर्भ में पल रहे एम्ब्रियो को आठ हफ़्ते बाद यानी 57वें दिन से बच्चा पैदा होने तक क़ानून की नज़र में 'फ़ीटस' यानी 'भ्रूण' माना गया. आख़िर कौन फेंक गया बोरे में 14 भ्रूण लड़कियों के मुकाबले लड़के पसंद करनेवाली सोच की वजह से भ्रूण की लिंग जांच कर, गर्भपात करवाया जाता रहा है. अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका 'लैनसेट' के शोध के मुताबिक़ 1980 से 2010 के बीच भारत में एक करोड़ से ज़्यादा भ्रूण इसलिए गिरा दिए गए क्योंकि लिंग जांच में पाया गया कि वो पैदा होकर लड़की होंगे. ऐसी भ्रूण हत्या को रोकने के मक़सद से लाए गए पीसीपीएनडीटी ऐक्ट के तहत, लिंग जांच करवाने के लिए डॉक्टर और परिवारवालों - सभी को तीन साल की सज़ा और जुर्माना हो सकता है. भ्रूण में ही बच्चे को मिलेगी बीमारी से मुक्ति किसे है भ्रूण के जीवन पर फ़ैसले का अधिकार? लड़की पसंद ना करने के अलावा भी गर्भपात की और वजहें हो सकती हैं. मसलन बलात्कार की वजह से गर्भवती हुई महिला या गर्भ-निरोधक के ना काम करने पर गर्भवती हुई महिला जब बच्चा ना पैदा करना चाहे. लेकिन कुछ दशक पहले तक भारत में गर्भपात पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी था. सिर्फ़ एक ही सूरत में इसकी अनुमति थी - अगर बच्चा पैदा करने से महिला की जान को ख़तरा हो. इसलिए 1971 में गर्भपात के लिए नया क़ानून, 'द मेडिकल टरमिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी ऐक्ट' यानी एमटीपी ऐक्ट पारित हुआ और इसमें गर्भ धारण करने के 20 हफ़्तों तक गर्भपात करवाने को क़ानूनी अनुमति दी गई. इस अनुमति की शर्त ये कि बच्चा पैदा करने से मां को शारीरिक या मानसिक हानि पहुंचती हो और पैदा होनेवाले बच्चे में मानसिक या शारीरिक विकलांगता होने की संभावना हो. भ्रूण के जीवन के बारे में ये फ़ैसला करने पर मां और पिता राय और सहमति तो दे सकते हैं, लेकिन आख़िरी फ़ैसले का अधिकार डॉक्टर के पास रहता है. 12 हफ़्ते से पहले गर्भ गिराने का फ़ैसला एक पंजीकृत डॉक्टर कर सकता है और 12 से 20 हफ़्ते तक विकसित हो चुके भ्रूण के फ़ैसले में दो पंजीकृत डॉक्टरों की राय ज़रूरी है. यूटेरस ट्रांसप्लांट कराना कितना मुश्किल है 14 सप्ताह का भ्रूण भ्रूण गिरवाने पर सज़ा अगर एमटीपी ऐक्ट की शर्तें पूरी ना हों और एक औरत अपना भ्रूण गिरवा दे या कोई और उसका गर्भपात करवा दे तो ये अब भी जुर्म है जिसके लिए उस औरत को ही तीन साल की सज़ा और जुर्माना हो सकता है. गर्भवती औरत की जानकारी के बिना उसका गर्भपात करवाने पर उम्रक़ैद हो सकती है. गर्भपात करवाने की नीयत से औरत की हत्या करना या कोई भी ऐसा काम करना जिसका मक़सद हो कि पैदा होने से पहले ही गर्भ में बच्चा मर जाए या पैदा होने के फ़ौरन बाद बच्चा मर जाए तो इसके लिए 10 साल की सज़ा हो सकती है. अगर एक व्यक्ति की वजह से गर्भवती महिला की मौत हो जाए या उसे इतनी चोट लगे की कोख में पल रहे भ्रूण की मौत हो जाए तो इसे 'कल्पेबल होमिसाइड' यानी ग़ैर-इरादतन हत्या माना जाएगा जिसके लिए 10 साल की सज़ा हो सकती है. आयरलैंड में गर्भपात क़ानून बदलने का इंडिया कनेक्शन ये भी पढ़ें: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "मुंबई हाई कोर्ट ने एक बलात्कार पीड़िता की गर्भपात की दरख़्वास्त नामंज़ूर कर दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n18 साल की पीड़िता के गर्भ में पल रहा भ्रूण 27 हफ़्ते का हो गया है और डॉक्टरों के मुताबिक उसे गिराने से मां की जान को ख़तरा हो सकता है. इससे पहले अदालत ने ये भी कहा कि ऐसे मसले में भ्रूण के अधिकारों की समीक्षा भी करनी चाहिए. भारतीय संविधान की धारा 21 के मुताबिक हर व्यक्ति को आज़ादी से जीने का अधिकार है जब तक वो किसी क़ानून का उल्लंघन नहीं कर रहा हो. सवाल ये कि क्या भ्रूण को व्यक्ति का दर्जा दिया जा सकता है? 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जीडीपी को दो तरह से पेश किया जाता है. क्योंकि उत्पादन की लागत महंगाई के साथ घटती-बढ़ती रहती है, यह पैमाना है कॉस्टेंट प्राइस. इसके तहत जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होता है. समाप्त मसलन अगर आधार वर्ष 2010 है तो उसके आधार पर ही उत्पादन का मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है. जीडीपी को जिस दूसरे तरीके से पेश किया जाता है वो है करेंट प्राइस. इसके तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर भी शामिल होती है. नोटबंदी का एक माह और आंकड़ों का सच 'नोटबंदी का जुआ क्यों हार गए पीएम मोदी' केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ उत्पादन और सेवाओं के मूल्यांकन के लिए एक आधार वर्ष यानी बेस ईयर तय करता है. इस बेस ईयर में क़ीमतों को आधार बनाकर उत्पादन और सेवाओं की क़ीमत देखी जाती है और उसी हिसाब से तुलनात्मक वृद्धि या गिरावट आंकी जाती है. कॉस्टेंट प्राइस के आधार पर जीडीपी की गणना इसलिए की जाती है ताकि इस आंकड़े को महंगाई के उतार-चढ़ाव से अलग रखकर मापा जा सके. बेस ईयर का फंडा भारत की कॉस्टेंट प्राइस गणना का आधार वर्ष अभी 2011-12 है. मसलन अगर 2011 में देश में सिर्फ़ 100 रुपये की तीन वस्तुएं बनीं तो कुल जीडीपी हुई 300 रुपये. और 2017 तक आते-आते इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया लेकिन क़ीमत हो गई 150 रुपये तो नॉमिनल जीडीपी 300 रुपये हो गया. लेकिन असल में हुआ क्या, भारत की तरक्की हुई कि नहीं? यहीं बेस ईयर का फॉर्मूला काम आता है. 2011 की कॉस्टेंट कीमत (100 रुपये) के हिसाब से वास्तविक जीडीपी हुई 200 रुपये. अब साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि जीडीपी में गिरावट आई है. 'सरकार ने 21,000 करोड़ खर्च कर 16,000 करोड़ बचाए' 'नोटबंदी पर पूरी तरह विफल रही मोदी सरकार' सीएसओ देशभर से उत्पादन और सेवाओं के आंकड़े जुटाता है इस प्रक्रिया में कई सूचकांक शामिल होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई हैं. सीएसओ विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों से समन्वय स्थापित कर आंकड़े एकत्र करता है. मसलन, थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई की गणना के लिए मैन्युफैक्चरिंग, कृषि उत्पाद के आंकड़े उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जुटाता है. इसी तरह आईआईपी के आंकड़े वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाला विभाग जुटाता है. सीएसओ इन सभी आंकड़ों को इकट्ठा करता है फिर गणना कर जीडीपी के आंकड़े जारी करता है. मुख्य तौर पर आठ औद्योगिक क्षेत्रों के आंकड़े जुटाए जाते हैं. ये हैं- कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ख़बरों से लेकर आम आदमी के बीच अक्सर एक शब्द खूब चर्चा में होता है और वो है जीडीपी. पर जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) यानी सकल घरेलू उत्पाद है क्या बला?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजीडीपी किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का सबसे ज़रूरी पैमाना है. जीडीपी किसी ख़ास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल क़ीमत है. भारत में जीडीपी की गणना हर तीसरे महीने यानी तिमाही आधार पर होती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये उत्पादन या सेवाएं देश के भीतर ही होनी चाहिए. भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है. ये आंकड़ा देश की आर्थिक तरक्की का संकेत देता है. आसान शब्दों में, अगर जीडीपी का आंकड़ा बढ़ा है तो आर्थिक विकास दर बढ़ी है और अगर ये पिछले तिमाही के मुक़ाबले कम है तो देश की माली हालत में गिरावट का रुख़ है. तो जीडीपी का आकलन होता कैसे है? जीडीपी को दो तरह से पेश किया जाता है. क्योंकि उत्पादन की लागत महंगाई के साथ घटती-बढ़ती रहती है, यह पैमाना है कॉस्टेंट प्राइस. इसके तहत जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होता है. समाप्त मसलन अगर आधार वर्ष 2010 है तो उसके आधार पर ही उत्पादन का मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है. जीडीपी को जिस दूसरे तरीके से पेश किया जाता है वो है करेंट प्राइस. इसके तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर भी शामिल होती है. नोटबंदी का एक माह और आंकड़ों का सच 'नोटबंदी का जुआ क्यों हार गए पीएम मोदी' केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ उत्पादन और सेवाओं के मूल्यांकन के लिए एक आधार वर्ष यानी बेस ईयर तय करता है. इस बेस ईयर में क़ीमतों को आधार बनाकर उत्पादन और सेवाओं की क़ीमत देखी जाती है और उसी हिसाब से तुलनात्मक वृद्धि या गिरावट आंकी जाती है. कॉस्टेंट प्राइस के आधार पर जीडीपी की गणना इसलिए की जाती है ताकि इस आंकड़े को महंगाई के उतार-चढ़ाव से अलग रखकर मापा जा सके. बेस ईयर का फंडा भारत की कॉस्टेंट प्राइस गणना का आधार वर्ष अभी 2011-12 है. मसलन अगर 2011 में देश में सिर्फ़ 100 रुपये की तीन वस्तुएं बनीं तो कुल जीडीपी हुई 300 रुपये. और 2017 तक आते-आते इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया लेकिन क़ीमत हो गई 150 रुपये तो नॉमिनल जीडीपी 300 रुपये हो गया. लेकिन असल में हुआ क्या, भारत की तरक्की हुई कि नहीं? यहीं बेस ईयर का फॉर्मूला काम आता है. 2011 की कॉस्टेंट कीमत (100 रुपये) के हिसाब से वास्तविक जीडीपी हुई 200 रुपये. अब साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि जीडीपी में गिरावट आई है. 'सरकार ने 21,000 करोड़ खर्च कर 16,000 करोड़ बचाए' 'नोटबंदी पर पूरी तरह विफल रही मोदी सरकार' सीएसओ देशभर से उत्पादन और सेवाओं के आंकड़े जुटाता है इस प्रक्रिया में कई सूचकांक शामिल होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई हैं. सीएसओ विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों से समन्वय स्थापित कर आंकड़े एकत्र करता है. मसलन, थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई की गणना के लिए मैन्युफैक्चरिंग, कृषि उत्पाद के आंकड़े उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जुटाता है. इसी तरह आईआईपी के आंकड़े वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाला विभाग जुटाता है. सीएसओ इन सभी आंकड़ों को इकट्ठा करता है फिर गणना कर जीडीपी के आंकड़े जारी करता है. मुख्य तौर पर आठ औद्योगिक क्षेत्रों के आंकड़े जुटाए जाते हैं. ये हैं- कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं. 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' मंगलवार को ही पाकिस्तान की सत्तारुढ मुस्लिम लीग क्यू ने कहा कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने आगामी चुनावों के लिए नामांकन पत्र दाखिल कर दिया है जिसका 17 सांसदों ने समर्थन किया है. पार्टी के महासचिव मुसाहिद हुसैन ने कहा कि मुशर्रफ़ के चुने जाने के लिए पर्याप्त वोट हैं. अटार्नी जनरल के बयान की विपक्षी दलों ने कड़ी आलोचना की है. पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और विपक्षी सांसद इमरान खान का कहना था कि मुशर्रफ़ ने पूरे देश को बंदूक की नोक पर बधक बना रखा है.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के वकीलों का कहना है कि अगर राष्ट्रपति पद के लिए दोबारा उनका चुनाव नहीं होता है तो वो सेनाध्यक्ष के पद पर बने रहेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में मुशर्रफ़ के वकीलों ने सेनाध्यक्ष पद छोड़ने की शर्तों के बारे में स्पष्टीकरण दिया. कोर्ट को यह फ़ैसला करना है कि क्या मुशर्रफ़ दोनो पदों ( राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष) पर रहते हुए चुनाव लड़ सकते हैं. इससे पहले सोमवार को अमरीका ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ से कहा था कि वो यह सुनिश्चित करें कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हों. विरोध प्रदर्शन सैन्य शासन के विरोध में लगातार हो रहे प्रदर्शनों के बीच आने वाले दिनों में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं. सुप्रीम कोर्ट के कड़े रवैये को देखते हुए राषट्रपति मुशर्रफ़ ने वादा किया था कि अगर वो फिर राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाते हैं तो वो सेनाध्यक्ष पद छोड़ देंगे. अटार्नी जनरल मोहम्मद कयूम ने मंगलवार को राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की योजनाओं के बारे में कोर्ट में अधिक विवरण दिए. उन्होंने कहा ' ये बिल्कुल साफ है कि अगर वो राष्ट्रपति पद के लिए नहीं चुने गए तो सेनाध्यक्ष बने रहेंगे.' कयूम ने इन ख़बरों का खंडन किया कि अगर चुनाव के बारे में उनकी योजना सही नहीं रही तो राष्ठ्रपति मार्शल लॉ लगा सकते हैं. उन्होंने कहा ' कोई मार्शल लॉ नहीं लगेगा. कोई इमरजेंसी नहीं लगाई जाएगी. 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परवाह किए बगैर ज़्यादा खा लेते हैं. तो एक तरफ जहां नाच-कूद रहे थे, अगले दिन बदहज़मी से बेहाल या जी मिचलाने से परेशान. बार-बार ये समस्या आपको परेशान ना करे या हर बार आपको डॉक्टर के पास ना भागना पड़े, इसके लिए बीबीसी ने सर गंगाराम अस्पताल की डाइट विशेषज्ञ डॉक्टर मुक्ता वशिष्ठ से बात की. सबसे पहले क्या करें? नींबू पानी(बिना चीनी) में थोड़ा शहद और चुटकी भर हल्दी मिलाकर पिएं. चाहें तो इसे हमेशा सुबह पीने की आदत डालें. ये हमेशा आपके हाज़मे को ठीक रखेगा और कई दूसरी पेट की बीमारियों से भी बचाएगा. बादाम, अखरोट, का़जू को अपनी डाइट में शामिल करें. वज़न के हिसाब से कम या ज़्यादा ले सकते हैं. जैसे वज़न ज़्यादा है तो मात्रा थोड़ी कम रखें. ये आपको कार्बोहाइ़ेट पचाने में मदद करेगा. फल ज़्यादा से ज़्यादा लें. लेकिन खाने से आधे या एक घंटा पहले खाएँ. खाने के बाद फल लेने से कोई फायदा नहीं होता है. कई लोग कटे हुए फल ऑफिस लेकर चले जाते हैं, ऐसा ना करें. जिस वक्त फल काटें, उसी वक्त खाएं. फलों से आपको एंटी-आक्सीडेंट, विटामिन, मिनरल मिलते हैं जो आपको बीमारियों से बचाकर रखते हैं. ग्रीन-टी रोज़ पिएं. अगर दिन में 2 बार ग्रीन-टी में आधा चम्मच दाल-चीनी मिला कर पिएंगे तो ये डायबिटीज़ को भी कंट्रोल में रखेगा. छाछ या लस्सी भी डाइट में रख सकते हैं. फलों का जूस पिएं तो ताज़ा जूस पिएं बजाए डिब्बाबंद जूस के. जब तक भारीपन, बदहज़मी महसूस कर रहे हैं तब तक तला हुआ खाना बिल्कुल ना खाएं. अगर इस डाइट को रेगुलर रखा जाए तो हम काफी हद तक खुद को स्वस्थ रख सकते हैं. कामकाज़ी लोग कम से कम ये ज़रूर करें (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत त्योहारों और शादियों का देश है. इतने बड़े देश में साल भर दोनों चलते रहते हैं तो ज़ाहिर है पकवान का भी कोई एक सीज़न नहीं होता.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़िट रहने के लिए कैसी होनी चाहिए डाइट? ज़्यादातर मौक़ों पर हम ख़ुशी में बहक जाते हैं और बिना सोचे-समझे सेहत की परवाह किए बगैर ज़्यादा खा लेते हैं. तो एक तरफ जहां नाच-कूद रहे थे, अगले दिन बदहज़मी से बेहाल या जी मिचलाने से परेशान. बार-बार ये समस्या आपको परेशान ना करे या हर बार आपको डॉक्टर के पास ना भागना पड़े, इसके लिए बीबीसी ने सर गंगाराम अस्पताल की डाइट विशेषज्ञ डॉक्टर मुक्ता वशिष्ठ से बात की. सबसे पहले क्या करें? नींबू पानी(बिना चीनी) में थोड़ा शहद और चुटकी भर हल्दी मिलाकर पिएं. चाहें तो इसे हमेशा सुबह पीने की आदत डालें. ये हमेशा आपके हाज़मे को ठीक रखेगा और कई दूसरी पेट की बीमारियों से भी बचाएगा. बादाम, अखरोट, का़जू को अपनी डाइट में शामिल करें. वज़न के हिसाब से कम या ज़्यादा ले सकते हैं. जैसे वज़न ज़्यादा है तो मात्रा थोड़ी कम रखें. ये आपको कार्बोहाइ़ेट पचाने में मदद करेगा. फल ज़्यादा से ज़्यादा लें. लेकिन खाने से आधे या एक घंटा पहले खाएँ. खाने के बाद फल लेने से कोई फायदा नहीं होता है. कई लोग कटे हुए फल ऑफिस लेकर चले जाते हैं, ऐसा ना करें. जिस वक्त फल काटें, उसी वक्त खाएं. फलों से आपको एंटी-आक्सीडेंट, विटामिन, मिनरल मिलते हैं जो आपको बीमारियों से बचाकर रखते हैं. ग्रीन-टी रोज़ पिएं. अगर दिन में 2 बार ग्रीन-टी में आधा चम्मच दाल-चीनी मिला कर पिएंगे तो ये डायबिटीज़ को भी कंट्रोल में रखेगा. छाछ या लस्सी भी डाइट में रख सकते हैं. फलों का जूस पिएं तो ताज़ा जूस पिएं बजाए 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प्रशंसकों और समर्थकों ने उन्हें घेर लिया. उन्होंने भी उन लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा 'मैं अपने प्रशंसकों से प्यार करता हूँ'. इसके बाद वह कार के ऊपर चढ़कर खड़े हो गए और उन्होंने लोगों का अभिवादन स्वीकार किया. इससे पहले वह जब अदालत पहुँचे तो भी उनके प्रशंसकों और समर्थकों ने नारे लगाकर उनका हौसला बढ़ाया, उन्हें एक काली गाड़ी में कई सुरक्षाकर्मियों के साथ वहाँ लाया गया. वहाँ सैकड़ों पत्रकार अपने कैमरों के साथ मौजूद थे जिनमें माइकल जैक्सन की तस्वीरें खींचने के लिए होड़ लगी थी. माइकल जैक्सन अपने समर्थकों से हाथ मिलाते हुए, धीमी चाल से अदालत के अंदर दाख़िल हुए. इस मौक़े पर परिवार की एकता को दिखाते हुए माइकल जैक्सन के माँ-बाप और कई रिश्तेदार मौजूद थे, उनके वकीलों का एक पूरा दस्ता भी वहाँ मौजूद था. माइकल जैक्सन को कुछ समय पहले गिरफ़्तार किया गया था और वह 30 लाख डॉलर की ज़मानत पर रिहा किए गए. गंभीर आरोप उन पर आरोप है कि उन्होंने बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार किया, बच्चों को नशीले पदार्थ दिए और उनका शोषण किया. माइकल जैक्सन ने इन आरोपों को सरासर झूठ बताया है और कहा है कि आरोप लगाने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के लोग हैं. माइकल जैक्सन के पिता ने भी अपने बेटे को बेकसूर बताया है और कहा है कि जीत उन्हीं की होगी. इस बीच माइकल जैक्सन के प्रशंसक और समर्थक भी मैदान में उतर आए हैं और उनसे डटे रहने की अपील कर रहे हैं. माइकल जैक्सन पर आरोप लगने के बाद माना जा रहा है कि उनका पूरा करियर दाँव पर लग गया है. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उन्हें काला होने की वजह से जान बूझकर निशाना बनाया जा रहा है.\n\nSummary:", "target": "बाल यौन शोषण के आरोपों से जूझ रहे पॉप गायक माइकल जैक्सन ने ख़ुद को बेक़सूर बताया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवह पहली बार अदालत में पेश हुए और कैलिफोर्निया की सांता मारिया अदालत में गए जहाँ उनके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप उन्हें पढ़कर सुनाए गए. जैक्सन पर बाल यौन शोषण के सात आरोप हैं मगर उन्होंने सभी को 'सरासर झूठ' बताया. इसके बाद जब वह अदालत से बाहर आए तो उनके प्रशंसकों और समर्थकों ने उन्हें घेर लिया. उन्होंने भी उन लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा 'मैं अपने प्रशंसकों से प्यार करता हूँ'. इसके बाद वह कार के ऊपर चढ़कर खड़े हो गए और 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कि इसराइल 7000 से अधिक फ़लस्तीनी कैदियों को रिहा करे और चरमपंथियों को निशाना बनाने की अपनी नीति त्याग दे. उधर इसराइली प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन कहते हैं कि काहिरा की बैठक में जो बात हो रही है वह नाकाफी है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 402, "source_item_id": "402", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1252, "clean_index": 360, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:360"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअभ्यास जितना सूक्ष्म हो, सजगता उतनी ही बढ़ जाती है. फलस्वरूप प्राण-शक्ति का अनुभव होता है जो जन्म से मृत्यु तक इस स्थूल रूपी शरीर को धारण किए रहती है. इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ ऐसे योगाभ्यास भी सीख लिए जाएँ जो देखने और करने में सरल हो और जिसका सीधा संपर्क हमारे शारीरिक और मानसिक शांति से हो. किसा शायर ने क्या ख़ूब कहा है- 'दुनिया में दो ही शगुन दुरूस्त, अल्लाह आबरू से रखे और तंदरूस्त.' आरंभिक स्थिति आइए आज दो-तीन ऐसे अभ्यास करें जो आप कुर्सी या सोफ़े पर बैठ कर भी कर सकते हैं बशर्ते पैरों को घुटनों से सीधा रखें तथा रीढ़ की हड्डी को भी. वैसे पारंपरिक तरीके से ज़मीन पर दोहरा कंबल बिछा इसका अभ्यास करें तो बहुत बढ़िया. यह आसन पैरों के ज़रिए दिन भर थके शरीर को नई ऊर्जा देने के लिए बहुत उपयोगी है. प्रारंभिक स्थिति ज़मीन पर बैठने की विधि है. दोनों पैरों को सामने की ओर फैला कर बैठें और पैरों को आपस में मिला कर रखें. दोनों हथेलियाँ नितंब के पास रखेंगे तथा अँगुलियों का रूख़ पीछे की ओर रहेगा. कोहनियों को सीधा कर लें तथा रीढ़ की हड्डी, सिर को भी सीधा रखने का प्रयास करें. इस स्थिति में कुछ देर विश्राम कर सकते हैं. विशेष: कंधों को पीछे की और खींच कर रखना चाहिए, कंधे उठे हुए न हो. पादांगुलि नमन विधि: - आरंभिक स्थिति में बैठिए और दोनों पैरों में थोड़ा अंतर रखिए. दोनों हथेलियों के सहारे रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने का प्रयास करें. अब दोनों पैरों की अंगुलियों के प्रति सजग हो जाएँ और अपना ध्यान पैरों की अंगुलियों की ओर लगातर रखिए. सजग हो जाने पर श्वास भरते हुए सिर्फ़ पैरों की अंगुलियों को पीछे की ओर (घुटनों की ओर) खींचिए, श्वास भरने तक अंगुलियों को खींचकर ही रखिए. थोड़ा रुकने का प्रयत्न करें. इसी प्रकार श्वास छोड़ते हुए पैरों की अंगुलियों को बाहर की ओर खींचेंगे, थोड़ी देर उसी अवस्था में रुकेंगे और चेतना पैरों की ओर लगाकर रखेंगे. इस प्रकार 10 से 15 बार दोहराइए. विशेष: श्वास भरते हुए पैरों की अंगुलियों को पीछे की ओर खींचना है और श्वास छोड़ते हुए अंगुलियों को बाहर की ओर खींचना है. पैर सीधे ही रखें, टखनों को ढीला और स्थिर रखें. सिर्फ़ पैरों की अंगुलियों को गति प्रदान करें. गुल्फ नमन विधि: यह अभ्यास भी प्रारंभिक स्थिति में बैठकर करना है. श्वास भरें और पैरों को टखनों से मोड़ते हुए अपनी ओर खींचेंगे. कुछ पल रुकिए और मांसपेशियों में खिंचाव को महसूस करें. इसके बाद श्वास छोड़ते हुए पैरों को बाहर की ओर खींचते हुए पैरों के तलवे को ज़मीन से लगाने का प्रयास करें. दोनों ही स्थिति में कुछ देर रुकने का प्रयास करें. इस प्रक्रिया को 10 से 15 बार दोहराइए. विशेष: श्वास भरते हुए पैरों को टखने से मोड़ते हुए अपनी ओर खींचना है तथा श्वास छोड़ते हुए बाहर की ओर. एकाग्रता श्वास के प्रति तथा पैरों के तलवे, टखने, पिंडलियाँ और पैरों की मांसपेशियों में खिंचाव की ओर रखेंगे.\n\nSummary:", "target": "योग से सजगता बढ़ती है. स्थूलता से हम सूक्ष्म की ओर बढ़ते है. कुछ योगाभ्यास भी सूक्ष्म होते है जो हमारे शरीर के जोड़, सूक्ष्म अंग तथा उनकी मांसपेशियों को स्थायी रूप से प्राण-ऊर्जा प्रदान कर सकते है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअभ्यास जितना सूक्ष्म हो, सजगता उतनी ही बढ़ जाती है. फलस्वरूप प्राण-शक्ति का अनुभव होता है जो जन्म से मृत्यु तक इस स्थूल रूपी शरीर को धारण किए रहती है. इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ ऐसे योगाभ्यास भी सीख लिए जाएँ जो देखने और करने में सरल हो और जिसका सीधा संपर्क हमारे शारीरिक और मानसिक शांति से हो. किसा शायर ने क्या ख़ूब कहा है- 'दुनिया में दो ही शगुन दुरूस्त, अल्लाह आबरू से रखे और तंदरूस्त.' आरंभिक स्थिति आइए आज दो-तीन ऐसे अभ्यास करें जो आप कुर्सी या सोफ़े पर बैठ कर भी कर सकते हैं बशर्ते पैरों को घुटनों से सीधा रखें तथा रीढ़ की हड्डी को भी. वैसे पारंपरिक तरीके से ज़मीन पर दोहरा कंबल बिछा इसका अभ्यास करें 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उचित समझा उतना समय लिया. दुखदायी फ़ैसला निष्कासन के फ़ैसले पर व्यक्तिगत राय रखते हुए उन्होने कहा कि ये फ़ैसला दुखदायी था, पर इसके अलावा कोई विकल्प भी नही था. उन्होने अपनी तरफ से इस मामले मे सफ़ाई भी पेश की, \"मैं ये बिल्कुल साफ़ करना चाहता हूँ कि मैने कभी इस मामले मे अपनी कोई राय नही रखी, मैने कभी किसी को दोषी या निर्दोष नही बताया. जिस दिन ये मामला सामने आया उसी दिन मैने सभी दलों के नेताओं से मुलाक़ात की और उन्होंने कहा कि इस मामले मे जल्दी ही कुछ किया जाना चाहिए और उसके बाद ही ये कमेटी बनाई गई.\" इससे पहले संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले से जुड़े 10 लोकसभा सांसद और एक राज्यसभा सांसद को दोनों सदनों ने बर्ख़ास्त कर दिया. इस पर लोकसभा में हुए मतदान का लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने वॉकआउट किया.\n\nSummary:", "target": "लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा है कि संसद के निचले सदन से 10 सांसदों के निष्कासन के फैसले की सूचना जल्दी ही चुनाव आयोग को दे दी जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशीतकालीन सत्र की समाप्ति पर संवाददाताओं से बातचीत 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ऑस्ट्रेलिया की ओर से ट्राय एल्डर ने. ऑस्ट्रेलिया की ओर से दूसरा गोल 38वें मिनट में जेमी ड्वायर ने किया. इसके बाद माइकेल मैकैन ने तीसरा गोल करके अपनी टीम को 3-1 से बढ़त दिला दी, उन्होंने 49वें मिनट में गोल दाग़ा. इसके एक मिनट बाद ही भारत के गगन अजीत सिंह ने गोल करके स्कोर को 3-2 पर ला दिया. इस मैच में भारत ने कड़ा संघर्ष किया, गगन अजीत सिंह के गोल के दो मिनट बाद ही 52वें मिनट में अर्जुन हल्लपा ने एक और गोल कर दिया. इस तरह भारत और ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 3-3 से बराबर हो गया, एक बार लगने लगा कि भारत यह मैच जीत सकता है. माइकल बर्नन ने 70वें मिनट में आख़िरी गोल करके ऑस्ट्रेलिया को जीत दिला दी. इस मैच में दोनों टीमों के सातों गोल 'फ़ील्ड गोल' थे यानी किसी टीम ने पेनल्टी कॉर्नर के ज़रिए गोल नहीं किया. दूसरी दिलचस्प बात ये थी कि सातों गोल सात अलग-अलग खिलाड़ियों ने किए.\n\nSummary:", "target": "एथेंस ओलंपिक के पुरुष हॉकी मुक़ाबले में भारत ऑस्ट्रेलिया से 4-3 से हार गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारतीय टीम ने छठे मिनट में ही पहला गोल करके बढ़त बना ली थी 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चुनौतियां सर्च ऑपरेशन जारी मृत चार जवानों में तीन की मौत गोली लगने से हुई है जबकि एक जवान की मौत हार्ट अटैक आने से हुई है. हमला रात के क़रीब दो बजे किया गया है. चरमपंथियों ने कैंप में घुसने से पहले हैंडग्रेनेड फेंके और फ़ायरिंग की थी. सीआरपीएफ़ के एक अधिकारी ने बताया कि गोलीबारी बंद है और सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है. इसी साल अगस्त महीने में पुलवामा में ही आत्मघाती हमलावरों ने पुलिस लाइन्स को निशाना बनाया था. इस हमले में सुरक्षा बल के आठ जवान मारे गए थे. जवाबी कार्रवाई में तीन चरमपंथी भी मारे गए थे. घाटी में मेजर समेत दो सैनिक मारे गए कश्मीर में सेना पर हमला, तीन सैनिकों की मौत कश्मीर में एक साथ कई चरमपंथी हमले (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में रविवार तड़के सीआरपीएफ़ के ट्रेनिंग कैंप पर चरमपंथियों ने हमला कर दिया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n(फाइल फ़ोटो) पुलवामा में आधी रात के बाद सीआरपीएफ़ कैंप पर 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है कि युवा चेहरे पीछे ही रह गए? कांग्रेस पार्टी में सब तरह के लोग हैं. मगर ये बात भी सच है की हम युवाओं की अपेक्षा पर खरा नहीं उतर पाए. युवाओं ने कांग्रेस के पक्ष में ज़्यादा मतदान नहीं किया. इसमें ग़लती किसी की नहीं है. ग़लती सिर्फ़ हमारी है. हमने उनकी उम्मीदों को सही तरह से समझा नहीं. जो नया वोटर है, या यूं कहिए कि जो 18 से लेकर 25 साल की उम्र के मतदाता हैं, उसे हम पूरी तरह संतुष्ट करने में कामयाब नहीं रहे. क्या कांग्रेस चुनाव के लिए तैयार ही नहीं थी? दस सालों तक हमने सरकार चलायी. मेरा ऐसा मनना है कि अपने कार्यकाल में हमने जो नियम, क़ानून, कार्यक्रम और योजनाएं लागू की थीं वह देश के कल्याण के लिए थीं. मगर कहीं ना कहीं हमारा संदेश देश की जनता तक सही ढंग से नहीं पहुँच पाया. हमारी मार्केटिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग उस स्तर की नहीं हो पायी जैसी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की थी. हम लोगों के अंदर भी आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है क्योंकि हार एक तरफ़ होती है, मगर जिस अंतर से हम हारे हैं वो निश्चित रूप से काफ़ी चिंता का विषय है. कांग्रेस पार्टी का एक कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि हम एक चौराहे पर खड़े हैं. आने वाला रास्ता तय करने के लिए हमें बड़े बदलाव करने पड़ेंगे और ख़ुद को झिंझोड़ना पड़ेगा. कांग्रेस क्या एक परिवार की पार्टी बन कर रह गई है? आपको याद होगा कि पिछले 25 साल में गांधी परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना, साल 1989 से लेकर आज तक. यह बात सही है कि सोनिया गांधी को लोग बार-बार पार्टी अध्यक्ष चुनते हैं क्योंकि वह पार्टी में एकता का प्रतीक हैं. वह चुनाव जीतती रही हैं और जिताती रही हैं. साल 2004 में उनके नेतृत्व में हम चुनाव जीते और साल 2009 में उन्होंने चुनाव जिताया और इस बार हम हारे हैं. हमें लगता है कि वह अपनी कार्यशैली से लोगों को संगठित करने में कामयाब रहती हैं. कांग्रेस के नेता उन्हें धर्म, भाषा, जाति से हटकर देखते हैं. उनसे पार्टी को लाभ मिलता है, नेतृत्व मिलता है. लेकिन अब समय आ गया है कि हमें भविष्य के लिए दूसरे स्तर का नेतृत्व तैयार करना होगा. राज्य के नेतृत्व को और मज़बूत करना होगा. जनाधार वाले नेताओं को अगर सम्मान और इज़्ज़त देकर संगठन में जगह दी जाएगी, तो कांग्रेस पार्टी का कार्यक्षेत्र और व्यापक होगा. मनीष तिवारी चुनाव लड़ने से पीछे हट गए और बहुत से नेताओं ने आधे मन से चुनाव लड़ा. जबकि यूपीए-1 और यूपीए-2 ने जनता के लिए कई अहम काम किए. तो क्या वे अपनी उपलब्धियां जनता तक नहीं पहुंचा सके? जब कोई पार्टी या आदमी चुनाव हारता है, तो इसके कारण बताने वाले 500 लोग आ जाते हैं. मगर यह सही है कि हमने लोगों को अधिकार दिया है शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और सूचना का. स्वास्थ्य का अधिकार हम देने वाले थे. हमारे काम में कमी नहीं थी, चाहे वह ऊर्जा का क्षेत्र हो या कृषि का. दूसरी बात चुनाव कौन लड़ेगा या नहीं लड़ेगा, यह पार्टी का निर्णय होता है. पार्टी जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देकर चुनाव लड़ाती है. कभी कोई चुनाव हारने के लिए चुनाव नहीं लड़ता. हम चुनाव लड़े और हमने जनादेश को बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया है. और यह जीवन का अंत नहीं है. चुनाव हारे हैं, हमारा अस्तित्व ख़त्म नहीं हुआ है. हम कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी जगह पर खड़े हैं. देश की नई सरकार अगर कभी वह जनहित के ख़िलाफ़ काम करती है, तो हम अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभाएंगे. मगर प्रभावी विपक्ष की भूमिका आप कैसे निभाएंगे क्योंकि कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिली हैं? प्रभावी विपक्ष के लिए संख्या बल की नहीं बल्कि मनोबल की ज़रूरत होती है. सचेत रहकर सरकार को सही रास्ते पर चलाने की ज़िम्मेदारी प्रजातंत्र में जितनी सत्ता पक्ष की होती है, उतनी ही विपक्ष की भी होती है. संख्या बल चाहे कुछ भी हो, हमारे मनोबल, हमारे संकल्प में कोई कमी नहीं आई है. कांग्रेस का क्या भविष्य देखते हैं? पार्टी किस मोड़ पर खड़ी है? कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां बहुत से बदलाव करने होंगे. अभूतपूर्व बदलाव करने होंगे, सच्चाई कबूल करनी होगी. सच्चाई यह कि यह भारत 21वीं सदी का भारत है. हमें नौजवानों की इच्छा और आकांक्षाओं के अनुरूप काम करना होगा. जो जननेता नीतियां बनाते हैं और कांग्रेस पार्टी के जो नीति निर्धारक हैं, उन्हें ज़मीन से जुड़ना होगा. जनाधार वाले व्यक्ति को ही शीर्ष पद पर बैठाना होगा, चाहे वो राज्य में हों या ज़िले में हो. राष्ट्रीय स्तर पर सोनिया गांधी हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी युवा मतदाताओं की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. लेकिन एक चुनाव में हार का मतलब कांग्रेस का अंत नहीं है और पार्टी दोबारा खड़ी होगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसचिन पायलट से बात की बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने. कांग्रेस की सरकार में अग्रिम पंक्ति के जो चेहरे नज़र आते थे, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत, ज़्यादातर राज्यसभा सांसद थे. जिन नेताओं ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, वे आगे रहे. क्या कारण है कि युवा चेहरे पीछे ही रह गए? कांग्रेस पार्टी में सब तरह के लोग हैं. मगर ये बात भी सच है की हम युवाओं की अपेक्षा पर खरा नहीं उतर पाए. युवाओं ने कांग्रेस के पक्ष में ज़्यादा मतदान नहीं किया. इसमें ग़लती किसी की नहीं है. ग़लती सिर्फ़ हमारी है. हमने उनकी उम्मीदों को सही तरह से समझा नहीं. जो नया वोटर है, या यूं कहिए कि जो 18 से लेकर 25 साल की उम्र के मतदाता हैं, उसे हम पूरी तरह संतुष्ट करने में कामयाब नहीं रहे. क्या कांग्रेस चुनाव के लिए तैयार ही नहीं थी? दस सालों तक हमने सरकार चलायी. मेरा ऐसा मनना है कि अपने कार्यकाल में हमने जो नियम, क़ानून, कार्यक्रम और योजनाएं लागू की थीं वह देश के कल्याण के लिए थीं. मगर कहीं ना कहीं हमारा संदेश देश की जनता तक सही ढंग से नहीं पहुँच पाया. हमारी मार्केटिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग उस स्तर की नहीं हो पायी जैसी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की थी. हम लोगों के अंदर भी आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है क्योंकि हार एक तरफ़ होती है, मगर जिस अंतर से हम हारे हैं वो निश्चित रूप से काफ़ी चिंता का विषय है. कांग्रेस पार्टी का एक कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि हम एक चौराहे पर खड़े हैं. आने वाला रास्ता तय करने के लिए हमें बड़े बदलाव करने पड़ेंगे और ख़ुद को झिंझोड़ना पड़ेगा. कांग्रेस क्या एक परिवार की पार्टी बन कर रह गई है? आपको याद होगा कि पिछले 25 साल में गांधी परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना, साल 1989 से लेकर आज तक. यह बात सही है कि सोनिया गांधी को लोग बार-बार पार्टी अध्यक्ष चुनते हैं क्योंकि वह पार्टी में एकता का प्रतीक हैं. वह चुनाव जीतती रही हैं और जिताती रही हैं. साल 2004 में उनके नेतृत्व में हम चुनाव जीते और साल 2009 में उन्होंने चुनाव जिताया और इस बार हम हारे हैं. हमें लगता है कि वह अपनी कार्यशैली से लोगों को संगठित करने में कामयाब रहती हैं. कांग्रेस के नेता उन्हें धर्म, भाषा, जाति से हटकर देखते हैं. उनसे पार्टी को लाभ मिलता है, नेतृत्व मिलता है. लेकिन अब समय आ गया है कि हमें भविष्य के लिए दूसरे स्तर का नेतृत्व तैयार करना होगा. राज्य के नेतृत्व को और मज़बूत करना होगा. जनाधार वाले नेताओं को अगर सम्मान और इज़्ज़त देकर संगठन में जगह दी जाएगी, तो कांग्रेस पार्टी का कार्यक्षेत्र और व्यापक होगा. मनीष तिवारी चुनाव लड़ने से पीछे हट गए और बहुत से नेताओं ने आधे मन से चुनाव लड़ा. जबकि यूपीए-1 और यूपीए-2 ने जनता के लिए कई अहम काम किए. तो क्या वे अपनी उपलब्धियां जनता तक नहीं पहुंचा सके? जब कोई पार्टी या आदमी चुनाव हारता है, तो इसके कारण बताने वाले 500 लोग आ जाते हैं. मगर यह सही है कि हमने लोगों को अधिकार दिया है शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और सूचना का. स्वास्थ्य का अधिकार हम देने वाले थे. हमारे काम में कमी नहीं थी, चाहे वह ऊर्जा का क्षेत्र हो या कृषि का. दूसरी बात चुनाव कौन लड़ेगा या नहीं लड़ेगा, यह पार्टी का निर्णय होता है. पार्टी जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देकर चुनाव लड़ाती है. कभी कोई चुनाव हारने के लिए चुनाव नहीं लड़ता. हम चुनाव लड़े और हमने जनादेश को बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया है. और यह जीवन का अंत नहीं है. चुनाव हारे हैं, हमारा अस्तित्व ख़त्म नहीं हुआ है. हम कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी जगह पर खड़े हैं. देश की नई सरकार अगर कभी वह जनहित के ख़िलाफ़ काम करती है, तो हम अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभाएंगे. मगर प्रभावी विपक्ष की भूमिका आप कैसे निभाएंगे क्योंकि कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिली हैं? प्रभावी विपक्ष के लिए संख्या बल की नहीं बल्कि मनोबल की ज़रूरत होती है. सचेत रहकर सरकार को सही रास्ते पर चलाने की ज़िम्मेदारी प्रजातंत्र में जितनी सत्ता पक्ष की होती है, उतनी ही विपक्ष की भी होती है. संख्या बल चाहे कुछ भी हो, हमारे मनोबल, हमारे संकल्प में कोई कमी नहीं आई है. कांग्रेस का क्या भविष्य देखते हैं? पार्टी किस मोड़ पर खड़ी है? कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां बहुत से बदलाव करने होंगे. अभूतपूर्व बदलाव करने होंगे, सच्चाई कबूल करनी होगी. सच्चाई यह कि यह भारत 21वीं सदी का भारत है. हमें नौजवानों की इच्छा और आकांक्षाओं के अनुरूप काम करना होगा. जो जननेता नीतियां बनाते हैं और कांग्रेस पार्टी के जो नीति निर्धारक हैं, उन्हें ज़मीन से जुड़ना होगा. जनाधार वाले व्यक्ति को ही शीर्ष पद पर बैठाना होगा, चाहे वो राज्य में हों या ज़िले में हो. राष्ट्रीय स्तर पर सोनिया गांधी हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. 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(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "महाराष्ट्र सरकार ने एंटी ब्लैक मैज़िक अध्यादेश को पारित करने का फ़ैसला लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमहाराष्ट्र सरकार इस अध्यादेश को राज्यपाल को मंज़ूरी के लिए भेजेगी. ये फ़ैसला राज्य सरकार की कैबिनेट की बैठक में लिया गया. महाराष्ट्र सरकार के इस फ़ैसले के बाद राज्य में काले जादू और अंध विश्वास के चलते नर बलि देने की प्रथा पर अंकुश लगाना संभव होगा. यह फ़ैसला इस कानून को पारित कराने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के एक दिन के बाद लिया गया है. मंगलवार को नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी. अज्ञात हमलावरों ने दाभोलकर को उस वक्त गोली मारी जब वे पुणे में टहलने के लिए निकले थे. दाभोलकर ने दो सप्ताह पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चव्हाण सरकार की इस बात के लिए आलोचना की थी कि सरकार इस कानून को पारित करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है. राज्य सरकार की ओर से पहले से ये भरोसा दिया जाता रहा है कि कानून बनने के बाद इस तरह की धार्मिक पूजा कराने वाले वरकरी समुदाय के लोगों का उत्पीड़न नहीं किया जाएगा. इस अध्यादेश के पारित होने के बाद अंध विश्वास और अंध श्रद्धा को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों पर भी रोक लगेगी. अख़बार और टीवी चैनलों पर अब ऐसे विज्ञापनों का दिखाया जाना अपराध के दायरे में आएगा. दो दशक से लंबा संघर्ष इस हत्या के ख़िलाफ़ पुणे में बुधवार को भारी पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है. महाराष्ट्र सरकार ने हत्यारों के बारे में कोई भी सूचना देने वालों को दस लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की है. इसके अलावा पुणे पुलिस प्रशासन ने प्रत्यक्षदर्शियों से मिली जानकारी के आधार पर हत्यारों का स्केच भी जारी किया है. 69 साल के दाभोलकरने महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का गठन किया था और अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के ख़िलाफ़ कानून बनाने की मांग कर रहे थे. दाभोलकर दकियानूसी परंपरा के ख़िलाफ़ दो दशक से भी ज़्यादा समय से संघर्ष कर रहे थे. चिकित्सा विज्ञान में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने समाज में अंधविश्वास मिटाने के लिए अपने अभियान की शुरुआत 1983 में की थी. 1989 में उन्होंने एकसमान सोच वाले लोगों के साथ मिलकर अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का गठन किया था. 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'आप का समर्थन नहीं करूंगा' विधायक आसिफ मोहम्मद ख़ान ने कहा, 'मैं 'आप' सरकार का समर्थन नहीं करूंगा, चाहे कांग्रेस मुझे पार्टी से निकाल दे. मैं विधानसभा में केजरीवाल के खिलाफ वोट करूंगा.'' दिल्ली सरकार ने बुधवार को ही वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगे की एसआईटी जांच की उपराज्यपाल से सिफारिश की थी. आसिफ मोहम्मद ख़ान ने कहा कि वो किसी भी विधायी कामकाज में 'आप' सरकार का समर्थन नहीं करेंगे. भले ही कांग्रेस उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करे, लेकिन उन्हें उसकी परवाह नहीं है. पिछले साल एक निचली अदालत ने बटला हाउस मुठभेड़ कांड में इंडियन मुजाहिदीन चरमपंथी समूह से जुड़े शहजाद अहमद को दोषी ठहराया था और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. आसिफ ने आम आदमी पार्टी पर दिल्ली की जनता को धोखा देने का आरोप लगाया. आसिफ ने बटला हाउस मुठभेड़ मामले में जांच की मांग की और कहा कि इस मामले में भी एसआईटी जांच कराई जाए. उन्होंने कहा, ''दिल्ली की जनता से केजरीवाल झूठ बोल रहे हैं. केजरीवाल वर्ष 1984 के सिख दंगों पर राजनीति कर रहे हैं लेकिन मुस्लिमों से उन्हें कोई सरोकार नहीं है.'' उन्होंने आम आदमी पार्टी पर मुस्लिम समुदाय के साथ दोहरे मानदंड अपनाने का भी आरोप लगाया. राजनीतिक नियुक्तियाँ इससे पहले प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह के मामले पर कहा कि जितनी भी नियुक्तियां राजनीतिक मंशा से हुई हैं उन्हें हटाया जाएगा. केजरीवाल ने कहा कि बरखा सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं. वो कैसे स्वतंत्र रहकर काम कम सकती हैं? उनके काम में राजनीतिक पुट तो आएगा ही. केजरीवाल ने कहा कि एक महीने में सरकार ने बिजली, पानी, भ्रष्टाचार से लेकर तमाम मुद्दों पर कार्रवाई की है. पानी के मीटर की चेकिंग के लिए दो एजेंसियों की सहायता ली जा रही है और यदि किसी को मीटर जांच करानी हो तो वो उसकी जांच ज़रूर की जाएगी. पिछले दिन रैन-बसेरे में ठंड से हुई मौतों पर स्पष्टीकरण देते हुए केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में जितने रैन-बसेरे हैं वो केवल 17-18 हजार लोगों के लिए ही पर्याप्त हैं. उन्होंने कहा कि एक महीने में दिल्ली सरकार ने दर्जनों नए रैन-बसेरे बनाए लेकिन ये नाकाफ़ी हैं और आने वाले समय में और रैन-बसेरे बनाए जाएंगे. लोकपाल बिल के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि अगली कैबिनेट मीटिंग में इस संबंध में प्रस्ताव लाया जाएगा. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली सरकार के एक महीना पूरा होने पर प्रेस वार्ता कर रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की वार्ता में कांग्रेस के एक विधायक ने उन पर दिल्ली की जनता को धोखा देने सहित कई अन्य आरोप लगाए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nओखला से कांग्रेस विधायक आसिफ मोहम्मद खान ने साल 2008 की बटला हाउस मुठभेड़ की एसआईटी जांच की मांग करते हुए केजरीवाल का विरोध किया. यह प्रेस कांफ्रेंस दिल्ली सचिवालय में बुलाई गई थी. हंगामा तब शुरू हुआ जब केजरीवाल ने पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. एक सवाल के जवाब में केजरीवाल ने कहा कि सरकार बटला मुठभेड़ की जांच के लिए एसआईटी नहीं बनाएगी. इसी समय विधायक आसिफ मोहम्मद खान खड़े हो गए और आप के खिलाफ नारे लगाने लगे. केजरीवाल ने कहा था कि अदालत इस मामले में पहले ही फैसला सुना चुकी है हम अदालत के आदेश का सम्मान करते हैं. हम इस मामले की जांच के लिए एसआईटी नियुक्त नहीं करने जा रहे. मुख्यमंत्री के सुरक्षाकर्मियों ने विधायक को रोकने की कोशिश की लेकिन वो नारे लगाते रहे. 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पेटियों को अलग रखा जाएगा. निगरानी अफगानिस्तान में पहले लोकतांत्रिक चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र की भी थी. जांच कार्य के लिए बनायी गयी तीन सदस्यीय समिति में कनाडा के पूर्व राजनयिक, स्वीडन के चुनाव विशेषज्ञ और एक अन्य व्यक्ति हैं जिनके नाम की घोषणा नहीं हुई है. यह समिति चुनाव में धांधली के सभी आरोपों की जांच करेगी और उस स्याही की भी जिस पर विवाद हुआ है. स्याही पर उठे विवाद के बाद ही राष्ट्रपति पद के कई उम्मीदवारों ने चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा की थी. इससे पहले अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने देश में हुए पहले राष्ट्रपति चुनावों को सही ठहराया था. यूरोप में सुरक्षा और सहयोग के लिए काम कर रहे संगठन द ऑर्गनाईज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कॉपरेशन (ओएससीई) इन यूरोप का कहना है कि राष्ट्रपति पद के 15 उम्मीदवारों की चुनाव रद्द करने की मांग जायज़ नहीं है. हालांकि संगठन ने माना कि चुनाव में गड़बड़ी ज़रुर हुई है जिसकी जांच होनी चाहिए. ओएससीई के राजदूत रॉबर्ट बैरी ने कहा, 'चुनाव रद्द करने से अफ़ग़ानिस्तान के उन लोगों के साथ बेइंसाफ़ी होगी जो अपनी सुरक्षा को नज़रअंदाज़ कर अपना मत डालने आए थे.' इसके अलावा स्थानीए संस्था फ़्री एंड फ़ेयर इलैक्शन्स फ़ाउंडेशन ऑफ़ अफ़गानिस्तान का कहना था कि ये चुनाव मोटे तौर पर लोकतांत्रिक थे. शनिवार को हुए ऐतिहासिक मतदान के दौरान अफ़रातफरी के बीच राष्ट्रपति पद के 18 में से 15 उम्मीदवारों ने ऐलान कर दिया था कि वे इस चुनाव के नतीज़ों को नहीं मानते क्योंकि उनका आरोप था कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है. मगर अब अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव का बहिष्कार करने की बात कहने वाले राष्ट्रपति पद के कई उम्मीदवारों ने संकेत दिए हैं कि वे विरोध छोड़ने को तैयार हैं. सबसे अधिक विवाद वोटरों की ऊँगली पर लगने वाली स्याही को लेकर था, ज्यादातर लोगों का कहना था कि स्याही का निशान पक्का नहीं है और धुल जाता है. अंतरिम राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कहा है कि सभी को अफ़ग़ान चुनाव आयोग के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और जब नतीजे का एलान हो जाए तो उसका सम्मान करना चाहिए. आरोप और जवाब राष्ट्रपति चुनाव में खड़े अधिकतर उम्मीदवारों ने ये कहते हुए चुनाव को रद्द करने की माँग की है कि मतदान में गड़बड़ी को रोकने के लिए मतदाताओं की ऊँगलियों पर लगाई जानेवाली स्याही आसानी से मिट जा रही थी. चुनाव में कई मतदाताओं ने वोट देने के बाद इस निशान को मिटाकर दोबारा भी वोट डाले. मगर उनके आरोपों को महत्व नहीं देते हुए करज़ई ने उल्टे ये सवाल पूछा,\"कौन ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं? ये 15 उम्मीदवार या वे लाखों लोग जो आज अपने वोट डालने आए? \". शनिवार को अफ़ग़ानिस्तान के पहले बड़े लोकतांत्रिक चुनाव में लाखों अफ़ग़ानों ने वोट डाले और मतदान कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहा.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 410, "source_item_id": "410", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2697, "clean_index": 368, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:368"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nश्रीलंका को मात्र 122 रनों पर समेटने के बाद भारत ने जीत के लिए आवश्यक रन सिर्फ़ दो विकेट के नुक़सान पर 21वें ओवर में ही हासिल कर लिया. इस जीत के साथ भारत ने सात मैचों की सिरीज़ में 2-0 की बढ़त हासिल कर ली है. मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लगातार दूसरे मैच में शानदार बल्लेबाज़ी की और 70 रन पर नाबाद रहे. वीरेंद्र सहवाग ने भी उनका अच्छा साथ निभाया और सिर्फ़ 29 गेंदों पर 38 रनों की पारी खेली. भारत की जीत में प्रमुख भूमिका गेंदबाज़ों ने निभाई. जिनकी धारदार गेंदबाज़ी के कारण श्रीलंका की टीम सिर्फ़ 35.4 ओवर में 122 रन बनाकर आउट हो गई. इरफ़ान पठान ने सिर्फ़ 37 रन देकर चार विकेट लिए. जबकि हरभजन सिंह और जेपी यादव को दो-दो विकेट मिले. इरफ़ान पठान को मैन ऑफ़ द मैच का पुरस्कार मिला. भारत का पहला विकेट 80 रन पर गिरा और वीरेंद्र सहवाग ने सिर्फ़ 29 गेंदों पर पाँच चौकों और एक छक्के की सहायता से 38 रन बनाए. उनका विकेट महारुफ़ को मिला. दूसके विकेट के लिए सचिन तेंदुलकर और जेपी यादव ने 35 रन जोड़े. जेपी यादव नौ रन बनाकर मुरलीधरन की गेंद पर आउट हुए. श्रीलंकाई पारी इससे पहले श्रीलंका की पूरी टीम सिर्फ़ 35.4 ओवर में 122 रन बनाकर आउट हो गई. भारत ने मोहाली की विकेट पर टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया. दिन-रात के मैच में ओस के कारण दूसरी पारी में गेंदबाज़ों की मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए भारत ने यह 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following text in Hindi.\n\nText:\nश्रीलंका को मात्र 122 रनों पर समेटने के बाद भारत ने जीत के लिए आवश्यक रन सिर्फ़ दो विकेट के नुक़सान पर 21वें ओवर में ही हासिल कर लिया. इस जीत के साथ भारत ने सात मैचों की सिरीज़ में 2-0 की बढ़त हासिल कर ली है. मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लगातार दूसरे मैच में शानदार बल्लेबाज़ी की और 70 रन पर नाबाद रहे. वीरेंद्र सहवाग ने भी उनका अच्छा साथ निभाया और सिर्फ़ 29 गेंदों पर 38 रनों की पारी खेली. भारत की जीत में प्रमुख भूमिका गेंदबाज़ों ने निभाई. जिनकी धारदार गेंदबाज़ी के कारण श्रीलंका की टीम सिर्फ़ 35.4 ओवर में 122 रन बनाकर आउट हो गई. इरफ़ान पठान ने सिर्फ़ 37 रन देकर चार विकेट लिए. जबकि हरभजन सिंह और जेपी यादव को दो-दो विकेट मिले. इरफ़ान पठान को मैन ऑफ़ द मैच का पुरस्कार मिला. भारत का पहला विकेट 80 रन पर गिरा और वीरेंद्र सहवाग ने सिर्फ़ 29 गेंदों पर पाँच चौकों और एक छक्के की सहायता से 38 रन बनाए. उनका विकेट महारुफ़ को मिला. दूसके विकेट के लिए सचिन तेंदुलकर और जेपी यादव ने 35 रन जोड़े. जेपी यादव नौ रन बनाकर मुरलीधरन की गेंद पर आउट हुए. श्रीलंकाई पारी इससे 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का दावा करने वाले परिवार की आय और संपत्ति को प्रमाणित करने वाले अधिकारी की रैंक तहसीलदार से कम नहीं होनी चाहिए. नोटबंदी का अध्ययन होगा? हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़ एक संसदीय पैनल नरेंद्र मोदी सरकार से नोटबंदी और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़े असर का अध्ययन करने के लिए कह सकता है. सरकार कई बार नोटबंदी और जीएसटी के अपने फ़ैसलों का बचाव कर चुकी है और उसका तर्क है कि लंबे समय में इसके सकारात्मक नतीजे देखने को मिलेंगे. दिल्ली में बारिश हिंदुस्तान के मुताबिक़ दिल्ली में आज से बारिश के आसार हैं. ख़बर के मुताबिक़ मौसम विभाग का अनुमान है कि आज दोपहार बाद कुछ इलाक़ों में बूंदाबांदी और रात तक ज़्यादातर हिस्सों में बारिश हो सकती है. यह सिलसिला 26 जनवरी तक चलने का अनुमान है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ़ अखिल भारतीय जाट आरक्षण बचाओ महाआंदोलन के नेताओं ने कहा है कि सरकार ने आरक्षण की उनकी मांग न मानकर धोखा किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरविवार को दिल्ली में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश के जाट नेता महाआंदोलन के बैनर तले इकट्ठा हुए. इन नेताओं ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने आरक्षण की मांग न मानकर उनके साथ धोखा किया है. महाआंदोलन के धर्मवीर चौधरी ने कहा कि यूपीए की सरकार ने जाटों को केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण का लाभ दिया था, लेकिन जब इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो एनडीए सरकार ने जानबूझकर कोर्ट में हमारा पक्ष मज़बूती से नहीं रखा, जबकि आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण सात दिन में दे दिया. जाट नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर कोटा देने की उनकी मांग न मानी गई तो आम चुनावों में जाट, बीजेपी का विरोध करेंगे और मायावती को अपना समर्थन देंगे. सामान्य ग़रीबों को आरक्षण फ़रवरी से केंद्र सरकार की नौकरियों में ग़रीब अभ्यर्थियों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण एक फ़रवरी से लागू होगा. हिंदुस्तान की ख़बर के मुताबिक़ सरकारी सेवाओं के लिए कार्मिक विभाग ने ये आदेश जारी किया है. विश्वविद्यालयों, केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थानों और स्कूलों में प्रवेश के दौरान आरक्षण के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय अलग से आदेश जारी करेगा. आरक्षण का लाभ वही परिवार उठा पाएंगे, जिनकी सालाना आमदनी आठ लाख रुपये से कम होगी. किसान वर्ग में जिनके पास पाँच एकड़ से कम खेती की ज़मीन होगी. आरक्षण का दावा करने वाले परिवार की आय और संपत्ति को प्रमाणित करने वाले अधिकारी की रैंक तहसीलदार से कम नहीं होनी चाहिए. नोटबंदी का अध्ययन होगा? हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़ एक संसदीय पैनल नरेंद्र मोदी सरकार से नोटबंदी और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़े असर का अध्ययन करने के लिए कह सकता है. सरकार कई बार नोटबंदी और जीएसटी के अपने फ़ैसलों का बचाव कर चुकी है और उसका तर्क है कि लंबे समय में इसके सकारात्मक नतीजे देखने को मिलेंगे. दिल्ली में बारिश हिंदुस्तान के मुताबिक़ दिल्ली में आज से बारिश के आसार हैं. ख़बर के मुताबिक़ मौसम विभाग का अनुमान है कि आज दोपहार बाद कुछ इलाक़ों में बूंदाबांदी और रात तक ज़्यादातर हिस्सों में बारिश हो सकती है. यह सिलसिला 26 जनवरी तक चलने का अनुमान है. 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40 प्रतिशत बाघ भारत में हैं. देश में 17 राज्यों में 23 बाघ अभयारण्य हैं.\n\nSummary:", "target": "भारत में बाघों की तेज़ी से घटती जनसंख्या को देखते हुए अब अभयारण्यों की चौकसी के लिए सेवानिवृत सैन्यकर्मियों को नियुक्त किया जायेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया था कि देश में बाघों की संख्या घटकर 1500 से भी कम रह गई है. इसी के बाद सरकार ने 'बाघ संरक्षण बल' के गठन की घोषणा की है. भारत में वर्ष 2002 में हुए अंतिम बड़े सर्वेक्षण में बाघों की संख्या 3642 पाई गई थी. वन्यजीव संरक्षण में जुटे कार्यकर्ताओं ने बाघों की संख्या में लगातार हो रही कमी के लिए शिकार और तेज़ी से फैलते नगरों को ज़िम्मेदार बताया है. उनका कहना है कि प्रशासन को इस संबंध में और कदम उठाने चाहिए. भारतीय जंगलों में बाघों के संरक्षण के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 'आपात उपायों' की सूची जारी की है. इसी के तहत बाघ संरक्षण बल के गठन की घोषणा की गई है. मंत्रालय ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस बल में कितने पूर्व सैनिकों की भर्ती की जायेगी. कभी 40 हज़ार बाघ थे सरकार ने मई में एक गणना कराई थी जिसमें पता चला था कि देश के जंगलों में अनुमान से कहीं कम बाघ रह रहे हैं. वाइल्डलाइफ़ इंस्टीटयूट आफ़ इंडिया के इस अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि कुछ राज्यों में बाघों की संख्या में पाँच वर्षों में लगभग दो तिहाई तक की गिरावट आई है. अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट दिसंबर में आएगी. वन्यजीव विशेषज्ञों ने शिकारियों और बाघ की खाल के अवैध व्यापार को रोकने में असफलता के लिए भारत सरकार की आलोचना की है. बाघों का शिकार उनके शरीर के अंगों को हासिल करने के लिए किया जाता है. बाघ की खाल का वस्त्रों के लिए और हडिडयों का दवाएँ बनाने में इस्तेमाल होता है. चीन में बाघ की खाल की कीमत 12500 डालर यानि लगभग पाँच लाख रुपए तक मिल जाती है. रिर्पोटों के अनुसार एक शताब्दी पहले भारत में लगभग 40 हज़ार बाघ थे. विश्व के 40 प्रतिशत बाघ भारत में हैं. देश में 17 राज्यों में 23 बाघ अभयारण्य हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", 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निमंत्रण मिला है. पुराना रिकॉर्ड ईरान ने संयुक्त राष्ट्र की दो महीने की समय सीमा को अनदेखा कर दिया है जिसमें उसे अपना परमाणु कार्यक्रम रोकने को कहा गया था. इसके बाद ही सुरक्षा परिषद में प्रतिबंधों को कड़ा करने के लिए दूसरा प्रस्ताव लाने की तैयारी की जा रही है. परमाणु कार्यक्रम पर महमूद अहमदीनेजाद की सख़्त टिप्पणियाँ सुर्खियाँ बनती रही हैं. हाल ही में उन्होंने कहा था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम एक ऐसी ट्रेन के समान है जिसमें न तो ब्रेक हैं और न रिवर्स गियर. ईरान में भी अहमदीनेजाद पर आरोप लगाए गए हैं कि परमाणु कार्यक्रम पर बोलते हुए वे कूटनीतिक भाषा का प्रयोग नहीं करते. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि यदि वे सुरक्षा परिषद के सामने अपनी बात रख भी लेते हैं तो इस बात की संभावना कम है कि इससे कोई फ़र्क पड़ने वाला है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2005 में राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद से अहमदीनेजाद दो बार संयुक्त राष्ट्र में भाषण कर चुके हैं लेकिन सुरक्षा परिषद के सामने बोलने का उन्हें मौक़ा नहीं मिला है.\n\nSummary:", "target": "ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने कहा है कि वे ख़ुद संयुक्त 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घातक हमलों की वजह एक जाति विशेष का ‘अपमान’ बताया गया. इसके बाद तो मुरुगन ने ‘लेखक के रूप में अपनी मौत की घोषणा कर दी’ यानी लिखना बंद कर दिया जिसकी पूरे देश में चर्चा हुई. जानकारों का कहना है कि केंद्र में 'भाजपा के सत्ता' में आने के बाद से, हिंदुत्ववादी गुटों ने अगले वर्ष होने वाले चुनाव को देखते हुए इस तरह के मुद्दों का इस्तेमाल अपना आधार बढ़ाने के लिए शुरू कर दिया है. 'हर राजनीतिक दल में' तमिल इतिहासकार एआर वेंकटचलपति कहते हैं, “अगर आप ग़ौर से देखें तो निचली जातियों में पहचान की राजनीति के बढ़ने से धर्म के आधार पर भाजपा का आगे बढ़ना बाधित होता है. जबकि दबंग जातियाँ मौजूदा जातीय समीकरण के संतुलन को बनाए रखना चाहती हैं.” समाप्त बहुत से लोग तमिलनाडु में गाउंदर जाति के लोगों को ऐसी ही छवि से जोड़कर देखते हैं. मुरुगन पर हमले की वजह थी कि उनके लेखन में मुख्य पात्रों को गाउंदर जाति का बताया गया है. करूर में गाउंदर जाति के नेता अमियप्पन वेंकटचलपति से सहमत नहीं हैं, “गाउंदर तमिलनाडु के दस ज़िलों में बड़ी संख्या में रहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बिहार या यूपी में यादव हैं, इन घटनाओं का भाजपा से कोई राजनीतिक लिंक नहीं है, हमारी जाति के लोग तो हर राजनीतिक दल में मौजूद हैं.” गाउंदर जाति की राजनीति करने वाले संगठन कोंगनाडु जनानायके काचि (केजीके) के नेता जीके नागराज कहते हैं, “मुरुगन की किताब पर विवाद तो चार साल पहले उसके प्रकाशन के समय से ही था. लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार के आने के बाद ही हिंदुत्ववादी संगठनों ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए इस मुद्दे को उठाया.” 'टालमटोल' जातीय समीकरणों के बारे में वेंकटचलपति कहते हैं, “मुरुगन के मामले में हिंदुत्ववादी आगे-आगे थे क्योंकि वे गाउंदर जाति के हैं, लेकिन मुरुगेसन के मामले में उन्होंने कोई जोश नहीं दिखाया कि क्योंकि मुरुगेसन नाडर जाति के हैं जो भाजपा के लिए अहम है, ख़ास तौर पर कन्याकुमारी वाले इलाक़े में.” तमिलनाडु की एआईडीएमके सरकार भी इस मामले में बहुत संभलकर चल रही है. जाने-माने वकील और राजनीतिक विश्लेषक जीआर स्वामीनाथन कहते हैं, “अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे, कोई दल किसी जाति के लोगों को नाराज़ नहीं करना चाहता. महीने भर तक किसी राजनीतिक दल ने इन हंगामों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और सरकार मामले पर टालमटोल करती रही.” मामला तब थमा जब मुरुगन ने एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के सामने माफ़ीनामे पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद मुरुगन ने लिखा जो उनके जीवन भर के लेखन से अधिक चर्चित हो गया, “लेखक पेरुमल मुरुगन मर गया, वह भगवान नहीं है इसलिए उसका नया अवतार नहीं होगा, अब सिर्फ़ पी मुरुगन स्कूल मास्टर जिंदा है.” (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तमिलनाडु में जातीय पहचान की राजनीति के ज़ोर पकड़ने के साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले भी तेज़ हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपिछले कुछ महीनों में दो तमिल लेखकों पेरूमल मुरुगन और पुलियार मुरुगेसन पर घातक हमलों की वजह एक जाति विशेष का ‘अपमान’ बताया गया. इसके बाद तो मुरुगन ने ‘लेखक के रूप में अपनी मौत की घोषणा कर दी’ यानी लिखना बंद कर दिया जिसकी पूरे देश में चर्चा हुई. जानकारों का कहना है कि केंद्र में 'भाजपा के सत्ता' में आने के बाद से, हिंदुत्ववादी गुटों ने अगले वर्ष होने वाले चुनाव को देखते हुए इस तरह के मुद्दों का इस्तेमाल अपना आधार बढ़ाने के लिए शुरू कर दिया है. 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भारत में एक बिलियन डॉलर निवेश कर रही है. वो भारत पर कोई अहसान नहीं कर रही है.'' इधर, पीयूष गोयल ने भी अपने बयान पर सफ़ाई दे दी है. उन्होंने कहा, \"मैं बस ये कहना चाहता था कि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों को नियमों का पालन करना चाहिए. उन्हें देश के छोटे व्यापारियों के लिए चीज़ें मुश्किल नहीं बनानी चाहिए.'' गोयल ने कहा कि सरकार हर तरह के निवेश का स्वागत करती है लेकिन अगर किसी ने क़ानून का उल्लंघन किया तो उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होगी. केरल: संक्रांति के दिन बीफ़ वाले ट्वीट से विवाद केरल के पर्यटन विभाग ने मकर संक्राति के दिन एक ऐसा ट्वीट किया था जिससे अब सोशल मीडिया में विवाद हो रहा है. केरल टूरिज़्म के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया, \"ख़ुशबूदार मसालों, नारियल के टुकड़ों, करी पत्ते के साथ धीमी आंच पर भुने गए बीफ़ के नर्म टुकड़े; मसालों की धरती केरल से शानदार डिश, बीफ़ उलरतियातु की रेसिपी.' इस ट्वीट के साथ बीफ़ के डिश की तस्वीर भी पोस्ट की गई थी. जनसत्ता में प्रकाशित ख़बर के अनुसार सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ने के बाद राज्य सरकार ने सफ़ाई दी और कहा कि उनका मक़सद किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं था. हालांकि ट्विटर हैंडल से इस तस्वीर और पोस्ट को हटाया नहीं गया है. ये भी पढ़ें: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा है कि 'भारतीय राजनीति में परिश्रमी और आत्मनिर्भर नरेंद्र मोदी के सामने पांचवीं पीढ़ी के वंशज राहुल गांधी के लिए कोई मौक़ा नहीं है.'", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविभिन्न मुद्दों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी की मुखर आलोचना करने वाले जाने वाले इतिहासकार ने केरल साहित्यिक समारोह के दूसरे दिन ये बातें कहीं. अमर उजाला ने इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह दी है. गुहा ने यह भी कहा कि 'वायनाड ने राहुल गांधी को नेता चुनकर विनाशकारी कदम उठाया है.' उन्होंने कहा, \"अगर आप 2024 में भी राहुल गांधी को दोबारा चुनने की ग़लती करेंगे तो आप नरेंद्र मोदी को ही लाभ पहुंचाओगे.\" गुहा ने कहा, ''मैं व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन कांग्रेस अब निराशावादी पारिवारिक कंपनी में बदल गई है, जो भारत में हिंदुत्व और अंध-राष्ट्रवाद बढ़ने के कारणों में से एक है.'' गुहा ने कहा, ''मोदी का सबसे मज़बूत पक्ष यह है कि वो राहुल गांधी नहीं हैं. वह बेहद परिश्रमी हैं और उन्होंने कभी यूरोप में छुट्टियां नहीं मनाईं.'' समाप्त 'क़व्वाली नहीं चलेगी' मशहूर कथक डांसर मंजरी चतुर्वेदी लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में 'ऐसा बनना संवरना मुबारक तुम्हें' क़व्वाली पर डांस कर रही थीं कि अचानक संगीत रुक गया. उन्हें लगा कि ऐसा शायद किसी तकनीकी गड़बड़ी से हुआ है लेकिन तभी आयोजन में मौजूद अधिकारियों ने आगे आकर कहा, \"क़व्वाली नहीं चलेगी, स्टेज पर क़व्वाली नहीं होगी.\" मंजरी चतुर्वेदी ये वाकया बुधवार को उस कार्यक्रम में हुआ जिसे उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग ने आयोजित कराया था. मंजरी का आरोप है कि संगीत रुकने के बाद वो मंच पर ही थीं कि अगली प्रस्तुति का ऐलान कर दिया गया. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मंजरी ने तुरंत माइक पर जाकर कहा, \"अपने 25 साल के करियर में मैंने 35 देशों में परफ़ॉर्म किया है और कभी मुझे इस तरह बीच में नहीं रोका गया, कभी मंच से नहीं 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हां, 18-20 हजार की संख्या में आमंत्रण पत्र ज़रूर छापे गए हैं और उन्हें भेजा भी जा चुका है. यह जानकारी पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम प्रमुख सुलतान अहमद ने दी है. कॉन्सर्ट का आयोजन यही सरकारी निगम कर रहा है. सुलतान अहमद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं. समाप्त सुलतान अहमद का कहना है कि पिछले साल ममता बनर्जी ने ग़ुलाम अली का कार्यक्रम कोलकाता में कराने का प्रस्ताव रखा था. मुंबई में शिवसेना की धमकी के बाद ग़ुलाम अली का कॉन्सर्ट रद्द कर दिया गया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के मशहूर ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली 12 जनवरी को कोलकाता के फुटबॉल क्लब स्टेडियम मोहन बगान में ग़ज़ल कार्यक्रम पेश करेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपहले ग़ज़ल गायन का कॉन्सर्ट ईडेन गार्डन में रखा गया था लेकिन वहां इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी की ओर से प्रस्तावित परीक्षण कार्यक्रम के कारण जगह बदल दी गई. बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली के अनुसार कॉन्सर्ट के लिए टिकट की किसी तरह की बिक्री नहीं हो रही है. हां, 18-20 हजार की संख्या में आमंत्रण पत्र ज़रूर छापे गए हैं और उन्हें भेजा भी जा चुका है. यह जानकारी पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम प्रमुख सुलतान अहमद ने दी है. कॉन्सर्ट का आयोजन यही सरकारी निगम कर रहा है. सुलतान अहमद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं. समाप्त सुलतान अहमद का कहना है कि पिछले साल ममता बनर्जी ने ग़ुलाम अली का कार्यक्रम कोलकाता में कराने का प्रस्ताव रखा था. मुंबई में शिवसेना की धमकी के बाद ग़ुलाम अली का कॉन्सर्ट रद्द कर दिया गया था. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान में अधिकारियों का कहना है कि तालिबान ने कुंदूज़ प्रांत के एक अहम उत्तरी ज़िले चारदारा पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nप्रांतीय पुलिस प्रमुख के प्रवक्ता सय्यद सरवर हुसैनी ने समाचार एजेंसी एपी से कहा, \"सैन्य बल भेजे जा रहे हैं और शहर को दोबारा नियंत्रण में लेने का अभियान तुरंत शुरू किया जाएगा.\" बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि यह रणनीतिक रूप से बेहद अहम है और प्रांतीय मुख्यालय और एयरपोर्ट से कुछ ही किलोमीटर दूर है. कुंदूज़ की प्रांतीय परिषद के मुखिया मोहम्मद यूसुफ़ अय्यूबी ने एपी को बताया कि दो दिनों तक स्थानीय सुरक्षा बलों पर हमलों के बाद रविवार को तालिबान लड़ाकों ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया. अयूबी के मुताबिक लड़ाई अभी जारी है और स्थानीय लोग जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं, शहर छोड़कर भाग रहे हैं. समाप्त अफ़ग़ानिस्तान से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षाबलों के जाने के बाद से अफ़ग़ान सुरक्षाबलों को नुक़सान उठाना पड़ रहा है. रणनीतिक रूप से अहम अफ़ग़ानी बलों को तालिबान के मुक़ाबले नुक़सान उठाना पड़ रहा है. हुसैनी के मुताबिक शनिवार को हुए हमलों में अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के तीन जवान मारे गए हैं और छह घायल हुए हैं. उनके मुताबिक लड़ाई में क़रीब 17 तालिबनी लड़ाके मारे गए हैं और 20 घायल हुए हैं. वहीं तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्ला मुजाहिद ने ईमेल के ज़रिए हमलों की ज़िम्मेदारी लेते हुए सुरक्षाबलों को भारी नुक़सान का दावा किया है. 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भीड़ ने कांग्रेस प्रत्याशी मीर मुश्ताक के काफिले पर पथराव कर दिया. इस पर मीर मुश्ताक के सुरक्षाकर्मी ने फ़ायरिंग की. फायरिंग में मंज़ूर अहमद की मौत हो गई और कुछ अन्य लोग घायल हो गए. बाद में लोगों की भीड़ मंज़ूर का शव लेकर नारेबाज़ी करते हुए बारामूला के पुराने शहर की ओर बढ़ने लगी. पुलिस ने भीड़ को आगे बढ़ने से रोका और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए बलप्रयोग किया. बेकाबू भीड़ पर नियंत्रण के लिए हुई पुलिस फायरिंग में एक युवक तनवीर अहमद शेख़ की मौत हो गई. हिंसाग्रस्त इस क्षेत्र में अघोषित कर्फ़्यू की स्थिति है. कड़ी चौकसी उधर, दूसरे चरण के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला समेत 81 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. विधानसभा क्षेत्रों गांदरबल, कंगन, डरहल, नौशेरा, राजौरी और कलाकोटे के लगभग 4.94 लाख मतदाता 530 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे. चरमपंथियों के संभावित हमलों को विफल करने और मतदाताओं में बेख़ौफ़ मतदान का भरोसा जगाने के लिए सुरक्षाबल मतदान केंद्रों के आसपास कड़ी चौकसी बरत रहे हैं. दूसरे चरण के क़रीब आधे मतदान केंद्रों को अति संवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है, जबकि शेष मतदान केंद्रों को संवेदनशील माना गया है. गांदरबल मुक़ाबला इस चरण का सबसे दिलचस्प और आकर्षक मुक़ाबला गांदरबल क्षेत्र में है. उमर अब्दुल्ला इस सीट पर पीडीपी के अफ़ज़ल और कांग्रेस के शेख़ इश्फ़ाक़ के ख़िलाफ़ त्रिकोणीय मुक़ाबले में हैं. इसके अलावा इस सीट पर नौ अन्य उम्मीदवार भी मैदान में हैं. अफ़ज़ल ने 2002 में उमर अब्दुल्ला को पराजित किया था. कंगन सीट पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के मियाँ अल्ताफ़ अहमद लगातार चौथी जीत के लिए ताल ठोक रहे हैं. इसके अलावा कांग्रेस के ग़ुलाम अहमद राठेर, नेशनल कॉन्फ्रेंस के राधेश्याम शर्मा, कांग्रेस के रमेश चंद्र शर्मा, नेशनल कॉन्फ्रेंस के बाग़ी उम्मीदवार चौधरी तालिब हुसैन और मोहम्मद शरीफ़ तारिक़ और कांग्रेस के विद्रोही प्रत्याशी अशोक कुमार शर्मा भी मैदान में हैं. दो महिला उम्मीदवार बहुजन समाज पार्टी की शेराज़ बेग़म और मोहिंदर कौर (निर्दलीय) भी अपना भाग्य आजमा रही हैं. पहले चरण में 17 नवंबर को राज्य विधानसभा की 10 सीटों के लिए मतदान हुआ था. छठे चरण की अधिसूचना इस बीच, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा ने 17 दिसंबर को होने वाले छठे चरण के मतदान के लिए अधिसूचना जारी कर दी है. श्रीनगर में सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि छठे चरण में 16 विधानसभा क्षेत्रों के लिए वोट डाले जाएँगे. इस चरण के लिए 29 नवंबर तक नामांकन दाखिल किए जा सकेंगे. पहली दिसंबर को नामांकन पत्रों की जाँच होगी और प्रत्याशी 3 दिसंबर तक नाम वापस ले सकेंगे. छठे चरण के दौरान 5.6 लाख महिलाओं समेत कुल 11.6 लाख मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे.\n\nSummary:", "target": "जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में रविवार को छह सीटों के लिए मतदान होगा. इस बीच, बारामूला क्षेत्र में मतदान पूर्व हिंसा में दो युवक मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी संवाददाता अल्ताफ़ हुसैन के अनुसार हिंसा की पहली घटना शनिवार को बारामूला के पास ख़ानपुरा में हुई. चुनाव का विरोध कर रही भीड़ ने कांग्रेस प्रत्याशी मीर मुश्ताक के काफिले पर पथराव कर दिया. इस पर मीर मुश्ताक के सुरक्षाकर्मी ने फ़ायरिंग की. फायरिंग में मंज़ूर अहमद की मौत हो गई और कुछ अन्य लोग घायल हो गए. बाद में लोगों की भीड़ मंज़ूर का शव लेकर नारेबाज़ी करते हुए बारामूला के पुराने शहर की ओर बढ़ने लगी. पुलिस ने भीड़ को आगे बढ़ने से रोका और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए बलप्रयोग किया. बेकाबू भीड़ पर नियंत्रण के लिए हुई पुलिस फायरिंग में एक युवक तनवीर अहमद शेख़ की मौत हो गई. हिंसाग्रस्त इस क्षेत्र में अघोषित कर्फ़्यू की स्थिति है. कड़ी चौकसी उधर, दूसरे चरण के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला समेत 81 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. विधानसभा क्षेत्रों गांदरबल, कंगन, डरहल, नौशेरा, राजौरी और कलाकोटे के लगभग 4.94 लाख मतदाता 530 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे. चरमपंथियों के संभावित हमलों को विफल करने और मतदाताओं में बेख़ौफ़ मतदान का भरोसा जगाने के लिए सुरक्षाबल मतदान केंद्रों के आसपास कड़ी चौकसी बरत रहे हैं. दूसरे चरण के क़रीब आधे मतदान केंद्रों को अति संवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है, जबकि शेष मतदान केंद्रों को संवेदनशील माना गया है. गांदरबल मुक़ाबला इस चरण का सबसे दिलचस्प और आकर्षक मुक़ाबला गांदरबल क्षेत्र में है. उमर अब्दुल्ला इस सीट पर पीडीपी के अफ़ज़ल और कांग्रेस के शेख़ इश्फ़ाक़ के ख़िलाफ़ त्रिकोणीय मुक़ाबले में हैं. इसके अलावा इस सीट पर नौ अन्य उम्मीदवार भी मैदान में हैं. अफ़ज़ल ने 2002 में उमर अब्दुल्ला को पराजित किया था. कंगन सीट पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के मियाँ अल्ताफ़ अहमद लगातार चौथी जीत के लिए ताल ठोक रहे हैं. इसके अलावा कांग्रेस के ग़ुलाम अहमद राठेर, नेशनल कॉन्फ्रेंस के राधेश्याम शर्मा, कांग्रेस के रमेश चंद्र शर्मा, नेशनल कॉन्फ्रेंस के बाग़ी उम्मीदवार चौधरी तालिब हुसैन और मोहम्मद शरीफ़ तारिक़ और कांग्रेस के विद्रोही प्रत्याशी अशोक कुमार शर्मा भी मैदान में हैं. दो महिला उम्मीदवार बहुजन समाज पार्टी की शेराज़ बेग़म और मोहिंदर कौर (निर्दलीय) भी अपना भाग्य आजमा रही हैं. पहले चरण में 17 नवंबर को राज्य विधानसभा की 10 सीटों के लिए मतदान हुआ था. छठे चरण की अधिसूचना इस बीच, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा ने 17 दिसंबर को होने वाले छठे चरण के मतदान के लिए अधिसूचना जारी कर दी है. श्रीनगर में सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि छठे चरण में 16 विधानसभा क्षेत्रों के लिए वोट डाले जाएँगे. इस चरण के लिए 29 नवंबर तक नामांकन दाखिल किए जा सकेंगे. पहली दिसंबर को नामांकन पत्रों की जाँच होगी और प्रत्याशी 3 दिसंबर तक नाम वापस ले सकेंगे. छठे चरण के दौरान 5.6 लाख महिलाओं समेत कुल 11.6 लाख मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 423, "source_item_id": "423", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2515, "clean_index": 381, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:381"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयोगी आदित्यनाथ ने पुरुलिया में एक रैली को आख़िरकार संबोधित किया. योगी की रैली को लेकर राज्य की ममता बनर्जी सरकार और बीजेपी में टकराव की स्थिति बनी हुई थी. पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने योगी के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं दी थी. रैली को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा, ''गर्व से कहो हम हिन्दू हैं. पश्चिम बंगाल की धरती भारतीय जनता पार्टी की धरती होनी चाहिए क्योंकि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी यहीं के थे.'' योगी ने कहा, ''बंगाल की अराजक और अलोकतांत्रिक ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ हमारे कार्यकर्ताओं ने जो मोर्चा खोला है उसका हम स्वागत करते हैं. मोदी जी ने देश में परिवर्तन की जो मुहिम पूरे देश में चलाई है उसका फ़ायदा पश्चिम बंगाल की जनता को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि टीएमसी के गुंडे पैसे खा जा रहे हैं. टीएमसी ग़रीबों की योजनाओं को रोक रही है.'' योगी ने रैली सरकार पर हिन्दुओं और मुसलमानों के त्योहारों में भेदभाव का भी आरोप लगाया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा, ''पश्चिम बंगाल की सरकार ने मुहर्रम के कारण दुर्गा पूजा के कार्यक्रमों को रोका. भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी तो टीमएमसी के गुंडो की खैर नहीं रहेगी. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी तो एसपी और बीएसपी के गुंडे जान की भीख मांगने लगे.'' योगी ने कहा, ''मोदी जी ग़रीबों के खाते में सीधे पैसे डाल रहे हैं. प्रधानमंत्री को पता था कि सीधे पैसे नहीं डाले जाएंगे तो टीएमसी के गुंडे खा जाएंगे.'' पश्चिम बंगाल में हेलिकॉप्टर लैंड करने की अनुमति न मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सड़क मार्ग से पुरुलिया 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'हिंदुत्व की राजनीति जीत रही है' सीबीआई शारदा चिट फंड मामले में राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहती थी. लेकिन वहाँ पहुँचे सीबीआई अधिकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया और अब कोर्ट ने राजीव कुमार से कहा है कि वे सीबीआई से सहयोग करें. साथ ही सीबीआई को भी अदालत ने कहा है कि वो राजीव कुमार को गिरफ़्तार नहीं कर सकती. राजीव कुमार से पूछताछ पश्चिम बंगाल से बाहर शिलांग में होगी. हालांकि केंद्र सरकार के रवैए से नाराज़ ममता बनर्जी अभी धरने पर बैठी हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पश्चिम बंगाल में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैली पर दिन भर नाटकीय घटनाक्रम चलता रहा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयोगी आदित्यनाथ ने पुरुलिया में एक रैली को आख़िरकार संबोधित किया. योगी की रैली को लेकर राज्य की ममता बनर्जी सरकार और बीजेपी में टकराव की स्थिति बनी हुई थी. पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने योगी के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं दी थी. रैली को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा, ''गर्व से कहो हम हिन्दू हैं. पश्चिम बंगाल की धरती भारतीय जनता पार्टी की धरती होनी चाहिए क्योंकि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी यहीं के थे.'' योगी ने कहा, ''बंगाल की अराजक और अलोकतांत्रिक ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ हमारे कार्यकर्ताओं ने जो मोर्चा खोला है उसका हम स्वागत करते हैं. मोदी जी ने देश में परिवर्तन की जो मुहिम पूरे देश में चलाई है उसका फ़ायदा पश्चिम बंगाल की जनता को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि टीएमसी के गुंडे पैसे खा जा रहे हैं. टीएमसी ग़रीबों की योजनाओं को रोक रही है.'' योगी ने रैली सरकार पर हिन्दुओं और मुसलमानों के त्योहारों में भेदभाव का भी आरोप लगाया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा, ''पश्चिम बंगाल की सरकार ने मुहर्रम के कारण दुर्गा पूजा के कार्यक्रमों को रोका. भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी तो टीमएमसी के गुंडो की खैर नहीं रहेगी. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी तो एसपी और बीएसपी के गुंडे जान की भीख मांगने लगे.'' योगी ने कहा, ''मोदी जी ग़रीबों के खाते में सीधे पैसे डाल रहे हैं. प्रधानमंत्री को पता था कि सीधे पैसे नहीं डाले जाएंगे तो टीएमसी के गुंडे खा जाएंगे.'' पश्चिम बंगाल में हेलिकॉप्टर लैंड करने की अनुमति न मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सड़क मार्ग से पुरुलिया पहुँचे. ममता बनर्जी की अगुआई वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने पहले भी योगी आदित्यनाथ के हेलिकॉप्टर को लैंड नहीं होने दिया था. पुरुलिया में हेलिकॉप्टर लैंड होने की अनुमति नहीं मिलने के बाद योगी आदित्यनाथ सड़क मार्ग से पश्चिम बंगाल पहुँचे. उनके हेलिकॉप्टर ने झारखंड के बोकारो में लैंड किया और फिर उनका काफ़िला पुरुलिया पहुँचा. कुंभ में डुबकी लगाने वाले पहले CM हैं योगी? योगी की हार पर क्या बोले गोरखपुर के लोग? लखनऊ से रवाना होने से पहले योगी आदित्यनाथ ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए और ममता बनर्जी की सरकार पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगाया. साथ ही उन्होंने ममता बनर्जी सरकार पर हिंसा को बढ़ावा देने और भ्रष्टाचार का भी आरोप लगाया. तीन फ़रवरी को योगी आदित्यनाथ उत्तरी दिनाजपुर ज़िले के रायगंज और दक्षिणी दिनाजपुर ज़िले के बालुरघाट में रैली करने वाले थे, लेकिन राज्य सरकार ने उनके हेलिकॉप्टर को लैंड करने की अनुमति नहीं दी, जिसके बाद योगी आदित्यनाथ ने मोबाइल से रैली में आए लोगों को संबोधित किया. हाल ही में कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ को लेकर काफ़ी बवाल हुआ था. नज़रिया: 'हिंदुत्व की राजनीति जीत रही है' सीबीआई शारदा चिट फंड मामले में राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहती थी. लेकिन वहाँ पहुँचे सीबीआई अधिकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया और अब कोर्ट ने राजीव कुमार से कहा है कि वे सीबीआई से सहयोग करें. साथ ही सीबीआई को भी अदालत ने कहा है कि वो राजीव कुमार को गिरफ़्तार नहीं कर सकती. राजीव कुमार से पूछताछ पश्चिम बंगाल से बाहर शिलांग में होगी. हालांकि केंद्र सरकार के रवैए से नाराज़ ममता बनर्जी अभी धरने पर बैठी हैं. 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(डियर दुनिया) जापान से सौ साल पहले लाए गए चेरी ब्लॉज़म के पेड़ अपनी गुलाबी चादर वाशिंगटन पर फैलाने के लिए बेताब हैं. एक हफ़्ते में फिर से बर्फ़ पड़े या बर्फ़ीली बारिश हो, ये शहर गुलाबी हो उठेगा. चेरी ब्लॉज़म पार्टियां होंगी, परेड होंगी, निगोड़ी ठंड को झटकने की क़वायद होगी. फूलों से ज़्यादा प्यारा तोहफ़ा शायद कुछ और नहीं होता. लेकिन ज़रा सोचिए जिस देश ने हज़ारों चेरी ब्लॉज़म के पेड़ अमरीका भेजे, उसी देश ने 1941 के दिसंबर में पर्ल हार्बर पर बम बरसाया और अमरीका को विश्व युद्ध में घसीट लिया. निरपेक्ष राजनीति अमरीका में रह रहे एक लाख से ज़्यादा जापानी मूल के लोगों को राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के फ़रमान पर घरों से निकालकर कैंपों में क़ैद कर दिया गया. उनमें से दो तिहाई अमरीकी नागिरक बन चुके थे. (दिवालिया होने की कहानी) कहते हैं कुछ लोगों ने अपना ग़ुस्सा चेरी ब्लॉज़म पर भी उतारा और कुछ पेड़ काट दिए गए. लेकिन बाक़ी बचे पेड़ों में फूल फिर भी खिले. उनकी राजनीति हमेशा से निरपेक्ष रही है. चार साल बाद अमरीका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराया. वाशिंगटन में दो साल तक चेरी ब्लॉज़म फ़ेस्टिवल नहीं मनाया गया लेकिन ये मूक पेड़ फिर भी अपनी ज़िद पर अड़े रहे, फूल खिलाते रहे, गुलाबियत बिखेरते रहे. एक ख़ास बात और हुई. युद्ध के बाद जब जापान के ही कई शहरों में इन पेड़ों का नामोनिशान मिट गया तो फिर अमरीका से भी कुछ डंठलें भेजी गईं जो अब फिर से वहां जड़ जमा चुकी हैं, फल-फूल रही हैं. जापानी पीढ़ियां 1945 के उस ज़ख़्म को और कड़वाहट को भूल गई होंगी ऐसा तो नहीं है. लेकिन इतने वीभत्स अमरीकी हमले के बाद आज जापान और अमरीका निकटतम सहयोगियों में गिने जाते हैं. भारत-पाक रिश्ते मुझे यक़ीन है कहीं न कहीं चेरी ब्लॉज़म की गुलाबियत ने आपसी घावों पर मरहम लगाने और सहलाने का काम ज़रूर किया होगा. (वाशिंगटन में टैक्सी पॉलिटिक्स) दो और देश भी हैं जिन्होंने 1947 से ही ज़ख़्म पाल रखे हैं, चार लड़ाइयां लड़ चुके हैं और आज भी एक दूसरे का गला काटने को तत्पर हैं. सीमा पर अभी भी हर रोज़ पांव पटक-पटक कर धरती-फाड़ परेड होती है, अवाम को युद्ध गर्जना सुनाई जाती है. वहां कई लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर अमन तलाशने की कोशिशें की हैं लेकिन नाकामयाब रहे. एक बार फूलों को आज़माने में क्या बुराई है? चेरी ब्लॉज़म न सही, गुलमोहर के ही पेड़ वहां लगा दिए जाएं तो उनकी लाली और छांव शायद कुछ कमाल दिखा दें. एक आइडिया भर है. चुनावी मौसम में नागवार गुज़रे तो भूल-चूक माफ़. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "वाशिंगटन में इस हफ़्ते पड़ी बर्फ़ काफ़ी हद तक पिघल गई है लेकिन बिजली के तारों और पेड़ों में फंसे बेरंग होते पतंगों की तरह कुछ धब्बे, कुछ टुकड़े अभी भी न पिघलने की ज़िद पर अड़े हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन इस ज़िद्दी बर्फ़ीले कचरे को मानो मुंह चिढ़ाते हुए वसंत ने अपने आने का औपचारिक एलान कर दिया है. 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(वाशिंगटन में टैक्सी पॉलिटिक्स) दो और देश भी हैं जिन्होंने 1947 से ही ज़ख़्म पाल रखे हैं, चार लड़ाइयां लड़ चुके हैं और आज भी एक दूसरे का गला काटने को तत्पर हैं. सीमा पर अभी भी हर रोज़ पांव पटक-पटक कर धरती-फाड़ परेड होती है, अवाम को युद्ध गर्जना सुनाई जाती है. वहां कई लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर अमन तलाशने की कोशिशें की हैं लेकिन नाकामयाब रहे. एक बार फूलों को आज़माने में क्या बुराई है? चेरी ब्लॉज़म न सही, गुलमोहर के ही पेड़ वहां लगा दिए जाएं तो उनकी लाली और छांव शायद कुछ कमाल दिखा दें. एक आइडिया भर है. चुनावी मौसम में नागवार गुज़रे तो भूल-चूक माफ़. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पेशावर के एयरबेस पर हुए हमले और भारत-पाक तल्ख़ी के अलावा अमरीकी बच्चे अहमद की पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बीते हफ़्ते ख़ासी चर्चा रही.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n‘एक्सप्रेस’ अख़बार का संपादकीय है, 'अमरीका में एक मुसलमान लड़के की वाहवाही.' अख़बार लिखता है कि 14 वर्षीय अहमद ने तो अपनी बनाई घड़ी ये सोचकर टीचर को दिखाई कि शाबाशी मिलेगी, लेकिन गोरे टीचर ने उसे बम समझकर अहमद को पुलिस के हवाले कर दिया. अख़बार के मुताबिक़, जब जांच में पता चला कि वो बम नहीं, बल्कि नए तरीक़े की डिजिटल घड़ी है तो सोशल मीडिया पर अहमद की शोहरत हर तरफ़ फैल गई. अख़बार लिखता है कि अब अहमद को व्हाइट हाउस से लेकर नासा और फ़ेसबुक तक की तरफ़ से अपनी नायाब घड़ी के साथ आने के न्यौते मिल रहे हैं. समाप्त शोहरत की बुलंदियों पर रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने इस सिलसिले में पाकिस्तानी जांच एजेंसियों के तौर तरीक़ों पर सवाल उठाया है. अख़बार लिखता है कि अगर अहमद को पाकिस्तान में इस संदेह में गिरफ़्तार किया जाता तो घड़ी बम तो छोड़ो एक तरफ़, उससे तोप भी बरामद कर ली जाती. अख़बार ने इस मामले को मिसाल बताते हुए पाकिस्तानी जांच एजेंसियों को इससे सबक़ लेने की नसीहत दी है. वहीं ‘उम्मत’ ने अहमद को नासा की तरफ़ से स्कॉलरशिप दिए जाने की ख़बर को प्रमुखता से छापा है. अख़बार लिखता है कि अमरीकी टीचरों के नस्लवाद और नफ़रत भरे सलूक ने अहमद को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है. बातचीत की बात ‘नवा-ए-वक़्त’ ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ के इस बयान को तवज्जो दी है कि न्यूयॉर्क में पाकिस्तान और भारत के प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात तभी हो सकती है, जब भारत इसके लिए दरख़्वास्त करेगा. रोज़नामा ‘इंसाफ़’ कहता है कि अगर भारत मुलाक़ात की बात करता है तो पाकिस्तान को कश्मीर पर बातचीत की शर्त रखनी चाहिए क्योंकि इसी तरह पाकिस्तान अपनी पक्ष को सही और मज़बूती से रख सकता है. दोनों देशों के बीच तनाव पर ‘जसारत’ लिखता है कि जब से भारत में मोदी सरकार बनी है, उसकी पहली प्राथमिकता यही दिखती कि कश्मीर समस्या को ख़त्म कर दिया जाए और नियंत्रण रेखा को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा बना दिया जाए. दूसरी तरफ़, पिछले दिनों पाकिस्तानी वायुसेना के एक ठिकाने पर हुए हमले पर ‘मशरिक़’ का संपादकीय है, 'पेशावर पर ख़ौफ़ के साए.' अख़बार लिखता है कि पोलियो की दवा पिलाने वाली टीमों पर हमले तो आम बात बन गए हैं, बावजूद इसके सैन्य बेस पर हमला बताता है कि जब तक रणनीति आला दर्जे की नहीं होगी, तब तक कुछ नहीं, भले ही सड़कों पर कितने भी पुतले खड़ कर लिए जाएं. चुनावी तस्वीर पर नज़रें रुख़ भारत का करें तो बिहार के आगामी चुनाव पर ‘जदीद ख़बर’ का संपादकीय है, 'कांटे की टक्कर.' अख़बार लिखता है कि चुनावी लड़ाई में आरजेडी और कांग्रेस को साथ लेकर नीतीश कुमार ने बीजेपी के कैंप में सनसनी फैला दी और इसीलिए प्रधानमंत्री को बिहार के लिए बड़े पैकेज का एलान करना पड़ा. अख़बार की टिप्पणी है कि ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देने वाले मोदी की छवि अब सिर्फ़ बात करने वाले प्रधानमंत्री की रह गई है. अख़बार लिखता है कि शुरुआती सर्वेक्षणों में तो नीतीश को बीजेपी से आगे दिखाया जा रहा है, लेकिन देखना है कि आगे आगे बिहार में कैसी चुनावी तस्वीर उभरती है. वहीं ‘क़ौमी तंज़ीम’ ने बिहार के चुनाव को कांग्रेस का इम्तिहान बताया है. अख़बार ने आंकड़ों के साथ राज्य में कांग्रेस की घटती ताक़त का ब्यौरा देते हुए लिखा है कि इसके बाद या तो ख़ात्मे का सफ़र होगा या वापसी का. ‘छोटी सोच’ ‘हमारा समाज’ ने मराठी बोलने वालों को ही ऑटो रिक्शा का लाइसेंस देने के महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले की ओलचना की है. अख़बार ने इसे छोटी सोच बताते हुए लिखा है कि इसका मक़सद यही है कि राज्य में मराठी न बोलने वालों को काम न मिले. अख़बार कहता है कि ये फ़ैसला संविधान की उस व्याख्या के विपरीत है जो लोगों को देश में कहीं भी जाकर बसने और काम करने का हक़ देती है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "एक मां को लंदन के हवाई अड्डे पर अपना क़रीब 14 लीटर ब्रेस्ट मिल्क नष्ट करना पड़ा जिसपर उन्होंनें शर्म और खीझ ज़ाहिर की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़ेसबुक पर पोस्ट किए एक खुले ख़त में अमरीकी नागरिक जेसिका कोकले मार्टिनेज़ ने लिखा कि वे अपने 8 महीने के बेटे के बिना सफ़र कर रही थीं. उन्होंने लिखा, \"आपने मुझे अपने बेटे के लिए लगभग दो सप्ताह के लिए पर्याप्त खाना फेंकने के लिए मजबूर किया.\" हीथ्रो एयरपोर्ट के अधिकारियों का कहना है कि सरकार के नियमों के अनुसार विमान में तरल पदार्थ ले जाने संबंधी ब्रितानी सरकार के नियम उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं. यातायात विभाग की वेबसाइट के मुताबिक़ तरल पदार्थ का सिर्फ़ 100 एमएल या उससे कम मात्रा छोटी पारदर्शी बोतलों में सील किए जाने योग्य बैग में ले जाया जा सकता है. समाप्त वेबसाइट के मुताबिक़ बच्चों का दूध ले जाने की अनुमति है लेकिन उसके लिए बच्चे को मां के साथ होना चाहिए. मार्टिनेंज़ का कहना है कि वे मानती हैं कि उन्हें नियम देख लेने चाहिए थे. लेकिन \"इस तरह के नियम उनके जैसी काम करने वाली महिलाओं के साथ भेदभाव करने जैसे हैं.\" वे कहती हैं \"अपना दूध फेंक देने के कारण अब अपने बच्चे का पेट भरने में मुझे दिक़्क़त होगी. अब मेरे पास अपना दूध देने के बाद उसे बाहर का खाना भी देना होगा. क्योंकि मेरे पास उस समय के लिए दूध नहीं है जब मैं काम पर जाउंगी.\" उन्होंने लिखा, \"एक काम करने वाली मां होते हुए मैंने बहुत मुश्किल से ये सुनिश्चित किया कि मैं अपने काम और बच्चे को वो दे सकूं जो उन्हें चाहिए. लेकिन केवल एक ही दोपहर में आपने मेरे लिए ये ऐसा कर पाना नामुमकिन हो गया है.\" मार्टिनेज़ ने लिखा, \"सुरक्षा आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए लेकिन आपका उद्देश्य सिर्फ़ यही नहीं होना चाहिए और ये तो निश्चित रूप से नहीं होना चाहिए कि आप उन्हीं लोगों को सज़ा दें जिन्हें सुरक्षा देना आपकी मंशा है.\" वे कहती हैं कि उनके बच्चे का भोजन छीने जाने के अलावा उन्हें इस पूरे मामले में शर्मिंदा होना पड़ा और उन्हें लगा कि एक मां और एक कामकाजी महिला के नाते वे पूरी तरह हार गई हैं. 2006 में सात ट्रांस एटलांटिक विमानों को उड़ाने की साज़िश का पर्दाफ़ाश होने के बाद से तरल पदार्थों के लेकर ब्रिटेन में सुरक्षा नियम सख़्त किए गए थे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने उनकी मूर्तियां बनाने से संबंधित एक याचिका का उत्तर देते हुए सवाल किया है कि अयोध्या में 221 मीटर राम की मूर्ति बनने से किसी को कोई ऐतराज़ क्यों नहीं हुआ?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमायावती ने यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी और अन्य दलित नेताओं की मूर्तियां बनवाई थीं. इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है. द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ अब मायावती की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथपत्र में पूछा गया है कि जब अयोध्या में राम की 221 मीटर ऊंची मूर्ति बनाने का प्रस्ताव दिया गया तो कोई आपत्ति क्यों नहीं की गई. अपने शपथ पत्र में मायावती ने कहा है कि जाने माने लोगों की मूर्तियां लगवाना और उनकी यादें ताज़ा रखना भारत में कोई नई बात नहीं है. उन्होंने कहा कांग्रेस के शासनकाल में देशभर में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की मूर्तियां जनता के पैसों से लगवाई गई थीं. लेकिन न तो मीडिया ने कोई आपत्ति की न ही याचिकाकर्ता ने. नाबालिग बेटियों की हत्या कर पत्नी को भेजी तस्वीर महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक शिक्षक ने अपनी दो नाबालिग बेटियों की हत्या करके तस्वीरें व्हाट्सएप पर अपनी पत्नी को भेज दीं और बाद में ख़ुद भी जान दे दी. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेशे से शिक्षक कोपाल सी कुडुपल्ली की पत्नी उनसे अलग रह रहीं थीं और वो इससे परेशान चल रहे थे. मंगलवार सुबह उन्होंने अपनी छह साल और 18 महीने की बेटियों की हत्या कर दी और तस्वीर व्हाट्सएप पर पत्नी को भेज दी और बाद में अपनी जान भी दे दी. कुडुपल्ली की पत्नी कुछ महीने पहले शाहनवाज़ ख़ान नाम के एक युवक के साथ चली गईं थी जिससे वो बहुत आहत थे. प्रतिबंध के बाद रफ़ाल पर किताब हो गई लांच चुनावी उड़नदस्ते ने चैन्ने में कथित रफ़ाल घोटाले पर लिखी गई किताब के विमोचन को रोकने की ख़बर द हिंदू अख़बार में छपी है. बाद में प्रकाशक चुनाव आयोग से किताब जारी करने की अनुमति लेने में कामयाब रहे और कुछ घंटे बाद ही किताब जारी कर दी गई. द हिंदू अख़बार ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि चुनाव आयोग ने उड़नदस्ते में शामिल लोगों को इसके बाद ड्यूटी से हटा दिया है और कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. दलित की हत्या का अभियुक्त लड़ना चाहता है चुनाव बीते साल दो अप्रैल को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुई हिंसा में 23 साल की दलित युवा दीपक जाटव की मौत हो गई थी. वो अपने पिता की चाय की दुकान के पास खड़े थे कि उच्च जाति के समूह ने हमला कर दिया. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक दीपके के परिवार ने अब बंदूकों के पांच लाइसेंसों के लिए आवेदन दिए हैं. वहीं हत्या में शामिल एक अभियुक्त राजा सिंह चौहान अब लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. 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नसबंदी करवाने और राजीव गांधी को बाबरी मस्जिद में शिलान्यास कराने की सज़ा दी है. चटपटापन और सनसनी मीडिया की कमज़ोरी है और आज़म ख़ान इस कमज़ोरी से ख़ूब वाक़िफ़ हैं. ऐसे ऐसे राज़ खोलते हैं कि मुंह खुला रह जाए. ऐसे मुंह को तो अल्लाह ताला ही ताला लगाए तो लगे. जैसे यही कि करगिल की चोटियां हिंदुओं ने नहीं, मुसलमान सिपाहियों ने फतह की थीं और नेताजी की सालगिरह की फंडिंग तालिबान और दाउद इब्राहिम ने की थी, इत्यादि, इत्यादि. समाप्त ताज़ा ख़बर आज़म ख़ान ने ये फोड़ी है कि दाउद इब्राहिम से नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात लाहौर में नवाज़ शरीफ़ के घर पर हुई थी. अब कम से कम बरखा दत्त को इतनी बड़ी ख़बर मिस करने पर आज़म ख़ान के चरण छू ही लेने चाहिए. मगर आज़म ख़ान ने भी पूरी बात नहीं बताई, शायद ये सोचकर नहीं बताई कि कल को क्या बताएंगे और परसों को क्या बेचेंगे. मैं बताता हूँ कि लाहौर में हुआ क्या? मोदी-दाउद इब्राहिम की मुलाकात की ख़बर आईएसआई ने रॉ को दी और रॉ ने ये ख़बर आज़म ख़ान को बता दी, क्योंकि प्रधानमंत्री को ये बताने का कोई फ़ायदा था नहीं कि उनकी मुलाक़ात दाउद इब्राहिम से भी हुई है. इस मुलाकात में मोदी ने वादा किया कि अगर दाउद भाई घर वापसी योजना के तहत घर वापस आ जाएं, तो अदालत उन्हें जो भी सज़ा दे, परवाह नहीं. वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के जरिए माफ़ करवा देंगे. धुले धुलाए दाउद इब्राहिम अगले यूपी चुनाव में बीजेपी के टिकट पर रामपुर से आज़म ख़ान के मुक़ाबले में जितवाने के बाद, उन्हें यूपी मंत्रालय में सीनियर मंत्री बना देंगे. अगर बीजेपी यूपी में सरकार नहीं बना पा सकी, तो दाउद इब्राहिम के लिए फिर भी यूपी विधानसभा में विपक्ष के नेता की जगह पक्की. इससे ना केवल आज़म ख़ान की राजनीति को धक्का लगेगा बल्कि पाकिस्तान के साथ संबंधों पर भी अच्छा असर पड़ेगा. ऐसी योजनाओं से कांफिडेंस बिल्डिंग बढ़ेगी और फिर दोनों देश हंसी ख़ुशी एक दूसरे पर वॉर करते रहेंगे. तो ये है सारा चक्कर, जिसकी वजह से आज़म ख़ान मोदी सरकार पर इतने गर्म चल रहे हैं. वैसे हमारे पास भी आज़म ख़ान की टक्कर का एक राजनैतिक अभिनेता शेख रशीद के नाम से मीडिया की डार्लिंग है. शेख साहब की चमत्कारियों का बयान फिर सही. अभी तो ग़ालिब का ये शेर सुनते जाएं- बक रहा हूं जुनूं में क्या क्या कुछ, कुछ ना समझे ख़ुदा करे कोई.\n\nSummary:", "target": "रामपुर की दो चीजें मशहूर हैं. चाकू और आज़म ख़ान.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआश्चर्यजनक बात ये है कि ऐसा नेता जिसने क़ानून की शिक्षा की हो, चार पार्टियां बदली हों, 1980 से आठवीं बार विधानसभा का सदस्य हो, पांचवीं बार मंत्री हो, एक बार विपक्ष का नेता रहा हो, उसे फिर भी इतनी रेटिंग क्यों चाहिए कि ख़बरों में रहने के लिए वह एक ब्यूरोक्रेट को भरी सभा में बकवास बंद करो, बदतमीज़ कहीं के, कह दे. चुनाव आयोग को इस बात पर नकार दे कि मुझे मुसलमान होने की सज़ा दी जा रही है और कहे कि अल्लाह ने संजय को मुसलमानों की नसबंदी करवाने और राजीव गांधी को बाबरी मस्जिद में शिलान्यास कराने की सज़ा दी है. चटपटापन और सनसनी मीडिया की कमज़ोरी है और आज़म ख़ान इस कमज़ोरी से ख़ूब वाक़िफ़ हैं. ऐसे ऐसे राज़ खोलते हैं कि मुंह खुला रह जाए. ऐसे मुंह को तो अल्लाह ताला ही ताला लगाए तो लगे. जैसे यही कि करगिल की चोटियां हिंदुओं ने नहीं, मुसलमान सिपाहियों ने फतह की थीं और नेताजी की सालगिरह की फंडिंग तालिबान और दाउद इब्राहिम ने की थी, इत्यादि, इत्यादि. समाप्त ताज़ा ख़बर आज़म ख़ान ने ये फोड़ी है कि दाउद इब्राहिम से नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात लाहौर में नवाज़ शरीफ़ के घर पर हुई थी. अब कम से कम बरखा दत्त को इतनी बड़ी ख़बर मिस करने पर आज़म ख़ान के चरण छू ही लेने चाहिए. मगर आज़म ख़ान ने भी पूरी बात नहीं बताई, शायद ये सोचकर नहीं बताई कि कल को क्या बताएंगे और परसों को क्या बेचेंगे. मैं बताता हूँ कि लाहौर में हुआ क्या? मोदी-दाउद इब्राहिम की मुलाकात की ख़बर आईएसआई ने रॉ को दी और रॉ ने ये ख़बर आज़म ख़ान को बता दी, क्योंकि प्रधानमंत्री को ये बताने का कोई फ़ायदा था नहीं कि उनकी मुलाक़ात दाउद इब्राहिम से भी हुई है. इस मुलाकात में मोदी ने वादा किया कि अगर दाउद भाई घर वापसी योजना के तहत घर वापस आ जाएं, तो अदालत उन्हें जो भी सज़ा दे, परवाह नहीं. वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के जरिए माफ़ करवा देंगे. धुले धुलाए दाउद इब्राहिम अगले यूपी चुनाव में बीजेपी के टिकट पर रामपुर से आज़म ख़ान के मुक़ाबले में जितवाने के बाद, उन्हें यूपी मंत्रालय में सीनियर मंत्री बना देंगे. अगर बीजेपी यूपी में सरकार नहीं बना पा सकी, तो दाउद इब्राहिम के लिए फिर भी यूपी विधानसभा में विपक्ष के नेता की जगह पक्की. इससे ना केवल 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रुस ने गैस की सप्लाई बहाल की है लेकिन यूक्रेन गैस यूरोपीय देशों में पहुँचाने में विफल रहा है. उधर यूक्रेन का कहना है कि रुस ने गैस सप्लाई के लिए बने रुट को बदल दिया है. रुस-यूक्रेन बॉर्डर के पास पंपिग स्टेशन से बीबीसी के संवाददाता का कहना है कि दोनों देशों के बीच इस नए विवाद से स्पष्ट दिखता है कि अविश्वास किस हद तक बढ़ गया है. दोनों देश कर्ज़ और गैस की कीमत को लेकर उपजे मतभेद को सुलझाने में विफल रहे हैं. ग़ौरतलब है कि रुस ने पिछले बुधवार को यूरोपीय देशों को गैस की आपूर्ति यह कहते हुए रोक दी थी कि यूरोपीय उपभोक्ताओं के लिए दी जाने वाली गैस की चोरी यूक्रेन कर रहा है. गैज़प्रॉम के पिछले एक हफ़्ते से गैस की सप्लाई बंद करने से लाखों घरों में गैस की आपूर्ति बाधित हो रही है जिससे अनेक लोग कड़ाके की ठंड झेलने को मजबूर हैं. निगरानी हालांकि सोमवार को रुस ने गैस आपूर्ति को चालू करने की बात की थी. उसका कहना था कि रुस और यूरोपीय देशों के पर्यवेक्षकों को यूक्रेन से जाने वाली गैस रुट की निगरानी करने दी जाए. रुस का कहना है कि बुधवार को सूज़ा पंपिग स्टेशन पर से गैस की आपूर्ति चालू कर दी गई. यूरोपीय देश के पर्यवक्षकों ने भी बाद में इसकी पुष्टि की है. हालांकि उनका कहना था कि यह बेहद कम थी. यूरोपीय देशों में लगभग एक चौथाई गैस की आपूर्ति रुस से होती है जिसका 80 प्रतिशत हिस्सा यूक्रेन से होकर ही जाता है. मेदवेदेव का कहना है कि गैज़प्रॉम ने यूरोपीय संघ को इस बात की सूचना दे दी है कि वह यूक्रेन के रास्ते गैस की आपूर्ति करने में असमर्थ है क्योंकि यूक्रेन ने कोई निर्यात पाइप लाईन नहीं खोल रखी है. इस विवाद की वजह से मध्य यूरोप के 15 से ज्यादा देश प्रभावित हैं.गैस सप्लाई बाधित होने से सबसे अधिक प्रभावित देशों में सर्बिया और बोस्निया-हर्ज़ेगोविना हैं.\n\nSummary:", "target": "रुस की गैस कंपनी गैज़प्रॉम का कहना है कि यूक्रेन ने यूरोपीय देशों की गैस सप्लाई रोक रखी है. इसके बाद अब गैस आपूर्ति विवाद का कोई हल निकलना मुश्किल दिख रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nगैज़प्रॉम के उप प्रमुख अलेक्जेंडर मेदवेदेव का कहना है कि रुस ने गैस की सप्लाई बहाल की है लेकिन यूक्रेन गैस यूरोपीय देशों में पहुँचाने में विफल रहा है. उधर यूक्रेन का कहना है कि रुस ने गैस सप्लाई के लिए 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जेडीयू से बातचीत हो गई है और उनसे समझ बन गई है. 'होगा एक और कैबिनेट विस्तार' जेडीयू के पास दो सांसद हैं. बीजेपी के 18 सांसद हैं. अभी टीडीपी है, और पार्टियां हैं. दक्षिण से इन्हें एक पार्टी को लेना ही है. एआईएडीएमके का आना लगभग तय है, लेकिन वहीं चूंकि स्थिति अभी बहुत उलझी हुई है और तय नहीं है कि कौन-सा गुट सत्ता में रहेगा. जब तक तमिलनाडु में एआईएडीएमके की आंतरिक समस्याएं नहीं सुलझ जातीं, तब तक वहां से किसी को लिया नहीं जा सकता. तब तक इनको शिवसेना और दूसरे सहयोगियों से बात करके फ़ैसला लेना होगा. मैं समझता हूं कि उन बातों को अभी भविष्य के लिए छोड़ दिया गया है. इसलिए मुझे विश्वास है कि मोदी सरकार का चौथा कैबिनेट विस्तार होगा और वह मुख्यत: सहयोगी दलों पर ही केंद्रित होगा. एनडीए ने अब तक जो दिखाया है कि उन्हें भले ही बहुत ज़रूरत नहीं है, लेकिन उनकी आगे के विस्तार की जो योजनाएं और रणनीतियां हैं, उसके मद्देनज़र उन्हें सहयोगी दलों की ज़रूरत है और वह रहने वाली है. 'एआईडीएमके की अनिश्चितता' पलानीसामी इस बार सहयोगी दलों से एक मंत्री भी नहीं बनाया जा सका, इसका एक बड़ा कारण तो तमिलनाडु की अनिश्चित स्थिति ही है. किसी एक सहयोगी दल से मंत्री बना लेते और बाद में फिर एआईएडीएमके के लिए कोई दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार किया जाता, उससे उलझनें और बढ़तीं. लेकिन मुझे लगता है कि इन्होंने शिवसेना से संवाद ठीक नहीं रखा है, इसलिए उनको ज़्यादा परेशानी हो रही है और उधर से इस तरह की अभिव्यक्तियां देखने में आ रही हैं. जहां तक लालू यादव की ओर से इस मसले पर नीतीश पर प्रहार की बात है, उनसे प्रशंसा की अपेक्षा तो किसी को नहीं रही होगी. वो विपक्ष में हैं और नीतीश कुमार को चिढ़ाना उनका रोज़ का काम है. मैं उसे बहुत महत्व नहीं देता. एकमात्र जो भाजपा के लिए चिंता वाली बात है, वो शिवसेना का बयान है. टीडीपी का एक बयान आया है चंद्रबाबू नायडू का, लेकिन उसमें आलोचना नहीं है. उसमें यह उम्मीद जताई गई है कि अगले विस्तार में उनके राज्य की ज़रूरतों का ख़्याल रखा जाएगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "केंद्र सरकार के कैबिनेट फेरबदल की दो वजह से ज़्यादा चर्चा है. एक, भारत को निर्मला सीतारमण के रूप में दूसरी महिला रक्षा मंत्री मिली हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउद्धव ठाकरे, नरेंद्र मोदी और दो, इस बार नौ नए मंत्री बनाए गए, लेकिन उनमें एक भी भाजपा के सहयोगी दलों से नहीं था. हाल ही में राजद और कांग्रेस से हाथ छुड़ाकर एनडीए के साथ आने वाली जदयू से भी किसी को मंत्री नहीं बनाया गया. शिवसेना की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रिया आई है. उनके प्रवक्ता संजय राउत ने कहा है कि एनडीए अब लगभग मर चुका है. उधर जेडीयू को मंत्री पद न मिलने पर आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव ने चुटकी ली है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, 'दो नाव पर चलना और टांग फट कर मरना. नीतीश दो नाव की सवारी कर रहे हैं. ये अपनी ही चालाकी में फंस गए.' बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव से बात की और पूछा कि क्यों कहा जा रहा है कि कैबिनेट फेरबदल में सहयोगी दलों को बेदख़ल कर दिया गया? आगे पढ़िए राहुल देव की राय: संजय राउत मैं नहीं समझता कि सहयोगी दलों से कोई मंत्री न बनाकर उन्हें बेदख़ल कर दिए जाने जैसी कोई बात है. यह तो विरोधियों की कही हुई बात है. बहुत ज़ाहिर है कि यह बीजेपी तक सीमित कैबिनेट विस्तार था. जैसा मैंने लिखा भी है कि एक विस्तार और होना भी है और वो मैं समझता हूं कि सहयोगी दलों के लिए ही मुख्यत: होगा. दो तीन बातें मुख्य तौर पर याद रखनी चाहिए. शिवसेना की ओर से संजय राउत का बयान आया है कि एनडीए मर चुका है, वगैरह. लेकिन एक बात तो तय है कि जेडीयू से बातचीत हो गई है और उनसे समझ बन गई है. 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है. उस दिन खुलकर ये नहीं बताया गया था कि आख़िर ये जानकारी सलमान रुश्दी को किस ख़ुफ़िया सूत्र से मिली है. पुलिस ने कहा रुश्दी से संपर्क नहीं जयपुर साहित्य समारोह में लोगों की काफ़ी भीड़ उमड़ी है दो दिन बाद अब सलमान रुश्दी ने ट्विटर पर लिखा है कि राजस्थान पुलिस ने उनकी जान को ख़तरा वाली बात बताकर उन्हें गुमराह किया ताकि वो साहित्य महोत्सव में न आ पाएं. लेकिन राजस्थान पुलिस का कहना है कि उनका सलमान रश्दी के साथ किसी माध्यम से कोई संपर्क हुआ ही नहीं है. जयपुर के पुलिस कमिश्नर डीएल सोनी कहते हैं, ‘‘मैं उनके ट्विट पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा लेकिन ये ज़रूर कहना चाहूंगा कि हमने न तो उनको कोई ईमेल भेजा न कोई फ़ैक्स भेजा, उनसे हमारा किसी भी प्रकार का संपर्क हुआ ही नहीं है और हमने यहां पर तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर रखी है.’’ रुश्दी को खतरे की बात किसने बताई? अब सवाल उठता है कि सलमान रुश्दी जिस राजस्थान पुलिस को झूठ बोलने का दोषी ठहरा रहे हैं अगर उसका उनसे कोई संपर्क हुआ ही नहीं तो फिर ख़ुफ़िया ब्यूरो का हवाला देकर उन्हें किसने बताया कि उनकी जान को ख़तरा है. ये बात रविवार को तब सामने आई कि आयोजकों ने ही ये बात तब सलमान रुश्दी को बताई थी और फिर उनका बयान पढ़कर सुनाया गया था कि उनकी जान को ख़तरा है. समारोह के आयोजक संजॉय रॉय कहते हैं, ‘‘ये जानकारी आईबी ने हमें दी और आईबी ने ही हमसे कहा कि ये जानकारी उन्हें दी जाए. उसके बाद ही राजस्थान प्रशासन को सूचित करते हुए ही हमने ये बात सलमान रुश्दी को बताई.’’ सवाल उठता है कि अगर आयोजकों ने ही सलमान रुश्दी को ख़ुफ़िया ब्यूरो के हवाले से जान को ख़तरे वाली बात बताई थी तो उस दिन सलमान रुश्दी का बयान पढ़े जाते वक़्त आयोजकों ने इसका ज़िक्र क्यों नहीं किया. ऐसा क्यों ज़ाहिर होने दिया गया कि सलमान रुश्दी को ख़ुद महाराष्ट्र और राजस्थान के ख़ुफ़िया सूत्रों से ये जानकारी मिली है. अब सवाल उठता है कि रूश्दी की सुरक्षा क्या वाकई इतनी बड़ी चुनौती थी कि राज्य सरकार उसे संभाल ही नहीं सकती थी. राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, ‘‘सरकार ने उनकी सुरक्षा के पूरे प्रबंध कर रखे थे, ये हमार ड्यूटी है कि केंद्र से अगर कोई एडवाइज़री आती है, किसी भी का भी कोई कार्यक्रम आता है जिसको ख़तरा है तो उसकी सुरक्षा का बंदोबस्त करना हमारा काम है.’’ यानि राज्य 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सबकी गहन पड़ताल होनी चाहिए ताकि सच सामने आ सके.\n\nSummary:", "target": "भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखक सलमान रुश्दी के जयपुर साहित्य महोत्सव में आने से जुड़ा विवाद तूल पकड़ता जा रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउनके न आने को लेकर नई-नई जानकारियां सामने आ रही हैं. सलमान रुश्दी ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा है कि राजस्थान पुलिस नहीं चाहती थी कि वो साहित्य महोत्सव में आएं इसीलिए उन्हें गुमराह किया गया कि उनकी जान को ख़तरा है. दो दिन पहले उन्होंने एक बयान जारी कर कहा था कि महाराष्ट्र और राजस्थान के ख़ुफ़िया सूत्रों से उन्हें ख़बर मिली है कि मुंबई अंडरवर्ल्ड के कुछ लोग उन्हें मारने के लिए पैसे लेकर निकल चुके हैं. हालांकि उन्हें इसके सही होने का पूरा यक़ीन नहीं है. उस दिन खुलकर ये नहीं बताया गया था कि आख़िर ये जानकारी सलमान रुश्दी को किस ख़ुफ़िया सूत्र से मिली है. पुलिस ने कहा रुश्दी से संपर्क नहीं जयपुर साहित्य समारोह में लोगों की काफ़ी भीड़ उमड़ी है दो दिन बाद अब सलमान रुश्दी ने ट्विटर पर लिखा है कि राजस्थान पुलिस ने उनकी जान को ख़तरा वाली 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सलमान रुश्दी को बताई.’’ सवाल उठता है कि अगर आयोजकों ने ही सलमान रुश्दी को ख़ुफ़िया ब्यूरो के हवाले से जान को ख़तरे वाली बात बताई थी तो उस दिन सलमान रुश्दी का बयान पढ़े जाते वक़्त आयोजकों ने इसका ज़िक्र क्यों नहीं किया. ऐसा क्यों ज़ाहिर होने दिया गया कि सलमान रुश्दी को ख़ुद महाराष्ट्र और राजस्थान के ख़ुफ़िया सूत्रों से ये जानकारी मिली है. अब सवाल उठता है कि रूश्दी की सुरक्षा क्या वाकई इतनी बड़ी चुनौती थी कि राज्य सरकार उसे संभाल ही नहीं सकती थी. राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, ‘‘सरकार ने उनकी सुरक्षा के पूरे प्रबंध कर रखे थे, ये हमार ड्यूटी है कि केंद्र से अगर कोई एडवाइज़री आती है, किसी भी का भी कोई कार्यक्रम आता है जिसको ख़तरा है तो उसकी सुरक्षा का बंदोबस्त करना हमारा काम है.’’ यानि राज्य सरकार की तरफ से सुरक्षा की पूरी तैयारी थी. तब फिर ख़ूफ़िया ब्यूरो वाली बात क्या जानबूझकर सामने लाई गई ताकि वो न आएं क्योंकि उनकी तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से आयोजन की सफलता प्रभावित हो सकती थी. बाकी के साहित्यकार नज़रअंदाज़ हो सकते थे. चारों तरफ़ बंदूकधारी सुरक्षाकर्मियों की वजह से महोत्सव में शिरकत करनेवाले आम लोगों की संख्या कम हो सकती थी. 19 जनवरी को आयोजक संजॉय रॉय, नमिता गोखले और विलियम डैलरिंपल ने जो प्रेस कॉन्फ़्रेंस की थी उसमें बताया गया था कि 20 जनवरी के उद्घाटन समारोह में सलमान रूश्दी नहीं आ रहे हैं और अगले कुछ दिन तक भी उनका जयपुर आने का कार्यक्रम नहीं है लेकिन आयोजकों की तरफ़ से उनको दिया गया निमंत्रण अभी भी बरकरार है. लेकिन आगे एक और बात संजॉय रॉय ने कही थी कि ‘‘इस महोत्सव में 258 लेखक और 108 कलाकार हिस्सा ले रहे हैं ये केवल एक लेखक का महोत्सव नहीं है.’’ यानि सलमान रुश्दी नहीं आए तो ये कहीं सबके लिए ‘चित भी हमारी पट भी हमारी’ वाली मिसाल तो नहीं रही. आयोजकों के विरोधाभासी बयान, पुलिस और प्रशासन के रुख, केंद्रीय और राज्य ख़ुफ़िया ब्यूरो से आयोजकों को दी गई जानकारी इन सबकी गहन पड़ताल होनी चाहिए ताकि सच सामने आ सके.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 432, "source_item_id": "432", 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बल्लेबाज़ के रूप में अच्छा खेल दिखाया है. लेकिन पिछले दिनों कप्तान सौरभ गांगुली ने यह बयान दिया कि सलामी बल्लेबाज़ के रूप में युवराज सिंह उनकी पहली पसंद हैं. इसके बाद से ही आकाश चोपड़ा के भविष्य को लेकर प्रश्न चिन्ह लग गया है. सचिन तेंदुलकर ने पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा कि टीम सौरभ गांगुली की कप्तानी में सही दिशा में बढ़ रही है. सचिन ने कहा, \"सौरभ बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं. मैं यह महसूस करता हूँ कि टीम सही दिशा में आगे बढ़ रही है और जब ऐसा है तो किसी बदलाव की कोई ज़रूरत नहीं.\"\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट टीम में टेस्ट मैचों के लिए सलामी बल्लेबाज़ों को लेकर चल रही बयानबाज़ी में अब मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर भी शामिल हो गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकुछ दिनों पहले कप्तान सौरभ गांगुली ने युवराज सिंह को टेस्ट मैचों में वीरेंदर सहवाग के साथ उतारे जाने की पैरवी की थी. बंगलौर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सचिन तेंदुलकर ने कहा कि युवराज सिंह और आकाश चोपड़ा बहुत अच्छे बल्लेबाज़ हैं. सचिन ने कहा, \"मेरे विचार में आकाश चोपड़ा 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पुनर्वास की राज्य सरकार की योजना का हिस्सा है. इस इलाके में पहले दो सौ से ज्यादा हॉकर सड़क के किनारे वीआईपी बाजार में अपनी दुकानें लगाते थे. लेकिन सड़क को चौड़ा करने की वजह से उनकी दुकानें उजड़ गई थीं. उन हॉकरों के पुनर्वास के लिए ही सरकार ने इस झील में बैंकाक की तर्ज पर बाजार बसाने का फैसला किया था. समुद्र में जहाज़ों को रास्ता दिखाती है ये लड़की पूर्वी भारत का पहला बाज़ार कोलकाता की पाटुली झील पर बना यह बाजार पूर्वी भारत का पहला तैरता बाजार है. कोलकाता महानगर विकास प्राधिकरण की ओर से नौ करोड़ की लागत से बनाए गए इस बाजार में फल-सब्जी, मछली और फूलों समेत तक सबकुछ नावों पर ही बिकता है. झील में डेढ़ सौ से भी ज्यादा नावों में तरह-तरह के सामान बिकते हैं. पांच सौ मीटर लंबे और 60 मीटर चौड़े इस बाजार में खरीददारों के लिए लकड़ी की पुलिया पर रास्ते बने हैं जिनको वॉकवे कहा जा रहा है. यह महानगर को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ने वाली मुख्य सड़क ईस्टर्न बाईपास के ठीक किनारे स्थित है. झील में फिलहाल 114 नावें हैं. हर नाव पर दो-दो दुकानें लगी हैं. मिर्ज़ा ग़ालिब के दिल में बसा था कलकत्ता सरकारी सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपने बैंकाक दौरे के दौरान झील पर बाजार बसाने का ख्याल आया था वहां से लौटने के बाद उन्होंने अधिकारियों से इस बारे में बात की और इस योजना को मूर्त रूप दिया गया. पश्चिम बंगाल के शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं, ' सरकार तो कोलकाता को लंदन बनाने का प्रयास कर रही है.' 'कामयाबी सर चढ़ी तो कोलकाता चला जाऊंगा' क्या हैं इस बाज़ार से जुड़ी समस्याएं इस साल जनवरी के आखिरी सप्ताह में जब इस बाजार का उद्घाटन किया गया तब यहां रोजाना भारी भीड़ जुटती थी. दरअसल, इस बाजार की पुरानी जगह के ग्राहकों और तैरता हुआ बाजार देखने के उत्सुक लोगों की भीड़ थी. शुरूआती एकाध महीनों के बाद खासकर अब गर्मी बढ़ने के बाद बाजार से भीड़ छंटने लगी है. इससे इस बाजार औऱ यहां दुकान लगाने वाले दुकानदारों के भविष्य पर संकट के गहरे बादल मंडराने लगे हैं. दरअसल, यहां दुकानदार तो छांव में बैठते हैं, लेकिन ग्राहकों के लिए ऐसी कोई सहूलियत नहीं है. नतीजतन ज्यादातर लोगों ने अपने मोहल्ले के बाजारों का रुख कर लिया है. गर्मी और उसके बाद होने वाली बरसात में ग्राहकों की तादाद और घटने का अंदेशा है. यहां खरीददारी कर रहे कल्याण रायचौधरी कहते हैं, 'बंगाली लोग किसी भी वस्तु को हाथों में लेकर परखने के बाद ही उसे खरीदते हैं. लेकिन यहां आप रेलिंग की वजह से किसी चीज को छू कर नहीं देख सकते.' सब्जी बेचने वाले खोकन साहा कहते हैं, 'रेलिंग में ऐसी जगह बनाना मुश्किल है जहां से लोग नाव में उतर सकें या उसके करीब आ सकें. झील का पानी 10-12 फीट गहरा है. वैसी स्थिति में लोगों खासकर छोटे बच्चों के झील में गिरने का खतरा बना रहेगा.' एक सब्जी विक्रेता गीता बताती हैं, 'बीते तीन महीने में छह हजार रुपये का घाटा होने के बाद मैंने अब दुकान में सब्जी की बजाय गोलगप्पे बेचने का फैसला किया है. कोलकाता: कवयित्री को फ़ेसबुक पर गैंगरेप की धमकी वह कहती है कि दूर-दराज से शनिवार और रविवार की शाम को यहां घूमने वाले लोग खरीददारी नहीं करते. लेकिन शायद उनको गोलगप्पे पसंद आ जाएं. एक मछली विक्रेता रवि बताता है कि पुराने बाजार में उसका धंधा अच्छा था. यहां कुछ पुराने ग्राहक आते हैं. इससे किसी तरह रोजी-रोटी चल रही है. ग्राहकों की भीड़ घटने की वजह से बाजार के दुकानदार अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. इस बाजार की देख-रेख करने वाले केएमडीए के अधिकारियों ने दुकानदारों की समस्या पर विचार करने का भरोसा दिया है. शहरी विकास मंत्री, जो केएमडीए के अध्यक्ष भी हैं, फिरहाद हकीम कहते हैं, सरकार इस बाजार को बढ़ावा देने की दिशा में ठोस पहल करेगी. इसके लिए विशेषज्ञों से भी सलाह ली जा रही है. यहां ख़रीददारी कर रहे एक ग्राहक सुरजीत घोषाल कहते हैं, 'पुनर्वास की यह योजना तो बहुत अच्छी थी. लेकिन इसमें बेसिक चीजों का ख्याल नहीं रखा गया. अब अगर दुकानदारों की दिक्कतों को दूर करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हई तो इस फ्लोटिंग मार्केट पर डूबने का गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा.' (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "धूमधाम से उद्घाटन के महज चार महीने के भीतर ही कोलकाता स्थित पूर्वी भारत के पहले फ्लोटिंग मार्केट के भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने थाईलैंड की तर्ज पर नौ करोड़ की लागत से इस बाजार को बसाया था. शुरुआती दौर में लोग उत्सुक होकर इसे देखने-घूमने आते थे और लगे हाथों खरीददारी भी कर लेते थे. लेकिन अब इस बाजार की दुकानों पर ग्राहकों का भारी टोटा है. अब भी शनिवार और रविवार की शाम को यहां काफ़ी भीड़ जुटती है. लेकिन वह महज घूमने और सेल्फी लेने वालों की भीड़ होती है. कोलकाता के पूर्वी छोर पर एक झील में बसे इस बाजार में 140 नावों पर 280 दुकानें लगनी थीं. लेकिन कई नावें अब तक खाली पड़ी हैं. कोलकाता : क्यों बदल रही है सोनागाछी की रंगत? दरअसल, यह बाजार हॉकरों के पुनर्वास की राज्य सरकार की योजना का हिस्सा है. इस इलाके में पहले दो सौ से ज्यादा हॉकर सड़क के किनारे वीआईपी बाजार में अपनी दुकानें लगाते थे. लेकिन सड़क को चौड़ा करने की वजह से उनकी दुकानें उजड़ गई थीं. उन हॉकरों के पुनर्वास के लिए ही सरकार ने इस झील में बैंकाक की तर्ज पर बाजार बसाने का फैसला किया था. समुद्र में जहाज़ों को रास्ता दिखाती है ये लड़की पूर्वी भारत का पहला बाज़ार कोलकाता की पाटुली झील पर बना यह बाजार पूर्वी भारत का पहला तैरता बाजार है. कोलकाता महानगर विकास प्राधिकरण की ओर से नौ करोड़ की लागत से बनाए गए इस बाजार में फल-सब्जी, मछली और फूलों समेत तक सबकुछ नावों पर ही बिकता है. झील में डेढ़ सौ से भी ज्यादा नावों में तरह-तरह के सामान बिकते हैं. पांच सौ मीटर लंबे और 60 मीटर चौड़े इस बाजार में खरीददारों के लिए लकड़ी की पुलिया पर रास्ते बने हैं जिनको वॉकवे कहा जा रहा है. यह महानगर को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ने वाली मुख्य सड़क ईस्टर्न बाईपास के ठीक किनारे स्थित है. झील में फिलहाल 114 नावें हैं. हर नाव पर दो-दो दुकानें लगी हैं. मिर्ज़ा ग़ालिब के दिल में बसा था कलकत्ता सरकारी सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपने बैंकाक दौरे के दौरान झील पर बाजार बसाने का ख्याल आया था वहां से लौटने के बाद उन्होंने अधिकारियों से इस बारे में बात की और इस योजना को मूर्त रूप दिया गया. पश्चिम बंगाल के शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं, ' सरकार तो कोलकाता को लंदन बनाने का प्रयास कर रही है.' 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'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए मुख्यमंत्री दीक्षित ने माना कि दिल्ली में संसाधनों की चुनौती है. दिल्ली में पानी के निजीकरण के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे स्वीकार करती हैं कि ऐसा माहौल बना हुआ है कि दिल्ली में पानी का निजीकरण हो रहा है लेकिन यह सच नहीं है. उन्होंने कहा कि दिल्ली में पानी का निजीकरण नहीं हो रहा है. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे जल्दी ही स्वयंसेवी संगठनों की एक बैठक बुलाने जा रही हैं और वे इसमें स्पष्ट कर देंगी कि सरकार ऐसा कोई फ़ैसला नहीं कर रही है. पानी की कमी को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सोनिया विहार का मामला जल्दी ही निपट जाएगा और दिल्ली को 300 क्यूसेक पानी मिलेगा. आधुनिक शहर एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में दिल्ली का स्वरुप बदला है और आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलेगा. उनका कहना था कि दिल्ली दुनिया का सबसे ज़्यादा भीड़ वाला शहर है और यहाँ यातायात को संयोजित करने की बहुत ज़रुरत है. शीला दीक्षित ने कहा, \"दिल्ली में हर साल पाँच लाख की जो आबादी बढ़ रही है वह एक चुनौती है लेकिन दिल्ली की बढ़ती आबादी भी ख़ुशहाल आबादी है.\" उन्होंने कहा कि दिल्ली में आवास एक समस्या है और दिल्ली ने केंद्र सरकार से और ज़मीन माँगी है जिससे कि मध्यवर्ग और ग़रीबों के आवास की समस्या हल की जा सके. शीला दीक्षित ने एक सवाल के जवाब में कहा कि बिजली की जो दरें बढ़ाई गई हैं उसका फ़ैसला नियामक आयोग ने सभी से बात करने के बाद लिया था. उनका कहना है कि उनकी जानकारी में यह बात है कि कुछ लोगों ने बिजली का बिल न चुकाने की धमकी दी है लेकिन उन्होंने साफ़ कहा कि इससे बिजली बोर्ड निपटेगा या फिर नियामक आयोग. क़ानून-व्यवस्था दिल्ली की क़ानून व्यवस्था के बारे में उन्होंन कहा, \"दिल्ली देश का अकेला ऐसा राज्य है जहाँ क़ानून व्यवस्था राज्य सरकार के हाथों में नहीं है. हमने इसके लिए केंद्र सरकार से अनुरोध किया है.\" मुख्यमंत्री दीक्षित का कहना था कि इस बारे में तीन महीने पहले वे एक प्रतिनिधि मंडल के साथ केंद्रीय गृहमंत्री से भी मिली थीं. उनका कहना था कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में था कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाया जाएगा और उन्हें उम्मीद है कि केंद्र सरकार इसके लिए समुचित क़दम उठाएगी. उन्होंने माना कि दिल्ली में क़ानून व्यवस्था एक चुनौती है लेकिन उन्होंने कहा कि हर दिन बाहर से आने वाले लोगों के कारण दिल्ली की समस्या अन्य तरह की है. दिल्ली की मुख्यमंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा कि उनकी सरकार रहे न रहे दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तैयार रहेगी ऐसा उनका विश्वास है. उन्होंने इस बात को ख़ारिज कर दिया कि दिल्ली रहने के लिए बेहतर जगह नहीं बन रही. उन्होंने कहा, \"यदि वातावरण अच्छा न होता तो लोग क्यों आते यहाँ रहने.\"\n\nSummary:", "target": "दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है कि दिल्ली में पानी का निजीकरण नहीं किया जा रहा है. उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि बिजली की बढ़ी हुई दर का भुगतान करना होगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशीला दीक्षित ने कहा कि यह कहना ठीक नहीं होगा कि दिल्ली में रहने की बेहतर व्यवस्था नहीं है क्योंकि अगर ऐसा होता तो लोग दिल्ली आना क्यों जारी रखते. 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए मुख्यमंत्री दीक्षित ने माना कि दिल्ली में संसाधनों की चुनौती है. दिल्ली में पानी के निजीकरण के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे स्वीकार करती हैं कि ऐसा माहौल बना हुआ है कि दिल्ली में पानी का निजीकरण हो रहा है लेकिन यह सच नहीं है. उन्होंने कहा कि दिल्ली में पानी का निजीकरण नहीं हो रहा है. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे जल्दी ही स्वयंसेवी संगठनों की एक बैठक बुलाने जा रही हैं और वे इसमें स्पष्ट कर देंगी कि सरकार ऐसा कोई फ़ैसला नहीं कर रही है. पानी की कमी को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सोनिया विहार का मामला जल्दी ही निपट जाएगा और दिल्ली को 300 क्यूसेक पानी मिलेगा. आधुनिक शहर एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में दिल्ली का स्वरुप बदला है और आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलेगा. उनका कहना था कि दिल्ली दुनिया का सबसे ज़्यादा भीड़ वाला शहर है और यहाँ यातायात को संयोजित करने की बहुत ज़रुरत है. शीला दीक्षित ने कहा, \"दिल्ली में हर साल पाँच लाख की जो आबादी बढ़ रही है वह एक चुनौती है 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माना कि दिल्ली में क़ानून व्यवस्था एक चुनौती है लेकिन उन्होंने कहा कि हर दिन बाहर से आने वाले लोगों के कारण दिल्ली की समस्या अन्य तरह की है. दिल्ली की मुख्यमंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा कि उनकी सरकार रहे न रहे दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तैयार रहेगी ऐसा उनका विश्वास है. उन्होंने इस बात को ख़ारिज कर दिया कि दिल्ली रहने के लिए बेहतर जगह नहीं बन रही. उन्होंने कहा, \"यदि वातावरण अच्छा न होता तो लोग क्यों आते यहाँ रहने.\"\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 435, "source_item_id": "435", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2544, "clean_index": 393, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:393"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स और अपराध विभाग (यूएनओडीसी) के मुताबिक इस साल बर्मा में अफ़ीम की खेती में 17 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज़ हुई है. पिछले साल देश भर में 40 हज़ार हेक्टेयर भूमि पर अफ़ीम की खेती हो रही थी, जो इस साल बढ़कर 51 हज़ार हेक्टेयर हो गई है. बर्मा अफ़गानिस्तान के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अफ़ीम उत्पादक देश है. देश के कुल अफ़ीम उत्पादन का ज़्यादातर हिस्सा शान और काचिन प्रांत में उपजता है. ये दोनों वैसे इलाके हैं जहां पिछले काफी समय से सेना और कट्टरपंथी समूह के बीच झड़प चल रही है. बर्मा सरकार के आंकड़ों के मुताबिक रिपोर्ट यह भी बताती है कि इस साल देश भर में करीब 24 हज़ार हेक्टेयर अफ़ीम के खेतों को नष्ट किया गया जो बीते साल से चार गुना ज़्यादा है. बंदूक, पैसा और ड्रग्स यूएनओडीसी के दक्षिण पूर्व एशिया के प्रतिनिधि गैरी लुइस ने बताया, “बर्मा में ज़मीनी हालात बेहद खराब हैं. अफ़ीम की खेती वाले इलाकों में बंदूक, पैसा और ड्रग्स का ख़तरनाक मिश्रण देखने को मिल रहा है.” सेना और विरोधी लड़ाके किसानों से रिश्वत लेकर इन्हें खेती करने की अनुमति देते हैं. दूसरी ओर किसानों का कहना है कि अस्थिरता के इस माहौल में उनके लिए अफ़ीम की खेती फ़ायदे का सौदा है. अफ़ीम से हेरोइन बनाई जाती है, जिसका ड्रग्स के तौर पर इस्तेमाल होता है. दक्षिण पूर्व एशिया अफ़ीम सर्वे 2012 के मुताबिक दुनिया के कुल अफ़ीम उत्पादन का एक चौथाई हिस्सा बर्मा में उपजता है. उधर लाओस में पिछले पांच साल ( 2007-2012) के दौरान अफ़ीम की खेती चार गुना बढ़कर 6300 हेक्टेयर तक पहुंच गई है. मौजूदा स्थिति 1998 से 2006 के बीच के नतीज़ों के एकदम उलट है, तब बर्मा और लाओस में अफ़ीम की खेती में 83 फ़ीसदी की कमी हुई थी. मांग बर्मा की थिन सेन सरकार ने हालात में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं. बर्मा की अधिकांश अफीम से हेरोइन बनायी जाती है. करीब आधा उत्पादन चीन के बाज़ार में जाता है, जबकि आधा दक्षिण पूर्व एशिया के बाज़ार में बेचा जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक एशिया में हेरोइन की लगातार बढ़ रही मांग के चलते अफ़ीम की खेती बढ़ी है. बावजूद इसके बर्मा के लिए एक अच्छी ख़बर है. यूएनओडीसी प्रतिनिधि लुइस का कहना है कि समस्या का हल निकालने की कोशिशें तेज हुई हैं. सुधार के लिए राष्ट्रपति थिन सीन की सरकार ने कई कदम उठाए हैं. संघर्षविराम और राजनीतिक जागरुकता के चलते संयुक्त राष्ट्र जैसी एजेंसियों के लिए देश के अंदर पहुंच बनाना संभव हो पाया है. पिछले कई दशकों से बर्मा, थाईलैंड और 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में कड़ा रुख़ अख़्तियार करते हुए पार्टी को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया है. इस मामले में आयोग ने भाजपा नेता लालजी टंडन के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 171-बी के तहत मुकदमा चलाने के लिए भी कहा है. धारा 171-बी रिश्वत देने के मामले में लागू होता है और आयोग का कहना है कि पहली नज़र में यह मतदाताओं को रिश्वत देने का मामला दिखता है. इस मामले में आयोग ने प्रधानमंत्री पर कोई टिप्पणी नहीं की क्योंकि तब तक उन्होंने वहाँ से नामांकन दाख़िल नहीं किया था. आयोग के उपायुक्त एएन झा ने इस बारे में संवाददाता सम्मेलन में जानकारी दी. आयोग ने निर्देश दिया है कि लखनऊ के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का तबादला कर दिया जाए. भाजपा नेता लालजी टंडन के जन्मदिन पर लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान महिलाओं को साड़ियाँ बाँटी जा रही थीं और उसी में भगदड़ मच जाने के बाद 22 महिलाओं की मौत हो गई थी. इस कांड के बाद से ही विपक्षी पार्टियाँ इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन मान रही थीं जबकि भाजपा का कहना था कि ये हर वर्ष होने वाला कार्यक्रम था और इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना 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लाकरावी और ब्राहीम अल बकरावी के रुप में हुई है. विस्फोट के कुछ देर पहले एयरपोर्ट के एक सीसीटीवी कैमरा में उनकी तस्वीर दर्ज हुई थी. तस्वीर में दाईं तरफ उनके साथ एक तीसरा व्यक्ति भी नज़र आ रहा है. उसकी पहचान अबतक नहीं हो सकी है. ब्राहिम के भाई ख़ालिद अल बकरावी ने माएलबीक मेट्रो स्टेशन पर हमला किया था. अधिकारियों का कहना है कि नवंबर में पेरिस में हुए हमले के मामले में गिरफ्तार सालाह अब्देस्लाम ने ब्रसेल्स में हुए धमाके से जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया है. इस्लामिक स्टेट ने ब्रसेल्स और पेरिस पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी ली है. पेरिस में हुए हमले में 130 लोगों की मौत हुई थी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स का इंटरनेशनल एयरपोर्ट मंगलवार से पहले नहीं खुलेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअधिकारियों का कहना है कि एयरपोर्ट टर्मिनल पर न्यायिक जांच से जुड़ा काम पूरा हो चुका है लेकिन यात्रियों से जुड़ी गतिविधियां मंगलवार से पहले शुरु नहीं हो पाएंगी. ब्रसेल्स के ज़ेवेंटम एयरपोर्ट पर 22 मार्च को आत्मघाती हमला हुआ था. उसी दिन शहर के एक मेट्रो स्टेशन पर भी हमला हुआ था. इन हमलों में 31 लोगों की मौत हो गई थी. हमले के बाद पहली बार एयरपोर्ट इंजीनियरों और तकनीकी काम के जानकारों की टीम को हवाई अड्डे में दाख़िल होने की इजाज़त दी गई है. समाप्त वो एयरपोर्ट टर्मिनल को हुए नुक़सान और इमारत की मज़बूती का आंकलन करेंगे. एयरपोर्ट पर सुरक्षा के नए इंतज़ाम भी किए जाएंगे. एयरपोर्ट के चेक-इन एरिया को काफ़ी नुक़सान हुआ है. वहां हुए दोनों आत्मघाती धमाके डिपार्चर हॉल के दोनों सिरों पर हुए थे. डीएनए टेस्ट के ज़रिए दो आत्मघाती हमलावरों की पहचान नाज़िम लाकरावी और ब्राहीम अल बकरावी के रुप में हुई है. विस्फोट के कुछ देर पहले एयरपोर्ट के एक सीसीटीवी कैमरा में उनकी तस्वीर दर्ज हुई थी. तस्वीर में दाईं तरफ उनके साथ एक तीसरा व्यक्ति भी नज़र आ रहा है. उसकी पहचान अबतक नहीं हो सकी है. ब्राहिम के भाई ख़ालिद अल बकरावी ने माएलबीक मेट्रो स्टेशन पर हमला किया था. अधिकारियों का कहना है कि नवंबर में पेरिस में हुए हमले के मामले में गिरफ्तार सालाह अब्देस्लाम ने ब्रसेल्स में हुए धमाके से जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया है. इस्लामिक स्टेट ने ब्रसेल्स और पेरिस पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी ली है. पेरिस में हुए हमले में 130 लोगों की मौत हुई थी. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रविवार को होने वाली इंडियन ग्रां प्री में रफ्तार के शौकीनों की नज़र जहां फ़र्राटा रेस के रोमांच पर होगी, वहीं जर्मन ड्राइवर सेबेस्टियन वेटल की नज़र लगातार चौथी बार विश्व ख़िताब जीतने पर होगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवेटल ख़िताब की दौड़ में सबसे आगे हैं पोल पोज़िशन हासिल करने वाले रेड बुल के वेटल अगर बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर होने वाली फ़ॉर्मूला वन रेस अपने नाम कर लेते हैं तो विश्व ख़िताब उनके खाते में चला जाएगा. शनिवार को हुई रेस में वेटल को पोल पोज़िशन मिली (स्टार्टिंग ग्रिड पर सबसे आगे) जबकि मर्सडीज़ के निको रोज़बर्ग को दूसरा स्थान हासिल हुआ. रोज़बर्क की ही टीम के लुइस हैमिल्टन को तीसरा स्थान मिला. चौथा स्थान वेटल की टीम के मार्क बेवर को मिला. वहीं फरारी के फर्नांडो अलोंसो आठवें स्थान पर रहे. खिताब की रेस में अलोंसो ही वेटल के निकटतम प्रतिद्वंद्वी हैं. इस सीज़न में लगातार सातवीं बार पोल पोजिशन हासिल करने के बाद वेटल ने कार रेडियो पर कहा, “हां दोस्तो, हां. जो हम करना चाहते थे, हमने कर दिया. ज़बरदस्त. कार बहुत ही बढ़िया थी.” वैसे 2011 में शुरू हुई इंडियन ग्रां प्री में अब तक वेटल ही जीत का झंडा फहराते रहे हैं. इंडियन ग्रां प्री में वेटल अगर पांचवें स्थान पर आते हैं तो भी उन्हें वर्ल्ड ख़िताब मिलना तय है, फिर भले ही स्पेन के अलोंसो को कोई भी स्थान मिले (बशर्ते उन्हें 16 अंक न मिलें). अनिश्चित्ता के बादल भारत में फॉर्मूला वन रेस सिर्फ़ तीन साल पुरानी है और इसका कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म होने में दो साल बाकी हैं लेकिन भारतीय ग्रां प्री का भविष्य अभी से अनिश्चित लग रहा है. फॉर्मूला वन के प्रमुख बर्नी एकलस्टोन पहले ही कह चुके हैं कि रेसिंग कैलेंडर में सुधार के लिए भारत में 2014 में होने वाली ग्रां प्री को हटाना पड़ेगा. इस रेस को देखने के लिए हर साल लोग पहुंचते हैं. हज़ारों लोग फॉर्मूला वन सर्किट तक आते हैं और लाखों लोग टीवी पर इसे देखते हैं. लेकिन कई लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि भारतीय रेस से होने वाले आर्थिक फायदे क्या वाकई इतने ज़्यादा हैं कि कंपनियां इसमें निवेश करें. रेस के ड्राइवर और बॉलीवुड की अभिनेत्रियां रेस के दिन होने वाले कार्यक्रमों में छाई रहती हैं. लेकिन मैक्लॉरेन के ड्राइवर सर्गियो पेरेज़ मानते हैं कि ये रेस अब तक भारत की जनता के दिल-ओ-दिमाग़ पर नहीं छाई है. उनका कहना है कि ये बड़े दुख की बात है कि ये रेस भारत में अगले साल नहीं होगी. 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इस सवाल के जवाब में उर्दू के सुपरिचित साहित्यकार शमशुल रहमान फ़ारूक़ी कहते हैं, \"इसके दो बड़े कारण हैं, एक तो इस गीत में वतन की मोहब्बत का जो जज़्बा हर पंक्ति में भर दिया गया है उस पर किसी को शक नहीं हो सकता. दूसरा इसमें पूरे देश की ख़ासियत को अच्छी तरह पिरोया गया है.\" नारंग कहते हैं कि इसके बाद एक बड़ा कारण यह भी बना कि इक़बाल के गीत आसानी से गाए जा सकने वाले थे चाहे वे कठिन हों या आसान. फिर ये गीत तो आसान ही था. विवाद एक ओर 'सारे जहाँ से अच्छा...' की लोकप्रियता को लेकर कोई विवाद नहीं है तो दूसरी ओर ये बड़े विवाद का विषय रहा है कि डॉक्टर अल्लामा इक़बाल ने देश के विभाजन की वकालत की थी. शमशुल रहमान इसे सही नहीं मानते. वह कहते हैं, \"इसमें शक है कि वह दो देशों के पक्षधर थे. दो क़ौमों की बात को दो देशों की बात नहीं कहा जा सकता क्योंकि क़ौम को हम समाज के रुप में देखते रहे हैं. वह तो एक संघीय ढाँचे के पक्षधर थे जिसमें मुसलमानों के लिए स्वायत्तता वाले इलाक़े चाहते थे न कि अलग राष्ट्र.\" उनकी राय से गोपीचंद नारंग भी इत्तेफ़ाक रखते हैं और कहते हैं, \"इक़बाल मुसलमानों के लिए एक अलग सूबा चाहते थे, अलग देश नहीं. वह हिंदुस्तानी थे और 1938 में हिंदुस्तानी ही मरे.\" लेकिन 'सारे जहाँ से अच्छा...' इतना राष्ट्रप्रेम से भरा लोकप्रिय गीत था तो फिर उसे राष्ट्रगीत क्यों नहीं बनाया गया? यह सवाल भी शायद इसी विवाद से जुड़ा हुआ है. पहली बार हिंदुस्तान की सांस्कृतिक, सामाजिक विविधता और भौगोलिक महत्ता को सटीक रुप से परिभाषित करने वाले इस गीत की रचना का इतिहास भी दिलचस्प है. गोपीचंद नारंग ने बीबीसी को बताया कि 1904 में अल्लामा इक़बाल युवा थे और एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. उनके एक शिष्य लाला हरदयाल ने अमरीका में ग़दर पार्टी बनाई थी. लाहौर में उन्होंने यंगमेन्स इंडियन एसोसिएशन बनाया था. इस संस्था के एक आयोजन में उन्होंने अल्लामा इक़बाल को बुलाया था. वह कोई राजनीतिज्ञ तो थे, न ही कवि थे और वहाँ इक़बाल एक गीत लिखकर ले गए थे. उन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा...' वहाँ गाया और वहाँ मौजूद मोहम्मद उमर ने उसे जैसे-तैसे नोट करके कहीँ छपवा दिया. बाद में इक़बाल ने इस गीत में सुधार किए. फिर यह तथ्य भी अपने आपमें दिलचस्प है कि इस गीत की जो धुन अभी हम सुनते हैं, जिसे भारतीय सेना का बैंड बजाता है या जो मोबाइल की रिंग टोन में आती है उसे पंडित रविशंकर ने तैयार किया है. बहरहाल एक जनगीत सौ बरस का हो गया है और इसकी लोकप्रियता बताती है कि यह इसी तरह आने वाले बरसों में भी गाया-सुना जाता रहेगा.\n\nSummary:", "target": "जनगीत वो होता है जो जन-जन की ज़ुबान पर बसा हो और इस नज़रिए से देखें तो अल्लामा इक़बाल का लिखा हुआ गीत 'सारे जहाँ से अच्छा...' सही मायनों में एक जनगीत है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतभी तो यह गीत पूरे सौ बरस का हो गया और अब भी यह लोगों की ज़बान पर बसा हुआ है. एक स्कूली बच्चे से लेकर एक फ़ौजी तक सभी को अपने देश की विशेषता बताने के लिए आज भी 21 अप्रैल 1904 को पहली बार गाया गया यह गीत याद आता है. तभी तो महात्मा गाँधी से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक सभी 'सारे जहाँ से अच्छा...' गाते रहे हैं और जब अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय राकेश शर्मा से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने पूछा था कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखाई देता है तो उनका जवाब था, 'सारे जहाँ से अच्छा...' और हाल ही में मुज़फ़्फ़राबाद से श्रीनगर के बीच बस चली तो पूरे रास्ते भर पोस्टर लगे हुए थे, 'मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...' और साथ में थी अल्लामा इक़बाल की तस्वीरें. दिल में बसा गीत हालाँकि इन बरसों में इस बात को लेकर बहुत बहस चली कि 'सारे जहाँ से अच्छा...' लिखने वाले अल्लामा इक़बाल ने तो देश के बँटवारे की वकालत की थी और वह मुस्लिम लीग के समर्थक थे लेकिन इन विवादों ने इस गीत की लोकप्रियता पर कोई आँच नहीं आने दी. साहित्यकार और समीक्षक गोपीचंद नारंग कहते हैं कि यह गीत लोगों के दिलों में बसता है. ऐसा क्या है इस गीत में जिसकी वजह से यह जन गीत बन गया? 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(पढ़ें- क्या बीजेपी की बात बन पाएगी) जाति की जानकारी इस महासंपर्क अभियान के दौरान प्रत्येक नए सदस्य से इंटरव्यूह होगा और उसमें उनके शौक और जाति की जानकारी ली जाएगी. समाप्त इन जानकारियों को इकट्ठा करने के लिए एक प्रोफोर्मा भी तैयार किया गया है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने सदस्यों से जातिगत जानकारी मांगने के संबंध में अनभिज्ञता व्यक्त की और कहा, यह \"मेरी जानकारी में नहीं है.\" उद्देश्य लेकिन पार्टी के अभियान प्रभारी प्रकाश शर्मा जातिगत जानकारी मांगने की बात की न सिर्फ पुष्टि करते हैं बल्कि उसे औचित्यपूर्ण भी ठहराते हैं. वे पूछते हैं, \"आप कोई भी फ़ॉर्म भरते हैं तो उसमे जाति/धर्म पूछा जाता है या नहीं?\" उन्होंने कहा, \"भारतीय जनता पार्टी सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी है, समाज के हर वर्ग और धर्म के लोगों को साथ लेकर चलना हमारा उद्देश्य है. और भी बातें पूछी जा रही हैं लेकिन आप लोग एक जाति पर ही क्यों अटक गए.\" (पढ़ें- बीजेपी का चुनाव अभियान शुरू) लोगों को जोड़ेंगे लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने कहा कि जो भी अन्य जानकारी ली जा रही है उसकी मदद से प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए हम एक संगठन खड़ा करेंगे. उन्होंने बताया, \"अगर किसी का शौक सफ़ाई है तो उसे स्वच्छता अभियान से जोड़ दिया जाएगा.\" बाजपेयी के अनुसार इस अभियान के दौरान पार्टी से जुड़ने वाले हर सदस्य से यह भी पूछा जाएगा कि वो किस तरह के रोज़गार से जुड़ा है. इस जानकारी के माध्यम से उन्हें आर्थिक मदद मुहैया कराई जाएगी. पार्टी को उम्मीद है कि इस जानकारी के ज़रिए ये पता चलेगा कि नए सदस्यों में किन जाति और धर्म के लोग उससे जुड़ रहे हैं. दलित वर्ग पर विशेष ध्यान इसलिए होगा क्योंकि भाजपा चाहेगी कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भी मायावती की झोली खाली रहे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नवंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के जाति के आधार पर जनगणना करने के लिए पारित आदेश को खारिज कर दिया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन इस साल भारतीय जनता पार्टी पिछले छह महीनों में बने अपने नए सदस्यों से उनकी पसंद, शौक और जाति संबंधी जानकारी लेगी. भाजपा का सदस्यता अभियान 30 अप्रैल को ख़त्म हो रहा है और एक मई से 'महासंपर्क अभियान' शुरू होगा. 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रहा है. प्रखंड विकास अधिकारी परवेज़ उल्लाह तो कहते हैं कि \"कोई नहीं फंसा है बल्कि अब जो भी लोग हैं वो स्वयं ही आना नहीं चाहते हैं\". इस बात में सच्चाई थी कि लोग आना नहीं चाहते और यह संख्या हज़ारों में है. बचाव कार्य में जुटे नाविक शिवनारायण मंडल कहते हैं, \"अब देखिए बहुत लोग गांवों में है और वो लोग मवेशी के साथ हैं. वो आना नहीं चाहते हैं. हम तो आज भी नाव लेकर गए थे लेकिन वो कहते हैं कि बचाव नहीं, राहत चाहिए\". हालांकि कुछ लोग अभी भी ऐसे हैं जो रो रोकर कह रहे थे कि उनके बच्चे अभी फंसे हुए है. ऐसी ही एक महिला का कहना था कि चनपुर में वो अपने तीन बच्चों को पड़ोसियों के पास छोड़कर आई थी और उन्हें लाने के लिए वो जाना चाहती हैं. इस महिला की समस्या सुनने के लिए अधिकारी बिल्कुल तैयार नहीं थे और इसके लिए उनका तर्क था कि पानी घटने के कारण अब सब लोग वापस जाना चाहते हैं. विशेष एडीएम का कहना था कि अब लोग अपना घर बार देखने वापस जाना चाहते हैं और कोई भी नहीं फंसा है. सरकार इनकी मदद करने को तैयार नहीं क्योंकि उनका कहना है कि \"हमारा काम जान बचाना है, सामान नहीं\". इसके अलावा एक और समस्या है जिससे बचावकर्मी जूझ रहे हैं. बीएसएफ के अधिकारी अमर कुमार पांडे कहते हैं, \"अब असल में पानी बहुत तेज़ी से घट रहा है तो सड़कों पर से पानी हट गया है. ऐसे में नाव जा नहीं सकती. वो सड़कों पर लग जाती है. कुछ नाव टूट भी गए हैं\". लोग क्यों न वापस जाना चाहें. किसी का संबंधी छूटा हुआ है, किसी का घर, मवेशी. लोग अपने जीवन भर की पूंजी छोड़कर जान बचाने के लिए भाग आए हैं. ज़ाहिर है कि अब वो जल्दी जल्दी लौटना भी चाहते हैं. शायद उन्हें भी पता है कि राहत शिविरों में ज़िंदगी कैसी हो सकती है.\n\nSummary:", "target": "अररिया ज़िले से क़रीब पचास किलोमीटर दूर सिरसुर के बाद सड़क यूं ख़त्म हो जाती है मानो किसी ने उसे कुल्हाड़ियों से काट दिया हो.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआगे निगाह की हद तक सिर्फ पानी ही पानी दिखता है और उसमें मरे हुए जानवरों की लाशें भी. इसी छोर से सीमा सुरक्षा बल के जवान स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर बचाव कार्य में लगे हुए हैं. बुधवार को इस बचाव केंद्र ने 100 से अधिक लोगों की जान बचाई. चनपुर ब्लाक से कुछ लोग नावों में आए तो उनका कहना था कि अब भी करीब 100-150 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"Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बीमारी से मरने वालों में अधिक संख्या बच्चों की है. इस बीमारी से लोगों के मरने के ये मामले राज्य के पूर्वी ज़िलों में सामने आए हैं. इनमें से कुछ नेपाल सीमा से सटे हुए हैं. हालांकि इस बीमारी की रोकथाम के लिए इस वर्ष राज्य सरकार की ओर से गर्मी के मौसम में बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाया गया था. ग़ौरतलब है कि पिछले वर्ष भी दिमाग़ी बुख़ार से सबसे प्रभावित ज़िलों में पूर्वी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर, महाराजगंज और कुशीनगर थे. चिंता सरकारी आँकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष दिमाग़ी बुख़ार से राज्य भर में 1500 से भी ज़्यादा लोगों की जानें गई थीं. इस रोग के शुरुआती मामले भी वर्ष 1977 में राज्य के पूर्वी इलाकों में ही सबसे पहले देखने को मिले. एक अनुमान के मुताबिक तब से लेकर अब तक 10,000 से भी ज़्यादा लोग इस बीमारी के चलते अपनी ज़िंदगी खो चुके हैं. यह बीमारी मुख्य रूप से वर्षा ऋतु के दौरान मच्छरों के काटने से फ़ैलती है. पिछली वर्ष जिस तेज़ी से यह बीमारी इन ज़िलों में फैली उसके बाद सरकार को चीन से बड़े पैमाने पर इसके टीके आयात करने पड़े 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सलमान ख़ान की बहन अर्पिता ख़ान के मेहंदी और संगीत समारोह में हिस्सा लेने शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान के घर पहुंचे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबॉलीवुड में सलमान ख़ान के प्रतिद्वंद्वी समझे जाने वाले शाहरुख़, मुंबई के बांद्रा स्थित सलमान ख़ान के घर गैलेक्सी अपार्टमेंट रविवार देर रात 12 बजे पहुंचे. अर्पिता ख़ान ने सलमान और शाहरुख़ के साथ वाली अपनी तस्वीरें इंस्टाग्राम पर शेयर भी कीं. सलमान के जीजा अतुल अग्निहोत्री ने भी ये तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर की. बिग बी, आमिर को भी न्यौता अतुल, सलमान की बहन अलवीरा के पति हैं. सलमान ने शाहरुख़ ख़ान को शादी का न्यौता भेजा था और शाहरुख़ ने मीडिया से कहा था कि वो शादी में ज़रूर शरीक़ होंगे क्योंकि अर्पिता उनकी भी छोटी बहन की तरह ही हैं. अर्पिता की शादी, हैदराबाद में 18 नवंबर को होनी है और इसमें अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान जैसे सितारों को भी आमंत्रित किया गया है. 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एक 'ट्रेलर होम' में रहते हैं, यानी कार के पीछे चलने वाले चलते फिरते घर में. ज़ाहिर है किसी ख़ानाबदोश की तरह. उनकी बेटी चार साल की है और बेटा छह महीने का. रिवर्स और उनकी पत्नी अब कुछ पैसा इस तरह लगाना चाहते हैं कि वह बच्चों की पढ़ाई के काम आए. दरअसल उन्होंने जीते तो हैं आठ करोड़ 90 लाख डॉलर चूंकि वे अपनी जीती हुई राशि नकद चाहते हैं इसलिए उन्हें चार करोड़ 90 लाख डॉलर ही मिलेंगे. वे कहते हैं, ''इतना पैसा जीतकर भी डर लगता है.'' और आप जानते हैं कि इतना पैसा जीतने के बाद पहला काम उन्होंने क्या किया है - वे एक 'फ़ाइनेंशियल एडवाइज़र' से मिल आए हैं.\n\nSummary:", "target": "वो कहते हैं ना कि 'देने वाला जब भी देता, देता छप्पर फाड़ के'.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nऐसा ही कुछ हुआ एक नौजवान के साथ जो इस बात से परेशान था कि उसकी नौकरी छूट गई. वह अमरीका की एक फ़ैक्ट्री में काम करता था और एक हफ़्ते पहले ही उसकी नौकरी चली गई थी. उसकी चार करोड़ 90 लाख डॉलर की लॉटरी लग गई और अब वो इसका जश्न मना रहा है. 24 साल के टिन रिवर्स, सालेम, इंडियाना के रहने वाले हैं और उनको 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आरक्षण के ख़िलाफ़ दिल्ली के डॉक्टरों ने हड़ताल जारी रखने का फ़ैसला किया है. राष्ट्रपति ने मेडिकल छात्रों से कहा है कि वो भूख हड़ताल समाप्त करें और सामान्य रूप से कामकाज करें. साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि संस्थानों में सीटें बढ़ाने की व्यवस्था की जाएगी. आरक्षण ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्ग के छात्रों को 27 प्रतिशत आरक्षण अगले साल जून से दिया जाएगा. यूपीए की समन्वय समिति और वामपंथी दलों की बैठक के बाद सरकार ने घोषणा की है कि इसके लिए संसद के मानसून सत्र में एक विधेयक लाया जाएगा. साथ ही सरकार ने एक समिति बनाने का फ़ैसला किया है जो आरक्षण के दायरे में न आने वाले अन्य वर्गों के हितों पर विचार करेगी और सीटें बढ़ाने के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाएगी. इस समिति की रिपोर्ट अगस्त 2006 तक आ जाएगी. उल्लेखनीय है कि सरकार ने जब से केंद्र सरकार की मदद से चलने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का फ़ैसला किया है तब से इसका विरोध भी शुरु हो गया है. दिल्ली और कई शहरों के मेडिकल छात्र पिछले 13 दिनों से हड़ताल पर हैं और दूसरे 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फ़ारूक़ी का कहना है, \"मायावती के इस बयान से न सिर्फ़ उत्तरप्रदेश बल्कि पूरे देश के अभियंता आक्रोश में हैं. \" उधर विपक्षी समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिपाल सिंह यादव सहित कुछ नेताओं ने औरेया का दौरा किया है और आरोप लगाया है कि मायावती की सरकार इस मामले को दबाने की कोशिश कर रही है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मायावती के लिए ये घटना काफ़ी मुसीबत बन गई है और वो भी एक ऐसे समय पर जब मायावती की नज़र भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है.\n\nSummary:", "target": "उत्तरप्रदेश की पुलिस का कहना है कि राज्य के एक इंजीनियर की हत्या के मामले में सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी के विधायक शेखर तिवारी और अन्य तीन अभियुक्तों पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के अनुसार विधायक और अन्य तीनों अभियुक्तों पर पहले ही गैंगस्टर अधिनियम के तहत हत्या का मामला दर्ज किया जा चुका है. राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत अभियुक्त को अंतरिम ज़मानत नहीं मिल सकती है. विधायक शेखर तिवारी और अन्य तीन अभियुक्तों को बुधवार को गिरफ़्तार किया गया 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सभी ज्ञात पदार्थों में सबसे ज़्यादा है. सुपर मटीरियल ग्रेफीन में समानांतर कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला होती है और इसे दुनिया का सबसे मजबूत पदार्थ यानी ''सुपर मटीरियल'' माना जाता है. लेकिन कार्बाइन इससे भी दो गुना मजबूत है. वैज्ञानिक पहले इसकी गणना कर चुके हैं कि ग्रेफीन की एक पतली चादर को तोड़ने के लिए एक पेंसिल की नोक पर हाथी के बराबर ज़ोर लगाना पड़ेगा. उन्होंने गणना की है कि कार्बाइन में, ग्रेफीन और कार्बन ट्यूब की अपेक्षा दोगुना और हीरे की अपेक्षा तीन गुना कठोरता होती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि कार्बाइन को चुंबकीय सुपरकंडक्टर में बदला जा सकता है. इससे पहले कुछ वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कार्बाइन बनाने में सफलता हासिल की थी लेकिन इसकी प्रकृति बहुत ही अस्थिर थी. राइस विश्वविद्यालय से ही जुड़े वसीली आर्तयूखोव ने कहा, \"हमारा मकसद इन सभी चीज़ों को एक साथ लाकर एक पदार्थ के रूप में कार्बाइन की पूरी तस्वीर स्पष्ट करना था.\" उन्होंने कहा कि तनाव की स्थिति में कार्बाइन स्थिर रहता है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि कार्बाइन नाम का एक पदार्थ अब तक का सबसे कठोर ज्ञात पदार्थ हो सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशोधकर्ताओं का मानना है कि कार्बाइन हीरे से तीन गुना मज़बूत है. उनका कहना है कि यह हीरे और ग्रेफीन से भी कठोर है. शोधकर्ताओं की इस टीम का कहना है कि कार्बाइन के कुछ असाधारण गुण हो सकते हैं, अगर इसे बड़ी मात्रा में बनाया जा सके. कुछ विशेषज्ञ इसे बड़ी मात्रा में बनाए जाने की संभावना पर सवाल उठा रहे हैं. इस शोध को एसीएस नैनो नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है. कार्बाइन असल में कार्बन परमाणुओं की एक श्रृंखला है जो एक दूसरे से दो या तीन रासायनिक बांडों के मार्फत जुड़े होते हैं. अब तक हीरे को सबसे कठोर पदार्थ माना जाता रहा है. ह्यूस्टन के राइस विश्वविद्यालय के बोरिस याकोब्सन ने अपने शोधपत्र में दिखाया है कि खिंचाव के मामले में कार्बाइन की क्षमता सभी ज्ञात पदार्थों में सबसे ज़्यादा है. सुपर मटीरियल ग्रेफीन में समानांतर कार्बन परमाणुओं की श्रृंखला होती है और इसे दुनिया का सबसे मजबूत पदार्थ यानी ''सुपर मटीरियल'' माना जाता है. लेकिन कार्बाइन इससे भी दो गुना मजबूत है. वैज्ञानिक पहले इसकी गणना कर चुके हैं कि ग्रेफीन की एक पतली चादर को तोड़ने के लिए एक पेंसिल की नोक पर हाथी के बराबर ज़ोर लगाना पड़ेगा. उन्होंने गणना की है कि कार्बाइन में, ग्रेफीन और कार्बन ट्यूब की अपेक्षा दोगुना और हीरे की अपेक्षा तीन गुना कठोरता होती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि कार्बाइन को चुंबकीय सुपरकंडक्टर में बदला जा सकता है. इससे पहले कुछ वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कार्बाइन बनाने में सफलता हासिल की थी लेकिन इसकी प्रकृति बहुत ही अस्थिर थी. राइस विश्वविद्यालय से ही जुड़े वसीली आर्तयूखोव ने कहा, \"हमारा मकसद इन सभी चीज़ों को एक साथ लाकर एक पदार्थ के रूप में कार्बाइन की पूरी तस्वीर स्पष्ट करना था.\" उन्होंने कहा कि तनाव की स्थिति में कार्बाइन स्थिर रहता है. 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'फ़िल्म 'टाइटैनिक' याद है, जब लिओनार्डो डी कैप्रियो स्केच बनाते हैं, मुझे वैसे ही 'मैनिक्योर' किए हुए नाख़ून पसंद हैं.' फिर एक और दोस्त थी जिसे घुंघराले बालों का शौक है. उसने कहा, 'भूरे घुंघराले बालों वाला 'हिप्पी लुक' चाहिए मुझे. और साथ में अगर वो चश्मा पहनता हो तो क्या बात है!' समाप्त हंसते हुए बोली, 'ऐसे मर्दों को देख लगता है कि सोच गहराई वाली है और शक्ल-सूरत स्टाइलिश.' उलझन मैं उलझन में थी क्योंकि इनमें से कोई भी छह फ़ीट के क़द, गोरे या गेहुंए रंग, काले-रेशमी बालों और डोलों की बात नहीं कर रही थीं. ख़ूबसूरत मर्द के नाम पर मन में ह्रितिक रौशन, शाहरुख़ ख़ान और रणवीर सिंह की जो छवि उभरी थी वो धुंधली होने लगी थी. आख़िर ये लड़कियां तो इनमें से किसी का भी सपना नहीं देख रही थीं. बल्क़ि वो तो किसी एक हीरो की तलाश में ही नहीं थीं. उनके हीरो तो अलग-अलग और अनोखे थे. और आम समझ वाले हीरो तो वो थे ही नहीं. तभी तो जब एक लोकप्रिय टीवी शो ने बहस के लिए मुद्दा चुना- 'कौन-सी औरतें ख़ूबसूरत हैं- केरल की या तमिलनाडु की?'- तो उन्होंने उसे उल्टाकर अपनी एक बहस करने की ठानी कि, कौन-से मर्द ख़ूबसूरत हैं? वो औरत जिन्होंने विदेश में पहली बार फहराया भारत का झंडा तीन तलाक़ को चुनौती देने वाली औरतें पैसे मिलें तो क्या विकलांग से शादी करेंगे? टीवी शो के प्रोमो का एक दृश्य मैं इसके विरोध में थी क्योंकि ऐसा कर वो भी तो वही कर रही थीं जो वो टीवी शो करने वाला था? यानी दो इलाकों की औरतों की तुलना महज़ उनके ऊपरी रंग-रूप की बिनाह पर. औरतों को सिर्फ़ उनके रूप तक सीमित करना और एक इलाके की सभी औरतों को एक ही ख़ांचे में बांध देना. भला एक प्रदेश की सब औरतें एक तरह की कैसे हो सकती हैं! मेरी पड़ोसन तक मुझसे बहुत अलग दिखती है, दूसरा पहनावा है और मुख़्तलिफ़ तरीके से पेश आती है. टीवी शो तो एक कदम आगे बढ़कर बहस के मुद्दे को सोशल मीडिया पर 'वोटिंग' के लिए ले गया. सवाल वही था 'कौन-सी औरतें ख़ूबसूरत हैं- केरल की या तमिलनाडु की?' टीवी शो के प्रोमो का एक दृश्य विरोध फिर क्या, विरोध की लहर दौड़ गई. आरोप ये कि ये वोटिंग और बहस 'औरतों को सिर्फ़ ख़ूबसूरती के चश्मे से देखकर सामान की तरह' पेश कर रहे हैं. आख़िरकार टीवी चैनल ने बहस का प्रसारण रोक दिया और इंटरनेट पर डाली गई वोटिंग और वीडियो प्रोमो हटा दिए. मेरी सहेलियों की चाय पार्टी कुछ हद तक इसी का जश्न मना रही थी कि एक लोकप्रिय टीवी शो अब औरतों की ख़ूबसूरती के बारे में बनी रूढ़ीवादी समझ को आगे नहीं बढ़ाएगा और ना ही उन्हें महज़ उनके रंग-रूप के लिए पूजेगा. टीवी चैनल द्वारा कराई गई वोटिंग पर इस पार्टी में ख़ूबसूरत मर्दों पर जैसी बहस हुई उसे देख मैंने अपनी सहेलियों से पूछा, 'तो अब तुम लोग मर्दों को उसी चश्मे से क्यों आंक रही हो? तुम मर्दों के व्यक्तित्व के और पहलुओं पर बात क्यों नहीं कर रही हो? उनका मिज़ाज, कितने पढ़े-लिखे हैं, उनकी राजनीतिक सोच, दुनिया की समझ वगैरह.' आधी रात बाद सड़कों पर निकलती हैं ये औरतें दुल्हनिया पाने का भी खेल रहा है जल्लीकट्टू क्या हो पैमाना? क्या ये सब एक इंसान की ख़ूबसूरती आंकने के पैमाने नहीं हैं? एक आवाज़ में उन सबने जवाब दिया, 'क्योंकि तुम मज़ाक नहीं समझती हो. ये कोई टीवी शो थोड़े ही है. इन हल्की-फुल्की बातों से कोई नुक़सान नहीं है, इन पर हंसना सीखो और मस्त रहो.' पर मैं पलटकर बोली, 'यही परेशानी है.' ख़ूबसूरत नैन नक़्श और सुंदर शरीर वाले मर्द मुझे भी पसंद हैं और किसी आम इंसान की तरह मैं भी पहली समझ उनके रूप रंग को देखकर ही बनाती हूं. लेकिन मज़ाक में ही सही जब हम मर्द और औरतों को सिर्फ़ सबसे 'सुंदर' शरीर वाले लोगों के पैमाने पर आंकने लगते हैं तो हम ऐसी धारणा को सही ठहरा देते हैं. शायद इसीलिए दर्जनों लड़कियां उस टीवी शो में भाग लेने को तैयार हो गईं और चैनल ने बहस के लिए ऐसा मुद्दा चुना. उन्हें लगा कि ये बिना नुक़सान वाला हल्का-फुल्का मज़ा होगा. पर क्या मज़ाक में किया ऐसा हल्का-फुल्का मज़ा ही धीरे-धीरे अंधाधुंध 'डाइट', 'डिप्रेशन', अपने में विश्वास खोने और पतला दिखने के लिए 'लिपोसक्शन' जैसे रास्ते अपनाने का दबाव नहीं बनाता है? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "कौन-सा मर्द ख़ूबसूरत माना जाए? एक सर्द शाम में गर्म चाय की चुस्कियों के बीच मैं और मेरी सहेलियां इसी सवाल पर बहस कर रही थीं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमेरी छोटे कद की तंदरुस्त दोस्त ने कहा, 'मुझे ना ज़्यादा लंबा पसंद है ना ज़्यादा पतला. बल्कि थोड़ा मोटा हो तो सही रहेगा ताकि मुझ पर हर व़क्त भूखे रहकर उसके जैसा बनने का दबाव ना हो.' पर इस पर दूसरी बोली, 'नहीं! मैं मोटे, तोंदवाले मर्दों को बर्दाश्त ही नहीं कर सकती! मुझे तो वो बदसूरत से लगते हैं! और हां, मुझे शरीर पर बाल भी सख़्त नापसंद हैं.' 'फ़िल्म 'टाइटैनिक' याद है, जब लिओनार्डो डी कैप्रियो स्केच बनाते हैं, मुझे वैसे ही 'मैनिक्योर' किए हुए नाख़ून पसंद हैं.' फिर एक और दोस्त थी जिसे घुंघराले बालों का शौक है. उसने कहा, 'भूरे घुंघराले बालों वाला 'हिप्पी लुक' चाहिए मुझे. और साथ में अगर वो चश्मा पहनता हो तो क्या बात है!' समाप्त हंसते हुए बोली, 'ऐसे मर्दों को देख लगता है कि सोच गहराई वाली है और शक्ल-सूरत स्टाइलिश.' उलझन मैं उलझन में थी क्योंकि इनमें से कोई भी छह फ़ीट के क़द, गोरे या गेहुंए रंग, काले-रेशमी बालों और डोलों की बात नहीं कर रही थीं. ख़ूबसूरत मर्द के नाम पर मन में ह्रितिक रौशन, शाहरुख़ ख़ान और रणवीर सिंह की जो छवि उभरी थी वो धुंधली होने लगी थी. आख़िर ये लड़कियां तो इनमें से किसी का भी सपना नहीं देख रही थीं. बल्क़ि वो तो किसी एक हीरो की तलाश में ही नहीं थीं. उनके हीरो तो अलग-अलग और अनोखे थे. और आम समझ वाले हीरो तो वो थे ही नहीं. तभी तो जब एक लोकप्रिय टीवी शो ने बहस के लिए मुद्दा चुना- 'कौन-सी औरतें ख़ूबसूरत हैं- केरल की या तमिलनाडु की?'- तो उन्होंने उसे उल्टाकर अपनी एक बहस करने की ठानी कि, कौन-से मर्द ख़ूबसूरत हैं? वो औरत जिन्होंने विदेश में पहली बार फहराया भारत का झंडा तीन तलाक़ को चुनौती देने वाली औरतें पैसे मिलें तो क्या विकलांग से शादी करेंगे? टीवी शो के प्रोमो का एक दृश्य मैं इसके विरोध में थी क्योंकि ऐसा कर वो भी तो वही कर रही थीं जो वो टीवी शो करने वाला था? यानी दो इलाकों की औरतों की तुलना महज़ उनके ऊपरी रंग-रूप की बिनाह पर. औरतों को सिर्फ़ उनके रूप तक सीमित करना और एक इलाके की सभी औरतों को एक ही ख़ांचे में बांध देना. भला एक प्रदेश की सब औरतें एक तरह की कैसे हो सकती हैं! मेरी पड़ोसन तक मुझसे बहुत अलग दिखती है, दूसरा पहनावा है और मुख़्तलिफ़ तरीके से पेश आती है. टीवी शो तो एक कदम आगे बढ़कर बहस के मुद्दे को सोशल मीडिया पर 'वोटिंग' के लिए ले गया. सवाल वही था 'कौन-सी औरतें ख़ूबसूरत हैं- केरल की या तमिलनाडु की?' टीवी शो के प्रोमो का एक दृश्य विरोध फिर क्या, विरोध की लहर दौड़ गई. आरोप ये कि ये वोटिंग और बहस 'औरतों को सिर्फ़ ख़ूबसूरती के चश्मे से देखकर सामान की तरह' पेश कर रहे हैं. आख़िरकार टीवी चैनल ने बहस का प्रसारण रोक दिया और इंटरनेट पर डाली गई वोटिंग और वीडियो प्रोमो हटा दिए. मेरी सहेलियों की चाय पार्टी कुछ हद तक इसी का जश्न मना रही थी कि एक लोकप्रिय टीवी शो अब औरतों की ख़ूबसूरती के बारे में बनी रूढ़ीवादी समझ को आगे नहीं बढ़ाएगा और ना ही उन्हें महज़ उनके रंग-रूप के लिए पूजेगा. टीवी चैनल द्वारा कराई गई वोटिंग पर इस पार्टी में ख़ूबसूरत मर्दों पर जैसी बहस हुई उसे देख मैंने अपनी सहेलियों से पूछा, 'तो अब तुम लोग मर्दों को उसी चश्मे से क्यों आंक रही हो? तुम मर्दों के व्यक्तित्व के और पहलुओं पर बात क्यों नहीं कर रही हो? उनका मिज़ाज, कितने पढ़े-लिखे हैं, उनकी राजनीतिक सोच, दुनिया की समझ वगैरह.' आधी रात बाद सड़कों पर निकलती हैं ये औरतें दुल्हनिया पाने का भी खेल रहा है जल्लीकट्टू क्या हो पैमाना? क्या ये सब एक इंसान की ख़ूबसूरती आंकने के पैमाने नहीं हैं? एक आवाज़ में उन सबने जवाब दिया, 'क्योंकि तुम मज़ाक नहीं समझती हो. ये कोई टीवी शो थोड़े ही है. इन हल्की-फुल्की बातों से कोई नुक़सान नहीं है, इन पर हंसना सीखो और मस्त रहो.' पर मैं पलटकर बोली, 'यही परेशानी है.' ख़ूबसूरत नैन नक़्श और सुंदर शरीर वाले मर्द मुझे भी पसंद हैं और किसी आम इंसान की तरह मैं भी पहली समझ उनके रूप रंग को देखकर ही बनाती हूं. लेकिन मज़ाक में ही सही जब हम मर्द और औरतों को सिर्फ़ सबसे 'सुंदर' शरीर वाले लोगों के पैमाने पर आंकने लगते हैं तो हम ऐसी धारणा को सही ठहरा देते हैं. शायद इसीलिए दर्जनों लड़कियां उस टीवी शो में भाग लेने को तैयार हो गईं और चैनल ने बहस के लिए ऐसा मुद्दा चुना. उन्हें लगा कि ये बिना नुक़सान वाला हल्का-फुल्का मज़ा होगा. पर क्या मज़ाक में किया ऐसा हल्का-फुल्का मज़ा ही धीरे-धीरे अंधाधुंध 'डाइट', 'डिप्रेशन', अपने में विश्वास खोने और पतला दिखने के लिए 'लिपोसक्शन' जैसे रास्ते अपनाने का दबाव नहीं बनाता है? 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'कैंसर' नामक जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक़ जांच के इस नए तरीक़े को 4051 महिलाओं पर आज़माया गया. नतीजों के मुताबिक़ इससे इलाज की ज़रूरत वाली महिलाओं की पहचान की जा सकती है. हालांकि जांच के इस तरीक़े के बारे में एक विस्तृत अध्ययन ब्रिटेन में किया जा रहा है जिसकी रिपोर्ट 2015 में आएगी. अंडाशय कैंसर का शुरुआत में पता चल जाने से 90 फ़ीसदी मरीज़ों के ठीक हो जाने की संभावना रहती है, जबकि इस बीमारी की जानकारी बाद में लगने पर 30 फ़ीसदी मरीज़ों के ही ठीक होने की संभावना रहती है. अन्य तरह के कैंसर से अलग अंडाशय कैंसर में पेड़ू और पेट दर्द या सूजन जैसे लक्षण इस बीमारी को दबा देते हैं और गांठ के बारे में पता नहीं चल पाता. ऐसे हुआ शोध वैज्ञानिकों को यह बात पहले से पता है कि अंडाशय कैंसर के मरीज़ों के रक्त में 'सीए125' नामक प्रोटीन का स्तर अधिक होता है. शोधकर्ताओं ने रक्त की जांच के उस तरीक़े का परीक्षण किया हैं जिससे कि 'सीए125' प्रोटीन के स्तर के आधार पर कैंसर से पीड़ित हो सकने वाले मरीज़ों की पहचान की जा सके. इस आधार पर सीधे सर्जरी कराने की बजाय 'लो रिस्क' वाले मरीज़ों की साल में एक बार और 'मीडियम रिस्क' वाले मरीज़ों की तीन महीने पर जांच करवाने के अलावा 'हाई रिस्क' वाले मरीज़ों में गांठ के बारे में पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड करवाया गया. अमरीका के टेक्सस विश्वविद्यालय में किए गए इस अध्ययन में महिलाओं पर औसतन 11 वर्षों तक नज़र रखी गई. ब्रिटेन में 50 हजार महिलाओं पर किए जा रहे शोध से निश्चित परिणाम आने की संभावना है. इस जांच में शामिल की गईं महिलाओं में से 10 की अल्ट्रासाउंड स्कैन के आधार पर सर्जरी की गई. रक्त की जांच के आधार पर शुरू में ही इन महिलाओं के कैंसर से पीड़ित होने के बारे में पता लगा लिया गया था. शोधकर्ता डॉक्टर करेन लु ने बीबीसी से कहा, ''हमारे अध्ययन से निश्चित तौर पर इलाज के तरीक़े में बदलाव नहीं होगा, लेकिन इससे हमें विस्तृत जानकारी मिलती है.'' डॉक्टर लु का कहना है कि 50 हज़ार महिलाओं पर ब्रिटेन में किए जा रहे अध्ययन से निश्चित परिणाम मिल सकेगा. उन्होंने कहा, ''दो अहम सवाल हैं- क्या हम एकदम शुरू में कैंसर का पता लगा सकते हैं और क्या हम इससे होने वाली मौतों को कम कर सकते हैं.'' संभावना ओवैरियन कैंसर एक्शन रिसर्च की डॉक्टर सारा ब्लैगडेन का कहना है, ''ब्रिटेन में जारी शोध की तुलना में यह अध्ययन छोटा है, लेकिन इससे पता चलता है कि अंडाशय की प्रभावी जांच की जा सकती है.'' टार्गेट ओवैरियन कैंसर के मुख्य कार्यकारी एनवेन जोंस का कहना है, ''इसमें कोई शक नहीं कि इस अध्ययन के नतीजे बेहद सकारात्मक हैं और हमें इनसे उम्मीद रखनी चाहिए.'' (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका में हुए एक शोध के मुताबिक़ अंडाशय कैंसर की जांच के एक नए तरीक़े की खोज से बिल्कुल शुरुआत में ही इस बीमारी के बारे में पता चल सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवैज्ञानिक रक्त जांच करने के एक ऐसे तरीके की खोज़ कर रहे हैं जिससे कि शुरुआत में ही अंडाशय कैंसर का पता लगाया जा सके. आमतौर पर अंडाशय कैंसर के मरीज़ों में शुरुआत में गांठों का पता लगाना मुश्किल होता है. इस कारण जब तक गांठों के बारे में पता चलता है तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है. 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(ये लाईन कैफ़ी साहब ने लिखी थी मेरी फ़िल्म तमन्ना के एक गाने में.)\n\nSummary:", "target": "अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हिंदी फ़िल्म अभिनेत्री निर्माता और निर्देशक पूजा भट्ट ने बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत की.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपूजा आपको क्या लगता है कि महिलाओं की स्थिति में पिछले सालों में कोई सुधार आया है? मुझे लगता है हमने कुछ इतनी तरक़्क़ी नहीं की है. जब मैं अपनी दादी या नानी को देखती हूँ या उस पीढ़ी की औरतों को देखती हूँ तो मुझे लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ किया था और वो भी चुपचाप किया था. आज जब हम कुछ बोलते हैं या करते हैं तो चाहते हैं कि हमें किसी महिलावादी पत्रिका के कवर पर छापा जाए. आज औरतें अपने आपको कहीं भूल सी गई हैं क्योंकि महिला आज़ादी का मतलब ये नहीं होता कि आप पुरुषों के साथ वही करें जो आप नहीं चाहते कि वो आपके साथ करें. बहुत आवश्यक है कि औरत और मर्द दोनों एक-दूसरे की इज़्ज़त करे और दोनों के बीच खुली बातचीत हो. मुंबई जैसे शहर में रहने वाली औरत का समाज में जो स्थान है, क्या आपको लगता है कि उनकी स्थिति गाँव में रहने वाली औरतों से बेहतर है? नहीं. बिल्कुल अच्छी नहीं है, चाहे आप बोर्डरूम में काम करते हों, फ़िल्म निर्देशक हो या एक्टर हो या गाँव में रहने वाली औरत, आप उतना ही हिंसा या दर्द का शिकार हो सकती हैं. मैं ख़ुद एक साल पहले कुछ ऐसे ही हालात का शिकार थी. मेरे एक अल्कोहलिक व्यक्ति के साथ संबंध थे और वो मुझे मारता था. लोग मुझे यही कहते थे कि अगर ये तुम्हारे साथ हो सकता है तो हमारा क्या होगा, क्योंकि मैं एक मज़बूत औरत मानी जाती हूँ जो खुल कर अपने ख़याल रखती हूँ. अगर मैं अपने नाम को बचाने के लिए चुप रहती तो ये सही नहीं होता, उन तमाम औरतों के लिए जिनके साथ हर रोज़ ये हो रहा है. औरतों के अधिकारों की बात हम सिर्फ आठ मार्च को करते हैं, फिर भूल जाते हैं. जो औरतें हिंदी फ़िल्मों में काम करती हैं, उनके साथ कैसा बर्ताव किया जाता है? किसी के साथ ख़राब बर्ताव नहीं किया जाता लेकिन आप वैसी ही फ़िल्में बनाओगे जैसे आप ख़ुद हैं. फ़िल्म इंडस्ट्री काफी सीमित है, बाहर की दुनिया से ज़्यादा मेलजोल नहीं है, अपनी अलग ही दुनिया में रहते हैं ये लोग. ऐसे में अगर बाहर की दुनिया से जानकारी नहीं लेंगे, अगर रोज़ कुछ सीखेंगे नहीं, तो फ़िल्मों में भी कोई नई बात नहीं आने वाली है. बहुत ज़रूरी है कि अगर आप अपनी कला को बेहतर बनाना चाहते हैं तो पहले अपने आप को बेहतर बनाएँ. ये जो इतने सारे फ़िल्म स्टार राजनीति में हिस्सा ले रहे हैं, किसी न किसी पार्टी से जुड़ रहे हैं. इसके बारे में आपका क्या ख़याल है? मुझसे भी पूछा गया था कि क्या आप इस पार्टी या उस पार्टी के लिए प्रचार करेंगी तो मैंने यही कहा कि मैं एक कलाकार हूँ और मैं बाहर से ज़्यादा काम कर सकती हूँ. अगर मैं किसी एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ जाउंगी तो उसके बाद मैं जो भी करुंगी लोगों को यही लगेगा कि मैं किसी फ़ायदे के लालच से कर रही हूँ. लेकिन ये मेरा निजी ख़याल है. अच्छी बात है कि लोग राजनीति में इतनी रुचि ले रहे हैं लेकिन मुझे इस सब में थोड़ा शक होता है, क्योंकि चुनाव के पहले नेता फ़िल्म स्टारों को पार्टी में लेते हैं लेकिन तीन महीने बाद ये फ़िल्म स्टार राजनीति में नज़र नहीं आते. महिला दिवस के दिन कोई संदेश? मैं यही कहना चाहूँगी कि आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये हमें याद दिलाता है कि अपने अधिकारों के लिए लड़ो. लेकिन ये जंग केवल एक दिन तक सीमित न होने दो. हर दिन अपने औरत होने का जश्न मनाओ. याद रखो- जन्नत एक और है जो मर्द के पहलू में नहीं. 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'' उल्लेखनीय है कि पिछले साल दिल्ली नगर निगम चुनावों में बीएसपी को पंद्रह से अधिक सीटों पर सफलता मिली थी और उसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि विधानसभा चुनावों में वो बड़ा उलटफेर कर सकती है. मल्होत्रा दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी के घोषित उम्मीदवार है. उनका कहना था कि दिल्ली में सत्ता विरोधी लहर चल रही है और जनता इस बार कांग्रेस को हराएगी. दिल्ली में पिछले दस साल से शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार है. मुद्दों के बारे में बीजेपी नेता का कहना था, ''बिजली सड़क पानी सब मुद्दा है. सीलिंग, कालोनियों को रेगुलराइज़ न करना, बढ़ती मंहगाई, आतंकवाद से लोग जूझ रहे हैं. निकम्मी सरकार को कौन वोट देगा. '' उन्होंने शीला दीक्षित सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया और कहा कि मंहगाई दिल्ली चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा है. उल्लेखनीय है कि दस साल पहले कांग्रेस पार्टी प्याज की बढ़ती क़ीमतों को मुद्दा बनाकर सरकार में आई थी. मल्होत्रा का कहना था कि इस बार टमाटर की क़ीमतें आसमान छू रही हैं और साथ ही सभी चीज़ें मंहगी हो गई हैं. कांग्रेस अपनी उपलब्धियों के रुप में मेट्रो का निर्माण और फ्लाईओवरों के निर्माण को गिनाती है. इस बारे में मल्होत्रा कहते हैं कि मेट्रो का काम बीजेपी के शासनकाल में शुरु हुआ था और इसका श्रेय कांग्रेस को देना सही नहीं है. उनका कहना था, '' मेट्रो की शुरुआत हमने की थी. फ्लाईओवर कितने ग़लत तरीके से बने हैं. बीआरटी कॉरीडोर को देख लीजिए. ट्रैफ़िक जाम लग रहा है घंटों का. इसी तरह का शहर बनाना है उनको जहां लोगों को दिक्कतें हों. '' मल्होत्रा का कहना है कि बीजेपी दिल्ली में दो तिहाई बहुमत से जीतेगी और इसका फ़ायदा आने वाले आम चुनावों में भी पार्टी को मिलेगा.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार वीके मल्होत्रा का कहना है कि चुनावों में बसपा एक बड़ा फैक्टर साबित होगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में मल्होत्रा ने साफ साफ कहा कि बहुजन समाज पार्टी को वोट बैंक दिल्ली में बढ़ा है और इन चुनावों में असर दिखेगा. उनका कहना था, ''बीएसपी बड़ा फैक्टर होगा. उनका वोट बैंक क़रीब 15 प्रतिशत है और ये सारे वोट कांग्रेस के थे जो अब बसपा को मिलेंगे. इसका नुकसान कांग्रेस को होगा. बीजेपी को नहीं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बैंगलोर में निर्णायक वनडे में ऑस्ट्रेलिया ने भारत के 384 रन के विशाल लक्ष्य के जवाब में शानदार वापसी की है. फॉकनर के तूफ़ानी शतक की बदौलत मैच रोमांचक मोड़ पर पहुंच गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफॉकनर की शतकीय पारी से ऑस्ट्रेलियाई टीम की मैच में वापसी हुई है. आठ विकेट के नुकसान के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ फॉकनर साथी खिलाड़ी मैके के साथ क्रीज़ पर डटे हुए हैं. मैच बेहद रोमांचक होता जा रहा है. इससे पहले भारत के रोहित शर्मा के धमाकेदार दोहरे शतक की बदौलत टीम इंडिया ने 383 रन बनाए. रोहित ने 158 गेंदों पर 16 छक्कों और 12 चौकों की मदद से 209 रन बनाए. एकदिवसीय मैच में दोहरा शतक जमाने वाले वो तीसरे बल्लेबाज़ बन गए. इससे पहले भारत के ही वीरेंद्र सहवाग ने 219 रन और सचिन तेंदुलकर ने नाबाद 200 रन बनाए थे. इसके अलावा छक्कों की बरसात करते हुए रोहित शर्मा ने कई नए रिकॉर्ड्स बना डाले. उन्होंने कुल 16 छक्के लगाए जो एकदिवसीय मैच की एक पारी में किसी भी बल्लेबाज़ द्वारा मारे गए सबसे ज़्यादा छक्के हैं. शतक रोहित ने अपना शतक 114 गेंदो पर चार चौकों और छह छक्कों की मदद से पूरा किया. शतक पूरे होते ही वो ख़ासतौर पर आक्रमक हो गए. बाक़ी के 109 रन उन्होंने सिर्फ़ 44 गेंदों पर 10 छक्कों और आठ चौकों की मदद से बना डाले. उनकी धमाकेदार पारी की बदौलत भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 384 रन का लक्ष्य दिया है. रोहित शर्मा के अलावा भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने 38 गेंदों पर 62 और शिखर धवन ने 57 गेंदों पर 60 रन बनाए. रोहित शर्मा और महेंद्र सिंह धोनी की आतिशी पारी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने आख़िरी के 10 ओवरों में 141 रन और आख़िर के पांच ओवरों में 100 रन ठोक डाले. सात मैचों की सीरिज़ में बंगलौर में खेला जा रहा मैच आख़िरी मैच है. इससे पहले दोनों टीमों ने दो-दो मैच जीते हैं जबकि दो मैच बारिश की नज़र चढ़ गए थे. बंगलौर मैच के फ़ैसले पर ही सिरीज़ का फ़ैसला होगा. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर में सबसे ज़्यादा आत्महत्या के मामले भारत में हो रहे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nप्रीवेंटिंग स्यूसाइड नाम की इस रिपोर्ट में दर्ज आंकड़े कहते हैं कि भारत में साल 2012 में 2,58,075 लोगों ने आत्महत्या की. महिलाओं के बजाए उन पुरूषों की संख्या ज़्यादा है जिन्होंने अपनी जान ली है. 99,977 महिलाओं ने आत्महत्या की है जबकि 1,58,098 पुरुषों ने अपनी जान ख़ुद ली है. आंकड़े हर चालीस सेकेंड पर दुनिया में कोई आत्महत्या कर रहा है. आत्महत्या के मामलों पर जारी की गई अपनी पहली रिपोर्ट में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि दुनिया भर में तक़रीबन आठ लाख लोग हर साल अपनी जान ले लेते हैं. हर चालीस सेकेंड में दुनिया के किसी ना किसी हिस्से में कोई आत्महत्या करता है. संगठन की रिपोर्ट ने आत्महत्या को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के तौर पर रेखांकित किया है जिसे ख़त्म करने की ज़रूरत है. यह रिपोर्ट इस बात की चेतावनी देती है कि मीडिया में आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग इस तरह की घटनाओं के दोहराए जाने का कारण बनती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि महिलाओं के मुक़ाबले पुरषों में आत्महत्या करने की संभावना तीन गुना ज़्यादा है. आत्महत्या की यह प्रवृत्ति सिर्फ़ उच्च आय वाले देशों में ही नहीं है बल्कि यह आम तौर पर सभी देशों में हो रही हैं. साल 2012 के आंकड़े बताते हैं कि 75 फ़ीसदी आत्महत्या के मामले मध्यम और कम आय वाले देशों में हुए हैं. 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देती है कि हम अपनी बात लोगों को प्रभावित करें और उनका समर्थन हासिल करें, मैने यही बात कश्मीर में हुर्रियत कांफ़्रेंस से, असम में उल्फ़ा से कही है और आँध्र प्रदेश में नक्सलियों से कह रहा हूँ.\" उन्होंने कहा, \"हर वो राजनीतिक संगठन जो जनता के हितों की बात करता है उसे अपनी राजनीतिक लोकप्रियता को मतपेटी से मापना चाहिए. लोकतंत्र में जनता की भावनाएँ मतपेटियों से होकर गुज़रती हैं बंदूक की गोलियों से नहीं.\" ज़मीन वितरण ज़मीन बाँटने की योजना के दूसरे चरण की शुरुआत प्रधानमंत्री सिंह ने की. इस चरण में मेंडक ज़िले में 1.68 लाख एकड़ ज़मीन ग़रीबों को बाँटी जाएगी. उन्होंने कहा, \"महात्मा गाँधी ने ग़रीबी, बेरोज़गारी और अशिक्षा को दूर करने का जो सपना देखा था वह अभी अधूरा है लेकिन जिस तरह हम विकास कर रहे हैं वह जारी रहा तो अगले दशक तक वह पूरा हो जाएगा.\" उन्होंने कहा कि विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए अधिकारियों और पंचायती राज संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा और जनता को चौकस रहना होगा. उन्होंने आँध्र प्रदेश को भरपूर सहयोग देने का वादा भी किया. नक्सलियों की माँगों में एक मुख्य मुद्दा यह भी था कि ग़रीब लोगों को ज़मीन आबंटित किया जाए. संयोग है कि नक्सली संगठनों पर प्रतिबंध लागाए जाने के तीन दिनों बाद ग़रीबों को ज़मीनें बाँटी जा रही हैं. हालांकि इस योजना का पहला चरण 26 जनवरी को शुरु किया गया था और उसमें डेढ़ लाख एकड़ ज़मीनें ग़रीबों को बाँटीं गई थीं. इससे पहले प्रधानमंत्री ने पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की प्रतिमा का अनावरण किया. कार्यक्रम के दौरान उनके साथ मुख्यमंत्री वाय राजशेखर रेड्डी और आँध्र प्रदेश के प्रभारी महासचिव दिग्विजय सिंह भी थे.\n\nSummary:", "target": "आँध्र प्रदेश के दौरे पर गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलियों को चुनौती दी है कि यदि वे लोगों के बीच लोकप्रिय हैं तो उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवे आँध्र प्रदेश के दौरे पर थे जहाँ उन्होंने ग़रीबों को ज़मीन बाँटने की योजना के दूसरे चरण की शुरुआत की. कई कार्यक्रमों में भाग लेने के बाद वे दिल्ली लौट आए हैं. सबसे पहले 'प्रेस एंड नेशन' कार्यक्रम में भाग बोलते हुए उन्होंने नक्सली समस्या को लेकर मीडिया की भूमिका की सराहना की. इस कार्यक्रम का आयोजन तेलगु 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"Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराजकोट में वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ पृथ्वी शॉ सबसे कम उम्र में टेस्ट शतक बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर बने हैं. आज से पांच साल पहले भी उन्होंने एक कारनामा किया था तब सचिन तेंदुलकर के संन्यास के बाद भारत को एक सचिन जैसे ही धुरंधर बल्लेबाज़ की खोज थी. सचिन तेंदुलकर के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद ये सवाल उठने लगे थे कि सचिन की विरासत कौन संभालेगा? क्या सचिन जैसा दूसरा खिलाड़ी आ पाएगा? इसका जवाब इतना आसान नहीं था क्योंकि सचिन जैसा खिलाड़ी एक दिन में नहीं बनता. वर्षों की साधना और क्रिकेट के मैदान पर प्रतिभा दिखाने के बाद कोई सचिन बनता है. लेकिन उसी दौरान सचिन के रिटायरमेंट के कुछ ही दिन बाद नवंबर 2013 में हैरिस शील्ड प्रतियोगिता में रिकॉर्डतोड़ 546 रन बनाकर 15 साल के पृथ्वी शॉ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. रिज़वी स्प्रिंगफ़ील्ड के कप्तान पृथ्वी शॉ ने सेंट फ़्रांसिस डी असीसी के ख़िलाफ़ 330 गेंदों पर 546 रन बनाकर अरमान जाफ़र के 498 रनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया था. उनकी इसी सफलता के बाद बीबीसी ने पृथ्वी शॉ का इंटरव्यू लिया था. बीबीसी हिंदी के साथ विशेष बातचीत में पृथ्वी ने कहा कि उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि वे विश्व रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं. उन्होंने कहा, \"मेरे लिए अच्छा मौक़ा था और विकेट भी काफ़ी अच्छा था. मैं संयम से खेल रहा था. मुझे मेरे कोच ने कहा था कि सिंगल्स पर ध्यान दो और मैंने वैसा ही किया.\" सचिन तेंदुलकर के मुरीद हालाँकि अपनी पारी में पृथ्वी ने 85 चौके और पाँच छक्के लगाए. पृथ्वी के आदर्श भी सचिन तेंदुलकर हैं. वे मानते हैं कि सचिन से उन्होंने काफ़ी कुछ सीखा है. उन्होंने कहा, \"मैं भारत के लिए क्रिकेट खेलना चाहता हूँ, लेकिन अभी सोचा नहीं है कुछ. क्योंकि अभी यह मेरी शुरुआत है. मैं अभी काफ़ी छोटा हूँ और मुझे आगे अभी बहुत खेलना है.\" उन्होंने कहा, \"वो एक अलग दुनिया थी. मेरा वहाँ का अनुभव बहुत अच्छा था. लेकिन भारत में भी उभरते हुए क्रिकेटरों के लिए अच्छी सुविधा है. भारत ने इस मोर्चे पर काफ़ी सुधार किया है.\" पृथ्वी सचिन के ज़बरदस्त प्रशंसक हैं. वे कहते हैं कि सचिन की ईमानदारी और नम्रता से वे काफ़ी प्रभावित हैं, लेकिन वे ख़ुद पृथ्वी बनना चाहते हैं. 'पढ़ाई में भी अच्छा करे' अपनी बल्लेबाज़ी की शैली के बारे में पृथ्वी कहते हैं कि वे टीम की ज़रूरत के हिसाब से खेलते हैं. पृथ्वी के पिता पंकज शॉ अपने बेटे के प्रदर्शन से गदगद हैं. वे चाहते हैं कि उनका बेटा अच्छा खेलता रहे. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, \"पृथ्वी ने पाँच साल की उम्र से ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था. हमने शुरू से ही उसे हरसंभव सुविधा प्रदान की.\" उन्होंने स्वीकार किया कि हैरिसशील्ड में विश्व रिकॉर्ड बनाने के बाद वे मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गए हैं, लेकिन इससे उन पर दबाव नहीं होगा, बल्कि उनके बेटे को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होगा. पृथ्वी के पिता रेडीमेड गारमेंट्स के सेल्समैन हैं और अपने बेटे को लेकर उनके काफ़ी अरमान हैं. वे चाहते हैं कि नौवीं क्लास में पढ़ रहा उनका बेटा क्रिकेट के साथ-साथ पढ़ाई में भी अच्छा करे. ये भी पढ़ें: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "(ये आर्टिकल पहली बार 20 नवंबर 2013 को प्रकाशित हुआ था. आज पृथ्वी शॉ ने पहले टेस्ट मैच में सेंचुरी लगाई है. इसलिए इसे एक बार फिर प्रकाशित किया जा रहा है. )", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराजकोट में वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ पृथ्वी शॉ सबसे कम उम्र में टेस्ट शतक बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर बने हैं. आज से पांच साल पहले भी उन्होंने एक कारनामा किया था तब सचिन तेंदुलकर के संन्यास के बाद भारत को एक सचिन जैसे ही धुरंधर बल्लेबाज़ की खोज थी. सचिन तेंदुलकर के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद ये सवाल उठने लगे थे कि सचिन की विरासत कौन संभालेगा? क्या सचिन जैसा दूसरा खिलाड़ी आ पाएगा? इसका जवाब इतना आसान नहीं था क्योंकि सचिन जैसा खिलाड़ी एक दिन में नहीं बनता. वर्षों की साधना और क्रिकेट के मैदान पर प्रतिभा दिखाने के बाद कोई सचिन बनता है. लेकिन उसी दौरान सचिन के रिटायरमेंट के कुछ ही दिन बाद नवंबर 2013 में हैरिस शील्ड प्रतियोगिता में रिकॉर्डतोड़ 546 रन बनाकर 15 साल के पृथ्वी शॉ ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. रिज़वी स्प्रिंगफ़ील्ड के कप्तान पृथ्वी शॉ ने सेंट फ़्रांसिस डी असीसी के ख़िलाफ़ 330 गेंदों पर 546 रन बनाकर अरमान जाफ़र के 498 रनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया था. उनकी इसी सफलता के बाद बीबीसी ने पृथ्वी शॉ का इंटरव्यू लिया था. बीबीसी हिंदी के साथ विशेष बातचीत में पृथ्वी ने कहा कि उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि वे विश्व रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं. उन्होंने कहा, \"मेरे लिए अच्छा मौक़ा था और विकेट भी काफ़ी अच्छा था. मैं संयम से खेल रहा था. मुझे मेरे कोच ने कहा था कि सिंगल्स पर ध्यान दो और मैंने वैसा ही किया.\" सचिन तेंदुलकर के मुरीद हालाँकि अपनी पारी में पृथ्वी ने 85 चौके और पाँच छक्के लगाए. पृथ्वी के आदर्श भी सचिन तेंदुलकर हैं. वे मानते हैं कि सचिन से उन्होंने काफ़ी कुछ सीखा है. उन्होंने कहा, \"मैं भारत के लिए क्रिकेट खेलना चाहता हूँ, लेकिन अभी सोचा नहीं है कुछ. क्योंकि अभी यह मेरी शुरुआत है. मैं अभी काफ़ी छोटा हूँ और मुझे आगे अभी बहुत खेलना है.\" उन्होंने कहा, \"वो एक अलग दुनिया थी. मेरा वहाँ का अनुभव बहुत अच्छा था. लेकिन भारत में भी उभरते हुए क्रिकेटरों के लिए अच्छी सुविधा है. भारत ने इस मोर्चे पर काफ़ी सुधार किया है.\" पृथ्वी सचिन के ज़बरदस्त प्रशंसक हैं. वे कहते हैं कि सचिन की ईमानदारी और नम्रता से वे काफ़ी प्रभावित हैं, लेकिन वे ख़ुद पृथ्वी बनना चाहते हैं. 'पढ़ाई में भी अच्छा करे' अपनी बल्लेबाज़ी की शैली के बारे में पृथ्वी कहते हैं कि वे टीम की ज़रूरत के हिसाब से खेलते हैं. पृथ्वी के पिता पंकज शॉ अपने बेटे के प्रदर्शन से गदगद हैं. वे चाहते हैं कि उनका बेटा अच्छा खेलता रहे. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, \"पृथ्वी ने पाँच साल की उम्र से ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था. हमने शुरू से ही उसे हरसंभव सुविधा प्रदान की.\" उन्होंने स्वीकार किया कि हैरिसशील्ड में विश्व रिकॉर्ड बनाने के बाद वे मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गए हैं, लेकिन इससे उन पर दबाव नहीं होगा, बल्कि उनके बेटे को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होगा. पृथ्वी के पिता रेडीमेड गारमेंट्स के सेल्समैन हैं और अपने बेटे को लेकर उनके काफ़ी अरमान हैं. वे चाहते हैं कि नौवीं क्लास में पढ़ रहा उनका बेटा क्रिकेट के साथ-साथ पढ़ाई में भी अच्छा करे. ये भी पढ़ें: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": 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घटने की कोई संभावना बने. यानी की अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यात्री किराए में बढ़ोतरी नहीं होगी. बार बार पूछे जाने पर लालू ने केवल इतना कहा,'' अच्छे बजट की उम्मीद कीजिए. हमने पिछले साल में आम आदमी को ध्यान में रखते हुए बजट बनाया था.'' उन्होंने कहा कि वो किराए भाड़े के बारे में फिलहाल कुछ भी नहीं कहना चाहेंगे. रेल बजट ऐसे समय में आया है जब कुछ ही दिन पहले समझौता एक्सप्रेस में विस्फोट हुआ है और रेलवे में सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं. जाहिर है रेल मंत्री को बजट में सुरक्षा संबंधी प्रावधानों पर कुछ अतिरिक्त ध्यान अवश्य देना पड़ा है. वो कहते हैं.'' सुरक्षा से जुड़े सभी विषयों पर हमने विचार किया है और बजट बनाते समय इसका भी पूरा ध्यान रखा है.'' रेल मंत्री का कहना था कि रेल बजट से लोगों को बहुत उम्मीदें रहती हैं क्योंकि ट्रेन के ज़रिए लाखों की संख्या में लोग यात्रा करते हैं. इसके साथ ही स्टील, धातु और खाद जैसी महत्वपूर्ण वस्तुएं ट्रेनों के द्वारा ही ढोई जाती हैं.\n\nSummary:", "target": "रेल बजट के दौरान विपक्षी एनडीए सदस्यों के भारी हंगामे के बावजूद रेल मंत्री लालू यादव इसे पेश कर रहे 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लड़कियां और शोर-शराबा हो गया है. हेलेन आइटम सांग करतीं थी लेकिन आज कोई उनका मुक़ाबला कर सकता है क्या. हालांकि मुझे भी आइटम गाने से ही फेम मिली है लेकिन फ़िर एक के बाद एक वैसे ही ऑफ़र आने लगे तो मैने प्रोड्यूसरों को हाथ जोड़ दिए भईया प्लीज़ मुझे वेश्या मत बनाओ, मुझे कुछ और भी गाने दो. आज के दौर में वैसा संगीत क्यों नहीं बनता जो साठ या सत्तर के दशक में बनता था कमी कहाँ है? उस दौर में बीस के क़रीब संगीतकार थे लेकिन सब एक से बढ़ कर एक टेलैंटेड और मेहनती थे. संगीत ही उनकी जान था. एक टीम की तरह गीतकार, संगीतकार, गायक, निर्माता, निर्देशक बैठते थे और फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से गाना तैयार होता था. आज सौ के लगभग संगीतकार और गायक हैं, लेकिन दो या तीन की ही बराबरी उस दौर के संगीतकारों से की जा सकती है. ऐसा नहीं है कि आज अच्छे गाने नहीं बनते, लेकिन आज गायक और संगीतकार के दिमाग़ में गाने के अलावा और भी हज़ारों चीज़े होतीं हैं. कुछ फ़िल्मकार बिना गीत संगीत के फ़िल्में बना रहे है, एक गायक और संगीतकार होने के नाते आपको यह देख कर कैसा लगता है? वो लोग बिल्कुल सही कर रहे हैं. एक बहुत ही ख़ूबसूरत गाना अगर फ़िल्म में सही जगह पर नहीं है तो वो फ़िल्म को डुबो भी सकता है. अगर गानों को डालने से फ़िल्म की आत्मा मरती है तो उनका न होना ही अच्छा है. मेरा मानना है कि फ़िल्म की रफ्तार मे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए गाना हो या न हो. एक हीरोइन का कहना है कि आज फ़िल्म को सेक्स या शाहरुख़ ख़ान ही चला सकते है आपकी क्या प्रतिक्रिया है, गीत संगीत के लिए कोई जगह ही नहीं बची? पहली बात तो यह कम्पैरिज़न ही ग़लत है. सेक्स का दौर आया था लेकिन आजकल कुछ इस तरह ही फ़िल्में बन रहीं हैं जो बतातीं है कि लोगों की पसंद बड़ी तेज़ी से बदल रही है. शाहरुख़ ख़ान बड़े ज़बरदस्त कलाकार हैं उनकी अपनी जगह है. लेकिन संगीत तो इन सबसे बढ़ कर रहा है. ढेरों ऐसी फ़िल्में हैं जो गानों के बल पर ही चलीं और आज भी लोग गानों से खिचें थियेटर चले आते है. संगीत ने आपको नाम, शोहरत, पैसा सभी कुछ दिया है बदले में आप संगीत के लिए क्या कर रहे है? यह सही है कि मैं आज जो कुछ हूँ संगीत की वजह से हूँ. भगवान ने मुझे यह कला दी है. मै चाहता हूँ इस बहाने मुझसे कुछ भला हो तो अच्छा ही है. अब संगीतकार के तौर कुछ फ़िल्में कर रहा हूँ तो नई आवाज़ों को मौक़ा देने की कोशिश करुंगा. एक स्टूडियो का भी प्रोजेक्ट है जहाँ कुछ अलग करने वालों को अपना टेलैंट दिखाने का मौक़ा मिलेगा.\n\nSummary:", "target": "चल छइयां-छइयां से फ़िल्मी दुनिया पर छा जाने वाले युवा गायक सुखविंदर सिंह ने अब तक ढेरों हिट गीत दिए है. संघर्ष करके सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने वाले सुखविंदर सिंह का मानना है कि कलाकार पैदा होता है बनाया नहीं जाता.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनाइजीरिया में लागोस के म्यूसॉन शैल हॉल में रिहर्सल के दौरान उनसे बातचीत की शुरुआत हुई, उन्होनें सिगरेट सुलगाई और मैने पेन संभाल लिया. रीमिक्स गीतों को लेकर लोगों में और संगीत जगत दोनों में कुछ रोष है. सुखविंदर सिहं का क्या कहना है? देखिए...रीमिक्स के पीछे जो मक़सद था कि नई पीढ़ी को पुराने गानों से, गीतकारों, संगीतकारो से परिचित करवाया जाए वो तो पीछे ही छूट गया है. रीमिक्स के नाम पर संगीत के साथ भद्दा मज़ाक हो रहा है. मै तो इसे क्राइम ही मानता हूँ. देखिए, किसी चीज़ को नए तरीक़े से पेश करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन अपने कल्चर का कुछ तो ध्यान रखना ही चाहिए. आजकल आइटम गाना 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कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग में मौजूद पत्रकार एहतेशाम उल हक़ ने बीबीसी को बताया कि मुशर्रफ़ ने भारत-पाकिस्तान बातचीत में कश्मीर मुद्दे की अहमियत पर ज़ोर दिया. एक सवाल के जवाब में मुशर्रफ़ ने कहा कि उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, अमरीका और पश्चिमी जगत को साफ बता दिया है कि जुलाई-अगस्त तक द्विपक्षीय वार्ताओं में कश्मीर पर बातचीत नहीं हुई तो वह शांति प्रक्रिया में शामिल नहीं रहेंगे. ग़ौरतलब है कि जुलाई-अगस्त में दोनों देशों के बीच पहले विदेश सचिव और फिर विदेश मंत्री स्तर पर बातचीत होनी है. मुशर्रफ़ ने कहा कि उस बातचीत में कश्मीर का मुद्दा आना चाहिए और दोनों देशों को किसी समाधान की ओर बढ़ना चाहिए. पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि कश्मीर मुद्दे पर प्रगति नहीं होने की स्थिति में उनके देश के लिए शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाएगा. मुशर्रफ़ ने जम्मू कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन को पाकिस्तान का राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन हर हाल में जारी रखने की भी बात की.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा है कि जुलाई-अगस्त तक कश्मीर मसले पर प्रगति नहीं 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अधिकतर स्कूली बच्चे थे. नौका में सवार 23 यात्री अब भी लापता हैं. ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति पार्क ने कहा, \"इस मामले में जो ढिलाई बरती गई उसकी ज़िम्मेदारी मेरी बनती है.\" उन्होंने कहा कि तटरक्षक बल अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा. अगर उनसे तुरंत राहत कार्य शुरू किया होता तो कई जानें बच सकती थीं. राष्ट्रपति ने कहा कि अपने मौजूदा स्वरूप में तटरक्षक बल ऐसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है. समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक़ पार्क ने कहा, \"तटरक्षक बल का ढांचा बड़ा है लेकिन उसके पास सामुद्रिक सुरक्षा के लिए कर्मचारियों और बजट की कमी है. साथ ही बचाव के लिए प्रशिक्षण भी नाकाफ़ी है.\" राष्ट्रपति कार्यालय ने एजेंसियों को बताया कि उनकी योजना को पहले संसद से मंजूरी दिलानी होगी जहाँ उनकी पार्टी सैनूरी बहुमत में है. हादसा पार्क ने तटरक्षक बल को भंग किए जाने सहित कई उपायों की घोषणा की. अंतरिम जाँच के मुताबिक़ नौका में क्षमता से तीन गुना ज़्यादा लोग सवार थे और तेज़ी से मोड़ लेने के चक्कर में नौका पलटी थी. नौका के कप्तान और चालक दल के तीन सदस्यों पर जनसंहार का मुक़दमा चलाया जाएगा. अभियोजकों ने चालक दल के 11 अन्य सदस्यों पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है. इस दुर्घटना में चालक दल के 29 में से 22 सदस्यों समेत 172 यात्री ही बच पाए थे. (बीबीसी हिंदी केएंड्रॉइड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक और ट्विटर से भी जुड़ सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दक्षिण कोरिया की राष्ट्रपति पार्क गियून-हे ने कहा है कि देश के तटरक्षक बल को भंग कर दिया जाएगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदेश में हाल में हुई नौका दुर्घटना में क़रीब 300 लोगों के मारे जाने के बाद यह क़दम उठाया जा रहा है. राष्ट्रपति ने टेलीविज़न पर देश को संबोधित करते हुए औपचारिक रूप से इस हादसे के लिए जनता से माफी मांगी. उन्होंने कहा कि बचाव कार्यों के लिए एक नई एजेंसी का गठन किया जाएगा जबकि जाँच का काम पुलिस के ज़िम्मे रहेगा. गत 16 अप्रैल को सेवोल नाम की एक नौका के पलटने से 281 यात्री मारे गए थे जिनमें से अधिकतर स्कूली बच्चे थे. नौका में सवार 23 यात्री अब भी लापता हैं. ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति पार्क ने कहा, \"इस मामले में जो ढिलाई बरती गई उसकी ज़िम्मेदारी मेरी बनती है.\" उन्होंने कहा कि तटरक्षक बल अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा. अगर उनसे तुरंत राहत कार्य शुरू किया होता तो कई जानें बच सकती थीं. राष्ट्रपति ने कहा कि अपने मौजूदा स्वरूप में तटरक्षक बल ऐसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है. समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक़ पार्क ने कहा, \"तटरक्षक बल का ढांचा बड़ा है लेकिन उसके पास सामुद्रिक सुरक्षा के लिए कर्मचारियों और बजट की कमी है. साथ ही बचाव के लिए प्रशिक्षण भी नाकाफ़ी है.\" राष्ट्रपति कार्यालय ने एजेंसियों को बताया कि उनकी योजना को पहले संसद से मंजूरी दिलानी होगी जहाँ उनकी पार्टी सैनूरी बहुमत में है. हादसा पार्क ने तटरक्षक बल को भंग किए जाने सहित कई उपायों की घोषणा की. अंतरिम जाँच के मुताबिक़ नौका में क्षमता से तीन गुना ज़्यादा लोग सवार थे और तेज़ी से मोड़ लेने के चक्कर में नौका पलटी थी. नौका के कप्तान और चालक दल के तीन सदस्यों पर जनसंहार का मुक़दमा चलाया जाएगा. अभियोजकों ने चालक दल के 11 अन्य सदस्यों पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है. इस दुर्घटना में चालक दल के 29 में से 22 सदस्यों समेत 172 यात्री ही बच पाए थे. (बीबीसी हिंदी केएंड्रॉइड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक और ट्विटर से भी जुड़ सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 472, "source_item_id": "472", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1651, "clean_index": 421, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:421"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलिएंडर पेस अभिनीत फिल्म 'राजधानी एक्सप्रेस' 4 जनवरी, 2013 को रिलीज़ होने के लिए तैयार है. हाल ही में फिल्म का पहला लुक मुंबई में सभी के सामने पेश किया गया. इस मौके पर फिल्म की ज़्यादातर कास्ट मौजूद थी लेकिन फिल्म के लीड हीरो यानी खुद लिएंडर पेस यहां मौजूद नहीं थे. तो क्या थी लिएंडर के इस मौके पर मौजूद न होने की वजह? जब बीबीसी ने लिएंडर से फ़ोन के जरिए संपर्क साधने की कोशिश की तो उन्होंने फ़ोन का कोई जवाब नहीं दिया. हालांकि लिएंडर के बचाव में बोलते हुए उनकी फिल्म के पीआर ने ज़रूर इस पूरे मामले पर रौशनी डाली. क्यों नहीं आए लिएंडर पेस के पीआर के मुताबिक, जिस दिन फिल्म का पहला लुक लॉन्च किया गया, उस दिन लिएंडर कोलकाता में थे और फ्लाइट में देरी के कारण वो इस इवेंट में समय पर पहुंच नहीं पाए. खैर अब लिएंडर नहीं आए सो नहीं आए लेकिन इस मौके पर उनकी तारीफ करने वालों की कमी नहीं थी. फिल्म में लिएंडर के साथ काम करने वाली अभिनेत्री सियाली भगत कहती हैं, ''लिएंडर बहुत ही मेहनती हैं. फिल्म में मैंने जो भी दृश्य उनके साथ किए हैं, उन्होंने उन सभी दृश्यों पर बहुत मेहनत की. वो तो एक्टिंग वर्कशॉप में भी आते थे.'' सियाली ये भी कहती हैं कि लिएंडर टेनिस के महारथी हैं और इसके बावजूद उन्होंने अभिनय में कदम रखा और जी-तोड़ मेहनत भी की. वो ये भी कहने से खुद को रोक नहीं पाई कि फिल्म में लिएंडर ने बहुत ही अच्छा काम किया है. जल्द ही रिलीज़ हो रही इस फिल्म का निर्देशन किया है अशोक कोहली ने. लिएंडर की ही तरह बतौर निर्देशक ये अशोक की भी पहली ही फिल्म है.\n\nSummary:", "target": "भारत के टेनिस स्टार लिएंडर पेस ने यूं तो हर सर्फेस पर टेनिस खेला हैं लेकिन जल्द ही वो एक नए प्लेटफार्म पर अपना टैलेंट आजमाते नज़र आएंगे और ये टैलेंट टेनिस नहीं बल्कि अभिनय है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलिएंडर पेस अभिनीत फिल्म 'राजधानी एक्सप्रेस' 4 जनवरी, 2013 को रिलीज़ होने के लिए तैयार है. हाल ही में फिल्म का पहला लुक मुंबई में सभी के सामने पेश किया गया. इस मौके पर फिल्म की ज़्यादातर कास्ट मौजूद थी लेकिन फिल्म के लीड हीरो यानी खुद लिएंडर पेस यहां मौजूद नहीं थे. तो क्या थी लिएंडर के इस मौके पर मौजूद न होने की वजह? 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बहुत सारी कलाकृतियां विलास की वस्तु हो चुकी हैं. कई सारे कला संग्रहकर्ताओं के लिए फेरारी कार ख़रीदने और कोई महँगी कलाकृति ख़रीदने में कोई अंतर नहीं है. इसलिए इसे भी कला के मूल्य निर्धारण का आधार नहीं माना जा सकता. इसलिए मेरा मानना है कि किसी कलाकृति की गुणवत्ता के निर्धारण का कोई अनुभवसिद्ध तरीक़ा अगर है, तो वो बाज़ार है. और शायद यही वजह है कि आज की दुनिया से कला लुप्त होती जा रही है. 'कला जगत के पोप' कला आलोचक क्लीमेंट ग्रीनबे ने एक बार कहा था, \"कला की नाभिनाल पैसे से जुड़ी है, अब वो चाहे निजी पूँजी हो या सरकारी.\" ऐसे में सवाल उठता है कि किसी कलाकृति की क़ीमत कौन तय करता है, मीडिया, कला आलोचक कला संरक्षक, कला के ख़रीदकार या फिर आम दर्शक ? मेरा मानना है कि कला जगत में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण में किसी की सर्वाधिक भूमिका होती है तो कला संरक्षक की है. जर्मन कला आलोचक विली बॉनगार्ड ने एक बार कहा था, \"कला संरक्षक कला जगत के पोप हैं\". मेरा मानना है कि ऐतिहासिक तौर पर कला जगत काफी हद तक अंतर्मुखी रहा है. कई ऐसे सफल कलाकार हुए हैं जिन्हें व्यापक जनता की ज़रूरत नहीं रही है. यह कलाकारों, आर्ट डीलर, संग्रहकर्ताओं के बीच का मामला रहा है. व्यापक जनता तक की कला का पहुँचना बहुत ज़्यादा मायने नहीं रखता है. हालाँकि कोई भी व्यक्ति कला का आनंद उठा सकता है. यहाँ तक कि मैं भी. (ग्रेसन पेरी पॉटर कलाकार हैं. उन्हें कला जगत का प्रतिष्ठित टर्नर प्राइज़ (2003) मिल चुका है. यह लेख उनके बीबीसी रेडियो-4 रीथ वार्षिक व्याख्यान शृंखला के तहत दिए जा रहे पहले व्याख्यान का संपादित अंश है. इस श्रंखला के तहत पेरी चार व्याख्यान देंगे. पेरी अपने दूसरे व्याख्यान में \"कला क्या है\" विषय पर बोलेंगे.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ग्रेसन पेरी ने \"लोकतंत्र को कला की समझ नहीं है\" व्याख्यान में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण के तरीकों पर विचार किया है. उन्होंने वर्तमान समय में किसी कलाकृति में सर्वाधिक प्रभावशाली कारकों पर अपनी राय रखी है. जानिए उन्हीं के शब्दों में.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमैं कला के बारे में एक कलाकार के तौर पर बोल रहा हूँ. उन अनुभवों के आधार पर बोल रहा हूँ जो मुझे एक कलाकार के तौर पर हुए हैं. अकादमिक तौर पर मैं कला विशेषज्ञ नहीं हूँ और इसीलिए मेरे द्वारा केवल अपने अनुभवों के साधारणीकरण के आधार पर कला के बारे में कहना अकादमिक जगत के लोगों को बुरा लग सकता है. मेरा लेक्चर कला की दुनिया के बारे में है. कला आप जिसे दुनियाभर के संग्रहालयों, कला दीर्घाओं में देखते हैं या फिर गलियों में और साइबर वर्ल्ड या कहीं भी देखते हैं. मैं इस लेक्चर में बताना चाहूँगा कि लोकतंत्र को कला की समझ नहीं है'. कला जगत में क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं, इसका निर्णय करने का आधार क्या होता है, इसका जवाब देना आसान नहीं है. अच्छी कला क्या है कला जगत में लोकप्रियता और कलात्मकता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं रहा है. मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि मैं कला के मूल्य के बारे में बात करने जा रहा हूँ. बाज़ार मूल्य, लोकप्रियता, ऐतिहासिक महत्व, कलात्मक गुणवत्ता इत्यादि कला के मूल्य निर्धारण के आधार हो सकते हैं. आप देख सकते हैं कि कला के मूल्य निर्धारण के कई प्रतिमान परस्पर विरोधी भी हो सकते हैं. कई बेहद लोकप्रिय कलाकृतियों को कला के लिए समर्पित लोगों ने वाहियात माना है. 1990 के आसपास दो रूसी कलाकारों ने कई देशों की लोकप्रिय कलाकृतियों का अध्ययन करवाया. उन्होंने पाया कि हर देश में लगभग एक तरह ही की कलाकृति पसंद आती है. ऐसे चित्र मूलतः प्रकृति चित्र थे जिनमें नीले रंग का बहुतायत में इस्तेमाल किया गया था. इस नतीजे के बाद इन कलाकारों ने कहा था कि हम स्वतंत्रता की तलाश में निकले थे, लेकिन हमें ग़ुलामी मिली. किसी कलाकृति के बारे में यह कहना कि यह सुंदर नहीं है, उसके मूल्य निर्धारण का ग़लत प्रतिमान होगा क्योंकि सुंदरता एक बहुत ही सापेक्षिक मूल्य है. यह मूलतः एक कंस्ट्रक्ट है. ऐसे में सवाल उठता है कि अच्छी कला क्या है इसका निर्धारण कौन करता है? बहुत सारी कलाकृतियां विलास की वस्तु हो चुकी हैं. कई सारे कला संग्रहकर्ताओं के लिए फेरारी कार ख़रीदने और कोई महँगी कलाकृति ख़रीदने में कोई अंतर नहीं है. इसलिए इसे भी कला के मूल्य निर्धारण का आधार नहीं माना जा सकता. इसलिए मेरा मानना है कि किसी कलाकृति की गुणवत्ता के निर्धारण का कोई अनुभवसिद्ध तरीक़ा अगर है, तो वो बाज़ार है. और शायद यही वजह है कि आज की दुनिया से कला लुप्त होती जा रही है. 'कला जगत के पोप' कला आलोचक क्लीमेंट ग्रीनबे ने एक बार कहा था, \"कला की नाभिनाल पैसे से जुड़ी है, अब वो चाहे निजी पूँजी हो या सरकारी.\" ऐसे में सवाल उठता है कि किसी कलाकृति की क़ीमत कौन तय करता है, मीडिया, कला आलोचक कला संरक्षक, कला के ख़रीदकार या फिर आम दर्शक ? मेरा मानना है कि कला जगत में किसी कलाकृति के मूल्य निर्धारण में किसी की सर्वाधिक भूमिका होती है तो कला संरक्षक की है. जर्मन कला आलोचक विली बॉनगार्ड ने एक बार कहा था, \"कला संरक्षक कला जगत के पोप हैं\". मेरा मानना है कि ऐतिहासिक तौर पर कला जगत काफी हद तक अंतर्मुखी रहा है. कई ऐसे सफल कलाकार हुए हैं जिन्हें व्यापक जनता की ज़रूरत नहीं रही है. यह कलाकारों, आर्ट डीलर, संग्रहकर्ताओं के बीच का मामला रहा है. व्यापक जनता तक की कला का पहुँचना बहुत ज़्यादा मायने नहीं रखता है. हालाँकि कोई भी व्यक्ति कला का आनंद उठा सकता है. यहाँ तक कि मैं भी. 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है. हमलों के बाद इसराइल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और गज़ा पट्टी पर हवाई हमले किए गए हैं. बुरा प्रभाव व्हाइट हाउस ने कहा है कि तेल अवीव में हुए बम विस्फोटों का हमास समेत अन्य फ़लस्तीनी आतंकवादी संगठनों द्वारा समर्थन करना सही नहीं है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. प्रवक्ता स्कॉट मैकलॉन ने कहा \" फ़लस्तीनी मंत्रिमंडल के सदस्यों द्वारा इन हमलों का बचाव करना या समर्थन करना फ़लस्तीनी प्राधिकरण और मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने की कोशिशों में लगे अन्य देशों के साथ उनके संबंधों पर बुरा प्रभाव डाल सकता है.\" इससे पहले फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इन हमलों की भर्त्सना की थी लेकिन हमास ने कहा था कि यह कार्रवाई बचाव में की गई है. हमास के प्रवक्ता सामी अबू ज़ूहरी कहते हैं कि ये धमाके फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ जारी इसराइली अपराधों के विरोध में की गई स्वत स्फूर्त प्रक्रिया है. उनका कहना था \" फ़लस्तीनी जनता अपना बचाव कर रही है और उन्हें अपने बचाव के लिए कोई भी रास्ता अपनाने का हक है.\" इसराइल के विदेश मंत्रालय ने इस घटना के लिए हमास को ज़िम्मेदार ठहराया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गिडियॉन मायर ने बीबीसी से कहा \"इसमें हमास का सीधा हाथ भले ही न हो लेकिन विचारधारा तो वही है. \" अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सीन मैक्कॉरमैक ने कहा है कि अमरीका अब हमास के नेतृत्व वाली सरकार का असली चेहरा देख रहा है. अनिश्चितता की स्थिति संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से अपील की है कि वो आत्मघाती हमलों के संबंध में कड़ा रुख अपनाएं. उन्होंने कहा कि इसराइल फ़लस्तीनी प्रशासन के मुद्दे पर नौ मई को रुस, अमरीका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र की बैठक में वो ये मुद्दा उठाएंगे. यूरोपीय संघ के विदेश मामलों के प्रमुख हाविए सोलाना ने सभी पक्षों से अपील की है कि वो धैर्य से काम लें और हिंसा न फैलाएं. रुस के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर हमलों की निंदा की है. इस बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में हिस्सा लेने गए इसराइली प्रतिनिधि डैन गिलरमैन ने कहा है कि मध्य पूर्व में अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं और पिछले दिनों इस क्षेत्र में कुछ देशों द्वारा दिए गए बयान युद्घ भड़काने वाले हैं.\n\nSummary:", "target": "अमरीका ने तेल अवीव में हुए बम 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Hindi.\n\nText:\nबीबीसी उर्दू के ज़ीशान हैदर ने इस घटना का सीसीटीवी फ़ुटेज ट्वीट किया है जिसमें विमान गिरता दिख रहा है. ज़ीशान अपने ट्वीट में लिखते हैं कि फ़ुटेज में विमान के इंजन में आग लगी हुई नज़र नहीं आ रही है. पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस का ए320 एयरबस विमान लाहौर से रवाना हुआ था. इस विमान में 99 लोग सवार बताए जा रहे हैं जिनमें से 97 की मौत की पुष्टि हो गई है. वहीं, दो घायलों को बचाया गया है. समाप्त ज़ीशान हैदर ने एक तस्वीर भी ट्वीट की है जिसमें विमान हादसे के बाद रिहाइशी इलाक़े का दृश्य दिख रहा है. कैसे हुआ ये हादसा लाहौर से चलकर कराची पहुंचते हुए एयरपोर्ट पर लैंडिंग से ठीक पहले ये विमान रिहाइशी इलाक़े जिन्ना गार्डन मॉडल कॉलोनी में गिर गया जो कि एयरपोर्ट से सिर्फ 3.2 किलोमीटर दूर है. हादसे से पहले विमान के चालक ने इंजन ख़राब होने और विपत्ति का संकेत मेडे जारी किया था. पीआईए के मुख्य अधिकारी एयर वाइस मार्शल अरशद मलिक ने बताया कि पायलट ने ट्रैफ़िक कंट्रोल को बताया था कि विमान में तकनीकी समस्याएं आ रही थीं. पाकिस्तान के समाचार चैनल दुनिया न्यूज़ ने कहा है कि उनके पास पायलट और एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग है. ये रिकॉर्डिंग मॉनिटरिंग वेबसाइट liveatc.net पर भी पोस्ट की गई है. इस कथित रिकॉर्डिंग में पायलट कहता है, \"विमान के दो इंजनों ने काम करना बंद कर दिया है, .... .... .... मे डे मे डे.\" घटनास्थल पर मौजूद रहे बीबीसी उर्दू संवाददाता रियाज़ सुहैल कहते हैं, \"अधिकारियों के मुताबिक़, इस क्रैश से एक मिनट पहले जहाज़ का एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल टावर से संबंध टूट गया था. इसके बाद धुआँ उठता हुआ देखा गया. इसके बाद इस विमान के क्रैश होने की सूचना मिली.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के कराची में शुक्रवार को हुए विमान हादसे का सीसीटीवी फ़ुटेज सामने आया है जिसमें विमान कराची एयरपोर्ट पर लैंडिंग से पहले एक रिहाइशी इलाक़े पर गिर रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी उर्दू के ज़ीशान हैदर ने इस घटना का सीसीटीवी फ़ुटेज ट्वीट किया है जिसमें विमान गिरता दिख रहा है. ज़ीशान अपने ट्वीट में लिखते हैं कि फ़ुटेज में विमान के इंजन में आग लगी हुई नज़र नहीं आ रही है. पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस का ए320 एयरबस विमान लाहौर से रवाना हुआ था. इस विमान में 99 लोग सवार बताए जा रहे हैं जिनमें से 97 की मौत की पुष्टि हो गई है. वहीं, दो घायलों को बचाया गया है. समाप्त ज़ीशान हैदर ने एक तस्वीर भी ट्वीट की है जिसमें विमान हादसे के बाद रिहाइशी इलाक़े का दृश्य दिख रहा है. कैसे हुआ ये हादसा लाहौर से चलकर कराची पहुंचते हुए एयरपोर्ट पर लैंडिंग से ठीक पहले ये विमान रिहाइशी इलाक़े जिन्ना गार्डन मॉडल कॉलोनी में गिर गया जो कि एयरपोर्ट से सिर्फ 3.2 किलोमीटर दूर है. हादसे से पहले विमान के चालक ने इंजन ख़राब होने और विपत्ति का संकेत मेडे जारी किया था. पीआईए के मुख्य अधिकारी एयर वाइस मार्शल अरशद मलिक ने बताया कि पायलट ने ट्रैफ़िक कंट्रोल को बताया था कि विमान में तकनीकी समस्याएं आ रही थीं. पाकिस्तान के समाचार चैनल दुनिया न्यूज़ ने कहा है कि उनके पास पायलट और एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग है. ये रिकॉर्डिंग मॉनिटरिंग वेबसाइट liveatc.net पर भी पोस्ट की गई है. इस कथित 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बताया कि ऐपल कंपनी ने गुरूवार को अपनी नई तकनीक के लिए पेटेंट का आवेदन किया है, लेकिन इसके लिए जमा किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ऐपल इस पर 2011 के अगस्त महीने से ही काम कर रही थी. यानी अब ये कहा जा सकता है कि आईफ़ोन और आईपैड के बाद ऐपल अब आईवॉच की तैयारी कर रहा है. हालाकि पेटेंट करा लेने के बाद भी कई बार ऐसा होता है कि कंपनी बाज़ार में अपना उत्पाद नहीं उतार पाती है. लेकिन ब्लूमबर्ग, वॉल स्ट्रीट जर्नल और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे सभी मीडिया संस्थानों सभी ने इसी महीने ये ख़बर छापी है कि सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि ऐपल हाथ की घड़ी जैसी कोई चीज़ जल्द ही बाज़ार में उतारने की तैयारी कर रहा है. लेकिन जब बीबीसी ने ऐपल से संपर्क किया तो कंपनी ने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. कंगन या स्मार्टवॉच? जानकार बताते हैं कि ऐपल जिस तरह के उपकरण की तैयारी कर रहा है वो चूड़ी या कंगन की तरह हाथ की कलाई में पहनने वाली कोई चीज़ होगी. इस तरह की चीज़ 80 के दशक में किशोरों के बीच ख़ूब लोकप्रिय थी लेकिन बाद में लोग उसे कम पसंद करने लगे क्योंकि कुछ समय के बाद उस उपकरण की आकृति बिगड़ जाती थी. मार्टियन कंपनी आवाज़ से संचालित घड़ी जल्द ही बाज़ार में उतारने वाली है. इसके अलावा कुछ लोगों ने उस उपकरण से हाथों को नुक़सान पहुंचने की भी शिकायत की थी. लेकिन ऐपल उसी उपकरण में तकनीकी तौर पर और सुधार करके नए तरीक़े से पेश करने की तैयारी कर रहा है. हाथ की कलाई में बंधे इस घड़ी या उपकरण का संपर्क फ़ोन, टैबलेट या लैपटॉप से होगा और इस घड़ी के ज़रिए उन उपकरणों से काम लिया जा सकता है. एबीआई रिसर्च के अनुसार फ़ॉसिल, पेबल और सोनी जैसी कंपनियां पहले से ही स्मार्ट वॉच बेच रहीं हैं और सैमसंग तथा मार्टियन कंपनियां इस तरह के उपकरण बाज़ार में लाने की तैयारी कर रही हैं. इस क्षेत्र में फिलहाल नाइक कंपनी के फ़्यूलबैंड और गार्मिन फ़ोररनर का वर्चस्व है जिनका 60 फ़ीसदी बाज़ार पर क़ब्ज़ा है. लेकिन इन उपकरणों में केवल कुछ ही ख़ासियत हैं. विशेषज्ञों के अनुसार स्मार्टवॉच के बारे में तो कई वर्षों से चर्चा होती रही हैं लेकिन लोगों की कल्पना को साकार करने संबंधी तकनीक की खोज हाल ही में हुई है.\n\nSummary:", "target": "अमरीकी पेटेंट ऑफ़िस से मिली जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि ऐपल कंपनी अब आईवॉच यानी एक 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परिवार के लोग उनके शासनकाल में काफी अमीर हो गए हैं. इन लोगों में वेन जियाबाओ की माँ, बेटा, बेटी और छोटे भाई शामिल हैं. अखबार में कहा गया है कि वेन के परिवार वालों के नाम उनके व्यापारिक हिस्सेदारों के बीच में छिपाए गए हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक फिलहाल ऐसे संकेत नहीं मिले हैं कि वेन जियाबाओ अपने परिवार की व्यापारिक गतिविधियों से परिचित हैं या फिर उसमें शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इस बारे में चीनी सरकार और वेन के रिश्तेदारों की इस मामले में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने भी कुछ कहने से इनकार कर दिया. ग़रीब परिवार अखबार लिखता है कि वेन जियाबाओ की माँ उत्तरी चीन में एक स्कूल टीचर थीं. माओ के एक राजनीतिक अभियान के दौरान उनके पिता ने उन्हें सुअरों की देखभाल का जिम्मा सौंप दिया था. अखबार का कहना है कि पिछले साल एक भाषण के दौरान खुद वेन जियाबाओ ने कहा था कि उनका बचपन बेहद गरीब परिवार में बीता है. न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है, “अब ये स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं और वेन जियाबाओ की नब्बे वर्षीया मां यांग झियुन न सिर्फ गरीबी को बहुत पीछे छोड़ आई हैं बल्कि पूरी तरह से अमीर बन चुकी हैं. कम से कम दस्तावेज तो यही बताते हैं.” अखबार लिखता है कि चीन में वित्तीय सेवा देने वाली एक बड़ी कंपनी में ही उनके नाम से पांच साल पहले एक करोड़ बीस लाख डॉलर का निवेश हुआ था. वेबसाइट ब्लॉक न्यू यॉर्क टाइम्स में इस खबर के प्रकाशित होने के बाद चीन में अखबार की वेबसाइट पर रोक लगा दी गई है.ये जानकारी खुद न्यू यॉर्क टाइम्स अखबार ने दी है. अखबार का ये भी कहना है कि चीन के नियंत्रकों ने देश की सबसे ज्यादा माइक्रोब्लॉगिंग सेवाओं पर भी रोक लगा दी थी जहां इस खबर की चर्चा हो रही थी. न्यू यॉर्क टाइम्स ने अपनी इस खबर में कहा था कि वेन जियाबाओ के परिवार वालों ने इतनी अकूत संपत्ति कैसे अर्जित की या फिर उन्हें इन सबके बारे में पता है भी या नहीं, अखबार के पास इसके विवरण नहीं हैं. लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक ये स्पष्ट है कि यह सब तब हुआ जब उनके बेटे वेन की चीनी शासन में तरक्की होने लगी. यानी साल 1998 में जब वो देश के उप प्रधानमंत्री और उसके पाँच साल बाद जब प्रधानमंत्री बने. न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो दस्तावेज इकट्ठे किए हैं, उनके मुताबिक वेन जियाबाओ की न सिर्फ माँ, बल्कि उनके बेटे, बेटी, छोटा 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संख्या में लोग मौजूद थे. इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के इस्तीफ़ें की मांग कर रहे हैं. इमरान का आरोप है कि नवाज़ शरीफ़ ने देश में बीते साल हुआ आम चुनाव धांधली करके जीता था. वहीं नवाज़ शरीफ़ ने भगदड़ में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताई है और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को घायलों का बेहतर तरीके से इलाज करने का आदेश दिया है. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान से मिल रही ख़बरों में कहा गया है कि मुल्तान शहर में एक राजनीतिक रैली में मची भगदड़ में कम से कम छह लोग मारे गए हैं और 40 अन्य घायल हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभगदड़ उस समय मची जब पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता इमरान ख़ान के भाषण के बाद लोग स्टेडियम से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे. इमरान ख़ान ने प्रशासन की अक्षमता को इस भगदड़ की वजह बताया है. उन्होंने कहा है कि वे मुल्तान के डिप्टी कमिश्नर की निंदा करते हैं क्योंकि प्रशासन और पुलिस ने सहयोग नहीं किया. घायलों को मुल्तान के अस्पताल में भर्ती कराया गया है. अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर परवेज़ ने बीबीसी उर्दू को बताया कि 37 घायलों को भर्ती कराया गया है. उनका ये भी कहना है कि इनमें से कोई भी व्यक्ति गंभीर रूप से घायल नहीं है. सरकार विरोधी प्रदर्शन पाकिस्तान में इस साल अगस्त से ही सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के अध्यक्ष इमरान खान विभिन्न शहरों में सरकार विरोधी सभाएं कर रहे हैं. इससे पहले उन्होंने कराची और लाहौर में सभा थी. मुल्तान की इस सभा में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे. इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के इस्तीफ़ें की मांग कर रहे हैं. इमरान का आरोप है कि नवाज़ शरीफ़ ने देश में बीते साल हुआ आम चुनाव धांधली करके जीता था. वहीं नवाज़ शरीफ़ ने भगदड़ में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताई है और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को घायलों का बेहतर तरीके से इलाज करने का आदेश दिया है. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 481, "source_item_id": "481", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1385, "clean_index": 429, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:429"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयह बैठक ऐसे समय में हो रही है कि जबकि कुछ ही दिनों पहले दुनिया के प्रमुख औद्योगिक देशों के संगठन जी-8 ने मध्य पूर्व में राजनीतिक सुधारों पर ज़ोर देने की बात कही है. शुरुआत में ही ओआईसी के महासचिव डॉ अब्दुलवाहेद बलकज़ीज ने ज़ोरदार भाषण में मुस्लिम जगत की नाकामियों पर ज़ोर दिया. उन्होंने विदेश मंत्रियों को बताया कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के मामले में उनके देशों का रिकॉर्ड 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पागल मत बनाओ. क्या सलमान ख़ान ने खेल के लिए कभी कुछ किया है...नहीं.\" एक ट्वीट के जवाब में योगेश्वर ने ये भी लिखा की वो निराश नहीं हैं. उन्होंने लिखा, \"निराश वो लोग हैं जिनको सच बात हज़म नहीं हो रही, उनको पता नहीं मेने क्या बोला ओर क्यूँ बोला.\" कुछ लोगों ने योगेश्वर को विवादों से दूर रहने की सलाह भी दी. रिशभ (‏@imrrishabh ) ने लिखा, \"भाई तू कांस्य भी ना जीत पाएगा अगर नेतागिरी पर ध्यान देगा. खेल पर ध्यान दे.\" चौधरी डी ट्रंप (‏@sailorsmoon) ने लिखा, \"भाई छोड़ो. हमें पदक चाहिए बस और वो तुम लाओगे, एम्बेसेडर नहीं. पड़के लगे रहो बस.\" (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ़िल्म अभिनेता सलमान ख़ान को रियो ओलंपिक का गुडविल एम्बेसेडर बनाए जाने पर पहलवान योगेश्वर दत्त ने सवाल क्या उठाए, सोशल मीडिया वेबसाइट ट्विटर पर नई बहस ही छिड़ गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअपनी अगली फ़िल्म 'सुल्तान' में सलमान ख़ान एक पहलवान का किरदार निभा रहे हैं. बहुत से लोगों ने योगेश्वर 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वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में भी मानवाधिकार की स्थिति बिगड़ रही है. इसके अलावा रूस का प्रशासन चेचन्या में युद्ध को आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के नाम पर जायज़ ठहराने की कोशिश कर रहा है. संस्था ने कहा है कि सद्दाम हुसैन का शासन क्रूर रहा होगा मगर इसे हटाने के लिए मार्च 2003 में जो रास्ता अपनाया गया वह ठीक नहीं ठहराया जा सकता. संस्था के अनुसार, \"बुश प्रशासन इराक़ में युद्ध को मानवीय हस्तक्षेप कहकर उचित नहीं ठहरा सकता और न ही टोनी ब्लेयर ऐसा कर सकते हैं.\" उधर सोमवार को अमरीका के एक रेडियो को दिए साक्षात्कार में अमरीका के पूर्व प्रमुख हथियार निरीक्षक डेविड के ने इराक़ में व्यापक विनाश की क्षमता वाले हथियारों की मौजूदगी पर एक बार फिर संदेह जाहिर किया. उनका कहना था कि इराक़ की ओर से ख़तरों के बारे में सीआईए ने जो चेतावनी अमरीकी राष्ट्रपति को दीं उसके बारे में उसे सफाई देनी चाहिए.\n\nSummary:", "target": "प्रमुख मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि इराक़ की 'क्रूर सत्ता' को हटाना वहाँ जंग छेड़ने का कोई वाजिब कारण नहीं हो सकता है.", "probe_text": "Summarize the 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गया था कि हर प्रांत में एक महिला सीट आरक्षित रखी जाए. लेकिन जब संविधान घोषित हुआ तो हमें पता चला कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में यह कर दिया गया है.” मुश्किलें काबुल में स्थिति फिर भी ठीक दिखती है क्योंकि यहाँ क़ानून व्यवस्था की स्थिति बाक़ी प्रांतों की तुलना में बेहतर है क्योंकि यहाँ सरकार का असर पूरा है. मज़ारे शरीफ़ को छोड़कर बाक़ी प्रांतों अभी भी क़बायली लड़ाकों का प्रभाव बना हुआ है. काबुल में तो महिलाएँ काम करने के लिए बाहर भी आ रही हैं. लेकिन क्या उनकी स्थिति सचमुच बेहतर है? इस सवाल पर मानवाधिकार आयोग में महिलाओं की स्थिति पर काम कर रहीं अनारकली कहती हैं, “अभी भी मर्द घर की महिलाओं को बाहर काम करने नहीं जाने देना चाहते क्योंकि जो महिलाएँ काम करने बाहर जाती हैं उनको अच्छा नहीं समझा जाता.” वे स्वीकार करती हैं कि बाहर काम करने जाने के कारण कई लोग उनके बारे में ग़लत धारणाएँ बनाते हैं. इसका कारण पूछने पर वे कहती हैं, “दरअसल समाज में शिक्षा इतनी कम है कि महिलाएँ ख़ुद अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानतीं.” अफ़ग़ानिस्तान में बमुश्किल 20 प्रतिशत लोग साक्षर हैं और महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत तो 14 ही है. अशिक्षा हिंदू सिख समुदाय के रवींदर सिंह महिलाओं की बदतर स्थिति को अशिक्षा से ही जोड़कर देखते हैं. वे कहते हैं कि जब तक यह स्थिति नहीं सुधरेगी अफ़ग़ानिस्तान में कुछ नहीं बदलने वाला है. काबुल यूनिवर्सिटी में क़ानून और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर वादिर सफ़ी कहते हैं कि तत्काल तो वैसे भी कुछ नहीं बदलने वाला है और इसके लिए आने वाले समय का इंतज़ार करना होगा. अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं पर पाबंदी और अत्याचार की कहानियाँ जगज़ाहिर हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय कोशिश कर रहा है कि राजनीति में उनको लाकर समाज को बदलने की कोशिश की जाए. भारत में महिलाओं को संसदीय चुनाव में आरक्षण देने के मसले को दो दशकों से जिस तरह टाला जा रहा है उसे देखकर तो लगता है कि रूढ़ीवादी माने जाने वाले अफ़ग़ानिस्तान ने एकबारगी एक लंबी छलाँग तो लगा ही ली है.\n\nSummary:", "target": "ज़ाबुल दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान का एक प्रांत हैं. सड़क से जाएँ तो राजधानी काबुल से कोई सात घंटे की दूरी पर.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस प्रांत की तीन सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की 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जब तक यह स्थिति नहीं सुधरेगी अफ़ग़ानिस्तान में कुछ नहीं बदलने वाला है. काबुल यूनिवर्सिटी में क़ानून और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर वादिर सफ़ी कहते हैं कि तत्काल तो वैसे भी कुछ नहीं बदलने वाला है और इसके लिए आने वाले समय का इंतज़ार करना होगा. अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं पर पाबंदी और अत्याचार की कहानियाँ जगज़ाहिर हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय कोशिश कर रहा है कि राजनीति में उनको लाकर समाज को बदलने की कोशिश की जाए. भारत में महिलाओं को संसदीय चुनाव में आरक्षण देने के मसले को दो दशकों से जिस तरह टाला जा रहा है उसे देखकर तो लगता है कि रूढ़ीवादी माने जाने वाले अफ़ग़ानिस्तान ने एकबारगी एक लंबी छलाँग तो लगा ही ली है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 485, "source_item_id": "485", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2605, "clean_index": 433, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:433"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nड्रोन विमानों के इस्तेमाल पर सवाल उठते रहे हैं अधिकारियों का कहना है कि मारे गए संदिग्ध चरमपंथियों में अल-कायदा का एक सदस्य भी शामिल है. ड्रोन विमानों ने मीर अली इलाके में दो ठिकानों को निशाना बनाया. उत्तरी वजीरिस्तान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सक्रिय चरमपंथी समूहों का गढ़ है. यहां बीते सप्ताह हुए एक ड्रोन हमले में तालिबान के वरिष्ठ कमांडर मुल्ला नज़ीर मारे गए थे. मुल्ला नज़ीर पाकिस्तान में सक्रिय चार चरमपंथी धड़ों में से एक के नेता थे जिन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान की मदद के लिए लड़ाके भेजे थे. ड्रोन हमले, पाकिस्तान और अमरीका के बीच तनाव की वजह रहे हैं. पाकिस्तान का कहना है कि इन हमलों में उसके निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं और इससे उसकी सम्प्रभुता का उल्लंघन होता है. साल 2009 में बराक ओबामा के अमरीकी राष्ट्रपति बनने के बाद पाकिस्तान में ड्रोन हमलों की संख्या बढ़ती गई जिनमें सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. पाकिस्तान के लोगों में इसकी वजह से गुस्सा रहा है. मारे गए लोगों में अल-कायदा और तालिबान के वरिष्ठ नेता भी शामिल रहे हैं. इसने अलावा और भी कई चरमपंथी मारे जा चुके हैं जिनकी नाम और पहचान जाहिर नहीं हो पाई. इसे भी पढ़ें टॉपिक\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में अधिकारियों का कहना है कि देश के पश्चिमोत्तर कबाइली इलाके उत्तरी वजीरिस्तान में ड्रोन हमले में कम से कम सात लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nड्रोन विमानों के इस्तेमाल पर सवाल उठते रहे हैं अधिकारियों का कहना है कि मारे गए संदिग्ध चरमपंथियों में अल-कायदा का एक सदस्य भी शामिल है. ड्रोन विमानों ने मीर अली इलाके में दो ठिकानों को निशाना बनाया. उत्तरी वजीरिस्तान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सक्रिय चरमपंथी समूहों का गढ़ है. यहां बीते सप्ताह हुए एक ड्रोन हमले में तालिबान के वरिष्ठ कमांडर मुल्ला नज़ीर मारे गए थे. मुल्ला नज़ीर पाकिस्तान में सक्रिय चार चरमपंथी धड़ों में से एक के नेता थे जिन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान की मदद के लिए लड़ाके भेजे थे. ड्रोन हमले, पाकिस्तान और अमरीका के बीच तनाव की वजह रहे हैं. पाकिस्तान का कहना है कि इन हमलों में उसके निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं और इससे उसकी सम्प्रभुता का उल्लंघन 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कार्रवाई थी. अपने संबोधन में भारत की पहली महिला राष्ट्रपति ने वित्तीय संस्थानों की निगरानी के लिए तंत्र को और मज़बूत बनाए जाने की बात कही. उन्होंने कहा कि कुछ कंपनियों के ग़लत कार्यकलाप और सीमा से अधिक विस्तार के कारण शेयरधारकों को नुक़सान पहुँचा है. जवाबदेही प्रतिभा पाटिल ने कहा, \"ऐसी घटनाएँ हमें अधिक सख़्तीपूर्वक कॉरपोरेट संचालन के लिए सतर्क करती हैं. ऐसे नुक़सान होने पर जवाबदेही के स्पष्ट नियम होने चाहिए. कुछ लोगों की समृद्धि दूसरे लोगों को उनके हक़ से वंचित करने की क़ीमत पर नहीं होनी चाहिए.\" राष्ट्रपति ने कहा कि उद्योग जगत के लिए यह बड़ा सबक है और सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय कर रही है कि वित्तीय संस्थाएँ और कंपनियाँ उच्च मानदंड और आचरण का सख़्ती से पालन करें. पिछले साल नवंबर में हुए मुंबई हमलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्राथमिक कार्य देश को आतंकवादियों और कट्टरपंथियों से बचाना है. उन्होंने कहा, \"मुंबई में निर्ममतापूर्वक किया गया हमला भारत के आत्मविश्वास को तोड़ने के लिए एक संगठित और सुनियोजित कार्रवाई थी. इससे पूरे देश में रोष उत्पन्न हुआ. लेकिन आतंकवादियों की आशा के विपरीत इस घटना से भारतवासियों ने अपनी एकता और मज़बूती से प्रदर्शित की.\" कार्रवाई राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार ने आतंकवादी ख़तरों से निपटने के लिए एक एजेंसी बनाई है और क़ानूनी बदलाव भी किए हैं. इस ख़तरे से निपटने के लिए सभी एजेंसियों को सुदृढ़, समन्वित और संगठित नज़रिया अपनाना ज़रूरी है. उन्होंने अपने संबोधन में महिलाओं और युवाओं का विशेष रूप से उल्लेख किया और कहा कि युवा आने वाले कल की उम्मीद हैं और राष्ट्र की एक अमूल्य संपत्ति हैं. उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे उपलब्ध अवसरों का पूरा लाभ उठाए. महिलाओं का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, \"भारत की पहली महिला राष्ट्रपति होने के नाते अपने देश की महिलाओं के प्रति मेरी भावनाएँ स्वाभाविक रूप से जुड़ी हुई हैं. मैं उनकी कठिनाइयों से परिचित हूँ. उनका सशक्तिकरण ज़रूरी है.\" राष्ट्रपति ने कहा कि यह कार्य उन्हें शिक्षा और आर्थिक सहयोग देकर किया जा सकता है.\n\nSummary:", "target": "राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा है कि देश को आतंकवादियों और कट्टरपंथियों से बचाना प्राथमिक कार्य है.", "probe_text": "Summarize 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मायूसी हुई. चाँदनी रात में ताज की छटा देखते ही बनती थी और उस वक़्त प्रेमी युगल का एक हुजूम ताज परिसर में मौजूद रहता था. सरकार का कहना था कि उसने यह फ़ैसला ताज को चरमपंथियों के ख़ौफ़ से बचाने के लिए किया है. लेकिन अब आशा की एक किरण जागी है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ताज को फिर रातों में खुला रखने पर विचार कर रही है. वरिष्ठ पर्यटन अधिकारी आलोक सिन्हा कहते हैं, \"हमारा प्रस्ताव है कि ताजमहल को पाँच रातों में खुला रखा जाए. एक पूर्णिमा की रात और दो रातें उससे पहले और बाद\". रोज़ रात को ताज को खुला रखने का इरादा नहीं है क्योंकि उसके लिए बड़ी-बड़ी फ़्लड लाइट का इंतज़ाम करना पड़ेगा. आलोक सिन्हा का कहना है कि ये क़दम इसलिए नहीं उठाया जा सकता क्योंकि कृत्रिम बिजली इस अनमोल और यादगार स्मारक को नुक़सान पहुँचा सकती है. मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने ताजमहल अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में बनाया था और लोगों का मानना है कि यह उनके प्रेम की निशानी है. इसका निर्माण 1631 में शुरू हुआ और बीस हज़ार लोगों की मेहनत से यह 1653 में बन कर तैयार हुआ था.\n\nSummary:", "target": "'इक शंहशाह ने दौलत का सहारा ले कर,हम 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका ने उत्तर कोरिया की शिपिंग इंडस्ट्री के ख़िलाफ़ नए प्रतिबंधों की घोषणा की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउत्तर कोरिया की लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल इन प्रतिबंधों को उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम को रोकने का एक और प्रयास बताया जा रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसे उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध कहा है. क्या उत्तर और दक्षिण कोरिया की दुश्मनी ख़त्म हो गई है? किम जोंग उन का ये है 'सीक्रेट हथियार'! इस बार जहाज़ और नौवहन परिवहन संबंधी 50 से अधिक कंपनियों को इन प्रतिबंधों का निशाना बनाया गया है. इनमें से 16 कंपनियां उत्तर कोरिया जबकि पांच हांगकांग, दो चीन, दो ताइवान और एक-एक पनामा तथा सिंगापुर में रजिस्टर कंपनियां हैं. उत्तर कोरिया पर उसके परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल परीक्षणों की वजह से अमरीका समेत कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध पहले से लगे हुए हैं. इसके बावजूद उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों और अमरीका तक मार करने में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण पिछले साल तक करता रहा है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी राज्य लुइज़ियाना के गवर्नर बॉबी जिंदल ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारतीय मूल के अमरीकी जिंदल ने बुधवार को न्यू आरलिएंस में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पाने के लिए मैदान में उतरने का एलान किया. रिपब्लिकन बॉबी जिंदल ने कहा, \"मैं वॉशिंगटन में मुख्यालय से आज्ञा लिए बगैर राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए चुनाव लड़ रहा हूं.\" पहली बार किसी भारतीय मूल के अमरीकी ने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए चुनाव मैदान में औपचारिक तौर पर गंभीरता से लड़ने की घोषणा की है. अगले साल नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए अब तक रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से 13 प्रत्याशी मैदान में आ चुके हैं. समाप्त अमरीकी में दो मुख्य पार्टियों डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से आधिकारिक तौर पर उम्मीदवारी पाने की प्रक्रिया ख़ासी लंबी और जटिल है. डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ से पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, तो रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के भाई जेब बुश समेत कई नेता अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं. हालत पतली जिंदल का कहना है कि अगर वह राष्ट्रपति बने तो वह स्वास्थ्य, रक्षा और शिक्षा जैसे मुद्दों पर नीतियों में बदलाव लाएंगे. लेकिन बॉबी जिंदल के लिए राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव तो दूर ख़ुद रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार चुना जाना भी बहुत ही मुश्किल लग रहा है. एक ताज़ा सर्वेक्षण में बॉबी जिंदल को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर सिर्फ एक प्रतिशत रिपब्लिकन पार्टी के वोटरों का समर्थन मिला. उधर लुइज़ियाना के गवर्नर की हैसियत से भी उनका समर्थन घट रहा है. बॉबी जिंदल ने दो बार अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा का चुनाव भी जीता. बॉबी जिंदल वर्ष 2008 में लुइज़ियाना राज्य के गवर्नर चुने गए थे और 2010 में एक जनमत संग्रह मे जिंदल अमरीका के गवर्नरों में से सबसे लोकप्रिय गवर्नर भी चुने गए थे. 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बचावकार्य में लगी थाईलैंड की सेना का कहना है कि गुफा से बाहर निकलने के लिए इन बच्चों को तैराकी सीखनी होगी या फिर उन्हें बाढ़ के पानी के उतर जाने तक इंतज़ार करना होगा जिसमें महीनों भी लग सकते हैं. लगातार बढ़ता जलस्तर बचावकार्य में लगे कर्मचारियों के लिए चुनौती बना हुआ है. बचावकर्मी बच्चों के लिए खाने और दवाओं की व्यवस्था कर रहे हैं. सेना के अनुसार बच्चों के लिए ऐसा खाना जुटाया जा रहा है जो कम से कम चार महीने तक चल सके. टैम लूंग गुफा बाढ़ के समय हमेशा पानी से भर जाती है और बाढ़ का पानी सितंबर या अक्टूबर के महीने तक रहता है. गुफा में भरे पानी को पंप के ज़रिए बाहर निकालने की कोशिशें भी की जा रही हैं, लेकिन इसमें अधिक सफलता नहीं मिल रही है. गुफा में फंसे बच्चों को सोमवार को तलाश लिया गया था. उनके पास जब ब्रितानी गोताखोर पहुंचे तो उन्होंने शुक्रिया अदा करने के बाद सबसे पहले यही पूछा कि 'हम बाहर कब निकलेंगे'. गोताखोरों ने उन्हें बताया कि 'आज नहीं'. फिर उन्होंने पूछा कि 'आज कौन सा दिन है', इस पर गोताखोरों ने कहा 'सोमवार, आप यहां दस दिन से हो, आप बहुत मज़बूत हैं, बहुत मज़बूत'. देश भर में चिंता गोताखोरों के बच्चों के पास पहुंचने का वीडियो थाईलैंड नेवी सील ने जारी किया है. गुफा में लापता हुए 12 लड़कों और उनके कोच को लेकर पूरे देश में चिंता का माहौल था. इन सभी के सुरक्षित होने की ख़बर उनके परिजनों के लिए खुश होने की वजह लेकर आई है. चियंग राय के गवर्नर नारोंग्सक ओसोटानकोर्न ने बताया कि खोजी अभियान में शामिल नौसेना के विशेष दल ने इनकी तलाश की. जब उनके ज़िंदा होने की ख़बर बाहर आई तो गुफा के बाहर मौजूद एक बच्चे की मां ने कहा, \"आज का दिन सबसे अच्छा है. मैं कब से अपने बेटे का इंतज़ार कर रही हूं. मुझे लग रहा था कि उसके ज़िंदा होने की संभावना 50 फ़ीसदी ही है. अब मैं बहुत उत्साहित हूं. जब वो बाहर आएगा तो सबसे पहले मैं उसे गले लगाऊंगी. मैं सबका शुक्रिया अदा करना चाहती हूं.\" बचावकर्मियों के अनुसार गुफा में फंसे बच्चों और उनके कोच ने ज़मीन के भीतर कोई ऐसी जगह तलाश ली थी जिससे वे बाढ़ के पानी की चपेट में आने से बच गए. इस घटना की चर्चा पूरे थाईलैंड में हो रही थी और पूरे देश में इन बच्चों और उनके कोच को बचाने के लिए दुआएं की जा रहीं थीं. खोजी अभियान में मुश्किलें लगातार बढ़ते पानी और कीचड़ के चलते इस खोजी अभियान में बहुत-सी मुश्किलें आ रही थीं. वहां हालात कितने मुश्किल हैं ये बताया बचाव टीम में शामिल बेल्जियम के गोताखोर बेन रेमेनेंट्स ने. बच्चों के मिलने से पहले उन्होंने बीबीसी से कहा, \"वो बहुत भीतर हैं और वहां सिर्फ़ तैरकर ही जाया जा सकता है. ये गुफाएं भूलभुलैया जैसी हैं, तापमान 21 डिग्री है और बहुत चिपचिपाहट है. ये छोटी-छोटी सुरंगों की भूलभुलैया है जो कई किलोमीटर तक है. पहले दिन मुझे बहुत निराशा हुई क्योंकि अंधेरे की वजह से हम कुछ देख ही नहीं पा रहे थे.\" बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने की योजना बनाई जा रही है. पत्रकारों से बात करते हुए चियंग राय के गवर्नर ने बचाव अभियान के अगले चरण के बारे में बताते हुए कहा, \"अब हम उनके पास खाना भेजेंगे. लेकिन अभी हम नहीं जानते कि वो खा पाएंगे या नहीं क्योंकि उन्होंने दस दिनों से कुछ नहीं खाया है. हम देखेंगे कि वो खाने को पचा पाएंगे या नहीं. अभी हमें बहुत कुछ करना है. उन्हें बाहर सुरक्षित निकालना है और सामान्य करना है ताकि वो स्कूल जा सकें.\" इन गुफाओं में बारिश का पानी भर गया है कौन थे ये बच्चे? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "थाईलैंड की एक गुफा में नौ दिन तक लापता रहे 12 लड़के और उनके फ़ुटबॉल कोच को तलाश लिया गया है. लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती इन बच्चों को गुफा से बाहर निकालने की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअपने कोच के साथ खड़े सभी बच्चे चियंग राय स्थित टैम लूंग गुफा में चलाए गए तलाशी अभियान की जानकारी देते हुए एक अधिकारी ने बताया कि 'सभी लोग सुरक्षित हैं, लेकिन गुफा में पानी का स्तर बढ़ रहा है और कीचड़ की वजह से उन तक पहुंच मुश्किल बनी हुई है.' गुफ़ा में फंसे बच्चे कैसे बचेंगे? बचावकार्य में लगी थाईलैंड की सेना का कहना है कि गुफा से बाहर निकलने के लिए इन बच्चों को तैराकी सीखनी होगी या फिर उन्हें बाढ़ के पानी के उतर जाने तक इंतज़ार करना होगा जिसमें महीनों भी लग सकते हैं. लगातार बढ़ता जलस्तर बचावकार्य में लगे कर्मचारियों के लिए चुनौती बना हुआ है. बचावकर्मी बच्चों के लिए खाने और दवाओं की व्यवस्था कर रहे हैं. सेना के अनुसार बच्चों के लिए ऐसा खाना जुटाया जा रहा है जो कम से कम चार महीने तक चल सके. टैम लूंग गुफा बाढ़ के समय हमेशा पानी से भर जाती है और बाढ़ का पानी सितंबर या अक्टूबर के महीने तक रहता है. गुफा में भरे पानी को पंप के ज़रिए बाहर निकालने की कोशिशें भी की जा रही हैं, लेकिन इसमें अधिक सफलता नहीं मिल रही है. गुफा में फंसे बच्चों को सोमवार को तलाश लिया गया था. उनके पास जब ब्रितानी गोताखोर पहुंचे तो उन्होंने शुक्रिया अदा करने के बाद सबसे पहले यही पूछा कि 'हम बाहर कब निकलेंगे'. गोताखोरों ने उन्हें बताया कि 'आज नहीं'. फिर उन्होंने पूछा कि 'आज कौन सा दिन है', इस पर गोताखोरों ने कहा 'सोमवार, आप यहां दस दिन से हो, आप बहुत मज़बूत हैं, बहुत मज़बूत'. देश भर में चिंता गोताखोरों के बच्चों के पास पहुंचने का वीडियो थाईलैंड नेवी सील ने जारी किया है. गुफा में लापता हुए 12 लड़कों और उनके कोच को लेकर पूरे देश में चिंता का माहौल था. इन सभी के सुरक्षित होने की ख़बर उनके परिजनों के लिए खुश होने की वजह लेकर आई है. चियंग राय के गवर्नर नारोंग्सक ओसोटानकोर्न ने बताया कि खोजी अभियान में शामिल नौसेना के विशेष दल ने इनकी तलाश की. जब उनके ज़िंदा होने की ख़बर बाहर आई तो गुफा के बाहर मौजूद एक बच्चे की मां ने कहा, \"आज का दिन सबसे अच्छा है. मैं कब से अपने बेटे का इंतज़ार कर रही हूं. मुझे लग रहा था कि उसके ज़िंदा होने की संभावना 50 फ़ीसदी ही है. अब मैं बहुत उत्साहित हूं. जब वो बाहर आएगा तो सबसे पहले मैं उसे गले लगाऊंगी. मैं सबका शुक्रिया अदा करना चाहती हूं.\" बचावकर्मियों के अनुसार गुफा में फंसे बच्चों और उनके कोच ने ज़मीन के भीतर कोई ऐसी जगह तलाश ली थी जिससे वे बाढ़ के पानी की चपेट में आने से बच गए. इस घटना की चर्चा पूरे थाईलैंड में हो रही थी और पूरे देश में इन बच्चों और उनके कोच को बचाने के लिए दुआएं की जा रहीं थीं. खोजी अभियान में मुश्किलें लगातार बढ़ते पानी और कीचड़ के चलते इस खोजी अभियान में बहुत-सी मुश्किलें आ रही थीं. वहां हालात कितने मुश्किल हैं ये बताया बचाव टीम में शामिल बेल्जियम के गोताखोर बेन रेमेनेंट्स ने. बच्चों के मिलने से पहले उन्होंने बीबीसी से कहा, \"वो बहुत भीतर हैं और वहां सिर्फ़ तैरकर ही जाया जा सकता है. ये गुफाएं भूलभुलैया जैसी हैं, तापमान 21 डिग्री है और बहुत चिपचिपाहट है. ये छोटी-छोटी सुरंगों की भूलभुलैया है जो कई किलोमीटर तक है. पहले दिन मुझे बहुत निराशा हुई क्योंकि अंधेरे की वजह से हम कुछ देख ही नहीं पा रहे थे.\" बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने की योजना बनाई जा रही है. पत्रकारों से बात करते हुए चियंग राय के गवर्नर ने बचाव अभियान के अगले चरण के बारे में बताते हुए कहा, \"अब हम उनके पास खाना भेजेंगे. लेकिन अभी हम नहीं जानते कि वो खा पाएंगे या नहीं क्योंकि उन्होंने दस दिनों से कुछ नहीं खाया है. हम देखेंगे कि वो खाने को पचा पाएंगे या नहीं. अभी हमें बहुत कुछ करना है. उन्हें बाहर सुरक्षित निकालना है और सामान्य करना है ताकि वो स्कूल जा सकें.\" इन गुफाओं में बारिश का पानी भर गया है कौन थे ये बच्चे? 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हौगी आईसीएल के इस सीज़न में हैदराबाद की टीम को मिली जीत के बाद अब कपिल ने नौ अप्रैल से इंडियन क्रिकेट लीग की ट्वेन्टी 20 सिरीज़ एक नए स्वरुप के साथ शुरू की है. इसमें आईसीएल के भारतीय खिलाड़ियों को मिलाकर इंडिया एलेवन, पाकिस्तान के खिलाड़ियों को मिलाकर पाकिस्तान एलेवन और अन्य खिलाड़ियों को मिलाकर वर्ल्ड एलेवन टीम बनाई गई है. ग्लैमर पहले आईसीएल के दौरान बॉलीवुड सितारों के कार्यक्रम आयोजित होने और अब आईपीएल में बॉलीवुड सितारों के हिस्सा लेने पर कपिल का कहना था, \"क्रिकेट अच्छी होनी चाहिए, ठीक है ये ग्लैमर की दुनिया है, उसमें ग्लैमर भी चलता है लेकिन हमें कभी ये नहीं भूलना चाहिए कि क्रिकेट हमारा लक्ष्य है और हमें उसके ऊपर ही ज्यादा ग़ौर करना है.\" कानपुर में शुरु हुए तीसरे और निर्णायक टेस्ट मैच के बारे में कपिल ने कहा कि जिस तरह की पिच भारतीय खिलाड़ियों को चाहिए थी अब वो भी उन्हें मिल गयी है, इसके बावजूद अगर वो नहीं जीते तो फिर कुछ नहीं कहा जा सकता. कपिल ने कहा, \"सबसे ज्यादा ध्यान क्रिकेट पर देना चाहिए न कि हारने के बाद दूसरे बहानों का सहारा लेना चाहिए.\" 1983 में विश्व कप जीतने वाली टीम 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उम्मीदें पूरी कर पाए तो उन्हें बहुत ख़ुशी हौगी आईसीएल के इस सीज़न में हैदराबाद की टीम को मिली जीत के बाद अब कपिल ने नौ अप्रैल से इंडियन क्रिकेट लीग की ट्वेन्टी 20 सिरीज़ एक नए स्वरुप के साथ शुरू की है. इसमें आईसीएल के भारतीय खिलाड़ियों को मिलाकर इंडिया एलेवन, पाकिस्तान के खिलाड़ियों को मिलाकर पाकिस्तान एलेवन और अन्य खिलाड़ियों को मिलाकर वर्ल्ड एलेवन टीम बनाई गई है. ग्लैमर पहले आईसीएल के दौरान बॉलीवुड सितारों के कार्यक्रम आयोजित होने और अब आईपीएल में बॉलीवुड सितारों के हिस्सा लेने पर कपिल का कहना था, \"क्रिकेट अच्छी होनी चाहिए, ठीक है ये ग्लैमर की दुनिया है, उसमें ग्लैमर भी चलता है लेकिन हमें कभी ये नहीं भूलना चाहिए कि क्रिकेट हमारा लक्ष्य है और हमें उसके ऊपर ही ज्यादा ग़ौर करना है.\" कानपुर में शुरु हुए तीसरे और निर्णायक टेस्ट मैच के बारे में कपिल ने कहा कि जिस तरह की पिच भारतीय खिलाड़ियों को चाहिए थी अब वो भी उन्हें मिल गयी है, इसके बावजूद अगर वो नहीं जीते तो फिर कुछ नहीं कहा जा सकता. कपिल ने कहा, \"सबसे ज्यादा ध्यान क्रिकेट पर देना चाहिए न कि हारने के बाद दूसरे बहानों का सहारा लेना 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मंत्री डेविड कैमरन की आव भगत ने उनका क़द ऊंचा किया. सही मायने में इतना बढ़िया स्वागत और इतनी ज़बरदस्त गर्मजोशी से कोई भी सपनों की दुनिया में खो सकता है. लेकिन सपनों की दुनिया के बाहर असल ज़िंदगी घर वापसी पर उनका इंतज़ार कर रही है. समाप्त शायद मोदी सोच रहे होंगे कि ये दौरा तुरंत क्यों ख़त्म हो गया. क्योंकि बिहार विधान सभा चुनाव का सुपर स्टार बनने की उनकी कोशिश बुरी तरह नाकाम रही. इसकी जवाबदेही उन्हीं की होगी क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं के नाम पर चुनाव लड़ा था. दूसरी तरफ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बग़ावत की आवाज़ उनके कानों में अब भी गूँज रही होगी. दिल्ली वापस जाने पर ये आवाज़ तेज़ होने वाली है. वेम्बले स्टेडियम की धूमधाम और चमक-दमक का असर घर जाते ही ख़त्म हो जाएगा. उनके आलोचक एक बार फिर उनसे ये सवाल पूछेंगे कि विदेश की यात्राएं कम करके देश की बढ़ती समस्याओं पर ध्यान क्यों नहीं देते. लोग उनसे कहेंगे कि असहिष्णुता के बढ़ते माहौल के विरुद्ध वेम्बले और मैडिसन स्क्वेयर गार्डन जैसे तेज़ आवाज़ वाले बयान क्यों नहीं देते? लेकिन तीन दिनों की ब्रितानी यात्रा के दौरान भी सब कुछ मोदी के मन के मुताबिक़ नहीं था. डेविड कैमरन के साथ साझा प्रेस कॉन्फेरेंस के दौरान उनसे ब्रिटिश मीडिया ने चुभते हुए सवाल किए. यहाँ तक कि गुजरात दंगों का भी हवाला दिया जो मोदी को बिलकुल पसंद नहीं. इसके बाद जब वो गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ा रहे थे तो नेपाली, कश्मीरी और पंजाबी समुदाय के लोग उनके ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे. भारत में उनके आलोचक भी उन्हें इज़्ज़त के दायरे में बुरा भला कहते हैं लेकिन यहाँ तो 'मोदी हत्यारा' और 'मोदी आतंकवादी' जैसे नारे लग रहे थे. ज़्यादातर भारतीय मीडिया उनके दूसरे विदेशी दौरों की तरह केवल उनकी धूम धाम और प्रवासी भारतीयों में उनके बढ़ते हुए क़द की बातों पर फोकस कर रही थी लेकिन ब्रिटिश मीडिया उन्हें बख़्शने के मूड में नहीं थी. 'गार्डियन' अख़बार ने अपने एक ताज़ा संपादकीय में कहा है कि मोदी का दौरा ओवर द टॉप या ज़रूरत से अधिक चर्चित था. 'इंडिपेंडेंट' अख़बार ने लिखा कि गुजरात दंगों का ज़िम्मेदार कोई भी हो, ये मारकाट हुई तो उन्हीं के राज में. (वो उस समय एक साल पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे). कई अख़बारों ने डेविड कैमरन को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया कि वो प्रधानमंत्री मोदी की खुशामद पर क्यों उतर आए थे. बुद्धिजीवियों और मानव अधिकार की संस्थाओं ने कहा कि डेविड कैमरन को चाहिए कि नरेंद्र मोदी से वो पूछें कि उनके देश में असहिष्णुता की बढ़ती घटनाएं क्यों हो रही हैं? लेकिन इन में से कोई सड़कों पर मोदी विरोधी प्रदर्शनों में शामिल नहीं हुआ. जहाँ भारतीय मूल के आम लोग और भारतीय मूल के ब्रितानी सांसद मोदी के आने पर जोश में दिखाई दे रहे थे वहीं ब्रिटेन की स्थानीय जनता पर उनके दौरे का कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा. उनके लिए इसमें केवल जिज्ञासा से अधिक कुछ और नहीं था, लेकिन दोनों नेताओं के बीच गंभीर बातें भी हुईं. असैनिक परमाणु समझौते जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए गए. ब्रिटेन ने भारत में तीन स्मार्ट शहरों के निर्माण का सौदा भी किया और दोनों देशों के बीच 9 अरब पाउंड के व्यापर पर रज़ामंदी भी हुई. दोनों देशों के रिशतों में एक नई जान फूंकने की ज़रूरत थी. इस दौरे से इस रिश्ते में एक नई जान आ सकती है लेकिन यहाँ आलोचक कहते हैं ये उपलब्धियां शोर शराबे के बग़ैर भी हासिल की जा सकती थीं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन की तीन दिनों की यात्रा समाप्त हुई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयहाँ उनका एक सुपर स्टार जैसा स्वागत किया गया. ब्रितानी संसद में भाषण देने वाले वो पहले भारतीय प्रधान मंत्री बने. ब्रिटेन की रानी के बकिंघम पैलेस में खाना खाने वाले पहले भारतीय प्रधान मंत्री का सेहरा भी उन्हीं के सर गया. ब्रितानी प्रधान मंत्री डेविड कैमरन की आव भगत ने उनका क़द ऊंचा किया. सही मायने में इतना बढ़िया स्वागत और इतनी ज़बरदस्त गर्मजोशी से कोई भी सपनों की दुनिया में खो सकता है. लेकिन सपनों की दुनिया के बाहर असल ज़िंदगी घर वापसी पर उनका इंतज़ार कर रही है. समाप्त शायद मोदी सोच रहे होंगे कि ये दौरा तुरंत क्यों ख़त्म हो गया. क्योंकि बिहार विधान सभा चुनाव का सुपर स्टार बनने की उनकी कोशिश बुरी तरह नाकाम रही. इसकी जवाबदेही उन्हीं की होगी क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं के नाम पर चुनाव लड़ा था. दूसरी तरफ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बग़ावत की आवाज़ उनके कानों में अब भी गूँज रही होगी. दिल्ली वापस जाने पर ये आवाज़ तेज़ होने वाली है. वेम्बले स्टेडियम की धूमधाम और चमक-दमक का असर घर जाते ही ख़त्म हो जाएगा. उनके आलोचक एक बार फिर उनसे ये सवाल पूछेंगे कि विदेश की यात्राएं कम करके देश की बढ़ती समस्याओं पर ध्यान क्यों नहीं देते. लोग उनसे कहेंगे कि असहिष्णुता के बढ़ते माहौल के विरुद्ध वेम्बले और मैडिसन स्क्वेयर गार्डन जैसे तेज़ आवाज़ वाले बयान क्यों नहीं देते? लेकिन तीन दिनों की ब्रितानी यात्रा के दौरान भी सब कुछ मोदी के मन के मुताबिक़ नहीं था. डेविड कैमरन के साथ साझा प्रेस कॉन्फेरेंस के दौरान उनसे ब्रिटिश मीडिया ने चुभते हुए सवाल किए. यहाँ तक कि गुजरात दंगों का भी हवाला दिया जो मोदी को बिलकुल पसंद नहीं. इसके बाद जब वो गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ा रहे थे तो नेपाली, कश्मीरी और पंजाबी समुदाय के लोग उनके ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे. भारत में उनके आलोचक भी उन्हें इज़्ज़त के दायरे में बुरा भला कहते हैं लेकिन यहाँ तो 'मोदी हत्यारा' और 'मोदी आतंकवादी' जैसे नारे लग रहे थे. ज़्यादातर भारतीय मीडिया उनके दूसरे विदेशी दौरों की तरह केवल उनकी धूम धाम और प्रवासी भारतीयों में उनके बढ़ते हुए क़द की बातों पर फोकस कर रही थी लेकिन ब्रिटिश मीडिया उन्हें बख़्शने के मूड में नहीं थी. 'गार्डियन' अख़बार ने अपने एक ताज़ा संपादकीय में कहा है कि मोदी का दौरा ओवर द टॉप या ज़रूरत से अधिक चर्चित था. 'इंडिपेंडेंट' अख़बार ने लिखा कि गुजरात दंगों का ज़िम्मेदार कोई भी हो, ये मारकाट हुई तो उन्हीं के राज में. 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(नीचे की तरफ बाएं से दाएं) राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एच आर मैकमास्टर, अमरीकी पर्यारण सुरक्षा एजेंसी के प्रमुख रहे स्कॉट प्रूइट, अमरीकी स्वास्थ्य मंत्री रहे टॉम प्राइस और संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की दूत रही निकी हेली. बीते महीने समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक स्रोत के हवाले से ख़बर दी थी कि इसके बाद उप राष्ट्रपति माइक पेन्स के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के तौर पर काम कर रहे निक आयर्स को इस पद नियुक्त किया जा सकता है. खोजी पत्रकार बॉब वुडवॉर्ड इसी साल खोजी पत्रकार बॉब वुडवॉर्ड की एक किताब आई थी जिसमें दावा किया गया था कि जॉन केली ने ट्रंप को कई बार 'इडियट' कहा है. बाद में केली ने इन दावों को खारिज कर दिया था. किताब के अनुसार केली ने कई बार इस शब्द का इस्तेमाल किया था और ये भी कहा था कि \"ट्रंप को कोई भी बात समझा पाना असंभव है.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पत्रकारों से कहा है कि व्हाइट हाउस के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जॉन केली इस साल के आख़िर तक अपना पद छोड़ देंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजॉन केली हाल के दिनों में आ रही ख़बरों के अनुसार जॉन केली पर पद से इस्तीफ़ा देने का दबाव बन रहा था. कई मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है किकेली और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच रिश्ते ख़राब हुए हैं और दोनों के बीच बातचीत लगभग ना के बराबर है. ट्रंप का कहना है कि \"आने वाले दो-तीन दिनों\" में इस पद के लिए नए नाम की घोषणा की जा सकती है. थल सेना और जल सेना की टीमों के बीच फिलाडेलफिया में होने वाले एक फुटबॉल मैच देखने के लिए निकलने से पहले ट्रंप ने मीडिया के साथ बातचीत में ये घोषणा की है. व्हाइट हाउस चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ नियुक्त किए जाने से पहले जॉन केली होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के प्रमुख थे. बीते साल जुलाई में ट्रंप ने उन्हें होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के प्रमुख के पद के लिए नामित किया था और फिर बाद में रीन्स प्रीबस की जगह चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ बनाया था. निक आयर्स और जॉन केली बीबीसी के उत्तर अमरीकी संवाददाता एंटनी ज़र्कर कहते हैं कि देखा जाए तो जॉन केली से पहले ट्रंप प्रशासन में तीन चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ और तीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बदले जा चुके हैं. ट्रंप 20 जनवरी 2017 से सत्ता में आए थे और तभी से उनके प्रशासन से आला अधिकारियों का जाना सुर्खियों में बना हुआ है. इससे पहले रीन्स प्रीबस चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के पद पर और रिक डियरबॉर्न और केटी वॉल्श डिप्टी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के पद पर काम कर चुके हैं. एचआर मैक्मास्टर और माइक फ्लिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद से और डीना पोवेल डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं. ट्रंप प्रशासन से जुड़े कुछ चेहरे जिन्होंने पद ये इस्तीफ़ा दिया या फिर जिन्हें पद से हटाया गया : (ऊपर की तरफ बाएं से दाएं) विदेश मंत्री रहे रेक्स टिलरसन, मौजूदा चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जॉन केली, अटॉर्नी जनरल रहे जेफ़ सेशन्स, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे माइक फ्लिन. 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शुक्रवार को बिहार के दरभंगा ज़िले में एक चुनावी सभा मे कहा था कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के लिए कांग्रेस को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जो केंद्र में सत्तासीन थी. अर्थव्यवस्था मनमोहन सिंह ने गुवाहाटी में आशा जताई कि भारतीय अर्थव्वस्था फिर से पटरी पर लौट सकती है और भारत आठ से नौ प्रतिशत के विकास दर को प्राप्त कर सकता है. मनमोहन सिंह ने कहा,\"मुझे उम्मीद है कि विश्व अर्थव्यवस्था में सितंबर तक आंशिक सुधार आएगा और ऐसे में भारत फिर से आठ से नौ प्रतिशत का विकास दर हासिल कर सकेगा जैसा कि पिछले पाँच साल में होता रहा है\". प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2008-2009 में देश का विकास दर 7.1 प्रतिशत के निकट रहा है और वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी विकास दर 6.5 से सात प्रतिशत के बीच रहेगी. उहोंने कहा कि अभी विश्व के सामने आया संकट महत्वपूर्ण विकसित देशों में वित्तीय व्यवस्था को ठीक से नहीं संभाल पाने के कारण खड़ा हुआ है. मनमोहन सिंह ने बताया कि वैश्विक आर्थिक संकट से भारत के निर्यात और पूँजी के प्रवाह पर असर पड़ा है. गुवाहाटी में डालेंगे वोट असम दौरे पर मनमोहन सिंह ने पत्रकारों से कहा कि वे इस बार 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हमले की फ़ुटेज दिखाई जा रही है ईरान की सरकारी मीडिया का कहना है कि ये हमले जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए किए गए हैं जिन्हें अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के आदेश पर बग़दाद में एक ड्रोन हमले में मार डाला गया था. अमरीकी राष्ट्रपति ने एक ट्वीट करते हुए कहा है कि सबकुछ ठीक है और वो बुधवार को एक बयान जारी करेंगे. ट्रंप ने इस ट्वीट में कहा, \"सब ठीक है, ईरान ने इराक़ में दो सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं. हताहत और नुक़सानी की समीक्षा की जा रही है. अभी तक सब अच्छा है. हमारे पास दुनिया की सबसे ताक़तवर सेना है. मैं सुबह एक बयान जारी करुँगा.\" वहीं ईरान के विदेश मंत्री जव्वाद ज़रीफ़ ने कहा है उन्होंने ये हमला आत्मरक्षा में किया है. समाप्त जव्वाद ज़रीफ़ ने ट्वीट कर कहा,\"ईरान ने यूएन चार्टर के आर्टिकल-51 के तहत आत्मरक्षा में ऐसे ठिकानों को निशाना बनाया है जहाँ से कायरपूर्ण तरीक़े से हमारे नागरिकों और वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ हमले किए गए. हम लड़ाई नहीं बढ़ाना चाहते, पर हम पर हुए हमलों से अपनी रक्षा करेंगे\". दो शहरों में हुए हमले पेंटागन ने कहा है कि इराक़ के इरबिल और अल-असद शहर में दो ठिकानों पर हमले हुए हैं जहाँ उनके सैनिक रह रहे थे. अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि हमले में कोई हताहत हुआ है या नहीं. अमरीकी राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस की प्रवक्ता स्टेफ़नी ग्रिशम ने एक बयान में कहा, \"हमें इराक़ में अमरीकी ठिकानों पर हमले की ख़बर मिली है. राष्ट्रपति को इस बारे में ब्रीफ़ कर दिया गया है, हम स्थिति की निगरानी कर रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा टीम से मशविरा कर रहे हैं.\" ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने कहा है कि ये हमला शुक्रवार को जनरल सुलेमानी की मौत का जवाब लेने के लिए किया गया है. ईरान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी इरना पर जारी किए गए एक बयान में रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने कहा, \"हम अमरीका के उन सारे साथियों को चेतावनी देना चाहते हैं जिन्होंने उसकी आतंकवादी सेना को अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने दिया है, कि ऐसी किसी भी जगह से जहाँ से ईरान के ख़िलाफ़ कार्रवाई होती है, उसे निशाना बनाया जाएगा.\" अल मयादीन टीवी के अनुसार हमले जनरल सुलेमानी को दफ़नाए जाने के कुछ ही घंटे बाद हुए. पहले अल-असद में मिसाइलें दागी गईं, उसके बाद इरबिल में भी हमले किए गए. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन का कहना है कि इराक़ में अमरीकी सेना के कम-से-कम दो ठिकानों पर एक दर्जन से ज़्यादा मिसाइल हमले हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nईरान के सरकारी टीवी पर मिसाइल हमले की फ़ुटेज दिखाई जा रही है ईरान की सरकारी मीडिया का कहना है कि ये हमले जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए किए गए हैं जिन्हें अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के आदेश पर बग़दाद में एक ड्रोन हमले में मार डाला गया था. अमरीकी राष्ट्रपति ने एक ट्वीट करते हुए कहा है कि सबकुछ ठीक है और वो बुधवार को एक बयान जारी करेंगे. ट्रंप ने इस ट्वीट में कहा, \"सब ठीक है, ईरान ने इराक़ में दो सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं. हताहत और नुक़सानी की समीक्षा की जा रही है. अभी तक सब अच्छा है. हमारे पास दुनिया की सबसे ताक़तवर सेना है. मैं सुबह एक बयान जारी करुँगा.\" वहीं ईरान के विदेश मंत्री जव्वाद ज़रीफ़ ने कहा है उन्होंने ये हमला आत्मरक्षा में किया है. समाप्त जव्वाद ज़रीफ़ ने ट्वीट कर कहा,\"ईरान ने यूएन चार्टर के आर्टिकल-51 के तहत आत्मरक्षा में ऐसे ठिकानों को निशाना बनाया है जहाँ से कायरपूर्ण तरीक़े से हमारे नागरिकों और वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ हमले किए गए. हम लड़ाई नहीं बढ़ाना चाहते, पर हम पर हुए हमलों से अपनी रक्षा करेंगे\". दो शहरों में हुए हमले पेंटागन ने कहा है कि इराक़ के इरबिल और अल-असद शहर में दो ठिकानों पर हमले हुए हैं जहाँ उनके सैनिक रह रहे थे. अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि हमले में कोई हताहत हुआ है या नहीं. अमरीकी राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस की प्रवक्ता स्टेफ़नी ग्रिशम ने एक बयान में कहा, \"हमें इराक़ में अमरीकी ठिकानों पर हमले की ख़बर मिली है. राष्ट्रपति को इस बारे में ब्रीफ़ कर दिया गया है, हम स्थिति की निगरानी कर रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा टीम से मशविरा कर रहे हैं.\" ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने कहा है कि ये हमला शुक्रवार को जनरल सुलेमानी की मौत का जवाब लेने के लिए किया गया है. ईरान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी इरना पर जारी किए गए एक बयान में रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने कहा, \"हम अमरीका के उन सारे साथियों को चेतावनी देना चाहते हैं जिन्होंने उसकी आतंकवादी सेना को अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने दिया है, कि ऐसी किसी भी जगह से जहाँ से ईरान के ख़िलाफ़ कार्रवाई होती है, उसे निशाना बनाया जाएगा.\" अल मयादीन टीवी के अनुसार हमले जनरल सुलेमानी को दफ़नाए जाने के कुछ ही घंटे बाद हुए. पहले अल-असद में मिसाइलें दागी गईं, उसके बाद इरबिल में भी हमले किए गए. 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'विरोध नहीं' माना जा रहा है कि बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने ऐसी चाल चली कि उनके विरोधी ऐसे ढेर हुए जैसे शतरंज के प्यादे. हालांकि उनके विरोधी आरोप लगाते हैं कि वो दो बार से अपने रुतबे और पैसे के दम पर बीसीसीआई प्रमुख का पद हासिल कर रहे हैं और अपनी मर्जी से उसे चला रहे हैं. जिस तरह से बीसीसीआई ने पिछले दिनों आईपीएल के पूर्व कमिशनर ललित मोदी को पूरी तरह से अपने रास्ते से हटाया और जिस तरह से एन श्रीनिवासन बोर्ड के अध्यक्ष बनना चाहते है उससे एक बात तो तय है कि वह अच्छी तरह जानते है कि बीसीसीआई की गाड़ी को कैसे चलाया जाए. केंद्रीय मंत्री और बीसीसीआई के पदाधिकारी राजीव शुक्ला और अरुण जेटली भी श्रीनिवासन का खुलकर विरोध नही कर पाते. 'ये कैसा बोर्ड है' जाने-माने क्रिकेट विश्लेषक प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, “मेरी तो समझ में ही नही आ रहा है कि यह कैसा बोर्ड है जो भारत के सबसे बड़े कोर्ट का ही सुझाव नही मान रहा है. अगर जेटली और शुक्ला जैसे बोर्ड के पदाधिकारी श्रीनिवासन को समझा नही पा रहे है, रोक नही पा रहे है तो फिर इस बोर्ड की कार्यशैली कैसी है और कैसे यह काम करता है.” प्रदीप मैगजीन कहते हैं, “अब यह भी समझ से परे है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करने के आदेश दिए है तो फिर इस सालाना बैठक को क्यों रद्द नही किया गया. अब अगर जीतने के बाद श्रीनिवासन के पास कोई अधिकार नही होगा तो बोर्ड क्यों दूसरा अध्यक्ष नहीं चुनता या फिर कोर्ट के अगले आदेश तक जगमोहन डालमिया को ही अंतरिम अध्यक्ष बने रहने देता.” श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन पर आईपीएल 6 में सट्टेबाज़ी का आरोप है. प्रदीप मैगज़ीन आगे कहते है कि ऐसे में अगर रविवार को श्रीनिवासन अध्यक्ष बन गए तो फिर सोमवार को आने वाला सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बेहद अहम हो सकता है. मैगजीन कहते हैं, “अब जहां तक खिलाडियों की बात है तो उन्हे पेंशन से लेकर गवर्निंग कांउसिल का सदस्य तथा कमेंटेटर के रूप में करोड़ों रुपए मिलते है तो वह बोर्ड के ख़िलाफ़ क्यों बोले, लेकिन यह बड़े दुख की बात है कि एक तरफ हिंदुस्तान की क्रिकेट तरक्की कर रही है तो दूसरी तरफ बोर्ड के काम में किसी तरह की नैतिकता और पारदर्शिता नही है.” फेरबदल समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक शुक्रवार को बीसीसीआई के मध्य ज़ोन के उपाध्यक्ष सुधीर डाबिर और पश्चिम ज़ोन के उपाध्यक्ष निरंजन शाह को उनके पदों से हटा दिया गया हालांकि दोंनो के कार्यका्ल बढ़ाया जा सकता था. वहीं बोर्ड के एक और उपाध्यक्ष, अरुण जेटली ने अपनी राजनीतिक ज़िम्मेदारियों का हवाला देते हुए पद छोड़ दिया है. मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रवि सावंत अब पश्चिम ज़ोन के और कांग्रेस नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला मध्य ज़ोन के उपाध्यक्ष बने हैं. वहीं डीडीसीए के स्नेह बंसल ने अरुण जेटली की जगह ली है. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की रविवार को चेन्नई में होने वाली बैठक पर सबकी निगाहें टिकी हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकई विवादों में घिरे हैं एन श्रीनिवासन बैठक में बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव होना है और विवादों में घिरे बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन एकमात्र उम्मीदवार हैं. ऐसे में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे निर्विरोध चुने जा सकते हैं. लेकिन अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद कुछ समय तक श्रीनिवासन कार्यभार नहीं संभाल सकेंगे. दरअसल बिहार क्रिकेट एसोसिएशन ने श्रीनिवासन को अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा किया है. शुक्रवार को कोर्ट ने श्रीनिवासन को चुनाव लड़ने की इजाज़त तो दे दी लेकिन साथ ही ये भी निर्देश दिया कि अगले आदेश तक वे कार्यभार नहीं संभाल सकते. इसके अलावा श्रीनिवासन आईपीएल-6 में चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक हैं. उनके दामाद गुरूनाथ मयपन्न पर आईपीएल मैचों में सट्टेबाजी के आरोप है. मयप्पन का नाम सामने आने के बाद एन श्रीनिवासन ने अध्यक्ष के रूप में नियमित कामकाज से अपने को अलग कर लिया है. उनकी जगह ये कामकाज जगमोहन डालमिया देख रहे हैं. 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(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 503, "source_item_id": "503", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3322, "clean_index": 448, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:448"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nब्रिटनी और उनके डांसर पति केविन फ़ेडरलिन ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें एक बेटा हुआ है. इस सप्ताह के आरंभ में ऐसी ख़बरें आई थीं कि ब्रिटनी रविवार को माँ बन गईं हैं लेकिन ब्रिटेन में ब्रिटनी के सहयोगियों ने इस ख़बर से इनकार किया. लेकिन बुधवार को अमरीका के शहर लॉस एंजिल्स में एक अस्पताल में ब्रिटनी स्पीयर्स के भर्ती होने की ख़बर आई जिसके बाद अस्पताल के बाहर फ़ोटोग्राफ़र जुटने शुरू हो गए. गुरूवार को 23 वर्षीया पॉप स्टार ने अपनी वेबसाइट पर अपने बेटे के जन्म की घोषणा की. ब्रिटनी ने एक बयान में अपने प्रशंसकों से कहा है,\"सभी खुश हैं, स्वस्थ हैं और बिल्कुल ठीक हैं\". बच्चे का नाम अभी नहीं बताया गया है लेकिन अमरीका की एक पत्रिका में सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि बच्चे का नाम प्रेस्टन माइकल स्पीयर्स फ़ेडरलिन होगा. ब्रिटनी और केविन ब्रिटनी स्पीयर्स और 27 वर्षीय केविन फ़ेडरलिन ने पिछले वर्ष सितंबर में छह महीने के साथ के बाद शादी कर ली थी. शादी के कुछ महीने बाद ही पत्र-पत्रिकाओं में ब्रिटनी के गर्भवती होने की ख़बरें उठने लगीं. आख़िर अप्रैल में ब्रिटनी ने ये स्वीकार किया कि वे गर्भवती हैं. ब्रिटनी के पति के अपनी पूर्व महिला मित्र और अभिनेत्री शार जैक्सन से दो बच्चे हैं जिनमें एक का जन्म ब्रिटनी के साथ उनके संबंधों की शुरूआत के बाद हुआ. ब्रिटेन ने जनवरी 2004 में म़ज़ाक़-मज़ाक़ में अपने बचपन के दोस्त से शादी कर ली थी. लेकिन कुछ ही घंटों के बाद अदालत से उनके आग्रह पर ये शादी रद्द कर दी गई.\n\nSummary:", "target": "जानी-मानी पॉप गायिका ब्रिटनी स्पीयर्स माँ बन गई हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nब्रिटनी और उनके डांसर पति केविन फ़ेडरलिन ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें एक बेटा हुआ है. इस सप्ताह के आरंभ में ऐसी ख़बरें आई थीं कि ब्रिटनी रविवार को माँ बन गईं हैं लेकिन ब्रिटेन में ब्रिटनी के सहयोगियों ने इस ख़बर से इनकार किया. लेकिन बुधवार को अमरीका के शहर लॉस एंजिल्स में एक अस्पताल में ब्रिटनी स्पीयर्स के भर्ती होने की ख़बर आई जिसके बाद अस्पताल के बाहर फ़ोटोग्राफ़र जुटने शुरू हो गए. गुरूवार को 23 वर्षीया पॉप स्टार ने अपनी वेबसाइट पर अपने बेटे के जन्म की घोषणा की. ब्रिटनी ने एक बयान में अपने प्रशंसकों से कहा है,\"सभी खुश हैं, स्वस्थ हैं और बिल्कुल ठीक हैं\". बच्चे का नाम अभी नहीं बताया गया है लेकिन अमरीका की एक पत्रिका में सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि बच्चे का नाम प्रेस्टन माइकल स्पीयर्स फ़ेडरलिन होगा. ब्रिटनी और केविन ब्रिटनी स्पीयर्स और 27 वर्षीय केविन फ़ेडरलिन ने पिछले वर्ष सितंबर में छह महीने के साथ के बाद शादी कर ली थी. शादी के कुछ महीने बाद ही पत्र-पत्रिकाओं में ब्रिटनी के गर्भवती होने की ख़बरें उठने लगीं. आख़िर अप्रैल में ब्रिटनी ने ये स्वीकार किया कि वे गर्भवती हैं. ब्रिटनी के पति के अपनी पूर्व महिला मित्र और अभिनेत्री शार जैक्सन से दो बच्चे हैं जिनमें एक का जन्म ब्रिटनी के साथ उनके संबंधों की शुरूआत के बाद हुआ. ब्रिटेन ने जनवरी 2004 में म़ज़ाक़-मज़ाक़ में अपने बचपन के दोस्त से शादी कर ली थी. लेकिन कुछ ही घंटों के बाद अदालत से उनके आग्रह पर ये शादी रद्द कर दी गई.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 504, "source_item_id": "504", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1281, "clean_index": 449, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:449"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकाबुल में एक हफ्ते के भीतर ये तीसरा बड़ा हमला है. काबुल में मौजूद बीबीसी संवाददाता डेविड लोइन के मुताबिक ये धमाका न्याय मंत्रालय की कार पार्किंग के पास हुआ. धमाके के वक्त आसपास की सड़कों पर काफी लोग थे क्योंकि ये सरकारी कर्मचारियों के घर लौटने का वक्त था. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, धमाका इतना ज़ोरदार था कि उसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई पड़ी. समाप्त सरकार के एक प्रवक्ता ने रॉयटर्स को बताया कि पार्किग में विस्फोटकों से लदी कार खड़ी थी जिसमें धमाका किया गया. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये हमले तालिबान की रणनीति प्रतीत हो रहे हैं और हो सकता है कि तालिबान संभावित बातचीत से पहले सरकार पर दबाव बनाने का कोशिश कर रहे हों. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक बम धमाका हुआ जिसमें कम से कम पांच लोग मारे गए और कई अन्य घायल हो गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकाबुल में एक हफ्ते के भीतर ये तीसरा बड़ा हमला है. काबुल में मौजूद बीबीसी संवाददाता डेविड लोइन के मुताबिक ये धमाका न्याय मंत्रालय की कार पार्किंग के पास हुआ. धमाके के वक्त आसपास की सड़कों पर काफी लोग थे क्योंकि ये सरकारी कर्मचारियों के घर लौटने का वक्त था. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, धमाका इतना ज़ोरदार था कि उसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई पड़ी. समाप्त सरकार के एक प्रवक्ता ने रॉयटर्स को बताया कि पार्किग में विस्फोटकों से लदी कार खड़ी थी जिसमें धमाका किया गया. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये हमले तालिबान की रणनीति प्रतीत हो रहे हैं और हो सकता है कि तालिबान संभावित बातचीत से पहले सरकार पर दबाव बनाने का कोशिश कर रहे हों. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आरुषि-हेमराज हत्याकांड में सीबीआई की विशेष अदालत ने आरुषि के माता-पिता को दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस फैसले का भारत से दूर नेपाल में भी काफी बेसब्री से इंतज़ार था. तलवार दंपति के घर में मृत नौकर हेमराज नेपाल का ही रहने वाला था. उनकी पत्नी खुम काला बंजादे ने बीबीसी की नेपाली सेवा से बातचीत करते हुए कहा है कि तलवार दंपति को फांसी की सजा होनी चाहिए. काला ने बीबीसी से कहा, \"तलवार दंपति ने मेरे पति पर झूठा आरोप लगाया. पहले उन्होंने अपनी बेटी की हत्या की और फिर मेरे पति की. इसके बाद मेरे पति पर झूठा आरोप मढ़ दिया कि उनकी बेटी की हत्या करके हेमराज फरार हो गया.\" 'निर्दोष था मेरा पति' काला के मुताबिक उनके पति हेमराज को इस मामले में कुछ भी लेना-देना नहीं था, लेकिन उसे तलवार दंपति के यहां काम करने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी. काला ने बीबीसी से कहा, \"मेरे पति एक सामान्य और ईमानदार आदमी थे. वे पूरी तरह निर्दोष थे.\" यह बात सीबीआई की विशेष अदालत ने मानी है और नौकर हेमराज और आरुषि की हत्या के लिए तलवार दंपति को ही जिम्मेदार ठहराते हुए उम्र कैद की सजा भी सुनाई है. लेकिन खुम काला इस सजा को कम मानती हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, \"इस हत्या के तलवार दंपति को मौत की सजा मिलनी चाहिए.\" मुआवजे की मांग आरुषि और हेमराज की हत्या 15-16 मई 2008 को की गई थी. उत्तर प्रदेश पुलिस ने पहले राजेश तलवार पर हत्या का शक जाहिर किया था. बाद में तलवार के घरेलू नौकर हेमराज पर हत्या का शक जाहिर किया गया और कहा गया कि वह हत्या करके भाग गए हैं लेकिन आरुषि की हत्या के अगले ही दिन 16 मई को तलवार के फ्लैट की छत पर हेमराज का शव मिला. इसके बाद एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत शक की सुई राजेश तलवार पर आ गई और उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इस मामले में डॉक्टर तलवार के एक सहायक और उनके परिचितों के घर काम करने वाले दो नौकरों समेत तीन अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया गया था और जाँच के बाद उन्हें छोड़ दिया गया. अब जबकि तलवार दंपति को सजा सुनाई जा चुकी है, हेमराज की पत्नी की मांग है कि उन्हें उनके पति की मौत उचित मुआवजा भी मिले. 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धांधली? चुनाव में कथित धांधली को लेकर ट्विटर पर कई लोगों ने नाराजगी जाहिर की है. खासतौर से लाहौर और कराची से आई कथित धांधली की खबरों पर. पाकिस्तान के कुछ बड़े पत्रकारों और तहरीक-ए-पाकिस्तान के समर्थकों ने इस मसले को खूब उछाला. कुछ लोगों का आरोप है कि मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट के लोगों ने कराची और नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन ने पंजाब में चुनावों में धांधली की. टीवी एंकर सलीम साफी ने ट्वीट किया, “मेरे ज्यादातर सहयोगी पंजाब में चुनाव धांधली के मसले पर एक राय रखते हैं. लेकिन वो इसे नवाज शरीफ से डरने की वजह से खुल कर जाहिर नहीं करते.” तालिबान की धमकियों के बाद महिलाएं वोट देने के लिए बाहर निकलीं लेखक और टीवी एंकर शाहिद मसूद ने ट्विटर पर लिखा, “पाकिस्तान के इतिहास में विवादास्पद/अयोग्य चुनाव आयोग की देखरेख में 2013 के चुनावों में सबसे ज्यादा धांधली हुई है.” एमक्यूएम की आलोचना करते हुए स्तंभकार अहमद कुरैशी ने ट्वीट किया कि एमक्यूएम के लोगों को सामूहिक रूप से इस्तीफे देना चाहिए और उन्हें अगले पांच सालों तक लोकतंत्र का नाम भी नहीं लेना चाहिए. बलूचिस्तान की सीनेटर सना बलोच कहती हैं, “सबसे खराब प्रबंधन था. सिपाहियों को बलूचिस्तान के खरान में प्रिसाइंडिंग ऑफिसर के तौर पर तैनात किया गया था. बलूचिस्तान में ऐतिहासिक धांधली हुई.” तालिबान को झटका तालिबान और दूसरे चरमपंथी संगठनों की ओर से हिंसा की धमकी मिलने के बाद भी ट्विटर का इस्तेमाल करने वालों ने चुनाव का समर्थन किया है. पत्रकार उमर कुरैशी का मानना है, “ इतने बड़े पैमाने पर लोगों का वोट देने के लिए बाहर निकलना तालिबान के लिए झटका है. ये वैसे ही प्रतिक्रिया है जैसी मलाला गोलीकांड के बाद सामने आई है” दुनिया न्यूज के समूह संपादक मोहम्मद मलिक इससे सहमत नजर आते हैं. वो कहते हैं, “लंबी लंबी कतारों ने तालिबान और उनके सहयोगियों को हरा दिया है. डर को परास्त करते हुए लोग झुंड के झुंड बाहर निकले. पाकिस्तानी होने पर गर्व है.” तालिबान समर्थक हैं इमरान? कुछ लोगों ने ट्टिवर पर खैबर पख्तूनवा प्रांत में इमरान की जीत पर चिंता जाहिर की है. इन लोगों का मानना है कि तालिबान का विरोध करने वाली सरकार को हटाकर वहां पर ऐसी सरकार आ रही है जो तालिबान को लेकर ज्यादा लचीली है. अभी तक इस प्रांत में एएनपी(आवामी नेशनल पार्टी) का शासन था. पीएम पद के दावेदार माने जा रहे इमरान खान की पार्टी दसरे नंबर तक पहुंची तालिबान के हमलों में अब तक इस पार्टी के 700 नेता अपनी जान गंवा चुके हैं. पाकिस्तानी मूल के कनाडाई कॉमेडियन तारेक फतह ने इसे आईएसाई की जीत कहा है. वो ट्विटर पर लिखते हैं, \"चुनाव का मकसद एएनपी को खैबर प्रांत से बाहर करना और तालिबान को समर्थन करने वाली सरकार को सत्ता देना है.\" लेखक और तलिबान का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मारवी सिरमद कहती हैं, “आवामी नेशनल पार्टी के गुलाम अहमद बिलौर ने तालिबान के खिलाफ कड़े रुख का परिचय दिया. उनकी हर पर हमें गहरा दुख हुआ है.” इतना ही नहीं असद मुनीर जैसे लोग जो ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं, कहते हैं, “चलो अब खैबर प्रांत पर तालिबान को राज करने दो क्योंकि वहां तो लोगों ने उन्हें वो देकर जिताया है.”\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में ट्विटर इस्तेमाल करने वालों ने चुनाव का स्वागत किया है और इसे लोकतंत्र की दिशा में एक बढ़ा हुआ कदम बताया है. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कुछ जगहों पर 'धांधली' के आरोप लगाए हैं और इसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल भी उठाए हैं.", "probe_text": "Summarize the following 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इसराइल के फ़ैसले की निंदा की है. हमास ने कहा है कि वह चुनाव प्रचार की कोई वैकल्पिक व्यवस्था करेगा. इसराइली मंत्रिमंडल के फ़ैसले के तुरंत बाद ही पुलिस ने पूर्वी यरुशलम में हमास के अनेक समर्थकों को हिरासत में ले लिया. इसराइली मंत्रिमंडल ने पूर्वी यरूशलम में हमास के चुनाव अभियान चलाने और उसके उम्मीदवारों के नाम मतपत्र में शामिल किए जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है. हमास ने इसराइल की शर्त की निंदा की है और कहा है कि वह अपना चुनाव अभियान जारी रखेगा. समझा जाता है कि चुनाव में हमास के उम्मीदवारों का प्रदर्शन काफ़ी अच्छा रह सकता है. फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख वार्ताकार साएब एरेकात ने कहा है कि इसराइल को ऐसी शर्तें लादने का कोई अधिकार नहीं है. अनुमति इससे पहले इसराइली मंत्रिमंडल ने पूर्वी यरूशलमें रहनेवाले फ़लस्तीनियों को चुनाव में भाग लेने की अनुमति दे दी और वे डाकघरों में जाकर मतदान कर सकेंगे. फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास ने धमकी दी थी कि यदि इसराइल पूर्वी यरुशलम में रह रहे फ़लस्तीनियों को चुनाव में भाग नहीं लेने देता तो वे चुनाव नहीं करवाएँगे. बीबीसी संवाददाता के अनुसार सभी मंत्री इस प्रस्ताव पर सहमत थे और ये वैसी ही व्यवस्था है जैसी कि पिछले सालों में रही है. पूर्वी यरूशलम में लगभग दो लाख फ़लस्तीनी रहते हैं और उन्होंने 1996 में हुए चुनाव में हिस्सा लिया था लेकिन तब हमास चुनाव में शामिल नहीं था. पूर्वी यरुशलम का इलाक़ा उन क्षेत्रों में से एक है जिसपर इसराइलियों ने 1967 की जंग में कब्ज़ा किया था. पूर्वी यरुशलम पर इसराइली क़ब्ज़े को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं है. यरूशलम के इस हिस्से को अक्सर अरबी पूर्वी यरूशलम कहा जाता है क्योंकि यहाँ फ़लस्तीनियों की संख्या अधिक है और फ़लस्तीनियों को उम्मीद है कि वे अलग राष्ट्र बनने की स्थिति में उसे ही अपनी राजधानी बनाएँगे.\n\nSummary:", "target": "फ़लस्तीनी नेताओं ने इसराइली मंत्रिमंडल के इस फ़ैसले की आलोचना की है कि फ़लस्तीनी संसदीय चुनावों में चरमपंथी संगठन हमास को पूर्वी यरुशलम में भाग लेने से रोकने की कोशिश की जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग़ौरतलब है कि फ़लस्तीनी राष्ट्रीय एसेंबली के चुनाव 25 जनवरी को होने हैं. इसराइली मंत्रिमंडल ने रविवार को हुई बैठक में पूर्वी यरुशलम में रहने वाले 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अनुमति दे दी और वे डाकघरों में जाकर मतदान कर सकेंगे. फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास ने धमकी दी थी कि यदि इसराइल पूर्वी यरुशलम में रह रहे फ़लस्तीनियों को चुनाव में भाग नहीं लेने देता तो वे चुनाव नहीं करवाएँगे. बीबीसी संवाददाता के अनुसार सभी मंत्री इस प्रस्ताव पर सहमत थे और ये वैसी ही व्यवस्था है जैसी कि पिछले सालों में रही है. पूर्वी यरूशलम में लगभग दो लाख फ़लस्तीनी रहते हैं और उन्होंने 1996 में हुए चुनाव में हिस्सा लिया था लेकिन तब हमास चुनाव में शामिल नहीं था. पूर्वी यरुशलम का इलाक़ा उन क्षेत्रों में से एक है जिसपर इसराइलियों ने 1967 की जंग में कब्ज़ा किया था. पूर्वी यरुशलम पर इसराइली क़ब्ज़े को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं है. यरूशलम के इस हिस्से को अक्सर अरबी पूर्वी यरूशलम कहा जाता है क्योंकि यहाँ फ़लस्तीनियों की संख्या अधिक है और फ़लस्तीनियों को उम्मीद है कि वे अलग राष्ट्र बनने की स्थिति में उसे ही अपनी राजधानी बनाएँगे.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", 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बढ़ाने से संकट दूर हो जाएगा. वियना में ओपेक देशों की बैठक में तेल के उत्पादन में पाँच लाख बैरल से लेकर 10 लाख बैरल प्रतिदिन तक उत्पादन बढ़ाने पर विचार होगा. ओपेक के अध्यक्ष और कुवैत के तेल मंत्री शेख़ अहमद अल सबाह ने कहा है,\"हम बाज़ार को आरामदायक स्थिति में लाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे\". फ़िलहाल ओपेक देश प्रतिदिन दो करोड़ 80 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं.\n\nSummary:", "target": "दुनिया के तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के प्रतिनिधि सोमवार को वियना में बैठक करेंगे जिसमें तेल की बढ़ती माँग को देखते हुए तेल का उत्पादन बढ़ाए जाने पर विचार होगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nओपेक पर तेल का उत्पाद बढ़ाने के लिए राजनीतिक दबाव बन रहा है. ब्रिटेन के वित्त मंत्री गोर्डन ब्राउन ने ओपेक पर आरोप लगाया है कि दुनिया में तेल की माँग के अनुरूप आपूर्ति नहीं कर रहा है. मगर ओपेक ने कहा है कि वह तेल की आपूर्ति बढ़ाकर अपना बाज़ार नहीं ख़राब करना चाहता. तेल की बढ़ती माँग के अतिरिक्त पिछले दिनों अमरीका के दक्षिणी हिस्से में कैटरीना तूफ़ान के कारण भी कई तेल 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और आईटी हेड पुनीत अग्रवाल ने भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इस आर्टिकल को शेयर किया है और इसे एक चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है. पुनीत अग्रवाल ने लिखा, \"कितने न्यूज़ चैनल अब इस मुद्दे पर डिबेट करेंगे. सिवाए करप्शन के भला कांग्रेस की इतनी कमाई का क्या सोर्स हो सकता है?\" लेकिन बीबीसी ने इन सभी दावों को ग़लत पाया क्योंकि जिस रिपोर्ट के आधार पर 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' का ये आर्टिकल लिखा गया था, उस रिपोर्ट में बाद में तथ्यात्मक बदलाव किये गए थे और सोनिया गांधी का नाम लिस्ट से हटा दिया गया था. आर्टिकल में कहा क्या गया? 2 दिसंबर 2013 को छपे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के आर्टिकल में लिखा था: बीजेपी प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय साल 2015 में भी इसी आर्टिकल को एक बार पहले शेयर कर चुके हैं. हफ़िग्टन पोस्ट की उस रिपोर्ट के आधार पर ये ख़बर लिखने वाला टाइम्स अकेला संस्थान नहीं था. 2013 में ये रिपोर्ट सामने आने के बाद कई स्थानीय भारतीय मीडिया संस्थानों ने ये ख़बर छापी थी कि सोनिया गांधी का नाम दुनिया के सबसे अमीर नेताओं की श्रेणी में शामिल है. सोशल मीडिया सर्च से पता चलता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भी इस 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हटाना पड़ा. इस ग़लतफ़हमी के लिए हमें खेद है.\" साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब सोनिया गांधी ने रायबरेली सीट से नामांकन दर्ज किया था, उस समय उन्होंने अपने हलफ़नामे में लिखा था कि उनके पास कुल मिलाकर 10 करोड़ की सपत्ति है. कोई भी ऐसा आधिकारिक दस्तावेज़ मौजूद नहीं है जिसके आधार पर ये कहा जा सके कि सोनिया गांधी ब्रिटेन की महारानी से भी ज़्यादा अमीर हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया समेत कुछ भारतीय न्यूज़ साइट्स हैं जिन्होंने हफ़िग्टन पोस्ट की इस रिपोर्ट में हुई तबदीली को भी छापा और इस बारे में लोगों को सूचित किया. लेकिन पुरानी ख़बर को जानबूझकर वायरल किया गया. सोशल मीडिया पर कई ऐसे फ़ेसबुक पेज भी हैं जो दावा करते हैं कि वो टाइम्स ऑफ़ इंडिया को उनकी पुरानी ख़बर अपडेट करने की अपील कर चुके हैं. 'फ़ैक्ट चेक' की अन्य कहानियाँ: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सोमवार को 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के एक पुराने आर्टिकल का लिंक शेयर किया था जिसे अब सोशल मीडिया पर तेज़ी से शेयर किया जा रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n2013 में छपे इस आर्टिकल के अनुसार 'कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ-II से भी अधिक अमीर हैं'. इस आर्टिकल को ट्वीट करते हुए अश्विनी उपाध्याय ने लिखा, \"कांग्रेस की एलिज़ाबेथ ब्रिटेन की महारानी से और कांग्रेस के सुल्तान ओमान के सुल्तान से भी अधिक अमीर हैं. भारत सरकार को जल्द से जल्द क़ानून बनाकर इनकी 100 फ़ीसद बेनामी संपत्ति को ज़ब्त कर लेना चाहिए और उम्रक़ैद की सज़ा देनी चाहिए.\" अपने इस ट्वीट में अश्विनी उपाध्याय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री के दफ़्तर (पीएमओ) के आधिकारिक हैंडल को भी टैग किया है. तीन हज़ार से अधिक लोग उनके इस ट्वीट को लाइक और री-ट्वीट कर चुके हैं. दक्षिणपंथी रुझान रखने वाले फ़ेसबुक ग्रुप्स और पन्नों पर भी अब इस आर्टिकल को शेयर किया जा रहा है. यहाँ भी लोग कथित तौर पर सबसे अमीर भारतीय नेता सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं. दिल्ली भाजपा के सोशल मीडिया और आईटी हेड पुनीत अग्रवाल ने भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इस आर्टिकल को शेयर किया है और इसे एक चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है. पुनीत अग्रवाल ने लिखा, \"कितने न्यूज़ चैनल अब इस मुद्दे पर डिबेट करेंगे. सिवाए करप्शन के भला कांग्रेस की इतनी कमाई का क्या सोर्स हो सकता है?\" लेकिन बीबीसी ने इन सभी दावों को ग़लत पाया क्योंकि जिस रिपोर्ट के आधार पर 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' का ये आर्टिकल लिखा गया था, उस रिपोर्ट में बाद में तथ्यात्मक बदलाव किये गए थे और सोनिया गांधी का नाम लिस्ट से हटा दिया गया था. आर्टिकल में कहा क्या गया? 2 दिसंबर 2013 को छपे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के आर्टिकल में लिखा था: बीजेपी प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय साल 2015 में भी इसी आर्टिकल को एक बार पहले शेयर कर चुके हैं. हफ़िग्टन पोस्ट की उस रिपोर्ट के आधार पर ये ख़बर लिखने वाला टाइम्स अकेला संस्थान नहीं था. 2013 में ये रिपोर्ट सामने आने के बाद कई स्थानीय भारतीय मीडिया संस्थानों ने ये ख़बर छापी थी कि सोनिया गांधी का नाम दुनिया के सबसे अमीर नेताओं की श्रेणी में शामिल है. सोशल मीडिया सर्च से पता चलता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भी इस आर्टिकल को काफ़ी शेयर किया गया था और इसके आधार पर लोगों ने सोनिया गांधी पर भ्रष्ट होने के आरोप लगाये थे. फ़ेसबुक सर्च करने पर ऐसी सामग्री की भरमार मिलती है जिसमें दावा किया गया है कि सोनिया गांधी दुनिया के सबसे अमीर नेताओं में शामिल हैं और उनकी संपत्ति ब्रिटेन की महारानी से ज़्यादा है. हफ़िग्टन पोस्ट की रिपोर्ट में बदलाव अपनी पड़ताल में हमने पाया कि 29 नवंबर 2013 को हफ़िग्टन पोस्ट ने सबसे अमीर नेताओं की एक लिस्ट छापी थी. इसके साथ नेताओं की तस्वीरें भी लगाई गई थीं. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम लिस्ट में 12वें स्थान पर था, लेकिन बाद में उनका नाम उस लिस्ट से हटा लिया गया. ऐसा क्यों किया गया? इसके जवाब में हफ़िग्टन पोस्ट के एडिटर ने साइट पर लगी इस रिपोर्ट के नीचे एक नोट लिखा. इस नोट के अनुसार, \"सोनिया गांधी और क़तर के शेख़ हामिद बिन ख़लीफ़ा अल-थानी का नाम लिस्ट से हटाया गया. कांग्रेस नेता सोनिया गांधी का नाम इस लिस्ट में किसी थर्ड पार्टी साइट के आधार पर रखा गया था, जिसपर बाद में सवाल उठे. हमारे एडिटर सोनिया गांधी की बताई गई संपत्ति की पुष्टि नहीं कर सके, इसलिए लिंक को हटाना पड़ा. इस ग़लतफ़हमी के लिए हमें खेद है.\" साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब सोनिया गांधी ने रायबरेली सीट से नामांकन दर्ज किया था, उस समय उन्होंने अपने हलफ़नामे में लिखा था कि उनके पास कुल मिलाकर 10 करोड़ की सपत्ति है. कोई भी ऐसा आधिकारिक दस्तावेज़ मौजूद नहीं है जिसके आधार पर ये कहा जा सके कि सोनिया गांधी ब्रिटेन की महारानी से भी ज़्यादा अमीर हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया समेत कुछ भारतीय न्यूज़ साइट्स हैं जिन्होंने हफ़िग्टन पोस्ट की इस रिपोर्ट में हुई तबदीली को भी छापा और इस बारे में लोगों को सूचित किया. लेकिन पुरानी ख़बर को जानबूझकर वायरल किया गया. सोशल मीडिया पर कई ऐसे फ़ेसबुक पेज भी हैं जो दावा करते हैं कि वो टाइम्स ऑफ़ इंडिया को उनकी पुरानी ख़बर अपडेट करने की अपील कर चुके हैं. 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( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री ली कचियांग ने कहा है कि चीन इस बात की कोशिश करेगा कि भारतीय सामानों की पहुंच चीन के बाज़ारों में बढ़े.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदोनों मुल्कों ने आठ संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं. दिल्ली में उद्योग और व्यापार संघ के आयोजित कार्यक्रम में चीनी प्रधानमंत्री ने कहा, \"जहां तक भारत के व्यापार घाटे की चिंता की बात है, चीनी पक्ष अपने बाज़ार में भारतीय माल की पहुंच बढ़ाने के लिए हर तरह की सुविधा मुहैया करवाएगा. \" उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों मु्ल्कों के बीच साझा व्यापार में भारत को जो घाटा है उसे पूरा किया जा सकेगा. भारत और चीन के बीच सालाना व्यापार 66.5 अरब डॉलर का है. लेकिन साल 2012 के आंकड़ों के मुताबिक ये चीन के पक्ष में अधिक फ़ायेदामंद है. मेलजोल की ज़रूरत ली कचियांग का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत को और अहम भूमिका निभाते देख चीन को खुशी होगी. उन्होंने कहा कि ज़रूरत है कि विश्व स्तर पर विकासशील मुल्कों की आवाज़ और बुलंद हो. दिल्ली में उनकी मौजूदगी के दौरान भारत और चीन ने आठ अहम मुद्दों पर संधि किए हैं. ली कचियांग ने कहा कि विश्व की एक तिहाई आबादी इन दोनों मुल्कों में रहती है और पिछले कुछ सालों में दोनों देशों में विकास की दर औसतन सात प्रतिशत रही है. उन्होंने कहा कि हालांकि दोनों मुल्कों के बीच कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसपर मतभेद हैं लेकिन ज़रूरत है कि लोगों के बीच और अधिक मेलजोल की. उनका कहना था कि इससे 'एक दूसरे के प्रति हमारी समझ बढ़ेगी.' 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में भूकंप पीड़ित जिले आवारान में हुए एक धमाके में पाकिस्तान के दो सैनिक मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है पाकिस्तान सेना ने बीबीसी को बताया ये सैनिक भूकंप प्रभावित इलाकों में राहत कार्यों में जुटे थे कि सड़क किनारे रखे गए बम का निशाना बने और इस विस्फोट में तीन सैनिक घायल भी हुए. पाकिस्तान के सैन्य सूत्रों के अनुसार राहत कार्यों में लगे सैनिकों पर होने वाला ये सातवां हमला है, हालांकि ये पहला मौका है जब इस तरह के हमले में किसी की जान गई है. बीते गुरुवार को भूकंप प्रभावित इलाकों का हवाई दौरा करने वाले सेना के हेलीकॉप्टरों पर रॉकेट दागे गए. अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है. इस संगठन के अनुसार भूकंप प्रभावित इलाके के पास पहाड़ियों में सेना और बलूच अलगावादियों की झड़प भी हुई जिसमें 14 लोग मारे गए हैं, हालांकि इस दावे की सेना की तरफ से कोई पुष्टि नही हुई है. पिछले महीने बलूचिस्तान में आए भूकंप से बड़े पैमाने पर तबारी हुई और वहां सेना राहत के काम में जुटी है. 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पार्टी (पीडीपी) ने भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की कांग्रेस सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. अमरनाथ मंदिर बोर्ड को ज़मीन दिए जाने को लेकर चल रहे विवाद के कारण पीडीपी ने यह फ़ैसला किया था. पीडीपी अमरनाथ मंदिर बोर्ड की ज़मीन दिए जाने के राज्य सरकार के फ़ैसले से नाराज़ थी. इस फ़ैसले पर राज्य में काफ़ी विरोध भी हो रहा है. पीडीपी कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल थी और इसके 18 विधायक हैं. 87 सदस्योंवाली जम्मू कश्मीर विधानसभा में कांग्रेस के 21 विधायक हैं और उसे सीपीएम के दो और आठ निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल है. विपक्षी नेशनल कांफ्रेंस के 24 सदस्य हैं और उसने पहले ही कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने से इनकार कर दिया है. जबकि चार सदस्यों वाली पैंथर्स पार्टी और गठबंधन सरकार के बीच 2005 से ही मनमुटाव चल रहा है.\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित राज्य जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा ने मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद सरकार को सात जुलाई तक विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने को कहा गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in 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के बाद रैफ़ बदावी को दूसरी बार सरेआम कोड़े लगाए जाने थे. पिछले शुक्रवार को बदावी को 50 कोड़े मारे गए थे जिसका पूरी दुनिया में विरोध किया गया. सऊदी अरब की ओर से इस विरोध पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. समाप्त सऊदी अरब ने बदावी के स्वास्थ्य और उनकी बाकी सज़ा के बारे में अभी कोई बयान नहीं दिया है. सज़ा के मुताबिक उन्हें हर सप्ताह कोड़े लगाए जाने हैं. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी ने एक बयान में कहा कि रैफ़ बदावी की जाँच करने के बाद डॉक्टरों को लगा कि पिछले सप्ताह बदवी को लगाए गए कोड़ों की वजह से आने वाले घाव अभी भरे नहीं हैं और वो अधिक कोड़े खाने में सक्षम नहीं हैं. एमनेस्टी के अनुसार डॉक्टर ने सज़ा को अगले सप्ताह तक स्थगित करने की मांग की. बदावी की पत्नी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सज़ा टाले जाने से उन्हें उम्मीद बंधी है कि सऊदी प्रशासन इस सज़ा को ख़त्म करना चाहता है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हो रही है. कौन हैं बदावी सऊदी अरब ने 31 वर्षीय ब्लॉगर और एक्टिविस्ट रईफ़ बदावी ने 2008 में एक ऑनलाइन फ़ोरम- लिबरल सऊदी नेटवर्क- बनाया था. इसमें उन्होंने सऊदी अरब के धर्माधिकारियों के आलोचनात्मक लेख लिखे थे और नीतियों पर सवाल उठाए थे. जाने माने मुस्लिम विद्वान शेख अब्दुर्रहमान अल-बराक ने बदावी के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करते हुए उन्हें 'नास्तिक' और 'धर्मत्यागी' करार दिया. उनके अनुसार बदावी ने कहा था कि 'मुसलमान, यहूदी, ईसाई और नास्तिक सभी समान हैं.' इसके बाद साल 2012 में उन पर जानलेवा हमला किया गया जिसके बाद उनकी बीवी और परिवार ने कनाडा में शरण मांगी. इसी साल जेद्दाह में उन्हें इस्लाम के अपमान और नाफ़रमानी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया था. साल 2013 में उन्हें सात साल की सज़ा और 600 कोड़ों की सज़ा दी गई थी. उन्होंने इस आदेश को चुनौती दी लेकिन पिछले साल मई में अदालत ने सज़ा बढ़ाकर 10 साल कैद और 1,000 कोड़ों में बदल दी. सऊदी अरब इस्लामी क़ानून का कड़ाई से पालन करता है और यहां धर्म के बारे में खुली चर्चा करने से लोग बचते हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सऊदी अरब के ब्लॉगर को रैफ़ बदावी को दूसरी बार कोड़े लगाने की सज़ा स्थगित कर दी गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबदावी पर अपनी वेबसाइट ''सऊदी लिबरल नेटवर्क'' पर इस्लाम का अपमान करने, साइबर अपराध और अपने पिता के अवहेलना करने के आरोप थे. यह वेब साइट अब बंद कर दी गई है. रैफ़ बदावी की कोड़ों की सज़ा उनकी खराब सेहत के चलते रोकी गई है. बदावी को जून 2012 में गिरफ़्तार किया गया था. उन्हें 10 साल क़ैद और 1000 कोड़े मारे जाने की सज़ा दी गई थी. शुक्रवार की नमाज के बाद रैफ़ बदावी को दूसरी बार सरेआम कोड़े लगाए जाने थे. पिछले शुक्रवार को बदावी को 50 कोड़े मारे गए थे जिसका पूरी दुनिया में विरोध किया गया. सऊदी अरब की ओर से इस विरोध पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. समाप्त सऊदी अरब ने बदावी के स्वास्थ्य और उनकी बाकी सज़ा के बारे में अभी कोई बयान नहीं दिया है. सज़ा के मुताबिक उन्हें हर सप्ताह कोड़े लगाए जाने हैं. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी ने एक बयान में कहा कि रैफ़ बदावी की जाँच करने के बाद डॉक्टरों को लगा कि पिछले सप्ताह बदवी को लगाए गए कोड़ों की वजह से आने वाले घाव अभी भरे नहीं हैं और वो अधिक कोड़े खाने में सक्षम नहीं हैं. एमनेस्टी के अनुसार डॉक्टर ने सज़ा को अगले सप्ताह तक स्थगित करने की मांग की. बदावी की पत्नी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सज़ा टाले जाने से उन्हें उम्मीद बंधी है कि सऊदी प्रशासन इस सज़ा को ख़त्म करना चाहता है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हो रही है. कौन हैं बदावी सऊदी अरब ने 31 वर्षीय ब्लॉगर और एक्टिविस्ट रईफ़ बदावी ने 2008 में एक ऑनलाइन फ़ोरम- लिबरल सऊदी नेटवर्क- बनाया था. इसमें उन्होंने सऊदी अरब के धर्माधिकारियों के आलोचनात्मक लेख लिखे थे और नीतियों पर सवाल उठाए थे. जाने माने मुस्लिम विद्वान शेख अब्दुर्रहमान अल-बराक ने बदावी के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करते हुए उन्हें 'नास्तिक' और 'धर्मत्यागी' करार दिया. उनके अनुसार बदावी ने कहा था कि 'मुसलमान, यहूदी, ईसाई और नास्तिक सभी समान हैं.' इसके बाद साल 2012 में उन पर जानलेवा हमला किया गया जिसके बाद उनकी बीवी और परिवार ने कनाडा में शरण मांगी. इसी साल जेद्दाह में उन्हें इस्लाम के अपमान और नाफ़रमानी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया था. साल 2013 में उन्हें सात साल की सज़ा और 600 कोड़ों की सज़ा दी गई थी. उन्होंने इस आदेश को चुनौती दी लेकिन पिछले साल मई में अदालत ने सज़ा बढ़ाकर 10 साल कैद और 1,000 कोड़ों में बदल दी. सऊदी अरब इस्लामी क़ानून का कड़ाई से पालन करता है और यहां धर्म के बारे में खुली चर्चा करने से लोग बचते हैं. 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मौक़े पर हमले करके ये चरमपंथी सांप्रदायिक तनाव पैदा करना चाहते थे. त्यौहार को देखते हुए इन दिनों दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी है, दिल्ली में पिछले वर्ष दीपावली से ठीक पहले हुए बम धमाके में साठ से अधिक लोग मारे गए थे. जाँच अधिकारियों ने तब इस हमले के लिए लश्करे तैबा पर शक ज़ाहिर किया था लेकिन ख़ुद को लश्कर का प्रवक्ता बताने वाले एक व्यक्ति ने फ़ोन पर दावा किया था दिल्ली के बम धमाकों से उनका कोई ताल्लुक नहीं है.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली पुलिस ने लश्करे तैबा से जुड़े दो चरमपंथियों को पकड़ने का दावा किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिल्ली पुलिस का कहना है कि ये दोनों चरमपंथी बांग्लादेशी नागरिक थे और दिल्ली में धमाके करने के मक़सद से आए थे. पुलिस ने बताया कि मोहम्मद असलम गीर और अब्दुल रज़्ज़ाक को डेढ़ किलोग्राम आरडीएक्स के साथ पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया है. ये दोनों संदिग्ध चरमपंथी जम्मू से रेल यात्रा करके पुरानी दिल्ली पहुँचे थे, पुलिस का कहना है कि इनके बारे में पहले से गुप्त सूचना मिली थी जिसके आधार पर 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की सिरीज़ भी हार गया है क्योंकि इससे पहले चेन्नई के वनडे में भी उसे हार का सामना करना पड़ा था. भारत ने सँभलते हुए पारी की शुरुआत की थी मगर वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर की जोड़ी ज़्यादा देर तक नहीं चली. 10वें ओवर में जुनैद ख़ान की गेंद गंभीर के बल्ले को चकमा देकर विकेट छूती हुई गुज़र गई. गंभीर ने तब तक 11 रन बनाए थे. उसके बाद विराट कोहली भी सिर्फ़ छह रन बनाकर आउट हो गए. उस समय टीम का स्कोर 55 रन था. भारत को फिर सहवाग और युवराज से उम्मीद थी कि उनका अनुभव टीम के काम आएगा मगर पहले सहवाग और फिर युवराज भी पवेलियन लौट चले. सहवाग ने 31 रन बनाए और उन्हें उमर गुल ने एलबीडब्ल्यू आउट किया. इसके बाद नौ रन बनाकर युवराज विकेट के पीछे लपके गए. भारत इस तरह 70 रनों पर चार विकेट खो चुका था. अब सुरेश रैना और भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की वो जोड़ी मैदान पर थी, जिसने इससे पहले भी भारतीय पारी को ज़रूरत पड़ने पर कई मौक़ों पर सँभाला है. मगर इस मैच में ऐसा नहीं हुआ. सुरेश रैना ने आगे बढ़कर मोहम्मद हफ़ीज़ की गेंद को खोलने की कोशिश की. मगर गेंद सीधे कामरान अकमल के दस्तानों में गई और इससे पहले की रैना का पैर क्रीज़ के अंदर ज़मीन को छूता अकमल ने गिल्लियाँ बिखेर दीं. इसी तरह आगे बढ़कर खेलने की कोशिश में रविचंद्रन अश्विन भी स्टंप आउट हुए. उन्होंने तीन रन बनाए. कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अंत तक रुककर टीम को जिताने की कोशिश की मगर उनका साथ देने के लिए कोई नहीं बचा और पूरी टीम 165 रनों पर सिमट गई. धोनी ने 54 रन बनाए और अंत तक नॉट आउट रहे. पाकिस्तान की पारी इससे पहले पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ दूसरे वनडे मैच में बेहतरीन शुरुआत की लेकिन टीम 48 ओवर तीन गेंदों में मात्र 250 रनों पर ही सिमट गई. पाकिस्तान के सलामी बल्लेबाज़ों नासिर जमशेद और मोहम्मद हफीज़ ने पहले विकेट के लिए शानदार 141 रन जोड़े और एक समय ऐसा लग रहा था कि दोनों बल्लेबाज़ अपने शतक पूरे कर लेंगे. लेकिन फिर रविंदर जडेजा ने भारत को पहली सफलता दिलाई मोहम्मद हफीज़ के रुप में. हफीज़ को 76 रनों के निजी स्कोर पर जडेजा ने बोल्ड कर दिया. हफीज़ ने पचास गेंदों में अर्धशतक बनाया था जबकि 74 रनों पर कुल 76 रन जोड़े. इसके बाद भी पाकिस्तान के बल्लेबाज़ अज़हर अली हड़बड़ी में रन आउट हो गए. उन्होंने मात्र दो ही रन जोड़े थे कि उन्हें धोनी और सहवाग ने मिलकर रन आउट कर दिया. सलामी बल्लेबाज़ जमशेद ने अपना शतक पूरा किया मात्र 120 गेंदों में और इसमें उन्होंने 12 चौके और दो शानदार छक्के भी लगाए. जमशेद को 106 के निजी स्कोर पर धोनी ने स्टंप कर दिया. गेंदबाज़ एक बार फिर रविंदर जडेजा रहे. इसके बाद तो मानो पाकिस्तान की टीम के बल्लेबाज़ जल्दी जल्दी आउट होने लगे. यूनिस खान सिर्फ दस रन बनाकर आउट हुए तो मिस्बाह दो ही रन पर पगबाधा हो गए. शोएब मलिक ने एक दो अच्छे शॉट लगाए लेकिन 24 के निजी स्कोर पर वो इशांत की गेंद पर कैच दे बैठे. कैच लपका युवराज सिंह ने. कामरान अकमल तो बिना खाता खोले ही पवेलियन लौट गए. उमर गुल ने 17 रनों का योगदान किया. पाकिस्तान की शुरुआत अच्छी रही लेकिन अंत ठीक नहीं रहा. भारत की तरफ से रविंदर जडेजा और इशांत शर्मा ने तीन-तीन विकेट लिए.\n\nSummary:", "target": "कोलकाता वनडे में पाकिस्तान को सिर्फ़ 250 रनों पर समेटने में क़ामयाब होने के बाद भारतीय बल्लेबाज़ी पूरी तरह लड़खड़ा गई और 85 रनों से मैच भारत हार गया. भारत की पूरी टीम 165 रनों पर सिमट गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत को जीतने के लिए 251 रनों का लक्ष्य मिला था इस हार के साथ ही भारत तीन वनडे मैचों की सिरीज़ भी हार गया है क्योंकि इससे पहले चेन्नई के वनडे में भी उसे हार का सामना करना पड़ा था. भारत ने सँभलते हुए पारी की शुरुआत की थी मगर वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर की जोड़ी ज़्यादा देर तक नहीं चली. 10वें ओवर में जुनैद ख़ान की गेंद गंभीर के बल्ले को चकमा देकर विकेट छूती हुई गुज़र गई. गंभीर ने तब तक 11 रन बनाए थे. उसके बाद विराट कोहली भी सिर्फ़ छह रन बनाकर आउट हो गए. उस समय टीम का स्कोर 55 रन था. भारत को फिर सहवाग और युवराज से उम्मीद थी कि उनका अनुभव टीम के काम आएगा मगर पहले सहवाग और फिर युवराज भी पवेलियन लौट चले. सहवाग ने 31 रन बनाए और उन्हें उमर गुल ने एलबीडब्ल्यू आउट किया. इसके बाद नौ रन बनाकर युवराज विकेट के पीछे लपके गए. भारत इस तरह 70 रनों पर चार विकेट खो चुका था. अब सुरेश रैना और भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की वो जोड़ी मैदान पर थी, जिसने इससे पहले भी भारतीय पारी को ज़रूरत पड़ने पर कई मौक़ों पर सँभाला है. मगर इस मैच में ऐसा नहीं हुआ. सुरेश रैना ने आगे बढ़कर मोहम्मद हफ़ीज़ की गेंद को खोलने की कोशिश की. मगर गेंद 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उन्होंने मात्र दो ही रन जोड़े थे कि उन्हें धोनी और सहवाग ने मिलकर रन आउट कर दिया. सलामी बल्लेबाज़ जमशेद ने अपना शतक पूरा किया मात्र 120 गेंदों में और इसमें उन्होंने 12 चौके और दो शानदार छक्के भी लगाए. जमशेद को 106 के निजी स्कोर पर धोनी ने स्टंप कर दिया. गेंदबाज़ एक बार फिर रविंदर जडेजा रहे. इसके बाद तो मानो पाकिस्तान की टीम के बल्लेबाज़ जल्दी जल्दी आउट होने लगे. यूनिस खान सिर्फ दस रन बनाकर आउट हुए तो मिस्बाह दो ही रन पर पगबाधा हो गए. शोएब मलिक ने एक दो अच्छे शॉट लगाए लेकिन 24 के निजी स्कोर पर वो इशांत की गेंद पर कैच दे बैठे. कैच लपका युवराज सिंह ने. कामरान अकमल तो बिना खाता खोले ही पवेलियन लौट गए. उमर गुल ने 17 रनों का योगदान किया. पाकिस्तान की शुरुआत अच्छी रही लेकिन अंत ठीक नहीं रहा. भारत की तरफ से रविंदर जडेजा और इशांत शर्मा ने तीन-तीन विकेट लिए.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 519, "source_item_id": "519", 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है. अब 'मन की बात' लोगों से अपने आप को कनेक्ट नहीं कर पा रहा है. आलोचना प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम के ज़रिए सरकार की नीतियां लोगों तक पंहुचाई. कई बार महत्वपूर्ण घोषणाएं भी इस पर हुईं. मसलन, प्रधानमंत्री ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े अध्यादेश को फिर नहीं लाने की घोषणा सबसे पहले इसी कार्यक्रम पर की. यह कार्यक्रम विवादों में भी रहा. प्रधानमंत्री ने रक्षा बंधन की बधाई लोगों को इस कार्यक्रम के ज़रिए दी. लेकिन उसी समय होने वाले रमज़ान पर वे चुप रहे. इसकी तीखी आलोचना हुई थी. मन की बात नहीं इस कार्यक्रम के साथ दिक्कत यह हुई कि प्रधानमंत्री ने कई बड़े मुद्दों को इसमें शामिल नहीं किया. लोगों को ऐसा लगने लगा कि यह सही अर्थों में मन की बात नहीं है. यह अब लोगों के 'मन' से नहीं जुड़ रहा है. यह एक महज औपचारिकता बन कर रह गया. सरकारी माध्यमों की विश्वसनीयता पहले से ही नहीं थी. इस कार्यक्रम की शुरुआत में जो साख बनी थी, वह बरक़रार नहीं रही. यह भी दूसरे कार्यक्रमों की तरह हो गया. (बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से हुई बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' को शुरू हुए एक साल पूरा हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमोदी ने पहली बार 3 अक्तूबर 2014 को रेडियो पर 'मन की बात' की थी. नरेंद्र मोदी ने अपने, अपनी पार्टी और अपनी सरकार के प्रचार के लिए तमाम माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल किया. रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' उसका एक हिस्सा भर है. उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल किया और उन्हें इसका फ़ायदा भी मिला. इस कार्यक्रम की शुरुआत बहुत ही प्रभावशाली ढंग से हुई थी. मोदी ने ऐसे कई मुद्दों को उठाया, जिन पर प्रधानमंत्री अमूमन बात नहीं करते. उन्होंने छोटी-छोटी बातों को भी इसमें शामिल किया. समाप्त रेडियो फिर होगा लोकप्रिय? लोगों ने रेडियो की ओर ध्यान से देखना शुरू कर दिया था. ऐसा लगा कि इसकी गरिमा और प्रतिष्ठा लौट आएगी. रेडियो एक बार फिर लोकप्रिय हो जाएगा. लेकिन अब यह कार्यक्रम अपना प्रभाव खो रहा है. इसकी धार कुंद हो चुकी है, अब यह लोगों को पहले की तरह अपील नहीं करता. लोगों को ऐसा लगने लगा है कि दूसरे सरकारी माध्यमों की तरह यह भी है. अब 'मन की बात' लोगों से अपने आप को कनेक्ट नहीं कर पा रहा है. आलोचना प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम के ज़रिए सरकार की नीतियां लोगों तक पंहुचाई. कई बार महत्वपूर्ण घोषणाएं भी इस पर हुईं. मसलन, प्रधानमंत्री ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े अध्यादेश को फिर नहीं लाने की घोषणा सबसे पहले इसी कार्यक्रम पर की. यह कार्यक्रम विवादों में भी रहा. प्रधानमंत्री ने रक्षा बंधन की बधाई लोगों को इस कार्यक्रम के ज़रिए दी. लेकिन उसी समय होने वाले रमज़ान पर वे चुप रहे. इसकी तीखी आलोचना हुई थी. मन की बात नहीं इस कार्यक्रम के साथ दिक्कत यह हुई कि प्रधानमंत्री ने कई बड़े मुद्दों को इसमें शामिल नहीं किया. लोगों को ऐसा लगने लगा कि यह सही अर्थों में मन की बात नहीं है. यह अब लोगों के 'मन' से नहीं जुड़ रहा है. यह एक महज औपचारिकता बन कर रह गया. सरकारी माध्यमों की विश्वसनीयता पहले से ही नहीं थी. इस कार्यक्रम की शुरुआत में जो साख बनी थी, वह बरक़रार नहीं रही. यह भी दूसरे कार्यक्रमों की तरह हो गया. 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अवसरों में कमी आई है. उन्होंने कहा, \"राज्य में शिक्षा व्यवस्था जर्जर है और स्वास्थ्य व्यवस्था बीमार.\" प्रधानमंत्री ने लोगों से कांग्रेस पार्टी को वोट देने की अपील करते हुए कहा कि उनकी पार्टी जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करती. उन्होंने कहा कि राज्य में पिछले 15 वर्षों में सत्ता में रहे ग़ैर कांग्रेसी सरकारों के दौरान विकास का रास्ता रूक गया है. प्रधानमंत्री का कहना था कि राज्य सरकार केंद्र प्रायोजित योजनाओं के कोष को भी दूसरे मदों में खर्च कर रही है. उत्तर प्रदेश में तीन मई को होने वाले छठे चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार मंगलवार को ख़त्म हो गया. इस चरण में नौ ज़िलों की 52 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होंगे.\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री मनमहोन सिंह ने उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान कहा है कि वहाँ 'गुंडागर्दी' चरम पर है. छठे चरण के लिए प्रचार ख़त्म हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्होंने गोरखपुर में चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में क़ानून और व्यवस्था की हालत ठीक नहीं है और बुनियादी सुविधा भी 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है कि वह आर्थिक प्रतिबंधों की आशंका को देखते हुए यूरोपीय देशों से अपना धन हटा रहा है. ईरान के सेंट्रल बैंक के उप प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा है कि उनका यूरोपीय देशों से धन हटाने का फ़िलहाल कोई इरादा नहीं है. इससे पहले ईरानी समाचार एजेंसी ने शुक्रवार को ख़बर दी थी कि सेंट्रल बैंक के प्रमुख ने परमाणु कार्यक्रम पर बढ़ते दबाव को देखते हुए यूरोप से अपना धन समेटना शुरू कर दिया है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों तरफ़ से परस्पर विरोधी बयान जारी हैं, दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र की परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए की बैठक 2 फ़रवरी को होगी जिसमें फ़ैसला किया जाएगा कि ईरान का मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सौंपा जाए या नहीं. अगर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुँचता है तो ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.\n\nSummary:", "target": "इसराइल के रक्षा मंत्री ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ा बयान दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरक्षा मंत्री शॉल मोफ़ाज़ ने कहा कि उनके देश को मंज़ूर नहीं है कि 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कहा, तो उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री को हिंदुस्तान के मन की बात सुननी चाहिए. यही नहीं कांग्रेस की महिला इकाई ने दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय के बाहर धरना दिया. समाप्त कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई राज्यों में भी अपने सांसदों के निलंबन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. गतिरोध दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस के डीएनए में लोकतंत्र है ही नहीं. वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, \"कांग्रेस के पॉलिटिकल डीएनए में लोकतंत्र है नहीं. आज भी माँ अध्यक्ष और बेटा उपाध्यक्ष है. ये हमें लोकतंत्र सिखाएँगे.\" उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने संसद के सत्र को बर्बाद करने का बीड़ा ही नहीं उठाया उसको एक दर्शन बना दिया है. दूसरी ओर एक और केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा कि कांग्रेस के सांसदों को इसलिए निलंबित किया गया है क्योंकि वे सदन का काम नहीं होने दे रहे थे. जबकि सरकार बहस के लिए तैयार है. उधर कांग्रेस को कई अन्य पार्टियों का भी समर्थन मिला है. बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने इस फ़ैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इस पर फिर से विचार होना चाहिए. समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने भी कांग्रेस का इस मुद्दे पर समर्थन किया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "लोकसभा से कांग्रेस के 25 सांसदों के निलंबन को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में बयानबाज़ी तेज़ हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकांग्रेस ने संसद में इसके विरोध में धरना दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. हिंदुस्तान के मन की बात सुनें मोदी: राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे लोकतंत्र की हत्या कहा, तो उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री को हिंदुस्तान के मन की बात सुननी चाहिए. यही नहीं कांग्रेस की महिला इकाई ने दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय के बाहर धरना दिया. समाप्त कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई राज्यों में भी अपने सांसदों के निलंबन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. गतिरोध दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस के डीएनए में लोकतंत्र है ही नहीं. वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, \"कांग्रेस के पॉलिटिकल डीएनए में लोकतंत्र है नहीं. आज भी माँ अध्यक्ष और बेटा उपाध्यक्ष है. ये हमें लोकतंत्र सिखाएँगे.\" उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने संसद के सत्र को बर्बाद करने का बीड़ा ही नहीं उठाया उसको एक दर्शन बना दिया है. दूसरी ओर एक और केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा कि कांग्रेस के सांसदों को इसलिए निलंबित किया गया है क्योंकि वे सदन का काम नहीं होने दे रहे थे. जबकि सरकार बहस के लिए तैयार है. उधर कांग्रेस को कई अन्य पार्टियों का भी समर्थन मिला है. बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने इस फ़ैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इस पर फिर से विचार होना चाहिए. समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने भी कांग्रेस का इस मुद्दे पर समर्थन किया है. 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{"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकेरल के कासरगोड को छोड़कर राज्य के सभी ज़िलों में बाढ़ के कारण 'रेड अलर्ट' जारी किया गया है. मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अगले कुछ दिनों में केरल में मूसलाधार बारिश होने के कारण बाढ़ प्रभावित 13 ज़िलों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है. केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि, \"हमने बचाव कार्य को तेज़ कर दिया है. बहुत सारे लोग सीएम ऑफ़िस को उन जगहों की सूचना दे रहे हैं जहाँ लोग फंसे हुए हैं.\" सरकारी अधिकारियों के अनुसार, केरल में बनाये गए पाँच सौ से ज़्यादा राहत शिविरों में अब तक क़रीब दो लाख से ज़्यादा लोग पहुँच चुके हैं. केरल में बाढ़ की वजह से जो इलाक़े सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं वो पश्चिमी घाट के 'इकोलॉजिकल सेंसिटिव ज़ोन' के अंतर्गत आते हैं. स्थानीय मीडिया के अनुसार, कोच्चि, त्रिवेंद्रम, इडुक्की, पलक्कड और वायनाड ज़िले में हालात सबसे ज़्यादा ख़राब हैं. नेशनल डिज़ास्टर रेस्पॉन्स फ़ोर्स (एनडीआरएफ़) की छह टीमें दिल्ली और छह टीमें अहमदाबाद से केरल भेजी गई हैं. एनडीआरएफ़ की 18 टीमें केरल के 7 ज़िलों में पहले से तैनात हैं. एनडीआरएफ़ के महानिदेशक संजय कुमार ने मीडिया को बताया है, \"हम केरल सरकार के साथ मिलकर बचाव कार्य कर रहे हैं. केरल में अगर और टीमों की ज़रूरत होगी तो हम भेजेंगे. केरल में हालात काफ़ी चुनौतीपूर्ण हैं.\" सभी ज़िला मुख्यालयों पर एक हेलीकॉप्टर भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने ट्वीट किया है, \"ऑपरेशन मदद के तहत केरल के सभी ज़िला मुख्यालयों पर हमने एक हेलीकॉप्टर तैनात करके का फ़ैसला किया है. इस बारे में भारतीय वायु सेना को ज़रूरी निर्देश दे दिये गए हैं. मौसम ने साथ दिया तो आज रात तक ये हेलीकॉप्टर बचाव कार्य के लिए केरल पहुँच जायेंगे.\" उन्होंने बताया कि भारतीय आर्मी ने बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में 18 जगहों पर रास्ते बहाल किये हैं और 11 जगहों पर अस्थायी पुल बनाये हैं ताकि फंसे हुए लोगों तक मेडिकल मदद पहुँच सके. केरल सरकार ने रक्षा मंत्रालय से बचाव कार्य के लिए 600 मोटरबोट भी मांगी हैं. शुक्रवार को केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने ट्वीट किया, \"आप हमें वक़्त और तारीख़ के साथ अपनी सही लोकेशन, ज़िले का नाम और फ़ोन नंबर भेजें. हम उन तक मदद पहुँचाने की कोशिश करेंगे.\" इस बीच गृह-मंत्रालय की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसून सीज़न शुरू होने से लेकर अभी तक देशभर में 930 लोगों की मौत हो चुकी है. कितनी भयानक है केरल में बाढ़ की स्थिति केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन का कहना है कि पिछले 100 सालों में राज्य ने कभी भी इस तरह के बाढ़ का सामना नहीं किया है. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, \"इससे पहले केरल ने कभी भी इस तरह की स्थिति नहीं देखी.\" मानसून में हर साल केरल में देश के कुछ राज्यों की तुलना में ज़्यादा बारिश होती है लेकिन मौसम विभाग का कहना है कि इस बार हुई बारिश औसत से 37 फ़ीसदी ज़्यादा है. चिंता की बात ये है कि आने वाले दिनों में भी तेज़ बारिश का प्रकोप जारी रहने की आशंका है. सोशल मीडिया के ज़रिए मांग रहे हैं लोग मदद इसके बाद काफ़ी सारे लोगों ने अपनी जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की है और सरकार से मदद की गुहार लगाई है. गुरुवार को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने लोगों से बाढ़ राहत कोष में मदद भेजने का आग्रह किया था. उन्होंने ट्विटर पर एक बयान जारी कर लोगों से मदद मांगी थी. केरल में आई इस बाढ़ को 94 साल की 'सबसे बड़ी बाढ़' कहा जा रहा है. राज्य के विभिन्न हिस्सों में बिजली आपूर्ति, संचार प्रणाली और पेयजल आपूर्ति बाधित है. बचाव कार्य के लिए भारतीय नेवी और ज़्यादा बोट और गोताखोरों को भेज रही है यहाँ ट्रेन सेवाएं बाधित हैं और सड़क परिवहन सेवाएं भी अस्त-व्यस्त हैं. जगह-जगह सड़कें पानी में डूब गई हैं. अधिकारियों के अनुसार, कासरगोड़ को छोड़कर बाकी सभी ज़िलों में शैक्षणिक संस्थानों में छुट्टी की घोषणा कर दी गई है. कॉलेजों और महाविद्यालयों ने परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं. कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरी तरह से पानी में डूब गया है और इसे 26 अगस्त तक बंद रखने के आदेश दिये गए हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "केरल सरकार के अनुसार, बाढ़ की वजह से हुए हादसों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 324 हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकेरल के कासरगोड को छोड़कर राज्य के सभी ज़िलों में बाढ़ के कारण 'रेड अलर्ट' जारी किया गया है. मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अगले कुछ दिनों में केरल में मूसलाधार बारिश होने के कारण बाढ़ प्रभावित 13 ज़िलों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है. केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि, \"हमने बचाव कार्य को तेज़ कर दिया है. बहुत सारे लोग सीएम ऑफ़िस को उन जगहों की सूचना दे रहे हैं जहाँ लोग फंसे हुए हैं.\" सरकारी अधिकारियों के अनुसार, केरल में बनाये गए पाँच सौ से ज़्यादा राहत शिविरों में अब तक क़रीब दो लाख से ज़्यादा लोग पहुँच चुके हैं. केरल में बाढ़ की वजह से जो इलाक़े सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं वो पश्चिमी घाट के 'इकोलॉजिकल सेंसिटिव ज़ोन' के अंतर्गत आते हैं. स्थानीय मीडिया के अनुसार, कोच्चि, त्रिवेंद्रम, इडुक्की, पलक्कड और वायनाड ज़िले में हालात सबसे ज़्यादा ख़राब हैं. नेशनल डिज़ास्टर रेस्पॉन्स फ़ोर्स (एनडीआरएफ़) की छह टीमें दिल्ली और छह टीमें अहमदाबाद से केरल भेजी गई हैं. एनडीआरएफ़ की 18 टीमें केरल के 7 ज़िलों में पहले से तैनात हैं. एनडीआरएफ़ के महानिदेशक संजय कुमार ने मीडिया को बताया है, \"हम केरल सरकार के साथ मिलकर बचाव कार्य कर रहे हैं. केरल में अगर और टीमों की ज़रूरत होगी तो हम भेजेंगे. केरल में हालात काफ़ी चुनौतीपूर्ण हैं.\" सभी ज़िला मुख्यालयों पर एक हेलीकॉप्टर भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने ट्वीट किया है, \"ऑपरेशन मदद के तहत केरल के सभी ज़िला मुख्यालयों पर हमने एक हेलीकॉप्टर तैनात करके का फ़ैसला किया है. इस बारे में भारतीय वायु सेना को ज़रूरी निर्देश दे दिये गए हैं. मौसम ने साथ दिया तो आज रात तक ये हेलीकॉप्टर बचाव कार्य के लिए केरल पहुँच जायेंगे.\" उन्होंने बताया कि भारतीय आर्मी ने बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में 18 जगहों पर रास्ते बहाल किये हैं और 11 जगहों पर अस्थायी पुल बनाये हैं ताकि फंसे हुए लोगों तक मेडिकल मदद पहुँच सके. केरल सरकार ने रक्षा मंत्रालय से बचाव कार्य के लिए 600 मोटरबोट भी मांगी हैं. शुक्रवार को केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने ट्वीट किया, \"आप हमें वक़्त और तारीख़ के साथ अपनी सही लोकेशन, ज़िले का नाम और फ़ोन नंबर भेजें. हम उन तक मदद पहुँचाने की कोशिश करेंगे.\" इस बीच गृह-मंत्रालय की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसून सीज़न शुरू होने से लेकर अभी तक देशभर में 930 लोगों की मौत हो चुकी है. कितनी भयानक है केरल में बाढ़ की स्थिति केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन का कहना है कि पिछले 100 सालों में राज्य ने कभी भी इस तरह के बाढ़ का सामना नहीं किया है. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, \"इससे पहले केरल ने कभी भी इस तरह की स्थिति नहीं देखी.\" मानसून में हर साल केरल में देश के कुछ राज्यों की तुलना में ज़्यादा बारिश होती है लेकिन मौसम विभाग का कहना है कि इस बार हुई बारिश औसत से 37 फ़ीसदी ज़्यादा है. चिंता की बात ये है कि आने वाले दिनों में भी तेज़ बारिश का प्रकोप जारी रहने की आशंका है. सोशल मीडिया के ज़रिए मांग रहे हैं लोग मदद इसके बाद काफ़ी सारे लोगों ने अपनी जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की है और सरकार से मदद की गुहार लगाई है. गुरुवार को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने लोगों से बाढ़ राहत कोष में मदद भेजने का आग्रह किया था. उन्होंने ट्विटर पर एक बयान जारी कर लोगों से मदद मांगी थी. केरल में आई इस बाढ़ को 94 साल की 'सबसे बड़ी बाढ़' कहा जा रहा है. राज्य के विभिन्न हिस्सों में बिजली आपूर्ति, संचार प्रणाली और पेयजल आपूर्ति बाधित है. बचाव कार्य के लिए भारतीय नेवी और ज़्यादा बोट और गोताखोरों को भेज रही है यहाँ ट्रेन सेवाएं बाधित हैं और सड़क परिवहन सेवाएं भी अस्त-व्यस्त हैं. जगह-जगह सड़कें पानी में डूब गई हैं. अधिकारियों के अनुसार, कासरगोड़ को छोड़कर बाकी सभी ज़िलों में शैक्षणिक संस्थानों में छुट्टी की घोषणा कर दी गई है. कॉलेजों और महाविद्यालयों ने परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं. कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरी तरह से पानी में डूब गया है और इसे 26 अगस्त तक बंद रखने के आदेश दिये गए हैं. 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इलाक़ों में हिंसक अभियान चलाए हुए हैं. जिन नौ हथियारबंद गुटों को भंग किए जाने पर सहमति हुई है उनमें से अधिकांश का अलावी के अंतरिम मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व है. इन गुटों के लड़ाके जनवरी 2005 में देश में चुनाव होने तक हथियार डाल देंगे. इनमें कुर्द पेशमर्ग गुट और शिया गुट बद्र ब्रिगेड भी शामिल हैं.\n\nSummary:", "target": "इराक़ के अंतरिम प्रधानमंत्री ईयाद अलावी ने कहा है कि सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ सक्रिय रहे कई लड़ाकू गुटों को भंग किए जाने पर सहमति हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्होंने कहा कि कोई एक लाख लड़ाके इस बात के लिए सहमत हो गए हैं कि वे या तो इराक़ी सुरक्षा बलों में शामिल हो जाएँगे या फिर आम नागरिक की ज़िंदगी जीएँगे. हालाँकि चरमपंथी शिया नेता मुक़्तदा सद्र के समर्थक मेहदी आर्मी के लड़ाके इस समझौते में शामिल नहीं होंगे. मेहदी आर्मी के लड़ाके कुफ़ा और नजफ़ जैसे इलाक़ों में अमरीकी अगुआई वाली सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं. वैसे सुन्नी चरमपंथी इसमें शामिल नहीं होंगे जो कि इराक़ के फ़लुजा जैसे इलाक़ों में हिंसक अभियान चलाए हुए हैं. जिन नौ हथियारबंद गुटों को भंग किए जाने पर सहमति हुई है उनमें से अधिकांश का अलावी के अंतरिम मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व है. इन गुटों के लड़ाके जनवरी 2005 में देश में चुनाव होने तक हथियार डाल देंगे. इनमें कुर्द पेशमर्ग गुट और शिया गुट बद्र ब्रिगेड भी शामिल हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 526, "source_item_id": "526", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 858, "clean_index": 469, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:469"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसांस्कृतिक रूप से भारत और उसके पड़ोसी देश अलग होकर भी अलग नहीं दिखते. एक भारतीय, एक पाकिस्तानी, एक श्रीलंकाई और एक नेपाली में अंतर ढूँढ़ना कभी-कभी काफ़ी मुश्किल होता है. खाना एक, संगीत भी समान और फ़िल्मों को लेकर रुचि भी समान. पाकिस्तान में जब भूकंप आया तो सहायता के हाथ सीमापार से भी उठे लेकिन कश्मीर को लेकर भारत-पाकिस्तान का रुख़ कौन नहीं जानता. अपेक्षाकृत छोटे-छोटे देशों से घिरा भारत अपने पड़ोसियों की नज़र में एक शक्ति तो है लेकिन क्या उसका व्यवहार एक दोस्त की तरह है या दादा. पिछले दिनों भारत सप्ताह के मौक़े पर बीबीसी हिंदी और एनडीटीवी ने मिलकर एक बहस छेड़ी. बहस में शामिल हुए पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा, कांग्रेस के नेता और पूर्व विदेश राज्य मंत्री सलमान ख़ुर्शीद, फ़िल्म अभिनेत्री सारिका और भारती ग्रुप के राकेश मित्तल. बहस के दौरान काठमांडू, इस्लामाबाद, कोलंबो और ढाका से लोगों ने अपनी राय भी रखी और सवाल भी पूछे. कार्यक्रम में लोगों को सैटेलाइट लिंक के ज़रिए जोड़ा गया. कार्यक्रम का संचालन किया बीबीसी हिंदी के भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव और एनडीटीवी के अभिज्ञान प्रकाश ने और कार्यक्रम के प्रोड्यूसर थे ब्रजेश उपाध्याय.\n\nSummary:", "target": "अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को उभरती हुई आर्थिक शक्ति और लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रतिष्ठा मिली हुई है. लेकिन पड़ोसी देशों के लोगों से जब बात करें तो कुछ और ही उभर कर सामने आता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसांस्कृतिक रूप से भारत और उसके पड़ोसी देश अलग होकर भी अलग नहीं दिखते. एक भारतीय, एक पाकिस्तानी, एक श्रीलंकाई और एक नेपाली में अंतर ढूँढ़ना कभी-कभी काफ़ी मुश्किल होता है. खाना एक, संगीत भी समान और फ़िल्मों को लेकर रुचि भी समान. पाकिस्तान में जब भूकंप आया तो सहायता के हाथ सीमापार से भी उठे लेकिन कश्मीर को लेकर भारत-पाकिस्तान का रुख़ कौन नहीं जानता. अपेक्षाकृत छोटे-छोटे देशों से घिरा भारत अपने पड़ोसियों की नज़र में एक शक्ति तो है लेकिन क्या उसका व्यवहार एक दोस्त की तरह है या दादा. पिछले दिनों भारत सप्ताह के मौक़े पर बीबीसी हिंदी और एनडीटीवी ने मिलकर एक बहस छेड़ी. बहस में शामिल हुए पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा, कांग्रेस के नेता और पूर्व विदेश राज्य मंत्री सलमान ख़ुर्शीद, फ़िल्म अभिनेत्री सारिका और भारती ग्रुप के राकेश मित्तल. बहस के दौरान काठमांडू, इस्लामाबाद, कोलंबो और ढाका से लोगों ने अपनी राय भी रखी और सवाल भी पूछे. कार्यक्रम में लोगों को सैटेलाइट लिंक के ज़रिए जोड़ा गया. कार्यक्रम का संचालन किया बीबीसी हिंदी के भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव और एनडीटीवी 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पत्रकारों से कहा, \"भारत का इन देशों के साथ व्यापार बहुत ज़्यादा नहीं है. प्रधानमंत्री की यात्रा का उद्देश्य ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना है.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सोमवार को छह देशों की यात्रा पर रवाना होंगे, जिनमें रूस और मध्य एशिया के पांच देश शामिल हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसबसे पहले वो उज़्बेकिस्तान और फिर कजाकिस्तान की यात्रा करेंगे. इन दोनों देशों की यात्रा के बाद प्रधानमंत्री रूस में उफा रवाना होंगे, जहां वे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. वे शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में भी शामिल होंगे. रूस के बाद उन्हें तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जाना है. समाप्त समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक ये पहली बार है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री इन पाँचों केंद्रीय एशियाई देशों की एक साथ यात्रा कर रहा है. विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) नवतेज सरना ने पत्रकारों से कहा, \"भारत का इन देशों के साथ व्यापार बहुत ज़्यादा नहीं है. प्रधानमंत्री की यात्रा का उद्देश्य ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना है.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 529, "source_item_id": "529", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 841, "clean_index": 471, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:471"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपिछले चौबीस घंटों के दौरान प्रशासन ने कुछ आपात क़दम उठाए हैं जिससे संगम तट पर गंगा का जलस्तर थोड़ा बढ़ा है और पानी की गंदगी भी कुछ कम हुई है. अर्धकुंभ की शुरुआत बुधवार सुबह लगभग साढ़े सात बज़े पौष पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त के साथ हुई. हालाँकि हज़ारों की संख्या में कल्पवासी और श्रद्धालु तड़के तीन बजे से ही गंगा तट पर पहुँचने लगे थे. संगम तट पर चिरपरिचित भजन कीर्तन की धुन सुनाई दे रही है. बिजली की चकाचौंध कर देने वाली चमक है. स्थानीय प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए वाहनों को काफ़ी दूर पर ही रोकने की व्यवस्था की है जिससे लोगों को मीलों पैदल चल कर घाट पर आना पड़ रहा है. मेले में यातायात नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगभग 10 हज़ार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है. प्रशासन की कोशिश है कि एक ही समय में तट पर ज़्यादा भीड़ जमा नहीं हो, ताकि व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिल सके. सुचारू रुप से स्नान संपन्न कराने के लिए इस बार 30 घाट बनाए गए हैं. गंगा की धारा भी इस तरह है कि घाटों पर स्नान के लिए पर्याप्त जगह दिख रही है. सावधानी लाउडस्पीकर के ज़रिए मंत्रोच्चार और भजन के साथ साथ लोगों से अपने सामान की सुरक्षा करने को कहा जा रहा है. सुरक्षा इंतज़ामों को बावजूद कुछ लोगों ने सामान चोरी होने की शिकायत की है. प्रशासन ने 60 से 70 लाख लोगों के स्नान की व्यवस्था की है. लेकिन पहले दिन इतने लोगों के आने की संभावना कम है. पौष पूर्णिमा के बाद अब मुख्य स्नान 14 जनवरी (मकर संक्रांति), 19 जनवरी (माघी पूर्णिमा), 23 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टीवी पर देखना और वो भी वहां से धुआं उठता हुआ देखना बहुत ही अजीब अहसास होता है. जब इसराइली रॉकेटों ने गजा के मध्य में उस इमारत को निशाना बनाया जिसमें कई टीवी कंपनियों के दफ्तर हैं, तो मुझे बहुत ही अजीब लगा. ये वही इमारत है जहां से मैंने 2009 के गज़ा युद्ध की बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग की थी. छह स्थानीय पत्रकार घायल हो गए. मेरे एक दोस्त को अपनी टांग गंवानी पड़ी. मैं सोचता हूं कि मैं भी वहां हो सकता था.. मुश्किल जिंदगी गज़ा एक छोटी सी जगह है. लगभग 41 किलोमीटर लंबी और छह से 14 किलोमीटर तक चौड़ी. वहां लगभग 15 लाख लोग रहते हैं. 2005 से पहले गज़ा के 40 प्रतिशत क्षेत्रफल में इसराइली बस्तियां थीं. उनमें सिर्फ 5000-6000 इसराइली रहते थे थे जबकि बाकी आधे हिस्से में पंद्रह लाख फलस्तीनी लोग बसे थे. अब गज़ा तीन तरफ से सील किया हुआ है. इसराइल, और यहां तक कि मिस्र ने भी उसके जमीन, समुद्र और आकाश पर बंदिश लगा रखी है. आप न कहीं जा सकते हैं और न ही कुछ कर सकते हैं. अगर आप भाग्यशाली हैं तो आपके पास नौकरी होगी और नौकरी भी होगी तो मेहनताना बहुत कम होगा. किसी तरह की सुरक्षा नहीं होगी. गज़ा में इसराइली हमलों में बच्चे भी निशाना बन रहे हैं जिस इलाके में बमबारी हुई, वहां बड़ी आबादी रहती है. गज़ा की आधी आबादी बच्चे हैं जो सड़कों पर खेलते रहते हैं. उनके पास खेलने की कोई जगह नहीं है. बस गर्मियों में समुद्र के किनारे जा सकते हैं. वहां भी कोई सुरक्षा नहीं है. वहां गंदा पानी जाता है, सो आप तैर नहीं सकते हैं. अगर मुझे समंदर में डुबकी लगानी है तो इसके लिए दक्षिण में मिस्र की सीमा या फिर उत्तर में इसराइल की सीमा के करीब जाना होगा. लेकिन वहां से इसराइली तटरक्षकों की नौकाएं ज्यादा दूर नहीं रह जाती हैं. वो तट से दूर तक मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर गोलियां चलाती हैं जिनका निशाना लोग भी बनते हैं. बमबारी के साए में जिंदगी गज़ा में एक फलस्तीनी घर का मतलब है कॉन्क्रीट की दीवारें और उन पर लोहे की चादर वाली छत. गर्मियों में ये घर तप जाते हैं और किसी तरह की एयरकंडीशन नहीं होता है और हो भी, तो उसे चलाने के लिए बिजली नहीं होती. सर्दियों में दीवारें जम जाती हैं और गज़ा के घरों में उन्हें गर्म करने वाला कोई हीटिंग सिस्टम नहीं होता. जहां तक बात इलेक्ट्रिक हीटरों की है, उनके लिए फिर बिजली की किल्लत सामने आती है. अब मैं गज़ा को देखता हूं तो मुझे 2009 के ऑपरेशन “कास्ट लीड” की याद आ जाती है. गज़ा में किसी सायरन की जरूरत नहीं होती. कर्फ्यू का एलान भी नहीं होता, बस वो लागू हो जाता है. लोग जानते हैं कि कोई भी चलती फिरती चीज इसराइली लड़ाकू विमानों का निशाना बन जाती है. 2009 के युद्ध से पहले गज़ा में थोड़ी बहुत खेती होती थी और कुछ उद्योग होते थे, जो सब्जियां, स्ट्रॉबैरी, फूल उगाते और फर्नीचर बनाते और उन्हें निर्यात करते थे. लेकिन युद्ध के बाद 95 प्रतिशत निजी उद्योगों को बंद कर दिया गया. आज गज़ा अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इसराइल पर निर्भर है. वो भी सिर्फ इकलौती खुली चौकी किर्म शालोम से होती है. बाकी आपूर्ति मिस्र से सुरंगों के जरिए होती है. गुस्सा और नफरत घेराबंदी, रोक, हमले, गोलाबारी और जेल जैसे हालात में रहने की भावना से लोगों में गुस्सा और नफरत बढ़ती है और इससे कट्टरपंथ हो हवा मिलती है. इसी से युवा पीढ़ी की सोच को आकार मिलता है. मैं नहीं समझता कि ये पीढ़ी राजनीतिक बनेगी- गज़ा के सभी लोग अब राजनीतिक नहीं है और उनमें से बहुत से लोग न तो हमास का समर्थन करते हैं और न फतह का, भले वे ऐसा खुल कर नहीं कह पाते हों. लेकिन मैं जिन युवाओं को जानता हूं वो अपने आसपास खून को छीटों को देख देख कर बड़े हुए हैं. वे नहीं जानते हैं कि सामान्य जिंदगी क्या होती है- ये हाल आधी आबादी का है. मेरे शहर का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखता है.\n\nSummary:", "target": "जैसे ही आप गज़ा को छोड़ते हैं और सीमा की दूसरी तरफ आ जाते हैं तो अचानक आपको महसूस होता है कि जैसे रिहा हुए हों, जेल से बाहर आ गए हों.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसराइली बमबारी से गज़ा में भारी तबाही हुई है जब भी मैं गज़ा छोड़ता हूं तो मुझे ऐसा ही लगता है. मेरे शहर में इसराइल की बमबामी शुरु होने से तीन हफ्ते पहले मुझे एक कोर्स के लिए लंदन जाना पड़ा. मैं अपने परिवार और दोस्तों को वहां छोड़ कर आया हूं. जिस जगह को आप जानते हैं उसे टीवी पर देखना और वो भी वहां से धुआं उठता हुआ देखना बहुत ही अजीब अहसास होता है. जब इसराइली रॉकेटों ने गजा के मध्य में उस इमारत को निशाना बनाया जिसमें कई टीवी कंपनियों के दफ्तर हैं, तो मुझे बहुत ही अजीब लगा. ये वही इमारत है जहां से मैंने 2009 के गज़ा युद्ध की बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग की थी. छह स्थानीय पत्रकार घायल हो गए. मेरे एक दोस्त को अपनी टांग गंवानी पड़ी. मैं सोचता हूं कि मैं भी वहां हो सकता था.. मुश्किल जिंदगी गज़ा एक छोटी सी जगह है. लगभग 41 किलोमीटर लंबी और छह से 14 किलोमीटर तक चौड़ी. वहां लगभग 15 लाख लोग रहते हैं. 2005 से पहले गज़ा के 40 प्रतिशत क्षेत्रफल में इसराइली बस्तियां थीं. उनमें सिर्फ 5000-6000 इसराइली रहते थे थे जबकि बाकी आधे हिस्से में पंद्रह लाख फलस्तीनी लोग बसे थे. अब गज़ा तीन तरफ से सील किया हुआ है. इसराइल, और यहां तक कि मिस्र ने भी उसके जमीन, समुद्र और आकाश पर बंदिश लगा रखी है. आप न कहीं जा सकते हैं और न ही कुछ कर सकते हैं. अगर आप भाग्यशाली हैं तो आपके पास नौकरी होगी और नौकरी भी होगी तो मेहनताना बहुत कम होगा. किसी तरह की सुरक्षा नहीं होगी. गज़ा में इसराइली हमलों में बच्चे भी निशाना बन रहे हैं जिस इलाके में बमबारी हुई, वहां बड़ी आबादी रहती है. गज़ा की आधी आबादी बच्चे हैं जो सड़कों पर खेलते रहते हैं. उनके पास खेलने की कोई जगह नहीं है. बस गर्मियों में समुद्र के किनारे जा सकते हैं. वहां भी कोई सुरक्षा नहीं है. वहां गंदा पानी जाता है, सो आप तैर नहीं सकते 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और जो विद्रोही राजधानी पर धावा बोल रहे हैं उससे किस तरह का ख़तरा पैदा हो सकता है? लगभग एक करोड़ की आबादी वाले उत्तरी अफ्रीकी देश चाड के ज़्यादातर लोग अपनी जीविका कृषि से ही चलाते हैं जबकि इस देश में ऊपजाऊ ज़मीन कम और रेगिस्तान अधिक है. हालाँकि चाड के पास खनिज भंडार की कमी नहीं है, यहाँ सोना तो है ही यूरेनियम भी है लेकिन बुनियादी सुविधाओं का काफ़ी अभाव है. संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक़ चाड दुनिया के पाँच सबसे पिछड़े देशों में से एक है. यहाँ फ्रांसीसी और अरबी भाषा मुख्य रूप से बोली जाती है, इस देश में मुसलमान और ईसाई धर्म के मानने वाले लोग रहते हैं, ज़्यादातर लोग अलग-अलग कबीलों में बँटे हैं. चाड में मौजूदा राष्ट्रपति ने बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना 2001 में की थी और मई में देश में लोकतांत्रिक चुनाव होने हैं और अगर विद्रोह बेक़ाबू हुआ या विद्रोही राष्ट्रपति को हटाने में सफल रहे लोकतंत्र ख़तरे में पड़ सकता है. वैसे भी 1996 में तख़्तापलट करके राष्ट्रपति इदरीस सत्ता में आए थे और देश में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी नहीं हैं, देश कई क़बीलों में बँटा है और गृह युद्ध भड़कने की आशंका से कोई इनकार नहीं कर सकता. ऐसे में दुनिया के एक निर्धन देश की ग़रीब जनता के लिए संकट और बढ़ जाएगा. चाड ने कुछ ही वर्षों पहले पेट्रोलियम का निर्यात करना शुरू किया है, लोग इस विद्रोह को तेल की संपदा से भी जोड़कर देख रहे हैं. सूडान, लीबिया और नाइजीरिया से घिरे इस देश में समृद्धि की आशा जागी है क्योंकि यहाँ पेट्रोलियम निकालने का काम शुरू हो गया है और चाड अब पेट्रोलियम के निर्यातकों देशों की जमात में शामिल हो गया है. चाड में जारी उथलपुथल की जड़ें इस नई उपलब्धि में भी हैं, विद्रोहियों और पड़ोसी देशों की नज़र चाड की इस प्राकृतिक संपदा पर न हो, ऐसा नहीं हो सकता. चाड में अंदरूनी राजनीति में भी तेल की भारी भूमिका है. पहले सरकार ने एक क़ानून बनाकर वादा किया था कि तेल के निर्यात से होने वाली आय का उपयोग निर्धनता दूर करने के लिए किया जाएगा लेकिन हाल ही में राष्ट्रपति इदरीस डेबी ने इस क़ानून को पलट दिया है जिससे विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन नाराज़ हैं. विद्रोहियों को भी लग रहा है कि तेल की संपदा पर राष्ट्रपति अपना पूरा नियंत्रण जमा रहे हैं इसलिए उन्हें रोकना ज़रूरी है.\n\nSummary:", "target": "मध्य अफ्रीकी देश चाड में विद्रोही हिंसा का सीधा संबंध पड़ोसी देश सूडान में चल रही दारफुर की समस्या है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nज़्यादातर अफ्रीकी देशों की तरह सूडान और चाड में ऐसे क़बीले हैं जो दो देशों के बीच में बँटे हुए हैं. जब दारफ़ुर में लोगों ने सूडान की केंद्रीय सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह किया तो उस विद्रोह को बलपूर्वक कुचलने की कोशिश की गई, ऐसे में विद्रोहियों ने पड़ोसी देश चाड के अपने भाई-बंधुओं से मदद ली. इसके अलावा दारफ़ुर के लगभग दो लाख लोग चाड में शरणार्थी बनकर पहुँच गए. चाड के राष्ट्रपति इदरीस डेबी का आरोप है कि सूडानी सरकार अपनी दुश्मनी निकाल रही है और उन्हें सत्ता से हटाने की माँग करने वाले विद्रोहियों को भड़का रही है. वैसे उनका यह आरोप सही भी हो सकता है क्योंकि चाड के विद्रोही सूडान की ही तरफ़ से चलकर चाड की राजधानी तक पहुँचे हैं. चाड आख़िर कैसा देश है और जो विद्रोही राजधानी पर धावा बोल रहे हैं उससे किस तरह का ख़तरा पैदा हो सकता है? लगभग एक करोड़ की आबादी वाले उत्तरी अफ्रीकी देश चाड के ज़्यादातर लोग अपनी जीविका कृषि से ही चलाते 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कन्हैया कुमार को देशद्रोही कहना गलत था. इसके पहले पार्टी ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले पर सवाल उठाए थे. संसद में भले ही इस मुद्दे पर शिवसेना एनडीए के साथ हो लेकिन बाहर वो बीजेपी के रुख का खुलकर विरोध कर रही है. शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा, \"शिवसेना ने कभी लुकाछिपी नहीं की है. उत्तराखंड को लेकर हमने अपना नजरिया रखा है कि बहुमत साबित करने की जगह विधानसभा या संसद है. जो भी कीजिए विधानसभा के अंदर कीजिए.\" शिवसेना केंद्र सरकार की पाकिस्तान नीति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा और भारतीय जनता पार्टी के पीडीपी के साथ गठबंधन की भी तीखी आलोचना करती रही है. पार्टी सूखे की स्थिति को लेकर भी केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की आलोचना करती रही है. भारतीय जनता पार्टी को शिवसेना के ये तेवर रास नहीं आ रहे. बीजेपी के नेता इसे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों से उपजी हताशा बताते हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा कहते हैं, \"शिवसेना हमारा वरिष्ठ सहयोगी था, उन्हें अपने बारे में ग़लतफहमियां भी थीं. चुनाव के बाद हम बड़ी पार्टी हैं और वे छोटी पार्टी. लगता है कि वे इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते हैं, उसकी टीस रहती है.\" उधर, बीजेपी-शिवसेना की तकरार ने कांग्रेस को दोनों पार्टियों पर निशाना साधने का मौका दे दिया है. कांग्रेस का कहना है कि दोनों ही पार्टियां कई मोर्चों पर नाकाम हो चुकी हैं और नाकामी की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने की कोशिश में दिखती हैं. कांग्रेस नेता संजय निरुपम कहते हैं, \"ऐसा नहीं है कि शिवसेना बीजेपी पर हमले कर रही है बल्कि बीजेपी भी उतनी ही बुरी तरह से शिवसेना पर हमला करती रही है. दोनों अपनी अपनी सरकार की नाकामियों से जान बचाने के लिए सहयोगी पार्टी की आलोचना करती है, जो अनुचित है.\" वहीं, शिवसेना का कहना है कि वो सरकार में सहयोगी जरुर है लेकिन केंद्र में सरकार नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र में बीजेपी की है, शिवसेना की नहीं. पार्टी नेता राउत का दावा है कि शिवसेना सत्ता छोड़ सकती है लेकिन जनता से जुड़े मुद्दे उठाना बंद नहीं कर सकती. संजय राउत कहते हैं, \"सत्ता में हैं इसका मतलब ये नहीं है कि हम जन भावनाओं से मुंह मोड़ ले. सत्ता छोड़ सकते हैं, जनभावनाओं को नहीं.\" वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स दोनों पार्टियों के संबंधों को लेकर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी से शिवसेना सिर्फ नाराज़ नहीं बल्कि बहुत नाराज़ है. खड़स कहते हैं,\"शिवसेना को अच्छे मंत्रालय नहीं दिए गए हैं. स्थानीय निकाय की सत्ता को लेकर भी दोनों पार्टियों में संघर्ष है. सिर्फ सत्ता के लिए दोनों पार्टियां साथ हैं.\" शिवसेना जानती है कि उसे सरकार से अलग होने में फायदा नहीं मिलेगा लेकिन पार्टी नेताओं के तेवरों से इतना साफ है कि फिलहाल वो अपने रुख में बदलाव नहीं करने जा रही. ऐसे में बीजेपी और उसके रिश्तों को लेकर सवाल उठते ही रहेंगे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने देश के न्यायाधीश रो पड़े, इसे सफलता मानें या असफलता ? महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन के बारे में चुनाव से पहले दिए गए वचनों का क्या हुआ?'", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकेंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से ये सवाल किसी विरोधी दल नहीं बल्कि केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार में शामिल शिवसेना ने पूछे हैं. शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में केंद्र सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा, \"देश के सूखाग्रस्त इलाकों में सरकारी योजनाएं दो साल में नहीं पहुंच सकीं, इसे पिछली सरकार की नाकामी बताने से काम नहीं चलेगा.\" सामना में ये भी कहा गया है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता ये बयान दे रहे हैं- \"प्रधानमंत्री मोदी ईश्वर के अवतार हैं. नेताओं और ईश्वर को उनके भक्त ही मुसीबत में डालते हैं.\" सत्ता में रहते हुए विपक्षी दल जैसे तेवर शिवसेना ने पहली बार नहीं दिखाए हैं. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और पार्टी के दूसरे नेता केंद्र और महाराष्ट्र सरकार पर लगातार निशाना साधते रहे हैं. समाप्त कुछ दिन पहले ही शिवसेना प्रमुख ने कहा था कि जेएनयू छात्र संघ कन्हैया कुमार को देशद्रोही कहना गलत था. इसके पहले पार्टी ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले पर सवाल उठाए थे. संसद में भले ही इस मुद्दे पर शिवसेना एनडीए के साथ हो लेकिन बाहर वो बीजेपी के रुख का खुलकर विरोध कर रही है. शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा, \"शिवसेना ने कभी लुकाछिपी नहीं की है. उत्तराखंड को लेकर हमने अपना नजरिया रखा है कि बहुमत साबित करने की जगह विधानसभा या संसद है. जो भी कीजिए विधानसभा के अंदर कीजिए.\" शिवसेना केंद्र सरकार की पाकिस्तान नीति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा और भारतीय जनता पार्टी के पीडीपी के साथ गठबंधन की भी तीखी आलोचना करती रही है. पार्टी सूखे की स्थिति को लेकर भी केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की आलोचना करती रही है. भारतीय जनता पार्टी को शिवसेना के ये तेवर रास नहीं आ रहे. बीजेपी के नेता इसे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों से उपजी हताशा बताते हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा कहते हैं, \"शिवसेना हमारा वरिष्ठ सहयोगी था, उन्हें अपने बारे में ग़लतफहमियां भी थीं. चुनाव के बाद हम बड़ी पार्टी हैं और वे छोटी पार्टी. लगता है कि वे इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते हैं, उसकी टीस रहती है.\" उधर, बीजेपी-शिवसेना की तकरार ने कांग्रेस को दोनों पार्टियों पर निशाना साधने का मौका दे दिया है. कांग्रेस का कहना है कि दोनों ही पार्टियां कई मोर्चों पर नाकाम हो चुकी हैं और नाकामी की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने की कोशिश में दिखती हैं. कांग्रेस नेता संजय निरुपम कहते हैं, \"ऐसा नहीं है कि शिवसेना बीजेपी पर हमले कर रही है बल्कि बीजेपी भी उतनी ही बुरी तरह से शिवसेना पर हमला करती रही है. दोनों अपनी अपनी सरकार की नाकामियों से जान बचाने के लिए सहयोगी पार्टी की आलोचना करती है, जो अनुचित है.\" वहीं, शिवसेना का कहना है कि वो सरकार में सहयोगी जरुर है लेकिन केंद्र में सरकार नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र में बीजेपी की है, शिवसेना की नहीं. पार्टी नेता राउत का दावा है कि शिवसेना सत्ता छोड़ सकती है लेकिन जनता से जुड़े मुद्दे उठाना बंद नहीं कर सकती. संजय राउत कहते हैं, \"सत्ता में हैं इसका मतलब ये नहीं है कि हम जन भावनाओं से मुंह मोड़ ले. सत्ता छोड़ सकते हैं, जनभावनाओं को नहीं.\" वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स दोनों पार्टियों के संबंधों को लेकर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी से शिवसेना सिर्फ नाराज़ नहीं बल्कि बहुत नाराज़ है. खड़स कहते हैं,\"शिवसेना को अच्छे मंत्रालय नहीं दिए गए हैं. स्थानीय निकाय की सत्ता को लेकर भी दोनों पार्टियों में संघर्ष है. सिर्फ सत्ता के लिए दोनों पार्टियां साथ हैं.\" शिवसेना जानती है कि उसे सरकार से अलग होने में फायदा नहीं मिलेगा लेकिन पार्टी नेताओं के तेवरों से इतना साफ है कि फिलहाल वो अपने रुख में बदलाव नहीं करने जा रही. ऐसे में बीजेपी और उसके रिश्तों को लेकर सवाल उठते ही रहेंगे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 533, "source_item_id": "533", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3212, "clean_index": 475, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:475"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस मुठभेड़ में 10 से अधिक जवान घायल भी हुए हैं. पुलिस ने मृतकों की संख्या बढ़ने से इनकार नहीं किया है. घात लगाकर हमला अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (नक्सल ऑपरेशन) आरके विज के अनुसार पिछले कुछ दिनों से पुलिस सुकमा ज़िले के अलग-अलग इलाकों में ऑपरेशन चला रही है. उन्होंने बताया कि शनिवार को एसटीएफ़ के जवानों का दल ऑपरेशन के बाद लौट रहा था. तभी दोरनापाल के पीडमेल के पास घात लगाए माओवादियों ने पुलिस दल पर हमला कर दिया. इस घटना के बाद ज़िला मुख्यालय से बड़ी संख्या में पुलिस बलों को मुठभेड़ वाले इलाक़े के लिए रवाना किया गया है. समाप्त इधर, घायलों को कांकेर के लंका इलाके तक लाया गया है, जिन्हें रायपुर भेजने की तैयारी की जा रही है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "छत्तीसगढ़ के बस्तर में माओवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में एक प्लाटून कमांडर समेत पुलिस के सात जवान मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस मुठभेड़ में 10 से अधिक जवान घायल भी हुए हैं. पुलिस ने मृतकों की संख्या बढ़ने से इनकार नहीं किया है. घात लगाकर हमला अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (नक्सल ऑपरेशन) आरके विज के अनुसार पिछले कुछ दिनों से पुलिस सुकमा ज़िले के अलग-अलग इलाकों में ऑपरेशन चला रही है. उन्होंने बताया कि शनिवार को एसटीएफ़ के जवानों का दल ऑपरेशन के बाद लौट रहा था. तभी दोरनापाल के पीडमेल के पास घात लगाए माओवादियों ने पुलिस दल पर हमला कर दिया. इस घटना के बाद ज़िला मुख्यालय से बड़ी संख्या में पुलिस बलों को मुठभेड़ वाले इलाक़े के लिए रवाना किया गया है. समाप्त इधर, घायलों को कांकेर के लंका इलाके तक लाया गया है, जिन्हें रायपुर भेजने की तैयारी की जा रही है. 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ने निवेश करने की दिलचस्पी दिखाई है. साथ ही उन्होंने कहा कि जिन कंपनियों को बचाया जा सकता है उन्हें निजी कम्पनियों को बेचने की कोशिश की जाएगी. हालाँकि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ये भी कहा कि निजी हाथों में दी गई इन कंपनियों में सरकार अपना कुछ हिस्सा रखेगी. राज्य बिजली बोर्ड, कोलकाता ट्राम कम्पनी और राज्य पर्यटन निगम का पूरी तरह पुनर्गठन किया जाएगा ताकि वो मुनाफ़ा कमाने लायक बन सकें. इस संरचनात्मक और विनिवेश कार्यक्रम के लिए केन्द्र सरकार ने कोई दो अरब डॉलर का अनुदान दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि केन्द्र सरकार पर सहयोगी वामपंथी दलों की तरफ़ से ये दबाव रहता है कि वह सुधारों को धीरे धीरे लागू करे. अब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने स्वयं विनिवेश करने का फ़ैसला किया है जिससे केन्द्र को अपनी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाने का बहाना मिल जाएगा. जानकारों का कहना है कि वामदल जिन सुधारों को राज्य में लागू कर रहे हैं उनका केन्द्रीय स्तर की राजनीति में विरोध करना उनके लिए कठिन होगा.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": 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खुनाम नांगनोन नेशनल पार्क के कर्मियों ने देखा कि 12 साइकिलें गुफा के प्रवेश द्वार पर खड़ी हैं. इसी के बाद इन्हें खोजने का अभियान शुरू हुआ. इन बच्चों में से एक लड़के के माता-पिता ने नेशनल पार्क के कर्मियों को बताया कि उनका बेटे से संपर्क नहीं हो पा रहा है. शनिवार रात को आधिकारिक रूप से माएसई पुलिस ने इन बच्चों के ग़ायब होने की बात कही और 24 जून, रविवार को दोपहर में एक बजे के आसपास शुरुआती खोज अभियान शुरू हुआ. हालांकि कुछ स्थानीय रिपोर्टरों का कहना है कि गुफा में ये फ़ुटबॉल प्रैक्टिस के बाद एक सरप्राइज पार्टी में गए थे. इसी टीम के एक खिलाड़ी का नाम गेम है. 23 जून को वो गुफा में नहीं गया था. थाईलैंड गुफा: अब तक क्या-क्या हुआ? उसने कासोद अख़बार से कहा कि टीम इससे पहले भी तीन बार उस गुफा में जा चुकी है, लेकिन ऐसा बारिश के मौसम में कभी नहीं हुआ. उसने उस अख़बार से कहा, ''हमलोग गुफा में जाने से पहले तैयारी करते थे. हमलोग के पास टॉर्च होते थे. हमलोग इस बात को सुनिश्चित करते थे कि सभी वहां जाने के लिए फिट तो हैं.'' थाईलैंड: आख़िर चार बच्चों को गुफा से कैसे निकाला गया गेम ने कहा कि वो उस दिन टीम का हिस्सा इसलिए नहीं बन पाया, क्योंकि तबीयत ठीक नहीं थी. गेम ने कहा, ''हमलोग ट्रेनिंग के लिए गुफा में जाते थे या फिर किसी टीम सदस्य के बर्थडे के मौक़े पर. ये किसी बर्थडे प्लान का हिस्सा लग रहा है.'' इसी हफ़्ते गुफा से एक चिट्ठी आई थी. फ़ुटबॉल कोच एकापोल ने अपनी दादी को निराश नहीं होने के लिए आश्वस्त किया था. इसके साथ ही उन्होंने बच्चों के माता-पिता से माफ़ी भी मांगी थी. आख़िर गुफा में लोग फँसे कैसे? गुफा में टीम के पहुंचने के बाद से ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी. जंगल के बाढ़ के पानी से गुफा का प्रवेश द्वार बंद हो गया. इसके बाद कोच के साथ सारे बच्चे गुफा में लगातार फँसते गए. थाईलैंड: बच्चों ने लिखा 'चिंता मत करिए, हम बहादुर हैं' थाईलैंड: बच्चों को बचाने में लगे गोताखोर की मौत थाईलैंड की गुफ़ा: इतने दिनों बाद कैसे जीवित हैं लोग! थाईलैंड: अगर चार महीने तक बच्चे गुफा से ना निकले तो.. गुफा का जल स्तर लगातार बढ़ता गया. टैम लोंग गुफा 10,316 लंबी है और यह थाईलैंड की चौथी सबसे बड़ी गुफा है. बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ब्रिटिश केव रेस्क्यू काउंसिल के बिल वाइटहाउस ने कहा कि गोताखोरों ने आंशिक रूप से बाढ़ग्रस्त और संकरे गलियारे में 15,00 मीटर जाकर पता लगाया था. सात जुलाई को डेलीन्यूज़ वेबसाइट की रिपोर्ट में कहा गया है कि एक खोज अभियान बच्चों को ऊपर से निकालने पर काम कर रहा है. बीबीसी थाई की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य कोच का कहना है कि ये लड़के थाईलैंड की पेशेवर फ़ुटबॉल टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं. वो बच्चे जो गुफा में फँसे हैं- गुफ़ा को लेकर मिथ थाईलैंड में गुफा को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं. एक लोकप्रिय मान्यता उसके नाम को लेकर है. इस गुफा का 'नाम टैम लोंग- खुन नम नांग नोन' है. इसका मतलब हुआ पर्वत पर सो रही एक महिला की गुफा जो एक नदी का उद्गम स्थल है. कहानी यह है कि चियांग रूंग शहर की एक राजकुमारी एक घुड़सवार से गर्भवती हो गई थीं. दोनों अपनी ज़िंदगी को लेकर डरे हुए थे, इसलिए दक्षिणी हिस्से में चले गए. दोनों जब वो पर्वतीय इलाक़े में पहुंचे तो पति ने राजकुमारी से कहा कि वो कुछ खाने के लिए लाने जा रहा और तब तक वो आराम कर लें. हालांकि इसी दौरान राजकुमारी के पिता ने उसके पति की हत्या दी. राजकुमारी ने अपने पति का कई दिनों तक इंतजार किया. जब उन्हें लगा कि अब वो नहीं आएगा तो राजकुमारी ने बालों में लगाने की पिन से ख़ुदकुशी कर ली. राजकुमारी का ख़ून पहाड़ से नीचे गिरा और उसी से एक नदी निकली. इस गुफा में लोग मरे भी हैं और ज़िंदा भी वापस आए स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार 1986 में एक विदेशी पर्यटक सात दिनों के लिए फँस गया था. हालांकि तब आसानी से निकाल लिया गया था, लेकिन तब बाढ़ जैसी स्थिति नहीं थी. अगस्त 2016 में चीनी भाषा के पूर्व टीचर तीन महीने के लिए इस गुफा में ग़ायब हो गए थे. तब उन्होंने अपनी साइकिल नेशनल पार्क के सामने पार्क की थी और कहा था कि वो गुफा में तपस्या करने जा रहे हैं. उनके लिए खोज अभियान भी शुरू किया गया, लेकिन वो नहीं मिले थे. हालांकि तीन महीने बाद पास के ही रिसॉर्ट में वो टहलते मिले थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "थाईलैंड की एक गुफा में फँसे 12 बच्चों में से रविवार को चार बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया गया है. बाक़ी बच्चों और उनके फ़ुटबॉल कोच को निकालने को कोशिश जारी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक सवाल सबके मन में उठा है कि शनिवार, 23 जून को फ़ुटबॉल कोच और ये 12 बच्चे उस मौत की गुफा में गए क्यों थे? बीबीसी थाई रिपोर्ट के अनुसार 23 जून को स्थानीय समय दिन में 10 बजे यह टीम फ़ुटबॉल की प्रैक्टिस के लिए पहुंची थी. 10:42 बजे कोच ने फ़ुटबॉल प्रैक्टिस का फ़ेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया. शाम में क़रीब तीन बजे टैम-लोंग- खुनाम नांगनोन नेशनल पार्क के कर्मियों ने देखा कि 12 साइकिलें गुफा के प्रवेश द्वार पर खड़ी हैं. इसी के बाद इन्हें खोजने का अभियान शुरू हुआ. इन बच्चों में से एक लड़के के माता-पिता ने नेशनल पार्क के कर्मियों को बताया कि उनका बेटे से संपर्क नहीं हो पा रहा है. शनिवार रात को आधिकारिक रूप से माएसई पुलिस ने इन बच्चों के ग़ायब होने की बात कही और 24 जून, रविवार को दोपहर में एक बजे के आसपास शुरुआती खोज अभियान शुरू हुआ. हालांकि कुछ स्थानीय रिपोर्टरों का कहना है कि गुफा में ये फ़ुटबॉल प्रैक्टिस के बाद एक सरप्राइज पार्टी में गए थे. इसी टीम के एक खिलाड़ी का नाम गेम है. 23 जून को वो गुफा में नहीं गया था. थाईलैंड गुफा: अब तक क्या-क्या हुआ? उसने कासोद अख़बार से कहा कि टीम इससे पहले भी तीन बार उस गुफा में जा चुकी है, लेकिन ऐसा बारिश के मौसम में कभी नहीं हुआ. उसने उस अख़बार से कहा, ''हमलोग गुफा में जाने से पहले तैयारी करते थे. हमलोग के पास टॉर्च होते थे. हमलोग इस बात को सुनिश्चित करते थे कि सभी वहां जाने के लिए फिट तो हैं.'' थाईलैंड: आख़िर चार बच्चों को गुफा से कैसे निकाला गया गेम ने कहा कि वो उस दिन टीम का हिस्सा इसलिए नहीं बन पाया, क्योंकि तबीयत ठीक नहीं थी. गेम ने कहा, ''हमलोग ट्रेनिंग के लिए गुफा में जाते थे या फिर किसी टीम सदस्य के बर्थडे के मौक़े पर. ये किसी बर्थडे प्लान का हिस्सा लग रहा है.'' इसी हफ़्ते गुफा से एक चिट्ठी आई थी. फ़ुटबॉल कोच एकापोल ने अपनी दादी को निराश नहीं होने के लिए आश्वस्त किया था. इसके साथ ही उन्होंने बच्चों के माता-पिता से माफ़ी भी मांगी थी. आख़िर गुफा में लोग फँसे कैसे? गुफा में टीम के पहुंचने के बाद से ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी. जंगल के बाढ़ के पानी से गुफा का प्रवेश द्वार बंद हो गया. इसके बाद कोच के साथ सारे बच्चे गुफा में लगातार फँसते गए. थाईलैंड: बच्चों ने लिखा 'चिंता मत करिए, हम बहादुर हैं' थाईलैंड: बच्चों को बचाने में लगे गोताखोर की मौत थाईलैंड की गुफ़ा: इतने दिनों बाद कैसे जीवित हैं लोग! थाईलैंड: अगर चार महीने तक बच्चे गुफा से ना निकले तो.. गुफा का जल स्तर लगातार बढ़ता गया. टैम लोंग गुफा 10,316 लंबी है और यह थाईलैंड की चौथी सबसे बड़ी गुफा है. बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ब्रिटिश केव रेस्क्यू काउंसिल के बिल वाइटहाउस ने कहा कि गोताखोरों ने आंशिक रूप से बाढ़ग्रस्त और संकरे गलियारे में 15,00 मीटर जाकर पता लगाया था. सात जुलाई को डेलीन्यूज़ वेबसाइट की रिपोर्ट में कहा गया है कि एक खोज अभियान बच्चों को ऊपर से निकालने पर काम कर रहा है. बीबीसी थाई की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य कोच का कहना है कि ये लड़के थाईलैंड की पेशेवर फ़ुटबॉल टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं. वो बच्चे जो गुफा में फँसे हैं- गुफ़ा को लेकर मिथ थाईलैंड में गुफा को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं. एक लोकप्रिय मान्यता उसके नाम को लेकर है. इस गुफा का 'नाम टैम लोंग- खुन नम नांग नोन' है. इसका मतलब हुआ पर्वत पर सो रही एक महिला की गुफा जो एक नदी का उद्गम स्थल है. कहानी यह है कि चियांग रूंग शहर की एक राजकुमारी एक घुड़सवार से गर्भवती हो गई थीं. दोनों अपनी ज़िंदगी को लेकर डरे हुए थे, इसलिए दक्षिणी हिस्से में चले गए. दोनों जब वो पर्वतीय इलाक़े में पहुंचे तो पति ने राजकुमारी से कहा कि वो कुछ खाने के लिए लाने जा रहा और तब तक वो आराम कर लें. हालांकि इसी दौरान राजकुमारी के पिता ने उसके पति की हत्या दी. राजकुमारी ने अपने पति का कई दिनों तक इंतजार किया. जब उन्हें लगा कि अब वो नहीं आएगा तो राजकुमारी ने बालों में लगाने की पिन से ख़ुदकुशी कर ली. राजकुमारी का ख़ून पहाड़ से नीचे गिरा और उसी से एक नदी निकली. इस गुफा में लोग मरे भी हैं और ज़िंदा भी वापस आए स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार 1986 में एक विदेशी पर्यटक सात दिनों के लिए फँस गया था. हालांकि तब आसानी से निकाल लिया गया था, लेकिन तब बाढ़ जैसी स्थिति नहीं थी. अगस्त 2016 में चीनी भाषा के पूर्व टीचर तीन महीने के लिए इस गुफा में ग़ायब हो गए थे. तब उन्होंने अपनी साइकिल नेशनल पार्क के सामने पार्क की थी और कहा था कि वो गुफा में तपस्या करने जा रहे हैं. उनके लिए खोज अभियान भी शुरू किया गया, लेकिन वो नहीं मिले थे. हालांकि तीन महीने बाद पास के ही रिसॉर्ट में वो टहलते मिले थे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "शिकागो के एक पुलिस अधिकारी ने शहर के पश्चिम में एक घरेलू झगड़े की कॉल पर दो लोगों को गोली मार दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशिकागो पुलिस(फ़ाइल फोटो) मारे गए लोगों में क्विंतोनियो लेग्रियर नाम का एक 19 वर्षीय लड़का और बेटी जोन्स नाम की एक पचास वर्षीय महिला हैं. दोनों ही काले समुदाय से हैं. मृतकों के परिवारों ने पुलिस पर इल्ज़ाम लगाया है कि उसने कुछ ज़्यादा ही प्रतिक्रिया की और अत्यधिक बल का प्रयोग किया. पुलिस के एक प्रवक्ता ने बताया कि पुलिस अधिकारी ने गोली इसलिए चलाई क्योंकि घरेलू झगड़े को सुलटाने गए अधिकारियों का सामना एक हिंसक शख़्स से हुआ था. लेकिन मृतक युवा की मां ने कहा कि जब क्विंतोनियो को गोली मारी गई तो उसके पास कोई बंदूक़ थी ही नहीं, उसके हाथ में सिर्फ़ एक बैट था. समाप्त मृतक महिला की बेटी के मुताबिक़, महिला ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, उस पर पुलिस ने गोली चला दी. 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विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना और कुछ अन्य सामाजिक संगठनों ने इस मामले पर अमरनाथ संघर्ष समिति का गठन किया है. समिति के अनुसार उनका बंद रविवार तक जारी रहेगा. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी के महासचिव अरुण जेटली शनिवार को जम्मू पहुँच रहे हैं. दोनों नेता वहाँ इस मामले पर हालात की समीक्षा करेंगे. अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन आवंटन का फ़ैसला वापसे लेने के बाद इसके विरोध में पूरे जम्मू इलाक़े में हिंसक प्रदर्शन हुए थे. जिसके बाद प्रशासन ने पूरे जम्मू शहर में मंगलवार को और भद्रवाह कस्बे में बुधवार को कर्फ़्यू लगा दिया था. बंद पर राजनीति विश्व हिंदू परिषद ने ज़मीन दिए जाने के फ़ैसले को वापस लेने के जम्मू कश्मीर राज्य सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ गुरुवार को देशव्यापी बंद का आयोजन किया था. बंद के दौरान पूरे उत्तर भारत में जन-जीवन अस्तव्यस्त हो गया था. इस दौरान हुई हिंसा में पाँच लोगों की मौत हो गई था. मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में बंद समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़पों के बाद उसके कुछ थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया था.\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित राज्य जम्मू कश्मीर में अमरनाथ बोर्ड को आवंटित ज़मीन का फ़ैसला रद्द करने का हिंसक विरोध होने के कारण जम्मू और भद्रवाह में लगाए गए कर्फ़्यू में शुक्रवार को कोई ढील नहीं दी गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बीच कठुआ, बंथल, गंग्याल और कुछ क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन की कुछ घटनाएँ हुईं. जिन्हें पुलिस ने हल्के बल प्रयोग के बाद बंद करा दिया. इसके अलावा पूरे जम्मू क्षेत्र में शांति बनी रही. प्रशासन ने जम्मू के कर्फ़्यूग्रस्त इलाक़ों में शुक्रवार दोपहर दूध और सब्ज़ी जैसी आवश्यक वस्तुओं का वितरण करवाया. फैल रही है शांति डिवीज़नल कमिश्नर सुधांशु पांडे ने बीबीसी को बताया कि कर्फ़्यूग्रस्त इलाक़ों में शुक्रवार को कोई छूट नहीं दी गई और पूरे क्षेत्र में शांति बनी रही. विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना और कुछ अन्य सामाजिक संगठनों ने इस मामले पर अमरनाथ संघर्ष समिति का गठन किया है. समिति के अनुसार उनका बंद रविवार तक जारी रहेगा. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी के महासचिव अरुण जेटली शनिवार को जम्मू पहुँच रहे 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लश्कर-ए-तैबा ज़िम्मेदार है. भारत ने पाकिस्तान को इस संगठन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा था. पाकिस्तान मुंबई हमलों में अपनी किसी भूमिका से इनकार करता रहा है लेकिन उसने मुंबई हमलों की जाँच में सहयोग का वादा भी किया है. मुंबई हमलों में 170 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें एक ब्रितानी नागरिक भी था. मुंबई पुलिस का दावा है कि उन्होंने दस में से एक हमलावर को पकड़ा है. हिरासत मोहम्मद अजमल आमिर क़साब नाम का यह संदिग्ध अभी मुंबई पुलिस की हिरासत में है. प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा कि ब्रितानी पुलिस भी क़साब से पूछताछ करना चाहती है. भारत का दावा है कि सभी 10 हमलावर पाकिस्तान से आए थे. पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के साथ एक संवाददाता सम्मेलन में गॉर्डन ब्राउन ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए पाकिस्तान के साथ सहयोग की नई पेशकश की. उन्होंने कहा, \"अब समय ये आ गया है कि बोलने की बजाए कार्रवाई हो. मैं आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए पाकिस्तान और अन्य देशों की मदद करना चाहता हूँ. हम पाकिस्तान के साथ आतंकवाद विरोधी कार्यक्रम का दायरा और बढ़ाएँगे.\" ब्रितानी प्रधानमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान भी आतंकवाद से प्रभावित है और अभी तक इस साल वहाँ 50 आत्मघाती हमले हो चुके हैं.\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा है कि ब्रितानी अधिकारी जिन गंभीर आतंकवादी साज़िश की घटनाओं की जाँच कर रहे हैं, उनमें से ज़्यादातर के तार पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान में राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी से मुलाक़ात के बाद उन्होंने कहा कि अब बात नहीं काम करने का समय आ गया है. उन्होंने पाकिस्तान को आतंकवाद से निपटने के लिए 60 लाख पाउंड की सहायता देने की पेशकश भी की. ब्राउन ने कहा, \"ब्रितानी अधिकारी जिन गंभीर आतंकवादी साज़िश की जाँच कर रहे हैं, उनमें से तीन चौथाई के तार पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं.\" राष्ट्रपति ज़रदारी से मुलाक़ात से पहले वे भारत में थे और वहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मुलाक़ात की. भरोसा मुंबई हमलों में मारे गए लोगों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए गॉर्डन ब्राउन ने भारत को भी आतंकवाद से निपटने में हरसंभव मदद देने का भरोसा दिलाया. उन्होंने कहा, \"मैंने 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रिलीज़ हुई थी तो उसने 11 करोड़ 50 लाख डॉलर की कमाई की थी और मिशन इम्पॉसिबल थ्री की कमाई उससे ज़्यादा है. अनुमान के मुताबिक रिलीज़ के बाद करीब 73 लाख लोग मिशन इम्पॉसिबल थ्री देख चुके हैं. जबकि रिलीज़ के बाद मिशन इम्पॉसिबल टू को एक करोड़ सात लाख लोगों ने देखा था और इस श्रृंखला की पहली फ़िल्म को एक करोड़ तीन लाख लोगों ने. लेकिन इस श्रृंखला की पहली दोनों फ़िल्में ऐसे समय रिलीज़ हुई थी जब छुट्टियाँ थी और छुट्टियों के दौरान फ़िल्म देखने वाले लोगों की संख्या ज़्यादा रहती है. पिता बनने के कुछ दिन बाद ही मिशन इम्पॉसिबल थ्री के प्रचार के लिए टॉम क्रूज़ ने कई हाई प्रोफ़ाइल दौरे किए थे. पैरामाउंट में मार्केंटिंग और वितरण विभाग के प्रमुख रॉब मूर ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि टॉम क्रूज़ की निजी जिंदगी का फ़िल्म के प्रदर्शन पर कोई असर पड़ा है. मिशन इम्पॉसिबल थ्री में ऑस्कर विजेता अभिनेता फ़िलिप सेयमोर हॉफ़मैन ने भी अभिनय किया है.\n\nSummary:", "target": "हाल ही में रिलीज़ हुई अभिनेता टॉम क्रूज़ की फ़िल्म मिशन इम्पॉसिबल थ्री ने बेहतरीन कारोबार करते हुए करीब 11 करोड़ 80 लाख डॉलर की कमाई की है. फ़िल्म का निर्देशन जेजे एबरेम्स ने किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस साल केवल आइस एज द मेल्टडाउन फ़िल्म ने ही प्रदर्शन के बाद सप्ताहांत में मिशन इमपॉसिबल थ्री से ज़्यादा कमाई की है. मिशन इम्पॉसिबल थ्री ने अमरीका और कनाडा के बजाय दूसरे देशों में बेहतर कारोबार किया है. फ़िल्म कंपनी पैरामाउंट का कहना है कि जब मिशन इम्पॉसिबल टू रिलीज़ हुई थी तो उसने 11 करोड़ 50 लाख डॉलर की कमाई की थी और मिशन इम्पॉसिबल थ्री की कमाई उससे ज़्यादा है. अनुमान के मुताबिक रिलीज़ के बाद करीब 73 लाख लोग मिशन इम्पॉसिबल थ्री देख चुके हैं. जबकि रिलीज़ के बाद मिशन इम्पॉसिबल टू को एक करोड़ सात लाख लोगों ने देखा था और इस श्रृंखला की पहली फ़िल्म को एक करोड़ तीन लाख लोगों ने. लेकिन इस श्रृंखला की पहली दोनों फ़िल्में ऐसे समय रिलीज़ हुई थी जब छुट्टियाँ थी और छुट्टियों के दौरान फ़िल्म देखने वाले लोगों की संख्या ज़्यादा रहती है. पिता बनने के कुछ दिन बाद ही मिशन इम्पॉसिबल थ्री के प्रचार के लिए टॉम क्रूज़ ने कई हाई प्रोफ़ाइल दौरे किए थे. पैरामाउंट में मार्केंटिंग और वितरण विभाग के प्रमुख रॉब मूर ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि टॉम क्रूज़ की निजी जिंदगी का फ़िल्म के प्रदर्शन पर कोई असर पड़ा है. मिशन इम्पॉसिबल थ्री में ऑस्कर विजेता अभिनेता फ़िलिप सेयमोर हॉफ़मैन ने भी अभिनय किया है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 541, "source_item_id": "541", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1241, "clean_index": 483, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:483"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदोनों पक्ष शनिवार को फिर बातचीत शुरु करेंगे. राज्य सरकार की ओर से प्रतिनिधिमंडल की अगुआई कर रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद रामदास अग्रवाल ने कहा, \"हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके हैं लेकिन बातचीत संतोषजनक रही. ये आगे भी जारी रहेगी.\" गूजरों की ओर से बातचीत कर रहे प्रतिनिधिमंडल में शामिल मसूद चौधरी ने बताया, \"हमनें अपनी बात विस्तार से उन्हें (सरकारी प्रतिनिधिमंडल) को बताई है. हम कल दोबारा बातचीत करेंगे.\" वार्ता जयपुर में हुई इस बातचीत में गूजरों की ओर से 28 प्रतिनिधि और राज्य सरकार की ओर से नौ प्रतिनिधि शामिल हुए. हालांकि राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और गूजर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे गूजर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला इस बैठक में शामिल नहीं हुए. ग़ौरतलब है कि पिछले तीन हफ़्तों के दौरान राज्य में अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की माँग कर रहे गूजर लगातार आंदोलन कर रहे हैं. इस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और पुलिस फ़ायरिंग में कम से कम 37 लोगों की मौत हो गई थी. सैकड़ों लोग घायल हुए थे और कुछ जगहों पर कई दिनों तक रेल और सड़क यातायात बाधित रहा था. महिलाओं की रिहाई उधर यह भी जानकारी मिली है कि गूजर आंदोलन के दौरान गिरफ़्तार हुई महिलाओं को शुक्रवार को रिहा कर दिया गया. इन महिलाओं को पिछले दिनों आंदोलन के दौरान राज्य की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया था. गुरुवार की इन महिलाओं को ज़मानत मिल गई थी पर कुछ कागज़ी कार्यवाही बाकी रहने के चलते इनकी गुरुवार को रिहाई नहीं हो पाई थी. ये महिलाएं अलवर जेल में रखी गई थीं. गुरुवार को दौसा की ज़िला अदालत ने गिरफ़्तार की गई 25 गूजर महिलाओं को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया था. हालांकि राज्य सरकार इन महिलाओ को ज़मानत देने के लिए तैयार नहीं थी पर ज़मानत मिले बिना गूजर आगे बातचीत के लिए तैयार नहीं थे. अब अदालत की ओर से महिलाओं की ज़मानत दिए जाने के बाद बातचीत का रास्ता फिर से खुल गया है.\n\nSummary:", "target": "राजस्थान में 22 दिनों से आंदोलनरत गूजरों और राज्य सरकार के बीच दूसरे दौर की बातचीत में कोई नतीजा तो नहीं निकला लेकिन वार्ताकारों ने इसे संतोषजनक बताया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदोनों पक्ष शनिवार को फिर बातचीत शुरु करेंगे. राज्य सरकार की ओर से प्रतिनिधिमंडल की अगुआई कर रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद रामदास अग्रवाल ने कहा, \"हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके हैं लेकिन बातचीत संतोषजनक रही. ये आगे भी जारी रहेगी.\" गूजरों की ओर से बातचीत कर रहे प्रतिनिधिमंडल में शामिल मसूद चौधरी ने बताया, \"हमनें अपनी बात विस्तार से उन्हें (सरकारी प्रतिनिधिमंडल) को बताई है. हम कल दोबारा बातचीत करेंगे.\" वार्ता जयपुर में हुई इस बातचीत में 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सर्वेक्षण में साफ़ दिखता है कि लोगों ने रक्षा और विदेश नीति पर गहरी नज़र रखनी शुरू की है, इसे ब्रितानी जनता की राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव का एक संकेत माना जा सकता है. हालाँकि ब्रिटेन में आम चुनाव होने में अभी कुछ समय बाक़ी है लेकिन अमरीका में नवंबर में चुनाव होने हैं, साफ़ दिख रहा है कि विदेश नीति अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है. अमरीका के सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्थानों में से एक प्यू रिसर्च सेंटर का कहना है कि सत्तर के दशक में वियतनाम की लड़ाई के दौरान जिस तरह विदेश नीति आंतरिक राजनीति के केंद्र में आ गई थी, ठीक वैसा ही कुछ इस बार अमरीका में दिख रहा है. शोध संस्थान का कहना है कि अमरीका में ऐसा कम ही होता है कि घरेलू अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले, जनता विदेश और रक्षा नीति के आधार पर सरकार बनाए या हटाए. दो मुद्दे इतना तो कहा ही जा सकता है कि इराक़ का मामला अमरीकी विदेश नीति के बारे में लोगों की राय बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है, इसके साथ ही आतंकवाद का मुद्दा भी आता है. दोनों में से कौन सा मुद्दा जनता की राय को अधिक प्रभावित कर रहा है यह कहना मुश्किल है लेकिन इराक़ का मामला साफ़ तौर पर काफ़ी प्रभावी है. अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव में बहुत कड़ी टक्कर है, यह तो सभी सर्वेक्षण मान रहे हैं, फ़ैसला शायद बहुत मामूली अंतर से हो. इसमें कोई शक नहीं रह गया है कि जनता यह देखने की कोशिश कर रही है कि अमरीकी सेना के कमांडर इन चीफ़ की भूमिका में कौन ज़्यादा खरा उतर सकता है. शायद यही वजह है कि सीनेटर जॉन केरी के वियतनाम युद्ध में हिस्सा लेने की बात को बार-बार दोहराया जा रहा है, वे एक भूतपूर्व सैनिक होने की बात याद दिलाने से कभी नहीं चूकते. बोस्टन में पिछले महीने डेमोक्रेटिक पार्टी के सम्मेलन में भी जॉन केरी ने अपने भाषण में विदेश और रक्षा नीति पर बहुत ज़ोर दिया था और इस तरह उसे ही मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने का संकेत भी. जहाँ तक आतंकवाद का सवाल है, कई सर्वेक्षण बताते हैं कि देश ज़्यादातर जनता बुश की नीतियों को सफल मानती है, लेकिन जब इराक़ का मामला आता है तो सिर्फ़ 40 प्रतिशत लोग मानते हैं कि बुश के नेतृत्व में ठीक काम हो रहा है. अब नवंबर तक इंतज़ार करिए और देखिए, अमरीकी चुनाव में निर्णायक भूमिका इराक़ की होती है या आतंकवाद की.\n\nSummary:", "target": "इराक़ की लड़ाई और वहाँ विदेशी सेना की मौजूदगी का सीधा असर अमरीका और ब्रिटेन में जनमत पर पड़ता दिख रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nब्रिटेन के अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स के ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक़ देश की जनता विदेश नीति को अपनी चिंताओं में काफ़ी ऊपर रख रही है, यहाँ तक कि अर्थव्यवस्था से भी ऊपर. इसी तरह अमरीका में भी जनमत सर्वेक्षण बता रहे हैं कि रक्षा और विदेश नीति नवंबर में होने वाले चुनाव में अहम भूमिका निभाएँगे. प्रतिष्ठित समाचारपत्र फाइनेंशियल टाइम्स के जनमत सर्वेक्षण में साफ़ दिखता है कि लोगों ने रक्षा और विदेश नीति पर गहरी नज़र रखनी शुरू की है, इसे ब्रितानी जनता की राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव का एक संकेत माना जा सकता है. हालाँकि ब्रिटेन में आम चुनाव होने में अभी कुछ समय बाक़ी है लेकिन अमरीका में नवंबर में चुनाव होने हैं, साफ़ दिख रहा है कि विदेश नीति अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है. अमरीका के सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्थानों में से एक प्यू रिसर्च सेंटर का कहना है कि सत्तर के दशक में वियतनाम की 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भारत पांच में से एक भी मैच नहीं जीता है. बेल्जियम जैसी टीम ने भी उसे 0-3 से धो दिया है. हॉकी टीम के शर्मनाक प्रदर्शन के लिए अलग-अलग कारण दिए जा रहे हैं. लेकिन प्रदर्शन और आंकडे़ देखने के बाद साफ हो जाता है कि टीम हॉलैंड के खिलाफ एक मैच को छोड़कर बाकियों में कहीं मुकाबले में नहीं थी. लगातार पांच मैच हारने वाली यह टीम सिर्फ छह गोल ही कर पाई. जबकि विपक्षी टीमों ने उस पर 18 गोल किए हैं. इनमें 11 मैदानी गोल थे जो समझने के लिए काफी है कि भारतीय टीम की डिफेंस कैसा खेली. इनमें छह गोल पेनल्टी कॉर्नर से हुए. जबकि भारतीय खिलाड़ी पेनल्टी कॉर्नर से सिर्फ दो ही गोल बना सके. लेवल ही नहीं था बीबीसी से बातचीत में कोच माइकल नॉब्स ने माना, “ हमारा स्तर बाकी टीमों के बराबर नहीं था. मेरा मानना है कि सभी को आत्ममंथन करने की जरुरत है. मेरी टीम को गेंद को गोल में डालने की अपनी क्षमता को और मजबूत करना होगा. टीम के सभी खिलाड़ियों को अपने खेल का आंकलन करना चाहिए.” टीम से स्टार खिलाड़ी सरदार सिंह ने कहा, “ जो गलतियां पहले मैच में हुईं थी, टीम ने वही बार-बार दोहराईं. टीम को इसी का खामियाजा भुगतना पड़ा है. हमारी फिनिशिंग बिलकुल भी अच्छी नहीं थी. ” फॉरवर्ड की नाकामी सरदार सिंह ने बताया, “ कोच ने पहले मैच के बाद फिनिशिंग को लेकर हर खिलाड़ी के साथ अलग-अलग सेशन किया था. फॉरवर्ड को बताया गया था कि जो क्रॉस गोलपोस्ट के सामने मिल रहे हैं उन्हें गोल में कैसे बदलना चाहिए है. लेकिन कोई भी फॉरवर्ड इस पर अमल करने में नाकाम रहा.” वहीं गोलकीपर भरत छेत्री ने कहा, “ हमने कभी नहीं सोचा था कि हम एक भी मैच नहीं जीत पाएंगे. हम पहला मैच अच्छा खेले लेकिन दूसरे में प्रदर्शन डाउन हो गया. टीम एक समर्पित खेल दिखाने में नाकाम रही. हम से गोल ही नहीं हुए. इतने बड़े टूर्नामेंट में गोल नहीं होंगे तो जीतना मुश्किल हो जाता है.” किस्मत की मार फॉरवर्ड लाइन की नाकामी टीम के ऐसे प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण रही. इस बारे में पूछे जाने पर शिवेंदर सिंह ने किस्मत की दुहाई दी शिवेंदर ने कहा, “ हमारे काफी चांस मिस हुए. हमारा आंकलन है कि कई मौकों पर गेंद गोल पोस्ट के पोल से लग कर वापिस आ गई. इसके अलावा कई मौकों पर गोलकीपर भी जबरदस्त बचाव कर गया. ” शिवेंदर ने कहा, “ हमारे तालमेल में कोई कमी नहीं थी. हमें कई मौके मिले. पेनल्टी कॉर्नर मिले लेकिन हम इसे गोल में बदलने में नाकाम रहे. यकीनी तौर पर हमारी तैयारी में कमी रही होगी तभी हम सारे मैच हारे हैं. ” भारत को अब सबसे आखिरी 12वें स्थान पर रहने की शर्मिंदगी से बचने के लिए 11 अगस्त को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जीतना ही होगा.\n\nSummary:", "target": "भारतीय हॉकी टीम ने लंदन ओलंपिक में अपने सबसे बुरे प्रदर्शन से खुद को और देश को शर्मसार किया है. हालत यह है कि अब उसे खुद को सबसे नीचे 12वें स्थान पर रहने की शर्मिंदगी से बचाना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारतीय खिलाड़ियों को देख लगा ही नहीं कि वे ओलंपिक में खेल रहे हैं भारत पांच में से एक भी मैच नहीं जीता है. बेल्जियम जैसी टीम ने भी उसे 0-3 से धो दिया है. हॉकी टीम के शर्मनाक प्रदर्शन के लिए अलग-अलग कारण दिए जा रहे हैं. लेकिन प्रदर्शन और आंकडे़ देखने के बाद साफ हो जाता है कि टीम हॉलैंड के खिलाफ एक मैच को छोड़कर बाकियों में कहीं मुकाबले में नहीं थी. लगातार पांच मैच हारने वाली यह टीम सिर्फ छह गोल ही कर पाई. जबकि विपक्षी टीमों ने उस पर 18 गोल किए हैं. इनमें 11 मैदानी गोल थे जो समझने के लिए काफी 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श्रीलंका पहुँची जहाँ के क़रीब दो हज़ार लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है. यह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पिछले महीने दिए गए सरकारी आदेश के बाद श्रीलंका के विवादग्रस्त क्षेत्र में पहुँचने वाली खाद्य सहायता का दूसरा जत्था है. श्रीलंका की सेना तमिल टाइगरों पर लगातार हमले कर रही है जो तमिल अल्पसंख्यकों के लिए अलग राज्य की माँग कर रहे हैं. सेना के अनुसार, अब सैनिक किलिनोची गाँव से सिर्फ़ डेढ़ किलोमीटर दूर रह गए हैं. इस क्षेत्र में पत्रकारों के जाने पर प्रतिबंध होने की वजह से इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी. पिछले कई हफ़्तों से लड़ाई होते रहने की वजह से क्षेत्र के अनेक नागरिक किलिनोची चले गए थे.\n\nSummary:", "target": "भारत ने कहा है कि वह श्रीलंका में सरकारी सेना और तमिल टाइगर छापामारों के संघर्ष के बीच फंसे तमिल नागरिकों के लिए खाद्य सहायता भेज रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत की श्रीलंका के विशेष राजदूत बेसिल राजपक्षा से हुई बातचीत के बाद 800 टन अनाज भेजे जाने की घोषणा हुई. विद्रोहियों का सख़्ती से मुक़ाबला कर रहा श्रीलंका भारत को लगातार यह 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और वह है राजा का सम्मान क्योंकि कभी-कभी यह पर्यटन की औपचारिकता का हिस्सा होता है. बहरहाल, भले ही माहौल और सूरत बदल गई हो पर मेहरानगढ़ क़िला तमाम परंपराओं को आज भी अपने में समेटे हुए है और देखने लायक है.\n\nSummary:", "target": "इसे सन सिटी कहें या फिर ब्लू सिटी, जोधपुर शहर अपने कई नामों, परंपराओं, रवाजों और राठौड़ राजघराने के स्थापत्य के इतिहास के लिए जाना जाता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसी शहर के बीचोंबीच एक पहाड़ी पर खड़ा है मेहरानगढ़ क़िला. पंद्रहवीं शताब्दी में राठौड़ राजपरिवार के राजा जोधाजी महाराज ने इस अभेद्य माने जाने वाले क़िले का निर्माण कराया था. समय बदला और साथ ही राजमहलों और क़िलों की तस्वीर भी. कभी मुगल बादशाह औरंगज़ेब की तोपों का सामना करने वाला यह क़िला आज एक संग्रहालय में तब्दील हो चुका है. आज एक ओर वर्तमान समय का लोकतंत्र है और दूसरी तरफ़ राजपरिवार से जुड़े होने का अतीत. इसी अहसास और व्यवहार में आज भी पीढ़ियों से इस क़िले में काम कर रहे लोग यहाँ मौजूद हैं, अपने में तमाम परंपराओं, पहचानों को समेटे हुए. जीवित परंपराएँ आज भी जीवित परंपराओं के कई चिन्ह इस क़िले में बाकी हैं. मसलन नौबतख़ाने पर गूँजते नगाड़ों और शहनाई की आवाज़ आज भी क़िले में आ रहे लोगों का स्वागत करती हैं. यह बात और है कि यह स्वागत संगीत आज राजा की पालकी की जगह वातानुकूलित बसों और कारों से उतर रहे पर्यटकों के स्वागत में बजता है. अपनी पीढ़ियों की ज़िम्मेदारी को अभी तक निभा रहे इन कलाकारों से हमने पूछा कि राजशाही और आज के दौर में क्या कुछ फ़र्क महसूस होता है. क़िले के मुख्य द्वार पर नगाड़ा बजाते मोहम्मद उमर बताते हैं, \"उस दौर की बात दूसरी थी. तब हमारे पूर्वज राजाओं के क़रीबी होते थे और इसके चलते बिरादरी में उनका बड़ा सम्मान होता था. आज तो हम आम बैंड-बाजे वालों जैसे समझे जाते हैं.\" क़िले में उपर जाने के लिए लिफ़्ट लगा दी गई है पर पुराने रास्ते से आगे बढ़ें तो बीच में भील समुदाय के दो कलाकार रावणहत्ता नाम का पारंपरिक वाद्य बजाते मिल जाते हैं. कभी राजा की सवारी से न्यौछार की मोहरें बटोरकर अपना ग़ुजारा करने वाले ये भील अब पर्यटकों की कृपा पर आश्रित हैं. ये कलाकार हिंदी नहीं जानते और न ही विदेशी भाषाएँ, पर संगीत की भाषा इन्हें गुजारे भर का ईनाम 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पार्टी सेंट्रल कमेटी के इस प्रस्ताव को अब पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भेजा जाएगा जिससे कि वे इस पर विचार करके वे इसमें संशोधनों का सुझाव दे सकें. तीसरा विकल्प पार्टी प्रस्ताव में कहा गया है कि कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधनों का विकल्प तलाशा जाना चाहिए. इसमें तीसरा विकल्प बनाए जाने की बात कही गई है लेकिन प्रस्ताव को प्रेस के लिए जारी कर रहे सीपीएम महासचिव प्रकाश करात से जब सवाल पूछा गया कि क्या इसे तीसरा मोर्चा कहा जाना चाहिए तो उन्होंने कहा कि यह विकल्प चुनाव के लिए मोर्चा नहीं होगा बल्कि नीतियों के लिए एक विकल्प होगा. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी भाजपा को पहले नंबर का दुश्मन मानती है. प्रस्ताव में कहा गया है, \"पार्टी कांग्रेस और भाजपा में अंतर देखती है और मानती है कि कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ पार्टी है लेकिन जब भी सांप्रदायिक ताक़तें कोई चुनौती पेश करती हैं तो कांग्रेस डगमगा जाती है.\" सीपीएम ने एक बार फिर साफ़ किया है कि वह कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं बनाने जा रही है. अमरीका विरोध इस प्रस्ताव में सीपीएम ने अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों से चल रहे वैश्विकरण की निंदा करते हुए कहा है कि इसकी वजह से असमानता बढ़ी है. सीपीएम ने कहा है कि अमरीकी साम्राज्यवाद की नज़र पश्चिमी और मध्य एशिया पर इसलिए नज़र लगा रखी है ताकि वह उनके ऊर्जा स्रोतों पर नियंत्रण हासिल कर सके. पार्टी ने कहा है कि अमरीका के 'आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध' के कारण बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं. प्रस्ताव में चीन की निरंतर आर्थिक विकास और उसके बढ़ते प्रभाव की तारीफ़ की गई है. इसमें वियतनाम में ग़रीबी घटाने के प्रयासों की प्रशंसा की गई है और क्यूबा की तारीफ़ की गई है कि अमरीकी दबाव के बावजूद वह समाजवादी व्यवस्था को मज़बूत बनाए हुए है. सीपीएम ने कहा है, \"पार्टी भारतीय जनता को साम्राज्यवाद से निपटने के लिए लगातार प्रेरित करती रहेगी.\" आर्थिक नीतियाँ मार्क्सवादी पार्टी ने यूपीए की आर्थिक नीतियों की जमकर निंदा की है. पार्टी ने कहा है कि पिछले सालों में जो व्यवसाय-आधारित नीतियाँ रहीं हैं उसके चलते रोज़गार के अवसर पैदा नहीं हुए हैं और इसने कृषि क्षेत्र को अनदेखा कर दिया है. प्रस्ताव में कहा गया है, \"यूपीए सरकार ने उन आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाया है 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट) जैसे एक अच्छे क़ानून को कमज़ोर कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउनका कहना है कि उन्होंने गरीबों और कमज़ोरों को नुकसान पहुंचाया है. उधर, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि उनकी पार्टी की सरकार लिंगायत समुदाय को बांटने का काम नहीं करेगी. दोनों नेता कर्नाटक में चुनावी सभाओं को संबोधित कर रहे थे. राज्य में मई 12 को विधानसभा चुनाव हैं. फिलहाल यहां कांग्रेस की सरकार है औक भाजपा अपने पांव पसारने की कोशिश कर रही है. राहुल गांधी ने क्या कहा? राहुल के आरोपों के पीछे की राजनीति बीते साल दिए गए केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के बयान के बाद राज्य में कांग्रेस को दलित समुदाय में पसंद किया जा रहा है. कर्नाटक में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि पार्टी सत्ता में है और वो संविधान बदलने के लिए ही सत्ता में आई है. इस कारण दलित समुदायों को पहले ही ऐसा लग रहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की नीति को ख़त्म कर दिया जाएगा. राहुल गांधी ने और क्या-क्या किया? अपने दो दिवसीय कर्नाटक दौरे के बाद दिल्ली लौटने से पहले राहुल गांधी सिद्धगंगा मठ के मठाधीश श्री श्री शिवाकुमार स्वामीजी से मुलाक़ात की और उन्हें उनके 111वें जन्मदिवस की बधाई दी. राज्य के सभी राजनेता स्वामीजी के मठ में आते हैं. लेकिन राहुल के पास इसकी एक अलग वजह थी. हाल में स्वामीजी ने राज्य में कांग्रेस की सिद्धारमैय्या सरकार के केंद्र से लिंगायत को अलग धर्म बनाने की सिफारिश करने के फ़ैसले का समर्थन किया है. राज्य की राजनीति में लिंगायत वोट को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कांग्रेस लिंगायत वोट बैंक पर भाजपा के एकाधिकार को तोड़ने की कोशिश कर रही है. यही कारण है कि अमित शाह ने बंद दरवाज़े में हुई एक बैठक में राज्य के करीब सौ स्वीमीजी को बताया है कि भाजपा कभी भी लिंगायत समुदाय में बंटवारा नहीं होने देगी. ये पहली बार है जब भाजपा सरकार से जुड़े किसी आला नेता ने कांग्रेस के किसी समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के फ़ैसले पर बड़ी प्रतिक्रिया दी है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 552, "source_item_id": "552", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1873, "clean_index": 491, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:491"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुनने में भले ही यह बड़ी अजीब सी बात लगे लेकिन स्पेन के वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि वे पौधों में अनुवांशिक बदलाव कर उससे फेरोमोन्स नामक रसायन पैदा कर सकते हैं. फेरोमोन्स वहीं रसायन पदार्थ है जिसे मादा कीड़े नर कीड़ो को आकर्षित करने के लिए निकालती हैं. इस नए अविष्कार का मकसद उन पौधो को कीड़ों से बचाना है जिनकी बाज़ार में बहुत अधिक कीमत होती है. इस तकनीक के ज़रिए 'सेक्सी पौधों' को विकसित किया जाएगा. हालांकि पौधों को बचाने के लिए फेरोमोन्स का इस्तेमाल पहले से हो रहा है, लेकिन इसे बहुत अधिक लागत पर प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है. ससफायर प्रोजेक्ट अब एक प्रोजेक्ट के तहत पौधों को इस तरीके से विकसित किया जाएगा कि वे फेरोमोन्स बनाने में सक्षम हो सकें. इस प्रोजेक्ट का नाम 'ससफायर' रखा गया है. इस योजना के एक सदस्य और वेलेंसिया में पॉलीटेक्निक यूनिवर्सिटी में शोधार्थी विसेंट नवारो ने बीबीसी से कहा, ''सोचिए कि कोई पौधा इस काबिल हो जाए कि वह कीड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करे और जब कीड़ा उन पर बैठे तो वह मर जाए, फ़सल को बचाने के लिए यह बेहद कारगर तरीका हो सकता है.'' जब अधिक मात्रा में फेरोमोन्स पैदा होता है तो इससे नर कीड़े परेशान हो जाते हैं और वो मादा कीड़ों को खोज नहीं पाते, यही वजह है कि इन कीड़ों के प्रजनन में भी कमी आती है. नवारो बताते हैं कि यह तकनीक तो पहले से इस्तेमाल की जा रही है लेकिन इसमें बहुत अधिक खर्च आता है. वो बताते हैं, ''इसकी कीमत कई बार 23 हज़ार डॉलर से 35 हज़ार डॉलर और कभी-कभी तो 117 हज़ार डॉलर प्रतिकिलो तक पहुंच जाती है. इसका मतलब यह है कि फसल को कीड़ों से बचाने के लिए यह लागत बहुत ज़्यादा है.'' फसल से दूर ले जाकर मारेगा कीड़ों को ससफायर प्रोजेक्ट में स्पेन, जर्मनी, स्लोवेनिया और ब्रिटेन के वैज्ञानिक साथ काम कर रहे हैं. जब कीड़े पौधों की तरफ आकर्षित होते हैं और उन पर बैठते हैं तो कीटनाशकों के ज़रिए उन पर नियंत्रण किया जाता है. ससफायर प्रोजेक्ट के ज़रिए कीड़ों को फ़सल से दूर ले जाया जाएगा और फिर उन्हें बाहर ही खत्म भी कर दिया जाएगा. इस तरह किसी फसल में कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, इसकी जगह जिस जगह फसल लगाई गई है उसके बाहर ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जो कीड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करें और उन पर बैठकर मर जाएं. इस बारे में नवारो बताते हैं, ''हमने 'निकोटिआना बेंथामिआना' प्रकार के पौधे के ज़रिए फेरोमोन्स बनाने में सफलता पायी है. अब हमारे सामने सवाल है कि हम इसे कुछ और सामान्य प्रकार के पौधों में बनाने में सफलता हासिल कर पाते हैं या नहीं.'' सेक्सी पौधे की मदद से वैज्ञानिक कोटोनेट नामक प्रकार के कीड़े को नियंत्रित करने पर काम कर हैं, ये कीड़े खट्टे फलों को नुकसान पहुंचाते हैं. फ़िलहाल ससफायर प्रोजेक्ट की समयसीमा तीन साल तय की गई है. उसके बाद इस बात का आंकलन किया जाएगा कि अलग-अलग कंपनियां इस प्रोजेक्ट में कितनी दिलचस्पी दिखाती हैं. नवारो के अनुसार बहुत सी कंपनियों ने इस प्रोजेक्ट में अपनी इच्छा जताई है लेकिन फिलहाल इसे पूरा होने में पांच साल तो लग ही जाएंगे. वे मानते हैं कि यह 'सेक्सी पौधे' कीटनाशकों की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लेकर आएंगे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ज़रा सोचिए कि कोई पौधा हानिकारक कीड़ों में यौन आकर्षण पैदा कर उन्हें अपनी तरफ खींचे और फिर उन्हें मार डाले.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुनने में भले ही यह बड़ी अजीब सी बात लगे लेकिन स्पेन के वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि वे पौधों में अनुवांशिक बदलाव कर उससे फेरोमोन्स नामक रसायन पैदा कर सकते हैं. फेरोमोन्स वहीं रसायन पदार्थ है जिसे मादा कीड़े नर कीड़ो को आकर्षित करने के लिए निकालती हैं. इस नए अविष्कार का मकसद उन पौधो को कीड़ों से बचाना है जिनकी बाज़ार में बहुत अधिक कीमत होती है. इस तकनीक के ज़रिए 'सेक्सी पौधों' को विकसित किया जाएगा. हालांकि पौधों को बचाने के लिए फेरोमोन्स का इस्तेमाल पहले से हो रहा है, लेकिन इसे बहुत अधिक लागत पर प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है. ससफायर प्रोजेक्ट अब एक प्रोजेक्ट के तहत पौधों को इस तरीके से विकसित किया जाएगा कि वे फेरोमोन्स बनाने में सक्षम हो सकें. इस प्रोजेक्ट का नाम 'ससफायर' रखा गया है. इस योजना के एक सदस्य और वेलेंसिया में पॉलीटेक्निक यूनिवर्सिटी में शोधार्थी विसेंट नवारो ने बीबीसी से कहा, ''सोचिए कि कोई पौधा इस काबिल हो जाए कि वह कीड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करे और जब कीड़ा उन पर बैठे तो वह मर जाए, फ़सल को बचाने के लिए यह बेहद कारगर तरीका हो सकता है.'' जब अधिक मात्रा में फेरोमोन्स पैदा होता है तो इससे नर कीड़े परेशान हो जाते हैं और वो मादा कीड़ों को खोज नहीं पाते, यही वजह है कि इन कीड़ों के प्रजनन में भी कमी आती है. नवारो बताते हैं कि यह तकनीक तो पहले से इस्तेमाल की जा रही है लेकिन इसमें बहुत अधिक खर्च आता है. वो बताते हैं, ''इसकी कीमत कई बार 23 हज़ार डॉलर से 35 हज़ार डॉलर और कभी-कभी तो 117 हज़ार डॉलर प्रतिकिलो तक पहुंच जाती है. इसका मतलब यह है कि फसल को कीड़ों से बचाने के लिए यह लागत बहुत ज़्यादा है.'' फसल से दूर ले जाकर मारेगा कीड़ों को ससफायर प्रोजेक्ट में स्पेन, जर्मनी, स्लोवेनिया और ब्रिटेन के वैज्ञानिक साथ काम कर रहे हैं. जब कीड़े पौधों की तरफ आकर्षित होते हैं और उन पर बैठते हैं तो कीटनाशकों के ज़रिए उन पर नियंत्रण किया जाता है. ससफायर प्रोजेक्ट के ज़रिए कीड़ों को फ़सल से दूर ले जाया जाएगा और फिर उन्हें बाहर ही खत्म भी कर दिया जाएगा. इस तरह किसी फसल में कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, इसकी जगह जिस जगह फसल लगाई गई है उसके बाहर ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जो कीड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करें और उन पर बैठकर मर जाएं. इस बारे में नवारो बताते हैं, ''हमने 'निकोटिआना बेंथामिआना' प्रकार के पौधे के ज़रिए फेरोमोन्स बनाने में सफलता पायी है. अब हमारे सामने सवाल है कि हम इसे कुछ और सामान्य प्रकार के पौधों में बनाने में सफलता हासिल कर पाते हैं या नहीं.'' सेक्सी पौधे की मदद से वैज्ञानिक कोटोनेट नामक प्रकार के कीड़े को नियंत्रित करने पर काम कर हैं, ये कीड़े खट्टे फलों को नुकसान पहुंचाते हैं. फ़िलहाल ससफायर प्रोजेक्ट की समयसीमा तीन साल तय की गई है. उसके बाद इस बात का आंकलन किया जाएगा कि अलग-अलग कंपनियां इस प्रोजेक्ट में कितनी दिलचस्पी दिखाती हैं. नवारो के अनुसार बहुत सी कंपनियों ने इस प्रोजेक्ट में अपनी इच्छा जताई है लेकिन फिलहाल इसे पूरा होने में पांच साल तो लग ही जाएंगे. वे मानते हैं कि यह 'सेक्सी पौधे' कीटनाशकों की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लेकर आएंगे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बिहार विधानसभा चुनाव 2015 रोचक होता जा रहा है. कहा जा रहा है कि 'विकास' के बजाय चुनाव की प्रक्रिया में 'जाति' का महत्व बढ़ गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसके विपरीत 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़े गए थे. और तो और 2014 के संसदीय चुनाव जाति की फांस से ऊपर उठ गए थे, ख़ासतौर पर हिंदी के इलाक़ों में. लेकिन बिहार के मौजूदा विधानसभा चुनाव में एक राजनीतिक गठबंधन जाति के एजेंडा को मंडल-2 के नाम पर बढ़ा रहा है. कुछ महीने पहले इसी समूह ने बार-बार सरकार पर जनसंख्या के जाति आधारित आंकड़ों को सार्वजनिक करने को लेकर दबाव डालकर राज्य में राजनीतिक बहस को दूषित किया था. इस चुनाव में नीतीश कुमार ने, जो अब तक विकास का चेहरा रहे हैं, 2014 के चुनाव में हार के बाद लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया जो मंडल कमीशन का चेहरा रहे हैं. समाप्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते रहे हैं कि मंडल-1 राज्य के विनाश और अराजकता का प्रतीक रहा जिससे 'जंगल राज' आया तो मंडल-2 में अगर राजद, जदयू और कांग्रेस सत्ता में आते हैं तो इससे 'रोजाना जंगल राज का डर' अनिवार्य हो जाएगा. इससे विकास से ध्यान पूरी तरह हट जाएगा और उसकी जगह आ जाएगी जाति आधारित अराजकता. सच्ची बात तो यह है कि आज़ादी के बाद से जाति भारत की चुनावी जंग में हमेशा मौजूद रही. बदला चुनावी परिदृश्य पहले परंपरागत रूप से कांग्रेस, भारतीय कुलीन वर्ग, ब्राह्मणों, दलितों और मुसलमानों के मजबूत गठजोड़ से चुनावी जीत हासिल करती रही. जवाहरलाल नेहरू के स्वतंत्रता संग्राम की छवि के बावजूद चुनावी सफलता के लिए ज़मीनी स्तर पर जातीय गठजोड़ ज़रूरी था. जब चुनाव जीतने के लिए मतदाता आधार पर्याप्त नहीं रहा तो इस त्रिमूर्ति में राजपूतों को भी शामिल कर लिया गया. इस चुनावी रणनीति को नेहरू के पोते संजय गांधी ने 1980 के संसदीय चुनाव में तैयार किया था. इस तरह जाति ने भारत में हमेशा एक निर्णायक भूमिका निभाई है, लेकिन बिहार में यह एक जाना-माना सच रहा है. हालांकि राज्य में कई किसान, समाजवादी, साम्यवादी और उग्र आंदोलन हुए हैं लेकिन दुर्भाग्य से कोई महत्वपूर्ण बहु-जातीय सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ. दक्षिण और पश्चिमी भारत के कुछ बहु-जातीय आंदोलनों को स्थानीय पहचान और आर्थिक विकास से जोड़ कर देखा गया और इस तरह जातीय पहचान के स्तर तक ले आया गया. हालांकि बिहार में मुख्यतः दो ही पहचान थीं या तो जातीय या राष्ट्रीय, वहां कोई 'बिहारी' पहचान नहीं थी. इस तरह बिहार में जाति का महत्व हमेशा ज़्यादा रहा है, ख़ासकर चुनावी राजनीति में. हालांकि जब तक पारंपरिक कुलीनों की निर्वाचन में प्रधानता बनी रही तब तक उनके बहुत मेहनत से तैयार जातीय गणित को तिरस्कारपूर्ण नहीं माना जाता था. लेकिन चुनावी प्रक्रिया में हाशिए पर रहे सामाजिक समूह जब नब्बे के दशक की शुरुआत में तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में उथल-पुथल मचाते हुए उभरे तो इसे तुरंत गुप्त जातीय सभा करार दे दिया गया. तबसे बिहार के चुनावी परिदृश्य में पूरी तरह बदल गया है. दोहरा बर्ताव जब 2005 में नीतीश कुमार ने 'विरोधी ध्रुवों का गठबंधन' बनाया और उसी गठबंधन के तहत 2010 का चुनाव लड़ा तो तब तक एजेंडा विकास ही माना जाता था. हालांकि इस पराकाष्ठा के गठबंधन में कई मध्य जातियों को शामिल नहीं किया गया था. एक बार नीतीश ने भाजपा से संबंध तोड़ दिया तो यह गठबंधन टूट गया. इसलिए 2014 में नीतीश कुमार 'गरीबों और वंचितों का गठबंधन' बनाना चाहते थे लेकिन इसे तुरंत ही चुनी हुई जातियों का समायोजन कह दिया गया. अब लालू प्रसाद के इस गठबंधन, महागठबंधन, में शामिल होने को एक बाहरी और जाति से बाहर का गठबंधन माना जा रहा है. लेकिन कोई भी आसानी से यह देख सकता है कि 2014 के संसदीय चुनाव के बाद से भाजपा बिहार की विभिन्न जातियों को साथ जोड़ने को लेकर अतिसक्रिय है. हालांकि उन्हें जाति आधारित तिरस्कार से मुक्त कर दिया गया है. यकीनन यह अचरज की बात है कि कोई भी ऊंची जातियों का गठबंधन, चाहे वह शुरुआती सालों में कांग्रेस ने किया हो या अब बीजेपी कर रही है, को जाति-केंद्रित गठबंधन नहीं माना जाता लेकिन वंचित और नीची जातियों के इसी काम को, जिसका नेतृत्व नीतीश कुमार और लालू प्रसाद कर रहे हैं, को हमेशा ही जाति आधारित गठबंधन माना जाता है. यक़ीनन यह ऐसा दोहरा बर्ताव है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत के रविचंद्रन अश्विन एक क्रिकेट टेस्ट सिरीज़ में कुमार संगकारा को लगातार तीन मर्तबा आउट करने वाले इकलौते गेंदबाज़ बन गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअश्विन के लिए ये उपलब्धि इसलिए ख़ास है क्योंकि श्रीलंका के दिग्गज बल्लेबाज़ संगकारा के करियर का ये आख़िरी टेस्ट है. अश्विन ने कोलंबो में श्रीलंका के ख़िलाफ़ शुक्रवार को दूसरे क्रिकेट टेस्ट के दूसरे दिन संगकारा को आजिंक्य रहाणे के हाथों कैच कराया. संगकारा 32 रन ही बना सके. भारत की पहली पारी में 393 रनों के जवाब में दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक श्रीलंका ने तीन विकेट पर 140 रन बना लिए हैं. लगातार तीन बार शिकार अश्विन ने संगकारा को मौजूदा टेस्ट सिरीज़ में लगातार तीन बार आउट किया है. समाप्त गॉल में खेले गए पहले टेस्ट मैच में भी अश्विन ने दोनों पारियों में संगा को अपना शिकार बनाया था. पहली पारी में अश्विन ने संगकारा को लोकेश राहुल के हाथों कैच कराया था. इस पारी में संगकारा सिर्फ़ पाँच रन ही बना सके थे. दूसरी पारी में भी संगकारा की पारी 40 रन पर ठिठक गई थी और तब अश्विन की गेंद पर रहाणे ने उनका कैच लपका था. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के सशस्त्र कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में हुए विरोध और प्रदर्शनों के दौरान 50 से अधिक कश्मीरी युवक सुरक्षा बलों के हाथों मारे जा चुके हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइन प्रदर्शनों में दो हज़ार से अधिक लोग घायल भी हुए हैं. इनमें सबसे दर्दनाक हालत उन लोगों की है जिनकी आँखों और चेहरे पर लोहे के छर्रे लगे हैं. अस्पताल घायल मरीज़ोें से अभी भी भरे पड़े हैं. सुरक्षा बलों के हाथों इतनी बड़ी संख्या में कश्मीरी युवाओं की मौत पर भारत में चुप्पी है. कुछ समाचार पत्रों में कुछ संपादकीय और लेख ज़रूर प्रकाशित हुए हैं जिनमें सुरक्षा बलों की ज़्यादतियों का कुछ उल्लेख हुआ है. कश्मीर के संबंध में अधिकांश टीवी चैनल आक्रामक राष्ट्रवाद से भरा नज़रिया अपनाते हैं. उनकी चर्चाओं में कश्मीरी युवकों की मौत महत्वपूर्ण खबर नहीं बनती बल्कि उनका ध्यान इस पहलू पर केंद्रित दिखा कि सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए सभी युवा एक आतंकवादी के समर्थन में बाहर निकले थे. सोशल मीडिया पर बहुत बड़ी संख्या में ऐसे संदेश घूम रहे हैं जिनमें प्रदर्शन करने वाले कश्मीरी युवाओं को देशद्रोही कहा गया है और उनकी मौत को सही ठहराया गया है. समाप्त दरअसल कश्मीर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां भारत सरकार और कश्मीर घाटी के अवाम के बीच संवाद पूरी तरह टूटा हुआ है. कश्मीर में प्रदर्शन, सभाएं, बैठकें और विरोध और प्रतिरोध के हर लोकतांत्रिक तरीके पर प्रतिबंध लगा हुआ है. कश्मीरी अलगाववादियों की सभी गतिविधियों पर भी अंकुश लगा हुआ है. भारत – पाक कंट्रोल लाइन पर बेहतर चौकसी और पाकिस्तान की नीतियों में बदलाव के कारण चरमपंथी गतिविधियों और सशस्त्र संघर्ष के रास्ते काफ़ी हद तक बंद हो चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिससे यह पता चल सके कि कश्मीर के बारे में उनकी सरकार की नीति क्या है. इन से पहले मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी यही हालत थी. अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा किसी भी नेता ने कश्मीर के मसले को हल करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की. लेकिन मोदी सरकार ने साफ़ किया है वो अलगाववादियों से हरगिज बात नहीं करेगी. केंद्र में भाजपा की एक राष्ट्रवादी सरकार है. कश्मीर में भी भाजपा का शासन है. ये सभी को पता है कि कश्मीर समस्या का समाधान पाकिस्तान से संबंध बेहतर करने में निहित है लेकिन दस साल तक मनमोहन सिंह की सरकार ने पाकिस्तान से संबंध बेहतर करने के लिए कुछ नहीं किया. पिछले दो साल में जो कुछ संबंध बचे थे वह भी खत्म हो गए. पिछले 15-20 साल यूं ही बर्बाद किए गए. इस अवधि में कश्मीर में एक नई पीढ़ी ने किशोरावस्था की दहलीज पर क़दम रखा है. निराशा और बेबसी उनकी सोच और समझ पर हावी हो चुकी है. केंद्र और राज्य सरकारों ने बीते हुए वर्षों में ऐसा कुछ भी नहीं किया कि वह उन पर तिनका भर भी विश्वास कर सकें. पिछले 70 साल घाटी की जनता भारत से कभी भी इतना आक्रोशित और आशंकित नहीं हुई, जितना इतिहास की इस मंजिल पर हैं. भारत में कश्मीरियों के लिए किसी तरह के सहानुभूति के भाव नहीं है. भारत की नई राष्ट्रवादी पीढ़ी के लिए कश्मीरी युवा आतंकवादी, अलगाववादी, पाकिस्तान समर्थक और देश दुश्मन से ज़्यादा कुछ नहीं हैं. उनके मरने, अंधे और अपाहिज होने से यहां सहानुभूति के भाव पैदा नहीं होते. बल्कि कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए सुरक्षा बलों की प्रशंसा होती है. यह एक पूर्ण गतिरोध की स्थिति है. कश्मीरी युवाओं के लिए अभिव्यक्ति के सारे रास्ते बंद हैं. दोनों ओर आपसी नफ़रतें चरम पर हैं. बुरहान वानी इसी बेबसी और घुटन का प्रतिबिम्ब था. उसके जनाज़े और प्रदर्शनों में लाखों युवाओं की भागीदारी भी इसी घुटन और बेबसी का प्रतीक है. 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लिए चौराहे पर करीब एक लाख लोग इकट्ठा हुए थे. वहाँ बारिश भी हो रही थी. अमन की अपील पोप बेनेडिक्ट ने कहा, “मैं कामना करता हूँ कि जिस धरती पर ईसा मसीह का जन्म हुआ था वहाँ फिर से उजाला हो ताकि इसराइलियों और फ़लस्तीनियों को प्रेरणा मिले की वे शांति से रहें.” उनका कहना था कि इराक़ में ईसाइयों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उन्होंने राजनीतिक नेताओं से अनुरोध किया कि वे मध्य पूर्व में ईसाई समुदाय के साथ एकता दिखाएँ. पोप ने ये भी आग्रह किया कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकारों का सम्मान किया जाए. परंपरा के मुताबिक पोप ने बाद में 65 भाषाओं में क्रिसमस का संदेश दिया. संदेश के बाद पोप ने 350 बेघर लोगों के लिए दिन का भोज रखा. इससे पहले रात को क्रिसमस मास के मौके पर कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किए गए थे. मास के दौरान पोप के साथ सादे वर्दी पहने सुरक्षाकर्मी थे. उधर ब्रिटेन की महारानी ने अपने क्रिसमस संदेश में आधुनिक समाज में खेलों की अहमियत पर ज़ोर दिया है. पूर्व में दिए अपने क्रिसमस संदेशों से उलट इस बार उनके संदेश में अफ़ग़ानिस्तान में तैनात सैनिकों का सीधा ज़िक्र नहीं था हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि सैन्य अभियानों में घायल हुए सैनिकों के पुनर्वास में खेल अहम भूमिका निभा सकते हैं.\n\nSummary:", "target": "पोप बेनेडिक्ट ने अपने क्रिसमस संदेश में उम्मीद जताई है कि दुनिया भर में चल रहे विवादों और संघर्षों का अंत होगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसेंट पीटर्स के बासिलिका से दिए संदेश में उन्होंने इसराइलियों और फ़लस्तीनियों से शांतिपूर्ण तरीके से एक साथ रहने का आग्रह किया. पोप ने सोमालिया, दारफ़ुर और आइवरी कोस्ट में अमन की कामना की. प्राकृतिक विपदाओं से प्रभावित हेती, कोलंबिया, कोस्टा रिका और वेनेज़ुएला के लोगों के लिए उन्होंने प्रार्थना भी की. अपने संदेश में पोप ने चीन के ईसाई समुदाय से कहा कि मुश्किलों के बावजूद वे उम्मीद न खोएँ और हौसला बनाए रखें. सेंट पीटर्स के बाहर पोप का संदेश सुनने के लिए चौराहे पर करीब एक लाख लोग इकट्ठा हुए थे. वहाँ बारिश भी हो रही थी. अमन की अपील पोप बेनेडिक्ट ने कहा, “मैं कामना करता हूँ कि जिस धरती पर ईसा मसीह का जन्म हुआ था वहाँ फिर से उजाला हो ताकि इसराइलियों और फ़लस्तीनियों को प्रेरणा मिले की वे शांति से 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सांसद है और मैं वहाँ भाषण देने नहीं बल्कि अपने सैनिकों से उनकी चिंताएँ सुनने-समझने जा रहा हूँ.\" हाल में अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में अमरीकी सेना के कमांडर इन चीफ़ के तौर पर ओबामा के मुक़ाबले जनता ने रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मेकेन को अधिक पसंद किया है जिसके बाद से ओबामा इस दिशा में सक्रिय हुए हैं. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ओबामा विदेश नीति और सामरिक मामलों में अपनी साख को और मज़बूत करने की कोशिश के तहत ये अहम यात्राएँ कर रहे हैं.\n\nSummary:", "target": "अमरीका की डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के दावेदार बराक ओबामा अफ़ग़ानिस्तान के दौरे पर हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर उनका यह अफ़ग़ानिस्तान का पहला दौरा है. ओबामा अमरीकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ यात्रा पर निकले हैं और वे अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई से भी मिलने वाले हैं. अफ़ग़ानिस्तान के बाद वे इराक़, जॉर्डन, इसराइल, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन का भी दौरा करेंगे. काबुल में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने के बाद वे 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तस्करी में उनकी कथित तौर पर अहम भूमिका बताई जाती है. अभियान जारी चाड की सेना फ्रांस के नेतृत्व वाली सेना के साथ मिलकर माली में इस्लामी चरमपंथियों के साथ संघर्ष कर रही है. चाड टीवी पर आए सेना के एक बयान में कहा गया, “माली में चाड की सेना ने पहाड़ी इलाकों में मुख्य जेहादी केंद्र को पूरी तरह से धवस्त कर दिया है. इसमें कई चरमपंथी मारे गए हैं जिनमें मुख्तार बेलमुख्तार भी हैं.” इस बयान में यह भी कहा गया है कि इस संघर्ष में हथियार, उपकरण और करीब 60 वाहन ज़ब्त किए गए. पश्चिम अफ्रीका में बीबीसी के संवाददाता थॉमस फेसी का कहना है कि अगर उनके मौत की पुष्टि होती है तो इससे माली में इस्लामी चरमपंथ को बड़ा झटका लगेगा. अंतिम चरण इस्लामी चरमपंथी के मारे जाने की ख़बर चाड के राष्ट्रपति इदरीस की उस घोषणा के बाद आई जिसमें उन्होंने कहा था कि उत्तरी माली में सैनिकों ने अलक़ायदा के वरिष्ठ कमांडर अब्देल हामिद अबु ज़ईद को मार दिया है. अबु ज़ईद के मौत की पुष्टि अभी डीएनए के जरिए की जानी है. उनके बारे में यह कहा जाता है कि वह उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में चरमपंथी संगठन अलक़ायदा के दूसरे सबसे बड़े कमांडर थे जो माली में विदेशी सेना के खिलाफ़ संघर्ष कर रहा है. उत्तरी माली में सैन्य अभियान चला रही फ्रांस की सेना ने किसी भी मौत की पुष्टि नहीं की है. शुक्रवार को फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसिस्को ओलांड ने कहा था कि सैन्य अभियान अपने अंतिम चरण में है.\n\nSummary:", "target": "अफ्रीकी देश चाड के सैन्य बलों का कहना है कि वरिष्ठ इस्लामी चरमपंथी मुख्तार बेलमुख्तार को माली में सैनिकों ने मार दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअल्ज़ीरियाई मूल के मुख़्तार बेलमुख़्तार इस्लामी चरमपंथी के तौर पर दो दशक से संघर्ष कर रहे थे चाड के सरकारी टेलीविज़न चैनल ने उनके मौत की घोषणा की है लेकिन किसी अन्य सूत्रों से इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है. मुख्तार बेलमुख्तार अल-क़ायदा के पूर्व नेता रहे हैं और उन पर यह संदेह जताया जाता है कि उन्होंने जनवरी में अल्ज़ीरिया के एक गैस प्लांट पर हमला करने का आदेश दिया था, जहां कम से कम 37 से बंधक मारे गए थे. मिस्टर मार्लबोरो अल्ज़ीरियाई मूल के मुख़्तार बेलमुख़्तार इस्लामी चरमपंथी के तौर पर दो दशक से ज्यादा वक्त से संघर्ष कर रहे थे. उनका यह दावा था कि 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कमांडर अब्देल हामिद अबु ज़ईद को मार दिया है. अबु ज़ईद के मौत की पुष्टि अभी डीएनए के जरिए की जानी है. उनके बारे में यह कहा जाता है कि वह उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में चरमपंथी संगठन अलक़ायदा के दूसरे सबसे बड़े कमांडर थे जो माली में विदेशी सेना के खिलाफ़ संघर्ष कर रहा है. उत्तरी माली में सैन्य अभियान चला रही फ्रांस की सेना ने किसी भी मौत की पुष्टि नहीं की है. शुक्रवार को फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसिस्को ओलांड ने कहा था कि सैन्य अभियान अपने अंतिम चरण में है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 559, "source_item_id": "559", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2000, "clean_index": 498, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:498"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमाओवादियों धमकियों के बीच उनके प्रभाव वाले इलाक़ों में चुनाव करवाना बड़ी चुनौती है. माओवादियों ने ऐसा नहीं करने पर बुरे परिणामों की चेतावनी दी है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ की सरकार को एक पत्र में ये जानकारी दी है. एजेंसियों ने ये चेतावनी भी दी है कि माओवादियों ने बड़े पैमाने पर बस्तर के इलाके में बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव दो चरण में होने हैं. पहला चरण 11 नवम्बर को है जबकि दूसरा चरण 19 नवम्बर को है. दूसरे चरण में ज़्यादातर वो इलाके हैं जहाँ माओवादियों और सुरक्षा बलों में संघर्ष जारी है. केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुए इस पत्राचार में कहा गया है कि माओवादी चुनाव के दिन हेलीकॉप्टरों को भी अपना निशाना बना सकते हैं और मतदान केन्द्रों के आसपास विस्फोट भी कर सकते हैं. वर्ष 2008 में हुए विधानसभा के चुनाव के दौरान माओवादियों ने भारतीय वायुसेना के एक हेलीकाप्टर को निशाना बनाया था जिसमें एक पायलट और सीमा सुरक्षा बल के आठ जवानों की मौत हो गई थी. सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि माओवादी इस तरह के हमले इस बार विधानसभा के चुनाव में दोहरा सकते हैं. मतदान केंद्र स्थानांतरित केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ में चुनाव के लिए केंद्रीय बलों की 400 कंपनियां उपलब्ध कराई हैं. इन्हें ज़्यादातर उन इलाकों में तैनात करने की योजना है जहाँ माओवादियों का नियंत्रण है या फिर जहाँ संघर्ष चल रहा है. माओवादियों ने पहले ही चुनाव के बहिष्कार का आवाहन किया है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि राज्य प्रशासन और चुनाव आयोग सुरक्षा बलों की तैनाती में सावधानी बरत रहे हैं. साल 2008 के विधानसभा चुनावों में भी माओवादी हमले में एक पायलट और एसएसबी के आठ जवान मारे गए थे उनका कहना है कि ये आशंका तो है कि तैनाती के वक़्त माओवादी सुरक्षा बलों पर हमले कर सकते हैं लेकिन मतदान केन्द्रों में प्रतिनियुक्त होने वाले सुरक्षा बल के जवान और मतदान कर्मियों पर ज़्यादा हमले हो सकते हैं. छत्तीसगढ़ में चुनाव कराना किसी जंग लड़ने से कम नहीं है. माओवादियों के बहिष्कार के बीच चुनाव कराना चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती रही है. बस्तर में माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाकों में मतदान केंद्र बनाना भी बहुत मुश्किल काम है. बहिष्कार की वजह से ही ज़्यादातर जंगली इलाकों में मतदान का प्रतिशत नगण्य या कम ही रहता है. सुरक्षा कारणों से इस बार कई मतदान केन्द्रों को दूसरी जगहों पर स्थानांतरित भी किया जा रहा है. बस्तर में तैनात पुलिस अधिकारियों का कहना है कि माओवादियों ने कई इलाकों में पर्चे फ़ेंक कर आम लोगों से मत नहीं डालने की अपील की है. इन पर्चों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रचार नहीं करने की धमकी भी दी गयी है. कुछ इलाकों से पुलिस ने ऐसे कई पर्चे ज़ब्त भी किए हैं. छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इस बार प्रशासन को लगता है चुनाव के पहले और दौरान नक्सली हिंसा में तेज़ी आ सकती है. उनका कहना है, \"ये प्रतिक्रिया स्वाभाविक है क्योंकि पुलिस ने माओवादियों को काफी पीछे धकेल दिया है. लगातार चले अभियानों की वजह से माओवादी काफी कमज़ोर हो गए हैं. यही वजह है कि वो ज़्यादा आक्रामक रूप में सामने आ सकते हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में तैनात सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों से कहा है कि वो चुनावी प्रतिनियुक्ति से खुद को अलग रखें.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमाओवादियों धमकियों के 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द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर ने. दोनों ने तीसरे विकेट के लिए 69 रन जोड़े. सचिन ने कुछ आकर्षक शॉट लगाए. सचिन कैलिस की गेंद पर 44 रन बनाकर आउट हुए. उनके आउट होने के बाद राहुल द्रविड़ के रूप में भारत का चौथा विकेट गिरा. द्रविड़ 32 रन बनाकर कैलिस की गेंद पर ही चलते बने. लक्ष्मण अच्छे फ़ॉर्म में दिख रहे थे और सौरभ गांगुली के साथ उनकी साझेदारी भी महत्वपूर्ण हो रही थी. लेकिन वे भी 28 रन के निजी स्कोर पर एंटिनी की गेंद पर आउट हो गए. खेल ख़त्म होने के समय सौरभ गांगुली 14 रन पर नाबाद थे. एंटिनी और कैलिस ने दो-दो विकेट लिए. पोलक को एक विकेट मिला. पहले टेस्ट मैच में ख़राब मौसम के कारण भी बाधा आई. पिच में नमी के कारण मैच क़रीब डेढ़ घंटे देर से शुरू हुआ. चायकाल के बाद भी बारिश के कारण मैच में रुकावट आई. और आख़िरकार ख़राब रोशनी के कारण जब पहले दिन का खेल रोका गया, उस समय दिनभर में सिर्फ़ 56.5 ओवर ही फेंके गए थे.\n\nSummary:", "target": "दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ पहले टेस्ट के पहले दिन दक्षिण अफ़्रीका के तेज़ गेंदबाज़ों के आगे भारतीय बल्लेबाज़ों की मुश्किल जारी रही. पहले दिन का खेल ख़त्म होने तक भारत ने 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पड़ोसियों के साथ आपसी हितों के बेहतर तालमेल के साथ ही यह अपनी सीमाओं को ज़्यादा सुरक्षित और समृद्ध बना सकेगा.\" हालांकि अख़बार के एक अन्य लेख में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की चेतावनी भी दी गई है. चीनी मीडिया का कहना है कि भारत के मंगल अभियान से अंतरिक्ष दौड़ शुरू होने का ख़तरा है इसमें कहा गया है, \"चीन सरकार और भारत ही अकेले देश नहीं हैं जिनकी अंतरिक्ष में रुचि है. जापान और दक्षिण कोरिया के भी काफ़ी विकसित अंतरिक्ष कार्यक्रम हैं.\" \"अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के असंख्य फ़ायदे हैं, लेकिन चीन और भारत के मामले में क्षेत्रीय तनाव भड़कने का ख़तरा रहता है. इसलिए प्रतियोगिता करने के बजाय सहयोग करने में ज़्य़ादा समझदारी है.\" ग्लोबल टाइम्स कहता है कि भारत में भारी गरीबी के बावजूद इसके मंगल अभियान पर सवाल खड़े होते हैं. गरीबी और उड़ान इसमें कहा गया है, \"भारत को उन देश और विदेश में उन आलोचकों का सामना करना पड़ रहा है, जो चकित हैं कि ऐसे देश में जहां 35 करोड़ से ज़्यादा लोग करीब 77 रुपये प्रतिदिन पर गुज़ारा करते हैं और एक तिहाई लोगों को बिजली की दिक्कत झेलनी पड़ती है- क्या उस देश में अरबों रुपये मंगल की कुछ तस्वीरों के लिए ख़र्च किए जा सकते हैं.\" अख़बार इस मिशन के सामने आने वाली मुश्किलों की भी बात करता है, \"अब तक सिर्फ़ रूस, अमरीका और यूरोपीय यूनियन ही मार्स में पहुंचने में सफल रहे हैं. चीन और जापान समेत दूसरों के प्रयास असफल रहे हैं. इस क्षेत्र में भारत के एशिया में अग्रणी होने का सपना काफ़ी बड़ी महत्वाकांक्षा है.\" पाकिस्तानी अख़बारों ने भी मंगलयान के प्रक्षेपण को पर्याप्त कवरेज दी है. कुछ अख़बारों का कहना था कि भारत का मंगल अभियान पड़ोसी चीन पर केंद्रित है. आर्थिक समाचार पत्र बिज़नेस रिकॉर्डर लिखता है, \"इसरो के इनकार के बावजूद, अभियान के समय से यह अटकलें लग रही हैं कि भारत आर्थिक और सैन्य रूप से अपने से मज़बूत देशों के सामने कुछ साबित करना चाहता है.\" अख़बार भारत में गरीबी के कारण हो रही आलोचना का भी उल्लेख करता है. (बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं. बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें.)\n\nSummary:", "target": "भारत के पहले मंगल अभियान को लेकर चीन के सरकारी मीडिया ने नपी-तुली प्रतिक्रिया दी है, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी है कि अंतरिक्ष दौड़ से क्षेत्रीय तनाव नहीं बढ़ना चाहिए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत के मंगलयान ने मंगलवार सुबह इसरो से सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी थी और वह सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया है लेकिन 2014 में मंगल की कक्षा तक पहुंचने में उसे 300 दिन लगेंगे. चीन के अख़बार, 'दि चाइना डेली' का कहना है कि चीन और भारत को \"अंतरिक्ष प्रतियोगिता\" में पड़ने के बजाय अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में मिलकर काम करना चाहिए. चाइनीज़ अकेडमी ऑफ़ सोशल साइंसेस में दक्षिण एशिया की विशेषज्ञ, ये हेलिन ने अख़बार से कहा कि भारत के मंगल अभियान को भारत की \"बड़ी उपलब्धि\" के रूप में ही लिया जाना चाहिए और इसे बाकी दुनिया की भी प्रशंसा मिलनी चाहिए. वह कहती हैं, \"चीनियों की तरह भारतीयों के भी अंतरिक्ष के सपने हैं.\" क्षेत्रीय तनाव साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के एडिटोरियल में लिखा गया है, \"शक्ति और जीवन से भरपूर चीन के पड़ोसी, स्वाभाविक रूप से विकास और बढ़त की डींगें हांक रहे हैं.\" अख़बार में आगे छपा, \"यह कहा जा सकता है कि आखिरकार चीन 'मिडिल किंगडम कॉंपलेक्स' से बाहर आ रहा है और यह समझ रहा है कि अपने पड़ोसियों के साथ आपसी हितों के बेहतर तालमेल के साथ ही यह अपनी सीमाओं को ज़्यादा सुरक्षित और समृद्ध बना सकेगा.\" हालांकि अख़बार के एक अन्य लेख में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की चेतावनी भी दी गई है. चीनी मीडिया का कहना है कि भारत के मंगल अभियान से अंतरिक्ष दौड़ शुरू होने का ख़तरा है इसमें कहा गया है, \"चीन सरकार और भारत ही अकेले देश नहीं हैं जिनकी अंतरिक्ष में रुचि है. जापान और दक्षिण कोरिया के भी काफ़ी विकसित अंतरिक्ष कार्यक्रम हैं.\" \"अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के असंख्य फ़ायदे हैं, लेकिन चीन और भारत के मामले में क्षेत्रीय तनाव भड़कने का ख़तरा रहता है. इसलिए प्रतियोगिता करने के बजाय सहयोग करने में ज़्य़ादा समझदारी है.\" ग्लोबल टाइम्स कहता है कि भारत में भारी गरीबी के बावजूद इसके मंगल अभियान पर सवाल खड़े होते हैं. गरीबी और उड़ान इसमें कहा गया है, \"भारत को उन देश और विदेश में उन आलोचकों का सामना करना पड़ रहा है, जो चकित हैं कि ऐसे देश में जहां 35 करोड़ से ज़्यादा लोग करीब 77 रुपये प्रतिदिन पर गुज़ारा करते हैं और एक तिहाई लोगों को बिजली की दिक्कत झेलनी पड़ती है- क्या उस देश में अरबों रुपये मंगल की कुछ तस्वीरों के लिए ख़र्च किए जा सकते हैं.\" अख़बार इस मिशन के सामने आने वाली मुश्किलों की भी बात करता है, \"अब तक सिर्फ़ रूस, अमरीका और यूरोपीय यूनियन ही मार्स में पहुंचने में सफल रहे हैं. चीन और जापान समेत दूसरों के प्रयास असफल रहे हैं. इस क्षेत्र में भारत के एशिया में अग्रणी होने का सपना काफ़ी बड़ी महत्वाकांक्षा है.\" पाकिस्तानी अख़बारों ने भी मंगलयान के प्रक्षेपण को पर्याप्त कवरेज दी है. कुछ अख़बारों का कहना था कि भारत का मंगल अभियान पड़ोसी चीन पर केंद्रित है. आर्थिक समाचार पत्र बिज़नेस रिकॉर्डर लिखता है, \"इसरो के इनकार के बावजूद, अभियान के समय से यह अटकलें लग रही हैं कि भारत आर्थिक और सैन्य रूप से अपने से मज़बूत देशों के सामने कुछ साबित करना चाहता है.\" अख़बार भारत में गरीबी के कारण हो रही आलोचना का भी उल्लेख करता है. (बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं. बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 562, "source_item_id": "562", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2878, "clean_index": 501, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:501"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बैठक के बाद सीएम उद्धव ठाकरे मीडिया से मुखातिब हुए. उद्धव ठाकरे ने कहा, ''मैंने अधिकारियों से कहा है कि किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की जो योजनाएँ हैं, मुझे उसकी पूरी जानकारी दी जाए. अगले दो दिनों में महाराष्ट्र सरकार किसानों के लिए बड़े ऐलान करेगी. सरकार किसानों की खुशहाली के लिए काम करेगी.'' ठाकरे सरकार ने रायगढ़ के शिवाजी किले के सरंक्षण के लिए 20 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी है. शिवाजी की रियासत की राजधानी रायगढ़ रहा था और फिलहाल इस किले की हालत बहुत अच्छी नहीं है. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक पत्रकार ने उद्धव ठाकरे से पूछा कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में सेक्यूलर शब्द का इस्तेमाल किया गया है, क्या शिवसेना सेक्युलर हो गई है? इस पर ठाकरे ने कहा, ''सेक्युलर का मतलब क्या है? मैं क्यों जानूं? आप मुझसे पूछ रहे हो न सेक्युलर का मतलब, आप बताओ न सेक्युलर का मतलब क्या है.' समाप्त उद्धव ठाकरे जब ये जवाब दे रहे थे, उसी दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद एनसीपी नेता छगन भुजबल कहते हैं- प्रस्तावना में जो कहा गया है, उसमें सेक्युलर है न...उसे पढ़िए न. इसके बाद उद्धव ठाकरे कहते हैं, ''संविधान में जो कुछ है... वो है.'' शिवसेना और हिंदुत्व इस सवाल से उद्धव ठाकरे साफ़ असहज नज़र आए. संभवत: उद्धव ने इस सवाल की उम्मीद नहीं की होगी. दूसरा ये कि उद्धव ने अब तक अपने घोर राजनीतिक विरोधी रहे कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई है. इसकी कल्पना कुछ वक़्त पहले तक राजनीति के जानकारों ने भी नहीं की होगी. शिवसेना 60 के दशक में अपने गठन के बाद से ही और ख़ासकर 80 के दशक से अपने कट्टर हिंदुत्व की छवि के लिए जानी जाती रही है. वहीं कांग्रेस हमेशा ये दावा करती रही है कि वो एक सेक्यूलर पार्टी है. ऐसे में दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं की पार्टियों के एक साथ आने से ऐसे सवालों का उठना लाज़िमी है. शिव सेना और कांग्रेस किन मुद्दों पर रहे साथ शिव सेना और कांग्रेस सत्ता में कभी साथ नहीं रहे लेकिन कई मुद्दों पर दोनों पार्टियां एक साथ कई रही हैं. शिव सेना उन पार्टियों में से एक है जिसने 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थन किया था. तब बाल ठाकरे ने कहा था कि आपातकाल देशहित में है. आपातकाल ख़त्म होने के बाद मुंबई नगर निगम का चुनाव हुआ तो दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला. इसके बाद बाल ठाकरे ने मुरली देवड़ा को मेयर बनने में समर्थन देने का फ़ैसला किया था. 1980 में कांग्रेस को फिर एक बार शिव सेना का समर्थन मिला. बाल ठाकरे और सीनियर कांग्रेस नेता अब्दुल रहमान अंतुले के बीच अच्छे संबंध थे और ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में मदद की. 1980 के दशक में बीजेपी और शिव सेना दोनों साथ आए तो बाल ठाकरे खुलकर कम ही कांग्रेस के समर्थन में आए लेकिन 2007 में एक बार फिर से राष्ट्रपति की कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को समर्थन दिया ना कि बीजेपी के उम्मीदवार को. शिव सेना ने प्रतिभा पाटिल के मराठी होने के तर्क पर बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया था. पाँच साल बाद एक बार फिर से शिव सेना ने कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को समर्थन दिया. बाल ठाकरे शरद पवार को पीएम बनाने पर भी समर्थन देने की घोषणा कर चुके थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उद्धव ठाकरे ने गुरुवार देर शाम पहली कैबिनेट बैठक की.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बैठक के बाद सीएम उद्धव ठाकरे मीडिया से मुखातिब हुए. उद्धव ठाकरे ने कहा, ''मैंने अधिकारियों से कहा है कि किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की जो योजनाएँ हैं, मुझे उसकी पूरी जानकारी दी जाए. अगले दो दिनों में महाराष्ट्र सरकार किसानों के लिए बड़े ऐलान करेगी. सरकार किसानों की खुशहाली के लिए काम करेगी.'' ठाकरे सरकार ने रायगढ़ के शिवाजी किले के सरंक्षण के लिए 20 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी है. शिवाजी की रियासत की राजधानी रायगढ़ रहा था और फिलहाल इस किले की हालत बहुत अच्छी नहीं है. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक पत्रकार ने उद्धव ठाकरे से पूछा कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में सेक्यूलर शब्द का इस्तेमाल किया गया है, क्या शिवसेना सेक्युलर हो गई है? इस पर ठाकरे ने कहा, ''सेक्युलर का मतलब क्या है? मैं क्यों जानूं? आप मुझसे पूछ रहे हो न सेक्युलर का मतलब, आप बताओ न सेक्युलर का मतलब क्या है.' समाप्त उद्धव ठाकरे जब ये जवाब दे रहे थे, उसी दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद एनसीपी नेता छगन भुजबल कहते हैं- प्रस्तावना में जो कहा गया है, उसमें सेक्युलर है न...उसे पढ़िए न. इसके बाद उद्धव ठाकरे कहते हैं, ''संविधान में जो कुछ है... वो है.'' शिवसेना और हिंदुत्व इस सवाल से उद्धव ठाकरे साफ़ असहज नज़र आए. संभवत: उद्धव ने इस सवाल की उम्मीद नहीं की होगी. दूसरा ये कि उद्धव ने अब तक अपने घोर राजनीतिक विरोधी रहे कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई है. इसकी कल्पना कुछ वक़्त पहले तक राजनीति के जानकारों ने भी नहीं की होगी. शिवसेना 60 के दशक में अपने गठन के बाद से ही और ख़ासकर 80 के दशक से अपने कट्टर हिंदुत्व की छवि के लिए जानी जाती रही है. वहीं कांग्रेस हमेशा ये दावा करती रही है कि वो एक सेक्यूलर पार्टी है. ऐसे में दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं की पार्टियों के एक साथ आने से ऐसे सवालों का उठना लाज़िमी है. शिव सेना और कांग्रेस किन मुद्दों पर रहे साथ शिव सेना और कांग्रेस सत्ता में कभी साथ नहीं रहे लेकिन कई मुद्दों पर दोनों पार्टियां एक साथ कई रही हैं. शिव सेना उन पार्टियों में से एक है जिसने 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थन किया था. तब बाल ठाकरे ने कहा था कि आपातकाल देशहित में है. आपातकाल ख़त्म होने के बाद मुंबई नगर निगम का चुनाव हुआ तो दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला. इसके बाद बाल ठाकरे ने मुरली देवड़ा को मेयर बनने में समर्थन देने का फ़ैसला किया था. 1980 में कांग्रेस को फिर एक बार शिव सेना का समर्थन मिला. बाल ठाकरे और सीनियर कांग्रेस नेता अब्दुल रहमान अंतुले के बीच अच्छे संबंध थे और ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में मदद की. 1980 के दशक में बीजेपी और शिव सेना दोनों साथ आए तो बाल ठाकरे खुलकर कम ही कांग्रेस के समर्थन में आए लेकिन 2007 में एक बार फिर से राष्ट्रपति की कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को समर्थन दिया ना कि बीजेपी के उम्मीदवार को. शिव सेना ने प्रतिभा पाटिल के मराठी होने के तर्क पर बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया था. पाँच साल बाद एक बार फिर से शिव सेना ने कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को समर्थन दिया. बाल ठाकरे शरद पवार को पीएम बनाने पर भी समर्थन देने की घोषणा कर चुके थे. 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कंपनी के बारे में अलग से विचार होगा. इसमें अयोध्या मुद्दे के हल के लिए न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार करने की बात है. न्यूनतम साझा कार्यक्रम के मसौदे के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम, ऐसी घटनाओं की जाँच केंद्रीय एजेंसी से करवाने और मुकदमे विशेष अदालतों में चलाने की बात भी कही गई है. समाचार माध्यमों के अनुसार मसौदे के तहत कट्टरपंथी ताकतों से सख़्ती से निबटने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का आश्वासन दिया गया है.\n\nSummary:", "target": "संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के मसौदे पर काँग्रेस के सहयोगी दलों के विचार लिए जा रहे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार माध्यमों के अनुसार मसौदे में कृषि क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल और बिजली कंपनियों का निजीकरण न करने, रोजग़ार प्रदान करने और सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के लिए कदम उठाने पर ज़ोर दिया गया है. कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का विनिवेश सोच समझकर किया जाएगा लेकिन विदेशी पूँजी निवेश को प्रोत्साहन दिया जाएगा. सार्वजनिक क्षेत्र की उन कंपनियों का निजीकरण पहले 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मोहलत भी केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने उल्फ़ा और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहीं लेखिका इंदिरा गोस्वामी को शुक्रवार को संघर्षविराम आगे न बढ़ाने की सूचना दे दी है. यह फ़ैसला करने से पहले सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने केंद्रीय गृहसचिव वीके दुग्गल के साथ कई बैठकें कीं. इंदिरा गोस्वामी असम के नागरिक समाज की ओर से गठित 'पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप' का नेतृत्व कर रही हैं. यह ग्रुप केंद्र सरकार और उल्फ़ा के बीच मध्यस्थता कर रहा है. इंदिरा गोस्वामी ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि 'पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप' किसी भी पक्ष पर यह दबाव नहीं डाल सकता कि शांतिप्रक्रिया जारी रखा जाए वह केवल संदेश वाहक का काम कर रहा है. इंदिरा गोस्वामी ने बीबीसी से हुई बातचीत में बताया, \"एमके नारायण ने आश्वासन दिया है कि केंद्र सरकार कार्रवाई शुरु करने से पहले कुछ दिन इंतज़ार करेगी.\" माना जा रहा है केंद्र सरकार पर सेना सहित विभिन्न एजेंसियों की ओर से दबाव था कि संघर्षविराम को आगे न बढ़ाया जाए. इन एजेंसियों का कहना था कि संघर्षविराम का उपयोग उल्फ़ा अपनी ताक़त बढ़ाने और पैसा उगाही के लिए कर रहा है.\n\nSummary:", "target": "भारत सरकार ने असम के अलगाववादी गुट उल्फ़ा को साफ़ कह दिया है कि यदि वे सीधी बातचीत का लिखित आश्वासन नहीं देते हैं तो संघर्षविराम आगे नहीं बढ़ेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nप्रतिबंधित संगठन उल्फ़ा के ख़िलाफ़ सुरक्षाबलों की कार्रवाई गत 13 अगस्त को रोक दी गई थी और उसे चार बार आगे बढ़ाया जा चुका था. बुधवार को इसकी अवधि ख़त्म हो गई. केंद्र सरकार के इस निर्णय को असम में चल रही शांतिप्रक्रिया के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. उल्लेखनीय है कि उल्फ़ा माँग कर रहा है कि केंद्र सरकार उनके पाँच शीर्ष नेताओं को रिहा करे जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि पहले उल्फ़ा लिखित में यह आश्वासन दे कि वह केंद्र सरकार के साथ मध्यस्थों की उपस्थिति में सीधी बातचीत करेगा. केंद्र सरकार और उल्फ़ा के प्रतिनिधियों के बीच पहली बातचीत पिछले साल अक्तूबर में शुरू हुई थी. यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम यानी उल्फ़ा ने माँग की थी कि केंद्र सरकार सीधी बातचीत से पहले भारतीय सेना की कार्रवाई पर रोक लगाए. थोड़ी मोहलत भी केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने उल्फ़ा और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहीं लेखिका इंदिरा गोस्वामी को शुक्रवार को संघर्षविराम आगे न बढ़ाने की सूचना दे दी है. यह फ़ैसला करने से पहले सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने केंद्रीय गृहसचिव वीके दुग्गल के साथ कई बैठकें कीं. इंदिरा गोस्वामी असम के नागरिक समाज की ओर से गठित 'पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप' का नेतृत्व कर रही हैं. यह ग्रुप केंद्र सरकार और उल्फ़ा के बीच मध्यस्थता कर रहा है. इंदिरा गोस्वामी ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि 'पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप' किसी भी पक्ष पर यह दबाव नहीं डाल सकता कि शांतिप्रक्रिया जारी रखा जाए वह केवल संदेश वाहक का काम कर रहा है. इंदिरा गोस्वामी ने बीबीसी से हुई बातचीत में बताया, \"एमके नारायण ने आश्वासन दिया है कि केंद्र सरकार कार्रवाई शुरु करने से पहले कुछ दिन इंतज़ार करेगी.\" माना जा रहा है केंद्र सरकार पर सेना सहित विभिन्न एजेंसियों की ओर से दबाव था कि संघर्षविराम को आगे न बढ़ाया जाए. इन एजेंसियों का कहना था कि संघर्षविराम का उपयोग उल्फ़ा अपनी ताक़त बढ़ाने 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लिए काफ़ी ऊँची आवाज़ में बोलना होता है मगर फिर भी उनका डॉक्टरी का जज़्बा अभी ख़त्म नहीं हुआ है. उन्हें अब अधिकतर बातें समझने के लिए बेटे अलीम चंदिरामानी का सहारा लेना पड़ता है. अलीम भी डॉक्टर हैं और वह कहते हैं कि अपने पिता को ही देखकर उन्हें डॉक्टर बनने की प्रेरणा मिली. उनका कहना है कि डॉक्टर चंदिरामानी चाहते थे कि अलीम सर्जन बनें और उसी प्रेरणा को लेकर वह आगे बढ़े. डॉक्टर अलीम इतने समय तक अपने पिता के काम करने के पीछे उनके लेटर पैड पर लिखे बोधवाक्य को बताते हैं. उसमें लिखा था कि 'लोगों की सेवा ही ईश्वर की पूजा' है. इसके अलावा डॉक्टर अलीम के अनुसार उनके पिता ने अपने ज्ञान को कभी पुराना नहीं पड़ने दिया क्योंकि वह हमेशा ही विभिन्न जर्नल पढ़ते रहे. और शायद पढ़ने की उनकी यही रुचि थी जिसकी वजह से वह कई मसलों पर अपने डॉक्टर बेटे और बहू के साथ अक़सर चर्चा करते रहे.\n\nSummary:", "target": "उम्र का सातवाँ दशक पार करते-करते आमतौर पर लोग काम काज करना बंद कर देते हैं मगर कल्पना करिए एक ऐसे डॉक्टर की जो उम्र का शतक पूरा करने पर भी उसी जोश से लोगों के इलाज में लगा रहे.", "probe_text": "Summarize 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अगर उन्होंने लंदन छोड़ने का फ़ैसला किया तो क्यों किया? मैंने तमाम आंकड़ों का अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचा कि ये एक सकारात्मक पहलू है न कि नकारात्मक जैसा कि कुछ सुर्खियां आपको बताने की कोशिश कर रही हैं. गोरे ब्रितानियों के लंदन छोड़ने को आप्रवासियों के चलते मूल निवासियों के पलायन के तौर पर पेश किया जा रहा है, इसमें कुछ सच्चाई भी है लेकिन मेरी समझ से इसे श्रमिक वर्ग की आर्थिक उन्नति और सपनों के पूरा होने के तौर पर देखा जाना चाहिए. पिछले दशक में यानी 2001 से 2011 के बीच लंदन में रहने वाले गोरे ब्रितानियों की संख्या में छह लाख बीस हज़ार की कमी पाई ग.ई लेकिन शेष इंग्लैंड और वेल्स में रहने वाले गोरे ब्रितानियों की संख्या में केवल दो लाख बीस हज़ार की बढ़ोत्तरी हुई. आप पूछ सकते हैं कि बाक़ी चार लाख लोग कहां गए? मेरा मानना है कि जन्म दर में लगातार हो रही गिरावट और ब्रितानियों के देश छोड़कर जाने के कारण ऐसा हुआ है. आर्थिक उन्नति 21वीं सदी के पहले दशक में तमाम ब्रितानी लोगों की नौकरियां चली गई लेकिन उनके घरों में उनका काफ़ी पैसा लगा हुआ था. लेकिन नौकरी जाने के बाद मुआवज़े के तौर पर मिलने वाली एकमुश्त रक़म और पेंशन की रक़म से कई लोगों को फ़ायदा भी हुआ. इसकी वजह से कई ब्रितानी गोरों ने लंदन को छोड़ने का फ़ैसला कर लिया. लंदन पर नज़र दौडा़ने से पता चलता है कि कई मोहल्लों से लोग अपने घरों को छोड़कर जा रहे हैं. लंदन के कई मोहल्लों में आकर बसने वालों में काले अफ़्रीक़ी लोगों की एक बड़ी संख्या है. मेरी मुलाक़ात से विक्टर और विक्टोरिया से हुई जिनके माता-पिता 50 के दशक में घाना से ब्रिटेन आए थे. विक्टर लंदन ट्रांसपोर्ट में काम करते हैं और विक्टोरिया एक नर्स हैं. लंदन से अपने घर बेचकर जाने वाले गोरे ब्रितानियों का फ़ायदा उठाते हुए विक्टर और विक्टोरिया ने लंदन में घर ख़रीद लिया और यहीं बस गए. बदलता माहौल लंदन छोड़कर जाने वाले गोरे ब्रितानी इसेक्स और साउथएंड जैसे शहरों में जाकर बड़े-बड़े घरों में रहने लगे हैं. लंदन के बदलते माहौल के कारण भी कई लोग यहां से पलायन कर रहे हैं. पिछली दो जनगणनाओं से लंदन के सांस्कृतिक माहौल में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखे सकते हैं. कई ब्रितानी गोरों ने इसलिए उस इलाक़े को छोड़ दिया क्योंकि उनके आस-पड़ोस में कई ग़ैर-ब्रितानी या दूसरे मूल के लोग आकर बसने लगे थे जिनका रहन-सहन उनसे बिल्कुल अलग था. पुराने चायख़ानों और रेस्त्रा की जगह अब टेकअवे चिकन शॉप और हलाल सुपरमार्केट खुल गए हैं. लेकिन इससे साथ-साथ एक और बात भी है. 20वीं सदी के मध्य में गंदी बस्तियों से आकर लंदन में बसने वाले गोरे ब्रितानियों ने 21वीं सदी के शुरूआत में लंदन के बाहर बेहतर अवसर पाए. खा़सकर पिछले दशक में आर्थिक उन्नति और मकान की बढ़ती क़ीमतों के कारण अपने घरों को काफ़ी ऊंचे दाम में बेचकर लंदन से बाहर कॉटेज ख़रीदना शुरू कर दिया. इसलिए कहा जा सकता है कि ये अरमानों और उनके सफल होने की कहानी है.\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन की ताज़ा जनगणना के अनुसार लंदन में रहने वाले गोरे ब्रितानी लोग अब वहां अल्पसंख्यक होने लगे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपिछले दशक में तमाम गोरे ब्रितानियों ने लंदन छोड़ा. नए आंकड़ों के मुताबिक़ लंदन में रहने वाले गोरे ब्रितानी लोगों की संख्या लंदन की कुल जनसंख्या की 45 फ़ीसदी रह गई है. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी हैं कि आख़िर वो कहां गए और अगर उन्होंने लंदन छोड़ने का फ़ैसला किया तो क्यों किया? मैंने तमाम आंकड़ों 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कई ब्रितानी गोरों ने लंदन को छोड़ने का फ़ैसला कर लिया. लंदन पर नज़र दौडा़ने से पता चलता है कि कई मोहल्लों से लोग अपने घरों को छोड़कर जा रहे हैं. लंदन के कई मोहल्लों में आकर बसने वालों में काले अफ़्रीक़ी लोगों की एक बड़ी संख्या है. मेरी मुलाक़ात से विक्टर और विक्टोरिया से हुई जिनके माता-पिता 50 के दशक में घाना से ब्रिटेन आए थे. विक्टर लंदन ट्रांसपोर्ट में काम करते हैं और विक्टोरिया एक नर्स हैं. लंदन से अपने घर बेचकर जाने वाले गोरे ब्रितानियों का फ़ायदा उठाते हुए विक्टर और विक्टोरिया ने लंदन में घर ख़रीद लिया और यहीं बस गए. बदलता माहौल लंदन छोड़कर जाने वाले गोरे ब्रितानी इसेक्स और साउथएंड जैसे शहरों में जाकर बड़े-बड़े घरों में रहने लगे हैं. लंदन के बदलते माहौल के कारण भी कई लोग यहां से पलायन कर रहे हैं. पिछली दो जनगणनाओं से लंदन के सांस्कृतिक माहौल में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखे सकते हैं. कई ब्रितानी गोरों ने इसलिए उस इलाक़े को छोड़ दिया क्योंकि उनके आस-पड़ोस में कई ग़ैर-ब्रितानी या दूसरे मूल के लोग आकर बसने लगे थे जिनका रहन-सहन उनसे बिल्कुल अलग था. पुराने चायख़ानों और रेस्त्रा की जगह अब 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1500 लोग लापता हैं. भूस्खलन लेयटे द्वीप के सेंट बर्नड कस्बे के गिनसौगॉन गाँव में आया. पिछले 10 दिनों से यहाँ भारी बारिश हो रही थी. भूस्खलन में बच निकले एक व्यक्ति डेरियो लिबाटन ने कहा, “ऐसा लगा मानो किसी पहाड़ में धमाका हुआ है और उसके बाद सब कुछ ढह गया.” अधिकारियों ने कहा है कि अब तक चार लोगों के शव मिले हैं लेकिन मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका है क्योंकि प्रभावित इलाक़ों तक पहुँचने में दिक्कत हो रही है. तूफ़ान शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक एक स्कूल की इमारत भी भूस्खलन में दब गई है. राहत कार्य में मदद करने के लिए सेना के हेलिकॉप्टर भेजे गए हैं. फ़िलीपींस के रेड क्रॉस के प्रमुख रिचर्ड गॉर्डन ने जीनेवा से कहा है कि लोगों को ढूँढने के लिए मनीला से कुत्तों को बुलाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अमरीकी सेना फ़िलीपींस में अभ्यास के लिए आई हुई है और उम्मीद जताई कि वो राहत कार्यों में मदद करेगी. रिचर्ड गॉर्डन ने बताया, “प्रभावित इलाक़ों तक जाना मुश्किल है क्योंकि वहाँ कीचड़ ही कीचड़ है.” रिचर्ड गॉर्डन के मुताबिक मृतकों की असल संख्या के बारे में देर से ही पता चलेगा. बीबीसी संवाददाता ने बताया है 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है जबकि बाक़ी लोगों की तलाश जारी है. तीन अन्य व्यापारिक जहाज़, जिनमें 700 लोग सवार हैं, वो अरब सागर में खड़े हैं. मुंबई में मौजूद बीबीसी संवाददाता जाह्न्वी मूले ने बताया कि तटरक्षक बल के चेतक हेलिकॉप्टर्स ने गैल कंस्ट्रक्टर जहाज़ से 55 और लोगों को बचा लिया है. इससे पहले आठ लोगों को बचाया गया था. बचाव कार्य जारी हैं. अभी तक कुल 240 लोगों को बचाया जा चुका है. तटीय इलाकों से टकराने के बाद तौक्ते तूफ़ान अब कमज़ोर पड़ गया है लेकिन कम से कम 12 लोगों के मारे जाने की रिपोर्ट हैं. नेवी के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि अरब सागर में फँसे जहाज़ों से लोगों को बचाने के लिए तीन जहाज़ भेजे गए थे. फँसे हुए जहाज़ों में दो मुंबई के सागर तट के पास समंदर में थे जबकि एक गुजरात के सागर तट के पास. समाप्त नेवी के डिप्टी चीफ़ ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, \"पिछले चार दशकों में मैंने ये सबसे चुनौतीपूर्ण खोज और बचाव अभियान देखा है. नेवी के चार जहाज़ इस काम में लगे हुए हैं. मुंबई के सागर तट से 60 किलोमीटर की दूरी पर डूबे एफकॉन्स बार्ज P305 जहाज़ के 261 लोगों की तलाश और बचाव पर हमारा मुख्य मिशन है.\" गुजरात में तीन लोगों की मौत इस बीच गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने मंगलवार को बताया कि तौक्ते तूफ़ान के कारण राज्य में तीन लोगों की मौत हो गई. वापी में एक व्यक्ति की मौत हुई जबकि राजकोट में दीवार गिरने से एक बच्चे की मौत हो गई. गरियाधर में एक बुजुर्ग महिला की भी मौत हुई है. तौक्ते तूफ़ान के कारण राज्य के 1400 कोविड अस्पतालों में 16 की बिजली आपूर्ति बाधित हुई है. हालाँकि इनमें से 12 अस्पतालों में बाद में बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई. चार अस्पतालों में फ़िलहाल जेनरेटर से काम चलाया जा रहा है. राज्य के 2437 गाँवों में भी बिजली सेवाओं पर असर पड़ा है. हालाँकि इनमें से 485 गाँवों में मरम्मती का काम पूरा कर लिया गया है और आपूर्ति शुरू कर दी गई है. गुजरात सरकार ने बताया कि तौक्ते तूफ़ान के कारण 1081 खंभे नष्ट हो गए, 159 सड़कें टूट गईं और 196 सड़कों पर यातायात बंद है. 40 हज़ार से ज्यादा पेड़ गिर गए हैं. तूफ़ान के कारण लगभग 16 हज़ार कच्चे-पक्के घरों को नुकसान पहुँचा है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अरब सागर में आए तौक्ते तूफ़ान के कारण मुंबई के सागर तट के पास एक छोटे जहाज P305 के डूब जाने बाद 90 से ज़्यादा लोग अब भी लापता हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारतीय नौसेना ने बताया कि जहाज पर सवार 270 लोगों में से 177 लोगों को बचा लिया गया है जबकि बाक़ी लोगों की तलाश जारी है. तीन अन्य व्यापारिक जहाज़, जिनमें 700 लोग सवार हैं, वो अरब सागर में खड़े हैं. मुंबई में मौजूद बीबीसी संवाददाता जाह्न्वी मूले ने बताया कि तटरक्षक बल के चेतक हेलिकॉप्टर्स ने गैल कंस्ट्रक्टर जहाज़ से 55 और लोगों को बचा लिया है. इससे पहले आठ लोगों को बचाया गया था. बचाव कार्य जारी हैं. अभी तक कुल 240 लोगों को बचाया जा चुका है. तटीय इलाकों से टकराने के बाद तौक्ते तूफ़ान अब कमज़ोर पड़ गया है लेकिन कम से कम 12 लोगों के मारे जाने की रिपोर्ट हैं. नेवी के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि अरब सागर में फँसे जहाज़ों से लोगों को बचाने के लिए तीन जहाज़ भेजे गए थे. फँसे हुए जहाज़ों में दो मुंबई के सागर तट के पास समंदर में थे जबकि एक गुजरात के सागर तट के पास. समाप्त नेवी के डिप्टी चीफ़ ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, \"पिछले चार दशकों में मैंने ये सबसे चुनौतीपूर्ण खोज और बचाव अभियान देखा है. नेवी के चार जहाज़ इस काम में लगे हुए हैं. मुंबई के सागर तट से 60 किलोमीटर की दूरी पर डूबे एफकॉन्स बार्ज P305 जहाज़ के 261 लोगों की तलाश और बचाव पर हमारा मुख्य मिशन है.\" गुजरात में तीन लोगों की मौत इस बीच गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने मंगलवार को बताया कि तौक्ते तूफ़ान के कारण राज्य में तीन लोगों की मौत हो गई. वापी में एक व्यक्ति की मौत हुई जबकि राजकोट में दीवार गिरने से एक बच्चे की मौत हो गई. गरियाधर में एक बुजुर्ग महिला की भी मौत हुई है. तौक्ते तूफ़ान के कारण राज्य के 1400 कोविड अस्पतालों में 16 की बिजली आपूर्ति बाधित हुई है. हालाँकि इनमें से 12 अस्पतालों में बाद में बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई. चार अस्पतालों में फ़िलहाल जेनरेटर से काम चलाया जा रहा है. राज्य के 2437 गाँवों में भी बिजली सेवाओं पर असर पड़ा है. हालाँकि इनमें से 485 गाँवों में मरम्मती का काम पूरा कर लिया गया है और आपूर्ति शुरू कर दी गई है. गुजरात सरकार ने बताया कि तौक्ते तूफ़ान के कारण 1081 खंभे नष्ट हो गए, 159 सड़कें टूट गईं और 196 सड़कों पर यातायात बंद है. 40 हज़ार से ज्यादा पेड़ गिर गए हैं. तूफ़ान के कारण लगभग 16 हज़ार कच्चे-पक्के घरों को नुकसान पहुँचा है. 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'बस्तर से सोनी सोरी' पेशे से शिक्षिका सोनी सोरी को पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम ज़मानत मिली थी. लेकिन इस सूची में सबसे जाना पहचाना नाम छत्तीसगढ़ की बस्तर लोकसभा सीट से सोनी सोरी का है. उन्हें माओवादियों का समर्थन करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. पेशे से शिक्षिका सोनी सोरी को पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम ज़मानत मिली थी. सोनी सोरी ने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि उन्हें राहत मिलने से आदिवासियों में भी उम्मीद जगी है. इसके अलावा उत्तराखंड की हरिद्वार लोकसभा सीट से कंचन चौधरी भट्टाचार्य को उतारा गया है जो देश की पहली महिला पुलिस महानिदेशक बनीं थीं. साल 1973 के बैच की आईपीएस अधिकारी कंचन 2007 में रिटायर हुईं थीं. कंचन चौधरी इस साल फ़रवरी में आम आदमी पार्टी में शामिल हुईं थीं. 'दूसरी आईपीएस अधिकारी' शाज़िया को पहले सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ मैदान में उतारने की बात की जा रही थी. इसके अलावा उत्तरप्रदेश की गाज़ियाबाद लोकसभा सीट के लिए आम आदमी पार्टी की नेता शाज़िया इल्मी को भी टिकट मिल गया है. पहले शाज़िया को रायबरेली से सोनिया गांधी के सामने खड़ा करने की बात की जा रही थी. गाज़ियाबाद सीट से कांग्रेस ने राज बब्बर को मैदान में उतारा है. आम आदमी पार्टी ने अंडमान निकोबार, दादर और नागर हवेली, दमन और दीव, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, गोवा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से लेकर ओडिशा, राजस्थान और उत्तराखंड तक से अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया है. पार्टी ने अपने सबसे अधिक उम्मीदवार ओडीशा और उत्तर प्रदेश से उतारे हैं. इन दो राज्यों में आम आदमी पार्टी के 10-10 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. पार्टी ने मध्य प्रदेश से सात, महाराष्ट्र से छह, राजस्थान से पांच, उत्तराखंड और छत्तीसग़ढ से तीन-तीन उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आम आदमी पार्टी ने शनिवार को 16वीं लोकसभा के चुनाव के लिए अपनी छठी सूची जारी कर दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n55 नामों की यह सूची जारी होने के बाद अब आप की तरफ से लोकसभा चुनावों के लिए कुल 242 उम्मीदवार हो गए हैं. पार्टी ने इस सूची में पूरे भारत में अपनी ताल ठोकने की तैयारी की है. आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनावों के लिए अपनी छठी सूची में 13 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है. 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'दूसरी आईपीएस अधिकारी' शाज़िया को पहले सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ मैदान में उतारने की बात की जा रही थी. इसके अलावा उत्तरप्रदेश की गाज़ियाबाद लोकसभा सीट के लिए आम आदमी पार्टी की नेता शाज़िया इल्मी को भी टिकट मिल गया है. पहले शाज़िया को रायबरेली से सोनिया गांधी के सामने खड़ा करने की बात की जा रही थी. गाज़ियाबाद सीट से कांग्रेस ने राज बब्बर को मैदान में उतारा है. आम आदमी पार्टी ने अंडमान निकोबार, दादर और नागर हवेली, दमन और दीव, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, गोवा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से लेकर ओडिशा, राजस्थान और उत्तराखंड तक से अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया है. पार्टी ने अपने सबसे अधिक उम्मीदवार ओडीशा और उत्तर प्रदेश से उतारे हैं. इन दो राज्यों में आम आदमी पार्टी के 10-10 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. पार्टी ने मध्य प्रदेश से सात, महाराष्ट्र से छह, राजस्थान से पांच, उत्तराखंड और छत्तीसग़ढ से तीन-तीन उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है. 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'सैनिकों पर फेंकी बोतल' यह हिंसा दोनेत्सक और लुहांस्क क्षेत्रों में यूक्रेन से अलग होने की घोषणा के बाद मार्च में रूस द्वारा मार्च में क्राइमिया इलाके पर कब्ज़ा कर लेने के कारण हुई. रविवार को दोनेत्सक के मध्य में अलगाववादी सेना ने यूक्रेन के सैनिकों को मार्च करवाया. इनके हाथ बंधे हुए थे. समाचार एजेंसी रॉयटर के मुताबिक सड़कों के किनारे पर स्थानीय खड़े लोग भी अस्त-व्यस्त दिख रहे बंधक सैनिकों टिप्पणियाँ कर रहे थे और कुछ लोगों ने उन पर बोतल भी फेंकीं. जब से यह संकट शुरू हुआ है तब से दोनेत्सक लड़ाई का सबसे भारी केंद्र रहा है. यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने बंधक बनाए गए यूक्रेन के सैनिकों की परेड करवाए जाने की निंदा की है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पूर्वी यूक्रेन के दोनेत्सक में रूस समर्थक अलगाववादियों ने बंधक बनाए गए यूक्रेन की सरकार के कई सैनिकों से सड़क पर परेड करवाई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइससे पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेंको ने अलगाववादियों से लड़ने के लिए सेना को पर्याप्त उपकरणों से लैस करने के लिए तीन अरब रूपए ख़र्च करने की घोषणा भी की है. यह घटना यूक्रेन के स्वतंत्रता दिवस पर हुई है. वहीं दूसरी ओर यूक्रेन की सेना और नौसेना ने राजधानी किएफ़ में परेड के और करतब दिखाए. 2009 के बाद से पहली बार यूक्रेन की सेना ने इस तरह की परेड की. यूक्रेन के रूस समर्थक पूर्व राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने इन्हें बंद करवा दिया था. हाल ही के महीनों में सरकार और अलगाववादियों के बीच जारी लड़ाई में 2000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. पूर्वी यूक्रेन में अस्थिरता के कारण लगभग 330,000 से अधिक लोग अपना घर छोड़ चुके हैं. 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धीमी हो सकती है लेकिन यह कहना कि नौकरियों में कटौती हो सकती है, इसका कोई आधार नहीं है.\" शुक्रवार को एसोचैम ने एक बयान जारी कर कहा है कि उनकी रिसर्च टीम अपने ताज़ा सर्वेक्षण का और अधिक विश्लेषण कर रही है, ताकि तात्कालिक संकट का सही विश्लेषण किया जा सके और दूसरे सेक्टरों में नई नौकरियों के अवसरों का भी पता चल सके. पहले का बयान ग़ौरतलब है कि बुधवार को एसोचैम ने कहा था कि स्टील, सीमेंट, सूचना प्रौद्योगिकी, बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग, वित्तीय एवं ब्रोकरेज सर्विसेज़, रियल एस्टेट, निर्माण और उड्डयन क्षेत्रों में नौकरियों में कटौती होने की प्रबल संभावना दिखाई दे रही है. संगठन के अनुसार अधिकतर कंपनियां वैश्विक मंदी के प्रभाव में है और कई कंपनियों ने नौकरियों में कटौती सिर्फ़ दीवाली के कारण रोक रखी है. उल्लेखनीय है कि पिछले एक महीने में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में भूचाल आ गया है और अमरीका में कई बैंक तक डूब गए हैं. इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है जिसे साफ़ तौर पर शेयर बाज़ार में देखा जा सकता है. एसोचैम ने जिन सेक्टरों के नाम गिनाए थे उन सभी सेक्टरों के शेयर तेज़ी से गिरे हैं और 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शुरुआती 10.2 मिलियन डॉलर की बोली से हुई. नीलामी जीतने वाला ख़रीददार ऑक्शन रूम में मौजूद नहीं था. उसने फ़ोन पर बोली लगाई. ऑक्शन हाउस सोथबे में चीनी कलाकृतियों के प्रमुख निकोलस काउ ने इस बर्तन को असाधारण रूप से दुर्लभ करार दिया है. इससे पहले साल 2014 में चीन के ही मिंग राजवंश के दौर का एक शराब का प्याला 36 मिलियन डॉलर की रिकॉर्ड क़ीमत पर बिका था. इसके ख़रीददार बिजनेसमैन ली यिकियान थे. कहा जाता है कि चीन के सबसे रईस लोगों की लिस्ट में शुमार ली यिकियान किसी ज़माने में टैक्सी चलाया करते थे. नेपोलियन के आख़िरी तोहफ़े की नीलामी ईबे पर ख़ास 'ब्रा' की नीलामी रही नाकाम (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आप पूछ सकते हैं कि ऐसी क्या ख़ास बात है इस कटोरी में. चीनी मिट्टी से बनी ये कटोरी एक हज़ार साल पुरानी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nचीन के सांग राजवंश के दौर की ये कटोरी हांगकांग में मंगलवार को रिकॉर्ड क़ीमत पर नीलाम पर हुई है. ख़रीददार ने इसके लिए तकरीबन 38 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और नारेबाजी चल रही थी. राहुल गांधी ज़िंदाबाद के साथ-साथ इलाक़े के कांग्रेसी प्रत्याशी अजय कपूर के लिए भी नारे लगा रहे थे. थोड़ी देर में राहुल का काफ़िला वहाँ आ पहुँचा. पहले बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी पहुँचे, फिर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के जवानों ने सबको धकेल-धकेल कर किनारे किया. राहुल गांधी बस पर सवार थे. तभी पीछे से एक बुजुर्ग से कांग्रेसी कार्यकर्ता काफ़िले के आगे आकर लेट गए. लेकिन सुरक्षाकर्मियों और कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने उन्हें टांग कर वहाँ से हटाया. उस समय इतना शोर-शराबा था कि कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे जैसे किसी तरह राहुल की एक झलक मिल जाए. थो़ड़ी देर में एक बड़ी सी बस में सवार राहुल गांधी वहाँ पहुँचे. बस के अगले दरवाज़े पर सादी वर्दी में सुरक्षाकर्मियों से घिरे राहुल ने हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन स्वीकार किया. कुछ लोग उन पर फूल-मालाएँ फेंक रहे थे, तो कुछ लोग पुष्प-वर्षा कर रहे थे. राहुल-मय माहौल पूरा माहौल राहुल-मय हो गया था. राहुल ने वहाँ किसी से बात नहीं की, बस लोगों का अभिवादन किया. फिर उनका काफ़िला आगे बढ़ गया. लोगों की नारेबाज़ी और राहुल के वहाँ आने से गदगद कांग्रेस प्रत्याशी अजय कपूर ने बीबीसी से कहा, \"पूरे उत्तर प्रदेश में बदलाव की बयार चल रही है. पूरा प्रदेश राहुल गांधी ज़िंदाबाद कर रहा है.\" बड़ी संख्या में कांग्रेसी समर्थक राहुल गांधी के वहाँ से निकलने के बाद भी उत्साह में थे. किदवई नगर में ही रहने वाले स्वदेश शुक्ला का क्या कहना. अब उनकी बात में कितनी सच्चाई है, ये तो पता नहीं, लेकिन विश्वास ज़बरदस्त था. उन्होंने कहा, \"मैं कानपुर में कांग्रेस के प्रत्याशियों को सभी जगह जितवा रहा हूँ. राहुल गांधी के आदेश पर. कानपुर की सभी सीटों पर कांग्रेस पार्टी जीतेगी. राहुल गांधी के आने से जोरदार असर पड़ेगा.\" युवा अंटू सिंह को भी यही लगता है कि राहुल का काफ़ी असर पड़ेगा और कांग्रेस को इसका फ़ायदा भी होगा. उन्होंने कहा, \"हमें तो कांग्रेस को वोट देना है. राहुल गांधी को तो हम कभी भी देख सकते हैं.\" लेकिन वहीं कोने में एक ठेले पर संतरे बेच रहे राजिंदर थोड़े शांत से लगे. बोले कई नेता यहाँ आते हैं, लेकिन ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं हुई. भीड़ मायावती की रैली में भी हो रही है और राहुल के रोडशो में भी भीड़ बहुत थी. सवाल यही है कि क्या इतनी ही भीड़ मतदान केंद्र पर जाएगी और राहुल के प्रभाव से कांग्रेस को मतदान करेगी?\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश में पाँचवें चरण के मतदान के लिए राजनीतिक पार्टियों ने कमर कस ली है. कानपुर में उत्सव जैसा माहौल था, लेकिन सबका ध्यान था राहुल गांधी के रोड शो पर.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकानपुर में राहुल गांधी का रोड शो निकला तो शहर में हर जगह कांग्रेस के झंडे लहरा रहे थे कानपुर में राहुल गांधी का रोड शो निकला. शहर में हर जगह कांग्रेस के झंडे लहरा रहे थे. कई मोटरसाइकिलों, ऑटो, बसों और रिक्शों पर कांग्रेस के झंडे लगाए गए थे. कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का उत्साह देखते ही बन रहा था. जब मैं किदवई नगर विधानसभा क्षेत्र में पहुँचा तो चौक पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और नारेबाजी चल रही थी. राहुल गांधी ज़िंदाबाद के साथ-साथ इलाक़े के कांग्रेसी प्रत्याशी अजय कपूर के लिए भी नारे लगा रहे थे. थोड़ी देर में राहुल का काफ़िला वहाँ आ पहुँचा. पहले बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी पहुँचे, फिर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के जवानों ने सबको धकेल-धकेल कर किनारे किया. राहुल 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अपना पक्ष रखने को कहा है. ग़ौरतलब है कि हज मुसलमानों के पाँच धार्मिक कर्तव्यों में से एक है. अन्य चार कर्तव्य हैं कलमा, रोज़ा, नमाज़ और ज़कात. इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार हर सक्षम और स्वस्थ शरीर वाले मुसलमान को अपने जीवन में एक बार हज ज़रूर करना चाहिए.\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में केंद्र और राज्य सरकार को हज यात्रा पर सब्सिडी बंद करने का निर्देश दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाई कोर्ट के दो सदस्यीय बैंच ने शुक्रवार को अपने आदेश में कहा है कि अगले आदेश तक हज यात्रा पर सब्सिडी न दी जाए. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को इस मामले में छह हफ्ते में अपना जवाब देने को कहा है. ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार हज यात्रा पर जानेवाले प्रति व्यक्ति को हवाई यात्रा में लगभग 20 हज़ार रुपए की सब्सिडी देती है. इसके अलावा राज्य सरकारें हज यात्रियों को हज हाउस जैसी सुविधाएँ भी मुहैया कराती हैं. दरअसल शिव सेना के वीएम शुक्ला ने 1995 में हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी. याचिकाकर्ता की दलील थी कि किसी एक मजहब 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पुष्टि की. इस समझौते के तहत सोशल डेमोक्रेट पार्टी को आठ मंत्री पद मिलेंगे जबकि क्रिश्चियन डेमोक्रेट पार्टी और उसके सहयोगियों को छह पद मिलने की ख़बर है. सोशल डेमोक्रेट पार्टी के एक सूत्र ने बताया कि पार्टी को विदेश, वित्त और क़ानून और न्याय मंत्रालय मिलने की उम्मीद है. एंजेला मर्केल ने कहा है कि दोनों पार्टियों को अब आर्थिक सुधारों और रोज़गार के अवसर मुहैया करवाने पर ध्यान देना होगा. रिपोर्ट के मुताबिक़ गेरहार्ड श्रोडर गठबंधन में शामिल नहीं होंगे. सिंतबर में हुए चुनाव के नतीजे आने के बाद एंजेला मर्केल और गेरहार्ड श्रोडर दोनों ही चांसलर पद की होड़ में थे. चुनाव में एंजेला मर्केल की पार्टी को सिर्फ़ चार सीटें ज़्यादा मिली थीं. इस गठबंधन को दोनों पार्टियों और संसद से मंज़री लेनी होगी. क्रिश्चियन डेमोक्रेट पार्टी और सोशल डेमोक्रेट पार्टी के बीच दूसरे मुद्दों को लेकर बातचीत चल रही है. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि भले ही समझौता हो गया है लेकिन ये सिर्फ़ शुरूआत है और सरकार की भविष्य की नीति पर अभी और बातचीत होगी. जर्मनी में ऐसा गठबंधन सिर्फ़ एक बार साठ के दशक में किया गया था.\n\nSummary:", "target": "जर्मनी में क्रिश्चियन डेमोक्रेट पार्टी और सोशल डेमोक्रेट पार्टी के बीच हुए समझौते के बाद ये तय हो गया है कि एंजेला मर्केल देश की पहली महिला चांसलर होंगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक पत्रकार वार्ता में मार्केल ने दोनों पार्टियों के बीच हुए समझौते की पुष्टि की. इस समझौते के तहत सोशल डेमोक्रेट पार्टी को आठ मंत्री पद मिलेंगे जबकि क्रिश्चियन डेमोक्रेट पार्टी और उसके सहयोगियों को छह पद मिलने की ख़बर है. सोशल डेमोक्रेट पार्टी के एक सूत्र ने बताया कि पार्टी को विदेश, वित्त और क़ानून और न्याय मंत्रालय मिलने की उम्मीद है. एंजेला मर्केल ने कहा है कि दोनों पार्टियों को अब आर्थिक सुधारों और रोज़गार के अवसर मुहैया करवाने पर ध्यान देना होगा. रिपोर्ट के मुताबिक़ गेरहार्ड श्रोडर गठबंधन में शामिल नहीं होंगे. सिंतबर में हुए चुनाव के नतीजे आने के बाद एंजेला मर्केल और गेरहार्ड श्रोडर दोनों ही चांसलर पद की होड़ में थे. चुनाव में एंजेला मर्केल की पार्टी को सिर्फ़ चार सीटें ज़्यादा मिली थीं. इस गठबंधन को दोनों पार्टियों और संसद से मंज़री लेनी होगी. 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वीडियोः जसपाल सिंह और रुबाइयत बिस्वास (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान से 11 लोगों को भारत लाया गया है. ये सभी सिख और हिंदू अफ़ग़ान हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइन्हें भारत सरकार के विशेष विमान के ज़रिए भारत लाया गया. इन लोगों ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास में मदद की अपील की थी. इस ग्रुप के साथ निधान सिंह सचदेव भी भारत पहुंचे. उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में एक हथियारबंद समूह ने अगवाह कर लिया था. वो एक महीने तक उस समूह की कैद में रहे थे. वीडियोः जसपाल सिंह और रुबाइयत बिस्वास (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", 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(तेलंगानाः 700 साल लगे सपना साकार होने में) लक्ष्मण ने कहा कि अलग तेलंगाना राज्य के लिए होने वाले आंदोलन में सानिया मिर्ज़ा ने कभी हिस्सा नहीं लिया. भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने ग्रेटर हैदराबाद नगरपालिका के आने वाले चुनावों के मद्देनज़र अल्पसंख्यक मतों को ध्यान में रखकर यह फ़ैसला किया है. प्रतिक्रिया लेकिन इस पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई है. भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी ने एक पाकिस्तानी से शादी करने के कारण उनकी देशभक्ति पर ही सवाल उठाए हैं लेकिन दूसरी तरफ़ बीजू जनता दल के जय पांडा ने कहा कि चाहे सानिया ने किसी से शादी की हो, वो एक भारतीय नागरिक हैं जिसका सम्मान किया जाना चाहिए. वहीं अन्ना हज़ारे की सहयोगी और भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरन बेदी ने ट्वीट किया, ''सानिया भारत की बेटी हैं, उन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया है.'' मंगलवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने 27 वर्षीय सानिया मिर्ज़ा को एक करोड़ का चेक देते हुए उन्हें राज्य का ब्रांड एंबेसेडर बनाए जाने का नियु्क्ति पत्र सौंपा था. इस मौक़े पर उन्होंने कहा था, \"तेलंगाना को सानिया पर गर्व है जो एक सच्ची हैदराबादी हैं.\" सानिया मिर्ज़ा ने 2003 में जूनियर विंबलडन का ख़िताब जीता था. सफलता और विवाद इन 11 सालों में सानिया भारत की बड़ी खेल हस्ती बन चुकी हैं. महिला डबल्स में उनकी करियर रैंकिंग 6 तक पहुंच गई है. सानिया ने 2013 में अपनी जोड़ीदार कारा ब्लैक के साथ चाइना ओपन जीता था. 2005 में एक कट्टरपंथी इस्लामी समूह ने सानिया मिर्ज़ा के स्कर्ट में टेनिस खेलने को लेकर धमकी दी थी. 2008 में सानिया ने घोषणा की थी कि वे भारत के लिए नहीं खेलेंगी, तब उन पर ऑस्ट्रेलिया के अंदर भारतीय राष्ट्र ध्वज के अपमान का आरोप लगा था. सानिया की कामयाबी के बाद भी भारत में महिला टेनिस खिलाड़ियों का अभाव है. टॉप 500 खिलाड़ियों में महज दो भारत की हैं और दोनों में कोई भी ग्रैंड स्लैम में हिस्सा नहीं लेता. शायद यह भी एक वजह रही हो, जिसके चलते सानिया ने बीते साल हैदराबाद में टेनिस अकादमी शुरू की है. (बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत की स्टार महिला टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा को तेलंगाना का ब्रांड एंबेसेडर बनाए जाने पर उठे विवाद के बीच सानिया ने कहा है कि वो मरते दम तक भारतीय रहेंगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसानिया मिर्जा ने ट्विटर पर लिखा है, ''मुझे इस बात से दुख हो रहा है कि मेरे बारे में एक तुच्छ मुद्दे पर प्रमुख राजनीतिज्ञ और मीडिया अपना क़ीमती वक़्त जाया कर रहे हैं '' उन्होंने लिखा है, ''मेरे दादा-परदादा सदियों से हैदराबाद में रहते आए और जब मैं तीन सप्ताह की थी तो यहां अपने घर आई थी.'' उन्होंने लिखा है, ''मैंने शोएब मलिक से शादी की है, लेकिन मैं भारतीय हूं और अंतिम सांस तक भारतीय ही रहूंगी.'' इससे पहले तेलंगाना विधान सभा में भारतीय जनता पार्टी के नेता के लक्ष्मण ने सानिया मिर्ज़ा को 'पाकिस्तान की बहू' क़रार दिया था और उनको यह सम्मान दिए जाने पर सवाल उठाया था. भाजपा नेता के लक्ष्मण ने कहा था कि सानिया का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था और वह बाद में हैदराबाद में बस गईं थीं, वह यहां की 'स्थानीय निवासी नहीं' हैं. (तेलंगानाः 700 साल लगे सपना साकार होने में) लक्ष्मण ने कहा कि अलग तेलंगाना राज्य के लिए होने वाले आंदोलन में सानिया मिर्ज़ा ने कभी हिस्सा नहीं लिया. भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने ग्रेटर हैदराबाद नगरपालिका के आने वाले चुनावों के मद्देनज़र अल्पसंख्यक मतों को ध्यान में रखकर यह फ़ैसला किया है. प्रतिक्रिया लेकिन इस पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई है. भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी ने एक पाकिस्तानी से शादी करने के कारण उनकी देशभक्ति पर ही सवाल उठाए हैं लेकिन दूसरी तरफ़ बीजू जनता दल के जय पांडा ने कहा कि चाहे सानिया ने किसी से शादी की हो, वो एक भारतीय नागरिक हैं जिसका सम्मान किया जाना चाहिए. वहीं अन्ना हज़ारे की सहयोगी और भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरन बेदी ने ट्वीट किया, ''सानिया भारत की बेटी हैं, उन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया है.'' मंगलवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने 27 वर्षीय सानिया मिर्ज़ा को एक करोड़ का चेक देते हुए उन्हें राज्य का ब्रांड एंबेसेडर बनाए जाने का नियु्क्ति पत्र सौंपा था. इस मौक़े पर उन्होंने कहा था, \"तेलंगाना को सानिया पर गर्व है जो एक सच्ची हैदराबादी हैं.\" सानिया मिर्ज़ा ने 2003 में जूनियर विंबलडन का ख़िताब जीता था. सफलता और विवाद इन 11 सालों में सानिया भारत की बड़ी खेल हस्ती बन चुकी हैं. महिला डबल्स में उनकी करियर रैंकिंग 6 तक पहुंच गई है. सानिया ने 2013 में अपनी जोड़ीदार कारा ब्लैक के साथ चाइना ओपन जीता था. 2005 में एक कट्टरपंथी इस्लामी समूह ने सानिया मिर्ज़ा के स्कर्ट में टेनिस खेलने को लेकर धमकी दी थी. 2008 में सानिया ने घोषणा की थी कि वे भारत के लिए नहीं खेलेंगी, तब उन पर ऑस्ट्रेलिया के अंदर भारतीय राष्ट्र ध्वज के अपमान का आरोप लगा था. सानिया की कामयाबी के बाद भी भारत में महिला टेनिस खिलाड़ियों का अभाव है. टॉप 500 खिलाड़ियों में महज दो भारत की हैं और दोनों में कोई भी ग्रैंड स्लैम में हिस्सा नहीं लेता. शायद यह भी एक वजह रही हो, जिसके चलते सानिया ने बीते साल हैदराबाद में टेनिस अकादमी शुरू की है. 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'हिन्दू खाना... मुस्लिम खाना' यानी खाने में भी विभाजन है. लेकिन शहर में कुछ ऐसे रेस्तरां हैं जहाँ दोनों समुदाय के लोग आते हैं. उन में से एक 'कैफ़े क़ब्रिस्तान' बना है. पूरे कैफ़े में एक दर्जन क़ब्रें हैं. उन्हें हरे रंग से पेंट किया गया है. कैफ़े मुसलमानों का है लेकिन यहाँ खाने सभी समुदाय के लोग आते हैं. मुरदा के ऊपर बना ये कैफ़े शहर की उन कुछ जगहों में से है जहाँ हिन्दू और मुस्लिम का मिलाप होता है. हलाल मीट का वादा, बीजेपी प्रत्याशी से पूछताछ होगी भारत: क़ानूनन कहां-कहां हो सकती है गो हत्या? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खानों के ख़िलाफ मुहिम के बाद लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब बीजेपी सरकार राज्य को शाकाहारी बनाकर ही छोड़ेगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीफ़ बैन पर क्या कहते हैं गुजरात के मुसलमान गुजरात में बीजेपी पिछले 25 साल से सत्ता में है. राज्य में शाकाहारी पहले से काफी बड़ी संख्या में हैं. लेकिन बीजेपी के राज में क्या गुजरात अब पूरी तरह से शाकाहारी राज्य बन गया है? गुजरात को शाकाहारी राज्य समझा जाता है, लेकिन हक़ीक़त ये है कि इसके हर शहर में मीट आसानी से मिल जाता है. यहाँ की 36 प्रतिशत आबादी मांसाहारी है. जिस तरह से अहमदाबाद की आबादी हिंदू-मुस्लिम इलाक़ों में बंट गई है उसी तरह से खान-पान भी हिन्दू खाने और मुस्लिम खाने में बंट गया है. मुस्लिम मोहल्लों में जाएं तो बिरयानी, कबाब और कोरमा मिलेगा जबकि हिन्दू इलाक़ों में ढोकला, भेलपुरी और आलू टिक्की. गुजरात: 'नरेंद्र मोदी समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं' गुजरात के मुसलमानों में लौटता आत्मविश्वास मुसलमानों को बिरयानी यहाँ के मुसलमानों को सरकार से शिकायत नहीं है. फ़रोज़ ख़ान पठान कहते हैं, \"आज गुजरात के मुसलमानों को बिरयानी मिल रही है. अब भैंस के गोश्त का मिले या बकरे के गोश्त का मुसलमान यहाँ का बिरयानी खा रहा है. मोदी के राज में भी खाता था, केशु भाई (गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री) के राज में भी खाता था, आज भी खा रहा है.\" असल में बिरयानी हिन्दुओं को भी मिल रही है. तीन दरवाज़ा पुराने शहर का एक मशहूर इलाक़ा है जहाँ शाम होते ही एक खास गली में छोटे-छोटे रेस्तरां खुलने लगते हैं. गली के अंदर प्रवेश करने से पहले ही कबाब की खुशबू आने लगती है. कबाब से लेकर कोरमा और बिरयानी से लेकर मीट पुलाव सभी चीज़ें यहाँ मिलती हैं. समीउद्दीन की दुकान 40 साल पुरानी है. वो कहते हैं मटन फ़्राई, मटन चाप और कबाब सबसे अधिक बिकने वाले आइटम हैं. गुजरात में कैसा है मुसलमानों का हाल? गोरक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी राज्यों से मांगा जवाब शाकाहारियों का राज्य यहाँ पर आकर खाने वाले हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी. जैसा कि समीउद्दीन ने हमें बताया, \"दोनों धर्म के लोग यहाँ खाने आते हैं. हिन्दुओं की संख्या थोड़ी अधिक होगी.\" यहाँ ऐसा एहसास होता है कि खाने वाले नहीं चाहते कि उन्हें कोई पहचाने. वो सर झुका कर खा रहे होते हैं. एक ने कहा, \"मेरी तस्वीर मत लो. मेरे ऑफ़िस में किसी ने मीट खाते देख लिया तो मेरी नौकरी गई.\" लेकिन किसी भी बड़े रेस्तरां में जाएं तो मीट खाने वालों का चेहरा नीचे नहीं होता. बारबेक्यू नेशन नामी एक रेस्टोरेंट में लोग जम कर मीट खा रहे थे. बारबेक्यू नेशन मुंबई और दिल्ली में भी है. अहमदाबाद में भीड़ और रौनक अधिक नज़र आती है. 37 साल की हुई बीजेपी, जानें 10 अहम तथ्य 'मुल्क की शांति के लिए गोमांस छोड़ें मुसलमान' 'कैफ़े क़ब्रिस्तान' तीन दरवाज़े के क़रीब एक और जगह जहाँ खाने वालों की एक बड़ी भीड़ जमा है. ऐसा लगता है कि सैकड़ों बाराती एक साथ खाने पर टूट पड़े हों. यहाँ देर रात तक खाना मिलता है. ये जगह शाकाहारी लोगों के लिए स्वर्ग है. यहाँ इक्का-दुक्का ही मुस्लिम नज़र आते हैं. 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भारत सरकार नहीं चाहती है कि वो पाकिस्तान से आए इन हिंदुओं का पक्ष लेते हुए नजर आए. दिल्ली की व्यस्त रिंग-रोड के किनारे मजनूं का टीला नामक एक जगह है जहां लगभग आधा दर्जन हिंदू परिवारों ने शरण ली हुई है. ये सभी लोग पिछले साल ही पाकिस्तान से आए थे, लेकिन फिर वापस नहीं गए. क्यों वापस नहीं गए, ये पूछने पर पाकिस्तान के सिंध हैदराबाद इलाके से यहां आए कृष्ण ने बताया, ''मैं वहां मंडी में काम करता था, खेती-किसानी का भी काम करते थे. हम ये सोचकर भारत आए हैं कि हमारे बच्चों की जिंदगी सुधर जाएगी. यहां वे अपने धर्म में सुरक्षित रहेंगे, यहां इन्हें कोई तंग नहीं करेगा. हम पाकिस्तान में रहते तो वहां कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होती. पिछले साल ही तीन-चार डॉक्टरों को मार दिया गया था.'' पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हाल के वर्षों में कई पाकिस्तानी हिंदू परिवारभारत चले गए हैं और उनका आरोप है कि वे हत्या, अपहरण और जबरन धर्मांतरण से बचना चाहते हैं.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के सिंध सूबे में बाढ़ से मची तबाही के बाद बीते साल करीब 150 हिंदुओं का एक जत्था भारत आया था.", "probe_text": 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और गीतकार प्रसून जोशी, राज्यसभा सदस्य सोनल मानसिंह, पंडित विश्व मोहन भट्ट, पल्लवी जोशी, विवेक अग्निहोत्री, रिटायर्ड मेजर जनरल पीके मलिक और फ़िल्मकार मधुर भंडारकर समेत 62 हस्तियों ने एक चिट्ठी लिखी है. इन लोगों ने 49 बुद्धिजीवियों के खत को 'चुनिंदा नाराज़गी और झूठा नैरेटिव' क़रार दिया है. क्या लिखा है ख़त में 23 जुलाई, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे खुले ख़त ने हमें अचंभे में डाल दिया... इसमें देश की चेतना के 49 स्वयंभू रखवालों और अभिभावकों ने अपनी चुनिंदा चिंता व्यक्त की है और साफ़तौर पर राजनैतिक पक्षपात का प्रदर्शन किया है...\" \"हमलोगों ने इस ख़त पर दस्तखत किये हैं. हमारी नज़र में यह चुनिंदा नाराज़गी ग़लत क़िस्से को सच साबित करने के इरादे से व्यक्त की गई है. यह प्रधानमंत्री के अथक प्रयासों को नकारात्मक रूप से दिखाने की कोशिश है.\" \"उस ख़त पर दस्तखत करने वालों ने तब चुप्पी साधी थी जब आदिवासी और हाशिये पर खिसक चुके लोग नक्सलियों का शिकार बन रहे थे. वे उस समय चुप्पी साधे थे जब अलगाववादियों ने कश्मीर में स्कूलों को जलाने का फरमान जारी किया था. वे उस वक्त भी चुप थे जब भारत 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "देश में भीड़ के हाथों बढ़ती हत्याएं के वाक़ये और कथित असहिष्णुता की घटनाओं से चिंतित 49 कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ख़त लिख कर सख़्त क़दम उठाने की मांग की थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइन्होंने मोदी सरकार पर कई तरह के गंभीर सवाल उठाए थे. अब इनके जवाब में 62 अन्य हस्तियों ने पूरे मामले में सरकार बचाव करते हुए पत्र लिखा है. प्रसून जोशी अभिनेत्री कंगना रनौत, भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमुख और गीतकार प्रसून जोशी, राज्यसभा सदस्य सोनल मानसिंह, पंडित विश्व मोहन भट्ट, पल्लवी जोशी, विवेक अग्निहोत्री, रिटायर्ड मेजर जनरल पीके मलिक और फ़िल्मकार मधुर भंडारकर समेत 62 हस्तियों ने एक चिट्ठी लिखी है. इन लोगों ने 49 बुद्धिजीवियों के खत को 'चुनिंदा नाराज़गी और झूठा नैरेटिव' क़रार दिया है. क्या लिखा है ख़त में 23 जुलाई, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे खुले ख़त ने हमें अचंभे में डाल दिया... इसमें देश की चेतना के 49 स्वयंभू रखवालों और अभिभावकों ने अपनी चुनिंदा चिंता व्यक्त की है और साफ़तौर पर राजनैतिक पक्षपात का प्रदर्शन किया है...\" \"हमलोगों ने इस ख़त पर दस्तखत किये हैं. हमारी नज़र में यह चुनिंदा नाराज़गी ग़लत क़िस्से को सच साबित करने के इरादे से व्यक्त की गई है. यह प्रधानमंत्री के अथक प्रयासों को नकारात्मक रूप से दिखाने की कोशिश है.\" \"उस ख़त पर दस्तखत करने वालों ने तब चुप्पी साधी थी जब आदिवासी और हाशिये पर खिसक चुके लोग नक्सलियों का शिकार बन रहे थे. वे उस समय चुप्पी साधे थे जब अलगाववादियों ने कश्मीर में स्कूलों को जलाने का फरमान जारी किया था. वे उस वक्त भी चुप थे जब भारत को तोड़ने की आवाज़ उठी थी.\" इसमें लिखा गया है, \"ऐसा लगता है कि बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर भारत की स्वतंत्रता, एकता और अखंडता को धोखा दिया जा सकता है.\" \"वास्तव में मोदी शासन में हम अलग राय रखने और सरकार और व्यवस्था की आलोचना करने की सबसे अधिक आज़ादी देख रहे हैं. असहमति की भावना अब से ज़्यादा मज़बूत कभी नहीं रही है.\" मॉब लिंचिंग पर क्या बोले इंद्रेश कुमार? कंगना रनौत क्या कहती हैं? इस मामले में अभिनेत्री कंगना रनौत कहती हैं, \"कुछ लोग झूठी कहानी पैदा करने के लिए अपनी ताक़त और पद का दुरुपयोग कर रहे हैं. उनका कहना है कि वर्तमान सरकार में चीज़े ग़लत हो रही हैं जबकि इस देश में पहली बार, चीजें सही दिशा में जा रही हैं. हम एक बड़े बदलाव का हिस्सा हैं, देश की बेहतरी के लिए चीज़ें बदल रही हैं लेकिन कुछ लोग इससे परेशान हैं.\" वो कहती हैं, \"आम लोगों ने अपने प्रतिनिधियों और नेताओं को चुना है, जो उनके फ़ैसले का अनादर करते हैं. ये वो लोग हैं जिनमें लोकतंत्र को लेकर कोई सम्मान नहीं हैं.\" बीजेपी ने लिंचिंग के आरोपियों की मदद की? 49 लोगों ने पीएम को क्या लिखा था? इसी हफ़्ते 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री मोदी को एक खुला ख़त लिखा था, जिस पर फ़िल्म जगत से अनुराग कश्यप, अदूर गोपालकृष्णन, अपर्णा और कोंकणा सेन जैसे बड़े नामों और जाने माने इतिहासकार, लेखक रामचंद्र गुहा ने भी हस्ताक्षर किए थे. उस पत्र में मांग की गई थी कि लिंचिंग की घटनाओं को तुरंत रोका जाए. उस चिट्ठी में लिखा गया था कि मुस्लिम देश की आबादी का 14 फ़ीसदी हैं, लेकिन वो ऐसे 62 फ़ीसदी अपराधों के शिकार बने हैं. चिट्ठी के मुताबिक़ ऐसे 90 फ़ीसदी अपराध मई 2014 के बाद हुए, जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे. 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दर में गिरावट से अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होगा.\" अर्थशास्त्री और आर्थिक सलाहकार डॉक्टर डीएच पाई पानिक्कर का मानना है कि रिजर्व बैंक की इस घोषणा का विधानसभा चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा, \"मैं ये नहीं मानता कि चुनाव के कारण बैंक दर में कमी नहीं की गई है. रिजर्व बैंक स्वतंत्र संस्था है. मुझे लगता है कि यह फ़ैसला गवर्नर का स्वतंत्र फ़ैसला है कि इस समय बैंक दर में कटौती की कोई ज़रूरत नहीं.\"\n\nSummary:", "target": "भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष यानी मार्च 2004 तक की अवधि के लिए अपनी ऋण नीति की समीक्षा घोषित कर दी है जिसमें बैंक ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबैंक ने अपनी ऋण नीति की छमाही समीक्षा में यह भी अनुमान व्यक्त किया है कि अगले छह महीनों में महँगाई में कुछ कमी आएगी. बैंक ने अपनी ऋण नीति में नक़द जमा अनुपात यानी कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) में कोई बदलाव न करने की घोषणा की है. इस समय बैंक दर छह प्रतिशत और सीआरआर साढ़े चार प्रतिशत है. बैंक दर जितनी कम होती है लोगों को क़र्ज़ उसी दर पर 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\"दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में संरक्षणवाद के चिंतित करने वाले लक्षण दिख रहे हैं, इस मामले को हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाएँगे.\" उन्होंने कहा कि सरकार हालत को लेकर बहुत चिंतित है, उन्होंने स्वीकार किया कि पाँच लाख नौकरियों का जाना भयावह स्थिति की पूरी तस्वीर पेश नहीं करता, स्थिति इससे कहीं अधिक गंभीर है. संसद में चर्चा संसद में केंद्रीय श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नांडिस ने बताया कि राज्यों के श्रम मंत्रियों की एक आपात समिति गठित की गई है जो स्थिति पर नज़र रखेगी. कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता गुरुदास दासगुप्ता ने कहा कि निजी क्षेत्र की कंपनियों को चेतावनी दी जानी चाहिए कि वे श्रम का़नूनों का उल्लंघन न करें वरना सरकार कड़ी कार्रवाई करेगी. उन्होंने ये भी माँग की कि निजी कंपनियाँ अगर कम ब्याज दर पर कर्ज़ और अन्य सुविधाएँ चाहती हैं तो उन्हें रोज़गार के मामले में सरकारी निर्देशों का पालन करना होगा.\n\nSummary:", "target": "भारत सरकार ने कंपनियों से कहा है कि वे लोगों को नौकरियों से हटाने से बचें, अगर हालात बहुत बुरे हों तो वेतन में कटौती के उपाय पर विचार करें.", "probe_text": 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हैं. वो अब ऑफिस के लिए सोमवार को ही लौटेंगे. कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी अनिल झा ने बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में कहा, ''शहरी इलाकों में धीमी शुरुआत हुई है, लेकिन दिन में कुछ सुधार हुआ है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि दिन के अंत तक आकड़ों में सुधार आएगा.'' अनिल झा का मानना है कि अगर कुछ लोग हैं जो बिना वोट दिए छुट्टियों पर चले भी गए हैं तो उनकी तादात बहुत ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. ऐसे में एक बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर बंगलौर का वोटर गया कहा? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बदलाव के लिए आंदोलनों से लेकर डिजिटल अभियानों तक, बंगलौर के आईटी जीनियस बेहद सक्रिय दिखते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराजनीतिक चर्चा में शामिल होते हैं और अपनी बात भी रखते हैं, लेकिन लगता है उनका ये जोश वोट देने के मौके पर साथ छोड़ जाता है. बाकी कर्नाटक समेत बंगलौर की चार लोकसभा सीटों पर भी गुरूवार को मतदान हो रहे हैं. ये चार सीटें हैं - बंगलौर उत्तर, बंगलौर सेंट्रल, बंगलौर ग्रामीण और बंगलौर दक्षिण. बंगलौर दक्षिण वो लोकसभा सीट है जहां आईटी क्षेत्र में काम करने वाले ज़्यादातर लोग रहते हैं. कर्नाटक चुनाव आयोग से दोपहर तीन बजे तक के मिले आंकड़ों के मुताबिक बंगलौर दक्षिण में शहर की बाकी तीन सीटों के मुकाबले सबसे कम मतदान हुआ है. ये आंकड़ा 39.25 प्रतिशत है. छुट्टी का असर वहीं बंगलौर ग्रामीण में दोपहर तीन बजे तक 48.3 फ़ीसदी मतदान होने की जानकारी मिली है. पूरे राज्य में तीन बजे तक 47 फ़ीसदी मतदान हुआ है. शहरी इलाकों में धीमे मतदान के पीछे एक कारण जो कई स्थानीय जानकार और मतदाता बता रहे हैं, वो ये है कि शुक्रवार को गुड फ्राइडे की छुट्टी होने के कारण कई लोग चार दिन की छुट्टियों पर घूमने जा चुके हैं. वो अब ऑफिस के लिए सोमवार को ही लौटेंगे. कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी अनिल झा ने बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में कहा, ''शहरी इलाकों में धीमी शुरुआत हुई है, लेकिन दिन में कुछ सुधार हुआ है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि दिन के अंत तक आकड़ों में सुधार आएगा.'' अनिल झा का मानना है कि अगर कुछ लोग हैं जो बिना वोट दिए छुट्टियों पर चले भी गए हैं तो उनकी तादात बहुत ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. ऐसे में एक बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर बंगलौर का वोटर गया कहा? 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'घरेलू कामगार बिल' सांसद धनंजय सिंह की पत्नी जागृति सिंह पर घरेलू सहायिका की हत्या का आरोप है. हालांकि घरेलू कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए कानून 'घरेलू कामगार बिल' तैयार है. मगर यह बिल महिला आयोग के पास पड़ा हुआ है. इस बिल को 2004-2007 के बीच गैरसरकारी संगठनों ने मिलकर तैयार किया था. राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसे स्वीकृति देकर सरकार के पास भेजा था. पर उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. जहां तक प्लेसमेंट एजेंसी पर नियंत्रण रखने की बात थी, उसके लिए दिल्ली सरकार एक बिल लाई, 'प्लेसमेंट एजेंसी बिल'. मगर इस बिल का कोई फायदा नहीं है क्योंकि ये केंद्रीय कानून नहीं है. यह बिल केवल दिल्ली के लिए होगा. जबकि घरेलू कामगारों की नियुक्ति बाहर से की जाती है. इसलिए इसमें ट्रैफिकिंग का भी काफी डर है. राजनीतिक अड़चनें 'प्लेसमेंट एजेंसी बिल' के भी अब प्रभावहीन हो जाने का खतरा पैदा हो गया है क्योंकि नई सरकार इसमें अपने तरीके से बदलाव ला सकती है. हालांकि कल श्रम विभाग ने हाईकोर्ट में कहा है कि चुनाव के बाद हम इस बिल को फिर से लाएंगे. घरेलू कामगार बिल को कानून बनाने में सामाजिक सुरक्षा एक बड़ी समस्या के रूप में उभर कर आ रही है. इसलिए कोशिश ये हो रही है कि घरेलू कामगारों के हितों के लिए अलग से कानून न बनाकर इसे सामाजिक सुरक्षा में शामिल कर लिया जाए. इसका मतलब ये होगा कि घरों में काम करने वाले सामाजिक सुरक्षा के योग्य होगें. वे सरकारी बीमा के भी अधिकारी होंगे. शोषण का आर्थिक पहलू घरेलू काम करने वालों के साथ शारीरिक और मानसिक हिंसा आम है. घरेलू कामगारों का क्षेत्र काफी बड़ा है. यह बहुत सारे कामगारों को रोजगार देता है. इसलिए इस सेक्टर को विशेष कानून की जरूरत है. मगर अफसोस ऐसा अभी तक नहीं हो पाया. काफी बड़ा क्षेत्र होने के कारण शहरों, छोटे कस्बों में इस काम से जुड़ी महिलाओं और बच्चों से जुड़े कोई आंकड़े नहीं हैं. जबकि हाल ये है कि हर घर में एक घरेलू कामगार मौजूद है. इनके शोषण के पीछे एक खास तरह की अर्थव्यवस्था काम करती है. लोग 300-400 या 1000-1200 रुपए जितने मामूली रकम देकर महीने भर काम करवाते हैं. कानून का डर नहीं घरेलू कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए पुख्ता कानून नहीं है. इनके लिए कानून बना तो न्यूनतम मजदूरी का सवाल उठेगा. इससे बचने के लिए सरकार इस ओर कोई तवज्जो नहीं दे रही. घरेलू कामगारों के साथ हिंसा की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. मगर इससे कई गुणा ज्यादा ऐसे मामले हैं जो दर्ज ही नहीं होते हैं. एक तरफ तो हिंसा चारदीवारी के भीतर होने से पता नहीं चलता है. दूसरे लोगों में कानून का डर नहीं है. 'घरेलू कामगार बिल' में प्रावधान है इन कामगारों को 6 दिन के बाद हफ्ते की एक छुट्टी मिलनी चाहिए. मगर इन्हें महीने में मुश्किल से एक या दो छुट्टी ही मिलती है. आखिर वे भी कामगार हैं. अपने कार्यक्षेत्र में जाते हैं. उन्हें भी अन्य कामगारों की तरह सम्मान मिलना चाहिए. मगर ये नहीं हो रहा. घरों में काम करने वालों को हिंसा से बचाने का बस एक ही तरीका है कि एक विशेष कानून बने जो इनकी सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी को सुनिश्चित करे. (बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सांसद के घर में काम करने वाली महिला की हत्या के बाद अब ये सवाल गंभीरता से उठ रहे हैं कि आखिर घरेलू कामगारों के साथ हो रही हिंसा पर रोक कैसे लगाई जाए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत में घरेलू कामगारों को श्रम का बेहद सस्ता माध्यम माना जाता रहा है. इसके अलावा घरेलू श्रम करने वाले इस वर्ग के पास न तो ताकत है, न संगठन और न ही अभिव्यक्ति. सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने कारण लोग इनका फायदा उठाते हैं. घरेलू श्रम असंगठित क्षेत्र में आता है. असंगठित क्षेत्र होने के कारण इनकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है. यदि घर में काम करने वाले किसी महिला के साथ मालिक हिंसा करता है तो ऐसा कोई फोरम नहीं जहां जाकर वे अपनी बात कह सकें, शिकायत कर सकें. 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पूर्व मुख्य न्यायाधीश का काफ़िला वहाँ आने के लिए शहर के दूसरे हिस्से से चला था. धमाका बहुत ज़ोरदार था और उससे आसपास के दुकानों को भारी नुक़सान हुआ है, धमाके की आवाज़ दूर-दूर तक सुनी गई. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हमलावरों ने उस जगह को निशाना बनाया जहाँ विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के समर्थक रैली के लिए इकठ्ठा हुए थे. मक़सद स्पष्ट नहीं इफ़्तिख़ार चौधरी पाकिस्तान में राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के विरोध का प्रतीक बनते जा रहे हैं और उनकी लोकप्रियता भी बढ़ रही है. अगले कुछ दिनों के भीतर ही पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट जस्टिस चौधरी के निलंबन पर फ़ैसला सुनाने वाला है. इस्लामाबाद स्थित बीबीसी संवाददाता का कहना है कि वकीलों की सभा में आत्मघाती हमले का क्या मक़सद हो सकता है, यह स्पष्ट नहीं है. हाल ही में लंदन में हुई बातचीत में पीपीपी ने मुशर्रफ़ का विरोध कर रहे इस्लामी दलों से अपने आप को अलग कर लिया था. पीपीपी ने पिछले हफ़्ते लाल मस्जिद में सैन्य कार्रवाई का भी समर्थन किया था.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में निलंबित मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी 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ने गुमसुरी गाँव से युवकों, महिलाओं और बच्चों को अगवा किया है. ये घटना रविवार की है, लेकिन इसका पता गुरुवार को उस समय चला, जब ये व्यक्ति उनके चंगुल से बचकर मैदुगुरी शहर पहुँचा. इस व्यक्ति ने बताया कि जब वे अपने गाँव पहुँचे तो उन्होंने 33 लोगों को शव को दफ़नाने में मदद की और घर-घर जाकर ये पता करने की कोशिश की कि कितने लोग लापता है. समाप्त इस व्यक्ति के बयान की पुष्टि एक स्थानीय अधिकारी ने बीबीसी हौसा से की है. हमला बोको हराम के हमले में घायल एक व्यक्ति (फाइल फोटो) इस बीच समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ कैमरुन की सेना ने कहा है कि उन्होंने 116 नाइजीरियाई चरमपंथियों को मार दिया है, जिन्होंने उसके ठिकाने पर हमला किया था. लोगों ने बीबीसी को बताया है कि हथियारबंद चरमपंथियों ने अमचिदे के सीमावर्ती शहर पर बुधवार को हमला किया. ये चरमपंथियों दो गाड़ियों पर सवार थे और कई पैदल भी थे. उन्होंने बाज़ार के इलाक़े पर हमला किया और दुकानों के साथ-साथ 50 से ज़्यादा घरों को आग लगा दी. अभी तक किसी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन अधिकारियों ने इस हमले के लिए बोको हराम के चरमपंथियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. सिर्फ़ इस साल चरमपंथी हिंसा में दो हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. इनमें से ज़्यादातर लोग पूर्वोत्तर नाइजीरिया में मारे गए, जो कैमरून से लगा सीमावर्ती इलाक़ा है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नाइजीरिया में बोको हराम के संदिग्ध चरमपंथियों ने 33 लोगों की हत्या कर दी है और कम के कम 100 लोगों को अगवा कर लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवहाँ से बचकर भाग आए एक व्यक्ति ने बीबीसी को ये जानकारी दी है. उन्होंने बीबीसी को बताया कि बोको हराम के संदिग्ध चरमपंथियों ने गुमसुरी गाँव से युवकों, महिलाओं और बच्चों को अगवा किया है. ये घटना रविवार की है, लेकिन इसका पता गुरुवार को उस समय चला, जब ये व्यक्ति उनके चंगुल से बचकर मैदुगुरी शहर पहुँचा. इस व्यक्ति ने बताया कि जब वे अपने गाँव पहुँचे तो उन्होंने 33 लोगों को शव को दफ़नाने में मदद की और घर-घर जाकर ये पता करने की कोशिश की कि कितने लोग लापता है. समाप्त इस व्यक्ति के बयान की पुष्टि एक स्थानीय अधिकारी ने बीबीसी हौसा से की है. हमला बोको हराम के हमले में घायल एक व्यक्ति (फाइल फोटो) इस बीच समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ कैमरुन की सेना ने कहा है कि उन्होंने 116 नाइजीरियाई चरमपंथियों को मार दिया है, जिन्होंने उसके ठिकाने पर हमला किया था. लोगों ने बीबीसी को बताया है कि हथियारबंद चरमपंथियों ने अमचिदे के सीमावर्ती शहर पर बुधवार को हमला किया. ये चरमपंथियों दो गाड़ियों पर सवार थे और कई पैदल भी थे. उन्होंने बाज़ार के इलाक़े पर हमला किया और दुकानों के साथ-साथ 50 से ज़्यादा घरों को आग लगा दी. अभी तक किसी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन अधिकारियों ने इस हमले के लिए बोको हराम के चरमपंथियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. सिर्फ़ इस साल चरमपंथी हिंसा में दो हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. इनमें से ज़्यादातर लोग पूर्वोत्तर नाइजीरिया में मारे गए, जो कैमरून से लगा सीमावर्ती इलाक़ा है. 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एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "हाल के महीनों में दो शब्द चीन के आधिकारिक दस्तावेजों और नेताओं के बयानों में प्रमुखता से सुनाई पड़ रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये दो शब्द हैं 'डबल सर्कुलेशन.' यह एक तरह की आर्थिक रणनीति है जो एक 'संभावित बड़े बदलाव' की ओर इशारा करता है. मई के महीने में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसका प्रस्ताव रखा था और फिर अक्टूबर के महीने में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमिटी की सलाना बैठक में इस पर बात होने की उम्मीद थी. इस बैठक में अगले पांच सालों के लिए निर्धारित किए गए लक्ष्य को लेकर विचार-विमर्श हुआ. स्टोरीः तमारा गिल आवाज़ः भरत शर्मा वीडियो एडिटः दीपक जसरोटिया (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": 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हैं. ग्रीस के प्रधानमंत्री ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया है और कहा है कि इस आपात स्थिति से निपटने के लिए देश को हर संभव संसाधन जुटाने होंगे. देश के नाम संदेश में उन्होंने कहा, \"एक साथ कई जगह आग लग रही है, ये इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता.\" अग्निशमन दल का कहना है कि कई नई जगहों पर शनिवार को आग लगी है और नासा के उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि नई जगहों से धुँआ उठ रहा है. आपातकाल टेलीवीज़न पर बोलते हुए लामबेती गाँव से एक महिला ने कहा, \"हम यहाँ ज़िंदा ही जल जाएँगे.\" ज़हारो कस्बा सबसे ज़्यादा प्रभावित है और यहाँ करीब 39 लोगों की मौत हो चुकी है. कई जगहों से बेहद दर्दनाक किस्से सामने आ रहे हैं. एक जगह चार बच्चे और उनकी माँ ज़िंदा जल गए और पाँचों ने एक दूसरे को पकड़ा हुआ था. ग्रीस के प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस घटना का ज़िक्र करते हुए कहा,\" मैं उस माँ के बारे में सोच रहा हूँ जो अपने बच्चे के आस-पास बाहें डाले मर गई.\" ग्रीस में इस बार बेहद गर्मी पड़ी ही और तापमान करीब 40 डिग्री के आसपास है.\n\nSummary:", "target": "ग्रीस के प्रधानमंत्री कोस्टास कैरामानलिस ने कहा है कि ऐसा लगता है कि 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हो, एक में हो सकता है आईबी के जासूस हों. तो ऐसा लगता है कि चार या पांच घेरे भारत की सुरक्षा एजेंसियों के है इसलिए ये सात स्तरीय हो गई है. आवश्यकता इस बात की है कि इन सातों में तालमेल होना चाहिए. बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश के वक्त परिस्थितयां अलग थी. उस वक्त वे एक राजकीय यात्रा पर आए थे और उस वक़्त उनकी सरकारी व्यस्तताएँ थीं. अभूतपूर्व लेकिन राष्ट्रपति ओबामा राजपथ पर परेड के दौरान कम से कम डेढ़ घंटे तो बैठेंगे ही इसलिए डेढ़ घंटे अमरीकी राष्ट्रपति का खुले में बैठना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. इस मायने में उनकी सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व है जिस तरह से भारत में चरमपंथी हमलों का ख़तरा बना रहता है उससे यह जरूरी भी है. ऐसी सुरक्षा व्यवस्था हर उस जगह पर होगी जहां ओबामा होंगे या गुज़रेंगे. (बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र से बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी राष्ट्रपति के भारत दौरे को लेकर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबताया गया है कि उनके चारों ओर सात परत वाली सुरक्षा होगी. कैसी होती है 'सेवन लेयर सिक्यूरिटी', बता रहे हैं सुरक्षा मामलों के जानकार और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह. आम तौर पर सात स्तरों की सुरक्षा नहीं होती है लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति आ रहे हैं इसलिए भारतीय और अमरीकी, दोनों सुरक्षाकर्मियों का घेरा उनके चारों ओर होगा. ये दोनों मिलाकर सात हो रहे हैं. इन सात घेरों में कहाँ कौन तैनात होगा, ये तो भारत सरकार ने नहीं बताया है और बताना भी नहीं चाहिए. समाप्त ये एक तरह का चक्रव्यूह है जिसे पार करके ही कोई ओबामा तक पहुंच सकता है. इस चक्रव्यूह में किस स्तर पर किसे रखा गया है इसकी जानकारी गोपनीय रखी जाती है. तालमेल आम तौर पर एक बाहरी सुरक्षा घेरा होता है एक बीच का होता है और एक अंदरूनी होता है. यही तीन घेरे होते हैं. ओबामा के लिए सात सुरक्षा चक्र हैं जिसमें दो तो ज़रूर ही अमरीकी स्पेशल एजेंटों का घेरा होगा. भारत कुछ अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए इसे तीन से बढ़ाकर पांच कर दिया है जिसमें हो सकता है एक में एनएसजी हो, एक में पारामिल्ट्री फोर्स हो, एक में दिल्ली पुलिस हो, एक में हो सकता है आईबी के जासूस हों. तो ऐसा लगता है कि चार या पांच घेरे भारत की सुरक्षा एजेंसियों के है इसलिए ये सात स्तरीय हो गई है. आवश्यकता इस बात की है कि इन सातों में तालमेल होना चाहिए. बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश के वक्त परिस्थितयां अलग थी. उस वक्त वे एक राजकीय यात्रा पर आए थे और उस वक़्त उनकी सरकारी व्यस्तताएँ थीं. अभूतपूर्व लेकिन राष्ट्रपति ओबामा राजपथ पर परेड के दौरान कम से कम डेढ़ घंटे तो बैठेंगे ही इसलिए डेढ़ घंटे अमरीकी राष्ट्रपति का खुले में बैठना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. इस मायने में उनकी सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व है जिस तरह से भारत में चरमपंथी हमलों का ख़तरा बना रहता है उससे यह जरूरी भी है. ऐसी सुरक्षा व्यवस्था हर उस जगह पर होगी जहां ओबामा होंगे या गुज़रेंगे. 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न्यायपालिका को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. उत्सव बैंस ने हलफ़नामे में यह दावा किया था कि उन्हें चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला का केस लड़ने और इस बारे में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने के लिए रिश्वत का प्रस्ताव दिया गया था. बैंस का कहना है कि चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई पर ये आरोप 'साज़िश' के तहत लगाए गए हैं ताकि वो अपने पद से इस्तीफ़ा दे दें. सुनवाई के दौरान गुरुवार को जस्टिस अरुण मिश्रा उन्होंने कहा, \"पिछले तीन-चार साल से इस संस्थान (शीर्ष अदालत) के साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है जैसे कि ये ख़त्म होने वाला है. इस देश के लोगों को सच का पता चलना चाहिए. हम सच्चाई का पता लगाएंगे. क्या ताक़तवर लोगों को लगता है कि वो इस देश को चला सकते हैं?\" सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई पर उनकी पूर्व जूनियर असिस्टेंट ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. आरोप लगाने वाली महिला ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के सभी 22 जजों को एक चिट्ठी भेजी थी जिसमें जस्टिस गोगोई पर यौन उत्पीड़न करने, इसके लिए राज़ी न होने पर नौकरी से हटाने और बाद में उन्हें और उनके परिवार को 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जाता है. इकेबाना कला चीन से जापान आई. कहते हैं कि छठी शताब्दी में ओनो नो इमोको ने चीन के राज दरबार का तीन बार दौरा किया और वहीं फूल सजाने की कला सीखी. जब वो जापान लौटे तो उन्हें क्योतो के बौद्ध मंदिर का संरक्षक नियुक्त किया गया. वो एक छोटे से घर में रहा करते थे जिसे इकेनोबो कहा जाता था, यानी तालाब के किनारे बनी झोंपड़ी. वहाँ उन्होंने इस कला को और परिष्कृत किया. और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी जापानी गुरुओं ने इसमें महारत हासिल की. अब जापान में इकेबाना की अनेक शैलियाँ प्रचलित हैं, लेकिन सबसे पुरानी शैली को इकेनोबो नाम से ही जाना जाता है. जालंधर, पंजाब से सत्य प्रकाश बंसल ने पूछा है कि टेनिस के खेल में वाइल्ड कार्ड का क्या अर्थ है? टेनिस की प्रतियोगिताओं के आयोजकों को ये अधिकार होता है कि वो कुछ प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए स्वयं चुनें. विंबलडन जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में 128 खिलाड़ी अपने प्रदर्शन के आधार पर जगह पाते हैं और 8 वाइल्ड कार्ड पर आयोजक ऐसे खिलाड़ियों को शामिल करते हैं जो किसी कारणवश चुने नहीं जा सके हों या जिन्हें आयोजक प्रोत्साहन देना चाहते हों. वर्ष 2001 की विंबलडन प्रतियोगिता वाइल्ड कार्ड पर शामिल हुए गोरान इवानिसेविच ने जीती थी. ब्रिटेन से कुल कितने वायसराय भारत आए. लॉर्ड केनिंग कौन से वाइसराय थे? रहमान गंड, किशनगंज, बिहार से नारायण कुमार सिंह. भारत का गवर्नर जनरल ब्रिटिश प्रशासन का प्रमुख होता था. यह पद 1773 में शुरू किया गया. गवर्नर जनरल को वायसराय भी कहा जाता था. भारत के पहले गवर्नर जनरल थे वॉरैन हेस्टिंग्स और अंतिम चक्रवर्ती राजगोपालाचारि. लॉर्ड कैनिंग 1856 से 1862 तक वायसराय रहे. कठोर जल को लगातार पीने से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जानना चाहते हैं गंग किशोर, बलिया, उत्तर प्रदेश से धर्मेन्द्र कुमार राय. कठोर जल उसे कहा जाता है जिसमें कैल्शियम और मैगनीशियम की मात्रा अधिक होती है. वर्षा का पानी जब चट्टानों और मैदान से होकर गुज़रता है तो उसमें ये खनिज घुलते जाते हैं. विभिन्न अनुसंधानों से ये पता चला है कि अगर आपके आहार में कैल्शियम अधिक है तो आपकी हड्डियाँ मज़बूत रहेंगी. जहाँ तक मैगनीशियम का सवाल है उससे मांसपेशियों की कमज़ोरी, अवसाद और ऊँचाई के डर को रोका जा सकता है. अगर हमारे शरीर में मैगनीशियम की कमी हो जाए तो उससे हमारा विकास धीमा पड़ जाता है, हमारे गुरदे प्रभावित होते हैं और हमारे बाल झड़ने लगते हैं. इसलिए कठोर जल का सेवन स्वास्थ्य के लिए हितकर ही है. हाँ, इससे हमारी त्वचा रूखी ज़रूर हो जाती है और हमारे बालों को भी ये नुक़सान करता है.\n\nSummary:", "target": "फूल सजाने की जापानी कला को किस नाम से पुकारा जाता है और इसका क्या अर्थ है. ये सवाल पूछा है, ग्राम रानौं, चमोली गढ़वाल उत्तरांचल से प्रियंका और रश्मि भंडारी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफूल सजाने की जापानी कला को इकेबाना कहा जाता है. इसमें आकाश, पृथ्वी और मानवजाति इन तीन तत्वों का एक संतुलित ढंग से प्रतिनिधित्व किया जाता है. इकेबाना कला चीन से जापान आई. कहते हैं कि छठी शताब्दी में ओनो नो इमोको ने चीन के राज दरबार का तीन बार दौरा किया और वहीं फूल सजाने की कला सीखी. जब वो जापान लौटे तो उन्हें क्योतो के बौद्ध मंदिर का संरक्षक नियुक्त किया गया. वो एक छोटे से घर में रहा करते थे जिसे इकेनोबो कहा जाता था, यानी तालाब के किनारे बनी झोंपड़ी. वहाँ उन्होंने इस कला को और परिष्कृत किया. और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी जापानी गुरुओं 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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी क़ीमतें बढ़ाने के फ़ैसले पर सवाल उठाए हैं. पार्टी नेता प्रकाश करात ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि तेल डीज़ल और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने के फ़ैसले का समय सही नहीं है. उनका कहना था कि इस फ़ैसले से मंहगाई बढ़ेगी और आम आदमी पर और बोझ बढ़ेगा. वामपंथी दलों ने इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करने की भी मांग की है.\n\nSummary:", "target": "भारत में पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने के केंद्र सरकार के फैसले की जहां विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी आलोचना की है वहीं सरकार के सहयोगी वामपंथी दलों ने भी फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिल्ली में एक बयान जारी कर भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि कांग्रेस ने वामपंथियों के साथ मिलकर आम आदमी को करारी चोट पहुंचाई है. भाजपा का कहना है कि पिछले छह महीनों में चौथी बार पेट्रोल की कीमतें बढ़ाई गई हैं. जिससे आम आदमी की हालत ख़राब हो रही है. रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाए जाने के बारे में पार्टी का कहना था कि यह पहले से ही परेशान आम जनता को धीमा ज़हर 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पकड़ पाएंगे.\" इंजीनियरिंग की छात्रा अपूर्वा प्रकाश कहती हैं, \"अपराधी भले ही पकड़ में न आएँ पर इस तरह साइकिल चलाने से इन कॉंस्टेबलों की तोंद और वजन ज़रूर कम हो जाएगा.\" जहाँ तक पुलिसकर्मियों की बात है अपराध को रोकना तो अपनी जगह है, उनके लिए यह एक खुशी की बात इस लिहाज से भी है कि उन्हें घर आने-जाने में सुविधा हो गई है. नाम न बताने की शर्त पर 48 वर्षीय एक कांस्टेबल ने बताया, \"सच पूछिए तो अब साइकिल चलाने की उम्र भी नहीं रही और न ही आदत. और अब तो डाकिया भी बाइक से आता है.\" ग़ौरतलब है कि तीन साल पहले भी राज्य में मोटरसाइकिल स्कवॉड 'चीता' का गठन किया गया था लेकिन अपराध की रोकथाम में उसे भी ज़्यादा सफल नहीं पाया गया था.\n\nSummary:", "target": "देहरादून में पुलिसकर्मी इन दिनों बड़ी संख्या में साइकिल चलाते नज़र आ रहे हैं. हाँ मगर ऐसा कोई वर्जिश या व्यायाम के लिए नहीं बल्कि अपराधियों को पकड़ने के लिये चलाई जा रही एक अनूठी कसरत के लिए है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुबह होते ही सैकड़ों पुलिस कांस्टेबल अपने-अपने थाने से साइकिल उठाकर ड्यूटी पर निकल पड़ते 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इस घटना में जाति आधारित रंज़िश या गैंगवार की संभावना को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया है. उन्होंने कहा कि यह घटना पंचायत चुनाव लड़ रहे दो उम्मीदवारों से जुड़ी हो सकती है और एक दो दिन पहले एक उम्मीदवार के समर्थकों की पिटाई हुई थी. पुलिस के अनुसार बदले की कार्रवाई के दौरान एक दल ने अहाते में बैठे अनजान लोगों पर फायरिंग करनी शुरु कर दी और नौ लोगों की मौत हो गई. पंचायत चुनाव के दूसरे दौर में अलग अलग घटनाओं में पांच अन्य लोगों की भी मौत हुई है. इससे पहले सोमवार को भी पंचायत चुनाव के पहले दौर में हिंसा हुई थी और दस से अधिक लोग मारे गए थे. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इन घटनाओं की कड़ी आलोचना की है और इसके लिए राज्य सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है. सिंह का कहना था कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की मांगों के अनुसार हर संभव सहायता उपलब्ध कराई थी और इसके बावजूद हिंसा होना दुखद है.\n\nSummary:", "target": "बिहार में पंचायत चुनावों के दूसरे दौर में नालंदा में हुई हिंसा में 14 लोगों की मौत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनालंदा के सरमेरा थाना क्षेत्र में नौ लोगों को गोली मार दी गई. पुलिस का कहना है कि यह घटना आपसी बदले की कार्रवाई में हुई है और इसका संबंध चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों से है. नालंदा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अनिल सिन्हा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सरमेरा थाना क्षेत्र में हुई घटना में दो लोगों ने अंधाधुंध फायरिंग की जिसमें नौ लोगों की एक ही स्थान पर मौत हो गई. सिन्हा ने इस घटना में जाति आधारित रंज़िश या गैंगवार की संभावना को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया है. उन्होंने कहा कि यह घटना पंचायत चुनाव लड़ रहे दो उम्मीदवारों से जुड़ी हो सकती है और एक दो दिन पहले एक उम्मीदवार के समर्थकों की पिटाई हुई थी. पुलिस के अनुसार बदले की कार्रवाई के दौरान एक दल ने अहाते में बैठे अनजान लोगों पर फायरिंग करनी शुरु कर दी और नौ लोगों की मौत हो गई. पंचायत चुनाव के दूसरे दौर में अलग अलग घटनाओं में पांच अन्य लोगों की भी मौत हुई है. इससे पहले सोमवार को भी पंचायत चुनाव के पहले दौर में हिंसा हुई थी और दस से अधिक लोग मारे गए थे. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इन घटनाओं की कड़ी आलोचना की है और इसके लिए राज्य सरकार को 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(ओलंपिक में भारत की वापसी) शिवा केशवन कहते हैं, \"इससे पहले मैं स्वतंत्र ओलंपिक भागीदार के तौर पर यहां था. आख़िरकार अब हम अपना तिरंगा यहां लहरा पाएंगे, यह हमारे लिए बड़े गर्व की बात है.\" शीतकालीन ओलंपिक खेलों में विशेष समारोह के दौरान कल भारतीय ध्वज फहराया गया. समारोह में इन तीनों भारतीय खिलाड़ियों के अलावा भारतीय ओलंपिक संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष एन. रामचंद्रन और अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के पदाधिकारियों ने भाग लिया. निलंबन हटा अब भारतीय खिलाड़ी 23 फ़रवरी को शीतकालीन खेलों के समापन समारोह में तिरंगा लेकर चल सकेंगे. उल्लेखनीय है कि पिछले दिनो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारतीय ओलंपिक संघ पर लगाया गया निलंबन हटा दिया था. (नारायण रामचंद्रन बने नए अध्यक्ष) भारतीय ओलपिंक संघ के पदाधिकारियों पर चुनाव में घांघली और भ्रष्ट्राचार के गंभीर आरोप थे जिसके बाद क़रीब 14 महिने पहले अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारतीय ओलंपिक संघ को निलंबित कर दिया था. सोची शीतकालीन ओलंपिक सात फ़रवरी को शुरू हुए थे जबकि भारतीय ओलंपिक संघ के पदाधिकारियों के नए चुनाव नौ फ़रवरी को हुऐ और उसके दो दिन बाद ही भारत का निलंबन समाप्त हो गया. इसके साथ ही खेल गांव में भारतीय ध्वज तिरंगे के लहराने का रास्ता भी साफ़ हो गया. भविष्य की योजनाएँ जबकि इससे पहले निलंबन के दौरान भारतीय खिलाड़ी दुनिया भर की अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के झंडे के नीचे प्रदर्शन कर रहे थे. शिवा केशवन ने कहा कि भारतीय ओलंपिक संध के निलंबन के कारण पूरी दुनिया के सामने हमें शर्मशार होना पड़ा. (सोची में भारत की चुनौती) भारतीय खिलाड़ियों के लिए ऐसी स्थिति का सामना करना असहनीय था. इससे आगे शिवा कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने दिखा दिया कि वह कितनी तेज़ी से कोई निर्णय ले सकते है. वैसे शिवा को इस बात का दर्द है कि भारतीय ओलंपिक संघ के चुनाव थोड़ा देर से हुए. काश कि चुनाव शीतकालीन ओलंपिक शुरू होने से केवल एक सप्ताह पहले भी हो जाते तो ऐसी स्थिति नही आती. शिवा का कहना है कि चलो जो होना था हुआ लेकिन अब नए सिरे से भविष्य को लेकर योजनाए बनाई जा सकती हैं और एक नया इतिहास लिखा जा सकता है. संघ के नए पदाधिकारी भारतीय खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकते है. एथलीटों का प्रदर्शन अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि नए पदाधिकारी क्या कुछ करते हैं लेकिन उनके सामने सबसे बडी चुनौती तो आगामी राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों के लिए भारतीय खिलाड़ियों में जोश भरना है. (क्या चमकेगी रूस की छवि) इसके अलावा पिछले 14 महीने से लगभग निष्क्रिय पडे विभिन्न खेल संधो को भी संदेश देना होगा कि वह राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों के लिए खिलाड़ियों के चयन से लेकर उनकी ट्रेनिंग पर पूरा ध्यान दे. वैसे नवनिर्वाचित अध्यक्ष एन रामचंद्रन पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता एथलीटो के लिए पैसा जुटाना है. एथलीटों का प्रदर्शन बेहतरीन हो क्योंकि हम केवल एथलीटो की वजह से संघ में हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "\"मेरे विचार से यह भारत के लिए बेहद ख़ुशी का अवसर है. मैं वैसे विंटर ओलंपिक खेलों का अपना मान्यता पत्र हासिल कर चुका हूं, जिस पर भारत लिखा हुआ है.\"", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयह कहना है रूस के सोची शहर में आयोजित किए जा रहे शीतकालीन ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाले भारतीय एथलीट शिवा केशवन का, जो ल्यूज़ स्पर्द्धा में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे है. उनके अलावा दो अन्य भारतीय एथलीट हिमांशु ठाकुर और नदीम इक़बाल भी इन खेलों में भाग ले रहे है. 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तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक महेंद्र रेड्डी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानकारी दी, \"अगर कोई अपमानजनक टिप्पणी करके लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश करता है तो इससे राज्य की शांति व्यवस्था भंग होने का ख़तरा होता है. एक हिंदू देवता के ख़िलाफ़ महेश की टिप्पणी से बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है. इसी वजह से उन्हें राज्य से बाहर निकालने का फ़ैसला किया गया.\" डीजीपी ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी एक मौलिक अधिकार है, लेकिन हर किसी को ये ध्यान रखना चाहिए कि इससे किसी दूसरे की धार्मिक भावनाएं आहत ना हो. पुलिस ने महेश को उनके पैतृक गांव आंध्र प्रदेश के चित्तूर भेज दिया है. पुलिस ने बताया है कि अगर महेश ने छह महीने से पहले हैदराबाद वापस लौटने की कोशिश की तो उनपर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है, जिसके अंतर्गत उन्हें तीन साल तक की जेल हो सकती है. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक ने 'लोट कर' की मंदिर की परिक्रमा डीजीपी ने बताया, \"समूहों में नफ़रत पैदा करना गंभीर अपराध है. अगर वो सोशल मीडिया या किसी दूसरे माध्यम से लोगों की भावनाओं को आहत करना जारी रखते हैं तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.\" इसके साथ ही उन्होंने बताया कि अगर कोई मीडिया चैनल उनके ऐसे बयानों का प्रसारण करता है तो चैनल के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि चर्चा का प्रसारण करने वाले एक स्थानीय टीवी चैनल को भी केबल टीवी रेगुलेशन एक्ट के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. चैनल के स्पष्टीकरण के आधार पर कार्रवाई की जाएगी. हिंदू धर्म को बचाने के लिए 'लोट कर' की मंदिर की परिक्रमा ख़बरों में रहने की रणनीति वकील और सामाजिक कार्यकर्ता साईं पदमा ने कहा, \"लंबे समय से काथी महेश विवादास्पद टिप्पणियां कर रहे थे. रोज़ाना की ख़बरों में बने रहने के लिए ये उनकी रणनीति है.\" उन्होंने कहा, \"अगर चैनल टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण करता है तो इससे समाज में तनाव का माहौल पैदा हो सकता है. आर्टिकल 19(1A) और 19 (2) के मुताबिक़ अगर कोई व्यक्ति या संस्था अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करती है तो उनपर कुछ प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.\" \"हालांकि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि किसी व्यक्ति को निष्कासित करना क़ानून के मुताबिक़ न्यायसंगत नहीं है. ऐसे विवादों की वजह से समाज के असल मसले कहीं दब के रह जाते हैं.\" आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के वकील वेनुगोपाल रेड्डी ने बताया, \"किसी व्यक्ति को किसी जगह से निष्कासित कर देना उसकी स्वतंत्रता का हनन माना जा सकता है.\" उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए एकतरफ़ा विचारों के आधार पर किसी व्यक्ति को तड़ीपार कर देना क़ानूनन ग़लत है. \"क़ानून के हिसाब से, पुलिस किसी को हिरासत में ले सकती है लेकिन उसे किसी व्यक्ति को निष्कासित करने का अधिकार नहीं है.\" विवादित बयानों से राबड़ी देवी का नाता पुराना काथी महेश कौन है? काथी महेश फिल्म समीक्षक और तेलुगू सिनेमा के अभिनेता हैं. इससे पहले वो अभिनेता पवन कल्याण के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने को लेकर ख़बरों में थे. जनवरी 2018 में इस टिप्पणी के बाद पवन कल्याण के प्रशंसकों ने उन्हें ट्रोल भी किया था. 'सम्मान' के लिए हिंदू धर्म छोड़ बौद्ध बने ऊना के दलित पाकिस्तान: सिंध में हिंदू क्यों बन रहे सिख? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फिल्म समीक्षक काथी महेश को तेलंगाना पुलिस ने छह महीने के लिए तड़ीपार कर दिया है. उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंदुओं के देवता राम पर एक टीवी डिबेट के दौरान अपमानजनक टिप्पणी की थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस ने उनके ख़िलाफ़ यह कार्रवाई एक शिकायत के आधार पर सोमवार को की थी, जिसके बाद अब वो हैदराबाद में नहीं घुस सकेंगे. जहां काथी महेश की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें काफ़ी विरोध झेलना पड़ा है. वहीं सूबे के दलित पुलिस की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं. दलित कार्यकर्ता सुजाता सुरेपल्ली ने आरोप लगाया है कि सरकार दलितों पर प्रतिशोध भरे रवैए से कार्रवाई कर रही है. लेकिन इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब पुलिस ने इन विरोधों के बाद शिकायत करने वाले संत परिपूर्णानंद को भी शहर के बाहर जाने का आदेश दिया. पूरिपूर्णानंद को भी छह महीने के लिए तड़ीपार किया गया है. महेश के समर्थन में कई तबके पुलिस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. संत पूरिपूर्णानंद को नोटिस जारी कर 2017 के दौरान मेंडक में दिए एक भाषण पर स्पष्टीकरण मांगा गया है, जिसमें उन्होंने दूसरे धर्मों के लिए कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. सहायक पुलिस आयुक्त ने बताया कि जब 24 घंटों के बाद भी उनका कोई जवाब नहीं आया तो उन्हें भी निष्कासित करने का फ़ैसला किया गया. हालांकि पूरिपूर्णानंद के क़ानूनी सलाहकार का कहना है कि उन्हें पहले पुलिस का कोई नोटिस नहीं मिला था. इससे पहले पूरिपूर्णानंद को नज़रबंद कर दिया था, क्योंकि उन्होंने काथी महेश के ख़िलाफ़ मार्च निकालने का ऐलान किया था. ये लोग हिंदू धर्म की बदनामी ही कर रहे हैं: स्वरा भास्कर तेलंगाना डीजीपी महेंद्र रेड्डी काथी महेश पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया? तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक महेंद्र रेड्डी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानकारी दी, \"अगर कोई अपमानजनक टिप्पणी करके लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश करता है तो इससे राज्य की शांति व्यवस्था भंग होने का ख़तरा होता है. एक हिंदू देवता के ख़िलाफ़ महेश की टिप्पणी से बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है. इसी वजह से उन्हें राज्य से बाहर निकालने का फ़ैसला किया गया.\" डीजीपी ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी एक मौलिक अधिकार है, लेकिन हर किसी को ये ध्यान रखना चाहिए कि इससे किसी दूसरे की धार्मिक भावनाएं आहत ना हो. पुलिस ने महेश को उनके पैतृक गांव आंध्र प्रदेश के चित्तूर भेज दिया है. पुलिस ने बताया है कि अगर महेश ने छह महीने से पहले हैदराबाद वापस लौटने की कोशिश की तो उनपर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है, जिसके अंतर्गत उन्हें तीन साल तक की जेल हो सकती है. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक ने 'लोट कर' की मंदिर की परिक्रमा डीजीपी ने बताया, \"समूहों में नफ़रत पैदा करना गंभीर अपराध है. अगर वो सोशल मीडिया या किसी दूसरे माध्यम से लोगों की भावनाओं को आहत करना जारी रखते हैं तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.\" इसके साथ ही उन्होंने बताया कि अगर कोई मीडिया चैनल उनके ऐसे बयानों का प्रसारण करता है तो चैनल के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि चर्चा का प्रसारण करने वाले एक स्थानीय टीवी चैनल को भी केबल टीवी रेगुलेशन एक्ट के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. चैनल के स्पष्टीकरण के आधार पर कार्रवाई की जाएगी. हिंदू धर्म को बचाने के लिए 'लोट कर' की मंदिर की परिक्रमा ख़बरों में रहने की रणनीति वकील और सामाजिक कार्यकर्ता साईं पदमा ने कहा, \"लंबे समय से काथी महेश विवादास्पद टिप्पणियां कर रहे थे. रोज़ाना की ख़बरों में बने रहने के लिए ये उनकी रणनीति है.\" उन्होंने कहा, \"अगर चैनल टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण करता है तो इससे समाज में तनाव का माहौल पैदा हो सकता है. आर्टिकल 19(1A) और 19 (2) के मुताबिक़ अगर कोई व्यक्ति या संस्था अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करती है तो उनपर कुछ प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.\" \"हालांकि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि किसी व्यक्ति को निष्कासित करना क़ानून के मुताबिक़ न्यायसंगत नहीं है. ऐसे विवादों की वजह से समाज के असल मसले कहीं दब के रह जाते हैं.\" आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के वकील वेनुगोपाल रेड्डी ने बताया, \"किसी व्यक्ति को किसी जगह से निष्कासित कर देना उसकी स्वतंत्रता का हनन माना जा सकता है.\" उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए एकतरफ़ा विचारों के आधार पर किसी व्यक्ति को तड़ीपार कर देना क़ानूनन ग़लत है. \"क़ानून के हिसाब से, पुलिस किसी को हिरासत में ले सकती है लेकिन उसे किसी व्यक्ति को निष्कासित करने का अधिकार नहीं है.\" विवादित बयानों से राबड़ी देवी का नाता पुराना काथी महेश कौन है? काथी महेश फिल्म समीक्षक और तेलुगू सिनेमा के अभिनेता हैं. इससे पहले वो अभिनेता पवन कल्याण के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने को लेकर ख़बरों में थे. जनवरी 2018 में इस टिप्पणी के बाद पवन कल्याण के प्रशंसकों ने उन्हें ट्रोल भी किया था. 'सम्मान' के लिए हिंदू धर्म छोड़ बौद्ध बने ऊना के दलित पाकिस्तान: सिंध में हिंदू क्यों बन रहे सिख? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 609, "source_item_id": "609", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 4070, "clean_index": 544, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:544"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत में कोरोनावायरस के मामले कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय 11: 30 IST को अपडेट किया गया इटली के अधिकारियों के मुताबिक़, शनिवार को भी इस वायरस से 681 लोगों की मौत हुई है और कुल मौतों का आंकड़ा 15,362 तक पहुंच गया है. लेकिन शनिवार को लंबे समय के बाद इटली में उम्मीद की कोई पहली किरण नज़र आई है. इटली में आम लोगों की सुरक्षा करने वाले सिविल प्रोटेक्शन डिविज़न के मुताबिक देश में ऐसे मरीज़ों की संख्या में पहली बार कमी देखने को मिली है, जिनका इलाज इंटेंसिव केयर यूनिट में चल रहा है. इटली के सिविल प्रोटेक्शन डिविज़न के प्रमुख एंजेलो बोर्रेली ने मीडिया को बताया है कि शुक्रवार को इटली के अस्पतालों में क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या 4,068 थी जो शनिवार को कम होकर 3,994 हो गई है. समाप्त एंजेलो बोर्रेली ने कहा है, \"यह हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण डेटा है क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ है जब क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या कम हुई है. यह इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे हमारे अस्पतालों को थोड़ी राहत मिलेगी. उन्हें सांस लेने का मौक़ा मिलेगा. जब से हम लोगों ने आपातकालीन स्थितियों को देखा है तब से पहली बार क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या में कमी आयी है.\" इतालवी सरकार के साइंटिफ़िक काउंसिल के प्रमुख फ्रांको लोकतेली ने बताया कि क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या में कमी एक अहम संकेत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता है कि इटली ने क्रिटिकल स्टेज को पार कर लिया है. उन्होंने कहा, \"इससे यह ज़रूर पता चलता है कि हम जो तौर तरीक़े अपना रहे हैं, वो कारगर साबित हो रहे हैं.\" कारगर हुए हैं उपाय इटली में नए संक्रमण के मामलों में भी कमी देखने को मिल रही है. शनिवार को इटली में कोरोना वायरस से संक्रमण के 2,886 नए मामले सामने आए हैं. मौजूदा समय में इटली में कोरोना वायरस की चपेट में 88,274 एक्टिव मरीज़ हैं. इसके अलावा 20,996 मरीज़ इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं. लोम्बार्डी का उत्तरी क्षेत्र इस वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित है. पूरे देश के संक्रमित लोगों में से 85 फ़ीसदी इस क्षेत्र से हैं और जितनी मौतें इटली में हुई हैं उनमें से ज़्यादातर इसी इलाक़े में हुई हैं. इस इलाक़े के लोगों को घर से बाहर निकलने पर सुरक्षा के लिए मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है. यह नया प्रावधान 5 अप्रैल यानी रविवार से लागू होगा और 13 अप्रैल तक जारी रहेगा. इतना ही नहीं इटली के उत्तरी हिस्से के दूसरे शहरों यानी वेनेतो और आल्टो एडिगे में भी लोगों के लिए बाज़ार या शॉपिंग स्टोर में ख़रीदारी करने के लिए निकलने पर मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है. इससे पहले भी इन इलाक़ों में एहतियातन कड़े क़दम उठाए गए थे. मसलन 15 अप्रैल तक इलाक़े में सड़कों पर वॉक करने या दौड़ने की इजाज़त नहीं दी गई थी. बाइक से भी बाहर निकलने पर पाबंदी लगाई गई थी. सभी पर्यटक स्थलों और होटलों को बंद कर दिया गया था. इसके अलावा किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर पाबंदी लगाई गई थी. फ़रवरी से ख़राब हुए थे हालात इटली में पहला केस आने से पहले ही इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक टास्क फोर्स का गठन किया था. जो ख़ासतौर पर कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए तैयार किया गया था. इटली यूरोपीय यूनियन का पहला ऐसा देश था जिसने अपने यहां विमान सेवाओं को प्रतिबंधित किया. अभी पूरे इटले में लॉकडाउन की स्थिति है, लेकिन लोम्बार्डी में कुछ ज़्यादा ही सख़्ती से प्रावधान लागू कराए जा रहे हैं, जिसके उल्लंघन करने पर लोगों पर ढाई लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा रहा है. इसके बाद कोरोना वायरस पर अंकुश लगाने में इटली कामयाब नहीं रहा. हालांकि स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के बूते इटली संक्रमण के मामलों का इलाज करता रहा. लेकिन इलाज के लिए अस्पताल और उसमें बेड सब कम पड़ गए, मानवीय और तकनीकी दोनों संसाधनों का संकट उभर आया. वैसे इटली में आधिकारिक तौर पर कोरोना वायरस संक्रमण की शुरुआत 20 फ़रवरी से हुई. जब एक 38 वर्षीय शख़्स ने लोम्बार्डी के कोडोग्नो कस्बे में अपनी जांच करायी. जब जांच रिपोर्ट आई तो यह व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया. यह इटली का पहला आधिकारिक तौर पर दर्ज कोविड-19 केस था. हालांकि कुछ स्वास्थ्य अधिकारी ये मानते हैं कि इटली में इस वायरस का प्रवेश बहुत पहले हो गया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का क़हर बढ़ रहा है लेकिन इस महामारी से सबसे ज़्यादा मौतें इटली में हुई हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत में कोरोनावायरस के मामले कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय 11: 30 IST को अपडेट किया गया इटली के अधिकारियों के मुताबिक़, शनिवार को भी इस वायरस से 681 लोगों की मौत हुई है और कुल मौतों का आंकड़ा 15,362 तक पहुंच गया है. लेकिन शनिवार को लंबे समय के बाद इटली में उम्मीद की कोई पहली किरण नज़र आई है. इटली में आम लोगों की सुरक्षा करने वाले सिविल प्रोटेक्शन डिविज़न के मुताबिक देश में ऐसे मरीज़ों की संख्या में पहली बार कमी देखने को मिली है, जिनका इलाज इंटेंसिव केयर यूनिट में चल रहा है. इटली के सिविल प्रोटेक्शन डिविज़न के प्रमुख एंजेलो बोर्रेली ने मीडिया को बताया है कि शुक्रवार को इटली के अस्पतालों में क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या 4,068 थी जो शनिवार को कम होकर 3,994 हो गई है. समाप्त एंजेलो बोर्रेली ने कहा है, \"यह हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण डेटा है क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ है जब क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या कम हुई है. यह इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे हमारे अस्पतालों को थोड़ी राहत मिलेगी. उन्हें सांस लेने का मौक़ा मिलेगा. जब से हम लोगों ने आपातकालीन स्थितियों को देखा है तब से पहली बार क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या में कमी आयी है.\" इतालवी सरकार के साइंटिफ़िक काउंसिल के प्रमुख फ्रांको लोकतेली ने बताया कि क्रिटिकल मरीज़ों की संख्या में कमी एक अहम संकेत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता है कि इटली ने क्रिटिकल स्टेज को पार कर लिया है. उन्होंने कहा, \"इससे यह ज़रूर पता चलता है कि हम जो तौर तरीक़े अपना रहे हैं, वो कारगर साबित हो रहे हैं.\" कारगर हुए हैं उपाय इटली में नए संक्रमण के मामलों में भी कमी देखने को मिल रही है. शनिवार को इटली में कोरोना वायरस से संक्रमण के 2,886 नए मामले सामने आए हैं. मौजूदा समय में इटली में कोरोना वायरस की चपेट में 88,274 एक्टिव मरीज़ हैं. इसके अलावा 20,996 मरीज़ इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं. लोम्बार्डी का उत्तरी क्षेत्र इस वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित है. पूरे देश के संक्रमित लोगों में से 85 फ़ीसदी इस क्षेत्र से हैं और जितनी मौतें इटली में हुई हैं उनमें से ज़्यादातर इसी इलाक़े में हुई हैं. इस इलाक़े के लोगों को घर से बाहर निकलने पर सुरक्षा के लिए मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है. यह नया प्रावधान 5 अप्रैल यानी रविवार से लागू होगा और 13 अप्रैल तक जारी रहेगा. इतना ही नहीं इटली के उत्तरी हिस्से के दूसरे शहरों यानी वेनेतो और आल्टो एडिगे में भी लोगों के लिए बाज़ार या शॉपिंग स्टोर में ख़रीदारी करने के लिए निकलने पर मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है. इससे पहले भी इन इलाक़ों में एहतियातन कड़े क़दम उठाए गए थे. मसलन 15 अप्रैल तक इलाक़े में सड़कों पर वॉक करने या दौड़ने की इजाज़त नहीं दी गई थी. बाइक से भी बाहर निकलने पर पाबंदी लगाई गई थी. सभी पर्यटक स्थलों और होटलों को बंद कर दिया गया था. इसके अलावा किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर पाबंदी लगाई गई थी. फ़रवरी से ख़राब हुए थे हालात इटली में पहला केस आने से पहले ही इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक टास्क फोर्स का गठन किया था. जो ख़ासतौर पर कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए तैयार किया गया था. इटली यूरोपीय यूनियन का पहला ऐसा देश था जिसने अपने यहां विमान सेवाओं को प्रतिबंधित किया. अभी पूरे इटले में लॉकडाउन की स्थिति है, लेकिन लोम्बार्डी में कुछ ज़्यादा ही सख़्ती से प्रावधान लागू कराए जा रहे हैं, जिसके उल्लंघन करने पर लोगों पर ढाई लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा रहा है. इसके बाद कोरोना वायरस पर अंकुश लगाने में इटली कामयाब नहीं रहा. हालांकि स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के बूते इटली संक्रमण के मामलों का इलाज करता रहा. लेकिन इलाज के लिए अस्पताल और उसमें बेड सब कम पड़ गए, मानवीय और तकनीकी दोनों संसाधनों का संकट उभर आया. वैसे इटली में आधिकारिक तौर पर कोरोना वायरस संक्रमण की शुरुआत 20 फ़रवरी से हुई. जब एक 38 वर्षीय शख़्स ने लोम्बार्डी के कोडोग्नो कस्बे में अपनी जांच करायी. जब जांच रिपोर्ट आई तो यह व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया. यह इटली का पहला आधिकारिक तौर पर दर्ज कोविड-19 केस था. हालांकि कुछ स्वास्थ्य अधिकारी ये मानते हैं कि इटली में इस वायरस का प्रवेश बहुत पहले हो गया था. 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'साधना' का यह गीत इस बात की नुमाइन्दगी के लिए एक आदर्श गीत का मुकाम रखता है- 'औरत ने जनम दिया मरदों को' महात्मा गांधी के लिए गीत बनाने वाली पहली जोड़ी आंखों ही आंखों में इशारा करने वाली शकीला एसएन त्रिपाठी: मधुर गीतों के रसिक संगीतकार ख़य्याम और रोशन के समकक्ष इस तरह के गीतों को सुनकर आप आसानी से एन. दत्ता की उपस्थिति को रोशन, ख़य्याम, मदन मोहन और रवि के समकक्ष रखकर देख सकते हैं, जिन लोगों ने इतनी ही स्तरीय ग़ज़लें फ़िल्म संगीत को मुहैया कराई हैं. 'मरीन ड्राइव', 'धूल का फूल', 'साधना', 'धर्मपुत्र', 'नाचघर', 'जालसाज़', 'मोहिनी', 'मिस्टर जॉन', 'दीदी', 'ग्यारह हज़ार लड़कियां' और 'नया रास्ता' से गुज़रकर बनने वाली राह थोड़ी संश्लिष्ट, थोड़ी गम्भीर और थोड़ी सामाजिक चेतना संपन्न रही है. उसमें इस बात का भी ध्यान दिया गया है कि जीवन और समाज के रिश्तों को आपसी सामंजस्य से हल कर लिया जाए. उस आदर्शवाद या कि मानवीय चेतना का यह रूप, सिर्फ़ एन. दत्ता ही सुन्दर ढंग से दिखा सकते थे. एन. दत्ता की सबसे बड़ी ख़ूबी यह रही कि उन्होंने अपनी धुनों में कई मर्तबा कुछ ऐसे पारंपरिक वाद्यों का सुन्दर इस्तेमाल किया, जो गीत के पूरे उठान को एकाएक कई गुना बढ़ा देते हैं. शहनाई, सारंगी, तबला और ढोलक के साथ वॉयलिन उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है. गीतों को चपल और ख़ूबसूरत बनाने के लिए एकॉर्डियन और मैण्डोलिन के टुकड़ों से सजाने का मामला हो या कि शायराना अल्फ़ाज़ को बहुत हल्के से रागों की अर्थछायाओं से भरने की कोशिश, हर जगह एन. दत्ता की कम्पोज़ीशन गजब ढंग से प्रासंगिक बनकर उभरी है. मोहम्मद रफ़ी के साथ एन. दत्ता हृदयग्राही संगीत बनी पहचान एन. दत्ता ने हमेशा ही कुछ सार्थक रचा. परिचित अंदाज़ से हटकर रचा, लय और बीट को तरज़ीह देते हुए भी शब्दों की सुन्दरता को करीने से बरक़रार रखने के जतन में रचा. फिर वह मुजरा गीत था या कि हलके-फुल्के ढंग से सिनेमाई भाषा के साथ न्याय करता हुआ गीत, हर जगह कुछ हृदयग्राही संगीत जैसे दत्ता साहब की पहचान बन गई थी. एन. दत्ता ने मैलोडी को इतना अधिक साधा कि हर एक फ़िल्म के लिए उनकी धुनों की अभिव्यक्तियां उतनी ही कोमल व सरस बन बैठी. आप उनके करियर से कोई भी फ़िल्म चुनें, तो आसानी से यह पाएंगे कि हर दूसरा रेकॉर्ड, कम से कम, एक, दो कर्णप्रिय गीतों से सजा हुआ है. उनके यहां लता मंगेशकर, मुकेश, मो. रफ़ी, तलत महमूद और आशा भोंसले सभी के लिए उनकी विशिष्ट आवाज़ों की विशिष्ट तर्ज़ें मौजूद थीं, जिन्हें नए सन्दर्भों में वे परख रहे थे. लता मंगेशकर के लिए तो जैसे एन. दत्ता का संगीत कुछ अलग ही स्तर पर पहुँचा हुआ है. गुणवत्ता और सांगीतिक उत्कर्ष में सब बेजोड़ गीत लता जी के लिए खास ढंग से रचे गए. एन. दत्ता ने उनके लिए मुजरा गीत, क्लब सॉन्ग और प्रेम की स्नेहिल पुकार की आत्मीय अभिव्यक्तियाँ स्पन्दित की हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गम्भीर क़िस्म का संगीत रचने वाले एन. दत्ता साहब जिनका पूरा नाम दत्ता नाईक है, एक महत्वपूर्ण संगीतकार के रूप में आज भी याद किए जाते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमहेंद्र कपूर, यश चोपड़ा और साहिर लुधियानवी के साथ एन. दत्ता (दाएं से दूसरे) कम फ़िल्मों के कैटलॉग से सजा हुआ एन. दत्ता का संगीतकार इतना प्रबुद्ध रहा है कि आप उनकी धुनों को उठाकर सामाजिक राजनैतिक विमर्श के ढेरों सरोकारों को देख सकते हैं. एन. दत्ता, जिनका अर्थ ही है गम्भीर शब्दावली में लिखे गए गीतों की मानवीयता के पक्ष में सुरीली अदायगी. एन. दत्ता के करीबी लोगों में साहिर लुधियानवी, बी.आर. चोपड़ा और राज खोसला जैसे दिग्गज शामिल थे, जिसके चलते स्तरीय संगीत और शायरी के प्रति उनका रुझान कुछ अतिरिक्त संजीदा ढंग का बन सका. उनकी धुनों को सुनते हुए यह समझा जा सकता है कि ग़ज़लनुमा अभिव्यक्ति में शायरी को अत्यन्त गम्भीर और मार्मिक अर्थों में बदलने की कला में वे माहिर थे. 'साधना' का यह गीत इस बात की नुमाइन्दगी के लिए एक आदर्श गीत का मुकाम रखता है- 'औरत ने जनम दिया मरदों को' महात्मा गांधी के लिए गीत बनाने वाली पहली जोड़ी आंखों ही आंखों में इशारा करने वाली शकीला एसएन त्रिपाठी: मधुर गीतों के रसिक संगीतकार ख़य्याम और रोशन के समकक्ष इस तरह के गीतों को सुनकर आप आसानी से एन. दत्ता की उपस्थिति को रोशन, ख़य्याम, मदन मोहन और रवि के समकक्ष रखकर देख सकते हैं, जिन लोगों ने इतनी ही स्तरीय ग़ज़लें फ़िल्म संगीत को मुहैया कराई हैं. 'मरीन ड्राइव', 'धूल का फूल', 'साधना', 'धर्मपुत्र', 'नाचघर', 'जालसाज़', 'मोहिनी', 'मिस्टर जॉन', 'दीदी', 'ग्यारह हज़ार लड़कियां' और 'नया रास्ता' से गुज़रकर बनने वाली राह थोड़ी संश्लिष्ट, थोड़ी गम्भीर और थोड़ी सामाजिक चेतना संपन्न रही है. उसमें इस बात का भी ध्यान दिया गया है कि जीवन और समाज के रिश्तों को आपसी सामंजस्य से हल कर लिया जाए. उस आदर्शवाद या कि मानवीय चेतना का यह रूप, सिर्फ़ एन. दत्ता ही सुन्दर ढंग से दिखा सकते थे. एन. दत्ता की सबसे बड़ी ख़ूबी यह रही कि उन्होंने अपनी धुनों में कई मर्तबा कुछ ऐसे पारंपरिक वाद्यों का सुन्दर इस्तेमाल किया, जो गीत के पूरे उठान को एकाएक कई गुना बढ़ा देते हैं. शहनाई, सारंगी, तबला और ढोलक के साथ वॉयलिन उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है. गीतों को चपल और ख़ूबसूरत बनाने के लिए एकॉर्डियन और मैण्डोलिन के टुकड़ों से सजाने का मामला हो या कि शायराना अल्फ़ाज़ को बहुत हल्के से रागों की अर्थछायाओं से भरने की कोशिश, हर जगह एन. दत्ता की कम्पोज़ीशन गजब ढंग से प्रासंगिक बनकर उभरी है. मोहम्मद रफ़ी के साथ एन. दत्ता हृदयग्राही संगीत बनी पहचान एन. दत्ता ने हमेशा ही कुछ सार्थक रचा. परिचित अंदाज़ से हटकर रचा, लय और बीट को तरज़ीह देते हुए भी शब्दों की सुन्दरता को करीने से बरक़रार रखने के जतन में रचा. फिर वह मुजरा गीत था या कि हलके-फुल्के ढंग से सिनेमाई भाषा के साथ न्याय करता हुआ गीत, हर जगह कुछ हृदयग्राही संगीत जैसे दत्ता साहब की पहचान बन गई थी. एन. दत्ता ने मैलोडी को इतना अधिक साधा कि हर एक फ़िल्म के लिए उनकी धुनों की अभिव्यक्तियां उतनी ही कोमल व सरस बन बैठी. आप उनके करियर से कोई भी फ़िल्म चुनें, तो आसानी से यह पाएंगे कि हर दूसरा रेकॉर्ड, कम से कम, एक, दो कर्णप्रिय गीतों से सजा हुआ है. उनके यहां लता मंगेशकर, मुकेश, मो. रफ़ी, तलत महमूद और आशा भोंसले सभी के लिए उनकी विशिष्ट आवाज़ों की विशिष्ट तर्ज़ें मौजूद थीं, जिन्हें नए सन्दर्भों में वे परख रहे थे. लता मंगेशकर के लिए तो जैसे एन. दत्ता का संगीत कुछ अलग ही स्तर पर पहुँचा हुआ है. गुणवत्ता और सांगीतिक उत्कर्ष में सब बेजोड़ गीत लता जी के लिए खास ढंग से रचे गए. एन. दत्ता ने उनके लिए मुजरा गीत, क्लब सॉन्ग और प्रेम की स्नेहिल पुकार की आत्मीय अभिव्यक्तियाँ स्पन्दित की हैं. 'कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे' और 'ऐ दिल ज़ुबां न खोल' को इसी सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए. अस्सी के दशक में होने लगे गायब तर्ज़ों की उदात्ता बड़े संयम से साधने वाले एन. दत्ता बाद में एक भूले-बिसरे संगीतकार के रूप में ही जाने गए, जिनकी अस्सी की दशक की फ़िल्मों ने कोई बहुत उल्लेखनीय मुकाम हासिल नहीं किया. यह वही एन. दत्ता साहब थे, जिनकी झूमती हुई ऑर्केस्ट्रेशन और हल्के कोरस की पृष्ठभूमि लिए हुए गीतों ने साठ के दशक में एक बिलकुल अलग ही लीक रची थी. गंभीर किस्म का संगीत रचने वाले एन. दत्ता रागों और वाद्यों के मजेदार खेल से एक नई ही बात निकाल लेने वाले एन. दत्ता को इसलिए भी याद किया जाएगा कि उन्होंने आधुनिक ध्वनि संयोजन पर आधारित तर्ज़ें बनाकर एक अभिनव ढंग का संगीत रचा था, जो नये मुहावरे, नये ऑर्केस्ट्रेशन और नयी मैलोडी का सुन्दर उदाहरण बन सका था. 'तू हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा' (धूल का फूल) जैसा महान गीत अपनी विचार प्रवणता में दत्ता साहब ही रच सकते थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 613, "source_item_id": "613", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3941, "clean_index": 546, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:546"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन क्या आपको अंदाजा है कि दुनिया में केवल दो जगहें ऐसी हैं, जो दस मानकों में सात को पूरा करती हैं. एक है माउंट ताई, चीन के शानडोंग प्रांत के पांच बड़े पर्वतों में एक है माउंट ताई. जबकि दूसरी जगह है ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में स्थित वाइल्डनेस वर्ल्ड हेरिटेज एरिया मेलालुका. यह छह नेशनल पार्क की शृंखला है और ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी राज्य के 20 फीसदी हिस्से में फैला हुआ है. topcat2 समाप्त इसे दुनिया का बेहतरीन वन्य क्षेत्रों में गिना जाता है. साउथवेस्ट नेशनल पार्क करीब 6000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फ़ैला हुआ है. जंगली जीव, हरे भरे जंगल और सफेद हिमनद, नदियां और समुद्री तट सबकुछ एक दूसरे में सिमटा और दूर तक फैला हुआ. पर्यटन का केंद्र साल के नौ महीनों के दौरान ये पार्क समुद्री हवाओं और भारी बारिश की चपेट में रहता है. हर साल दिसंबर में चिलचिलाती गर्मी में यहां पर्यटक दो समूह में पहुंचते हैं. पहले समूह में हजार लोगों का होता है. इस समूह में ज्यादातर लोग पहाड़ों पर ट्रेकिंग करने वाले होते हैं. साउथ कोस्ट ट्रैक में चढ़ाई करना बेहद रोमांच से भरा होता है. 84 किलोमीटर लंबे इस ट्रैक को सबसे ख़तरनाक माना जाता है. इस पर चढ़ाई करने वाले युवा एक सप्ताह का राशन पानी अपनी पीठ पर लादे हुए चुलते हैं. आपको साथ खाना बनाने वाले उपकरण, टेंट, स्लीपिंग बैग्स, फर्स्ट एड किट और रेडियो भी संभाल कर चलना होता है. (देखें- 5 शहर सबसे जहां सबसे ज़्यादा पर्यटक पहुंचते हैं) इसके अलावा यहां दूसरा समूह 100 लोगों का होता है जो यहां सालाना नौकायन प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचते हैं. दिसंबर से लेकर मार्च पोर्ट डेवी मैरीन रिजर्व में यहां पहुंचे लोग नौकायन करते हैं. केवल दो कंपनियां इलाके में इको टूरिज्म को संचालित करती हैं. इको टूरिज़्म की राजधानी इनमें से एक है रोरिंग 40 एक्सपीडिशन. अमूमन यह तीन से सात दिनों तक चलता है. यह जिस मरीन रिजर्व में होता है उसे दक्षिण पश्चिम नेशनल पार्क में सबसे दूर दराज का इलाका माना जाता है. हालांकि अब यह पूरा इलाका बदलाव की तैयारी में हैं. तस्मानियाई पार्क एवं वाइल्डलाफ़ सर्विस तस्मानिया वाइल्डरनेस हेरिटेज एरिया को विकसित करने की तैयारी में हैं, इसमें साउथ वेस्ट नेशनल पार्क भी शामिल है, तब यह दुनिया के इको टूरिज़्म की राजधानी के तौर पर स्थापित हो सकता है. सिडनी मार्निंग हेराल्ड के मुताबिक सरकारी अधिकारी 37 जगहों को पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित करने की तैयारी में हैं. इसमें साउथ कोस्ट ट्रैक पर हेलीकाफ्टर लैंडिंग साइट्स भी तैयार किया जाएगा. इस बदलाव से हज़ारों पर्यटकों के यहां सालाना पहुंचने की उम्मीद की जा रही है. topcat2 रोरिंग 40 एक्सपीडिशन के प्रमुख रेग ग्रुंडी कहते हैं, \"अगर प्रस्ताव के मुताबिक काम हुआ तो साल में बारहों महीने प्लेन यहां उतर पाएंगे. इसके बाद यहां इको लॉज़ भी बनाया जा सकता है.\" वो रोमांचक अभियान मैं इस रोरिंग 40 अभियान के तीन दिनों वाले अभियान में शामिल हुआ और 112 किलोमीटर की दूरी तय की. इस दौरान पोर्ट डेवी मैरीन रिजर्व में चाय के रंग का पानी भी नजर आया. दरअसल पोर्ट डैवी का मुहाने विचित्र रंग का समुद्री पानी नजर आता है. कई बार हरा भी और कई बार पीला भी. इलाके में जो समुद्री जीव पाए जाते हैं वो भी दुनिया के दूसरे हिस्सों में नजर नहीं आते मसलन, समुद्री कोरल, बिस्किट स्टारफिश, ट्यूब वॉर्म और अन्य समुद्री जीव केवल यहीं पाए जाते हैं. पोर्ट डैवी के इलाके में गिनती के पक्षी ही नजर आते हैं. topcat2 अपनी यात्रा के दूसरे दिन हम ब्रैंम्बल कोव में बने कैंप में पहुंचे. इसी कैंप में क्रिचले पार्कर जूनियर की कब्र है. मेलर्बन के इस कारोबारी की मौत 1940 के दशक में यहां जमीन सर्वे करने के दौरान हो गई थी. इसके बाद हमने 37 आदिवासी गुफाओं की झलक भी देखी. पुरातत्व विशेषज्ञों के मुताबिक ये गुफाएं करीब 30 हज़ार साल पुरानी हैं. मौसम का असर यात्रा के तीसरे दिन हम बाथूरस्ट चैनल के पास पहुंचे और वहां हमें तेज़ समुद्री लहरों का एहसास हुआ. समुद्री लहरें इतनी तेज़ थीं कि हम एक किलोमीटर दूर स्थित ब्रेकसी आईलैंड तक नहीं जा पाए. पोर्ट डैवी में अमूमन समुद्री लहरें 4 मीटर तक उठती हैं लेकिन यह तूफान के समय ये 12 मीटर ऊंची भी हो सकती हैं. हमें ग्रुंडी ने बताया कि थोड़ा भी मौसम खराब होने पर यहां समुद्री तूफ़ान काफी तेज़ हो जाते हैं. लिहाजा हम वापस मेलालुका की ओर लौटने लगे. topcat2 बीते 15 सालों में ट्रैवल राइटर के तौर पर काम करने के दौरान मुझे एक से बढ़कर एक रोमांचक जगहों पर जाने का मौका मिला है लेकिन मैं केवल इतना कह सकता हूं कि साउथवेस्ट नेशनल पार्क जैसी रोमांच से भरी दूसरी जगह मैं कभी नहीं गया. तस्मानिया का साउथ वेस्ट नेशनल पार्क एक ऐसी जगह है जहां समय ठहर जाता है और आप आसपास की प्राकृतिक खूबसूरती में खो जाते हैं. अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "यूनेस्को किसी जगह को हेरिटेज साइट का दर्जा देने से पहले उसका आकलन दस मानकों पर करता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन क्या आपको अंदाजा है कि दुनिया में केवल दो जगहें ऐसी हैं, जो दस मानकों में सात को पूरा करती हैं. एक है माउंट ताई, चीन के शानडोंग प्रांत के पांच बड़े पर्वतों में एक है माउंट ताई. जबकि दूसरी जगह है ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में स्थित वाइल्डनेस वर्ल्ड हेरिटेज एरिया मेलालुका. यह छह नेशनल पार्क की शृंखला है और ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी राज्य के 20 फीसदी हिस्से में फैला हुआ है. topcat2 समाप्त इसे दुनिया का बेहतरीन वन्य क्षेत्रों में गिना जाता है. साउथवेस्ट नेशनल पार्क करीब 6000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फ़ैला हुआ है. जंगली जीव, हरे भरे जंगल और सफेद हिमनद, नदियां और समुद्री तट सबकुछ एक दूसरे में सिमटा और दूर तक फैला हुआ. पर्यटन का केंद्र साल के नौ महीनों के दौरान ये पार्क समुद्री हवाओं और भारी बारिश की चपेट में रहता है. हर साल दिसंबर में चिलचिलाती गर्मी में यहां पर्यटक दो समूह में पहुंचते हैं. पहले समूह में हजार लोगों का होता है. इस समूह में ज्यादातर लोग पहाड़ों पर ट्रेकिंग करने वाले होते हैं. साउथ कोस्ट ट्रैक में चढ़ाई करना बेहद रोमांच से भरा होता है. 84 किलोमीटर लंबे इस ट्रैक को सबसे ख़तरनाक माना जाता है. इस पर चढ़ाई करने वाले युवा एक सप्ताह का राशन पानी अपनी पीठ पर लादे हुए चुलते हैं. आपको साथ खाना बनाने वाले उपकरण, टेंट, स्लीपिंग बैग्स, फर्स्ट एड किट और रेडियो भी संभाल कर चलना होता है. 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प्रवक्ता का कहना था कि महिलाएँ सेक्स हड़ताल के ज़रिए निरस्त्रीकरण का संदेश देना चाहती हैं. अध्ययनों में पता चला है कि स्थानीय लोग रुतबे, ताक़त और यौन आकर्षण की वजह से बंदूक उठा लेते हैं और अपराध की दुनिया में पहुँच जाते हैं. कोलंबिया के रेडियो का कहना है कि उनके ऐसा करने के पीछे कोई आर्थिक कारण नहीं होते हैं. बंदूक से प्यार करने वाले एक ऐसे ही पुरुष की प्रेमिका जेनीफ़र बेयर ने ब्रिटेन के गार्डियन अख़बार से कहा, \"हम उन्हें यह समझाना चाहते हैं कि हिंसा कोई सेक्सी चीज़ नहीं है.\" जेनीफ़र बेयर का कहना था कि महिलाओं ने इस हड़ताल के लिए एक गाना भी तैयार किया है जिसका साराश कुछ इस तरह है - \"महिलाएँ बहुत क़ीमती हैं. हम हिंसक आदमी के प्यार में नहीं पड़ना चाहतीं क्योंकि उनका साथ बहुत घाटे का सौदा है...\"\n\nSummary:", "target": "कोलंबिया के सबसे ज़्यादा हिंसक शहरों में से एक में रहने वाली महिलाओं ने अपने पतियों और प्रेमियों को बंदूक फेंकने पर मजबूर करने के लिए एक अनोखा रास्ता चुना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइन महिलाओं ने अपने पतियों और प्रेमियों को 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वजह से बंदूक उठा लेते हैं और अपराध की दुनिया में पहुँच जाते हैं. कोलंबिया के रेडियो का कहना है कि उनके ऐसा करने के पीछे कोई आर्थिक कारण नहीं होते हैं. बंदूक से प्यार करने वाले एक ऐसे ही पुरुष की प्रेमिका जेनीफ़र बेयर ने ब्रिटेन के गार्डियन अख़बार से कहा, \"हम उन्हें यह समझाना चाहते हैं कि हिंसा कोई सेक्सी चीज़ नहीं है.\" जेनीफ़र बेयर का कहना था कि महिलाओं ने इस हड़ताल के लिए एक गाना भी तैयार किया है जिसका साराश कुछ इस तरह है - \"महिलाएँ बहुत क़ीमती हैं. हम हिंसक आदमी के प्यार में नहीं पड़ना चाहतीं क्योंकि उनका साथ बहुत घाटे का सौदा है...\"\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 616, "source_item_id": "616", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1624, "clean_index": 549, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:549"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत को शनिवार तक 2-1 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कारनामे अंजाम दिए जिनके लिए उन्हें बहादुरी के कई सम्मान मिले. उन सम्मानों में मिलिटरी क्रॉस भी शामिल है. नियाज़ी ने ब्रितानी सेना में जापान में भी सेवा की और उस दौरान उन्हें टाइगर नियाज़ी का ख़िताब दिया गया. जनरल नियाज़ी ने भारत के साथ 1965 के युद्ध में भी बहादुरी दिखाई थी लेकिन 1971 के युद्ध में उन्होंने भारतीय सेना के सामने हथियार डाल दिए थे. नियाज़ी के साथ क़रीब 90 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों ने भी हथियार डाले थे. जानकारों का कहना है कि भारतीय सेना और बंगाली लोगों के हाथों पाकिस्तानी सेना की शिकस्त और जनरल नियाज़ी का हथियार डाल देना पाकिस्तानी इतिहास में एक काला अध्याय है. 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान की हार के कारणों की जाँच के लिए हमूदुर्रहमान आयोग बनाया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में जनरल नियाज़ी को ही बड़ी हद तक ज़िम्मेदार क़रार दिया था. जनरल नियाज़ी आख़िरी समय तक अपनी स्थिति को सही बताते रहे और मौत के सामने हथियार डालने से कुछ ही हफ़्ते पहले उन्होंने एक टेलीविज़न रिपोर्ट में कहा था कि वह फ़ौज की बड़ी व्यवस्था का एक छोटा सा हिस्सा थे इसलिए उन्होंने हथियार डालने की प्रक्रिया पर सिर्फ़ अमल किया था. हालाँकि उनका निजी ख़याल ये था कि वह लड़ाई जारी रख सकते थे और भारतीय सेना को एक लंबे समय तक उलझाए रख सकते थे. इस पर जनरल गंधर्व नागरा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि जनरल नियाज़ी हार चुके थे और यह हार उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी. \"असलिययत यही थी कि पाकिस्तानी सेना हार चुकी थी, बाद में कोई कुछ भी कहता रहे.\" जनरल नागरा ने जनरल नियाज़ी के परिवार के साथ सांत्वना व्यक्त की.\n\nSummary:", "target": "सन् 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में 'पूर्वी पाकिस्तान' में भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करने वाले पाकिस्तानी लेफ़्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला ख़ाँ नियाज़ी का रविवार को लौहार में देहांत हो गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस आत्मसमर्पण के बाद 'पूर्वी पाकिस्तान' का हिस्सा पाकिस्तान से आज़ाद हो गया था और आज इसे ही बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. उस समय भारतीय सेना के कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा थे. बीबीसी ने जनरल अरोड़ा से संपर्क करके उनके विचार जानने चाहे तो वे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाए. जनरल अरोड़ा भी अब काफ़ी वृद्ध हो चुके हैं. इस आत्मसमर्पण के समय मौजूद मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने जनरल नियाज़ी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि जनरल नियाज़ी एक बहादुर फौजी थे लेकिन भारतीय सेना ने उनको हराया. जनरल नागरा ने कहा कि वे जनरल नियाज़ी को काफ़ी पहले से जानते थे और शुरू में नियाज़ी ने उनके सामने ही समर्पण किया था लेकिन औपचारिक समर्पण जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने ही होना था. जनरल नियाज़ी ने आत्मसमर्पण के समय जो पिस्तौल ले रखी थी, उसके दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय से चोरी हो जाने की ख़बरों से पिछले साल कुछ विवाद खड़ा हो गया था. लेकिन सेना ने कहा था कि उनकी पिस्तौल देहरादून में राष्ट्रीय सेना अकादमी के संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई है. नियाज़ी कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे और लाहौर के कम्बाइंड मिलिटरी अस्पताल में रविवार रात को उन्होंने दम तोड़ दिया. नियाज़ी 89 वर्ष के हो चुके थे. नियाज़ी के दामाद रऊफ़ ख़ान ने बताया है कि रविवार की रात को क़रीब नौ बजे अचानक उनकी तबियत ख़राब हो गई तो उन्हें सैनिक अस्पताल भर्ती कराया गया लेकिन उन्हें 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ग्रामीण इलाक़ों में भी लोग नियमों को तोड़ रहे हैं. चीन के संविधान के मुताबिक़ पुरुष 22 और महिलाएँ 20 की उम्र में शादी कर सकते हैं. साथ ही देर से विवाह करने और देर से माता-पिता बनने को बढ़ावा दिया जाता है. लेकिन राष्ट्रीय जनसंख्या और परिवार नियोजन आयोग के अधिकारी के मुताबिक़ ग्रामीण इलाक़ों में अब भी कम उम्र में विवाह किया जाता है. इसकी एक वजह पारंपरिक तौर पर बेटों को तरजीह दिया जाना बताया जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसके चलते बच्चियों के जन्म के बारे में बताया नहीं जाता और न ही कन्या भ्रूण हत्या के बारे में.\n\nSummary:", "target": "चीन में परिवार नियोजन आयोग ने कहा है कि लोग एक ही बच्चा पैदा करने की नीति का उल्लंघन कर रहे हैं और इससे जनसंख्या में फिर से वृद्धि हो सकती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराष्ट्रीय जनसंख्या और परिवार नियोजन आयोग के अधिकारी ज़ांग वीगिंग ने सरकारी मीडिया को बताया कि लोगों के बीच बढ़ती आर्थिक खाई के चलते जन्म दर में बढ़ोत्तरी हो सकती है. उन्होंने शिन्हुआ समाचार एजेंसी को बताया कि अमीर लोग एक ही बच्चा पैदा करने की 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सलमान खान के परिवारिक सदस्यों के साथ इफ्तारी करने भिंडी बाज़ार के व्यस्त नुक्कड़ में बसे शालीमार जलपान घर पहुँची थीं. शालीमार रेस्टोरेंट की स्थापना 1970 में पहलवान सेठ ने कोल्ड ड्रिंक हाउस से की थी. एक ही साल में यह जलपान घर में एक तब्दील हो गया. अब पहलवान सेठ की तीसरी पीढ़ी उमेश शैख़ ने इस कारोबार की बागडोर संभाल ली है. मोहम्मद अली रोड पर स्थापित शालीमार रेस्टोरेंट में हर दिन करीब 5000 ग्राहक आते हैं. इतनी भीड़ में किसी फ़िल्मी सितारे के लिए लज़ीज़ व्यंजनों का लुत्फ उठाना मुमकिन नहीं है, इसलिए कई फ़िल्मी सितारे अँधेरी स्थित शाखा में गोपनीयता से व्यंजनों का लुफ्त उठाते हैं. यहाँ आने वाले सितारों में खान परिवार, राजकुमार संतोषी, संजय लीला भंसाली, साजिद वाजिद और फ़िल्म जगत के जाने माने बहुत से नाम शामिल हैं. शालीमार के मुगलई व्यंजन बहुत प्रसिद्ध है. खान परिवार यहाँ के लज़ीज़ कबाब, सिजलर्स का दीवाना है. साजिद को दाल गोश्त बहुत पसंद है, कई अनेक हस्तियों को यहाँ का तवा मेजवान पसंद है. हाजी अली जूस सेंटर सलमान खान हाजी अली जूस सेंटर के बेहद दीवाने हैं. हाजी अली दरगाह के पास बना हुआ ये जूस 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चीज़ डोसा बेहद पसंद है. विले पार्ले के मशहूर विद्यापीठ मिठिभाई के सामने बसा हुआ आनंद वड़ा पाव न केवल सिर्फ छात्रों के बीच लोकप्रिय है बल्कि कई फ़िल्मी सितारे भी यहाँ आते हैं. 1980 में अर्नुघम नेणार ने वड़ा पाव के ठेले से शुरुवात की और धीरे धीरे ठेला दुकान में तब्दील हो गया. वर्ष 2000 में जाने माने प्रकाशन ने आनंद वड़ापाव के डोसा को सर्वश्रेष्ठ डोसा के लिए पुरस्कृत किया. इसके बाद यहाँ दूर दूर से लोग सिर्फ इस डोसे को चखने के लिए विले पार्ले आने लगे. फ़िल्मी जगत के कई सितारे यहाँ के डोसा और वड़ापाव का लुफ्त उठाने आते है, लेकिन अपनी गोपनीयता कायम रखने के कारण वो अपनी गाड़ियों से बाहर नहीं आते. यहाँ आने वाले बॉलीवुड कलाकारों में अजय देवगन, काजोल, गोविन्दा, जैकी श्रॉफ, विवेक ओबेरॉय, मनोज बाजपेई, साउथ की अदाकारा सिमरन, तमन्नाह आदि शामिल हैं. विवेक ओबेरॉय और तमन्नाह को यहाँ का मैगी चीज़ डोसा बेहद पसंद है. पर कई फ़िल्मी कलाकार यहाँ के वड़ा पाव के दीवाने हैं खासकर जैकी श्रॉफ. इस सेंटर के मालिक आनंद का कहना है कि डोसा की जैसी विविधता यहाँ है वो मुंबई में कहीं और नहीं मिलेगी. इस दुकान की ज़िम्मेदारी आनंद नेणार ने अपने पिता के देहांत के बाद 2012 में ली. वो एमबीए हैं. उनके पिता चाहते थे कि वो कोई दूसरा काम करें, लेकिन किस्मत उन्हें अपने पारिवारिक कारोबार में ले आई. आनंद को इससे कोई आपति नहीं है वे अपने पिता के बनाये हुए इस नाम को और रोशन करना चाहते हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं)\n\nSummary:", "target": "जब हम बॉलीवुड के सितारों के बारे में सोचते हैं तो हमारे ज़ेहन में बड़ी गाड़ियां, बड़े घर, बड़े होटल और उनके महंगे खाने का ही ख़्याल आता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपर क्या आपको पता है कि बॉलीवुड के कई फ़िल्मी सितारे मुंबई की खास गलियों-नुक्कड़ों में मिलने वाले ज़ायकों के दीवाने हैं. कई फ़िल्मी अक्सर सितारे छुपते-छुपाते ऐसी जगहों पर जाकर खाने का लुत्फ़ उठाते हैं. आइये जानते हैं ऐसे ही कुछ स्ट्रीट फूड ठिकानों के बारे में. शालीमार रेस्टोरेंट 2012 के रमजान के पाक महीने में कटरीना कैफ, सलमान खान के परिवारिक सदस्यों के साथ इफ्तारी करने भिंडी बाज़ार के व्यस्त नुक्कड़ में बसे शालीमार जलपान घर पहुँची थीं. शालीमार रेस्टोरेंट की स्थापना 1970 में पहलवान सेठ ने कोल्ड ड्रिंक हाउस से की थी. एक ही साल में यह जलपान घर में एक तब्दील हो गया. अब पहलवान सेठ की तीसरी पीढ़ी उमेश शैख़ ने इस कारोबार की बागडोर संभाल ली है. मोहम्मद अली रोड पर स्थापित शालीमार रेस्टोरेंट में हर दिन करीब 5000 ग्राहक आते हैं. इतनी भीड़ में किसी फ़िल्मी सितारे के लिए लज़ीज़ व्यंजनों का लुत्फ उठाना मुमकिन नहीं है, इसलिए कई फ़िल्मी सितारे अँधेरी स्थित शाखा में गोपनीयता से व्यंजनों का लुफ्त उठाते हैं. यहाँ आने वाले सितारों में खान परिवार, राजकुमार संतोषी, संजय लीला भंसाली, साजिद वाजिद और फ़िल्म जगत के जाने माने बहुत से नाम शामिल हैं. शालीमार के मुगलई व्यंजन बहुत प्रसिद्ध है. खान परिवार यहाँ के लज़ीज़ कबाब, सिजलर्स का दीवाना है. साजिद को दाल गोश्त बहुत पसंद है, कई अनेक हस्तियों को यहाँ का तवा मेजवान पसंद है. हाजी अली जूस सेंटर सलमान खान हाजी अली जूस सेंटर के बेहद दीवाने हैं. हाजी अली दरगाह के पास बना हुआ ये जूस सेंटर 40 साल पुराना है. इसकी शुरुआत नूरानी जी ने की थी. ये छोटा सा जूस सेंटर अपने व्यंजनों के लिए इतना मशहूर है कि बॉलीवुड के दबंग खान यानी सलमान खान अक्सर यहाँ आते रहते है. सलमान खान का पसंदीदा व्यंजन है जैन पिज़्ज़ा और केसर बादाम मिल्क शेक. पुणे की येरवडा जेल से फिलहाल छुट्टी पर बाहर आए संजय दत्त भी यहाँ अक्सर आते थे. भारत के मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को यहाँ का सीताफल (शरीफा) फ्रेश क्रीम बेहद पसंद है. सलमान खान तो इस जगह के इतने दीवाने हैं कि उन्होंने अपने ट्विटर पर भी इसका जिक्र किया है \"हाजी अली जूस सेंटर अब 12 बजे बंद हो जाता है. पता नहीं क्यों? बहुत दुखद बात है! पहले हम सुबह के पाँच बजे वहां जूस और पिज़्ज़ा खाया करते थे.\" पूरी मुंबई में ये ऐसी इकलौती दुकान है जिसमें दरवाज़े नहीं है और करीबन 500 से 1000 लोग रोज़ यहाँ आते हैं. व्यवसाय की बागडोर अब नूरानी जी की बेटियों ने संभाल ली है. अस्मे नूरानी मुंबई के हाजी अली जूस सेंटर की देखरेख करती है जबकि ओमान में उनकी दूसरी बेटी. लगभग 70-75 लोग यहाँ अलग-अलग शिफ्ट में काम करते है . आनंद वड़ा पाव विवेक ओबेरॉय को आनंद वड़ा पाव का मैगी चीज़ डोसा बेहद पसंद है. विले पार्ले के मशहूर विद्यापीठ मिठिभाई के सामने बसा हुआ आनंद वड़ा पाव न केवल सिर्फ छात्रों के बीच लोकप्रिय है बल्कि कई फ़िल्मी सितारे भी यहाँ आते हैं. 1980 में अर्नुघम नेणार ने वड़ा पाव के ठेले से शुरुवात की और धीरे धीरे ठेला दुकान में तब्दील हो गया. वर्ष 2000 में जाने माने प्रकाशन ने आनंद वड़ापाव के डोसा को सर्वश्रेष्ठ डोसा के लिए पुरस्कृत किया. इसके बाद यहाँ दूर दूर से लोग सिर्फ इस डोसे को चखने के लिए विले पार्ले आने लगे. फ़िल्मी जगत के कई सितारे यहाँ के डोसा और वड़ापाव का लुफ्त उठाने आते है, लेकिन अपनी गोपनीयता कायम रखने के कारण वो अपनी गाड़ियों से बाहर नहीं आते. यहाँ आने वाले बॉलीवुड कलाकारों में अजय देवगन, काजोल, गोविन्दा, जैकी श्रॉफ, विवेक ओबेरॉय, मनोज बाजपेई, साउथ की अदाकारा सिमरन, तमन्नाह आदि शामिल हैं. विवेक ओबेरॉय और तमन्नाह को यहाँ का मैगी चीज़ डोसा बेहद पसंद है. पर कई फ़िल्मी कलाकार यहाँ के वड़ा पाव के दीवाने हैं खासकर जैकी श्रॉफ. इस सेंटर के मालिक आनंद का कहना है कि डोसा की जैसी विविधता यहाँ है वो मुंबई में कहीं और नहीं मिलेगी. इस दुकान की ज़िम्मेदारी आनंद नेणार ने अपने पिता के देहांत के बाद 2012 में ली. वो एमबीए हैं. उनके पिता चाहते थे कि वो कोई दूसरा काम करें, लेकिन किस्मत उन्हें अपने पारिवारिक कारोबार में ले आई. आनंद को इससे कोई आपति नहीं है वे अपने पिता के बनाये हुए इस नाम को और रोशन करना चाहते हैं. 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'सब ख़त्म नहीं हुआ' अबरार 2006 मालेगाँव धमाके मामले में सरकारी गवाह बन गए हलफ़नामे के मुताबिक अबरार की मुलाकात एंटी-टेरर स्क्वैड के वरिष्ठ अधिकारियों से भी करवाई गई, हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी में लिख दस्तावेज़ों पर उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध कथित तौर पर हस्ताक्षर भी लिए गए. हमने इस हलफ़नामे पर खुद राजवर्धन से संपर्क किया तो वो बार बार कहते रहे कि वो इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे और हम इस बारे में जाँच एजेंसी सीबीआई से बात करें जो कि इस मामले की जाँच कर रही है. इससे पहले हमने उस वक़्त राज्य के डीजीपी रहे पीएस पसरीचा से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने भी कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया था. अबरार के परिवार के मुताबिक उनकी पत्नी और साला भी इस साज़िश में शामिल थे और ये सब उन्होंने धन की लालच में किया. अबरार के भाई और इस मामले में वकील जलील अहमद कहते हैं, “‘ये ज़रूरी हो जाता है कि अबरार अहमद के उस वक्त का मोबाईल रिकॉर्ड निकाला जाए, सभी बातें साफ़ हो जाएंगी कि इसमें राजवर्धन शामिल हैं या नहीं और अबरार अहमद के साथ क्या हुआ.” धमाके के करीब छह महीने पहले ही अबरार कुछ मतभेदों के कारण अपने परिवार से अलग हो गए थे और ये पूरा वाकया परिवार की साख के लिए अच्छा नहीं था. अबरार के पिता बताते हैं कि वो आज़ादी के सिपाही रहे हैं और उनके दादा को 1921 में फांसी दे दी गई थी. वो कहते हैं कि गुस्से में उन्होंने अबरार से सभी संपर्क तोड़ लिए थे. अबरार चार भाइयों में सबसे छोटे थे, इसलिए वो सबसे लाडले थे. उन्होंने सिर्फ़ आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की लेकिन नज़र कमज़ोर होने के वजह से आगे नहीं पढ़ सके. वो परिवार के पावरलूम के कारोबार से जुड़े रहे. जलील कहते हैं कि इस पूरे किस्से की सबसे महत्वपूर्ण बात ये रही कि बम धमाकों के दौरान शहर में कोई दंगा फ़साद नहीं हुआ और लोगों की एकता बरकरार रही. इस बात को सुन रहे बगल में बैठे अहमद सईद की आंखों में जैसे चमक सी आ गई और वो धीरे से बोले, अब भी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है. (कुछ दिन पहले दिल्ली स्थित एक पत्रिका में स्वामी असीमानंद का मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया ‘इक़बालिया बयान’ छपा. इसमें असीमानंद ने कहा कि मालेगाँव धमाकों में हिंदू चरमपंथियों का हाथ हैं. ये बयान महाराष्ट्र पुलिस की तहकीकात और जाँच के बिल्कुल विपरीत है जिसके तहत नौ मुसलमान नौजवान जेल में बंद हैं. हमारे संवाददाता विनीत खरे पहुँचे मालेगाँव जेल में बंद लोगों के परिवारों से मिलने. ये इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी है)\n\nSummary:", "target": "अबरार अहमद के 82 साल के पिता अहमद सईद के घर में ही एक मदरसा भी है जिसमें कई बच्चे पढ़ते हैं. हम जब शाम को उनके घर पहुँचे तो बच्चों की आवाज़ें पूरे घर में गूँज रही थीं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्हें सबसे ज़्यादा दुख इस बात का है कि अबरार 2006 मालेगाँव धमाके मामले में सरकारी गवाह बन गए, लेकिन उनकी मानें तो अबरार को फंसाया गया और इसके पीछे उस समय नासिक के ग्रामीण इलाकों के पुलिस अधीक्षक ज़िम्मेदार हैं. इस श्रृंखला की पहली कड़ी इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी वो कहते हैं, “हमारा खानदान स्वतंत्रता सेनानी परिवार है. हमको ये जानकर झटका लगा कि सरकारी गवाह बनकर अबरार ने बट्टा लगा दिया. हम उससे इतना नाराज़ थे कि उसका नाम भी घर में लेने को मना कर दिया था.” दरअसल अबरार सरकारी गवाह तो बने लेकिन अप्रैल 2009 को दायर अपने हलफ़नामे में उन्होंने अपना बयान बदला और खुद को फंसाने के लिए पुलिस अधीक्षक राजवर्धन को ज़िम्मेदार बताया. अपने हलफ़नामे में अबरार कहते हैं कि उन्होंने कुछ हिंदू लोगों को इस षडयंत्र के बारे में बात करते हुए सुना था और इसका ज़िक्र उन्होंने जब राजवर्धन से किया तो वो हैरान रह गए. राजवर्धन ने कथित तौर पर अबरार से कहा कि उन्हें सूचना मिली है कि ये काम कुछ हिंदू और मुस्लिम लोगों ने मिलकर किया है. अबरार के मुताबिक राजवर्धन ने उन्हें एक मोबाइल फ़ोन भी दिया जिसका नंबर हलफ़नामे में दर्ज है. अबरार के मुताबिक कुछ पुलिसवाले उन्हें और उनकी पत्नी जन्न्तुनिसा को नासिक और इंदौर जैसी जगहों पर ले गए, उनकी मुलाकात साधुओं से करवाई गईं, उनकी तस्वीरें भी ली गईं और बातचीत भी रिकॉर्ड की गई. अबरार के मुताबिक वो लगातार कथित तौर पर राजवर्धन के संपर्क में रहे और उनके किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया जाता था. 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आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी रुपदेव गवड़े ने कहा कि वे आर्थिक तंगी और गुरिल्ला लड़ाके के रुप में यहाँ वहाँ भटक-भटककर परेशान हो गए थे और अब समाज की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं. पुलिस का कहना है कि जिन माओवादियों ने बुधवार को आत्मसमर्पण किया वे केशकाल इलाक़े के रहने वाले हैं. उल्लेखनीय है कि इस समय छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से है और राज्य के दक्षिणी हिस्से बस्तर में पिछले एक साल में सौ से अधिक ग्रामीण नक्सली हिंसा में मारे गए हैं. आत्मसमर्पण नीति गृह मंत्री रामविचार नेताम का कहना है कि नक्सलियों का यह आत्मसमर्पण राज्य सरकार की नई आत्मसमर्पण नीति के कारण हुआ है. राज्य सरकार ने हाल ही में एक आत्मसमर्पण नीति घोषित की है जिसके तहत आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को आर्थिक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध करवाई जाएगी और यदि किसी माओवादी का आपराधिक रिकॉर्ड न हुआ तो नौकरी भी दिलवाई जाएगी. हालांकि एक सवाल के जवाब में गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले किसी भी माओवादी को कोई रियायत सरकार की ओर से नहीं दी जाएगी और क़ानून अपना कार्य करेगा. आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को एक-एक हज़ार रुपए भी दिए गए. राज्य के पुलिस महानिदेशक ओपी राठौर के अनुसार पिछले दो सालों में 117 नक्सली विद्रोहियों को पुलिस ने पकड़ा है और पिछले साल मुठभेड़ में नौ की मौत हुई है.\n\nSummary:", "target": "छत्तीसगढ़ राज्य में 79 माओवादियों ने राज्य पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. समर्पण करने वालों में 20 गुरिल्ला लड़ाके भी शामिल हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराजधानी रायपुर में पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण करने वालों में 12 महिलाएँ भी हैं. कुछ माओवादियों ने अपने हथियार भी पुलिस को सौंपे जिनमें देसी पिस्तौलें, राइफ़लें और पुलिस के स्टेनगन से मिलती-जुलती बंदूकें हैं. सभी माओवादियों ने महात्मा गाँधी की तस्वीर पर माला पहनाकर हिंसा छोड़ने और गाँधी के अहिंसा के मार्ग पर चलने की शपथ ली. इस पूर्व नियोजित आत्मसमर्पण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री रमन सिंह, गृह मंत्री रामविचार नेताम और पुलिस के आला अधिकारी मौजूद थे. आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी रुपदेव गवड़े ने कहा कि वे आर्थिक तंगी और गुरिल्ला लड़ाके के रुप में यहाँ वहाँ भटक-भटककर परेशान हो गए थे और अब समाज की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं. पुलिस का कहना है कि जिन माओवादियों ने बुधवार को आत्मसमर्पण किया वे केशकाल इलाक़े के रहने वाले हैं. उल्लेखनीय है कि इस समय छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से है और राज्य के दक्षिणी हिस्से बस्तर में पिछले एक साल में सौ से अधिक ग्रामीण नक्सली हिंसा में मारे गए हैं. आत्मसमर्पण नीति गृह मंत्री रामविचार नेताम का कहना है कि नक्सलियों का यह आत्मसमर्पण राज्य सरकार की नई आत्मसमर्पण नीति के कारण हुआ है. राज्य सरकार ने हाल ही में एक आत्मसमर्पण नीति घोषित की है जिसके तहत आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को आर्थिक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध करवाई जाएगी और यदि किसी माओवादी का आपराधिक रिकॉर्ड न हुआ तो नौकरी भी दिलवाई जाएगी. हालांकि एक सवाल के जवाब में गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले किसी भी माओवादी को कोई रियायत सरकार की ओर से नहीं दी जाएगी और क़ानून अपना कार्य करेगा. आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को एक-एक हज़ार रुपए भी दिए गए. राज्य के पुलिस महानिदेशक ओपी राठौर के अनुसार पिछले दो सालों में 117 नक्सली विद्रोहियों को पुलिस ने पकड़ा है और पिछले साल मुठभेड़ में नौ की मौत हुई है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 623, "source_item_id": "623", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1686, "clean_index": 556, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:556"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया है कि घरेलू महिलाओं के मुक़ाबले कामकाजी महिलाओं की बेटियों का करियर बेहतर होता है. इस अध्ययन में 24 देशों को शामिल किया गया था, लेकिन यह नतीज़ा खासकर ब्रिटेन और अमरीका के लिए है. इस शोध की मुखिया कैथलीन मैकगिन के मुताबिक़, “नौकरी करने वाली महिलाएँ अक्सर अपने बच्चों के लिए भविष्य के ख़तरे का संकेत भांप जाती हैं.” इंटरनेशनल सोशल सर्वे प्रोग्राम में 2002 से लेकर 2012 तक के आंकड़ों के नतीजे बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं की बेटियां अपने समकक्षों से 4 प्रतिशत अधिक तनख्वाह पाती हैं. समाप्त बेटों भी होते हैं पॉजिटिव इस अध्ययन में यह भी पाया गया है कि कामकाजी महिलाओं की तीन में से एक बेटी प्रबंधकीय पद पर थी, जबकि घरेलू महिलाओं की बेटियों में यह अनुपात चार में एक था. अध्ययन के मुताबिक़, “ये नतीज़े बताते हैं कि कामकाजी महिलाएं अपनी बेटियों को ऐसे हुनर सिखाती हैं जो उन्हें उनके भविष्य में और नेतृत्व के पदों पर सफल बनाता है.” हालांकि इसमें नौकरीशुदा मातृ पक्ष और वयस्क बेटों के कामकाजी ढर्रे के बीच संबंध का पता नहीं चलता. हालांकि कामकाजी महिलाओं के बेटों में देखा गया है कि वो अपने परिवार की देखभाल में ज़्यादा समय गुजारते हैं, बनिस्बत घरेलू महिलाओं के बेटों के. इस अध्ययन से नतीजा निकाला गया है, “पूरी दुनिया के पैमाने पर महिलाएं अधिकाधिक कामकाजी हो रही हैं, लेकिन इसी के समानांतर पुरुषों का घरेलू कामों में हाथ बंटाने की रफ़्तार धीमी है.” घर के कामों का महिलाओं पर अधिक भार होने से सार्वजनिक ज़िंदगी में उनके विकल्प भी सीमित हो जाते हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "कामकाजी महिलाओं की बेटियां भी बेहतर नौकरी पाती हैं, जबकि उनके बड़े बेटे घर के कामों में अधिक हाथ बंटाते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया है कि घरेलू महिलाओं के मुक़ाबले कामकाजी महिलाओं की बेटियों का करियर बेहतर होता है. इस अध्ययन में 24 देशों को शामिल किया गया था, लेकिन यह नतीज़ा खासकर ब्रिटेन और अमरीका के लिए है. इस शोध की मुखिया कैथलीन मैकगिन के मुताबिक़, “नौकरी करने वाली महिलाएँ अक्सर अपने बच्चों के लिए भविष्य के ख़तरे का संकेत भांप जाती हैं.” इंटरनेशनल सोशल सर्वे प्रोग्राम में 2002 से लेकर 2012 तक के आंकड़ों के नतीजे बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं की बेटियां अपने समकक्षों से 4 प्रतिशत अधिक तनख्वाह पाती हैं. समाप्त बेटों भी होते हैं पॉजिटिव इस अध्ययन में यह भी पाया गया है कि कामकाजी महिलाओं की तीन में से एक बेटी प्रबंधकीय पद पर थी, जबकि घरेलू महिलाओं की बेटियों में यह अनुपात चार में एक था. अध्ययन के मुताबिक़, “ये नतीज़े बताते हैं कि कामकाजी महिलाएं अपनी बेटियों को ऐसे हुनर सिखाती हैं जो उन्हें उनके भविष्य में और नेतृत्व के पदों पर सफल बनाता है.” हालांकि इसमें नौकरीशुदा मातृ पक्ष और वयस्क बेटों के कामकाजी ढर्रे के बीच संबंध का पता नहीं चलता. हालांकि कामकाजी महिलाओं के बेटों में देखा गया है कि वो अपने परिवार की देखभाल में ज़्यादा समय गुजारते हैं, बनिस्बत घरेलू महिलाओं के बेटों के. इस अध्ययन से नतीजा निकाला गया है, “पूरी दुनिया के पैमाने पर महिलाएं अधिकाधिक कामकाजी हो रही हैं, लेकिन इसी के समानांतर पुरुषों का घरेलू कामों में हाथ बंटाने की रफ़्तार धीमी है.” घर के कामों का महिलाओं पर अधिक भार होने से सार्वजनिक ज़िंदगी में उनके विकल्प भी सीमित हो जाते हैं. 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'तकनीकी विकास में दख़ल नहीं' मसौदे में यह भी कहा गया है - \"आईएईए निगरानी इस तरह से रखेगी ताकि भारत के आर्थिक और तकनीकी विकास में कोई बाधा न आए और इस समझौते के बाहर भारत द्वारा परमाणु सामग्री या साज़ो-सामान या तकनीक़ में कोई दख़ल न हो.\" इस मसौदे में 18 जुलाई 2005 को भारत-अमरीका के संयुक्त बयान में शामिल कुछ अहम मुद्दों को भी जगह दी गई है. इसमें पहला तो यह कि चरणबद्ध तरीक़े से असैनिक और सैन्य परमाणु संस्थाओं और अड्डों की पहचान की जाए और उन्हें अलग किया जाए. दूसरा यह कि भारत सरकार स्पष्ट तौर पर आईएईए को बताए कि उसके कौन कौन से असैन्य परमाणु प्रतिष्ठान हैं. तीसरा यह कि भारत सरकार फ़ैसला करे कि वह अपने असैनिक परमाणु प्रतिष्ठान आईएईए की निगरानी में सौंप रही है. इस मसौदे में ज़ोर देकर यह भी कहा गया है कि निगरानी में रखे गए प्रतिष्ठानों में लाए जाने वाली सामग्री या फिर उपकरणों का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने या फिर किसी सैनिक मक़सद के लिए नहीं किया जाएगा. यह भी बताया गया है कि इस समझौते के बाद भारत अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग समझौतों के तहत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार से लगातार और बिना किसी विघ्न के ईंधन न केवल ले पाएगा बल्कि रणनीतिक रिज़र्व यानी बचाकर ईंधन रख भी पाएगा ताकि ऊर्जा की सप्लाई बाधित न हो. इस समझौते के तहत भारत आईएईए को हर साल या फिर जब भी ये माँगी जाए, अपने असैनिक परमाणु ठिकानों के बारे में जानकारी देगा.\n\nSummary:", "target": "भारत-अमरीका परमाणु समझौते के तहत भारत के लिए अनिवार्य है कि वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर करे जिसके नियमों के तहत भारत के असैनिक परमाणु ठिकानों पर निगरानी रखी जाए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत सरकार के अनुरोध पर बुधवार को आईएईए सचिवालय ने आईएईए बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के सदस्यों को निगरानी समझौते का मसौदा सौंप दिया. भारत में वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए इस मसौदे में सबसे अहम बात यह है - 'अपने देश के नागरिकों के भले के लिए भारत को परमाणु शोध और विकास गतिविधियाँ जारी रखने का संप्रभु और अभिन्न अधिकार है.\" मसौदे में बार-बार ये स्पष्ट किया गया है कि ये समझौता भारत के असैनिक परमाणु ठिकानों के बारे में है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सिडनी के कैफ़े में लोगों को बंधक बनाने वाले की पहचान मन हारून मोनिस के रूप में हुई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nऑस्ट्रेलियाई मीडिया का कहना है कि मोनिस पुलिस कार्रवाई में मारे गए हैं. ऑस्ट्रेलियाई पुलिस का कहना है कि ईरानी मूल के हारून मोनिस राजनीतिक शरण पर ऑस्ट्रेलिया आए थे. मोनिस के पूर्व वकील के मुताबिक वह किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं और अकेले ही काम करते हैं. 49 साल के मोनिस पर कई हिंसक अपराधों के लिए ऑस्ट्रेलिया में मुकदमा चल रहा है. समाप्त फिलहाल उन्हें ज़मानत पर रिहा किया गया है और ऑस्ट्रेलिया की पुलिस उन्हें बहुत अच्छे से पहचानती है. मोनिस पर यह भी आरोप है कि उसने विदेशों में सेवा के दौरान मारे गए ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के मां बाप को गालियों से भरे पत्र भेजे थे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं)\n\nSummary:", "target": "समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को हवा दे दी है हालांकि उनका कहना है कि तीसरे मोर्चे का जन्म 2014 के आम चुनाव के बाद हो सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुलायम सिंह का कहना है कि इस सिलसिले में उनकी वाम मोर्चे से बातचीत जारी है. मुलायम ने कहा, \"तीसरा मोर्चा चुनाव के बाद बन सकता है. चुनाव से पहले यह नहीं बन सकता. हम इस बारे में प्रकाश करात से बात कर रहे हैं.\" सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुलायम सिंह ने कहा, \"अभी मोर्चे का गठन मुमकिन नहीं है क्योंकि टिकट बंटवारे को लेकर मतभेद पैदा हो सकते हैं.\" हालांकि उन्होंने दावा किया कि अगला प्रधानमंत्री गठबंधन दलों से होगा. वाम दल सक्रिय माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य भी नई दिल्ली में दो दिन के लिए बैठक कर रहे हैं. इनकी कोशिश है कि सभी ग़ैर कांग्रेसी, ग़ैर भाजपा पार्टियों को लोकसभा चुनाव से पहले एक मंच पर लाया जा सके. चुनाव के मद्देनज़र तैयारियों के तहत सीपीआईएम दिल्ली में 30 अक्तूबर को एक राष्ट्रीय सम्मेलन करने वाली है. इसका विषय होगा– धर्मनिरपेक्षता के हक़ में. माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव और जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव इसमें भाग ले सकते हैं. इस बैठक में पांच राज्यों की चुनाव तैयारियों पर भी चर्चा होने की संभावना है. शुक्रवार को मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि वे सीपीआईएम के महासचिव प्रकाश करात से मुलाकात करेंगे और तीसरे मोर्चे के गठन की संभावनाओं पर बात करेंगे. उनका कहना था कि उनकी पार्टी हमेशा सांप्रदायिक ताकतों से लड़ती रहेगी और उनकी असली लड़ाई भाजपा के साथ है. 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'हीमोडायनैमिकली स्टेबल' होने का मतलब है कि दिल उतनी ऊर्जा पैदा कर पा रहा है कि वह ख़ून को धमनियों में सही ढंग से भेज सके. इससे ख़ून का प्रवाह सही रहता है और शरीर के अंगों तक ऑक्सिजन पहुंचती रहती है. प्रधानमंत्री भी पहुंचे एम्स बताया जा रहा है कि सांस लेने की समस्या के कारण जेटली को अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनके अस्पताल में भर्ती होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन उन्हें देखने के लिए अस्पताल पहुंचे थे. पिछली मोदी सरकार में 66 वर्षीय अरुण जेटली वित्त मंत्री थे. उनका किडनी ट्रांसप्लांट भी हुआ था. स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनकी ज़िम्मेदारियों को कई बार पीयूष गोयल को दिया गया. इस साल फ़रवरी में वह इलाज के लिए देश से बाहर गए थे जिसके कारण वह अंतरिम बजट पेश नहीं कर पाए थे. मई में बीजेपी की दोबारा सरकार बनने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा था कि वह स्वास्थ्य कारणों से नई सरकार में कोई ज़िम्मेदारी नहीं चाहते हैं. उन्होंने पत्र में लिखा था कि बीते 18 महीनों से उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं हैं जिसके कारण वह कोई पद नहीं लेना चाहते हैं. वकालत से राजनीति में आए जेटली बीजेपी के दिग्गज नेताओं में शुमार हैं. वह दिल्ली एवं ज़िला क्रिकेट संघ डीडीसीए के अध्यक्ष भी रहे और अभी राज्यसभा सांसद हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पूर्व वित्त मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली को ख़राब स्वास्थ्य के कारण नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएम्स ने बयान जारी कर बताया है कि अरुण जेटली को आज सुबह अस्पताल में भर्ती कराया गया था. अभी उनका आईसीयू में इलाज चल रहा है. एम्स ने बताया है कि उनका इलाज विभिन्न विभाग के डॉक्टरों की एक टीम कर रही है. साथ ही एम्स ने बताया है कि उनकी हालत अभी 'हीमोडायनैमिकली स्टेबल' है. 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'जंगल वाले दोस्त' पेड़ों पर बने मचानों से हाथियों पर नज़र रखी जा रही थी. हमारे ‘जंगल वाले दोस्त’ अच्युतन को हाथी की लोकेशन के बारे में पूरा आभास था. अच्युतन भी मुथवन आदिवासी हैं. लग रहा था कि कुछेक दूरी पर पेड़ों पर बने मचानों की मदद से हाथी पर नज़र रखी जा रही है और वहीं से लोग ऊंची आवाज़ में चेतावनी दे रहे हैं. एक अकेला हाथी अच्छी ख़बर नहीं होती है. बहुत संभव है कि वो ‘मस्त’ वाली स्थिति में हो और हाथियों के नाराज़ झुंड ने उसे झुंड से निकाल दिया हो. वो ऐसा क्षण था जब हमें हाथियों से जुड़ी सारी बुरी ख़बरें याद आ रही थीं. याद आया कि जब हाथी मस्त वाली स्थिति में होता है तो उसके टेस्टोस्टेरोन स्तर सामान्य से साठ गुना अधिक बढ़ जाते हैं और इस ऊर्जा को वो लड़ने में ख़र्च करता है. हममें से शायद ही कोई इस मस्त हाथी से लड़ना चाहता था इसलिए हमने एक पेड़ की छांव में शरण ली. जब कभी पेड़ों के बीच कुछ हलचल होती, हम सोचते, ये हमारे जंगल वाले दोस्त हैं या फिर.....इन कुछ घंटों में हम इदुक्की के सुंदर जंगलों के नज़ारे का आनंद भी उठा नहीं पाए. हमें अपना सबक मिल गया था, कभी भी ऐसी जगह पर शार्ट कट का इस्तेमाल न करें जिस जगह को आप न जानते हों. यह आपदा हो सकती है. हम कोच्चि से निकले थे और मुन्नार में रात रुके थे. पेट्टीमुडी तक हम कार से आए और उसके बाद हमने शुरू की 18 किलोमीटर की यात्रा पहाड़ों से होकर इदामालकुडी की. हाथियों के इलाके में केरला के ही रहने वाले चिनप्पा दास और अच्यूतन एम भी इस सफ़र में साथ थे. पंचायत में इंटरव्यू ख़त्म कर के हमने सोचा कि हम चतुर हो गए हैं. हमने सोचा कि क्यों फिर वापस जाएं 18 किलोमीटर वापस. हमने सोच कि क्यों न शॉर्ट कट लेकर दूसरी दिशा में वलपरई की तरफ चलें जाएं जो तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले में है. ये रास्ता पहाड़ियों वाला है पर है बस आठ-दस किलोमीटर. वलपरई से फिर सड़क मार्ग से कोच्चि और फिर मुन्नार. लेकिन ये रास्ता हाथियों के इलाके वाला था और हम फंस गए थे. आख़िरकार पास के एक गांव से तीन युवा आदिवासी पहुंचे और हमें लेकर चले एक कतार में. इन तीनों में से एक के हाथ में छोटा सा बैग था जिसे उसने कस कर पकड़ रखा था. कुछ मिनटों के बाद छोटे धमाके जैसी आवाज़ हुई और हमें समझ आया कि बैग में पटाखे हैं. इसके जवाब में हाथी की कोई आवाज़ नहीं आई. कैसे इतना विशालकाय जीव अदृश्य सा रह सकता है? लेकिन कुछ ही मिनटों में हमें लेकर जा रहे लोगों ने कहा कि अब हम आगे बढ़ सकते हैं. नदी को पार कर सकते हैं. हाथियों को पटाखों की आवाज़ पसंद नहीं. हालांकि नदी पार करने के बाद भी हम हाथी को देख नहीं पाए. नदी के दूसरी तरफ भी नहीं. हां पास में हमने हाथी का मल ज़रूर देखा, ढेर सारा. लेकिन हम रुक कर ये देखने की जहमत नहीं उठाना चाहते थे कि ये मल ताज़ा है या पुराना. एकमात्र विकल्प एक शोध के अनुसार हाथी मनुष्य की आवाज़ से उसके लिंग की पहचान कर सकता है. हमें पता चला कि हाथियों के झुंड ने वही रास्ता लिया है जिस रास्ते के ज़रिए हम वलपरई जाना चाह रहे थे. आदिवासी, यहां तक कि हमें रास्ता दिखा रहे लोग भी, इस रास्ते पर जाना नहीं चाहते थे. हमारे पास बस एक विकल्प था, लंबा रास्ता पकड़ा जाए जो पहाड़ियों और चढ़ाई से भरा हुआ था. इस रास्ते पर लगा कि हम लगातार अपने घुटनों पर रेंग रहे हों. रास्ते पर ही हमने समझा कि पहाड़ों पर पुराने जूतों का ही इस्तेमाल करें. मैं नए जूतों का इस्तेमाल किया और भुगत रहा था. आठ किलोमीटर की यात्रा पच्चीस किलोमीटर की यात्रा जैसी लग रही थी. भारी बैग और बैकपैक, कैमरा, पानी से भरा हुआ. हमें आठ घंटे लगे यात्रा पूरी करने में. इदामलयार नदी के पास हमने आधे घंटे आराम किया लेकिन कोई हाथी नहीं दिखा. हमारी किस्मत अच्छी थी कि मौसम सूखा था. अगर बारिश का मौसम होता तो खून चूसने वाले जोंकों का सामना अलग करना पड़ता. हम जब वलपरई पहुंचे तो हम पिछले 36 घंटों में पेट्टीमुडी से 40 किलोमीटर चल चुके थे. लेकिन हमें लग रहा था कि हम 100 किलोमीटर चले हैं लेकिन अभी तक हम कोई हाथी देख नहीं पाए थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "हम ऊंची घासों और कई पेड़ों वाले उस मैदान में तकरीबन एक घंटा बिता चुके थे और हमारे साथ-साथ था एक जंगली हाथी भी जिसे हम देख नहीं पाए थे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहम आठ लोग थे जो केरल के सुदूर जंगलों में स्थित इदामालकुड़ी पंचायत जा रहे थे और साथ चलते हाथी को देख नहीं पाए थे. हालांकि हमारे साथ जो ग्रामीण थे वो उस जंगली हाथी की हर गतिविधि पहचान रहे थे. हम बार बार ग्रामीणों के मुंह से अनाई अनाई (हाथी, हाथी) सुनते पर हाथी को देख नहीं पाते. आसपास के गांवों वाले लोग ऊंची आवाज़ में चेतावनी देते कि पानी के पास कोई न जाए. रास्ते में मिलते हुए आदिवासी हमें बताते जाते, \"वो नदी के पास ही है. ध्यान से जाना.\" ये आदिवासी सोसायटीकुडी जा रहे हैं जहां से हम आ रहे हैं. उनकी चेतावनी से राहत तो नहीं ही मिल रही थी. हम पास के खेतों में चले गए, आवाज़ें आती रहीं. 'जंगल वाले दोस्त' पेड़ों पर बने मचानों से हाथियों पर नज़र रखी जा रही थी. हमारे ‘जंगल वाले दोस्त’ अच्युतन को हाथी की लोकेशन के बारे में पूरा आभास था. अच्युतन भी मुथवन आदिवासी हैं. लग रहा था कि कुछेक दूरी पर पेड़ों पर बने मचानों की मदद से हाथी पर नज़र रखी जा रही है और वहीं से लोग ऊंची आवाज़ में चेतावनी दे रहे हैं. एक अकेला हाथी अच्छी ख़बर नहीं होती है. बहुत संभव है कि वो ‘मस्त’ वाली स्थिति में हो और हाथियों के नाराज़ झुंड ने उसे झुंड से निकाल दिया हो. वो ऐसा क्षण था जब हमें हाथियों से जुड़ी सारी बुरी ख़बरें याद आ रही थीं. याद आया कि जब हाथी मस्त वाली स्थिति में होता है तो उसके टेस्टोस्टेरोन स्तर सामान्य से साठ गुना अधिक बढ़ जाते हैं और इस ऊर्जा को वो लड़ने में ख़र्च करता है. हममें से शायद ही कोई इस मस्त हाथी से लड़ना चाहता था इसलिए हमने एक पेड़ की छांव में शरण ली. जब कभी पेड़ों के बीच कुछ हलचल होती, हम सोचते, ये हमारे जंगल वाले दोस्त हैं या फिर.....इन कुछ घंटों में हम इदुक्की के सुंदर जंगलों के नज़ारे का आनंद भी उठा नहीं पाए. हमें अपना सबक मिल गया था, कभी भी ऐसी जगह पर शार्ट कट का इस्तेमाल न करें जिस जगह को आप न जानते हों. यह आपदा हो सकती है. हम कोच्चि से निकले थे और मुन्नार में रात रुके थे. पेट्टीमुडी तक हम कार से आए और उसके बाद हमने शुरू की 18 किलोमीटर की यात्रा पहाड़ों से होकर इदामालकुडी की. हाथियों के इलाके में केरला के ही रहने वाले चिनप्पा दास और अच्यूतन एम भी इस सफ़र में साथ थे. पंचायत में इंटरव्यू ख़त्म कर के हमने सोचा कि हम चतुर हो गए हैं. हमने सोचा कि क्यों फिर वापस जाएं 18 किलोमीटर वापस. हमने सोच कि क्यों न शॉर्ट कट लेकर दूसरी दिशा में वलपरई की तरफ चलें जाएं जो तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले में है. ये रास्ता पहाड़ियों वाला है पर है बस आठ-दस किलोमीटर. वलपरई से फिर सड़क मार्ग से कोच्चि और फिर मुन्नार. लेकिन ये रास्ता हाथियों के इलाके वाला था और हम फंस गए थे. आख़िरकार पास के एक गांव से तीन युवा आदिवासी पहुंचे और हमें लेकर चले एक कतार में. इन तीनों में से एक के हाथ में छोटा सा बैग था जिसे उसने कस कर पकड़ रखा था. कुछ मिनटों के बाद छोटे धमाके जैसी आवाज़ हुई और हमें समझ आया कि बैग में पटाखे हैं. इसके जवाब में हाथी की कोई आवाज़ नहीं आई. कैसे इतना विशालकाय जीव अदृश्य सा रह सकता है? लेकिन कुछ ही मिनटों में हमें लेकर जा रहे लोगों ने कहा कि अब हम आगे बढ़ सकते हैं. नदी को पार कर सकते हैं. हाथियों को पटाखों की आवाज़ पसंद नहीं. हालांकि नदी पार करने के बाद भी हम हाथी को देख नहीं पाए. नदी के दूसरी तरफ भी नहीं. हां पास में हमने हाथी का मल ज़रूर देखा, ढेर सारा. लेकिन हम रुक कर ये देखने की जहमत नहीं उठाना चाहते थे कि ये मल ताज़ा है या पुराना. एकमात्र विकल्प एक शोध के अनुसार हाथी मनुष्य की आवाज़ से उसके लिंग की पहचान कर सकता है. हमें पता चला कि हाथियों के झुंड ने वही रास्ता लिया है जिस रास्ते के ज़रिए हम वलपरई जाना चाह रहे थे. आदिवासी, यहां तक कि हमें रास्ता दिखा रहे लोग भी, इस रास्ते पर जाना नहीं चाहते थे. हमारे पास बस एक विकल्प था, लंबा रास्ता पकड़ा जाए जो पहाड़ियों और चढ़ाई से भरा हुआ था. इस रास्ते पर लगा कि हम लगातार अपने घुटनों पर रेंग रहे हों. रास्ते पर ही हमने समझा कि पहाड़ों पर पुराने जूतों का ही इस्तेमाल करें. मैं नए जूतों का इस्तेमाल किया और भुगत रहा था. आठ किलोमीटर की यात्रा पच्चीस किलोमीटर की यात्रा जैसी लग रही थी. भारी बैग और बैकपैक, कैमरा, पानी से भरा हुआ. हमें आठ घंटे लगे यात्रा पूरी करने में. इदामलयार नदी के पास हमने आधे घंटे आराम किया लेकिन कोई हाथी नहीं दिखा. हमारी किस्मत अच्छी थी कि मौसम सूखा था. अगर बारिश का मौसम होता तो खून चूसने वाले जोंकों का सामना अलग करना पड़ता. हम जब वलपरई पहुंचे तो हम पिछले 36 घंटों में पेट्टीमुडी से 40 किलोमीटर चल चुके थे. लेकिन हमें लग रहा था कि हम 100 किलोमीटर चले हैं लेकिन अभी तक हम कोई हाथी देख नहीं पाए थे. 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स्पेस कचरे को यह फांसता हुआ दिख रहा है. सूरे स्पेस सेंटर के निदेशक प्रोफेसर गुगलाइलमो अगलीती कहते हैं, \"जैसी हमलोगों की उम्मीदें थी, यह वैसा ही काम कर रहा है.\" \"आप साफ़तौर पर देख सकते हैं कि यह कैसे जाल में फंसा. हम लोग किए गए इस प्रयोग से ख़ुश हैं.\" कुछ इस तरह तैयार किया गया है स्पेस जाल आगे क्या होगा यह महज़ एक प्रयोग था, जिसमें एक जूते के डिब्बे के आकार के कचरे को दूसरे सैटेलाइट से पृथ्वी की ओर गिराया गया था, जिसे बाद में जाल में फांसा गया. अगर वास्तव में ऐसा हो पाएगा तो कचरे को फांसने के बाद सैटेलाइट की मदद से जाल इसे पृथ्वी की कक्षा से बाहर कर देगा. पृथ्वी की कक्षा मैं तैर रहे कचरे को हटाने की बात होती रही है. कई प्रयोग भी इस पर चल रहे हैं पर दावा किया जा रहा है कि यह पहली दफ़ा है जब इस तरह का सफल प्रयोग किया गया है. जल्द ही अब इस कोशिश के तहत दूसरे चरण का प्रयोग किया जाएगा, जिसमें एक कैमरा लगाया जाएगा जो स्पेस के वास्तविक कचरे को क़ैद कर सके ताकि उन्हें हटाना आसान हो. यह उम्मीद की जा रही है कि नए साल की शुरुआत तक इससे और बेहतर तरीक़े से काम लिया जा सकेगा. स्पेस कचरे से कितना ख़तरा पृथ्वी की कक्षा में लाखों टुकड़े तैर रहे हैं. ये टुकड़े पुराने और सेवा से बाहर हो चुके उपग्रहों के अंश और अंतरिक्ष यात्रियों के द्वारा ग़लती से छूटे कुछ उपकरण हैं. डर यह है कि अगर इन कचरों को हटाया नहीं गया तो यह काम में आ रही उपग्रहों को क्षतिग्रस्त कर देगा. इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे इंजीनियर अलस्टेयर वेमैन कहते हैं, \"अगर ये टुकड़े आपस में टकराते हैं तो और अधिक कचरा बनेगा. अधिक कचरा बनने से टकराने की आशंका दिनों-दिन बढ़ती चली जाएगी और एक दिन यह बड़ी परेशानी ला सकती है.\" आने वाले समय में ज़रूरतों के हिसाब से कई सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में लॉन्च किए जाएंगे. अगर स्पेस कचरे से निपटा नहीं गया तो योजनाएं फ़ेल हो सकती हैं. ये भी पढ़ें: (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन की एक सैटेलाइट ने पृथ्वी की कक्षा में एक जाल लगाया है जो स्पेस के कचरे को इकट्ठा करेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nप्रयोग के तौर पर शुरू की गई 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एक और वीडियो फ़ेसबुक पर शेयर किया गया था. बेलफास्ट यूनिवर्सिटी के एक छात्र रेयान एल ने बीबीसी को बताया कि जब उन्होंने अपने दोस्त की न्यूज़ फीड में इस वीडियो को देखा तो उन्होंने फ़ेसबुक से इसकी शिकायत की थी. लेकिन इसके जवाब में फ़ेसबुक ने कहा था, ‘‘ आपकी शिकायत के लिए धन्यवाद लेकिन हमने पाया कि यह हिंसा के मामले में फ़ेसबुक के सामुदायिक मानकों का उल्लंघन नहीं करता है.’’ फ़ेसबुक पूर्व में कह चुका था कि वो ऐसी सामग्री को यूं ही छोड़ देगा. अमरीका और ब्रिटेन में फ़ेसबुक की इस तरह के वीडियो के मामलों में कड़ी आलोचना हुई है. ब्रितानी सरकार की बच्चों की इंटरनेट पर सुरक्षा संबंधी काउंसिल के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य जॉन कॉर का कहना था कि फ़ेसबुक इस मामले में अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं कर रहा है. इतना ही नहीं एक ऑनलाइन याचिका के ज़रिए भी फ़ेसबुक पर दबाव बनाया गया था कि वो उस वीडियो को हटाए जिसमें एक व्यक्ति का सर कलम करते हुए दिखाया गया है. इस वीडियो को यह रिपोर्ट लिखते वक्त तक 200 से अधिक लाइक मिल चुके थे. फ़ेसबुक अधिकारी बाल्कम का कहना है कि ऐसे वीडियो क्लिप को फैलने से रोकने के आइडिया पर 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'ख़तरनाक क़दम' विवेकानंद फ़ाउंडेशन के सुशांत सरीन के अनुसार मिशन का दफ़्तर खाली करने का फ़ैसला काफ़ी अहम है. वह कहते हैं, \"यह निर्णय ग़लती से नहीं आया है. यह नई सरकार का फ़ैसला है, जो एक सख्त संदेश देना चाहती है कि कश्मीर मुद्दा कोई अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं है.\" दिल्ली के अलावा मिशन का एक दफ़्तर जम्मू-कश्मीर में भी है. वरिष्ठ प्रेक्षक अनिल आनंद कहते हैं कि दिल्ली के बाद कश्मीर के दफ़्तर भी खाली कराए जा सकते हैं. वह कहते हैं, \"इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव अलगाववादियों पर पड़ेगा क्योंकि वह हर छोटे-बड़े मामले पर सैन्य प्रेक्षकों को ज्ञापन दिया करते थे.\" भारत सरकार के इस फ़ैसले पर अलगाववादियों की तरफ़ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर की टीकाकार प्रोफ़ेसर हमीदा नईम ने बंगला खाली कराने को एक ख़तरनाक क़दम बताया है. वह कहती हैं, \"संयुक्त राष्ट्र के इस मिशन का यहां होना ही इस बात का प्रतीक है कि कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय विवाद है. अगर यह मिशन बंद हो गया, तो कश्मीर के विवाद को ख़त्म बताया जाएगा. अलगाववादियों और पाकिस्तान को इस पर कड़ा विरोध जताना चाहिए.\" इस दौरान संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी ख़ामोशी से दिल्ली के सरकारी बंगले में अपना सामान समेट रहे हैं. अभी यह पता नहीं है कि वे कब तक यह बंगला खाली करेंगे. क्या संयुक्त राष्ट्र अपना यह मिशन सदा के लिए बंद कर देगा? अभी इस बारे में कुछ नहीं मालूम. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार कश्मीर से संयुक्त राष्ट्र को बेदखल कर रही है? बहुत से प्रेक्षकों का मानना है कि सरकार ने यह प्रक्रिया शुरू कर दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत सरकार ने दिल्ली में मौजूद कश्मीर से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के मिशन से कहा है कि वह उस सरकारी बंगले को खाली करे, जिसमें उसका दफ़्तर है. संयुक्त राष्ट्र के सैन्य मिशन के जिस दफ़्तर को खाली करने को कहा गया है, वह 1949 से भारत में है और दिल्ली में पुराना क़िला के पास एक इमारत में चल रहा है. यह निर्णय संयुक्त राष्ट्र के सिर्फ़ इसी दफ़्तर के बारे में है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने एक पत्रकार वार्ता में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा, \"हमारा यह मानना है कि संयुक्त राष्ट्र का यह मिशन अप्रासंगिक हो चुका है. मैं इस बात की पुष्टि करता हूं कि सरकार ने संयुक्त राष्ट्र से वह सरकारी बंगला खाली करने को कहा है, जो सरकार ने उन्हें निशुल्क दिया था.\" सुरक्षा मामलों के प्रेक्षकों का विचार है कि कश्मीर मामले में संयुक्त राष्ट्र के सैन्य प्रेक्षकों की भूमिका पहले ही काफ़ी सिमट चुकी थी. 'ख़तरनाक क़दम' विवेकानंद फ़ाउंडेशन के सुशांत सरीन के अनुसार मिशन का दफ़्तर खाली करने का फ़ैसला काफ़ी अहम है. वह कहते हैं, \"यह निर्णय ग़लती से नहीं आया है. यह नई सरकार का फ़ैसला है, जो एक सख्त संदेश देना चाहती है कि कश्मीर मुद्दा कोई अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं है.\" दिल्ली के अलावा मिशन का एक दफ़्तर जम्मू-कश्मीर में भी है. वरिष्ठ प्रेक्षक अनिल आनंद कहते हैं कि दिल्ली के बाद कश्मीर के दफ़्तर भी खाली कराए जा सकते हैं. वह कहते हैं, \"इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव अलगाववादियों पर पड़ेगा क्योंकि वह हर छोटे-बड़े मामले पर सैन्य प्रेक्षकों को ज्ञापन दिया करते थे.\" भारत सरकार के इस फ़ैसले पर अलगाववादियों की तरफ़ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर की टीकाकार प्रोफ़ेसर हमीदा नईम ने बंगला खाली कराने को एक ख़तरनाक क़दम बताया है. वह कहती हैं, \"संयुक्त राष्ट्र के इस मिशन का यहां होना ही इस बात का प्रतीक है कि कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय विवाद है. अगर यह मिशन बंद हो गया, तो कश्मीर के विवाद को ख़त्म बताया जाएगा. अलगाववादियों और पाकिस्तान को इस पर कड़ा विरोध जताना चाहिए.\" इस दौरान संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी ख़ामोशी से दिल्ली के सरकारी बंगले में अपना सामान समेट रहे हैं. अभी यह पता नहीं है कि वे कब तक यह बंगला खाली करेंगे. क्या संयुक्त राष्ट्र अपना यह मिशन सदा के लिए बंद कर देगा? अभी इस बारे में कुछ नहीं मालूम. 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'आइंस्टाइन' के प्रीमियर के साथ इस साल के पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल 2014 का प्रारंभ होगा. कनाडाई ड्रामा लेखक गेब्रियल ईमैन्युअल के इस नाटक का निर्देशन भी नसीरुद्दीन शाह ने ही किया है. बुधवार से शुरू होने वाले पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल में इस साल 25 धुआंधार परफ़ॉर्मेंस होंगे. 12 दिनों तक चलने वाले इस फ़ेस्टिवल में 13 नए प्रोडक्शंस उतने ही ग्रुप पेश करेंगे. इसके अलावा अकुस्टिक जैमिंग सेशन्स, फ्रिन्ज थिएटर एक्ट्स और थिएटर के जाने पहचाने चेहरों के साथ बातचीत के मौक़े भी रखे गए हैं. सीधी बात पृथ्वी थिएटर, जुहु के ट्रस्टी कुनाल ने बीबीसी हिन्दी को बताया, \"कुछ नए एलिमेंट्स इस साल फ़ेस्टिवल का हिस्सा हैं. जैसे इस बार फ्रिन्ज थिएटर के ज़रिए हम एक नया प्लेटफॉर्म खड़ा कर रहे हैं. इस प्रयोगात्मक थिएटर के ज़रिए कलाकार परफ़ॉर्मेंस के अलावा दर्शकों से सीधी बात भी कर पाएंगे.\" फ्रिन्ज थिएटर में प्रवेश निःशुल्क है. यहां आप 'फॉल्स 2-11 (क्लर्क एन्ड जोय)', 'क्रेप्स लास्ट टेप (सेम्युअल बेकेट)' और 'सॉन्ग्स ऑफ दी स्वांस (आज़ाद हुसैन)' जैसे नाटक भी देख सकते हैं. फ़ेस्टिवल में होने वाले नाटको में यात्री ग्रुप का 'हिरोइन बनूंगी मैं', होशरुबा रेपेर्टोरी का 'दास्तान-ए-चौबुली', एकजुट का 'रोशनी की सदा', इप्टा की 'दरिंदे...दी विलंस' वग़ैरह शामिल हैं. परिवार का मनोरंजन 'स्टेज टॉक सेशंस' में परेश रावल, कुमुद मिश्रा, शेरनाज़ पटेल, ओम पुरी, रोहीनी हटंगड़ी संवाद रचेंगे. इसके इलावा फ़ेस्टिवल में संगीत को जोड़ते हुए अकुस्टिक, जैज़ और सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा इंडिया के कार्यक्रम भी शामिल किए गए हैं. पहली बार दो बहुत अलग तरीक़े के सर्कस एक्ट्स फ़ेस्टिवल का हिस्सा हैं, जिसमें एक्रोबेटिक्स के करतब दिखाता फ्रैंच निओ सर्कस होगा तो साथ में जोकरों की मस्ती और एक्रोबेट्स के कमाल का मिश्रण भारतीय रैम्बो सर्कस भी पूरे परिवार का मनोरंजन करने के लिए अपने खेल दिखाएंगे. थिएटर की दुनिया कई वर्षों से इस फ़ेस्टिवल से एक या दूसरे तरीक़े से जुड़ते आए अभिनेता, लेखक, निर्देशक मकरंद देशपांडे ने अपना अनुभव बताते हुए कहा, \"फ़ेस्टिवल तो कई होते हैं लेकिन पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल की बात ही कुछ और है. यहां तो जैसे त्योहार का सा माहौल बन जाता है.\" उन्होंने कहा, \"नए पुराने अभिनेता, लेखक, निर्देशक और दर्शक भी इस फ़ेस्टिवल को साथ मिलकर मनाते हैं. यहां थिएटर की दुनिया में अभी बह रही धारा को देखा जा सकता है तो लोककला का रस भी महसूस होता है.\" वे कहते हैं, \"मैंने एक कलाकार के तौर पर इस फ़ेस्टिवल से बहुत कुछ पाया है. मैं आज जो भी हूं, शायद इसी एक्सपोज़र की वजह से हूं. यह कहने में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं है.\" नाटक और संवाद पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल जैसे थिएटर को चाहने वाले मित्रों की लंबी मुलाक़ातों की वजह बन जाता है. सत्यदेव दुबे हमेशा कहा करते थे, \"नाटक के बाद भी डॉयलॉग तो चाहिए.\" पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल, इसी वाक्य की वास्तविकता है. 'मान लो' नाटक का चौथा अंक लोगों से मेल-मिलाप में ही परफॉर्म होता है. सिनेमा और टेलीविज़न की भीड़ में यह फ़ेस्टिवल थिएटर का मूल्यांकन करने वाला एक कोना बनता है जिसकी शुरुआत मुंबई में बस होने को है और फिर थिएटर का यह जश्न दो हफ़्ते तक चलेगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "विश्व के जाने-माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन को अपने काम से निराशा हो सकती है कभी? क्या असफलताओं का डर उन्हें भी घेरे रखता था?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनसीरुद्दीन शाह 'आइंस्टाइन' नाटक में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे कई सवालों के जवाब देने के लिए आइंस्टाइन ख़ुद आपसे बात करेंगे. दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह इस साल इसी नाम के नाटक में आइंस्टाइन के किरदार में दिखेंगे. 'आइंस्टाइन' के प्रीमियर के साथ इस साल के पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल 2014 का प्रारंभ होगा. कनाडाई ड्रामा लेखक गेब्रियल ईमैन्युअल के इस नाटक का निर्देशन भी नसीरुद्दीन शाह ने ही किया है. बुधवार से शुरू होने वाले पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल में इस साल 25 धुआंधार परफ़ॉर्मेंस होंगे. 12 दिनों तक चलने वाले इस फ़ेस्टिवल में 13 नए प्रोडक्शंस उतने ही ग्रुप पेश करेंगे. इसके अलावा अकुस्टिक जैमिंग सेशन्स, फ्रिन्ज थिएटर एक्ट्स और थिएटर के जाने पहचाने चेहरों के साथ बातचीत के मौक़े भी रखे गए हैं. सीधी बात पृथ्वी थिएटर, जुहु के ट्रस्टी कुनाल ने बीबीसी हिन्दी को बताया, \"कुछ नए एलिमेंट्स इस साल फ़ेस्टिवल का हिस्सा हैं. जैसे इस बार फ्रिन्ज थिएटर के ज़रिए हम एक नया प्लेटफॉर्म खड़ा कर रहे हैं. इस प्रयोगात्मक थिएटर के ज़रिए कलाकार परफ़ॉर्मेंस के अलावा दर्शकों से सीधी बात भी कर पाएंगे.\" फ्रिन्ज थिएटर में प्रवेश निःशुल्क है. यहां आप 'फॉल्स 2-11 (क्लर्क एन्ड जोय)', 'क्रेप्स लास्ट टेप (सेम्युअल बेकेट)' और 'सॉन्ग्स ऑफ दी स्वांस (आज़ाद हुसैन)' जैसे नाटक भी देख सकते हैं. फ़ेस्टिवल में होने वाले नाटको में यात्री ग्रुप का 'हिरोइन बनूंगी मैं', होशरुबा रेपेर्टोरी का 'दास्तान-ए-चौबुली', एकजुट का 'रोशनी की सदा', इप्टा की 'दरिंदे...दी विलंस' वग़ैरह शामिल हैं. परिवार का मनोरंजन 'स्टेज टॉक सेशंस' में परेश रावल, कुमुद मिश्रा, शेरनाज़ पटेल, ओम पुरी, रोहीनी हटंगड़ी संवाद रचेंगे. इसके इलावा फ़ेस्टिवल में संगीत को जोड़ते हुए अकुस्टिक, जैज़ और सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा इंडिया के कार्यक्रम भी शामिल किए गए हैं. पहली बार दो बहुत अलग तरीक़े के सर्कस एक्ट्स फ़ेस्टिवल का हिस्सा हैं, जिसमें एक्रोबेटिक्स के करतब दिखाता फ्रैंच निओ सर्कस होगा तो साथ में जोकरों की मस्ती और एक्रोबेट्स के कमाल का मिश्रण भारतीय रैम्बो सर्कस भी पूरे परिवार का मनोरंजन करने के लिए अपने खेल दिखाएंगे. थिएटर की दुनिया कई वर्षों से इस फ़ेस्टिवल से एक या दूसरे तरीक़े से जुड़ते आए अभिनेता, लेखक, निर्देशक मकरंद देशपांडे ने अपना अनुभव बताते हुए कहा, \"फ़ेस्टिवल तो कई होते हैं लेकिन पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल की बात ही कुछ और है. यहां तो जैसे त्योहार का सा माहौल बन जाता है.\" उन्होंने कहा, \"नए पुराने अभिनेता, लेखक, निर्देशक और दर्शक भी इस फ़ेस्टिवल को साथ मिलकर मनाते हैं. यहां थिएटर की दुनिया में अभी बह रही धारा को देखा जा सकता है तो लोककला का रस भी महसूस होता है.\" वे कहते हैं, \"मैंने एक कलाकार के तौर पर इस फ़ेस्टिवल से बहुत कुछ पाया है. मैं आज जो भी हूं, शायद इसी एक्सपोज़र की वजह से हूं. यह कहने में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं है.\" नाटक और संवाद पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल जैसे थिएटर को चाहने वाले मित्रों की लंबी मुलाक़ातों की वजह बन जाता है. सत्यदेव दुबे हमेशा कहा करते थे, \"नाटक के बाद भी डॉयलॉग तो चाहिए.\" पृथ्वी थिएटर फ़ेस्टिवल, इसी वाक्य की वास्तविकता है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स एसोसिएशनों की महासंघ (आईएएएफ़) ने कहा है कि उसने जांच के बाद 28 खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का फ़ैसला किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआईएएएफ़ के अनुसार 2005 और 2007 के विश्व चैंपियनशिप के विजेताओं के रक्त के नमूनों की दोबारा जांच के बाद ये फ़ैसला किया गया है. लेकिन आईएएएफ़ ने कहा है कि क़ानूनी वजहों से वो अभी इन खिलाड़ियों के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकता है. आईएएएफ़ के अनुसार उनमें से बहुत कम खिलाड़ी अभी भी सक्रिय हैं और उन्हें फ़िलहाल निलंबित किया जा रहा है जिसके कारण इसी महीने बीजिंग में होने वाली विश्व चैंपियनशिप में वे खिलाड़ी हिस्सा नहीं ले सकेंगे. पिछले सप्ताह आई रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले कुछ वर्षों में हुए ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप के कई विजेताओं के रक्त नमूनों की जांच के बाद वे शक के घेरे में आ गए हैं. समाप्त आईएएएफ़ ने कहा है कि उसने उन नमूनों की दोबारा जांच इसी साल अप्रैल में शुरू की थी, ताज़ा आरोपों के उजागर होने से बहुत पहले. 800 एथलीटों पर सवाल पिछले सप्ताह ब्रितानी अख़बार द संडे टाइम्स और जर्मनी के ब्रॉडकास्टर एआरडी ने 5000 एथलीटों के 12,000 रक्त जाँच नमूनों के नतीजों में पाया था कि बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी हुई है. सबूतों के आधार पर विशेषज्ञों ने ये शक जताया था कि 2001 से 2012 के बीच हुए ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में मेडल जीतने वाले एक तिहाई एथलीट्स ने प्रतिबंधित दवाओं या फिर परफ़ोर्मेंस बढ़ाने वाले पदार्थों का सेवन किया था. डाटा को देखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि 2001 से 2012 के बीच हुए ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय खेलों में भाग लेने वाले या फिर मेडल जीतने वाले 800 एथलीटों के ब्लड टेस्ट नतीज़े शक पैदा करते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक खेलों में दस पदक उन एथलीटों ने जीते जिनके टेस्ट नतीजे संदिग्ध थे. इस रिपोर्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स डोपिंग के मुद्दे पर एक नए तूफ़ान में घिर गया है. 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'ज़रूरत पड़े तो प्रवासियों को गोली मार दें' दुनिया की पहली मिसाइल फ़ैक्ट्री बनने वाला गांव शरणार्थी संकट संसद में पहुंचने के लिए उसे कम से कम पांच प्रतिशत वोट चाहिए. पिछली बार वो एक से भी कम प्रतिशत वोटों से रह गई थी. दूसरे विश्व युद्ध के बाद ये पहली बार होगा जब एक कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी, जर्मनी के संसद में जाने वाली है. हम जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी का एक काला अध्याय रहा है. इस बात को जर्मनी के लोग भी मानते हैं कि ये एक ऐसा बदनुमा दाग़ है जिसे वो कभी मिटा नहीं सकते. ऐसे समय में एएफ़डी का उभार चिंताजनक है. लेकिन राहत की बात है कि इसके विरोध में भी काफ़ी लोग हैं. शरणार्थी संकट पर उनके रुख़ के लिए मर्केल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी तारीफ़ की जा रही है और दो तीन सालों से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी लगातार उनका नाम भेजा जा रहा है लेकिन शरणार्थी संकट उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. 'एंटी मुस्लिम पार्टी' के ख़िलाफ़ लेफ़्ट का ज़ोरदार प्रदर्शन जर्मन चांसलर को नहीं है ब्रिटेन और अमरीका पर भरोसा जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेट फॉर जर्मनी (एएफ़डी) के इस बार संसद में उपस्थिति दर्ज करने की संभावना है यूरोपीय राजनीति जर्मनी के एक आम आदमी को लगता है कि शरणार्थियों के आने से यहां अपराध बढ़े हैं, उन पर सार्वजनिक धन खर्च हो रहा है. उन्हें ये भी लगता है कि ये एक अतिरिक्त बोझ हैं, जिससे बचा जा सकता था. शरणार्थी मुद्दे पर मर्केल का कोई स्पष्ट पक्ष नहीं रहा है और ये बात जर्मनी के लोगों को थोड़ी अजीब लगती है. मर्केल को चुनौती दे रहे हैं मार्टिन शुल्ज़. यूरोपीय राजनीति से उन्होंने जर्मनी की राजनीति में प्रवेश लिया है. शुल्ज़ यूरोपीय की संसद के अध्यक्ष थे, इसलिए उन्हें लेकर एक बड़े तबके में काफ़ी उम्मीद थी. लेकिन उनका जादू अधिक दिन तक नहीं चला. शुरुआत में सर्वे में उन्हें क़रीब 35 प्रतिशत का समर्थन हासिल था जो कि वर्तमान में गिरकर 20 प्रतिशत के आस पास पहुंच गया है. जर्मनी में हर दिन प्रवासियों पर दस हमले ट्रंप ने मर्केल से कहा, 'हम दोनों के फ़ोन टैप हुए' (जर्मनी में पत्रकार अनवर जमाल अशरफ़ से बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल से बातचीत पर आधारित.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "जर्मनी में रविवार को आम चुनाव होने जा रहा है. चांसलर एंगेला मर्केल चौथी बार चुनावी मैदान में हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतीन बार से वो सत्ता में हैं. एक नेता के तौर पर उन्होंने दुनिया भर में काफ़ी मजबूत स्थिति हासिल कर ली है. आख़िर के दिनों में मर्केल के लिए ये चुनाव काफ़ी आसान हो गया है. सर्वे भी बता रहे हैं कि मर्केल एक आसान विजय की ओर बढ़ रही हैं. ताज्जुब की बात है कि पिछले दिनों जब शरणार्थी संकट पैदा हुआ था और जिसे लेकर यहां के लोगों में गहरा असंतोष था, उससे लग रहा था कि मर्केल इस बार चुनाव न जीत पाएं. उनके अनुसार, ऐसा लगता है कि पिछले दो महीनों में ये मुद्दा पीछे चला गया है. इस्लामी आतंक जर्मनी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा: मर्केल दुनिया की सबसे ताकतवर महिला के पति कौन हैं? जर्मन सोशल डेमोक्रेट (एसडीपी) पार्टी के नेता और चांसलर पद के उम्मीदवार यूरोपीय संघ हालांकि यहां के चुनाव में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाया है. राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी दलों का पूरी दुनिया में ही उभार हुआ है. पिछले साल अमरीकी चुनाव के साथ इसको और हवा मिली है. यूरोप भी इससे अछूता नहीं रहा है. यूरोप को तो अभी ब्रेक्सिट से भी निपटना है और ब्रिटेन के अलग होने के बाद जर्मनी यूरोपीय संघ का सबसे मजबूत और ताक़तवर देश बन गया है. जर्मनी में पिछले चार-पांच सालों में एक कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी उभर कर आई है, जिसका नाम है अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफ़डी). ये पार्टी शरणार्थियों, मुसलमानों और संयुक्त यूरोप के ख़िलाफ़ है. इस पार्टी का इतनी तेज़ी से उभार हुआ है कि ये 16 में से 12 प्रांतीय असेंबलियों में पहुंच चुकी है. और ये लगभग तय माना जा रहा है कि वो इस बार संसद में भी पहुंच जाएगी. 'ज़रूरत पड़े तो प्रवासियों को गोली मार दें' दुनिया की पहली मिसाइल फ़ैक्ट्री बनने वाला गांव शरणार्थी संकट संसद में पहुंचने के लिए उसे कम से कम पांच प्रतिशत वोट चाहिए. पिछली बार वो एक से भी कम प्रतिशत वोटों से रह गई थी. दूसरे विश्व युद्ध के बाद ये पहली बार होगा जब एक कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी, जर्मनी के संसद में जाने वाली है. हम जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी का एक काला अध्याय रहा है. इस बात को जर्मनी के लोग भी मानते हैं कि ये एक ऐसा बदनुमा दाग़ है जिसे वो कभी मिटा नहीं सकते. ऐसे समय में एएफ़डी का उभार चिंताजनक है. लेकिन राहत की बात है कि इसके विरोध में भी काफ़ी लोग हैं. शरणार्थी संकट पर उनके रुख़ के लिए मर्केल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी तारीफ़ की जा रही है और दो तीन सालों से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी लगातार उनका नाम भेजा जा रहा है लेकिन शरणार्थी संकट उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. 'एंटी मुस्लिम पार्टी' के ख़िलाफ़ लेफ़्ट का ज़ोरदार प्रदर्शन जर्मन चांसलर को नहीं है ब्रिटेन और अमरीका पर भरोसा जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेट फॉर जर्मनी (एएफ़डी) के इस बार संसद में उपस्थिति दर्ज करने की संभावना है यूरोपीय राजनीति जर्मनी के एक आम आदमी को लगता है कि शरणार्थियों के आने से यहां अपराध बढ़े हैं, उन पर सार्वजनिक धन खर्च हो रहा है. उन्हें ये भी लगता है कि ये एक अतिरिक्त बोझ हैं, जिससे बचा जा सकता था. शरणार्थी मुद्दे पर मर्केल का कोई स्पष्ट पक्ष नहीं रहा है और ये बात जर्मनी के लोगों को थोड़ी अजीब लगती है. मर्केल को चुनौती दे रहे हैं मार्टिन शुल्ज़. यूरोपीय राजनीति से उन्होंने जर्मनी की राजनीति में प्रवेश लिया है. शुल्ज़ यूरोपीय की संसद के अध्यक्ष थे, इसलिए उन्हें लेकर एक बड़े तबके में काफ़ी उम्मीद थी. लेकिन उनका जादू अधिक दिन तक नहीं चला. शुरुआत में सर्वे में उन्हें क़रीब 35 प्रतिशत का समर्थन हासिल था जो कि वर्तमान में गिरकर 20 प्रतिशत के आस पास पहुंच गया है. जर्मनी में हर दिन प्रवासियों पर दस हमले ट्रंप ने मर्केल से कहा, 'हम दोनों के फ़ोन टैप हुए' (जर्मनी में पत्रकार अनवर जमाल अशरफ़ से बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल से बातचीत पर आधारित.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 637, "source_item_id": "637", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3264, "clean_index": 570, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:570"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमई 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की एक रैली में अचानक हत्या हुई और कांग्रेस के सामने खड़े हुए नेतृत्व के संकट के हल के लिए नरसिंह राव को आगे लाया गया. इसी वर्ष वे प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह को साथ लेकर भारत की अर्थव्यवस्था को खोला और आर्थिक सुधार के ऐसे कार्यक्रम चलाए जिनकी नींव पर ही भारत दुनिया के सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं की कतार में जा खड़ा हुआ. नरसिंह राव ने ही अपने शासनकाल में भारत में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए बने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कीं. लेकिन उनके शासनकाल में कुछ दाग़ भी लगे. 1991 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद उनके ही कार्यकाल में ढहा दी गई जिसके बाद देश भर में दंगे हुए और विदेशों में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई. इसके अलावा भ्रष्टाचार के भी कई मामलों में नरसिंह राव का नाम फँसा. उदारीकरण की राह नरसिंह राव जब प्रधानमंत्री बने तो उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत डाँवाडोल थी और भारत दिवालिएपन के कगार पर था. फिर वे प्रख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाकर ले आए जिसपर कई लोगों को हैरानी हुई. मगर मनमोहन सिंह ने भारत की उदारीकरण की राह प्रशस्त की और फिर 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के समय कमान उन्हीं को सौंपी गई. नरसिंह राव 1996 में जब सत्ता से बाहर हुए तो वह गांधी-नेहरू ख़ानदान से अलग पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया. और नरसिंह राव के जाते-जाते भारतीय अर्थव्यवस्था ना केवल पटरी पर आ गई बल्कि उसने गति भी पकड़नी शुरू कर दी. भ्रष्टाचार नरसिंह राव भ्रष्टाचार के भी तीन मामलों की लपेट में आए. ये थे - सेंट किट्स मामला, लखूभाई पाठक रिश्वत मामला और झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड. 1996 में पहले तो सत्ता हाथ से गई और उसके बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में उनपर आपराधिक मुक़दमा भी चला. उन पर आरोप था कि उन्होंने जुलाई 1993 में एक अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपनी कॉंग्रेस पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए एक क्षेत्रीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के सदस्यों को भारी धनराशि दी. चार साल बाद एक अदालत ने उनको दोषी भी ठहरा दिया और भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी भी ठहरा दिया. भारतीय इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को दोषी ठहराया गया था. मगर मार्च 2002 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नरसिंह राव को सभी आरोपों से बरी कर दिया.\n\nSummary:", "target": "पी वी नरसिंह राव ने ऐसे समय भारत में सरकार का नेतृत्व किया जब भारत में और कांग्रेस पार्टी में एक बड़ा बदलाव हुआ.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमई 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की एक रैली में अचानक हत्या हुई और कांग्रेस के सामने खड़े हुए नेतृत्व के संकट के हल के लिए नरसिंह राव को आगे लाया गया. इसी वर्ष वे प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह को साथ लेकर भारत की अर्थव्यवस्था को खोला और आर्थिक सुधार के ऐसे कार्यक्रम चलाए जिनकी नींव पर ही भारत दुनिया के सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं की कतार में जा खड़ा हुआ. नरसिंह राव ने ही अपने शासनकाल में भारत में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए बने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कीं. लेकिन उनके शासनकाल में कुछ दाग़ भी लगे. 1991 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद उनके ही कार्यकाल में ढहा दी गई जिसके बाद देश भर में दंगे हुए और विदेशों में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई. इसके अलावा भ्रष्टाचार के भी कई मामलों में नरसिंह राव का नाम फँसा. उदारीकरण की राह नरसिंह राव जब प्रधानमंत्री बने तो उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत डाँवाडोल थी और भारत दिवालिएपन के कगार पर था. फिर वे प्रख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाकर ले आए जिसपर कई लोगों को हैरानी हुई. मगर मनमोहन सिंह ने भारत की उदारीकरण की राह प्रशस्त की और फिर 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के समय कमान उन्हीं को सौंपी गई. नरसिंह राव 1996 में जब सत्ता से बाहर हुए तो वह गांधी-नेहरू ख़ानदान से अलग पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया. और नरसिंह राव के जाते-जाते भारतीय अर्थव्यवस्था ना केवल पटरी पर आ गई बल्कि उसने गति भी पकड़नी शुरू कर दी. भ्रष्टाचार नरसिंह राव भ्रष्टाचार के भी तीन मामलों की लपेट में आए. ये थे - 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'चीन में मानवाधिकार नहीं' ये प्रदर्शन काठमांडू में चीनी दूतावास के बाहर और वीज़ी दफ़्तर के बाहर हुए हैं. ग़ौरतलब है कि इन सभी इलाक़ो में प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा हुआ है. हालाँकि पुलिस अधिकारियों का ये भी कहना है कि बीजिंग में ओलंपिक की शुरुआत से पहले बढ़े प्रदर्शनों के कारण ये गिरफ़्तारियाँ की गई हैं और दिन के अंत तक इन्हें रिहा कर दिए जाने की उम्मीद है. महत्वपूर्ण है कि इस साल मार्च में ल्हासा में हुए प्रदर्शनों को चीन की सरकार ने सख़्ती से दबाया था जिसके बाद नेपाल में बार-बार चीन विरोधी प्रदर्शन होते रहते हैं. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार प्रदर्शनों में शामिल बीस साल के एक छात्र ने बताया, \"हम सैकड़ों एथलीट्स और करोड़ों लोग जो ओलंपिक की शुरुआत देखेंगे, उन्हें ये संदेश देना चाहते हैं कि तिब्बत में मानवाधिकार नहीं हैं.\" जब तिब्बती नेताओं ने मार्च में ये आरोप लगाए थे तब चीन की सरकार ने इन्हें ख़ारिज किया था और राष्ट्रपति हू जिंताओ ने कहा था कि इन प्रदर्शनों का संबंध मानवाधिकारों से नहीं बल्कि चीन की अखंडता से है. कई प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़पें भी हुई हैं और कुछ लोग घायल भी हुए हैं. पुलिस ने भी सख़्ती बरती है और कुछ जगह पर लाठी चार्ज भी किया है लेकिन एक प्रदर्शनकारी ने कहा, \"मैं यहाँ पर पिछले तीन महीने से विरोध प्रदर्शन करने आ रहा हूँ और आगे भी आता रहूँगा.\" ग़ौरतलब है कि गुरुवार को पुलिस ने नेपाल की राजधानी काठमांडू में लगभग दो हज़ार लोगों के एक प्रदर्शन को तितर-बितर किया था. भारत की राजधानी दिल्ली में भीषण प्रदर्शन हुए थे और निर्वासित तिब्बती नेता दलाई लामा के अनेक समर्थकों ने चीनी दूतावास के सामने प्रदर्शन करने कोशिश की थी.\n\nSummary:", "target": "नेपाल में बसे हुए तिब्बती मूल के लोगों ने चीन में ओलंपिक के विरोध में ज़ोरदार प्रदर्शन किए हैं जिनमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया है. नेपाल में लगभग 20 हज़ार तिब्बती बसे हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये प्रदर्शन गुरुवार से ही हो रहे हैं और इनमें बौद्ध भिक्षुओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में छात्रों ने भी हिस्सा लिया है. ये लोग धार्मिक मंत्रोच्चारण के साथ-साथ चीन की सरकार और चीनी राष्ट्रपति हू जिताओ के ख़िलाफ़ नारेबाज़े भी कर रहे हैं. बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हेविलैंड के मुताबिक तिब्बती समुदाय में मूजौद सूत्रों ने उन्हें बताया है कि लगभग 900 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और पुलिस और भी तिब्बतियों के गिरफ़्तार कर रही है. उन्होंने ये भी कहा है कि प्रदर्शनकारियों में महिलाएँ भी शामिल थीं और जहाँ इनमें से अनेक लोग चीख रहे थे और रो रहे थे, वहीं महिला और पुरुष पुलिस अधिकारी उनके साथ बुरा बर्ताव कर रहे थे और उन्हें लाठियों से पीट भी रहे थे. 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सैनिकों को वापस बुलाने का काम पटरी पर है लेकिन इससे ज़्यादा सैनिकों को वापस बुलाने के बारे में अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है. ये सैनिक अड्डा कुवैत के अरफ़ीजान में है जहाँ एक दल अफ़ग़ानिस्तान और मध्य पूर्व की गतिविधियों पर नज़र रखता है. अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले साल इराक़ में तीस हज़ार अतिरिक्त अमरीकी सैनिक भेजने के क़दम से इराक़ अब एक ऐसा देश बन गया है जहाँ लोगों में उम्मीद लौट रही है. उनका कहना था, \"साल भर पहले के मुकाबले इराक़ अब एक नया देश है. हमें पूरी कोशिश करनी चाहिए कि वर्ष 2008 में हालात और बेहतर हों.\" इराक़ में अमरीका के सैन्य कमांडर जनरल डेविड पेट्रियस और इराक़ में अमरीकी राजदूत रयान क्रॉकर ने जॉर्ज बुश से बातचीत की और बाद में अमरीकी राष्ट्रपति वहाँ तैनात करीब पंद्रह हज़ार सैनिकों से भी मिले. जॉर्ज बुश ने कहा, \"इराक़ में सैनिकों की संख्या और घटाई जाए या नहीं ये इस पर निर्भर करेगा कि वहाँ हालात कैसे हैं. ये जनरल पेट्रियस को तय करना है कि ऐसा संभव है या नहीं.\" ईरान का मुद्दा इसराइली और फ़लस्तीनी नेताओं से मिलने के बाद जॉर्ज बुश खाड़ी क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं. उन्होंने कुवैत में शेख सबा से बातचीत की. संवाददाताओं का कहना है कि वे अरब क्षेत्र के अपने कई सहयोगियों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे मध्य पूर्व शांति प्रस्ताव का समर्थन करें. साथ ही उन्होंने सीरिया और ईरान से भी कहा कि वो इराक़ में हिंस कम करने के लिए और क़दम उठाए. जॉर्ज बुश का मकसद है कि इसराइल के साथ बातचीत में अरब देश फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास का समर्थन करें. लेकिन बीबीसी संवादादाता का कहना है कि कुवैत समेत खाड़ी क्षेत्र के कई देशों की असल चिंता इसराइल-फ़लस्तीनी मुद्दा नहीं है बल्कि ईरान और उसके प्रति अमरीका का रवैया है. माना जा रहा है कि खाड़ी देश बुश से कहेंगे कि वो ईरान-अमरीका मसले का शांतिपूर्ण हल चाहते हैं न कि सैन्य हल.\n\nSummary:", "target": "अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा है कि पिछले साल इराक़ में अमरीकी सैनिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी के बाद अब वहाँ उम्मीद लौटती नज़र आ रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजॉर्ज बुश ने ये बात कुवैत में कही जहाँ वे एक सैनिक अड्डे पर आए हुए थे. बुश ने कहा कि जुलाई तक बीस हज़ार सैनिकों को वापस 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हार्पर को मदद के लिए बुलाया था. ये तीनों ही 'केव एक्सपर्ट' हैं. समाप्त स्टेनटोन पहले फ़ायर ब्रिगेड में भी काम कर चुके हैं. ये तीनों नॉर्वे, फ़्रांस और मेक्सिको में भी ऐसे बचाव अभियान को अंजाम दे चुके हैं. सुमन गुनन समन गुनन 38 साल के सुमन गुनन लापता समूह को ऑक्सीजन की टंकी पहुंचाने के बाद वापस आते वक़्त बेहोश हो गए और बाद में उनकी मौत हो गई. सुमन गुनन थाई नौसेना के पूर्व गोताखोर थे. उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी लेकिन बचाव अभियान में शामिल होने के लिए वो लौट आए थे. थाईलैंड के राजा ने सुमन गुनन को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की घोषणा की थी. डॉक्टर रिचर्ड हैरिस डॉक्टर रिचर्ड हैरिस ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टर रिचर्ड हैरिस को डाइविंग (गोताखोरी) का दशकों का अनुभव है. उन्होंने गुफा में बच्चों की जांच करने के बाद ग्रीन सिग्नल दिया जिसके बाद बचाव अभियान आगे बढ़ पाया. चूंकि बच्चे नौ दिन तक बिना कुछ खाए-पीए बेहद कमज़ोर हो चुके थे इसलिए उन्हें डाइविंग के ज़रिए बाहर निकालना ख़तरनाक हो सकता था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉक्टर हैरिस ऑस्ट्रेलिया, चीन, क्रिसमस आईलैंड और न्यूजीलैंड में बचाव अभियान को अंजाम दे चुके हैं. बेन रेमेनैंन्ट्स बेल्जियम के बेन रेमेनैंन्ट्स फुकेट में डाइविंग का बिज़नेस करते हैं. बताया जा रहा है कि बचाव अभियान के पहले दिन उन्होंने ही सबसे पहले बच्चों को गुफ़ा में ढूंढा. क्लॉस रैसमिसेन क्लॉस रैसमिसेन स्कूलों में डाइविंग सिखाने वाले रैसमिसेन एक डाइविंग कंपनी में इंस्ट्रक्टर के तौर पर भी काम करते हैं. उन्होंने एशिया के कई देशों में डाइविंग की है. मीको पासी मीको पासी फ़िनलैंड के मीको पासी को टेक्निकल डाइविंग में महारत हासिल है. उनकी पत्नी ने एक फ़ेसबुक पोस्ट में बताया है कि जिस दिन वो बचाव अभियान में शामिल होने थाईलैंड आए थे, उस दिन उनकी शादी की आठवीं सालगिरह थी. इवान केर्दज़ी इवान केर्दज़ी इवान थाईलैंड में ही एक डाइविंग सेंटर चलाते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि जब उन्होंने गुफा में पहले बच्चे को देखा तो उन्हें अचानक समझ नहीं आया कि वो ज़िंदा है या नहीं. बाद में उसे जिंदा और सुरक्षित पाकर इवान ने राहत की सांस ली थी. एरिक ब्राउन (बाएं) एरिक ब्राउन कनाडा के एरिक ब्राउन एक टेक्निकल डाइवर हैं और उन्होंने मिस्र में एक डाइविंग स्कूल भी खोला है. मंगलवार की रात उन्होंने फ़ेसबुक पर बताया था कि पिछले नौ दिनों में वो सात डाइविंग मिशन पूरे कर चुके हैं. थाई नौसैनिक और डॉक्टर ख़ास सुरक्षाबल इस रेस्क्यू मिशन का हिस्सा थे. इनमें भी सबसे ख़ास हैं डॉक्टर पाक लोहार्नशन और वो तीन दूसरे गोताखोर जिन्होंने गुफा में बच्चों के साथ रुकने का प्रस्ताव रखा. थाईलैंड की नौसेना ने अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है जिनमें डॉक्टर लोहार्नशन एक बच्चे के जख़्मों पर दवा लगा रहे हैं. वहीं, थाईलैंड के नौसैनिक मंगलवार देर शाम को सबसे आख़िर में गुफा में बाहर निकले. सबको सुरक्षित बाहर निकालने के बाद. ये भी पढ़ें:बुराड़ी मामला: दैवीय शक्ति या मानसिक बीमारी? रेप पर ट्वीट, कश्मीरी IAS टॉपर पर कार्रवाई सरकार ने जियो इंस्टीट्यूट को क्यों दिया विशेष दर्जा (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "थाईलैंड की गुफ़ा से सभी 12 बच्चों और उनके कोच को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है. संकरे, टेढ़े-मेढ़े रास्तों, पानी से लबालब और घुप अंधेरे वाली गुफ़ा में से 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थाईलैंड सरकार ने ब्रिटेन के वोलेनथन, रिचर्ड स्टेनटोन और रॉबर्ट चार्ल्स हार्पर को मदद के लिए बुलाया था. ये तीनों ही 'केव एक्सपर्ट' हैं. समाप्त स्टेनटोन पहले फ़ायर ब्रिगेड में भी काम कर चुके हैं. ये तीनों नॉर्वे, फ़्रांस और मेक्सिको में भी ऐसे बचाव अभियान को अंजाम दे चुके हैं. सुमन गुनन समन गुनन 38 साल के सुमन गुनन लापता समूह को ऑक्सीजन की टंकी पहुंचाने के बाद वापस आते वक़्त बेहोश हो गए और बाद में उनकी मौत हो गई. सुमन गुनन थाई नौसेना के पूर्व गोताखोर थे. उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी लेकिन बचाव अभियान में शामिल होने के लिए वो लौट आए थे. थाईलैंड के राजा ने सुमन गुनन को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की घोषणा की थी. डॉक्टर रिचर्ड हैरिस डॉक्टर रिचर्ड हैरिस ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टर रिचर्ड हैरिस को डाइविंग (गोताखोरी) का दशकों का अनुभव है. उन्होंने गुफा में बच्चों की जांच करने के बाद ग्रीन सिग्नल दिया जिसके बाद बचाव अभियान आगे बढ़ पाया. चूंकि बच्चे नौ दिन तक बिना कुछ खाए-पीए बेहद कमज़ोर हो चुके थे इसलिए उन्हें डाइविंग के ज़रिए बाहर निकालना ख़तरनाक हो सकता था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉक्टर हैरिस ऑस्ट्रेलिया, चीन, क्रिसमस आईलैंड और न्यूजीलैंड में बचाव अभियान को अंजाम दे चुके हैं. बेन रेमेनैंन्ट्स बेल्जियम के बेन रेमेनैंन्ट्स फुकेट में डाइविंग का बिज़नेस करते हैं. बताया जा रहा है कि बचाव अभियान के पहले दिन उन्होंने ही सबसे पहले बच्चों को गुफ़ा में ढूंढा. क्लॉस रैसमिसेन क्लॉस रैसमिसेन स्कूलों में डाइविंग सिखाने वाले रैसमिसेन एक डाइविंग कंपनी में इंस्ट्रक्टर के तौर पर भी काम करते हैं. उन्होंने एशिया के कई देशों में डाइविंग की है. मीको पासी मीको पासी फ़िनलैंड के मीको पासी को टेक्निकल डाइविंग में महारत हासिल है. उनकी पत्नी ने एक फ़ेसबुक पोस्ट में बताया है कि जिस दिन वो बचाव अभियान में शामिल होने थाईलैंड आए थे, उस दिन उनकी शादी की आठवीं सालगिरह थी. इवान केर्दज़ी इवान केर्दज़ी इवान थाईलैंड में ही एक डाइविंग सेंटर चलाते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि जब उन्होंने गुफा में पहले बच्चे को देखा तो उन्हें अचानक समझ नहीं आया कि वो ज़िंदा है या नहीं. बाद में उसे जिंदा और सुरक्षित पाकर इवान ने राहत की सांस ली थी. एरिक ब्राउन (बाएं) एरिक ब्राउन कनाडा के एरिक ब्राउन एक टेक्निकल डाइवर हैं और उन्होंने मिस्र में एक डाइविंग स्कूल भी खोला है. मंगलवार की रात उन्होंने फ़ेसबुक पर बताया था कि पिछले नौ दिनों में वो सात डाइविंग मिशन पूरे कर चुके हैं. थाई नौसैनिक और डॉक्टर ख़ास सुरक्षाबल इस रेस्क्यू मिशन का हिस्सा थे. इनमें भी सबसे ख़ास हैं डॉक्टर पाक लोहार्नशन और वो तीन दूसरे गोताखोर जिन्होंने गुफा में बच्चों के साथ रुकने का प्रस्ताव रखा. थाईलैंड की नौसेना ने अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है जिनमें डॉक्टर लोहार्नशन एक बच्चे के जख़्मों पर दवा लगा रहे हैं. वहीं, थाईलैंड के नौसैनिक मंगलवार देर शाम को सबसे आख़िर में गुफा में बाहर निकले. सबको सुरक्षित बाहर निकालने के बाद. ये भी पढ़ें:बुराड़ी मामला: दैवीय शक्ति या मानसिक बीमारी? रेप पर ट्वीट, कश्मीरी IAS टॉपर पर कार्रवाई सरकार ने जियो इंस्टीट्यूट को क्यों दिया विशेष दर्जा (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तुर्की के एक रूसी जेट विमान को गिराए जाने के बाद रूस ने सीरिया में अपने विमानों का सुरक्षा घेरा बहुत मज़बूत कर लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरूस का क्रूज़र मस्कवा सीरिया तट की ओर बढ़ रहा है. इस पर लांग रेंज एयर डिफ़ेंस सिस्टम लगा है जो रूसी जंगी विमानों को सुरक्षा कवच देगा. वहीं रूस ने सीरिया में अपने मुख्य बेस पर क़रीब 400 मिसाइलें तैनात कर दी हैं. हालांकि तुर्की के राष्ट्रपति रचैप तय्यैप एर्दोआन ने रूस को चेतावनी दी है कि सीरिया में अपने अभियान को लेकर वह \"आग से न खेले.\" विमान गिराने की घटना के बाद रूस ने तुर्की के साथ वीज़ा मुक्त व्यवस्था भी रद्द करने का फ़ैसला किया है. समाप्त राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चाहते हैं कि एर्दोआन पहले माफ़ी मांगें, तभी उनसे बात हो सकती है. रूस ने इस दावे को भी खारिज किया कि उसका एसयू-24 जेट विमान तुर्की के हवाई क्षेत्र में था. रूसी सेना के सीनियर कमांडर के मुताबिक़ तुर्की के दो विमान पहले से घात लगाकर बैठे थे. रूस गत 30 सितंबर से सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के समर्थन में सीरियाई विद्रोहियों पर हवाई हमले कर रहा है. तुर्की चाहता है कि कोई राजनीतिक समाधान निकलने तक असद को अपना पद छोड़ देना चाहिए. टेलीविज़न पर भाषण में तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा कि पेरिस में पर्यावरण सम्मेलन के दौरान वे इस मसले पर पुतिन से बात करना चाहते हैं. हालांकि उन्होंने माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया है. 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अमित मित्रा ने भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश की. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने कहा ने उनके राज्य में ढांचागत सुविधाएं मज़बूत हैं और सूचना तकनीक के क्षेत्र में राज्य का अहम स्थान है. रेड्डी का कहना था कि अमरीका में काम करे 25 फ़ीसदी सॉफ़्टवेयर प्रोफेशनल आंध्र प्रदेश से हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदी में अपनी बात रखते हुए प्रवासी भारतीयों को आश्वस्त करने की कोशिश की कि बिहार से घबराने की अब ज़रूरत नहीं है. हम आपके स्वागत के लिए तैयार हैं. उनका कहना कि मानव संसाधन बिहार की पूंजी है और एक साल में बिहार भी किसी से पीछे नहीं रहेगा. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि गुजरात ने आर्थिक सुधारों की दिशा में चमत्कारी उपलब्धियाँ हासिल की हैं. उनका कहना कि गुजरात का सकल घरेलू उत्पादन, जीडीपी 15.6 है जो एशिया में सबसे ज़्यादा है. मोदी का कहना था कि अब गुजरात की प्रतिस्पर्धा देश के राज्यों से नहीं है बल्कि चीन, जापान और जर्मनी से है. जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना था कि उनके राज्य में पर्यटन के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. उन्होंने प्रवासी भारतीयों को प्रसंस्कृति खाद्य क्षेत्र में निवेश के लिए आमंत्रित किया. केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने खाड़ी के देशों में रहनेवाले प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को उठाया. उनका कहना था कि उनके कल्याण के लिए और क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है. उन्होंने खाड़ी के देशों में जानेवाले असंगठित क्षेत्र की लोगों के कल्याण के लिए उठाए गए क़दमों की जानकारी दी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का कहना था कि घरेलू और विदेशी निवेश के मामले में उनका राज्य आगे है लेकिन वो इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं.\n\nSummary:", "target": "हैदराबाद में चौथे प्रवासी भारतीय सम्मेलन को निवेश के लिए रिझाने की कोशिश के तहत विभिन्न प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने राज्यों में निवेश की संभावनाओं को पेश किया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक तहर से प्रवासी भारतीय दिवस का दूसरा दिन मुख्यमंत्रियों के नाम रहा. इसमें एक ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रवासी भारतीयों को आमंत्रित किया और कहा कि एक साल में बिहार भी किसी राज्य से पीछे नहीं रहेगा. दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि अब उनके राज्य की प्रतिस्पर्धा देश के किसी राज्य से नहीं है बल्कि चीन, जापान और जर्मनी से है. इस सत्र की अध्यक्षता योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने की. सबसे पहले फ़िक्की के अमित मित्रा ने भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश की. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने कहा ने उनके राज्य में ढांचागत सुविधाएं मज़बूत हैं और सूचना तकनीक के क्षेत्र में राज्य का अहम स्थान है. रेड्डी का कहना था कि अमरीका में काम करे 25 फ़ीसदी सॉफ़्टवेयर प्रोफेशनल आंध्र प्रदेश से हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदी में अपनी बात रखते हुए प्रवासी भारतीयों को आश्वस्त करने की कोशिश की कि बिहार से घबराने की अब ज़रूरत नहीं है. हम आपके स्वागत के लिए तैयार हैं. उनका कहना कि मानव संसाधन बिहार की पूंजी है और एक साल में बिहार भी किसी से पीछे नहीं रहेगा. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि गुजरात ने आर्थिक सुधारों की दिशा में चमत्कारी उपलब्धियाँ हासिल की हैं. उनका कहना कि गुजरात का सकल घरेलू उत्पादन, जीडीपी 15.6 है जो एशिया में 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उन्होंने यह भी कहा कि वो उत्तर कोरिया पर अतिरिक्त प्रतिबंध की मांग को लेकर अमरीका, फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के संयुक्त राष्ट्र संघ को लिखे संयुक्त पत्र (जॉइंट लेटर) का जवाब भी दे रहे थे. इस जॉइंट लेटर में सभी सदस्यों से प्रवासी उत्तर कोरियाई कामगारों को उनके घर वापस भेजे जाने की अपील की गई है. इस बयान में कहा गया है, \"जिस बात को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, वो यह है कि जॉइंट लेटर का खेल खेला गया... और वो भी उसी दिन जब दूसरी तरफ़ राष्ट्रपति ट्रंप एक शिखर वार्ता का प्रस्ताव रख रहे थे.\" यह भी कहा गया कि व्यावहारिक रूप से यह अमरीका के दोहरे रवैये को दर्शाता है, जो उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ विरोधी रुख़ है. इसमें कहा गया है कि, \"संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों को कोरियाई प्रायद्वीप पर शांतिपूर्ण माहौल बिगाड़ने की सोची समझी गई इन अमरीकी कोशिशों के प्रति सतर्क रहना होगा.\" उत्तर कोरिया ने कहा कि 'सभी समस्याओं के लिए रामबाण' के रूप में प्रतिबंधों का इस्तेमाल करना 'काफ़ी हास्यास्पद' है. उत्तर कोरिया के इस बयान पर अभी अमरीकी प्रतिक्रियाएं नहीं आई हैं. वियतनाम की राजधानी हनोई में इसी साल फ़रवरी में अपनी दूसरी मुलाकात के दौरान डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन कैसे हैं अमरीका-उत्तर कोरिया के रिश्ते? बीते महीने ही अमरीका ने उत्तर कोरिया के एक मालवाहक समुद्री जहाज़ को यह कहते हुए ज़ब्त किया था कि इसने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन किया है. इसी साल फ़रवरी में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के बीच असफल मुलाक़ात हुई थी. अमरीका उत्तर कोरिया से उसके परमाणु कार्यक्रमों को बंद करने के लिए कह रहा था जबकि उत्तर कोरिया ने उस पर लगे प्रतिबंधों में छूट देने की मांग की थी. उत्तर कोरिया ने अमरीका पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत मई के महीने में ही पांच दिनों के भीतर दो बार मिसाइल परीक्षण भी किया था. जबकि अमरीका ने उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार और मिसाइल परीक्षणों के चलते ही उस पर कई तरह के अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगा रखे हैं. बीते वर्ष कोरियाई शासक किम जोंग-उन और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बीच सिंगापुर में परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर ही मुलाकात हुई थी. दोनों कोरियाई प्रायद्वीप को पूरी तरह से परमाणु हथियार मुक्त बनाने पर सहमत भी हुए थे, हालांकि इस 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50 रनों की साझेदारी की लेकिन दोनों को तीसरे ओवर में ही जुदा होना पड़ा. इयान बेल को ज़हीर ने अपना तीसरा शिकार बनाया. बल्लेबाज़ों के लिए दूसरे टेस्ट का पहला दिन किसी भी समय आसान नहीं दिखा. अपने गुडलेंथ गेंदों से ज़हीर ने बल्लेबाज़ों को शुरु से ही मुश्किल में रखा और शुरुआती पाँच ओवरों में ही दो विकेट चटका दिए. लॉर्ड्स टेस्ट में 96 रन बनाने वाले स्ट्रॉस पहले स्लिप पर लपक लिए गए और फिर इसी तरह से वॉगन पेवेलियन लौटे. श्रीसंत शुरु में मँहगे साबित होते हुए दिखे और उन्हें विकेट भी नहीं मिला था लेकिन उनकी एक गेंद ने कॉलिंगवुड के बल्ले का भीतरी किनारा लिया और सीधे स्टंप पर जा लगा. कुक को गांगुली ने पेवेलियन भेजा, जिसने अब तक के खेल में टीम के लिए सर्वाधिक 43 रन जोड़े हैं. जबकि प्रायर कुंबले के शिकार बने. खेल ख़त्म होने के समय ट्रेमलेट और साइडबॉटम मैदान पर थे.\n\nSummary:", "target": "इंग्लैंड के साथ दूसरे टेस्ट मैच के पहले ही दिन के खेल में भारतीय गेंदबाज़ों ने कारनामा दिखाया है और 169 रन देकर सात विकेट गिरा दिए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहालांकि मैदान 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अपने ही शरीर में खुद का पेसमेकर तैयार करने की कल्पना जल्द ही हक़ीक़त में बदल सकती है. वैज्ञानिकों ने सुअरों में इसके कामयाब प्रयोग किए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवैज्ञानिकों ने हृदय की कोशिकाओं में एक जीन डालकर उन्हें पेसमेकर कोशिका में बदल दिया. लॉस एंजेलिस के सिडार्स-सिनाई हार्ट इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार 'जैविक पेसमेकर एक बीमारी का प्रभावी ढंग इलाज करने में' कामयाब रहा है. ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के अनुसार साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित शोध को प्रयोग में आने में 'अभी बहुत समय लगेगा.' शोधकर्ताओं ने ऐसे सुअरों में एक जीन को डाला जिन्हें हृदयगति धीमी रहने की बीमारी थी. इस जीन थैरेपी ने करोड़ों की संख्या में मौजूद दिल की मांसपेशियों में से कुछ को बहुत दुर्लभ उन विशेष कोशिकाओं में बदल दिया जो दिल की धड़कन को एक समान रखती हैं. पारंपरिक पेसमेकर (जैविक पेसमेकर कोशिकाओं की तस्वीर) शोध दल का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर एडुआर्डो मार्बन ने कहा, \"पहली बार हम एक जैविक पेसमेकर तैयार करने में कामयाब हुए हैं जिसमें कम से कम बाहरी दखल दिया गया है. इससे यह भी पता चला है कि जैविक पेसमेकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी का बोझ उठा सकता है.\" पारंपरिक पेसमेकर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है जिसे छाती के अंदर लगाया जाता है और ये अनियमित हृदयगति को नियंत्रित करता है. 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'अच्छे और बुरे तालिबान' प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने बयान में 'अच्छे और बुरे तालिबान' की बात की है, अच्छे या बुरे चरमपंथियों की नहीं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ये घोषणा एक ऐसे प्रधानमंत्री ने की है जो देश की नीतियों को नहीं चला रहे हैं. अब जबकि चरमपंथियों ने फ़ायदे से ज्यादा नुक़सान किया है, सुख से ज्यादा दुख दिया है तो जनता सरकार की तरफ़ से स्पष्ट और दो टूक बात होने की उम्मीद कर रही है. पेशावर के आर्मी स्कूल में मारे गए बच्चों की माताएँ. बदले और इंतकाम की तड़प में सिर्फ़ कुछ ही चरमपंथियों को निशाना न बनाया जाए, बल्कि एक ऐसा झाड़ू चलाया जाए कि पाकिस्तान सही मायनों में 'पाक' हो जाए. हालाँकि आने वाले दिन हिंसक कार्रवाइयों में वृद्धि की तरफ इशारा कर रहे हैं. इसकी एक वजह पेशावर स्कूल पर हमले के बाद पाकिस्तान सरकार और तालिबान के बीच संघर्ष के नए राउंड का आगाज़ है और दूसरी वजह है अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सेनाओं की वापसी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के पेशावर शहर में एक आर्मी स्कूल पर हुए हमले के बाद वहाँ जनता में भारी ग़ुस्सा है और बहस तालिबान के इर्द-गिर्द घूम रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहर कोई उन्हें सरे आम फांसी देने और आने वाले समय के लिए मिसाल क़ायम करने की बात कह रहा है. सरकार भी अच्छे और बुरे तालिबान के बीच कोई फ़र्क़ न रखने की बात कह रही है. लेकिन ये भी साफ़ नहीं है कि इस पूरी बहस का केंद्र सिर्फ़ तालिबान तक सीमित है या फिर इसके दायरे में अल क़ायदा, हक्कानी नेटवर्क और भारत विरोधी चरमपंथी संगठन भी हैं या नहीं? नफ़रत और ग़ुस्सा आर्मी पब्लिक स्कूल में तकरीबन डेढ़ सौ छात्रों और अध्यापकों की हत्या की वजह से जो नफ़रत और ग़ुस्सा इस वक्त जनता, सरकार और सैन्य स्तर पर है, उसके चलते शायद अल क़ायदा और हक्कानी नेटवर्क भी अपने आपको यतीम समझने लगें. समाप्त लेकिन क्या चरमपंथ के ख़िलाफ़ ये नफ़रत और ग़ुस्सा भारत विरोधी चरमपंथी संगठनों के लिए भी उल्टी गिनती साबित होगा? भारत के साथ हालिया सीमा तनाव के बाद जमात उद दावा ने इस साल अक्टूबर में कराची में एक जनसभा में सरकार से कहा कि भारत के ख़िलाफ़ जिहाद का ऐलान किया जाए. मुंबई हमलों की साजिश जमात उद दावा के प्रमुख और अमरीका और भारत के वांछितों की सूची में शामिल हाफ़िज़ सईद ने भी एक बयान में भारत को पेशावर हमले के लिए ज़िम्मेदार बताकर उससे बदला लेने का ऐलान कर दिया है. दूसरी तरफ़ जान-बूझकर तो शायद नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से इस्लामाबाद की आतंकवाद निरोधी एक अदालत ने छह साल में पहली बार अचानक मुंबई हमलों की साज़िश के मामले में मुख्य अभियुक्त जकीउर रहमान लखवी को ज़मानत दे दी. इस फैसले ने सबको हैरत में डाल दिया. अब सरकार ने उन्हें दोबारा हिरासत में लेते हुए अडियाला जेल में ही नज़रबंद कर दिया है. सरकार का रवैया लखवी इस मुकदमे के सात अभियुक्तों में से पहले हैं जिन्हें ज़मानत दी गई है. अदालत के फ़ैसले के लिए शायद इससे बुरा कोई समय न हो. जमात उद दावा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के प्रति सरकार का रवैया अतीत में कथित तौर पर हमेशा नरम रहा है. उन्हें पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान हमेशा भारत पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करता रहा है ताकि 'पाकिस्तान को तोड़ने की साजिशों और मंसूबों' से भारत को रोका जा सके और बातचीत की मेज़ पर लाया जा सके. विश्लेषक इस नीति में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं देख रहे हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान की सेना का कहना है कि रविवार को इस्टर के दिन लाहौर में हुए हमले के मामले में अब तक 200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस हमले में कम से कम 72 लोग मारे गए थे. सेना का कहना है कि इस कार्रवाई में गोला-बारूद भी बरामद किए गए हैं. हिरासत में लिए गए लोगों की वास्तिविक संख्या तो अभी नहीं पता चली है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक 200-300 संदिग्धों को अब तक हिरासत में लिया गया है. इनकी पहचान भी सार्वजनिक नहीं की गई है. सेना के प्रवक्ता असीम बाजवा ने उन्हें 'संदिग्ध चरमपंथी और उनके मददगार' के रूप में संबोधित किया है. समाप्त यह कार्रवाई रविवार की रात में ही फ़ौज के बड़े अधिकारियों की एक बैठक के बाद शुरू हो गई थी. इस बैठक में पंजाब में चरमपंथियों के ठिकानों को नष्ट का फैसला किया गया. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने अपने तीन ट्वीट के जरिए चरमपंथी ठिकानों पर मारे गए पहले पांच छापों के बारे में बताया था. सच यह है कि इन छापों में पुलिस की मौजूदगी को लेकर किसी भी तरह का जिक्र नहीं होने के कारण भौहें तन गई थी. अभी तक पंजाब में फ़ौजी या असैनिक एजेंसियों की ओर से दी गई खुफिया सूचनाओं के आधार पर छापे मारे जाते हैं. इन छापों का नेतृत्व पुलिस करती है और पैरामिलिट्री बैक अप देती है. कहां छापा मारना है, इसे लेकर प्रांतीय सरकार के पास विशेषाधिकार होता है लेकिन ज़ाहिर तौर पर रविवार की रात पुलिस और पैरामिलिट्री गैर-मौजूद रहे. पंजाब प्रांत के सूचना मंत्री ने प्रेस कांफ्रेस में कहा कि सरकार के पास इस बात का विशेषाधिकार था कि 'कहां और कितनी ताकत के साथ हमला करना चाहिए' इसका निर्धारण वो करें. इसका मतलब है कि वाकई में राजनीतिक नेतृत्व ने पंजाब में फ़ौज को बुलाने का फैसला लिया है. लेकिन इस वक्त कुछ लोग इस बात को लेकर सहमत है और एक यह धारणा बनी है कि फ़ौज ने सरकार के हाथ बांध रखे हैं. पंजाब का दक्षिणी इलाका खासतौर पर भारत विरोधी चरमपंथी संगठनों लश्कर-ए-तैएबा और जैश-ए-मोहम्मद का गढ़ रहा है. यह इलाका आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है और परंपरागत तौर पर यह मजहबी संगठनों का प्रमुख केंद्र रहा है. शुरू में सेना ने मध्य पंजाब के लाहौर और फैसलाबाद में चरमपंथी ठिकानों को निशाना बनाया. फिर उसके बाद दक्षिणी ज़िला मुल्तान में फ़ौजी कार्रवाई की गई. पाकिस्तान के लगभग सभी अतिवादी समूह पंजाब में अपने मदरसे चलाते हैं. ये गुट इन मदरसों का इस्तेमाल अपने ऑफिस, संपर्क स्थल और आवास के रूप में करते हैं. नवाज़ शरीफ का राजनीतिक करियर जनरल ज़िया-उल-हक़ के फ़ौजी हुकूमत में अपने परवान पर चढ़ा था. ज़िया की फ़ौजी हुकूमत के दौरान पाकिस्तान में क़ानून-व्यवस्था का इस्लामीकरण हुआ था. नवाज़ शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) ने अफ़ग़ानिस्तान में 1990 के दशक में जिहाद को समर्थन दिया और पंजाब में बड़े पैमाने पर मजहबी वोट बैंक को पाने में कामयाबी हासिल की. लेकिन पेशावर में स्कूल पर हुए हमले के बाद फ़ौजी कार्रवाई से उनकी राजनीति मध्यममार्ग से दक्षिणपंथ की ओर के बजाए मध्यममार्ग की ओर आ गई लगती है. पाकिस्तान पर लंबे समय से चरमपंथी समूहों को फलने-फूलने देने का इल्जाम लगता रहा है. इसे विदेश नीति की कूटनीति के अलावा मजहबी नजरिए से भी देखा जाता है. इसे कई लोग इस तौर पर भी देखते हैं कि चरमपंथी समूह और ये मजहबी नजरिया ही फ़ौज को धर्मनिरपेक्ष राजनीति से दूर रखने में मदद पहुंचाता है. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में नेटो को हुआ नुकसान और पाकिस्तान में चीन के निवेश करने की योजनाओं ने लगता है कि इन हालातों को बदला है. पाकिस्तान की फ़ौज ने उत्तरी वजीरिस्तान में फ़ौजी कार्रवाई शुरू की है जिसकी लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही थी. यहां 1980 के दशक से चरमपंथी समूहों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ था. पेशावर में हुए चरमपंथी हमले के बाद सरकार ने नेशनल ऐक्शन प्लान को भी मंजूरी दी जिसके तहत चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अंधाधुंध कार्रवाई का वादा किया गया. लेकिन सरकार ने पाकिस्तान की ज़मीन पर सक्रिय भारत और अफ़ग़ानिस्तान विरोधी समूहों के अस्तित्व को नज़रअंदाज करना अब भी जारी रखा है. 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ने कहा कि इस मसले को ठीक तरीके से हल किया जाना चाहिए. अलग-अलग रुख भारत की विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर ने कहा कि इटली ने घटना पर खेद जताया है. उन्होंने कहा कि जहाँ तक कानून की बात है, भारत और इटली का अलग-अलग रुख है.इस समय दोनो अभियुक्त भारतीय जमीन पर हैं और भारतीय अदालत को ही उन पर फैसला करना है. जहाँ तक भारत का सवाल है , हम भारतीय कानून का पालन करेंगें और कानून अपना काम करेगा. पर भारत ने इटली को भरोसा दिलाया है कि भारतीय कानून पूरी तरह सक्षम और निष्पक्ष है. इससे पहले, मंगलवार को केरल की एक अदालत ने भारतीय मछुआरों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराए गए जहाज के सदस्यों को दो हफ़्ते के लिए हिरासत में भेज दिया. इटली का कहना है कि इन दोनों को भारत में सजा नहीं मिलनी चाहिए, इनके खिलाफ इटली के कानून के हिसाब से मुकदमा चले. क्योंकि जहाज पर इटली का झंडा लगा हुआ था और यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से जा रहा था. उसके मुताबिक यह जहाज भारतीय सीमा से 32 नॉटिकल मील दूर था. इटली का ये भी का कहना है कि मछुआरों की नाव ने बहुत ही खराब व्यवहार किया था और बार बार अपील करने के बाद भी वे नहीं माने. मंत्रालय का कहना है कि अधिकारियों ने सिर्फ चेतावनी देने के लिए हवा में गोलियां चलाईं. लेकिन भारत का कहना है कि गार्डों ने निहत्थे लोगों पर हमला किया है और चूंकि ये हादसा भारत के अधिकार क्षेत्र में हुआ है, इसलिए भारतीय क़ानून प्रक्रिया का ही पालन किया जाएगा. एक करोड़ का मुआवजा इस बीच, गोलीबारी में मारे गए मछुआरों के एक परिवार ने मंगलवार को मुआवजे के लिए केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है. याचिका में मृतकों के परिवार ने मांग की है कि जब तक जहाज़ की कंपनी एक करोड़ रुपये मुआवजा अदा नहीं किया जाता तब तक अदालत मालवाहक जहाज को कोच्चि छोड़ने की अनुमति नही दी जानी चाहिए.. ये याचिका वकील विन्सेंट और कोल्लम डाइअसिस की ओर से दायर की गई है. गोलीबारी में मारा गया मछुआरा गेलास्टीन धार्मिक संगठन (कोल्लम डाइअसिस) से जुड़ा है. मछुआरों के कई समूहों ने मंगलवार को कोल्लम के जिलाधीश कार्यालय और राजधानी में विरोध-प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियो की ये भी माँग थी कि जहाज के कप्तान को भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए. महत्वपूर्ण है कि इटली के मालवाहक जहाज के चालक दल के सदस्यों ने 15 फरवरी को अलाप्पुझा के तट पर दो भारतीय मछुआरों आजेश बिनकी और जलास्टीन पर कथित तौर पर इसलिए गोली चलाई क्योंकि उन्हें लगा कि ये मछुआरे समुद्री लुटेरे हैं. सोमालिया और अदन की खाड़ी में जहाज़ों के अपहरण और समुद्री लुटेरों के हमले के बाद से हर जहाज़ में चालक दल के सदस्य अपने साथ बंदूकधारी भी रखने लगे हैं.\n\nSummary:", "target": "इतालवी कार्गो जहाज से हुई फायरिंग में दो भारतीय मछुआरों की मौत के मामले को कूटनीति के स्तर पर इसे सुलझाने के लिए इटली के उप विदेश मंत्री ने भारतीय विदेश मंक्षालय के अधिकारियों से मुलाकात की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत ने इस मामले में कड़ा रुख़ अपनाया है उप विदेश मंत्री स्ताफन दी मिसतुरा के साथ आए पाँच सदस्यों के दल ने विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर से मुलाकात की. विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात के बाद इटली के उप विदेश मंत्री स्ताफन दी मिसतुरा ने कहा कि घटना हुई है, इससे इंकार नही किया जा सकता, पर ये घटना आंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में हुई है. धटना की परिस्थितियों के सही विश्लेषण और जाँच की जरूरत है और वो अब केरल का रूख कर रहे हैं. इतालवी उप विदेश मंत्री ने कहा कि इस मसले को ठीक तरीके से हल किया जाना चाहिए. अलग-अलग रुख भारत की विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर ने कहा कि इटली ने घटना पर खेद जताया है. उन्होंने कहा कि जहाँ तक कानून की बात है, भारत और इटली का अलग-अलग रुख है.इस समय दोनो अभियुक्त भारतीय जमीन पर हैं और भारतीय अदालत को ही उन पर फैसला करना है. जहाँ तक भारत का सवाल है , हम भारतीय कानून का पालन करेंगें और कानून अपना काम करेगा. पर भारत ने इटली को भरोसा दिलाया है कि भारतीय कानून पूरी तरह सक्षम और निष्पक्ष है. इससे पहले, मंगलवार को केरल की एक अदालत ने भारतीय मछुआरों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराए गए जहाज के सदस्यों को दो हफ़्ते के लिए हिरासत में भेज दिया. इटली का कहना है कि इन दोनों को भारत में सजा नहीं मिलनी चाहिए, इनके खिलाफ इटली के कानून के हिसाब से मुकदमा चले. क्योंकि जहाज पर इटली का झंडा लगा हुआ था और यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से जा रहा था. उसके मुताबिक यह जहाज भारतीय सीमा से 32 नॉटिकल मील दूर था. इटली का ये भी का कहना है कि मछुआरों की नाव ने बहुत ही खराब व्यवहार किया था और बार बार अपील करने के बाद भी वे नहीं माने. मंत्रालय का कहना है कि अधिकारियों ने सिर्फ चेतावनी देने के लिए हवा में गोलियां चलाईं. लेकिन भारत का कहना है कि गार्डों ने निहत्थे लोगों पर हमला किया है और चूंकि ये हादसा भारत के अधिकार क्षेत्र में हुआ है, इसलिए भारतीय क़ानून प्रक्रिया का ही पालन किया जाएगा. एक करोड़ का मुआवजा इस बीच, गोलीबारी में मारे गए मछुआरों के एक परिवार ने मंगलवार को मुआवजे के लिए केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है. याचिका में मृतकों के परिवार ने मांग की है कि जब तक जहाज़ की कंपनी एक करोड़ रुपये मुआवजा अदा नहीं किया जाता तब तक अदालत मालवाहक जहाज को कोच्चि छोड़ने की अनुमति नही दी जानी चाहिए.. ये याचिका वकील विन्सेंट और कोल्लम डाइअसिस की ओर से दायर की गई है. गोलीबारी में मारा गया मछुआरा गेलास्टीन धार्मिक संगठन (कोल्लम डाइअसिस) से जुड़ा है. मछुआरों के कई समूहों ने मंगलवार को कोल्लम के जिलाधीश कार्यालय और राजधानी में विरोध-प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियो की ये भी माँग थी कि जहाज के कप्तान को भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए. महत्वपूर्ण है कि इटली के मालवाहक जहाज के चालक दल के सदस्यों ने 15 फरवरी को अलाप्पुझा के तट पर दो भारतीय मछुआरों आजेश 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को रोकने के लिए ज़िम्मेदारी से क़दम नहीं उठाए वरना बिहार में आतंकवाद को बढ़ावा नहीं मिलता.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बात शुरू हुई केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता राजवी प्रताप रूडी के ट्वीट से जिसमें पाकिस्तानी अख़बार डॉन की वेबसाइट पर जदयू के विज्ञापन छपने का मुद्दा उठाया गया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरूडी के साथी और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी ऐसा ही ट्वीट दाग़ा. हालांकि रूडी ने बाद में ट्वीट वापस ले लिया. ट्वीट के आने के बाद लोग इसपर सवाल उठा रहे थे और बता रहे थे कि गूगल वेबसाइटों पर इश्तिहार कैसे काम करते हैं. बताया गया कि गूगल वेबसाइटों पर जहां से वेबसाइट देखी जा रही है उसी स्थान के आधार पर विज्ञापन दिखाता है. बिहार चुनावों के दौरान बीजेपी किसी न किसी तरह से महागठबंधन को पाकिस्तान से जोड़ने की कोशिश करती रही है. समाप्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चंद दिनों पहले बयान दिया कि अगर बिहार में एनडीए की हार हुई तो पाकिस्तान 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एंटी-बायोटिक दवाओं के अनियंत्रित इस्तेमाल की समस्या है. ऐसे में कई लोग छिटपुट बीमारियों के लिए एंटी-बायोटिक गोलियाँ खा लेते हैं, जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं होती. वहीं ज़रूरतमंद को ये दवाई नहीं मिल पाती. एंटी-बायोटिक दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल से इसका असर कम हो जाने का खतरा बढ़ जाता है. (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय एंटी-बायोटिक दवाओं का सबसे बड़े खरीदार बन गए हैं. बीते दस सालों में भारत में एंटी-बायोटिक की खपत 62 फ़ीसदी बढ़ी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअमरीका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार बीते दस वर्षों में पूरी दुनिया में एंटी-बायोटिक दवाओं का उपयोग 36 फ़ीसदी बढ़ा है. ब्रिक्स देशों में यह उछाल सबसे ज़्यादा है. भारत में साल 2001 में आठ अरब यूनिट एंटी-बायोटिक दवाओं की खपत साल 2010 तक बढ़कर 12.9 अरब हो चुकी है. रिसर्च के अनुसार, भारत के लोग औसतन हर साल 11 एंटी-बायोटिक गोलियां खाते हैं. लेकिन इन दवाओं का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल अमरीकी करते हैं, जो हर साल 22 एंटिबायोटिक गोलियां खाते हैं. इस रिसर्च के वरिष्ठ शोधकर्ता रमनन लक्ष्मीनारायण ने बीबीसी को बताया, “भारत में एंटी-बायोटिक दवाएं आसानी से मिल रही हैं, ये अच्छी बात है लेकिन इसका इतना ज़्यादा इस्तेमाल चिंता भी पैदा करता है.” रमनन लक्ष्मीनारायण ने बताई एंटी-बायोटिक दवाओं के बारे में कुछ खास बातें, आइए जानते हैं- किस काम आता है एंटी-बायोटिक? एंटी-बायोटिक दवाएं कई तरह के इंफ़ेक्शनों के इलाज़ के लिए इस्तेमाल की जाती हैं. ये दवाइयां बैक्टीरिया संबंधी बीमारियों पर तेज़ असर करता है. एंटी-बायोटिक कई तरह के होते हैं और हर मामले में बीमारी के हिसाब से इन्हें मरीज़ को दिया जाता है. एंटी-बायोटिक दवाएं लेने के क़ायदे सबसे ज़रूरी है कि बीमारी के लक्षण दिखने पर मरीज़ डॉक्टर के पास जाए. डॉक्टर के कहने पर ही एंटी-बायोटिक दवाएं लें. डॉक्टर से बिना पूछे, सर्दी-खांसी की गोली की तरह एंटी-बायोटिक दवाई लेना मरीज़ के लिए खतरनाक हो सकता है. कई बार सर्दी-ज़ुकाम की वजह एलर्जी भी होती है, ऐसे में एंटी-बायोटिक दवाइयां कारगर नहीं होती. क्या नहीं करना चाहिए? अपने से कोई दवाई नहीं खानी चाहिए. अगर एंटी-बायोटिक दवाएं ले रहे हों तो उसका कोर्स ज़रूरी पूरा करें, बीच में न छोड़े. कई बार मरीज़ थोड़ा ठीक होने पर दवाई खाना छोड़ देते हैं, जिससे बीमारी के वापस आने का खतरा बढ़ जाता है. ज़्यादा एंटीबायोटिक दवाएं लेने के खतरे भारत में एंटी-बायोटिक दवाओं के अनियंत्रित इस्तेमाल की समस्या है. ऐसे में कई लोग छिटपुट बीमारियों के लिए एंटी-बायोटिक गोलियाँ खा लेते हैं, जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं होती. वहीं ज़रूरतमंद को ये दवाई नहीं मिल पाती. एंटी-बायोटिक दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल से इसका असर कम हो जाने का खतरा बढ़ जाता है. 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उम्मीदवार पूर्व रेल मंत्री शेख़ रशीद के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा दिखाते हुए कहा कि शेख़ रशीद को उस वक़्त अपने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था, जब लाल मस्जिद ऑपरेशन में मासूम बच्चों और बच्चियों की मौत हुई थी. उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया होता तो वह लोगों से वोट मांगने का हक़ भी रखते थे. लोग उनके साथ चलते भी, लेकिन अब हम उनका समर्थन नहीं करेंगे और न ही उनको वोट देंगे. पूर्व मंत्री शेख़ रशीद मानते हैं कि लोग उनकी सरकार की ओर से अमरीकी नितीयों के समर्थन के विरुद्ध हैं. उनका कहना है कि वह इसके बावजूद चुनाव जीत जाएंगे. इमाम से मुलाक़ात चुनाव बिल्कुल पास आने पर मुस्लिम लीग (क्यू) के नेता चौधरी शुजात हुसैन ने इडयाला जेल में बंद लाल मस्जिद के पुर्व ख़तीब (जुमे को मस्जिद भाषण देने वाले इमाम) मौलाना अब्दुल अज़ीज़ से कुछ दिन पहले ही अचानक मुलाक़ात की. लाल मस्जिद के प्रवक्ता आमिर सिद्दीक़ ने कहा कि चौधरी शुजात हुसैन की मुलाक़ात का मक़सद मौलाना की ख़ैरीयत पूछना था. उन्होंने कहा कि चौधरी शुजात ने इस मुलाक़ात के दौरान मौलाना से कहा, “अगर वह सत्ता में आए तो वह उनकी रिहाई के लिए कोशिश करेंगे.” उन्होंने कहा कि चौधरी शुजात हुसैन ने ऐसे वक़्त में मुलाक़ात की जब चुनाव हो रहे हैं तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह उनकी अपनी साख बहाल करने की राजनीतिक कोशिश हो. क़ायम है उम्मीद आमिर सिद्दीक़ का कहना है कि हम दुआ करते हैं कि यह उनकी संजीदा कोशिश हो और वह उसे अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि लाल मस्जिद की घटना के वक़्त जब वह सत्ता में थे तो भी उन्होंने अपना रोल नहीं निभाया, अब कम से कम उनको मौलाना की रिहाई और दूसरे मामलों को हल करने के लिए संजीदा कोशिश करनी चाहिए. पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान को लाल मस्जिद ऑपरेशन के साथ-साथ न्यायपालिका की समस्या और मंहगाई की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. अब ऐसा दिखाई दे रहा है कि उन समस्याओं का चुनावी मलबा सत्ताधारी पार्टी पर गिर रहा है.\n\nSummary:", "target": "लाल मस्जिद फ़ौजी ऑपरेशन को हुए लगभग सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन उसका प्रेत पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के समर्थन वाली पार्टी मुस्लिम लीग (क्यू) का अब भी पीछा नहीं छोड़ रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउनके उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के दौरान इस विषय में वोटरों के सवालों का सामना करना पड़ा. वैसे तो पाकिस्तान में लोगों की सामूहिक-याद काफ़ी कमज़ोर है, लेकिन बहुत से लोगों के मन में लाल मस्जिद ऑपरेशन का जख़्म अभी भी ताज़ा है. प्रत्याशियों से सवाल चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम लीग (क्यू) के उम्मीदवारों से वोटरों ने लाल मस्जिद ऑपरेशन के दौरान सौ से अधिक छात्र-छात्राओं की मौत के बारे में सवालों का सामना करना पड़ा. रावलपिंडी के एक वोटर ने मुस्लिम लीग (क्यू) के उम्मीदवार पूर्व रेल मंत्री शेख़ रशीद के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा दिखाते हुए कहा कि शेख़ रशीद को उस वक़्त अपने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था, जब लाल मस्जिद ऑपरेशन में मासूम बच्चों और बच्चियों की मौत हुई थी. उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया होता तो वह लोगों से वोट मांगने का हक़ भी रखते थे. लोग उनके साथ चलते भी, लेकिन अब हम उनका समर्थन नहीं करेंगे और न ही उनको वोट देंगे. पूर्व मंत्री शेख़ रशीद मानते हैं कि लोग उनकी सरकार की ओर से अमरीकी नितीयों के समर्थन के विरुद्ध हैं. उनका कहना है कि वह इसके बावजूद चुनाव जीत जाएंगे. इमाम से मुलाक़ात चुनाव बिल्कुल पास आने पर मुस्लिम लीग (क्यू) के नेता चौधरी शुजात हुसैन ने इडयाला जेल में बंद लाल मस्जिद के पुर्व ख़तीब (जुमे को मस्जिद भाषण देने वाले इमाम) मौलाना अब्दुल अज़ीज़ से कुछ दिन पहले ही अचानक मुलाक़ात की. लाल मस्जिद के प्रवक्ता आमिर सिद्दीक़ ने कहा कि चौधरी शुजात हुसैन की मुलाक़ात का मक़सद मौलाना की ख़ैरीयत पूछना था. उन्होंने कहा कि चौधरी शुजात ने इस मुलाक़ात के दौरान मौलाना से कहा, “अगर वह सत्ता में आए तो वह उनकी रिहाई के लिए कोशिश करेंगे.” उन्होंने कहा कि चौधरी शुजात हुसैन ने ऐसे वक़्त में मुलाक़ात की जब चुनाव हो रहे हैं तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह उनकी अपनी साख बहाल करने की राजनीतिक कोशिश हो. क़ायम है उम्मीद आमिर सिद्दीक़ का कहना है कि हम दुआ करते हैं कि यह उनकी संजीदा कोशिश हो और वह उसे अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि लाल मस्जिद की घटना के वक़्त जब वह सत्ता में थे तो भी उन्होंने अपना रोल नहीं निभाया, अब कम से कम उनको मौलाना की रिहाई और दूसरे मामलों को हल करने के लिए संजीदा कोशिश 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लेकिन आलोचकों का कहना है कि बीजिंग दमनकारी शासकों के साथ संबंध बढ़ा रहा है. जबकि चीन का कहना है कि हम सिर्फ़ व्यवसाय कर रहे हैं और इसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है. सम्मेलन में हू जिंताओ ने कहा, '' आज की हमारी बैठक इतिहास में दर्ज़ होगी. चीन हमेशा अफ़्रीका का अच्छा मित्र, सहयोगी और भाई बना रहेगा.'' हू जिंताओ ने कहा कि चीन 2009 तक अफ़्रीकी देशों को मिलने वाली सहायता दोगुनी कर देगा. हालाँकि उन्होंने इस संबंध में कोई आँकड़ा नहीं दिया है. इसके अलावा बीजिंग अगले तीन वर्षों में अफ़्रीकी देशों को पाँच अरब डॉलर का कर्ज़ भी देगा. बढ़ता सहयोग चीन ने कहा है कि वह 15 हज़ार अफ़्रीकी पेशवरों को प्रशिक्षण देगा और वहाँ स्कूल और कॉलेजों के निर्माण के लिए विकास कोष स्थापित करेगा. ग़ौरतलब है कि चीन के अफ़्रीकी देशों से तेल और अन्य सामान खरीदने की वज़ह से दोनों पक्षों के बीच 2005 में 42 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. इसके अलावा अफ़्रीकी देश चीनी माल के लिए उभरते हुए बाज़ार के रूप में भी सामने आ रहे हैं. विश्लेषकों का मानना है कि जब पश्चिमी देश दुनिया के दूसरे भागों में तेल भंडारों तक पहुँच चुके हैं 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स्थिति को सँभाला वो सराहनीय है. मीडिया में यह बार-बार आता रहा है कि गुजरात दंगों के बारे में जसवंत सिंह की टिप्पणियों से भारतीय जनता पार्टी का एक तबका और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता नाराज़ चल रहे थे.\n\nSummary:", "target": "पूर्व विदेश मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने कहा है कि वो जल्द ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उस व्यक्ति का नाम बता देंगे जो कथित रूप से भारतीय परमाणु कार्यक्रम के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी अमरीका को देता था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहालाँकि उन्होंने मीडिया के सामने इस नाम को सार्वजनिक नहीं किया और कहा कि वो इसे केवल प्रधानमंत्री को ही बताएँगे. पिछले दिनों जसवंत सिंह ने आरोप लगाया था कि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय में नियुक्त यह व्यक्ति ऐसी जानकारी अमरीका को देता रहा था जो देश के हितों के ख़िलाफ़ थी. रविवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जसवंत सिंह को चुनौती दी थी कि वो साहस रखते हैं तो उस व्यक्ति का नाम बताएं. इस बारे में बीबीसी से बात करते हुए जसवंत सिंह का कहना है कि इसमें साहस दिखाने जैसी कोई बात नहीं है और जो जानकारी उनके पास है वो प्रधानमंत्री को दी जा सकती है. जसवंत सिंह का कहना है कि उन्हें इस व्यक्ति के बारे में जानकारी एक अमरीकी अधिकारी के पत्र के ज़रिए मिली थी. नैतिक मामला हाल में प्रकाशित जसवंत सिंह की किताब 'ए कॉल टू ऑनर' में उन्होंने एक बार फिर कंधार अपहरण कांड की चर्चा करते हुए बताया है कि उनका भारतीय बंधकों को छुड़ाने के लिए चरमपंथियों को कंधार ले जाकर रिहा करना सही था. इस बारे में बीबीसी से बात करते हुए उनका कहना था कि उस समय सरकार को नैतिक दृष्टि से दो मुश्किल विकल्पों के बीच चयन करना था. एक तरफ़ तीन चरमपंथियों को रिहा करना और दूसरी ओर लगभग 166 निर्दोष लोगों को निश्चित मौत के मुँह से निकालना. सरकार ने चरमपंथियों को रिहा कर के मासूम लोगों की जान बचाने का फ़ैसला किया जो कि सही था. जसवंत सिंह ने बातचीत में यह भी कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनकी टिप्पणियों से उठे विवाद को उन्होंने ख़त्म करने की कोशिश की. पहले रिपोर्टों के अनुसार कहा जा रहा था कि उन्होंने गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार 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था. ट्रक मालिक जोभेपा ने गांव वालों से मदद मांगी. कुटसापो गांव में चेखेसांग जनजाति के लोग रहते हैं. ग्राम सभा अध्यक्ष ज़शीबेजो राखो ने बीबीसी को बताया कि 8 जनवरी को गांव के करीब 400 लोगों ने परंपरागत तकनीकों का इस्तेमाल करके ट्रक को खाई से बाहर निकाला. ट्रक के टायर स्लिप ना करें इसके लिए मिट्टी वाले रास्ते पर बांस की पटरियां बिछाई गईं. ट्रक को बाहर की तरफ खींचते वक़्त लोग लोकगीत गा रहे थे. वीडियोः म्हाशेवो लोहे और दिलीप कुमार शर्मा, बीबीसी हिंदी के लिए (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नगालैंड के फेक जिले का कुटसापो गांव अचानक चर्चा में है. 26 दिसंबर को इस गांव में एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nट्रक सड़क से करीब 525 फुट नीचे गिर गया था. कुटसापो ग्राम विकास बोर्ड के तहत बनाया गया भारत का पहला गांव है. सड़क की हालत खराब होने के कारण ट्रक को बाहर निकालना आसान नहीं था. ट्रक मालिक जोभेपा ने गांव 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अधिकारियों ने कहा है कि इस हादसे में एक सौ अट्ठारह लोग घायल हुए हैं जिनमें अट्ठारह लोगों की हालत गंभीर है. दुर्घटनाएं रोकने के लिए रेल ट्रैक पर ऑटोमैटिक ब्रेक सिस्टम लगा था. जर्मनी के परिवहन मंत्री एलेग्ज़ेंडर डोब्रिन्ट ने कहा है कि ट्रेन हादसे के पीछे तकनीकी गड़बड़ी थी या मानवीय भूल, इसकी जांच की जाएगी. ट्रेनों के तीन ब्लैक बॉक्स रिकॉर्डरों में से दो ब्लैक बॉक्स रिकॉर्डर बरामद कर लिए गए हैं. समाप्त दुर्घटनास्थल पर बड़े पैमाने पर राहत और बचाव कार्य चलाया जा रहा है. करीब सात सौ इमर्जेंसी कार्यकर्ता, हलिकॉप्टर और एंबुलेंस बचाव कार्य में लगे हुुए हैं. यह दुर्घटना म्यूनिख़ से 60 किमी दूरी पर बसे दक्षिण-पूर्वी शहर बाटएबलिंग में हुई. यह शहर पर्यटकों में काफ़ी लोकप्रिय है. पुलिस के प्रवक्ता स्टीफ़न सॉनटैग ने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस को बताया, ''इस इलाक़े में हाल के सालों में हुआ यह सबसे बड़ा हादसा है. घटनास्थल पर इमर्जेंसी डॉक्टर, एंबुलेंस और हेलिकॉप्टर पहुँच गए हैं.'' उन्होंने बताया कि हादसा स्थानीय समयानुसार सुबह सात बजे से पहले रोज़ेनहाएम और होल्ज़सेन के बीच हुआ. माना जा रहा है कि दोनों रेलगाड़ियों की आमने-सामने की टक्कर हुई. जर्मन मीडिया के मुताबिक़ दुर्घटना के बाद एक ट्रेन पटरी से उतर गई और उसके कई डिब्बे पलट गए. रिपोर्टों के मुताबिक कार्निवल के कारण छुट्टियां होने की वजह से ट्रेन में बच्चे नहीं थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "जर्मनी के बवेरिया प्रांत में दो ट्रेनों की टक्कर में नौ लोगों की मौत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजर्मन अधिकारियों ने कहा है कि इस हादसे में एक सौ अट्ठारह लोग घायल हुए हैं जिनमें अट्ठारह लोगों की हालत गंभीर है. दुर्घटनाएं रोकने के लिए रेल ट्रैक पर ऑटोमैटिक ब्रेक सिस्टम लगा था. जर्मनी के परिवहन मंत्री एलेग्ज़ेंडर डोब्रिन्ट ने कहा है कि ट्रेन हादसे के पीछे तकनीकी गड़बड़ी थी या मानवीय भूल, इसकी जांच की जाएगी. ट्रेनों के तीन ब्लैक बॉक्स रिकॉर्डरों में से दो ब्लैक बॉक्स रिकॉर्डर बरामद कर लिए गए हैं. समाप्त दुर्घटनास्थल पर बड़े पैमाने पर राहत और बचाव कार्य चलाया जा रहा है. करीब सात सौ इमर्जेंसी कार्यकर्ता, हलिकॉप्टर और एंबुलेंस बचाव कार्य में लगे हुुए हैं. यह दुर्घटना म्यूनिख़ से 60 किमी दूरी पर बसे दक्षिण-पूर्वी शहर बाटएबलिंग में हुई. यह शहर पर्यटकों में काफ़ी लोकप्रिय है. पुलिस के प्रवक्ता स्टीफ़न सॉनटैग ने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस को बताया, ''इस इलाक़े में हाल के सालों में हुआ यह सबसे बड़ा हादसा है. घटनास्थल पर इमर्जेंसी डॉक्टर, एंबुलेंस और हेलिकॉप्टर पहुँच गए हैं.'' उन्होंने बताया कि हादसा स्थानीय समयानुसार सुबह सात बजे से पहले रोज़ेनहाएम और होल्ज़सेन के बीच हुआ. माना जा रहा है कि दोनों रेलगाड़ियों की आमने-सामने की टक्कर हुई. जर्मन मीडिया के मुताबिक़ दुर्घटना के बाद एक ट्रेन पटरी से उतर गई और उसके कई डिब्बे पलट गए. रिपोर्टों के मुताबिक कार्निवल के कारण छुट्टियां होने की वजह से ट्रेन में बच्चे नहीं थे. 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झड़पें होती रहीं. पेशावर, टांक में हिंसा इस्लामाबाद से बीबीसी संवाददाता ज़फ़र अब्बास का कहना है कि विरोध प्रदर्शन अब भी ज़ोरों पर हैं और देश के कई हिस्सों में फैलते जा रहे हैं. बुधवार को अधिकारियों के अनुसार धार्मिक दलों से संबंधित सैकड़ों सदस्यों ने पेशावर में पश्चिमी देशों की निंदा की और माँग उठाई कि पाकिस्तान में डेनमार्क के राजदूत को देश से निकाल दिया जाए. शहर के बीचोंबीच हो रहे प्रदर्शनों के दौरान कुछ व्यवसायिक इमारतों को निशाना बनाना शुरु किया और नॉर्वे की एक मोबाइल कंपनी के दफ़्तर को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया. इसके बाद पुलिस हरकत में आई और उसने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया. वहाँ प्रदर्शनकारियों ने हवा में गोलियाँ चलाईं जिसके दौरान एक बच्चे की मौत हो गई. एक अन्य व्यक्ति तब मारा गया जब बिजली का तार उस पर गिरा. ईरान की सीमा से सटे हुए टांक नगर में तब हिंसा भड़की जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को दुकानों और व्यवसायिक संस्थानों को बलपूर्वक बंद करवाए जाने पर प्रदर्शनकारियों को रोका. जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं तो एक पुलिसकर्मी घायल हो गया. वीडियों और सीडी 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और दुकानों को भी निशाने पर लिया है और तोड़-फोड़ की है. नब्बे के दशक में बंबई के नाम को लेकर आंदोलन करने वाली शिवसेना ने अब स्कूलों और शो-रूम को निशाना बनाना शुरू किया है. पार्टी चाहती है कि जिन स्कूलों या संस्थानों के नाम में बॉम्बे या बंबई हो, उन्हें भी बदल कर मुंबई कर दिया जाए. पार्टी कार्यकर्ताओं ने मुंबई के प्रतिष्ठित बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल पर धावा बोल कर साइन बोर्ड उखाड़ दिए और उसकी जगह मुंबई लिख दिया. इतना ही नहीं वर्ली में बॉम्बे डाइंग के शो-रूम पर भी कार्यकर्ता पहुँचे और बॉम्बे शब्द को हटा दिया. इन दोनों ही स्थानों पर तोड़-फोड़ की गई. लेख इससे पहले शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में इस संबंध में एक लेख छपा था कि मुंबई में कई संस्थान अभी भी बॉम्बे या बंबई के नाम से चल रहे हैं और ये ग़लत है. मैंने सामना के कार्यकारी संपादक संजय राउत से बात की और पूछा कि संस्थानों के साथ ऐसा करना कितना सही है. वो कहते हैं, \"देखिए अब सरकारी तौर पर भी बंबई का नाम मुंबई हो गया है लेकिन कुछ संस्थान ऐसे हैं जिन्होंने अपना नाम नहीं बदला, मसलन बॉम्बे स्कॉटिश, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, बॉम्बे डाइंग. इनको बदलना 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में रामसेतु की ऐतिहासिकता के अलावा राम के अस्तित्व को भी अप्रमाणिक बताया गया था जिसके बाद विपक्ष और हिंदू संगठनों ने सरकार का विरोध शुरू कर दिया था. अपनी ही पार्टी के एक नेता की ओर से इस तरह का बयान आने के बाद अंबिका सोनी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि अगर प्रधानमंत्री या यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी उनसे इस मामले में इस्तीफ़ा देने को कहेंगी तो वो तत्काल अपने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देंगी. 'मैं जयराम रमेश नहीं' उन्होंने कहा, \"मैंने इस मामले से संबंधित सभी क़ाग़ज़ात प्रधानमंत्री और सोनिया जी के पास भेज दिए हैं. अगर उनको लगता है कि मैं इस्तीफ़ा दूँ तो मुझे अपना इस्तीफ़ा देने में एक मिनट का भी वक़्त नहीं लगेगा.\" अंबिका सोनी ने जयराम रमेश पर इस बारे में पलटवार करते हुए कहा कि वे जयराम रमेश नहीं हैं. इससे पहले अंबिका सोनी ने जापान यात्रा से लौटकर भारत पहुँचने के बाद पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात की. इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के अधिकारियों की ओर से लापरवाही बरती गई है और जो भी लोग ज़िम्मेदार हैं, उसकी जाँच की जाएगी. उधर तत्काल प्रभाव से एएसआई के दो आला अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया गया है. अंबिका सोनी ने बताया कि इस मामले में अधिकारियों को हलफ़नामे में जो ज़रूरी सुधार करने के लिए कहा गया था वे नहीं किए गए जिसके कारण हलफ़नामे को लेकर विवाद की स्थिति पैदा हुई. पहले से ही रामसेतु पर अपने हलफ़नामे को लेकर विवादों से घिर चुकी केंद्र सरकार के लिए पार्टी के अंदर उपजा यह संकट चिंताओं को और बढ़ा रहा है.\n\nSummary:", "target": "रामसेतु मामले पर केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए हलफ़नामे पर विवाद अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है और अब केंद्र सरकार के दो मंत्री इस मसले पर आमने-सामने हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकांग्रेस के नेता और केंद्र सरकार के वाणिज्य राज्यमंत्री जयराम रमेश ने इस मामले में केंद्रीय संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा है कि अगर वो संस्कृति मंत्री होते तो इतने विवाद के बाद इस पद से इस्तीफ़ा दे देते. उन्होंने यह बातें कोलकाता में कुछ पत्रकारों से बातचीत के दौरान कही. ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार को सेतु समुद्रम परियोजना के संदर्भ में रामसेतु पर दिए गए अपना हलफ़नामा सुप्रीम कोर्ट से वापस लेना पड़ा है. दाखिल हलफ़नामे में रामसेतु की ऐतिहासिकता के अलावा राम के अस्तित्व को भी अप्रमाणिक बताया गया था जिसके बाद विपक्ष और हिंदू संगठनों ने सरकार का विरोध शुरू कर दिया था. अपनी ही पार्टी के एक नेता की ओर से इस तरह का बयान आने के बाद अंबिका सोनी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि अगर प्रधानमंत्री या यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी उनसे इस मामले में इस्तीफ़ा देने को कहेंगी तो वो तत्काल अपने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देंगी. 'मैं जयराम रमेश नहीं' उन्होंने कहा, \"मैंने इस मामले से संबंधित सभी क़ाग़ज़ात प्रधानमंत्री और सोनिया जी के पास भेज दिए हैं. अगर उनको लगता है कि मैं इस्तीफ़ा दूँ तो मुझे अपना इस्तीफ़ा देने में एक मिनट का भी वक़्त नहीं लगेगा.\" अंबिका सोनी ने जयराम रमेश पर इस बारे में पलटवार करते हुए कहा कि वे जयराम रमेश नहीं हैं. इससे पहले अंबिका सोनी ने जापान यात्रा से लौटकर भारत पहुँचने के बाद पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात की. इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के अधिकारियों की ओर से लापरवाही बरती गई है और जो भी लोग ज़िम्मेदार हैं, उसकी जाँच की जाएगी. उधर तत्काल प्रभाव से एएसआई के दो आला अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया गया है. अंबिका सोनी ने बताया कि इस मामले में अधिकारियों को हलफ़नामे में जो ज़रूरी सुधार करने के लिए कहा गया था वे नहीं किए गए जिसके कारण हलफ़नामे को लेकर विवाद की स्थिति पैदा हुई. पहले से ही रामसेतु पर अपने हलफ़नामे को लेकर विवादों से घिर चुकी केंद्र सरकार के लिए पार्टी के अंदर उपजा यह संकट चिंताओं को और बढ़ा रहा है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 669, "source_item_id": "669", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1894, "clean_index": 598, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:598"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपिछले दिनों रूस के उफ़ा में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात हुई थी जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान जाने का न्यौता स्वीकार कर लिया था. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के विदेश और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने स्वदेश लौटकर एक प्रेस कांफ्रेस में कहा, \"भारतीय नेतृत्व को स्पष्ट बता दिया गया है कि कश्मीर पर बात किए बग़ैर भारत से बातचीत नहीं हो सकती है.\" उन्होंने कहा, \"भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे अहम मुद्दा कश्मीर है.\" 'भारत की दख़लंदाज़ी' उन्होंने कहा कि भारत बलूचिस्तान में दख़लंदाज़ी कर रहा है और ये बात प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बता दी है. समाप्त ग़ौरतलब है कि भारत ऐसे सभी आरोपों से इनकार करता है. सरताज अज़ीज़ ने कहा कि पाकिस्तान बातचीत चाहता है लेकिन इसके लिए अपने सम्मान को दांव पर नहीं लगाएगा. रूस के उफ़ा में मिले मोदी और नवाज़ शरीफ़ मुंबई हमलों के बाद से दोनों देशों की वार्ता में कई रुकावटें आई हैं. भारत हमले के ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्वराई की मांग कर रहा है. वहीं पाकिस्तान का रुख़ रहा है कि इसके लिए उसे पुख़्ता सबूत नहीं मुहैया कराए गए हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान ने कहा है कि कश्मीर मुद्दे पर बात किए बिना भारत के साथ वार्ता संभव नहीं है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपिछले दिनों रूस के उफ़ा में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात हुई थी जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान जाने का न्यौता स्वीकार कर लिया था. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के विदेश और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने स्वदेश लौटकर एक प्रेस कांफ्रेस में कहा, \"भारतीय नेतृत्व को स्पष्ट बता दिया गया है कि कश्मीर पर बात किए बग़ैर भारत से बातचीत नहीं हो सकती है.\" उन्होंने कहा, \"भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे अहम मुद्दा कश्मीर है.\" 'भारत की दख़लंदाज़ी' उन्होंने कहा कि भारत बलूचिस्तान में दख़लंदाज़ी कर रहा है और ये बात प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बता दी है. समाप्त ग़ौरतलब है कि भारत ऐसे सभी आरोपों से इनकार करता है. सरताज अज़ीज़ ने कहा कि पाकिस्तान बातचीत चाहता है लेकिन इसके लिए अपने सम्मान को दांव पर नहीं लगाएगा. रूस के उफ़ा में मिले मोदी और नवाज़ शरीफ़ मुंबई हमलों के बाद से दोनों देशों की वार्ता में कई रुकावटें आई हैं. भारत हमले के ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्वराई की मांग कर रहा है. वहीं पाकिस्तान का रुख़ रहा है कि इसके लिए उसे पुख़्ता सबूत नहीं मुहैया कराए गए हैं. 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'कहा-सुनी पर हमला' नाटो के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सहायता सुरक्षा बल के प्रवक्ता ने बताया कि शनिवार को वारदाक प्रांत में एक सुरक्षा चौकी पर एक अफगान सुरक्षाकर्मी ने एक अमरीकी सैनिक और विदेशी ठेकेदार की जान ले ली. ये घटना सैयदाबाद जिले में अफगान राष्ट्रीय सेना के ठिकाने के निकट एक सुरक्षा चौकी पर हुई. वारदाक के पुलिस प्रमुख ने बीबीसी को बताया कि इस हमले में कई अफगान सैनिक भी मारे गए हैं. प्रांतीय सरकार के प्रवक्ता शाहिदुल्लाह ने समाचार एजेंसी एपी को बताया कि अफगान सैनिक ने अपनी बंदूक का मुंह अमरीकियों की तरफ किया और गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. उन्होंने कहा, “शरुआती रिपोर्टों से पता चलता है कि अफगान सैनिकों और अमेरिकी सैनिकों के बीच गलतफहमी हो गई थी.” ब्रितानी अखबार डेली टेलीग्राफ ने स्थानीय लोगों के हवाले से ट्विटर पर कहा है कि उनके बीच एक घर की तलाशी को लेकर कहा-सुनी हुई थी. बढ़ते अंदरूनी हमले अफगानिस्तान में एक दशक से जारी युद्ध में भारी तबाही हुई है. दोनों तरफ के सैन्य अधिकारियों ने इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं. इस साल अफगान सुरक्षा बल के सदस्यों के हमलों में कम से कम 52 विदेशी सैनिक मारे गए हैं जिनमें आधे अमरीकी हैं. पिछले साल इस तरह के हमलों में 35 विदेशी सैनिकों की जानें गई थीं. अमरीका ने 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया जिसके बाद से उसकी सेनाएं वहां तैनात हैं. नाटो की सेनाएं भी अफगान अभियान में अमरीका का साथ दे रही हैं. अफगानिस्तान में मौजूद सभी विदेशी सेनाओं ने 2014 के अंत तक अफगानिस्तान छोड़ने की घोषणी कर रखी है.\n\nSummary:", "target": "अफगानिस्तान में मारे गए अमरीकी सैनिकों की संख्या 2000 तक पहुंच गई है. 2001 से वहां तैनात अमरीकी और नाटो सेनाएं तालिबान चरमपंथियों से लोहा ले रही हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअफगानिस्तान में विदेशी सेनाएं एक दशक से भी ज्यादा समय से तैनात हैं. शनिवार को पूर्वी अफगानिस्तान में एक अफगान सैनिक के हमले में एक अमेरिकी सैनिक और एक विदेशी ठेकेदार की मौत हो गई. इस साल विदेशी सैनिकों पर अफगान सुरक्षा बलों के सदस्यों के हमलों में खासी वृद्धि हुई है, जिन्हें ‘अंदरूनी हमलों’ का नाम दिया जाता है. मारे गए ठेकेदार की राष्ट्रीयता के बारे में अभी जानकारी नहीं मिली है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत के सूखाग्रस्त थार रेगिस्तान इलाके में पाकिस्तान फ़ौज ने आपात राहत दल भेजे हैं जहां स्थानीय चिकित्सकों का कहना है कि कुपोषण की वजह से महज एक महीने में लगभग 30 बच्चों ने दम तोड़ दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकई गांवों में मरने वाले बच्चों की गिनती ही नहीं हुई भोजन-पानी की तलाश में हज़ारों परिवार यहां से पलायन कर गए हैं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने केंद्र सरकार की ओर से पूरी मदद का आश्वासन दिया है. इससे पहले सिंध के मुख्यमंत्री सैयद क़ायम अली ने आलोचनाओं के बीच राहत और बचाव प्रयासों की समीक्षा के आदेश जारी कर दिये थे. उन्होंने इलाके में पड़े सूखे को मौजूदा हालत की वजह बताया है. सरकार की प्राथमिकता बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है सिंध के मुख्यमंत्री सैयद क़ायम अली ने डॉक्टरों का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से हुई है. उनका यह भी कहना है कि जब मां कुपोषित होगी तो बच्चा भी कमज़ोर होगा. इलाके में 14 मोबाइल डिस्पेंसरी रात-दिन काम कर रही हैं. दवाओं से भरे दो ट्रक पहले ही थार भेजे जा चुके हैं. इसके अलावा प्रभावित परिवारों को गेहूं की आपूर्ति 25 से बढ़ाकर 50 किलोग्राम कर दी गई है. सरकार की ओर से केवल अस्पतालों में दम तोड़ने वाले बच्चों की संख्या बताई जा रही है. लेकिन कई गांवों में मरने वाले बच्चों की गिनती ही नहीं की गई है. प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ सोमवार को थार इलाके का दौरा करने वाले हैं. 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12 लोगों को गोली मार दी. करबला शिया मुसलमानों का पवित्र शहर है और बीबीसी संवाददाता के अनुसार इस हमले को भी भड़काऊ माना जा रहा है. करबला शहर के एक व्यस्त इलाक़े में यह कार बम धमाका हुआ. कार में रखे गए बम में रिमोट कंट्रोल से विस्फोट किया गया. राजधानी बग़दाद अपेक्षाकृत शांत है लेकिन वहाँ अभी दिन का कर्फ़्यू चल रहा है. लेकिन शहर के बाहरी छोर पर शिया विद्रोहियों और सुन्नियों के बीच गोलीबारी की ख़बर है. इराक़ की सरकार ने अल अस्करी मज़ार का दोबारा निर्माण कराने का वादा किया है. लेकिन हिंसा को देखते हुए अधिकारियों ने राजधानी बग़दाद के साथ-साथ दियाला, बाबिल और सलाहुद्दीन प्रांतों में कर्फ़्यू जारी रखने का फ़ैसला किया है. प्रधानमंत्री इब्राहिम अल जाफ़री ने प्रदर्शनों पर पाबंदी लगाने की घोषणा की है. साथ ही सार्वजनिक रूप से हथियार लेकर चलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है.\n\nSummary:", "target": "इराक़ के कई इलाक़ों में कर्फ़्यू के बावजूद हिंसा का दौर जारी है. शनिवार को अलग-अलग घटनाओं में कम से कम 36 लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदक्षिणी बग़दाद 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का अभियान बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल को हर संभव सहायता देने की पेशकश की है. सैन्य विमान रवाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नेपाल और भारत में आए भूकंप की स्थिति की समीक्षा हुई. भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा है कि तीन टन सामग्री के साथ एक सैन्य परिवहन विमान नेपाल भेजा जा रहा है. अधिकारियों ने बताया है कि इसके बाद तीन और विमान मोबाइल अस्पताल और अन्य राहत दलों के साथ नेपाल रवाना होंगे. समाप्त रेलवे मंत्रालय ने भूकंप प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक लाख 'रेल नीर' भेजने की घोषणा की है. भारत के दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि अगले तीन दिन तक नेपाल के लिए बीएसएनएल से लोकल दरों पर कॉल की जा सकेंगी. यही नहीं, ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने नेपाल में बिजली व्यवस्था सुचारू करने के लिए इंजीनियर्स और उपकरण भेजने की पेशकश की है. फ्रांस की भी पेशकश इसके अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा है कि नेपाल जिस भी तरह की सहायता मांगेगा, उनका देश देने के लिए तैयार है. फ्रांस्वा के कार्यालय से जारी एक बयान में कहा गया है, \"दुख की इस घड़ी में फ्रांस नेपाल के लोगों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करता है.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नेपाल में भूकंप से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए दुनियाभर से सहायता की पेशकश की जा रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत ने मानवीय सहायता भेजने का अभियान बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल को हर संभव सहायता देने की पेशकश की है. सैन्य विमान रवाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नेपाल और भारत में आए भूकंप की स्थिति की समीक्षा हुई. भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा है कि तीन टन सामग्री के साथ एक सैन्य परिवहन विमान नेपाल भेजा जा रहा है. अधिकारियों ने बताया है कि इसके बाद तीन और विमान मोबाइल अस्पताल और अन्य राहत दलों के साथ नेपाल रवाना होंगे. समाप्त रेलवे मंत्रालय ने भूकंप प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक लाख 'रेल नीर' भेजने की घोषणा की है. भारत के दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि 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Hindi.\n\nText:\nराजीव गांधी मई 1991 में तमिलनाडु में एक चुनावी रैली के दौरान एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे. इस मामले में संथन, मुरुगन और पेरारीवालन को अदालत ने 1998 में मौत की सज़ा सुनाई थी. उन्होंने साल 2000 में राष्ट्रपति के पास अपनी माफ़ी की अर्ज़ी दी थी लेकिन 11 वर्षों के बाद राष्ट्रपति ने उनकी अर्ज़ी ख़ारिज कर दी थी. पहले उन्हें 2011 में फांसी दी जानी थी लेकिन मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर उसे रोक दिया गया था. उसके बाद से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में अटका हुआ था. आख़िरकार मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मंगलवार को इन लोगों की मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया. पेरारीवालन की माँ अरुपताम्मल ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, \"सबसे पहले मैं सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को धन्यवाद देती हूं. पिछले 23 साल से मैं इस शांति के लिए संघर्ष कर रही थी. 'बेगुनाह' उन्होंने कहा, \"मेरे बेटे ने बेगुनाह होने के बावजूद 23 साल सलाखों के पीछे काटे हैं. हर कोई ये जानता है. मैं कई सालों से इस पल का इंतज़ार कर रही थी और कई बार मुझे छला गया था. यही कारण था कि मैं आज भी घबराई हुई थी कि न जाने क्या होगा.\" अरुपताम्मल ने कहा, \"मैं दुनियाभर के सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भी आभारी हूं जिन्होंने इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाई.\" याचिकाकर्ताओं के वकील युग मोहित चौधरी ने बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत में कहा, \"सरकार ने अपनी दलील में कहा कि उसके पास इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि सज़ा देने में इतनी देर क्यों हुई. सरकार ने कहा कि इन लोगों पर जेल में कोई अत्याचार नहीं हुआ और वे जेल में मज़े कर रहे थे.\" उन्होंने कहा, \"कोर्ट ने फिर पूछा कि जब वे जेल में मज़े कर रहे थे तो फिर बार-बार सरकार को चिट्ठी लिखकर दया याचिका पर फ़ैसला करने का आग्रह क्यों कर रहे थे. कोर्ट ने कहा कि इससे साबित होता है कि ये लोग बदतर मानसिक स्थिति में थे.\" वाइको ने इसे एक ऐतिहासिक दिन बताया. असर क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उन तीनों की रिहाई भी संभव है, इस सवाल के जवाब में चौधरी ने कहा, \"जिसे आजीवन कारावास मिलती है उसे कम से कम 14 साल जेल में रहना पड़ता है. उसके बाद सरकार फ़ैसला कर सकती है कि उसे कब रिहा किया जाए. यह राज्य सरकार के हाथ में है कि किस क़ैदी को कब छोड़ना है. हमें उम्मीद है कि तमिलनाडु की सरकार इस मामले में फ़ैसला लेगी.\" उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले का दूसरे मामलों पर भी असर पड़ेगा. जिन मामलों में मौत की सज़ा देने में देरी हुई है और सरकार के पास इसका स्पष्टीकरण नहीं है, उन मामलों पर इसका असर पड़ेगा. चौधरी ने कहा, \"मेरी राय में यह फ़ैसला मृत्युदंड को समाप्त किए जाने की दिशा में एक अहम क़दम है. इससे साबित होता है कि मृत्युदंड कितनी घृणित चीज़ है. मृत्युदंड पर अभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि एक दिन ऐसा ज़रूर होगा.\" एमडीएमके के नेता वाइको ने इसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, \"आज का दिन ऐतिहासिक है. यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में भी अहम दिन है और स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. पूरे तमिल समुदाय के लिए आज ख़ुशी का दिन है.\" टिप्पणी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को देखे बिना इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते हैं. भाजपा नेता बलबीर पुंज ने कहा, \"सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ज़्यादा टिप्पणी नहीं करनी चाहिए पर राजीव गांधी जी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या की घटना को क़रीब 24 साल हो गए हैं और इतने लंबे समय से हमारी न्याय व्यवस्था दोषियों को सज़ा नहीं दे पाई.\" उन्होंने कहा, \"इससे पता चलता है कि हमारी न्याय व्यवस्था कितनी धीमी है और ऐसे अहम मामलों में भी कितनी देरी से फ़ैसले आते हैं. पीडीपी की नेता महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि यह अच्छा फ़ैसला है. इस मौक़े पर अफ़ज़ल गुरू को याद करते हुए महबूबा मुफ़्ती ने कहा, ''काश अफ़ज़ल गुरू के मामले में भी ऐसा हुआ होता तो अच्छा होता. इस फ़ैसले से जम्मू-कश्मीर के लोगों को एक बार फिर महसूस होगा कि उन पर अलग क़ानून लागू होता है और शेष भारत के लोगों पर अलग.'' ग़ौरतलब है कि अफ़ज़ल गुरू को भारतीय संसद पर 2001 में हुए हमले के लिए मौत की सज़ा सुनाई गई थी और उन्हें 2013 में फांसी दे दी गई थी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में तीन लोगों की मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर उनके परिजनों ने राहत की सांस ली है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराजीव गांधी मई 1991 में तमिलनाडु में एक चुनावी रैली के दौरान एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे. इस मामले में संथन, मुरुगन और पेरारीवालन को अदालत ने 1998 में मौत की सज़ा सुनाई थी. उन्होंने साल 2000 में राष्ट्रपति के पास अपनी माफ़ी की अर्ज़ी दी थी लेकिन 11 वर्षों के बाद राष्ट्रपति ने उनकी अर्ज़ी ख़ारिज कर दी थी. पहले उन्हें 2011 में फांसी दी जानी थी लेकिन मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर उसे रोक दिया गया था. उसके बाद से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में अटका हुआ था. आख़िरकार मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मंगलवार को इन लोगों की मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया. पेरारीवालन की माँ अरुपताम्मल ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, \"सबसे पहले मैं सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को धन्यवाद देती हूं. पिछले 23 साल से मैं इस शांति के लिए संघर्ष कर रही थी. 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राजनीतिक दलों के लिए नियम-अधिनियम तैयार करने के लिए कोई क़ानून नहीं है. कोई मतदाता-सूची नहीं है. लगभग बीस सालों से इराक़ में कोई विश्वसनीय जन-गणना नहीं हुई है. चुनाव-क्षेत्रों के लिए कोई हदबंदी नहीं है.'' उनका कहना था कि इन तकनीकी समस्याओं को सुलझाने में अभी वक़्त लगेगा. इराक़ में ज़्यादातर लोगों को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि देश में चुनावों के लिए, उन्हें अभी पंद्रह महीने और इंतज़ार करना पड़ सकता है. कुछ ही सप्ताह पहले तक, देश का बहुसंख्यक शिया समुदाय अपनी इस माँग पर ज़ोर दे रहा था कि तीस जून को इराक़ियों को सत्ता सौंपे जाने से पहले, देश में चुनाव होने चाहिए. मगर लगता है कि संयुक्त राष्ट्र से अमरीकियों का यह अनुरोध कारगर साबित हुआ है कि इराक़ में चुनावी संभावनाओं का जायज़ा लेने और देश के राजनीतिक तथा धार्मिक नेताओं से बातचीत करने के लिए वो अपना एक दल इराक़ भेजे.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 681, 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पर्यावरण, संस्कृति, मनोरंजन कर लालजी वर्मा-- संसदीय कार्य, चिकित्सा शिक्षा रामवीर उपाध्याय-- उर्जा ठाकुर जयवीर सिंह--माध्यमिक शिक्षा सुधीर गोयल- सूचना स्वामी प्रसाद मौर्य-- राजस्व वेदराम भाटी--श्रम एवं संयोजन चौधरी लक्ष्मीनारायण-- कृषि राकेशधर त्रिपाठी--उच्च शिक्षा बाबू सिंह कुशवाहा--पंचायती राज और खनिज फागूचरण- कारागर दद्दू प्रसाद- ग्राम विकास रामप्रसाद चौधरी--खाद और रसद धर्म सिंह सैनी-- बुनियादी शिक्षा\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने शपथ ग्रहण करने के पाँच दिन बाद आख़िरकार अपने मंत्रियों के विभागों की घोषणा कर दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमुख्यमंत्री ने गृह, कार्मिक, सतर्कता, वित्त, न्याय, परिवार कल्याण और खादी जैसे कुल 43 विभाग अपने पास रखे हैं. उनके सबसे निकटवर्ती समझे जाने वाले पार्टी के प्रवक्ता सतीश चंद्र मिश्र को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है और कहा गया है कि मुख्यमंत्री कार्यालय का कामकाज की निगरानी करेंगे. इसके साथ ही पार्टी के नेता सुखदेव राजभर को विधानसभा अध्यक्ष बनाने पर बसपा और कांग्रेस में सहमति भी 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\"उनकी हालत फ़िलहाल ऐसी नहीं है कि उन्हें कहीं ले जाया जा सके.\" लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि \"उनकी स्थिति इतनी स्थिर हो गई है कि वे विमान यात्रा कर सकते हैं.\" जर्मनी की एक संस्था 'सिनेमा फ़ॉर पीस' ने उनके लिए इस एंबुलेंस एयरक्राफ़्ट का बंदोबस्त किया था. बताया गया है कि बर्लिन के एक चैरिटी अस्पताल में उनका इलाज किया जाएगा. एलेक्सी की प्रवक्ता किरा यारमिश ने शनिवार सुबह ट्वीट किया था कि \"एलेक्सी को बर्लिन ले जाया जा रहा है. उनका समर्थन करने के लिए सभी का बहुत आभार. एलेक्सी के जीवन और स्वास्थ्य की लड़ाई बस शुरू हो रही है.\" जर्मनी और फ़्रांस, दोनों ने कहा था कि उन्हें एलेक्सी नवेलनी का इलाज करने में ख़ुशी होगी. जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने कहा था कि एलेक्सी नवेलनी को जो भी मेडिकल मदद की ज़रूरत है, वो उन्हें दी जाएगी. राष्ट्रपति पुतिन के एक प्रवक्ता ने भी कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर नवेलनी को विदेश भेजने में मदद करके रूस को ख़ुशी होगी. नवेलनी को साल 2011 में गिरफ़्तार भी किया गया था और उन्हें 15 दिनों के लिए जेल भेजा गया था. उन्होंने पुतिन की पार्टी पर संसदीय चुनाव के दौरान वोटों में धांधली का आरोप लगाया था और विरोध प्रदर्शन भी किया था जिसके बाद उन्हें गिरफ़्तार किया गया था. पुतिन की यूनाइटेड रूस पार्टी को उन्होंने 'बदमाशों और चोरों की पार्टी' कहा था. जुलाई 2013 में भी कुछ समय के लिए उन्हें जेल भेजा गया था. उन पर गबन के आरोप लगे थे. लेकिन उन्होंने इसे राजनीतिक बताया था. वर्ष 2018 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने की कोशिश की थी, लेकिन धोखाधड़ी के आरोपों के कारण उनपर रोक लगा दी गई. नवेलनी ने इसे भी राजनीतिक क़दम बताया था. जुलाई 2019 में अनाधिकृत रूप से विरोध प्रदर्शन का आह्वान करने के कारण उन्हें 30 दिन जेल की सज़ा हुई थी. जेल में ही उनकी तबीयत बिगड़ गई थी. उस समय भी ये आरोप लगे थे कि उन्हें ज़हर देने की कोशिश हुई. वर्ष 2017 में उन पर हमला हुआ था. उस समय उन पर एंटिसेप्टिक डाई से हमला हुआ जिस वजह से उनकी दाहिनी आँख 'केमिकल बर्न' से प्रभावित हुई थी. पिछले साल ही उनके 'एंटी करप्शन फ़ाउंडेशन' को विदेशी एजेंट घोषित किया गया था. इस कारण फ़ाउंडेशन को कड़ी जाँच प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "एक एंबुलेंस एयरक्राफ़्ट रूस के विपक्षी नेता एलेक्सी नवेलनी को लेकर जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँच चुका है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने फ़्लाइट ट्रैकिंग डेटा के आधार पर यह जानकारी दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनवेलनी गंभीर रूप से बीमार हैं. उनके समर्थकों ने संदेह जताया है कि ज़हरीली चाय पीने के बाद वे कोमा में चले गये थे. साथ ही उनके परिवार ने रूसी अधिकारियों पर अपराध छिपाने का आरोप भी लगाया है. नवेलनी की पत्नी और उनके समर्थकों के अनुरोध पर जर्मनी के डॉक्टरों की एक टीम शुक्रवार को विमान के ज़रिये साइबेरियाई शहर ओम्सक पहुँचे थे जहाँ नवेलनी को अस्पताल में भर्ती किया गया था. सोशल मीडिया पर आई तस्वीर में नवेलनी को अस्पताल ले जाते देखा जा सकता है नवेलनी के परिवार ने कहा था कि जिस अस्पताल में नवेलनी को रखा गया है, वहाँ बहुत सीमित सुविधाएं हैं और नवेलनी का इलाज ठीक से नहीं किया जा रहा. बताया गया है कि ओम्सक के सरकारी अस्पताल से नवेलनी को एक एंबुलेंस में ओम्सक हवाई अड्डे तक लाया गया, जहाँ से दो घंटे बाद एक एंबुलेंस एयरक्राफ़्ट उन्हें जर्मनी के लिए ले गया. समाप्त चश्मदीदों के अनुसार, इस विमान में नवेलनी की पत्नी युलिया और उनकी प्रवक्ता किरा यारमिश भी सवार थीं. एलेक्सी नवेल्नी कौन हैं, जिन्हें 'ज़हर' दिया गया? रूस में सरकार विरोधी नेता नवेलनी विमान यात्रा के दौरान बीमार पड़ गये थे. उनकी प्रवक्ता किरा यारमिश के मुताबिक़, मॉस्को से टॉम्स्क लौटते वक्त उड़ान के दौरान नवेलनी बीमार पड़ गये और विमान को ओम्स्क में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी. उन्होंने संदेह जताया था कि एलेक्सी नवेलनी को चाय में ज़हर दिया गया है क्योंकि यात्रा से पहले, सुबह उन्होंने सिर्फ़ चाय पी थी. हालांकि अस्पताल के डिप्टी हेड फ़िजिशियन अनातोली केलिनिचेन्को ने शुक्रवार को मीडिया से बातचीत में कहा था कि \"निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल है कि नवेलनी को ज़हर दिया गया.\" जबकि यारमिश ने कुछ डॉक्टरों के हवाले से दावा किया था कि ज़हरीला पदार्थ गर्म तरल के साथ जल्द ही घुल गया और कुछ ही समय बाद नवेलनी बेहोश हो गये. 44 वर्षीय नवेलनी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कड़े आलोचक माने जाते हैं. शुक्रवार को ओम्सक में उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने कहा था कि \"उनकी हालत फ़िलहाल ऐसी नहीं है कि उन्हें कहीं ले जाया जा सके.\" लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि \"उनकी स्थिति इतनी स्थिर हो गई है कि वे विमान यात्रा कर सकते हैं.\" जर्मनी की एक संस्था 'सिनेमा फ़ॉर पीस' ने उनके लिए इस एंबुलेंस एयरक्राफ़्ट का बंदोबस्त किया था. बताया गया है कि बर्लिन के एक चैरिटी अस्पताल में उनका इलाज किया जाएगा. एलेक्सी की प्रवक्ता किरा यारमिश ने शनिवार सुबह ट्वीट किया था कि \"एलेक्सी को बर्लिन ले जाया जा रहा है. उनका समर्थन करने के लिए सभी का बहुत आभार. एलेक्सी के जीवन और स्वास्थ्य की लड़ाई बस शुरू हो रही है.\" जर्मनी और फ़्रांस, दोनों ने कहा था कि उन्हें एलेक्सी नवेलनी का इलाज करने में ख़ुशी होगी. जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने कहा था कि एलेक्सी नवेलनी को जो भी मेडिकल मदद की ज़रूरत है, वो उन्हें दी जाएगी. राष्ट्रपति पुतिन के एक प्रवक्ता ने भी कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर नवेलनी को विदेश भेजने में मदद करके रूस को ख़ुशी होगी. नवेलनी को साल 2011 में गिरफ़्तार भी किया गया था और उन्हें 15 दिनों के लिए जेल भेजा गया था. उन्होंने पुतिन की पार्टी पर संसदीय चुनाव के दौरान वोटों में धांधली का आरोप लगाया था और विरोध प्रदर्शन भी किया था जिसके बाद उन्हें गिरफ़्तार किया गया था. पुतिन की यूनाइटेड रूस पार्टी को उन्होंने 'बदमाशों और चोरों की पार्टी' कहा था. जुलाई 2013 में भी कुछ समय के लिए उन्हें जेल भेजा गया था. उन पर गबन के आरोप लगे थे. लेकिन उन्होंने इसे राजनीतिक बताया था. वर्ष 2018 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने की कोशिश की थी, लेकिन धोखाधड़ी के आरोपों के कारण उनपर रोक लगा दी गई. नवेलनी ने इसे भी राजनीतिक क़दम बताया था. जुलाई 2019 में अनाधिकृत रूप से विरोध प्रदर्शन का आह्वान करने के कारण उन्हें 30 दिन जेल की सज़ा हुई थी. जेल में ही उनकी तबीयत बिगड़ गई थी. उस समय भी ये आरोप लगे थे कि उन्हें ज़हर देने की कोशिश हुई. वर्ष 2017 में उन पर हमला हुआ था. उस समय उन पर एंटिसेप्टिक डाई से हमला हुआ जिस वजह से उनकी दाहिनी आँख 'केमिकल बर्न' से प्रभावित हुई थी. पिछले साल ही उनके 'एंटी करप्शन फ़ाउंडेशन' को विदेशी एजेंट घोषित किया गया था. इस कारण फ़ाउंडेशन को कड़ी जाँच प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा. 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दिल्ली पुलिस ने कोर्ट से कन्हैया कुमार समेत 10 लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा शुरू करने की अपील की है. हालांकि आरोप पत्र में कुल 36 लोगों के नाम हैं, लेकिन बाकी के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं होने की बात कही गई है. कोर्ट चाहे तो उन्हें समन भेज सकता है. आरोप पत्र के साथ कोर्ट में सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल फुटेज और अन्य दस्तावेजों को बतौर सबूत पेश किया गया है. दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में सीपीआई नेता डी राजा की बेटी अपराजिता और जेएनयू छात्रसंघ नेता शहला राशिद का नाम भी शामिल किया गया है. इसके अलावा जेएनयू प्रशासन, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों, सुरक्षाकर्मियों समेत कुछ अन्य लोगों से भी पूछताछ की गई है. उमर खालिद और कन्हैया ने क्या कहा? कन्हैया कुमार ने ट्वीट करके कहा है कि अगर ये ख़बर सही है तो मोदी जी और उनकी पुलिस को बहुत बहुत धन्यवाद है. वहीं, उमर ख़ालिद और अनिर्बान ने चार्जशीट दाखिल होने के बाद अपना बयान जारी करके कहा है कि वह दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय और सरकार को 9 फरवरी 2016 के बाद चुनाव से ठीक तीन महीने पहले गहरी नींद से जागकर उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल करने पर बधाई देना चाहते हैं. झूठ बोलना एक कला है और सिर्फ़ झूठ बोलना ही काफ़ी नहीं है. ऐसा करने वालों में झूठ बोलने के समय और जगह की भी समझ होनी चाहिए. यही बात किसी को बेहतरीन झूठा बनाती है. इसके साथ ही ऐसे व्यक्ति के पास अपने चीयरलीडर्स भी होने चाहिए जो एक दूसरे के झूठों की सराहना करें और इस समय वर्तमान सरकार में भारत का ज़्यादातर मीडिया यही काम कर रहा है. आरोपों को लेकर ख़ालिद ने कहा है, \"हमने अभी तक चार्जशीट नहीं देखी है और जो भी कुछ मीडिया में चल रहा है, वो सच है तो हम इन आरोपों का पूरी तरह से खंडन करते हैं. और हम क़ानूनी ढंग से इन्हें चुनौती देंगे.\" आख़िर क्या था मामला? साल 2016 में 9 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ अज्ञात युवकों ने संसद पर हमले के दोषी अफ़जल गुरू को मौत की सज़ा दिए जाने के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था. इस विरोध प्रदर्शन में कुछ युवाओं ने कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए थे. इसके बाद कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद को राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली पुलिस ने जेएनयू में कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए जाने के मामले में सोमवार को पटियाला हाउस कोर्ट में चार्जशीट दाख़िल कर दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य पर भी भारत विरोधी नारे लगाने का मामला दर्ज किया है. इसके अलावा चार्जशीट में आक़िब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उमर गुल, रईस रसूल, बशीर भट और बशरत का नाम शामिल है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में आरोप लगाया है कि कन्हैया उस भीड़ का हिस्सा थे और भारत-विरोधी नारे लगाने के लिए लोगों को भड़का रहे थे. दिल्ली पुलिस ने बीजेपी सांसद महेश गिरी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी की शिकायत के बाद दिल्ली के वसंत कुंज थाने में 11 फरवरी, 2016 को 124 ए (राजद्रोह) और 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था. बीबीसी के सहयोगी सुचित्र मोहंती ने पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वकील केसी कौशिक के हवाले से बताया है कि आरोप तय करने में पुलिस ने एक तय प्रक्रिया का पालन किया है. केसी कौशिक बताते हैं, \"पुलिस ने अभियुक्तों के ख़िलाफ़ इस मामले से उनके संबंध और उन पर लगे आरोपों के आधार पर अपनी चार्जशीट दाखिल की है. अब आगे की कार्रवाई कोर्ट तय करेगा कि मामले की सुनवाई के दौरान किन आरोपों को लगाया जाए और किन आरोपों को हटा लिया जाए.\" चार्जशीट में क्या है? दिल्ली पुलिस ने कोर्ट से कन्हैया कुमार समेत 10 लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा शुरू करने की अपील की है. हालांकि आरोप पत्र में कुल 36 लोगों के नाम हैं, लेकिन बाकी के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं होने की बात कही गई है. कोर्ट चाहे तो उन्हें समन भेज सकता है. आरोप पत्र के साथ कोर्ट में सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल फुटेज और अन्य दस्तावेजों को बतौर सबूत पेश किया गया है. दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में सीपीआई नेता डी राजा की बेटी अपराजिता और जेएनयू छात्रसंघ नेता शहला राशिद का नाम भी शामिल किया गया है. इसके अलावा जेएनयू प्रशासन, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों, सुरक्षाकर्मियों समेत कुछ अन्य लोगों से भी पूछताछ की गई है. उमर खालिद और कन्हैया ने क्या कहा? कन्हैया कुमार ने ट्वीट करके कहा है कि अगर ये ख़बर सही है तो मोदी जी और उनकी पुलिस को बहुत बहुत धन्यवाद है. वहीं, उमर ख़ालिद और अनिर्बान ने चार्जशीट दाखिल होने के बाद अपना बयान जारी करके कहा है कि वह दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय और सरकार को 9 फरवरी 2016 के बाद चुनाव से ठीक तीन महीने पहले गहरी नींद से जागकर उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल करने पर बधाई देना चाहते हैं. झूठ बोलना एक कला है और सिर्फ़ झूठ बोलना ही काफ़ी नहीं है. ऐसा करने वालों में झूठ बोलने के समय और जगह की भी समझ होनी चाहिए. यही बात किसी को बेहतरीन झूठा बनाती है. इसके साथ ही ऐसे व्यक्ति के पास अपने चीयरलीडर्स भी होने चाहिए जो एक दूसरे के झूठों की सराहना करें और इस समय वर्तमान सरकार में भारत का ज़्यादातर मीडिया यही काम कर रहा है. आरोपों को लेकर ख़ालिद ने कहा है, \"हमने अभी तक चार्जशीट नहीं देखी है और जो भी कुछ मीडिया में चल रहा है, वो सच है तो हम इन आरोपों का पूरी तरह से खंडन करते हैं. और हम क़ानूनी ढंग से इन्हें चुनौती देंगे.\" आख़िर क्या था मामला? साल 2016 में 9 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ अज्ञात युवकों ने संसद पर हमले के दोषी अफ़जल गुरू को मौत की सज़ा दिए जाने के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था. इस विरोध प्रदर्शन में कुछ युवाओं ने कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए थे. इसके बाद कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद को राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. 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कर्नाटक के मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से बातचीत भी हुई है और वे असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से भी संपर्क में हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि वो इस बारे में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरन कुमार रेड्डी से भी बात करेंगे. सर्तक रहना होगा जब प्रधानमंत्री से पूछा गया कि क्या वो इस बात को लेकर चिंतित है कि असम में हुई हिंसा का प्रभाव अन्य राज्यों में भी फैल रहा है तो उनका कहना था,'' हमें सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखना होगा. हमें सतर्क रहने की जरूरत है.'' मनमोहन सिंह ने कहा कि सभी पार्टियों को साथ मिलकर प्रभावित लोगों को विश्वास दिलाना होगा. \"बंगलोर रेलवे स्टेशन पर एकत्रित हुए पूर्वोत्तर के लोग गोहाटी के लिए ट्रेन पकड़ रहे है ऐसे में कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री को रेलवे स्टेशन पर भेज कर अच्छा काम किया.'\" प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्होंने कहा, ''बंगलौर रेलवे स्टेशन पर जमा हुए पूर्वोत्तर के लोग गुवाहाटी के लिए ट्रेन पकड़ रहे हैं. ऐसे में कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री को रेलवे स्टेशन पर भेज कर अच्छा काम किया.'' बंगलौर में स्वतंत्रता दिवस के दिन अचानक अफवाहें गर्म हो गईं कि पूर्वोत्तर के लोगों को निशाना बनाया जा सकता है. इसके बाद शहर के मुख्य रेलवे स्टेशन पर पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों की भीड़ जमा हो गई जो शहर छोड़कर जाना चाह रहे थे. हालत ये हो गई कि अधिकारियों को दो विशेष रेलगाड़ियों का इंतजाम करना पड़ा. बंगलौर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया कि 4000 लोग शहर छोड़कर चले गए हैं और इनमें से ज्यादातर छात्र हैं. स्थिति में सुधार स्थानीय पत्रकार खालिद कर्नाटकी का कहना है,'' मुख्यमंत्री ने यहां रह रहे पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों से बातचीत की है और अब स्थिति में सुधार हो रहा है.बृहस्पतिवार की शाम तक केवल 1000 टिकटें ही वापसी के लिए कटाई गई हैं.'' असम में हुई हिंसा के बाद हज़ारों लोगों को शर्णाथी कैंपों में शरण लेनी पड़ी थी असम, नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा जैसे राज्यों से बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में नौजवान लड़के-लड़कियाँ दिल्ली, पुणे, बंगलौर, मुंबई जैसे भारत के अलग अलग शहरों में जाते हैं. सिर्फ बंगलौर शहर में उनकी जनसंख्या 2.5 लाख से ज्यादा है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर ने कहा है कि बंगलौर में रहने वाले उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों को कोई खतरा नहीं है. धमकी राज्य के गृह मंत्री आर अशोक ने कहा है कि हिंसा की स्थिति पैदा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी. असम में गुरुवार को मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई जिसमें फैसला किया गया है कि एक टीम शुक्रवार को स्थिति का जायजा लेने के लिए कर्नाटक जाएगी. स्थानीय पत्रकार विनोद रिंगानिया का कहना है, ''सरकार से बातचीत करने वाले उल्फा गुट के कुछ नेताओं ने धमकी दी है कि अगर दक्षिण भारतीय राज्यों में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के खिलाफ कोई हिंसा होती है या उन्हें धमकी दी जाती है तो वे असम में काम कर रही दक्षिण भारत की कंपनियों को यहां से जाने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा.'' इससे जुड़ी और सामग्रियाँ\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों पर देश के अन्य राज्यों में हो रहे हमलों को लेकर उड़ी अफ़वाह की निंदा की है. साथ ही उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे सतर्क रहें और हर कीमत पर शांति बनाए रखें.", "probe_text": "Summarize the following text in 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आयुक्त ने बताया कि नक्सल प्रभावित इलाक़ों को छोड़कर अन्य हिस्सों में मतदान काफ़ी शांतिपूर्ण रहा. झारखंड, छत्तीसगढ़ और बिहार में हुए पहले चरण के मतदान में कई जगह हुई हिंसक घटनाओं में 19 लोग मारे गए. झारखंड में हिंसा बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार के हवाले से बताया कि झारखंड में चुनावी हिंसा में 10 लोगों के मारे गए हैं. इनमें सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) के छह जवान और दो आम लोग शामिल है. राजीव कुमार ने बताया कि लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र के विशुनपुरा और चतरा लोकसभा क्षेत्र के हाता मतदान केंद्र से आठ चुनावकर्मी लापता हैं. पुलिस के अनुसार झारखंड के खुंटी लोकसभा क्षेत्र के रनिया इलाक़े में एक सुरक्षा कर्मी लापता है. छत्तीसगढ़ का हाल उधर, छत्तीसगढ़ के पुलिस उपमहानिरीक्षक पवन देव ने बताया कि राजनांदगांव ज़िले में माओवादियों ने चुनाव दल की एक गाड़ी को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया. इसमें पांच सुरक्षाकर्मी मारे गए. बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली के अनुसार छत्तीसगढ़ में क़रीब 51 फ़ीसदी मतदान हुआ. राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाक़ें से मिले शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक़ वहाँ 46 फ़ीसदी मतदान हुआ. दंतेवाड़ा में माओवादी हमले में सीआरपीएफ़ का एक जवान मारा गया और छह घायल हो गए. दंतेवाड़ा में भी सीआरपीएफ़ के दो जवान मारे गए. राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाक़े से 14 ईवीएम के लूटे जाने और 20 से अधिक जगहों पर पुलिस के साथ नक्सलियों की मुठभेड़ होने की ख़बर है. बिहार के गया में हिंसा बिहार से बीबीसी संवाददाता मणिकांत ठाकुर ने बताया कि गया में बांकेपुर थाना क्षेत्र में माओवादियों ने हमला कर एक पुलिसकर्मी और एक होमगार्ड की हत्या कर दी. मणिकांत ठाकुर ने बिहार पुलिस के प्रवक्ता के हवाले से बताया कि संवेदनशील क्षेत्रों में बारूदी सुरंगरोधी 50 गाड़ियाँ लगाई थीं और निगरानी रकने के लिए हेलिकॉप्टरों की मदद ली गई. लालू, जोशी, रेणुका का भाग्य ईवीएम में बंद इस चरण में जिन बड़े नेताओं के भाग्य का फ़ैसला होना है उनमें राष्ट्रीय जनता दल नेता लालू प्रसाद यादव और भारतीय जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी शामिल हैं. तेलंगाना राष्ट्र समिति चंद्रशेकर राव, कांग्रेस की रेणुका चौधरी, अभिनेत्री विजयाशांति, एनटीआर की पुत्री डी पुरंदेश्वरी और पूर्व केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के नाम भी उन नेताओं की सूची में शामिल हैं जिनके चुनाव क्षेत्रों में इसी चरण में मतदान हुआ है. पहले चरण में केरल की सभी 20 सीटों, छत्तीसगढ़ की 11 और मेघालय तथा अरुणाचल की दो-दो सीटों के लिए मतदान हुआ. बिहार की 40 में से 13, उत्तर प्रदेश की 80 में से 16, महाराष्ट्र की 48 में से 13, आंध्र प्रदेश की 42 में से 22, झारखंड की 14 में से छह और उड़ीसा की 21 में से 10 सीटों के लिए भी मतदान हुआ. पूर्वोत्तर में असम की 14 में से तीन और मणिपुर की दो में से एक सीट के लिए वोट डाले गए. भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की छह में से एक सीट के लिए भी मतदान हुआ. पहले चरण में अंडमान निकोबार, लक्षद्वीप, मिजोरम और नगालैंड की एक-एक लोकसभा सीट के लिए भी वोट डाले गए. गुरुवार को ही आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में विधानसभा चुनावों के लिए भी मतदान हुआ. आंध्र प्रदेश की 294 में से 154 विधानसभा सीटों और उड़ीसा की 147 में से 70 विधानसभा सीटों के लिए पहले चरण में वोट डाले गए. बीबीसी संवाददाता उमर फ़ारूक़ के अनुसार चुनाव के समाप्त हो जाने के बाद भी कई मतदान केंद्रों पर लंबी-लंबी क़तारें देखी गई. उत्तर प्रदेश बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद ने बनारस के ज़िलाधिकारी और चुनाव अधिकारी एके उपाध्याय के हवाले से बताया कि बनारस संसदीय सीट और ज़िले में मतदान शांतिपूर्ण तरीक़े से संपन्न हो गया. ज़िलाधिकारी के मुताबिक़ किसी भी इलाक़े से किसी तरह के अप्रिय घटना की ख़बर नहीं मिली है. हालांकि सुबह मतदान शुरू होने के बाद कुछ स्थानों पर वोटिंग मशीनों में ख़राबी की शिकायत मिली थी जिन्हें तत्काल दुरुस्त कर दिया गया. एके उपाध्याय ने बीबीसी को बताया कि बनारस संसदीय सीट के बाहर लेकिन ज़िले के ही पिंडारा विधानसभा क्षेत्र के खतौरा गांव में लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया था. ऐसा उन्होंने जन प्रतिनिधियों से असंतुष्ट होने के कारण किया न कि किसी दबाव में. आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में नक्सलवादियों के प्रभाव को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे.\n\nSummary:", "target": "भारतीय चुनाव आयोग के मुताबिक़ 15वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के पहले चरण में 124 सीटों के लिए हुए मतदान में गुरुवार को क़रीब 50 फ़ीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमतदान की समय 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लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है. उनका कहना था कि प्रारंभिक जानकारी के अनुसार आग की शुरुआत कैंटीन से हुई थी. हालांकि आग का क्षेत्र ज़्यादा व्यापक नहीं था लेकिन जल्द ही धुएं ने समस्या खड़ी कर दी. इस आग को बुझाने में 20 से अधिक आग बुझानेवाली गाड़ियाँ लगीं और उन्हें इसे काबू पाने में एक घंटे से अधिक समय लगा. बचाव दल के एक अधिकारी ने रूसी समाचार एजेंसी को बताया,'' आग छोटी थी लेकिन धुआँ गहरा था और इसकी वजह से लोगों की सोते में मौत हुई.''\n\nSummary:", "target": "रूसी अधिकारियों का कहना है कि मॉस्को के एक नशा मुक्ति अस्पताल में लगी आग से 42 लोगों की मौत हो गई है और लगभग 150 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअधिकारियों का कहना है कि इमारत की दूसरी मंज़िल में आग लगी थी जिसके बाद यह फैल गई और अनेक लोग इसमें फंस गए. अग्निशमन कर्मचारियों इसको बुझाने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. रूसी आपात मंत्रालय के प्रवक्ता एरिना एंद्रियानोवा का कहना था,'' चूंकि यह नशा मुक्ति अस्पताल है इसलिए यह अलग तरह की पाँच मंज़िला इमारत है जिसमें निकलने 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इक़बाल को उनके चुनावी क्षेत्र के विकास के काम भी हार से नहीं बचा सके. उधर राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के बचाव में संविधान की नित नई व्याख्याएँ करने वाले संसदीय मामलों के मंत्री शेर अफ़ग़ान नियाज़ी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए. बड़े नाम मार्च 2007 में मुख्य न्यायाधीश इफ़्तेख़ार चौधरी को हटाए जाने के बाद हुए हंगामे के दौरान अपने दिलचस्प बयानों के कारण चर्चित उस समय के क़ानून मंत्री वसी ज़फ़र का नाम भी हारने वालों की फ़ेहरिस्त में शामिल है. हारने वालों में चौधरी ज़फ़र इक़बाल वड़ाइच जैसे सिद्धान्तवादी व्यक्ति भी शामिल हैं जिन्होंने 2002 का चुनाव पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के टिकट पर जीतने के बाद इस्तीफ़ा दिया और मुस्लिम लीग (क़ायदेआज़म) के टिकट पर दोबारा चुनाव जीत कर मंत्रिमंडल में शामिल हुए. इसके अलावा पूर्व सामाजिक कल्याण मंत्री आबादी चौधरी शहबाज़ हुसैन, शिक्षा मंत्री ज़ुबैदा जलाल, संचार राज्य मंत्री इशाक ख़ाक़वानी और विधि राज्य मंत्री शाहिद अकरम भिंडर भी अपनी सीटें नहीं बचा सके. नौजवान मंत्रियों में सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री ओवेस ख़ान लेघारी, पर्यावरण राज्य मंत्री मलिक अमीन असलम, वित्त राज्य 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रहा. धोनी को इस में पहली पारी में 92 और दूसरी में 68 रन बनाने के लिए मैन ऑफ़ द मैच का ख़िताब दिया गया. लेकिन धोनी ने साफ़ कर दिया कि इस जीत का श्रेय सिर्फ़ उनको नहीं बल्कि सारी टीम को जाता है. इस मैच में ऑस्ट्रेलिया के प्रदर्शन के बाद ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या वाकई ऑस्ट्रेलिया अब भी विश्व की नंबर एक क्रिकेट टीम है? धोनी ने ऐसे सवालों को ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि ये कहना ग़लत होगा कि ऑस्ट्रेलिया अब विश्व की चोटी की टीम नहीं रही है. धोनी इस मैच में, ख़ासकर अपनी दूसरी पारी में बल्लेबाज़ी करते हुए अपने पुराने रंग में नज़र आए, और उन्होंने ताबड़तोड़ शॉट खेले. मैच के बाद प्रेसवार्ता में उन्होंने माना, \"मुझे इसी तरह की बल्लेबाज़ी पर टिके रहना चाहिए क्योंकि ये मेरा प्राकृतिक अंदाज़ है.\" उन्होंने माना कि वो पिछले कुछ महीनों से अपना प्राकृतिक खेल नहीं खेल रहे थे. धोनी ने कहा आक्रामक बल्लेबाज़ी उनकी बैटिंग की पहचान है और अब वो ऐसे ही खेलते रहने की कोशिश करेंगे. ख़ास बात ये भी है कि धोनी की कप्तानी में भारत की ये दूसरी जीत है. ग़ौरतलब है कि इससे पहले जब दक्षिण अफ्रीकी टीम भारत के दौरे पर थी तो धोनी ने कानपुर टेस्ट में भारतीय टीम की अगुवाई की थी वो टेस्ट भी भारत ने ही जीता था. अब भारत बॉर्डर-गावस्कर श्रृंखला में एक-शून्य से आगे हो गया है. इस श्रृंखला का पहला मैच बैंगलोर में ड्रॉ रहा था. अगला टेस्ट मैच दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला मैदान पर 29 अक्तूबर से खेला जाएगा. सीरिज़ का आख़िरी मैच छह नवंबर से नागपुर के विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन ग्राउंड पर होगा.\n\nSummary:", "target": "मंगलवार को मोहाली टेस्ट में भारत को ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मिली तीन सौ बीस रन की जीत, रनों के अंतर के हिसाब से भारत की ऑस्ट्रेलिया पर सबसे बड़ी जीत है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजीत के बाद के इस मैच में अनिल कुंबले की ग़ैर-मौजूदगी में भारत की कप्तानी कर रहे महेंद्र सिंह धोनी ने कहा कि इस टेस्ट में भारतीय टीम ने कोई ग़लती नहीं की और सब योजना के मुताबिक़ ही हुआ. उन्होंने कहा है कि जीत का श्रेय उनको अकेले को देना ग़लत होगा क्योंकि यह जीत टीम की जीत है. ऑस्ट्रेलियाआई कप्तान रिकी पॉन्टिंग ने भी माना कि पहले दिन से ही भारत ने उनसे बेहतर क्रिकेट खेला. उन्होंने कहा भारत 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उन्होंने माना, \"मुझे इसी तरह की बल्लेबाज़ी पर टिके रहना चाहिए क्योंकि ये मेरा प्राकृतिक अंदाज़ है.\" उन्होंने माना कि वो पिछले कुछ महीनों से अपना प्राकृतिक खेल नहीं खेल रहे थे. धोनी ने कहा आक्रामक बल्लेबाज़ी उनकी बैटिंग की पहचान है और अब वो ऐसे ही खेलते रहने की कोशिश करेंगे. ख़ास बात ये भी है कि धोनी की कप्तानी में भारत की ये दूसरी जीत है. ग़ौरतलब है कि इससे पहले जब दक्षिण अफ्रीकी टीम भारत के दौरे पर थी तो धोनी ने कानपुर टेस्ट में भारतीय टीम की अगुवाई की थी वो टेस्ट भी भारत ने ही जीता था. अब भारत बॉर्डर-गावस्कर श्रृंखला में एक-शून्य से आगे हो गया है. इस श्रृंखला का पहला मैच बैंगलोर में ड्रॉ रहा था. अगला टेस्ट मैच दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला मैदान पर 29 अक्तूबर से खेला जाएगा. सीरिज़ का आख़िरी मैच छह नवंबर से नागपुर के विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन ग्राउंड पर होगा.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 692, "source_item_id": 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साथ-साथ इस नेटवर्क का और विस्तार किया गया. सैन्य हवाई अड्डों के साथ साथ सिविलियन एयरपोर्ट तक भी पाइपलाइन बिछा दी गई. आज इसका नेटवर्क क़रीब 2,400 किलोमीटर का है. कुछ जगहों पर ही इस नेटवर्क के पाइप धरती से ऊपर देखने को मिलते हैं. ज़्यादातर जगहों पर ये अंडरग्राउंड ही है. कई जगह, इसके आस-पास चेतावनी के बोर्ड भी लगाए गए हैं. इनमें से कई बोर्ड तो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान के ही हैं. वैसे तो आज ये नेटवर्क कोई राज़ नहीं. मगर सरकारी दस्तावेज़ों में ये अभी भी ख़ुफ़िया नेटवर्क ही है. इसका नाम पहले गवर्नमेंट पाइपलाइन एंड स्टोरेज सिस्टम था. 2015 में इसे एक स्पेनिश कंपनी को बेच दिया गया. अब इसे सीएलएच पाइपलाइन सिस्टम के नाम से जाना जाता है. इसका पूरा नक्शा कंपनी की वेबसाइट पर है. हालांकि सही-सही ठिकाने की जानकारी अभी भी सार्वजनिक नहीं की गई है. बस, कुछ चेतावनी वाले बोर्ड की मदद से इसकी पहचान होती है. (अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "चलिए आज आपको ब्रिटेन के बहुत बड़े राज़ से रूबरू कराते हैं. ब्रिटेन में अंडरग्राउंड पाइपलाइन का एक खुफ़िया नेटवर्क है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसे जनता की नज़र से बरसों से छुपाकर रखा गया है. क़रीब अस्सी साल पुराने इस पाइपलाइन नेटवर्क ने दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटेन की जीत में बड़ा योगदान दिया था. ब्रिटेन में बहुत से लोगों ने इस पाइपलाइन नेटवर्क की निशानियां देखी होंगी. मगर किसी को भी इसका पूरा सच नहीं पता होगा. इसे बीसवीं सदी में ब्रिटिश इंजीनियरों के सबसे बड़े कारमानों में से एक कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. इस पाइपलाइन नेटवर्क से ब्रिटेन के तमाम हवाई अड्डों तक हवाई जहाज़ के ईंधन की सप्लाई की जाती है. समाप्त ये पाइपलाइन नेटवर्क, सीधे रिफ़ाइनरीज़ से तेल को एयरपोर्ट तक पहुंचाता है, किसी की नज़र में आए बग़ैर. इस पाइपलाइन नेटवर्क को पिछली सदी के तीस के दशक में बिछाया गया था. इसके पीछे मक़सद था देश की सुरक्षा. उस वक़्त लिवरपूल की स्टैनलो रिफ़ाइनरी से ब्रिस्टॉल के एवनमाउथ बंदरगाह तक एक पाइपलाइन बिछाई गई. फिर इसे देश के रोड और रेल नेटवर्क से जोड़ा गया. सितंबर 1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया. हिटलर की सेनाओं ने एक एक करके हॉलैंड, बेल्जियम और फ्रांस पर कब्ज़ा कर लिया. ब्रिटेन पर लगातार हवाई हमले हो रहे थे. बड़ा ख़तरा मंडरा रहा था. दुश्मन पर जवाबी हवाई हमलों के लिए इंग्लैंड के पूर्वी तटों पर स्थित फौजी हवाई अड्डों तक ईंधन की लगातार सप्लाई होनी ज़रूरी थी. और ये काम दुश्मन की नज़र से छुपाकर करना था. सड़क से या रेल से ईंधन भेजना ख़तरे से ख़ाली नहीं था. जर्मनी के विमान उन पर बमबारी कर सकते थे. इसीलिए इस पाइपलाइन के नेटवर्क को बिछाने का फ़ैसला किया गया. इसकी खुदाई बड़े खुफिया तरीक़े से की गई. रात में ही इसका काम होता था. ताकि दुश्मन की निगाहों से बचा जा सके. आख़िर में इस पाइपलाइन नेटवर्क की मदद से पूर्वी इंग्लैंड के कई हवाई अड्डों तक तेल की सप्लाई का इंतज़ाम किया गया. यहां से उड़ान भरने वाले ब्रिटिश और अमरीकी विमानों को बिना रुके लगातार ईंधन की मिला. अमरीकी और ब्रिटिश सेनाओं की जीत में इस नेटवर्क का बड़ा योगदान रहा. दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे के बाद भी इस पाइपलाइन का इस्तेमाल होता रहा. बल्कि हवाई उड़ानों में इज़ाफ़े के साथ-साथ इस नेटवर्क का और विस्तार किया गया. सैन्य हवाई अड्डों के साथ साथ सिविलियन एयरपोर्ट तक भी पाइपलाइन बिछा दी गई. आज इसका नेटवर्क क़रीब 2,400 किलोमीटर का है. कुछ जगहों पर ही इस नेटवर्क के पाइप धरती से ऊपर देखने को मिलते हैं. ज़्यादातर जगहों पर ये अंडरग्राउंड ही है. कई जगह, इसके आस-पास चेतावनी के बोर्ड भी लगाए गए हैं. इनमें से कई बोर्ड तो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान के ही हैं. वैसे तो आज ये नेटवर्क कोई राज़ नहीं. मगर सरकारी दस्तावेज़ों में ये अभी भी ख़ुफ़िया नेटवर्क ही है. इसका नाम पहले गवर्नमेंट पाइपलाइन एंड स्टोरेज सिस्टम था. 2015 में इसे एक स्पेनिश कंपनी को बेच दिया गया. अब इसे सीएलएच पाइपलाइन सिस्टम के नाम से जाना जाता है. इसका पूरा नक्शा कंपनी की वेबसाइट पर है. हालांकि सही-सही ठिकाने की जानकारी अभी भी सार्वजनिक नहीं की गई है. बस, कुछ चेतावनी वाले बोर्ड की मदद से इसकी पहचान होती है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तानी मीडिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा के बहाने कश्मीर को लेकर भारत पर निशाना साधा गया है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान में भी उसकी ‘सरगर्मियों’ पर सवाल उठाए गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरोज़नामा ‘वक़्त’ लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ साफ़ कर चुके हैं कि पाक-भारत संबंधों के सिलसिले में कश्मीर एक बुनियादी मुद्दा है और इसे संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाएगा. अख़बार लिखता है कि कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच तीन लड़ाइयां हो चुकी हैं, इसलिए पाकिस्तान चाहता है कि भारत कश्मीर समेत हर मुद्दे पर बात करे, क्योंकि समस्याएं बातचीत से ही सुलझ सकती हैं, जंगों से नहीं. अख़बार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा है कि वो भारत की आक्रामता पर ध्यान दे और कश्मीर मुद्दे के हल के लिए ‘अपनी क़िस्मत का फैसला ख़ुद करने के कश्मीरियों के हक़’ पर अमल कराए. कश्मीर में रायशुमारी दैनिक ‘जंग’ लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद वाला इलाक़ा है जहां जनता को रायशुमारी के ज़रिए भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का फ़ैसला करना है. समाप्त अख़बार लिखता है कि हर साल पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को घाटी में पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने और भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को काला दिवस के रूप में मनाए जाने से इस रायशुमारी का नतीजा साफ़ हो जाता है. इसलिए भारत ने इस रायशुमारी से बचने के लिए कश्मीर को अपना अटूट अंग बताया है. उधर ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ के कार्यकाल का ये उनका तीसरा भाषण होगा जब वो ये बताने की कोशिश करेंगे कि क्षेत्र में शांति के लिए कश्मीर विवाद हल करना कितना ज़रूरी है. ‘ भारत ने मदद से भरमाया’ उधर रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ के इस बयान को प्रमुखता दी है कि पेशावर में सैन्य एयर बेस पर हुए हमले के सिलसिले में सबूत जमा करके अफ़ग़ानिस्तान को सौंपे जाएंगे. अख़बार लिखता है कि ये ज़िम्मेदारी अफ़ग़ानिस्तान की है कि वो पता लगाए कि उसकी सरज़मीन में कहां-कहां पाकिस्तान विरोधी दहशतगर्द छिपे हैं. अख़बार की टिप्पणी है कि ऐसा महसूस होता है कि भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को अपनी मदद में भरमा रखा है और इसलिए वहां उसकी सरगर्मियों पर अफ़ग़ानिस्तान का कोई कंट्रोल नहीं है. उधर दैनिक ‘दुनिया’ का संपादकीय है - नाराज़ बलोच नेताओं से बातचीत में अहम प्रगति. अख़बार लिखता है कि नाराज़ बलोच नेताओं को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने की सरकार की कोशिशों के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं. इस सिलसिले में अख़बार ने दर्जनों बलोच लड़ाकों के हथियार छोड़ हिंसा से तौबा करने का ज़िक्र किया और लिखता है कि स्वनिर्वासन में रहने वाले बचोल नेता भी समझ रहे हैं कि अब हिंसक मुहिम के लिए हालात ठीक नहीं हैं. नेपाल के हालात रुख़ भारत के उर्दू अख़बरों का करें तो ‘सहाफ़त’ अख़बार ने नेपाल में नया संविधान लागू होने और उसके बाद भारत-नेपाल रिश्तों में आई तल्खी को अपने संपादकीय का विषय बनाया है. अख़बार कहता है कि काठमांडू में भारतीय दूतवास को पिछले दिनों इस बात का खंडन करना पड़ा कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मधेसी लोगों की हिंदुस्तानी होने की हैसियत से रक्षा करने की बात कही है. अख़बार कहता है कि इस खंडन से इतना तो साफ़ है कि अन्य नेपालियों के मुक़ाबले भारत को मधेसी लोगों की ज़्यादा चिंता है, लेकिन नेपाल साफ़ कर चुका है कि देश में नया संविधान लागू करना उसका अंदरूनी मामला और इसमें कोई बाहरी दख़ल नहीं होना चाहिए. वहीं ‘जदीद ख़बर’ लिखता है कि नेपाल में शांतिपूर्ण हालात भारत के लिए अहम हैं क्योंकि नेपाल ऐसा सरहदी देश हैं जहां अशांति के आसार ज़्यादा हैं. अख़बार के मुताबिक़ नेपाल के कुछ गुटों के संबंध पड़ोसी चीन से होना भारत के लिए पहले ही चिंता का विषय है. 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पद्म विभूषण से सम्मानित किया जाएगा. भारत में गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिए जाने वाले पद्म पुरस्कारों में इस वर्ष तीन पद्म विभूषण, 19 पद्म भूषण और 74 पद्मश्री सम्मान शामिल हैं. जाने माने फ़िल्म निर्देशक गुलज़ार, फ़िल्म कलाकार सौमित्र चैटर्जी, साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष गोपीचंद नारंग पद्म भूषण से सम्मानित होने वाले प्रमुख नाम हैं. उनके अलावा सशस्त्र सेना स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल विजय नंदन शाही को भी पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना है. पद्मश्री से सम्मानित होने वालों में फ़िल्म अभिनेता अनुपम खेर और कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग के नाम प्रमुख हैं.\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरभ गांगुली, उपकप्तान राहुल द्रविड़ और एथलीट अंजू बॉबी जार्ज सहित सात खिलाड़ियों को इस वर्ष पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराजधानी नई दिल्ली में की गई आधिकारिक घोषणा के अनुसार इन प्रमुख खिलाड़ियों के अलावा हॉकी खिलाड़ी दिलीप टिर्की को भी ये सम्मान दिया जाएगा. सम्मानित होने वाले अन्य 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पत्र में आगे लिखा है कि जिन आरोपों से वे घिरे हैं उससे कहीं ज़्यादा गंभीर आपराधिक सज़ा झेल चुके या अभियुक्त आज भी चुनाव के मैदान में हैं. कांग्रेस पार्टी पर चुटकी लेते हुए उन्होंने लिखा है कि वर्ष 1984 में दिल्ली में हुए दंगों में जिन लोगों के ख़िलाफ़ मामले चल रहे हैं उन्हें भी पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि जिस जल्दबाज़ी में चुनाव आयोग ने निर्णय लिए हैं उससे ऐसा लगता है कि राजनीतिक दबाव के तहत ऐसा किया गया है. इससे पहले वे चुनाव आयोग के आरोपों को ये कहते हुए ख़ारिज कर चुके हैं कि उनके 'भाषण की वीडियो रिकॉर्डिंग में छेड़छाड़ की गई है.\n\nSummary:", "target": "पीलीभीत से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार वरुण गाँधी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि उनके बारे में जल्दबाज़ी में फ़ैसला किया गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरविवार रात चुनाव आयोग ने वरुण गांधी को एक समुदाय के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने का दोषी पाया था और भाजपा को सुझाव दिया था कि लोकसभा चुनाव में वह उन्हें पार्टी का उम्मीदवार न बनाए. वरुण 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एकीकृत असम प्रांत का ही हिस्सा था और स्थिति से निपटने में प्रशासनिक विफलता के बाद मिज़ो युवाओं ने हथियार उठा कर अलगाववादी संगठन मिज़ो नेशनल फ़्रंट का गठन कर लिया. बीस वर्षों तक अलगाववाद की राह पर चलने के बाद यह संगठन 1986 में राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ा और मिज़ोरम के मौजूदा मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा एमएनएफ़ के अग्रणी नेताओं में से एक थे. सेना की मुस्तैदी अभी चूहों से सबसे अधिक बर्बादी पश्चिमी और पूर्वी मिज़ोरम तथा मणिपुर के चुड़ाचांदपुर ज़िले में हो रही है जहाँ सेना ने कमान संभाल ली है. कर्नल शांतनु देव गोस्वामी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया \"चुड़ाचांदपुर में हमारी उपस्थिति पहले से ही काफ़ी मज़बूत है क्योंकि हम यहाँ पहले से ही चरमपंथियों से निपट रहे हैं. अब चूहे यहाँ के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं इसिलए हम उनसे भी लड़ रहे हैं.\" सेना के प्रवक्ता कर्नल गोस्वामी ने कहा कि चूहों को मौत की नींद सुलाने के अलावा सेना किसानों को अदरक और हल्दी की खेती के गुर भी सिखा रही है. अदरक और हल्दी चूहों को आसपास फटकने भी नहीं देते हैं. 'मौतक' चूहों से अनाज की बर्बादी से जो अकाल जैसी स्थिति पैदा होती है उसे 'मौतम' कहते हैं और इसके बाद बारी आती है 'मौतक' की. मौतक में बाँसों में फूल खिलने की प्रक्रिया काफ़ी तेज़ हो जाती है औरनतीज़तन फतिंगों, टिड्डों की संख्या भी बढ़ने लगती है. मिज़ोरम के अधिकारियों के मुताबिक पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में मौतक जैसे हालात पैदा हो चुके हैं. इससे फ़सलों को हुए नुक़सान के मद्देनज़र राज्य सरकार किसानों को आलू और अन्य नक़दी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है.\n\nSummary:", "target": "भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में चूहों के आतंक से निपटने के लिए अब सेना मैदान में उतरी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदो राज्यों मिज़ोरम और मणिपुर में चूहों की बेतहाशा बढ़ती आबादी खेतों में लगी फ़सलों और खलिहानों में रखे भंडारों को तेज़ी से चट कर रही है. अधिकारियों के मुताबिक़ ऐसा बाँसों मे फूल खिलने के कारण हो रहा है जिसे हज़म करने से चूहों की प्रजनन क्षमता में गुणात्मक बढ़ोत्तरी होती है. पूर्वोत्तर में बाँसों की खेती बड़े पैमाने पर होती है और इनमें 50 वर्षों के अंतराल पर इस तरह के फूल खिलते हैं. इतिहास इससे लोगों में 60 के दशक की यादें ताज़ा हो गई है जब चूहों ने मिज़ोरम में भयंकर अकाल की स्थिति पैदा कर दी थी. उस समय मिज़ोरम एकीकृत असम प्रांत का ही हिस्सा था और स्थिति से निपटने में प्रशासनिक विफलता के बाद मिज़ो युवाओं ने हथियार उठा कर अलगाववादी संगठन मिज़ो नेशनल फ़्रंट का गठन कर लिया. बीस वर्षों तक अलगाववाद की राह पर चलने के बाद यह संगठन 1986 में राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ा और मिज़ोरम के मौजूदा मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा एमएनएफ़ के अग्रणी नेताओं में से एक थे. सेना की मुस्तैदी अभी चूहों से सबसे अधिक बर्बादी पश्चिमी और पूर्वी मिज़ोरम तथा मणिपुर के चुड़ाचांदपुर ज़िले में हो रही है जहाँ सेना ने कमान संभाल ली है. कर्नल शांतनु देव गोस्वामी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया \"चुड़ाचांदपुर में हमारी उपस्थिति पहले से ही काफ़ी मज़बूत है क्योंकि हम यहाँ पहले से ही चरमपंथियों से निपट रहे हैं. अब चूहे यहाँ के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं इसिलए हम उनसे भी लड़ रहे हैं.\" सेना के प्रवक्ता कर्नल गोस्वामी ने कहा कि चूहों को मौत की नींद सुलाने के अलावा सेना किसानों को अदरक और हल्दी की खेती के गुर भी सिखा रही है. अदरक और हल्दी चूहों को आसपास फटकने भी नहीं देते हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली की आज़ादपुर सब्ज़ी मंडी एशिया की सबसे बड़ी सबसे मंडियों में से एक है. प्याज़ के बढ़ते दामों की गुत्थी सुलझाने बीबीसी संवाददाता मंडी पहुंचे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवहां उन्होंने पाया की प्याज़ किसान तो सात से आठ रुपए प्रति किलो बेचता है. पर आपकी प्लेट तक आते-आते वो 35-40 रुपए किलो तक हो जाता है. बुरे मौसम के अलावा प्याज़ के व्यापारी मीडिया की ख़बरों को भी ज़िम्मेदार बताते हैं. प्याज़: कभी ये हंसाए, कभी ये रुलाए कैसे बढ़ती है प्याज़ की क़ीमत किसान ने बेचा - 8 से 9 रुपए प्रति किलो माल भाड़ा - 3.5 रुपए प्रति किलो मंडी पहुँचते पहुँचते - 13 से 15 रुपए प्रति किलो खुदरा व्यापारी की ख़रीद - 20 से 25 रुपए प्रति किलो आम आदमी की ख़रीद - 35 से 40 रुपए प्रति किलो प्याज़ का पूरा सफ़र आगे पढ़ें प्याज़ की थोक और खुदरा क़ीमतें लगातार बढ़ रही है. आजादपुर मंडी में प्याज़ प्रति मन यानी प्रति चालीस किलो 700 से 800 रुपए यानी 15 से 20 रुपए प्रति किलो मिल रहा है. वहीं महाराष्ट्र के नासिक से आने वाला प्याज़ 25 से 30 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिल रहा है. अब किसानों के रुला रहा है प्याज़ मुख्यतः महाराष्ट्र और राजस्थान से प्याज़ आता है. महाराष्ट्र में प्याज़ की फसल ख़राब होने की वजह से अब राजस्थान से ज़्यादा माल आ रहा है. आजादपुर मंडी में प्याज़ के थोक विक्रेता मुनीश कपूर पिछले दस साल से प्याज़ बेच रहे हैं. मीडिया की देन उनका कहना है कि जितना माल आना चाहिए था उतना आ नहीं पा रहा है. खुदरा बाजार में प्याज़ की क़ीमत 35 से 40 रुपए प्रति किलो है. आम लोगों को रुला रहा है प्याज़ आपको प्याज़ बेचने वाले कहते हैं कि प्याज़ की क़ीमतों में उछाल दरअसल मीडिया की देन है. मीडिया में जब ख़बरें दिखाई जाने लगी कि प्याज़ महंगा बिक रहा है तो महाराष्ट्र और राजस्थान के किसानों ने ज़्यादा मुनाफ़े के लिए माल रोक दिया. आसमान छूती क़ीमतें बढ़ती कीमतों का दर्द झेलती एक आम गृहिणी अनीता दावर ने 45 रूपए प्रति किलो के हिसाब से प्याज़ ख़रीदा है. वह कहती हैं, \"हम पंजाबी हैं और हमारे हर पकवान में प्याज़ का ज़्यादा इस्तेमाल होता है. अब हम हिसाब से ही प्याज़ खाते हैं.\" थोक से लेकर खुदरा तक का सफ़र तय करते-करते प्याज़ की क़ीमतें आसमान छूने लगती हैं. केंद्र सरकार ने प्याज़ की कालाबाज़ारी और जमाख़ोरी रोकने के लिए प्याज़ के निर्यात का न्यूनतम दर तय किया है. 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(बीबीसी रेडियो से बातचीत पर आधारित)\n\nSummary:", "target": "मेरे भैया सत्येंद्र दुबे हद से ज़्यादा प्यारे इंसान थे. उन्हें हमेशा दूसरों की फ़िक्र रहती थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयदि भैया को लगता कि उनके जान देने किसी का एक भी बूंद ख़ून बचाया जा सकता है तो शायद वह ऐसा कर भी जाते. वह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अकेली लड़ाई लड़ रहे थे. मुझे कई बार उनके प्रोजेक्ट वाले इलाक़े का दौरा करने का मौक़ा मिला. मैंने देखा कि कैसे भैया धूल-धक्कड़ की परवाह किए बिना दूर-दराज के इलाक़ों में भी जाते थे. वह सातों दिन काम पर जाते, जबकि आम तौर पर बाकी मैनेजर 10-15 दिन में एक बार प्रोजेक्ट स्थल पर जाने को ही बड़ा काम मानते हैं. भैया ने प्रोजेक्ट में एक-एक मशीन और उपकरण का हिसाब रखा था. हम सिर्फ़ यही चाहते हैं कि दोषी पकड़े जाएँ और भैया की मुहिम को आगे बढ़ाया जाए उनके चारों ओर भ्रष्टाचार हद से ज़्यादा था. भैया ने कई भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की थी. उनके कहने पर एक कंसल्टेंट इंजीनियर का तबादला कर दिया गया था. इन सब कारणों से उन पर दबाव तो था, लेकिन हमें नहीं लगता कि उन्हें किसी से जान पर ख़तरे का एहसास था. उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक से की थी, लेकिन हमें नहीं लगता कि उनका नाम लीक होना उनकी हत्या का कारण बना. वैसे ही उनसे अनेक लोग नाराज़ थे. दुनिया भर से लोग हमारे परिवार के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर रहे हैं. उनके जाने से निश्चय ही हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति दुष्प्रभावित हुई है लेकिन सरकार से मदद का कोई आश्वासन नहीं मिला है प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी अफ़सोस व्यक्त किया लेकिन उनकी बात हम तक मीडिया के ज़रिए ही मिल पाई. उनके जाने से निश्चय ही हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति दुष्प्रभावित हुई है लेकिन सरकार से मदद का कोई आश्वासन नहीं मिला है. हम सिर्फ़ यही चाहते हैं कि दोषी पकड़े जाएँ और भैया की मुहिम को आगे बढ़ाया जाए. उनकी मौत से भारतीयों में जो चेतना जगी है वह नष्ट नहीं हो. 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सेवन से दोनों की तबीयत ख़राब हुई. पुलिस उस सफ़ेद पावडर का परीक्षण कर रही है जो कि राहुल और विवेक को शुक्रवार तड़के अस्पताल लेकर आए लोगों ने अस्पताल के अधिकारियों को सौंपी थी. उन लोगों का कहना था कि राहुल और विवेक ने संभवत: उस पावडर का भी सेवन किया था. अग्रवाल के अनुसार घटनास्थल पर मौजूद सबूतों और नौकरों से की गई पूछताछ से पता चला है कि बीमार होने से पूर्व राहुल और उनके सहयोगियों ने शराब का भी सेवन किया था. इकलौता बेटा राहुल भाजपा के पूर्व महासचिव प्रमोद महाजन के इकलौते बेटे हैं, जबकि विवेक मैत्रा प्रमोद के सचिव के तौर पर काम करते थे. प्रमोद महाजन कथित रूप से अपने ही भाई की गोलियों का शिकार होकर बुरी तरह घायल हो गए थे. और दो सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रहने के बाद अंतत: तीन मई को उनकी मौत हो गई थी. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के निमंत्रण पर राहुल महाजन पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में हिस्सा लेने मुंबई से दिल्ली आए हुए थे. विवेक मैत्रा एक दशक से भी अधिक समय से प्रमोद महाजन के सचिव के रुप में काम कर रहे थे और उन्हें महाजन परिवार का विश्वासपात्र माना जाता रहा है. विवेक मैत्रा भी राहुल महाजन के साथ ही दिल्ली आए थे और दोनों दिल्ली में 7, सफ़दरजंग रोड स्थित सरकारी आवास में रह रहे थे जो कि दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन के नाम आवंटित था.\n\nSummary:", "target": "भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन की स्थिति गंभीर बनी हुई है. तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरात के भोजन के समय उनके साथ मौजूद उनके सहयोगी विवेक मैत्रा की अस्पताल पहुँचाए जाने से पहले ही मौत हो गई थी. घटना की रात राहुल महाजन और विवेक मैत्रा के साथ रहे तीन नवयुवक पुलिस के सामने शुक्रवार की रात पेश हो गए. उनसे पुलिस पूछताछ कर रही है. अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार राहुल को जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे रखा गया है, और उनकी हालत गंभीर किंतु स्थिर बनी हुई है. पुलिस जाँच दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त उपायुक्त मनीष अग्रवाल ने बीबीसी हिंदी सेवा को बताया कि विवेक की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकेगा कि किस पदार्थ के सेवन से दोनों की तबीयत ख़राब हुई. पुलिस उस सफ़ेद पावडर का परीक्षण 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लोगों की हत्याएँ हुईं और इस मामले में पाँच लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चला. अभियुक्तों ने जो इक़बालिया बयान दिए हैं, उनके मुताबिक कुछ लोगों को गड्ढे में गिराने के बाद पत्थर मार-मार कर मार डाला गया. एक व्यक्ति को ज़िदा दफ़न कर दिया गया जबकि कईयों को रेगिस्तान में खुला छोड़ दिया गया. अभियुक्तों ने अदालत में अपनी दलील में कहा कि उन्हें यही बताया गया है कि अनैतिक कार्यों में लिप्त लोग यदि चेतावनी देने से भी नहीं मानें तो उन्हें मारा जा सकता है. मारे गए लोगों के परिजनों का कहना था कि पाँच बार ऐसा हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फ़ैसले को पलट दिया हो.\n\nSummary:", "target": "ऐसी ख़बरें हैं कि ईरान के सुप्रीम कोर्ट ने कई हत्याएँ करने के पाँच अभियुक्तों को रिहा कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअभियुक्तों का कहना था कि जो लोग मादक द्रव्यों का कारोबार करते हों या विवाहेतर शारीरिक संबंध बनाते हों, तो दो बार चेतावनी देने के बाद उन्हें मारने में कोई गलती नहीं है और इस्लाम इसकी अनुमति देता है. अदालत ने उनकी इस दलील को स्वीकार कर लिया. संवाददाताओं 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है. ब्रहमपुत्र नदी उफान पर है और उसकी सहायक नदियों में भी पानी बढ़ रहा है. इससे डिब्रूगढ़, शोणितपुर, तिनसुकिया, गोलघाट, मोरीगांव, धेमाजी, कामरूप, लखीमपुर, बक्सा, बारपेटा, जोरहाट, नलबाड़ी, सिबसागर और उदालगुड़ी ज़िलों में लगभग पांच लाख लोग प्रभावित हुए हैं. नॉर्थ सिक्किम जिले के डिप्टी कमिश्नर टी डब्ल्यू खानशेरपा का कहना है कि भूस्खलन की वजह से चुंगथांग और मंगन के बीच कई जगहों पर मुख्य सड़क मार्ग बाधित हुआ है. अरूणाचल प्रदेश, भूटान के पहाड़ी इलाकों और असम में बीते 15 दिनों से बारिश हो रही है. इसकी वजह से ब्रह्मपुत्र समेत इलाक़े की तमाम छोटी-बड़ी नदियां ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही हैं.\n\nSummary:", "target": "भारत के पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम के सुदूर इलाकों में भारी बारिश और भूस्खलन के कारण 27 लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसी पीटीआई का कहना है कि मृतकों में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) और बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेश (बीआरओ) के जवान भी शामिल हैं. खबरों में कहा गया है कि कम से कम 21 शव मिल गए हैं जबकि आठ अन्य अभी भी लापता 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में हैं. कुछ बंदूकधारियों ने मंगलवार को उनका अपहरण कर लिया था और गवर्नर के घरवालों का कहना है कि अपहर्ता क़ैम शहर से अमरीकी सैनिकों को हटाने की माँग कर रहे हैं. आत्मघाती हमले इराक़ में बुधवार को पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के गृहनगर तिकरित में एक व्यस्त बाज़ार में धमाका हुआ जो एक पुलिस थाने के पास है. इस आत्मघाती हमले में कम-से-कम 28 लोग मारे गए और लगभग 70 लोग घायल हो गए. इराक़ी पुलिस के एक प्रवक्ता का कहना था कि पहले पुलिस थाने के बाहर विस्फोट करने की योजना थी. दूसरी ओर उत्तर में हवीजा में पुलिस और सेना के भर्ती केंद्र के नज़दीक हुए बम विस्फोट में कम से कम 30 लोगों की जान गई है. पुलिस का कहना है कि ये धमाका तब हुआ जब विस्फोटकों को शरीर पर लपेटे हुए एक आत्मघाती हमलावर भर्ती केंद्र में गया और अपने आप को उड़ा लिया. उधर राजधानी बग़दाद में चार बम धमाके हुए जिनमें दो का निशाना पुलिसकर्मी थे. इन धमाकों में कम-से-कम चार लोगों के मारे जाने का समाचार है.\n\nSummary:", "target": "पिछले 12 दिनों से हिंसा की नई लहर का सामना कर रहा इराक़ बुधवार को तीन शहरों में हुए कई धमाकों से दहल गया.", 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की योजना थी. दूसरी ओर उत्तर में हवीजा में पुलिस और सेना के भर्ती केंद्र के नज़दीक हुए बम विस्फोट में कम से कम 30 लोगों की जान गई है. पुलिस का कहना है कि ये धमाका तब हुआ जब विस्फोटकों को शरीर पर लपेटे हुए एक आत्मघाती हमलावर भर्ती केंद्र में गया और अपने आप को उड़ा लिया. उधर राजधानी बग़दाद में चार बम धमाके हुए जिनमें दो का निशाना पुलिसकर्मी थे. इन धमाकों में कम-से-कम चार लोगों के मारे जाने का समाचार है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 705, "source_item_id": "705", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1359, "clean_index": 631, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:631"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के मुताबिक मुठभेड़ राजधानी श्रीनगर के सरई बल इलाके में सोमवार देर रात हुई. कश्मीर रेंज के इंस्पेक्टर जनरल जाविद गिलानी मुजतबह ने बीबीसी को बताया, \"इस मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गये हैं जो कि जैश-ए मोहम्मद संगठन के थे.\" पुलिस के मुताबिक दोनों चरमपंथी रिहाइशी इलाके में एक मकान के अंदर छुपे हुए थे. मारे गये चरमपंथियों में से एक कमांडर बताया जा रहा है जिसकी शिनाख्त सैफुलह के तौर पर हुई है. समाप्त श्रीनगर में सोमवार को हुए दो अलग-अलग चरमपंथी हमलों में तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई. ये हमले जड़ीबल और टेंगपुरा में किए गए थे. दोनों हमलों के बाद चरमपंथी मौके से भागने में कामयाब हो गए थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर की पुलिस ने दावा किया है कि सुरक्षाबलों से मुठभेड़ में जैश-ए-मोहम्मद के दो चरमपंथियों की मौत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के मुताबिक मुठभेड़ राजधानी श्रीनगर के सरई बल इलाके में सोमवार देर रात हुई. कश्मीर रेंज के इंस्पेक्टर जनरल जाविद गिलानी मुजतबह ने बीबीसी को बताया, \"इस मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गये हैं जो कि जैश-ए मोहम्मद संगठन के थे.\" पुलिस के मुताबिक दोनों चरमपंथी रिहाइशी इलाके में एक मकान के अंदर छुपे हुए थे. मारे गये चरमपंथियों में से एक कमांडर बताया जा रहा है जिसकी शिनाख्त सैफुलह के तौर पर हुई है. समाप्त श्रीनगर में सोमवार को हुए दो अलग-अलग चरमपंथी हमलों में तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई. ये हमले जड़ीबल और टेंगपुरा में किए गए थे. दोनों हमलों के बाद चरमपंथी मौके से भागने में कामयाब हो गए थे. 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'मरना पसंद करुँगा' लाल मस्जिद के आसपास हो रही गोलीबारी के कारण धार्मिक और संसदीय नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल लाल मस्जिद परिसर में दाख़िल नहीं हो पाया. यह प्रतिनिधिमंडल छात्रों के नेता और मस्जिद के मौलवी अब्दुल रशीद ग़ाजी से बातचीत करने की उम्मीद से वहाँ गया था. गाज़ी का कहना है कि मस्जिद में लगभग 1800 लोग मौजूद हैं. उन्होंने कहा है कि वे गिरफ़्तार होने की जगह मरना पसंद करेंगे. बिजली कटी, खाद्य पदार्थों की कमी शुक्रवार रात को भी लाल मस्जिद के बाहर गोलीबारी और धमाके हुए. शुक्रवार देर रात को दो बड़े धमाके हुए जो करीब आठ किलोमीटर तक सुने जा सकते थे. धमाके के बाद आस-पास मलबा पड़ा हुआ दिखाई दिया. मस्जिद में अभी भी सैकड़ों लोग मौजूद हैं जिसमें बच्चे भी शामिल हैं, चाहे एक हज़ार से ज़्यादा लोग मस्जिद से बाहर आ चुके हैं. मस्जिद की बिजली और पानी की सप्लाई काट दी गई है. बताया जा रहा है कि वहाँ खाने की भी कमी होने लगी है. शुक्रवार को कुछ छात्रों ने मस्जिद से बाहर निकलने की कोशिश की थी जिसके बाद करीब आधे घंटे तक सैन्य कार्रवाई चली. इसमें दो छात्रों की मौत हो गई और 10 लोग घायल हो गए. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सरकार लाल मस्जिद के अंदर मौजूद लोगों पर मानसिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के अंदर मौजूद कट्टरपंथी इस्लामी छात्रों को चेतावनी दी है कि यदि वे आत्मसमर्पण नहीं करेंगे तो वे कार्रवाई में मारे जाएँगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने सरकारी टीवी पर कहा कि यदि ये छात्र लाल मस्जिद को नहीं छोड़ते तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी. इस्लामाबाद के बीचोंबीच स्थित लाल मस्जिद इलाक़े और उससे जुड़े मदरसे के आसपास पुलिस और कट्टरपंथियों के बीच पिछले पाँच दिनों से टकराव चल रहा है. इससे पहले पुलिस ने मदरसे की इमारत पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था. दोनो ओर से हुई अब तक की कार्रवाई में 21 लोग मारे गए हैं. 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(शायद उपेंद्र भाई को अंदाज़ा ही नहीं है कि कुछ लोग इससे ज़्यादा रुपया सिर्फ एक शाम की अय्याशी में ही उड़ा देते हैं और महीने में आठ-दस लाख रुपए कमाना अब कुछ लोगों के लिए मामूली बात हो गई है.) जिस जगह पर खड़े होकर उपेंद्र भाई से बात कर रहा था, वहीं दस साल पहले हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं की जुनूनी भीड़ ने एक बेकरी में आग लगा दी और वहाँ मौजूद लोगों को ज़िंदा जला डाला था. बदलाव ने आखिर क्या बदला बेकरी के मालिक सहित बारह मुसलमान और दो हिंदू कर्चमारियों को यहाँ मार डाला गया था. पुलिस ने केस इतना कच्चा बनाया कि अदालत से सभी अभियुक्त रिहा कर दिए गए. पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होने और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद मामले की फाइल फिर से खुली और अंत में चार लोगों को आजन्म कारावास की सज़ा दी गई. तब से पिछले दस साल में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को 'वायब्रेंट' गुजरात में बदल दिया. हर जगह चौड़ी-चिकनी सड़कें, शॉपिंग मॉल्स, विदेशी कारें, विदेशी कंपनियाँ, आलीशान बड़े-बड़े विज्ञापन और बिजली. लेकिन बड़ौदा के हनुमान टीकरी मोहल्ले में कुछ नहीं बदला- न गलियाँ, न गंदगी, न ग़रीबी. और न ही यादें. ख़ास तौर पर मारे गए बेकरी के मालिक की पत्नी हिना के लिए फिर भी कुछ नहीं बदला. पति के मार डाले जाने के बाद अब वो अपने दो बच्चों के साथ उसी घर में रहती है. बकरियाँ चरा कर अपना गुज़ारा करती है. नीचे के कमरे उन्होंने उत्तर प्रदेश से आए कुछ कामगार परिवारों को किराए पर दे दिए हैं. उनके सभी किराएदार हिंदू हैं. उपेंद्र भाई कहते हैं, ''यहाँ हिंदू और मुसलमानों में कोई समस्या नहीं है. नरेंद्र मोदी ने ये करवाया क्योंकि उन्हें वोट चाहिए थे.'' लेकिन मोहल्ले के दूसरे लोग इस मामले में अपनी राय ज़ाहिर नहीं करते. बेस्ट बेकरी पर सब खामोश दस साल पहले जुनूनी भीड़ ने बेस्ट बेकरी में आग लगा दी थी इस बार के गुजरात विधानसभा चुनाव में बेस्ट बेकरी का ज़िक्र कहीं नहीं है- न सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की सभाओं में और न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जलसों में. स्थानीय काँग्रेसी उम्मीदवार भी 2002 के दंगों का ज़िक्र करने पर असहज हो जाते हैं. इसकी वजह जानने के लिए मुझे राजनीति के किसी पंडित के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी. टैक्सी ड्राइवर शक्तिभाई ने एक वाक्य में जवाब दिया, ''इसकी वजह वहम है. शक.'' उन्होंने कहा कि ''दंगों के बाद से हिंदुओं को लगता है कि अगर काँग्रेस जीत गई तो मुसलमानों का राज आ जाएगा और मुसलमानों को लगता है कि अभी शांति है और अगर इनको (बीजेपी वालों को) छेड़ा गया तो फिर दंगे भड़केंगे.'' और यही नरेंद्र मोदी की सफलता है कि पिछले दस साल में राज्य में कहीं पर भी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, लेकिन उनका साया हर जगह मौजूद रहता है. मगर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खिंच गई शक की इस दीवार को चुनावी मौसम में ऐसे देखा जाता है जैसे कि ये पारदर्शी दीवार हो. भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेंद्र मोदी तो इसके वजूद को स्वीकार नहीं ही करते, काँग्रेस को भी लगता है कि अगर समाज के इस गहरे बँटवारे का ज़िक्र होगा तो इसे मुसलमानों की तरफ़दारी माना जाएगा. पर जिस तथ्य के बारे में खाता-पीता गुजराती समाज चर्चा भी नहीं करना चाहता, उसके बारे में फेरीवाले उपेंद्र या टैक्सीवाले शक्तिभाई बिना लाग लपेट बतियाते हैं.\n\nSummary:", "target": "बेस्टबेकरी के ठीक सामने की अपनी झुग्गी के बाहर खड़े उपेंद्र भाई बिना हिचके-सकुचाए कहते हैं, ''नरेंद्र मोदी सिर्फ़ अमीरों का ही विकास करते हैं. ये अमीरों की सरकार है.''", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउपेंद्र भाई कहते हैं मोदी ने जो किया, वोट की खातिर किया. उपेंद्र भाई फेरी लगाते हैं. मोहल्ले-मोहल्ले अपनी साइकिल पर रूई रखकर बेचते हैं. हाल ही में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई और घर की देखभाल करने के लिए बड़ी बेटी को स्कूल छोड़ना पड़ा. एक बेटा और एक बेटी अब भी स्कूल जाते हैं. उपेंद्र भाई कहते हैं जिन्हें 'पचीस हज़ार-पचास हज़ार रुपए' तनख्वाह मिलती है, नरेंद्र मोदी उनके लिए काम करते हैं. 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हिंदुओं को लगता है कि अगर काँग्रेस जीत गई तो मुसलमानों का राज आ जाएगा और मुसलमानों को लगता है कि अभी शांति है और अगर इनको (बीजेपी वालों को) छेड़ा गया तो फिर दंगे भड़केंगे.'' और यही नरेंद्र मोदी की सफलता है कि पिछले दस साल में राज्य में कहीं पर भी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, लेकिन उनका साया हर जगह मौजूद रहता है. मगर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खिंच गई शक की इस दीवार को चुनावी मौसम में ऐसे देखा जाता है जैसे कि ये पारदर्शी दीवार हो. भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेंद्र मोदी तो इसके वजूद को स्वीकार नहीं ही करते, काँग्रेस को भी लगता है कि अगर समाज के इस गहरे बँटवारे का ज़िक्र होगा तो इसे मुसलमानों की तरफ़दारी माना जाएगा. पर जिस तथ्य के बारे में खाता-पीता गुजराती समाज चर्चा भी नहीं करना चाहता, उसके बारे में फेरीवाले उपेंद्र या टैक्सीवाले शक्तिभाई बिना लाग लपेट बतियाते हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 708, 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जलवा है. 92 साल के वीएस अच्युतानंदन केरल के सबसे पुराने नेताओं में से एक हैं. वो एलडीएफ का चेहरा भी हैं. वो केरल के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. दूसरी ओर 83 साल के केएम मनी केरल कांग्रेस के बड़े नेता हैं. वो विधानसभा में 13 बार राज्य का बजट पेश कर चुके हैं. केरल कांग्रेस यूडीएफ गठबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक है. मनी के नाम अब तक सबसे ज़्यादा बार मंत्री रहने का रिकार्ड भी है. वो 1965 से ही कोट्टायम के पाला विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इस बार भी वो पाला से ही चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं 86 साल के ओ. राजागोपाल केरल में भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं. पार्टी को इस बार के चुनाव में उनसे बहुत उम्मीदें हैं. इससे पहले वो आठ बार चुनाव हार चुके हैं. वहीं 72 साल के पिनारायी विजयन एलडीएफ के दूसरे बड़े कद्दावर नेता हैं. अगर एलडीएफ सरकार बनाती है तो मुख्यमंत्री पद के वो भी बड़े दावेदार हैं. पार्टी और गठबंधन में उनका ख़ासा प्रभाव है. सीपीएम के विजयन कुन्नूर के धर्मादम से चुनाव मैदान में हैं. राज्य के मुख्यमंत्री 72 साल के ओमान चांडी कांग्रेस के बड़े नेताओं में हैं. वो 1970 से राजनीति 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "केरल इन दिनों चुनावी रंग में डूबा हुआ है. राज्य विधानसभा की कुल 140 सीटों के लिए 16 मई को मतदान होना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराज्य के 14 ज़िलों में 21,498 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जहां क़रीब 2.54 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे. इस बार चुनाव मैदान में कुल 1203 उम्मीदवार हैं. इस बार भी मुख्य मुक़ाबला सत्तारूढ़ यूडीएफ और एलडीएफ के बीच है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी चुनाव में पूरा ज़ोर लगा रही है. यूडीएफ के बैनर तले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस (जैकब), आरएसपी और जनता दल (यूनाइटेड) चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं एलडीएफ में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल (सेकुलर), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, केरल कांग्रेस (थामस), भारतीय कांग्रेस (समाजवादी) और इंडियन नेशनल लीग शामिल हैं. समाप्त इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी और भारत धर्मा जना सेना (बीडीजेएस) का गठबंधन चुनाव मैदान में है. तमिलनाडु की तरह ही केरल में बड़े उम्र के राजनेताओं का जलवा है. 92 साल के वीएस अच्युतानंदन केरल के सबसे पुराने नेताओं में से एक हैं. वो एलडीएफ का चेहरा भी हैं. वो केरल के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. दूसरी ओर 83 साल के केएम मनी केरल कांग्रेस के बड़े नेता हैं. वो विधानसभा में 13 बार राज्य का बजट पेश कर चुके हैं. केरल कांग्रेस यूडीएफ गठबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक है. मनी के नाम अब तक सबसे ज़्यादा बार मंत्री रहने का रिकार्ड भी है. वो 1965 से ही कोट्टायम के पाला विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इस बार भी वो पाला से ही चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं 86 साल के ओ. राजागोपाल केरल में भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं. पार्टी को इस बार के चुनाव में उनसे बहुत उम्मीदें हैं. इससे पहले वो आठ बार चुनाव हार चुके हैं. वहीं 72 साल के पिनारायी विजयन एलडीएफ के दूसरे बड़े कद्दावर नेता हैं. अगर एलडीएफ सरकार बनाती है तो मुख्यमंत्री पद के वो भी बड़े दावेदार हैं. पार्टी और गठबंधन में उनका ख़ासा प्रभाव है. सीपीएम के विजयन कुन्नूर के धर्मादम से चुनाव मैदान में हैं. राज्य के मुख्यमंत्री 72 साल के ओमान चांडी कांग्रेस के बड़े नेताओं में हैं. वो 1970 से राजनीति में सक्रिय हैं. इस बार भी कांग्रेस ने उनपर भरोसा जताया है. वे कोट्टायम के ठुथुपल्ली से चुनाव मैदान में हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 710, "source_item_id": "710", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1990, "clean_index": 635, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:635"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस सिलसिले में केंद्र सरकार को भी आज ही अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल करना है. अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े के बाद दिल्ली में इस वर्ष 18 फरवरी से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है. चौटाला की पेशी हरियाणा में 15 अक्तूबर को विधानसभा चुनाव होने हैं हरियाणा के बहुचर्चित जेबीटी शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओम प्रकाश चौटाला को आज दिल्ली उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पेश होना है. चौटाला को इस घोटाले के लिए दस साल जेल की सज़ा मिली है, लेकिन वे स्वास्थ्य कारणों से ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. उन पर ज़मानत की शर्तों को तोड़ने का आरोप है. वो राज्य में इन दिनों चल रहे सघन चुनाव प्रचार में भी हिस्सा ले रहे हैं. चेतावनी भारतीय मौसम विभाग का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में उठा चक्रवाती तूफ़ान हुदहुद आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और ओडिशा के गोपालपुरा की ओर बढ़ रहा है. हुदहुद की वजह से तटीय इलाकों में तेज़ हवाएं चलने और भारी बारिश होने की आशंका है. मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की चेतावनी दी गई है. मार्क ज़करबर्ग की नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग दो दिन की भारत यात्रा पर हैं. आज वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात कर सकते हैं. मुलाक़ात के दौरान इंटरनेट के प्रसार में साझेदारी, शिक्षा, ई-गवर्नेंस और फ़ेसबुक के ज़रिये ख़ुफ़िया जानकारी जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. नोबेल शांति पुरस्कार डायनामाइट के अविष्कारक स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल नोबेल पुरस्कारों की घोषणा का सिलसिला जारी है. आज नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा होने वाली है. नॉर्वे की नोबेल समिति का कहना है कि शांति प्रयासों के लिए उत्कृष्ट योगदान के लिए उसे इस वर्ष 278 नामांकन मिले हैं जो इस पुरस्कार के लिए नामांकनों की अब तक सबसे अधिक संख्या है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली विधानसभा को भंग करके फिर से चुनाव कराने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई होनी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस सिलसिले में केंद्र सरकार को भी आज ही अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल करना है. अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े के बाद दिल्ली में इस वर्ष 18 फरवरी से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है. चौटाला की पेशी हरियाणा में 15 अक्तूबर को विधानसभा चुनाव होने हैं हरियाणा के बहुचर्चित जेबीटी शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओम प्रकाश चौटाला को आज दिल्ली उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पेश होना है. चौटाला को इस घोटाले के लिए दस साल जेल की सज़ा मिली है, लेकिन वे स्वास्थ्य कारणों से ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. उन पर ज़मानत की शर्तों को तोड़ने का आरोप है. वो राज्य में इन दिनों चल रहे सघन चुनाव प्रचार में भी हिस्सा ले रहे हैं. चेतावनी भारतीय मौसम विभाग का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में उठा चक्रवाती तूफ़ान हुदहुद आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और ओडिशा के गोपालपुरा की ओर बढ़ रहा है. हुदहुद की वजह से तटीय इलाकों में तेज़ हवाएं चलने और भारी बारिश होने की आशंका है. मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की चेतावनी दी गई है. मार्क ज़करबर्ग की नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग दो दिन की भारत यात्रा पर हैं. आज वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात कर सकते हैं. मुलाक़ात के दौरान इंटरनेट के प्रसार में साझेदारी, शिक्षा, ई-गवर्नेंस और फ़ेसबुक के ज़रिये ख़ुफ़िया जानकारी जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. नोबेल शांति पुरस्कार डायनामाइट के अविष्कारक स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल नोबेल पुरस्कारों की घोषणा का सिलसिला जारी है. आज नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा होने वाली है. नॉर्वे की नोबेल समिति का कहना है कि शांति प्रयासों के लिए उत्कृष्ट योगदान के लिए उसे इस वर्ष 278 नामांकन मिले हैं जो इस पुरस्कार के लिए नामांकनों की अब तक सबसे अधिक संख्या है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली का कहना है कि कोरोना संकट के इस दौर में जब दोबारा क्रिकेट शुरू होगा तो वो पहले जैसा खेल रहेगा या नहीं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविराट कोहली ने सोशल मीडिया वेबसाइट इंस्टाग्राम पर स्पिनर रविचंद्रन अश्विन के साथ एक लाइव बातचीत के दौरान ये बात कही. कोहली ने कहा, \"मुझे नहीं पता आगे क्या होने वाला है, ये सोचकर भी अजीब लगता है कि खेलते समय कभी आप अपने आप चाहेंगे कि साथी खिलाड़ी के साथ मिलकर ताली बचाएँ, पर आप वो नहीं कर सकते, आपको हाथ जोड़ना होगा और पीछे हट जाना होगा.\" उन्होंने आगे कहा, \"ये सुनने में अजीब लगता है, पर हो सकता है कि आगे ऐसा ही हो जाए, कम-से-कम तब तक जब तक कि कोई इलाज या टीका नहीं ढूँढ लिया जाता.\" हालांकि, कोहली ने ये भी माना कि लोगों को इन नए बदलावों को स्वीकार करने में परेशानी नहीं होगी. समाप्त भारतीय कप्तान ने कहा,\"हम सबको ये अजीब लगेगा, मगर इसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने में मुश्किल नहीं होगी.\" आईसीसी के दिशा-निर्देश अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद, आईसीसी ने 22 मई को क्रिकेट के दोबारा शुरू होने के बारे में दिशा-निर्देश जारी किए थे. आईसीसी ने कहा है, \"एक चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर या बायोसेफ़्टी ऑफ़िसर नियुक्त करने के बारे में सोचना चाहिए जो सरकारी नियमों का पालन करवाने और जैव-सुरक्षा की योजना को लागू करवाने के लिए ज़िम्मेदार होगा.\" दिशानिर्देश में साथ ही मैचों से 14 दिन पहले खिलाड़ियों को अलग ट्रेनिंग कैंपों में रखने, उनका तापमान चेक करने, कोविड-19 की जाँच करने, खिलाड़ियों के सामानों के सैनिटाइज़ेशन और सोशल डिस्टैंसिंग का अभ्यास करने की ज़रूरत भी बताई गई. कहा गया कि खेल के मैदानों में खिलाड़ियों और अंपायरों को भी नियमों को मानना होगा जिसका मतलब ये है कि खिलाड़ी अब पहले की भांति अंपायर को टोपी, चश्मा, रूमाल, स्वेटर जैसी चीज़ें नहीं थमा सकेंगे. अंपायरों को भी गेंदों को छूते समय दस्ताने पहनने पड़ सकते हैं. बॉल को सुरक्षित रखने के लिए खिलाड़ियों को उस पर थूक नहीं लगाना होगा, और गेंद को छूने के बाद आँख, नाक, मुँह को नहीं छूना होगा. आईसीसी ने कहा कि यात्रा के लिए चार्टर्ड विमानों और सीटों के बीच सुरक्षित दूरी बनाने पर भी विचार किया जाना चाहिए. मार्च के महीने से ही एक भी अंतरराष्ट्री क्रिकेट मैच नहीं हो सका है. हालाँकि, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ एक सुरक्षित वातावरण में जुलाई में तीन टेस्ट मैचों की सिरीज़ खेलने की योजना बना रहे हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नेपाल में पिछले हफ़्ते आए 7.8 तीव्रता के भूकंप से अब तक पांच हज़ार लोगों की मौत हो गई और हज़ारों लोग घायल हो गए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस भूकंप से नेपाल की कई एतिहासिक धरोहरों को भी काफ़ी नुकसान हुआ. ये है काठमांडू का धरहरा टावर जो भूकंप में ध्वस्त हो गया. इसमें पहली तस्वीर 27 अक्टूबर 1998 की है जबकि दूसरी 26 अप्रैल 2015 की है. काठमांडू घाटी की सात यूनेस्को हेरिटेज साइट्स में से चार को भूकंप से ख़ासा नुकसान हुआ है. काठमांडू के दरबार स्क्वैयर को भी क्षति पहुंची है. यहां 19वीं शताब्दी तक नेपाली राजघराने का आवास था. दरबार स्क्वैयर काठमांडू की 13 फऱवरी 2013 और 27 अप्रैल 2015 की तस्वीरें. भूकंप की वजह से कई इमारतें मलबे में तब्दील हो गईं. काठमांडू का दरबार स्क्वैयर. पहली फरवरी 2015 है और दूसरी 27 अप्रैल 2015 की. समाप्त नौ मंजिला धरहरा टावर की ऊंचाई 60 मीटर थी और इसे 1832 में बनाया गया था. धरहरा टावर का भूकंप के पहले और बाद में सेटेलाइट से लिया गया चित्र. भूकंप के बाद मैदानों और स्टेडियमों में राहत शिविर बनाए गए हैं. अपना घर गंवा चुके लोग यहां आसरा ले रहे हैं. जो लोग घर जाने से डर रहे हैं, उनके लिए भी ये ठिकाना बना हुआ है. काठमांडू स्टेडियम की भूकंप के पहले और बाद में ली गई तस्वीरें. नेपाल के भक्तपुर में भूकंप से आधी से ज़्यादा इमारतों के ध्वस्त होने की ख़बर है. यहां 80 फ़ीसदी मंदिरों को नुकसान हुआ है. भक्तपुर नेपाल की राजधानी काठमांडू के पूर्व में स्थित है. अक्टूबर 2014 और 27 अप्रैल 2015 को ली गई तस्वीरें. भूकंप से प्रभावित नेपाल की मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय बचाव दल और मेडिकल विशेषज्ञ पहुंचे हुए हैं. ये तलाश और राहत अभियान में हिस्सा ले रहे हैं. ये तस्वीरें दरबार स्क्वैयर, भक्तपुर की है जिनमें पहली फरवरी 2015 को ली गई जबकि दूसरी भूकंप के बाद की है. 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उनके ख़िलाफ़ केवल एक आरोप पर ही मुकदमा चलाया गया और वह था उनका तालेबान को मदद देना. उन्होने 1990 के दशक में धर्मपरिवर्तन किया और वे सीएटल में दार-उस-सलाम मसजिद शुरु करने वालों में से एक थे. इस मामले में जाँच के दौरान अमरीकी अधिकारियों ने उनसे लंदन स्थित इस्लामी कट्टरपंथी अबु हम्ज़ा के बारे में भी जानकारी हासिल की थी.\n\nSummary:", "target": "अमरीका में एक ऐसे व्यक्ति को दो साल की कैद की सज़ा सुनाई गई है जिसने अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व तालेबान शासकों की मदद करना स्वीकार किया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवे पिछले कुछ सालों में ही धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बने थे. जेम्स उजामा नाम के 38 वर्षीय व्यक्ति को अमरीका में सन 2002 में गिरफ़्तार किया गया था. उनके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों में से एक अमरीका में 'आतंकवादी' कैंप शुरु करने की योजना बनाना था. जब उन्होंने अपने ख़िलाफ़ चल रही न्यायिक जाँच में सहयोग देना स्वीकार किया तब उनके ख़िलाफ़ लगे कई आरोप नहीं लाए गए. उनके ख़िलाफ़ केवल एक आरोप पर ही मुकदमा चलाया गया और वह था उनका तालेबान को मदद देना. उन्होने 1990 के 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कृष्ण बहादुर महारा ने पत्रकारों को बताया कि उन्होंने इस्तीफ़े दे दिए हैं. नेपाल की आठ पार्टियों की अंतरिम सरकार में माओवादियों को पाँच मंत्री पद दिए गए थे. विवाद माओवादियों की मांग है कि चुनाव से पहले अंतरिम सरकार देश को गणराज्य घोषित करे जबकि गठबंधन के अन्य घटक चुनाव बाद इसकी घोषणा करना चाहते हैं. ग़ौरतलब है कि पिछले साल नेपाल में माओवादी नेताओं ने दशकों पुराने संघर्ष को ख़त्म करते हुए सरकार में शामिल होने का फ़ैसला किया था. नेपाल में नवंबर में चुनाव होने हैं जिसमें राजशाही के भविष्य के बारे में फ़ैसला होगा. संवाददाताओं का मानना है कि इन चुनावों में माओवादी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहने की आशंका व्यक्त की जा रही है. उल्लेखनीय है कि दो साल पहले राजा के ख़िलाफ़ नेपाल की जनता में नाराज़गी बढ़ गई थी और बड़े जन आंदोलन के बाद उन्होंने संसद को बहाल करते हुए अंतरिम सरकार को सत्ता सौंप दी थी.\n\nSummary:", "target": "नेपाल के पूर्व माओवादी विद्रोहियों ने अंतरिम सरकार से अलग होने की घोषणा की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमाओवादियों के एक प्रवक्ता का कहना था 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वाणिज्यिक गतिविधियाँ रोकने और अतिक्रमण हटाने की भी हिदायत दी है. अदालत ने राष्ट्रीय उद्यान मे डीज़ल वाहनों का प्रवेश वर्जित कर दिया है और सीएनजी एवं पेट्रोल वाहनों की ही इज़ाज़त दी है. न्यायालय ने कहा कि इस उद्यान पर राज्य पर्यटन निगम का कोई अधिकार नहीं होगा और आवंटित धनराशि सीधे मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक के नाम ही जाएगी. वन्य जीव कल्याण पर काम कर रहे महेंद्र सिंह कच्छावा कहते हैं,\"जंगली जानवरों की हिफ़ाज़त और परवरिश के लिए यह बहुत ज़रूरी फ़ैसला है.\" रणथंभौर शुष्क पतझड़ी वनों वाला रणथंभौर अरावली और विंध्य पर्वत श्रंखलाओं का मिलन स्थल भी है. कोई 392 वर्ग किलोमीटर में फैले इस राष्ट्रीय उद्यान में बाघ सदियों से पनाह लेते रहे हैं. रियासत काल में यह जयपुर राजघराने का शिकारगाह था. आज़ादी के बाद 1961 में इंग्लैंड की महारानी पूर्व राजपरिवार की अतिथि बनकर आईं तो रणथंभौर में बाघ का शिकार किया गया था. आधिकारिक तौर पर ये कहना मुश्किल है कि वहाँ कितने बाघ हैं. वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक अभी वहाँ 32 बाघ हैं जबकि 13 शावक भी घूमते हुए पाए गए हैं. तीन दिन पहले दो मादा शावक रणथंभौर के एक वीरान कुएं 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(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं. बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान भारत प्रशासित कश्मीर में जारी हिंसा के ख़िलाफ़ वहां के लोगों के साथ एकजुटता जाहिर करने के लिए बुधवार को ब्लैक डे मना रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nस्थानीय टीवी चैनलों पर सुबह के अधिकांश बुलेटिन में देश भर में 'ब्लैक डे' मनाए जाने की ख़बर प्रमुखता से छाई रही. प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भी इस मौके पर कश्मीरियों के साथ एकजुटता जाहिर की. उन्होंने कहा, \"हम कश्मीर के लोगों को कभी भी अकेला नहीं छोड़ेंगे. सभी कूटनीतिक, राजनीतिक और मानवाधिकार मंचों पर हम उनके लिए लड़ेगें.\" नवाज़ शरीफ़ ने भारत प्रशासित कश्मीर में मीडिया पर लगाई गई पाबंदी की आलोचना की. उन्होंने कहा कि भारत कश्मीरियों के दिल पर पाबंदी नहीं लगा सकता, उनकी आवाज को नहीं दबा सकता क्योंकि सोशल मीडिया अब उनकी आवाज बुलंद करने का कारगर हथियार बन चुका है. समाप्त शरीफ़ का ये बयान ऐसे वक़्त में आया है जब भारत प्रशासित कश्मीर में 8 जुलाई को हिज़्बुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत होने के बाद से कश्मीर में लगातार हिंसा और तनाव का माहौल है. बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से अब तक सुरक्षा बलों और नागरिकों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 45 से अधिक लोगों की मौत हो गई है जबकि कई लोग घायल हुए हैं. सरकार ने मंत्रालयों, विभागों और प्रांतीय सरकारों तक को ब्लैक डे मनाने के निर्देश दिए हैं और कहा है कि वे भारत के 'अत्याचार' के ख़िलाफ प्रतिरोध दर्ज करें. यही नहीं, सभी सरकारी अधिकारियों को बांह पर काली पट्टी बांधने को कहा गया है. दोपहर की नमाज़ के बाद कश्मीरियों के लिए विशेष प्रार्थना भी रखी गई. कश्मीर मसले पर दुनिया भर का ध्यान आकर्षित करने के लिए पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में जगह जगह जुलूस और कार्यक्रम भी रखे गए हैं. इस बीच पाकिस्तान ट्विटर पर सुबह से #BlackDay ट्रेंड कर रहा है. यूजर्स ट्वीट के जरिए कश्मीरी 'भाइयों' के प्रति समर्थन और एकजुटता जाहिर कर रहे हैं. 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'अब मैं पटवारी हूँ' सुशील खांडे. सुशील खांडे कहते हैं, “मैंने सरकार की पायलट प्रशिक्षण योजना के लिए अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी थी. लेकिन 89 घंटे की फ़्लाइंग के बाद मेरी पायलट ट्रेनिंग बंद हो गई. न मैं इंजीनियर बना, ना ही पायलट. अब पटवारी हूं.” राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह अब भी गाहे-बगाहे अपने भाषणों में पायलट प्रशिक्षण योजना का उल्लेख करते हैं लेकिन हालत ये है कि बंद हो चुकी प्रशिक्षण योजना के पूरे दस्तावेज़ भी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है. आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त गायत्री नेताम. यहां तक कि प्रशिक्षण ले रहे पूरे बच्चों की संख्या और नाम-पता भी विभाग के पास नहीं है. आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त गायत्री नेतम कहती हैं, “जिन ग़रीब, आदिवासी और पिछड़े बच्चों ने ठीक से ट्रेन नहीं देखी हो, उनके लिए ये कल्पना से परे की योजना थी. इसका बंद हो जाना दुर्भाग्यजनक है.” गायत्री नेतम का कहना है कि प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने वाली साईं फ़्लाईटेक के ख़िलाफ़ उन्होंने पिछले छह महीने में कई बार थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने की कोशिश की. लेकिन हर बार उन्हें काग़ज़ात का हवाला दे कर वापस लौटा दिया जाता है. मोदी से गुहार गायत्री कहती हैं, “हमारी कोशिश है कि साईं फ़्लाईटेक के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो और उससे पैसों की वसूली भी की जाए.” कुछ सरकारी अफ़सरों का कहना है कि सरकार फिर से इस प्रशिक्षण योजना को शुरू कर सकती है. पायलट बनने की उम्मीद मन में पाले बच्चों को भी अफ़सर और नेता यही भरोसा दिला रहे हैं. इसी सप्ताह कुछ प्रशिक्षु पायलटों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘स्किल डेवेलपमेंट’ का हवाला देते हुए, इस योजना को शुरू करने का अनुरोध किया है. लेकिन ऐसे समय में, जबकि राज्य सरकार आदिवासियों और किसानों की तमाम योजनाओं के बजट में भारी कटौती कर रही है, हवाई जहाज़ उड़ाने का प्रशिक्षण अधूरा छोड़ चुके नौजवानों को सरकारी उम्मीद हवा-हवाई ही लग रही है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "जांजगीर-चांपा ज़िले में हिर्री गांव के बलवंत खन्ना को पांच साल पहले जब छत्तीसगढ़ सरकार ने पायलट प्रशिक्षण के लिए चुना तो उन्हें लगा कि उनके सपने अब साकार होने के दिन आ गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबलवंत खन्ना कहते हैं कि पॉयलट ट्रेनिंग के चक्कर में उनकी पढ़ाई भी छूट गई. बलवंत कहते हैं, “बचपन में अपने गांव से कभी कभार आसमान से उड़ते हवाई जहाज़ देख कर मैं ख़ुश हो जाता था. जब पायलट प्रशिक्षण की बात सुनी तो आप सोच नहीं सकते कि मैं कितना ख़ुश था.” बलवंत ने कृषि विश्वविद्यालय की अपनी पढ़ाई छोड़ी और पायलट प्रशिक्षण में शामिल हो गए. लेकिन एक दिन राज्य सरकार ने अचानक प्रशिक्षण योजना बंद कर दी. ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले बेरोज़गार बलवंत कहते हैं, “मैं कहीं का नहीं रहा. ना एग्रीकल्चर की पढ़ाई कर सका और ना ही पायलट बन सका.” समाप्त पढ़ें विस्तार से छत्तीसगढ़ सरकार ने ग़रीब और पिछड़े वर्ग के लिए 2007 में पायलट प्रशिक्षण योजना शुरू की थी. सरकार ने साईं फ़्लाईटेक नामक कंपनी के साथ क़रार किया और बाक़ायदा परीक्षा आयोजित कर के हज़ारों ग़रीब नौजवानों में से योग्य प्रतिभागियों को डेढ़ साल के प्रशिक्षण के लिए चुना. हरेक प्रशिक्षु पायलट के लिए सरकार ने लगभग 14 लाख रुपए का भुगतान कंपनी को किया. पायलट प्रशिक्षण के लिए चुने गए इन नौजवानों की आंखों में सपना था और उस सपने के सच होने की उम्मीद भी. लेकिन प्रशिक्षण पूरा हो पाता, उससे पहले ही प्रशिक्षण देने वाली कंपनी साईं फ़्लाईटेक एक दिन अपना बोरिया बिस्तर बांध कर रवाना हो गई. राज्य सरकार की इस योजना ने दम तोड़ दिया और हर साल पायलट प्रशिक्षण योजना में चुने जाने वाले नौजवानों के चांद-तारों को छूने के सपने तार-तार हो गए. पड़ोसी राज्य झारखंड से भी 30 बच्चों को प्रशिक्षण के लिए भेजा गया लेकिन उन बच्चों का भी प्रशिक्षण अधूरा ही रह गया. मस्तूरी इलाक़े के सुशील खांडे बनना तो चाहते थे पायलट, लेकिन बड़ी मुश्किल से अब पटवारी का काम मिला है. वे गांव-घर में इन दिनों ज़मीन की नाप जोख का काम करते हैं. 'अब मैं पटवारी हूँ' सुशील खांडे. सुशील खांडे कहते हैं, “मैंने सरकार की पायलट प्रशिक्षण योजना के लिए अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी थी. लेकिन 89 घंटे की फ़्लाइंग के बाद मेरी पायलट ट्रेनिंग बंद हो गई. न मैं इंजीनियर बना, ना ही पायलट. अब पटवारी हूं.” राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह अब भी गाहे-बगाहे अपने भाषणों में पायलट प्रशिक्षण योजना का उल्लेख करते हैं लेकिन हालत ये है कि बंद हो चुकी प्रशिक्षण योजना के पूरे दस्तावेज़ भी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है. आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त गायत्री नेताम. यहां तक कि प्रशिक्षण ले रहे पूरे बच्चों की संख्या और नाम-पता भी विभाग के पास नहीं है. आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त गायत्री नेतम कहती हैं, “जिन ग़रीब, आदिवासी और पिछड़े बच्चों ने ठीक से ट्रेन नहीं देखी हो, उनके लिए ये कल्पना से परे की योजना थी. इसका बंद हो जाना दुर्भाग्यजनक है.” गायत्री नेतम का कहना है कि प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने वाली साईं फ़्लाईटेक के ख़िलाफ़ उन्होंने पिछले छह महीने में कई बार थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने की कोशिश की. लेकिन हर बार उन्हें काग़ज़ात का हवाला दे कर वापस लौटा दिया जाता है. मोदी से गुहार गायत्री कहती हैं, “हमारी कोशिश है कि साईं फ़्लाईटेक के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो और उससे पैसों की वसूली भी की जाए.” कुछ सरकारी अफ़सरों का कहना है कि सरकार फिर से इस प्रशिक्षण योजना को शुरू कर सकती है. पायलट बनने की उम्मीद मन में पाले बच्चों को भी अफ़सर और नेता यही भरोसा दिला रहे हैं. इसी सप्ताह कुछ प्रशिक्षु पायलटों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘स्किल डेवेलपमेंट’ का हवाला देते हुए, इस योजना को शुरू करने का अनुरोध किया है. लेकिन ऐसे समय में, जबकि राज्य सरकार आदिवासियों और किसानों की तमाम योजनाओं के बजट में भारी कटौती कर रही है, हवाई जहाज़ उड़ाने का प्रशिक्षण अधूरा छोड़ चुके नौजवानों को सरकारी उम्मीद हवा-हवाई ही लग रही है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली में दो नाबालिग़ बच्चियों के साथ शुक्रवार को सामूहिक बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार नांगलोई के पास दो बाईक सवारों ने एक बच्ची को घर के सामने से अग़वा कर लिया. बाद में ख़ून से लथपथ बच्ची का शरीर पास के पार्क से बरामद किया गया. दूसरे मामले में पांच साल की एक बच्ची के कुकर्म के लिए प्रकाश, रेवती और सीताराम के ख़िलाफ़ मामला दर्ज हुआ है. डिप्टी कमीशनर ऑफ़ पुलिस भैरों सिंह गुर्जर ने बताया कि भारतीय दंड संहिता और पोस्को की धाराओं के तहत आनंद विहार पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया है. केंद्र-दिल्ली में ठनी दोनों बच्चियों का इलाज फ़िलहाल अस्पताल में जारी है. समाप्त दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने ट्वीट कर कहा है कि वे शनिवार को बच्ची से मिली. बच्ची को गंभीर चोट आई है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक ट्वीट संदेश में पूछा है, ''बार-बार बलात्कार की घटनाएं शर्मनाक और चिंताजनक हैं. सुरक्षा देने में दिल्ली पुलिस पूरी तरह नाकाम रही है. प्रधानमंत्री और उनके राज्यपाल क्या कर रहे हैं?'' उन्होंने लिखा है कि मोदी ''या तो मामले में हस्तक्षेप करें या तो वे दिल्ली पुलिस को दिल्ली की जनता की चुनी सरकार को नियंत्रित करने दें. ‘या खुद करो या दूसरों को करने दो’.'' केजरीवाल ने कहा है कि पुलिस का नियंत्रण साल भर के लिए दिल्ली सरकार को दिया जाए अगर उस बीच हालात नहीं बदलते हैं तो फ़ैसला वापस ले लिया जाए. 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भी उन्होंने कोई जानकारी हासिल करने के लिए आवेदन दाखिल किया है, सरकारी अधिकारी आवेदन की भाषा और प्रारूप की कमियों का फायदा उठाकर जानकारी देने से बचते रहे हैं. ऐसे में एक कम पढ़े-लिखे या अशिक्षित व्यक्ति के लिए तो सरकारी विभागों से जानकारी माँगना और भी कठिन काम है. बिहार के मुख्यमंत्री सचिवालय के विशेष सचिव चंचल कुमार ने बीबीसी को बताया, \"इन कॉल सेंटरों को ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर शुरु किया जा रहा है जो या तो अशिक्षित हैं और या फिर उन्हें सूचना माँगने के लिए एक सही आवेदन तैयार करने में दिक्कत होती है.\" चंचल बताते हैं, \"इस योजना के शुरू होने के बाद लोगों को मीलों यात्रा करके ज़िले और राज्य के मुख्यालय तक आवेदन करने के लिए जाने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी. लोगों की ज़रूरत के मुताबिक प्रारूप तैयार करना और संबंधित विभाग तक आवेदन पहुँचाने का जिम्मा इन कॉल सेंटरों का ही होगा.\" इन कॉल सेंटरों को शुरू करने में मदद कर रहे जन संगठनों का कहना है कि ऐसा करने से लोगों के समय और पैसे दोनों की बचत होगी. व्यवहारिक दिक्कतें हालांकि इसे योजना के प्रभावी होने को लेकर कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं. 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ब्रीफ़िंग दी जाएगी जिसमें उन्हें गोपनीय ख़ुफ़िया जानकारी दी जाएगी. ऐसा इसलिए क्योंकि एक हफ़्ता पहले ही राष्ट्रपति के सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू होने की घोषणा हो चुकी है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपनी सीनियर प्रेस टीम में सिर्फ़ महिलाओं को रखा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजेन साकी उनके दफ़्तर का दावा है कि अमेरिका के इतिहास में ये पहली बार हुआ है. इस टीम का नेतृत्व केट बेडिंगफ़ील्ड करेंगी जो पूर्व में बाइडन के कैम्पेन की डिप्टी कम्युनिकेशन डायरेक्टर रही हैं. वहीं, राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में व्हाइट हाउस की कम्युनिकेशन डायरेक्टर रहीं जेन साकी बाइडन की प्रेस सचिव होंगी. बाइडन ने वादा किया है कि वो अपने प्रशासन को विविध बनाएँगे जो देश की विविधता को दर्शाएगा. समाप्त बाइडन ने अपने बयान में कहा, \"'मुझे ये घोषणा करते हुए गर्व हो रहा है कि व्हाइट हाउस की पहली सीनियर कम्युनिकेशन टीम में सब महिलाएँ होंगी. \"ये योग्य, अनुभवी कम्यूनिकेटर्ज़ काम में विविध नज़रिया लेकर आएँगी और इस देश को फिर से बनाने की हम सबकी साझा प्रतिबद्धता के साथ आएँगी.\" निर्वाचित उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की दो मुख्य प्रेस अधिकारी होंगी सिमोन सैंडर्स और ऐश्ली एटीन. कैबिनेट के पदों की तरह प्रेस दफ़्तर को सीनेट की रज़ामंदी की ज़रूरत नहीं होती. चुनाव जीतने के बाद से बाइडन प्रमुख कैबिनेट पदों के लिए अपनी 'पहली पसंद' के नाम सामने रख रहे हैं. पिछले हफ़्ते उन्होंने कहा कि \"उनका चुनाव एक ऐसी टीम होगी जो ये दर्शाएगा कि अमेरिका वापस आ गया है.\" उन्होंने कहा कि उनकी टीम दुनिया का नेतृत्व करने के साथ-साथ अपने देश को सुरक्षित रखेगी. इस बीच रविवार को बाइडन के पैर में हेयरलाइन फ़्रैक्चर हो गया जब वे अपने कुत्ते मेजर के साथ खेलते हुए फ़िसल गए. उनके डॉक्टर केविन ओ कॉनर के मुताबिक़ बाइडन को कई हफ़्तों के लिए एक वॉकिंग बूट पहनना पड़ेगा. आने वाली 20 जनवरी को उन्हें राष्ट्रपति पद की शपथ लेनी है. सोमवार 30 नवंबर को राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें पहली ब्रीफ़िंग दी जाएगी जिसमें उन्हें गोपनीय ख़ुफ़िया जानकारी दी जाएगी. ऐसा इसलिए क्योंकि एक हफ़्ता पहले ही राष्ट्रपति के सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू होने की घोषणा हो चुकी है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 724, "source_item_id": "724", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1753, "clean_index": 648, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:648"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के मुताबिक लड़की को धमकियां मिल रहीं थीं और ब्लैकमेल किया जा रहा था. ये घटना थरपारकर ज़िले के डालान-जो-टर्र गांव में हुई है. पीड़िता ने एक कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली. पुलिस का कहना है कि पीड़िता के परिजनों की शिकायत के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. इस मामले में अब तक एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है. लड़की के पिता का कहना है कि दिन पहले जब रात को उनकी आंख खुली तो देखा कि बेटी बिस्तर पर नहीं है. उन्होंने पड़ोसियों को जगाकर खोजबीन शुरू की. लेकिन उसके पैरों के निशान नहीं मिले. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जब वो लड़की को तलाश करते-करते अभियुक्त के घर की ओर गए तो उन्हें लड़की और उसके पैरों के निशान मिल गए. उन्होंने घर का घेराव किया तो अभियुक्त वहां मौजूद था. समाप्त रेप का मुकदमा लड़की के पिता ने बताया, उस वक्त रात के दो बज चुके थे. उसी समय हमने एक ज़ोरदार आवाज़ सुनी जो पास ही के एक कुएं से आई थी. उन्होंने बताया कि जब हम वहां पहुंचे तो कुएं के पास उसके पैरों के निशान थे. बाद में पुलिस ने पहुंच कर लाश को कुएं से निकाला. ये घटना चेलहार थाना क्षेत्र में हुई है. चेलहार थाने के एसएचओ मुश्ताक़ मलिक का कहना है कि लड़की के परिजनों ने जो शिकायत दी है वही मुकदमा दर्ज किया गया है. उनके मुताबिक, पुलिस को कुएं के आसपास लड़की के अलावा किसी और के पैरों के निशान नहीं मिले. मृतका के पिता के सात बच्चे हैं. उन्होंने बीते साल अपनी 18 साल की बेटी के साथ रेप का मुकदमा दर्ज करवाया था जिसमें तीन लोग अभियुक्त थे. पाकिस्तानी अख़बार डॉन की एक रिपोर्ट के मुताबिक उस समय के एसएसपी अबदुल्लाह अहमद ने कहा था कि मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हुई. पाकिस्तान में हिंदू घरों को क्यों बनाया गया निशाना? हिंदू और मुसलमान पीड़िता के पिता का कहना है कि पुलिस ने उस समय तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार किया था लेकिन उन्हें तीन महीने बाद ही ज़मानत मिल गई थी. इसके बाद से ही वो धमकियां दे रहे थे. उन्होंने दावा किया है कि कोरोना की वजह से उनके मुकदमे की सुनवाई नहीं हो सकी. अब इस मुकदमे में 15 अक्तूबर को परिवार के कलमबंद बयान दर्ज किए जाने थे. पीड़िता भी अपने बयान पर क़ायम थी. उनका कहना है कि, उसे डराने के लिए धमकियां दी जा रहीं थी और दबाव बनाया जा रहा था जिसकी वजह से उसने खुदकुशी कर ली. इस मामले में पीड़िता और अभियुक्त एक ही गांव के हैं. डालान-जो-टर्र गांव भी उन इलाक़ों में शामिल है जहां हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते हैं. जबकि थार रेगिस्तान की तकरीबन आधी आबादी हिंदू है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के सिंध प्रांत के रेगिस्तानी इलाक़े थार में पुलिस के मुताबिक बीते साल कथित तौर पर रेप का निशाना बनने वाली एक हिंदू लड़की ने आत्महत्या कर ली है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के मुताबिक लड़की को धमकियां मिल रहीं थीं और ब्लैकमेल किया जा रहा था. ये घटना थरपारकर ज़िले के डालान-जो-टर्र गांव में हुई है. पीड़िता ने एक कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली. पुलिस का कहना है कि पीड़िता के परिजनों की शिकायत के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. इस मामले में अब तक एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है. लड़की के पिता का कहना है कि दिन पहले जब रात को उनकी आंख खुली तो देखा कि बेटी बिस्तर पर नहीं है. उन्होंने पड़ोसियों को जगाकर खोजबीन शुरू की. लेकिन उसके पैरों के निशान नहीं मिले. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जब वो लड़की को तलाश करते-करते अभियुक्त के घर की ओर गए तो उन्हें लड़की और उसके पैरों के निशान मिल गए. उन्होंने घर का घेराव किया तो अभियुक्त वहां मौजूद था. समाप्त रेप का मुकदमा लड़की के पिता ने बताया, उस वक्त रात के दो बज चुके थे. उसी समय हमने एक ज़ोरदार आवाज़ सुनी जो पास ही के एक कुएं से आई थी. उन्होंने बताया कि जब हम वहां पहुंचे तो कुएं के पास उसके पैरों के निशान थे. बाद में पुलिस ने पहुंच कर लाश को कुएं से निकाला. ये घटना चेलहार थाना क्षेत्र में हुई है. चेलहार थाने के एसएचओ मुश्ताक़ मलिक का कहना है कि लड़की के परिजनों ने जो शिकायत दी है वही मुकदमा दर्ज किया गया है. उनके मुताबिक, पुलिस को कुएं के आसपास लड़की के अलावा किसी और के पैरों के निशान नहीं मिले. मृतका के पिता के सात बच्चे हैं. उन्होंने बीते साल अपनी 18 साल की बेटी के साथ रेप का मुकदमा दर्ज करवाया था जिसमें तीन लोग अभियुक्त थे. पाकिस्तानी अख़बार डॉन की एक रिपोर्ट के मुताबिक उस समय के एसएसपी अबदुल्लाह अहमद ने कहा था कि मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हुई. पाकिस्तान में हिंदू घरों को क्यों बनाया गया निशाना? हिंदू और मुसलमान पीड़िता के पिता का कहना है कि पुलिस ने उस समय तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार किया था लेकिन उन्हें तीन महीने बाद ही ज़मानत मिल गई थी. इसके बाद से ही वो धमकियां दे रहे थे. उन्होंने दावा किया है कि कोरोना की वजह से उनके मुकदमे की सुनवाई नहीं हो सकी. अब इस मुकदमे में 15 अक्तूबर को परिवार के कलमबंद बयान दर्ज किए जाने थे. पीड़िता भी अपने बयान पर क़ायम थी. उनका कहना है कि, उसे डराने के लिए धमकियां दी जा रहीं थी और दबाव बनाया जा रहा था जिसकी वजह से उसने खुदकुशी कर ली. इस मामले में पीड़िता और अभियुक्त एक ही गांव के हैं. डालान-जो-टर्र गांव भी उन इलाक़ों में शामिल है जहां हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते हैं. जबकि थार रेगिस्तान की तकरीबन आधी आबादी हिंदू है. 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'अन्फ़ार्गेटेबल' दौरे की शुरुआत टोरंटो शहर में 18 जुलाई को एक रंगारंग कार्यक्रम के जरिए होगी और उसके बाद भारतीय फ़िल्मों के ये सितारे अपना जलवा बिखेरना शुरु करेंगे. इन सभी कलाकारों ने अपने व्यस्त शूटिंग शेड्यूल से समय निकालकर मुंबई में अपना अभ्यास भी शुरु कर दिया है. ये कलाकार इस अभ्यास के दौरान डॉयलाग से लेकर नृत्य तक के अभ्यास में जुट गए हैं. ऐसा पहली बार होगा जब फ़िल्मी दुनिया के प्रथम परिवार माने जाने वाले बच्चन परिवार के तीन सदस्य अमिताभ, अभिषेक और ऐश्वर्या एक साथ एक ही मंच से दुनिया भर के अपने प्रशंसकों से रूबरू होंगे. अभिषेक का इंतज़ार अभिषेक बच्चन इन दिनों अपनी फ़िल्म 'सरकार राज' के रिलीज़ होने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. उन्होंने बताया,'' जैसा कि इस दौरे का नाम अन्फ़ार्गेटेबल है और ये पूरी दुनिया में भारतीय फ़िल्मों के प्रशंसकों के लिए न भूलने वाला ही अनुभव होगा. हम सभी अपने चाहने वालों के मनोरंजन के लिए पूरी जोर शोर से तैयारी कर रहे हैं. ऐश्वर्या अपनी फ़िल्मों के कुछ गानों के साथ साथ देवदास के डोला रे में माधुरी दीक्षित के साथ परफॉर्म करेंगी.'' उनका कहना था,'' इस दौरे का हिस्सा बनकर मैं काफ़ी खुश हूँ और अपने परिवार के साथ कजरारे गाने पर परफॉर्म करने के साथ साथ अपने दोस्तों अक्षय, माधुरी, प्रीति और रितेश की परफॉर्मेंस को लेकर खास उत्साहित हूँ. ये बहुत ही यादगार दौरा होगा.'' मशहूर अभिनेत्री प्रीति जिंटा और रितेश देशमुख भी इस दौरे की तैयारी में लगे हैं. इस दौरे का ख़ास आकर्षण रहेंगे खिलाड़ी अक्षय कुमार और माधुरी दीक्षित. इन सभी कलाकारों के परफॉर्मेंस के लिए विशेष संगीत देने का काम करेगी संगीत की मशहूर जोड़ी विशाल-शेखर और कोरियोग्राफ़ी का जिम्मा संभालेंगे मशहूर कोरियोग्राफ़र श्यामक डावर.\n\nSummary:", "target": "बच्चन परिवार सहित कई फ़िल्मी कलाकारों का विश्व दौरा ‘अन्फ़ार्गेटेबल’ जुलाई से शुरु होने जा रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस दौरे के पहले चरण में ये फ़िल्मी सितारे टोरंटो, लॉस एंजिल्स, सैनफ्रांसिस्को, लंदन, ऐम्सटर्डम, न्यूयॉर्क, त्रिनिदाद ऐंड टौबोको और हस्टन जैसे दस प्रमुख शहरों में अपने स्टेज परफॉर्मेंस के जरिए दुनिया भर के लोगों का मनोरंजन करेंगे. इस दौरे में अमिताभ, अभिषेक और ऐश्वर्या के अलावा अक्षय कुमार, माधुरी दीक्षित के साथ साथ रितेश देशमुख और प्रीति जिंटा भी शामिल होंगे. 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इस गली में सिर्फ मेरा घर ही बचा है. अब मैं भी यहाँ नहीं रहना चाहती हूँ. नया घर दूर है तो क्या हुआ, मैं अकेले यहाँ पर नहीं रह सकती.\" वो कहती हैं कि ज़्यादातर लोगों को शहर के बाहरी इलाक़ों में बसाया जा रहा है. मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले मोहम्मद यासीन कहते हैं कि झुग्गियों में रहने वालों का पुनर्वास हमेशा से विवाद में घिरा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक मुबंई के 60 प्रतिशत लोग झुग्गियों और झोपड़पट्टियों में रहते हैं. उन्होंने कहा, \"यदि सिर्फ इस वज़ह से कि झुग्गियाँ देखने में अच्छी नहीं लगती उन्हें हटा कर शहर से बाहर कर दिया जाए, यह काफ़ी दुखद है.\"\n\nSummary:", "target": "हवाई जहाज़ों की भीषण आवाज़ 12 वर्षीय सुनीता विश्वकर्मा के लिए मोटर गाड़ियों की आवाज़ों से भी ज़्यादा जानी-पहचानी है. बचपन से उसने हवाई जहाज़ों को उड़ते-उतरते देखा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवह भारत की आर्थिक राजधानी मुबंई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के एक रनवे के नज़दीक वर्षों पुरानी झुग्गी बस्ती में एक छोटे-सी झोपड़ी में रहती है. आज़ाद नगर की संकरी गलियों वाली इस झोपड़पट्टी में कई घर पचास वर्षो से भी ज़्यादा पुराने हैं. इन गलियों में ज़्यादातर छोटी फ़ैक्टरियों में काम करने वाले कामगार रहते हैं. अब सरकार ने एयरपोर्ट की ज़मीन पर अनाधिकृत रूप से 200 एकड़ में फैली इन झुग्गियों को हटाने का फ़ैसला किया है. दशकों से हवाई यात्रा करने वालों के लिए झुग्गियों के ऊपर से हो कर मुबंई के इस रनवे पर उतरना दहशत से भरा अनुभव रहा है. विरोध सुनीता की माँ गीता अपनी बड़ी बेटी गुड़िया के साथ मिलकर नकली गहनों के लिए मनके बनाती है जिससे उनके घर का चूल्हा जलता है. वह कहती हैं, \"काफ़ी समय से हमें यहाँ से दूसरी जगह बसाने की बात चल रही है. हमारे कई पड़ोसी तो गली छोड़ कर जा भी चुके हैं.\" झुग्गी बस्ती में रहने वाले कुछ लोगों ने झुग्गियों को ध्वस्त करने का काफ़ी विरोध किया है. उन्हें डर है कि इससे उन्हें काम करने और बाज़ार में माल बेचने में दिक्कतें आएँगी. साथ ही नई जगह से दूर होने की वज़ह से उनके बच्चों को स्कूल जाने में भी परेशानी होगी. मुबंई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के प्रवक्ता मनीष कालघातगी का कहना है, \"झुग्गियों में रहने वालों को दूसरी जगहों पर बसाया जाएगा. झुग्गियाँ एयरपोर्ट की ज़मीन पर हैं और रन वे काफ़ी नज़दीक है.\" आज़ादनगर के निवासी दिक्कतों के बावज़ूद झुग्गियों को नहीं छोड़ना चाहते हैं. तीन वर्ष पहले मानसून में पूरा रनवे पानी में डूब गया था फिर भी लोगों ने अपनी झुग्गियों को नहीं छोड़ा. आमीना मोहम्मद शेख़ कहती हैं कि बाढ़ ने उन्हें नहीं डराया था लेकिन पड़ोसियों को चुपचाप झोपड़ियों को छोड़ कर जाते देख उन्हें दहशत सी होती है. वो कहती हैं, \"अगर सब लोग चल जाऐँगे तो हम यहाँ क्या करेंगें? 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'दुर्भाग्यपूर्ण' मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद को विधानसभा में बयान देना पड़ा जिसमें उन्होंने इसे 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया. लेकिन उन्होंने कहा कि बस सेवा की शुरुआत कहीं बड़ा क़दम है और हमें इसके ख़राब पक्ष को अधिक तूल नहीं देना चाहिए. लेकिन विपक्ष मुफ़्ती मोहम्मद सईद के बयान से संतुष्ट नहीं था. उसका कहना था कि पाकिस्तान ने 'राज्य के चुने हुए प्रतिनिधियों की बेइज्ज़ती की है.' पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सात अप्रैल को श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस के साथ भारत राजनीतिक नेताओं के जाने के अनुरोध को ठुकरा दिया था. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भारतीय अधिकारियों को भेजे संदेश में कहा था कि यह प्रावधान सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो अपने परिवार के सदस्यों से मिलने के लिए मुज़फ़्फराबाद जाना चाहते हैं. भारत के आठ प्रमुख कश्मीरी राजनीतिक नेताओं ने मुज़फ़्फ़राबाद जाने की अनुमति माँगी थी. इनमें राज्य के उप मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के मंगतराम शर्मा भी शामिल थे. इस बस से मुज़फ़्फ़राबाद जाने की अर्ज़ी देने वालों में शामिल नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व विदेश राज्य मंत्री उमर अब्दुल्ला भी थे. भारतीय विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तानी सरकार को आठ लोगों की सूची भेजी थी और कहा था कि इन लोगों एक अलग वाहन में मुज़फ़्फ़राबाद तक जाने की अनुमति दी जाए.\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर के नेताओं को मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस में स्थान देने से पाकिस्तान के इनकार पर भारत ने कहा है कि वह पाकिस्तान को आपसी संपर्क को बढ़ाने के लिए राज़ी करने का प्रयास करेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमॉरिशस की यात्रा से वापसी पर पत्रकारों से बातचीत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा,'' हमारा मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच आवागमन और विचारों का आदान-प्रदान मुक्त हो रूप से हो. हमारा प्रयास होगा कि पाकिस्तान को लोगों के आपसी संपर्क को जहाँ तक संभव हो, प्रोत्साहित करने के लिए राज़ी किया जाए.'' मनमोहन सिंह ने एक सवाल के जवाब में कहा,'' पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ दोनों देशों के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हम हर मुद्दे पर बातचीत करने के इच्छुक हैं.'' इसके पहले पाकिस्तान के भारतीय नेताओं को श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस में स्थान देने से इनकार करने पर भारत प्रशासित कश्मीर के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. जम्मू- कश्मीर विधानसभा में शनिवार को इस पर जमकर हंगामा हुआ और कार्यवाही थोड़े समय के लिए स्थगित करनी पड़ी थी. 'दुर्भाग्यपूर्ण' मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद को विधानसभा में बयान देना पड़ा जिसमें उन्होंने इसे 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया. लेकिन उन्होंने कहा कि बस सेवा की शुरुआत कहीं बड़ा क़दम है और हमें इसके ख़राब पक्ष को अधिक तूल नहीं देना चाहिए. लेकिन विपक्ष मुफ़्ती मोहम्मद सईद के बयान से संतुष्ट नहीं था. उसका कहना था कि पाकिस्तान ने 'राज्य के चुने हुए प्रतिनिधियों की बेइज्ज़ती की है.' पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सात अप्रैल को श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाली बस के साथ भारत राजनीतिक नेताओं के जाने के अनुरोध को ठुकरा दिया था. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भारतीय अधिकारियों को भेजे संदेश में कहा था कि यह प्रावधान सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो अपने परिवार के सदस्यों से मिलने के लिए मुज़फ़्फराबाद जाना चाहते हैं. भारत के आठ प्रमुख कश्मीरी राजनीतिक नेताओं ने मुज़फ़्फ़राबाद जाने की अनुमति माँगी थी. इनमें राज्य के उप मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के मंगतराम शर्मा भी शामिल थे. इस बस से मुज़फ़्फ़राबाद जाने की अर्ज़ी देने वालों में शामिल नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व विदेश राज्य मंत्री उमर 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ख़बरों के मुताबिक ये सभी उज़्बेक थे. इस्लामाबाद स्थित बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान से सटे पाकिस्तानी इलाक़ों में सैंकड़ों चरमपंथियों का अड्डा है जो तालेबान और अल क़ायदा को समर्थन देते हैं. पाकिस्तान सरकार और उत्तरी वज़ीरिस्तान में तालेबान समर्थक चरमपंथियों ने इलाक़े में अमन कायम करने के लिए पिछले साल एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उत्तरी वज़ीरिस्तान के बुज़ुर्ग क़बायलियों की परिषद जिरगा की पहल पर हुआ यह समझौता अपनी तरह का पहला समझौता है.\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान से सटे पाकिस्तानी इलाक़े वज़ीरिस्तान में एक स्थानीय कबायली नेता के समर्थकों और विदेशी चरमपंथियों के बीच हुई झड़प में 15 लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान से मिल रही ख़बरों के मुताबिक झड़प तब शुरू हुई जब चरमपंथियों ने सरकार समर्थक एक कबायली नेता को जान से मारने की कोशिश की. इस कोशिश में कबायली नेता तो बच निकले लेकिन उनके समर्थकों और हमलावरों के बीच घंटों तक गोलीबारी होती रही. बाद में कबायली शांति समिति ने हस्तक्षेप किया जिससे माहौल शांत करने 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सैनिकों ने पेशावर को खैबर दर्रे से जोड़ने वाले हाइवे पर नाकाबंदी कर दी है. पेशावर से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सेना ने पहाड़ पर बने चरमपंथियों के मोर्चों पर गोलाबारी की है. ख़बर है कि अब तक की गोलाबारी में एक चरमपंथी की मौत हो गई है. माना जा रहा है कि हथियारबंद गुटों का संपर्क अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर स्थित कबायली इलाक़ों से काटने के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है. खैबर दर्रा मुख्य मार्ग है जिससे पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा जुड़ी है. पाक-अफ़गान सीमा पर स्थित इलाक़े तालेबान समर्थक स्थानीय हथियारबंद गुटों का गढ़ माने जाते हैं. इस बीच पाकिस्तानी सेना के लिए मुसीबत बन चुके चरमपंथी बैतुल्ला महसूद ने घोषणा की है कि वे सरकार के साथ चल रही बातचीत को स्थगित कर रहे हैं. महसूद ने सरकार पर अपने वादे से मुकरने का आरोप लगाया है, पाकिस्तान सरकार ने कबायली इलाक़ों से सेना हटाने का आश्वासन दिया था. बैतुल्ला महसूद सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिकों के अपहरण जैसे कई मामलों के लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तानी सेना ने सूबा सरहद की राजधानी पेशावर में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ 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आगे लिखा, \"हम पांच लोग शॉर्क पकड़ने निकले थे और किसी ब्लूफिन ट्यूना को पकड़ने का हमारा इरादा नहीं था. लगभग दो घंटे तक जाल को बिछाए रखने के बाद हमें एक मछली मिली. जब हमने देखा तो पता चला कि वो एक विशाल ट्यूना थी. हमें यकीन नहीं हुआ.\" 226 किलो की थी यह ट्यूना ब्लूफिन ट्यूना संरक्षित प्रजातियों की सूची में शामिल है और ब्रिटिश सरकार ने इसे पकड़ने पर पाबंदी लगा रखी है. ब्रिटिश समुद्र प्रबंधन संस्था के मुताबिक अगर इसे गलती से पकड़ा भी जाता है तो उसे जीवित वापस छोड़ देना चाहिए. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "वेल्स के पामब्रोकेशर में एक इतनी बड़ी मछली जाल में फंसी जिसे देखकर पकड़ने वाले 49 वर्षीय एंड्रयू अलसोप के होश उड़ गए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएंड्रयू अलसोप इस ट्यूना को पकड़ने के दौरान घायल भी हुए. मछली पकड़ने के लिए नेलैंड पहुंचे अलसोप को इसके लिए करीब सवा दो घंटे की मशक्कत करनी पड़ी. यह मछली करीब साढ़े सात फ़ुट लंबी और 226 किलो की थी. हालांकि इस लुप्तप्राय ट्यूना फ़िश को उन्होंने वापस समंदर में छोड़ दिया. 80 लाख रुपये की मछली जब 40 टन मछलियों से पट गई झील करीब साढ़े सात फ़ीट बड़ी थी यह ट्यूना फ़िश उन्होंने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा, \"मैंने सवा दो घंटे के इस संघर्ष में अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी मछली पकड़ी. यह ब्लूफिन ट्यूना वेल्स के समंदर में पकड़ी गई अब तक की सबसे बड़ी मछली है.\" अलसोप ने आगे लिखा, \"हम पांच लोग शॉर्क पकड़ने निकले थे और किसी ब्लूफिन ट्यूना को पकड़ने का हमारा इरादा नहीं था. लगभग दो घंटे तक जाल को बिछाए रखने के बाद हमें एक मछली मिली. जब हमने देखा तो पता चला कि वो एक विशाल ट्यूना थी. हमें यकीन नहीं हुआ.\" 226 किलो की थी यह ट्यूना ब्लूफिन ट्यूना संरक्षित प्रजातियों की सूची में शामिल है और ब्रिटिश सरकार ने इसे पकड़ने पर पाबंदी लगा रखी है. ब्रिटिश समुद्र प्रबंधन संस्था के मुताबिक अगर इसे गलती से पकड़ा भी जाता है तो उसे जीवित वापस छोड़ देना चाहिए. 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कि उसके कुछ कमांडर सेना के उच्च पदों पर नियुक्त हों और पीएलए का अलग स्वरूप भी बना रहे. वहीं पीएलए के का एक धड़ा किसी भी तरह के विलय के ख़िलाफ़ है. उसका मानना है कि पीएलए मूल रूप में ही बनी रहे.\n\nSummary:", "target": "नेपाल में पिछले साल सत्ता में आए माओवादियों और सेना के बीच चल रहा वाकयुद्ध तेज़ हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनेपाल के रक्षामंत्री राम बहादुर थापा ने एक आदेश जारी कर सेना प्रमुख से सेना के लिए जारी भर्ती प्रक्रिया को रोकने को कहा है. सत्तारूढ़ माओवादी और नेपाली सेना 2006 से पहले क़रीब 10 साल तक आपस में लड़ते रहे हैं. नेपाल में पिछले साल अप्रैल में हुए आम चुनाव में माओवादियों ने भारी जीत दर्ज की थी. इसके बाद से ही सेना और माओवादियों के बीच टकराव चल रहा है. बिगड़ते संबंध माओवादी सेना के आयुक्त और अब रक्षामंत्री राम बहादुर थापा और सेना प्रमुख जनरल रुकमांगद कटवाल के बीच संबंध अब सामान्य नहीं रह गए हैं. जनरल रुकमांगद की नियुक्ति उस समय हुई थी जब नेपाल में राजा का शासन था. रक्षामंत्री और सेनाध्यक्ष पहले आपस में नियमित रूप से मिलते 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लगातार बढ़ती रही है और आज चीन दुनिया के सबसे बड़े निर्यातकों में से है. आप दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाएँ, चीन में बनी चीज़ें आपको ज़रूर नज़र आ जाएँगी. विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता चीन की स्थिति और मज़बूत करेगी. उसके उत्पादों को दुनिया भर के देशों में नए बाज़ार मिलेंगे. लेकिन साथ ही उसे अपने बाज़ार भी इन देशों के उत्पादों के लिए खोलने पड़ेंगे. कुछ लोगों का कहना है कि इससे जहाँ निजी क्षेत्र को बल मिलेगा, वहीं देश में बेरोज़गारी और अस्थिरता बढ़ने का भी ख़तरा है. फ़िलहाल देश की कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता पर पहले जैसी ही मज़बूत पकड़ बना रखी है. किसी तरह के भी राजनीतिक विरोध से कड़ाई से निबटा जाता है और विरोधी नेताओं को कड़ा कारावास भुगतना पड़ता है. मानवाधिकार संस्थाओं का आरोप है कि चीन में अब भी हर वर्ष कई लोगों को मौत की सज़ा दी जाती है. इसके अलावा तिब्बत पर चीन के शासन को लेकर भी विवाद है. आलोचकों का कहना है कि चीनी अधिकारी एक सोची-समझी रणनीति के तहत तिब्बत की बौद्ध संस्कृति को बर्बाद कर रहे हैं और निर्वासन में रह रहे तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के समर्थकों को तंग कर रहे हैं. नेता मार्च 2003 में चीन की नेशनल पीपुल्स काँग्रेस ने जब हु जिंताओ को राष्ट्रपति चुना तो उनके बारे में बहुत कुछ पता नहीं था. जिंताओ 1964 से कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं और सत्तर के दशक में उनके कैरियर में अचानक तेज़ी आई. अस्सी के दशक में वे ग्वीज़ू और तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे. वर्ष 1992 में उन्हें पार्टी पोलित ब्यूरो का सबसे कम उम्र वाला सदस्य बनने का मौक़ा मिला. इस नियुक्ति से पार्टी में उनके भविष्य का इशारा मिल गया था लेकिन 2002 में हू जिंताओ को आधिकारिक तौर पर पार्टी का नेता चुन लिया गया. हू जिंताओ का जन्म 1942 में अनहुई प्रांत में हुआ था. उन्होंने बीजिंग विश्विद्यालय में हाइड्रोइलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग पढ़ी और इसके बाद जल मंत्रालय में काम करना शुरू किया. कहा जाता है कि उन्हें नाचने और टेबल-टेनिस खेलने का शौक़ है. कम्युनिस्ट पार्टी के वफ़ादारी के अलावा उनकी याददाश्त और उनका दिमाग और राजनितिक समझ उनकी सफलता का कारण मानी जाती है. संचार माध्यम चीन में समाचार माध्यमों पर कड़ा नियंत्रण है. इसके अलावा सरकार विदेशी प्रसारकों के रेडियो चैनल और वेबसाइट को चीन में सुने या देखे जाने से रोकती है. चीनी जनता के लिए टेलीविज़न ही समाचार का मुख्य माध्यम है और इस क्षेत्र में मुक़ाबला कड़ा है – ख़ासकर शहरों में. अधिकारियों के अनुसार 2002 में टीवी देखने वालों की संख्या 1.1 अरब थी. इसके अलावा सैटेलाइट और केबल टेलीविज़न देखने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2010 तक ऐसे लोगों की संख्या 12.8 करोड़ तक पहुँच जाने की संभावना है. वैसे इस तरह के चैनलों की संख्या अभी कम ही है. एओएल टाइम वार्नर, रूपर्ट मर्डॉक की न्यूज़क़ॉर्प के अलावा फ़िनिक्स टीवी को अपने चैनल दिखाने की अनुमति है. बदले में चीनी सेंट्रल टीवी के अंग्रेज़ी भाषा के कार्यक्रम ब्रिटेन और अमरीका में देखे जा सकते हैं. चीन का कहना है वो सिर्फ़ ऐसे चैनल दिखाने की अनुमति देगा जिससे उसकी “सुरक्षा” को ख़तरा न हो. चीन में इंटरनेट पर भी नियंत्रण है लेकिन इसके बावजूद इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या पिछले साल के मध्य तक लगभग सात करोड़ पहुँच चुकी थी. बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार संगठनों की वेबसाइट के अलावा मानवाधिकार गुटों और फ़ालुनगॉन्ग धार्मिक समुदाय की वेबसाइटों पर भी पाबंदी है.\n\nSummary:", "target": "दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले देश चीन का इतिहास चार हज़ार वर्ष से अधिक पुराना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकागज़, बारूद, कपास और कागज़ी मुद्रा जैसी चीज़ें, जिन्हें आधुनिक समाज की नींव समझा जाता है, सबसे पहले चीन ही में देखने में आईं. माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन में साम्यवाद की स्थापना हुई. साम्यवाद के पहले दो दशकों में अर्थव्यवस्था में बहुत प्रगति देखने को नहीं मिली. लेकिन अस्सी के दशक से शुरू हुई उदारीकरण की प्रक्रिया ने चीन को दुनिया की सबसे तेज़ी से विकास कर रही अर्थव्यवस्था बना दिया है. चीन सरकार ने सबसे पहले सामूहिक खेती समाप्त कर निजी क्षेत्र को इस क्षेत्र में आने का मौक़ा दिया. इसके बाद से चीनी अर्थव्यवस्था में निजी कंपनियों की भागेदारी लगातार बढ़ती रही है और आज चीन दुनिया के सबसे बड़े निर्यातकों में से है. आप दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाएँ, चीन में बनी चीज़ें आपको ज़रूर नज़र आ जाएँगी. विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता चीन की स्थिति और मज़बूत करेगी. उसके उत्पादों को दुनिया भर के देशों में नए बाज़ार मिलेंगे. लेकिन साथ ही उसे अपने बाज़ार भी इन देशों के उत्पादों के लिए खोलने पड़ेंगे. कुछ लोगों का कहना है कि इससे जहाँ निजी क्षेत्र को बल मिलेगा, वहीं देश में बेरोज़गारी और अस्थिरता बढ़ने का भी ख़तरा है. फ़िलहाल देश की कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता पर पहले जैसी ही मज़बूत पकड़ बना रखी है. किसी तरह के भी राजनीतिक विरोध से कड़ाई से निबटा जाता है और विरोधी नेताओं को कड़ा कारावास भुगतना पड़ता है. मानवाधिकार संस्थाओं का आरोप है कि चीन में अब भी हर वर्ष कई लोगों को मौत की सज़ा दी जाती है. इसके अलावा तिब्बत पर चीन के शासन को लेकर भी विवाद है. आलोचकों का कहना है कि चीनी अधिकारी एक सोची-समझी रणनीति के तहत तिब्बत की बौद्ध संस्कृति को बर्बाद कर रहे हैं और निर्वासन में रह रहे तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के समर्थकों को तंग कर रहे हैं. नेता मार्च 2003 में चीन की नेशनल पीपुल्स काँग्रेस ने जब हु जिंताओ को राष्ट्रपति चुना तो उनके बारे में बहुत कुछ पता नहीं था. जिंताओ 1964 से कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं और सत्तर के दशक में उनके कैरियर में अचानक तेज़ी आई. अस्सी के दशक में वे ग्वीज़ू और तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे. वर्ष 1992 में उन्हें पार्टी पोलित ब्यूरो का सबसे कम उम्र वाला सदस्य बनने का मौक़ा मिला. इस नियुक्ति से पार्टी में उनके भविष्य का इशारा मिल गया था लेकिन 2002 में हू जिंताओ को आधिकारिक तौर पर पार्टी का नेता चुन लिया गया. हू जिंताओ का जन्म 1942 में अनहुई प्रांत में हुआ था. उन्होंने बीजिंग विश्विद्यालय में हाइड्रोइलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग पढ़ी और इसके बाद जल मंत्रालय में काम करना शुरू किया. कहा जाता है कि उन्हें नाचने और टेबल-टेनिस खेलने का शौक़ है. कम्युनिस्ट पार्टी के वफ़ादारी के अलावा उनकी याददाश्त और उनका दिमाग और राजनितिक समझ उनकी सफलता का कारण मानी जाती है. संचार माध्यम चीन में समाचार माध्यमों पर कड़ा नियंत्रण है. इसके अलावा सरकार विदेशी प्रसारकों के रेडियो चैनल और वेबसाइट को चीन में सुने या देखे जाने से रोकती है. चीनी जनता के लिए टेलीविज़न ही समाचार का मुख्य माध्यम है और इस क्षेत्र में मुक़ाबला कड़ा है – ख़ासकर शहरों में. अधिकारियों के अनुसार 2002 में टीवी देखने वालों की संख्या 1.1 अरब थी. इसके अलावा सैटेलाइट और केबल टेलीविज़न देखने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2010 तक ऐसे लोगों की संख्या 12.8 करोड़ तक पहुँच जाने की संभावना है. वैसे इस तरह के चैनलों की संख्या अभी कम ही है. एओएल टाइम वार्नर, रूपर्ट मर्डॉक की न्यूज़क़ॉर्प के अलावा फ़िनिक्स टीवी को अपने चैनल दिखाने की अनुमति है. बदले में चीनी सेंट्रल टीवी के अंग्रेज़ी भाषा के कार्यक्रम ब्रिटेन और अमरीका में देखे जा सकते हैं. चीन का कहना है वो सिर्फ़ ऐसे चैनल दिखाने की अनुमति देगा जिससे उसकी “सुरक्षा” को ख़तरा न हो. चीन में इंटरनेट पर भी नियंत्रण है लेकिन इसके बावजूद इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या पिछले साल के मध्य तक लगभग सात करोड़ पहुँच चुकी थी. बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार संगठनों की वेबसाइट के अलावा मानवाधिकार गुटों और फ़ालुनगॉन्ग धार्मिक समुदाय की वेबसाइटों पर भी पाबंदी है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 734, "source_item_id": "734", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3407, "clean_index": 657, 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लखनऊ के 10 हज़ार स्कूली बच्चों को मुफ्त लैपटॉप मिल चुके हैं जबकि 14,900,00 लाख हज़ार अभी कतार में हैं. हुसैनगंज इलाक़े में रहने वाली निकिता द्विवेदी शहर के प्रतिष्ठित नेशनल कॉलेज में पढ़ती हैं. उन्हें भी सरकार से एक नया लैपटॉप मुफ्त मिला है, लेकिन निकिता एक बात से ख़ासी नाराज़ हैं. उन्होंने कहा, \"मुफ्त लैपटॉप देने से क्या होता है? इसमें जो स्क्रीन सेवर है उसे हम कभी भी बदल नहीं सकते. लैपटॉप चालू होते ही इसमें मुलायम सिंह यादव और अखिलेश का चेहरा सामने आता है. मैं चाह कर भी इसमें अपने परिवार या पसंदीदा फ़िल्मी सितारे की तस्वीर नहीं लगा सकती\". इस्तेमाल सरकार कहती है लैपटॉप बेचने की कोशिश पर नकेल कसी जाएगी. हजारों करोड़ रूपए के ख़र्च पर अमल की जाने वाली इस योजना के शुरू होते ही इसके गलत इस्तेमाल पर सवाल भी उठ रहे हैं. ख़बरों के अनुसार मुफ्त लैपटॉप की पहली खेंप बंटने के अगले दिन ही कई छात्र इन्हें बेचने के इरादे से लखनऊ की कंप्यूटर ब्लैक मार्केट पहुँच गए. सरकार ने इस बात का पता चलते ही कड़ी कानूनी कार्रवाई का फरमान भी जारी कर दिया. उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री अभिषेक मिश्रा ने इस बात को स्वीकार किया कि उनके पास भी ऐसी शिकायतें पहुंची थी. उन्होंने बताया, \"किसी भी दुकानदार ने इन्हें सस्ते दामों पर खरीदने से मना कर दिया था. बच्चों और उनके अभिवाकों को साफ़ तौर से बता भी दिया गया है कि ये पहल प्रदेश में बच्चों की विज्ञान और तकनीक से कदमताल के लिए शुरू की गई है और इसमें कोई छिपा मकसद नहीं है.\" लेकिन खुद नए लैपटॉप के मालिक बने कई बच्चे इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. निकिता द्विवेदी ने कहा, \"सभी को पता है कि करोड़ों खर्च करके हमें ये क्यों दिए गए हैं. अगले चुनावों में हम सभी वोट जो करेंगे!\" मकसद के साथ साथ सरकार के सामने अभी तो पूरे राज्य में लाखों लैपटॉप और टैबलेट कंप्यूटरों के वितरण की भी चुनौती है. असल तस्वीर तब सामने आएगी जब ग्रामीण इलाकों में इन महँगी मशीनों को मुफ्त में बांटा जाएगा. ( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तान्या सक्सेना की ज़िंदगी में इन दिनों सुकून है. उन्होंने पिछले वर्ष कक्षा 12 पास करके कॉलेज में प्रवेश किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतान्या से ज़्यादा उनके परिवार के लोग उनका लैपटॉप इस्तेमाल करते हैं. लखनऊ के राजाजीपुरम इलाक़े में रहने वाली 17 वर्ष की तान्या उन ख़ुशकिस्मत छात्रों में से एक हैं, जिन्हें मुफ्त में लैपटॉप मिले हैं. उन्होंने बताया, \"जब हमारे स्कूल में मुफ्त लैपटॉप मिलने की सूचना पहुंची तो हम सबको लगा पता नहीं मिलेगा भी या नहीं. लेकिन जब मिला तब यकीन ही नहीं हुआ.\" अपनी ज़रूरतों पर तान्या कहतीं है, \"हाँ मुझे फायदा तो है, पापा के लिए इस लैपटॉप से बिजनेस का काम आसान हो गया है. छोटा भाई भी इस पर काम करता है. लेकिन हाँ, अगर ये नहीं भी मिला होता तब भी ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि हम एक नया लैपटॉप लेने की सोच ही रहे थे.\" चुनावी वादा निकिता के पास पहले से ही घर में कंप्यूटर था. इन दिनों सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टीं राज्य के छात्रों को चुनावों के पहले लैपटॉप और टैबलेट कंप्यूटर देने का वादा निभा रही है. सरकार ने 15 लाख लैपटॉप और लगभग 26 लाख टैबलेट मुफ्त बांटने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. राजधानी लखनऊ के 10 हज़ार स्कूली बच्चों को मुफ्त लैपटॉप मिल चुके हैं जबकि 14,900,00 लाख हज़ार अभी कतार में हैं. हुसैनगंज इलाक़े में रहने वाली निकिता द्विवेदी शहर के प्रतिष्ठित नेशनल कॉलेज में पढ़ती हैं. उन्हें भी सरकार से एक नया लैपटॉप मुफ्त मिला है, लेकिन निकिता एक बात से ख़ासी नाराज़ हैं. उन्होंने कहा, \"मुफ्त लैपटॉप देने से क्या होता है? इसमें जो स्क्रीन सेवर है उसे हम कभी भी बदल नहीं सकते. लैपटॉप चालू होते ही इसमें मुलायम सिंह यादव और अखिलेश का चेहरा सामने आता है. मैं चाह कर भी इसमें अपने परिवार या पसंदीदा फ़िल्मी सितारे की तस्वीर नहीं लगा सकती\". इस्तेमाल सरकार कहती है लैपटॉप बेचने की कोशिश पर नकेल कसी जाएगी. हजारों करोड़ रूपए के ख़र्च पर अमल की जाने वाली इस योजना के शुरू होते ही इसके गलत इस्तेमाल पर सवाल भी उठ रहे हैं. ख़बरों के अनुसार मुफ्त लैपटॉप की पहली खेंप बंटने के अगले दिन ही कई छात्र इन्हें बेचने के इरादे से लखनऊ की कंप्यूटर ब्लैक मार्केट पहुँच गए. सरकार ने इस बात का पता चलते ही कड़ी कानूनी कार्रवाई का फरमान भी जारी कर दिया. उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री अभिषेक मिश्रा ने इस बात को स्वीकार किया कि उनके पास भी ऐसी शिकायतें पहुंची थी. उन्होंने बताया, \"किसी भी दुकानदार ने इन्हें सस्ते दामों पर खरीदने से मना कर दिया था. बच्चों और उनके अभिवाकों को साफ़ तौर से बता भी दिया गया है कि ये पहल प्रदेश में बच्चों की विज्ञान और तकनीक से कदमताल के लिए शुरू की गई है और इसमें कोई छिपा मकसद नहीं है.\" लेकिन खुद नए लैपटॉप के मालिक बने कई बच्चे इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. निकिता द्विवेदी ने कहा, \"सभी को पता है कि करोड़ों खर्च करके हमें ये क्यों दिए गए हैं. अगले चुनावों में हम सभी वोट जो करेंगे!\" मकसद के साथ साथ सरकार के सामने अभी तो पूरे राज्य में लाखों लैपटॉप और टैबलेट कंप्यूटरों के वितरण की भी चुनौती है. असल तस्वीर तब सामने आएगी जब ग्रामीण इलाकों में इन महँगी मशीनों को मुफ्त में बांटा जाएगा. 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मज़दूरों को धोखाधड़ी से गुर्दा बेचने को राज़ी किया जाता था. तथाकथित रूप से मज़दूरों को इसके लिए क़रीब एक लाख रूपए तक दिए जाते थे. माना जा रहा है कि गुर्दा के ख़रीदार धनी भारतीय और कुछ विदेशी नागरिक होते हैं जिन्हें गुर्दा प्रतिरोपण की शीघ्र ज़रूरत होती है. वे इसके लिए मोटी रक़म भी देने को तैयार रहते हैं. एक पीड़ित व्यक्ति से मिली सूचना के बाद पुलिस ने पिछले हफ़्ते गुडगाँव स्थित उस अवैध क्लिनिक पर छापा मारा था. पुलिस ने इस मामले में शामिल चार लोगों को गिरफ़्तार किया है लेकिन तथाकथित रूप से जो डॉक्टर मुख्य रूप से इस धंधे के पीछे है वह फ़रार है. उन्होंने कहा कि पुलिस संदिग्ध डॉक्टर के गिरफ़्तारी के लिए इंटरपोल से एक वारंट ज़ारी करवाने के बारे में भी सोच रही है.\n\nSummary:", "target": "मानव अंगों के कारोबार के मामले में कथित रूप से शामिल एक डॉक्टर के ख़िलाफ़ भारतीय पुलिस ने अलर्ट ज़ारी किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nगुड़गाँव के पुलिस कमिश्नर मोहिंदर लाल ने बीबीसी को बताया कि संदिग्ध डॉक्टर को देश छोड़ कर भागने से रोकने के लिए हवाई अड्डों पर 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वास्तविक संख्या से कहीं कम है क्योंकि इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण वाले तमाम इलाकों तक पहुंचा नहीं जा सका है. रिपोर्ट के मुताबिक इराक़ में जारी संघर्ष के चलते 30 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए हैं और हज़ारों लोगों का इस्लामिक स्टेट ने अपहरण किया है. समाप्त यूएन की इस रिपोर्ट में इराकी सुरक्षा बलों और कुर्द लड़ाकों की हिंसा का भी ज़िक्र किया गया है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त ज़ाइद राद अल हुसैन का कहना है कि इस रिपोर्ट से पता चलता है कि इराकी शरणार्थी किन भयावह चीज़ों से भाग कर यूरोप आने की कोशिश करते हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इराक़ पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, इराक़ में नागरिकों के ख़िलाफ़ हिंसा के आंकड़े चौंका देने वाले हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो सालों में 18 हजार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. रिपोर्ट में चरमपंथी इस्लामिक स्टेट संगठन पर सुव्यवस्थित हिंसा का आरोप लगाया गया है जिनमें से कुछ तो नरसंहार के बराबर हैं. रिपोर्ट के अनुसार ये संख्या भी वास्तविक संख्या से कहीं कम है क्योंकि इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण वाले तमाम इलाकों तक पहुंचा नहीं जा सका है. रिपोर्ट के मुताबिक इराक़ में जारी संघर्ष के चलते 30 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए हैं और हज़ारों लोगों का इस्लामिक स्टेट ने अपहरण किया है. समाप्त यूएन की इस रिपोर्ट में इराकी सुरक्षा बलों और कुर्द लड़ाकों की हिंसा का भी ज़िक्र किया गया है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त ज़ाइद राद अल हुसैन का कहना है कि इस रिपोर्ट से पता चलता है कि इराकी शरणार्थी किन भयावह चीज़ों से भाग कर यूरोप आने की कोशिश करते हैं. 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'कितनी दूर है मौर्य होटल' रैली में चल रहे लोगों से बातचीत करने के दौरान किसी ने मुझसे पूछा, \"कितनी दूर है मौर्य होटल?\" इसपर साथ के किसी साथी ने बताया, \"हमें तो जंतर मंतर तक जाना है. वहाँ से आगे पुलिस जाने ही नहीं देगी.\" शायद सच भी यही है कि सुरक्षा की तैयारियों के मद्देनज़र देखें तो रैली स्थल से बुश के ठहरने की जगह यानी मौर्य होटल की दूरी उतनी ही है, जितनी कि वाशिंगटन की. जिस वक्त दिल्ली की सड़कों पर इन प्रदर्शनों का वामदल नेतृत्व कर रहे थे, उसी वक्त वामदलों के समर्थन वाली सरकार के मुखिया, मनमोहन सिंह अमरीकी राष्ट्रपति के साथ तमाम नए संबंधों को अंतिम रूप दे रहे थे. बहरहाल, तमाम विरोध-प्रदर्शनों के बीच भारत-अमरीका के बीच संबंधों का विस्तार जारी है.\n\nSummary:", "target": "अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के भारत पहुँचने के दूसरे दिन जिस वक़्त दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में बुश और भारत के प्रधानमंत्री के बीच बातचीत हो रही थी, उसी समय दिल्ली की सड़कों पर बुश विरोधी नारे गूँज रहे थे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजंतर-मंतर पर हज़ारों की तादाद में इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारियों की रैली को संबोधित करते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव, प्रकाश कारत ने कहा, \"मैं मनमोहन सिंह को चेतावनी देता हूँ कि स्वतंत्र विदेश नीति से अलग न हों वरना देश की जनता उनसे अलग हो जाएगी.\" उन्होंने कहा कि भारत पिछले 50 वर्षों से अपनी आत्मनिर्भरता के साथ परमाणु क्षेत्र में विकास करता रहा है पर अमरीका उस स्वतंत्रता को ख़त्म करने का दबाव डाल रहा है. रैली में पहुँचे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कहा, \"आज तमाम वामदलों और अन्य संगठनों का यह प्रदर्शन प्रतीकात्मक ही है. हमें समझना होगा कि कांग्रेस और भाजपा की नीतियाँ एक जैसी ही हैं. मैं देश के हित में अपनी सरकार तक कुर्ब़ान करने को तैयार हूँ.\" रैली में प्रकाश कारत, एबी बर्धन, डी राजा, सीताराम येचुरी, दीपांकर भट्टाचार्य समेत कई वाम नेताओंने हिस्सा लिया. इसके अलावा समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह, रामगोपाल यादव, अखिलेश यादव और अमर सिंह भी बुश विरोधी रैली में आए. विरोध दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में गुरुवार सुबह से ही हज़ारों की तादाद में प्रदर्शनकारी इकट्ठा होने लगे. इनमें वामपंथी दलों, समाजवादी पार्टी और जनता दल सेक्युलर के कई कार्यकर्ताओं समेत कई जन संगठनों, मजदूर यूनियनों, रंगकर्मियों, आदिवासी समूहों और छात्रों ने हिस्सा लिया. रामलीला मैदान से बुश विरोधी बैनरों, मुखौटों और झंडों के साथ रैली निकाली गई जो जंतर-मंतर तक आई. कहीं गीत तो कहीं नारे, पर सभी स्वरों में एक ही बात थी- 'हत्यारे बुश, वापस जाओ'. कई रंगकर्मी अपने समूहों में आए थे और बुश के ख़िलाफ़ तमाम नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन भी चल रहा था. कुछ आदिवासी समूहों ने भी बुश के ख़िलाफ़ अपनी पारंपरिक पोशाकों में विरोध प्रदर्शन किया. 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‘सितारों को हटाओ भारत को बचाओ’ जैसी बहसें चल रही थीं. लेकिन 16 महीने पहले हालात बिल्कुल अलग थे. भारत इंग्लैंड में नंबर एक टेस्ट टीम के रुप में पहुंचा था. धोनी की कप्तानी में भारत ने 11 टेस्ट श्रृंखलाएं जीती थीं. \"बहुत से लोग हार से ज़्यादा हारने के तरीके से परेशान हैं. भारत ने तीन बार टॉस जीता. मुंबई में उन्हें मनपसंद पिच मिली. कोलकाता में भी अच्छी पिच थी लेकिन वो इसका फ़ायदा नहीं उठा पाए.\" राहुल द्रविड़ लेकिन उसके बाद से भारत ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया से चार-शून्य से श्रृंखलाएं हारी हैं. राहुल द्रविड़ का कहना है कि लोगों का क्रोधित होना जायज़ है. बीबीसी के कार्यक्रम टेस्ट मैच स्पेशल को द्रविड़ ने बताया, “बहुत से लोग हार से ज़्यादा हारने के तरीके से परेशान हैं. भारत ने तीन बार टॉस जीता. मुंबई में उन्हें मनपसंद पिच मिली. कोलकाता में भी अच्छी पिच थी लेकिन वो इसका फ़ायदा नहीं उठा पाए. ” कोलकाता में हार के बाद चयनकर्ताओं ने युवराज और ज़हीर ख़ान के आख़िरी टेस्ट मैच की टीम में जगह नहीं दी है. उनकी जगह परविंदर अवाना और रविंद्र जडेजा को लिया गया है. सीख दोनों ने ही अब तक कोई टेस्ट मैच नहीं खेला है. जडेजा ने फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट में तीन तिहरे शतक लगाए हैं लेकिन द्रविड़ मानते हैं कि घेरलू क्रिकेट टेस्ट मैच खेलने से बिल्कुल अलग है. द्रविड़ ने कहा, “इंग्लैंड ने भारतीय क्रिकेट को आइना दिखाया है. अनके सामने खड़ी चुनौतियों के बारे में. हमें समझना होगा कि भारतीय टीम मुश्किल दौर में है. अच्छी टेक्नीक वाले युवा खिलाड़ियों को पहचानना और प्रोत्साहित करना सीखना होगा. ” द्रविड़ को सबसे बड़ी चिंता भारतीय स्पिन अटैक है. टीम को अनिल कुंबले और हरभजन सिंह जैसे स्पिनर अब नहीं मिल रहे हैं. रविचंद्रन अश्विन और प्रज्ञान ओझा पर तो इंग्लैंड के मॉन्टी पनेसर और ग्रैम स्वॉन ही भारी पड़ रहे हैं. द्रविड़ के अनुसार नागपुर टेस्ट में जो भी हो लेकिन भारत को अब इसी श्रृंखला से सीख लेनी चाहिए ताकि वो एक बार फिर नंबर एक की टेस्ट टीम बन पाए. इसे भी पढ़ें टॉपिक\n\nSummary:", "target": "जिस मैदान पर भारतीय क्रिकेट को सबसे बड़ी जीत मिली थी, उसी मैदान पर उसे सबसे शर्मनाक हार मिली.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसैम शेरिंघम बीबीसी खेल संवाददाता धोनी की भी ख़ूब आलोचना हो रही है. 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किनारे ये रिकॉर्ड बनाने का प्रयास किया जाएगा. आयोजन कर रही कंपनी लाउड बीटल के 22 साल के प्रमुख अहमर ख़ान के लिए डल झील के किनारे एक मील लंबा दस्तरख़ान बिछाने के बजाए श्रीनगर में शाम की संस्कृति को बढ़ावा देवा ज़्यादा अहम है. अहमर कहते हैं, \"ये भूतहा शहर जैसा हो जाता है. सूरज छिपते ही लोग गायब हो जाते हैं और सड़के सूनी हो जाती हैं. मेरे पिता मुझे याद दिलाते रहते हैं कि किसी ज़माने में कश्मीर की शामें कितनी ख़ूबसूरत हुआ करती थीं. मैं ज़िंदग़ी की उस ख़ूबसूरती को वापस लौटाना चाहता हूँ.\" अहमर और उनके चार सहयोगी क़रीब 500 स्वयंसेवकों का सहयोग जुटाने में कामयाब रहे हैं. समाप्त ये लोग अब तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं. डल झील के किनारे एक मील लंबा दस्तरख़ान बिछाया जा रहा है. एशिया में सबसे लंबी इफ़्तार शाम को जब सूरज छुपेगा और रोज़ा इफ़्तार का वक़्त होगा तो एशिया की सबसे लंबी इफ़्तार पार्टी का रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की जाएगी. इस इफ़्तार में क़रीब तीन हज़ार लोग शामिल हो सकते हैं. यह एशिया की सबसे बड़ी इफ़्तार पार्टी होगी. दुबई में इफ़्तार के लिए सवा किलोमीटर लंबी मेजें सजाई गईं थीं. श्रीनगर में 1.7 किलोमीटर लंबा दस्तरख़ान सजाया जा रहा है. इफ़्तार में सभी वर्गों के लोगों के शामिल होने की उम्मीद है. एलेक्सेंड्रिया मे 26 जून को तीन किलोमीटर लंबी इफ़्तार का आयोजन किया गया था. अहमर का कहना है कि उन्होंने खुले में इफ़्तार करने की अनुमति लेने के सिवा सरकार से किसी भी तरह की मदद नहीं ली है. उन्होंने कहा, \"मेरे दोस्त और उद्यमी व्यवस्था करने में मदद कर रहे हैं. हमने खजूर, जूस और फ्राइड राइस की व्यवस्था की है.\" उन्होंने कहा कि कुछ निजी ऑपरेटरों ने लोगों के आने-जाने में मदद करने की पेशकश की है. श्रीनगर की सूनसान शामें अहमर ख़ान कहते हैं कि वो श्रीनगर की ख़ूबसूरत शामें लौटाना चाहते हैं. 1989 में कश्मीर में भारतीय प्रशासन के ख़िलाफ़ व्यापक सशस्त्र विद्रोह हुआ था. 1990 के दशक में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में प्रशिक्षित कश्मीरी लड़ाके भारतीय सेना के ख़िलाफ़ हमले करते थे. इसके बाद से कश्मीर में लंबे कर्फ्यू लगना आम बात हो गई. युद्ध जैसी स्थितियों में कश्मीरी लोगों को दिन ढलने से पहले घर लौटने की आदत हो गई. कश्मीर में हिंसा अभी भी जारी है हालांकि घटनाएं ज़्यादातर दूरस्थ इलाक़ों में होती हैं. बड़े शहर और क़स्बों में कुछ हद तक शांति हैं. मुसलमान सूरज छिपने के बाद ही रोज़ा खोलते हैं. इसे ही इफ़्तार कहा जाता है. लेकिन बावजूद इसके जल्द घर लौटने की लोगों की आदत बनी हुई है. आयोजन में मदद कर रहे शकील हसन कहते हैं, \"ये हालात बदलने चाहिए क्योंकि ये हमारे समाज के लिए अच्छे नहीं हैं. हमें इस बात की फ़िक्र नहीं है कि हम दुबई का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे या नहीं. हम चाहते हैं कि इसके बाद लोगों में शाम के वक़्त घर से निकलने का ट्रेंड शुरू हो. कश्मीर शाम के बाद मुर्दा सा लगता है. अब ये हालात बदलने चाहिए.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर में संयुक्त अरब अमरीत में बने सबसे लंबी इफ़्तार पार्टी का रिकॉर्ड तोड़ने की तैयारी की जा रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nश्रीनगर की डल झील के किनारे एशिया की सबसे लंबी इफ़्तार पार्टी की तैयारी की जा रही है. शनिवार शाम को श्रीनगर की डल झील के किनारे ये रिकॉर्ड बनाने का प्रयास किया जाएगा. 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Hindi.\n\nText:\nलेकिन सालों से चल रहे ओलंपिक खेलों की भावना क़ायम है. सिटियस, ऑल्टियस और फ़ोर्टियस- ये आदर्श हैं ओलंपिक खेलों का. इसका अर्थ है और तेज़, और ऊँचा, और मज़बूत. एथेंस में ओलंपिक खेल 38 जगह होंगे 28 तरह के खेल और इनमें भाग लेंगे दस हज़ार पाँच सौ खिलाड़ी. उनके साथ साढ़े पाँच हज़ार अधिकारी भी मौजूद रहेंगे. खेलों की ख़बरें आप तक पहुंचाने के लिये प्रसार माध्यमों के कोई साढ़े 21 हज़ार लोग इकठ्ठा हो रहे हैं और 45 हज़ार सुरक्षा कर्मी तैनात हैं सबकी सुरक्षा के लिये. प्राचीन ओलंपिक प्रचीन ओलंपिक खेल ग्रीक देवी-देवताओं के पिता ज़ूस के सम्मान में आयोजित किये जाते थे और ये उत्सव होता था ओलंपिया में. क्योंकि ओलम्पिया ग्रीस का सबसे पुराना धार्मिक केंद्र था और उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि ग्रीस और उसके उपनिवेशों से खिलाड़ी और दर्शक आसानी से वहाँ पहुँच सकते थे. खेलों के समय एक महीने के लिये युद्ध विराम हो जाता था और अगर कोई इसका उल्लंघन करता तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता. वही खिलाड़ी भाग ले सकते थे जो यूनानी भाषा बोलना जानते थे और औरतें खेलों में भाग नहीं ले सकती थीं बल्कि विवाहित महिलाओं को तो खेल देखने की भी इजाज़त नहीं थी. ओलंपिक खेलों की इस प्राचीन परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए एक फ़्रांसीसी शिक्षाविद बैरन पिया द कुबर्तां ने 23 जून 1894 में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) का गठन किया. आईओसी एक ग़ैर सरकारी और ग़ैर व्यावसायिक संस्था है जिसका काम है ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन ओलंपिक खेलों का निरीक्षण करना. परंपरा ओलंपिक खेलों की परंपरा इतनी पुरानी है कि इन खेलों से बहुत से अनुष्ठान जुड़े है. इनमें से एक है ओलंपिक मशाल जिसे खेल शुरू होने से सात महीने पहले जलाया किया जाता है और वो भी सूर्य की किरणों से. शांति और मैत्री का संदेश लेकर ये मशाल कई महाद्वीपों और देशों में घुमाई जाती है और उदघाटन के दिन पहुंचती है स्टेडियम में. ओलंपिक खेलों का प्रतीक चिन्ह है नीले, काले, लाल, पीले और हरे रंग के एक दूसरे में गुथे हुए छल्ले. ये पाँच छल्ले प्रतिनिधित्व करते हैं पाँच महाद्वीपों का और इनका एक दूसरे में गुथा रहना ओलंपिक खेलों की सार्वभौमिकता का परिचायक है. ये प्रतीक ओलंपिक की श्वेत पताका पर अंकित रहता है. हर खेल के अंत में मेज़बान शहर का मेयर इस पताका को अगले मेज़बान 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पाकिस्तान एडिटर्स' की बैठक में शरीफ़ ने कहा कि उन्हें मीडिया की आज़ादी से बहुत प्यार है, लेकिन मीडिया कम से कम दो साल के लिए अपनी रेटिंग और बिजनेस व्यापार भूल जाए और सरकार का साथ दे. प्रधानमंत्री ने कहा, \"मीडिया चरमपंथ के ख़िलाफ़ अपनाई गई राष्ट्रीय रणनीति पर अमल करके अपना योगदान दे.\" नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि वह मीडिया से उम्मीद करते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर संतुलित रिपोर्टिंग की जाएगी. धरना और मीडिया उन्होंने कहा, \"इस समय हर संस्थान का यह दायित्व बनता है कि वह पाकिस्तान को इस मुश्किल हालात से निकालने के लिए अपना भरपूर योगदान दें.\" समाप्त शरीफ़ ने कहा, \"यह देश ठीक हो जाएगा तो आपके संस्थान भी भरपूर तरीक़े से चलेंगे और आपकी रेटिंग भी बढ़ती रहेगी.\" नवाज़ शरीफ़ ने इस्लामाबाद में तहरीक़-ए-इंसाफ़ और आवामी तहरीक़ के धरने में मीडिया के कुछ संस्थानों की भूमिका और सरकार के पतन के लिए किए जाने वाले दावों का भी ज़िक्र किया. प्रधानमंत्री ने कहा, \"हम जकड़े गए थे, लेकिन हमने मीडिया को नहीं जकड़ा.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और 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रोल करने चाहिए.\" अनिल कपूर कहते हैं कि इन सब आलोचनाओं के बावजूद सोनम कपूर ने सांवरिया से लेकर अब तक अपने आप को साबित किया है.\n\nSummary:", "target": "बॉलीवुड अभिनेता अनिल कपूर मानते हैं कि फिल्म स्टार्स के बच्चों को फिल्म जगत में ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअनिल कपूर इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि स्टार किड्स से लोगों को उम्मीदें कहीं ज्यादा होती हैं. अपनी आगामी फिल्म तेज के सिलसिले में पत्रकारों से रूबरू हुए अनिल कपूर ने कहा, \"क्योंकि वो सितारों के बच्चे हैं इसलिए उन्हें लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है और मुझे लगता हैं कि उनका संघर्ष हमसे ज्यादा है.\" गौरतलब है कि अनिल कपूर के तीन बच्चों में से एक सोनम कपूर अभिनेत्री हैं, दूसरी बेटी रिया कपूर फ़िल्म निर्माता बन गई हैं जबकि उनका बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है. अनिल कपूर कहते हैं, \"मुझे लगता है कि सोनम ने शानदार काम किया हैं और बहुत सारी मेहनत की है. स्टार किड होने के नाते जब आप अच्छा करते हैं तो लोग आपसे और अधिक अच्छे की उम्मीद रखते हैं. मुझे लगता है कि सोनम से भी 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तो कैमरे को घुमा दीजिये. कंपनी का दावा है कि इसका मैक्रो फोकस बढ़िया है. ओप्पो के एन1 में भी ऐसा घूमने वाला कैमरा है और उसके साथ में एक रिमोट कंट्रोल भी है! तो फोटो लेने के लिए आपको स्क्रीन को छूना भी नहीं पड़ेगा. जिओनी की तरह इसमें भी 13 मेगापिक्सेल का कैमरा है. ओप्पो का ही एफ1 को भी सेल्फ़ी कैमरे के रूप में बेचने की कोशिश की जा रही है और फिल्म स्टार रितिक रोशन विज्ञापनों में आपको लुभाने की कोशिश करते दिखेंगे. असूस, मोटो एक्स स्टाइल, एलजी जी4, शिओमी मी 4आई जैसी कई और कंपनियां सेल्फ़ी के नाम पर स्मार्टफोन बेचने की कोशिश कर रही हैं. अब स्मार्टफोन के कैमरे पर इतना ज़ोर है कि कहीं एक दिन ऐसा न आए कि लोग भूल जाएं कि स्मार्टफोन से कॉल भी कर सकते हैं. सेल्फ़ी खींचने के लिए जूते, चम्मच, अंगूठी, कंघी, सेल्फ़ी स्टिक और सेल्फ़ी वाले टोस्टर, जिसमें ब्रेड टोस्ट करने पर आपकी सेल्फ़ी वाली तस्वीर आती है, वो सब भी इस सेल्फ़ी इकोनोमी में शामिल हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "स्मार्टफोन की दुनिया में इसे सेल्फ़ी इकोनोमी कहते हैं. फ़ोन बनाने वाली कंपनियां सेल्फ़ी लेने की बीमारी को अपना धंधा बना रही हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयह धंधा कुछ ऐसा चल निकला है कि अब ऐसे स्मार्टफोन बनाये जा रहे हैं जो केवल सेल्फ़ी लेने की खूबी पर ही ज़ोर दे रहे हैं. पिछले महीने सोनी ने नया स्मार्टफोन लॉन्च किया है. इसका नाम है एक्सपीरिया एक्स ए अल्ट्रा. इसमें 16 मेगा पिक्सेल का फ्रंट कैमरा है और 21 मेगा पिक्सेल का रियर कैमरा है. इसके मुकाबले आईफोन 6एस और सैमसंग गैलेक्सी एस7 दोनों में फ्रंट कैमरा 5 मेगा पिक्सेल का है और और रियर कैमरा 12 मेगा पिक्सेल का है. लोगों को ये बताने के लिए कि उससे लिए हुए फोटो कितना बढ़िया हो सकते हैं, आईफोन 6एस और सैमसंग गैलेक्सी एस7 के विज्ञापनों में उनसे लिए गए फोटो काफी इस्तेमाल किए जाते हैं. समाप्त जैसे जैसे सेल्फ़ी रोग बढ़ता जा रहा है स्मार्टफोन के सामने का कैमरा अचानक अहम हो गया है. कुछ में वाइड एंगल लेंस होते हैं, कुछ में मुस्कान पहचानने वाले फीचर और कुछ और में कंपनियां दावा करती हैं कि ऑटो मोड दूसरों से बेहतर काम करता है. कंपनियों की मार्केटिंग का जादू तब माना जाता है कि जब कम से कम फीचर देकर लोगों से उसके लिए ज़्यादा कीमत ली जा सकती है. सोनी के ही एक्सपीरिया सी3 में वाइड एंगल लेंस है लेकिन कैमरा सिर्फ पांच मेगा पिक्सेल का है. लेकिन एचटीसी आई में सामने और पीछे दोनों तरफ 13 मेगापिक्सेल के ही कैमरे हैं और दोनों के साथ एक फ़्लैश भी है. अगर आस पास की लाइट कम भी हो गई तो भी आपको सेल्फ़ी या दूसरे फोटो लेने में कोई परेशानी नहीं होगी. माइक्रोमैक्स के कैनवास नाइट में पीछे का कैमरा 16 मेगापिक्सेल का है और सामने का 8 मेगापिक्सेल का. इस कैमरे, माफ़ कीजिए स्मार्टफोन, की खासियत ये है कि सॉफ्टवेयर के ज़रिये आप उसमें अलग अलग फीचर डाल सकते हैं. जैसे कि ज़ूम, ब्राइटनेस, मोड, सीन वगैरह. और तय कर सकते हैं कि इन फीचर को सामने के कैमरे में इस्तेमाल करें या पीछे के कैमरे में. जिओनी के इ7 मिनी स्मार्टफोन में लोगों को 13 मेगापिक्सेल के रोटेटिंग कैमरे को इस्तेमाल करने का मौका मिलता है. जब चाहें उससे सेल्फ़ी ले लें और जब किसी और की फोटो लेनी है तो कैमरे को घुमा दीजिये. कंपनी का दावा है कि इसका मैक्रो फोकस बढ़िया है. ओप्पो के एन1 में भी ऐसा घूमने वाला कैमरा है और उसके साथ में एक रिमोट कंट्रोल भी है! तो फोटो लेने के लिए आपको स्क्रीन को छूना भी नहीं पड़ेगा. जिओनी की तरह इसमें भी 13 मेगापिक्सेल का कैमरा है. ओप्पो का ही एफ1 को भी सेल्फ़ी कैमरे के रूप में बेचने की कोशिश की जा रही है और फिल्म स्टार रितिक रोशन विज्ञापनों में आपको लुभाने की कोशिश करते दिखेंगे. असूस, मोटो एक्स स्टाइल, एलजी जी4, शिओमी मी 4आई जैसी कई और कंपनियां सेल्फ़ी के नाम पर स्मार्टफोन बेचने की कोशिश कर रही हैं. अब स्मार्टफोन के कैमरे पर इतना ज़ोर है कि कहीं एक दिन ऐसा न आए कि लोग भूल जाएं कि स्मार्टफोन से कॉल भी कर सकते हैं. सेल्फ़ी खींचने के लिए जूते, चम्मच, अंगूठी, कंघी, सेल्फ़ी स्टिक और सेल्फ़ी वाले टोस्टर, जिसमें ब्रेड टोस्ट करने पर आपकी सेल्फ़ी वाली तस्वीर आती है, वो सब भी इस सेल्फ़ी इकोनोमी में शामिल हैं. 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है, इसलिए अदालत इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट से दिशा निर्देश लेगी. इस बीच ज़ाहिरा शेख के वकील डीके गर्ग ने अदालत में एक याचिका दायर की है जिसमें कहा गया है कि ज़ाहिरा को 24 मार्च तक मुंबई में ही रखा जाए. मुंबई अदालत के जज ने कहा है कि वे मामले पर ग़ौर करेंगे. उन्होंने ज़ाहिरा को 16 मार्च तक न्यायिक हिरासत में भेजा है. अदालत में चले मुकदमे के दौरान ज़ाहिरा रो पड़ी और जज के सामने अपना बयान देते समय उन्होंने मीडिया को बाहर रखने का अनुरोध किया. इसके बाद अदालत की कार्यवाही कुछ देर के लिए स्थिगत कर दी गई. जब कार्यवाही दोबारा शुरू हुई तो मीडिया को सुनवाई में आने की अनुमति दी गई. ज़ाहिरा शेख के वकील ने कहा है कि वे ज़ाहिरा की सज़ा कम किए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करेंगे. बेस्ट बेकरी आगज़नी मामले में मुंबई की विशेष अदालत नौ लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा सुना चुकी है. मार्च 2002 में हुए इस हत्याकांड में दंगाइयों ने 14 लोगों को ज़िंदा जला दिया था जिनमें 12 मुसलमान थे.\n\nSummary:", "target": "भारत में मुंबई की एक विशेष अदालत ने कहा है कि वो बेस्ट बेकरी कांड की प्रमुख गवाह ज़ाहिरा शेख को दी 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ज़िम्मेदार लोगों का पता नहीं चला है. इराक़ में पिछले कुछ महीनों में सांप्रदायिक हिंसा की वारदात बढ़ी हैं और 2008 से ये सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच गई हैं. जानकारों के मुताबिक़ निनेवेह सुन्नी समुदाय के चरमपंथियों के लिए अहम निशाना बना हुआ है. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक़ इस साल अब तक इराक़ में पांच हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें से आठ सौ की सिर्फ़ अगस्त में मौत हुई. सुन्नियों का ग़ुस्सा इराक़ के बाक़ुबा इलाक़े में दो दिन पहले हुए हमले में 30 लोगों की मौत हो गई थी. पुलिस के मुताबिक़ ताज़ा हमले का निशाना शबाक समुदाय के एक सदस्य का अंतिम संस्कार समारोह था. क़रीब 50 हज़ार लोगों का समुदाय शबाक मोसुल और बाशिक़ा इलाक़े में बसर करता है और उनकी अपनी अलग भाषा और विश्वास हैं. ये लोग ज़्यादातर शिया इस्लाम से निकले एक धर्म को मानते हैं और सुन्नी चरमपंथियों के हमले का अक्सर निशाना बनते हैं. ये हमला बाक़ुबा शहर की एक सुन्नी मस्जिद पर हुए बम हमले के एक दिन बाद हुआ है जिसमें 30 लोगों की मौत हो गई थी. हाल ही में हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी सामुदायिक और जातीय तनाव के चलते हुई है जिसकी शुरुआत अप्रैल में हाविजा में सुन्नी अरब सरकार विरोधी शिविर पर सेना की कार्रवाई से हुई थी. पिछले कुछ हफ़्तों में इराक़ी सुरक्षा बलों ने सैकड़ों अल क़ायदा सदस्यों को बग़दाद के आसपास से गिरफ़्तार किया है. ये गिरफ़्तारियां शिया समर्थित सरकार के उस अभियान का हिस्सा हैं जिसे सरकार ने ‘शहीदों का बदला’ नाम दिया है. मगर ये कार्रवाईयां ज़्यादातर सुन्नी इलाक़ों में हुईं हैं जिसने सुन्नी समुदाय को नाराज़ कर दिया है. सीरिया में चल रहे संघर्ष की वजह से भी देश में हिंसा की वारदात बढ़ी हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उत्तरी इराक़ में एक अंतिम संस्कार के दौरान आत्मघाती हमलावर के हमले में 20 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई और कई ज़ख्मी हो गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहमला निनेवेह राज्य की राजधानी मोसुल के पास शनिवार को हुआ. अभी तक हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों का पता नहीं चला है. इराक़ में पिछले कुछ महीनों में सांप्रदायिक हिंसा की वारदात बढ़ी हैं और 2008 से ये सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच गई हैं. जानकारों के मुताबिक़ निनेवेह सुन्नी समुदाय के चरमपंथियों के लिए अहम निशाना बना हुआ है. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक़ इस साल अब तक इराक़ में पांच हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें से आठ सौ की सिर्फ़ अगस्त में मौत हुई. सुन्नियों का ग़ुस्सा इराक़ के बाक़ुबा इलाक़े में दो दिन पहले हुए हमले में 30 लोगों की मौत हो गई थी. पुलिस के मुताबिक़ ताज़ा हमले का निशाना शबाक समुदाय के एक सदस्य का अंतिम संस्कार समारोह था. क़रीब 50 हज़ार लोगों का समुदाय शबाक मोसुल और बाशिक़ा इलाक़े में बसर करता है और उनकी अपनी अलग भाषा और विश्वास हैं. ये लोग ज़्यादातर शिया इस्लाम से निकले एक धर्म को मानते हैं और सुन्नी चरमपंथियों के हमले का अक्सर निशाना बनते हैं. ये हमला बाक़ुबा शहर की एक सुन्नी मस्जिद पर हुए बम हमले के एक दिन बाद हुआ है जिसमें 30 लोगों की मौत हो गई थी. हाल ही में हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी सामुदायिक और जातीय तनाव के चलते हुई है जिसकी शुरुआत अप्रैल में हाविजा में सुन्नी अरब सरकार विरोधी शिविर पर सेना की कार्रवाई से हुई थी. पिछले कुछ हफ़्तों में इराक़ी सुरक्षा बलों ने सैकड़ों अल क़ायदा सदस्यों को बग़दाद के आसपास से गिरफ़्तार किया है. ये गिरफ़्तारियां शिया समर्थित सरकार के उस अभियान का हिस्सा हैं जिसे सरकार ने ‘शहीदों का बदला’ नाम दिया है. मगर ये कार्रवाईयां ज़्यादातर सुन्नी इलाक़ों में हुईं हैं जिसने सुन्नी समुदाय को नाराज़ कर दिया है. सीरिया में चल रहे संघर्ष की वजह से भी देश में हिंसा की वारदात बढ़ी हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "\"तीन बजे भोरवा में चलली सड़किया के सफाई में चला हे सखिये उठा रोड के सफाई में,", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहाथ में लेली टरचवा, हाथ में लेली डंडवा, चला हे सखिये उठा रोड के सफाई में...” बिहार के नालंदा इलाक़े में तड़के सुबह महिलाएं ये गीत गाती सड़कों पर निकलती हैं. महिलाओं की ये टोली पहरे पर निकली है, जिसका मक़सद है खुले में शौच करने वालों को खदेड़कर आबादी वाले इलाक़ों से दूर करना. नालंदा ज़िले के अरौत गाँव की 16 महिलाओं की ये पहरेदारी इलाक़े के लोगों को सफ़ाई का पाठ पढ़ाने के लिए है. समाप्त गाँव में लगभग पौने तीन सौ घर हैं, लेकिन ज़्यादातर घरों में शौचालय नहीं. ऐसे में औरत-मर्द दोनों शौच के लिए रास्तों के किनारे खुले में बैठा करते थे. गाँव में रहने वाले सुदामा प्रसाद कहते हैं, “दस फुट की सड़क पर चलने की ख़ातिर चार फुट भी जगह नहीं बचती थी. रात के अंधेरे में नीचे खेत में उतर कर आते-जाते थे कि मैला ना लगे”. गंदगी और उनसे होने वाली बीमारियों से परेशान गाँव की ही एक महिला गिरजा देवी ने पिछले साल अक्तूबर में पहल करते हुए गाँव की कुछ महिलाओं को इकट्ठा कर सुबह और शाम रास्ते पर पहरेदारी करने का निर्णय लिया. घरों में शौचालय नहीं और अंधेरे में दूर तक जाना सुरक्षित नहीं, ऐसे में पहरा देने वाली टोली की महिलाएं शौच करने वाली औरतों को दूर खेत तक छोड़कर आती हैं. यही नहीं समूह की महिलाएं हफ्ते में एक बार गाँव की नालियाँ भी साफ करती हैं. गिरजा देवी बताती हैं, \"शुरुआत में पहले पहल हम चार लोग थे, लेकिन धीरे-धीरे और महिलाओं नें जुड़ने की इच्छा जताई. इस तरह आज हम कुल 16 औरतें हैं जो चार-चार की टोली में अपने घर के नज़दीक वाले रास्ते पर पहरा देती हैं.” समूह की सभी महिलाएं दलित हैं और पढ़ाई-लिखाई का कभी कोई मौका नहीं मिला, लेकिन स्वच्छता के प्रति इनकी प्रतिबद्धता देखते बनती है. पहरेदारी के लिए निकली राज मुन्नी देवी बातों-बातों में कहती हैं, \"काम भले ही नेक हो, लेकिन सफाई के लिए पहरेदारी करना आसान नहीं है.\" उनके मुताबिक़, गाँव के कई लोगों से इन औरतों का बैर हुआ और तो कईयों ने बोल-चाल तक बंद कर दी. लेकिन काम चलाऊ डंडे और हाथ में टॉर्च लेकर अंधेरे मुंह मुस्तैदी करने वाली इन महिलाओं की पहल रंग ला रही है. इस मुहिम को लोगों का समर्थन मिल रहा है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं. )\n\nSummary:", "target": "भारत एक ओर जानलेवा गर्मी और लू से जूझ रहा है तो इस बार बारिश के भी बहुत कम कहने की संभावना जताई जा रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री हर्षवर्धन के मुताबिक मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है कि मानसून बस 88 फीसदी ही रहेगा. उनका कहना है कि ऐसे में भारत के आधे किसान जहां पहले ही सिंचाई के साधनों की कमी झेल रहे हैं भारत में सूखे की स्थिति बन सकती है. अप्रैल में कहा गया था कि साल के भीतर मानसून 93 फीसद होगा. बारिश अगर 90 फीसदी से कम होती है तो उससे जिस स्थिति का निर्माण हो सकता है उसे सूखा माना गया है. समाप्त सरकार ने मानसून के सामान्य से कम स्तर पर रहने के पूूर्वानुमान पर चिंता ज़ाहिर की है. बेमौसम बरसात और ओलों की वजह से किसान पहले से ही बेहद परेशान हैं. क़र्ज़ में दबे कई किसान इसे वजह बताते हुए आत्महत्या कर चुके हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "नींद का विज्ञान अपने आप में बेहद दिलचस्प है और नींद की सीक्रेट्स पिछले कुछ सालों में ही सामने आ रही हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआज तक वैज्ञानिक ठीक-ठीक यह पता नहीं लगा पाए हैं कि नींद में हमारा दिमाग किस तरह काम करता है, हमें सपने क्यों आते हैं और उन सपनों के क्या मायने हैं. इसके बावजूद नींद को लेकर कई दिलचस्प बातें पता चली हैं और बीबीसी फ्यूचर ऐसी 10 दिलचस्प और अहम बातों को आपके लिए लाया है. 1. परिचित सुगंध: नींद के वक्त अगर आस पास परिचित सुगंध हो तो इस दौरान आपकी यादाश्त बेहतर होती है. आपमें किसी काम को सीखने की प्रवृति बेहतर होती है. 2. शरीर का कांपना: नींद के दौरान जिन लोगों का शरीर रह रहकर कांपता या झटके खाता है, वह आम बात है. इन्हें हिप्निक जर्क कहते हैं और इनका कोई नुकसान नहीं होता है. समाप्त 3. डिजरीडू से अच्छी नींद: एक अध्ययन के अनुसार यदि ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों का वाद्य डिजरीडू (बासुरी जैसा पर कई फ़ुट लंबा विंड इस्ट्रयूमेंट) बजाएँ तो सांस लेने वाली मांसपेशियां मज़बूत होती हैं और इसके बजाने वालों को बहुत अच्छे से नींद आती है. 4. झपकी लेने का समय: सोने के लिहाज से प्राकृतिक तौर पर झपकी लेने का समय दोपहर 2 से 4 बजे के बीच होना चाहिए जिससे रचनात्मकता बढ़ती हैं. हालाँकि, इस समय के बाद ली गई झपकी आपकी ऊर्जा से जल्द 'रेसटोर' करती है. 5. कुछ के लिए चार घंटे काफ़ी: हाल ही में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि जीन म्यूटेशन के कारण जिन लोगों में डीईसी2 जीन होती है, उनके लिए केवल चार घंटे सोना काफ़ी होता है. इतनी नींद के बाद भी वे भरपूर ऊर्जा से पूरे दिन काम कर लेते हैं. ध्यान इस बात का रखना चाहिए कि ऐसा हर व्यक्ति में नहीं होता और हमें अपने शरीर और उसके नींद के पैटर्न को समझना चाहिए. 6. आठ घंटे की नींद ज़रूरी: प्राकृतिक रूप से केवल 5 प्रतिशत लोग ही कम नींद लेने वाले होते हैं. ज़्यादातर लोगों को रोज़ाना आठ घंटे की नींद की जरूरत होती है. लेकिन हममें से 30 फ़ीसदी लोगों को प्रति रात छह घंटे से कम नींद मिलती है. 7. यादाश्त व्यवस्थित करने का समय: नींद पर एक थ्योरी यह है कि नींद के दौरान हमारा दिमाग यादाश्त को सही से व्यवस्थित करता है. शायद कटु अनुभवों से निपटने में भी नींद हमारी मदद करती है. 8. सपनों का वीडियो: कुछ विशेषज्ञों ने लोगों के दिमाग की सक्रियता के आधार पर उनके देखे गए यूट्यूब वीडियो को रीकन्सट्रक्ट किया है. माना जा रहा है कि इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए एक दिन हमारे सपने को भी रीकन्सट्रक्ट किया जा सकेगा. 9. कम नींद का हल: सैन्य अनुसंधानों के मुताबिक अगर आप पहले से ही कुछ ज़्यादा देर तक सो लें, तो बाद में कम नींद का आप पर ज़्यादा असर नहीं होगा. 10. छह घंटे से कम नींद, नशे जैसी हालत: अगर आप लगातार 12 रातों तक छह घंटे से कम सोते रहे हैं, तो आपकी चुस्ती और चेतना वैसी ही होगी जैसे कि आपके रक्त में 0.1 प्रतिशत अल्कोहल के बाद होगी. आपके बोलना साफ़ नहीं होगा, संतुलना बिगड़ा हुआ होगा और यादाश्त भी तेज़ नहीं होगी. दूसरे शब्दों में कहें तो आप नशे में होंगे ! अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है. 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जून की तारीख़ बहुत ही प्रासंगिक है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लगा था. खुलेंगे पत्ते उधर माना जा रहा है कि शिवसेना की ओर से सोमवार को यह घोषणा हो सकती है कि राष्ट्रपति पद के लिए वे किसका समर्थन करेंगे. शिवसेना की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि एनडीए के घटक होने के बावजूद वे भैरोसिंह शेखावत के नामांकन का समर्थन करेंगे या नहीं. इस बारे में पहले शिवसेना के स्थापना दिवस यानी 19 जून को घोषणा की जाने की बात कही गई थी पर इस घोषणा को टाल दिया गया. इस बीच भाजपा की ओर से गोपीनाथ मुंडे की शिवसेना नेताओं के साथ लंबी बातचीत हुई है पर कुछ भी घोषणा नहीं की गई है. दरअसल, शिवसेना ने अपने मुखपत्र में कहा था कि मराठी मूल की प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना गर्व की बात है. इसके बाद से ही यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि शिवसेना क्षेत्र के आधार पर प्रतिभा पाटिल को समर्थन देगी या फिर एनडीए का समर्थन प्राप्त भैरोसिंह शेखावत को समर्थन देगी. आमने-सामने इससे पहले शनिवार को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए और वाम दलों की साझा उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल ने अपना 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डॉक्टर सीमी जमाली ने बीबीसी को बताया कि शहर के जिन्ना अस्पताल में आठ शव आ चुके हैं जिनमें दो बच्चे शामिल हैं. पत्रकार हफ़ीज़ चाचड़ ने घटनास्थल से जानकारी दी कि धमाका फल और सब्जी बाज़ार में हुआ. यह कराची का औद्योगिक क्षेत्र है और पास में ही गुल अहमद टेक्सटाइल मिल है और यहाँ बड़ी संख्या में मज़दूर रहते हैं और वे ही इस धमाके का निशाना बने हैं. बम धमाका कैसे हुआ इसके मारे में अभी निश्चित रूप से पता नहीं चला है. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि विस्फोटक एक मोटर साइकिल में छुपाया हुआ था. शौकत ख़ान ने बीबीसी को बताया कि विस्फोटक मोटर साइकिल अथवा फलों की रेहड़ी में रखा गया हो सकता है. लेकिन सिंध प्रांत के पुलिस प्रमुख अज़हर फारूक़ी का कहना है कि शुरुआती जाँच से पता चला है कि विस्फोटक फलों की रेहड़ी में रखा हुआ था. अफ़रातफ़री एक प्रत्यक्षदर्शी रहमान मलिक ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया,'' जब मैं फैक्ट्री से बाहर निकल रहा था तब मैंने एक ज़ोरदार धमाका सुना और मैंने देखा कि अनेक लोग खून से लथपथ सड़क पर पड़े थे.'' बम धमाका ऐसे वक्त हुआ जब बाज़ार में भीड़भाड़ थी. इस धमाके के बाद उत्तेजित भीड़ ने 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पाकिस्तान यात्रा के दौरान कही थी और चरमपंथी गुट ईस्ट तुर्कमान इस्लामिक मूवमेंट को रोकने के लिए पाकिस्तानी नेतृत्व से कहा था. चीनी अधिकारियों का कहना है कि इस संगठन से जुड़े चरमपंथी चीन के प्रांत सिंक्यांग में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं जो कि उनके लिए चिंता की बात है. चीन का गुस्सा गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि चीनी अधिकारियों ने इस मामले को फिर से उठाया है और चीन के विदेश मंत्री ने राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के मुलाक़ात कर इस पर गंभीर रुप से बात की थी. अधिकारी के मुताबिक उस मुलाक़ात में केंद्रीय गृह सचिव को भी बुलाया गया था. चीनी अधिकारियों ने बताया कि इस संगठन के लोग ज्यादातर पाकिस्तान के कबायली इलाक़ों में रह रहे हैं जहाँ वह प्रशिक्षण हासिल करने के बाद पाकिस्तानी सीमा से सटे चीनी इलाके में दाखिल हो रहे हैं. पाकिस्तानी अधिकारियों ने चीन को हर संभव कदम उठाने का आश्वासन दिया है और इस संबंध में सुरक्षाबलों को चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए हैं. चरमपंथियों की जानकारी ग़ौरतलब है कि कुछ दिन पहले पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने कबायली इलाकों से चीनी 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गाज़ी अब्दुल्लाह एक अनाथालय में बड़े हुए और अब सरकारी अफसर बन गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवो जम्मू कश्मीर के डोडा ज़िले से आते हैं. गाज़ी ने कश्मीर प्रशासनिक सेवा परीक्षा (केएएस) में 46वीं रैंक हासिल की. गाज़ी जब ढाई साल के थे तब उनके पिता की मौत हो गई थी. मुश्किल हालात में भी गाज़ी ने हिम्मत नहीं हारी और वो मेहनत करते रहे. 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दिल के लिए बहुत हानिकारक हैं. इस शोध से इस बात के सुबूत मिलते हैं कि ये सभी हमारे दिमाग़ के लिए भी हानिकारक हैं.'' अलज़ाइमर सोसाइटी के अनुसार पैंसठ साल के अधिक उम्र के हर तीन व्यक्ति में से एक को भूलने की बीमारी हो सकती है लेकिन इस ख़तरे को कम करने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है. संतुलित आहार, वज़न पर नियंत्रण, नियमित रूप से व्यायाम, रक्तचाप और कोलेस्टेरोल की नियमित जांच और धुम्रपान से परहेज़ करके दिमाग़ को होने वाले नुक़सान पर क़ाबू पाया जा सकता है. इसे भी पढ़ें\n\nSummary:", "target": "लंदन के किंग्स कॉलेज में शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि सिगरेट पीने से व्यक्ति की स्मरण शक्ति, सीखने और तार्किक बात करने की क्षमता नष्ट हो जाती है जिसके कारण उसका दिमाग़ सड़ जाता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसिगरेट पीने से कई तरह की बीमारियां होती हैं. पचास साल से अधिक उम्र के लगभग आठ हज़ार आठ सौ लोगों पर किए गए शोध से पता चला कि उच्च रक्तचाप और मोटापे के कारण भी दिमाग़ पर थोड़ा असर पड़ता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि लोगों को ये समझना चाहिए उनकी जीवन 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क्षमता के हिसाब से उत्तरी अमरीका का मुक्त व्यापार समझौता सबसे बड़ा बना रहेगा. यह विस्तार क्यों हो रहा है? यूरोपीय संघ के विस्तार के समर्थकों का कहना है कि लंबे समय से विभाजित और संघर्षरत यूरोप को शांतिपूर्वक जोड़ने का ये एक ऐतिहासिक अवसर है. उनका कहना है कि इससे वर्तमान सदस्य देशों के अन्य देशों के साथ जुड़ने से उनमें स्थिरता आएगी और समृद्धि बढ़ेगी. इसके अलावा इस विस्तार से यूरोप एक सुरक्षित क्षेत्र बन जाएगा. यूरोप के साझा बाज़ार के आकार के बढ़ने से उसकी अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा और नई नौकरियों की संभावना बढ़ेगी. साथ ही दुनिया में इसका प्रभाव भी बढ़ेगा. जिन नए देशों को यूरोपीय संघ में शामिल करने का वादा किया गया था वो इस वादे से ही प्रोत्साहित हो कर अपने देश में आर्थिक और सामाजिक सुधारों के लिए पहले से ही सक्रिय हो गए हैं. इस दौरान इन देशों ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया है जिसने उनकी अर्थिक वृद्धि की गति को तेज़ करने में मदद की है. ये विस्तार यूरोपीय संघ में क्या परिवर्तन लाएगा? ये दरअसल कोई नहीं जानता. विस्तृत यूरोपीय संघ में फ़्रांस और जर्मनी को एक साथ मिल कर अपना प्रभुत्व जमाना और कठिन हो जाएगा. इस बात के भी कुछ संकेत हैं कि इस कठिनाई से बचने के लिए ये दोनों देश ब्रिटेन के साथ और नज़दीकी बढ़ा कर काम करने की आशा कर रहे हों. समझा जाता है कि यूरोपीय संघ के नए सदस्य संघ में आर्थिक आधुनिकीकरण के प्रयास को पूरा समर्थन देंगे. वो आमतौर पर यूरोपीय संघ के फ़्रांस जैसे कुछ पुराने सदस्य देशों की अपेक्षा अमरीका समर्थक ज़्यादा हैं. ब्रसेल्स में ये भय भी व्यक्त किया जा रहा है कि 25 देशों वाले यूरोपीय संघ की बैठकें पहले की अपेक्षा अधिक लंबी होंगी और उनमें निर्णय ले पाना और कठिन हो जाएगा. ये भी हो सकता है कि नए सदस्य देश यूरोपीय संघ की नई पहलों का विरोध करें जो उनकी क्षमता से अधिक महँगी हों. नए सदस्य राष्ट्र कितने ग़रीब हैं? नए सदस्य देशों का औसत सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान सदस्य देशों के औसत सकल घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत है. हालाँकि साइप्रस और स्लोवीनिया कुछ नए देश अन्य नए सदस्यों की तुलना में ज़्यादा अमीर हैं. क्या पूर्वी यूरोपीय देशों के लोग पश्चिम में आकर काम करना चाहेंगे? कुछ तो निश्चित रूप से आएंगे लेकिन उनकी संख्या के बारे में कई तरह के अनुमान हैं. यूरोपीय संघ के हाल के एक 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यूरोपीय संघ में क्या परिवर्तन लाएगा? ये दरअसल कोई नहीं जानता. विस्तृत यूरोपीय संघ में फ़्रांस और जर्मनी को एक साथ मिल कर अपना प्रभुत्व जमाना और कठिन हो जाएगा. इस बात के भी कुछ संकेत हैं कि इस कठिनाई से बचने के लिए ये दोनों देश ब्रिटेन के साथ और नज़दीकी बढ़ा कर काम करने की आशा कर रहे हों. समझा जाता है कि यूरोपीय संघ के नए सदस्य संघ में आर्थिक आधुनिकीकरण के प्रयास को पूरा समर्थन देंगे. वो आमतौर पर यूरोपीय संघ के फ़्रांस जैसे कुछ पुराने सदस्य देशों की अपेक्षा अमरीका समर्थक ज़्यादा हैं. ब्रसेल्स में ये भय भी व्यक्त किया जा रहा है कि 25 देशों वाले यूरोपीय संघ की बैठकें पहले की अपेक्षा अधिक लंबी होंगी और उनमें निर्णय ले पाना और कठिन हो जाएगा. ये भी हो सकता है कि नए सदस्य देश यूरोपीय संघ की नई पहलों का विरोध करें जो उनकी क्षमता से अधिक महँगी हों. नए सदस्य राष्ट्र कितने ग़रीब हैं? नए सदस्य देशों का औसत सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान सदस्य देशों के औसत सकल घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत है. हालाँकि साइप्रस और स्लोवीनिया कुछ नए देश अन्य नए सदस्यों की तुलना में ज़्यादा अमीर हैं. क्या पूर्वी यूरोपीय देशों 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(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "असम में हिंसा न तो पहली बार हुई है और न शायद आखिरी बार. बांग्ला बोलने वाले मुसलमान और स्थानीय बोडो समाज के बीच तनाव का इतिहास 60 साल से भी अधिक पुराना है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयही वजह है कि वहां के लोगों को ताज़ा हिंसा पर आश्चर्य नहीं हुआ हालांकि लोगों को इस हिंसा के समय को लेकर ताज्जुब ज़रूर हो रहा है क्योंकि इस समय देश में चुनाव चल रहे हैं. मीडिया और उत्तर भारतीय लोगों का ध्यान इस सच पर ज़्यादा नहीं है कि इस हिंसा में अब तक मरने वाले सभी 32 लोग बांग्लाभाषी मुसलमान हैं. असम पुलिस के अनुसार इसमें बोडो चरमपंथियों का हाथ है. स्थानीय पुलिस का ये भी मानना है कि बोडो चरमपंथियों ने मुसलमानों पर इसलिए हमले किए क्योंकि उन्होंने चुनाव में उनके विरोधियों को वोट दिया. समाज के हाशिये पर इस हिंसा का जो भी कारण रहा हो अगर ये हमला बंगाली मुसलमान करते और मरने वाली बोडो जनता होती तो मीडिया और उत्तर भारतीय लोगों का रुख क्या होता? सच तो ये है कि बोडो बहुल इलाक़ों में बसे बंगाली मुसलमानों को अक्सर बांग्लादेशियों से अलग करके नहीं देखा जाता. बांग्लाभाषी मुसलमान ग़रीब हैं, ज़मीन के मालिक नहीं हैं और केवल मज़दूरी करते हैं. राजनीति में उनका दखल नहीं है. वो अक्सर बहुसंख्यक आबादी से दूर धान के खेतों या पानी से घिरे टापुओं पर रहते हैं. अपने जन्म से ही यहाँ रहने वालों को भी घुसपैठिया कहा जाना आम है. इसमें कोई शक नहीं कि बांग्लादेश की सरहदें पड़ोस में हैं और वहां से असम आने वालों की एक समय लंबी क़तार होती थी. इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों होते थे लेकिन बांग्लादेश से आए हिंदुओं को घुसपैठिया या ग़ैर-क़ानूनी नागरिक नहीं समझा जाता. सच ये भी है कि असम में पहले से लाखों बंगाली मुसलमान बोडो इलाक़े में रहते थे. मैंने खुद 1994 में बोडो इलाक़ों में जाकर इस तनाव पर रिपोर्टिंग की है. मैं जब कोकराझार पहली बार पहुँचा तो उस समय बोडो विद्रोहियों ने 24 बंगाली मुसलामनों की हत्या कर दी थी. उस समय मुझे दोनों समाज के बीच फ़र्क़ साफ़ दिखाई दिया, समाज के हाशिये पर रहने वाले मुसलमान या तो आम लोगों से कटकर रहते थे या फिर उन्हें समाज ने अपनाया नहीं था फ़ासले की लकीर असम एक बहुजातीय समाज है जहाँ हिंदू 61 प्रतिशत हैं जबकि मुसलमान 34 प्रतिशत. बोडोलैंड के अलावा बाक़ी असम में भी बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों और असमिया बोलने वाले हिंदुओं के बीच तनाव दशकों से चला आ रहा है. नेली में 1983 में हुए जनसंहार को आज़ाद भारत के सबसे बड़ी हिंसक घटनाओं में गिना जाता है, जिसमें तीन हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे जिनमें से अधिकतर मुसलमान थे. यही वजह है कि वहां के मुसलमान आतंकित रहे हैं. बोडो इलाक़े में रहने वाले मुसलमान आम तौर पर कांग्रेस पार्टी को वोट डालते हैं. यहां के मुसलमानो को हमेशा इस बात का डर सताता है कि उन पर कभी भी हमला हो सकता है. ज़ाहिर है, इस समय वे मोदी को लेकर भी घबराये हुए होंगे लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि राज्य के 34 प्रतिशत मुसलमान वहां की एक हक़ीक़त हैं और जितनी जल्दी इसे स्वीकार कर लिया जाए उतना ही सब के लिए अच्छा होगा. भारत सरकार ने इस क्षेत्र में लगातार हिंसा जारी रहने के बाद मामले की तह तक पहुँचने के लिए जाँच कराने का फ़ैसला किया है और दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की एक टीम भी बोडो इलाक़े में भेजी गई है. अब देखना है कि इस जाँच से कुछ निकलता है या नहीं. 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वहाँ सौ प्रतिशत मतदान होने की बात हजम नहीं होती, मैंने पंद्रह मतदान केंद्रों का दौरा किया है मुझे सिर्फ़ एक सुन्नी वोटर मिला जिनसे मैंने बात की. सिर्फ़ देखकर शिया सुन्नी में अंतर बताना मुश्किल है, लोग कह रहे हैं कि सुन्नी भी वोट डाल रहे हैं लेकिन उतनी तादाद में नहीं जितना कि शिया. कुछ भी हो, लेकिन सौ प्रतिशत मतदान वाली बात तो असंभव लगती है. जिस सुन्नी वोटर से मेरी बात हुई वे दस किलोमीटर दूर से वोट डालने आए थे और उनका कहना था कि वे बहुत ख़ुश हैं कि ज़िंदगी में पहली बार उन्हें अपनी मर्ज़ी से वोट डालने का मौक़ा मिला है. इस इलाक़े में मस्जिदों में लोगों से अपील की गई है कि वे घरों से निकलकर वोट डालें, कई लोगों ने मुझे बताया मस्जिद के फ़रमान के कारण वे वोट डालने निकले हैं, ऐसे में शिया धार्मिक नेता आयतुल्लाह सिस्तानी के समर्थन वाले गठबंधन को अधिक हिमायत मिलती दिख रही है.\n\nSummary:", "target": "मैं बसरा के पास अल ज़ुबैर में हूँ जो दक्षिणी इराक़ का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमैंने अल ज़ुबैर को इसलिए चुना क्योंकि यहाँ 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(आखिर शरीफ़ से क्या गलती हुई?) पीआईए के अलावा हेवी इलेक्ट्रिकल कॉम्प्लेक्स और नेशनल पावर कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड के भी 51 प्रतिशत शेयर निजी स्वामित्व में देने का फ़ैसला किया गया है. इन फ़ैसलों को अब अंतिम मंज़ूरी के लिए कैबिनेट की निजीकरण समिति में पेश किया जाएगा. निजीकरण प्रक्रिया से जुड़े संबंधित महत्वपूर्ण सूत्रों का कहना है कि दरअसल निजीकरण आयोग के बोर्ड की बैठक में लिए गए फ़ैसलों को अंतिम माना जाता है और ऐसा बहुत कम हुआ है कि कभी इसके निर्णय को पलटा गया हो. वित्तीय पैकेज पाकिस्तान की सरकार ने रेलवे क्षेत्र में सुधार के लिए सलाहकार नियुक्त करने का फैसला किया है. ग़ौरतलब है कि 2006 में तत्कालीन सरकार ने स्टील मिल्स का निजीकरण किया था और रूसी, सऊदी और पाकिस्तानी निजी कंपनियों के कंसॉर्टियम ने 21 अरब 67 करोड़ रुपए की बोली लगाकर पाकिस्तान स्टील के 75 फ़ीसदी शेयर हासिल कर लिए थे. (कराची जल रहा है..) हालांकि पाकिस्तान उच्चतम न्यायालय ने बाद में स्टील मिल्स की बिक्री को अवैध करार दे दिया था और इस प्रकार यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी. सोवियत संघ की वित्तीय और तकनीकी सहायता से बनने वाली स्टील मिल्स की गिनती पाकिस्तान की बड़ी परियोजनाओं में होती रही है, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी था जब यह घाटे में थी और पिछले सरकार के कार्यकाल में उसे दिवालिया होने से बचाने के लिए वित्तीय पैकेज भी दिया गया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के निजीकरण आयोग ने पाकिस्तान स्टील मिल्स, ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड और तीन बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी को आंशिक तौर पर कम करके निजी क्षेत्र को देने की मंज़ूरी दे दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआयोग ने गुरुवार को दो दिन की बैठक के बाद यह फ़ैसला किया. राजधानी इस्लामाबाद में निजीकरण आयोग अध्यक्ष मोहम्मद ज़ुबैर की अध्यक्षता में हुई बैठक में पाकिस्तान स्टील मिल्स, इस्लामाबाद और फ़ैसलाबाद की बिजली आपूर्ति कंपनियों के कम से कम 51 फ़ीसदी शेयरों के निजीकरण को मंज़ूरी दी गई. आयोग ने ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी, एलाइड और यूनाइटेड बैंक की भी दस-दस फ़ीसदी सरकारी हिस्सेदारी जबकि हबीब बैंक के 20 प्रतिशत शेयर निजी स्वामित्व में देने की मंज़ूरी दी. इसके अलावा पाकिस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड के पांच प्रतिशत शेयर बेचने का फ़ैसला किया गया है. 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नज़दीक आने का मंत्र और ख़ज़ाना दोनों हैं. टोक्यो क़ुदरती ख़ूबसूरती से लबरेज़ है. यहां के जंगलों में हर बीमारी का इलाज मौजूद है. यहां कई तरह की जड़ी-बूटियां मिल जाती हैं. इनका स्वाद भले ही कड़वा हो, लेकिन ये बीमारी को जड़ से ख़त्म करने की ताक़त रखती हैं. इन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल कई तरह की दवाएं बनाने में भी होता है. टोक्यो के इन जंगलों में तनाव मुक्त होने के लिए लगभग पूरे जापान से लोग आते हैं. इनमें बड़ी तादाद ऑफ़िस कर्मचारियों की होती है. पूरे जापान के जंगलों में करीब 62 थेरेपी सोसाइटी हैं, जो यहां लोगों की मदद करती हैं. इस थेरेपी के तहत लोग खुली हवा में गहरी सांस लेते हैं, मेडिटेशन करते हैं. परिंदों की चहचहाहट भी थेरेपी तस्योशी मसुज़ावा कहते हैं अगर सुबह सवेरे उठकर सिर्फ़ परिंदों की चहचहाहट सुनी जाए तो वो भी एक थेरेपी की तरह ही काम करती है. बच्चा होने के बाद डिप्रेशन में चली जाती हैं महिलाएं सुबह के वक़्त पेड़ों पर जब परिंदे शोर मचाते हैं, तो लगता है कि वो आपस में बातें कर रहे हैं. इनकी ये बातें इंसानों का दिल बहलाती हैं और तनाव दूर करती हैं. ख़ुद को तंदुरुस्त रखने का जापानियों का ये तरीक़ा दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहा है. मेडिकल साइंस में रिसर्च करने वालों के लिए भी ये जंगल आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं. उनका भी कहना है कि इन जंगलों में तनाव कम करने और ब्लड प्रेशर नियंत्रण की दवा मौजूद है. फॉरेस्ट्री एंड फ़ॉरेस्ट प्रोडक्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेसर ताकाहिदे अकागावा का कहना है कि इन जंगलों की आबो-हवा में तनाव पैदा करने वाले हार्मोन को नियंत्रित करने की ताक़त है. साथ ही यहां की जाने वाली थेरेपी एंटी एजिंग है. यानी फ़ॉरेस्ट थेरेपी से आपकी उम्र भी लंबी होगी. ऑफ़िस के बाद ईमेल चेक मत कीजिए, ख़ुश रहेंगे इन आठ तरीकों से बढ़ा सकते हैं दिमाग़ की क्षमता (नोटः ये मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं) (मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिककरें, जोबीबीसी पर उपलब्ध है.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तनाव आज दुनिया भर के लिए एक बड़ा मसला है. डॉक्टरों के मुताबिक़ तनाव ही तमाम बीमारियों की जड़ है. इससे जितना दूर रहा जाए उतना अच्छा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन, नए दौर के रहन-सहन ने हम सभी को तनाव का ग़ुलाम बना दिया है. तनाव मुक्त रहने के लिए लोग तरह-तरह की दवाएं खाने लगे हैं. कोई मेडिटेशन कर रहा है तो कोई योग. लेकिन, जापान के लोग तनाव मुक्त होने के लिए क़ुदरत की शरण में जा रहे हैं. यहां लोगों को तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए जंगलों में फ़ॉरेस्ट थेरेपी दी जा रही है. फॉरेस्ट गाइड और थेरेपिस्ट तस्योशी मसुज़ावा का कहना है कि जापान की राजधानी टोक्यो में तनाव से दूर रहने और प्रकृति के नज़दीक आने का मंत्र और ख़ज़ाना दोनों हैं. टोक्यो क़ुदरती ख़ूबसूरती से लबरेज़ है. यहां के जंगलों में हर बीमारी का इलाज मौजूद है. यहां कई तरह की जड़ी-बूटियां मिल जाती हैं. इनका स्वाद भले ही कड़वा हो, लेकिन ये बीमारी को जड़ से ख़त्म करने की ताक़त रखती हैं. इन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल कई तरह की दवाएं बनाने में भी होता है. टोक्यो के इन जंगलों में तनाव मुक्त होने के लिए लगभग पूरे जापान से लोग आते हैं. इनमें बड़ी तादाद ऑफ़िस कर्मचारियों की होती है. पूरे जापान के जंगलों में करीब 62 थेरेपी सोसाइटी हैं, जो यहां लोगों की मदद करती हैं. इस थेरेपी के तहत लोग खुली हवा में गहरी सांस लेते हैं, मेडिटेशन करते हैं. परिंदों की चहचहाहट भी थेरेपी तस्योशी मसुज़ावा कहते हैं अगर सुबह सवेरे उठकर सिर्फ़ परिंदों की चहचहाहट सुनी जाए तो वो भी एक थेरेपी की तरह ही काम करती है. बच्चा होने के बाद डिप्रेशन में चली जाती हैं महिलाएं सुबह के वक़्त पेड़ों पर जब परिंदे शोर मचाते हैं, तो लगता है कि वो आपस में बातें कर रहे हैं. इनकी ये बातें इंसानों का दिल बहलाती हैं और तनाव दूर करती हैं. ख़ुद को तंदुरुस्त रखने का जापानियों का ये तरीक़ा दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहा है. मेडिकल साइंस में रिसर्च करने वालों के लिए भी ये जंगल आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं. उनका भी कहना है कि इन जंगलों में तनाव कम करने और ब्लड प्रेशर नियंत्रण की दवा मौजूद है. फॉरेस्ट्री एंड फ़ॉरेस्ट प्रोडक्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेसर ताकाहिदे अकागावा का कहना है कि इन जंगलों की आबो-हवा में तनाव पैदा करने वाले हार्मोन को नियंत्रित करने की ताक़त है. साथ ही यहां की जाने वाली थेरेपी एंटी एजिंग है. यानी फ़ॉरेस्ट थेरेपी से आपकी उम्र भी लंबी होगी. ऑफ़िस के बाद ईमेल चेक मत कीजिए, ख़ुश रहेंगे इन आठ तरीकों से बढ़ा सकते हैं दिमाग़ की क्षमता (नोटः ये मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं) (मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिककरें, जोबीबीसी पर उपलब्ध है.) 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'ग्लोबल ब्रिटेन' का नारा देने के बाद टेरीज़ा मे ने पहला दौरा भारत का किया था. भारत एक अहम ट्रेड पार्टनर है ब्रिटेन का. लेकिन भारत-ब्रिटेन के बीच व्यापार काफ़ी कम है जिसे बढ़ाने की जरूरत है. दोनों देशों को एक-दूसरे के सामान के आयात-निर्यात पर लगने वाले करों की कटौती करनी पड़ेगी. भारत को अपने कानून भी लचीले बनाने होंगे. इसलिए भारत को ब्रेक्ज़िट की प्रक्रिया पर नज़र रखनी चाहिए कि ब्रिटेन के क्या विचार है. अगर ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन के कस्टम यूनियन में बना रहा तो भारत को ब्रिटेन की बजाए यूरोपीयन यूनियन से डील करनी पड़ेगी. ब्रिटेन के चुनाव को प्रभावित कर पाएँगी विदेशी ताक़तें? जिन्होंने खुलकर कहा गे हैं, अब बनेंगे प्रधानमंत्री चुनाव के नतीजों का भारत-ब्रिटेन व्यापार संबंधों पर क्या असर पड़ेगा? भारत-ब्रिटेन संबंधों पर असर? भारत-ब्रिटेन रिश्ते पूरी तरह से चुनावी नतीजों पर निर्भर करता है क्योंकि ब्रिटेन की दोनों प्रमुख पार्टियों की राय अलग-अलग है. लेबर या लिबरल डेमोक्रेट्स की जीत से ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन के कस्टम यूनियन में बना रह सकता है. ऐसी सूरत में भारत-ब्रिटेन वार्ताओं की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी. भारत को अपने हित का ख्याल रखना चाहिए. कई व्यापार संधियां ख़त्म हो रही हैं. आगे नए समझौतों में चौकन्ना रहना होगा. भारत-ब्रिटेन व्यापार वार्ताएं आसान नहीं होंगी. ब्रिटेन चाहेगी कि कारों पर आयात कर कम किया जाए. साथ ही वित्तीय सेवाओं और कानूनी फ़र्मों के भारत में प्रवेश की भी मांग हो सकती है. पहले भी ये मांगें उठ चुकी हैं लेकिन भारत को अपने हितों का ख़ास ख़्याल रखना होगा. टेरीज़ा मे और कॉर्बिन ने दिए वोटर्स के सवालों के जवाब 'आप गर्भवती हैं तो सांसद का काम कैसे करेंगी?' व्यापार समझौतों पर चुनाव के नतीजों का क्या असर पड़ेगा? व्यापार समझौतों पर असर? ब्रिटेन अगर यूरोपीय यूनियन से निकलता है तो यूरोपीय यूनियन से व्यापार कम हो जाएगा. इसलिए ब्रिटेन को भारत से व्यापार करने की जल्दबाज़ी देखी जा सकती है. ताकि यूरोपीय यूनियन से निकलने के बाद होने वाला नुकसान कम किया जा सके. लेकिन भारत-ब्रिटेन व्यापार वार्ता आसान नहीं है. पिछली बार जब भारत यूरोपीय यूनियन वार्ता रुक गई थी तब टेरीज़ा मे ब्रिटेन की गृह मंत्री थीं और वो नहीं चाहती थीं कि भारत को अप्रवासन के मामले में कोई रियायत दी जानी चाहिए. ब्रिटेन में अप्रवासन के ख़िलाफ़ लोगों की भावनाएँ हैं. भारत ने साफ़ किया है कि ये रवैया भारत के हित में नहीं है. ब्रितानी चुनाव: वो बातें जो आप को नहीं मालूम जर्मन चांसलर को नहीं है ब्रिटेन और अमरीका पर भरोसा आप्रवासन पर क्या असर पड़ेगा? आप्रवासन पर असर? कंज़र्वेटिव पार्टी यूरोपीय यूनियन के देशों से सिर्फ़ एक लाख तक आप्रवासियों को ही ब्रिटेन आने देना चाहती है. इस वक्त ये संख्या दो लाख है और इसे कम करना काफ़ी बड़ी बात है. इसका मतलब यह है कि इसका असर भारत, पाकिस्तान और और बांग्लादेश से आने वालों पर भी पड़ेगा. लेकिन लेबर और लिबरल डेमोक्रेट्स आप्रवासन पर ढील देने को तैयार हैं. मैनचेस्टर का हमलावर हमारा समर्थक: आईएस फिर उठेगा स्कॉटलैंड की आज़ादी का मुद्दा ? चुनाव के बाद ब्रेक्ज़िट प्रक्रिया के दौरान भारत को क्या तैयारी करनी चाहिए? भारत की तैयारी? ब्रेक्ज़िट के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था धीमी पड़े जाएगी. यूरोपीय यूनियन पर ब्रेक्ज़िट का असर कम पड़ेगा क्योंकि वो एक बड़ी अर्थव्यवस्था है. इसलिए भारत को ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के रिश्तों पर नज़र रखनी चाहिए. भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच सबसे बड़ी अड़चन कृषि क्षेत्र की सब्सिडी को लेकर थी लेकिन भारत-ब्रिटेन रिश्तों में ये कोई अड़चन नहीं बनने वाली है. हां, अप्रवासन को लेकर ब्रिटेन का रुख ज़रूर अड़चन पैदा करने वाला है. वहीं यूरोपीय यूनियन के लिए यह उतना अहम मुद्दा नहीं था. टेरीज़ा क्यों चाहती हैं समय से पहले आम चुनाव? (बीबीसी संवाददाता पवन सिंह अतुल से बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "8 जून को ब्रिटेन की नई सरकार के लिए चुनाव होने वाले हैं. ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने का फ़ैसला किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआगे की दिशा तय करने के पहले ब्रिटेन सरकार ने चुनाव कराने का निर्णय लिया. ये चुनाव ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के लिए तो अहम हैं ही, चुनाव नतीजों का ब्रिटेन-भारत संबंधों पर भी असर हो सकता है. लेकिन ये असर कैसा और कितना होगा, ये जानने के लिए लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से जुड़ीं स्वाति ढींगरा के सामने बीबीसी ने पांच सवाल रखे. ब्रिटेन चुनाव: लंदन में घर का सपना कौन करेगा पूरा? लंदन हमला: 12 अरेस्ट, आईएस ने ली जिम्मेदारी भारत को ब्रिटेन के चुनाव पर क्यों नज़र रखनी चाहिए? भारत के लिए अहम क्यों? 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आने वालों बड़े बड़े लोंगो और नेताओं के कारण अस्पताल का अमला परेशान है. महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा भी आज उस लड़की का हाल जानने के लिए अस्पताल पहुँची शर्मा ने बाहर निकल कर पत्रकारों को बताया कि सरकार इस लड़की को इलाज के लिए विदेश ले जाने के लिए तैयार है लेकिन इलाज कर रहे डॉक्टरों के अनुसार उसकी हालत इस लायक नहीं है कि उसे इस असपताल से हिलाया भी जा सके. हालत बेहतर अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है “इस लड़की की हालत सोमवार से बेहतर है लेकिन अभी भी उसकी हालत नाज़ुक ही है. हम बस इतना कह सकते हैं की हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.” अस्पताल में उसके इलाज कर रहे हैं मनोचिक्त्सक डॉक्टर रस्तोगी का कहना है कि “यह लडकी भविष्य को लेकर आशावादी है.”\n\nSummary:", "target": "सफ़दरजंग के आईसीयू में तारों और दवा की नलियों से बिंधी हुई वो लड़की और बाहर वेटिंग रूम में बैठे माँ-बाप, मनोचिकित्सक उनको बता रहे हैं कि इस लड़की की सांसों की लड़ाई कितनी कठिन है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपूरे देश में इस सेहत लड़की की सेहत के लिए प्रार्थनाएं की जा रही है. अस्पताल के 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संरक्षित पाए गए हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनचेस्टर की विशेषज्ञ डॉक्टर लिडीजा मैकनाइट ने बताया कि आश्चर्य की बात है कि एक तिहाई जानवरों की ममी में कोई भी जानवरों का अवशेष नहीं मिला. इसके बजाए वो बताती है कि कपड़ों में कुछ और ही चीजें लिपटी हुई थीं. मसलन लकड़ी, कीचड़ और खर-पतवार जैसी चीज़ें. इंसानों की ममी मृत शरीर को संरक्षित करने के मकसद से बनाई जाती थीं लेकिन जानवरों की ममी का इस्तेमाल धार्मिक मकसद से किया जाता था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने प्राचीन मिस्र के जानवरों की ममी उद्योग में घपले को उजागर किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमैनचेस्टर संग्राहलय में एक स्कैनिंग प्रोजेक्ट और यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के ज़रिए इस बात का पता चला कि एक तिहाई ममी में कपड़ो के गट्ठर अंदर से खाली थे. शोधकर्ताओं का मानना है कि धार्मिक कारणों से जानवरों की ममी की मांग काफ़ी होना इसकी वजह हो सकती है. शोधकर्ता दल की ओर से किया गया अपनी तरह का यह अनोखा स्कैनिंग प्रोजेक्ट था. इसके तहत बिल्ली और चिड़ियों की ममी से लेकर घड़ियाल की ममी तक 800 ममियों से ज़्यादा की स्कैनिंग एक्स रे और सीटी स्कैन की मदद से की गई. समाप्त धार्मिक मकसद इसमें से एक तिहाई ममियों में मृत जानवरों के शरीर सही सलामत हालत में पाए गए. एक तिहाई में मृत जानवरों के शरीर आंशिक रूप से संरक्षित पाए गए हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनचेस्टर की विशेषज्ञ डॉक्टर लिडीजा मैकनाइट ने बताया कि आश्चर्य की बात है कि एक तिहाई जानवरों की ममी में कोई भी जानवरों का अवशेष नहीं मिला. इसके बजाए वो बताती है कि कपड़ों में कुछ और ही चीजें लिपटी हुई थीं. मसलन लकड़ी, कीचड़ और खर-पतवार जैसी चीज़ें. इंसानों की ममी मृत शरीर को संरक्षित करने के मकसद से बनाई जाती थीं लेकिन जानवरों की ममी का इस्तेमाल धार्मिक मकसद से किया जाता था. 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है. लाख से अधिक लोग दरअसल ब्राज़ील सरकार एक निश्चित उम्र के बाद देश के सभी बुज़ुर्ग नागरिकों को पेंशन देती है. इस समय देश में 90 साल से अधिक उम्र वाले एक लाख से अधिक लोग हैं. बीबीसी संवाददाता स्टीव किंगस्टोन का कहना है कि इस नियम की भावना तो अच्छी थी लेकिन यह बुरी तरह विफल हुई है. सरकार चाहती थी कि 90 साल से अधिक उम्र के सभी बुज़ुर्ग समाजिक सुरक्षा कार्यालय में अपना रजिस्ट्रेशन करा लें जिससे कि किसी भी तरह की धोखाधड़ी को रोका जा सके. लेकिन जैसे ही इस नियम की घोषणा हुई, सामाजिक सुरक्षा कार्यालय के सामने बुज़ुर्गों की कतार लगनी शुरु हो गई. लोग अपने हाथों में दस्तावेज़ों लिए हुए थे और उनको कागज़ी कार्रवाई पूरी करने के लिए खड़ा रहना पड़ा. ब्राज़ील के विपक्षी दलों ने इसे अमानवीय और क्रूर बताते हुए इसका ज़ोरदार विरोध किया. और सरकार में इसे लेकर ऐसा हड़कंप मचा कि पेंशन मामलों के मंत्री को टेलीविजन पर आकर बुज़ुर्गों से माफ़ी माँगनी पड़ी. मंत्री रिकार्डो बारज़ोइनी ने कहा कि इस परेशानी के लिए पूरी ज़िम्मेदारी ले रहे हैं. हालांकि सरकार ने इस नियम को वापस नहीं लिया है लेकिन कहा गया है कि अब ज़्यादातर कागज़ी कार्रवाई उनके घर पर जाकर ही की जाएगी.\n\nSummary:", "target": "पेंशन लेने के लिए अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र देने का नियम बनाने के लिए ब्राज़ील सरकार ने अपने देश के बुज़ुर्गों से माफ़ी माँगी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसरकार ने यह नियम पिछले हफ़्ते लागू किया था ताकि धोखाधड़ी को रोका जा सके. यह नियम 90 साल से अघिक उम्र के सभी बुज़ुर्गों पर लागू होना था. सरकार का कहना है कि पेंशन के एक तिहाई मामलों मे धोखाधड़ी हो रही है और युवा लोग अपने ऐसे रिश्तेदारों के नाम पर पेंशन ले रहे हैं जिनकी मौत हो चुकी है. लेकिन इस नियम के लागू होने के बाद सामाजिक सुरक्षा कार्यालय के बाहर जिस तरह की कतार लग गई और बुज़ुर्गों को जिस तरह की परेशानी हुई उसके चलते सरकार को माफ़ी माँगनी पड़ी है. लाख से अधिक लोग दरअसल ब्राज़ील सरकार एक निश्चित उम्र के बाद देश के सभी बुज़ुर्ग नागरिकों को पेंशन देती है. इस समय देश में 90 साल से अधिक उम्र वाले एक लाख से अधिक लोग हैं. बीबीसी संवाददाता स्टीव किंगस्टोन का कहना है कि इस नियम की भावना तो अच्छी थी लेकिन यह बुरी तरह 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किया गया था जो 18 जुलाई को खत्म होना था. झामुमो ने के नेतृत्व में भाजपा के नेतृ़त्व वाली सरकार से 8 जनवरी को समर्थन वापस ले लिया था जिसके बाद 18 जनवरी को झारखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था. झारखंड राज्य बनने के बाद 13 साल से भी कम समय में नौवें मंत्रिमंडल की अगुवाई कर रहे हेमंत सोरेन पांचवे आदिवासी मुख्यमंत्री हैं. राज्य बनने के बाद इसकी कमान चार आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी (एक बार), अर्जुन मुंडा (तीन बार), शिबू सोरेन (तीन बार) और मधु कोड़ा (एक बार) संभाल चुके हैं.\n\nSummary:", "target": "झारखंड से राष्ट्रपति शासन हटाए जाने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन राज्य के नौवें मुख्यमंत्री बन गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nहेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र हैं. हेमंत सोरेन को राज्यपाल सैयद अहमद ने राजभवन परिसर में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. हेमंत सोरेन के साथ साथ राज्य में कांग्रेस विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह और राष्ट्रीय जनता दल की नेता अन्नपूर्णा देवी ने भी मंत्री के तौर पर शपथ ली. 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तो उन्हें इसका ख़ासा नुकसान हुआ है. इस कंपनी ने अपने एक क्लाइंट के कहने पर किसी कंपनी का एक शेयर 610,000 येन या पाँच हज़ार डॉलर में बेचा लेकिन बेचते समय उसके दलाल ने शायद दुनिया की सबसे महंगी टाइपिंग की ग़लती कर डाली. दलाल ने येन की जगह शेयर लिख दिए यानी एक शेयर की बज़ाय 610,000 शेयर बेच दिए गए वो भी एक येन की क़ीमत पर जी हां.....एक येन में बिक गए 610,000 शेयर. मिज़ुहो कंपनी ने दो मिनट से भी कम समय में ग़लती खोज निकाली लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. ऑनलाइन पर बैठे ग्राहकों की तेज़ नज़र से ये बात छुपी नहीं और व्यापार शुरु हो गया यानी इन शेयरों की ख़रीद शुरू हो गई. कई घंटों तक ग़लती नहीं मानने वाली मिज़ुहो कंपनी अब उन शेयरों को कम से कम क़ीमत में ख़रीदने की कोशिश कर रही है लेकिन कंपनी का कहना है कि इससे उन्हें 22 करोड़ डॉलर का नुक़सान होगा. सरकार ने पूरे मामले की जाँच की घोषणा कर दी है कि शेयर मार्केट के कंप्यूटर ऐसी भूल को तत्काल क्यों नहीं पकड़ सके. कंपनी ने अपनी सालाना पार्टी रद्द कर दी है और शायद इस साल कार्यकर्ताओं को क्रिसमस का बोनस भी बहुत कम मिले.\n\nSummary:", "target": "टाइप की एक ग़लती किसी कंपनी के लिए इतनी घातक साबित होगी, ये न कंपनी ने सोचा होगा और न टाइप करने वाले ने.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन यही हुआ जापान में और नुक़सान कितना हुआ होगा! अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाए. इस कंपनी को नुक़सान हुआ है 22 करोड़ डॉलर का. मिज़ुहो सिक्यूरिटीज़ नाम की इस कंपनी ने ग़लती से एक येन (जापानी मुद्रा) में 610,000 शेयर की पेशकश कर दी जबकि करना था 610,000 येन में एक शेयर. लेकिन तब तक तो देर हो चुकी थी. कंप्यूटर पर शेयर व्यापार के शुरु होते ही स्टॉक बाज़ार तक सबकी पहुँच हो गई जो कि अब तक कुछ ही लोगों तक सीमित थी. घर बैठे आम निवेशकर्ता भी शेयरों की खरीद बिक्री करने लगे और सारी प्रणाली चाक चौबंद और काफी तेज़ हो गई. शेयर दलाल एक दिन ज्यादा से ज़्यादा व्यापार करने लगे लेकिन जापान के मिज़ुहो सिक्र्यूरिटीज़ की बात करें तो उन्हें इसका ख़ासा नुकसान हुआ है. इस कंपनी ने अपने एक क्लाइंट के कहने पर किसी कंपनी का एक शेयर 610,000 येन या पाँच हज़ार डॉलर में बेचा लेकिन बेचते समय उसके दलाल ने शायद दुनिया की सबसे महंगी टाइपिंग की ग़लती कर डाली. दलाल ने 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को डिज़ायन करने वाली छात्रा रोशाना किलफिडर ने बताया, \"सन ट्रैप बैग का विचार मुझे उन दोस्तों को देख कर आया जो अंधेरे में घर के दरवाज़े पर खड़े होकर बैग में चाभी ढूँढ- ढूँढ कर परेशान होती हैं.\" किलफिडर ने आगे बताया, \"मैंने ये भी नोटिस किया कि कैसे लोग अँधेरे में बैग में चाभी ढूँढने में मोबाइल फ़ोन की रोशनी का इस्तेमाल करते हैं.\" यदि बारिश या ख़राब मौसम के कारण दिन में भी अँधेरा छाया रहता हो...तो भी घबराने की बात नहीं. सोलर बैग की बैटरी बिजली से भी चार्ज की जा सकती है.\n\nSummary:", "target": "किसी महिला के हैंडबैग में रखी चीज़ें हमेशा से रहस्य रही हैं और कई बार उस महिला को भी पूरी तरह पता नहीं होता वो क्या-क्या लेकर चल रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन ब्रिटेन में डिज़ायन किए गए एक हैंडबैग से इस समस्या पर कुछ रोशनी पड़ सकेगी. दरअसल ब्रनेल विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने एक सौर-पैनल युक्त हैंडबैग डिज़ायन किया है. यह बैग सौर ऊर्जा की सहायता से रोशन होता है और इस कारण उसमें चाभी जैसी छोटी-छोटी चीज़ों को चुटकी बजाते ढूँढ कर निकाला जा सकता है. 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हुए हैं उनमें अरब लीग के अध्यक्ष अम्र मूसा और अमरीका के वरिष्ठ दूत विलियम बर्न्स शामिल थे. फ्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक बाद में लेबनान की यात्रा करेंगे. अमरीका ने हरीरी की मौत के विरोधस्वरूप सीरिया से अपने राजदूत को वापस बुला लिया है. बेरूत में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हरीरी की मौत पर मुसलमान, ईसाई और द्रूज़ सभी शोक में शामिल हुए.\n\nSummary:", "target": "लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक हरीरी का बुधवार को राजधानी बेरूत में अंतिम संस्कार कर दिया गया जिसके लिए हज़ारों लोग एकत्र हुए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअंतिम संस्कार के दौरान काफ़ी तनाव रहा. रफ़ीक हरीरी की गत सोमवार को बेरूत में एक बम विस्फोट में मौत हो गई थी. उनके अलावा कम से कम 14 अन्य लोग भी मारे गए थे. रफ़ीक हरीरी के जनाज़े लेबनान के झंडे में लपेटा गया था और जिस मस्जिद में उनके जनाज़े की नमाज़ हुई वहाँ हज़ारों लोग जमा हुए. बहुत से लोग हरीरी के घर के आसपास भी एकत्र हुए थे और वहाँ उन्होंने सीरिया विरोधी नारे लगाए. लेबनान के विपक्षी दल ने हरीरी की मौत के लिए सीरिया को 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में बीबीसी से बातचीत में कंगना ने दिल खोलकर बात की. मौका था उनकी निजी वेबसाइट के लॉन्च का. हमने उनसे जानना चाहा कि वे अपनी निजी ज़िंदगी के विवादों को लेकर क्या सोचती हैं? 'विवाद तकलीफ़देह' निजी ज़िन्दगी से जुड़े विवादों और अफ़वाहों के बारे में कंगना बताती हैं, ''सभी का अपना-अपना नज़रिया होता है, अनुभव होते हैं, मतभेद होते हैं तो विवाद के लिए भी जगह बन जाती है.\" वे आगे कहती हैं, \"ऐसा नहीं है कि अब इन विवादों से फ़र्क नहीं पड़ता, पड़ता है. कई बार जब निजी बातें सार्वजनिक हो जाती हैं और गॉसिप बनकर चटखारों का विषय बन जाती हैं, तो तकलीफ़ भी होती है. मगर फिर उन्हें हैंडल भी करना पड़ता है.'' 'अतीत का अफ़सोस नहीं' कहते हैं कि इंसान के अतीत के फ़ैसले ही उसका आज बनाते हैं. कंगना जब से फिल्मों में आईं, उनका नाम किसी न किसी से जुड़ता रहा. पहले उनका नाम आदित्य पंचोली से जोड़ा गया. फिर अध्ययन सुमन से उनके प्रेम प्रसंग पर चर्चे हुए. अतीत को लेकर उनके मन में कहीं किसी तरह का पछतावा तो नहीं. वे कहती हैं, ''अफ़सोस तो नहीं होता. आप किसी हालात से गुज़रे हों, या किसी भी तालमेल में रहे हों, ऐसा नहीं होता कि आप कुछ सीखते नहीं हैं. हर अनुभव एक सबक होता है. उसमें ये सोचना कि ऐसा नहीं होता तो वैसा होता बेवकूफी है. क्योंकि कितने अरबों-खरबों पल और कितने अनगिनत इत्तेफ़ाक आपको इस मुकाम यानी वर्तमान तक लाते हैं. इस फ़लसफ़े से तो सभी वाकिफ़ हैं कि एक भी सेकेंड इधर-उधर हो गया होता तो हम और आप यहाँ बैठे बातें न कर रहे होते. मैं अपनी ज़िंदगी को अध्यात्मिक नज़रिए से देखती हूँ.'' 'लोगों ने धोखा दिया' पर्दे पर ट्रेजेडी क्वीन के किरदार बखूबी अंजाम देने वाली कंगना के बारे में कहा जाता है कि वे प्यार के मामले में अनलकी साबित हुई हैं. क्या अब प्यार को लेकर उनके मन में कड़वाहट है? इस सवाल पर वे कहती हैं, ''माना मुझे लोगों ने धोखा दिया, मेरे साथ बुरा बर्ताव किया, पर परिवार और दोस्तों के मामले में मैं लकी हूँ. मेरा परिवार मुझे बहुत चाहता है. जहाँ तक किसी ख़ास दोस्त या किसी ख़ास शख़्स की बात है, तो फिलहाल मेरे पास इतना वक़्त नहीं है. जब वक़्त आएगा तब उसे भी मौका दूँगी. फिलहाल मैं सिंगल हूँ.'' 'ज़िद का ख़मियाज़ा' कंगना एक अच्छी अभिनेत्री हैं, ये सभी मानते हैं पर उनके साथ काम करनेवालों का इल्ज़ाम है कि उनके नाज़-नखरे बहुत होते हैं. कहा जाता है कि आमतौर पर वे सेट पर सामंजस्य नहीं बिठा पातीं. कुछ अरसा पहले डेविड धवन की 'रास्कल' के दौरान उन पर ये इल्ज़ाम लगा था. इस आरोप पर वे कहती हैं, 'सबका स्वभाव अलग होता है. मैं स्वभाव से थोड़ी ज़िद्दी हूं, अड़ियल हूं और मुझे कई बार बहुत ग़ुस्सा आ जाता है. अगर मुझे दाएं जाना है, तो दुनिया की कोई ताक़त मुझे बाएं नहीं भेज सकती. मेरा यह स्वभाव बचपन से है. कई लोग इसे बुरा मानते हैं पर कई इस ज़िद्दी स्वभाव के कारण मेरी क़द्र करते हैं.\" वे कहती हैं, \"मुझे अपने इस स्वभाव का ख़मियाज़ा भी भुगतना पड़ा है. मेरे हाथों से कई बार चीजें छिन जाती हैं. मगर यह भी महसूस होता है कि मेरा ज़िद्दीमिज़ाज ही मुझे इस मुकाम तक लाया है. ये बदतमीजियां और ज़िद मैंने अपने घर में न की होतीं तो शायद मैं यहाँ न होती.\" एक तरफ कंगना 'तनु वेड्स मनु' के दमदार किरदार में सबका दिल जीत लेती हैं, तो दूसरी ओर 'रास्कल्स' और 'डबल धमाल' में बिकनी बेब और अर्थहीन भूमिकाएं कर दर्शकों को निराश कर देती हैं. इस पर वे कहती हैं, 'देखिए, यह फिल्म इंडस्ट्री काफी असुरक्षित जगह है. कई बार आप पैसों के लिए ऐसे रोल कर जाते हैं, जिन्हें लेकर आप खुद भी खुश नहीं होते. 'रास्कल्स' या 'डबल धमाल' जैसी फिल्में करने का दुःख नहीं है पर मैं यह जान चुकी हूँ कि वो मेरा अंदाज़ नहीं है.'' कंगना की वेबसाइट कंगना के नाम पर इंटरनेट पर कई फ़र्ज़ी अकाउंट्स मौजूद हैं. उनकी वेबसाइट इसी को ठीक करने की कोशिश है. \"मुझे लगा कि मुझसे जुड़ी जानकारी सही माध्यम से बाहर नहीं जा पा रही है. इसके अलावा ट्विटर और फ़ेसबुक मेरा समय बहुत खाता है तो मुझे लगा कि वेबसाइट लॉन्च करना सही होगा. सच कहूँ, तो आज तक मेरे और मेरे प्रसंशकों के बीच कोई सीधा ज़रिया रहा ही नहीं. मेरी कई फ़िल्में आ रही हैं जैसे 'कृष 3','क्वीन','रिवॉल्वर रानी','उंगली' और 'रज्जो'. मुझे लगा कि मुझे अपने फ़ैन्स से जुड़ने की ज़रूरत है.\" इस वेबसाइट का सबसे बड़ा आकर्षण होगा कंगना का ब्लॉग और रचनात्मक बातचीत. जैसे कंगना की पसंद-नापसंद, डायट. इसके अलावा दूसरी जानकारियां भी वहां होंगी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गैंगस्टर, वो लम्हे, फ़ैशन, तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों की ग्लैमरस अभिनेत्री कंगना रनाउत जितना अपनी दमदार भूमिका को लेकर चर्चा में रहीं हैं, उतना ही वे विवादों में भी घिरी रही हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकभी उनके अफेयर्स पर विवाद होते हैं तो कभी उन्हें 'टैन्ट्रम क्वीन' कहा जाता है. हाल ही में बीबीसी से बातचीत में कंगना ने दिल खोलकर बात की. मौका था उनकी निजी वेबसाइट के लॉन्च का. हमने उनसे जानना चाहा कि वे अपनी निजी ज़िंदगी के विवादों को लेकर क्या सोचती हैं? 'विवाद तकलीफ़देह' निजी ज़िन्दगी से जुड़े विवादों और अफ़वाहों के बारे में कंगना बताती हैं, ''सभी का अपना-अपना नज़रिया होता है, अनुभव होते हैं, मतभेद होते हैं तो विवाद के लिए भी जगह बन जाती है.\" वे आगे कहती हैं, \"ऐसा नहीं है कि अब इन विवादों से फ़र्क नहीं पड़ता, पड़ता है. कई बार जब निजी बातें सार्वजनिक हो जाती हैं और गॉसिप बनकर चटखारों का विषय बन जाती हैं, तो तकलीफ़ भी होती है. मगर फिर उन्हें हैंडल भी करना पड़ता है.'' 'अतीत का अफ़सोस नहीं' कहते हैं कि इंसान के अतीत के फ़ैसले ही उसका आज बनाते हैं. कंगना जब से फिल्मों में आईं, उनका नाम किसी न किसी से जुड़ता रहा. पहले उनका नाम आदित्य पंचोली से जोड़ा गया. फिर अध्ययन सुमन से उनके प्रेम प्रसंग पर चर्चे हुए. अतीत को लेकर उनके मन में कहीं किसी तरह का पछतावा तो नहीं. वे कहती हैं, ''अफ़सोस तो नहीं होता. आप किसी हालात से गुज़रे हों, या किसी भी तालमेल में रहे हों, ऐसा नहीं होता कि आप कुछ सीखते नहीं हैं. हर अनुभव एक सबक होता है. उसमें ये सोचना कि ऐसा नहीं होता तो वैसा होता बेवकूफी है. क्योंकि कितने अरबों-खरबों पल और कितने अनगिनत इत्तेफ़ाक आपको इस मुकाम यानी वर्तमान तक लाते हैं. इस फ़लसफ़े से तो सभी वाकिफ़ हैं कि एक भी सेकेंड इधर-उधर हो गया होता तो हम और आप यहाँ बैठे बातें न कर रहे होते. मैं अपनी ज़िंदगी को अध्यात्मिक नज़रिए से देखती हूँ.'' 'लोगों ने धोखा दिया' पर्दे पर ट्रेजेडी क्वीन के किरदार बखूबी अंजाम देने वाली कंगना के बारे में कहा जाता है कि वे प्यार के मामले में अनलकी साबित हुई हैं. क्या अब प्यार को लेकर उनके मन में कड़वाहट है? इस सवाल पर वे कहती हैं, ''माना मुझे लोगों ने धोखा दिया, मेरे साथ बुरा बर्ताव किया, पर परिवार और दोस्तों के मामले में मैं लकी हूँ. मेरा परिवार मुझे बहुत चाहता है. जहाँ तक किसी ख़ास दोस्त या किसी ख़ास शख़्स की बात है, तो फिलहाल मेरे पास इतना वक़्त नहीं है. जब वक़्त आएगा तब उसे भी मौका दूँगी. फिलहाल मैं सिंगल हूँ.'' 'ज़िद का ख़मियाज़ा' कंगना एक अच्छी अभिनेत्री हैं, ये सभी मानते हैं पर उनके साथ काम करनेवालों का इल्ज़ाम है कि उनके नाज़-नखरे बहुत होते हैं. कहा जाता है कि आमतौर पर वे सेट पर सामंजस्य नहीं बिठा पातीं. कुछ अरसा पहले डेविड धवन की 'रास्कल' के दौरान उन पर ये इल्ज़ाम लगा था. इस आरोप पर वे कहती हैं, 'सबका स्वभाव अलग होता है. मैं स्वभाव से थोड़ी ज़िद्दी हूं, अड़ियल हूं और मुझे कई बार बहुत ग़ुस्सा आ जाता है. अगर मुझे दाएं जाना है, तो दुनिया की कोई ताक़त मुझे बाएं नहीं भेज सकती. मेरा यह स्वभाव बचपन से है. कई लोग इसे बुरा मानते हैं पर कई इस ज़िद्दी स्वभाव के कारण मेरी क़द्र करते हैं.\" वे कहती हैं, \"मुझे अपने इस स्वभाव का ख़मियाज़ा भी भुगतना पड़ा है. मेरे हाथों से कई बार चीजें छिन जाती हैं. मगर यह भी महसूस होता है कि मेरा ज़िद्दीमिज़ाज ही मुझे इस मुकाम तक लाया है. ये बदतमीजियां और ज़िद मैंने अपने घर में न की होतीं तो शायद मैं यहाँ न होती.\" एक तरफ कंगना 'तनु वेड्स मनु' के दमदार किरदार में सबका दिल जीत लेती हैं, तो दूसरी ओर 'रास्कल्स' और 'डबल धमाल' में बिकनी बेब और अर्थहीन भूमिकाएं कर दर्शकों को निराश कर देती हैं. इस पर वे कहती हैं, 'देखिए, यह फिल्म इंडस्ट्री काफी असुरक्षित जगह है. कई बार आप पैसों के लिए ऐसे रोल कर जाते हैं, जिन्हें लेकर आप खुद भी खुश नहीं होते. 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क्योंकि बुशरा मानिका और इमरान ख़ान शादी तो 18 फ़रवरी की रात नौ बजे के करीब हुई. इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने इस निकाह की तस्दीक कर दी है. इमरान ख़ान और बुशरा मानिका ने किया निकाह समाप्त 'तावीज़ लेने के लिए हुई थी इमरान-बुशरा की मुलाकात' हालांकि तब इमारन ख़ान की पार्टी की तरफ़ एक बयान ट्वीट किया गया था जिसमें सिर्फ़ इतना ही स्वीकार किया गया था कि इमरान ख़ान ने बुशरा मानिका नाम की एक महिला को शादी का प्रस्ताव दिया है लेकिन अभी उनका जवाब नहीं आया है. सात जनवरी को जारी इस बयान में पार्टी ने कहा था, \"मिस्टर ख़ान ने बुशरा मानिका को शादी का प्रस्ताव दिया है, लेकिन इस पर जवाब देने के लिए उन्होंने वक़्त मांगा है. वह अपने परिवार और बच्चों से बात करके इस पर फ़ैसला लेंगी.\" 'इमरान की तीसरी शादी का नवाज़ कनेक्शन' इमरान की शादी में मीडिया दीवाना कौन हैं बुशरा? पाकिस्तान में चर्चा है कि आखिर यह बुशरा मानिका कौन हैं जिन पर इमरान ख़ान का दिल आ गया है. पाकिस्तान के अख़बार 'द एक्सप्रैस ट्रिब्यून की मानें तों बुशरा मानिका से इमरान की पहली मुलाक़ात साल 2015 में लोधरन में एनए-154 सीट के लिए होने वाले उपचुनाव से पहले हुई थी. अख़बार लिखता है कि बुशरा पांच बच्चों की मां हैं और उनकी उम्र 40 साल से ऊपर है. बुशरा के पूर्व पति का नाम ख़ावर फ़रीद मानिका है और दोनों का हाल ही में तलाक़ हुआ है. ख़ावर फ़रीद मानिका पेशे से कस्टम अधिकारी हैं और उनके पिता ग़ुलाम फ़रीद मानिका संघीय मंत्री रह चुके हैं. अख़बार आगे लिखता है कि बुशरा के दो बेटों इब्राहिम और मूसा ने लाहौर के एचिसन कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया और फिलहाल वे विदेश से आगे की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं. बुशरा की तीन बेटियां भी हैं, जिनमें सबसे बड़ी बेटी मेहरू पंजाब (पाकिस्तान) के सांसद मियां अट्टा मोहम्मद मानिका की बहू हैं. इमरान ख़ान और उनकी दूसरी पत्नी रेहाम ख़ान पहले भी जुड़ चुका है नाम पाकिस्तान के एक और बड़े अख़बार 'डॉन' ने मानिका के बारे में लिखा है कि वे वट्टू बिरादरी से ताल्लुख रखती हैं. डॉन अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ऐसा पहली बार नहीं है जब मानिका परिवार के साथ इमरान ख़ान का नाम जुड़ा हो. साल 2016 में भी इसी परिवार की एक अन्य महिला के साथ इमरान के शादी करने की ख़बरें मीडिया में उड़ी थीं. उस समय महिला का नाम मरियम बताया गया था. तब इमरान ख़ान ने ख़ुद सामने आकर इन ख़बरों को बेबुनियाद बताया था. द न्यूज़ वेबसाइट ने बताया है कि इमरान बुशरा के पास आध्यात्मिक ज्ञान लेने जाते थे. अपनी पहली पत्नी जेमिमा के साथ इमरान ख़ान इमरान ख़ान ने पहली शादी जेमिमा गोल्डस्मिथ से की थी, जिनसे उनके दो बेटे हैं. जेमिमा और इमरान के बीच साल 2004 में तलाक़ हो गया था. इसके बाद 2014 में इमरान ने टीवी एंकर रेहाम ख़ान से दूसरी शादी की थी. रेहाम ख़ान के माता-पिता पाकिस्तानी हैं और उनका जन्म लीबिया में हुआ है. दोनों की शादी सिर्फ़ 10 महीने चल पाई थी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर और तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) पार्टी के नेता इमरान ख़ान की तीसरी शादी की ख़बरें सरहद पार सुर्खियां बना रही हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजनवरी की शुरुआत में एक अख़बार ने दावा किया था कि इमरान ख़ान ने नए साल के मौक़े पर तीसरी बार शादी कर ली है. लेकिन वो ख़बर महज अटकलबाज़ी ही निकली क्योंकि बुशरा मानिका और इमरान ख़ान शादी तो 18 फ़रवरी की रात नौ बजे के करीब हुई. इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने इस निकाह की तस्दीक कर दी है. इमरान ख़ान और बुशरा मानिका ने किया निकाह समाप्त 'तावीज़ लेने के लिए हुई थी इमरान-बुशरा की मुलाकात' हालांकि तब इमारन ख़ान की पार्टी की तरफ़ एक बयान ट्वीट किया गया था जिसमें सिर्फ़ इतना ही स्वीकार किया गया था कि इमरान ख़ान ने बुशरा मानिका नाम की एक महिला को शादी का प्रस्ताव दिया है लेकिन अभी उनका जवाब नहीं आया है. सात जनवरी को जारी इस बयान में पार्टी ने कहा था, \"मिस्टर ख़ान ने बुशरा मानिका को शादी का प्रस्ताव दिया है, लेकिन इस पर जवाब देने के लिए उन्होंने वक़्त मांगा है. वह अपने परिवार और बच्चों से बात करके इस पर फ़ैसला लेंगी.\" 'इमरान की तीसरी शादी का नवाज़ कनेक्शन' इमरान की शादी में मीडिया दीवाना कौन हैं बुशरा? पाकिस्तान में चर्चा है कि आखिर यह बुशरा मानिका कौन हैं जिन पर इमरान ख़ान का दिल आ गया है. पाकिस्तान के अख़बार 'द एक्सप्रैस ट्रिब्यून की मानें तों बुशरा मानिका से इमरान की पहली मुलाक़ात साल 2015 में लोधरन में एनए-154 सीट के लिए होने वाले उपचुनाव से पहले हुई थी. अख़बार लिखता है कि बुशरा पांच बच्चों की मां हैं और उनकी उम्र 40 साल से ऊपर है. बुशरा के पूर्व पति का नाम ख़ावर फ़रीद मानिका है और दोनों का हाल ही में तलाक़ हुआ है. ख़ावर फ़रीद मानिका पेशे से कस्टम अधिकारी हैं और उनके पिता ग़ुलाम फ़रीद मानिका संघीय मंत्री रह चुके हैं. अख़बार आगे लिखता है कि बुशरा के दो बेटों इब्राहिम और मूसा ने लाहौर के एचिसन कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया और फिलहाल वे विदेश से आगे की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं. बुशरा की तीन बेटियां भी हैं, जिनमें सबसे बड़ी बेटी मेहरू पंजाब (पाकिस्तान) के सांसद मियां अट्टा मोहम्मद मानिका की बहू हैं. इमरान ख़ान और उनकी दूसरी पत्नी रेहाम ख़ान पहले भी जुड़ चुका है नाम पाकिस्तान के एक और बड़े अख़बार 'डॉन' ने मानिका के बारे में लिखा है कि वे वट्टू बिरादरी से ताल्लुख रखती हैं. डॉन अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ऐसा पहली बार नहीं है जब मानिका परिवार के साथ इमरान ख़ान का नाम जुड़ा हो. साल 2016 में भी इसी परिवार की एक अन्य महिला के साथ इमरान के शादी करने की ख़बरें मीडिया में उड़ी थीं. उस समय महिला का नाम मरियम बताया गया था. तब इमरान ख़ान ने ख़ुद सामने आकर इन ख़बरों को बेबुनियाद बताया था. द न्यूज़ वेबसाइट ने बताया है कि इमरान बुशरा के पास आध्यात्मिक ज्ञान लेने जाते थे. अपनी पहली पत्नी जेमिमा के साथ इमरान ख़ान इमरान ख़ान ने पहली शादी जेमिमा गोल्डस्मिथ से की थी, जिनसे उनके दो बेटे हैं. जेमिमा और इमरान के बीच साल 2004 में तलाक़ हो गया था. इसके बाद 2014 में इमरान ने टीवी एंकर रेहाम ख़ान से दूसरी शादी की थी. रेहाम ख़ान के माता-पिता पाकिस्तानी हैं और उनका जन्म लीबिया में हुआ है. दोनों की शादी सिर्फ़ 10 महीने चल पाई थी. 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नाराज़ हैं, तो उन्होंने कहा, \"प्रशासन की तो हर जगह नुक्ताचीनी होती है, जितना हमसे हो सकता है हम कर रहे हैं लेकिन आप भी जानते हैं कि एक ही दिन में सब कुछ नहीं हो सकता.\" तारीफ़ उन्होंने राहत और बचाव के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा,\"हमारी सेना और राज्य के प्रशासन ने बहुत मुस्तैदी दिखाई है, बहुत जल्द हमने क़दम उठाए, इससे जल्द और नहीं हो सकता था.\" जब उन्हें बताया गया कि लोग इतने नाराज़ हैं कि उन्होंने कुछ डॉक्टरों की पिटाई तक कर दी तो उन्होंने सफ़ाई में कहा, \"अगर लोगों को तकलीफ़ होगी तो वे नाराज़ तो होंगे ही, वे फौरन अपनी तकलीफ़ का अंत चाहते हैं लेकिन दवा, डॉक्टर और सामग्री पहुंचाने में थोड़ा समय तो लगता ही है.\" दुर्गम इलाक़ों में राहत नहीं पहुँचने की शिकायत के बारे में उन्होंने कहा, \"जहाँ हम सड़क से नहीं पहुँच पा रहे हैं वहाँ हेलिकॉप्टर से खाने के पैकेट बाँटे जा रहे हैं, हमारी तरफ़ से कोई कमी नहीं है.\" भूकंप प्रभावित इलाक़ों में रहने वाले विभाजित परिवारों का संपर्क टूट जाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ी समस्या है. उन्होंने कहा, \"यहां यह एक बड़ा सवाल है, लोगों में चिंता है, इसके बारे में मैंने प्रधानमंत्री से बात की है, आज भी जब वे आएँगे तो बात होगी.\"\n\nSummary:", "target": "जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद का कहना है कि भूकंप से राज्य में कम से कम 945 लोग मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी हिंदी से एक विशेष बातचीत में उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि मरने वालों की वास्तविक संख्या बढ़ सकती है क्योंकि बड़ी संख्या में लोग घायल हैं और अनेक लोग मलबे में दबे हो सकते हैं. जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कहा कि केंद्र सरकार पूरी सहायता दे रही है. उन्होंने कहा, \"केंद्र सरकार आर्थिक सहायता दे रही है, हमारे पास संसाधनों की कमी नहीं है.\" जब उनसे पूछा गया कि तीन रातों से लोग खुले आसमान के नीचे पड़े हैं, राज्य प्रशासन से नाराज़ हैं, तो उन्होंने कहा, \"प्रशासन की तो हर जगह नुक्ताचीनी होती है, जितना हमसे हो सकता है हम कर रहे हैं लेकिन आप भी जानते हैं कि एक ही दिन में सब कुछ नहीं हो सकता.\" तारीफ़ उन्होंने राहत और बचाव के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा,\"हमारी सेना 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परमाणु मसले पर उनका देश 'तयशुदा वक़्त में निर्णायक' बातचीत में शामिल होने के लिए तैयार है. ईरान 2006 से ही परमाणु मसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्य देशों और जर्मनी से बातचीत कर रहा है. पश्चिमी देशों को शक है ईरान परमाणु हथियार का विकास कर रहा है. ईरान इन आरोपों से पूरी तरह इनकार करता रहा है. इस मसले पर किसी निश्चित समय सीमा के बारे में पूछने पर रूहानी ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा, \"इस बातचीत के किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए इसका सीमित अवधि में होना ज़रूरी है.\" रूहानी ने कहा है, \"यह समय सीमा जितनी कम हो, सभी के लिए यह उतना अच्छा होगा. ईरान चाहता है कि यह समय सीमा तीन महीने की हो, अगर यह छह महीने हो तो भी ठीक है. यह महीनों का ही मामला है, न कि सालों का.\" भविष्य की उम्मीद ओबामा ने कहा है कि अमरीका ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए कटिबद्ध है. ईरान के अमरीका के साथ वर्षों तक तल्ख रिश्ते रहने का बावजूद रूहानी ने कहा कि अगर वो अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलते हैं तो वो \"भविष्योन्मुखी\" रवैया अपनाएँगे. रूहानी ने बताया, \"इस संबंध में ईरान का अमरीका के 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(बीबीसी हिन्दी केक्लिक करें एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि परमाणु मसले पर उनका देश छह प्रमुख विश्व शक्तियों से बातचीत कर तीन से छह महीने के अंदर अंतिम फ़ैसले तक पहुँचना चाहता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवॉशिंगटन पोस्ट अख़बार से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा है कि वह इस मुद्दे के हल को अमरीका-ईरान संबंधों में नए अध्याय की \"शुरुआत\" मानते हैं. रूहानी ने अख़बार से यह भी कहा कि उन्हें इस बातचीत के लिए ईरान के सबसे बड़े नेता अयातुल्लाह ख़ुमैनी का पूरा समर्थन प्राप्त है. रूहानी गुरुवार को दुनिया के छह देशों के नेताओं से बात करेंगे. पी फाइव प्लस वन समूह नामक इस समूह में सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य देशों अमरीका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस के अलावा जर्मनी शामिल है. ईरान के विदेश मंत्री जव्वाद ज़रीफ़ न्यूयॉर्क में अमरीका के विदेश मंत्री जॉन केरी से मिलेंगे. ज़रीफ़ ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी के कूटनीतिज्ञों से भी मिलेंगे. निर्णायक बातचीत रूहानी ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में कहा था कि परमाणु मसले पर उनका देश 'तयशुदा वक़्त में निर्णायक' बातचीत में शामिल होने के लिए तैयार है. ईरान 2006 से ही परमाणु मसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्य देशों और जर्मनी से बातचीत कर रहा है. पश्चिमी देशों को शक है ईरान परमाणु हथियार का विकास कर रहा है. ईरान इन आरोपों से पूरी तरह इनकार करता रहा है. इस मसले पर किसी निश्चित समय सीमा के बारे में पूछने पर रूहानी ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा, \"इस बातचीत के किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए इसका सीमित अवधि में होना ज़रूरी है.\" रूहानी ने कहा है, \"यह समय सीमा जितनी कम हो, सभी के लिए यह उतना अच्छा होगा. ईरान चाहता है कि यह समय सीमा तीन महीने की हो, अगर यह छह महीने हो तो भी ठीक है. यह महीनों का ही मामला है, न कि सालों का.\" भविष्य की उम्मीद ओबामा ने कहा है कि अमरीका ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए कटिबद्ध है. ईरान के अमरीका के साथ वर्षों तक तल्ख रिश्ते रहने का बावजूद रूहानी ने कहा कि अगर वो अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलते हैं तो वो \"भविष्योन्मुखी\" रवैया अपनाएँगे. रूहानी ने बताया, \"इस संबंध में ईरान का अमरीका के संग पत्राचार और संवाद जारी है. हमें एक प्रस्थान बिंदु की ज़रूरत है और मुझे लगता है कि परमाणु मसला वही बिंदु है.\" रूहानी ने कहा, \"परमाणु मसले पर सहमति बनने के बाद हमारे संबंधों की बेहतरी की दिशा में कोई भी असंभव बाधा नहीं रहेगी. इस मसले के सुलझने के बाद कुछ भी संभव है.\" ओबामा ने ईरान के राष्ट्रपति के कमोबेश \"उदार रुख\" का स्वागत किया है. ओबामा ने कहा कि अमरीका ईरान के साथ परमाणु मसले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहता है और वो ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए कटिबद्ध है. बुधवार को ज़रीफ़ फ्रांस के विदेश मंत्री लॉरेंट फेबियस से मिले थे. ज़रीफ़ ने कहा, \"परमाणु मसले और कल की बैठक के बारे में हमारी अच्छी बातचीत हुई.\" परमाणु मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र एवं पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था काफी प्रभावित हुई है. 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भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि देश के कुछ पुराने रिएक्टरों में स्थिति अलग है और भारत को उनकी भी जांच पड़ताल करानी चाहिए. बेहतरी की गुंजाइश वियना स्थिति आईएईए की ऑपरेशनल सेफ्टी डिविजन के प्रमुख मीरोस्लाव लिपर का कहना है, “भारत (ऑडिट में) वैश्विक सुरक्षा रैंक में विजेता के तौर पर उभरा है.” लिपर ही उस बहुराष्ट्रीय 12 सदस्यों वाली टीम के प्रमुख थे जिसने भारत में निर्मित राजस्थान के 220 मेगावॉट क्षमता वाले इस संयंत्र का मुआयना किया. उन्होंने कहा, “भारत के रिएक्टर सुरक्षित और प्रभावशाली हैं.” लेकिन उन्होंने कहा, “इसमें सुधार की गुंजाइश भी है.” संयंत्र में ऐसा तंत्र भी होना चाहिए तो गड़बड़ी होने की स्थिति में मूल समस्या का विश्लेषण करे. उनके अनुसार, “ये बताना आसान है कि क्या हुआ, लेकिन ये बताने की भी जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ.” लिपर ने कहा जिन दो रिएक्टरों का उन्होंने मूल्यांकन किया वो “दुनिया के बेहतरीन रिएक्टरों में से हैं जहां ऐसे तौर तरीके अपनाए जाते हैं जिनसे दुनिया सीख सकती है.” लिपर ने बताया कि उनकी टीम को रिएक्टर के सभी हिस्सों को देखने की अनुमति दी गई और उनसे कुछ भी नहीं छिपाया गया. उन्होंने कहा कि कचरे के निपटारे की व्यवस्था भी संतोषजनक थी. आईएईए की टीम इस बात से भी प्रभावित थी कि संयंत्र के कर्मचारी उच्च और निम्न रेडियोधर्मी कचरे को एक दूसरे से अलग करते हैं. परमाणु ऊर्जा पर सवाल कुडनकुलम परियोजना पर कई सवाल उठते रहे हैं दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि भारत को अपने सबसे पुराने तारापुर रिएक्टरों की जांच पड़ताल भी संयुक्त राष्ट्र से करानी चाहिए. इन दो वॉटर बॉइलिंग रिक्टरों का निर्माण 1969 में जनरल इलेक्ट्रिक ने किया था. आण्विक ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ए गोपालकृष्णन कहते हैं, “तारापुर की ये छोटी इकाइयां पूरी तरह असुरक्षित हैं और इन्हें बहुत पहले ही बंद कर दिया जाना चाहिए था क्योंकि ये उसी तरह के रिएक्टर हैं जो फुकुशिमा दुर्घटना में एक के बाद एक धमाके के शिकार हुए थे.” तमिलनाडु में हाल में हफ्तों तक कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ प्रदर्शन हुए. कई सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग वहां रूस की मदद से बनाए जा रहे 100 मेगावॉट क्षमता के रिएक्टर को असुरक्षित बता कर उसका विरोध कर रहे हैं. विश्लेषकों का कहना है कि आईएईए की रिपोर्ट परमाणु रिएक्टर विरोधियों के स्वर कमजोर होंगे. भारत अगले दो साल में अपनी एटॉमिक रिएक्टर क्षमता को बढ़ा कर 63 हजार मेगावॉट करना चाहता है. अभी भारत में 20 रिएक्टर है जिनकी क्षमता 4,800 मेगावॉट है.\n\nSummary:", "target": "संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था ने कहा है कि भारत के रिएक्टर दुनिया के सबसे सुरक्षित और बेहतरीन रिएक्टरों में शामिल हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआईएईए रिपोर्ट में भारतीय रिएक्टरों की तारीफ हुई कई हफ्तों तक राजस्थान एटॉमिक पॉवर स्टेशन की जांच पड़ताल करने के बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने कहा कि ये संयंत्र फुकुशिमा जैसे हादसे से निपटने से सक्षम हैं. लेकिन आईएईए की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संयंत्र में अग्नि सुरक्षा और इलेक्ट्रिक केबलिंग सिस्टमों में बेहतरी की जरूरत है. ये पहला मौका है जब भारत ने अपने यहां संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों को आने की अनुमति दी है. लेकिन भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि देश के कुछ पुराने रिएक्टरों में स्थिति अलग है और भारत को उनकी भी जांच पड़ताल करानी चाहिए. बेहतरी की गुंजाइश वियना स्थिति आईएईए की 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भागवत के बयान को ग़लत तरीके से पेश किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने भी भागवत के बयान का बचाव करते हुए कहा है कि 'सेना का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए'. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को ट्विटर पर लिखा कि मोहन भागवत को सेना का अपमान करने पर 'शर्म आनी चाहिए'. राहुल गांधी ने कहा है, \"संघ प्रमुख का भाषण हर भारतीय का अपमान है क्योंकि ये उनका असम्मान करता है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दी. ये हमारे झंडे का अपमान है क्योंकि ये हर जवान का अपमान करता है जिन्होंने हमारे झंडे को सलाम किया था. भागवत जी को शर्म आनी चाहिए क्योंकि उन्हें हमारे शहीदों और सेना का अपमान किया है.\" आख़िर क्या बोले भागवत? संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में दिए एक भाषण में कहा, \"हम मिलिट्री संगठन नहीं हैं. मगर मिलिट्री जैसा अनुशासन हमारे अंदर है. और अगर देश को ज़रूरत पड़े और देश का संविधान, कानून कहे तो सेना तैयार करने को छह-सात महीने लग जाएंगे. संघ के स्वयं-सेवकों को लेंगे तो तीन दिन में तैयार हो जाएगा. ये हमारी क्षमता है.\" संघ ने दी सफाई भागवत के बयान पर बहस शुरू होने के बाद संघ की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया है. संघ नेता डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा है, \"मोहन भागवत जी के वक्तव्य को ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है. यह सेना के साथ तुलना नहीं थी बल्कि ये सामान्य समाज और स्वयंसेवकों के बीच में तुलना थी. दोनों को भारतीय सेना को ही तैयार करना होगा.\" बचाव में उतरी सरकार इसके साथ ही गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने भी ट्वीट करते हुए कहा है, \"भारतीय सेना हमारा सम्मान है. आपातकालीन स्थितियों में (कांग्रेसी आपातकाल में नहीं) हर भारतीय को सैन्य बलों के साथ खड़ा रहना चाहिए. भागवत जी ने बस इतना कहा है कि किसी को भी सेना के लिए तैयार होने में छह से सात महीनों का समय लगेगा लेकिन अगर संविधान इजाज़त दे तो आरएसएस के स्वयंसेवकों में योगदान देने की क्षमता है.\" रिजिजू ने अपने ट्वीट में ये भी कहा है, \"भारतीय सेना से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत किसने मांगे थे? भारतीय सेना के राजनीतिकरण की कोशिश नहीं कीजिए. कांग्रेस ने साल 2004 में धार्मिक आधार पर सैनिकों की गिनती कराने की कोशिश की थी लेकिन सेना ने अपना धरातल मजबूती से थामे रखा.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के कथित तौर पर सेना से संघ की तुलना से जुड़े एक बयान पर बहस शुरू हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकांग्रेस ने भागवत के बयान को 'हर भारतीय का अपमान' बताते हुए इसकी निंदा की है. वहीं विवाद होने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सफाई देते हुए कहा है कि भागवत के बयान को ग़लत तरीके से पेश किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने भी भागवत के बयान का बचाव करते हुए कहा है कि 'सेना का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए'. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को ट्विटर पर लिखा कि मोहन भागवत को सेना का अपमान करने पर 'शर्म आनी चाहिए'. राहुल गांधी ने कहा है, \"संघ प्रमुख का भाषण हर भारतीय का अपमान है क्योंकि ये उनका असम्मान करता है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दी. ये हमारे झंडे का अपमान है क्योंकि ये हर जवान का अपमान करता है जिन्होंने हमारे झंडे को सलाम किया था. भागवत जी को शर्म आनी चाहिए क्योंकि उन्हें हमारे शहीदों और सेना का अपमान किया है.\" आख़िर 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बनते जा रहे पश्चिमी देशों के नागरिक अब सोच रहे हैं कि क्या सऊदी अरब की सरकार वास्तव में उनकी सुरक्षा कर सकती है. हाल ही में सऊदी अरब के शहर खोबर में इस्लामी चरमपंथियों ने 22 लोगों को मार डाला था जिसके बाद तेल की क़ीमतें आसमान छूने लगी थीं. सऊदी अरब ने उसके बाद बार बार ये बयान दिए हैं कि वो तेल की आपूर्ति बढ़ा देगा और उसने तेल ठिकानों की सुरक्षा की व्यवस्था कर ली है. इसके बाद ही तेल की क़ीमतें कुछ संभली हैं. इससे पहले मई की शुरुआत में भी एक तेल ठिकाने पर हमला हुआ था जहाँ विदेशी काम करते हैं. लेकिन ऐसे हमलों से ये चिंताएँ एक बार फिर बढ़ रही हैं.\n\nSummary:", "target": "सऊदी अरब की राजधानी रियाध से कुछ अमरीकियों पर गोलीबारी की ख़बरें मिली हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक्षेत्र में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ है. लेकिन लगातार हमलों का निशाना बनते जा रहे पश्चिमी देशों के नागरिक अब सोच रहे हैं कि क्या सऊदी अरब की सरकार वास्तव में उनकी सुरक्षा कर सकती है. हाल ही में सऊदी अरब के शहर खोबर में इस्लामी चरमपंथियों ने 22 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अपने नोटिस में मांग की है कि पत्रिका माफीनामा छापे. पर आउटलुक पत्रिका ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अभी तक ये नोटिस नहीं मिला है. बीबीसी से बातचीत में स्मिता सब्बरवाल ने कहा, “मुझे सबसे बुरा ये लगा कि एक पत्रिका जिसे लाखों लोग पढ़ते हैं वो ऐसा सुझाए कि एक महिला अपनी ख़ूबसूरती की वजह से अपने करियर में आगे बढ़ पा रही है.” सोशल मीडिया पर कई लोगों ने लेख की निंदा की. हालांकि पत्रिका ने अपने लेख के साथ छापा कार्टून अपनी वेबसाइट से हटा लिया है. इस कार्टून में एक महिला को फैशन शो में हिस्सा लेते हुए दिखाया गया था और कुछ नेताओं को ‘बुरी नज़र’ से महिला की तरफ़ घूरते हुए दिखाया गया था. समाप्त लेख में ऑफिसर का नाम लिए बगैर ये लिखा था कि हमेशा साड़ी पहनने वाली महिला एक फैशन शो में पैंट और फ्रिल वाली टॉप में नज़र आईं तो फोटो खींचने का अच्छा मौका बना. 14 साल से आईएएस ऑफिसर स्मिता सब्बरवाल के मुताबिक, “ये ओछी पत्रकारिता की मिसाल है, ये महिला-विरोधी सेक्सिस्ट सोच है जो बदलते समाज में अब कम ही लोगों में बची है, पर पत्रिका इस पुरानी सोच को प्रकाशित कर बढ़ावा दे रही है.” उन्होंने कहा कि वे फ़ैशन शो में अपने पति के साथ बतौर महमान गई थीं. करीयर में आगे बढ़ने के पीछे एक महिला का काम नहीं उसकी सुंदरता होती है, कई लोग इस तरह के आरोप लंबे समय से लगाते आए हैं. साड़ी की जगह पैंट-टॉप पहनने पर महिला को अलग नज़र से भी देखा जाता रहा है. पर इस सोच को पुराना और रूढ़ीवादी बताने में महिलाओं का साथ अक़्सर पत्रकारों ने ही दिया है. पुरुषों के प्रभुत्व वाले काम और उद्योगों में महिलाओं के आने पर लेख भी लिखे गए हैं. तो क्या ये महिलावादी समझ महज़ सतही है? मीडिया पर नज़र रखने वाली वेबसाइट ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ चलाने वाली वरिष्ठ पत्रकार मधू त्रेहन के मुताबिक पत्रकारिता में सेक्सिस्ट लेखों और तस्वीरों की मिसालें अब भी आम हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि संस्थान बड़ा है या छोटा, या पत्रकार बड़े शहर में काम करता है या छोटे, ये सोच अभी भी है, देखें तो अक़्सर महिला खिलाड़ियों की जो तस्वीरें छापी जाती हैं, वो भी ‘ख़राब’ नज़र से होती हैं.” ऐसी ही एक मिसाल पिछले साल सामने आई जब अंग्रेज़ी अख़बार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने बॉलीवुड अभिनेत्री दीपीका पाडुकोण की ‘क्लीवेज’ वाली एक तस्वीर छापी थी. दीपीका ने सोशल मीडिया के ज़रिए कहा था कि महिला सशक्तिकरण के दौर में पाठकों की नज़र एक कामकाजी औरत की तरफ़ ऐसे खींचना ग़लत है. अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा था, \"हां, मैं एक औरत हूं. मेरे पास स्तन हैं, क्लीवेज है. आपको कोई समस्या है इस बात से?\" फिर अख़बार ने दीपिका के इस ग़ुस्से पर जवाब देते हुए एक ट्वीट किया, \"दीपिका, हम तो आपकी तारीफ़ कर रहे हैं. आप बेहद ख़ूबसूरत हैं और हम चाहते हैं कि हर किसी को इस बात का पता चले.\" तेलंगाना के मुख्यमंत्री की सचिवों के साथ बैठक. कई लोग इसे बहुत महीन कहते हैं, पर एक बहुत साफ रेखा है जो तारीफ़ की सीमाओं को बद्दतमीज़ी की हद में बदल देती है. फर्क नज़रिए का है, रेखा के इस ओर या उस ओर. महिला की तारीफ एक जगह है और उसकी काबिलियत को कम आंकना या सुंदरता के नाम पर दरकिनार कर देना दूसरी. आखिर ये भी साफ़ है कि सफल कामकाजी पुरुषों के रूप-रंग पर ऐसी टिप्पणियां नहीं की जाती. शायद ही किसी लेख में उनके पहनावे को उनके करीयर से जोड़ा जाता हो. मधु त्रेहन के मुताबिक समाज की सोच को बदलने की ज़रूरत है, “पत्रकार भी तो अपने आसपास के माहौल से सोच बनाते हैं, आए दिन नेताओं की ओर से सेक्सिस्ट बयान आते हैं और इनमें कई खुद महिला होती हैं, तो असर तो होगा ही.” स्मिता सब्बरवाल देश के किसी मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव पद पर नियुक्त की जाने वाली पहली महिला ऑफिसर हैं. उनके मुताबिक पुरुषों के वर्चस्व वाले काम में अपने लिए जगह बनाना भी इस तंज़ भरे लेख के पीछे की वजह हो सकती है. उन्होंने कहा, “मेरी ये उप्ल्बधि शायद कुछ पुरुषों को पसंद नहीं आई हो, पर पत्रिका का मेरे काम के बारे में जानकारी जुटाए बिना ऐसी बातों को जगह देना निंदनीय है.” (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "“…वो काम क्या करती हैं, ये तो एक पहेली है. पार्टी के नेताओं के मुताबिक वो अपनी खूबसूरत साड़ियों से फैशन स्टेटमेंट देती हैं और मीटिंग में ‘आई कैंडी’ का काम करती हैं.”", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअंग्रेज़ी पत्रिका ‘आउटलुक’ ने जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय में अतिरिक्त सचिव स्मिता सब्बरवाल के बारे में ऐसा लिखा तो उन्होंने पत्रिका को मानहानी का क़ानूनी नोटिस भेज दिया है. स्मिता ने अपने नोटिस में मांग की है कि पत्रिका माफीनामा छापे. पर आउटलुक पत्रिका ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अभी तक ये नोटिस नहीं मिला है. बीबीसी से बातचीत में स्मिता सब्बरवाल ने कहा, “मुझे सबसे बुरा ये लगा कि एक पत्रिका जिसे लाखों लोग पढ़ते हैं वो ऐसा सुझाए कि एक महिला अपनी ख़ूबसूरती की वजह से अपने करियर में आगे बढ़ पा रही है.” सोशल मीडिया पर कई लोगों ने लेख की निंदा की. हालांकि पत्रिका ने अपने लेख के साथ छापा कार्टून अपनी वेबसाइट से हटा लिया है. इस कार्टून में एक महिला को फैशन शो में हिस्सा लेते हुए दिखाया गया था और कुछ नेताओं को ‘बुरी नज़र’ से महिला की तरफ़ घूरते हुए दिखाया गया था. समाप्त लेख में ऑफिसर का नाम लिए बगैर ये लिखा था कि हमेशा साड़ी पहनने वाली महिला एक फैशन शो में पैंट और फ्रिल वाली टॉप में नज़र आईं तो फोटो खींचने का अच्छा मौका बना. 14 साल से आईएएस ऑफिसर स्मिता सब्बरवाल के मुताबिक, “ये ओछी पत्रकारिता की मिसाल है, ये महिला-विरोधी सेक्सिस्ट सोच है जो बदलते समाज में अब कम ही लोगों में बची है, पर पत्रिका इस पुरानी सोच को प्रकाशित कर बढ़ावा दे रही है.” उन्होंने 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हालांकि बाद में पैसे की मांग की गई और वीडियो वायरल कर दिया गया. पुलिस की कार्रवाई घटना से आक्रोशित लोगों ने थानागाजी कस्बे में मंगलवार को प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय राजमार्ग रोक दिया. इसके बाद पुलिस हकरत में आई और एक अभियुक्त को गिरफ़्तार कर लिया. राज्य के पुलिस महानिदेशक कपिल गर्ग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया से कहा कि घटना में पांच लोगो को नामज़द किया गया है और अभियुक्तों की तलाश के लिए 14 टीमें गठित की गई हैं. डीजीपी गर्ग ने कहा कि पुलिस ने घटना को गंभीरता से लिया है. पीड़िता की मेडिकल और फॉरेंसिक जांच की जा रही है. प्रदर्शन में शामिल अलवर ज़िले के दलित कार्यकर्ता चरण सिंह ने बीबीसी को बताया कि घटना 26 अप्रैल की है. पीड़िता अपने पति के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही थी. तभी पांच लोगो ने उन्हें घेर कर रोक लिया और सुनसान जगह ले जाकर पति के सामने ही पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया. दलित संगठनों का प्रदर्शन पीड़ित परिवार दलित संगठनों का आरोप है कि अभियुक्त घटना का वीडियो बनाते रहे और पति को बेरहमी से पीटते रहे. इन संगठनों के मुताबिक़ पीड़िता रहम की गुहार करती रही मगर अभियुक्तों ने उसे अनसुना 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नितिन गडकरी, भाजपा अध्यक्ष \"प्रशासन ने किसानों की 48 हेक्टेयर यानी क़रीब 120 एकड़ ज़मीन को महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के हितों को परे रखते हुए नितिन गडकरी को सौंप दी.\" केजरीवाल ये ज़मीन मुझे या मेरी कंपनी को नहीं दी गई है, ये संस्था को 11 वर्ष की लीज़ पर दी गई है. जिस संस्था के नाम पर ज़मीन मिली है वह पूर्ति सिंचन के नाम की धर्मार्थ सेवा है. जमीन वेस्ट लैंड की तरह पड़ी थी. तब हमने कहा कि नई किस्म के गन्ने के सैंपल तैयार करके हम किसानों को देते हैं. और जहाँ तक पानी का सवाल है बाँध से से सिर्फ़ 0.8 प्रतिशत पानी हम लेते हैं बाक़ी दूसरी कंपनियां लेती हैं और कुछ पानी किसानों को भी जाता है. मैं गाँव, ग़रीब और किसानों के लिए काम करना चाहता हूँ, जिन लोगों ने बिना कुछ देखे मुझे बदनाम करने की कोशिश की, ये दुर्भाग्यपूर्ण है सुषमा स्वराज 1997 में डैम बनने के बाद 2006 में गडकरी के ट्रस्ट को 11 साल की लीज पर जमीन दी गई है. वह बंजर भूमि थी जिस पर गडकरी का ट्रस्ट गन्ने की पौध उपजाता है और बाजार से आधे से भी कम कीमत पर विदर्भ के किसानों को देता है. दिग्विजय सिंह, कांग्रेस मैं शुरू से ही कहता रहा हूं कि नितिन गडकरी नेता से अधिक कारोबारी हैं. केजरीवाल ने जो कुछ कहा है, वह नई बात नहीं है. मैं केजरीवाल को पत्र लिखकर कहूंगा कि बीजेपी का पर्दाफाश करने का उनका इरादा स्पष्ट नहीं हुआ है. कांग्रेस ने हमेशा ही कहा है कि केजरीवाल बीजेपी की 'बी टीम' का हिस्सा हैं. इसे भी पढ़ें टॉपिक\n\nSummary:", "target": "भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कानून मंत्री क्लिक करें सलमान खुर्शीद , क्लिक करें रॉबर्ट वाड्रा को घेरने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनता पार्टी के क्लिक करें मुखिया नितिन गडकरी को घेर लिया है . तेवर बेहद आक्रामक और मुद्रा गंभीर.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरॉबर्ट वाड्रा और सलमान खुर्शीद को घेरने के बाद अब केजरीवाल नें नितिन गडकरी पर आरोप लगाए हैं केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष 'नितिन गडकरी का व्यापार किसानों की क़ीमत पर फल-फूल रहा है.' भाजपा ने केजरीवाल के आरोपों के बेबुनियाद बताया है और पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने गडकरी का बचाव किया है. पढ़िए किसने क्या कहा- अरविंद केजरीवाल विदर्भ के उन्मेद तालुका के घुरसापुर ग्राम के गांव में बांध बनाए जाने के लिए ज़मीन का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन बांध तैयार होने के बाद भी काफ़ी ज़मीन बच गई जिसे किसान वापस लेकर खेती करने की मांग कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने किसानों की 48 हेक्टेयर यानी क़रीब 120 एकड़ ज़मीन को महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के हितों को परे रखते हुए नितिन गडकरी को सौंप दी. जो बांध किसानों को पानी देने के लिए बनाया गया था उसका पानी नितिन गडकरी की और दूसरे और लोगों की कंपनियों को दिया जा रहा है. प्रशांत भूषण, वकील ग़लती दो तरह की हुई है. एक क़ानूनी रुप से ग़लत ये है कि ज़मीन का अधिग्रहण सार्वजनिक काम के लिए किया गया था, इसलिए इसे किसी निजी व्यक्ति या कंपनी को नहीं दिया जा सकता है. दूसरी मामला नैतिकता का है कि आप किसानों की ज़मीन छीनकर उस पर ख़ुद खेती कर रहे हैं. जिस पार्टी का अध्यक्ष ख़ुद अपने व्यावसायिक फ़ायदे के लिए किसानों का हक़ मार रहा हो वो उन पर हो रहे ज्यादतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ कैसे उठाएगा? 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'नाराज़गी' लेकिन माना जा रहा है कि कई शीर्ष खिलाड़ी इस अनुबंध से नाराज़ हैं और इसी कारण बीसीसीआई ने अपना रुख़ नरम किया है और अब कहा जा रहा है कि खिलाड़ियों से विचार विमर्श किया जाएगा. इस मामले पर निरंजन शाह ने कहा, \"अभी तक खिलाड़ियों की ओर से मुझे कोई जवाब नहीं मिला है. मैं रविवार को कोलकाता जा रहा हूँ. अगर उनकी कोई चिंता हुई तो मैं खिलाड़ियों से बात करूँगा.\" उन्होंने माना कि अगर खिलाड़ियों की कुछ आपत्ति है तो बांग्लादेश दौरे से पहले वे अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते. पहले भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों के ग्रेडिंग सिस्टम के आधार पर पैसा मिलते थे. खिलाड़ियों को वरीयता के आधार पर तीन ग्रेड ए, बी और सी में बाँटा गया था और इसी आधार पर उन्हें पैसे भी मिलते थे. इसके तहत ग्रेड ए के खिलाड़ियों को 50 लाख, ग्रेड बी के खिलाड़ियों को 35 लाख और ग्रेड सी के खिलाड़ियों को सालाना 20 लाख रुपए मिलते थे.\n\nSummary:", "target": "नए अनुबंध को लेकर खिलाड़ियों में नाराज़गी की ख़बरों के बीच भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अपना रुख़ नरम करते हुए कहा है कि खिलाड़ी बांग्लादेश दौरे के बाद भी अनुबंध पर हस्ताक्षर कर सकते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपहले बीसीसीआई ने कहा था कि बांग्लादेश दौरे पर रवाना होने से पहले खिलाड़ी अनुबंध पर हस्ताक्षर कर दें. विश्व कप में भारतीय क्रिकेट टीम के ख़राब प्रदर्शन के बाद बीसीसीआई की कार्यकारी समिति ने ग्रेडिंग सिस्टम रद्द कर दिया था. नए अनुबंध के मुताबिक़ बीसीसीआई ने बांग्लादेश दौरे पर जाने वाले सभी खिलाड़ियों को एकमुश्त पाँच लाख रुपए देने की पेशकश की है. इसके अलावा खिलाड़ियों को हर वनडे मैच के लिए डेढ़ लाख रुपए और हर टेस्ट मैच के लिए ढाई लाख रुपए देने का प्रस्ताव है. बीसीसीआई सचिन निरंजन शाह के अनुसार अनुबंध में खिलाड़ियों को बोनस देने की भी बात है. 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' हूजी का हाथ' सेना के प्रवक्ता के अनुसार मारे गए कथित चरमपंथियों का संबंध बांग्लादेश के इस्लामी चरमपंथी संगठन हरकत उल जेहाद-ए-इस्लामी यानी 'हूजी' से हो सकता है. राजेश कालिया का कहना था, \" हमें बंसबारी इलाक़े में हूजी चरमपंथियों की गतिविधियों की सूचना मिली और ये ऑपरेशन पुख़्ता जानकारी के बाद किया गया है.\" ग़ौरतलब है कि भारत में हाल के वर्षो में होने वाले अधिकतर बम धमाकों के लिए हूजी को ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा है. ख़ुफिया जानकारियों के अनुसार कथित चरमपंथी असम को दूसरे राज्यों में संदिग्ध गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं हालाँकि यह पहली बार है कि किसी तथाकथित हूजी चरमपंथियों के समूह के साथ असम में मुठभेड़ हुई हो.\n\nSummary:", "target": "भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में सेना के साथ हुई एक मुठभेड़ में कम से कम सात 'इस्लामी चरमपंथी' मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसेना के प्रवक्ता राजेश कालिया के मुताबिक़ मुठभेड़ की ये घटना शुक्रवार को पश्चिमी असम के धुबरी ज़िले के बंसबारी गाँव में घटी. सेना के प्रवक्ता का कहना था कि 21वीं जाट रेजिमेंट नें संदिग्ध चरमपंथियों के अड्डे को घेर लेने के बाद उनसे कहा कि वे अपने को सेना के हवाले कर दें लेकिन जवाब में चरमपंथियों ने सेना पर गोलीबारी शुरू कर दी. राजेश कालिया के मुताबिक़ संदिग्ध चरमपंथियों की गोलीबारी के बाद सेना ने उनके अड्डे पर धावा बोल दिया जिसमें सात चरमपंथी मारे गए. मुठभेड़ दो घंटे तक चली. उन्होने बताया कि सेना ने मुठभेड़ के बाद दो किलोग्राम विस्फोटक और छह पिस्तौल बरामद किए हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "संसद के कामकाज को लेकर चल रहे गतिरोध के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो देश के विकास को रोकना चाहते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमोदी ने ये बातें भारतीय जनता पार्टी के संसदीय दल की बैठक में कहीं. बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने गतिरोध तोड़ने के लिए समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलयाम सिंह यादव की कोशिशों की सराहना की. रूड़ी ने कहा, \"प्रधानमंत्री मोदी ने मुलायम सिंह यादव का आभार व्यक्त किया है.\" अपील दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से फिर अपील करेगी कि सदन को चलने दें, सिर्फ़ अपने अहंकार के कारण सदन को ना रोकें. समाप्त मानसून सत्र में कांग्रेस ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में ललित मोदी के मामले में सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े की मांग को लेकर विरोध जारी रखा है. लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कांग्रेस के 25 सांसदों को पाँच दिन के लिए निलंबित भी किया था. लेकिन कांग्रेस ने सदन के बाहर इसका जम कर विरोध किया. सोमवार को भी दोनों सदनों में कमोबेश यही स्थिति रही. इस बीच केंद्र सरकार ने राज्यसभा में जीएसटी विधयेक पेश करने का फ़ैसला किया है. ये विधेयक पिछले सत्र में ही लोकसभा से पास हो गया था. 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अब अपनी आवाज़, अपनी उम्मीदें तलाश रहे हैं कि हम किस तरह विकास करें.\" सऊदी अरब में महिलाएं भी चलाएंगी गाड़ी वो मुस्कुरा कर बोला, \"हमारा देश बदल रहा है\" कभी समान समाज हुआ करता था सऊदी अरब सारा कहती हैं, \"कभी सऊदी अरब एक समान समाज हुआ करता था. मुझे लगता है कि चुनौती यह है कि आप वो संतुलन तलाश करेंजिसमें आप जो करना चाहें वो करें, और दूसरों के भी तरीकों का सम्मान करें.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सऊदी अरब के समाज में महिलाओं की ज़िंदगी पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं. हाल ही में सऊदी अरब में महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाज़त मिलने के बाद पूरी दुनिया में इस कदम की सराहना की गई थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमहिलाओं ने विशेष रूप से इसे एक ऐसा कदम बताया था जिसे कई साल पहले उठाया जाना था. सऊदी अरब की कुछ महिलाओं ने बीबीसी से इस मुद्दे पर बात की और अपने समाज में महिलाओं की बदलती ज़िंदगी पर खुलकर बात की है. क्या सऊदी अरब में मौलवियों का असर होगा 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तारीफ की और कहा कि इस सिरीज से उनकी टीम को सीखने का मौका मिला है. इससे पहले तीसरे दिन सुबह भारत की पूरी टीम 272 रन बनाकर आउट हो गई. इस तरह मेज़मान भारत को मेहमान ऑस्ट्रेलियाई टीम पर दस रनों की बढ़त हासिल हो गई है. ऑस्ट्रेलिया ने अपनी पहली पारी में 262 रन बनाए थे. खेल के तीसरे दिन भारत ने 266 रन पर आठ विकेट से आगे खेलना शुरू किया लेकिन उसके आख़िरी दोनों बल्लेबाज़ जल्द ही पैवेलियन लौट गए. ईशान शर्मा नौवें विकेट के रूप में आउट हुए तो ठीक उसके बाद प्रज्ञान ओझा दसवें और आख़िरी विकेट के रूप में पैवेलियन लौटे, दोनों ही बल्लेबाज़ अपना खाता भी नहीं खोल सके. भुव्नेश्वर कुमार 14 रन बनाकर नाबाद रहे. ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से सबसे कामयाब गेंदबाज़ रहे लॉयन जिन्होंने 23.2 ओवरों में 94 रन देकर सात विकेट लिए. पैटिसन, सिडल और मैक्सेवेल को एक-एक विकेट मिले जबकि जॉनसन कोई भी विकेट लेने में सफल नहीं हो सके. इससे पहले खेल के दूसरे दिन ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में 262 रन में जवाब में भारत ने ठोस शुरुआत की. चेतेश्वर पुजारा और मुरली विजय ने पहले विकेट के लिए 108 रन जोड़े. पुजारा ने 74 गेंदों में पाँच चौकों के साथ अपना अर्द्धशतक पूरा किया लेकिन इसके बाद वो अपनी पारी को ज़्यादा लंबी नहीं खींच पाए. वो नैथन लॉयन की गेंद पर बोल्ड हुए. विराट कोहली मात्र एक रन बनाकर लॉयन की गेंद पर पगबाधा क़रार दिए गए. इस तरह भारत ने छह रन के अंतराल में दो विकेट गंवा दिए. भारतीय मध्यम क्रम के बल्लेबाजों ने अपने समर्थकों को निराश किया. रहाणे सात रन, कप्तान धोनी 24, रवींद्र जडेजा 43 और अश्विन मात्र 12 बनाकर वापस पैवेलियन लौट गए. अश्विन के पंजे में कंगारू इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने कल के स्कोर आठ विकेट पर 231 से आगे खेलना शुरु किया और उसकी पूरी पारी 262 रन पर सिमट गई. पीटर सिडल ने 51 और जेम्स पैटिनसन ने 30 रन बनाए. भारत की तरफ से ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने 34 ओवर में 57 रन देकर पाँच विकेट लिए. इशांत शर्मा ने 35 रन देकर दो और रवीन्द्र जड़ेजा ने 40 रन देकर दो विकेट लिए. एक विकेट प्रज्ञान ओझा के खाते में गया.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला मैदान में खेले जा रहे चौथे और आख़िरी टेस्ट में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को छह विकेट से हरा दिया है. इस तरह भारत ने ये सिरीज 4-0 से जीत ली.", "probe_text": "Summarize the 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कार्यकारी माइक इलीकाक नेताओं के इस उत्तर से ख़ुश नहीं हैं. वो कहते हैं, ''इस तरह की चीज़ें दूसरे देशों में नहीं होंगी. यह गणित को लेकर हमारी सोच को दर्शाती है. अगर यही चीज़ आप फ़्रांस में पूछें, तो यह कुछ ऐसा होगा कि मंत्री पढ़ सकते हैं कि नहीं.'' ग़लत जवाब बच्चे एक बार जब पहाड़ा पढ़ लेते है तो उनके लिए 12 गुणे 12 का गुणनफल हमेशा 144 ही होगा. लेकिन यह सभी अंकों के लिए नहीं है. शैक्षणिक क्षेत्र के लिए शोध करने वाली कंपनी फ्लयूरिश के मुताबिक़ अधिकांस बच्चों को छह गुणा आठ का उत्तर बताने में परेशानी होती है. बेडफ़ोर्डशायर के कैडिंगटन विलेज स्कूल के 62.5 फ़ीसद बच्चों ने इस सवाल का ग़लत जवाब दिया. फ्लयूरिश के निदेशक माइक स्मिथ कहते हैं, ''बीच के अंकों से जुड़े सवालों से बच्चे परेशानी महसूस करते हैं, जैसे छह. सात, आठ और नौ. यह परेशानी तब और बढ़ जाती है, जब इस तरह के अंकों को उनसे ही गुणा करने के लिए कह दिया जाए. वहीं पांच, दस और 11 जैसे अंकों के साथ गुणा-भाग करना आसान होता है.'' शिक्षा सचिव माइकल गोव चाहते हैं कि इंग्लैंड के सभी बच्चे नौ साल की उम्र में पूरा पहाड़ा याद कर लें. (बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप क्लिक करें बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन में पहाड़े याद रखना बच्चों का खेल नहीं रहा. एक बार बच्चों ने जब यूके के चांसलर जॉर्ज ऑसबर्न से पहाड़ों को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने जवाब देने से ही इनकर कर दिया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआख़िर ऐसा क्यों होता है, यही जानने की कोशिश की बीबीसी संवाददाता जस्टिन पार्किंसन ने. पहाड़ों से जुड़े ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनसे राजनेताओं को डर लगता है. दूध के एक बोतल या एक पाव रोटी की क़ीमत पूछने के साथ उन्हें इस बात से भी डर लगता है कि कोई उनके किसी शब्द की स्पेलिंग पूछे या फिर कोई जोड़. ऐसे में उन्हें शर्मनाक ग़लती कर बैठने का डर होता है. नेताओं के उत्तर स्काई न्यूज़ पर इंटरव्यू लेने वाले बच्चों में से सात साल के एक बच्चे ने जब जॉर्ज ऑसबर्न से पूछा कि सात गुणा आठ कितना होगा? इस पर जॉर्ज ऑसबर्न ने कहा, ''उन्होंने अपने जीवन में एक नियम बना लिया है कि वो उत्तर नहीं देंगे.'' ए लेबल तक गणित की पढ़ाई करने वाले जॉर्ज ऑसबर्न को 1998 में लेबर स्कूल मंत्री स्टीफ़न बायर्स का उड़ाया गया मज़ाक़ याद आ गया होगा. उस समय उन्होंने कह दिया था कि सात गुणे बराबर 54 होता है, जबकि सही उत्तर है, 56. उनके इस जवाब पर उस समय उनकी काफ़ी खिल्ली उड़ाई गई थी. कल्याणकारी संस्था नेशनल न्यूमेरिक के मुख्य कार्यकारी माइक इलीकाक नेताओं के इस उत्तर से ख़ुश नहीं हैं. वो कहते हैं, ''इस तरह की चीज़ें दूसरे देशों में नहीं होंगी. यह गणित को लेकर हमारी सोच को दर्शाती है. अगर यही चीज़ आप फ़्रांस में पूछें, तो यह कुछ ऐसा होगा कि मंत्री पढ़ सकते हैं कि नहीं.'' ग़लत जवाब बच्चे एक बार जब पहाड़ा पढ़ लेते है तो उनके लिए 12 गुणे 12 का गुणनफल हमेशा 144 ही होगा. लेकिन यह सभी अंकों के लिए नहीं है. शैक्षणिक क्षेत्र के लिए शोध करने वाली कंपनी फ्लयूरिश के मुताबिक़ अधिकांस बच्चों को छह गुणा आठ का उत्तर बताने में परेशानी होती है. बेडफ़ोर्डशायर के कैडिंगटन विलेज स्कूल के 62.5 फ़ीसद बच्चों ने इस सवाल का ग़लत जवाब दिया. फ्लयूरिश के निदेशक माइक स्मिथ कहते हैं, ''बीच के अंकों से जुड़े सवालों से बच्चे परेशानी महसूस करते हैं, जैसे छह. सात, आठ और नौ. यह परेशानी तब और बढ़ जाती है, जब इस तरह के अंकों को उनसे ही गुणा करने के लिए कह दिया जाए. वहीं पांच, दस और 11 जैसे अंकों के साथ गुणा-भाग करना आसान होता है.'' शिक्षा सचिव माइकल गोव चाहते हैं कि इंग्लैंड के सभी बच्चे नौ साल की उम्र में पूरा पहाड़ा याद कर लें. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "जैसे-जैसे विश्व का तापमान बढ़ रहा है ऊंचे इलाकों में मलेरिया के फैलने का खतरा बढ़ रहा है. एक अध्ययन में ये बात सामने आई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि गर्म तापमान वाले दिनों में अफ्रीका और दक्षिण अमरीका के ऊंचे इलाकों में रहने वाले लोगों में मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ गया है. उनका मानना है कि यदि भविष्य में तापमान और बढ़ा तो इस बात की संभावना है कि कुछ इलाकों में मलेरिया के लाखों और मामले सामने आएंगे. विज्ञान की पत्रिकाओं में छपे इस शोध पर काम करने वाले अमरीका के मिशिगन विश्वविद्यालय के प्रो पास्कल ने बताया, \"मलेरिया के चपेट में आने वाले मरीजों की संख्या के तेजी से बढ़ने की आशंका है.\" रोग की चपेट में अधिक ऊंचाई वाले इलाके हमेशा से मलेरिया जैसे घातक रोग से बचने वालों के लिए 'स्वर्ग' माने जाते रहे हैं. मलेरिया परजीवी और मलेरिया जन्म देने वाले मच्छरों को कम तापमान वाले इलाकों में जिंदा रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. तापमान बढ़ता है तो यूथोपिया के ऊंचाई वाले इलाके मलेरिया के लिहाज से ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं. प्रो पास्कल कहते हैं, \"अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मलेरिया का खतरा कम पाया गया है. इसीलिए लोग मैदानी इलाकों की बजाय ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बसना पसंद करते रहे हैं.\" मगर वैज्ञानिकों का कहना है कि अब यह बीमारी उन इलाकों में प्रवेश कर रही है जिन्हें पहले मलेरिया मुक्त माना जाता था. इस जानकारी को पुख्ता करने के लिए वैज्ञानिकों ने कोलंबिया और यूथोपिया की घनी आबादी वाले इलाकों का अध्ययन किया. वहां के साल 1990 से साल 2005 के बीच के तापमान और मलेरिया के आंकड़ों को खंगाला गया. पाया गया कि पहाड़ में गरम दिनों में मलेरिया के ज्यादा मामले पाए गए जबकि ठंडे दिनों में कम. टीम का मानना है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तापमान के बढ़ने से मलेरिया के मामले बढ़े. अधिक ऊंचाई यूथोपिया जहां आधी आबादी 1,600 मी और 2,400 मी के बीच की ऊंचाई वाले क्षेत्र में रहती है, वैज्ञानिकों का मानना है कि मलेरिया के ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं. पास्कल कहते हैं, \"ऊंचाई के हिसाब से मलेरिया का आकलन करें तो हमारे अनुमान के अनुसार हर 15 साल पर तापमान में एक डिग्री की बढोतरी से मलेरिया के अतिरिक्त तीन लाख मामले बढ़ जाएंगे.\" टीम का मानना है कि वे इलाके मलेरिया के लिहाज से ज्यादा खतरनाक हैं जहां पहले कभी मलेरिया का मामला नहीं पाया गया, इसलिए नए इलाकों में रोग के फैलने पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. साथ ही, ये भी देखा गया है कि कम ऊंचाई वाले इलाकों की तुलना में नए इलाकों में रोग पर काबू करना ज्यादा आसान है क्योंकि यहां मलेरिया का रोग नया-नया फैला होता है. अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन के ताज़ा आकलन के मुताबिक साल 2012 में मलेरिया के 20 करोड़ 70 लाख मामले सामने आए और 627,000 मौतें दर्ज की गईं. मरने वालों में अधिकांश अफ्रीका के बच्चे थे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ का कहना है कि शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक तनाव विश्व सुरक्षा के लिए शायद सबसे बड़ा खतरा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ का कहना है कि कुछ देश सांप्रदायिक हिंसा की आग को भड़का रहे हैं. बीबीसी से बातचीत करते हुए ज़रीफ़ ने कुछ सुन्नी मुस्लिम बहुल देशों को \"ख़ौफ़ फैलाने\" के लिए ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, \"कुछ लोगों ने राजनीतिक फ़ायदों के लिए कटुता फैलाई है.\" सीरिया, इराक और पाकिस्तान ऐसे देशों में शामिल हैं, जो इस समय सांप्रदायिक हिंसा से जूझ रहे हैं. ज़रीफ़ ने कहा कि सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच संघर्ष \"न केवल इस क्षेत्र के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए गंभीर खतरा है.\" उन्होंने कहा, \"मेरा सोचना है कि हमें यह समझने की जरूरत है कि इस्लामिक देशों में सांप्रदायिक मतभेद हम सब के लिए एक खतरा है.\" 'सांप्रदायिक हिंसा की आग' बीबीसी के मध्य-पूर्व संपादक जर्मी बोवेन का कहना है कि शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच 1,000 साल से भी ज़्यादा समय से सांप्रदायिक तनाव रहा है. लेकिन इस शताब्दी के दौरान मध्य-पूर्व में उथल-पुथल, खासकर साल 2003 में इराक पर अमरीका की अगुवाई में हमले के बाद से हालात और बुरे हो गए हैं. इराक में इस साल अभी तक सांप्रदायिक हमलों में करीब 6,500 नागरिक मारे गए हैं. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सीरियाई युद्ध की शुरुआत एक सांप्रदायिक तनाव के तौर पर नहीं हुई थी लेकिन बाद में यह सांप्रदायिक संघर्ष में तब्दील हो गया. सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद, जो शिया हैं, ईरान के सहयोगी हैं. वहां के सुन्नी विद्रोहियों को तुर्की और सऊदी अरब जैसी सुन्नी ताकतों से समर्थन हासिल है. ज़रीफ़ ने सीधे किसी देश का नाम लिए बगैर अरब के सुन्नी नेताओं पर सांप्रदायिक हिंसा की \"आग भड़काने\" का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, \"किसी को सांप्रदायिक हिंसा की आग नहीं भड़कानी चाहिए. इसे काबू में लाना चाहिए. ऐसे संघर्ष से बचना चाहिए जो सभी की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह होगा.\" बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सऊदी अरब ईरान पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने का आरोप लगाता है. 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समझौते पर हस्ताक्षर करनेवालों विश्व बैंक भी शामिल है. पाकिस्तान ने इस वर्ष जनवरी महीने में विश्व बैंक से अनुरोध किया था कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे. इसके पहले भी भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि पर सहमति बनाने के लिए विश्व बैंक ने ही मध्यस्थता की थी. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की हाल की भारत यात्रा के दौरान भी बगलिहार बाँध पर विस्तार से चर्चा हुई थी. पाकिस्तान बगलिहार बाँध पर कड़ी आपत्ति करता रहा है और उसका कहना है कि यह सिंधु जल संधि का उल्लंघन है. पाकिस्तान ने आशंका व्यक्त की है कि इस बाँध के बनने से उसे मिलने वाला चनाब नदी का पानी कम हो जाएगा. भारत ने इन आशंकाओं का खंडन करते हुए कहा है कि वह सिंधु जल संधि का पूरी तरह पालन करते हुए ही बाँध बना रहा है.\n\nSummary:", "target": "विश्व बैंक ने जम्मू-कश्मीर के डोडा ज़िले में चनाब नदी पर बन रहे बगलिहार बाँध परियोजना के लिए तटस्थ विशेषज्ञ को नियुक्त किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविश्व बैंक ने स्विस प्रोफेसर रेमंड लेफ़ित को नियुक्त किया है और वो इस मामले में भारत और 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की बस्ती के पास मिली हैं. पुलिस इनमें से किसी की भी पहचान नहीं कर पाई है और यह भी नहीं बता पा रही है कि वे शिया हैं या सुन्नी. समुदायों के आधार पर इस तरह की हत्याएँ इराक़ में नई नहीं हैं लेकिन चौबीस घंटों में इतनी बड़ी संख्या में लाशें मिलने की यह पहली घटना है. इनमें से कुछ लोग वो हो सकते हैं जिनका अपहरण गिरोहों ने फ़िरौती के लिए किया होगा. इस बीच पुलिस को निशाना बनाकर शहर के फ़ुटबॉल स्टेडियम के पास एक बम विस्फोट भी किया गया है.\n\nSummary:", "target": "इराक़ की राजधानी बग़दाद में मंगलवार की सुबह से अब तक कोई 60 लाशें मिल चुकी हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई लोगों को बाँध दिया गया था और गोली मारने से पहले उन्हें यातनाएँ दी गई थीं. इस बीच शहर में एक कार बम विस्फोट हुआ है जिसमें कम से कम 10 लोग मारे गए हैं और 33 लोग घायल हुए हैं. इसके अलावा सेना के एक प्रशिक्षण केंद्र में मोर्टार दाग़े गए हैं जिसमें चार लोग घायल हुए हैं. शहर भर में लाशें हिंसा के शिकार लोगों की लाशें दजला नदी के पूर्वी भाग में शिया ज़िलों में मिली 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दिनों में भी चुनाव के दौरान ये इलाका काफी महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि 12 सीटें काफी उलट पलट करने का माद्दा रखती हैं. बाक़ी की 6 सीटें गाँव और डोंगरगढ़ की हैं. राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमण सिंह एक बार फिर चुनाव लड़ रहे हैं. इस बार के चुनाव में बस्तर को लेकर दोनों प्रमुख राजनितिक दल यानी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी नें अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. यहाँ 12 में से 11 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास है जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक ही सीट मिल पाई. इसलिए ये कहा जा रहा है कि \"बस्तर में भाजपा के पास खोने के लिए सब कुछ और पाने के लिए कुछ भी नहीं\" है. सत्ता विरोधी लहर भाजपा की कोशिश है कि इस बार बस्तर के इलाके से वो अपनी 6 सीटें भी बचाने में कामयाब रहे तो गद्दी का रास्ता साफ़ हो जाएगा. मगर पार्टी के लिए बस्तर की डगर उतनी आसान भी नहीं है क्योंकि इस इलाके से चुने गए उनके कई विधायकों के खिलाफ 'एंटी-इनकम्बेंसी' यानी सत्ता विरोधी लहर का मुद्दा एक बड़ी चुनौती है. बस्तर से भाजपा के तीन मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं जिनमे कोंडागांव से लता उसेंडी, नारायणपुर से केदार कश्यप और अंतागढ़ से विक्रम उसेंडी शामिल हैं. इसके अलावा बीजापुर से संसदीय सचिव महेश घाघडा की किस्मत भी दाव पर लगी है. इत्तेफाक से इन चारों को इस बार मुश्किलों का सामना करना पढ़ रहा है. बस्तर में इस बार कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं. खास तौर पर 28 मई को बस्तर के दर्भा इलाके में हुए नक्सली हमले के बाद जिसमें सलवा जुडूम के जन्मदाता महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और वरिष्ट नेता विद्याचरण शुक्ल मारे गए थे. कांग्रेस इस घटना की सुहानुभूति के सहारे बस्तर में चुनाव लड़ना चाह रही है. यही वजह है कि जगह जगह पर पार्टी ने महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल की तस्वीरें लगाकर लोगों से इनकी क़ुरबानी को याद रखने की अपील की है. मतदान पर दारोमदार पार्टी को लगता है कि घटना के बाद बस्तर की आम जनता की हमदर्दी उनके साथ है और इसलिए वो इस बार अपनी स्थिति को बेहतर होता देख रहे हैं. वैसे भी कांग्रेस को इस इलाके से पिछले चुनाव में सिर्फ एक ही सीट मिली थी और वो भी कोंटा से कवासी लखमा की. मगर इस बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को भी बस्तर से दो सीटों की उम्मीद है. एक सीट कोंटा की जहाँ से आदिवासी नेता मनीष कुंजाम लड़ रहे हैं और दूसरी सीट दंतेवाडा की जहाँ बोदाराम कवासी लड़ रहे हैं. कांग्रेस नें महेंद्र कर्मा की विधवा देवती कर्मा को दंतेवाडा से खड़ा किया है. हलाकि पिछले चुनाव में इस सीट पर महेंद्र कर्मा तीसरे स्थान पर आये थे और सीट भारतीय जनता पार्टी के भीमा मंडावी की झोली में गयी थी, इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद लोगों में देवती के प्रति सुहानुभूति है. लेकिन सब कुछ निर्भर करता है मतदान के प्रतिशत पर क्योंकि सुदूर इलाकों में कम या नहीं के बराबर मतदान होता आया है. पूरे बस्तर में अस्सी प्रतिशत मतदान केंद्र अति संवेदनशील घोषित किए गए हैं. इस बार भी मतदान प्रतिशत ज्यादा न होने की संभावना हैं क्योंकि दक्षिण बस्तर का एक बड़ा इलाक़ा है जहाँ के लोग अपना मत इसलिए नहीं डाल पाएंगे कि उनके मतदान केन्द्रों को स्थानांतरित कर दिया गया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा के चुनाव के पहले चरण में कुल मिलकर 18 सीटें हैं. इनमें से 12 सीटें बस्तर में हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअविभाजित मध्य प्रदेश के दिनों में भी चुनाव के दौरान ये इलाका काफी महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि 12 सीटें काफी उलट पलट करने का माद्दा रखती हैं. बाक़ी की 6 सीटें गाँव और डोंगरगढ़ की हैं. राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमण सिंह एक बार फिर चुनाव लड़ रहे हैं. इस बार के चुनाव में बस्तर को लेकर दोनों प्रमुख राजनितिक दल यानी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी नें अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. यहाँ 12 में से 11 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास है जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक ही सीट मिल पाई. इसलिए ये कहा जा रहा है कि \"बस्तर में भाजपा के पास खोने के लिए सब कुछ और पाने के लिए कुछ भी नहीं\" है. सत्ता विरोधी लहर भाजपा की कोशिश है कि इस बार बस्तर के इलाके से वो अपनी 6 सीटें भी बचाने में कामयाब रहे तो गद्दी का रास्ता साफ़ हो जाएगा. मगर पार्टी के लिए बस्तर की डगर उतनी आसान भी नहीं है क्योंकि इस इलाके से चुने गए उनके कई विधायकों के खिलाफ 'एंटी-इनकम्बेंसी' यानी सत्ता विरोधी लहर का मुद्दा एक बड़ी चुनौती है. बस्तर से भाजपा के तीन मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं जिनमे कोंडागांव से लता उसेंडी, नारायणपुर से केदार कश्यप और अंतागढ़ से विक्रम उसेंडी शामिल हैं. इसके अलावा बीजापुर से संसदीय सचिव महेश घाघडा की किस्मत भी दाव पर लगी है. इत्तेफाक से इन चारों को इस बार मुश्किलों का सामना करना पढ़ रहा है. बस्तर में इस बार कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं. खास तौर पर 28 मई को बस्तर के दर्भा इलाके में हुए नक्सली हमले के बाद जिसमें सलवा जुडूम के जन्मदाता महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और वरिष्ट नेता विद्याचरण शुक्ल मारे गए थे. कांग्रेस इस घटना की सुहानुभूति के सहारे बस्तर में चुनाव लड़ना चाह रही है. यही वजह है कि जगह जगह पर पार्टी ने महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल की तस्वीरें लगाकर लोगों से इनकी क़ुरबानी को याद रखने की अपील की है. मतदान पर दारोमदार पार्टी को लगता है कि घटना के बाद बस्तर की आम जनता की हमदर्दी उनके साथ है और इसलिए वो इस बार अपनी स्थिति को बेहतर होता देख रहे हैं. वैसे भी कांग्रेस को इस इलाके से पिछले चुनाव में सिर्फ एक ही सीट मिली थी और वो भी कोंटा से कवासी लखमा की. मगर इस बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को भी बस्तर से दो सीटों की उम्मीद है. एक सीट कोंटा की जहाँ से आदिवासी नेता मनीष कुंजाम लड़ रहे हैं और दूसरी सीट दंतेवाडा की जहाँ बोदाराम कवासी लड़ रहे हैं. कांग्रेस नें महेंद्र कर्मा की विधवा देवती कर्मा को दंतेवाडा से खड़ा किया है. हलाकि पिछले चुनाव में इस सीट पर महेंद्र कर्मा तीसरे स्थान पर आये थे और सीट भारतीय जनता पार्टी के भीमा मंडावी की झोली में गयी थी, इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद लोगों में देवती के प्रति सुहानुभूति है. लेकिन सब कुछ निर्भर करता है मतदान के प्रतिशत पर क्योंकि सुदूर इलाकों में कम या नहीं के बराबर मतदान होता आया है. पूरे बस्तर में अस्सी प्रतिशत मतदान केंद्र अति संवेदनशील घोषित किए गए हैं. इस बार भी मतदान प्रतिशत ज्यादा न होने की संभावना हैं क्योंकि दक्षिण बस्तर का एक बड़ा इलाक़ा है जहाँ के लोग अपना मत इसलिए नहीं डाल पाएंगे कि उनके मतदान केन्द्रों को स्थानांतरित कर दिया गया है. 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कि इसके लिए कई अभियान चलाए गए जिनमें अपाचे हेलिकॉप्टर का सहारा भी लिया गया. ब्रितानी सैन्य अधिकारी का कहना था कि जुलाई की शुरुआत तक ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती का काम पूरा हो जाएगा. ग़ौरतलब है कि ब्रिटेन अमरीकी सैनिकों से दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने जा रहा है. अभियान तेज़ दूसरी ओर अमरीकी सेना का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में ताज़ा संघर्ष में लगभग 40 तालेबान लड़ाके मारे गए हैं. गठबंधन सैनिकों ने कहा कि उन्होंने अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के साथ मिलकर देश के दक्षिणी हिस्से में एक ऐसे ठिकाने पर हमला किया जहाँ अफ़ग़ान लड़ाके छुपे हुए थे. इधर अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी कूनार प्रांत में एक सड़क पर हुए बम विस्फोट में गठबंधन सेना के दो सैनिकों की मौत हो गई. गठबंधन सेना और अफ़गान सैनिकों ने मिलकर इसी सप्ताह एक बड़ा अभियान शुरू किया जिसे 'ऑपरेशन माउंटेन थ्रस्ट' नाम दिया गया है. इस अभियान का उद्देश्य ख़ासतौर से दक्षिणी इलाक़ों में तालेबान लड़ाकों को निशाना बनाना है और उन इलाक़ों में सरकारी नियंत्रण सुनिश्चित करना है.\n\nSummary:", "target": "ब्रिटिश सेना ने दावा किया है कि उसने दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के प्रभाव वाले क्षेत्र में अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअफ़ग़ानिस्तान में ब्रितानी सेनाओं के प्रमुख ब्रिगेडियर बटलर का कहना था कि तालेबान के प्रभाववाले हेलमंद प्रांत में उनका अभियान अपने निर्धारित कार्यक्रम से दो महीने आगे चल रहा है. उनका कहना था कि ब्रिटिश सैनिकों ने ऐसे पर्वतीय इलाक़ों में नाके स्थापित कर लिए हैं जिनपर पिछले तीन दशकों से किसी भी सरकार का नियंत्रण नहीं रहा है. ब्रिगेडियर बटलर का कहना था कि ब्रितानी सेनाओं ने पिछले कुछ महीनों में लगभग 30 तालेबान लड़ाकों को मारने में सफलता हासिल की है. उनका कहना था कि इसके लिए कई अभियान चलाए गए जिनमें अपाचे हेलिकॉप्टर का सहारा भी लिया गया. ब्रितानी सैन्य अधिकारी का कहना था कि जुलाई की शुरुआत तक ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती का काम पूरा हो जाएगा. ग़ौरतलब है कि ब्रिटेन अमरीकी सैनिकों से दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने जा रहा है. अभियान तेज़ दूसरी ओर अमरीकी सेना का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में ताज़ा संघर्ष में लगभग 40 तालेबान 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भारतीय कश्मीर में हज़ारों कश्मीरी खुले आसमान के नीचे रातें काट रहे हैं. राज्य के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद का भी मानना है कि तंबुओं की भारी कमी है. उनका कहना है कि लोगों को सिर छिपाने के लिए तंबू उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है. जम्मू-कश्मीर के उड़ी और तंगधार सबसे अधिक प्रभावित ज़िले हैं जहाँ 140 गाँवों में भूकंप ने तबाही मचाई है. लेकिन कुछ गाँव अब भी ऐसे हैं जहाँ राहत नहीं पहुँच सकी है क्योंकि वहाँ पहुँचने के रास्ते चट्टानों के गिरने के कारण बंद हो गए हैं. तंबुओं की कमी मानवाधिकार आयोग के दल ने प्रभावित इलाक़ों का तीन दिवसीय दौरा किया था. मानवाधिकार आयोग ने सलाह दी है कि सरकार अनाथ बच्चों, विधवाओं और प्रभावित बच्चियों की एक कंप्यूटरीकृत सूची बनाए ताकि सहायता कार्य प्रभावी ढंग से चल सके. आयोग के इस दल में महानिदेशक-जाँच जीएस राजगोपाल, अजित भरहोक और एके पाराशर शामिल थे. मानवाधिकार आयोग की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकार को प्रभावित इलाक़ों के लिए तत्काल राहत उपलब्ध करानी चाहिए. इस दल का कहना है कि सर्दी का मौसम शुरू हो गया है और ठंड के कारण बच्चों और कमज़ोर लोगों के लिए ख़तरा है. मानवाधिकार आयोग का कहना है कि ज़रूरत से कम संख्या में तंबू उपलब्ध हैं और अस्थाई कैंप बनाए जाने चाहिए. समाचार एजेसी पीटीआई के अनुसार जम्मू कश्मीर में शनिवार को भूकंप के दो हल्के झटके भी महसूस किए गए जिससे लोगों में दहशत फैल गई. मौसम विभाग के अनुसार तड़के सुबह लगभग एक बजे भूकंप का झटका महसूस किया गया. यह रिक्टर स्केल पर 5.4 मापा गया. दूसरा झटका 9.55 सुबह आया. हालाँकि इनसे किसी नुक़सान की कोई ख़बर नहीं है.\n\nSummary:", "target": "भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार से कहा है कि वह जम्मू कश्मीर के भूकंप प्रभावित इलाक़ों के लिए तत्काल ज़्यादा राहत शिविरों का इंतज़ाम करे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउल्लेखनीय है कि भारतीय कश्मीर में हज़ारों कश्मीरी खुले आसमान के नीचे रातें काट रहे हैं. राज्य के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद का भी मानना है कि तंबुओं की भारी कमी है. उनका कहना है कि लोगों को सिर छिपाने के लिए तंबू उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है. जम्मू-कश्मीर के उड़ी और तंगधार सबसे अधिक 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आडवाणी बस्ती, ख़लीलाबाद और गोरखपुर भी जाएँगे. भाजपा अध्यक्ष वेंकैया नायडू राजकोट, दमन, सिल्वासा और दीव जाएँगे. पार्टी ने अपने छह अप्रैल को वाजपेयी और आडवाणी सहित 26 नेताओं को जगह-जगह रैलियाँ करने के लिए भेजने का फ़ैसला किया है. पार्टी के प्रवक्ता मुख़्तार अब्बास नक़वी का कहना है कि भाजपा सिर्फ़ विकास, स्थायित्व और सुशासन के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी. घोटालों का हिसाब दूसरी ओर कांग्रेस ने आज सवाल उठाया कि आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की बात करने वाली भाजपा की सरकार ने पिछसे पाँच सालों में सुरक्षा के नाम पर जो घोटाले किए हैं उसका भी हिसाब भाजपा को देना चाहिए. कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि संसद ने सरकार को रक्षा सामग्री की ख़रीदी के लिए जो पैसे दिए थे उसमें से 27 हज़ार करोड़ का उपयोग सरकार कर ही नहीं सकी. उनका कहना था कि कारगिल के बारे में सीएजी और पीएसी ने जो रिपोर्ट दी उससे भी सरकार पीछे हट गई. उनका कहना था कि इसके अलावा सरकार ने कारगिल युद्ध के बाद जनता से जो चार हज़ार करोड़ का अतिरिक्त टैक्स वसूला था उसका भी सही उपयोग सरकार नहीं कर पाई. उन्होंने लगातार गिर रहे वायुसेना के विमानों के पीछे भी घटिया रक्षा उपकरण होने का आरोप लगाया. 'फ़ील गुड- डील गुड' आठ साल की एक बच्ची ने पूछा कि भाजपा की मंत्री टेबल पर हरे हरे नोट लेना ही क्या फ़ील गुड है? फिर उसने ख़ुद ही जवाब दिया, 'अरे यह तो डील गुड है.' साधना भारतीय नाम की इस बच्ची को कांग्रेस ने अपने पार्टी कार्यालय में पत्रकारों के सामने प्रस्तुत किया और बताया कि यह बच्ची कांग्रेस के लिए प्रचार कर रही है. इस बच्ची ने सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की अपील करते हुए भाजपा के ख़िलाफ़ चार पाँच मिनट का एक लंबा भाषण दिया. किसी पत्रकार को याद आया कि थोड़े दिन पहले वो भाजपा नेता उमा भारती के साथ मंच पर थीं तो साधना ने तत्काल जवाब दिया कि वे उनके साथ लोधी समाज की बात कहने के लिए मंच पर थीं. राजनीतिक दल भी भीड़ जुटाने के लिए क्या क्या नहीं करते.\n\nSummary:", "target": "चुनावी विश्लेषकों को लगता था कि भारतीय जनता पार्टी ने 'भारत-उदय' यानी 'इंडिया शाइनिंग' का नारा थोड़ा जल्दी उछाल दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभाजपा ख़ुद इस विश्लेषण को सही साबित कर रही है. उसने अब एक नया नारा उछाला है 'ग्राम राज से राम राज तक' और इसे भाजपा 'महासंग्राम' भी कह रही है. भाजपा का कहना है कि यह महासंग्राम छह अप्रैल से शुरु होगा और यह दूसरे चरण की चुनावी यात्रा होगी और इसके तहत भाजपा के सभी आला नेता सौ से अधिक चुनावी सभाएँ और रैलियाँ करेंगे. प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी इस दिन गुवाहाटी में होंगे और लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या में. वैसे आडवाणी बस्ती, ख़लीलाबाद और गोरखपुर भी जाएँगे. भाजपा अध्यक्ष वेंकैया नायडू राजकोट, दमन, सिल्वासा और दीव जाएँगे. पार्टी ने अपने छह अप्रैल को वाजपेयी और आडवाणी सहित 26 नेताओं को जगह-जगह रैलियाँ करने के लिए भेजने का फ़ैसला किया है. पार्टी के प्रवक्ता मुख़्तार अब्बास नक़वी का कहना है कि भाजपा सिर्फ़ विकास, स्थायित्व और सुशासन के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी. घोटालों का हिसाब दूसरी ओर कांग्रेस ने आज सवाल उठाया कि आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की बात करने वाली भाजपा की सरकार ने पिछसे पाँच सालों में सुरक्षा के नाम पर जो घोटाले किए हैं उसका भी हिसाब भाजपा को देना चाहिए. कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि संसद ने सरकार को रक्षा सामग्री की ख़रीदी के लिए जो पैसे दिए थे उसमें से 27 हज़ार करोड़ का उपयोग सरकार कर ही नहीं सकी. उनका कहना था कि कारगिल के बारे में सीएजी और पीएसी ने जो रिपोर्ट दी उससे भी सरकार पीछे हट गई. उनका कहना था कि इसके अलावा सरकार ने कारगिल युद्ध के बाद जनता से जो चार हज़ार करोड़ का अतिरिक्त टैक्स वसूला था उसका भी सही उपयोग सरकार नहीं कर पाई. उन्होंने लगातार गिर रहे वायुसेना के विमानों के पीछे भी घटिया रक्षा उपकरण होने का आरोप लगाया. 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कारण वे काफ़ी नाराज़ हैं. वाराणसी में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के दौरान प्रशांत भूषण ने कहा था कि कश्मीर से सेना हटा ली जानी चाहिए, सेना के विशेषाधिकार ख़त्म कर देने चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर जनमतसंग्रह कराया जाना चाहिए और अगर वहाँ के लोग भारत के अलग होना चाहते हैं तो ऐसा करने देना चाहिए.\n\nSummary:", "target": "सुप्रीम कोर्ट के चर्चित वकील और टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण पर हमला करने वाले दो लोगों को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nप्रशांत भूषण ने कहा है कि वे कश्मीर वाले अपने बयान पर क़ायम हैं ये दोनों लोग प्रशांत भूषण पर हमला करने के बाद भाग गए थे, जबकि एक व्यक्ति मौक़े पर ही पकड़ लिया गया था. पुलिस ने गुरुवार की सुबह तेजिंदर पाल सिंह बग्गा और विष्णु गुप्ता को दिल्ली के बाबा खड़ग सिंह मार्ग के पास से गिरफ़्तार कर लिया. जबकि इंदर वर्मा को मौक़े से ही गिरफ़्तार कर लिया गया. बुधवार को ये तीनों सुप्रीम कोर्ट के पास स्थित प्रशांत भूषण के कार्यालय में घुस गए और उनके साथ मारपीट की. नाराज़गी दो लोग तो वहाँ से भागने में सफल 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एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने मीरा को भारत में एड्स पीड़ितों की बढ़ती हुई संख्या से अवगत कराया. मीरा कहती हैं, “उन्होंने सीधे मुझसे पूछा कि तुम इस बारे में क्या कर सकती हो, तब एकदम से मुझे यह ख़्याल आया कि क्यों न 9/11 की तरह ही कुछ निर्देशक मिलकर काम करें.” फ़िल्म के माध्यम से लोगों तक पहुँचने के विचार के पीछे भी एक कारण था. वे कहती हैं, “भारत में सिनेमा का महत्व मंदिर के समान है और अभिनेता, अभिनेत्री को जनता देवी- देवताओं का दर्ज़ा देती है. मैने ऐसे लोगों को संपर्क किया जिनके काम से मैं बहुत प्रभावित थी और जो अपने क्षेत्र में दिग्गज हैं. सौभाग्यवश ये सब तैयार भी हो गए.” मनोरंजन पर ज़ोर हालाँकि हर निर्देशक को अपनी फ़िल्म बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी, लेकिन कुछ बातें शुरू में ही तय कर दी गई थी. मसलन फ़िल्म मनोरंजन से भरपूर होगी और इसमे नामी फ़िल्मी हस्तियाँ काम करेंगी. ‘सलाम बॉम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’ और हाल ही में ‘नेम सेक’ जैसी फ़िल्में बनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी मीरा कहती हैं, “हमें ऐसी फ़िल्में बनानी थीं जिन्हें लोग देखें, भागें नहीं. इसलिए यह भी ज़रूरी था कि हम बडे नामों वाले अभिनेता एवं अभिनेत्रियों को इसमें जोड़ें.” इस फ़िल्म से जुड़े दो और निर्देशक विशाल भारद्वाज (जिनकी ‘मक़बूल’ तीन साल पहले टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में प्रदर्शित हुई थी) और संतोष सिवान भी टोरंटो आए हुए हैं. भारद्वाज कहते हैं, “जब मीरा ने इसका जिक्र किया तो मै तुरंत राजी हो गया. हमने सोचा, अगर बीमारी और दवाइयों के बारे में बताएँगे तो कोई नही देखेगा इसलिए तय हुआ कि मस्त, चालू कहानियाँ सुनाएँगे और इसके जरिए जो भी कहना चाहेंगे वो कह सकेंगे.” मीरा की फ़िल्म इस बात को दर्शाती है कि एचआईवी वाइरस कितना तांत्रिक है (न जात देखता है, न वर्ग). वहीं भारद्वाज की फ़िल्म दर्शाती है की एचआईवी वाइरस के साथ भी जिया जा सकता है. संतोष सिवान की फिल्म का केंद्र है एड्स से जुडे कलंक का एक परिवार पर प्रभाव और फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म दर्शाती है एड्स का पारिवारिक संबंधों पर असर. हालाँकि खचाखच भरे सिनेमा हॉल में काफ़ी लोग मीरा नायर का नाम सुनकर आए थे, पर सभी फ़िल्मों को काफ़ी सराहना मिली. मुश्किलें चर्चा सत्र में मीरा नायर ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि हिंदी सिनेमा के कुछ प्रसिद्ध सितारों ने पहले फ़िल्म में काम करने की इच्छा ज़ाहिर की और फिर मुकर गए. पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से लोगों से उन्हें मदद भी मिली. बाकी निर्देशकों का कहना था कि उन्हे अभिनेताओं से काफ़ी मदद मिली. इन फिल्मों में शबाना आज़मी, बोमान इरानी, पंकज कपूर, शाइनी आहूजा, समीरा रेड्डी, सिद्धार्थ और दक्षिण भारत के स्टार प्रभु देवा, सरोजा देवी और रम्या आदि ने काम किया है. अब सवाल यह है कि इन फ़िल्मों को आम जनता तक कैसे पहुँचाया जाए? मीरा कहती है, “भारत के कई सिनेमा विक्रेता इस बात पर राज़ी हैं कि फ़िल्म की ढ़ाई मिनट की झलकी एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस पर दूरदर्शन पर प्रसारित की जाए. साथ ही चर्चा सत्र आयोजित करने के प्रयास भी होने चाहिए. फ़िल्म की अवधि मात्र 80 मिनट की होने के कारण अभी यह तय नहीं हुआ है कि इसे फ़ीचर फ़िल्म की तरह रिलीज़ किया जाएगा या नहीं. लेकिन मीरा कहती है कि एक संभावना यह भी है कि कुछ थिएटरों में एक हफ़्ते के लिए इसे दिखाया जाए. भविष्य में इन निर्देशकों की नई फ़िल्मों के डीवीडी में उनकी ये लघु फ़िल्म शामिल होगी.\n\nSummary:", "target": "एड्स पर बनी फिल्में अक्सर गंभीर और उपदेशात्मक होती हैं, लेकिन मीरा नायर, विशाल भारद्वाज, संतोष सिवान और फ़रहान अख़्तर जैसे फ़िल्मकार इस विषय को कैमरे में क़ैद करें तो निस्संदेह परिणाम अलग ही होता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़िल्म ‘एड्स-जागो’ इस ख़तरनाक बीमारी के अलग-अलग पहलु्ओं को दर्शाती है, लेकिन दर्शकों का मनोरंजन करते हुए. दरअसल, ये फ़िल्म इन निर्देशकों की चार लघु फिल्मों का संग्रह है. इस फ़िल्म को 32वें टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में नौ सितंबर को पहली बार प्रदर्शित किया गया. छह सितंबर से 15 सितंबर तक चलने वाले इस महोत्सव में 55 देशों से 349 फ़ीचर फिल्में दिखाई जा रही है, जिनमें भारत से पांच फ़ीचर फ़िल्में और ‘एड्स-जागो’ शामिल है. संकल्पना हालाँकि हर निर्देशक ने स्वतंत्र रूप से अपना काम किया है, परंतु इस फ़िल्म की संकल्पना एवं निर्देशकों को साथ लाने का श्रेय मीरा नायर को जाता है. ऐसे संग्रह की प्रेरणा उन्होंने अपने एक पूर्व अनुभव से ली, जिसमें 9/11 के हादसे पर 11 निर्देशकों ने मिलकर काम किया और सभी ने 11 मिनट की एक-एक लघु फ़िल्म बनाई. संयोग की बात है कि इस 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अपनी पहचान बना चुकी मीरा कहती हैं, “हमें ऐसी फ़िल्में बनानी थीं जिन्हें लोग देखें, भागें नहीं. इसलिए यह भी ज़रूरी था कि हम बडे नामों वाले अभिनेता एवं अभिनेत्रियों को इसमें जोड़ें.” इस फ़िल्म से जुड़े दो और निर्देशक विशाल भारद्वाज (जिनकी ‘मक़बूल’ तीन साल पहले टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में प्रदर्शित हुई थी) और संतोष सिवान भी टोरंटो आए हुए हैं. भारद्वाज कहते हैं, “जब मीरा ने इसका जिक्र किया तो मै तुरंत राजी हो गया. हमने सोचा, अगर बीमारी और दवाइयों के बारे में बताएँगे तो कोई नही देखेगा इसलिए तय हुआ कि मस्त, चालू कहानियाँ सुनाएँगे और इसके जरिए जो भी कहना चाहेंगे वो कह सकेंगे.” मीरा की फ़िल्म इस बात को दर्शाती है कि एचआईवी वाइरस कितना तांत्रिक है (न जात देखता है, न वर्ग). वहीं भारद्वाज की फ़िल्म दर्शाती है की एचआईवी वाइरस के साथ भी जिया जा सकता है. संतोष सिवान की फिल्म का केंद्र है एड्स से जुडे कलंक का एक परिवार पर प्रभाव और फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म दर्शाती है एड्स का पारिवारिक संबंधों पर असर. हालाँकि खचाखच भरे सिनेमा हॉल में काफ़ी लोग मीरा नायर का नाम सुनकर आए थे, पर सभी फ़िल्मों को काफ़ी सराहना मिली. मुश्किलें चर्चा सत्र में मीरा नायर ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि हिंदी सिनेमा के कुछ प्रसिद्ध सितारों ने पहले फ़िल्म में काम करने की इच्छा ज़ाहिर की और फिर मुकर गए. पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से लोगों से उन्हें मदद भी मिली. बाकी निर्देशकों का कहना था कि उन्हे अभिनेताओं से काफ़ी मदद मिली. इन फिल्मों में शबाना आज़मी, बोमान इरानी, पंकज कपूर, शाइनी आहूजा, समीरा रेड्डी, सिद्धार्थ और दक्षिण भारत के स्टार प्रभु देवा, सरोजा देवी और रम्या आदि ने काम किया है. अब सवाल यह है कि इन फ़िल्मों को आम जनता तक कैसे पहुँचाया जाए? मीरा कहती है, “भारत के कई सिनेमा विक्रेता इस बात पर राज़ी हैं कि फ़िल्म की ढ़ाई मिनट की झलकी एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस पर दूरदर्शन पर प्रसारित की जाए. साथ ही चर्चा सत्र आयोजित करने के प्रयास भी होने चाहिए. फ़िल्म की अवधि मात्र 80 मिनट की होने के कारण अभी यह तय नहीं हुआ है कि इसे फ़ीचर फ़िल्म की तरह रिलीज़ किया जाएगा या नहीं. लेकिन मीरा कहती है कि एक संभावना यह भी है कि कुछ थिएटरों में एक हफ़्ते के लिए इसे दिखाया जाए. भविष्य में इन निर्देशकों 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नोबेल पुस्कार दिया गया है. नोबेल की शुरूआत साल 1901 में हुई और तब से लेकर अब तक वह ये सम्मान पाने वाली 16वीं महिला हैं. आख़िरी बार साल 1993 में अमरीकी लेखिका टोनी मरिसन को 1993 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था. ग्लिक को साल 1993 में पुलित्ज़र पुरस्कार उनकी रचना 'द वाइल्ड आइरिश' के लिए दिया गया था. साल 2014 में उन्हें नेशनल बुक अवॉर्ड से नवाज़ा गया. साल 2008 में ग्लिक को वालेस स्टीवेंस पुरस्कार, 2001 में उन्हें बोलिंजन प्राइज़ फ़ॉर पोएट्री और 2015 नेशनल ह्युमेनिटीज़ मेडल दिया गया. ग्लिक की कविताएं मानवीय दर्द, मौत, बचपन और परिवार की पृष्ठभूमि और उनकी जटिलताओं को बयां करती हैं. अपनी रचनाओं में वह ग्रीक पौराणिक कथाओं और उसके पात्रों, जैसे- पर्सपेफोन और एरीडाइस से भी प्रेरणा लेती हैं, जो अक्सर विश्वासघात का शिकार होते हैं. अकादमी ने कहा कि उसका 2006 का संग्रह एवर्नो एक 'उत्कृष्ट संग्रह' था. नोबेल पुरस्कार कमेटी के अध्यक्ष एंड्रेस ऑल्सन ने कवियत्री की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'उनके पास बातों को कहने का स्पष्टवादी और समझौता ना करने वाला अंदाज़ है जो उनकी रचनाओं को और बेहतरीन बनाता है.' ग्लिक 1993 में 'बेस्ट अमेरिकन पोएट्री' की संपादक रहीं थीं. उन्होंने 2003-04 से कांग्रेस की लाइब्रेरी में पोएट लिट्रेचर कंसल्टेंट के रूप में काम किया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आपयहां क्लिककर सकते हैं. आप हमेंफ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्रामऔरयूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "साहित्य के लिए इस साल का नोबेल पुरस्कार अमरीकी कवयित्री लुईस ग्लिक को दिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनोबेल सम्मान देने वाली स्वीडिश अकादमी ने कहा कि 'ग्लिक की कविताओं की आवाज़ ऐसी है जिनमें कोई ग़लती हो ही नहीं सकती और उनकी कविताओं की सादगी भरी सुंदरता उनके व्यक्तिगत अस्तित्व को भी सार्वलौकिक बनाती है.' अकादमी ने बताया कि जब उन्हें फ़ोन करके ये जानकारी दी गई तो वह 'आश्चर्यचकित'हो गईं. ग्लिक का जन्म न्यूयॉर्क में साल 1943 में हुआ था. वह अमरीका के मैसेच्युसेट्स शहर में रहती हैं और फ़िलहाल येल विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं. साल 2010 से लेकर अब तक वह चौथी ऐसी महिला हैं जिन्हें साहित्य का नोबेल पुस्कार दिया गया है. नोबेल की शुरूआत साल 1901 में हुई और तब से लेकर अब तक वह ये सम्मान पाने वाली 16वीं महिला हैं. आख़िरी बार साल 1993 में अमरीकी लेखिका टोनी मरिसन को 1993 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था. ग्लिक को साल 1993 में पुलित्ज़र पुरस्कार उनकी रचना 'द वाइल्ड आइरिश' के लिए दिया गया था. साल 2014 में उन्हें नेशनल बुक अवॉर्ड से नवाज़ा गया. साल 2008 में ग्लिक को वालेस स्टीवेंस पुरस्कार, 2001 में उन्हें बोलिंजन प्राइज़ फ़ॉर पोएट्री और 2015 नेशनल ह्युमेनिटीज़ मेडल दिया गया. ग्लिक की कविताएं मानवीय दर्द, मौत, बचपन और परिवार की पृष्ठभूमि और उनकी जटिलताओं को बयां करती हैं. अपनी रचनाओं में वह ग्रीक पौराणिक कथाओं और उसके पात्रों, जैसे- पर्सपेफोन और एरीडाइस से भी प्रेरणा लेती हैं, जो अक्सर विश्वासघात का शिकार होते हैं. अकादमी ने कहा कि उसका 2006 का संग्रह एवर्नो एक 'उत्कृष्ट संग्रह' था. नोबेल पुरस्कार कमेटी के अध्यक्ष एंड्रेस ऑल्सन ने कवियत्री की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'उनके पास बातों को कहने का स्पष्टवादी और समझौता ना करने वाला अंदाज़ है जो उनकी रचनाओं को और बेहतरीन बनाता है.' ग्लिक 1993 में 'बेस्ट अमेरिकन पोएट्री' की संपादक रहीं थीं. उन्होंने 2003-04 से कांग्रेस की लाइब्रेरी में पोएट लिट्रेचर कंसल्टेंट के रूप में काम किया था. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ़ुटबॉल विश्व कप में उरुग्वे की कोस्टा रीका के हाथों हार की वजह क्या एक खाद्य पदार्थ की कमी हो सकती है? कम से कम उरुग्वे के कुछ फ़ैंस तो यही मानते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदरअसल, उरुग्वे की टीम विश्व कप के लिए जब ब्राज़ील पहुंची तो एयरपोर्ट पर ब्राज़ीली अधिकारियों ने उनके सामान में मौजूद 39 किलो के स्वादिष्ट व्यंजन को ज़ब्त कर लिया गया. डुलसे डे लेख़ नाम का ये मीठा व्यंजन उरुग्वे में बहुत लोकप्रिय है. ब्राज़ीली अधिकारियों का कहना था कि दूध से बने इस व्यंजन के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ उरुग्वे के पास नहीं थे. उरुग्वे की कोस्टा रीका के हाथों 3-1 से हुई हार से हैरान कुछ फ़ैंस इसके लिए डुलसे डे लेख़ की कमी को ज़िम्मेदार मान रहे हैं. उरुग्वे का अगला मैच इंग्लैंड के साथ गुरुवार 19 जून को है. एक उलटफेर में उरुग्वे अपने पहले मैच में कोस्टा रीका से 3-1 से हार गया. ब्राज़ील के कृषि विभाग के एक अधिकारी ने रॉयटर्स समाचार एजेंसी को बताया कि जैसे ही उरुग्वे की टीम डुलसे डे लेख़ के लिए ''ज़रूरी दस्तावेज़ मुहैया कराएगी'', उसे ये व्यंजन वापस मिल जाएगा. अधिकारी का कहना था, \"या फिर वे ब्राज़ील से लौटते वक्त इसे अपने साथ वापस ले जा सकते हैं.\" ये साफ़ नहीं है कि पूरा 39 किलो एक ही व्यक्ति के सामान में था या फिर अलग-अलग वज़न के इसके डिब्बे खिलाड़ियों में बांट दिए गए थे. उरुग्वे के कुछ फ़ैंस कोस्टा रीका से उसकी हार के लिए डुलसे डे लेख़ की कमी को ज़िम्मेदार मान रहे हैं. उरुग्वे के पूर्व गोलकीपर हुआन कास्टिलो का कहना था कि साल 2010 में भी उरुग्वे की टीम दक्षिण अफ़्रीका में हुए विश्व कप में डुलसे डे लेख़ लेकर गई थी लेकिन तब उन्हें कस्टम्स पर किसी भी तरह की परेशानी नहीं हुई थी. डुलसे डे लेख़ बनाने के लिए दूध, चीनी, बेकिंग पाउडर और वनीला एक्ट्रेक्ट को मिलाकर पकाया जाता है. इसे ब्रैड, पैनकेक और बिस्कुटों पर लगाया जाता है या फिर फल या आइस क्रीम पर फैलाकर खाया जाता है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा है कि सीरिया के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई के लिए कई देश उनके साथ हैं. इसके लिए अमरीका को काफ़ी समर्थन मिल रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपेरिस में मौजूद जॉन केरी के मुताबिक़ दुनिया ‘नरसंहार की मूकदर्शक’ नहीं बनी रह सकती. सीरिया पर अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप है. अमरीका ने 21 अगस्त को सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद की सेनाओं पर 1429 लोगों की गैस हमले में हत्या करने का आरोप लगाया था. इस बीच यूरोपियन यूनियन के विदेश मंत्रियों ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट आए बगैर कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. फ़्रांसीसी राष्ट्रपति फ़्रांसुआ ओलांद सीरिया पर अमरीकी सैन्य अभियान के अहम समर्थक माने जाते हैं. उन्होंने आशा जताई है कि गैस हमले को लेकर संयुक्त राष्ट्र की शुरुआती जांच रिपोर्ट अगले हफ़्ते तक आ जाएगी. सीरिया के हालात पर बीबीसी विशेष- कहां आ पहुंचा सीरिया ओबामा के सामने चुनौती जी-20 देशों की बैठक में रूस सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर एकमत नहीं हो सका. अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने विद्रोहियों पर गैस हमले का आरोप लगाया है. ओबामा इससे पहले कह चुके हैं कि कोई भी सैन्य कार्रवाई ‘समय और विस्तार के लिहाज़ से सीमित’ होगी और उसका मक़सद सीरियाई सरकार को फिर अपने नागरिकों का क़त्लेआम रोकने को मजबूर करना और इस तरह की क्षमता से विहीन करना होगा. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक़ सीरिया में ढाई साल से जारी हिंसक संघर्ष में अब तक क़रीब एक लाख लोग मारे जा चुके हैं. ‘म्यूनिख क्षण’ केरी चार दिन के यूरोप दौरे पर हैं. उन्होंने फ़्रांस के विदेशमंत्री लॉरेन फ़ेबियस से पेरिस में मुलाक़ात की जहां दोनों ने सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल को लेकर अपने फ़ैसले का समर्थन किया. पिछले हफ़्ते बोले गए अपने शब्दों को दोहराते हुए जॉन केरी ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ‘म्यूनिख क्षण’ से गुज़र रहा है. उनका इशारा तुष्टिकरण की नीति को लेकर था जो 1930 के दशक में नाज़ी जर्मनी को रोकने में नाकामयाब रही थी. जॉन केरी ने कहा, ‘हम अमरीका में इस बात को समझते हैं और हमारे फ़्रांसीसी नेता भी जानते हैं कि यह वक़्त नरसंहार का मूकदर्शक बने रहने का नहीं है. यह वक़्त एक सीमित, सुनिश्चित लेकिन साफ़ और प्रभावी जवाब देने का है, ताकि ज़ुल्म के लिए ज़िम्मेदार बशर असद जैसे तानाशाहों को रोका जा सके.’ जॉन केरी ने कहा कि उनके समर्थन में आए देशों की तादाद दो अंकों में है. यूएन रिपोर्ट का इंतज़ार इससे पहले लिथुआनिया की राजधानी विलनियस में जॉन केरी ने सीरिया के मामले में यूरोपियन यूनियन के विदेशमंत्रियों के प्रस्ताव का स्वागत किया. ये विदेशमंत्री विलनियस में बैठक कर रहे हैं. यूरोपियन यूनियन के मंत्रियों ने कहा है कि मौजूद ख़ुफ़िया जानकारी से पता चलता है कि ‘इस बात के काफ़ी तगड़े सुबूत हैं कि सीरियाई सरकार हमले के लिए ज़िम्मेदार है’ और इसके लिए ‘साफ़ और मज़बूत जवाब’ दिया जाना चाहिए. मगर मंत्रियों ने फ़्रांसीसी राष्ट्रपति की इस मांग का समर्थन किया कि किसी भी कार्रवाई से पहले संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का इंतज़ार करना चाहिए. केरी लंदन जाने से पहले पेरिस में अरब लीग के प्रतिनिधियों से भी मिलने वाले हैं ताकि वो इंग्लैंड के विदेश सचिन विलियम हेग से मुलाक़ात कर सकें. रूस और चीन दोनों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के बिना सीरिया के ख़िलाफ़ कोई भी कार्रवाई अवैध मानी जाएगी. उधर अमरीका में राष्ट्रपति ओबामा के सामने इस मामले को लेकर कांग्रेस को मनाने की चुनौती मौजूद है. जहां सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स सीरिया के मुद्दे पर अगले हफ़्ते मतदान कर सकते हैं. बीबीसी और एबीसी न्यूज़ की ओर से हुए एक मतदान से पता चलता है कि कांग्रेस के एक तिहाई सदस्य सीरिया के ख़िलाफ़ किसी सैन्य कार्रवाई को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं. जिन्होंने इस बारे में कोई फ़ैसला किया भी है उनमें से ज़्यादातर का कहना है कि वो राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ मतदान करेंगे. 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'अच्छा क़दम' अभी एक दिन पहले ही ईरान ने कहा है कि उसे देश में ऐसे कई जासूसी नेटवर्क के बारे में पता चला है जो अमरीका और उसके सहयोगी चला रहे हैं. ईरानी अधिकारियों ने स्विस राजदूत को इस बारे में तलब किया है. ईरानी टीवी का कहना है कि इस नेटवर्क के ज़रिए 'घुसपैठ' और साज़िश रचने' की कोशिश हो रही थी. ईरान में अमरीका के हितों का प्रतिनिधित्व स्विट्ज़रलैंड करता है. उधर अमरीका में व्हाइट हाउस का कहना है कि वो ख़ुफ़िया मामलों से जुड़े ख़बरों की न ही पुष्टि करता है और न ही इनकार करता है. 1980 में ईरान में क्रांति के बाद सोमवार को हुई बैठक अमरीका-ईरान के बीच पहली औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत थी. बीबीसी संवाददाता पॉल रेनॉल्डस का कहना है कि अमरीका ने पहले इस बातचीत के लिए शर्तें रखी थीं लेकिन बाद में वो पीछे हट गया. इसमें इराक़ सरकार को ईरान के समर्थन की माँग शामिल थी. बैठक से पहले इराक़ के प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ने इस बातचीत को क्षेत्र के लिए अहम क़दम बताया. वहीं तेहरान में ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने सरकारी रेडियो पर कहा कि अब अमरीका ईरान से इराक़ के बारे में बातचीत करना चाहता है जो अच्छा संकेत है. बातचीत में ईरान का रुख़ वहाँ के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़मेनेई ने तय किया है. उन्होंने कहा है कि बैठक का मकसद इराक़ पर क़ब्ज़ा करने वाले अमरीका को ये याद दिलाना है कि इराक़ को सुरक्षित बनाना उनकी ज़िम्मेदारी है. ईरान में बीबीसी संवाददाता के मुताबिक दोनों पक्षों के बीच बातचीत का सांकेतिक महत्व ज़रूर है लेकिन किसी बड़े फ़ैसले पर पहुँचने की उम्मीद कम ही है.\n\nSummary:", "target": "ईरान और अमरीका के बीच पिछले तीस सालों में पहली बार हुई द्विपक्षीय बातचीत को अमरीका ने 'सकारात्मक' बताया है और कहा कि 'मुद्दे पर ही' बात हुई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबातचीत के एजेंडे में केवल इराक़ की सुरक्षा स्थिति का मुद्दा ही शामिल था. बैठक इराक़ की राजधानी बग़दाद में करीब चार घंटे तक चली. बैठक में इराक़ में अमरीका के राजदूत रयान क्रॉकर, ईरान के राजदूत हसन काज़मी और इराक़ी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिक़ी शामिल थे. रयान क्रॉकर ने कहा है कि बैठक में इराक़ के प्रति नीति पर आम सहमति थी. लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि अब ज़रूरत इस बात की है ईरान वाकई में कुछ क़दम उठाए. रयान क्रॉकर ने बताया कि उन्होंने ईरान से कहा है कि वो इराक़ में मिलिशिया गुटों को हथियार देना बंद करे. 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हैं जिसमें भारतीय शास्त्रीय नृत्य, संगीत के अलावा और भी कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इसी के सिलसिले में वो पत्रकारों से बात कर रही थीं. वैजयंती माला की प्रशंसक हेमा मालिनी कहती हैं कि वो मशहूर अदाकारा वैजयंती माला की ज़बरदस्त प्रशंसक हैं. वो कहती हैं कि वैजयंती माला बेहतरीन अभिनेत्री होने के साथ-साथ ज़बरदस्त डांसर भी हैं. एक स्टेज परफारमेंस के दौरान दुर्गा के रूप में हेमा मालिनी. हेमा मालिनी कहती हैं, \"वैजयंती जी कमाल का शास्त्रीय नृत्य करती हैं. वो इस समय तकरीबन 75 साल की हैं, लेकिन अब भी उनके नृत्य कौशन का जवाब नहीं. एक अवॉर्ड समारोह में उन्होंने मुझे पुरस्कार दिया था. मेरे लिए ये बहुत बड़ा सम्मान था.\" हेमा मालिनी को फिल्म 'देवदास' में माधुरी दीक्षित का नृत्य भी ख़ासा पसंद आया था. दिल्ली गैंगरेप केस से दुखी हेमा मालिनी बीते रविवार दिल्ली में एक 23 वर्षीय लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार से भी ख़ासी दुखी हैं. वो कहती हैं, \"मैं उस लड़की के लिए लगातार प्रार्थना कर रही हूं. उसके मां-बाप पर ना जाने क्या बीत रही होगी.\" वो ये भी कहती हैं, \"बीते काफी समय से दिल्ली में इस 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उनके साथ है और शराब के ठेके की दुकान पर ताला लग चुका है. यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है. पिछले सात सालों में उत्तरांचल में कई महिला प्रतिनिधियों ने “प्रधान पति” के साए से बाहर आकर अपना रास्ता बनाया है जो बाक़ी के लिए मिसाल है. 'बुआरियाँ चामारंगी पंचायतें', 'औरतें क्या पगड़ी बाँधकर बैठेंगी चौपाल पर', 'वो क्या काम करेंगी, काम करेगा उसका पति'. छींटाकशी के ऐसे ज़ुमलों का सामना शुरू में लगभग हर उस महिला को करना पड़ा जो पंचायतों में चुनकर आईं. महिला आरिक्षत सीटों पर “कठपुतलियों” को खड़ा कर दिया जाता और असली बागडोर परिवार के पुरुषों के हाथ में ही रही और अधिकांश मामलों में महिलाओं की भूमिका घूंघट में रहकर अंगूठा लगाने की ही रही और एक नया पद ही बन गया “सरपंच पति” या “प्रधान पति” का. लेकिन वे अब इस साए से बाहर आ रही हैं. कड़ा रुख़ रूद्रप्रयाग जिला पंचायत अध्यक्ष शैलारानी रावत ने नौकरशाही के भ्रष्ट आचरण का कड़ा विरोध किया और पंचायत समिति के कुछ सदस्यों के कमीशन लेने के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गईं. झूठे मामले में उन्हें फंसाने पर उन्होंने अपनी जमानत लेने से इनकार कर दिया. हारकर पंचायत समिति के सदस्यों को अपनी गलती माननी पड़ी. देहरादून जिले के कालसी ब्लॉक की सदस्य शारदा चौहान की कहानी ये है कि उन्होंने सभी महिला सदस्यों को इकट्ठा कर पंचायत की बैठक में “प्रधान पति” को घुसने नहीं दिया. आखिरकार हारकर उस व्यक्ति को अपनी पत्नी को बैठक की अध्यक्षता के लिए भेजना ही पड़ा. ये कुछ उदाहरण भर हैं. इसके अलावा स्कूल खुलवाना, सड़क बनवाना, वन संरक्षण के अनेक काम निर्वाचित महिलाओं के खाते में दर्ज हैं जो उन्होंने अपने-अपने इलाकों की खुशहाली के लिए किए हैं. लेकिन उनके रास्ते अभी भी आसान नहीं हुए हैं और राजनीति की कठिन डगर पर हर कदम अभी भी चुनौतियाँ उनका इंतजार कर रही हैं. आँखें खोलने वाले अनुभव राजधानी देहरादून में उत्तरांचल की पंचायती राज संस्थाओं की लगभग 650 प्रतिनिधियों ने जब अपने खट्टे मीठे अनुभव बाँटे तो सबकी आँखें और खुलीं. ये एक खुला मंच था, एक अनूठा संगम. जहाँ पिथौरागढ़ से लेकर टिहरी गढ़वाल के दूर दराज के इलाके से आई महिलाओं ने पंचायतों को और अधिक अधिकार संपन्न बनाने की माँग की और कहा कि स्थानीय विकास और उसके उपयोग में उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए. सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए चकराता ब्लॉक थंटा गाँव की पंचायत सदस्य लक्ष्मी कहती हैं “गाँव में तैनात अफ़सर शासनादेश को अमल में लाते ही नहीं. जहाँ सरकार को छहकदम चलना है, वो एक कदम चल रही है, पाँच कदम और चलना बाकी है.” सुमति देवी ने सवाल उठाया कि “उत्तरांचल में वन पंचायतों का गठन कर सरकार एक समांनांतर व्यवस्था क्यों खड़ी कर रही है.” फकोट से आई सुशीला देवी की शिकायत थी कि “ग्राम प्रधान महिला सदस्यों को गंभीरता से लेते हीं नहीं, न उन्हें बैठक की सूचना दी जाती है और न ही विकास योजनाओं की जानकारी.” उत्तरांचल देश का संभवतः एकमात्र राज्य है जहाँ पंचायत संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 45 प्रतिशत है जो कि 33 प्रतिशत के तय आरक्षण से कहीं ज़्यादा है.\n\nSummary:", "target": "टिहरी के भोपालपानी गाँव की प्रधान शांति देवी की दिनचर्या आज से दो साल पहले किसी दूसरी पहाड़ी महिला की ही तरह थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुबह उठकर हँसिया और रस्सी लेकर वे पहाड़ों पर मीलों की चढ़ाई चढ़कर मवेशियों के लिए चारा और घर के लिए ईंधन लाती, फिर खेत में फसल की गुड़ाई और घर लौटकर परिवार के लिए खाने का प्रबंध करतीं. परिवार के पुरुष शराब में डूबे रहते. लेकिन जब वे प्रधान बनीं तो उन्होंने शराब के ठेकों के ख़िलाफ़ मुहिम ही छेड़ दी. आज इस मुहिम में सारा गाँव उनके साथ है और शराब के ठेके की दुकान पर ताला लग चुका है. यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है. पिछले सात सालों में उत्तरांचल में कई महिला प्रतिनिधियों ने “प्रधान पति” के साए से बाहर आकर अपना रास्ता बनाया है जो बाक़ी के लिए मिसाल है. 'बुआरियाँ चामारंगी पंचायतें', 'औरतें क्या पगड़ी बाँधकर बैठेंगी चौपाल पर', 'वो क्या काम करेंगी, काम करेगा उसका पति'. छींटाकशी के ऐसे ज़ुमलों का सामना शुरू में लगभग हर उस महिला को करना पड़ा जो पंचायतों में चुनकर आईं. महिला आरिक्षत सीटों पर “कठपुतलियों” को खड़ा कर दिया जाता और असली बागडोर परिवार के पुरुषों के हाथ में ही रही और अधिकांश मामलों में महिलाओं की भूमिका घूंघट में रहकर अंगूठा लगाने की ही रही और एक नया पद ही बन गया “सरपंच पति” या “प्रधान पति” का. लेकिन वे अब इस साए से बाहर आ रही हैं. कड़ा रुख़ रूद्रप्रयाग जिला पंचायत अध्यक्ष शैलारानी रावत ने नौकरशाही के भ्रष्ट आचरण का कड़ा विरोध किया और पंचायत समिति के कुछ सदस्यों के कमीशन लेने के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गईं. झूठे मामले में उन्हें फंसाने पर उन्होंने अपनी जमानत लेने से इनकार कर दिया. हारकर पंचायत समिति के सदस्यों को अपनी गलती माननी पड़ी. देहरादून जिले के कालसी ब्लॉक की सदस्य शारदा चौहान की कहानी ये है कि उन्होंने सभी महिला सदस्यों को इकट्ठा कर पंचायत की बैठक में “प्रधान पति” को घुसने नहीं दिया. आखिरकार हारकर उस व्यक्ति को अपनी पत्नी को बैठक की अध्यक्षता के लिए भेजना ही पड़ा. ये कुछ उदाहरण भर हैं. इसके अलावा स्कूल खुलवाना, सड़क बनवाना, वन संरक्षण के अनेक काम निर्वाचित महिलाओं के खाते में दर्ज हैं जो उन्होंने अपने-अपने इलाकों की खुशहाली के लिए किए हैं. लेकिन उनके रास्ते अभी भी आसान नहीं हुए हैं और राजनीति की कठिन डगर पर हर कदम अभी भी चुनौतियाँ उनका इंतजार कर रही हैं. आँखें खोलने वाले अनुभव राजधानी देहरादून में उत्तरांचल की पंचायती राज संस्थाओं की लगभग 650 प्रतिनिधियों ने जब अपने खट्टे मीठे अनुभव बाँटे तो सबकी आँखें और खुलीं. ये एक खुला मंच था, एक अनूठा संगम. जहाँ पिथौरागढ़ से लेकर टिहरी गढ़वाल के दूर दराज के इलाके से आई महिलाओं ने पंचायतों को और अधिक अधिकार संपन्न बनाने की माँग की और कहा कि स्थानीय विकास और उसके उपयोग में उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए. सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए चकराता ब्लॉक थंटा गाँव की पंचायत सदस्य लक्ष्मी कहती हैं “गाँव में तैनात अफ़सर शासनादेश को अमल में लाते ही नहीं. जहाँ सरकार को छहकदम चलना है, वो एक कदम चल रही है, पाँच कदम और चलना बाकी है.” सुमति देवी ने सवाल उठाया कि “उत्तरांचल में वन पंचायतों का गठन कर सरकार एक समांनांतर व्यवस्था क्यों खड़ी कर रही है.” फकोट से आई सुशीला देवी की शिकायत थी कि “ग्राम प्रधान महिला सदस्यों को गंभीरता से लेते हीं नहीं, न उन्हें बैठक की सूचना दी जाती है और न ही विकास योजनाओं की जानकारी.” उत्तरांचल देश का संभवतः एकमात्र राज्य है जहाँ पंचायत संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 45 प्रतिशत है जो कि 33 प्रतिशत के तय आरक्षण से कहीं ज़्यादा है.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 832, "source_item_id": "832", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2844, "clean_index": 737, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:737"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nटार्न नदी पर बना मिलो पुल ढाई किलोमीटर लंबा है और इसकी कुल ऊँचाई 270 मीटर यानी 885 फुट है. इस पुल का सबसे ऊँचा खंभा 340 मीटर से कुछ अधिक (1,115 फुट) है. संभावना है कि इस साल के अंत तक इस पुल को यातायात के लिए खोल दिया जाएगा. इस पुल से पेरिस और भूमध्य स्थल के बीच संपर्क स्थापित हो जाएगा. जब इस पुल के सारे खंभे खड़े हो जाएँगे और उस पर तार बाँध दिए जाएँगे तो यह पुल एफ़िल टॉवर से ऊँचा हो जाएगा. एफ़िल टॉवर 340 मीटर ऊँचा है. बड़ी परियोजना समाचार एजेंसियों के अनुसार शुक्रवार को दोपहर इस पुल का आख़िरी हिस्सा बनकर तैयार हुआ. इस पुल को उसी आइफ़ैज कंपनी ने तैयार किया है जिसने एफ़िल टॉवर तैयार किया था. योजना थी कि यह परियोजना तीन साल में पूरी कर ली जाएगी लेकिन ख़राब मौसम की वजह से इसमें छह महीने का विलंब होने के आसार हैं. इसके निर्माण में 30 करोड़ डॉलर का खर्च आया है और इस टोल पुल से इसकी वसूली 75 सालों में होने का अनुमान है. कॉनकॉर्ड विमान और चैनल पर बने टनल की तरह यह परियोजना भी फ़्रांस और ब्रिटेन दोनों देशों के सहयोग से पूरी हो रही है. इस परियोजना के वास्तुविद नॉर्मन फॉस्टर हैं.\n\nSummary:", "target": "दक्षिण फ़्रांस में दुनिया का सबसे ऊँचा सड़क पुल बनकर तैयार हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nटार्न नदी पर बना मिलो पुल ढाई किलोमीटर लंबा है और इसकी कुल ऊँचाई 270 मीटर यानी 885 फुट है. इस पुल का सबसे ऊँचा खंभा 340 मीटर से कुछ अधिक (1,115 फुट) है. संभावना है कि इस साल के अंत तक इस पुल को यातायात के लिए खोल दिया जाएगा. इस पुल से पेरिस और भूमध्य स्थल के बीच संपर्क स्थापित हो जाएगा. जब इस पुल के सारे खंभे खड़े हो जाएँगे और उस पर तार बाँध दिए जाएँगे तो यह पुल एफ़िल टॉवर से ऊँचा हो जाएगा. एफ़िल टॉवर 340 मीटर ऊँचा है. बड़ी परियोजना समाचार एजेंसियों के अनुसार शुक्रवार को दोपहर इस पुल का आख़िरी हिस्सा बनकर तैयार हुआ. इस पुल को उसी आइफ़ैज कंपनी ने तैयार किया है जिसने एफ़िल टॉवर तैयार किया था. योजना थी कि यह परियोजना तीन साल में पूरी कर ली जाएगी लेकिन ख़राब मौसम की वजह से इसमें छह महीने का विलंब होने के आसार हैं. इसके निर्माण में 30 करोड़ डॉलर का खर्च आया है और इस टोल पुल से इसकी वसूली 75 सालों में होने का अनुमान है. कॉनकॉर्ड विमान और चैनल पर बने टनल की तरह यह परियोजना भी फ़्रांस और ब्रिटेन दोनों देशों के सहयोग से पूरी हो रही है. इस परियोजना के वास्तुविद नॉर्मन फॉस्टर हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", 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कि उनके परिवार और आसपास के निवासियों को हटाया नहीं गया है. उन्होंने बताया कि आसपास के घरों में शांति बनी हुई है. अभी पुलिस ने ये नहीं बताया है कि इस घर की तलाशी क्यों ली गई. एक स्थानीय काउंसिलर निकनाम हुसैन ने बताया कि उन्हें लगता है कि लूटन में मंगलवार को हुई तलाशी से ही यहाँ हो रही तलाशी के तार जुड़े हुए हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें जो जानकारी है उसके मुताबिक़ यह घर उस व्यक्ति का है जिसे लूटन स्टेशन के बाहर मिली कार से संबद्ध माना जा रहा है. पुलिस ने मंगलवार को लूटन स्टेशन की कार पार्किंग में खड़ी इस कार में नियंत्रित धमाके किए थे और उसे वहाँ से विस्फोटक सामग्री भी मिली थी.\n\nSummary:", "target": "ब्रिटेन की राजधानी लंदन में पिछले सप्ताह हुए धमाकों की जाँच के सिलसिले में आतंकवाद निरोधक इकाई के पुलिसकर्मियों ने बकिंघमशायर में एक घर पर छापा मारा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबुधवार की रात एल्सबरी स्थित एक घर पर पुलिस ने छापा मारा और तलाशी ली. स्कॉटलैंड यॉर्ड के एक प्रवक्ता ने बताया कि फ़ॉरेन्सिक जाँच पूरा होने में अभी कुछ समय लगेगा. स्थानीय समय 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240 मीटर ऊंची चिमनी भरभरा कर गिर गई थी. इस हादसे में 40 मज़दूरों की मौत हो गई थी. हालांकि श्रम न्यायालय ने अपने आदेश में कारख़ाना अधिनियम के तहत मामले को चलने लायक नहीं बताते हुये अन्य आठ आरोपियों को दोषमुक्त क़रार दिया है. बाल्को वेदांता के संवाद प्रमुख बीके श्रीवास्तव ने बीबीसी से बातचीत में कहा, \"हमें श्रम न्यायालय के आदेश की जानकारी मिली है. हमारे वकील पूरे मामले की जानकारी ले रहे हैं.\" समाप्त श्रीवास्तव के अनुसार बाल्को के तत्कालीन सीईओ गुंजन गुप्ता ने काफ़ी पहले ही बाल्को से इस्तीफ़ा दे दिया है और वे इन दिनों भारत से बाहर किसी कंपनी में कार्यरत हैं. वहीं शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के चेयरमेन हाउ जुओजीन चीन में निवासरत हैं. इधर बाल्को और भारतीय ठेका कंपनी जीडीसीएल की ओर से मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता अशोक तिवारी ने कहा कि राज्य शासन की ओर से सहायक कारख़ाना निरिक्षक ने यह मामला श्रम न्यायालय में दायर किया गया था. तिवारी ने कहा, \"न्यायालय द्वारा कारख़ाना अधिनियम के तहत यह प्रकरण नहीं बनना पाया गया क्योंकि वहां न तो कोई निर्माण प्रक्रिया चल रही थी और ना ही वहां कोई ऐसी स्थितियां थीं. जिन दो लोगों के ख़िलाफ़ गिरफ्तारी वारंट जारी हुये हैं, जब वे अदालत में उपस्थित होंगे तो उनके ख़िलाफ़ विचारण होगा.\" बाल्को पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी थी लेकिन साल 2002 में इसका विनिवेश कर दिया गया था. वेदांता ग्रुप की स्टरलाइट कंपनी ने इसे ख़रीद लिया था. बाल्को ने अपने पावर प्लांट के चिमनी निर्माण का काम चीनी कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन को दिया था और सेप्को ने जीडीसीएल नाम की कंपनी को चिमनी निर्माण कार्य का ठेका दे दिया था. पुलिस ने इस मामले में बाल्को वेदांता, चीन की ठेका कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन यानी सेपको में कार्यरत तीन चीनी नागरिकों और भारतीय ठेका कंपनी जीडीसीएल के अधिकारियों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज की. इससे पहले राज्य सरकार द्वारा बनाए गए संदीप बख्शी आयोग ने वेदांता-स्टरलाइट कंपनी बाल्को के अधिकारी, चिमनी का निर्माण करने वाली ठेका कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के परियोजना प्रबंधक, उप ठेका कंपनी जीडीसीएल के परियोजना प्रबंधक व इंजीनियर और वल्लभगढ़ के वैज्ञानिक व इंजीनियर को 40 मजदूरों की मौत के लिए ज़िम्मेदार बताया था. लेकिन इनमें से सभी के सभी आरोपी अदालती दांव-पेंच के कारण जेल से बाहर हैं. यहां तक कि शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के तीन चीनी अधिकारी भी अपने देश लौट गये. दूसरी ओर इस हादसे में मारे गये मज़दूरों के परिजनों को नियमानुसार आज तक नौकरी नहीं मिली है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सात साल पहले हुए छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित बाल्को चिमनी हादसा मामले में श्रम न्यायालय ने दो लोगों के ख़िलाफ़ स्थायी गिरफ़्तारी वारंट जारी किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nश्रम न्यायालय ने बाल्को के तत्कालीन सीईओ गुंजन गुप्ता और चीन की कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के चेयरमेन हाउ जुओजीन के ख़िलाफ़ वारंट जारी किया है. 23 सितंबर 2009 को कोरबा में ब्रिटिश कंपनी वेदांता-स्टरलाईट के बाल्को पावर प्लांट की 240 मीटर ऊंची चिमनी भरभरा कर गिर गई थी. इस हादसे में 40 मज़दूरों की मौत हो गई थी. हालांकि श्रम न्यायालय ने अपने आदेश में कारख़ाना अधिनियम के तहत मामले को चलने लायक नहीं बताते हुये अन्य आठ आरोपियों को दोषमुक्त क़रार दिया है. बाल्को वेदांता के संवाद प्रमुख बीके श्रीवास्तव ने बीबीसी से बातचीत में कहा, \"हमें श्रम न्यायालय के आदेश की जानकारी मिली है. हमारे वकील पूरे मामले की जानकारी ले रहे हैं.\" समाप्त श्रीवास्तव के अनुसार बाल्को के तत्कालीन सीईओ गुंजन गुप्ता ने काफ़ी पहले ही बाल्को से इस्तीफ़ा दे दिया है और वे इन दिनों भारत से बाहर किसी कंपनी में कार्यरत हैं. वहीं शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के चेयरमेन हाउ जुओजीन चीन में निवासरत हैं. इधर बाल्को और भारतीय ठेका कंपनी जीडीसीएल की ओर से मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता अशोक तिवारी ने कहा कि राज्य शासन की ओर से सहायक कारख़ाना निरिक्षक ने यह मामला श्रम न्यायालय में दायर किया गया था. तिवारी ने कहा, \"न्यायालय द्वारा कारख़ाना अधिनियम के तहत यह प्रकरण नहीं बनना पाया गया क्योंकि वहां न तो कोई निर्माण प्रक्रिया चल रही थी और ना ही वहां कोई ऐसी स्थितियां थीं. जिन दो लोगों के ख़िलाफ़ गिरफ्तारी वारंट जारी हुये हैं, जब वे अदालत में उपस्थित होंगे तो उनके ख़िलाफ़ विचारण होगा.\" बाल्को पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी थी लेकिन साल 2002 में इसका विनिवेश कर दिया गया था. वेदांता ग्रुप की स्टरलाइट कंपनी ने इसे ख़रीद लिया था. बाल्को ने अपने पावर प्लांट के चिमनी निर्माण का काम चीनी कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन को दिया था और सेप्को ने जीडीसीएल नाम की कंपनी को चिमनी निर्माण कार्य का ठेका दे दिया था. पुलिस ने इस मामले में बाल्को वेदांता, चीन की ठेका कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन यानी सेपको में कार्यरत तीन चीनी नागरिकों और भारतीय ठेका कंपनी जीडीसीएल के अधिकारियों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज की. इससे पहले राज्य सरकार द्वारा बनाए गए संदीप बख्शी आयोग ने वेदांता-स्टरलाइट कंपनी बाल्को के अधिकारी, चिमनी का निर्माण करने वाली ठेका कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के परियोजना प्रबंधक, उप ठेका कंपनी जीडीसीएल के परियोजना प्रबंधक व इंजीनियर और वल्लभगढ़ के वैज्ञानिक व इंजीनियर को 40 मजदूरों की मौत के लिए ज़िम्मेदार बताया था. लेकिन इनमें से सभी के सभी आरोपी अदालती दांव-पेंच के कारण जेल से बाहर हैं. यहां तक कि शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन के तीन चीनी अधिकारी भी अपने देश लौट गये. दूसरी ओर इस हादसे में मारे गये मज़दूरों के परिजनों को नियमानुसार आज तक नौकरी नहीं मिली है. 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हालाँकि ब्रायन लारा ने सिर्फ़ 131 टेस्ट में ही यह रिकॉर्ड क़ायम किया. जबकि सचिन तेंदुलकर का ये 152वाँ टेस्ट मैच है. इस रिकॉर्ड के अलावा नाम वनडे में सर्वाधिक रन (16361), वनडे में सर्वाधिक शतक (42) और टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक शतक (39) का रिकॉर्ड भी मास्टर ब्लास्टर के नाम ही था. पारी ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सिरीज़ से पहले सचिन को लारा का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए 77 रनों की आवश्यकता थी. लेकिन सचिन बंगलौर टेस्ट में कुल 62 रन ही बना पाए. पहली पारी में उन्होंने सिर्फ़ 13 रन बनाए जबकि दूसरी पारी में उन्होंने 49 रनों का योगदान दिया. लेकिन मोहाली टेस्ट के पहले ही दिन सचिन को बल्लेबाज़ी करने का मौक़ा मिल गया. चायकाल के पहले सचिन 13 रन बनाकर नाबाद थे. यानी उन्हें लारा का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए सिर्फ़ दो रनों की आवश्यकता थी. चायकाल के बाद पहली ही गेंद पर सचिन ने लारा का रिकॉर्ड तोड़ दिया. 35 वर्षीय सचिन तेंदुलकर ने अपना बल्ला उठाकर लोगों का अभिवादन स्वीकार किया. उस समय पिच पर मौजूद सौरभ गांगुली ने सचिन को बधाई दी और फ़ील्डिंग कर रहे सभी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने ताली बजाकर सचिन का अभिवादन 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की कहानी में दम नहीं होने की वजह से फ़िल्म पहले हफ़्ते में ही बॉक्स ऑफ़िस पर दम तोड़ती नज़र आ रही है. हालाँकि फ़िल्म में बिग बी अमिताभ बच्चन भी हैं मगर उनकी भूमिका भी लोगों को खींच नहीं पा रही है. अपनी भूमिका के बारे में अमिताभ कहते हैं, \"बहुत दिनों के बाद ऐसा हल्का-फुल्का रोल कर रहा हूँ. ज़ाहिर है कि एक कलाकार की हैसियत से हमें जो मिले उसे करना चाहिए.\" 'कहानी में दम नहीं' मगर इस भूमिका से समीक्षक बहुत ख़ुश नहीं हैं. फ़िल्म आलोचक इंदु मीरानी के अनुसार, \"फ़िल्म के कैरेक्टर काफ़ी मज़बूत नहीं हैं. वे बस आते हैं जाते हैं. उनका कोई मतलब नहीं लगता.\" इस फ़िल्म के अंत में अमिताभ ही विवेक और ऐश्वर्या को मिलाने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं मगर असल ज़िंदगी में ये काम किया फ़िल्म के निर्देशक समीर कार्णिक ने. समीर कार्णिक कहते हैं, \"विवेक और ऐश्वर्या पहली बार मिले तो क्यों हो गया न के ही सेट पर. फ़िल्म में उन्होंने बहुत बढ़िया काम किया.\" बतौर निर्देशक समीर की ये पहली फ़िल्म है. आज कल की फ़िल्मों के रुझान को देखते हुए फ़िल्म के संवाद ऐसे हैं जो आज कल की युवा पीढ़ी आम तौर पर इस्तेमाल करती है. इस फ़िल्म में भी परिवार के सदस्यों के बीच बेहद प्यार का माहौल, आपसी प्यार, देर रात तक तारों को ताकना जैसे फ़ॉर्मूले अपनाए गए हैं. मगर इंदु मीरानी कहती हैं कि फ़िल्म की कहानी में तो दम ही नहीं है. उनके अनुसार, \"ऐश्वर्या और विवेक के बीच जो विवाद दिखाया जाता है वो बहुत अजीब सा है. एक पारंपरिक शादी का समर्थक है तो दूसरा प्रेम विवाह का. अब ये विवाद इतना बड़ा नहीं है कि दोनों के बीच संबंध विच्छेद की नौबत आ जाए.\" मीरानी के अनुसार फ़िल्म वास्तविकता से कहीं दूर है. फ़िल्म में कुछ मज़ेदार लम्हे हैं लेकिन मध्यांतर के पहले फ़िल्म कहीं-कहीं खिंच जाती है. शायद इसी का नतीजा दिख रहा है बॉक्स ऑफ़िस पर और दर्शक कह रहे हैं 'बस, हो गया न!'.\n\nSummary:", "target": "बॉलीवुड की सबसे लोकप्रिय मानी जाने वाली अभिनेत्री ऐश्वर्या राय जब उनकी 'असल ज़िंदगी के हीरो' के तौर पर लोकप्रिय हो रहे विवेक ओबरॉय के साथ पर्दे पर दिखीं तो सबका यही कहना था, 'क्यों, हो गया न!'", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमगर दर्शकों को फ़िल्म से जो अपेक्षाएँ थीं वो जैसे पूरी नहीं हुईं और नतीजा बॉक्स ऑफ़िस पर 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शुक्रिया अदा करती हैं. topcat2 बीबीसी से बातचीत में वह कहती हैं, \"मुझे नहीं पता कि लोग मेरा नाम अर्जुन और वरुण के साथ क्यों जोड़ देते हैं. ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्र है कि मेरा नाम रणदीप हुडा के साथ नहीं जुड़ा. वैसे अर्जुन और वरुण दोनों ही मेरे बहुत क़रीबी दोस्त हैं.\" शुक्रवार को आलिया भट्ट और वरुण धवन की फ़िल्म 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' रिलीज़ हुई, जिसे बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छी शुरुआत मिली. 'अपने बलबूते काम किया' बॉलीवुड में फ़िल्मी परिवारों से लगातार नए कलाकार आ रहे हैं. क्या ऐसे में बाहरी लोगों के लिए फ़िल्मों में एंट्री करना मुश्किल हो गया है? topcat2 करण जौहर के चैट शो में आलिया के दिए जवाबों का सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ा था. आलिया का जवाब था, \"मैं ऐसा नहीं मानती. सही समय और सही टैलेंट ज़रूरी हैं. हमें फ़िल्मी लोगों का साथ ज़रूर मिल जाता है लेकिन बाक़ी सब तो हमें ही करना पड़ता है. मुझे अपने पिता महेश भट्ट का टैग लेकर घूमना पसंद नहीं.\" मज़ाक का जवाब बीते दिनों topcat2 सोशल मीडिया पर लोगों के मज़ाक का शिकार बनीं. वजह थी उनका 'सामान्य ज्ञान'. दरअसल करण जौहर ने अपने चैट शो 'कॉफ़ी विद करण' में आलिया से कुछ सवाल पूछे थे और सभी सवालों का आलिया ने ग़लत जवाब दिया था. topcat2 उड़ने पर आलिया क्या नाराज़ होतीं हैं. इस पर वह कहती हैं, \"मैं इन जोक्स पर क्यों ग़ुस्सा करूं. मैंने कोई बम थोड़े न फोड़ा है. कम से कम इस बहाने लोगों को याद तो रहती हूं.\" (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आलिया भट्ट का नाम पहले वरुण धवन और फिर अर्जुन कपूर के साथ जुड़ा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफिर उन्होंने रणदीप हुडा के साथ फ़िल्म 'हाईवे' में काम किया लेकिन रणदीप से उनका नाम नहीं जुड़ा और इसके लिए वह भगवान का शुक्रिया अदा करती हैं. topcat2 बीबीसी से बातचीत में वह कहती हैं, \"मुझे नहीं पता कि लोग मेरा नाम अर्जुन और वरुण के साथ क्यों जोड़ देते हैं. ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्र है कि मेरा नाम रणदीप हुडा के साथ नहीं जुड़ा. वैसे अर्जुन और वरुण दोनों ही मेरे बहुत क़रीबी दोस्त हैं.\" शुक्रवार को आलिया भट्ट और वरुण धवन की फ़िल्म 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' रिलीज़ हुई, जिसे बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छी शुरुआत मिली. 'अपने बलबूते काम किया' बॉलीवुड में फ़िल्मी परिवारों से लगातार नए कलाकार आ रहे हैं. क्या ऐसे में बाहरी लोगों के लिए फ़िल्मों में एंट्री करना मुश्किल हो गया है? topcat2 करण जौहर के चैट शो में आलिया के दिए जवाबों का सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ा था. आलिया का जवाब था, \"मैं ऐसा नहीं मानती. सही समय और सही टैलेंट ज़रूरी हैं. हमें फ़िल्मी लोगों का साथ ज़रूर मिल जाता है लेकिन बाक़ी सब तो हमें ही करना पड़ता है. मुझे अपने पिता महेश भट्ट का टैग लेकर घूमना पसंद नहीं.\" मज़ाक का जवाब बीते दिनों topcat2 सोशल मीडिया पर लोगों के मज़ाक का शिकार बनीं. वजह थी उनका 'सामान्य ज्ञान'. दरअसल करण जौहर ने अपने चैट शो 'कॉफ़ी विद करण' में आलिया से कुछ सवाल पूछे थे और सभी सवालों का आलिया ने ग़लत जवाब दिया था. topcat2 उड़ने पर आलिया क्या नाराज़ होतीं हैं. इस पर वह कहती हैं, \"मैं इन जोक्स पर क्यों ग़ुस्सा करूं. मैंने कोई बम थोड़े न फोड़ा है. कम से कम इस बहाने लोगों को याद तो रहती हूं.\" (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": 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चुनाव आयोग को शासकीय बल का सहारा लेना पड़ा है.\" प्रोफ़ेसर कुकला ने यह भी कहा कि इसके साथ समाज में 'कलम माफ़िया' का भी उदय हो चुका है, जो चिंता का विषय है. दैनिक हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक हिमांशु घिल्डियाल ने इस मौक़े पर कहा कि आज चुनाव में जो मूल मुद्दे हैं, वे अदृश्य हो गए हैं और राजनीतिक नेता चुनाव जीतने के लिए ऐसी मनभावन बातें कर रहे हैं जो उनके कार्यक्षेत्र की लक्ष्मण रेखा से बहुत दूर हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि आगरा ही उदाहरण लिया जाए तो चुनावों के दौरान न तो पर्यटन और न ही यमुना प्रदूषण की बात हो रही है. इसके बजाए उम्मीदवार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाए जाने की घोषणा कर रहे हैं जो उनके कार्यक्षेत्र के बाहर है. मीडिया का काम जनसंचार और पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर गिरिजा शंकर शर्मा ने कहा कि मीडिया का काम जनता को चुनाव के समय जागरूक करने और उनमें नई चेतना जगाने का होना चाहिए. उनका कहना था कि यदि जनता शिक्षित नहीं होगी तो उन्हें इसका मूल्य ग़रीबी आदि के रूप में चुकाना होगा. बीबीसी हिंदी डॉटकॉम की ओर से पत्रकारिता के क्षेत्र में नई तकनीक के उपयोग के बारे में जानकारी दी गई और विद्यार्थियों को बीबीसी हिंदी डॉटकॉम पर उपलब्ध सामग्री के बारे में बताया गया. कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने उत्तर प्रदेश चुनाव पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के फ़ोरम पर अपने विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम का संचालन संस्थान के सदस्य और ताज प्रेस क्लब के महासचिव उपेंद्र शर्मा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अजय शर्मा ने किया.\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में असली मुद्दों पर जातिवादी राजनीति के हावी रहने के सवाल पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की परिचर्चा में गंभीर विचार-विमर्श हुआ.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआगरा विश्वविद्यालय के जनसंचार और पत्रकारिता विभाग और बीबीसी हिंदी डॉटकॉम ने गुरुवार को विश्वविद्यालय परिसर में इस परिचर्चा का आयोजन किया जिसमें आगरा विश्वविद्यालय से जुड़े बुद्धिजीवियों, पत्रकारिता विभाग के छात्रों और कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने हिस्सा लिया. परिचर्चा का विषय था - 'उत्तर प्रदेश चुनाव में जातिगत समीकरण असली मुद्दों पर हावी क्यों नज़र आ रहे हैं.' डॉक्टर बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर एएस कुकला ने 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उन्होंने कहा, \"ईरान का मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भेजने का मुद्दा एजेंडे पर है.\" उन्होंने कहा कि इस बारे में बैठक में फ़ैसला होगा लेकिन ये स्पष्ट है कि हम किस ओर सोच रहे हैं. जैक स्ट्रा का कहना था, \"ये मुद्दा शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाना चाहिए लेकिन इसके लिए ईरान पर कूटनीतिक और दूसरी तरह के दबाव डालने होंगे.\" ब्रितानी विदेश मंत्री ने कहा कि वे फ़्रांस और जर्मनी के विदेश मंत्रियों और यूरोपीय संघ की विदेश नीति के प्रमुख हाविए सोलाना से गुरुवार को मिलेंगे. कड़ी प्रतिक्रिया संवेदनशील परमाणु केंद्र पर लगी सील तोड़ने के ईरान के फ़ैसले पर अमरीका ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. अमरीका ने कहा है कि अब इस मामले को सुरक्षा परिषद में ले जाने की बजाय अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास कोई चारा नहीं है, जहाँ ईरान पर संभावित प्रतिबंध पर विचार हो सकता है. रूस ने भी सील तोड़ने के ईरान के फ़ैसले पर चिंता जताई है. वियना में संयुक्त राष्ट्र की परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए के प्रमुख मोहम्मद अल बरादेई ने कहा है कि ईरान ने नतांज़ परमाणु केंद्र पर छोटे स्तर का संवर्धन कार्य शुरू करने की योजना बनाई थी. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ईरान के क़दम के बाद आईएईए के बोर्ड की आपात बैठक हो सकती है. बोर्ड इस बात पर भी विचार करेगा कि ईरान का मामला सुरक्षा परिषद में ले जाया जाए या नहीं. ईरान हमेशा से ये कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण कार्यों के लिए है. ईरान ने यूरोपीय संघ के साथ बातचीत के दौरान ख़ुद से ही अपना परमाणु शोध कार्य रोक दिया था. यूरोपीय संघ के देशों ने ईरान से गारंटी मांगी थी कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल हथियार विकसित करने के लिए नहीं करेगा. सील तोड़ी इससे पहले तमाम अंतरराष्ट्रीय चेतावनी की अनदेखी करते हुई ईरान ने घोषणा की कि वह अपने नतांज़ परमाणु केंद्र पर संयुक्त राष्ट्र की लगी सील को तोड़ रहा है. जब सील तोड़ी जा रही थी, उस समय अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के अधिकारी वहाँ मौजूद थे. लेकिन आईएईए के प्रमुख मोहम्मद अल बरादेई ने ईरान से परमाणु केंद्र पर काम शुरू न करने की अपील की. हालाँकि ईरान ने अपना पुराना पक्ष दोहराते हुए कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण कार्यों के लिए है. ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन के प्रमुख मोहम्मद सईदी ने इससे 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रहा है ”. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे मुस्लिम देश भी जनसंख्या नियंत्रण के लिए धार्मिक सहायता ले रहे हैं तो फिर यहाँ ऐसा क्यों नहीं हो सकता. पाकिस्तान ने हाल ही में जन्म नियंत्रण के उपायों के लिए इस्लामिक गुरुओं की सहायता ली लेकिन इससे पहले धार्मिक नेताओं के बीच इसके लिए एक राय बनाई थी.\n\nSummary:", "target": "मध्य प्रदेश सरकार राज्य के मुसलमानों के बीच ऐसी पुस्तक बंटवाएगी जिसमें जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने की हिदायत क़ुरान के ज़रिए दी गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n“जनगणना, इस्लाम और परिवार नियोजन” नाम की इस पुस्तक में कुरान की कुछ आयतों को शामिल किया गया है और उनकी व्याख्या के साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण पर इस्लामिक बुद्धिजीवियों की राय भी शामिल की गई है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अजय बिश्नोई ने बीबीसी को बताया कि शुरुआत में इस किताब की दस हज़ार प्रतियाँ खरीदी जाएँगी. इन प्रतियों को उन मुस्लिमों में बँटवाया जाएगा जो जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को नहीं अपना रहे हैं. बिश्नोई ने कहा कि इस किताब में बताया गया है कि इस्लाम का जो 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हालांकि उन्होंने ये भी साफ़ किया कि ये अध्ययन पर आधारित अनुमान है. अलग-अलग परिभाषा हाल ही में पोप ने कहा था कि दो प्रतिशत कैथोलिक पादरी बाल यौन शोषण करते हैं. इस तरह के अनुमानों में दिक्कत ये है कि बाल यौन शोषण यानी ''पीडोफ़ाइल'' शब्द के अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मायने होते हैं. पीडोफ़ाइल शब्द की क्लिनिकल या डॉक्टरी परिभाषा पर सहमति है. माइकल सेटो और उनके सहयोगी इस बात पर सहमत हैं कि पीडोफ़ाइल व्यक्ति वो है जिसकी 11 या 12 साल से कम उम्र के बच्चों में यौन दिलचस्पी होती है. इस परिभाषा के आधार पर आम आबादी में ऐसे लोगों की तादाद कुछ भी हो, लेकिन राजनेता, कलाकार या पादरी जैसे किसी बड़े समूह में कुछ बाल यौन शोषक का होना तय है. तो दो बातें पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती हैं. पहली ये कि चाहे कैथोलिक पादरी हों या आम आबादी, बाल यौन शोषण करने वालों की तादाद के आंकड़े पूरी तरह सही नहीं हैं. और दूसरा ये कि दोनों ही वर्गों में ये आंकड़े लगभग समान हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "कैथोलिक ईसाइयों के धर्मगुरु पोप ने हाल ही में कहा था कि लगभग दो प्रतिशत कैथोलिक पादरी पीडोफ़ाइल यानी बाल यौन शोषक हैं. लेकिन अगर पूरे समाज की बात करें, तो ये संख्या औसत से ज़्यादा है या कम?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस सवाल का जवाब ढूंढना मुश्किल है क्योंकि बाल यौन शोषण करने वालों की पहचान करना आसान नहीं है. टोरंटो विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिक और यौन व्यवहार विशेषज्ञ डॉक्टर जेम्स कैंटर कहते हैं, \"बाल यौन शोषण बहुत रहस्यमयी क्षेत्र है और बहुत कम लोग ही इस बात को कबूल करेंगे, इसलिए एक विश्वसनीय अनुमान नहीं लगाया जा सकता.\" डॉक्टर माइकल सेटो ने इस तरह अनुमान लगाने की कोशिश की. साल 2008 में डॉक्टर सेटो ने एक किताब लिखी थी जिसमें उन्होंने आम आबादी में बाल यौन शोषण करने वालों की तादाद पांच प्रतिशत बताई थी. ये आंकड़ा जर्मनी, नॉर्वे और फ़िनलैंड में सर्वेक्षणों पर आधारित था. इनमें पुरुषों से पूछा गया था कि क्या कभी उन्हें बच्चों के बारे में कामुक विचार आए हैं या फिर उन्होंने बच्चों के साथ यौन संबंध बनाए हैं. लेकिन डॉक्टर सेटो का कहना है कि पांच प्रतिशत का आंकड़ा अधिकतम था और अध्ययनों का दायरा सीमित था. अब अध्ययन के बेहतर तरीकों और ज़्यादा जानकारी उपलब्ध होने के बाद डॉक्टर सेटो ने आम आबादी में बाल यौन शोषण करने वालों की मौजूदगी का आंकड़ा घटा कर एक प्रतिशत कर दिया है. हालांकि उन्होंने ये भी साफ़ किया कि ये अध्ययन पर आधारित अनुमान है. अलग-अलग परिभाषा हाल ही में पोप ने कहा था कि दो प्रतिशत कैथोलिक पादरी बाल यौन शोषण करते हैं. इस तरह के अनुमानों में दिक्कत ये है कि बाल यौन शोषण यानी ''पीडोफ़ाइल'' शब्द के अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मायने होते हैं. पीडोफ़ाइल शब्द की क्लिनिकल या डॉक्टरी परिभाषा पर सहमति है. माइकल सेटो और उनके सहयोगी इस बात पर सहमत हैं कि पीडोफ़ाइल व्यक्ति वो है जिसकी 11 या 12 साल से कम उम्र के बच्चों में यौन दिलचस्पी होती है. इस परिभाषा के आधार पर आम आबादी में ऐसे लोगों की तादाद कुछ भी हो, लेकिन राजनेता, कलाकार या पादरी जैसे किसी बड़े समूह में कुछ बाल यौन शोषक का होना तय है. तो दो बातें पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती हैं. पहली ये कि चाहे कैथोलिक पादरी हों या आम आबादी, बाल यौन शोषण करने वालों की तादाद के आंकड़े पूरी तरह सही नहीं हैं. और दूसरा ये कि दोनों ही वर्गों में ये आंकड़े लगभग समान हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "जीतू राय ने शनिवार को एशियाई खेलों में 50 मीटर पिस्टल स्पर्धा में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस प्रतियोगिता में वियतनाम के न्यूयेन होंग फुंग दूसरे नंबर पर रहे. हालांकि फुंग ने राय को कड़ी टक्कर दी और एक समय दोनों के स्कोर के बीच महज 0.2 का अंतर था. एक समय जीतू और वियतनाम के न्यूयेन होंग फुंग के बीच स्कोर बराबर था लेकिन अंतिम दो प्रयासों में जीतू राय ने होंग के 5.8 स्कोर के मुकाबले 8.4 स्कोर बनाकर स्वर्ण पदक पर कब्ज़ा कर लिया. आईएसएसएफ की विश्व रैंकिंग के 10 मीटर एयर पिस्टल में जीतू नंबर एक और 50 मीटर में वो नंबर पांच पर हैं. श्वेता ने एशियाई खेलों में खोला भारत का खाता इससे पहले निशानेबाज़ श्वेता चौधरी ने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में कांस्य पदक जीता जबकि स्वर्ण पदक चीन की चांग ने जीता और रजत पदक कोरिया की जुंग की झोली में गया. एशियाई खेल: भारत के सामने मुश्किल चुनौती भारत की स्टार शूटर हिना सिंधू फाइनल के क्वॉलिफ़ाई नहीं कर पाईं. उनसे इन खेलों में पदक की उम्मीद थी. दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में 17वें एशियाई खेल चल रहे हैं. शनिवार को भोरोत्तोलन, बैडमिंटन, बास्केटबॉल, निशानेबाज़ी और जूडो जैसे खेलों में भारत के खिलाड़ी अपनी चुनौती पेश करेंगे. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "हॉन्ग कॉन्ग में विवादित प्रत्यर्पण विधेयक का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी सोमवार को संसद भवन में जा घुसे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंसद के अंदर घुसे प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ भी की है. पुलिस को हालात पर क़ाबू पाने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा. कड़ी मेहनत के बाद पुलिस इन प्रदर्शनकारियों को संसद भवन और इसके आसपास के इलाके से दूर करने में सफल रही है. इससे पहले प्रदर्शनकारी संसद भवन के अंदर घुसे और कई घंटों तक वहीं जमे रहे. ये लोग हॉन्ग कॉन्ग को ब्रिटेन से चीन को हस्तांतरित किए जाए की वर्षगांठ पर जुटे थे. आधी रात के बाद पुलिस ने पहले तो प्रदर्नकारियों को चेतावनी दी और फिर इमारत को ख़ाली करवा दिया. हॉन्ग कॉन्ग का संसद भवन कई हफ़्तों से हो रहे हैं प्रदर्शन हॉन्ग कॉन्ग में पहले से ही उस प्रस्तावित विधेयक का विरोध हो रहा है जिसके क़ानून बन जाने पर अभियुक्तों को चीन को प्रत्यर्पित किया जा सकेगा ताकि वहां पर उन पर मुक़दमा चलाया जा सके. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि चीन इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल कर सकता है. चिंता जताई जा रही है कि इस क़ानून के माध्यम से चीन उन लोगों को निशाना बना सकता है जो राजनीतिक रूप से उससे सहमति नहीं रखते. ऐसे में इस बिल के विरोध में पिछले कुछ हफ्तों से लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. हेलमेट और मास्क पहनकर आए थे प्रदर्शनकारी सोमवार को बिगड़े हालात सोमवार को दर्जनों प्रदर्शनकारी संसद भवन में घुस आए. शाम को पुलिस वहां से हट गई तो सैकड़ों की संख्या में और भी प्रदर्शनकारी वहां पहुंच गए. अंदर प्रदर्शनकारियों ने मुख्य सभागार में हॉन्ग कॉन्ग के प्रतीक चिह्न के साथ छेड़खानी की और ब्रितानी औपनिवेशिक झंडा लहराया. कुछ लोगों ने फर्नीचर तोड़ दिया और दीवारों पर नारे लिख दिए. मुश्किल में फंसी हॉन्ग कॉन्ग की नेता कैरी लाम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके संसद भवन में घुसकर \"हिंसक व्यवहार\" करने वालों की आलोचना की है. ब्रितानी औपनिवेशिक झंडा फहराता प्रदर्शनकारी कैसे सुधरे हालात संसद भवन के बाहर प्लास्टिक के हेलमेट लगाए प्रदर्शनकारी छाते लहरा रहे थे. इसी बीच संसद भवन के बाहरी हिस्से में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने उन लोगों को बाहर खींचना शुरू किया जो यहां से जाने के लिए तैयार नहीं थे. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़, डेमोक्रैटिक सांसदों डेट ह्यूई और रॉय क्वॉन्ग ने पुलिस से अपील की कि प्रदर्शनकारियों को यहां से जाने के लिए समय दिया जाए. इसके एक घंटे के अंदर इमारत के आसपास की गलियां खाली हो गईं. मीडिया और पुलिसकर्मियों के अलावा और कोई वहां नहीं बचा. इसके बाद अधिकारियों ने इमारत की तलाशी शुरू की ताकि कोई प्रदर्शनकारी बचा न रह गया हो. अभी तक किसी की गिरफ़्तारी की ख़बर नहीं है. पुलिस ने लाठीचार्ज और पेपर स्प्रे इस्तेमाल करके प्रदर्शनकारियों को काबू करने की कोशिश की क्या कहते हैं प्रदर्शनकारी लोकतंत्र समर्थक एक सांसद ने बीबीसी को बताया कि कुछ युवा प्रदर्शनकारी पूरी रात संसद भवन में रुकना चाह रहे थे. उन्होंने कहा, \"वे आपस में बात कर रहे थे हम लोग पुलिस पर भारी पड़ेंगे. मुझे उनकी यह बात ख़तरनाक लगी.\" \"मैं पत्रकार थी और 30 साल पहले मैंने तियानमेन चौक में हुए ख़ून-ख़राबे की रिपोर्टिंग की थी. ऐसे ही शब्द उस समय चीन की राजधानी में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के थे.\" इस सांसद के सहयोगी फर्नांडो चेयूंग इमारत में घुस आए प्रदर्शनकारियों के साथ ही थे. उन्होंने खुशी जताई कि वे लोग पुलिस से उलझे बिना चुपचाप बाहर निकल आए. फर्नांडो ने कहा, \"अगर उन्होंने प्रतिरोध किया होता तो मुझे डर था कि ख़ून-ख़राबा हो सकता था. मेरे ख्याल से पुलिस इन लोगों को तितर-बितर करने में बल प्रयोग करने से भी नहीं चूकती.\" फ़र्नांडो ने उन प्रदर्शनकारियों की तारीफ़ की जो उन लोगों को खींचकर साथ ले गए जो जाना नहीं चाह रहे थे. \"वे लोग वापस आए और बाक़ियों को बाहर खींचा. ख़ुशी की बात है कि ऐसा हुआ.\" हॉन्ग कॉन्ग में सरकारी इमारतों के पास प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस इस्तेमाल करती पुलिस क्यों हो रहा है विरोध? सोमवार को हॉन्ग कॉन्ग को ब्रिटेन से चीन को सौंपे जाने की 22वीं वर्षगांठ थी. इस मौक़े पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का आह्वान किया गया था. हॉन्ग कॉन्ग को चीन की \"एक देश दो प्रणालियां' सिद्धांत के तहत कुछ स्वायत्ता मिली हुई है. हर साल हॉन्ग कॉन्ग के चीन को हस्तांतरण की वर्षगांठ पर लोकतंत्र के समर्थन में कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है मगर इस साल मामला थोड़ा अलग है. पुलिस और प्रदर्शनकारियों को चोटें आने की ख़बरें हैं इस बार कुछ हफ्ते पहले से ही हॉन्ग कॉन्ग में लाखों लोग सड़कों पर उतरकर प्रस्तावित प्रत्यर्पण विधेयक का विरोध कर रहे हैं. प्रदशनकारियों के दबाव के कारण सरकार को खेद प्रकट करते हुए इस प्रस्तावित क़ानून को टालना पड़ा है. हालांकि बहुत से प्रदर्शनकारी कहते हैं कि वे तब तक नहीं हटेंगे, जब तक कि इस विधेयक को पूरी तरह खारिज नहीं कर दिया जाता. 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अधिकारियों से यह अपील की गई कि वो संयुक्त राष्ट्र के विशेष राजदूत इब्राहिम गमबारी को बर्मा में प्रवेश करने दें. अमरीका और यूरोपीय संघ चाहते थे कि सुरक्षा परिषद बर्मा पर प्रतिबंध लगाए लेकिन चीन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया. संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत ने कहा कि बर्मा पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का हल नहीं निकलेगा. मामला हाल ही में बर्मा में सैन्य सरकार द्वारा सरकार विरोधी प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की गई थी जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद बर्मा में ख़राब होते राजनीतिक हालातों पर चर्चा हुई. बर्मा की सैन्य सरकार के अनुसार प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिशों के दौरान एक भिक्षु की मौत हुई थी. जबकि अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार देश के मुख्य शहर रंगून में दस हज़ार से अधिक लोगों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया और सैन्य कार्रवाई में कई लोग घायल हो गए थे. संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत इब्राहिम गंबारी जल्दी ही बर्मा रवाना होगें और वहाँ से वो स्थिति के बारे में संयुक्त राष्ट्र को जानकारी देंगे. सुरक्षा परिषद में हुई इस चर्चा से पहले अमरीका और यूरोपीय संघ के कई देशों ने बर्मा पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बर्मा के ख़िलाफ आर्थिक प्रतिबंधो की पहले ही घोषणा कर दी है. सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक से ठीक पहले अमरीका और यूरोपीय संघ के 27 सदस्यों के बीच हुई बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया था जिसमें संयुक्त राष्ट्र से बर्मा के सैन्य शासकों की निंदा करने और प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी. अमरीका और यूरोपीय संघ के साझा बयान में बर्मा में शांति से प्रदर्शन करने वालों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की निंदा की गई और बर्मा के सैन्य नेताओं को उनके कामों के लिए व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार ठहराया गया था. बयान में बर्मा प्रशासन से हिंसा रोकने और लोकतंत्र समर्थक नेताओं के साथ संवाद कायम करने की बात कही गई थी. इस साझा बयान में सुरक्षा परिषद से भी अपील की गई थी कि वो बर्मा की स्थिति पर जल्द चर्चा करे और प्रतिबंध सहित दूसरे कदमों पर विचार करे. राजनैतिक संकट बर्मा के सुरक्षा बलों ने देश के प्रमुख शहर रंगून में हुए हाल के विशाल प्रदर्शनों पर गोलियाँ चलाईं. सरकारी रेडियो का कहना है कि इस गोलीबारी में एक आदमी मारा गया और तीन अन्य घायल हो गए. लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे बौद्ध भिक्षुओं में से लगभग 100 भिक्षु घायल हुए हैं. सैनिक शासकों के ख़िलाफ़ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद से ऐसा पहली बार हुआ था. बर्मा में लोकतंत्र समर्थकों के ख़िलाफ़ सैन्य सरकार की इस कार्रवाई पर वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है. दरअसल विश्लेषकों को डर है कि कहीं 1988 में घटी फिर से न दोहरा दी जाए जिसमें हज़ारों निहत्थे प्रदर्शनकारियों को गोलीबारी में मार डाला गया था. प्रतिबंध लेकिन इस बात के साफ़ संकेत थे कि संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बर्मा सरकार पर किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाने जाने की स्थिति में रूस और चीन बाधा डालेंगे. इस साल की संयुक्त राष्ट्र आम सभा की बैठक में बर्मा में गहराते राजनैतिक संकट का मुद्दा छाया हुआ है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान-की-मून ने अपने भाषण में भी प्रमुखता के साथ बर्मा के मुद्दे को उठाया था. अमरीका और अन्य यूरोपीय देश अपनी तरफ से बर्मा पर पहले ही कई तरह के प्रतिबंध लगा चुके हैं. बर्मा के लिए भारत और रूस का बहुत महत्व है. इन दोनों ही देशों का बर्मा से व्यापारिक संबंध है. रूस को बर्मा को एक परमाणु अंनुसंधान रिएक्टर बेचने की योजना भी बना रहा है. बर्मा के लिए उसके पड़ोसी देश चीन का सबसे अधिक महत्व है. बर्मा के ऊर्जा संसाधनों का चीन एक बड़ा ख़रीदार है. पिछली जनवरी में चीन और रूस ने बर्मा के शासकों के ख़िलाफ़ लगाए गए सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर वीटो किया था.\n\nSummary:", "target": "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने बर्मा की सैनिक सरकार से ख़राब होते राजनैतिक हालातों के बीच संयम रखने को कहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक के बाद बर्मा के सैन्य अधिकारियों से यह अपील की गई कि वो संयुक्त राष्ट्र के विशेष राजदूत इब्राहिम गमबारी को बर्मा में प्रवेश करने दें. अमरीका और यूरोपीय संघ चाहते थे कि सुरक्षा परिषद बर्मा पर प्रतिबंध लगाए लेकिन चीन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया. संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत ने कहा कि बर्मा पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का हल नहीं निकलेगा. मामला हाल ही में बर्मा में सैन्य सरकार द्वारा सरकार विरोधी प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की गई थी जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद बर्मा में ख़राब होते राजनीतिक हालातों पर चर्चा हुई. बर्मा की सैन्य सरकार के अनुसार प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिशों के दौरान एक भिक्षु की मौत हुई थी. जबकि अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार देश के मुख्य शहर रंगून में दस हज़ार से अधिक लोगों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया और सैन्य कार्रवाई में कई लोग घायल हो गए थे. संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत इब्राहिम गंबारी जल्दी ही बर्मा रवाना होगें और वहाँ से वो स्थिति के बारे में संयुक्त राष्ट्र को जानकारी देंगे. सुरक्षा परिषद में हुई इस चर्चा से पहले अमरीका और यूरोपीय संघ के कई देशों ने बर्मा पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बर्मा के ख़िलाफ आर्थिक प्रतिबंधो की पहले ही घोषणा कर दी है. सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक से ठीक पहले अमरीका और यूरोपीय संघ के 27 सदस्यों के बीच हुई बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया था जिसमें संयुक्त राष्ट्र से बर्मा के सैन्य शासकों की निंदा करने और प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी. अमरीका और यूरोपीय संघ के साझा बयान में बर्मा में शांति से प्रदर्शन करने वालों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की निंदा की गई और बर्मा के सैन्य नेताओं को उनके कामों के लिए व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार ठहराया गया था. बयान में बर्मा प्रशासन से हिंसा रोकने और लोकतंत्र समर्थक नेताओं के साथ संवाद कायम करने की बात कही गई थी. इस साझा बयान में सुरक्षा परिषद से भी अपील की गई थी कि वो बर्मा की स्थिति पर जल्द चर्चा करे और प्रतिबंध सहित दूसरे कदमों पर विचार करे. राजनैतिक संकट बर्मा के सुरक्षा बलों ने देश के प्रमुख शहर रंगून में हुए हाल के विशाल प्रदर्शनों पर गोलियाँ चलाईं. सरकारी रेडियो का कहना है कि इस गोलीबारी में एक आदमी मारा गया और तीन अन्य घायल हो गए. लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे बौद्ध भिक्षुओं में से लगभग 100 भिक्षु घायल हुए हैं. सैनिक शासकों के ख़िलाफ़ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद से ऐसा पहली बार हुआ था. बर्मा में लोकतंत्र समर्थकों के ख़िलाफ़ सैन्य सरकार की इस कार्रवाई पर वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है. दरअसल विश्लेषकों को डर है कि कहीं 1988 में घटी फिर से न दोहरा दी जाए जिसमें हज़ारों निहत्थे प्रदर्शनकारियों को गोलीबारी में मार डाला गया था. प्रतिबंध लेकिन इस बात के साफ़ संकेत थे कि संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बर्मा सरकार पर किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाने जाने की स्थिति में रूस और चीन बाधा डालेंगे. इस साल की संयुक्त राष्ट्र आम सभा की बैठक में बर्मा में गहराते राजनैतिक संकट का मुद्दा छाया हुआ है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान-की-मून ने अपने भाषण में भी प्रमुखता के साथ बर्मा के मुद्दे को उठाया था. अमरीका और अन्य यूरोपीय देश अपनी तरफ से बर्मा पर पहले ही कई तरह के प्रतिबंध लगा चुके हैं. बर्मा के लिए भारत और रूस का बहुत महत्व है. इन दोनों ही देशों का बर्मा से व्यापारिक संबंध है. रूस को बर्मा को एक परमाणु अंनुसंधान रिएक्टर बेचने की योजना भी बना रहा है. बर्मा के लिए उसके पड़ोसी देश चीन का सबसे अधिक महत्व है. बर्मा के ऊर्जा संसाधनों का चीन एक बड़ा ख़रीदार है. पिछली जनवरी में चीन और रूस ने बर्मा के शासकों के ख़िलाफ़ लगाए गए सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर वीटो किया था.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": 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देशों के बीच तनातनी होती है, यह सेवा रोक दी जाती है. हाल ही में भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले के बाद इस ट्रेन सेवा को रोका गया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान ने लाहौर से भारत के अटारी के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस ट्रेन को हमेशा के लिए बंद करने की घोषणा की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान के रेल मंत्री शेख़ रशीद अहमद ने कहा है कि उन्होंने समझौता एक्सप्रेस को 'हमेशा के लिए' बंद करने का फ़ैसला किया है. यह क़दम भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद उठाया गया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने भी इस बात की पुष्टि की है. हालांकि, इस संबंध में अभी भारत की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. नाराज़ पाकिस्तान अब तक कई प्रतिक्रियात्मक क़दम उठा चुका है. उसने भारत के साथ द्विपक्षीय कारोबार बंद कर दिया है. इसके साथ ही पाकिस्तान ने अपने यहां से भारतीय उच्चायुक्त को वापस भेजने और भारत से अपने उच्चायुक्त को वापस बुलाने का फ़ैसला किया है. समझौता एक्सप्रेस को रोकने से पहले गुरुवार को ही उसने अपने हवाई क्षेत्र को भारतीय विमानों के लिए बंद कर दिया था. समझौता एक्सप्रेस को लेकर पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख़ रशीद अहमद ने कहा, \"ये नहीं हो सकता कि कश्मीरियों पर ज़ुल्म हो और पाकिस्तान की क़ौम ख़ामोश होकर तमाशा देखती रहे. ऐसे में समझौता एक्सप्रेस को हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया गया है.\" उन्होने कहा, \"जिन लोगों के टिकटों के पैसे हैं, उन्हें नहीं काटा जाएगा. पूरे पैसे लौटा दिए जाएंगे.\" क्या है'समझौता' का इतिहास वाघा से पाकिस्तान के ट्रेन ड्राइवर और गार्ड इसे अटारी तक लाते हैं मगर पाकिस्तान ने उन्हें ट्रेन के साथ भेजने से इनकार कर दिया है. वाघा और अटारी के बीच यह ट्रेन तीन किलोमीटर की दूरी तय करती है. समझौता एक्सप्रेस भारत और पाकिस्तान के बीच सप्ताह में दो दिन चलने वाली रेलगाड़ी है जो विभाजन से पहले से अटारी से लाहौर तक बिछी पटरी पर दौड़ती है. इस ट्रेन को शिमला समझौते के बाद 22 जुलाई 1976 को लाहौर से अमृतसर के बीच शुरू किया गया था. बाद में 1994 में इसे अटारी और लाहौर के बीच चलाया जाने लगा. यह ट्रेन भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा होने वाले तनाव की भेंट चढ़ती रही है. जब भी दोनों देशों के बीच तनातनी होती है, यह सेवा रोक दी जाती है. हाल ही में भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले के बाद इस ट्रेन सेवा को रोका गया था. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान ने एक बार फिर से भारत के अनुरोध को ठुकरा दिया है. भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सऊदी अरब दौरे के लिए पाकिस्तान से उसके हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति मांगी थी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरविवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा, ''आज 27 अक्टूबर है और कश्मीर के लिए यह काला दिन है. हमने कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए भारत के अनुरोध को ख़ारिज कर दिया है.'' क़ुरैशी ने कहा कि इस मामले में पाकिस्तान स्थित भारत के दूतावास को सूचित कर दिया गया है. पिछले दो महीने में ये दूसरी बार है जब पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के लिए अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी. इससे पहले भारत ने 20 सितंबर को पाकिस्तान से पीएम मोदी के जर्मनी दौरे के लिए हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति मांगी थी और तब भी पाकिस्तान ने इनकार कर दिया था. पाकिस्तान के इनकार के बाद सोमवार को पीएम मोदी के एयर इंडिया वन को सऊदी पहुंचने के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा. पीएम मोदी सोमवार को सऊदी पहुंच रहे हैं. उनकी मुलाक़ात सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और किंग सलमान से होगी. मोदी सऊदी अरब पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड की ओर से आयोजित इन्वेस्टमेंट समिट में बोलेंगे. इस निवेश सम्मेलन को दावोस ऑफ द डेजर्ट्स के नाम से भी जाना जाता है. नवाज़ शरीफ़ का प्लेटलेट काउंट 25 हज़ार पहुंचा पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की हालत लगतार बिगड़ती जा रही है. नवाज़ शरीफ़ का ब्लड प्लेटलेट काउंट लगातार गिर रहा है. समाप्त रविवार को शरीफ़ का प्लेटलेट 45 हज़ार से 25 हज़ार पर पहुंच गया. इस हालत को देखते हुए डॉक्टरों को हार्ट की दवाई रोकनी पड़ी है. नवाज़ शरीफ़ के हार्ट की भी हालत ठीक नहीं है. डॉक्टरों का कहना है कि अगर प्लेटलेट 20 हज़ार से नीचे आया तो यह ख़तरनाक हो सकता है. शिव सेना और बीजेपी में तनातनी महाराष्ट्र में शिव सेना और बीजेपी के बीच जारी मतभेद के कारण नई सरकार के गठन की तस्वीर अभी तक साफ़ नहीं हो पाई है. कहा जा रहा है कि बीजेपी प्रमुख और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 30 अक्टूबर को शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मिलने जाएंगे. 30 अक्टूबर को ही महाराष्ट्र में बीजेपी विधायक दल की बैठक है और इस बैठक के बाद शाह की मुलाक़ात उद्धव ठाकरे से होगी. शिव सेना की मांग है कि बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री का पद दोनों पार्टियों के पास ढाई-ढाई साल के लिए होने चाहिए. शिव सेना ने कहा है कि बीजेपी के साथ सरकार 50-50 फ़ॉर्म्युले के आधार पर बनेगी. शिव सेना ने कैबिनेट में भी आधा हिस्सा मांगा है. 288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी के पास 103 विधायक हैं और शिव सेना के पास 56. सरकार गठन के लिए 145 विधायकों का समर्थन चाहिए. दिल्ली की हवा में बढ़ा प्रदूषण दिवाली की रात पटाखों के इस्तेमाल के बाद दिल्ली और नोयडा की हवा में प्रदूषण का स्तर ख़तरनाक रूप से बढ़ गया है. एयर क्वॉलिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च के अनुसार दिल्ली में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 306 और नोयडा में 356 पर पहुंच गया. दूसरी तरफ़ पिछले पाँच सालों में मुंबई की दिवाली सबसे साफ़ रही है. शून्य से 50 तक के एयर क्वॉलिटी इंडेक्स को बढ़िया माना जाता है. 300 के पार को काफ़ी ख़तरनाक माना जाता है. चिली के राष्ट्रपति सेबेस्टिन पिन्येरा ने पूरी कैबिनेट को निलंबित कर दिया है चिली में आपातकाल ख़त्म चिली के राष्ट्रपति सेबेस्टियन पिन्येरा ने आपातकाल समाप्त करने की घोषणा की है. चिली में ग़ैर-बराबरी के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं. ये प्रदर्शन पिछले एक सप्ताह से हो रहे हैं. हालांकि सैंटियागो समेत कुछ शहरों में पहले से ही कर्फ़्यू समाप्त कर दिया गया था. पिन्येरा ने कहा कि वो देश को सामान्य स्थिति में लाना चाहते हैं. मेट्रो किराए में बढ़ोत्तरी के विरोध से शुरू हुआ यह प्रदर्शन देखते ही देखते एक बड़े देशव्यापी प्रदर्शन में बदल गया था. 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(वरिष्ठ पत्रकार अजय उमठ से बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल की बातचीत पर आधारित.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गुजरात में वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस से इस्तीफ़ा देना, पार्टी के लिए एक बड़ा झटका साबित होने वाला है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशंकर सिंह वाघेला एक वरिष्ठ नेता का जाना ऐसे समय हुआ है, जब राज्य चुनावी तैयारी के मोड़ पर आ गया है, जहां इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. वाघेला के इस दांव से गुजरात की सियासत पर क्या असर पड़ेगा और कांग्रेस के लिए कितनी बड़ा नुक़सान. वरिष्ठ पत्रकार अजय उमठ का विश्लेषण; अपनी ओर से पार्टी को मुक्त करता हूं: शंकर सिंह वाघेला नज़रिया: यूं ही नहीं कोई अमित शाह हो जाता है वाघेला की मंशा सिर्फ़ कांग्रेस को तोड़ने की नहीं है बल्कि उनकी नज़र आठ अगस्त को होने वाले राज्यसभा चुनाव पर भी है. वो राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी को हराने की कोशिश करेंगे. संभावना ये है कि या तो वो अपना कोई उम्मीदवार खड़ा करेंगे या भाजपा के उम्मीदवार को समर्थन देंगे. हाल ही में हुए राष्ट्रपति चुनावों में कथित रूप से गुजरात में 11 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी, इनकी संख्या 20 तक जा सकती है. ऐसा इसलिए कि हाल ही में वाघेला के साथ 20 विधायक देखे गए थे. उनके साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भी दो विधायक मौजूद थे. वाघेला ने खुद भी अनौपचारिक रूप से 20-22 विधायकों के समर्थन का दावा किया है. अलग पार्टी बनाएंगे इस घटना से पहले कांग्रेस की ओर से राज्यसभा के लिए अहमद पटेल का नाम चल रहा था, लेकिन अब लगता है कि वो चुनाव नहीं लड़ेंगे. हालांकि शंकर सिंह वाघेला ने पहले कहा था कि वो भाजपा के साथ नहीं जाएंगे, लेकिन कुछ दिन पहले उनकी अमित शाह से मुलाक़ात हुई थी, जिसके बाद अटकलें लगाई जाने लगी थीं. इससे पहले वो राज्य के भाजपा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री विजय भाई रूपानी से भी मुलाक़ात कर चुके हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि वो ध्रुवीकरण के लिए भाजपा का समर्थन कर सकते हैं और ज़्यादा संभावना है कि वो अपनी अलग पार्टी बनाएं. उन्होंने शुक्रवार को अपने 77वें जन्मदिन के मौके पर समर्थकों से 15 अगस्त के बाद अहमदाबाद में एक बड़ी रैली की तैयारी करने को कहा है. यहां हो सकता है कि वो शक्ति प्रदर्शन के साथ अपनी नई पार्टी की घोषणा करें. ऐसी जानकारी मिल रही है कि वो पटेल आंदोलन से उभरे हार्दिक पटेल, दलित आंदोलन से उभरे जिग्नेश मेवाणी, आदिवासी नेता छोटू भाई वसावा और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर को साथ लाने की कोशिश करेंगे. युवा नेताओं का साथ छोटू भाई वसावा का दक्षिण गुजरात में अच्छा-खासा आधार माना जाता है. हार्दिक पटेल का गुरुवार को जन्मदिन था. इस अवसर पर उन्होंने वाघेला को फ़ोन कर आशीर्वाद मांगा और उनको जन्मदिन की अग्रिम बधाई भी दी थी. इससे पहले भी हार्दिक पटेल कह चुके हैं कि अगर वाघेला उनके समुदाय के पक्ष में आते हैं तो वो उनका समर्थन करेंगे. जिग्नेश मेवाणी भी कुछ मौकों पर शंकर सिंह वाघेला के साथ नज़र आए हैं. इसलिए लगता है कि वाघेला इन युवा नेताओं के साथ एक किस्म का गठजोड़ करने की कोशिश में हैं. उधर, एनसीपी ने वाघेला को खुलकर समर्थन देने की बात कही है. अगर ध्रुवीकरण होता है तो इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा फायदे में भाजपा रहेगी. भाजपा ख़ुश! इसकी वजह साफ है, वाघेला सबसे अधिक वोट कांग्रेस पार्टी का काटेंगे. शायद इसीलिए कांग्रेस के किसी भी नेता की ओर से उनके जन्मदिन पर सामान्य शिष्टाचार के तहत बधाई भी नहीं दी गई. बल्कि कांग्रेस ने उन्हें 'गद्दार और धोखेबाज़' तक कहा. इस पूरे मामले में भाजपा सबसे अधिक ख़ुश नज़र आ रही है. भाजपा नेताओं की ओर से वाघेला के जन्मदिन पर कई शुभकामना संदेश दिए गए. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दिल्ली के शाहीन बाग़ में फ़ायरिंग करने वाले युवक को आम आदमी पार्टी से जोड़ने वाले दिल्ली पुलिस के अधिकारी पर चुनाव आयोग ने कार्रवाई करते हुए कहा है कि उन्हें चुनावों से संबंधित कोई काम न सौंपा जाए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक्राइम ब्रांच के डीसीपी राजेश देव ने दावा किया था कि शाहीन बाग़ में गोली चलाने वाला युवक कपिल बैंसला आम आदमी पार्टी से जुड़ा है. बुधवार को चुनाव आयोग ने राजेश देव को चेतावनी नोटिस जारी किया है और इसकी कॉपी उनके सीआर डॉज़ियर में जोड़ दी गई है. चुनाव आयोग ने कहा है कि राजेश देव को दिल्ली चुनावों से संबंधित कोई काम न सौंपा जाए. चुनाव आयोग ने इस संबंध में गुरुवार शाम छह बजे तक अनुपालन रिपोर्ट भी जमा कराने के लिए कहा है. समाप्त डीसीपी राजेश देव ने मंगलवार को एक प्रेसवार्ता में दावा किया था कि कपिल बैंसला ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया है कि वह आम आदमी पार्टी से जुड़ा है. वहीं एक बयान में राजेश देव ने कहा था, \"कपिल ने स्वीकार किया है कि उसने और उसके पिता ने जनवरी-फरवरी 2019 में आम आदमी पार्टी का दामन थामा था.\" चुनाव आयोग ने डीसीपी को नोटिस दिया है चुनाव आयोग ने अपने नोटिस में कहा है कि डीसीपी देव के एक राजनीतिक पार्टी के बारे में, ऐसे समय बयान देने से जब जांच चल ही रही हो, चुनावों पर नकारात्मक असर हुआ है. चुनाव आयोग ने कहा है कि डीसीपी ने जो किया है उसकी कोई ज़रूरत नहीं थी और इसका स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने पर भी असर होगा. कपिल बैंसला को आम आदमी पार्टी से जोड़े जाने के बाद दिल्ली में राजनीति तेज़ हो गई थी. विपक्षी दल बीजेपी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर दिल्ली में अराजकता फैलाने के आरोप लगाए थे. वहीं जब केजरीवाल से पत्रकारों ने इस बारे में सवाल किया थो उन्होंने कहा था कि कपिल बैंसला को सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाए और अगर ये साबित होता है कि वो किसी भी तरह आम आदमी पार्टी से जुड़ा है तो उसे दोगुनी सज़ा दी जाए. केजरीवाल ने कहा था कि बीजेपी उकसावे की राजनीति कर रही है. कपिल बैंसला नाम के इस युवक ने शनिवार को दिल्ली के शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शन में पहुंचकर गोली चलाई थी. इस दौरान उसने कहा था कि भारत में सिर्फ़ हिंदुओं की ही चलेगी. कपिल बैंसला को वहीं से दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. उससे एक देसी पिस्टल भी बरामद की गई थी. दिल्ली का शाहीन बाग़ विधानसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा बन गया है और केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी का चुनाव अभियान इसी पर केंद्रित है. बीजेपी के नेता मंच से देश के गद्दारों को गोली मारने का आह्वान कर चुके हैं. इस घटना से पहले जामिया यूनिवर्सिटी के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर भी एक नाबालिग युवक ने देसी कट्टे से गोली चलाई थी. इस घटना में एक छात्र घायल हुआ था. हमलावर को बाल सुधार गृह भेज दिया गया है. 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की संभावना है. पचास पन्नों के इस आकलन में अमरीका की विभिन्न ख़ुफ़िया एजेंसियों में कहा गया है कि अगले साल इराक़ की अस्थिरता ख़तरे में रहेगी और सबसे ख़राब हालात गृह युद्ध की तरफ़ भी जा सकते हैं. चूँकि राष्ट्रपति बुश ख़ुद भी कह चुके हैं कि आने वाले वक़्त में हालात मुश्किल हो सकते हैं, ऐसे में इन ताज़ा ख़ुफ़िया सूचनाओं से बुश के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जॉन कैरी को मसाला मिल सकता है. ऐसे में बहुत से विश्लेषक यह भी कहते हैं कि इराक़ में ऐसे ख़राब हालात में आगामी जनवरी में चुनाव कराना क्या सही फ़ैसला होगा.\n\nSummary:", "target": "अमरीकी अधिकारियों ने कहा है कि नई ख़ुफ़िया सूचनाओं में इराक़ की बहुत निराशाजनक तस्वीर उभर रही है और आशंका व्यक्त की गई है कि देश में गृहयुद्ध भी शुरू हो सकता है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराष्ट्रपति जॉर्ज बुश के लिए तैयार किए गए इस आकलन को सबसे पहले न्यूयॉर्क अख़बार में प्रकाशित किया गया है. वाशिंगटन में बीबीसी संवाददाता निक चाइल्ड्स का कहना है कि बुश प्रशासन इन ख़ुफ़िया सूचनाओं के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ कहने से बच रहा 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इको सिस्टम में ब्लाइंट कैट फिश का पाया जाना लगभग दुर्लभ ही है क्योंकि यह भूमिगत प्रजाति का जीव है जो गहरे कुंए में पाया जाता है. केरल अपने दलदली ज़मीन के लिए ख़ासा मशहूर है. वैज्ञानिकों के मुताबिक भारत के दक्षिण पश्चिम समुद्रीतट का दलदलीय इलाका और उसके चलते यहां की पर्यावरणीय अनुकूलता भूमिगत जीवों की मौजूदगी के लिए आदर्श स्थिति है. बिजॉय नंदन ने कहा, ''ब्लाइंड कैट फ़िश की रिकॉर्डिंग से काफी दिलचस्प विवरण मिल सकता है जो मछलियों के वर्गीकरण के अलावा इन जीवों के विकास के बारे में जानकारी देगा. दूसरे देशों में पायी जाने वाली इन मछलियों से इसका क्या संबंध हो सकता है, यह भी पता चल पाएगा.'' अंधी मछली ब्लाइंड कैट फिश की जीन के बारे में अभी जानकारियां जुटाई जा रही हैं जीव विज्ञानी कहते है कि जब कुएं या सुरंग की खुदाई होती है तो ये प्रजाति उनके गहरे छेदों में जगह बना लेती है. वे बताते है कि गहरे समुद्री कुएं, गर्म पानी के झरने इनके विकास की प्रकिया पर जानकारी देने में सहायता करते हैं. इस नई प्रजाति ब्लाइंड कैट फिश का नाम पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के नाम पर होरेगलेनिस अब्दुलकलामी रखा गया है. इसका ये नाम उनके विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान और युवाओं को शोध और विज्ञान को करियर के तौर पर चुनाव करने के लिए प्रोत्साहित करने लिए दिया गया है. इस मछली का एक अलग चरित्र ये है कि इसका रंग खून की तरह लाल है और इसकी आंखे नहीं हैं. ये प्रजाति मिट्टी में मिलने वाले जैविक पदार्थ पर जीवनयापन करती है. साथ ही ये न केवल संरक्षक होती है बल्कि पर्यावरण में भी महत्वपूर्ण योगदान करती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस नई प्रजाति, ब्लाइंड कैटफिश के जीन के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है लेकिन इस बारे में काम हो रहा है ताकि इसके विकास के बारे में जाना जा सके.\n\nSummary:", "target": "दक्षिण भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नई प्रजाति के जीव का पता लगाया है. इस जीव को ब्लाइंड कैट फिश का नाम दिया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये मछली की नई प्रजाति है जो खून सी लाल रंग की है ब्लाइंड कैट फिश दलदली ज़मीन पर पायी जाने वाली एक मछली है. दक्षिण भारतीय राज्य केरल के थ्रिसूर जिले के इरिनजलाकूडा इलाके के एक गहरे कुंए में इसका पता चला है. इस जीव का पता लगाने वाले 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कैट फ़िश की रिकॉर्डिंग से काफी दिलचस्प विवरण मिल सकता है जो मछलियों के वर्गीकरण के अलावा इन जीवों के विकास के बारे में जानकारी देगा. दूसरे देशों में पायी जाने वाली इन मछलियों से इसका क्या संबंध हो सकता है, यह भी पता चल पाएगा.'' अंधी मछली ब्लाइंड कैट फिश की जीन के बारे में अभी जानकारियां जुटाई जा रही हैं जीव विज्ञानी कहते है कि जब कुएं या सुरंग की खुदाई होती है तो ये प्रजाति उनके गहरे छेदों में जगह बना लेती है. वे बताते है कि गहरे समुद्री कुएं, गर्म पानी के झरने इनके विकास की प्रकिया पर जानकारी देने में सहायता करते हैं. इस नई प्रजाति ब्लाइंड कैट फिश का नाम पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के नाम पर होरेगलेनिस अब्दुलकलामी रखा गया है. इसका ये नाम उनके विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान और युवाओं को शोध और विज्ञान को करियर के तौर पर चुनाव करने के लिए प्रोत्साहित करने लिए दिया गया है. इस मछली का एक अलग चरित्र ये है कि इसका रंग खून की तरह लाल है और इसकी आंखे नहीं हैं. ये प्रजाति मिट्टी में मिलने वाले जैविक पदार्थ पर जीवनयापन करती है. साथ ही ये न केवल संरक्षक होती है बल्कि पर्यावरण में भी 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कोर्ट में 80 मिनट की सुनवाई में सभी पक्षों के वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें दीं. ग़ैर-बीजेपी गठबंधन की ओर से दलील देते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने 48 एनसीपी विधायकों के समर्थन की चिट्ठी दिखाते हुए कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि उनके पास 54 विधायकों का समर्थन है और हमारे पास भी 48 विधायकों का. उन्होंने कहा, ''क्या सुप्रीम कोर्ट इसकी अनदेखी कर सकता है. जब दोनों ही पक्ष बहुमत साबित करने के लिए तैयार हैं तो देर किस बात की है.'' समाप्त शनिवार सुबह अचानक से पता चला कि देवेंद्र फडणवीस को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री पद की. शिव सेना की ओर से दलील देते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि सुबह 5.17 पर राष्ट्रपति शासन हटाने की क्या जल्दी थी? सिब्बल ने कहा, ''ऐसी कौन सी आपातकाल की स्थिति आ गई थी कि देवेंद्र फडणवीस को सुबह आठ बजे शपथ दिलवाई गई. जब ये बहुमत का दावा कर रहे हैं तो इसे साबित करने से क्यों बच रहे हैं.'' राज्यपाल के सचिवालय की ओर से पैरवी करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 22 नवंबर को अजित पवार ने चिट्ठी लिखा समर्थन देने की घोषणा की थी. तुषार मेहता ने अजित पवार के समर्थन की चिट्ठी को भी कोर्ट के सामने पेश किया. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से पैरवी करते हुए मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि एनसीपी के 54 विधायक अजित पवार और फडणवीस के साथ हैं. उन्होंने देवेंद्र फडणवीस की ओर से कहा, \"एक पवार उनके साथ हैं, एक पवार हमारे साथ हैं. यह एक पारिवारिक झगड़ा हो सकता है. हम नहीं बल्कि वो हॉर्स ट्रेडिंग कर रहे हैं. हम 170 विधायकों के समर्थन के साथ राज्यपाल के पास गए और उन्होंने हमारे दावे को स्वीकार किया. लिहाज़ा राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और मैंने शपथ ली.\" मुकुल रोहतगी ने कहा कि राज्यपाल की आलोचना की ज़रूरत नहीं थी और बहुमत परीक्षण तो होना ही है. इस पर जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा है कि अभी असल सवाल ये है कि मुख्यमंत्री के पास बहुमत है या नहीं और इसके लिए फ्लोर टेस्ट होना चाहिए. इस पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि फ्लोर टेस्ट होना ही है लेकिन वो चार दिन में होगा या दस दिन में या पांच दिन में, क्या कोई कोर्ट इस बारे में फैसला ले सकती है? मुकुल रोहतगी ने देवेंद्र फडणवीस की ओऱ से कहा कि वे शपथ पत्र दे सकते हैं कि राज्यपाल और बीजेपी ने क़ानून-सम्मत तरीक़े से काम किया है. किसी ने नहीं कहा कि समर्थन की चिट्ठी फ़र्ज़ी है. मुकुल रोहतगी ने कहा कि हम इस अर्ज़ी पर शपथ पत्र दाख़िल करेंगे और अभी अंतरिम आदेश की ज़रूरत नहीं है. राज्यपाल की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पैरवी की और जवाब देने के लिए दो-तीन दिनों का वक़्त मांगा. उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने अपने अधिकार के तहत सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का मौक़ा दिया था. तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा है कि राज्यपाल को सौंपी गई चिट्ठी में अजित पवार ने ख़ुद को एनसीपी के विधायक दल का नेता बताया है और 54 विधायकों के समर्थन के साथ देवेंद्र फडणवीस को समर्थन देने की बात कही है. इस चिट्ठी के साथ एनसीपी के 54 विधायकों के हस्ताक्षर हैं. ये चिट्ठी मराठी में लिखी है और सुप्रीम कोर्ट ने इसका अनुवाद मांगा है. तुषार मेहता ने राज्यपाल की ओर से देवेंद्र फडणवीस को सरकार बनाने का न्योता देने की चिट्ठी भी शीर्ष अदालत में पेश की है. इन दोनों चिट्ठियों की मांग सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में की थी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को विधानसभा में कब बहुमत साबित करना होगा इस पर फ़ैसला मंगलवार को आएगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है. इस तरह से बीजेपी को महाराष्ट्र में बहुमत साबित करने के लिए एक और दिन का वक़्त मिल गया है. उधर एनसीपी, कांग्रेस और शिव सेना ने 162 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी राज्यपाल को सौंपने का दावा किया है. एनसीपी नेता जयंत पाटिल ने कहा है कि बीजेपी को समर्थन देने वाले अजित पवार को मना लिया जाएगा. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में 80 मिनट की सुनवाई में सभी पक्षों के वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें दीं. ग़ैर-बीजेपी गठबंधन की ओर से दलील देते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने 48 एनसीपी विधायकों के समर्थन की चिट्ठी दिखाते हुए कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि उनके पास 54 विधायकों का समर्थन है और हमारे पास भी 48 विधायकों का. उन्होंने कहा, ''क्या सुप्रीम कोर्ट इसकी अनदेखी कर सकता है. जब दोनों ही पक्ष बहुमत साबित करने के लिए तैयार हैं तो देर किस बात की है.'' समाप्त शनिवार सुबह अचानक से पता चला कि देवेंद्र फडणवीस को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री पद की. शिव सेना की ओर से दलील देते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि सुबह 5.17 पर राष्ट्रपति शासन हटाने की क्या जल्दी थी? सिब्बल ने कहा, ''ऐसी कौन सी आपातकाल की स्थिति आ गई थी कि देवेंद्र फडणवीस को सुबह आठ बजे शपथ दिलवाई गई. जब ये बहुमत का दावा कर रहे हैं तो इसे साबित करने से क्यों बच रहे हैं.'' राज्यपाल के सचिवालय की ओर से पैरवी करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 22 नवंबर को अजित पवार ने चिट्ठी लिखा समर्थन देने की घोषणा की थी. तुषार मेहता ने अजित पवार के समर्थन की चिट्ठी को भी कोर्ट के सामने पेश किया. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से पैरवी करते हुए मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि एनसीपी के 54 विधायक अजित पवार और फडणवीस के साथ हैं. उन्होंने देवेंद्र फडणवीस की ओर से कहा, \"एक पवार उनके साथ हैं, एक पवार हमारे साथ हैं. यह एक पारिवारिक झगड़ा हो सकता है. हम नहीं बल्कि वो हॉर्स ट्रेडिंग कर रहे हैं. हम 170 विधायकों के समर्थन के साथ राज्यपाल के पास गए और उन्होंने हमारे दावे को स्वीकार किया. लिहाज़ा राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और मैंने शपथ ली.\" मुकुल रोहतगी ने कहा कि राज्यपाल की आलोचना की ज़रूरत नहीं थी और बहुमत परीक्षण तो होना ही है. इस पर जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा है कि अभी असल सवाल ये है कि मुख्यमंत्री के पास बहुमत है या नहीं और इसके लिए फ्लोर टेस्ट होना चाहिए. इस पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि फ्लोर टेस्ट होना ही है लेकिन वो चार दिन में होगा या दस दिन में या पांच दिन में, क्या कोई कोर्ट इस बारे में फैसला ले सकती है? मुकुल रोहतगी ने देवेंद्र फडणवीस की ओऱ से कहा कि वे शपथ पत्र दे सकते हैं कि राज्यपाल और बीजेपी ने क़ानून-सम्मत तरीक़े से काम किया है. किसी ने नहीं कहा कि समर्थन की चिट्ठी फ़र्ज़ी है. मुकुल रोहतगी ने कहा कि हम इस अर्ज़ी पर शपथ पत्र दाख़िल करेंगे और अभी अंतरिम आदेश की ज़रूरत नहीं है. राज्यपाल की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पैरवी की और जवाब देने के लिए दो-तीन दिनों का वक़्त मांगा. उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने अपने अधिकार के तहत सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का मौक़ा दिया था. तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा है कि राज्यपाल को सौंपी गई चिट्ठी में अजित पवार ने ख़ुद को एनसीपी के विधायक दल का नेता बताया है और 54 विधायकों के समर्थन के साथ देवेंद्र फडणवीस को समर्थन देने की बात कही है. इस चिट्ठी के साथ एनसीपी के 54 विधायकों के हस्ताक्षर हैं. ये चिट्ठी मराठी में लिखी है और सुप्रीम कोर्ट ने इसका अनुवाद मांगा है. तुषार मेहता ने राज्यपाल की ओर से देवेंद्र फडणवीस को सरकार बनाने का न्योता देने की चिट्ठी भी शीर्ष अदालत में पेश की है. इन दोनों चिट्ठियों की मांग सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में की थी. 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नुक़सान पर 379 रन बनाए हैं. कप्तान इंज़मामुल हक़ और शाहिद आफ़रीदी क्रीज़ पर हैं और इस जोड़ी ने पाँचवें विकेट की साझेदारी में 163 रन बनाए हैं. पहले दिन का खेल समाप्त होने तक इंज़मामुल हक़ ने 79 और शाहिद आफ़रीदी ने 85 रन बनाए हैं. आफ़रीदी ने इरफ़ान पठान के एक ही ओवर में धुआँधार 20 रन जड़े. इससे पहले तक आफ़रीदी कुछ सब्र के साथ खेल रहे थे और उन्होंने अपना अर्द्धशतक 63 गेंदों में पूरा किया. भारत की तरफ़ से अपना पहला टेस्ट खेल रहे आरपी सिंह ने शानदार गेंदबाज़ी करते हुए तीन विकेट लिए हैं और गेंदबाज़ के रूप में उन्हें पहली सफलता पहले ही घंटे में मिल गई जब उन्होंने ओपनर शोएब मलिक को आउट कर पाकिस्तान को पहला झटका दिया. इसके बाद उन्होंने यूनुस ख़ान और मोहम्मद यूसुफ़ के महत्वपूर्ण विकेट लिए. हालाँकि इन दोनों की साझेदारी काफ़ी अच्छी रही तीसरे विकेट की साझेदारी में 142 रन का योगदान किया. यूनुस ख़ान ने 83 और मोहम्मद यूसुफ़ ने 65 रन बनाए. युवराज सिंह ने रूद्र प्रताप सिंह की गेंद पर यूनुस ख़ान का एक बेहतरीन कैच लपका. इसके थोड़ी देर बाद विकेट के पीछे महेंद्र सिंह धोनी ने मोहम्मद यूसुफ़ का एक शानदार कैच लेकर आर पी सिंह को तीसरा विकेट दिलाया. रुद्र प्रताप छाए जब मेज़बान टीम का पहला विकेट शोएब मलिक के रूप में गिरा तब पाकिस्तान का स्कोर था 49 रन. आरपी सिंह की गेंद पर कप्तान राहुल द्रविड़ ने स्लिप में जब मलिक का कैच पकड़ा तो उनका निजी स्कोर था 19 रन. पाकिस्तान का दूसरा विकेट सलमान बट का गिरा जब ज़हीर ख़ान की गेंद पर उनका कैच धोनी ने लपका. सलमान बट ने 37 रनों का योगदान किया. पाकिस्तान के कप्तान इंज़माम उल हक़ ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया. इस मैच के लिए भारतीय टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली को शामिल नहीं किया गया है. उनकी जगह ऑलराउंडर आरपी सिंह को मौका दिया गया है. ख़राब फॉर्म से जूझ रहे अजित अगरकर की जगह ज़हीर ख़ान को टीम में वापस बुलाया गया है. इसी तरह पाकिस्तानी टीम ने भी दो तेज़ गेंदबाज़ों को टीम से हटाया है. मोहम्मद समी और राना नवीद उल हसन को टीम से हटाकर उनकी जगह मोहम्मद आसिफ़ और अब्दुल रज़्ज़ाक को शामिल किया गया है. भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर में खेला गया पहला टेस्ट मैच हार-जीत के फ़ैसले के बिना समाप्त हो गया था. भारतीय टीमः राहुल द्रविड़, वीरेंदर सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण, सचिन तेंदुलकर, युवराज सिंह, एमएस धोनी, इरफ़ान पठान, ज़हीर ख़ान, आरपी सिंह, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह. पाकिस्तानी टीमः इंज़माम उल हक़, सलमान बट्ट, शोएब मलिक, युनुस ख़ान, मोहम्मद युसुफ़, शाहिद आफ़रीदी, कामरान अकमल, शोएब अख़्तर, अब्दुल रज़्ज़ाक, दानिश कनेरिया, मोहम्मद आसिफ़.\n\nSummary:", "target": "फ़ैसलाबाद में भारत के साथ दूसरे टेस्ट मैच में भारतीय गेंदबाज़ रुद्र प्रताप सिंह की शानदारी गेंदबाज़ी के प्रभाव से उबरते हुए पाकिस्तानी टीम एक बार फिर बड़ा स्कोर खड़ा करने की तरफ़ बढ़ रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़ैसलाबाद की पिच पहले दिन तो गेंदबाज़ों के लिए धुनाई वाली साबित हुई और पाकिस्तान के चार खिलाड़ियों ने पहले ही दिन अर्द्धशतक लगाए हैं. पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय टेस्ट में खेल रहे भारतीय खिलाड़ी रुद्र प्रताप सिंह ने पहले ही दिन तीन विकेट लेकर तहलका मचा दिया. बाँए हाथ के गेंदबाज़ रुद्र प्रताप सिंह ने ख़तरनाक बल्लेबाज़ यूनुस ख़ान और मोहम्मद यूसुफ़ के विकेट चटकाए. पहले दिन का खेल समाप्त होने तक पाकिस्तानी टीम ने चार विकेट के 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लेकर आर पी सिंह को तीसरा विकेट दिलाया. रुद्र प्रताप छाए जब मेज़बान टीम का पहला विकेट शोएब मलिक के रूप में गिरा तब पाकिस्तान का स्कोर था 49 रन. आरपी सिंह की गेंद पर कप्तान राहुल द्रविड़ ने स्लिप में जब मलिक का कैच पकड़ा तो उनका निजी स्कोर था 19 रन. पाकिस्तान का दूसरा विकेट सलमान बट का गिरा जब ज़हीर ख़ान की गेंद पर उनका कैच धोनी ने लपका. सलमान बट ने 37 रनों का योगदान किया. पाकिस्तान के कप्तान इंज़माम उल हक़ ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया. इस मैच के लिए भारतीय टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली को शामिल नहीं किया गया है. उनकी जगह ऑलराउंडर आरपी सिंह को मौका दिया गया है. ख़राब फॉर्म से जूझ रहे अजित अगरकर की जगह ज़हीर ख़ान को टीम में वापस बुलाया गया है. इसी तरह पाकिस्तानी टीम ने भी दो तेज़ गेंदबाज़ों को टीम से हटाया है. मोहम्मद समी और राना नवीद उल हसन को टीम से हटाकर उनकी जगह मोहम्मद आसिफ़ और अब्दुल रज़्ज़ाक को शामिल किया गया है. भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर में खेला गया पहला टेस्ट मैच हार-जीत के फ़ैसले के बिना समाप्त हो गया था. भारतीय टीमः राहुल द्रविड़, वीरेंदर सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण, सचिन तेंदुलकर, युवराज सिंह, एमएस धोनी, इरफ़ान पठान, ज़हीर ख़ान, आरपी सिंह, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह. पाकिस्तानी टीमः इंज़माम उल हक़, सलमान बट्ट, शोएब मलिक, युनुस ख़ान, मोहम्मद युसुफ़, शाहिद आफ़रीदी, कामरान अकमल, शोएब अख़्तर, अब्दुल रज़्ज़ाक, दानिश कनेरिया, मोहम्मद आसिफ़.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 858, "source_item_id": "858", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2810, "clean_index": 762, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:762"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिलचस्प बात यह है कि हज़ारों लोग इसी सुलगती हुई ज़मीन पर झोपड़े डालकर बसते हैं और ज़हरीले धुएँ में साँस लेते हैं. रामगोविंद साहू ऐसी ही झोपड़पट्टी में रहते हैं. वो बताते हैं, “क्या करें, और कोई रास्ता ही नहीं है. यह ज़मीन हमारी ख़रीदी हुई है. बाप-दादाओं के समय से हम यहीं बसे हैं.” पर जब उनसे कहा कि अपनी ज़मीन से भी ज़हर या आग निकलने लगे तो आदमी छोड़कर जाता तो है न. इसपर वो बोले, “भागकर जाएँ भी तो कहाँ, कहाँ बसर होगा. मरना तो यहाँ भी है और नई जगह पर भी. नई जगह पर तो भूखे मर जाएँगे. उससे तो बेहतर यहीं मर जाना है.” ज़मीन के भीतर से सुलगते हुए कोयले से निकलने वाली गैसें अब झरिया शहर के भीतर भी तमाम जगहों से निकलने लगीं हैं लेकिन लोग एक तरह से उनके ख़तरे से बेख़बर जिए जाते हैं. आख़िर क्या मजबूरियाँ हैं इन लोगों की, यह पूछने पर झरिया बचाओ समिति के सचिव अशोक अग्रवाल बताते है, यह लोगों की मजबूरी है क्योंकि कोयला ही इन लोगों की जीविका का साधन है. ये खदान से कोयला चारी करते हैं. वहाँ रहकर चोरी करना कैसे संभव हो पाता है, पूछने पर वो बताते हैं, “आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पूरे झरिया शहर में एक भी कोयला डिपो नहीं है फिर भी लोग कोयला जला रहे हैं, यह कहाँ से आता है.ज़ाहिर है कि यह कोयला चोरी का ही है.” शहर उजाड़ने की योजना भारत सरकार की कोयला कंपनियाँ चाहती हैं कि झरिया शहर को उजाड़कर कहीं और बसा दिया जाए और शेष कोयला भंडार में आग लगने से पहले उसे निकाला और इस्तेमाल में लाया जा सके. पर क्या लोग इस विस्थापन के लिए तैयार हैं. इस बाबत झरिया की आग प्रभावित क्षेत्र के पास की एक बस्ती के लल्लन कहते हैं, “घर-दुआर मिल जाने के बाद तो हम इस जगह को छोड़ ही देंगे. जैसे और लोग कमा रहे हैं, हम भी कमा-खा लेंगे.” उधर उनकी पत्नी कहती हैं, “हमको इस गैस में रहकर कोई सुख नहीं मिल रहा पर क्या करें, कहीं और कैसे जाए.” पर झरिया बचाओ समिति के अशोक कहते हैं, “इनको पहले आग बुझानी चाहिए. ऐसा नहीं है कि यह आग बुझाई नहीं जा सकती है. आग केवल ऊपरी सतह पर है न कि भीतर तक.\" उन्होंने कहा, \"इसको बुझाने के कई तरीके हैं. सबसे आसान तरीका सेंड स्टोनिंग है. जहाँ जहाँ से कोयला निकाला, वहाँ बालू भरना चाहिए. इसका मतलब है कि बालू नहीं भरी जा रही है यानी बालू में कुछ हेराफेरी हुई है.” महत्वपूर्ण यह है कि झरिया के लोग क्या चाहते हैं, क्या वो झरिया से कहीं दूर जाना चाहते हैं या फिर झरिया में ही रहना चाहते हैं. और लोगों से मुख़ातिब हुए तो उन्होंने एक स्वर में कहा कि वो झरिया छोड़कर नहीं जाना चाहते. कइयों ने तो यह भी कहा कि सरकार को आग बुझाने का उपाय करना चाहिए. कुछ का आरोप था कि आग पर काबू के लिए जो पैसा भेजा गया, वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. ख़ुद झरिया बचाओ समिति का मानना है कि बड़ी कोयला कंपनियाँ सरकार से झरिया को बचाने के नाम पर अच्छा मुनाफ़ा कमाना चाहती हैं. उनकी नज़र झरिया के नीचे दबे कोयला भंडार पर है. वो बताते हैं, “बीसीसीएल की मंशा साफ़ है. उनका कोयला चाहिए जबकि इस तरह से खुला उत्खनन इस क्षेत्र के लिए घातक है. सच तो यह है कि यहाँ जिस तरह की स्थितियाँ हैं, उनमें खुला उत्खनन होना ही नहीं चाहिए.” “जो निजी क्षेत्र की कंपनियाँ हैं, उन्होंने कभी यहाँ खुला उत्खनन नहीं किया. बीसीसीएल की मंशा है कि झरिया को खाली करा लिया जाए ताकि वो वहाँ खुला उत्खनन कर सकें.” सुलगती आग के साथ तेज़ होती इस बहस में शायद वो लोग चुपचाप दम तोड़ रहे हैं जो आजीविका के लिए कोयले की जहरीली गैस में रहने और साँस लेने को मजबूर हैं.\n\nSummary:", "target": "झरिया शहर कोयले के एक विशाल भंडार पर बसा हुआ है समस्या यह है कि कोयले की आग के सुलगते ढेर पर बसे झरिया को उजाड़ कर नई जगह पर बसाने की बात कही जा रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिलचस्प बात यह है कि हज़ारों लोग इसी 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को राज्य से सिर्फ़ एक सीट ही मिल पाई थी जबकि इससे पहले राज्य की 14 में से 11 सीटों पर उसका क़ब्ज़ा था. भाजपा की झारखंड में रैली और फिर राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को राज्य में पार्टी की चुनावी तैयारी माना जा रहा है. हिंदू विरोधी नीति पार्टी कार्यकारिणी के पहले दिन लालकृष्ण आडवाणी का अध्यक्षीय भाषण मीडिया के लिए जारी किया गया. भाषण के दौरान मीडिया को बैठक स्थल से बाहर रखा गया. आडवाणी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में शंकराचार्य की ग़िरफ़्तारी का मुद्दा उठाया और कहा कि यह हिंदुत्व का अपमान है. उन्होंने कहा कि आस्था और महंगाई- दो प्रमुख मुद्दे हैं, जिन पर दृढ़ता से जवाब देने की ज़रूरत है. आडवाणी ने कहा, \"मैं चाहता हूँ कि भारत के लोग इस प्रश्न पर सोचें कि किन लोगों ने इस प्रकार का बेतुका और विकृत बौद्धिक वातावरण पैदा किया है जहाँ हिंदू धर्म, लोकाचार और हिंदू धर्म से संबंधित किसी भी बात को सांप्रदायिक, दकियानूसी माना जाता है.\" आडवाणी ने सत्ताधारी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी पर भी जम कर प्रहार किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी का एक वर्ग, कम्युनिस्ट और अन्य राजनीतिक शक्तियाँ इस देश से हिंदू लोकाचार को सुव्यवस्थित ढंग से धीरे-दीरे मिटाने की साज़िश रच रही हैं. आडवाणी ने कहा कि ये लोग हमारी संस्कृति और सभ्यता की मूल हिंदू पहचान को ही मिटाने में लगे हुए हैं. भाजपा अध्यक्ष ने कश्मीर मुद्दे पर भी केंद्र सरकार का फटकार लगाई. उन्होंने कहा कि एक तरफ़ तो प्रधानमंत्री ने श्रीनगर में ये कहा कि उप महाद्वीप में कोई रेखा नहीं खिंची जाएगी, तो दूसरी तरफ़ कहा जा रहा है कि पैकेज समाधान के रूप में कुछ रेखाओं को मिटाया जा सकता है. आडवाणी के भाषण में अयोध्या का मुद्दा भी उठा. उन्होंने कहा कि बीजेपी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) आगे बढ़कर ये घोषणा कर रही है कि हमें बातचीत के द्वारा हल करने का तरीक़ा ज़्यादा उचित लगता है. बिहार के बारे में अध्यक्षीय भाषण का एक पूरा पैराग्राफ़ समर्पित है, जिसका शीर्षक है- आसुरी शक्तियों के चंगुल से बिहार को मुक्त कराएँ. आडवाणी ने कहा कि अगले दो दिसंबर को पटना में होने वाली पार्टी की विशाल रैली में युद्ध रेखाएँ खिंची जाएँगी. रैली पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले राँची में भाजपा की एक बड़ी रैली भी हुई. जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी मौजूद थे. आडवाणी ने रैली में भी आतंकवाद और महंगाई की बात उठाई और चुनावी बिगुल फूँकने की कोशिश की. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि रैली और कार्यकारिणी की बैठक राज्य में पार्टी की चुनावी तैयारियों की शुरुआत है. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे संगठित होकर काम करें और वोट बँटने न दें. उन्होंने कहा कि पार्टी कार्यक्रमों के आधार पर जनता से समर्थन मांगे. रैली में वाजपेयी ने आडवाणी की प्रशंसा के पुल बाँध दिए. उन्होंने गृह मंत्री के रूप में आडवाणी के कामकाज की जम कर तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि गृह मंत्री के रूप में आडवाणी को काम करते देखकर उन्हें वल्लभ भाई पटेल की याद आ गई.\n\nSummary:", "target": "भारतीय जनता पार्टी ने अपने विरोधियों को चेतावनी दी है कि वे हिंदू विरोधी राजनीति से बाज़ आएँ.शंकराचार्य की ग़िरफ़्तारी को पार्टी ने हिंदुत्व का अपमान बताया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nझारखंड की राजधानी राँची में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र सरकार और सरकार को समर्थन दे 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अर्थव्यवस्था पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. ग्यारह सितंबर जैसी गिरावट मंगलवार को अमरीका के न्यूयॉर्क के डाउ जोंस सूचकाँक में तीन प्रतिशत की गिरावट देखी गई. ग्यारह सितंबर 2001 के हमलों में बाद डाउ जोंस में पहली बार इतनी गिरावट पाई गई है. इससे पहले यूरोप और एशिया के बाज़ारों को इससे काफ़ी नुकसान हुआ है. पिछले कुछ वर्षों में चीन का तेज़ी से आर्थिक विकास हुआ है और सरकार ने अपने कई महत्वपूर्ण कंपनियों के शेयर बेचे हैं. हालांकि अब चीन की सरकार इस वृद्धि पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है और कई निवेशकों को डर है कि इसका अर्थ कड़े नियम लगाना होगा जिसका प्रभाव स्टॉक मार्केट में होने वाले निवेश पर पड़ सकता है. निवेशकों को चिंता है कि आने वाले दिनों में चीन में ब्याज़ दरें भी बढ़ाई जाएंगी ताकि क़ीमतों में बढ़ोतरी को रोका जा सके और इसका नुकसान उन कंपनियों को होगा जिन्होंने चीन में काफी निवेश किया है.\n\nSummary:", "target": "चीन के शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में मंगलवार को आई ज़बर्दस्त गिरावट का प्रभाव दुनिया भर के स्टॉक मार्केट पर पड़ रहा है और अमरीकी सरकार ने कहा है कि वो इस स्थिति पर नज़र रखे हुए 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ग्वांतानामो बे शिविर के बंदियों के मामलों की सुनवाई करने वाले सैनिक ट्राइब्यूनलों और आयोगों को काम करने के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी ज़रूरी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये ट्राइब्यूनल और आयोग सिर्फ़ राष्ट्रपति की इज़ाज़त के साथ काम नहीं कर सकते. न्यायालय ने आगे कहा था कि आयोगों को बेहतर क़ानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी. इसलिए राष्ट्रपति बुश को एक ऐसे क़ानून की पेशकश करनी थी जिसे कांग्रेस के सामने रखा जा सके. दूसरा, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव अनेक देशों में सीआईए की ख़ुफ़िया जेलों के मामले में राष्ट्रपति पर दबाव था कि वे इस बारे में स्थिति स्पष्ट करें और पूछताछ के लिए सख़्त तरीका अपनाने बारे में उठे विवाद से भी पर्दा उठाएँ. ख़ासतौर से यूरोपीय देश संदिग्ध लोगों को सीआईए की गुप्त जेलों में पहुँचाने या वहाँ से निकालने के लिए इस्तेमाल होने वाली उड़ानों को लेकर ख़ासे नाराज़ थे. इस बारे में यूरोपीय काउंसिल की एक रिपोर्ट में तीखी टिप्पणियाँ की गई थीं. बंदियों के साथ अमानवीय और प्रताड़ना भरे बर्ताव की तीखी आलोचना हुई थी. तीसरा, समय बीतना समय बीतने के बाद राष्ट्रपति को यह कहने का मौक़ा मिला है कि अल क़ायदा के जो कथित सदस्य हिरासत में थे उन्होंने वो सबकुछ बता दिया है जिसे जानने की ज़रूरत थी इसलिए अब सीआईए की गुप्त जेलें ख़ाली की जा सकती हैं और संदिग्ध लोगों पर उन नए नियमों के तहत मुक़दमे चलाए जा सकते हैं जो कांग्रेस निर्धारित करेगी. लेकिन उन्होंने दो चेतावनी भी दी हैं - एक तो ये कि अगर और संदिग्ध पकड़े जाते हैं तो सीआईए ऐसी गुप्त जेलें फिर से खोलने के लिए तैयार है और राष्ट्रपति संदिग्ध लोगों से पूछताछ करने वालों के ख़िलाफ़ मुक़दमों पर रोक लगाने के लिए क़ानून चाहते हैं. चौथा, नवंबर में कांग्रेस के चुनाव बुश और उनके प्रशासन ने यह फ़ैसला काफ़ी सोच-समझकर किया है ताकि अमरीकी लोगों की आम राय का रुख़ इराक़ मुद्दे से हटाकर \"आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध\" की तरफ़ मोड़ा जा सके, इराक़ युद्ध को सही ठहराते हुए कहा जा सके कि इराक़ युद्ध \"आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध\" का ही एक हिस्सा रहा है.\n\nSummary:", "target": "अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने \"आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध\" के बंदियों के मामले में जो फ़ैसला किया है उससे उनकी नीति की आलोचना कुछ हम तो होगी लेकिन ऐसा नहीं कि आलोचना बिल्कुल ही रुक जाएगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराष्ट्रपति बुश ने ऐसा चार कारणों से किया है. पहला - क़ानूनी अनिवार्यता अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने अल क़ायदा नेता ओसामा बिन लादेन के ड्राइवर के मामले में जून में रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफ़ेल्ड के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि ग्वांतानामो बे शिविर के बंदियों के मामलों की सुनवाई करने वाले सैनिक ट्राइब्यूनलों और आयोगों को काम करने के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी ज़रूरी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये ट्राइब्यूनल और आयोग सिर्फ़ राष्ट्रपति की इज़ाज़त के साथ काम नहीं कर सकते. न्यायालय ने आगे कहा था कि आयोगों को बेहतर क़ानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी. इसलिए राष्ट्रपति बुश को एक ऐसे क़ानून की पेशकश करनी थी जिसे कांग्रेस के सामने रखा जा सके. दूसरा, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव अनेक देशों में सीआईए की ख़ुफ़िया जेलों के मामले में राष्ट्रपति पर दबाव था कि वे इस बारे में स्थिति स्पष्ट करें और पूछताछ के लिए सख़्त तरीका अपनाने बारे में उठे विवाद से भी पर्दा उठाएँ. ख़ासतौर से यूरोपीय देश संदिग्ध लोगों को सीआईए की गुप्त 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अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार और शाहरुख खान ने एक साथ फोटोशूट कराया है. शाहरुख़ कहते हैं, \"एक बार जब मुझे अमिताभ से मिलने का मौका मिला तो मैंने उनसे पूछा कि वो अपने खाली वक़्त में क्या करते हैं. इस सवाल का जवाब देते हुए अमिताभ ने कहा कि इन दिनों उनके घर में एक चूहा घुस आया है जो रात में बड़ा परेशान करता है और वो खाली समय में इसी चूहे को पकड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं.\" शाहरुख़ कहते हैं कि ये पल उनके लिए इसलिए भी इतने खास हैं क्योंकि सायरा जी और अमित जी से ऐसी बातें सुनने के बाद अगर वो स्टार न भी बनते तो भी उनकी ज़िन्दगी सफल थी. दिलीप, अमिताभ और शाहरुख़ साथ साथ ये शूट दिलीप कुमार के घर पर ही किया गया हाल ही में एक मनोरंजन पत्रिका के लिए दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान ने एक फोटो शूट किया. ये शूट दिलीप कुमार के घर पर ही किया गया. इस शूट के बारे में बात करते हुए शाहरुख़ कहते हैं, ''दिलीप साहब और अमित जी के साथ ये फोटो शूट करना अपने आप में ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात रही. उन दोनों के साथ कुछ समय बिताना ये जानते हुए भी कि वो दोनों कितने महान कलाकार हैं इससे बड़ी बात मेरे लिए और क्या हो सकती थी.'' इस शूट की कुछ यादें पत्रकारों से बांटते हुए शाहरुख़ कहते हैं, ''पूरी शूट के दौरान एक बहुत ही अच्छा गाना बज रहा था और दिलीप साहब उस गाने पर अपने हाथ हिलाते रहे और ये बात आप तस्वीरों में भी देख सकते हैं.'' शाहरुख़ ये भी कहते हैं कि इस पूरी शूट के दौरान दिलीप साहब ही थे जिन्होंने अपना काम सबसे बेहतर तरीके से किया. दिलीप साहब की उम्र 90 वर्ष है. उन्होंने फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत 1944 में आई फिल्म ज्वार भाटा से की थी. दिलीप कुमार 1998 तक फिल्मों में नज़र आए.\n\nSummary:", "target": "शाहरुख़ खान के अब तक के जीवन के यादगार लम्हों में से एक लम्हा वो है जब सायरा बानो ने उनसे कहा था, \"अगर मेरा और दिलीप साहब का कोई बेटा होता तो वो बिलकुल शाहरुख़ जैसा ही होता.\"", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदिलीप कुमार से अपनी जान-पहचान का ज़िक्र करते हुए शाहरुख़ बताते हैं कि दिलीप कुमार और उनके पिता दोनों ही पेशावर से हैं, पर जब वो मुंबई में दिलीप साहब से मिले तो उस वक़्त दिलीप साहब की पत्नी सायरा बानो ने उनके बालों पर हाथ फेरते हुए ये बात कही थी. इतना 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(' हमें अमरीका नहीं जाना चाहिए था') 15 अप्रेल को बॉस्टन में मैराथन में बम धमाकों से तीन लोगों की जाने चली गईं थी और 260 से ज़्यादा लोग घायल हो गए थे. 'कार से सफ़र' ब्लूमबर्ग ने कहा \" बीती रात हमें बताया गया कि \"ज़ोख़र और उनके भाई की योजना थी कि वो न्यूयॉर्क तक कार चला कर आयेंगे.\" न्यूयॉर्क के पुलिस कमिश्नर कैली के अनुसार सारनाएफ़ भाइयों की योजना बॉस्टन में धमाके के बाद एक अगवा की गई कार से न्यूयॉर्क तक आने की थी. बकौल कमिश्नर कैली के \"उनकी योजना इसलिए सफल नहीं हुई क्योंकि कार में ईंधन कम था . जिस कार को उन्होंने अगवा किया था उसके ड्राइवर को उन्होंने बोला कि नज़दीकी पेट्रोल पम्प पर रुके और यहीं कार का ड्राइवर भाग निकला और उसने पुलिस को आगाह कर दिया.\" पुलिस ने दोनों भाइयों को सबसे पहले कार से भागते वक़्त ही पकड़ा था. कार पकड़े जाने के दौरान हुई गोलीबारी में ही ए क पुलिस अधिकारी की मौत हो गई थी. पुलिस के साथ इसी मुठभेड़ में तामरलान सारनाएफ़ की मौत हो गई थी. 'ज़ोख़र मौन' ज़ोखर सारनाएफ़ इस समय पुलिस हिरासत में अस्पताल में मौजूद हैं और उन पर बड़े विनाश के हथियारों का इस्तेमाल कर लोगों की जान लेने का आरोप है. अमरीकी मीडिया के अनुसार ज़ोख़र सारनाएफ़ ने 16 घंटों तक पुलिस को उसके प्रश्नों के उत्तर दिए लेकिन जब उन्हें बताया गया कि कानून उन्हें इस बात की अनुमति देता है कि वो चुप रह सकते हैं और एक वकील भी ले सकते तो उन्होंने उत्तर देने बंद कर दिए. इस बीच बॉस्टन धमाकों के संदिग्ध भाइयों तमरलान और ज़ोख़र सारनाएफ़ की मां ने उनके परिवार के 10 साल पहले अमरीका पलायन करने पर अफ़सोस जताया है. 'मेरे बच्चे बेकसूर' जुबेदात सारनाएफ़ ने रूसी गणराज्य दागेस्तान में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अमरीका ने उनके बच्चों को उनसे छीन लिया है. उन्होंने साथ ही कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि उनके बच्चे इस हमले में शामिल नहीं थे. आंसुओं के सैलाब में डूबी जुबेदात ने कहा, “काश में अमरीका नहीं गई होती! मुझे इस बात का अफ़सोस है कि मैं वहां क्यों गई.” संदिग्धों के पिता अंजोर सारनाएफ़ ने कहा कि वो गुरूवार या शुक्रवार को अमरीका जाएंगे. वो अपने बेटे के शव को रूस लाना चाहते हैं.\n\nSummary:", "target": "न्यूयॉर्क के मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने कहा है कि बॉस्टन धमाकों के पीछे मौजूद सारनाएफ़ भाइयों का अगला निशाना न्यूयॉर्क का टाइम स्क्वायर था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nज़ोख़र सारनाएफ़ ने अमरीकी जांच एजेंसी एफ़बीआई को बताया है कि उनका अगला निशाना न्यूयॉर्क का टाइम स्क्वायर था. गुरुवार शाम ब्लूमबर्ग ने दावा किया है कि पुलिस मुठभेड़ में जीवित बचे ज़ोख़र सारनाएफ़ ने अमरीकी जांच एजेंसी एफ़बीआई को बताया है कि उनका अगला निशाना न्यूयॉर्क का टाइम स्क्वायर था. न्यूयॉर्क के पुलिस कमिश्नर रेमंड कैली ने पत्रकारों को बताया कि संधिग्दों के पास एक प्रेशर कुकर बम और पांच पाइप बम और थे. 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'मेरे बच्चे बेकसूर' जुबेदात सारनाएफ़ ने रूसी गणराज्य दागेस्तान में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अमरीका ने उनके बच्चों को उनसे छीन लिया है. उन्होंने साथ ही कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि उनके बच्चे इस हमले में शामिल नहीं थे. आंसुओं के सैलाब में डूबी जुबेदात ने कहा, “काश में अमरीका नहीं गई होती! मुझे इस बात का अफ़सोस है कि मैं वहां क्यों गई.” संदिग्धों के पिता अंजोर सारनाएफ़ ने कहा कि वो गुरूवार या शुक्रवार को अमरीका जाएंगे. वो अपने बेटे के शव को रूस लाना चाहते हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 865, "source_item_id": "865", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2306, "clean_index": 768, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:768"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअफ़ग़ान अधिकारियों ने बताया कि ज़किया ज़की को सात गोलियाँ मारी गईं, कुछ गोलियाँ सिर और सीने में भी लगीं. गोलियाँ मारे जाने के समय ज़किया ज़की अपने घर में सो रही थीं. उनका बीस महीने का बेटा भी उन्हीं के पास सो रहा था. परवान प्रांत के गवर्नर अब्दुल जब्बार तक़वा ने बीबीसी को बताया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि ज़किया को किसने मारा. यह हमला परवान प्रांत में ही हुआ है. ज़किया पर हमले की किसी ने अभी ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की है. ज़किया की हत्या से कुछ ही दिन पहले एक महिला समाचार वाचक की हत्या कर दी गई थी और हत्या की वजह कुछ पारिवारिक बताए गए थे. 'आतंकवादी कार्रवाई' परवान प्रांत के गवर्नर अब्दुल जब्बार तक़वा ने जबाल शहर में इस घटनास्थल का दौरा किया. यह स्थान राजधानी काबुल से क़रीब 70 किलोमीटर उत्तर में है. गवर्नर ने कहा कि हमला करने वाले तीन लोग थे और उन्होंने पिस्तौलों और राइफ़लों से यह हमला किया. हमलावर ज़किया के घर में ज़बरदस्ती घुसे थे और अंदर के कमरों तक पहुँच गए. हमले के समय ज़किया का तीन साल का बेटा भी उनके साथ था लेकिन ग़नीमत की बात रही कि ज़किया के छहों बेटे सही सलामत थे. अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मामलों के मंत्रालय ने इस घटना की निंदा की है और इसे \"आतंकवादी कार्रवाई\" क़रार दिया है. मंत्रालय ने कहा है कि हमलावरों को पकड़ने की कोशिश की जा रही है. 35 वर्षीय ज़किया ज़की एक रिपोर्टर थीं और उन्होंने एक स्कूल में अध्यापिका के रूप में भी काम किया. ज़किया देश की महिला पत्रकारों में काफ़ी चर्चित थीं और उन्होंने तालेबान शासन के दौरान काफ़ी हिम्मत का परिचय दिया था. ज़किया अमरीकी धनराशि से चलने वाले रेडियो शांति का भी कार्यभार संभाला था. रेडियो शांति 2001 में तालेबान का शासन समाप्त होने के बाद शुरू किया गया था. काबुल में बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैवीलैंड का कहना है कि ज़किया ज़की ने कई मौक़ों पर पूर्व मुजाहिदीन की आलोचना की थी और उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो युद्धापराधों में फँसे हुए थे. पर्यवेक्षकों का कहना है कि ज़किया की हत्या के पीछे क्या मक़सद हो सकता है, इसका किसी को अंदाज़ा नहीं हो पा रहा है और हत्यारों को पकड़ने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया है.\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान में एक रेडियो स्टेशन चलाने वाली महिला ज़किया ज़की की गोली मारकर हत्या कर दी गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअफ़ग़ान अधिकारियों ने बताया कि ज़किया ज़की को सात गोलियाँ मारी गईं, कुछ गोलियाँ सिर और सीने में भी लगीं. गोलियाँ मारे जाने के समय ज़किया ज़की अपने घर में सो रही थीं. उनका बीस महीने का बेटा भी उन्हीं के पास सो रहा था. परवान प्रांत के गवर्नर अब्दुल जब्बार तक़वा ने बीबीसी को बताया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि ज़किया को किसने मारा. यह हमला परवान प्रांत में ही हुआ है. ज़किया पर हमले की किसी ने अभी ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की है. ज़किया की हत्या से कुछ ही दिन पहले एक महिला समाचार वाचक की हत्या कर दी गई थी और हत्या की वजह कुछ पारिवारिक बताए गए थे. 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.\n\nSummary:", "target": "“मैं हमेशा से यही सोचता रहता था कि लोगों को पहाड़ों पर चढ़ाई क्या मिलता है? मेरी रिसर्च में मुझे पता चला कि उन्हें इससे ख़ुशी मिलती है और उन्हें संतुष्टि मिलती है.”", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nऐसा कहना है फ़िल्मकार आशुतोष गोवारिकर का जो एक टेलीविज़न सीरियल 'एवरेस्ट' लेकर आ रहे हैं. आशुतोष इसके निर्माता हैं, निर्देशक हैं ग्लेन बरैटो और अंकुश मोहला. संगीत दिया है ए आर रहमान ने और शो को लिखा है फ़िल्म 'स्वदेस' की सहायक कला निर्देशक रही मिताली महाजन ने. एवरेस्ट पर फ़िल्म क्यों नहीं? पर इतनी अच्छी टीम के साथ आशुतोष टेलीविज़न सीरियल बनाने के बजाए एवरेस्ट पर एक अच्छी ख़ासी फ़िल्म बना सकते थे. उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? इस सवाल पर हंसते हुए आशुतोष ने कहा, \"देखिए मैं वैसे भी लंबी फ़िल्में बनाने के लिए जाना जाता हूं, तो अगर मैं एवरेस्ट पर फ़िल्म बनाता तो वो तक़रीबन 15 से 20 घंटे की होती. बात दरअसल ये है कि इस कहानी के कई पहलू हैं जो हमें दिखाने थे और वो फ़िल्म के ज़रिए हम नहीं दिखा पाते.\" 'टीवी में काम करने की इच्छा' संगीतकार ए आर रहमान कहते हैं, \"काफ़ी सालों से टेलीविज़न में काम करने की मेरी इच्छा थी. जब मुझे आशुतोष जी ने 'एवरेस्ट' की कहानी सुनाई तो मुझे ये काफी पसंद आई. इससे बेहतर और क्या होगा कि मैं टीवी पर आशुतोष जी के साथ काम करूं.” 'एवरेस्ट' के निर्देशक अंकुश मोहला ने कहा, “आशुतोष हमारे लिए प्रेरणास्रोत रहे और उन्होंने हमेशा हमें सही दिशा दिखाई. हम तो सिर्फ़ इतना जानते थे कि ये सबसे ऊंची चोटी है पर वहां जाने के लिए क्या जद्दोजहद करनी पड़ती है वो सब हमें आशुतोष ने बताया.\" इस सीरियल के कितने एपिसोड्स होंगे और ये कब दिखाया जाएगा? इसका जवाब आशुतोष ने नहीं दिया पर बातों ही बातों में ए आर रहमान ने कह दिया 50 एपिसोड्स. फिर तुरंत ही 100 बताकर आशुतोष की तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिए. 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होगा. ये उन परिस्थितियों के कारण हुआ है, जो पीसीबी के नियंत्रण के बाहर हैं.\" मुआवज़ा हालाँकि बैठक में यह भी फ़ैसला हुआ कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) को जिस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, उस स्थिति में पाकिस्तान को मुआवज़ा दिया जाएगा. आईसीसी बोर्ड का कहना है कि अप्रैल की बैठक से पहले चैम्पियंस ट्रॉफ़ी के मेज़बान देश पर फ़ैसला हो जाएगा. बोर्ड के सदस्य इस बात पर भी सहमत थे कि एक कार्यदल पाकिस्तान का दौरा करेगा और पीसीबी के साथ मिलकर जहाँ तक संभव हो, यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा कि भविष्य में वहाँ अंतरराष्ट्रीय मैच आयोजित कराए जाएँ. आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफ़ी में दुनिया की आठ शीर्ष टीमें हिस्सा लेंगी. चार-चार टीमों के दो ग्रुप होंगे. पहले राउंड रॉबिन मैच होंगे, फिर सेमी फ़ाइनल और फ़ाइनल.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान इस साल चैम्पियंस ट्रॉफ़ी क्रिकेट की मेज़बानी नहीं करेगा. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने सुरक्षा कारणों से यह फ़ैसला किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदरअसल चैम्पियंस ट्रॉफ़ी का आयोजन पिछले साल ही 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में राज्य सभा में पार्टी का नेता और दोनों सदनों में पार्टी के उपनेता एवं व्हिप का चयन करेंगे. इतना नहीं नहीं संसदीय कार्यकारी समिति बनाने का अधिकार भी विपक्ष के नेता आडवाणी को सौंपा गया है. आडवाणी को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाने का प्रस्ताव जसवंत सिंह ने रखा जिसका मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज ने समर्थन किया. हालांकि आडवाणी ने पहले ये ज़िम्मेदारी लेने से इंकार किया था लेकिन बाद में राजनाथ सिंह ने उन्हें यह ज़िम्मेदारी लेने के लिए मनाया है. शायद यही कारण है कि अभी इस बारे में स्पष्ट रुप से कोई कुछ नहीं कह रहा है कि आडवाणी अगले पांच साल इस पद पर रहेंगें या नहीं.\n\nSummary:", "target": "भारतीय जनता पार्टी की संसदीय दल की बैठक में लालकृष्ण आडवाणी को लोकसभा में पार्टी का नेता चुना गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nआडवाणी पिछली लोकसभा में भी विपक्ष के नेता रहे थे. हालांकि अभी ये साफ नहीं है कि आडवाणी अगले पांच साल इस पद पर रहेंगे या नहीं. आडवाणी ने इस अवसर पर पार्टी नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस यह समझने की ग़लती न करे कि यह जनादेश 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सितंबर 2010 में स्टीफ़न के आंत में कैंसर का पता चला था जो जल्द ही उनके धुटने और उसके बाद फेफड़े और लीवर तक में फैल गया. तीन सालों के भीतर उनके सात बड़े ऑपरेशन किए गए और चार अलग अलग कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के सत्र हुए. अप्रैल 2014 में फ़ेसबुक पर उनकी अंगूठा दिखाती तस्वीर आने के बाद पूरी दुनिया में लोग दान देने के लिए प्रेरित हुए. एक लाख पैतीस हज़ार से ज़्यादा लोग इस मुहिम में अब तक दान दे चुके हैं. हास्य अभिनेता जैसन मैनफ़ोर्ड अस्पताल में स्टीफ़न से मिलने के बाद काफ़ी प्रभावित है. उन्होंने #थम्बसअप फॉर स्टीफ़न अभियान चलाया है जिसमें वे लोगों से अभियान को प्रोत्साहित करने के लिए खुद की सेल्फ़ी साझा करने के लिए कहते हैं. मैनफ़ोर्ड ने स्टीफ़न को \"प्रेरणादायक लड़का\" बताया है. हास्य अभिनेता ने कहा, \" जीवन को समय से नहीं बल्कि उपलब्धियों से मापना चाहिए. यह जिंदगी का सबसे बड़ा दर्शन है और टीनएज़ कैंसर ट्रस्ट के लिए धन जुटाने के प्रति स्टीफ़न के समर्पण ने मुझे हिलाकर रख दिया. \" प्रभावशाली व्यक्तित्व 16 दिसंबर, 1994 को जन्मे स्टीफ़न अपने शहर बर्नटवूड, स्टैफर्डशायर में स्कूली शिक्षा ली. वह एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी रहे. उन्होंने वालसाल यूथ टीम के लिए फ़ुटबॉल खेला और देश से बाहर अपनी काउंटी का प्रतिनिधित्व किया. परीक्षा के वक़्त कीमोथेरेपी से गुज़रने के बावजूद उन्होंने कॉलेज में अच्छा प्रदर्शन किया. उनकी योजना एक डॉक्टर बनने की थी. इसके लिए उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में साक्षात्कार भी दिया था. लेकिन यह जानने के बाद कि उनका कैंसर लाइलाज है उन्होंने अपना आवेदन वापस ले लिया. उनके प्रधानाध्यापक स्टुअर्ट जोंस ने कहा, \" मैं जितने लोगों से अब तक मिला हूँ उसमें स्टीफ़न सबसे अद्भुत व्यक्ति थे. \" 7 जनवरी 2013 को स्टीफ़न ने अपनी ज़िंदगी की बातों का ऑनलाइन पेज़ \" स्टीफ़न स्टोरी \" बनाकर साझा करने का फ़ैसला लिया. जिसमें उन्होंने 46 चीज़ों की सूची बनाई थी जो वे करना चाहते थे. अपने फ़ेसबुक संदेश में स्टीफ़न ने कहा कि वे ख़ुद को मिले समर्थन से अभिभूत है. उन्होंने कहा, \" लोगों का एक साथ इस मक़सद के लिए आना वाकई में दिल को छूने वाला है. मेरी और भविष्य में होने वाले किसी भी कैंसर मरीज जिन्हें इन पैसों से मदद मिलेगी की तरफ से धन्यवाद. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "स्टीफ़न सटन कैंसर के इलाज़ के दौरान इस बात को लेकर दृढ़ निश्चयी थे कि वे अपनी कहानी को एक दुखद कहानी नहीं बनने देंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअपनी किस्मत को कोसने के बजाए उन्होंने मरने से पहले 46 चीज़ों की सूची बनाई जिसमें भीड़ के सामने ड्रम बजाने, टैटू बनवाने और इन सब में सबसे महत्वपूर्ण टीनएज़ कैंसर ट्रस्ट के लिए क़रीब 10 लाख रूपए जुटाने जैसी उनकी ख्वाहिशें शामिल हैं. कैंसर ट्रस्ट के लिए जुटाया जाने वाला यह धन सोशल नेटवर्किंग साइट और जैसन मैनफ़ोर्ड और जिम्मी कैर जैसी जानी मानी हस्तियों की मदद के चलते अब लगभग 30 करोड़ रूपए के क़रीब पहुँच चुका है. प्रेरणा सितंबर 2010 में स्टीफ़न के आंत में कैंसर का पता चला था जो जल्द ही उनके धुटने और उसके बाद फेफड़े और लीवर तक में फैल गया. तीन सालों के भीतर उनके सात बड़े ऑपरेशन किए गए और चार अलग अलग कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के सत्र हुए. अप्रैल 2014 में फ़ेसबुक पर उनकी अंगूठा दिखाती तस्वीर आने के बाद पूरी दुनिया में लोग दान देने के लिए प्रेरित हुए. एक लाख पैतीस हज़ार से ज़्यादा लोग इस मुहिम में अब तक दान दे चुके हैं. हास्य अभिनेता जैसन मैनफ़ोर्ड अस्पताल में स्टीफ़न से मिलने के बाद काफ़ी प्रभावित है. उन्होंने #थम्बसअप फॉर स्टीफ़न अभियान चलाया है जिसमें वे लोगों से अभियान को प्रोत्साहित करने के लिए खुद की सेल्फ़ी साझा करने के लिए कहते हैं. मैनफ़ोर्ड ने स्टीफ़न को \"प्रेरणादायक लड़का\" बताया है. हास्य अभिनेता ने कहा, \" जीवन को समय से नहीं बल्कि उपलब्धियों से मापना चाहिए. यह जिंदगी का सबसे बड़ा दर्शन है और टीनएज़ कैंसर ट्रस्ट के लिए धन जुटाने के प्रति स्टीफ़न के समर्पण ने मुझे हिलाकर रख दिया. \" प्रभावशाली व्यक्तित्व 16 दिसंबर, 1994 को जन्मे स्टीफ़न अपने शहर बर्नटवूड, स्टैफर्डशायर में स्कूली शिक्षा ली. वह एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी रहे. उन्होंने वालसाल यूथ टीम के लिए फ़ुटबॉल खेला और देश से बाहर अपनी काउंटी का प्रतिनिधित्व किया. परीक्षा के वक़्त कीमोथेरेपी से गुज़रने के बावजूद उन्होंने कॉलेज में अच्छा प्रदर्शन किया. उनकी योजना एक डॉक्टर बनने की थी. इसके लिए उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में साक्षात्कार भी दिया था. लेकिन यह जानने के बाद कि उनका कैंसर लाइलाज है उन्होंने अपना आवेदन वापस ले लिया. उनके प्रधानाध्यापक स्टुअर्ट जोंस ने कहा, \" मैं जितने लोगों से अब तक मिला हूँ उसमें स्टीफ़न सबसे अद्भुत व्यक्ति थे. \" 7 जनवरी 2013 को स्टीफ़न ने अपनी ज़िंदगी की बातों का ऑनलाइन पेज़ \" स्टीफ़न स्टोरी \" बनाकर साझा करने का फ़ैसला लिया. जिसमें उन्होंने 46 चीज़ों की सूची बनाई थी जो वे करना चाहते थे. अपने फ़ेसबुक संदेश में स्टीफ़न ने कहा कि वे ख़ुद को मिले समर्थन से अभिभूत है. उन्होंने कहा, \" लोगों का एक साथ इस मक़सद के लिए आना वाकई में दिल को छूने वाला है. मेरी और भविष्य में होने वाले किसी भी कैंसर मरीज जिन्हें इन पैसों से मदद मिलेगी की तरफ से धन्यवाद. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ़्रांस और तुर्की ने कहा है कि उत्तरी सीरिया में अस्पतालों पर हो रहे हवाई हमले युद्ध अपराध की श्रेणी में आते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि स्कूलों और अस्पतालों पर हुए हमलों में 50 लोगों की मौत हो गई है. तुर्की के विदेश मंत्रालय ने इन हमलों के लिए रूस को दोषी ठहराया. मास्को ने अभी तक इन आरोपों का जवाब नहीं दिया है. इस बीच, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद ने सीरिया में युद्ध को ख़त्म किए जाने की योजना पर संदेह जताया है. पिछले हफ़्ते विश्व शक्तियों ने सीरिया में सीमित संघर्ष विराम की दिशा में काम करने पर सहमति जताई थी. समाप्त लेकिन इस घोषणा पर टिप्पणी करते हुए राष्ट्रपति असद ने कहा कि इस तरह के संघर्ष विराम का मतलब यह नहीं होगा कि सभी पक्ष अपना हथियार डाल देंगे. क्या है युद्ध अपराध 'स्पष्ट युद्ध अपराध' फ़्रांस ने कड़े शब्दों में एमएसएफ़ क्लिनिक पर की गई बमबारी की निंदा की है. फ़्रांस के विदेश मंत्री ज्यां मार्क एरो ने कहा कि इस तरह के हमले 'युद्ध अपराध' होते हैं. तुर्की ने भी इन हमलों को 'स्पष्ट' युद्ध अपराध कहा है. हाल के दिनों में तुर्की और रूस के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं. विद्रोहियों के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ करते हुए रूस सीरिया की सरकार का समर्थन कर रहा है. लेकिन रूस का कहना है कि वो केवल चरमपंथियों को ही निशाना बना रहा है. एक निगरानी समूह सीरियन ऑब्ज़र्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स ने कहा है कि कुर्द सेना ने उत्तरी सीरिया में इस्लामी विद्रोहियों से ताल रिफ़ात शहर को क़ब्जे में ले लिया है. सीरिया में लगभग पांच सालों से चल रहे युद्ध में 250,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 1.1 करोड़ से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं. 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'चरमपंथी भाग रहे हैं' पुलिस का कहना है कि अलग-अलग मुठभेड़ों में कम से कम 60 चरमपंथी मारे गए हैं. जब सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछा गया कि क्या हिंसा में तेज़ी से निपटना एक नई चुनौती है, तो उन्होंने कहा, \"ये तो साफ है कि अब चरमपंथी भाग रहे हैं. हम जंगलों और गांवों में उनका पीछा कर रहे हैं. इसका मतलब हिंसा में तेज़ी आना नहीं है.\" इस बीच श्रीनगर और अन्य प्रमुख शहरों में और उसके आसपास पुलिस और अर्धसैन्य बलों की टुकड़ियां तैनात की गई हैं, ताकि राज्य में गोमांस पर कोर्ट के प्रतिबंध के आदेश के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों को रोका जा सके. कई अलगाववादी दलों ने शनिवार को घाटी में बंद का आह्वान किया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत प्रशासित कश्मीर में सैन्य अधिकारियों का कहना है कि चरमपंथियों के साथ रात भर चली मुठभेड़ में दो सैनिक मारे गए हैं और ऑपरेशन जारी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफाइल फोटो कर्नल एनएन जोशी ने बीबीसी को बताया कि गुरूवार शाम मिली एक सूचना के आधार पर सेना ने श्रीनगर के उत्तर में 70 किलोमीटर दूर कुपवाड़ा के राजवर के जंगली इलाके की घेराबंदी की. उन्होंने बताया कि चरमपंथियों ने सैन्य दस्ते पर घात लगाकर हमला किया जिसमें दो जवान मारे गए. कर्नल जोशी ने कहा,\" अभी तक हमारे जवानों ने दो चरमपंथियों को मारा है. उनकी शिनाख्त की जा रही है और सैन्य कार्रवाई अभी जारी है.\" भारत-पाकिस्तान की सेना के अधिकारी सीमा पर तनाव खत्म करने की ताज़ा कोशिश के तहत बातचीत कर रहे हैं और इस दौरान कश्मीर में चरमपंथी हिंसा में बढ़ोतरी हुई है. समाप्त स्थिति तनावपूर्ण फाइल फोटो कुपवाड़ा ज़िला नियंत्रण रेखा के करीब है जो कश्मीर क्षेत्र को दोनों देशों के बीच बांटने वाली सीमा है. पिछले महीने भी कुपवाड़ा में हिंसा की दो घटनाओं में सेना के दो जवान और पांच चरमपंथी मारे गए थे. इससे पहले सोपोर में एक लंबी मुठभेड़ के दौरान चरमपंथी मारा गया था. इसी सैन्य कार्रवाई में भारतीय सेना के एक जवान की भी मौत हो गई. कश्मीर घाटी में भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां चरमपंथियों के खिलाफ अपनी गतिविधियां तेज़ कर रही हैं. 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वैज्ञानिक कहते हैं कि इसके पीछे तेज़ी से हुआ औद्योगीकरण है, जंगलों का तेज़ी से कम होना है, पेट्रोलियम पदार्थों के धुँए से होने वाला प्रदूषण है और फ़्रिज, एयरकंडीशनर आदि का बढ़ता प्रयोग भी है. क्या होगा असर? वैज्ञानिक कहते हैं कि इस समय दुनिया का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड है और वर्ष 2100 तक इसमें डेढ़ से छह डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है. एक चेतावनी यह भी है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तत्काल बहुत कम कर दिया जाए तो भी तापमान में बढ़ोत्तरी तत्काल रुकने की संभावना नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्यावरण और पानी की बड़ी इकाइयों को इस परिवर्तन के हिसाब से बदलने में भी सैकड़ों साल लग जाएँगे. ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के उपाय वैज्ञानिकों और पर्यावरणवादियों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग में कमी के लिए मुख्य रुप से सीएफसी गैसों का ऊत्सर्जन कम रोकना होगा और इसके लिए फ्रिज़, एयर कंडीशनर और दूसरे कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल कम करना होगा या ऐसी मशीनों का उपयोग करना होगा जिनसे सीएफसी गैसें कम निकलती हैं. औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकले वाला धुँआ हानिकारक हैं और इनसे निकलने वाला कार्बन डाई ऑक्साइड गर्मी बढ़ाता है. इन इकाइयों में प्रदूषण रोकने के उपाय करने होंगे. वाहनों में से निकलने वाले धुँए का प्रभाव कम करने के लिए पर्यावरण मानकों का सख़्ती से पालन करना होगा. उद्योगों और ख़ासकर रासायनिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे को फिर से उपयोग में लाने लायक बनाने की कोशिश करनी होगी. और प्राथमिकता के आधार पर पेड़ों की कटाई रोकनी होगी और जंगलों के संरक्षण पर बल देना होगा. अक्षय ऊर्जा के उपायों पर ध्यान देना होगा यानी अगर कोयले से बनने वाली बिजली के बदले पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पनबिजली पर ध्यान दिया जाए तो आबोहवा को गर्म करने वाली गैसों पर नियंत्रण पाया जा सकता है. याद रहे कि जो कुछ हो रहा है या हो चुका है वैज्ञानिकों के अनुसार उसके लिए मानवीय गतिविधियाँ ही दोषी हैं.\n\nSummary:", "target": "ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है. विज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में सूखा बढ़ेगा, बाढ़ की घटनाएँ बढ़ेंगी और मौसम का मिज़ाज बुरी तरह बिगड़ा हुआ दिखेगा.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसका असर दिखने भी लगा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं और रेगिस्तान पसरते जा रहे हैं. कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं. कहीं सूखा है तो कहीं नमी कम नहीं हो रही है. वैज्ञानिक कहते हैं कि इस परिवर्तन के पीछे ग्रीन हाउस गैसों की मुख्य भूमिका है. जिन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड है, मीथेन है, नाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये गैसें वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इससे ओज़ोन परत की छेद का दायरा बढ़ता ही जा रहा है. ओज़ोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह है. तो क्या कारण हैं ग्लोबल वार्मिंग के? 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बीते साल जब ट्रंप हिलेरी क्लिंटन के साथ अमरीकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थे. जब ट्रंप ने चुनावी प्रचार के दौरान अमरीका को जलवायु परिवर्तन समझौते से बाहर कराने का वादा किया था. दरअसल ट्रंप ने साल 2011 में मेक अमरीका ग्रेट अगेन कहा था. तब वो राष्ट्रपति पद की दौड़ में तो शामिल नहीं थे लेकिन उन्होंने कहा था, ''मैं अपने सारे विकल्प खुले रखना चाहता हूं. क्योंकि हमें अमरीका को फिर से महान बनाना होगा.'' इसके बाद जब ट्रंप अमरीकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हुए, तब ये उनका चुनावी नारा बना. क्या है पेरिस समझौता? जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का मतलब है उद्योगों और कृषि कार्यों से उत्सर्जित होने वाली गैसों से पर्यावरण पर होने वाले नकारात्मक और नुक़सानदेह असर. पेरिस समझौते का मक़सद गैसों का उत्सर्जन कम कर दुनियाभर में बढ़ रहे तापमान को रोकना था. वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और कोशिश करना कि वो 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़े. मानवीय कार्यों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को इस स्तर पर लाना की पेड़, मिट्टी और समुद्र उसे प्राकृतिक रूप से सोख लें. इसकी शुरुआत 2050 से 2100 के बीच करना. हर पांच साल में गैस उत्सर्जन में कटौती में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करना. विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष देना और भविष्य में इसे बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता. ट्रंप के ट्वीट पर लोगों की चुटकी @AynRandPaulRyan ने ट्रंप के ट्वीट पर जवाब देते हुए लिखा, ''दुर्भाग्य से आपके पेरिस समझौते से बाहर आने के फैसले के चलते हम सब पानी में समा जाएंगे.'' अन्ना अकाना ने लिखा, ''ट्रंप आप इस्तीफा दे दीजिए.'' निक ने लिखा, ''जब राष्ट्रपति को क्लाइमेंट चेंज से ज्यादा कैपसलॉक पर यकीन हो तो मानिए कि अमरीका मुसीबत में है.'' ट्रंप के इस ट्वीट के सारे अल्फाबेट्स कैपिटल हैं. इस पर तंज करते हुए @ZaackHunt कहते हैं, ''मुझे लगता है कि आपका कैप्सलॉक बटन दबा रह गया है.'' जेमी कहते हैं, ''एक बार आप दफ्तर से बाहर निकल जाएं तो हम अमरीका को महान बनाने की सोच सकते हैं.'' ट्रंप की टा टा के बाद अब क्या होगा पेरिस समझौते का? पेरिस समझौते को भारत की मंज़ूरी का मतलब पेरिस समझौते का भारत पर क्या होगा असर? (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पेरिस समझौते से बाहर निकलने का फैसला कर चुके अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपना चुनावी नारा दोहराया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nट्रंप ने ट्विटर पर लिखा, ''मेक अमरीका ग्रेट अगेन,'' यानी अमरीका को फिर से महान बनाएंगे. इससे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्रंप के पेरिस समझौते से बाहर जाने फैसले पर कहा था- हम प्लेनेट को फिर से महान बनाएंगे. राष्ट्रपति ट्रंप ने इससे पहले कहा ट्रंप ने पूरा किया चुनावी वादा? बीते साल जब ट्रंप हिलेरी क्लिंटन के साथ अमरीकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थे. जब ट्रंप ने चुनावी प्रचार के दौरान अमरीका को जलवायु परिवर्तन समझौते से बाहर कराने का वादा किया था. दरअसल ट्रंप ने साल 2011 में मेक अमरीका ग्रेट अगेन कहा था. तब वो राष्ट्रपति पद की दौड़ में तो शामिल नहीं थे लेकिन उन्होंने कहा था, ''मैं अपने सारे विकल्प खुले रखना चाहता हूं. क्योंकि हमें अमरीका को फिर से महान बनाना होगा.'' इसके बाद जब ट्रंप अमरीकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हुए, तब ये उनका चुनावी नारा बना. क्या है पेरिस समझौता? जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का मतलब है उद्योगों और कृषि कार्यों से उत्सर्जित होने वाली गैसों से पर्यावरण पर होने वाले नकारात्मक और नुक़सानदेह असर. पेरिस समझौते का मक़सद गैसों का उत्सर्जन कम कर दुनियाभर में बढ़ रहे तापमान को रोकना था. वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और कोशिश करना कि वो 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़े. मानवीय कार्यों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को इस स्तर पर लाना की पेड़, मिट्टी और समुद्र उसे प्राकृतिक रूप से सोख लें. इसकी शुरुआत 2050 से 2100 के बीच करना. हर पांच साल में गैस उत्सर्जन में कटौती में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करना. विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष देना और भविष्य में इसे बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता. ट्रंप के ट्वीट पर लोगों की चुटकी @AynRandPaulRyan ने ट्रंप के ट्वीट पर जवाब देते हुए लिखा, ''दुर्भाग्य से आपके पेरिस समझौते से बाहर आने के फैसले के चलते हम सब पानी में समा जाएंगे.'' अन्ना अकाना ने लिखा, ''ट्रंप आप इस्तीफा दे दीजिए.'' निक ने लिखा, ''जब राष्ट्रपति को क्लाइमेंट चेंज से ज्यादा कैपसलॉक पर यकीन हो तो मानिए कि अमरीका मुसीबत में है.'' ट्रंप के इस ट्वीट के सारे अल्फाबेट्स कैपिटल हैं. इस पर तंज करते हुए @ZaackHunt कहते हैं, ''मुझे लगता है कि आपका कैप्सलॉक बटन दबा रह गया है.'' जेमी कहते हैं, ''एक बार आप दफ्तर से बाहर निकल जाएं तो हम अमरीका को महान बनाने की सोच सकते हैं.'' ट्रंप की टा टा के बाद अब क्या होगा पेरिस समझौते का? पेरिस समझौते को भारत की मंज़ूरी का मतलब पेरिस समझौते का भारत पर क्या होगा असर? 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इजाजत नहीं दे सकते. लेकिन अब तक यही होता आया है.\" समाप्त उन्होंने कहा, \"हम सबकुछ बदलने वाले हैं और हमारे पास कार्ड भी है, इसे भूलिएगा मत.\" ट्रंप कहते हैं, \"चीन पर इस्तेमाल करने के लिए हमारे पास बहुत सारी शक्तियां हैं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका के राष्ट्रपति चुनान में रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी की दौड़ में आगे चल रहे डोनल्ड ट्रंप ने चीन पर अमरीका का 'रेप' करने का आरोप लगाया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nट्रंप ने इंडियाना में एक रैली को संबोधित करते हुए चीन की व्यापार नीति की कड़ी आलोचना करते हुए उसे दुनियाभर के इतिहास में 'सबसे बड़ी चोरी' के लिए जिम्मेदार बताया. अरबपति कारोबारी ट्रंप लंबे समय से चीन को इस बात के लिए कोसते रहे हैं कि अपना निर्यात बढ़ाने के लिए चीन अपनी मुद्रा में जोड़-तोड़ करता रहा है. ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन के इस क़दम से अमरीकी कारोबार और कामगारों को बुरी तरह से नुकसान हुआ है. उन्होंने कहा, \"चीन अमरीका का 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लगीं हैं. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का कहना है, '' लोगों में उनकी छवि को धक्का लगा है क्योंकि यह धारणा बन गई है कि सोनिया गांधी पीछे से सरकार चला रही हैं.'' उनका कहना है, ''कारण यह भी है कि मनमोहन सिंह काफी संकोची है और ऐसा कहा जाता है सरकार चलाने का काम वो करते हैं और सारे राजनीतिक फ़ैसले सोनिया गाँधी करती हैं.'' विश्लेषकों का मत है कि हाल के घटनाक्रम ने सोनिया गाँधी के आभामंडल में सेंध ज़रूर लगा दी है. आउटलुक पत्रिका के संपादक आलोक मेहता कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ढोल पीटा इसलिए उनकी ऐसी छवि बनी. पर कांग्रेस में कई ऐसे नेता दबी ज़बान में कहते हैं कि त्याग वाली स्थिति अब नहीं है.'' वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी का कहना है कि सोनिया गाँधी अपनी छवि का इस्तेमाल यूपीए को मज़बूत करने के लिए और कांग्रेस के पुनर्जन्म के लिए कर सकती थीं पर वैसा हुआ नहीं. गठबंधन धर्म गठबंधन धर्म के पालन के लिए कांग्रेस पार्टी कितनी तैयार है इस पर अब एक बार फिर चर्चा हो रही है. तमिलनाडु में केंद्रीय मंत्री इवीकेएस इलागोवन के बयान कि कांग्रेस दूसरों को सत्ता में बनाए रखने के लिए राजनीति में नहीं है. इस बयान ने एक बार फिर कांग्रेस के गठबंधन के प्रति नजरिए को उजागर किया है. प्रभाष जोशी का मानना है कि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बिहार और उत्तरप्रेदश में है और शायद यही कारण था कि कांग्रेस ने बिहार में ऐसा रुख अपनाया. उनका कहना है,''कांग्रेस यह कोशिश कर रही है कि वह दलितों और मुसलमानों का एक गठबंधन बनाए जिसे वह अपनी ऊँची जाति के समर्थन को पुष्ट करते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार में अपनी ताक़त बढ़ाए. पर कांग्रेस ऐसा नहीं कर पायी.'' पर यह भी एक यथार्थ है कि केंद्र में सत्ता चलाने के अलावा सोनिया गांधी पर कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने का ज़िम्मा भी है. पर सवाल यह है कि जो नतीजे निकले उनसे शायद कुछ सीख भी कांग्रेस पार्टी को मिले. नीरजा चौधरी का मानना है,'' मुझे लगता है कि सलाहकार बदलने से ज़्यादा सोनिया गाँधी जिन लोगों की मदद से निर्णय ले रही हैं,उसे विस्तृत बनाए जाने की ज़रूरत है.'' उनका मानना है कि शुरू में जब वे कांग्रेस अध्यक्ष बनी थी तो 20-30 लोगों से हर बात पर राय लेती थी. सवाल है कि क्या अब कांग्रेस में आत्ममंथन होगा और पार्टी की कार्यप्रणाली बदलेगी आने वाले दिनों में ये तस्वीर 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पार्टी को किसी पार्टी से गठजोड़ नहीं करना चाहिए. कांग्रेस ने साल 2011 के आंदोलन के दौरान लोगों के साथ धोखा किया, जनता इससे नाराज़ थी. कांग्रेस अभी भी नहीं सुधरी तो लोकसभा चुनाव में भी उसे मुंह की खानी पड़ेगी. निर्मला सीतारामन हम 'आप' के प्रदर्शन का स्वागत करते हैं लेकिन 'आप' के उम्मीदवारों को किसी तरह से प्रलोभन देकर वहाँ फूट पैदा करने में भाजपा की कोई दिलचस्पी नहीं है. चंदन मित्रा मैं निराश हूँ. मुझे उम्मीद थी कि हम दिल्ली में क्लीन स्वीप करेंगे. ऐसी उम्मीद नहीं थी कि एक नई पार्टी जिसका कोई एजेंडा नहीं था, इतना अच्छा प्रदर्शन करेगी. इरफ़ान हबीब ये कांग्रेस के खिलाफ़ आम जनता का निर्णायक फ़ैसला है. इसमें किंतु-परंतु की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि इसका कोई मतलब नहीं होगा. कांग्रेस को संयम के साथ इन नतीजों को स्वीकार करना चाहिए. शाज़िया इल्मी आम आदमी पार्टी, किसी भी पार्टी से कोई गठजोड़ नहीं करेगी. हम असल मुद्दों को लेकर जनता के बीच गये थे. शेखर कपूर, फ़िल्मकार आम आदमी पार्टी को बधाई. उम्मीद है कि आप की जीत साल 2014 के चुनावों में एक नई क्रांति लाए. भारत बदलाव के लिए तैयार है. वहीं बीबीसी 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गुजरात के अहमदाबाद शहर में कोरोना मरीज़ों के लिए निर्धारित एक अस्पताल में आग लगने की एक घटना में 8 मरीज़ों की मौत हो गई है. मारे गए मरीज़ों में तीन महिलाएँ थीं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअहमदाहबाद के अतिरिक्त मुख्य अग्निशमन अधिकारी राजेश भट्ट ने बीबीसी को बताया कि शहर के नवरंगपुरा इलाक़े में स्थित श्रेय अस्पताल में तड़के तीन बजे आग लग गई. अधिकारी ने बताया कि आग अस्पताल के कर्मचारी पीपीई किट पहनकर काम कर रहे थे जब शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई. आग पर एक घंटे में क़ाबू पा लिया गया मगर अफ़रातफ़री की वजह से 8 मरीज़ों की मौत हो गई. राजेश भट्ट ने बताया कि आग लगने के बाद अस्पताल के 40 मरीज़ों को एसपीवी अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है. सभी मरीज़ कोरोना पॉज़िटिव थे. समाप्त अधिकारी ने कहा कि बचाव कार्य में लगे अग्निशमन दल के सभी कर्मचारियों को क्वारंटीन कर दिया गया है क्योंकि वो मरीज़ों के संपर्क में आए थे. पुलिस ने दुर्घटना में मौत का मामला दर्ज किया है और इस सिलसिले में जाँच की जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हादसे पर शोक जताया है और कहा है कि उन्हों मुख्यमंत्री विजय रूपाणी से बात की है. उन्होंने ट्वीट कर जानकारी की कि प्रशासन सभी प्रभावित लोगों को सहायता पहुँचा रहा है. मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने आग लगने की घटना की तत्काल जाँच के आदेश जारी किए हैं और तीन दिन के भीतर ज़िम्मेदार लोगों की पहचान करने का आदेश दिया है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "शायद अमीना हार्ट की यह योजना नहीं थी कि वह अपने स्पर्म डोनर को ढूंढकर उससे शादी करें, पर ऐसा हो गया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबीबीसी के अप ऑलनाइट कार्यक्रम में रॉड शार्प से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उनकी बेटी अपने पिता की डुप्लीकेट लगती है. अमीना एक अनजाने स्पर्म डोनर की मदद से मां बनी थीं लेकिन बाद में उनमें अपनी बेटी के पिता को लेकर उत्सुकता पैदा हो गई. वह कहती हैं, \"वह (उनकी बेटी) बहुत ही सुंदर थी लेकिन अपने सुनहरे बालों, नीली आंखों और गोरी त्वचा की वजह से साफ़ था कि मुझ पर नहीं गई थी क्योंकि मेरी त्वचा, बालों और आंखों का रंग काला है.\" अमीना ने औपचारिक ढंग से उस अनजान स्पर्म डोनर को संपर्क किया क्योंकि वह 'इतनी प्यारी बच्ची के लिए दिल से उनका धन्यवाद करना चाहती थीं.' समाप्त उन्हें स्पर्म डोनर के बारे में बस वही जानकारियां थीं, जो पंजीकरण करवाते समय दी जाती हैं. उन्होंने स्पर्म डोनर की शक्ल भी नहीं देखी थी. अमीना ने उस अनजान स्पर्म डोनर को अपनी बच्ची की तस्वीरें भेजीं और उसने भी काफ़ी सकारात्मक जवाब दिया. वे लोग छह महीने तक ईमेल के ज़रिए संपर्क में रहे. इसके बावजूद उन्होंने न स्पर्म डोनर की शक्ल देखी थी और न उसकी आवाज़ सुनी थी. जब उनकी बेटी एक साल की हो गई, तो वह छुट्टियां मनाने ब्रिटेन गईं, जहां वह अपने परिचितों और रिश्तेदारों को अपनी बेटी से मिला रही थीं. यही वह समय था जब वह उससे (स्पर्म डोनर) से मिलीं. अमीना कहती हैं, \"और वह दोनों मिलते ही एक-दूसरे को प्यार करने लगे. मुझे पता नहीं यह क्या था, किस वजह से था लेकिन पिता और बेटी को एक-दूसरे को देखते ही प्यार हो गया. और फिर यह संबंध और मज़बूत हो गया.\" अमीना ने अपने अनजान स्पर्म डोनर को ढूंढने, उससे मिलने और प्यार होने को लेकर अपनी किताब 'हाऊ आई मेट योअर फ़ादर' (मैं तुम्हारे पिता से कैसे मिली) में लिखा है. अब उनकी कहानी पर एक फ़िल्म भी बन रही है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बताया है कि उन्होंने अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को जीत की बधाई क्यों नहीं दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबाइडन और ट्रंप की फ़ाइल फ़ोटो व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि वो क़ानूनी लड़ाई के फ़ैसले आने तक इंतज़ार करेंगे तभी बाइडन को बधाई देंगे. रूसी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में पुतिन ने कहा कि औपचारिक बधाई देने में देरी से रूस और अमेरिका के रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि दोनों देशों के बीच के संबंधों में पहले से ही तनाव रहा है. लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से पुतिन की तारीफ़ करते रहे हैं और उन पर राष्ट्रपति बनने में रूस से मदद लेने का भी आरोप है. समाप्त रूस और अमरीका क्या बोले पुतिन पुतिन से पूछा गया कि बधाई न देकर क्या पुतिन दोनों देशों के रिश्तों को ख़राब नहीं कर रहे हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि 'जो रिश्ता पहले से ही ख़राब है वो और क्या ख़राब होगा'. पुतिन ने कहा, \"हमलोगों का दोनों से सम्मानजनक संबंध है. निवर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप और नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन दोनों से सम्मानजनक रिश्ते हैं. हमें किसी से कोई समस्या नहीं है. यह एक औपचारिक मामला है. हमारा कोई छुपा हुआ एजेंडा नहीं है. मुझे नहीं लगता कि औपचारिक रस्म निभाने में जल्दबाज़ी दिखाने से ख़राब रिश्ते अच्छे हो जाएंगे.\" पुतिन ने कहा कि दुनिया के जिन नेताओं ने बधाई दी है वे सभी अनुभवी लोग हैं और उन्हें पता है कि कब क्या करना है. रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि पिछली बार भी सबने हिलेरी क्लिंटन को बधाई दे दी थी लेकिन जीत ट्रंप को मिली थी. यूरोप के देश ट्रंप और पुतिन के रिश्तों से असहज राजनीतिक संघर्ष के थमने तक इंतज़ार पुतिन ने कहा कि वो अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति के साथ काम करने को तैयार हैं जिन्हें वहाँ की जनता ने चुना है लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि वोट गिने जाने और घरेलू राजनीतिक संघर्ष के थमने तक इंतज़ार किया जाए. पुतिन ने कहा, \"अमेरिकी जनता का जिस भी राष्ट्रपति में भरोसा होगा हम उनके साथ काम करने को तैयार हैं.\" अमेरिका में तीन नवंबर को चुनाव हुआ था. चुनावी नतीजों में ट्रंप के प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन को विजेता घोषित किया गया है. लेकिन ट्रंप इसे मानने को तैयार नहीं हैं. ट्रंप दावा कर रहे हैं कि वोटों की गिनती में धोखाधड़ी हुई है. कई राज्यों में वोटों की गिनती अब भी चल रही है. बाइडन को ट्रंप से 60 लाख ज़्यादा वोट मिले हैं. अमेरिका में जीत के लिए 270 इलेक्टोरल कॉलेज के वोट चाहिए और बाइडन को 306 वोट मिल गए हैं. इसके बावजूद ट्रंप अपनी हार को स्वीकार नहीं कर रहे हैं. हॉन्ग कॉन्ग पर चीन ने पश्चिमी देशों को दी धमकी चीन की चुप्पी जो बाइडन को बधाई देने को लेकर रूस के दोस्त चीन ने भी लंबे समय तक चुप्पी रखी. पर चीन ने आख़िरकार 13 नवंबर को बाइडन को बधाई दी थी. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने 13 नवंबर को एक बेहद ही औपचारिक भाषा में कहा था, \"हम अमेरिकी नागरिकों की पसंद का सम्मान करते हैं. जो बाइडन और कमला हैरिस को चीन बधाई देता है.\" चीन और अमेरिका के रिश्ते हाल के दिनों में काफ़ी तल्ख़ी वाले रहे हैं. ट्रेड, जासूसी और कोरोनो महामारी को लेकर चीन और अमेरिका में तनाव कई बार बद से बदतर स्थिति में पहुँच गया. जो बाइडन के सामने क्या हैं चुनौतियां? और जिन देशों से नहीं मिली बधाई जब ट्रंप को जीत मिली थी तो पुतिन ने तत्काल बधाई दी थी लेकिन बाइडन को लगता है कि पुतिन की बधाई के लिए और इंतज़ार करना पड़ सकता है. लेकिन बात केवल रूस और चीन तक ही सीमित नहीं है. बाइडन को अभी ब्राज़ील, मेक्सिको और उत्तर कोरिया से भी बधाई नहीं मिली है. ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो ट्रंप के अच्छे विश्वासपात्र माने जाते हैं. बाइडन ने अपने चुनावी कैंपेन में अमेज़न के जंगलों को बचाने के लिए ब्राज़ील पर दबाव डालने की भी बात कही थी. ऐसे में कहा जा रहा है कि ब्राज़ील की वर्तमान सरकार को ट्रंप की तुलना में बाइडन शायद अच्छे लगें. उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन भी बाइडन को बधाई देने के मामले में चुप हैं जबकि पिछले चुनाव में उन्होंने ट्रंप को तत्काल बधाई दी थी वहीं मेक्सिको के राष्ट्रपति आंद्रेस मैनुएल लोपेज ने कहा है कि वो बाइडन को बधाई देने में जल्दबाज़ी नहीं दिखाएंगे. लोपेज़ के भी ट्रंप से अच्छे रिश्ते हैं. ऐसा तब है जब ट्रंप मेक्सिको से आने वाले प्रवासियों को लेकर बहुत ही सख़्त रहे हैं. उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन भी बाइडन को बधाई देने के मामले में चुप हैं जबकि पिछले चुनाव में उन्होंने ट्रंप के तत्काल बधाई दी थी. बाइडन को लेकर कहा जाता है कि वो चीन और रूस को लेकर बहुत सख़्त रहेंगे और ऐसा कोई मौक़ा नहीं देंगे जिनसे दोनों देश वैश्विक रणनीति में भारी पड़ें. वहीं ट्रंप के बारे में कहा जाता है कि उनकी ग़लत नीतियों के कारण पिछले चार सालों में रूस और चीन को उभरने का मौक़ा मिला. 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(ये लेखक के निजी विचार हैं.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पिछला साल लालू यादव के लिए एक डरावने सपने की तरह था. उन्हें चारा घोटाले में दोषी क़रार दिया गया. वे चुनाव नहीं लड़ सकते थे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलोकसभा चुनाव में भी लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बुरी तरह हारी थी. कांग्रेस, और खासकर राहुल गांधी के साथ उनके रिश्ते पूरी तरह से बिगड़ चुके थे. वाकई लालू यादव पूरी तरह ख़त्म हो चुके थे. लेकिन हालिया बिहार विधानसभा चुनाव से उन्होंने वापसी की है. बिहार विधानसभा चुनाव में राजद अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. भाजपा के जो नेता 'किंग मेकर' कहकर उनका मखौल उड़ाया करते थे वे अपनी क़रारी हार के बाद अब ख़ामोश हो गए हैं. अपनी हार से भाजपा दुखी है. वो चाहती है कि लालू यादव नीतीश कुमार के लिए मुश्किलें खड़ी करें. समाप्त भाजपा ये सोच कर ख़ुश हो रही है कि आने वाले दिनों में लालू यादव के हाथ में रिमोट कंट्रोल रहेगा और बिहार की नई सरकार जल्दी ही गिर जाएगी. वो बल्कि राजद नेताओं को ये याद कराने में व्यस्त हो गई है कि लालू को उपमुख्यमंत्री पद की मांग करनी चाहिए. और भाजपा बेशक़ ये चाहती है कि राजद के विधायक उसी अराजकता का परिचय दें जिसके लिए लालू यादव बदनाम रहे हैं. यदि ऐसा हुआ तो बिहार की जीत की ख़ुशी जल्द ही ग़ायब हो जाएगी. और महागठबंधन तुरंत बिखर जाएगा. लेकिन लालू प्रसाद यादव ने संकेत दिए हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा. पटना में रविवार को हुए एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में संकेत दिए कि वे और नीतीश छिपी हुई दिक्कतों को लेकर पहले से सजग थे. उन्होंने वो बात भी कही जो जीत की धूमधाम में दब गई थी. वे बोले, \"हम इतने बेवकूफ़ नहीं कि आने वाले ख़तरों को भांप न सकें... अगर हमने अब ग़लती की तो जनता कभी माफ़ नहीं करेगी.\" लालू यादव ने अपने संकल्प को जाहिर किया कि वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की भूमिका निभाते रहेंगे. और ये संयोग नहीं कि उन्होंने ऐलान किया कि वे जनता का धन्यवाद देने के लिए वाराणसी, प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र, जाएंगे. बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के 1990-2005 के शासन काल को जंगल राज या अराजक शासन पुकारना एक फ़ैशन बन गया है. चारा घोटाला 1996 में सामने आया जिसमें 1983-1996 के बीच 1,200 करोड़ रुपए का घपला हुआ और इस मामले में लालू यादव को 1997 में गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया. ये मामला उन कई मामलों में से एक था जिनके आधार पर लालू को 2014 में दोषी करार देते हुए चुनाव लड़ने से रोक दिया गया. लेकिन उनके आलोचकों ने कई बातें बड़ी आसानी से भूला दी है. बिहार में 1980-1990 के बीच की अवधि कोई स्वर्णिम युग नहीं थी. लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री बनने के पहले जनसंहार, जाति आधारित निजी सेनाएं, माओवादी हिंसा, फिरौती के लिए अपहरण जैसी समस्याएं मौजूद थीं. साल 1995 में शानदार चुनावी जीत के बस एक साल बाद ही चारा घोटाला हुआ था. तत्कालीन मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री होने के कारण उन्हें तब इस घोटाले के लिए जवाबदेह ठहराया गया था. लालू के ख़िलाफ़ सारे सबूत परिस्थितिजन्य थे. सीबीआई ने घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा जैसे राजनेता, आईएएस अधिकारी, आपूर्तिकर्ताओं आदि पर आरोप लगाए थे. घोटाले को संरक्षण देने के बावजूद पुलिस और सतर्कता अधिकारी लोगों की आंखों में धूल झोंकने में सफल हो गए. इन संरक्षकों का एक बड़ा हिस्सा थे अगड़ी जातियां और 'शिक्षित'. लालू प्रसाद यादव जब केंद्रीय रेल मंत्री थे तो उनसे एक संवाददाता ने पूछा कि रेलवे में उल्लेखनीय काम करने के बावजूद वे बिहार में क्यों हार गए. उनका जवाब निरुत्तर कर देने वाला था. उन्होंने कहा, “ जब 1996 में काम करने का वक्त आया तो मुझे जेल में डाल दिया गया.\" हालांकि हल्के फुल्के अंदाज में कही गई ये बात सवाल का जवाब नहीं थी लेकिन इसमें एक आशय छिपा था. मुख्यमंत्री के रूप में ज़िम्मेदारी संभालने से पहले लालू यादव कभी भी मंत्री नहीं बने थे. उन्होंने काम करते हुए सब कुछ सीखा. अपने दूसरे कार्यकाल में ख़ुद का अस्तित्व बनाए रखने के लिए वे राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे थे. लेकिन 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल विवादों से मुक्त रहा. उन्होंने सबक ले लिया था. उन्होंने संवाददाता को बताया, “मैंने ख़ुद डॉ मनमोहन सिंह को कहा था कि मुझ पर नज़र रखने के लिए वे आईबी, रॉ और कोई दूसरी एजेंसी को लगा दें... मैं जानता हूं कि लोग मेरा भेद जानने के इंतज़ार में हैं.” उनके हाव-भाव से हम निश्चिंत हो सकते हैं कि लालू यादव को बिहार के लोगों ने जो दूसरा मौक़ा दिया है उसे वे अब नहीं गंवाएंगे. जनता ने दूसरा मौक़ा दिया है. तीसरे की बारी कभी नहीं आएगी. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत में ग़रीबों के लिए काम करने वाली नन मदर टेरेसा को वेटिकन में हुए एक समारोह में संत की उपाधि दी गई.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nरविवार को वेटिकन के सेंट पीटर स्क्वायर में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि दी. इस मौक़े पर वहां हुए विशेष कार्यक्रम में दसियों हज़ार लोग मौजूद थे. भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कार्यक्रम में शरीक होने के लिए ख़ास तौर से वेटिकन गए हैं. 1997 में मदर टेरेसा का निधन हो गया था. लेकिन मदर टेरेसा के नाम से दो बीमारियों के चमत्कारिक ढंग से ठीक होने के बाद वेटिकन ने उन्हें संत बनाने का रास्ता साफ़ कर दिया था. संत का दर्जा पाने के लिए कम से कम दो चमत्कार करना ज़रुरी है. समाप्त वेटिकन के अनुसार साल 2002 में मदर टेरेसा से प्रार्थना करने के बाद एक भारतीय महिला मोनिका बेसरा के पेट का ट्यूमर चमत्कारिक ढंग से ठीक हो गया था. इसी तरह वेटिकन ने टेरेसा से जुड़े एक और चमत्कार की पुष्टि की थी. 2008 में ब्राज़ील की एक महिला का ब्रेन ट्यूमर ठीक हो गया. इसे पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार के रूप में मान्यता दे दी. इसके बाद अगले साल यानी साल 2009 में उन्हें संत बनाए जाने का रास्ता साफ़ हो गया था. मदर टेरेसा को 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया था जो संत बनाए जाने की प्रक्रिया का पहला चरण है. मदर टेरेसा को कोलकाता की झुग्गी बस्तियों में उनके काम के लिए शांति के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. उनका निधन 87 साल की उम्र में हुआ था. उन्होंने 1950 में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की शुरुआत की थी. कोलकाता में इस मौक़े पर मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी में उत्सव का माहौल है. मदर टेरेसा के मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी से दुनिया भर की तीन हज़ार से ज़्यादा नन जुड़ी हुई हैं. कुष्ठ रोगियों की बस्तियां, ग़रीबों के लिए रसोई, स्कूल, आश्रम, अनाथ बच्चों के लिए घर आदि ऐसी सेवाएं हैं जो मदर टेरेसा ने शुरू की थी. हालांकि उन्हें आलोचना का भी शिकार होना पड़ा. उन पर उनकी मिशनरीज़ की ओर से चलाए जाने वाले अस्पतालों में सफ़ाई व्यवस्था ख़राब होने के आरोप लगे. उन पर चैरिटी वर्क के लिए पैसा लेने के भी आरोप लगाए गए. 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चुनाव के शुरुआती दौर में तो केंद्र में मंत्री दिलीप सिंह जूदेव का नाम चर्चा में था मगर रिश्वत कांड में उनका नाम आने के बाद उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था और माना जा रहा है कि शायद उसी वजह से उनका दावा नहीं रहेगा. मगर राज्य के प्रभारी राजनाथ सिंह से जब इस बारे में पूछा गया कि क्या जूदेव के नाम पर भी विचार होगा तो उनका कहना था कि वह इस बारे में विधायकों से बातचीत के बाद ही कुछ फ़ैसला करेंगे. जूदेव ने तो ये भी कह दिया था कि अगर भाजपा चुनाव नहीं जीती तो वह अपनी मूँछ कटा देंगे. ऐसे में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह का नाम भी काफ़ी चर्चा में है. राजनाथ सिंह ने कहा कि चुनाव के बाद बनने वाली भाजपा सरकार जोगी के विवादास्पद फ़ैसलों की समीक्षा भी करेगी. उन्होंने कहा कि जल्दी ही इस बात का फ़ैसला हो जाएगा कि मुख्यमंत्री की गद्दी कौन सँभालेगा.\n\nSummary:", "target": "छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री अजीत जोगी को नकारते हुए भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनवगठित राज्य में पहली बार हुए चुनाव में पार्टी ने 90 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत हासिल कर लिया है. भाजपा ने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर किसी को भी पेश नहीं किया था इसलिए अटकलों का बाज़ार गर्म है और राज्य के भाजपा प्रभारी राजनाथ सिंह के अनुसार विधायकों से चर्चा के बाद ही इस बात का फ़ैसला किया जाएगा. मुख्यमंत्री अजीत जोगी भाजपा के नंद कुमार साय को 52,141 मतों से हराकर अपनी सीट बचाने में क़ामयाब हो गए मगर कांग्रेस की चुनावी नैया वह पार नहीं लगा सके. हारने वाले प्रमुख लोगों में रायगढ़ सीट से स्वास्थ्य मंत्री केके गुप्ता, नागरिक आपूर्ति मंत्री चनेशराम रथिया, जशपुर से विक्रम भगत और डोंगरगाँव से महिला और बाल कल्याण मंत्री गीता देवी शामिल हैं. शुरुआती तौर पर तो लग रहा था कि मुक़ाबला काँटे का चल रहा है मगर धीरे-धीरे जैसे ही नतीजे आने लगे भाजपा ने बढ़त बना ली. इस बीच निवर्तमान मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कहा है कि वह जनमत का सम्मान करेंगे और सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएँगे. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सलियों से साठ-गाँठ का आरोप लगते रहे थे मगर उन्हीं क्षेत्रों में उनकी पार्टी को नुक़सान हुआ है. जोगी के अनुसार नतीजे साफ़ करते हैं कि ये आरोप निराधार थे. कौन होगा नेता? 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इराक़ी सेना में हुई एक जांच से ऐसे लगभग 50 हज़ार सैनिकों का पता चला है जिनके नाम से वेतन तो लिया जा रहा है, लेकिन असल में उनका अता-पता नहीं है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nऐसे सैनिकों को 'भूत सैनिक' का नाम दिया गया है. अब प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है कि इन सैनिकों के नाम पर दिए जाने वाले वेतन पर रोक लगा दी गई है. संवाददाताओं का कहना है कि इराक़ी सेना में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है जिसके चलते इस्लामिक स्टेट से निपटने की उसकी क्षमता भी प्रभावित होती है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार इराक़ी प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी के प्रवक्ता रफ़ीद जबूरी ने कहा, \"पिछले कुछ हफ़्तों से प्रधानमंत्री इन भूत सैनिकों के मामले को उजागर करने और इस मामले की तह तक जाने के लिए क़दम उठा रहे थे.\" आईएस की चुनौती इराक़ी सेना के लिए इस्लामिक स्टेट एक बड़ी चुनौती बना हुआ है माना जाता है कि ये वेतन सेना के भ्रष्ट अधिकारी निकाल रहे थे. एक अधिकारी ने एएफ़पी को बताया कि लगभग इन 50 हज़ार सैनिकों में ऐसे सैनिकों के नाम भी शामिल हैं जो या तो हालिया लडाई में मारे गए हैं या फिर सेना को छोड़ चुके हैं. इराक़ी सेना को खड़ा करने में अमरीका ने अरबों डॉलर ख़र्च किए हैं. लेकिन हाल के महीनों में इराक़ी सेना चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लाचार दिखती रही है और इराक के एक बड़े इलाके पर आईएस का नियंत्रण हो चुका है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बिज़नेस स्कूलों और मार्केटिंग गुरुओं के सिद्धांत ‘जो दिखता है, वो बिकता है’ की कामयाबी पर किसी को संदेह नहीं है लेकिन क्या इसे राजनीतिक दलों पर लागू किया जा सकता है?", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nक्या इस सिद्धांत के आधार पर राजनीतिक दल अपनी स्वयंसिद्ध और आज़माई हुई रणनीति छोड़ने का ख़तरा मोल ले सकते हैं? क्या ‘पारंपरिक’ बिहार ‘नवचेता’ बिहार पर आज भी भारी है? बल्कि इतना अधिक कि लौटकर उसके पास जाना सियासी जमातों की मजबूरी हो गया है? बिहार में अक्तूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के संदर्भ में इसका कोई स्पष्ट उत्तर तो शायद न मिले लेकिन तीनों सवालों को जोड़कर देखने पर लगता है कि सारे राजनीतिक दल अभियान के सिलसिले में इस बार कुछ नया कर रहे हैं. अंतर केवल इतना है जहां सत्ता की उम्मीद में भाजपा ‘पारंपरिक’ तरीक़ों की ओर लौट रही है, वहीं जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस गठबंधन आभासी प्रयोग कर रहा है, जो उसने पहले कभी नहीं किया. समाप्त सोशल मीडिया का हथियार ट्विटर युद्ध के महारथियों से लैस भाजपा की रणनीति बदलने के दो मुख्य कारण बताए जा रहे हैं. पहला यह कि पार्टी के दिग्गज आश्वस्त नहीं हैं कि बिहार में पहुंच के लिए सोशल मीडिया जैसा कारगर हथियार हो सकता है, जैसा वह आम चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर था. दूसरा कारण इसका ठीक उल्टा है. यह कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहल करके ट्विटर और सोशल मीडिया के दूसरे हथियार भाजपा से छीन लिए. ‘शब्द वापसी’ का पूरा युद्ध और डीएनए के नमूने दिल्ली भेजने के अभियान को देखते हुए भाजपा ने युद्ध के हथियार बदल देना उचित समझा. कुछ प्रेक्षकों का कहना है कि हो सकता है ‘बिहार के चर्चित पिछड़ेपन’ की वजह से भाजपा समाज में नए मीडिया की पहुंच और उसके दख़ल के बारे में दुविधा में हो. बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं. 38 ज़िलों में फैली हुई. कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर और 2011 की जनगणना मुताबिक़ कुल आबादी 10.38 करोड़, जो संख्या के हिसाब से उसे देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य बनाती है. परिवर्तन यात्रा और रथ ज़ाहिर है, ‘बढ़ चलने’ के बावजूद बिहार में राज्य पक्षी ‘गौरैया’ की बात कम सुनी जाती है. राज्य पशु ‘बैल’ के सहारे इतने बड़े क्षेत्र में हर जगह पहुंचना क़रीब-क़रीब असंभव है. पहुंचे भी तो मुमकिन है तब तक अगले चुनाव का वक़्त आ जाए. राज्य पुष्प ‘गेंदा’ ज़रूर हर जगह है पर सिर्फ़ शोभा बढ़ाने के काम आता है. प्रधानमंत्री के भाषण और मुख्यमंत्री के डीएनए पर सवाल उठाने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ‘परिवर्तन यात्रा’ के 200 रथों को हरी झंडी दिखाई. पहला रथ हरिहर क्षेत्र से रवाना हुआ. ये यात्राएं एक महीना चलने वाली हैं. टेम्पो-ट्रैवेलर से बनाए गए रथों की सुविधाएं, मसलन बिस्तर, फ्रिज, एसी और लालबत्ती छोड़ दीजिए तो भी इनका सीधा अंकगणित कम चमत्कारिक नहीं है. केंद्रीय रसायन मंत्री और बिहार के प्रभारी अनंत कुमार के अनुसार रथों की संख्या 160 से 200 तक होगी और इनका उद्देश्य ‘सीधे संपर्क के साथ सकारात्मक प्रचार’ अभियान होगा. ज़मीनी राजनीति इस हिसाब से राज्य के हर ज़िले में चार से पांच रथ होंगे और प्रतिदिन एक सौ किलोमीटर के औसत से दिन में पांच सौ किलोमीटर चलेंगे. तीस दिन के अभियान में हर ज़िले में पंद्रह हज़ार किलोमीटर तय किए जाएंगे. यानी वे हर जगह दिखेंगे. कई जगह, कई बार. सारे ज़िलों में कुल मिलाकर ये रथ पांच लाख सत्तर हज़ार किलोमीटर चलेंगे, जिसका जवाब दूसरे ख़ेमे को तलाश करना होगा. पिछले किसी चुनाव में ऐसा ज़मीनी अभियान देश ने शायद नहीं देखा होगा. बिहार में खेल बदल गया है. जो सोशल मीडिया के हिमायती थे, आभासी संसार से ज़मीन पर उतर आए हैं. ज़मीनी राजनीति करने वाले आभासी हथियार उठाए हुए हैं. किसके पांव कीचड़ में सने होंगे और किसके तीर निशाने पर लगेंगे, महीने-डेढ़ महीने में पता चल जाएगा. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद शहर में मौजूद भारतीय वाणिज्य दूतावास के पास हुए धमाकों में कम से कम सात लोगों की मौत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़ाइल फ़ोटो वहां हुए दो धमाकों में दो नागरिकों के मारे जाने की खबर है. सुरक्षा बलों से हुई मुठभेड़ और विस्फोट में इस हमले में शामिल दो आत्मघाती हमलावर और चार बंदूकधारी भी मारे गए हैं. धमाकों के अलावा गोली चलने की भी ख़बरें हैं. जनवरी में जलालाबाद में ही पाकिस्तानी कॉंसुलेट पर भी इसी तरह का हमला किया गया था. नंगरहार प्रांत में तालिबान और इसलामिक स्टेट दोनों संगठनों के लड़ाकू सक्रिय हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय ने बताया कि एक आत्मघाती हमलावर ने ख़ुद को उड़ा लिया. समाप्त एक डॉक्टर ने बीबीसी को बताया कि नंगरहार प्रांत की राजधानी जलालाबाद में हुए इन धमाकों में कम से कम नौ लोग ज़ख़्मी हो गए हैं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. शुरुआती ख़बरों में कहा गया था कि धमाके भारतीय वाणिज्य दूतावास के क़रीब हुए हैं. पाकिस्तान का वाणिज्य दूतावास भी पास में ही है. धमाकों की वजह से दूतावास और आसपास की इमारतों की खिड़कियों के शीशे टूट गए और कम से कम आठ कारें ध्वस्त हो गईं. बताया जाता है कि भारतीय वाणिज्य दूतावास के पास हुए ये धमाके आत्मघाती हमले थे. हमले को देखते हुए आसपास की सड़कों को बंद कर दिया गया है. 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'ई-बुक' छपी किताबों का इलेक्ट्रॉनिक संस्करण है जिसे आप कंप्यूटर, मोबाइल या आईपैड पर पढ़ सकते हैं. यूरोप, अमरीका समेत कई देशों में तो ये ख़ासी लोकप्रिय हो चुकी हैं. लेकिन क्या भारत में भी ई-बुक अपनी पैठ बना चुकी है. समाप्त क्या परंपरागत किताबों के बाज़ार को ई-बुक्स से ख़तरा महसूस हो रहा है? क्या कहता है बाज़ार? ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट अमेज़न इंडिया के प्रवक्ता का कहना है, \"भारत में ई-बुक का बाज़ार फ़िलहाल नवजात है. वैसे किताबों के बाज़ार में भारत की गिनती विश्व के टॉप टेन देशों में है. भारत अंग्रेज़ी किताबों का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार है.\" फ्लिपकार्ट के प्रवक्ता गौरव गुप्ता के मुताबिक़, \"भारत में अभी भी छपी किताबों का दबदबा ज़्यादा है. लेकिन इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन और टेबलेट इस्तेमाल करने वालो की संख्या निरंतर बढ़ने के कारण ई-बुक पढ़ने वालों की संख्या भी बहुत बढ़ी है. इंडस्ट्री रिपोर्ट के मुताबिक़ अगले तीन-चार साल में ई-बुक पढ़ने वालों की संख्या कुल किताब पढ़ने वालों की संख्या की 25 फ़ीसदी हो जाएगी.\" कौन हैं ग्राहक? गौरव गुप्ता के मुताबिक़ ई-बुक पढ़ने वालों में ज़्यादातर युवा हैं. साथ ही वो विद्यार्थी वर्ग जो सफ़र करने के दौरान इन्हें पढ़ना पसंद करता है. फ़िलहाल ई-बुक का बाज़ार मेट्रो शहरों में ज़्यादा है. विज्ञान की छात्रा उर्मिला सुब्रमण्यम कहती हैं, \"मुझे दोनों फॉर्मेट में किताबे पसंद है पर ई-बुक की ख़ासियत ये है कि इससे आपके बैग का वज़न नहीं बढ़ता.\" मीडियाकर्मी स्वाति रोहतगी कहती हैं, \"मुझे छपी किताबे पढ़ना ज़्यादा पसंद है लेकिन उसे हमेशा साथ रखना मुमकिन नहीं इसलिए अब मैं ई-बुक भी पढ़ने लगी हूं.\" असर मुंबई की 160 साल पुरानी लाइब्रेरी डेविड सिसोन की सेक्रेटरी उमा वाघले का कहना है, \"इस लाइब्रेरी में काफ़ी बदलाव आए हैं. बीच में ई-बुक के बढ़ते चलन की वजह से हमारे यहां पाठक कुछ कम ज़रूर हुए थे, लेकिन अब वापस से वो आने लगे हैं. युवा वर्ग, क्षेत्रीय भाषा की किताबों में भी दिलचस्पी लेने लगा है. लेकिन हां, 40 की उम्र से ज़्यादा के पाठक अधिकता में हैं.\" पेशे से वकील संदेश सेठ कहते हैं, \"मुझे तो लाइब्रेरी जाकर किताबें पढ़ना ज़्यादा अच्छा लगता है. जो नशा असल किताबों का है वो कंप्यूटर या फ़ोन में किताबे पढ़ने से नहीं मिलता.\" उमा वागले अंत में कहती है, \"छपी किताब ख़रीदने के बाद आपकी हो जाती है. पर ई-बुक आपको पढ़ने का लाइसेंस देती है उस पर मालिकाना हक़ नहीं.\" (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "'किताब एक सपना है जो आप अपने हाथ में पकड़ते है.' नील गैमन के ये शब्द किताब की अहमियत बताने के लिए काफ़ी हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत में किताब, लेखक और पाठकों का अपना इतिहास है. वक़्त के साथ साथ इसमें कई बदलाव आए है. इंटरनेट क्रांति के बाद ज्ञान और कहानियां सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रह गई. किताबों को नई प्रजाति मिल गई जिसे नाम दिया गया 'ई-बुक'. 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अख़बार लिखता है कि मालेगाँव में मस्जिद के पास विस्फोट के बाद ह्दयविदारक दृश्य था. लोग एक संकरे दरवाज़े से बाहर निकल रहे थे. लोग रास्ते में पड़े मृतकों और गंभीर रूप से घायल लोगों पर चढ़कर भाग रहे थे. अंग्रेज़ी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस की हेडिंग है- आतंक का 38 लोग निशाना बने, पहले से ही बंटे हुए शहर को निशाना बनाया. पंजाब केसरी ने ख़बर छापी है कि इस घटना के बाद राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है. अमर उजाला का शीर्षक है- मालेगाँव में मस्जिद के पास धमाके. अख़बार लिखता है कि बड़े शहरों में करोड़ों लोगों पर नज़र रखना मुश्किल है लेकिन बमुश्किल चार लाख की आबादी वाले मालेगाँव में खु़फ़िया तंत्र की कमजोरी निराश करती है. हिंदुस्तान का शीर्षक है- मस्जिद पर आतंकी हमला. अख़बार लिखता है कि मालेगाँव के धमाकों को जिस तरह से अंजाम दिया गया, उससे आशंका जाहिर की जा रही है कि चरमपंथी फकीर के वेष में आए थे. हिंदुस्तान टाइम्स की हेडिंग है- आतंक ने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाक़े को निशाना बनाया. अख़बार लिखता है कि मालेगाँव के सांप्रदायिक इतिहास और बेराज़गार नवयुवकों की बड़ी 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फरवरी)- दिन-रातचौथा एक दिवसीय: मुल्तान (16 फरवरी)- दिन-रातपाँचवाँ एक दिवसीय: कराची (19 फरवरी)\n\nSummary:", "target": "भारतीय क्रिकेट टीम के ऑफ़ स्पिनर हरभजन सिंह के पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पहले एक दिवसीय मैच में खेलने पर संदेह के बादल मँडरा रहे हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसोमवार को पेशावर में भारत और पाकिस्तान के बीच पाँच एकदिवसीय मैचों की सिरीज़ का पहला मैच खेला जाएगा. भारतीय टीम के कप्तान राहुल द्रविड़ ने पेशावर में पत्रकारों को बताया, \"शनिवार को अभ्यास करते समय हरभजन को उस ऊंगली में चोट लग गई जिससे वे स्पिन कराते हैं. उनकी ऊंगली सूज गई है.\" द्रविड़ ने उम्मीद जताई कि हरभजन सोमवार को मैच शुरू होने से पहले फ़िट हो जाएँगे. लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि सोमवार सुबह तक अगर वे फ़िट नहीं हुए तो वे मैच नहीं खेल पाएँगे. हरभजन सिंह को तीन टेस्ट मैचों की सिरीज़ के दो टेस्ट मैचों में ही खेलने का मौक़ा मिला था लेकिन उन्हें कोई विकेट नहीं मिल पाया था. जबकि तीसरे टेस्ट में उन्हें टीम में शामिल नहीं किया गया था. हरभजन सिंह के बारे में द्रविड़ ने कहा, \"दक्षिण अफ़्रीका और श्रीलंका के ख़िलाफ़ घरेलू सिरीज़ में हरभजन सिंह ने अच्छा प्रदर्शन किया था. मुझे उम्मीद है कि इस सिरीज़ में भी वे अच्छा खेल दिखाएँगे.\" भारतीय टीम (इनमें से चुनी जाएगी) राहुल द्रविड़ (कप्तान), वीरेंदर सहवाग (उप कप्तान), सचिन तेंदुलकर, युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ़, महेंद्र सिंह धोनी, सुरेश रैना, गौतम गंभीर, इरफ़ान पठान, अजित अगरकर, ज़हीर ख़ान, रूद्र प्रताप सिंह, एस श्रीसंत, मुरली कार्तिक और हरभजन सिंह पाकिस्तान टीम (इनमें से चुनी जाएगी) इंज़माम-उल-हक़ (कप्तान), यूनुस ख़ान (उप कप्तान), मोहम्मद यूसुफ़, सलमान बट, कामरान अकमल, फ़ैसल इक़बाल, शोएब मलिक, अब्दुल रज़्ज़ाक़, शाहिद अफ़रीदी, शोएब अख़्तर, मोहम्मद आसिफ़, राणा नवीद, उमर ग़ुल, अरशद ख़ान मैचों के कार्यक्रम पहला एक दिवसीय: पेशावर ( 6 फरवरी)दूसरी एक दिवसीय: रावलपिंडी (11 फरवरी)तीसरा एक दिवसीय: लाहौर (13 फरवरी)- दिन-रातचौथा एक दिवसीय: मुल्तान (16 फरवरी)- दिन-रातपाँचवाँ एक दिवसीय: कराची (19 फरवरी)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", 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तक मां के साथ चिपटे रहते हैं. ओरैंगउटैन मलय भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है 'जंगल का व्यक्ति'. हिंदी में इसे वनमानुष कहते हैं. गोरिल्ला भी बहुत बुद्धिमान प्राणी है और चिंपांज़ियों की तरह इसे भी इशारों की कुछ भाषा सिखाने में सफलता मिली है. चौड़ी नाक वाला कैमान मगरमच्छ पूर्वी, मध्य और दक्षिण अफ़्रीका में पाया जाता है. भूरे भालू आमतौर पर अकेले रहते हैं और भालू मां अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद आक्रामक होती है. एक वेरेऑक्स सिफ़ाका मां अपने बच्चे के साथ. अलास्का में अपनी गुफ़ा के बाहर एक ध्रुवीय भालू मां अपने शावक के साथ. केन्या में नाकारु झील के पास अपने दो महीने के बच्चे के साथ सफेद गैंडा. एशियाई हाथी और उसका बच्चा, बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान दरियाई घोड़ा और उसका बच्चा, दक्षिण लुंवांगवा राष्ट्रीय उद्यान, जाम्बिया पहाड़ी बकरी अपने बच्चे के साथ, माउंट इवांस, कोलोराडो हिरण प्रजाति में सबसे बड़ा होता है मूस. एक मादा मूस अपने एक नवजात बछड़ों के साथ, टोनी नोल्स तटीय ट्रेल, एंकोरेज सेरेंगेटी राष्ट्रीय उद्यान, तंजानिया में एक रॉक हाइरैक्स अपने बच्चों के साथ. यह प्राणी अन्य जीवों से इतना अलग है कि इसे एक अलग प्रजाति हाइरेकोएडी में रखा गया है. इसे हाथी का सबसे नज़दीकी जीवित रिश्तेदार माना जाता है. टोंगा में अपने बच्चे को साथ लेकर तैरती एक हंपबैक व्हेल मां. क्यूबेक के मैगडैलेन द्वीप पर एक सील अपने बच्चे को नाक छूकर प्यार करती हुई. एक चिलियन फ़्लैमिंगो अपने चूज़े को खिलाती हुई. बाली में स्पाइन-चीक एनिमोनफीश अपने नन्हे से बच्चे के साथ. (अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "कहा जाता है कि मां के प्यार से बढ़कर दुनिया में कुछ भी नहीं होता और इसे साबित करने के लिए किसी सबूत की भी ज़रूरत नहीं होती.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nओरैंगउटैन या वनमानुष को जीव जगत में इंसान का सबसे नज़दाकी रिश्तेदार माना जाता है. बीबीसी अर्थ ने मदर्स डे के मौक़े पर इन 21 तस्वीरों के माध्यम से एक मां के प्यार को दिखाया है फिर चाहे वो जानवरों की ही दुनिया क्यों ना हो. चीता सबसे तेज़ गति से दौड़ने वाला जानवर है. लेकिन इस मां के लिए यह समय रुककर अपने शावकों को दुलारने का है. वेरेऑक्स सिफ़ाका या सफ़ेद सिफ़ाका लंगूर प्रजाति का जीव है, जो मूलतः मेडागास्कर में पाया जाता है. अंटार्कटिक और इसके आस-पास के द्वीपों में रहने वाले जेंटू पेंगुइन तीसरे सबसे बड़े पेंगुइन होते हैं जिनकी ऊंचाई 30 इंच और वज़न 5.5 किलो तक हो सकता है. चूहे जैसा दिखने वाला उत्तरी अमरीका का ओपस्सम एक शिशु धानी वाला प्राणी है. कंगारू की तरह इसके बच्चे जीवित रहने के लिए कुछ समय तक मां के साथ चिपटे रहते हैं. ओरैंगउटैन मलय भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है 'जंगल का व्यक्ति'. हिंदी में इसे वनमानुष कहते हैं. गोरिल्ला भी बहुत बुद्धिमान प्राणी है और चिंपांज़ियों की तरह इसे भी इशारों की कुछ भाषा सिखाने में सफलता मिली है. चौड़ी नाक वाला कैमान मगरमच्छ पूर्वी, मध्य और दक्षिण अफ़्रीका में पाया जाता है. भूरे भालू आमतौर पर अकेले रहते हैं और भालू मां अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद आक्रामक होती है. एक वेरेऑक्स सिफ़ाका मां अपने बच्चे के साथ. अलास्का में अपनी गुफ़ा के बाहर एक ध्रुवीय भालू मां अपने शावक के साथ. केन्या में नाकारु झील के पास अपने दो महीने के बच्चे के साथ सफेद गैंडा. एशियाई हाथी और उसका बच्चा, बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान दरियाई घोड़ा और उसका बच्चा, दक्षिण लुंवांगवा राष्ट्रीय उद्यान, जाम्बिया पहाड़ी बकरी अपने बच्चे के साथ, माउंट इवांस, कोलोराडो हिरण प्रजाति में सबसे बड़ा होता है मूस. एक मादा मूस अपने एक नवजात बछड़ों के साथ, टोनी नोल्स तटीय ट्रेल, एंकोरेज सेरेंगेटी राष्ट्रीय उद्यान, तंजानिया में एक रॉक हाइरैक्स अपने बच्चों के साथ. यह प्राणी अन्य जीवों से इतना अलग है कि इसे एक अलग प्रजाति हाइरेकोएडी में रखा गया है. इसे हाथी का सबसे नज़दीकी जीवित रिश्तेदार माना जाता है. टोंगा में अपने बच्चे को साथ लेकर तैरती एक हंपबैक व्हेल मां. क्यूबेक के मैगडैलेन द्वीप पर एक सील अपने बच्चे को नाक छूकर प्यार करती हुई. एक चिलियन फ़्लैमिंगो अपने चूज़े को खिलाती हुई. बाली में स्पाइन-चीक एनिमोनफीश अपने नन्हे से बच्चे के साथ. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "शहर के कई पुराने इलाक़ों में पानी बुरी तरह से भरा हुआ है और हज़ारों लोग अभी भी बेघर हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकोट्टुरपुरम इलाक़े में कई मकान ऐसे हैं जिनकी पहली मंज़िल को पानी अभी तक निगले हुए हैं. हमसा और उनका परिवार इस आपदा के अलावा देर से मिल रही मदद से भी आहत है. उन्होंने बताया, \"पांच दिन से इसी नाइटी में यहाँ-वहां घूम रही हूं, मदद कैसी होगी. हमारा घर पहली मंज़िल पर था और हमें तीसरी पर जाकर शरण लेनी पड़ी. सब सामान बर्बाद हो गया है, न जाने कब तक भटकना पड़ेगा\". कोट्टुरपुरम से क़रीब दो किलोमीटर आगे चलने पर एक बस्ती हुआ करती थी जिसका अब नामोनिशान तक नहीं बचा है. समाप्त स्थानीय प्रशासन ने यहाँ एक कैंप लगाया है जहाँ दिन रात लोग अपने डूबे हुए सामान की शिकायत दर्ज करा रहे हैं. ऐसे ही एक व्यक्ति बर्नाड ने कहा, \"अगर ये निचला इलाक़ा था तब आख़िर सरकार ने हमें यहाँ घर बनाने की इजाज़त ही क्यों दी थी? अब हमारे घरों में पानी है तो उसे बाहर भी निकलवाया जाए\". कुछ ऐसा ही मंज़र गणेशपुरम में मिला जहाँ दर्जनों घर पानी भरने से वीरान हो चुके हैं और उनमें रहने वाले बच्चे-औरतें और बूढ़े सभी पास के स्कूलों में या बस-स्टॉप पर रात बिता रहे है. यहीं के निवासी प्रभु बताते है, \"पास के महंगे इलाक़ों में तो बिजली कल शनिवार को बहाल हो गई लेकि हम ग़रीबों का क्या होगा. सिर्फ़ खाने के पैकेटों पर जी रहे हैं और उन्हें लेने के लिए भी बारिश में खड़े होकर लाईन लगानी पड़ती है\". चेन्नई के सैदापेट इलाक़े में भी हालात कष्टकारी बने हुए हैं. हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार 'सरकार कपड़ों से लेकर खाने तक की सभी सुविधा मुहैया करा रही है'. लेकिन पूरे इलाक़े में अभी भी ट्यूबवेलों के ज़रिए पानी निकाल जा रहा है और दिन भर सड़कों पर खाना पहुंचाने वाली गाड़ियों के आगे लंबी क़तारें लगी रहतीं हैं. ज़मीनी स्थिति को देखते हुए कहना ग़लत नहीं होगा कि स्थिति सामान्य होने में हफ़्तों लग सकते हैं. 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'ऐतिहासिक जीत' मंगलवार रात को राजस्थान की राजधानी जयपुर में गूजरों की ओर से निर्णायक दौर की वार्ता की अगुआई कर रहे कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने तब तक हुए 'समझौते' को ऐतिहासिक जीत बताया है. राज्य सरकार की ओर से प्रतिनिधिमंडल में शामिल रामदास अग्रवाल और बैंसला ने एकसाथ इस 'समझौते' की चर्चा की थी. दोनों ने कहा था कि वे ख़ुश हैं. हालाँकि समझौते का दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किया गया था. कर्नल बैंसला ने कहा था, \"बुधवार को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ मैं समझौते पर औपचारिक दस्तख़त करुँगा और उसके बाद इसे सार्वजनिक किया जाएगा.\" कर्नल बैंसला ने सिर्फ़ इतना बताया था, \"समझौते के तहत आरक्षण की जो व्यवस्था की गई है उससे किसी अन्य वर्ग को नुकसान नहीं होगा.\" उन्होंने सबका शुक्रिया अदा किया था और सफल बातचीत के लिए मुख्यमंत्री के प्रति आभार व्यक्त किया. गूजर नेता रामसिंह विधूड़ी ने बीबीसी को बताया था कि 'समझौते' में गूजरों को चार से छह फ़ीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था की बात है और यह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कोटे के भीतर ही होगी. यानी ओबीसी कोटे में रहते हुए गूजरों के लिए चार से छह फ़ीसदी सीटें अलग से आरक्षित की जाएँगी.\n\nSummary:", "target": "राजस्थान में लगभग चार हफ़्ते पुराने गूजर आंदोलन को सुलझाने के प्रारंभिक संकेतों के बाद ख़बर मिली है कि दोनों पक्षों के बीच अब भी गतिरोध जारी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nगूजर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से सीधी बातचीत करने के लिए उनके दफ़्तर पहुँचे हैं. राज्य का गूजर समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की माँग कर रहा है. पिछले चार सप्ताह के आंदोलन में पुलिस फ़ायरिंग और झड़पों में दो पुलिसकर्मियों समेत 41 लोग मारे गए हैं. सकारात्मक संकेत, फिर गतिरोध सरकार और गूजर नेताओं के बीच चार दौर की बातचीत के बाद ख़बर आई थी कि दोनों पक्षों में किसी तरह का समझौता होने की संभावना है. दोनों पक्षों को बुधवार दोपहर संयुक्त संवाददाता में समझौता का विस्तृत वर्णन करना था लेकिन ये संवाददाता सम्मेलन हो ही नहीं पाया. सूत्रों से ख़बर मिली है कि दोनों ओर से रस्साकशी जारी है और समझौते के मसौदे पर सहमति नहीं बन पाई है. जानकारी मिली है कि तीन सुझावों पर चर्चा हो रही है - गूजरों को घुमंतू जनजाति का दर्जा दिया जाए जिसके तहत उन्हें चार से छह प्रतिशत आरक्षण मिले, या फिर उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में अतिपिछडों का दर्जा दिया जाए. तीसरा सुझाव ये है कि राज्य सरकार केंद्र को पत्र लिखकर गूजरों को जनजाति का दर्जा दिए जाने की सिफ़ारिश कर दे. इस तीसरे सुझाव का भाजपा के कई नेता और भाजपा के मीना समुदाय समर्थक विरोध कर रहे हैं. एक सोच ये भी चल रही है कि सरकार आर्थिक तौर पर पिछड़ों को भी कुछ आरक्षण दे, लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि ये कैसे हो. 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'मैंने कुछ दिनों से वीडियो नहीं बनाया क्योंकि मेरा मूड ठीक नहीं था. अभी पूरा भारत कई प्रेशर से गुज़र रहा है. समाप्त एक तो सुशांत सिंह राजपूत के जाने के बाद से मेंटल और इमोशनल प्रेशर. दुख होना लाज़मी भी है क्योंकि हमने अपने सामने एक जवान ज़िंदगी को जाते हुए देखा है.\" 'फ़िल्मों से बड़ा है म्यूज़िक माफ़िया'' सोनू ने म्यूज़िक इंडस्ट्री को लेकर कहा, \"आज बॉलीवुड से सुशांत सिंह राजपूत की मौत हुई है. एक एक्टर मरा है, कल आप किसी सिंगर के बारे में ऐसा सुन सकते हैं या किसी कंपोज़र या संगीतकार के बारे में सुन सकते हैं. फ़िल्मों से बड़ा है म्यूज़िक माफ़िया. म्यूज़िक इंडस्ट्री में जो नए बच्चे आए हैं वो परेशान हैं. म्यूज़िक इंडस्ट्री के दो लोगों के हाथों में ताक़त है, जिनकी कंपनी है, जो फ़ैसला करते हैं कि इस सिंगर को लो, दूसरों को नहीं. आप लोग ऐसा मत करो. बददुआ बुरी चीज़ होती है.\" सोनू ने कहा कि वही एक्टर जिस पर आजकल उंगलियाँ उठ रही हैं, वह उनके साथ भी ऐसा ही कर चुके हैं. उन्होंने कहा, \"मेरे साथ में ऐसा हो सकता है कि मेरे गाने जो मैं गा रहा हूं और कोई बोले कि.... वही एक्टर जिसके ऊपर आजकल बहुत 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ढील देने की कोशिश की थी लेकिन लगता है कि पलुवामा की हिंसा के बाद इसे फिर से सख़्ती से लागू किया जा रहा है. भारतीय गृह मंत्री ने श्रीनगर में गवर्नर एनएन वोहरा और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती से मुलाक़ात की है. वो व्यापारियों के संघ और अन्य लोगों से भी मिलेंगे हालांकि पिछले दौरे में व्यापारियों ने उनसे मिलने से साफ मना कर दिया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "गृहमंत्री राजनाथ सिंह के भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे के पहले दिन ही घाटी के पुलवामा ज़िले में हिंसा भड़क गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसमें एक 18-साल के युवक आमिर गुल की मौत हो गई है जबकि 16 लोग ज़ख़्मी हैं. श्रीनगर से बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर का कहना है कि सूबे के पुलवामा में लोग बुधवार को प्रदर्शन के लिए निकले जिसमें हिंसा भड़क उठी और पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पेलेट गन से फ़ायरिंग की है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ राजनाथ सिंह ने कहा है कि हर उस शख़्स का स्वागत है जो कश्मीरियत, इंसानियत और जमहूरियत में यक़ीन रखता है. राजनाथ ने कश्मीरियत, इंसानियत और जमहूरियत की बात की है जम्मू-कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिदीन के कथित चरमपंथी बुरहान वानी की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद वहां हिंसक प्रदर्शनों के कारण 45 दिनों से ज़्यादा समय से कर्फ़्यू जारी है. समाप्त लोग घरों में बंद रहने को मजबूर हैं. अब तक 60 से अधिक मौतें हो चुकी हैं. हालांकि प्रशासन ने राजनाथ सिंह के दौरे पर पहुंचने से पहले कर्फ़्यू में अघोषित ढील देने की कोशिश की थी लेकिन लगता है कि पलुवामा की हिंसा के बाद इसे फिर से सख़्ती से लागू किया जा रहा है. भारतीय गृह मंत्री ने श्रीनगर में गवर्नर एनएन वोहरा और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती से मुलाक़ात की है. वो व्यापारियों के संघ और अन्य लोगों से भी मिलेंगे हालांकि पिछले दौरे में व्यापारियों ने उनसे मिलने से साफ मना कर दिया था. 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पर पकड़ खो बैठे. दूसरी हार सात देशों की इस प्रतियोगिता में भारत की ये लगातार दूसरी हार रही. गुरूवार को भारत जर्मनी के हाथों अपना पहला मैच 3-1 से हार गया था. उधर पाकिस्तान ने अपने पहले मैच में दक्षिण कोरिया को 4-2 से मात दी थी. रविवार को अपने अगले मैच में अब भारत मलेशिया से भिड़ेगा. पाकिस्तान इस दिन स्पेन के साथ खेलेगा.\n\nSummary:", "target": "13वीं अज़लान शाह हॉकी प्रतियोगिता में भारत अपना दूसरा मैच भी हार गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nदूसरे मैच में पाकिस्तान ने भारत को 3-2 से हरा दिया. पाकिस्तान की तरफ़ से सोहेल अब्बास ने तीनों गोल दागकर हैट्रिक लगाई. उन्होंने 13वें, 18वें और 50वें मिनट में गोल लगाए. एशिया कप और अफ़्रो एशियाई खेलों में भारत से मात खाने के बाद पाकिस्तान की ये भारत पर पहली जीत रही. भारत की तरफ़ से दो गोल बलजीत सिंह ढिल्लों और राजपाल सिंह ने किए. भारत के गोल 13वें और 15वें मिनट में हुए जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान पर 2-1 से बढ़त बना ली थी. मगर फिर भारतीय खिलाड़ी खेल पर पकड़ खो बैठे. दूसरी हार सात देशों की इस प्रतियोगिता में 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''चलो मैडम, ट्यूशन ले कर ही सही, प्रधानमंत्री मोदी से कहो एक प्रेस वार्ता खुद भी तो करें, बहुत जवाब देने हैं, देश इंतज़ार कर रहा है. मंज़ूर है?'' अपनी प्रेस वार्ता में राहुल ने पीएम मोदी के साढ़े चार साल के कार्यकाल पर निशाना साधा है. इसके अलावा मंगलवार को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी पर तंज कसा कि उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान मीडिया से बात करने में कभी डर नहीं लगा. मनमोहन ने अपनी किताब 'चेंजिंग इंडिया' के विमोचन के मौके पर कहा, \"मैं कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं था, जिसे प्रेस से बात करने में डर लगता हो. मैं नियमित तौर पर प्रेस से मिलता था, और जब भी मैं विदेश दौरे पर जाता था, लौटने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन ज़रूर बुलाता था.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत के बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों के कर्ज़ माफ़ी की घोषणा कर पार्टी अपने वादों को तेज़ी से पूरा करने की कोशिश कर रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमंगलवार को पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी संसद में शीतकालीन सत्र में शामिल होने आए थे, जहां मीडिया ने उन्हें घेर लिया. राहुल ने रफ़ाल, किसानों और नोटबंदी जैसे कई मुद्दों पर बात की. उन्होंने मोदी सरकार पर कई सवाल उठाए. इस पूरी वीडियो का एक शुरुआती हिस्सा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें मीडिया के सामने आने से पहले वो अपनी पार्टी के नेताओं के साथ कुछ बात करते हुए दिखाई दिए. इस वीडियो में देखा जा सकता है कि राहुल गांधी को पार्टी के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, अहमद पटेल, गुलाम नबी आज़ाद ने घेरा हुआ है. प्रेस वार्ता शुरू करने से पहले उन्हें अहमद पटेल और ज्योतिरादित्य सिंधिया कुछ कहते दिख रहे हैं. अहमद पटेल को वीडियो में 'आई ऐग्री' कहते सुना जा सकता है, वहीं सिंधिया उन्हें कह रहे हैं कि 'जो मोदी नहीं कर पाए, वो मैं करके दिखा चुका हूं', जिस पर राहुल उनकी बात पर गर्दन हिलाते हुए सहमति का इशारा दे रहे हैं. इस वीडियो का सोशल मीडिया पर काफ़ी शेयर किया जा रहा है. इस वीडियो को केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपने सोशल मीडिया के ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया है. उन्होंने वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, ''आजकल सपना दिखाने के लिए भी ट्यूशन लेनी पड़ती है ???'' इसके जवाब में कांग्रेस की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, ''सपने दिखाने के बाद उन्हें जुमले बता देना और झूठ परोसने की ट्यूशन तो पक्का भाजपा कार्यालय में मिलती है!'' 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में जिन छात्राओं के शव मिले हैं, वे एसवीएस कॉलेज की हैं. शवों को अस्पताल ले जाया गया है. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और इस मामले से जुड़े चार व्यक्तियों के ख़िलाफ़ जाँच शुरू हो गई है.\" पीड़ितों में कॉलेज प्रबंधन के ख़िलाफ़ इस कदर गुस्सा है कि दो छात्राओं के माता-पिता ने तब तक शवों का पोस्टमॉर्टम कराने से इनकार कर दिया है जब तक कि सरकार कॉलेज के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करती. लक्ष्मी ने कहा, \"सरान्या के माता-पिता ने पोस्टमॉर्टम की इजाज़त दे दी है. दो अन्य छात्राओं के माता-पिता ने अभी रज़ामंदी नहीं दी है. हम उनसे बात कर रहे हैं.\" ज़िला कलेक्टर ने कहा कि प्रशासन ने छात्रों के साथ बात की है और कॉलेज प्रबंधन के ख़िलाफ़ उनकी शिकायतें सुनी हैं. लक्ष्मी ने कहा, \"हम इस मामले को देख रहे हैं. छात्र चाहते हैं कि कॉलेज को सील कर दिया जाए और छात्रों को दूसरे कॉलेजों में दाखिला दिलाया जाए.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "तमिलनाडु में पुलिस ने एक कॉलेज मालिक के बेटे और प्रिंसिपल को गिरफ़्तार किया है. उन्हें तीन छात्राओं की आत्महत्या के मामले में गिरफ़्तार किया गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपुलिस के अनुसार शनिवार को छात्राओं ई सरान्या, वी प्रियंका (दोनों 18) और मोनिशा (19) ने कथित तौर पर अधिक फ़ीस की मांग होने पर कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी थी. बताया जा रहा है कि विल्लुपुरुम के कल्लाकुरुचि स्थित एसवीएस योग मेडिकल कॉलेज की इन छात्राओं ने ये क़दम कॉलेज प्रबंधन के 'कृत्यों' को उजागर करने के लिए उठाया. पहली नज़र में आत्महत्या की वजह 'अधिक फ़ीस' को इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि छात्रों ने पिछले साल सितंबर और अक्टूबर में अधिक फ़ीस वसूलने और इसकी रसीद नहीं देने के कॉलेज प्रबंधन के क़दम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया, \"गिरफ़्तार लोग हैं- कॉलेज मालिक का बेटा सुखी वर्मा और कॉलेज के प्रिंसिपल कलानिधि.\" समाप्त विल्लुपुरम की ज़िला कलेक्टर एम लक्ष्मी ने कहा, \"संदिग्ध परिस्थितियों में जिन छात्राओं के शव मिले हैं, वे एसवीएस कॉलेज की हैं. शवों को अस्पताल ले जाया 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हैरी पॉटर सिरीज़ की छठी किताब का नाम घोषित कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nये किताब कही जाएगी- 'हैरी पॉटर एंड द हाफ़ ब्लड प्रिंस' रॉलिंग ने इस बात की घोषणा अपनी वेबसाइट पर की है. उन्होंने उन लोगों की भी आलोचना की है जो ये अफ़वाह फैला रहे थे कि किताब का शीर्षक 'हैरी पॉटर एंड द पिलर ऑफ़ स्टोरेज' होगा. वैसे लेखिका ने इस बात का कोई भी संकेत नहीं दिया है कि नन्हे जादूगर के रोमांचक कारनामों की किताब कब आएगी. इस बारे में ध्यान में रखने वाली बात ये है कि चौथी और पाँचवीं किताब के बीच दो साल का अंतराल था. पाँचवीं किताब 'द ऑर्डर ऑफ़ फ़ीनिक्स' जून 2003 में बाज़ार में आई थी और बहुत ही जल्दी बिक भी गई थी. इस किताब का पेपरबैक संस्करण अभी नहीं आया है. रॉलिंग ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है कि 'हाफ़ ब्लड प्रिंस' नाम के चरित्र का संबंध हैरी पॉटर या लॉर्ड वॉल्डरमॉर्ट से नहीं होगा.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": 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'जज ही अब न्याय की मांग कर रहे हैं' यूपी में रिलीज़ होगी पद्मावत सेंसर बोर्ड की अनुमति के बावजूद शुक्रवार को बीजेपी शासित गुजरात और मध्य प्रदेश ने कहा कि वह 'पद्मावत' फ़िल्म पर प्रतिबंध को जारी रखेगी और उसे अपने राज्यों में नहीं दिखाएगी. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी ख़बर के अनुसार, उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने फ़िल्म पर प्रतिबंध न लगाने का फैसला किया है. वहीं, वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार पहले ही राज्य में इस फ़िल्म को दिखाने पर प्रतिबंध लगा चुकी है. दीपिका पादुकोण द्वारा अभिनीत पद्मावत फ़िल्म 25 जनवरी को रिलीज़ होगी. उच्चतम शिक्षा में 4.9% ही मुस्लिम शिक्षक द हिंदू की ख़बर के अनुसार, भारत के उच्चतम शिक्षण संस्थानों में केवल 4.9 फ़ीसदी ही मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व है जो इस देश में समुदाय की आबादी (14.2%) के हिसाब से बेहद कम है. उच्चतर शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण की हालिया रिपोर्ट से इस आंकड़े का पता चला है. वहीं, उच्चतर शिक्षा में आबादी के लिहाज़ से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व भी बेहद कम है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जब सर्वेक्षण पूरा किया तो इसमें अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व 8.3 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति का 2.2 फ़ीसदी था. फेसबुक से पकड़ा डॉक्टर को पारिवारिक कारण बताकर मिस्र में छुट्टी मनाने चले गए दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के एक डॉक्टर का मामला सामने आया है और उनके इस झूठ को फेसबुक के ज़रिए पकड़ा गया. अमर उजाला के अनुसार, अस्पताल के हड्डी रोग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र कुमार ने मिस्र में पिरामिड के सामने बैठकर फोटो खिंचवाई जो फ़ेसबुक पर वायरल हो गई. यहां तक तो ठीक था लेकिन सर्जिकल सामान देने वाली कंपनी के एक प्रतिनिधि भी इस फोटो में मौजूद थे. इसके बाद प्रबंधन ने उनके ख़िलाफ़ जांच के आदेश दिए है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की ओर से न्यायपालिका और लोकतंत्र को ख़तरे में बताने के बाद सुप्रीम कोर्ट के ही एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि न्यायाधीशों की आलोचना के बाद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व्यवस्था में कोई बदलाव करें, इसकी संभावना नहीं है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी का कहना है कि यह न्यायपालिका का एक आंतरिक मामला है और इसे हल कर लिया जाना चाहिए. सरकार के वरिष्ठ कानून अधिकारी अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बेंच के भीतर सद्भावना की बात कही है. उन्होंने कहा, \"जो कुछ हुआ, उससे बचा जा सकता था.\" उन्होंने आगे कहा कि न्यायाधीशों को अब राजनेताओं की तरह कार्य करना होगा और सुनिश्चित करें की विभाजन पूरी तरह से निष्प्रभावी हो और भविष्य में सद्भावना और आपसी समझ प्रबल हो. चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र कब-कब चर्चा में रहे? 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क़ुनार प्रांत में गुप्त सूचना के आधार पर हुई कार्रवाई में अल-क़ायदा के सात संदिग्ध चरमपंथी मारे गए. दूसरी ओर स्थानीय लोगों का कहना है कि ये चरमपंथी नहीं थे बल्कि कबायली समाज के वरिष्ठ लोग थे जो एक विवाद के समाधान के लिए वहाँ एकत्रित हुए थे. मारे गए लोगों में एक बच्चा भी शामिल है. ग़ौरतलब है कि इस वर्ष पूरे अफ़गानिस्तान में चरमपंथी हिंसा तेज़ी से बढ़ी है जिसमें सैंकड़ो लोग मारे गए हैं. अमरीकी सेना ने अपने बयान में कहा है, \"अफ़गान और गठबंधन देशों की सेनाएँ एक परिसर की ओर बढ़ रही थी तभी उन पर भारी गोलीबारी शुरु हुई जिसका जवाब दिया गया.\" गठबंधन सेना के प्रवक्ता कर्नल थॉमस कॉलिन ने कहा कि अल-क़ायदा जान बूझ कर महिलाओं और बच्चों को हथियार के रुप में इस्तेमाल करता है ताकि उनके अवैध और अनैतिक गतिविधियों पर आँच न आने पाए. काबुल स्थित बीबीसी संवाददाता रोलैं बुएर्क के मुताबिक हाल के दिनों में कुनार प्रांत में अमरीकी सेना को भारी लड़ाई का सामना करना पड़ रहा है.\n\nSummary:", "target": "पूर्वी अफ़गानिस्तान में उत्तरी एटलांटिक संधि संगठन यानी नैटो और अफ़गान सुरक्षा बलों के साझा अभियान में आठ लोगों 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ज़रिए ये जानकारी पत्रकारों को देते हुए कहा, \"अपने रणनीतिक हवाई हमलों के साथ-साथ हम इस्लामिक स्टेट के नेताओं को निशाना बना रहे हैं.\" वॉरेन ने बताया, \"पिछले एक महीने के दौरान हमने हवाई हमलों में इस्लामिक स्टेट के 10 बड़े नेताओं को मारा है. इनमें बाहरी हमलों की योजनाएं बनाने वाले भी शामिल हैं, कुछ पेरिस हमलों की साज़िश में भी शामिल थे, जबकि अन्य पश्चिमी देशों पर हमलों की साज़िशें रच रहे थे.\" अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों का गठबंधन इराक़ और सीरिया में बीते साल से इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ हवाई हमले कर रहा है. हाल ही में रूस ने भी सीरिया में इस्लामिक स्टेट पर हवाई हमले शुरू किए हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीकी सेना के प्रवक्ता का कहना है कि पिछले महीने के दौरान इराक़ और सीरिया में किए गए हवाई हमलों में इस्लामिक स्टेट के 10 कमांडर मारे गए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपेरिस पर हमलों के कुछ दिन बाद पुलिस के साथ मुठभेड़ में अबाउद की मौत हो गई थी. अमरीकी सेना के प्रवक्ता कर्नल स्टीव वॉरेन के मुताबिक़ पेरिस हमलों की साज़िश से जुड़े कमांडर भी मारे गए हैं. वॉरेन के मुताबिक़ हमलों में शराफ़-अल-मूदान भी मारे गए हैं जो पेरिस के हमलावर अब्देलहमीद अबाउद के संपर्क में थे. कर्नल वॉरेन के मुताबिक़ मूदान 24 दिसंबर को हुए एक हमले में मारे गए. 13 नवंबर को पेरिस में सिलसिलेवार हमलों में 140 लोग मारे गए थे बेल्जियम के नागरिक अबाउद पेरिस पर हुए हमलों के बाद पेरिस के बाहरी इलाक़े में एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे. समाप्त कर्नल स्टीव वॉरेन ने बग़दाद से वीडियो लिंक के ज़रिए ये जानकारी पत्रकारों को देते हुए कहा, \"अपने रणनीतिक हवाई हमलों के साथ-साथ हम इस्लामिक स्टेट के नेताओं को निशाना बना रहे हैं.\" वॉरेन ने बताया, \"पिछले एक महीने के दौरान हमने हवाई हमलों में इस्लामिक स्टेट के 10 बड़े नेताओं को मारा है. इनमें बाहरी हमलों की योजनाएं बनाने वाले भी शामिल हैं, कुछ पेरिस हमलों की साज़िश में भी शामिल थे, जबकि अन्य पश्चिमी देशों पर हमलों की साज़िशें रच रहे थे.\" अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों का गठबंधन इराक़ और सीरिया में बीते साल से इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ हवाई हमले कर रहा है. हाल ही में रूस ने भी सीरिया में इस्लामिक स्टेट पर हवाई हमले शुरू किए हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार के आदिवासियों को मुफ़्त में रामायण और गीता बांटने की योजना का विरोध शुरू हो गया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराज्य के संस्कृति विभाग ने बस्तर में बोली जाने वाली गोंडी और हल्बी भाषा में इन दोनों हिन्दू धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद प्रकाशित किया है. राज्य के संस्कृति मंत्री दयालदास बघेल का कहना है कि दोनों ही ग्रंथ नीति शिक्षा के उद्देश्य से प्रकाशित किए गए हैं. पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े में ईसाई और हिंदू संगठनों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं. धार्मिक संघर्ष ये मामले इस हद तक बढ़े हैं कि सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा है कि आदिवासियों को कुछ लोग हिंदू बताने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ ईसाई. समाप्त सूबे में भाजपा की सरकार आने के बाद से धार्मिक संघर्ष और तेज़ हुआ है. पिछले साल से ही विश्व हिंदू परिषद के हस्तक्षेप के बाद बस्तर की कुछ पंचायतों ने हिंदू धर्म के अलावा किसी भी दूसरे धर्म के प्रचार-प्रसार और यहां तक कि उनकी प्रार्थना को भी अपनी पंचायत में प्रतिबंधित कर दिया है. छत्तीसगढ़ क्रिश्चिन फ़ोरम ने पंचायत के मामले में हाई कोर्ट में अपील कर रखी है. हालांकि फ़ोरम के अध्यक्ष अरूण पन्नालाल का कहना है कि अपील को दाख़िल किए हुए कई महीने हो गए हैं लेकिन केस में एक भी सुनवाई नहीं हुई है. भाषा का प्रचार अब बस्तर में रामायण और गीता बांटे जाने को इन्हीं धार्मिक प्रचार-प्रसार से जोड़ा जा रहा है. भारतीय वन सेवा के अधिकारी और संस्कृति विभाग के संचालक राकेश कुमार चतुर्वेदी इसे भाषा के प्रचार-प्रसार के तौर पर देख रहे हैं. चतुर्वेदी कहते हैं, “गोंडी और हल्बी बोलने वालों की संख्या राज्य में बहुत कम है. ऐसे ग्रंथों के प्रकाशन से इन दोनों ही भाषाओं के विकास में सुविधा होगी.” आदिवासियों के बीच हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथ बांटने के सरकार के इस फ़ैसले से सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के पक्षधर नाराज़ हैं. सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज कहती हैं, “सरकार को अगर कुछ बांटना ही है तो वह वन अधिकार कानून, पंचायत क़ानून जैसी किताबों का अनुवाद कर बांट सकती थी. इससे बस्तर के आदिवासियों का भला ही होता.\" वो कहती हैं, \"लेकिन रामायण-गीता बांट कर वे किसका भला करना चाहते हैं, यह बात सब समझते हैं.” संघ का एजेंडा आदिवासी समाज और संस्कृति पर पिछले 50 सालों से शोध करने वाले निरंजन महावर ने बस्तर के आदिवासियों पर कई किताबें लिखी हैं. महावर कहते हैं, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस तरह से अपने एजेंडे पर काम करता है, यह केवल उसका नमूना है.” पन्नालाल का कहना है कि सरकार आदिवासी इलाक़े में सिर्फ़ हिंदू ग्रंथ बांटने की योजना क्यों रखती है. उसे इसी तरह बाइबल और क़ुरान भी बांटने चाहिए. 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'अभी या कभी नहीं' फुल्का ने शनिवार को फ़ेसबुक पेज ''1984 दंगा पीड़ितों के लिए न्याय- अभी या कभी नहीं'' नाम से पोस्ट किया है और लोगों से अपील की है कि संयुक्त राष्ट्र के सामने इसके लिए विरोध प्रदर्शन करें. समाप्त ये प्रदर्शन 25 सितंबर को होने वाले हैं. उम्मीद की जा रही है कि प्रधानमंत्री मोदी 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में संबोधन देंगे. फुल्का 1984 दंगों में पीड़ितों की ओर से लड़ते रहे हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आम आदमी पार्टी को एक और झटका लगा है. पार्टी के नेता और वरिष्ठ वकील हरविंदर सिंह फुल्का ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसमाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार फुल्का का कहना है कि वे 1984 के दंगा पीड़ितों के न्याय दिलाना चाहते हैं. फुल्का ने कहा कि यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है और वे अपना पूरा ध्यान इसी पर लगाना चाहते हैं. पीटीआई के अनुसार फुल्का ने बताया है कि उन्होंने पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल से इस विषय पर बात की थी जिसके बाद ही उन्होंने पार्टी के ''सभी पदों से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया है.'' 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कर पाए. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ चेन्नई वनडे में उन्होंने एक बेहतरीन शतक जरूर बनाया लेकिन टीम को जीत नहीं दिला पाए. ऐसे में उनकी कप्तानी पर उठता सवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है. भारतीय क्रिकेट टीम के पू्र्व कप्तान और दुनिया के महान सलामी बल्लेबाज़ रहे सुनील गावस्कर ने कहा है कि अब समय आ गया है कि जब कप्तानी की बागडोर युवा विराट कोहली को सौंप दी जाए. गावस्कर के मुताबिक धोनी को थोड़ा आराम दिए जाने की जरूरत है ताकि वह तरोताज़ा होकर अपना स्वभाविक खेल खेल सकें. दबाव में हैं धोनी अंडर 19 टीम की कप्तानी करते हुए भारत को विश्व कप जिता चुके विराट कोहली के कोच और दिल्ली रणजी टीम के पू्र्व आलराउंडर राजकुमार शर्मा मानते हैं कि अगर चयनकर्ताओं को लगता है कि विराट को कप्तान बनाया जाए तो उन्हे कप्तान बनाया जा सकता है. \"अब वक्त आ गया है जब भारत का क्रिकेट बोर्ड भारत की क्रिकेट को बचाए ना कि धोनी को, क्योंकि धोनी को बचाने की कोशिश में एक चयनकर्ता जिन्हें चेयरमैन बनाने का वादा किया गया था उन्हें इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वह धोनी को कप्तानी से हटाना चाहते थे.\" मनिंदर सिंह, पूर्व क्रिकेटर हालांकि उसके साथ ही वह ये भी कहते है कि उन्होंने विराट को यही सलाह दी है कि वह अच्छा खेलने पर ध्यान दें. धोनी की बात चलने पर राजकुमार शर्मा मानते है कि उन्हे अभी कप्तानी से हटाना ठीक नही है. वे कहते हैं, \"उन्होने भारत को टवेंटी-टवेंटी और वन-डे का विश्व कप जिताया है, उन्हे कुछ साबित करने की ज़रुरत नही है. एक दो सिरीज़ में हार से यह साबित नही हो जाता कि वह ख़राब कप्तान है, लेकिन पिछली टेस्ट में जिस तरह से उन्होंने निर्णय लिए वह ज़रुर सोचने की बात है लेकिन धोनी सफल ओर बेहतरीन कप्तान है.\" विराट हैं दावेदार महेंद्र सिंह धोनी को क्रिकेट के तीनों प्रारूप टेस्ट, वन-डे और टवेंटी-टवेंटी में से कम से कम एक में से कप्तानी से हटाने वालों में पूर्व सलामी बल्लेबाज़ चेतन चौहान और पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन शामिल हैं. इन दोनों का साफ़-साफ़ मानना है कि तीनों प्रारूप में कप्तानी करने से अत्तिरिक्त दबाव बनता है. इत्तेफाक़ से इन दोनों की पसंद भी गावस्कर की तरह विराट ही हैं. धोनी को टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी से हटाए जाने की बात पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह भी कहते हैं. मनिंदर सिंह कहते हैं, \"अब वक्त आ गया है जब भारत का 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क्रिकेट को बचाए ना कि धोनी को, क्योंकि धोनी को बचाने की कोशिश में एक चयनकर्ता जिन्हें चेयरमैन बनाने का वादा किया गया था उन्हें इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वह धोनी को कप्तानी से हटाना चाहते थे.\" बहरहाल, गेंद अब चयनकर्ताओं के पाले में है, जो कप्तानी में बदलाव करते हैं या फिर धोनी पर ही भरोसा करते हैं. ये देखना दिलचस्प होगा. इसे भी पढ़ें टॉपिक\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 917, "source_item_id": "917", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 2689, "clean_index": 814, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:814"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमलेशियाई पुलिस ने परमाणु तकनीक के प्रसार के मामले में शुक्रवार को एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार ख़ान के कथित मुख्य फ़ाइनेंसर बुहारी सैयद अबू ताहिर ने रहोस्यदघाटन किया है कि यूरेनियम एक पाकिस्तानी विमान में लीबिया ले जाया गया. श्रीलंकाई नागरिक ताहिर मलेशिया में रह रहे हैं. उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि ईरान ने परमाणु ईंधन संयंत्र के पुराने हिस्सों के लिए क़दीर ख़ान को 30 लाख डॉलर का भुगतान किया था. उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों ख़ान ने पाकिस्तान के सरकारी टेलीविज़न पर उपस्थित होकर परमाणु तकनीक अन्य देशों को बेचने की बात कबूल की थी. बाद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने उन्हें राष्ट्रीय नायक बताते हुए माफ़ी दे दी थी. मलेशियाई पुलिस क़दीर ख़ान के परमाणु तकनीक के धंधे में ताहिर की भूमिका की पड़ताल कर रही थी. ताहिर ने पुलिस को बताया कि ईरान ने क़दीर ख़ान के दुबई स्थित सरकारी गेस्ट हाउस में 30 लाख डॉलर की रकम का नकद भुगतान किया.\n\nSummary:", "target": "मलेशिया में पुलिस का कहना है कि पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल क़दीर ख़ान ने लीबिया को संवर्द्धित यूरेनियम मुहैया कराया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमलेशियाई पुलिस ने परमाणु तकनीक के प्रसार के मामले में शुक्रवार को एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार ख़ान के कथित मुख्य 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मुश्किल है पर इसे 33 अरब से 53 अरब के बीच आंका जा रहा है. तेल कुओं पर क़ब्ज़े के बाद पिछले साल अनुमान लगाया गया था कि इस्लामिक स्टेट के पास क़रीब दो अरब डॉलर का बजट और साढ़े 25 अरब डॉलर से ज़्यादा पैसा था. तब से इस्लामिक स्टेट ने अपने कई इलाक़े और तेल क्षेत्रों को खो दिया है और अमरीकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने उन पर हवाई हमले किए हैं. इस साल फ़रवरी में व्हाइट हाउस ने जानकारी दी थी कि इस्लामिक स्टेट के पास 31500 लड़ाकुओं के मुक़ाबले अब 25 हज़ार लड़ाकू ही बचे हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "एक अमरीकी सैन्य अधिकारी के मुताबिक़ चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट की 80 करोड़ डॉलर यानी क़रीब 53 अरब 15 करोड़ रुपए की नक़दी हवाई हमलों में बर्बाद हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबग़दाद में मौजूद मेजर जनरल पीटर गर्स्टेन ने बताया कि अमरीका लगातार इस संगठन के धन के भंडार को निशाना बना रहा है. इतने बड़े नुक़सान की वजह से इस्लामिक स्टेट में 90 फ़ीसदी दलबदल के मामले सामने आए हैं और नई भर्तियां भी काफ़ी कम हो गईं हैं. 2014 में अमरीकी कोष ने आईएस को सबसे अमीर चरमपंथी संगठन बताया था, जिससे उनका सामना हुआ. आईएस के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया ऑपरेशन के उपकमांडर गर्स्टेन ने बताया कि संगठन के धन भंडारों पर क़रीब 20 हवाई हमले किए गए. समाप्त हालांकि उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि अमरीका को बर्बाद हुई रकम की सही मालूमात कैसे हुई. उन्होंने बताया कि एक मामले में इराक के मोसुल शहर में एक घर में रखी 15 अरब डॉलर से ज़्यादा नक़दी बर्बाद कर दी गई. गर्स्टेन का कहना है कि ख़ुफ़िया सूचना मिली थी कि घर के किस कमरे में यह पैसा छिपाकर रखा गया था. इसके बाद उस पर बम गिराए गए. उन्होंने माना कि बर्बाद हुई नक़दी के सही-सही आंकड़े का पता लगाना मुश्किल है पर इसे 33 अरब से 53 अरब के बीच आंका जा रहा है. तेल कुओं पर क़ब्ज़े के बाद पिछले साल अनुमान लगाया गया था कि इस्लामिक स्टेट के पास क़रीब दो अरब डॉलर का बजट और साढ़े 25 अरब डॉलर से ज़्यादा पैसा था. तब से इस्लामिक स्टेट ने अपने कई इलाक़े और तेल क्षेत्रों को खो दिया है और अमरीकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने उन पर हवाई हमले किए हैं. इस साल फ़रवरी में व्हाइट हाउस ने जानकारी दी थी कि इस्लामिक स्टेट के पास 31500 लड़ाकुओं के मुक़ाबले अब 25 हज़ार लड़ाकू ही बचे हैं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान की सरकार ने राजधानी इस्लामाबाद के 122 स्कूलों और कॉलेजों के नामों को पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमले में मारे गए लोगों के नाम पर रखने की मंज़ूरी दे दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में पिछले साल 16 दिसंबर को हुए हमले में क़रीब 150 लोग मारे गए थे जिनमें से ज़्यादातर संख्या छात्रों की थी. ख़ैबर पख़्तूनख़्वा सरकार ने इस हमले की बरसी को सरकारी स्तर पर मनाने का एलान किया था जहां इसका फ़ैसला सुनाया गया. सरकारी टीवी के मुताबिक़ प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने सोमवार को 122 स्कूलों और कॉलेजों के नाम को पेशावर स्कूल हमले में मारे गए लोगों के ऊपर रखने को आधिकारिक तौर पर मंज़ूरी देते हुए कहा कि इस क़दम का मक़सद अज्ञानता और नफ़रत के ख़िलाफ़ लड़ाई में मारे गए शहीदों को श्रद्धांजलि देना है. नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि नफ़रत फैलाने वाले चाहते हैं कि हमारे बच्चे आगे न बढ़ें. समाप्त उनका कहना था, ''हमारे दुश्मन नफ़रत और असहिष्णुता फैलाना चाहते हैं लेकिन हम उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे.'' उन्होंने कहा, \"शहीदों की यादें पाकिस्तान के अस्तित्व से जुड़ी हैं.\" उधर पाकिस्तान के संसद में पेशावर स्कूल हमले में मारे गए लोगों के परिजनों से एकजुटता प्रकट की गई और चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई को समर्थन देने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया. विपक्षी नेता एतज़ाज़ अहसन ने संसद में अपने विचार व्यक्त करते हुए 16 दिसंबर को पाकिस्तान के इतिहास का काला दिन क़रार दिया. 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पश्चिम बंगाल के गृह सचिव अमित किरन देब इस बारे में सीबीआई को औपचारिक अनुरोध भेजेंगे. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि राज्य पुलिस अपने स्तर पर इस मामले की जाँच जारी रखेगी. यह चोरी इसी सप्ताह गुरूवार को हुई थी लेकिन पुलिस को अभी इस बारे में कोई सुराग नहीं मिला है.\n\nSummary:", "target": "गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर का नोबेल पुरस्कार मेडल और प्रमाण पत्र चोरी होने के मामले की जाँच केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई को सौंप दी गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nग़ौरतलब है कि साहित्य के लिए 1913 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित टैगोर की यह धरोहर इसी सप्ताह चोरी हो गई थी. पश्चिम बंगाल सरकार ने इस मामले की जाँच अब सीबीआई से करने के लिए कहा है. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने रविवार को पत्रकारों को बताया कि पहले उन्होंने इस मामले में शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय के कुलपति सुजीत बासु से बात की. फिर उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से संपर्क किया जिन्होंने सीबीआई जाँच को हरी झंडी दे दी. उम्मीद की जा रही है कि अब पश्चिम बंगाल के गृह सचिव अमित किरन देब इस 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ख़त्म होने तक कुम्बले की गेंद पर वे भी गौतम गंभीर को एक कैच दे बैठे. मुबारक़ 10 रनों के साथ मैदान पर हैं. श्रीलंका के पहले दो विकेट इरफ़ान पठान ने लिए. संगकारा को पठान की गेंद पर कुम्बले ने लपका तो गुणवर्धने 25 रनों पर एलबीडब्लू आउट हुए. इसके बाद लंबे समय तक कोई विकेट नहीं गिरा. फिर कुंबले की फ़िरकी ने कमाल दिखाया और 59 वें ओवर में उन्होंने जयवर्धने को पेवेलियन वापस भेजा. अपने अगले ओवर में ही कुम्बले ने समरवीरा को बोल्ड किया और अगली गेंद पर दिलशान को एलबीडब्लू आउट किया. उनके पास हैट्रिक का अवसर था लेकिन वे इसमें विफल रहे. भारतीय पारी और मुरलीधरन इससे पहले श्रीलंकाई गेंदबाज़ों ने भारत को पहली पारी में 290 रनों पर समेट डाला. ऑफ़ स्पिनर मुथैया मुरलीधरन की घूमती गेंदों ने दूसरे दिन पाँच खिलाड़ियों को शिकार बनाया. मुरलीधरन ने पहली पारी में 100 रन देकर भारत के सात विकेट झटके. रविवार को गांगुली और सचिन पहले दिन के स्कोर 3 विकेट पर 245 रन को आगे बढ़ाने आए. दूसरे दिन आउट होने वाले पहले खिलाड़ी थे गांगुली जो मुरलीधरन की गेंद पर एलबीडब्ल्यू आउट हो गए. गांगुली कल के अपने स्कोर में एक रन जोड़कर 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सुनील गावसकर के 34 शतकों का रिकॉर्ड तोड़ा. एक दिवसीय मैचों में भी सचिन के नाम सर्वाधिक शतक का रिकॉर्ड है. सचिन ने एक दिवसीय मैचों में अभी तक 38 शतक लगाए हैं. सचिन के शानदार शतक की बदौलत भारत ने पहले दिन का खेल ख़त्म होने तक तीन विकेट के नुक़सान पर 245 रन बनाए थे. सचिन तेंदुलकर 100 और सौरभ गांगुली 39 रन बनाकर खेल रहे थे. चेन्नई में वर्षा से बाधित पहला टेस्ट मैच अनिर्णीत रहा था. अंतिम टेस्ट मैच अहमदाबाद में होगा. भारतीय टीम:युवराज सिंह, गौतम गंभीर, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण, सौरभ गांगुली, महेन्द्र धोनी, अजीत अगरकर, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, इरफ़ान पठान श्रीलंका टीम:अविश्का गुणवर्धने, कुमार संगकारा, महेला जयवर्धने, थिलन समरवीरा, मरवन अटपट्टु, तिलकरत्ने दिलशान, चमिंडा वास, मलिंगा बंडारा, दिलहारा फ़र्नांडो, मुथैया मुरलीधरन, जेहन मुबारक\n\nSummary:", "target": "पहली पारी में भारत के 290 रनों के जवाब में दूसरे दिन का खेल ख़त्म होने तक श्रीलंका ने छह विकेट के नुक़सान पर 198 रन बना लिए थे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nश्रीलंका की शुरूआत तो 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भारत में इसको लेकर चर्चा हो रही है. इसको लेकर कई ट्वीट और फ़ेसबुक पोस्ट में भारत के सुन्नी मुसलमानों को निशाने पर लिया जा रहा है. समाप्त वहीं, इमरान ख़ान से जुड़े एक कथित बयान को लेकर भी लोग ख़ूब सोशल मीडिया पर बहस कर रहे हैं. सोशल मीडिया पोस्ट में एक समाचार चैनल की ख़बर के हवाले से कहा जा रहा है कि इमरान ख़ान ने कह दिया है कि पाकिस्तान 'शिया शून्य' होगा. इमरान ख़ान ने क्या कहा? एक निजी समाचार चैनल की ख़बर को जब हमने पढ़ा तो इसमें कहीं भी इमरान ख़ान के बयान का ज़िक्र तक नहीं था. इस ख़बर में इमरान ख़ान के उन वादों का ज़िक्र था जो उन्होंने पाकिस्तान में ग़ायब हुए लोगों के लिए किए थे. इसके अलावा इस ख़बर में कराची में हुए प्रदर्शनों का ज़िक्र था. इससे पता चलता है कि एक ख़बर के भ्रामक शीर्षक से झूठी बात फैलाई जा रही हैं. इसके बाद बीबीसी हिन्दी फ़ैक्ट चेक की टीम ने इमरान ख़ान के हालिया बयानों पर और उनके सोशल मीडिया हैंडल पर नज़र डाली. इमरान ख़ान ने 31 अगस्त को ट्वीट करके शांतिपूर्ण तरीक़े से 'आशुरा' के पूरे होने पर देश का शुक्रिया अदा किया था. आशुरा दरअसल इस्लामी मोहर्रम महीने के वो दिन हैं जिसमें शिया मुसलमान इमाम हुसैन की मौत पर ग़म मनाते हैं. इमरान ख़ान ने अपने ट्वीट में कहा था कि इस दौरान सांप्रदायवाद भड़काने की कोशिश की गई और वो इसके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करेंगे. हालांकि, हाल में हुए शिया विरोधी प्रदर्शनों पर इमरान ख़ान या पाकिस्तान सरकार ने अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है. पाकिस्तान में शिया मुसलमान? 20 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश पाकिस्तान एक मुस्लिम राष्ट्र है जहां पर लगभग 95 फ़ीसदी मुसलमानों की आबादी है. सोशल मीडिया पर यह भी दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान शिया समुदाय को मुसलमान नहीं मानता है जबकि ऐसा नहीं है. तक़रीबन 6 फ़ीसदी से अधिक शिया मुसलमानों की आबादी को पाकिस्तान मुसलमान मानता है लेकिन वो अहमदिया समुदाय को मुसलमान नहीं मानता है बल्कि अलग धर्म मानता है. पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा होती रही है. पाकिस्तान के 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' अख़बार के अनुसार, 2001 से 2018 के बीच पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा में 4847 शिया मुसलमान मारे जा चुके हैं. इसके अलावा ईशनिंदा क़ानून की तलवार भी हमेशा शिया मुसलमानों पर लटकी रहती है. पाकिस्तान के मानवाधिकार समूहों का कहना है कि अगस्त महीने में ईशनिंदा के 40 मामले दर्ज हुए हैं जिनमें अधिकतर मामले उन शिया मुसलमानों पर दर्ज किए गए हैं जो धार्मिक जुलूसों में भाषण दे रहे थे. बीबीसी हिंदी फ़ैक्ट चेक की पड़ताल में हमने पाया है कि शिया विरोधी प्रदर्शन पाकिस्तान में हुए लेकिन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने 'शिया शून्य' जैसी कोई टिप्पणी नहीं की थी. (इस लिंक पर क्लिक करके भी आप हमसे जुड़ सकते हैं) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकतेहैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान में बीते शुक्रवार और शनिवार को कराची में धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने शिया विरोधी रैली निकाली. बताया जा रहा है कि शनिवार को हुई रैली में 30,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअहल-ए-सुन्नत जमात, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम, तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान जैसे संगठनों की इस रैली में प्रदर्शनकारियों ने शिया विरोधी संगठन सिपाह-ए-सहाबा के पोस्टर भी ले रखे थे. सिपाह-ए-सहाबा पर शिया मुसलमानों की हत्या के आरोप लगते रहे हैं. इन सुन्नी धार्मिक संगठनों का आरोप है कि मुहर्रम के बीते महीने में आशुरा के दौरान शिया नेताओं ने एक टीवी प्रसारण के दौरान बड़ी मुस्लिम शख़्सियतों के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी की थी जो ईशनिंदा है. भारत में क्यों है चर्चा? पाकिस्तान में शिया विरोधी प्रदर्शनों के बाद अब भारत में इसको लेकर चर्चा हो रही है. इसको लेकर कई ट्वीट और फ़ेसबुक पोस्ट में भारत के सुन्नी मुसलमानों को निशाने पर लिया जा रहा है. समाप्त वहीं, इमरान ख़ान से जुड़े एक कथित बयान को लेकर भी लोग ख़ूब सोशल मीडिया पर बहस कर रहे हैं. सोशल मीडिया पोस्ट में एक समाचार चैनल की ख़बर के हवाले से कहा जा रहा है कि इमरान ख़ान ने कह दिया है कि पाकिस्तान 'शिया शून्य' होगा. इमरान ख़ान ने क्या कहा? एक निजी समाचार चैनल की ख़बर को जब हमने पढ़ा तो इसमें कहीं भी इमरान ख़ान के बयान का ज़िक्र तक नहीं था. इस ख़बर में इमरान ख़ान के उन वादों का ज़िक्र था जो उन्होंने पाकिस्तान में ग़ायब हुए लोगों के लिए किए थे. इसके अलावा इस ख़बर में कराची में हुए प्रदर्शनों का ज़िक्र था. इससे पता चलता है कि एक ख़बर के भ्रामक शीर्षक से झूठी बात फैलाई जा रही हैं. इसके बाद बीबीसी हिन्दी फ़ैक्ट चेक की टीम ने इमरान ख़ान के हालिया बयानों पर और उनके सोशल मीडिया हैंडल पर नज़र डाली. इमरान ख़ान ने 31 अगस्त को ट्वीट करके शांतिपूर्ण तरीक़े से 'आशुरा' के पूरे होने पर देश का शुक्रिया अदा किया था. आशुरा दरअसल इस्लामी मोहर्रम महीने के वो दिन हैं जिसमें शिया मुसलमान इमाम हुसैन की मौत पर ग़म मनाते हैं. इमरान ख़ान ने अपने ट्वीट में कहा था कि इस दौरान सांप्रदायवाद भड़काने की कोशिश की गई और वो इसके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करेंगे. हालांकि, हाल में हुए शिया विरोधी प्रदर्शनों पर इमरान ख़ान या पाकिस्तान सरकार ने अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है. पाकिस्तान में शिया मुसलमान? 20 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश पाकिस्तान एक मुस्लिम राष्ट्र है जहां पर लगभग 95 फ़ीसदी मुसलमानों की आबादी है. सोशल मीडिया पर यह भी दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान शिया समुदाय को मुसलमान नहीं मानता है जबकि ऐसा नहीं है. तक़रीबन 6 फ़ीसदी से अधिक शिया मुसलमानों की आबादी को पाकिस्तान मुसलमान मानता है लेकिन वो अहमदिया समुदाय को मुसलमान नहीं मानता है बल्कि अलग धर्म मानता है. पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा होती रही है. पाकिस्तान के 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' अख़बार के अनुसार, 2001 से 2018 के बीच पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा में 4847 शिया मुसलमान मारे जा चुके हैं. इसके अलावा ईशनिंदा क़ानून की तलवार भी हमेशा शिया मुसलमानों पर लटकी रहती है. पाकिस्तान के मानवाधिकार समूहों का कहना है कि अगस्त महीने में ईशनिंदा के 40 मामले दर्ज हुए हैं जिनमें अधिकतर मामले उन शिया मुसलमानों पर दर्ज किए गए हैं जो धार्मिक जुलूसों में भाषण दे रहे थे. बीबीसी हिंदी फ़ैक्ट चेक की पड़ताल में हमने पाया है कि शिया विरोधी प्रदर्शन पाकिस्तान में हुए लेकिन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने 'शिया शून्य' जैसी कोई टिप्पणी नहीं की थी. 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केस की एफ़आईआर निकलवाई. उसमें न भगत सिंह का नाम है, न राजगुरु का न सुखदेव का. ये तीनों बेगुनाह थे जिन्हें फांसी पर लटका दिया गया. इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका इंसाफ़ क्या इंसाफ़ था.\" समाप्त वो कहते हैं, \"साढ़े चार सौ गवाहों को सफ़ाई का मौक़ा ही नहीं दिया गया. न तो क्रॉस एक्ज़ामिनेशन की इजाज़त दी गई. ये कैसा इंसाफ़ वो हमें देकर गए हैं.'' राशिद क़ुरैशी की मांग है कि इस मुद्दे पर ब्रिटेन माफी मांगे और स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को भारी मुआवज़ा भी दे. राशिद क़ुरैशी के मुताबिक भारत में भगत सिंह का परिवार चाहता है कि इस मामले को दोबारा खोला जाए और वह हाल ही में होशियारपुर होकर आए थे जहां उनका उनके परिवार से संपर्क हुआ. तो क्या भारत में और भी किसी की इसे लेकर दिलचस्पी है? इस पर राशिद क़ुरैशी ने दावा किया कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और उर्दू के साहित्यकार मौलाना हसरत मोहानी के दामाद डॉ नफ़ीस अहमद सिद्दीक़ी के नेतृत्व में वकीलों का एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आएगा. पाकिस्तान के जड़ानवाला स्थित भगतपुर में भगत सिंह का घर (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक 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आदेश सुनाने वाला था और इस पर अंतिम निर्णय सात मार्च को होना था. उन्होंने कहा, \"बैनर्जी कमेटी के वकील ने आश्वासन दिया कि सात मार्च से पहले कुछ नहीं होगा, इसके बाद हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश टाल दिया. ऐसे में तीन मार्च को यह रिपोर्ट घोषित करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है.\" प्रकाश जावड़ेकर ने आरोप लगाया कि रिपोर्ट के प्रकाशित होने का समय भी राजनीति से प्रेरित रहा है. प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, \"कमेटी की अंतरिम रिपोर्ट बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले प्रकाशित की गई थी और लालू प्रसाद ने इसका लाभ भी उठाना चाहा था.\" उन्होंने कमेटी के गठन को ही ग़लत करार देते हुए कहा कि नानावटी आयोग इस मामले की जाँच कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई भी चल रही है. ऐसे में इस कमेटी का गठन ही ग़लत है.\" रिपोर्ट इस कमेटी ने अंतिम रिपोर्ट में भी यही दोहराया है कि साबरमती ऐक्सप्रेस में आग, दरअसल बाहर से नहीं लगाई गई थी और वो एक दुर्घटना थी. केंद्र की यूपीए सरकार ने सितंबर 2004 में गोधरा कांड की जाँच के लिए यूसी बैनर्जी समिति का गठन किया था और इस समिति ने जनवरी 2005 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट में भी कहा था कि रेलगाड़ी में लगी आग एक दुर्घटना थी. न्यायमूर्ति बैनर्जी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शुक्रवार को रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष जयप्रकाश बत्रा को सौंपी.\n\nSummary:", "target": "भारतीय जनता पार्टी ने गोधरा रेल आगज़नी मामले में बैनर्जी कमेटी की रिपोर्ट की निंदा करते हुए कहा है कि यह रिपोर्ट असंगत, तर्कहीन और राजनीति से प्रेरित है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nफ़रवरी 2002 में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस में लगी आग की जाँच करने वाली न्यायमूर्ति यूसी बैनर्जी समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में कहा है कि आग सिर्फ़ एक दुर्घटना थी और यह जानबूझकर नहीं लगाई गई थी. रिपोर्ट पर सवालिया निशान लगाते हुए भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि यह खेदजनक है कि एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने ख़ुद को राजनीतिक हथियार बनाना मंज़ूर किया है. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले सप्ताह गुजरात उच्च न्यायालय इस बारे में अपना अंतरिम आदेश सुनाने वाला था और इस पर अंतिम निर्णय सात मार्च को होना था. उन्होंने कहा, \"बैनर्जी कमेटी के वकील ने आश्वासन दिया कि सात मार्च से पहले कुछ नहीं होगा, इसके बाद हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश टाल दिया. ऐसे में तीन मार्च को यह रिपोर्ट घोषित करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है.\" प्रकाश जावड़ेकर ने आरोप लगाया कि रिपोर्ट के प्रकाशित होने का समय भी राजनीति से प्रेरित रहा है. प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, \"कमेटी की अंतरिम रिपोर्ट बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले प्रकाशित की गई थी और लालू प्रसाद ने इसका लाभ भी उठाना चाहा था.\" उन्होंने कमेटी के गठन को ही ग़लत करार देते हुए कहा कि नानावटी आयोग इस मामले की जाँच कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई भी चल रही है. ऐसे में इस कमेटी का गठन ही ग़लत है.\" रिपोर्ट इस कमेटी ने अंतिम रिपोर्ट में भी यही दोहराया है कि साबरमती ऐक्सप्रेस में आग, दरअसल बाहर से नहीं लगाई गई थी और वो एक दुर्घटना थी. केंद्र की यूपीए सरकार ने सितंबर 2004 में गोधरा कांड की जाँच के लिए यूसी बैनर्जी समिति का गठन किया था और इस समिति ने जनवरी 2005 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट में भी कहा था कि रेलगाड़ी में लगी आग एक दुर्घटना थी. न्यायमूर्ति बैनर्जी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शुक्रवार को रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष जयप्रकाश बत्रा को 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इस चैनल के संचालक आकाश गांधी हैं, जो भारतीय मूल के अमरीकी हैं. आकाश अपने इस यूट्यूब चैनल पर बॉलीवुड की धुनें पियानो पर बजाकर गानों को एक नया रूप देते हैं. इस चैनल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जोनिता गांधी. जोनिता और आकाश का कोई रिश्ता नहीं है. जोनिता कनाडा में पली बड़ी गायिका हैं और उन्हें बॉलीवुड गीत गाना पसंद है. जोनिता ने आकाश के यूट्यूब चैनल के लिए कई गाने गए है. जोनिता की आवाज़ यूट्यूब के ज़रिए संगीतकार एआर रहमान के कानों में पड़ी. थोड़े समय बाद एआर रहमान फ़िल्म हाइवे के लिए आवाज़ ढूंढ रहे थे, जोनिता की आवाज़ उन्हें पसंद आई और उन्होंने जोनिता को तुरंत चेन्नई रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया. जोनिता ने बीबीसी को बताया, \"यूट्यूब से रहमान तक पहुंच जाऊंगी, ऐसा सोचा भी नहीं था. मैं रिकॉर्डिंग के समय कांप रही थी. मेरे गानों को बॉलीवुड के कई दिग्गजों ने यूट्यूब पर देखा और पसंद भी किया है. अमिताभ बच्चन ने भी मेरे गानों के लिंक ट्वीट किए हैं.\" एआर रहमान के लिए गाने के बाद जोनिता की झोली में अब बॉलीवुड के कई प्रोजेक्ट हैं. जोनिता और आकाश यूट्यूब पर गाने बनाने के अलावा प्राइवेट संगीत कार्यक्रम भी करते हैं. रिएलिटी शो ने निकाला, यूट्यूब ने स्टार बनाया: श्रद्धा शर्मा देहरादून के एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी श्रद्धा शर्मा एक यूट्यूब स्टार हैं. 18 साल की श्रद्धा को गाने का शौक़ बचपन से ही था. इस शौक़ की वजह से उन्होंने कई टीवी रियलिटी शो में हिस्सा लिया. कभी पहले राउंड से तो कभी दूसरे राउंड से बाहर निकलने के बाद भी श्रद्धा ने कभी हार नहीं मानी. अपने घर में एक वीडियो रिकॉर्डर पर गाने गाकर श्रद्धा ने यूट्यूब पर अपलोड करना शुरू किया. अब श्रद्धा के यूट्यूब चैनल पर एक करोड़ से ज़्यादा हिट्स हैं और हाथ में यूनिवर्सल म्यूज़िक का कॉन्ट्रैक्ट. श्रद्धा बताती हैं, \"मैंने यूट्यूब पर बस मज़े-मज़े में वीडियो डालने शुरू किए, वो कैसे रातोंरात इतने लोकप्रिय हुए मुझे नहीं पता. बेशक मुझे रिएलिटी शो में हिस्सा लेने का मौक़ा न मिला हो लेकिन असलियत यही है कि मैंने अपने गायिका बनने के ख़्वाब को जी लिया है.\" संगीतकार लेज़्ली लेविस ने अपने संगीत से श्रद्धा शर्मा की एल्बम ‘रस्ते’ को सजाया है. लिल्ली सिंह उर्फ़ सुपरवूमन लिल्ली सिंह के वीडियो यूट्यूब पर काफ़ी पसंद किए जाते हैं. कनाडा में जन्मी भारतीय पंजाबी लिल्ली सिंह यानी सुपरवुमन की यूट्यूब पर बहुत बड़ी फ़ैन फॉलोविंग है. लिल्ली के यूट्यूब चैनल पर क़रीब 20 करोड़ हिट हैं. लिल्ली अपने चैनल पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर व्यंग्यात्मक वीडियो डालती हैं. शाहरुख़ ख़ान और बॉलीवुड की फ़ैन लिल्ली को हाल ही में माधुरी दीक्षित के साथ फ़िल्म 'गुलाब गंग' का प्रमोशन करने का अवसर मिला. इसके अलावा लिल्ली पंजाबी और अंग्रेज़ी में रैप भी करती हैं. उन्हें पंजाबी गायक जस्सी सिद्धू के गीत 'हिपशेकर' में रैप करने का मौक़ा भी यूट्यूब पर बढ़ती लोकप्रियता की वजह से मिला. भारत में सुपरवूमन के कई करोड़ फ़ैन हैं, ख़़ास तौर पर 11 से 20 साल के लड़के-लड़की. स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं, यूट्यूब है ना: शाहरुख़ बीते शनिवार को मुंबई में भारत और विदेश से आए कई यूट्यूबर्स को एक मंच पर अपने प्रशंसकों से मिलने का मौक़ा मिला. ये समारोह था यूट्यूब द्वारा आयोजित भारत का पहला यूट्यूब फ़ैन फ़ेस्ट. इस फ़ेस्ट में शाहरुख़ ख़ान भी अपने बच्चों के साथ पहुंचे. शाहरुख़ ने कहा, \"यूट्यूब एक बेहतरीन प्लेटफ़ॉर्म है, अब आपको स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं है. आप अपने कमरे से ही सुपरस्टार बन सकते हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "फ़ेसबुक और ट्विटर के अलावा इंटरनेट पर यूट्यूब एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जो रोज़ाना इस्तेमाल किया जाता है. यूट्यूब पर अलग-अलग विषयों पर कई करोड़ वीडियो हैं. आप मनोरंजन से लेकर न्यूज़ और संगीत से लेकर टीवी प्रोग्राम सब यूट्यूब पर देख सकते हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलेकिन अब यूट्यूब का इस्तेमाल अपना हुनर दिखाने के लिए भी किया जा रहा है. भारत और विदेश में कई ऐसे लोग हैं जो अपना पेट अपने हुनर से पालते हैं. इन लोगों को आम बोल चाल की भाषा में यूट्यूबर्स कहा जाता है. ये वो लोग हैं जो सिर्फ़ यूट्यूब के लिए ओरिजिनल वीडियो बनाते हैं और उसे यूट्यूब पर अपलोड कर शोहरत और हिट्स पाते हैं. बीबीसी ने मुंबई में ऐसे ही कुछ यूट्यूबर्स से मुलाक़ात की जिन्होंने यूट्यूब के ज़रिए पैसा, नाम और शोहरत कमाया. यूट्यूब पर देख एआर रहमान ने दिया मौक़ा: जोनिता यूट्यूब के चैनल '88 कीज़ टू यूफ़ोरिया' को डेढ़ करोड़ से भी ज़्यादा बार देखा जा चुका है. इस चैनल के संचालक आकाश गांधी हैं, जो भारतीय मूल के अमरीकी हैं. आकाश अपने इस यूट्यूब चैनल पर बॉलीवुड की धुनें पियानो पर बजाकर गानों को एक नया रूप देते हैं. इस चैनल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जोनिता गांधी. जोनिता और आकाश का कोई रिश्ता नहीं है. जोनिता कनाडा में पली बड़ी गायिका हैं और उन्हें बॉलीवुड गीत गाना पसंद है. जोनिता ने आकाश के यूट्यूब चैनल के लिए कई गाने गए है. जोनिता की आवाज़ यूट्यूब के ज़रिए संगीतकार एआर रहमान के कानों में पड़ी. थोड़े समय बाद एआर रहमान फ़िल्म हाइवे के लिए आवाज़ ढूंढ रहे थे, जोनिता की आवाज़ उन्हें पसंद आई और उन्होंने जोनिता को तुरंत चेन्नई रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया. जोनिता ने बीबीसी को बताया, \"यूट्यूब से रहमान तक पहुंच जाऊंगी, ऐसा सोचा भी नहीं था. मैं रिकॉर्डिंग के समय कांप रही थी. मेरे गानों को बॉलीवुड के कई दिग्गजों ने यूट्यूब पर देखा और पसंद भी किया है. अमिताभ बच्चन ने भी मेरे गानों के लिंक ट्वीट किए हैं.\" एआर रहमान के लिए गाने के बाद जोनिता की झोली में अब बॉलीवुड के कई प्रोजेक्ट हैं. जोनिता और आकाश यूट्यूब पर गाने बनाने के अलावा प्राइवेट संगीत कार्यक्रम भी करते हैं. रिएलिटी शो ने निकाला, यूट्यूब ने स्टार बनाया: श्रद्धा शर्मा देहरादून के एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी श्रद्धा शर्मा एक यूट्यूब स्टार हैं. 18 साल की श्रद्धा को गाने का शौक़ बचपन से ही था. इस शौक़ की वजह से उन्होंने कई टीवी रियलिटी शो में हिस्सा लिया. कभी पहले राउंड से तो कभी दूसरे राउंड से बाहर निकलने के बाद भी श्रद्धा ने कभी हार नहीं मानी. अपने घर में एक वीडियो रिकॉर्डर पर गाने गाकर श्रद्धा ने यूट्यूब पर अपलोड करना शुरू किया. अब श्रद्धा के यूट्यूब चैनल पर एक करोड़ से ज़्यादा हिट्स हैं और हाथ में यूनिवर्सल म्यूज़िक का कॉन्ट्रैक्ट. श्रद्धा बताती हैं, \"मैंने यूट्यूब पर बस मज़े-मज़े में वीडियो डालने शुरू किए, वो कैसे रातोंरात इतने लोकप्रिय हुए मुझे नहीं पता. बेशक मुझे रिएलिटी शो में हिस्सा लेने का मौक़ा न मिला हो लेकिन असलियत यही है कि मैंने अपने गायिका बनने के ख़्वाब को जी लिया है.\" संगीतकार लेज़्ली लेविस ने अपने संगीत से श्रद्धा शर्मा की एल्बम ‘रस्ते’ को सजाया है. लिल्ली सिंह उर्फ़ सुपरवूमन लिल्ली सिंह के वीडियो यूट्यूब पर काफ़ी पसंद किए जाते हैं. कनाडा में जन्मी भारतीय पंजाबी लिल्ली सिंह यानी सुपरवुमन की यूट्यूब पर बहुत बड़ी फ़ैन फॉलोविंग है. लिल्ली के यूट्यूब चैनल पर क़रीब 20 करोड़ हिट हैं. लिल्ली अपने चैनल पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर व्यंग्यात्मक वीडियो डालती हैं. शाहरुख़ ख़ान और बॉलीवुड की फ़ैन लिल्ली को हाल ही में माधुरी दीक्षित के साथ फ़िल्म 'गुलाब गंग' का प्रमोशन करने का अवसर मिला. इसके अलावा लिल्ली पंजाबी और अंग्रेज़ी में रैप भी करती हैं. उन्हें पंजाबी गायक जस्सी सिद्धू के गीत 'हिपशेकर' में रैप करने का मौक़ा भी यूट्यूब पर बढ़ती लोकप्रियता की वजह से मिला. भारत में सुपरवूमन के कई करोड़ फ़ैन हैं, ख़़ास तौर पर 11 से 20 साल के लड़के-लड़की. स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं, यूट्यूब है ना: शाहरुख़ बीते शनिवार को मुंबई में भारत और विदेश से आए कई यूट्यूबर्स को एक मंच पर अपने प्रशंसकों से मिलने का मौक़ा मिला. ये समारोह था यूट्यूब द्वारा आयोजित भारत का पहला यूट्यूब फ़ैन फ़ेस्ट. इस फ़ेस्ट में शाहरुख़ ख़ान भी अपने बच्चों के साथ पहुंचे. शाहरुख़ ने कहा, \"यूट्यूब एक बेहतरीन प्लेटफ़ॉर्म है, अब आपको स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं है. आप अपने कमरे से ही सुपरस्टार बन सकते हैं. 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(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटर और फेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान का एक चिड़ियाघर अपने यहाँ जानवरों की जगह डायनासोरों के मॉडल लगा रहा है. इसकी वजह चिड़ियाघर में जानवरों की कमी बताई जा रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस चिड़ियाघर में बनी गुफाओं में कभी शेर, तेंदुए और साँपों की रिहाइश हुआ करती थी, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि इन जानवरों की माँदें कई साल से खाली पड़ी हैं. शेर के भेस में कुत्ता चिड़ियाघर में डायनासोरों की प्रतिकृतियाँ रखे जाने की एक वजह यह भी बताई गई है कि इस्लामाबाद के नगर प्रशासन के पास नए जानवरों को लाने के लिए पैसा नहीं है. साल भर पहले चिड़ियाघर के आखिरी शेर की मौत हो गई थी. एसोसिएटेड प्रेस ऑफ पाकिस्तान के मुताबिक चिड़ियाघर के प्रबंधकों का मानना है कि डायनासोरों के विशालकाय मॉडल लगाने से वहाँ आने वाले सैलानियों की गिरती संख्या को थामा जा सकेगा. निराश सैलानी चिड़ियाघर आए एक सैलानी ने समाचार एजेंसी को बताया, \"ये शुरुआत अच्छी है, लेकिन चिड़ियाघर प्रबंधन को नए जानवर लाने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए.\" बेजान जानवरों का घर स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में इस चिड़ियाघर की खस्ताहालत का अक्सर ज़िक्र होता रहा है. इन ख़बरों में वहाँ आने वाले निराश सैलानियों की भावनाओं का भी ज़िक्र रहता है. फ़रवरी के महीने में पाकिस्तान टुडे की वेबसाइट ने अनाम सूत्रों के हवाले से कहा था कि तीन शेर और तीन चीते इस चिड़ियाघर में लाए जाएंगे. पर यह ख़बर हक़ीकत में नहीं बदल सकी. एपीपी ने चिड़ियाघर प्रबंधन के हवाले से कहा है कि डायनासोर की प्रतिकृतियाँ लगाना एक तात्कालिक उपाय है और नए जानवर लाने के लिए धन इकट्ठा करने की योजना पर काम चल रहा है. 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में कोई प्रगति नहीं हुई थी लेकिन मुक़दमे के दौरान एक स्तर पर शक के तार शर्मा की तरफ़ मुड़े और शिवानी भटनागर को रास्ते से हटाने की साज़िश का भंडाफोड़ हुआ. शर्मा ने कई महीनों तक फरार रहने के बाद आख़िरकार अगस्त 2002 में अंबाला की एक अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. गिरफ़्तारी के समय वे पुलिस महानिरीक्षक (कारावास) थे. पुलिस ने बाद में श्रीभगवान को भी गिरफ़्तार कर लिया था. पुलिस ने दावा किया था कि रविकांत शर्मा ने सहअभियुक्त सत्यप्रकाश, श्रीभगवान, वेद प्रकाश शर्मा और वेद उर्फ़ कालू से दिसंबर 1998 में दिल्ली के अशोक होटल में मुलाक़ात की थी. अभियुक्तों के वकील ने कहा है कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील करेंगे.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली की एक अदालत ने 1999 में पत्रकार शिवानी भटनागर की हत्या के मामले में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के एक वरिष्ठ अधिकारी आरके शर्मा सहित चार अभियुक्तों को दोषी क़रार दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nशर्मा पुलिस महानिरीक्षक के पद से निलंबित चल रहे थे. दिल्ली की इस विशेष अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राजेंद्र कुमार शास्त्री ने आरके शर्मा को शिवानी भटनागर की हत्या की साज़िश रचने का दोषी पाया है. कहा जाता है कि शिवानी भटनागर ने शर्मा को धमकी दी थी कि उन्होंने नौ साल पहले जो कुछ गोपनीय दस्तावेज़ उसे दिए थे, वह उनके बारे में शर्मा का भंडाफोड़ कर देगी. आईपीएस अधिकारी आरके शर्मा को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 302, 120बी और 201 के तहत दोषी क़रार दिया गया है. तीन अन्य अभियुक्तों भगवान शर्मा, प्रदीप शर्मा और सत्यप्रकाश को भी शिवानी भटनागर की हत्या करने की शर्मा की साज़िश को अंजाम देने का दोषी क़रार दिया गया है. उन पर सबूतों को नष्ट करने का भी आरोप साबित हुआ है. अदालत में जब यह फ़ैसला सुनाया गया तो आरके शर्मा वहाँ मौजूद थे. दो अन्य अभियुक्त वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश उर्फ़ कालू को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है. सज़ा अदालत इन दोषी पाए गए मुजरिमों के लिए सज़ा का फ़ैसला 20 मार्च को सुनाएगी. इनकी सज़ा उम्रक़ैद से लेकर मृत्युदंड तक हो सकती है. इस मुक़दमे में कुल 209 गवाह पेश हुए लेकिन उनमें से 51 ने कई अपने बयान पलट दिए थे हालाँकि पुलिस, जाँच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष ने घटनाक्रम में तारतम्य और सबूतों को जोड़कर अभियुक्तों के ख़िलाफ़ ये मामला निर्धारित किया है. यह मुक़दमा लगभग नौ साल तक चला. भारत के एक अंग्रेज़ी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस की वरिष्ठ पत्रकार शिवानी भटनागर की 23 जनवरी 1999 को दिल्ली में हत्या कर दी गई थी. शर्मा सहित कुल छह लोगों पर इस मामले में धारा 302 (हत्या), 120बी (साज़िश), 201 (सबूतों को नष्ट करना), 403 और 404 (संपत्ति के बारे में ग़लत जानकारी देना) के तहत आरोप निर्धारित किए गए थे. अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि शिवानी भटनागर पहली बार आरके शर्मा से तब मिली थीं जब शर्मा प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यालय में विशेषाधिकारी थे. अदालत में सुनवाई के दौरान सामने आई जानकारी के अनुसार बाद में शिवानी भटनागर और रविकांत शर्मा के बीच प्रेम संबंध बन गए और उसी दौरान शर्मा ने शिवानी को कुछ गोपनीय दस्तावेज़ दिखाए जिनमें सेंट किट्स मामले से संबंधित भी कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ थे. जानकारी के अनुसार बाद में आरके शर्मा ने शिवानी भटनागर से विवाह करने से इनकार कर दिया तो शिवानी भटनागर ने कथित तौर पर रविकांत शर्मा का भंडाफोड़ करने की धमकी दी. अदालत को बताया गया कि उसके बाद शर्मा ने शिवानी की हत्या करने का फ़ैसला कर लिया. शिवानी भटनागर अपने मकान में अपने छोटे से बेटे के साथ रहती थी जब उसकी हत्या की गई. आरोप थे कि हत्यारों ने बिजली के एक तार से शिवानी भटनागर का गला घोंट दिया और किचन में इस्तेमाल होने वाले चाकू से उस पर कम से कम दस वार किए. लगभग तीन साल तक शिवानी भटनागर के हत्याकांड मामले की जाँच में कोई प्रगति नहीं हुई थी लेकिन मुक़दमे के दौरान एक स्तर पर शक के तार शर्मा की तरफ़ मुड़े और शिवानी भटनागर को रास्ते से हटाने की साज़िश का भंडाफोड़ हुआ. शर्मा ने कई महीनों तक फरार रहने के बाद आख़िरकार अगस्त 2002 में अंबाला की एक अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. गिरफ़्तारी के समय वे पुलिस महानिरीक्षक (कारावास) थे. पुलिस ने बाद में श्रीभगवान को भी गिरफ़्तार कर लिया था. पुलिस ने दावा किया था कि रविकांत शर्मा ने सहअभियुक्त सत्यप्रकाश, श्रीभगवान, वेद प्रकाश शर्मा और वेद उर्फ़ कालू से दिसंबर 1998 में दिल्ली के अशोक होटल में मुलाक़ात की थी. अभियुक्तों के वकील ने कहा है कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील करेंगे.\n\nSummary:", "lang": 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बीबीसी को बताया कि अब तक इस हिंसा में 36 लोगों की मौत हुई है और मंगलवार सुबह से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं हैं. कर्फ्यू मुजफ़्फ़रनगर ज़िले के तीन थाना क्षेत्रों- सिविल लाइंस, कोतवाली और नई मंडी में कर्फ्यू अब भी जारी है और इसमें ढील देने के बारे में कोई फ़ैसला मंगलवार शाम को समीक्षा के बाद ही किया जाएगा. इस हिंसा के लिए उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ रही है. उधर राज्य सरकार ने मुजफ़्फ़रनगर में 27 अगस्त से 9 सितंबर तक भड़की हिंसा के मामले की जांच करने के लिए रिटायर्ड जस्टिस विष्णु सहाय की अध्यक्षता में एक सदस्यीय कमीशन नियुक्त किया है. कमीशन मामले की जांच कर दो महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. शिंदे ने कहा कि केन्द्र सरकार दंगों से निपटने के लिए हरसंभव सहायता देने को तैयार है. ज़मीनी स्तर पर जहां हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं, वहीं राज्य सरकार पर लगातार राजनीतिक हमले हो रहे हैं. इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कहना है कि उत्तर प्रदेश की सरकार को पहले ही चेतावनी दे दी गई थी कि राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है. शिंदे ने कहा, \"मैंने अपनी मासिक बैठक में कहा था कि चुनावों के नज़दीक आने के मद्देनजर देश में देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है.\" उन्होंने किसी राजनीतिक दल का नाम लिए बगैर कहा, \"हमारे पास ऐसी सूचना है कि कुछ लोग ऐसा कर सकते है. मैं किसी पार्टी को ज़िम्मेदार नहीं मान रहा हूं.\" (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर और आस-पास के ज़िलों में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में मरने वालों की संख्या को लेकर एक राय देखने को नहीं मिल रही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराज्य के गृह सचिव कमल सक्सेना ने समाचार एज़ेंसी पीटीआई को बताया, \"पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में भड़की हिंसा में अब तक 38 लोगों की मौत हुई है. इनमें मुजफ़्फ़रनगर में अकेले 32 लोगों की मौत हुई है.\" कमल सक्सेना ने ये भी बताया कि इस हिंसा में मेरठ जिले में दो और हापुड़, बागपत, सहारनपुर और शामली में एक-एक लोगों की मौत हुई है. इन जिलों में अब तक 366 लोगों को हिरासत में लिया गया है. 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Hindi.\n\nText:\nवेबसाइट का कहना है कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने एक फ़र्जी दस्तावेज़ को अयमन अल ज़वाहिरी का ख़त बताया है. जिसे अयमन अल ज़वाहिरी की चिट्ठी बताया जा रहा था उसमें उन्होंने इराक़ में विद्रोहियों की रणनीति पर सवाल उठाए गए थे. अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि अबू मुसाब अल ज़रकावी को अरबी में लिखी इस चिट्ठी में शियाओं के खिलाफ़ हिंसा और बंधकों की हत्या के प्रभावों की चर्चा की गई थी. इस चिट्ठी के बारे में जानकारी पिछले सप्ताह आई थी, अब लगभग छह हज़ार शब्दों वाली चिट्ठी को सार्वजनिक कर दिया गया. अमरीकी अधिकारी दावा कर रहे हैं कि यह चिट्ठी ताज़ा है और ज़वाहिरी ने ही ज़रकावी को लिखी है लेकिन स्वतंत्र सूत्रों से न तो अमरीकी ख़ुफ़िय़ा एजेंसी के दावे या अल क़ायदा के कथित खंडन की पुष्टि संभव है. ख़ुफ़िया अधिकारियों का कहना है कि यह पत्र अल क़ायदा की विचारधारा की नायाब झलक पेश करता है. शुरू में इस पत्र के कुछ अंश जारी किए गए थे, अब अमरीकी ख़ुफ़िया विभाग के निदेशक ने इस पूरे पत्र को अरबी और अँगरेज़ी में अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया. अमरीकी अधिकारी यह बताने को तैयार नहीं है कि उन्हें यह पत्र कब और कैसे मिला, सिर्फ़ इतना बताया गया है कि यह इराक़ में एक सैनिक कार्रवाई के दौरान हाथ आया. यह पत्र सीधे ज़रकावी को संबोधित नहीं है लेकिन अमरीकी अधिकारी मानते हैं कि यह उन्हीं के लिए लिखा गया था. इस पत्र को पढ़ने के बाद अमरीकी अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला है कि अल क़ायदा का केंद्रीय नेतृत्व इराक़ में होने वाली गतिविधियों को क़ाबू में रखने की कोशिश कर रहा है. लक्ष्य इस पत्र में इराक़ में अल क़ायदा के नेता को बताया गया कि उनके चार लक्ष्य हैं-- अमरीकियों को इराक़ से निकालना, वहाँ इस्लामी हुकूमत क़ायम करना, जिहाद को इराक़ के पड़ोसी देशों में ले जाना और इसराइल के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना. इस पत्र में यह भी कहा गया है कि इन कामों के लिए आम लोगों के समर्थन की भी ज़रूरत है इसलिए ऐसे कामों से परहेज़ किया जाए जिनसे जनता उनके ख़िलाफ़ हो सकती है, इसमें संकेत दिए गए हैं कि क्रूर छवि बनने से नुक़सान हो सकता है. क्या यह पत्र ज़रकावी को ही लिखा गया था, ज़रकावी को यह पत्र मिला या नहीं, इस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया रही, ये सारे सवाल अनुत्तरित हैं. इस पत्र में एक और अहम बात ये है कि अल क़ायदा के नेताओं की मुश्किलों का ज़िक्र, इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना की कार्रवाइयों से 'वास्तविक ख़तरा' पैदा हो गया है.\n\nSummary:", "target": "बुधवार को अमरीकी ख़ुफ़िया अधिकारियों ने \"अल क़ायदा के दूसरे सबसे बड़े नेता की चिट्ठी\" प्रकाशित की थी, अब अल क़ायदा से जुड़ी समझी जाने वाली एक वेबसाइट ने उसे ग़लत बताया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवेबसाइट का कहना है कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने एक फ़र्जी दस्तावेज़ को अयमन अल ज़वाहिरी का ख़त बताया है. जिसे अयमन अल ज़वाहिरी की चिट्ठी बताया जा रहा था उसमें उन्होंने इराक़ में विद्रोहियों की रणनीति पर सवाल उठाए गए थे. अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि अबू मुसाब अल ज़रकावी को अरबी में लिखी इस चिट्ठी में शियाओं के खिलाफ़ हिंसा और बंधकों की हत्या के प्रभावों की चर्चा की गई थी. इस चिट्ठी के बारे में जानकारी पिछले सप्ताह आई थी, अब लगभग छह हज़ार शब्दों वाली चिट्ठी को सार्वजनिक कर दिया गया. अमरीकी अधिकारी दावा कर रहे हैं कि यह चिट्ठी ताज़ा है और ज़वाहिरी ने ही ज़रकावी को लिखी है लेकिन स्वतंत्र सूत्रों से 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हम कक्षाओं की तरफ़ भागे. उस समय नौंवी और दसवीं के छात्रों के लिए पार्टी चल रही थी. इसलिए वहाँ काफ़ी छात्र थे. ऊपरी माले पर 11वीं और 12वीं के छात्रों की परीक्षा चल रही थी. मैने हमलावरों को देखा था. वो छह या सात थे. वो हर क्लास में जाकर बच्चों को मार रहे थे. प्रत्यक्षदर्शी जब हमल हुआ तो हम कुर्सी और मेज़ के नीचे छिप गए. लेकिन उन्होंने हमारे सर पर गोलियाँ चलाईं और टाँगों पर भी. वे लगातार गोलियाँ चलाते रहे. लेकिन हम हिले नहीं क्योंकि जो भी हिल रहा था वो उस पर गोलियाँ चला रहे थे. हम टेबल के नीचे ही बैठे रहे. समाप्त रिश्तेदारों की ज़बानी रिश्तेदार मेरी सहेली की बच्ची बच निकलने में सफल रही. हमला लड़कों के सेक्शन में हुआ था इसलिए वो बच्ची थोड़ी दूरी पर थी. वो किसी तरह अपने भाई को ढूँढने पहुँची पर वो उसे नहीं ढूँढ पाई. वो जिस कमरे में पहुँची वहाँ गोलीबारी चल रही थी. उसके कपड़े खून से लथपथ थे. उसने दिखाया जैसे वो मर चुकी है ताकि हमलावर चले जाएँ. फिर वो पिछले दरवाज़े से भाग निकली. रिश्तेदार मेरे बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं जहाँ हमला हुआ. सुबह हमारे पास फ़ोन आया कि कुछ चरमपंथी स्कूल में घुस गए हैं. मेरा एक बेटा सुरक्षित निकल आया लेकिन एक अंदर ही है. मुझे नहीं पता कि वो सुरक्षित है या नहीं. मेरे रिश्तेदार अस्पतालों में उसे खोज रहे हैं. पता नहीं वो ज़िंदा है या नहीं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के शहर पेशावर में एक स्कूल पर हुए हमले में 132 लोग मारे गए हैं. इनमें से ज़्यादातर बच्चे हैं. तालिबान ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री समेत कई नेताओं ने हमले की निंदा की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nप्रत्यक्षदर्शियों की आँखों देखी प्रत्यक्षदर्शी जैसे ही गोलीबारी शुरु हुई हम कक्षाओं की तरफ़ भागे. उस समय नौंवी और दसवीं के छात्रों के लिए पार्टी चल रही थी. इसलिए वहाँ काफ़ी छात्र थे. ऊपरी माले पर 11वीं और 12वीं के छात्रों की परीक्षा चल रही थी. मैने हमलावरों को देखा था. वो छह या सात थे. वो हर क्लास में जाकर बच्चों को मार रहे थे. प्रत्यक्षदर्शी जब हमल हुआ तो हम कुर्सी और मेज़ के नीचे छिप गए. लेकिन उन्होंने हमारे सर पर गोलियाँ चलाईं और टाँगों पर भी. वे लगातार गोलियाँ चलाते रहे. लेकिन हम हिले नहीं क्योंकि जो भी हिल रहा था वो उस पर गोलियाँ चला रहे थे. हम टेबल के नीचे ही बैठे रहे. समाप्त रिश्तेदारों की ज़बानी रिश्तेदार मेरी सहेली की बच्ची बच निकलने में सफल रही. हमला लड़कों के सेक्शन में हुआ था इसलिए वो बच्ची थोड़ी दूरी पर थी. वो किसी तरह अपने भाई को ढूँढने पहुँची पर वो उसे नहीं ढूँढ पाई. वो जिस कमरे में पहुँची वहाँ गोलीबारी चल रही थी. उसके कपड़े खून से लथपथ थे. उसने दिखाया जैसे वो मर चुकी है ताकि हमलावर चले जाएँ. फिर वो पिछले दरवाज़े से भाग निकली. रिश्तेदार मेरे बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं जहाँ हमला हुआ. सुबह हमारे पास फ़ोन आया कि कुछ चरमपंथी स्कूल में घुस गए हैं. मेरा एक बेटा सुरक्षित निकल आया लेकिन एक अंदर ही है. मुझे नहीं पता कि वो सुरक्षित है या नहीं. मेरे रिश्तेदार अस्पतालों में उसे खोज रहे हैं. पता नहीं वो ज़िंदा है या नहीं. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दुनिया का सबसे बड़ा आयोजन कहे जाने वाले कुंभ मेले का पहला शाही स्नान शुरू हो चुका है और आधिकारिक रूप से मेले की शुरुआत हो गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n49 दिन तक चलने वाले इस मेले का समापन चार मार्च को होगा और इस बीच आठ मुख्य पर्वों पर शाही स्नान होगा. शाही स्नान को देखते हुए प्रयागराज ज़िले के सभी स्कूल-कॉलेज तीन दिन के लिए बंद कर दिए गए हैं. शहर की ओर आने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेडिंग की गई है और वाहनों को शहर के बाहर बने पार्किंग स्थलों पर ही रोक दिया जा रहा है. इन पार्किंग स्थलों से मेला क्षेत्र तक आने के लिए शटल बसें और ई-रिक्शा चलाए गए हैं. 12 करोड़ लोग आ सकते हैं कुंभ माना जा रहा है कि 49 दिनों तक चलने वाले इस बार के कुंभ मेले में क़रीब 12 करोड़ लोगों के आने की संभावना है जिसमें 10 लाख के क़रीब विदेशी नागरिक भी होंगे. उत्तर प्रदेश सरकार कुंभ 2019 को अब तक का सबसे भव्य कुंभ बता रही है और सरकार ने इसकी ख़ूब ब्रांडिंग भी की है. माना जाता है कि प्रयागराज में जहां पर कुंभ मेले का आयोजन होता है वहीं ब्रह्माण्ड का उद्गम हुआ था और वहीं पर पृथ्वी का केंद्र भी है. मान्यता ये भी है कि सृष्टि निर्माण से पहले ब्रह्माजी ने इसी स्थान पर अश्वमेघ यज्ञ किया था. कुंभ के ज़िलाधिकारी विजय किरण आनंद के मुताबिक़, इस बार मेला क्षेत्र क़रीब 45 वर्ग किमी के दायरे में फैला है, जबकि इससे पहले यह सिर्फ़ 20 वर्ग किमी इलाक़े में ही होता था. क्षेत्र को फैला देने का लाभ ये हुआ है कि संगम क्षेत्र में भीड़ का दबाव बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ पाएगा और स्नान घाटों के विकल्प बढ़ जाएंगे. तंबुओं का अस्थायी शहर कुंभ के दौरान प्रयागराज में दुनिया का सबसे बड़ा तंबुओं का अस्थायी शहर बस जाता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, कुंभ के आयोजन पर इस साल चार हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च हो रहा है. साधु संतों के कुल 13 अखाड़ों के लिए हर पर्व पर शाही स्नान का समय और स्नान की अवधि प्रशासन की ओर से तय की जाती है. मेला अधिकारी विजय किरण आनंद के मुताबिक़, \"15 जनवरी को पहले शाही स्नान की शुरुआत सुबह 5 बजकर 15 मिनट से हुई है और हर अखाड़े को स्नान के लिए 45 मिनट का समय दिया गया है. स्नान शाम को चार बजे तक चलेगा.\" शाही स्नान में विभिन्न अखाड़ों से संबंध रखने वाले साधु-संत सोने-चांदी की पालकियों, हाथी-घोड़े पर बैठकर संगम में स्नान के लिए पहुंचते हैं. ये साधु-संत अपनी-अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते हैं जिसके ज़रिए शस्त्र और शास्त्र के समन्वय का संदेश देते हैं. कुंभ मेले पर पुस्तक लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, \"शाही स्नान को राजयोग स्नान भी कहा जाता है, जिसमें साधु-संत और उनके अनुयायी संगम या फिर अन्य किसी पवित्र नदी में तय समय पर डुबकी लगाते हैं. माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में डुबकी लगाने से अमरता का वरदान मिल जाता है. कुंभ के दौरान शाही स्नान के बाद ही आम लोगों को संगम में डुबकी लगाने की इजाज़त होती है.\" शाही स्नान के दौरान अखाड़ों के साधु-संत अपने हाथों में पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र लिए होते हैं, शरीर पर राख लिपटी रहती है और वे जयकारा भी लगाते रहते हैं. आज डुबकी लगाएंगे एक करोड़ लोग कुंभ मेला अधिकारी विजय किरण आनंद ने बताया कि पहले शाही स्नान पर एक करोड़ लोगों के पहुंचने की उम्मीद है जबकि पूरे कुंभ के दौरान क़रीब 12 करोड़ लोगों के आने की संभावना जताई जा रही है. यात्रियों की भारी संख्या को देखते हुए रेलवे ने विशेष ट्रेनें चलाई हैं और रोडवेज ने मेला स्पेशल बसें बड़ी संख्या में चला रखी हैं. प्रशासन ने सुरक्षा के भी कड़े इंतज़ाम किए हैं. राज्य के डीजीपी ओपी सिंह के मुताबिक़, \"सुरक्षा के लिए एअर सर्विलांस और हवाई स्नाइपर्स की मदद ली जा रही है. 22 हज़ार पुलिसकर्मियों के अलावा अर्धसैनिक बलों की 80 बटालियन भी तैनात की गई हैं.\" प्रशासन का दावा है कि पूरा मेला क्षेत्र खुले में शौच से मुक्त है और इसे सुनिश्चित कराने के लिए सवा लाख से भी ज़्यादा शौचालय बनाए गए हैं. लेकिन पहले शाही स्नान तक कुंभ क्षेत्र के विभिन्न सेक्टरों में शौचालयों की स्थिति ठीक नहीं है. कहीं इन शौचालयों के सिर्फ़ ढांचे खड़े हैं तो कहीं कनेक्शन का काम पूरा नहीं हुआ है. भारत में कुल चार स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता है - प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक. इनमें से हर स्थान पर बारहवें साल कुंभ होता है. प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह साल के अंतराल पर अर्धकुंभ भी होता है. परंपरा के अनुसार इस बार अर्धकुंभ ही पड़ रहा है लेकिन सरकार ने अर्धकुंभ का नाम बदलकर कुंभ और कुंभ का नाम महाकुंभ कर दिया है. सरकार के इस क़दम का तमाम शास्त्रीय विशेषज्ञों ने भी विरोध भी किया है. 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान रेप को लेकर अपनी एक टिप्पणी के कारण विवादों में घिर गए हैं. राष्ट्रीय महिला आयोग ने उन्हें नोटिस भेजकर सात दिन में जवाब मांगा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nएक इंटरव्यू में अपनी आने वाली फिल्म 'सुल्तान' को लेकर सलमान ने कहा, ''जब मैं शूटिंग के बाद रिंग से बाहर निकलता था, तो बलात्कार की शिकार एक महिला की तरह महसूस करता था. मैं सीधा नहीं चल पाता था.'' इस फिल्म में सलमान ख़ान एक पहलवान का किरदार निभा रहे हैं. सलमान ने कहा, ''छह घंटे की शूटिंग के दौरान उठाना-पटकना चलता रहा था. बहुत मुश्किल था. मुझे 120 किलो के आदमी को 10 बार उठाना पड़ता और वो भी 10 अलग अलग एंगल से.'' उनके इस बयान पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने सलमान ख़ान को नोटिस भेजकर सात दिन में जवाब दाखिल करने को कहा है. समाप्त आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने बताया कि आयोग ने उनको नोटिस भेजकर पूछा है कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा. उन्होंने कहा कि यह दुख की बात है, वह ऐसा बयान इसलिए नहीं दे सकते है कि वो सलमान ख़ान हैं. वहीं शूटिंग के अनुभव की तुलना बलात्कार की शिकार महिला से किए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर काफी हंगामा हो रहा है. जाने माने पत्रकार राहुल कंवल ने ट्विटर पर लिखा, ''सलमान ख़ान को अपना मुंह सिल लेना चाहिए. जब भी वो बोलते हैं तो कुछ न कुछ ऐसा ही होता है. बलात्कार से तुलना बहुत ही निराशाजनक है.'' प्रोफेसर एजी अयर का ट्वीट है, ''सुल्तान से जुड़े एक इंटरव्यू में सलमान ख़ान ने जो रेप से तुलना की है, उससे उनकी सोच और महिलाओं को लेकर असंवेदनशीलता पता चलती है.'' कुछ लोग पत्रकारों को भी आड़े हाथ ले रहे हैं. करिश्मा ने ‏@karishmau ने ट्वीट किया, ''अगर आप सलमान के रेप वाले कमेंट की निंदा करते हैं तो आपको उन पत्रकारों की भी निंदा करनी चाहिए जो उसके बाद खिलखिलाकर हंस रहे थे.'' असीम रस्तोगी ने भी @aseemrastogi2 से ऐसी ही टिप्पणी की है, ''सलमान की टिप्पणी असंवेदनशील थी. लेकिन उन पत्रकारों का क्या जो उस पर हंस रहे थे? इससे पता चलता है कि एक समाज के तौर पर हम महिलाओं के बारे में क्या सोचते हैं.'' वहीं एक यूज़र ने ‏@FearlessIndian1 से ट्वीट किया, ''रेप जेंडरन्यूट्रल होता है और सिर्फ़ महिला ही नहीं पुरूष का भी रेप होता है और उसे भी उसका अहसास होता है.. हम सलमान का समर्थन करते हैं.'' 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Hindi.\n\nText:\nमंडेला के करीबी मित्र अहमद कथराडा ने श्रद्धांजलि दे रहे लोगों से कहा, उन्होंने \"एक बड़े भाई\" को खो दिया है. कथराडा कई सालों तक रॉबेन द्वीप जेल में मंडेला के साथ जेल में रहे थे. मंडेला के परिवार ने उनके पारंपरिक काउसा पद्धति से होने वाले अंतिम संस्कार में केवल कुछ सौ मेहमानों को शामिल होने के लिए कहा था. मंडेला के ताबूत को सेना के जवानों के साथ ही परिवार के सदस्यों और मित्रों ने कांधा दिया. मंडेला के पोते नदाबा मंडेला ने एक लिखित श्रद्धांजलि भाषण में कहा, \"यह मंडेला ही थे जिनके माध्यम से दुनिया ने दक्षिण अफ़्रीका पर नज़र डाला और काले दक्षिण अफ़्रीकी लोगों के संगठित दमन पर ध्यान दिया.\" नेल्सन मंडेला की मृत्यु पांच दिसंबर को 95 वर्ष की आयु में हुई. हवाई सलामी जब ताबूत को कब्र में रखा जा रहा था तब दक्षिण अफ्रीकी वायु सेना ने मंडेला को हवाई सलामी दी. सैन्य वायुयान में मंडेला का शव वाटरलू हवाई अड्डे पहुंचा तो उनकी सबसे बड़ी बेटी मकाज़िवे मंडेला और मंडेला की पोती मडिलेका हवाई अड्डे पर मौजूद थीं. दक्षिण अफ्रीकी के झंडे में लिपटे उनके शव को गार्ड ऑफ़ ऑनर के साथ 32 किलोमीटर 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "दक्षिण अफ़्रीका के नेता नेल्सन मंडेला को रविवार को उनके पैतृक गाँव कुनु में दफ़ना दिया गया है. परिवार के सदस्यों, मित्रों समेत इस मौके पर उपस्थित देश-विदेश के विभिन्न धार्मिक और राजनैतिक नेताओं ने मंडेला को श्रद्धांजलि दी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमंडेला के करीबी मित्र अहमद कथराडा ने श्रद्धांजलि दे रहे लोगों से कहा, उन्होंने \"एक बड़े भाई\" को खो दिया है. कथराडा कई सालों तक रॉबेन द्वीप जेल में मंडेला के साथ जेल में रहे थे. मंडेला के परिवार ने उनके पारंपरिक काउसा पद्धति से होने वाले अंतिम संस्कार में केवल कुछ सौ मेहमानों को शामिल होने के लिए कहा था. मंडेला के ताबूत को सेना के जवानों के साथ ही परिवार के सदस्यों और मित्रों ने कांधा दिया. मंडेला के पोते नदाबा मंडेला ने एक लिखित श्रद्धांजलि भाषण में कहा, \"यह मंडेला ही थे जिनके माध्यम से दुनिया ने दक्षिण अफ़्रीका पर नज़र डाला और काले दक्षिण अफ़्रीकी लोगों के संगठित दमन पर ध्यान दिया.\" नेल्सन मंडेला की मृत्यु पांच दिसंबर को 95 वर्ष की आयु में हुई. हवाई सलामी जब ताबूत को कब्र में रखा जा रहा था तब दक्षिण अफ्रीकी वायु सेना ने मंडेला को हवाई सलामी दी. सैन्य वायुयान में मंडेला का शव वाटरलू हवाई अड्डे पहुंचा तो उनकी सबसे बड़ी बेटी मकाज़िवे मंडेला और मंडेला की पोती मडिलेका हवाई अड्डे पर मौजूद थीं. दक्षिण अफ्रीकी के झंडे में लिपटे उनके शव को गार्ड ऑफ़ ऑनर के साथ 32 किलोमीटर की यात्रा के बाद कुनु पहुंचा. मदीबा अपने आख़िरी दिन यहीं बिताना चाहते थे. नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेदी सरकार की जगह एक लोकतांत्रिक बहुनस्लीय सरकार बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया और इसके लिए वे 27 साल तक जेल में रहे. फ़रवरी 1990 में नेल्सन मंडेला को दक्षिण अफ़्रीका की सरकार ने जेल से रिहा कर दिया. वर्ष 1994 में दक्षिण अफ्रीका के पहले काले राष्ट्रपति का पद संभालते हुए उन्होंने कई अन्य संघर्षों में भी शांति बहाल करवाने में अग्रणी भूमिका निभाई. वर्ष 1918 में जन्मे नेल्सन मंडेला को वर्ष 1993 में संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार और वर्ष 1990 में भारत रत्न दिया गया था. 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'पार्टी में नियम-क़ानून नहीं' राहुल ने कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की और कहा कि पार्टी में शायद किसी को नहीं मालूम कि कांग्रेस का नियम क्या है और ये चलती कैसे है, चुनाव कैसे जीत लेती है. उनका कहना था, \"कांग्रेस गांधी जी का संगठन है और इसमें हिंदुस्तान का डीएनए भरा हुआ है. हमारे विपक्ष के लोग इसे समझ नहीं पाते. कोई कहता है मैं इस जाति की पार्टी हूं, मैं इस धर्म की पार्टी हूं. लेकिन कांग्रेस कहती है कि हम हिंदुस्तान की पार्टी हैं.\" राहुल ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की नेतृत्व क्षमता पर भी अपनी राय रखी.राहुल गांधी ने कहा, \"आज नेतृत्व के विकास पर फोकस नहीं किया जाता. आज से पांच-छह साल बाद ऐसी बात होनी चाहिए कि हमारे सामने 40-50 नेता तैयार हों जो देश को चला सकें. हमें ऐसे नेता विकसित करने हैं जो धर्मनिरपेक्ष हों और हिंदुस्तान को समझते हों. ऐसे नेता जिन्हें देख कर लोग कहें कि हम उनके पीछे खड़े होना चाहते हैं.\" उन्होंने ये भी कहा कि नेता अगर काम नहीं कर रहा तो उसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिए. जिस दिन जनता की आवाज़ कांग्रेस के अंदर गुंजने लगेगी, उस दिन कांग्रेस को कोई नहीं हरा पाएगा. राहुल गांधी ने कहा, \"मैं सबकुछ नहीं जानता. दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो सब कुछ जानता हो. लेकिन कांग्रेस पार्टी में कहीं न कहीं जानकारी ज़रूर है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओ से सीखूंगा. आपकी आवाज़ को आगे बढ़ाऊंगा.\" भावुक पल राहुल गांधी को शनिवार को जयपुर में पार्टी उपाध्यक्ष बनाया गया था भाषण में कई बार राहुल गांधी ने अपनी ज़िंदगी के भावुक पलों को भी सबके साथ बाँटा. नई ज़िम्मेदारी को लेकर मन में चली उधेड़ बुन पर बात करते हुए राहल ने कहा, \" आज सुबह मैं चार बजे ही उठ गया और बालकनी में गया. सोचा कि मेरे कंधे पर अब बड़ी जिम्मेदारी है. अंधेरा था, ठंड थी. मैंने सोचा कि आज मैं वो नहीं कहूंगा जो लोग सुनना चाहते हैं. आज मैं वो कहूंगा जो मैं महसूस करता हूं\" उसके बाद उन्होंने अपनी दादी इंदिरा गांधी के निधन के समय को याद करते हुए अपने पिता राजीव गांधी और उनके राजनीतिक संघर्ष को याद किया. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों ही चरमपंथियों के हाथों मारे गए थे.राहुल गांधी ने कहा कि अगर उम्मीद न हो तो आप बदलाव नहीं ला सकते. जब माँ रोते हुए आई पार्टी उपाध्यक्ष का पद मिलने के बाद माँ सोनिया गांधी की क्या प्रतिक्रिया रही. राहुल अपनी ज़िंदगी के इस पल को साझा करने से भी नहीं हिचकिचाए. इस मौके पर उन्होंने कहा, \"पिछली रात मेरी मां मेरे पास आई और रो पड़ी क्योंकि वो जानती हैं कि सत्ता ज़हर की तरह होती है. सत्ता क्या करती है. हमें शक्ति का इस्तेमाल लोगों को सबल बनाने के लिए करना है.\" राहुल गांधी जब ये बातें कह रहे थे तो मंच पर बैठे कांग्रेसी नेता खड़े होकर उनका अभिवादन कर रहे थे. अपने उपाध्यक्षीय भाषण की समाप्ति राहुल ने ये कह कर की कि \"कांग्रेस पार्टी अब मेरी ज़िंदगी है. भारत के लोग मेरी जिंदगी हैं और मैं देश के लोगों और पार्टी के लिए लड़ूंगा. मैं अपनी पूरी ताकत से लड़ूंगा और आप सबों का आह्वान करता हूं कि इस लड़ाई में मेरा साथ दें.\"\n\nSummary:", "target": "कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष पद की कमान संभालने के बाद राहुल गांधी ने रविवार को कहा कि अब कांग्रेस ही उनकी ज़िंदगी है और वो पूरी ताक़त से पार्टी और देश की सेवा करेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nराहुल गांधी कांग्रेस के पहले उपाध्यक्ष बनाए गए हैं जयपुर में पार्टी के चिंतन शिविर के समापन सत्र में राहुल गांधी ने कहा कि पिछले आठ साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है. राहुल का कहना था कि वे इन अनुभवों का प्रयोग अपने आनेवाले राजनीतिक जीवन में करना चाहते हैं. उन्होंने कहा, \"कांग्रेस पार्टी दुनिया का सबसे बड़ा परिवार है लेकिन इसमें बदलाव की ज़रूरत है. मगर सोच-समझ कर. सबको एक साथ लेकर बदलाव की बात करनी है और बदलाव लाना है. प्यार से, सोचसमझ के साथ, सबकी आवाज़ को सुनकर आगे बढ़ना है.\" राहुल गांधी ने कहा कि वो सबको एक ही आंख से एक ही तरीके से देखेंगे चाहे वो युवा हो, कांग्रेस कार्यकर्ता हो, बुजुर्ग हो या फिर महिला हो. 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सूर्यनारायण के बच्चे और उनके बूढ़े माता-पिता भी शोक में डूबे हुए हैं. सूर्यनारायण के पिता के चंद्रशेखर ने कहा, \"ये ख़बर इतनी अचानक आई कि हम विश्वास नहीं कर पाए.\" आर्थिक सहायता अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान विद्रोहियों ने भारतीय इंजीनियर सूर्यनारायण की रविवार को हत्या कर दी थी. हैदराबाद के रहने वाले के सूर्यनारायण तीन बच्चों के पिता थे. वह जनवरी महीने से अफ़ग़ानिस्तान में थे और वहाँ बहरीन की कंपनी अल-मोयद के लिए एक मोबाइल नेटवर्क परियोजना पर काम कर रहे थे. सूर्यनारायण का शुक्रवार को ज़ाबूल प्रांत में तालेबान ने अपहरण कर लिया था और तालेबान ने रिहाई के लिए कुछ शर्तें रखी थीं. सूर्यनारायण की हत्या की ख़बर की पुष्टि भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन ने की थी. परिवार को सांत्वना देने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी भी आए और कुछ देर परिवारवालों के साथ रहे. उन्होंने कहा कि सूर्यनारायण के परिवारवालों को पाँच लाख रुपए की मदद दी जाएगी और उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी. उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से भी सांत्वना प्रकट की. 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अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान विद्रोहियों ने भारतीय इंजीनियर सूर्यनारायण की रविवार को हत्या कर दी थी. हैदराबाद के रहने वाले के सूर्यनारायण तीन बच्चों के पिता थे. वह जनवरी महीने से अफ़ग़ानिस्तान में थे और वहाँ बहरीन की कंपनी अल-मोयद के लिए एक मोबाइल नेटवर्क परियोजना पर काम कर रहे थे. सूर्यनारायण का शुक्रवार को ज़ाबूल प्रांत में तालेबान ने अपहरण कर लिया था और तालेबान ने रिहाई के लिए कुछ शर्तें रखी थीं. सूर्यनारायण की हत्या की ख़बर की पुष्टि भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन ने की थी. परिवार को सांत्वना देने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी भी आए और कुछ देर परिवारवालों के साथ रहे. उन्होंने कहा कि सूर्यनारायण के परिवारवालों को पाँच लाख रुपए की मदद दी जाएगी और उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी. उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से भी सांत्वना प्रकट की. मुख्यमंत्री ने बताया कि बहरीन की जिस कंपनी के लिए सूर्यनारायण काम करते थे वो कंपनी भी परिवार को मुआवज़ा देगी.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": 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की भी बदनामी हुई है. समिति ने अब जीवन भर उनके क्रिकेट संबंधी किसी भी गतिविधि में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया है. राज कुंद्रा राज कुंद्रा और उनकी पत्नी अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी अकसर सुर्ख़ियों में रहते हैं. कारोबारी पृष्ठभूमि वाले राज कुंद्रा राजस्थान रॉयल्स टीम के सह-मालिक हैं. आईपीएल में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी को लेकर लंबे समय से राज कुंद्रा भी शक के घेरे में रहे हैं. लोढ़ा समिति ने उन्हें भी सट्टेबाज़ी का दोषी पाया है और वो भी कभी क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाएंगे. प्रभावित खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स का चेहरा रहे हैं. उनकी अगुवाई में इस टीम ने दो बार आईपीएल ख़िताब और एक बार चैंपियंस लीग ट्वेंटी20 का ख़िताब जीता है. फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी से जुड़ी जांच के बाद चेन्नई की टीम को दो साल के लिए निलंबित किए जाने के बाद अब नज़रें धोनी के अगले कदम पर होंगी. ख़ासकर वो किस टीम का हिस्सा बनेंगे, ये बात जानने में सबकी दिलचस्पी होगी. सुरेश रैना सुरेश रैना भी आईपीएल की चेन्नई फ्रैंचाइज़ी का हिस्सा हैं. वो 2008 में आईपीएल के आगाज़ से ही इस टीम के साथ जुड़े रहे हैं. अन्य खिलाड़ी: चेन्नई सुपरकिंग्स के अन्य खिलाड़ी जो टीम के निलंबन से प्रभावित होंगे, उनमें फाफ डू प्लेसिस, ब्रैंडन मैककुलम, माइकल हसी और ड्वेन ब्रावो शामिल हैं. अजिंक्य रहाणे राजस्थान लॉयल्स के लिए खेलने वाले और इन दिनों ज़िम्बाब्वे का दौरा कर रही भारतीय टीम के कप्तान अजिंक्य रहाणे भी लोढ़ा समिति के फैसले से प्रभावित होगें. उन पर और अन्य खिलाड़ियों पर असर इस तरह होगा कि वे आरआर की टीम के सदस्य हैं जो अगले दो साल तक आईपीएल नहीं खेल पाएगी. स्टीव स्मिथ आईपीएल के आठवें सीज़न में राजस्थान रॉयल्स की कप्तानी स्टीव स्मिथ के हाथों में थी. अब टीम के निलंबन के बाद उनके अगले कदम पर भी नज़रें रहेंगी. वैसे स्टीव स्मिथ राजस्थान से पहले आईपीएल की अन्य टीमों के लिए भी खेल चुके हैं जिनमें रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर, पुणे वॉरियर और कोच्चि टस्कर्स केरला जैसी टीमें शामिल हैं. अन्य खिलाड़ी: राजस्थान रॉयल्स के जो अन्य खिलाड़ी टीम के निलंबन से प्रभावित होंगे उनमें शेन वाट्सन, जेम्स वॉट्सन, टिम साउथी शामिल हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "आईपीएल में सट्टेबाज़ी पर सुप्रीम कोर्ट की समिति ने चेन्नई और राजस्थान की टीमों पर दो साल का प्रतिबंध लगाया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nजस्टिस लोढ़ा समिति के फैसले से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के कई बड़े नाम प्रभावित होंगे. आईपीएल में कब क्या हुआ, पढ़िए. आईपीएल के लिए सुनामी, कई परतें और खुलेंगी. एक नज़र उन लोगों पर जो सीधे इससे जुड़े पाए गए और अन्य जो टीमों पर लगे प्रतिबंध से प्रभावित होंगे. समाप्त गुरुनाथ मय्यपन गुरुनाथ मय्यपन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट समिति के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद हैं. वो आईपीएल की नामी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के 'टीम प्रिंसिपल' रहे हैं. वो चेन्नई सुपरकिंग्स की मालिक इंडिया सीमेंट कंपनी के प्रबंधन निदेशक भी रहे हैं. जस्टिस लोढ़ा समिति का कहना है कि गुरुनाथ मय्यपन सट्टेबाज़ी में लिप्त पाए गए हैं और उनकी वजह से न सिर्फ आईपीएल बल्कि क्रिकेट की भी बदनामी हुई है. समिति ने अब जीवन भर उनके क्रिकेट संबंधी किसी भी गतिविधि में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया है. राज कुंद्रा राज कुंद्रा और उनकी पत्नी अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी अकसर सुर्ख़ियों में रहते हैं. कारोबारी पृष्ठभूमि वाले राज कुंद्रा राजस्थान रॉयल्स टीम के सह-मालिक हैं. आईपीएल में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी को लेकर लंबे समय से राज कुंद्रा भी शक के घेरे में रहे हैं. लोढ़ा समिति ने उन्हें भी सट्टेबाज़ी का दोषी पाया है और वो भी कभी क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाएंगे. प्रभावित खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स का चेहरा रहे हैं. उनकी अगुवाई में इस टीम ने दो बार आईपीएल ख़िताब और एक बार चैंपियंस लीग ट्वेंटी20 का ख़िताब जीता है. फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी से जुड़ी जांच के बाद चेन्नई की टीम को दो साल के लिए निलंबित किए जाने के बाद अब नज़रें धोनी के अगले कदम पर होंगी. ख़ासकर वो किस टीम का हिस्सा बनेंगे, ये बात जानने में सबकी दिलचस्पी होगी. सुरेश रैना सुरेश रैना भी आईपीएल की चेन्नई फ्रैंचाइज़ी का हिस्सा हैं. वो 2008 में आईपीएल के आगाज़ से ही इस टीम के साथ जुड़े रहे हैं. अन्य खिलाड़ी: चेन्नई सुपरकिंग्स के अन्य खिलाड़ी जो टीम के निलंबन से प्रभावित होंगे, उनमें फाफ डू प्लेसिस, ब्रैंडन मैककुलम, माइकल हसी और ड्वेन ब्रावो शामिल हैं. अजिंक्य रहाणे राजस्थान लॉयल्स के लिए खेलने वाले और इन दिनों ज़िम्बाब्वे का दौरा कर रही भारतीय टीम के कप्तान अजिंक्य रहाणे भी लोढ़ा समिति के फैसले से प्रभावित होगें. उन पर और अन्य खिलाड़ियों पर असर इस तरह होगा कि वे आरआर की टीम के सदस्य हैं जो अगले दो साल तक आईपीएल नहीं खेल पाएगी. स्टीव स्मिथ आईपीएल के आठवें सीज़न में राजस्थान रॉयल्स की कप्तानी स्टीव स्मिथ के हाथों में थी. अब टीम के निलंबन के बाद उनके अगले कदम पर भी नज़रें रहेंगी. वैसे स्टीव स्मिथ राजस्थान से पहले आईपीएल की अन्य टीमों के लिए भी खेल चुके हैं जिनमें रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर, पुणे वॉरियर और कोच्चि टस्कर्स केरला जैसी टीमें शामिल हैं. अन्य खिलाड़ी: राजस्थान रॉयल्स के जो अन्य खिलाड़ी टीम के निलंबन से प्रभावित होंगे उनमें शेन वाट्सन, जेम्स वॉट्सन, टिम साउथी शामिल हैं. 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बहुमत होगा वही असली पार्टी होगी और इतना समर्थन शरद पवार के गुट के पास ही है. इसी वजह से संगमा ने बताया कि पार्टी कार्यकारिणी की उनके निवास पर बैठक हुई जिसमें उन्हें पवार की जगह अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया. विदेशी मूल का मुद्दा संगमा का कहना था कि पार्टी का गठन जिन सिद्धांतों को लेकर किया था उनमें प्रमुख ये था कि विदेशी मूल का व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि शरद पवार को पार्टी से निष्कासित नहीं किया गया है और उन्हें कांग्रेस के साथ जाने के फ़ैसले के बारे में फिर से सोचना चाहिए. संगमा का कहना था कि वह पवार का सम्मान करते हैं मगर सिद्धांतों पर समझौता नहीं कर सकते. वहीं जब विदेशी मूल के व्यक्ति के प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन के बारे में अनवर से पूछा गया तो उनका कहना था कि कांग्रेस पार्टी ख़ुद ही कह चुकी है कि वह बतौर प्रधानमंत्री किसी का नाम पेश नहीं कर रही है. अनवर ने कहा कि ऐसे में बहस का कोई मसला नहीं है और ये विवाद बार-बार नहीं उठाना चाहिए. चुनाव निशान अब इन सब स्थितियों के बाद मसला चुनाव आयोग के पास जा सकता है क्योंकि दोनों ही गुट अपने धड़े को असली पार्टी बता रहे हैं. ऐसे में चुनाव को देखते हुए चुनाव निशान किसे दिया जाएगा ये फ़ैसला आयोग को करना होगा.\n\nSummary:", "target": "राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का औपचारिक विभाजन हो गया है. एक गुट ने शरद पवार को अध्यक्ष पद से हटाकर ये ज़िम्मेदारी पीए संगमा को दे दी है तो वहीं दूसरे गुट ने शरद पवार को ही अध्यक्ष बनाए रखने की बात कही है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस बीच छत्तीसगढ़ में पार्टी नेता विद्याचरण शुक्ल ने पार्टी से अलग होकर एक आंचलिक पार्टी बनाने की घोषणा की है. ये पूरा विवाद और पार्टी में टूट की नौबत आम चुनाव की आहट के बीच गठबंधन के मसले पर हुई है. शरद पवार का गुट जहाँ कांग्रेस के साथ तालमेल करने के पक्ष में है तो वहीं संगमा गुट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ जाना चाहता है. शरद पवार गुट के नेता तारिक़ अनवर ने संगमा की इस नियुक्ति को ग़ैर-सांवैधानिक बताया. उन्होंने कहा कि जिसके पास तीन चौथाई लोगों का बहुमत होगा वही असली पार्टी होगी और इतना समर्थन शरद पवार के गुट के पास ही है. इसी वजह से संगमा ने बताया कि पार्टी कार्यकारिणी की उनके निवास पर बैठक 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दिग्विजय सिंह ने आपकी तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया. उन्होंने आपकी तारीफ़ की कि आपने भाजपा से लड़ाई लड़ी. उन्होंने कहा कि उन्हें आपसे तालमेल करने में कोई परहेज़ नहीं है. दिग्विजय सिंह कांग्रेस के नेता हैं. वो मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. अलग-अलग दलों में रहते हुए भी मेरे उनसे अच्छे रिश्ते हैं. मैं उनका बहुत आदर करता हूँ, वह भी मेरा आदर करते हैं. यह खुशी की बात है कि वो कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश के प्रभारी भी हैं. जहां तक यूएनपीए का सवाल है जिसका मैं चेयरमैन हूँ, राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता. इस तरफ़ दिग्विजय सिंह ने एक अच्छा कदम उठाया है. अलग-अलग दलों में रहते हुए भी, एक दूसरे से बातचीत करना मुश्किल हो जाए, यह अच्छी बात नहीं है. हम किसी को राजनीतिक विरोधी तो मानते हैं, लेकिन दुश्मन नहीं मानते. जहाँ तक नीतियों का सवाल है, जबसे यूएनपीए बना है, हमारे बीच दूरियाँ बढ़ रही थीं, बातचीत नहीं हो रही थी. यह अच्छा नहीं है. मैं चाहता हूं कि यह वातावरण हर दल में हो. हमें देश के मामलों पर एक हो जाना चाहिए. जब-जब देश का मामला आया है, हम एक हुए हैं. लेकिन उनके बयान से ऐसी अटकलें लगाई जा रही 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वे आधिकारिक उम्मीदवार महमूद अब्बास का समर्थन करें.\" बरग़ूती के चुनाव मैदान में कूदने की संभावना को देखते हुए फ़तह आंदोलन में विभाजन को बचाने की बड़े पैमाने पर कोशिश की जा रही थी. फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात की मौत के बाद नए फ़लस्तीनी राष्ट्रपति का चुनाव जनवरी में होना है. माना जा रहा है कि इस समय भले ही बरग़ूती ने पीछे हटने का फ़ैसला कर लिया हो, लेकिन अगस्त में फ़तह के संगठन चुनावों में वे हिस्सा लेंगे. संगठन चुनाव जेल में बरग़ूती के साथ हुई बैठक के बाद फ़तह के संगठन चुनाव की तारीख़ चार अगस्त की घोषणा हुई. जो पिछले 16 सालों में पहली बार होगा. फ़तह के संगठन चुनाव की घोषणा उस कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है जिसके तहत विभिन्न गुटों के सदस्यों को संगठन में जगह दी जाएगी. फ़लस्तीन के पूर्व प्रधानमंत्री महमूद अब्बास को फ़तह ने जनवरी में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकित किया है. महमूद अब्बास पहले ही फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के चेयरमैन बन चुके हैं और अब वे राष्ट्रपति पद के लिए भी सबसे आगे माने जा रहे हैं. चरमपंथी घटनाओं के आरोप में बरग़ूती इस समय इसराइली जेल में आजीवन क़ैद की पाँच सज़ाएँ काट रहे हैं. अगर वे चुनाव में कूदना भी चाहते तो उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में आना होता. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि बरग़ूती फ़लस्तीनी लोगों में काफ़ी लोकप्रिय हैं और इसराइल के ख़िलाफ़ संघर्ष में लोग उन्हें 'हीरो' का दर्जा देते हैं.\n\nSummary:", "target": "इसराइली जेल में बंद फ़लस्तीनी नेता मरवान बरग़ूती राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं लड़ेंगे. एक अधिकारी ने यह जानकारी दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nबरग़ूती ने फ़तह के आधिकारिक उम्मीदवार पूर्व प्रधानमंत्री महमूद अब्बास को अपना समर्थन देने की घोषणा की है. पहले यह कहा गया था कि जेल में बंद बरग़ूती जनवरी में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अब्बास को चुनौती देने की सोच रहे हैं. लेकिन फ़लस्तीनी कैबिनेट मंत्री कदुरा फ़ेयर्स ने बताया कि फ़तह में विभाजन से बचने के लिए बरग़ूती ने चुनाव न लड़ने का फ़ैसला किया है. इसराइल की जेल में बंद बरग़ूती से मिलने के बाद फ़ेयर्स ने बताया, \"बरग़ूती ने फ़तह आंदोलन से जुड़े लोगों और अपने समर्थकों से अपील की है कि वे आधिकारिक उम्मीदवार 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हमले में पुलिस के कुछ हथियार भी लूट लिए गए हैं. राज्य पुलिस प्रवक्ता का दावा है कि पुलिस की गोलीबारी में कुछ नक्सली भी हताहत हुए हैं. इस घटना के मद्देनज़र राज्य सरकार ने प्रत्येक मृतक पुलिसकर्मियों के परिजनों के लिए 20 लाख रुपए के मुआवज़े की घोषणा की है. घटनास्थल से मिली जानकारी के मुताबिक़ रविदास जयंती समारोह में स्थानीय पुलिसकर्मी भी आमंत्रित किए गए थे, समझा जा रहा है कि नक्सलियों ने पुलिसकर्मियों को फँसाया. जहाँ ये घटना हुई है, वो नवादा, गिरीडीह और जमुई ज़िले के सीमा क्षेत्र में है. यहाँ अक्सर नक्सली हमले की घटनाएँ होती रहती है.\n\nSummary:", "target": "बिहार के नवादा ज़िले के अंतर्गत कौआकोल पुलिस थाना क्षेत्र के महोलिया टाँड़ गाँव के पास सोमवार दोपहर नक्सलियों ने पुलिस दल पर हमला कर दिया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस हमले में कौआकोल के थाना प्रभारी समेत 10 पुलिसकर्मी मारे गए. राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक नीलमणि ने बीबीसी को बताया कि नवादा पुलिस को ये सूचना मिली थी कि महोलिया टाँड़ गाँव में आयोजित रविदास जयंती समारोह पर हमला हुआ है. इसी 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निगाहें अजीब सी हो जाती हैं. मेरे परिवार में पता है कि मैं सिगरेट पीती हूँ. कोई नैतिक दबाव नहीं है लेकिन हाँ सेहत का हवाला देकर ज़रूर वो मुझे कहते हैं कि मुझे सिगरेट नहीं पीनी चाहिए. शुरुआत में मुझे मेरे पिताजी ने सिगरेट पीते हुए देखा था. उन्होंने पूछा कि क्या तुम सिगरेट पीती हो, अगर हाँ तो निर्णय तुम्हारा ही होगा बस मैं इतना कहूँगा कि ये तुम्हारी ही जिंदगी पर असर डालेगा. तनाव-मुक्ति क्या कहती है रिपोर्ट मेडिकल पत्रिका लांसेट में छपी रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में तंबाकू का इस्तेमाल अपनी जड़ें जमा रहा है. इतना ही नहीं चिंता की बात ये है कि विकासशील देशों में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है. तीन अरब की कुल आबादी के 16 देशों में हुए शोध के अनुसार 48.6 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं जबकि 11.3 प्रतिशत महिलाएं तंबाकू का इस्तेमाल करती हैं. खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाएं जल्द धूम्रपान करना शुरु करती हैं और ये उम्र लड़कों के ही समान है. इस शोध में धूम्रपान के अलावा तंबाकू चबाना भी शामिल है. शोध के अनुसार रूस में धूम्रपान करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है. रुस में 15 साल से ज्यादा उम्र के 39.1 प्रतिशत लोग तंबाकू सेवन करते हैं. अब सिगरेट मेरे लिए तनाव से मुक्ति पाने का एक तरीका है और मैं इसका आनंद लेती हूँ. अगर मुझे सिगरेट न मिले तो मैं चिड़चिड़ी हो जाती हूँ और मुझे गुस्सा आने लगता है. मुझे सड़क पर सिगरेट पीने में अच्छा नहीं लगता. लोग अजीब सी निगाहों से देखते हैं. इसलिए मैं ऑटो में बैठकर सिगरेट पीती हूँ. हमारे देश में लड़कियों के सिगरेट पीने को नैतिकता से जोड़कर देखा जाता हैं. माना जाता हैं कि अगर एक लड़की सिगरेट पीती है तो उसके कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं. ये बड़ा ही बेतुका हैं क्योंकि सिगरेट का नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं है. यदि कोई लड़की सिगरेट पीती है तो इसका मतलब ऐसा नहीं है कि उसके सामने जो पहला इंसान आएगा वो उसके साथ सोने के लिए तैयार हो जाएगी. लोग ऐसा ही समझते हैं कि जो लड़की सिगरेट पीती है वो किसी के भी साथ सो सकती है. नैतिकता मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों माना जाता हैं क्योंकि अगर एक आदमी सिगरेट पीता है ये एकदम साधारण बात मानी जाती है और सिगरेट पीने को नैतिकता से जोड़ा नहीं जाता. ये मैं सड़क पर चलने वालों की सोच के बारे में बात कर रही हूँ. मैं एडवर्टाइज़िंग में काम करती हूँ और वहां मुझे ऐसे किसी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता. एक बार डॉक्टर ने मुझे डरा दिया था तो मैंने छोड़ने की कोशिश की पर एक दिन से ज्यादा नहीं कर पाई. मुझे पता है कि मुझे एक दिन सिगरेट छोड़ना होगा क्योंकि मैं हमेशा सिगरेट पीते नहीं रह सकती. अगर ऐसा करूँगी तो जी नहीं पाऊंगी. फिलहाल मैं सिगरेट का पूरा मज़ा लेती हूँ और जब तक मेरे दिल से आवाज़ ना आए तब मैं सिगरेट नहीं छोड़ सकती. इससे जुड़ी और सामग्रियाँ\n\nSummary:", "target": "एक नए शोध के अनुसार भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं कम धूम्रपान करती हैं लेकिन महिलाओं में ये चलन तेज़ी से बढ़ रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमेडिकल पत्रिका लांसेट में छपी रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में तंबाकू का इस्तेमाल अपनी जड़ें जमा रहा है. इतना ही नहीं चिंता की बात ये है कि विकासशील देशों में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है. मुंबई में रह रहीं एक महिला से बीबीसी ने विशेष बातचीत कर धूम्रपान के उनके इस शौक की वजह समझने की कोशिश की. रेवती की कहानी मैं रेवती हूँ. मैं मुंबई में एडवर्टाइज़िंग कॉपीराइटर हूँ और दिन में लगभग 20 सिगरेट पी जाती हूँ. सिगरेट पीने की शुरुआत कॉलेज के दिनों में हुई थी. मस्ती-मस्ती में शुरुआत हुई और फिर धीरे-धीरे आदत पड़ गई. मुझ पर दोस्तों का दबाव नहीं था कि सिगरेट पियो लेकिन मुझे ट्राइ करना था और मैंने किया. उस उम्र में ऐसा होता है कि आप हर चीज़ ट्राइ करके देखना चाहते हैं. जब मैंने सिगरेट पीना शुरू किया था तो ऐसा कुछ सामाजिक बहिष्कार नहीं हुआ. जो मेरे दोस्तों का सर्कल था उसमें सिगरेट पीना कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन जब मैं पुणे पहुँची तो लगा कुछ अलग है. किसी लड़की को अगर कोई सिगरेट पीता देखे तो निगाहें अजीब सी हो जाती हैं. मेरे परिवार में पता है कि मैं सिगरेट पीती हूँ. कोई नैतिक दबाव नहीं है लेकिन हाँ सेहत का हवाला देकर ज़रूर वो मुझे कहते हैं कि मुझे सिगरेट नहीं पीनी चाहिए. शुरुआत में मुझे मेरे पिताजी ने सिगरेट पीते हुए देखा था. उन्होंने पूछा कि क्या तुम सिगरेट पीती हो, अगर हाँ तो निर्णय तुम्हारा ही होगा बस मैं इतना कहूँगा कि ये तुम्हारी ही जिंदगी पर असर डालेगा. तनाव-मुक्ति क्या कहती है रिपोर्ट मेडिकल 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एयर चीफ़ मार्शल ने गेम चेंजर बताया है उसे ही राहुल गांधी ग़लत बता रहे हैं. उन्होंने ट्वीट किया, \"एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ ने राफेल डील को 'game changer' डील बताया है, वही दूसरी ओर राहुल गांधी इसके विपरीत कह रहें है। अब देश की जनता तय करे कि वो किस पर विश्वास करेगी एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ पर या राहुल गांधी पर? \" रक्षा मंत्री फ़्रांस में भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन फ्रांस की यात्रा पर हैं. तीन दिनों की इस यात्रा में वो वहां फ्रांस की मंत्री फ्लोरेंस पार्ली से मुलाक़ात करेंगी. राहुल गांधी ने रक्षा मंत्री की इस यात्रा पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा, \"भारतीय की रक्षा मंत्री फ्रांस जा रही हैं, इससे अधिक स्पष्ट संदेश क्या हो सकता है?\" \"एक बात याद रखें, दासौ कंपनी को एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल हुआ है और वो वही बोलेगा जो भारत सरकार उसे बोलने के लिए कहेगी.\" रफ़ाल मामले पर पत्रकारों से क्या कहा राहुल गांधी ने: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से रफ़ाल डील पर मांगी जानकारी अडाणी समूह पर क्यों 'मेहरबान' झारखंड की बीजेपी सरकार फ्रांसीसी मीडिया ने क्या दावा किया है? फ्रांसीसी मीडिया 'मीडियापार्ट' ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया है कि रफ़ाल सौदे के लिए इसे बनाने वाली कंपनी दासौ को भारतीय कंपनी रिलायंस से गठजोड़ करना ज़रूरी था. मीडियापार्ट ने कंपनी के कुछ आंतरिक दस्तावेज़ों के हवाले से कहा है कि दासौ के नंबर दो अधिकारी लोइक सेगलन ने अपने 11 मई 2017 के प्रेजेंटेशन में अपने कर्मियों से कहा था कि रिलायंस के साथ उनका ज्वाइंट वेंचर सौदे के लिए \"अनिवार्य और बाध्यकारी\" था. हालांकि दासौ ने इन रिपोर्टों पर अपनी सफाई पेश की है. कंपनी का कहना है कि उसने रिलयांस का चयन \"स्वतंत्र\" रूप से किया है. दोनों कंपनी ने मिल कर दासौ-रिलायंस एरोस्पेस लिमिटेड बनाया है, जिसके तहत भारत में रफ़ाल विमान तैयार किए जाएंगे. भारत सरकार ने फ्रांस से कुल 36 रफ़ाल खरीदने के लिए सौदा किया है, जिस पर फिलहाल विवाद छिड़ा है. विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि ये सौदा नियमों को नजरअंदाज कर रिलायंस को फायदा पहुंचाने के मकसद से किया गया है. कांग्रेस का यह भी आरोप है कि भाजपा सरकार ने फ्रांस के साथ ज़रूरत से कहीं ज्यादा महंगा सौदा किया है. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का एक बयान सामने आया था जिसमें उन्होंने दावा किया था कि रफ़ाल विमान बनाने के लिए 58 हज़ार करोड़ रुपए के समझौते के लिए भारत सरकार ने ही रिलायंस डिफेंस का नाम सुझाया था. उनके इस बयान के बाद फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा था कि \"फ्रांस की सरकार किसी भी तरह से भारतीय औद्योगिक साझेदारों के चयन में शामिल नहीं है. उनका चयन फ्रांस की कंपनियों को करना है. भारतीय अधिग्रहण प्रक्रिया के मुताबिक़ यह करने की फ्रांस की कंपनियों को पूरी आज़ादी है.\" बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से रफ़ाल डील की प्रक्रिया की जानकारी मांगी है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह जानकारी बंद लिफाफे में 29 अक्टूबर तक उपलब्ध कराने को कहा है. कितनी विश्वसनीय है रिपोर्ट फ्रांसीसी पत्रकार वैजू नरावाने मीडियापार्ट को एक विश्वसनीय मीडिया संस्थान मानती हैं. उन्होंने कहा कि मीडियापार्ट इस तरह की रिपोर्ट करता रहता है. बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, \"मीडियापार्ट पहले से फ्रांस सरकार के गोपनीय दस्तावेजों को सामने लाता रहा है और उसकी विश्वसनीयता काफी अधिक है. उसने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं जो यह दिखाते हैं कि सौदे के लिए रिलायंस से उनकी साझेदारी बाध्यकारी थी.\" वैजू बताती हैं कि \"रिपोर्ट में \"अदले-बदले\" की बात की गई है. इसका मतलब यह है कि आप कुछ दीजिए, बदले में आपको कुछ मिलेगा. ये सौदे की बात थी.\" वो बताती हैं कि फ्रांस की मीडिया में रफ़ाल पर बहुत चर्चा नहीं है क्योंकि वहां की मीडिया ऐसे मामलों में बहुत ज्यादा नहीं बोलती है. हालांकि मीडियापार्ट खोजी पत्रकारिता करता है और वो ऐसी रिपोर्ट करता रहता है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "रफ़ाल मामले में फ्रांस की मीडिया के दावे के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nउन्होंने कहा कि एक-एक कर सौदे के पीछे की कहानी सामने आ रही है और प्रधानमंत्री इस पर कुछ भी नहीं बोल पा रहे हैं और ऐसे में उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. राहुल गांधी ने कहा, \"अगर वो कुछ नहीं बोल पा रहे हैं तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए. मुख्य मुद्दा यह है कि जिस भ्रष्टाचार को रोकने का जिक्र वो बार-बार करते थे, वो खुद मामले में आरोप बन रहे हैं.\" राहुल गांधी को जवाब देते हुए बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि जिनका पूरा परिवार ही भ्रष्ट है वो आज दूसरों पर उंगली उठा रहे हैं. संबित पात्रा ने ये भी कहा कि जिस डील को एयर चीफ़ मार्शल ने गेम चेंजर बताया है उसे ही राहुल गांधी ग़लत बता रहे हैं. उन्होंने ट्वीट किया, \"एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ ने राफेल डील को 'game changer' डील बताया है, वही दूसरी ओर राहुल गांधी इसके विपरीत कह रहें है। अब देश की जनता तय करे कि वो किस पर विश्वास करेगी एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ पर या राहुल गांधी पर? \" रक्षा मंत्री फ़्रांस में भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन फ्रांस की यात्रा पर हैं. तीन दिनों की इस यात्रा में वो वहां फ्रांस की मंत्री फ्लोरेंस पार्ली से मुलाक़ात करेंगी. राहुल गांधी ने रक्षा मंत्री की इस यात्रा पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा, \"भारतीय की रक्षा मंत्री फ्रांस जा रही हैं, इससे अधिक स्पष्ट संदेश क्या हो सकता है?\" \"एक बात याद रखें, दासौ कंपनी को एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल हुआ है और वो वही बोलेगा जो भारत सरकार उसे बोलने के लिए कहेगी.\" रफ़ाल मामले पर पत्रकारों से क्या कहा राहुल गांधी ने: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से रफ़ाल डील पर मांगी जानकारी अडाणी समूह पर क्यों 'मेहरबान' झारखंड की बीजेपी सरकार फ्रांसीसी मीडिया ने क्या दावा किया है? फ्रांसीसी मीडिया 'मीडियापार्ट' ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया है कि रफ़ाल सौदे के लिए इसे बनाने वाली कंपनी दासौ को भारतीय कंपनी रिलायंस से गठजोड़ करना ज़रूरी था. मीडियापार्ट ने कंपनी के कुछ आंतरिक दस्तावेज़ों के हवाले से कहा है कि दासौ के नंबर दो अधिकारी लोइक सेगलन ने अपने 11 मई 2017 के प्रेजेंटेशन में अपने कर्मियों से कहा था कि रिलायंस के साथ उनका ज्वाइंट वेंचर सौदे के लिए \"अनिवार्य और बाध्यकारी\" था. हालांकि दासौ ने इन रिपोर्टों पर अपनी सफाई पेश की है. कंपनी का कहना है कि उसने रिलयांस का चयन \"स्वतंत्र\" रूप से किया है. दोनों कंपनी ने मिल कर दासौ-रिलायंस एरोस्पेस लिमिटेड बनाया है, जिसके तहत भारत में रफ़ाल विमान तैयार किए जाएंगे. भारत सरकार ने फ्रांस से कुल 36 रफ़ाल खरीदने के लिए सौदा किया है, जिस पर फिलहाल विवाद छिड़ा है. विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि ये सौदा नियमों को नजरअंदाज कर रिलायंस को फायदा पहुंचाने के मकसद से किया गया है. कांग्रेस का यह भी आरोप है कि भाजपा सरकार ने फ्रांस के साथ ज़रूरत से कहीं ज्यादा महंगा सौदा किया है. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का एक बयान सामने आया था जिसमें उन्होंने दावा किया था कि रफ़ाल विमान बनाने के लिए 58 हज़ार करोड़ रुपए के समझौते के लिए भारत सरकार ने ही रिलायंस डिफेंस का नाम सुझाया था. उनके इस बयान के बाद फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा था कि \"फ्रांस की सरकार किसी भी तरह से भारतीय औद्योगिक साझेदारों के चयन में शामिल नहीं है. उनका चयन फ्रांस की कंपनियों को करना है. भारतीय अधिग्रहण प्रक्रिया के मुताबिक़ यह करने की फ्रांस की कंपनियों को पूरी आज़ादी है.\" बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से रफ़ाल डील की प्रक्रिया की जानकारी मांगी है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह जानकारी बंद लिफाफे में 29 अक्टूबर तक उपलब्ध कराने को कहा है. कितनी विश्वसनीय है रिपोर्ट फ्रांसीसी पत्रकार वैजू नरावाने मीडियापार्ट को एक विश्वसनीय मीडिया संस्थान मानती हैं. उन्होंने कहा कि मीडियापार्ट इस तरह की रिपोर्ट करता रहता है. बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, \"मीडियापार्ट पहले से फ्रांस सरकार के गोपनीय दस्तावेजों को सामने लाता रहा है और उसकी विश्वसनीयता काफी अधिक है. उसने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं जो यह दिखाते हैं कि सौदे के लिए रिलायंस से उनकी साझेदारी बाध्यकारी थी.\" वैजू बताती हैं कि \"रिपोर्ट में \"अदले-बदले\" की बात की गई है. इसका मतलब यह है कि आप कुछ दीजिए, बदले में आपको कुछ मिलेगा. ये सौदे की बात थी.\" वो बताती हैं कि फ्रांस की मीडिया में रफ़ाल पर बहुत चर्चा नहीं है क्योंकि वहां की मीडिया ऐसे मामलों में बहुत ज्यादा नहीं बोलती है. हालांकि मीडियापार्ट खोजी पत्रकारिता करता है और वो ऐसी रिपोर्ट करता रहता है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 951, "source_item_id": "951", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 3993, "clean_index": 846, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:846"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअब अमरीका की एक अदालत ने उनकी अपील पर यह शादी रद्द कर दी है. अमरीका के लास वेगास शहर में दोनों अपने क़रीबी दोस्तों की मौजूदगी में विवाह बंधन में बंधे थे. दूल्हा-दुल्हन दोनों की उम्र 22 साल है. ब्रिटनी स्पीयर्स अपने इस बयान को लेकर काफ़ी चर्चा में रही हैं कि वह शादी होने तक अपना कौमार्य भंग नहीं होने देंगी. लेकिन पिछले वर्ष जुलाई में उन्होंने स्वीकार किया कि अब वह 'कुमारी' नहीं रही हैं. दुल्हन की पोशाक कहा जा रहा है कि ब्रिटनी अपनी शादी के समय जीन्स पहने थीं और उन्होंने सिर पर बेसबॉल कैप लगा रखी थी. जिस चर्च में उनकी शादी हुई वह चौबीस घंटे खुला रहता है और उनसे पहले जोन कॉलिन्स, जूडी गारलैंड, ब्रूस विलिस और डेमी मूर जैसी हॉलीवुड की जानीमानी हस्तियाँ विवाह बंधन में बंध चुकी हैं. वैसे एक वेबसाइट का कहना है कि ब्रिटनी और उनके दोस्त एक पार्टी में शामिल थे और मज़ाक़-मज़ाक़ में शादी का फ़ैसला ले लिया गया. लेकिन बाद में जब उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो उन्होंने इस शादी को रद्द कराए जाने के इंतज़ाम शुरू कर दिए. ब्रिटनी ने हाल ही में अपनी चौथी ऐलबम 'इन द ज़ोन' रिलीज़ की है. वह सबसे मशहूर गायिकाओं में से एक हैं और 1999 से अब तक दुनिया भर में उनकी साढ़े पाँच करोड़ ऐलबम बिक चुकी हैं.\n\nSummary:", "target": "मशहूर पॉप गायिका ब्रिटनी स्पीयर्स ने मज़ाक़-मज़ाक़ में अपने बचपन के दोस्त जेसन ऐलेन से शादी कर ली और कुछ घंटे बाद ही उन्हें लगा कि 'अरे! यह क्या हो गया'.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअब अमरीका की एक अदालत ने उनकी अपील पर यह शादी रद्द कर दी है. अमरीका के लास वेगास शहर में दोनों 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हाउस के प्रवक्ता स्कॉट मैक्केलन ने कहा है कि ग्वांतनामो बे शिविर के बारे में संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट से कुछ नहीं बदला है. प्रवक्ता ने प्रताड़ना और अमानवीय बर्ताव के आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि यह उन्हीं आरोपों को दोहराने जैसा है जो पहले ग्वांतनामो बे शिविर में रखे गए कुछ बंदियों के वकील लगा चुके हैं. प्रवक्ता स्कॉट मैक्केलन ने कहा, \"ग्वांतनामो बे शिविर में रखे गए बंदी ख़तरनाक आतंकवादी हैं और यह सर्वविदित है कि अल क़ायदा अपने सदस्यों को ऐसे झूठे आरोपों का प्रचार करने का प्रशिक्षण देता है.\" संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार मामलों की वरिष्ठतम अधिकारी ने लुइस आर्बूर ने कहा है कि क्यूबा स्थित ग्वांतानामो बे में अमरीका के बंदीगृह को बंद न करने के अलावा अब और कोई विकल्प नहीं बचा है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त लुइस आर्बूर ने कहा है कि वहाँ कुछ बंदी तो इतने अधिक समय से क़ैद हैं कि अमरीकी न्याय व्यवस्था अधिक प्रयत्न करे तो भी जो नुक़सान हुआ है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती है. पाँच विशेषज्ञों की इस संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में ग्वांतनामो बे शिविर में बिना मुक़दमा चलाए पाँच साल 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क़रीब आठ घंटे तक सेना की कार्रवाई के बाद चरमपंथियों को मार गिराया गया और अकादमी पर सेना ने नियंत्रण कर लिया. इस पूरे घटनाक्रम में आठ चरमपंथियों और आठ पुलिसकर्मियों समेत 18 लोग मारे गए हैं और एक चरमपंथी को गिरफ़्तार भी किया गया है. गृह मंत्री रहमान मलिक ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि पाकिस्तान के समक्ष दो ही विकल्प है या तो वो तालेबान के ख़िलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष करे या फिर तालेबान को पाकिस्तान पर कब्ज़ा कर लेने दे. मलिक ने हमले के पीछे चरमपंथी संगठनों का हाथ होने की बात कही है और ये भी संकेत दिए हैं कि इसके पीछे किसी दूसरे देश का भी हाथ हो सकता है. मलिक का कहना था कि पाकिस्तान की एकता इस समय ख़तरे में है. लाहौर में संवाददाताओं से उन्होंने कहा कि हमले के पीछे तालेबान नेता बैतुल्लाह महसूद के लड़ाकों का हाथ दिख रहा है जो दक्षिणी वज़ीरिस्तान में सक्रिय हैं. पाकिस्तान में एक महीने से भी कम समय में ऐसी ज़बर्दस्त चरमपंथी घटना हुई है. कुछ ही दिन पहले चरमपंथियों ने श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर भी दिन दहाड़े हमला किया था. दिन दहाड़े हमला लाहौर में पुलिस अकादमी पर सोमवार की सुबह क़रीब साढ़े आठ बजे हमला हुआ और शाम के चार बजे के आसपास सैनिकों ने परिसर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया. शाम को टीवी पर दिखाई जा रही तस्वीरों में सैनिक परिसर के छत पर जश्न मनाते देखे गए.केंद्र की घेराबंदी करीब आठ घंटों तक चली और शाम को करीब 10-15 मिनटों की ताबड़तोड़ गोलीबारी के बाद अधिकारियों ने घोषणा की नाकेबंदी ख़त्म हो गई है. ये पुलिस केंद्र वाघा सीमा के नज़दीक है. केंद्र पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश के दौरान जब सेना ने परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की थी तो बंदूकधारियों ने ग्रेनेड से हमला किया. पाकिस्तान में आंतरिक मामलों के मंत्रालय में मंत्री रहमान मलिक ने कहा कि ये योजनाबद्ध, संगठित और आतंकवादी हमला था. ये दिखाता है कि हमारे देश के दुश्मन किस हद तक जा सकते हैं लेकिन ये कहना ग़लत है कि पाकिस्तान में क़ानून व्यवस्था चौपट हो गई है. रहमान मलिक का कहना था,'' ये हमले मुंबई जैसे हैं. जब तक हमले के ज़िम्मेदार लोगों को हम पकड़ नहीं लेते और आगे जाँच नहीं करते, हम नहीं कह सकते कि इस हमले के पीछे कौन है.'' उनका कहना था,'' इस बात की जाँच की जाएगी कि हमलावरों को हथियार और पैसा कहां से मिल रहा है. ऐसी बंदूकें कहाँ से मिल रही हैं, ग्रेनेड कहाँ से हासिल हो रहे हैं.'' बीबीसी संवाददाता के मुताबिक अधिकारियों का कहना है कि हमलावर पुलिस की वर्दी में अकादमी में घुसे थे. गोलीबारी समाचार एजेंसी एपी के अनुसार पुलिस अधिकारी मोहम्मद अफ़ज़ल ने बताया सोमवार को सुबह जिस समय पुलिस अधिकारी परेड कर थे, उस दौरान बंदूकधारियों ने उन पर हमला किया. पुलिस का कहना है कि हमलावरों ने गोलीबारी के अलावा ग्रेनेड भी फेंके. टीवी दृश्यों में कई पुलिस जवानों को खून से लथपथ ज़मीन पर पड़े दिखाया गया है. इस स्थान की घेराबंदी कर दी गई थी और कमांडो दस्ते, पाकिस्तान रेंजर्स को तैनात किया गया था. लगभग एक महीने पहले बंदूकधारियों ने लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला किया था. उस हमले में छह पुलिसवाले मारे गए थे जबकि हमलावर बंदूकधारी बच कर निकल गए थे.\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तान के लाहौर शहर में हुए ज़बर्दस्त हमले के बाद पाकिस्तान के गृह मंत्री ने अपील की है कि पूरा देश चरमपंथियों के ख़िलाफ़ एकजुट हो जाए.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसोमवार को हथियारबंद चरमपंथियों ने लाहौर की 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इमारत के अंदर आते हैं, इसकी ख़ूबसूरती आपको मोहित कर लेती है. इस मिनी मीनार को मोहम्मद आमीन ख़ान ने बनवाया था. आमीन ख़ान खीवा के मशहूर शासक थे. वे इतनी ऊंची इमारत बनवाना चाहते थे, जिससे दक्षिण पूर्व में 400 किलोमीटर दूर बुख़ारा को देखा जा सके. उन्होंने मीनार बनवाने का काम 1851 में शुरू किया था. 1855 में उनकी मृत्यु के बाद काम थम गया और तब तक 14 मीटर चौड़ा और 26 मीटर ऊंचा मीनार ही तैयार हो पाया था. खीवा के शासकों का महल है कुहना आर्क. इसके अंदर की मस्जिद पर 1838 में स्थानीय टाइल्स लगाई गई थीं. खीवा की कई इमारतों में आपको इस तरह की नक्क़ाशी देखने को मिल सकती है. शताब्दियों तक मध्य एशिया अध्ययन का केंद्र रहा है. खीवा इसका अपवाद नहीं है. यहां 780 में फ़ारसी विद्वान अबू अब्दलाह मोहम्मद इब्न मूसा अल ख़्वारिज़्म का जन्म हुआ था. उन्हें कई बार कंप्यूटर साइंस का 'ग्रैंड फादर' भी कहते हैं. दशमलव पद्धति को लोकप्रिय बनाने का श्रेय इन्हें ही है. वैसे अलजेब्रा का जन्म यहीं हुआ है. अलजब्रा पर उन्होंने महत्वपूर्ण किताब लिखी जिसका नाम था - हिसाब अल जबर वल मुक़ाबला. अबू अब्दलाह मोहम्मद की विरासत आज शहर के पश्चिमी दरवाज़े पर उनकी मूर्ति के रूप में भी देखी जा सकती है. वैसे इस शहर की ख़ूबसूरती केवल दीवारों के अंदर तक सीमित नहीं है. बल्कि ज़्यादातर आबादी इसके बाहरी हिस्से में रहती है. शहर का मिज़ाज जानना हो तो उसकी नब्ज़ यहां के बाज़ार में महसूस की जा सकती है. यहां आने के बाद इचान काला के बाहर आप पूर्वी गेट से निकलें तो वहां बाहर शहर का बाज़ार मौजूद है. शहर के इतिहास और ख़ूबसूरती को जानने के लिए बाहर निकलकर एक कप चाय पीना सबसे बेहतर विकल्प है. चाय उज़्बेक संस्कृति का अहम हिस्सा है. यहां टी-हाउस को चाय ख़ाना कहते हैं. उज़्बेक लोगों में चाय खाना ब्रिटिश संस्कृति के पब की तरह है और ये ख़ासे लोकप्रिय भी हैं. चाय देना यहां के स्वागत सत्कार की संस्कृति है. अमूमन यहां चाय बिना दूध और चीनी के पी जाती है और हर खाने की शुरुआत और अंत चाय के कप से होता है.\n\nSummary:", "target": "उज़्बेकिस्तान का शहर खीवा वर्ल्ड हेरिटेज़ साइट में शामिल है. करीब 2000 साल के इतिहास वाले शहर में सिल्क रोड के समय के महलों, मस्जिदों और मक़बरों के खंडहर मिलते हैं. कायजलकुम और काराकुम के रेगिस्तान से घिरा हुआ है ये शहर.", 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संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है. पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ़. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उन दो पुराने फ़ैसलों को ख़ारिज कर दिया जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था. 1954 में एमपी शर्मा मामले में छह जजों की पीठ ने और 1962 में खड़ग सिंह केस में आठ जजों की पीठ ने फ़ैसला सुनाया था. वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने फ़ैसला आने के बाद मीडिया से कहा, 'सरकार ने आधार कानून बनाया है जिसमें समाज कल्याण की योजनाओं के लिए आधार की जानकारी देना ज़रूरी है. इस पर भी विचार किया जाएगा. अगर सरकार रेल टिकट और फ़्लाइट टिकट और दूसरी चीजों में भी आधार को ज़रूरी बनाती है तो इसके ख़िलाफ भी आवाज़ उठाई जाएगी.' इसके पहले, जुलाई में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निजता का अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है और इस पर राजसत्ता कुछ हद तक तर्कपूर्ण रोक लगा सकती है. मामले की सुनवाई कर रही संविधान बेंच ने यह सवाल किया था कि आखिर निजता के अधिकार की रूपरेखा क्या हो? निजता की बहस निजता के अधिकार को लेकर बहस तब तेज़ हुई जब सरकार ने आधार कार्ड को ज़्यादातर सुविधाओं के लिए ज़रूरी बनाना शुरू कर दिया. आधार को क़ानूनी तौर पर लागू करने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार के वकीलों ने कोर्ट ने निजता के अधिकार की मौलिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिए. सुप्रीम कोर्ट में 2015 में सरकारी वकीलों की तरफ़ से तर्क दिया गया कि ये हो सकता है कि आधार लोगों की निजता में दखल देता हो, लेकिन क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? सरकार का तर्क था कि इस बारे में कभी भी अदालत ने कोई फैसला नहीं दिया और संविधान में भी इस बारे में स्पष्ट कुछ लिखा नहीं है. उस समय इस मामले की सुनवाई तीन जज कर रहे थे. उन्होंने सरकारी वकील की दलील मान ली और इस पर फैसला लेने के लिए मामले को संविधान पीठ के हवाले कर दिया था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "निजता के अधिकार के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nनौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है. पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ़. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उन दो पुराने फ़ैसलों को ख़ारिज कर दिया जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था. 1954 में एमपी शर्मा मामले में छह जजों की पीठ ने और 1962 में खड़ग सिंह केस में आठ जजों की पीठ ने फ़ैसला सुनाया था. वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने फ़ैसला आने के बाद मीडिया से कहा, 'सरकार ने आधार कानून बनाया है जिसमें समाज कल्याण की योजनाओं के लिए आधार की जानकारी देना ज़रूरी है. इस पर भी विचार किया जाएगा. अगर सरकार रेल टिकट और फ़्लाइट टिकट और दूसरी चीजों में भी आधार को ज़रूरी बनाती है तो इसके ख़िलाफ भी आवाज़ उठाई जाएगी.' इसके पहले, जुलाई में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निजता का अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है और इस पर राजसत्ता कुछ हद तक तर्कपूर्ण रोक लगा सकती है. मामले की सुनवाई कर रही संविधान बेंच ने यह सवाल किया था कि आखिर निजता के अधिकार की रूपरेखा क्या हो? निजता की बहस निजता के अधिकार को लेकर बहस तब तेज़ हुई जब सरकार ने आधार कार्ड को ज़्यादातर सुविधाओं के लिए ज़रूरी बनाना शुरू कर दिया. आधार को क़ानूनी तौर पर लागू करने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार के वकीलों ने कोर्ट ने निजता के अधिकार की मौलिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिए. सुप्रीम कोर्ट में 2015 में सरकारी वकीलों की तरफ़ से तर्क दिया गया कि ये हो सकता है कि आधार लोगों की निजता में दखल देता हो, लेकिन क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? सरकार का तर्क था कि इस बारे में कभी भी अदालत ने कोई फैसला नहीं दिया और संविधान में भी इस बारे में स्पष्ट कुछ लिखा नहीं है. उस समय इस मामले की सुनवाई तीन जज कर रहे थे. उन्होंने सरकारी वकील की दलील मान ली और इस पर फैसला लेने के लिए मामले को संविधान पीठ के हवाले कर दिया था. 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के वाणिज्य और उद्योग मंत्री कमलनाथ ने बीबीसी हिंदी से इस विषय पर बात की और कहा कि ये भारत के लिए बहुत बड़ी सफलता है. \"भारत के लगातार सवाल उठाने पर ही विकसित देशों ने विकासशील देशों की चिंताओ पर ध्यान दिया है.\" कमलनाथ का कहना था कि सब्सिडी घटाए जाने से भारत और विकासशील देशों के किसानों को विश्व के कृषि व्यापार में भाग लेने का मौक़ा मिलेगा. कानकुन में पिछले साल हुई बैठक की विफलता के बाद इस सहमति को मील का पत्थर माना जा रहा है. जबकि इन वार्ताओं पर नज़र रखने वाले अर्थशास्त्रियों और चीन जैसे कुछ देशों का मानना है कि इस वार्ता से कुछ तो हासिल हुआ है लेकिन वो विकासशील देशों की उम्मीदों से काफी कम है. बराबरी लेकिन भारत के वाणिज्य मंत्री कमलनाथ इस बात से सहमत नहीं हैं. उनका कहना था, \"हर विकासशाल देश की अपनी ज़रूरतें हैं लेकिन अगर भारत की बात करें तो हमें इस समझौते से फ़ायदा होगा.\" \"जब धनी देश अपने किसानों को सब्सिडी नहीं देंगे तो कृषि उत्पादन का मूल्य बढेगा. भारत के किसान अमरीकी किसान का मुक़ाबला कर सकते हैं पर अमरीकी सरकार का नहीं, अब मुक़ाबला बराबरी का होगा.\" लेकिन कई विश्लेषकों की राय में विकासशील देशों को कुछ भी ठोस हासिल नहीं हुआ है और ये समझौता विकसित देशों के दबाव में हुआ है. भारत के परिप्रेक्ष्य में भी कहा जा रहा है कि वो अमरीका सहित दूसरे देशों के दबाव में आ गया है. भारत विकासशील देशों की अगुवाई करता रहा है, फिर क्या उसके दबाव में आने की बात उचित है? कमलनाथ ने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा, \"ये सही नहीं है. हम पर कौन दबाव डालेगा, और दबाव बनाकर कौन सफल होगा ये तो भविष्य की बात होगी, सच तो ये है कि जो हमें कानकुन और दोहा में नहीं मिला वो अब जाकर मिला है. अब अगले साल से ये प्रावधान लागू होने की प्रक्रिया शुरू होगी.\" अमीर देशों के किसानों को सरकारी मदद इतनी मिलती है कि वो बाज़ार में अपनी चीज़ें बहुत सस्ती क़ीमतों पर बेच सकते है लेकिन उन क़ीमतों का मुक़ाबला ग़रीब देश नहीं कर पाते हैं और इसीलिए विश्व व्यापार में मामला बराबरी का नहीं होता. अब इस समझौते से स्थिति बेहतर होने की उम्मीद तो ज़रूर लगाई जा रही है लेकिन ये सबकुछ कितने ठोस रूप में होगा, इसके लिए अभी कुछ और साल की बातचीत का इंतज़ार करना पड़ सकता है.\n\nSummary:", "target": "विश्व व्यापार संगठन के 147 सदस्य 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'दुरुपयोग' पोटा के तहत देश भर में सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया. ऐसे भी आरोप लगे कि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में राजनीतिक दलों ने पोटा का इस्तेमाल आपसी दुश्मनी निकालने के लिए किया. गुजरात में दंगों के बाद कई मुसलमानों को भी पोटा के तहत जेलों में बंद कर दिया गया. मानवाधिकार संगठनों ने इस क़ानून का कड़ा विरोध किया था. लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने सत्ता में आने पर पोटा वापस करने का वादा किया था. राष्ट्रपति ने आतंकवाद से निपटने के लिए मंगलवार को एक अन्य पुराने कानून में संशोधन को भी मंजूरी दी है.\n\nSummary:", "target": "राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने आतंकवाद निरोधक विवादास्पद कानून पोटा को निरस्त करने संबंधी अध्यादेश को मंजूरी दे दी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nयह कानून दो साल पहले संसद पर हमले के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या एनडीए सरकार ने बनाया था. इस क़ानून के तहत सुरक्षा बलों को ये अधिकार मिले थे कि वो किसी को भी 30 दिनों तक अदालत में पेश किए बिना हवालात में रखकर पूछताछ कर सकते हैं. पोटा को संसद में पारित करने के लिए एनडीए को काफी मेहनत करनी पडी थी क्योंकि कांग्रेस समेत कई अन्य दल इसका विरोध कर रहे थे. इसे संसद के संयुक्त सत्र में पारित करवाया गया था. 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मगर मौलाना फ़ज़लुल्लाह भले ही कट्टरपंथी हों, नई टेक्नॉलोजी से उनकी कोई लड़ाई नहीं है. मौलाना फ़जलुल्लाह ने अपनाया है मुल्ला एफ़एम, उनका मुल्ला एफ़एम स्वात घाटी के कई इलाक़ों में सुनाई देता है. मुल्ला एफ़एम वहाँ के लोगों के लिए ये पहले मनोरंजन का साधन बना, फिर इस्लाम की अच्छी बातें सीखने का और फिर सरकार के ख़िलाफ़ मुल्ला फ़ज़लुल्लाह की बग़ावत के संदेश भेजने का. पेशावर विश्वविद्यालय के लेक्चरर सैयद इरफ़ान अशरफ़ कहते हैं, \"किसी भी सैनिक अभियान में, चाहे वो सेना का हो या विद्रोहियों का, एक दूसरे को जानकारी देना, हमले का सही समय चुनना, लड़ाई में पीछे हटना और एक दूसरे का मनोबल बढ़ाना – इन सबकी अहम भूमिका होती है\". एक स्थानीय चरमपंथी कमांडर ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि उनके लिए ये काम मौलाना फ़ज़लुल्लाह का मुल्ला एफ़एम करता है. स्थानीय पत्रकार ग़ुलाम फ़ारूक का कहना है कि \"मुल्ला एफ़एम पर तो यहाँ तक कहा गया कि लोग अपने टीवी रेडियो तोड़ दें ताकि सरकार का कुप्रचार वे न सुन सकें और कुछ लोगों ने तो ऐसा कर भी दिया\". दिलचस्प बात ये है कि एफ़एम रेडियो को एक छोटे से ट्रांसमीटर से चलाया जा सकता 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मुक़ाबला 116-112, 115-113, 113-115 से जीता. जीत के बाद मेवेदर ने अपने प्रतिद्वंद्वी के बारे में कहा, \"वो ताबड़तोड़ घूँसे बरसा रहे थे लेकिन निशाने पर नहीं. वो चुनौती देने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मुझे हरा नहीं पाए.\" उनका कहना था, \"अब ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जिसे मैं साबित नहीं कर सकता. मैंने इस खेल से खूब पैसे बनाए हैं.\" दूसरी ओर डी ला होया का कहना था, \"अगर मैं आक्रामक नहीं होता तो मुक़ाबला एकतरफा हो जाता. मैंने कुछ ऐसे प्रहार किए जिसका दर्द उन्हें महसूस हो रहा होगा.\"\n\nSummary:", "target": "मुक्केबाज़ी इतिहास के सबसे ख़र्जीले मुक़ाबले में फ्लायड मेवेदर ने ऑस्कर डी ला होया को 12 राउंड तक चले मुक़ाबले में हरा दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस मुक़ाबले को देखने के लिए दर्शकों ने लगभग दो करोड़ डॉलर राशि के टिकट ख़रीदे. इससे पहले 1999 में इवेंडर होलीफ़िल्ड और लेनॉक्स लुईस के बीच हुए मुक़ाबले में 30 लाख डॉलर के टिकट बिके थे. मेवेदर की फ़ुर्ती और ज़ोरदार प्रहार को देखते हुए उन्हें विजेता घोषित किया गया. इसके साथ ही बॉक्सिंग रिंग के चैंपियन कहे 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{"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस योजना में बेहतर ख़ुफ़िया व्यवस्था होगी और बेहतर तालमेल भी होगा. इस बीच इराक़ में हिंसा की वजह से कुछ और इराक़ी नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों की जान चली गई. ग़ौरतलब है कि एक दिन पहले यानी बुधवार को ही एक हमले में 14 अमरीकी सैनिकों की मौत हो गई थी. उसके अलावा एक अन्य घटना में एक अमरीकी सैनिक मारा गया था. यह घटना रमादी में हुई जहाँ सैनिक पर किसी छोटे हथियार से हमला किया गया. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अमरीकी सैनिकों और इराक़ी सुरक्षा बलों की जो भी रणनीति हो, अलग-अलग स्थानों पर हो रहे हमलों में इराक़ियों की जानें जा रही हैं. गुरूवार को ताज़ा हमले में दाक़ूक़ में एक आत्मघाती हमले में चार इराक़ियों की जाने चली गईं. इसके अलावा किरकुक के पास एक हमले में तीन इराक़ी पुलिसकर्मियों की मौत हो गई. इराक़ी प्रधानमंत्री इब्राहीम अल जाफ़री ने कहा, \"हम युद्ध की स्थिति में हैं\" इसलिए नई सुरक्षा योजना जल्दी ही घोषित की जाएगी. उन्होंने कहा कि ख़ुफ़िया सेवाओं में बेहतर तालमेल की ज़रूरत है और उन्होंने विदेश मंत्री से कहा है कि वे विद्रोही गतिविधियों पर क़ाबू पाने के प्रयासों में पड़ोसी देशों से सहयोग और तालमेल बढ़ाने पर विचार करें. इब्राहीम अल जाफ़री ने कहा कि विद्रोही गतिविधियों का मुक़ाबला करते वक़्त भी बंदियों सहित हर किसी के साथ मानवीय और क़ानून के अनुसार बर्ताव किया जाए.\n\nSummary:", "target": "इराक़ के प्रधानमंत्री इब्राहीम अल जाफ़री ने कहा है कि चूँकि देश बहुत ही भयंकर युद्ध का सामना कर रहा है इसलिए एक नई सुरक्षा योजना तैयार की गई है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस योजना में बेहतर ख़ुफ़िया व्यवस्था होगी और बेहतर तालमेल भी होगा. इस बीच इराक़ में हिंसा की वजह से कुछ और इराक़ी नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों की जान चली गई. ग़ौरतलब है कि एक दिन पहले यानी बुधवार को ही एक हमले में 14 अमरीकी सैनिकों की मौत हो गई थी. उसके अलावा एक अन्य घटना में एक अमरीकी सैनिक मारा गया था. यह घटना रमादी में हुई जहाँ सैनिक पर किसी छोटे हथियार से हमला किया गया. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अमरीकी सैनिकों और इराक़ी सुरक्षा बलों की जो भी रणनीति हो, अलग-अलग स्थानों पर हो रहे हमलों में इराक़ियों की जानें 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रहे हैं. ये लोग कावेरी नदी पर तमिलनाडु के होगेनक्कल में बनने वाली एक पेयजल परियोजना का विरोध कर रहे हैं. तमिलनाडु ने कावेरी नदी पर होगेनक्कल में पेयजल परियोजना को पूरा करने का फ़ैसला किया है जबकि कर्नाटक में लोग इसका भारी विरोध कर रहे हैं. कर्नाटक का कहना है कि इससे कावेरी नदी से मिलने वाले उसके पानी के हिस्से में कमी आएगी. इस परियोजना से तमिलनाडु के धर्मपुरी और कृष्णागिरि ज़िले के लगभग 30 लाख लोगों को फ़ायदा पहुँचने का अनुमान है.\n\nSummary:", "target": "होगेनक्कल परियोजना पर तमिलनाडु विरोधी प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ तमिल सितारे सड़क पर उतर आए हैं. रजनीकांत जैसे कई सितारों ने उपवास शुरू किया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतमिल फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ के सुपरस्टार रजनीकांत, माधवन और अभिनेत्री ख़ुशबू ने शुक्रवार को चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम के पास आठ घंटे का उपवास शुरू किया. उनके साथ तमिल फ़िल्म उद्योग के सैकड़ों अन्य लोग भी उपवास पर बैठ हैं. दरअसल ये सितारे कावेरी नदी पर तमिलनाडु के होगेनक्कल में प्रस्तावित पेयजल परियोजना के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के सिलसिले 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रंगीन चलचित्र पर इन्हें खूब सराहा गया. समाप्त दोबारा देखने पर अचरज होता है कि ये फ़िल्म किसी भी तरह से पारिवारिक मनोरंजन की फ़िल्म नहीं लगती. फ़िल्म षड्यंत्र रचने, झूठ बोलने और पैसे से लगाव रखने वाले और पुरुषों को बहकाने वाले महिला की कहानी पेश करती है. ये दास प्रथा को सही ठहराने वाले अमरीका के दक्षिणी भाग और दास प्रथा का विरोध कर रहे उत्तरी भाग के संघर्ष को भी दिखाती है. चार घंटे के उतार-चढ़ाव के बाद कई अनसुलझी गुत्थियों के साथ ही फ़िल्म अचानक ख़त्म हो जाती है. फ़िल्म को दोबारा देखने के बाद हैरानी होती है कि ये अमरीका की सबसे नापसंदीदा फ़िल्म कैसे नहीं बनी. फ़िल्म माग्रेट मिशेल के उपन्यास पर बनी थी और यह उपन्यास 1037 पन्नों का था. डेविड सेल्ज़ेनिक ने इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के अधिकार 50 हज़ार डॉलर में ख़रीदे. लेकिन इस उपन्यास को पर्दे पर उतारना बड़ी चुनौती थी. स्क्रिप्ट कई बार लिखी गई, यही नहीं निर्देशक सेल्ज़ेनिक फ़िल्म बनने के दौरान इसके संवाद बदलते रहे. 31 स्क्रीन टेस्ट सेल्ज़निक ने मुख्य भूमिका के लिए हॉलीवुड की 31 अभिनेत्रियों का स्क्रीन टेस्ट लिया. इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन की विवियन ले को चुना जो उस समय हॉलीवुड में ज़्यादा चर्चित न थीं. लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो सब कुछ बदल गया. बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म ने सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले और 10 श्रेणियों में ऑस्कर जीते. सेल्ज़निक की मेहनत रंग लाई लेकिन ऑडिएंस फ़िल्म देखकर असमंजस में भी पड़ सकती थी. फिल्म अमरीका में हुए गृह युद्ध और इससे ठीक पहले की पृष्ठभूमि की बेजोड़ तस्वीर पेश करती है. फिल्म की नायिका स्कार्लेट हवेली में रहती है. उसकी कपास की खेती है वहां बड़ी संख्या में ग़ुलाम काम करते हैं. उसकी नटखट और चंचल प्रवृत्ति उसमें एक विशेष आकर्षण पैदा करती है. वह अपनी सुंदरता के प्रति भी बेहद सजग रहती है. कई नाटकीय मोड़ स्कार्लेट किसी बात की परवाह नहीं करती सिवाय एशले विल्क्स के, जो उनकी आँखों में बस गया है. वहीं एशले विल्क्स अपनी चचेरी बहन मेलनी के प्रति आकर्षित है. मेलनी और एशले की शादी हो जाती है. स्कार्लेट इस कदर एशले की दीवानी है कि बाँका नौजवान रिट बटलर भी उसका ध्यान नहीं बटा सकता. बाद में स्कार्लेट और बटलर की शादी हो जाती है, लेकिन स्कार्लेट अपने दिल से एशले को नहीं भुला पाती है. हैरानी की बात यह है कि फिल्म चार घंटे की होने के बावजूद इसमें इतने नाटकीय मोड़ हैं कि वह ख़ासी तेज़ गति से बढ़ती है. नस्लभेद मिशेल का उपन्यास जब पहली बार प्रकाशित हुआ तो इस पर विवाद हुआ था. सेल्ज़निक ने कुछ नस्लभेद टिप्पणियों को हटाने की भी कोशिश की, लेकिन फ़िल्म में स्कार्लेट के पिता की ये सलाह \"आपको निचले दर्जे के लोगों, ख़ासकर काले लोगों के साथ सख़्त रहना चाहिए,\" वाला संवाद सुनना दुखद है. फ़िल्म के आख़िरी घंटे में जब कहानी गृह युद्ध से आगे बढ़ जाती है और स्कार्लेट अपनी संपत्ति को दोबारा पाने के संघर्ष में लगी होती है, तब एक हैरान करने वाला लव ट्राएंगल छा जाता है. स्कार्लेट और रिट बटलर की शादी हो चुकी होती है लेकिन स्कार्लेट का दिल अब भी एशले के लिए धड़कता है. क्लार्क गेबल के अलावा शायद नायक की इस भूमिका को कोई और नहीं निभा सकता था. लेकिन फिल्म देखकर इस पर विश्वास करना मुश्किल लगता है कि स्कार्लेट जैसी महिला रिट बटलर (गेबल) की जगह एशले (46 वर्षीय लेसली हॉवर्ड) की ओर आकर्षित होगी. मानवीय संवेदनाओं की ऐसी सूक्ष्म अभिव्यक्ति कुछ ही फ़िल्मों में दिखाई देती है. पात्रों के कलात्मक परिधान, नायक और नायिका की रोमांटिक रूप सज्जा और अभिनय, उनके भारी-भरकम कॉस्ट्यूम, प्राकृतिक सुंदरता का मनमोहक फ़िल्मांकन इस फिल्म को महान और चिर-नवीन बनाता है. अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अमरीका में एक ऐसी फ़िल्म बनी जिसकी लोकप्रियता 75 साल भी नहीं घटी. नाम है 'गॉन विद द विंड'.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइसे अमरीका की सबसे मशहूर और कामयाब फ़िल्मों में शुमार किया जाता है. इसका प्रीमियर ठीक 75 साल पहले हुआ था. वर्ष 2008 में हैरिस पोल (अमरीका में 50 साल से सर्वेक्षण कराने वाली एक संस्था) और 2011 में एबीसी न्यूज़ के सर्वे में यह 1939 के बाद रिलीज़ की गई फ़िल्मों में बेहतरीन मानी गई. बॉक्स ऑफिस पर इसकी कमाई भी इसके मशहूर होने का सबूत है. अगर इस फ़िल्म की तब की कमाई को महंगाई दर से जोड़ा जाए तो यह आज भी ये सबसे सफल फ़िल्म है. स्क्रीन पर उतारने की चुनौतियां इस फ़िल्म में अभिनेता क्लार्क गेबल की मूछें हों या ख़ूबसूरत अभिनेत्री विवियन ले की अदाएं, तब के रंगीन चलचित्र पर इन्हें खूब सराहा गया. समाप्त दोबारा देखने पर अचरज होता है कि ये फ़िल्म किसी भी तरह से पारिवारिक मनोरंजन की फ़िल्म नहीं लगती. फ़िल्म षड्यंत्र रचने, झूठ बोलने और पैसे से लगाव रखने वाले और पुरुषों को बहकाने वाले महिला की कहानी पेश करती है. ये दास प्रथा को सही ठहराने वाले अमरीका के दक्षिणी भाग और दास प्रथा का विरोध कर रहे उत्तरी भाग के संघर्ष को भी दिखाती है. चार घंटे के उतार-चढ़ाव के बाद कई अनसुलझी गुत्थियों के साथ ही फ़िल्म अचानक ख़त्म हो जाती है. फ़िल्म को दोबारा देखने के बाद हैरानी होती है कि ये अमरीका की सबसे नापसंदीदा फ़िल्म कैसे नहीं बनी. फ़िल्म माग्रेट मिशेल के उपन्यास पर बनी थी और यह उपन्यास 1037 पन्नों का था. डेविड सेल्ज़ेनिक ने इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के अधिकार 50 हज़ार डॉलर में ख़रीदे. लेकिन इस उपन्यास को पर्दे पर उतारना बड़ी चुनौती थी. स्क्रिप्ट कई बार लिखी गई, यही नहीं निर्देशक सेल्ज़ेनिक फ़िल्म बनने के दौरान इसके संवाद बदलते रहे. 31 स्क्रीन टेस्ट सेल्ज़निक ने मुख्य भूमिका के लिए हॉलीवुड की 31 अभिनेत्रियों का स्क्रीन टेस्ट लिया. इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन की विवियन ले को चुना जो उस समय हॉलीवुड में ज़्यादा चर्चित न थीं. लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो सब कुछ बदल गया. बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म ने सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले और 10 श्रेणियों में ऑस्कर जीते. सेल्ज़निक की मेहनत रंग लाई लेकिन ऑडिएंस फ़िल्म देखकर असमंजस में भी पड़ सकती थी. फिल्म अमरीका में हुए गृह युद्ध और इससे ठीक पहले की पृष्ठभूमि की बेजोड़ तस्वीर पेश करती है. फिल्म की नायिका स्कार्लेट हवेली में रहती है. उसकी कपास की खेती है वहां बड़ी संख्या में ग़ुलाम काम करते हैं. उसकी नटखट और चंचल प्रवृत्ति उसमें एक विशेष आकर्षण पैदा करती है. वह अपनी सुंदरता के प्रति भी बेहद सजग रहती है. कई नाटकीय मोड़ स्कार्लेट किसी बात की परवाह नहीं करती सिवाय एशले विल्क्स के, जो उनकी आँखों में बस गया है. वहीं एशले विल्क्स अपनी चचेरी बहन मेलनी के प्रति आकर्षित है. मेलनी और एशले की शादी हो जाती है. स्कार्लेट इस कदर एशले की दीवानी है कि बाँका नौजवान रिट बटलर भी उसका ध्यान नहीं बटा सकता. बाद में स्कार्लेट और बटलर की शादी हो जाती है, लेकिन स्कार्लेट अपने दिल से एशले को नहीं भुला पाती है. हैरानी की बात यह है कि फिल्म चार घंटे की होने के बावजूद इसमें इतने नाटकीय मोड़ हैं कि वह ख़ासी तेज़ गति से बढ़ती है. नस्लभेद मिशेल का उपन्यास जब पहली बार प्रकाशित हुआ तो इस पर विवाद हुआ था. सेल्ज़निक ने कुछ नस्लभेद टिप्पणियों को हटाने की भी कोशिश की, लेकिन फ़िल्म में स्कार्लेट के पिता की ये सलाह \"आपको निचले दर्जे के लोगों, ख़ासकर काले लोगों के साथ सख़्त रहना चाहिए,\" वाला संवाद सुनना दुखद है. फ़िल्म के आख़िरी घंटे में जब कहानी गृह युद्ध से आगे बढ़ जाती है और स्कार्लेट अपनी संपत्ति को दोबारा पाने के संघर्ष में लगी होती है, तब एक हैरान करने वाला लव ट्राएंगल छा जाता है. स्कार्लेट और रिट बटलर की शादी हो चुकी होती है लेकिन स्कार्लेट का दिल अब भी एशले के लिए धड़कता है. क्लार्क गेबल के अलावा शायद नायक की इस भूमिका को कोई और नहीं निभा सकता था. लेकिन फिल्म देखकर इस पर विश्वास करना मुश्किल लगता है कि स्कार्लेट जैसी महिला रिट बटलर (गेबल) की जगह एशले (46 वर्षीय लेसली हॉवर्ड) की ओर आकर्षित होगी. मानवीय संवेदनाओं की ऐसी सूक्ष्म अभिव्यक्ति कुछ ही फ़िल्मों में दिखाई देती है. पात्रों के कलात्मक परिधान, नायक और नायिका की रोमांटिक रूप सज्जा और अभिनय, उनके भारी-भरकम कॉस्ट्यूम, प्राकृतिक सुंदरता का मनमोहक फ़िल्मांकन इस फिल्म को महान और चिर-नवीन बनाता है. अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है. 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ये कैसी विडंबना है कि 70 फ़ीसदी लोग अपनी मातृभाषा लिख या पढ़ नहीं सकते हैं. वो मायूस होकर कहते हैं कि लोग अपनी भाषा ही नहीं जानते हैं. आगमन कोलकाता में चीनी समुदाय की जड़े बहुत पुरानी हैं. बेंटिंक स्ट्रीट इलाक़े में जूतों की दुकान के मालिक 50 वर्षीय कू बताते हैं कि बंगाल में चीनियों का इतिहास 200 वर्षों से भी पुराना है. चीनी स्कूल में मेरे साथ पढ़नेवाले 30 लोगों में से सिर्फ़ तीन कोलकाता में हैं बाकी सब कनाडा चले गए. एक चीनी मूल के व्यक्ति ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में चीनियों का पहला जत्था कोलकाता से लगभग 65 किलोमीटर दूर डायमंड हार्बर के पार उतरा था. उसके बाद रोज़गार की तलाश में धीरे-धीरे और लोग कोलकाता आए और फिर वे यहीं के होकर रह गए. किसी जमाने में यहाँ चीनियों की आबादी 50 हज़ार थी. कोलकाता का एक बड़ा इलाक़ा चाइना टाउन कहलाता है. चाइना टाउन अब भी है लेकिन अब उसमें वो रौनक नहीं रही. कू बताते हैं कि अब तो यहां लोग ही नहीं रहते. पलायन लगभग पूरा चाइना टाउन ही अब कनाडा चला गया है. 1962 में चीन युद्ध के दौरान, चीनियों का कहना है कि उन पर अत्याचार भी हुए. सरकार ने हज़ारों लोगों को चीन भेज दिया. उसके बाद चीनियों का पलायन शुरू हुआ और लोग कनाडा और अमरीका जाने लगे. अब हर घर का कम से कम एक व्यक्ति कनाडा में है. कू बताते हैं कि यहाँ चीनी स्कूल में उनके साथ पढ़नेवाले 30 लोगों में से सिर्फ़ तीन कोलकाता में हैं बाकी सब कनाडा चले गए. कू का कहना है कि चीनियों के हितों की ओर न तो राज्य सरकार ने कोई ध्यान दिया और न ही चीन सरकार ने. कोलकाता में पहले चीनी भाषा की पढ़ाई के लिए तीन स्कूल थे. इनमें से एक तो बंद हो चुका है और जो दो बचे हैं उनमें भी छात्रों की संख्या काफ़ी कम है. पहले यहाँ से तीन अख़बार निकलते थे लेकिन उनमें से एक 'जेनरस ऑफ़ इंडिया' तो बंद हो चुका है. एक बात पर चीनी समुदाय के सभी लोग सहमत हैं कि अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा को बचाए रखना ज़रूरी है. वे कहते हैं कि इसके बिना तो हमारा वजूद ही ख़त्म हो जाएगा.\n\nSummary:", "target": "\"हम लोग चीनी भाषा पढ़ना भूल रहे हैं. कृपया चीन से कुछ शिक्षक भेजिए.\"", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में रहनेवाले चीनी समुदाय के संगठन चाइनीज़ एसोसिएशन ने दिल्ली स्थित चीनी 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मामले की सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई होगी या फिर ये प्रक्रिया सिर्फ़ निचली अदालत के दस्तावेजों की समीक्षा भर होगी. चीन की क़ानूनी व्यवस्था के अमरीकी विशेषज्ञ जेरोम कोहेन ने इसे ‘सही दिशा में उठाया गया कदम’ बताया है. उन्होंने कहा कि इससे साफ ज़ाहिर होता है कि चीन की सर्वोच्च न्यायपालिका मृत्युदंड के बढ़ते निर्णयों से चिंतित है.\n\nSummary:", "target": "चीन में मौत की सज़ा के क़ानून को कड़ा किया गया है और अब मृत्युदंड पर देश की सर्वोच्च अदालत की मुहर लगनी ज़रूरी होगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n1980 के दशक में चीन में निचली अदालतों को मृत्युदंड का हक दिये जाने के बाद न्याय में चूक होने के कई मामले सामने आए हैं. चीन की सरकारी संवाद समिति शिन्हुआ के अनुसार मृत्युदंड के मामले में पिछले दो दशकों में यह सबसे अहम सुधार है. माना जाता है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले चीन में ज्यादा अपराधियों को सज़ा ए मौत दी जाती है. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि वर्ष 2005 में चीन में 1770 लोगों को फाँसी पर लटकाया गया और तक़रीबन 4000 लोगों को 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मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय भारतीय नागरिकों को वापस लाकर उन्हें भारत में ठीक ढंग से रखने के लिए ज़रूरी प्रबंध करेगा. जयपुर में राहुल गांधी की रैली पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंगलवार को जयपुर के अल्बर्ट हॉल में युवाओं को ध्यान में रखते हुए एक रैली को संबोधित करेंगे. कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी की इस रैली का नाम युवा आक्रोश रखा गया है. इस रैली के माध्यम से राहुल गांधी युवाओं की समस्याओं पर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे. मलेशिया ने चीनी पर्यटकों पर बैन लगाया मलेशिया ने कोरोना वायरस के चलते चीन के वुहान शहर से आने वाले चीनी पर्यटकों पर अल्पकालिक बैन लगा दिया है. प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि वुहान से आने वाले पर्यटकों को वीज़ा दिए जाने की प्रक्रिया तत्काल रूप से रोकी जा रही है. चीन में कंपनियों ने कर्मचारियों की छुट्टियां बढ़ाईं चीन में कोरोना वायरस के चलते कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर पर रहने की सलाह दी है. इसके साथ ही कोरोना वायरस से प्रभावित क्षेत्रों से लौट रहे लोगों को दफ़्तर न आने की सलाह दी जा रही है. चीन में कम से कम 80 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच मंगलवार को दोपहर साढ़े बारह बजे निर्भया गैंगरेप केस मामले के दोषी मुकेश कुमार की दया याचिका पर सुनवाई करेगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइस मामले में दोषी ठहराए गए मुकेश कुमार ने अपनी फांसी की सज़ा को टलवाने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के समक्ष दया याचिका भेजी थी जिसे राष्ट्रपति ने ख़ारिज कर दिया है. मुकेश कुमार ने अपनी दया याचिका पर राष्ट्रपति के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. इस मामले में दोषियों मुकेश कुमार, अक्षय, विनय और पवन को 1 फ़रवरी की सुबह फांसी दिए जाने का समय तय किया गया है. भारत लाए जाएंगे चीन में फंसे भारतीय चीन में बीते कुछ दिनों में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 80 हो चुकी है. समाप्त फ्रांस और जापान समेत कई देश वायरस के केंद्र माने जा रहे वुहान में फंसे अपने नागरिकों को बाहर निकालने की कोशिश में लगे हुए हैं. भारत सरकार ने भी वुहान में फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं. प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, विदेश मंत्रालय इस मसले पर चीनी अधिकारियों से बात करके ज़रूरी क़दम उठाएगा. चीनी अधिकारियों से सहमति बन जाने के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय भारतीय नागरिकों को वापस लाकर उन्हें भारत में ठीक ढंग से रखने के लिए ज़रूरी प्रबंध करेगा. जयपुर में राहुल गांधी की रैली पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंगलवार को जयपुर के अल्बर्ट हॉल में युवाओं को ध्यान में रखते हुए एक रैली को संबोधित करेंगे. कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी की इस रैली का नाम युवा आक्रोश रखा गया है. इस रैली के माध्यम से राहुल गांधी युवाओं की समस्याओं पर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे. मलेशिया ने चीनी पर्यटकों पर बैन लगाया मलेशिया ने कोरोना वायरस के चलते चीन के वुहान शहर से आने वाले चीनी पर्यटकों पर अल्पकालिक बैन लगा दिया है. प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि वुहान से आने वाले पर्यटकों को वीज़ा दिए जाने की प्रक्रिया तत्काल रूप से रोकी जा रही है. चीन में कंपनियों ने कर्मचारियों की छुट्टियां बढ़ाईं चीन में कोरोना वायरस के चलते कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर पर रहने की सलाह दी है. इसके साथ ही कोरोना वायरस से प्रभावित क्षेत्रों से लौट रहे लोगों को दफ़्तर न आने की सलाह दी जा रही है. चीन में कम से कम 80 लोगों की मौत के साथ दुनिया भर में कोरोना वायरस के तीन हज़ार से ज़्यादा मामलों की पुष्टि हो चुकी है. 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पाँच अतिरिक्त रन देने पर पाकिस्तानी टीम चायकाल के बाद मैदान पर नहीं पहुँची. अधिकारियों ने इस विवाद को सुलझाने के लिए घंटों कोशिश की और अंत में मैच का फ़ैसला इंग्लैंड के पक्ष में सुना दिया गया था. इस घटना के बाद हेयर के निर्णय को लेकर विवाद गहराता चला गया और पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने पाकिस्तान के साथ होने वाले किसी भी मैच में हेयर के अंपायरिंग नहीं करने की माँग की.आईसीसी ने उन्हें अंपायरिंग से हटा लिया था. विवादास्पद इसके बाद हेयर को अपने संवाद को दुरुस्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का एक कोर्स करना पड़ा था. उन्होंने कहा कि वे ठीक ढंग से ख़ुद को अभिव्यक्त करना सीख गए हैं. हेयर ने कहा, \"मैने यह सीखा है कि आप जो कहना चाहते हैं उसे लोग भी उसी रूप कैसे समझें.\" हेयर क्रिकेट के नियमों के अच्छे जानकार माने जाते रहे हैं लेकिन विवाद भी उनके साथ-साथ चलता रहा है. हेयर सबसे ज़्यादा चर्चा में उस समय आए जब उन्होंने श्रीलंका के स्टार स्पिनर मुथैया मुरलीधरन के ऐक्शन को ग़लत ठहराया और उस समय तक नो बॉल देते रहे जब तक कि तत्कालीन कप्तान अर्जुन रणतुंगा ने मुरलीधरन को गेंदबाज़ी के 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शिक्षा संस्थानों में महिलाओं के हिजाब पहनने या सिर पर दुपट्टा रखने पर लगी पाबंदी को हटाने के लिए पहले संवैधानिक संशोधन को 107 के मुक़ाबले 403 मतों से मंज़ूरी दी थी. लेकिन तुर्की की धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकतर लोगों ने इसका विरोध किया. विरोधियों का कहना था कि हिजाब या सिर पर दुपट्टा रखना राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक है इससे तुर्की गणराज्य की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को ख़तरा पैदा होता है. अभी एक अन्य अदालत में तुर्की में सत्तारूढ़ एके पार्टी (एकेपी) पर धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से खिलवाड़ करने का मामला चल रहा है. इस मामले में अदालत एकेपी को प्रतिबंधित करने का फ़ैसला भी सुना सकती है. हालाँकि ताज़ा फ़ैसले पर एकेपी के वरिष्ठ नेता बेकर बोज़दैग ने कहा कि अदालत संसदीय प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रही है.\n\nSummary:", "target": "तुर्की की सर्वोच्च अदालत ने कॉलेज जाने वाली छात्राओं को हिजाब पहनने की इजाज़त देने का प्रस्ताव ठुकरा दिया है. अदालत ने इसे धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ़ बताया.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nतुर्की की संसद ने कॉलेज जाने वाली छात्राओं को हिजाब पहनने की इजाज़त देने के समर्थन में एक विधेयक पारित किया था. लेकिन तुर्की की संवैधानिक अदालत ने इसे देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के ख़िलाफ़ बताया है. तुर्की की सरकार का कहना है कि हिजाब या दुपट्टा पहनने पर लगी पाबंदीकी वजह से ऐसी हज़ारों लड़कियाँ उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय नहीं जातीं जो हिजाब पहनना या सिर पर दुपट्टा रखना पसंद करती हैं. प्रतिक्रिया तुर्की की संसद ने उच्च शिक्षा संस्थानों में महिलाओं के हिजाब पहनने या सिर पर दुपट्टा रखने पर लगी पाबंदी को हटाने के लिए पहले संवैधानिक संशोधन को 107 के मुक़ाबले 403 मतों से मंज़ूरी दी थी. लेकिन तुर्की की धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकतर लोगों ने इसका विरोध किया. विरोधियों का कहना था कि हिजाब या सिर पर दुपट्टा रखना राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक है इससे तुर्की गणराज्य की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को ख़तरा पैदा होता है. अभी एक अन्य अदालत में तुर्की में सत्तारूढ़ एके पार्टी (एकेपी) पर धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से खिलवाड़ करने का मामला चल रहा है. इस मामले में अदालत एकेपी को प्रतिबंधित करने का फ़ैसला भी सुना सकती है. हालाँकि ताज़ा फ़ैसले 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महसूस कर रही थी, क्योंकि इस टूर्नामेंट में उन्होंने कई मैचों में वापसी की थी. समाप्त फ़ाइनल लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साइना का मुक़ाबला फ़ाइनल में ऑल इंग्लैंड चैम्पियन और वर्ल्ड नंबर वन और मौजूदा चैम्पियन कैरोलिना मारिन से रविवार को होगा. साइना ने कहा, \"मैं फ़ाइनल में अच्छा खेलना चाहती हूँ. लेकिन मारिन के ख़िलाफ़ मुक़ाबला कड़ा होगा.\" साइना का वर्ल्ड चैम्पियनशिप में पदक जीतना तो तय ही है. ये वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भारत का पाँचवाँ पदक होगा. पीवी सिंधु ने 2013 और 2014 में कांस्य पदक जीता था. जबकि ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने 2011 के वर्ल्ड चैम्पियनशिप में डबल्स मुक़ाबले में कांस्य जीता था. जबकि प्रकाश पादुकोण ने 1983 में कांस्य जीता था. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत की बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल ने कहा है कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वे वर्ल्ड चैम्पियनशिप के फ़ाइनल में पहुँचेंगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइंडोनेशिया के जकार्ता में चल रही वर्ल्ड बैडमिंटन चैम्पियनशिप के सेमी फ़ाइनल में साइना ने इंडोनेशिया की लिंडावेनी फ़ानेत्री को 21-17 और 21-17 से मात दी. वर्ल्ड चैम्पियनशिप के फ़ाइनल में साइना मैच के बाद साइना ने कहा, \"मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं फ़ाइनल में पहुँच पाऊँगी. ये मैच इस सप्ताह के संघर्षपूर्ण मैचों में से एक था. मैं दर्शकों के ख़िलाफ़ भी खेल रही थी. जब भी उन्हें अंक मिले, वो मेरी ग़लती की वजह से. वो बिना किसी तनाव के खेल रही थी.\" साइना ने कहा कि वे दबाव महसूस कर रही थी, क्योंकि इस टूर्नामेंट में उन्होंने कई मैचों में वापसी की थी. समाप्त फ़ाइनल लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साइना का मुक़ाबला फ़ाइनल में ऑल इंग्लैंड चैम्पियन और वर्ल्ड नंबर वन और मौजूदा चैम्पियन कैरोलिना मारिन से रविवार को होगा. साइना ने कहा, \"मैं फ़ाइनल में अच्छा खेलना चाहती हूँ. लेकिन मारिन के ख़िलाफ़ मुक़ाबला कड़ा होगा.\" साइना का वर्ल्ड चैम्पियनशिप में पदक जीतना तो तय ही है. ये वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भारत का पाँचवाँ पदक होगा. पीवी सिंधु ने 2013 और 2014 में कांस्य पदक जीता था. जबकि ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने 2011 के वर्ल्ड चैम्पियनशिप में डबल्स मुक़ाबले में कांस्य जीता था. जबकि प्रकाश पादुकोण ने 1983 में कांस्य जीता था. 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अन्य तीसरे देश में भी इसके लिए साझा निवेश की बात कही गई है. इसके अलावा भारत में तेल शोधन, मार्केटिंग और स्टोरेज़ के लिए सऊदी अरब के निवेश पर भी रज़ामंदी हुई है. आपूर्ति लेकिन यह सऊदी अरब में गैस पर आधारित उर्वरक प्लांट स्थापित भारत और सऊदी अरब की साझा कोशिश की व्यावहारिकता पर निर्भर करेगा. सऊदी अरब इस समय भारत को 17 करोड़ 50 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति करता है. जो भारत की तेल ज़रूरत का एक चौथाई है. भारत अपनी आपूर्ति का 70 प्रतिशत आयात करता है और इस समय वह केंद्रीय एशिया से दक्षिण अमरीका तक आपूर्ति करने वाले नए देशों की तलाश कर रहा है. सऊदी अरब इस समय दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है. सऊदी अरब भारत और चीन के साथ अपने संबंध मज़बूत करना चाहता है जहाँ की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है लेकिन इससे वहाँ की ऊर्जा ज़रूरतें भी बढ़ी हैं. भारत और सऊदी अरब के बीच 'आतंकवाद' से निपटने के लिए द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और विश्व स्तर पर सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति हुई. बयान में कहा गया है कि दोनों सरकारें 'आतंकवाद', नशीली दवाओं और हथियारों की तस्करी रोकने के लिए भी सहयोग करने पर राज़ी हो गए 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भारत और सऊदी अरब की साझा कोशिश की व्यावहारिकता पर निर्भर करेगा. सऊदी अरब इस समय भारत को 17 करोड़ 50 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति करता है. जो भारत की तेल ज़रूरत का एक चौथाई है. भारत अपनी आपूर्ति का 70 प्रतिशत आयात करता है और इस समय वह केंद्रीय एशिया से दक्षिण अमरीका तक आपूर्ति करने वाले नए देशों की तलाश कर रहा है. सऊदी अरब इस समय दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है. सऊदी अरब भारत और चीन के साथ अपने संबंध मज़बूत करना चाहता है जहाँ की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है लेकिन इससे वहाँ की ऊर्जा ज़रूरतें भी बढ़ी हैं. भारत और सऊदी अरब के बीच 'आतंकवाद' से निपटने के लिए द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और विश्व स्तर पर सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति हुई. बयान में कहा गया है कि दोनों सरकारें 'आतंकवाद', नशीली दवाओं और हथियारों की तस्करी रोकने के लिए भी सहयोग करने पर राज़ी हो गए हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 978, 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बातचीत का दौर संकट में फँस गया है और जिन प्रमुख मुद्दों पर समझौता होना था, अब वो नहीं हो सकता. स्विटज़रलैंड के जिनीवा शहर में विश्व व्यापार संगठन की बातचीत चल रही है. इस बैठक में पचास से ज़्यादा देश कृषि सब्सिडी और अन्य उत्पादों पर शुल्क कम करने के लिए प्रस्तावों पर बातचीत कर रहे हैं. विश्व व्यापार संगठन में अमीर और विकासशील देशों के बीच मामला इसलिए फँस गया है क्योंकि अमरीका और यूरोपीय देश चाहते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश उनके माल के लिए अपने बाज़ारों को पूरी तरह खोल दें. साथ ही वे ये भी चाहते हैं कि विकासशाल देश विदेशी माल के आयात पर लगी पाबंदियाँ दूर कर दें. लेकिन भारत हमेशा इस मुद्दे पर बराबरी का व्यवहार किए जाने की माँग करता रहा है.\n\nSummary:", "target": "भारत के वाणिज्य मंत्री कमलनाथ विश्व व्यापार संगठन की जिनीवा में चल रही बैठक के बीच में ही छोड़कर लौट आए हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nलौटकर उन्होंने कहा था कि वहाँ जो चर्चा चल रही थी वह भारत के हित में नहीं जा रही थी. इससे पहले ही उन्होंने कहा था कि विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) 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इस्तीफ़ा माँगा. सिब्बल ने एक निजी समाचार चैनल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना के फ़ॉर्म श्रम मंत्रालय से ही मिलने चाहिए, मगर ये फ़ॉर्म मुंबई स्थित भाजपा कार्यालय में बांटे जा रहे हैं और ये भ्रष्टाचार का मामला है. उन्होंने कहा कि वह ये मामला चुनाव आयोग के पास ले जाने के लिए भी तैयार हैं. आरोप झुठलाए वहीं भाजपा का कहना है कि उनके कार्यकर्ता लोगों की मदद करने के लिए ही ये फ़ॉर्म बेच रहे हैं. इस बीच श्रम मंत्री वर्मा ने कहा कि वह इस मामले की इसमें कोई भ्रष्टाचार नहीं है और वह जाँच ख़ुद कपिल सिब्बल को ही सौंपने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा कार्यालय पर अगर भाजपा के चुनाव निशान वाला कोई फ़ॉर्म दिया जा रहा है तो वह पार्टी का कोई सर्वेक्षण हो सकता है और ऐसे फ़ॉर्म तो स्वीकार ही नहीं किए जा सकते. साथ ही इस योजना के तहत श्रमिकों के पैसे जमा करने के बारे में उन्होंने कहा कि पैसे कोई भी लेकर जमा कर सकता है. कांग्रेस ने समाचार चैनल की रिपोर्ट के हवाले से कहा था कि भाजपा के कार्यकर्ता ही पैसे ले रहे हैं और ये ग़लत है क्योंकि पैसा फ़ॉर्म के साथ सीधे जमा करवाया जाना चाहिए. बसपा-सपा से गठबंधन उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बारे में सिब्बल ने कहा कि कांग्रेस भाजपा के विरुद्ध सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को एकजुट करना चाहती है. उन्होंने कहा, “सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को भाजपा के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए और अगर दूसरे दल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ते तो जनता फ़ैसला करेगी कि असली धर्मनिरपेक्ष कौन है.” उन्होंने कहा कि वह चुनाव में साझेदारी के बारे में समाजवादी पार्टी से भी बातचीत को तैयार हैं.\n\nSummary:", "target": "कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी पर भ्रष्टाचार से जुड़ा एक और आरोप लगाते हुए श्रम मंत्री साहिब सिंह वर्मा के इस्तीफ़े की माँग की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nवर्मा ने कांग्रेस के इस आरोप को झुठलाते हुए कहा है कि अगर सिब्बल उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप साबित कर देते हैं तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे. कांग्रेस प्रवक्ता ने एक सरकारी योजना के फ़ॉर्म मुंबई स्थित भारतीय जनता पार्टी कार्यालय से मिलने के मामले में एक संवाददाता सम्मेलन 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क्योंकि पैसा फ़ॉर्म के साथ सीधे जमा करवाया जाना चाहिए. बसपा-सपा से गठबंधन उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बारे में सिब्बल ने कहा कि कांग्रेस भाजपा के विरुद्ध सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को एकजुट करना चाहती है. उन्होंने कहा, “सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को भाजपा के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए और अगर दूसरे दल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ते तो जनता फ़ैसला करेगी कि असली धर्मनिरपेक्ष कौन है.” उन्होंने कहा कि वह चुनाव में साझेदारी के बारे में समाजवादी पार्टी से भी बातचीत को तैयार हैं.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 980, "source_item_id": "980", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1780, "clean_index": 873, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:873"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमई 2014 में नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी आमंत्रित थे. इसे लेकर भारत सरकार की विदेश नीति ख़ासकर चीन और पाकिस्तान को लेकर जो नीति है उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इस फ़ैसले के मद्देनज़र भारत की विदेश नीति किस ओर जा रही है, इस पर रक्षा और विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन की राय: चीन को संकेत देने की कोशिश की गई है, और वो शायद चीन के पास चला गया है. यह सारी चीजें उस वक्त हो रही थी जब भारत और चीन के बीच उच्च स्तरीय बातचीत चल रही थी. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी चीन के दौरे पर थे. हम इस बात की अटकल लगा सकते हैं कि मसूद अज़हर के मामले के साथ जरूर इसका जुड़ाव होगा या फिर चीन के साथ कोई बैक रूम डील हुई है. समाप्त इस तरह से ताकि भारत जब अगले एक-दो बार इस मुद्दे को उठाएगा तो इसे चीन की तरफ से हामी हासिल हो जाएगी. दूसरी संभावना यह है कि उसका मसूद अज़हर के साथ कोई जुड़ाव नहीं था. सिर्फ चीन को एक संकेत देना था कि आप हमारे ख़िलाफ़ कोई इस तरह की कार्रवाई पाकिस्तान या किसी और के साथ मिलकर करते हैं तो हमारे पास भी कुछ रास्ते हैं. लेकिन भारत ने इसे जिस तरह से किया है उससे मुझे लगता है कि वो संकेत कहीं गुम हो गया है. वास्तविक स्थिति क्या है, ये तो उन्हीं लोगों को पता है जिन्होंने यह निर्णय लिया है. चीन के साथ पेचीदगियां बहुत हैं. एक तो सामरिक स्तर पर जिस तरीक़े का चीन का रवैया है, उनके जो हित हैं, वो भारत के हित के साथ मेल नहीं खाते. मसूद अज़हर के मामले में भारत को बुरा तो बहुत लगा लेकिन क्या सारे रिश्ते एक ही जगह केंद्रित रहेंगे. शायद नहीं. मुझे लगता है कि चीन के साथ कई स्तर पर निपटना पड़ेगा. कई मामलों में आप चीन के साथ सख्ती दिखा सकते हैं लेकिन फिर कई में आपको नरमी बरतनी होगी. रही बात पाकिस्तान पर नीति की तो उसमें एक तरह से कमज़ोरी रही है. सार्वजनिक स्तर पर जिनके बारे में पता चलता है, उसके दो स्तर है. एक तो यह कि पिछले दो साल में कम से कम पांच बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद पहल की है. हाल में भी जब रिश्तों में कड़वाहट आई तो उसे बेहतर करने की कोशिश नरेंद्र मोदी ने की. लेकिन लगता है कि पहले के प्रधानमंत्रियों की कोशिशों की तरह उनकी कोशिश का कोई असर नज़र नहीं आ रहा. दूसरा पहलू है नरेंद्र मोदी का सऊदी अरब या यूएई जाकर नए सामरिक समीकरण बनाने की कोशिश करना. इससे एक बात साफ़ होती है कि पूर्व में हम पाकिस्तान से एक ही स्तर पर डील करने की कोशिश कर रहे थे, और, जो पूरा रणनीतिक माहौल है उसपर हमारी नज़र नहीं थी. ये क़दम इसमें एक बड़ा बदलाव है. एक सच्चाई भारत को स्वीकार करनी होगी कि अगर नेताओं के व्यक्तिगत संबंध अच्छे भी हैं जो इससे मुल्कों के संबंध बेहतर नहीं हो जाते. जिस नाटकीयता से लाहौर की यात्रा हुई, उसकी ज़रूरत नहीं थी. उसका एक नकारात्मक पहलू यह रहा कि जबसे मोदी सरकार आई थी तब से पाकिस्तान में जो डर या हिचकिचाहट थी - मोदी की नीतियां पाकिस्तान को लेकर पिछली सरकारों से बिल्कुल अलग होगी; वो लगभग पूरी तरह से ख़त्म हो गई है. (रक्षा और विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित) (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "भारत सरकार ने चीन मूल की अमरीकी मानवाधिकार कार्यकर्ता लू जिन्गहुआ को वीज़ा देने से इंकार कर दिया है. इसके पहले भारत ने वीगरों के नेता डॉल्कन ईसा का वीज़ा रद्द कर दिया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमई 2014 में नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी आमंत्रित थे. इसे लेकर भारत सरकार की विदेश नीति ख़ासकर चीन और पाकिस्तान को लेकर जो नीति है उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इस फ़ैसले के मद्देनज़र भारत की विदेश नीति किस ओर जा रही है, इस पर रक्षा और विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन की राय: चीन को संकेत देने की कोशिश की गई है, और वो शायद चीन के पास चला गया है. यह सारी चीजें उस वक्त हो रही थी जब भारत और चीन के बीच उच्च स्तरीय बातचीत चल रही थी. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी चीन के दौरे पर थे. हम इस बात की अटकल लगा सकते हैं कि मसूद अज़हर के मामले के साथ जरूर इसका जुड़ाव होगा या फिर चीन के साथ कोई बैक रूम डील हुई है. समाप्त इस तरह से ताकि भारत जब अगले एक-दो बार इस मुद्दे को उठाएगा तो इसे चीन की तरफ से हामी हासिल हो जाएगी. दूसरी संभावना यह है कि उसका मसूद अज़हर के साथ कोई जुड़ाव नहीं था. सिर्फ चीन को एक संकेत देना था कि आप हमारे ख़िलाफ़ कोई इस तरह की कार्रवाई पाकिस्तान या किसी और के साथ मिलकर करते हैं तो हमारे पास भी कुछ रास्ते हैं. लेकिन भारत ने इसे जिस तरह से किया है उससे मुझे लगता है कि वो संकेत कहीं गुम हो गया है. वास्तविक स्थिति क्या है, ये तो उन्हीं लोगों को पता है जिन्होंने यह निर्णय लिया है. चीन के साथ पेचीदगियां बहुत हैं. एक तो सामरिक स्तर पर जिस तरीक़े का चीन का रवैया है, उनके जो हित हैं, वो भारत के हित के साथ मेल नहीं खाते. मसूद अज़हर के मामले में भारत को बुरा तो बहुत लगा लेकिन क्या सारे रिश्ते एक ही जगह केंद्रित रहेंगे. शायद नहीं. मुझे लगता है कि चीन के साथ कई स्तर पर निपटना पड़ेगा. कई मामलों में आप चीन के साथ सख्ती दिखा सकते हैं लेकिन फिर कई में आपको नरमी बरतनी होगी. रही बात पाकिस्तान पर नीति की तो उसमें एक तरह से कमज़ोरी रही है. सार्वजनिक स्तर पर जिनके बारे में पता चलता है, उसके दो स्तर है. एक तो यह कि पिछले दो साल में कम से कम पांच बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद पहल की है. हाल में भी जब रिश्तों में कड़वाहट आई तो उसे बेहतर करने की कोशिश नरेंद्र मोदी ने की. लेकिन लगता है कि पहले के प्रधानमंत्रियों की कोशिशों की तरह उनकी कोशिश का कोई असर नज़र नहीं आ रहा. दूसरा पहलू है नरेंद्र मोदी का सऊदी अरब या यूएई जाकर नए सामरिक समीकरण बनाने की कोशिश करना. इससे एक बात साफ़ होती है कि पूर्व में हम पाकिस्तान से एक ही स्तर पर डील करने की कोशिश कर रहे थे, और, जो पूरा रणनीतिक माहौल है उसपर हमारी नज़र नहीं थी. ये क़दम इसमें एक बड़ा बदलाव है. एक सच्चाई भारत को स्वीकार करनी होगी कि अगर नेताओं के व्यक्तिगत संबंध अच्छे भी हैं जो इससे मुल्कों के संबंध बेहतर नहीं हो जाते. जिस नाटकीयता से लाहौर की यात्रा हुई, उसकी ज़रूरत नहीं थी. उसका एक नकारात्मक पहलू यह रहा कि जबसे मोदी सरकार आई थी तब से पाकिस्तान में जो डर या हिचकिचाहट थी - मोदी की नीतियां पाकिस्तान को लेकर पिछली सरकारों से बिल्कुल अलग होगी; वो लगभग पूरी तरह से ख़त्म हो गई है. 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ब्रह्मपुरी में बरामद हुआ था. वह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले थे और छह महीने पहले दिल्ली आए थे. दिल्ली हिंसा: पुलिसवालों पर हमले के वीडियो वायरल पाकिस्तान में महिलाओं के लिए खोली गई मस्जिद पाकिस्तान की ऐतिहासिक सुनहरी मस्जिद के दरवाजे 24 साल बाद महिलाओं के लिए खोले गए. दैनिक भास्कर में प्रकाशित समाचार में बताया गया है कि यह जानकारी पाकिस्तान के अखबार द डॉन ने दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, 1996 के बाद पहली बार शुक्रवार को 15-20 महिलाओं ने नमाज पढ़ी. यह मस्जिद सदर रोड स्थित केंटोनमेंट एरिया में मौजूद है. मस्जिद प्रशासन का कहना है कि ईद की नमाज के लिए भी महिलाओं को अनुमति दी जाएगी. ये भी पढ़ेंः (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "हिंदी फिल्मों के जानेमाने अभिनेता धर्मेंद्र के रेस्टोरेंट 'HE MAN' (ही मैन) को सील कर दिया गया है. यह रेस्टोरेंट 14 फ़रवरी को वैलेंटाइन डे के दिन खोला गया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nइंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित 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इसराइली सैनिकों की मौत हुई है. इसराइल ने सुरंगों को तबाह करने के मक़सद से 17 जुलाई को ज़मीनी अभियान शुरू किया था. उसका कहना है कि किसी भी तरह के संघर्ष विराम समझौते में सुरंगों को तबाह करने का उसका हक़ शामिल रहेगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा है कि जब तक फलस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास की बनाई गई सभी सुरंगें तबाह नहीं हो जातीं, तब तक ग़ज़ा में इसराइल की कार्रवाई नहीं रुकेगी.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nमंत्रिमंडल की एक बैठक से पहले नेतन्याहू ने कहा कि इसराइल सुरंगें ज़रूर तबाह करेगा, चाहे 'संघर्ष विराम समझौता हो या न हो'. इससे पहले इसराइल ने अपने 16 हज़ार अतिरिक्त सैनिकों को और बुला लिया है. इसके साथ ही अब तक तैनात किए गए सैनिकों की संख्या बढ़कर 86 हज़ार हो गई है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ मौजूदा संघर्ष की वजह से ग़ज़ा में अब तक लगभग सवा चार लाख लोग विस्थापित हुए हैं. सुरंगों से ख़तरा इसराइल ने ग़ज़ा में 'ऑपरेशन प्रोटेक्टिव एज' नाम से सैन्य कार्रवाई आठ जुलाई को शुरू की थी. तब से अब तक कम से कम 1360 फलस्तीनी मारे गए हैं, जिनमें से ज़्यादातर आम नागरिक थे. इस अभियान की शुरुआत में इसराइल हमास की रॉकेट छोड़ने की क्षमता पर ध्यान दे रहा था. इसराइल ने कहा है कि वो हमास की बनाई सभी सुरंगे तबाह करेगा. लेकिन अब ये दायरा बढ़ गया है और इसमें इसराइल-ग़ज़ा सीमा के नीचे बनी सुरंगें भी शामिल हो गई हैं. ग़ज़ा पर हवाई हमले शुरू करने के बाद इसराइली सेना को ग़ज़ा से इसराइल में आने वाली सुरंगों का जाल मिला था. हमास चरमपंथियों ने इन सुरंगों से कई हमले किए हैं, जिनमें कई इसराइली सैनिकों की मौत हुई है. इसराइल ने सुरंगों को तबाह करने के मक़सद से 17 जुलाई को ज़मीनी अभियान शुरू किया था. उसका कहना है कि किसी भी तरह के संघर्ष विराम समझौते में सुरंगों को तबाह करने का उसका हक़ शामिल रहेगा. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 984, "source_item_id": "984", "source_lang": "hin_Deva", "full_chat_token_length": 1404, "clean_index": 877, "clean_language_index": "hin_Deva:validation:877"} {"prompt": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविश्नु 'किसन' पंडित (61 वर्ष) मुंबई में जन्मे विश्नु अमरीका में बसने से पहले कोलकाता के एक मैरीन इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी और उसके बाद मिशिगन विश्वविद्यालय से नेवल आर्किटेक्चर में स्नातक की डिग्री ली. वह मैरीन इंजीनियर और नेवल आर्किटेक्ट थे और नेवी के सी-सिस्टम कमांड में कार्यरत थे. अख़बार 'वॉशिंगटन पोस्ट' के साथ साझा की गई श्रद्धांजलि में उनके परिवार ने कहा है कि किसन को अमरीकी नेवी में शामिल होने पर गर्व था और उन्होंने करीब 25 वर्ष तक नागरिक कर्मचारी के रूप में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं थीं. किसन अपने पीछे पत्नी अंजली, दो बेटे और एक पोती को छोड़ गए हैं. मार्टिन बॉडरोग (54) वर्जीनिया के रहने वाले मार्टिन बॉडरोग एक संडे स्कूल टीचर थे. सेना में दो दशक की अपनी सेवा के दौरान वो कई जिम्मेदारियों को निभा चुके थे और सैन्य ठेकेदार के रूप में पानी के जहाजों की खरीद में मदद देने का काम कर रहे थे. वो अपने पीछे 25 वर्षीय पत्नी मेलेनी और तीन बेटियों को छोड़ गए हैं. माइकल अर्नाल्ड (59) वर्जीनिया के माइकल अर्नाल्ड नेवी में कमांडर या लेफ्टिनेंट कमांडर पद से सेवानिवृत्त हुए थे. वह पर्ल हार्बर पर भी नियुक्त रह चुके थे. वह नेवी यार्ड में जहाज के डिजाइन विभाग से जुड़े हुए थे. उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं. मैरी नाइट (51) उत्तरी कैरोलिना में जन्मीं मैरी ने कम्प्यूटर संसाधन एवं सूचना प्रबंधन में परास्नातक की डिग्री ली थी. नेवल सी-सिस्टम कमांड में मैरी नाइट सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहीं थीं. उन्होंने उत्तरी वर्जीनिया कम्युनिटी कॉलेज में अध्यापन का कार्य भी किया था. सिल्विया फ्रेजियर (53) सिल्विया नेवल सी सिस्टम कमांड में नेटवर्क सिक्युरिटी एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में कम कर रही थीं. अपने सात भाई बहनों में वह छठे नंबर पर थीं. कैथलीन गार्डी (63) कैथलीन ने नेवी यार्ड में वित्तीय विश्लेषक के रूप में काम किया था. उनके पति भी उनके साथ काम करते थे और पिछले ही साल सेवानिवृत्त हुए थे. टांपा में साउथ फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की थी. फ्रैंक कोहलर (50) फ्रैंक एक मीटिंग के सिलसिले में मैरीलैंड से वॉशिंगटन आए हुए थे और उसी दौरान यह दुर्घटना घटी. वह रक्षा ठेका कम्पनी लॉकहीड मार्टिन में साइट मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. वह अपने पीछे पत्नी और दो बेटियां छोड़ गए हैं. केनेथ प्रॉक्टर (46) नेवी यार्ड के नागरिक सेवा विभाग में केनेथ फोरमैन के पद पर थे. जिस इमारत में गोलीबारी की घटना हुई उन्होंने वहां कभी काम नहीं किया था और वहां नाश्ता करने गए हुए थे. उनका तलाक हो चुका था. उनके दो बेटे हैं. आर्थर डेनियल्स (51) आर्थर संघीय सरकार की इमारतों में फर्नीचर लगाने का काम करते थे. सोमवार को हुई गोलीबारी के दौरान वह नेवी यार्ड के अंदर काम कर रहे थे. आवाज सुनकर जैसे ही वह लिफ्ट की ओर भागे हमलावर ने उन्हें पीछे से गोली मार दी. डेनियल्स के पीछे पांच बच्चे और नौ पोते-पोतियां हैं. जॉन रोजर जॉन्सन (73) जॉन रोजर नेवी में एक नागरिक कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे थे. पड़ोसियों के मुताबिक वो एक शांत एवं संजीदा व्यक्ति थे. रिचर्ड मिशेल रिजेल (52) रिजेल की मृत्यु पर मैरीलैंड के विंसमिस्टर के निवासियों ने श्राद्धांजलि दी. रिचर्ड मैरीलैंड के पूर्व पुलिस अधिकारी थे और 1983 से 2000 के बीच अपनी सेवाएं दी थीं. उनके पीछे तीन बेटियां हैं. गेराल्ड रीड (58) गेराल्ड इन्फार्मेशन एस्योरेंस विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत थे. उन्होंने अपने करियर का बहुत बड़ा हिस्सा सेना में ही गुजारा था और दक्षिण कोरिया में सिस्टम एनॉलिस्ट के रूप में भी सेवाएं दी थीं. इराक और अफ़गानिस्तान युद्ध के दौरान वह सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके थे. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)\n\nSummary:", "target": "गत सोमवार को वॉशिंगटन नेवी यार्ड में गोलीबारी के दौरान मारे गए लोगों की पहचान को पुलिस ने सार्वजनिक कर दिया है. मृतकों में एक भारतीय विश्नु 'किसन' पंडित का नाम भी है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nविश्नु 'किसन' पंडित (61 वर्ष) मुंबई में जन्मे विश्नु अमरीका में बसने से पहले कोलकाता के एक मैरीन इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी और उसके बाद मिशिगन विश्वविद्यालय से नेवल आर्किटेक्चर में स्नातक की डिग्री ली. वह मैरीन इंजीनियर और नेवल आर्किटेक्ट थे और नेवी के सी-सिस्टम कमांड में कार्यरत थे. अख़बार 'वॉशिंगटन पोस्ट' के साथ साझा की गई श्रद्धांजलि में उनके परिवार ने कहा है कि किसन को अमरीकी नेवी में शामिल होने पर गर्व था और उन्होंने करीब 25 वर्ष तक नागरिक कर्मचारी के रूप में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं थीं. किसन अपने पीछे पत्नी अंजली, दो बेटे और एक पोती को छोड़ गए हैं. मार्टिन बॉडरोग (54) वर्जीनिया के रहने वाले मार्टिन बॉडरोग एक संडे स्कूल टीचर थे. सेना में दो दशक की अपनी सेवा के दौरान वो कई जिम्मेदारियों को निभा चुके थे और सैन्य ठेकेदार के रूप में पानी के जहाजों की खरीद में मदद देने का काम कर रहे थे. वो अपने पीछे 25 वर्षीय पत्नी मेलेनी और तीन बेटियों को छोड़ गए हैं. माइकल अर्नाल्ड (59) वर्जीनिया के माइकल अर्नाल्ड नेवी में कमांडर या लेफ्टिनेंट कमांडर पद से सेवानिवृत्त हुए थे. वह पर्ल हार्बर पर भी नियुक्त रह चुके थे. वह नेवी यार्ड में जहाज के डिजाइन विभाग से जुड़े हुए थे. उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं. मैरी नाइट (51) उत्तरी कैरोलिना में जन्मीं मैरी ने कम्प्यूटर संसाधन एवं सूचना प्रबंधन में परास्नातक की डिग्री ली थी. नेवल सी-सिस्टम कमांड में मैरी नाइट सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहीं थीं. उन्होंने उत्तरी वर्जीनिया कम्युनिटी कॉलेज में अध्यापन का कार्य भी किया था. सिल्विया फ्रेजियर (53) सिल्विया नेवल सी सिस्टम कमांड में नेटवर्क सिक्युरिटी एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में कम कर रही थीं. अपने सात भाई बहनों में वह छठे नंबर पर थीं. कैथलीन गार्डी (63) कैथलीन ने नेवी यार्ड में वित्तीय विश्लेषक के रूप में काम किया था. उनके पति भी उनके साथ काम करते थे और पिछले ही साल सेवानिवृत्त हुए थे. टांपा में साउथ फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की थी. फ्रैंक कोहलर (50) फ्रैंक एक मीटिंग के सिलसिले में मैरीलैंड से वॉशिंगटन आए हुए थे और उसी दौरान यह दुर्घटना घटी. वह रक्षा ठेका कम्पनी लॉकहीड मार्टिन में साइट मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. वह अपने पीछे पत्नी और दो बेटियां छोड़ गए हैं. केनेथ प्रॉक्टर (46) नेवी यार्ड के नागरिक सेवा विभाग में केनेथ फोरमैन के पद पर थे. जिस इमारत में गोलीबारी की घटना हुई उन्होंने वहां कभी काम नहीं किया था और वहां नाश्ता करने गए हुए थे. उनका तलाक हो चुका था. उनके दो बेटे हैं. आर्थर डेनियल्स (51) आर्थर संघीय सरकार की इमारतों में फर्नीचर लगाने का काम करते थे. सोमवार को हुई गोलीबारी के दौरान वह नेवी यार्ड के अंदर काम कर रहे थे. आवाज सुनकर जैसे ही वह लिफ्ट की ओर भागे हमलावर ने उन्हें पीछे से गोली मार दी. डेनियल्स के पीछे पांच बच्चे और नौ पोते-पोतियां हैं. जॉन रोजर जॉन्सन (73) जॉन रोजर नेवी में एक नागरिक कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे थे. पड़ोसियों के मुताबिक वो एक शांत एवं संजीदा व्यक्ति थे. रिचर्ड मिशेल रिजेल (52) रिजेल की मृत्यु पर मैरीलैंड के विंसमिस्टर के निवासियों ने श्राद्धांजलि दी. रिचर्ड मैरीलैंड के पूर्व पुलिस अधिकारी थे और 1983 से 2000 के बीच अपनी सेवाएं दी थीं. उनके पीछे तीन बेटियां हैं. गेराल्ड रीड (58) गेराल्ड इन्फार्मेशन एस्योरेंस विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत थे. उन्होंने अपने करियर का बहुत बड़ा हिस्सा सेना में ही गुजारा था और दक्षिण कोरिया में सिस्टम एनॉलिस्ट के रूप में भी सेवाएं दी थीं. इराक और अफ़गानिस्तान युद्ध के दौरान वह सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके थे. 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(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "ओडिशा में रायगडा ज़िले के बातूड़ी गाँव में हुई ग्राम सभा की बैठक ने नियामगिरि पर्वत में बॉक्साइट खनन का प्रस्ताव सर्वसम्मति से ख़ारिज कर दिया है. यहां ब्रितानी वेदांता कंपनी एल्यूमिनियम प्लांट लगाना चाहती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ओडिशा सरकार 12 गाँवों में ग्रामसभा करा रही है. ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 18 अप्रैल के अपने एक फ़ैसले में आदिवासियों के 'पवित्र पर्वत' पर खुदाई की इजाज़त देने या नकारने का फ़ैसला ग्राम सभाओं पर छोड़ दिया था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल करते हुए राज्य सरकार ने नियामगिरि के इर्द-गिर्द बसे रायगडा और कालाहांडी ज़िलों के 12 गावों में ग्राम सभा के गठन की घोषणा की. इस क्रम में पहली ग्रामसभा रायगडा ज़िले के सेरकापाड़ी गाँव में 18 जुलाई को हुई. इसमें प्रस्ताव को सर्वसम्मति से ख़ारिज कर दिया गया. शनिवार को इस कड़ी में छठी ग्रामसभा बातूड़ी गाँव में हुई. अब तक हुई तमाम ग्रामसभाओं में ग्रामीणों ने यह प्रस्ताव ख़ारिज ही किया है. वेदांता ने की सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना इससे पहले हुई पाँच ग्रामसभाओं में भी खनन प्रस्ताव ख़ारिज हो गया है. स्थानीय भाषा में ग्रामसभा की बैठक को पल्ली सभा कहा जाता है. शुक्रवार को हुई सभा में सदस्यों ने कुई भाषा में अपनी बात रखी, जिसे अनुवादक की मदद से अधिकारियों को समझाया गया. अधिकारियों ने उड़िया भाषा में तैयार दस्तावेज पर ग्रामीणों के दस्तख़त और अंगूठे के निशान भी लिए. नियामगिरी सुरक्षा समिति के कार्यकर्ता भालचंद्र सडन्गी ने बीबीसी को बताया, \"आने वाले दिनों में होने वाली ग्रामसभाओं में भी यह प्रस्ताव गिरने की संभावना है. सरकार बड़ी बेईमानी से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अपने तरीक़े से मतलब निकालते हुए 112 गाँव के बजाय सिर्फ 12 गाँवों में ही ग्राम सभाएं आयोजित करवा रही है. लेकिन इसमें भी सरकार कामयाब होती नहीं दिख रही है. नियामगिरी के लोगों ने प्रस्ताव गिराने का मन बना लिया है.\" ग़रीबों, आदिवासियों को दबाकर विकास नहीं: राहुल देवता सभा में मौजूद प्रकाश कारसिका ने कहा, \"नियामगिरी हमारे देवता हैं और उन्हीं से हमारी संस्कृति और जीवनयापन जुड़ा है. अगर यहाँ बॉक्साइट खनन होगा तो इससे सारी नदियाँ और नालें सूख जाएंगे और पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा. हम किसी भी सूरत में अपने पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाने देंगे.\" नियामगिरि सुरक्षा समिति ने घोषणा की है कि वह 112 गावों में ग्राम सभा आयोजित करेगी और बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग और उनमें पारित प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट के पास भेजेगी. नियामगिरी पर्वत पर बसे आदिवासी खनन का विरोध करते रहे हैं. ग़ौरतलब है कि नियामगिरि में खनन पर पर्यावरण मंत्रालय की पाबंदी के कारण पर्वत के पास कालाहांडी ज़िले के लांझीगढ़ में वेदांता द्वारा लगाई गई एक मिलियन टन की रिफ़ाइनरी पांच दिसंबर 2012 से ही बंद पड़ी है. नियमगिरि के बिना क्या जी पाएँगे आदिवासी? प्लांट पर ख़तरा अगर वेदांता को नियामगिरि में खुदाई की अनुमति नहीं मिलती तो न केवल यह रिफ़ाइनरी बल्कि झारसुगुड़ा में कंपनी के स्मेल्टर प्लांट के भी बंद होने की नौबत आ जाएगी और कंपनी द्वारा चालीस हज़ार करोड़ की लागत पर बनी यह पूरी परियोजना ख़तरे में पड़ जाएगी. 2003 में वेदांता और राज्य सरकार के उपक्रम ओडिशा माइनिंग कंपनी या ओएमसी के बीच समझौते के अनुसार वेदांता अगले 30 साल में क़रीब 150 मिलियन टन बॉक्साइट का खनन करने वाली थी. स्थानीय डोंगरिया कोंध आदिवासियों के विरोध और अदालत में चल रहे मामलों के कारण कंपनी अभी तक यहां से एक ग्राम बॉक्साइट भी नहीं निकाल पाई है. 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कार्यक्रम भी टालना पड़ा था. गिरिजाप्रसाद कोइराल लगातार बीमार चल रहे हैं और पिछले हफ़्ते ही थाईलैंड में उनका एक ऑपरेशन हुआ था. कोइराला के निजी सचिव ने बीबीसी को बताया कि रात भर में उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. उन्होंने बताया कि उनके इलाज के लिए भारत से डॉक्टरों को बुलवाया गया है. कोइराला पांचवी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं और वो नेपाल की सबसे बड़े राजनीतिक दल नेपाली कांग्रेस के नेता हैं. हाल में नेपाल में माओवादी विद्रोही नेता प्रचंड और उनकी राजधानी काठमांडू में बातचीत हुई थी. माओवादी विद्रोह के दस साल के इतिहास में माओवादियों और सरकार के बीच ये पहली अधिकृत वार्ता थी.\n\nSummary:", "target": "नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला की तबियत में सुधार की ख़बरें हैं. उन्हें सीने में दर्द की शिकायतों के बाद अस्पताल में भर्ती किया गया था.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nडॉक्टरों का कहना है कि 84 वर्ष के कोइराला निमोनिया हो गया है. कोइराला की तबीयत ख़राब होने के बाद संसद में उनका भाषण टाल दिया गया है जो वे मंगलवार को देने वाले थे. माना जा रहा था 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अभी अटकलें लगाई जा रही हैं. बीबीसी संवाददाता ज़फ़र अब्बास का कहना है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें इस बारे में खुलकर कुछ कहना नहीं चाह रही हैं. हालाँकि भारत ने पहले कहा था कि अगर ये नेता पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के अलावा कहीं और जाते हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी पाकिस्तान की होगी. ज़फ़र अब्बास का कहना है कि अगर हुर्रियत नेता इस्लामाबाद जाते हैं तो भी भारत-पाक संबंधों पर इसका कोई बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा. उधर पाकिस्तान के अख़बारों में इस यात्रा को काफ़ी तरजीह दी जा रही है और क़रीब सभी अख़बारों के मुखपृष्ठों पर इन नेताओं की तस्वीरें छपी हैं. दूसरी तरफ़ भारतीय अख़बारों में इसे उतनी जगह नहीं मिल पाई है. एक दो अख़बारों को छोड़कर किसी अन्य अख़बार में यह पहली कहानी नहीं है. मुज़फ़्फ़राबाद में स्वागत मुज़फ़्फ़राबाद से बीबीसी संवाददाता मुबश्शिर ज़ैदी का कहना है कि शहर में यातायात पूरी तरह जाम हो गया और हज़ारों लोग उनका स्वागत करने के लिए सड़कों पर उतर आए. बहुत से लोगों ने हाथों में तरह-तरह की झंडियाँ पकड़ी हुई थीं जिन्हें उत्साह के साथ लहराया गया, सड़क के दोनों ओर खड़े लोगों ने कश्मीरी नेताओं पर फूल बरसाए. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की चकोती सीमा चौकी के ज़रिए प्रवेश करने वाले इन नेताओं के पहुँचने पर शांति के प्रतीक के तौर पर कबूतर भी उड़ाए गए. 1947 में विभाजन के बाद क़रीब छह दशक के इतिहास में यह पहला मौक़ा है कि भारत प्रशासित कश्मीर से कुछ नेता आधिकारिक यात्रा पर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर का दौरा कर रहे हैं.\n\nSummary:", "target": "कश्मीरी अलगाववादी संगठन सर्वदलीय हुर्रियत कांफ़्रेंस और कुछ अन्य कश्मीरी संगठनों के नेता आज पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में वरिष्ठ नेताओं से मुलाक़ात करने वाले हैं.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nभारत प्रशासित कश्मीर से अनेक नेता गुरूवार को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ्फराबाद पहुँचे थे. मुज़फ़्फ़राबाद में उनका भव्य स्वागत किया गया है और अब वो प्रधानमंत्री सिकंदर हयात से मिलेंगे. इन अलगाववादी नेताओं की मुलाक़ात कई अन्य स्थानीय नेताओं से भी होनी है और वो वहाँ की असेंबली देखने भी जाएंगे. एक दो दिन बाद इन नेताओं का इस्लामाबाद जाने का भी कार्यक्रम है जहाँ उनकी मुलाक़ात पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ 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text in Hindi.\n\nText:\nगांगुली की पीठ का दर्द अभी भी ठीक नहीं हो सका है और अब वे इलाज के लिए भारत वापस जा रहे हैं. सौरभ गांगुली की जगह भारतीय टीम में मोहम्मद कैफ़ को रखा जा रहा है. भारतीय टीम के मैनेजर रत्नाकर शेट्टी ने कहा है कि गांगुली एक अप्रैल को कोलकाता वापस जा रहे हैं जहाँ उनका इलाज होगा. गांगुली को लाहौर में एक दिवसीय क्रिकेट श्रृंखला के फ़ाइनल में फ़ील्डिंग करते समय चोट लग गई थी जिसके बाद मुल्तान में पहले टेस्ट में नहीं खेल पाए. तीन टेस्ट मैचों की सिरीज़ का दूसरा टेस्ट मैच पाँच अप्रैल से लाहौर में खेला जाना है. रत्नाकर शेट्टी ने बताया,\"भारतीय टीम के फ़िटनेस कोच एंड्र्यू लीपस पिछले कुछ दिनों से गांगुली के साथ मेहनत कर रहे थे मगर उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा\". लेकिन शेट्टी ने कहा कि गांगुली तीसरे टेस्ट मैच में खेल सकेंगे. तीसरा और अंतिम टेस्ट मैच 13 अप्रैल से रावलपिंडी में खेला जाएगा.\n\nSummary:", "target": "सौरभ गांगुली पाकिस्तान के ख़िलाफ़ दूसरे टेस्ट मैच में भी नहीं खेल सकेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nगांगुली की पीठ का दर्द 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लेकिन वो असीमानंद से कभी नहीं मिले. स्वामी असीमानंद उर्फ़ नबकुमार सरकार मक्क़ा मस्जिद धमाके के मुख्य आरोपी हैं. एनपीए बढने की आशंका, बैंकिग के लिए ख़तरा जनसत्ता में ख़बर छपी है कि भारतीय रिज़र्व बैंक के नए निर्देश में सभी बैंकों से कहा गया है कि वे एनपीए के मामले में ज़्यादा पारदर्शिता बरतें. संकेत हैं कि इस निर्देश के बाद जल्द ही बैंकों की एनपीए की रकम बढ़ जाएगी जो समूचे बैंकिग उद्योग के लिए ख़तरे का सूचक होगी. दो दिन पहले ही देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई के घाटे और एनपीए दोनों में ही बेतहाशा बढ़ोतरी का आंकड़ा सामने आया था. मानव संसाधन मंत्रालय राष्ट्रपति के फ़ैसले से असहमत इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ मानव संसाधन मंत्रालय ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को उनके एक फ़ैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है. पिछले साल अख़बार को ख़बर मिली थी कि विश्व भारती विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति के लिए मानव संसाधन मंत्रालय के एक पैनल से तीन नाम मिले थे. विश्वविद्यालय के सूत्रों के मुताबिक़ राष्ट्रपति ने उनमें से एक नाम पर मुहर लगा दी थी लेकिन नियुक्ति के आधिकारिक आदेश जारी ही नहीं किए गए. ये एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जिसके चांसलर ख़ुद प्रधानमंत्री हैं. भाजपा की रैली में मोटरसाइकिलों का संकट जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक़ हरियाणा के जींद में होने वाली भाजपा की युवा हुंकार रैली में एक लाख मोटरसाइकिल सवार युवाओं को इकट्ठा करना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने अमित शाह की जींद रैली के माध्यम से एक लाख मोटरसाइकिलें जुटने और दो लाख युवाओं के जुड़ने का दावा किया है. लेकिन भाजपा नेताओं के लिए घोषित लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल होता जा रहा है. (बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अरबपति ज्वैलरी डिज़ाइनर नीरव मोदी पर देश के सबसे बड़े बैंकिग घोटाले को अंजाम देने का आरोप है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअमर उजाला अख़बार की ख़बर के मुताबिक़ इस मामले के सामने आते ही बुधवार को पीएनबी के शेयरों में गिरावट से निवेशकों के 4,000 करोड़ रूपये डूब गए. बैंक के शेयर 160 रूपये पर खुले थे. लेकिन कारोबार के अंत में शेयर फिसलकर 145.80 रूपये पर बंद हुए. वित्त मंत्रालय ने कहा है कि स्थिति नियंत्रण में है. मामले पर कार्रवाई की जा रही है. वित्तीय सेवा विभाग के संयुक्त सचिव लोक रंजन ने कहा कि फ्रॉड को लेकर सभी बैंकों से इस हफ़्ते के अंत तक सूचना देने को कहा गया है. पुरोहित ने बदला बयान, कहा असीमानंद से नहीं मिले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने ख़बर छापी है कि 2008 मालेगांव धमाकों में आरोपी और मक्का मस्जिद धमाके में राष्ट्रीय जांच एजेंसी के गवाह लेफ्टीनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित बुधवार को कोर्ट में अपने बयान से पलट गए. पुरोहित ने कहा कि उन्होंने भारतीय सेना की खुफ़िया सेल में काम किया है और बहुत लोगों से मिलना-जुलना भी रहा, लेकिन वो असीमानंद से कभी नहीं मिले. स्वामी असीमानंद उर्फ़ नबकुमार सरकार मक्क़ा मस्जिद धमाके के मुख्य आरोपी हैं. एनपीए बढने की आशंका, बैंकिग के लिए ख़तरा जनसत्ता में ख़बर छपी है कि भारतीय रिज़र्व बैंक के नए निर्देश में सभी बैंकों से कहा गया है कि वे एनपीए के मामले में ज़्यादा पारदर्शिता बरतें. संकेत हैं कि इस निर्देश के बाद जल्द ही बैंकों की एनपीए की रकम बढ़ जाएगी जो समूचे बैंकिग उद्योग के लिए ख़तरे का सूचक होगी. दो दिन पहले ही देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई के घाटे और एनपीए दोनों में ही बेतहाशा बढ़ोतरी का आंकड़ा सामने आया था. मानव संसाधन मंत्रालय राष्ट्रपति के फ़ैसले से असहमत इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ मानव संसाधन मंत्रालय ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को उनके एक फ़ैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है. पिछले साल अख़बार को ख़बर मिली थी कि विश्व भारती विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति के लिए मानव संसाधन मंत्रालय के एक पैनल से तीन नाम मिले थे. विश्वविद्यालय के सूत्रों के मुताबिक़ राष्ट्रपति ने उनमें से एक नाम पर मुहर लगा दी थी लेकिन नियुक्ति के आधिकारिक आदेश जारी ही नहीं किए गए. ये एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जिसके चांसलर ख़ुद प्रधानमंत्री हैं. भाजपा की रैली में मोटरसाइकिलों का संकट जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक़ हरियाणा के जींद में होने वाली भाजपा की युवा हुंकार रैली में एक लाख मोटरसाइकिल सवार युवाओं को इकट्ठा करना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने अमित शाह की जींद रैली के माध्यम से एक लाख मोटरसाइकिलें जुटने और दो लाख युवाओं के जुड़ने का दावा किया है. लेकिन भाजपा नेताओं के लिए घोषित लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल होता जा रहा है. 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(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)\n\nSummary:", "target": "अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग ने कहा है कि उसने हालिया राष्ट्रपति चुनावों के पहले चरण में धांधली करने वाले अपने पांच हज़ार से ज़्यादा कर्मचारियों को बर्ख़ास्त कर दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअगले महीने होगा दूसरे चरण का चुनाव बर्ख़ास्त किए गए ज़्यादातर कर्मचारी अप्रैल में हुए मतदान के दौरान मतदान केंद्रों के प्रभारी थे. अफ़ग़ानिस्तान के 'स्वतंत्र चुनाव आयोग' के प्रमुख यूसुफ़ नूरीस्तानी ने कहा है कि जिन लोगों को बर्ख़ास्त किया गया है वो चुनाव के दूसरे चरण में ड्यूटी पर नहीं रहेंगे. राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण का चुनाव 14 जून होगा जिसमें पहले दौर में सबसे ज़्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार अब्दुल्ला अब्दुल्ला और अशरफ गनी के बीच मुकाबला होगा. दोनों ही उम्मीदवारों ने चुनाव के पहले चरण में धांधली होने का आरोप लगाया था. पुलिस अफसरों पर भी सवाल लाखों अफगानों ने तालिबान की धमकियों की परवाह किए बिना चुनावों में हिस्सा लिया था, इसलिए इस बार मतदान प्रतिशत 2009 के चुनाव से दोगुना रहा. पहले चरण के चुनावों में अफ़ग़ानिस्तान के स्वतंत्र चुनाव आयोग के पास लगभग 11 हज़ार कर्मचारी थे. नूरीस्तानी ने बताया कि उन्होंने गृह मंत्रालय से कई पुलिस अधिकारियों को हटाने की भी मांग की है जो चुनावी धांधलियों में शामिल थे. बीबीसी संवाददाता बिलाल सरवरी का कहना है कि दूसरे चरण के चुनाव के लिए मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाई गई है. दूसरे चरण में जीतने वाला उम्मीदवार राष्ट्रपति हामिद करज़ई की जगह लेगा. 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(फाइल फोटो) मैं नहीं मानती कि दिल्ली रेप कैपिटल है. ये रेप तो वर्षों से चला आ रहा है. ये मानसिकता में समाया हुआ है. गुजरात में मुसलमानों के साथ हुआ, कश्मीर में सुरक्षा बल करते हैं बलात्कार, मणिपुर में भी ऐसा होता है लेकिन तब तो कोई आवाज़ नहीं उठाता है. खैरलांजी में दलित महिला और उसकी बेटी का रेप कर के उन्हें जला दिया गया था. तब तो ऐसी आवाज़ नहीं उठी थी. एक सामंती मानसिकता है लोगों की जो तभी आवाज़ उठाती है जब बड़ी जाति के, प्रभुत्व वाले लोगों के साथ दिल्ली में कुछ होता है. आवाज़ उठनी चाहिए. जो हुआ है दिल्ली में उसके लिए हल्ला तो मचना चाहिए लेकिन ये हल्ला सिर्फ मिडिल क्लास लोगों को बचाने के लिए नहीं होना चाहिए. छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिला सोनी सोरी के साथ भी कुछ हुआ था आपको याद होगा तो. उनके जननांगो में पत्थर डाले गए थे.पुलिस ने ऐसा किया लेकिन तब तो किसी ने आवाज़ नहीं उठाई थी. उस पुलिस अधिकारी को तो साहस का अवार्ड मिला. कश्मीर में जब सुरक्षा बल गरीब कश्मीरियों का रेप करते हैं तब सुरक्षा बलों के खिलाफ़ कोई फांसी की मांग नहीं करता. जब कोई ऊंची जाति का आदमी दलित का रेप करता है तब तो कोई ऐसी मांग नहीं करता. इस बार जब सौ सौ लोग इकट्ठा हुए थे दिल्ली में जब लड़की को नंगा फेका गया था बस से बाहर तो लोग खड़े थे. किसी ने अपना कपड़ा दिया उसको. सब लोग खड़े रहे. दिल्ली में अमीर-गरीब के बीच भेद तो पहले भी था. अब भी है लेकिन अब वो भी निशाना बन रहे हैं. रेप मुद्दा नहीं है. जब देश का विभाजन हुआ था तब कितने रेप हुए थे अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते हम. एक सामंती मानसिकता है हम लोगों के अंदर. बलात्कार एक भयंकर अपराध है लेकिन लोग क्या करते हैं. जिस लड़की का रेप होता है उसे कोई स्वीकार क्यों नहीं करता. कैसे समाज में रहते हैं हम. कई मामलों में जिसका बलात्कार होता है उसी को परिवार के लोग घर से निकाल देते हैं. मेरे पास कोई जवाब नहीं है कि ये सब कैसे ठीक होगा लेकिन मानसिकता की एक बड़ी समस्या है. समाज में बहुत अधिक हिंसा है. विरोध होना चाहिए लेकिन चुन चुन के विरोध नहीं होना चाहिए. हर औरत के रेप का विरोध होना चाहिए. ये दोहरी मानसिकता है कि आप दिल्ली के रेप के लिए आवाज़ उठाएंगे लेकिन मणिपुर की औरतों के लिए, कश्मीर की औरतों के लिए और खैरलांजी की दलितों के लिए आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते हैं. रेप का विरोध कीजिए इस आधार पर नहीं कि वो दिल्ली में हुआ है या मणिपुर में या किसी और जगह. मैं बस यही कह सकती हूं.\n\nSummary:", "target": "जानी मानी लेखिका और सामाजिक मुद्दों पर अपनी अलग राय रखने वाली अरुंधति राय ने बीबीसी स्टूडियो में बलात्कार के मुद्दे पर अपने विचार रखे. पढ़िए वो क्या कहती है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nअरुंधति राय अपने अलग तरह के विचारों के लिए जानी जाती हैं. 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असहमति जताते हुए कहा कि इससे सिर्फ़ हिज़्बुल्ला को संगठित होने का मौका मिलेगा ताकि वे फिर इसराइल पर हमला कर सकें. हिज़्बुल्ला का दावा दूसरी ओर हिज़्बुल्ला नेता हसन नसरुल्ला ने इसराइल के ख़िलाफ़ 'ऐतिहासिक और सामरिक जीत' का दावा किया है. इधर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा है कि 'इसराइल और हिज़्बुल्ला के बीच संघर्ष स्वतंत्रता और आतंकवाद के बीच विश्वव्यापी जंग का हिस्सा है.' दूसरी ओर ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने इसराइल को हथियार देने के लिए अमरीका की आलोचना की है. उनका आरोप था कि अमरीकी हथियारों से इसराइल ने लेबनान में महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया. ग़ौरतलब है कि क़रीब पाँच सप्ताह की लड़ाई के बाद इसराइल और हिज़्बुल्ला के बीच सोमवार से ही युद्धविराम लागू हुआ है. हिज़्बुल्ला नेता हसन नसरुल्ला ने टेलीविज़न पर अपने संदेश में कहा कि यह हिज़्बुल्ला के लिए महान दिन हैं. उन्होंने कहा कि हिज़्बुल्ला के निशस्त्रीकरण पर बहस के लिए यह ग़लत समय है. नसरुल्ला ने कहा कि हिज़्बुल्ला इसराइली हमले में तबाह हुए इलाक़ों में पुनर्निर्माण कार्यों में मदद करेगा. घर वापसी इस बीच युद्धविराम लागू होने के बाद लेबनान के हज़ारों विस्थापित लोग एक बार फिर अपने घरों को लौटने की कोशिश कर रहे हैं. राजधानी बेरूत और साइडन की ओर जाने वाली सड़कें पूरी तरह जाम हैं. क्योंकि युद्धविराम के बाद बड़ी संख्या में लोग अपनी संपत्ति और घरों का हाल देखने जाना चाहते हैं. दक्षिणी लेबनान के बिंट जबेल गाँव में पहुँच एक बीबीसी संवाददाता ने वहाँ सिर्फ़ तबाही देखी. सीरिया जाकर पनाह लेने वाले लोग भी लेबनान की ओर लौटने लगे हैं. इस बीच संयुक्त राष्ट्र अधिकारी ने कहा है कि लेबनान में युद्धविराम पूरी तरह लागू है. उन्होंने कहा कि अब मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए इसराइल की अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं. लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के संयोजक डेविड शियरर ने कहा कि अब लेबनान में कोई ऐसा इलाक़ा नहीं, जहाँ जाने की रोक-टोक हो. हालाँकि उन्होंने माना कि राहत एजेंसियों की ये शिकायत है कि दक्षिणी लेबनान में यातायात पर इसराइली पाबंदी के कारण राहत कार्यों में मुश्किल पेश आ रही है. संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने टायर में सहायता सामग्री भेजी है. राहत एजेंसी रेड क्रॉस टायर में सहायता सामग्री का बँटवारा कर रही है.\n\nSummary:", "target": "इसराइली प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट ने कहा है कि हिज़्बुल्ला के साथ हुए युद्ध ने क्षेत्र का सामरिक संतुलन बदल दिया है. दूसरी ओर हिज़्बुल्ला भी जीत के दावे कर रहा है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nसंसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि युद्धविराम के बावजूद इसराइली सेना अगवा किए गए अपने दो जवानों की रिहाई के लिए हर ज़रुरी क़दम उठाएगा. हिज़्बुल्ला ने इन सैनिकों को क़ब्ज़े में ले लिया था जिसके बाद इसराइल ने हिज़्बुल्ला के ख़िलाफ सैनिक कार्रवाई शुरु कर दी थी. ओल्मर्ट ने कहा कि इस लड़ाई से हिज़्बुल्ला को भारी नुकसान हुआ है और दक्षिणी लेबनान में हिज़्बुल्ला की समानांतर सत्ता ख़त्म हो गई है. इसराइली संसद में विपक्ष के नेता बेंजामिन नेतन्याहू ने युद्धविराम से असहमति जताते हुए कहा कि इससे सिर्फ़ हिज़्बुल्ला को संगठित होने का मौका मिलेगा ताकि वे फिर इसराइल पर हमला कर सकें. हिज़्बुल्ला का दावा दूसरी ओर हिज़्बुल्ला नेता हसन नसरुल्ला ने इसराइल के ख़िलाफ़ 'ऐतिहासिक और सामरिक जीत' का दावा किया है. इधर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा है कि 'इसराइल और 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महीने की शुरुआत में मनमोहन सिंह से टेलीफ़ोन पर बातचीत की थी. इस बीच विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि अमरीका के राजनीतिक मामलों के उप मंत्री निकोलस ब‌र्न्स के भारत आने के बारे में अभी कोई तारीख़ तय नहीं है. ब‌र्न्स विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के साथ समझौते से जुड़े कुछ मसले पर बातचीत के लिए यहाँ आने वाले हैं. इस महीने की शुरुआत में वाशिंगटन में मेनन और ब‌र्न्स के बीच बातचीत हुई थी. बैठक में दोनों ने मई के अंत में मिलने पर रज़ामंदी जताई थी.\n\nSummary:", "target": "प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उम्मीद जताई है कि असैनिक परमाणु समझौते को लेकर अमरीका के साथ इस महीने के अंत में होने वाली अंतिम दौर की बातचीत से सार्थक नतीजे निकलेंगे.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nकुछ मसलों पर दोनों देशों के कठोर रुख के कारण समझौते को लेकर आशंका बनी हुई है. दोनों पक्षों के बीच प्रस्तावित बातचीत को लेकर मतभेद के संबंध में पूछे गए सवाल पर मनमोहन सिंह ने कहा, ''हम गंभीरता से बातचीत कर रहे हैं. बातचीत जारी है और मुझे काफ़ी उम्मीदें हैं.'' जून के पहले हफ़्ते में जर्मनी में औद्योगिक 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Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान में अधिकतर अंग्रेजी अखबारों ने इस सजा पर सवाल उठाए हैं जबकि उर्दू समाचार पत्रों ने डॉक्टर की जमकर आलोचना की. पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मारने में सीआईए की मदद करने वाले डॉक्टर शकील आफरीदी को कैद की सजा सुनाई गई है. इससे यह बहस छिड़ गई है कि क्या वो 'देशद्रोह' का काम था या फिर 'वे आंतकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए प्रतिबद्ध' थे. इस सजा के बाद अमरीकी सीनेट की एक अहम समिति ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि में तीन करोड़ तीस लाख डॉलर की कटौती कर दी है. अमरीकी विदेश मंत्री हिलरी क्लिंटन ने भी डॉ शकील को 33 साल की कैद की सज़ा की निंदा की थी. जबकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोआजम खान ने कहा कि अमरीका को पाकिस्तान के न्यायिक प्रणाली का सम्मान करना चाहिए. पाकिस्तान में अधिकतर अंग्रेजी अखबारों ने इस सजा पर सवाल उठाए हैं जबकि उर्दू समाचार पत्रों ने डॉक्टर की जमकर आलोचना की. 'ईनाम के बजाए सजा' डेली टाइम्स ने एक संपादकीय में कहा, ''सबसे वांछित आंतकवादी को दुनिया से छुटकारा दिलाने में मदद करने के लिए ईनाम देने के बजाए आफरीदी को 33 साल की सजा सुनाई गई है...आंतकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदार होने के नाते लादेन को ढूंढना पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जिम्मेदारी थी...'' उसने आगे लिखा, ''यह न केवल डरावना है बल्कि अनुचित भी है...आफरीदी ने दोनो देशों के हित का काम किया है. न्याय तभी मिलेगा अगर आफरीदी को रिहा किया जाता है.'' कराची के अख्बार डॉन ने लिखा है, ''अभियुक्त को वकील से वंचित रखा गया जबकि कुछ बजुर्ग लोगों ने उनकी किस्मत का फैसला कर दिया. उनकी सुनवाई स्थाई कोर्ट में क्यों नहीं की गई? या फिर उससे कुछ कड़वे सच सामने आते?'' फैसले की तारीफ पाकिस्तान ऑबजर्वर ने इस फैसले की तारीफ करते हुए कहा है, ''अदालत के इस अच्छे फैसले के मुताबिक डॉक्टर शकील एक विदेशी जासूसी एजेंसी के लिए काम करते थे जो पाकिस्तान के कानून के अनुसार देशद्रोह है...'' उसने आगे लिखा, ''इसलिए हमारे ख्याल से समय आ गया है कि हमारे प्रिय मित्र कुछ भी कहें, सरकार और देश को अपने सुरक्षा की चिंता का ध्यान रखना होगा और उन सब लोगों को सजा देनी होगी जो जन्मभूमि के हितों को नजरअंदाज कर अपना जमीर बेचते हैं.'' उर्दू मीडिया की बात करें तो कराची के अख्बार उनमत ने लिखा है, ''हिलेरी क्लिंटन ने डॉक्टर शकील आफरीदी की तुरंत रिहाई की मांग की है. अमरीका सोचता है कि पाकिस्तान की बेटी डॉक्टर अफिया सिद्दीक को उस अपराध के लिए सजा देना जो हुआ ही नहीं था जायज है लेकिन डॉक्टर आफरीदी को अपने देश के खिलाफ देशद्रोह करने के लिए 33 साल की सजा उसे पसंद नहीं. हमारा मानना है कि हमें ऐसे देश से दूर रहना चाहिए.'' रावलपिंडी के समाचार पत्र नवा-इ-वक्त ने लिखा है, ''अमरीका ने कहा है कि डॉक्टर आफरीदी की गतिविधियों को देशद्रोह समझना गंभीर गलती है...हम मानते हैं कि अमरीका को कोई हक नहीं है कि वो पाकिस्तान के फैसले को गंभीर गलती करार दे...अमरीका को पाकिस्तान के कानूनों का अपमान करने से दूर रहना चाहिए.''\n\nSummary:", "target": "पाकिस्तानी डॉक्टर शकील आफरीदी को सजा देने पर पाकिस्तान के मीडिया ने अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया की है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\nपाकिस्तान में अधिकतर अंग्रेजी अखबारों ने इस सजा पर सवाल उठाए हैं जबकि उर्दू समाचार पत्रों ने डॉक्टर की जमकर आलोचना की. पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मारने में सीआईए की मदद करने वाले डॉक्टर शकील आफरीदी को कैद की सजा सुनाई गई है. इससे यह बहस छिड़ गई है कि क्या वो 'देशद्रोह' का काम था या फिर 'वे आंतकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए प्रतिबद्ध' थे. इस सजा के बाद अमरीकी सीनेट की एक अहम समिति ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि में तीन करोड़ तीस लाख डॉलर की कटौती कर दी है. अमरीकी विदेश मंत्री हिलरी क्लिंटन ने भी डॉ शकील को 33 साल की कैद की सज़ा की निंदा की थी. जबकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोआजम खान ने कहा कि अमरीका को पाकिस्तान के न्यायिक प्रणाली का सम्मान करना चाहिए. पाकिस्तान में अधिकतर अंग्रेजी अखबारों ने इस सजा पर सवाल उठाए हैं जबकि उर्दू समाचार पत्रों ने डॉक्टर की जमकर आलोचना की. 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तत्कालीन निदेशक (प्राथमिक शिक्षा) संजीव कुमार को इस बारे में लिखित आदेश दिया. संजीव कुमार भी इस मामले में अभियुक्त बनाए गए हैं. इस घोटाले के वक्त हरियाणा के शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी चौटाला के पास थी. उन्होंने कुमार से कहा कि वो इंटरव्यू की फर्जी सूची तैयार करें. आरोप है कि जिन लोगों ने रिश्वत दी उन्हें इंटरव्यू में 20 में से 17 से 19 के बीच अंक दिए गए, जबकि आठ हजार लोगों में से योग्यता के आधार पर चुने गए लोगों को 3 से 5 अंक दिए गए. ये घोटाला उस समय सामने आया जब कुमार एक याचिका के साथ अदालत पहुंचे और उन्होंने इंटरव्यू की मूल सूची दिखाई. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार एक अधिकारी ने बताया, “संजीव कुमार पर मुख्यमंत्री की ओर से फर्जी सूची बनाने का दबाव था. उन्हें आशंका थी कि रिश्वत से मिलने वाली राशि का बराबर बंटवारा नहीं होगा, इसलिए वो अदालत गए.” संजीव कुमार के अलावा उन लोगों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया जिन्हें भर्ती में चुना नहीं गया.\n\nSummary:", "target": "दिल्ली की एक अदालत ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे समेत 53 लोगों को तीन हजार अध्यापकों को गैर कानूनी रूप से भर्ती करने का दोषी करार दिया है.", "probe_text": "Summarize the following text in Hindi.\n\nText:\n'घोटाले' के समय शिक्षा मंत्रालय भी चौटाला के पास था मीडिया खबरों के अनुसार अदालत के फैसले के बाद चौटाला को पुलिस हिरासत में ले लिया गया है. इस मामले में अदालत 22 जनवरी को सजा सुनाएगी. हरियाणा के इस तथाकथित जेबीटी घोटाले में शुक्रवार को सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की जिसमें 62 लोगों को अभियुक्त बनाया गया. विशेष सीबीआई जज विनोद कुमार ने चौटाला, उनके बेटे और अन्य लोगों को भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत दोषी करार दिया है. क्या था मामला आरोप है कि 1999-2000 के दौरान हरियाणा में 3,032 लोगों को अध्यापक के तौर पर भर्ती किया गया था. आरोप था कि इसमें से हर एक से तीन से चार लाख रुपये की रिश्वत ली गई. सीबीआई की चार्जशीट में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और और उनके बेटे अजय चौटाला का नाम भी शामिल है. सीबीआई के अधिकारियों का कहना है कि खुद चौटाला ने तत्कालीन निदेशक (प्राथमिक शिक्षा) संजीव कुमार को इस बारे में लिखित आदेश दिया. संजीव कुमार भी इस मामले में अभियुक्त बनाए गए हैं. इस घोटाले के वक्त हरियाणा के शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी चौटाला के पास थी. उन्होंने कुमार से कहा कि वो इंटरव्यू की फर्जी सूची तैयार करें. आरोप है कि जिन लोगों ने रिश्वत दी उन्हें इंटरव्यू में 20 में से 17 से 19 के बीच अंक दिए गए, जबकि आठ हजार लोगों में से योग्यता के आधार पर चुने गए लोगों को 3 से 5 अंक दिए गए. ये घोटाला उस समय सामने आया जब कुमार एक याचिका के साथ अदालत पहुंचे और उन्होंने इंटरव्यू की मूल सूची दिखाई. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार एक अधिकारी ने बताया, “संजीव कुमार पर मुख्यमंत्री की ओर से फर्जी सूची बनाने का दबाव था. उन्हें आशंका थी कि रिश्वत से मिलने वाली राशि का बराबर बंटवारा नहीं होगा, इसलिए वो अदालत गए.” संजीव कुमार के अलावा उन लोगों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया जिन्हें भर्ती में चुना नहीं गया.\n\nSummary:", "lang": "hin_Deva", "language": "Hindi", "task": "summarization", "source_dataset": "xlsum_tar::csebuetnlp/xlsum", "source_id": "manifest_hin_Deva", "source_split": "manifest_eval", "source_row": 999, "source_item_id": "999", 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