diff --git "a/indic_deva_eval.viewer.ocr.jsonl" "b/indic_deva_eval.viewer.ocr.jsonl" new file mode 100644--- /dev/null +++ "b/indic_deva_eval.viewer.ocr.jsonl" @@ -0,0 +1,1068 @@ +{"id": "indic_deva_eval_000000_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000000_hindi_handwritten_word_ocr_b025c2532db4.jpg", "ocr": "पोट"} +{"id": "indic_deva_eval_000001_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000001_hindi_handwritten_word_ocr_7d6658fa07fd.jpg", "ocr": "प्रबुद्घ"} +{"id": "indic_deva_eval_000002_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000002_devanagari_digits_mixed_84f7aac9865e.jpg", "ocr": "४0८6८0"} +{"id": "indic_deva_eval_000003_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000003_devanagari_page_ocr_8c95e5006275.jpg", "ocr": "महावंसो\n\n2्छा\n\n“एवं भन्‍्ते”ति वत्वा सो, सामणेरो महिद्धिको।\nतह्जञणंयेव आगम्म, धम्मासोकस्स सन्तिकं॥46॥\nसालमूलम्हि ठपितं, महाबोधिं तहिं सुभं।\nकत्तिकल्छणपूजाहि, पूजियन्तं तड्च अदहस॥47॥\nथ्रेरस्स वचन सुत्वा, राजतो लद्धधातुयो।\nपत्तपूरं गहेत्वान, हिमवन्तमुपागमि॥48॥\nहिमवन्ते ठपेत्वान, सधातु पत्तमुत्तमं।\nदेविन्दसन्तिकं गन्त्वा, थेरस्स वचन भणि॥49॥\nचूव्ठामणि चेतियम्हा, गहेत्वा दक्खिणक्खकं।\nसामणेरस्स पादासि, सक्‍को देवानमिस्सरो॥20॥\nसंस्कृतल्छाया- एवं भदन्‍्त” इति उक्त्वा स:, श्रामणेरो महादिक:।।\nतत्क्षणमेव आगत्य, धर्माशोकस्य अन्तिकम्‌।।6।।\nशालमूले स्थापितं, महाबोधिं तत्र शुभम्‌।\nकार्तिकक्षणपूजाभि, पूजयन्तं तञ्च अपश्यत्‌।।7॥।\nस्थविरस्य वचन सुत्वा, राजतः लब्धधातव:।\nपात्रपूरं गृहीत्वा, हिमवन्‍्तमुपागमत्‌।48॥॥\nहिमवन्ते स्थापयित्वा, सधातुं पात्रमुत्तमम्‌।\nदेवेन्द्रान्तिकं गत्वा, स्थविरस्य वचनमभणत्‌।49॥॥\nचूडामणि चैत्यात्‌, गृहीत्वा दक्षिणाक्षकम्‌।\nश्रामणेरस्य प्रादात्‌, शाक्‍्य: देवानामी ख्वर:॥20॥।\nहिन्दी-“जैसा आदेश है, भन्‍्ते! वही करूँगा”- कहकर वह ऋद्धिवलसम्पन्न श्रामणेर उसी समय सम्राट्‌ धर्माशोक के\nपास पहुँचा।।6॥।\nवहाँ उसने सम्राट्‌ को शालवृक्ष के मूल में पवित्र महाबोधि को रखकर कार्तिक-महोत्सव की पूजा करते हुए\nदेखा।।47]॥\nस्थबिर की बात कहने के बाद राजा से धातुएँ प्राप्त कर उन्हें पात्र में रखकर सुमन ने हिमालय की तरफ प्रस्थान\nकिया।।8॥॥\nहिमालय में उस पात्र एवं धातुओं को रखकर सुमन श्रामणेर देवेन्द्र शक्र के पास देवलोक में पहुँचे और उनसे\nस्थविर का सन्देश कहा।49॥।\nतब देबेन्द्र शक्र ने चूड़ामणि चैत्य से दक्षिण ग्रीवा की अस्थि निकाल कर श्रामणेर सुमन को प्रदान की।।20।।\n\n\"'०७-छछआ ऑ ऋण: जज 5 5 ७2.3 3."} +{"id": "indic_deva_eval_000004_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000004_indic_mozhi_deva_word_ocr_c11c9d84b8c3.jpg", "ocr": "राही"} +{"id": "indic_deva_eval_000005_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000005_hindi_handwritten_word_ocr_5a42483dfa86.jpg", "ocr": "टीचर"} +{"id": "indic_deva_eval_000006_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000006_indic_mozhi_deva_word_ocr_1413605ea368.jpg", "ocr": "यांच्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000007_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000007_devanagari_digits_mixed_3bb399393b13.jpg", "ocr": "४1२७7९9८४0३३3०"} +{"id": "indic_deva_eval_000008_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000008_hindi_handwritten_word_ocr_53d06536b223.jpg", "ocr": "सौंपी"} +{"id": "indic_deva_eval_000009_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000009_indic_mozhi_deva_word_ocr_87b652e277c6.jpg", "ocr": "हज़ार"} +{"id": "indic_deva_eval_000010_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000010_devanagari_page_ocr_16ffe5781065.jpg", "ocr": "अभिधम्मपिटके\n\n४७. दुक्खसच्ञं च समुदयसच्ञं च निरोधसचज्जञं च असड्जखतं खन्‍्धतो ठपेत्वा पड्चहि खन्‍्धेहि\nद्वादसहायतनेहि अद्लारसहि धातूहि सड्गहिता। कतिट्ि असड्गहिता? न केहिचि खनन्‍्धेहि न केहिचि\nआयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्गहिता। (तिकसूलकं।)\n\n४८. दुक्‍्खसचन्ञ च समुदयसज्ञज च मग्गसच्च च निरोधसज्ञ॑ च असड्खतं खन्‍धतो ठपेत्वा पठ्चहि\nखन्‍्धेहि द्वादसहायतनेहि अट्लारसहि धातूहि सडगहिता। कतिहि असड्नगछ्ठिता? न केहिचि खन्‍्धेहि न\nकेहिचि आयतनेहि न काहिचि धातूहि असडगहिता।\n\n४९. चत्तारि सच्चानि कतिहि खन्‍्धेहि कतिहायतनेहि कतिहि धातूहि सड्गहितानि? चत्तारि\nसच्चानि असड्खत॑ खन्‍्धतो ठपेत्वा पञ्चहि खनन्‍्धेहि द्वादसहायतनेहि अट्ठारसहि धातूहि\nसड्गहितानि। कतिहि असडूगहितानि? न केहिचि खन्‍्धेहि न केहिचि आयतनेह्ि न काहिचि धातूहि\nअसड्-गहितानि। (चतुक्‍कं।) (सं.)- कतिभि:\nअसइ्ग्रहीतानि? न केश्वित्‌ स्कन्वैः न कैश्चित्‌ आयतनै: न कैश्वित्‌ च धातुभि: असड्‌ग्रहीतानि।\n\n४७. दुःखसत्यडच समुदयसत्यञ्च निरोधसत्यडच असंस्कृत॑ स्कन्धतः हित्वा पड्चमिः स्कन्धैः\nद्वादशायतनै: अष्टादशभि: धातुभि: सड्ग्रहीतानि। कतिभि: असडुगग्रहीतानि? न कैश्वित्‌ स्कन्थै: न कैश्वित्‌\nआयतनै: न कैश्वित्‌ च धातुभि: असडग्ग्रहीतानि।\n\n४८. दुःखसत्यड्च समुदयसत्यड्च मार्गसत्यडच निरोधसत्यड्च असंस्कृत॑ स्कन्धतः हित्वा पड्चमिः\nस्कन्‍्चै: द्वादशायतनै: अष्टादशभि: धातुभि: सड्ग्रहीतानि। कतिभि: असड्यग्रहीतानि? न कैश्वित्‌ स्कन्‍्धै: न\nकैश्वित्‌ आयतनै: न कैश्वित्‌ च धातुभि: असड्ग्रहीतानि।\n\n४९. चत्वारि सत्यानि कतिभि: स्कन्‍्थै: कतिभि आयतनै: कतिशभि: धातुभि: सड्ग्ग्रहीतानि? चत्बारि\nसत्यानि असंस्कृतं स्कन्‍्धत: हित्वा पड्चभि: स्कन्‍्धै: द्वादशायतनै: अष्टादशभि: धातुभि: सडूगग्रहीतानि।\nकतिभि: असड्ग्रहीतानि? न कैश्वित्‌ स्कन्‍्धै: न कैश्वित्‌ आयतनैः न कैश्वित्‌ च धातुभि: असड्ग्रहीतानि।\nतहेन्की)- कितनों में असंग्रहौत हैं? न किन्हीं स्कन्धों, न किन्हीं आयतनों तथा न किल्हीं धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n४७. दुःखसत्य, समुदयसत्य और निरोधसत्य असंस्कृत निर्वाण को स्कन्ध के रूप में छोड़कर पाँच स्कन्धों,\nबारह आयतनों तथा अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? न किन्हीं स्कन्‍्धों, न किन्हीं आयतनों\nतथा न किन्‍्हीं धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n४८. दुःखसत्य, समुदयसत्य, मार्गसत्य और निरोधसत्य असंस्कृत निर्वाण को स्कन्‍्ध के रूप में छोड़कर पाँच\nस्कन्धों, बारह आयतनों तथा अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? न किसी स्कन्ध\nआयतनों में, न किन्‍्ही धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n४९. चारसत्य कितने स्कन्‍्धों, कितने आयतनों और कितने धातुओं में संग्रहीत है? चारसत्य असंस्कुत निर्वाण को\nस्कन्ध के रूप में छोड़कर पाँच स्कन्धों, बारह आयतनों में तथा अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं?\nन किन्हीं स्कन्‍्धों, न किन्हीं आयतनों तथा न किन्हीं धातुओं में असंग्रहीत हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000011_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000011_hindi_handwritten_word_ocr_9943b1e11afd.jpg", "ocr": "बीओटी"} +{"id": "indic_deva_eval_000012_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000012_devanagari_page_ocr_af40fa1a794b.jpg", "ocr": "4. इन्द्रियसंयुत्त 339\n\nभिक्खवे, समये उण्णाभो ब्राह्मणो कालड्करेय्य, नत्थि संयोजन येन संयोजनेन संयुत्तो\n'उण्णाभो ब्राह्मणों पुन इमं लोक॑ आगच्छेय्या''ति। दुतियं।\n४३. साकेतसुत्तं\n\n४३. एवं में सुतं - एकं समय॑ं भगवा साकेते विहरति अड्जनवने मिगदाये। तत्न खो\nभगवा भिक्खू आमन्‍्तेसि -- “अत्थि नु खो, भिक्खवे, परियायो यं परियायं आगम्म यानि\nपडिचन्द्रियानि तानि पद्च बलानि होन्ति, यानि पड्च बलानि तानि पडिनन्द्रियानि\nहोन्‍ती''ति?\n\n“*भगवंसूलका नो, भन्‍्ते, धम्मा भगवंनेक्तिका भगवंपटिसरणा। साधु वत, भन्ते,\nभगवन्तंयेव पटिभातु एतस्स भासितस्स अत्थो। भगवतों सुत्वा भिक्खू धारेस्सन्ती''ति।\n“अत्थि, भिक्खवे, परियायो य॑ परियायं आगम्म यानि पडिचिन्द्रियानि तानि पडच बलानि\nहोन्ति, यानि पडच बलानि तानि पडिचन्द्रियानि होन्ति''।\n\n(संस्कृतच्छाया) भिक्षव:, समये ऊर्णाभ: ब्राह्मण: काल॑ कुर्यात्‌, नास्ति संयोजन येन संयोजनेन संयुक्त:\nउण्णाभ: ब्राह्मण: पुनः इमं लोकम्‌ आगच्छेत्‌”इति। द्वि��ीयम्‌।\n\n४३. एवं मया श्रुतम। एकस्मिन्‌ समये भगवान्‌ साकेते विहरति अज्जनवने मृगदाये। तत्र खलु\nभगवान्‌ भिक्षून्‌ आमन्त्रयत- “अस्ति नु खलु, भिक्षव:! पर्याय: य॑ पर्यायम्‌ आगत्य यानि पड्चेन्द्रियाणि\nतानि पडच बलानि भवन्ति! यानि पडच बलानि तानि पड्चेन्द्रियाणि भवन्ति”इति?\n\n“भगवन्मूलका: नो, भदन्‍्त! धर्मा भगवननेत्रुका: भगवनूप्रतिशरणा:। साधु वत, भदन्‍्त!\nभगवन्तं येन प्रतिभातु एतस्य भाषितस्य अर्थ:। भगवत: श्रुत्वा भिक्षव: धारयिस्यन्ति”इति। “अस्ति,\nभिक्षव:! पर्याय: य॑ पर्यायम्‌ आगत्य यानि पड्चेन्द्रियाणि तानि पड्च बलानि भवन्ति, यानि पड्त्च\nबलानि तानि पड्चेन्द्रियाणि भबन्ति\"”।\nहिन्दी) झिक्षुओं! यदि इस समय उण्णाभ ब्राह्मण मर जाय तो उसे ऐसा कोई संयोजन नहीं लगा है जिससे वह इस\nमें फिर भी आये।\n\n४३. ऐसा मैंने सुना है। एक समय, भगवान्‌ साकेत में अंजनवन मृगदाय में विहार करते थे। वहाँ भगवान्‌ ने\nभिक्षुओं को आमन्त्रित किया, “भिक्षुओं ! क्या कोई दृष्टिकोण है जिससे पाँच इन्द्रियाँ पाँच बल हो जाते हैं, और\nपाँच बल पाँच इन्द्रियाँ हो जाते हैं ?” भन्‍्ते! धर्म के मूल भगवान्‌ ही।\n\nअन्ते! ...पूर्ववत्‌. कोण है जिससे पाँच इन्द्रियाँ पाँच बल हो जाते हैं, और पाँच बल\nपाँच इन्द्रियाँ हो जाते हैं।””"} +{"id": "indic_deva_eval_000013_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000013_hindi_handwritten_word_ocr_c2f9d20bfc3e.jpg", "ocr": "बरत"} +{"id": "indic_deva_eval_000014_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000014_indic_mozhi_deva_word_ocr_30c67716b663.jpg", "ocr": "मेरी"} +{"id": "indic_deva_eval_000015_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000015_indic_mozhi_deva_word_ocr_073b6afae1fa.jpg", "ocr": "गर्दी"} +{"id": "indic_deva_eval_000016_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000016_devanagari_page_ocr_b7354eba284e.jpg", "ocr": "अग्गवंसकतं ऋकमजिप्पकरो\nसहनीतिप्पकरणं\n\n'पदमाला धातुमाला तर\n\nसंरक्षक:\nप्रो. परमेश्वरतारायणशास्त्री , कुलपति:\n\n'पालि-अध्ययन-केन्द्रम्‌\n\nरष्ट्रिवसंस्कृतसंस्थानम्‌ (मानित-विश्वविद्यालय:)\n2४))९ द्वारा 'ए' श्रेण्यां प्रत्यायित\n(कन्द्रीय-मानव-संसाधन-विकास-मन्त्रालयाधीनम्‌)\n\nलखनऊ-परिसर: . विशालखण्ड:-4 गोमतीनगरम्‌, लखनऊ (ऊ.प्र.)"} +{"id": "indic_deva_eval_000017_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000017_devanagari_page_ocr_7b440c2a6ef4.jpg", "ocr": "धातुगब्भरूपवण्णनाकथा\nअढ धातुगब्भरूपवण्णनाकथा\n\nको दिये थे!। वह उत्तर दिया “यह सत्य है देव! (राजा), और कहा, एक आर्य द्वारा दिया हुआ ईट और एक मेरे\nईट सदृश को मेरे द्वारा निर्माण में इस्तेमाल किया गया।” फिर राजा ने पूछा क्‍या तुम उस ईट को पहचान सकते\nहो, उसने कहा उन स्वजन (भन्‍्ते) द्वारा कौन सी ईट सहायता के लिये दिया गया, मैं नहीं जानता। राजा ने कहा\nअगर ऐसा है तो, उसे देखने के लिए एक सैनिक को रखा। वह भी पहले जैसा एक सैनिक को देखा। सैनिक परिवेण\nको जाकर, नजदीक बैठ मैञ्रीपूर्ण स्वागत कर पूछा- “भन्‍्ते! “आप किस प्रान्त के निवासी हैं?', “मैं कोट्टिपाल जिले के\nपियडगल मठ का निवासी एवं गृहस्थ शिष्य हूँ। “आप इधर रहेंगे या बापय जायेंगे।” उन्होंने कहा “मैं यहाँ नहीं\nरहूँगा लेकिन इस तरह अमुक दिवस में जाएंगे। सैनिक ने कहा “मैं भी आपके साथ चलूँगा। मेरा भी गाँव आपके ही\nजनपद में है, अमुक नाम का गाँव है'। स्थविर बहुत अच्छी तरह से सहमत हुये। सैनिक इस घटना की सूचना राजा\nको दिये।\n\n0 फागध धतताढ, पोलाल पाकर 20 हातला; एल्आतलतस ता फल 092१8 ततआत३5७2०/३० एड वतन वाडछाल७,\nजशा9 ५/ब७ 3 डा) 0 छी8 एाजणल-0आतिछ- सिर गाए घोटाल बत0 बिल ०0 ४टाआत8 लए पी पानकाहा।\nए.आावढ6 गाव वीक 000 पा जरर ० फल 82७ १5 72805 208, (॥/८४0९५५ १00 ५/व७, ४४००६ ७३८६ ब००\nहक ३ छ2॥ व्वाडाजी/।छाहडतातह धार लग ध्लाक 005 तजता फजग१5 9७/०६६ छाज2०8 ६ ॥ञत& (08 ज25बल व ग-\nपा 900/. 7९६७ा०७० 0७7७ ब0०, ८माओजाह ॥0 जाल ॥ 3 92८ 9ल2तझञएह (० पीर (गढ़ जत4 4002७)॥0 008 ०,\nकर #०0224 0७7 थी (0825 0706 (०8०७7 जे कीड 0000- ग06 ताडडाछ-0ज00 १००७०७९०१॥६ 900 ७७०० 0 तोड़\n<०तब्पजटच00- पीठ होतला, जी लिए४९००६१०१ ब0० #3990825% अत] ध/ीछजात ब09 ९०तएधतछातड़ ६० (0209 ॥0 क)\n४०06 ०० ८ ७69६ 0283; ५४ब5 एडअठ/8 ॥0 ी& ।(३/8७०/७ 2७7 ७७१७. पड उल्यं)0. 0 ॥ड <बा१९ (० ७९\n॥000४०- ॥॥० 08 प७९३घ४०१८० (8 एोकमछ-७७ज9७7, १50404269 ७७९ 00०६ 30 8967 035 हा] 9 ७तट(\nकाल) 09 2 किक 9860 त0क्ठढट ९ 722॥80, 7६ ९, आर; विए्यातड़ | छाल हाएलत 9, 9 ०लाध्जण\nहोव6० ६० 9 आप ६० 00९ ०03 । ७३०० ६॥॥ घी ८०तडछ-घ ०7. रण जीरा ग्व्ट्व ७लाला ९ 0०७4\n7ढ८0ह22 ०९ ७॥20. 00६ 0 ००0अ007३घ४०० 0. ॥िड [द50/90॥02 528 0.७६ ॥6 ६०७/७ 0०६. 76 ।00& 90922 »\n933८० 80 फीश७ 39,308, या 03७६ 98 50, अ00७/ रत) ० किए. 8 ६00, वड एल, 8006० ता ६० फीड\n999८९ 80979, ॥6 99966 ५०7० ४४2०६ ६०. ७४७ 970९७, 300 5९३९० 0७०7 ७ हितेटा एकता सिलतव५\n€कतएछड३000 38020 00, \"डा 378 ५०0 9 जप #लार 07 व 7८अंतेटाएरे\n\n2030 काधला28,॥ जाए व जा...\n\nहाल छाउजा।०ल नर ;00 बव्कंवल्तध- आर\"\n\n29५ कडल008,। 900 3 7९०॥७९०६ ० ७५७ शि;क०8०।३ ता०त3ड0छ०/॥0 छा वाइच्तल ० (ठत्काएडन-\n\nहक १00 ॥06 #९7७ डा, 0 80 ७७०६२\n\n2 एढ॥2व, १४४८ डोज हर 0६ ॥ज ॥०7०, ७७६ ७७॥ तट०ख7६ 00 ड७टक 300 ड्जट॥ 3 939:7 76 9जगटट हृणजाव\n६०० ७9884, ॥ ६००, ७व। ३०००त७००५ 790. ७ जालड० 8 25070 0५8 इलाडिआतल तीड0क्‍26 गा ६ 9०5 5७८0 ७06\n0.0 9 03076.॥8 छोठ27 १820 ४०06, \"७००५ पड 7॥8 99928 80०४४ ०00७०५९० प���ई १९७७७ ९० 00७ हा.\n\nकुंड... 92 व'05559.. 53#55530घागगग॑व्वत. धवता9/0च०वा। __पजीउक्वाआ। ._ ॥व(कब्था0गंगा।\nएएड॥ग03)७9०ा 5७5300502975॥7) उरगंट३ 0900॥॥ डाआ0डएवगावकाहाज) पडाउ5५३ तल 05065 50\nएगातकावाआ) 93020/8. 9करश्शाज वआ0/8, ९808. 53007 नए. ४उज0््व 900. 5300॥॥0/2७8\nआतकाआध009000809.- 9900: ए/0092॥3, /हव3553: तीडडक808: 306: ड१८०१७/8५9. फीशवा\nआंडा05920/8 950९ 00५/0५8 9900॥702/279 ॥796620/8 90006 93/60/8. ७०8॥9097 293[॥0तटएड\nबठथा।_8. 9%त4कावाजा ॥0/0093940/235530079,/3. धंथ; 'ठंवा। (जाउब्का। आएं, ठआ 998\nडतव(9/७७आ) ए0909 9ए0.3559_तक093/90008,/3 95, (जा8 लगा, ।१७०३ 9कए030॥50 ४३०5\nफशउ5७३ 98998. ए]972७. प000.- 58(303/७99॥ 90ग09५॥८७/७ 90कतए (५8. 5९५३०गा।काहागा\n003000ग7) ३७५७ ५०ड9097 बा७/॥॥ |(्ब(३)/गकाए 93002. 29997 0गएगग,. 83|40000_ 8\nड300॥॥त ७४०6९०॥ 990५8 \"घएु/30॥9 ७॥9708, 709)# 3>क0 ॥09990\"0 ४३७४७ 0006 ७४७७८३॥३)७॥४७७३\nउ्ति0 डक पीश3553 वा0८९७ 7000 (३7) 500०8 तरतीकराएस3 3/3008008 (कब्र) ३\n२9 वंकधका0, तैजाक355०00400 ॥00५8 35७0०5/470 93७व02९५७७/853॥3 (३५३ 3॥ 008] (४2४७\nबनाता\". फनाएकक्‍०५3 5300309रवताहाज। ८036. 2ञ 03|80000 लाए, गा 006 ४३०908, ९७३ उठ\nचपीगा ७03४१99%00275097॥ ॥६३0४8 36:3,/ग (00६०७ (३४३ छै३(500॥009970 ॥(80५॥0 03 53॥0608\n॥(९५गंगा। 993 ॥ल्‍98020,/8 ॥(३गत॥9] अीतिलआ। १9ग३७॥॥ शव बात 3097व/203 ९५३ (द्वार"} +{"id": "indic_deva_eval_000018_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000018_indic_vision_bench_deva_ocr_3f5587e3de87.jpg", "ocr": "४१\nहिन्दुस्तानकी दशा-५\nबीचमें न आता तो कुदरत अपना काम करती, मेरा मन मजबूत बनता और अन्तमें निर्विषयी\n[\n१\n]\nहोकर मैं सुखी होता।\nअस्पतालें पापकी जड़ हैं। उनकी बदौलत लोग शरीरका जतन कम करते हैं और अनीतिको बढ़ाते हैं|\nयूरोपके डॉक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ़ शरीरके ही गलत जतनके लिए लाखों जीवोंको हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों पर प्रयोग करते हैं। ऐसा करना किसी भी धर्मको मंजूर नहीं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, जरथोस्ती-सब धर्म कहते हैं कि आदमीके शरीरके लिए इतने जीवोंको मारनेकी ज़रूरत नहीं|\nडॉक्टर हमें धर्मभ्रष्ट\n[\n२\n]\nकरते हैं। उनकी बहुतसी दवाओंमें चरबी या दारू होती है। इन दोनोंमें से एक भी चीज़ हिन्दू-मुसलमानको चल सके ऐसी नहीं है। हम सभ्य होनेका ढोंग करके, दुसरोंको वहमी मानकर और बे-लगाम\n[\n३\n]\nहोकर चाहे सो करते रहें; यह दूसरी बात है। लेकिन डॉक्टर हमें धर्मसे भ्रष्ट करते हैं, यह साफ और सीधी बात है।\nइसका परिणाम\n[\n४\n]\nयह आता है कि हम नि:सत्त्व\n[\n५\n]\nऔर नामर्द बनते हैं। ऐसी दशामें हम लोकसेवा करने लायक नहीं रहते और शरीरसे क्षीण\n[\n६\n]\nऔर बुद्धिहीन\n[\n७\n]\nहोते जा रहे हैं। अंग्रेजी या यूरोपियन डॉक्टरी सीखना गुलामीकी गाँठको मजबूत बनाने जैसा है।\nहम डॉक्टर क्यो�� बनते हैं, यह भी सोचनेकी बात है। उसका सच्चा कारण तो आबरूदार और पैसा कमानेका धंधा करनेकी इच्छा है। उसमें परोपकारकी बात नहीं है। उस धन्धेमें परोपकार नहीं है, यह तो मैं बता चुका। उससे लोगोंको नुकसान होता है। डॉक्टर सिर्फ़ आडम्बर दिखाकर ही लोगोंसे बड़ी फीस वसूल करते हैं और अपनी एक पैसेकी दवाके कई रुपये लेते हैं। यों विश्वासमें और चंगे हो जानेको आशामें लोग डॉक्टरोंसे ठगे जाते हैं। जब ऐसा ही है तब भलाईका दिखावा करनेवाले डॉक्टरोंसे खुले ठग-वैद्य (नीम-हकीम) ज्यादा अच्छे।\n↑\nबे-नन्स-परस्त।\n↑\nबेदीन।\n↑\nस्वछन्द।\n↑\nनतीजा।\n↑\nजिसमें कुछ दम न हो।\n↑\nकमज़ोर।\n↑\nबे-अक़्ल।"} +{"id": "indic_deva_eval_000019_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000019_devanagari_page_ocr_cb51daf7ab37.jpg", "ocr": "कुण्डधान बग्गो\n\n7. लसुणदायकत्थेरअपदानं\n\nलसुणं उपजीवामि, लसुणं मय्हभोजनं॥4080॥\n“खारियो पूरयित्वान, सड्खाराममगच्छहं।\nहड्ढी हड्लेल चित्तेन, सडःघस्स लसुणं अदं॥4084॥\n“विपस्सिस्स नरग्गस्स, सासने निरतस्सहं।\nसड्ःघस्स लसुणं दत्वा, कप्पं सग्गम्हि मोदहं॥082॥\n“एकनबुतितो कप्पे, लसुणं यमदं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, लसुणस्स इदं फलं॥4083॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥4084॥\nइत्थ॑ सुदं आयस्मा लसुणदायको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nलसुणदायकत्थेरस्सापदानं सत्तमं।\n\nहिसवतो$विदूरे , तापस आसमहं तदा।\n\nलशुनेनोपजीबामि, लशुनं मम भोजनम्‌॥4080॥\n\nखारीय॑ं पूरयित्वा, सडूघाराममगच्छमहम्‌।\n\nहृष्टो कृष्टेन चित्तेन, सडुघाय लशुनम्‌ अदाम॥084॥\n\nविपश्यिने नराग्रस्य, शासने निरतस्याहम्‌।\n\nसडूघाय लशुनं दत्वा, कल्पं स्वर्गेडमोदेडहम्‌॥4082॥\n\nएकनवतितमे कल्पे, लशुन॑ यमदां तदा।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, लशुनस्य इदं फलम्‌॥4083॥\n\nप्रतिसंविदश्वतस्त्र:... प्रे०..... कृतं बुद्धऔ्य शासनम्‌\"॥4084॥\n\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ लशुनदायक स्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\n\nउस समय में हिमालय प्रदेश के निकट एक तापस था तथा लहसुन पर आश्रित मेरी\n\nआजीविका थी और भोजन भी लहसुन था॥080॥\n\nखारी (बहंगी/ टोकरी) भर कर मैं संघाराम को गया और प्रसन्नतापूर्वक संघ को लहसुन प्रदान\nकिया॥084॥\n\nउन विपश्यी व नरथ्रे्ठ के शासन में निरत संघ को लहसुन देकर कल्पों तक मैंने स्वर्ग में\nआनन्‍्दभोग किया॥082।\n\nउन्नीखवें कल्प में मैंने जिस लहसुन का दान किया था उसी लहसुन दान का यह फल है कि मैं\nडुर्गति को नहीं जानता॥083॥\n\nचार प्रतिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों तथा पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार\nचूर्ण किया॥4084॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ लहसुन स्थबिर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nकर मैंने बुद्धशासन को"} +{"id": "indic_deva_eval_000020_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000020_indic_vision_bench_deva_ocr_d4f599c2158b.jpg", "ocr": "३०\nगांव-गाडा\nहे अधिकारी जातीपैकींच असून वंशपरंपरेचे म्हणजे वतनदार असतात. जातीमध्ये जी कुळी किंवा घराणे मानाने सर्वांत अग्रगण्य असतें तें पाटलाचें. कदाचित् असेंही असेल की, पाटलाचे घराणे जातीचे आद्य घराणे असावें. ज्याप्रमाणे राज्य मिळविणाराचे घराणें तें राजघराणे असते, त्याप्रमाणे जात अस्तित्वात आणणारे घराणे त्या जातीच्या जातपाटलाचे घराणे असावे असें अनुमान वर ज्या पाटलांच्या संज्ञा दिल्या आहेत त्यांवरून निघेल. शिवाय पाटलाला जातींत पहिल्या 'विड्या टिळ्याचा' म्हणजे सर्वांत मोठा मान असतो. पांढरपेशे व निकृष्ट जाती वजा करतां बाकीच्या मराठजातींत पाटील ही बहुमानदर्शक पदवी आहे. गांवांत डोके हलविणाऱ्या कुणब्याला- मग तो माळी, धनगर, मुसलमान, कोणत्याही जातीचा असो- लोक बहुमानाने पाटील म्हणतात; आणि कुणब्यांच्या सुनाही सासऱ्याला पाटील म्हणून हाका मारतात, मग तो पाटील घराण्यांतला असो वा नसो. पाटलाप्रमाणे जातचौगुल्याचे घराणेही जातींत प्रमुख असते. जातपाटलांची व चौगुल्यांची कांहीं उदाहरणे\n१\n[\n१\n]\nखाली टिपेंत दिली आहेत. पाटील हा शब्द पटु\n↑\nसाताऱ्याकडे धनगरांचे पाटील कऱ्हाडचे गावढे आहेत. तिसगांवकडील भोयांच्या नायकाची कुळी काथवटे, राशीनकडील बेरड- रामोशांच्या पाटलाची कुळी खराडे, तेलंगी कानडे जातीच्या नायकाची कुळी सदगीर व भुसनर, भराड्यांच्या पाटलाची कुळी शिंदे, वैदूंच्या व तिरमलांच्या पाटलाची कुळी फुलमाळी, मेडिंगे जोशांच्या पाटलाची कुळी गदाई, कुडमुडे जोशांच्या पाटलाची कुळी भोंसले, नागपूरकडील औषधे विकणाऱ्या गोंड लोकांच्या पाटलाची कुळी ठाकर, फांसपारध्यांच्या पाटलाची कुळी चव्हाण, माकडवाल्यांच्या (कैकाडी) पाटलाची कुळी सोनकचरे, चित्रकथ्यांच्या पाटलाची कुळी गांगर्डा, मांगगारोड्यांच्या पाटलाची कुळी सकट इत्यादि. साताऱ्याकडील धनगरांचा चौगुला (भल्ला अथवा खर्चा) देहबा, तेलंगी कानड्यांचा करवर (ह्या जातींत खाडगीर आडनांवाचा जातप्रधान आहे), वैदूंचा भोई, तिरमलांचा धनगर, कुडमुड्या जोशांचा पाचंग्या शिणगाण, फांसपारध्यांचा पवार (ह्याला प्रधान म्हणतात), काही ठिकाणी मांगांचा आढळगे, चित्रकथ्यांचा सुपलकर, मांगगारोड्यांचा बोडके इत्यादि. गुजराथेतील भनसाळी जातीला चौधरी नांवाचा कामगार आहे, तोच या जातीचा चौगुला होय."} +{"id": "indic_deva_eval_000021_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000021_indic_mozhi_deva_word_ocr_5d017a4b74ff.jpg", "ocr": "तत्त्व"} +{"id": "indic_deva_eval_000022_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000022_indic_mozhi_deva_word_ocr_2449105af1ea.jpg", "ocr": "बाहर"} +{"id": "indic_deva_eval_000023_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000023_indic_mozhi_deva_word_ocr_ba83c47afc27.jpg", "ocr": "मिळाली"} +{"id": "indic_deva_eval_000024_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000024_indic_mozhi_deva_word_ocr_d262375bfca5.jpg", "ocr": "बापू"} +{"id": "indic_deva_eval_000025_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000025_hindi_handwritten_word_ocr_265cf1f4a69c.jpg", "ocr": "निषेध"} +{"id": "indic_deva_eval_000026_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000026_devanagari_digits_mixed_51df0a2104e7.jpg", "ocr": "०1८३८966७0६985७748३"} +{"id": "indic_deva_eval_000027_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000027_hindi_handwritten_word_ocr_7b5a7fef4450.jpg", "ocr": "टेंशन"} +{"id": "indic_deva_eval_000028_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000028_hindi_handwritten_word_ocr_ad93fcd8f115.jpg", "ocr": "विनिवेश"} +{"id": "indic_deva_eval_000029_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000029_devanagari_page_ocr_af6103b6a220.jpg", "ocr": "मसहावंसो\n\n245\n\nथेरा नागचतुक्कम्हि, नहात्वा रहदे तहिं।\n\nपब्बतारोहणत्थाय, अट्ठंसु पटिपाटिया॥6॥\n\nराजा रथा तदो\"रुय्ह, अद्ठा थेरे'भिवादयि।\n\nउण्हे किलनतो किंराज! आगतोसी'ति आहुते॥7॥\n\nतुम्हाकं गसनासह्ली, आगतोम्ही'ति भासिते।\n\nइचेव वस्सं बसितुं, आगतम्हा'ति भासिय॥8॥\n\nवस्सूपनायिकं थेरो, खन्‍्धकं खन्‍धको विदो।\n\nकथेसि रजञ्ञो त॑ सुत्वा, भागिनेय्यो च राजिनो॥9॥\n\nमहारिट्वो महामच्चो, पठचपज्ञासभातुहि।\n\nसद्धिं जेट्टकनिद्लेह्िि, राजानमभितो ठितो॥40॥\n\nसंस्कृतच्छाया- _ स्थविरा: नागचतुष्के, स्नात्वा हृदि तत्र।\nपर्वतारोहणार्थाय, अतिष्ठन्‌ प्रतिपत्या।।6॥॥\nराजा रथात्‌ तद्‌ आरुह्म, अस्थात्‌ स्थविर अभ्यवदत्‌।\nउष्णे क्‍्लन्‍्तः किं राजन! आगतोऊंसि” इति आहुस्ते।।7॥।\nयुष्माकं गसनाशड्‌्की, आगतोउस्मि” इति भाषिते।\nइह्ैव वर्षा वसितुम, आगतस्मात्‌' इत्यभाषयत्‌।॥।8॥\nवस्सूपनायिकां स्थविर:, स्कन्धकं स्कन्धकोविद:।\nअकथयत् राज्ज: तं श्रुत्वा, भागिनेय: च राज़:॥9॥।\nमहारिष्टो महामात्यः, पद्चपञ्चाशद्भातृभि:।\nसार्ध ज्येष्कनिष्ठै. राजानमभितः स्थित:।।0॥।\n\nहिन्दी- स्थविर नागचतुष्क सरोवर में स्नान कर चैत्य पर्वत जाने के लिये पंक्तिबद्ध हो कर खड़े हुए।6॥॥\n\nराजा भी रथ से उतर कर स्थविरों को प्रणाम कर एक तरफ खड़े हो गये। तब स्थविरों न��� कहा- “राजन्‌! आपने इस\nभयड्कर गर्मी में यहाँ आने का क्‍यों कष्ट किया?।॥।॥7।\n\n'राजा द्वारा- “आप हमें छोड़ कर वापस चले जा रहे हैं- इसी आशडूका से जस्त होकर मैं यहाँ भागा हुआ चला आ\nरहा हूँ”- यह कहे जाने पर, स्थविरों ने राजा को आश्वासन दिया- “हम तो यहाँ वर्षावास कहने के लिये आये\nहैं?॥8॥॥\n\nतथा स्कन्‍्धक के विशेषज्ञ महास्थविर ने राजा को उक्त वर्षावास का विशेष ज्ञान कराने के लिये\n\nअस्सूपनायिकास्कन्ध की देशना की। उस देशना को सुनकर राजा का भगिनी-पुत्र।॥9॥।\nअपने छोटे-बड़े पचास भाइयों के साथ महारिष्ट नामक अमात्य राजा के सम्मुख आकर खड़ा हुआ।।0॥।\n\nकि..."} +{"id": "indic_deva_eval_000030_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000030_indic_vision_bench_deva_ocr_aecc149aebee.jpg", "ocr": "काही महत्त्वाच्या लेखांची भाषांतरे करून प्रकाशित करण्यात आली. हेतू हा की मूळ ग्रंथातील काही भाग थेट वाचकांपर्यंत पोहोचावा व त्यांनी जिज्ञासेने मूळ ग्रंथ वाचावेत. या मालेत पुढील ग्रंथ व त्यातील काही लेखांची प्रामुख्याने चर्चा करण्यात आली-\n१. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह 'दिनकर. (१९५६)\n२. भारत : इतिहास और संस्कृति- गजानन माधव मुक्तिबोध (१९८३)\n३. बौद्ध संस्कृति - डॉ. राहुल सांस्कृत्यायन (१९५२)\n४. जन, समाज और संस्कृति - विष्णु प्रभाकर (१९८६)\n५. संस्कृति क्या है? - विष्णु प्रभाकर (२०१५)\n६. समय और हम - जैनेंद्रकुमार (१९६२)\n७. संस्कृति का दार्शनिक विवेचन - डॉ. देवराज (१९५७)\n८. कबीर - डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी (१९४२)\n९. अशोक के फूल - डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी (१९४८)\n१०. कल्पलता - डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी (१९५१)\n११. विचार और वितर्क - डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी (१९५४)\n१२. कुटज - डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी (१९६४)\nसमाज प्रबोधन पत्रिका त्रैमासिकाचा बहुसंख्य वाचक मराठी भाषी व अभ्यासक आहे, हे लक्षात घेऊन ज्या ग्रंथांचा परिचय करून देण्यात आला त्या ग्रंथलेखकाचे साहित्यिक योगदान प्रारंभी देण्यात येऊन मग ग्रंथ परिचय वा भाषांतर देण्यात येत असे. त्यामुळे लेखकाचे श्रेष्ठत्व, वेगळेपणा, विचारधारा, व्यासंग, साहित्य रचना यांची माहिती होत असे. मग वाचक त्या आकलनाधारे पुढील ग्रंथ समजून घ्यायचा. या ग्रंथांविषयी वाचक उत्सुक होऊन त्यांनी तो मिळवून वाचावा असा उद्देश होता. त्यामुळे वाचक समाजात भारतीय संस्कृती ही प्रारंभापासूनच सामायिक संस्कृती आहे. इथे पूर्वापार अनेक जात, धर्म, व��श, संस्कृती, देशातील लोक राहात आल्याने आणि त्यांच्या प्रारंभापासूनच रोटी-बेटी व्यवहार होत आल्याने इथे एक वंश, शुद्ध जात, पवित्र धर्म असे काही नसून सर्व धर्म समभाव, जातीय ऐक्य, सांस्कृतिक देवाणघेवाण चालत आलेली आहे. सामाजिक सहिष्णुता व सांस्कृतिक सामंजस्यावरच या देशाची एकता व अखंडता टिकून आहे. हे परोपरीने अधोरेखित करण्यात आले. त्यामुळे संस्कृती म्हणजे नदीकाठची मानव वस्ती व प्राचीन संदर्भ इतकेच नसून ती कालौघात बदलत, विकसित होत जाणारी आहे. हे उपरोक्त ग्रंथ परिचय व लेख भाषांतरातून अधोरेखित"} +{"id": "indic_deva_eval_000031_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000031_indic_mozhi_deva_word_ocr_17799d21f193.jpg", "ocr": "सहसा"} +{"id": "indic_deva_eval_000032_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000032_hindi_handwritten_word_ocr_06ac88d42513.jpg", "ocr": "कपाट"} +{"id": "indic_deva_eval_000033_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000033_indic_mozhi_deva_word_ocr_91b65b88bbec.jpg", "ocr": "किसी"} +{"id": "indic_deva_eval_000034_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000034_indic_vision_bench_deva_ocr_d12bd2e505c2.jpg", "ocr": "२८\nव्यवस्थापनाची मूलतत्त्वे\nव्यवस्थापकाने मालकांना आवश्यक तितके समाधानी ठेवायला हवं आणि त्यांची मंजुरी मिळवायला हवी. अन्यथा उत्तम कामगिरी बजावूनही त्यांना भागधारकांच्या असंतोषाला सामोरे जावे लागेल.\nसामाजिक परिणाम\nसहावे आणि शेवटचे (पण न्यूनतम खचितच नव्हे) असे व्यवस्थापकाचे काम म्हणजे संघटनेच्या सामाजिक परिणामाचे व्यवस्थापन करणे. ज्या संघटना\n० मोठ्या प्रमाणात लोकांच्या नजरेत असतात,\n० पर्यावरणावर महत्त्वाचा परिणाम वा आघात करतात,\n० समाजाच्या अपेक्षा वाढवितात,\nअशा मोठ्या संघटनांसाठी हे विशेषकरून महत्त्वाचे असते.\nकोणतीही संघटना स्वत:पुरती अस्तित्वात नसते किंवा स्वत:च स्वत:चा अंतिम हेतू नसते. प्रत्येक संघटना हा समाजाचा एक घटक असतो आणि समाजासाठी अस्तित्वात असते.\nएखादा उद्योग कामगारांना आणि व्यवस्थापकांना नोक-या देण्याहून किंवा भागधारकांना लाभांश देण्याहून ग्राहकांना उत्पादित माल आणि सेवा यांच्या पुरवठा करीत असतो. डॉक्टर आणि परिचारिका यांच्या गरजा इस्पितळ भागवीत नाही तर रुग्णांच्या गरजा भागविते; शाळा ही विद्यार्थ्यांसाठी अस्तित्वात असते, शिक्षकांसाठी नव्हे. लष्कर हे देशाच्या रक्षणासाठी असते; सैनिक आणि अधिका-यांसाठी नव्हे. व्यवस्थापकाने हे विसरणे म्हणजे चुकीचे व्यवस्थापन करणे आहे.\nआर्थिक माल आणि सेवा यांसारख्या जीवनाच्या परिमाणांविषयी चिंता करण���याबरोबरच व्यवस्थापनाने जीवनाच्या दर्जाविषयीही म्हणजे आधुनिक माणूस आणि आधुनिक समाज यांच्या भौतिक, मानवी आणि सामाजिक परिस्थितीविषयीही चिंता करायला हवी.\nपरिणामकारकतेची पातळी\nसंघटनेच्या सामाजिक परिणामांचे, आघाताचे व्यवस्थापन करणे हे व्यवस्थापकाचे सर्वात गुंतागुंतीचे काम असते. हे व्यवस्थापकाच्या संघटनेच्या एकूण परिणामकारकतेच्या दृष्टीतून विचार करण्याच्या सामर्थ्यावर अवलंबून असते. तीन"} +{"id": "indic_deva_eval_000035_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000035_devanagari_page_ocr_a4c0864d89b2.jpg", "ocr": "2.बोज्झडुगसंयुत्तं 433\n\n“कथज्च, भिक्खवे, भिक्खु योनिसोमनसिकारसम्पन्नो सत्त बोज्ञड्गे भावेति, सत्त\nबोज्झड्ग्गे बहलीकरोति? इध, भिक्खवे, भिक्‍्खु सतिसम्बोज्झड्गं भावेति विवेकनिस्सितं\nउपेक्खासम्बोज्झड्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं।\nएवं खो, भिक्‍खवे, भिक्खु योनिसोमनसिकारसम्पन्नो सत्त बोज्झड्ग्गे भावेति, सत्त बोज्झड्गे\nबहुलीकरोती”'ति।\n\n३३. उपक्किलेससुत्तं\n३. “पडि्चिमे, भिक्खवे, जातरूपस्स उपक्किलेसा, येहि उपक्किलेसेहि उपक्किलिट्ठं\nजातरूप॑ न चेव मुदु होति न च कम्मनियं, न च पभस्सरं पभड्गु च, न च सम्मा उपेति कम्माय।\nकतमे पडच? अयो, भिक्खवे, जातरूपस्स उपक्किलेसो, येन उपक्किलेसेन उपक्किलिट्ठ॑ं जातरूपं\nन चेव सुदु होति न च कम्मनियं, न च पभस्सरं पभडगुु च, न च सम्मा उपेति कम्माय। लोहं,\nभिक्खवे, जातरूपस्स उपक्किलेसों, येन उपक्किलेसेन उपक्किलिट्ठलं जातरूपं...पे*... तिपु,\nभिक्खवे, जातरूपस्स उपक्किलेसो...पे*... सीसं, भिक्खवे, जातरूपस्स उपक्किलेसो ...पे*... सज्यु,\nजातरूपस्स उपक्किलेसो, येन उपक्किलेसेन उपक्किलिट्ठंं जातरूपं न चेव मुदु होति न\nच कम्मनियं, न च पभस्सरं पभड्गु च, न च सम्मा उपेति कम्माय।\nत्लंस्कृतच्छाया) “कथज्च, भिक्षब:! सिक्षु: योनिशोमनसिकारसम्पन्न: सप्त बोध्यडगानि भावयति, ससत\nबोध्यड्गानि बहलीकरोलति? इह, भिक्षब:! भिक्षु: स्मृतिसंबोध्यकूग भावयति विवेकनि:श्वित॑ ...पे0...\nविवेकनि:श्रितं विरागनिः:श्वितं निरोधनि:श्वित॑ व्यवसर्गपरिणामिनम्‌। एवं\nझिक्षव:! भिक्षु: योनिशोमनसिकारसम्पन्न: सप्त बोध्यडगानि भावयति, सप्त बोध्यडन्गानि\nबहुलीकरोति”इति।\n३३.“पड्चेमे, भिक्षव:! जातरूपस्य उपक्लेशा:, यैरुपक्लेशैरुपक्लिष्टं जातरूप॑ न चैव मृदु भवति\nन च कमनीयम्‌, न च प्रभास्वरं प्रभझगुरं च, न च सम्यग्‌ उपैति कर्मणे। कतमे पडच? अयम्‌, भिक्षव:!\nजातरूपस्य उपक्लेश:, येनोपक्लेशेन उपक्लिए्ट जातरूप॑ न चैव मृदु भवति न च कमनीयम्‌, नच\nप्रभास्वरं प्रभझूगुरं च, न च सम्यग्‌ उपैति कर्मणे। लोह: भिक्षव:! जातरूपस्योपक्लेशेन, येनोपक्लेशेन\nउपक्लिपट जातरूप॑ ...पे0... त्रपु, भिक्षब:! जातरूपस्य उपक्लेशेन ...पे0... सीसम्‌, भिक्षव:!\nजातरूपस्य उपक्लेशेन ...पे0... रज, भिक्षब:! जातरूपस्य उपक्लेशेन, येनोपक्लेशेन उपक्लिष्टं\nजातरूप॑ न चैव सृदु भवति न च कमनीयं, न च प्रभास्वरं प्रभड्गुरं च, न च सम्यग्‌ उपैति कर्मणे।\nतहेन्दी) जाती है कि वह इन सातों बोध्यंगों की भावना एवं अभ्यास में सफल होगा।\nअभिक्षुओं! कैसे अच्छी तरह मनन करने वाले भिक्ष्‌ सात बोध्यंगों का भावना एवं अभ्यास करता है? झिक्षओं!\n'पूर्ववत्‌... विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जाने बाले उपेक्षा-संबोध्यंग का अभ्यास करता है।\nइसी तरह, अच्छी तरह मनन करने वाला भिक्षु सात बोध्यंगों\n३३, भझिक्षुओं! सोना के ये पाँच मल होते हैं, जिनसे सोना न मृदु\n\nमैला हो सोना न मृदु होता है ...पूर्वबत्‌. लोहा पर ्रिषु ...पूर्ववत्‌... सीसा\n\n'पूर्वबत्‌... चाँदी ...पूर्वबत्‌...भिक्षुओं!"} +{"id": "indic_deva_eval_000036_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000036_indic_mozhi_deva_word_ocr_f9d6569aeab2.jpg", "ocr": "होत्या."} +{"id": "indic_deva_eval_000037_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000037_indic_vision_bench_deva_ocr_d47a6228842f.jpg", "ocr": "राहणार. कारण त्यात वैश्विकता, मानवतावाद, आदर्श आशावाद, समता, बंधुतासारखी कालातीत मूल्यं आहेत.\nआज जागतिकीकरणात सामान्य मनुष्य भरडला जात आहे. म्हणून ते थोपवलं पाहिजे असे म्हणणारे साहित्यिक डॉ. अनिल अवचट व जागतिकीकरण ही काळाची गरज आहे म्हणणारे ज्येष्ठ शास्त्रज्ञ डॉ. वसंत गोवारीकर या दोहोंच्या विधानात प्रस्तुतता असली तरी एकात भाबडा मानवतावाद आहे तर दुस-यात देशाच्या प्रगतीचं भविष्यलक्ष्यी स्वप्न नि महत्त्वाकांक्षा आहे.\nआज आपला भारत देश जागतिक महासत्ता होतो आहे. पंतप्रधान डॉ. मनमोहनसिंग आर्थिक प्रगतीचा दर स्थिर राहावा म्हणून कोण मेहनत घेत आहेत. अमेरिकेचे राष्ट्राध्यक्ष हिंदी शिका म्हणतात. कारण अमेरिकेचं भारतावरचं परावलंबन वाढत आहे. सर्वांमागील प्रस्तुतता शोधून आपण आपले विचार व व्यवहार ठरविले पाहिजेत. भारत कायाकल्पाच्या उंबरठ्यावर उभा आहे. भारताचं बदलतं चित्र पाहन स्टीफन स्वाईगचं आत्मचरित्र ‘द वर्ल्ड ऑफ येस्टर डे' आठवतं. त्यात ही कायाकल्पाचं अपूप आहे. तो म्हणतो -\n\"My Today and each of my yesterdays, my rise and falls are so divers that I sometimes feel as if I lived not one but several existences, each one different from the other.\"\nजाणिवांची आरास/२०"} +{"id": "indic_deva_eval_000038_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000038_indic_mozhi_deva_word_ocr_bf6e32bfd58a.jpg", "ocr": "पृष्ठ"} +{"id": "indic_deva_eval_000039_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000039_devanagari_page_ocr_b950f0f3f13a.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n456: न्‍\n\nपुरिसविपललासवसेन। तथा हि “पुत्त लभेथ वरद”न्ति इमस्स अट्ठकथाय॑ “लक्षेथा”ति\n'उल्लिड्गित्वा “लभेय्य”न्ति पुरिसविपललासबसेन विवरणं कतं। “अधम्मं सारथि कयिरा\"”ति\nइमस्स पन अट्ठकथायं “कयिरा”ति उल्लिड्गत्वा “करेय्यासी”ति विवरणं\nसारथि कयिरा\"ति एत्थ पुरिसविपल्लासो न चिन्तेतब्बो। अथ वा यथा “पुत्त लभेथ वरद”न्ति\nएत्थ च “काये रजो न लिम्पेथा\"तिआदीसु एथवचनं गहित॑, एवं एथवचन अग्गहेत्वा “लमे\nअथा”ति पदच्छेदो करणीयो। एवडिह सति पुरिसविपल्लासेन किच्च॑ नत्थि। तत्थ लभेति\nसत्तमिया उत्तमपुरिसबचनं “बज्ञझज्चापि पमोचये”ति पदमिब। अथाति अधिकारन्तरे निपातो\n'पदपूरणे बा। एत्थ च अधिकारन्तरबसेन अपरम्पि वरं पुत्तं लभेय्यन्ति अत्थो। यस्मा पनेत्थ\nद्विन्तमत्थानं उप्पत्ति दिस्सति, यस्मा चेतेसु द्वीसु दुज्जानों भगवतों अधिप्पायो, तस्मा द्वेपि\nअत्था गह्ेतब्बाबा\n\nएत्थ पन॒ किड्चापि लिड्गविपललासो _ विभत्तिविपललासो वचनविपललासो\nकालविपललासो पुरिसविपललासो अक्खरविपल्लासोति छब्बिधो विपल्‍लासो आहरित्वा\nदस्सेतब्बो, तथापि सो उपरि आविभविस्सतीति न दस्सितो। तत्र कयिराथाति पद सत्तमिया\nपरस्सपदवसेन अत्तनोपदवसेन च द्विधा भिज्जति, तथा मज्झिमपुरिसबहवचनवसेन\nपठमपुरिसेकवचनवसेन च। तथा हि “यथा पुज्ञानि कयिराथ, ददन्‍्ता अपरापर”च्ति एत्थ\n“कयथिराथा”ति इदं सत्तमिया परस्सपदवसेन मज्झिमपुरिसबह॒वचनवसेन च चबुत्तं। यथानुरूप॑\n'पुज्ञानि करेय्याथयेबाति हि अत्थो। “कथिराथ धीरो पुज्ञानी”ति एत्थ पन “कयथिराथा”ति इदं\nसत्तमिया अत्तनोपदवसेन पठमपुरिसेकबचनवसेन च बुत्तं। करेय्याति हि अत्थों। इध\nपरोक्खादिवसेन यिरपच्चयसहितानि रूपानि येभुस्येन सासने अप्पसिद्धानीति न दस्सितानि।\n\nअत्तनो फल॑ करोतीति कारणं। करोतीति कत्ता, एवं कारको कारक वा। एत्थ हि\nकारकसद्दों यत्थ कत्तुकारककम्मकारकादिवाचको, तत्थ पुल्लिड्गोपि होति, येभुस्येन\nनपुंसकलिड्गोपि। यत्थ पन रजतकारकम्मकारलोहकारादिबाचको, तत्थ पुल्लिड्गो एवा।\nकारापेतीति कारापको। करं, कुब्बं, क्रुब्बं, करोन्‍्तो, कुब्बन्तो, कुब्बानो, कुरुमानों, पक्रुंब्बमानो।\nकारिका, कारापिका। करोन्‍्ती, कुब्बन्ती। कारकं कुलं। कारापकं, करोन्‍्तं, कुब्बन्तं, कुरुमानं।\nसड्खारो, परिक्खारो, परिक्खतो, पुरक्‍्खतो, , क्रिया। अक्खरचिन्तका पन “क्रिया”\nइच्चपि पदमिच्छन्ति। एत्थ क्रियासद्दों किड्चापि “अफला होति अक्रुब्बतो”तिआदीसु\nककाररकारसंयोगवन्तानि पदानि दिस्सन्ति, तथापि क्लेससद्दो विय पाछ्ठियं न दिस्सति,\n\n, तस्मा “अधम्मं"} +{"id": "indic_deva_eval_000040_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000040_devanagari_page_ocr_678c592c918a.jpg", "ocr": "पालि-\n433.\n\n434.\n\n435.\n\n436.\n\n37\n\nमसावोच फरुसं कडिचि, चुत्ता पटिवदेय्यु तं।\n\nदुक्‍खा हि सारम्भकथा, पटिदण्डा फुसेय्यु तं ॥0/5 ॥।\nसचे नेरेसि जत्तानं, कंसो उपहतो यथा।\n\n'एस पत्तोसि निब्बानं, सारम्भो ते न विज्जति॥40/6 ॥।\nयथा दण्डेन गोपालो, गावो पाजेति गोचरं।\n\nएवं जरा च मच्चु च, आयु पाजेन्ति पाणिनं॥40/7 ॥\nअथ पापानि कम्मानि, करं बालो न बुज्ञति।\n\nसेहि कम्मेहि दुम्मेघो, अग्गिदद्ठो व तप्पति॥ 40/8 ॥\n\nसंस्कृतच्छाया-\n\nहिन्दी-\n\nमा वोच: परुष॑ किंचिद्‌ उक्ता: प्रतिवदेयुस्त्वाम्‌ ।\n\nदुःखा छि संरम्भकथा: प्रतिदण्डा: स्पुृशेयुस्त्वाम्‌ 0/5 ॥\nस चेत्‌ नेरयसि आत्मान कांस्यसुपहत॑ यथा ।\n\nएप प्रासोउसि निर्वाणं संरम्भस्ते न विद्यते ॥0/6 ॥\nयथा दण्डेन गोपालो गा: प्राजयति गोचरम्‌ ।\n\n'एवं जरा च मृत्युश्यायु: प्राजयत: प्राणिनाम्‌ ॥। 40/7 ॥।\nअथच्य पापानि कर्माणि कुर्वन्‌ बालो न बुध्यते ।\n\nस्वै: कर्मभि: दुर्मेधा अग्निदग्ध इब तप्यते ॥0/8 ॥।\n\nकठोर वचन न बोलो; बोलने पर दूसरे भी वैसे ही तुम्हें बोलेंगे, दुर्वीैचन दुःखदायक\nहोते हैं, बोलने से बदले में तुम्हें दण्ड मिलेगा । टूटा कांसा जैसे नि:शब्द रहता है,\nजैसे ही यदि तुम अपने को नि:शब्द रक्खो , तो तुमने निर्वाण को पा लिया, तुम्हारे\nकलह (छिंसा) नहीं रही ॥40/5-6।।\n\nग्वाला लाठी से गायों को चरागाह में ले जाता है, वैसे ही बुढ़ापा और मृत्यु\nप्राणियों की आयु को ले जाते हैं 4। 40/7 ॥।\n\nपाप कर्म करते वक्त मूढ़ पुरुष उसे नहीं बूझता, पीछे दुर्नुद्धि अपने ही कर्मों के कारण\nआग से जले की भाँति अनुताप करता है ॥। 0/8 ॥।\n\n(एफ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टाारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000041_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000041_devanagari_page_ocr_dd40f2b6bdce.jpg", "ocr": "चतुरासीतिसहस्सथूपकथा छ्रं\n\nअथ राजा समआ्ञातपेमो सबहमानो, सामणेरं पक्कोसथा”ति अमच्चे पेसेसि।\nअतिचिरायन्तीति पुन द्वे तयो पेसेसि, तुरितं आगच्छतृ”ति। सामणेरों अत्तनो पकतिया\nएब“अगमासि। राजा, पतिरुपासनं ञअत्वा निसीदरथाःति आह। इतो च इतो ओलोकेत्बा, नत्थि\nदानि अज्ञे भिक्खू”ति समुस्सितसेतच्छत्तं राजपललड्कं उपसड्कमित्वा पत्तगहणत्थाय रज्ञजो\nआकारं देस्सेसि। राजा तं॑ पल्‍लड्-कसमीपं गच्छन्‍्तं दिस्वा एवं चिन्तेसि, अज्जेव दानि अय॑\nसामणेरो इमस्स गेहस्स सामिको भविस्सतीति। सामणेरो रज्जो हत्थे पत्तं दत्वा पल्‍लडूनक॑\nअभिरूहित्वा निसीदि। राजा अत्तनो अत्थाय सम्पादितं सब्बं यागुखज्जभत्तविकतिं उपनामेसि।\nसामणेरो अत्तनों यापनमत्तं एबं सम्पटिच्छि। भत्तकिन्वावसाने राजा आह, सत्थारा तुम्हाकं\nदिन्नओवादं जानाथा”ति। जानामि महाराज एकदेसेना'ति तात मण्हं पि न॑ कथेहीति। साधु\nमहाराजा”ति रच्जो अनुरूप॑ धम्मपदे अप्पमादबग्गं अनुमोदनत्थाय अभासि। राजा पन,\nआप्पसादों असतपद पमादों मच्चुनों पदन्ति सुत्वाश्व, अज्जात तात परियोसापेलीति आह।\nअनुमोदनावसाने द्वत्तिंस धुरभत्तानि लभित्वा पुनदिवसे द्वत्तिंस भिक्खू गहेत्वा राजस्तेपुरं\nपविसित्वा भत्तकिन्न॑ अकासि। राजा, अच्जे पि द्वत्तिंस भिक्‍सू तुम्हेहि सद्दि येव सिकक्‍खं\nगण्हन्तृटति एतेनेब उपायेन दिवसे दिवसे बद्भापेन्तो सद्ठिसहस्सान ब्राह्मणपरिव्वाजकान भक्त\nउपच्छिन्दित्वा अन्तोनिवेसने सट्ठिसहस्सानं भिकक्‍्खूनं निश्चञभत्तं पद्धपेसि निग्रोधत्थेरगतेन” एव\nपसादेन। निग्मोधलत्थेरों पि राजान॑ सपरिस तीस सरणेस पश्चसु चर सीलेस पतिद्रापेत्वा बुख्सासने\nपोथुज्जनिकेन पसादेन अचलप्पसादं कत्वा पतिड्रापेसि।\nअथ राजा सजञ्ञातप्रेम: सबहमानः, श्रामणेरं प्रक्रोतत इति आमत्यान्‌ अप्रेषयत्‌। अतिचिरायन्ति\n\nइति पुनः द्वौ त्रीन्‌ प्रेषयत्‌, त्वरितम्‌ आगच्छतु” इति श्रामणेर: आत्मना प्रकृत्यैव अगमत्‌। राजा,\nप्रतिरूपासन ज्ञात्वा निषीदत” इति आह। इतश्व इतं॑ अवलोक्य, नास्ति इदानी अन्ये भिक्षव:” इति\nसमुच्छितश्वेछत्र॑राजपर्यड्कम्‌ उपसडूक्रम्य प्रासगृहणार्थाय राज्ः आकार अदर्शयत्‌। राजा त॑\nपर्यझकसमीप गच्छन्तं दुष्वा अअचिन्तयत्‌, अद्येव इदानीस्‌ अय॑ श्लामणेरः अस्य ग��हस्थ स्वासिको\nअविष्यति इति। श्रामणेर: राज्ञः हस्ते पात्र दत्वा पर्यडक अभिरूह्य न्यपीदत्‌। राजा आत्मन अर्थाय\nसम्पादित॑ सर्व यवागुखाद्यभक्तविकृतिम्‌ उपानामयत्‌। श्रामणेर आत्मनः यापनमात्रमेव सम्प्रत्यैच्छत्‌।\nभक्तकृत्यावसाने राजा आह, शास्त्रा यूप्मभ्यम्‌ दत्त अववादं जानाथ” इति। जानामि महाराज एकदेशेन'\nइति तात मह्यं अपि त॑ कथे इति। साधु महाराज” इति राज्ञः अनुरूप॑ धर्मपदे अप्रमादवर्गम्‌\nअनुमोदनार्थाय अभाषत। राजा पुनः, अप्रमाद अमृतपद् प्रमादः मृत्यो: पदमीति श्रुत्वैव, आजात॑ तात\nपर्यवघापै: इत्याह। अनुमोदनावसाने द्वात्रिंशति धुरभक्तानि लब्धवा पुनर्दिबसे द्वात्रिंशति भिक्षुन गृहित्वा\nराजान्त:पुर प्रविश्य भक्तकृत्यम्‌ अकारोत्‌। राजा अन्येऊपि द्वात्रिंशति भिक्षवः यूष्माभि: सार्ध एवं भिक्षां\nगृहणन्तु” इति एतेनैब उपायेन दिवसे दिवसे वर्धापयन्‌ पछिसहस्त्राणां ब्राह्मणपरित्राजकानां भक्त\nउपछ्ित्य अन्तर्निविशने पश्ठिसहस्ेभ्य: भिक्षुम्यः नित्य भक्त प्रास्थापयत्‌ न्‍्यग्रोध स्थविरगतेन”ः एव\nप्रसादेन। न्‍्यग्रोधस्थविरोऊपि राजानं सतपरिषदं त्रिषु: शरणेषु पश्चसु च शीलेपु प्रतिष्ठाप्य बुद्धशासने\nपुख्षक जनिकेन प्रसादन जनलप्रसाद कत्चा प्रत्यस्थापयल।\n\nइसके बाद उत्पन्न खेही राजा ने, श्रामणेर को बुलाओं, ऐसा कह, आमात्यों को भेज, श्रामणेर को आदर के साथ\nबुलवाया। उससे देखा कि वे बहुत देर कर रहे थे तो उसने फिर दो-तीन लोगों को कहा जाओ- उसे शीघ्रतीशीघ्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000042_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000042_indic_vision_bench_deva_ocr_76dea1b292ad.jpg", "ocr": "भी अच्छे बन जायें। इधर काम अच्छा मिला है, और मजूरी भी अच्छी मिल रही है। मगर सब इसी टीम-टाम में उड़ जाती है। यहाँ से थोड़ी दूर पर एक ईसाइन रहती है, वह रोज सुबह को पढ़ाने आती है। हमारे ज़माने में तो बेटा सिपारा और रोजा-नमाज का रिवाज था। कई जगह से शादी के पैग़ाम आये...\nसकीना ने कठोर होकर कहा--अरे, तो अब चुप भी रहोगी। हो तो चुका। आपकी क्या खातिर करूंँ बहन! आपने इतने दिनों बाद मुझ बदनसीब को याद तो किया!\nसुखदा ने उदार मन से कहा—याद तो तुम्हारी बराबर आती रहती थी, और आने को जी भी चाहता था; पर डरती थी, तुम दिल में न जाने क्या समझो। यह तो आज मियाँ सलीम से मालूम हुआ कि तुम्हारी तबीअत अच्छी नहीं है। जब हम लोग तुम्हारी खिदमत करने को हर तरह हाज़िर है तो तुम नाहक क्यों जान देती हो।\nसकीना जैसे शर्म को निगलकर बोली-बहन, मैं चाहे मर जाऊँ, पर इस गरीबी को मिटाकर छोङूंगी। मैं इस हालत में न होती, तो बाबूजी को क्यों मुझ पर रहम आता, क्यों वह मेरे घर आते; क्यों उन्हें बदनाम होकर घर से भागना पड़ता? सारी मुसीबत की जड़ ग़रीबी है। इसका खातमा करके छोङूंगी।\nएक क्षण के बाद उसने पठानिन से कहा--ज़रा जाकर किसी तम्बोलिन से पान ही लगवा लाओ। अब और क्या खातिर करें आपकी।\nबुढ़िया को इस बहाने से टालकर सकीना धीमे स्वर में बोली-यह मुहम्मद सलीम का खत है। आप जब मुझ पर इतना रहम करती हैं, तो आपसे क्या पर्दा करूँ! जो होना था, वह तो हो ही गया। बाबूजी यहाँ कई बार आये। खुदा जानता है जो उन्होंने कभी मेरी तरफ़ आँख उठाई हो। में भी उनका अदब करती भी। हाँ उनकी शराफ़त का असर जरूर मेरे दिल पर होता था। एकाएक मेरी शादी का जिक्र सुनकर बाबूजी एक नशे की-सी हालत में आये और मुझसे मुहब्बत जाहिर की। खुदा गवाह है बहन, मै एक हर्फ़ भी ग़लत नहीं कह रही हूँ। उनकी प्यार की बातें सुनकर मुझे भी सुध-बुध भूल गयी। मेरी जैसी औरत के साथ ऐसा\nकर्मभूमि\n२४५"} +{"id": "indic_deva_eval_000043_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000043_hindi_handwritten_word_ocr_d41f35c71efd.jpg", "ocr": "पात्र"} +{"id": "indic_deva_eval_000044_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000044_hindi_handwritten_word_ocr_a3c50d451af3.jpg", "ocr": "सौ-डेढ़"} +{"id": "indic_deva_eval_000045_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000045_indic_mozhi_deva_word_ocr_7e035ccc2543.jpg", "ocr": "चढ़ावों,"} +{"id": "indic_deva_eval_000046_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000046_indic_mozhi_deva_word_ocr_8f803506a7c5.jpg", "ocr": "आपल्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000047_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000047_indic_mozhi_deva_word_ocr_ef2db8bd9a7f.jpg", "ocr": "सम्पूर्ण"} +{"id": "indic_deva_eval_000048_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000048_devanagari_page_ocr_60710ec13547.jpg", "ocr": "वरव 24. विपस्सीबुद्धवंसो\n\n'खेसा उप्पलवण्णा च, अग्गा हेस्सन्ति साविका।\nअनासवा वीतरागा, सन्‍्तचित्ता समाहिता।\nबोधि तस्स भगवतो, अस्सत्थोति पवुज्चति॥826॥\n“चित्तो च हत्थाव्यवको, अग्गा हेस्सन्तुपट्ठका ।\nनन्‍्दमाता च उत्तरा, अग्गा हेस्सन्तुपढ्निका ।\nआयु बस्ससतं तस्स, गोतमस्स यसस्सिनों ॥827॥\n“इदं सुत्वान बचन॑...पे\"... हेस्साम सम्मुखा इमं”॥828॥\nतस्साहं वचन सुत्वा, भिययो चित्त पसादयिं।\nउत्तरिं वतम्धिट्ठासिं, दसपारमिपूरिया॥829॥\nनगर बन्धुमती नाम, बन्धुमा नाम खत्तियो।\nमाता बन्धुमती नाम, विपस्सिस्स महेसिनो॥830॥\n'क्षैमा उत्पलवर्णा च, अग्रे भविष्यतः श्वाविके।\nअनाखवौ वीतरागौ, शान्तचित्तौ समाहितौ���\nबोधिः तस्य भगवतः, अश्वत्थ इति प्रोच्यते॥826॥\n“चित्तश्ब हस्तालवकः, अग्रे भविष्यत उपस्थायकौ।\nनन्‍्दमाता चोत्तरा, अग्रे भविष्यत उपस्थायिके।\nआयुर्वर्षशतं तस्य, गौतमस्य यशस्विनः ॥827॥\n“इदं श्रुत्वा बचन॑...पे\". ..भविष्याम: सम्मुखा इमम्‌\"॥828॥\nतस्थाहं बचन श्रुत्वा, भूयश्चित्त प्रासादयम्‌।\nउत्तरीं ब्रतमध्यस्थाम्‌, दशपारमिपूर्त्ये॥829॥\nजगर॑ बन्धुमती नाम, बन्धुमान्‌ नाम क्षत्रियः।\nमाता बन्धुमती नाम, विपश्यिनों महर्षिण:/ महर्षे:॥830॥\nहिन्दी- आखब-रहित, राग-रहित, शान्त-चित्त और ध्यानी क्षेमा और उत्पलबर्णा ये दो अग्रश्नाविकायें होंगी,\nभगवान्‌ बुद्ध के उस बोधिवृक्ष को अश्वत्थ नाम से जाना जाता है॥826॥\nलिस और हस्ताललक नामक आग्र सेबक होंगे और नन्‍्दमाला तथा उत्तरा प्रधान सेचिकायें होंगी। इस\nयशस्वी गौतम की आयु सौ वर्ष की होगी। ननन्‍्दमाता और उत्तरा ये दो क होंगे तथा उस यशस्वी गौतम\nकी आयु सौ वर्ष की थी॥827॥\nऐसे बचन को सुनकर ध्यान में रहकर/....पूर्ववत्‌....) हम भगवान्‌ के सम्मुख हो जायेंगे॥328॥\nउनके वचन सुनकर मेरा चित्त प्रसन्नता से प्रफल्लित हो गया और इस दसपारमिताओं की पूर्ति हेतु मैंने\nब्त की अधिष्ठापना की॥829॥\nइन विषश्यी महर्षि का जन्मस्थान बन्धुमती था। बन्धुमान नामक राजा इन के पिता थे और इन की\nजननी माता बन्धुमती देवी थी॥830॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000049_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000049_devanagari_page_ocr_68cd21c661ee.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n263\n\nसंवण्णयिंसु, सामिअत्थवसेन पन “तव ममा”ति। सहसत्थे हि चतुत्थीछट्टीरूपानि सब्बथा\nविसदिसानि, सासने पन सदिसानि। तस्मा सासने सामज्ञेन पबत्तानि चतुत्थीछड्टीरूपानि\nसद्दसत्थे विसेसेन पवत्तेष्ठि चतुत्थीछट्टीरूपेहि समानगतिकानि कत्वा परेसमनुकम्पाय\nसम्पदानत्थे तुय्ह॑ मय्हंसद्वानं पवत्तिनियमों, सामिअत्थे च तव ममसुद्दानं पवत्तिनियमों\nदस्सितो। यस्मा पन परेसमनुकम्पाय अय॑ नियमो, तस्मा करुणायेवायंपराधो, न\nअद्भकथाचरियानं। ताय एव हि तेहि एवं संवण्णना कताति।\n\nकेचि पनेत्थ एवं वदेख्युं - ननु च भो अद्भछकथाचरियेहि सद्दनयं निस्साय ते मेसद्दानं\nसामिअत्थे वत्तमानानं “तव ममा”ति अत्थवचनेन “तुस्ह॑ मंसेन मेदेन, न मस्हे भरिया\nएसा\"तिआदीसु सामिविसयेस्‌ विभत्तिविपललासनयो दस्सितोति सक्‍का वत्तु, तथा सद्दनयड्ञेव\nनिस्साय ते मैसद्दानं सम्पदानत्थे वत्तमानानं “त���य्हं मय्ह'\"न्ति अत्थवचनेन “भत्तं तब न रुच्चति।\n'पब्बज्जा मस॒ रुच्चती”तिआदीसुपि सम्पदानविसयेसु विभत्तिविपललासनयो दस्सितोति सक्‍का\nवक्तुन्ति? न सक्‍का, गाथासु विय चुण्णियपदद्धानेपि तुय्हं मय्ह॑ तब ममसद्दानं अनियमेन द्वीसु\nअत्थेसु पवत्तनतो। न हि ईदिसे ठाने गाथाय॑ वा चुण्णियपदढद्राने वा विभक्तिविपल्लासो\nइच्छितब्बो। “तस्स रज्जस्सहं भीतों। किं नु खो अहं तस्स सुखस्स भायामी”तिआदीसुयेव पन\nठानेसु इच्छितब्बो।\n\nयदि सद्दनयं निससाय “तुय्ह॑ मंसेन मेदेना”तिआदीसु विभत्तिविपललासो इच्छितब्बो\nसिया, “ब्राह्मणस्स पियपुत्तदानं अदासि। ब्राह्मणस्स पिता अदासी”तिआदीसुपि सद्दनय॑\nजिरसाय “ब्राह्मणाथा/तिआदिना विभक्तिविषल्‍लासत्यो वत्ननीयों सिया चतत्वीछद्रीरूपान सत्य\nविसुं वचनतो। एवजच सति को दोसोति चे? अत्थेव दोसो, यस्मा दानयोगे वा नमोयोगे वा\nआयादेससहितानि चतुत्थीछट्टीरूपानि साट्ठकथे तेपिटके बुद्धवचने नुपलब्भन्ति, तस्मा\n“ब्राह्मणाया\"तिआदिना विभत्तिविपल्‍लासत्थवचने अयं दोसो यदिदं अविज्जमानग्गहणं। यस्मा\nपन ईदिसेसु ठानेसु विभत्तिविपल्लासकरणं सावज्जं, तस्मा “तुख्हं मंसेन मेदेना”तिआदीसुषि\nविभत्तिविपललासो न इच्छितब्बो।\n\nचतुस्थीछड़ी रूपानि हि अनउ्ञानि दिस्सच्ति “पुरिसस्स अदासि, पुरिसस्स धर्न ब्राह्मणान॑\nअदासि, ब्राह्मणानं सन्‍्तक”न्ति। तथा हि पावचने स नंसद्दा सम्पदानसामिअत्थेसु सामज्ेन\nपवत्तन्ति, तप्पवत्ति “अग्गस्स दाता मेधावी”तिआदीहि पयोगेषह्ि दीपेतब्बा। “अग्गस्स दाता\nमेधाबी”ति एत्थ हि “अग्गस्सा”ति अय॑ सद्दो यदा क्रियापटिग्गहणं पटिच्च सम्पदानत्थे"} +{"id": "indic_deva_eval_000050_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000050_indic_vision_bench_deva_ocr_f3f2d648622a.jpg", "ocr": "साबरमती नहीं सब्र मति\nमाणूस गुजरातला जातो नि त्यास महात्मा गांधींची आठवण होत नाही असं सहसा घडत नाही. गुजरातला जायचं ठरल्यावर मी महात्मा गांधींचा साबरमती आश्रम पाहायचं ठरवून टाकलं होतं. किंबहुना गुजरात विद्यापीठातील बैठकीचं निमंत्रण न टाळण्याचे मुख्य कारण साबरमती आश्रमच होतं.\nसंथ वाहणाऱ्या साबरमती नदीच्या किनारीच महात्मा गांधींनी आश्रम का स्थापला तेथपासून तिथल्या सर्व प्रयोगांची साद्यंत माहिती आपणास गांधी स्मारक संग्रहालय देतं.भारतीय स्वातंत्र्याचा साक्षीदार असणारा ह��� सत्याग्रह आश्रम अधिक चांगला ठेवला पाहिजे असा तो सारा परिसर पाहून माझी खात्री झाली.\n'हृदयकुंज' ही खरी बापू कुटी. तिथं बापूंची खोली, स्वयंपाक घर, बैठक हे सारं त्या काळात इतिहास म्हणून नेत असलं तरी तिची मांडणी अधिक सजीव व्हायला हवी. तिथं अनेक खलबतं, भेटी, निर्णय झाले ते सचित्र जिवंत करता येईल. कस्तुरबांच्या खोलीची ओळख नुसत्या तिथल्या एका पाटीनंच होते. सारी खोली रिकामी... स्त्रीकडे पाहण्याचा भारतीय दृष्टिकोनाचा हा तर सज्जण नि सलज्ज पुरावाच! तीच गोष्ट मीराबेन नि विनोबांच्या कुटीची!! आपल्या कल्पना दारिद्रयाचं नि उदासिन वृत्तीचं ते प्रतीक! मिठाच्या सत्याग्रहाच्या दांडी यात्रेची गंगोत्री समजल्या जाणारा हा आश्रम... अवघ्या तपभरानंतर आपल्या स्थापनेची (२०१९) शताब्दी साजरी करेल, पण तोवर इतिहास फार पुसट होऊन जाईल...!\nजाणिवांची आरास/३५"} +{"id": "indic_deva_eval_000051_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000051_hindi_handwritten_word_ocr_fa3573f07f74.jpg", "ocr": "रुप"} +{"id": "indic_deva_eval_000052_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000052_indic_vision_bench_deva_ocr_aa9d1fd7ce43.jpg", "ocr": "४७.\n'तंत्रज्ञानाचे अग्निदिव्य'\n२२५\n४८.\nलोकमताच्या कौलाची दिशा\n२३०\n४९.\nसीता वनवासीच आहे अजून\n२३३\n५०.\nनेपाळमधील शाही शिरकाणाचा इशारा\n२३७\n५१.\nग्रामोद्धारक - शबनम ते संगणक\n२४०\n५२.\nसरकारी आतंकवाद\n२४५\n५३.\n'बिनपरती' ते 'परिवर्तनीय'\n२५१\n५४.\nनर्मदा आंदोलनाची जलसमाधी\n२५५\n५५.\nकेल्याने होत आहे रे\n२६१\n५६.\n'काळ आई'ला 'सोनेरी प्रणाम'\n२६४\n५७.\nधिस् हॅपन्स् ओन्ली इन इंडिया!\n२६८\n५८.\nधर्मांतरातील प्रियाराधण\n२७२\n५९.\nप्रत्येकाच्या मनातील 'बंगारू'\n२७७\n६०.\nपंतप्रधानांच्या घोषणेतील चार मोठी आव्हाने\n२८२\n६१.\nअटल बिहारी वाजपेयींची नवी तरुणाई\n२८५\n६२.\nघातपाती आणि घायकुती\n२८९\n६३.\nलादेन विरुद्ध दाऊद इब्राहीम\n२९६\n६४.\nतिसरे महायुद्ध - जागतिक यादवी\n३०१\n६५.\nइंडियन सरकारी आतंकवाद\n३०५\n६६.\nसरहद्दीविरहीत तिसऱ्या महायुद्धाच्या\nपहिल्या फेरीत सरशी ओसामाची\n३१२\n६७.\nराष्ट्रवादीच्या वल्गना- बहिष्कारासह खुला व्यापार!\n३१६\n***\nतेरा"} +{"id": "indic_deva_eval_000053_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000053_devanagari_page_ocr_b86a57c8ec41.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n47\n\nअविस्सन्तियकालाति-पत्तीसु द्वीसु भासित॑।\nबव्हत्ते बहुएकत्ते, ससंयोगं स्सथत्तयं॥\n“तुम्हे भविस्सथि\"'ज्वेतं, भविस्सन्तियतों मतं।\n“अभविस्सथ तुम्हे”ति, “अभविस्सथ सो”ति च।\nकालातिपत्तितो बुत्तं, एतडिहि वचनद्��यं॥\nभविस्सन्तियकालाति-पत्तीसु समुदीरितं।\nमज्झिमपुरिसद्वाने, ससंयोगं स्ससेयुगं॥\n“भविस्ससे त्व\"मिच्चेतं, “त्वं अभविस्ससे”ति च।\nइसानि तु पयोगानि, तत्थ विड्जू पकासये॥\nस्सब्हेद्ययं सेन युतं, स्संद्रयछच चतुक्‍्ककं।\nइदम्पि कथितं द्वीसु, यथारुतविभत्तिसु॥\n“भविस्सब्हे”ति बव्हत्ते, भविस्सन्तिकमज्झिमो।\nबव्हत्ते “अभविस्सब्हे”, कालातिपत्तिमज्झिमो॥\n“अविस्स\" इति एकत्ते, भविस्सन्तिकमुत्तमो।\n“अभविस्स”\"न्ति एकत्ते, कालातिपत्तिकुत्तमो॥\nइति वुत्तानि बुत्तेहि, बचनेहि समानत।\nअन्तेकल्लेत्ि ते सत्य, एकलालीसथा दिले॥\nसेसानि पड्चपज्ञास, असमानानि सब्बथा।\nएत॑ नयं गहेत्वान, वदे सब्बत्थ सम्भवाति॥\nअयमेत्थ समानासमानवसेन वचनसडूगहो।\nआगमलक्खणवसेन विभक्तिवचनसड्गहे एवं उपलक्खेतब्बं -\nभविस्सन्तीपरोक्खज्ज-तनीकालातिपत्तिसु।\nनिच्च क्‍्वचि क्वचा'निच्च, इकारागमनं भवे॥\nइकारागमनं तडिहि, परोक्‍्खाय॑ विभत्तियं।\nबव्हत्ते मज्िमद्भाने, बव्हत्ते चुत्तमे सिया।\nपरस्सपदं सन्‍्धाय, इदं वचनमीरितं॥\nउत्तमेकबचो चापि, नेतस्स अत्तनोपदे।"} +{"id": "indic_deva_eval_000054_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000054_devanagari_page_ocr_c8dd35fb0eca.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n369\n\nयस॑ इस्सरियं सुख।\n\nपहासि लोकचित्तडच,\n\nसुगतो भगवा ततो॥\n\nतथा खन्‍धायतनधातादिभेदे धम्मकोट्ठासे सब्बं पपउ्च सब्बं योगं सब्बं गन्थं सब्बं संयोजन\n\nसमुच्छिन्दित्वा अमत॑ धातुं समधिगच्छन्तो वमि उग्गिरि अनपेक्खों छड़यि न पच्चावमीति\nभगवा। अथ वा सब्बेषि कुसलाकुसले सावज्जानवज्जे हीनप्पणीते कण्हसुक्कसप्पटिभागे धम्मे\nअरियमग्गआणमुखेन वमि उग्गिरि अनपेक्खो परिच्चजि पजहीति भगवा।\n\nखन्‍धायतनधातादी,\n\nधम्मभेदा महेसिना।\n\nकण्हसुक्का यतो वन्ता,\n\nततोपषि बगवा मतो॥\n\nजातकट्ठकथायं पन हिमवाति पदस्स वमुधातुबसेनपि निष्फत्ति दस्सिता। तथा हि\n\nसम्भवजातकट्टकथायं “हिमवाति हिमपातसमये हिमयुत्तोति हिमवा। गिम्हकाले हिमं वमतीति\nहिमवा”ति वुत्त। एवं जातकट्ठकथायं “हिमवा”ति पदस्स वसमुधातुवसेनपि निष्फत्ति दस्सिता,\nअय॑ नयो ईदिसेस्‌ ठानेसुषि नेतब्बो। “गुणवागणवा”तिआदीसु पन न नेतब्बो। यदि नयेख्य,\n“गुणवा गणवा”ति पदानं “निग्गुणो परिहीनगुणो”ति एवमादिअत्थो भवेय्य, तस्मा अय॑ नयो\nसब्बत्थपि न नेतब्बो। एत्थ सिया “यदि “भगवा'तिआदिपदानं बमुधातुवसेन न���ष्फत्ति होति,\nकर्थ “भगवन्तो, भगवन्त”न्तिआदीनि सिज्ञन्ती”ति? यथा “भगवा”ति पदं निरुत्तिनयेन\nसिज्ञति, तथा तानिषि तेनेव सिज्ञन्ति। अचिन्तेय्यों हि निरुत्तिनयो केबलं\nअत्थयुत्तिपटिबन्धमत्तोव, अत्थयुत्तियं सति निष्फादेतुमसक्कुणेय्यानिषि रूपानि अनेनेव\nसिज्मन्ति। एत्थ च य॑ निरुत्तिलक्खणं आहरित्वा दस्सेतब्ब॑ सिया, त॑ उपरि\nरूपनिप्फादनाधिकारे उदाहरणेहि सद्धिं पकासेस्साम।\n\nइध सारमते सुनिराजमते,\n\nपरम पदुतं सुजनो पिहय॑।\n\nविपुलत्थधरं धनिनीतिमिमं,\nअजत॑ मतिसुद्धकरं॥\nइत्ति नवकूगे साड्ुकथ पिटकलये व्यप्पधगतीस विज्जन\nकोसल्लत्थाय कते सद्दनीतिप्पकरणे\nसरबग्गपड्चकन्तिको नाम धातुविभागो पन्‍नरसमों परिच्छेदो।"} +{"id": "indic_deva_eval_000055_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000055_indic_mozhi_deva_word_ocr_7fe3de1e84a9.jpg", "ocr": "येतील"} +{"id": "indic_deva_eval_000056_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000056_hindi_handwritten_word_ocr_cdf8b0459b3e.jpg", "ocr": "चुनने"} +{"id": "indic_deva_eval_000057_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000057_indic_mozhi_deva_word_ocr_883f14a4304a.jpg", "ocr": "रूढ़िगत"} +{"id": "indic_deva_eval_000058_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000058_devanagari_page_ocr_75b23fb3cb04.jpg", "ocr": "20\n\nअपदानपालि\n\n40. खोमदायकत्थेरअपदानं\n“नगरे बन्धुमतिया, अहोसिं वाणिजो तदा।\nतेनेव दारं पोसेमि, रोपेमि बीजसम्पदं॥987॥\n“रथियं पटिपन्नस्स, विपस्सिस्स महेसिनो।\nएक॑ खोम॑ मया दिनन॑, कुसलत्थाय सत्थुनो॥988॥\n>एकनव॒त्तितों काप्से, य॑ खोससददिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, खोमदानस्सिदं फलं॥989॥\n“सत्तरसे [सत्तवीसे (सी० स्या०)] इतो कप्पे, एको सिन्धवसन्धनो।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चतुदीपम्हि इस्सरो॥990॥\n\n“नगर्याँ बन्धुमत्याम्‌, अभूव॑ वाणिजस्तदा।\nतेलैब दार॑ पोषयामि, रोपयामि बीजसम्पदम्‌॥987॥\n\n“रथोडय॑ प्रतिपन्‍नस्य, विपश्यिनो महर्पे:।\nएक॑ क्षौम॑ मया दत्तम्‌, कुशलार्थाय शास्त्रे॥988॥\n“एकनवतितमे कल्पे, यत्‌ क्षौसददां तदा।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, क्षौमदानस्येदं फलम्‌॥989॥\n“सम्र्विंशत्तमे कल्पे, एक: सैन्धवसन्धनः।\nसप्तरतसम्पन्न:, चतुरद्धीपिषु ईश्वरः॥990॥\n\nउस समय मैं बन्धुमति नामक नगर में एक व्यापारी था, उसी व्यापार से मैं अपनी स्त्री का\n\nभरण-पोषण व बीजसम्पदा का रोपण करता था॥987॥\n\nतब महारथी, प्रतिपन्न, विपश्यी तथा महर्षि शास्ता को मैंने एक रेशमी वस्त्र प्रदान\n\nकिया॥988॥\n\n97 वें कल्प में मेरे द्वारा जो क्षौम (रेशमी वस्त्र) प्रदान किया गया था उसी का यह सुफल\n\nकि आज मैं दुर्गति को नही��� जानता॥989॥\n\nअब से 27 बें कल्प में मैं सैन्धव, धन-सम्पत्ति ब ससरल्न सम्पन्न चारों द्वीपों का स्वामी\n\nइुआ॥990॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000059_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000059_indic_mozhi_deva_word_ocr_974d215ba569.jpg", "ocr": "दृढ़"} +{"id": "indic_deva_eval_000060_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000060_devanagari_page_ocr_ce826519458d.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n366- न्‍\n\nअजञाय॑ पाकछ्ि “ओमाति भन्‍्ते भगवा इद्धिया मनोमयेन कायेन ब्रह्मलोकं\n'उपसड्कमितु”न्ति। तत्थ ओमातीति पहोति सक्‍कोति।\n\nतिमु अद्दभावे। अद्दभावो तिन्‍तभावो। तेमति। तिन्‍तो, तेमियो। तेमितुकामा तेमिंसु।\n\nएल्थ तेमियोति एवंनामको कासिरज्ञो पुत्तो बोधिसत्तो। सो हि रज्जो चेव महाजनस्स च\nहृदयं तेमेन्तो अद्दभाव॑ पापेन्‍्तो सीतलभावं जनेन्तो जातोति “तेमियो”ति बुच्चति।\n\nनितमि किलमने। नितम्मति। हदयं दय्हते नितम्मामि।\n\nचमु छमु जपु झमु उमु जिमु अदने। चमति। चमू। चमूति सेन्ा। छमति। जमति। झमति।\nउमति। जेमति।\n\nकमु पदविक्खेपे। पदविक्खेपो पदसा गमनं। इदं पन वोहारसीसमत्तं वचन, तस्मा “नास्स\nकाये अग्गि वा बिसं वा सत्थं बा कमती”तिआदीसु अपदबिक्खेपत्थोषि गह्ेतब्बो। कमति।\nचड्नकमति, अतिककमति। अभिककमति। पटिक्कमति। पक्‍कमति। परक्‍्कमति। विक्कमति।\nनिक्‍कमति। सड्कमति। सड्कमनं। सड्कन्ति। कमनं। चड्कमनं। अतिक्‍्कमो। अभिककमों।\n\n'पटिक्कमसो। पक्‍कमो। विक्कमो। निक्‍कमो। अतिक्कन्‍्तो पुरिसो। अभिककनन्‍्ता रतक्ति। निक्खमति।\nअभिनिक्खमति। कारिते निक्‍्खामेति। अड्ञानिपि योजेतब्बानि। यस्मा पनायं धातु चुरादिगणं\n\nपत्वा इच्छाकन्ति यत्थेसु वत्तति, तस्मा तेषि अत्थे उपसग्गविसेसिते\nअभिक्‍कन्‍्तसहस्स अत्थुद्धारं वत्तब्बम्पि अवत्वा उपरि चुरादिगणेयेव कथेस्साम।\n\nयमु उपरमे। उपरमो विरमनं। यमशि। यमो। “परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे”ति\nइदमेत्थ निदस्सनं। तत्थ यमामसेति उपरमाम, नस्साम, मरामाति अत्थो।\n\nनम बहुत्ते सद्दे। बहुत्तो सद्दो नाम उग्गतसद्दों। नमति।\n\nअम दम हम्म मिम छम गतिम्हि। अमति। दमति। हम्मति। मिमति। छमति। छमा।\n\nछमाति पथवी। छमासद्दो इत्थिलिड्नगो दद्ठब्बो, “न छमाय॑ं निसीदित्वा आसने निसिन्‍नस्स\nअगिलानस्स धम्मं देसेस्सामीति सिक्‍्खा करणीया”ति च “छमायं परिवत्तामि वारिचरोब\nचम्मे”ति च पयोगदस्सनतो। सो च खो सत्तहि अद्ठहि वा विभत्तीहि द्वीसु च वचनेसु योजेतब्बो।\nऋछमन्ति गच्छन्ति एत्थाति छमा।\n\nधरम सदग्गिसं योगेसु। धमधातु सद्दे च मुखबातेन सद्धिं अग्गिसंयोगे च बत्तति। तत्थ\n'पठमत्थे “सड्खं धमति। सड्खधमको। भेरिं धमति। भेरिधमको। धमे धमे नातिधमे”ति पयोगो।\nदुतियत्थे “अग्गि धमति। समुद्ठापेति अत्तानं, अणुं अग्गिव सन्धम\"न्ति पयोगो।\n\nभाम कोधघे। भामति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000061_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000061_indic_vision_bench_deva_ocr_380de93babec.jpg", "ocr": "स्वप्नांचे वेड हा ज्याच्या स्वभावाचा स्थायीभावच असतो, त्याला मग नवे स्वप्न शोधावे लागते, नसले तर नवे निर्माण केल्याशिवाय त्याला चैनच पडत नाही. स्वप्नांशिवाय असा माणूस जगूच शकत नाही.\nखरे म्हणजे आपणही, सर्वसामान्य माणसेही कुठलीतरी स्वप्ने उराशी बाळगल्याशिवाय जगत नसतो.\nकुणाची स्वप्ने लहान, कुणाची मोठी.\nजेवढी स्वप्ने मोठी तेवढे स्वप्नभंगाचे दुःखहीं मोठे.\nपण दुःख मोठे, म्हणून स्वप्नांचे वेड सोडून देता येत नाही.\nआपले जीवनच स्वप्नांशिवाय अशक्य असते.\nआणि ‘मानवी स्वातंत्र्य' हे आजवर माणसाला पडत आलेले सर्वात मोठे, सर्वात सुंदर असे स्वप्न नाही का?\nमानव जन्माला आला तेव्हापासून या स्वप्नामागे तो धावत राहिलेला आहे.\nमग प्राचीन काळी या स्वप्नाला मोक्ष म्हणत असतील. आपण अर्वाचीन याला मुक्ती म्हणत असू.\nया स्वप्नामागे धावण्याचे मार्ग वेगवेगळे असतील.\nपण प्रेरणा, ध्यास एकच. हा बंधनात अडकलेला मानव मोकळा, स्वतंत्र कसा होईल,राहील.\nबंधने तरी किती प्रकारची !\nबंधने निसर्गाची !\nबंधने परिस्थितीची - माणसाने माणसांवर लादलेली.\nबंधने स्वतःची, आपल्या प्रकृतिधर्माची.\nया सर्व बंधनातून माणसाला पार करत करत न्यायचे. माणसाने जायचे. किती लांबचा प्रवास. तांडा किती तरी मोठा. प्रवास धोक्याचा, प्रचंड गोंधळाचा.\nअनेकदा हा प्रवास ज्यासाठी चालू आहे तो हेतूच विसरला जातो. स्वप्नच हरवते. मग कुणी मार्क्स, कुणी गांधी येतो. पायात थोडे बळ, स्वप्नाची आठवण देऊन जातो.\nकुणी रॉय येतो. पायात बळ देण्याची विद्या त्याला अवगत नसते.\nपण तो स्वप्नांची आठवण करून देतो. प्रवासाचा हेतू सांगत राहतो.\nतळ नाही तोवर बळ नाही । १३५"} +{"id": "indic_deva_eval_000062_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000062_devanagari_page_ocr_f778d549fef5.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 485\n\n३५४. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये लोकुत्तरं झानं भावेति निय्यानिकं अपचयगामिं\nदिद्विगतान॑ पहानाय पठमाय भूमिया पत्तिया विविच्चेव कामेहि. ..पे*... पठम॑ झानं\nउपसम्पज्ज विहरति सुखपटिपदं दन्धाभिज्ञ अप्पणिहितं, तस्मिं समये फस्सो होति...पे*...\nअविक्खेपो होति. ..पे*... इमे धम्मा कुसला।\n\n३५५. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये लोकुत्तरं झानं भावेति निय्यानिकं अपचयगामिं\nविद्धिगतान॑ पहानाय पठमाय भूमिया पत्तिया विविच्वेब कामेहि...पे*... पठम॑ झानं॑\nउपसम्पज्ज विहरति सुखपटिपदं खिप्पाभिज्ञं अप्पणिहितं, तस्मिं समये फस्सो होति...पे*...\nअविक्खेपो होति. ..पे*... इमे धम्मा कुसला।\n\n३५६. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये लोकुत्तरं झानं भावेति निय्यानिकं अपचयगामिं\nदिद्विगतान॑ पहानाय पठमाय भूमिया पत्तिया वितक्‍्कविचारानं वूपसमा...पे*... दुतियं झानं\nत्लस्कृतच्छाया) ३५७. कतमे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये लोकोत्तरं ध्यानं भावयति नै्याणिकम्‌\nअपचयगामिन दृष्टिगतानां प्रहाणाय प्रथमाया: भूम्या: प्राम्ये विविच्यैव कामेभ्य: ...पे*... प्रथम\nध्यानमुपसम्पद्य बिहरति सुखप्रतिपद॑ं तन्द्राभिज्ञम्‌ अप्रणिहितम्‌, तस्मिन्‌ समये स्पर्शों भबति, ...पे*\nअविक्षेपो भवति ...पे*... इसमे धर्मा: कुशला:।\n\n३५५. कतमे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये लोकोत्तरं ध्यानं भावयति नै्याणिकम्‌ अपचयगामिन\nदृष्टिगतानां प्रहाणाय प्रथमाया: भूम्या: प्रास्‍्यै विविच्यैव कामेभ्य: ...पे*... प्रथम ध्यानमुपसम्पग्य\nबिहरति सुखप्रतिपद क्षिप्राभिज्ञम्‌ अप्रणिहितम्‌, तस्मिन्‌ समये स्पर्शों भवति, ...पे*... अविक्षेपो भवति\n\nचे*... इसे धर्मा: कुशला:।\n\n३७६. कतसे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये लोकोत्तरं ध्यान भावयति नै्याणिकम्‌ अपचयगामिन\nड्छिगतानां प्रह्मणाय प्रथमाया: अम्या: प्रास्ये वितर्कविचारयो: व्यपशमात्‌ ...पे*... द्वितीय ध्यानम्‌\nकहेन्क) इए ० कोन से बने कुशल हैं? जिस समय नैर्याणिक एवं अपचयगामी लोकोत्तर ध्यान की मिथ्यादृष्टियों के\nप्राण हेतु तथा प्रथम भूमि की प्राप्ति हेतु भावना करता है, काम-भोगों को छोड़कर ...पूर्वबत्‌... प्रथम ध्यान को\nप्राम्कर सुखप्रतिपद तन्‍्द्राभिज्ञा अप्रणिहित के साथ बिहार करता है, उस समय स्पर्श होता है ...पूर्ववत्‌...\nअविक्षेप होता है ...पूर्ववत्‌... ये धर्म कुशल हैं।\n\n३५५. कौन से धर्म कुशल हैं? जिस समय नैर्याणिक (मार्गफल आदि को जानते हुए जाने बाला) एवं\nअपचयगामी ध्यान की मिथ्यादृष्टियों के प्रहाण हेतु तथा प्रथम भूमि की प्राप्ति हेतु भावना करता है,\nकाम-भोगों को छोड़कर ...पूर्वबत्‌... सुखप्रतिपद तन्द्राभिज्ञा अप्रणिह्ठित वाले प्रथम ध्यान को प्राप्तकर विहार\n\nकरता है, उस समय स्पर्श होता है ...पूर्ववत्‌... अविक्षेप होता है ...पूर्वबत्‌... ये धर्म कुशल हैं।\n३५६. कौन से धर्म कुशल हैं? जिस समय नै्याणिक एवं अपचयगामी लोकोत्तर ध्यान की मिथ्यादृष्टियों"} +{"id": "indic_deva_eval_000063_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000063_indic_vision_bench_deva_ocr_f6848577a7aa.jpg", "ocr": "गोदान : 173\n'हां, बेची है।'\n'तुम्हारा यही वादा तो था कि ऊख बेचकर रुपया दूंगा।'\n'हां, था तो।'\n'फिर क्यों नहीं देते! और सब लोगों को दिए हैं कि नहीं?'\n'हां, दिए हैं।'\n'तो मुझे क्यों नहीं देते?'\n'मेरे पास अब जो कुछ बचा है, वह बाल-बच्चों के लिए है।'\nपटेश्वरी ने बिगड़कर कहा-तुम रुपये दोगे, सोभा और हाथ जोड़कर और आज ही। हां, अभी जितना चाहो, बहक लो। एक रपट में जाओगे छ: महीने को, पूरे छ: महीने को, न एक दिन बेस, न एक दिन कम, यह जो नित्य जुआ खेलते हो, वह एक रपट में निकल जायगा। मैं जमींदार या महाजन का नौकर नहीं हूं, सरकार बहादुर का नौकर हूं, जिसका दुनिया-भर में राज है और जो तुम्हारे महाजन और जमींदार दोनों का मालिक है।\nपटेश्वरीलाल आगे बढ़ गए। सोभा और होरी कुछ दूर चुपचाप चले। मानो इस धिक्कार\nने उन्हें संज्ञाहीन कर दिया हो। तब होरी ने कहा-सोभा, इसके रुपये दे दो। समझ लो, ऊख में आग लग गई थी। मैंने भी यही सोचकर, मन को समझाया है।\nसोभा ने आहत हंठ से कहा-हां, दे दूंगा दादा! न दूंगा तो जाऊंगा कहां?\nसामने से गिरधर ताड़ी पिए झूमता चला आ रहा था। दोनों को देखकर बोला-झिंगुरिया\nने सारे का सारा ले लिया होरी काका! चबेना को भी एक पैसा न छोड़ा। हत्यारा कहीं का। रोया, गिड़गिड़ाया, पर इस पापी को दया न आई।\nशोभा ने कहा-ताड़ी तो पिए हुए हो, उस पर कहते हो, एक पैसा भी न छोड़ा!\nगिरधर ने पेट दिखाकर कहा-सांझ हो गई, जो पानी की बूंद भी कंठ तले गई हो, तो गो-मांस बराबर। एक इकन्नी मुंह में दबा ली थी। उसकी ताड़ी पी ली। सोचा, साल-भर पसीना गारा है, तो एक दिन ताड़ी तो पी लूं, मगर सच कहता हूं, नसा नहीं है। एक आने में क्या नसा होगा? हां, झूम रहा हूं जिसमें लोग समझें, खूब पिए हुए है। बड़ा अच्छा हुआ काका, बेबाकी हो गई। बीस लिए, उसके एक सौ साठ भरे, कुछ हद है।\nहोरी घर पहुंचा, तो रूपा पानी लेकर दौड़ी, सोना चिलम भर लाई, धनिया ने चबेना और नमक लाकर रख दिया और सभी आशा-भरी आंखों से उसकी ओर ताकने लगीं। झुनिया भी चौखट पर आ खड़ी हुई थी। होरी उदास बैठा था। कैसे मुंह-हाथ धोए, कैसे चबेना खाए। ऐसा लज्जित और ग्लानित था, मानो हत्या करके आया हो।\nधनिया ने पूछा-कितने की तौल हुई?\n'एक सौ बीस मिले, पर सब वहीं लुट गएधेला भी न बचा।'\nधनिया सिर से पांव तक भस्म हो उठी। मन में ऐसा उद्वेग उठा कि अपना मुंह नोंच ले। बोली-तुम जैसा घामड़ आदमी भगवान् ने क्यों रचा, कहीं मिलते तो उनसे पूछती। तुम्हारे साथ सारी जिंदगी तलख हो गई, भगवान् मौत भी नहीं देते कि जंजाल से जान छूटे। उठाकर सारे रुपये बहनोइयों को दे दिए। अब और कौन आमदनी है, जिससे गोई आएगी? हल में क्या मुझे जोतो, या आप जुतोगे? मैं कहती हूं, तुम बूढ़े हुए, तुम्हें इतनी अक्ल भी नहीं आई कि गोई-भर के रुपये तो निकाल लेते। कोई तुम्हारे हाथ से छीन थोड़े लेता। पूस की यह ठंड और"} +{"id": "indic_deva_eval_000064_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000064_indic_vision_bench_deva_ocr_1c4ecf3c9a54.jpg", "ocr": "६३८\nहिंदी-साहित्य का इतिहास\nकौने भेजौं दूत पूत सों विद्या सुनावै।\nबातन में बहराह जाए ताको यह लावै॥\nत्यागि मधुपुरी को गयो छाँड़ि सबन के साथ।\nसात समुंदर पै भयो दूर द्वारकानाथ॥\nजाइगो को उहाँ?\nनित नव परत अकाल, काल को चलत चक्र चहुँ।\nजीवन को आनंद न देख्यो जात यहाँ कहुँ॥\nबढ्यो यथेच्छाचारकृत जहँ देखौ तहँ राज।\nहोत जात दुर्बल विकृत दिन दिन आर्य-समाज॥\nदिनन के फेर सों।\nजे तजिं मातृभूमि सों ममता होत प्रवासी।\nतिन्है बिदेसी तंग करत है विपदा खासी॥\nx\n⁠\nx\n⁠\nx\n⁠\nx\n⁠\nनारी शिक्षा अनादरत जे लोग अनारी।\nते स्वदेश-अवनति-प्रंचड-पातक-अधिकारी॥\nनिरखि हाल मेरो प्रथम लेहु समुझि सब कोइ।\nविद्याबल लहि मति परम अबला सबला होइ॥\nलखौं अजमाई कै।\n(भ्रमरदूत)\n⁠\nभयो क्यों अनचाहत को संग?\nसब जग के तुम दीपक, मोहन! प्रेमी हमहूँ पतंग।\nलखि तव दीपति, देह-शिखा में निरत, विरह लौ लागी॥\nखींचति आप सो आप उतहि यह, ऐसी प्रकृति अभागी।\nयदपि सनेह-भरी तब बतियाँ, तउ अचरज की बात।\nयोग वियोग दोउन में इक सम नित्य जरावत गात॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000065_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000065_indic_mozhi_deva_word_ocr_7ace6030ee59.jpg", "ocr": "यायचा."} +{"id": "indic_deva_eval_000066_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000066_indic_vision_bench_deva_ocr_555082f0ef4b.jpg", "ocr": "\nआमची संस्कृती / १५\nबुद्धाच्या प्रेरणेने हे कमी झाले म्हणावे तर ब्रह्मदेश, चीन व जपान ह्या देशांतून शेकडो बौद्धधर्मानुयायी गायीचे मांस खातात. जैन धर्माच्या प्रेरणेने म्हणावे तर जैनांना सर्वच प्राण्यांचे मांस वर्ज���य आहे. एका काळी गायीला हिंदू पूज्य मानीत; पण तेव्हासुद्धा मृत जनावर खाणाऱ्या काही जाती हिंदू समाजात होत्याच. म्हणजे मांस खाण्यासाठी गाय किंवा बैल किंवा वासरू मारू नये- ती मेलेली असल्यास खाण्यास प्रत्यवाय नाही, असे दिसते. गायीचे दुभते म्हशीपेक्षा चांगले असते व बैल शेतीच्या अत्यंत उपयोगी आहे, ह्या दृष्टीने पाहिले तर, ज्या देशात गोमांस खातात तेथे गायीच्या दुभत्याची काळजी भारतापेक्षा जास्त घेतली जाते व तेथे बैलांची निपजही चांगली होते. गोमांस खाल्ल्याने ह्या दोन्ही गोष्टींना बाधा येण्याचे कारण नाही. एकच कारण राहते; ते म्हणजे सध्या काही लोकांना गाय इतकी पूज्य वाटते की, तिचे मांस खाण्याची कल्पनाही त्यांना सहन होत नाही! काही लोकांना काही गोष्टी आवडत नाहीत, तर त्यांच्या आवडीनिवडीला समाजाने कितपत मान तुकवावी असा प्रश्न उरतो. काही लोकांना मशिदीवरून वाद्ये वाजत गेलेली आवडत नाहीत; इतर देशांतून ती वाजवलेली चालतात. अशा वेळी एका वेळच्या जेतेपणाच्या रगीमुळे बसवलेला हा नियम समाजातील इतर लोकांनी पाळावा का? म्हणजे हे प्रश्न संस्कृतीचे नसून रोजच्या व्यावहारिक देवघेवीचे आहेत. इच्छा असली तर दोन्हींतूनही सर्वांना रुचेल अशी वाट काढणे शक्य आहे. पण सत्तेसाठी राजकीय प्रचारच करावयाचा असल्यास अर्थात तडजोड होणे शक्य नाही. मात्र ह्या सर्व भानगडीत बिचाऱ्या भारतीय संस्कृतीचा काडीमात्र संबंध नाही, हे विचारशील माणसाला पटण्यासारखे आहे.\nसंस्कृतिपरिवर्तनाचा मंत्र\nसंस्कृती बदलत जाते. म्हणजे बदल झाला की, संस्कृती बिघडली असे नव्हे. काही बदल चांगल्यासाठी होतात, काही वाईटासाठी होतात. म्हणून केवळ बदल झाला यासाठी ओरड करणे जसे योग्य होणार नाही, तसेच बदल झालाच पाहिजे यासाठी अट्टाहास करणेही योग्य होणार नाही. समाजसुधारक व राजकारणी पुरुष जाणूनबुजून समाजाला वळण लावण्याचा व सांस्कृतिक प्रवाह बदलण्याचा प्रयत्न करीत असतात. पण"} +{"id": "indic_deva_eval_000067_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000067_indic_mozhi_deva_word_ocr_0d736f243555.jpg", "ocr": "समय"} +{"id": "indic_deva_eval_000068_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000068_indic_vision_bench_deva_ocr_4b7d22064522.jpg", "ocr": "164 : प्रेमचंद रचनावली-6\n‘इसी का यह फल है कि आज आपका इतना सम्मान है। मैं एक प्रस्ताव करना चाहता हूं। मालूम नहीं, आप उसे स्वीकार करेंगे या नहीं। आप मेरी ओर से सौ आदमियों के नाम फ्री पत्र जारी कर दीजिए। चंदा मैं दे दूंगा।\nओंकारनाथ ने कृतज्ञता से सिर झुकाकर कहा-मैं धन्यवाद के साथ आपका दान स्वीकार करता हूं। खेद यही है कि पत्रों की ओर से जनता कितनी उदासीन है। स्कूल और कालिजों और मंदिरों के लिए धन की कमी नहीं है, पर आज तक एक भी ऐसा दानी न निकला, जो पत्रों के प्रचार के लिए दान देता, हालांकि जन-शिक्षा का उद्देश्य जितने कम खर्च में पत्रों से पूरा हो सकता है, और किसी तरह नहीं हो सकता है जैसे शिक्षालयों को संस्थाओं द्वारा सहायता मिला करती है, एसे ही अगर पत्रकारों को मिलने लगे, तो इन बेचारों को अपना जितना समय और स्थान विज्ञापनों की भेंट करना पड़ता है, वह क्यों करना पड़े? मैं आपका बड़ा अनुगृहीत हूं।\nरायसाहब बिदा हो गए। ओंकारनाथ के मुख पर प्रसन्नता की झलक न थी। रायसाहब ने किसी तरह की शर्त न की थी, कोई बंधन न लगाया था, पर ओंकारनाथ आज इतनी करारी फटकार पाकर भी इस दान को अस्वीकार न कर सके। परिस्थिति ऐसी आ पड़ी थी कि उन्हें उबरने का कोई उपाय ही न सूझ रहा था। प्रेस के कर्मचारियों का तीन महीने का वेतन बाकी पड़ा हुआ था। कागज वाले के एक हजार से ऊपर आ रहे थे, यही क्या कम था कि उन्हें हाथ नहीं फैलाना पड़ा।\nउनकी स्त्री गोमती ने आकर विद्रोह के स्वर में कहा-क्या अभी भोजन का समय नहीं आया, या यह भी कोई नियम है कि जब तक एक बज जाय, जगह से न उठो? कब तक कोई चूल्हा अगोरता रहे ?\nओंकारनाथ ने दु:खी आंखों से पत्नी की ओर देखा। गोमती का विद्रोह उड़ गया। वह उनकी कठिनाइयों को समझती थी। दूसरी महिलाओं के वस्त्राभूषण देखकर कभी-कभी उसके मन में विद्रोह के भाव जाग उठते थे और वह पति को दो-चार जली कटी सुना जाती थी, पर वास्तव में यह क्रोध उनके प्रति नहीं, अपने दुर्भाग्य के प्रति था, और इसकी थोड़ी-सी आंच अनायास ही ओंकारनाथ तक पहुंच जाती थी। वह उनका तपस्वी जीवन देखकर मन में कुढ़ती थी और उनसे सहानुभूति भी रखती थी। बस, उन्हें थोड़ा-सा सनकी समझती थी। उनका उदास मुंह देखकर पूछा-क्यों उदास हो, पेट में कुछ गड़बड़ है क्या?\nओंकारनाथ को मुस्कराना पड़-कौन उदास है, मैं? मुझे तो आज जितनी खुशी है, उतनी अपने विवाह के दिन भी न हुई थी। आज सबेरे पंद्रह सौ की बोहनी हुई। किसी भाग्यवान् का मुंह देखा था।\nगोमती को विश्वास न आया, बोली-झूठे हो, तुम्हें पंद्रह सौ कहां मिल जाते हैं? पंद्रह रुपये कहो, मान लेती हूं।\n'नहीं-नहीं, तुम्हारे सिर की कसम, पंद्रह सौ मारे। अभी रायसाहब आए थे। सौ ग्राहकों का चंदा अपनी तरफ से देने का वचन दे गए हैं।'\nगोमती का चेहरा उतर गया-तो मिल चुके!\n'नहीं, रायसाहब वादे के पक्के हैं।'\n‘मैंने किसी ताल्लुकेदार को वादे का पक्का देखा ही नहीं। दादा एक ताल्लुकेदार के नौकर"} +{"id": "indic_deva_eval_000069_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000069_indic_mozhi_deva_word_ocr_f7e898bc6cd3.jpg", "ocr": "गाणे"} +{"id": "indic_deva_eval_000070_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000070_indic_mozhi_deva_word_ocr_7b46612a75b8.jpg", "ocr": "मान्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000071_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000071_indic_mozhi_deva_word_ocr_06a42bcfbab8.jpg", "ocr": "दर्शन"} +{"id": "indic_deva_eval_000072_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000072_indic_mozhi_deva_word_ocr_0a7f4c1fc77b.jpg", "ocr": "त्याच"} +{"id": "indic_deva_eval_000073_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000073_devanagari_page_ocr_5ec6a3be3b41.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n89\n\nदूरक्वानेपि रस्सत्त, “जनिन्द''इति दिस्सति।\nन कत्थचिपि दीघत्तं, इति नीति मया मता॥\n\nइदम्पेत्थ वक्तब्ब॑ “कुतों नु भो इदमसायात॑ “दूसक्॒स्सालपनं अदूरद्रस्सालपनमि'ति\"?\nसद्दसत्थतो। सच्दस॒त्थं नाम न सब्बसो बुद्धवचनस्सोपकारकं,\n\nइमस्मिं पकरणे “बहुवचन”न्ति वा “पुथुवचन”न्ति वा “अनेकवचन\"”न्ति वा अत्थतो एकं,\nब्यड्जनमेव नान॑, तस्मा सब्बत्थ “बहुवचन”न्ति वा “पुथुवचन\"न्ति वा “अनेकवचन\"न्ति वा\nवोहारो कातब्बो, पुथुवचन॑ अनेकवचनन्ति च इद॑ सासने निरुत्तज्जून॑ वोहारो, इतरं\nसद्दसत्थविदूनं।\n\nकस्मा पन इसस्मिं पकरणे द्विवचन न वुत्तन्ति? यस्मा बुद्धवचने द्विवचन नाम नत्थि,\nतस्मा न वुत्तन्ति। ननु बुद्धवचने वचनत्तयं अत्थि, तथा हि “आयस्मा”ति इदं एकबचनं,\n“आयस्मन्ता”ति इदं द्विबचनं, “आयस्मन्तो”ति इदं बहबचनन्ति? तन्‍न, यदि “आयस्मन्ता”ति\nइद॑ वचन द्विवचन भवेय्य, “पुरिसो पुरिसा”तिआदीसु कतरं द्विवचनन्ति वदेय्याथ, तस्मा\nबुद्धवचने द्विवचनन नाम नत्थि। तेनेव हि सि यो अं यो ना हीतिआदिना एकवचनबह॒वचनानेव\nदस्सितानीति।\n\nननु च भो “सुणन्तु मे आयस्मन्ता, अज्ज उपोसथो पन्‍नरसो। यदायस्मन्तानं पत्तकल्लं, मय॑\nअज्ञमऊ्जं पारिसुद्धिउपोसथ्थ करेय्यामा”ति पाछियं द्वे सन्‍्धाय “आयस्मन्ता”ति चुत्तं, “उद्दिद्ा\nखो आयस्मन्तो चत्तारों पाराजिका धम्मा”तिआदीसु पन पाव्ठीसु बहबो सन्धाय\n“आयस्मन्तो”\"ति बुत्तं, न च सकक्‍का वच्तुं “यथा तथा बुत्त”न्ति, परिबासादिआरोचनेपि\nअद्भकथाचरियेहि विज्ञातसुगताधिप्पायेहि “द्विन्‍्न॑ आरोचेन्तेन 'आयस्मन्ता धारेन्तू'ति, तिण्णं\nआरोचेन्तेन 'आयस्मन्तो धारेन्‍्तू'ति बत्तब्ब”न्ति बुत्तत्ताति? सच्च॑ वुत्त, तं पन विनयवोहारवसेन\nबुत्तन्ति। ननु विनयो बुद्धवचनं, कस्मा “बुछधवचने द्विवचन नाम नत्थी”ति वद्थाति? सच्च\nविनयो _ बुद्धवचनं,. तथापि विनयकम्मवसेन चुत्तत्ता उपलक्खणमत्तं, न\nसब्बसाधारणबहुबचनपरियापन्‍नं। यदि हि “आयस्मन्ता”ति इदं द्विबचनं सिया, तप्पयोगानिपि\nक्रियापदानि द्विवचनानेव सियुं, तथारूपानिपि क्रियापदानि न सन्ति। न हि\nअक्खरसमयकोविदो झानलाभीपषि दिब्बचक्खुना वस्ससतम्पि वस्ससहस्सम्पि समवेक्खन्तो\nबुद्धवचने एकम्पि क्रियापदं द्विवचनन्ति पस्सेय्य, एवं क्रियापदेसु द्विवचचनस्साभावा नामिकपदेसु\n\nएकदेसेन पन होति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000074_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000074_indic_vision_bench_deva_ocr_7970e0f2c360.jpg", "ocr": "ठरवू शकत नाहीत, पंतप्रधानांचा व मंत्रिमंडळाचा त्यांच्या धोरणाला पाठिंबा असला पाहिजे हे कळण्याची पात्रता छगलांच्या टीकाकारांत खचित होती. परंतु सरकारवर प्रत्यक्ष टीका करण्याचे टाळण्यासाठी छगलांना टीकेचे लक्ष्य ठरविण्यात आले. या विधेयकाविरुद्ध अलीगढ ओल्ड बॉयज् असोसिएशनने सर्वोच्च न्यायालयात अर्ज केला व हे विद्यापीठ मुस्लिम समाजाचे आहे असे जाहीर करण्याची मागणी केली. सुप्रीम कोर्टाने हा अर्ज फेटाळून लावला व अलीगढ विद्यापीठ मुस्लिम समाजाच्या मालकीचे नाही असा निकाल दिला.\nउर्दूचा प्रश्न हा असाच मुस्लिम समाजाच्या आंदोलनाचा एक विषय बनवून ठेवण्यात आला आहे. उत्तर प्रदेश आणि बिहार यांसारख्या राज्यांत जिथे मुस्लिमांची मातृभाषा उर्दू आहे तेथे उर्दू भाषेचे आपल्याला शिक्षण मिळाले पाहिजे ही मुस्लिम समाजाकडून करण्यात आलेली मागणी चुकीची नव्हती. वस्तुतः उर्दू भाषिकांच्या शिक्षणाची तरतूद उत्तर प्रदेशच्या सरकारने केली होती. परंतु ही तरतूद कागदावरच राहिली. तिची नीट अंमलबजावणी कधीच झाली नाही. मुस्लिम समाजाच्या दृष्टीने या धोरणाच्या अंमलबजावणीचा आग्रह रास्त ठरला असता. परंतु ही मागणी एवढ्यावरच थांबली नाही. उर्दूला उत्तर प्रदेशमध्ये दुय्यम राज्यभाषेचा दर्जा मिळावा या मागणीकरिता हजारो सह्यांचा एक अर्ज डॉ. झाकिर हसेन यांच्या नेतृत्वाखाली १९५४ मध्ये राष्ट्रपती डॉ. राजेंद्रप्रसाद यांना सादर करण्यात आला. उर्दू ही उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आणि म्हैसूर या राज्यांतून दुय्यम राज्यभाषा झाली पाहिजे अशी मागणी मजलिस-ए-मशावरतने पुढे १९६७ च्या निवडणुकीच्या वेळी केली. तिच्या नऊकलमी कार्यक्रमानुसार अर्थात उर्दू हीच राष्ट्रभाषा व्हायला लायक आहे. उर्दूचा आग्रह धरताना मुसलमान करीत असलेला युक्तिवाद फार मजेदार आणि परस्परविसंगत असतो. उर्दू भाषेला योग्य स्थान न मिळाल्यामुळे मुसलमानांवर अन्याय होत आहे, कारण मुस्लिम संस्कृतीचा उर्दू भाषा हा एक अविभाज्य घटक आहे असे ते एकीकडे प्रतिपादन करीत असतानाच उर्दू ही केवळ मुसलमानांचीच भाषा नाही, ती भारतीय भाषा आहे व तिचे जतन करणे सर्वांचे कर्तव्य आहे असे ते सांगत असतात. उर्दू ही सगळ्यांची भाषा आहे असे मानले तर मग सर्व आपोआपच उर्दू शिकतील. त्याकरिता मुसलमानांनीच आंदोलन करण्याची आवश्यकता नाही. उर्दू सर्वांची भाषा आहे हे सांगण्यामागील मुसलमानांची भूमिका एक प्रकारे आडदांडपणाची व आपली भाषा दुसऱ्यावर लादण्याच्या मनोवृत्तीची निदर्शक आहे. याचा अर्थ असा ही हिंदूंची भाषा कोणती हेदेखील मुसलमानांनी ठरवायचे आहे. मात्र मुसलमानांची भाषा कोणती हे ठरविण्याचा अधिकार मुसलमानांनाच आहे! थोडक्यात भारतातील सर्व भाषा हिंदूंच्या आहेत, त्यातील उर्दू भाषाही हिंदूंची आहे आणि सर्व भाषा शिकण्याचे उत्तरदायित्व हिंदूंवर आहे. मात्र मुसलमानांची भाषा तेवढी उर्दू आहे अशी उत्तर भारतातील मुसलमानांनी भूमिका आहे. आपली भाषा उर्दू आहे असे हिंदू मानीत नाहीत असा युक्तिवाद आपण केला तर हिंदूंनी देशाच्या ऐक्यासाठी ही तडजोड केली पाहिजे असे ते सुचवितात. अर्थात देशाच्या ऐक्यासाठी मुसलमानांनी किंमत देण्याचा काही प्रश्न येत नाही. त्यांनी तडजोडी करण्याचा प्रश्न येत नाही. तडजोडी हिंदूंनी करावयाच्या व सवलती मुसलमानांनी घ्यायच्या असा हा युक्तिवाद आहे.\nभारतीय मुसलमान /१४३"} +{"id": "indic_deva_eval_000075_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000075_devanagari_page_ocr_b6832119ddbc.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n405\n\nहेहिति, हेहिन्ति। हेहिसि। सेसं बित्थारेतब्बं।\n\nहोहिति, होहिन्ति। होहिसि। सेसं बित्थारेतब्बं। भविस्सन्तिया रूपानि।\n\nअहुविस्सा, अहविस्संसु। अहुविस्ससे, अहृविस्सथ। अहविस्सं, अहुविस्सम्हा। अहुविस्सथ,\nअह्ृविस्सिसु। अह्वविस्ससे, अह्वविस्सव्हे। अहवविस्सि, अहृवविस्साम्हसे। कालातिपत्तिरूपानि।\n\nज्हे अव्हायने बद्धायं सद्दे च। अव्हायनं पकक्‍कोसनं। बद्धाति अहड्कारों, घट्टनं वा\nसारम्भकरणं वा। सद्दो रवो। व्हेति, व्हायति, अव्हेति, अव्हायति, अव्हासि इच्चपि। कच्चायनो\nमसाणवकोस्मि राज, अनूननामो इति मब्हयन्ति। आसद्दो उपसग्गोव, सो सड्ञोगपरत्ता रस्सो\nजातो। अब्हितो। अनब्हितो ततो आगा। अव्हा, अव्हायना। वारणव्हयना रुक्‍्खा। कामब्हे\n\nरामणेय्यं अवाचयिं।\nसो म॑ रइडन्‍गम्हि अव्हेति,\nसरणं मे होहि कोसिया\"ति॥\nएत्थ अब्हेतीति सारम्भवसेन अत्तनो विसयं दस्सेतुं सड्घट्टतीति अत्थों। “समागते एकसतं\nसमग्गे, अब्हेत्थ यक्खो अविकम्पमानो”ति एत्थापि सारम्भवसेन घट्टनं अव्हायनं नाम।\n\n'तत्थ नज्चन्ति\n\nअच्छरा विय देवेसु, नारियो समलइकता'\n\nएत्थ पन अबज्हायन्ति वरावरन्ति बरतो बरं नच्चड्च गीतडच करोन्तियो सारम्भं\nकरोन्‍तीति अत्थो वष्ठब्बो।\n\n'पछ्ह पुच्छायं। भिक्खु गरुं पडह॑ पडहति। पडहो। अयं॑ पन पाक “परिपुच्छति परिपज्हति\nइरद भन्‍्ते कथं इमस्स को अत्थो”ति। पडहसद्दो पुल्लिडगवसेन गह्ेतब्बो। “पड्हो म॑ पटिभाति, तं\nसुणा\"ति येभुस्येन पुल्लिड्गप्पयोगदस्सनतो। कत्थचि पन इत्थिलिड्गोपि भवति\nनपुंसकलिड्गोपि। तथा हि “पड्हा मेसा कुसलेहि चिन्तिता। कोण्डड्ज पड्हानि वियाकरोही”ति\nतद्दीपिका पाछ्ियों दिस्‍्सन्ति, लिड्गविपल्‍्लासों वा तत्थ वट्ठब्बो।\n\nपडह इच्छायं। पडहति। पड्हो। एत्थ च पड्होति जातुं इच्छितो अत्थो। इदं पनेत्थ\nनिब्बचन पणिहियति आतुं इच्छियति सोति पड्होति। तथा हि वुत्त “विस्सज्जितम्हि पड्हे”ति\nइमिस्सा नेत्तिपाक्ठिया अत्थं संवण्णेन्तेन “पड्हेति आातुं इच्छिते अत्थे”ति।\n\nन गायन्ति, अव्हायन्ति वरावरं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000076_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000076_indic_mozhi_deva_word_ocr_17856b33bd4c.jpg", "ocr": "भूमिका"} +{"id": "indic_deva_eval_000077_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000077_devanagari_digits_mixed_474619c69d8b.jpg", "ocr": "9९8०671७3२२८56२9"} +{"id": "indic_deva_eval_000078_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000078_hindi_handwritten_word_ocr_b9d614ad2822.jpg", "ocr": "प्रज्ञनानंद"} +{"id": "indic_deva_eval_000079_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000079_devanagari_page_ocr_627f8ab84262.jpg", "ocr": "42 थूपबंसो\n\nतस्स अपरभागे इतो एकनवुतिकप्पमत्थके विपस्सी नाम बुद्धो उदपादि। तदा बोधिसत्तो\nमहिद्धिको महानुभावों अतुलों नाम नागराजा ह॒त्वा सत्तरतनखचितं सोवण्णमहापीठं\nअगवतो अदासि। सो पि न॑ इतो एकनबुतिकपण्पसत्थके बुद्धो भविस्सतीति व्याकासि। तस्स\nपन भगवतों ध���तुयो न विकिरिंसु। सब्बे देवमनुस्सा सजन्निपतित्वा धातुयों गहेत्वा\nसत्तयोजननिकं थूप॑ अकंसु। तेन बुत्त\n\n'विपस्सि जिनवरो वीरो, सुमित्तारामम्हि निब्ब॒ुतो।\n\nतत्थेव सो थूपवरो, सत्तयोजनिको कतो“\nतस्य अपरभागे इतः एकनबुतिकल्पमस्तके विपस्यी नाम बुद्ध: उदपादि। तदा बोधिसत्त्वः महर्लिकः\nमहानुभावः अतुलः नाम नागराजा भूत्वा ससरतनखचितं सैवर्णमहापीर्ं भगवते अदात्‌। सो5पि न॑ इतः\nएकनवुतिकल्पमस्तके बुद्धो भविष्यति इति व्याकार्षीत्‌। तस्य पुनः भगवत: धातवः न व्यकारिपु:। सर्वे\nदेवमनुष्या: सन्निपत्य धातवः गृहीत्वा ससयोजनिकं स्तृपम्‌ अकार्पू:। तेनोक्तम-\n\nविपस्सी जिनवरो वीर: समित्तारामे हि निर्वतः\n\nतत्रैव स स्तूपबरः सप्योजनिकः कृतः इति॥\nउनके बाद, इस कल्प से एकानबे कल्प पश्चात्‌ भगवान्‌ विपश्यी उत्पन्न हुए। उस समय बोधिसच्त्व ने बड़े\nऋद्धिमान, महाप्रतापी (प्रभाव बाले) अतुल नामक नाग राजा होकर सप्त रत्न जटित एक सोने का बड़ा आसन\n(सिंहासन) भगवान्‌ को दिया। उन्होंने भी भविष्यवाणी की कि 'इस कल्प से डक्‍्यानबे कल्प बीतने पर 'वे बुद्ध\nहोंगे। उन भगवान्‌ बुद्ध की धातुएएँ (अवशेष) भी बिखेरी हुए नहीं गईं। सभी देव मनुष्यों ने एकत्र होकर धातुओं\nको सात योजन ऊँचा एक स्तूप का निर्माण किया। अत: कहा गया है- बीर श्रेष्ठ विजेता विपश्यी (विपस्सी)\nखुमित्ताराम विहार में परिनिर्ृत हए। उनका उसी जगह पर सात योजन उत्कृष्ट ऊँचाई वाला श्रेष्ठ स्तूप बनवाया\n2०मम, ॥8 #ज७॥-भए (० हताहए०0त2०६ ७४०० ७४३७ (०0 एत ॥४०9० सा ९मी९ #एछॉ३ जा हवा2१६ ७/०060005\n304 डछए270३0छाव 90७०४ 83७४९ ७१५ ६३६९० 008 3 कह हज ३६०० ॥गंत जाती घर उलएटए जाल्टातव5\nकह, ल6 ६००, छ/०एल्‍कलव ते (टॉटिएट026 ६७ लात ीकए 6 ७४०७० 98006 भ0 ६०॥ह६७0०० 006 ॥0. ९\nकच्चा, व 7९॥८० 0/ ७/५ ६३७३६०० 00९, ॥0%/2९७2, ४४००७ 00६ ३८३६0०४९, #॥ घ७ तलत्ट७ ३06 तात\nहछाहए० ६०७१९ १००, प्वाथतह (१० 7ढ॥८5, 00 १ ६४७७6 ० 5९७९० ॥2गह७०-\n\nलत0० ६ छ बम : [5 (१8 ॥4९7०, ५५४९ $७(०0०७१९ 0004७७४०7, 9355७ 3७७३५३७ १४७77 70 एत2 उद्धतपद॑धगगलात\n॥80095087/. ॥#6 ९.४०९॥ ००६ 0७४०० एतट7०।0 एी8 ३९0९ 99९6 ७४३७ 9७॥६ ६० ३ ॥ ९६१६ ० 5९७७० ॥2३ह ०९5.\n\nन3559 39940/596 [६० छ(क्ा७३(००0गवच0व2 5॥क्ता ७25५३७/॥०\"७ 6७७ 900008 त०030च70. 5क्ांडडठ\n00393/700 ॥(छ8 900॥॥53000 4४॥॥09770 ॥5073 ।ढ8 ॥७(५8 09७09॥22970/603553 590903553 5८७४\n॥0ग505097 03५३७९९/७ 520.8३(७॥3व0003000७॥, 00009. 630५8: ॥500900278097 ॥६३(४७\n॥390ए9/30#20087॥ उठे, 50. छा कर (0, ९३759 ॥००02 0054॥0.- 0/3/55उ00 ४५/ठ्ज, धञाकांडड3\n0७0393५900 00900/0 ९७5७३ ॥०९५३ अछीआ5७. 5333-30 0ठ03/उ570. 9908 90553 तह७/०\nकरभाहए४व प/ण|ग/७002/30॥ 5३(.8/व३0३॥09/7 |39#53053500#97 प09क गत्ग5७७-/203 ५०एा।\n\nडक्षा प्राणारंएआ0 0050॥0 0055ठै व03॥# 00000,\n\nव/९५३ एव5७५३ (0093७ ७0 /0]|आ3-ज-७५५३७०'घ.\n\nतस्स अपरभागे इतो एकतिंसकप्पमत्थके सिखी वेस्सभू'ति द्वे बुद्धा निव्वत्तिस। सिखिस्स\nभगवतो काले बोधिसत्तों अरिन्दमो नाम राजा ह॒त्वा बुद्धपमुखस्स सडूघस्स सचीवरं\nमहादानं पवत्तेत्वा सत्तरतनपतिमण्डितं हत्थिरतनं दत्वा हत्थिप्पमाणं कत्वा कप्पियभण्डं"} +{"id": "indic_deva_eval_000080_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000080_indic_mozhi_deva_word_ocr_903dc1be113d.jpg", "ocr": "केवल"} +{"id": "indic_deva_eval_000081_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000081_hindi_handwritten_word_ocr_8d96efa52928.jpg", "ocr": "प्रश्नों"} +{"id": "indic_deva_eval_000082_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000082_indic_mozhi_deva_word_ocr_acb910b05b1d.jpg", "ocr": "अपनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000083_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000083_indic_mozhi_deva_word_ocr_e52124f360f9.jpg", "ocr": "कहा-वही"} +{"id": "indic_deva_eval_000084_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000084_indic_vision_bench_deva_ocr_c5435762f092.jpg", "ocr": "गोदान : 215\nहो जाता और मैं इस झमेले में न पड़ता।'\nमिस्टर तंखा ने घड़ी की तरफ देखकर कहा-तो रायसाहब, अगर आप साफ कहलाना चाहते हैं, तो सुनिए-अगर आपने दस हजार का चैक मेरे हाथ पर रख दिया होता, तो आज\nनिश्चय एक लाख के स्वामी होते। आप शायद चाहते होंगे, जब आपको राजा साहब से रुपये मिल जाते, तो आप मुझे हजार-दो-हजार दे देते। तो मैं ऐसी कच्ची गोली नहीं खेलता। आप\nराजा साहब से रुपये लेकर तिजोरी में रखते और मुझे अंगूठा दिखा देते। फिर मैं आपका क्या बना लेता? बतलाइए? कहीं नालिश-फरियाद भी तो नहीं कर सकता था।\nरायसाहब ने आहत नेत्रों से देखा-आप मुझे इतना बेईमान समझते हैं?\nतंखा ने कुरसी से उठते हुए कहा-इसे बेईमानी कौन समझता है। आजकल यही चतुराई है। कैसे दूसरों को उल्लू बनाया जा सके, यही सफल नीति है, और आप इसके आचार्य हैं।\nरायसाहब ने मुट्ठी बांधकर कहा--मैं?\n'जी हां, आप पहले चुनाव में मैंने जी-जान से आपकी पैरवी की। आपने बड़ी मुश्किल\nसे रो-धोकर पांच सौ रुपये दिए, दूसरे चुनाव में आपने एक सड़ी-सी टूटी-फूटी कार देकर अपना गला छुड़ाया। दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंककर पीता है।'\nवह कमरे से निकल गए और कार लाने का हुक्म दिया।\nरायसाहब का खून खौल रहा था। इस अशिष्टता की भी कोई हद है। एक तो घंटे-भर इंतजार कराया और अब इतनी बेमुरौवती से पेश आकर उन्हें जबरदस्ती घर से निकाल रहा\nहै। अगर उन्हें विश्वास होता कि वह मिस्टर तंखा को पटकनी दे सकते हैं, तो कभी न चूकते, मगर तंखा डील-डौल में उनसे सवाए थे। जब मिस्टर तंखा ने हार्न बजाया, तो वह भी आकर\nअपनी कार पर बैठे और सीधे मिस्टर खन्ना के पास पहुंचे।\nनौ बज रहे थे, मगर खन्ना साहब अभी मीठी नींद का आनंद ले रहे थे। वह दो बजे रात के पहले कभी न सोते थे और नौ बजे तक सोना स्वाभाविक ही था। यहां भी रायसाहब को\nआधा घंटा बैठना पड़ा, इसीलिए जब कोई साढ़े नौ बजे मिस्टर खन्ना मुस्कुराते हुए निकले तो रायसाहब ने डांट बताई-अच्छा। अब सरकार की नींद खुली है तो साढ़े नौ बजे। रुपये जमा\nकर लिए हैं न जभी बेफिक्री है। मेरी तरह ताल्लुकेदार हाते, तो अब तक आप भी किसी द्वार पर खड़े होते। बैठे-बैठे सिर में चक्कर आ जाता।\nमिस्टर खन्ना ने सिगरेट-केस उनकी तरफ बढ़ाते हुए प्रसन्न मुख से कहा-रात सोने में बड़ी देर हो गई। इस वक्त किधर से आ रहे हैं।\nरायसाहब ने थोड़े शब्दों में अपनी सारी कठिनाइयां बयान कर दीं। दिन में खन्ना को गालियां देते थे, जो उनका सहपाठी होकर भी सदैव उन्हें ठगने की फिक्र किया करता था, मगर\nमुंह पर उसकी खुशामद करते थे।\nखन्ना ने ऐसा भाव बनाया, मानो उन्हें बड़ी चिंता हो गई है, बोले-मेरी तो सलाह है, आप एलेक्शन को गोली मारें, और अपने सालों पर मुकदमा दायर कर दें। रही शादी, वह तो\nतीन दिन का तमाशा है। उसके पीछे जेरबार होना मुनासिब नहीं। कुंवर साहब मेरे दोस्तों में हैं, लेन-देन का कोई सवाल न उठने पाएगा।\nरायसाहब ने व्यंग करके कहा-आप यह भूल जाते हैं मिस्टर खन्ना कि मैं बैंकर नहीं, ताल्लुकेदार हूं। कुंवर साहब दहेज नहीं मांगते, उन्हें ईश्वर ने सब कुछ दिया है, लेकिन आप जानते"} +{"id": "indic_deva_eval_000085_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000085_devanagari_page_ocr_af94e5e69cc8.jpg", "ocr": "4. इन्द्रियसंयुत्त 323\n\n*“कतमउ्च, भिक्खवे, दुक्खिन्द्रियं? यं खो, भिक्‍्खवे, कायिकं दुक्‍्खं, कायिकं असातं,\nकायसम्फस्सजं दुक्‍्खं असातं वेदयितं -- इदं वुल्चति, भिक्‍्खवे, दुक्खिन्द्रियं।\n\n““कतमछ्चव, भिक्खवे, सोमनस्सिन्द्रियं? यं खो, भिक्खवे, चेतसिकं सुखं, चेतसिकं\nसातं, मनोसम्फस्सजं सुखं सातं वेदयितं -- इदं बुज्चति, भिक्खबे, सोमनस्सिन्द्रियं।\n\n**कतमड्च, भिक्खवे, दोमनस्सिन्द्रियं? यं खो, भिक्‍खवे, चेतसिकं दुक्‍्खं, चेतसिकं\nअसातं, मनोसम्फस्सजं दुक्‍्खं असात॑ वेदयितं -- इदं बुल्चति, भिक्‍्खवे, दोमनस्सिन्द्रियं।\n\n**कतमउच, भिक्खवे, उपेक्खिन्द्रियं? यं खो, भिक्खवे, कायिकं वा चेतसिक�� वा\nनेवसातं नासातं वेदयितं -- इदं बुक्चति, भिक्खवे, उपेक्खिन्द्रियं| इमानि खो, भिकक्‍्खवे,\nपडिचन्द्रियानी' 'ति।\n\n३७. दुतियविभड्नगसुत्तं\n\n३७. “पडिचमानि, भिक्खवे, इन्द्रियानि। कतमानि पठच? सुखिन्द्रियं, दुक्खिन्द्रियं,\nसोमनस्सिन्द्रियं, दोमनस्सिन्द्रियं, उपेक्खिन्द्रियं।\n\n(संस्कृतच्छाया) कतमन्नञ, भिक्षव:! दुःखेन्द्रियमू? यत्‌ खलु, भिक्षव:! कायिकं दुःखम्‌, कायिकं\nअशातम्‌, कायसंस्पर्शजं दुःखम्‌ अशात॑ं बेदयितम्‌ - इदम्‌ उच्यते, भिक्षव:! दु:खेन्द्रियम।\n\nकतमच्च, भिक्षव:! सौमनस्येन्द्रियम्‌? यत्‌ खलु, भिक्षव:! चैतसिक सुखम्‌, चैतसिकं शातम्‌,\nमनोसंस्पर्शज सुखं शातं वेदयितम्‌ - इदम्‌ उच्यते, भिक्षव:! सौमनस्येन्द्रियम।\n\n“कतमच्च, भिक्षव:! दौर्मनस्येन्द्रियम्‌? यत्‌ खलु, भिक्षवः! चैतसिकं दुःखम्‌, चैतसिकं अशातम्‌,\nमन: संस्पर्शजं दुःखम्‌ अशातं वेदयितम्‌ - इदम्‌ उच्यते, भिक्षव:! दौर्मनस्येन्द्रियम्‌। “कतमच्च, भिक्षव:\nउपेक्षेन्द्रियम्‌? यत्‌ खलु, भिक्षव:! कायिकं वा चैतसिकं वा नैव शात॑ नाशात॑ वेदयितम्‌- इदम्‌ उच्यते,\nभिक्षव:! उपेक्षेन्द्रियम्‌। इसानि खलु, भिक्षव:! पड्चेन्द्रियाणि” इति। पष्ठम्‌।\n\n३७. “पड्चेसानि, झिक्षव:! इन्द्रियाणि। कतसानि पड्च? सुखेन्द्रियम्‌, दुःखेन्द्रियम्‌,\nदौर्मनस्थेन्द्रियम्‌, उपेक्षेन्द्रियम।\nतहन्कीा भिलओं दुःख-इन्द्रिय क्या है। जो कायिक दुःख, कायिक असात, काय-संस्पर्श से दुःखद वेदना होती है,\nकहलाता है।\n\nभिक्षुओं! सौसनस्य-इन्द्रिय क्या है? भिक्षुओं! जो मानसिक सुख, मानसिक सात, मनः संस्पर्श से सुखद\nअनुभव बेदना होती है, बह सौमनस्य-इन्द्रिय कहलाता है।\n\nभिक्षुओं! दौर्मनस्य-इन्द्रिय क्या है? भिक्षुओं! जो मानसिक दुःख, मानसिक असात, मनःसंस्पर्श से दुःख\nचैदना होती है, बह दौर्मनस्य-इन्द्रिय कहलाता है।\n\nभिक्षुओं! उपेक्षा-इन्द्रिय क्या है ? भिक्षुओं जो कायिक या मानसिक सुख या दुःख नहीं है, बह उपेक्षा-\nइन्द्रिय कहलाता है। भिक्षुओं ! यहीं पाँच इन्द्रियाँ हैं।\n\n३७. भिक्षुओं! इन्द्रियाँ पाँच हैं। कौन से पाँच? सुख-इन्द्रिय ...पूर्ववत्‌... उपेक्षा-इन्द्रिय।"} +{"id": "indic_deva_eval_000086_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000086_indic_mozhi_deva_word_ocr_9913d463f632.jpg", "ocr": "भांडण"} +{"id": "indic_deva_eval_000087_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000087_indic_vision_bench_deva_ocr_b2478c8cbef5.jpg", "ocr": "३१\nवतन-वृत्ति.\n(हुशार) ह्या संस्कृत शब्दाप��सून निघाला असावा; अथवा पट्ट म्हणजे मुख्य ह्या शब्दापासूनही तो निघाला असेल. कौलाला पट्टा म्हणतात, व इजारा म्हणजे मक्ता. ज्यावरून गांवाचें बाबवार घेणे देणे समजतें अशा गांवाच्या जमाबंदीच्या ताळेबंदाला पट्टा किंवा इजारपट म्हणतात, व तो पाटलाजवळ असतो, आणि पाटील त्याप्रमाणे वसूल करतो. हजिरीच्या तक्त्यालाही हजिरीपट किंवा पट म्हणतात. पाटील, पटवारी (कुळकर्णी) हे जुळे पट किंवा पट्टा या शब्दांवरून बरेंच संभाव्य दिसते. ज्यांजवळ पट्टा किंवा पट असतो आणि त्याबरहुकूम जे पट्टी, सारा, अगर सार्वजनिक वर्गणी वसूल करतात ते पाटील-पटवारी. तेव्हां सबंध जमातींत जो स्मरणाचा धड असून लोकांवर ज्याचे वजन आहे अशा बुद्धिमान् व मुख्य माणसाजवळच जातीचा पट रहावयाचा. कानडी मुलखांत पुष्कळ जातपाटलांना नाईक, गौडा, किंवा बुधवंत (बुद्धिवान) म्हणतात; व सिंध-गुजराथेंत मुखी, अगेवान म्हणतात. जो आपल्या गुणांनी समाजाला पटला असेल त्यालाच त्याने आपला पाटील पसंत केला असेल. कोणत्याही बाजूने पाहिले तरी पाटील हा असामान्य गुणाढ्य असला पाहिजे, हे उघड होते. म्हणून असें अनुमान निघतें कीं, मूळ पाटील हा समाजस्थैर्यरक्षणास व समाजाभिवृद्धि करण्यास योग्य असा लोकांनी निवडलेला पुरुष असावा; आणि वतनाची कल्पना दृढ होईपर्यंत पाटीलकी लोकांच्या पसंतीवर अवलंबून असावी. स्वयंपाकाचे अनेक पदार्थ शिजविण्यास बोघोण्या (पातेलें) सारखें दुसरें एकहीं पात्र नाहीं; म्हणून त्याला बहुगुणी म्हणतात. बहुगुणी याचा अपभ्रंश ब्राह्मणांत बोघोणे व ब्राह्मणेतरांत बघुललें किंवा भगुलें असा झाला आहे. त्याप्रमाणे चौगुला हा शब्द चौगुणी ह्या शब्दापासून निघाला असावा. चार ह्याचा अर्थ अनेक. जसें-चार लोक गोळा झाले. चौ-गुणी म्हणजे अनेकगुणी, अथवा चौगुला म्हणजे चौ-चार चौघे गोळा करणारा किंवा चौकडून-चोहोंकडून गोळा करणारा; आणि चौधरी म्हणजे चार चौधे धरणारा, सांवरून धरणारा, किंवा चोहोंकडून धरून"} +{"id": "indic_deva_eval_000088_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000088_indic_mozhi_deva_word_ocr_1fcaa216132a.jpg", "ocr": "भारत-जर्मन"} +{"id": "indic_deva_eval_000089_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000089_indic_mozhi_deva_word_ocr_f9a50cdcb109.jpg", "ocr": "त्यांनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000090_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000090_devanagari_page_ocr_6ca354889f6b.jpg", "ocr": "पश्चमों परिच्छेदो\n\n68 +-\nभूसापेत्वान नगरं, गन्त्वा सझूझघ॑ निमन्तिया\n\nचरं नेत्वान भोजेत्वा, दत्वा सामणकं बहुं॥76॥\n\nसत्थारा ��ेसितों धम्मों, कित्तकोति अपुच्छथ।\n\nब्याकासि मोग्गलिपुत्तो, तिस्सत्थेरो तदस्स तं॥77॥\n\nसुत्वान चतुरासी ति, धम्मक्खन्धा'ति सो \"ब्रवि।\n\nपूजेमि तेहं पच्चेकं, विहारेना'ति भूपति॥78॥\n\nदत्वा तदा छन्‍नवुति-धनकोटिं महीपति।\n\nपुरेसु चतुरासीति-सहस्सेसु महीतले॥ 79॥\n\nतत्थ तत्थेव राजूहि, विहारे आरभापयि।\n\nसयं असोकारामं तु, कारापेतुं समारभि॥80॥\n\nभूषयित्वा नगरं, गत्वा सड्ःघं न्‍्यमन्त्रयत्‌।\n\nगृह नीत्वा भोजयित्वा, दत्वा श्रामणकं बहुम्‌।।76।।\n\n“शास्त्राणि दिशतः धर्म:, कियत्‌?” इति अपृच्छत्‌।\n\nव्याकार्षीत्‌ मोग्गलिपुत्र:, तिष्यस्थविर: तदस्य तम्‌।77॥॥\n\nश्रुत्वा “चतुरशीति धर्मस्कन्धा:” इति स अव्नवीत्‌।\n\n“पूजयामि तेडहं प्रत्येकें, विहारेण' इति भूपति:।॥78।॥।\n\nदत्वा तदा षण्णवतिधनकोटिं महीपति।\n\nपुरेषु चतुराशीति-सहस्त्रेषु मही तले।।79\n\nतत्र तत्रैव राजभिः, विहारे आरभाषयत्‌।\n\n___स्वयम्‌ अशोकारामं तु, कारापयितुं समारभत।80॥।\n\nहिन्दी- सम्पूर्ण नगर को अलंकृत कराकर, सड्घ को निमन्त्रित कर, महल में बुलाकर, उसे ससम्मान भोजन\n\nकराकर बहुत सा दान किया।।76॥\n\nफिर एकान्त में बैठकर उसने सड्घ से पूछा- “भन्‍्ते! शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित धर्म कितना है”? सडूघ की तरफ से\nमोग्गलिपुत्त तिष्य स्थविर ने इसका उत्तर दिया”-॥77।\n\n“राजन! सुगतोपदिष्ट धर्म के चौरासी हजार स्कन्ध हैं\"। भूपति बोले- “मैं उन स्कन्‍्धों को एक-एक विहार बनवा कर\n\nप्रत्येक को सम्मान दूँगा।78॥॥\nतब सम्राट ने छयानवे करोड़ धन एक साथ देकर समग्र पृथ्वीतल के चौरासी हजार नगरों में विहार-निर्माण\n\nप्रारम्भ करवाये।।79॥।\nचहाँ के अधीन राजाओं को आजा भेज कर उन-उन नगरों में उनसे स्वतन्त्र विहार निर्माण कराये। और स्वर्य हे\nविशाल अशोका रामविहार बनवाना प्रारम्भ किया।।80॥।\n\nसंस्कृतच्छाया-"} +{"id": "indic_deva_eval_000091_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000091_devanagari_page_ocr_657e3de4764d.jpg", "ocr": "348 संयुत्तनिकायपालि\n\nएकमन्तं निसिन्‍ना खो ते भिक्‍्खू भगवनन्‍्तं एतदवोचुं -\n\n“*आयस्मता, भन्‍्ते, पिण्डोलभारद्वाजेन अज्ञा ब्याकता - “खीणा जाति, बुसितं\nब्रह्मचरियं, कत॑ करणीयं, नापरं इत्थत्ताया'ति पजानामीति। कि नु खो, भन्‍्ते, अत्थवसं\nसम्पस्समानेन आयस्मता पिण्डोलभारद्वाजेन अज्ञा ब्याकता - “खीणा जाति, बुसितं\nब्रह्मचरियं, कत॑ करणीयं, नापरं इत्थत्ताया'ति पजानामी''ति?\n\n“तिण्���न्न॑ खो, भिक्खवे, इन्द्रियानं भावितत्ता बहुलीकतत्ता पिण्डोलभारद्वाजेन\n\nभिक्खुना अज्ञा ब्याकता - “खीणा जाति, बुसितं ब्रह्मचरियं, कत॑ करणीयं, नापरं\nइत्थत्ताया'ति पजानामीति। कतमेस॑ तिण्णन्नं? _ सतिन्द्रियस्स,. समाधिन्द्रियस्स,\nपडिजिन्द्रियस्स - इमेसं खो, भिक्खवे, तिणणन्नं इन्द्रियानं भावितत्ता बहलीकतत्ता\n\nपिण्डोलभारद्वाजेन किक्खुना अच्छा व्याकता . खीणा जाति, व॒सितं ब्रह्मचरियं, कत॑\nकरणीयं, नापरं इत्थत्ताया'ति पजानामीति। इमानि च, भिक्खवे, तीणिन्द्रियानि किमन्‍्तानि?\nखयन्‍्तानि।\n\n(संस्कतच्छाया) एकान्ते निपण्णा: खल्‌ ते झिक्षवः भगवन्तम्‌ एतदवोचन -\n\n“आयुप्मता, भदन्‍्त! पिण्डोलभारद्वाजेन आज्ञा व्याकृता - 'क्षीणा जाति, उपित ब्रह्मचर्यम, कृत\nकरणीयम्‌, नापरम्‌ इत्थत्वाय इति प्रजानामि”इति। कि नु खलु, भदन्त! अर्थवर्श सम्पश्यता आयुष्मता\nपिण्डोलभारद्वाजेन आज्ञा व्याकृता - 'क्षीणा जाति, उपितं ब्रह्मचर्यम्‌, कृत॑ करणीयम्‌, नापरम्‌\nइत्थत्वाय”इति?\n\n“त्रयाणां खलु, भिक्षव:! इन्द्रियाणां भावितत्वात्‌ बहलीकृतत्वात्‌ पिण्डोलभारद्वाजेन भिक्षुणा\nआज्ञा व्याकृता- “क्षीणा जाति, उदितं ब्रह्मचर्यम, कृत॑ करणीयम्‌, नापरम्‌ इत्थत्वाय इति\nप्रजानामि”इति। कतमेषां त्रयाणाम्‌? स्मृतीन्द्रियस्य, समाधीन्द्रियस्य, पज्ञेन्द्रियस्थ - एपां खलु,\nज्िक्षव:! त्रयाणाम्‌, इन्द्रियाणां भावितत्वात्‌ बहलीकृतत्वात्‌ पिण्डोलभारद्धाजेन झिक्षुणा आज्ञा\nब्याकृता- 'क्षीणा जाति, उपितं ब्रह्मचर्यम्‌, कृतं करणीयम्‌, नापरम्‌ इत्थत्वाय इति प्रजानामि”इति।\nइमानि च, शिक्षव:! त्रीणीन्द्रियाणि किमन्तानि? क्षयान्तानि।\n\n(हिन्दी) एक क्िक्ष भगवान्‌ से बोले, “भन्‍्ते ! आयुप्मान्‌ पिण्डोल भारद्वाज ने परम-ज्ञान को घोषित\nकिया है “जाति क्षीण हुई....पूर्ववत... ऐसा मैंने जान लिया। भन्‍्ते ! किस अर्थ से आयुष्मान्‌ पिण्डोल भारद्वाज ने\nपरम-ज्ञान को घोषित किया है-“जाति क्षीण हुई....पूर्ववत... ऐसा मैंने जान लिया ?”\n\nभिक्षुओं ! तीन इन्द्रियों के भावित और अभ्यस्त हो जाने से आयुष्मान्‌ पिण्डोल भारद्वाज ने परम-\nचोषित किया है-“जाति क्षीण हुई....पूर्ववत... ऐसा मैंने जान लिया। किन तीन इन्द्रियों के ? स्मृति-\nसमाधि-इन्द्रिय के, प्रज्ञा-इन्द्रिय के।"} +{"id": "indic_deva_eval_000092_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000092_devanagari_digits_mixed_3c601981aeaa.jpg", "ocr": "२804५0७5२610५"} +{"id": "indic_deva_eval_000093_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000093_hindi_handwritten_word_ocr_67fead5d798f.jpg", "ocr": "पड़ोसियों"} +{"id": "indic_deva_eval_000094_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000094_devanagari_page_ocr_a2ea6ce96f69.jpg", "ocr": "भूमिका\n\nभगवान्‌ बुद्ध ने अपने उपदेश छान्दस्‌ में संग्रह करने क॑ ल्विए सना किया\nअपनी भाषा में संग्रह करने की आज्ञा दी थी। त्रिपिटक में इस तरह के सन्दर्भ मिलते क गा ॥\nसुरक्षित रखते थे। धम्मपदों के नाम से पाठ की परम्परा भी प्राप्त होती है तथा मिश्षुओं की श्रेष्ठता को गणना करते\nसमय धम्मधर विनयधर भिक्षुओं का उल्लेख मिलता है। बंगीय भिश्चु संगीत के माध्यम से गेय के रूप से चुद्धबचनों\nका प्रचार करते थे। धम्मपद में महाप्रज्ञ उसे बतलाया गया है जो शब्द खिद्या में पारंगत हो आर्थात्‌\n'जीतितण्हो अनादानो निरुत्तिपदकोविदो।\nअकक्‍्खरान सन्निपातं जज्ञा पुब्यापरानति अ।\nस वे अच्तिमसरीरों महापञ्ञो ति बुच्चति॥\n'पात्नि व्याकरण परम्परा रे\"\nपालि की समृद्ध परम्परा में पाँच व्याकरण सम्प्रदायों का उल्लेख प्राप्त होता है-\nबोधिसत्त व्याकरण\nकच्चायन व्याकरण\nसत्त्वगुणाकर व्याकरण\nमसोगल्लायन व्याकरण\n5. सद्दनीति व्याकरण\nइनमें से प्रथम तथा तृतीय उपलब्ध नहीं है। मात्र तीन सम्प्रदाय- कच्चायन व्याकरण , मोगल्लायन व्याकरण\nऔर सद्दनीति व्याकरण ही उपलब्ध हैं। सदसंगहो का भी उल्लेख मिलता है।\nपरम्परा के अनुसार पालि व्याकरण की उत्पत्ति के विषय में प्रसिद्धि है कि बुद्ध के श्रोताओं को उनके उपदेशों\nकी भाषा को समझने में कठिनाई होने लगी, तथा यह बात व्यक्त की गई तो भगवान्‌ के प्रधान शिष्य महाकच्चायन\nने इस सम्बन्ध में समाधि लगाई और उन लोगों के समक्ष अपने व्याकरण के प्रथम सूत्र- ““अत्थो अक्खरसज्ञातो''\nको लेकर उपस्थित हुए, जो इस सम्प्रदाय का आधार स्तम्भ है। (फ्रांसिस मैसन, कु बबलाटा३>वाव3 ?व॥ (उाग्गाणला, पृ.\n4)\n\nगया था तथा 'सकाय निरुत्तिया' अपनी\nहैं कि सिश्षु गाथाओं में उनको\n\nमे श्र\n\nइस अनुश्रुति के अनुसार, पालि व्याकरण के रचयिता बुद्ध के प्रधान शिष्य महाकच्चायन कहे जाते हैं।\n““मागधिकाय पालिभासाय कच्चायनव्याकरणतो पोराणतरं वित्थारगतं व्याकरणं न दिस्सति।''\n(गुणरत्ल थेर, कच्चायतव्याकरण , भूमिका पृ. 53)\n\nश्री लक्ष्मीनारायण तिवारी इस मत से इसलिए सहमत नहीं हैं क्योंकि अट्ठकथाओं में इसके प्रयोग नहीं हैं,\nन ही उद्धरण दिया गया है, बल्कि कुछ प्रयोग पाणिनि के आधार पर है तथा कुछ निरुक्ति पद्धति पर अलम्बित है।\nकुछ अन्य व्याकरण सम्प्रदायों से ग्रहण किए गए हैं। इस प्रकार अट्ठकथाओं में कच्चायन व्याकरण का आश्रय नहीं\nलिया गया है। (कच्चायन व्याकरण, ल ना ति ( भूमिका, पृ. 54)\n\nजबकि डॉ. बर्नेल इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कच्चायन व्याकरण चतुर्थी शताब्दी से पूर्व किसी आधार पर\nआधारित है।\n\nश्री त्रिपाठी जी का मानना है कि अट्ठकथाकारों के समक्ष कोई व्याकरण अवश्य था। इन्होंने कच्चायन\n\nह4]॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000095_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000095_devanagari_page_ocr_22e1b428821f.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n74- न्‍\n\nजिक्खून॑ आमसन्तनपाक्तियं गाथास्‌ क्र दिस्सति, चुण्णियपदेस च॒ सन्धिविसय्रेयेव दिस्सलि।\nसावकस्स पन भिकक्‍्खून॑ आमन्तनपाछियं न दिस्सतीति अयं द्विन्न॑ विसेसो वट्ठब्बो। तथा हि\n“एवड्ल पन भिक्खवे इम॑ सिक्खापदं॑ उद्दिसेय्याथा”तिआदीसु “भिक्खबे”ति पर्द\nचुण्णियपदेस्वेव दिट्ठंं। “भिक्खवो तिसता इमे, याचन्ति पझजलीकता”तिआदीसु “भिक्खवों\"ति\nपच्चत्तपद गाथासुयेब दिद्ठें। “आयस्मा सारिपुत्तो भिकख्त आमन्तेसि आवुसो झ्िक्खवे\"लि\nएवमसादीस सावकस्स झिक्खून आमन्तनपाकरीस सन्धिविसय्रेयेव “सिक्‍्खवे”लि पद दिला\n“भिकक्‍्खू आमन्तेसि सोतुकामत्थ भिक्खवे”ति “इध भिक्खवे भिक्खू\"तिआदीसु पन बुद्धस्स\nभिक्खूनं आमन्तनपाव्ठीसु सन्धिविसयाविसयेसु “भिक्खवे\"”ति पदं दिट्ठं। “अरज्झे रुक्खमूले वा,\nसुड्ञागारेव भिक्खवो”\"ति “तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि भिक्खवो\"ति एवमादीसु बुद्धस्स\nभिकखून॑ आमन्तनपाछीसु “भिक्खवो\"ति आमन्तनपर्द गाथासु च दिढ़्ं, चुण्णियपदेस च\nसन्धिविसयेयेव दिट्रंं। इच्चेवं -\nचुण्णियेव पदे दिट्ठं, “भिक्खवे\"ति पद द्विधा।\nयतो पवत्तते सन्धि-विसयाविसयेसु तं॥\n“भिक्खवो”ति पद दिट्ठं, गाथायड्चेव चुण्णिये।\nपदस्मिम्पि च सन्धिस्स, विसयेवाति निद्दिसेति॥\nसविनिच्छयोयं उकारन्तपुल्लिड्गानं पकतिरूपस्स नामिकपदमालाबिभागो।\nउत्तारस्ततापकतलिक उक्त रस्तपलिलिदग लिद्धिला\nइदान्ति पन सयम्भूडच्वेतस्स पकतिरूपस्स तंसदिसानऊ्च नामिकपदमालं कथयाम -\nसयम्भू, सयम्भू, सयम्भुवो। सयम्भुं, सयम्भू, सयम्भुवो। सयम्भुना, सयम्भूहि, सयम्भूभि।\nसयम्भुस्स, सयम्भुनों, सयम्भूनं। सयम्भुना, सयम्भुस्मा, सयम्भुम्हा, स��म्भूहि, सयम्भूमि।\nसयम्भुस्स, सयम्भुनो, सयम्भूनं। सयम्भुस्मि, सयम्भुम्हि, सयम्भूस। भो सयम्भु, भो सयम्भू,\nभवन्‍्तों सयम्भू, सयम्भुवो। एवं पभू अभिभूविभू इच्चादीनिपि।\nसब्बज्ञू, सब्बज्जू, सब्बज्ञुनों। सब्बज्ञुं, सब्बज्जू, सब्बज्जुनों। भो सब्बज्ञु, भवन्‍्तो\nसब्बज्ञू, सब्बज्जुनों, सेसासु विभत्तीसु पदानि भिक्खुसदिसानि भवन्ति, एवं बिदू विज्ञू\nजतायत सस्ते समय शव गत सगयत संता ते वयणत सखवतन उतायाश\nतत्र “ये च लद्धा मनुस्सत्तं, बदज्जू बीतमच्छरा\"ति एत्थ “बदज्ञ्ू\"ति पच्चत्तबहवचनस्स\n\nदस्सनतो सयम्भू सब्बज्छू इच्चादीनम्पि पच्लत्तोपयोगबहुवचनत्तं गहेतब्बं। अपिच “विद,"} +{"id": "indic_deva_eval_000096_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000096_indic_mozhi_deva_word_ocr_6bd93b882d6a.jpg", "ocr": "पटत"} +{"id": "indic_deva_eval_000097_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000097_hindi_handwritten_word_ocr_7a73cb65ff29.jpg", "ocr": "एन्क्लेव"} +{"id": "indic_deva_eval_000098_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000098_hindi_handwritten_word_ocr_2ae2df7ae2ba.jpg", "ocr": "बिट"} +{"id": "indic_deva_eval_000099_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000099_indic_mozhi_deva_word_ocr_6a0790112ec4.jpg", "ocr": "नाही'"} +{"id": "indic_deva_eval_000100_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000100_devanagari_page_ocr_d1e628e0456b.jpg", "ocr": "अपदानपालि की\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो ...पे*... कतं बुद्धस्स सासनं”॥4950॥\nइत्थं सुदं आयस्मा वेदिकारको थेरो इमा गाथायो अभासित्थात्ति।\nवेदिकारकत्थेरस्सापदानं ततियं।\n\n4. सपरिवारियत्थेरअपदानं\n“पदुमुत्तरो नाम जिनो, लोकजेट्लो नरासभो।\n\nजलित्वा अग्गिक्खन्धोव, सम्बुद्धों परिनिब्बुतो॥954॥\n“निब्बुते च महाबीरे, थूपो बित्थारिको अह।\n\nदूरतोब [अहोरुत्तं (सी०), थूपदत्तं (स्या\")] उपड्लेन्ति, धातुगेहबरुत्तमे॥952॥\n“पसन्‍्नचित्तों सुमनो, अकं॑ चन्दनवेदिकं।\n\nदिस्सति थूपखन्धो च [दीयति धूमक्खन्धो च (सी०), दीयति ध्ूपगन्धो च (स्या०)],\nथूपानुच्छविको तदा॥953॥\n\nच्चः\n\nअ्रतिसंविदश्वतस्र:...प्रै... कृत बुद्धऔ्य शासनम्‌॥950॥\nइत्थँ स्विद्‌ आयुष्मान्‌ वेदिकारक स्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nपद्मोत्तरो नाम जिन:, लोकज्येछो नरपपभ:।\n\nजलित्बा अग्रिस्कन्ध्येब, सम्बुद्धों परिनिर्वृतः॥॥954॥\n\nनिर्वुते च महावीरे, स्तूप: विस्तारिकोउभूता\n\nदूरतेव उपतिष्ठन्‍्ति, धातुग्रहवरोत्तमे॥4952॥\n\nप्रसन्‍नचित्त: सुमनः, अक॑ चन्दनवेदिकाम।\n\nदृष्यते स्तूपस्कन्धश्य, स्तूपानुच्छविकस्तदा॥4953॥\n\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडझिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्शासन को पूर्ण\nकिया॥ 950॥\n\nइस ��्रकार आयुप्मान्‌ विदिकारक स्थविर ने इन गाथ्राओं को कहा-\n\nअद्योत्तर नाम के जिन, लोकज्ये्ठ नरर्पभ सम्बुद्ध ने अग्निस्कन्ध\nप्राप्त किया॥954॥\n\nमहावीर के निर्वत हो जाने पर स्तूप का विस्तार हो गया और उस उत्तम धातु गृह में भिक्षु गण दूर से ही\nपरिचर्या करते थे॥4952॥\n\nप्रसन्नचित्त और सुन्दर मन से चन्दन वेदिका को बनाया तब स्तूप-स्कन्ध दिखायी देता था तथा स्तूप की\nछबी अनुरूप स्तूप स्कन्ध दिखाई देती थी॥953॥\n\nके समान प्रज्वलित हो परिनिर्वुति को"} +{"id": "indic_deva_eval_000101_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000101_indic_mozhi_deva_word_ocr_f6ba72a0edd8.jpg", "ocr": "मेरे"} +{"id": "indic_deva_eval_000102_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000102_devanagari_page_ocr_433cbeecdc9d.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो छ्व\n\nपालि- निमितते चत्रो दिस्‍्वा, हस्थ्रियानेन निकक्‍्खमि।\nअनूनदसमासानि, पधाने पदही जिनो॥289॥\nपधानचारं चरित्वान, अबुज्झि मानसं सुनि।\nब्रह्ममुना याचितो सन्‍तों, दीपडकरो महामुनि॥290॥\nबत्ति चक्‍के महावीरो, नन्‍्दारामे सिरीघरे [सिरीधरे (सी-))\nनिसिन्‍नो सिरीसमूलम्हि, अका तित्थियमद्धनं॥294॥\nसुमड्गलो च तिस्सो च, अहेसुं अग्गसावका।\nसागतो [सोभितों (क)] नामुपद्ठाको, दीपडकरस्स सत्थुनो॥292॥\nनन्‍दा चेव सुनन्‍्दा च, अहेसुं अग्गसाविका।\nबोधि तस्स भगवतो, पिप्फलीति पबुक््चति॥293॥\nसंस्कृतच्छाया- ._ निमित्तानि चत्बारि दुष्ट्वा, हस्तियानेन निरक्रमत्‌।\nअन्यूनं दशमासान्‌, प्रधानान्‌ प्राधाद्‌ जिन:॥289॥\nप्रधानचर्या चरित्वा, अबुद्ध्यत मानस सुनिः।\nब्रह्मणा याचित: शान्तः, दीपडकरो महासुनि:॥290॥\nअवर्त्तयत्‌ चक्र महावीरः, नन्‍्दारामे श्रीगृहे।\nनिषण्ण: शिरीपमूले, अकार्षीत्‌ तैर्थिकमर्दनम्‌॥294॥\nसुमडुगलश्च तिष्यश्व, अभवताम्‌ अग्रस्रावकौ।\nसस्‍्वागतो नामोपस्थायकः, दीपड्करस्य शास्तुण:॥292॥\nजन्‍्दा चैव सुननन्‍्दा च, अभवताम्‌ अग्रश्ाविकेा।\nबोधिः तस्य भगवतः, पिप्पलीति प्रोच्यते॥293॥\nहिन्दी- इन्होंने भी वृद्ध, रोगी, सृत एवं संन्‍्यासी- ये चार निमित्त देखकर, हस्तियान पर आरूढ़ होकर, गृहत्याग\nकर दिया तथा दस सास तक तपश्वर्या करते हये प्रयकषपूर्वक अपने चित्त बिकारों को क्षीण किया॥289॥\nतदलल्तर ब्रह्मा द्वारा याचना करने पर इस प्रकार प्रयत्न करते हये उन मुनि ने बोध प्राप्त कर ली॥290॥\nउन महाबीर ने जनता को धर्मोपदेश आरम्भ (धर्मचक्र्रवर्तन) किया। इन्होंने अतिशय शोौभायमान\nजनन्‍्दाराम के शिरीषवृक्ष के नीचे ध्मासन लगाकर अन्य मतानुयायियों का तेज (प्रभाव) क्षीण (मर्दन) किया\nश्रा॥294॥\nइनके सुमझुगल एवं तिध्य नामक दो अग्श्नावक थे। इनके प्रधान उपस्थायक (परिचारक) का नाम\nस्वागत था॥292॥\n(इन की) नन्‍्दा एबं सुनन्दा- ये दो प्रमुख सेविकायें थीं तथा बोधिबुक्ष का नाम पिप्पली था॥293॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000103_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000103_devanagari_page_ocr_5262ab3917ae.jpg", "ocr": "॥74 अनुपिटके\n\n“आम, महाराज, भगवा द्वत्तिसमहापुरिसलक्खणेहि समन्‍नागतो असीतिया च॑\nअनुब्यठ्जनेहि परिरडिजतो सुवण्णवण्णो कडचनसन्निभत्तचों ब्यामप्पभो”ति।\n\n“किं पनस्स, भन्‍्ते, मातापितरो'पि द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि समन्‍नागता असीतिया\nच अनुब्यञ्जनेहि परिरडिजता सुवण्णवण्णा कड्चनसन्निभत्तचा ब्यामप्पभा”ति?\n\n'नो च'स्स, महाराज, मातापितरो द्वक्षिंसमहापुरिसलक्खणेहि समन्‍नागता असीतिया\nच अनुब्यठ्जनेहि परिरडिजता सुवण्णबण्णा कठ्चनसन्निभत्तचा ब्यामप्पभा”ति।\n\n“एवं सन्‍ते खो, भन्‍्ते नागसेन, न उप्पज्जति बुद्धों द्त्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि\nसमन्‍नागतो असीतिया च अनुब्यञ्जनेहि परिरडिजितो सुवण्णवण्णो कडठ्चनसन्निभत्तचो\nब्यामप्पभोति। अपि च मातुसदिसो वा पुत्तो होति मातुपक्खो वा, पितुसदिसो वा पुत्तो होति\nपितुपक्खो वा”ति। थेरो आह- “अत्थि पन, महाराज, किडिच पदुम॑ सतपत्त”ति?\n\n“आम, भन्‍्ते, अत्थी”ति। “तस्स पन कुहिं सम्भवो”ति?\nसंस्कृतच्छाया- \"आम्‌, महाराज, भगवान्‌ द्वात्रिंशन्‍्महापुरुषलक्षणै: समन्‍वागत: अशीत्या चाव्यनुअनैः\nपरिरज्ञितः सुवर्णवर्ण: का थनसन्निभत्वक व्यामप्रभ\"इति।\n\n\"किम्पुनरस्य, भदन्त, मातापितरावपि द्वात्रिशन्महापुरुषलक्षणै: समनन्‍्वागतौ अशीत्या चानुव्यअनैः\nपरिरक्षितौ सुवर्णवर्णों काथनसन्निभत्वचौ व्यामप्रभावि\"ति। \"न चास्य, महाराज, सातापितरी\nद्वार्विशन्महापुरुपलक्षणै: समन्‍्वागती अशीत्या चानव्यजनैः परिरक्षिती स॒वर्णवर्णों काश्वनसन्निभत्वची\nवब्यामप्रभावि\"ति।\n\n\"एवं सति खलु, भदन्‍्त नागसेन, नोत्पच्यते बुद्धो द्वातिंशनमहापुरुपलक्षपै: समन्‍्वागत:\nअशीत्या चानुव्यअ्जनै: परिरक्ञित: सुवर्णवर्ण: काञ्वनसन्निभत्वक्‌ व्यामप्रभ इति। अपि च मातृसदृशो वा\nपुत्रो भवति मातृपक्षों वा, पितृसदृशों वा पुत्रों भवति पितृपक्षो वे\"ति | स्थविर आह- \"अस्ति\nपुनर्महाराज, किश्वित्‌ पह्म॑ ��तपत्रमि\"ति?\n\n\"आम्‌, भदन्‍्त, अस्ती\"ति। \"तस्य पुन: कुत: सम्भव\"इति?\n\n! क्‍या उनके मां-बाप भी वैसे ही थे?\"“नहीं महाराज! वे\n! तब बुद्ध भी वैसे नहीं हो सकते, क्योंकि लड़का या तो अपनी माँ के समान या अपने पिता के\nओर बोले- “महाराज! क्या आप कमल के फूल को जानते हैं?”\n\nसमान होता है।'\n\n“हाँ भन्‍्ते! जानता हूँ।” “बह कहाँ उत्पन्न होता है?\""} +{"id": "indic_deva_eval_000104_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000104_indic_vision_bench_deva_ocr_e4df5b39e7fb.jpg", "ocr": "और नाक पर घूंसा मारा। घोष बाबू मूर्छित हो गये। सिपाहियों ने दूसरा घूंसा पड़ने दिया। चार आदमियों ने दौड़कर सलीम को पकड़ लिया। चार आदमियों ने घोष को उठाया और होश में लाये।\nअँधेरा हो गया था। आतंक ने सारे गाँव को पिशाच की भाँति छाप लिया था। लोग शोक से मौन और आतंक के भार से दबे, मरनेवालों की लाशें उठा रहे थे। किसी के मुँह से रोने की आवाज न निकलती थी। ज़ख्म ताजा था, इसलिये टीस न थी। रोना पराजय का लक्षण है। इन प्राणियों को विजय का गर्व था। रोकर अपनी दीनता प्रगट न करना चाहते थे। बच्चे भी जैसे रोना भूल गये थे।\nमिस्टर घोष घोड़े पर सवार होकर डाकबँगले गये। सलीम एक सब इंसपेक्टर और कई कांसटेबलों के साथ एक लारी पर सदर भेज दिया गया। वह अहीरिन युवती भी उसी लारी पर भेजी गयी। पहर रात जाते-जाते चारों अर्थियां गंगा की ओर चलीं। सलोनी लाठी टेकती हई आगे-आगे गाती जाती थीं---\n'सैयाँ मोरा रूठा जाय सखी री...'\n८\nकाले खाँ के आत्म-समर्पण ने अमरकान्त के जीवन को जैसे कोई आधार प्रदान कर दिया। अब तक उसके जीवन का कोई लक्ष्य न था, कोई आदर्श न था, कोई व्रत न था। इस मृत्यु ने उसकी आत्मा में प्रकाश सा डाल दिया। काले खाँ की याद उसे एक क्षण के लिए भी न भूलती और किसी गुप्त शक्ति से उसे शांति और बल देती थी। वह उसकी वसीयत इस तरह पूरी करना चाहता था कि काले खाँ की आत्मा को स्वर्ग में शांति मिले। घड़ी रात से उठकर क़ैदियों का हाल-चाल पूछना और उनके घरों पर पत्र लिखकर रोगियों के लिए दवा-दारू का प्रबन्ध करना, उनकी शिकायतें सुनना और अधिकारियों से मिलकर शिकायतों को दूर करना यह सब उसके काम थे। और इस काम को वह इतनी विनय, इतनी नम्रता और सहृदयता से करता कि अमलों को भी उस पर सन्देह\nकर्मभूमि\n३७३"} +{"id": "indic_deva_eval_000105_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000105_devanagari_page_ocr_8902a86ddf4e.jpg", "ocr": "253\n\nसिरस्मिं मे पतिद्ठातु, आगम्म सह धातुको।\n\nइति राजा विचिन्तेसि, चिन्तितं त॑ तथा अहु॥26॥\n\nअ���तेना'भिसित्तोब, अह हट्ठो'ति भूपति।\n\nसीसतो थ गहेत्वान, हत्थिक्खन्धे ठपेसि तं॥27॥\n\nहट्लो हत्ती कुड्चनादं, अका कम्पित्थ मेदिनी।\n\n'लतो नागो निवत्तित्वा, सथेर बलवाहनो॥28॥\n\nपुरत्थिमेन द्वारेन, पविसित्वा पुरं सुभं।\n\nदक्खिणेन च द्वारेन, निक्खमित्वा ततो पुन॥29॥\n\nथूपारामे चेतियस्स, ठानतो पच्छतो कतं।\n\nमहेज्जावत्थुं गन्‍्त्वान, बोधिठाने निवत्तिय॥30॥\n\nसंस्कृतछ्छाया- शिरसि मे प्रतिष्ठातु, आगम्य सह धातुक:ः।\nइति राजा विचिन्तयत्‌, चिन्तितं त॑ तथा अभूत्‌।।26।।\nअमृतेनाभिषिक्तः इव, अभूत्‌ हृष्ट: इति भूषतिः।\nशीशतोज्थ गृहीत्वा, हस्तिस्कन्धे स्थापयत्‌ तम्‌।।27]।\nहूष्टो हस्तिः क्रौद्धनादम्‌, अकरोत्‌ कम्पिताउत्र मेदिनी।\nततो नागो निर्वुत््य, सस्थविरो बलवाहन:।28।।\nपूर्वस्थेण द्वारेण, प्रविश्य पुरं शुभम्‌।\nदक्षिणेन च द्वारेण, निष्क्रम्य ततः पुन:॥29॥\nस्तूपारामे चैत्यस्य, स्थानत: पृष्ठतः कृतम्‌।\nमहेज्यावस्तु गत्वा, बोधिस्थाने निर्वत््य।30॥।\n\nहिन्दी- धातुसहित यह पिटक स्वयं मेरे सिर पर आ जाय”। राजा जैसा सोच रहे थे महासुनि के प्रभाव से वही हो\nगया।।26॥।\n\nराजा ऐसा सनन्‍्तुष्ट हुआ, मानो किसी ने उस पर अमृत की वर्षा कर दी हों। और उसने उसे धातुपिटक को सिर से\nउतार कर हाथी की पीठ पर रख दिया।।27]।\n\nउधर हाथी ने भी प्रमुदित होकर क्रौंच्नाद किया। पृथ्वी कॉप उठी। फिर वह हाथी लौट कर स्थविरों, सेनाओं एवं\nयानों सहित।।28॥॥\n\nउस शुभ नगर के पूर्वद्वार से प्रविष्ट होकर दक्षिण द्वार से बाहर निकला।।29॥॥\nफिर स्तूपाराम के पश्चिम पार्ष्च में बने हुए महेज्या वस्तु पर जा कर फिर वहाँ से बोधिस्थान में लौटकर।।30॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000106_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000106_devanagari_digits_mixed_acb01c0eb47d.jpg", "ocr": "४972५96९40४०८1६४8"} +{"id": "indic_deva_eval_000107_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000107_indic_mozhi_deva_word_ocr_9cec1f3c6c5f.jpg", "ocr": "दिला."} +{"id": "indic_deva_eval_000108_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000108_devanagari_page_ocr_96d4d00ad306.jpg", "ocr": "56 -संयुसनिकायपालि_ हा\nरागविनयपरियोसानं दोसविनयपरियोसानं मोहविनयपरियोसानं। एवं खो, भिक्खवे, भिक्‍्खु\nअरियं॑ अट्ठड्टिगिकं मग्गं भावेन्तो अरियं अद्ठड्िग्गिके मग्गं बहुलीकरोन्तो निब्बाननिन्नो होति\nनिब्बानपोणो निब्बानपब्भारो”'ति। (रागविनयद्धादसकी दुतियकी समुद्दनिन्‍्नन्ति)।\n\n११५. पठमपाचीननिन्‍नसुत्तं\n\n११५. “सेय्यथापि, भिक्खवे, गड़ग्गा नदी पाचीननिनन्‍ना पाचीनपोणा पाचीनपब्भारा;\nएवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु अरियं अट्ठड्लिगक॑ मग्गं भावेन्तो अरियं अट्ठड्लिगिक॑मग्गं\nबहुलीकरोन्तो निव्बाननिन्नो होति निबव्बानपोणो निब्बानपब्भारो। कथं च, भिक्खवे, भिक्खु\nअरिय॑ अद्डक्िगिक॑ मर्गं भावेन्तों अरिय॑ अद्रड्िगक॑ मरगं बहलीकरोन्तो निव्वाननिन्नों होति\nनिब्बानपोणो निब्बानपब्भारो? इध, भशिक्खवे, भिक्खु सम्मादिदष्ठिं भावेति अमतोगध॑ं\nअमतपरायनं अमतपरियोसानं ...पे*... सम्मासमाधिं भावेति अमतोगर्ध अमतपरायनं\nअमतपरियोसानं। एवं खो, भिक्‍खवे, भिक्खु अरियं अट्ठड्िगक॑ मग्गं भावेन्तो अरियं अट्ठडिजगिक\nमग्गं बहुलीकरोन्‍्तो निव्बाननिन्नो होति निव्बानपोणो निब्बानपब्भारो”'ति।\n\n११६ - १२०. दुतियादिपाचीननिन्‍्नसुत्तपञ्चकं\n\n११६. सेय्यथापि , भिक्‍्खवे, यमुना नदी पाचीननिनना पाचीनपोणा पाचीनपब्भारा;\nलिस्कृतच्छाया) रागविनयपर्यवसान द्वेपविनयपर्यवसान मोहविनयपर्यवसानम। एवं खल भिक्षवः/\nजिक्षु: आर्यम्‌ अष्टाडिगक॑ मार्ग भावयन्‌ आर्यम्‌ अष्टाडिगक॑ मार्ग बहलीकुर्वन्‌ निर्वाणनिम्नो भवति\nनिर्वाणप्रवणों निर्वाणप्राग्भार:”इति। (रागविनयद्वादसकी दुतियकी समुद्दनिन्‍नन्ति)।\n\n११५.“तद्यथापि, झ्िक्षवः! गड्गा नदी प्राचीननिम्ना प्राचीनप्रवणा प्राचीनप्राग्भारा; एव्मेव\nखलु, भिक्षव:! भिक्षु: आर्यम्‌ अष्टाहिगक॑ मार्ग भावयन्‌ आर्यम्‌ अष्टाडिगकं मार्ग बहलीकुर्वन्‌ निर्वाणनिम्रो\nभवति निर्वाणप्रवणो निर्वाणप्राग्मारः। कर्थ च, भिक्षवः! भिक्षु: आर्यम्‌ अष्टाडिगक मार्ग भावयन्‌ आर्यम्‌\nअष्टाड्गिकं मार्ग बहलीकुर्वन्‌ निर्वाणनिम्नो भवति निर्वाणप्रवणो निर्वाणप्राग्भार:? इह, भिक्षवः! भिक्षु:\nसम्यग्दुर्षि भावयति अमृतावगाधम्‌ अम्ृतपरायणाम्‌ अमृतपर्यवसानाम्‌ ...पे*... सम्यक्समार्थि भावयति\nअमृतौगन्धम्‌ अमृतपरायणम्‌ अमृतपर्यवसानम्‌॥। एवं खलु भिक्षवः! झिक्षु: आर्यम्‌ अष्टाहडिगकं मार्ग\nभावयन्‌ आर्यम्‌ अष्टाडिगिक॑ मार्ग बहलीकुर्वन्‌ निर्वाणनिम्रो भवति निर्वाणप्रवणो निर्वाणप्राग्भारः”इति।\n\n११६. तद्यथापि, सिक्षव:! यमुना नदी प्राचीननिम्ना प्राचीनप्रवणा प्राचीनप्राग्भारा:\nकहेन्का का अन्यास करके भिक्षु निर्वाण की ओर अग्रसर होता है। (रागविनय आदि का बोध कराने वाले\nसमुद्रनिम्न द्वादश सूत्रों वाला वर��ग समाम)\n\n११५. भिक्षुओं! जैसे गडगा नदी पूर्व की ओर बहती है, बढती है, पूर्व की ओर अग्रसर होती है। उसी तरह\n| आर्य अष्टांगिक मार्ग का भावना एवं अभ्यास करने भिक्षु निर्वाण की ओर अग्रसर होता है, बढता\nअग्रसर होता है। कैसे, भिक्षुओं! आर्य अष्टांगिक मार्ग का अभ्यस करने वाला झिक्षु निर्वाण की\nओर अग्रसर होता है, बढता है, निर्वाण की ओर झुकता है? भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु अमृतप्लुत एवं अमृत की ओर ले\nजाने बाली सम्यस्द्ठि . अमृतप्लुत एवं अमृत की ओर ले जाने वाली सम्यक्‌-समाधि की भावना\nकरता है। ...पूर्ववत्‌..."} +{"id": "indic_deva_eval_000109_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000109_indic_mozhi_deva_word_ocr_a107fe934fc8.jpg", "ocr": "अपने"} +{"id": "indic_deva_eval_000110_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000110_indic_vision_bench_deva_ocr_5404e7f71b23.jpg", "ocr": "थोडी दारू प्यायलो तर कुणाचं काय वाईट होतंय?\n\"अधूनमधून नाही, जवळ जवळ रोज पिता आणि त्यामुळे आपलं दोघांचंही वाईट होतंय.\"\n\"काय वाईट होतंय? मी काय तुला वाईट वागवतो का मारहाण करतो?\"\n\"मारहाण करणं म्हणजेच वाईट वागवणं का? जरा विचार करा, रणजित. लग्न झाल्यानंतरचे दिवस आणि आत्ता ह्यात तुम्हाला काहीच फरक जाणवत नाही? आपण एकत्र फिरायला जात होतो, चेष्टामस्करी करीत, रेंगाळत जेवत होतो, रात्री उशीरापर्यंत गप्पा मारीत होतो. आता एखादं काम उरकल्यासारखं जेवण करून तुम्ही लगेच झोपायला जाता. मी आवराआवर करून येते तो तुम्ही गाढ झोपेत असता. फिरायला तर आपण किती दिवसांत गेलो नाही.\n\"तू घरी कुठे असतेस?\"\n\"मी रोज तुम्ही यायच्या आत घरी आलेली असते.\"\n\"मग कुणी ना कुणी दुकानात आलेलं असतं.\"\n\"बास? एवढंच?\"\n\"म्हणायचंय काय तुला? लग्नानंतरचे हनीमूनचे दिवस जन्मभर टिकतात का?\"\nलग्नानंतर ३-४ दिवस तो रानात गेला नव्हता, आणि तिनं का म्हणून विचारलं तेव्हा म्हणाला होता, आपला हनीमून नाही का?\nआता ती म्हणाली, \"तुमच्याशी वाद घालण्यात अर्थ नाही, कारण तुम्ही मुद्दाम वेड पांघरताय. मी तुम्हाला फक्त एवढंच सांगते अशा तऱ्हेनं जगणं मला अशक्य आहे. हे असंच चालू राहिलं तर तुम्हाला सोडून जाणं एवढा एकच मार्ग मला आहे.\"\n\"का म्हणून सोडून जाणार? तुझं माझ्यावर प्रेम नाही?\"\n\"खूप प्रेम आहे. म्हणूनच तुमचं वागणं आणि त्यामुळे आपल्या नात्याचं जे होतंय ते सहन करणं मला शक्य नाही. तुमच्याशी लग्न करण्यात मी फार मोठी चूक केली. ती आता निस्तरली पाहिजे.\"\n\"चूक केली असं कसं म्हणतेस?\"\n\"सरळ आहे. माझ्याशी लग्न केल्यामुळे ���ुमचं सुरळित चाललेलं आयुष्य विस्कटलं. ते परत रुळावर आणण्यासाठी जे करायला पाहिजे ते करायला तुम्ही तयार नाही. तुम्ही तुमच्या चौकटीतून बाहेर पडायलाच मागत नाही.\nकमळाची पानं । १७२"} +{"id": "indic_deva_eval_000111_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000111_devanagari_page_ocr_469a56dce3e6.jpg", "ocr": "सद्नीतिप्पकरणं\n\n228:\n\nपुस्गलवचनस्स पन दिस्सति। यदि च “सालो धवो खदीरो”तिआदीनं विय रुक्खवचनस्स\nबोधिसदस्स पुल्लिड्गत्त सिया, जम्बू सिम्बली पाटलीसद्दादीनं रुक्खवाचकत्ता पुल्लिड्गत्त\nसिया, न तेसं इमस्स च रुक्खवाचकत्तेपि पुल्लिड्गभावों उपलब्भति। यदि हि रुक्खबचनो\nबोधिसद्दो पुल्लिडुगो, एवं सन्‍्ते निब्बानवचनो सब्बज्जुतज्ञाणवचनो च बोधिसद्दो\nनपुंसकलिड्गो सिया “निव्बान”न्तिआदिना नपुंसकलिड्गवसेन निषदिट्ठस्स निब्बानादिनो\n\nअत्थस्स कथनतो।\n\nये एवं बदन्ति “रुक्खवचनों बोधिसद्दों पुल्लिड्गो”ति, ते “बोधि वुच्चति चतूसु मग्गेसु\nजाणं, त॑ एत्थ भगवा पत्तोति रुक्खोषि बोधिज्वेव वुच्चती”ति बुत्तमत्थं चेतसि सन्निधाय\n“बुज्मति एत्थाति बोधी”ति निब्बचनवसेन “किं रुक्खबचनो बोधिसद्दो पुल्लिझ्गो न\nभविस्सती\"ति मज्ञमाना वदन्ति मछ्झे। नेवं दढ्ब्बं, एवड्च पन दट़ब्बं, “बोधि वुच्चति चतूस\n\nमग्गेसु आणं, त॑ एत्थ भगवा पत्तोति रुक्खोषि बोधिच्वेव वुच्चती”ति वदन्तेहि गरूहि\nआणवचरनं इत्थि लिझगभूतं॑ बोधीति आणस्स नाम॑ पण्णत्तिअन्तरपरिकप्पनेनत्थं परिकप्पेन्तेन\nबुज्ञनद्ठानभूते रुक्खे आरोपेत्वा रुक्खो “बोधी\"ति वुत्तों, तस्मा ईदिसेसु ठानेसु निव्बचने आदरो\nन कातब्बो। न हि “बुज्ञति एत्थाति बोधी”ति निव्बचनकरणं रुक्खवचनस्स बोधिसद्धस्स\nपुल्लिड्गत्त कातुं सक्‍कोति सड्तकेतसिद्धत्ता वोहारस्स, तस्मा रुक्‍्खें सर्य अबोधिम्पि समान॑\nबोधिया पटिलाभदट्ठानत्ता सडकेतसिद्धेन “बोधी”ति इत्थिलिड्गवोहारेन वोहरन्ति सासनिका,\nबोधिया वा कारणत्ता फलवोहारेन। एतमत्थंयेव हि सन्‍्धाय “बोधि वुच्चति चतूसु मग्गेसु आणं,\nत॑ एत्थ भगवा पत्तोति रुक्खोषि बोधिच्वेव वुच्चती”ति बुत्तन्ति दद्ठब्बं, एवं “बोधी”ति\nइत्थिलिड्गवसेन रुक्खनामं॑ पवत्ततीति। तेनाह आयस्मा सारिपुत्तो धम्मसेनापति\nअनुधम्मचक्कवत्ती बोहारकुसलो इत्थिलिड्गवोहारेन “बुद्धानं भगवन्तानं बोधिया मूले सह\nसब्बज्जुतञ्ञाणप्पटिलाभा सच्छिका पञ्जत्ति यदि���ं बुद्धो\"ति। अपिच तत्थ तत्थ “बोधिया\nसाखा”ति च, “केनड्रेन महाबोधि, कस्स सम्बन्धिनी च सा”ति च,\n\n“हत्थतो मुत्तमत्ता सा,\n\nअसीतिरतनं नभं।\n\nउम्गन्त्वान तदा मिच,\n\nहब्वण्णा रस्मियो सुभा\"ति च\n'एबमादयो रुक्खवाचकस्स बोधिसद्दस्स इत्थिलिड्गभावे पयोगा दिस्सन्ति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000112_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000112_indic_vision_bench_deva_ocr_b9e1bfbc7212.jpg", "ocr": "७\nहिन्दुस्तान कैसे गया?\nपाठक :\nआपने सभ्यताके बारेमें बहुत कुछ कहा; और मुझे विचारमें डाल दिया। अब तो मैं इस संकट\n[\n१\n]\nमें आ पड़ा हूँ कि यूरोपकी प्रजासे मैं क्या लूँं और क्या न लूँ। लेकिन एक सवाल मेरे मनमें तुरन्त उठता है: अगर आजकी सभ्यता बिगाड़ करनेवाली है, एक रोग है, तो ऐसी सभ्यतामें फँसे हुए अंग्रेज हिन्दुस्तानको कैसे ले सके? इसमें वे कैसे रह सकते हैं?\nसंपादक :\nआपके इस सवालका जवाब कुछ आसानीसे दिया जा सकेगा और अब थोड़ी देरमें हम स्वराज्यके बारेमें भी विचार कर सकेंगे। आपके इस सवालका जवाब अभी देना बाकी है, यह मैं भूला नहीं हूँ। लेकिन आपके आखिरी सवाल पर हम आयें। हिन्दुस्तान अंग्रेजोंने लिया सो बात नहीं है, बल्कि हमने उन्हें दिया है। हिन्दुस्तानमें वे अपने बलसे नहीं टिके हैं, बल्कि हमने उन्हें टिका रखा है। वह कैसे सो देखें। आपको मैं याद दिलाता हूँ कि हमारे देशमें वे दरअसल व्यापारके लिए आये थे। आप अपनी कंपनी बहादुरको याद कीजिये। उसे बहादुर किसने बनाया? वे बेचारे तो राज करनेका इरादा भी नहीं रखते थे। कंपनीके लोगों की मदद किसने की? उनकी चाँदीको देखकर कौन मोहमें पड़ जाता था? उनका माल कौन बेचता था? इतिहास\n[\n२\n]\nसबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्दी पैसा पानेके मतलबसे हम उनका स्वागत करते थे। हम उनकी मदद करते थे। मुझे भांग पीनेकी आदत हो और भांग बेचनेवाला मुझे भांग बेचे, तो क़सूर बेचनेवालेका निकालना चाहिये या अपना खुदका? बेचनेवालेका क़सूर निकालनेसे मेरा व्यसन\n[\n३\n]\nथोड़े ही मिटनेवाला है? एक बेचनेवालेको भगा देंगे तो क्या दूसरे मुझे भांग नहीं बेचेंगे? हिन्दुस्तानके सच्चे सेवकको अच्छी तरह खोज करके इसकी जड़ तक पहुँचना होगा। ज्यादा खानेसे अगर मुझे अजीर्ण\n[\n४\n]\nहुआ हो, तो मैं पानीका दोष निकाल कर अजीर्ण दूर नहीं कर सकूँगा। सच्चा डॉक्टर\n२१\n↑\nपसोपेश, दुविधा।\n↑\nतवारीख।\n↑\nलत, कुटेव।\n↑\nबदहजमी।"} +{"id": "indic_deva_eval_000113_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000113_devanagari_page_ocr_491a1a3decb8.jpg", "ocr": "अपदानपालि अंडे\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥937॥\nइत्थं सुदं आयस्मा एकचम्पकपुप्फियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nएकचम्पकपुष्फियत्थेरस्सापदानं अद्ठमं।\n9. तिमिरपुण्फियत्थेरअपदानं\n“चन्दभागानदीतीरे, अनुसोत॑ बजामहं।\nअइसं विरजं बुद्धं, सालराजंब फुल्लितं॥938॥\n“पसन्‍्नचित्तों सुमनो, पच्वेकमुनि सृत्तमं।\nगहेत्वा लिमिरं पुप्फे, मत्थके ओकिरिं अहं॥939॥\n“एकनबुतितो कप्पे, यं पुप्फमभिपूजयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजायिदं फलं॥940॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो. ..पे*. .. कतं बुद्धस्स सासनं\"॥944॥\nइत्थं सुदं आयस्मा तिमिरपुण्फियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nतिमिरपुण्फियत्थेरस्सापदानं नवमं।\n\n“प्रतिसंविदश्वतस्र: ...पे*... कृत बुद्धस्य शासनम्‌\"॥937॥\nउल्बें स्थिंद जायामान एकलस्पकपापीयस्थलिर उसा गाथा जभापिषटेलि।\n“चन्द्रभागानदीतीरे, अनुखोतं ब्रजाम्यहम।\nअद्राक्ष॑ विरज॑ बुद्धमू, शालराज इब फुल्लितम्‌॥938॥\n“प्रसन्‍नचित्त: सुमनाः, प्रत्येकमुनिमुत्तमम।\nगृहीत्वा तिमिरं पुष्पम्‌, मस्तके अवाकिरम्‌ अहम्‌॥939॥\n>एकनवर्लितसे कल्से, सन पर्पसन्‍्यपजयस।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजाया इदं फलम्‌॥940॥\n“प्रतिसंविदश्चतस्त्र: ....पे*... कृतं बुद्धस्य शासनम्‌”॥944॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ तिमिरपुष्पीयस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nजार पटिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥937॥\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ एकचम्पकपुष्पीय स्थविर ने इन गाथाओं को कहा। __\nको दे गाया नदी के तट का अनुसरण करते हुए जा रहा था, तब मैंने शालराज के समान प्रफुल्लित निर्मल\nबुद्ध को देखा॥938॥\n्रत्येक बुद्धों में उत्तम मुनि को प्रसन्नचित्त एवं सुन्दरमन से मैंने तिमिरपुष्प को ग्रहण कर उनके मस्तक\nपर फैला दिया॥939॥\nयहाँ से 94 वें कल्प में मैंने जो पुष्प अभ्यर्पित किया था, यह उस बुद्ध-पूजा का ही सुपरिणाम है कि मैं\nडुर्गति को नहीं जानता॥940॥\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥944॥\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ तिमिरपुष्पीय स्थविर ने इन गाथाओं को कहा।"} +{"id": "indic_deva_eval_000114_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000114_devanagari_page_ocr_36d5f2ffb208.jpg", "ocr": "मातिका\n\n७\n\n४. (क) हेतू चेव धम्मा सह्ेतुका चा।\n(ख) सहेतुका चेव धम्मा न च हेतू।\n५. (क) हेतू चेव धम्मा हेतुसम्पयुत्ता च।\n(ख) हेतुसम्पयुत्ता चेब धम्मा न च हेतू।\n६. (क) न हेतू खो पन धम्मा सहेतुकापि।\n(ख) अहेतुकापि।\n(२) चूव्ठन्‍्तरदुक\n७. (क) सप्पच्चया धम्मा।\n(ख) अप्पच्चया धम्मा।\n<.(क) सक्नता धम्मा।\n(ख) असझ्वता धम्मा।\n(संस्कृतच्छाया) ४. (क) हेतवश्वैव धर्मा: सह्ेतुकाश्व।\n(ख) सहेतुकाश्वैव धर्मा: न च हेतव:।\n५. (क) हेतवश्वैव धर्मा: हेतुसम्प्रयुक्ताश्वा\n(ख) हेतुसम्प्रयुक्ताश्व चैव धर्मा: न च हेतव:।\n६. (क) न हेतव: खलु पुन: धर्मा: सहेतुका अपि।\n(ख) अहेतुका अपि।\n७. (क) सप्रत्यया: धर्मा:।\n(ख) अप्रत्यया: धर्मा:।\n<. (क) संस्कृता: धर्मा:।\n(ख) असंस्कृता: धर्मा:।\n(नदी) ४. (क) वे धर्म, जो स्वयं हेतु हैं और हेतुओं से युक्त भी हैं।\n(ख) बे धर्म, जो स्वयं हेतु नहीं हैं, किन्तु हेतुओं से युक्त हैं।\n५.(क) बे धर्म, जो स्वयं हेतु हैं और हेतुओं से संप्रयुक्त हैं।\n(ख) वे धर्म, जो स्वयं हेतु नहीं हैं, किन्तु हेतुओं से संप्रयुक्त हैं।\n६.(क) वे धर्म, जो स्वयं हेतु नहीं हैं, किन्तु जो हेतुओं से युक्त हैं।\n(ब) वे धर्म, जो न स्वयं हेतु हैं और न हेतुओं से युक्त हैं।\n७.(क) वे धर्म, जो प्रत्यय से युक्त हैं।\n(ब) वे धर्म, जो प्रत्यय से युक्त नहीं हैं।\n<.(क) वे धर्म, जो संस्कृत हैं। (ख) वे धर्म, जो असंस्कृत हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000115_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000115_devanagari_page_ocr_9dc44281eb02.jpg", "ocr": "400.\n\n25. भिक्‍्ख्युवग्गो\n\nचालि-\n368.\n\n369.\n\n370.\n\n374.\n\nमेत्ताविहारी यो भिक्‍्खु, पसन्‍नो बुद्धसासने।\n\nअधिगच्छे पर्द सन्‍्तं, सद्धारूपसमं सुखं॥ 25/9 ।।\n\nसिज्च भिकक्‍्खु इस नावं, सित्ता ते लहमेस्सति।\n\nछल्वा रागठच दोसउतच, ततो निब्बानमेहिसि॥25/0।\n\nचड्च छिबन्‍्दे पठच जहे, पठच चुत्तरि भावये।\n\nचपड्च सज्ञातिगो भिक्‍्ख्ु, “ओघतिण्णो”ति बुल्चति॥:25/4॥॥\n\nझाय भिक्‍ख्ु सा पसादो, मा ते कामगुणे रमेस्सु चित्तं।\n\nमा लोहगुव्ठ गिली पमत्तो, मा कन्दि “दुक्खंमिदं ति डय्हमानो॥25/42॥।\n\nसंस्कृतच्छाया- मैत्रीविहारी यो भिक्षु: प्रसन्नो चुद्धशशासने ।\n\nअधिगच्छेत्‌ पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम्‌ ।।25/9 ॥।\n\nसिंच अिश्षो ! इमां नावं सिक्ता ते लघुत्वम्‌ एष्यति ।\n\nछित्वा रागं च द्वेषं च ततो निर्वाणमेष्यसि ॥॥25/40 ॥।\n\nपंच ह्ट्िन्धि पंच जहीहछि पंचोत्तरं भावये |\n\nपंच संगाउतिगो भिक्षु: ओघतीर्ण इत्युच्यते ।।25/44 ॥।\n\nध्याय भिक्षो ! मा च प्रमादो, मा ते कामगुणे श्रमतु चित्तम्‌ ।\n\nमा लोहगोल॑ ��िल प्रमत्तो, सा क्रन्दीर्दु:खमिदमिति दह्यमान:।।25/42 ।।\n\nहिन्दी- मैत्री (भावना) से विहार करता जो भिक्षु बुद्ध के उपदेश में प्रसन्न (श्रद्धावान) रहता\n\nदा (वह) सभी संस्कारों को शमन करने वाले शान्त और सुखमय पद को प्रास करता\n॥425/9 ॥।\n\nछे भिल्षु! इस नाव को उलीची, उलीचने पर (यह) तुम्हारे लिये हल्की हो जायेगी।\nराग और द्वेष को छेदन कर, फिर तुम निर्वाण को प्रास होगे।।25/40 ॥।\n\n(जो रूप, राग, समान, उद्धतपना और अविद्या इन) पाँच को छेदन करे; (जो नित्य\nआत्मा की कल्पना, सन्देह, शील-ब्रत पर अधिक जोर, भोगों में राग, और प्रति हिंसा\nइन) पाँच को त्याग करे; उपरान्त (जो श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा) इन\nपॉँच की भावना करे; (जो, राग, द्वेष, मोह, मान और झूठी धारणा इन) पाँच के\nसंसर्ग को अतिक्रमण कर चुका है; (वह काम भव, दृष्टि और अविद्यारूपी) ओघों\n(बाढ़ों) से उत्तीर्ण हुआ कहा जाता है।।25/44॥।\n\nहे भिक्षु ! ध्यान में लगो, मत गफलत करो, तुम्हारा चित्त मत भोगों के चक्कर में पड़े,\n\nप्रमत्त होकर मत लोहे के गोले को निगलो (हाय) यह दुःख कहकर दग्ध होते (पीछे)\n. मत तुम्हें क्रददन करना पड़े ।।25/42।॥\n\n(एफ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टाारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000116_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000116_indic_mozhi_deva_word_ocr_8ffa6d583386.jpg", "ocr": "टाकण्याची"} +{"id": "indic_deva_eval_000117_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000117_indic_vision_bench_deva_ocr_0036907b0375.jpg", "ocr": "प्रारंभीचे शब्द\nअकरा\nवरिष्ठ अधिका-याने करायला हव्यात अशा सुधारणांची प्रत्येकाकडे एक यादी असते. कालांतराने वरिष्ठ अधिकारी सुधारण्याची शक्यता असली तरीही ही सुधारणा खूप कमी आणि धिम्या चालीने होणे अटळ आहे. याचं कारण असं की वरिष्ठ अधिकारी हे (तुलनेने) अधिक यशस्वी झालेले असतात. आणि यश एक वाईट शिक्षक आहे. यश काही करायचा एक मार्ग शिकवते आणि इतर प्रत्येक मार्गाला हटवादी विरोध करते. व्यवस्थापकाचे मूळ काम हे आवश्यकरीत्या स्वतः आत्मपरीक्षण करून स्वत:ला सुधारणे हे आहे. एक कवी म्हणतो त्याप्रमाणे :\nमिटा दे अपनी गफलत, फिर जगा अरबाब गफलत को,\nउन्हें सोने दे, पहले ख्वाबसे बेदार तू हो जा।\n(आधी दुस-यांच्या गोंधळाची चिंता करण्यापूर्वी स्वत:च्या गोंधळाची काळजी घे,\nत्यांना झोपू दे, आणि तुझ्या स्वत:च्या स्वप्नापासून सुटका मिळव.)\nजेव्हा मी एम.बी.ए.ला शिकवीत होतो तेव्हा शेवटच्या वर्षातील विद्यार्थ्यांसाठीच्या शेवटच्या लेक्चरला मला वारंवार या प्रश्नाचं उत्तर ���ेणं भाग झालं होतं : “सर, आम्ही आता व्यवस्थापक होणार आहोत-आम्हांला आमच्या यशासाठी तुम्ही काय ‘टिप्’ देता?\n“पहिली ‘टिप्' म्हणजे टिप्स् मागू नका.\" मी उत्तर द्यायचो. “दुसरी आणि शेवटची टिप म्हणजे तुम्ही एक वही ठेवा. या वहीत तुमच्या अवतीभोवती चाललेल्या चांगल्या किंवा वाईट व्यवस्थापनाची नोंद ठेवा. उदाहरणार्थ, जर इतरांसमोर वरिष्ठ अधिका-याने जर हाताखालच्या व्यक्तीची प्रशंसा केली तर कृपया त्याची या वहीत नोंद करा आणि जर एखादा वरिष्ठ अधिकारी हाताखालच्या व्यक्तीवर ओरडला किंवा बरोबरीने काम करणाच्या सहकाच्याबरोबर भांडला तर त्याचीसुद्धा नोंद ठेवा. रात्री झोपण्यापूर्वी ह्या नोंदी वाचा आणि योग्य प्रसंगी तुम्ही स्वतः यातील 'चांगले किंवा 'वाईट' व्यवस्थापन करता की कार्य ते तपासा. याने तुम्हांला गतकालीन गोष्टींचे अवलोकन करून आपण कोठे चुकलो याची समज (पश्चातदृष्टी) येईल. काही काळानंतर तुम्हांला ‘मध्यदृष्टी' प्राप्त होईल–प्रत्यक्ष कामात तुम्ही कसे, कोणत्या मार्गाने वाटचाल करीत आहात ते काम करता करता समजेल. सरतेशेवटी तुम्हांला 'दूरदृष्टी' प्राप्त होईल–समस्या आणि संधी यांची अटकळ बांधून तुमची धोरणे ठरविण्याची कुवत येईल. व्यवस्थापनातील ही खरी बिकट बाब आहे.\""} +{"id": "indic_deva_eval_000118_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000118_indic_mozhi_deva_word_ocr_b907214b0799.jpg", "ocr": "होंगे"} +{"id": "indic_deva_eval_000119_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000119_indic_vision_bench_deva_ocr_c86c0099bd3f.jpg", "ocr": "[२]\nविषय\nपृष्ठ\n(१७)चालीसवाँ प्रकरण--महात्माओं के दर्शन १६२-१७२\n(१८)एकतालीसवाँ प्रकरण--व्यापार पर प्रकाश १७३--१८१\n(१९)बयालीसवाँ प्रकरण--चरित्र की दरिद्रता १८२--१९१\n(२०)तेंतालीसवाँ प्रकरण--गया-श्राद्ध में\nचमत्कार ... ...१९२--२०३\n(२१)चौवालीसवाँ प्रकरणा -- श्राद्ध पर शास्त्रार्थ २०४--२१७\n(२२)पैंतालीसावाँ प्रकरण-मातृस्नेह की महिमा २१८--२२६\n(२३)छियालीसवाँ प्रकरण--कर्म-फल का खाता २२७-२३८"} +{"id": "indic_deva_eval_000120_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000120_hindi_handwritten_word_ocr_b7066fada545.jpg", "ocr": "न्यायाधीश"} +{"id": "indic_deva_eval_000121_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000121_hindi_handwritten_word_ocr_ec057a4c600c.jpg", "ocr": "पपरी"} +{"id": "indic_deva_eval_000122_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000122_indic_mozhi_deva_word_ocr_37c45d207903.jpg", "ocr": "सांग.\""} +{"id": "indic_deva_eval_000123_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000123_indic_vision_bench_deva_ocr_167e352e85d6.jpg", "ocr": "उघडले, तर पाकीट पाकीटच राहते. त्याचा आपण पुन्हा उपयोग करू शकतो अथवा अशा पाकिटांचा गठ्ठा जमला, तर तो ��द्दीत देऊ शकतो.\nथोडक्यात, कागदांची फाडफाडी आणि चोळामोळा करून बोळे करायचे थांबवले, तर कमीतकमी एका डस्टबिनमधील कचरानिर्मिती तरी थांबत होती.\nआता माझा उत्साह वाढला. मी स्वयंपाकघरातील कचऱ्याच्या बादलीकडे माझा मोर्चा वळविला. त्या बादलीत हात घालता येत नव्हता, कारण बादली उघडताच हाताचा उपयोग नाक दाबायला करावा लागत होता. म्हणून दुसऱ्या दिवशी त्या बादलीत कचरा होण्यापूर्वीच ती तपासायची असे मी ठरवले.\nनेहमीप्रमाणे मी दूध घेऊन आलो. कात्री घेतली आणि दुधाच्या पिशवीचा एक कोपरा उडविला. दूध पातेल्यात तापत ठेवले. चहा टाकावा म्हणून चहाचे पातेले घ्यायला बाजूला वळलो. मघाशी कात्रीने उडविलेला दुधाच्या पिशवीचा तुकडा ओट्यावर पडला होता. माझ्याकडे तो केविलवाण्या नजरेने बघतोय, असे मला वाटले. जोपर्यंत तो पिशवीचा भाग होता, तोपर्यंत तो कचरा नव्हता. ज्या क्षणाला मी त्याला पिशवीपासून अलग केले, त्या क्षणाला तो कचरा बनला. म्हणजे माझी पिशवी फाडायची पद्धत चुकीची होती. पिशवी जर मी ब्लेडने आडवी चीर देऊन फाडली असती, तर असा कचरा झाला नसता.\nदुधाची पिशवी जर मी बेसिनमध्ये तशीच पडू दिली असती आणि तासा-दोन तासांनी तिला साफ करायला गेलो असतो, तर पिशवी धुताना प्रथम मला थोडीशी तरी किळस वाटली असती. एखाद्या गोष्टीबद्दल किळस वाटणे, हे ती वस्तू कचऱ्यात रूपांतरित होत आहे, याचे द्योतक आहे. मी लगोलग त्या दोन्ही पिशव्या उलट्या करून साबणाने स्वच्छ धुतल्या. फडक्याने पूर्ण पुसल्या. आता त्यांना दूध नासल्याचा आंबूस वास येणार नव्हता. हे सर्व काम दूध तापून चहाला उकळी फुटेपर्यंत झाले होते. किती थोडा वेळ ! नाहीतर या वेळेत मी काय केले असते ? कचरा बनलेल्या त्या पिशवीच्या छोट्या तुकड्याची क्षमा मागून मी पेपर वाचायला बसलो.\nआज सुट्टीचा दिवस होता. पेपरमधून हॅण्डबिलांच्या जाहिराती बाहेर पडत होत्या. पूर्वी या कागदांना मी सरळ डस्टबिनची वाट दाखवीत असे, पण आता शून्य कचऱ्याचे गणित मला उलगडू लागले होते. मी त्या सर्व जाहिराती व्यवस्थित गोळा केल्या आणि रद्दीच्या खणात एका बाजूला ठेवून दिल्या.\nचहा पीत, पेपर वाचत मी रविवारची सकाळ मजेत घालवीत होतो. ओट्यावर चहाचे पातेले धुवाचये राहिले होते. गाळण्यात चहाची ओली पूड जमा झालेली होती.\n१६ * शून्य कचरा"} +{"id": "indic_deva_eval_000124_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000124_devanagari_page_ocr_6e7b55191491.jpg", "ocr": "350\n\nमेत्तेयवग्गो\n\n“एकनबुतितों कप्पे, यं कम्ममकरिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, तनुकिच्चस्सिदं फलं॥4664॥\n“किलेसा झापिता मस्हं...पे*... विहरामसि अनासवो॥662॥\n“स्वागतं बत मे आसि...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं॥663॥\n“पटिसस्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥4664॥\nइत्थं सुदं आयस्मा पुण्णको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\n\nचुण्णकल्थेरस्सापदान दुतियं।\n\n3. मेत्तगुत्थेरअपदानं\n\n“हिमवन्तस्साविदूरे, असोको नाम पब्बतो।\n'तत्थासि अस्समों मख्हं, विस्सकम्मेन [विसुकम्मेन (सी* स्या* क*)] मापितो॥4665॥\n“सुमेधो नाम सम्बुद्धों, अग्गो कारुणिको सुनि।\n\nनिवासयित्वा पुब्बण्हे, पिण्डाय मे [मं (सी*)] उपागमि॥4666॥\n\nआअत्‌ कर्माकरवे\nदुर्गतिं नाभिजानामि, तनुकृत्यस्येदं फलम्‌॥4664॥\n\n“क्लेशा: ध्मापिताः मम...पे*... विहरामि अनासख्रबः॥662॥\n“स्वागत बत मे आसीत्‌...पे*... कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌॥663॥\n“प्रतिसंविदश्वतस्त्र: . ..पे*... कृतं बुद्धस्य शासनम्‌”॥664॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ पूर्णकस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\n“हिमबन्तस्याविदूरे, अशोको नाम पर्वतः।\n\nतत्नासीत्‌ आश्रमों मम, विश्वकर्मणा मापित:॥665॥\n\n“सुमेधो नाम सम्बुद्ध:, अग्र: कारुणिको सुनि:।\n\nनिवासय्य पूर्वाह्लि, पिण्डाय मे उपागमत्‌॥666॥\n\nअब से 9। वें कल्प में मैने जो कर्म किया था, उसी शरीरकृत्य का ही सुपरिणाम है मैं दुर्गति को नहीं\n\nजानला॥664॥\n\nरहित हो विहार कर रहा हूँ॥662॥\n\nमेरे सभी क्लेश दग्ध हो चुके हैं। मैं भवचक्र से मुक्त हो चुका हूँ। हाथी के समान बन्धन को तोड़कर आखच\n\nमैं सौभाग्यशाली था कि बुद्ध्लरेष के समीप पहुँचा तथा तीनों विद्याओं को प्राप्त कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया।4663॥\nचार पटिसम्भिदाओं आठ विमोक्षों तथा पड्िभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया॥664॥\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ पूर्णक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nहिमालय पर्वत से कुछ दूरी पर अशोक नाम का पर्वत था। वहाँ पर व्यवस्थित रूप से निर्मित मेरा आश्रम था॥665॥\nसुमेध नाम के अग्र कारुणिक मुनि सम्बुद्ध पूर्वाह्न के समय भिक्षाटन के लिए मेरे निवास स्थान पर आये॥666॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000125_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000125_indic_vision_bench_deva_ocr_e643c82a8842.jpg", "ocr": "गोदान : 109\nधनिया हाथ मटकाकर बोली-हां, दे दिया। अपनी गाय थी, मार डाली, फिर किसी दूसरे\nका जानवर तो नहीं मारा? तुम्हारे तहकियात में यही निकलता ह���, तो यही लिखो। पहना दो मेरे\nहाथ में हथकड़ियां। देख लिया तुम्हारा न्याय और तुम्हारे अक्कल की दौड़। गरीबों का गला\nकाटना दूसरी बात है। दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात।\nहोरी आंखों से अंगारे बरसाता धनिया की ओर लपका, पर गोबर सामने आकर खड़ा\nहो गया और उग्र भाव से बोला-अच्छा दादा, अब बहुत हुआ। पीछे हट जाओ, नहीं मैं कहे\nदेता हूं, मेरा मुंह न देखोगे। तुम्हारे ऊपर हाथ न उठाऊंगा। ऐसा कपूत नहीं हूं। यहीं गले में फांसी\nलगा लूंगा।\nहोरी पीछे हट गया और धनिया शेर होकर बोली-तू हट जा गोबर, देखूं तो क्या करता\nहै मेरा। दारोगाजी बैठे हैं। इसकी हिम्मत देखूं । घर में तलासी होने से इसकी इज्जत जाती है।\nअपनी मेहरिया को सारे गांव के सामने लतियाने से इसकी इज्जत नहीं जाती ! यही तो वीरों\nका धरम है। बड़ा वीर है, तो किसी मरद से लड़। जिसकी बांह पकड़कर लाया, उसे मारकर\nबहादुर कहलाएगा। तू समझता होगा, इसे रोटी-कपड़ा देता हूं। आज से अपना घर संभाल।\nदेख तो इसी गांव में तेरी छाती पर मूंग दलकर रहती हूं कि नहीं, और इससे अच्छा खाऊं-\nपहनूंगी। इच्छा हो देख ले।\nहोरी परास्त हो गया। उसे ज्ञात हुआ, स्त्री के सामने पुरुष कितना निर्बल, कितना निरुपाय है।\nनेताओं ने रुपये चुनकर उठा लिए थे और दारोगाजी को वहां से चलने का इशारा\nकर रहे थे। धनिया ने एक ठोकर और जमाई-जिसके रुपये हों, ले जाकर उसे दे दो। हमें\nकिसी से उधार नहीं लेना है। और जो देना है, तो उसी से लेना। मैं दमड़ी भी न दूंगी, चाहे\nमुझे हाकिम के इजलास तक ही चढ़ना पड़े। हम बाकी चुकाने को पच्चीस रुपये मांगते\nथे, किसी ने न दिया। आज अंजुली-भर रुपये ठनाठन निकाल के दे दिए। मैं सब जानती हूं।\nयहां तो बांट-बखरा होने वाला था, सभी के मुंह मीठे होते। ये हत्यारे गांव के मुखिया हैं, गरीबों\nका खून चूसने वाले। सूद-ब्याज, डेढ़ी-सवाई, नजर-नजराना, घूस-पास जैसे भी गरीबों को\nलूटो। उस पर सुराज चाहिए। जेहल जाने से सुराज न मिलेगा। सुराज मिलेगा धरम से, न्याय से।\nनेताओं के मुख में कालिख-सी लगी हुई थी। दारोगाजी के मुंह पर झाडू-सी फिरी हुई\nथी। इज्जत बचाने के लिए हीरा के घर की ओर चले।\nरास्ते में दारोगा ने स्वीकार किया औरत है बड़ी दिलेर ।\nपटेश्वरी बोले—दिलेर है हुजूर, कर्कशा है। ऐसी औरत को तो गोली मार दे।\n'तुम लोगों का काफिया तंग कर दिया उसने। चार-चार तो मिलते ही।'\n'हुजूर के भी तो पंद���रह रुपये गए।'\n'मेरे कहां जा सकते हैं? वह न देगा, गांव के मुखिया देंगे और पंद्रह रुपये की जगह\nपूरे पचास रुपये। आप लोग चटपट इंतजाम कीजिए।'\nपटेश्वरीलाल ने हंसकर कहा-हुजूर बड़े दिल्लगीबाज हैं।\nदातादीन बोले-बड़े आदमियों के यही लक्षण हैं। ऐसे भाग्यवानों के दर्शन कहां होते हैं?\nदारोगाजी ने कठोर स्वर में कहा-यह खुशामद फिर कीजिएगा। इस वक्त तो मुझे पचास"} +{"id": "indic_deva_eval_000126_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000126_hindi_handwritten_word_ocr_e93f24166b04.jpg", "ocr": "विवरण"} +{"id": "indic_deva_eval_000127_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000127_indic_mozhi_deva_word_ocr_4d0c8334bb96.jpg", "ocr": "नामवंत"} +{"id": "indic_deva_eval_000128_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000128_hindi_handwritten_word_ocr_ed8dce0cf750.jpg", "ocr": "छुटने"} +{"id": "indic_deva_eval_000129_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000129_indic_mozhi_deva_word_ocr_e5c30e3edec8.jpg", "ocr": "सम्पूर्ण"} +{"id": "indic_deva_eval_000130_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": 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उपागमि।\nसत्ततिंससतसहस्सानं, दुतियाभिसमयों अह॥620॥\nसंस्कृतच्छाया- .. तत्रैव मण्डकल्पे, सुजातो नाम नायकः।\nसिंहहनुऋषभस्क्ध:, अप्रमेयो दुरासद:॥646॥\nचन्द्र इव विमलः शुद्ध, शतरश्मिरिव प्रतापवान्‌।\nएवं शोभते सम्बुद्धः, ज्वलन्‌ श्चिया सदा॥647॥\n\nलोकनायको (स्या* कं-)॥।\n\nप्राप्य सम्बुद्धः, केवल बोधिसुत्तमसा\nसुमडुगले नगरे, धर्मचक्र प्रावर्तयत्‌॥648॥\nदिशन्‌ प्रवरं धर्मम्‌, सुजाते लोकनायके ।\nअशीतिकोटय अभ्यशमयन, प्रथमे धर्मदेशने॥649॥\nयदा सुजातोउमितयशः, देवे वर्षम्‌ उपागमत्‌।\nससर्विशसहख्राणाम्‌, द्वितीयाभिसमयोउभूत्‌॥620॥\nकहेल्दी- उसी सण्डकल्प में सुजात नामक शास्ता का अवतार हुआ। सिंह के समान हनु तथा वृषभ-स्कन्ध थे। वे\nकिसी भी प्राणी द्वारा अप्रमेय तथा अनतिक्रमणीय थे॥646॥\nवे सुजात बुद्ध अपनी शरीर-शोभा से उसी प्रकार शोभित होते थे, जैसे- आकाश में स्वच्छ चन्द्रमा एवं\nप्रतापी (तेजस्वी) सहस्र किरणों वाला सूर्य शोभित होता है॥67॥\nइन सम्बुद्ध ने यथासमय श्रेष्ठ सस्बोधिप्रास कर सुमडुगल नगर में धर्मचक्रप्रवर्तन किया था॥648॥\n\nइन सुजात लोकनायक द्वारा कृत प्रथम धर्माभिसमय के अवसर पर अस्सी लाख धर्मजिज्ञासु एकत्र हए\nबे॥649॥\n\nजब इन अमित यशस्वी सुजात बुद्ध ने देवलोक में वर्षावास किया उस अवसर पर द्वितीय धर्माभिसमय\nमें सत्तर लाख धर्माजिज्ञासु एकत्र हए॥620॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000134_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000134_devanagari_page_ocr_2cce4959adc9.jpg", "ocr": "264- धातुनिधानकथा\n\nऔर जब उसने, उसे चैत्यघर से उतरते हुए एवं अर्धचन्द्राकार पत्थर की पटिया पर मूंगे की एक कमल\nपर खड़े दिखाया तो उसने कहा- 'क्या आप चैत्य और चैत्यघर के मूल्य का आकलन करेगें? श्रामणेर ने कहा-\n“महाराज! मैं उनके मूल्य का आकलन करने में सक्षम नहीं हूँ, सम्पूर्ण ताम्रपर्णी द्वीप में उपस्थित रत्नों का यह अर्द\nचन्द्राकार पत्थर की पटिया के मूल्य के लायक नहीं है या बराबर नहीं है। नागराज ने पूछा- और कहा कि 'हे भन्‍्ते!\nक्‍या यह अनुचित नहीं है कि धातु अवशेष को उच्च सत्कार की जगह से, कम सत्कार की जगह पर हटाया जाय\nश्वामणेर ने इस प्रकार कहा- “महाराज! आम तौर पर बुद्धधम्म को सम्मान से पकड़े रहते हैं न कि भोग-सामग्रियों\nको अधिक महत्त्व देने वाले, भले ही आप चक्रवाल के रूप में रज्रघर का निर्माण कर, सभी रल्रों से पूर्ति कर धातुओं\nकी रक्षा किये हो फिर भी एक ही नाग धम्म का बोध प्रास करने में सक्षम नहीं हो पाएगा। इसके बाद उन्होंने\nकहा-\n\nनाग! यहाँ तक कि साक्ष्य के रूप में आपको सत्य का कोई अहसास है, तो इसका सामना करने के लिए धातु\nको एक जगह से हटाकर सच्चाई का एहसास किया जा सकता है।\nतथागत संसार के दुख से प्राणियों के उद्धार के लिए प्रकट हुए, इसलिए बुद्ध\nनिकाल देंगे।\nआज ही धातु अवशेष को राजा स्वयं मंदिर में स्थापित करेंगे, इसलिए बिना देरी के कारण, सुझे जल्द ही\nधातु अवशेष दें।\nव भला मल मर 00000 ६ ६७ करत, #ल तहड<तव९त #00 एक ८2छ)३+०056 ड04 अ्छतकाड़ ७००0 3\n।ठ608 ० ० 90 3 ॥ड/0090 02020 5६००७ #3७ ॥8 58, 00 ३४3०55, आ। 8 ७३७8 ०7 (साई 0609 ०0० घी\n26 घ४३-॥00567 706 00श66 7९९०) 5850 78, । १७) 000 बछ6 ६० व४४०क३ फीट ४ड 05: धो ध९३३७७७५॥॥ घड\nबाप ।मंत तह ठ0032300॥ 6 0०६ ४४००७ घपड ॥क-ए0००० हजछ2 5६०१९ अठ09/. ॥#6 89 ॥008 38६००.\n३६ 9९ 5०, 0 ए००0८ 6 0१8 ए2ए0एव ०7८७ हिएतए ३ 9366 ०8 ॥00007 ६० ३ छ|३68 0655 #00007 00६\n॥का कलर पट 00026 50 0७% 'हाता.ह00०००१ 07०5 ह९१७४३॥४ ॥०० ५2 0030009 ॥0 ०5६2९८७५ ७०५ 0०६\nाबषछातैओ हमतऊ ९०००३ छा) ४/ढा2 (० 00050७८९ व 2वीतट2 02८5 35 छाह 35 ७७ छ0/ए९३९, अल. धरा\nड॥ 972ल005 (एड 304 60 7जतात व) ७१0० धी8 लहटक, 00६ ६७७७ ०९ वक89 ७७॥ ७8 ८१७३० ० बला\nफल 72क४3000 ० एड 0।कताता3, आत2०\n20 098९, 0० ए2छसव४०0 ० फल पाक कक ल्जतलतटल ९एलत ६० ;०0, (६ 8 ए)ह०६ घाआ( चाल एलाटड छ९\nहल्ताठएटव ६० | एग०6 पहला चा९ प7७चछ। ०१७ ७6 7९आर0-\nाड0)389035 30027 607 छ९ तलाजट7३0०९ ० 0श तह ०0) एह ताड्टात९४ ता 5क0त5373, 'ढाएट/गप्टव\nसावडघलाट: लाला 33 छी6 ॥0027 0०0 ठ घी हतडएट००१ 206: #९०८९ ७०९ ७४॥ ए९0१0७6 ९ एक\nयार ४७०७ १995 घा8 शतड तहत) लए ० लाट७ चाह तितह #िताइल ता 00 0008, <ढ७जएड ए० वलग/\nहज ताल एत० (०८४ 5000. 50 ॥० 5.\n\nइरादे को रख हम अवशेष को\n\nहडणा एएएड एएलजह माता 7७७४७ लधका० 0७/उक्ा।ल0ालाक ताकतपाप एणकाएणत ताकमिभाका०\nहलक, पर» शीला तय वीक वन का रह ॥ जिम जलजक पल मजिलाप पल उस\n200. #087 पडता एड 8॥0 5808 7ड55क3 धल॥2(० 08207 5080. >ठ0#80ा तदादावाविध, छ39॥05\nएम दैकाएस, छठ एीपआाण एाजमालालकत, 98008 0 तिवा00 ची00/3000॥ 7डपरतितका। तीषठ-\n\n'50/8हवा ललित पाए 0/7०७-छभरवा0 लए पटल\n\nडिक ल 72555 बताई अल आत तक कष्ट,\n\nएज 2 पका व कात जमा० लत 0 ५मा\n\nकट बतुयो सं पितोतिमेकसाती\n\nएवं बुत्ते नागराजा अप्पटिभानो ह॒त्वा अत्तनो भागिनेय्येन धातुयो “लि मऊ\n\nएवं आह- तुम्हे भन्‍्ते चेतिये धातून अस्थिभाव॑ वा नत्थिभाव॑ वा अजानन्ता, देहि देहीति बदथः\nअहं नत्थीति वदामि, सचे पस्सथ गहेत्वा गच्छथा'ति। गण्हामि महाराजा'ति, गण्ह भिक्‍्खू\"ति\n\nतिक्‍्खचुं पटिज्ज गहेत्वा-"} +{"id": "indic_deva_eval_000135_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000135_indic_mozhi_deva_word_ocr_c5ee0754a22a.jpg", "ocr": "वळत."} +{"id": "indic_deva_eval_000136_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000136_hindi_handwritten_word_ocr_d2f23c95dcd1.jpg", "ocr": "लश्करे"} +{"id": "indic_deva_eval_000137_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000137_hindi_handwritten_word_ocr_26a8115b5356.jpg", "ocr": "रविकर"} +{"id": "indic_deva_eval_000138_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000138_devanagari_page_ocr_846fe4c47adb.jpg", "ocr": "थूपबंसो छा\n\nजानते हुए अस्वीकार कर दिया कि इस पर घास और पेड़ जैसे वनस्पति विकसित होंगे और यह एक मिट्ट का\nटीला बन जायेगा और यह एक लम्बे समय के लिए नहीं होगा। एक अन्य ने कहा- “मैं सौ पुरुषों को लेकर, एक-\nएक दिन मिट्टी घड़े का उपयोग कर, इस काम को मैं करूँगा“, तब तक दूसरे ने कहा- “मैं पाँच डोंगी (कण्डाल या\nबाल्टी) मिट्टी उपयोग कर, इस काम को मैं करूँगा” तब तक एक अन्य ने कहा- “मैं दो डॉंगी मिट्टी उपयोग कर इस\nकाम को मैं करूँगा। उन्हें भी राजा वास्तब में अस��वीकार कर दिये।\n\nवहढ7९७७०० फल हातड़ ३भंप0०० ४७ 07067 ० ताला ३08 इठात, त७। बचटा, धता& बड चल ठ72म६ 0०च/०\n<०ाएाह एव लिए चल 07427 0॥ 7000॥8 ३2890 औाऊ 000 708. वह 0000॥5 0॥0 000 उ्वणलडव्ह ॥0\n॥णठततड़ छह ॥0 हाउत83। (वातनाताबकातह) तल, #९ हज02१ कला वटवणरबठट००९ (०7 कज पी 00027 तर ताठतार\n(650 3८<ट2६ आए) कि 006 ७००९४ ज0त ॥3ज\"8 2क्शीगीड ह7९८७2० ० 802९ ७4८९5 ज॥ 7०७१० चीह आष ला फल\nव॥७७9 308 तरडाता8 छी8 07867 00 00006 आप फलाशत 209 वाधछ2तडए 8 विज) ओता5 ७०00, ९०७ कि ०0६\n९९ ॥९ 830७७ व 0 पीछा 00९ती८9702005 ३७८) व5 (5९5३०१९-) ०0, ॥002/ ३00 छरकत8, करत ३०६ ७8 0तवश ०\n0८ 00 घीला ७४४. 0५ ॥2 ॥90 970ठग03७०) 0962 ॥0 पीर लए 9/ 92०0 00 07७00 अत ॥96 छोड\nताडडपछा-0॥00/5 353९७१७/७०; 300 02) ए७0७७७7९० 500, 006 ३0008 पीटए 5३७० घी (8 १0० ७१००७8४६-\nजे 50228०4 ॥0 778 पी8 ।806/5 4९०७॥ ३१४ ४० ७७4 ७५8 67290 ०९६४४७-\" 76 दितड ३०८०५, //40 ४ ७॥\n०७ 9६7 7 नि 7९७॥९, “आ8, एल 3 00970 उड्झंजञजए५७ बतत एल ७० 3 ७७०8४००-०020 ते हकाते\n49/, ॥ ७७॥ 40 छ९ ०००० ॥#& हा 8 7०८०० 0 00008 ए७७॥ छी३६ ३४३७ 50६ ७४०७॥4 ७2८०११2 ५ 00000\nला 437 00५ फीज( ००8०(०७०७ 3७८३ 98 छाव$३ ७06 ७86४ ४४०७० 8000 ७७०१६ 300 0०९६ ७४०७५ 0०९॥950 0 ।00७.\nअ्० पार - गाव, पाता 3 #७0976 फछत 305 एडत& ७० 9 ॥७१0७॥3 ० ७३7७) 3 699 ७४॥ 609 ७१७ ७४ छा\n30०फ27, 4 ४॥॥ ७5९ ७७ ॥७७ बाततत१83 ० ९३7७१ १ 3५ 309. 60 08 ७७०७९/ पर0 ३००छी७० ॥ ७॥॥ एच्ड ७७ ७४०\nअति 209 (0 0१6 ४७००८/ ॥१९00 ६००, छी७।द 08 00 ७००।४/९(७८५-\n\n4009 लि० 99090. |छुनगा।व एगतक्ञागत गागा। त०ए० पत्ता ॥०0०0०5 5७ए7ल॥ ५ग(लप/ठ\nएा5३020॥40५3 9300500900 ९(३॥१॥09090) ९(८७॥202५३ ।0॥2060४8 925॥80900 5३७३॥) 03/60/3 ।(३तागथ\nजाप व03. रिकंठ ९५आा॥ ३30 ॥वट2 02: एवेताए ॥3. 03,550: लावा(/भ्रतोव्वीट३ 0355३\n030 6८कएशड 9009 90८८] 50009 9308 ॥(३त5535. ॥ 3 ॥#908 ७॥858/907009 6९५३०७0४०\n५३०0१30553 58078 उतीगरातए८०े, ४३०6॥9त 5७४३003०507॥ 90720/8 ७०व३॥१8॥॥8026५8 9300 ७०३७०\n9960/8. ७००/८००७॥#/गा डक, 8॥99#3909 उठता तकरआप्गा। ७०3/७०७७७७७७०7, ७७७१8. 02५9\nपतीडकत ३० जी, रिकांव, 58009 $90॥0500८#एश5 (35५9: ५3॥355399/97/(070 58033 ७७३०7,\n30855399/099/900)/8७3. 200000970॥ 08003: ५0७3008/30(8/क0 5/09553990904<8 95005, 0५508553\n॥(छ89309 53035580 ८७ 030/छ 300॥0930(08/6 92039 ।002७(#ऑ ८०३ 03025. शायद ने\n\nअथ अज्जो पण्डितो इद्ठकवड्डकी:- अहं देव उदुक्खले कोट्टेत्वा सुप्पे्टि वट्टेल्वा निसदे\nपिंसित्वा पंसून॑ एकम्मर्ण एकाहेनेव खेपेत्वा पेसिकानं सत॑ गहेत्वा कम्म॑ करोमीति आह। राजा:\nएवं सति महाचेतिये तिणादीनि न भविस्सन्ति, चिरद्ठितिकश्व॒ भविस्सतीति सम्पटिच्छित्वा पुन\nपुच्छि:- किं-सण्ठानं पन करिस्ससीति। तस्मि खणे विस्सकम्मदेवपुत्तो वड्डकिस्स सरीरे\nअधिमुन्चि। वड्ढडकी सुवण्णपातिं पूरेत्वा उदक॑ आहरापेत्वा पाणिना उदकं गहेत्वा उदकपिट्ठियं\nआहनि। फव्ठी���घटसदिसं महन्तं उदकबुब्बुलं उद्बासि। देव, इदिसं करोमीति आह। राजा,\nसाथधू”ति सम्पटिच्छित्वा तस्स सहस्सग्घनक॑ साटकयुगलं सहस्सग्घनकं येव पुण्णक॑ नाम\nसुवण्णालड्कारं सहस्सग्घनका पादुका द्वादस कहापणसहस्सानि च दत्वा अनुरूपद्ठाने गेहल\nखेत्तद्च दापेसि।\n\nअथ अन्य: पण्डित: इप्टिकावर्धकी- अहं देव! उद्खले कोटयित्वा शूर्पः बर्तयित्वा दृषदि पिपित्वा\nपांशूनाम्‌ एकार्मणम्‌ एकाहेनैव क्षेपयित्वा प्रेषिकाणां शतं गृहीत्वा कर्म करोमीत्याह। राजा:- एवं सत्ति\nमहाचैत्ये तृणादीनि न भविष्यन्ति, चिरस्थितिकश्व भविष्यति इति सम्प्रतीष्य पुनः अपूच्छत- किं\nसंस्थान पुनः करिप्यसीति। तस्मिन्‌ क्षण विश्वकर्मदिवपुत्रो वर्धकिन: शरीरे अध्यमचत। वर्धकी स्वर्णपात्री"} +{"id": "indic_deva_eval_000139_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000139_devanagari_page_ocr_d527a624c3e5.jpg", "ocr": "अककक्‍्कसं विज्ञापनिं\nअकतं दुक्‍्कटं सेय्यो\nअक्कोच्ह्धि मं अवधि म॑\nअक्कोच्चछि म॑ं अवधि मं\nअक्कोधनं वतवन्तं\nअक्कोधघेन जिने कोध॑\nअक्कोसं वधबन्धं॑ च\nअचरित्वा ब्रह्मचरियं\nअचरित्वा ब्रह्मचरियं\nअचिरं वतयं कायो\nअज्ञा हि लाभूपनिसा\nअट्टीन नगरं कतं\nअत्तदत्थं परत्थेन\nअत्तना चोदयत्तानं\nअत्तना हि कतं पापष॑\nअत्तना हि कत॑ पाष॑\nअत्ता हवे जितं सेय्यो\nअत्ता हि जत्तनो नाथो\nअत्ता हि अत्तनो नाथो\nअत्तानं चे तथा कयिरा\nअत्तानं चे पियं जज्ञा\nअत्तानमेव पठमं॑\nअत्थम्हि जातम्हि सुखा\nअथ पापानि कम्मानि\nअथ वास्स अगारानि\nअनव्ठितचित्तस्स\nअनवस्सुतचित्तस्स\nअनिक्कसावो कासाव॑ं\nअनुपुब्बेन मेधावी\nअनूपवादो अनूपघातो\nअनेकजातिसंसारं\nअन्धभूतो अयं लोको\nअपि दिब्बेसु कामेसु\nअपु]ज्ललाभो च गती च\nअप्पं पि चे संहितं भासमानो\nअप्पका ते मनुस्सेसु\nअप्पमत्तो अयं गन्धो\nअप्पमत्तो पमत्तेसु\nअप्पमादरता होथ\n\nगाथानुक्कमणिका\n\n26/26\n22/9\n4/3\n4/4\n26/48\n47/3\n26/47\n44/40\nव4/4\n3 /9\n5/46\n44/5\n42/40\n25/20\n42/9\n42/5\n8/5\n42/4\n25/24\n42/3\n42/4\n42/2\n23/42\n40/8\n40/42\n3/6\n3३7\n4/9\n48/5\n447\n44/8\n43/8\n44/9\n22/5\n4/20\n6/40\n4/43\n2/9\n23/8\n\nअप्पमादरतो भिक्‍खु\nअप्पमादरतो भिकक्‍्खु\nअप्पमादेन मघवा\nअप्पमादों अमतपदं\nअप्पलाभोपि चे भिक्‍्खु\nअप्पस्सुतायं पुरिसो\nअभये भयदस्सिनो\nअभित्थरेथ कल्याणे\nअभिवादनसीलिस्स\nअभूतवादी निरयं उपेति\nअयसाव मल समुद्ठितं\nअयोगे युड्जमत्तानं\nअलक्लतो चे पि सम\nअलज्जिताये लज्जन्ति\nअवज्जे वज्जमतिनो\nअविरुद्ध विरुद्धेसु\nअसंसह्ठं गहट्ल���हि\nअसज्ञायमला मन्ता\nअसन्त॑ भावनमिच्छेय्य\nअसारे सारमतिनो\nअसाहसेन धम्मेन\nअसुभानुपस्सि विहरन्तं\nअस्सद्धो अकतज्ञ्ू च\nअस्सो यथा भद्रो\n\nअहं नागो व सज्भञामे\nअहिंसका ये मुनयो\nआकासेव पदं नत्थि\nआकासेब पदं नत्थि\nआरोग्यपरमा लाभा\nआसा यस्स न विज्जन्ति\nइदं पुरे चित्तमचारि चारिक॑\nइध तप्पति पेच्च तप्पति\nइध नन्‍्दति पेच्च नन्‍्दति\nइध मोदति पेच्च मोदति\nइध वस्सं वसिस्सामि\nइध सोचति पेच्च सोचति\nउच्छिन्न सिनेहमत्तनो\nउद्बानकालम्हि अनुट्ठहानो\n\n2/44\n2/42\n2/40\n2\n25/7\n44/7\n22/42\n94\n8/40\n22/4\n48/6\n46/\n40/84\n22/44\n22/43\n26/24\n26/22\n48/7\n5/44\n4/॥4\n49/2\n4/8\n7/8\n40/6\n23/4\n47/5\n48/20\n48/24\n45/8\n26/28\n23/7\n4/47\n4/48\n4/46\n20/44\n4/45\n20/व3\n20/8"} +{"id": "indic_deva_eval_000140_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000140_indic_vision_bench_deva_ocr_16df80fba149.jpg", "ocr": "मुळात तालुकाच डोंगराळ, म्हणून कठीण, खडकाळ जमीन, तिथे नैसर्गिक पाण्यावर बाजरीखेरीज काही पिकायचं नाही. बाजरीचं पीकही दुष्काळात पुरेसं येत नाही. यावर्षीही असंच झालं. पावसाळा लांबला. मृग पूर्ण कोरडा गेला, त्यानंतर दोन जेमतेम पाऊस झाले. त्यावर कशीतरी तीन क्विंटल बाजरी पदरात आली. त्यातली एक बाजारात दरवर्षीच्या शिरस्त्याप्रमाणे पडत्या भावात ताबडतोबीने विकून आलेल्या पैशात किरकोळ उधार - उसनं देणं व मीठ - मिरचीची तरतूद करणं भाग होत. उरलेले धान्य राघू, त्याची बायको व दोन मुले आणि विधवा होऊन त्याच्याकडेच राहायला आलेली बहीण ठकूबाई एवढ्या प्रपंचाला कितीस पुरणार? दिवाळीला तर त्यातला एक कणही राहिला नव्हता.\nदरवर्षी शेजारच्या रामपूर तालुक्यात तो सर्व कुटुंबकबिल्यासह साखर कारखान्यावर उसतोडीला जायचा. यंदा ऊसही पावसाअभावी कमी झालेला, म्हणून फेब्रुवारीतच गळीत हंगाम संपला. ठेकेदाराकडून परततानाच पुढील वर्षाची आगाऊ रक्कम घेतली, तीही हां हां म्हणता संपून गेली आणि त्या कुटुंबाला आता रोजगार हमीच्या कामाखेरीज जगण्यासाठी दुसरा मार्ग नव्हता.\nराधूनं कामासाठी शोधाशोध सुरू केली, तेव्हा सुदैवानं शेजारच्या गावी तांड्याला जोडणा-या जोडरस्त्याचे काम नुकतंच सुरू झालं होतं. या काम आवश्यकता असूनही जास्त मजूर मिळत नव्हते. कारण डोंगराळ भाग असल्या जवळपास माती नव्हती, खडक होता. तो फोडणं अवघड काम होतं.\nयाचा प्रत्यय राधूला व त्याच्या पत्नीला - बहिणीला आला. पहिल्याच दिवशी खडी फोडून हाताला फोड आले होते. पण इतर कामापेक्षा मजुरीचे दर जादा होते. आसपास दुसरे कोणतेही कामे सुरू नव्हते. म्हणून शरीर साथ देत नसतानाही त्या कामावर जाणे भाग होते.\nघरधनी गेल्यानंतर पांढरं कपाळ घेऊन भावाकडे आल्यानंतर त्याच्या कमीत कमी भार पडावा म्हणून अहोरात्र राबणं, रानात कामाला जाणं व उपासाच्या नावाखाली एकदाच दुपारी भाकर तुकडा खाणं, त्यामुळे ठकुबाई कमालीची रोडावलेली होती. तिला हे खडी फोडण्याचं काम झेपणारं नव्हतं. पहिल्या आठवड्यानंतर रोजगाराचं वाटप झालं, तेव्हा तिची मजुरी तिच्या भावजयीपेक्षा अर्धीच भरली होती. ‘वयनी, काय करू बघा' कपालीचं कुंकू गेल्यानंतर कुडीत जीवच नाय राहिला..'\nराघूची बायको मैनाचे गावातल्या व समाजातल्या बायका कान फुंकत असल्यातरीं, जात्याच प्रेमळ असल्यामुळे तिला ठकुबाईकडे पाहिलं की पोटात कसतरी व्हायचं. आपल्याच उमरीची ही आपली नणंद. कुंकवाचा आधार गेला आणि बिचारीची\nपाणी! पाणी!! / ५२"} +{"id": "indic_deva_eval_000141_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000141_hindi_handwritten_word_ocr_7e09c91c855d.jpg", "ocr": "कॉर्पोरेट"} +{"id": "indic_deva_eval_000142_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000142_devanagari_page_ocr_4a6134cc1655.jpg", "ocr": "अपदानपालि अड\n\n““तिंसकप्पसहस्सानि, देवलोके रमिस्सति।\n\nसहस्सक्खत्तुं राजा च, चक्‍कबत्ती भविस्सति'॥4994॥\n“सुलद्धलाभं लद्धोम्हि, तोसयित्वान सुब्बतं।\n\nसब्बासवे परिज्ञाय, विहरामि अनासबो॥995॥\n\n“किलेसा झापिता मस्हें...पे*... विहरामि अनासबो॥4996॥\n“स्वागतं बत मे आसि....पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं॥997॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कतं बुद्धस्स सासनं\"॥4998॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा उदेनो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nडदेनत्थेरस्सापदान दसमं।\nमेत्तेय्यवग्गो एकचत्तालीसमो।\n\n““ज्िंशत्कल्पसहस्राणि, देवलोके रंस्यति।\n\nसहसख्॒कृत्व: राजा च, चक्रवर्त्ती भविष्यति'॥4994॥\n“सुलब्धलाभं लब्धोंउस्मि, तोषयित्वा सुत्रतम्‌।\n\nसर्वास्रवान्‌ परिज्ञाय, विहरामि अनाख्रबः॥995॥\n\n“क्लेशा: ध्मापिताः मम...पे*... विहरामि अनास्रबः॥996॥\n“स्वागत॑ वत मे आसीत्‌...पे*... कुत॑ बुद्धस्य शासनम्‌॥4997॥\n>प्रतिसंचि दश्यलस्: . कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥998॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ उदयनस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\n\n30 हजार कल्पों तक वह देवलोक में रमण करेगा और हजार बार चक्रवर्ती राजा होगा॥4994॥\n\nमैंने सभी प्रकार के सुलाभ को प्रास किया है जो मुझे भगवान्‌ को सन्‍्तुष्ट करने के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुआ\nहै। मैं सभी आखबों को प्रास कर अनास््रव हो विहरण करता हूँ॥4995॥\n\nमे��े द्वारा भव के सभी क्लेश समूल नष्ट कर दिये गये हैं और जैसे हाथी बन्धनमुक्त हो विचरण करता है बैसे\nही मैं भी अनाखब हो विचरण करता हूँ॥996॥\n\nमेरा बुद्ध के समीप स्वागत हुआ और मैंने तीन विद्याओं को प्रास कर बुद्धशासन को पूर्ण किया॥997॥\n\nचार पटिसम्भिदाओं आठ विमोक्षों तथा पट्लिजज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥4998॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ उदयनस्थविर ने इन गाथाओं को कहा-"} +{"id": "indic_deva_eval_000143_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000143_indic_mozhi_deva_word_ocr_790ee6110d69.jpg", "ocr": "कायम"} +{"id": "indic_deva_eval_000144_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000144_indic_vision_bench_deva_ocr_5542943a325e.jpg", "ocr": "५६\nरामनाम\nखडा हो गया—अितना नजदीक खडा था कि पिस्तोलसे निकली हुअी गोलीका खोल बादमे बापूके कपडोकी पर्तमे अुलझा हुआ मिला। सात कारतूसोवाली ऑटोमेटिक पिस्तोलसे जल्दी-जल्दी तीन गोलिया छूटी। पहली गोली नाभीसे ढाअी अिंच अूपर और मध्यरेखासे साढे तीन अिच दाहिनी तरफ पेटकी दाहिनी बाजूमे लगी। दूसरी गोली मध्यरेखासे अेक अिचकी दूरी पर दाहिनी तरफ घुसी और तीसरी गोली छातीकी दाहिनी तरफ लगी। पहली और दूसरी गोली शरीरको पार करके पीठ पर बाहर निकल आअी। तीसरी गोली अुनके फेफडेमे ही रुकी रही। पहले वारमे अुनका पाव, जो गोली लगनेके वक्त आगे बढ रहा था, नीचे आ गया। दूसरी गोली छोडी गअी, तब तक वे अपने पावो पर ही खडे थे। और अुसके बाद वे गिर गये। अुनके मुहसे आखिरी शब्द \"राम! राम!\" निकले।\nहरिजनसेवक, १५-२-१९४८\n४१\nप्रार्थना-प्रवचनोंमें से\nरामनाम––अुसके नियम और अनुशासन\nगाधीजीने कहा रामनाम आदमीको बीमारीमे मदद कर सकता है, लेकिन अुसके कुछ नियम और अनुशासन है। कोअी जरूरतसे ज्यादा खाना खाकर 'रामनाम' जपे और फिर भी अुसे पेटका दर्द हो, तो वह गाधीको दोष नही दे सकता। रामनामका अुचित ढगसे अुपयोग किया जाय तभी अुससे लाभ होता है। कोअी आदमी रामनाम जपे और लूटपाट मचावे, तो वह मोक्षकी आशा नहीं कर सकता। वह सिर्फ अुन्हींके लिअे है, जो आत्मशुद्धि के लिअे अुचित अनुशासन पालनेके लिअे तैयार है।\n––बम्बअी, १५-३-४६\nसबसे असरकारक इलाज\nअुरुळीकाचनकी प्रार्थना-सभामे भाषण करते हुअे गाधीजी ने कहा—रामधुन शारीरिक और मानसिक बीमारियोंके लिअे सबसे असरकारक इलाज है। कोअी डॉक्टर या वैद्य दवा देकर बीमारी अच्छी करनेका वचन नही"} +{"id": "indic_deva_eval_000145_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000145_devanagari_page_ocr_fd85fceff8ac.jpg", "ocr": "थ्र्व\n\nअपदानपालि\n\n3. छ��्रदायकस्थविरापदानम्‌\n“पुत्तो मम॒ पब्वजितो, कासायवसनो तदा।\nसो च बुद्धत्तं सम्पत्तो, निब्बुतों लोकपूजितो॥444॥\n“विचिनन्तो सक॑ पुत्ते, अगमं पच्छतो अहं।\nनिब्बुतस्स महन्तस्स, चितक॑ अगमासहं॥442॥\n“पर्गय्ह अज्जलिं तत्थ, वन्दित्वा चितकं अहं।\nसेतच्छत्तञच पर्गय्ह, आरोपेसिं अहं तदा॥443॥\n“चतुन्नवुतितो कप्पे, य॑ छत्तमभिरोपयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, छत्तदानस्सिदं फलं॥444॥\n“पडत्वबीसे इतो कप्पे, सत्त आसुं जनाधिपा।\nमहारहसनामा ते, चक्‍कवत्ती महब्बला॥445॥\n\n“'पुत्रो मम प्रत्रजित:, काषायवसनस्तदा।\n\nसश्व बुद्धस्‍्ब॑ सम्प्रासः, निर्वुती लोकपूजित:॥44॥\n“विचिन्वन्‌ स्वकं पुत्रम्‌, अगम॑ पृष्ठतोज्हमा।\nनिर्वुतस्य महान्तस्य, चितकम्‌ अगमाम्यहम्‌॥42॥\n>प्रगह्य अजजलि तन, वच्दित्वा चितकमह सा\nश्वेतच्छत्रच्च प्रगृह्य, आरोपयमह तदा॥443॥\n“चतुर्णवतितमे कल्पे, यच्छल्रमभ्यरोपयम।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, छत्रदानस्येदं फलम्‌॥444॥\n“पडचविंशे इतः कल्पे, ससत आस्म जनाधिपाः।\nसहारहसनामा ते, चक्रवर््तिमहाबला:॥445॥\n\nतब कापाय वस्त्र धारी मेरा प्रत्नजित पुत्र बुद्धत्व को प्रास निर्वुत हो लोक में पूजित हुआ ॥44॥\nअपने पुत्र की विवेचना करते हुए मैं उसके पीछे-पीछे गया और उन निर्वृत की महान्‌\n\nचिताके समीप पहुँच गया ॥42॥\n\nवहाँ अञ्जलि बद्ध होकर मैंने चिता की वन्‍्दना की और ग्वेत छत्न को ग्रहण कर उस पर अभ्यर्पित किया ॥443॥\nयहाँ से 94 वें कल्प में जो छत्न अभ्यर्पित किया था यह उस छत्रदान का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\n\nको नहीं जानता ॥बव4॥\n\nयहाँ से 25 वें कल्प में महारहस नामक सात महाबलशाली चक्रवर्ती राजा हुए थे॥45॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000146_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000146_devanagari_page_ocr_7a7f579e5abd.jpg", "ocr": "36\n\nअपदानपालि\n\n“चतुत्तिंसतिक्खत्तुडच, देवरज्जं करिस्सति।\nबलाधिपो अट्ठसतं, वसुधं आवसिस्सति॥654॥\n*“अद्भपड्ञासक्खत्तुड्च, चक्‍कवत्ती भविस्सति।\nपदेसरज्ज॑ विपुलं, महिया कारयिस्सत्ति॥652॥\n““कप्पसतसहस्सम्हि, ओक्‍्काककुलसम्भवो।\nगोतमो नाम गोत्तेन, सत्था लोके भविस्सति॥653॥\n“सकयान॑ कुलकेतुस्स, आतिबन्धु भविस्सति।\nआनन्दो नाम नामेन, उपड्लाको महेसिनो॥654॥\n““आतापी निपको चापि, बाहसच्चे सुकोविदो।\n\nनिवातवुत्ति अत्थद्धो, सब्बपाठी भविस्सति॥655॥\n\n“नचतुश्त्रिशल्कृत्वश्व, देवराज्यं करिष्यति।\n\nबलाधिपो अष्टशतम्‌, बसुधाम्‌ आव���िष्यति॥654॥\n\n““अष्टपश्चाशत्कृत्वश्व, चक्रवर्त्ती भविष्यति।\n\nप्रदेशराज्य विपुलम, मह्यां कारयिष्यति॥652॥\n\n““कल्पशतसहख्रे, इक््वाकुकुलसम्भव:।\n\nगौतसो नाम गोत्रेण, शास्ता लोके भविष्यति॥653॥\n\n““शाक्यानां कुलकेतो:, ज्ञातृबन्धुर्भविष्यति।\n\nआनन्दो नाम नाम्ना, उपस्थाको महर्षिण:॥654॥\n\n““आतापी निपक्रश्वापि, बहुसत्य सुकोचिद:।\n\nनिबातवृत्तिः अर्थर्द:, सर्वपाठी भविष्यति॥655॥\n\nबह 34 बार देवताओं का राजा होगा तथा तुषितलोक से च्युत होकर 800 बार चतुरड्िगणी\nसेना का स्वामी होकर पृथ्वी पर चास करेगा॥654॥\n\nबह अष्टपश्चाशत (अद्भाबन) बार चक्रवर्ती राजा होगा जो इस धरा पर विशाल प्रदेशराज्य की\nस्थापना करायेगा॥652॥\n\nशतसहखकल्प में इथ्चाकुकुलोत्पन्न वह गौतम नामक गोत्र से लोक में शास्ता होगा॥653॥\n\nशाकयों के कुलकेतु बुद्ध का ज्ञातिबन्धु होगा जो आनन्द नाम से महर्षि का उपस्थापक अर्थात्‌\nसेवक होगा॥654॥\n\nबह आतापी (उद्योगी), निपक (निपुण), शास्त्रों\nबाला तथा सम्पूर्ण त्रिपिटक का पाठी होगा॥655॥\n\nज्ञाता, विनम्र और अर्थ को प्रकाशित करने"} +{"id": "indic_deva_eval_000147_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000147_devanagari_page_ocr_f06479466f9b.jpg", "ocr": "क्र दसथूपकथा\n\nध35३03॥3553 9च08 ५३0055छात्रात 8930८50, (क्जात ॥का३ अतद08 ल(क/(० 79 9गगवस्‍50., ॥दता500#850\nछतराहक५, 0. 00500. था900. ॥3550, 8५व ७०8. 3: 000. 0रतिकाजा ए(2: |. 0953039559\n2गाएरए080॥ 7ह7उ/७ ॥2८ 6305॥व7स्‍889॥00१8 7उफ 04090 93८0॥#50, ॥2ल 'फ्ता/० शतच& ।३ए/ठ\nउक्षभााभा।व0कवा, 0(११गवा व, ऑफीआ50,. 009. 00.. 998॥गात,.. निीवातव5ड३०0. 09. (0नावाव\n॥//0ए(3090क्‍#कागा 9... नि्ा्ावा). ०ढपच,. छ03..003530300 लए क/५0,.. ६20/0098597॥:)॥,\n७ए352/स्‍८७00५8. शत्वगाधआ ताजा) (३0४8. 0॥00960ए00 2(कव्आ) 9303600॥0, ॥(३७/७. 8५ंगाप्ठ शक\n53॥36685, ॥कञांए। पीव08 9305'प, 700 9303597020% (030/9. 30709 69, ८०७ए५॥३]॥ठ090॥\n500४8 ४ए९५8५/3, आ353/3553030700क05 695303॥3559 790 5308॥7 ॥३/94590390#7 99८9\n0553)/09353(50#. 50४३003000॥] ०३१0० ३टाएकव्ीट5.. 0७2०॥6. (80५8. पता], एएएआाकी पुर. आरके\n9वत)ठ॥कत0ए'च 3005.\n\nअथ खो चत्तारों मल्‍लपामोक्खा सीसं॑ नहाता अहतानि बत्थानि निवत्था\nवीसंरतनसतिक चन्दनचितक आलिस्पेस्सामा”ति अढ़ पि सोत्कस पि द्क्षिसा पि जना हत्वा\nयमकऊक्कायो गहेत्वा तालबण्टेहि बीजन्ता भस्तानि धमन्‍्ता न सक्कोन्ति येब अग्गिं गाहापेतुं।\nअथ खो कोसिनारका मल्‍ला चितकस्स अपज्जलनकारणं आयस्मन्तं अनुरुद्धं पुच्छित्वा देवतानं\nअधिप्पायं सुत्वा, महाकस्सपो किर भो पदश्चहि भिक्‍्खुसतेहि सद्धिं दसबलस्स पादे\nबन्दिस्सामीति आगच्छति, तस्मि किर अनागते चि���को न पज्जलति। कीदिसोभासो भिकक्‍्खु,\nकाव्ठो ओदातो दीघो रस्सो, एवरूपे नाम भो भिक्खुम्हि ठिते कि दसबलस्स परिनिब्बानं\nनामा/ति केचि गन्धमालादिहत्था पटिपथ्थं गच्छिसु, केचि वीथियो विचित्ता कत्वा आगमनमग्गं\nओलोकयमाना अट्ठंस। अथ खो आयस्मा महाकस्सपो येन कुसिनारा मकुटबन्धनं नाम मल्‍लानं\nचेतियं, येन भगवतो चितको तेनु”पसड्कमि, उपसड्कमित्वा एकंसं चीवरं कत्वा तिक्खत्तुं चितकं\nपदक्खिण कत्वा आवज्जन्तो व सल्‍लक्खेसि, इमस्मिं ठाने पादा”ति। ततो पादसमीपे ठत्वा\nअभिज्जापादक॑ चतुत्थज्ञानं समापज्जित्वा बुद्राय, अरसहस्सपतिमण्डिता दसबलस्स पादा\nसद्धिं कप्पासपटिलेहि पश्च दुस्सयुगसतानि सुववण्णदोणिं चन्दनचितकश्च च द्वेधा कत्वा मय्हं\nउत्तमडगे सिरसि पतिद्रहन्त्‌टति अधिद्वासि।\n\nअथ खलु चत्वारो मल्लप्रमुखा: शीर्ष स्राता: अहतानि बस्त्रा्णिं धारयन्त: “विंशतिरत्रशतिकां\nचन्दनचिताम्‌ आलेप्स्याम'इति अष्टौ अपि पोडशपि द्वा्रिशदि जना: भूत्वा यमकउल्का: गृहीत्वा\nतालवृन्तैः वीजयन्ता: भस्त्रा: धमन्‍्ता: न शक्कुबन्त्येब अग्नि ग्राहयितुं। अथ खलु कौशिनारकाः मल्लाः\nचिताया: अप्रज्वलन्‌ कारणम्‌ आयुष्मन्तम्‌ अनुरुद्ध पृष्ट्वा देवतानाम्‌ अभिप्राय॑ श्रुत्वा, महाकाश्यपः\nकिल भो पद्चभि भिक्षुशतैः सार्द दशवलस्य पादौ वन्दिस्थामि इति आगच्छत्‌, तस्मिन्‌ किल अनागते\nचिता: न प्रज्वलति। कीदृगवभाषः भिक्षु, काल अबदातो दीर्घ: हस्वः 'एबंरूपे नाम भो भिक्षौ स्थिते\nकिस दशवलस्ख परिनिवाणिं नाम'टलि कचित गन्धमालादिहस्ता: प्रतिषयम अगमन, केचित चीचियो\nविचित्रा: कृत्वा आगमनमार्गम्‌ अवलोकयमाना: अस्थु। अथ खलु आयुष्मान्‌ कश्यपः यत्र\nकुशीनारासुकुटबन्धन नाम मल्लानां चैत्यं, यत्र भगवत: चिता तत्रोपसमक्राम्यत्‌, उपसड्क्रम्य एकांसे\nचीबर॑ कृत्वा त्रिकृत्व: चितिका प्रदक्षिणां कुत्वा आवर्जन्‌ एवं समलक्षयत्‌, 'अस्मिन्‌ स्थाने पादौ”इति।\nततः पादसमीपे स्थित्वा अभिज्ञापादक॑ चतुर्थध्यानं समापद्य उत्थाय, आर्यसहस्रप्रतिमण्डितीौ दशबलस्य\nपादौ सार्द कपसिपटीलै: पश्च दूर्ष्ययुगसतानि स्वर्णद्रोणीं चन्दनचिताश्व द्विधा कृत्वा मम उत्तमाझगे\nआरसी प्रतितिप्टल्ल इति अध्यस्थाला"} +{"id": "indic_deva_eval_000148_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000148_indic_vision_bench_deva_ocr_1d6c384294ea.jpg", "ocr": "[३९]\n \nह��य. वाङ्मयांत विद्याधन, सामर्थ्यधन, आरोग्यधन, असे शब्दप्रयोग येतात. परंतु हे प्रयोग अलंकारिक आहेत हें उघड आहे. येथें निरानराळ्या गुणांवर रुपक केलेलें आहे.\nसंपत्ति या नांवावालीं मोडणा-या वस्तूंमधला दुसरा सामान्य गुण म्हणजे त्यांची मानवा वासनांची तृप्ति करण्याची शक्ति होय. याला वस्तूची उपयुक्तता म्हणतात. अर्थ या शब्दानें व्युत्पत्तिदृष्ट्या हा गूणच व्यक्त केला जातो. जें मनुष्याकडून प्रार्थिलं अगर इच्छिलें जातें तो अर्थ. म्हणजे धन, संपत्ति किंवा अर्थ यांमध्यें मनुष्याचा इच्छा वासना किंवा त्याचें काम भागविणारी शक्ति असलीच पाहिजे हें उघड-होतें. ज्या वस्तूंमध्यें मनुष्याची कोणतीच वासना भागावण्याच सामथ्य नाहीं ती वस्तू संपत्ति किंवा धन या पदाप्रत पावणारच नाही. मनुष्याच्या वासना नीतिवर्धक आहेत किंवा अनीतिप्रवर्तक आहेत; त्या स्वाभाविक आहेत किंवा कृत्रिम आहेत, या गोष्टीचा विचार अर्थशास्त्रामध्यें येत नाहीं. यामुळें ज्या ज्या वस्तूंना लोकांत मागणी आह किंवा त्यांचा खप लोकांत होतो, त्या त्या सर्व वस्तू संपत्ति या पद प्रत पावतात. म्हणूनच दारू, तंबाखू वगैरेसारख्या वस्तूंचें सेवन अनीतिकारक असलें तरी अर्थशास्त्रदृष्ट्या त्या संपत्तींतच मोडतात.\nसंपत्तीच्या ठायीं वास करणारा तिसरा सामान्यगुण गुण म्हणजे तिची दुर्मिळता किंवा कष्टसाध्यता होय. जे पदार्थ इतके विपुल आहेत कीं, ते मिळविण्याकरितां कांहीं एक काम करावें लागत नाहा व ते कितीजणांनाही लागले तरी मुबलक असतात, अशा पदार्थाची कोणीही संपत्तीमध्यें गणना करणार नाहीं. या वस्तूच्या ठिकाणीं मनुष्याची वासना तृप्त करण्याची उपयुक्तता असेल, व मनुष्यापासून विलगपणाही असेल, परंतु तेवढ्यानेंच त्या वस्तू संपत्ति होणार नाहींत. संपत्तीमध्यें दुर्मिळता किंवा कष्टसाध्यता हा गुण असला पाहिजे. म्हणजे हवा, पाणी, नवीन वसाहतीमध्यें जमीन व लांकूडफांटें या वस्तू संपत्ति म्हणून समजल्या जात नाहींत. तर त्या सृष्टीनें मानवी प्राण्यास फुकट दिलेल्या देणग्याच समजल्या जातात. यांना कोणीही आपली संपत्ति अगर धन म्हणणार नाहीत; परंतु विशेष प्रसंगीं या वस्तूही संपत्ति होतात, म्हणजे जेथें जेथें ह्या दुर्मिळ तेथें तेथें त्यांना धनाचें स्वरूप येतें. मारवाडच्या रुक्ष प्रदशांत लोटाभर"} +{"id": "indic_deva_eval_000149_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000149_devanagari_digits_mixed_9f242160c343.jpg", "ocr": "२९28०३9६१४९533"} +{"id": "indic_deva_eval_000150_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000150_indic_vision_bench_deva_ocr_550d7b65eb6c.jpg", "ocr": "६६\nहिन्द स्वराज्य\nबात यह है कि किसानोंने, प्रजा-मंडलोंने अपने और राज्यके कारोबारमें सत्याग्रहको काममें लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।\nमुझे याद है कि एक रियासतमें रैयतको अमुक हुक्म पसन्द नहीं आया, इसलिए रैयतने हिजरत करना-गाँव खाली करना-शुरू कर दिया। राजा घबड़ाये। उन्होंने रैयतसे माफी माँगी और हुक्म वापस ले लिया। ऐसी मिसालें तो बहुत मिल सकती हैं। लेकिन वे ज्यादातर भारत-भूमिकी ही उपज होंगी। ऐसी रैयत जहाँ है वहीं स्वराज्य है। इसके बिना स्वराज्य कुराज्य है।\nपाठक :\nतो क्या आप यह कहेंगे कि शरीरको कसनेकी ज़रूरत ही नहीं है?\nसंपादक :\nऐसा मैं कभी नहीं कहूँगा। शरीरको कसे बिना सत्याग्रही होना मुश्किल है। अकसर जिन शरीरोंको गलत लाड़ लड़ा कर या सहलाकर कमज़ोर बना दिया गया है, उनमें रहनेवाला मन भी कमज़ोर होता है। और जहाँ मनका बल नहीं है वहाँ आत्मबल कैसे हो सकता है? हमें बाल-विवाह वगैराके कुरिवाजको और ऐश-आरामकी बुराईको छोड़कर शरीरको कसना ही होगा। अगर मैं मरियल और कमज़ोर आदमीको यकायक तोपके मुँह पर खड़ा हो जानेके लिए कहूँ, तो लोग मेरी हँसी उड़ायेंगे।\nपाठक :\nआपके कहनेसे तो ऐसा लगता है कि सत्याग्रही होना मामूली बात नहीं है, और अगर ऐसा है तो कोई आदमी सत्याग्रही कैसे बन सकता है, यह आपको समझाना होगा।\nसंपादक :\nसत्याग्रही होना आसान है। लेकिन जितना वह आसान है उतना ही मुश्किल भी है। चौदह बरसका एक लड़का सत्याग्रही हुआ है, यह मेरे अनुभवकी बात है। रोगी आदमी सत्याग्रही हुए हैं, यह भी मैंने देखा है। मैंने यह भी देखा है कि जो लोग शरीरसे बलवान थे और दूसरी बातोंमें भी सुखी थे, वे सत्याग्रही नहीं हो सके।\nअनुभवसे मैं देखता हूँ कि जो देशके भलेके लिए सत्याग्रही होना चाहता है, उसे ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये, गरीबी अपनानी चहिये, सत्यका"} +{"id": "indic_deva_eval_000151_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000151_devanagari_digits_mixed_c637b2bf73ab.jpg", "ocr": "550७०61३8९४०४93३"} +{"id": "indic_deva_eval_000152_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000152_indic_mozhi_deva_word_ocr_b09cbe347427.jpg", "ocr": "वास्तविक"} +{"id": "indic_deva_eval_000153_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000153_hindi_handwritten_word_ocr_c735e966161c.jpg", "ocr": "एडस"} +{"id": "indic_deva_eval_000154_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000154_indic_mozhi_deva_word_ocr_ff40c3360331.jpg", "ocr": "लाना"} +{"id": "indic_deva_eval_000155_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000155_devanagari_page_ocr_20606bd8574d.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n94- न्‍\n\nकेचि पनेत्थ वदेय्युं - या तुम्हे्ि ओकारन्ततापकतिकस्स इत्थिलिड्गस्स गोसहस्स “गो,\nगाबी, गावो, गावी, गवो\"तिआदिना नयेन पदमाला ठपिता, सा “मातुगामो इत्थी मातुगामा\nइत्थियो”ति बुत्ततदिसा च होतीति? तन्‍न। मातुगामइत्थीसद्धा हि नानालिछूगा\nपुमित्थिलिड्गभावेन, नानाधातुका च गसु इसुधातुवसेन, इमस्मिं पन ठाने गो गावीसद्दा\nएकलिड्गा इत्थि लिड्गभावेन, एकधातुका च गसुधातुवसेनाति। यज्जेव॑ गोणसद्दस्स\nगोसहृस्सादेसवसेन कच्चायनेन वुत्तत्ता तदादेसत्तं एकधातुकत्तड्चागम्म तेनापि सद्धिं मिस्सेत्वा\nपदमाला वत्तब्बाति? न, गोणसद्दस्स अच्च्चन्तपुल्लिड्गत्ता अकारन्ततापकतिकत्ता च। तथा हि\nसो विसुं पुल्लिड्गट्ठाने उद्दिल्ो। अयं पन “गो, गावी, गावो, गावी, गवो”तिआदिका पदमाला\nओकारीकारन्तपदानि मिस्सेत्वा कताति न सलल्‍लक्खेतब्बा, अथ खो विकप्पेन गोसदतो परेसं सि\n\nयो अंबचनानं ईकारिंकारादेसबसेन बुत्तपदवन्तत्ता ओकारन्तित्थिलिड्गपदमाला इच्चेब सारतो\nपच्चेतब्बा।\n\nइदानि गोसदस्स इत्थिलिकुगभावसाधकानि सुत्तपदानि लोकिकप्पयोगानि च कथयाम -\n“सेय्यथापि भिक्खबे वस्सानं पच्छिमे मासे सरदसमये किट्ठसम्बाधे गोपालको गावो रक्खेय्य,\nता गावो ततो ततो दण्डेन आकोटेय्य।\n\nअन्नदा बलदा चेता, बण्णदा सुखदा च ता।\n\nएतमत्थं बसं जत्वा, नास्सु गावो हनिंसु ते॥\nसब्बा गावो समाहरति। गमिस्सन्ति भन्‍्ते गावो वच्छगिद्धिनियो”ति इमानि सुत्तपदानि। “गोसु\nदुस्हमानासु गतो\"तिआदीनि पन लोकिकप्पयोगानि। इति गोसहस्स इत्थिलिछ्गभावोषि\nपुल्लिडुगभावो विय सारतो पच्चेतब्बो।\n\nतत्र “गो, गावी, गावो, गावी, गवो”तिआदीनि किड्चापि इत्थिलिड्गभावेन बुत्तानि,\n\nतथापि यथापयोगं “पजा देवता”तिपदानि विय इत्थिपुरिसवाचकानेव भवन्ति, तस्मा\nइत्थिलिड्गवसेन “सा गो”ति वा “ता गावो”ति वा वुत्ते इत्थिपुमभूता सब्बेषि गोणा गहिताति\nबेदितब्बा। न हि ईदिसे ठाने एकन्‍्ततो लिड्गगं पधानं, अत्थोयेव पधानो। “वजेगावो दुहन्ती”ति\nबुत्ते किउ्चापि “गावो”ति अय॑ सद्दो पुमेषि वत्तति, तथापि दुहनक्रियाय पुमे असम्भवतो\nअत्थवसेन इत्थियो आयन्ते। “गावी दुहन्ती”ति बुत्ते पन लिड्गवसेन अत्थवसेन च वचनतो को\nसंसयमापज्जिस्सति विज्ञू। “ता गाबो चरन्ती”ति बुत्ते इत्थिलिड्गबसेन बचनतो कदाचि\nकस्सचि संसयो सिया “ननु इत्थियो”ति, पुल्लिड्गवसेन पन “ते गाबो चरन्ती”ति बुत्ते संसयो"} +{"id": "indic_deva_eval_000156_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000156_indic_mozhi_deva_word_ocr_c8d81db4f181.jpg", "ocr": "आया,"} +{"id": "indic_deva_eval_000157_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000157_indic_mozhi_deva_word_ocr_403651136190.jpg", "ocr": "बड़े-बड़े"} +{"id": "indic_deva_eval_000158_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000158_devanagari_page_ocr_f0fcb7f6a154.jpg", "ocr": "मिलिन्दपज्हो\n\n“कामनिस्सितानि खो, दारक, वत्थानि, कमनीयानि! गिहिव्यछजनानि। यानि कानिचि\nखो भयानि वत्थतों उपज्जन्ति, तानि कासाववसनस्स न होन्ति, तस्मा वत्थानिषि मे न यथा\nअज्जेसं\"ति।\n\n“जानासि खो, त्वं मारिस, सिप्पानि नामा”ति? “आम, दारक, जानाम'हं सिप्पानि, य॑\nलोके उत्तमं मन्तं, त॑ पि जानामी”ति। “मय्हं पि तं, मारिस, दातुं सक्‍का”ति? “आम, दारक,\nसकक्‍का”ति। “तेन हि मे देही”ति। “अकालो खो, दारक, अन्तरघरं पिण्डाय पविद्ठ'म्हा”ति।\n\nअथ खो नागसेनो दारको आयस्मतो रोहणस्स हत्थतो पत्तं गहेत्वा घरं पवेसेत्वा\nपणीतेन खादनीयेन भोजनीयेन सहत्था सन्‍्तप्पेत्वा सम्पवारेत्वा आयस्मन्तं रोहणं भुत्ताविं\nओनीतपत्तपाणिं एतदवोच “देहि मे दानि, मारिस, मन्‍्तं”ति। “यदा खो त्वं, दारक,\nनिष्पलिबोधो हत्वा मातापितरो अनुजानापेत्वा मया गहित॑ पब्बजितवेसं गण्हिस्ससि, तदा\nदस्सामी”ति आह।\nसंस्कृतच्छाया- कामनि:श्लितानि खलु दारक, वस्त्राणि कमनिःश्रितानि गृहव्यञ्ञनानि। यानि कानिचित्‌\nखलु भयानि बलस्त्रत उत्पद्चन्ते तानि काषपायवसनस्य न भवन्ति। तस्माद्‌ वस्त्राण्यपि मम न\nयथाउन्येषामि\"ति।\n\n\"जानासि खलु त्वम्‌, मार्ष, शिल्पानि नामे\" ति? \"आम्‌, दारक, जानाम्यहं शिल्पानि। यो लोके\nउत्तमों मन्त्रस्तमपि जानामी\" ति। \"मह्यमपि तन्‍्मार्ष, दातुं शक्त\" इति? \"आम्‌, दारक, शक्त\" इति। \"तेन\nहि मे देही\"ति। \"अकाल: खलु, दारक। अन्तर्गुहं पिण्डाय प्राविक्षामे\"ति।\n\nअथ खलु नागसेनो दारक आयुष्मतो रोहणस्य हस्तात्‌ पात्र गृहीत्वा गृह प्रवेश्य प्रणीतेन\nखादनीयेन._ भोजनीयेन _ स्वहस्तात्‌. सन्‍्तर्प्य. सम्प्रवार्यायुष्मन्‍्त॑ रोहणं. भुक्तबन्तमबनीतपात्र-\nपाणिमेतदवोचत्‌- \"देहि मे इदानीम्‌, मार्ष, मन्‍्त्रसि\" ति। \"यदा खलु त्वम्‌, दारक, निष्परिबाधों भूत्वा\nमातापितरावनुज्ञाप्य मया गृहीत॑ प्रत्नजितवेष॑ ग्रहीष्यसि तदा दास्यामी\"त्याह।\nफैन्दी- “बाल��! गृहस्थों के सुन्दर बस्त्रों में कामवासनायें लगी रहती हैं। वस्त्र के कारण जिस भय की सम्भावना\nहै, वह काषाय वस्त्र पहनने वाले को नहीं होता। इसीलिये मेरे बस्त्र भी वैसे नहीं है जैसे दूसरों के।”\n\nक्या आप ज्ञान की बातें जानते हैं?” “बालक! हाँ, मैं यथार्थ ज्ञान को जानता हूँ और जो संसार में सबसे\nउत्तम मन्त्र है उसे भी जानता हूँ।” “मारिस! क्या आप सुझे भी सिखा सकते हैं?” “हाँ, सिखा सकता हूँ।” “तब\nमुझे सिखावें।\" “बालक! उसके लिए यह उचित समय नहीं है। अभी मैं गाँव में भिक्षाटन के लिए आया हूँ।\"\n\nतब नागसेन आयुष्मान्‌ रोहण के हाथ से पात्र ले उन्हें घर के भीतर ले गया। वहाँ अपने हाथों से उत्तम\nभोजन परोस कर उन्हें तृस किया। आयुष्मान्‌ रोहण के भोजन कर चुकने और पात्र से हाथ हटा लेने पर उसने\nकहा, “मारिस! अब मुझे मन्त्र सिखावें।” आयुष्मान्‌ रोहण बोले- “बालक! जब तुम सभी बाधाओं से रहित हो,\nमाता पिता की अनुमति ले मेरे भिक्षुबेश को धारण कर लोगे, तब मैं तुम्हें सिखाऊँगा।”\n\nसिलिन्दपज्हपालि, पू.-5\n\n23"} +{"id": "indic_deva_eval_000159_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000159_devanagari_page_ocr_39e1b307b64b.jpg", "ocr": "7. सकचिन्तनियवग्गो\n\n4. सकचिन्तनियत्थेरअपदानं\n\n“पबन कानन॑ दिस्वा, अप्पसद्मन्नाबिल॑।\nइसीनं अनुचिण्णंव, आहतीनं पटिग्गहं॥4340॥\n\n“थूप॑ कत्वान पुलिनं [वेक्ुना (अद्ठ०), वेक्ठिनं (स्या*)], नानापुप्फं समोकिरिं।\nसम्मुखा विय सम्बुद्धं, निम्मितं अभिवन्दहं॥344॥\n\nराजा र्ठम्हि इस्सरो।\n\nसककम्माभिरद्धोहं, पुप्फपूजायिदं [थूपपूजायिदं (सी*)] फलं॥ 4342॥\n\n“एकनबुतितो कप्पे, य॑ँ पुप्फमभिरोपयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, पुप्फपूजायिदं [थूूपपूजायिदं (सी*)] फलं॥4343॥\n\nचबन॑ कानन॑ दृष्ट्वा, अल्पशब्दसनाविलम्‌।\nऋषीणाम्‌ अनुचीर्णमिव, आहतीनां प्रतिग्रहम्‌॥340॥\nस्तूप कृत्वा पुलिनम्‌, नानापुष्पं समकिरम।\n\nसम्मुखा इब सम्बुद्धम, निर्मितस्‌ अभ्यवन्देज्ह म्‌॥4344॥\n\nससरलसम्पन्‍न: , राजा राष्ट्र ईश्वर:।\nस्वककर्माभिरब्धो हम, पुष्पपूजाया इदं फलम्‌॥342॥\n'एकनवतलितमे कल्पे, यत्‌ पुष्पमभ्यरोपयम।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, पुष्पपूजाया इदं फलम्‌॥4343॥\n\nउपद्रव एवं कोलाहल रहित पवन नामक वन को देखकर मैंने मानो ऋषि-सन्ियों की आहतियों के द्वारा\nपूजा सत्कार किया॥340॥\n\nनवीलट पर स्तूप को निर्मित कर उस पर विविध पुष्पों को फैला कर साक्षात्‌ सम्बुद्ध के सदृश मैंने उस\nस्तूप की ब���्‍्दना की॥34॥\n\nअपने कर्मों के प्रारब्ध से मैं राष्ट्र में ससरल् सम्पन्न राजा हुआ, यह मेरे पुष्प पूजा का ही\nखुपरिणामस है॥4342॥\n\n9॥ बें कल्प में मैंने जो पुष्प अभिरोषित किया था, यह उसी पुष्प पूजा का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\nको नहीं जानता ॥4343॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000160_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000160_devanagari_page_ocr_7702e8f76df4.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\nश्श्ा\n\nआदीसु, तथा काकसद्दोपि वायसे, एवंनामके दासेपि पवत्तति “काको रबति, काकों नाम दासो\nसह्ठलियोजनानि गच्छती”तिआदीसु। जम्बूसद्दो पन गहपतिमनादीसु चित्त कुस काकसद्धा विय\nपण्णत्तिवसेन दीपस्मि न पवत्तति, तस्मा यथावुत्तोयेव नयो मनसिकरणीयो।\nसहस्स नामिकपदमाला समासवसेन व्यासवसेन च॑\nयोजिता, एवं “पुब्बविदेहदीपो, अपरगोयानदीपो, उत्तरकुरुदीपो, अस्सयुजनक्खत्तं, चित्रमासो,\nवेस्सन्तरराजा, सेतवत्थं, दिव्बरथो”तिआदीनम्पि नामिकपदमाला समासवसेन ब्यासवसेन च\nयोजेतब्बा। पुब्बविदेहादिसद्ेह्ि पुब्बविदेहदीपादीन॑ कथनऊ्च वेदितब्बं। “दिव्वरथो”तिआदीन\nसमासगतपदानं॑ पयोजने सति ब्यासवसेन विसुं कत्तब्बता च वेदितब्बा। तथा हि ब्यासवसेन\n“दिव्बो रथो”तिआदिलना द्विन्न॑ द्विन्‍्त॑ं पदान॑ं समानाधिकरणवसेन पच्चेकविभत्तियुत्तभावे सति\nगाथासु वुत्तिपालनसुखुच्चारणगुणो भवति। सो च सासनानुकूलो हि अय॑ नयो ठपितों। तथा हि\nपावचने “दिव्बो रथो पातुरह, वेदेहस्स यसस्सिनो”तिआदिका पाछ्तियो बहू दिस्सन्ति, एवं\nलड़्न्‍कादीपादिसद्दानं विसेसवन्तता भवति।\nइदानि बोधिसन्धिआदीनं विसेसवन्तता बुच्चति -\nबोधि सन्धि विभत्ता'यु, धात॒येव पजापति।\nदामा दाम तथा सद्धा, सद्धं तट तटी तटो॥\n\nयथा पनेत्थ\n\nब्यड्जनं ब्यजजनो अत्थो, अत्थमक्खरमक्खरो।\nअज्जबं अज्जवो चेव, तथा महबगारवा॥\nबचो बचीति चादीनि, समरूपा सरूपतो।\nद्विक्तिलिकगानि सम्भोक्ति, यथासम्भवमद्धिसे॥\nएतेसु हि बोधिसद्वस्स ताव “बोधि राजकुमारो\"ति च, “अरियसाबको 'बोधी'ति बुच्वति,\n'तस्स बोधिस्स अड्गोति बोज्झड्गो”ति च एवं पुग्गलवचनस्स “बोधि, बोधी, बोधयो। बोधिं,\nबोधी, बोधयो। बोधिना\"ति पुल्लिड्गे अग्गिनयेन नामिकपदमाला भवति।\nरुक्खमग्गनिब्बानसब्बज्ञुतड्ञाणबचनस्स पन “बोधि, बोधी, बोधियो। बोधिं, बोधी,\nबोधियो। बोधिया”ति इत्थिलिड्गगे रक्तिनयेन नामिकपदमाला भवति।\nकेचि पन “रुक्खबचनो बोधिसद्यो पुल्लिझगो”ति वदन्ति, त॑ आगमेन विरूद्ध विय\nदिस्सनतो विचारेतब्बं। न हि आगमे रुक्खवचनस्स बोधिसदस्स पुल्लिइगभावों दिस्सति,"} +{"id": "indic_deva_eval_000161_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000161_devanagari_page_ocr_f09213334225.jpg", "ocr": "3. चित्तवग्गो\n\nपी ि फन्दनं चपलं चित्त, दूरक्खं दुन्निवारयं।\n\nउजुं करोति मेधावी, उसुकारो व तेजनं॥3/4 ॥।\n34... वारिजो व थले खित्तो, ओकमोकतउब्मतो।\n\nचपरिफन्दतिदं चित्त, मारधेय्यं पहातवे॥ 3/2 ॥।\n35... दुन्निग्गहस्स लहनो, यत्थकामनिपातिनो।\n\nचित्तस्स दमथो साथ्ु, चित्त दनन्‍्तं सुखावहं॥3/3 ॥।\n36. सुदुद्दसं सुनिषुणं, यत्थकामनिपातिनं।\n\nचित्त रक्खेथ मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं॥ 3/4॥।\n\nसंस्कृतच्छाया-\nस्पंदनं चपल॑ चित्त दुर्रक्ष्यं दुर्निवार्यम्‌ ।\nऋजुं करोति मेधावी इघुकार इव तेजनम्‌ ।। 3/4 ॥।\nवारिजमिव स्थले क्षिसम्‌ उदकौकत उद्भूतम्‌ ।\nपरिस्पन्दत इदं चित्त मारधेयं प्रहातुम्‌ ॥॥ 3/2 ॥।\nदुर्निग्रहस्य लघुनो यत्र-काम-निपातिन: ।\nचित्तस्य दमन साधु, चित्त दान्तं सुखावहम्‌ ॥॥3/3 ॥।\nसुदुदर्श सुनिषुर्ण यत्र-कामनिपातिनम्‌ ।\nचित्त रक्षेत्‌ मेधावी, चित्त गुसं सुखावहम्‌ । ।3/4 ।।\nहिन्दी-\n\n(इस) चंचल, चपल, दूर्‌-: ६4 को\nसीधा करता है, जले बार बन से दूर-निवार्य चित्त को मेघावी (पुरुष, उसी प्रकार)\n\nनाने वाला बाण को ॥। 3/4॥। तड़फड़ाती\n\nदे ४85 से निकालकर स्थल पर फेंक दी गई मछती (वारिज) तड़ है\nकड़ाता है ० (राग), द्वेष, मोह) के फन्द से निकले के लिये यह चित्त\n\n(जो) कठिनाई से डा गेग्य न (पाग, द्वेष, मोह) को दूर करना चाहिये ।3/2.\n(देसे ) चित्त क. ५. दे योग्य; शीक्रगामी; जहाँ चाहता है वहाँ चला जाने वाल\nहा करता, उत्तम है; दमन किया गया चित्त सुखप्रद होल हक ॥!\nबुद्धिमान जानने 2४० ४ अत्यन्त चालाक; जहाँ चाहे वहाँ ले जाने वा' ह\nजा करे; सुरक्षित चित्त सुखप्रद होता है।।3/44 ।।\n\n(एफ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टाारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000162_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000162_indic_vision_bench_deva_ocr_0a0c248ff61d.jpg", "ocr": "आकाश-दीप\nस्तम्भ पर से देखा--सामुद्रिक नावों की एक श्रेणी चम्पा का उपकूल छोड़ कर पश्चिम-उत्तर की ओर महा जल-ब्याल के समान सन्तरण कर रही है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।\nयह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चम्पा आजीवन उस दीप-स्तम्भ में आलोक जलाती ही रही। किन्तु उसके बाद भी बहुत दिन, द्वीप-निवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश उसकी पूजा करते थे।\nएक दिन काल के कठोर हाथों ��े उसे भी अपनी चंचलता से गिरा दिया।"} +{"id": "indic_deva_eval_000163_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000163_devanagari_page_ocr_a13c7390e1ca.jpg", "ocr": "चुद्दसमों परिच्छेदो\n\n90:\n\nतदा तस्स मनुस्सा ते, आगरम्म परिवारयुं।\n\nतदा सेसे छ दस्सेसि, महाथेरो सहागते॥4॥\n\nते दिस्वा अब्रवी राजा, “कदा” मे आगता इति।\n\n“मया सद्धिं”ति थेरेन, बुत्ते पुच्छि इदं पुना॥2॥\n\n“सन्ति ईदिसका अज्जे, जम्बुदीपे यती” इति।\n\nआह “कासावपज्जोतो, जम्बुदीपो तहिं पन॥43॥\n\nते विज्जा इद्धिप्पत्ता च, चेतोपरिज्ञ कोविदा।\n\n“दिव्बसोतारहन्तो च, बहू बुद्धस्स सावका”॥44॥\n\nपुच्छि “केनागतत्था”ति, न थलेन न वारिना।\n\nआगतम्हा”ति बुत्तो सो, विजानि नभसागमं॥45॥\n\nसंस्कृतच्छाया- तदा तस्य मनुष्या: ते, आगम्य परिवारयन्‌।\n'तदा शेषान्‌ च अदर्शयत्‌, महास्थविर: सहागतान्‌॥44॥।\nतान्‌ दृष्ट्वा अब्रवीत राजा, “कदा” मे आगतम्‌ इति।\n“मया सार्धम्‌” इति स्थविरेण, उक्ते अपूल्छत्‌ इदं पुन:॥॥42॥।\n“सन्ति ईदृशका अन्‍्ये, जम्बुद्दीपे यति” इति।\nआह “काषायप्रद्योत:, जम्बुद्बीप: तत्र पुनः॥3॥॥\nत्रैविद्या: ऋद्धिप्रासता च, चेतोपर्यायकोविदा:।\n“दिव्यस्रोता: च अर्ईन्तः, बहू बुद्धस्य श्रावका:।4॥।\nअपृच्छत्‌ “केनागतात्र” इति, न स्थलेन न वारिणा।\n\nनरक आगतास्म” इति उक्ते सः, अज्ञासीत्‌ नभसागमम्‌॥45॥\nपा />उसके अड्गरक्षक भी राजा के पीछे आकर बैठ गये। तब स्थविर ने भी अपने सहानुयायियों को प्रकट\n॥44]॥\n\nअकस्मात्‌ उन्हें देखकर राजा ने पूछा- “ये कब आये?”\n\nस्थविर ने कहा- फिर राजा ने पूछा-।2॥\n“क्या जम्बुद्वीप में ऐसे यति अन्य भी हैं?” दहन मे साइड कि हक\n\nहै।3॥॥ स्थबिर ने कहा” “समग्र जम्बुद्ीप ऐसे काघायवस्त्रों से प्रकाशमान\n४४ कितने ही जैविध ऋद्धिवलसम्पत्न, परचित्तविजाननसमर्थ दिव्यश्रोत्र एवं अर्हत्‌ बुद्धशिष्य\n॥ ।\n\nफिर पूछा- “कैसे आये हैं?” स्थविर ने कहा- “न स्थल से आये हैं, ता\nै, न जल से।“ ऐसा कहे जाने पर राजा समझ\nकि ये आकाशमार्ग से आये हैं।।45॥॥ सा कटे"} +{"id": "indic_deva_eval_000164_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000164_indic_mozhi_deva_word_ocr_103fc7ad559a.jpg", "ocr": "दुकान"} +{"id": "indic_deva_eval_000165_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000165_indic_vision_bench_deva_ocr_5ddf94746bcc.jpg", "ocr": "निवेदन\nइस पुस्तक में मेरी अन्तर्यात्रा में पड़नेवाले कुछ प्रदेश हैं। यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि, पर हृदय को भी साथ लेकर। अपना रास्ता निकालती हुई बुद्धि जहाँ कहीं मार्मिक या भावाकर्षक स्थलों पर पहुँचती है वहाँ हृदय थोड़ा-बहुत रमता और अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कुछ कहता गया है। इस प्रकार यात्रा के श्रम का परिहार होता रहा है। बुद्धिपथ पर हृदय भी अपने लिए कुछ न कुछ पाता रहा है।\nबस, इतना ही निवेदन करके इस बात का निर्णय मैं विज्ञ पाठकों पर ही छोड़ता हूँ कि ये निबन्ध विषय-प्रधान है या व्यक्ति प्रधान।\nकाशी\n}\n{\\displaystyle \\scriptstyle {\\left.{\\begin{matrix}\\ \\\\\\\\\\ \\ \\end{matrix}}\\right\\}\\,}}\nरामचंद्र शुक्ल\n२-२-१९१९"} +{"id": "indic_deva_eval_000166_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000166_indic_mozhi_deva_word_ocr_9b0e6f43308e.jpg", "ocr": "केन्द्रीय"} +{"id": "indic_deva_eval_000167_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000167_hindi_handwritten_word_ocr_0fdf6376b458.jpg", "ocr": "खानी"} +{"id": "indic_deva_eval_000168_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000168_devanagari_page_ocr_718e6b5fbfe8.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 245\n\n२. दुतियं चित्त\n\n४२१. कतमे धम्मा अकुसला? यस्मिं समये अकुसलं चित्तं उप्पन्नं होति दोमनस्ससहगतं\n'पटिघसम्पयुत्तं ससन्लारेन रूपारम्मणं वा ...पे*... धम्मारम्मणं वा यं यं वा पनारब्भ, तस्मि\nसमये फस्सो होति ...पे*... अविक्खेपो होति. ..पे*... इमे धम्मा अकुसला।\n\n३. मोहचित्तानि\n१. पठमं॑ चित्त\n\n४२२. कतमे धम्मा अकुसला? यस्मिं समये अकुसलं चित्त उप्पन्नं होति उपेक्खासहगतं\nविचिकिच्छासम्पयुत्त रूपारम्मर्णं वा सद्दारम्मणं वा गन्धारम्मर्णं वा रसारम्मणं वा\nफोट्डब्बारम्मरं वा धम्मारम्म् वा यं य॑ वा पनारब्भ, तस्मिं समये फस्सो होति, वेदना होति,\nहोति, चेतना होति, चित्त होति, वितकको होति, विचारो होति, उपेक्खा होति,\nचित्तस्सेकग्गता होति, वीरियिन्द्रियं होति, मनिन्द्रियं होति, उपेक्खिन्द्रियं होति, जीवितिन्द्रियं\nहोति, मिच्छासक्ृप्पो होति, मिच्छावायामो होति, वीरियबलं होति, अहिरिकबलं होति,\nअनोत्तप्पबलं होति, विचिकिच्छा होति, मोहो होति, अहिरिकं होति, अनोत्तप्पं होति, पग्गाहो\n(संस्कृतच्छाया)४२१. . कतमे धर्मा: अकुशला:? यस्मिन्‌ू समये अकुशलं चिक्तमुत्पन्न॑भवति\nदौर्मनस्यसहगतं प्रतिघसम्प्रयुक्त ससंस्कारेन रूपालम्बनं वा ...पे*... धर्मालम्बनं वा यत्‌ यत्‌ वा पुनः\nआलम्ब्य, तस्मिन्‌ समये स्पर्शों भवति. ..पे*... अविक्षेपो भवति ...पे*... इमे धर्मा: अकुशला:।\n\n४२२. कतमे धर्मा: अकुशला:? यस्मिन्‌ समये अकुशलं चित्तम्‌ उत्पन्न भवति उपेक्षासहगतं\nविचिकित्सासम्प्रयुक्ते रूपालम्बनं वा शब्दालम्बनं वा गन्धालम्बनं वा रसालम्बनं वा स्पुष्टब्यालम्बनं वा\nधर्मालम्बनं वा यत्‌ यत्‌ वा पुनः आलम्ब्य, तस्मिन्�� समये स्पर्शों भवत्ति, वेदना भवति, संज्ञा भवति,\nचेतना भवति, चित्त भवति, वितर्कों भवति, विचारों भवति, उपेक्षा भवति, चित्तस्वैकाग्रता भवति,\nवीर्येन्द्रियं भवति, मनइन्द्रियं भवति, उपेक्षेन्द्रियं भवति, जीवितेन्द्रियं भवति, मिथ्यासक्ुल्पो भवति,\nमिथ्याव्यायामो भवतति, वीर्यबल भवति, अछ्लीकबलं भवति, अनपत्राप्यबलं भवति, विचिकित्सा भवति,\nमोहो भवति, अह्लीक॑ भवति, अनपत्राप्यं भवति, प्रग्राहो\nतहेन्दी) ४३ १. कौन से धर्म अकुशल हैं? जिस समय दौर्मतस्यसहगत प्रतिघसम्प्रयुक्त ससंस्कारिक रूपालम्बन\nधर्मालम्बन अथवा पुनः भिन्न-भिन्न आलम्बनों को ग्रहणकर अकुशल चित्त उत्पन्न होता है, उस समय\nहोता है ...पूर्ववत्‌... अविक्षेप होता है ...पूर्ववत्‌... ये धर्म अकुशल हैं।\n\n४२२. कौन से धर्म अकुशल हैं? जिस समय उपेक्षासहगत विचिकित्सासम्प्रयुक्त रूपालम्बन या\nगन्धालस्बन था रसालम्वन या स्पृष्टव्यालम्बन या धर्मालम्वन अथवा पुनः भिन्न-भिन्न आलम्वनों को ग्रहणकर\nअकुशल चित्त उत्पन्न होता है, उस समय स्पर्श, बेदना, संज्ञा, चेतना, चित्त, बितर्क, विचार, उपेक्षा, चित्त की\nएकाग्रता, वीर्येन्द्रिय, मन-इन्द्रिय, उपेक्षा-इन्द्रिय, जीवितेन्द्रिय, मिथ्यासंकल्प, मिथ्याव्यायाम, वीर्यबल,\nअह्लीकबल, अनपत्राप्यबल, विचिकित्सा, मोह, अ्लीक, अनपत्राप्य, प्रग्राह; अथवा उस समय जो भी अन्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000169_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000169_indic_vision_bench_deva_ocr_aaec9522a189.jpg", "ocr": "\nतरह से जमा दिए जाते हैं कि उनके बीच में से सिर्फ पानी निकले, मिट्टी और रेत आदि पीछे जम जाए, छूट जाए।\nरेगिस्तानी क्षेत्र में रेत की मात्रा मैदानी क्षेत्रों से कहीं अधिक होती है। इसलिए वहां तालाब में खुरा अधिक व्यवस्थित, कच्चे के बदले पक्के भी बनते है। पत्थरों को गारे चुने से जमा कर बकायदा एक ऐसी दो मंजिली पुलिया बनाई जाती हैं, जिसमें से ऊपरी मंजिल की खिड़कीयों, या छेदों से पानी जाता है, उन छेदों के नीचे से एक नाली में आता है और वहां पानी सारा भार कंकर-रेत आदि छोड़कर साफ होकर फिर पहली मंजिल के छेदों से बाहर निकल आगौर की तरफ बढ़ता है। कई तरह के छोटे-बढ़े, ऊँचे-नीचे छेदों से पानी छानकर आगर में भेजने वाला यह ढांचा छेदी कहलाता है।\nइस तरह रोकी गई मिट्टी के कोई भी कई नाम हैं। कहीं यह साद है, गाद है, लद्दी है, तो कहीं तलछट भी। पूरी सावधानी रखने के बाद भी हर वर्ष प���नी के साथ कुछ न कुछ मिट्टी आगर में आ ही जाती है। उसे निकालने के भी अवसर और तरीके बहुत व्यवस्थित रहे हैं। उनका ब्यौरा बाद में।\nअभी फिर पाल पर चलें। पाल कहीं सीधी, कहीं अर्ध चंद्राकार, दूज के चांद की तरह बनती है तो कहीं उसमें हमारे हाथ की कोहनी की तरह एक मोड़ होता है। यह मोड़ कोहनी ही कहलाता है। जहां भी पाल पर आगौर से आने वाले पानी का बड़ा झटका लग सकता है, वहां पाल की मज़बूती बढ़ाने के लिए उस पर कोहनी दी जाती है।\nजहां संभव है, सामर्थ्य है, वहां पाल और पानी के बीच पत्थर के पाट लगाए जाते हैं। पत्थर जोड़ने की क्रिया जुहाना कहलाती है। छोटे पत्थर गारे से जोड़े जाते थे और इस घोल में रेत, चूना, बेलफल (बेलपत्र) गुड़, गोंद और मेथी मिलाई जाती थी। कहीं-कहीं राल भी। बड़े वजनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000170_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000170_indic_mozhi_deva_word_ocr_1749f8416064.jpg", "ocr": "त्यांना"} +{"id": "indic_deva_eval_000171_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000171_devanagari_page_ocr_6f7394da3cb0.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n279\n\nभवितुं, उब्भवितुं, समुब्भवितुं, पभवितुं, पराभवितुं, अतिभवितुं, सम्भवितुं, विभवितु,\nभोतुं, सम्भोतुं, विभोतुं, पातुभवितुं, पातुब्भवितुं बा, पातुभोतुं। इसानि अकम्मकानि\nतुमन्‍्तपदानि।\n\nपरिभोतुं परिभवितुं, अभिभोतुं अभिभवितुं, अधिभोतुं अधिभवितुं, अतिभोतुं अतिभवितु,\nअनुभोतुं अनुभवितुं, समनुभोतुं समनुभवितुं, अभिसम्भोतुं अभिसम्भवितुं। इमानि सकम्मकानि\nतुमन्‍्तपदानि, सब्बानेतानि सुद्धकत्तरि भवन्ति।\n\n“भावेतुं, पभावेतुं, सम्भावेतुं, विभावेतुं, परिभावेतुं”इच्चेवमादीनि हेतुकत्तरि\nतुमन्‍्तपदानि, सब्बानिपि हेतुकत्तरि तुमन्‍्तपदानि सकम्मकानियेव भवन्ति। उद्देसोय॑।\n\nतत्न समानत्थपदेसु एकमेवादिपदं गहेत्वा निद्देसो कातब्बो - भवितुन्ति होतुं विज्जितुं\n'पड्ञायितुं सरूप॑ लभितुं। एत्थ बुत्तनयानुसारेन सेसानम्पि तुमन्‍्तानं निद्धेसों वित्थारेतब्बो,\nसब्बानि तुमन्‍्तप दानि चतुत्थियस्थे बत्तन्ति “त्वं मम चित्तमज्ञाय, नेत्तं याचितुमागतो”ति एल्थ\nविय। याचितुन्ति हि याचनत्थायाति अत्थो। तस्मा भवितुन्तिआदीनम्पि “भवनत्थाया”ति वा\n“भवनत्थ”\"न्ति बा “भवनाया\"ति वा आदिना अत्थो गहेतब्बो। अपिच “नेक्खम्म॑ दट्कु\nखेमतो”ति एत्थ “दट्कु”न्ति पदस्स “दिस्वा”ति अत्थदस्सनतो यथारहं तुमन्‍्तानि\nत्वासदन्तपदत्थवसेनपि गहेतब्बानि। एतानि च निपातपदेसु सडुगहंगच्छन्ति। वुत्तजञिह\nनिरुत्तिपिटके निपातपदपरिच्छेदे “तुं इति चतुत्थिया”ति। तत्रायमत्थो इति एतदन्तो\nनिपातों चतुत्थिया अत्थे वत्तती”ति। तुमन्‍्तकथा समत्ता।\n\nइदानि त्वादियन्तपदानि बुच्चन्ते -\n\nअवित्वा, भवित्वान, भवितुन, भविय, भवियान। उब्भवित्वा, उब्भवित्वान, उब्भवितुन,\n'उब्भविय, उब्भवियान। एस नयो “समुब्भवित्वा, पराभवित्वा, सम्भवित्वा, विभवित्वा,\nपातुब्भवित्वा”ति एत्थापि। इसानि अकम्मकानि उस्सुक्कनत्थानि त्वादियन्तपदानि।\n\nभुत्वा, भुत्वान, परिभवित्वा, परिभवित्वान, परिभवितुन, परिभविय, परिभवियान,\nपरिभुय्य। अभिभवित्वा, अभिभवित्वान, अभिभवितुन, अभिभविय, अभिभवियान, अभिभुय्य।\nएस नयो “अधिभवित्वा, अतिभवित्वा, अनुभवित्वा”ति एत्थापि। इदज्चेत्थ निदस्सनं।\n“तमबोच राजा अनुभवियान तम्पि, एय्यासि खिप्पं अहमपि पूर्ज कस्स”न्ति। अनुभुत्वा,\nअनुभुत्वान। अधिभोत्वा, अधिभोत्वान।"} +{"id": "indic_deva_eval_000172_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000172_hindi_handwritten_word_ocr_5da5518fcc27.jpg", "ocr": "प्लेट"} +{"id": "indic_deva_eval_000173_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000173_hindi_handwritten_word_ocr_8b9d54b42aae.jpg", "ocr": "जुबली"} +{"id": "indic_deva_eval_000174_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000174_hindi_handwritten_word_ocr_e769ab20255d.jpg", "ocr": "झाड़ी"} +{"id": "indic_deva_eval_000175_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000175_indic_mozhi_deva_word_ocr_720f00a4c019.jpg", "ocr": "पंडित"} +{"id": "indic_deva_eval_000176_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000176_indic_mozhi_deva_word_ocr_39353360a64c.jpg", "ocr": "क्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000177_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000177_devanagari_page_ocr_320fa92cc51e.jpg", "ocr": "विज्जमानथूपानं बुद्धानं थूपकथा 5\n\nतस्य अपरभागे इमस्मिन्‌ कल्पे चत्त्वारः बुद्धा न्यवर्तन्‍्त, ककुसन्ध: कोनागमनः कश्यपः अस्माकं भगवान्‌\nइति ककुसन्धस्य पुनः भगवत:ः काले बोधिसच्त्वः क्षेमो नाम राजा भूत्वा बुद्धप्रमुखाय संघाय\nसपात्रचीवरदानञैव अज्जनादिभैषज्यानि च दत्वा शास्तुः धर्मदेशनां श्रुत्वा प्राब्राजीत्‌। सोडपि न॑ शास्ता\nव्याकार्षीत्‌। तस्य पुनः भगवतो धातबः न व्यकारिपु:। सर्वे सन्निपत्य धातबः गृहीत्वा गब्यूतोद्वे॑ स्तूपम्‌\nअकार्षु:। तेनोक्तम-\n\nकुकुसन्धों जिनवर: क्षेमारामे हि निर्व॒तः।\n\nतत्रैब तस्य स्तूपबरः गब्यूत॑ नभम्‌ उदगतः इति।\nमें ककुसन्ध, कोणागम, काश्यप, तथा हमलोगों के भगवान्‌ (गौतम) बुद्ध नामक चार बुद्ध\nउत्पन्न हुए। ककुसन्ः के काल में वोधिसच्च क्षेम नामक राजा होकर, बुद्ध प्रमुख शिक्ष्‌ संघ को पात्र चीवर\nसहित मह���दान तथा अज्ञन आदि भैषज्यादि (दवाईयाँ) दे, शास्ता के धर्मोपदेश सुन प्रत्नजित हो गये। उस शास्ता\nने भी उनके सम्बन्ध में बुद्ध होने की भविष्यवाणी की। उन भगवान्‌ (ककुसन्ध) की धातुएँ विकीर्ण नहीं की गईं।\nसभी ने एकजित होकर धातुओं को ग्रहण कर एक गव्यूति ऊँचा उठा हुआ एक स्तूप बनवाया। अतः कहा गया है-\nश्रेष्ठ विजेता ककुसन्ध खेमाराम विहार में परिनिवृत हुए। उसी स्थान पर उनका श्रेष्ठ स्‍्तूप आकाश में एक गब्यूति\nऊँचाई बाला बनाया गया।\n50७३-व०७००६ ६० ॥ंत, पटाह जएलार ७000, त0ताड फ़ाड १९०0, लिए हराहराप्टत०व 002४... #(०(६७०००क#०,\n(एल ककशमठ००, कमन्‍ट2०, गाव. 007 हातवहाघ्ट0९१ 006. 44, 0७, ही पताह ० हल हध्आपट0, 006\n#काद.४90209, (08 /50//400 (० हतवह0७00१९०६ ४४४० ५४३७ ए५९ |लह 700१० दा ह8 हारिक गे आए ॥ल0कआएह\n०७5 204 70068 304 70००ा20९5 3७८७ 35 ९0॥/0000 ६० फै९ 0780 (000७) एफ पी ६0॥802020: 006 35\n॥04080 ॥#लगढ ६० पी प2बटीछ ५ ए2॥छ 005 तड200738 200 छतए27७७ (५९ 07, ॥#0६ 7002087 ६०0, 9/02#6अ20\nमत ॥(/ट02026 ७ #ाए- व02 7९॥०७ ० ची७ &आ0०० 006, ॥०/०७७ ७४९/७ 0०0 ३८०ए७९(००० ६४६०१/००९ 00९7९\nपठ260७/ 300, एवावाह छाल 7॥०६, 9७६३ 0७७०० ७ 90८९० 80. ॥000670 ७ उत्ात- ॥06 5५७7९०७७ ८0१व0७०/\n(एक वारकातपित 355९0 3७/७५॥0 0/202067 006 #्षटरीिदाकाात जी 0035९80/- '#6 ९३४०ल॥ लाए इक७७० (० ता पोल\nइलाडव002 ७926 7056 006 900८०॥00० छो९ अ0-\n\nउनके बाद इस\n\nन]\nहगुंड ॥0७0८७ ॥322१930229५७७० 53000 59708 970७8 0॥9000090259097) 5७५५७ ७७०6॥030व0७कगा\n0त्रौतकए5आ पा, ॥॥97020४8, ॥79/50व7, 93४3020/8. 930900320303(:3/058)0/0708|0७/९७वित॑\n(९५३ 50५१009090.3(८9ग ८३ 030४8 5900७ 590॥08 93009). 50 छाए 53005 ५१/5६85. 75559 00393७300.\nककब0छ/० जाकाए5७-९09 ७ए५वा\n\n६5 490॥9700 50000॥0 ?800कक।डत0ओ॥। ए०00०,\n\n00ब00ज06087/(ओ0, ढेतझ ७8५७ (७५७ 930253(0/..\n\nतस्स अपरभागे कोणागमनो नाम सत्था उदपादि। तदा बोधिसत्तो पब्बतो नाम राजा\nहत्वा अमज्ञगणपरिवुतो सत्थु सन्तिक॑ गन्त्वा धम्मदेसनं सुत्वा बुद्धपमु्ख भिक्खुसडूःं\nनिमन्तेत्वा महादानं पव्तेत्वा पत्तुण्णचीनपट्टकोसेस्यकम्बलदुकूलानि” चेव सुवण्णपट्टक थ दत्वा\nसत्थु सन्तिके पब्बजि। सो पि नं सत्था अनागते बुद्धों भविस्सतीति व्याकासि। तस्स भगवतो\nश्वात॒यों विकिरिंसु। तेन वुत्तं,\nकोणागमनो सम्बुद्धों, पब्बतारामम्हि निबुत्तो।\nधातुवित्थारिकं आसि, तेसु तेसु पदेसतो”ति।।47।।\nतस्थ अपरभागे कोनागमनों नाम शास्ता उदपादि। तदा बोधिसच्ष्बः पर्वतो नाम राजा भूत्वा\nअमात्यगणपरिवृतः शास्तु: सन्तिक॑ गत्वा धर्मदेशनां श्रुत्वा बुद्धप्रमुखं भिक्षुसंघ॑ निमन्त्र्य महादानं प्रवर्त्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000178_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000178_hindi_handwritten_word_ocr_642d96ef89c6.jpg", "ocr": "ख़रीदा।"} +{"id": "indic_deva_eval_000179_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000179_devanagari_digits_mixed_1ff85d721caf.jpg", "ocr": "0६४1०४2३६८८1"} +{"id": "indic_deva_eval_000180_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000180_indic_mozhi_deva_word_ocr_5b2360e819e4.jpg", "ocr": "लोगों"} +{"id": "indic_deva_eval_000181_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000181_devanagari_page_ocr_71a5873c890d.jpg", "ocr": "42 अनुपिटके\n\nनवड्-गसत्थुसासने परियत्तिधरो पारमिप्पत्तो जिनवचने धम्मत्थदेसनापटिवेधकुसलो\nअक्खयविचित्रपटिभानो चित्रकथी कल्याणवाक्करणो दुरासदो दुप्पसहो दुरुत्तरो दुरावरणो\nदुन्निवारयों, सागरो विय अक्खोभो, गिरिराजा विय निज्चलो, रणडजहो तमोनुदो पभडकरो\nमहाकथी परगणिगणमथनों परतित्थियमद्दनों भिक्‍खून॑ भिक्खुनीन॑ उपासकानं उपासिकानं\nराजूनं राजमहामत्तानं सक्कतो गुरुकततो मानितो पूजितो अपचितो लाभी\nचीवरपिण्डपातसेनासनगलानप्पनज्नयभेसज्जपरिक्खारानं लाभग्गयसग्गप्पत्तो, विद्वानं विज्ञूनं\nसोतावधानेन समन्‍नागतानं सन्दस्सेन्तो नवडूगं जिनसासनरतनं, उपदिसन्तो धम्ममग्गं,\n\nधारेन्तो धम्मप्पज्जोत॑, उस्सापेन्तो धम्मयूपं, यजन्तो धम्मयागं, पग्गण्हन्तो धम्मद्धजं,\nउस्सापेन्तो धम्मकेतुं, धमेन्‍्तो धम्मसडूखं, आहनन्तो धम्मभेरिं, नदन्‍तो सीहनादं , गज्जन्तो\nइन्दगज्जितं, मधुरगिरगज्जितेन आणवरविज्जुजालपरिवेठितेन करुणाजलभरितेन महता\nधम्मामतमेघेन सकललोकमशितप्पयन्तो गामनिगमराजधानीसु चारिकं चरमानो ;\nसंस्कृतच्छाया- नवाइशास्तशासने पर्यासिधरः पारमीं ब्राप्तो जिनवचने\nधर्मार्थदेशनाप्रतिवेधकुशलोक्षयविचित्रप्रतिभानश्वित्रकथी कल्याणवाक्करणो दुरासदो दुष्प्रसहो दुरुत्तरो\nदुरावरणो दुर्निवीर्य:. सागर इवाक्षोभ:, गिरिराज इब निश्चलो, रणअहो (रागरहितो), तमोनुदः,\nप्रभाकरो, महाकथी परगणिगणमथन: परलैर्थिकमर्दनो भिक्षूणां भिक्षुणीनामुपासकानामुपासिकानां\nराज्ञा ._ राजमहामात्यानां सत्कृतो_ गुरुकुतो. मानित: .. पूजितोज्पचितो.._ लाभी\nचीवरपिण्डपातशयनासनस्लानप्रत्ययमैषज्यपरिष्काराणां लाभास्यशोठत््गप्रामो. बुद्धानां. विज्ञानां\nश्रोत्रावधानेन समन्वागतानां सन्दर्शयन्‌, नवाडूगं जिनशासनरलं, उपदिशन्‌ धर्ममार्ग, धारयन्‌\nधर्मप्रद्योत॑, उत्सर्पयन्‌ धर्मयूप॑, यजन्‌ धर्मयागं, प्रगृह्नन्‌ धर्मध्वजं, उत्सर्पयन्‌ धर्मकेतुं, ध्मायन्‌ धर्मशडूखं,\nआह्नन्‌ धर्मभेरिं, नदन्‌ सिंहनादं, गर्जन्‌ इन्द्रगर्जितं, मधुरगीर्गर्जितेन ज्ञानवरविद्युज्जालपरिवेष्टितेण\nकरूणाजलभरितेण महता धर्मामृतमेघेन सकललोकमभितर्पयन्‌, ग्रामनिगमराजधानीपु चारिकां चरन्‌ ;\nहिन्दी- भगवान्‌ बुद्ध के शासन की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को भी जानने वाले, प्रज़्सिधर, पारमी प्राप्त, भगवान के\nधर्म के अनुकूल देशना करने में कुशल, कभी भी विफल न होने वाली विचित्र प्रत्युत्पन्नमति से युक्त थे। विचित्र\nवक्ता, शुभ बातों को बोलने वाले, अद्वितीय, अपराजेय थे। उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया जा सकता था। उन्हें\nतर्कों से नहीं बुझाया जा सकता था। सागर के समान शान्त, हिमालय के जैसा निश्चल, राग रूपी क्लेश पर\nविजय पाने वाले, अज्ञानरूपी अन्धकार को नाश करने बाले,\nदूसरे मत वालों को पराजित करने वाले, दूसरे तैर्थिकों को हराने वाले, भिक्खु, भिक्खुणी, उपासक, उपासिका,\nराजा और राजमन्त्री सभी से सत्कार पाने बाले और पूजा किए जाने वाले, चीवर, पिण्डपात, शयनासन और\nस्लानप्रत्यय पाने वाले, उत्तम लाभ और यश पाने वाले, धर्मोपदेश सुनने की इच्छा से आए हुए अकुशल और विज्ञ\nपुरुषों को बुद्ध-धर्म के नव रत्नों को दिखाने वाले, धर्ममार्ग को उपदेश देने वले, धर्मरूपी प्रकाश को धारण करने\nबाले, धर्म-स्तम्भ को गाड़ने वाले, धर्म यज्ञ करने वाले, धर्म-ध्वजा को पकड़े हुए धर्मभेरी को बजाते, सिंहनाद\nजलत, खिजली की जि तदकत, संचर्लाणी चालत, तरणार पी बंदों की राखाद बयां वलते, जपत जञानर सी चित\nको चमकाते, बड़े भारी धर्म-रूपी मेघ से अमृतवर्षा कर लोगों को सन्‍्तुष्ट करते,"} +{"id": "indic_deva_eval_000182_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000182_indic_mozhi_deva_word_ocr_80f90dc01962.jpg", "ocr": "कामा"} +{"id": "indic_deva_eval_000183_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000183_indic_mozhi_deva_word_ocr_20e3026b1e1c.jpg", "ocr": "बोली-कौन"} +{"id": "indic_deva_eval_000184_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000184_indic_mozhi_deva_word_ocr_bf98282eec9d.jpg", "ocr": "यहाँ"} +{"id": "indic_deva_eval_000185_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000185_devanagari_page_ocr_9c1e7e1e4ffe.jpg", "ocr": "58\n\nअपदानपालि\n\n“दिस्वानाहं बुद्धथूपं, गरुचित्त उपद्ठहिं।\n\nबुद्धसेट्रस्स थूपोयं, पलुग्गों अच्छती बने॥745॥\n\n“नच्छन्न॑ नप्पतिरूपं, जानन्तस्स गुणागुणं।\n\nबुद्धथूपं असोधेत्वा, अज्ञं कम्म॑ पयोजये॥446॥\n\n“तिणकट्ठ॒छच वल्लिड्च, सोधयित्वान चेतिये।\n\nबन्दित्वा अट्ठ वारानि [अट्ठ ठानानि (क०)], पटिकुटिको अगच्छहं॥ 747॥\n'तेन कम्मेन सुकतेन, चेतनापणिधीहि च।\n\nजहित्वा मानुसं देहं, तावतिंसमगच्छहं॥7 8॥\n\n\"तत्थ मे सुकत॑ ब्यम्हं, सोवण्णं सपभस्सरं।\nसट्ठियोजनमुब्बिद्धं, तिंसयोजनवित्थतं॥79॥\n“दुष्ट्वाउहं बुद्धस्तूपम्‌, गरुचित्तम्‌ उपास्थामहम्‌।\nबुद्धश्रेष्ठस्य स्तूपोयम्‌, प्ररुणण अर्कती/आस्यति बने॥745॥\n“नाच्छन्नं नाप्रतिरूपस्‌, जानन्तस्य गुणागुणम्‌।\n\nबुद्धस्तूपम्‌ अशोध्य, अन्य कर्म प्रयोजयेत्‌॥746॥\n“तृणकाछ्ठठ्च वल्लिउ्च, शोधयित्वा चैत्ये।\n\nवन्दित्वा अष्ट वाराणि, प्रतिकुटिको आगच्छाम्यहम्‌॥747॥\n“तेन कर्मणा सुकृतेन, चेतनाप्रणिधिभिश्व।\n\nहित्वा मानुषं देहम्‌, त्रायस्व्रिशम्‌ आगच्छमहम्‌॥748॥\n“तत्र मे सुकृतं विमानम्‌, सौवर्ण सप्रभास्वरम्‌।\n'घष्टियोजनस॒द्विद्धम्‌, त्रिंशयोजनविस्तृतम्‌॥749॥\n\nरूप्ण अवस्था में बुद्धश्रेष्ठ के स्तूप को बन में स्थित देखकर मेरा मन भारी हो गया॥745॥\nआच्छादित एवं अप्रतिरूप में, इसके गुण-अवगुण को जाने विना अन्य कर्म के प्रयोजन से भी बुद्धस्तूप\n\nका शोधन नहीं किया गया था॥746॥\n\nतृष्ण, काष्ठ और लता को चैत्य पर शोधित करके मैंने आठ दिन तक स्तूप की वन्दना\n\nकरके अपनी कुटि को आ गया॥747॥\n\nउस कर्म की सुकृति से और चेतना की प्रसन्नता से मैं मनुष्य शरीर को छोड़कर ज्रायत्रिंश लोक में आ\n\nगया॥748॥\n\nसोने की प्रभा से युक्त सुकृत विमान वहाँ मेरे लिए विद्यमान था जो 60 योजन ऊँचा तथा\n\n30 योजन विस्तृत था॥749॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000186_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000186_hindi_handwritten_word_ocr_6cafe71640d2.jpg", "ocr": "धरोहर"} +{"id": "indic_deva_eval_000187_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000187_indic_mozhi_deva_word_ocr_e1eedb498e8b.jpg", "ocr": "बनते"} +{"id": "indic_deva_eval_000188_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000188_indic_mozhi_deva_word_ocr_f1f1edc7a6e0.jpg", "ocr": "उनके"} +{"id": "indic_deva_eval_000189_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000189_indic_mozhi_deva_word_ocr_7c3191f13b71.jpg", "ocr": "जहाँ"} +{"id": "indic_deva_eval_000190_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000190_devanagari_page_ocr_50835aaeb01f.jpg", "ocr": "26 अपदानपालि\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अट्ठिमे।\nछव्ठभिज्जा सच्छिकता, कतं॑ बुद्धस्स सासनं॥560॥\nइत्थं सुदं आयस्मा उमापुण्फियों थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nउमापुप्फियत्थेरस्सापदान पठम॑।\n2. पुलिनपूजकत्थेरअपदानं\n“ककु्ध बिलसन्तंब, निसभाजानियं यथा।\nओसधिंव विरोचन्तं, ओभासन्तं नरासभं॥564॥\n“अज्जलिं पर्गहेत्वान, अवन्दिं सत्थुनो अहं।\nसत्थारं परिवण्णेसिं, सककम्मेन तोसयिं [तोसितो (सी०)]॥562॥\n“सुसुद्धं पुलिनं गय्ह, गतमग्गे समोकिरिं।\nउच्छड्गगेन गहेत्वान, विपस्सिस्स महेसिनो॥563॥\n“ततो उपड्डपुलिनं, विष्पसन्नेन चेतसा।\nदिवाविहारे ओसिडिंच, द्विपदिन्दस्स तादिनो॥564॥\n“अ्रतिसंविदश्वतस्र:, विमोक्षा अपि चाष्टका:।\n'षडशिज्ञाः साक्षात्कुता, कृतं बुद्धस्य शासनम्‌॥560॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ उमापुष्पीयस्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\n“ककुध॑ बिलसल्निव, नृपभाजानीय॑ यथा।\nऔषधी: इव विरोचन्तम्‌, अवभासयन्‌ नरर्षभम्‌॥564॥\n“अज्जलिं प्रगृह्य, अवन्दे शास्त्रेज्हम्‌।\nशास्तारं पर्यववर्णयम्‌, स्वककर्मणा अतुघम्‌॥562॥\n“सुशुद्ध पुलिनं गृह्य, गतमार्गे समवाकिरम।\nउत्सडगेन गृहीत्वा, विपश्यिनः महरें:॥563॥\n“ततः उपार्धपुलिनम्‌, विप्रसन्‍नेन चेतसा।\nदिवाविहारे अवासिउ्चम्‌, द्विपदिन्द्रस्य तायिन:॥564॥\nजार पटिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडमिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया॥560॥\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ उमापुष्पीय स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\nजैसे ऋषभ के पीठ पर निकला हुआ कुकुध चमकता है, उसी प्रकार चमकती हुई औषधि को नर्पभ\nजानते हैं॥564॥\nअजलिबद्ध हो कर मैंने शास्ता की वन्‍्दना की और अपने कर्म से सन्तुष्ट शास्ता की प्रशंसा की॥562॥\nशुद्ध बालू गोद में ग्रहण कर विपश्यी, महर्षि के जाने वाले मार्ग पर फैला दिया॥563॥\nउसके पश्चात्‌ बचे हुए बालू को मैंने अत्यधिक प्रसन्न मन से उन द्विपदेन्द्र के कुछ समय विश्वास करने\nबाले विहार पर छिड़क दिया॥564॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000191_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000191_devanagari_page_ocr_38395e3dd1b1.jpg", "ocr": "496 धम्मसज्भणि\n\n३७७. कतम॑ तस्मिं समये समाधिन्द्रियं होति? या तस्मिं समये चित्तस्स ठिति सण्ठिति अबद्ठिति\nअविसाहारो अविक्खेपो अविसाहटमानसता समथो समाधिन्द्रियं समाधिबलं मिच्छासमाधि - इदं\nतस्मिं समये समाधिन्द्रियं होति?\n\n३७८. कतम॑ तस्मिं समये मनिन्द्रियं होति? यं तस्मि समये चित्त मनो मानसं हदय॑ पण्डरं मनो\nमनायतनं मनिन्द्रियं विड्आाणं विड्ञाणक्खन्धो तज्जामनोविज्ञाणधातु- इदं तस्मि समये मनिन्द्रियं\nहोति।\n\n३७९. कतमं तस्मिं समये सोमनस्सिन्द्रियं होति? यं॑ तस्मिं समये चेतसिकं सातं चेतसिकं सुख\nचेतोसम्फस्सजं सातं सुख वेदयितं चेतोसम्फस्सजा साता सुखा वेदना - इदं तस्मि समये सोमनस्सिन्द्रियं\nहोति।\n\n३८०. कतमं तस्मिं समये जीवितिन्द्रियं होति? यो तेसं अरूपीनं धम्मानं आयु ठिति यपना यापना\nइरियना बत्तना पालना जीवितं जीवितिन्द्रियं- इदं तस���मिं समये जीवितिन्द्रियं होति।\n\n(्संस्कृतच्छाया) ३७७. कतमं तस्मिन्‌ समये समाधीन्‍्द्रियं भवति? या तस्मिन्‌ समये चित्तस्य स्मृति:\nसंस्थिति: अवस्थिति: अविसंहार: अविक्षेप: अविसंह्वतमानसता शमथ: समाधीन्द्रियं समाधिबलं\nमिथ्यासमाधि: - इदं तस्मिन्‌ समये समाधीन्द्रियं भवति।\n\n३७८. कतमं तस्मिन्‌ समये मनइन्द्रियं भवति? य॑ तस्मिन्‌ समये चित्त मनो मानसं हृदय पाण्डरं\nमसनो सनआयतन मसनइन्द्रियं विज्ञानं विज्ञानस्कन्धस्तज्तो मनोविज्ञानधातुः- इद॑ तस्मिन्‌ समये\nमनइन्द्रियं भवति।\n\n३७९. कतमं तस्मिन्‌ समये सौमनस्थेन्द्रियं भवति? यत्‌ तस्मिन्‌ समये चैतसिकं शातं चैतसिकं\nसुख चेतस्संस्पर्शज॑ शातं सुख वेदयितं चेतस्संस्पर्शजा शाता सुखा वेदना- इदं तस्मिन्‌ समये\nसौमनस्येन्द्रियं भवति।\n\n३८०. कतम॑ तस्मिन्‌ समये जीवितेन्द्रियं भवति? य: तेघाम्‌ अरूपीणां धर्माणाम्‌ आयु: स्थिति:\nयपना यापना ईरणं बर्तन पालन जीवितं जीवितेन्द्रियम्‌- इदं तस्मिन्‌ समये जीवितीन्द्रियं भवति।\n(हिन्दी) ३७७. उस समय कौन सी समाधि-इन्द्रिय होती है? जो उस समय चित्त की स्थिति, संस्थिति (सम्यक्‌ रूप\nसे स्थिति), अवस्थिति (सुदृढ़ स्थिति), अचंचलता, अविक्षेप, अविक्षिप्त चित्त से युक्त रहना, चित्त की शान्त\nअवस्था, समाधि-इन्द्रिय, समाधि-बल और सम्यक्समाधि है- यही उस समय समाधि-इन्द्रिय होती है।\n\n३७८. उस समय कौन सी मन-इन्द्रिय होती है? जो उस समय चित्त, मन, मानस, हृदय, श्वेत(स्पष्ट), मन,\nमनआयतन, मन-इन्द्रिय, विज्ञान, विज्ञान-स्कन्ध, उससे उत्पन्न मनोविज्ञान धातु है- यही उस समय मन-इन्द्रिय\nहोती है।\n\n३७९. उस समय कौन सी सौमनस्य-इन्द्रिय होती है? जो उस समय चैतसिक आनन्द, चैतसिक सुख, चित्त\nके संस्पर्श से उत्पन्न आनन्द एवं सुख की अनुभूति, चैतसिक संस्पर्श से उत्पन्न आनन्दमयि एवं सुखमयि बेदना है-\nयही उस समय सौमनस्य-इन्द्रिय होती है।\n\n३८०. उस समय कौन सी जीवित-इन्द्रिय होती है? जो उन अरूपी धर्मों की आयु, स्थिति, व्यतीत होना,\nगुजरना, क्रिया शीलता,विद्यमान रहना, पालन करना, जीवन और जीवित-इन्द्रिय है- यही उस समय जीवित-\nइन्द्रिय होती है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000192_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000192_indic_vision_bench_deva_ocr_cde02c6ccb32.jpg", "ocr": "७४\nहिन्द स्वराज्य\nजब पुख्ता (पक्की) उम्रके हो जायं तब भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पायें, और वह भी उसे मिटानेके इरादेसे, न कि उसके ज़रिये पैसे कमानेके इरादेसे। ऐसा करते हुए भी हमें यह सोचना होगा कि अंग्रेजीमें क्या सीखना चाहिये और क्या नहीं सीखना चाहिये। कौनसे शास्त्र पढ़ने चाहिये, यह भी हमें सोचना होगा। थोड़ा विचार करनेसे ही हमारी समझमें आ जायगा कि अगर अंग्रेजी डिग्री लेना हम बन्द कर दें, तो अंग्रेज हाकिम चौकेंगे।\nपाठक :\nतब कैसी शिक्षा दी जाय?\nसंपादक :\nउसका जवाब ऊपर कुछ हद तक आ गया है। फिर भी इस सवाल पर हम और विचार करें। मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओंको उज्ज्वल-शानदार बनाना चाहिये। हमें अपनी भाषामें ही शिक्षा लेनी चाहिये-इसके क्या मानी है, इसे ज्यादा समझानेका यह स्थान नहीं है। जो अंग्रेजी पुस्तकें कामकी हैं, उनका हमें अपनी भाषामें अनुवाद करना होगा। बहुतसे शास्र सीखनेका दंभ और वहम हमें छोड़ना होगा। सबसे पहले तो धर्मकी शिक्षा या नीतिकी शिक्षा दी जानी चाहिये। हरएक पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानीको अपनी भाषाका, हिन्दूको संस्कृतका, मुसलमानको अरबीका, पारसीको फ़ारसीका और सबको हिन्दीका ज्ञान होना चाहिये। कुछ हिन्दुओंको अरबी और कुछ मुसलमानों और पारसियोंको संस्कृत सीखनी चाहिये । उत्तरी और पश्चिमी हिन्दुस्तानके लोगोंको तामिल सीखनी चाहिये। सारे हिन्दुस्तानके लिए जो भाषा चाहिये, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिये। उसे उर्दू या नागरी लिपिमें लिखनेकी छूट रहनी चाहिये। हिन्दू-मुसलमानोंके संबंध ठीक रहें, इसलिए बहुतसे हिन्दुस्तानियोंका इन दोनों लिपियोंको जान लेना ज़रूरी है। ऐसा होनेसे हम आपसके व्यवहारमें अंग्रेजीको निकाल सकेंगे।\nऔर यह सब किसके लिए ज़रूरी है? हम जो गुलाम बन गये हैं उनके लिए। हमारी गुलामीकी वजहसे देशकी प्रजा गुलाम बनी है। अगर हम गुलामीसे छूट जायं, तो प्रजा तो छूट ही जायगी।\nपाठक :\nआपने जो धर्मकी शिक्षाकी बात कही वह बड़ी कठिन है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000193_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000193_devanagari_page_ocr_c2450eab00b7.jpg", "ocr": "मिलिन्दपज्हो\n\n(ग) कि लक्खणं विरियं!\n\nराजा आह- “भन्ते नागसेन, कि लक्खणं बीरियं”ति? “उपत्थम्भनलक्खणं, महाराज,\nबीरियं, वीरियूपत्थम्भिता सब्बे कुसला धम्मा न परिहायन्ती”ति।\n\n4. “ओपम्मं करोही”ति।\n\n“यथा, महाराज, पुरिसो गेहे पतन्ते अड्जेन दारुना उपत्थम्भेय्य, उपत्थम्भितं सन्‍्तं एवं\nत॑ गेहं न पतेय्य एबमेव खो, महाराज, उपत्थम्भनलक्खणं विरियं। विरियूपत्थम्भिता सब्बे\n���ुसला धम्मा न परिहायन्ती”ति।\n\n2. “भिय्यो ओपम्मं करोही”ति।\n“यथा, महाराज, परित्तकं सेनं महती सेना भड्जेय्य।\nसंस्कृतच्छाया- (ग) कि लक्षण वीर्यम्‌\n\nराजा5ःह- \"भदन्‍्त नागसेन, कि लक्षणं वीर्यि\"ति? \"उपस्तम्भनलक्षणं, महाराज, वीर्यम।\nवीयॉपिस्तम्भिता: सर्वे कुशला धर्मा न परिहीयन्त\" इति।\n\n4. \"औपम्यं कुर्वि\"ति।\n\n\"यथा, महाराज, पुरुषों गेहे पतति अन्येन दारुणोपस्तम्भ्यात्‌, उपस्तम्भितं सदेव तद्‌ गेहं॑ न पतेत;\n\nएवमेव खलु, महाराज, उपस्तम्भनलक्षणं वीर्यम्‌। वीर्योपस्तम्भिता: सर्वे कुशलाः धर्माः न परिहीयन्त\"\nइति।\n\n2. \"भूय औपम्यं कुर्वि\"ति ।\n\n\"यथा, महाराज, प्ररिक्तकां सेनां महती सेना भज्यात।\nहिन्दी- (ग) वीर्य का लक्षण क्‍या है?\n\n“राजा बोला- “भन्‍्ते! वीर्य की क्‍या लक्षण है?'\nधर्म वीर्य से दृढ़ कर दिए गए हैं, वे कभी नहीं डिगते।”\n\n4. “कृपया उपमा देकर समझावें।”\n\n“महाराज! जैसे कोई मनुष्य अपने घर को गिरता देख एक खम्भे का सहारा दे उसे दृढ़ कर देता है और\nतब घर नहीं गिरने पाता। उसी तरह महाराज! दृढ़ कर देना वीर्य की लक्षण है। जो कुशल-धर्म वीर्य से दृढ़ कर\nदिए गए हैं, वे कभी नहीं डिगते।\"\n\n2. “कृपया फिर भी उपमा देकर समझावें।”\n\n“महाराज! किसी छोटी सेना को एक बड़ी सेना हरा दे।\n\n'महाराज! दृढ़ कर देना वीर्य की लक्षण है। जो कुशल-\n\n+ ११. बीरियलक्खणपऊ्हो, मिलिन्दपण्हपालि, पू.- 46\n\nपा"} +{"id": "indic_deva_eval_000194_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000194_hindi_handwritten_word_ocr_7439b53dd658.jpg", "ocr": "करे।"} +{"id": "indic_deva_eval_000195_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000195_devanagari_page_ocr_a6ed5b1d52bd.jpg", "ocr": "340 संयुत्तनिकायपालि\n\n१८. पटिपन्नसुत्तं\n\n१८.“पडिचिमानि, भिक्खवे, इन्द्रियानि। कतमानि पडठ्च? सकद्िन्द्रियं...पे*\nपड्जिन्द्रियं - इसानि खो, भिक्खवे, पडिचन्द्रियानि। इमेसं खो, भिक्खवे, पउचन्नं इन्द्रियानं\nसमत्ता परिपूरत्ता अरहं होति, ततो मुदुतरेहि अरहत्तफलसच्छिकिरियाय पटिपन्नो होति,\n'ततो मुदुतरेह्ठि अनागामी होति, ततो मुदुतरेह्ि अनागामिफलसच्छिकिरियाय पटिपननो होति,\nततो मुदुतरेहि सकदागामी होति, ततो मुदुतरेहि सकदागामिफलसच्छिकिरियाय पटिपन्नो\nहोति, ततो मुदुतरेहि सोतापननो होति, ततो मुदुतरेहि सोतापत्तिफलसच्छिकिरियाय\nपटिपननो होति। यस्स खो, भिक्खबे, इमानि पडिचिन्द्रियानि सब्बेन सब्बं सब्बथा सब्बं नत्थि,\nतमहं “बाहिरो पुथुज्जनपक्खे ठितो'ति वदामी''ति।\n\n१९. सम्पन्नसुत्तं\n\n१९. अथ खो अज्ञतरो भिक्खु येन भगवा तेनुपसड्कमि; उपसड्कमित्वा भगवन्तं\nअभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो सो भिक्खु भगवन्‍्तं एतदवोच --\n(संस्कृतच्छाया) १८. “पड्चेमानि, शिक्षव:! इन्द्रियाणि । कतमानि पठ्च? अब्रद्धेन्द्रियम्‌...पे*...\nअज्लेन्द्रियमू- इसानि खलु, भिक्षब:! पड्चेन्द्रियाणि। एपां खलु, झिक्षब:! पश्चानाम्‌ इन्द्रियाणां शमत्वात्‌\nपरिपूर्णत्वात्‌ अर्हत्‌ भवति, तत: मृदुतरै: अर्हत्‌फलसाक्षात्काराय प्रतिपनन्‍नों भवति, ततः मृदुतरैः\nअनागामी भवति, तत: मृदुतरै: अनागामिफलसाक्षात्काराय प्रतिपन्‍नो भवतति, ततः मृदुतरैः\nसकूदागामी भवत्ति, तत: मृदुतरै: सकृदागामिफलसाक्षात्काराय प्रतिपन्‍नों भवति, ततः मृदुतरैः\nख्रोतापन्‍नो भवति, तत: मृदुतरैः ख्रोतापत्तिफलसाक्षात्काराय प्रतिपन्‍नो भवति । यस्य खलु, झिक्षव:!\nइसानि पड्चेन्द्रियाणि सर्वेण सर्व सर्वथा सर्व नास्ति, तमहं 'बाह्य: पृथुज्जनपक्षे स्थित:”'इति\nबदामि”इति।\n\n१९. अथ खलु अन्यतरो भिक्षुर्यत्र भगवान्‌ तत्रोपसमक्रमीत्‌; उपसडक्रस्य भगवन्तम्‌ अभिवाद्य\nन्यसीदत्‌ । एकाल्ते स्थित: खलु कश्यप: देवप॒त्र: भगवन्तम्‌ एतदवोचत्‌--\nतहन्दी) १८: जिक्षुओं इन्द्रियाँ पाँच हैं। भिक्षुओं! इन्द्रियों के बिल्कुल पूर्ण हो जाने से अर्हत्‌ होता है। उससे\nयदि कम हुआ तो अर्हुत्‌ फल के साक्षात्कार लिये प्रयत्वान्‌ होता है। ...पूर्ववत्‌...अनागामी होता है।\n...पूर्ववत्‌...अनागामी-फल के साक्षात्कार करने के लिये प्रयत्नवान्‌ होता है।\n\n'पूर्ववत्‌...सकृदागामी-फल के साक्षात्कार करने के लिये प्रयत्रवान्‌ होता है। ...पूर्ववत्‌... ख्नोतापन्न होता है।\n...पूर्ववत्‌...ख्नोतापक्ति-फल के साक्षात्कार करने लिये प्रयत्रवान्‌ होता है। भिक्षुओं! जिसका यह पाँच इन्द्रियाँ\nबिल्कुल किसी प्रकार से कुछ भी नहीं है, उसे मैं बाहर का, पृथक्‌-जन कहता हूँ।\n\n१९. तब, कोई भिक्षु ...पूर्ववत्‌...भगवान्‌ से बोला-“'भन्‍्ते ! लोग “इन्द्रिय-सम्पन्न, इन्द्रिय-सम्पन्न” कहा करते\nहैं। भन्‍्ते! कोई कैसे इन्द्रिय-सम्पन्न होता है ?”"} +{"id": "indic_deva_eval_000196_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000196_indic_mozhi_deva_word_ocr_2544b21ca00b.jpg", "ocr": "एकमेव"} +{"id": "indic_deva_eval_000197_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000197_indic_mozhi_deva_word_ocr_b9e2f8a4e0ef.jpg", "ocr": "बीमारी"} +{"id": "indic_deva_eval_000198_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000198_hindi_handwritten_word_ocr_5345437483d9.jpg", "ocr": "सुनते"} +{"id": "indic_deva_eval_000199_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000199_devanagari_page_ocr_addca3b2fd9a.jpg", "ocr": "2.बोज्झडुगसंयुत्तं 439\n\n“पडिचिमे, भिक्‍्खवे, आवरणा नीवरणा चेतसो अज्ञारुहा पञ्ञाय दुब्बलीकरणा। कतमे\nपडत्च? कामच्छन्दो, भिक्‍्खवे, आवरणो नीवरणो चेतसो अज्ञारुहों पड्ञाय दुब्बलीकरणो।\nब्यापादों, भिक्‍्खवे, आवरणो नीवरणो चेतसो अज्ञारुहो पड्ञाय दुब्बलीकरणो। थिनमिद्धं,\nभिक्‍खवे, आवरणं नीवरणं चेतसो अज्ञारुहं पञ्ञाय दुब्बलीकरणं। उद्धच्चकुक्कुच्चं, भिक्खवे,\nआवरणं नीवरणं चेतसो अज्ञारुहं पड्ञाय दुब्बलीकरणं। विचिकिच्छा, भिक्खवे, आवरणा\nनीवरणा चेतसो अज्ञारुहा पञ्ञाय दुब्बलीकरणा। इमे खो, भिक्खवे , पठच आवरणा नीवरणा\nचेतसो अज्ञारुहा पड्ञाय दुब्बलीकरणा।\n\n“सत्तिमे, भिक्‍्खवे, बोज्झमड्गा अनावरणा अनीवरणा चेतसो अनज्ञारुहा भाविता\nबहुलीकता विज्जाविमुत्तिफलसच्छिकिरियाय संवत्तन्ति। कतमें सत्त? सतिसम्बोज्झड्ग्गो,\nभिकक्‍्खवे, _ अनावरणो._ अनीवरणो _ चेततो_अनज्ञारहो भावितो बहलीकतो\nविज्जाविमुत्तिफलसच्छिकिरियाय संवत्तति ...पे*... उपेक्खासम्बोज्झड्गगो, भिक्खवे, अनावरणो\nअनीवरणो चेतसो अनज्ञारुहो भावितो बहलीकतो विज्जाविमुत्तिफलसच्छिकिरियाय\nसंवत्तति। इमे खो, भिक्‍्खवे, सत्त बोज्मड्गा अनावरणा अनीवरणा चेतसो अनज्ञारुहा भाविता\nबहुलीकता विज्जाविमुत्तिफलसच्छिकिरियाय संवत्तन्ती”ति।\nह्लस्कृतच्छाया) पच्चेमानि, भिक्षवः! आवरणानि नीवरणानि चेतसः: अध्यारूढानि प्रज्या:\nदुर्बलीकरणानि। कतमे पडच? कामच्छन्द:, भिक्षव:! आवरण: नीवरण: चेतस: अध्यारूढ: प्रज्ञया:\nदुर्बलीकरण:। ब्यापाद:, भिक्षबव:ः आवरण: नीबरण: चेतस: अध्यारूढ: प्रज्या: दुर्बलीकरण:।\nस्त्थानमृद्ध॑ झिक्षवः। आवरणं नीवरणं चेतस: अध्यारूढं प्रज्ञया: दुर्बलीकरणम्‌। औद्धत्यकौकृत्यम्‌,\nभिक्षब:! आवरणं निवरणं चेतस: अध्यारूढं प्रज्ञया: दुर्बलीकरणम्‌। विचिकित्सा, भिक्षबव:! आवरणा\nनीबरणा चेतस: अध्यारूढा प्रज्ञया दुर्बलीकरणा। इमानि खलु, भिक्षब:! पठ्च आवरणानि नीबरणा\nचेतस: अध्यारूढा प्रज्ञया दुर्बलीकरणानि।\nभिक्षव:! बोध्यडुगानि अनावरणानि अनीवरणानि चेतस: अध्यारूढानि\nभावितानि बहलीकृतानि विद्याविमक्तिफलसाक्षात्काराय संवर्तन्‍्ते। कतमानि स्तर स्मृतिसंबोध्यकुगम,\nभिक्षवः! अनावरणम्‌ अनीवरणं चेतसः अध्यारूढं भावित॑ बहलीकृतं विद्याविम��क्तिफलसाक्षात्काराय\nसंबर्तते ...पे0... उपेक्षासंबोध्यडगम्‌, भिक्षब:! अनाबरणम्‌ अनीबरणं चेतस: अध्यारूढं भावित॑\nबहलीकृत॑ विद्याविमुक्तिफलसाक्षात्काराय संबर्तते। इमानि_खलु, जिक्षव:! सप्त बोध्यड्गानि\nअनाबरणानि अनीवरणानि चेतस: अध्यारूढानि भावितानि बहलीकृतानि\nविद्याविमुक्तिफलसाक्षात्काराय संबर्तन्ते” इति।\nतहेन्दी) भिक्षुओं/ यह चित्त से फूटने वाले पाँच उपक्लेश भी प्रज्ञा को दुर्बल करने वाले पाँच ज्ञान के आवरण हैं।\n\nज्ञान के आवरण भी नई होते। उनके"} +{"id": "indic_deva_eval_000200_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000200_hindi_handwritten_word_ocr_8fac2988eb32.jpg", "ocr": "डिग्रियों"} +{"id": "indic_deva_eval_000201_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000201_indic_vision_bench_deva_ocr_758fcc3cb278.jpg", "ocr": "बारीकसारीक फेरफार करायला जावं तर सबंध इमल्यालाच तडा जायचा.\nराम बाथरूममधून \" छान पार्टी झाली. सगळ्यांना खूप मजा आली \" असं म्हणत बाहेर आला. दर पार्टीनंतर तो जवळजवळ ह्याच शब्दात असंच म्हणायचा. तिच्या मनात आलं, हे ऐकण्याची माझी ही शेवटचीच वेळ. रामने दिलेली पार्टी अर्थात सर्व दृष्टींनी उत्तम असायची. पार्टी देण्यात त्याचा हातखंडा होता. कुठल्या पाहुण्यांना एकत्र बोलवायचं, पदार्थ कोणते मागवायचे, मरगळ आलेल्या पार्टीत चैतन्य आणण्यासाठी कोणते वाद सुरू करायचे, कोणत्या क्षणी हळूच एक थोडासा आचरट विनोद टाकून त्यांची साखळी सुरू करायची ह्या सगळ्यात तो पारंगत होता.\nज्योती नुसतीच म्हणाली, \" हं!\"\nतो बिछान्यात शिरून त्याच्या बाजूचा दिवा मालवीपर्यंत थांबून मग ती म्हणाली, \"राम, मला काही सांगायचंय तुला.\"\n\"बाप रे, तू म्हणजे एकदमच सीरियस झालीस. काय आहे एवढं?\"\nतिला जे सांगायचं होतं ते एकदम तिला नाटकात-बिटकात फेकतात तसलं वाक्य वाटलं. पण मग जास्त विचार न करता तिनं घाईघाईन म्हणून टाकलं, \"मी तुला सोडून जाणार आहे.\"\n\" म्हणजे म्हणायचंय काय तुला, ज्यो?\" त्याच्या आवाजात अजिबात धास्ती नव्हती.\nत्यांच्या मित्रमंडळींत एक पद्धत होती. आपल्या नावाचा अशा तऱ्हेनं संक्षेप करायचा की, जणू इंग्रजी नावं वाटावी. रणधीरचा रॉन व्हायचा. विनयाची विनी, विक्रमचा विक. प्रथम जेव्हा राम तिला ज्यो म्हणायला लागला. तेव्हा ते तिला आवडल, खास त्यांच्यातच वापरायचं नाव म्हणून.\n\" जे म्हणायचंय तेच म्हटलंय मी\"\n\" एकदम हे काय काढलंयस मला कळत नाहीये.\" आपल्यावर मोठा अन्याय होतोय, असा स्वर काढून तो म्हणाला.\nह्याब��्दल खूप दिवस विचार करून शेवटी आज पार्टी चालू\n४:साथ"} +{"id": "indic_deva_eval_000202_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000202_indic_mozhi_deva_word_ocr_77d2acff650d.jpg", "ocr": "चाहे"} +{"id": "indic_deva_eval_000203_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000203_hindi_handwritten_word_ocr_559ddfba906a.jpg", "ocr": "१००वीं"} +{"id": "indic_deva_eval_000204_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000204_indic_vision_bench_deva_ocr_02b8984e3ff6.jpg", "ocr": "अलीकडे मी अनेकदा विमानातून प्रवास करतो. एअर पोर्टवर 'चेक इन' झाल्यावर बोर्डिंग पास घेताना मी स्वागतिकेला आवर्जून ‘रिअर साईड विंडो'(मागील बाजूची खिडकी) या जागेचा मोठा फायदा असतो.तिथं डोक्यावरच्या शेल्फवर विमानातली सर्व वर्तमानपत्रं, मासिके ठेवलेली असतात. एअर होस्टेसला एकदा सांगून मनमुराद सारी वर्तमानपत्रं,मासिक वाचता येतात. विमानातल्या शिष्ट,अबोल, गंभीर प्रवाशांकडे ढुंकून न बघता खालची गावं, दिवे न्याहाळत प्रवास कसा मस्त होऊन जातो.सोबत वारंवार येणारी कॉफी, ज्यूस, स्नॅक्स नि लंचमुळे तर पैसे फिटून जातात- (नि एअर होस्टेसमुळे डोळ्याचे पारणेही!)\nरोजचा माझा दिवस वर्तमानपत्रांनी उगवतो नि मावळतोही! वेळेप्रमाणे मात्र, वर्तमानपत्रंही वेगवेगळी मिळण्याची अट असते. मुंबईत असेल तर ‘मिड डे' लागतो. पुण्यात असेल तर ‘संध्यानंद' हवा. विदेशातील प्रवासाने मला हॉटेल्स निवडण्यात पारंगतच करून टाकलंय. काही हॉटेल्स चक्क ‘गुड मॉर्निंग' असा शिक्का मारून ‘बेड टी' बरोबर ‘बेड पेपर' ही देतात. अशा हॉटेल्सशी माझी मैत्री आता जुनी झालीय. वर्तमानपत्रं नुसती वर्तमान सांगत नसतात. ती रोज भविष्य घडवितात. माणसं घडवितात असं मला वाटतं. ती तुम्हास वैचारिक लेख देऊन गंभीर करतात. तशी 'जाहीर नोटीस' म्हणून दिलेल्या मजकुरातून माणसांचे कंगोरेही समजतात. वर्तमानपत्र तुमची अनेक प्रकारची, जाण, समज, विकसित करतं. फक्त ती समज, जाणीव तुमच्यात सुप्त असावी लागते. जाणीवांची आरास घेऊन येणारी वर्तमानपत्रं माणसात संवेदनांची कारंजी,भावभावनांचे वसंत घेऊन येतात,तेव्हा मला आकाश ठेंगणे होते.\n***\nजाणिवांची आरास/२८"} +{"id": "indic_deva_eval_000205_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000205_hindi_handwritten_word_ocr_786c51927c8f.jpg", "ocr": "श्रोण"} +{"id": "indic_deva_eval_000206_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000206_devanagari_page_ocr_1990603d8dec.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\nवह\n\nतुसिता सो चबित्वान, सुक्रमूलेन चोदितो।\n\nगोतमस्स भगबतो, अजह्नजो सो भविस्सति॥743॥\n\nसचे वसेय्य [सचा'वसेय्य (?)] अगारं, चक्रवत्ती भवेय्य सो।\n\nअद्वानमेत॑ य॑ं तादी, अगारे रतिमज्ञगा॥ 744॥\n\nनि���्‍्खमित्वा अगारम्हा, पब्बजिस्सति सुब्बतो।\n\nराहुलो नाम नामेन, अरहा सो भविस्सति'॥745॥\n\n“किकीब अण्डं रक्खेय्य, चामरी बिय बालधिं।\n\nनिपको सीलसम्पन्नो, मं रक्खि महामुनि [एवं रक्खि महासुनि (सी* क०), ॥746॥\n\n“तस्साहं धम्ममज्ञाय, बिहासिं सासने रतो।\n\nसब्बासवे परिज्ञाय, विहरामसि अनासबो॥747॥\nतुषितात्‌ सः च्युत्वा/च्यवित्वा नु, शुक्‍्लमूलेन चोदित:।\nगौतमस्य भगवत:, आत्मज: सः भविष्यति॥743॥\nस चेद्‌ वसेद्‌ आगारम्‌, चक्रवर्त्ती भवेत्‌\nअस्थानमेतद्‌ यत्‌ तादुकू, आगारेडरतिमध्यगाः॥744॥\nनिष्क्रम्य आगारात्‌, प्रत्नजिष्यति सुब्रत:।\nराहलो नाम नाम्रः, अर्हन्‌ सः भविष्यतति'॥745॥\nकेकीब अण्ड रक्षेत्‌, चसरी इब बालथिम।\nनिषक्र: शीलसम्पन्न:, माम्‌ अरक्षत्‌ महामुनि:॥746॥\nतस्याहं धर्ममाज्ञाय, व्यहर्ष शासने रत:।\n\nसर्वासवान्‌ परिज्ञाय, विहरामि अनाखब:॥उ47॥\n\nकुशलमूल से प्रेरित बह तुषित लोक से च्युत होकर गौतम भगबान्‌ के पुत्ररूप में इस पृथ्वी पर\nउत्पन्न होगा ॥743॥\n\nयदि बह घर में रहेगा तो चक्रवर्ती होगा। फिर भी वह उस प्रकार से भोग-विलासो में रुचि\nनहीं रखेगा ॥744॥\n\nबह सुब्रती घर से निकल कर प्र्नजित होगा और राहल नाम से अर्हत्‌ होगा ॥745॥\n\nजिस प्रकार किकी (मोर) अण्डे की और चमरी गाय अपने पूँछ की रक्षा करती है, उसी प्रकार\nशीलसम्पन्न तथा निषुण उन महामृनि ने मेरी रक्षा की ॥74/\n\nउनके धर्म को भली प्रकार से जानकर और हर्षित हो शासन में रत (संलग्न) सभी आखवों का\nप्रहाण कर मैं आखबरहित होकर विहार करता हूँ ॥747॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000207_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000207_hindi_handwritten_word_ocr_8cf0a7cca077.jpg", "ocr": "नामी"} +{"id": "indic_deva_eval_000208_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000208_indic_mozhi_deva_word_ocr_60cbc0b09fef.jpg", "ocr": "कहा-अगर"} +{"id": "indic_deva_eval_000209_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000209_hindi_handwritten_word_ocr_58d3f4010003.jpg", "ocr": "फ़रवरी"} +{"id": "indic_deva_eval_000210_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000210_hindi_handwritten_word_ocr_af8489a582d9.jpg", "ocr": "यथार्थतः"} +{"id": "indic_deva_eval_000211_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000211_indic_vision_bench_deva_ocr_2d5b835d2b6b.jpg", "ocr": "196 : प्रेमचंद रचनावली-6\nआजकल पैसे-पैसे की तंगी है। ऊख के रुपये बाहर ही बाहर उड़ गए। अब तो मजूरी करनी पड़ती है। आज बेचारे खेत में बेहोस हो गए। रोना-पीटना मच गया। तब से पड़े हैं।'\nमुंह-हाथ धोकर और खूब बाल बनाकर गोबर गांव की दिग्विजय करने निकला। दोनों चाचाओं के घर जाकर राम-राम कर आया। फिर और मित्रों से मिला। गांव में कोई विशेष परिवर्तन न था। हां, पटेश्वरी की नई बैठक बन गई थी और झिंगुरीसिंह ने दरवाजे पर नया कुआं खुदवा लिया था। गोबर के मन में विद्रोह और भी ताल ठोंकने लगा। जिससे मिला, उसने उसका आदर किया, और युवकों ने तो उसे अपना हीरो बना लिया और उसके साथ लखनऊ जाने को तैयार हो गए। साल ही भर में वह क्या से क्या हो गया था।\nसहसा झिंगुरीसिंह अपने कुएंपर नहाते हुए मिल गए, गोबर निकला, मगर सलाम न किया, न बोला। वह ठाकुर को दिखा देना चाहता था, मैं तुम्हें कुछ नहीं समझता।\nझिंगुरीसिंह ने खुद ही पूछा-कब आए गोबर, मजे में तो रहे? कहीं नौकर थे लखनऊ में?\nगोबर ने हेकड़ी के साथ कहा-लखनऊ गुलामी करने नहीं गया था। नौकरी है तो गुलामी। मैं व्यापार करता था।\nठाकुर ने कुतूहल भरी आंखों से उसे सिर से पांव तक देखा-कितना रोज पैदा करते थे?\nगोबर ने छुरी को भाला बनाकर उनके ऊपर चलाया-यही कोई ढाई-तीन रुपये मिल जाते थे। कभी चटक गई तो चार भी मिल गए। इससे बेसी नहीं।\nझिंगुरी बहुत नोच-खसोट करके भी पचीस-तीस से ज्यादा न कमा पाते थे। और यह गंवार लौंडा सौ रुपये कमाने लगा। उनका मस्तक नीचा हो गया। अब किस दावे से उस पर रोब जमा सकते थे? वर्ण में वह जरूर ऊंचे हैं, लेकिन वर्ण कौन देखता है। उससे स्पर्द्धा करने का यह अवसर नहीं, अब तो उसकी चिरौरी करके उससे कुछ काम निकाला जा सकता है। बोले-इतनी कमाई कम नहीं है बेटा, जो खरच करते बने। गांव में तो तीन आने भी नहीं मिलते। भवनिया (उनके जेठे पुत्र का नाम था) को भी कहीं कोई काम दिला दो, तो भेज दें। न पढ़े न लिखे, एक न एक उपद्रव करता रहता है। कहीं मुनीमी खाली हो तो कहना, नहीं साथ ही लेते जाना। तुम्हारा तो मित्र है। तलब थोड़ी हो, कुछ गम नहीं। हां, चार पैसे की ऊपर की गुंजाइस हो।\nगोबर ने अभिमान भरी हंसी से कहा-यह ऊपरी आमदनी की चाट आदमी को खराब कर देती है ठाकुर, लेकिन हम लोगों की आदत कुछ ऐसी बिगड़ गई है कि जब तक बेईमानी न करें, पेट ही नहीं भरता। लखनऊ में मुनीमी मिल सकती है, लेकिन हर एक महाजन ईमानदार चौकस आदमी चाहता है। में भवानी को किसी के गले बांध तो दूं, लेकिन पीछे इन्होंने कहीं हाथ लपकाया, तो वह तो मेरी गर्दन पकड़ेगा। संसार में इलम की कदर नहीं, ईमान की कदर है।\nयह तमाचा लगाकर गोबर आगे निकल गया। झिंगुरी मन में ऐंठकर रह गए। लौंडा कितने घमंड की बातें करता है, मानो धर्म का अवतार ही तो है।\nइसी तरह गोबर ने दातादीन को भी रगड़ा। भोजन करने जा रहे थे। गोबर को द���खकर प्रसन्न होकर बोले-मजे में तो रहे गोबर? सुना, वहां कोई अच्छी जगह पा गए हो। मातादीन को भी किसी हीले से लगा दो न? भंग पीकर पड़े रहने के सिवा यहां और कौन काम है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000212_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000212_indic_mozhi_deva_word_ocr_a312c035f242.jpg", "ocr": "आणि"} +{"id": "indic_deva_eval_000213_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000213_indic_mozhi_deva_word_ocr_be3eaaff7dcd.jpg", "ocr": "हवाली"} +{"id": "indic_deva_eval_000214_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000214_indic_mozhi_deva_word_ocr_7255d8a3ed19.jpg", "ocr": "घरी"} +{"id": "indic_deva_eval_000215_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000215_indic_mozhi_deva_word_ocr_426337d089b6.jpg", "ocr": "बोस"} +{"id": "indic_deva_eval_000216_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000216_indic_vision_bench_deva_ocr_30b785237963.jpg", "ocr": "दो बहनें\nपदार्थ के प्रति शर्मिला के रूद्ध स्नेह का उद्यम पिल पड़ा। सुभीता यह था कि ईंट-काठ के शरीर में धैर्य अटल बना रहता है। साजने-संवारने के महा उद्यम में दो दो नौकर हाँफ उठे। एक तो भाग ही खड़ा हुआ। कमरों की सजावट शशांक को मन में रखकर होने लगी। बैठकखाने में वह आजकल अक्सर बैठता ही नहीं, फिर भी उसीकी थकी पीठ की रीढ़ के लिये नये फ़ैशन के कुशन सजाए गए; फूलदानी एक-आध नहीं अनेकों; तिपाई पर, टेबुल पर, फूल-कढ़े झालरदार आवरण। सोने के कमरे में आजकल दिन को शशांक का आना एकदम बंद है, क्योंकि उसके आधुनिक पत्रे में रविवार भी सोमवार का जुड़वाँ भाई है। दूसरी छुट्टियों में भी जब काम बंद रहता है तो भी वह कोई न कोई छिटफुट कार्य खोज ही निकालता है, आफ़िसवाले कमरे में प्लैन बनानेवाला तेलहा काग़ज़ या बही-खाता लेकर बैठ जाता है। फिर भी पुराना नियम चल रहा है। मोटी गद्दीवाले सोफ़ा के सामने रेशमी चप्पलों के जोड़े तैयार रहते हैं। वहाँ पहले के समान ही पनबट्टे में पान सजा रहता है। आले पर पर पतले सिल्क का कुर्ता टँगा रहता है, चुनी हुई धोती लटकती रहती है। आफ़िस के कमरे में\n२०"} +{"id": "indic_deva_eval_000217_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000217_devanagari_page_ocr_804f060bdf81.jpg", "ocr": "8\n\nअपदानपालि\n\n“इतो तेरसकप्पम्हि, धनिद्ठो नाम खत्तियो।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कवत्ती महब्बलो॥78॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो ...पे०... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥79॥\nइत्थं सुदं आयस्मा सन्धितो [सण्ठितो (सी०)] थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nसन्धितत्थेरस्सापदानं छड़।\n7. तालवण्टदायकत्थेरअपदानं\n“तालवर्ण्टं मया दिन्‍्न॑, तिस्सस्सादिच्चबन्धुनो।\nगिम्हनिब्बापनत्थाय, परिव्ठाहोपसन्तिया॥80॥\n“सन्निब्बापेमि रागग्गि, दोसग्गिड्च तदुत्तरिं।\nनिब्बापेमि च मोहग्गि, तालवण्टस्सिदं फलं��84॥\n“किलेसा झापिता मस्हं, भवा सब्बे समूहता।\nधारेमि अन्तिम देहं, सम्मासम्बुद्धसासने॥82॥\n“इतस्त्रयोदशकल्पे, धनिद्ठो नाम:\nसस्तरकसम्पन्नः, चक्रवर्त्ती महाबलः\n“प्रतिसंविदश्वतस्र: ...पे*... कृत बुद्धस्य शासनम्‌\"॥79॥\nइत्थ स्विद आयुप्मान सन्धितस्थविर इसा गाथा अभापिछेति।\n“तालवून्तं मया दत्तम्‌, तिष्यायादित्यबन्धवे।\nग्रीष्मनिर्वापणार्थाय, परिदाहोपशान्तये॥80॥\n“सल्लिवापियामि रागाझ्निम्‌, द्वेषाग्रिड्च तदुत्तरम्‌।\nनिर्वापयामि च मोहाग्रिम्‌, तालबृन्तस्येदं फलम्‌॥84॥\n“क्लेशा: ध्मापिताः मम, भवाः सर्वे समुद्धृता।\nधारयास्यन्तिमं देहम्‌, सम्यक्सम्बुद्धशासने॥82॥\nयहाँ से 33 बे कल्प में धनिद्ठ नाम से ससरत्सम्पन्न, महाबलशाली, चक्रवर्ती क्षत्रिय हुआ ॥78॥\nचार पटिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥79॥\nइस अकार आयुप्मान सब्धित स्थचिर ने इन गाथाओं को कटाई\nआदित्य बन्धु तिष्य को ग्रीष्म को समाप्त करने के लिए और परिदाह की शान्ति हेतु\n(पंखा) दिया गया॥80॥\nतालवृन्त (पंखा) दान का यह सुपरिणाम है कि मेरे सभी राग-अश्नि, द्वेष-अग्लि और सभी मोह-अग्नि\nसमाप्त हो गये ॥84॥\nइस भव-समूह के मेरे सभी क्लेश समास हो गये हैं और सम्यक्‌ सम्बुद्ध के शासन में अन्तिम देह धारण\nकरता हूँ॥82॥\n\nमेरे द्वारा तालबृन्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000218_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000218_indic_mozhi_deva_word_ocr_bdec28d4cba2.jpg", "ocr": "मानो"} +{"id": "indic_deva_eval_000219_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000219_devanagari_page_ocr_bcdcebc52be2.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\nथव\n\n'तत्थ आगमेतीति मुहृत्तं अधिवासेतीति अत्थो। घम्मतीति गछ्छति। आगच्छतीति आयाति।\n'उग्गछ्छतीति उय्याति उद्धे गल्छति। अतिगच्छतीति अतिक्कमित्बा गच्छति। पटिगच्छतीति\nपुन गच्छति। अवगच्छतीति जानाति। अधिगच्छतीति लभति जानाति वा। अनुगच्छतीति\nपच्छतो गच्छति। उपगच्छतीति समीपं॑ गच्छति। अपगच्छतीति अपेति। विगच्छतीति\nविगमति। निगच्छतीति लभति। “यसं पोसो निगच्छती”ति इदं निदस्सनं। निग्गज्छतीति\nनिक्‍्खमति। सप्पतीति गच्छति। संसप्पतीति संसरन्‍्तो गच्छति। परिसप्पतीति समन्‍्ततो\nगच्छति।\n\nइदानि पन विज्ञूनं साट्ठकथे तेपिटके बुछवचने परमकोसल्लजननरत्थ सप्पयोग पदमालं॑\nकथयाम। सेय्यथिदं? सो गच्छति, ते गच्छन्ति, गच्छरे। त्व॑ गछ्छसि, तुम्हे गच्छथ। अहं\nगच्छामि, मर्य गच्छाम। सो ग��्छते, ते गच्छल्ते। त्व॑ं गच्छसे, तुम्हे गच्छव्हे। अहं गच्छे, मय॑\nगच्छाम्हे। वत्तमानाय रूपानि।\n\nसो गच्छतु, ते गच्छन्तु। त्वं गछ्छाहि, गच्छ, गच्छस्सु, तुम्हे गल्छथ। अहं गच्छामि, मयं\nगच्छाम। सो गच्छतं, ते गच्छन्तं। त्वं गच्छस्सु, तुम्हे गछ्छव्हों। अहं गच्छे, मयं गच्छामसे।\nपड्चमिया रूपानि।\n\nसो गच्छेय्य, गच्छे, ते गच्छेय्युं। त्वं गच्छेय्यासि, तुम्हे गच्छेय्याथ। अहं गच्छेय्यामि, मय॑\nगच्छेय्याम, गच्छेमु। सो गच्छेथ, ते गच्छेरं। त्वं गच्छेथो, तुम्हे गच्छेय्यावब्हो। अहं गच्छेय्यं, मर्य॑\nगच्छेय्याम्हे। सत्तमिया रूपानि।\n\nसो गच्छ, ते गच्छु। त्वं गच्छे, तुम्हे गच्छित्थ, गडिछित्थ। अहं गच्छ, मय॑ गच्छिम्ह,\nगछि्छिम्ह। सो गच्छित्थ, गडिछत्थ, ते गच्छिरे। त्व॑ं गच्छित्थो, तुम्हे गच्छिव्हो। अहं गच्छि,\nगछिक्लि, मय॑ गच्छिम्हे। परोक्‍्खाय रूपानि।\n\nसो अगच्छा, ते अगच्छू। त्व॑ं अगच्छे, तुम्हे अगच्छथ। अहं अगच्छ, मयं अगच्छम्हा। सो\nअगच्छथ, ते अगच्छत्थुं। त्व॑ं अगच्छसे, तुम्हे अगच्छिव्हं। अं अगच्छे, मय॑ अगच्छिम्हे।\nअज्जतनिया रूपानि।\n\nसो गच्छिस्सति, ते गच्छिस्सन्ति। त्व॑ं गच्छिस्ससि, तुम्हे गच्छिस्सथ। अहं गच्छिस्सामि,\nमसरय॑ गच्छिस्साम। सो गच्छिस्सते, ते गच्छिस्सन्ते। त्व॑ गच्छिस्ससे, तुम्हे गच्छिस्सब्हे। अहं\nगच्छिस्सं, मयं गच्छिस्साम्हे। भविस्सन्तिया रूपानि।"} +{"id": "indic_deva_eval_000220_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000220_hindi_handwritten_word_ocr_005d692ee2a5.jpg", "ocr": "जताना"} +{"id": "indic_deva_eval_000221_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000221_indic_vision_bench_deva_ocr_12994f08c238.jpg", "ocr": "चाऊसशेठला हे माहीत होतं. खरं तर दुष्काळाच्या वेळी नेहमीच गुरांच्या छावण्या उघडण्याचे शासनाचे आदेश असतात. कुठेतरी साखर कारखान्याच्या परिसरात दोन चार छावण्या उघडल्या जातात. पण भावे साहेबांनी यंदा कमालच केली. स्वतः प्रत्येक तालुक्यात व महसूल मंडळात जाऊन तेथे चांगलं काम करणा-या संस्थांना प्रोत्साहित करून जवळपास चाळीस गुरांच्या छावण्या उघडल्या. त्यामुळे शेतक-यांनी जनावरे बेभाव विकण्याऐवजी ती छावण्यांमध्ये दाखल केली. परिणामतः कंपनीला या पंधरा दिवसांत एकही जनावर मिळालं नाही. तीन शिफ्टमध्ये कंपनी गेले दीड महिना चालू असताना आता जेमतेच एक शिफ्टचंच काम उरलं होत होतं - तेही इतर जिल्ह्यांतील जनावरांमुळे; पण त्यात वाहतूक खर्च फार होता.\n‘अलनूर साहब आपसे सखुत नाराज है चाऊसशेठ.' हयातखान म्हणाला, ‘कुछ कीजिए, कुछ कीजिए. वर्ना कम्पनी आपकी खातिरदारी बंद कर देगी.'\nचाऊसशेठ संतप्त नजरेनं पाहात आहेत हे जाणवताच हयातखान सावरीत म्हणाला, 'ये साहब ने गुस्से में कहा होगा. हम उनको समझायेंगे. लेकिन सवाल हल नहीं होता इतने से. जूनपर्यंत कंपनीच्या तिन्ही शिफ्ट चालल्या पाहिजेत. गेल्या दोन वर्षातला लॉस भरून काढायचा हाच मौका आहे. कुछ करो शेठ, कुछ करो.'\nते अलनूर साहेबांना चांगले ओळखून आहेत. त्यामुळे जरी हयातखानने सौम्य शब्दांत त्यांची नाराजी पोचवली असली तरी त्यामागची धग चाऊसशेठनं ताडली होती.\nआज त्यांना पूर्ण जिल्हा चाऊसशेठ म्हणून जाणतो. सत्ताधारी पक्षाच्या अल्पसंख्याक सेलचे ते सचिव आहेत. एका परमिट रूमसह हॉटेल आणि दोन ट्रक व चार टेम्पोसह चालणारी ट्रान्स्पोर्ट कंपनी हे वैभव गेल्या चार-सहा वर्षातलं. त्याला कारणही अलनूर साहेब होते. त्यांनी चाऊसला कंपनीचा मुख्य एजंट बनवलं आणि कंपनीच्या कामात अडथळे न येण्यासाठी राजकीय - प्रशासनिक आघाडी सांभाळण्याचं काम दिलं. आजवर चाऊसशेठ अलनूरच्या कसोटीला सहजतेनं उतरले होते. त्यामुळे हातात पैसा खेळू लागला, समाजात पत वाढली आणि त्यांनी सत्ताधारी पक्षात ऊठबस सुरू करून स्वतःचं एक स्थान निर्माण केलं.\nदास्ता-ए-अलनूर कंपनी / १६३"} +{"id": "indic_deva_eval_000222_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000222_indic_mozhi_deva_word_ocr_b972668ebdf1.jpg", "ocr": "मान्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000223_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000223_indic_mozhi_deva_word_ocr_9b9251ab6b0d.jpg", "ocr": "युरोपमधील"} +{"id": "indic_deva_eval_000224_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000224_devanagari_page_ocr_d14a3272ea80.jpg", "ocr": "2. अवोपुप्फियस्थेरअपदान 288-289 8. सेनासनदायकल्थेरअपदान 343-344\n3. पच्चागसनियस्थेरअपदान 290-29॥ 9. बेय्याबच्चकस्थेरअपदान 344-345\n4- परप्पसादकत्थेरअपदान 29-293 0. बुद्धपड्माकस्थेरअपदान 345-346\n5. भिसदायकल्थेर्अपदान 293-294 44. भिवस्वादायिवस्गो\n6. सुचिस्तितत्थेरअपदान 295-296 . भिक्‍्खदायकत्थेरअपदान 347-उ48\n7. बत्थदायकल्थेरअपदान 296-298 2. जाणसब्जिकल्थेरअपदान उ48-349\n8. अम्बदायकत्थेर्अपदान 298-300 3. डप्पलहस्थियल्थेरअपदान 349-350\n9. खुमनत्थेसअपदान 300-30 4. पदपूजकत्थेरअपदान 350-35\n. पुष्फचद्स्‍ोटियत्थेरअपदान 30-303 5. सुद्डिपष्फियल्थेरअपदान 35-352\n8. चागसमालबग्गो 6. उदकपूजकत्थेरअपदान 352-354\n।. नागसमालत्थेरअपदान उ04 7. चब्ठमालियत्थेरअपदान 354-356\n2. पदसज्जकल्थेरअपदान 305 8. आसनुपड्ञाहकत्थेरअपदान 356-357\n3. बुद्धसज्जकस्थेरअप��ान 306 9. बिव्ठलिदायकल्थेरअपदान 357-359\n4. भिसालुबदायकत्थेस्अपदान 307 0. रेणुपूजकल्थेरअपदान 359-360\n5. एकसज्जकत्थेरआपदान 308 42. सहापरिलारबग्गो\n. तिणसन्थरदायकल्थेरअपदान.. 309-30 . महापरिवारकत्थेरअपदान 36-362\n'. सुचिदायकल्थेसअपदार् 30-34] 2. सुमझ्लत्थेरअपदान 363-364\n. पाटलिपुष्फियल्थेरअपदान 32-33 3- सरणगमनियल्थेरअपदान 364-366\n'. ठितज्जलियत्थेरअपदान 33-3]4 4. एकासनियत्थेरअपदान 367-368\n. तिपदुमियत्थेरअपदान 34-320 5. सुबण्णपुष्फियल्थेरअपदान 368-370\n9. लिमिरजग्गो 6. चितकपूजकत्थेरअपदान 370-372\n« लिमिरपुष्फियल्थेरअपदान उ&4-32> 7. चुद्धसज्जकल्थेरअपदान 372-373\n गतसज्ञकल्थेस्अपदान 323-324 8. सरगसज्जकत्थेरअपदान 374-375\n3. निपन्‍नड्जलिकत्थेरअपदान 324-325 9. पच्चुपद्भानसजञ्ञजकत्थेरअपदानं 375-377\n अधोपुष्फियल्थेरअपदान 325-327 0. जातिपूजकत्थेरअपदान 377-379\n. रंसिसज्जकत्थेरअपदान 327-328 43. सेरेस्थबग्गो\n.. दुतियरंसिसञ्जकत्थेरअपदान उ28 . सेरेय्यकल्थेरअपदान उ80-उ87\n'. फलदायकत्थेरअपदान 329 2. पुष्फथूपियत्थेरअपदान 38-384\n. सदसञ्जथकत्थेरअपदान 330 3. पायसदायकल्थेस्अपदान 385-386\n9. बोधिसिज्चकस्थेरअपदान 330-33] 4- गनन्‍्धोदकियस्थेरअपदान 386-उ87\n. पदुमपुष्फियल्थेरअपदान 33-333 5. सम्मुखाथविकत्थेस्अपदान 388-392\n40. सुधावग्गो 6. कुसुमासनियत्थेरअपदानं 392-394\n4. सुधापिण्डियत्थेरअपदान 334-335 7. फलदायकत्थेरअपदान 394-396\n2. सुचिन्तिकत्थेस्अपदान 335-336 8. जाणसज्जिकत्थेरअपदान 396-397\n3. अड्जचेव्ठकत्थेरअपदान 36-337 9. गण्ठिपुष्फियल्थेरअपदान 398-399\n4- सूचिदायकल्थेरअपदान 337-338 0. पदुमपूजकल्थेरअपदान 399-40।\n5. गन्धमालियस्थेरआपदान 338-340 44. सोभितवग्गो\n6. तिपुष्फियत्थेस्अपदान 3उ40-34] . सोझितत्थेस्अपदान 402-403\nय\n\n'. मधुपिण्डिकल्थेरअपदान 34-342 2. सुदस्सनत्थेरअपदान 404-405\n\nरस"} +{"id": "indic_deva_eval_000225_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000225_indic_mozhi_deva_word_ocr_dd0c309ebb09.jpg", "ocr": "जेव्हा"} +{"id": "indic_deva_eval_000226_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000226_hindi_handwritten_word_ocr_fd61f836276e.jpg", "ocr": "प्रदेशके"} +{"id": "indic_deva_eval_000227_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000227_indic_mozhi_deva_word_ocr_23440f43693f.jpg", "ocr": "कॅथलिक"} +{"id": "indic_deva_eval_000228_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000228_hindi_handwritten_word_ocr_d466f48ff462.jpg", "ocr": "जोड़े"} +{"id": "indic_deva_eval_000229_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000229_indic_mozhi_deva_word_ocr_39347462f3e0.jpg", "ocr": "मारता"} +{"id": "indic_deva_eval_000230_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000230_hindi_handwritten_word_ocr_1acccf1a9ae7.jpg", "ocr": "खरीदिए"} +{"id": "indic_deva_eval_000231_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000231_hindi_handwritten_word_ocr_2c713ff43679.jpg", "ocr": "मुसहर।"} +{"id": "indic_deva_eval_000232_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000232_indic_mozhi_deva_word_ocr_3e8aa3a22276.jpg", "ocr": "चाहे"} +{"id": "indic_deva_eval_000233_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000233_devanagari_page_ocr_c04315c6ba00.jpg", "ocr": "24. ककुसन्धबुद्धवंसो\n\nपालि- वेस्सभुस्स अपरेन, सम्बुद्धो द्विपदुत्तमो।\n\nककुसन्धो नाम नामेन, अप्पमेय्यो दुरासदो॥902॥\n\nउम्घाटेत्वा सब्बभवं, चरियाय पारमिं गतो।\n\nसीहोब पड्जरं भेत्वा, पत्तो सम्बोधिमुत्तमं॥903॥\n\nधम्मचक्क पवत्तेन्ते,\n\nचत्तारीसकोटिसहस्सानं, धम्माभिसमयों अहु॥904॥\n\nअन्तलिक्खम्हि आकासे, यमकं कत्बा विकुब्बनं।\n\nतिंसकोटिसहस्सानं, बोधेसि देवमानुसे॥905॥\n\nनरदेवस्स यक्‍्खस्स, चतुसच्चप्पकासने।\n\nधम्माभिसमयो तस्स, गणनातो असड्खियो॥906॥\nसंस्कृतच्छाया- .. विश्वभुवों अपरेण, सम्बुद्धो द्विपदुत्तम:।\n\nककुसन्धे लोकनायके।\n\nककुसन्धो नाम नाम्ना, अप्रमेयो दुरर्पद:॥902॥\nउद्धाठ्य सर्वभवम्‌, चर्यया पारमीं गतः।\nसिंह एवं पीउजरं भीत्वा, प्रासः सम्बोधिमुत्तमम्‌॥903॥\nधर्मचक्र प्रवर्तते, ककुसन्धे लोकनायके।\nचत्वारिंशत्कोटिसहस्राणाम्‌, धर्माभिसमयोज्मूत्‌॥904॥\nकह्जा विकवाणसा\nत्रिंशल्कोटिसहस्नाणाम्‌, अबोधयद्‌ देवमानुषान्‌॥905॥\nनरदेवस्य यक्षस्य, चतुःसत्यप्रकाशने।\nधर्माभिसमय: तस्य, गणनातो5सड्ख्येय:॥906॥\nहिन्दी- भगवान्‌ विश्वभू बुद्ध के अनन्तर नसथेष्ठ अप्रमेय एवं दुर्धर्ष ककुसन्द नामक बुद्ध हुए॥902॥\nसमस्त भव की यथार्थता जान कर, चर्या के सहारे से सभी साधनाओं को सीमा तक पूर्ण कर वे ककुसन्‍्द\nबुद्ध उसी प्रकार बोधि को प्रात कर गये, जैसे- कोई सिंह अतीब सरलता से पिझ्रे को तोड़ कर निकल\nजाये॥903॥\nइन भगवान्‌ लोकनायक ककुसन्द द्वारा धर्मचक्र प्रवर्तन करते समय, चालीस हजार करोड़ देव एवं\nमनुष्य धर्मजिज्ञासुओं की धर्माभिसमय हुआ॥904॥\nआकाश में अन्तरिक्ष में अदभुत प्रातिहार्य करके तीस हजार करोड़ देव एवं मनुष्यों को ज्ञान\nकराया॥905॥\nनर, देव एवं यक्षों को चार आर्यसत्यों का उपदेश करते समय असडख्य जिन धर्मजिज्ञासुओं का धर्माभिसमय\nहुआ॥906॥\n\nअन्तरिक्षे आकाशे, यम"} +{"id": "indic_deva_eval_000234_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000234_devanagari_page_ocr_9e295f970ad9.jpg", "ocr": "महावंसो\n\nकिंबादी सुगतो भन्‍्ते ॥5/2699॥\nकिच्छेन बासित॑ रह्/ं ॥8/20॥\nकुद्धो सहाजनो रज्जो ॥6/40॥\nकुन्तिपुत्ता दुबे येरा ॥8/2278\nकुमारपुरिसा सब्बे ॥0/700\nकुमारल्ल मनुस्खान ॥0/32॥\nकुसारो तत्थ गन्त्वान ॥0/27॥\nकुसारो पुच्छिछ कि भन्‍्ते ॥5/427॥\nकुसारो रस्मिसादाय ॥0/55॥\nकुलेहि सो सोव्ठसह्ि ॥9/430\nकुबण्णाया'ति सुल���वाह ॥7/66॥\nकुसिनारायं यमकसाला ॥३/20॥\nकूटागाई ठपापेल्वा ॥20/44॥\nकूटागारगलं बेरी ॥20/538\nकूटागारे रोपयित्वा ॥20/38॥\nको एसो”लि तलो खुला ॥9/6॥\nको डुक्‍्करो लि पुल्छित्वा ॥5/260॥\nखत्तिया काजरग्गासे ॥१9/54॥\nखन्‍्धाचार नगरके ॥१0/65॥\nखन्‍्धाबार निवेसेल्वा ॥0/46॥\nखसापेल्वा धस्मिके ते ॥4/43॥\nखवीणासबसहस्स सो #5/॥2॥\nखीणासबसहस्सस्स ॥#5/4490\nखीणासबा भिक्‍्खुनियो ॥20/570॥\nजकझुगाय स्थिपि गण्हालु ॥8/230\nगच्छ दानि सु भोति ॥7/608\nगच्छा लि चाचामत्तम्पि ४5/32॥\nजणनाबीलिकत्ता ले ॥5/430\nजणेनेव इधागम्स ॥43/20॥\nजण्हाथ सब्बानेःतानि ४१0/670\nगण्हि निग्रोधपण्णानि ॥१0/360\nगण्हित्वा गोचर सीहो ॥6/6॥\nगण्हिस्लास पविट्डन्ति ॥0/68॥\nगण्हिस्साम विहारं'लि ॥4/33॥\nगलेसु लेखु सो गनल्या ॥0/42॥\nगनन्‍्ल्‍का अज्जापदेसेन ॥8/9॥\nगन्‍्ल्वा चलूहि येरेहि ॥2/48\nगन्‍्ल्वा चेतियगेहं ते ॥9/79#\nगन्‍्ल्था ल॑ शुसरक्खं सो ॥0/620॥\nगन्‍्ल्वा ले ते लथाबोचुं ॥5/254॥\nगन्‍ल्वा सहादेवस्थेरो ॥42/29॥\nगल्ल्या सहाचन सिक्खूसऊूघ ॥4/42॥\nगन्ल्या रछ्छो निवेदेसि ॥१4/50॥\nगन्ल्या“थ रक्ख्ितस्थेरो ॥2/340॥\nगन्‍्त्वा'पत्तिस्सगास ते ७0/48॥\nगन्त्या“परन्तिक येरो ॥2/34॥\n'गन्ल्वाधिकरणं एत॑ ॥5/237।\nगन्ल्वान योनबिसर्य ॥2/39॥\n\nसन्ल्वान सब्निपालेल्का ॥5/238॥\nगस्मीरनदिया लीरे॥7/44॥\nजय्हसाना सहाबोधि ॥7/470॥\nगजक्‍्ख्बन्हि डसापेत्वा ॥9/479#\nगवकक्‍्खाभिसुखद्वाने ॥9/58\nगहड्ढी चेव चेरो सो॥5/44।\nगहेल्‍वा\"पतिस्स गार्स ॥9/4॥\nगहेसित वालखिस्मि ॥0/59॥\nशिरिकण्डसियो नाम ॥0/29॥\nगिरिदीप ततो नाथो ॥/30॥\nजीवाय त॑ गहेतवा सो ॥0/84॥\nगोकुलिकेडि पण्णक्तिबादा ॥5/50\nमोचराय गहे सीहे ॥6/40\n\nचर॑ गन्‍्ल्वान पुल्छित्या ध5/१340\nचातेस्साम कनि्धिक्ति ॥9/30\nअण्डवज्जी च ले पझच ॥5/429॥\nचण्डालगामसगमा ॥5/42॥\nचण्डालबादी चण्डाल ॥5/648\nअण्डाखोको लि जायिल्थ ॥5/489॥\nचतुत्य॑ तु सहाबोधि ॥20/48॥\nचलुल्ये दिवसे येरो ॥5/86॥\nचलुरासीति सहस्सानि ४2/00॥\nअत्तालीख सहस्सानि ॥१2/30॥\nअत्तालीससहस्सेहि ॥१4/20\nचत्तालीससहस्सेहि ॥१5/620\nचम्सख्वण्ड पसारेसि ॥/29॥\nचित्त सहस्सं दापेल्वा ॥9/25॥\nलित्तलालसमीपस्हि ॥20/54॥\nजित्तो च कालवेलो च ॥0/4#\nजिरदिद्ठो हि सम्बुद्धो ॥॥7/2॥\nचूब्णमणि चेतियम्हा ४47/20॥\nचेलाबिगासतो चा थि ॥१7/59॥\nचेतियड्चेत्थ कारेसि ॥॥20/46॥\nचेतियपब्बतारामे ॥१9/620॥\nचेतियपब्बते चस्स ॥20/36॥\nचेतियो मुचलो चेव ॥2/30\nछद्केचि दिवसे येरो ४१5/970\nब्लब्बीसदिवसे येरो ॥6/28\nछक्कभिज्ञाबलप्पत्तों ॥4/2॥\nछ��तपब्बतपादम्हि ॥/08\nछछादापेत्वा मेदबण्ण॥१/39॥\nजनस्स धम्मं देसेसि ॥5/85॥\nजम्बुदीपे एकरज्ज ॥5/550\nजयन्तो नाम नामेन ॥१5/27॥\nजयसेनस्स घीला च ॥2/6॥\nजलडं रूक्‍्खसुसिर ॥0/88\nजलसाडिकधालु सो ॥5/578#\nजाणुमत्तं जल॑ राजा ॥5/2558\n\n305\n\nजाता ति श्रस्मुत्तरियाह5/7#॥\nजाता सब्बत्थिवादीड़ि ४5/9#\nजाते अल्वनिकाये थि ॥9/74#\nजात्ते जाक्ते राजगेहे #2/459\nजानामी तसति पटिज्लाते #5/॥4उ|#\nजालासरीरा निकल्नस्स ४॥5/2248\nजिनलिव्वाणतो पच्छछा ४5/28\nजिलेन परिमुक्तेसु ॥5/758\nजीवित देहि मे सासि ॥7/220\nजेट्डी आह अलुद्भो सो ॥5/579॥\nजोलयित्वान कालेन ॥४20/58॥\nजत्वा तिस्सपटिसन्धि ॥5/38॥\nअल्वान सोल्थिगसन ॥8/220\nआतके ते च अज्ञे च ॥4/24\nजआतीन॑ सझूगहँ कातुं ॥3/508\nआतो च लझूकासज्ञस्हि ४१/24#\nठपयित्वान लंकिन्दो ॥१9/340\nपापेल्था तदझुगेहि ॥5/2626\nठपापेत्वान कारेसि ॥8/6508\nठपेल्वा घातुपत्त ल॑ ॥7/249#\nपेल्वा सुदस्सने साले ॥45/4:40\nपपेल्वाप्पोसचब्गे ले ॥4/738\nपेल्थानन्दल्थेरस्स ॥3/2798\n्पेसि धातुयो खब्बा ॥7/23॥\n'डितो रतनसालस्हि ॥१5/908\n\nस॑ इद्धिं उपराजा सो ॥5/650\n\n'ल॑ एलं अतिसाहख॑ ॥20/590॥\n\nले कम्पकारणं पुच्छि॥5/489\n\nल॑ कुमार गहेत्वान॥0/40#\n\nसे खर्णयेव वीजस्हा ॥5/430\n\nल॑ गन्त्या सत्तविनय ॥5/64#\n\nल॑ गहेतवा सुरूडुगाय ॥7/598\n\nलं चा पि राजायतन ॥१/889\n\nत॑ चिक्तयसके पड्छ ४5/468\n\nत॑ छादथित्या कारेसि #/4#\n\nज॑ दिस्वान सहाराब ॥2/490\n\nल॑ धम्मदेखने खुल्वा ॥5/490\nस॑ धम्मदेखखन खुल्वा ॥5/4540॥\nजे घालुं धालुपत्तजल ॥7/249\n\nत॑ नन्‍्दना दक्खिण्णेन ॥5/4१8॥\n\nत॑ निक्‍्खसन्‍ल पवजिसन्तो ॥5/43308\nत पण्ड्बासुदेज ते ॥8/478\n\nले पण्डुवासुदेव ते ॥8/27॥\n\nत॑ घाडिहारिय 5/35.44.45.57#\nल॑ सहानन्दनचन ॥5/2020॥\n\n'त॑ महावरुणों थेरो ॥5/45॥\n\nल॑ रक्‍्खसिं सपरिस ॥2/50#\n\nल॑ खर पुन लिक्खत्चु ४१0/588"} +{"id": "indic_deva_eval_000235_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000235_indic_mozhi_deva_word_ocr_68470777eff7.jpg", "ocr": "मामांनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000236_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000236_hindi_handwritten_word_ocr_1c5e96783513.jpg", "ocr": "माध्यम"} +{"id": "indic_deva_eval_000237_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000237_devanagari_page_ocr_1253536cff9f.jpg", "ocr": "सहावंसो\n\n263\nनगरस्से'कदेसम्हि, रम्मे भिक्खुनुपस्सये।\n\nकारापिते नरिन्‍्देन, वासं कप्पेसि सुब्बता॥44॥\n\nउपासिकाहि ताहे'स, बुत्थो भिक्‍्खुनुपस्सयो।\n\nउपासिकाविहारो ति, तेन लंकाय विस्सुतो॥42॥\n\nआगिनेय्यो महा'रिट्लो, धम्मासोकस्स राजिनो।\n\nअप्पेत्वा राजसन्देसं, थेरसन्देस'मत्रवि॥3॥\n\nभातुजाया सहायस्स, रज्ञो ते राजकुझ्जरा।\n\nआकहक्चषमाना पब्बज्जं, निज्च वसति सडञ्ञला॥44॥\n\nसल्भमित्तं भिक्‍्खुनिं तं, पब्बाजेतुं विसज्जय।\n\nताय सदिं महाबोधिं दक्खिणसाखमेव च॥ 45॥\n\nसंस्कृतच्छाया-_ नगरस्यैकदेशे, रम्ये भिश्लुण्युपाश्नये।\nकारापिते नरेन्‍्द्रेण, वासमकल्पयत्‌ सुत्रता।।44॥।\nउपासिकाशिस्ताभि एः, वसितः भिक्षुण्युपाश्नय:।\nउपासिकाविहार: इति, तेन लक्ञ्या विश्लुत:॥॥2॥।\nभागिनेयो महारिएष्ट:, धर्माशोकस्य राज्:।\nअर्पयित्वा राजसन्देशं, स्थविरसन्देशमत्रवी त्‌।।43॥।\nभ्रातृजाया सहायस्य, राज्ञस्ते राजकुझरा:।\nआकांक्षमाणा त्रब्नज्यां, नित्यं बसति संयता।।44॥।\nसंघमित्रां भिक्षुणीं तां, प्रत्राजयितुं विसर्जयत्‌।\n'तया सार्थ महाबोधिं दक्षिणशाखामेव च।।5।।\n\nहिन्दी- नगर के एक तरफ राजा द्वारा निर्मापित सुन्दर एक भिक्षुणी-उपाश्चय में सुक्नतों के साथ रहने लगी।॥4॥॥\nयह शिक्षुणी-उपाश्नय उपासिकाओं के वास के कारण “उपासिका-विहार' नाम से ही प्रसिद्ध हो गया।।१2।\n\nभगिनीपुत्र महारिषप्ट अमात्य ने सम्राट धर्माशोक को अपने राजा का सन्देश सुनाकर, स्थविर का सन्देश\nदिया।।43॥\n\n“राजश्रेष्ठ! आपके प्रिय मित्र के भाई की पत्नी प्रब्नज्या की इच्छद्रा से निरन्तर संयमपूर्वक रहती हुई प्रत्नज्या की इच्छ्छा\nकिये बैठी है।।44॥।\n\nअत: आप उसको प्रत्नजित करने के लिये सडुझघमित्रा भिक्षुणी को भेजने की व्यवस्था करें। साथ ही सहाबोधि की\nदक्षिण शास्त्रा भेजें।45॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000238_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000238_devanagari_page_ocr_5b7874ea49c7.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n'पदुसुत्तरो लोकविदू, आहतीनं पटिग्गहो।\nसड्कप्पसज्ञाय, आगच्छि मम सन्तिकं॥658॥\n\n&\nमम सड्ल्\n\n“उपागतं महानागं, देवदेव॑ नरासभं।\n\nबिव्ठालिं पर्गहेत्वान, पत्तम्हि ओकिरिं अहं॥659॥\n“परिभुडिज महावीरो, तोसयन्‍्तो मम तदा।\n'परिभुञजित्वान सब्बज्झू, इमं गा अभासथ॥660॥\n““सक॑ चित्त पसादेत्वा, बिव्ठालिं मे अदा तुवं।\n\nकप्पानं सतसहस्सं, दुग्गतिं नुपपज्जसि'॥664॥\n\n“चरिमं वत्तते मय्हं, भवा सब्बे समूहता।\nधारेमि अन्तिम देहं, सम्मासम्बुद्धसासने॥662॥\n\nपद्मोत्तरो लोकविद्‌, आहतीनां प्रतिग्रह:।\n\nमम सड्कल्पमाज्ञाय, आगच्छन्मम सान्तिकम्‌॥4658॥\n\nऊपागत॑ महानागम्‌, देवदेवं नरर्पभमा।\n\nविडालि प्रगृह्य, पात्रे अवाकिरम्‌ अहम्‌॥659॥\n\nपर्यभुडत महावीर:, तोषयन्‌ मां तदा।\n\nपरिशुज्य सर्वज्ञः, इमा गाथा अभाषत॥4660॥\n\nस्वकं चित्त प्रसाव्य, विडालिं मे अदास्त्वम।\n\nकल्प��नां शतसहसम, दुर्गतिं नोपपत्स्यसे॥4664॥\n\nचरम॑ वर्चते मह्यम्‌, भवाः सर्वे समूहिता:।\n\nधारयाम्यच्तिम देहम्‌, सम्यक्सम्बुद्धशासने॥662॥\n\nलोकविद्‌, आहतियों के ग्रहणकर्ता पद्मोत्तर, मेरे संकल्प को जानकर मेरे समीप आये॥658॥\n\nसमीप आये हुए महानाग, देवों के देव, नरर्पभ के पात्र में मैंने बिडालि (नामक वृक्ष के पत्रों) को डाल\n'दिया।॥659\n\nमुझको सन्तुष्ट करते हये महावीर ने उसको खाया और खाकर उस सर्वज्ञ ने ये गाथायें कहीं-4660॥\n\nतुमने मुझमें जो अपने चित्त को प्रसादित कर बिडालि (नामक वृक्ष के पत्रों) को प्रदान किया है तो तुम\nसौ हजार कल्पों में भी दुर्गति में उत्पन्न नहीं होगे॥664।\n\nमेरे सभी भव क्षीण हो गये हैं। यह मेरा अन्तिम जन्म है और मैं सम्यक्सम्बुद्ध के शासन में अन्तिम देह\nको धारण कर रहा हूँ॥662॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000239_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000239_hindi_handwritten_word_ocr_0bd9f7a0d94d.jpg", "ocr": "तौर-तरीका"} +{"id": "indic_deva_eval_000240_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000240_hindi_handwritten_word_ocr_62505418b33c.jpg", "ocr": "निडाना"} +{"id": "indic_deva_eval_000241_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000241_indic_mozhi_deva_word_ocr_d1ba4e020f64.jpg", "ocr": "टाळतात."} +{"id": "indic_deva_eval_000242_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000242_devanagari_page_ocr_e68be8577d76.jpg", "ocr": "66 धम्मसज्भणि\n\n«५. कतमानि तस्मिं समये सत्त बलानि होन्ति? सद्धाबलं, वीरियबलं, सतिबलं, समाथिबलं,\n'पड्ञाबलं, हिरिबलं, ओत्तप्पबलं।\n\n«९६. कतमं तस्मि समये सद्धावलं होति? या तस्मि समये सद्धा सद्हना ओकप्पना अभिष्पसादो\nसद्धा सद्धिन्द्रियं सद्धावलं - इदं तस्मिंसमये सद्धाबलं होति।\n\n९७. कतमं तस्मिं समये वीरियबलं होति? यो तस्मिं समये चेतसिको वीरियारम्भो निक्‍्कमो\nपरक्‍्कमो उस्यामो वायामों उस्साहो उस्सोत्ठही थामो धिति असिथिलपरक्कमता अनिक्खित्तछन्दता\nअनिक्खित्तधुरता धुरसम्पग्गाहो वीरिय॑ वीरियिन्द्रियं वीरियबलं सम्मावायामो - इर्दं तस्मि समये\nबीरियबलं होति।\n\n९८. कतमं तस्मिं समये सतिबलं होति? या तस्मि समये सति अनुस्सति पटिस्सति सति सरणता\nशारणता अपिलापनता असम्मुस्सनता सति सतिन्द्रियं सतिबलं॑ सम्मासति - इदं तस्मिंसमये सतिबलं\nहोति।\nसंस्कृतच्छाया) ६५. कतसानि तस्मिन्‌ समये सप्त बलानि भवन्ति? श्रद्धावलम्‌, वीर्यबलम्‌, स्मृतिबलम्‌,\nसमाधिबलम्‌, प्रज्ञावलम्‌, छीबलम्‌, अपत्राप्यवलम्‌ |\n\n९६. कतमं तस्मिन्‌ समये श्रद्धाबलं भवति? या तस्मिन्‌ समये श्रद्धा श्रद्हनम्‌ अवकल्पनम्‌\nअभिप्नसाद: श्रद्ध�� श्रद्धेन्द्रियं श्रद्धावलम्‌ - इदं तस्मिन्‌ समये श्रद्धाबलं भवति।\n\n९७. कतम॑ं तस्मिन्‌ समये वीर्यबल भवति? यः तस्मिन्‌ समये चैतसिको वीर्यारम्भो निष्क्रम:\nपराक्रम: उद्यम: व्यायाम: उत्साह: उत्साहित्वं स्थामं धृति: अशिथिलपराक्रमत्वम्‌ अनिक्षिस्चछन्दत्वम्‌\nअनिशक्षिसधुरत्वम्‌ धुरसम्प्रग्राहो वीर्य वीर्येन्द्रियं वीर्यवल सम्यग्वायाम:- इदं तस्मिन्‌ समये वीर्यबर्ल\nअबति।\n\n९८. कतम॑ तस्मिन्‌ समये स्मृतिबलं भवति? या तस्मिन्‌ समये स्मृति: अनुस्मृति: प्रतिस्मृतिः\nस्मृति: स्सरणता धारणता अप्लाबनता असम्मर्षणता स्मृति: स्मृतीन्द्रियं स्मृतिबल सम्यक्‍्स्मृति:- इदं\nतस्मिन्‌ समये स्मृतिबलं भवति।\n\n(हिन्दी) ६५. उस समय कौन से सात बल होते हैं? श्रद्धाबल, वीर्यबल, स्मृतिबल, समाधिबल, प्रज्ञाबल, छीबल,\nअपन्राप्यवल।\n\n९६. उस समय कौन सा श्रद्धावल होता है? जो उस समय श्रद्धा, विश्वास करना, दृढ़ धारणा रखना,\nअत्यधिक श्रद्धा, श्रद्धा, श्रद्धेन्द्रिय, श्रद्धावल है- यही उस समय श्रद्धाबल है।\n\n«७. उस समय कौन सा बीर्यबल होता है? जो उस समय चैतसिक प्रयत्न का आरम्भ, प्रयत्र, पराक्रम,\nउद्यम, व्यायाम, उत्साह, अत्यन्त सुदृढ़ उत्साह का भाव, सामथ्य, धैर्य, वीरता (सुदृढ़ पराक्रम की दशा), सुदृढ़\nसंकल्प की मनोदशा, सुदृढ़ वीर्य बाला होना, सुदृढ़ प्रयत्र, वीर्य, वीर्येन्द्रिय, वीर्यबल, सम्यग्व्यायाम है- यही उस\nसमय बीर्यबल होता है।\n\n«९८. उस समय कौन सा स्मृतिबल होता है? जो उस समय स्मृति, अनुस्मृति, विचारणा, स्मरण करना, मन\nमें धारण करना, बार-बार दोहराना, अविस्मरण की अवस्था, स्मृति के विप्रलोप का अभाव, स्मृति, स्मृति-इन्द्रिय,\nस्मृति-बल, सम्यक्स्मृति है- यही उस समय स्मृति-बल होता है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000243_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000243_indic_mozhi_deva_word_ocr_689fa899e17b.jpg", "ocr": "उसके"} +{"id": "indic_deva_eval_000244_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000244_indic_mozhi_deva_word_ocr_fcfaab261695.jpg", "ocr": "परिस्थिती"} +{"id": "indic_deva_eval_000245_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000245_indic_vision_bench_deva_ocr_b318e7be6f2e.jpg", "ocr": "224 : प्रेमचंद रचनावली-6\nअब तो तुम कभी ऐसी शरारत न करोगे?\n'कभी नहीं, जीते जी कभी नहीं।'\n'कान पकड़ो।'\n'कान पकड़ता हूं, मगर अब तुम दया करके जाओ और मुझे एकांत में बैठकर सोचने और रोने दो। तुमने आज मेरे जीवन का सारा आनंद...।'\nमालती और जोर से हंसी-देखो, तुम मेरा बहुत अपमान कर रहे हो और तुम जानते हो,\nरूप अपमान नहीं सह सक��ा। मैंने तो तुम्हारे साथ भलाई की और तुम उसे बुराई समझ रहे हो।\nखन्ना विद्रोह-भरी आंखों से देखकर बोले-तुमने मेरे साथ भलाई की है या उलटी छुरी से मेरा गला रेता है?\n'क्यों, मैं तुम्हें लूट लूटकर अपना घर भर रही थी। तुम उस लूट से बच गए।'\n'क्यों घाव पर नमक छिड़क रही हो मालती। मैं भी आदमी हूं।'\nमालती ने इस तरह खन्ना की ओर देखा, मानो निश्चय करना चाहती थी कि वह आदमी है या नहीं?\n'अभी तो मुझे इसका कोई लक्षण नहीं दिखाई देता।'\n'तुम बिल्कुल पहेली हो, आज यह साबित हो गया।'\n'हां, तुम्हारे लिए पहेली हूं और पहेली रहूंगी।'\nयह कहती हुई वह पक्षी की भांति फुर से उड़ गई और खन्ना सिर पर हाथ रखकर सोचने लगे, यह लीला है या इसका सच्चा रूप।\nतेईस\nगोबर और झुनिया के जाने के बाद घर सुनसान रहने लगा। धनिया को बार-बार चुन्नू की याद आती रहती है। बच्चे की मां तो झुनिया थी, पर उसका पालन धनिया ही करती थी। वही उसे\nउबटन मलती, काजल लगाती, सुलाती और जब काम-काज से अवकाश मिलता, उसे प्यार करती। वात्सल्य का यह नशा ही उसकी विपत्ति को भुलाता रहता था। उसका भोला भाला\nमक्खन-सा मुंह देखकर वह अपनी सारी चिंता भूल जाती और स्नेहमय गर्व से उसका हृदय फूल उठता। वह जीवन का आधार अब न था। उसका सूना खटोला देकर वह रो उठती। वह\nकवच, जो सारी चिंताओं और दुराशाओं से उसकी रक्षा करता था, उससे छिन गया था। वह बार-बार सोचती, उसने झुनिया के साथ ऐसी कौन-सी बुराई की थी, जिसका उसने यह दंड दिया। डाइन ने आकर उसका सोने-सा घर मिट्टी में मिला दिया। गोबर ने तो कभी उसकी बात का जवाब भी न दिया था। इसी राँड़ ने उसे फोड़ा और वहां ले जाकर न जाने कौन-कौन-सा नाच नचाएगी। यहां ही वह बच्चे की कौन बहुत परवाह करती थी। उसे तो अपनी मिस्सी-काजल, मांग-चोटी ही से छुट्टी नहीं मिलती। बच्चे की देखभाल क्या करेगी? बेचारा अकेला जमीन पर पड़ा रोता होगा। बेचारा एक दिन भी तो सुख से नहीं रहने पाता। कभी खांसी, कभी दस्त,"} +{"id": "indic_deva_eval_000246_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000246_hindi_handwritten_word_ocr_0d25aed5bc33.jpg", "ocr": "जंग"} +{"id": "indic_deva_eval_000247_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000247_hindi_handwritten_word_ocr_17b8e601664c.jpg", "ocr": "खाधान्न"} +{"id": "indic_deva_eval_000248_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000248_devanagari_digits_mixed_13fc5ec69466.jpg", "ocr": "4८८37१0"} +{"id": "indic_deva_eval_000249_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000249_devanagari_digits_mixed_fd82b6a7694c.jpg", "ocr": "१6९२0४४४"} +{"id": "indic_deva_eval_000250_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000250_devanagari_digits_mixed_21a590715f83.jpg", "ocr": "३५७04098149611०६५२१"} +{"id": "indic_deva_eval_000251_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000251_indic_mozhi_deva_word_ocr_9ecee9e14bb0.jpg", "ocr": "सम्पूर्ण"} +{"id": "indic_deva_eval_000252_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000252_indic_vision_bench_deva_ocr_ef617bebecc3.jpg", "ocr": "८१\nछुटकारा\nऐसा कहना ठीक नहीं है। और साधारण विचार करनेसे भी हमें लगेगा कि 'अंग्रेजोंके बिना आज तो हमारा काम चलेगा ही नही.' ऐसा कहना अंग्रेजोंको अभिमानी बनाने जैसा होगा।\nअंग्रेज बोरिया-बिस्तर बांधकर अगर चले जायेंगे, तो हिन्दुस्तान अनाथ हो जायगा ऐसा नही मानना चाहिये। अगर वे गये तो संभव है कि जो लोग उनके दबावसे चूप रहे होंगे वे लड़ेंगे। फोड़ेको दबाकर रखनेसे कोई फायदा नही। उसे तो फूटना ही चाहिये। इसलिये अगर हमारे भागमें आपसमें लड़ना ही लिका होगा तो हम लड़ मरेंगे। उसमे कमज़ोरकों बचानेके बहाने किसी दूसरेको बीचमें पड़नेकी ज़रूरत नहीं है। इसीसे तो हमारा सत्यानाश हुआ है। इस तरह कमज़ोरको बचाना उसे और भी कमज़ोर बनाने जैसा है। मॉडरेटोंको इस बात पर अच्छी तरह विचार करना चाहिये। इसके बिना स्वराज्य नहीं प्राप्त हो सकता। मैं उन्हें एक अंग्रेज पादरीके शब्दोंकी याद दिलाऊंगा: \"स्वराज्यमें अंधाधुंधी बरदाश्त की जा सकती हैं, लेकिन परराज्यकी व्यवस्था\n[\n१\n]\nहमारी कंगालीको बताती है।\" सिर्फ़ उस पादरीके स्वराज्यका और हिन्दुस्तानके स्वराज्यका अर्थ अलग है। हम किसीका भी जुल्म या दबाव नहीं चाहते-चाहे वा गोरा हो या हिन्दुस्तानी हो। हम सबको तैरना सीखना और सिखाना है।\nअगर ऐसा हो तो एक्स्ट्रामिस्ट और मॉडरेट दोनों मिलेंगे-मिल सकेंगे-दोनोंको मिलना चाहिये;दोनोंको एक-दूसरेका डर रखनेकी या अविश्वास करनेकी ज़रूरत नही है।\nपाठक:\nइतना तो आप दोनो पक्षोंसे कहेंगे।परन्तु अंग्रेजोंसे क्या कहेंगे?\nसंपादक:\nउनसे में विनयसे कहूंगा कि आप हमारे राजा ज़रूर है।आप अपनी तलवारसे हमारे राजा हैं या हमारी इच्छासे, इस सवालकी चर्चा मुझे करनेकी ज़रूरत नहीं।आप हमारे देशमें रहें इसका भी मुझे द्वेष\n[\n२\n]\nनहीं है। लेकिन राजा होते हुए भी आपको हमारे नौकर बनकर रहना होगा। आपका कहा हमें नहीं, बल्कि हमारा कहा आपको करना होगा। आज तक आप इस\n↑\nबन्दोबस्त।\n↑\nडाह, ईर्ष्या, बैर।"} +{"id": "indic_deva_eval_000253_hindi_handwritten_word_ocr", "image": 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"indic_deva_eval_000259_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000259_indic_mozhi_deva_word_ocr_83c133f06527.jpg", "ocr": "आणि"} +{"id": "indic_deva_eval_000260_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000260_indic_mozhi_deva_word_ocr_b63243881fec.jpg", "ocr": "हुए"} +{"id": "indic_deva_eval_000261_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000261_indic_mozhi_deva_word_ocr_4f666f20449e.jpg", "ocr": "झालेल्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000262_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000262_devanagari_digits_mixed_5994c39af0e0.jpg", "ocr": "3७२८5६4४६१"} +{"id": "indic_deva_eval_000263_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000263_devanagari_digits_mixed_034be7b073a3.jpg", "ocr": "७1७९35४2"} +{"id": "indic_deva_eval_000264_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": 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सुखदुःखाच्या गोष्टी करीत बसल्या होत्या. त्यांना उशिरानं हे समजलं, तशा त्याही उठल्या व पाण्यासाठी घागरी कमरेवर घेऊन निघाल्या.\nरखमा आसुसून तो चंपकशेठचा हिरवागार मला पाहात होती. नजरेत ते वैभव सुख आणण्याऐवजी काट्यासारखं सलत राहिलं. मग ती हलकेच म्हणाली,\n'भीमी, आपल्या गावात दरवर्षीच उन्हाळ्यात पाणी कमी पडतं; पण टँकर प्रथमच लावला गेला हो ना?”\n'व्हय रखने गेल्या साली या शेठ्जीची हीर सरकारनं ताब्यात घेतली व्हती व पाण्यासाठी खुली केली होती. बुद्धवाड्यासाठी लई सोईचं व्हतं बघ.'\n'मग यावर्षी काय झाले त्यांची विहीर अधिग्रहण न करायला? सारा गाव तहानलाय, माणसाला पाणी नाही; पण यांच्या उसाला व कडेच्या गाजर गवतालाही पाणी पाजलं जातंय...' रखमा म्हणाली, 'बरं ते जाऊ दे. आपल्याला लगबग करायला हवी. चल चल बघू...'\n'उलीसं थांब रखमे नदर फिरतीय बग' भीमीला अशक्तपणामुळे व अर्धपोटी अवस्थेमुळे चक्कर आल्यासारखं होत होतं. तिचा चेहरा पांढराफेक पडला होता.\nरखमाला गहिवरून आलं. ती म्हणाली, 'भीमे, काय गं तुझी ही दशा? तू इथं त्या झाडाखाली बसं. मी आणते तुझं व माझं पाणी माझी सवय हॉस्टेलला राहिल्यामुळे काही मोडली नाही अजून.'\n'अगं पन रखमे...' भीमीचं बोलणं अर्धवटच राहिलं, कारण गावातून बौद्धवाड्यातल्या चार-पाच बाया येत होत्या. या दोघींना पाहून त्यापैकी एक म्हणाली, बया-बया- बया... किती लेट भीमे - रखमे पानी संपलं की... आता पुना टँकर उद्याच्याला येनार...'\nत्या निघून गेल्यावर भीमी म्हणाली, 'आता कसं व्हायचं रखमे... घरट्यात पान्याचा थेंब पन नाय...'\nक्षणभर विचार करीत रखमा म्हणाली, 'मी असं करते भीमे... हे तारेच्या कुंपणावरून मळ्यात जाते... तिथल्या विहिरीवरचं पाणी आणते. कदाचित तिथं\nमृगजळ/११७"} +{"id": "indic_deva_eval_000269_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000269_devanagari_page_ocr_f1bac8fbed21.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n26: न्‍\n\nदुक्‍खं, त॑ नत्थि एत्थाति नाकोति अत्थों गहेतब्बो। यथेत्थ इत्थीसद्धादीन॑ नामिकपदमाला\nयोजिता, एबं “बितक्को बिचारो आभा पदीपो”तिआदीनम्पि योजेतब्बा।\nभू, भू, भुयो। भुं, भू, भुयो। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं।\nभुया, भुयं, भूस। भोति भु, भोतियो भू, भोतियो भुयो। एत्थ च “भूरुहों भूपालो भूभुजो\nभूतल”न्ति निदस्सनपदानि।\nभूमि, भूमी, भूमियो। सेसं वित्थारेतब्बं।\nअरख्ञं, अरछ्ञानि, अरज्ञा। सेसं बित्थारेतब्बं॥\nअरडज्ञानी बुच्चति महाअरखज्ञं, “गहपतानी”ति पदमिव इनीपच्चयवसेन साधेतब्बं पर्द॑\nइत्थिलिडगडच। “अरज्ञानी”ति हि अट्ठकथापाठोपि दिस्सति।\nअरज्ञानी, अरज्ञानी, अरज्जानियो। अरज्ञानिं, अरज्जानी, अरज्ञानियो।\nअरज्ञानिया, अरज्ञानीहि, अरज्ञानीशि। अरज्जानिया, अरज्जानीनं। अरव्ञानिया,\nअरज्ञजानीहि, अरड्ञानीशभि। अरड्ञानिया, अरड्ञानीनं। अरड्ञानिया, अरड्ञानियं,\nअरज्ञानीसु। भोति अरज्ञानि, भोतियों अरज्जानी, भोतियो अरड्ञानियो।\nयथेत्थ उत्तराधिकबसेन योजिता, एवं “सभा, सभाय”न्तिआदीसुपषि योजेतब्बा। सभायन्ति\nसभा एव, लिड्गब्यत्तयवसेन पन एवं वुत्त। “सभाये वा द्वारमूले वा वत्थब्ब”न्ति पाक्ति एत्थ\nनिदस्सन।\n'पड्ञा, पड्ञा, पड्ञायो। पडञ॑, पछ्ञा, पड्ञायो। पड्ञाय।\nपज्ञाणं, पञ्ञाणानि, पञ्ञाणा। पद्ञाणं, पण्ञाणानि, पञज्ञाणे। पड्ञाणेन।\n“तथा हि भन्‍ते भगवतो सीलपड्ञाणं। साधु पड्ञाणवा नरो”तिआदीनेत्थ\nनिदस्सनपदानि।\nजआआाणं, जाणानि, आणा। ञाणं, जाणानि, आणे। जाणेन। सेसं सब्बं नेय्यं। “अग्गि अग्गिनि\nगिनि”इच्चादीसुषि उत्तराधिकवसेन नामिकपदमाला योजेतब्बा।\nको वी सादीसुपि एकक्खरेसु को वुच्चति ब्रह्मा वातो च सरीरज्च, तस्स तब्बाचकत्ते इमे\nपयोगा। सेय्यथिदं?\n“जिनेन येन आनीतं, लोकस्स अमित हित॑।\n'तस्स पादस्‍्बुजं बन्दे, कमोव्छिअलिसेवितं॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000270_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000270_indic_mozhi_deva_word_ocr_9cf135bedd4b.jpg", "ocr": "जोरजोरात"} +{"id": "indic_deva_eval_000271_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000271_indic_mozhi_deva_word_ocr_aacb906e33c2.jpg", "ocr": "एकदा"} +{"id": "indic_deva_eval_000272_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000272_devanagari_page_ocr_d5c81027cef9.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n343\n\nमज्ज संसुद्धियं। मज्जति। बाहिरं परिमज्जति। भूमिं सम्मज्जति। मज्जनं। सम्मज्जनी।\n\nनिडिजि सुद्धियं। निउजति। पनिड्जति। निडिजितुं। पनिडिजितुं। निडिजित्वा। पनिडिजित्बा।\nअय॑ पन पाछ्ठति “ततो त्व॑ं मोग्गललान उद्लायासना उदकेन अक्खीनि पनिडिजत्वा दिसा\nअनुलोकेय्यासी”ति।\n\nनिजि अब्यत्तसद्दे। निउजति।\n\nभज पाके। तिलानि भज्जति। भज्जमाना तिलानि च।\n\n'उज्ु अज्जवे। अज्जवं उजुभावो। ओजति। उजु।\n\nसज विस्सग्गपरिस्सज्जनब्भुक्किरणेसु। सजति। लोक्यं सजन्‍्तं उदकं।\n\nरूज भड्‌��े। रुजति। रुजा। रोगो। एत्थ रुजाति ब्याधि रुजन्रेन। रोगोति रुजति भज्जति\nअड्न्गपच्चड्गानीति रोगों, ब्याधियेव, यो “आतइको”तिपि “आबाधो”तिपि वुच्चति।\n\nभुज कोटिल्ले। आविपुब्बो अज्ञजत्थेसु च। उरगो भुजति। आभुजति। भिक्‍खु\nआभुजति, ऊरुबद्धासनं बन्धतीति अत्थो। महासमुद्दो आभुजति, आवट्ट्तीति अत्थो। केचि पन\n“ओसक्कती”ति अत्थं॑ वदन्ति। “वण्णदान”न्ति आभुजति, मनसि करोतीति अत्थो। मूलानि\nविभुजतीति मूलविभुजो, रथो। एत्थ च विभुजतीति छिन्दति। भोगो। भोगी। आभोगों।\nआशभुजित्वा। एत्थ च भोगोति भुजयति कुटिलं करियतीति भोगो, अहिसरीरं। भोगीति सप्पो।\n\nरजि विज्ञने। नागो दन्तेहि भूमिं रझजति। आरज्जति। एत्थ च “तथागतरडख्जितं\nइतिपी”ति नेत्तिपाक्ति निदस्सनं। तस्सत्थो “इं सिक्खत्तयसड्गहित॑ सासनत्रह्मचरिय\n'तथागतगन्धहत्थिनो महावजिरञाणसब्बज्ञुतञ्ञाणदन्तेहि रड्जितं आरडिजतं, तेभूमकधम्मानं\nआरज्जनट्ठानन्तिपि बुच्चती”ति। रज्जितन्ति हि रज्जति विज्मति एत्थाति रुड्जितं,\nरड्जनट्ठानं। “इदं नेस॑ पदक्‍्कनन्‍्त”न्तिआदिम्हि विय एतस्स सद्दस्स सिद्धि वेदितब्बा\nअधिकरणत्थसम्भवतो।\n\nविजी भयचलनेसु। ईकारन्तोयं धातु, तेनस्स सनिग्गहीतागमानि रूपानि न सन्ति।\nबेजति। बेगो। धम्मसंवेगो। संबिगो बेगेन पलायि। नदीबेगो। ऊमिवेगो, बातबेगो। एत्थ\nधम्मसंवेगोति सहोत्तप्पं आणं। “वेगो, जवो, रयो”ति इमे एकत्था। दिवादिगर्ण पन पत्तस्स\n“विज्जति संविज्जति उब्बिज्जती”ति रूपानि भवन्ति द्विगणिकत्ता।\n\n'लज्ज लज्जने। लज्जति। लज्जा। लज्जाति हिरी। या “विरिव्ठना”तिपि बुच्चति।\n\nबब्ठजि परिभोगे। वव्ठठ्जति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000273_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000273_indic_vision_bench_deva_ocr_0d5325534d2b.jpg", "ocr": "देवलांची शारदा\nगोविंद बल्लाळ देवल यांचा जन्म इ. स. १८५५ साली झाला. त्यानुसार त्यांची जन्मशताब्दी इ. स. १९५५ ला मोठ्या प्रमाणावर साजरी व्हायला हवी होती, पण ती झाली नाही. देवल १९१६ ला वारले. यानुसार त्यांची पन्नासावी पुण्यतिथी पुढच्या वर्षी येते. कृतज्ञता म्हणून ही पुण्यतिथी आपण कै. देवलांच्या नाट्यसेवेच्या फेर मूल्यमापनासह साजरी केली पाहिजे. मराठी रंगभूमी आणि मराठी नाटके या क्षेत्रात किर्लोस्कर आणि देवल ही गुरुशिष्यांची जोडी अशी आहे की, ज्यांच्या वाङ्मयीन मोठेपणाबद्दल फारसे दुमत कधीच झाले ना��ी. कोल्हटकर आणि गडकरी या दुसऱ्या गुरुशिष्यांच्या जोडीबद्दल जेवढी विवाद्यता राहिली, तेवढी सर्वमान्यता पहिल्या जोडीविषयी होती. दुसऱ्या महायुद्धाच्या पूर्वी मराठी रंगभूमीवरील सर्वांत महत्त्वाचे नाटककार म्हणून जर आपण यादी करू लागलो, तर कुणीही देवलांचे नाव विसरण्याचा संभव नाही. देवलांच्या वाङ्मयीन मोठेपणाविषयी कधीच कुणाची तक्रार नव्हती. या सर्वमान्यतेमुळेच की काय त्यांच्या वाङ्मयाचा तपशीलवार चिकित्सक अभ्यास करण्याचा फारसा प्रयत्नही झाला नाही. देवलांचे मोठेपण मान्य केले तरी त्या मोठेपणाचे स्वरूप कोणते याविषयी मात्र दुमत होण्याचा संभव आहे.\n'शारदा'कार देवल पिंडप्रकृतीने वास्तववादी नाटककार होते हे एकदा सर्वांनी गृहीत धरले आणि त्यांच्या प्रासादिक मराठीतील अकृत्रिम संवादकौशल्याची स्तुती करून बहुतेक टीकाकार थांबले. यापेक्षा खोलात जाण्याचा फारसा प्रयत्न करण्याची गरज कुणाला भासली नाही. रसिकतेच्या निकोप वाढीसाठी अशा प्रयत्नांची आवश्यकता आहे असे मला वाटते. विशेषतः मराठी रंगभूमीच्या ज्या परिस्थितीच्या चौकटीत देवल निर्माण झाले ती चौकट विसरून जाऊन देवलांचा विचार करण्याची प्रवृत्ती अलीकडे बलवान होऊ लागली आहे. एखाद्या कलावंताचे कलात्मक मोठेपण परिस्थितीच्या चौकटीवर अवलंबून असते असे कुणीच म्हणणार नाही.कलाकृतींचा दर्जा परिस्थिती-\nदेवलांची शारदा १"} +{"id": "indic_deva_eval_000274_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000274_devanagari_page_ocr_848133e21154.jpg", "ocr": "सुवण्णबिब्बोहनवग्गो 79\n\n“सत्तसद्ठिम्हितो कप्पे, पटिजग्गसनामका।\n\nसत्तरतनसम्पन्ना, सत्तासूं चकक्‍्कवत्तिनों [पटिजग्गसनासकों। सत्तरतनसम्पन्नो,\n\nचक्कवत्ती महब्बलो (स्या०)]॥340॥\n\n“पटिसस्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासन”॥344॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा चितकपूजको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nचितकपूजकत्थेरस्सापदानं सत्तमं।\n8. आलुवदायकत्थेरअपदानं\n\n“पब्बते हिमवन्तम्हि, महासिन्धु सुदस्सना।\n\nतत्थद्टसं वीतरागं, सुप्पभासं सुदस्सनं॥342॥\n\n“परमोपसमे युत्त॑, दिस्‍्वा विम्हितमानसो।\n\nआलुबं तस्स पादासिं, पसन्‍नो सेहि पाणिभि॥343॥\n\n“एकत्तिंसे इतो कप्पे, यं फलमददिं तदा।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, आलुवस्स इदं फलं॥344॥\n\n“सप्तपष्ठ्याम्‌ इतः कल्पे, पटिजग्गसनामकाः।\n\nसप्तरत्सम्पन्‍्ना:, सप्तासन्‌ चक्रवर्ततिनः॥340॥\n“भ्रतिसंविदश���चतस्र:....पे*... कृत बुद्धस्य शासनम्‌\"॥344॥\n\nइत्थ॑ स्विद्‌ आयुष्मान्‌ चितकपूजकस्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\n“पर्वते हिमबन्ते, महासिन्धु सुदर्शना।\n\nतज्ञाद्राक्ष वीतरागम्‌, सुप्रभासं सुदर्शनम्‌॥342॥\n\n“परमोपशमे युक्तम, दृष्ट्वा विस्मृतमानसः।\n\nआलुब॑ तस्मै प्रादाम्‌, प्रसन्‍नः स्वाभ्यां पाणिभ्याम्‌॥343॥\n»एकत्रिंशे इतः कल्पे, यत्‌ फलमददां तदा।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, आलुवस्य डदं फलम्‌॥344॥\n\nयहाँ से 67 वें कल्प में प्रतिजग्रस नाम वाला सप्तरत्रसम्पन्न, सात चक्रवर्ती राजा हआ॥340॥\n\nचार पटिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों औरपडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया34॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ चितकपूजक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nएक समय हिमालय पर्वत के समीप महासिन्धु नामक एक सुन्दर नदी थी, वहाँ मैंने सुन्दर शोभा से युक्त\nबीतराग भगवान्‌ सुदर्शन को देखा॥342॥\n\nउन परम शान्ति से युक्त सुदर्शन भगवान्‌ को देखकर मैंने प्रसन्न मन से अपने हाथों से उन्हें आलू प्रदान\nकिया॥343॥\n\nयहाँ से 3 वें कल्प में मैंने जो फल का दान दिया था, यह उस कर्म का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति को\nनहीं जानता॥344॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000275_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000275_indic_mozhi_deva_word_ocr_0626f48a29c1.jpg", "ocr": "दस-पाँच"} +{"id": "indic_deva_eval_000276_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000276_devanagari_digits_mixed_5ea81a35d31c.jpg", "ocr": "८२५"} +{"id": "indic_deva_eval_000277_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000277_indic_mozhi_deva_word_ocr_5bad0a967eb7.jpg", "ocr": "रामेशम"} +{"id": "indic_deva_eval_000278_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000278_hindi_handwritten_word_ocr_54d01ef504d9.jpg", "ocr": "थू।"} +{"id": "indic_deva_eval_000279_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000279_hindi_handwritten_word_ocr_c24925509380.jpg", "ocr": "बंदे"} +{"id": "indic_deva_eval_000280_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000280_devanagari_page_ocr_212cc3795da8.jpg", "ocr": "358\n\nमेत्तेयवग्गो\n\n““सतसहस्सस्स वयं [वर्य सतसहस्संव (क०)], दत्वा [कत्वा (सी\" पी०)] कारापितो मया।\nतबत्थाय महासेतु, पटिग्गण्ह महामुने॥4703॥\n““पदुसुत्तरो लोकबिदू, आहतीन पटिग्गहो।\nभिक्खुसडूघे निसीदित्वा, इमा गाथा अभासथ॥4704॥\n““यो मे सेतुं अकारेसि, पसन्‍नो सेहि पाणिशि।\nतमहं कित्तयिस्सामि, सुणाथ मम भासतो॥4705॥\n““दरितो पब्बततो वा, रुक्खतो पतितोपियं।\nचुतोपषि लच्छती ठानं, सेतुदानस्सिदं फलं॥4706॥\n““विरूव्ठहमूलसन्तानं, निग्रोधमिव मालुतो।\nअमित्ता नप्पसहन्ति, सेतुदानस्सिदं फलं॥4707॥\n7 5 झतसहसखस्य वयम्‌, दत्वा कारापितो मया।\nतवार्थाय महासेतु:, प्रतिगृह्हाण महामुने॥4703॥\n“पहमोत्त��ो लोकबिद, आहतीनां प्रतिग्रहः।\nअआभिक्षुसड्चे निसीदय, इसां गाथाम्‌ अभाषत॥4704॥\n““यो से सेतुम्‌ अकारयत्‌, प्रसन्‍नः स्वाभ्यां पाणिभ्याम्‌।\nतमहं कीर्त्तयिष्यामि, श्रुणुत मम भाषमाणस्य॥705॥\n““दरितः पर्वततो बा, वृक्षतः पतितोउपि अयम।\nच्युतोजपि लक्ष्यते स्थानम्‌, सेतुदानस्थेदं फलम्‌॥706॥\n““विखूडमुलसन्तानाम्‌, न्यग्रोधमिव मारूत:।\nअमित्रानि नप्रसह्यन्ति, सेतुदानस्येदं फलम्‌॥4707॥\nसौ हजार देकर मेरे द्वारा सेः\n\nतु का निर्माण किया गया तब महासुनि ने उठकर महासेतु को\n\nग्रहण किया॥4703॥\n\nचदह्मोत्तर लोकविद्‌, आहतियों के ग्रहणकर्ता ने भिक्षुसंघ में बैठकर इन गाथाओं को कहा-॥704॥\n“ये जिसने मेरे लिए सेतु का निर्माण प्रसन्नमन हो दोनों हाथों से किया था, मैं उसकी कीर्ति का गान गरूँगा।\n\nमेरे ऐसे बचनों को सुनो॥705॥\n\nबह दरिया से, पर्वत से, वृक्ष से पतित होने पर भी च्युतस्थान को प्राप्त नहीं होता। सेतुदान\n\nका ही सुपरिणाम है॥4706॥\n\nगे हुए वटवृक्ष की लम्बी-लम्बी शाखाओं को जैसे हवा नष्ट नहीं कर पाती वैसे ही अमित्र मुझे नहीं जीत\n\nपाता यह सेतुदान का ही सुपरिणाम है॥4707॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000281_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000281_indic_mozhi_deva_word_ocr_8160dbd83a71.jpg", "ocr": "कमला"} +{"id": "indic_deva_eval_000282_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000282_devanagari_page_ocr_f8c3ee5ccc2d.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n95\n\nएकबचनप्पयोगा पन अप्पा। सेय्यथिदं? “गरूनं दारे, धम्म॑ चरे योपि समुड्जकं चरे,\nदारड्ल्व पोसं ददमप्पकस्मि”न्ति च,\n“ये गहद्ला पु्जकरा, सीलवन्तों उपासका।\nधम्मेन दारं पोसेन्ति, ते नमस्सामि मातली”ति च,\n“परदारं न गच्छेय्यं, सदारपसुतो सिय”'\n“यो इच्छे पुरिसो होतुं, जातिं जातिं पुनप्पुनं।\nपरदारं विवज्जेय्य, धोतपादोब कदम \"न्ति च\nएबमादयो एकवचनप्पयोगा अप्पा।\nसमाहारलक्खणवसेन पनेस दारसद्दो नपुंसकलिड्गेकबचनोषि कत्थचि भवति। “आदाय\nपुत्तदारं। पुत्तदारस्स सडूगहो”इति एवं इध बुत्तप्पकारेन लिडुगठच अत्थड्च सल्लक्खेत्वा\n“पुरिसो पुरिसा”ति पबत्तं पुरिससद्नय॑ निस्साय खब्बेसं “भूतो भावको भवों”तिआदीनं\nभूधातुमयानं॑ अज्जेसड्चोकारन्तपदानं॑ नामिकपदमालासू सद्धासम्पन्नेहि कुलपुत्तेहि\nसद्धम्मद्वितिया कोसल्लमुप्पादेतब्बं।\nकि पन सब्बानि ओकारन्तपदानि पुरिसनये सब्बप्पकारेन एकसदिसानेव ह॒त्वा\nपविद्ठलानीति? न पविद्लानि। कानिचि हि ओकारन्तपदानि पुरिसनये सब्बथा पवि���्ठानि च होन्ति,\nएकदेसेन पविदष्ठानि च, कानिचि ओकारन्तपदानि पुरिसनये एकदेसेन पविद्ठानि च होन्ति,\nएकदेसेन न पविद्लानि च, कानिचि ओकारन्तपदानि पुरिसनये सब्बथा अप्पविद्वानेव। तत्र\nकतमानि कानिचि ओकारन्तपदानि पुरिसनये सब्बथा पविद्रानि च होस्ति, एकदेसेन पविद्ठानि\nच? “सरो वयो चेतो”तिआदीनि। सरोइति हि अयंसद्दो उसुसद्ससरवनअकारादिसरबाचको चे,\n'पुरिसनये सब्बथा पविट्ठो। रहदवाचको चे, मनोगणपक्खिकत्ता पुरिसनये एकदेसेन पविट्ठो।\nबयोइति सद्दो परिहानिवाचको चे, पुरिसनये सब्बथा पविट्ठो। आयुकोट्ठासवाचको चे,\nमनोगणपक्खिकत्ता पुरिसनये एकदेसेन पविट्ठो। चेतो इति सद्दो यदि पण्णत्तिवाचकों, पुरिसनये\nसब्बथा पविट्ठो। यदि पन चित्तवाचकों, मनोगणपक्खिकत्ता पुरिसनये एकदेसेन पविट्ठो।\nमसनोगणों च नाम -\nमनो बचो बयो तेजो, तपो चेतो तमो यसो।\nअयो पयो सिरो छन्‍्दो, सरो उरो रहो अहो - इमे सोव्ठस।\nइदानि यथावुत्तस्स पाकटीकरणत्थं मनसद्दादीन॑ नामिकपदमालं कथयाम -"} +{"id": "indic_deva_eval_000283_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000283_devanagari_page_ocr_0023501bbf70.jpg", "ocr": "98 अनुपिटके\n\n“यो खो, भन्‍्ते, अजानन्तो गण्हेय्य, सो बलवतरं डस्हेय्या”\"ति। “एवमेव खो, महाराज,\nयो अजानन्‍्तो पापकम्मं करोति, तस्स बहुतरं अपुष्ञं\"ति।\n\n“कल्लोसि, भन्‍्ते नागसेना”ति।\n\n38. इमिना सरीरेन देवलोकगमन!\n\nराजा आह- “भन्ते नागसेन, अत्थि कोचि, यो इमिना सरीरेन उत्तरकुरुं वा गच्छेय्य,\nब्रह्मलोक॑ वा, अच्ज॑ वा पन दीप॑\"ति?\n\n“अत्थि, महाराज, यो इमिना चातुम्महाभूतिकेन कायेन उत्तरकुरुं वा गच्छेय्य,\nब्रह्मलोक॑ वा, अज्जं वा पन दीप॑”ति।\n\n“कथं, भन्‍ते नागसेन, इमिना चातुम्महाभूतिकेन कायेन उत्तरकुरुं वा गच्छेय्य,\nब्रह्मलोक॑ वा, अज्ज॑ वा पन दीप॑\"ति?\n\n“अभिजानासि नु, त्व॑ महाराज, इमिस्सा पथविया विदत्थि वा रतनं वा\n\nकिक):\nसंस्कृतच्छाया- \"य: भदन्‍्त, अजाननू्‌ गृक्षीयात्‌ स बलवत्तरं दह्येते'\nयो5्जानन्‌ पापकर्म करोति, तस्य बहुतरमपुण्यमि\"ति।\n\"कल्योउसि, भदन्‍्त नागसेने\"ति।\n38. अनेन शरीरेण देवलोकगमनम्‌\nराजा55ह- \"भदन्त नागसेन, अस्ति कश्चिद्‌ योइनेन शरीरेणोत्तरकुरुं वा गच्छेत्‌, ब्रह्मलोक॑ वा,\nअन्य वा पुनर्द्धीपमि\"ति? \"अस्ति, महाराज, यो्नेन चातुर्महाभूतिकेन कायेनोत्तरकुरुं वा गच्छेतु,\nब्रह्मलोक॑ वा, अन्‍्य॑ वा द्वीपसि\"ति?\n\"कर्थ, भदनन्‍्त नागसेन अनेन चात॒र्��हाभृतिकेन कायेनोत्तरकरूं वा गच्छेत, ब्रह्मलोक॑ वाउसय वा\n\"लि? \"अभिजानासि नु त्वं, महाराज, अस्या: पृथिव्या वितस्ति वाउरल्लिं वा लड््घिते\" ति।\n'भन्ते! जो बिना जाने छू दे वही।\" “महाराज! इसी तरह जो बिना जाने पाप करता है, उसे अधिक\n“भन्‍्ते! आपने ठीक कहा।\"\n38. इस शरीर से देवलोकगमन\nराजा बोला- “भन्ते! क्या ऐसा कोई है जो इसी शरीर से उत्तरकुरु, ब्रह्मलोक या दूसरे चार द्वीपों में से\nकहीं जा सकता है?' लोग हैं, जो इसी शरीर से उत्तरकुरु, ब्रह्मलोक या दूसरे चार द्वीपों में\nसे कहीं जा सकता है।”\n“भन्ते! वे कैसे जाते\n“हाँ भन्‍्ते! मैं आठ हाथ भी लांघ सकता हैं।\n\n\"ति। \"एवबमेव खलु, महाराज,\n\nईपमि'\nहिन्दी-\nपाप लगता है?”\n\nहैं?” “महाराज! क्या आप पृथ्वी पर ही एक बित्ता या एक हाथ लांघ सकते हैं?\"\n'महाराज! आप आठ हाथ कैसे लांघ लेते हैं?”\n\n+ ९. उत्तरकुसकादिगमनपड्हों, भिलिन्दपज्हपालि, पू.-07"} +{"id": "indic_deva_eval_000284_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000284_indic_mozhi_deva_word_ocr_82b69fec765b.jpg", "ocr": "मक्ता"} +{"id": "indic_deva_eval_000285_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000285_indic_vision_bench_deva_ocr_eed4f3e06b03.jpg", "ocr": "खरेदी हा अन्याय आहे. एकाधिकारात फायदा कुणाचा झाला? कापूस खरेदीसाठी सहा महिन्याचा नोकरवर्ग आवश्यक तिथे १२ महिन्याचा नोकरवर्ग भरती केला. प्रशासकीय खर्च प्रचंड, कापसाची रुई करायचा खर्च जास्त, हा कापूस विकताना व्यापारी जेवढा भाव देतो तेवढा भावही एकाधिकारात मिळत नाही. हे सर्व मुंबईतल्या गिरणी मालकाच्या फायद्यासाठी चाललंय. एकाधिकार चालू व्हायच्या आधी मुंबईचा प्रत्येक गिरणीवाला ३ ते ६ महिन्यांचा कापूससाठा ठेवत होता. एकाधिकारात आठवड्याला लिलाव होतोय म्हटल्यावर १ महिना पुरेल एवढा साठा ठेवला जातो. यात व्यापाऱ्यांचा कोट्यवधीचा फायदा झाला आणि ही व्यवस्था विदर्भ मराठवाडा जोपर्यंत मुंबईशी जोडलेले असतील तोपर्यंत राहणार आहे. मुंबईत शरद पवारांचं राज्य असो की, मनोहर जोशींचं आणि दिल्लीला इंदिरा गांधीचं राज्य असो, की देवेगौडांचं राज्य असो जोपर्यंत कापूस खरेदीत सरकारचा एकाधिकार चालू राहणार आहे तोपर्यंत कापसाला स्वातंत्र्य मिळण्याची शक्यता नाही. ते जर मिळवायचे असेल तर तुमचा तुम्ही निर्णय करण्याची शक्यता तयार झाली पाहिजे.\nयापुढे तुम्हाला भिंती रंगवायच्या तर जरूर रंगवा. त्यावर स्वतंत्र मराठवाडा न लिहिता 'बळीराज्य मराठवाडा' असं लिहा.\nयेत्या २१ नोव्हेंबरला अको��्यात कापूस प्रश्नावर कापूस उत्पादकांचा मेळावा घेण्यात येणार आहे. या वेळेचे कापूस आंदोलनाचे प्रभावी हत्यार म्हणून 'बळीराज्य मराठवाडा' हे हत्यार वापरावे, यापेक्षा उत्तम हत्यार दुसरे होणार नाही.\nआपल्या साऱ्या इतिहासात मराठवाड्याचे अभिमानबिंदु शोधून काढले पाहिजेत. आमचे विद्वत्तेच्या क्षेत्रातले कोणते, कलेच्या क्षेत्रातले कोणते, राजकीय क्षेत्रातले कोणते या अभिमानस्थळांची इथल्या लोकांना एकदा जाणीव करून द्या. वर्तमानपत्रातून कार्य व्हावे, पुस्तिका काढाव्या. ही मागणी जर खऱ्या अर्थाने यशस्वी व्हायची असेल तर परभणीला या मागणीसाठी येत्या सुरेगाव हुतात्मा स्मृतीदिनी १० डिसेंबरला भरणाऱ्या बळीराज्य मराठवाडा परिषदेत या भागातल्या ज्या व्यक्तीविषयी आदराची भावना आहे डॉक्टर, वकील, खेळाडू, नट, नट्या ज्यांनी राजकीय आधार न घेता आपापल्या क्षेत्रात स्वतःचे स्थान निर्माण केले आहे ती मंडळी तुमच्या मंचावर आली तर स्वतंत्र मराठवाड्या तुमची मागणी कोणीही नाकारू शकत नाही.\n(६ नोव्हेंबर १९९६)\n♦♦\nभारतासाठी । १५२"} +{"id": "indic_deva_eval_000286_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000286_indic_mozhi_deva_word_ocr_ec6a3382b307.jpg", "ocr": "अधिक"} +{"id": "indic_deva_eval_000287_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000287_hindi_handwritten_word_ocr_73147e05713a.jpg", "ocr": "फीचर"} +{"id": "indic_deva_eval_000288_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000288_hindi_handwritten_word_ocr_3eaa43541ce6.jpg", "ocr": "क़ासिम"} +{"id": "indic_deva_eval_000289_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000289_indic_mozhi_deva_word_ocr_cdf931256210.jpg", "ocr": "पूरे"} +{"id": "indic_deva_eval_000290_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000290_hindi_handwritten_word_ocr_9d0bd5008f4a.jpg", "ocr": "विडंबना"} +{"id": "indic_deva_eval_000291_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000291_devanagari_page_ocr_0f72f593b0cf.jpg", "ocr": "सुशूतिव्गो 2०३\n\nइत्थ॑ सुदं आयस्मा पड्चसीलसमादानियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\n'पड्चसीलसमादानियत्थेरस्सापदानं चतुत्थं।\n\n5. अन्नसंसावकत्थेरअपदानं\n“सुवण्णवण्णं सम्बुद्धं, गछ्छन्तं अन्तरापणे।\nकड्चनग्धियसंकासं, बात्तिसवरलक्खणं॥958॥\n“सिद्धत्थं लोकपज्जोतं, अप्पमेय्यं अनोपमं।\nअलत्थ॑ परम पीतिं, दिस्वा दन्तं जुतिन्धरं॥959॥\n“सम्बुद्धं अभिनामेत्बा, भोजयिं त॑ महामुनिं।\nमहाकारुणिको लोके [नाथो (सी-)], अनुमोदि मम तदा॥960॥\n“तस्मि महाकारुणिके, परमस्सासकारके।\nबुद्धे चित्त पसादेत्वा, कप्पं सग्गम्हि मोदहं॥964॥\nइत्थ स्विद्‌ आयुष्मान्‌ पठ्चशीलसमादानीय: स्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nपड्चशीलसमादानियस्थविरस्यापदानं चतुर्थमा\n>सवणनण रम्बद्यम, गरटयताम ज्तरापा।\nकाउनार्चियसंकाशम्‌, द्वात्रिंशद्वरलक्षणम्‌॥958॥\n“सिद्धार्थ लोकप्रद्योतम्‌, अप्रमेयम्‌ अनुपममा\nअलमर्था परमां प्रीतिम, दृष्ट्वा दान्‍्तं झुतिन्धरम्‌॥959॥\n“मसम्बुद्धम्‌ अभिनम्य, अभोजयं त॑ महासुनिमा\nमहाकारुणिको लोके, अन्वमोदन्मां तदा॥960॥\n“तस्मिन्‌ महाकारुणिके, परमाश्वासकारके।\nबुद्धे चित्त प्रसाद्य, कल्पं स्वर्गेडमोदेज्हम्‌॥964॥\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ पश्चणीलसमादान स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\nबाजार के मध्य जाते हुए उन स्वर्णवर्ण, काश्नार्घ्य सदृश, 32 लक्षणों से युक्त और-॥958॥\nसंसार को प्रकाशित करने वाले अप्रमेय, अनुपम एवं आनन्दमूर्ति संयतेन्द्रिय तथा झुतिन्धर\nसम्बुद्ध को देखकर-॥959॥\nउन सम्बुद्ध सहासुन्ति को नमस्कार कर मैंने भोजन कराया तब लोक में महाकारुणिक ने मेरा\nअनुमोदन किया॥960॥\n\nउन महाकारुणिक एवं परम आश्चासक बुद्ध में अपने चित्त को प्रसन्न कर मैंने कल्पपर्यन्त स्वर्ग\nमें आनन्द लिया॥964॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000292_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000292_indic_mozhi_deva_word_ocr_436684dcd921.jpg", "ocr": "उसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000293_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000293_indic_mozhi_deva_word_ocr_0b3da93c19c3.jpg", "ocr": "विशेष"} +{"id": "indic_deva_eval_000294_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000294_hindi_handwritten_word_ocr_b56f01ce034d.jpg", "ocr": "स्वच्छंद"} +{"id": "indic_deva_eval_000295_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000295_hindi_handwritten_word_ocr_e11585ea5f18.jpg", "ocr": "करने"} +{"id": "indic_deva_eval_000296_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000296_devanagari_page_ocr_c3d018572d70.jpg", "ocr": "संयुत्तनिकायपालि\n\n**तम्घ तुम्हे, भिक्‍खवे, एवं पुद्ठा एवं ब्याकरमाना वुत्तवादिनो चेव मे होथ, न च म॑\nअभूतेन अब्भाचिक्खथ, धम्मस्स चानुधम्मं ब्याकरोथ, न चर कोचि सहधम्मिको दानुवादो\nगारय्ह॑ ठान॑ं आगच्छति। दुक्खस्स हि परिज्ञत्थं मयि ब्रह्मचरियं वुस्सति। सचे वो, भिक्खवे,\nअज्जतित्थिया परिब्बाजका एवं पुच्छेय्युं--\n\n“अत्थि पनावुसों, मग्गो, अत्थि पटिपदा एतस्स दुक्खस्स परिज्ञाया'ति, एवं पुद्ठा तुम्हे,\nभिकक्‍्खवे, तेसं अज्ञतित्थियानं परिब्बाजकानं एवं ब्याकरेय्याथ -- “अत्थि खो, आवुसो, मग्गो, अत्थि\n'पटिपदा एतस्स दुक्खस्स परिज्ञाया'””ति।\n\n**कतमो च, भिक्‍्खवे, मग्गो, कतमा पटिपदा एतस्स दुक्‍्खस्स परिड्ञायाति? अयमेव अरियो\nअट्गड्डगिको मग्गो, सेय्यथिदं -- सम्माविद्धि ...पे*... सम्मासमाधि। अयं, भिक्‍्खवे, मग्गो, अयं पटिपदा\n'एतस्स दुक्‍्खस्स परिड्जायाति। एवं पुद्ठा तुम्हे, भिक्‍ख���े, तेसं अज्ञतित्थियानं परिव्बाजकानं एवं\nब्याकरेय्याथा''ति। पड्चमं।\nल्स्कृतच्छाया) “तद्धि यूयम्‌, भिक्षव:! एबं पृष्ा एवं ब्याकुर्बाण: उक्तबादिनश्चैब मे भवथ, न च माम्‌\nअभूतेन अभ्याचक्षध्वे, धर्मस्य चानुधर्म ब्याकुरुथ, न च कश्चित्‌ सहधर्मिको वादानुवादो गह्माँ स्थानम्‌\nआगच्छति। दुःखस्य हि परिज्ञानार्थ मयि ब्रह्मचर्यम्‌ उष्यते। स चेत्‌ वः, झिक्षव:! अन्यतीर्थिकाः\nपरिव्राजका एवं पृच्छेयु:- “अस्ति पुनः आयुष्मन्त:, मार्ग, अस्ति प्रतिषद एतस्य दुःखस्य\nपरिज्ञाबै'इति, एवं पृष्ठा वयम्‌, भदन्‍्त! तेषाम्‌ अन्यतीर्थिकानां परित्राजकानाम्‌ एवं व्याकुर्यात- अस्ति\nखलु आयुष्मन्त:, मार्ग:, अस्ति प्रतिपदा एतस्थ दुःखस्य परिज्ञायै'इति ।\n\n*कतमश्य, भिक्षब:! मसार्ग:, कतमा प्रतिपदा एतस्य दु:खस्य परिज्ञायै'डति,? अयमेब आर्य:\nअष्टाहिगको मार्ग:, तद्यथेदम्‌-- सम्यग्दृष्टि: ...पे*... सम्यक्समाधि:। अयम्‌, झिक्षब:! सार्ग:, इय॑\nप्रतिषद एतस्य दु:खस्य परिज्ञायै इति। एवं पृष्ठा: यूयम्‌, भिक्षव:! तेषाम्‌ अन्यतीर्थिकानां\n\nपरिब्राजकानाम्‌ एवं व्याकुर्यात'*इति। पडचमम्‌।\nकहेनदी) “जल्ते! इस प्रकार उत्तर देकर हम भगवान्‌ के अनुकूल तो कहते हैं ऐसा कह कर हम असत्य तो नहीं\n\nबोलते, फिर हम यह सब धर्मानुसार ही कहते है इस उत्तर से आप की किसी प्रकार की निन्‍दा तो नहीं होती?\nअिक्षुओं! इस प्रकार उत्तर देकर तुम मेरे अनुकूल ही कहते हो ...पूर्ववत्‌... मुझ पर कोई झूठी बात नहीं\nपते हो। भिक्षुओं! दुःख की पहचान के लिये ही मेरे शासन में ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।\nभिक्षुओं! यदि तुमसे दूसरे मत वाले साधु पूछें, **आवुस! दुःख की पहचान के लिये क्‍या मार्ग है?\nकहना, “हा आबुस ! दुःख की पहचान के लिये मार्ग है।'*\nभशिक्षुओं! इस दुःख की पहचान के लिये कौन सा मार्ग है? यही आर्य आष्टांगिक मार्ग। जो, सम्यक्‌-दृष्टि\n...पूर्ववत्‌... सम्यक्‌ समाधि। भिक्षुओं! इस दुःख की पहचान के लिये यही मार्ग है। भिक्षुओं! दूसरे मत के साधु के\nअ्रश्न का उत्तर तुम इसी प्रकार देना।\n\nतो तुम"} +{"id": "indic_deva_eval_000297_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000297_indic_vision_bench_deva_ocr_7d34eb1c9200.jpg", "ocr": "गोदान:149\nका अंग नहीं है। मालती ने तो आज के लिए नए फैशन की साड़ी निकाली थी, नए काट के\nजंपर बनवाए थे। और रंग-रोगन और फूलों से खूब सजी हुई थी, मानो उसका विवाह हो रहा हो। वीमेंस लीग में इतना समारोह और कभी न हुआ था। डाक्टर मेहता अकेले थे, फिर भी देवियों के दिल कांप रहे थे। सत्य की एक चिंगारी असत्य के एक पहाड़ को भस्म कर सकती है।\nसबसे पीछे की सफ मिर्जा और खन्ना और संपादकसी भी विराज रहे थे। रायसाहब\nभाषण शुरू होने के बाद आए और पीछे खड़े हो गए।\nमिर्जा ने कहा-आ जाइए आप भी, खड़े कब तक रहिएगा?\nरायसाहब बोले—नहीं भाई, यहां मेरा दम घुटने लगेगा।\n'तो मैं खड़ा होता हूं। आप बैठिए।'\nरायसाहब ने उनके कंधे दबाए-तकल्लुफ नहीं, बैठे रहिए। मैं थक जाऊंगा, तो आपको\nउठा दूंगा और बैठ जाऊंगा, अच्छा मिस मालती सभा नेत्री हुई। खन्ना साहब कुछ इनाम दिलवाइए।\nखन्ना ने रोनी सूरत बनाकर कहा-अब मिस्टर मेहता पर निगाह है। मैं तो गिर गया।\nमिस्टर मेहता का भाषण शुरू हुआ-\n'देवियों, जब मैं इस तरह आपको संबोधित करता हूं, तो आपको कोई बात खटकती\nनहीं। आप इस सम्मान को अपना अधिकार समझती हैं, लेकिन आपने किसी महिला को पुरुषों के प्रति 'देवता' का व्यवहार करते सुना है? उसे आप देवता कहें, तो वह समझेगा, आप उसे\nबना रही हैं। आपके पास दान देने के लिए दया है, श्रद्धा है, त्याग है। पुरुष के पास दान के लिए क्या है? वह देवता नहीं, लेवता है। वह अधिकार के लिए हिंसा करता है, संग्राम करता है, कलह करता है...'\nतालियां बजीं। रायसाहब ने कहा-औरतों को खुश करने का इसने कितना अच्छा ढंग\nनिकाला।\n'बिजली' संपादक को बुरा लगा-कोई नई बात नहीं। कितनी ही बार यह भाव व्यक्त\nकर चुका हूं।\nमेहता आगे बढ़े-इसलिए जब मैं देखता हूं, हमारी उन्नत विचारों वाली देवियां उस दया\nऔर श्रद्धा और त्याग के जीवन से असंतुष्ट होकर संग्राम और कलह और हिंसा के जीवन की ओर दौड़ रही हैं और समझ रही हैं कि यही सुख का स्वर्ग है, तो मैं उन्हें बधाई नहीं\nदे सकता।\nमिसेज खन्ना ने मालती की ओर सगर्व नेत्रों से देखा। मालती ने गर्दन झुका ली।\nखुर्शेद बोले-अब कहिए। मेहता दिलेर आदमी है। सच्ची बात कहता है और मुंह पर।\n'बिजली' संपादक ने नाक सिकोड़ी-अब वह दिन लद गए, जब देवियां इन चकमों\nमें आ जाती थीं। उनके अधिकार हड़पते जाओ और कहते आओ, आप तो देवी हैं, लक्ष्मी हैं, माता हैं।\nमेहता आगे बढ़े-स्त्री को पुरुष के रूप में, पुरुष के कर्म में रत देखकर मुझे उसी तरह\nवेदना होती है, जैसे पुरुष को स्त्री के रूप में, स्त्री के कर्म करते देखकर। मुझे विश्वास है, ऐसे पुरुषों को आप अपने विश्वास और प्रेम का पात्र नहीं स���झतीं और मैं आपको विश्वास दिलाता"} +{"id": "indic_deva_eval_000298_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000298_hindi_handwritten_word_ocr_5ab9a30b2c38.jpg", "ocr": "गुरुर्ब्रह्मा"} +{"id": "indic_deva_eval_000299_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000299_devanagari_page_ocr_7daab19cde2a.jpg", "ocr": "आलम्बणदायकवरग्गो\nआलम्बणदायकबग्गो कह\n\n“एकत्तिंसे इतो कप्पे, यं कम्ममकरिं तदा।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, वन्‍्दनाय इदं फलं॥452॥\n\n“चलुवीसतिकप्पम्हि, विकतानन्दनामको।\n\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कबत्ती महब्बलो॥453॥\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥454॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा एकवन्दनियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\n\nएकबन्दनियत्थेरस्सापदानं दसमं।\nआलम्बणदायकवरग्गो तेवीसतिमो।\n\nतस्योद्वान॑ -\n\nआलम्बणडच अजिनं, मंसदारक्खदायको।\n\nअब्याधि अड्कोलं [वकुलं (स्या\"), बकुकं (क*)] सोण्णं, मिउजआवेव्णवन्दनं।\n\nपड्चपञ्ञास गाथायो, गणिता अत्थदस्सिभि॥\n\nफकज्रिशे इतः कल्पे, यत्‌ कर्माकरव तदा।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, वन्दनाया इ्दं फलम्‌॥52॥\n“चतुर्विशतितमे कल्पे, बिकृतानन्दनामक:।\nसप्तरलसम्पन्नः, चक्रवर्त्ती महाबलः॥453॥\n“भ्रतिसंविदश्वतस््र:...पे*... कृत बुद्धस्य शासनम्‌\"॥54॥\nउत्थ स्विंद आयप्मान एकबन्दनीयस्थबिर टसा गाथा अभापिशेति।\n\nतस्योदानम्‌ -._ आलस्वनब्च अजिनम्‌, मांसदारक्षदायकम।\n\nअब्याधि अड्कोल॑ स्वर्णम्‌, मिज्जावेलवन्दनम्‌।\nपड्चपड्जाशद्‌ गाथा, गणिता अर्थदर्शिभिः॥\n\nयहाँ से 3 बें कल्प में मैंने जो कर्म किया था उसी बन्दना का यह सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति को नहीं\nजानता॥452॥\n\nयहाँ से 24 वें कल्प में एक विकतानन्द नामक ससरलसम्पन्न, चक्रवर्ती, महाबलशाली राजा हुआ॥453॥\n\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥454॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ एकवन्दनीय स्थविर ने इन गाथाओं\n\nको कहा-\n\nउनके उदान- आलम्बन, अजिन, मांसदारक्षदायक अब्याध, अड्-कोल,\nइक्यावन गाथायें यहाँ अर्थदर्शियों के द्वारा दर्शायी गयी हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000300_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000300_indic_vision_bench_deva_ocr_df38cbb7eee6.jpg", "ocr": "\nउजाडलं तरी बिघडणार नाही; पण भगाडण्याची धांदल थोडी मंदच हवी. इमारत रंगवणं रात्रीत होतं, पण पिकासोचं चित्र तयार व्हायला कधी-कधी वर्ष गेली. सारवणावरची रांगोळी नि प्लास्टिक छापाची चिकटणारी स्टीकर रांगोळी यातला फरक हा निसर्ग नि कृत्रिमतेचं अंतर स्पष्ट करणारा आहे. बर्गर की ��ाकरी? पूर्व की पश्चिम? असं द्वंद्व माझ्या मनात नाही. मला पूर्व आणि पश्चिमेच्या समन्वयानं जाता, जगता येतं की नाही असं विचाराचंय. थोडा विचार करा म्हणजे कळेल की घाईचा घात हा भरून न येणारा तोटा असतो. उलटपक्षी संयमी चाल ही उशिरा यश देणारी असली तरी ती चिरंजीवी, चिरस्थायी असते. हे आपण लक्षात ठेवायला हवं. सन २००७ कडे जात असताना माझ्या असं लक्षात आलंय की गेल्या सहा वर्षांत आपणास विस्तारभयानं पछाडलंय.\n◼◼\nजाणिवांची आरास/११६"} +{"id": "indic_deva_eval_000301_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000301_devanagari_page_ocr_f5a3f8792dc8.jpg", "ocr": "अभिधम्मपिटके\n26\n\nसेक्‍्खा धम्मा... असेक्खा धम्मा... महग्गता धम्मा चतूहि खन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि द्वीहि धातूहि\nसकुगहिता। कतिहि असझगछधिता? एकेन खन्‍्धेन दसहायतनेहि सोब्ठसहि धातृह्ि असदगहिता।\n\n९४. नेव दस्सनेन न भावनाय पहातब्बा धम्मा... नेव दस्सनेन न भावनाय पहातब्बहेतुका\nधम्मा... नेवाचयगामिनापचयगामिनो धम्मा... नेवसेक्खनासेक्खा धम्मा असड्खतं खन्‍्धतो ठपेत्वा\nपड्चहि खनन्‍्धेहि द्वादसहायतनेहि अट्लारसहि धातूहि सडुगहिता। कतिहि असड्गहिता? न केहिचि\nखनन्‍्धेहि न केहिचि आयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्न्गहिता।\n\n९५. परित्ता धम्मा पज्चहि खन्धेहि द्वादसहायतनेहि अट्ठलारसहि धातूहि सड्गहिता। कतिहि\nअसड्गहिता? न केहिचि खन्धेहि न केहिचि आयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्गहिता।\n\n९६. अप्पमाणा शधम्मा... पणीता धम्मा असडूखतं खन्‍धतो ठपेत्वा चतूहि खन्‍्धेहि\nद्वीहायतनेहि\nत्ल.)- बैक्ष्या: बम... अजेक्ष्याए धर्माः\nधातुभ्यां. सड्ग्रहीता:। कतिभि:\nअसड्ग्रहीता:।\n\n९४. नैब दर्शनेन न भावनया प्रह्ातब्या धर्मा:... नैव दर्शनेन न भावनया प्रहातब्यहेतुका धर्माः\nनैबाचयगामिनापचयगामिन: धर्माः ... नैवशैक्ष्यानाशैक्ष्या: धर्माः असंस्कृतं स्कन्‍्धत: हित्वा पड्चभि: स्कन्ः\nद्वादशायतनै: अष्टादशभि: धातुज्ि: सड्ग्रहीता:। कतिभि: असझुिपग्रहीता:? न कैश्वित्‌ स्कन्‍थै: न कैश्वित्‌\nआयतनै: न कैश्वित्‌ च॒ धातुभि: असड्ग्रहीताः।\n\n९५. प्ररित्ताधर्मा: पठ्चभि: स्कन्‍्धै: द्वादशायतनै: अष्टादशजि: धातुभि: सड्ग्रहीता:। कतिभि:\nअसइग्रहीताः? न कैश्वित्‌ स्कन्थै: न कैश्वित्‌ आयतनै: न कैश्वित्‌ च॒ धातुजि: असडत्ग्रहीताः।\n\n९६. अप्रमाणा धर्माः... प्रणीता धर्माः असंस्कृतं स्कन्‍्धत: हित्वा चतुर्भि: स्कन्‍्धै: द्वाभ्याम्‌\n���हलका घन तक संचय के विनाश के कारण उत्पन्न धर्म ) ....., शैक्ष्य (आर्य पुद्ूलों के ७ प्रकार के चित्त ) धर्म ...\nअशैक्ष्य धर्म ....., महद्गत (महान आकार वाले चित्त) धर्म चार स्कन्‍्धों, दो आयतनों और दो धातुओं में संग्रहीत हैं।\nकितनों से असंग्रहीत हैं? एक स्कन्ध, दस आयतनों और सोलह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n«४, न दर्शन से न भावना से प्रहाण करने योग्य धर्म ....., न दर्शन से न भावना से प्रहाण हेतुक धर्म ......\nआचयगामिन न अपचयगामिन धर्म ....., न शैक्य न अशैक्ष्य धर्म ....., असंस्कृत निर्वाण को स्कन्ध के रूप में छोड़कर,\nपाँच स्कन्‍्धों, बारह आयतनों और अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों से असंग्रहीत हैं? न किन्‍्हीं स्कन्धों, न किन्हीं\n\n. महद्वताः धर्माः चतुर्जि: स्कन्‍्चै: द्वाभ्याम्‌ आयतनाभ्यां द्वाभ्याम्‌\n: असडुग्रहीताः? एकेन स्कन्‍्धेन दशायतनै: पोडशज्ि: धातुभिः\n\nआयतनों और न किन्हीं भी धातुओं में असंग्रहीत हैं।\nआकार वाले धर्म) पाँच स्कन्ध्रों, बारह आयतनों और अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं।\nधों, न किन्हीं आयतनों और न किन्‍्हीं भी धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n«५. प्ररित्त धर्म (अल्प\nकितनों से असंग्रहीत हैं? न किन्हीं स्कन्‍्थ\n\n६. अप्रसाण धर्म (अपरिमेय आकार वाले).\nचार स्कन्‍्धों, दो आयतनों और\n\n५ प्रणीत धर्म असंस्कृत निर्वाण को स्कन्ध\n\nमें छोड़कर,"} +{"id": "indic_deva_eval_000302_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000302_hindi_handwritten_word_ocr_b1cfa73e7e39.jpg", "ocr": "घिनोने"} +{"id": "indic_deva_eval_000303_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000303_indic_vision_bench_deva_ocr_03ecb8ae03e8.jpg", "ocr": "महाराष्ट्रातील १०० सामान्य पक्षी\nडॉ. राजू कसंबे : 2015\nसामान्य लावा\n(छाया: डॉ. राजू कसंबे)\nमराठी नावः\nसामान्य लावा.\nइंग्रजी नावः\nCommon Quail.\nशास्त्रीय नावः\nCoturnix coturnix.\nलांबीः\n२० सेंमी.\nओळखः\nपाठ फिक्कट तपकिरी असून त्यावर बाणासारख्या तांबूस रेषा असतात. खालील बाजू पांढरट किरमिजी असते. नराच्या गळ्यावर बरेचदा नांगराच्या आकाराची काळी खुण असते. मादीच्या गळ्यावर ही खुण नसते.\nआवाज:\nवारंवार उच्चारलेली 'व्हीट, व्हीट-टीट' अशी मंजुळ शिळ.\nव्याप्ती:\nस्थलांतरित संपूर्ण महाराष्ट्र.\nअधिवासः\nगवताळ प्रदेश तसेच शेतीप्रदेशात दिसतो.\nखाद्यः\nधान्य, गवताच्या बिया, वाळवी इ.\n४४"} +{"id": "indic_deva_eval_000304_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000304_indic_mozhi_deva_word_ocr_6bcc4e90ad8c.jpg", "ocr": "थोडीसुद्धा"} +{"id": "indic_deva_eval_000305_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000305_hindi_handwritten_word_ocr_5a07d02cc909.jpg", "ocr": "दुकाने"} +{"id": "indic_deva_eval_000306_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000306_indic_vision_bench_deva_ocr_dd70fb23b86c.jpg", "ocr": "[१२]\nरागता का व्याख्यान कर, पाँचवे पध में गुणगान करने से पापकर्मों का क्षय कहा गया है, छठे पद्यमें उनसे उपदिष्ट धर्म तथा उसके पालन का उपदेश दिया गया है। और सातवे में उपयुर्क्त देव की शरण में आने से ही मनुष्य को सुख शांति मिल सकती है ऐसा कहा है। जैन धर्म में सिद्ध परमेष्ठी के आठ गुण माने गये है, इसलिए सिद्धस्तुति करते हुए आठवें पद्य में उनके आठ गुणों का निर्देश किया गया है।\nजैनधर्म मे पृथ्वी वातवलय से वेष्टित बतलाई गई है। कुरल में\nभी पच्चीसवे अध्याय के पांचवें पद्य में दया के प्रकरण में कहा गया है—'क्लेश दयालु पुरुष के लिए नहीं है, भरी पूरी वायु वेष्ठित पृथ्वी इस बात की साक्षी है।'\nसत्य का लक्षण कुरलमें वही कहा गया है जो जैनधर्म को मान्य\nहै—'ज्यों की त्यों बात कहना सत्य नहीं है किंतु समीचीन अर्थात् लोक हितकारी बात का कहना ही सत्य है, भले ही वह ज्यों त्यों न हो।'\nनहीं किसी भी जीव को जिससे पीड़ा कार्य।\nसत्य वचन उसको कहे, पूज्य ऋषीश्वर आर्य॥१॥\nवैदिक पद्धति में जब वर्णव्यवस्था जन्ममूलक है तब जैन पद्धति\nमें वह गुणमूलक है। कुरल में भी गुणमूलक वर्णव्यवस्था का वर्णन\nहैं—'साधु-प्रकृति-पुरुषों को ही ब्राह्मण कहना चाहिए, कारण वे ही लोग सब प्राणियों पर दया रखते है।'\nवैदिक वर्णव्यवस्था में कृषि शूद्र का हो कर्म है, तब कुरल अपने\nकृषि अध्याय में उसे सबसे उत्तम आजीविका बताता है, क्योंकि अन्य लोग पराश्रित तथा परपिण्डोपजीवी है। जैन शास्त्रानुसार प्रत्येक वर्ण वाला व्यक्ति कृषि कर सकता है।\nउनका जीवन सत्य जो, करते कृषि उद्योग।\nऔर कमाई अन्य की, खाते बाकी लोग॥\nजैन शास्त्रों में नरकों को 'विवर' अर्थात बिलरूप में तथा मोक्ष\nस्थान को स्वर्गलोक के ऊपर माना है। कुरल में ऐसा ही वर्णन है, जैसा कि उसके पद्यों के निम्न अनुवाद से प्रकट है—\nजीवन में ही पूर्व से, कहे स्वंय अज्ञान।\nअहो नरक का छुद्र बिल, मेरा भावी स्थान॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000307_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000307_indic_mozhi_deva_word_ocr_025ef74eb06d.jpg", "ocr": "उदाहरण"} +{"id": "indic_deva_eval_000308_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000308_hindi_handwritten_word_ocr_e46417a73d1b.jpg", "ocr": "मैम"} +{"id": "indic_deva_eval_000309_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000309_indic_vision_bench_deva_ocr_1f5dcc74d811.jpg", "ocr": "गोदान : 245\nखेलने वाले जीव थे, मगर नोहरी भोला के स्वभाव से परिचित हो चुकी थी।\nभोला मिन्नत ��रके बोला-देख नोहरी, दिक मत कर। अब तो वहां बहुएं भी नहीं हैं। तेरे ही हाथ में सब कुछ रहेगा। यहां मजूरी करने से बिरादरी में कितनी बदनामी हो रही है, यह सोच।\nनोहरी ने ठेंगा दिखाकर कहा-तुम्हें जाना है जाओ, मैं तुम्हें रोक तो नहीं रही हूं। तुम्हें बेटे की लातें प्यारी लगती होंगी, मुझे नहीं लगतीं। मैं अपनी मजदूरी में मगन हूं।\nभोला को रहना पड़ा और कामता अपनी स्त्री की खुशामद करके उसे मना लाया। इधर नोहरी के विषय में कनबतियाँ होती रहीं-नोहरी ने आज गुलाबी साड़ी पहनी है। अब क्या पूछना है, चाहे रोज एक साड़ी पहने। सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का। भोला की आंखें फूट गई हैं क्या?\nसोभा बड़ा हंसोड़ था। सारे गांव का विदूषक, बल्कि नारद। हर एक बात की टोह लगाता रहता था। एक दिन नोहरी उसे घर में मिल गई। कुछ हंसी कर बैठा। नोहरी ने नोखेराम से जड़ दिया। सोभा की चौपाल में तलबी हुई और ऐसी डांट पड़ी कि उम्र-भर न भूलेगा।\nएक दिन लाला पटेश्वरी प्रसाद की शामत आ गई। गमिर्यों के दिन थे। लाला बगीचे में बैठे आम तुड़वा रहे थे। नोहरी बनी-ठनी उधर से निकली। लाला ने पुकारा-नोहरा रानी, इधर आओ, थोड़े से आम लेती जाओ, बड़े मीठे हैं।\nनोहरी को भ्रम हुआ, लाला मेरा उपहास कर रहे हैं। उसे अब घमंड होने लगा था। वह चाहती थी, लोग उसे जमींदारिन समझें और उसका सम्मान करें। घमंडी आदमी प्रायः शक्की हुआ करता है। और जब मन में चोर हो तो शक्कीपन और भी बढ़ जाता है। वह मेरी ओर देखकर क्यों हंसा? सब लोग मुझे देखकर जलते क्यों हैं? मैं किसी से कुछ मांगने नहीं जाती। कौन बड़ी सतवंती है। जरा मेरे सामने आए, तो देखूं। इतने दिनों में नोहरी गांव के गुप्त रहस्यों से परिचित हो चुकी थी। यही लाला कहारिन को रखे हुए हैं और मुझे हंसते हैं। इन्हें कोई कुछ नहीं कहता। बड़े आदमी हैं न। नोहरी गरीब है, जात की हेठी है, इसलिए सभी उसका उपहास करते हैं। और जैसा बाप है, वैसा ही बेटा। इन्हीं का रमेसरी तो सिलिया के पीछे पागल बना फिरता है। चमारियों पर तो गिद्ध की तरह टूटते हैं, उस पर दावा है कि हम ऊंचे हैं।\nउसने वहीं खड़े होकर कहा-तुम दानी कब से हो गए लाला। पाओ तो दूसरों की थाली की रोटी उड़ा जाओ। आज बड़े आमवाले हुए हैं। मुझसे छेड़ की तो अच्छा न होगा, कहे देती\nओ हो! इस अहीरिन का इतना मिजाज। नोखेराम को क्या फांस लिया, समझती है सारी दुनिया पर उसका राज है। बोले-तू तो ऐसी ति���क रही है नोहरी, जैसे अब किसी को गांव में रहने न देगी। जरा जबान संभालकर बातें किया कर, इतनी जल्द अपने को न भूल जा।\n'तो क्या तुम्हारे द्वार कभी भीख मांगने आई थी?'\n'नोखेराम ने छांह न दी होती, तो भीख भी मांगती।'\nनोहरी को लाल मिर्च-सा लगा। जो कुछ मुंह में आया बका-दाढ़ीजार, लम्पट, मुंह-झौंसा और जाने क्या-क्या कहा और उसी क्रोध में भरी हुई कोठरी में गई और अपने बरतन-भांड़े निकाल-निकालकर बाहर रखने लगी।\nनोखेराम ने सुना तो घबराए हुए आए और पूछा-वह क्या कर रही है नोहरी, कपड़े-लत्ते क्यों निकाल रही है? किसी ने कुछ कहा है क्या?"} +{"id": "indic_deva_eval_000310_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000310_hindi_handwritten_word_ocr_64589d2c93bf.jpg", "ocr": "पाएंगीं"} +{"id": "indic_deva_eval_000311_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000311_hindi_handwritten_word_ocr_2d5a08170c29.jpg", "ocr": "जहाज़"} +{"id": "indic_deva_eval_000312_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000312_indic_vision_bench_deva_ocr_1c04144b6a37.jpg", "ocr": "आम १९\nउबरा, ओबरा ३१\nआमेर ५६\nउम्मेदसिंहजी महेता ६४, १०२\nआयतन ३०\nउरमूल ट्रस्ट ९५, १०५\nआर ३०\nउरैंड ३९\nआरकाट ७७\nउस्ताद निज़ामुद्‌दीन ९७, १०१, १०५\nआर-पार ३०\nए॰ सी॰ लायल ९४\nआरंग ७६\nएच॰ एच॰ विल्सन ९६\nआव ३०\nएच॰ एल॰ वधवा ९९\nआसफजहाँ २२\nएम॰ जी॰ भट्‌ट ९१\nआसार १३, १५\nएरी २५, ९५, ९६\n'आसारूस सनादीद' सन् १८६४ ९९\nएरी वार्यम् २५\nआसूताल ६१\n'ऐनल्स एंड एन्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान'\n⁠\n९६, ९९\nआहर २५\nओड़, औड़, ओढ़न, ओढ़ही, ओढ़िया,\n⁠\nओरही २३, २४, ९४, ९५\nइटारसी ३८\nओम थानवी ९०, ९७, १०२\nइलाहाबाद ८९, ९२\nओरछा ४०\n'इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्चरल फ्रीडम' ९०\nकच्छ १९, ७८\n'इंडियन साइंस एंड टेक्नॉलॉजी इन एटीन्थ\n⁠\nसेंचुरी' ८९\nकजलिया ७६, ८६\nइंद्र १९, ७८\nकर्णझील ८९\nइंद्रजीत राय ९५\nकर्नल टॉड ९६, ९९\nइंदिरा नहर २४, ९५\nकर्नल बी॰ एल॰ वर्मा १०६\nइंदिरा नहर प्राधिकरण ६६\nकर्नाटक २५, ९०, ९१\nइंदौर ८४, ८५, १००, १०८\nकर्नाटक राज्य योजना विभाग ९०\nईस्ट इंडिया कंपनी ८९\nकपिल मुनि २०\nईसरलालजी का तालाब ६९\nकपा, कापू ९७\nउच्छ्‌वास ३१\nकमल, कुमुदिनी २१\nउज्जैन ५१\nकरनाल ८९\nउड़ाही ४४, ४५\nकराची १८\nउड़ीसा २०, २३, २४, ४३, ९४, ९५\nकल्याण ब्रह्म १०६\nउत्तर कन्नड़ २५\nकलानंद मणि ९५, ९६, १०६\nउत्तर प्रदेश २३, २४, ३१, ३९, ४०, ४२,\n⁠\n४९, ५०, ९६\nकाजल पंड्‌या ९५\nउत्तरा १२\nकाजल माता ७८\nउत्तुंग ऋषि ७१\nकासार ५३\nउदयपुर १०२\nकालिया २३\nउदित सिंह ४०\nकालिया सोत २३\nउफरेंखाल ५१\n११०\nआज भी खरे हैं\n⁠\nतालाब\n⁠"} +{"id": "indic_deva_eval_000313_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000313_indic_mozhi_deva_word_ocr_af5ea0b14990.jpg", "ocr": "रही"} +{"id": "indic_deva_eval_000314_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000314_devanagari_page_ocr_d69494af379e.jpg", "ocr": "_एकपदुमियवरग्गो बढ\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे०... कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥867॥\nइत्थं सुदं आयस्मा एकञ्जलियो थेरो इमा गाथायों अभासित्थाति।\nएकउजलियत्थेरस्सापदान दसम॑।\nएकपदुमियबग्गों पछचतिंसतिमों।\nतस्सुद्दानं -\nपदुसी उप्पलमाली, धजो किड्कणिकं नं [किड्कणिको नव्ठो 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"ocr": "सद्नीतिप्पकरणं\n\n384-\n\nतत्र गरुव्ठोति गरुं लाति आददाति गण्हातीति गरुव्ठो, यो “सुपण्णो, दिजाधिपो, नागारि,\nकरोटी\"ति च बुच्चति। सीहव्ठोति सीह॑ लाति आददाति गण्हातीति सीहव्छो, पुब्बपुरिसो।\nतब्बंसे जाता एतरहि सब्बेषि सीहव्ठा नाम जाता।\n\nराहलोतिआदीसु पन राष्टु बिय लाति गण्हातीति राहुलो, को सो? सिक्खाकामो आयस्मा\nराहुलभद्दो बुद्धपुत्तो। तस्स हि जातदिवसे सुद्धोदनमहाराजा “पुत्तस्स मे तुट्ठिं निवेदेशा”ति\nउय्याने कीव्ठल्तस्स बोधिसत्तस्स सासन॑ पहिणि। बोधिसत्तो तं सुत्वा “राह जातो बन्धन\nजात”न्ति आह। पुत्तस्स हि जायनं राहग्गहो विय होति। तण्हाकिलिस्सनतापादनतो बाव्ठहेन च\nसड्खलिकादिबन्धनेन बन्धं विय होति मुच्चितुं अप्पदानतोति “राहु जातो बन्धनं जात”न्ति\nआह। राजा “किं मे पुत्तो अवचा\"ति पुच्छित्वा त॑ं वचन सुत्वा “इतो पद्ठाय मे नत्ता 'राहुलो'\nत्वेव होत्‌\"ति आह, ततो पढ़ाय कुमारो राहलो नाम जातो।\n\nमहापदानसुत्तटीकायडिह ��राह जातो”ति एत्थ “राहृति राहग्गहो”ति बुत्तं, त॑ पन\n“लि वचनस्सत्थ पाकर्ट अधिष्पायत्थवसेन वुत्त। न हि केवलो “राह्र”ति सद्दो\n“राहरग्गहो \"ति अत्थं बदति, अथ खो जातसदइसम्बन्ध॑ लभित्वा बदति। तथा हि “राहु जातो”ति\nबोधिसत्तेन वुत्ततचनस्स “राहग्गहों जातो”ति अत्थौ भवति, तस्मा सुद्धोदनमहाराजा “मम\nनत्ता राह विय लातीति राहुलोति वत्तब्बो\"ति चिन्तेत्वा “राहुलोत्वेव होत्‌\"ति आहाति दट्ठब्बं।\n\nकेचि पन “राहुलो जातो बन्धनं जात”न्ति पठन्ति, कत्थच्ि पोत्थके च लिखन्ति, तं॑ न\nसुन्दरं, अत्थस्स अयुत्तितो टीकाय च सद्धिंविरोचतों। न हि “राहलो”ति कुमारस्स नाम॑ पठम॑\nउप्पन्नं, पच्छायेव पन उप्पन्नं अय्यकेन दिन्नत्ता, तस्मा तदा बोधिसत्तेन “राहुलो जातो”ति\nवक्तुं न युज्जति। यथा हि अनभिसित्ते अराजिनि पुग्गले “ 'लि वोहारो नप्पवत्तति।\nटीकायड्च “राहति राहग्गहो”ति वुत्तं। अथापि तेसं सिया “राहलो जातो बन्धनं जात”न्ति\nपदस्स विज्जमानत्ता एब टीकाय॑ “राहग्गहो”ति भावबसेन लासद्वेन समानत्थो आदानत्थो\nगहसद्दो बुत्तोति एवम्पि नुपपज्जति, “राहुलानं जात॑ बन्धनं जात”न्ति पाठस्स बत्तब्बत्ता।\nराहलोति हि इदं पदं “सीहव्ठो”ति पद विय दब्बवाचकं, न कदाचिपि भाववाचकं, तस्मा\n“राहुलो जातों बन्धनं जात”न्ति एतं एकच्चेहि दुरोपितं पाठं अग्गहेत्वा “राह जातो बन्धनं\nजात\"न्ति अयमेव पाठो गह्ेतब्बो, सारतो च पच्चेतब्बो सुपरिसुद्धेसु अनेकेसु पोत्थकेसु दिद्वत्ता,\n'पोराणेहि च गम्भी रसुखुमजाणेहि आचरियपचारियेहि पठितत्ता।\n\n'महाराजा'"} +{"id": "indic_deva_eval_000317_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000317_indic_mozhi_deva_word_ocr_6bc3786a3902.jpg", "ocr": "एकच"} +{"id": "indic_deva_eval_000318_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000318_indic_mozhi_deva_word_ocr_f6b38aaa1d56.jpg", "ocr": "पुढे"} +{"id": "indic_deva_eval_000319_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000319_indic_vision_bench_deva_ocr_86eb18927a76.jpg", "ocr": "गोदान : 199\nहुए थे। और गोबर चमाचम बूट पहने था। साफ-सुथरी धारीदार कमीज, संवारे हुए बाल, पूरा बाबू साहब बना हुआ। फटेहाल गोबर और इस परिष्कृत गोबर में बड़ा अंतर था हिंसा-भाव तो यों ही समय के प्रभाव से शांत हो गया था और बचा-खुचा अब शांत हो गया। जुआरी था ही, उस पर गांजे की लत और घर में बड़ी मुश्किल से पैसे मिलते थे। मुंह में पानी भर आया।\nबोला-चलूंगा क्यों नहीं, यहां पड़ा-पड़ा मक्खी ही तो मार रहा हूं। कै रुपये मिलेंगे?\nगोबर ने बड़े आत्मविश्वास से कहा-इसकी कु��� चिंता मत करो। सब कुछ अपने ही\nहाथ में है। जो चाहोगे, वह हो जायगा। हमने सोचा, जब घर में ही आदमी है, तो बाहर क्यों जाएं?\nजंगी ने उत्सुकता से पूछा--काम क्या करना पड़ेगा?\nकाम चाहे चौकीदारी करो, चाहे तगादे पर जाओ। तगादे का काम सबसे अच्छा। अमामी\nसे गठ गए। आकर मालिक से कह दिया, घर पर मिला ही नहीं, चाहो तो रुपये-आठ आने\nजो बना सकते हो।\n'रहने की जगह भी मिलती है।'\n'जगह की कौन कमी? पूरा महल पड़ा है। पानी का नल, बिजली, किसी बात की कमी\nनहीं है। कामत हैं कि कहीं गए हैं?'\n'दूध लेकर गए हैं। मुझे कोई बाजार नहीं जाने देता। कहते हैं, तुम तो गांजा पी जाते हो।\nमैं अब बहुत कम पीता हूं भैया, लेकिन दो पैस रोज तो चाहिए ही। तुम कामता से कुछ न कहना।\nमैं तुम्हारे साथ चलूंगा।'\n'हां-हां बेखटके चलो। होली के बाद।'\n'तो पक्की रही'\nदोनों आदमी बातें करते भोला के द्वार पर आ पहुंचे। भोला बैठे सुतली कात रहे थे। गोबर\nने लपककर उनके चरण छुए और इस वक्त उसका गला सचमुच भर आया। बोला-काका\nमुझसे जो कुछ भूल-चूक हुई, उसे छमा करो।\nभोला ने सुतली कातना बंद कर दिया और पथरीले स्वर में बोला -काम तो तुमने ऐसा\nही किया था गोबर, कि तुम्हारा सिर काट दूं तो भी पाप न लगे, लेकिन अपने द्वार पर आए\nहो, अब क्या कहूं। जाओ, जैसा मेरे साथ किया, उसकी सजा भगवान् देंगे। कब आए?\nगोबर ने खूब नमक-मिर्च लगाकर अपने भाग्योदय का वृत्तांत कहा, और जंगी को अपने\nसाथ ले जाने की अनुमति मांगी। भोला को जैसे बेमांगे वरदान मिल गया। जंगी घर पर एक-न-एक उपद्रव करता रहता था। बाहर चला जाएगा, तो चार पैसे पैदा तो करेगा। न किसी को\nकुछ दे, अपना बोझ तो उठा लेगा।\nगोबर ने कहा-नहीं काका, भगवान् ने चाहा और इनसे रहते बना तो साल-दो-साल में\nआदमी बन जाएंगे।\n'हां, जब इनसे रहते बने।'\n'सिर पर आ पड़ती है, तो आदमी आप संभल जाता है।'\n'तो कब तक जाने का विचार है?'\n'होली करके चला जाऊंगा। यहां खेती-बारी का सिलसिला फिर जमा दूं, तो निश्चिंत\nहो जाऊं।'"} +{"id": "indic_deva_eval_000320_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000320_indic_mozhi_deva_word_ocr_0aa361639218.jpg", "ocr": "\"काही"} +{"id": "indic_deva_eval_000321_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000321_indic_mozhi_deva_word_ocr_db7af173fd2b.jpg", "ocr": "एकाकीपन"} +{"id": "indic_deva_eval_000322_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000322_indic_vision_bench_deva_ocr_ff0be0787cfc.jpg", "ocr": "घेतले. रयतेमध्ये सुरक्षिततेची भावना निर्माण केली आणि म्हणूनच हातामध्ये रुमणे घेणारा शेतकरी आपल्या शेतीच्या रक्षणासाठी सुगीचे दिवस संपताच तलवार घेऊन उभा राहिला.\nसमाजाच्या प्रगतीची बीजे रोवली\nशिवाजीराजाच्या राज्यात रयतेच्या \"स्वराज्यात\" रयतेला सुरक्षितता प्राप्त झाली. सन्मानाची वागणूक मिळू लागली. या सर्वांबरोबरच समाजाच्या प्रत्येक घटकाला स्वत:च्या विकासाची दिशाही स्वराज्यात दिसू लागली हे नि:संशय. स्वराज्याचा मूळ मुलूख हा काही समृद्ध शेतीचा प्रदेश नाही. आजचा विदर्भ आणि मराठवाडा हे दोन प्रदेश सपाटीचे, जास्त शेतजमीन असलेले आणि म्हणूनच शेतीच्या जास्त उत्पन्नाचे प्रदेश.हे स्वराज्यात नव्हतेच. त्यामुळे शेतीच्या बरोबरीने इतर जोडधंदे निर्माण होणे, ते रयतेला उपलब्ध होणे यातूनच रयतेची आर्थिक परिस्थिती अधिक सुधारू शकत होती. शेतीतून राज्यव्यवस्थेने नेलेला महसूल काही थोड्याच लोकांनी वापरले यापेक्षा त्या महसुलातही रयतेचा पुरेपूर वाटा असणे हे राजाच्या आणि शेतकऱ्यांच्या निरोगी देवघेवीचे लक्षण आहे.\nमहाराष्ट्राच्या भूमीत सैनिकि पेशा हा तसा शेतीचा जोडधंदाच होता. दसऱ्यापर्यंत शेती करायची नंतर मुलूखगिरीला बाहेर पडायचे. अक्षयतृतीयेला परत येऊन शेतीच्या कामाला लागायचं ही पद्धत. मुलूखगिरीतून सैन्याला पगार होते. रणागंणात कामी आले तर मान होता. अशा वीरमृत्यूनंतर घरच्यांची काळजी घ्यायला राजा होता. मावळातल्या रयतेतीलच लोक या सैन्यात होते आणि किनारपट्टीवरच्या आगरी, कोळी, भंडारी, आणि मुसलमान या दर्यावर्दी जमातींना आरमारात स्थान होते. एरवी समुद्रावरच्या सर्व हालचाली हबशी आणि इंगजांनी ताब्यात घेतलेल्या होत्या. आरमारातील सर्व प्रकारच्या नोकऱ्या रयतेला उपलब्ध झाल्या. त्याचबरोबर किनारपट्टीवरच अनेक ठिकाणी जहाजे आणि अनेक प्रकारच्या छोट्या नौका करण्याचे कारखाने होते. एकशेसाठ आणि अनेक इतर अनेक प्रकारच्या छोट्या नौका आरमात होत्या. जहाजे तयारकरायला कोणी टोपीकर इंग्रज वगैरे बाहेरच्यामाणसांना नोकरीला ठेवले होते की नाही माहीत नाही. कदाचित काही काळ असतीलही. आरमार आणि जहाजे तयार करणे, तेलपाणी करून व्यवस्थित ठेवणे एक मोठे क्षेत्र किनारपट्टीवरच्या जातीजमातींना राजाने खुले केले यात संशय नाही.\nतीच गोष्ट गावोगावच्या लोहारांची , चाभारांची, सुतारांची आणि गवंडी यांची म्हणता येईल. स्वराज्याच्या सुरुवातीपासूनच तोरणा दुरुस्ती, राजगड उभारणी,\nशेतकऱ्यांचा राजा शिवाजी आणि इतर लेख / ७८"} +{"id": "indic_deva_eval_000323_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000323_indic_vision_bench_deva_ocr_cba32e843405.jpg", "ocr": "२३४\nभारत\nअनेक बयान निकाले। एक बयान में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि यह सत्याग्रह-आन्दोलन अंगरेजों, मुसलमानों अथवा किसी दल के भी विपरीत नहीं किया जा रहा है। यह तो भारतीय जनता को स्वतन्त्र बता कर उसे ज़बरदस्ती लड़ाई मे शामिल करने के व्यवहार के विरुद्ध एक प्रबल नैतिक प्रतिरोध है। उन्होंने इसी वक्तव्य में यह भी कहा कि भारत को स्वतन्त्र करने के मार्ग में अधिकारियो द्वारा भारतीय मतैक्य का बहाना लेने का मार्ग गलत और काल्पनिक है। सत्याग्रह में २५००० व्यक्ति जेल गये और वह चौदह महीने जारी रहा।\nअप्रैल १९४१ में बम्बई में, सर तेज बहादुर सप्रू के नेतृत्व में निर्दल सम्मेलन हुआ। सर तेज ने अपने भाषण में कहा कि, \"जनमत की अवहेलना जैसी वर्तमान भारत-सरकार ने की है वैसी किसी अन्य भारतीय सरकार ने नहीं की थी। सम्मेलन ने, ब्रिटिश कामनवैल्थ के देशों की भाँति ही भारतीय जनता को, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में पूर्ण अधिकार की माँग की। लड़ाई के बाद, एक निश्चित अवधि के भीतर, भारत को बरतानिया और उसके उपनिवेशो जैसे अधिकार दिये जाने की स्पष्ट घोषणा किये जाने का भी मतालबा किया गया। सर तेज इन प्रस्तावों को ले जाकर वाइसराय से भी मिले। कुछ दिन बाद भारत-मन्त्री ने कामन-सभा में बोलते हुए जवाब दे दिया कि भारत की समस्या को भारत की जनता ही, आपस में समझौता करके, सुलझा सकती हैं।\nइसी महीने में मदरास के लीग के जलसे में, सभापति पद से बोलते हुए, मि॰ जिन्ना ने कहा––\"मैं इस मंच से बलपूर्वक कह देना चाहता हूँ कि भारत में ब्रिटिश सरकार की निकम्मी, कमजोर और अनिश्चित नीति योरप की उसकी वर्तमान नीति से भी अधिक विनाशकारी सिद्ध होने को है। इन लोगों को क्यों नही सूझता कि घटनायें कैसी तेज़ी से घट रही हैं और नकशे कितनी जल्द-जल्द बदल रहे हैं?\"\nमई में मि॰ जिन्ना ने एक गश्ती पत्र निकाल कर कहा कि हम लड़ाई और भारत-रक्षा के आयोजन में सहयोग देने को तैयार हैं बशर्ते कि केन्द्रिय और प्रान्तीय सरकारो में लीग के प्रतिनिधियों को सच्चा और सारपूर्ण भाग दिया जाय।\nभारत के माडरेटों के अतिरिक्त ब्रिटेन में भी भारत की समस्या के सम्बन्ध"} +{"id": "indic_deva_eval_000324_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000324_indic_vision_bench_deva_ocr_c9a45eb1b911.jpg", "ocr": "उपोद्घात\nलॉर्ड लोधियन जब सेवाग्राम आ���े थे तब उन्होंने मुझसे ‘हिन्द स्वराज्य'की नकल मांगी थी। उन्होंने कहा था : ‘गांधीजी आजकल जो कुछ भी कह रहे हैं वह इस छोटीसी किताबमें बीजके रूपमें है, और गांधीजीको ठीकसे समझनेके लिए यह किताब बार-बार पढ़नी चाहिये।'\nअचरजकी बात यह है कि उसी अरसेमें श्रीमती सोफिया वाड़ियाने ‘हिन्द स्वराज्य' के बारे में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने हमारे सब मंत्रियोंसे,धारासभाके सदस्योंसे,गोरे और भारतीय सिविलियनोंसे,इतना ही नहीं , आजके लोक-शासनके अहिंसक प्रयोगकी सफलता चाहनेवाले हरएक नागरिकसे यह किताब बार-बार पढ़नेकी सिफारिश की थी। उन्होंने लिखा था: ‘अहिंसक आदमी अपने ही घरमें तानाशाही कैसे चला सकता है? वह शराब कैसे बेच सकता है? अगर वह वकील हो तो अपने मुवक्किलको अदालतमें जाकर लड़नेकी सलाह कैसे दे सकता है? इन सारे सवालोंका जवाब देते समय बहुत ही महत्वके राजनीतिक सवालोंका विचार करना ज़रूरी हो जाता है। ‘हिन्द स्वराज्य' में इन प्रश्नोंकी सिद्धान्तकी दृष्टिसे चर्चा की गई है। इसलिए वह पुस्तक लोगोंमें ज्यादा पढ़ी जानी चाहिये और उसमें जो कहा गया है उसके बारेमें लोकमत तैयार करना चाहिये।'\nश्रीमती वाड़ियाकी बिनती ठीक वक्त पर की गई है। १९०९ में गांधीजीने विलायतसे लौटते हुए जहाज पर यह पुस्तक लिखी थी। हिंसक साधनोंमें विश्वास रखनेवाले कुछ भारतीयोंके साथ जो चर्चाएँ हुई थीं, उन परसे उन्होंने मूल पुस्तक गुजरातीमें लिखी थी और 'इण्डियन ओपीनियन' नामक साप्ताहिकमें सिलसिलेवार लेखोंमें उसे प्रगट किया गया था। बादमें\n२१"} +{"id": "indic_deva_eval_000325_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000325_indic_vision_bench_deva_ocr_fd835e5321d2.jpg", "ocr": "गैंगजी कल्ला, गंगाजी ४६,४७,४८\nगोचर ११\nगोंद ३३\nगोपालपुरा ७३\nगोपीनाथ कालभोर १००\nगोयल ब्रदर्स १०२\nगोला ताल ५६, ५७,१०१\nगोवा २५, ३९, ४३, ५४, ९५\nगोविंदसर ६५\nगौंड २०, २२,७३\nगंगा १०८\nगंगाजलिया १०७\nगंगा नहर ८९\nगंजाम २४\nगंगा सागर ६९\nगांधी शांति केन्द्र ९९\nगांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र ९९\n⁠\nघटोइया १५, ३४, ३५, ७३, ९२, ९७\nघड़सीसर, गड़सीसर, गड़ीसर ४८, ६०, ६१,\n⁠\n६३, ६४, ६५, ६६, ६७, ६८, ८६,१०२\nघरगैल, घरमैल ७६\n⁠\nचमोली ९६\nचवदार ताल ५६,१००\nचाकसू ४२, ५६, ५७, ९७\nचाल ५०, ५१\nचाक्षुष ४२\nचिखलिया ५३\nचितपावन २६, ९६\nचिरगांव १००\nचीरे २५\nचीला ४२\nचुकरैंड, चुरंडी, चौंडा, चुंडा ३९, ९७,\nचुनकर १४, १५, २०\nचुरु ५९\nचूहर ३०\nचेरूवू, चैर ५१\nचोपरा, ���ौपरा, चौपड़ा ५१, ५२\nचोहरमल २४\nचौघरा ५१\n'चौमासा' १०६\nचौरा ५१\nचंडीप्रसाद भट्ट ९६\nचंदेल-बुंदेल ३९, ७४\nचंद्रपुर ३६\nचंद्रबह्म १०६\nचंद्रवार १२\n⁠\nछतरपुर ९४\nछत्तीसगढ़ २२, २४, २७, ३१, ३६, ४२, ४३,\n⁠\n४४, ५१, ५२, ५३, ७५, ८६, ९४, ९६,\n⁠\n१०१, १०६\nछलका ३१\nछत्रसाल ७४\nछिपीलाई ५४, १०१\nछेदी ३३\nछेर-छेरा ७५, ८६, १०६\nजगतराज ७४\nजगन्नाथपुरी ७९, ९३\nजजमान १७\nजनवासा ५५\nजनसत्ता ८८, ९०, ९७, १००\nजबलपुर २२, ६४, ८८, ९२\n'जबलपुर स्मारक ग्रंथ' ८८\nजमालशाह पीर ६४\nजयगढ़ ५६\nजयपुर ४२, ५६, ९२, ९७\nजयप्रकाश थानवी ९७, ९८\nजयबाण ५६, ५७\nजय शक्ति ब्रह्म, 'द्वितीय' १०६\nजयंत १९\nजलचर १२\nजल थंब, जल स्तंभ ३५, ६६\nजलसूंघा १९\nजल संवर्धने योजना संघ ९१\nजल संसाधन विभाग, कर्नाटक सरकार ९१\nजलागम २९\n११२\nआज भी खरे हैं\n⁠\nतालाब\n⁠"} +{"id": "indic_deva_eval_000326_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000326_indic_mozhi_deva_word_ocr_7c89bd844e32.jpg", "ocr": "पालन"} +{"id": "indic_deva_eval_000327_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000327_devanagari_digits_mixed_9e19b6c5969e.jpg", "ocr": "२08674७०2"} +{"id": "indic_deva_eval_000328_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000328_indic_vision_bench_deva_ocr_61731cc5f925.jpg", "ocr": "[२१६]\nया चार आठवड्यांच्या सबंद मजुरीचें नुकसान भरून येण्यास वाढलेले मजुरीचे दर वर्षभर रहावे लागतात. परंतु धंद्याची भरभराट राहिली-तर असे दर आपोआपच वाढले असते. परंतु धंद्याची मंदी होत चालली असली तर पुन: दर कमी होणारच.\nसंप अगदीं विकोपास जाऊन कारखानदारांचें सर्व भांडवल नाहींसें झाले व त्यांची यंत्रसामग्रीही खराब झाली तर तो धंदाच देशांतून नाहीसा होईल व मग मजुरांना मजुरी मिळण्याचें एक साधनच कमी होईल. सारांश, संपाचे सांपत्तिक परिणाम नेहमीं देशाला व मजूरवर्गाला अनिष्टच होतात, असें पुष्कळ अर्थशास्त्रकारांनीं दाखविलें आहे. व त्यांत बराच तथ्यांश आहे हें वाचकांच्या तेव्हांच ध्यानांत येइल.\nकांहीं अर्थशास्त्रकारांनीं संपाचें वैय्यर्थ्य तात्विकदृष्ट्या दाखविण्याचा प्रयत्न केला आहे. त्यांचें म्हणणें असें कीं, संपाचा उद्देश मजुरीचा दर वाढविण्याचा असतो. आतां मजुरीचा सामान्य दर लोकसंख्या व भांडवल यांवर अवलंबून असतो. व संपाच्या योगानें या दोहोंपैकीं कोणत्याच बाबतींत फरक होत नाही. उलट कांहीं लोक रिकामे बसतात व बाकीच्यांना मजुरी जास्त मिळण्याचा संभव असतो. परंतु समजा, संपाच्यायोगानें एका धंद्यांतील मजुरांच्या मजुरीचे दर वाढले तर या धंद्यांत देशांतील भांडवल जास्त जाईल. म्हणजे त्या मानाने��� देशांतील भांडवल इतर धंद्यांना कमी होणार म्हणजे इतर धंद्यांतील मजुरीचे दर उतरले तरी पाहिजेत. म्हणजे मजुरीचा सामान्य दर कायमच राहिला. मात्र एका धंद्यांतील मजुरांनीं आपल्या वर्गाच्या दुस-या मजुरांच्या हातचा घास काढून घेतला. म्हणजे त्यांनीं कारखानदारांचें कांहीं एक नुकसान केलें नाहीं किंवा त्यांच्या नफ्यांत कांहींएक कमीपणा आला नाहीं. म्हणून मजुरांच्या संपाचा प्रयत्न हा सर्वथा आत्मघातकीपणाचा प्रयत्न आहे व त्याच्यायोगानें मजुरीचा सामान्य दर वाढविणें अशक्य आहे. ज्याप्रमाणें आपल्या मानवी प्रयत्नानें सृष्टीशक्तीमध्यें भर घालतां येणें अशक्य आहे; त्याप्रमाणेंच अर्थशास्त्राच्या नियमांतही फरक करतां येणें अशक्य आहे.\nवरील कोटिक्रमांत मजुरीफंड ही वादग्रस्त बाबी गृहीत धरली आहे हे वाचकांच्या तेव्हांच ध्यानांत येईल व त्यावरून या कोटिक्रमांतील हेत्वाभासही सहज ध्यानांत येईल. कोणत्याही देशांत कांहीं एक ठराविक"} +{"id": "indic_deva_eval_000329_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000329_indic_mozhi_deva_word_ocr_5006735d82cf.jpg", "ocr": "जाता"} +{"id": "indic_deva_eval_000330_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000330_indic_mozhi_deva_word_ocr_36037e79e7ef.jpg", "ocr": "ऐकू"} +{"id": "indic_deva_eval_000331_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000331_indic_mozhi_deva_word_ocr_a9995cfce321.jpg", "ocr": "वैसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000332_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000332_indic_mozhi_deva_word_ocr_260215a7abd2.jpg", "ocr": "८१३"} +{"id": "indic_deva_eval_000333_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000333_devanagari_digits_mixed_9478342832ca.jpg", "ocr": "५६0३7436"} +{"id": "indic_deva_eval_000334_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000334_indic_mozhi_deva_word_ocr_14c862ea015f.jpg", "ocr": "माझ्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000335_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000335_hindi_handwritten_word_ocr_78764e0b9533.jpg", "ocr": "नियत"} +{"id": "indic_deva_eval_000336_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000336_indic_vision_bench_deva_ocr_ebc766b00ff6.jpg", "ocr": "गोदान : 159\nनहीं। तुम लोगों ने अपने समाज की प्यारी मर्यादा की रक्षा के लिए उसे धमकाया होगा। बेचारा\nभाग न जाता, तो क्या करता।\nनोखेराम इसका प्रतिवाद न कर सके। मालिक जो कुछ कहें, वह ठीक है। वह यह भी\nन कह सके कि आप खुद चलकर झूठ-सच की जांच कर लें। बड़े आदमियों का क्रोध पूरा\nसमर्पण चाहता है। अपने खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकता।\nपंचों ने रायसाहब का फैसला सुना, तो नशा हिरन हो गया। अनाज तो अभी तक ज्यों-का-त्यों पड़ा था, पर रुपये तो कब के गायब हो गए। होरी को मकान रेहन लिखा गया था, पर\nउस मकान को देहात में कौन पूछता था? जैसे हिंदू स्त्री पति के साथ घर की स्वामिनी है, और\nपति त्याग दे, तो कहीं की नहीं रहती, उसी तरह यह घर होरी के लिए लाख रुपये का है, पर\nउसकी असली कीमत कुछ भी नहीं। और इधर रायसाहब बिना रुपये लिए मानने के नहीं। यही\nहोरी जाकर रो आया होगा। पटेश्वरी लाल सबसे ज्यादा भयभीत थे। उनकी तो नौकरी ही चली\nजायगी। चारों सज्जन इस गहन समस्या पर विचार कर रहे थे, पर किसी की अक्ल काम न\nकरती थी। एक-दूसरे पर दोष रखता था। फिर खूब झगड़ा हुआ।\nपटेश्वरी ने अपनी लंबी शंकाशील गर्दन हिलाकर कहा-मैं मना करता था कि होरी\nके विषय में हमें चुप्पी साधकर रह जाना चाहिए। गाय के मामले में सबको तावान देना पड़ा।\nइस मामले में तावान ही से गला न छूटेगा, नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, मगर तुम लोगों को\nरुपये की पड़ी थी। निकालो बीस-बीस रुपये। अब भी कुशल है। कहीं रायसाहब ने रपट कर\nदी, तो सब जने बंध जाओगे।\nदातादीन ने ब्रह्म तेज दिखाकर कहा-मेरे पास बीस रुपये की जगह बीस पैसे भी नहीं\nहैं। ब्राह्मणों को भोज दिया गया, होम हुआ। क्या इसमें कुछ खरच ही नहीं हुआ? रायसाहब\nकी हिम्मत है कि मुझे जेहल ले जायं? ब्रह्म बनकर घर का घर मिटा दूंगा। अभी उन्हें किसी\nब्राह्मण से पाला नहीं पड़ा।\nझिंगुरीसिंह ने भी कुछ इसी आशय के शब्द कहे। वह रायसाहब के नौकर नहीं\nहैं। उन्होंने होरी को मारा नहीं, पीटा नहीं, कोई दबाव नहीं डाला। होरी अगर प्रायश्चित\nकरना चाहता था, तो उन्होंने इसका अवसर दिया। इसके लिए कोई उन पर अपराध नहीं\nलगा सकता, मगर नोखेराम की गर्दन इतनी आसानी से न छूट सकती थी। यहां मजे से\nबैठे राज करते थे। वेतन तो दस रुपये से ज्यादा न था, पर एक हजार साल की ऊपर\nको आमदनी थी, सैकड़ों आदमियों पर हुकूमत, चार-चार प्यादे हाजिर, बेगार में सारा\nहो जाता था, थानेदार तक कुरसी देते थे, यह चैन उन्हें और कहां था। और\nतो नौकरी के बदौलत महाजन बने हुए थे। कहां जा सकते थे। दो-तीन दिन इसी चिंता\nमें पड़े रहे कि कैसे इस विपत्ति से निकलें। आखिर उन्हें एक मार्ग सूझ ही गया। कभी-कभी कचहरी में उन्हें दैनिक 'बिजली' देखने को मिल जाती थी। यदि एक गुमनाम पत्र\nउसके संपादक की सेवा में भेज दिया जाय कि रायसाहब जिस तरह असामियों से जुरमाना\nवसूल करते हैं, तो बचा को लेने के देने पड़ जायं। नोखेराम भी सहमत हो गए। दोनों ने\nमिलकर किसी तरह एक पत्र लिखा और रजिस्ट्री से भेज दिया।\nसंपादक ओंकारनाथ तो ऐसे पत्रों की ताक में रहते थे। पत्र पाते ही तुरंत रायसाहब\nको सूचना दी। उन्हें एक ��सा समाचार मिला है, जिस पर विश्वास करने की उनकी इच्छा"} +{"id": "indic_deva_eval_000337_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000337_indic_vision_bench_deva_ocr_5b5b3ca5c603.jpg", "ocr": "अद्भुततेच्या थराला गेलेल्या आहेत. काश्मीर प्रश्नावर स्वतंत्र पक्षाने सतत घेतलेली पाकिस्तानबरोबरच्या तडजोडीची भूमिका आणि भारत-पाकिस्तानवादात अनेकदा पाकिस्तानच्या भूमिकेचे त्यांनी केलेले समर्थन याची साक्ष देईल. स्वतंत्रांची अडचण अशी आहे की जग जसे असायला पाहिजे असे ज्यांना वाटते तसे ते आहे असा त्यांनी सोयीस्कर गैरसमज करून घेतलेला आहे. या दृष्टिकोनातून एकदा पाहिल्यानंतर, एकदा काश्मीरवर तडजोड झाली की भारत-पाक संबंध मैत्रीचे होतील असे त्यांनी गृहीत धरले. स्वतंत्र पक्षाच्या मिनू मसानी आणि पिलू मोदी या नेत्यांना पाकिस्तानच्या स्थापनेमागील ऐतिहासिक पार्श्वभूमी कधी समजून घेण्याची आवश्यकताच भासली नाही. त्याचबरोबर पाकिस्तानविषयक त्यांची अनुकूल भूमिकाही नेहरूंविषयीच्या पूर्वग्रहामुळे बनली गेलेली आहे. स्वतंत्र पक्ष हा कट्टर कम्युनिस्टविरोधी आहे. नेहरूंचे तटस्थतेचे धोरण, सोव्हिएट रशियाशी मैत्रीचे संबंध प्रस्थापित करण्याचे त्यांचे प्रयत्न यांचा हा पक्ष विरोधक होता. अमेरिकेशी मैत्री न करण्यात नेहरूंची चूक होत आहे अशी त्यांची पक्की समजूत होती. वस्तुतः अमेरिकाच भारताशी मैत्री करण्यास उत्सुक नव्हती हे स्वतंत्रांनी कधी समजून घेतले नाही. नेहरू हे शिष्ट आहेत असा यांचा समज होता. यामुळे पाकिस्तानच्या बाबतीत नेहरूंचेच चुकले असावे असे स्वतंत्रांनी गृहीत धरले.\nयेथे हे लक्षात घेतले पाहिजे की पाकिस्तान हे अमेरिकेबरोबर लष्करी कराराने बांधले गेलेले आहे आणि म्हणून एकदा 'अमेरिकेचे धोरण नेहमीच बरोबर असते' असे मानल्यानंतर पाकिस्तानच्या भूमिकेचे समर्थन करणे स्वतंत्रांच्या दृष्टीने अपरिहार्य ठरते. पाकिस्तानच्या बाबतीतील या धोरणाचा स्वतंत्र पक्षाच्या उदारमतवादाशी किती संबंध आहे आणि अमेरिकेच्या बरोबर अमेरिकेच्या दोस्तांचेही समर्थन करण्याचा भाग त्यात किती हे ठरविणे कठीण आहे. कारण आपल्याला असे दिसते की पाकिस्तानबरोबर भारताने जुळते घ्यावे, शक्यतो तडजोड करावी, असे म्हणणाऱ्या स्वतंत्र पक्षाने अरबांविरुद्ध इस्रायलचे सतत समर्थन केले आहे.\nइस्रालय आणि पाकिस्तान हे दोन्ही देश अमेरिकेचे मित्र आहेत हे येथे लक्षात घेतले पाहिजे. स्वतंत्र पक्षाच्या नेत्यांना असे वाटते की कम्युनिझमचा प्रसार रोखणे (कुणाचेही) प्रथम कर्तव्य आहे. स्वतंत्रांची भूमिका थोडक्यात अशी दिसते- भारताने अमेरिकेबरोबर वस्तुतः लष्करी करार करायला हवा होता. भारताने तो केला नाही. ही भारत सरकारची चूक आहे. काश्मीरप्रश्न उपखंडात सलत राहिला आहे. तो नसता तर भारताला रशियाच्या बाजूला झुकावे लागले नसते.\nवस्तुतः अमेरिकेच्या स्वतंत्र समाजव्यवस्थेचा आदर्श मानणाऱ्यांनी अमेरिकेच्या परराष्ट्र धोरणाचे जसेच्या तसे समर्थन करण्याची काहीच जरूरी नाही. अनेक ठिकाणी अमेरिकेने हडेलहप्पीदेखील केली आहे. सनदशीर पद्धतीने निवडून आलेले ग्वाटेमालाचे सरकार श्री. जॉन फॉस्टर डल्लेस परराष्ट्रमंत्री असताना अमेरिकेने उलथून पाडले आणि आपली तळी उचलून धरणाऱ्यांचे सरकार स्थापिले. इंडोनेशियात सुकार्नोना पदच्युत करून तो देश घशाखाली घालण्याचा डाव श्री. डल्लेस यांनी जवळजवळ पूर्णावस्थेला आणला होता. परंतु ते जमले\n१९६/राष्ट्रीय एकात्मता आणि भारतीय मुसलमान"} +{"id": "indic_deva_eval_000338_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000338_devanagari_digits_mixed_432df343f372.jpg", "ocr": "७९60८230१६54१2४9८8८"} +{"id": "indic_deva_eval_000339_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000339_indic_mozhi_deva_word_ocr_2ca686aa17b6.jpg", "ocr": "फुटून"} +{"id": "indic_deva_eval_000340_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000340_devanagari_page_ocr_909134edf129.jpg", "ocr": "..._._ जब ७७७७\n\nमहावंसो\n\nलाव्ठरट्रे पुरे तस्मिं, सीहबाहु नराधिषो।\n\nरज्ज॑ कारेसि कत्वान, महेसिं सीहसीवलिं॥36॥\n\nमहेसी सोव्ठसक्खत्तुं, यमके च दुबे दुवे।\n\nपुत्ते जनयि काले सा, विजयो नाम जेद्रको॥37॥\n\nसुमित्तो नाम दुतियो, सब्बे द्धत्तिस पुत्तका।\n\nकालेन विजयं राजा, उपरज्जेभिसेचयि॥ 38॥\n\nविजयो विसमाचारो, आसि तम्परिसा पि च।\n\nसाहसानि अनेकानि, दुससहानि करिंसु ते॥39॥\n\nकुद्धो महाजनो रञ्ञजो, तमत्थं पटिवेदयि।\n\nराजा ते सञ्ञपेत्वान, पुत्त ओवदि साधुकं॥40॥\n\nसंस्कृतचछाया- _ लाडराष्टे पुरे तस्मिन, सिंहवाह नराधिप:।\nराज्यमकारयत्‌ कृत्वा, महिषीं सिंहसीवलिम्‌।।36।।\nमसहिषी षघोडशवारम्‌, यमकौ च द्वौ द्ौ।\nपुजम्‌ अजनयत्‌ काले सा, विजयो नाम ज्येछक:।।37॥।\nसुमित्रो नाम द्वितीय: , सर्वे द्वात्िंशत्‌ पुत्रका:।\nकालेन विजयं राजा, उपराज्ये अभ्यषिज्चयत्‌।।38।।\nविजयो विसमाचारः, आसीत्‌ तम्परिषदपि च।\nसाहसानि अनेकानि, दुष्कृतानि अकार्चु: ते।39॥।\nकुद्धो महाजन: राज्ञ:, तदर्थ ��्रत्यवेदयत्‌।\n\nराजा तान्‌ संज्ञापय्य, पुत्रम्‌ अवदत्‌ साधुकम्‌।।40॥॥\n\nहिन्दी-बहॉँ उसने लालराष्ट्र पुर में एक स्वतन्त्र नगर बसाया। सिंहबाह वहाँ का राजा बना और सिंहसीवलि को\nअपनी रानी बनाकर, राज्य करने लगा।।36॥॥\n\nउसकी रानी ने सोलह बार दो दो युगल सन्‍्तानें पैदा कीं। उसमें सब से ज्येछ पुत्र का नाम था विजय।।37।।\n\nउससे छोटे का नाम था सुमित्र। वे संख्या में बत्तीस थीं और सभी पुत्र थे। राजा ने समय आने पर विजय को\nयुवराज बनाया।।38॥॥\n\nपरन्तु विजय दुराचारी था, उसके साथी भी वैसे ही थे। उन्होंने राज्य में बहत से दु:साहसपूर्ण कुकत्य किये।39।|\nकुकुत्यों\n\nउस के इन कुकृत्यों से क्रुद्ध होकर भद्र नागरिकों ने राजा से उसके ये दुष्कृत्य बताये। राजा ने विजय को बुला कर\nप्रेस से समझाया और ऐसे दुष्कृत्यों से दूर रहने का उपदेश किया।।40।।"} +{"id": "indic_deva_eval_000341_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000341_indic_vision_bench_deva_ocr_8158645b5673.jpg", "ocr": "मुख्यमंत्र्यांनी जाट शेतकऱ्यांच्या सर्व मागण्या आंदोलन सुरू होण्यापूर्वीच मान्य करून टाकल्या; पण आंदोलन थांबविले, मागे घेतले गेले, तरच अंमलबजावणी सुरू होईल, अशी मेखही मारून ठेवली. त्यामुळे आंदोलनाच्या शिडातील हवा सुरुवातीपासूनच निघून गेली. आता तर एखाद दुसऱ्या खेड्यात तलाठ्याला काम करू न देण्यापलीकडे या आंदोलनाचे नावही ऐकू येईनासे झाले आहे. काँग्रेसबद्दल येथे इतकी अप्रीती आहे की, आझमगड काँग्रेस विजयानंतरही येथील सर्व पोटनिवडणुकीत जनता उमेदवारच निवडून येत आहेत. अशी राजकीय सुस्थिरता असतानाही गुंडगिरी वाढते आहे, याबद्दल सार्वत्रिक चिंता येथे दिसून येते. काल रिक्षात एक शेतकरी भेटला. जयपूरपासून ४० मैलांवर असलेल्या खेड्यात तो शेती करतो. जनता पक्ष आल्यापासून ग्रामीण भागात खूप सुधारणा होत आहेत, असे त्याने सांगितले; पण गुंडगिरी वाढते आहे, अशी त्याचीही चिंता होती. गुंडगिरीला राजकीय पक्षच कारणीभूत आहेत, गुंडांना पक्षांचे - शासनाचे संरक्षण मिळते, असा त्याचा स्पष्ट आरोपच होता. सवाई माधोपूर ते जयपूर रेल्वे प्रवासात डब्यात एक वृद्धा आली. तिची या भागात पूर्वी कुठे तरी जहागिरी होती. माहेर रायबरेलीचे. त्यामुळे साहजिकच तिकडच्या-इकडच्या गोष्टी निघाल्या. फर्स्ट क्लासचा डबा असूनही पंखे चालू नव्हते, बटने-बल्बस् पळविले गेलेले होते. खेडोपाडी इकडे वीज गेली. शेती सु���ारली,पण चोऱ्यांमाऱ्याही फार वाढल्या, असे ती सारखे सांगत होती. अर्थात रायबरेली व एकूणच उत्तर प्रदेशाइतकी परिस्थिती येथे खालावलेली नाही. रायबरेलीला अलीकडेच ती गेली तेव्हा रात्रीचा प्रवास टाळून तिला जावे लागले; इतके भीतीचे, दहशतीचे वातावरण तिकडे आहे, असे तिचे म्हणणे पडले. तिकडे राजकीय अस्थिरता हे कारण सांगितले जाऊ शकते. इकडे राजस्थानला हे कारण लागू पडत नाही; तरी पण गुंडगिरीचा वाढता धोका इकडेही सार्वत्रिक चिंतेचा विषय आहे. जनता-शासनाचा चितोड किंवा हळदी घाट झालाच तर तो या समस्येवर होईल, असे लोक उघडपणे बोलत असतात. 'कुछ करते नहीं है' असे प्रसिद्धीखात्यातील एक अधिकारीच काल मला म्हणाला.\nयेथे कम्युनिस्ट पक्षाचा जोर नसला तरी अस्तित्व आहे. तरीही मजूर आघाडी शांत वाटते. मजुरांवर, गरीब जनतेवर एकही गोळी गेल्या वर्षभरात झाडली गेलेली नाही, ही राजस्थानातील जनता राजवटीची एक जमेची बाजू म्हणून मानली जाते. वर्षभरात ७०० मजूर-मालक तंटे सामोपचाराने सोडवले गेल्याची नोंद आहे. असेही सांगितले गेले की, भारतात कुठेही झाला नाही असा मजूर-संघटनांमधील मान्यतेचा वाद खुल्या मतदानपद्धतीने मिटविण्याचा लोकशाही प्रयोग येथे करण्यात आला आणि तो यशस्वीही ठरला, राजस्थान रोडवेज ही येथील सरकारी वाहतूक संस्था. आपल्याकडील एस. टी. सारखी. कामगार\nनिर्माणपर्व । १९२"} +{"id": "indic_deva_eval_000342_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000342_indic_vision_bench_deva_ocr_17209ed1c6fa.jpg", "ocr": "\nपोचमपल्लीकडे\nलांबवरूनच दहाचे टोल ऐकू येत होते. बाजूच्या स्टेशनात गाडी धडधडत शिरत होती. बहुधा सिकंदराबाद एक्सप्रेस. याच गाडीने मी दहा वर्षांपूर्वी ओरिसातील ग्रामदान पहाणीचा माझा दौरा संपवला होता. आताही मी याच चळवळीच्या उगमस्थानाकडे-गंगोत्रीकडे निघालो होतो. 'पहाणी' हा मात्र आता उद्देश नाही. कारण तिथे काय आढळेल याची पूर्वानुभवामुळे स्थूल कल्पना होतीच. आज मी यात्रिक होतो आणि यात्रेकरूने का कुठे काही ‘पहायला' जायचे असते ! त्याने जायचे असते ते भावसमृद्धीसाठी, दृढतेसाठी-जे पहायचे असते ते त्याचेपाशीच असते. भूदानग्रामदान चळवळीमागील मला समजलेला, जाणवलेला भाग 'अंत्योदया' चा आहे. समाजातील अखेरच्या, तळच्या माणसाला स्पर्श करावा, तो वर उचलावा ही या आंदोलनामागील नैतिक प्रेरणा मला भिडते व अविरोधाच्या, सर्वात्मकतेच्या भूमिकेवरून करण्यात आलेली या ���ंदोलनाची मांडणी माझ्या भारतीय मनाला जवळची वाटते. अखेरच्या माणसाला जाग यावी ही या काळाचीच प्रेरणा आहे. हा आजचा युगविशेष आहे. जो विचार, जे आंदोलन, जो पक्ष, जे राजकारण या प्रेरणेतून उगम पावत नाही, या युगविशेषावर आधारित नाही ते आधुनिक नव्हेच. त्याची नैतिकताही सदैव शंकित आणि शबलित रहाणार आहे. कम्युनिझम (समाजवाद यात आलाच) हा या प्रेरणेचे प्रतिनिधित्व करतो म्हणून तो प्रभावी ठरतो. पुरोगामित्वाच्या नावाखाली कम्युनिझमने भीषण हत्याकांड घडविली असतील, वंचनेची आणि विश्वासघाताची महापापे केली असतील. महापापे फॅसिझमही करतो, कम्युनिझमही करतो. पण कम्युनिझमच्या मुळाशी आधुनिक युगाची, समतेची तलस्पर्शी प्रेरणा जागी असते, फॅसिझमच्या मुळाशी ती नसते, एवढाच काय तो मौलिक, मूलभूत फरक. त्यामुळे इतिहास लेनिनला युगनेता मानतो, क्रांतीचा उद्गाता म्हणून गौरवतो, हिटलरला भस्मासुर ठरवतो. पण हत्याकांडांचा, हिंसेचा, रक्तरंजित संघर्षाचा हा कम्युनिझमचा वारसा टाळून अखेरच्या माणसाला भारतात न्याय मिळवून देता येतो का ! भूदान-ग्रामदान आंदोलनाच्या मुळाशी ही भूमिका होती असे मला वाटते.\n| ४५ |"} +{"id": "indic_deva_eval_000343_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000343_devanagari_page_ocr_1c98134e05d4.jpg", "ocr": "22. हत्थिवग्गो झा\n\n9. सप्पिदायकत्थेरअपदानं\n“निसिन्‍नों पासादवरे, नारीगणपुरक्खतो।\nब्याधितं समर्ण दिस्वा, अभिनामेसहं घरं॥93॥\n“उपदिद्ठं महावीरं, देवदेव॑ नरासभं।\nसप्पितेलं मया दिन्नं, सिद्धत्थस्स महेसिनो॥94॥\n“पस्सद्धदरथं दिस्वा, विप्पसन्नमुखिन्द्रियं।\nबन्दित्वा सत्थुनो पादे, अनुसंसावयिं पुरै॥95॥\n\n“दिस्वा म॑ सुप्पसन्नत्तं [सुप्पसन्नन्‍्तं (स्था\" क\") सुप्पसननचित्तन्ति अत्थो], इद्धिया पारमिडुगतो।\n\nनं अब्भुग्गमी धीरो, हंसराजाब अम्बरे॥96॥\n“चतुन्नवुतितों कप्पे, यं दानमददिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, सप्पितेलस्सिदं फलं॥97॥\nपल यासादवर , तारीगणपरस्कन ।\nव्याधित॑ श्रम दुष्ट्वा, अभ्यनामयमहं गृहम्‌॥93॥\n“उपबिष्ठ महावीरम, देवदेव॑ नर्पभमा\nसर्पिष्लैलं मया दत्तम्‌, सिद्धार्थाय महर्षये॥94॥\n“प्रखव्धदरथं दुप्टवा, विप्रसन्‍नमखेन्द्रियमा\nबन्दित्वा शास्त्रे पादौ, अनुसमश्रावयं पुरे॥95॥\n“दुष्ट्बा मां सुप्रसन्‍नात्मम्‌, ऋध्या पारमीड्गत:।\nनभस्युदगमद्‌ धीरः, हंसराज इवास्बरे॥96॥\n“चतुर्णवतितमे कल्पे, यद्धानमददां तदा।\nदर्मलिं नाशिजानासि, सर्विप्वेलस्थेद फलम॥97॥\nश्रेष्ठ प्रासाद में बैठा हुआ नारी गणों से पुरस्कृत मैं रोग से ग्रस्त श्रमण को देखकर उन्हें अपने घर ले\nआओ देव, नरर्पधभ महावीर के समीप बैठ कर सिद्धार्थ, महर्षि को मेरे द्वारा घी, तेल का दान दिया\nगया॥94॥\n\nका शमन किये, अत्यधिक प्रसन्न सुख-इन्द्रिय वाले शास्ता के चरणों की बन्दना करके हम पूर्वकाल\nकृतकृत्य हो गये॥95॥\nऋद्धि की पूर्णता को प्रास किये हुए धीर ने अत्यधिक प्रसन्न आत्मा वाले मुझको देखकर हंसराज के\nसमान अस्बर की ओर प्रस्थान किया॥96॥\n\nयहाँ से 94 वें कल्प में मैंने जो घी और तेल का दान दिया था उस कर्म का यह सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\nको नहीं जानता॥97॥\n\nमें"} +{"id": "indic_deva_eval_000344_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000344_devanagari_digits_mixed_974ff6035a33.jpg", "ocr": "09988५५३7३६7"} +{"id": "indic_deva_eval_000345_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000345_hindi_handwritten_word_ocr_24777bd3787d.jpg", "ocr": "कान्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000346_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000346_indic_mozhi_deva_word_ocr_f5274e69d9fc.jpg", "ocr": "कसक"} +{"id": "indic_deva_eval_000347_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000347_hindi_handwritten_word_ocr_757b0fecdc0e.jpg", "ocr": "चुफाल"} +{"id": "indic_deva_eval_000348_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000348_devanagari_page_ocr_8ade0043c064.jpg", "ocr": "धातुकथापाव्दि\n\nवे\n\nविष्पयुत्ता... ते धम्मा एकेन खन्‍्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि विप्पयुत्ता; एकेनायतनेन\n'एकाय धातुया केहिचि विप्पयुत्ता।\n\n३९३. अनासवेहि धम्मेहि ये धम्मा... आसवविप्पयुत्तेह्ि अनासवेहि धम्मेहि ये धम्मा\nविप्पयुत्ता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता... ते धम्मा न केह्िचि खनन्‍्धेहि न केहिचि आयतनेहि\nछहि धातूहि विष्पयुत्ता।\n\n३९४. संयोजनेहि धम्मेहि ये धम्मा... गन्थेहि धम्मेहि ये धम्मा... ओघेहि धम्मेहि ये धम्मा...\nयोगेहि धम्मेहि ये धम्मा... नीवरणेहि धम्मेहि ये धम्मा... परामासेहि धम्मेहि ये धम्मा.\n'परामाससम्पयुत्तेह्टि धम्मेहि ये धम्मा... परामासेहि चेव परामट्रलेह्टि च धम्मेहि ये धम्मा विष्पयुत्ता,\nतेहि धम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता... ते धम्मा एकेन खन्‍्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि\nविष्पयुत्ता; एकेनायतनेन एकाय धातुया केहिचि विप्पयुत्ता।\n\n३९५. अपरामट्ठिह्टि धम्मेहि ये धम्मा... परामासविप्पयुत्तेष्ठि अपरामद्लिह्टि धम्मेष्ठि ये धम्मा\nविप्पयुत्ता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता... ते धम्मा न केहिचि खनन्‍्धेहि न केहिेचि आयतनेहि\nछहि धातूहि विष्पयुत्ता।\n\n'एकेन धातुना कैश्चित्‌ विप्रयुक्���ाः\n\n३९३. अनाखवैः धर्म: ... आख्रवविध्रयुक्तैः अनाखवैः धर्म: ये धर्माः विप्रयुक्ता:, लैः धर्म: ये\nधर्माः विश्रयुक्ताः.... ते धर्मा: न कैब्वित्‌ स्कन्चैः न कैश्वित्‌ आयतनैः पदिलः धालुभि: विरयुक्ता:,\n\n३९४. संयोजनधर्मः ये धर्माः... ग्रन्थधर्मः ये धर्मा:... ओघधर्मः ये धर्माः... योगधर्मैः ये धर्माः\nनीवरणधर्मः ये धर्माः.... परामर्शधर्मै: ये धर्माः... परामर्शसम्प्रयुक्तधर्मः ये धर्माः... परामर्शैश्वैव परामृष्ैश्व\nशर्म: ये धर्माः विप्रयुक्ता:, तैः धर्म: ये धर्माः विध्रयुक्ताः ... ते धर्मा: एकेन स्कन्धेन दशजिः आयतनैः घोडशभिः\nधातुभिः विप्रयुक्ता:; एकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्वित्‌ विप्रयुक्ता:।\nअपरामृछैः धर्म: ये धर्माः... परामर्शविप्रयुक्तैः अपरामृषैः धर्म: ये धर्माः विप्रयुक्ता:, तैः धर्म:\n: न कैश्वित्‌ आयतनैः षड्धिभः धातुभिः विप्रयुक्ताः\nविप्रयुक्त है, उन धर्मों से जो धर्म विप्रयुक्त है..... वे धर्म एक\n\nएक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से वि्रयुक्त\nबी जम यान विभ्रयु्त अनाखव धर्म से विश्रयु्त है, उन धर्मो से जो धर्म\n.... बे धर्म न उकेल्ही आयतनों और छह धातुओं से विष्रयक्त\n.. जो धर्म संयोजन धर्मों से... ग्रंथ धर्मो ... ओघ धर्मा.... योग नीव॒रुण धर्मों... परामर्श\n. परामर्शसम्प्रयुक्त धर्मों... परामर्श और परामृष्ट धर्मों से जो धर्म विप्रयुक्त है, उन धर्मों से जो धर्म विप्रयुक्त\nहै..... वे धर्म एक स्कन्ध, दस आयतनों और सोलह धातुओं से विप्रयुक्त हैं; एक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से\nविप्रयुक्त हैं।\n\n३९५. जो धर्म अपरामृष् धर्म.\n\nविप्रयुक्त है..... बे धर्म न किन्ही स्क\n\nआयतनों और सोलह धातुओं से विध्रः\n\nचरामर्शविध्रयक्त\nन किन्ही आयतनों\n\nअपरामृष्ट धर्म से जो धर्म विप्रयुक्त है, उन धर्मों से जो धर्म\nऔर छह धातुओं से विध्रयुक्त हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000349_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000349_devanagari_page_ocr_75f44df05edd.jpg", "ocr": "अपदानपालि डक\n\n8. सेनासनदायकत्थेरअपदानं\n\n“सिद्धत्थस्स भगवतो, अदासिं पण्णसन्थरं।\n\nसमन्‍्ता उपहारउ्च, कुसुमं ओकिरिं अहं॥4588॥\n\n“पासादेबं गुणं रम्म॑ [पासादे च गुहं रम्म॑ (स्था०)], अनुभोमि महारहं।\nमहस्घानि च पुप्फानि, सयनेभिसवन्ति मे॥4589॥\n\n“सयनेहं तुवट्टामि, विचित्ते पुप्फसन्थते।\n\nपुप्फबुद्धि च सयने, अभिवस्सत्ति तावदे॥4590॥\n\n“चतुन्नवुतितो कप्पे, अदासिं पणणसन्थरं।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, सन्��्थरस्स इदं फलं॥4594॥\n\n“तिणसन्थरका नाम, सत्तेते चकक्‍्कवत्तिनो।\n\nइतो ते पड्चमे कप्पे, उप्पज्जिसु जनाधिपा॥4592॥\n\nप्पों\n\nसिद्धार्थाय भगवते, अदां पर्णसंस्तरम्‌।\nसमन्‍्तात्‌ उपहारज्च, कुसुमम्‌ अवाकिरम्‌ अहम॥4588॥\nप्रासादेवं गुण रम्यम्‌, अनुभवामि महार्म।\n\nमहार्घाणि च पुष्पाणि, शयनेउमिश्ववन्ति मे॥589॥\nशयनेऊहं इन्द्रयामि, विचित्रे पुष्पसंस्तुते।\n\nपुष्पवृष्टिश्न शयने, अभिवर्षति तावदेव॥4590॥\nचतुर्ण्णवताबित: कल्पे, अदाम्‌ पर्णसंस्तरम्‌।\n\nदर्गतिं नाभिजानामि, संस्तरस्येदं फलम्‌॥4594॥\n\nससैते चक्रवर्त्तिन:।\n\nइतस्ते पड्चमे कल्पे, उपापद्यन्त जनाधिपा:॥4592॥\n\nतीर्णसंस्तरका नाम, सः\n\nएक समय मैंने भगवान्‌ सिद्धार्थ को पत्तों का बिछौना प्रदान किया और उसके चारों ओर उपहार एवं\n\nगँँ को बिखेर दिया ॥588॥\n\n(मेरा) प्रासाद रम्य, बहमूल्य एवं गुणों से शुसोभित है ऐसा अनुभव करता हैँ और महनीय पुष्प उस\n\nशयन पर फैल जाते हैं॥589॥\n\nविभिन्न प्रकार\n94 वें\n\nर के पुष्पों से आकीर्ण शयन पर मैं पड़ा हूँ तभी विस्तर पर पुष्पों की वर्षा होने लगती है॥4590॥\nमें पत्ते का जो बिछौना (मैंने) प्रदान किया था उसी कारण मैं दुर्गति को नहीं जानता, यह\n\nउसी बिछौने का ही सुपरिणाम है॥594॥\n\nयहाँ से पाँचवें कल्प में तीर्णसंधारक नाम से सात बार चक्रवर्ती राजा हुआ॥592॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000350_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000350_hindi_handwritten_word_ocr_2d4707316ffd.jpg", "ocr": "संझ"} +{"id": "indic_deva_eval_000351_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000351_devanagari_page_ocr_7dcd10d8d07a.jpg", "ocr": "सद्नीतिप्पकरणं\n\nउ4\n\nअस्सं पुरिमगाथायं, “आयुहे\"तिपदस्स हि।\n'आयूहती\"ति अत्थोति, विज्ञातब्बों विभाविना॥\n\nविभत्तिया विपल्‍लास-वसेनायं समीरितो।\n\nबत्तमाने सत्तमीति, तिस्सेकारबसेन बा॥\n\nपछ्छिमाय च गाथायं, “आयुहे”तिपदस्स तु।\n\n“आयूहामी\"ति अत्थोति, सद्दत्थड्जू विभावये॥\n\nतथा “भवे”तिएतस्स, वत्तमानाविभत्तियं।\n\n“भवती\"ति, “भवामी”ति, चत्थं द्वेधा विभावये॥\n\nएबंविधेसु अज्जेसु, पाठेसुपि अय॑ नयो।\n\nनेतब्बो नयदक्खेन, नयसागरसासने॥\n\nएवमयं भवेसद्दो पज्चसु छसु वा क्रियापदत्थेसु पवत्तति। तथा\nसत्तमीविभत्यन्तनामिकपदस्स बुद्धिसंसारकम्मभवूषपत्तिभवसड्खातेसु अत्येसुषि। तथा हि\n“अभवे नन्‍्दति तस्स, भवे तस्स न नन्‍्दती”तिआदीसु वुद्धिम्हि। “भवे विचरन्‍्तो”तिआदीसु\nसंसारे। “भवे खो सति जाति होति, जातिपच्चया जरामरण\"”न्त���आदीसु कम्मभवे।\nअवेबिज्जसाने \"लि आदीस उपपत्तिभवेति वढ़ब्बं। इडसिना नद्येन भूधाततो निए्फननान अब्जतोषि\nअज्ञेसं क्रियापदानं यथासम्भवमत्थो उद्धरितब्बो।\n\nआख्यातत्थम्हिमे अत्था, न लातब्बा कुदाचन।\nअत्थुद्धारवसेनेते, उद्धटा नामतो यतो॥\nइदमेल्थ सड्स्खेपतो अत्थुद्धारनयनिदस्सन।\n\nअत्थसहचिन्ताय॑ पन एवमुपलक्खेतब्ब॑ - “भवन्‍्ते, पराभवन्‍्ते, पराभवे\"इच्चादयो\nगच्छति गच्छे गच्छतोसद्धादयो विय विसेससद्दा, न याचनोपतापनत्थादिवाचको नाथतिसद्दो\nबिय, न च राजदेवतादिबाचको देवसद्दो विय सामञ्जसद्दा। ये चेत्थ विसेससद्दा, ते सब्बकालं\nविसेससद्दाव। ये च सामज्ञसद्दा, तेपि सब्बकाल॑ सामझ्जसद्गाव।\n\n'तत्र गच्छतीतिआदीनं विसेससह्ता एवं दट्ढलुब्बा - गछ्छतीति एकं नामपदं, एकमाख्यातं।\nतथा गच्छन्ति एक नामपदं, एकमाख्यातं। गच्छतोति एको कितन्‍्तो, अपरो रूव्ठहीसद्दो।\nसतिपि विसेससद्दते सदिसत्ता सुतिसामज्जतो._ तब्बिसय॑ बुद्धि. नुप्पादेति\nबिनाव'त्थप्पकरणसबन्तराशिसम्वन्धेन। तथा हि सद्दल्तरामिसस्वन्धेन “गच्छति पतिद्रित\"न्ति"} +{"id": "indic_deva_eval_000352_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000352_hindi_handwritten_word_ocr_11f94ad3eb49.jpg", "ocr": "मृदा"} +{"id": "indic_deva_eval_000353_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000353_devanagari_digits_mixed_218034984d87.jpg", "ocr": "९२98९१३8२49३५४"} +{"id": "indic_deva_eval_000354_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000354_hindi_handwritten_word_ocr_f4b89594c32f.jpg", "ocr": "ओटो"} +{"id": "indic_deva_eval_000355_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000355_devanagari_page_ocr_17927202edfd.jpg", "ocr": "१. चित्तुप्पादकण्ड 83\n\nकायकम्मज्जता होति, चित्तकम्मज्जता होति, कायपागुज्जता होति, चित्तपागुड्जता होति, कायुजुकता\nहोति, चित्तुजुकता होति, सति होति, समथो होति, पग्गाहो होति, अविक्खेपो होति; ये वा पन तस्मि\nसमये अड्ञेपि अत्थि पटिल्वसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इमे धम्मा कुसला. ..पे*...।\n\nतस्मिं खो पन समये चत्तारो खनन्‍्धा होन्ति, द्वायतनानि होन्ति, द्वे धातुयो होन्ति, तयो\nआहारा होन्ति, सक्तिन्द्रियानि होन्ति, पठ्चज्ञिकं झानं होति, चतुरज्ञिको मग्गो होति, छ बलानि\n\nहोन्ति, द्वे हेतू होन्ति, एको फस्सो होति, एका बेदना होति, एका सञ्ञा होति, एका चेतना\nहोति, एक चित्त होति, एको वेदनाक्खन्धो होति, एको सड्ञाक्खन्धों होति, एको सद्लारक्खन्धो\nहोति, एको विज्ञाणक्खन्धो होति, एकं मनायतनं होति, एक मनिन्द्रियं होति, एका\nमसनोबिड्ञाणधातु होति,एकं धम्मायतनं होति, एका धम्मधातु होति; ये वा पन तस्मिं समये\nअज्ञेपि अत्थि पटिच्चसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा- इमे धम्मा कुसला. ..पे*...।\nह्लस्कृतच्छाया) कायकर्मण्यता भवति, चित्तकर्मण्यता भवति, कायप्रागुण्यता भवति, चित्तप्रागुण्यता\nअवति, कारयर्जुकता भवत्ति, चित्तर्जुकता भवति, स्मृति: भवति, शमथों भवति, प्रग्राहो भवति, अविक्षेपो\nभवति; ये वा पुनः तस्मिन्‌ समये अन्येउपि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ता: अरूपिणों धर्मा: - इमे धर्मा: कुशला:\nतस्मिन्‌ खलु पुन: समये चत्वार: स्कन्‍्धा: भवन्ति, द्वे आयतने भवतः, द्वौ धातू भवत:, त्रयः\nआहारा: भवन्ति, अष्टेन्द्रियानि भवन्ति, पड्चाज्लिकं ध्यानं भवति, पज्चाज्लिको मार्गों भवति, घड्‌ बलानि\nभवन्ति, त्रयो हेतवों भवन्ति, एक: स्पर्शों भवति, एका वेदना भवति, एका संज्ञा भवति, एका चेतना\nभवति, एकं चित्त भवति, एको वेदनास्कन्धो भवति, एक: संज्ञास्कन्धो भवति, एक: संस्कारस्कन्धो\nभवति, एको विज्ञानस्कन्धो भवति, एक॑ मनआयतनं भवति, एक॑ मनइन्द्रियं भवति, एको\nमनोविज्ञानधातु: भवत्ति, एक॑ धर्मायतनं भवत्ति, एको धर्मधातु: भवति; ये वा पुनः तस्मिन्‌ समये\nअन्येदपि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना: अरूपिणों धर्मा:- इसे धर्मा: कुशला:।\n_ तहेन्दी) चित्तमुदुता होती है, कायकर्मण्यता होती है, चित्तकर्मण्यता होती है, कायप्रागुण्यता होती है,\nजचित्तप्रागुण्यता होती है, कार्यर्जुकता होती है, चित्तर्जुकता होती है, स्मृति होती है, शमथ होता है, प्रग्राह होता है,\nअविश्षेप होता है; अथवा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म कुशल होते हैं।\n\nउस समय में चार स्कन्ध होते हैं, दो आयतन होते हैं, दो धातुए७ँ होती हैं, तीन आहार होते हैं, सात-इन्द्रियाँ\nहोती है, पाँच ध्यानांग होते हैं, चार मार्गांग होते हैं, छः बल होते हैं, दो धातुएँ होती हैं, एक स्पर्श होता है, एक\nबेदना होती है, एक संज्ञा होती है, एक चेतना होती है, एक चित्त होता है, एक वेदनास्कन्ध होता है. एक\nसंज्ञास्कन्ध होता है, एक संस्कारस्कन्ध होता है, एक विज्ञानस्कन्ध होता है, एक मनायतन होता है, एक मान-\nइन्द्रिय होती है, एक मनोविज्ञानधातु होती है. एक धर्मायतन, एक धर्मधातु होती है; अथवा उस समय जो भी\nअन्य प्रतीत्यससुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म कुशल होते हैं। ...पूर्वबत्‌...।"} +{"id": "indic_deva_eval_000356_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000356_hindi_handwritten_word_ocr_ab33b76b1a60.jpg", "ocr": "अस्त्वि"} +{"id": "indic_deva_eval_000357_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000357_devanagari_page_ocr_f40954b96f13.jpg", "ocr": "न]\n\nगाथानुक्रमणिका\n\nयथा अत्थड्गते सूरिये 4442\nयथा च भूमि अचला 570\nयथा बलाकयोनिम्हि 544\nथा भूतद्वितो पोसो 496\nअथा मे कायो निब्बाति 4642\nयथा विसादो पुरिसो 494\nयथा समुद्दो उदधीनमग्गो 867\nयथा सारत्थिको पोसो 272\nयथा सूचिघरे सूची 46\nयथा सूलाबुतो पोसो 488\nअथाण्डजा च संसेदा 408\nयथापि उदके जाता 325\nअथापि चन्दो विमलो 320\nअथापि पदुमम जलजं॑ 327\nअथापि पदुम नाम 50\nअथापि ब्याधितो पोसो 267\nअथापि भहके खेत्ते /292\nअथापि रम्मके मासे 329\nअथापि राजा बलवा 525\nअथापि सेलो हिमबा 333\nअथासकेन थामेन 347\nअथासकेन थामेन 934\nअथोदयन्तो आदिच्चो 443\nयदा कुप्पन्ति इसयो 564\nयदा तु सक्‍्यसुनि 545\nयदा देवो देवकाया 2480\nदा वनवासी इसि 2244\nअदा विपस्सी लोकर्गों 726\nयदि रूपिनी भवेय्य 363\nयदिच्छामि अहं वस्सं 089\nअमहं पठम॑ दिस्वा 368\nअमहं फलमदासिं 4527\nअम्हि देसे ठितो सत्था 2063\n\nयस्मिज्च॒जायमानस्मि 4804, 802,\n4803, 4804, 4805, 806, 4807, 4808\nअस्स सद्धा तथागते 4354\nयानकारो पुरे आसिं 4973\nयावता देवता भुम्मा 4024\nयावता नगर आसि 894\n\nयावता बुद्धलकत्तम्हि 303, 355, 44, 545\nयावता बुद्धखेत्तेसु 7\n\nयावता बुद्धभणित 547\n\nयावता बोधिया मूले 597\n\nयाबता रूपिनो सत्ता 4058\nचाबता हिसवन्तन्‍्ता 2403\n\nयूथा विनिस्सटो सन्‍्तो 848\n\nये केचि गणिनो लोके 340\n\nये केचि पाणझूतत्थि 4409\n\nये केचि पादपा सब्बे 4044\n\nये केचि मनुजा दिस्वा 468\n\nये च एतरहि अत्थि 24\n\nये च खीणासवा तत्थ 79\n\nये च सच्ति समितारो 996\n\nये धम्मा हेतुप्पभबा 286\n\nये मे बद्चरा आसुं 2205\n\nये सत्ता सज्जिनो अल्थि 50\n\nयेन जाणेन पत्तोसि 876\n\nचैन आणेन पत्तोसि 225\n\nचेन आणेन सम्बुद्धों 247\n\nयेनाय॑ अज्जली दिननो 4260\nचेनाये जोलिता सेस्था 734\n\nचेनाय॑ रोचिता बोधि 330\nयेनिदं आसन दिन्न॑ 4027, 467\nयेनिद थवितं आण॑ 4067\n\nयेनिदं थवित आण॑ 4447\n\nयेनिदं पदुस खित्त 7348\n\nयेनिदं पदुमं दिनने 620"} +{"id": "indic_deva_eval_000358_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000358_hindi_handwritten_word_ocr_55ec5749b71d.jpg", "ocr": "योगदान"} +{"id": "indic_deva_eval_000359_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000359_indic_mozhi_deva_word_ocr_50938d732f18.jpg", "ocr": "मन्दिर"} +{"id": "indic_deva_eval_000360_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000360_hindi_handwritten_word_ocr_70804342332d.jpg", "ocr": "लोकोन्मुखी"} +{"id": "indic_deva_eval_000361_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000361_devanagari_page_ocr_a2a107470d5a.jpg", "ocr": "3. 0ब७गपाएए9गाएनतड\nदसथूपकथा\n\n809कराड०0०. 9300गरएठ.. आएात॑त्गा203... रिक्ं9०09.. छगराएश्व,. (३७9. एक895\n2गए93७१0900%030300#6. ॥जा00, #3930#39|809. ॥|श03 ॥भजाध/का500. 80. 990।\n53003 निए(क 930४8. छंड58. भाएआ, 599709020फ7399.:. (09. ध3.. किक. कब्ागा। (/506%/6829\n७0353#स्‍0977/0५5 (७७७॥) 5900॥(8 30/॥9303/585909 909//000॥00 ०)30085557 ॥0905930॥,8097) 9303।\nशड्कक90000477360352: 50॥ठ77/9076. 50 व(ठ/9 '॥४032ठ:ठ59]. 9क0॥0गँए४ठ ६2४३7: 7;\n0५३0080व000.. 93४९४... शउतीबाउ/3. ता&.. ताजीवे४0359008.. ॥8ठ59757%.. \"80997\nधाहाता०0/8.. 58/90॥359779,8.. 50007 809. धागा पाए. 920७8. (ता... 3999\nगताएकएप३9७00 000॥#770697 वा0)/॥9 एं/लात 5ठवएए)70४8, 9 (व५वञ09॥॥ 99॥व/॥-97 0॥एता5जका /ठ्तक\n6 १00808)8 352७0 लएका। धा॥७८०५७३७”४ 0307) १0४8 29डल7305800॥॥0/60 ॥रत्रताए/8 5जां/8\nबा (0आ॥08:. /2७३. निक्ाववांगा। अवआ020४9.. 939॥9॥09)/ठ76:.. 90008/#४55अठ0,. पर्भगत3,च॥8\n०0९७०90क्‍(30%7. 9वए8.. 932८॥09,/87॥4/355॥6:. 035803॥9:3009७७व/वं]805300390037807॥900एकग\n5300अए६छतीड0, 9 जीगगएधठ.. उवत(३७३७छ09॥ 000 53072. ;९७३- भचात७(५5:- (09008: ५३808\nअच॑ग2ववा० जात तराना॥0- 090॥0449707्रव593023/6/0030608. 900055७॥6 ८०7 व9गँगिा।ज00\n495903#35च8 07308 0008 59090307स्‍280/%/00005. 8) ठ0036090003085970\n9064॥3८960एव3 ॥0॥97) ०।00७॥(० 07क7000 गर#250097) अ68)/3 ।६१५७३ 00 ॥00 05(॥9009]) 000\n65७))/गा5.. 00(0700.: #छ70999/(809 ॥छाक(क(३७॥8७७॥॥-.तै30४3.. 99ग2३५व७ा/ठ09,. तक पा\n0300अ८छाउधछ00 अ0055७70/8,: ५५0))8)/ठ5अ05 ।(8500/0: ए३९८॥७00 >7(9ठ03998 0ए36७09 5300॥॥\nत97020५७... उध्छ[क09000005त/358.. व ए१0३08..ादु65,8.. 9कीट३७३१०४३7३॥. #रहकाएाआा\n५३5आए ठग. 980४9. 8. कराए) जोक209.. 3४७७०५३०809... 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पबाहेत्वा\nनेरअराय तीरे महावनसण्डे नानासमापत्तीहि दिवाभागं वीतिनामेत्वा सायण्हसमये सोत्थियेन\nदिन्न॑ तिणसुद्धिं गहेत्वा काछेन नागराजेन अभित्थुतगुणो बोधिमण्ड आरुय्ह तिणानि सन्थरित्वा,\nन ता/विम पल्लडूक॑ भिन्दिस्सामि याव मे अनुपादाय आसबेहि चित्त विमुश्जिस्सतीति पटिक्ञ\nकत्वा पाचीनदिसाभिमुखो निसीदित्वा सुरिये अनत्थमिते येव मारबलं विधमेत्वा पठमयामे\nपुब्बेनिबवासआणं, ._ मज्झिमयामे._ चुतूपपातञाणं.._ पत्वा__ पच्छिमयामावसाने\nदसबलचतुवेसारज्जादिसब्बगुणपतिमण्डित॑ सब्बच्जुतआणं पटिविज्झित्वा सत्तसत्ताह\nबोधिसमीपे येव बीतिनामेत्वा अट्ठमे सत्ताहे_ अजपालनिग्रोधमूले निसिज्ञो\nधम्मगम्भीरतापज्जवेक्खनेन. अप्पोस्सुक्रतं. आपज्जमानों दससहस्सीमहात्रह्मपरिवारेन\nसहम्पतिमहाब्रह्मुना आयाचितधम्मदेसनो बुद्धचक्खुना लोक॑ ओलोकेन्‍्तो ब्रह्मुनो अज्झेसनं\nआदाय, कस्स नु खो पठमं धम्म॑ देसेय्यन्ति आलोकन्तो आव्ठारुद्कानं कालकतभाव॑ जत्वा\nपश्चवग्गियानं भिक्‍्खूनं बहपकारतं अनुस्सरित्वा उद्लायासना कासिपुरं गच्छल्तो अन्तरामग्गे\nउपकेन सद्धिं मन्‍्तेत्वा आसाक्ठिहपुण्णमदिवसे इसिपतने मिगदाये पश्चवग्गियानं भिक्‍्खूनं"} +{"id": "indic_deva_eval_000362_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000362_indic_vision_bench_deva_ocr_3fb6cb958601.jpg", "ocr": "भारत\n२३५\nमें जोरों की चर्चा चल पड़ी थी। पार्लमेन्ट के दोनों हाउसों में भारत-सम्बन्धी सरकारी नीति की निन्दा की गई। तब जुलाई १९४१ में एक श्वेत-पत्र प्रकाशित हुया, जिसमें कहा गया कि युद्ध-काल में समस्त भारत के सहयोग के लिये एक केन्द्रिय युद्ध-सलाहकारी बोर्ड बनाया जायगा और वाइसराय की कार्यकारिणी कौंसिल में हिन्दुस्तानी सदस्य बढ़ा दिये जायँगे। कांग्रेस ने सरकार के इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया। मुसलिम लीग भी इनसे सन्तुष्ट नहीं हुई। वह वाइसराय की कौंसिल में अपना बहुमत माँगती थी। पाँच सदस्य वाइसराय की कार्यकारिणी में इस अवसर पर बढ़ा दिये गये।\nमि॰ जिन्ना ने इस पर कहा कि, \"यह तो कोरा दिखावा है। इसके द्वारा तो सरकार के अधिकार और शक्ति में वास्तविक भाग नहीं मिला।\" निर्दल सम्मेलन के नेता डा॰ जयकर ने कहा कि, \"एक भी असली विभाग तो योरपियन के हाथ से भारतीय के हाथ में नहीं आया। मि॰ एमरी अब भी पुरानी ब्रिटिश नीति, अविश्वास और सन्देह, को ग्रहण किये जा रहे हैं।\" फरवरी १९४२ में फिर निर्दल सम्मेलन की बैठक हुई। डा॰ जयकर ने इसमें बलपूर्वक कहा कि, \"बिना जनता को साथ लिये सरकार इतने बड़े युद्ध को कदापि नहीं चला सकती। हम भारत में मलय की स्थिति को नहीं देखना चाहते। हटो, और हमें अपनी रक्षा का काम सँभालने दो।\" उनसे अगले महीने सर तेज तथा अन्य निर्दल नेताओं ने फरवरी के सम्मेलन के प्रस्ताव आधार पर मि॰ चर्चिल से अपील की।\nअगस्त १९४१ की अटलांटिक योजना भी अपने ���ाथ कुछ नहीं लाई। कांग्रेस तो उस पर मौन रही, किन्तु लिबरल नेता पं॰ हृदयनाथ कुँजरू ने इस पर कहा कि, \"इस प्रकार की योजनाएँ और समझोते भारत के लिये तो क्रूर हास्य जैसे हैं। अटलांटिक योजना पर भारत के हस्ताक्षर हैं इसलिये कि राष्ट्रों को अपने भविष्य में आशा और विश्वास उत्पन्न हो, किन्तु भारत को वह स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती, जिसका वचन वह दूसरे देशों को देता है। क्या इससे बढ़कर भी कोई विरोधाभास हो सकता है?\"\nदिसम्बर '४१ में सरकार ने कुछ उदारता दिखाई। सत्याग्रह के कैदियों को छोड़ दिया गया, किन्तु अन्य राजनीतिक क़ैदी नहीं छोड़े गये। इसी मास में"} +{"id": "indic_deva_eval_000363_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000363_devanagari_page_ocr_5704eb19b610.jpg", "ocr": "28 संयत्तनिकायपालि_ ८\n\nअयं चित्तस्स आधारो। सेय्यथापि, भिक्खवे, कुम्भो अनाधारो सुप्पवत्तियो होति, साधारो\nदुष्पवत्तियो होति; एवमेव खो, भिक्खबे, चित्त अनाधारं सुप्पवत्तियं होति, साधारं दुष्पवत्तियं\nहोती'”ति।\n२८. समाधिसुत्तं\n\n२८. सावत्थिनिदानं। *अरियं वो, भिक्खवे, सम्मासमाधिं देसेस्सामि सउपनिसं\nसपरिक्खारं। त॑ सुणाथ। कतमो च, भिक्खवे, अरियो सम्मासमाधि सउपनिसो सपरिक्खारो?\nसेय्यथिदं-- सम्मादिद्धि -- सम्मासति । या खो, भिक्‍खवे, इमेहि सत्तहड्गेह्टि चित्तस्स\nएकर्गता सपरिक्खारता- अयं वुच्चति, भिक्खवे, अरियो सम्मासमाधि सउपनिसो इतिपि\nसपरिक्खारो इतिपी''ति।\n\n२९. बेदनासुत्तं\n\n२९. सावत्थिनिदानं। ““तिस्सो इमा, भिक्खवे, वेदना। कतमा तिस्सो? सुखा वेदना, दुक्खा\nबेदना, अदुक्खमसुखा वेदना -- इमा खो, भिक्खवे, तिस्सो बेदना। इमासं खो, भिक्खवे, तिस्सन्‍न॑\nचबेदनानं परिड्ञाय अरियो अट्ठड्िगिको मग्गो भावेतब्बों। कतमो अरियो अट्ठड्िगिको मग्गो?\nसेय्यथिदं-- सम्मादिद्धि...पे*... सम्मासमाधि। इमासं खो , भिक्खवे, तिस्सन्‍न॑ वेदनानं परिज्ञाय\nअरियो मसग्गों भावेतब्बो''ति।\nत्ल॑स्कृतच्छाया) अर्य चित्तस्य आधार:। तद्यथ्ेदम्‌ भिक्षवः! कुम्भोज्नाधारः सुप्रवर्त्य: भवति साधारः\nदुष्प्रबर्त्य: भवति; एबमेब खलु, भिक्षवः! चित्तम्‌ अनाधारं सुप्रवर्त्य भवति, साधार दुष्प्रबर््य भबति””\nइति।\n\n२८. श्वावस्तीनिदानम। आर्य वो, भिक्षवः! सम्यक्समा्िं देक्ष्यामि सोपनिषद सपरिप्कारम्‌। तत्‌\nशुणुत। कतमश्च, झिक्षवः! आर्य: सम्यक्समाधि: सोपनिषद: सपरिष्कारः? तद्यथ्ेदम्‌ू- सम्यग्दृष्टिः\n\n.पे0... सम्यक्स्मृति:। या खलु, भिक्षव:! एमि: सप्तभि: अड्गैहि चित्तस्यैकाग्रता सपरिष्कारता- अयम्‌\n\nउच्यते, भिक्षबः! आर्य: सम्यक्समाधि: सोपनिषद: इत्यपि सपरिष्कार इत्यपि'” इति।\n\n२९.श्रावस्तीनिदानम्‌। तिख््र: इमा:, भिक्षवः! वेदना:। कतमाश्तिस्र:? सुखा बेदना, दुःखा वेदना,\nअदुःखासुखा: वेदना- इमा: खलु झिक्षवः! तिख्रो वेदना:। आसां खलु, भिक्षवः! तिसृणां वेदनाणां परिज्ञायै\nआर्य: अष्टाडिगको मार्ग: भावयितव्य:। कतमः आर्य: अष्टाडिगको मार्ग:? तद्मथेदम्‌- सम्यग्दृष्टि: ...पे0.\nखलु, भिक्षव:! तिसृणां वेदनाणां परिज्ञायै आर्य: अष्टाइन्को मार्ग: भावयितव्यः'\n) आधार क्‍या? जो यह आर्य अष्टांगिक मार्ग, जैसे- सम्यग्दृष्टि ... पूर्ववत्‌... सम्यक्समाधि। यही चित्त\nका आधर है। भिक्षुओं! जैसे, घड़ा बिना आधार का ... पूर्ववत्‌... कुछ आधार के होने से आसानी से लुढ़काया नहीं\nजाता। वैसे ही भिक्षुओं। अनाधार चित्त आसानी से लुढ़क जाता है तथा साधार चित्त आसानी से नहीं लुढ़कता।\n\n२८. श्वावस्ती में। भिक्षुओं! मैं हेतु और परिष्कार बाला सम्यक्‌-समाधि का उपदेश करूँगा। उसे सुनो।\nजिक्षुओं! वह हेतु और परिष्कार वाला आर्य सम्यक्‌-समाधि क्या है? जो, ... पूर्ववत्‌... सम्यक्‌-स्मृति है। भिश्षुओं!\nजो इन सात अंगों से चित्त की एकाग्रता है, उसी को हेतु और परिष्कार के साथ आर्य सम्यक्‌-समाधि कहते हैं।\n\n२६. श्रावस्ती में। भिक्षुओं! वेदना तीन हैं। कौन-सी तीन? सुख-बेदना, दुःख-वेदन, और दुःख-सुख वेदना।\nभिक्षुओं! यही तीन वेदना हैं। भिक्षुओं! इन तीन वेदनाओं की परिज्ञा के लिये आर्य अष्टांगिक मार्ग का अभ्यास"} +{"id": "indic_deva_eval_000364_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000364_devanagari_page_ocr_02dd5f63b15d.jpg", "ocr": "404\n\nमेत्तेयवग्गो\n\n““चतुसट्ठिक्खत्तुं राजा, चक्‍कवत्ती भविस्सति।\nपदेसरज्जं बिपुलं, गणनातो असड्खियं॥938॥\n““कप्पसतसहस्सम्हि, ओकक्‍्काककुलसम्भवों।\n\nगोतमो नाम गोत्तेन, सत्था लोके भविस्सति॥4939॥\n““उपपज्जति यं योनिं, देवत्त अथ मानुसं।\nअनूनभोगो ह॒त्वान, मनुस्सत्तं गमिस्सति॥4940॥\n“अज्ञायको भवित्वान, तिए्णं वेदान पारगू।\nउत्तमत्थं गवेसन्‍्तो, चरिस्सति महिं इमं॥944॥\n“सो पच्छा पब्बजित्वान, सुक्कमूलेन चोदितो।\nगोतमस्स भगवतो, सासनेभिरमिस्सति॥4942॥\n\n'चत॒ »पष्टिकृत्व: राजा, चक्रवर्ती भविष्यति।\nप्रदेशराज्यं विपुलम्‌, गणनातोज्सड्ख्येयम्‌॥4938॥\n““कल्पशतसहस्रे, इक््वाकुकुलसम्भवः।\n\nगौतमो नाम गोत्रेण, शास्ता लोके भविष्यति॥939॥\n““उपपच्चते यां योन्याम्‌, देवत्वम्‌ अथ मानुषम।\nअनूनभोगो भूत्वा, मनुष्यत्वं गमिप्यति॥940॥\n““अध्यायको भूत्वा, ब्याणां वेदानां पारग:।\n\nउत्तमार्थ गवेषयन्‌, चरिष्यति महिम्‌ इसाम्‌॥944॥\n““सः पश्चात्‌ प्रव्नज्य, शुक्लमूलेन चोदितः।\n\nगौतमस्य भगवतः, शासनेभिरंस्यते॥942॥\n\n64 बार बह चक्रवर्ती राजा होगा और उसका प्रदेशराज्य विपुल तथा गणना में असंख्य होगा ॥938॥\nसौ हजारवे कल्प में इक््वाककुल में उत्पन्न हो वह गौतम नामक गोत्र से लोक में शास्ता होगा ॥939॥\nबह देवत्व अथवा मनुष्यत्व जिस भी योनि में उत्पन्न होगा सम्पूर्ण भोगों को भोगकर मनुष्यत्व को प्राप्त\n\nकरेगा॥940॥\n\nअध्यापक होकर वह तीनों वेदों को पार करेगा और उत्तम अर्थ की प्राप्ति के लिए इस पृथ्वी पर विचरण\n\nकरेगा॥4944॥\n\nउसके पश्चात्‌ कुशल कर्मों के उदित होने पर प्रत्रज्या ग्रहण करेगा और गौतम भगवान्‌ के शासन में रमण\n\nकरेगा॥942॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000365_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000365_indic_mozhi_deva_word_ocr_266b6de85fe7.jpg", "ocr": "गये"} +{"id": "indic_deva_eval_000366_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000366_indic_mozhi_deva_word_ocr_9985ae1c1e73.jpg", "ocr": "हारकर"} +{"id": "indic_deva_eval_000367_hindi_handwritten_word_ocr", "image": 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रात को झुनिया घर में आ गई। उस बखत मैं घर में न रखता, तो सोचो, कहां जाती? किसकी होकर रहती?\nझुनिया बरौठे के द्वार पर छिपी खड़ी यह बातें सुन रही थी। बाप को अब वह बाप नहीं\nशत्रु समझती थी। डरी, कहीं होरी बैलों को दे न दें। जाकर रूपा से बोली-अम्मां को जल्दी से बुला ला। कहना, बड़ा काम ह���, बिलम न करो!\nधनिया खेत में गोबर फेंकने गई थी, बहू का संदेश सुना, तो आकर बोली-काहे बुलाया\nहै बहू, मैं तो घबड़ा गई।\n'काका को तुमने देखा है न?'\n'हां देखा, कसाई की तरह द्वार पर बैठा हुआ है। मैं तो बोली भी नहीं।'\n'हमारे दोनों बैल मांग रहे हैं, दादा से।'\nधनिया के पेट की आगे भीतर सिमट गईं।\n'दोनों बैल मांग रहे हैं?'\n'हां, कहते हैं या तो हमारे रुपये दो, या हम दोनों बैल खोल ले जायंगे।'\n'तेरे दादा ने क्या कहा?'\n'उन्होंने कहा, तुम्हारा धरम कहता हो, तो खोल ले जाओ।'\n'तो खोल ले जाय, लेकिन इसी द्वार पर आकर भीख न मांगे, तो मेरे नाम पर थूक देना।\nहमारे लहू से उसकी छाती जुड़ाती हो, तो जुड़ा ले।'\nवह इसी तैश में बाहर आकर होरी से बोली-महतो दोनों बैल मांग रहे हैं, तो दे क्यों\nनहीं देते? उनका पेट भरे, हमारे भगवान् मालिक हैं। हमारे हाथ तो नहीं काट लेंगे? अब तक अपनी मजूरी करते थे, अब दूसरों को मजूरी करेंगे। भगवान् की मरजी होगी, तो फिर बैल-बधिये हो जायेंगे, और मजूरी ही करते रहे, तो कौन बुराई है। बूड़े-सूखे और पोत-लगान का बोझ न रहेगा। मैं न जानती थी, यह हमारे जैसे हैं, नहीं गाय लेकर अपने सिर पर विपत्ति क्यों लेती। उस निगोड़ी का पौरा जिस दिन से आया, घर तहस-नहस हो गया।\nभोला ने अब तक जिस शस्त्र को छिपा रखा था, अब उसे निकालने का अवसर आ\nगया। उसे विश्वास हो गया, बैलों के सिवा इन सबों के पास कोई अवलंब नहीं है। बैलों को\nबचाने के लिए ये लोग सब कुछ करने को तैयार हो जायंगे। अच्छे निशानेबाज की तरह मन\nको साधकर बोला-अगर तुम चाहते हो कि हमारी बेइज्जती हो और तुम चैन से बैठो, तो यह न होगा। तुम अपने सौ-दो-सौ को रोते हो। यहां लाख रुपये की आबरू बिगड़ गई। तुम्हारी कुसल"} +{"id": "indic_deva_eval_000370_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000370_hindi_handwritten_word_ocr_1f5e66667bd6.jpg", "ocr": "गड़करी"} +{"id": "indic_deva_eval_000371_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000371_indic_mozhi_deva_word_ocr_37578c67fcbd.jpg", "ocr": "घेणारे"} +{"id": "indic_deva_eval_000372_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000372_indic_mozhi_deva_word_ocr_1f6923fe92b9.jpg", "ocr": "तशा"} +{"id": "indic_deva_eval_000373_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000373_indic_vision_bench_deva_ocr_b913766279cf.jpg", "ocr": "संस्कृतीचा फारसा प्रश्नच नव्हता. सगळेच लोक गेल्या २००-३०० वर्षांत तिथे जाऊन राहिलेले, तर अशाच तऱ्हेने राज्यांची बांधणी हिंदुस्थानातसुद्धा करावी कारण तुम्हाला किती मिळणार आहे. हे कुणी ठरवायचं? सरकारने ठरायचंय. विदर्भाचा विकास,मराठवाड्याचा विकास कशावर अवलंबून आहे? राज्याच्या अंदाजपत्रकाम��्ये जी रक्कम येते त्याची वाटणी करण्यावर अवलंबून आहे आणि ती जर का वाटणी सरकारने योग्य तऱ्हेने केली तर नकाशे कसे आखावेत याला काही फारसे महत्त्व नाही. याच कल्पनेने विदर्भातील लोकांनी अकोला करार केला नागपूर करार केला आणि लिहून घेतलं की जी काही साधन संपत्ती येईल त्या साधन संपत्तीचं वाटप एक किंवा दोन मार्गांनी होईल. क्षेत्रफळाच्या आधारांनी अगर लोकसंख्येच्या आधारानी साधनाचं वाटप झालं म्हणजे मग वादांना काही कारण नाही राहिलं.\nत्याच्या पलीकडे जाऊन आणखी एक मागणी होती की, मराठवाडा आणि विदर्भ हे मागासलेले प्रदेश आहेत. त्यांच्यावरती विशेष खर्च झाला पाहिजे. ही कलम घातल्यावर आता काही अडचण राहणार नाही. मराठवाड्याचा, विदर्भाचा विकास व्यवस्थितपणे होऊ लागेल. कारण महाराष्ट्राची साधन संपत्ती नीट वाटली जाणर आहे असं गृहीत धरलेलं. यातूनच अनुशेष म्हणजेच 'बॅकलॉग' हा शब्द आलाय. म्हणजे पश्चिम महाराष्ट्राच्या तुलनेत आम्हाला (विदर्भ मराठवाड्याला) जितकं मिळायला पाहिजे तितकं मिळालेलं नाही हा पश्चिम महाराष्ट्राच्या लोकांनी दुष्टपणे आमच्याकडून हे काढून घेतलं. याच्यातला रावण कोण असेल तर आख्खा पश्चिम महाराष्ट्र आणि सज्जन कोण तर तुमच्या कमलकिशोर कदमांसह सर्व धरून मराठवाड्यात जेवढे असतील ते सर्व सज्जन आणि पश्चिन महाराष्ट्रात जितके आहेत तितके सारे दुर्योधन अशी मांडणी करण्यात आली. मला प्रामुख्याने या विषयावर बोलायचंय, कारण माझा अभ्यासाचा विषय प्रामुख्याने हा आहे.\nएकूण करांपैकी किती कराची रक्कम मराठवाड्यावर खर्च व्हायला पाहिजे होती अन् प्रत्यक्षात किती झाली? हा हिशोब सर्वसाधारण जनतेच्या दृष्टीने निरर्थक आहे. पश्चिम महाराष्ट्रामध्ये साखर कारखाने काढले; पण विदर्भात काढले नाहीत. मराठवाड्यात काढले नाहीत ही भाषा सर्वसामान्य लोकांची, नाही पश्चिम महाराष्ट्रात जसे साखर सम्राट बनले तसे विदर्भात बनले नाहीत, किमान तसे सूत सम्राट किंवा कपास सम्राट बनावेत, अशी ज्यांची मनीषा आहे त्या लोकांनी ही भाषा सुरू केली आहे. याच्यामध्ये आकडे आहेत हे खरे\nभारतासाठी । १४४"} +{"id": "indic_deva_eval_000374_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000374_devanagari_digits_mixed_918b8de3740e.jpg", "ocr": "८९१०४6५२५7"} +{"id": "indic_deva_eval_000375_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000375_indic_mozhi_deva_word_ocr_8b1b3ad9a6fc.jpg", "ocr": "करके"} +{"id": "indic_deva_eval_000376_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000376_indic_mozhi_deva_word_ocr_e27b95035732.jpg", "ocr": "थीं"} +{"id": "indic_deva_eval_000377_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000377_devanagari_digits_mixed_6ed36fb8d7b2.jpg", "ocr": "९7८४"} +{"id": "indic_deva_eval_000378_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000378_devanagari_page_ocr_541cb32a1c25.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो 205\n\nपालि- मम अच्छरियं दिस्वा, सोपि बुद्धो वियाकरि।\n\n“इमम्हि भद्दके अयं बुद्धों भविस्सति॥973॥\n“अह कपिलव्हया रम्मा, निक्खमित्वा तथागतो।\nपथधान॑ पदहित्वान, कत्वा दुक्करकारिकं॥974॥\nअजपालरुक्खमूले, निसीदित्वा तथागतो।\nतत्थ पायासं पग्गय्ह, नेरझ्जरमुपेहिति॥975॥\n“नेरड्जराय तीरम्हि, पायासं परिभुडिजिय।\nपटियत्तवरमग्गेन, बोधिमूलमुपेहिति॥976॥\n“ततो पदक्खिणं कत्वा, बोधिमण्डं अनुत्तरो।\nअपराजितट्ठानम्हि [अपराजितनिसभट्ठाने (क-)), बोधिपल्लड्ःकमुत्तमे।\n'पलल्‍लइड्-केन निसीदित्वा, बुज्झिस्सति महायसो॥977॥\nमम आश्चर्य दुष्ट्वा, सोडपि बुद्धो व्याकरोत्‌।\n'अस्मिन्‌ भद्रके कल्पे, अय॑ बुद्धों भविष्यत्तिक्‍973॥\n\n“अभूत्‌ कपिलाह्ब्या रम्या, निष्क्रम्य तथागत:।\nप्रधान प्रधाय, कृत्वा दुष्करकारिकाम्‌॥974॥\n“अजपालवृक्षमूले, निषद्म तथागतः।\nतज्न पायसं प्रगृह्मय, निरज्जरमुपैदिति॥975॥\nसैर ज्जराया: तीरे, पायस परिभुज्या\nप्रत्यात्मवरमार्गेण, बोधिमूलमुपैदिति॥976॥\n“ततः प्रदक्षिणां कृत्वा, बोधिमण्डम्‌ अनुत्तर:।\nअपराजितस्थाने, बोधिपर्यड्कमुत्तमे।\nपर्यछके निषद्य, बोधिष्यते महायशा:॥977॥\nहिन्दी- मेरे इस अद्भुत (आश्चर्यमय) कर्म को देखकर उन पूजनीय बुद्ध ने मेरे विषय में, भिक्षु परिषद्‌ में,\nभविष्यवाणी की कि 'यह साधक निश्चय ही भद्गक कल्प में बुद्ध होगा'॥973॥\n\nकपिलवस्तु नाम से प्रसिद्ध नगर था, उस नगर से बाहर निकलकर तथागत अपने गृह को विशेषरूप से\nत्याग कर दुष्कर कार्य को करके ... ॥974॥\n\nतथागत अजपाल नामक वृक्ष के नीचे बैठ गये और वहाँ पायस ग्रहण कर नेरअ्ज़रा नामक नदी के समीप\nपहुँच गये॥975॥\n\nनेरजरा नामक नदी के किनारे पायस को ग्रहण कर लिये और प्रास श्रेष्ठ मार्ग से बोधि-बृक्ष के नीचे प्रास\nहये॥976॥\n\nबह अलनुत्तर नामक महायश भगवान्‌\nकरेगा और बैठकर भिक्षुओं को सम्बोधित\n\nरसुत्तमे।\n\nबहाँ अपराजितस्थान में बोधिपर्यडक आसन पर बुद्धत्व प्रास\n।977॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000379_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000379_devanagari_page_ocr_2963cff1971f.jpg", "ocr": "थूपबंसो 20\n\nमग्गेन गच्छन्तो लेणद्वारं पत्वा अन्तोलेणं ओलोकेन्तो त॑ रजतरासिं दिस्वा रजतपिण्डं गहेत्वा\nवासिया छिन्दित्वा रजतभाव���॑ जत्वा महन्त॑ सज्झुपिण्ड गहेत्वा सकटसन्तिकं॑ गन्त्वा\nतिणोदकसम्पन्ने ठाने सकटानि निवेसेत्वा लहं। अनुराधपुरं गन्त्वा रच्जो देस्सेत्वा त॑ अत्थ॑\nनिवेदेसि। राजा तस्सापि यथारहं सक्कारं कारेसि।\nतदनन्तरमन्यदपि शासनसम्‌ आहरन्‌-.. नगरतो.. दक्षिणपार्ख्स अष्टयोजनमस्तके\nअम्बष्कोलजनपदे एकस्मिन लखने रजतमस्‌ उदपद्यत। तस्मिन समये नगरबासिकः: एत्\nशकटैः हरिद्राश्रुइगीवैरादीनाम्‌ अर्थाय मलय॑ गतः लयनस्य अविदूरे शकटानि मुकत्वा प्रतोददारूं पर्यपन्‌\nत॑ पर्वतम्‌ अभिरूढ: एक पणसयपछ्टिम्‌ अपश्यत्‌। तस्य महन्त॑ चाटिप्रमाणम्‌ एकस्‌ एवं पनसफल तरूणयप्टिं\nनामयित्वा अधस्तात्‌ पाषाणपृछ्ठे अस्थात्‌। सः तां फलभारेन नमितं दृष्ट्वा उपगत्य हस्तेन परामृष्य\nपक्रभाव ज्ञात्वा वृन्‍्ते अच्छिनत्‌, पनसय्टि उद्वत्य यथास्थानम्‌ अस्थात्‌। वणिक, अग्र॑ दत्वा भोछ्ये इति\nचिन्तयित्वा काल अघोपयत्‌। तदा चत्वारः क्षीणाखवा आगस्य तस्य पुरतः प्रादरभूवन। वणिक तान\nदुष्टूबा आप्तमनः पादौ वन्दित्वा निसाझ तस्य फलस्थ वृन्तसामन्ता वासिया तक्षयित्वा अपाश्य\nलुश्ययित्वा अपानामयत्‌। समनन्‍्ततः यूसम्‌ अबतीर्य अपाश्रयानीतम्‌ आवार्ट अपूर्यत्‌। बाणिक्‌\nमनोशिलोदकवर्णपनसयूसम्‌ पात्रे परथित्वा अदात। ते क्षीणाश्रवा: तस्य पश्यन्तस्थेव आकाशम्‌\nअब्भूद्स्य प्राक्रमिषु:। सः पुनः काल॑ अघोषयत्‌। अन्ये चत्वारः क्षीणाश्रवा: आगमन्‌ तेषाम्‌ अपि हस्ततः\nपात्रान्‌ गृहीत्वा स्वर्णवर्ण: पनसमज्जै: पूरयित्वा अदातू। तेषु त्रयः स्थविरा आकाशेन प्राक्रमिषुः, इतरः\nइन्द्रगुप्तस्थविरो नाम क्षीणाश्नवः तस्य तम रजत दर्शयितुकामः उपरि पर्वतात्‌ अवतीर्य तस्य लयनस्य\nअविदूरे निसीद्य पनसमज्ज॑ परिभुनक्ति। उपासकः स्थविरस्य गतकाले अवशेसमज्ज॑ आत्मना, अपि\nखादित्वा शेषक भण्डिकं कृत्वा आदाय गच्छत स्थविरं दृष्ट्वा उदकञ्च पात्रधोवनशाखाश्व अदात्‌।\nस्थविरः: अपि लयनद्वारेण शकटसमीपगामीमार्ग मापयित्वा, अनेन मार्गेण “गछ्छ उपासक' इत्याह। सः\nस्थविर बन्दित्वा तेन सार्मेण गच्छल लयनद्वाई प्राप्य अन्तोलयनस्‌ अवलोकयत्‌ त॑ रजतराशिं दुष्ट्वा\nरजतपिण्डं गृहीत्वा वासिया छेत्वा रजतभावं ज्ञात्वा महन्त॑ साध्यपिण्डं गृहीत्वा शकटान्तिकं गत्वा\nतृणोदकसम्पन्ने स्थाने शकटानि निवेश्य लघुम्‌। अनुराधपुरं गत्वा राजानं देशयित्वा तम्‌ अर्थम्‌\nन्‍्यवेदयत्‌। राजा तस्यापि यथाह सत्कारम्‌ अकारयता\n\nऔर तंरुत बाद अभी-अभी एक और संदेश लाये। शहर के दक्षिण में आठ लीग दूर एक जगह पर अम्बट्रकोल\nजिले में एक गुफे में वहाँ चाँदी दिखाई दिया। उस समय शहर के एक निवासी जो व्यापारी था, कई वाहनों के\nसाथ हल्दी, अदरक आदि लेने मलय देश गया, गुफा के समीपवर्ती में वाहनों को छोड़कर बैलों को हाँकने के लिए\nएक अच्छी लकड़ी की खोज के लिए पहाड़ी पर चढ़ गए, कटहल के पेड़ को देखा। उस महान्‌ पेड़ पर, खाना बनाने\nबाले मिट्टी के बर्तन जैसा एकमात्र एक फल था, जो चट्टानों की सतह पर विश्वाम कर रहा था, उस युवा पेड़ को\nनचे सोड़ दिया। वह फल को वजन के साथ झुका हुआ देखकर, समीप जाकर हाथ से स्पर्श कर, पका हुआ जानकर\nडसे डंठल से तोड़ा और कटहल का डंठल (डाली) अपने यथा स्थान ऊपर की ओर चला गया। व्यापारी दान में\nपहला हिस्सा देने की सोचकर, समय की घोषणा किया। उसके बाद चार क्षीणास्रव उसके सामने प्रादुर्भूत हुए।\nव्यापारी उन्हें देखकर प्रसन्न मन हो, उनके पैरों की बन्दना कर उन्हें बैठाया और उस फल के डंठल के सहारे चारों\nओर से चाकू से छीलकर एक तरफ रख दिया। चारों ओर से रस नीचे की तरफ उतरा और डंठल के चारो तरफ से\nछिलका (सहारा) हटने की वजह से वहाँ का गद्ढा भर गया। व्यापारी लाल आर्सेनिक रंग के कटहल के जूस को\nकटोरे में भरकर उन्हें दे दिया। यहाँ तक कि बह चारो क्षीणासतत्रवों को देखता रहा, जब तक कि बे आकाश में ऊपर\nजाकर विदा न हो गए। वह पुनः समय की घोषणा किये। चार अन्य क्षीणात्रव आये। वह उनके हाथ से पात्र लेकर"} +{"id": "indic_deva_eval_000380_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000380_indic_mozhi_deva_word_ocr_abc06e673735.jpg", "ocr": "साहित्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000381_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000381_indic_mozhi_deva_word_ocr_94eab41f9feb.jpg", "ocr": "होंगे"} +{"id": "indic_deva_eval_000382_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000382_indic_vision_bench_deva_ocr_6a656bba01fd.jpg", "ocr": "आज भी खरे हैं\nतालाब\nपर्यावरण कक्ष ।। गांधी शांति प्रतिष्ठान"} +{"id": "indic_deva_eval_000383_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000383_devanagari_page_ocr_f640e0c06557.jpg", "ocr": "5व2-\n\nसद्नीतिप्पकरणं\n\nअविज्जासदनिष्फत्ति, दीपेतब्बा सुधीमता॥\nएत्थ पूरेतुं अयुत्तद्वेन कायदुच्चरितादि अविन्दियं नाम, अलद्धब्बन्ति अत्थो, तं अविन्दिय॑\n\nविन्दतीति अविज्जा, तब्बिपरीततो कायसुचरितादि विन्दियं नाम, तं विन्दियं न विन्दतीति\nअविज्जा। खन्‍्धानं रासट्ठं, आयतना���ं आयतनहुं, धातूनं सुज्छाट्ं, सच््चानं तथद्ठं, इन्द्रियानं\nअधिपतियद्ठ॑ अविदितं करोतीति अविज्जा। दुक्खादीन॑ पीव्शनादिवसेन बुत्त चतुब्बिधं अत्थ॑\nअविदितं करोतीति अविज्जा, अन्तविरहिते संसारे सब्बभवयोनिगतिविज्ञाणट्ठितिसत्तावासेसु\nसत्ते जवापेतीति अविज्जा, परमत्थतो अविज्जमानेसु इत्थिपुरिसादीसु जवति, विज्जमानेसुपि\nखन्‍धादीसु न जवतीति अविज्जा।\n\nय॑ पन अ्लकथाय॑ “अपिच चक्खुविज्ञाणादीन\n\nवत्थारम्मणपटिच्चससुप्पादपटिच्वसमुप्पन्ना न॑ धम्मानं छादनतोपषि अविज्जा”ति बुत्त, एतं न\nसद्दत्थतो बुत्तं, अथ खो अविज्जाय छादनकिच्चत्ता चुत्तं। तथा हि अभिधम्मटीकायं इदं बुत्त -\n\n“ब्यच्जनत्थं दस्सेत्वा सभावत्थं दस्सेतुं 'अपिचा'तिआदिमाह, चक्खुविज्ञाणादीनं\nवत्थारम्मणानि “इदं वक्तु, इदमारम्मण'न्ति अविज्जाय जातुं न सक्‍काति अविज्जा\nतप्पटिच्छादिका. वुत्ता, . वत्थारम्मणसभावच्छादनतो... एवं... अविज्जादीनं\nसहिच््वससप्पादभावस्स, जरामरणादीन पटिच्वसम्पन्नभावस्स च छादनतो\nपटिज्चसमुप्पादपटिच्चसमुप्पन्नछादनं बवेदितब्बन्ति। तत्थ दुग्गतिगामिकम्मस्स\nविसेसप्पच््चयत्ता अविज्जा “अविन्दियं विन्दती'ति बुत्ता, तथा विसेसपच्चयो\nविन्दतीयस्स न होतीति '“विन्दियं न॒ विन्दतीति च, अत्तनिस्सितानं\nचक्खुविज्ञाणादीन॑ पवत्तापनं उप्पादन॑ आयतनं, सम्मोहभावेनेव अनभिसमयभूतत्ता\n“अविदितं अज्ञातं करोति, अन्तबिरहिते जबापेती'ति\nवण्णागमविपरियायविकारबिनासधातुअत्थविसेसयोगेहि 'पडन्वविधस्स\nनिरुक्तिलक्खणस्स वसेन तीसुषि पदेसु अकारविकारजकारे गहेत्वा अड्जेस वण्णानं\nलोप॑ कत्वा जकारस्स च दुतियस्स आगमं कत्वा अविज्जाति वुत्ता\"ति।\n\nअरहधातुतो जेय्या, अरहंसद्सण्ठिति।\n\nअरारूपपदहन-धातुतो बाथवा पन॥\n\nरहतो रहितो चापि, अकारपुब्बतो इध।\n\nबुच्चते अस्स निप्फत्ति, आरकादिरबस्सिता॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000384_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000384_devanagari_page_ocr_6a749f028776.jpg", "ocr": "गाथानुक्रमणिका\n\nज्ज़्ता\n\nलक्खणे द्वे च कडखामि 4377\nलबुजस्स फलं॑ गय्ह 4043\nलभामि चतुरो वण्णे 4266\nलभामि दिब्बनयनं 4254\nलाभा अम्हं सुलद्धं नो 568, 4674\nलाभा मम सुलद्ध॑ मे 4544\nलाभा मस्हं सुलद्धं मे 2023\nलोकचक्खु महातेजो 4355\nलोहदोणिं गहेत्वान 755\nबग्गूसु भासमानासु 4922\nबच उसीरं लट्ठिमधुं 446\nबज्जन्ति भेरियो सब्बा 925\nवण्णगन्धरसोपेत॑ 4299\n\nबत्त�� गुणे पटिपत्ति 4240, 285\nबत्थं गन्धड्च सप्पिड्च 4687\nवनकम्मिको तदा आसिं 744\nबनचारी पुरे आसिं 268\nवननन्‍्तरे बुद्ध दिस्वा 4026\nबनसण्ड समोगय्ह 455\nवन्दित्वान महानागं 4534\nबरचन्दनेनानुलिम्पि 882\nवरधम्ममनुप्पत्तो 4645\n\nबसी गणी पतापी च 347\nवसीसतसहस्सेहि 453\nवस्सिके पुप्फमानम्हि 879\nबस्से च ते ओरमिते 4530\n\nबाकचीरं धुनन्‍्ता ते 4753\nबाकचीरधरो आसिं 406\nवासियों सत्थके चापि 442\nविचरन्तो अरज्ञम्हि 494\nविचिनन्तों सकं पुत्त 442\nविजहित्वा देववण्णं 234\nविज्जा मन्तपदे चेव 4236\nविज्जाधरो तदा आसिं 949\nवित्तिसड्जननं मय्हं 044\nवित्थारिके पावचने 607\nविधूपने तालवण्टे 4443\nविधूपने सुगते दत्वा 4245\nविनतानदिया तीरे 4020\nविनिच्छयं पापुणाम 444\nविनिपातं विवज्जेत्वा 4670\nविपस्सि तत्थ अद्दक्खि 467\nबिपस्सि लोकपज्जोत॑ 407\nविपस्सि लोकमहितं 950\nविपस्सिनों पावचने 4054\nविपस्सिनों भगवतों 73, 459, 897\nविपस्सिस्स नरग्गस्स 369\nविपस्सिस्स भगवतो 24, 427, 385\nविपस्सी नाम भगवा 953\nबिपस्सी नाम सम्बुद्धो 697\nबिपाक॑ एकदुस्सस्स 693\nबिपिनचारी सम्बुद्धों 262"} +{"id": "indic_deva_eval_000385_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000385_hindi_handwritten_word_ocr_69fe1bb5adb5.jpg", "ocr": "औलिया"} +{"id": "indic_deva_eval_000386_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000386_hindi_handwritten_word_ocr_98da512c17fa.jpg", "ocr": "तनिक"} +{"id": "indic_deva_eval_000387_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000387_indic_vision_bench_deva_ocr_95b018614bfd.jpg", "ocr": "कम हो गयी थी। मधुसूदनजी ने बहुत चाहा, कि रंग जमा दें; पर लोग जम्हाइयाँ ले रहे थे और पिछली सफ़ों में तो लोग बड़ल्ले से सो रहे थे। मालूम होता था, मन्दिर का आंगन कुछ छोटा हो गया है, दरवाजे कुछ नीचे हो गये हैं। भजनमंडली के न होने से और भी सन्नाटा है। उधर नौजवान सभा के सामने खुले मैदान में शांतिकुमार की कथा हो रही थी। ब्रजनाथ, सलीम, आत्मानन्द आदि आनेवालों का स्वागत करते थे। थोडी देर में दरियां छोटी पड़ गयीं और थोड़ी देर और गुजरने पर मैदान भी छोटा पड़ गया। अधिकांश लोग नंगे बदन थे, कुछ लोग चीथड़े पहने हुए। उनकी देह से तम्बाकू और मैलेपन की दुर्गन्ध आ रही थी। स्त्रियाँ आभूषणहीन, मैली-कूचेैली धोतियां या लहँगे पहने हए थीं। रेशम और सुगन्ध और चमकीले आभूषणों का कहीं नाम न था; पर हृदयों में दया थी, धर्म था, सेवा-भाव था, त्याग था। नये आनेवालों को देखते ही लोग जगह घेरने को पाँव न फैला लेते थे, यों न ताकते थे, जैसे कोई शत्रु आ 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आड़े\n२०४\nकर्मभूमि"} +{"id": "indic_deva_eval_000388_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000388_indic_mozhi_deva_word_ocr_c75a94b9fde6.jpg", "ocr": "कहो"} +{"id": "indic_deva_eval_000389_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000389_hindi_handwritten_word_ocr_b0a01f77a743.jpg", "ocr": "कस्बों"} +{"id": "indic_deva_eval_000390_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000390_hindi_handwritten_word_ocr_327a97179d53.jpg", "ocr": "करिए"} +{"id": "indic_deva_eval_000391_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000391_hindi_handwritten_word_ocr_ef80588cf46f.jpg", "ocr": "जागीर"} +{"id": "indic_deva_eval_000392_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000392_devanagari_page_ocr_b2bb088f1ae4.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n225\n\n5. मोघराजत्थेरअपदानं\n“अत्थदस्सी तु भगवा, सयम्भू अपराजितो।\nभिक्खुसड्ू-घपरिब्यूव्ठहो, रथियं पटिपज्जथ॥055॥\n“सिस्सेहि सम्परिवुतो, घरम्हा अभिनिक्खमिं।\nनिक्‍्खमित्वानहं , अद्दसं लोकनायकं॥ 4056॥\n“अभिवादिय सम्बुद्धं, सिरे कत्वान अज्जलिं।\nसकं चित्त पसादेत्बा, सन्‍्थबिं लोकनायकं॥4057॥\n“यावता रूपिनो सत्ता, अरूपी वा असड्छिनो।\nसब्बे ते तब जाणम्हि, अन्तो होन्ति समोगधा॥4058॥\n“सुखुमच्छिकजालेन , उदकं यो परिक्खिपे।\nथे केचि उदके पाणा, अन्तोजाले भवन्ति ते॥4059॥\nअर्थदर्शी तु भगवान्‌, स्वयम्भूरपराजित:।\nभिक्षुसड्खपरिव्यूछ:, रथ्यं प्रत्यपद्मत॥4055॥\nशिष्यै: सम्परिवृत:, गृहाद्‌ अभिनिरक्रमम्‌।\nनिष्क्र्याहं तत्र, अद्राक्ष लोकनायकम्‌॥056॥\nअभिवाद्य सम्बुद्धम्‌, 'शिरसि कृत्वा अज्जली मा\nस्वकं॑ चित्त प्रसाद्य, समस्तौम लोकनायकम्‌॥057॥\nयावन��‍्तः रूपिण: सत्त्वा:, अरूपिणों वा संज्ञिनः।\nसर्वे ते तब ज्ञान, भवन्ति समोगधा:॥058॥\nसूक्ष्मेक्षिकाजालेन , उदक॑ य: परिक्षिपेत्‌।\nये केचिद्‌ उदके प्राणाः, अन्तजाले भवन्ति ते॥059॥\n\nहनायः\n\nतब उन स्वयम्भू, अपराजित अर्थदर्शी तथा झिक्षुसंघ से आवृत भगवान्‌ ने-॥4055॥\n\nशिष्यों से सम्परिवृत घर से निष्क्रमण कर मैंने उन लौकनायक को देखा॥4056॥\n\nबुद्ध का अभिवादन कर, सर झुका कर करबद्ध होकर स्वचित्त को प्रसन्न कर मैंने लौकनायक\nकी संस्तुति की॥4057॥\n\nरूपी, अरूपी व असंज्ञी जितने भी सत्त्व (जीव) हैं, वे सभी आप के द्वारा दिप्ट-मार्ग में\nसमाहित हो जाते हैं॥4058॥\n\nजब कोई बारीक मछली मारने वाला जाल को जल में फेंकता है तब उसमे जितने भी जलीय\nप्राणी होते हैं, वे जालाबद्ध हो जाते हैं॥4059॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000393_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000393_devanagari_digits_mixed_5f8710daa965.jpg", "ocr": "२४५३०१1158058७५7५९१"} +{"id": "indic_deva_eval_000394_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000394_devanagari_page_ocr_f20c48c15995.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n322- न्‍\n\nअत्थो तानि तायति रक्खतीति वुच्चति। को पन सोति? अज्ञकुलपरम्परासाधारणं तस्स\nकुलस्स आदिपुरिससम्मुदितं तंकुलपरियापन्‍नसाधारणं सामज्जरूप॑।\n\nनक्खत्तन्ति विसमगतिया अगन्त्वा अत्तनों बीथियाव गमनेन नक्खनं गमन॑ तायति\nरक्खतीति नक्खत्तं, त॑ पन अस्सयुजादिवसेन सत्तवीसतिविध॑ होति। तथा हि अस्सयुजो भरणी\nकत्तिका रोहणी मिगसिरो अद्दा पुनब्बसु फुस्सो अस्सलिसो माघों पुब्बफग्गुणी उत्तरफग्गुणी\nहत्थो चित्त स्वाति बिसाखा अनुराधा जेद्ठा मूल॑ पुब्बासव्वहं उत्तरासव्वह॑ सावर्ण धनसिद्ठा\nसतभिसत्तं पुब्ब॒भद्दप्द उत्तरभद्यपदं रेवती चाति सत्तवीसति नक्खत्तानि। तानि पन अत्तनो\nगमनदट्ठानं ईसकम्पि न विजहन्ति किडिच सीघं किडिच दन्ध॑, कदाचि सीघं, कदाचि दन्धं, एत्तो\nइतो चाति एवं विसमगतिया अगन्त्वा यन्‍्तचक्के पटिपाटिया योजितानि विय\nसमप्पसमाणगतिया अत्तनो बीथियाब गच्छन्तानि मण्डलाकारेन सिनेरूुं परिबत्तन्ति। एवं इमानि\nजकखने गमन॑ तायन्ति रक्खन्तीति नक्खत्तानीति वुच्चन्ति। पोराणा पन खरधातुवसेन\n“नक्खरन्ति न नस्सन्‍्तीति नक्खत्तानी”ति आवोचुं, “नक्खत्तं जोति रिक्खं तं” इच्चेतानि\n\nनकखत्ततारकान॑ नासानि। “उत्ऐछ तारा तारका\"लि इसानि पन सब्बासम्पि तारकान॑\nसाधारणनामानि। ओसधीति पन तारकाविसेसस्स नामं।\n\nचिति सजञ्ञाणे। सज्ञा्णं चिहनं लक्खणकरणं। चेतति। चिहनं॑ करोतीति अत्थो।\nईकारन्तवसेन बुत्तत्ता अस्मा धातुतों सकि सड्कायन्ति धातुतों विय निग्गहीतागमो न होति।\nएस नयो अज्जेसुषि ईदिसेसु ठानेसु।\n\nचत गतिय॑ं। पतति। पपतति पपातं, पपतेय्यहं। पापत्तं निरय॑ भुसं। अहंसद्देन योजेतब्बं,\nपापत्तं पपतितोस्मीति अत्थो। पापत्थ निरयं भुसं, सोकुमारोति योजेतब्बं, पापत्थ पपतितोति\nअत्थो। परोक्‍्खापदडिहएतं द्वयं। “पावर्द पावदा”\"तिआदीसु विय उपसग्गपदस्स दीघभावो, ततो\nअंसहस्स त्तंआदेसो, असहस्स च त्थादेसो भवति। अचिन्तेय्यो हि पाक्िनयों।\n\nअत सातच्चगमने। सातच्चगमनं निरन्तरगमनं। अतति। यस्मा पन अतधातु\nसातच्चगमनत्थवाचिका, तस्मा भवाभवं धावन्‍न्तो जातिजराब्याधिमरणादिभेद॑ अनेकविहितं\nसंसारदुक्खं अतति सततं गच्छति पापुणाति अधिगच्छतीति अत्तातिषि निब्बचनमिच्छितब्बं।\nअत्थन्तरवसेन पन “आहितो अहंमानो एत्थाति अत्ता, अत्तभावो”ति च “सुखदुक्खं अदति\nअनुभवतीति अत्ता”ति च “अत्तमनोति पीतिसोमनस्सेन गहितमनो”ति चर अत्थो वट्ठब्बो, यत्थ\nयत्थ यथा यथा अत्थो लब्भति, तत्थ तत्थ तथा तथा अत्थस्स गह्ेतब्बतोति।\n\nचुत आसेचने खरणे च। चोतति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000395_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000395_hindi_handwritten_word_ocr_973e2a905213.jpg", "ocr": "मस्जिद"} +{"id": "indic_deva_eval_000396_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000396_indic_mozhi_deva_word_ocr_2179f518a750.jpg", "ocr": "दीं"} +{"id": "indic_deva_eval_000397_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000397_indic_mozhi_deva_word_ocr_9c3ac26332af.jpg", "ocr": "बरेचसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000398_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000398_devanagari_page_ocr_15bf43356a30.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 293\n\nसमये दुक्खिन्द्रियं होति। कतमं तस्मि समये जीवितिन्द्रियं होति? यो तेसं अरूपीनं धम्मानं आयु\nठिति यपना यापना इरियना बत्तना पालना जीवितं जीवितिन्द्रियं- इदं तस्मिं समये\nजीवितिन्द्रियं होति। ये वा पन तस्मि समये अड्ञेपि अत्थि पटिच्वसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा -\nइसमे धम्मा अब्याकता।\n\nतस्मिं खो पन समये चत्तारों खन्धा होन्ति, द्वायतनानि होन्ति, द्वे धातुयो होन्ति, तयो\nआहारा होन्ति, तीणिन्द्रियानि होल्ति, एको फस्सो होति, एका वेदना होति, एका सज्ञा होति,\nएका चेतना होति, एकं चित्त होति, एको बेदनाक्खन्धो होति, एको सड्ञाक्खन्धो होति, एको\nसल्लारक्खन्धो होति, एको विड्ञाणक्खन्धो होति, एकं॑ मनायतनं होति, एक॑ मनिन्द्रियं होति,\nएका कायविज्ञाणधातु होति, एकं धम्मायतनं होति, ए��ा धम्मधातु होति; ये वा पन तस्मि\nसमये अज्ञेपि अत्थि पटिच्चसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इमे धम्मा अब्याकता. ..पे*...।\n(संस्कृतच्छाया) समये दु:खेन्द्रियं भवति। कतमं॑ तस्मिन्‌ समये जीवितेन्द्रियं भवति? य: तेषाम्‌ अरूपीणां\nधर्माणाम्‌ आयु: स्थिति: यपना यापना ईरणं वर्तन॑ पालन जीवितं जीवितेन्द्रियम- इद॑ तस्मिन्‌ समये\nजीवितीन्द्रियं भवति। ये वा पुनः तस्मिन्‌ समये अन्येपि सच्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना अरूपिणों धर्मा: - इमे\nधर्मा: अब्याकृता:।\n\nतस्मिन्‌ खलु पुनः समये चत्वार: स्कन्‍्धा: भवल्ति, द्वे आयतने भवल्ति, द्वौ धातू भवतः, त्रयः\nआहारा: भवक्‍्ति, त्रीणीन्द्रियाणि भवच्ति, एक:\n\nस्पर्शों भवति, एका वेदना भवति, एका संज्ञा भवति,\nएका चेतना भवति, एक॑ चित्त भवति, एको वेदनास्कल्धों भवति, एक:\n\nसंज्ञास्कन्धो भवति, एक:\nसंस्कारस्कन्धो भवति, एको विज्ञानस्कन्धो भवति, एकं मनआयतनं भवति, एकं मनइन्द्रियं भवति, एक:\nकायविज्ञानधातर्भवत्ति, एक धर्मायतन भवति, एको धर्मधात्भवत्ति; थे वा पुनः तस्मिन समय्रे अच्चेडति\nप्रतीत्यसमुत्पन्ना अरूपिणो धर्मा: - इसे धर्मा: अव्याकृता:।\nतहेन्दी) दुःखेन्द्रिय होती है। उस समय कौन सी जीवित-इन्द्रिय होती है? जो उन अरूपी धर्मों की आयु, स्थिति,\nव्यतीत होना, गुजरना, क्रिया शीलता,विद्यमान रहना, पालन करना, जीवन और जीवित-इन्द्रिय है- यही उस\nसमय जीवित-इन्द्रिय होती है। अथवा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यससुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म अब्याकृत हैं।\nउस समय चार स्कनन्‍्ध होते हैं, दो आयतन होते हैं, दो धातुएँ होती हैं, तीन आहार होते हैं, 'इन्द्रिय होती\nहैं, एक स्पर्श होता है, एक वेदना होती है, एक संज्ञा होती है, एक चेतना होती है, एक चित्त होता है, एक\nबेदनास्कन्ध होता है, एक संज्ञास्कन्ध होता है, एक संस्कारस्कन्ध होता है, एक विज्ञानस्कन्ध होता है, एक\nमनआयतन होता है, एक मन-इन्द्रिय होती है, एक कायविज्ञानधातु होती है, एक धर्मायतन होता है, एक धर्मधातु\nहोती है; अथवा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यसमत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म अव्याकृत हैं ...पूर्ववत्‌."} +{"id": "indic_deva_eval_000399_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000399_devanagari_page_ocr_22b4c5d72e66.jpg", "ocr": "338 'पिलिन्दवच्छवग्गो\n\n““अस्सेव दीपदानस्स, [अद्ठदीपफलेन हि। उपड्िस्सन्तिमं जन्‍्तुं (स्या०), अद्भ दीपा फलेन\nहि। न जहिस्सन्ति'मं जन्तुं (?)] अद्भदीपफलेन हि।\n\nन जयिस्सन्तिमं जन्तू [अट्ठदीपफलेन हि। उपट्विस्सन्तिमं जन्तुं (स्या*), अट्ठ दीपा फलेन\nहि। न जहिस्सन्ति'मं जन्तुं (?2)], दीपदानस्सिदं फलं॥4606॥\n\n““कप्पसतसहस्सम्हि, ओक्‍्काककुलसम्भवो।\nगोतमो नाम गोत्तेन, सत्था लोके भविस्सति॥4607॥\n'तस्स धम्मेसु दायादो, ओरसो धम्मनिम्मितो।\nसब्बासवे परिड्ञाय, निब्बायिस्सतिनासवो॥608॥\n““तोसयित्वान सम्बुद्धे, गोतम॑ सक्‍्यपुडूगवं।\nअजितो नाम नामेन, हेस्सति सत्थु सावको'॥4609॥\n“सढ़ि कप्पसहस्सानि, देवलोके रमिं अहं।\nतत्रापि मे दीपसतं, जोतते निच्चकालिकं [सब्बकालिकं (सी*)]॥4640॥\n““अस्वैव दीपदानस्स, अष्टदीपफलेन हि।\nन जयिष्यान्तिमं जन्तुम्‌, दीपदानस्येदं फलम्‌॥606॥\nशनतसहखे, दक्ष्बाकुकुलसम्भव:।\nगोतमो नाम गोत्रेण, शास्ता लोके भविष्यति॥4607॥\n““तस्थ धर्मेषु दायादः, औरसो धर्मनिर्मितः।\nसर्वास्रवान्‌ परिज्ञाय, निर्वायिष्यत्यनाखब:॥608॥\n_तोपयित्वा सम्बद्धम, गौतम शाक्यपटगवसा\nअजितो नाम नाम्ना, भविष्यति शास्तुः श्वावकः'॥609॥\n“पष्टिकल्पसहखाणि, देवलोके रसे अहम\n\n'तत्नापि में दीपशतम्‌, ओतते नित्यकालिकम्‌॥4640॥\n\nछस क्तदान का हो परिणाम है कि इसे आठ द्वीप प्राप्त होगा। आठ द्वीपों के फल इस\nश्राणी को नहीं छोड़ पायेंगे॥606॥\n\nअब से सौ हजारवें कल्प में इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हो गौतम नाम के\n46070\nउनके धर्म में दीक्षित, धर्मनिर्भित औरस तथा सर्वाख्रचों को जानकर वह निर्वाण को प्रास करेगा॥4608॥\n\nशाक्‍्य कुलोत्पन्न श्रेष्ठ गौतम सम्बुद्ध को सन्‍्तुष्ट करके अजित नामक शास्ता का श्ाबक होगा॥609॥\n\nसाठ हजार तक मैंने देवलोक में रमण किया और वहाँ पर भी मेरे लिए सौ दीपक\nसदैव प्रकाशित रहते हैं॥460॥\n\nगोत्र से लोक सें\n\nशास्ता हो:"} +{"id": "indic_deva_eval_000400_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000400_indic_vision_bench_deva_ocr_c1a550806d60.jpg", "ocr": "तोंड पाहण्याची' इच्छा होती, तर कोणाला 'अहेवपणी मरणाची'. पण, अजूनही\nकोणी आपल्या मनातलं बोलत नव्हत्या, आपल्याला काय हवे, नको ते\nबोलत नव्हत्या असे जाणवत होते. मग, मला एकदम\n'सत्वर पाव गे मला, भवानी आई, रोडगा वाहीन तुला,\nसासू माझी गावी गेली, तिथंच खपू दे तिला'\nया भारुडाची आठवण झाली. असल्या मनीच्या इच्छा बोलून दाखविण्याची\nकोणाची तयारी नव्हती. मग, मी आणखी एक प्रश्न धाडसाने विचारला.\n'जन्मल्यापासून आतापर्यंत, बाईच्या जन्माला आले याचा कधी आनंद झाला\nका?'\nउत्तर लगेच मिळाले, 'पहिला मुलगा झाला तवा लई आनंद झाला' आणि\nअचानक, एका साध्यासुध्या दिसणाऱ्या बाईने एक ओळ म्हणून दाखविली,\n'अस्तुरी जल्मा नको घालू शिरीहारी,\nरात न दिस परायाची ताबेदारी\n'\nशेतकरी संघटनेच्या नैतिक दर्शनातील 'स्वातंत्र्याच्या कक्षा (Degrees of\nFreedom)' ही कल्पना इतकी सहज पुढे आल्यामुळे मी आनंदून गेलो. विजय\nपरूळकरांनी एका कागदाच्या तुकड्यावर एक चिठ्ठी पाठविली, 'मी स्वत:ला\nसंचारतज्ज्ञ समजतो, पण तुमच्यापुढे माझे साष्टांग दंडवत आहे.'\nबायांची राहण्याची सोय जवळच्याच घरी होती. त्या दिवशी बाया घरी\nगेल्या. रात्री बहुधा त्यांनी अहमहमिकेने भजने म्हटली असावीत. दुसरे दिवशी\nनाश्ता करून त्या बैठकीला आल्या आणि मग, कुपोषणाची सर्व लक्षणे\nदिसणाऱ्या, एका बाईने मला म्हटले, 'भाऊ, तुम्ही कालपासून आम्हाला\nबोलायला सांगता. कोणाची हिम्मत होत नाही. पण, मी ठरवले आहे. पूर्वी\nमाहेर असताना तेथे गेल्यावर सगळं काही - हातचं राखून न ठेवता सगळं- \nभावाला सांगायची. आता तुम्हीच माझे भाऊ; तुमच्यापासून काय लपवून\nठेवायचं? मी तर सगळं काही सांगणार आहे.'\nमग तिने तिची कहाणी सांगितली : 'उसाला भाव मिळाला, मालक दारू\nपिऊ लागले आणि मला फक्त मार पडायला लागला.' पुढे मी ही कहाणी\nअनेक वेळा सांगितली आहे. पण, त्या क्षणी शेतकरी महिला आघाडीच्या\nबाया आणि मी यांच्यात – पत्रकार सतीश कामत यांच्या शब्दांत - मालकाच्या\n'साहेबां'ना 'भाऊ' म्हणणारे नाते तयार झाले.\nनंतर एकेकीने आपले प्रश्न मांडले - भाषणासारखे नाही, बोलल्यासारखे. विधवापणामुळे किंवा संसार नासल्यामुळे माहेरी माघारी येऊन मोठ्या भावाकडे,\nचांदवडची शिदोरी : स्त्रियांचा प्रश्न / १९"} +{"id": "indic_deva_eval_000401_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000401_devanagari_page_ocr_ac9aa63e0243.jpg", "ocr": "45. पियदस्सीबुद्धवंसो\n438 पल\n\nपालि- दोणमुखं हत्थिं, विनेसि नरसारथि।\nअसीतिकोटिसहस्सानं, ततियाभिसमयों अह॥657॥\nसल्निपाता तयो आसुं, तस्सापि पियदस्सिनो।\nकोटिसतसहस्सानं, पठमो आसि समागमो॥658॥\nततो परं नवुतिकोटी, समिंसु एकतो सुनी।\nततिये सन्निपातम्हि, असीतिकोटियो अह॥659॥\nअहं तेन समयेन, कस्सपो नाम ब्राह्मणो [मानवों (स्था* कं)]।\nअज्ञायको मन्तधरो, तिण्णं वेदान पारगू॥660॥\nतस्स धम्मं सुणित्वान, पसाद॑ जनयिं अहं।\nकोटिसतसहस्सेहि, सझूघारामं अमापयिं॥664॥\nसंस्कृतच्छाया- द्रोणसुखं हस्तिनम्‌, व्यनयत्‌ नरसारथि:\nअशीतिकोटिसहस्राणाम, तृतीयाभिसमयोउ्��ूत्‌॥657॥\nसन्निपाताः त्रय आसन्‌, तस्यापि प्रियदर्शिन:।\nकोटिशतसहखाणाम्‌, प्रथम: आसीत्‌ समागमः॥658॥\nततः पर॑ नवतिकोटिः, अशमयन्‌ एकतो मुनयः।\nतृतीये सन्निपाते, अशीतिकोटयोउभुबन्‌॥659॥\nअहं तस्मिन्‌ समये, काश्यपो नाम ब्राह्मणः\nअध्यायको मन्त्रधर:, त्रयाणां बेदानां पारगः\nतस्य धर्म श्रुत्त्या, प्रसादम्‌ अजयनम्‌ अहम्‌।\nकोटिशतसहसौः, सडुघारामम्‌ अमापयम्‌॥664॥\nकेन्दी- इन शास्ता ने द्रोणमुख हस्ती का दमन किया था, तब उनका अस्सी हजार करोड़ का तृतीय\nधर्माभिसमय हुआ॥657॥\nइन प्रियदर्शी भगवान्‌ बुद्ध के तीन शिष्यसम्मेलन भी हुए थे। उनमें प्रथम समागम एक लाख करोड़ का\nथरा॥658॥\nदूसरा समागस नब्बै करोड़ भिक्षुओं का हुआ तथा तृतीय समागम अस्सी हजार करोड़ भिक्षुओं का\nडुआ॥659॥\n\nमैं उस समय एक स्वाध्यायी, मन्‍्त्रधर, तीनों बेदों का पारइगत काश्यप नामक ब्राह्मण था॥660॥\nमैंने उस समय उन प्रियदर्शी बुद्ध का धर्मोपदेश सुना तो उन के प्रति मेरी श्रद्धा हो गयी तथा एक\nकरोड़ सुद्रा व्यय कर मैंने भिक्षुसकूघ के लिये एक सडुघाराम बनवा दिया॥664॥\n\n/660॥\n\nलाख"} +{"id": "indic_deva_eval_000402_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000402_devanagari_digits_mixed_a17cacefab47.jpg", "ocr": "५९४८4३४82070१7"} +{"id": "indic_deva_eval_000403_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000403_indic_mozhi_deva_word_ocr_aab5dc66e05c.jpg", "ocr": "कमी"} +{"id": "indic_deva_eval_000404_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000404_indic_vision_bench_deva_ocr_06a655f79d76.jpg", "ocr": "६८०\nहिंदी-साहित्य का इतिहास\nके लिये रहस्यवाद का परदा मिल गया अथवा यों कहें कि इनकी सारी प्रणयानुभूति ससीम पर से कूदकर असीम पर जा रही है।\nइनकी पहली विशिष्ट रचना \"आँसू\" (सं॰ १९८८) है। 'आँसू' वास्तव में तो हैं। शृंगारी विप्रलंभ के, जिनमें अतीत संयोग-सुख की खिन्न स्मृतियाँ रह रहकर झलक मारती हैं, पर जहाँ प्रेमी की मादकता की बेसुधी में प्रियतम नीचे से ऊपर आते और संज्ञा की दशा में चले जाते हैं,\n[\n१\n]\nजहाँ हृदय की तरंगें 'उस अनंत कोने' को नहलाने चलती हैं, वहाँ वे आँसू उस 'अज्ञात प्रियतम' के लिये बहते जान पड़ते हैं। फिर जहाँ कवि यह देखने लगता है कि ऊपर तो––\nअवकाश\n[\n२\n]\nअसीम सुखों से आकाशतरंग\n[\n३\n]\nबनाता,\nहँसता-सा छाया-पथ में नक्षत्र-समाज दिखाता।\nपर\nनीचे विपुला धारणी है दुख-भार वहन-सी करती,\nअपने खारे आँसू से करुणा-सागर को भरती।\nऔर इस 'चिर दग्ध दुखी वसुधा' को, इस निर्मल जगती को, अपनी प्रेस-वेदना की कल्याणी शीतल ज्वालामय उजाला देना चाहता है, वहाँ वे आँस��� लोकपीड़ा पर करुणा के आँसू से जान पड़ते हैं। पर वहीं पर जब हम कवि की दृष्टि अपनी सदा जगती हुई अखंड ज्वाला की प्रभविष्णुता पर इस प्रकार जमी पाते हैं कि \"है मेरी ज्वाला!\nतेरे प्रकाश में चेतन संसार वेदनावाला\nमेरे समीप होता है पाकर कुछ करुण उजाला।\"\n↑\nमादकता से आए तुम; संज्ञा से चले गए थे।\nउर्दू के प्रसिद्ध कवि अकबर ने भी कहा है––\nमैं मरीजे होश था, मस्ती ने अच्छा कर दिया।\n↑\nअवकाश=दिक्, Space\n↑\nआकाश-तरंग=Ether waves"} +{"id": "indic_deva_eval_000405_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000405_hindi_handwritten_word_ocr_7aeb14938ac7.jpg", "ocr": "वेक्यूम-सकर"} +{"id": "indic_deva_eval_000406_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000406_devanagari_page_ocr_915e2acc187a.jpg", "ocr": "सुभूतिवग्गो ्\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अद्विमे।\nछव्ठभिज्जा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥854॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा सुभूति थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nसुभूतित्थेरस्सापदान पठम॑।\n\n2. उपवानत्थेरअपदानं\n\n“चदुमुत्तरो नाम जिनों, सव्बधम्मान पारगू।\n\nजलित्वा अग्गिक्खन्धोब, सम्बुद्धों परिनिब्बुतो॥855॥\n“महाजना समागम्म, पूजयित्वा तथागतं।\n\nचितं सरीरं अभिरोपयुं॥856॥\n\nकल्वान सुकतं,\n\n“प्रतिसंविदश्चतस्र:, विमोक्षा अपि चाष्टकाः\n'घडभिज्ञाः साक्षात्कृताः, कृत॑ बुद्ध्य शासनम्‌\"॥854॥\n\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ सुभूतिः स्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nसुभूतिस्थविरस्यापदानं प्रथम\n\n“पद्मोत्तरों नाम जिन:, सर्वधर्म्माणां पारग:।\nज्वलित्बाग्रिस्कन्ध इब, सम्बुद्ध: परिनिर्वुत:॥855॥\n\n“महाजना: समागम्य, पूजयित्वा तथागतम्‌।\n\nचिता कृत्वा सुकृतम्‌, शरीरम्‌ अभ्यरोपयम्‌॥856॥\n\nमैंने चार प्रकार की प्रतिसम्भिदाओं, आठ प्रकार के विमौक्षों तथा पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार\nकर बुद्धशासन को पूर्ण किया॥854॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ सुभूति स्थविर ने ये गाथाएँ कहीं-\n\nसभी धर्मों में पारंगत पद्मोत्तर नामक जिन ने अग्निस्कन्‍्ध की तरह जलकर सम्बुद्धत्त्व व\nघरिनिर्वाण की प्राप्ति की॥855॥\n\nमहाजन समुदाय ने वहाँ आकर, तथागत की पूजा कर तथा उत्तम चिता बनाकर उस पर\nशरीर को रखा॥856॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000407_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000407_indic_mozhi_deva_word_ocr_b42763d92f6b.jpg", "ocr": "हुआ"} +{"id": "indic_deva_eval_000408_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000408_devanagari_digits_mixed_9258796f9eb9.jpg", "ocr": "२8६९615५6"} +{"id": "indic_deva_eval_000409_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000409_indic_mozhi_deva_word_ocr_4e19bf9c943e.jpg", "ocr": "ढालने"} +{"id": "indic_deva_eval_000410_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000410_devanagari_page_ocr_8f7476d87ef0.jpg", "ocr": "अभिध��्मपिटके\n70\n\nते धम्मा द्वीहि खन्धेहि एकादसहायतनेहि संततरसडि बाजि धर असडगहिता।\n\n२२५. अज्झत्तिकेहि धम्मेहि ये धम्मा खन्‍्ः असड्गहिता आयतनसडूगहेन\nअसड्गहिता धातुसड्गहेन असड्गहिता तेह्टि धम्मेहि ये धम्मा...पे*... ते धम्मा तीहि खन्‍्धेहि\n'एकेनायतनेन एकाय धातुया असड्गहिता।\n\n२२६. उपादानेहि धम्मेह्टि ये धम्मा... किलेसेहि धम्मेहि ये धम्मा... किलेसेहि चेव\nसंकिलेसिकेहि च धम्मेहि ये धम्मा... किलेसेहि चेव संकिलिट्रेडि च धम्मेहि ये धम्मा... किलेसेहि\nचेब किलेससम्पयन्तेह्नि च धम्मेहि ये धरम्मा खन्‍्धसकगहन असकगछिता आयतनसकगहेन\nअसडूगहिता धातुसडूगहेन असड्गहिता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा...पे*... ते धम्मा द्वीहि खन्धेहि\n'एकादसहायतनेहि सत्तरसहि असडूगहिता।\n\n२२७. असंकिलेसिकेहि ये धम्मा... संकिलिछ्लेि धम्मेहि ये धम्मा... किलेससम्पयुत्तेहि\nधम्मेहि ये धम्मा... संकिलिट्रेडि चेब नो च किलेसेहि धम्मेहि ये धम्मा... किलेससम्पयुत्तेह्ि चेब नो\nच किलेसेहि धम्मेहि ये धम्मा... किलेसविप्पयुत्तेहि असंकिलेसिकेहि धम्मेहि ये धम्मा... दस्सनेन\nपहातब्बेहि धम्मेहि ये धम्मा... भावनाय पहातब्बेहि धम्मेहि\nत्व.) ते धर्माः द्वाम्याम्‌ स्कन्धास्याम्‌ एकादशायतनैः ससदशभ्िः धातुझिः असडूग्रहीता:।\n\n५. आध्यात्मिक: धर्म: ये धर्मा: स्कन्‍्धसड्गग्रहेन असड्ग्रहीता: आयतनसड्गग्रह़ेन असड्ग्ग्रहीता:\nधातुसड्ग्रहेन असड्ग्रहीताः, लैः धर्म: ये धर्माः... पू०.... ते धर्माः त्रिभि: सकल खातुना\nअसड्ग्ग्रहीता:।\n\n२२६. उपादानधर्मः ये धर्माः... क्लेशधर्मः ये धर्माः...क्लेशैश्वैव संक्लेशिकैश्व धर्म: ये धर्माः\nक्लेशैश्वैव संक्लिष्रैश्व धर्म: ये धर्माः... क्लेशैश्वैव क्लेशसम्प्रयुक्तैश्व॒ धर्म: ये धर्मा: स्कन्‍्धसड्ग्ग्रहेन\nआयतनसडूगग्रहेन असड्गग्रहीताः धातुसडग्रहेन असड्ग्रहीताः, लैः धर्मैः ये धर्माः... पू०.\nस्कन्धाभ्याम्‌ एकादशायतनैः ससदशशिः: धातुभिः असड्ग्रहीता:।\n\n२२७. असांक्लेशिकधर्म: ये धर्माः..... संक्लिष्टेः धर्मैं: ये धर्माः..... क्लेशसम्प्रयुक्तधर्मः ये धर्माः\nसंक्लिष्टै: चैव न च, क्लेशधर्म: ये धर्माः...क्लेशसम्प्रयुक्तेश्लैव न च क्लेशधर्म: ये धर्माः... क्लेशविप्रयुक्तैः\nअसांक्लेशिकधर्म: ये धर्मा:.... दर्शनेन प्रहमतव्यैः धर्म:\nतहेन्दी)- ..... पू०.... वे धर्म दो स्कन्धों में, ग्यारह आयतनों से औ��� सत्रह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n२२५. जो धर्म अध्यात्मिक धर्मों के साथ किसी एक स्कन्‍्ध, आयतन और धातु में असंग्रहीत हैं .... पू०.... वे धर्म\nजीन स्कन्‍्धों में, एक आयतन और एक धात्‌ में असंग्रहीत\n\n२२६. जो धर्म उपादानभूत धर्मों.... क्लेश धर्मों (जो धम्म कक्‍्लेश (चित्त-मल-राग, द्वेष, मोहादि) - स्वरूप हैं) ....\nक्लेश धर्मों एवं सांक्लेशिक धर्मों (जो धम्म कलेश पैदा करने वाले हैं ).... क्लेश धर्मों एवं संक्लिष्ट धर्मो..... क्लेश धर्मों\n\nऔर 94286 ४: क्त धर्मों के साथ किसी एक स्कन्ध॒, आयतन और धातु में असंग्रहीत हैं. [०...- वे धर्म दो स्कन्‍्धों में,\nऔर में असंग्रहीत हैं।\n\nधर्मों (में असंग्रहीत हैं) .... संक्लिष्ट धर्मों (जो धम्म क्लेशों से युक्त हैं) ....\nकलश से संलग्न है)... संक्लि एवं अक्‍्लेशभूल धर्मों... क्लेशसम्पयुक्त अर्मो और स्व\nशविध्रयुक्त एवं असाक्लेशिक धर्मों.... दर्शन द्वारा प्रहाण किये जाने योग्य धर्मों ....\nभावना या अभ्यास के द्वारा प्रहाण किये जाने योग्य धर्मों."} +{"id": "indic_deva_eval_000411_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000411_devanagari_page_ocr_9aa1affab967.jpg", "ocr": "थूपवंसो 37\n\nएवं किलममानो आगतो”ति। तुम्हे मम गाव्ठह॑ ओवादं दत्वा इदानि गन्तुकामा तनु खो'ति\nजाननत्थं भन्‍्ते” ति। न मयं महाराज गन्‍्तुकामा, अपि च वस्सूपनायिककालो नामायं, समाणेन्‌\nनाम बस्सूपनायिकं ठानं जातुं बट्टतीति। राजा पि खो तड्खणः येव करण्डकचेतियड्‌्गर्ण नगरं\nएव अगमासि। ते पि थेरा महाजन ओवदमाना चेतियगिरिम्हि वस्सं वसिसुं।\n\nअथ खलु राजा, स्थविर अयाचितः स्वयं एवागतः, तस्मात्‌ तस्य अपृष्द्वा गमनमपि भवेत्‌” इति\nचिन्तयित्वा रथम्‌ अभिरूह्य चैत्यगिरिम्‌ अगमत्‌ महता राजानुभावेन। गत्वा स्थविराणां समीपे\nउपसइुक्राम्यन्‌ अतीव क्‍्लान्तरूप: भूत्वा उपसमक्राम्यत। ततो न॑ स्थविर आह। कस्मात्‌ त्व॑ महाराज एवं\nक्लममान आगत:”इति। यूयम्‌ मम॒ गाढम्‌ अबबादं दत्वा इदानीं गन्तुकामा: नु खलु” इति ज्ञानार्थ भदन्तः\nइति। न बय॑ महाराज गन्तुकामा, अपि च वर्षोपनायिककालो नामायें, श्रमणेन नाम वर्षोपनायिकं स्थान\nजान वर्धते टलि। राजा अधि खल्‌ तल्क्षणं एव करण्डक्ल्याइुगर्ण परिप्रद्षिपत अछ्ाप्टयाम लघनेप कर्म\nप्रस्थाप्य नगरम्‌ एव अगमत्‌। ते अपि स्थविराः महाजन अवबाद माना चैत्य गिरे वर्षाम्‌ अवसन।\n\nतब राजा ने, जैसे कि स्थविर बिना निमन्‍्त्रण के स्वयं आए हैं, वैसे ही वे जा भी सकते हैं। ऐसा विचार करकि\nमेरे सलाह के बिना होगा, महान्‌ शाही वैभव के साथ रथ पर चढ़कर चैत्यगिरि पर्वत पर पहुँचकर, स्थविरों के\nसमीप में उपस्थित होकर अत्यन्त थके दु:खी मन से पास में गया। तब स्थविर ने पूछा-महाराज! किस कारण से\nआप थके हुए हालात में आए हैं। स्थविर, आप सब मुझे गूढ उपदेश देकर यहां क्‍यों चले आए? अब मैं जानना\nचाहता हूँ। नहीं महाराज! हम लोग गये नहीं हैं, जाने वाले नहीं है बल्कि वास्तव में वर्षाबास का समय है, इसलिए\nयह आवश्यक हो गया कि श्रमण को वर्षावास स्थान में जाने का समय है। राजा तुरन्त ही करण्डक चैत्य के प्रांगण\nको घेरकर 68 कोशिकाओं (संरक्षक या गुफा) को स्थापित कर नगर में लौट आया। उन स्थविरों ने भी जनता को\nउपदेश देते हुए चैत्थगिरि में वर्षावास व्यतीत किया।\n\nवहशलण2००, फ९ 08 7ली९८६०१, प0९ ६0९० ८३०९ तर कांड 0००0 ३८८० एस१०७६ 0लाएह 0ए02०, #८ए८९ ६ ता७७\n७० घजए ॥ा तलएग0्फत& ६0० ७स॥ ७९ धसफ्त०७६ ००त5जाताड़ 76९, बतत॑ 00090026 00 की टका०६ ॥8 ]070०/०० ६०\n८रएगहात ॥0. छए९म( 7लडग हछासात0छा, राजगढ़ पीकर बाधत हण।छ8 (० छाल 97०5००८९ गई छाल हातलाऊ #०\nज099/02ट028 जोडता ॥0. ज0 र०त/रल्‍ताला+ किचहए९० ०00ताच०0- पक#९0 घी९ हांतल/ उहर2व #त, १४४॥९०९म०7९, 5/०३६\n॥कतड़; व0 भ०७ ०0९ 828 5० जिपहए०त२ \"हा ६॥5॥0 तातकत ए० गत 00६ कील्क्‍तरर (5 ५००७ ॥0२/प०० 0०७४ ६०\nह० 9७४७५ मस्छि ५०७ ॥3७७ हांएटए 006 उ्तत00ाध०ा ता हा९६ अछातीट॥१८९-/ *७7९व६ छाए, ॥६ ॥5 0०६ 0छत ॥६७७७०ए\n६० ह०, ७५७ फ़ाड ७र०३॥5 प& घातत& लि शतए०त०8 ७००० फीड एगातड-72३त&02९९, |0५ ॥६७७॥0७2७ ३ 7000॥ ६० ।0000७\nज्वाला ॥९ ऋठछात शतपला ७9०0 छाल एगाउ-2कत९१८९:/ #६ छीअ६ ७०५ एडघ्वात६ पी तह (०० बाउतह2व जि. छल\n०ततता2त०2०१९०६ ता एस्‍& ८005७७८७०७ ०ा 5000/-शह४६ ९८९॥५ तंड६ 70000 घ१& ९०७/१७/३३० ० ७३९ ॥(॥ख6॑3स्‍(३-\n<ल्च+क १७०० ए९९७/त१९० ६० (४९ ला- ॥.#शा, 79058 ह।त७०७ ६००, 59००0 छी एजत३-एलन्नतत९९ ० टलह/गक्गात हाशए8\nउ40त0तांच00 ६० घर ताजचष्छत९,\n\nअका5)/कञा तगीडाजाज060 ५७७७३७३५५० 93७820/5 ॥.३७७/८३०७००३०१७५०१ ७००530॥300858 ॥वुंडाा\n€६७७०3५०८७ ट3ठ0900 00 ॥रआठा5)]3 5आगउ5ग॥0050॥0. ४४३09 936८७0300१5/9. 37 |(आभाग3\nआतए09 930300809 एक, एथआओका। ७१०॥मप्वघ. ० 09008. ७आ॥2.. १७०८७७७\n\n00902 पा09ग) 9क000७879झ7 एछएागराणीउ9] जताा्वताह0, शव ८३ 080990 000 ३८८१\nडवाछ03,. ड30तांत. गराजाध्टा. तावाहाजवप.. हां. बाग. 93590॥(ग029.. 90७८८७४१७७००७॥४\n0097080॥50,/0 ॥३८८।कता'व 5७00900: 53-9000550॥060. ६४७ ॥]बाा3]9, /0॥५०- 5005020/6 00\nएन. 90009प्रंववात. वाकतप्ठाड9९0४8.. 5929]00.. ७00डक१॥. उठती, 5३00व/4५3८��78\nएगपागए-शच ताभरीच॒आआअ(ततराए, ३30054(छ/2॥93ए7790वीएगए 8९0४७ ७० ४5७७ 5९६३८८॥३५०आ\n55७5060/8. 58)/90#359703/8 ॥09780893७3700//8750॥र/७600 ५8 ॥ 360॥8 क्ज। एक 00800:\n३०८ागनंच, 785 55000 59009 2८0४. ग्कष० ०९७/३५॥॥॥0९५४३ 35750:"} +{"id": "indic_deva_eval_000412_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000412_indic_mozhi_deva_word_ocr_d5c2e27050c6.jpg", "ocr": "पैसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000413_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000413_devanagari_page_ocr_a8b817c20a8e.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n॥8: न्‍\n\n“पड्चाला”ति, “कुरुयो”ति पच्चत्तवचन वत्वा “केकके”ति उपयोगवचनस्स बचने, तस्मा\n“केकके”ति इदं पच्चत्तबचनमेव। तथा हि सन्धिविसोधनविधायको आचरियो तादिसानं पदानं\nपच्चत्तवचनत्तञज्ञेब विभावेन्तो सामं कते पकरणे “वनप्पगुम्बो वनप्पगुम्बे, सुख दुक्खं जीवो,\nसुखे दुक्‍्खे जीवे”ति आह, टीकायम्पि च तेसं पच्चत्तवतचनभावमेव विभावेन्तो “वनप्पगुम्बो,\nसुखं, दुक्‍्खं, जीवो”ति साधनीयं रूप॑ पतिट्ठपेत्वा निग्गहीतलोपवसेन अकारोकारानड्च\n'एकारादेसवसेन “वनप्पगुम्बे, सुखे, दुक्खे, जीवे”ति रूपनिष्फत्तिमाह। सा पाव्ठिनयानु कूला।\nकच्चायनाचरियेनपि पाक्तिनयं निस्साय “द्विपदे तुल्याधिकरणे”ति पच्चत्तबहवचनपद बुत्तं।\nतेनाह वुत्तियं “द्वे पदानि तुल्याधिकरणानी”ति। “द्विपदे तुल्याधिकरणे”ति च इदं “अद्ठ\nनागाबाससतानी\"”ति वक्तब्बे “अद्ठ नागावाससते\"ति पदमिब बुच्चतीति दट्ठब्बं।\n\nकेचि पन तेसं भुम्मेकबचनत्तं इच्छन्ति। तत्थ यदि “बनप्पगुम्बे”ति पच्चत्ते भुम्मबचनं,\n\"ति च॒ पच्चत्ते उपयोगवचनं, “एसेसे एके एकट्रे”ति एत्थ “एसेसे”ति इमानिपि पच्चत्ते\nभुम्मवचनानि वा सियुं, उपयोगवचनानि वा। यथेतानि एवंविधानि न होन्ति,\nसुद्धपच्चत्तवचनानियेव होन्ति, तथा “वनप्पगुम्बे, केकके”तिआदीनिपि तथाविधानि न होन्ति,\nसुद्धपच्चत्तवचनानियेव होन्ति। इच्चेवं॑ सब्बथापि “वनप्पणग॒म्बे, बाले, पण्डिते, केकके”ति,\n“विरत्ते कोसियायने, अट्ठ नागावाससते, के पुरिसे, एसेसे”ति एवमादीनं अनेकेसं\nपुरिसिलिकृगइत्थिलिक्गनपुंसकलिकुगसब्बनासएकबचन अने कवचनवसेन.. सासनवरे. छितान॑\nपदान॑ निप्फत्ति. पच्चत्तेकवचनपुथुवचनानमेकारादेसवसेनेव.. भवतीति. अवस्समिदं\nसम्पटिच्छितब्बं। एवं “वनप्पगुम्बे, बाले, पण्डिते”तिआदीनं सुद्धपच्वत्तवचनता अतीव सुखुमा\nदृब्बिज्ञेस्या, सद्धेन कुलपुत्तेन आचरिये पयिरूपासित्वा तदुपदेस सक्कच्च्॑ गहेत्वा जानितव्वा।\nबुद्धवचनस्मिड्हि सद्दतो च अत्थतो च अधिप्पायतोी च अक्खरचिन्तकानं\nजाणचकखसम्मस्हनद्वान भता पाव्िनया विविधा दिस्सन्ति।\n\nतत्थ सद्दतों ताव इदं सम्मुय्हनट्ठलानं - “विरत्ता कोसियायनी”ति वत्तब्बे “विरत्ते\nकोसियायने”ति इत्थिलिड्न्गपच्चत्तवचनं दिस्सति, “को पुरिसो”ति बत्तब्बे “के पुरिसे”ति\nसब्बनामिकपच्चत्तवचनं दिस्सति, “किन्नामो ते उपज्ञायो\"ति बत्तब्बे “कोनामो ते\nउपज्ञायो”ति समासपर्द पुल्लिड्गविसय॑ दिस्सति। किं नाम॑ एतस्साति कोनामोति हि समासो।\nतेन “कोनामा इत्थी, कोनामं कुल”न्ति अयम्पि नयो गहेतब्बो। “क्व ते बल॑ महाराजा”ति"} +{"id": "indic_deva_eval_000414_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000414_devanagari_page_ocr_8dadf942fd60.jpg", "ocr": "अपदानपालि उँलड\n\n“सील॑ पज्ञड्च धम्मडच, थवित्वा लोकनायकं।\nपत्तोम्हि परम॑ सन्ति, निव्बानं पदमच्चुतं॥427॥\n“अहो नून स भगवा, चिरं तिद्लेस्य चक्खुमा।\nअज्ञातज्च विजानेय्युं, फुसेय्युं [अछ्ञातड्चापि जानेय्य, पस्सेय्य (क*)] अमतं\nचदं॥4428॥\n“अय॑ में पच्छिमा जाति, भवा सब्बे समूहता।\nसब्बासबे परिड्ञाय, बिहरामि अनासबो॥429॥\n“सतसहस्सितो कप्पे, य॑ बुद्धमभिथोमयिं\nदुग्गतिं नाभिजानामि, कित्तनाय इदं फलं॥430॥\n“किलेसा झापिता मस्ह, भवा सब्बे समूहता।\nसब्बासवा परिक्खीणा, नत्थि दानि पुनब्भवो॥4434॥\n“कलल प्रज्ञाज्व धर्मज्च, स्तुत्वा लोकनायकम।\nप्रा्तोस्सि परम॑ शान्तिम्‌, निर्वाणं पदमच्युतम्‌॥427॥\n“अहो नून स भगवान्‌, चिरं तिछेत्‌ चक्षुष्मान।\nअज्ञातञ्च विजानीयु:, स्पृशेयु: अमृत॑ पदम्‌॥428॥\n“अं मे पच्छिमा जातिः, भवाः सर्वे समुद्धृता:।\nसर्वाख्वान्‌ परिज्ञाय, विहरामि अनाखब:॥429॥\n“शतसहस्र इतः कल्पे, य॑ बुद्धमभ्यतुस्तोममयम।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, कीर्चनस्य इ्दं फलम॥4430॥\n“क्लेशा: ध्मापिताः मम, भवाः सर्वे समुद्धृता:।\nसर्वासत्रवा: परिक्षीणा, नास्ति इदानीं पुनर्भव:॥434॥\nशील से, प्रज्ञा से, और धर्म से लोकनायक की स्तुति कर परम शान्ति रूपी अच्युतपद निर्वाण को प्रास\nकिया॥427॥\nनिश्चय ही वह चक्षमान भगवान्‌ चिरकाल तक यहाँ ठहरे और अज्ञात को जानकर अमृत पद का स्पर्श\nकिया॥4428॥\nसभी भव-समूह में यह मेरा अन्तिम जन्म है और मैं सभी आखबों का ज्ञान प्रास कर अनाख्रव हो विहरण\nकरता हूँ॥429॥\nसौ हजारवें कल्प में जो मैंने बुद्ध की स्तुति की थी यह उस कीर्ति-गान का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\nको नहीं जानता॥4430॥\nमेरे द्वारा भव के सभी क्लेश समूल नष्ट कर दिये गये हैं और जैसे हाथी बन्धनसुक्त हो विचरण करता है,\nमैं भी अनाखब हो विचरण करता हूँ॥43॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000415_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000415_indic_vision_bench_deva_ocr_9b7491e37328.jpg", "ocr": "विषय-सूची\nविषय\nपृष्ठ\n१—भाव या मनोविकार\n…\n…\n१—५\n२—उत्साह\n…\n…\n६—१६\n३—श्रद्धा-भक्ति\n…\n…\n१७—४३\n४—करुणा\n…\n…\n४४—५५\n५—लज्जा और ग्लानि\n…\n…\n५६—६८\n६—लोभ और प्रीति\n…\n…\n६९—९६\n७—घृणा\n…\n…\n९७—१०६\n८—ईर्ष्या\n…\n…\n१०७—१२३\n९—भय\n…\n…\n१२४—१३०\n१०—क्रोध\n…\n…\n१३१—१४०\n११—कविता क्या है\n…\n…\n१४१—१८६\n१२—भारतेन्दु हरिश्चन्द्र\n…\n…\n१८७—१९९\n१३—तुलसी का भक्ति मार्ग\n…\n…\n२००—२०६\n१४—'मानस' की धर्म-भूमि\n…\n…\n२०७—२१२\n१५—काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था\n…\n…\n२१३—२२६\n१६—साधारणीकरण और व्यक्ति-वैचित्र्यवाद\n…\n…\n२२७—२४१\n१७—रसात्मक बोध के विविध रूप\n…\n…\n२४२—२७१"} +{"id": "indic_deva_eval_000416_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000416_devanagari_page_ocr_37d1f0d70b2f.jpg", "ocr": "]6\n\nअपदानपालि\n\n“पेसेल्वा सिरिकं नागं, बुद्धं आसादयिं तदा।\n'ततो सड्जातकोपो सो [जातकोपोब (स्या*)], नागो नुद्धरते पदं॥556॥\n“नागं रुण्णमन [रुठ्ठमनं (पी अट्ठ\"), वुद्ठमनं (सी* अट्ठ०)] दिस्वा, बुद्धे कोध॑ अकासहं।\n\nविहेसयित्वा सम्बुद्धं, उस्यानं अगमासहं॥557॥\n“सातं तत्थ न विन्दामि, सिरो पज्जलितो यथा।\nपरिव्ठाहेन डय्हामि, मच्छोव बव्ठिसादको॥558॥\n“ससागरन्‍्ता पथवी, आदित्ता विय होति मे।\nपितु सन्तिकुपागम्म, इदं बचनमत्रबिं॥559॥\n“आसीविसंब कुपितं, अग्गिक्खन्धंव आगत॑।\nमत्तंव कुड्जरं दन्ति, यं सयम्भुमसादयिं॥560॥\n\n“ब्रेष्य श्रीकं/सिरिक नागस्‌, बुद्धम्‌ आसादय॑ तदा।\n\nतत: सज्जातकोप: नागो नोद्धरते पदम्‌॥556॥\n\n“नाग रुदितमन दुष्ट्वा, बुद्धे क्रोधम्‌ अकार्पमहम्‌।\n\nविहिंस्य सम्बुद्धम्‌, उद्यानम्‌ अगमाम्यहम्‌॥557॥\n\n“शातं तत्र न विन्‍्दे/विन्दामि, शिर: प्रज््वलितं यथा।\n\nपरिदाहेन दहामि, मत्स्य इब बलिसादक:॥558॥\n\n“ससागरान्ता पृथ्वी, आदीप्तेव भवति मे।\n\nपितुरन्तिकमुपाग मय, इदं बचनमत्रवम्‌॥559॥\n\n“आशीर्विपमिव कुषितस्‌, अग्निस्कन्धमिवागतम।\n\nमत्तमिव कुछ्जरं दन्तिनम्‌, य॑ँ स्वयम्भुवमवासादयम्‌॥560॥\n\nउस समय सिरिक हाथी को भेजकर मैंने बुद्ध को अपमानित किया, किन्तु\nहाथी एक पण भी आगे नहीं बढ़ता है॥556॥\n\nहाथी को कष्ट से रोता चिल्लाता हुआ देखकर मैं बुद्ध पर क्रोधित हुआ तत्पश्चात्‌ सम्बद्ध को\nअपमानित कर, उद्यान से वापस आ गया॥557॥\n\nसम्बुद्ध के अपसान पर मुझे सुख नहीं मिला, उन पर किए क्रोध के कारण कॉटे में फंसकर\nतड़पती मछली के समान पश्चाताप की अग्नि में मेरा मस्तक जल उठा और तड़प उठा॥558॥\n\nखागर पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी सुझे जलती हुई प्रतीत हो रही है, तब पिता के समक्ष आकर मैंने\nयह वचन कहा॥559॥\n\nविषयुक्त सर्प के समान कुपित, नशे में चूर कुझर (हाथी) के समान मत्त तथा अग्निस्कन्ध बत\nक्रोश्ित होकर मैंने जिन दान्त (संयत) सम्बुद्ध का अपमान किया॥560॥\n\nक्रोध से युक्त वह"} +{"id": "indic_deva_eval_000417_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000417_indic_mozhi_deva_word_ocr_9763485b11d7.jpg", "ocr": "करून"} +{"id": "indic_deva_eval_000418_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000418_devanagari_page_ocr_84f54caa52fa.jpg", "ocr": "अतुत्यो परिच्छेदो... न्‍खच्तच्क्कक्‍ज--\n\nउ6\n\nदसवत्थूनि दीपेसुं, कप्पन्ती ति अलज्जिनो।\n\nत॑ सुत्वान यसत्थेरो, एवं वज्जीसु चारिकं॥4॥\nछतव्कभिज्ञाबलप्पत्तो, यसो काकण्डकदिजत्रजो।\nत॑ समेतुं स-उस्साहो, तत्थागमि'महावनं॥ |2॥\nठपेत्वा'पोसथग्गे ते, कंसपातिं सहोदकं।\n\nकहापणादिसब्डस्स, देये'ताह उपासके॥3॥\nन कप्पते त॑ मा देथ, इति थेरो स वारयि।\n\nपटिसारणियं कम्मं, यसत्थेरस्स ते करूं॥4॥\n\nयाचित्वा अनुदूतं सो, सह तेन पुरड्गतो।\nअत्तनों धम्मवादित्तं, सड्ञापेत्वाह नागरे॥5॥\nसंस्कृतच्छाया-_ दशवस्तूनि अदीपयन्‌, “कल्पयन्ति” इति अलज्जिनः।\nत॑ श्रुत्वा यशस्थविर:, एवं वज्जीसु चारिकम्‌।॥।44।।\nषड्भिज: बलप्रासः, यशः काकण्डद्विजात्मजः।\nत॑ शमयितुं सोत्साहः, तत्रागमत्‌” महावनम्‌॥।42॥।\nस्थापयित्वा उपोसथाग्रे ते, कांस्यपात्रीं सहोदकाम्‌।\nकार्षापणादि सड्ूघाय, दत्त” इत्याहुः उपासकान्‌॥3।।\nन कल्पते एतत्‌ मा दत्त”, इति स्थविरः: स अवारयत्‌।\nप्रतिसारणीयं कर्म, यशस्थविराय ते अकुर्वन्‌।4।॥\nयाचित्वा अनुदूतं सः, सह तेन पुरं गतः।\nआत्मनो धर्मवादित्वं, संज्ञाप्याह नागरान्‌॥|5।।\nहिन्दी- बज्जिपुत्रक भिक्षु इन दश बातों के औचित्य का स्पष्टत: समर्थन करने लगे। यह सुन कर उस\nसमय बज्जिप्रदेश में चारिका करने वाले, काकण्डकद्विजपुत्र, छह अभिजाओं के बल से समन्वित यश स्थविर इस\nविवाद के प्रशमन हेतु सहावन की तरफ सोत्साह चल पड़े।44-42॥\nमार्ग में उन्हें वे भिक्षु उपोसथ के दिन जलभरी कॉसे की थाली सामने रखकर उपासकों से - “सडूघ के लिये\nकापार्पण आदि दान दो” -ऐसा कहते हुए दिखायी पड़े।43॥॥\nयश स्थविर ने उन उपासकों से कहा- “यह कर���म धर्मानुकूल नहीं हैं, अत: यह अनुचित दान न दो” ऐसा सुन कर\nउन झिक्षुओं ने यश स्थबिर का प्रतिसारणीय कर्म किया।।44॥।\nयश स्थबिर ने उन शिक्षुओं से साथ चलने के लिए एक अनुदूत सहायक माँगा वे उस सहायक के साथ नगर में गये।\nअपना धर्मपक्ष सुनाया।5॥।\n\nवहाँ जाकर उन्होंने प्रामाणिक नागरिकों"} +{"id": "indic_deva_eval_000419_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000419_indic_vision_bench_deva_ocr_256220bc6c63.jpg", "ocr": "206 : प्रेमचंद रचनावली-6\nरूपा ने जिरह की-अगर वह पहले खाती है, तो क्यों मोटी नहीं है? ठाकुर क्यों मोटे\nहैं? अगर ठाकुर उन पर गिर पड़े, तो ठकुराइन पिस जायं।\nसोना ने प्रतिवाद किया-तू समझती है, अच्छा खाने से लोग मोटे हो जाते हैं। अच्छा खाने\nसे लोग बलवान होते हैं, मोटे नहीं होते। मोटे होते हैं घास-पात खाने से।\n'तो ठकुराइन ठाकुर से बलवान हैं?'\n'और क्या अभी उस दिन दोनों में लड़ाई हुई, तो ठकुराइन ने ठाकुर को ऐसा ढकेला\nकि उनके घुटने फूट गए।'\n'तो तू भी पहले आप खाकर तब जीजा को खिलाएगी?'\n'और क्या?'\n'अम्मां तो पहले दादा को खिलाती हैं।'\n'तभी तो जब देखो तब दादा डांट देते हैं। बलवान होकर अपने मरद को काबू में रखूंगी। \nतेरा मरद तुझे पीटेगा, तेरी हड्डी तोड़कर रख देगा।'\nरूपा रुआंसी होकर बोली-क्यों पीटेगा, मैं मार खाने का काम ही न करूंगी।\n'वह कुछ न सुनेगा। तूने जरा भी कुछ कहा और वह मार चलेगा। मारते-मारते तेरी खाल उधेड़ लेगा।'\nरूपा ने बिगड़कर सोना की साड़ी दांतों से फाड़ने की चेष्टा की और असफल होने पर\nचुटकियां काटने लगी।\nसोना ने और चिढ़ाया-वह तेरी नाक भी काट लेगा।\nइस पर रूपा ने बहन को दांत से काट खाया। सोना की बांह लहुआ गई। उसने रूपा को जोर से ढकेल दिया। वह गिर पड़ी और उठकर रोने लगी। सोना भी दांतों के निशान देखकर रो पड़ी।\nउन दोनों का चिल्लाना सुनकर गोबर गुस्से से भरा हुआ आया और दोनों को दो-दो घूसे\nजड़ दिए। दोनों रोती हुई निकलकर घर चली दीं। सिंचाई का काम रुक गया। इस पर पिता-पुत्र में एक झड़प हो गई।\nहोरी ने पूछा-पानी कौन चलाएगा? दौड़े-दौड़े गए, दोनों को भगा आए। अब जाकर मना\nक्यों नहीं लाते?\n'तुम्हीं ने इन सबों को बिगाड़ रखा है।'\n'इस तरह मारने से और निर्लज्ज हो जायंगी।'\n'दो जून खाना बंद कर दो, आप ठीक हो जायं।'\n'मैं उनका बाप हूं, कसाई नहीं हूं।'\nपांव में एक बार ठोकर लग जाने के बाद किसी कारण से बार-बार ठोकर लगती है और\nकभी-कभी अंगूठा पक जाता है और महीनों कष्ट देता है। प���ता और पुत्र के सद्भाव को आज\nउसी तरह की चोट लग गई थी और उस पर यह तीसरी चोट पड़ी।\nगोबर ने घर जाकर झुनिया को खेत में पानी देने के लिए साथ लिया। झुनिया बच्चे को\nलेकर खेत में आ गई। धनिया और उसकी दोनों बेटियां बैठी ताकती रहीं। मां को भी गोबर की\nयह उद्दंडता बुरी लगती थी। रूपा को मारता तो वह बुरा न मानती, मगर जवान लड़की को\nमारना, यह उसके लिए असह्य था।\nआज ही रात को गोबर से लखनऊ लौट जाने का निश्चय कर लिया। यहां अब वह नहीं"} +{"id": "indic_deva_eval_000420_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000420_indic_mozhi_deva_word_ocr_1e4b91117fde.jpg", "ocr": "एखाद"} +{"id": "indic_deva_eval_000421_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000421_devanagari_page_ocr_671f367002f0.jpg", "ocr": "400\n\nपालने वाला सभी\n\nमेत्तेयवग्गो\n\n“तेलिका कट्ठह्ारा च, उदहारा च पेस्सिका।\n\nसूपिका सूपरक्‍्खा च, आगच्छन्ति मम घरं॥948॥\n\n“दोबारिका अनीकट्ठा, बन्धिका [वन्दिका (सी०), गन्थिका (स्या“), सन्दिका (पी०)]\nपुप्फछड़का।\n\nहत्थारुहा हत्थिपाला, आगच्छलन्ति मम घरं॥4949॥\n\n“आननन्‍्दस्स महारज्ञो [आनन्दस्स नाम रज्जो (स्या*), अरिन्दमनाम रज्ञो (पी-\nममत्थस्स [पमत्तस्स (सी पी०), समग्गस्स (स्या*)] अदासहं।\n\n«)] पूरयामहं॥4920॥\n\nसत्तवण्णेन रतनेन, ऊनत्थ॑ [ऊनत्तं (सी* स्या* पी\n“ये मया कित्तिता सब्बे, नानावण्णा बहू जना।\nतेसाहं चित्तमज्ञाय, तप्पयिं रतनेनहं॥4924॥\n“वग्गूसु भासमानासु, वज्जमानासु भेरिसु।\nसड्खेसु धमयन्तेसु, सकगेहे रमामहं॥922॥\n\n“तैलिका: काषछ्ठहाराश्व, उदहाराश्् प्रेष्यका:।\n\nसूपिकाः सूपरक्षाश्व, आगच्छन्ति मम गृहम्‌॥948॥\n\n“दौवारिका अनीकस्था:, वन्धिकाः पुष्पछर्दका:।\n\nहस्त्यारोहकाः हस्तिपालाः, आगच्छल्ति मम गृहम्‌॥949॥\n\n“आनन्दाय महाराज, ममार्थाय अदामहम\n\nसप्तवर्णन रत्लेन, ऊनल्वं पूरयाम्यहम्‌॥920॥\n\n“ये मया कीरत्तिता सर्वे, नानावर्णा: बह्वः जना:।\n\nतेषामहं चित्तमाज्ञाय, अतर्पयं रत्रेनाहम्‌॥924॥\n\n“बल्गूस्‌ भासमाणास्‌, वद्यममानास मेरिपा।\n\nशड्खेपु धमयन्तेषु, स्वकगृहे रमेज्हम्‌॥4922॥\nतेली, लकड़हारा, पानी लाने वाला, दास-दासी, रसोइयाँ और रसोइ रक्षक सभी मेरे घर आ गये॥948॥\nद्वारपालक,सेना की टुकड़ी, बन्धक बनाने वाला, कुम्हलाये पुष्पों को फेंकने वाला, महावत और हाथी\nमेरे घर आ गये॥949॥\nआनन्द नामक स्वार्थी महाराज को मेरे द्वारा सात वर्णों के रत्नों से जो मात्रा में कम थे, पूरित किया\n\nगया॥4920॥\n\nविविध वर्णों के बह जनों द्वारा ये जो मेरी कीर्ति की गई है उनके चि���्त को जानकर मैंने रत्नों से तर्पित\n\nकिया॥924॥\n\nमैंने अपने घर में सुन्दररूप से ध्वनित्‌ एवं बादित भेरिवायओं एवं शडखों में रमण किया॥4922॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000422_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000422_hindi_handwritten_word_ocr_310a9f4ca482.jpg", "ocr": "मिलावट"} +{"id": "indic_deva_eval_000423_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000423_indic_mozhi_deva_word_ocr_f479c497f26a.jpg", "ocr": "देसाई"} +{"id": "indic_deva_eval_000424_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000424_devanagari_page_ocr_8a055ba8b83b.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो 33\n\nपालि- उक्कुद्धिसद्दा वत्तन्ति, अप्फोटेन्ति [अप्फोठेन्ति (सी\")] हसन्ति च।\nकतड्जली नमस्सन्ति, दससहस्सी सदेवका॥52॥\n“यदिमस्स लोकनाथस्स, विरज्झिस्साम सासनं।\nअनागतम्हि अद्धाने, हेस्साम सम्मुखा इमं॥453॥\n\n“यथा मनुस्सा नदिं तरन्ता, पटितित्थं विरज्िय।\n\n>हेद्भातित्थे गहेत्वान, उत्तरन्ति महानदिं॥454॥\n\n“एबमेब मरय॑ सब्बे, यदि सुड्चामिमं जिन॑।\n\nअनागतम्हि अद्धाने, हेस्साम सम्मुखा इमं”॥455॥\n\nदीपड्करों लोकविदू, आह॒तीन॑ पटिग्गहो।\n\nमम कम्मं॑ पकित्तेत्वा, दक्खिणं पादमुद्धरि॥456॥\n\nसंस्कृतच्छाया-.. उत्कटशब्दा: वर्चन्ते, स्फोटयन्िति हसस्ति च।\n\nकुताडजलयो नंस्यन्ति, दशसाहखं सदेवकाः:॥52॥\n“यद्यस्य लोकनाथस्य, विराध्याम: शासनम्‌।\nअनागतेड्ध्वनि, भविष्यामः सम्मुखा वयम्‌॥53॥\n“यथा मनुष्याः नदीं तरन्तः, प्रतितीर्थ विराध्य।\nअधस्तात्तीर्थान्‌ गृहीत्वा, उत्तरन्ति महानदीम्‌॥54॥\n“एबमेब बय॑ सर्वे, यदि सुड्चाम इस जिनमा\nअनागते अध्वनि, भविष्याम: सम्मुखा वयम्‌\"॥455॥\nदीपड्करो लोकबिद्‌, आहतीनां प्रतिग्रह:।\nमम कर्म प्रकीर्च्य, दक्षिणं पादमुदधरीत्‌॥456॥\n\nहिन्दी- (उस समय) देवताओं के सहित समस्त संसारवासी हर्षध्वनि करने लगे, ताली बजाने\n\nतथा हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगे॥452॥\n\n(और सोचने लगे कि) यदि हम दीपड्कर बुद्ध के समय में प्राप्त नहीं किये(चूक गये) तो भविष्य में (उन्त\nतपस्वी सुमेध के बुद्ध होने का समय) अवश्य इसके सम्मुख कृतकार्य होंगे॥53॥\n\nअथा- कोई नदी पार करनेवाले पुरुष सामने का घाट छूट जाने पर नीचे के किसी अन्य घाट से उस\nमहानदी को पार कर लेते हैं॥454॥\n\nउसी प्रकार, यदि हम इन दीपंकर बुद्ध के समय अर्हच्प्रापति में सफल मनोरथ न हो पाये तो इस सुमेध\nतपस्बी के बुद्धत्त्वकाल में उत्पन्न हो कर हम अवश्य सफल हो पायेंगे॥455॥\n\nउन सल्कार के पात्र लोकविद्‌ दीपड्कर (भगवान्‌ बुद्ध) ने मेरे कर्म की प्रशंसा करके अपना दक्षिण पाद\nउठाकर रखा॥456॥\n\n+नोट- 'ह���ट्ठा' शब्द पालि में कहाँ से आया, यह ज्ञात नहीं। इसका अर्थ 'अधस्तात्‌” शब्द से व्यक्त\n\nलगे, हंसने"} +{"id": "indic_deva_eval_000425_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000425_hindi_handwritten_word_ocr_53001f9993f6.jpg", "ocr": "पत्रो"} +{"id": "indic_deva_eval_000426_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000426_indic_vision_bench_deva_ocr_afedec104db1.jpg", "ocr": "नूतन सहस्त्रकातील आव्हानं\nहिल्या दोन सहस्रकातील सामाजिक घडामोडी आणि त्यातून निर्माण झालेली स्त्री-पुरुष समानता, लोकशाही आणि भांडवलशाही ही त्रिसूत्री याचा परामर्श आपण मागच्या लेखात घेतला. याच त्रिसूत्रीच्या आधारावर आपल्याला तिसऱ्या सहस्रकात वाटचाल करायची आहे.\nतिसरे सहस्रक:\nपहिल्या सहस्रकात सातत्यानं घडलेल्या लष्करी संघर्षामुळं समाजातील बुध्दिमान व पराक्रमी तरुणांचा कल लष्करांकडे होता. दुसऱ्या सहस्रकात जगात अनेक ठिकाणी मोठमोठी साम्राज्ये स्थापन झाल्याने त्यांचा कारभार हाताळण्यासाठी प्रशासकीय क्षेत्रात बुद्धिमान व्यक्तींची गरज निर्माण झाली. साहजिकच समाजातील बौध्दिक प्रतिमा त्याकडे आकर्षित झाली. तर तिसच्या सहस्रकात माणसाचं रूपांतर ‘आर्थिक प्राण्या'त झाल्यानं उद्योग व व्यवसाय यांना राजकारणापेक्षाही अधिक महत्व प्राप्त झालंं आहे. त्यामुळं 'व्यवस्थापन'क्षेत्राला अनन्यसाधारण महत्व मिळतं आहे. याचा परिणाम लष्कर, नोकरशाही आणि व्यक्तिगत व्यवसाय यांच्यावर होणं अपरिहार्य आहे.\nया सहस्त्रकाच्या सुरुवातीपासूनच अमेरिका ही एकमेव महाशक्ती उरली आहे.त्याचप्रमाणं संयुक्त राष्ट्रसंघही विविध देशांमधील परस्पर संघर्षांमध्ये लक्ष घालून जागतिक पोलिसांची भूमिका बजावत आहे.त्यामुळं ‘राष्ट्रीय लष्कर'ही संकल्पना मागे पडत आहे.युध्दांची संख्या खुप कमी झाली आहे. लष्करांचा उपयोग दुसऱ्या देशांशी लढण्यासाठी ना होता, स्वतःच्याच देशातील कायदा आणेि सुव्यवस्था टिकविण्याकरिता अधिक होत आहे. मात्र हे काम खास प्रशिक्षित पोलिसांकडून अधिक चांगल्या प्रकारे व कमी खर्चात करून घेता येतं,हे अनेक देशांच्या लक्षात आलं आहे.अशा खास पोलीस दलांना वायुदालाचं पाठबळ दिल्यास तेवढे पुरेसं आहे,लष्कर असण्याची आवश्यकता नाही असा विचार मांडला जाऊ लागला आहे. तो या सहस्त्रकात मूळ धरण्याची शक्यता आहे.\nसाम्राज्यांची स्थिरता, विस्तार व विकासामध्ये प्रशासकीय नोकरशाहीनं महत्त्वाची\nअद्भूत दुनिया व्यवस्थापनाची/१६९"} +{"id": "indic_deva_eval_000427_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000427_devanagari_digits_mixed_9c81f735f73c.jpg", "ocr": "6755९6०८41६३६५६87"} +{"id": "indic_deva_eval_000428_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000428_indic_vision_bench_deva_ocr_fd11f5a58746.jpg", "ocr": "\nमराठी माती नि मन\nबेळगाव आणि त्या भोवतालचा मराठी मुलुख राजकीयदृष्ट्या कर्नाटकात असला तरी त्याची माती आणि मन मराठीच आहे याची मला आलेली प्रचिती आपणाप्रत पोहोचवावी असे प्रकर्षाने वाटल्यावरून हा पंक्तिप्रपंच. बेळगावच्याजवळील कडोली, उचगाव, येलूर, माचीघर या परिसरात गेली बावीस वर्षे प्रतिवर्षी मराठी साहित्य संमेलन भरत असते. पूर्वेला अद्याप न भरल्याने प्रथमच दि. २४ डिसेंबर २००६ रोजी सांबरा गावी साहित्य संमेलन संपन्न झाले. काही अपरिहार्य कारणांमुळे पूर्वनियोजित अध्यक्ष येऊ न शकल्याने अध्यक्षपदी माझी वर्णी लागली. त्यात माझ्या योग्यतेपेक्षा सीमावासियांच्या मराठी माणसांविषयीच्या सहजस्नेहाचा भाग मोठा होता.\nसांबरा येथे संपन्न झालेले मराठी साहित्य संमेलन तिथल्या माय मराठी संघाने आयोजित केले होते. स्वागताध्यक्ष दिलीप चव्हाण व त्यांचे सहकारी कार्यकर्ते यांनी मराठी प्रेमापोटी जीवापाड कष्ट घेऊन, पदरमोडी करून हे संमेलन यशस्वी केले.\nया संमेलनाची अनेक वैशिष्ट्य माझ्या लक्षात आली. सीमाबांधवांच्या मराठी प्रेम व अभिनयाचा कित्ता आपण गिरवायला हा. इथली सर्व साहित्य संमेलने लोकवर्गणीतून यशस्वी होतात. त्यांना सरकारी अनुदान असत नाही. आपल्याकडच्या संमेलनांचे शासकीय अनुदान बंद झाले तर ती भरतील का असं उगीच माझ्या मनात येऊन गेले, संमेलनाचे स्वरूप गावजत्रेसारखं उत्साही असतं. त्यात पोरं-टोरं, तरुण-तरुणी, आबाल-वृद्ध सारे सारख्याच उत्साहाने सहभागी असतात. ही संमेलने भरू नये म्हणून कर्नाटक सरकार भरपूर प्रयत्न करते. मराठी मन आणि माती त्यास पुरून\nजाणिवांची आरास/११७"} +{"id": "indic_deva_eval_000429_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000429_hindi_handwritten_word_ocr_fbfd2e7ae0e1.jpg", "ocr": "जसवन्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000430_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000430_devanagari_page_ocr_e4df1b8e425c.jpg", "ocr": "गा अ-सम्मिलित और अ-सम्मिलित (असंगहितेन असंगहितं) :कितने स्कन्‍्थ, आयतन\nऔर धातुओं में वे धर्म अ-सम्मिलित हैं जो कुछ अन्य धर्म या धर्मों के साथ उन्हीं स्कन्‍्ध , आयतन\nऔर धातुओं में असम्मिलित हैं जो पुनः अन्य धर्म या धर्मों के साथ उनमें (स्कन्ध, आयतन आऔर\nचातुओं में) असम्मिलित हैं। यह अध्याय चौथे अध्याय का ठीक विपरीत ह���।\n\nहै संयोग और खवियोग (सम्पयोगो विपयोगो) : कितने स्कन्‍्ध, आयतन और धातुओं के साथ\nशर्म संयुक्त हैं, या कितने के साथ वे वियुक्त हैं।\n\n७. संयुक्त से वियुक्त (सम्पयुत्तेन विप्पयुत्त): कितने स्कन्‍्ध, आयतन और धातुओं से वे\nधर्म वियुक्त हैं, जो उन धर्मों से, जो अन्य धर्मों के साथ संयुक्त हैं, वियुक्त हैं।\n\n<. वियुक्त से संयुक्त (विप्पयुत्तेन सम्पयुत्त) : कितने स्कन्‍थध, आयतन और धातुओं से जे\nशर्म संयुक्त हैं, जो उन धर्मों से, जो कुछ अन्य धर्मों से वियुक्त हैं, संयुक्त है।\n\n<. संयुक्त से संयुक्त (सम्पयुत्तेन सम्पयुत्त): कितने स्कन्‍्ध, आयतन और धातुओं से वे धव\nमे संयुक्त है, झो उन्न धर्मों से, जो अन्य धर्मो से संयुक्त हैं, संयुक्त है।\n\n३०. वियुक्त से वियुक्त (विष्पयुत्तेन विप्पयुत्त): कितने स्कन्‍्ध, आयतन और धातुओं से\nवे धर्म वियुक्त हैं, जो उन्त धर्मों से, जो अन्य धर्मों से वियुक्त हैं, वियुक्त हैं।\n\n३५. सम्मिलित से संयुक्त और वियुक्त (संगहितेन सम्पयुत्त विष्पयुत्त) : (अ9 कितने\nस्कन्ध, आयतन और धातुओं से वे धर्म संयुक्त हैं जो समान स्कन्ध में सम्मिलित नहीं, किन्तु समान\nआयतन और धातु में कुछ अन्य धर्मों के साथ सम्मिलित हैं, (आ) कितने सस्‍्कनन्‍्थ, आयतन और\nच्ातुओं से वे धर्म वियुक्त हैं जो समान स्कन्ध में सम्मिलित नहीं, किन्तु समान आयतन और धातु\nमें कुछ अन्य धर्मों के साथ सम्मिलित हैं।\n\n३२. संयुक्त से सम्मिलित और असम्मिलित (सम्पयुत्तेन संगहित॑ असंगहितं) : (आअ)\nकितने स्कन्‍ध, आयतन और धातुओं में वे धर्म सम्मिलित हैं जो कुछ अन्य धर्मों से संयुक्त हैं,\n(आ) कितने स्कन्‍्ध, आयतन और धातुओं में वे धर्म असम्मिलित हैं जो कुछ अन्य धर्मो से संयुक्त\nहैं।\n\n२३. असम्मिलित से संयुक्त और वियुक्त (असंगहितेन सम्पयुत्तं विष्पयुत्त): (अ) कितने\nस्कन्ध, आयतन और धातुओं से जे धर्म संयुक्त हैं, जो किन्‍्हीं अन्य धर्मों के साथ समान स्कनन्‍्ध,\nआयतन और धातुओं में सम्मिलित नहीं हैं, (आ) कितने स्कन्ध, आयतन और धातुओं से जे धर्म\nवियुक्त हैं , जो किन्हीं अन्य धर्मों के साथ समान स्कन्‍्ध, आयतन और धातुओं में सम्मिलित नहीं\nहैं। वियुक्त से सम्मिलित और असम्मिलित (विप्पयुत्तेन संगहित॑ असंगहित) : कितने स्कन्‍्ध,\nआयतन और धर्मों में वे धर्म सम्मिलित हैं, जो कुछ अन्य धर्मों से वियुक्त हैं, (आ) कितने स्कन्‍्ध,.\nआयत�� और धर्मों में वे धर्म - सम्मिलित नहीं हैं, जो कुछ अन्य धर्मों से वियुक्त हैं।\n\nजता"} +{"id": "indic_deva_eval_000431_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000431_indic_vision_bench_deva_ocr_1c479494d217.jpg", "ocr": "साबरमती आश्रम के दौरे के नोट्स\nभारत अपनी जरुरत से ज्यादा भोजन (खाद्य पदार्थ) पैदा करता है, इसके बावजूद भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी भूखमरी का शिकार है। दुनिया भर में, समय के साथ घटने के बजाय, आय की असमानता बहुत बढ़ गई है। रोग, अपर्याप्त पानी और गरीबी जैसी अनेंक समस्या दुनिया को बहुत ही अधिक प्रभावित कर रही है।\nऔर फिर यहाँ काफी हिंसा है। एक देश अन्य देशों के खिलाफ, और अपने ही लोगों के खिलाफ भी हिंसा का सहारा ले रही है। आतंकवादी हिंसा, और एक समुदाय का अन्य समुदायों के खिलाफ की हिंसा, चौंकाने वाली है। बलात्कार, हत्या और दुर्व्यवहार, व्यक्तिगत हिंसा के अनेक रूप काफी फैल रही हैं।\nसैम तकनीक के दृष्टिकोण से आशावादी व्यक्ति हैं। उनका मानना है कि हमें आज के दुनिया में कुछ करने का एक अनूठा अवसर मिला है। मसलन हुम अनेक रोगों का इलाज कर सकते हैं। हमारे पास साफ पानी हो सकता है। हम इंटरनेट की गति बढ़ा और उसे सार्वभौमिक बना सकते हैं, और तो और हम इंटरनेट को मुफ्त में उपलब्ध करा सकते हैं। हम ग्लोबल वार्मिंग को कम सकते हैं।\nलेकिन, इनमें से कुछ भी करने के लिए, हमें अपने वैश्विक तंत्र को फिर से डिजाइन करना होगा कि हम अपनी दुनिया को किस तरह से चलाते हैं। सैम अक्सर कहते हैं कि हमें विशेष रूप से अपना ध्यान मानव अधिकारों पर केंद्रित करना होगा, हमें मानवीय जरूरतों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना होगा।\nजब सैम ने अपनी बात खत्म कर ली, तब उसके बाद दिनेश त्रिवेदी ने बात की। दिनेश त्रिवेदी लंबे समय से सांसद रहे है और वे काफी आध्यात्मिक और धार्मिक व्यक्ति भी हैं। सैम और मैं दिल्ली में उनके ही घर में रुके थे और मुझे उन्हें करीब से जानने का मौका मिला।\nदिनेश ने कहा, हमारी आधुनिक दुनिया की प्रमुख समस्या यह है कि कोई भी एक समुदाय, अन्य सभी समुदायों से काफी नफरत करता है। यह व्यक्तिविषेश रहित घृणा (depersonalized hatred) की वजह से एक व्यक्ति यह मान लेता है कि इस सामदायिक घृणा के बारे में वह निजी फैसला नहीं कर सकता। क्योंकि इस घृणा की उत्पत्ति उसके अपने समुदाय की आम सहमति से हुई है। इस तरह की सामुदायिक हिंसा के शिकार हुए व्यक्ति को हम एक खास व्यक्ति विशेष की तरह नहीं देखते हैं ब्लकि वह हमारी घृणा के एक बेनाम पात्र होते है।\nयह हिंसा अक्सर राष्ट्रवाद के आधार पर या जाति-भेदों से पैदा होती है, लेकिन कई बार यह धर्म की भिन्नता से भी पैदा होती है। दिनेश जी ने कहा कि हमें अपने अंदर झांकना होगा कि दुनिया की जरूरत, केवल धर्म पर ध्यान केंद्रित करना नहीं है, बल्कि आध्यात्मिकता पर ध्यान केंद्रित करना है। यह केवल हम पर निर्भर करता है कि हम अपने आप को बदलें क्योंकि केवल तब ही हम दूसरों को बदल सकते हैं।\nफिर दीना पटेल ने बात की। उन्होंने कहा कि हिंसा रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है। कि इसकी शुरुआत आप स्वयं से करें। उन्होंने एक युवक की कहानी सुनाई, जिसका\n21"} +{"id": "indic_deva_eval_000432_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000432_indic_vision_bench_deva_ocr_22fbe63fd61c.jpg", "ocr": "१३\nसच्ची सभ्यता कौनसी?\nपाठक :\nआपने रेलको रद कर दिया, वकीलोंकी निन्दा की, डॉक्टरोंको दबा दिया। तमाम कलकाम\n[\n१\n]\nको भी आप नुकसानदेह मानेंगे, ऐसा मैं देख सकता हूँ। तब सभ्यता\n[\n२\n]\nकहें तो किसे कहें?\nसंपादक :\nइस सवालका जवाब मुश्किल नहीं है। मैं मानता हूँ कि जो सभ्यता हिन्दुस्तानने दिखायी है, उसको दुनियामें कोई नहीं पहुँच सकता। जो बीज हमारे पुरखोंने बोये हैं, उनकी बराबरी कर सके ऐसी कोई चीज देखनेमें नहीं आयी। रोम मिट्टीमें मिल गया, ग्रीसका सिर्फ़ नाम ही रह गया, मिस्रकी बादशाही चली गई, जापान पश्चिमके शिकंजेमें फँस गया और चीनका कुछ भी कहा नहीं जा सकता। लेकिन गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान आज भी अपनी बुनियादमें मजबूत है।\nजो रोम और ग्रीस गिर चुके हैं, उनकी किताबोंसे यूरोपके लोग सीखते हैं। उनकी गलतियां वे नहीं करेंगे ऐसा गुमान\n[\n३\n]\nरखते हैं। ऐसी उनकी कंगाल हालत है, जब कि हिन्दुस्तान अचल है, अडिग है। यही उसका भूषण है। हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उससे जीवनमें कुछ फेरबदल कराये ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण\n[\n४\n]\nहै, दोष\n[\n५\n]\nनहीं। अनुभव\n[\n६\n]\nसे जो हमें ठीक लगा है, उसे हम क्यों बदलेंगे? बहुतसे अक़ल देनेवाले आतेजाते रहते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है, यह उसका लंगर है।\nसभ्यता वह आचरण\n[\n७\n]\nहै जिससे आदमीं अपना फ़र्ज अदा करता है। फ़र्ज अदा करनेके मानी है नीतिका पालन करना। नीतिके पालनका मतलब है अपने मन और इन्द्रियोंको बसमें रखना। ऐसा करते हुए हम अपनेको\n४२\n↑\nयंत्रकाम।\n↑\nतहजीब।\n↑\nअभिमान।\n↑\nसिफ़त।\n↑\nनुक़्स।\n↑\nतजरबा।\n↑\nबरताव।"} +{"id": "indic_deva_eval_000433_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000433_hindi_handwritten_word_ocr_c1ff4c9bd0b6.jpg", "ocr": "पीडि़त"} +{"id": "indic_deva_eval_000434_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000434_devanagari_page_ocr_1e7f846ae9b8.jpg", "ocr": "28\n\nअपदानपालि\n\n“'सीहो यथा दाठबली पसस्ह, राजा मिगानं अभिभुय्य चारी।\n\nसेवेथ पन्‍तानि सेनासनानि, एको चरे खग्गविसाणकप्पो॥28॥\nमैत्तं उपेक्खं करुणं विमुत्ति, आसेवमानों मुदितउ्च काले।\n\nसब्बेन लोकेन अविरुज्ममानो, एको चरे खग्गविसाणकप्पो॥29॥\n““रागडच दोसड्च पहाय मोहं, सन्‍्दालयित्वान संयोजनानि।\nअस्त जीवितसइेखबसम्टि, एको चरे खग्गविसाण कप्पा॥430॥\n“*भजन्ति सेवन्ति च कारणत्था, निक्‍कारणा दुल्लभा अज्ज मित्ता।\nअत्तत्थपञ्जा असुचीमनुस्सा, एको चरे खग्गविसाणकप्पो॥34॥\n““विसुद्धसीला सुविसुद्धपञ्जा, समाहिता जागरियानुयुत्ता।\nविपस्सका धम्मविसेसदस्सी, मग्गडगबोज्झड्गगते विजड्ञा॥32॥\n\nसिंहो यथा दृढबलं प्रसह्य, राजा मृगाणाम्‌ अभिभूय चारी।\nसेवेत प्रान्तानि शयनासनानि, एकश्वरेत्‌ खड्गविषाणकल्प:\nमैज्रीम्‌ उपेक्षां करुणां विमुक्तिम्‌, आसेवमानो सुदिताउच्च\nसर्वेण लोकेन अविरुध्यमान:, एकश्वरेत खड़गविपाणकल्प:\n\nरागजच दोषऊ्च प्रहाय मोहम्‌, सन्‍्दाल्य संयोजनानि।\n\nअसल्त्रसः जीवितसइक्षये, एकश्वरेन खड्गविषाणकल्प:॥30॥\n\n““भजन्ति सेवन्ते च कारणार्थान्‌, निष्कारणानि दुर्लभानि अद्य मित्राणि।\n\nआत्मार्थप्रज्ञा: अशुचयोर्मनुष्या:, एकश्वरेत्‌ खड़्गविषाणकल्प:॥34॥\n\n““विशुद्धशीलाः सुविशुद्धप्रजाः, समाहिता: जागरिकानुयुक्ता:।\n\nविपश्यका धर्मविशेषदर्शिन:, मार्गाइगबोध्यडगगता विजानीयात्‌॥432॥\n\nजिस प्रकार कोई अकेला सिंह अपनी तीदण दैंट्राओं के बल पर अन्य पशुओं का दमन करता\nहै, उसी प्रकार साधक प्रान्त (एकान्त) शयनासन का सेवन करे तथा गैंडे के समान एकाकी रह कर\nसाधना करे ॥428॥\n\nसमय-समय पर मैत्री, करुणा एवं मुदिता, उपेक्षा और विमुक्ति की भावना करता हुआ और समस्त\nसंसार में कहीं भी विरोध न रखने बाला साधक गैंडे के समान एकाकी होकर सर्वत्र विचरण करे ॥429॥\n\nडाग, द्वेष एवं सोह का प्रहाण कर तथा सभी संयोजनों (बन्धनों) का छेदन कर, मृत्यु से भी\nभय न मानता हुआ साधक गैंडे के समान एकल विचरण करे ॥॥30॥\n\nमित्र प्राय: स्वार्थवश ही साथ देते हैं, आज कल निःस्वार्थ मित्र मिलना दुर्लभ है। मन म��ं मैल रखने वाले\nअनेक पुरुष स्वार्थ ही देखते हैं। अतः साधक को गैंडे के समान एकाकी रहकर साधना करनी चाहिये ॥॥34॥\n\nविशुद्धशील और विशुद्धप्रज्ञा से युक्त जागृत एवं धर्म को विशेष रूप से देखने वाला तथा\nबोध्यडगों एवं सार्गाडुगों का ज्ञाता पुरुष-॥432॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000435_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000435_indic_mozhi_deva_word_ocr_5c2504648c7f.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_000436_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000436_indic_mozhi_deva_word_ocr_b1f313752031.jpg", "ocr": "नाही."} +{"id": "indic_deva_eval_000437_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000437_devanagari_page_ocr_b75d8f8c07b3.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n383\n\nतत्थ मच्तुन्ति मरितुं। तथा हि अलीनसत्तुजातके “यो मत्तुमिच्छे पितुनो पमोक्‍्खा\"ति\nपाछ्ठि दिस्सति। मज्चोति मरितब्बसभावताय “मच्वो”ति लद्यधनामो सत्तो। मरूति दीघायुकोपि\nसमानो मरणसीलोति मरु, देवों। मरणन्ति चुति।\nमरणं अन्तको मच्चु, हिन्दं कालो च मट्दु च।\nनिक्‍्खेपो चुति चेतानि, नामानि मरणस्स वे॥\nमारोति सत्तानं कुसलं मारेतीति मारो, कामदेवो।\nइमानिस्स नामानि -\nमारो नमुचि कण्हो च, वसवक्ति पजापति।\nपमत्तबन्धु मद्दनो, पापिमा दब्बकोषि च।\nकन्दप्पो च रतिपति, कामो च कुसुमायुधो॥\nअज्ञे अज्जानिषि नामानि वदन्ति, तानि सासनानुलोमानि न होन्‍तीति इध न\nदस्सितानि। अद्ठकथासु पन “मारो, नमुचि, कण्हों, पमत्तबन्धू”ति चत्तारोव नामानि आगतानि।\nएत्थ च मारोति देवपुत्तमारेन सद्धिं पड्च मारा किलेसमारो खन्‍्धमारों अभिसड्खारमारो\nमच्चुमारो देवपुत्तमारोति।\nधर अवत्थाने। धरति।\nभर पोसने। भरति। भरितो, भत्ता।\nथर सन्थरणे। थरति, सन्‍्थरति। सन्‍्थरणं।\nदर विदारणे। भूमिं दरति। कुदालो।\nदर दाहे। कायो दरति। दरो, दरथो।\n'तिर अधोगतियं। तिरति। तिरच्छानो, तिरच्छा वा।\nअर गतियं। अरति। अत्थ॑, अत्थो, उतु।\n'एत्थ अत्थं वुच्चति निब्बानं। तं त॑ सत्तकिच्चं अरति वत्तेतीति उतु।\nरकारन्तथातुरूपानि।\nलकारन्तधातु\nला आदाने। लाति। लानं, गरुव्ठो, सीहव्ठो, राहुलो, कुसलं, बालो, महल्लको, महल्लिका।"} +{"id": "indic_deva_eval_000438_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000438_indic_vision_bench_deva_ocr_4a56b9a126a1.jpg", "ocr": "१३८\nतटस्थता\nब्रिटेन जाती थी। सन् १९२४ में यहाँ समाजवादी सरकार थी और उसने इसे निःशस्त्र बना दिया। पर पिछले कुछ सालों में देश-रक्षा के लिये थोड़ा प्रयत्न किया गया है। ८ अप्रैल १९४० की रात को जर्मन-सेनाओं ने डेनमार्क पर आक्रमण किया। डेनमार्क की सरकार ने प्रतिवादपूर्वक\nआत्मसमर्पण कर दिया। यद्यपि डेनमार्क तटस्थ था, फिर भी जर्मनी ने हमला करके उसे अपने अधीन कर लिया। सिर्फ दो कारणों से ऐसा किया गया—एक तो नार्वे पर आक्रमण करने के लिये जर्मनी दस देश को अपना हवाई अड्डा बनाना चाहता था, दूसरे डेनमार्क की कृषि-पैदावार से भी\nवह फायदा उठाना चाहता था।\nडेल आइरीन—\nआयरिश स्वतंत्र राज्य की पार्लमेंट की द्वितीय परिषद्।\nत\nतटस्थता—\nराष्ट्रों में परस्पर युद्ध होने पर उसमें भाग न लेने की स्थिति। अन्तर्राष्ट्रीय विधान के अनुसार तटस्थ देश को युद्ध में किसी प्रकार भी भाग न लेना चाहिये। उसे किसी भी विग्रही राष्ट्र के सैन्य-सङ्गठन में न बाधा डालनी चाहिये और न सहायता ही देनी चाहिये। यदि उसकी तटस्थता में कोई बाधा डाली जाय तो उसे आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है। जो विग्रही देश तटस्थ देश की तटस्थता को भंग करने के लिए हवाई यानों अथवा नौसेना का प्रयोग करे, उसके विरुद्ध बलप्रयोग का उसे पूरा अधिकार है। तटस्थ देश में होकर विग्रही राष्ट्र की सेना को न मार्ग दिया जा सकता और न उस देश के प्रदेश में हवाई सेना या नौ-सेना के अड्‌डे ही बन सकते हैं,"} +{"id": "indic_deva_eval_000439_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000439_devanagari_page_ocr_192ee0e1f3f8.jpg", "ocr": "अभिधम्मपिटके\n434-\n\nअविज्जापच्चया सड्खारेहि ये धम्मा सम्पयुत्ता.\nधातूहि _सड्गहिता। कतिहि असड्गहिता? एकेन\nअसड्न्गहिता।\n\n४२४. सड्ःखारपच्चया विज्ञाणेन ये धम्मा सम्पयुत्ता... ते धम्मा तीहि खन्‍्धेहि एकेनायतनेन\n'एकाय धातुया_ सड्ग्गह्िता। कतिहि असड्ग्गहिता? द्वीहि खन्धेहि एकादसहायतनेहि सत्तरसहि\nधातूहि असड्गहिता।\n\n४२५. सव्ठायतनपच्चया फस्सेन ये धम्मा सम्पयुत्ता... ते धम्मा चतूहि खन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि\nअद्ठहि 2/24:0 सड्गहिता। कतिहि असड्गहिता? एकेन खन्धेन दसहायतनेहि दसहि धातूहि\nअसडू- ॥\n\n४२६. फस्सपच्चया वेदनाय ये धम्मा सम्पयुत्ता... ते धम्मा तीहि खन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि अद्डहि\nधातूहि सडगहिता। कतिहि असड्गहिता? द्वीहि खन्धेहटि दसहायतनेहि दसहि धातूहि असड्गहिता।\nत्व)- जविद्याप्रत्ययाद्‌ संस्कार: ये धर्माः सम्प्रयुक्ताः... ते धर्माः चतुर्मिः स्कन्ैः द्वाभ्याम्‌ आयतनाभ्यां\nद्वाभ्याम्‌ धातुभ्यां सड्ग्रहीता:। कतिभिः असड्ग्रहीताः? एकेन स्कन्धेन दशझिः आयतनैः पोडशश्िः धातुभिः\nअसड्िग्रहीताः।\n\n४२४, संस्कारप्रत्ययाद्‌ विज्ञानेन ये धर्माः सम्प्रयुक्ताः\nधातुना सड्ग्रहीता। कतिभिः सड़गग्रहीताः? द्वाभ्याम्‌\nधातुझिः असडत्ग्रहीताः।\n\n४२५. घडायतनप्रत्ययाद्‌ स्पर्शग ये धर्माः सम्प्रयुक्ता:... ते धर्मा: चतुर्भिः स्कन्धैः द्वाभ्याम्‌\nआयतनाभ्याम्‌ अष्टनि: धातुभिः सड्ग्रहीता:। कतिभि असडूग्रहीता:? एकेन स्कन्घेन दशजि: आयतनै दशमिः\nधातुजिः असड्ग्रहीताः।\n\n४२६. स्पर्शप्रत्ययाद्‌ बेदनया ये धर्माः सम्प्रयुक्ता:... ते धर्माः त्रिभिः स्कन्‍्चैः द्वाभ्याम्‌ आयतनाभ्याम्‌\nअष्टभिः धातुभिः सड्ग्रहीता। कतिभिः असडुग्ग्रहीताः? द्वाभ्याम्‌ स्कन्धाभ्याम्‌ दशभि:ः आयतनैः दशशिः\nधातुभिः असड-गहीता।\n_ तहेन्दी)- अविद्या के कारण से उत्पन्न संस्कारों से जो धर्म सम्प्रयुक्त है, ..... वे धर्म चार स्कन्‍्धों से, दो आयतनों और दो\nधातुओं द्वारा संग्रहीत हैं; कितनों के द्वारा असंग्रहीत हैं? एक स्कनन्‍्ध से, दस आयतनों और सोलह धातुओं द्वारा\nअसंग्रहीत हैं।\n\n४२४. जो धर्म संस्कार के कारण से उत्पन्न विज्ञान के साथ सम्प्रयुक्त है.... वे धर्म तीन स्कन्‍्धों, एक आयतन\n\nऔर एक धातु से संग्रहीत हैं। कितनों से असंग्रहीत हैं? दो स्कन्‍्धों, ग्यारह आयतनों और सत्रह धातुओं द्वारा असंग्रहीत\nहैं।\n\nते धम्मा चतूहि खन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि द्वीहि\nन खन्‍्धेन दसहायतनेहि सोव्ठ्सहि धातूहि\n\nते धर्माः व्रिभिः स्कन्‍्च्ैः एकेनायतनेन एकेन\nन्धाभ्याम्‌ एकादशजि:ः आयतनैः सस्दशभिः\n\n४२५. जो धर्म पडायतन के कारण उत्पन्न स्पर्श के साथ सम्प्रयुक्त है...\nआठ धातुओं द्वारा संग्रहीत हैं; कितनों\nहैं।\n\nबे धर्म चार स्कन्‍्धों, दो आयतनों और\nद्वारा असंग्रहीत हैं? एक स्कन्‍्ध, दस आयतनों और दस धातुओं द्वारा असंग्रहीत\n\n४२६. जो धर्म स्पर्श के द्वारा वेदना के साथ.... बे धर्म तीन स्कन्‍्धों से, दो आयतनों और आठ धातुओं द्वारा\nसंग्रहीत हैं; कितनों के द्वारा असंग्रहीत हैं? दो स्कन्‍्धों से, दस आयतनों और दस धातुओं द्वारा असंग्रहीत हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000440_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000440_devanagari_digits_mixed_c75bed094c13.jpg", "ocr": "53८8०5357627८६084२"} +{"id": "indic_deva_eval_000441_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000441_indic_mozhi_deva_word_ocr_cb2297df63ed.jpg", "ocr": "झाली."} +{"id": "indic_deva_eval_000442_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000442_indic_vision_bench_deva_ocr_d56dcbe6ca9b.jpg", "ocr": "संघ-उभारण्यातील अडचणी\n४९\nसंघर्षावर तडजोडी करतो त्याला जेव्हा महत्त्वपूर्ण संघर्षांना सामोरे जावे लागते तेव्हा ह���लचाली करायला अधिक वाव मिळतो.\nकाही बाबतीत, महत्त्वपूर्ण संघर्षानंतर वरिष्ठ अधिका-याच्या मनात काही काळ कटुपणाची भावना मागे राहण्याची शक्यता असते. दुसरीकडे, अशी अनेक उदाहरणे आहेत ज्यात महत्त्वपूर्ण संघर्षानंतर वरिष्ठ अधिका-याच्या मनात हाताखालच्या व्यक्तीविषयी काहीसा आदर निर्माण झालेला असतो.\nसहका-यांची हाताळणी\nवरिष्ठ अधिकारी किंवा हाताखालची माणसे यांची हाताळणी करण्याहून बरोबरीच्या सहका-यांची हाताळणी करणे अधिक अवघड असते.हाताखालच्या माणसांविषयी बोलायचे तर आपल्याजवळ वरिष्ठ म्हणून आलेल्या अधिकार पद्धतीतून त्यांच्यावर गाजविण्यासाठी अधिकार असतात. वरिष्ठ अधिका-यांच्या बाबतीत आपल्याकडे आपल्या कामगिरीतून येणारा अधिकार असतो. मात्र बरोबरीने काम करणाच्या सहका-यांबरोबर आपल्याला तसा काहीही अधिकार नसतो. खरे तर, कामगिरीचा ठळक, वरचढ देखावा हा हानिकारक ठरू शकतो, कारण मत्सर निर्माण होऊन शत्रुत्वाची भावना निर्माण होऊ शकते. खालील \nबाबीद्वारे बरोबरीच्या सहका-यांचे व्यवस्थापन करता येणे शक्य असते :\n० अनौपचारिकपणे व्यक्तिगत संबंध ठेवून.\n० परस्परसहकार्य, देवाणघेवाण करून.\n० श्रेयाची वाटणी करून.\nअनौपचारिक व्यक्तिगत संबंध\nबरोबरीच्या सहका-यांच्यासोबत कामावर असताना आणि बाहेर अनौपचारिकरीत्या संबंध ठेवल्याने आपुलकी निर्माण व्हायला मोठी मदत होते. काम करीत असताना\nऔपचारिक देवाणघेवाणीमध्ये विविध विभागांतील विविध कार्यामुळे संघर्ष होतातच. उदाहरणार्थ, विक्रीविभाग विरुद्ध उत्पादनविभाग, उत्पादनविभाग विरुद्ध मालखरेदीविभाग, लेखापरीक्षणविभाग विरुद्ध प्रत्येक जण! मात्र, बरोबरीच्या प्रत्येक सहका-यांशी वैयक्तिक स्तरावर संबंध ठेवण्याने अधिक सलोख्याचे वातावरण निर्माण होते, ज्यामुळे विभागांमधील संघर्षाचे अडथळे संपुष्टात आणले जाऊ शकतात."} +{"id": "indic_deva_eval_000443_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000443_indic_mozhi_deva_word_ocr_ee057725f851.jpg", "ocr": "मुस्कराता"} +{"id": "indic_deva_eval_000444_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000444_indic_mozhi_deva_word_ocr_694cee9712e5.jpg", "ocr": "रेजिमेन्ट"} +{"id": "indic_deva_eval_000445_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000445_hindi_handwritten_word_ocr_535f33b7ff6e.jpg", "ocr": "मोसाद"} +{"id": "indic_deva_eval_000446_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000446_indic_mozhi_deva_word_ocr_9a2f8442c3c7.jpg", "ocr": "समाप्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000447_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000447_devanagari_page_ocr_c8582381d8cf.jpg", "ocr": "न]\nव्रछ8 25. कोणागमनबुद्धवंसो\n\nपालि- पट्टुण्णं चीनपट्टज्व, कोसेय्यं कम्बलम्पि च।\n\nसोवण्णपादुकड्चेव, अदासिं सत्थुसावके॥939॥\n\nसोपि मं बुद्धो ब्याकासि, सड्घमज्झे निसीदिय।\n\n“इमम्हि भद्दके कप्पे, अय॑ बुद्धों भविस्सति॥940॥\n\n“अहु कपिलव्हया रम्मा. ..पे*... हेस्साम सम्मुखा इमं”॥944॥\n\nतस्सापि वचन सुत्वा, भिय्यो चित्त पसादयिं।\n\nउत्तरिं बतमधिट्ठासिं, दसपारमिपूरिया॥942॥\n\nसब्बज्ञुतं गवेसन्तो, दानं दत्वा नरुत्तमे।\n\nओहायाहं महारज्जं, पब्बजिं जिनसन्तिके [तस्स सच्तिके (सी-)|॥943॥\nसंस्कृतच्छाया-.. पद्टोर्ण चीनपढ् उतर, कोशय कस्वलमपि च।\n\nसौवर्णपादुकाज्वैब, अददां शास्तृश्नावकेभ्य:॥939॥\nसोऊपि मां बुद्धो व्याकार्षीत्‌, सडघमध्ये निषद्म/निषीदित्वा।\n“अस्मिन्‌ भद्रके कल्पे, अय॑ बुद्धो भविष्यति॥940॥\n“अभूत्‌ कपिलाहव्या रस्या.\nतस्थापि बचन श्रुल्वा, भूयश्चित्त प्रासादयम्‌।\nउत्तरं ब्रतमध्यस्थाम्‌, दशपारमिपूर्तये॥942॥\nसर्वज्ञत्वं गवेषयन्‌, दान॑ दत्वा नरोत्तमाय।\nविहायाहं महाराज्यम्‌, प्रान्नजं जिनसान्तिके॥943॥\nहिन्दी- साथ ही सैंने भिक्षुओं को रूई एवं ऊन का वस्त्र (पट्टोर्ण) चीनपट्ट, कौपेय (रेशमी), कम्बल (ऊनी बस्तर)\nतथा सुवर्णनिर्भित पादुकाएँ भी प्रदान कीं॥939॥\nतदन्‍्तर उन भगवान्‌ बुद्ध ने भी उस भिक्षुपरिषद्‌ के मध्य मेरे लिये यह भविष्यवाणी की- “यह भी\nआगामी भद्गक कल्प में बुद्ध होगा।॥940॥\nकपिलवस्तु नाम से नगरी की प्रसिद्धि हुई, जहाँ......पूर्ववत्‌...... हम रहते हुए भगवान्‌ बुद्ध के सम्मुख\nहो जायेंगे॥944॥\nउनके भी बचन सुनकर मेरा चित्त प्रसआता से प्रफुल्लित हो गया दसपारमिताओं की पूर्ति हेतु शरे्ठ ब्रत\nकी अधिष्ठापना की॥942॥\nइस प्रकार सर्वज्ञता की गवेषणा करने हेतु मैंने उन नरश्रेष्ठ को यथेच्छ दान करते हुए अपने महान्‌ राज्य\nका सर्वथा त्याग कर उन से प्रत्नज्या की दीक्षा ली॥943॥\n\n'चें>.\n\n- भविष्यासः सम्सुखा इसम्‌\"॥944॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000448_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000448_indic_vision_bench_deva_ocr_b05f161443d6.jpg", "ocr": "३६\nगांव-गाडा.\nवळल्यामुळे राजाधिकारी व धर्माधिकारी कालांतराने वतनदार झाले आज आहे उद्यां नाही, असल्या मिळकतींत जीव काय ? कांहीं केलें तर ते असे करावें कीं, पिढ्यान् पिढ्या त्याला घोर नाही, ह्या विचाराने वतन निर्माण केले. राजाने राज्य कमावलें तें एकट्याने नव्हे, त्याला अनेक मुत्सद्यांचे आणि वीरांचे साह्य झाले तेव्हां तें त्याच्या हातीं चढले. राज्य संपादन करण्याच्या कामी ज्यांनी आपल्या खांद्याशी खांदा भिडवून संपत्ति, संतति व आपला स्वतःचा प्राण ह्यांची पर्वा केली नाही, त्यांचाच ओढा आपणाकडे असणार, आणि कमावलेलें राज्य संभाळण्यांत त्यांचीच योजना करणे अवश्य व हितकर आहे, असे कृतज्ञतापूर्वक ध्यानांत आणून ज्यांची जशी मदत व प्रेम त्याप्रमाणे राजांनी\n१\n[\n१\n]\nत्यांना असाम्या दिल्या. स्वतःबरोबरच आपल्या संतानाच्या कल्याणाचा विचार मनांत न बोलावतां येतो, आणि साहजिक असें वाटावयाचें की, नव्याची प्रतीति घेण्यापेक्षां देखला पाणोथा खास बरा. जे आपल्या कामा आले त्यांची संतति आपल्या संततीच्या उपयोगी पडण्याचा संभव अधिक आहे. पूर्वीच्या धामधुमीच्या काळांत जंगमाची किंमत फार कमी होती. स्थावराला चोरांचिलटांची भीति नाही म्हणून तें सुरक्षित असे लोक मानीत. त्यामुळे रोकडीच्या मानाने कमी उत्पन्नाचे स्थावर असले तरी ते निरंतर टिकणारे असते, असा विचार मनांत वागवून कामगार रोकडीपेक्षां स्थावराला जास्त चहात. शिवाय ज्या राजाने स्थावराची नेमणूक करून दिली त्याचे राज्य टिकलें तर ती नेमणूक चालेल, ही गोष्ट कोणालाही कळण्याजोगी आहे. तेव्हां स्थावर नेमणुका करून दिल्या म्हणजे त्या स्वस्त्या पडतील व नेमणूकदार आपल्या पोटतिडिकेसाठी राजनिष्ठ राहातील, इतकेच नव्हे तर राजासाठी पैशानें, शरीराने व स्थावरावरील मालकीमुळे रयतेवर प्राप्त होण्याच्या वजनाने झटतीलही, असें भूपतींना वाटणे साहजिक आहे. दुसऱ्या\n↑\n'तुल्यवेतनोऽस्मि, भवद्भिःसह भोग्यमिदं राज्यम् ।' अशी प्रसिद्ध राजनीति आहे."} +{"id": "indic_deva_eval_000449_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000449_indic_mozhi_deva_word_ocr_7d43c7868451.jpg", "ocr": "सोय"} +{"id": "indic_deva_eval_000450_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000450_devanagari_digits_mixed_efdaa8b3a214.jpg", "ocr": "5५९९85७२60१1९5३९"} +{"id": "indic_deva_eval_000451_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000451_indic_mozhi_deva_word_ocr_d2824d91ccc0.jpg", "ocr": "सद्राही"} +{"id": "indic_deva_eval_000452_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000452_indic_mozhi_deva_word_ocr_9319e36ed6c4.jpg", "ocr": "तारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000453_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000453_indic_mozhi_deva_word_ocr_bd90193b9429.jpg", "ocr": "दिमाग"} +{"id": "indic_deva_eval_000454_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000454_devanagari_page_ocr_c5e3083957d0.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n343\n\nअत्थानुसासति। निसीदित्वातिपि पाठो। निसीदित्वा। निसीदित्वान। निसीदितुन। निसीदिय।\n'निसीदियान। संसीदित्वा। अबसी दित्वा। ओसीदित्वा।\nतत्थ कुसीतोति वीरियेनाधिगन्तव्बस्स अत्थस्स अलाभतों कुच्छितेनाकारेन सीदतीति\nकुसीतो। अथ वा सयम्पि कुच्छितेनाकारेन सीदति अज्ञेपि सीदापेति त॑ निस्साय अच्जेसं\nसीदनस्स सम्भवतोति कुसीतो। तथा हि बुत्त -\n“परित्त कट्ठमारूय्ह, यथा सीदे महण्णवे।\nएवं कुसीतमागम्म, साधजीवीपि सीदती\"ति।\nकुसीतोति चेत्थ दस्स तत्तं “सुगतो”ति एत्थ विय “सतस्मीति होती”ति एल्थ विय च। तथा\nहि सीदतीति सतं, अनिच्चस्सेतं अधिवचनं। इमिना उच्छेददिद्ठि बुत्ता। सतइति चेत्थ\nअविभत्तिको . निद्वेसो। सन्निसीवेसूति परिस्समविनोदनत्थ सब्बसो . निसीदन्तेसु,\nविस्समसानेसूति अत्थो, दकारस्स वकार॑ कत्वा निदेसो। निसीदनन्ति निसीदनक्रिया।\nमज्वपीठादिक॑ बा आसने। तडिह निसीदन्ति एत्थाति निसीदनन्ति बुक्चति। निसिन्‍्नन्ति\nनिसीदनक्रिया एवं। एत्थ पन “गते ठिते निसिन्‍ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे\nसम्पजानकारी होति। मातुगामेन स््धि रहो मज्जे तया निसिन्‍नन्ति कुक्कुच्च॑\nउपदहतीतिआदीसु चस्स पयोगों वेदितव्बो। एत्थ हि गमनं गर्भ, ठान॑ ठित॑, निसीदन॑ निसन्नं,\n\nसुपन॑ सुत्तं, जागरण जागरितं, भासनं भासितन्ति वुच्चति। निसज्जाति निसीदना।\nगोनिसादोति गोनिसज्जना। उपनिसाति उपनिसीदति फल॑ एत्थाति उपनिसा, कारणं।\nनिसादेतुन्ति निसीदापेतुं। निसादेत्वाति निसीदापेत्वा।\nभाबे नपुंसको जेय्यो, निसिन्‍नन्ति रबो पन।\nवाच्वलिकुगों तिलिकुगो सो, गतादीसुप्ययं नयो॥\nचद याचने। याचनं अज्झेसनं। चदति।\nमिद मेद मेधाहिंसासु। मिदति। मेदति।\nनिद नेद कुच्छासन्निकरिसेसु। कुछ्छा गरहा। सन्निकरिसं वोहारविसेसो। निदति। नेदति।\nबुन्दि निसाने। निसानं तेजनं तिक्खता। बुन्दति। बोन्दि।\nएत्थ च बोन्दीति सरीरं। तजिह बुन्दानि तिक्खानि पिसुणफरुसबाचादीनि वा\n'पड्ञावीरियादीनि वा एत्थ सन्‍्तीति बोन्दीति वुच्चति, सड्ओोगपरत्तेषि उकारस्सोकारादेसो,\nपापकल्याणजनवसेनेस अत्थो वढ्॒ब्बो। बोन्दिसद्वस्स सरीरबाचकता पन -\n“नाहं पुन न च पुन, न चापि अपुनप्पुनं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000455_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000455_devanagari_page_ocr_d474314d7aa6.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n390- न्‍\n\nरड्चतीति राजा, भूमिं पालेतीति भूमिपालो, नरे इन्दतीति नरिन्दोति। एस नयो सब्बत्थापि\nविभावेतब्बो।\n\nइल गतियं। इलति।\n\nहिल हावकरणे। हेलति।\n\nसिल उड्छे। सिलति।\n\nतिल सिनेहने। तिलति। तिलं, तेलं, तिलो।\n\nचिल बसने। चिलति।\n\nबल विलासने। वलति।\n\nपिल गहणे। पिलति।\n\nमिल सिनेहने। मिलति।\n\nफुल सड्चले फरणे च। फुलति।\nलकारन्तधातुरूपानि।\nबकारन्तधातु\n\nवा गतिगन्धनेसु। वाति। वातो।\n\nबी पजनकन्ति असनखादन गतीसु। पजनं॑ चलनं। कन्ति अभिरुचि। असन॑ भत्तपरिभोगो।\nखादन पूवादिभक्खनं। गति गमन॑। वेति।\n\nबे तन्‍्तसनन्‍्ताने। वायति। तन्‍तवायो।\n\nवे सोसने। वायति।\n\nधि्रु खिब्रु निदस्सने। धेवति। खेवति।\n\nथिबु दित्तियं। थेवति। मधुमधुका थेवन्ति।\n\nजीव पाणधारणे। जीवति। जीवितं, जीवो, जीविका। अत्थि नो जीविका देव, सा च\nयादिसकीदिसा। जीवित कप्पेति।\n\nपिव मिव तिव निव थूलिये। पिवति। पिवरो। मिवति। तिवति। निवति।\n\nएत्थ च पिवरोति कच्छपो, यो कोचि वा थूलसरीरो। तथा हि “पिवरो कच्छपे थूले”ति\nपुब्बाचरियेहि चुत्त।\n\nअब पालने। अवति। बुद्धो मम अबतं।\n\nभव गतियं। सबति।\n\nकब वण्णे। कबति।\n\nखिबु मदे। खिवति।\n\nश्ोबु धोचने। धोवति।\n\nदेवु देव देवने। देवति आदेवति, परिदेवति, आदेवो, परिदेवों, आदेवना, परिदेवना,\n\nआदेवितत्तं, परिदेवितत्तं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000456_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000456_indic_mozhi_deva_word_ocr_8720e5422d8a.jpg", "ocr": "आहे."} +{"id": "indic_deva_eval_000457_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000457_devanagari_page_ocr_70e0fe685b46.jpg", "ocr": "गन्धोदकबग्गो व63\n\n“सहस्सकण्डं सतभेण्ड्‌, धजालु हरितामयं।\nसतसहस्सनिय्यूहा, ब्यम्हे पातुभविंसु मे॥740॥\n“ये ये योनुपपज्जामि, देवत्तं अथ मानुसं।\nमम सड्कप्पमज्ञाय, पासादो उपत्िद्रति॥744॥\n“भयं वा छम्भितत्तं वा, लोमहंसो न विज्जति।\nलासं मम न जानामि, तिणकुटिकायिदं [तिणकुटियिदं (क०)] फलं॥742॥\n“सीहब्यग्घा च दीपी च, अच्छकोकतरच्छका [तरच्छयो (स्या* क*)]।\nसब्बे मं परिवज्जेन्ति, तिणकुटिकायिदं फलं॥743॥\n“सरीसपा [सिरिंसपा (सी* स्या०), सरिंसपा (क\")] च भूता च, अही कुम्भण्डरक्खसा।\nतेपि म॑ परिवज्जेन्ति, तिणकुटिकायिदं फलं॥744॥\n'सहख्रकण्डं शतगेण्दुक, ध्वजालु हरितामयम्‌।\nशतसहस्निर्व्यूहा:, विमाने प्राद्रभूबन्‌ मे॥740॥\n“यां यां योनिमुपपओ, देवत्वम्‌ अथ सानुपमा।\nमम सड्कल्पमाज्ञाय, प्रासाद उपतिष्ठति॥744॥\n“भय वा छम्भितत्वं वा, लोमहर्षों न विद्यति।\nतासाँं मम न जानामि, तृणकुटिकया इदं फलम्‌॥742॥\n“सिंहव्याधाश्व द्वीपिश्व, अच्छकोकतरक्षकाः\nसर्वे मां परिवर्जयन्ति, तृणकुटिकया इदं फलम्‌॥743॥\n“सरीसृपाश्य भूताश्व, अही कुम्भाण्डराक्षसा:।\nतेपि मां परिवर्जयन्ति, तुणकुटिकया इदं फलमु॥744॥\nसौ हजार तीर, अस्थ विशेष, हरितमय ध्वज, सौ हजार द्वार बाला विमान मेरे लिए प्रकट हुआ॥740॥\nजिस-जिस योनि में उत्पन्न होता हैँ वह मनुष्यत्व हो अथवा देवत्व मेरे संकल्प को जान\nश्रासाद खड़ा होता है॥744॥\nमुझमें भय जड़ी भूत नहीं होता और रोम हर्ष भी सुझमें विद्यमान नहीं है मैं उनको नहीं जानता, यह\nसृण कुटि का ही सुपरिणाम है॥742॥\nसिंह, व्यान्न, चीता, रीछ और भालू सभी मेरा बचाव करते हैं, यह तृण-कुटि दान का ही सुपरिणाम है॥743॥\nसॉप, भूत और दिव्य शक्तियों से युक्त राक्षस ये सभी मेरा बचाव करते हैं, यह तृण कुटि\nदान का ही सुपरिणाम है॥744॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000458_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000458_devanagari_page_ocr_c12c72fedfc4.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n200\n\n“बत्तन्ते चरिमे चित्ते, मम सील॑ अनुस्सरिं।\n\nलेन कम्मेन सुकतेन, तावलिंसं अगच्छहं॥943॥\n\n“तिंसक्खत्तुड्च देविन्दो, देवरज्जमकारयिं।\n\nदिव्बसुखं [दिव्बं सुखं (सी०)] अनुभविं, अच्छराहि पुरक्खतो॥944॥\n“पड्चसत्ततिक्खत्तु्॑च, चक्‍्कवत्ती अहोसहं।\n\nपदेसरज्जं विपुलं, गणनातो असड्खियं॥945॥\n\n“देवलोका चबित्वान, सुक्कमूलेन चोदितो।\n\nपुरे वेसालियं जातो, महासाले सुअड्डके॥ 946॥\n\n“बस्सूपनायिके काले, दिप्पन्ते [दिव्बन्ति (क*)] जिनसासने।\n\nमाता च मे पिता चेव, पड्चसिक्खापदग्गहूं॥947॥\n\n“बर्चन्ते चरमे चित्ते, मम शीलम्‌ अन्वस्मरम्‌।\n\nतेन कर्मणा सुकूते न, त्रायख्िंशे उगल्छमहम्‌॥943॥\n“त्रिंशत्कृत्वश्व देवेन्द्र:, देवराज्यमकारयम्‌।\nदिव्यसुखम्‌ अन्ब भूवम्‌, अप्सरोभिः पुरस्कूत:॥944॥\n“पड्च्वससतिकृत्वश्व, चक्रवर्च्यभूवमहम्‌।\n\nप्रदेशराज्यं विपुलम्‌, गणनातो5सड्ख्येयम्‌॥945॥\n“देवलोकात्‌ च्युत्वा, शुक्‍्लमूलेन चोदितः।\n\n» महाशाले स्वाब्यके॥946॥\n“बर्षोषनायिके काले, दीप्यते जिनशासने।\n\nमाता च में पिता चैव, पडचशिक्षापदमगुक्ञला म्‌॥947॥\n\nशील का अनुस्मरण करते हुए यह मेरा अच्तिम भव है। उस सुकृत कर्म के फलस्वरूप मैं\nतायस्थिश लोक में उत्पन्न हुआ॥94:\n\nतीस बार देवेन्द्र हो मैंने देवताओं में राज्य किया तथा अप्सराओं से पुरस्कृत हो दिव्य सुखों का\nअनुभव किया॥944॥\n\nमैं पचहत्तर बार गणना में असंख्य व विशाल प्रदेशराज्य का चक्रवर्ती राजा हुआ॥945॥\n\nकुशल धर्मों से प्रेरित मैं देवलोक से च्युत होकर वैशाली पुरी में एक धनाक्य कुल के विशाल\nअवन में उत्पन्न हुआ॥946॥\n\nवर्षा ऋतु में मेरे माता-पिता ने दिव्य जिनशासन सें पद्चशिक्षापद ग्रहण किया॥947॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000459_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000459_indic_mozhi_deva_word_ocr_02c0a46f4019.jpg", "ocr": "बंदूक"} +{"id": "indic_deva_eval_000460_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000460_indic_mozhi_deva_word_ocr_b9451da05b3b.jpg", "ocr": "अपनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000461_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000461_indic_mozhi_deva_word_ocr_19a027ce302a.jpg", "ocr": "दिसू"} +{"id": "indic_deva_eval_000462_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000462_devanagari_page_ocr_dd671dd6167a.jpg", "ocr": "अनुपिटके\n\nत॑ यथा'नुसूयते - अत्थि योनकान॑ नानापुटभेदनं सागलं नाम नगरं नदीपब्बतसोभितं\nरमणीयभूमिप्पदेसभागं आरामु'स्यानोपवनतडागपोक्खरणीसम्पन्त॑ नदीपब्बतवनरामणेय्यक\nसुतवन्तनिम्मित॑ निहतपच्चत्थिकपच्चामित्तं अनुपपीक्ठितं विविधविचित्रदव्छहमद्टालकोट्ठकं\nवरगोपुरतोरणं.._ गम्भीरपरिखापण्डरपाकारपरिक्खिन्त ल्तेपुरं।.. सुविभत्तवीधिचच्चरचत-\nक्कसिड्ूघाटकं सुप्पसारिता'नेकविधवरभण्डपरिपूरितन्तरा'पणं विविधदानग्गसततमुपसोभितं\nहिसगिरिसिखरसड्कासवरभवनसतसहस्सप्पटिमण्डितं गजहयरथपत्तिसमाकुल॑ अभिरूप-\nनरनारीगणानुचरितं आकिण्णजनमनुस्स॑ पुथुखत्तियब्राह्मणवेस्ससुद्ं विविधसमणब्राह्मण-\nसभाजनसड्घटितं बहुविधविज्जावन्तनरवीरनिसेबितं_ कासिककोट्म्बरिकादिनानाविध-\nवत्थापणसम्पन्न॑ सुप्पसारितरुचिरबहुविधपुण्फगन्धापणं गन्धगन्धितं॑ आसिंसनियबहुरतन-\nपरिपूरितं दिसामुखसुप्पसारितापणसिडूगारवाणिजगणा'नुचरितं कहापणरजतसुवण्णकंस-\nपत्थरपरिपूरं पज्जोतमाननिधिनिकेतं पहतधनधडज्ञवित्त्‌'पकरणं परिपुण्णकोसकोट्ठागारं\nसंस्कृतच्छाया- तद्‌ यथाउनुश्रूबते। अथ यदस्ति यवनकानां नानापुटभेदन॑ सागल नाम नगरं\nनदीपर्वतशोभित॑__ रमणीयशूमिप्रदेशभागमारासोद्यानोपवनतडागपुष्करिणीसम्पन्न॑_ नदीपर्वतवन-\nरामणीयकं श्रुतवन्निर्मितं निहतप्रत्यर्थिकप्रत्यमित्रमनुपपीडितं विविधविचित्रदृढाद्वालकोछक॑ बरगोपुर-\nतोरण॑ _ गम्भीरपरिखापाण्ड्रप्राकारपरिश्षिसान्त:पुर॑सुविभक्तबीथिचत्वरचतुप्कशुडुगाटकेसुप्रसारि-\nतानेकविधवरभाण्डपरिपूरितान्तरापणं _ विविधदानास्यसततोपशोभितं॑ हिमगिरिशिखरसड्ककाशवर-\nभवनशतसहस्रप्रतिमण्डितं गजहयरथपत्तिसमाकुलमभिरूपनरनारीगणानुचरितमाकीर्णजनमनुष्य॑ पृथु-\nक्षत्रियब्राह्मणवैश्यशूद्र विविधश्रमणब्राह्मणसभाजनसड्लघटित॑ बहुविधविद्यावन्नरवीरनिषेवित॑ काशिक-\nकौटुम्बरकादिनानाविधवस्त्रापणसम्पन्न॑ 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चहल-\nरहती थी। सुन्दर-सुन्दर स्त्री और पुरुष समूह रूप में घूमते दिखायी देते थे। बह नगर सभी प्रकार के मनुष्यों से\nआकीर्ण था। वहाँ क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, श्रमण, ब्राह्मण-सन्‍्यासी तथा गणाचार्य भी रहते थे। वहाँ\nप्रतिभाशाली विद्वानों का केन्द्र था। वहाँ काशी, कोयम्बटूर आदि स्थानों के बने कपड़ों की बड़ी-बड़ी दुकानें थीं।\nसाथ ही अनेक प्रकार के फूल तथा सुगन्धित द्रव्यों की दुकानें थीं। अभिलाषित रत्न भरे पड़े थे। सभी ओर श्रृंगार-\nवाणिज्य की दुकानें खुली रहती थीं। कर्पापण, चाँदी, सोना, कॉसा और अमूल्य पत्थरों आदि परिपूर्ण बह नगर\nमानों बहमूल्य चमकता खजाना थ्रा।"} +{"id": "indic_deva_eval_000463_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000463_indic_vision_bench_deva_ocr_b711cae5f693.jpg", "ocr": "समुद्राला मीठ हरवून चालणार नाही\n\"बाौ\nद्ध किंवा हरिजन समाज तसेच मुसलमान हेही भारतीय जनता पक्ष, शिवसेनेप्रमाणे अत्यंत कडवे जातीयवादी आहेत आणि ते जातीयतेच्या आधारावर हिंदुधर्मियांवर आक्रमक दृष्टीने प्रचार करतात, 'हिंदू को मिटा डालो, बौद्ध धर्म लाओ' असे नारे लावत हिंदुधर्मियांच्या मोहल्ल्यांतून मिरवणुका काढतात तेव्हा शेतकरी संघटना कोणतेही आंदोलन उभं करीत नाही; आपल्या धार्माबद्दल बौद्ध किंवा मुसलमान अभिमान बाळगतात तेवढाच अभिमान हिंदूंनीही आपल्या धर्माबद्दल बाळगला तर त्यात हिंदूंचे काय चुकले?\" अशा शंका विचारणारी शेतकरी संघटनेच्या कार्यकर्त्यांची व हितचिंतकांची पत्रे संघटनेने जातीयवादाविरुद्ध घेतलेल्या ठाम भूमिकेच्या अनुषंगाने आली आहेत. या शंकांचे सामूहिक निरसन करण्याचा हा प्रयत्न आहे.\nस्वधर्माविषयी अभिमान बाळगणे हे आवश्यक आहे; जो स्वधर्माविषयी अभिमान बाळगत नाही त्याचा विनाश अटळ आहे.\nमाझा धर्म कोणता? मी कोणत्या धर्माचा अभिमान बाळगायचा?\n\"धारयति इति धर्मः।\" म्हणजे, संगोपन करतो तो धर्म अशी व्याख्या धर्ममार्तंडच अनेक वेळा देतात आणि अशा धर्माचे रक्षण केले तर तो धर्म आपले रक्षण करतो- “धर्मो रक्षति रक्षितः।\" असेही आग्रहाने सांगतात.\nपण, \"धारयति इति धर्मः।\" असे वचन आहे, \"अधारयत् इति धर्मः।\" असे नाही. म्हणजे, संगोपन करतो तो धर्म असे वचन आहे, ज्याने कधीकाळी भूतकाळात संगोपन केले तो धर्म असे वचन नाही.\nएके काळी जे चांगले असेल तेच आजही चांगले असेल असे थोडेच आहे?\nया विश्वाची उत्पत्ती कशी झाली, त्याचे चलनवलन कसे चालते आणि या सगळ्या व्यापाचा अर्थ काय या प्रश्नांची उत्तरे एका काळी ऋषिमुनींनी, साधुसंतांनी,\nभारतासाठी । २२"} +{"id": "indic_deva_eval_000464_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000464_indic_vision_bench_deva_ocr_9685d3e994a9.jpg", "ocr": "३\nरामनाम : हमारा अेकमात्र आधार\nराम, अल्लाह, गॉड सब मेरे नजदीक अेकार्थक शब्द है। मैने देखा कि सीधे-भोले लोगोने धोखेसे अपना यह खयाल बना लिया है कि मुसीबतके समय मै अुनको दिखाअी देता हू। मै अिस वहमको दूर कर देना चाहता हू। मै किसीको दर्शन नही देता। अेक नश्वर शरीर पर भरोसा रखना महज अुनका भ्रम है। अिसलिअे मैने अुनके सामने अेक सादा और सरल नुस्खा रखा है, जो कभी बेकार नही जाता—अर्थात् हर रोज सुबह सूरज निकलनेके पहले और शामको सोनेके वक्त अपनी प्रतिज्ञाओको पूरी करनेके लिअे अीश्वरकी सहायता मागना। लाखो हिन्दू अीश्वरको रामके नामसे पहचानते है। बचपनमे जब-जब मै डरता था, तब मुझे रामनाम लेनेको कहा जाता था। मेरे कितने ही साथी अैसे है, जिन्हे मुसीबतके वक्त रामनामसे बडी तसल्ली मिली है। मैने धाराला और अछूतोको भी रामनाम बताया। मै अपने अुन पाठकोके सामने भी अिसे पेश करता हू, जिनकी दृष्टि धुधली नही हुअ�� है और जिनकी श्रद्धा बहुत विद्वत्ता प्राप्त करनेसे मन्द नही हो गअी है। विद्वत्ता हमे जीवनकी अनेक अवस्थाओसे पार ले जाती है, पर सकट और प्रलोभनके समय वह हमारा साथ बिलकुल नहीं देती। अुस हालतमें अकेली श्रद्धा ही हमे अुबारती है। रामनाम अुन लोगोके लिअे नही है, जो अीश्वरको हर तरहसे फुसलाना चाहते है और हमेशा अपनी रक्षाकी आशा अुससे लगाये रहते है। यह अुन लोगोके लिअे है, जो अीश्वरसे डर कर चलते है, और जो सयमपूर्वक जीवन बिताना चाहते है लेकिन अपनी निर्बलताके कारण अुसका पालन नहीं कर पाते।\nहिन्दी नवजीवन, २२-१-१९२५\n७"} +{"id": "indic_deva_eval_000465_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000465_indic_mozhi_deva_word_ocr_9ddaff8f18c2.jpg", "ocr": "ताना"} +{"id": "indic_deva_eval_000466_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000466_devanagari_page_ocr_4807d6728c7b.jpg", "ocr": "22. सिखीबुद्धवंसो\n482 अल\n\nपालि- सखिला च पदुमा च, अहेसुं अग्गसाबिका।\nबोधि तस्स भगवतों, पुण्डरीकोति बुच्चति॥864॥\nसिरिवद्डो च नन्‍्दो च, अहेसुं अग्गुपट्ठका।\nचित्ता चेव सुगुत्ता च, अहेसुं अग्गुपद्धिका॥865॥\nउच्‌चत्तनेन सो बुद्धों, सत्ततिहत्थमुग्गतो।\nकजञ्ूूचनग्धियसड्ककासो , द्वक्तिसवरलक्खणो॥866॥\n'तस्सापि ब्यामप्पभा काया, दिवारुत्तिं निरन्तरं।\nदिसोदिसं निच्छरन्ति, तीणियोजनसो पभा॥867॥\nसत्ततिवस्ससहस्सानि, आयु तस्स महेसिनो।\n'तावता तिट्ठमानों सो, तारेसि जनतं बहुं॥868॥\nसंस्कृतच्छाया-_ सखिला च पद्मा च, अभवताम्‌ अग्रोपस्थायिके।\nबोधिः तस्य भगवतः, पुण्डरीक इत्युच्यते॥864॥\nसिरिवर्धश्व नन्‍्दश्व, अभवताम्‌ अग्रोपस्थायकौ।\nचित्रा चैव सुगुप्ता च, अभवताम्‌ अग्रोपस्थायिके॥865॥\nउज्जत्वेन स बुद्ध, ससतिहस्तमुद्धतः।\nकाश्चनार्घ्यसड्काश:, द्वात्रिंशद्वरलक्षण:॥866॥\nतस्यापि व्योमप्रभाः कायात्‌, दिवारात्रौ निरन्‍्तरम्‌।\nदिशाबदिशं निस्सरन्ति, त्रीणियोजनसः प्रभा:॥867॥\nसप्ततिवर्षसहख्राणि, आयुष्तस्य महर्घिण:/महर्घे:।\n\nतावता तिछन्‌ सः, अतारयत्‌ जनता बहुम्‌॥868॥\nसखिला एवं प्मा- ये दो प्रधान शिष्याएँ थीं और इन भगवान्‌ के बोधिवृक्ष का नाम पुण्डरीक था\n\nइन भगवान्‌ के श्रीवृद्ध एवं नन्‍्द- ये दो प्रसुक उपासक थे और चित्रा एवं सुगुसता- ये दो प्रमुख\nडपासिकाएँ थीं॥865॥\n\nइन भगवान्‌ का शरीर सत्तर हाथ ऊँचा उठा हुआ था। इन का वर्ण स्वर्ण के समान था तथा इनमें सभी\nबत्तीस महापुरुष लक्षण विद्यमान थे॥866॥\n\nउस शुभ शरीर से निकलने वाली प्रभा तीन यौजन तक दिन रात निरन्तर फैली रहती थी॥867॥\n\nउन महर्षि की आयु सत्तर हजार थी। उन्होंने इतने दीर्घ काल तक इस लोक में विराजमान रहकर यहाँ\nकी बहुत सी जनता को धर्मोपदेश द्वारा संसारसागर से पार किया॥868॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000467_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000467_hindi_handwritten_word_ocr_b96d69994ce2.jpg", "ocr": "गोंद"} +{"id": "indic_deva_eval_000468_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000468_indic_mozhi_deva_word_ocr_4c77c60cc151.jpg", "ocr": "मैंने"} +{"id": "indic_deva_eval_000469_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000469_indic_mozhi_deva_word_ocr_1a6def0d1674.jpg", "ocr": "रहा"} +{"id": "indic_deva_eval_000470_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000470_indic_vision_bench_deva_ocr_7dd3416f852a.jpg", "ocr": "⁠\nभाई राम आनंद साहित्य क्षेत्र में प्रवेश करते ही प्रेमचंद द्वारा स्थापित प्रकाशन संस्थान '\nसरस्वती प्रेस'\nसे जुड़ गए थे। लगभग बीस वर्षों तक उन्होंने स्व॰ श्रीपत राय (प्रेमचंद के ज्येष्ठ पुत्र) के मार्गदर्शन में अप्राप्य प्रेमचंद साहित्य पर शोध कार्य किया। वे स्व॰ श्रीपत राय के संपादन में प्रकाशित होने वाली विख्यात कथा-पत्रिका '\nकहानी'\nके सहायक संपादक रहे। श्रीपत राय के देहांत के बाद उन्होंने '\nकहानी'\nका स्वतंत्र रूप से संपादन किया और उसे नया रूप तथा गरिमा प्रदान की। उन्होंने जिस गहरी सूझ-बूझ, लगन, धैर्य और निष्ठा से इस रचनावली के संपादन कार्य को इतने सुरुचिपूर्ण और वैज्ञानिक ढंग से संपन्न कियाइसके लिए वे हम सबों के साधुवाद के पात्र हैं।\n⁠\nश्री हरीशचन्द्र वार्ष्णेय, श्री प्रेमशंकर शर्मा, श्री उदयकान्त पाठक ने प्रूफ-संशोधन और सम्पूर्ण मुद्ण कार्य में विशेष जागरूकता और मनस्विता का परिचय दिया, इनके साथ विमलसिंह, आर॰ के॰ यादव, सुनील जैन, शिवानंदसिंह तथा संस्था के अन्य सभी सहकर्मियों के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं क्योंकि इन सबके सहयोग और सद्भाव के बिना यह काम पूरा होना लगभग असंभव था।\n⁠\nमेरी भ्रातृजा रीमा और भ्रातृज संदीप, संजीव, मनीष, विक्रांत, चेतन की लगन और सूझबूझ ने भी मुझे सदैव प्रेरित और उत्साहित किया वे भी धन्यवाद के पात्र हैं।\n⁠\nरचनावली\nके मुद्रण का कार्य श्री कान्तीप्रसाद शर्मा की देखरेख में हुआ है। उनकी भूझबूझ और श्रमनिष्ठा के लिए वे हमारे हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं।\n⁠\nसर्वश्री विजयदान देथा, यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र, रामकुमार कृषक, स्वामी प्रेम जहीर डॉ॰ कुसुम वियोगी, रामकुमार शर्मा आदि सभी मित्रों के सुझावों के लिए भी आभारी हूं।\n⁠\nइस कार्य में पूज्य माताजी श्रीम��ी जसवन्ती देवी का आशीर्वाद और पिताश्री प्रेमनाथ शर्मा का दीर्घकालीन प्रकाशन-व्यवसाय का अनुभव और आशीर्वाद मेरे विशेष प्रेरणा स्रोत रहे। इनके साथ मातृतुल्ग्रा भाभी श्रीमती ललिता शर्मा, अज राजकुमार शर्मा, चमनलाल शर्मा, धर्मपाल शर्मा एवं उनकी धर्मपत्नी इन्दु शर्मा के साथ भाई हरीशकुमार शर्मा एवं सुभाषचन्द्र शर्मा के साथ ही चाचा श्री दीनानाथ शर्मा का भी आभारी हूं जिन्होंने पग-पग पर मेरा मार्ग दर्शन कियाऔर सबसे अंत में सहधर्मिणी श्रीमती गीता शर्मा ने जो सहयोग और संबल प्रदान किया उसके लिए आभार अथवा धन्यवाद जैसा शब्द बहुत कम होगा। सारा श्रेय उन्हीं का है।\n⁠\nनेशनल लाइब्रेरीकलकत्ता के सहयोग से दुर्लभ पुस्तक ‘महात्मा शेखसादी' लगभग सत्तर वर्ष बाद एक बार फिर इस रचनावली के मार्फत पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की जा रही है। मैं नैशनल लाइब्रेरी कलकत्ता के प्रति अपना आभार प्रकट करता ह। उन समस्त संस्थानों, पुस्तकालयों, विभागों, संस्थाओं, लेखकों, संपादकों, अधिकारियों और व्यक्तियों के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने इस रचनावली के आयोजन में सहयोग किया।\n⁠\nअन्त में विद्वान पाठकों से हमारा निवेदन है कि वे इस रचनावली की त्रुटियों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करें ताकि आगामी संस्करणों में उन्हें दूर किया जा सके।\n⁠\nहम आशा करते हैं कि हिन्दी जगत् इस बहु-प्रतीक्षित रचनावली का हार्दिक स्वागत करेगा।\nअरुण कुमार\n(प्रबंध निदेशक)"} +{"id": "indic_deva_eval_000471_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000471_indic_mozhi_deva_word_ocr_8904819cfdc3.jpg", "ocr": "त्याला"} +{"id": "indic_deva_eval_000472_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000472_hindi_handwritten_word_ocr_c8213b44279d.jpg", "ocr": "समुद्र"} +{"id": "indic_deva_eval_000473_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000473_indic_mozhi_deva_word_ocr_af56931ad058.jpg", "ocr": "निर्माण"} +{"id": "indic_deva_eval_000474_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000474_indic_mozhi_deva_word_ocr_c183eaa62b76.jpg", "ocr": "नागमोडी"} +{"id": "indic_deva_eval_000475_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000475_indic_mozhi_deva_word_ocr_3bd40a69fdf1.jpg", "ocr": "अपनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000476_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000476_devanagari_page_ocr_801602998052.jpg", "ocr": "236 बोधिवन्दनवग्गो\n\n“नाहं एतेन मग्गेन, पापु्णिं बोधिसुत्तमं।\n\nकुम्मग्गेन गवेसिस्सं, पुब्बकम्मेन वारितो॥4099॥\n\n“पुज्ञपापपरिक्खीणो, सब्बसन्तापबज्जितो।\n\nअसोको अनुपायासो, निब्बायिस्समनासवो॥4400॥\n\n“एवं जिनो वियाकासि, भिक्खुसडूघस्स अग्गतो।\n\nसब्बाभिज्ञाबलप्पत्तो, अनोतत्ते महासरे”ति॥4404॥\n\nइत्थ सदं भगवा अत्तनों पव��वचरित कम्मपिलोतिक नाम ब॒द्धापदानधम्मपरियाय\n\nअभासित्थाति।\nपुब्बकम्मपिलोतिकं नाम बुद्धापदानं दसमं।\nअवटफलवबग्गो एकूनचत्तालीसमो।\n“नाक एसेन मार्गेन, प्राप्रव बोधिस॒त्तमाम।\n\nकुमार्मेन गवेषिष्यम्‌, पूर्वकर्मणा वारितः॥4099॥\n“पुण्यपापपरिक्षीण:, सर्वसन्तापवर्जित:।\n\nअशोक अनुपायासः, निर्वायिष्यमनास्तरव:॥4400॥\n“एबं जिनो व्याकार्पीत्‌, झिक्षुसझ्घाय अग्रतः।\nसर्वाभिज्ञानबलप्रासः, अनवतसे महासरे“इति॥4404॥\n\nइत्थं स्विद्‌ भगवान्‌ आत्मनः पूर्वचरितं कर्मपिलोतिक॑ नाम बुद्धापदानधर्मपर्यायम्‌\nअभाषिष्टेति।\n\nचुदसमं भाणवारं।\n\nन मैंने इस मार्ग से और न ही कुमार्ग के द्वारा उत्तम बोधि को प्रास किया बल्कि पूर्वकर्म को रोक कर मैंने\nउत्तमबोधि को प्रास किया॥099॥\n\nपाष को क्षीण किये हुए, पुण्य को पाये हए, सभी सन्‍्तापों को छोड़कर शोकरहित, चिन्तारहित, आश्रवों\nको हटा कर निर्वाण प्राप्ति में लगे हुए.... ॥॥400॥\n\nइस प्रकार उन सर्वाभिज्ञाबल प्रा जिन ने भिक्षुसंघ के आगे अनोतत्त महासागर के तट पर व्याख्यान\nकिया॥404॥\n\nइस प्रकार कर्मपिलोतिक नाम के भगवान्‌ ने अपने पूर्व चरित बुद्धापदान धर्म के पर्याय को कहा।"} +{"id": "indic_deva_eval_000477_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000477_devanagari_digits_mixed_7f8ce1e50d5b.jpg", "ocr": "६74४58101610551१३"} +{"id": "indic_deva_eval_000478_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000478_indic_mozhi_deva_word_ocr_48fa4cb6a6a7.jpg", "ocr": "फूला"} +{"id": "indic_deva_eval_000479_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000479_devanagari_page_ocr_e4df62453e86.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n“सत्तासीतिम्हितो कप्पे, सरितच्छेदनब्हयो।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कबत्ती महब्बलो॥4845॥\n\n“अग्गिनिब्बापनों नाम, कप्पानं छव्ठसीतिया।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कबत्ती महब्बलो॥846॥\n“गतिपच्छेदनो नाम, कप्पानं पड्चसीतिया।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कबत्ती महब्बलो॥4847॥\n“राजा बातसमो नाम, कप्पान॑ चुल्लसीतिया।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कवत्ती महब्बलो॥848॥\n“रतनपज्जलो नाम, कप्पानं तेअसीतिया।\nसत्तरतनसम्पन्नो, चक्‍कवत्ती महब्बलो॥4849॥\n\nसप्ताशीतितमे कल्पे, सरितच्छेदनाह्वय:।\nसप्तरल्सम्पन्न:, चक्रवर्त्ती महाबल:॥4845॥\n\nअग्निनिर्वापनो नाम, कल्पानां पडाशीतितमे।\nसप्तरत्लसम्पन्न:, चक्रवर्त्ती महाबल:॥4846॥\nगतिपच्छेदनो नाम, कल्पानां पड्चाशीतितमे।\nससरत्वसम्पन्‍्न:, चक्रवर्ती महाबल:॥4847॥\n\nराजा वातसमो नाम, कल्पानां चतुराशीतितमे।\nससरल्लसम्पन्‍्न:, चक्रवर्त्ती महाबल:��848॥\n\nरजप्रज्ज्वलो नाम, कल्पानां त््याशीतितमे।\nससरल्रसम्पन्न:, चक्रवर्त्ती महाबल:॥849॥\n\nउठ\n\nयहाँ से 87 वें कल्प में ससरलसम्पन्न, महाबलशाली, सरितच्छेदन नाम से पुकारा जाने वाला- चक्रवर्ती\n\nराजा हुआ॥4845॥\n86 वें कल्प में ससरकसम्पन्न, महावलशाली अग्गिनिव्बापन नामक चक्रवर्ती राजा हआ॥846॥\n85 वें कल्प में गतिल्छेदन नामक सप्तरत्सम्पन्न, महाबलशाली चक्रवर्ती राजा हुआ॥4847॥\n84 वें कल्प में वातसम नाम से ससरत्नसम्पन्न, महाबलशाली राजा हुआ॥4848।\n\nरुक्प्रजज्जल नाम का चक्रवर्ती राजा हुआ॥89॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000480_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000480_devanagari_page_ocr_76fd4b0ac3ad.jpg", "ocr": "गाथानुक्रमणिका\n\nअ अंसबबद्धे जिने दत्वा 4226\n\nअककक्‍्कसे अफरुसे 207\nअक्कनन्‍्तड्च पद दिस्‍्वा 884, 35\nअक्खदस्सेभिवादेत्वा 454\nअगारा अभिनिक्खम्म 4446, 4543, 4643\nअग्गजज पुप्फमादाय 267\n\nअग्गिं दारुं आहरित्वा 4622\nअग्गिदारुञच छड्ेत्वा 4875\nअग्गो आरद्धवीरियानं 4063\nअड्न्कोल॑ पुष्फितं दिस्‍्वा 924\nअड्कोलका बिम्बिजाला 4954\nअड्कोला यूथिका चेव 2037\nअचलो होमि मेत्ताय 4388\nअचिरं गतमत्तं मं 853\n\nअचिरं गतमत्तम्हि 474\n\nअच्छा दीपी च मयूरा 2032\nअच्छोदका सीतजला 4963\nअजितो नाम नामेन 404\nअजिनचम्मरुद्देन 4758\nअजिनानिधरा एते 4974\nअजिनेन निवत्थोहं 699\n\nअज्जुना अतिमुत्ता च 4725\nअज्जुना असना चेत्थ 2039\nअज्जुनो नाम सम्बुद्धों 048\nअज्ञायको भवित्वान 4944\nअज्ञायको मन्तधरो 4643, 4889\n\nअज्मझिट्नो कथयी बुद्धो 7798\nअज्ञोगाहेत्वा हिमब॑ 2000\n\nअड्जलिं पग्गहेत्वान 297, 456, 549,\n562, 653, 949, 4878\n\nअख्जं तेहं वरं दम्मि 4438\n\nअज्ञम्पि मे अच्छरियं 725, 726, 727,\n728, 729, 730\n\nअज्जे गच्छन्ति गोयानं 4756\n\nअड्ले पीठे च पल्‍लड्के 86\n\nअड्ज गोपानसी दत्वा 4385\n\nअट्ठछड्िगिके मग्गवरे 4283\nअट्ठतिंसतिक्खत्तुक्च 4675, 230\nअट्ठबीसे इतो कप्पे 264\n\nअट्ठसद्ठलिम्हितो कप्पे 224\nअट्भसत्ततिकप्पम्हि 53\n\nअट्डानिसंसे अनुभोमि 4205\n\nअद्वारस सिस्ससता 4696\n\nअट्टारसे कप्पसते 7, 488, 487, 499,\n4027, 4479, 4483, 4575, 4836,\n2048, 2069,\n\nअड्भजतेय्यविंशत्सहसैः 703\n\nअतिथिं मे गहेत्वान 247\n\nअतिबाव्वहं निपीछेसि 436\n\nअतिमुत्ता सत्तलिका 4955\n\nअतीता नवबुति कप्पा 4064\n\nअत्थदस्सिस्स भगवतो404"} +{"id": "indic_deva_eval_000481_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000481_indic_mozhi_deva_word_ocr_ca7523e3d51d.jpg", "ocr": "भावना"} +{"id": "indic_deva_eval_000482_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000482_hindi_handwritten_word_ocr_fe6ccc92e928.jpg", "ocr": "तदात्म्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000483_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000483_hindi_handwritten_word_ocr_20eea89613f6.jpg", "ocr": "मलिन"} +{"id": "indic_deva_eval_000484_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000484_indic_mozhi_deva_word_ocr_51cf5ba1dfbe.jpg", "ocr": "फेब्रुवारी,"} +{"id": "indic_deva_eval_000485_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000485_indic_mozhi_deva_word_ocr_95525690f908.jpg", "ocr": "मैं"} +{"id": "indic_deva_eval_000486_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000486_indic_vision_bench_deva_ocr_400227bea19c.jpg", "ocr": "गोदान : 223\nमालती का मुख लाल हो गया। खन्ना घबराए, हेकड़ी जाती रही, पर इसके साथ ही उन्हें यह भी मालूम हुआ कि अगर वह कांटों में फंस गए हैं, तो मालती दलदल में फंस गई है, अगर उनकी थैलियों पर संकट आ पड़ा है तो मालती की प्रतिष्ठा पर संकट आ पड़ा है, जो थैलियों से ज्यादा मूल्यवान है। तब उनका मन मालती की दुरवस्था का आनंद क्यों न उठाए? उन्होंने मालती को अरदब में डाल दिया था और यद्यपि वह उसे रुष्ट कर देने का साहस खो चुके थे, पर दो-चार खरी-खरी बातें कर सुनाने का अवसर पाकर छोड़ना न चाहते थे। यह भी दिखा देना चाहते थे कि मैं निरा भोंदू नहीं हूं। उसका रास्ता रोककर बोले-तुम मुझ पर इतनी कृपालु\nहो गई हो, इस पर मुझे आश्चर्य हो रहा है मालती।\nमालती ने भवें सिकोड़कर कहा-मैं इसका आशय नहीं समझी।\n'क्या अब मेरे साथ तुम्हारा वही वर्ताव हैं, जो कुछ दिन पहले था?'\n'मैं तो उसमें कोई अंतर नहीं देखती।'\n'लेकिन मैं तो आकाश-पाताल का अंतर देखता हूं।'\n'अच्छा मान लो, तुम्हारा अनुमान ठीक हैं, तो फिर? मैं तुझसे एक शुभकार्य में सहायता मांगने आई हूं, अपने व्यवहार की परीक्षा देने नहीं आई हूं। और अगर तुम समझते हो, कुछ चंदा देकर तुम यश और धन्यवाद के सिवा और कुछ पा सकते हो, तो तुम भ्रम में हो।'\nखन्ना परास्त हो गए। वह एक ऐसे संकरे कोने में फंस गए थे, जहां इधर-उधर हिलने का भी स्थान न था। क्या वह उससे यह कहने का साहस रखते हैं कि मैंने अब तक तुम्हारे ऊपर हजारों रुपये लुटा दिए, क्या उसका यही पुरस्कार है? लज्जा से उनका मुंह छोटा-सा निकल आया, जैसे सिकुड़ गया हो। झेंपते हुए बोले-मेरा आशय यह न था मालती, तुम बिल्कुल गलत समझीं।\nमालती ने परिहास के स्वर में कहा-खुदा करे, मैंने गलत समझा हो, क्योंकि अगर मैं उसे सच समझा लूंगी तो तुम्हारे साये से भी भागूंगी। मैं रूपवती हूं। तुम भी मेरे अनेक चाहने वालों में से एक हो। वह मेरी कृपा थी कि जहां मैं औरों के उपहार लोटा देती थी, तुम्हारी सामान्य-से-सामान्य चीजें भी धन्यवाद के साथ स्वीकार कर लेती थी, और जरूरत पड़ने पर तुमसे रुपये भी मांग लेती थी। अगर तुमने अपने धनोन्माद में इसका कोई दूसरा अर्थ निकाल लिया, तो मैं तुम्हें क्षमा करूंगी। यह पुरुष-प्रकृति है अपवाद नहीं, मगर यह समझ लो कि धन ने आज तक किसी नारी के हृदय पर विजय नहीं पाई, और न कभी पाएगा।\nखन्ना एक एक शब्द पर मानो गज गज भर नीचे धंसते जाते थे। अब और ज्यादा चोट सहने का उनमें जीवट न था। लज्जित होकर बोले-मालती, तुम्हारे पैरों पड़ता हूं, अब और जलील न करो। और न सही तो मित्र-भाव तो बना रहने दो।\nयह कहते हुए उन्होंने दराज से चैकबुक निकाली और एक हजार लिखकर डरते-डरते मालती की तरफ बढ़ाया।\nमालती ने चेक लेकर निर्दय व्यंग किया-यह मेरे व्यवहार का मूल्य है या व्यायामशाला का चंदा?\nखन्ना सजल आंखों से बोले-अब मेरी जान बख्शो मालती, क्यों मेरे मुंह में कालिख\nपोत रही हो।\nमालती ने जोर से कहकहा मारा-देखो, डांट बताई और एक हजार रुपये भी वसूल किए।"} +{"id": "indic_deva_eval_000487_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000487_indic_vision_bench_deva_ocr_4f679c421884.jpg", "ocr": "वर्तमानपत्रे रद्दी म्हणून विकली जातात,भंगारवाला धातूच्या वस्तू आणि काच विकत घेतो आणि जुन्या कपड्यांना बोहारीण भांडीरूपी पैसे देतेच की !\nम्हणजे यातून असा मथितार्थ निघतो की --- नको असलेल्या वस्तू व्यवस्थित ठेवण्यासाठी सामान्य माणसाला पैसे मिळाले, तरच तो हे काम करेल !--- दाम करी काम असे म्हटले जाते, ते काही खोटे नाही. कुठल्याही सरकारी माणसाला हे काही वेगळे पटवून द्यायला नको.\nमग गरीब बिचाऱ्या बेरक्या सामान्य माणसानेसुद्धा तसेच म्हटले, तर त्यात वावगे काय आहे ? एखादा प्रश्न सोडवायचे साम, दाम आणि दंड असे तीन मार्ग असतात. ह्या पर्यायांपैकी, 'दाम' पर्यायाचा अर्थ आपण फक्त पैसे घेणे असाच गृहीत धरतो. पैसे घेण्याऐवजी जो माणूस वापरलेल्या वस्तूंचे योग्य व्यवस्थापन करेल त्याला पैसे देण्याचा विचारपूर्वक अवलंब केल्यास प्रश्न सुटू शकतात.\nक्षणभर आपण अशी कल्पना करू या की, एखाद्या नगरपालिकेला माझे म्हणणे पटले, तर त्या गावात, वापरून झालेल्या विविध वस्तूंची ‘कलेक्शन सेंटर्स’ उघडलेली दिसतील आणि त्या 'कलेक्शन सेंटर'वरील माणूस पैसे घेण्याऐवजी, पैसे देताना आपल्याला दिसेल.\nवापरून झालेल्या आणि नको असलेल्या वस्तूंचा प्रश्न एकदा सुटला की प्रश्न उरेल नको असलेल्या जैविक वस्तूंचा. हा प्रश्न खरे तर फार गहन नाही. कारण हे काम निसर्ग अगोदरच करत आहे. तुम्ही करा अथवा करू नका, सर्व जैविक पदार्थांचे मातीत रूपांतर करण्याचे काम निसर्ग अनादी-अनंत कालापासून क��तच आहे. आपले काम आहे, त्याला मदत करायचे. निसर्गाला मदत हीसुद्धा हास्यास्पदच कल्पना आहे. निसर्गाला मदत असे न म्हणता त्याच्या बरोबरीने चालायची सवय आपल्याला करायची आहे. माती हे प्रत्येक सजीवाचे अंतिम स्थानक आहे. जैविक कचरा हा खरोखरच जिवंत कचरा आहे. जिवंत अशासाठी की, त्यात प्रचंड ऊर्जा साठलेली आहे. जैविक पदार्थांचे मातीत रूपांतर होते, तेव्हा ह्या ऊर्जेमुळे उत्कृष्ट प्रकारची खतयुक्त माती तयार होते.\nप्रत्येक घरामध्ये जसे देवघर असते, तशी १५ इंच X ११ इंच x ९ इंच ह्या मापाची सर्व बाजूंनी जाळीदार असलेली प्लॅस्टिकची टोपली बसवली, तर त्या टोपलीमध्ये साधारण पाच माणसांच्या कुटुंबातून निर्माण होणाऱ्या जैविक पदार्थांचे रूपांतर उत्कृष्ट गांडूळखतात करता येते. प्रत्येक घरातून जर असे गांडूळखत निर्माण होत असेल, तर ती त्या नगराची संपत्तीच असेल. रासायनिक खत-कारखाने उभारण्यासाठी आणि ते चालविण्यासाठी अनंत कोटी रुपये खर्च होत असतात. त्यातील थोडीशी जरी रक्कम ह्या घराघरांत लावलेल्या गांडूळखत प्रकल्पांना दिली, तर सामान्य माणसे दामाच्या प्रलोभनाला आकृष्ट होऊन हिरिरीने घराघरांमध्ये गांडूळखत प्रकल्प सुरू करतील.\n३० * शून्य कचरा"} +{"id": "indic_deva_eval_000488_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000488_indic_mozhi_deva_word_ocr_e2f779f6d180.jpg", "ocr": "सोन्याने"} +{"id": "indic_deva_eval_000489_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000489_devanagari_page_ocr_56b64dfb31c6.jpg", "ocr": "अपदानपालि जा\n\n“मलहरणियो [अज्जननाक्छियो (सी०), हत्थलिलड्गके (स्या* पी), हत्थलिलडगते\n(क०)] दत्वा, बुद्धे सडूचे गणुत्तमे।\nपड्चानिसंसे अनुभोमि, कम्मानुच्छविके मम॥267॥\n“सब्बलक्खणसम्पन्नो, आयुपड्ञआसमाहितो।\nसब्बायासविनिमुत्तों, कायो मे होति सब्बदा॥268॥\n“तणुधारे सुनिसिते, सडूःघे दत्वान पिप्फले।\nकिलेसकन्तनं जाणं, लभामि अतुल सुचिं॥4269॥\n“सण्डासे सुगते दत्वा, सडुघे गणवरुत्तमे।\nकिलेसभज्जनं [किलेसलुड्चनं (सी* स्या* पी०)] जाणं, लभामि अतुल सुचिं॥4270॥\n“नत्थुके [थविके (?) भेसज्जथविकेति हि पुब्बे वुत्त] सुगते दत्वा, सड्ःघे गणवरुत्तमे।\nअद्भानिसंसे अनुभोमि, कम्मानुच्छविके मस॥4274॥\n“मलहारिणी दत्वा, बुद्धाय सडूघाय गणोत्तमाय।\nपड्चानुशंसा अनुभवामि, कर्मानुच्छविका मम॥4267॥\n“सर्वलक्षणसम्पन्‍्नः, आयु:प्रज्ञासमाहितः।\nसर्वायासविनिर्मुक्त:, कायो मे भवति सर्वदा॥268॥\n“तनुधारे सुनिसृते, सड्घाय दत्वा पिप्पलानि।\nज्ञानम्‌, लभे अतुल शुचिम्‌॥4269॥\n“सण्डिशान्‌ सुगताय दत्वा, सड्घखाय गणवरोत्तमाया\nक्लेशभज्जनं ज्ञानम्‌, लभे अतुल शुचिम्‌॥270॥\n“नस्तुक॑ सुगताय दत्वा, सड्घाय गणबरोत्तमाय।\nअष्टानुशंसा अनुभवामि, कर्मानुच्छविका मस॥274॥\nगणों में उत्तम संघ एवं बुद्ध को सल का हरण करने बाली डिविया प्रदान कर मैं इस कर्म के अनुरूप\nगुणों का अनुभव करता हूँ॥267॥\nमैं सदा सभी लक्षणों से सम्पन्न,\nछोटी कैंची को भली प्रकार से\nकरने वाले ज्ञान का लाभी होता हूँ॥269॥\nगणों में उत्तम संघ एवं सुगत को सँडसी देकर मैं पवित्र, अतुल और क्लेश को नष्ट करने वाले ज्ञान को\nप्राप्त करता हूँ॥270॥\nगणों में उत्तम संघ एवं सुगत को नत्थु (औषधी से युक्त पोटली) देकर मैं इस कर्म के अनुरूप आठ गुणों\nका अनुभव करता हूँ॥27#\n\nक्लेशकान्तकं॑\n\nपाँच\n\nआयु, प्रजा से युक्त तथा सभी कष्टों से मुक्त शरीर बाला होता हूँ॥268॥\nतेज कर संघ को प्रदान कर मैं अतुल और पवित्र तथा कक्‍्लेश का अन्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000490_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000490_indic_mozhi_deva_word_ocr_0192dfe46867.jpg", "ocr": "सदा"} +{"id": "indic_deva_eval_000491_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000491_indic_vision_bench_deva_ocr_e44c4503fb5d.jpg", "ocr": "३९\nहिन्दुस्तानकी दशा-५\nहोते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो वे सिर्फ़ अंग्रेजों पर ही राज करते। हिन्दुस्तानी जज और हिन्दुस्तानी वकीलके बगैर उनका काम चल नहीं सका। वकील कैसे पैदा हुए, उन्होने कैसी धांधल मचाई, यह सब अगर आप समझ सकें, तो मेरे जितनी ही नफ़रत आपको भी इस पेशेके लिए होगी। अंग्रेजी सत्ताकी एक मुख्य\n[\n१\n]\nकुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतोंकी कुंजी वकील हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्याके पेशे जैसा नीच माना जाय, तो अंग्रेजी राज एक दिनमें टूट जाय। वकीलोंने हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट-कचहरी रूपी पानीकी मछलियां हैं।\nजो शब्द मैं वकीलोंके लिए इस्तेमाल करता हूँ, वे ही शब्द जजोंको भी लागू होते हैं। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक-दूसरेको बल देनेवाले हैं।\n१२\nहिन्दुस्तानकी दशा-५\nडॉक्टर\nपाठक :\nवकीलोंकी बात तो हम समझ सकते हैं। उन्होंने जो अच्छा काम किया है वह जान-बूझकर नहीं किया, ऐसा यकीन होता है। बाकी उनके धंधेको देखा जाय तो वह कनिष्ठ\n[\n२\n]\nही है। लेकिन आप तो डॉक्टरोंको भी उनके साथ घसीटते हैं। यह कैसे?\nसंपादक :\nमैं जो विचार आपके सामने रखता हूँ, वे इस समय तो ���ेरे अपने ही हैं। लेकिन ऐसे विचार मैंने ही किये हैं सो बात नहीं। पश्चिमके सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दोंमें इन धंधोंके बारेमें लिख गये हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरोंकी बहुत निंदा की है। उनमेंसे एक लेखकने एक ज़हरी पेड़का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरा निकम्मे धंधेवालोंको उसकी शाखाओंके रूपमें बताया है और उस पेड़के तने पर नीति-धर्मकी कुल्हाड़ी\n↑\nबड़ी।\n↑\nबहुत हलका।"} +{"id": "indic_deva_eval_000492_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000492_devanagari_page_ocr_7d459e6eb1ff.jpg", "ocr": "380 मेत्तेयवग्गो\n““अज्जे [सब्बे (स्या०)] पीठे च पललड्न्के, आसन्‍्दीसु निसीदरे।\nलुबम्पि सब्बदस्सावी, निसीद रतनासने'॥4846॥\n“सब्बरतनमयं पीठं, निम्मिनित्वान तावदे।\nपियदस्सिस्स मुनिनो, अदासिं इद्धिनिम्मितं॥847॥\n“रतने च निसिन्‍नस्स, पीठके इद्धिनिम्मिते।\nकुम्भमत्तं जम्बुफलं, अदासिं तावदे अहं॥848॥\nपरिभुडिज महासुनि।\n'तदा चित्त पसादेत्वा, सत्थारं अभिवादयिं॥ 849॥\n“पियदस्सी तु भगवा, लोकजेट्लो नरासभो।\nरतनासनमासी नो, इमा गाथा अभासथ॥4820॥\n“अन्ये पीठे च पल्‍लड्के, आसन्‍्दीसु निसीदते।\nल्वमपि सर्वदर्शी, निसीद रज्ासने'॥846॥\n“सर्वरत्ञम्य पीठम्‌, निर्माय तावदेव।\nप्रियदर्शेः मुनेः, अदाम्‌ ऋद्धिनिर्मितम्‌॥4847॥\n“रल्ले च निषण्णस्य, पीठके ऋद्धिनिर्मिते।\nकुम्भमात्र जम्बुफलम्‌, अदां तावदेव अहम॥4848॥\n“मम हासं ज्ञात्वा, पर्यभौक्षीत्‌ महासुनिः।\nतदा चिक्त॑ प्रसाद्य, शास्त्रे अभ्यवादयम्‌॥4849॥\n“प्रियदर्शी तु भगवान्‌, लोकज्येछो नरर्पभः।\nरज्ासनमासीनः, इमां गाथाम्‌ अभाषत॥820॥\n\n“मम हासं जनेत्वान,\n\nअन्य (बुद्ध) पीठ, पलंग और चौकी पर बैठे, अतः है सर्वदर्शी! आप भी रज्रमय आसन पर बैठें!॥846॥\n\nउस समय मैंने सर्वरत्मय पीठ को सभी ऋद्धियों के द्वारा निर्मित कर प्रियदर्शी सुनि को प्रदान\nकिया॥4847॥\n\nउस समय ऋद्ियों द्वारा निर्मित रत्तरमयी पीठ पर बैठे हुए भगवान्‌ को मैंने कुम्भमात्र जम्बुफल प्रदान\nकिया॥4848॥\n\nमेरी प्रसन्नता को जानकर महासुनि ने जम्बुफल खाया तब मैंने चित्त को प्रसादित\nकिया॥4849॥\n\nतब भगवान्‌ प्रियदर्शी, लोकज्यष्ठ, नरर्पभ ने रत्मय पीठ पर आसीन हो इन गाथाओं को कहा......॥820॥\n\nकर शास्ता का अभिवादन"} +{"id": "indic_deva_eval_000493_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000493_devanagari_page_ocr_37e5e5a338d3.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 95\n\n१६३. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये रूपूपपत्तिया मग्गं भावेति ��ीतिया च विरागा\nउपेक्खको च विहरति सतो च सम्पजानो सुखड्च कायेन पटिसंवेदेति, यं त॑ अरिया\nआचिक्खन्ति- “उपेक्खको सतिमा सुखविहारी”ति ततियं॑ झानं उपसम्पज्ज विहरति\nपथबवीकसिणं, तस्मिं समये फस्सो होति, वेदना होति, सञ्ञा होति, चेतना होति, चित्त होति,\nसुखं होति, चित्तस्सेकग्गता होति, सद्धिन्द्रियं होति, वीरियिन्द्रियं होति, सतिन्द्रियं होति,\nसमाधिन्द्रियं होति, पड्जिन्द्रियं होति, मनिन्द्रियं होति, सोमनस्सिन्द्रियं होति, जीवितिन्द्रियं\nहोति, सम्मादिद्ठि होति, सम्मावायामो होति...पे*... पर्गाहो होति, अविक्खेपो होति; ये वा\nपन तस्मि समये अडज्झेपि अत्थि पटिच्चससुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इसमे धम्मा\nकुसला. ..पे*...।\n\nतस्मिं खो पन समये चत्तारों खन्धा होन्ति, द्वायतनानि होन्ति, द्वे धातुयो होन्ति, तयो\nआहारा होन्ति, अ्विन्द्रियानि होन्ति, दुबज्जिकं झानं होति, चतुरज्लिको मग्गो होति,\nत्लंस्कृतच्छाया) १६३. कतमे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये रूपोपपत्यै मार्ग भावयति प्रीत्याश्व\nबिरागादुपेक्षकश्व विहरति स्मृतिमान्‌ च सम्प्रज्ञान: सुखडच कायेन प्रतिसंवेदयति यत्‌ तदार्या आचक्षन्ते\n“उपेक्षक: स्मृतिमान्‌ सुखविहारि' इति तृतीय ध्यानम्‌ उपसम्पद्य विहरति पृथिवीकृत्स्लम्‌, तस्मिन्‌ समये\nस्पर्श: भवति, वेदना भवति, संज्ञा भवति, चेतना भवति, चित्त भवति, सुखं भवति, चित्तस्वैकाग्रता\nभवति, श्रद्धेन्द्रियं भवति, वीर्येन्द्रियं भवति, स्मृतीन्द्रियं भवति, समाधीन्द्रियं भवति, प्रज्ञेन्द्रियं भवति\nमसनइन्द्रियं भवति, सौमनस्येन्द्रियं भवति, जीवितेन्द्रियं भवति, सम्यग्दृष्टि: भवति, सम्यग्व्यायामो\nभवति ...पे*... प्रग्राहो भवति, अविक्षेपों भवति; ये वा पुनः तस्मिन्‌ समये अन्येजपि सन्ति\nप्रतीत्यसमुत्पन्ता अरूपिणो धर्मा: - इमे धर्मा: कुशला: ।\n\nतस्मिन्‌ खलु पुनः समये चत्वार: स्कन्‍्धा: भवन्ति, द्वे आयतने भवत:, द्वौ धातू भवतः, त्रयः\nआहारा: भवन्ति, अष्टेन्द्रियानि भवन्ति, द्यड्िगकं ध्यानं भवति, चतुराड्गको मार्गों भवति,\n\n(हिन्दी) १६३. धर्म कुशल हैं? जिस समय रूपभव में पुनर्जन्म की प्राप्ति के लिए मार्ग की भावना करता है\nप्रीति से विराग हो जाने पर उपेक्षा युक्त होकर विहार करता है एबं स्मृति से युक्त हो कर कायिक सुख का अनुभव\nकरता है जिसके विषय में आर्य जन “उपेक्षा युक्त स्म��तिमान सुखपूर्वक्‌ विहार करने बाला” कहते हैं। इस तरह के\nतृतीय ध्यान को प्राप्त कर पृथ्वीकृत्ख़ के साथ विहरता है; उस समय स्पर्श, वेदना, संज्ञा, चेतना, चित्त, सुख, चित्त\nकी एकाग्रता, श्रद्धा-३न्द्रिय, बीर्य-इन्द्रिय, स्मृति-इन्द्रिय, समाधि-इन्द्रिय, प्रज्ञा-इन्द्रिय, मन-इन्द्रिय, सौसनस्य-\nइन्द्रिय, जीवित-इन्द्रिय, सम्यग्दृष्टि, सम्यरब्यायाम...पूर्ववत्‌... प्रग्राह, अविक्षेप होता है; अथवा उस समय जो भी\nअन्य प्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म कुशल हैं...पूर्वबत्‌...।\n\nउस समय चार स्कन्ध,\n\n, दो आयतन, दो धातु, तीन आहार, आठ-इन्द्रियाँ, दो अंगों वाला ध्यान, चार अंगों"} +{"id": "indic_deva_eval_000494_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000494_indic_mozhi_deva_word_ocr_701bebc8cb0d.jpg", "ocr": "समाजातलं"} +{"id": "indic_deva_eval_000495_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000495_indic_vision_bench_deva_ocr_80d6f25a93b7.jpg", "ocr": "68 : प्रेमचंद रचनावली-6\nअवसर ही कब मिला था? उनकी जीविका पोथी-पत्रों पर थी। शराब लाते कहां से, और पीते भी तो जाते कहां? फिर वह तो रेलगाड़ी पर न चढ़ते थे, कल का पानी न पीते थे, अंग्रेजी पढ़ना पाप समझते थे। समय कितना बदल गया है। समय के साथ अगर नहीं चल सकते, तो वह तुम्हें पीछे छोड़कर चला जायगा। ऐसी महिला के कोमल हाथों से विष भी मिले, तो शिरोधार्य\nकरना चाहिए। जिस सौभाग्य के लिए बड़े-बड़े राजे तरसते हैं, वह आज उनके सामने खड़ा है। क्या वह उसे ठुकरा सकते हैं?\nउन्होंने ग्लास ले लिया और सिर झुकाकर अपनी कृतज्ञता दिखाते हुए एक ही सांस में पी गए और तब लोगों को गर्व भरी आंखों से देखा, मानो कह रहे हों, अब तो आपको मुझ पर विश्वास आया। क्या समझते हैं, मैं निरा पोंगा पंडित हूं। अब तो मुझे दंभी और पाखंडी कहने का साहस नहीं कर सकते?\nहाल में ऐसा शोरगुल मचा कि कुछ न पूछो, जैसे पिटारे में बंद कहकहे निकल पड़े हों। वाह देवीजी क्या कहना है। कमाल है मिस मालती, कमाल है। तोड़ दिया, नमक का कानून तोड़ दिया, धर्म का किला तोड़ दिया, नेम का घड़ा फोड़ दिया !\nओंकारनाथ के कंठ के नीचे शराब का पहुंचना था कि उनकी रसिकता वाचाल हो गई। मुस्कराकर बोले-मैंने अपने धर्म की थाती मिस मालती के कोमल हाथों में सौंप दी और मुझे\nविश्वास है, वह उसकी यथोचित रक्षा करेंगी। उनके चरण-कमलों के इस प्रसाद पर मैं ऐसे एक हजार धर्मों को न्योछावर कर सकता हूं।\nकहकहों से हाल गूंज उठा।\nसंपादकजी का चेहरा फूल उठा था, आंखें झुकी पड़ती थीं। दूसरा ग���लास भरकर बोले-यह मिल मालती की सेहत का जाम है। आप लोग पिएं और उन्हें आशीर्वाद दें।\nलोगों ने फिर अपने-अपने ग्लास खाली कर दिए।\nउसी वक्त मिर्जा खुर्शेद ने एक माला लाकर संपादकजी के गले में डाल दी और बोले-सज्जन, फिदवी ने अभी अपने पूज्य सदर साहब की शान में एक कसीदा कहा है। आप लोगों की इजाजत हो तो सुनाऊं।\nचारों तरफ से आवाजें आई-हां-हां, जरूर सुनाइए।\nओंकारनाथ भंग तो आए दिन पिया करते थे और उनका मस्तिष्क उसका अभ्यस्त हो गया था, मगर शराब पीने का उन्हें यह पहला अवसर था। भंग का नशा मंथर गति से एक स्वन की भांति आता था और मस्तिष्क पर मेघ के समान छा जाता था। उनकी चेतना बनी रहती थी। उन्हें खुद मालूम होता था कि इस समय उनकी वाणी बड़ी लच्छेदार है, और उनकी कल्पना बहुत प्रबल। शराब का नशा उनके ऊपर सिंह की भांति झपटा और दबोच बैठा। वह\nकहते कुछ हैं, मुंह से निकलता कुछ है। फिर यह ज्ञान भी जाता रहा। वह क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसकी सुधि ही न रही। यह स्वप्न का रोमानी वैचित्र्य न था, जागृति का वह चक्कर था, जिसमें साकार निराकार हो जाता है।\nन जाने कैसे उनके मस्तिष्क में यह कल्पना जाग उठी कि कसीदा पढ़ना कोई बड़ा अनुचित काम है। मेज पर हाथ पटककर बोले-नहीं, कदापि नहीं। यहां कोई कसीदा नईं ओगा, नईं ओगा। हम सभापति हैं। हमारा हुक्म है। हम अबी इस सबा को तोड़ सकते हैं। अबी तोड़ सकते हैं। सभी को निकाल सकते हैं। कोई हमारा कुछ नई कर सकता। हम सभापति हैं। कोई"} +{"id": "indic_deva_eval_000496_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000496_hindi_handwritten_word_ocr_452a867d32a4.jpg", "ocr": "महादलित"} +{"id": "indic_deva_eval_000497_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000497_devanagari_digits_mixed_0ac9a52e23db.jpg", "ocr": "५47७00५३88703"} +{"id": "indic_deva_eval_000498_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000498_indic_mozhi_deva_word_ocr_1d2a2c5a90f4.jpg", "ocr": "निवेश"} +{"id": "indic_deva_eval_000499_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000499_devanagari_page_ocr_48124eeb4af4.jpg", "ocr": "तुवरदायकवग्गो ब्\n\n“एकत्तिंसे इतो कप्पे, य॑ पुष्फमभिपूजयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजायिदं फलं॥220॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे०... कत॑ बुद्धस्स सासन॑\"॥224॥\nइत्थं सुदं आयस्मा सत्तलिपुप्फपूजक थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nसत्तलिपुष्फपूजकत्थेरस्सापदानं अट्ठमं।\n9. बिम्बिजालियत्थेरअपदानं\nबिस्बिजालीयस्थविरापदानम्‌\n“पदुमुत्तरो नाम जिनो, सयम्भू अग्गपुग्गलो।\nचतुसच्च॑ पकासेति, दीपेति अमतं पदं॥222॥\n“बिस्बिजालकपुप्फानि [बिम्बजालकपुप्फानि (क०)], पुथु कत्वानहं तदा।\n��ुद्धस्स अभिरोपेसिं, द्विपदिन्दस्स तादिनो॥223॥\n“अद्भसट्ठिम्हितो कप्पे, चतुरो किड्जकेसरा।\nसत्तरतनसम्पन्ना, चक्‍कबत्ती महब्बला॥224॥\nएकत्रिशे इतः कल्पे, यत्‌ पुष्पमम्यपूजयम।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजाया इदं फलम्‌॥220॥\n\n“प्रतिसंविदश्वतस्त्र:...पे*... कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥224॥\n\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ सत्तलिपुष्पपृजकस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\n\n“पद्मोत्तरो नाम जिनः, स्यम्भूरग्रपुद्धलः।\n\nचतुःसत्य॑ प्रकाशयति, दीपयत्यमृतं पदम्‌॥222॥\n\n“बिस्बजालकपुष्पाणि, पृथूनि कृत्वाहं तदा।\n\nबुद्धाय अभ्यरोपयम्‌, द्विपदिन्द्राय तायिने॥223॥\n\n'अष्टपष्टितमें कल्पे, चत्वारः किड्जकेशरा:।\nससरत्सम्पन्‍नाः, चक्रवर्त्तिमहाबला:॥224॥\n\nयहाँ से 3 वें कल्प में जो पुष्प अभ्यर्पित किया था, उस कर्म का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति को नहीं\nजानता॥220॥\n\nचार पटिसम्भिदाओं आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥224॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान सततलिपुप्पपूजक स्थिर ने इन गाया\n\nसद्मोत्तर नाम के जिन, स्वयम्भू, अग्रपुद्बल ने चार आर्यसत्य\nकिया॥222॥\n\nतब मैंने विम्बजालक पुष्प को पृथक्‌-पृथक्‌ करके उस द्विपदिन्द्र, बुद्ध को अभ्यर्चित किया॥223॥\n\nयहाँ से 68 वें कल्प में ससरत्सम्पन्न, महाबलशाली किक्केशर नाम का चार चक्रवर्ती हुआ॥224॥\n\nकहा-\nको प्रकाशित कर अमृत पद को प्रकाशित"} +{"id": "indic_deva_eval_000500_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000500_devanagari_page_ocr_b2464e108729.jpg", "ocr": "धातुकथापाव्दि\n\n69\n\nधम्मेहि ये धम्मा... चित्तविसंसट्लेहटि धम्मेष्ठि ये धम्मा... चित्तसमुद्ठानेहि धम्मेहि ये धम्मा...\nचित्तसहभूहि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तानुपरिवत्तीहि धम्मेहि ये धम्मा... बाहिरेहि धम्मेहि ये\nधम्मा... उपादाधम्मेहि ये धम्मा खन्धसड्ग्गहेन असड्गहिता आयतनसड््गहेन असड्गहिता\nधातुसडःगहेन असड्ःगहिता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा...पे*... ते धम्मा एकेन खनन्‍्धेन एकेनायतनेन\nसत्तहि धातूृहि असड्गहिता।\n\n२२३. चित्तेहि धम्मेहि ये धम्मा खन्‍्धसड्गहेन असड्गहिता आयतनसड्-गहेन असड्ः्गहिता\nधातुसडगह्देन असडूगहिता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा...पे*... ते धम्मा चतूहि खन्‍्धेहि\n'एकादसहायतनेहि एकादसहि धातूहि असड्ग्गहिता।\n\n२२४. चेतसिकेहि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तसम्पयुत्तेष्ठि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तसंसद्ठेह्ि\nधम्मेहि ये धम्मा... चित्तसंसट्टसमुद्ठानेहि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तसंसट्ठडसमुद्ठानसहभूहि धम्मेहि ये\nधरम्मा. चित्तसंसट्ठसमुद्भानानुपरिवत्तीछि धम्मेह्हि ये धम्मा खन्‍्धसडगहेन असड्गहिता\nआयतनसड्-गहेन असड्गगहिता धातुसड्गह्ठेन असड्गहिता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा...पे*\nशर्म: ये धर्माः.... चित्तसमुत्थानैः धर्म: ये धर्मा:... चित्तसहभूभिः धर्मः\nबाह्नैः धर्म: ये धर्माः..... उपादायधर्मः ये धर्माः\nस्कन्धसड्ग्रहेन असड्ग्रहीताः आयतनसड्गग्रहेन असडग्ग्रहीता: धातुसडूगग्रहेन असड्ग्रहीताः, तैः धर्म: ये\nधर्मा:... पू०.... ते धर्मा: एकेन स्कन्धेन एकेनायतनेन ससभि: धातुझ्िः असड्ग्रहीताः।\n\n२२३. चिकत्तधर्म: ये धर्मा: स्कन्धसड्ग्रहेन असड्ग्रहीता: आयतनसडूग्रहेन असडुग्रहीताः\nधातुसडुग्रहेन असड्ग्रहीताः, तैः धर्म: ये धर्माः... पू०.... ते धर्मा: चतुर्भिः स्कन्‍्वैः एकादशायतनैः एकादशनभिः\nधातुभि: असड्ग्ग्रहीता:\n\n२२४. चैतसिकैः धर्मः ये धर्मा: चित्तसम्प्रयुक्तधर्म: ये धर्माः.... चित्तसंसुष्टैः धर्म: ये धर्माः\nचित्तसंसृष्टसमुत्थानैः धर्म: ये धर्माः....चित्तसंसृष्टसमुत्थानसहभूभि:ः. धर्म: ये. धर्माः\nचित्तसंसृष्टसमुत्थानानुपरिवर्तिभिः धर्म: ये धर्मा: स्कन्धसड्ग्रहेन असड्ग्रहीता: आयतनसड्ग्ग्रहेन\nअसड्ग्रहीताः धातुसड्गग्रहेन असड्य्रहीताः, लैः धर्म: ये धर्माः... पू०....\n0हेन्दी)- धर्म.... चित्तविसंस॒छ त्जो चेतना से संसृष्ट नहीं हैं) धर्म.... चित्तसमुत्थान (जो चेतना के द्वारा उत्पन्न किये\nजाते हैं) धर्म.... चित्तसहभू (जो चेतना की उत्पत्ति के साथ उत्पन्न होने वाले हैं) धर्म.... चित्तानुपरिवर्ति धर्म (जो\nचेतना के परिवर्तन के साथ परिवर्तित हो जाते हैं).... बाह्य धर्म... उपादा धर्मों के साथ किसी एक स्कन्‍्ध, आयतन और\nधातुओं में असंग्रहीत हैं .... पू०.... वे धर्म एक स्कन्‍्ध से, एक आयतन से और सात धातुओं से असंग्रहीत हैं।\n\nर जो धर्म चित्त से धर्मों के साथ किसी एक स्कनन्‍्ध, आयतन और धातुओं में असंग्रहीत हैं जो उन्हीं धर्मों के\nसाथ उनमें असंग्रहीत .... पू०.... वे धर्म चार स्कन्‍्धों में, ग्यारह आयतनों में, ग्यारह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\nधर्मों चित्तसंसृष्ठ धर्मों (जो चेतना से संसृष्ठ हैं).\n\nचित्तसंसृष्ट एवं चित्त से उत्पन्न धर्मों .... चित्तसंसृष्ट एवं चित्त के साथ उत्पन्न होने वाले धर्मो.... चित्तसंस��ष्ट एवं चित्त\nसे उत्पन्न से अनुपरिवर्ति धर्मों के साथ किसी एक स्कन्ध आयतन और धातुओं में असंग्रहीत हैं"} +{"id": "indic_deva_eval_000501_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000501_indic_mozhi_deva_word_ocr_d464b468fc1a.jpg", "ocr": "स्त्रियों"} +{"id": "indic_deva_eval_000502_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000502_indic_mozhi_deva_word_ocr_86191ab05209.jpg", "ocr": "उरलीसुरली"} +{"id": "indic_deva_eval_000503_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000503_indic_vision_bench_deva_ocr_ca868a72129f.jpg", "ocr": "गोदान : 37\nतो पी जाने की ही वस्तु है।\nधनिया पति को फटकारने लगी। ऐसे अवसर उसे बहुत कम मिलते थे। होरी उससे चतुर था, पर आज बाजी उसके हाथ थी। हाथ मटकाकर बोली-क्यों न हो, भाई ने पंद्रह रुपये कह दिए, तो तुम कैसे टोकते? अरे, राम-राम। लाड़ले भाई का दिल छोटा हो जाता कि नहीं। फिर जब इतना बड़ा अनर्थ हो रहा था कि लाड़ली बहू के गले पर छुरी चल रही थी, तो भला तुम कैसे बोलते । उस बखत कोई तुम्हारा सरबस लूट लेता, तो भी तुम्हें सुध न होती।\nहोरी चुपचाप सुनता रहा। मिनका तक नहीं। झुंझलाहट हुई, क्रोध आया, खून खौला, आंख जली, दांत पिसे, लेकिन बोला नहीं। चुपके-से कुदाल उठाई और ऊख गोड़ने चला।\nधनिया ने कुदाल छीनकर कहा-क्या अभी सबेरा है जो ऊख गोड़ने चले? सूरज देवता माथे पर आ गए। नहाने-धोने जाव। रोटी तैयार है।\nहोरी ने घुन्नाकर कहा-मुझे भूख नहीं है।\nधनिया ने जले पर नोन छिड़का-हां, काहे को भूख लगेगी । भाई ने बड़ेबड़े लड्डू खिला दिए हैं न। भगवान् ऐसे सपूत भाई सबको दें।\nहोरी बिगड़ा और क्रोध अब रस्सियां तुड़ा रहा था-तू आज मार खाने पर लगी हुई ।\nधनिया ने नकली विनय का नाटक करके कहा-क्या करूं, तुम दुलार ही इतना करते हो कि मेरा सिर फिर गया है।\n‘तू घर में रहने देगी कि नहीं?'\n'घर तुम्हारा, मालिक तुम, मैं भला कौन होती तुम्हें घर से निकालने वाली?\nहोरी आज धनिया से किसी तरह पेश नहीं पा सकता। उसकी अक्ल जैसे कुंद हो गई है। इन व्यंग्य-बाणों के रोकने के लिए उसके पास कोई ढाल नहीं है। धीरे से कुदाल रख दी और गमछा लेकर नहाने चला गया। लौटा कोई आध घंटे में, मगर गोबर अभी तक न आया था। अकेले कैसे भोजन करे। लौंडा वहां जाकर सो रहा। भोला की वह मदमाती छोकरी है न झुनिया। उसके साथ हंसी-दिल्लगी कर रहा होगा। कल भी तो उसके पीछे लगा हुआ था। नहीं गाय दी, तो लौट क्यों नहीं आया। क्या वहां ढई देगा।\nधनिया ने कहा -अब खड़े क्या हो? गोबर सांझ को आएगा।\nहोरी ने और कुछ न कहा। कहीं धनिया फिर न कुछ कह बैठे।\nभोजन करके नीम की छांह में लेट रहा।\nरूपा रोती हुई आई। नंगे बदन एक लंगोटी लगाए, झबरे बाल इधर-उधर बिखरे हुए। होरी की छाती पर लोट गई। उसकी बड़ी बहिन सोना कहती है- गाय आएगी, तो उसका गोबर\nमैं पाथूंगी। रूपा यह नहीं बर्दाश्त कर सकती है। सोना ऐसी कहां की बड़ी रानी है कि सारा गोबर आप पाथ डाले। रूपा उससे किस बात में कम है? सोना रोटी पकाती है, तो क्या रूपा बर्तन नहीं मांजती? सोना पानी लाती है, तो क्या रूपा कुएं पर रस्सी नहीं ले जाती? सोना तो कलसा भरकर इठलाती चली आती है।रस्सी समेटकर रूपा ही लाती है। गोबर दोनों साथ पाथती\nहैं। सोना खेत गोड़ने जाती है, तो क्या रूपा बकरी चराने नहीं जाती? फिर सोना क्यों अकेली गोबर पाथेगी? यह अन्याय रूपा कैसे सहे?"} +{"id": "indic_deva_eval_000504_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000504_indic_mozhi_deva_word_ocr_248fe1e07174.jpg", "ocr": "सभी"} +{"id": "indic_deva_eval_000505_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000505_indic_mozhi_deva_word_ocr_d5ae40270022.jpg", "ocr": "सांगितले."} +{"id": "indic_deva_eval_000506_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000506_indic_mozhi_deva_word_ocr_e5824db5e6b1.jpg", "ocr": "लागलेल्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000507_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000507_indic_vision_bench_deva_ocr_c68ea758d0d2.jpg", "ocr": "78 : प्रेमचंद रचनावली-6\nतो तुम्हें रंज हो या न हो? मैं तो समझती हूं, तुम्हें बिल्कुल रंज न होगा।\nमेहता ने आहत स्वर से कहा-तुम समझती हो, मैं आदमी नहीं हूं?\n‘मैं तो यही समझती हूं, क्यों छिपाऊं।'\n'सच कहती हो मालती?'\n'तुम क्या समझते हो?'\n'मैं। कभी बतलाऊंगा।'\nपानी मेहता की गर्दन तक आ गया। कहीं अगला कदम उठाते ही सिर तक न आ जाय। मालती का हृदय धक्-धक करने लगा। बोली-मेहता, ईश्वर के लिए अब आगे मत जाओ, नहीं, मैं पानी में कूद पड़ूंगी।\nउस संकट में पालती को ईश्वर याद आया, जिसका वह मजाक उड़ाया करती थी। जानती थी, ईश्वर कहीं बैठा नहीं है, जो आकर उन्हें उबार लेगा, लेकिन मन को जिस अवलब और\nशक्ति की जरूरत थी, वह और कहां मिल सकती थी?\nपानी कम होने लगा था। मालती ने प्रसन्न होकर कहा-अब तुम मुझे उतार दो।\n'नहीं-नहीं, चुपचाप बैठी रहो। कहीं आगे कोई गढ़ा मिल जाय।'\n'तुम समझते होगे, यह कितनी स्वार्थिन है।'\n'मुझे इसकी मजदूरी दे देना।'\nमालती के मन में गुदगुदी हुई।\n'क्या मजदूरी लोगे?'\n'यही कि जब तुम्हें जीवन में ऐसा ही कोई अवसर आए, तो मुझे बुला लेना।'\nकिनारे आ गए। मालती ने रेत पर अपनी साड़ी का पानी निचोडा, जूते का पानी निकाला, मुह-हाथ धोया, पर ये शब्द अपने रहस्यमय आशय के साथ उसके सामने नाचते रहे?\nउसने इस अनुभव का आनद उठाते हुए कहा-यह दिन याद रहेगा।\nमेहता ने पूछा- तुम बहुत डर रही थीं?\n'पहले तो डरी, लेकिन फिर मुझे विश्वास हो गया कि तुम हम दोनो की रक्षा कर सकते हो।'\nमेहता ने गर्व से मालती को देखा-उनके मुख पर परिश्रम की लाली के साथ तेज था।\n'मुझे यह सुनकर कितना आनंद आ रहा है, तुम यह समझ सकोगी मालती?'\n'तुमने समझाया कब? उलटे और जंगलों में घसीटते फिरते हो, और अभी फिर लौटती बार यही नाला पार करना पड़ेगा। तुमने कैसी आफत में जान डाल दी। मुझे तुम्हारे साथ रहना पड़े, तो एक दिन न पटे।'\nमेहता मुस्कराए। इन शब्दों का संकेत खूब समझ रहे थे।\n'तुम मुझे इतना दुष्ट समझती हो और जो मैं कहूं कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं, तो तुम मुझसे विवाह करोगी?'\n'ऐसे काठ-कठोर से कौन विवाह करेगा। रात-दिन जलाकर मार डालोगे।'\nऔर मधुर नेत्रों से देखा, मानो कह रही हो इसका आशय तुम खूब समझते हो। इतने\nबुद्धू नहीं हो।"} +{"id": "indic_deva_eval_000508_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000508_devanagari_page_ocr_fc165d0d3e61.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n3\n\nगोत्ततों गोतमो नाम, तथेबादिज्वबन्धु च॥\nसक्‍यकुले पसूतत्ता, सक्यपुत्तोति बिस्सुतो।\nसकक्‍को इति च अड्हितो, तथा सक्‍्यमुनीति च॥\nसब्बत्थ सेट्ठभावेन, सक्‍ये च सेट्ठभावतों।\nसकक्‍यसीहोति सो सक्‍य-पुडगवोलति च सम्मतो॥\nसुद्धोदनीति पितितो, नभे चन्दोब विस्सुतो।\nमातितोपि च सज्ञातो, मायादेवीसुतो इति॥\nसब्बज्ञ्यू सुगतो बुद्धों, धम्मराजा तथागतो।\nसमन्‍्तभद्दो भगवा, जिनो दसबलो मुन्ति॥\nसत्था विनायको नाथो, सुनिन्दों लोकनायको।\nनरासभो लोकजिनो, सम्बुद्धो द्विपदुत्तमो॥\nदेवदेवो लोकगरू, धम्मस्सामी महामुनि।\n\nसमन्‍्तचक्खु पुरिस-दम्मसारथि मारजि॥\nधम्मिस्सरो च अद्वेज्म-वचनो सत्थवाहको।\n\nविसुद्धिदेवो देवाति-देवो च समणिस्सरो॥\nभूरिपज्जो\"नधिवरो, नरसीहो च चक्खुमा।\n\nमुनिमुनि नरबरो, छव्ठभिज्जो जने सुतो॥\nअड्गीरसो यतिराजा, लोकबन्धु'मतन्ददो।\nबत्ता पवत्ता सद्धम्म-चक्‍्कवत्ती यतिस्सरो॥\nलोकदीपो सिरीघनो, समणिन्दो नरुत्तमो।\nलोकत्तयविद्‌ लोक-पज्जोतो पुरिसुत्तमो॥\nसच्चदसो सतपुछज्ज-लक्खणो सच्चसब्हयो।\nरविबन्धा'समसमो, पउ्चनेत्त'ग्गपुग्गलो॥\nसब्बाभिभू सब्बविदू, सच्चनामो च पारगू।\nपुरिसातिसयो सब्ब-दस्सावी नरसारथि॥\nसम्मासम्बुद्धों इति सो, आतो सत्तुत्तमोति च।\nतादी विभज्जवादीति, महाकारुणिकोति चा॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000509_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000509_indic_mozhi_deva_word_ocr_ea49fa51ebab.jpg", "ocr": "समाज"} +{"id": "indic_deva_eval_000510_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000510_indic_vision_bench_deva_ocr_6c9f22777d13.jpg", "ocr": "[६७]\nघाटावरील घाटवळ लोक हे शरीरसामर्थ्याने सर्वांत वर आहेत. यामुळे सर्व मोठ्या मेहनतीचीं कामें याच लोकांचे हातांत आहेत. मुंबईतील हमालांचीं कामें, गोंदीतील कामें, स्टेशनावरलि मोठमोठे बोजे उचलण्याचीं कामें बहुधा या लोकांच्या हातीं आहेत. तोच कोंकणांतील मजूर जरी घाटीलोकांइतका शक्तिमान व मजबूत नसतो तरी पण चलाखपणांत कंटकपणांत व हुशारींत त्याचा वर नंबर लागतो. यामुळे मुंबईत घरगुती कामांत, आफीसाच्या कामांत व गिरणींतील कामांत याच लोकांचा जास्त भरणा आहे. तरी पण सुधारलेल्या देशांच्या मानानें हिंदुस्थानांतील सर्व ठिकाणचा व सर्व वंशांचा मजूरवर्ग कमी प्रतीचा आहे हें कबूल करणें भाग आहे.\nदुसरी गोष्ट मजुरांना मिळणारें खाणेंपिणें व अन्न यांवर त्यांची कार्यक्षमता अवलंबून असते. ज्या ज्या ठिकाणीं मजुरांना खाणेंपिणें भरपूर मिळून त्यांचें अन्न पौष्टिक असतें तेथें तेथें मजुरांची कार्यक्षमता जास्त असते. या बाबतींतही अमेरिकेंतील मजुरांचा नंबर सर्वांत वर लागतो. युरोपमध्यें आयर्लंडच्या मजुरांचें अन्न निःसत्व बटाट्यांचें असतें. यामुळे त्यांची कार्यक्षमता फार कमी असते. मनुष्यप्राणी याची स्थिति कांहीं अंशों एंजिनासारस्वी असते. ज्या मानानें एजिनांत कोळसा व पाणी घालावें त्या मानानें एंजिनापासून कमजास्त उष्णता व शक्ति उत्पन्न होऊं शकते, त्याचप्रमाणें मनुष्याला जास्त व पौष्टिक खायला घातलें तर त्याचे हातून काम जास्त होतें. परंतू हा क्रम कांही काळपर्यंत चालतो. एजिनच्या आटोकाट शक्तीबाहेर जर कोळसा घातला तर एंजिन एकदम फुटून जाइल, तसेच मनुष्याच्या अटोकाट पाचकशक्तीपेक्षां जर अन्न जास्त घातलें तर मनुष्याच्या जीवालाच अपाय होईल. परंतु या मर्यादेच्या आधीं जितकें जास्त अन्न तितकें जास्त काम हा नियम खरा आहे.\nहिंदुस्थानाध्यें एकंदर दारिद्य फार असल्यामुळे पुष्कळ लोकांना पोटभर व पुरेसें अन्न मिळतें किंवा नाहीं, याबद्दल शंका आहे. तेव्हां तें अन्न कमी पौष्टिक आहे किंवा जास्त पौष्टिक आहे यांची तुलना फारशी शक्य नाहीं. यामुळे येथल्या एकंदर मजूरवर्गीची कार्यक्षमता कमी . आहे; तरी अन्नाच्या पौष्टिकपणावर सामर्थ्य अवलंबून आहे हें येथेंही"} +{"id": "indic_deva_eval_000511_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000511_devanagari_page_ocr_aad9f7cc308c.jpg", "ocr": "288 अस्सी,\nखीणासबस्स यतिनो अत्तानं अनपेक्खिय।\nदिज्न॑ सरकभत्तन्ति पुज्ञपोत्थं अवाचयि।।454।।\nश्रृत्वा तुछमानसः राजा, भदल्त! यू मत्युयद्धंडपि अपल्षय/इतलि उक्तवा लव्धाश्वासः पण्यपुस्तक\nवाचयितुम्‌ आज्ञापयत्‌। लेखकः पुण्यपुस्तकम्‌ एवं अवाचयत्‌-\nएकनआतचिह्वारा सहाराजेन कारिला।\nएक्नविंशतिकोटिमिः विहारः मसिचिवट्टि च।।\n\nउत्तमः लौहप्रासाद: त्रिंशकोटिशि: कारित:।\nमहास्तूपा अनर्घा: कारिता चतुर्विशति॥\n\nमहास्तूपे शेषानि कारितानि सुबुद्धिना।\nकोटिसहस््रम्‌ अ्न्ते, महाराज, त्वया पुनः॥\n\nकोलम्बनामसलये अकक्‍्खक्खायिकप्सातके।\nकुण्डलौ महार्चो द्वौ दत्वा गृहीत्वा॥\n\nक्षीणाखवेभ्य: पद्चभ्यः महास्थविरेभ्य: उत्तम:।\nदत्त: प्रसन्नचित्तेन कह्ग्वम्बिलपिण्डक:।।\n\nचूलडगणीययुद्धे पराजित्य पलायता।\nकाल॑ घोषयित्वा आगतस्य विहायसा॥\n\nक्षीणाखवस्य यते: आत्मानम्‌ अनपेल्या\nदत्त सरकभक्तं मीति पुण्यपुस्तकम्‌ अबाचयत्‌॥\nराजा यह सुनकर मन से प्रसन्न हये और बोले “भन्‍्ते! यहाँ तक कि आप मेरे मृत्यु युद्ध में भी मुख्य सहारा\nने” यह कहकर आश्वासन प्रास कर पुण्य पुस्तक को वाचने की आज्ञा दी। लेखक ने पुण्य पुस्तक को इस प्रकार से\nबाचा-\n+निन्‍्यानबे विहारों\nमसरिचकट्ट विहार बनवाया गया।\n*उत्तम लोह प्रसाद 30 करोड़ की लागत से बनाया गया था और महान्‌ स्तूप को अमूल्य वस्तुओं की लागत\nसे कराये जिसकी कीमत 24 करोड़ था।\n+हे महाराज!, महास्तूप पर, बाकी वस्तुओं का काम उत्तम बुद्धिवाले उस राजा द्वारा महास्तूप में जो शेष\nकार्य कराये गए बे एक हजार करोड मूल्य के थे।\n*अक्खक्खायिक नामक आकाल के दौरान कोलम्ब नामक पहाड़ी पर प्राप्त अपने वहमूल्य कुंडल को दान में\nदे दिया, जो आपके द्वारा (राजा) वहाँ प्राप्त की हुई थी।\n“पाँच महान्‌ अर्हत्‌ स्थविरों में प्रसन्न (श्रद्धा) चित्त होकर, उत्तम स्वादिष्ट खट्टा बाजरे का पेय दिया।\n*जब चूलडूगणिय युद्ध में पराजित होकर तथा पलायन करते हुए आपने आकाश मार्ग से आ रहे अर्हत्‌\nभोजनकाल की सूचना दिलाई तथा स्वयं अपनी चिन्ता न करते हुए आखबों को क्षीण कर चुके यतियों (भिक्ष) को\nसरकभत्त दान में दे दिया तब उन्होंने इस पुण्य पुस्तक का वाचन किया।\n\nमहान राजा द्वारा निर्मित करवाया गया और 9 करोड़ रुपयों की लागत से"} +{"id": "indic_deva_eval_000512_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000512_indic_mozhi_deva_word_ocr_e9dfcdf9499d.jpg", "ocr": "फोन"} +{"id": "indic_deva_eval_000513_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000513_indic_mozhi_deva_word_ocr_38a15b3dd836.jpg", "ocr": "सर्व"} +{"id": "indic_deva_eval_000514_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000514_indic_vision_bench_deva_ocr_b1f08a82fc58.jpg", "ocr": "ओर देखा, मानो पूछ रहे हों--चलते हो, या अभी सोचना बाक़ी हैं ? और फिर शान्त हो गये। साहस ने चूहे की भाँति बिल से सिर निकालकर फिर अन्दर खींच लिया।\nनैना के पास वाली बुढ़िया ने कहा--अपना मन्दिर लिये रहें, हमें क्या करना है।\nनैना ने जैसे गिरती हुई दीवार को सँभाला--मन्दिर किसी एक आदमी का नहीं है।\nशांतिकुमार ने गूंजती हुई आवाज़ में कहा--कौन चलता है मेरे साथ अपने ठाकुरजी के दर्शन करने?\nबुढ़िया ने सशंक होकर कहा--क्या अन्दर कोई जाने देगा?\nशांतिकुमार ने मुट्ठी बांधकर कहा--मैं देखूंगा कौन नहीं जाने देता। हमारा ईश्वर किसी की संपत्ति नहीं है, जो सन्दूक में बन्द करके रखा जाय। आज इस मुआमले को तय करना है, सदा के लिए।\nकई सौ स्त्री पुरुष शांतिकुमार के साथ मन्दिर की ओर चले। नैना का हृदय धड़कने लगा; पर उसने अपने मन को धिक्कारा और जत्थे के पीछे-पीछे चली। वह यह सोच-सोचकर पुलकित हो रही थी कि भैया इस समय यहाँ हाते तो कितने प्रसन्न होते। इसके साथ भाँति-भाँति की शंकाएँ भी बुलबुलों की तरह उठ रही थीं।\nज्यो-ज्यों जत्था आगे बढ़ता था, और लोग आ-आकर मिलते जाते थे; पर ज्यों-ज्यों मन्दिर समीप आता था लोगों की हिम्मत कम होती जाती थी। जिस अधिकार से वे सदैव वंचित रहे, उसके लिए उनके मन में कोई तीव्र इच्छा न थी। केवल दुःख था, मार का। वह विश्वास, जो न्याय-ज्ञान से पैदा होता है, वहाँ न था। फिर भी मनुष्यों की संख्या बढ़ती जाती थी। प्राण देनेवाले तो बिरले ही थे। समूह की धौंस जमा कर विजय पाने की आशा ही उन्हें बढ़ा रही थी।\nजत्था मन्दिर के सामने पहुँचा, तो दस बज गये थे। ब्रह्मचारीजी कई पुजारियों और पंडों के साथ लाठियाँ लिये द्वार पर खड़े थे। लाला समरकांत भी पैंतरे बदल रहे थे।\nनैना को ब्रह्मचारी पर ऐसा क्रोध आ रहा था कि जाकर फटकारे, तुम\nकर्मभूमि\n२०७"} +{"id": "indic_deva_eval_000515_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000515_hindi_handwritten_word_ocr_0b0914406bb5.jpg", "ocr": "ऊपर।"} +{"id": "indic_deva_eval_000516_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000516_devanagari_page_ocr_cd1f220d00b3.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n498: न्‍\n\nपाल रक्‍्खणे। “रकक्‍्खणं, ताणं, गोपनं, अवनं, पालनं, रक्खा, रक्‍्खणा, गुत्ति\" इच्चेते\nपरियाया। पालेति, पालयति। पालको, बुद्धपालो। अम्बपाली गणिका। समों भवतु पालिना।\nपालितो, पालन, पाव्ठि।\n\nएत्थ पाव्ठीति अत्थं पालेतीति पाछ्ठि, लस्स व्ठत्त। अथ वा अन्तोदकं रक्खणड्रलेन महतो\n\nतव्छाकस्स थिरा महतीति पाछि वियाति पाक, परियत्तिधम्मो। अपरो नयो पकट्ठानं उक्कट्ठान॑\nसीलादिअत्थानं॑ बोधनतो__ सभावनिरुत्तिभावतो बुद्धादीहि भासितत्ता च पढढ्/ानं\nबचनप्पबन्धानं आव्दीति पाछ्ठि।\n\nपाछ्छिसद्दो पाक्तिधम्मे, तव्ठाकपाव्ठियम्पि च।\nदिस्सते पन्तियड्चेव, इति जेय्यं बिजानता॥\nअयदिह “पाकछ्िया अत्थमपपरिकखन्ती\"तिआदीस परियत्तिधम्मसकखाते पाक्िधम्से दिस्‍्सति।\n“महतो तव्ठाकस्स पाव्ठी\"तिआदीसु तव्णाकपाक्ठियं। “पाछ्तिया निसीद्दिसू”तिआदीसु पन्तियं,\n'पटिपाटिया निसीदिंसूति अत्थो। इमस्िं पनत्थे धातुया किच्च॑ नत्थि। पाटिपदिको हि\nपन्तिवाचको पाव्ठिसद्दो।\nतिल सिनेहने। तेलेति, तेलयति। तेलं, तिलो, तिलं।\nतत्थ तिलोति तिलगच्छो। तिलन्ति तप्फलं। ततो पन निक्‍्खन्तो सिनेहो तेलं। सो हि\n“तिलानं इदन्ति तेल”न्ति वुच्चति। यदि एवं “सासपतेल”न्तिआदिवचनं न युज्जेय्याति? नो न\nयुज्जति, “तिलसिनेहने”ति एवं वुत्ताय तिलधातुया सामज्जतों यस्स कस्सचि सिनेहस्स\nवचनतो। तेन “सासपतेलं, आदयो सासने पयोगा दिस्सन्ति। मय॑ पन\nतिलधातुवसेन निष्फन्नानं॑ तिलगच्छतप्फलवाचकानं “तिलो, तिल”न्ति सद्दरूपान॑\nपकासनमुखेन “तिलानं इदन्ति तेल”न्ति वदाम, न पन तेन वचनेन सासपादीनं सिनेहस्स\nअतेलत्तं वदाम। अथ किज्चरहीति चे? तद्धितविधाने विज्ञुनं कोसल्लत्थं तिलसद्ध॑ पटिच्च\n“तिलान॑ इदन्ति तेल”न्ति बदाम। सिनेहसड्खातस्स सासपादीनं तेलस्स बचन॑ न जहाम, तस्मा\n'उदाहरणप्पकासने “तिलो, तिलं, तेल\"न्ति अवत्वा “तेलं, तिलो, तिल\"न्ति अम्हेहि बुत्तं। इदड्हि\nवचन तेलस्स सामजञ्जतो सिनेहे पवत्ति दीपेति। तेनेव च सासने “तिलतेलं,\nसासपतेल”न्तिआदिना विसेसवचनम्पि दिस्सतीति निद्ठमेत्थावगन्तब्बं। अपिच तेलसद्दो\nयेशुब्येन तिलतेले बत्तति, यथा मिगसद्दो हरिणमिगेतिपि दह्ुब्बं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000517_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000517_devanagari_page_ocr_a7046cf26c68.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n390- न्‍\n\nरड्चतीति राजा, भूमिं पालेतीति भूमिपालो, नरे इन्दतीति नरिन्दोति। एस नयो सब्बत्थापि\nविभावेतब्बो।\n\nइल गतियं। इलति।\n\nहिल हावकरणे। हेलति।\n\nसिल उड्छे। सिलति।\n\nतिल सिनेहने। तिलति। तिलं, तेलं, तिलो।\n\nचिल बसने। चिलति।\n\nबल विलासने। वलति।\n\nपिल गहणे। पिलति।\n\nमिल सिनेहने। मिलति।\n\nफुल सड्चले फरणे च। फुलति।\nलकारन्तधातुरूपानि।\nबकारन्तधातु\n\nवा गतिगन्धनेसु। वाति। वातो।\n\nबी पजनकन्ति असनखादन गतीसु। पजनं॑ चलनं। कन्ति अभिरुचि। असन॑ भत्तपरिभोगो।\nखादन पूवादिभक्खनं। गति गमन॑। वेति।\n\nबे तन्‍्तसनन्‍्ताने। वायति। तन्‍तवायो।\n\nवे सोसने। वायति।\n\nधि्रु खिब्रु निदस्सने। धेवति। खेवति।\n\nथिबु दित्तियं। थेवति। मधुमधुका थेवन्ति।\n\nजीव पाणधारणे। जीवति। जीवितं, जीवो, जीविका। अत्थि नो जीविका देव, सा च\nयादिसकीदिसा। जीवित कप्पेति।\n\nपिव मिव तिव निव थूलिये। पिवति। पिबरो। मिवति। तिवति। निवति।\n\nएत्थ च पिवरोति कच्छपो, यो कोचि वा थूलसरीरो। तथा हि “पिवरो कच्छपे थूले”ति\nपुब्बाचरियेहि चुत्त।\n\nअब पालने। अवति। बुद्धो मम अबतं।\n\nभव गतियं। सबति।\n\nकब वण्णे। कबति।\n\nखिबु मदे। खिवति।\n\nश्ोबु धोचने। धोवति।\n\nदेवु देव देवने। देवति आदेवति, परिदेवति, आदेवो, परिदेवों, आदेवना, परिदेवना,\n\nआदेवितत्तं, परिदेवितत्तं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000518_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000518_devanagari_digits_mixed_9b5a201cc1f9.jpg", "ocr": "०९२०५2108७५4०3३0"} +{"id": "indic_deva_eval_000519_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000519_indic_mozhi_deva_word_ocr_1cac0b9156c0.jpg", "ocr": "हाथों"} +{"id": "indic_deva_eval_000520_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000520_hindi_handwritten_word_ocr_11fab788dc49.jpg", "ocr": "कैल्सियम"} +{"id": "indic_deva_eval_000521_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000521_indic_mozhi_deva_word_ocr_5c36b6d14387.jpg", "ocr": "त्यांच्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000522_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000522_devanagari_digits_mixed_c16f2dabdd38.jpg", "ocr": "१293219011५३"} +{"id": "indic_deva_eval_000523_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000523_devanagari_page_ocr_774d0e20da3c.jpg", "ocr": "“>> 7\n\nश्रेरमेजा'भि वादेत्वा, एकमन्‍्तं निसीदिसुं।\nतेसं धम्मसदेसेसि, थेरो आसिविसोपमं॥26॥\nअसीतिया सहस्सानं, धम्माभिसमयो अह।\nसतसहस्स पुरिसा, पब्बजुं थेरसन्तिके॥27॥\nततोप्पभूति कस्मिर-गन्धाराते इदानिपि।\nआसुं कासाव पज्जोता, वलत्थुत्तयपरायना॥28॥\nगन्त्वा महादेवत्थेरो, देसं महिसमण्डलं।\nसुत्तन्तं देवदूतं सो, कथेसि जनमज्झगो॥29॥\nचत्तालीस सहस्सानि, धम्मचकक्‍्खुं विसोधयुं।\nचत्तालीस सहस्सानि, पब्बर्जिसु तदन्तिके॥30॥\nसंस्कृतल्छाया- _ स्थविरमेवाभिवाद्य एकान्‍्ते न्‍्यसीदन्‌।\nतेषां धर्ममदेशयत्‌ स्थविर आशीविषोपमम्‌।।26।।\nआशीत्या: या सहस्राणां, धर्माभिसमय अभूत्‌।\nशतसहस्त्र॑ पुरुषाः, प्राब्राजिषु: स्थविरान्तिके।।27।।\nततोप्रभ���ृति कश्मीरगान्धारास्ते इदानीम्‌ अपि।\nआसन्‌ काषायप्रद्योता:, वस्तुत्रयपरायणा:।।28॥।\nगत्वा महादेवस्थविर:, देश महिषमण्डलम्‌।\nसूत्रान्तं देवदूत॑ सः. अकथयत्‌ जनमध्यग:।।29।\nचत्वारिंशत्‌ सहस्त्राणि, धर्मचक्षु: विशोधयन्‌।\nचत्वारिंशत्‌ सहस्त्राणि, प्रात्राजिषु: तदन्तिके।।30॥।\nहिन्दी- स्थविर को प्रणाम कर एक तरफ बैठ गये। स्थविर ने उनको 'आशीविषोपम सूत्र' का उपदेश दिया।26।।\nउस सूत्र के प्रभाव से अस्सी हजार मनुष्यों ने धर्मज्ञानचक्षु प्राप्त किये, तथा एक लाख पुरुषों ने स्थविर से प्रव्नज्या\nग्रहण की।।27॥।\nउसी समय से आज तक यह कश्मीर-गान्धार प्रदेश काषाय वस्त्रों से जगमगा रहा है। तथा वहाँ की जनता रत्वत्रय\nके प्रति श्रद्धालु है।।28॥।\nउधर महादेव स्थविर ने माहिषमण्डल जाकर वहाँ की जनता के मध्य देवदूत सूत्र का उपदेश किया।।29॥।\nजिसके प्रभाव से चालीस हजार जनता में धर्मज्ञानचक्षु का प्रादरर्भाव हआ। और चालीस हजार पुरुषों ने ही उनसे\nभ्रत्नज्या ग्रहण की।30॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000524_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000524_indic_mozhi_deva_word_ocr_e8f8fc65d1c3.jpg", "ocr": "एका"} +{"id": "indic_deva_eval_000525_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000525_indic_mozhi_deva_word_ocr_5363531ab665.jpg", "ocr": "करून"} +{"id": "indic_deva_eval_000526_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000526_devanagari_page_ocr_93fa63682cde.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n524- न्‍\n\nदुक्‍्ख॑ अनुविधिय्यन्ति, तो सत्त त्वं दुक्‍्खं अनुविधिय्यसी”ति योजेतब्बं। अय॑ नयो अतिविय\nसुखुमो पाव्किनयानुकूलो।\n\nनामसिकपदत्ते “धात्‌\"तिआदीनि भवन्ति। तत्थ धातूति सलक्खर्ण दधाति धारेतीति धातु।\nअट्डठकथासु पन “सलक्खणधारणतो दुक्खविधानतो दुक्खधानतो च धातू”ति बुत्तं। धातूति\nपथवीधातादिधातुयो। तत्थ सलक्खणधारणतोति यथा तित्थियपरिकप्पितो पकति जत्ताति\n'एबमादिको सभावतों नत्थि, न एवमेता, एता पन सलक्ख्ण सभावं धारेन्तीति धातुयो।\nदुक्‍्खविधानतोति दुक्खस्स विवहनतो। एता हि धातुयो कारणभावेन ववत्थिता ह॒त्वा यथा\nअयलोहादिधातुयो अयलोहादिअनेकप्पकारं संसारदुक्‍्खं विदहन्ति। दुक्खधानतोति अनप्पकस्स\nदुक्‍्खस्स विधानमत्ततो अवसवत्तनतो, तं वा दुक्‍्खं एताहि कारणभूताहि सत्तेह्ठि अनुविधीयति,\nतथाविहितड्च त॑ एतेस्वेब धीयति ठपियति, एवं दुक्खधानतो धातुयो। अपिच निज्जीबट्ठो\nश्रातवोति गहेतब्बं| तथा हि. भगवा “छ धातुयोस॑ भिक्खुपुरिसो”तिआदीसु\nजीवसज्जासमूहनत्थ॑ धातुदे���न॑ अकासीति। यो पन तत्थ अम्हेहि भावद्धाने “सत्तो दुक्‍्खं\nअनुविधिय्यती\"ति तिपुरिसमण्डितो एकबचनबहुवचनिको पठमाविभत्तिप्पयोगो बुत्तो। सो -\n\n“दूसितो गिरिदत्तेन, हयो सामस्स पण्डवो।\nपोराणं पकतिं हित्वा, तस्सेवानुविधिय्यती”ति च\n\n“माता हि तब इरन्धति, विधुरस्स हदयं धनिय्यती”ति च “ते संकिलेसिका धम्मा\nपहीयिस्सन्‍्ती”ति च इमासं पाव्ठीन॑ बसेन सारतो पच्वेतब्बो। तत्थ पण्डबो नाम अस्सो\nगिरिदत्तनामकस्स अस्सगोपकस्स पकतिं अनुविधिय्यतिं अनुकरोतीति अत्थो। एत्थ च यदि\nकत्तुपदं इच्छितं सिया, “अनुविद्धाती”ति पाक्िि वत्तब्बा सिया। यदि कम्मपदं इच्छितं सिया,\n“पण्डबेना”ति ततियन्त॑ कस्तुपर्द वत्तब्ब॑ सिया, एवं अवचनेन “अनुविधिस्यती”ति इदं\nभावपदन्ति सिद्धं। न केनचि एत्थ वत्तुं सकक्‍का “दिवादिगणे कत्तरि विहितयपच्चयस्स वसेन वुत्तं\nडर रूप”न्ति, धाधातुया दिवादिगणे अप्पवत्तनतो, एकन्तभूवादिगणिकत्ता च। दुतियप्पयोगे\nन यदि कत्तुपदं इच्छितं सिया, “धनुतते”ति पाक्ति वत्तब्बा सिया। यदि कम्मपर्द इच्छितं सिया,\n“धातुया\"ति वत्तब्बं॑ सिया। एवं अवचनेन “धनिय्यती”ति इदम्पि भावपदन्ति सिद्धं। एत्थ\n“ध्निय्यतीति पत्थेति, इच्छतीति अत्थो”ति अट्ठकथायं वबुत्त। “धनु याचने”ति धातु एसा\nएकन्‍्तेन तनादिगणेयेब बत्तति। ततियप्पयोगे “पहीयिस्सन्ती\"ति यदि भूबादिगणे “हा चागे”ति\nधातुया रूप॑ सिया, कत्तरि “पजहिस्सन्ती”ति रूपं सिया, “कस्मा नो पजहिस्सती”ति एत्थ बिया"} +{"id": "indic_deva_eval_000527_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000527_indic_mozhi_deva_word_ocr_924e31891610.jpg", "ocr": "अमित"} +{"id": "indic_deva_eval_000528_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000528_devanagari_page_ocr_f0542cc427d3.jpg", "ocr": "88 अनुपिटके\n\n“या मज्झिमे यामे अच्चि, सा पच्छिमे यामे अच्ची”ति? “न हि भन्ते”ति।\n\n“किं नु खो, महाराज, अज्ञो सो अहोसि पुरिमे यामे पदीपो, अज्ञो मज्झिमे यामे\n'पदीपो, अज्ो पच्छिमे यामे पदीपषो”ति?\n\n“न हि भन्‍्ते,\n“एवमेब खो, महाराज, धम्मसन्तति सन्‍्दहति। अड्ञजो उप्पज्जति, अज्जों निरुज्ञति, अपुब्बं\nअचरिमं विय सन्दहति, तेन न च सो, न च अज्ञो, पुरिमविज्ञाणे पच्छिमविज्ञाणं सडूगहं\nगच्छती”ति।\n\n3. “भिय्यो ओपम्मं करोही”ति।\n\n“यथा, महाराज, खीरं दुग्हमानं कालन्तरेन दश्ि परिवत्तेय्य, दध्ितो नवनीतं,\nघ॒त॑ परिवत्तेय्य।\nसंस्कृतच्छाया- “या मध्यमे यामेउर्चि:, सा पश्चिमे यामेडर्चिरित��? “न हि, भदन्ते”\"ति।\n\nकिन्नु खलु, महाराज, अन्यः सोऊभूत पूर्व यामे प्रदीपः, अन्यो मध्यमे यामे प्रदीप, अन्यः\nपश्चिमे यामे प्रदीप इति।\n“न हि, भदनन्‍्त। तमेव नि:श्रित्य सर्वरात्रिं प्रदीस' इति।\n\n\"एबमेब, खलु, महाराज, धर्मसन्‍्तति: सन्दधाति। अन्य उत्पद्यते, अन्यो निरूध्यते,\nअपूर्वमचरममिव सन्दधाति। तेन न च स: न चान्य: पूर्वविज्ञाने पश्चिमविज्ञानं सड्ग्रहं गच्छती\"ति।\n\n3. \"भूय औपम्यं कुर्वि\"ति।\n\n\"यथा, महाराज, क्षीरं दुह्यमानं कालान्तरेण\n\n_ घूतं परिवर्तेता\nहिन्दी- . “या जो दूसरे पहर का दीपक है, वहीं तीसरे पहर का दीपक है?\" “नहीं भन्‍्ते!\nमहाराज! तो क्या वह दीपक पहले पहर में दूसरा, दूसरे और तीसरे पहर में दूसरा हो जाता है।?\"\n\n“नहीं भन्‍्ते! वही दीया सारी रात जलता रहता है।\n“महाराज! ठीक इसी तरह किसी वस्तु के अस्तित्व के सिलसिले में एक अवस्था उत्पन्न होती है, एक लय होती है।\nऔर इस तरह प्रवाह जारी रहता है। एक प्रवाह की दो अवस्थाओं में एक क्षण का भी अन्तर नहीं होता; क्योंकि\nउत्पन्न हो जाती है। इसी कारण, न वही जीव रहता है और न दूसरा ही हो जाता है।”\nलीन होते ही दूसरे जन्म का प्रथम विज्ञान उठ खड़ा होता है।”\n\nत॑ येव निस्साय सब्बरत्तिं पदीपितो”ति।\n\nरेण दधि परिवर्तेत, दधितो नवनीतं, नवनीततो\n\n3. “कृपया एक और उपमा देकर समझावें ।”\n\nदूध दूल्ले जाने पर कुछ समय के बाद जम कर दही हो जाता है; दही से मक्खन और मक्खन\n\nसे घी भी बना लिया जाता है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000529_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000529_devanagari_page_ocr_77f2ef319461.jpg", "ocr": "ः वेसाखसुक्खपक्खादिदिते दूता विनिग्गता॥37॥\n\nतामलिस्तियमारुय्ह , नावं ते जम्बुकोलके के।\n\nओरुय्ह भूप॑ पस्सिंसु, पत्वा द्वादसियं इति॥38॥\n\nअदंसु पण्णाकारे ते, दूता लंकादीपस्स ते।\n\nत्तेसं महन्तं सककारं, लंकापति अकारयि॥ 39॥\n\nते मग्गसिस्मासस्स, आदिचन्दोदये दिने।\n\nअभिसित्तं च लंकिन्दं, अमच्चा सामिभत्तिनो॥40॥\n\nसंस्कृतच्छाया-. कुरुध्वं मया सहायस्य, अभिषेक पुनः” इति।\nउक्त्वा सहायामात्ये ते, सत्कृत्य च प्रेषयत्‌।।36।।\nपश्चमासे उषित्वा, तेन अमात्या: अतीव सत्कृताः:।\nवैशाखशुक्लपक्षादिदिने दूताश्व विनिर्गता:॥37।\nताम्रलिस्यामारुह्य नावं ते जम्बुकोलके।\nअवरुह्य भूप॑ अद्वाक्षुः, प्रासा द्वादशीयमिति।।38॥4\nअपश्यन्‌ पर्णाकारे ते, दूता: लड्-काद्वधी पसय ते।\nतेषां महन्तं सत्कारम्‌, लडकापति अकारयत्‌।।39॥\nते मार्गशीर्षमासस्य आदिचन्द्रोदये दिने।\n\nअभिषिक्तञ्व लड्नकेन्द्रमू, असात्या: स्वामिभक्तिन:।40।।\n\n गऋज्ँ ट्य अभिजवेक करना।\nउसके उस अपने दूतों का यह भी आदेश दिया कि हमारी तरफ से राजा के पुन: अभिषेक की रीति वर्ण कर\nउसके दूलों का सत्कार करते हुए वापस लौटाया।।36॥।\n\nपाँच मास तक पाटलिपुत्न में रहते हुए वे दूत हो : बैशाख सास के शुक्ल पक्ष की प्रतिषदा\nतिथि को वहाँ से चले।।37॥। हुए वे दूत अतीव सत्कृत हो कर पुनः\n\nताग्रनलिप्ति से नाव में\n\nअपने राजा के दर्शन\n\nचढ़कर जम्बुकोल बनन्‍्दरगाह में के दिन उन दूतों\n\nकिये।38॥| तु बन्दरगाह में उतर कर द्वादशी के दिन उन दूलों ने है\nलत है अहम\n\nसी जनक इकाधिपति की सेवा में जाकर उन्हें सम्राट्‌ धर्माशोक का पत्र तथा भेंट समर्चित की। लड॒ के\n\nसत्कार किया।।39॥\n\nउन स्वामिभक्त अमात्य दलों ने कक\n“पात्य दूतों ने सम्राट धर्माशोक का सन्देश सुनाकर सार्गशीर्ष सास की शुक्ल\n\nदिन लइकापति को हाल ह\nडर को पुन: अभिषिक्त किया।।40॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000530_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000530_indic_vision_bench_deva_ocr_dacc6e7686aa.jpg", "ocr": "त्या क्षेत्रात काम करणाऱ्या प्रत्येक व्यवस्थापकाला स्वीकारावं लागतं. हा व्यवस्थापनातील\nसर्वात नाजूक व निर्णायक टप्पा असतो. तो अत्यंत कौशल्याने हाताळावा लागतो.\n'बदलांची रेल्वेगाडी’ इच्छितस्थळी पोहोचण्यापूर्वी तिला तीन स्टेशनं घ्यावी लागतात.\nपहिलं, बदलांबाबतचं ज्ञान. दुसरं बदलांबाबतचा विश्वास. तिसरं बदल अंगी बाणणं.\nया गाडीचा वेग कितीही जास्त असला तरी ही तीन स्टेशनं घ्यावी लागतातच.\nहोणारा बदल नेमका काय आहे, याचे ज्ञान प्रथम व्यवस्थापकाला असणं आवश्यक\nआहे. ज्या गोष्टीची आपल्याला माहिती नसली किंवा असली तरी अर्धवट एकतर्फीं\nअसते, तिला विरोध करण्याची आपली वृत्ती असते. शिवाय कोणताही बदल शंभर\nटक्के आदर्श किंवा पूर्णपणे फायद्याचा असत नाही. तो आपल्याबरोबर काही दोष तर\nकाही गुण घेऊन येतो. त्यामुळे त्यांचे व्यवस्थापन असतं.\nअलीकडे डंकेल प्रस्ताव, गॅट करार हे शब्द ज्याच्या त्याच्या तोंडी आहेत. त्यांच्या\nविरोधकांना तुम्ही गॅट म्हणजे काय असे विचाराल तर ते सांगतील, ‘ते आम्हाला\nमाहिती आमचा त्याला कट्टर विरोध आहे. गॅट, डंकेल यामुळे भारतातील\nनाही, पण उद्योगांमध्ये बरेच बदल होणार आहेत, हे त्यांना माहीत असते. मात्र, या करारांमधील\nतर��ुदी कोणत्या आहेत व त्यांचा फायदा कसा उठवता येईल, याची जाणीव नसल्याने\nत्यांना विरोध केला जातो.\nयाउलट या प्रस्तावांचे समर्थक त्यातील फायद्यांबाबत आपापसांत चर्चा करतात\nपण सर्वसामान्य जनतेला समजावून सांगत नाहीत. त्यामुळे लोकही अंधारात राहतात.\nतेव्हा बदल, स्वत: समजून घेणं व त्या बदलांचा ज्यांच्यावर परिणाम होणार आहे, त्या\nसर्वांना पटेल अशा पध्दतीने व पटेपर्यंत समजावून देणे, हे कुशल व्यवस्थापकाचं\nपहिलं काम आहे. मी सुरुवातीला दिलेला माझ्या घरातील संवाद हा 'बदल' समजून\nदेण्याचाच उपक्रम आहे.\nत्यानंतरचा टप्पा म्हणजे बदल अंगी बाणणं. बदल केवळ कागदावर किंवा मनात\nअसून उपयोग होणार नाही. तो कृतीत आणला पाहिजे. त्यानुरूप स्वतःची मानसिकता\nबदलली पाहिजे.\nबदल हाताळण्याचे आव्हान :\nबदल घडवून इच्छिणाऱ्यांनी, ज्यांच्यासाठी हे बदल केले जात आहेत व ज्यांच्यावर\nया बदलांचा सर्वाधिक परिणाम होणार आहे, त्यांच्याशी सुसंवाद साधणे हे पहिली गरज\nआहे. कोणताही बदल मग तो कितीही आवश्यक व चांगला असला तरी प्रारंभीच्या\nकाळात अडचणीचा वाटतो. असुरक्षिततेची भावना निर्माण होते. उदाहरणार्थ, गेल्या\nपन्नास वर्षात भारतात ७५ टक्क्यांहून अधिक नोकऱ्या सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्रात\nअद्भुत दुनिया व्यवस्थापनाची/ १५"} +{"id": "indic_deva_eval_000531_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000531_hindi_handwritten_word_ocr_296ff03a55c9.jpg", "ocr": "बलशाली"} +{"id": "indic_deva_eval_000532_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000532_devanagari_page_ocr_1b7a7076c577.jpg", "ocr": "निकली »* “ “\n\nमहावंसो\n\nडक 455\n\nसेनापति पलायित्वा, गुम्बद्बानं सपाविसि।\n\nसेनापति गुम्बको'ति, तेन एस पबुच्चति॥74॥\n\nउपरिट्ठमातुलसिरं, सीसरासिं सपस्सिय।\n\nलाबुरासी'व इच्चाह, तेना'हु लाबुगामको॥ 72॥\n\nएवं विजितसज्भामो, ततो सो पण्डुकाभयो।\n\nअय्यकस्सा'नुराधस्स, वसनठानमागमि॥73॥\n\nअत्तनो राजगेहं सो, तस्स दत्वान अय्यको।\n\nअज्ञत्थवासं कप्पेसि, सो तु तस्मिं घरे बसि॥74॥\n\nपुच्छापेत्वान नेमित्तं, वत्थुविज्जा'बिदुं तथा।\n\nनगरं पबरं तस्मिं, गामेयेव असमापयि॥ 75॥\n\nसंस्कृतच्छाया- सेनापति: पलायित्वा, गुम्बस्थानं स: प्राविशत्‌।\n“सेनापतिगुम्बकः” इति, तेन एपघ प्रोच्यते।।7॥।\n'उपरिष्टमातुलाशिर: शीशराशिं सोडपश्यत्‌।\nलाबुराशि” इब इत्याह, तेनाभूदलाबुग्रामक:।।72।।\nएवं विजितसड्-ग्राम:, ततः सः पाण्डुकाभयः:।\nआर्यकस्यानुराधस्य, वसनस्थानमागमत्‌।।73॥।\nआत्���न: राजगृहं सः, तस्य दत्वा आर्यक:।\n\nअन्यत्रवासं कल्पयसि, स तु तस्मिन्‌ गृहे अवसत्‌।।74॥।\n\nपृष्ट्वा नैमित्तिकं, वास्तुविद्या” विदं तथा।\nनगरं प्रवरं तस्मिन्‌, ग्रामे एब अमापयत्‌।75॥॥\n\nहिन्दी-सेनापति वहाँ से भाग कर घोर जंगल में छिप गया। इसीलिये आज तक वह स्थान “सेनापतिगुम्बक'\nकहलाता है।।74॥॥\n\nकटे सैनिकों के शिरों पर रखे मामाओं के मस्तक देखकर उसने उनका परिहास करते हुए कहा-\n\n- “यह तो लाबू की\nढेर है\"। तभी से यह स्थान 'लाबुग्राम' कहलाता है।।72॥॥\n\nबह पाण्डुकाभय उस युद्ध को जीत कर अपने नाना अनुराध के वासस्थान पर आया।।73॥।\n\nउसके नाना ने अपना राजनिवास उसको देकर अपने लिये दूसरा घर बनवा लिया, और वहीं रहने लगा।।74॥।\nज्योतिषियों एवं भवननिर्माणकलाविदों से पूछकर उसी ग्राम में ही एक श्रेष्ठ नगर बसाया।।75।।"} +{"id": "indic_deva_eval_000533_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000533_indic_mozhi_deva_word_ocr_59a4899c0932.jpg", "ocr": "महत्त्वाची"} +{"id": "indic_deva_eval_000534_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000534_devanagari_page_ocr_8666ece51e28.jpg", "ocr": "302 संयुत्तनिकायपालि\n\nपडिजिन्द्रियं| कतमठ्च, भिक्खवे, सद्धिन्द्रियं? इध, भिक्खवे, अरियसाबको सद्धो होति,\nसचद्दहति तथागतस्स बोधिं -- “इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धों विज्जाचरणसम्पन्नो\nसुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा'ति -- इदं वुच्चति,\nभिक्‍खवे, सद्;विन्द्रियं।\n\n“कतमड्च, भिकक्‍्खवे, वीरियिन्द्रियं? इध, भिक्खबवे, अरियसावको आरब्धवीरियो\nविहरति अकुसलानं धम्मानं पहानाय, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदाय, थामवा दब्हहपरक्कमो\nअनिक्खित्तधुरो कुसलेसु धम्मेसु। सो अनुप्पन्नानं पापकानं अकुसलानं धम्मानं अनुप्पादाय छन्द॑\nजनेति वायमति वीरियं आरभति चित्त पग्गण्हाति पदहति; उप्पन्नानं पापकानं अकुसलानं\nधम्मानं॑ पहानाय छन्‍्द॑ जनेति वायमति वीरियं आरभति चित्त पग्गण्हाति पदहति;\nअनुप्पन्नानं॑ कुसलानं धम्मानं उप्पादाय छन्‍द जनेति वायमति वीरियं आरभति चित्त\nपर्गण्हाति पदहति; उप्पन्नानं कुसलानं धम्मानं ठितिया असम्मोसाय भिय्योभावाय बेपुल्लाय\nभावनाय पारिपूरिया छन्‍्दं जनेति वायमति\nत्संस्कृतच्छाया) प्रज्ञैन्द्रियम। कतमच्च, भिक्षव:! श्रद्धेन्द्रिम? इह, भिक्षव:! आर्यश्रावक: श्रद्धो\nभवत्ति, श्रद्धधाति तथागतस्य बोधिम्‌- 'इत्यपि स भगवान्‌ अर्हत्‌ सम्यक्सम्बुद्धो विद्याचरणसम्पन्नः\nसुगतः लोकविद्‌ अनुत्तर: पुरुषदम्यसारथि शास्ता देवमनुष्याणां बुद्धों भगवान्‌'इति- इदम्‌ उच्यते,\nभिक्षव:! श्रद्धेन्द्रियम।\n\n“कतमड्च, भिक्षव:! वीर्येन्द्रिम? इह, भिक्षव:! आर्यक्षावक: आरब्धवीर्य: विहरति\nअकुशलानां धर्माणां प्रहाणाय, कुशलानां धर्माणाम्‌ उपसम्पदायै, स्थामवान्‌ दृढपराक्रम: अनिक्षिसधुर:\nकशलेप धर्मेप | सोउनत्पन्नानां पापकानास अकशलानां धर्माणास्‌ अनुत्पादाय छन्‍्द जनयति व्यायमति\nवीर्यम्‌ आरभते चित्त प्रगृह्ञाति प्रदधाति; उत्पन्नानां पापकानाम्‌ अकुशलानां धर्माणां प्रहाणाय छ्द॑\nजनयति व्यायमति वीर्यम्‌ आरभते चिक्त प्रगृह्ञाति प्रदधाति; अनुत्पन्नानां कुशलानां धर्माणाम्‌\nउत्पादाय छन्‍्द॑ जनयति व्यायमति बीर्यम्‌ आरभते चित्त प्रगृह्लाति प्रदधाति; उत्पन्नानां कुशलानां\nधर्माणाम्‌ स्थित्ये अविप्रमोषाय भूयोभावाय बैपुल्यायै भावनायै परिपूर्तये छन्‍्दं जनयति ब्यायमति\n(हिन्दी) इन्द्रिय क्या है? सिक्षुओं! आर्यश्वावक श्रद्धालु होता है। बुद्ध के बुद्धत्व में श्रद्धा रखता है- ऐसे वह भगवान्‌\nअर्हत्‌, सम्यक्‌-सम्बुद्ध, विद्याचरण-सम्पन्न, लोकविद्‌, अनुत्तर, पुरूषों को दमन करने में सारथि के समान, देवताओं\nऔर मनुष्यों के गुरू, बुद्ध भगवान्‌। भिक्षुओं ! इसी को श्रद्धा-इन्द्रिय कहते हैं।\n\nभिक्षुओं! वीर्य-इन्द्रिय क्या है? भिक्षुओं! आर्यश्वावक अकुशल धर्मों के प्रहाण करने और\nकरने में वीर्यवान्‌ होता है, स्थिरता से दृढ़ पराक्रम करता है, और कुशल धर्मो में कन्धा झुका\nहै। वह अनुत्पन्न पापमय अकुशल धर्मो के अनुत्पादन के लिए हौसला करता है, कोशिश करता है, वीर्य करता\nसन लगाता है। वह उत्पन्न पापमय अकुशल धर्मो के प्रह्ण के लिए हौसला करता है...पूर्ववत...'\nधर्मों के उत्पाद के लिए...पूर्वबत्‌...। उत्पन्न कुशल धर्मों की स्थिति, वृद्धि, भावना और पूर्णता के लिए हौसला\nकरता है, कोशिश करता है, वीर्य करता है, मन लगाता है। भिक्षुओं ! इसी को वीर्य-इन्द्रिय कहते हैं।\n\nशल धर्मों के पैदा\nबाला नहीं होता\nता हैं;"} +{"id": "indic_deva_eval_000535_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000535_indic_mozhi_deva_word_ocr_1c13e9ee9e96.jpg", "ocr": "करती"} +{"id": "indic_deva_eval_000536_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000536_devanagari_page_ocr_496eb7dbd2fb.jpg", "ocr": "460 धम्मसज्भणि\n\nपडिजिन्द्रियं पझ्ञाबलं पज्ञासत्थ॑ पज्ञापासादों पञ्ञाआलोको पजञ्ञाओभासो\n'पड्ञापज्जोतो पड्ञारतनं अमोहो धम्मविचयो सम्मादिद्ठि धम्मविचयसम्बोज्झज्जो मग्गड्रं\nमग्गपरियापन्‍न - इदं तस्मिं समये पड्जिन्द्रियं होति।\n\n२९३. कतमं तस्मिं समये मनिन्द्रियं होति? य॑ं तस्मिं समये चित्त मनो मानसं हदयं पण्डरं\nसनो सनायतनं मनिन्द्रियं विज्ञाणं विज्ञाणक्खन्धो तज्जा मनोविज्ञाणधातु - इदं तस्मि\nसमये मनिन्द्रियं होति।\n\n२९४. कतमं तस्मिं समये सोमनस्सिन्द्रियं होति? यं तस्मिं समये चेतसिकं सातं चेतसिकं\nसुखं चेतोसम्फस्सजं सातं सुखं वेदयितं चेतोसम्फस्सजा साता सुखा वेदना - इदं तस्मि समये\nसोमनस्सिन्द्रियं होति।\n\n(संस्कृतच्छाया) प्रजेन्द्रियं प्रजावलं प्रज्ञाशसंर प्रज्ञाप्रासाद: प्रजालोक: प्रज्ावभास: प्रज्ञाप्रयोत: प्रज्ञारलम्‌\nअमोहो धर्मचिचयः सम्यस्द्शि: धर्मविचयसम्वोध्यद्न सार्गानन सार्गपर्यापन्‍नस- इंदं तस्मिन समये\nप्रज्ञेन्द्रियं भवति।\n\n२९३. कतम॑ तस्मिन्‌ समये मनइन्द्रियं भवति? यत्‌ तस्मिन्‌ समये चित्त मनो मानस हृदय\nपाण्डरं॑ मनो मनआयतनं मनइन्द्रियं विज्ञानं विज्ञानस्कन्धस्तज्जो मनोविज्ञानधातु: - इदं तस्मिन्‌ समये\nमनइन्द्रियं भवति।\n\n२९४. कतमं तस्मिन्‌ समये सौमनस्येन्द्रियं भवति? यत्‌ तस्मिन्‌ समये चैतसिकं शात॑ चैतसिकं\nसुख चेतस्संस्पर्शजं शातं सुख वेदयितं चेतस्संस्पर्शना शाता सुखा वेदना - इदं॑ तस्मिन्‌ समये\nसौमनस्येन्द्रियं भवति।\nतहेन्की) प्रकार से अनित्य, अनात्म एवं दुःख का ज्ञान), अंकुश( गलत रास्ते पर जाने से रोकने वाली है), प्रज्ञा\nप्रज्ञा-इन्द्रिय, प्रजञा-बल, प्रज्ञा-शस्त्र, प्रज्ञा-प्रासाद, प्रजा-आलोक, प्रज्ञा-प्रकाश, प्रज्ञा-प्रयोत, प्रज्ञा-रत्र, अमोह, धर्म-\nविचय, सम्यग्दृष्टि, धर्मविचय-सम्बोध्यंग, आर्य-अष्टांगिक-मार्ग का अंग या मार्ग पर आरूढ़ है- यही उस समय\nप्रज्ञा-इन्द्रिय होती है।\n\n२६३. उस समय कौन सी मन-इन्द्रिय होती है? जो उस समय चित्त, मन, मानस, हृदय, श्वेत(स्पष्ट), मन,\nमनआयतन, मन-इन्द्रिय, विज्ञान, विज्ञान-स्कन्ध, उससे उत्पन्न मनोविज्ञान धातु है - यही उस समय मन-इन्द्रिय\nहोती है।\n\n२९४. उस समय कौन सी सौमनस्य-इन्द्रिय होती है? जो उस समय चैतसिक आनन्द, चैतसिक सुख, चित्त\nके संस्पर्श से उत्पन्न आनन्द एवं सुख की अनुभूति, चैतसिक संस्पर्श से उत्पन्न आनन्दमयी एवं सुखमयी बेदना है-\nयही उस समय सौमनस्य-इन्द्रिय होती है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000537_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000537_indic_vision_bench_deva_ocr_2de0264fbcee.jpg", "ocr": "कामगारांचे राज्य पृथ्वीवर आणू इच्छितो; दुसऱ्याला हवा आहे बलसागर भारत. समाजवाद्यांजवळ असे काय आहे की, ज्यासाठी वर्षानुवर्षे झुरत राहावे, पिढ्यानुपिढ्या झगडत राहावे ? उपेक्षा झाली, अवमान आणि पराभव झाले तरी न खचता, न विकले जाता, कंटकाकीर्ण मार्गाने ध्वज खांद्यावर घेऊन पुढे पुढे जातच रहावे ? एखादा सखोल आत्मप्रत्यय असला, तरच असे सामर्थ्य, हे निश्चयाचे बळ निर्माण होत असते-जे आज या दुभंगलेल्या स्थितीतही पूर्वाश्रमीच्या जनसंघीयांजवळ दिसते आहे. हिंदुत्ववादातून निघालेली ही राष्ट्रीय पुननिर्माणाची जबरदस्त प्रेरणा आणि समाजवाद्यांची समतादृष्टी यांचा जनता पक्षात संगम होऊ शकला असता, पण ती संधी हुकली. आताही, वेगळा झालेला जो गट असे दोन्ही पंख विस्तारून झेप घेईल, त्यालाच भवितव्य आहे, हे नीट ओळखूनच पुढची वाटचाल केलेला बरी. केवळ हिंदुत्ववाद, केवळ समाजवाद घेऊन हे गट पूर्वीप्रमाणेच अलग अलग चालत राहिले तर लवकरच दोघेही थकतील, गिळंकृतही होतील. विकेंद्रित अर्थरचना असलेला भारतच बलशाली भारत असू शकतो, हे सत्य हिंदुत्ववाद्यांनी ध्यानात घ्यायला हवे व इतर नव्या-जुन्या जनतापक्षीयांनी, समाजवाद्यांनाही गांधीजींचा मुस्लिम अनुनयाचा, अहिंसा परमोधर्मवादाचा पुनर्विचार करून हिंदुत्ववाद्यांची या क्षेत्रातली ऐतिहासिक कामगिरी मोकळेपणाने मान्य करायला हवी. अशा समन्वयातून जो ध्येयवाद, जी विचारसरणी जो कार्यक्रम तयार होईल त्यात जयप्रकाश-गांधीजी असतील, शिवाजी - राणाप्रतापही असतील; नाही तर काहीच उभे राहू शकणार नाही. गांधीवादी समाजवाद असे या समाज विचारसरणीचे नामकरण करण्यात आलेले आहे; पण एखाद्या व्यक्तिनामापेक्षा सरळ भारतीय समाजवाद असेच का म्हणू नये ? प्रत्येक देशाने आपापल्या परंपरेप्रमाणे, लोकरिवाजाप्रमाणे, नाही तरी, समाजवादाची वेगवेगळी रूपे उत्क्रांत केलेली आहेतच. भारतीय किंवा दंडवते-जनता पक्षीयांनी खेड्यांच्या आधुनिक करणावर आधारलेला, समाजवादाचा नवा विकेंद्रित भारतीय नमुना उत्क्रांत करण्याची मनीषा का बाळगू नये ? नेहरूंनी शहरे वाढवली. जनतावाल्यांनी खेडी मोठी करण्याची, आधुनिक करण्याची आकांक्षा बाळगावी, एवढेच शक्य आहे, आवश्यक आहे. यावर जोर दिला तर देश खूप पुढे जाणार आहे. गांधीजीं��ा सत्तानिरपेक्ष मानवपरिवर्तनाचा प्रयोग ही फार लांबची गोष्ट आहे. सत्तेचा वापर करून, तिचा उपभोग घेऊन, विकेंद्रित समाजवादाचा पर्याय जरी भारतीय जनता पक्ष म्हणा, नुसता जनता पक्ष म्हणा, सिद्ध दाखवू शकला, तरी उद्याचा भारत त्यांचा ऋणी राहील.\nएप्रिल १९८०\n▣ ▣ ▣\nनिर्माणपर्व । २२८"} +{"id": "indic_deva_eval_000538_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000538_indic_mozhi_deva_word_ocr_79c1e6a629da.jpg", "ocr": "कितनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000539_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000539_devanagari_page_ocr_e5cdce17f87d.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\nव79\n\nएत्तावता भूधातुमयानं पुल्लिड्गान॑ नामिकपदमाला सद्धिं लिडुगन्तरेहि सद्दन्तरेहि\nअत्थन्तरेहि च नानप्पकारतो दस्सिता।\n\nइमं सद्दनीतिं सुनीतिं विचित्तं,\n\nसपड्ञेहि सम्मा परीपालनीयं।\n\nसदा सुट्कु चिन्तेति बाचेति यो सो,\n\nनरो जाणवित्थिन्नतं याति सेट्रं॥\nइति नवढूगे सादुकथे पिट्कलये व्यप्पथगतीस विज्ल॒न\nकोसल्लत्थाय कते सह्नीतिप्पकरणे\nसविनिच्छयो निग्गहीतन्तादिपुल्लिड्गान\nपकति रूपस्स नामिकपदमालाविभागो\n\nसत्तमों परिच्छेदो।\n\nसब्बथापि पुल्लिड्गं समत्तं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000540_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000540_devanagari_page_ocr_6be451619ad1.jpg", "ocr": "(*र' परेड के साल राष्ट्रीय ूल्यांकण एल (००त०व॥००व ७७ ४७:१८: ४\n\n'पुरोवाक\n\nयह अत्यन्त हर्ष का लिषय है कि राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) संस्कृत के सर्वांगीण लिकास\nके साथ-साथ पालि एवं प्राकृत भाषाओं के विकास के त्लिए भी कृतसंकल्प है। ये दोनों मध्यकालीन आर्यभाषाएँ हैं। पाल्ि\nमें भगवान्‌ बुद्ध के प्रामाणिक बचन सुरक्षित हैं। भारतवर्ष में जिस प्रकार संस्कृत को धार्मिक भाषा को रूप में सम्मान प्राप्त\nहै, ठीक चैसा ही सम्मान पाल्ि को भी श्रीलक्का, म्याँमार, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस आदि देशों में प्राप्त है। यह पाल\nभाषा केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, अचितु ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी से ईस्वी पाँचवी शताब्दी तक के भारतीय राजनीति,\nअर्थनीति, सामाजिक व्यवस्था, भौगोलिक स्थिति आदि चिषयों को जानने के लिए भी इस भाषा में निबद्ध वाडत्मय सर्वोत्तम\nआंकड़े उपलब्ध करता है। इसलिए यह भाषा शोध की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वहीं प्राकृत भाषा में जैन धर्म\nका बाबत्मय निबद्ध है तथा संस्कृत नाटकों के साथ मध्यकालीन लिपुल ग्रल्थ-भण्डार भी है। भारत के आधुनिक\nके विकास-क्रम को समझने तथा भारतीय संस्कृति की श्र��ण-परम्परा को सम्यग्‌ रूप से जानने का भी यह एक प्रामाणिक\nएवं प्राचीन स्रोत है।\n\nसन्‌ 2009 से भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मन्‍्त्रालय द्वारा प्राप्त आर्थिक आलुदान से राष्ट्रिय संस्कृत\nसंस्थान (सानित विश्वविद्यालय), नई दिल्‍ली ने पालि-प्राकृत भाषा एवं साहित्य के संरेक्षण-संवर्धन के लिए दिल्ली, जयपुर\nऔर लखनऊ में पालि/प्राकृत अध्ययन केन्द्रों की स्थापना की है। लखनऊ-परिसरस्थ पाल्वि-अध्ययन केन्द्र में पाल्ति-तिपिटक\n(त्रापिटक) की संस्कृतच्छाया, हिन्दी-अनुवाद तथा प्राकृत-ऑनलाइन-डिक्शनरी पर कार्य चल रहा है। अब तक त्रिपिटक\nको ॥0 ग्रन्थों का 7 भागों में प्रकाशन हो चुका है, जिसे पाल, प्राकृत एवं संस्कृतके मूर्धन्य विद्वानों ने मुक्लकण्ठ से सराहना\nकी है। पालि सूल का संस्कृतच्छाया और हिन्दी-अनुवाद सहित उपलब्धता से जहाँ अर्थबोध में सुविधा होती है, वहीं संस्कृतज्\nएवं हिन्दी भाषी विद्ानों के लिए भी यह सुग्राह्म हो सकेगा।\n\nप्रस्तुत प्रकाशन के सात भागों में से संयुत्तनिकायपालि (सब्ठायततवग्गों), संयुत्तनिकायपात्ति (महावग्गों)\nखुदकनिकायपालि का आपदानपात्लि-+ (श्लेशपदानपात्ति--20 बग्गो), खुदकनिकायपात्लि का चुद्धव॑ंसपालि, ये चार पास्ति-त्रिपिटकस्थ\nग्रन्थ हैं। *थूपबंस' पालि-भाषा में निबद्ध सुप्रसिद्ध वंससाहित्य का ग्रन्थ है। *पालि-सल्लाप-सहस्सकं” संस्कृत एवं हिन्दी\nमाध्यम से पात्ति बोल-चाल सिखाने वाली एक हजार सरल वाकयों से समन्वित पुस्तिका है। मेरी इच्छा थी कि संस्कृत की\nभाँति पालि एवं प्राकृत भाषा का भी जन-जन में प्रचार-प्रसार हो। इस भाव को में पात्ति-प्राकृत भाषा के खिट्दानों के समक्ष\nअदा कदा प्रकट करता रहा हूँ। आज इसको परिणत होता देखकर हर्षानुभूति हो रही है। “पाइआ-सद्द-कोसो', यह प्राकृत शब्दों\nका रोमनीकरण, संस्कृतच्छाया, हिन्दी एवं अंग्रेजी अनुवाद से समन्वित प्राकृत-ऑनलाइन-डिक्शनरी के ऑनलाइन संस्करण\nका प्रथम भाग है। इसमें सुख्यरूप से संस्कृतनाटकों में प्रयुक्त प्राकृत शब्दों का समावेश किया गया है, जो पहले प्राप्त\nप्राकृत-कोशों में समाविष्ट नहीं थे।\n\nमैं प्रकृत ग्रन्थों के अध्येता/अध्येत्री लेखक/लेखिकाओं को साधुबाद देते हुए सभी सहयोगियों एवं सम्पादकों का\nअभिनन्दन करता हूँ। ९3\n\nघु आाच्शलछ\n( प्रो. पो. एन. शास्त्री)\nकुलपति\n\n3, पलण एल���ा-१0058 ॥क.: (0) 28523949 तम्0 उछजडाग्रवठ ..\n28527994, 20524995 8. ७॥ : एत्कक०८ को) जोकत0-०तक,\n\n22080: 28524993."} +{"id": "indic_deva_eval_000541_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000541_indic_vision_bench_deva_ocr_e7a933c40f55.jpg", "ocr": "४४\nहिन्द स्वराज्य\nउन्होंने देखा कि राजाओं और उनकी तलवारके बनिस्बत नीतिका बल ज्यादा बलवान है। इसलिए उन्होंनें राजाओंको नीतिवान पुरूषों-ऋषियों और फ़कीरों-से कम दर्जेका माना।\nऐसी जिस राष्ट्रकी गठन है वह राष्ट्र दूसरोंको सिखाने लायक है; वह दूसरा से सीखने लायक नहीं है।\nइस राष्ट्रमें अदालतें थीं, वकील थे, डॉक्टर-वैद्य थे। लेकिन वे सब ठीक ढंगसे नियमके मुताबिक चलते थे। सब जानते थे कि ये धन्धे बड़े नहीं हैं। और वकील, डॉक्टर वगैरा लोगोंमें लूट नहीं चलाते थे; वे तो लोगोंके आश्रित\n[\n१\n]\nथे। वे लोगोंके मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्साफ़ काफी अच्छा होता था। अदालतोंमें न जाना, यह लोगोंका ध्येय\n[\n२\n]\nथा। उन्हें भरमानेवाले स्वार्थी लोग नहीं थे। इतनी सड़न भी सिर्फ़ राजा और राजधानीके आसपास ही थी। यों (आम) प्रजा तो उससे स्वतंत्र रहकर अपने खेतका मालिकी हक भोगती थी। उसके पास सच्चा स्वराज्य था।\nऔर जहाँ यह चांडाल\n[\n३\n]\nसभ्यता नहीं पहुँची है, वहाँ हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है। उसके सामने आप अपने नये ढोंगोंकी बात करेंगे, तो वह आपकी हँसी उड़ायेगा। उस पर न तो अंग्रेज राज करते हैं, न आप कर सकेंगे।\nजिन लोगोंके नाम पर हम बात करते हैं, उन्हें हम पहचानते नहीं हैं, न वे हमें पहचानते हैं। आपको और दूसरोंको, जिनमें देशप्रेम है, मेरी सलाह है कि आप देशमें-जहां रेलकी बाढ़ नहीं फैली है उस भागमें-छह माहके लिए घूम आयें और बादमें देशकी लगन लगायें, बादमें स्वराज्यकी बात करें।\nअब आपने देखा कि सच्ची सभ्यता मैं किस चीजको कहता हूँ। ऊपर मैंने जो तसवीर खींची है वैसा हिन्दुस्तान जहाँ हो वहाँ जो आदमी फेरफार करेगा उसे आप दुश्मन समझिये। वह मनुष्य पापी है।\nपाठक : आपने जैसा बताया वैसा ही हिन्दुस्तान होता तब तो ठीक था। लेकिन जिस देशमें हजारों बाल-विधवायें हैं, जिस देशमें दो बरसकी बच्चीकी\n↑\nपनाहगीर।\n↑\nमक़सद।\n↑\nशैतानी।"} +{"id": "indic_deva_eval_000542_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000542_indic_vision_bench_deva_ocr_9c2ba7d412ad.jpg", "ocr": "(२१)\nनारो महादेव.\nकुळकर्ण नारोपंतानीं सन १६९७ चे सुमारास शंभर होन देऊन खरेदी घेतलें. त्यांचा बाप तें कुळकर्ण गुमास्ता या नात्यानें चालवीत होता तें आतां त्यांचें वतनी झालें. या कुळकर्णाच्या खरेदीचा पट्टा \"शके १६१९ ईश्वर नाम संवत्सरे आषाढ शुद्ध तृतीयेस ग्राम पुरुषाचे अनुमतें १ देव ठाकूर मतकरी २ विठ ठाकूर गांवकर ३ काळ ठाकूर गांवकर.\" यांणीं लिहून दिला होता. \"तो भूमीमधें धामधूम करितां आच्छादून ठेविला होता यास्तव जीर्ण होऊन अक्षरें थोडीं थोडीं गेली याकरितां तो पट्टा आणून दाखविला त्यावरून \"ग्रामाधिकारी यानीं नवीन पट्टा शके १६३६ जय नाम संवत्सरे श्रावण शुद्ध सप्तमी भृगुवासरे या दिवशी करून दिला. वाडीकर सावंतांकडून तो म्हापण गांव नारोपंतास इनाम मिळाला याची सनद सन १७१४ त दिलेली आहे तींत सुद्धां पूर्वीची सनद हरवल्याचा उल्लेख आहे. त्यावरून या सालापूर्वीच तो गांव त्यांस इनाम मिळाला होता असे स्पष्ट होते. हा म्हापण गांव नारोपंतांस सावंतानी इनाम दिल्याविषयींची एक दंतकथा अशी आहे की, रामचंद्रपंत अमात्य यानीं एकदां सावंतवाडी संस्थानावर स्वारी करून खुद्द सावंतवाडीस वेढा घातला. तेव्हां त्या फौजेंत मुख्य सरदार नारोपंत होते, त्यांनी सावंतांस तह घडवून आणण्याच्या कामीं मदत करून वाडी संस्थानाचा बचाव केला म्हणून सावंतानीं कृतज्ञ होऊन नारोपंतांस तो गांव इनाम दिला.\nसन १७०७ मधें औरंगजेब मरण पावला. त्याच्या लष्करांत शाहूमहाराज कैदेंत होते त्यांस बादशहाच्या मुलानें हिंदुस्थानांत बरोबर नेलें होतें तेथून सोडून दिलें. त्यानंतर शाहूमहाराज आपलें राज्य घेण्यासाठी दक्षिण प्रांती येऊं लागले. परंतु ताराबाईंच्या मनांत राज्य द्यावयाचें नव्हतें. अर्थातच राज्यांतच दुफळी झाली. राज्याकरितां पुढे होणाऱ्या झटापटींत आपणास यश यावें म्हणून ताराबाई"} +{"id": "indic_deva_eval_000543_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000543_indic_mozhi_deva_word_ocr_3e6d6183c040.jpg", "ocr": "कळलेच"} +{"id": "indic_deva_eval_000544_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000544_devanagari_page_ocr_70e04a6fa1d6.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\n363\n\nमेथुनो/ति क् सोभने बाचाविसये अय॑ भासा आगता। “यभती”तिआदिका पन भासा\n“सिखरणी\"तिआदिका भासा बिय असम्भिवाचा। न हि हिरोत्तप्पसम्पन्नो लोकियजनोपि\nईदिसिं वा भासति। एवं सन्‍्तेषि अधिमत्तुक्कंसगतहिरोत्तप्पोषि भगवा महाकरुणाय\nसड्व्वोदितहदयो लोकानुकम्पाय परिसमज्झे अभासि। अहो तथागतस्स महाकरुणाति।\nइसानि पन मेथुनधम्मस्स नामानि-\nसंवेसनं निदुधुवन, मेथुन सूरत रतं।\nब्यथयों गामधम्मो च, याभस्सं मोहनं रति॥\nअसद्धम्मो च वसल-धम्मो मीव्ठहसुखम्प�� च।\nद्वयंद्यसमाप त्ति, द्वन्दो गम्मो'दकल्तिको॥\nसिभ विभ कत्थने। सिभति। विभति।\nदेभ अभि दभ्ि सद्दे। देभति। अम्भति। अम्भो। दम्भति।\nएल्थ च अम्भो वुच्चति उदकं। तडिह निज्जीवम्पि समानं ओचकालादीसु विस्सन्दमानं\nअम्भति सह करोतीति अम्भोति वुच्चति।\nइसानिस्स नामानि -\nपानीय॑ उदक॑ तोयं, जल॑ पातो च अम्बु च।\nदकं क॑ सलिलं बारि, आपो अम्भो पपम्पि च॥\nनीरड्च केपुक॑ पानि, अमतं एलमेव च,\nआपोनामानि एतानि, आगतानि ततो ततो॥\nएत्थ च “बालग्गेसु च॒ केपुके। पिवितउ्च तेस॑ भुसं होति पानी”तिआदयों पयोगा\nदस्सेतब्बा।\nथभि खभि पटिबद्धे थम्भति, वित्थम्भति। खम्भति, विक्खम्भति। थम्भो। थद्धो,\nउपत्थम्भो। उपत्थम्भिनी। विक्खम्भो। विक्खम्भितकिलेसो।\nजभ जभि गत्तविनामे। जभति। जम्भति, विजम्भति। विजम्भनं, विजम्भिता। विजम्भन्तो,\nविजम्भमानो, विजम्भितो।\nसब्भ कथने। सब्भति।\nवब्भ भोजने। वब्भति।\nगब्भ धारणे। गब्भति। गढ्भो।"} +{"id": "indic_deva_eval_000545_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000545_hindi_handwritten_word_ocr_294ab9dc6f58.jpg", "ocr": "बवाल"} +{"id": "indic_deva_eval_000546_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000546_devanagari_page_ocr_2e8a47ed5686.jpg", "ocr": "पत्चसो परिच्छेदो\n\nअक्खुसहस्स उच्चिनि, कारतु सद्धम्मसड्हे।\nजेहि असोकारामम्तहि, अका सद्धम्मसड़्हछें॥276॥\n\nमसह्ाकस्सपत्वेरों च, यसत्थेरा च कारयूं।\nतिस्सत्थेरों पि ते तथा॥277॥\n\nअथा ते ध्रम्स संगीतिं, ति\nकऋथावत्थुप्पकरणं, परवादप्पमद्बन।\nअमासि तिस्सत्वेरों च, तस्सि संगीतिमण्डल्ले॥278॥\n\nकरव भिक्‍्खुसहस्सेन, रक्‍्ख्ायासोकराजिनो।\n\nनवह्रि मासेहि, धम्मसंगीति निद्धिता॥279॥\n\nसत्तरसे वस्से. द्वासत्चतिससो इसि।\n\nमसह्वापवारणाय सो, संगीति ते समापयि॥280॥\n\nसंस्कृतअ््छाया- आअसहूस्नमृदचिनोत्‌, कर्तु सद्धर्ससंग्रहसा\n\nनोकानासे, अकरनोत्‌ सद्धर्मसंग्रह्नम।।276।॥\nमक्लाकाश्यपस्थविन्व्य, यशस्थविन्खथ्य अकारयतू\n\nबथा ते धर्म-संगीतिम्‌, तिप्यस्थविरो5पि तां सललया।।277।।\n\nविप्यस्थविन्ख्य, तस्सिन्‌ संगीतिमण्डल्तेत।278/\nआ्आायामशोकराज्ञ:\nबर्मसंगी तिनिछिता।।279!\n\nराज: समदशे वर्ष, दाससतिसमः ऋति:।\nसहापवारणायास:, संगीलि तां समापयत्‌।।280।4\n\nबह धर्मसइगीति भी उसी पद्धति से हुई जिस पद्धति से सहास्थविर\nसझगीति एवं यश स्थविर ने जिस प्रकार द्वितीय सडगीति करायी थी।।277।।\nब्वरखित कथावस्तु-प्रकरण, जिसमें सभी अन्य सतवादियों के मतों का"} +{"id": "indic_deva_eval_000547_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000547_hindi_handwritten_word_ocr_74f4b683b4da.jpg", "ocr": "स्ट्रोक्स"} +{"id": "indic_deva_eval_000548_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000548_devanagari_digits_mixed_905fd89d2481.jpg", "ocr": "२4९8९७8८1६0"} +{"id": "indic_deva_eval_000549_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000549_devanagari_page_ocr_6dca615454fc.jpg", "ocr": "अभिधम्मपिटके\n\n422:\n\n३९६. सारम्मणेहि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तेह्ठि धम्मेषि ये धम्मा... चेतसिकेहि धम्मेहि ये\nधम्मा... चित्तसम्पयुत्तेहि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तसंसद्रेष्ि धम्मेष्ठि ये धम्मा... चित्तसंसट्ठसमुद्ठानेहि\nधम्मेहि ये धम्मा... चित्तसंसट्गरसमुद्ठानसहभूहि धम्मेहि ये धम्मा... चित्तसंसट्ठसमुद्ठानानुपरिवत्तीहि\nधम्मेह्ठि ये धम्मा विष्पयुत्ता, तेहि धम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता... ते धम्मा एकेन खन्‍्धेन\nदसहायतनेहि दसहि धातूहि विप्पयुत्ता; एकेनायतनेन एकाय धातुया केहिचि विप्पयुत्ता।\n\n३९७. अनारम्मणेहि [अनुपादिण्णेहि (सी* क*)] धम्मेहि ये धम्मा... चित्तविष्पयुत्तेहि धम्मेहि\nये धम्मा... चित्तविसंसट्ठेष्टि धम्मेहि ये धम्मा... उपादाधम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता, तेहि धम्मेहि ये\nधम्मा विप्पयुत्ता... ते धम्मा चतूहि खन्धेहि एकेनायतनेन सत्तहि धातूहि विप्पयुत्ता; एकेनायतनेन\nएकाय धातुया केहिचि विप्पयुत्ता।\n\n३९८. अनुपादिन्नेहि धम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता, तेष्टि धम्मेहि ये धम्मा विप्पयुत्ता... ते\nधम्मा न केहिचि खन्धेहि न केहििचि आयतनेहि पठ्चहि धातूहि विप्पयुत्ता।\n\n३९९. उपादानेहि धम्मेहि ये धम्मा... किलेसेहि धम्मेहि ये धम्मा...संकिलिट्लेह्टि धम्मेह्टि ये\n(सं.)- ३९६. सालम्बनैः धर्मः ये धर्माः... चित्तधर्मै: ये धर्मा:.... चेतसिकधर्म: ये धर्माः... चित्तसम्प्रयुक्तधर्म: ये\n... चित्तसंसृत्ठैः धर्म: ये धर्माः.... चित्तसंसृष्ठसमुत्थानैः धर्मैः ये धर्माः...... चित्तसंसृष्ठसमुत्थानसहभूमिः\nशर्म: ये धर्माः..... चित्तसंसृष्ठसमुत्थानानुपरिबर्तिभिः धर्म: ये धर्माः विप्रयुक्ताः, तैः धर्म: ये धर्माः\nविप्रयुक्ताः.... ते धर्माः एकेन स्कन्‍्धेन दशज्िः आयतनैः दशश्िः धातुभिः विप्रयुक्ताः; एकेनायतनेन एकेन\nधातुना कैश्वित्‌ विप्रयुक्ता:\n\n३९७. अनालम्बनैः धर्म: ये धर्माः... चित्तविप्रयुक्तेः धर्मः ये धर्माः..... चित्तविसंसूषठैः धर्म: ये धर्माः\n...उपादानधर्मः ये धर्माः विप्रयुक्ताः, तैः धर्मैः ये धर्माः विप्रयुक्ताः..... ते धर्माः चतुर्भि: एकेनायतनेन ससभिः\nधातुभि: विप्रयुक्ता:; एकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्ित्‌ विप्रयुक्ता:।\n३९८. अनुपादिज्नैः धर्म: ये धर्माः विध्रयुक्ता:, तैः धर्म: विप्रयुक्ताः.... ते धर्मा: न कैश्वित्‌ स्कन्थेन न\nकैश्वित्‌ आयतनैः पश्चमिः धातुभिः विप्रयुक्ताः।\n३९९. उपादानधर्म: ये धर्माः.... क्लेशधर्म: ये धर्माः.... संक्लि्ठधर्मैं: ये\nहल जो चर लासलन बफ ६. जो धर्म सालम्बन धर्मों .... चित्त धर्मों.... चैतसिक धर्मों.... चित्तसम्प्रयुक्त धर्मों.... चित्तसंसृष्ट\n'चित्तसंसूछसम॒त्थान धर्मो.... चित्तसंस्टसम॒त्थानसह/भभू धर्मों .... चित्तसंसृष्टसम॒त्थानानुपरिवर्ती से धर्म विप्रय॒क्त\nबे धर्म एक स्कन्‍्ध से, दस आयतनों और दस धातुओं से विप्रयुक्त\n\nहै, उन धर्मों से जो धर्म विप्रयुक्त है. एक आयतन\n\nऔर एक धातु में आंशिक रूप से विप्रयक्त\n८ जो धर्म अनालप्वन धर्मों ने.... चित्तलिधयुक्त\nकी अना िप्रयक्त है उन बनी से था धर्म विश्नसुत है पान बार स्का,\nविध्रयुक्त हैं; एक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से विध्रयुक्त हैं।\n<. जो धर्म अनुपादि धर्मों से विप्रयुक्त है, उन धर्मों से जो धर्म विध्रयुक्त है..... वे धर्म न किन्ही स्कन्‍्धों से,\nन किन्‍्ही आयतनों और पाँच धातुओं से विप्रयुक्त हैं।\n३९ ६. जो धर्म उपादान धर्मों से.... क्लेश धर्मों से जो धर्म.... संक्लिए धर्मों से जो धर्म\n\n(लो पूर्वाकमों के\nएक आयतन"} +{"id": "indic_deva_eval_000550_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000550_devanagari_page_ocr_9fd3eb1f92a0.jpg", "ocr": "ज48 संयुत्तनिकायपालि\n\nबाव्ठ्हा मे दुक्खा बेदना अभिक्‍कमन्ति, नो पटिक्कमन्ति; अभिककमोसान पज्ञायति, नो\nपटिक्कमो””ति। “सत्तिमे, मोग्गल्लान, बोज्झड्गा मया सम्मदक्खाता भाविता बहुलीकता\nअभिवष्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संबत्तन्ति। कतमे सत्त? सतिसम्बोज्झड्गो खो, मोग्गल्लान,\nमसया सम्मदक्खातो भावितों बहलीकतो अभिज्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति...पे*...\n'उपेक्खासम्बोज्झड्गो खो, मोग्गल्लान, मया_सम्मदक्खातो भावितो बहलीकतो अभिष्ञाय\nसम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति। इमे खो, मोग्गल्लान, सत्त बोज्झड्गा मया सम्मदक्खाता\nभाविता बहुलीकता अभिजष्ञाय सम्बोधाय _निव्बानाय संवत्तन्ती”ति। “तग्घ , भगवा,\nबोज्झड्ग्गा; तग्घ, सुगत, बोज्झड्गा“ति। इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा महामोग्गल्लानो\nभगवतो भासितं अभिनन्दि। बुद्ह्ठि चायस्मा महामोग्गल्लानो तम्हा आबाधा। तथापहीनो\nचायस्मतो महामोग्गललानस्�� सो आबाधो अहोसीति।\n१६. ततियगिलानसुत्तं\n\n१६. एक समय॑ भगवा राजगहे विहरति वेव्छवने कलन्दकनिवापे। तेन खो पन समयेन\nभगवा आबाधिको होति दुक्खितो बाव्ठहगिलानो। अथ खो आयस्मा महाचुन्दो येन भगवा\n(संस्कृतच्छाया)वाढा में द:खा वेदना अभिक्राम्यन्ति, नो प्रतिक्राम्यन्ति; अभिक्रमावसानं प्रजायते, नो\nप्रतिक्रम-डलि। “रासमानि, सोस्गल्लान! बोत्यकगालि सथा सम्यगाख्यातासि भावितासि वहलीकतानि\nअभिज्ञायै सम्बोधाय निर्वाणाय संवर्तन्ते। कतमानि सप्त? स्मृतिसम्वोध्यक्ग खलु, सोग्गल्लान! मया\nसम्यगाख्यात॑ भावित॑ बहलीकृत॑ अभिज्ञायै सम्बोधाय निर्वाणाय संवर्तते ...पे0... उपेक्षासम्बोध्यक्गं\nखलु, काश्यप! मया सम्यगाख्यातं भावितं बहलीकृतम्‌ अभिज्ञायै सम्बोधाय निर्वाणाय संवर्तते। इमानि\nखलु, मोग्गल्लान! सस्त बोध्यड्गानि मया सम्यगाख्यातानि भावितानि बहलीकृतानि अभिज्ञायै\nसम्बोधाय निर्वाणाय संवर्तनते”इति। “तद्धि, भगवन्‌! बोध्यड्गानि; तद्धि, सुगत! बोध्यड्गानि”इति।\nइदमबोचद्‌ भगवान्‌। आस्मना आयुष्मान्‌ सोग्गल्लानों भगवतों भाषितम्‌ अभ्यनन्दत। उत्थितोहि\nचायुष्मान्‌ मोग्गल्लानस्तस्माद्‌ आबाधात्‌। तथा प्रहीण: चायुष्मतों मोग्गल्लानस्यथ स आबाध: अभूत्‌\nइति।\n\n१६.एकस्मिन्‌ समये भगवान्‌ राजगृहे विहरति वेणुवने कलन्दकनिवापे। तस्मिन्‌ खलु पुन: समये\nअगवान्‌ आवाधिको भवति दुःखित: बाढग्लान:। अथ खलु आयुष्मान्‌ महाचुन्द: यत्र भगवान्‌\n(हिन्दी) नहीं भन्‍्ते! मेरी तबियत अच्छी नहीं है, बीमारी घट नहीं रही है, बल्कि बढ़ती ही मालूम होती है।\nमोग्गलान! मैंने यह सात बोध्यंग बताये हैं जिनके भावित और अभ्यास होने से परम-ज्ञान और की प्राप्ति होती है।\nकौन से सात? स्मृति-संबोध्यंग की भावना और अभ्यास होने से परम-ज्ञान और की प्राप्ति होती ...पूर्ववत्‌.\nउपेक्षा-संबोध्यंग की भावना और अभ्यास होने से परम-ज्ञान और की प्राप्ति होती। मोग्गलान! मैंने यही सात\nबोध्यंग बताये हैं, जिनके भावित और अभ्यस्त होने से परमज्ञान और निर्वाण की प्राप्ति होती है। भगवान्‌! आप ने\nबोध्यंगों के विषय में यथार्थ कहा। सुगत! बोध्यंगों के विषय में यथार्थ कहा। भगवान्‌ ने यों उपदेश किया। तथा\nइस उपदेश से सन्त॒ष्ट होकर आयुप्सान्‌ महा-मोग्गलान ने और अनुमोदन\nकिया। आयुष्मान्‌ महा-मोग्गलान उस बीमारी से उठ खड���े हुए। आयुष्मान्‌ महा-मोग्गलान की बीमारी तुरन्त दूर\nहो गई।\n\n१६. एक समय भगवान्‌ राजगृह में वेलुबन वेलुवन कलन्दकनिवाप में विहार करते थे। उस समय, भगवान"} +{"id": "indic_deva_eval_000551_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000551_devanagari_page_ocr_d57de007fa32.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\nश्व7\n\nयंगुणनेमित्तिक”न्ति निव्वचनमिल्कितव्वं। यग्गुणाति एत्थ पन \"यस्स गुणा यग्गुणा”तति\nनिव्बचनं। तथा हि -\n“अपि सब्बज्ञुता पड्ञा, यग्गुणन्तं न जानिया।\nअथ का तस्स विजजञा, त॑ बुद्ध भूगुणं नमे”ति\nपोराणकविरचनायं “यस्स गुणा यग्गुणा”ति निब्बचनमिच्छितब्बं।\nयसइस्स समासम्हि, सद्धिं परपदेहि वे।\nनिग्गहीतागमो वाथ, द्विभावों वा सिया द्विधा॥\nएवं यसद्वस्स समासो सल्लक्खितब्बो।\nइदानि तसद्स्स नामिकपदमाला बुच्चते\nसो, ते। नं, तं, ने, ते। नेन, तेन, नेहि, तेहि, नेभि, तेभि। अस्स, नस्स, तस्स, 'नेसं, तेसं\n(आसं)। अस्मा, नस्मा, तस्मा, नम्हा, तम्हा, नेहि, तेहि, नेभि, तेमि। अस्स, नस्स, तस्स, नेसं,\nतेसं (आसं)। अस्थि, नस्मि, तस्मि, अम्हि, नम्हि, तम्हि, त्यम्हि, नेसु, तेसु। डदं पुल्लिड्गं। एत्थ\nच आसंसदइस्स अत्थिभावे “नेबासं केसा दिस्सन्ति, हत्थपादा च जालिनो”ति गाथा निदस्सनं,\nसो च तिलिड्गो दट्ठब्बो। त्यम्हीति पदस्स अत्थिभावे -\n“यदास्स सील॑ पड्ञछ्च, सोचेय्यडचाधिगच्छति।\nअथ बिस्सासते त्यम्हि, गुय्हल्चस्स न रक्खती”ति\nअये गाथा निदस्सनं। अयमेत्थ रूपविसेसो सल्लक्खितब्बो - अरियविनयेति वा\nसप्पुरिसविनयेति वा। एसे से एके एकक्‍्ड्रेति पाक्ठिप्देसे पच्चत्तेककचनकानमेत तसद्दानं\nएकारन्तनिद्देसोषि दिस्सतीति।\nएत्थ पन तेसद्स्स अत्थुद्धारो बुच्चते - तेसद्दो “न ते सुख पजानल्ति, ये न पस्सन्ति\nननन्‍्दन”स्तिआदीसु तंसद्दस्स वसेन पच्चत्तनहवचने आगतो, “ते न पस्सामि दारके”तिआदीसु\nउपयोगबहुबवचने। “नमो ते पुरिसाजज्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम। नमो ते बुद्ध वीरत्थू”ति च आदीसु\nतुम्हसदस्स बसेन सम्पदाने, तुय्हन्ति अत्थोति बदन्ति। “किन्ते दिद्ठं किन्ति ते दिद्ं, उपधी ते\nसमतिक्कनता, आसवा ते पदालिता”ति च आदीसु करणे। “किन्ते वबतं कि पन\nब्रह्मचरिय\"न्तिआदीसु सामिअत्थे, तबाति अत्थोति वदन्ति। एत्थेत॑ बुल्चति -\n“पच्चत्ते उपयोगे च, करणे सम्पदानिये।\n\n,"} +{"id": "indic_deva_eval_000552_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000552_devanagari_digits_mixed_3a11b3bf1be7.jpg", "ocr": "73५1०४155०५४0"} +{"id": "indic_deva_eval_000553_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000553_indic_mozhi_deva_word_ocr_cadf920c808e.jpg", "ocr": "इंजिनियर"} +{"id": "indic_deva_eval_000554_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000554_hindi_handwritten_word_ocr_39a95fc74c87.jpg", "ocr": "पंखुड़ियां"} +{"id": "indic_deva_eval_000555_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000555_hindi_handwritten_word_ocr_c73fdce11b70.jpg", "ocr": "बर्बर"} +{"id": "indic_deva_eval_000556_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000556_hindi_handwritten_word_ocr_f8134ef70ae3.jpg", "ocr": "न्यूट्रालिटी"} +{"id": "indic_deva_eval_000557_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000557_hindi_handwritten_word_ocr_fbb3a0d7c7b4.jpg", "ocr": "पिरो"} +{"id": "indic_deva_eval_000558_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000558_indic_mozhi_deva_word_ocr_03f5278332d3.jpg", "ocr": "वक्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000559_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000559_indic_mozhi_deva_word_ocr_1ca15c762a5e.jpg", "ocr": "असावा."} +{"id": "indic_deva_eval_000560_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000560_hindi_handwritten_word_ocr_7247d35f624d.jpg", "ocr": "दुनियाँ"} +{"id": "indic_deva_eval_000561_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000561_indic_mozhi_deva_word_ocr_a5047a93c4d2.jpg", "ocr": "समाज"} +{"id": "indic_deva_eval_000562_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000562_devanagari_page_ocr_90ea35384af3.jpg", "ocr": "अलुल्थो परिच्स्डेदो\nही\n\n_ >रेनाजितेनेत्थ, पर्जत्ते आसने सूभे।\nक स्जुनो ॥5॥\n\nलिसीदिस महाथेरा. सहास॒ति सतर>\nतेस्‌ बत्थूस्‌ एकेकं, कमतों रेबतों सहा।\nबेरो बेरं सब्बकारिं. पुच्छिद पुल्ुछासु कोविदो॥52॥\n\nसब्बकामसी सहायेरो. तेन पुद्टोथ ज्याकरि।\n\nसब्बानि तानि वत्थूनि, न कप्पन्ती ति सुत्ततो॥53॥\nनीहरित्वाधिकरणं. त॑ ते तत्थ यथाक्‍कमं।\n\nतत्थेव सद्बमज्झम्हि. पुच्चाविस्सज्जनं करुं॥54॥\nनिरगहं पापभिक्खूनं, दसवत्थुकदीपिनं।\n\nतेस दससहस्सान, महाथेरों अकस्‌ ले॥55॥\nदहरेणाजितेनात्र, प्रजले आसने शुभे।\nन्‍्यसीदन्‌ महास्थविरा:, महासुनिमतज्ञा:।।5॥॥\nतेष्‌ वस्तुषु एकैक, क्रमत: रेवतो महान्‌\nस्थबिर: स्थविरं सर्वकामिनम्‌, अपूच्छत्‌ पृष्टासु कोबिद:।॥52॥।\nसर्वकामी महास्थविर:, तत्र पृष्टोड्थ व्याकरोत्‌।\nसर्वाणि तानि वस्तूनि, न कल्पन्ते इति सूचल:।53|\nनिहत्याधिकरणं, त॑ तै: तत्र यथाक्रमम्‌।\nतथैव सडूघमध्ये, पृष्टा-विसर्जन्त कुलम्‌।।54।।\nनिग्रहं पापभिक्षू्णां, दशवस्तुकदीपनम्‌।\nलेषां दशसहस्त्राणां, महास्थविरा: अक्‌र्वन्‌ ले।55।।\nहिन्दी-वहाँ तरुण भिक्षु अजित द्वारा प्रज्षस सुन्दर आसनों पर विराज कर महासुनि के अभिमत को सर्वः\nवाले महास्थविर उक्त विवाद पर निर्णय करने बैठे।।54|।\nप्रश्न पूछने में अत्यधिक प्रवीण महास्थविर रेवत ने सर्वकामी स्थबिर से उन दश बातों में से प्रत्येक पर क्र\nपूछा।।52॥।\nमहास्थविर द्वारा पूछे गये सभी प्रश्नों का सर्वकामी स्थविर ने धर्मानुकूल उत्तर देते हुए अपना निर्णय देते :\n“सभ�� बातें सूत्र की दृष्टि से धर्मानुमत नहीं हैं, अत: उचित नहीं है\"॥53॥॥\nअस तरह उन आठो महास्थविरों ने उक्त अधिकरण को वहा निश्चित किया। उसी तरह उन्होंने सइूध\nबैठकर भी यथापूर्व प्रश्नोत्तरपूर्वक समाधान किया।।54॥।\nइस तरह महास्थाविरों ने उन दश बातों के समर्थक पापी निर्लज्ज दश हजार शिशुओं को सडूघ से निष्क\nउनका निग्रह किया।।55।।\n\nसंस्कृतच्छाया-"} +{"id": "indic_deva_eval_000563_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000563_indic_mozhi_deva_word_ocr_0d67cbc7a7a5.jpg", "ocr": "करके"} +{"id": "indic_deva_eval_000564_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000564_indic_vision_bench_deva_ocr_b6d4ea93428b.jpg", "ocr": "वस्तुस्थिती अशी आहे की समाजात उच्चकनिष्ठ असा जो भेदभाव असतो, त्याच्याविषयीची जाणीव मुसलमानांत तेवढी तीव्र नाही. धार्मिकदृष्ट्या सर्व मुसलमानांना एकत्र आणणाऱ्या आणि बंधुत्वाची घोषणा देणाऱ्या इस्लामच्या सैद्धांतिक विचारसरणीने सामान्य मुसलमान असा भारावून गेला आहे की ईश्वरासमोर सर्व समान असणे आणि ऐहिक जीवनात समान असणे या दोन्हीतील फरकच तो समजू शकत नाही. इस्लामने त्याला मशिदीत बादशहांच्यादेखील खांद्याला खांदा लावून नमाज पढण्याचे स्वातंत्र्य दिले आहे. या बंधुत्वाच्या भावनेने तो असा भारावला जातो की भाजीच्या किंवा मासळीच्या बाजारात तो अमिराशी समान नसतो हे काही त्याला आकलन होत नाही. त्याच्या दृष्टीने मशीद आणि मासळीबाजार यात काही फरक नसतो. नाही तरी उमर खलिफाने म्हटलेच आहे, “मुसलमानाला मशिदीत तो काय करतो यावरून ओळखू नका. तो बाजारात काय करतो यावरून ओळखा.\" म्हणून तर उत्तरप्रदेशची जमीनदारी नष्ट केल्यामुळे गरीब मुसलमानांना दुःख झाले. वस्तुतः श्रीमंत मुसलमान जमीनदार आणि सामान्य मुसलमान यांचे हितसंबंध परस्परविरोधी होते. परंतु मुसलमान तसे मानीत नाहीत. जमीनदाराच्या हितसंबंधांचे रक्षण करणे हे त्याच्या दृष्टीने इस्लामच्या हितसंबंधाचे रक्षण करणे ठरते.\nभारतात गेल्या काही वर्षांत झालेल्या दंगलींचे नीट निरीक्षण केले तर असे दिसून येते की या दंगली प्रामुख्याने नव्याने निर्माण झालेल्या औद्योगिक केंद्रांत झालेल्या आहेत. रांची. जमशेदपूर, अहमदाबादचा औद्योगिक विभाग ही दंगलींची केंद्रे आहेत आणि येथे कामगारांनी कामगारांचे गळे कापले आहेत. काय चुकते आहे? कामगार तर आर्थिक हितसंबंधांनी एकत्र आलेले असतात! मग धर्मभावनेने प्रज्वलित होऊन ते एकमेकांचे मुडदे पाडीत आहेत, ह्या घटनेचा अर्थ कसा लावायचा? परंतु कामगारांच्या ऐक्याची घोषणा कम्युनिस्ट करीतच असतात. कामगार हा फक्त बोनस व पगारवाढीसाठी एकत्र येतो. एरवी जात आणि धर्मगट यात तो विखुरला गेला आहे आणि जे सामाजिक तणाव इतरत्र अस्तित्वात आहेत त्यांचे प्रतिबिंब कामगारांत उमटले जाते. परंतु या वस्तुस्थितीकडे कम्युनिस्ट पक्षाने सोयीस्करपणे डोळेझाक केली आणि ठोकळेबाज आर्थिक सिद्धांतांच्या चष्म्यातून सतत या प्रश्नाकडे पाहिले.\nया ठोकळेबाज आर्थिक सिद्धांतांचा अंगीकार केल्यामुळे कम्युनिस्टांना सोयीस्करपणे अनेक प्रश्नांना बगल मात्र देता आली. म्हणूनच हरिजन प्रश्नावर कम्युनिस्ट फारसे काम करताना दिसत नाहीत, आणि मुस्लिम जातीयवादाच्या प्रश्नावर बोलणाऱ्याला ते सी. आय. ए. किंवा जनसंघाचा हस्तक ठरवितात. सारे काही कम्युनिस्ट क्रांती झाल्यानंतर ठीक होईल असे त्यांचे याला उत्तर आहे. कम्युनिस्ट क्रांती झाली की जातिसंस्था आपोआप कोसळून पडेल आणि समान नागरिक कायदा व्हावा म्हणून कम्युनिस्टांकडे मुसलमान हट्ट धरतील अशी ही रम्य कल्पना आहे. फक्त कम्युनिस्ट क्रांती व्हावी कशी? हिंदू जातींचा बुजबुजाट मोडून काढल्याखेरीज आणि मुस्लिम मनावरील धर्मभावनेचा जबरदस्त प्रभाव नष्ट केल्याखेरीज भारतात आर्थिक समानतेचे युगदेखील येणे कठीण आहे. केवळ आर्थिक लढे लढवून येथे नवी समाजव्यवस्था अंमलात येणार नाही. याचा अर्थ आर्थिक लढे महत्त्वाचे नाहीत असे नव्हे. ते\nसमारोप /२०५"} +{"id": "indic_deva_eval_000565_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000565_indic_mozhi_deva_word_ocr_170ac5739731.jpg", "ocr": "लैला"} +{"id": "indic_deva_eval_000566_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000566_hindi_handwritten_word_ocr_b4ef8a327d7a.jpg", "ocr": "फिनॉमिना"} +{"id": "indic_deva_eval_000567_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000567_devanagari_page_ocr_82fee2f8961e.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n436: न्‍\n\nअनप्पक”\"स्तिआदीसु उपचितल्ति अत्थों। “दिद्ठं सुतं मुतं विड्ञात”ल्तिआदीसु सद्दोति अत्थो।\n“बहुस्सुतो होति सुतधरो सुतसन्निचयो”तिआदीसु सोतद्वारानुसारविज्ञातधम्मधरोति अत्थो।\nसोतसद्दोपि अनेकत्थप्पभेदो। तथा हेस -\nमंसविच्ञाणजआाणेसु, तण्हादीसु च दिस्‍्सति।\nधाराय॑ अरियमग्गे, चित्तसन्‍्ततियम्पि च॥\n\n“सोतायतनं, सोतधातु, सोतिन्द्रिय”न्तिआदीसु सोतसद्दो मंससोते दिस्सति, “सोतेन सद्ध\nसुत्वा\"तिआदीसु सोतविज्ञाणे। “दिव्बाय सोतधातुया\"तिआदीसु आणसोते। “यानि सोतानि\nलोकस्मि��्ति, यानि एतानि सोतानि मया कित्तितानि पकित्तितानि आचिक्खितानि देसितानि\nपज्ञपितानि पट्ठपितानि विवरितानि विभत्तानि उत्तानीकतानि पकासितानि। सेय्यथिदं?\nतण्हासोतो दिद्लिसोतो किलेससोतो दुलत्चरितसोतो अविज्जासोतो”तिआदीसु पड्चसु धम्मेसु।\n“अद्दसा खो भगवा महन्तं दारुक्खन्धं गडगाय नदिया सोतेन बुय्हमान”न्तिआदीसु उदकधारायं।\n“अरियिस्सेत॑ आवुसो अद्गड्डिगकस्स मग्गस्स अधिवचनं, यदिद॑ सोतो”तिआदीसु अरियमग्गे।\n“पुरिसस्स च विज्ञाणसोत॑ पजानाति उभयतो अब्बोच्छिन्नं इधलोके पतिट्ठितञ्च परलोके\nपतिद्ठितज्चा \"तिआदीसु चित्तसन्‍्ततियन्ति।\n\nसोणोति सुनखो। सो हि सामिकस्स वचन सुणातीति सोणोति वुच्चति।\n\nइसानि तदभिधानानि -\n\nसुनखो सारमेय्यो च, सुणो सूनो च कुक्‍्कुरो।\nसोणों स्वानों सुवानो च, साव्छुरो मिगदंसनो॥\nसा सुनिधाति'मे सद्दा, पुमानेसु पवत्तरे।\nसुनखी कुक्‍्कुरी सी'ति, इमे इत्थीसु वत्तरे॥\nसुनखा सारमेय्याति, आदि बहुबचो पन।\nपवत्तति पुमित्थीस, अच्ञत्नापि अय॑ नयो।\nकुक्‍्कुरोति अय॑ तत्थ, बालकाले रवबेन वे।\nमहल्लकेपि सुनखे, रूव्छिहया सम्पबत्तति॥\n\nतथा हि अट्ठछकथाचरिया कुक्कुरजातके “ये कुक्कुरा राजकुलम्हि बड्जा, कोलेय्यका\nवण्णबलूपपन्‍ना”तिइमस्मिंपदेसे एबमत्थं बण्णयिंसु “ये कुक्कुराति ये सुनखा। यथा हि तरुणोपि"} +{"id": "indic_deva_eval_000568_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000568_devanagari_page_ocr_3c9f85978733.jpg", "ocr": "208 अनुपिटके\n\nअथ खो मिलिन्दस्स रज्जो एतद'होसि- “सब्बं मया सुपुच्छितं, सब्ब॑ भदन्‍्तेन नागसेनेन\nसुविसज्जित॑\"ति। आयस्मतों पि नागसेनस्स सझुघारामगतस्स एतदहोसि- “किं मिलिन्देन रच्जा\nपुच्छितं, कि मया विसज्जितं”\"ति। अथ खो आयस्मतो नागसेनस्स एतदहोसि- “सब्बं मिलिन्देन\nरख्ञा सुपुच्छितं, सब्ब॑ मया सुविसज्जितं\"ति।\n\nअथ खो आयस्मा नागसेनो तस्सा रक्तिया अच्चयेन पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा\nपत्तचीवरमा'दाय येन मिलिन्दस्स रज्जो निवेसनं तेनुपसडकमि। उपसड्कमित्वा पठ्ञत्ते आसने\nनिसीदि। अथ खो मिलिन्दो राजा आयस्मन्तं नागसेनं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि, एकमन्तं\nनिसिन्‍नो खो मिलिन्दों राजा आयस्मन्तं नागसेनं एतदवोच - “मा खो भदनन्‍्तस्स एवं अहोसि\n“नागसेनस्स मया, पड्ह़ो पुच्छितोति। तेनेव सोमनस्सेन तं रक्तावसेसं वीतिनामेसीति न ते एवं\nवट्छब्बं। तस्स मय्हं, भन्‍्ते, त�� रत्तावसेसं एतदहोसि- “किं मया पुच्छितं, कि भदन्तेन\nविसज्जितं'ति, 'सब्बं मया सुपुच्छितब्बं, सब्बं॑ भदन्‍्तेन सुविसज्जितं””ति।\nसंस्कृतच्छाया- अथ खलु मिलिन्दस्य राज्ञ एतदभूत्‌- \"सर्व मया पृष्ठ, सर्व भदन्तेन नागसेनेन\nसुविसर्जितमि\"ति। आयुष्मतोऊपि नागसेनस्थ सडूघारामगतस्य राज्ञा पृष्ठ कि\nमया विसर्जितमि\"ति। अथ खल्वायुप्मतो नागसेनस्वैतदमूत- सर्व मिलिन्देन राजा सुपृ्ट, सर्व मया\nसुविसर्जितमि\"ति।\n\nअथ खल्वायुष्मान्नागसेनस्तस्था रात्रेरत्ययेन पूर्वाह्लसमयं निवास्य पात्रचीवरमादाय येन\nमिलिन्दस्य राज्ञों निबसन॑ तेनोपसमक्रमीत्‌। उपसडक्रम्य प्रज्ञम आसने न्‍्यघदत्‌। अथ खलु मिलिन्दो\nराजाडथ्युष्मन्तं नागसेनमभिवाच्कान्तं न्‍्यपदत्‌। एकान्‍्त॑ निषण्ण: खलु मिलिन्दो राजा आयुष्मन्त\nनागसेनमेतदवोचत्‌- \"मा खलु भदन्‍्तस्वैतदभूत्‌- नागसेनस्य मया प्रश्न: पृष्ट:\"इति। तेनैव सौमनस्येन त॑\nराज्यवशेष॑ व्यत्यनैषीदिति, न ते एवं द्रष्टब्यं। तस्य मम, भदन्‍्त, त॑ राज्यवशेषमेतदभूत्‌- कि मया पृष्ठ कि\nअदन्तेन विसर्जितमिति? सर्व मया सुप्रष्टव्यं, सर्व भवन्तेन सुविसर्जितमि\"ति।\nहिन्दी- नागसेन के चले जाने के बाद राजा मिलिन्द अपने ही आप उन प्रश्नों और उत्तरों पर विचार करने लगा।\nउसने देखा- “मेरे सभी प्रश्न अच्छे थे और उनके उत्तर भी वैसे ही बहुत समीचीन थे।\" सडूघाराम पहुँचने पर\nआयुष्मान्‌ नागसेन को भी यही विचार हए।\n\nदूसरे दिन प्रातःकाल ही अपना चीवर पहन पात्र ले आयुष्मान्‌ नागसेन राजा के महल पर आए और\nबिछे आसन पर बैठ गये। राजा मिलिन्द भी प्रणाम कर आदर के साथ एक ओर बैठ गया और बोले-\nआप ऐसा न समझें कि रात भर मैं इसी हर्ष में जागा रहा कि आयुष्मान्‌ नागसेन से मैंने बहुत जटिल प्रश्न पूछे;\nकिन्तु मैं यही विचार करता रहा कि क्या मेरे प्रश्न उच्चित और उनके उत्तर संतोषजनक थे? अन्त में उन्हें वस्तुतः\nवैसा ही पाया।\""} +{"id": "indic_deva_eval_000569_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000569_indic_mozhi_deva_word_ocr_1a293e44aa56.jpg", "ocr": "जीवन"} +{"id": "indic_deva_eval_000570_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000570_indic_vision_bench_deva_ocr_1af74b2763b1.jpg", "ocr": "मुसलमानी मुलखांतली मुशाफरी\nम्हणजे राघो भरारीची अर्ध्या दिवसाची मजल आहे. सिंधुनद पार होण्यास एकच मार्ग त्या काळीं उपलब्ध होता आणि तो किल्ल्याच्या पायथ्याशीं असे; म्हणजे नाकेबंदी कशी पूर्ण होई हें ध्यानांत येई���. या किल्ल्यांत आजमितीसही ब्रिटिशांनी तोफा व पलटण ठेवून त्याचे महत्त्व ओळखलें आहे.\nह्या किल्ल्यांत अर्थातच मराठ्यांच्या पराक्रमाचें कांहीच अवशिष्ट स्मारक नाही. पेशावरच्या रस्त्यावर ब्रिटिश सैन्याने केलेल्या बारीकसारीक कामगिरीचे वर्णन शिलांकित करून लहानसे का होईना पण स्मारक केलेलें आढळतें. पण या जगड्ड्याळ पराक्रमाचा कांही मागमूसही लागत नाही ! सरकारी गॅझेटिअरमध्ये अकबराने हा किल्ला बांधतांना कोणत्या लोकांना बळी दिले त्यांची नांवें किंवा ब्रिटिशांनी किल्ला घेतांना कामास आलेल्या क्षुल्लक अधिकाऱ्यांच्या पराक्रमाचें (?) वर्णन सांपडतें; परंतु मराठ्यांनी हा किल्ला पंधराशें मैलांची मजल मारून हस्तगत केला या पराक्रमाचा निर्देशही नसावा काय?\nह्या किल्याच्या पायथ्याला जी वस्ती आहे ती बहुधा मुसलमानांचीच आहे आणि त्यांच्या मशिदी वगैरे धार्मिक स्थानेंही तेथे आहेत. त्यांच्या बाजूस एक शिवालय जीर्णोद्धरित असून, अटकेंंत असलेलेंं हिंदु मंदिर काय तेंं एकच ! तेथे कदाचित् मराठ्यांच्या पराक्रमाची खूण सापडेल या आशेने जावे तर वेगळाच इतिहास कळतो. किल्ला बांधला अकबराने हे खरं, पण त्याच्या बरोबर मानसिंग, तोडरमल, बिरबल (?) इत्यादि हिंदु मंडळी असल्याने त्यांनी आपल्या पूजेसाठी शिवमंदिरही बांधविलें, तेंं किल्ल्याच्या अगदी द्वारासमीप होते. परंतु मध्यंतरीच्या काळांत काय झालें कोणास ठाऊक, देवालयाच्या इतर भागाचा विध्वंस होऊन तेथे सर्व मुसलमानी वस्ती आली आणि\n१०"} +{"id": "indic_deva_eval_000571_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000571_devanagari_page_ocr_a772d2083025.jpg", "ocr": "महावंसो\n\nहा ह 469\n\nहेसभाजनकण्डं च, सिविकं च महारहं।\n\nहरीटकं॑ आमलकं, महग्घं अमतोसधं॥34॥\n\nसुकाहटानं सालीनं, सट्ठिवाहसतानि च।\n\nअभिसेकोपकरणं, परिवारविसेसितं॥32॥\n\nदत्वा काले सहायस्स, पण्णाकारे नरिस्सरो।\n\nदूते पाहेसि सद्धम्मपण्णाकारमिसम्पिच॥ 33॥\n\nअहं बुद्धं च धम्म॑ च, सर्च च सरणं गतो।\n\nउपासककत्त॑ देसेसिं, सक्‍्यपुत्तस्स सासने॥34॥\n\nत्वं पीमानि रतनानि, उत्तमानि नरुत्तम।\n\nचित्त पसादयित्वान, सद्धाय सरणं भज\"॥35॥\n\nकंस्कृतच्छाया- _ हेमभाजनकण्ड, शिविकञ्व महाईम।\nहरितकम्‌ आमलकं, महार्घममृतौषधम्‌।।34॥।\nशुकाहटानां शालीनाम्‌, षष्टि वाहशतानि च।\nअभिषेकोपकरणम्‌, परिवारविशेषितम्‌।॥। 32।।\nदल्वा काले सहायस्य,पर्णाकारं नरेश्वर:।\nदू��े प्राहार्षीत्‌ सद्धर्मपर्णाकारं इसमपि च।।33।।\nअहं बुद्धञ्व धर्मझ, सड्घञ्च शरणं गतवान्‌।\nउपासकरत्व अदाम्‌, शाक्यपुत्रस्थ शासने।।34॥।\nत्वमपि इमानि रल्ानि, उत्तमानि नरोत्तम।\nजित्तं प्रसीद्य, श्रद्धाया: शरणं भज।॥।35॥।\n\nहिन्दी- सुवर्ण पात्र, अमूल्य पालकी, हर्रैं, आँवला, बहुमूल्य अमृतौषध, मानसरोवर से तोतों द्वारा लाये गये\n\nशलिधान के साठ सौ बाह, अभिषेक की सामग्री, परिवारविशेष सहित।।3-32॥॥\n\nराजा ने यह सद्धर्म का प्रशंसा-बोधक पत्र भी दूतों के साथ भेजा।।33॥॥\n\n“नरश्रेष्ठ! मैं तो बुद्ध, धर्म एवं सड्ूघ की शरण में चला गया हैँ। मैंने भगवान्‌ बुद्ध के शासन का उपासकत्व स्वीकार\nकर लिया है।।34॥॥\n\n“राजन्‌! आप भी इस रख्नों के प्रति अपने चित्त में श्रद्धा उत्पन्न कर इनकी शरण में चले जॉय”॥॥35॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000572_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000572_devanagari_page_ocr_282705c6004d.jpg", "ocr": "सतानि सत्त भिक्‍्खूनं, अरहन्तानमु|\nकाव्ठासोकेन रक्खिता।\n\nते सब्बे कक रू धम्मसड-गहं॥63॥\nरेवतत्थेरपामोक्खा, डे\n\nचुब्बे कं तथा एव, धम्म॑ पच्छा च भासित॑।\n#< निद्वापेसूं तं, एतं मासेहि अट्ठृहि॥64॥\n\nआदाय सुं\nएवं दुतियसंगीतिं, कत्वा ते पि महायसा।\n् कालेन निब्बुति॥65॥\n\nथेरा दोसक्खयं पत्ता, पत्ता का ऑफ इसाओें\nइति परममतीन॑ पत्तिपत्तब्बकानं, तिभवहितकरान ॥\nसुमरिय मरणं त॑ सद्भ॒तासारकत्तं, परिगणियमसेसं अप्पमत्तो भवेय्या ति॥66॥\n\nसुजनप्पसादसंवेगत्थाय कते\n\nमहाजसे दि कक सं नाम\nपरिच्छेदो।\nपिटकत्रयधारिणाम्‌।\n\nसंस्कृतच्छाया- ब्भिन्नार्थादिज्ञातानां,\nशतानि ससभिक्षूणां, अर्हन्तानामुच्चास्पदम्‌।। 62॥।\nते सर्वे बालुकारामे, कालाशोकेन रक्षिता:।\nरेवतस्थविरप्रामोक्षाः, अकुर्वन्‌ धर्मसड्ग्ग्रहम्‌।।63॥।\nचूर्वे कृतं तथा एव, धर्म पश्चात्‌ च भाषितम्‌।\nआदाय न्यतिष्ठत्‌ तत्‌, एषा मासै अष्टभि:।॥64।।\nएवं द्वितीयसंगीतिं, कृत्वा तेडपि महायशा:।\nस्थविरा दोषक्षयं प्राप्ता:, प्राप्ताः: कालेन निर्वत्ति॥65।।\n\nइति परममतीनां प्राप्तिप्रासव्यकानां त्रिभवहितकराणां लोकानाथरसानाम्‌।\nपरिगणीयमशेषमप्रमत्तों भवेदिति।।66।।\n\n32 सुस्मर्य मरणं त॑ संस्कृता सारकृत्व॑ परिण\nकहत्सः कत्त ज्ञादे त्रतिसंविदाओों में निपुण, समग्र त्रिपिटक कण्ठाग्र रखने वाले सात सौ भिक्षुओं का चयन\n\nकिया।॥62॥।\nबे सभी भिक्षु राजा कालाशोक के संरक्षण में तथ��� रेवत स्थविर की प्रधानता में, वैशाली के बालुकारामविहार में\nएकत्र होकर धर्म का सड्गायन करने लगे।॥63॥।\n\nमें उसकी घोषणा की गयी, उसी तरह यहाँ भी\n\nजिस तरह प्रथम सड्गीति में पहले धर्म का संग्रह किया गया, बाद\nउद्धहण कर आठ मास में यह सड्गीति सम्पन्न हुई॥॥64।॥\n\nइस द्वितीय धर्मसडगीति के सभी सहयोगी महायशस्वी स्थविर अपने चित्तमलों का सर्वथा क्षय करते हुए, तथा\nअन्त में समय आने पर, परिनिर्बाण को प्राप्त हुए।॥65।।\n\nअत: परम बुद्धिमान, सफलमनोरथ, तीनों ओनियों के हितैषी लोकनाथ भगवान्‌ बुद्ध के उत्तराधिकारी उन\nस्थविरों के देहपात का स्मरण करते हुए हम को भी जीवन की क्षणभड्गुरता के प्रति अप्रमत्त नहीं रहना\n\nचाहिये।।66॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000573_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000573_indic_mozhi_deva_word_ocr_8f0c6141de6c.jpg", "ocr": "जिसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000574_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000574_indic_mozhi_deva_word_ocr_d8e70dae8d57.jpg", "ocr": "उनके"} +{"id": "indic_deva_eval_000575_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000575_hindi_handwritten_word_ocr_47d1bfc055e0.jpg", "ocr": "टांग"} +{"id": "indic_deva_eval_000576_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000576_indic_mozhi_deva_word_ocr_5f8b2d74ca8c.jpg", "ocr": "मैंने"} +{"id": "indic_deva_eval_000577_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000577_devanagari_page_ocr_7bd12caba60a.jpg", "ocr": "आरक्खदायकवग्गो वाह\n\n5. पुप्फासनदायकत्थेरअपदानं\n“सुवण्णवण्णं सम्बुद्धं, पीतरंसिंव [सतरंसिंव (सी* स्या*)] भाणुम॑।\nअविदूरेन गच्छन्तं, सिद्धत्थं अपराजितं॥547॥\n“तस्स पच्लुग्गमित्वान, पवेसेत्वान अस्सम।\nपुप्फासनं मया दिन्नं, विप्पसन्नेन चेतसा॥548॥\n“अज्जलिं पर्गहेत्वान, बेदजातो तदा अहं।\nबुद्धे चित्त पसादेत्वा, त॑ कम्म॑ परिणामयिं॥549॥\n“ये मे अत्थि कत॑ पुछ्जं, सयम्भुम्हपराजिते।\nसब्बेन तेन कुसलेन, विमलो होमि सासने॥520॥\n“चतुन्नवुतितो कप्पे, पुप्फासनमदं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, पुप्फासन स्सिदं फलं॥524॥\n\n“सुबर्णवर्ण सम्बुद्धम, पीतरश्मिरिव भानुसान्‌।\nअविदूरेण गच्छल्तम्‌, सिद्धार्थम्‌ अपराजितम्‌॥547॥\n“तस्मै प्रत्युद्धत्य, प्रविश्य आश्वममा\nपुष्पासन मया दत्तम्‌, विप्रसन्‍नेन चेतसा॥548॥\n“अछ्जलिं प्रगृह्य, वेदजात: तदा अहम्‌।\nबुद्धे चित्त प्रसाआय, तत्‌ कर्म परिणामयम्‌॥59॥\n“यन्मे अस्ति कूत॑ पुण्यम्‌, स्वयम्भ्वहममपराजिते।\nसर्वेण तेन कुशलेन, विमलो भवामि शासने॥520॥\n“चतुर्णबतितमे कल्पे, पुष्पासनमदां तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, पुष्पासनस्थेदं फलम्‌॥52॥\nकली रब्मि से युक्त भानु के समान सुवर्ण वर्ण वाले सम्बु��्ध, सिद्धार्थ अपराजित के समीप ॥547॥\nमेरे द्वारा आश्रम में प्रवेश कर अत्यधिक प्रसन्नमन से उनका स्वागत कर पुष्प-आसन प्रदान किया\nगया॥548॥\nअज्जलि-बद्ध हो बुद्ध में चित्त को प्रसादित कर मैं अत्यन्त आनन्दित हआ। यह उस कर्म का ही सुपरिणाम\nहै॥549॥\n___ स्वयम्भू अपराजित के लिए मैंने जो पुण्यकर्म किया था, उन सभी कुशलकर्मों से मैं बुद्धशासन में विमल\nहो गया॥520॥\nअब से 94 वें कल्प में मैंने जो पुष्प आसन का दान किया था, यह उस कर्म का ही सुपरिणाम है कि मैं\nदुर्गति को नहीं जानता॥524॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000578_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000578_hindi_handwritten_word_ocr_d1f4c1854851.jpg", "ocr": "निचले"} +{"id": "indic_deva_eval_000579_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000579_devanagari_page_ocr_b11d4faf18da.jpg", "ocr": "अट्ठारसमों परिच्छेदो\n\n270\n\nभिक्खुसड्घो साधुकारं, तुद्गचित्तो पवेदयि।\n\nचेलुक्खेपसहस्सानि, पवत्तिंसु समन्‍्ततो॥46॥\n\nएवं सतेन मूलानं, तत्थ सा गन्धकद्दमे।\n\nपतिट्रासि महाबोधि, पसादेन्ती महाजनं॥47॥\n\nतस्सा खन्‍्धों दसहत्थो, पछडच साखा मनोरमा।\n\nचतुहत्था चतुहत्था, दसड्डफलमण्डिता॥48॥\n\nसहस्सन्तु पसाखानं, साखानं तासमासि च।\n\nएवं आसि महाबोधि, मनोहरसिरिधरा॥49॥\n\nकटाहम्हि महाबोधि-पतिट्ठितक्खणे मही।\n\nअकम्पि पाटिहीरानि, अहेसुं विविधानि च॥50॥\n\nसंस्कृतच्छाया- भिक्षुसडूघो साधुकारं, तुष्टचित्त: प्रावेदयत्‌।\nचेलोल्क्षेपसहसत्राणि, प्रावारिषु: समन्‍्ततः।।46।।\nएवं शतेन मूलानां, तत्र सा गन्धकर्दमे।\nप्रतिष्ठासि महाबोधि, प्रसादयन्ति महाजनम्‌।।47॥।\nतस्याः स्कन्धो दशहस्तः, पद्चशाखा: मनोरमाः।\nचतुर्हस्ता: चतुर्हस्ता:, दशार्धफलमण्डिता:।।48।।\nसहवस््र तु प्रशाखानां, शाखानां तासामासीज्चा\nएवमासीत्‌ महाबोधि, मनोहरश्रीधरा।।49।।\nकटाहे महाबोधि-प्रतिष्ठितक्षणे मही।\n\nअकसम्पत्‌ प्रातिहार्याणि, अभूवन्‌ विविधानि च।।50।।\n\nहिन्दी- भिक्षसझच भी प्रह्मण्ट हो कर साधुवाद कह उठा तथा वहाँ प्रह्र जनता द्वारा हजारों वस्त्रपताकाएँ फहरायी\nगयीं।।46।।\n\nबह महाबोधि की दक्षिण शाखत्रा एक सौ सडख्या में विस्तृत हो कर उस वर्ण कटाह में फैल गयी, इसे देखकर\nअत्यन्त प्रसन्न हुआ।।47॥।\n\nउसका दश हाथ लम्बा स्कन्‍्ध, चार-चार हूा£\n\nकक दब शासल लम्बी पॉच-पॉच फलवाली पॉच सुन्दर शाखाएँ इसी\n\nहल 2 आ तथा छोटी शाखाओं से ओजित वह महाबोधि अतीब रमणीय लग रही थी।।48-49॥। उसी\nज्यों ही वह महाबोधि शाखा उस सुवर्ण-कटाह़ में प्���तिष्ठित ५०७७४\nसमय इसी तरह के अन्य अनेक चमत्कार भी डाए।50॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000580_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000580_devanagari_page_ocr_7aee3e3dca37.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\nप6 द्दनी |\n\nसज्झ्िमपुरिसा, मि म॒ इति उत्तमपुरिसा, ते अन्ते इति पठमपुरिसा, से व्हे इति मज्झिमपुरिसा,\nए म्हे इति उत्तमपुरिसा।\n\n'पठममज्झिसुत्तमपुरिसेसुषि ति-इति एकबचनं, अन्ति-इति बहुवचनन्ति एवं\nएकबचनबह॒वचनानि कमतो जेय्यानि। एवं सेसासु विभत्तीसु\nपरस्सपदत्तनोपदपठममज्म्िमुत्तमपुरिसिकवचनबहुवचनानि जेय्यानि।\n\nतत्थ विभत्तीति केनड्रेन विभत्ति? कालादिवसेन धात्वत्थं विभजतीति विभत्ति, स्यादीहि\nनामिकविभत्तीहि सह सब्बसड्गाहकबसेन पन सकत्थपरत्थादिभेदे अत्थे बिभजतीति विभत्ति,\nकम्मादयों वा कारके एकबचनबहुबचनवसेन विभजतीति विभत्ति, विभजितब्बा आणेनातिपि\nविभत्ति, विभजन्ति अत्थे एतायातिपि विभत्ति, अथ वा सतिपि जिनसासने अविभत्तिकनिद्देसे\nसब्बेन सब्बं विभत्तीहि बिना अत्थस्सा'निद्वधिसितब्बतो विसेसेन विविधेन वा आकारेन भजन्ति\n\nसेवन्ति न॑ पण्डितातिपि विभत्ति। तत्थ अविभन्तिकनिद्वेसलक्खणं बदाम सह\nपयोगनिदस्सनादीहि।\n\nअविभत्तिकनिद्देसो, नामिकेसुपलब्भति।\nनाख्यातेसूति विज्ञेय्य-मिदमेत्थ निदस्सनं॥\nनिग्रोधोब महारुक्खो, थेर बादानमुत्तमो।\nअनून॑ अनधिकड्च, केवल जिनसासनं॥\n\nतज्न थेर-इति अविभत्तिको निद्धेसो, थेरानं अयन्ति थेरो। को सो? वादो। थेरवादो अज्झेसं\n\nबादानं उत्तमोति अयमत्थो वेदितब्बो।\n\n“कायो ते सब्ब सोवण्णो”, इच्चादिम्हिपि नामिके।\n\nअविभक्तिकनिद्देसो, गहेतव्वों नयज्जुना॥\n\nअविभत्तिकनिद्देसो, नन्‍्वाख्यातेपि दिस्सति।\n\n“भो खाद पिव”इच्च्चत्र, वदे यो कोचि चोदको॥\n\nयदि एवं मतेनस्स, भवेय्य अविभत्तिकं।\n\n“अ्िक्‍्खु, भो पुरिसि”च्चादि, पदम्पि, न हिंदं तथा॥\n\n“म्िक्‍्खु, भो पुरिसि”च्चादि, सि ग लोपेन वुच्चति।\n\nतथा “खादा\"”तिआदीनि, हि लोपेन पबुच्चरे॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000581_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000581_devanagari_page_ocr_564ee9f3642f.jpg", "ocr": "434 अपदानपालि\n“तब आणेन सब्बज्ञ्ु, मोचेसिमं सदेवकं।\n'तब॑ आराधयित्वान, जातिया परिमुच्चरे॥2085॥\n“अदस्सनेन सब्बज्जु, बुद्धानं सब्बदस्सिनं।\nपतन्तिवीचिनिरयं, रागदोसेहि ओफुटा [ओत्थटा (स्यथा०)]।2086॥\n“तब दस्सनमागम्म, सब्बज्जु लोकनायक।\nपसुच्चन्ति भवा सब्बा, फुसन्ति अमतं पदं॥2087॥\n““यदा बुद्धा ���क्खुमन्‍्तो, उप्पज्जन्ति पभडन्करा।\n'किलेसे झापयित्वान, आलोकं दस्सयन्ति ते'॥2088॥\n“कित्तयित्वान सम्बुद्ध, तिस्सं लोकग्गनायकं।\nहट्ढो हड्लेल चित्तेन, तिणसूलं अपूजयिं॥2089॥\n'तव ज्ञानेन सर्वज्ञ, अमु्चवत्‌ मां सदेवकम्‌।\nल्वाम्‌ आराध्य, जात्याः परिमुख्चते॥2085॥\n“अदर्शनेन सर्वज्ञ:, बुद्धानां सर्वदर्शिणम्‌।\nपतन्त्यवीचिनिरयम्‌, रागदोचै अवस्पृष्टा॥2086॥\n“तब दर्शनमागत्य, सर्वज्ञो लोकनायकः\nप्रमुशचच्ति भवा: सर्वाः, स्पृषन्ति अमृत पदमु॥2087॥\n““यदा बुद्धा: चक्षुष्मन्तः, उत्पद्यच्ति प्रभड्करा:।\nक्लेशान्‌ ध्मापयित्वा, आलोकं दर्शयन्ति ते'॥2088॥\n“कीर्च॑यित्वा सम्बुद्धम, लिष्यं लोकाग्रनायकम्‌।\nहृष्टो हष्टन चित्तेन, तृणशूलम्‌ अपूपुजम्‌॥2089॥\n\nहै सर्वज्ञ! आप अपने ज्ञान से देवताओं सहित मुझे मुक्त करें और तुम्हारी आराधना कर मैं जन्म से मुक्त\nहोऊँगा॥2085॥\nबिना देखे ही सर्वज्ञ बुद्ध सब कुछ देख लेते हैं और राग द्वेष से युक्त जनों को नरक में\nगिरते हुए देख लेते हैं॥2086॥\nउन सर्वज्ञ लोकनायक के दर्शन के लिए आये हुए सभी भव से मुक्त हो जाते हैं और अमृत पद को प्रास\nकरते हैं॥2087॥\nजब चक्षुमान्‌ बुद्ध प्रभडकर उत्पन्न होगें तब क्‍्लेशों को नष्ट कर वे आलोक प्रदर्शित करेंगे॥:2088॥\nसम्बुद्ध लोकनायक तिष्य का कीर्तन कर अत्यश्िक प्रसन्नमन से मैंने तणशूल की पूजा की॥2089॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000582_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000582_devanagari_page_ocr_290c8cfd324b.jpg", "ocr": "अपदानपालि क््ड\n\n“कड्व्वनग्धियसड्न्कासं, बुद्धं लोकग्गनायकं।\n\nइन्दीवरंव जलितं, आदित्तंव हृतासनं॥4568॥\n“ब्यग्घूसभंव पवरं, अभिजातंव केसरिं।\n\nनिसिन्‍न॑ समणानग्गं, भिक्खुसड्ःघपुरक्खतं॥ 569॥\n“बन्दित्वा सत्थुनों पादे, पक्‍कामिं उत्तरामुखो।\n\nचतुन्नवुतितो कप्पे, गन्धमालं यतो अदं॥4570॥\n“बुद्धे कतस्स कारस्स, फलेनाहं विसेसतो।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजायिदं फलं॥4574॥\n\n“चत्तारीसम्हि एकूने, कप्पे आसिंसु सोव्ठस।\n\nदेवगन्धसनामा ते, राजानो चक्‍कवत्तिनो॥4572॥\n\nकाज्वनार्घीयसड्काशम्‌, बुद्धं लोकाग्रनायकम।\n\nइन्दी वरमसिव जलितम्‌, आदीक्षमिव हताशनम्‌॥4568॥\nव्याप्नवृषभमिव प्रवरम, अभिजातमिव केशरिणम्‌।\nनिषण्णं श्रमणानामग्रम, भिक्षुसड्घपुरस्कृतम्‌॥4569॥\nबन्दित्वा शास्तुः पादे, प्राक्रामम्‌ उत्तरासुख:।\nचतुर्ण्णवतावित: कल्पे, गन्धमालां यतोजददाम्‌��570॥\nबुद्धे कृतस्य कारस्य, फलेनाऊह विशेषत:।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजाया इदं फलम्‌॥4574॥\nचअच्त्वारिंशे एकूने, कल्पे आसन्‌ पोडश।\nदेवगन्धसनामास्ते, राजानश्यक्रवर्त्तिन:॥4572॥\n\nस्वर्ण-चित्रित के समान, लोक के श्रेष्ठ, नामक कमल के समान देदीप्यमान तथा अग्नि के समान\nप्रजज्वल्यमान बुद्ध-॥568॥\n\nश्रमणों के अग्र तथा भिक्षुसंघ से पुरस्कृत बुद्ध-श्रेष्ठ व्याप्न एवं अभिजात (बे\n(विराजमान)- ॥569॥\n\nशास्ता के चरणों में वन्‍्दना कर मैं उत्तराभिमुख हो कर चला गया। क्‍योंकि यहाँ से 94 वें कल्प में जो\nमैंने गन्‍्ध साला प्रदान किया था। अतः भगवान्‌ बुद्ध के द्वारा किये गये कार्य के विशेष फल से मैं दुर्गति को नहीं\nजानता, यह बुद्धपूजा का ही सुपरिणाम है॥4570 - 74॥\n\n39 वें कल्प में 6 बार देवगन्ध नामक चक्रबर्ति राजा हुआ॥572॥\n\nकुलोत्पन्न) सिंह के समान"} +{"id": "indic_deva_eval_000583_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000583_devanagari_digits_mixed_dc2fee351638.jpg", "ocr": "२१6548९७55५"} +{"id": "indic_deva_eval_000584_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000584_hindi_handwritten_word_ocr_9a4bb6fa9e8b.jpg", "ocr": "नागदौनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000585_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000585_devanagari_page_ocr_e7bcdd43fc74.jpg", "ocr": "54\n\nअपदानपालि\n\n“हिसवन्तसुपादाय, सागरछ्च महोदिं।\nएत्थन्तरे य॑ पुलिनं, गणनातों असड्खियं॥257॥\n““तम्पि सक्‍का असेसेन, सड्खातुं गणना यथा।\nन त्वेव सारिपुत्तस्स, पड्ञायन्तो भविस्सति॥258॥\n““लक्खे ठपियमानम्हि, खीये गडगाय वालुका।\nन ल्वेब सारिपुत्तस्स, पड्ञायन्तो भविस्सति॥259॥\n““महासमुद्दे ऊमियो, गणनातों असड्लिखिया।\nतथेब सारिपुत्तस्स, पड्ञायन्तो न हेस्सति॥260॥\n““आराधयित्वा सम्बुद्धं, गोतमं सक्‍्यपुड्न्गवं।\nपञ्ञाय पारमें गन्त्वा, हेस्सति अग्गसावको॥264॥\n\n““हिसबन्तसुपादाय, सागरडच महोदधिम।\n\nअतन्नान्तरे य॑ पुलिनम्‌, गणनातो असड्ख्यम्‌॥257॥\n\n““तदपि शक्‍्यम्‌ अशेषेण, सड्ख्यातुं गणना यथा।\n\nन त्वेव सारिपुत्रस्य, प्रज्ञाया: अन्तो भविष्यति॥258॥\n\n““लक्षे स्थाप्यमाने, क्षीयेरन्‌ गझुगाया वालुकाः।\n\nन त्वेब सारिपुत्रस्य, प्रज्ञाया: अन्तो भविष्यति॥259॥\n\n“महासमद्रे ऊर्मबः, गणनालों असडुख्या:।\n\nतथैव सारिपुत्रस्य, प्रज्ञाया अन्तो न भविष्यति॥260॥\n\n““आराध्य/आराध यित्वा सम्ब॒ुद्धम्‌, गौतम॑ शाक्यपुडुगवम।\nप्रज्ञया पारं/पारमिं गत्वा, भविष्यत्यग्रश्नावक:॥264॥\nहिसालय से लेकर सागरपर्यन्त इनके मध्य जितने भी असडख्य तट एकत्रित हैं-॥257॥\n\nउन अ���ंख्य तटों की भी गणना की जा सकती है परन्तु सारिपुत्र के ज्ञान या बुद्धि का कोई\nअन्त नहीं होगा॥258॥\nयदि लक्ष में बद्ध हो जाए तो गंगा के तट समाप्त हो सकते हैं, परन्तु सारिपुत्र की बुद्धि का\n\nकोई अन्त नहीं हो सकता ॥259॥\n\nजिस प्रकार महासमुद्र में उठने वाली असंख्य लहरों की गणना असम्भव है, उसी प्रकार\nसारिपुत्र की न होगा॥260॥\n\nइस प्रकार शाक्यपुडुगव गौतम बुद्ध की आराधना कर प्रज्ञापारमिता को पूर्ण कर वह\nअग्रश्नावक होगा॥264॥\n\nका"} +{"id": "indic_deva_eval_000586_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000586_hindi_handwritten_word_ocr_8951a297034b.jpg", "ocr": "नुक्स"} +{"id": "indic_deva_eval_000587_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000587_indic_mozhi_deva_word_ocr_373b981442cb.jpg", "ocr": "तृप्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000588_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000588_indic_mozhi_deva_word_ocr_6c49e7824d20.jpg", "ocr": "असा"} +{"id": "indic_deva_eval_000589_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000589_indic_vision_bench_deva_ocr_539087629619.jpg", "ocr": "बेळगावमध्ये इव्हानला कोणी ओळखत नाही. अगदी गणेशपूरमध्येही. इतक्या टोकाच्या प्रसिद्धीविन्मुख इव्हानला मी याचं रहस्य विचारलं तर त्यांनी अनेक कटू प्रसंग सांगितले. त्यापेक्षा तक्रार नसलेल्या, तक्रार न करणाच्या माणसात तिला राहणं आवडतं! तिची मात्र कुणाबद्दल तक्रार नाही. 'आय ॲम डुईंग माय जॉब! फिनिश!!' असं म्हणून त्या अबोल राहतात. त्यांचं मौन मला जास्त बोलकं वाटलं... वाटतं.\n■ ■\nप्रेरक चरित्रे/३१"} +{"id": "indic_deva_eval_000590_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000590_indic_mozhi_deva_word_ocr_80e00efdbd81.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_000591_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000591_indic_mozhi_deva_word_ocr_53d60cc09b01.jpg", "ocr": "किसी"} +{"id": "indic_deva_eval_000592_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000592_indic_vision_bench_deva_ocr_cee6ecdab7f7.jpg", "ocr": "१७]\nराणा प्रताप\nकसम खाओ कि हमारा यह प्यारा देश तुर्कों के कब्जे में न जायगा। तुम्हारी रगों में जब तक एक बूँद भी रक्त रहेगा, तुम उसे तुर्कों से बचाते रहोगे। और बेटा अमरसिंह, तुमसे विशेष विनती है कि अपने बाप दादों के नाम पर धब्बा न लगाना और स्वाधीनता को सदा प्राण से अधिक प्रिय मानते रहना। मुझे डर है कि कहीं विलासिता और सुख की कामना तुम्हारे हृदयों को अपने वश में न कर ले और तुम मेवाड़ की उस स्वाधीनता को हाथ से खो दो, जिसके लिए मेवाड़ के वीरों ने अपना रक्त बहाया।' संपूर्ण उपस्थित सरदारों ने एक स्वर से शपथ की कि जब तक हमारे दम में दम है, हम मेवाड़ की स्वाधीनता को कुदृष्टि से बचाते रहेंगे। प्रताप को इतमीनान हो गया और सरदारों को रोता-बिलखता छोड़ उसकी आत्मा ने पार्थिव चोले को त्याग दिया��� मानो मौत ने उसे अपने सरदारों से यह कसम लेने की मुहलत दे रखी थी।\nइस प्रकार उस सिंह-विक्रम राजपूत के जीवन का अवसान हुआ जिसकी विजय की गाथाएँ और विपदा की कहानियाँ मेवाड़ के बच्चे-बच्चे की जबान पर हैं। जो इस योग्य है कि उसके नाम के मंदिर गाँव-गाँव, नगर-नगर में निर्माण किये जायँ और उनमें स्वाधीनता देवी की प्रतिष्ठा तथा पूजा की जाय। लोग जब इन मंदिरों में जायँ तो स्वाधीनता का नाम लेते हुए जायँ। और इस राजपूत की जीवन-कथा से सच्ची आज़ादी का सबक सीखें।"} +{"id": "indic_deva_eval_000593_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000593_indic_vision_bench_deva_ocr_8ac892a0ea6f.jpg", "ocr": "दिन सूखे गिने गए हैं। यानी १२० दिन की वर्षा ऋतु यहां अपने संक्षिप्ततम रूप में केवल १० दिन के लिए आती है।\nलेकिन यह सारा हिसाब-किताब कुछ नए लोगों का है। मरुभूमि के समाज ने संभवत: १० दिन की वर्षा में करोड़ों बूंदों को देखा और फिर उनको एकत्र करने का काम घर-घर में, गांव-गांव में और अपने शहरों तक में किया। इस तपस्या का परिणाम सामने है।\nजैसलमेर ज़िले में आज ५१५ गांव हैं। इनमें से ५३ गांव किसी न किसी वजह से उजड़ चुके हैं। आबाद हैं ४६२। इनमें से सिर्फ एक गांव को छोड़ हर गांव में पीने के पानी का प्रबंध है। उजड़ चुके गांवों तक में यह प्रबंध कायम मिलता है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार जैसलमेर के ९९.७८ प्रतिशत गांवों में तालाब, कुएं और अन्य स्रोत हैं। इनमें नल, ट्यूबवैल जैसे नए इंतज़ाम कम ही हैं। पता नहीं १.७३ प्रतिशत गांव का क्या अर्थ होता है। पर इस सीमांत ज़िले के ५१५ गांवों में से 'इतने' ही गांवों में बिजली है। इसका अर्थ है कि बहुत-सी जगह ट्यूबवैल बिजली से नहीं, डीज़ल तेल से चलते हैं। तेल बाहर दूर से आता है। तेल का टैंकर न आ पाए तो पंप नहीं चलेंगे, पानी नहीं मिलेगा। सब कुछ ठीक-ठीक चलता रहा तो आगे-पीछे ट्यूबवैल से जलस्तर घटेगा ही। उसे जहां के\nतहां थामने का कोई तरीका अभी तो है नहीं।\n६० आज भी खरे हैं तालाब"} +{"id": "indic_deva_eval_000594_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000594_indic_mozhi_deva_word_ocr_5c6053f1ec23.jpg", "ocr": "हृदयनाथ"} +{"id": "indic_deva_eval_000595_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000595_indic_vision_bench_deva_ocr_af011a0856c9.jpg", "ocr": "गोदान : 179\nगई।\nजरा देर में डाक्टर नाग आए और सिविल सर्जन मि॰ टाड आए और भिषगाचार्य नीलकण्ठ शास्त्री आए, पर गोविन्दी बच्चे को लिए अपने कमरे में बैठी रही। किसने क्या कहा, क्या तशखीस की, उसे कुछ मालूम नहीं। जिस विपत्ति की कल्पना वह कर रही थी, वह आज उसके सिर पर आ गई। खन्ना ने आज जैसे उससे नाता तोड़ लिया, जैसे उसे घर से खदेड़कर द्वार बंद कर लिया, जो रूप का बाजार लगाकर बैठती है, जिसकी परछाईं भी वह अपने ऊपर पड़ने नहीं देना चाहती... वह उस पर परोक्ष रूप से शासन करे? यह न होगा। खन्ना उसके पति हैं, उन्हें उसको समझाने-बुझाने का अधिकार है, उनकी मार\nको भी वह शिरोधार्य कर सकती है, पर मालती का शासन? असंभव। मगर बच्चे का ज्वर जब तक शांत न हो जाय, वह हिल नहीं सकती। आत्माभिमान को भी कर्तव्य के सामने सिर झुकाना पड़ेगा।\nदूसरे दिन बच्चे का ज्वर उतर गया था। गोविन्दी ने एक तांगा मंगवाया और घर से निकली जहां उसका इतना अनादर है, वहां अब वह नहीं रह सकती। आघात इतना कठोर था कि बच्चों का मोह भी टूट गया था। उनके प्रति उसका जो धर्म था, उसे वह पूरा कर चुकी है। शेष जो कुछ है, वह खन्ना का धर्म है। हां, गोद के बालक को वह किसी तरह नहीं छोड़ सकती। वह उसकी जान के साथ है। और इस घर से वह केवल अपने प्राण लेकर निकलेगी। और कोई चीज़ उसकी नहीं है। इन्हें यह दावा है कि वह उसका पालन करते हैं। गोविन्दी दिखा देगी कि वह उनकें आश्रय से निकलकर भी जिंदा रह सकती है। तीनों बच्चे उस समय खेलने गए थे। गोविन्दी का मन हुआ, एक बार उन्हें प्यार कर ले, मगर वह कहीं भागी तो नहीं जाती। बच्चों को उससे प्रेम होगा, तो उसके पास आएंगे, उसके घर में खेलेंगे। वह जब जरूरत समझेगी, खुद बच्चों को देख जाया करेगी। केवल खन्ना का आश्रय नहीं लेना चाहती।\nसांझ हो गई थी। पार्क में खूब रौनक थी। लोग हरी घास पर लेटे हवा का आनंद लूट रहे थे। गोविन्दी हजरतगंज होती हुई चिड़ियाघर की तरफ मुड़ी हो थी कि कार पर मालती और खन्ना सामने से आते हुए दिखाई दिए। उसे मालूम हुआ, खन्ना ने उसकी तरफ इशारा करके कुछ कहा और मालती मुस्कराई। नहीं, शायद यह उसका भ्रम हो। खन्ना मालती से उसकी निंदा न करेंगे, मगर कितनी बेशर्म है। सुना है, इसकी अच्छी प्रैक्टिस हैं, घर की भी संपन्न है, फिर भी यों अपने को बेचती फिरती है। न जाने क्यों ब्याह नहीं कर लेती, लेकिन उससे ब्याह करेगा ही कौन? नहीं, यह बात नहीं। पुरुषों में ऐसे बहुत से गधे हैं, जो उसे पाकर अपने को धन्य मानेंगे। लेकिन मालती खुद तो किसी को पसंद करे और ब्याह में कौन-सा सुख रखा हुआ है? बहुत अच्छा करती है, जो ब्याह नहीं करती। अभी सब उसके गुलाम हैं। तब वह एक की लौंड़ी होकर रह जायगी। बहुत अच��छा कर रही है। अभी तो यह महाशय भी उसके तलवे चाटते हैं, कहीं इनसे ब्याह न कर ले, तो उस पर शासन करने लगें, मगर इनसे वह क्यों ब्याह करेगी? और समाज में दो-चार ऐसी स्त्रियां बनी रहें, तो अच्छा, पुरुषों के कान तो गर्म करती रहें।\nआज गोविन्दी के मन में मालती के प्रति बड़ी सहानुभूति उत्पन्न हुई। वह मालती पर"} +{"id": "indic_deva_eval_000596_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000596_indic_vision_bench_deva_ocr_3d2a8c847c44.jpg", "ocr": "अग्रगामी दल\nयूनियन का लक्ष्य, रूस को छोड़कर, समस्त यूरोप में एक संघ कायम करना था। प्रारम्भ में इस आंदोलन को कुछ सफलता मिली। परन्तु कुछ दिनों के बाद इसका अन्त होगया।\nअखिल स्लैववाद\n—इस आन्दोलन का जन्मदाता हर हर्डर नामक एक जर्मन विचारक है। इसका जन्म १९वी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुआ था। इसका उद्देश्य समस्त स्लैव जनता को एक राज्य के अधिक करना था। सबसे प्रथम स्लैव कांग्रेस सन १८४१ में हुई थी। इसके बाद रूस ने अखिल स्लैववाद आन्दोलन में प्रमुख भाग लिया। उसने इस आन्दोलन को अपने साम्राज्यवाद की प्रगति के लिए एक साधन बनाया। पोलैण्ड, यूक्रेन तथा बल्कान राज्यों और आस्ट्रिया पर अपना आतंक जमाने के लिए रूस भी इस आन्दोलन में कुद पड़ा। आस्ट्रिया तथा बल्कान राज्यों के स्लैव अपने सभ्य-मण्डल लेकर रूस को जाया करते थे। रूसी साहित्य में एक नवीन विचारधारा चल पड़ी थी जिसके अनुसार यूरोप में स्लैवा को एक पवित्र 'मिशन' माना जाने लगा। सोकल कीड़ा-संघ समस्त स्लैव लोगों में अखिल स्लैववादी विचारधारा का प्रचार करने लगा। बहुत-सी स्लैव कांग्रेसे भी हुई, परन्तु रूसी राज्य-क्रांति (१९१७) के साथ इस आन्दोलन का भी अन्त हो गया। इस आन्दोलन के प्रभाव के कारण ही बल्कान देशों में से तुर्कों का निष्कासन संभव होसका था तथा आस्ट्रिया का साम्राज्य छिन्न- भिन्न होगया। यह आन्दोलन एक संगठित राजनीतिक आन्दोलन के रूप में नहीं रहा। प्रत्युत् यह तो एक भावात्मक लहर के रूप में ही रहा। विगत विश्व-युद्ध के बाद स्लैव जनता में पारस्परिक-सहानुभूति की भावना का उदय हुआ, परन्तु स्लैव जनता के आपसी झगड़ो के कारण इसका व्यापक प्रभाव न पड़ा।\nअगादिर\n—यह पश्चिमी मरक्को का एक बंदरगाह है जो सन् १९११ के मरक्को-संकट के समय से प्रसिद्ध होगया है।\nअग्रगामी दल\n—भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के त्रिपुरी-अधिवेशन (मार्च सन् १९३९) के बाद जब कांग्रेसी नेताओं के नीति-संबंधी आंतरिक झगड़ों के कारण कांग्रेस के राष्ट्रपति श्री सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्रपतित्व से त्याग-पत्र"} +{"id": "indic_deva_eval_000597_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000597_devanagari_page_ocr_3eaaf7db51fa.jpg", "ocr": "अपदानपालि उेकर\n\n“खिप्पं पव्वतमारुय्ह, सब्बोसधमहासहं [सकासहं (स्या* क*)])\nपानीययोगं [पानीययोग्गं (सी*)] कत्वान, बुद्धसेद्रस्सदासहं॥498॥\n“परिशुत्ते महावीरे, सब्बच्जुलोकनायके।\nखिप्पं बातो वूपसमि, सुगतस्स महेसिनो॥4499॥\n“पस्सद्धं दरथ्थं दिस्वा, अनोमदस्सी महायसो।\nसकासने निसीदित्वा, इमा गाथा अभासथ॥4500॥\n““यो मे पादासि भेसज्जं, ब्याधिउच समयी मम।\n'तमहं कित्तयिस्सामि, सुणाथ मम भासतो॥4504॥\n““कप्पसतसहस्सानि, देवलोके रमिस्सति।\nबादिते तूरिये तत्थ, मोदिस्सति सदा अयं॥4502॥\n“क्षेत्र पर्कतमारुह्य, सर्वौषधमकार्पमहम्‌।\n\nपानीययोग्यं कृत्वा, बुद्धश्रेछ्ठाय अदामहम्‌॥4498॥\n“परिशुड्ते महावी रान्‌, सर्वजलोकनायकान।\nक्षिप्न॑ बातो व्युपाशाम्यत्‌, सुगतस्य महर्षे:॥499॥\n“अश्रब्ध दरथ्थ दृष्ट्वा, अनवमदर्शी महायशः।\nस्वकासने निसीद्य, इमा गाथा अभाषत॥4500॥\n““यो से प्रादात्‌ भैषज्यम, व्याधिज्च अशाम्यत्‌/अशमत्‌ मस।\nतमहं कीर्च॑यिष्यामि, श्रुणुत मम भाषमाणस्य॥504॥\nशतसहख्नाणि, देवलोके रंस्यति।\nबादिते तूर्य तत्र, मोदयिष्यतति सदा अयम्‌॥4502॥\nशीघ्र ही मैं पर्वत पर चढ़कर सभी औषधियों को ले आया और पीने योग्य बनाकर उसे बुद्धश्रे्ठ को प्रदान\nकिया॥4498॥\nसर्वज्ञ महावीर, लोकनायक ने उसका परिभोग किया और शीघ्र ही वे सुगत महर्षि बात-\nरोग से मुक्त हो गये॥499॥\nअनोसदर्शी व महान्‌ यशस्वी ने सुझे विश्वस्त एवं दुःख से शान्त देखकर अपने आसन पर बैठकर इन\nगाथाओं को कहा-॥500॥\nव्याधि के समय वो जिसने मुझे औषधि प्रदान किया है, मैं उसकी कीर्ति का गान करूँगा, मेरे ऐसे वचनों\nखुनो॥4504॥\n\n400 हजार कलल्‍्पों तक वह देवलोक में रमण करेगा और वहाँ वजते हए तूर्यबाद्य में यह\nसदैव प्रसन्न (आनन्दित) रहेगा॥502॥\n\nको"} +{"id": "indic_deva_eval_000598_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000598_devanagari_digits_mixed_76753d85025b.jpg", "ocr": "४7२6७४"} +{"id": "indic_deva_eval_000599_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000599_indic_mozhi_deva_word_ocr_e416ea0470b1.jpg", "ocr": "मेरे"} +{"id": "indic_deva_eval_000600_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000600_hindi_handwritten_word_ocr_272603417ebe.jpg", "ocr": "सीता"} +{"id": "indic_deva_eval_000601_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000601_hindi_handwritten_word_ocr_0b80c8638fee.jpg", "ocr": "सुहृदय"} +{"id": "indic_deva_eval_000602_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000602_hindi_handwritten_word_ocr_6397e88244c4.jpg", "ocr": "लि���्ट"} +{"id": "indic_deva_eval_000603_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000603_indic_vision_bench_deva_ocr_ff534841d970.jpg", "ocr": "सुख और दुख को तालाब से जोड़ने के प्रसंग हमें श्री भगवान दास माहेश्वरी, श्री राजेंद्र सिंह और श्री कलानंद मणि से मिले हैं।\nबुंदेलखंड में गड़े हुए खजाने से तालाबों को बनाने का विवरण श्री योगेश्वर प्रसाद त्रिपाठी के संपादन में ब्रह्मानंद महाविद्यालय, राठ, हमीरपुर, उत्तर प्रदेश से सन् १९७५ में प्रकाशित स्वामी ब्रह्मानंद अभिनंदन ग्रंथ से लिया गया है। पुस्तक में श्री बद्रीप्रसाद 'धवल' के लेख 'महोबा नगर का संक्षिप्त परिचय' में विक्रम संवत् २८६ से १२४० तक चंदेल वंश के राज का परिचय और उनकी बाईस पीढ़ियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। इन बाईस राजाओं में से कुछ के नाम इस प्रकार हैं: चन्द्र ब्रह्म, बाल ब्रह्म, गज ब्रह्म, भक्ति ब्रह्म, जयशक्ति ब्रह्म \"द्वितीय\", कील ब्रह्म, कल्याण ब्रह्म, सूर्य ब्रह्म, रूप विद्या ब्रह्म, राहिल ब्रह्म, मदन ब्रह्म, कीर्ति ब्रह्म तथा परिमाल ब्रह्म। यहां के बाईस बड़े तालाबों के नाम भी इन्हीं पर आधारित हैं। स्वामी ब्रह्मानंद अभिनंदन ग्रंथ हमें महोबा के श्री मनोज पटेरिया के सौजन्य से प्राप्त हुआ है।\nआवाज लगाकर बिकने वाले इलाहाबादी अमरूद और नागपुरी संतरों को तो सब लोग जानते हैं। लेकिन बलदेवगढ़ की मछली? बंगाल में बलदेवगढ़ की मछली ले लो, जैसी आवाज भी सुनाई देती है। यह बलदेवगढ़ बंगाल में नहीं, बुदेलखंड में है और यहां के तालाबों की मछली विशेष स्वादिष्ट मानी जाती रही है।\nछेर-छेरा त्यौहार और छत्तीसगढ़ से संबंधित अन्य सूचनाएं तालाबों के विवाह तथा बड़े गांवों की छै आगर छै कोरी वाली परिभाषा श्री राकेश दीवान की देन है।\nसीता बावड़ी के गुदने से संबंधित जानकारी मध्य प्रदेश शासन से प्रकाशित चौमासा पत्रिका के विभिन्न अंकों से ली गई है। इसी प्रसंग में कुंराऊं समाज की स्त्रियों के बीच गुदने की परंपरा पर दो पंक्तियां 'मद्रास डिस्ट्रिक्ट गजेटियर सीरीस' में श्री डब्ल्यू फ्रांसिस द्वारा तैयार किए गए सन् १९०६ के 'साउथ आरकाट जिला गजेटियर' से मिल पाई हैं।\nबिंदुसागर का वर्णन कर्नल बी.एल. वर्मा से हुई मौखिक बातचीत पर आधारित है। उनका पता है: एम ४९, ग्रेटर कैलाश भाग २, नई दिल्ली-४८। इसी प्रसंग में बनारस के तालाबों के नाम भी दुहराए जा सकते हैं। इनका नामकरण इसी आधार पर किया गया था क��� देश की सब नदियों का पवित्र जल यहां भी संग्रहित है। जेम्स प्रिंसेप नाम के एक अंग्रेज़ अधिकारी ने सन् १८२० के आसपास बनारस\n१०६ आज भी खरे हैं तालाब"} +{"id": "indic_deva_eval_000604_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000604_indic_mozhi_deva_word_ocr_6925a2d11662.jpg", "ocr": "रा०"} +{"id": "indic_deva_eval_000605_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000605_indic_mozhi_deva_word_ocr_abf3059910fb.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_000606_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000606_indic_mozhi_deva_word_ocr_59acdc1e677b.jpg", "ocr": "दूर"} +{"id": "indic_deva_eval_000607_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000607_indic_mozhi_deva_word_ocr_f7566f32932f.jpg", "ocr": "पुस्तक"} +{"id": "indic_deva_eval_000608_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000608_devanagari_page_ocr_59b49bd33d5f.jpg", "ocr": "45. सुखबग्गो\n\n56 पु रा\n\nचालि-\n204. जयं बेरं पसवति, दुकक्‍्खं सेति पराजितो।\n\nउपसन्तो सुखं सेति, हित्वा जयपराजयं॥ 5/5 ॥।\n202. चत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि।\n\nनत्थि खन्‍्धसमा दुक्‍्खा, नत्थि सन्तिपरं सुखं॥ 45/6 ॥।\n203. जिघच्छापरमा रोगा, सड्ूखारा परमा दुखा।\n\nएत॑ जत्वा यथाभूतं, निब्बानं परम सुखं॥ 45/7 ॥।\n204. आरोग्यपरमा लाभा, सनन्‍्तुट्ठिपरमं धनं।\n\nविस्सासपरमा आति, निब्बानं परम सुखं॥ 45/8 ॥।\n\nसंस्कृतज्छाया-\nजयो बैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजित: ।\nउपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥। 45/5 ॥।\nनास्ति रागसमोडउग्ि:, नास्ति द्वेघसम: कलि: ।\nनास्ति स्कन्‍्धसमा दु:खा:, नास्ति शान्तिपरं सुखम्‌ ।। 45/6 ॥।\nजिघत्सा परमो रोग:, संस्कार: परम दुःखम्‌ ।\n'एतद्‌ ज्ञात्त्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम्‌ ।॥45/7 ।॥।\nआरोग्यं परमो लाभ:, सन्तुष्टि: परम धनम्‌ ।\nविश्वास: परमा ज्ञाति:, निर्वाणं परमं सुखम्‌ ॥॥45/8 ॥।\n\nविजय वैर को उत्पन्न करती है, पराजित (पुरुष) दुःख की (नींद) सोता है, (राग\nआदि द्वेष जिसके) शांत हैं, ह् व आर पर गा छोड । (लीद\nसोता है।व557, दे पुरुष) जय और परजय को छोड़ सुल की (लीड)\nराग के समान अग्नि नहीं, द्वेष के समान मल नहीं, स्कन्धों\nदा * जल नहीं, न्धों (ससुदाय) के समान\nभूख 2 हल सुख नहीं ।। 45/6 ॥। नम अजीज ”\n\nबड़ा रोग है, संस्कार सबसे :ख्ब हैं, जान; लिॉँण की\nसबसे बड़ा सुख (कहा जाता) है ।।45/7 बा बी * बार\nनिरोग होना परम लाभ है, सन्‍्तोष\n\nपरम (सबसे बड़ा) सुख है।। 45,8,+_ है. विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण\n\n(फ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टााढा"} +{"id": "indic_deva_eval_000609_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000609_indic_mozhi_deva_word_ocr_3057e6d2aa86.jpg", "ocr": "उमड़े"} +{"id": "indic_deva_eval_000610_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000610_devanagari_page_ocr_f981b96169cd.jpg", "ocr": "मिलिन्दपज्हो भर\n\n44. ञाणं च पञ्ञा चा।\nराजा आह- “भन्ते नागसेन, यस्स आएं उप्पन्नं, तस्स पठ्ञा उप्पन्ना\"ति?\n“आम, महाराज, यस्स आणं उप्पन्नं, तस्स पठ्ञा उप्पन्ना”ति।\n'किं, भन्‍्ते, यज्जेव जाणं सा येव पञज्ञा”ति?\n“आम, महाराज, यज्ञेब ञआाणं सा येव पड्ञा”ति।\n“यस्स पन, भन्‍्ते, तज्जेव आणं सा येव पड्ञा उप्पन्ना, कि सम्मुय्हेय्य सो, उदाहु न\nसम्मुय्हेय्या”ति?\n“कल्थचि, महाराज, सम्मुय्हेय्य, कत्थचि न सम्मुस्हेय्या”ति।\n__ “कुहिं, भन्ते, सम्मुय्हेय्या”लि?\nसंस्कृतच्छाया- 44. जञाणं च पड्ञा च\nराजा55ह- \"भदनन्‍्त नागसेन, यस्य ज्ञानमुत्पन्नं, तस्य प्रज्ञोत्पन्नेणति?\n\"आम्‌, महाराज, यस्य ज्ञानमुत्पन्नं तस्य प्रज्ञोत्पन्ने“ति।\n\"किं, भदन्‍्त, यदेब ज्ञानं सैब प्रज्ञेणति?\n\"आम्‌, महाराज, यदेव ज्ञान सैव प्रजे\"ति।\n\"यस्य पुनर्भदन्‍त, तदेव जञान॑ सैव प्रज्ञा उत्पन्ना कि सम्मुह्येत्‌ सः, उताहो न सम्मुह्येदि\"्ति?\n\"कुञ्चिन्महाराज, सम्मुह्येत्‌ कुत्नरचिन्न सम्मुह्येदि\"ति।\n\"कुतो, भदन्‍्त, सम्मुह्येदि\"्ति?\nहिन्दी- 44. ज्ञान और प्रज्ञा\nराजा बोला- “भन्ते! जिसको ज्ञान उत्पन्न होते है, क्या उसको प्रज्ञा भी उत्पन्न हो जाती है?\"\n“हाँ, महाराज! उसको प्रज्ञा भी उत्पन्न हो जाती है।\"\n“अन्ते! क्‍या ज्ञान और प्रज्ञा दोनों एक ही चीज हैं?\"\n“हाँ, महाराज! ज्ञान और प्रज्ञा दोनों एक ही चीज हैं।\"\n'भन्ते! यदि ऐसी बात है तो उसे किसी विषय में मोह (मूढ़ता) रहेगा या नहीं?”\n“महाराज! उसे कुछ विषयों में मोह नहीं रहेगा और कुछ विषयों में रहेगा।\"\n“किन विषयों में मोह नहीं होगा और किन विषयों में होगा?\""} +{"id": "indic_deva_eval_000611_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000611_indic_mozhi_deva_word_ocr_fa60f9f76d5b.jpg", "ocr": "यांची"} +{"id": "indic_deva_eval_000612_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000612_indic_vision_bench_deva_ocr_82fbe867849b.jpg", "ocr": "समर्पण\nप्यारे!\nलो, तुम्हारी चंद्रावली तुम्हें समर्पित है। अंगीकार तो किया ही है, इस पुस्तक को भी उन्हींकी कानि से अंगीकर करो! इसमें तुम्हारे उस प्रेम का वर्णन है, इस प्रेम का नही जो संसार में प्रचलित है। हाँ, एक अपराध तो हुआ जो अवश्य क्षमा करना होगा। वह यह कि यह प्रेम की दशा छापकर प्रसिद्ध की गई। वा प्रसिद्ध करने ही से क्या जो अधिकारी नही है उनकी समझ ही में न आवेगा।\nतुम्हारी कुछ विचित्र गति है। हमी को देखो। जब अपराधों को स्मरण करो तब ऐसे कि कुछ कहना ही नहीं। क्षण भर जीने के योग्य नही। पृथ्वी पर पैर धरने की जगह नहीं। मुँह दिखाने के लायक नही। और जो यों देखो तो ये लम्बे-लम���बे मनोरथ। यह बोलचाल। यह ढिठाई की तुम्हारा सिद्धांत कह डालना। जो हो, इस दूध-खटाई की एकत्र स्थिति का करण तुम्हीँ जानो। इसमें कोई संदेह नही कि जैसे हों तुम्हारे बनते है। अतएव क्षमासमुद्र! क्षमा करो! इसी में निर्वाह है। बस—\nभाद्रपद कृष्ण १४\n}\n{\\displaystyle \\scriptstyle {\\left.{\\begin{matrix}\\ \\\\\\\\\\ \\ \\end{matrix}}\\right\\}\\,}}\nहरिश्चन्द्र\n⁠\nसं॰ १९३३"} +{"id": "indic_deva_eval_000613_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000613_hindi_handwritten_word_ocr_5f19f2b764ca.jpg", "ocr": "राजनितिक"} +{"id": "indic_deva_eval_000614_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000614_indic_vision_bench_deva_ocr_a14ba87709cd.jpg", "ocr": "क्षेत्रात कार्य करणारे डॉ. गणेश देवी यांचे कार्यही आंतरराष्ट्रीय पातळीवर सन्मान प्राप्त करणारे ठरले आहे.\nआज सुरू होणारे ९१ वे अखिल भारतीय साहित्य संमेलन हे बडोद्यामधील चौथे संमेलन आहे. १८७८ मध्ये न्यायमूर्ती महादेव गोविंद रानडे यांनी पुण्यात पहिले ग्रंथकार संमेलन सुरू केले, त्यानंतर १९४७ पर्यंत स्वातंत्र्यपूर्व काळात सत्तर वर्षांत ३१ साहित्य संमेलने झाली, त्यातील तीन संमेलने बड़ोदा येथे संपन्न झाली. १९०९ साली कान्होबा रणछोडदास कीर्तीकर यांच्या अध्यक्षतेखाली, १९२१ मध्ये साहित्यसम्राट न. चिं. केळकरांच्या अध्यक्षतेखाली तर १९३४ मध्ये नारायण गोविंद चाफेकरांच्या अध्यक्षतेखाली साहित्य संमेलन झाले. याचाच अर्थ बडोद्याची वाङ्मयीन परंपरा पुण्याखालोखाल समृद्ध होती असा लावला तर अनुचित होणार नाही. साहित्य संमेलनांच्या काही अध्यक्षांनी नवे वाङ्मयीन सिद्धान्त मांडले आहेत. त्याची सुरुवात बडोद्याला १९२१ साली न. चिं. केळकरांच्या वाङ्मयाबाबत सविकल्प समाधीचा' अजरामर सिद्धान्ताने झाली, ती आजही वाङ्मयीन आस्वादासाठी महत्त्वाची आहे. केळकरांनी ‘खरी सविकल्प समाधी उत्पन्न करू शकते ते वाङ्मय' अशी व्याख्या त्यांच्या अध्यक्षीय भाषणात मांडली. त्याबाबत स्पष्टीकरण देताना, त्यांनी जे विवेचन केले आहे, ते त्यांच्याच शब्दांत उद्धृत करण्याचा मोह मला आवरत नाही. मुख्य म्हणजे प्रत्येक रसिक वाचकांना वाचनानंद घेताना तो प्रत्ययास आल्याविना राहत नाही. केळकर खरी सविकल्प समाधी उत्पन्न करते ते वाङ्मय, हो सिद्धान्त अशा त-हेने उलगडून दाखवतात.\n\"निर्विकल्प समाधीत बाहेरच्या जगाची किंबहुना आपल्या देहाचीही काही एक जाणीव शिल्लक उरत नाही व उरताही कामा नये; पण वाङ्मय सेवनाने निर्माण होणा-या समाधीत स्वत:च्या मनोभूमिकेची जाणीव तर उरतेच, पण वर दर्शविलेल्या इतर भूमिकाही तीत समाविष्ट होऊ शकतात. एवढेच नव्हे तर, तेच वाङ्मय अधिक उत्कृष्ट की ज्यांच्या सेवनाने अधिकांत अधिक कल्पना मनात एकदम उठतील व अधिकाधिक भूमिकांचा मानस अनुभव घडेल. या दृष्टीने पाहता सुंदर कल्पनाकल्लोळ ही वाङ्मयप्रेमी मनुष्याला इष्टापत्तीच होय.\"\nआज अनेकजण दरवर्षी भरणा-या शतकी परंपरा असलेल्या साहित्य संमेलनाला उरूस' वा 'जत्रा' म्हणत टीका करतात, त्यालाही १९२१ सालीच केळकरांनी खालीलप्रमाणे उत्तर दिले आहे, तेही आज सर्व उपस्थित रसिकांना त्यांच्याच शब्दात सांगत या टीकाकारांना मी उत्तर देऊ इच्छितो.\n‘वाङ्मयग्रंथकार हे तर स्वयंभूच असतात. एका ग्रंथकाराने म्हटले आहे की, 'Literary men have neither ancestors nor posterity: they alone compose their whole race.' वाङ्मय ग्रंथकारांना कुलपरंपरा किंवा\nलक्ष्मीकांत देशमुख यांचे अध्यक्षीय भाषण / ५"} +{"id": "indic_deva_eval_000615_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000615_devanagari_page_ocr_ceb19f257e6b.jpg", "ocr": "अंडा\n\nयत्थ सच करिस्साम, तेन सद्देन घातय।\n\nआयुध॑ मे'नुभावेन, तेसं काये पतिस्सति॥36॥\n\nतस्सा सुत्वा तथा कत्वा, सब्बे यक्‍्खे अघातयि।\n\nसयम्पि लद्धविजयो, यक्खराज पसाधनं॥37॥\n\nपसाधनेहि सेसेहि, त॑ त॑ भच्च॑ पसाधयि।\n\nकतिपाहं वसित्वेत्थ, तम्बपण्णिमुपागमि॥38॥\n\nमसापयित्वा तम्पपण्णिनगरं विजयो तहिं।\n\nवसी यक्खिणिया सद्धिं, अमच््चपरिवारितो॥ 39॥\n\nनावाय भूमिमोतिण्णा, विजयप्पमुखा तदा।\n\nकिलनता पाणिना भूमिं, आलम्बिय निसीदिसुं॥40॥\n\nसंस्कृतच्छाया- _ यत्र शब्दं करिष्यामि, तेन शब्देन घातय।\nआयुध॑ मेउनुभावेन, तेषां काये पतिष्यति।36॥।\nतसया श्रुत्वा तथा कृत्वा, सर्वान्यक्षानघातयत्‌।\nस्वयमपि लब्धविजयो, यक्षराजप्रसाधनम्‌।।37॥।\nप्रसाधनै: शेषै:, तं तं भृत्यं प्रासाधयत्‌।\nकतिपहमुषित्वात्र, ताम्रपर्णीम्‌ उपागमत्‌।38॥\nमसापयित्वा ताम्रपर्णीनगरं विजयः तत्र।\nअवसत्‌ यक्षिण्या सार्धम्‌, अमात्यै: परिवारित:॥39॥\nनावा भूमिमबतीर्णा:, विजयप्रमुखा: तदा।\n\nकलान्ता: पाणिना भूमिम्‌, आलम्ब्य न्यसीदन्‌।।40।\nहिन्दी- “मैं उनके पास खड़ी होकर शब्द करती रहूँगी, उस शब्द के सहारे\nचमत्कार के प्रभाव से तुम्हारा प्रत्येक बाण इन के शरीर पर गिरेगा\"।।36॥।\nउसकी बात मान कर, बैसा ही करते हुए उसने सभी यक्षों को मार डाला। उन पर विजय प्राप्त कर उनके सभी\nअलड्कार लूट लिये तथा कुछ स्वयं रखें और।।37॥।\n\nकुछ भृत्यों में बॉट दिये। यों बह कुछ्ध दिन वहॉ रह कर पुन: ताम्रपर्णी लौट आया।। 38॥॥\n\nराजकुमार विजय ताम्रपर्णी नगर बसा कर यक्षिणी तथा अमात्यों के साथ रहते हुए जीवन बिताने लगा।।39\n\nजब विजय एवं उसके साथी नाव से पृथ्वी पर उतरे तो श्रम के कारण पृथ्वी पर हाथ टिका कर बैठ गये थे।40। ॥\n\nतुम इन सब को क्रमश: सार डालो॥। मेरे\n\n7क्‍शणाणणानभानणागारक्कानञॉाासाकल्लल्कलणन--+तततत- |||||||||"} +{"id": "indic_deva_eval_000616_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000616_indic_mozhi_deva_word_ocr_a91d9f4d223e.jpg", "ocr": "कीमत"} +{"id": "indic_deva_eval_000617_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000617_devanagari_page_ocr_c37a6fc0ed66.jpg", "ocr": "बट सोभितबग्गो\n\n“सत्तरसे कप्पसते, राजा आसि महीपति।\nअमित्ततापनों नाम, चक्‍कवत्ती महब्बलो॥4922॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो... बुद्धस्स सासन॑”॥4923॥\nइत्थं सुदं आयस्मा एकपसादनियों थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\n'एकपसादनियत्थेरस्सापदानं अद्भमं।\n9. सालपुप्फदायकत्थेरअपदानं\n“मिगराजा तदा आसिं, अभिजातो सुकेसरी।\nगिरिदुग्गं गवेसन्‍्तो, अछड्सं लोकनायकं॥924॥\n“अय॑ नु खो महावीरो, निब्बापेति महाजनं।\nयंनूनाहं उपासेय्यं, देवदेव॑ नरासभं॥925॥\n“साखं सालस्स भडिजत्वा, सकोसं पुप्फमाहरिं।\nउपगन्त्वान सम्बुद्धं, अदासिं पुप्फमुत्तमं॥926॥\nसल्तदशे कल्पशले, राजा आसीत्‌ महीपति।\nअमित्रतापनो नाम, चक्रवर्ती महाबल:॥4922॥\nप्रतिसंविदश्वतस्र:... परे... कृत बुद्धस्य शासनम्‌॥4923॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ एकप्रसादनिय स्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nमृगराजा तदा आसम्‌, अभिजात: सुकेशरी।\nिरिदुर्ग गवेघयन्‌, अद्राक्ष लोकनायकम्‌॥4924॥\nअय॑ नु खलु महावीर:, लिर्वापयति महाजनम्‌॥\nयज्वूनमहम्‌ उपासेयम्‌, देवदेव॑ नरर्पभम्‌॥925॥\nशाखां शालस्य भड्जित्वा, सकोश॑ पुष्पसाहरम।\nउपग॒ल्य सम्बुद्धम, अदां पुष्पमुत्तमम॥926॥\n4700 बे कल्प में अभित्रतापन नाम का सहावलशाली, महीपति चक्रवर्ती, राजा हुआ॥922॥\nचार पटिसस्भिदाओं आठ विमोक्षों और घडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥4923॥\nइस प्रकार आयुष्सान्‌ एकप्रसादनीय स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\nअच्छे कुल में उत्पन्न सुकेसरी नामक मृगराज (सिंह) था और गिरि कन्‍्दराओं को खोजते हुए लोकनायक\nको देखा॥924॥\nये महावीर बहुत लोगों को निर्वाण प्रास कराने वाले ही हैं। देवों के देव नरर्पभ की निश्चय ही मुझे\nउपासना करनी चाहिए॥925॥\nशाल वृक्ष से शाखा को तोड़कर कोश (टोकरी) सहित पुष्प को लाया और सम्बुद्ध के समीप जाकर\nउत्तमपुष्ष प्रदान किया॥4926॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000618_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000618_devanagari_page_ocr_cd76162d3e56.jpg", "ocr": "झ्युभाशंस्ा\nविगत वर्षो में 5-20 प्रकाशानों कभी श्वुख्त्ता में\n\nवर्ष 209-20 में पात्ति\nखम्सपद एवं सिल्तिस्दपड्छ\nजानकर अत्यन्त प्रसनन्‍्तता\nउपलब्ध हो सकंगी\n\nस्ंस्कृतच्छाया एः\nका प्रकाशन प्रश्रम बार हो\nइससे भी शोध क॑ कई\nचल रहा पालि अध्ययन\n\nभवतु सव्य मंगल\n\nपते -९॥ कक )\n\n( प्रो, परमेश्वरनारायणज्ास्त्री )"} +{"id": "indic_deva_eval_000619_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000619_devanagari_digits_mixed_3a5590dd6efa.jpg", "ocr": "4९८7९"} +{"id": "indic_deva_eval_000620_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000620_devanagari_page_ocr_c31a048ba44c.jpg", "ocr": "छट्ठी परिच्छेदो है का\n\n06 | 77---\n\nपुत्तो सोव्ठसवस्से सो, मातरं पुच्छि संसयं।\n\nतुबं पिता च नो अम्म, कस्मा असदिसा इति॥44॥\n\nसो सब्बमब्रवी तस्स, कि न यामा'ति सो 'ब्रवि।\n\nगुहं थकेति तातो ते, पासाणेना ति सात्रवि॥ 2॥\n\nमहागृहाय थकनं, खन्धेनादाय सो अका।\n\nएकाहेनेव पञ्ञास योजनानि गतागतं॥43॥\n\nगोचराय गहे सीहे, दक्खिणंसम्हि मातरं।\n\nवामे कणिद्धठिं कतवान, तयो सीघं अपक्कमि॥ 4॥\n\nनिवासेत्वान साखं ते, पच्चन्तं गाममागमुं।\n\nतत्थासि राजधीताय, मातुलस्स सुतो तदा॥5॥\n\nसंस्कृतच्छाया- पुत्र: घोडशवर्ष: सः, मातरम्‌ अपृच्छत्‌ संशयम्‌।\nत्वं पिता च नो अम्ब, कस्मात्‌ विसदृशाबिति।।44॥।\nसा सर्वमत्रवीत्‌ तस्य, “किं न याम?” इति सोउब्रवीत्‌।\n“गुहां स्थापयति तातस्ते, पाषाणेनेति साअब्रवीत्‌।।42।।\nमहागुहाया: स्थापनकम्‌, स्कन्धेनादाय सो5करोत्‌।\nएकाहेनैव पशञ्चाशद्‌, योजनानि गतागतम्‌।॥।43॥।\nगोचराय गते सिंहे, दक्षिणेउस्मिन्‌ मातरम्‌।\nवामे कनिष्ठां कृत्वा, तय: शीघ्रम्‌ अप्राक्रामन्‌।।44॥।\nउषितवन्तः शाखांस्ते, प्रत्यन्न॑ ग्राममागमन्‌।\n\nकलजमहछ्स्स औसीद :, मातुलस्य सुतस्तदा।।45।।\n\nदी-एक दिन का .' सोलह वर्ष की आयु होने पर, अपनी माता से अपने मन का सन्देह पूछ ही लिया कि “आप\n\nऔर पिता जो शरीरों के आकार-प्रकार में समान क्‍यों नहीं हैं”॥।॥\n\nजा\nतब माता ने अपने साथ घटित पिछली सभी बातें स्पष्ट बता दी। पुत्र ने पूछा- “तो क्‍यों न हम यहाँ से चल दें?\n_ पुत्र! हम ऐसा नहीं कर सकते;\n\nहा : क्योंकि तुम्हारा ये पिता प्रतिदिन गुफा के सामने एक भारी शिला रख जाता\nहै'॥42॥\n\nपुत्र ने उस गुफा के द्वार के सामने रखी शिला को अपने कन्धे के बल से दूर हटा दिया। और वह एक ही दित में\nपचास योजन दूर जाकर पुन: वहाँ लौट आया।।43॥\n\nफिर एक दिन, सिंह के भोजन की खोज में चले जाने के बाद, माता को दाहिने कन्धे पर और बहन को वॉये कन्चे\nअर वैठाकर वह वहाँ से निकल भागा॥।+. 4॥\nके तीनों अपने शरीर पर व॒क्षों की शाखाएँ लपेट कर उस\n\nमें समय\nल्‍र पर वृ जड्गल के ग्राम में प्रविष्ट हुए। उस\nवहाँ उस राजपुत्री के मामा का पत्र भी किसी कार्यविः है 3 लक\n\nशेष से रहता था।।45॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000621_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000621_indic_mozhi_deva_word_ocr_46af106eb319.jpg", "ocr": "वाटेल"} +{"id": "indic_deva_eval_000622_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000622_hindi_handwritten_word_ocr_5d4b2147d1f9.jpg", "ocr": "बचवा"} +{"id": "indic_deva_eval_000623_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000623_indic_vision_bench_deva_ocr_993c880f3735.jpg", "ocr": "नगाड़े के पास नहीं गयी, लोग कह-कहकर हार गये। आज तुम्हीं मुझे ले गये, और अब उलटे तुम्हीं नाराज़ होते हो!\nमुन्नी घर में चली गयी। थोड़ी देर बाद काशी ने आकर कहा--भाभी, तुम यहाँ क्या कर रही हो? तुम्हें वहाँ सब लोग बुला रहे हैं।\nमन्नी ने सिर-दर्द का बहाना किया।\nकाशी आकर अमर से बोला--तुम क्यों चले आये भैया? क्या गँवारों का नाच गाना अच्छा न लगा?\nअमर ने कहा--नहीं जी, यह बात नहीं। एक पंचायत में जाना है। देर हो रही है।\nकाशी बोला--भाभी नहीं जा रही हैं। इसका नाच देखने के बाद अब दूसरों का रंग नहीं जम रहा है। तुम चलकर कह दो, तो साइत चली जाय। कौन रोज़-रोज़ यह दिन आता है। बिरादरीवाली बात है। लोग कहेंगे, हमारे यहां काम आ पड़ा, तो मुँह छिपाने लगे।\nअमर ने धर्म-संकट में पड़कर कहा--तुमने समझाया नहीं?\nफिर अन्दर जाकर कहा--मुझसे नाराज़ हो गयीं मुन्नी ?\nमन्नी आँगन में आकर बोली--तुम मझसे नाराज़ हो गये, कि मैं तुमसे नाराज़ हो गयी ?\n'अच्छा, मेरे कहने से चलो।'\n'जैसे बच्चे मछलियों को खिलाते हैं, उसी तरह तुम मुझे खिला रहे हो, लाला! जब चाहा रुला दिया, जब चाहा हँसा दिया। लाला अब तो मुन्नी तभी नाचेगी, जब तुम उसका हाथ पकड़कर कहोगे--चलो हम-तुम नाचें। वह अब और किसी के साथ न नाचेगी।'\n'तो अब नाचना सीखूँ ?'\nमुन्नी ने अपनी विजय का अनुभव करके कहा--मेरे साथ नाचना चाहोगे, तो आप सीखोगे।\n'तो सिखा दोगी?'\n'तुम मुझे रोना सिखा रहे हो, मैं तुम्हें नाचना सिखा दूँगी।'\n'अच्छा चलो।'\nकालेज के सम्मेलनों में अमर कई बार ड्रामा खेल चुका था। स्टेज पर\nकर्मभूमि\n१६५"} +{"id": "indic_deva_eval_000624_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000624_hindi_handwritten_word_ocr_54779d43bb85.jpg", "ocr": "आएंगे।"} +{"id": "indic_deva_eval_000625_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000625_indic_mozhi_deva_word_ocr_b36957b1955a.jpg", "ocr": "निकली"} +{"id": "indic_deva_eval_000626_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000626_devanagari_page_ocr_3815208ff8d5.jpg", "ocr": "सत्तरसमो परिच्छेदो\n\n“>>. इ एछ\n\nसहायो ते महाराज, महाराजा मरुप्पियो।\n\nपसन्‍नों बुद्धसमये, थूपं कारेतुमिच्छति॥ जया\n\nसुनिनो धातुयो देहि, पत्तं भुत्तज्च सत्थुना।\n\nसरीरधातुयो सन्ति, बहवो हि तवन्तिके॥ 2॥\n\nपत्तपूरा गहेत्वा ता, गन्त्वा देवपुर्र वर\n\nसकक्‍क॑ देवानमिन्दं तं, एवं नो बचन॑ बद॥3॥\n\nतिलोकदक्खिणेय्यस्स, दाठाधातु दक्खिणा।\n\nतवन्तिकम्हि देविन्द, दक्खिणक्खकधातु च॥ १८ १॥\n\nदाढं त्वमेव पूजेहि, अक्खकं देहि सत्थुनो।\n\nलंकादीपस्स किच्‌्चेसु, मा पमज्जि सुराधिप॥45॥\n\nसंस्कृतच्छाया- सहायः ते, महाराज!, महाराजा मसरुषतियः।\nअ्रसन्नः बुद्धसमये, स्तूपं कारयितुमिच्छति।।4॥।\nसुनिनः धातलून्‌ देहि, प्रासं भुक्तन्व शास्तृणा।\nशरीरधातव: सन्ति, बहवो हि तवान्तिके।।\nपात्रपूरा गृहीत्वा ताः, गत्वा देवपुरं वरमस्‌।\nशक्रं देवानाम्‌ इन्द्र तं, एवं नो वचन बद।।43।।\nत्रिलोकदक्षिणेयस्य, दाढाधातुश्य दक्षिणा।\nतवान्तिके देवेन्द्र!, दक्षिणाक्षक धातुश्च।।4।।\nदाढं त्वमेव पूज, अक्षकं देहि शास्तु:।\n'लड्सकाद्वीपस्य कृत्येषु, मा प्रमद सुराधिप:।।45॥\n\nअब आपका साथी राजा देवानाम्प्रिय बुद्ध धर्म में श्रद्धालु होकर यहाँ धातुस्तुृप बनवाना चाहते\n\nबिल कि आपके पास महामुनि के शरीर की बहत सी धातुएँ हैं, अतः उनमें कुछ धातुएँ यहाँ के लिये देने की\nवहाँ से आम का आजल भी जिसमें महासुनि भिक्षा किया करते थे”।।:22॥॥\nदेवेन्द्रों आपके: ० 20 को के बाद तुम देवलोक चले जाना। और वहाँ देवराज इन्द्र से भी कहना।।7 3॥\nइनमें आप दक्षिण दाढ़ ऋप्पेओ के भगवान्‌ बुद्ध की दक्षिण दाढ़ एवं दश्लिण ग्रीवा की धातु हैं।।4! के\nइस शुभकार्य में आप व॑ गे पूजा हेतु अपने पास रख ले एवं दक्षिण ग्रीवा की धातु हमें दे दें। हे सुरेन्द्र! लड्काद्वीप\n\n\"पर की तरफ से कोई प्रसाद नहीं होना चाहिये”।।45॥॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000627_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000627_devanagari_digits_mixed_eac14bc81340.jpg", "ocr": "६८0377३२28०८७6"} +{"id": "indic_deva_eval_000628_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000628_indic_mozhi_deva_word_ocr_e7f73d949a1c.jpg", "ocr": "भ्याले?"} +{"id": "indic_deva_eval_000629_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000629_devanagari_page_ocr_54b1555e9e95.jpg", "ocr": "66 नया\nन हि ते।\n\nदुतिये सहणदे खरा, येक्डन्ता न आस ॥96॥\nलोके, तदुपद्ववघातकं।\n\nकला सके ूं, ० अचिरद्वायिजीवितं॥97॥\n\nते त॑ समुपसझ्म्म, आयाचिंसु ��हामतिं।\n\n/' तदुपद्ववघातकं॥ 98॥\n\nअदा पटिख्जं तेस सो, सासनुज्जोतनत्थिको।\n\nसिग्गवं चण्डवज्जिज्च अवोचु दहरे यती॥99॥\n\nअद्वारसाधिका वस्ससता उपरि हेस्‍्सति।\n\nउपद्दवों सासनस्स, न सम्भोस्साम त॑ मयं॥400॥\n\nजस्कृतच्छाया- .. द्वितीये सडूचे स्थविराः, प्रेक्षन्तः अनागतं हि ते।\nशासनोपद्रवं तस्य, राज्ञ: काले अपश्यन्‌॥96॥।\nग्रेक्षनतता सकले लोके, तदोपद्रवघातकम्‌।\nतिष्यब्रह्माणमद्राक्षम्‌, अचिरस्थायि-जीवितम्‌।॥97॥।\nतेषां समोपसड्क्रम्य, अयाचन्‌ महामतिम्‌।\nमनुष्येषूपपद्य, तदोपद्रवधातकम्‌।98॥\nअदातू प्रतिज्ञां तेषां सः, शासनोद्योतनार्थिक:।\nसिग्गवं चण्डवज्जिद्ध अवोचन्‌ दहरे यति:।॥99॥॥\nअष्टादशाधिका वर्षशता उपरि भविष्यति।\nउपद्रवः शासनस्य, न सम्भविष्याम: त॑ बयम्‌।।402॥।\n\nहिन्दी- परन्तु द्वितीय सड्गीति प्रारम्भ होने से पूर्व वर्तमान काल के स्थविरों ने भी दिव्य दृष्टि से जान लिया कि\nइस सम्राद्‌ के राज्यकाल में बुद्धशासन सड्कटग्रस्त होगा।।96॥।\n\nइस सड्कट को जानकर सभी लोकों में उन\n\nहोने पूर्वजों ने तिष्य ब्रह्मा को देखा, जिस का ब्रह्मा के रूप में जीवनकाल\nहा होने बाला था।।97।\n\nउस महामति के पास गये तथा बोले- “आप को मनुष्यलोक होकर, सड्कट का\nनिवारण करना है\"॥98॥ नुष्यलोक में उत्पन्न , सद्धर्म पर आनेवाले इस सड्‌ः\n\nउन्होंने शासन की उन्नति देखते हुए उत्पन्न होने का पूर्वजों के\n04% का\n\nनामक दो तरुण यतियों से कहा- ॥99 ॥ हो मिशेल जी डे जिला\n'आज से एक सौ अट्टारह वर्ष बाद शासन\n\nआायग। 000 गासन पर सड्कट आयेगा, जिसे हम देखने के लिये उपस्थित न रह"} +{"id": "indic_deva_eval_000630_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000630_indic_vision_bench_deva_ocr_b9de8e88b8c4.jpg", "ocr": "२\nजांभळीच्या शेवाळलेल्या बुंध्याला टेकून ती निवांत बसली होती. जांभळीच्या मोहोराचा आणि तिच्या पायांनी चुरगळल्या गेलेल्या पुदिन्याचा वास दरवळत होता. जंगलातली शांतता फक्त मधमाश्यांच्या गुणगुणीने भंग पावत होती.\nतिच्या मनात आलं, किती मजा असते असं करण्यात. पाय नेतील तिकडे चालत सुटायचं आणि कधी न पाहिलेल्या जागी येऊन ठेपायचं. पाऊलवाट पाहून चालायला लागायचं. पण थोड्याच वेळात ती कुठेतरी गवतात, झुडपात हरवून जाते. मग तशीच पुढे मुसंडी मारायची, आतापर्यंत तुडवला न गेलेला चुरचुरीत पाचोळा पायाखाली तुडवीत. झाडी जास्त जास्त दाट होत जातेयसं जाणवतं. कमरेएवढाल्या उंच झुडपांतून अडखळत वाट काढताना विचवीच्या काट्यांनी ओरबाडून घ्यायचं. आणि सगळ्या भटकंतीत दिशा इतक्यांदा बदललेली असते, की शेवटी अगदी ध्यानीमनी नसलेल्या अशा ठिकाणी उमटायचं.\n१२: साथ"} +{"id": "indic_deva_eval_000631_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000631_indic_vision_bench_deva_ocr_ea311f7b3cd4.jpg", "ocr": "युगान्त / २२५\nआपल्या स्वतःला व बायको-मुलाला विकतो. शेवटी आपल्या बायकोला मारायला तो तयार होतो आणि मग त्याच्या एकवचनीपणामुळे प्रसन्न झालेला विश्वामित्र ऋषी त्याच्या मेलेल्या मुलाला जिवंत करून सर्व राज्य परत देतो - अशी कथा आहे.\nऐतरेयातला राजा मनुष्य होता. देवालासुद्धा तो आपला मुलगा द्यायला तयार नव्हता. वचनभंगाच्या पातकामुळे जलोदर झाल्यामुळे त्याने दुसराच एक विकत घेतलेला मुलगा देऊ केला, पण आपला, मुलगा दिला नाही. नवस करणे म्हणजे देवाला प्रत्यक्ष वचन देण्यासारखेच आहे. पण राजाला मुलापुढे वचनाची किंमत नव्हती. ह्याउलट पुराणकालीन राजा स्वप्नात दिलेले वचन पुरे करण्यासाठी नाना तऱ्हेचे छळ पत्करतो; मनुष्यस्वभावाला विसंगत अशा गोष्टी करीत राहतो; आणि शेवटी सर्व काही परत मिळून वचनपूर्ती (म्हणजे राज्यदान) होतच नाही. सत्यवचनीपणा हे एक मायाजाळच ठरते.\nहरिश्चंद्र कथाच नव्हे, तर मागाहून येणाऱ्या इतरही कथा ह्याच धर्तीच्या आहेत. कुठल्यातरी एका गुणाची परिसीमा दाखवायची, आणेि शेवटी होणारा सत्यानाश न दाखवता सर्वतोपरी चांगलेच झाले, असे दाखवायचे, अशा धर्तीच्या ह्या नव्या युगातील कथा आहेत. महाभारताच्या काळापर्यंतचे वाङ्मय अगदी ह्याच्या उलट आहे.\nमहाभारताची कथा पहा. त्यामधली माणसे ही हाडामासाची, एका विशिष्ट समाजात राहणारी आहेत. ती काही कृत्ये करीत असतात व त्याची निमूटपणे फळे भोगीत असतात. आयुष्याच्या चाकाला एक दिशा व गती मिळालेली असते. ती दिशा बदलत नाही, ती गती थोपवली जात नाही. तो मनुष्य बाई असो, पुरुष असो, राजा असो, श्रीमंत असो, कंगाल असो, मनुष्य असो, देव असो, आयुष्याच्या ठरलेल्या फेऱ्यातून त्याला सुटका नाही. काही दिवस सुखाचे, ऐश्वर्याचे, भरभराटीचे काही दिवस दुःखाचे,"} +{"id": "indic_deva_eval_000632_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000632_indic_mozhi_deva_word_ocr_d5f9d008e984.jpg", "ocr": "दिवाणखान्यात"} +{"id": "indic_deva_eval_000633_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000633_devanagari_digits_mixed_c42deb1c704d.jpg", "ocr": "२841९३६१62२३५1२८०३८"} +{"id": "indic_deva_eval_000634_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000634_indic_mozhi_deva_word_ocr_0ed55303ed1b.jpg", "ocr": "शोधून"} +{"id": "indic_deva_eval_000635_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000635_indic_mozhi_deva_word_ocr_c62d66a1184e.jpg", "ocr": "माझ्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000636_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000636_hindi_handwritten_word_ocr_57b81537aad0.jpg", "ocr": "वेबमास्टर"} +{"id": "indic_deva_eval_000637_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000637_devanagari_digits_mixed_cabe06b854bb.jpg", "ocr": "८397४7१57७३२"} +{"id": "indic_deva_eval_000638_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000638_devanagari_page_ocr_e6f06bf3eb10.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 7\n\n५४१. कतमे धम्मा अब्याकता? यस्मिं समये लोकुत्तरं झानं भावेति निय्यानिकं\nअपचयगामिं दिद्लिगतानं पहानाय पठमाय भूमिया पत्तिया वितक्‍्कविचारानं वूपसमा अज्ज्त्तं\nसम्पसादन॑ चेतसो एकोदिभाव॑ अवितक्क॑ अविचार समाध्रिजं पीतिसुख॑ दुतिय झान॑ ...पेर...\nततियं झानं ...पे*... चतुत्थं झानं ...पे*... पठमं झानं ...पे०... पठचमं झानं उपसम्पज्ज\nविहरति दुक्खपटिपदं दन्धाभिज्ञं सुज्जतं छन्‍्दाधिपतेय्यन्ति कुसलं ...पे*... दुक्खपटिपदं\nदन्धाभिज्ञ॑ सुज्ञजतं छन्‍्दाधिपतेय्यन्ति विपाको ...पे*... दुक्खपटिपदं दन्धाभिज्ञ सुछ्ञतं\nछन्‍्दाधिपतेय्यन्ति कुसलं ...पे' दुक्‍्खपटिपदं दन्धाभिज्ञजं॑ अनिमित्तं छन्‍्दाधिपतेय्यन्ति\nविपाको ...पे*... दुक्खपटिपदं दन्धाभिज्ञजं॑ सुज्जतं छन्‍्दाधिपतेय्यन्ति कुसलं ...पे*..\nदुक्खपटिपदं दन्‍्धाभिज्ञं अप्पणिहितं छन्‍्दाधिपतेय्यन्ति विपाको, तस्मिं समये फस्सो होति\n\n-पे*... अविक्खेपो होति ...पे*... इमे धम्मा अब्याकता।\nह्लस्कृतच्छाया) ५ ४३. कतसे धर्मा: अव्याकृता:? यस्मिन्‌ समये लोकोत्तरं ध्यानं भावयति नै्याणिकम्‌\nअपचयगामिन दृष्टिगतानां प्रहाणायप्रथमाया: भम्या: प्रास्येवितर्कविचारयो: व्यूपशमात्‌\nआध्यात्मसम्प्रसादन॑ चेतस: एकोलिभावम्‌ अवितर्कम्‌ अविचारं॑ समाधिज प्रीतिसुख॑ द्वितीय॑ ध्यानम्‌\n\n'पे*... तृतीय॑ ध्यानम्‌ ...पे*... चतुर्थ ध्यानम्‌ ...पे*... प्रथम ध्यानम्‌ ...पे\"... पड्चमं ध्यानम्‌\nउपसम्पञ्य विहरति दुःखप्रतिपद॑ं तन्द्राभिज्ञ शून्यतां छन्‍्दाधिपत्यमिति कुशलम्‌ ...पे*... दुःखप्नतिपदं\nतन्द्राभिज शून्यतां छल्दाधिपत्यमिति विपाक: ...पे*... दुःखप्नतिप्द॑ तन्‍्द्राभिज्ञ शून्यतां\nछल्दाधिपत्यमिति कुशलम्‌ ...पे*... दुःखप्नतिपदं तन्द्राभिज्मम्‌ अनिमित्त छन्‍्दाधिपत्यमिति विपाकः\n...पे*... दुःखप्नतिपदं तन्द्राभिज्ञ शून्यतां छन्‍्दाधिपत्यमिति कुशलम्‌ ...पे*... दुःखप्नतिपद॑ तन्द्राभिज्ञम्‌\nअप्रणिहितं छन्‍्दाधिपत्यमिति विपाक:, तस्मिन्‌ समये स्पर्शों भवति...पे*... अविक्षेपो भव���ि ...पे*.\nइसे धर्मा: अब्याकृता:।\n(हिन्दी)५४१. कौन से धर्म अब्याकृत हैं? जिस समय नैर्याणिक एवं अपच्ययगामी लोकोत्तर ध्यान की\nमिथ्यादृष्टियों के प्रहाण हेतु तथा प्रथम भूमि की प्राप्ति हेतु भावना करता है, वितर्क-विचारों के शान्त हो जाने से,\nआन्तरिक रूप से स्वच्छता करने वाले चित्त की एकाग्रता से युक्त वितर्क-विचार से रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति\nएवं सुख वाले द्वितीय ध्यान ...पूर्ववत्‌... तृतीय ध्यान ...पूर्ववत्‌... चतुर्थ ध्यान ...पूर्ववत्‌... प्रथम ध्यान\n...पूर्ववत्‌... दुःखप्नतिपद तन्द्राभिज्ञा शून्यता छन्द की प्रधानता कुशल वाले पश्चम ध्यान को प्रास्कर बिहार करता\nहै ...पूर्वबत्‌... दुःखप्नतिपद तन्‍्द्राभिज्ञा शून्यता छन्द की प्रधानता वाली विपाक ...पूर्ववत्‌... दुःखप्नतिपद\nतन्द्राभिज्ञा शन्‍्यता छल्द की प्रधानता कुशल ...पूर्ववत्‌... दःखप्रतिपद तन्द्राभिज्ञा अनिमित्त छन्द की प्रधानता\n\nविपाक ...पूर्ववत्‌... दुःखप्नतिपद तन्द्राभिज्ञा शून्यता छन्द की प्रधानता कुशल ...पूर्वबत्‌... दुःखप्नतिपद तन्द्राभिज्ञा\nअप्रणिहित छन्‍्द की प्रधानता विषाक ...पूर्ववत्‌... अविक्षेप होता है ...पूर्वबत्‌... ये धर्म अव्याकृत हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000639_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000639_hindi_handwritten_word_ocr_f5fa9ffe7bcd.jpg", "ocr": "कैलाशगिरि"} +{"id": "indic_deva_eval_000640_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000640_hindi_handwritten_word_ocr_83f4324a787a.jpg", "ocr": "छूटने"} +{"id": "indic_deva_eval_000641_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000641_devanagari_page_ocr_071ecaf62cee.jpg", "ocr": "बुद्धबंसो\n\n223\nपालि- एतेसं धम्मराजूनं, अज्ञेसंनेककोटिनं\nआचिक्खित्वान त॑ मग्गं, निव्बुता ते ससावकाति॥4052॥\nबुद्धपकिण्णककण्डं निद्धितं॥\n\nएतेषां धर्मराजानाम्‌, अन्येघामनेककोटीनामा\n\nआचक्ष्य त॑ मार्गम्‌, निर्वतास्ते सश्लाबका इति ॥052॥\nकहेल्की-. इन धर्मराजों ने अन्य अनेक करोड़ों जिज्ञास जनता को (बुद्धों द्वारा परम्परा ये उपदिष्ट धर्माराधन) मार्ग\nको बता कर शिष्यों सहित परिनिर्वुत हो गये॥052॥\n\nसंस्कृतच्छाया-"} +{"id": "indic_deva_eval_000642_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000642_indic_mozhi_deva_word_ocr_3027e3167e1b.jpg", "ocr": "कोई"} +{"id": "indic_deva_eval_000643_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000643_devanagari_page_ocr_8a50053f4b44.jpg", "ocr": "सहावंसो 39\nपापा पि पक्स्ब पेक्सखन्‍ता, रेबतन्थेरसुन्‍्तस।\nसासणक परिक्सार, पटियादिय ने बहू॥26॥\n\nसीचघ नावाय गन्‍्त्वान, सह्जातिसमसीफपगा।\n\nकरोन्‍ता भक्ताविस्सग्ग, मनन्‍्तकाले\n\nउचढ्रिता॥27#\n\nसहक्जाति आवसन्तो, ��ाव्क्ृत्थरों विचिन्तिया\n\nपाबेय्यका श्रस्सवबादी, डति पस्सि अनासबो॥289\n\nउपेच्नच त॑ महात्रत्ा, धम्से लिट्ठा नि अव्रलि।\n\nनिच्च धम्से झितत्त सो, अक्तनो तस्स अतव्रि॥29॥\n\nसे परिक्सखारसादाय, रेवतत्थरसहइसू।\n\nओरो न गण्कि ते पकखे, तप्पक्सगाक़ी पणासयी॥30॥\nप्राषाउषि पलन्न प्रक्षल्ता, उवनस्थविन्सुत्तमस्‌।\nआआामण्णक परिष्कार, प्रत्यादाय ने बहूम।।26।/\nशीघ्च नौकया\n\nग॒ गल्बा, सल्जानिससीपसागसत\nचन्तो भक्तविसर्ग, मक्तकाल उपस्थित 27\nसहक्लजातिसावसन्त , साव्यक्रस्थविरो\n\nखिरो विच्चिन्त्य\nपराबेयययका श्रर्मबादी, इत्यप»श्यन अनाखव 28\nउपल्य त॑ सह्ाक्रत्या, श्रर्म तिछ दति अक्वीत\n\nनित्य शर्म निशत्व सः, आन्सन तस्य अव्वचीन ॥29\nले परिष्कारसादाय, सवतस्थविन्सद्ाल\n\nस्थबिरो न अग्रह्टीन तत्पकछ्त, तत्य\n\nब्ग्राढ्ी प्रणासयत।।30\n\nहिन्दी-\nस्थबिर के पास चल पड़े।।26।।\nनाब द्वारा सद्जाति के पास परढुँच। मोजन का समय उपस्थित कान मे पहल मोजन कर\n\n-डश्वर वे पापी अपना पक्ष सुताने के लिये, भिक्षुओं के अनुकुल बढ़त सा परिप्कार उपक्ाउस्वन्नार व्वकर रखत\n\nपहुँचे।।27॥।\n\nउश्वर सहूजाति-निबासी क्षीणाखव्र साव्यह़ स्थविर न भी\nपरावेय्यक शिल्षुओं का सत ही घर्ससम्मत है।/28//\nमहात्रह्मा ने भी उसके पास पहुँच कर उस श्रर्स पर आरूड रहने का\nनो खदा ही धर्म पर स्थित रहते हैं।।29।।\n\nवे परिष्कार लेकर रेबन स्थबिर के दर्शन केतु पहुँचे। परन्तु स्थविर ने उन का एक्क नहीं साना\nसमर्थकों को तत्काल अपने यहाँ से दर हटा दिया।।३0\n\nसमग्म प्रकरण पर चित्तलन करत\n\nचरामर्ण दिया। उत्तर में"} +{"id": "indic_deva_eval_000644_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000644_devanagari_page_ocr_30459afb864a.jpg", "ocr": "35. एकपदुमियवग्गो\n4. एकपदुमियत्थेरअपदानं\n\nपालि- “पदुमुत्तरो नाम जिनो, सब्बधम्मान पारगू।\nभवाभवे विभावेन्तो, तारेसि जनतं बहुं॥802॥\n“हंसराजा तदा होमि, दिजानं पवरो अहं।\nजातस्सरं॑ समोगय्ह, कीव्ठामि हंसकीव्ठितं॥803॥\n“चदुसुत्तरो लोकबिदू, आहतीन पटिग्गहों।\nजातस्सरस्स उपरि, आगच्छधि तावदे जिनो॥804॥\n“दिस्वानहं देवदेवं, सयम्भुं लोकनायकं।\nवण्टे छेत्वान पदुमं, सतपत्तं मनोरमं॥805॥\n“मुखतुण्डेन पर्गय्ह, पसन्‍नो लोकनायके [विप्पसन्नेन चेतसा (स्या०)]।\nउक्खिपित्वान गगणे [उक्खिपित्वा नलाटेन (क\")], बुछसेढ्ें अपूजयिं॥806॥\nसंस्कृत- “पद्मोत्तरो नाम जिन: , सर्वधर्मान्‌ पारग:।\nभवाभवे विभाव��न्‌, अतारयत्‌ जनतां बहन्‌॥802॥\n“हंसराजा तदा भवामि, द्विजानां प्रवरो5हम्‌।\nजातसरं॑ समवगाह्त, क्रीडामि हंसक्रीडितम्‌॥803॥\n“पद्मोत्तरो लोकविद्‌, आहतीनां प्रतिग्रहः।\nजातसरस्य उपरि, आगच्छत्‌ तावदेव जिन:॥804॥\n“डप्टवा हे देवदेखस, स्वयस्भ्‌वं लोकनायकम।\nबुन्ते छिल्वा पद्मम्‌, शतपत्र॑ मनोरमम्‌॥805॥\n“मुखतुण्डेन प्रगृह्य, प्रसन्नो लोकनायके।\nउक्षिप्य गगने, बुद्धश्रेछठम्‌ अपूजयम्‌॥806॥\nहिन्दी- सभी धर्मों में पारंगत पद्मोत्तर नामक जिन ने भव-अभव स्पष्ट कर बहत सी जनता को\n\n(भवसागर) पार कराया॥802॥\nउस समय मैं पक्षियों में श्रेष्ठ हंसराज हुआ तब एक प्राकृतिक झील में उतर कर हंसक्रीड़ा कर रहा\n\nथा॥803॥\nतब उसी समय पद्मोत्तर,\nगये॥804॥\nदेवों के देव सयम्भू लोकनायक को देखकर प्रसन्न सुन्दर प्मपुण्प को डण्ठल से तोड़कर.\nसुखतुण्ड में ग्रहण कर प्रसन्न मैंने आकाश में लोकनायक पर फेंककर बुद्धश्रेष्ठ की पूजा की॥806॥\n\nलोकविद्‌, आहतियों के ग्रहणकर्ता जिन जातसर (प्राकृत- झील) के ऊपर आ.\n\n॥805॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000645_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000645_indic_vision_bench_deva_ocr_a56b93dcf094.jpg", "ocr": "त्यात आक्षेपार्ह काही नाही. कारण या पत्रकात चळवळ अहिंसावादी आहे आणि गांधींनी आदेश दिल्याखेरीज कोणत्याही कार्यक्रमाला सुरुवात करायची नाही असे स्पष्ट म्हटले आहे.\"\nइ. स. १९४२ च्या क्रांतीचे नेते आता जीवित नाहीत किंवा कार्यशाली नाहीत, ४४-४५ सालच्या सुमारास भारतातील तरुणांवर जयप्रकाश नारायण, अच्युतराव पटवर्धन यांचा मोठा प्रभाव होता. युद्ध संपले, स्वातंत्र्यदानाची प्रक्रिया सुरू झाली. स्वातंत्र्य लवकर आले नाही तर अहिंसावादी स्वराज्य आंदोलन संपले आणि ४२च्या जहालांच्या हाती तिचे नेतृत्व जाईल अशी धास्ती नेहरू-पटेलांनासुद्धा पडली होती. घाईत त्यांनी फाळणीदेखील कबूल करून टाकली. त्याचे एक कारण ४२ च्या क्रांतिकारकांबद्दलची काँग्रेस नेतृत्वाची धास्ती, हे उघड आहे.\nकाळाचा महिमा असा की, काँग्रेसच्याच पंतप्रधानांना एका काळी काँग्रेसनेच नाकारलेले पितृत्व स्वीकारावे लागले.\n(२१ नोव्हेंबर १९९३)\n♦♦\nभारतासाठी । १००"} +{"id": "indic_deva_eval_000646_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000646_indic_vision_bench_deva_ocr_97f0953c3524.jpg", "ocr": "(११२)\nइचलकरंजी संस्थानाचा इतिहास.\nअसेपर्यंत पेशवाईविरुद्ध आचरण किंवा फंदफितूर त्यानीं कोणचाही\nकेला नाहीं. आधीं नसते उपद्व्याप करणें, आणि मागून त्यांतून\nआम्ही कसे शिताफीनें निसटलों म्हणून फुशारकी मिरविणें, हें त्यांस\nआवडत नसे. आपल्या आज्ञेची अमर्यादा यांस काडीमात्र सहन होत\nनसे. सातारच्या राजमंडळांत प्रधानांचें प्रस्थ मानून छत्रपति निर्माल्य \nझाले ही गोष्ट यांच्या डोळ्यांपुढें असल्यामुळें आपल्या राज्यांतला सर्व\nकारभार आपल्या एकट्याच्या तंत्रानें चालावा हा त्यांचा हेका आम्हांस गैरवाजवी वाटत नाही. त्यांच्या राज्यांत पुष्कळ अव्यवस्था माजली होती ती मोडावी हणून पेशव्यांनीं आपल्यातर्फेचा कोणी मुसद्दी त्यांस कारभारी नेमून द्यावा असें योजिलें होतें, परंतु ती गोष्ट कबूल करण्याचें त्या बाईनीं साफ नाकारिलें. त्यांना वाटे कीं, ही अव्यवस्था पुरवली, पण अधिकाऱ्यांचें प्राबल्य नकाे!\nजिजाबाई वारल्या या सालच्या अखेरीस माधवराव पेशवे मृत्यु\nपावले व त्यांच्या जागीं नारायणराव यांची स्थापना झाली. ता. १९\nजानेवारी सन १७७३ रोजीं नारायणराव पेशवे यांचा व कोल्हापूरकरांचा बेवीस कलमांचा करार झाला त्यांत चिकोडी व मनोळी हे तालुके करवीरकांस मिळाले व त्यांबरोबर अर्थात् लाट व रांगोळी हे गांव तिकडे गेले. परंतु हा ठराव कागदपत्रीं मात्र झाला. तो अमलांत आला नाहीं. कारण कीं, नारायणराव यांचा खून झाल्यानंतर रघुनाथराव दादासाहेब हे पेशवे झाले. त्यानीं “अनूबाईकडे लाट व रांगोळी हे गांव आहेत त्यांस उपद्रव देऊं नये” असें कोल्हापूरचे कारभारी येसाजी शिदे यांस पत्र लिहिलेलें आहे.\nरघुनाथराव दादासाहेब यांस पेशवाई प्राप्त झाल्यावर ते कर्नाटकांत मोहिमेस गेले. तो इकडे सखारामबापू, नाना फडनवीस,"} +{"id": "indic_deva_eval_000647_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000647_devanagari_digits_mixed_2ee3b3f8a526.jpg", "ocr": "7०14६०816७"} +{"id": "indic_deva_eval_000648_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000648_devanagari_page_ocr_e5c6bae5d4e3.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n406: न्‍\n\nमिह सेचने। मिहति, उम्मिहति। मेघो, मेहनं।\n'तत्थ उम्मिहतीति पस्साबं करोति। मेघोति मिहति सिज्वति लोकं बस्सधाराहीति मेघो,\nपज्जुन्नो। मेहनन्ति इत्थीनं गुय्हद्वानं।\nदह भस्मीकरणे धारणे च। आगारानि अग्गि दहति। अयं पुरिसो इमं इत्थिं अय्यिकं दहति,\nमम अस्यिकाति धारेतीति अत्थो। इमस्स पुरिसस्स अय॑ इत्थी अख्यिका होतीति अधिप्पायो।\nअज्न पनाय॑ पाछ्छि “सक्‍या खो अम्बद्ठ राजानं उककाक॑ पितामहं दहन्ती”ति। अग्गिना दहढ\nदण्हति, दण्हमानं। दस्स डादेसे “डहती”��ि रूपं। “डहन्तं॑ बालमन्वेति, भस्माछन्‍्नोव\nपावको”तिआदयो पयोगा एत्थ निदस्सनानि भवन्ति।\n\nचह परिसक्कने। चहति।\n\nरह चागे। रहति। रहो, रहितो।\n\nरहि गतियं। रहति। रहो, रहं।\n\nदहि बहि बुद्धियं। दहति। बहति।\n\nबहि सद्धे च। चकारो बुद्धापेक्खो। बहति।\n\nतुहि दुहि अदने। तुहति। दुहति।\n\nअरह मह पूजायं। अरहति। अरहं, अरहा। महति।\n\nमहनं, महो। विहारमहो। चेतियमहो।\n\nतत्र निक्किलेसत्ता एकन्‍्तदक्खिणेय्यभावेन अत्तनो कतपूजासक्कारादीन\nसह्फलभावकरणेन अरहणीयों पृजनीयोति अरहा, खीणासबो।\n\nईह चेतायं। ईहति। ईहा। ईहा बुछ्चति वीरियं।\n\nबह मह बुद्धियं। वहति, महति।\n\nअहि पिलहि गतियं। अहति। पिलहति, अहि।\n\nएल्थ च अहीति निष्पादोषि समानो अहति गच्छति गन्तुं सक्कोतीति अहि।\n\nगरह कलह कुच्छने। गरहति। गरहा, कलहति, कलहो।\n\nबरह वलह पधानिये परिभासनहिंसादानेसु च। वरहति। वलहति। वराहों।\n\nएल्थ च बराहोति सूकरोपि हत्थीपि बुक्चति। तथा हि “एनेस्या च बराहा चा\nमहावराहोव निवापपुद़ो \"तिआदीसु सूकरो “वराहो\"ति नामेन बुच्वति। “महावराहस्स नदीसु\nजग्गतों, भिसं घसमानस्सा”तिआदीसु पन हत्थी “बराहो”ति नामेन बुल्चति। महावराहस्साति\nहि महाहत्थिनोति अत्थो।\n\nपज्जु-"} +{"id": "indic_deva_eval_000649_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000649_devanagari_page_ocr_f91171af39f4.jpg", "ocr": "5 ज्फा\n\nसम्मोदित्वा ताय सर्धिं, तत्थागमनकारणं।\nतस्सा आत्वा अधिप्पायं, अधिप्पायविदू विदृ॥84॥\nसमता थूपगेहस्स, रम्म॑ भिक्खुनुपस्सयं।\nदेवानंपियतिस्सो सो, महाराजा अकारयि॥82॥\nहल्थाव्ठ्हकसमीपम्हि , कतो भिकक्‍्खुनुपस्सयो।\nह॒त्थावठ्हकविहारोति, विस्सुतो आसि तेन सो॥83॥\nसुमित्ता सच्समित्ता सा, मसहाथेरी महामती।\nतस्मिडिह वासं कप्पेसि, रम्मे भिक्‍्खुनुपस्सये॥ 84॥\nएवं लंकालोकहितं सासनबुद्धिं, संसोधेन्तो एस महाबोधिदुमिनन्‍्दो।\nलंकादीपे रम्मे महामेघवनस्थि, अद्ठा दीघं कालमनेकब्भूतयुत्तोति॥85॥\nसुजनप्पसादसंवेगत्थाय कते महावंसे बोधिआगमनो नाम 'एकूनवीसतलिमो परिच्छेदो।\nसंस्कृतच्छाया- . सम्मोद्य तया सार्धम्‌, तत्रागमनकारणम्‌।\n'तस्या: ज्ञात्वा अभिप्रायं, अभिप्रायविदु:अवेदी त्‌।8॥।\nसमन्तात्‌ स्तूपगृहस्य, रम्यं भिक्षुण्युपाश्रयम।\nदेवानांप्रिय: तिष्य: सः, महाराजा अकारयत्‌।॥82।।\nहस्त्याडकसमीपे, कृतः भिक्षुण्युपाश्नय:।\nहस्त्याढकविहार इति, विश्वुत आसीत्‌ तेन सः॥83॥।\nसुमित्रा सड्ःघमित्रा सा, महास्थविरी महामती।\nतस्सिन्‌ हि वासमकल्पयत्‌, रम्ये भिक्षुण्युपाश्रये।\nएवं लड्कालोकहितं शासनवृद्धिं, संसाधयन्‌ एप महावोधिदमेन्द्र:।\n___ लड्काद्ीपे रस्ये महामेघवने अस्थाद्दीर्थकालमनेकादुभुतयुक्त इति।।85।।\nकन्की- कुशल-प्रश्नानन्तर थेरी से यहाँ आकर बैठने का कारण पूछा। उसके मन की इच्छा जान कर उस राजा\nदेवानाम्प्रिय तिष्य ने उस स्तूपगृह के चारों तरफ सुन्दर भिक्षुणी-उपाश्नय बनवाया।।8-82॥।\n\nक्योंकि यह विहार हस्त्याढक से समीप ही निर्मित हुआ था, अतः आगे चलकर यह लोगों में हस्त्याडकविहार\nनामक से प्रसिद्ध हो गया।।83॥।\n\nसच्जरित्र सहयोगियों वाली बह बुद्धिमती सड्ूघमित्रा सुखपूर्वक ध्यानसाधनारत रहने लगी।।84॥]\nलड्न्‍कावासियों का हित एवं शासन की वृद्धि करता हुआ बह पवित्र महाबोधिवृक्ष लड्कादीप के उस रमणीय\nमहामेघवनोद्यान में चिरकाल तक अनेक आश्चर्यमय घटनाएँ दिखाता हुआ स्थिर रहा।।85।।"} +{"id": "indic_deva_eval_000650_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000650_indic_mozhi_deva_word_ocr_84063d6905bc.jpg", "ocr": "द्विवेदी,"} +{"id": "indic_deva_eval_000651_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000651_indic_vision_bench_deva_ocr_61e68268131e.jpg", "ocr": "प्रस्तावना\nअस्पृश्यांसंबंधाने 'केसरी' पत्रांत मी जे लेख लिहिले ते, थोडी अदलाबदल करून व भर घालून, पुस्तक रूपानें प्रसिद्ध करीत आहें.\nगेलीं चार पांच वर्षे अस्पृश्यांच्या प्रत्यक्ष परिचयाने त्यांच्या एकंदर स्थितीचे जे अवलोकन करता आलें त्यावरून सुचलेले हे विचार आहेत. मी जुना शास्त्रीपंडितही नव्हे आणि नवीन पद्धतीचा समाजशास्त्रज्ञही नव्हे. अर्थात् माझ्या लिहिण्यांत विद्वत्ता कमी. पण येवढें मात्र वाटतें कीं, प्रस्तुत विषयाशी माझी कांहींशी ओळख आहे. तिच्या बळावर अस्पृश्यांचे गाऱ्हाणे समाजाला सांगण्याचा प्रयत्न केला आहे.\nविद्वान् लोक आणि राष्ट्रहिताचे साधक यांनीं हा निबंध वाचून कांहीं अनुकूल-प्रतिकूल लिहिलें तर या बाबतींत जें कांहीं पुढे कर्तव्य असेल त्याचे स्वरूप जास्त निश्चित व कमी विवाद्य होईल.\n३३६ सदाशिव पेठ,\nश्री. म. माटे.\nपुणे शहर."} +{"id": "indic_deva_eval_000652_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000652_indic_mozhi_deva_word_ocr_2e46c5c7c001.jpg", "ocr": "किसी"} +{"id": "indic_deva_eval_000653_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000653_indic_vision_bench_deva_ocr_701c865e9c85.jpg", "ocr": "२०\nछुटकारा\nपाठक :\nआपके विचारोंसे ऐसा लगता है कि आप एक तीसरा ही पक्ष कायम करना चाहते हैं। आप एक्स्ट्रीमिस्ट भी नही��� हैं और मॉडरेट भी नहीं हैं।\nसंपादक :\nयहाँ आपकी भूल होती है। मेरे मनमें तीसरे पक्षका कोई ख़याल नहीं है। सबके विचार एकसे नहीं रहते। मॉडरेटोंमें भी सब एक ही विचारके हैं, ऐसा नहीं मानना चाहिये। जिसे (लोगोंकी) सेवा ही करनी है, उसके लिए पक्ष कैसा? मैं तो मॉडरेटोंकी सेवा करूँगा और एक्स्ट्रीमिस्टोंकी भी करूँगा। जहाँ उनके विचारसे मेरी राय अलग पड़ेगी वहां मैं उन्हें नम्रतासे बताऊँगा और अपना काम करता चलूँगा।\nपाठक :\nअगर आप दोनोंसे कहना चाहें तो क्या कहेंगे?\nसंपादक :\nएक्स्ट्रीमिस्टोंसे मैं कहूँगा कि आपका हेतु हिन्दुस्तानके लिए स्वराज्य हासिल करनेका है। स्वराज्य आपकी कोशिशसे मिलनेवाला नहीं है। स्वराज्य तो सबको अपने लिए पाना चाहिये-और सबको उसे अपना बनाना चाहिये। दूसरे लोग जो स्वराज्य दिला दें वह स्वराज्य नहीं है, बल्कि परराज्य है। इसलिए सिर्फ़ अंग्रेजोंको बाहर निकाला कि आपने स्वराज्य पा लिया, ऐसा अगर आप मानते हों तो वह ठीक नहीं है। सच्चा स्वराज्य जो मैंने पहले बताया वही होना चाहिये। उसे आप गोला-बारूदसे कभी नहीं पायेंगे। गोला-बारूद हिन्दुस्तानको सधेगा नहीं। इसलिए सत्याग्रह पर ही भरोसा रखिये। मनमें ऐसा शक भी पैदा न होने दीजिये कि स्वराज्य पानेके लिए हमें गोला-बारूदकी ज़रूरत है।\nमॉडरेटोंसे मैं कहूँगा कि हम खाली आजिज़ी करना चाहें, यह तो हमारी हीनता\n[\n१\n]\nहोगी। उसमें हम अपना हलकापन कबूल करते हैं। 'अंग्रेजोंसे सम्बन्ध रखना हमारे लिए ज़रूरी है'–ऐसा कहना हमारे लिए, ईश्वरके चोर बनने जैसा हो जाता है। हमें ईश्वरके सिवा और किसीकी ज़रूरत है,\n८०\n↑\nकमी"} +{"id": "indic_deva_eval_000654_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000654_indic_mozhi_deva_word_ocr_3cbf23e2e35a.jpg", "ocr": "किस"} +{"id": "indic_deva_eval_000655_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000655_devanagari_page_ocr_34ea30b7c9fd.jpg", "ocr": "मिलिन्दपज्हो 39\n\n“यथा वा पन, महाराज, कोचिदेव पुरिसो कुसलं कम्मं कत्वा कायस्स भेदा परं मरणा\nसुगतिं सग्गं लोक॑ उपपज्जेय्य, सो च तत्थ दिब्बेहि पडचहि कामगुणेह्टि समप्पितो समडि-गभूतो\nपरिचरेय्य। तस्स एवमस्स- 'स्वाहं खो पुब्बे कुसलं कम्मं अकासिं, सो'हं ततोनिदानं इमं एवरूपं\nबेदनं वेदियामी'ति। एवं खो, महाराज, वेदयितलक्खणा बेदना अनुभवनलक्खणा चा”ति।\n\n“कल्लोसि , भन्‍्ते नागसेना”ति।\n\n(ग) कि लक्खणा सञ्ञा!\n\n“भन्‍्ते नागसेन, कि लक्खणा सञ्ञा”ति?\n\n“सञ्जाननलक्खणा, महाराज, सञ्ञा। कि सज्जानाति?\nसंस्कृतच्छाया- यथा वा पुनर्महाराज, कश्चिदेव पुरुष: कुशल कर्म कृत्वा कायस्य भेदात्‌ परं मरणात्‌ सुगतिं\nस्वर्ग लोगसुपपगओ्येत। स च तत्र दिव्यै: पश्चभि: कामगुणैः समर्पित: समझुगीभूत: परिचरेत्‌। तस्वैवं\nस्यात्‌-- 'सोऊहं खलु पूर्वे कुशलं कर्माकार्पम्‌, सो5हँ ततोनिदानामिमामेवं रूपा बेदनां वेदयामी'ति।\nएबमसेव खलु, महाराज, वेदयितलक्षणा बेदना, अनुभवनलक्षणा चे\"ति ।\n\n\"कल्योउसि, भदन्त नागसेने\"ति ।\n\n(ग) किं लक्षणा संज्ञा\n\n\"भदनन्‍्त नागसेन, कि लक्षणा संज्ञेएति ?\n\n\"संज्ञानलक्षणा, महाराज, संज्ञेएति। \"किं संज्ञानमि\"ति?\nहिन्दी- अथवा महाराज! कोई आदमी पुण्य-कर्म करके मरने के बाद स्वर्ग लोक में उत्पन्न हो अच्छी गति को प्राप्त\nहो। वह वहाँ दिव्य पाँच कामगुणों का उपभोग करे। तब उसके मन में ऐसा हो- मैंने पहले पुण्य-कर्म किए उसी से\nमैं इन दिव्य पाँच कामगुणों का अनुभव कर रहा हूँ।\n\n'महाराज! इसी तरह “अनुभव होना, अनुभव करना” बेदना का लक्षण है।\"\nभन्ते! आपने ठीक कहा।\"\n(ग) संज्ञा का लक्षण क्‍या है?\n“भन्ते नागसेन! संज्ञा का लक्षण क्‍या है?\"\n“महाराज! 'पहचानना' संज्ञा का लक्षण है।” “क्या पहचानना?\""} +{"id": "indic_deva_eval_000656_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000656_indic_vision_bench_deva_ocr_f8eccb78f222.jpg", "ocr": "विषय-सूची\nक्रम\nविषय\nपृ॰ सं॰\nक्रम\nविषय\nपृ॰ सं॰\n१.\nईश्वर-स्तुति (दोहा)\n११०\n२५.\nदया\n१५८\n२.\nमेघ-महिमा\n११२\n२६.\nनिरामिष जीवन\n१६०\n३.\nमुनि-महिमा\n११४\n२७.\nतप\n१६२\n४.\nधर्म-महिमा\n११६\n२८.\nधूर्तता\n१६४\n५.\nगृहस्थाश्रम\n११८\n२९.\nनिष्कपट व्यवहार\n१६६\n६.\nसहधर्मिणी\n१२०\n३०.\nसत्यता\n१६८\n७.\nसन्तान\n१२२\n३१.\nक्रोध त्याग\n१७०\n८.\nप्रेम\n१२४\n३२.\nउपद्रव त्याग\n१७२\n९.\nअतिथि-सत्कार\n१२६\n३३.\nअहिंसा\n१७४\n१०.\nमधुर-भाषण\n१२८\n३४.\nसंसार की अनित्यता\n१७६\n११.\nकृतज्ञता\n१३०\n३५.\nत्याग\n१७८\n१२.\nन्यायशीलता\n१३२\n३६.\nसत्य का अनुभव\n१८०\n१३.\nसंयम\n१३४\n३७.\nकामना का दमन\n१८२\n१४.\nसदाचार\n१३६\n३८.\nभवितव्यता\n१८४\n१५.\nपरस्त्रीत्याग\n१३८\n३९.\nराजा\n१८६\n१६.\nक्षमा\n१४०\n४०.\nशिक्षा\n१८८\n१७.\nईर्ष्या-त्याग\n१४२\n४१.\nशिक्षा की उपेक्षा\n१९०\n१८.\nनिर्लोभिता\n१४४\n४२.\nबुद्धिमानों के उपदेश\n१९२\n१९.\nचुगली से घृणा\n१४६\n४३.\nबुद्धि\n१९४\n२०.\nव्यर्थ भाषण\n१४८\n४४.\nदोषों को दूर करना\n१९६\n२१.\nपाप कर्मों से भय\n१५०\n४५.\nयोग्य पुरुषों की मित्रता\n१९८\n२२.\nपरोपकार\n१५२\n४६.\nकुसङ्ग से दूर रहना\n२००\n२३.\nदान\n१५४\n४७.\nविच���रपूर्वक काम करना\n२०२\n२४.\nकीर्ति\n१५६\n४८.\nशक्ति का विचार\n२०४"} +{"id": "indic_deva_eval_000657_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000657_indic_mozhi_deva_word_ocr_14759da2bfd9.jpg", "ocr": "वैसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000658_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000658_devanagari_page_ocr_58160e9f5a64.jpg", "ocr": "बुद्धबंसो ड\n\nपालि- तस्स ब्यामप्पभा काया, निद्धावति दिसोदिसं।\nनिरन्तरं दिबारत्तिं, योजनं फरते सदा॥547॥\nन केचि तेन समयेन, समन्‍ता योजने जना।\nउक्‍्कापदीपे उज्जालेन्ति, बुद्धंसीहि ओत्थटा॥548॥\nनवुतिवस्ससहस्सानि, आयु विज्जति तावदे।\nतावता तिट्ठमानों सो, तारेसि जनतं बहुं॥549॥\nयथा उक्कृहि गगन, विचित्त उपसोभति।\n'तथेव सासन॑ तस्स, अरहन्तेहि सोभति॥550॥\nसंसारसोत॑ तरणाय, सेसके पटिपन्नके।\nधम्मसेतुं दव्ठहं कत्वा, निब्बुतों सो नरासभो॥554॥\nसंस्कृतच्छाया-. तस्य व्यामप्रभा काय:, निर्धावति दिशावदिशम्‌।\nनिरन्तरं दिवारात्रौ, योजनं स्फुरति सदा॥547॥\nन केचित्‌ तस्मिन्‌ समय, समन्‍्ताद योजने जना:।\nउल्काप्रदीपान्‌ उज्ज्वालयन्ति, बुद्धरश्मिभि: अवस्थिता:॥548॥\nनवतिवर्षसहस््राणि, आयुर्विद्यते तावता।\nताबता तिछठमानः सः, अतारयत्‌ जानता बहम्‌॥549॥\nयथा उद्डभिः गगनस्‌, विचित्रम्‌ उपशोभते।\nतथैव शासन तस्य, अर्हद्धिः शोभते॥550॥\nसंसारखोत॑ तरणया, शेषकान्‌ प्रतिपन्नकान।\nधर्मसेतु ढूढे कृत्वा, निर्वुतः स नर्घभः॥554॥\nहिन्दी- उनके शरीर की वह आभा निरन्तर दिनरात योजन दूर तक (समस्त दिशाओं में) फैली रहती थी॥547॥\nउस समय, उन के एक योजन तक समीप रहने बाला कोई भी पुरुष कभी प्रकाश के लिये न कोई दीपक\nजलाता था, न कोई उल्का (मशाल) ॥548॥\nवे बुद्ध नब्बे हजार वर्षों तक इस संसार में जीवित रहे। इतने काल तक उन्होंने धर्मोपदेश द्वारा\nबहस झुख्यक जनता को भवसागर से पार कराया॥549॥\nजैसे समस्त आकाशमण्डल चित्र-विचित्र नक्षत्रों से शोभित होता है, उसी प्रकार उनका भिक्षुसंघ भी\nविशिष्ट अर्हतों (ज्ञानियों) से शोभित था॥550\nइस भवसागर को पार करने के लिये शेष जिज्ञासुओं को धर्मसेतु सुदृढ़ कर वे पुरुषश्रेष्ठ बुद्ध परिनिर्वृत हो\nगये॥554॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000659_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000659_indic_mozhi_deva_word_ocr_18424014d621.jpg", "ocr": "भूमिका"} +{"id": "indic_deva_eval_000660_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000660_indic_vision_bench_deva_ocr_ce5f6def29b9.jpg", "ocr": "९. कचरा निर्मूलन - एक युद्ध\nनिसर्गतः कोणत्याही पदार्थाचे विघटन होताना ज्वलनाची क्रिया घडत असते. कचऱ्याच्या बाबतीतही हे असेच घडते. कचरा मंदज्वलन क्रियेने ��िघटन पावतो.\nजेव्हा हवा न लागता मंदज्वलन होते, तेव्हा त्या ज्वलनाला सडणे असे म्हणतात. या क्रियेत प्रामुख्याने घाण वास बाहेर पडतो. हा घाण वास का बाहेर पडतो ? कारण ही क्रिया घडत असताना हायड्रोजन सल्फाईड, कार्बन मोनॉक्साईड, मिथेन, अमोनिया आणि फॉस्फाईन असे विषारी व घाण वास असलेले वायू बाहेर पडत असतात. त्याचबरोबर सडण्याच्या क्रियेत रोगजंतूंचीही वाढ होते, कारण ते वातावरण रोगजंतूंच्या वाढीस पोषक असते. इतर ज्वलनांप्रमाणे या ज्वलनातून कार्बन डाय ऑक्साईड हाही वायू बाहेर पडत असतो.\nसडण्याची क्रिया आपल्याला हानिकारक असते, म्हणूनच कचरा निर्मूलनातील सडण्याची क्रिया टाळायची असते. सडण्याच्या क्रियेचे रूपांतर कुजण्याच्या क्रियेत होण्यासाठी आवश्यक असतो तो जरासा ओलावा अन् भरपूर खेळती हवा. ह्या दोनच गोष्टी मिळाल्यावर प्रथम नाहीसा होतो तो वास (दुर्गंधी). एकदा वास बंद झाल्यावर समजावे की, सडण्याचे रूपांतर कुजण्यात होते आहे. आणि असे झाल्यावर आजूबाजूच्या सर्व सजीवांना जगणे सुसह्य होऊ लागेल.\nहवा आणि पाणी यांव्यतिरिक्त आणखीही काही गोष्टींनी आपल्याला कुजण्याची क्रिया गतिमान आणि सजीवांसाठी उपयुक्त अशी करता येते. कुजण्याच्या क्रियेतसुद्धा कार्बनडाय-ऑक्साईड व रोगजंतू यांची वाढ होत असते, पण सडण्यापेक्षा कुजण्याच्या क्रियेत रोगजंतूंची वाढ अल्प प्रमाणात होत असते.\nहवा आणि पाणी देऊन आपण वास तर थांबवला, आता आपल्याला हल्ला करावयाचा आहे तो निर्माण होणाऱ्या रोगजंतूंवर. यासाठी आपल्याला असे काही बॅक्टिरिआ तेथे निर्माण करावे लागतील की, ज्यांचे अन्न हे ‘रोगजंतू' आहेत आणि त्या बॅक्टिरिआंचे उत्सर्जन सजीवांसाठी हानिकारक नाही.\nफोटो सिंथेटिक, अॅक्टिनो मायसेटिस, लॅक्टिक अॅसिड आणि यिस्ट या पदार्थांमधून आपल्याला अपेक्षित आहेत असे बॅक्टीरिआ मिळू शकतात. हे बॅक्टिरिआ रोगजंतूना खातात व त्यांच्या उत्सर्जनातून अॅमिनो अॅसिडस, साखर, फॉस्फेट आणि सल्फेट असे पदार्थ बाहेर पडतात. या पदार्थांचा फायदा कचऱ्यातील गांडूळांना व इतर कृमींना होतो. या पदार्थांवर त्यांचे चांगले पोषण होते व त्यांची वाढ होऊ लागते.\nकचरा निर्मूलन - एक युद्ध * ३९"} +{"id": "indic_deva_eval_000661_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000661_indic_mozhi_deva_word_ocr_55ef9c565a6f.jpg", "ocr": "बोलत"} +{"id": "indic_deva_eval_000662_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000662_devanagari_page_ocr_8ec383758f81.jpg", "ocr": "अकंसाचरियजादं से #5/4॥\nअकंखु खलत तस्स ॥5/34॥\nअकरूपो कम्पयित्वान ॥5/758॥\nअकालपुष्फालइकारे5/74,08,443\nअकिख्वपूर्ज लि सझ्जाल॑ ॥5/94॥\nअगदासलक चेव ॥5/26॥\nअगमासि सकाराम॑ ॥5/485॥\nअगा बेब्छचन पडचदस ॥5/445॥\nअगारत्तयपामोक्‍खे ॥१9/69॥\nअगु सुमनकूटन्ते ॥7/67॥\nअग्गं बहस्सुत्तादीन ॥3/34॥\nअग्गफलससापसिं ॥5/209॥\nअग्गहि ललिये चारे॥6/26॥\nअच्चुव्काराहि पूजाहि ॥9/7#\nअच्छरियानि चाहेसूं ॥३/40॥\nअजातसच्तुनों बस्से ॥2/32॥\nअजालस्तुपुत्तो त॑ ॥4/48॥\n\nअज्जेव पब्बजिस्साम ॥5/200#\nअज्जेब यक्‍खे घालेहि ॥7/35॥\nअज्जनो चाथ कललचाना ॥2/47॥\nअख्जँ उपविजज्ज सा ॥9/24॥\nअज्जासन अपस्सन्तों ॥5/40॥\nअज्जे अम्बे अनम्बे चल #4/98\nअट्ठ ते निज्चभत्तानि ॥5/69॥\nअट्ठ बाह्यणकुलानि ॥9/2॥\nअद्धारसल्न सेणीन ॥7/5708\nअद्धारसम्हि बस्सस्हि॥20/4॥\nअद्धारसाधिका वस्ससला ॥5/00॥\nअडदुद्भालि सहस्सानि ॥2/539\nअतिभीतो जहू राजा ॥4/39॥\nअतीते तम्हि सत्ताहे ॥8/560\nअतीते दसमे बस्से ॥4/8॥\n\nअलीब तुझो ते दिस्वा ॥5/494॥\n\nअलीब पाकटो आसि ॥5/453॥\n\nअलीब रूचिनिं आसि ॥6/3॥\n\nअत्तनो अत्तनो पत्त ॥5/35॥\n\nअत्तनों अभिसेक सो ॥0/78॥\n\nअत्तनो खज्जव5/72, 06,444\n\nअत्तनो खन्‍्धसमके ॥7/34॥\n\nअत्तनो चिन्तितं रख्जो ॥5/456॥\n\nअत्तनो धम्मकरणं ॥45/88॥\n\nअक्तनो पटियत्तेन ॥5/67॥\n\nअत्तनो राजगेहँ सो ॥0/740॥\n\nअल्थि पाटलिपुत्तस्सि ॥5/240\n\nअल्थि सो ॥2460॥\n\nअथ सासन दायादभाव ॥5/98॥\n\nअथा'मच्चेहि सन्तेत्वा ॥8/3॥\n\nअधामच्चा सामिनो ते ॥7/48॥\n\nअथेकदिवसं राजा ॥5/87॥\n\nअयेकदिबसं हल्थी ॥9/74॥\nअदंसु पण्णाकारे ते ॥44/39॥\n\nगाथानुक्रमणिका\nअदा अन्दकुमारस्य ४१0/79७\nअदा तत्थ निसिन्‍्नस्सख ॥5/478\nअदा पटिऊ्खंं तेस सो ॥5/999\nअदा सतसहूस्स सो ॥0/24#\nअदुल्भत्थाय सपर्थ ॥7/23॥\nअधिट्वानानि पड्चेच ॥7/538\nअधिवासबित्वा भगवा ॥/679\nअधोचिसं वत्यकोरटिं ॥/29॥\nअनायल्तेसु सब्बेखु ॥#7/46॥\nअनुकम्पा सयि पि ले॥/66॥\nअनुदूतवचो सुल्का ॥4/46॥\nअनुबन्धी ओरगझूगं ॥0/47#\nअनुमोहि इस रज्ज ॥5/57॥\nअनुला सा सपरिसा ॥9/65#\nअनुलादेवी सा सद्धि ॥8/9॥\nअनोतत्तोदक काजे ॥5/24#\nअनोतत्तोदक॑ चेव ॥4/30॥\n\nअनोलत्तोदकाजेसु ॥5/84#॥\n\nअनोमदस्सि सम्बुद्ध ॥/7॥\nअन्तो नरिन्दवल्युस्स ॥0/86॥\nअन्‍्तो'ब राजवत्थुस्स ॥4/47॥\nअन्‍्तोवस्सेकदिवस ॥ 8/20॥\nअपस्ख सुक्तिण्णपर्द ॥#7/47॥\nअपस्सिय अपस्सेन ॥5/2409\nअपुक्छि घम्मिके भिक्‍्स्बू ॥5/274॥\nअपेक्खमानो पब्बज्जं ॥4/28॥\nअचन्धी सब्वा सीसायो ॥45/4940॥\nअभिसिडिचि महावोधिं ॥8/36॥\nअमच्चस्स महादेव ॥8/20#\nअमच्च्वा सन्निपतिता ॥6/330॥\nअमच्लला'नुमतो\"���च्लो ॥8/44#॥\nअमतेना'भिसित्तोच ॥7/27॥\nअमितोदनसक्कस्स ॥8/48॥\nअस्वट्ठिकं अदा राजा ॥5/42॥\nअय॑ येरो वियाहम्पि ॥5/620\nअय॑ दीपो अद्ड फीतो ॥20/28॥\nअरबवालदहेवारि ॥2/44॥\nअरिद्वनामका\"'मच्न्ब ॥8/3॥\n\nअरिट्लो सो पडचसल ॥१9/660\nअलड्करित्वान बहुधा ॥47/36॥\nअलभ निसेधकं लस्स ॥6/240॥\nअवन्तिरह्ठं भुड्जन्तो ॥43/8॥\nअसंखियान देबान ॥१4/40॥\nअसंखेस्थायुका एले ४2/6॥\nअसखाव्क्ह-सुक्कपक्खस्हि॥ 3/4॥\nअसीतिया सहस्सानं ॥2/270\nअसीतिहत्थ कारेसि ॥१/420॥\nअसोको पितरा दिन ॥5/39॥\nअसोको मधुदो'सन्धि ॥5/60॥\n\nअस्सयुजस॒क्कपक्खे ॥8/7, 6१॥\n\nमान 2\n\nअल्सखुजस्स सासस्स ॥20/330\nअख्सासेन्लो सयड्रे ले ॥7/59#\nअर्ह़ चुद च खस्स च ॥१/34॥\nअर रज्जेन लिकखच्ु ॥9/430\nअहसेल कारापेस्खासि ॥१5/4689\nअड्ध डसर्स्सि कप्पस्मि ॥5/60#\nअड़ उपान्ियरस्स #5/048\nअड्ड बेसासिय पुल्चे॥5/058\nअहोसि लिए बुद्धान ॥5/2:\nअकृलोसि सागिलेल्यस्स #/58\nअज्लोसि सिग्मबो नास #5/20क#\nआकासस्टि निसीदित्वा ॥5/220#\nआकासा ओतलरित्वा सा ॥१7/548\nआकासे ठ्पयित्वान ४5/64#8\nआगच्छतति पेसेक्टि ॥5/239\nआगन्‍्तुकासा सब्बेज 45/65,99.433\nआगसासि घुर राजा #6/73४\nआगम्म अनुलादेची ॥१4/578\nआजीबकान ग्रेहजच #0/402#\nआणापेत्वा व्वर्णयेव ॥7/35#\nआणापेल्बा सातुलान ॥0/77#\nआदाय चतुरो येरे #3/48\nआदाय दक्खिण १5/78.442.447\nआदिया यूलसूलानि ४१8/440\nआदियिल्वान सोचण्ण ४8/399॥\nआनयित्वान नगरे ॥20/4008\nआनापयित्वा सतिसा #5/369\nआनुभावेन देवान ॥20/438\nजआपणादेसिका सा तु ४७5/599\nआयुत्तो सातुसन्देस ॥0/98\nआरामो कप्पते झल्‍्ले #5/4\nआरुय्ह जम्बुकोलसम्हि ४4/230\nआरोहतु सिस्सकलर् #१3/4#\nआलब्बित्वा कर रज्जो ४5/659\nआवासानुमताचिजण ॥4/09\nआवाहमइझूगले तत्य ॥7/उबघ्\nआसि अज्जनसककस्स ॥2/8#\nआह अस्हादिसे जाहे ४5/280॥\nआह राजा तु अम्म ४१8/78\nआह सता मे सहाराज॥8/8%8\nआहालितस्ति सत्ताहे ४5/58॥\nआह ते सुग् यक्‍खा ॥/27॥\nइच्च'जि सहायेरो ४5/820\nइच्न्चाह येरो ते खुल्वा ॥4/9॥\nइच्न्चाह चेरो येरस्ख ॥5/73॥\nइच्चाह नाम सनन्‍्धाय ॥5/409॥\nइच्चचेब चोदिलो चेरो ॥3/25॥\nइच्चेव मालरा बुक्तो ॥5/60॥\nइच्चेबसादि सुगतो ॥/70#॥\nइसि एलानि कम्मानि ॥20/26॥\nइति कुसुमपुरे सरे सरंसा ॥१8/68॥\nइति कोधवस्स गन्ल्वा॥20/5॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000663_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000663_devanagari_page_ocr_068889973b25.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n388: न्‍\n\nगिले पीतिक्खये। गिलायति। गिलानो, गेलड्ञं। गिलानोति अकल्लको। विनयेपि हि वुत्तं\n“नाह अकल्लको”\"ति। अट्ठकथायड्च “नाहं अकल्लकोति नाहं गिलानो”ति चुत्तं।\n\nमिले गत्तविनामे। मिलायति। मिलायनो, मिलायन्तो, मिलायमानो।\n\nकेले मसायने। मसायनं तण्हादिद्लिवसेन “मम इद”न्ति गहणं। केलायति। त्वं कं केलायति।\n\nसल चलने संवरणे च, वल वल्‍ल चलने च। संवरणापेक्खायं चकारो। सलति। कुसलं।\nबलति। वल्लति। बल्लूरो।\n\nतत्थ कुसलन्ति कुच्छिते पापधम्मे सलयति चलयति कम्पेति विद्धंसेतीति कुसलं। कुच्छितं\nअपायद्वारं सलन्ति संबरन्ति पिदहन्ति साधवो एतेनाति कुसलं। बलल्‍लन्ति संवरन्ति रक्खन्ति\nइतो काकसेनादयो सत्ते अखादनत्थायाति बललूरो।\n\nमसल मलल्‍ल धारणे। मलति। मल॑ं। मल्‍लति। मलल्‍लो।\n\nभल भल्ल परिभासनहिंसादानेसु। भलति। भल्लति।\n\nकल सडूख्याने। कलति। कला, कालो।\n\nएत्थ कलाति सोब्सभागादिभागो। कालोति “एत्तको अत्क्कन्तो”तिआदिना कलितब्बो\nसड्नखातब्बोति कालो, पुब्बण्हादिसमयो।\n\nकल्ल अरुद्दे। असद्दो। निस्सद्दो। कललति।\n\nजल दित्तियं। जलति। जलं, जलन्तो, पज्जलन्तो, जलमानो।\n\nको एति सिरिया जलं। जलंव यससा अद्ठा, देवदत्तोति मे सुतं। सद्धम्मपज्जोतों जलितो।\n\nहुल चलने। हलति। हलो। हलोति फालो, सो हि होलेति भूमिं भिन्‍्दन्तो मत्तिकखण्डं\nचालेतीति “हलो”ति बुच्चति उकारस्स अकारं कत्बा।\n\nचल कम्पने। चलति। चलितो, अचलो। महन्तो भूमिचालो। चलन, चालो।\n\nजल धज्ञे। जलति। जलं।\n\nटल ठुल बेलम्बे। टलति। टुलति।\n\nथल ठाने। थलति। थलो। थलोति निरुदकप्पदेसो। पब्बज्जानिब्बानेसुपि तंसदिसत्ता\nतब्बोहारों। यथा हि लोके उदकोघेन अनोत्थरणद्वानं “थलो”ति वुच्चति, एवं किलेसोघेन\nअनोत्थरणीयत्ता पब्वज्जा निव्बानउच “अलो\"ति बुच्चति, “तिण्णो पारइगतो थले तिद्ठति\nब्राह्मणो”ति हि चुत्त।\n\n'फाल विलेखने। फालति भूमिं विलेखति भिन्‍्दतीति फालो।\n\nनल गन्थे। नलति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000664_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000664_indic_mozhi_deva_word_ocr_0609c309d53c.jpg", "ocr": "अपना"} +{"id": "indic_deva_eval_000665_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000665_indic_mozhi_deva_word_ocr_b98ce28ee69f.jpg", "ocr": "प्रथम"} +{"id": "indic_deva_eval_000666_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000666_indic_vision_bench_deva_ocr_b7551fab57f0.jpg", "ocr": "४५\nसच्ची सभ्यता कौनसी?\nशादी हो जाती है, जिस देशमें बारह सालकी उम्रके लड़के-लड़कियां घर-संसार चलाते हैं, जिस देशमें स्री एकसे ज्यादा पति करती है, जिस देशमें नियोग\n[\n१\n]\nकी प्रथा है, जिस देशमें धर्मके नाम पर कुमारिकाएं बेसवाएं\n[\n२\n]\nबनती हैं, जिस देशमें धर्मके नाम पर पाड़ों और बकरोंको हत्या\n[\n३\n]\nहोती है, वह देश भी हिन्दुस्तान ही है। ऐसा होने पर भी आपने जो बताया वह क्या सभ्यताका लक्षण\n[\n४\n]\nहै?\nसंपादक :\nआप भूलते हैं। आपने जो दोष बताये वे तो सचमुच दोष ही हैं। उन्हें कोई सभ्यता नहीं कहता। वे दोष सभ्यताके बावजूद कायम रहे हैं। उन्हें दूर करनेके प्रयत्न हमेशा हुए हैं, और होते ही रहेंगे । हममें जो नया जोश पैदा हुआ है, उसका उपयोग हम इन दोषोंको दूर करनेमें कर सकते हैं।\nमैंने आपको आजकी सभ्यताको जो निशानी बताई, उसे इस सभ्यताके हिमायती खुद बताते हैं। मैंने हिन्दुस्तानकी सभ्यताका जो वर्णन\n[\n५\n]\nकिया, वह वर्णन नई सभ्यताके हिमायतियोंने किया है।\nकिसी भी देशमें किसी भी सभ्यताके मातहत सभी लोग संपूर्णता तक नहीं पहुँच पाये हैं। हिन्दुस्तानकी सभ्यताका झुकाव नीतिको मजबूत करनेकी ओर है; पश्चिमकी सभ्यताका झुकाव अनीतिको मजबूत करनेकी ओर है। इसलिए मैंने उसे हानिकारक कहा है। पश्चिमकी सभ्यता निरीश्वरवादी\n[\n६\n]\nहै, हिन्दुस्तानकी सभ्यता ईश्वरमें माननेवाली है।\nयों समझकर, ऐसी श्रद्धा रखकर, हिन्दुस्तानके हितचिंतकोंको चाहिये कि वे हिन्दुस्तानकी सभ्यतासे, बच्चा जैसे माँसे चिपटा रहता है वैसे, चिपट रहें।\n↑\nएक पुराना रिवाज जिसके मुताबिक बिना संतानवाली स्त्री पतिके रोगी, नपुंसक या मृत होनेकी हालतमें अपने देवर या पतिके किसी और संबंधीसे संतान पैदा करा सकती थी।\n↑\nदेवदासियां।\n↑\nकत्ल।\n↑\nनिशानी।\n↑\nबयान।\n↑\nखुदामें नहीं माननेवाली।"} +{"id": "indic_deva_eval_000667_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000667_indic_mozhi_deva_word_ocr_24d8d26831cc.jpg", "ocr": "आहेत,"} +{"id": "indic_deva_eval_000668_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000668_indic_vision_bench_deva_ocr_cc65be4b1ace.jpg", "ocr": "58 : प्रेमचंद रचनावली-6\nअब मेहता को अवसर मिला। बोले-आप भी तो इसी मरज में गिरफ्तार हैं?\n'मैंने प्रतिज्ञा की है कि किसी फिलासफर से शादी करूंगी और यह वर्ग शादी के नाम से घबराता है। हसबेंड साहब तो स्त्री को देखकर घर में छिप जाते थे। उनके शिष्यों में कई लड़कियां थीं। अगर उनमें से कोई कभी कुछ पूछने के लिए उनके फिस में चली जाती थी। तो आप ऐसे घबड़ा जाते, जैसे कोई शेर आ गया हो। हम लोग उन्हें खूब छेड़ा करते थे, बेचारे बड़े सरल-हृदय। कई हजार की आमदनी थी, पर मैंने उन्हें हमेशा एक ही सूट पहने देखा। उनकी एक विधवा बहन थी। वही उनके घर का सारा प्रबंध करती थी। मिस्टर हसबेंड को तो खाने की फिक्र ही न रहती थी। मिलने वालों के डर से अपने कमरे का द्वार बंद करके लिखा-पढ़ी करते थे। भोजन का समय आ जाता, तो उनकी बहन आहिस्ता से भीतर के द्वार से उनके पास जाकर किताब बंद कर देती थी, तब उन्हें मालूम होता कि खाने का समय हो गया। रात\nको भी भोजन का समय बंधा हुआ था। उनकी बहन कमरे की बत्ती बुझा दिया करती थी। एक दिन बहन ने किताब बंद करनी चाही, तो आपने पुस्तक को दोनों हाथों से दबा लिया और बहन\nभाई में जोर-आजमाई होने लगी। आखिर बहन उनकी पहिएदार कुर्सी को खींचकर भोजन के कमरे में लाई।\nरायसाहब बोले-मगर मेहता साहब तो बड़े खुशमिजाज और मिलनसार हैं, नहीं इस हंगामे में क्यों आते।\n'तो आप फिलासफर न होंगे। जब अपनी चिंताओं से हमारे सिर में दर्द होने लगता है, तो विश्व की चिंता सिर पर लादकर कोई कैसे प्रसन्न रह सकता है।'\nउधर संपादकजी श्रीमती खन्ना से अपनी आर्थिक कठिनाइयों की कथा कह रहे थे-बस यों समझिए श्रीमतीजी, कि संपादक का जीवन एक दीर्घ विलाप है, जिसे सुनकर लोग दया करने के बदले कानों पर हाथ रख लेते हैं। बेचारा न अपना उपकार कर सके, न औरों का। पब्लिक उससे आशा तो यह रखती है कि हरएक आंदोलन में वह सबसे आगे रहे, जेल जाय, मार खाए\nघर के माल-असबाब की कुर्की कराए, यह उसका धर्म समझा जाता है, लेकिन उसकी कठिनाइयों की ओर किसी का ध्यान नहीं। हो तो वह सब कुछ करे। उसे हरएक विद्या, हरएक कला\nमें पारंगत होना चाहिए, लेकिन उसे जीवित रहने का अधिकार नहीं। आप तो आजकल कुछ लिखती ही नहीं। आपकी सेवा करने का जो थोड़ा-सा सौभाग्य मुझे मिल सकता है, उससे मुझे क्यों वंचित रखती हैं?\nमिसेज खन्ना को कविता लिखने का शौक था। इस नाते से संपादक जी कभी-कभी उनसे मिल आया करते थे, लेकिन घर के काम-धंधों में व्यस्त रहने के कारण इधर बहुत दिनों से कुछ लिख नहीं सकी थीं। सच बात तो यह है कि संपादकजी ने ही उन्हें प्रोत्साहित करके कवि बनाया था। सच्ची प्रतिभा उनमें बहुत कम थी।\n‘क्या लिखूं कुछ सूझता ही नहीं। आपने कभी मिस मालती से कुछ लिखने को नहीं कहा?\nसंपादकजी उपेक्षा भाव से बोले-उनका समय मूल्यवान है कामिनीदेवी। लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार हैं। जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया, वह क्या लिखेंगे?\nकामिनी ने ईर्ष्या-मिश्रित विनोद से कहा-अगर आप उनसे कुछ लिखा सकें, तो आपका प्रचार दुगुना हो जाय। लखनऊ में तो ऐसा कोई रसिक नहीं है, जो आपका ग्राहक न बन जाय।"} +{"id": "indic_deva_eval_000669_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000669_indic_vision_bench_deva_ocr_37bdea80a680.jpg", "ocr": "समारोप\nवस्थापन’ या विषयावर गेल्या दीड वर्षांहून अधिक काळ मी ही लेखमाला चालविली आहे.हा विषय क्लिष्ट, नीरस आणि उच्च्पदस्थांनाच उपयोगी आहे,ही सार्वत्रिक समजून दूर करणं आणि तो सर्वसामान्यांपर्यंत पोहोचविणे, त्याचा तत्त्वे बारकावे आणि उपयुक्तता समजून देणे या उद्देशानं ही लेखमाला सुरू करण्यात आली होती. वाचकांचा उत्साहवर्धक प्रतिसाद मिळत गेल्यानं हा उद्देश सफल झाला असं म्हणावयास काही हरकत नाही.\nया विषयाला विशिष्ट अशी मर्यादा नाही. मानवाच्या यच्ययावत सर्व व्यवहारांमध्ये व्यवस्थापनाची भूमिका महत्त्वपूर्ण असते. किंबहुना उत्तम व्यवस्थापनाशिवाय कोणत्या ही कार्याची अगर व्यवहाराची यशस्वी सांगता होत नाही. चार माणसांचं (अलीकडचा काळात तर तीनच) छोटे कुटुंब सुखानं चालवायचं असो अगर तीन चार हजार कर्मचारी असलेला असलेला कारखाना किंवा संस्था असो, चालक जितका व्यवस्थापन कुशल तितकं यश अधिक असं सूत्र आहे. व्यवस्थापन ही एक कला तसंच एक शास्त्र आहे. घर,शाळा,महाविद्यालय,कारखाना,सेवा केंद्र, समाजिक संस्था,राजकाय पक्ष दुकान, हॉटेल क्लब, सरकारी कार्यालय, खाजगी अगर सरकारी कंपन्या इत्यादी कोणतीही संस्था असोत आणि यांना अनन्यसाधारण तेथे व्यवस्थापन व्यवस्थापक महत्त्व उद्दिष्टपूर्तीसाठी संस्थेतील बाहेरील घटकांकडून असतेच. संस्थेच्या व विविध शास्त्रशुध्द व नियमबध्द पध्दतीने काम करून घेणे आणि निर्धारित वेळेत उद्दिष्ट साध्य करणे म्हणजे व्यवस्थापन अशी त्याची सर्वसाधारण व्याख्या करता येईल.\nयाचे दोन भाग आहेत. एक बहिर्गत व्यवस्थापन आणि दोन अंतर्गत व्यवस्थापन संस्था सुरू करण्यापूर्वी व झाल्यानंतर तिच्यासाठी आर्थिक स्रोतांची जुळवाजुळव, कर्मचाच्यांची निवड,साधने अगर यंत्रसामुग्री खरेदी, तयार होणाच्या उत्पादनाचा किंवा सेवेची विक्री, पुरवठादार व ग्राहकांशी संबंध, सरकार व इतर समाज घटकांशी संपर्क इत्यादी काम बहिर्गत व्यवस्थापनाचा एक भाग असतात. तर उत्पादन, त्याच्या गुणवत्तेच संवर्धन,\nअद्भुत दुनिया व्यवस्थापनाची /२७०"} +{"id": "indic_deva_eval_000670_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000670_indic_mozhi_deva_word_ocr_168f362070cf.jpg", "ocr": "पूर्णा"} +{"id": "indic_deva_eval_000671_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000671_indic_mozhi_deva_word_ocr_005178ece7f1.jpg", "ocr": "साथ"} +{"id": "indic_deva_eval_000672_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000672_indic_mozhi_deva_word_ocr_dc561ea97e30.jpg", "ocr": "रखता"} +{"id": "indic_deva_eval_000673_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000673_indic_mozhi_deva_word_ocr_385792fa4f9f.jpg", "ocr": "वक्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000674_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000674_indic_mozhi_deva_word_ocr_7d5bdab62ac7.jpg", "ocr": "वळला"} +{"id": "indic_deva_eval_000675_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000675_hindi_handwritten_word_ocr_f5d484df30a6.jpg", "ocr": "दर्जे"} +{"id": "indic_deva_eval_000676_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000676_devanagari_page_ocr_46f1ad6d7df9.jpg", "ocr": "२. बोज्झड्ग्गसंयुत्तं\n१. पब्बतवग्गो\n१. हिमवन्तसुत्त\n१ .सावत्थिनिदानं। “सेय्यथापि, भिक्खवे, हिसवन्तं पब्बतराजानं निससाय नागा कार्य\nबड्जेन्ति, बल॑ गाहेन्ति; ते तत्थ कायं वड्डेत्वा बल॑ं गाहेत्वा कुसोब्भे ओतरन्ति, कुसोब्भे ओतरित्वा\nमहासोब्भे ओतरन्ति, महासोब्भे ओतरित्वा कुन्नदियो ओतरन्ति, कुन्नदियो ओतरित्वा\nमहानदियो ओतरन्ति, महानदियो ओतरित्वा महासमुद्दसागरं ओतरन्ति; ते तत्थ महन्तत्तं\nबेपुल्लत्तं आपज्जन्ति कायेन; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु सील॑ निस्साय सीले पतिट्ठाय सत्त\nबोज्झड्ग्गे भावेन्तो सत्त बोज्झड्ग्गे किम न्‍तो महन्तत्तं वेपुल्लत्तं पापुणाति धम्मेसु। कथड्च,\nभिक्‍्खवे, भिक्‍्खु सील॑_निस्साय सील बोज्झड्नगे भावेन्तो सत्त बोज्मड्गे\nबहलीकरोन्तो महन्तत्तं वेपुल्लत्तं पापुणाति 2 इध, भिक्खबवे, भिक्खु सतिसम्बोज्झड्न्गं\nभावेति विवेकनिस्सितं॑ विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं॑ वोस्सग्गपरिणामिं; धम्मविचय-\nसम्बोज्झड्गगं भावेति ...पे*... वीरियसम्बोज्झड््गं भावेति ...पे*... पीतिसम्बोज्झड्ग्गं भावेति\n>“पे*... पस्सकद्धिसम्बोज्ञड्गं भावेति ...पे*... समाधिसम्बोज्झड्गं भावेति ...पे*... उपेक्खा-\nसम्बोज्झड्न्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं बोस्सगर्गपरिणामिं। एवं\nखो, भिक्‍खवे, भिक्‍्खु सील॑ निससाय सीले पतिट्ठाय सत्त बोज्झड्गे भावेन्तो सत्त बोज्झड्गे\nबहुलीकरोन्‍्तो महन्तत्तं वेपुल्लत्तं पापुणाति धम्मेसू”ति।\n\nलंस्कृतच्छाया) १.श्रावस्तीनिदानम। “तद्यथापि, भिक्षव:! हिमवन्त॑ पर्वतराजानं निश्चित्य नागा: कार्य\n\nवर्धयन्ति, बल ग्राह्मन्ति; ते तत्न कार्य वर्धयित्वा बल॑ ग्राह्मयित्वा कुश्वश्ने अवतरन्ति, अबतीर्य\nमहाश्वश्ने अवतरन्ति, महाश्वश्ने अवतीर्य कुनदीषु अवतरन्ति, कुनदीषु अवतीर्य भावी अबतक,\nमहानदीषु अवतीर्य महासमुद्रसागरे अवतरन्ति; ते तत्र महन्ततां बैपुल्लत्व॑ न्ते मे\n\nखलु, भिक्षव:! भिक्षु: शील निश्चित्य शीले प्रतिष्ठाय सस॒ बोध्यड्गानि भावयन्‌ सप्त बोध्टः\nबहलीकुर्वन्‌ महन्ततां बैपुल्लत्व॑ प्राप्नोति धर्मेषु। कथउ्च, भिक्षव:! भिक्षु: शील॑ निश्चित्य शीले प्रतिष्ठाय\nसप्त बोध्यड्गानि भावयन्‌ सप्त बोध्यड्गानि अली कु, 28880 डा बैपुल्लत्ब प्राप्नोति धर्मेषु इति? इह्,\n\nमिलल/ जिश्षः स्मृतिसंवोध्यकर्ग भावयति :श्वित॑ निरोधनि:श्वितं व्यवसर्ग-\nपरिणामिनम्‌: ध्यड्ग _ भावयति\n\nचे0..._ वीर्यसंबोध्यड्‌गं भावयति ...पे0...\nअ्रीतिसंबोध्यड्गं भावयति ...पे0... प्रख्नव्धिसंबोध्यडूग भावयति ...पे0... समाधिसंबोध्यड्गं भावयत्ति\n'चे0...उपेक्षासंबोध्यडुग _ भावयति विवेकनि:श्रित॑ विरागनि:श्रित॑ निरोधनि:श्नितं._ व्यवसर्ग-\nपरिणामिनम। एवं खलु, भिक्षव:! भिक्षु: शील॑ निश्चित्य शीले प्रतिष्ठाय सप्त बोध्यड्गानि भावयन्‌ सस\nबोध्यड्गानि\n\nगनि बहलीकुर्वन्‌ महन्ततां वैपुल्लत्वं प्राप्नोति धर्मेषु”इति।\n\n(हिन्दी) १. श्रावस्ती में। भिक्षुओं! पर्वतराज हिमालय के आधार पर नाग बढ़ते और सबल होते हैं। भिक्षुओं! वैसे ही,\nसिक्षु शील के आधार पर प्रतिष्ठित हो, सात बोध्यंग का अभ्यास करते धर्म में बढ़कर महानता को प्राप्त होता है।\nभिक्षुओं! कैसे ...पूर्ववत्‌...? भिक्षुओं! भिक्षु विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले, स्मृति-संवोध्यंग का\nअभ्यास करते धर्म में बढ़कर महानता को प्रास होता है। भिक्षुओं! कैसे ...पूर्ववत्‌...? भिक्षुओं! भिक्षु विवेक, विराग\nऔर निरोध की ओर ले जानेबाले -संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। ...पूर्वबत्‌... धर्म-\nविचय-सम्बोध्यंग ...पूर्ववत्‌... प्रीति-संवोध्यंग ...पूर्वबत्‌... प्रश्नव्धिसंबोध्यंग ...पूर्ववत्‌... समाधि-संबोध्यंग\n.-.पूर्वबत्‌... उपेक्षा-संबोध्यंग ...पूर्ववत्‌... भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु शील के आधार पर प्रतिष्ठित हो, सात बोध्यंग\nका अभ्यास करते धर्म में बढ़कर महानता को प्रास होता है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000677_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000677_indic_vision_bench_deva_ocr_dde24c14d43c.jpg", "ocr": "समस्या म्हणजे प्रगतिपथावरील किंवा तुमच्या ध्येयप्राप्तीच्या वाटचालीतील अडथळे होत.\nध्येयप्राप्तीची जबाबदारी स्वीकारणाऱ्या व्यवस्थापकांना समस्यांना तोंड द्यावे लागते.\nनेहमी ऐकविली जाणारी समस्या म्हणजे : “माझा वरिष्ठ अधिकारी अकार्यक्षम आहे.\"\n“हे एक मोठे संकट आहे की मोठी संधी?\" मी विचारतो.\nनेहमी उद्भवणा���ी दुसरी एक समस्या म्हणजे, “माझ्या संघटनेत माझी उद्दिष्टे अजून स्पष्ट सांगितलेली नाहीत.\"\nमी यावर पुन्हा विचारतो, “ही एक संधी आहे की एखादे महासंकट?\"\nप्रत्येक समस्यामय परिस्थिती'साठी एक युक्ती आहे; ती म्हणजे व्यवस्थापकाने असा प्रश्न विचारायचा, “समस्या काय आहे? माझ्या ध्येयप्राप्तीच्या मार्गात ही समस्या कशी उभी राहते?\nनाटोच्या लष्करी छावणीविषयीची एक गोष्ट सांगतात. त्यांना छावणीतील दवाखान्यात एक परिचारिका नेमायची होती. त्या छावणीत असणारी ती एकमेव स्त्री असणार होती. अंतिम मुलाखतीसाठी तीन उमेदवार आले. पहिली उमेदवार ब्रिटिश होती, दुसरी जर्मन, तर तिसरी फ्रेंच होती. मुलाखत घेणान्यांनी तिघींना सर्व परिस्थिती समजावून सांगितली. यावर ती ब्रिटिश मुलगी म्हणाली, “या समस्येवरचा उपाय अगदी सोपा आहे. कमांडरने एक परिपत्रक काढायचं की 'परिचारिकेच्या कुंपणात पुरुषांना प्रवेश नाही.'\nजर्मन मुलगी म्हणाली, “मी स्वत: कमांडरच्या संरक्षणाखाली राहीन. म्हणजे मग मला कुणी त्रास देणार नाही.\"\nफ्रेंच मुलगी गोंधळल्यासारखी दिसली. तिने विचारलं, “यात समस्या आहे कोठे?\n५५"} +{"id": "indic_deva_eval_000678_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000678_indic_mozhi_deva_word_ocr_22004275c681.jpg", "ocr": "तुम्हारी"} +{"id": "indic_deva_eval_000679_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000679_devanagari_page_ocr_9418c0a8655e.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\nहि\n\n“तड्च अच्छरियं दिस्वा, अब्भुतं लोमहंसन॑।\nबुद्धे चित्त पसादेमि, द्विपदिन्दम्हि तादिने॥675॥\n“सोहं चित्त पसादेत्वा, दुस्सं दत्वान सत्थुनो।\n'सरणऊ्चच उपागच्छ्धि, सामच्चो सपरिज्जनो॥676॥\n“एकनबुतितो कप्पे, य॑ं कम्ममकरिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजायिदं फलं॥4677॥\n“इतो पन्‍नरसे कप्पे, सोव्ठसासुं सुबाहना [सोव्ठ्सासिंसु बाहनो (स्या-)]।\nसत्तरतनसम्पन्ना, चक्‍कवत्ती महब्बला॥678॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्‍्खापि च अट्ठिमे।\nछव्कभिज्ञा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥4679॥\nइत्थं सुदं आयस्मा महापरिवारको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nमहापरिवारकत्थेरस्सापदानं पठम॑।\n'तऊच आश्चर्य दुष्ट्वा, अदूभुतं लोमहर्षणम्‌।\nबुद्धे चित्त प्रासादयामि, द्विपदेन्द्रे तायिने॥4675॥\nसोऊहं चित्त प्रसाच्य, दूष्य॑ दत्वा शास्त्र\nशरणडऊच उपागच्छम्‌, सामात्य: सपरिजन:॥4676॥\nएकनवलितमे कल्पे, यत्‌ कर्माकरवं तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजाया इदं फलम्‌॥677॥\nइतो पञ्चदशे कल्पे, घोडशासन्‌ सुवाहना:।\nसप्तरत्लसम्पन्ना:, चक्रवर्तिमहाबला:॥4678॥\nप्रतिसंविदश्वतस््र:, विमोक्षा: अपि चाष्टकाः।\n'घडशिज्ञा: साक्षात्कृता:, कृतं बुद्धस्य शासनम्‌॥679॥\nउल्थ स्थिंद आयप्मान सहापरिवारकस्थलिर टसा गाया अभाविटेति।\nइस लोमहर्षक अदूभुत आश्चर्य को देखकर मैंने इन द्विपदेन्द्र बुद्ध में अपने चित्त को प्रसादित किया॥4675॥\nमैं चित्त को प्रसादित करके शास्ता को दूष्य देकर सामात्य और सपरिजन शरण में चला गया॥4676॥\nउस समय 9) वें कल्प में मैंने जो कर्म किया था, इस कारण मैं दुर्गति को नहीं जानता, यह बुद्ध पूजा का ही\nसुपरिणाम है॥4677॥\nयहाँ से 5 वें कल्प में सुवाहन नाम के 6 ससरलसम्पन्न महाबलशाली चक्रवर्ती राजा हुए॥4678॥\nचार प्रतिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥4679॥\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ महापरिवारक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा।"} +{"id": "indic_deva_eval_000680_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000680_devanagari_page_ocr_30514b442e05.jpg", "ocr": "पत्ममो परिच्छेदो\n88\nप्ोग्गलिसन्हयो।\nउपज्ञायों कुमारस्स, अह सोर\nपब्बाजेसि महादेवत्येरो मज्मन्तिको पन॥206॥\nकम्मवाचं अका तस्मि, सोपसम्पदमण्डले।\nअरहत्तं महासक्तो, पत्तो सपटिसम्भिदं॥207॥\n\nसब्बमित्तायुपज्ञाया , धम्मपाला ति विस्सुता।\nआचरिया आयुपाला, काले सासि अनासवा॥208॥\nउच्नो सासनपज्जोता, लंकादीपोपकारिनो।\n\nछट्े वस्से पव्वजिंसु, धम्मासोकस्स राजिनो॥209॥\nमसहासहिन्दो वस्सेहि, तीछि दीपप्पसादको।\n\nसिटकत्तयम॒र्गण्हि, उपज्ञायस्स सन्तिके॥240॥\nसंस्कृतच्छछाया- उपाध्याय: कुमारस्य, अभूत्‌ मोग्गलिसहाय:\nप्रात्नाजयत्‌ महादेवस्थविर:, सध्यान्तिकः पुनः\nकर्मवाचमसकरोत्‌ तस्मिन, सोपसम्पदमण्डले।\nअर्हत्वं महासत्त्व:, प्राप्त: सम्प्रतिसंविदाम्‌।207।\nसइखमित्रा: उपाध्याया, धर्मपालेति विश्वुता।\nआचार्या आयुपाला, कालेउडडसीदनाख्रवा।। 208।।\nउभौ शासनप्रद्योतौ, लडस्काद्वीपोपकारिणी।\nपे वर्ष प्राव्रजन्तौ, धर्माशोकस्य राज:।209॥\nमहामहेन्द्रो वर्ष, स्त्रिभि: दीपप्रसादक:।\nछल आल भाक उपाध्यायस्यान्तिके।।240।। द\nहेन्द टल्ड्र के उपाध्याय बने सोग्गलिपुत्र तिप्य तथा प्रश्नज्या देने वाले बने सहादेव स्थचविर। मध्यमक स्थविर ने\nहा वाक पढ़ी सहासच्च महेन्द्र उपसम्पन्न होते समय ही प्रतिसंविदाओं सहित अर्ह॑च्च के लाभी हो\nगये।।206-207:।\nअजान��काओ कक रत विस्ज्यात श्रर्सपाला थेेरी। तथा आचार्य बनी आयु पाला थेरी। समय आने पर वह\n\nये धर्मप्रकाशक, ल्तझ्काद्ीपोपकारक सहेन्‍्द्र एज न वि नमी |\nप्रत्रजित छुए।।209॥। हन्द्र एवं सझघसित्रा- दोनों ही सम्राद्‌ अशोक के राज्यारोहण के च्यठे\n\nलिया।।240॥। सहन्द्र ने अपने उपाध्याय से तीन वर्ष में तीनों पिटकों का अध्ययन\n\nस््रि\n\n:॥4206॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000681_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000681_devanagari_digits_mixed_b0a115d41e29.jpg", "ocr": "२991५7१7451८"} +{"id": "indic_deva_eval_000682_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000682_indic_mozhi_deva_word_ocr_8c824dabfeb4.jpg", "ocr": "बड़ी"} +{"id": "indic_deva_eval_000683_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000683_hindi_handwritten_word_ocr_4f0585f80771.jpg", "ocr": "चाही"} +{"id": "indic_deva_eval_000684_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000684_devanagari_page_ocr_b4f536df70d5.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n434- न्‍\n\n'तस पिपासायं। तस्सति, परितस्सति। परितस्सना, तसिणा, तसितो।\n\nदुस दोसने। दुस्सति। दोसो, दोसनं, दोसितो।\n\nदुस अप्पीतियं। दुस्सति, पदुस्सति। दोसो, पदोसो, दुढ्ो, पदुद्ढठो, दूसको, दूसितो, दूसना।\n\nअसु खेपे। खेपो खिपनं। अस्सति। निरस्सतिआदियति च धम्मं। इस्सासो।\n\nएत्थ च निरस्सतीति छड्डेति सत्थारं तथा धम्मक्खानादीनि। इस्सासोति उसुं अस्सति\nखिपतीति इस्सासो, धनुग्गहों।\n\nयसु पयतने। यस्सति। नियसकम्मं।\n\nएत्थ च येन विनयकम्मेन “निस्साय ते बत्थव्ब”न्ति नियस्सियति भजापियतीति नियसो\nबालं, त॑ नियसकम्मं नाम। “करोहि मे यक्ख नियसकम्म”न्ति एत्थ पन निग्गहकम्मं नियसकम्मं\nनाम\n\nभस्स भस्सने। भस्सति। भस्सं, भस्सकारको।\n\nबस सद्दे। सकुणो वस्सति। अधमो मिगजातानं, सिड्गालो तात बस्सति। मण्डूको वस्सति।\n\nनस अदस्सने। नस्सनथधम्मं नस्सति। पनस्सति। बिनस्सति। नस्स बसलि, चर पिरे बिनस्स।\nनट्ढो, विनछ्रो। कारिते - नासेति, नासयति।\n\nसुस सोसने। पण्णं सुस्सति। कारिते - वातों पण्णं सोसेति, सोसयति। कम्मे - वातेन पण्णं\nसोसियति। भावे क्रियापदमप्पसिद्धं। सोसो, सुक्‍खं कट्ठं। सुस्सं, सुस्सन्‍तो। सुस्समानो दहदो।\n\nतुस तुद्ठियं। तुस्सति, सन्तुस्सति। सन्तुद्ठि, सन्‍्तोसो, तोसनं, तुद्ठब्बं, तुस्सितब्बं, तुसिता।\nकारिते “तोसेति” इच्चादीनि।\n\nहा परिहानियं। हायति, परिहायति। हायन्ति वव्ठवा। भावे “भयं वा छम्भितत्तं वा\nलोमहंसो बा, सो पहीयिस्सती”ति च “रागो पहीयती”ति च रूपं। कम्मे क्रियापदमप्पसिद्धं।\n“रागों पहीयती”ति इदं पन “हा चागे”ति वुत्तस्स भूवादिगणिकधातुस्स ��ूप॑ “रागं पजहती”ति\nकच्ुपदस्स दस्सनतो।\n\nनह बन्धने। नय्हति। उपनय्हति। सन्‍नय्हति। सन्‍नाहों। सन्‍नद्धो।\n\nमुह वेचित्ते। मुख्हति, सम्मुय्हति, पमुण्हति। मोहो, पमोहो। मूव्ठहों। मोमूहो पुरिसो।\nमसोसूहं चित्त। कारिते - मोहेति। पमोहको। एत्थ च मोमूहोति अविसदताय मोमूहो,\nमहामूव्ठ्होति अत्थो।\n\nसह सुह सत्तियं। सय्हति। सुय्हति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000685_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000685_indic_mozhi_deva_word_ocr_0231d011214b.jpg", "ocr": "झाली"} +{"id": "indic_deva_eval_000686_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000686_indic_mozhi_deva_word_ocr_b89710327333.jpg", "ocr": "असत."} +{"id": "indic_deva_eval_000687_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000687_hindi_handwritten_word_ocr_4ee3e3467a63.jpg", "ocr": "माइंड"} +{"id": "indic_deva_eval_000688_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000688_indic_vision_bench_deva_ocr_105bd9f645ca.jpg", "ocr": "परिशिष्ट -७\nवि. स. खांडेकर : संदर्भ ग्रंथ सूची\n* चरित्र\n१.\nएक लेखक, एक खेडे : जया दडकर (पॉप्युलर प्रकाशन, मुंबई)\n२.\nवि. स. खांडेकर : सचित्र चरित्रपट : जया दडकर (देशमुख\nआणि कंपनी)\n३.\nवि. स. खांडेकर : डॉ. ललिता कुंभोजकर (राष्ट्रीय चरित्रमाला,\nपुणे)\n४.\nवि. स. खांडेकर : ओळख आणि अभ्यास - वा. शि. आपटे\n(श्री गणराज प्रकाशन, पुणे)\n५.\nवि. स. खांडेकर : जीवन आणि आठवणी : रा. वा. शेवडे\nगुरुजी (मेहता, कोल्हापूर)\n६.\nआता फक्त आठवणीच : रा. वा. शेवडे गुरुजी (शिवसागर\nप्रकाशन, कोल्हापूर) १९७८\n७.\nवि. स. खांडेकर : दुर्मीळ अश्रू ओघळलेले मोती - रा. वा.\nशेवडे गुरुजी (शिवसंस्कार प्रकाशन, कोल्हापूर)\n८.\nवि. स. खांडेकर : चरित्र आणि वाङ्मय - मा. का. देशपांडे\n(सुलभ कॉलेज बुक स्टॉल, कोल्हापूर)\n९.\nखांडेकर : मित्र आणि माणूस - वा. रा. ढवळे (कॉन्टिनेन्टल\nप्रकाशन, पुणे)\n१०.\nविष्णू सखाराम खांडेकर : म. द. हातकणंगलेकर (साहित्य\nअकादमी)\n११.\nVishnu Sakharam Khandekar - M. D. Hatkanaglekar,\nSahitra Akaademi, New Delhi\n१२.\nभाऊ (कादंबरी) - डॉ. वि. य. कुलकर्णी (इंद्रायणी प्रकाशन,\nपुणे, १९७७)\n१३.\nवि. स. खांडेकर : एक ध्येयवादी शिक्षक - डॉ. सुनीलकुमार\nलवटे\n१४.\nभाऊंच्या सहवासात : राम देशपांडे, अजब पब्लिकेशन, कोल्हापूर\n(२००७)\n१५.\nवि. स. खांडेकर चरित्र : डॉ. सुनीलकुमार लवटे - श्रमिक\nवि. स. खांडेकर चरित्र/१८२"} +{"id": "indic_deva_eval_000689_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000689_indic_mozhi_deva_word_ocr_b24e74f24e12.jpg", "ocr": "चांगल्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000690_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000690_devanagari_page_ocr_4e4627ca2dad.jpg", "ocr": "25. कोणागमनबुद्धवंसो\nपालि- ककुसन्धस्स अपरेन, सम्बुद्धो द्विपदुत्तमो।\nकोणागमनो नाम जिनो, लोकजेट्लो नरासभो॥929॥\nदसधम्मे पूरयित्वान, कन्‍तारं समतिक्कमि।\nप��ाहिय मलं॑ सब्बं, पत्तो सम्बोधिमुत्तमं॥930॥\nधम्मचकक्‍क पवत्तेन्ते, कोणागमननायके।\nतिंसकोटिसहस्सानं, पठमाभिसमयो अह॥934॥\nपाटिहीरं करोन्‍्ते च, परवादप्पसडने।\nबीसतिकोटिसहस्सानं, दुतियाभिसमयों अह॥932॥\nततो बिकुब्बनं कत्वा, जिनो देवपुरं गतो।\nबसते तत्थ सम्बुद्धो, सिलाय पण्डुकम्बले॥933॥\n\nसंस्कृतच्छाया-_ ककुसन्धस्य अपरेण, सम्बुद्धो द्विपदुत्तम:।\nकोणागमनो नाम जिनः, लोकज्येछो नर्षभः॥929॥\nदशधर्मान्‌ पूरयित्वा, कान्‍्तारं समत्यक्रमीत्‌।\nप्रवाह्य मल॑ सर्वम्‌, प्रासः सम्बोधिसुत्तमम॥930॥\nधर्मचक्रं प्रवर्तयति, कोणागमननायके।\nब्रिंशत्कोटिसहस््राणाम्‌, प्रथमाभिसमयोउ्भूत्‌॥934॥\nप्रातिहाय्य॑ कुर्वति च, परवादप्रमर्दने।\nविंशतिकोटिसहस््राणाम्‌, द्वितीयाभिसमयोउ्भूत्‌॥932॥\nततो विकुर्बाणं कृत्वा, जिनो देवपुरं गतः।\nबसते तत्र सम्बुद्धर, शिलायां पाण्डुकम्बले॥933॥\nहिन्दी-. भगवान्‌ ककुसन्ध बुद्ध के अनन्तर, नरथ्रेष्ठ, नरपुझुगव, लोकज्येछ्ठ कोणागमन नाम के बुद्ध इस लोक में\nहुए॥929॥\nबे दस पारमिताएँ पूर्ण कर, अपेक्षाकृत अधिक तपस्या हेतु गृह त्याग कर बन में चले गये। वहाँ उन्होंने\nतपश्नर्या द्वारा अपने सभी चित्तविकारों को क्षीण कर अन्त में सम्बोधित प्रास कर ली॥930॥\nतब उन कोणागमन बुद्ध द्वारा धर्मचक्रप्रवर्तनकाल में तीस हजार करोड़ जिज्ञासुओं को प्रथम\nशर्माभिससय हुआ॥934॥\nतदनन्‍्तर परमताबल्बी तीर्थिकों\nजिज्ञासुओं का द्वितीय धर्माभिसमय हुआ॥9320\nजलदनन्तर कभी ये ही बुद्ध ऋद्धिप्रदर्शन कर देवपुर (त्रायस्व्रिश) में गये और तब वहाँ पाण्डकम्बल शिला\nपर विराजमान हये॥933॥\n\nमतों का खण्डन करते समय प्रयुक्त धर्मॉपदेश से बीस हजार करोड़"} +{"id": "indic_deva_eval_000691_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000691_indic_mozhi_deva_word_ocr_7472f1f71eb4.jpg", "ocr": "लिहून"} +{"id": "indic_deva_eval_000692_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000692_devanagari_page_ocr_b7081aa5bf63.jpg", "ocr": "बुद्धवस्गो कस\n\n“सासनेन विरुद्धानं, विसं हलाहलं यथा।\nआसीविसो दिद्ग॒विसों [दद्भविसो (स्या* अट्ठ*)], एवं झापेति त॑ नरं॥584॥\n“सकिं पीत॑ हलाहलं, उपरुन्धति जीवबितं।\nसासनेन बिरुज्ित्वा, कप्पकोटिम्हि डय्हति॥582॥\n“खन्तिया अविहिंसाय, मेत्तचित्ततताय च।\nसदेवकं॑ सो तारति, तस्मा ते अविराधिया [अविरोधियो (सी*), ते अविरोधिया\n(स्था०)]॥583॥\n“लाभालाभे न सज्जन्ति, सम्माननविमानने।\nपथवीसदिसा बुद्धा, तस्मा ते न विराधिया॥584॥\n“देवदत्ते च बधके, चोरे अडुगुलिमालके।\nराहुले धनपाले च, सब्बेसं समको मुनि॥585॥\n\n“श्ासनेन बिरूद्धानाम, विष हालाहलं यथा।\n\nआशीविषो दष्टविष:, एवं धमापयति त॑ नरम्‌॥584॥\n\n“सकृत्‌ पीत॑ हालाहलम्‌, उपरुणद्धि जीवितम्‌।\n\nशासनेन विरुध्य, कल्पकोट्यां दहत्ति।582॥\n\n“क्षान्त्या अविहिंसया, मित्रचित्तवताय च।\n\nसदेवकं स तारयति, तस्मात्‌ स अविरोधनीय:॥583॥\n\n“लाभालाभौ न सज्जन्ति, सम्माननविमानने।\n\nपृथ्वीसदुशा बुद्धाः, तस्मात्‌ ते न विरोधनीया:॥584॥\n\n“देवदत्ते च वधिके, चौरे अडगुलिमालके।\n\n__ राइले धनपाले च, सर्वेषां समको मुनि:॥585॥\n\nकिस प्रकार सर्प अपने विष से मनुष्य को जलाता है उसी प्रकार शासन के विरोधियों को\n\nउनका कर्म॥584॥\n\n(विष) जीवन को एक ही बार समास करता है, परन्तु बुद्धशासन\nजलता रहता है॥582॥\n\nवो बुद्ध क्षान्ति (सहनशीलता), अविहिंसा (दयाभाव) तथा मैत्री-चित्त देवताः\nवर्तमान लोक को तारते हैं, इसलिए आप बुद्धशासन में मार्गारूढ् हों॥583॥\n\nबुद्ध लाभ-अलाभ में नहीं लगते तथा सम्मान एवं अपमान में पृथ्वी सदृश स्थिर रहते हैं, अतः\nतुम्हें बुद्ध का विरोध 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भावयति नैर्याणिकम्‌\nअपचयगामिन दृष्टिगतानां प्रहाणाय प्रथमाया: भूम्या: प्रास्‍्यै विविच्यैव कामेभ्यो विविच्य अकुशलेभ्यो\nधर्मेभ्य: सवितर्क सविचारं विवेकजं प्रीतिसुखं प्रथम ध्यानसुपसम्पच्य विहरति\n(हिन्दी) अकुशल ब्र्मो का प्रहाणकर, वितर्क एवं विचार सहित और विवेक से जनित प्रीति एवं सुख से युक्त\nबुःखप्नतिपद तन्द्राभिज्ञा अप्रणिहित वाले प्रथम ध्यान को प्रासकर विहार करता है, उस समय स्पर्श होता है\n..पूर्वबत्‌... अविश्षेप होता है; अथचा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म कुशल हैं। उसी\nलोकोत्तर कुशल ध्यान के किये जाने एवं भावित होने के कारण वह(साधक) प्राप्त विषाक के कारण काम-भोगों की\nबासना का त्यागकर ...पूर्ववत्‌... दुःखप्रतिषद तन्द्राभिज्ञा अप्रणिहित वाले प्रथम ध्यान को प्रास्कर विहार करता\nहै, उस समय स्पर्श होता है ...पूर्ववत्‌... अविश्तेप होता है; अथबा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यससुत्पन्न अरूपी\nधर्म हैं- ये धर्म कुशल हैं।\n\n५३२४, कौन से धर्म अव्याकृत हैं? जिस समय नै्याणिक एवं अपचयगामी लोकोत्तर ध्यान की मिथ्यादृष्टियों\nके प्रहाण हेतु तथा प्रथम भूमि की प्रासि 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राजा के नाम पर हो, लोग अपनी सावधानी के लिए, चेतावनी के लिए उसका नाम मगरा ताल, नकया या नकरा ताल रख लेते थे। नकरा शब्द संस्कृत के नक्र यानी मगर से बना है। कुछ जगह गधया ताल भी हैं। इनमें मगर की तरह गधे नहीं रहते थे! गधा बोझ ढोने का काम करता है। एक गधा मोटी रस्सी का जितना बोझ उठा सके, उतनी रस्सी की लंबाई बराबर गहरा ताल गधया ताल कहलाता था। कभी-कभी कोई दुर्घटना या घटना भी तालाब का पुराना नाम मिटा देती। यहां-वहां बह्मनमारा ताल मिलते हैं। इनका नाम कुछ और रहा होगा, पर कभी उनमें किसी ब्राह्मण के साथ दुर्घटना घट गई तो बाद में उन्हें बह्मनमारा की तरह ही याद रखा गया। इसी तरह का एक और नाम है बैरागी ताल। इसकी पाल पर बैठकर कोई कभी बैरागी बन गया होगा!\nनदियों के किनारे नदया ताल मिलते हैं। ऐसे ताल अपने आगौर से नहीं, नदी की बाढ़ के पानी से भरते थे। नदियों के बदले किसी पाताली स्रोत से जुड़े ताल को भूफोड़ ताल कहते थे। ऐसे तालाब उन जगहों में ज़्यादा थे जहां भूजल का स्तर काफ़ी ऊंचा बना रहता था। उत्तर बिहार में अभी भी ऐसे तालाब हैं और कुछ नए भी बनाए गए हैं।\nरख-रखाव के अच्छे दौर में भी कभी-कभी किसी खास कारण से एकाध तालाब समाज के लिए अनुपयोगी हो जाता था। ऐसे तालाब हाती ताल कहे जाते थे। हाती शब्द संस्कृत के हत शब्द से बना है और इसका अर्थ है नष्ट हो जाना। 'हत तेरे की' जैसे चालू प्रयोग में भी यह शब्द हत तेरे भाग्य की, यानी तेरा भाग्य नष्ट हो जाए जैसे अर्थ में है। हत-प्रभ और हत-आशा यानी हताशा भी इसी तरह बने हैं। इस प्रकार हाती ताल छोड़ दिए गए तालाब के लिए अपनाया गया नया नाम था। लेकिन हाथी ताल तालाब बिलकुल अलग नाम है—ऐसा तालाब जिस���ी गहराई हाथी जितनी हो।\n५४ आज भी खरे हैं तालाब"} +{"id": "indic_deva_eval_000697_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000697_indic_vision_bench_deva_ocr_b37b72aebc63.jpg", "ocr": "254 : प्रेमचंद रचनावली-6\nझुनिया को अब यह शंका होने लगी कि वह रखेली है, इसी से उसका यह अपमान हो\nरहा है। ब्याहता होती, तो गोबर की मजाल थी कि उसके साथ यह बर्ताव करता। बिरादरी उसे\nदंड देती, हुक्का-पानी बंद कर देती। उसने कितनी बड़ी भूल की कि इस कपटी के साथ घर\nसे निकल भागी। सारी दुनिया में हंसी भी हुई और हाथ कुछ न आया। वह गोबर को अपना\nदुश्मन समझने लगी। न उसके खाने-पीने की परवा करती, न अपने खाने-पीने की। जब गोबर\nउसे मारता, तो उसे ऐसा क्रोध आता कि गोबर का गला छुरे से रेत डाले। गर्भ ज्यों-ज्यों पूरा\nहोता जाता है, उसकी चिंता बढ़ती जाती है। इस घर में तो उसको मरन हो जायगी। कौन उसकी\nदेखभाल करेगा,कौन उसे संभालेगा? और जो गोबर इसी तरह मारता-पीटता रहा, तब तो उसका\nजीवन नरक ही हो जायगा।\nएक दिन वह बंबे पर पानी भरने गई, तो पड़ोस को एक स्त्री ने पूछा-कै महीने है रे?\nझुनिया ने लजाकर कहा-क्या जाने दीदी, मैंने तो गिना-गिनाया नहीं है।\nदोहरी देह की,काली-कलूटी, नाटी, कुरूपा, बड़े-बडे़ स्तनों वाली स्त्री थी। उसका पति\nएक्का हांकता था और वह खुद लकड़ी की दुकान करती थी। झुनिया कई बार उसकी दुकान\nसे लकड़ी लाई थी। इतना ही परिचय था।\nमुस्कराकर बोली- मुझे तो जान पड़ता है, दिन पूरे हो गए हैं। आज ही कल में होगा।\nकोई दाई-बाई ठीक कर ली है?\nझुनिया ने भयातुर स्वर में कहा-मैं तो यहां किसी को नहीं जानती।\n'तेरा मर्दुआ कैसा है, जो कान में तेल डाले बैठा है?'\n'उन्हें मेरी क्या फिकर!'\n'हां, देख तो रही हूं। तुम तो सौर में बैठोगी, कोई करने-धरने वाला चाहिए कि नहीं? सास-ननद, देवरानी-जेठानी, कोई है कि नहीं? किसी को बुला लेना था।'\n'मेरे लिए सब मर गए।'\nवह पानी लाकर जूठे बरतन मांजने लगी, तो प्रसव की शंका से हृदय में धड़कनें हो रही\nथीं। सोचने लगी-कैसे क्या होगा भगवान्? उंह यही तो होगा, मर जाऊंगी, अच्छा है, जंजाल\nसे छूट जाऊंगी।\nशाम को उसके पेट में दर्द होने लगा। समझ गई विपत्ति की घड़ी आ पहुंची। पेट को\nएक हाथ से पकड़े हुए पसीने से तर उसने चूल्हा जलाया, खिचड़ी डाली और दर्द से व्याकुल\nहोकर वहीं जमीन पर लेट रही। कोई दस बजे रात को गोबर आया, ताड़ी की दुर्गध उड़ाता हुआ।\nलटपटाती हुई जबान से ऊटपटांग बक रहा था। मुझे किसी की परवा नहीं है। जिसे सौ दफे\nगरज हो, रहे, नहीं चला जाय। मैं किसी का ताव नहीं सह सकता। अपने मां-बाप का ताव नहीं\nसहा, जिनने जनम दिया। तब दूसरों का ताव क्यों सहूं? जमादार आंखें दिखाता है। यहां किसी\nकी धौंस सहने वाले नहीं हैं। लोगों ने पकड़ न लिया होता, तो खून पी जाता, खून। कल देखूंगा\nबचा को। फांसी ही तो होगी। दिखा देंगा कि मर्द कैसे मरते हैं। हंसता हुआ, अकड़ता हुआ,\nमूंछों पर ताव देता हुआ फांसी के तख्ते पर जाऊं, तो सही। औरत की जात। कितनी बेवफा\nहोती है। खिचड़ी डाल दी और टांग पसारकर सो रही। कोई खाय या न खाय, उसकी बला से।\nआप मजे से फुलके उड़ाती है, मेरे लिए खिचड़ी। अच्छा सता ले जितना सताते बने, तुझे भगवान\nसताएंगे। जो न्याय करते हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000698_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000698_indic_vision_bench_deva_ocr_58b34cc3c9f5.jpg", "ocr": "दो बहनें\nनीरद ने उपसंहार में कहा, \"जहाँ तुम्हारा अपना स्वभाव प्रश्रय न पावे वहीं तुम्हें रहना चाहिए। मैं अगर नज़दीक रहता तो कोई चिन्ता नहीं थी क्योंकि मेरा स्वभाव तुमसे एकदम उल्टा है। तुम्हारा मन रखने के लिये उसे एकदम मिट्टी में मिला देने का काम मुझसे कभी भी नहीं हो सकता।\"\nऊर्मि ने सिर झुकाकर कहा, \"आपकी बात सदा याद रखूँगी।\"\nनीरद ने कहा, \"मैं तुम्हारे लिये कुछ किताबें रख जाना चाहता हूँ। जिन अध्यायों पर मैंने निशान लगा दिए हैं उन्हें विशेष रूप से पढ़ना, आगे चलकर काम आएगा।\"\nऊर्मि को इस सहायता की ज़रूरत थी, क्योंकि इधर उसके मन में बीच-बीच में आशंका होने लगी थी। सोचा करती; 'शायद पहले के उत्साह की झोंक में मैं ग़लती कर बैठी हूँ। शायद डाक्टरी मेरे अनुकूल नहीं पड़ेगी।'\nनीरद को निशान लगाई हुई किताबें उसके लिये कठोर बन्धन का काम करेंगी, उसे धारा के विरुद्ध खींच ले चलेंगी। नीरद के चले जाने के बाद ऊर्मि अपने ऊपर और भी कठिन अत्याचार करने लगी। कालेज जाती,\n५०"} +{"id": "indic_deva_eval_000699_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000699_indic_mozhi_deva_word_ocr_eee92c8bfa5d.jpg", "ocr": "साक्षात्कार"} +{"id": "indic_deva_eval_000700_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000700_indic_vision_bench_deva_ocr_39a500ae8b89.jpg", "ocr": "राजा सर अण्णामलै चेट्टियार साहित्य पुरस्कार से पुरस्कृत\nतुलसी चौरा\nतमिल के बहुचर्चित उपन्यास 'तुलसी माडम' का हिन्दी रूपान्तर\nमूल लेखक\n:\nना॰ पार्थसारथी\nहिन्दी रूपान्तरकार\n:\nडॉ॰ सुमित अय्यर"} +{"id": "indic_deva_eval_000701_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000701_devanagari_page_ocr_d8f62709afd8.jpg", "ocr": "एकादसमो परिच्छेदो\n\n64-\n\nदेवानंपियतिस्सो ति, विस्सुतो दुतियो सुतो।\nतेसु भातिसु सब्बेसु, चुड्ञपञ्ञाधिको अड्ढ॥6॥\nदेवानंपियतिस्सो सो, राजासि पितु अच्चये।\nतस्साभिसेकेन सम॑, बहूनच्छरियानहुं॥ 7॥\n\nलंकादीपम्हि सकले, निधयो रतनानि च।\nअन्तो ठितानि उग्गन्त्वा, पथधवीतलमारुहुँ॥8॥\nलंकादीपसमीपमिहि, भिन्‍ननावागतानि च।\nतजत्र जातानि च थलं, रतनानि समारुहुं॥9॥\nछातपब्बतपादम्हि, तिस्‍्सो च वेद्धुयद्धियो।\n\nजातारथपतोदेन, समाना परिमाणतो॥40॥\nसंस्कृत्छाया- _ देवानाम्प्रियतिष्य:” इति, विश्लुतः द्वितीय: सुतः।\n\nतेषु भ्रातृषु सर्वेषु, पुण्यप्रजाधिक अभूत्‌।6।।\nदेवानाम्प्रियतिष्य: सः, राजासीत्‌ पितु अत्यये।\nतस्याभिषेकेन सम, बहु आश्चर्या: अभूवन्‌।।7।।\nलड्नकाद्वीपे सकले, निधयः रत्नानि च।\nअन्तः स्थितानि उद्द॒त्वा, पृथ्वीतलमारोहन्‌।8।।\nलड्काद्वी पसमीपे, भिनज्ननावागतानि च।\nतत्र जातानि च स्थलं, रत्नानि समारोहन्‌।।9।\nछातपर्वतपादे, तिस््रः च वेणूर्यष्टिय:।\nजाता: रथप्रतोदेन, समाना: परिणामतः।।40॥॥\nहिन्दी-राजा के द्वितीय पुत्र देवानाम्प्रिय तिष्य अपने भाइयों में पुण्य एवं प्रज्ञा में सर्वाधिक थे।।6॥।\n\nपिता के मरने के वाद वह देवानाम्प्रिय तिष्य राजा बना। उसके राजा बनते समय अनेक चमत्कार हुए।।7॥\nसमग्र लड्काद्वीप में पृथ्वी के मध्य स्थित गुप्त कोष एवं रत्न पृथ्वी पर दिखायी देने लगे।।8॥।\n\nलड्काद्वीप के पास समुद्र में डूबने वाली नावों के रज्, समुद्र के तल से सभी स्थल पर आ गये।। 9॥\n\nछात पर्वत के मूल में चावुक जितनी लम्बी बॉस की तीन छड़ी पैदा हुई।।0।॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000702_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000702_indic_mozhi_deva_word_ocr_151f5b77a0e4.jpg", "ocr": "उठाने"} +{"id": "indic_deva_eval_000703_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000703_hindi_handwritten_word_ocr_4f2fbc41307b.jpg", "ocr": "इंडस्ट्री"} +{"id": "indic_deva_eval_000704_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000704_hindi_handwritten_word_ocr_5f6866819c6c.jpg", "ocr": "उलझाव"} +{"id": "indic_deva_eval_000705_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000705_devanagari_page_ocr_034217593eed.jpg", "ocr": "१. चित्तुप्पादकण्ड 99\n\nसमाधिन्द्रियं होति, पड्जिन्द्रियं होति, मनिन्द्रियं होति, सोमनस्सिन्द्रियं होति,\nजीवितिन्द्रियं होति, सम्मादिद्ठि होति, सम्मावायामो होति. ..पे*... पग्गाहो होति, अविक्खेपो\nहोति; ये वा पन तस्मिं समये अज्ञेपि अत्थि पटिज्चसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इमे धम्मा\nकुसला...पे*...।\n\nतस्मि खो पन समये चत्तारो खन्‍्धा होन्ति, द्वायतनानि होन्ति, द्वे धातुयो होन्ति, तयो\nआहारा होन्ति, अ���्विन्द्रियानि होन्ति, चतुरक्ञलिकं झानं होति, चतुरज्ञिको मग्गो होति, सत्त\nबलानि होन्ति, तयो हेतू होल्‍्ति, एको फस्सो होति...पे*... धम्मायतनं होति, एका\nश्रम्मधातु होति; ये वा पन तस्मिं समये अच्लेपि अत्थि पटिच्वसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इसे\nधम्मा कुसला. ..पे*...।\n\n१६९. कतमो तस्मि समये सल्लारक्खन्धो होति? फससो चेतना विचारों पीति\nचित्तस्सेकग्गता सद्,िन्द्रियं वीरियिन्द्रियं सतिन्द्रियं समाधिन्द्रियं पडिजन्द्रियं जीवितिन्द्रियं\n(संस्कृतच्छाया)समाधीन्द्रियं भवति, प्रज्ञैन्द्रियं भवति मनइन्द्रियं भवति, सौमनस्येन्द्रिय भवति,\nजीवितेन्द्रियं भवति, सम्यग्दुष्टि: भवति, सम्यर्व्यायाम: भवति, ...पे*... प्रग्राहों भवति, अविक्षेपो\nभवति; ये वा पुन: तस्मिन्‌ समये अन्येडपि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना अरूपिणों धर्मा:- इसे धर्मा: कुशलाः\n\nतस्मिन्‌ खलु पुनः समये चत्वार: स्कन्धा: भवन्ति, द्वे आयतने भवतः, छौ धातू भवतः, त्रयः\nआहारा: भवन्ति, अष्टेन्द्रियानि भवन्ति, चतुरड्िगक॑ ध्यान॑ भवति, चतुरड्िगक: मार्ग: भवति, सप्त\nबलानि भवत्ति, त्रयः हेतब: भवन्ति, एक: स्पर्श: भवति...पे*...एकं धर्मायत्न भवति, एक: धर्मधातु:\nभवति; ये वा पुनः तस्मिन्‌ समये अन्येउपि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना अरूपिणो धर्मा:- इसमे धर्मा: कुशला:\nचे*...।\n\n१६९. कतमः तस्मिन्‌ समये संस्कारस्कन्धो भवति? स्पर्शश्वेतना विचार: प्रीति: चित्तस्थैकाग्रता\nशद्धेन्द्रियं वीयेन्द्रियं स्मृतीन्द्रियं समाधीन्द्रियं प्रज्ञेन्द्रियं जीवितेन्द्रियं\nतहेन्दी) पृथ्वीकृत्ल का ध्यान भवना करता है, उस समय स्पर्श, बेदना, संज्ञा, चेतना, चित्त, प्रीति, सुख, चित्त की\nछकाग्रता, श्रद्धा-बन्द्रिय, वीर्य-इन्द्रिय, स्मृति-इन्द्रिय, समाधि-इन्द्रिय, प्रज्ञा-डन्द्रिय, मन-इन्द्रिय, सौसनस्य-इन्द्रिय,\nजीवित-इन्द्रिय, सम्यग्दृष्टि, सम्यग्ब्यायाम ...पूर्ववत्‌... प्रग्राह, अविक्षेप होता है; अथवा उस समय जो भी अन्य\nभ्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म कुशल हैं ...पूर्वबत्‌...।\n\nउस समय चार-स्कन्ध, दो धातुएँ, तीन आहार, आठ-इन्द्रिय, चार अंगों वाला ध्यान, चार अंगों\nवाला मार्ग, सात बल, तीन हेतुएँ, एक स्पर्श होता है धर्मायतन, एक धर्मधातु होती है; अथवा उस\nसमय जो भी अन्य प्रतीत्यससुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये ...पूर्वबत...।\n\n१६९. उस समय कौन सा संस्कारस्कन्ध होता है? स्पर्श, चेतना, विचार, प्रीति, चित्त की एकाग्रता,"} +{"id": "indic_deva_eval_000706_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000706_indic_mozhi_deva_word_ocr_fa30796bcc4f.jpg", "ocr": "दिया"} +{"id": "indic_deva_eval_000707_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000707_indic_vision_bench_deva_ocr_c2d8b67adf8c.jpg", "ocr": "मार्गदर्शक ठरतील.\n१. मर्यादित आयुष्य असणाऱ्या कंपन्या :\nबऱ्याच कंपन्या कुत्र्याच्या छत्रीसारख्या उगवतात आणि सीझन संपला की तशाच गळून पडतात. सुरुवातीच्या काळात आकर्षक पगार, अनुभव व सुविधांचं गाजर धरून बुध्दिमान व्यवस्थापक मिळविलेले असतात. मात्र कंपनी स्थापन करण्याचा संचालकांचा उद्देश एकदा का पूर्ण झाला की, ते कंपनीकडं आणि कर्मचारी वर्गाकडं दुर्लक्ष करतात. परिणाम व्हायचा तोच होतो. अल्पावधीतच कंपनी बंद पडते आणि तिच्यावर भाकरी अवलंबून असणारे कर्मचारी उघड्यावर पडतात. अनेक उद्योगांना सरकार बऱ्याच सवलती देते. केवळ त्यांचा लाभ उठविण्यासाठी त्या स्थापन केल्या जातात. आणि नंतर ‘आजारी' पाडल्या जातात.\nकाही कंपन्या फसवणुकीच्या उद्देशानं सुरू केलेल्या नसतात. त्यांचं आयुष्य अल्प असतं. उदाहरणार्थ बांधकाम कंपन्या, विवक्षित प्रकल्प पूर्ण झाला की कंपनी बंद केली जाते. काही वेळा प्रकल्प पूर्ण करण्यास लागलेला विलंब किंवा नवी कंत्राटं मिळणं यामुळं कंपनी अपेक्षेपेक्षा अधिक काळ चालते. त्यामुळं ती कायमची चालत राहणार असा कर्मचाऱ्यांचा गैरसमज होण्याची शक्यता असते. म्हणून कर्मचारी व व्यवस्थापकांनी आपल्या कंपनीचं खरं स्वरूप, तिचा उद्देश, तिचा भविष्यकाळ यांचा अभ्यास केला पाहिजे. कंपनीची उलाढाल, कंत्राटं, हिशोब, ऑडिट अहवाल इत्यादी पाहावयास हवेत. त्यानंतर अशा कंपनीमध्ये किती काळ काम करायचं, केव्हा सोडायचं आणि पर्यायी व्यवस्था कशी करायची याचा निर्णय घेणं सुलभ होतं.\n२. मुळातच कमजोर कंपन्या :\nवरून दिसायला सुंदर पण आतून रोगट असणाऱ्या व्यक्तीसारखी अशा कंपन्यांची अवस्था असते. सध्यापुरता तिचा कारभार व्यवस्थित चाललेला दिसतो. पण प्रतिकार शक्ती कमी असते. थोडासा धक्का बसला किंवा बाह्य परिस्थितीत काही बदल झाला तर तो त्या सहन करू शकत नाहीत. त्यांची उत्पादनं किंवा आर्थिक स्थिती यांच्यात मुळातच काही तरी दोष असतो. जाहिराबाजीचा मेक-अप चढवून तो काही काळ लपवता येतो, पण खरी स्थिती समोर येण्यास वेळ लागत नाही. उदाहरणार्थ, एकाच मोठ्या कंपनीला माल पुरविणारी छोटी ���ंपनी. ती पूर्णपणे मोठ्या कंपनीच्या कृपेवर अवलंबून असते. तिची मागणी थांबली की, छोटी कंपनी बंद पडते.\nआर्थिक तंगीत असणाऱ्या कंपन्याही थोड्याशा झटक्यानं बंद पडू शकतात.\n३. कालबाह्य नेतृत्व असणाऱ्या कंपन्या :\nकित्येक कंपन्या एखाद्या परंपरागत वस्तूचे उत्पादन करत असतात. संचालक\nस्वत:च्या कंपनीला ओळखा/२१२"} +{"id": "indic_deva_eval_000708_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000708_devanagari_page_ocr_d8ce411466c3.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n235\n\nकीदिसं। ईदिसो, ईदिसी, ईदिसं। एदिसो, एदिसी, एदिसं। सदिसो, सदिसी, सदिसं। कदाचि पन\n“यादिसा तादिसा\"ति एबमादीनि इत्थिलिड्गरूपानिपि भवन्ति। नासिकपदमाला नेसं पुरिस\nइत्थी चित्तनयेन योजेतब्बा।\nइदानि समासतद्धितपदभूतानं अममसद्दादीन॑ नामिकपदमाला वुच्चते - अममों, अममा,\nअममं, अममे। अममेन।\nसेस॑ वित्थारेतब्बं।\nमय्हको, मय्हका। मय्हकं, मय्हके। मय्हकेन।\nसेस॑ वित्थारेतब्बं।\nआमा, आमा, आमायो। आमं॑ं, आमा, आमायो।\nसेसं वित्थारेतब्बं।\nतत्र अममोति नत्थि तण्हाममत्तं दिद्धलिममत्तञ्च एतस्साति अममो, को सो, अरहायेवाति\nबच्तुं बद्डति। अपिच य्रेसतण्हापि सदिद्वीपि “सम इद”न्ति ममत्तं न करोच्ति, तेषि अममायेवा\nएल्थ च “मनुस्सा तत्थ जायन्ति, अममा अपरिग्गहा”ति इदं सासनतो निदस्सनं। “अममो\nनिरहड्कारो”ति इदं पन लोकतो निदस्सनं। इत्थिलिड्गगे वत्तब्बे “अममा, अममा, अममायो\"ति\nपदमाला। नपुंसके वत्तब्बे “अममं, अममानी”ति पदमाला। तत्र मय्हकोति “इदम्पि मय्हं इदम्पि\nमस्ह”न्ति विप्पलपतीति मय्हको, एको पक्खिविसेसो। वुत्तज्हेत॑ं जातके -\n“सकुणो मण्हको नाम,\nगिरिसानुदरीचरो।\nपक्‍क पिप्फलिमारुय्ह,\n“मय्हं मय्ह'न्ति कन्दती”ति॥\nइत्थिलिड्गे वत्तब्बे “मय्हकी, मय्हकी, मय्हकियो”ति पदमाला। तत्र आमाति “आम अजहं\nतुम्हाक॑ दासी”ति एवं दासिभावं॑ पटिजानातीति आमा। गेहदासी। बुत्तज्हेतं जातकेसु “यत्थ\nदासो आमजातो, ठितो थुल्लानि गच्छती”ति च, “\nइमानेवेत्थ निदस्सनपदानि।\nइदानि कति कतिपय कतिमीसद्दानं विसेसो बुच्चते यथारहं नामिकपदमाला च। तज्न\nकतिमीसद्दस्स नामिकपदमाला न लब्भति “अज्ज भन्‍्ते कतिमी”ति एवं पुच्छावसेन\nआगतमत्ततो। कति कतिपयसद्दानं पन लब्भतेव, सा च बह॒वचनिका। विसुद्धिमग्गटीकायं पन\n\n'आमाय दासापि भवन्ति लोके'\n\n'ति च, तस्मा"} +{"id": "indic_deva_eval_000709_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000709_devanagari_page_ocr_798d8607cbca.jpg", "ocr": "गया था। पुन: इसको सिंहली में स्थविर ध्म्मरतन द्वारा ।896 ई. , कोलम्बो में लिखा गया। इस\nग्रंथ को प्रो. बी. सी. लॉ द्वारा सम्पादित किया गया जो पालि टैक्स्ट सोसायटी द्वारा 4935 ई.\nमें प्रकाशित हुआ। पुन: इस ग्रंथ का अंग्रेजी अनुवाद प्रो. बी. सी. लॉ द्वारा किया गया, जो\n4945 ई. में प्रकाशित छहुआ। यह ग्रन्थ केवल श्रीलंका के धर्म इतिहास के लिए ही महत्त्वपूर्ण\nनहीं है अपितु श्रीलंका और भारत के आंतरिक संबंधों को बताने के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।\nइस ग्रन्थ में भगवान्‌ बुद्ध की थ्वातुओं पर स्मारक रूप में निर्मित स्तूपों का इतिहास है, और\nलंकाधिपति दुद़्गामणि (0। ई.पू. से 77 ई-पू.) द्वारा अनुराधपुर में बनवाये गये महास्तूपों का\nविस्तृत विवरण है। इस ग्रन्थ को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है जो 6 अभध्यायों\nमें है। पहले भाग में गौतम बुद्ध के पूर्ववर्ती 24 बुद्धों यथा- दीपंकर, कोडज्ञ, मंगल, सुमन,\nरेबत , अनोमदर्शी , नारद, सुजात, प्रियदर्शी , धर्मदर्शी , सिद्धार्थ, तिस्स , विपस्सी , सित्री, ककुसन्ध ,\n'कस्सप , कोणागमन , शोभित , पदुम, पद्मोत्तर, सुमेध, अत्थदर्शी , फुस्स, वेस्सभू इन प्रबुद्ध बुद्धों\nके स्तूपों का वर्णन बड़ी सावधानीपूर्वक एवं क्रमबद्ध तरीके से किया गया है।\nथूपवंस के द्वितीय भाग अर्थात्‌ चूड़ामणिदुस्सथूपद्ठयकथा, दसथूपकथा और धातुनिधान\nकथा में भगवान्‌ बुद्ध के जन्म से लेकर महापरिनिर्वाण तक कथा संक्षिप्त रूप में किन्तु बड़ी\nप्रभावशाली शैली में वर्णित की गई है। यथा-\nछेत्वान मोल्निं बरगन्धवासितं वेहासयं उक्स्विपि सक्‍यपुज्गजो।\n'सहस्सनेत्तो सिरसा पटिग्गहि सुबण्णचज्जञगेटवरेन जासवो”''ति॥।\n(थूपबंस, गाथा संख्या-58)\nतीसरे भाग में जिसे ग्रन्थ के शीर्षक को देखते हुए उसका प्रधान अंश ही कहा जा\nसकता है। इस भाग में 2 अध्यायों के अंतर्गत भगवान्‌ बुद्ध की धातुओं पर निर्मित स्तूपों का\nऔर उत्तरकालीन इतिहास का वर्णन किया गया है। इसमें महावंस, समन्‍्तपासादिका, जातकद्भकथा\nकी निदानकथा आदि की अपेक्षा नवीन कुछ नहीं है। बस स्थविर वाचिस्सर ने स्तूपों के चारों\nओर व्यवस्थित कर उसे एक नया रूप अवश्य दे दिया। आगे देखते हैं कि स्थविर महाकाश्यप\nके आदेश पर मगधराजा अजातशत्रु द्वारा वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लकप्प, वेठदीप, पावा और\n'कुसीनारा से बुद्ध धातुओं को इकट्»ला करवाकर राजगृह की धातुओं के साथ ���िलाकर इन पर\nराजगृह के दक्षिण-पूर्व भाग में एक महास्तूप के निर्माण करवाने का वर्णन मिलता है, बाद में\nसम्राट अशोक के समय में इन्हीं धातुओं के विभक्त अंशों पर 84000 चैत्यों का निर्माण का\n'विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है। तृतीय संगीति के बाद मोग्गलिपुत्ततिस्स द्वारा देश-विदेश में"} +{"id": "indic_deva_eval_000710_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000710_indic_mozhi_deva_word_ocr_34e581ea81d7.jpg", "ocr": "जात"} +{"id": "indic_deva_eval_000711_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000711_hindi_handwritten_word_ocr_3f15202fd861.jpg", "ocr": "दूसरे"} +{"id": "indic_deva_eval_000712_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000712_devanagari_page_ocr_5ee8106b9eca.jpg", "ocr": "280 संयुत्तनिकायपालि\n\n५. अमतवग्गो\n४१. अमतसुत्तं\n\n४१. सावत्थिनिदानं । “चतूसु, भिकक्‍्खवे, सतिपट्ठानेसु सुप्पतिद्धितचित्ता विहरथ। मा\nवो अमतं पनस्स। कतमेसु चतूसु? इध, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति आतापी\nसम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्ञादोमनस्सं; वेदनासु...पे*... चित्ते...पे०... धम्मेसु\nधम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानों सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्ञादोमनस्सं। इमेसु,\nभिक्‍्खवे, चतूसु सतिपट्ठानेसु सुप्पतिट्धितचित्ता विहरथ। मा वो अमतं पनस्सा” 'ति। पठम॑ं।\n\n४२. समुदयसुत्तं\n\n४२. ““चतुन्नं, भिक्‍्खवे, सतिपट्ठानानं समुदयठच अत्थड्ग्गमडछ्च देसेस्सामि। त॑ सुणाथ।\nको च, भिक्खवे, कायस्स समुदयो? आहारसमुदया कायस्स समुदयो; आहारनिरोधा कायस्स\nअत्थड्गमो। फस्ससमुदया बेदनानं समुदयो; फस्सनिरोधा वेदनानं अत्थड्गमो।\n(संस्कृतल्छाया)४१. श्रावस्तीनिदानम्‌ । “चतुर्षु, भिक्षव:! स्मृतिप्रस्थानेषु सुप्रतिछ्ठितचित्ता: विहरत।\nमा वो अमृतं पुन स्यात्‌। कतमेषु चतुर्षु? इह, भिक्षव:! भिक्षु: काये कायानुपश्यी विहरति आतापी\nसम्प्रज्: स्मृतिमानु, विनीय लोके अभिध्यादौर्मनस्ये; वेदनासु वेदनानुपश्यी विहरति ...पे*... “चित्ते\nचित्तानुपश्यी विहरति ...पे०... धर्मेषु धर्मानुपश्यी विहरति आतापी सम्प्रज्ञ: स्मृतिमानू, विनीय लोके\nअभिश्यादौर्मनस्ये। एपु, भिक्षवः! चतुर्षु स्मृतिप्रस्थानेषु सुप्रतिछितचित्ता: विहरत। मा वो अमृतं पुनः\nस्थात्‌”इति। प्रथमम।\n\n४२. “चतुर्णाम्‌, भिक्षव:! स्मृतिप्रस्थानानां समुदयड्च अस्तंगमनमछ्च देक्ष्यामि। तत्‌ शूणुता\nकश्च, भिक्षव:! कायस्य समुदयः? आहारसमुदयात्‌ कायस्य समुदय:; आहारनिरोधात्‌ कायस्य\nअस्तंगमनम्‌। स्पर्शसमुदयात्‌ वेदनानां ससुदय:; स्पर्शनिरोधात्‌ वेदनानाम्‌ अस्तंगमनम्‌।\nकहन्दी उड़. आवस्तो मे शिक्षुओं! चार स्मृतिप्रस्थानों में चित्त को अच्छी तरह प्रतिष्ठित हो कर विहार करो।\n\nफिर अमृत तुम्हारे पास है। किन चार में? यहाँ भिक्षुओं! भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता हैँ, -\n\nक्लेशों को तपाते हये आतापी, संप्रज्, स्मृतिमान्‌ हो, संसार में लोभ और दौर्मनस्य को दबा कर, वेदना...पूर्ववत्‌...\nचित्त...पूर्ववत्‌...धर्मो में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता हूँ- आतापी, संप्रज्ञ, स्मृतिमान्‌ हो, संसार में लोभ और\n\nअभिक्षुओं! चार स्मृतिप्रस्थानों के समुदय और अस्त होने का उपदेश करूँगा। उसे सुनो। भिक्षुओं। काया का\nक्‍या है? आहार से काया का समुदय होता है, और आहार के रूक जाने से अस्त हो जाता है। स्पर्श से बेदना"} +{"id": "indic_deva_eval_000713_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000713_indic_mozhi_deva_word_ocr_4819a4052e66.jpg", "ocr": "वेळा"} +{"id": "indic_deva_eval_000714_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000714_indic_vision_bench_deva_ocr_7a614795d729.jpg", "ocr": "समुद्र-सन्तरण\nकुछ लोग आ रहे हैं। वह चंचल हो उठा। फेनिल जलधि में\nफॉद पड़ा। लहरों में तैर चली।\nबेला से दूर---चारों ओर जल---आखों में वही धवल पाल,\nकानों में अस्फुट संगीत। सुदर्शन तैरते-तैरते थक चला था।\nसंगीत और वंशी समीप आ रही थी। एक छोटी मछली पकड़ने\nकी नाव आ रही थी। पास आने पर देखा धीवर-बाला वंशी\nबजा रही है और नाव अपने मन से चल रही है।\nधीवर-बाला ने कहा---आओगे?\nलहरों को चीरते हुए सुदर्शन ने पूछा---कहाँ ले चलोगी?\nपृथ्वी से दूर जल-राज्य में; जहाँ कठोरता नहीं केवल\nशीतल, कोमल और तरल आलिंगन है; प्रवंचना नहीं सीधा\nआत्मविश्वास है; वैभव नहीं सरल सौंदर्य है।\nधीवर-बाला ने हाथ पकड़कर सुदर्शन को नाव पर खींच\nलिया। दोनों हँसने लगे। चन्द्रमा और जलनिधि भी।\n_________\n--- १११ ---"} +{"id": "indic_deva_eval_000715_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000715_indic_mozhi_deva_word_ocr_5dfebd21581e.jpg", "ocr": "मर्मज्ञ"} +{"id": "indic_deva_eval_000716_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000716_indic_mozhi_deva_word_ocr_29f3f2d78f1e.jpg", "ocr": "उलट"} +{"id": "indic_deva_eval_000717_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000717_indic_mozhi_deva_word_ocr_089ce322e3cd.jpg", "ocr": "क्षमता"} +{"id": "indic_deva_eval_000718_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000718_devanagari_page_ocr_cada713f8314.jpg", "ocr": "406 मेत्तेयवग्गो\n\n“पटिसस्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥949॥\nइत्थें सुदं आयर्सा जलुकण्णित्थेरों इसा गाथायो अभासित्थाति।\nजतुकण्णित्थेरस्सापदानं नवमं।\n40. उदेनत्थेरअपदानं\n\n“हिसवन्तस्साविदूरे, पदुमो नाम पब्बतो।\nअस्समो सुकतो मण्हं, पण्णसाला सुमापिता॥4950॥\n“नदियों सन्‍्दरे तत्थ, सुपतित्था मनोरमा।\nअच्छोदका सीतजला, सन्‍्दरे नदियो सदा॥954॥\n“पाठीना पाबुसा मच्छा, बलजा सुझ्जरोहिता।\nसोभेन्‍्ता नदियो एते, वसन्ति नदिया सदा॥4952॥\n“अम्बजस्बूहि सड्छन्‍ना, करेरितिलका तथा।\nउद्दालका पाटलियो, सोभेन्ति मम अस्समं॥953॥\n“प्रतिसंविदश्चतस्त्र: - कृतं बुद्धस्य शासनम्‌\"॥4949॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ जतुकर्णीस्थविर इसा गाथा अभाषिष्ठेति।\n“'हिमवत अबिदूरे, पद्मो नाम पर्वतः।\nआश्रमः सुकृतो मह्यम्‌, पर्णशाला सुमापिता॥4950॥\n“नद्यः स्थन्दते तत्र, सुप्रतिष्ठा सनोरमा।\nअच्छोदकाः शीतजला:, स्यन्दते नद्य: सदा॥4954॥\n“पाठीनाः प्रावृषाः मत्स्या:, बलजाः सुछ्जरोहि ता:।\nशोभयन्‍्तः नदीम्‌ एते, वसन्ति नदझ्यां सदा॥952॥\n“आम्रजम्ब्बै: सज्छन्‍नाः, करेरितिलका: तथा।\nउद्दालकाः पाटलीय:, शोभन्‍्ते मम आश्रमम्‌॥953॥\n\nचार पटिसस्भिदाओं आठ विमोक्षों तथा पड़भिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥949॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ जतुकण्णित्थेर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nहिमालय पर्वत से कुछ दूरी पर पदम नाम का पर्वत था। वहाँ पर सुकृत रूप से मेरे द्वारा आश्रम सुनिर्भित\nकिया गया॥950॥\n\nबहाँ पर सुप्रतिछित मनोरम नदी प्रवाहित थी जो निर्मल जल, शीतल जल से युक्त हो सदैव\nप्रवाहित रहती थी॥4954॥\n\nये पाठीन, पावुस, मच्छ, वलजा तथा सुझजरोहित आदि नदी को शोभित करते हुए सदैव\nनदी में वास करते हैं॥952॥\n\nआम्र, जम्बू, करेरि और तिलक से आच्छादित है और उद्दालक, पाटलीय से मेरा 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एकमारख्यातपदं, एकमब्ययपदं। आख्यातत्ते एकबचनन्तं, अब्ययत्ते\nयथापावचनं। “पुत्ता मत्थि धना मत्थी”ति एत्थ अत्थीति अब्ययपदमिव एकवचनन्तम्पि\nबहुवचनन्तम्पि भवति। तस्साख्यातत्ते पयोगोविदितोब। अब्ययत्ते पन “सुखं न सुखसहगतं,\nसिया पीतिसहगत\"न्ति “इसे धम्मा सिया परित्तारम्मणा\"ति च एकवचनबह॒वचनप्पयोगा\nबेदितब्बा। एत्थ धातुया किच्च नत्थि। परोक्‍्खायं “इतिह अस इतिह असा\"”ति दस्सनतो अस\nइति पद गहेतब्बं। हिस्यत्तनीरूपानि अप्पसिद्धानि। अज्जतनिया पन “आसि, आसिंसु, आसुं।\nआसि, आसित्थ। आसिं, आसिम्हा” इच्चेतानि पसिद्धानि। भविस्सन्तिया “भविस्सति,\nभविस्सन्ति” इच्चादीनि। कालातिपत्तिया “अभविस्सा, अभविस्संसु” इच्चादीनि भवन्ति।\n\nसास अनुसिट्ठियं। सासति, अनुसासति। कम्मन्तं॑ वो सासति, सासनं, अनुसासनं,\nअनुसासनी, अनुसिट्ठि, सत्था, सत्थ॑ं, अनुसासकों, अनुसासिका।\n\n'तत्न सासनन्ति अधिसीलादिसिक्खत्तयसड्गहितसासनं, परियत्तिपटिपत्तिपटिबेधसड्खातं\nवा सासनं। तडिह सासति एतेन, एत्थ वाति “सासन”न्ति पबुज्चति। अपिच सासनन्ति “रज्जो\nसासन॑ पेसेती”तिआदीसु बिय पापेतब्बबचनं। तथा सासनन्ति ओवादो, यो “अनुसासनी”ति च,\n“अनुसिद्ठी”ति च बुच्चति। सत्थाति तिविधयानमुखेन सदेवक लोक॑ सासतीति सत्था,\nविद्गरधम्मिकसम्परायिकपरमत्थेहि यथारहं सत्ते अनुसासतीति अत्थो। सत्थन्ति सद्दे च अत्थे च\nसासति आचिक्खति एतेनाति सत्थं। किंतं? ब्याकरणं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000720_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000720_indic_mozhi_deva_word_ocr_d504849456c7.jpg", "ocr": "दृष्टि"} +{"id": "indic_deva_eval_000721_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000721_indic_mozhi_deva_word_ocr_4129c4299abb.jpg", "ocr": "त्याची"} +{"id": "indic_deva_eval_000722_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000722_hindi_handwritten_word_ocr_725c1c766b47.jpg", "ocr": "दिक्कत"} +{"id": "indic_deva_eval_000723_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000723_indic_mozhi_deva_word_ocr_803805660ddb.jpg", "ocr": "पढ़ी"} +{"id": "indic_deva_eval_000724_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000724_devanagari_page_ocr_98aac8050116.jpg", "ocr": "धम्मपदपात्ठि\n\nपालि-\n428. न अन्तलिक्खे न समुदमज्झे, न पब्बतानं विवरं पविस्स।\nन विज्जती सो जगतिपष्पदेसो, यत्थट्ठितं नप्पसहेस्य मच्चु॥9/43 ॥॥\nसंस्कृतच्छाया-\nनान्तरिश्ते न समुद्रमध्ये न पर्वतानां विवरं प्रविश्य।\nन विद्यते स जगति प्रदेशो यत्र स्थितं न प्रसहते मृत्यु: ॥। 9/43 ॥।\nहिन्दी-\n\nन आकाश में, न समुद्र के मध्य में, न पर्वतों के विवर में प्रवेश कर--संसार में कोई\nस्थान नहीं है, जहाँ रहकर मृत्यु से बच सके।।9/43 ॥।\n\nपोपवग्गो नवमो निष्धितो।\n\n(एफ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टाारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000725_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000725_indic_mozhi_deva_word_ocr_5d2eb3ffd2b9.jpg", "ocr": "नस-नस"} +{"id": "indic_deva_eval_000726_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000726_devanagari_page_ocr_246a772ec31d.jpg", "ocr": "26. ब्राह्मणबग्गो\nपाव 423\n\nपालि-\n422. उसभर पवरं वीरं, महेसिं विजिताविनं।\nअनेजें न्‍हातकं बुद्धं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥26/40।।\n423. पुब्बेनिवासं यो वेदि, सग्गापायं च पस्सति,\nअथो जातिक्खयं पत्तो, अभिज्ञावोसितो सुनि।\nसब्बवोसितवोसानं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥26/44 ।।\n\nसंस्कृतच्छाया-\nऋषमं प्रवरं वीरं महर्षि विजितवन्तनम्‌ ।\nअनेजं स्न्रातकं बुद्ध तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम्‌ ।26/40 ॥।\nपूर्व निवासं यो वेद स्वर्गाउपायं च पश्यति ।\nअयथ जातिक्षयं प्राप्तोडभिज्ञाव्यवसितो मुनि: ।\nसर्वव्यवसितध्यवसानं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम्‌ ॥26/44॥॥\nहिन्दी-\n\n(जो) ऋषभ [श्रेष्ठ, प्रवर, महर्षि, विजेता, अकम्प्य, स्लातक, और बुद्ध है, उसे मैं\nब्राह्मण कहता हूँ ॥26/40 ।॥।\n\nजो पूर्वजन्म को जानता है, स्वर्ग और अग॒ति को जो देखता है, जो जिसका (पुनर्जन्म\nक्षीण हो गया (जो) अभिज्ञा (दिव्यज्ञान) परायण है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।।\n\nब्राह्मणवग्गो छब्बीसतिमो निष्धितो।\n॥ इति ॥॥\n\n(एफ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टाारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000727_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000727_devanagari_page_ocr_7f07638d42d2.jpg", "ocr": "2.बोज्झडुगसंयुत्तं वठव\n\nवीरियसम्बोज्झड्गो तस्मिं समये भिक्खुनो आरख्यो होति; वीरियसम्बोज्झड्ग्गं तस्मिं समये\nभिक्खु भावेति; वीरियसम्बोज्झड्गो तस्मि समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गछ्छति।\nआरख्धवीरियस्स उप्पज्जति पीति निरामिसा। “यस्मि समये, भिक्खवे, भिक्खुनो\nआरद्धवीरियस्स उप्पज्जति पीति निरामिसा, पीतिसम्बोज्ञझड्ग्गो तस्मिंसमये भिक्खुनो आरद्धो\n\nहोति; पीतिसम्बोज्झड्ग्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति; पीतिसम्बोज्झड्गो तस्मिं समये भिक्खुनो\nभावनापारिपूरिं गच्छति। पीतिमनस्स कायोपि पस्सम्भति, चित्तम्पि पस्सम्भति। “यस्मिं समये,\n\nभिकक्‍्खवे, भिक्खुनो पीतिमनस्स कायोपि पस्सम्भति चित्तम्पि पस्सम्भति, पस्सद्धिसम्बोज्झड्स���गो\nतस्मिं समये भिक्खुनो आरद्वो होति; पस्सद्धिसम्बोज्झड्गं तस्मिं समये भिक्खु भावेति;\n\nपस्सद्धिसम्बोज्झड्ग्गो तस्मिं समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गछ्छति। पस्सद्धकायस्स सुखिनो\nचित्त समाधियति। “यस्मिं समये, भिक्‍्खवे, भिक्खुनो पस्सद्धकायस्स सुखिनो चित्त समाधियति,\nसमाधिसम्बोज्झड्ग्गो तस्मि समये भिक्खुनो आरद्धो होति ; समाधिसम्बोज्झड्गगं तस्मिं समये\nभिक्‍्खु भावेति; समाधिसम्बोज्झड्ग्गो तस्मि समये भिक्खुनो भावनापारिपूरिं गछ्छति। सो\nतथासमाहिदतं चित्त साधुकं अज्ञुपेक्खिता होति।\n\nत्लस्कृतच्छाया) वीयसंबीध्यड्ग: तस्मिन्‌ समये भिक्षो: आरब्धो भवति; वीर्यसंबोध्यछूग तस्मिन्‌ समये\nअआिक्षुभवियति; वीर्यसंवोध्यडुगसतस्मिन्‌ समये भ्िक्षो: भावनापारिपूर्य गच्छति। आरख्थवीर्ययों\nउत्पद्यते प्रीति निरामिषा। “यस्मिन्‌ समये, भिक्षव:! भिक्षोरारब्धवीर्ययो: उत्पद्यते प्रीति: निरामिषा,\nप्रीतिसंबोध्यडूग: तस्मिन्‌ समये भिक्षो: आरब्धो भवति। प्रीतिसंबोध्यडूगं तस्मिन्‌ समये भिक्षुर्भावयति:\nप्रीतिसंबोध्यड्गस्‌तस्मिन्‌ समये झिक्षो: भावनापारिपूर्य गच्छति। प्रीतिमनसः कायो5पि प्रश्नभ्यते,\nचित्तमपि प्रश्नभ्यते। “यस्मिन्‌ समये, भिक्षव:! भिक्षो: प्रीतिमनस: कायोउपि प्रश्नस्यते, चित्तमपि\nप्रश्नस्यते, प्रस्नब्धिसंबोध्यडग: तस्मिन्‌ समये भिक्षो: आरब्धो भवति प्रत्नव्धिसंबोध्यडूग तस्मिन्‌ समये\nभिक्षु: भावयति; प्रत्नव्धिसंबोध्यड्ग तस्मिन्‌ समये भिक्षो: भावनापारिपूर्य गच्छति। प्रस्रव्धिकायस्य\nसुखिनश्चित्तं समाधियति। यस्मिन्‌ समये, भिक्षव:! भिक्षो: प्रश्रव्थिकायस्य सुखिनश्चित्तं समाधियति,\nसमाधिसंबोध्यड्गं तस्मिन्‌ समये भिक्षो: आरब्धो भवति समाधिसंबोध्यड्‌गं तस्मिन्‌ समये भिक्षुः\nभावयति; समाधिसंबोध्यड्ग: तस्मिन्‌ समये मझिक्षो: भावनापारिपूर्य गच्छति। स तथा समाहित चित्त\nसाधुकं अध्युपेक्षिता भवति।\n\nकहन्का उस समय उसके वीर्य-संबोध्यंग का प्रारम्भ होता है। ...पूर्ववत्‌.... इस तरह, उसका वीर्य-संबोध्यंग\nभावित और पूर्ण हो जाता है। वीर्यवान्‌ को निरामित प्रीति उत्पन्न होती है। भिक्षुओं! जिस समय वीर्यवान्‌ भिक्षु\nको निरामिष प्रीति उत्पन्न होती है, उस समय उसके प्रीत्ति-संबोध्यंग का आरम्भ होता है। ...पूर्ववत्‌... इस तरह,\nउसका प्रीति-संबोध्यंग भावित और पूर्ण हो जाता है। प्रीति-युक्त होने से शरीर और मन दोनों प्रश्नब्ध हो जाते हैं।\nशभिक्षुओं! जिस समय प्रीति-युक्त होने से शरीर और मन दोनों प्रश्नव्ध हो जाते हैं, उस समय उनके प्रश्नव्धि-\nसंबोध्यंग का आरम्भ होता है। ...पूर्ववत्‌... इस तरह, उसका प्रश्नब्धि-संबोध्यंग भावित और पूर्ण हो जाता है।\nप्रश्व्ध हो जाने से सुख होता है। सुख-युक्त होने से चित्त समाहित हो जाता है। झिक्षुओं! जिस समय ...पूर्ववत्‌...\nचित्त समाहित हो जाता है, उस समय उसके समाधि-संबोध्यंग का आरम्भ होता है। ...पूर्वबत्‌... इस तरह, उसका\nसमाध्ि-संबोध्यंग भावित और पूर्ण हो जाता है। उस समय, वह अपने समाहित चित्त के प्रति अच्छी तरह उपेक्षित"} +{"id": "indic_deva_eval_000728_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000728_indic_vision_bench_deva_ocr_1c516dec9f9b.jpg", "ocr": "( १५९ )\nदुसरे नारायणराव व्यंकटेश.\nझाल्यामुळें त्यास जिकडे तिकडे स्थिरस्थावर करण्याची आवश्यकता\nव उत्कंठा होती. परंतु ती उत्तम संधि बाबासाहेबानीं गमावल्यामुळें\nइचलकरंजी संस्थानाचा दर्जा निष्कारण कमी झाला ! कारण कीं,\nइचलकरंजीकर हे फक्त सातारा राजमंडळाचे सरदार आहेत असा जो\nपेशवाईच्या वहिवाटीवरून साहेबलोकांचा ग्रह झाला होता. त्यांत एकदोन वर्षे लोटलीं नाहींत तोंच फेरबदल झाला व इचलकरंजी संस्थानावर करवीरकरमहाराजांचा कांहीं अंशीं तरी ताबा आहे असें मानणें वाजवी आहे असें त्यांस वाटूं लागलें !\nसन १८१२ त शिवजीमहाराज मरण पावल्यावर त्यांच्या गादी\nवर त्यांचे ज्येष्ठपुत्र संभाजीमहाराज बसले होते हें मागें सांगितलेच आहे. या महाराजांस आबासाहेब असें म्हणत असत.सन १८२१ च्या\nजुलई महिन्याच्या दुसऱ्या तारखेस सयाजी मोहिते नांवाच्या शिलेदाराची व आबासाहेबांची कांहीं बोलाचाली होऊन तींत यां मोहित्यानें आबासाहेबांस ठार मारिलें. नंतर त्यांचे धाकटे बंधु शाहूमहाराज गादीवर बसले यांस बुवासाहेब असे म्हणत असत. सातारचे थोरले शाहूमहाराज यांसही बुवासाहेब असें नांव होतें, व तेच नांव या करवीरच्या शाहूमहाराजानींही धारण केले होतें. या बुवासाहेबांची कारकीर्द फारच दंग्याधोप्याची झाली. तिचें वर्णन पुढें येईलच.\nप्रांत पन्हाळा व मिरज येथील देशमुखीचें वतन शाहूमहाराजानीं\nइचलकरंजीकरांस दिलेले होतें. देशमुखी वतनाबद्दल वतनदारास\nसरकारची चाकरी करावी लागते व नजर द्यावी लागते. ���रंतु इचलकरंजीकर हे शाहूमहाराजांच्या कृपेतले व पेशवेसरकारचे आप्तसंबंधी\nअसल्यामुळें त्यांस या वतनासंबंधेंं कधीं कोणाची चाकरी करावी लागली नाहीं अगर कोणास नजरही द्यावी लागली नाहीं. मिरज प्रांताच्या देशमुखीबद्दल शाहूमहाराजानीं व त्यांमागें त्यांच्या पेशव्यानीं"} +{"id": "indic_deva_eval_000729_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000729_indic_mozhi_deva_word_ocr_0f48c48700d0.jpg", "ocr": "माणसाला"} +{"id": "indic_deva_eval_000730_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000730_indic_vision_bench_deva_ocr_9315761d412c.jpg", "ocr": "निघाला.\"\nत्याही पलीकडे जाऊन मला एका गोष्टीची फार धन्यता वाटते. १९८० मध्ये शेतकरी आंदोलनाचं वातावरण तयार झालं होतं. ही गोष्ट खरी. उत्पादन वाढवल्यानंसुद्धा तोटाच होतो. अशी परिस्थिती त्यावेळी निर्माण झाली. शेतकरी उठावाची अशी आर्थिक व राजकीय परिस्थिती देशात तयार झाली होती. या परिस्थितीत शेतकऱ्यांचं नेतृत्व कुणाकडं जाईल, संभाव्य शेतकरी आंदोलनाचं नेतृत्व कुणाकडे जाईल, असा जर प्रश्न विचारला गेला असता तर अशा व्यक्तीच्या अंगी असाव्या लागणाऱ्या गुणांची यादी कशी झाली असती? शेतकरी पाहिजे, शेतकऱ्याचा मुलगा पाहिजे, शेतीचा अनुभव पाहिजे, चांगलं मराठी बोलणारा पाहिजे, अमक्या जातीचा पाहिजे..., अशी जी यादी झाली असती त्या यादीत जे जे काही गुण घातले गेले असते त्यातला एकही गुण नसलेला मी. त्या माझ्या डोक्यावर ही जबाबदारी आली आणि ती निभावत असता शेतकऱ्यांनी मला अफाट प्रेम दिलं याबद्दल मला धन्यता वाटते.\nत्याहूनही जास्त धन्य धन्य जर मला कधी वाटत असेल तर हा विचार करताना की शेतकऱ्यांचं तर आंदोलन उभं राहिलं, संघटना राहिली; पण त्याचबरोबर महाराष्ट्राच्या ग्रामीण भागातल्या स्त्रियांमध्ये जी काही जागृती शेतकरी संघटनेच्या निमित्ताने आज घडून आली त्याला माझाही थोडाफार हातभार लागला.\nयातून हाती काय आलं? शेतीमालाला भाव आला? नाही. शेतीमालाचा भाव म्हणजे काही घरी यायचा मिठाईचा डबा नाही! उद्या समजा शेतीमालाचा भाव घरी आला तरी तो विनासायास कायमचाच आपल्याला मिळत राहील अशी परिस्थिती कधीही येणार नाही. डोळ्यात तेल घालून सतत जागरुक राहाणं ही स्वातंत्र्याची किमत आहे. ETERNAL VIGILENCE IS THE PRICE OF FREEDOM. जर तुम्ही असं म्हणालात की आता मी स्वतंत्र झालो, आता थोडा आराम करतो तर दुसऱ्या क्षणाला तुमच्या हातातलं स्वातंत्र्य निघून जाईल. शेतीमालाचा भाव ही काही फक्त एकदाच साध्य करायची गोष्ट नाही. शेतीमालाचा भाव हा शेतकरी स्वतंत्र असल्याचा फक्त झेंडा आहे. तो झेंडा तुम्हाला सांभाळायचा असेल तर आज शेतीमालाचा भाव मिळाला म्हणून जर तुम्ही झोपी गेलात तर तो दुसऱ्या क्षणाला तुमच्या हातून गेल्याशिवाय राहणार नाही. म्हणून सतत जागरुकता ठेवणं हे आवश्यक आहे.\nशेतीमालाला रास्त भाव मिळाला तरी शेतकरी आंदोलनामुळे शेतकऱ्यांच्या खिशात किती रुपये जास्त आले याचा हिशोब होईल तेव्हा होवो; पण केवळ कर्जमुक्तीच्या निमित्तानेसुद्धा, आपण कितीही म्हटलं की ही कर्जमुक्ती अपुरी\nमाझ्या शेतकरी भावांनो मायबहिणींनो / ३९"} +{"id": "indic_deva_eval_000731_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000731_indic_mozhi_deva_word_ocr_e8c50b7fc5e5.jpg", "ocr": "उलझकर"} +{"id": "indic_deva_eval_000732_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000732_indic_mozhi_deva_word_ocr_0c85e806fa5c.jpg", "ocr": "जायचा."} +{"id": "indic_deva_eval_000733_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000733_indic_vision_bench_deva_ocr_20d40ccd7458.jpg", "ocr": "\n२७\nतर त्यांपासून फारसा फायदा होण्याचा संभव *नाहीं. ह्यावरून \nउघड होते की, पाऊस पुष्कळ पडण्यापेक्षां पडलेल्या पावसाचे \nपाणी वाहून जाऊ न देतां ते सांठवून ठेवण्याकरितां तजविजी \nयोजणे हे अत्यवश्यक आहे.\n--------------------\n-----\n*बेळगांव जिल्ह्यापैकीं गोकाकच्या कालव्याची अशाच प्रकारची \nस्थिति झाली आहे. कांहीं दिवसपावेतों ह्या कालव्याचे पाणी जमीन \nपिकविण्याकरितां सरकार लोकांस देऊ लागले होते. परंतु, पुढे कालव्याचे \nकांहीं पाणी एका गिरणीस द्यावे लागल्यामुळे कालव्यामध्ये पाणी अपुरे \nहोऊन तो निरुपयोगी झाल्यासारखा आहे."} +{"id": "indic_deva_eval_000734_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000734_hindi_handwritten_word_ocr_b6f99849d282.jpg", "ocr": "कोशिस"} +{"id": "indic_deva_eval_000735_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000735_indic_vision_bench_deva_ocr_728280c95bd1.jpg", "ocr": "आहे. हा अंतःप्रवाह कधी खंडित झाला असेल, पराभूतही ठरला असेल; पण इजिप्त किवा ग्रीसप्रमाणे पूर्ण नामशेष असा कधीही झालेला नाही. हा प्रवाह मुख्यतः आणि मूलतः हिंदू प्रवाह आहे आणि हाच येथील एकात्मतेचा, राष्ट्रीयत्वाचा मूलाधार आहे. इंग्रजांनी प्रादेशिक-भौगोलिक ऐक्य आणले हे हिंदुत्ववादी नाकारीत नाहीत. या मुख्य प्रवाहाला अनेक उपप्रवाह येऊन मिळाले आहेत, हीही वस्तुस्थिती आहे; पण गंगा-यमुनांचा संगम झाला तर पुढे वाहात जाणाऱ्या प्रवाहाला गंगानदीच म्हणतात. तसे इतर भिन्नभिन्न प्रवाह मुख्य प्रवाहाला मिळाले तरी प्रवाहाचे मूळ हिंदूस्वरूप बदलत नाही. चंद्रशेखरांना व इतर भारतयात्रिकांना आढळून आले��ा राष्ट्रीय एकात्मतेचा प्रवाह ही काही अचानक उद्भवलेली राजापूरची गंगा नाही. तो असलाच तर भगीरथाच्या काळापासून वाहात आलेला आहे, हिंदू म्हणवणाऱ्यांनी तो वाहात राहावा, नामशेष होऊ नये म्हणून आपली जीवने यासाठी सांडलेली आहेत, वेचलेली आहेत. म्हणून मवाळीग्रणींचा केवळ प्रादेशिकतेवर आधारित हिंदी राष्ट्रवाद व डाव्यांचा-साम्यवाद्यांचा उपखंडवाद हे दोन्हीही अनैतिहासिक राष्ट्रवाद आहेत. हिंदुत्व हेच येथील राष्ट्रजीवनाचे पर्याप्त वर्णन आहे. ख्रिस्ती धर्ममार्तडांनी गॅलिलियोचा खूप छळ केला. छळाला कंटाळून त्याने पृथ्वी ही बायबलमध्ये सांगितल्याप्रमाणे स्थिर आहे अशी कबुलीही दिली; पण शेवटी हळू आवाजात तो म्हणालाच, \"मी काय करू ? ती फिरतेच आहे.\" तसे निवडणूक-मार्तडांनी आपल्याकडे चालवले आहे. ख्रिश्चनांची आणि मुस्लिमांची मते मिळावीत म्हणून 'लब्धप्रकाश-इतिहास -निसर्गमाना' वर आधारलेला राष्ट्रवादाचा मूळ सिद्धांतच ते नाकारीत आहेत. तिकडे धर्ममार्तडांचे जे झाले तेच इकडे या निवडणूकमार्तडांचे होणार आहे. काळच त्यांना खोटे ठरवणार आहे. भारत-यात्रिकांना एकात्मतेचा अनुभव जर खरोखरच येत असेल तर या अनुभवाच्या मुळाशी, तळाशी जाण्याचा त्यांनी शक्यतो लवकर व प्रामाणिकपणे अवश्य प्रयत्न करावा. भारत म्हणा, राष्ट्रीय एकात्मता म्हणा, हिंदुत्व म्हणा- मूळ एकच आहे- इंग्रज आणि मुसलमान या देशात येण्यापूर्वीही जे होते ते. देवाण-घेवाण, सरमिसळ झाली हे नक्कीच; पण गाभा, बीजस्वरूप टिकले; ते टिकवून ठेवण्यासाठी पिढ्यानुपिढ्यांनी आपले रक्त सांडले म्हणून ! असे रक्त वाहिले नसते तर चंद्रशेखरादी यात्रिकांना जो भारतीय एकात्मतेचा अनुभव आला तो आलाच नसता ! चंद्रशेखर ज्यांच्या पावलावर पाऊल टाकून चालले आहेत त्या जयप्रकाशांनाही शेवटी शेवटी हे सत्य जाणवले. 'कुछ बात है ऐसी' जी आम्हाला एकत्र बांधून ठेवते आहे, असे त्यांनी बिहारमधील, अगदी एका\n।। बलसागर ।। १५४"} +{"id": "indic_deva_eval_000736_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000736_devanagari_page_ocr_c19b79033d2f.jpg", "ocr": "थूपबंसो छह\n\nइस प्रकार जब चैत्य निर्माण का कार्य चल रहा था, तो राजा ने पुष्प प्रसाद के लिये तिहरे चबूतरे का निर्माण\nपूरा किया। तब क्षीणाखव इसकी (स्तूप की) स्थिरता सुनिश्चित करने के क्रम में, जमीन के स्तर को डूबा दिये। इस\nप्रकार जो भी बनाया गया था, उसे वे नौबार लगाकार अवसरों ��र डुबोये। राजा कारण को नहीं जानने के चलते\nहुदय से उदास होकर भिक्षुसंघ का सम्मेलन बुलाये, 80,000 झिक्षुओं को एक साथ इकट्ठा किये। राजा भिक्षु संघ\nको गन्धमाला आदि से पूजा बन्दना कर पूछे- “भन्‍्ते! महाचैत्य पर पुष्प प्रसाद के लिये निर्मित तिहरे चबूतरे को नो\nबार पृथ्वी में डूबोया गया, मैं नहीं जानता क्‍या मेरे जीवन के लिये या मेरे उपक्रम के लिये खतरा नहीं है, झिक्ष॒\nसंघ ने कहा- “महाराज यह आपके जीवन और उत्तरदायित्व के लिये कोई खतरा नहीं है, वे अलौकिक शक्तियों के\nसाथ भविष्य में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये डुबोया गया, इसके बाद वे इसे डूबोयेंगे नहीं, मन में बिना\nअन्यथा भाव लाये महान स्तूप का निर्माण पूरा करें। यह सुनकर राजा बहुत खुश हुआ और स्तूप के कार्य को जारी\nरुखा। पुष्प प्रसाद के लिये दक्ष तीन मंजिल छत्तो को 0,000 ईटों के साथ पूरा किया गया।\n\n३२३९० चाल (तह ७४०७ एचड #क्जाह पी ७००0९ ला ०0ाउतपटप०त गा छी (2७७३ तै)ाल ॥९ ॥3१ छोड घताछाल\nसटाएब८2९ ि वि णरलितए85 ९०0१७/20००- 700 ८80॥८७॥४४०७९ 2(09003 ॥0 07घ67 (० ७03७/७ ७५७ अच्छा ए्ग\nकी ८02); एाडत ा६ आप 0० ची९ ॥2एढ। ले जी 80000; ७७; 00. 0॥06 5७०८९उजं७७ 0८८अअंजार चै९॥ एम\nउरी बष2ा/2 १०३७ 0७६ ७० ६० आल, ०९ 0009008 पी ॥2०३०७७ धी७ हा] 9९८३०९ तल ०८६७१ १६॥ ७००६ 304 ॥85\nपी ह 009७ 0। 00006 355७१७/60; ७00 80,000 0ल्‍00॥ हग्फटालव ०2०७९. ४०0000708 कै 07607 भें एणताऊ\nधर छल िताह& आ00 3096 जए0 92778 00१86 ६० पीछा, पी (08 ब॥(०0, /आऊ, फीह धाएह प्टावलटक वि.\n० 00085 १६ घी& ७7००९ ८०घ५७ ७७॥७ ७७ 00९ घेता९७ डअत 00 घी8 रात; | 40 700 ।00/ ७/१०७ढ-\nचाह 0 ह&। १० 009 ॥ल 07 ६० 709 जीतता. पग8 078 ० त00/७ 7९9॥20, 'ठाग दाह, पार कै 0०\n5867 सफताल (० ०07 ७0वहाएगा०8 07 ७० ५०७ आडि, 7#056 ए/७ी 95/ठ0 900/205 #906 0090७70 अं (0 ला\n॥0 किप्जा& ह३०७॥७८ बस्छ। पा ९४ ज॥ 00 तञजवट ६ अत: 00 2०0७/60७ पी७ छा९६ 7७93 हक 00 लभह\nरा गधता(७88 ता तगव/ ग08 8 ४०४० ७४७६ 0७०७०:९० ६० #2०7 पं ००१४0७९५ ४ ७५७ ७०००८ ० ७१७ 70099\nव ६०० धरा पछए३<९७ 7 पि0/ जीला085 ७2० ०000ए25०१ एके ७१ तखा<* ते छत,\n\n9009. 9ए७एए204005300992. एड. छ॥रताएडकचरा।0. ((एछ3-डए७एाक73,. गातत9/6:. 0७8. ॥(गएठड३७3\nडच्चातगरोटार. 0592... 0006 / ड्वा)3८व(७/व५डचा एीवाक0त3. गाव). ९((2/९७. 0855860... 3. उप\n॥#बधका१99ग05090, ०॥/९039(9. ५०003055508 ठग 056. 6 5ठ0॥00 उ03फ८टए:8 ७त:अग॑वताएात\n970४8 ८७७७३००व८्ाआ90990808 ७(४७000000#97॥0९09 ॥0203७900१एव5508 ॥97६४व ९(३7॥ ०ठ550॥\n50/930005559. 0077५], अ्काएटठ.. ७870. एठड808. ८३७५७७: 9855650. 53एं4॥/3:. ३एकजा।\n08009300097. छ4गगरावतत8/9: एउला3 ताउठ0096. ४७७७: एठ/(5/9:. 5अा96.. 36559ठ0370: ।८३0व\n१००९५७०-\n\nचुन पुष्फधानत्तये निद्ठिते भिक्खुसडूघो उत्तरसुमननामके द्वे खीणासबसामणेरे आणापेसि-\nतुम्हे समचतुरस्सं अद्भरतनबहलं एकेकपस्सतो असीति हत्थप्पमाणं छ मेदकवण्णपासाणे\nआहरथा”ति। ते साथू\"ति सम्पटिच्छित्बा उत्तरकुरूं गन्त्वा वुत्तप्पकारप्पमाणे भण्डिपुप्फनिभे छ\nमेदकवण्णपासाणे आहरित्वा एकं पासाणं धातुगब्भस्स भूमियं अत्थरित्वा चत्तारो पासाणे चतुसु\nपस्सेसु संविधाय अपरं धातुगब्भ॑ पिदहनत्थाय पाचीनदिसाभागे बालुकपाकारससीपे\nआदिस्समाण कल्वा ठपेस।\n\nपुनः पुष्प धानत्रये निश्चिते भिक्षुसंघ: उत्तरसुमन नामकै द्वौ क्षीणास्रव: श्रामणेरै आज्ञापयत्‌। युवाम्‌\nसमचत॒खम्‌ अष्टरलबहलम्‌ एकैकपार्थ्वतः अशीतिहस्तप्रमाणं पड मेदकवर्णपापाणान्‌ आहरमिती। ती\nसाध्विति सम्प्रतीष्य उत्तरकुरूं गत्वा उक्तप्रकारप्रमाणान्‌ भण्डीपुष्पनिभान्‌ षट्‌ मेदकवर्णपाषाणान्‌\nआहत्य_ एक॑ पाषाणं धातुगर्भस्थ भूम्याम्‌ आस्तृत्य चतुर: पाषाणान्‌ चतुर्ष पार्श्रेषु संविधाय अपर\nश्ात॒गर्भ पिधानार्थाय प्राचीन दिशामागे बालुकाप्राकारसमीये अदृश्यमानं कृत्वा अस्थापयताम्‌।"} +{"id": "indic_deva_eval_000737_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000737_indic_mozhi_deva_word_ocr_1fef0bf8be97.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_000738_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000738_indic_mozhi_deva_word_ocr_323d194975f5.jpg", "ocr": "उदात्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000739_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000739_devanagari_page_ocr_7c968d47a15d.jpg", "ocr": "'पण्णदायकबग्गो डक\n\n“एकनबुतितो कप्पे, यमहं पब्बजिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, पब्बज्जाय इदं फलं॥387॥\n“सत्तसह्लिम्हितो कप्पे, सत्त आसुं महीपती।\nसुनिक्खमाति आयन्ति, चक्‍कवत्ती महब्बला॥388॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो....पे*... कत॑ बुद्धस्स सासन”॥389॥\nइत्थं सुदं आयस्मा सत्ताहपब्बजितो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nसत्ताहपब्बजितत्थेरस्सापदानं अट्ठमं।\n9. बुद्धुपट्टायिकत्थे रअपदानं\n“बेटम्भिनीति [वेटम्बरीति (सी*), वेधम्भिनीति (स्या*)] मे नामं, पितुसन्तं [पिता'सन्तं\n(?)] मम तदा।\nमम हत्थ॑ गहेत्वान, उपानयि महामुनिं॥390॥\n“इमेम॑ उद्दधिसिस्सन्ति, बुद्धा लोकग्गनायका।\nतेहं उपद्ठधिं सक्‍्कच्च, पसन्‍नो सेहि पाणिशि॥394॥\nफकनवत्तितमे कल्पे, यमहं प्रात्रजं तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, प्रव्नज्यया इ्दं फलम्‌॥387॥\n“सप्तपष्ट्यास्‌ इतः सप्त आसन्‌ महीपतय:।\nसुनिष्क्रमाति ज्ञायन्ते, चक्रवर्त्तिमहाबला:॥388॥\n“प्रतिसंविदश्वतस््र: ....पे*... कृतं बुद्धस्य शासनम्‌\"॥389॥\nइत��थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ सप्ताहप्रत्नजितस्थविर इमा गाथा अभापषिष्टेति।\n“बेटस्भिनी इति सम नाम, पितुः अन्त॑ मां तदा।\nमम हस्त॑ गृहीत्वा, उपानयत्‌ महासुनिम्‌॥390॥\n“इमेमम्‌ उद्दिश्यन्ति, बुद्धाः लोकाग्रनायकाः।\nजहम्‌ उपास्थाम्‌ सत्कृत्यम्‌, प्रसन्‍नः स्वाध्यां पाणिभ्याम्‌॥394॥\nजो प्रत्नज्या ग्रहण की थी यह उस कर्म का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति को नहीं\n\nबहा\nजानता ॥3870॥\n\nयहाँ से 67 वें कल्प में सुनिष्क्रम नाम से जाने जाने वाले सात महाबलशाली चक्रवर्ती राजा हुए ॥388॥\n\nचार पटिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया ॥389॥\n\nइस प्रकार आयप्मान्‌ समाहप्रत्नजित स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nउस समय पिता के साथ रहता था, मेरा नाम बेटम्भिनी था, तब मेरा हाथ पकड़ कर मेरे पिता मुझे\nमहासुनि के समीप ले गये ॥390॥\n\nये जो लोक के अग्र नायक बुद्ध हैं, उन्होंने मुझे नियम का उपदेश प्रदान किया और उनके समीप जाकर\nप्रसन्नमन से दोनों हाथों से उनका सत्कार किया ॥39॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000740_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000740_devanagari_digits_mixed_6140f68dabe3.jpg", "ocr": "५६5९7१६४"} +{"id": "indic_deva_eval_000741_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000741_devanagari_page_ocr_a48334561b8a.jpg", "ocr": "96 संयुत्तनिकायपालि\n\n“को च, भिक्खबे, आहारो अनुप्पन्नस्स वा उद्धच्चकुक्कुच्चस्स उप्पादाय, उप्पन्नस्स\nवा उद्धलज्चकुक्कुच्चस्स भिव्योभावाय बेपुल्लाय? अत्थि, भिकक्‍खवे, चेतसो अवूपसमो। तत्थ\nअयोनिसोमनसिकारबहलीकारो - अयमाहारो अनुप्पन्नस्स वा उद्धच्चकुक्कुच्चस्स उप्पादाय,\nउप्पन्नस्स वा उद्धच्चकुक्कुच्चस्स भिय्योभावाय वेपुल्लाय। “को च, भिक्खवे, आहारो\nअनुप्पन्नाय वा विचिकिच्छाय उप्पादाय, उप्पन्ताय वा विचिकिच्छाय भिव्योभावाय\nबेपुल्लाय? अत्थि, भिक्‍खवे, विचिकित्क्काद्रानीया धम्मा। तत्थ अयोनिसोमनसिकारबहलीकारो\n- अयमाहारो अनुप्पन्नाय वा विचिकिच्छाय उप्पादाय, उप्पन्नाय वा विचिकिच्छाय\nभिव्योभावाय वेपुल्लाय। “सेय्यथापि, भिक्खवे, अयं कायो आहारट्लितिको, आहारं पटिच्च\nतिट्ठति, अनाहारो नो तिट्ठति; एवमेव खो, भिक्‍खवे, इमे पडछच नीवरणा आहारद्ठितिका, आहारं\nपटिचज्व तिट्ठन्ति, अनाहारा नो तिदट्ठन्ति। “सेय्यथापि, भिक्खवे, अयं कायो आहारड्वितिको,\nआहार पटिज्व तिट्ठति, अनाहारो नो तिट्भति; एबमेव खो, भिक्खवे, सत्त बोज्झड्गा\nआहारद्वितिका, आहारं पटिच्च तिट्ठन्ति, अनाहारा नो तिट्ठन्ति।\n\n(संस्कृतच्छाया) “कश्व, भिक्षव:! आहार: अनुत्पन्नस्य वा औद्धत्यकौकृत्यस्योत्पादाय, उत्पन्नस्य वा\nऔद्धत्यकौकृत्यस्य भूयोभावाय वैपुल्याय? अस्ति, भिक्षब:! चेतस: अव्युपशम:। तत्र अयोनिशो-\nमसनसिकारबहलीकार:- अयमाहार: अनुत्पन्तस्थ वा औद्धत्यकौकृत्यस्योत्पादाय, उत्पन्नस्थ वा\nऔद्धत्यकौकृत्यस्य भूयोभावाय बैपुल्याय। “कश्व, भिक्षव:! आहार: अनुत्पन्नाया: बा विचिकित्साया\nउत्पादाय, उत्पन्नाया बा विचिकित्साया भूयोभावाय बैपुल्याय? अस्ति, भिक्षब:! विचिकित्सा-\nस्थानीया: धर्मा:। तत्र अयोनिशोमनसिकारबहलीकार:- अयमाहार:, अनुत्पन्ताया वा विचिकित्साया\nउत्पादाय, उत्पन्नाया वा विचिकित्साया भूयोभावाय बैपुल्याय। “तद्यथापि, भिक्षब:! अय॑ कायः\nआहारस्थितिक:, आहारं प्रतीत्य॒तिषछ्ठति, अनाहार: नो तिछठति, एवमेव खलु, भिक्षव:! इमानि\nपश्चनीवरणानि आहारस्थितिकानि, आहारं प्रतीत्य तिष्ठन्‍्ति, अनाहारानि नो तिष्ठन्ति। “तद्यथापि,\nभिक्षव:! अय॑ं काय: आहारस्थितिक:, आहारं प्रतीत्य तिषठति, अनाहार: नो तिष्ठति, एवमेव खलु,\nभिक्षव:! सस्॒ बोध्यड्गानि आहारस्थितिकानि, आहारं प्रतीत्य तिष्ठन्‍्ति, अनाहारानि नो तिप्ठन्ति।\n\n0हेन्दी) क्या आहार है? भिक्षुओं! अरति, तन्‍्द्रा, जम्हाई-निमित्त है। का आना भोजन का मद तथा लन्‍्द्रा- ये सब\nअनुत्पन्न स्त्यानमृद्ध तथा उत्पन्न स्व्थानमृद्ध की वृद्धि एवं उन्नति में आहार के रूप में सहायक होते हैं। भिक्षुओं!\nअनुत्पन्न औद्धत्य- कौकृत्य की उत्पत्ति में, तथा उत्पन्न औद्धत्य- कौकृत्य की वृद्धि एवं बिपुलता मे कौन सा आहार\nहै? भिक्षुओं! चित्त शान्त की चंचलता है। ...पूर्ववत्‌... भिक्षुओं! अनुत्पन्न विचिकित्सा की उत्पत्ति में, तथा उत्पन्न\nविचिकित्सा की वृद्धि एवं विपुलता मे कौन सा आहार है? भिक्षुओं! उस सन्‍्देह ...पूर्ववत्‌... इसलिये कहा जाता है\nभिक्षुओं!- जैसे यह काया आहार पर अवलम्बित है, आहार पर स्थित होकर रहते है, अनाहार पर नही स्थित रहते\nहैं। उसी प्रकार झिक्षुओं! पाँच नीवरणों की उत्पत्ति, उन्नति तथा विपुलता भी अपने अपने तथाकथित आहारो पर\nआधूत है। इसलिये कहा जाता है भिक्षुओं।- जैसे यह काया आहार पर अवलम्बित है, आहार पर स्थित होकर रहते\nहै, अनाहार पर नहीं स्थित रहते हैं। उसी प्रकार भिक्षुओं! ये सात ...पूर्वबत्‌... अनाहार पर नही स्थित रहते हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000742_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000742_devanagari_page_ocr_8d07595a7747.jpg", "ocr": "पदमाला\nगन्थारम्भकथा\n२. सविकरणाख्यातविभागो ख्\n२. अवतिक्रियापदमालाविभागों 5\n३. पकिणणकविनिच्छयों उ\nडे भूधातुमयनामिकरूपविभागो 60\n६. आकारन्तपुल्लिड्रनामिकपदमाला ॥27\n७, निग्गहीतन्तपुल्लिड्रनामिकपदमाला ]54\n<. इत्थिलिड्जनामिकपदमाला ]80\n९. नपुंसकलिड्जनामिकपदमाला 206\n१०. लिड्भत्तयमिस्सकनामिकपदमाला ख़ाव\n११. वाच्चाभिधेय्यलिज्रादिपरिदीपननामिकपदमाला डर\n३१२. सब्बनामतंसदिसनामनामिकपदमाला 240\n१३. सविनिच्छयसब्डुत्यानामनामिकपदमाला 267\n१४. अत्थत्तिकविभाग 278\nधातुमाला\n\n१५. सरवग्गपञ्चतकन्तिक सुद्धस्सरधातु 283\n१६. भूवादिगणिकपरिच्छेदो 370\n१७. रुधादिछक्को क्षव\n१८. चुरादिगणपरिदीपन बेंढे+\n१९. सब्बगणविनिच्छयो हाड़\n\nजता"} +{"id": "indic_deva_eval_000743_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000743_indic_vision_bench_deva_ocr_464ed2872a5f.jpg", "ocr": "दो बहनें\nलिखा है, रिसर्च के जिस दुरूह कार्य में नीरद अपने आपको लगा देना चाहता है, वह भारतवर्ष में सम्भव नहीं है। इसीलिये उसे अपने जीवन में एक और बड़ा बलिदान करना पड़ेगा। ऊर्मि के साथ विवाह-सम्बन्ध विच्छिन्न\nकिए बिना अब चल ही नहीं सकता। एक यूरोपीय महिला उसके साथ विवाह करके उसके कार्य में आत्मनियोग करने को तैयार हैं। लेकिन काम तो वही है, भारतवर्ष में हो तो, और विलायत में हो तो। राजारामबाबू ने जिस कार्य के लिये धन देना चाहा था, उसका कुछ हिस्सा यहाँ लगाने में कोई अन्याय नहीं है। उससे मृत व्यक्ति का सम्मान ही होगा।\nशशांक ने कहा, \"जीवित व्यक्ति को कुछ-कुछ देकर यदि उस दूरदेश में ही जिला रख सको तो बुरा क्या है? क्योंकि यदि रुपया बंद कर दिया जाय तो भूख की ज्वाला से अधमरा होकर यहाँ दौड़ा चला आयगा, यह आशंका है।\"\nऊर्मि ने हँसकर कहा, \"यदि तुम्हारे मन में यह डर हो तो रुपया तुम्हीं भेजना, मैं तो एक पैसा भी नहीं देती।\"\nशशांक बोला, \"फिर से मन तो नहीं बदलेगा न? मानिनी का अभिमान तो अटल ही बना रहेगा?\"\n९७"} +{"id": "indic_deva_eval_000744_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000744_indic_mozhi_deva_word_ocr_69d86cc16f26.jpg", "ocr": "विभिन्न"} +{"id": "indic_deva_eval_000745_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000745_hindi_handwritten_word_ocr_d3059f8d8a66.jpg", "ocr": "उपवास"} +{"id": "indic_deva_eval_000746_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000746_hindi_handwritten_word_ocr_7e929e7f259e.jpg", "ocr": "संवारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000747_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000747_indic_mozhi_deva_word_ocr_e5366764ac8a.jpg", "ocr": "तंगड्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000748_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000748_indic_mozhi_deva_word_ocr_3eaadaf0e2b8.jpg", "ocr": "बाहेरून"} +{"id": "indic_deva_eval_000749_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000749_indic_mozhi_deva_word_ocr_a252cd23dee2.jpg", "ocr": "लिहायला"} +{"id": "indic_deva_eval_000750_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000750_devanagari_page_ocr_821c5a2541b6.jpg", "ocr": "4 && सद्नीतिप्पकरणं\n\nवित्थारेन्ति चिरं ठपेन्‍्तीति पपठ्चा। लोकिया पन “अम्हाकं तुम्हेहि सद्धिं कथेन्तानं पपड्चो\nहोती”तिआदीनि बदन्‍ता कालस्स चिरभाबं पपड्चोति बदन्ति, सासने पन द्वयम्पि लब्भति।\n\nसिच्च कुड्डने। सिच्वेति, सिछ्चयति।\n\nबड्चु पलम्भने। पलम्भनं उपलापनं। वज्चेति, वडचयति। बड्चको, वड्चनं। भूवादिगणे\nपन वडचधातु गत्यत्थे वत्तति। “सन्ति पादा अवड्चना”ति हि पाव्ठि\n\nचक्च अज्ञझयने। चच्चेति, चच्चयति।\n\nचअु चवने। चावेति, चावयति। अज्ञो “चु सहने” इति ब्रुते। चावेति, चाबयति, सहतीति\nअत्थो।\n\nअख्चु विसेसने। अड्चेति, अड्चयति।\n\nलोच भासायं। लोचेति, लोचयति। लोचनं, लोचयति समविसमं आचिक्खन्त॑ विय\nभवतीति लोचनं, चक्‍्खु।\n\nरच पतियतने। रचेति, रचयति। रचना, विरचितं, केसरचना, गाथारचना।\n\nसूच पेसुज्जे। पिसुणभावों पेसुज्ञं। सूचेति, सूचयति। सूचको।\n\nपच्च संयमने। पच्चेति, पच्चयति।\n\nरिच वियोजनसम्पज्जनेसु। रेचेति, रेचयति। सेट्ठिपुत्त विरेचेय्य। विरेचेति, विरेचयति।\nविरेचको, विरेचनं।\n\nबच भासने। वचेति, वचयति। भूवादिगणेपि अय॑ वत्तति। तदा तस्सा\nअवोच, अवोचु”न्तिआदीनि रूपानि भवन्ति। कारिते पन “अन्तेवासिकं धम्म॑ वाचेति,\nवाचयती”ति रूपानि। वत्तुं, वत्तवे, वत्वा, वुत्तं, वुच्चति।\n\nअच्च पूजायं। अच्चेति, अच्चयति। ब्रह्मासुरसुरच्चितो।\n\nसूच गन्धने। सुचेति, सूचयति। सूचको, सुत्तं।\n\n'एल्थ च अत्तत्थपरत्थादिशेदे अत्थे सूचेतीति सुत्त। तेपिटक॑ बुद्धवचने।\n\nकच दित्तियं। कच्चेति, कछ्चयति। कच्चो।\n\nएत्थ कच्चोति रूपसम्पत्तिया कच्चेति दिव्वति विरोचतीति कच्चो, एवंनामको\nआदिपुरिसो, तब्बंसे जाता पुरिसा “कच्चाना”तिपि “कच्चायना”तिपषि “कातियाना”तिपि\nबुच्चन्ति, इत्थियो पन “कच्चानी”तिपि “कच्चायनी ”तिपि “कातियानी”तिपि बुच्चन्ति।\n\n'वक्ति, बचति,"} +{"id": "indic_deva_eval_000751_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000751_devanagari_digits_mixed_70c7b1a90c03.jpg", "ocr": "६33३२889९7९3"} +{"id": "indic_deva_eval_000752_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000752_devanagari_page_ocr_1798f0ea58a8.jpg", "ocr": "अपदानपालि <\n\n“एकनबुतितो कप्पे, यं दानमददिं तदा।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, अम्बयागस्सिदं फलं॥485॥\n\n“पटि���म्भिदा चतस्सो...पे०... कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥486॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा अम्बयागदायको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\n\nअम्बयागदायकत्थेरस्सापदानं अट्ठमं।\n\n9. जगतिकारकत्थेरअपदानं\nजगतिकारकस्थविरापदानम्‌\n\n“निब्बुते लोकनाथम्हि, अत्थदस्सि नरूत्तमे।\n\nजगती कारिता म्हं, बुद्धस्स थूपमुत्तमे॥487॥\n\n“अद्भारसे कप्पसते, य॑ं कम्ममकरिं तदा।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, जगतिया इदं फलं॥488॥\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो ...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥489॥\nइत्थं सुदं आयस्मा जगतिकारको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nजगतिकारकत्थेरस्सापदानं नवम॑।\nगत स्कनवतितमे कल्‍्पे, यद्दालमददां तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, आम्रयागस्येदं फलम्‌॥485॥\n“भ्रतिसंविदश्वतस्र:....पे*... कूत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥486॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ आम्रयागदायकस्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\n'निर्वुते लोकनाथे, अर्थदर्शि नरोत्तमे।\nजगती कारिता मया, बुद्धस्य स्तूप उत्तमे॥487॥\nअष्टादशे कल्पशते, यत््‌ क्मकिरवं तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, जगत्या इदं फलम्‌॥88॥\n'्रतिसंविदश्वतस्र:.... पे\"... कृत बुद्धल्‍्य शासनम्‌\"॥489॥\nइल्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ जगतीकारकस्थविर इमा गाथा अभाषिष्ठेति।\n\nयहाँ से 97 थे कल्प में मैंने जो सम्बुद्ध को यज्ञ हेतु आम की लकड़ी प्रदान की थी, उस कर्म का ही\nखुपरिणाम है कि मैं दुर्गति को नहीं जानता॥85॥\n\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडशिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥486॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ आम्रयागदायक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nलोकनाथ, अर्थदर्शी, नरोत्तम, बुद्ध के उत्तम स्तूप पर मैंने एक वेदिका का निर्माण किया॥87॥\n\nयहाँ से 48 वें कल्प में जो बुद्ध के स्तूप पर बेदिका का निर्माण किया था, उस कर्म का ही सुपरिणाम है\nकि मैं दुर्गति को नहीं जानता॥88॥\n\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥489॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ जगतिकारक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-"} +{"id": "indic_deva_eval_000753_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000753_indic_mozhi_deva_word_ocr_c912a1a890fa.jpg", "ocr": "बच्ची"} +{"id": "indic_deva_eval_000754_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000754_indic_mozhi_deva_word_ocr_0b7ef1a7d260.jpg", "ocr": "दामाद"} +{"id": "indic_deva_eval_000755_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000755_indic_mozhi_deva_word_ocr_1a99f92fd936.jpg", "ocr": "चढ़ा"} +{"id": "indic_deva_eval_000756_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000756_indic_vision_bench_deva_ocr_b255e2c0f961.jpg", "ocr": "३८\nस���्ची रोशनी\nमुझे अफसोस है कि आज हिन्दुस्तान में रामराज्य नहीं है। अिसलिअे हम दिवाली कैसे मना सकते है? वही आदमी इस विजयकी खुशी मना सकता है, जिसके दिल में राम है। क्योंकि भगवान ही हमारी आत्मा को रोशनी दे सकता है, और अैसी ही रोशनी सच्ची रोशनी है। आज जो भजन गाया गया, अुसमें कवि की भगवान को देखने की अिच्छा पर जोर दिया गया है। लोगों की भीड दिखावटी रोशनी देखने जाती है, लेकिन आज हमे जिस रोशनी की जरूरत है वह तो प्रेम की रोशनी है। हमारे दिलों में प्रेमकी रोशनी पैदा होनी चाहिए। तभी सब लोग बधाअिया पाने लायक बन सकते है। आज हजारों-लाखो लोग भयानक दुख भोग रहे है। क्या आप लोगों में से हर एक अपने दिल पर हाथ रखकर यह कह सकता है कि हर दुखी आदमी या औरत––फिर वह हिन्दू, सिक्ख या मुसलमान कोअी भी हो––मेरा सगा भाअी या बहन है ? यही आप की कसौटी है। राम और रावण भलाअी और बुराअी की ताकतों के बीच हमेशा चलनेवाली लडाई के प्रतीक है। सच्ची रोशनी भीतर से पैदा होती है।\nहरिजनसेवक, २३-११-१९४७\n३९\nअवसानसे एक दिन पहले\n[२ फरवरी, १९४८ को श्री किशोरलालमाअीको गांधीजी के हाथका लिखा हुआ एक पोस्ट कार्ड मिला, जिसकी नकल नीचे दी जाती है।\nनोट––श्री शकरन हिन्दुस्तानी तालीमी सघ, सेवाग्राममे शिक्षक है।\nयहा 'किया' क्रिया का सम्बन्ध गांधीजी की 'करो या मरो' की प्रतिज्ञासे है, जो अुन्होंने दिल्ली पहुंचने पर ली थी।\n'दोनों को आशीर्वाद' का मतलब है––श्री किशोरलालमाअीको और उनकी पत्नी श्री गोमतीबहनको।\n––सम्पादक]\n५४"} +{"id": "indic_deva_eval_000757_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000757_devanagari_page_ocr_adbc0a58b861.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\nश्ख़ा\n\nपनेत्थ पयोगों “सं भिक्खू, सतं इत्थियो, सतं चित्तानि। भिक्‍्खूनं सतं, इत्थीन सतं, चित्तानं\nसतं। सहस्सादीसुषि एसेव नयो। इत्थञूच अज्ञथापि सद्दरूपानि भवन्ति। कोटि, कोटी,\nकोटियो। रतक्तिनयेन जेय्यं।\nएकप्पभुतितो याव, दसका या पवत्तति।\nसड्गख्या ताव सा सड्सख्येय्य-प्पधानाति गरू बदुं॥\nवीसतितो याव सता, या सझूख्या ताव सा पना।\nसड्सख्याप्पधाना सड्ख्येय्य-प्पधानाति च वण्णयुं॥\nअपिच -\nचीसतो याव कोटिया, सड्ख्या ताव हि सा खलु।\nसडूख्याप्पधाना सड्ख्येय्य-प्पधाना चाति निद्धिसे॥\nतथा हि “असीति कोटियो हित्वा, हिरज्ञस्सापि पब्बजि”न्ति, “खीणासवा वीतमला,\nसमिंस सतकोटियो\"ति च पाक्ति दिस्सति।\nइमस्मिं पन ठाने सब्बेसं सड्ख्यासहरूपानं पाकटीकरणेन विज्ञूनं सुखुमजआणपटिलाभत्थं\nसाट्ठकर्थ उदानपाक्ठिप्पदेसं अज्ञज्च पाव्ठिप्पदेसमट्ठकथावचनउच आहरित्वा दस्सयिस्सामि -\n“बैसं खो बिसाखे सत॑ं पियानि, सतं तेसं दुक्खानि, येसं नव॒ुति पियानि, नबुति\nतेस॑ दुक्‍्खानि। येसं असीति. ..पे*... येसं सत्तति। येसं सद्ठि। येसं पज्ञासं, येसं\nअत्तारीसं, येसं तिंसं। येसं खो बिसाखे बीस पियानि, बीसति तेसं दुक्खानि। येसं दस।\nयेस॑ नव। येसं अट्ठ। येसं सत्त। येसं छ। येसं पडच। येसं चत्तारि। येसं तीणि। येसं द्वे। येस॑\nएक॑ पियं, तेसं एकं दुक्ख”न्ति।\nतत्थ सतं पियानीति सतं पियायितब्बबत्थूनि। “सतं पिय”न्तिषि केचि पठन्ति।\nएत्थ च यस्मा एकतो पढ्ठाय याव दस, ताव सड्खख्यासड्ख्येय्यप्पधाना, तस्मा “येसं दस\nपियानि, दस तेसं दुक्खानी”तिआदिना पाठ्छि आगता। केचि पन “येसं दस पियानं, दस\nतेसं दुक्खान”ल्तिआदिना पटन्ति, त॑ न सुन्दरं। यस्मा पन वीसतितो पट्ठाय याव सतं,\nताव सड्ख्येय्यप्पधाना सडूख्याप्पधाना च, तस्मा तत्थापि सझूख्येय्यप्पधानंयेव\nगहेत्वा “येसं खो विसाखे सतं पियानि, सत॑ं तेसं दुक्खानी\"तिआदिना पावठ्छि आगता।\nसब्बेसम्पि च येस॑ एक॑ पिय॑, एक॑ तेस दुक्‍खन्ति पाठो, न पन दुक्‍्खस्साति। एकस्मिडिह"} +{"id": "indic_deva_eval_000758_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000758_hindi_handwritten_word_ocr_b657e36b3837.jpg", "ocr": "कालाबाजारी"} +{"id": "indic_deva_eval_000759_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000759_indic_mozhi_deva_word_ocr_a9d925751971.jpg", "ocr": "खरोखर,"} +{"id": "indic_deva_eval_000760_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000760_indic_vision_bench_deva_ocr_f41e39b7dc57.jpg", "ocr": "खपविण्याचे शिवधनुष्य व्यवस्थांना उचलावं लागत आहे.\nत्याचबरोबर दहा वर्षांपूर्वी भारताने जागतिक व्यापार संघटनेचे सदस्यत्व स्वीकारल्याने परदेशांत तयार होणाऱ्या मालाला भारताचे दरवाजे मोकळे करून द्यावे लागत आहेत.W.T.O. कराराप्रमाणे आयातीवरचे निबंध हटवावे लागले आहेत. त्यामुळे भारतीय वस्तूंपेक्षा टिकाऊ, सुबक व स्वस्त परदेशी वस्तूंनी आपली बाजारपेठ भरून जात आहे. आईवडिलांनी केवळ भात-आमटी खाण्याची सवय लावलेल्या बालकाच्या हातात मोठा ‘कॅडबरीज'चा बार ठेवावा आणि त्याने त्यावर तुटून पडावं, तसं आपले ग्राहकही या आकर्षक वस्तूंवर उड्या मारताहेत.\nयाचा परिणाम म्हणून देशी उद्योग खिळखिळे होत आहेत. अनेक तर बंदच पडले आहेत, पण त्यातील आधुनिक यंत्रांवर काम करण्यासाठी कुशल कामगारांची आवश्यकता आहे. पूर्वीच्या समाज��ादी अर्थव्यवस्थेत तंत्रज्ञान विकासाला प्राधान्य नसल्याने कुशल कामगारांची फौज तयार झाली नाही. अर्धकुशल किंवा अकुशल कामगारांची संख्या जास्त आहे.(अपवाद फक्त माहिती तंत्रज्ञान, संगणक सॉफ्टवेअर क्षेत्राचा) या अकुशल व अर्धकुशल कामगारांना आता काम मिळणं मुश्किल झालं असून त्यांच्या बेकारीची सामाजिक व मानवीय (ह्यूमन) समस्या उभी राहत आहे आणि या परिस्थितीला या कामगारांना दोषी ठरवता येणार नाही. त्यांच्या समस्यांचा सहानुभूतीपूर्वक विचार होणं ही प्राथमिकता आहे. त्यांना वाच्यावर सोडता येणार नाही.\nअशा तऱ्हेने, परकीय बाजारपेठ काबीज करणं, देशांतर्गत बाजारपेठ राखणे, बेकारी आणि जागतिक मंदी हे चार आव्हानात्मक भस्मासुर एकाच वेळी भारतीय व्यवस्थापनासमोर उभे आहेत. यातल्या एकीकडे जरी दुर्लक्ष झालं तरी तो आपल्या डोक्यावर हात ठेवेल.डिसेंबर महिन्यात सकाळी सहा वाजता अंगावरचे कपडे काढून पोहायला येत नसलेल्या एखाद्या बालकाला पोहण्याच्या पुलात उतरवावं, म्हणजे त्याची जी अवस्था होईल तीच अवस्था आपल्या उद्योग क्षेत्राची झाली आहे.\nतथापि, माझ्या व्यवस्थापकीय मित्रांनो,घाबरून जाण्याचे कारण नाही.बिरबलाच्या गोष्टीप्रमाणे आपण स्वतला फिरविण्याची तयारी दाखविली तर या सर्व भस्मासुरांना एकाच वेळी यमसदनी धाडणंं अशक्य नाही. यासाठी कोणते गुण विकसित करावे लागणार आहेत याची माहिती पुढील लेखात घेऊ.\nआव्हान जागतिक स्पर्धेचे/४२"} +{"id": "indic_deva_eval_000761_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000761_devanagari_page_ocr_417e0e82a2f6.jpg", "ocr": "सत्तरसमों परिच्छेदो\n260\n\nएवं पुरा बाहिरा च, सब्बे पब्बजिता तदा।\n\nतिंस भिक्खुसहस्सानि, अहेसुं जिनसासने॥64॥\n\nथूपारामे थूपवरं, निद्ठापेत्वा महीपति।\n\nरतनादीहि'नेकेहि, सदा पूजमकारयि॥62॥\n\nराजोरोधा खत्तिया च, अमच्चा नागरा तथा।\n\nसब्बे जनपदा चेव, पुजा'कंसु विसुं विसुं॥63॥\n\nथूपपुन्बज्भमं राजा, विहारं तत्थ कारयि।\n\nथूपारामोति तेने'स, विहारो विस्सुतो अहु॥64॥\n\nसकधातुसरीरकेन चे'वं, परिनिब्बानगतोषि लोकनाथो।\n\nजनकायहितं सुखठच सम्मा, बहुधा'कासि ठिते जिने कथावकाति॥65॥\nसुजनप्पसादसंवेगत्थाय कते महावंसे धातागमनो नाम सत्तरसमो परिच्छेदो।\n\nसंस्कृतच्छाया- एवं पुरा बाहिरा च, सर्वे प्रत्मजितास्तदा।\n\nविंशद्‌ भिक्षुसहस्त्राणि, अभूवन्‌ जिनशासने।॥64]।\nस्तूपारामे स्तूपवरं, निछाप्य महीपति:।\n��ज्रादीभिरनेकै:, सदा पूजामकारयत्‌।।62॥।\nराजावरोधा: क्षत्रियाश्व, अमात्या: नागराः तथा।\n\nसर्वे जनपदाश्वैव, पूजामकार्षु: वियुक्त वियुक्तम्‌।63॥।\nस्तूपपूर्वाडगर्म राजा, विहारं तत्न अकारयत्‌।\n\nस्तूपाराम: इति तेन एव विहारो विश्लुतोज्भूत्‌।॥64॥।\nस्वकधातुशरी रकेन चैवं, परिनिर्वाणगतो5पि\n\nलोकनाथ:।\nजनकायहित॑ सुखञ्ञ सम्यक्‌, बहुधा5कार्षीत्‌ स्थिते जिने कथा का! इति।॥65।।\nहक या भीतर रहने वाले तीस हजार पुरुषों ने भिक्षुभाव ग्रहण किया।।64|।\nस्तूपाराम में सुन्दर स्तूप बन जाने पर, राजा विविध रजादिक से उसकी निरन्तर पूजा करवाता रहा।।6:2॥।\nइसी तरह राजा के अमात्यों ने, क्षत्रियों एवं अन्य नागरिकों ने भी यथानुरूप उस स्तूप की पूजा की।63॥\nराजा ने स्तूप की पूर्व दिशा में एक अन्य विहार भी बनवाया जो कि स्तूपारामविहार कहलाया।।64!।\nइस प्रकार जब\n\nने स्वशरीर की धालुओं से ही जनता को अत्यधिक हित-सुख प्रात\nकृत्यों का तो वर्णन ही कितना किया जाय।।65॥।\n\nहिन्दी- इस प्रकार नगर के बाहर\n\n| थक लोकनाथ\nकराया, तो उनके जीवनकाल में हुए शुभ कृ"} +{"id": "indic_deva_eval_000762_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000762_indic_mozhi_deva_word_ocr_a0fd0472c0d6.jpg", "ocr": "कथा-साहित्य"} +{"id": "indic_deva_eval_000763_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000763_devanagari_page_ocr_13855933a70a.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n48: न्‍\n\nभुज पालनब्यवहरणेसु। पालनं रक्‍्खणं। ब्यवहरणं अज्ञोहरणं। भुछ्जति, परिभुड्जति,\nसंभुछ्जति। दासपरिभोगेन परिभुडिज। कारिते “भोजेति भोजयती”तिआदीनि रूपानि। भोजनं,\nसम्भोगो, महिभुजों, गामभोजको, उपभोगो, परिभोगो। भुत्तो ओदनो भवता। सचे भुत्तो\nभवेय्याहँं। ओदनं भुत्तो भुत्तवा भुत्तावी। तुमन्‍्तादित्ते “भुड्जितुं, परिभुज्जितुं, भोजेतुं, भोजयितु,\nभुड्जित्वा, भुज्जित्वान, भुज्जिय, भुज्जियान, भोजेत्वा, भोजेत्वान, भोजयित्वा, भोजयित्वान\"\nइच्चादीनि परिसद्दादीहि विसेसितब्बानि।\nतत्र भुड्जतीति भत्तं भुज्जति, भोजनीयं भुज्जति। तथा हि “खादनीय॑ वा भोजनीयं वा\nखादति वा भुछ्जति वा\"तिआदि बुत्त। अपिच कदाचि खादनीयेपि “भुड्जती”ति बोहारो\nदिस्सति। “फलानि खुद्दकप्पानि, भुडज्ज राज वरावर”न्ति हि बुत्त। परिभुड्जतीति चीवरं\nपरिभुड्जति, . पिण्डपात॑ परिभुज्जते, _ गिलानपच्चयभेसज्जपरिक्खारं. परिभुज्जति,\nपटिसेवतीति बुत्तं होति। तेनेव च पटिसेवतीति परिभुछ्जतीति अत्थो संवण्णियति। अपिच\n“कामे भुछ्जती”ति च “पड्चकामगुणे परिभुछ्जती”ति च दस्सनतो पन भुड्जनपरिभुड्जनसद्दा\nपटिसेवनत्थेन कत्थचि समानत्थापि होन्‍तीति अवगन्तब्बा। संभुड्जतीति सम्भोगं करोति,\nएकतो वास॑ करोतीति अत्थो। एत्थ सिया “ननु च भो अत्र भुजधातु पालनब्यवहरणेस्‌ वुत्तो, सो\nकर्थ एत्तकेसुषि अत्थेसु वत्तती”ति? बत्ततेब, अनेकत्था हि धातवो, ते उपसग्गसहाये लभित्वापि\nअनेकत्थतराब होन्ति। इतो पट्ठाय तुमन्‍्तादीनि रूपानि न वक्‍्खाम। यत्थ पन विसेसो दिस्सति,\nतत्थ वक्‍खाम।\nकति छेदने। कन्‍्तति, विकन्तति। सलल्‍लकत्तो।\nभिदि विदारणे। भिन्‍्दति। अनागतत्थे वत्तब्बे “भेज्जिस्सति, भिन्दिस्सती”ति द्विधा\nअवल्ति रूपानि। पापके अकुसले धम्से भिन्‍्दतीति भिकक्‍्खु। तेनाह -\n“न लेन भिक्खु सो होति, यावता भिक्खते परे।\nविसं धम्म॑ं समादाय, भिक्खु होति न तावता॥\nयोध पुछ्जज्च पापञ्च, बाहित्वा ब्रह्मचरियं।\nसहखाय लोके चरतति, सवे 'मिकख॒'ति व॒च्चती\"ति॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000764_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000764_hindi_handwritten_word_ocr_eef8c18221c3.jpg", "ocr": "ताड़"} +{"id": "indic_deva_eval_000765_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000765_devanagari_page_ocr_7ac81602389c.jpg", "ocr": "4० संयत्तनिकायपालि_\n\n५६. कल्याणमित्तसुत्तं\n\n५६. “सुस्यिस्स, मिक्‍्खवे, उदयतो एत॑ प्व्वकगर्स एत॑ पब्वनिमित्त, यदिद॑ अरूणर्गं:\nएवमेव खो, भिक्‍खवे, भिक्खुनो अरियस्स अट्ठडि-गकस्स मग्गस्स उप्पादाय एतं पुब्बडग्मं एत॑\nपुब्बनिमित्तं, यदिदं -- कल्याणमित्तता। कल्याणमित्तस्सेत॑, भिक्‍्खवे, भिक्खुनो पाटिकड्खं --\nअरिय॑ अद्गड्लिगिकं मग्गं भावेस्सति, अरियं अट्ठड्ट्गिकं मग्गं बहुलीकरिस्सति। कथड्च, भिक्खवे,\nभिक्खु कल्याणमित्तो अरियं अट्ठड्िगकं मग्गं भावेति, अरियं अट्ठडिग्गक॑ मग्गं बहुलीकरोति? इध,\nभिक्खवे, भिक्खु सम्मादिद्विं भावेति रागविनयपरियोसानं दोसविनयपरियोसान\nमोहविनयपरियोसान &/-ज८५४ सम्मासमाधिं भावेति रागविनयपरियोसान\nदोसविनयपरियोसानं मोहबिनयपरियोसानं। एवं खो, भिक्खवे, भिक्खु कल्याणमित्तो अरियं\nअट्ठड़िगिकं मग्गं भावेति, अरियं अट्ठड्लिगिकं मग्गं बहुलीकरोती''ति।\n\n५७-६ १. सीलसम्पदादिसुत्तपठचकं\n\n५७-६१. “'सूरियस्स , भिक्खवे, उदयतो एतं पुब्बड्गर्मं एतं पुब्बनिमित्तं, यदिदं --\nअरुणुग्गं; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खुनो अरियस्स अट्ठड्िगिकस्स मग्गस्स उप्पादाय एत॑\nपुब्बड-गमं एत॑ पुब्बनिमित्तं, यदिदं - सीलसम्पदा ...पे*... यदिदं -- छनन्‍्दसम्पदा ...पे*... यदिदं\nत्स्कृतच्छाया) \"६. सूर्वस्य, झिक्षबः! उदयाद्‌ एतत्‌ पूर्वडगमम्‌ एतत्‌ पूर्वनिभित्तम्‌, यदिदम्‌-\nअरुणोद्मनम्‌: एबमेव खलु, भिक्षवः , भिक्षोः आर्यस्य अष्टाडिगकस्य मार्गस्योत्पादाय एतत्‌ पूर्वड्गमम्‌\n'एतत्‌ पूर्बनिमित्तम्‌, यदियम्‌- कल्याणमित्रता। कल्याणमित्रस्यैतद्‌ भिक्षबः! भिक्षो: प्रतिकाड्स्‍््यम्‌ -\nआर्यम्‌ अष्टाड्िगिकं मार्ग भावयिष्यति आर्यम्‌ अष्टाहडिगकं मार्ग बहुलीकरिष्यति। क्थ च, भिक्षवः! भिक्षुः\nकल्याणमित्र: आर्यम्‌ अष्टाहिगक॑ मार्ग भावयति, आर्यम्‌ अष्टाह़गिक॑ मार्ग बहलीकरोति? इह, भिक्षवः!\nभिक्षु: सम्यस्दृष्टि भावयति रागविनयपर्यवसानां द्वेषविनयपर्यवसानां मोहविनयपर्यवसानां ....पे0...\nसम्यक्समाधिं 'भावयति रागविनयपर्यवसानं द्वेपविनयपर्यवसानं मोहविनयपर्यवसानम्‌। एवं खलु,\nझिक्षवः! भिक्षुः कल्याणमित्र: आर्यम्‌ अष्टाडिगक॑ मार्ग भावयति, आर्यम्‌ अष्टाडिगक॑ मार्ग\n\nबहलीकरोति''इति।\n\n! उदयाद्‌ एतत्‌ पूर्वडुगमस्‌ एतत्‌ पूर्वनिमित्तम्‌, यदिदम्‌- अरुणोद्सनम्‌:\nर् आर्यस्य अष्टाडिगकस्य मार्गस्योत्पादाय एतत्‌ पूर्वइुगमम्‌ एतत्‌\nपूर्वनिमित्तम्‌ यदियम्‌ - शीलसम्पद्‌ ...पे*... यदियम्‌- छल्दस्सम्पद्‌...पे०...यदियम्‌-\n\n(हिन्दी) ५६. श्ावस्ती में। भिक्षुओं। आकाश में ललाई का छा जाना सूर्योदय का पूर्व-लक्षण है। जिक्षुओं! वैसे ही,\n\nकल्याणमित्र वाला भिक्षु आर्य अष्टांगिक मार्ग का चिन्तन और अभ्यास करेगा।भिक्षुओं! कल्याणमित्र वाला भिक्षु\nकैसे आर्य अष्टांगिक मार्ग का चिन्तन और अभ्यास करता है? भिक्षुओं! भिक्षु राग, द्वेष और मोह को दूर करने वाली\nसम्यक्-दृष्टि का चिन्तन और अभ्यास करता है ...पूर्ववत्‌... राग, द्वेष और मोह को दूर करने वाली सम्यक्‌-समाधि\nका चिन्तन और अभ्यास करता है। जिक्षुओं! कल्याणमित्र वाला भिक्षु इसी प्रकार आर्य अष्टांगिक मार्ग का चिन्तन\nऔर अभ्यास करता है।\n\n५७-६१ .भिक्षुओं! आकाश में ललाई का छा जाना सूर्योदय का पूर्व-लक्षण है। भिक्षुओं! बैसे ही. भिक्षु का\nआर्य अष्टांगिक मार्ग के लाभ का पूर्व-लक्षण है। वैसे ही शील का आचरण ...पूर्वबत्‌... सत्कर्म में"} +{"id": "indic_deva_eval_000766_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000766_indic_vision_bench_deva_ocr_9e7cfea1dd5a.jpg", "ocr": "१८२ / आमची संस्कृती\nउद्देशून अशा त-हेने बोलण्याच��� कोणा मालकाची छाती नाही. शिक्षकाबद्दल मात्र कोणीही काहीही बोलले तरी चालते. पालकांपैकी कोणी गरीब म्हणून, कोणी पैसेवाले म्हणून, कोणी अधिकारी म्हणून, कोणी विधानसभेचे मेंबर म्हणून सारखे दडपण येते. पुरेसे मार्क मिळाले नाहीत तरी पास करा, टर्म भरली नाही तरी भरल्याचे सर्टिफिकेट द्या, पुरेसे मार्क नाहीत तरी सायन्सकडे घ्या, रेसिडेन्सीत जागा द्या, एक ना दोन- ह्या धमकीवजा प्रार्थना ऐकून ऐकून शेवटी असेच वाटते की, आयुष्यभर विद्यार्थिजीवन व कॉलेजजीवन ह्यांत अभ्यासाची, सदाचरणाची व विवेकाची एक विशिष्ट मर्यादा राखण्यासाठी केलेली खटपट व्यर्थ आहे. काहीकाही विद्यार्थी व आईबाप ह्यांच्या अमर्याद आकांक्षा व त्याचबरोबर नैतिक मूल्यांचा संपूर्ण अभाव ह्यांच्यातून वाट काढायची कशी?\n- १९५७"} +{"id": "indic_deva_eval_000767_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000767_indic_vision_bench_deva_ocr_1188b84d65a8.jpg", "ocr": "सूची\nविषय\nपृष्ठ\n(१) चौबीसवाँ प्रकारण--प्रयाग के भिखारी..१--१२\n(२) पचीसवाँ प्रकरण--मांस लक्षण ... १३--२१\n(३) छब्बीसवाँ प्रकरण--पौराणिक प्रयाग ... २१--३३\n(४) सत्ताईसवाँ प्रकरण--सतयुग का रामा ... ३४--४२\n(५) अट्ठाईसवाँ प्राकरण--कांतानाथ के घरेलू धंधे ४३--५१\n(६) उंतीसवाँ प्रकरण--घर की फूट ... ५२--६०\n(७)तीसवाँ प्रकरण...हिंदी और बलिदान...६१--६९\n(८)एकतीसवाँ प्रकरण--काशी की छटा...७०--८१\n(९) बत्तीसवाँ प्रकरण--देवदर्शन का आनंद ८२--९२\n(१०)तेंतीसवाँ प्रकरण--भक्ति रस की अमृतवृष्टि ९३--१०४\n(११)चौतींसवाँ प्रकरण--प्रियंवदा को पकड़\nले गए ... ... १०५--११५\n(१२)पैंतीसवाँ प्रकरण--प्रियंवदा का नसीरन...११६--१२१\n(१३)छत्तीसवाँ प्रकरण--प्रियंवदा का सतीत्व...१२२--१३०\n(१४) सैंतीसवाँ प्रकरण--घुरहू का प्रपंच ...१३१--१४१\n(१५) अड़तीसवाँ प्रकरण--भक्ति की प्रतिमूर्ति १४२--१५२\n(१६) उंतालीसवाँ प्रकरण--काशी की भलाई\nऔर बुराई ... ...१५३--१६१"} +{"id": "indic_deva_eval_000768_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000768_indic_vision_bench_deva_ocr_5f42ee96a67d.jpg", "ocr": "कोड स्वराज\nजिसका अर्थ है कि सरकार, जनता की है और वह उनकी सामूहिक इच्छा से काम करेगी। कोड स्वराज का अर्थ है, नियम की खुली किताब, जो लोगों के लिये होगी और जिसकी जानकारी सभी को होगी।\nएक खुले नियम पुस्तक के बिना आज का इंटरनेट बहुत ही अलग होता। हमारा मानना है। कि सभी अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रकचर) खुले और पारदर्शी नियमों पर आधारित हों, जो किसी को भी यह समझने की अनुमति दे कि सिस्टम कैसे ��ाम करता है और इसे हम कैसे बेहतर बना सकते हैं। इस तरह का सिद्धांत, लोकतंत्र का एक मूल सिद्धांत है। इसे ही हुम। ‘जानकारी को लोकतांत्रिक’ बनाना कहते हैं, जिसमें लोगों को इसकी जानकारी पाने में कहीं कोई बाधा न हो।\nहमारा मानना है कि समाज में सच्चे कोड स्वराज से हम और आगे बढ़ सकते हैं और हर इंसान के लिए, व्यापक पहुंच' (universal access) जैसे आकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त कर। सकते हैं। इंटरनेट ने हमें सिखाया है कि एक ओपन सिस्टम हमें, हमारे सपनों से भी आगे ले। जा सकता है। और इसी सबक को अब और अधिक व्यापक रूप से लागू किया जाना चाहिए।\nगांधी जीका स्वतंत्रता आंदोलन केवल भारत की स्वतंत्रता के लिये ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में स्वशासन, लोकतंत्र और राजनैतिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को स्थापित करने के बारे में था। गांधीजी और वे सभी लोग जो उनके अनुयायी थे, उनमें सभी के लिए समान अवसरों की सुलभता, सूचना का लोकतांत्रीकरण, ट्रस्टीशिप, और सामान्य अच्छाईयों के सिद्धांत, गहराई से अंतर्निहित थे।\nहम जिन तकनीकियों का उपयोग कर रहे हैं वे उन लोगों से प्रेरित हैं जिन्होंने हमसे पहले। काम किया है। हालांकि जो व्यक्तिगत जोखिम हुम उठाते हैं, वे उतने भी खतरनाक नहीं हैं, पर हमने निरंतर संघर्ष करने के सबक को अपने अंदर समा लिया है। सत्याग्रह के तरीकों और विधियों को, बड़ी और छोटी दोनों तरह की समस्याओं पर लागू किया जा सकता है, लेकिन जो मायने रखता है वह यह है कि हम सभी अपने लोकतंत्र को बेहतर बनाने का प्रयास करें। लोकतंत्र में सरकार हमारे लिए होती है, और जब तक हम सार्वजनिक कार्य में शामिल नहीं होते और जब तक हम खुद को, और हमारे शासकों को शिक्षित नहीं करते, तबतक हुम दुनिया के ट्रस्टीशिप में अपना आसन खो देंगे।\nहमने इस पुस्तक में बड़ी संख्या में तस्वीरें भी डाली हैं। यह पुस्तक एक मिश्रण है। इसका कारण यह है कि हम तस्वीरों से प्रेरणा लेते हैं। हमें कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी और सूचना मंत्रालय के अभिलेखागार (archive) में पुरानी तस्वीरों को देखना अच्छा लगता है। पहले से मौजूदा चीज़ों पर ही ज्ञान बढ़ता है और हमने इस पुस्तक को नेट (internet) पर उपलब्ध मौजूदा सामग्रियों पर बनाया है जो सभी के लिये उपलब्ध है।\nहम यह भी आशा करते हैं कि आप इन अद्भुत संसाधनों को देखने, और अपने स्वयं के काम में इन्हें इस्तेमाल करने के लिए सम��� निकालेंगे। ज्ञान पर सार्वभौमिक पहुंच मानव का\n2"} +{"id": "indic_deva_eval_000769_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000769_hindi_handwritten_word_ocr_dc5661a23113.jpg", "ocr": "सूचना"} +{"id": "indic_deva_eval_000770_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000770_indic_mozhi_deva_word_ocr_27a2b1ea3012.jpg", "ocr": "आम्ही"} +{"id": "indic_deva_eval_000771_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000771_hindi_handwritten_word_ocr_c381525aa8f3.jpg", "ocr": "जंकफूड"} +{"id": "indic_deva_eval_000772_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000772_devanagari_page_ocr_9c33d93fb0d8.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो 85\n\nपालि- ते च खीणासवा भिक्खू, सो च बुद्धो असादिसो।\nअतुलप्पभ्भ दस्सयित्वा, निब्बुता ये महायसा॥404॥\nतड्च जाणं अतुलियं, तानि च अतुलानि रतनानि।\nसब्बं तमनन्‍्तरहितं, ननु रित्ता सब्बसड्खारा॥402॥\nसुमनो यसधरो बुद्धो, अड्गारामम्हि निब्बुतो।\n'तत्थेव तस्स जिनथूपो, चतुयोजनमुग्गतोति॥403॥\nबन कक कक कक ककक कहे सुमनस्स भगवतों वंसो चतुत्थो।\nसंस्कृतच्छाया- . ते च क्षीणाख्रवाः भिक्षबः, स च बुद्ध असदृशः।\nअतुलप्रभां दर्शयित्वा, निर्वुता: ये महायशा:॥404॥\nतत्च ज्ञानम्‌ अतुल्यम्‌, तानि च अतुलानि रल्ानि।\nसर्व तमन्तहिंतम्‌, ननु रिक्ता: सर्वसंस्कारा:॥402॥\nसुमनो यशधरो बुद्धः, अड्गारामे निर्वुतः।\nतत्रैव तस्य जिनस्तूपः, चतुर्योजनसुद्गत इति॥403॥\nहिन्दी- वे क्षीणाश्रव भिक्षु तथा वे अनुपम सहायशस्वी बुद्ध- दोनों ही अपनी अतुलनीय\nपरिनिर्दृत हो गये॥404॥\nबह अतुलनीय ज्ञान तथा उस के प्रदाता अतुलनीय बुद्धरल- सभी एक दिन लुस हो गये, क्योंकि सभी\nसंस्कार, विनाशस्वभाव होने के कारण, एक दिन लुप्त हो ही जाते हैं॥402॥\n\nये यशस्वी सुमन बुद्ध अद्ृगाराम में परिनिर्वृत हये। उसी समय इन भगवान्‌ की स्मृति में बनाया गया\nस्तूप चार योजन ऊँचा था॥403॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000773_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000773_devanagari_page_ocr_ab04571afabd.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n333\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥4454॥\nइत्थं सुर्दं आयस्मा पाटलिपुप्फियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nपाटलिपुण्फियत्थेरस्सापदानं अद्ठमं।\n9. ठितञ्जलियत्थेरअपदानं\n“मिगलुद्दो पुरे आसिं, अरज्झे कानने अहं।\nतत्थ अद्दसं [तत्थद्सासिं (सी* स्या०)] सम्बुद्धं, बात्तिंसबरलक्खणं॥4455॥\n“तत्थाहं अड्जलिं कत्वा, पकक्‍कामिं पाचिनामुखो।\nअविदूरे निसिन्‍नस्स, नियके पण्णसन्थरे॥4456॥\n“ततो मे असनीपातो, मत्थके निपती तदा॥\nसोहं मरणकालम्हि, अकासिं पुनरञ्जलिं॥457॥\n\nप्रतिसंविदश्चवतस्त्र:...प्े*... कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥4454॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ पाट���िपुष्पिकस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nमृगलुव्ध: पुरा आसम्‌, अरण्ये कानने अहम\n\nतज्नाद्वाक्ष॑ सम्बुद्धम्‌, द्वात्रिंशद्धरलक्षणम्‌॥455॥\n\nतत्राहम्‌ अज्जलिं कृत्वा, प्राक्राम॑ प्राचिनासुख:।\nअविदूरे निषण्णस्य, नियके/नियते पर्णसंस्तरे ॥456॥\n\nततो मे अशनिषातः, मस्तके न्‍्यपतत्‌ तदा।\nसोऊह मरणकाले, अकार्ष पुनरछ्जलिम्‌॥457॥\n\nचार प्रतिसंविदों, आठ विमोक्षों और पडमिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥454॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ पाटलिपुष्पिक स्थविर ने ये गाथाएँ कहीं-\n\nपूर्व में मैं कानन बन में एक शिकारी था, वहाँ मैंने 32 श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त भगवान्‌ सम्बुद्ध को\nदेखा॥4550\n\nउन्हें अज्जलिवद्ध प्रणाम कर मैं बापस चला गया और पत्तों द्वारा स्वनिर्भित बिछौने पर बैठे हुए सुझ\nचर॥4456॥\n\nउसी समय मेरे मस्तक पर वज़पात हुआ और तब अपनी मृत्यु के समय मैंने उन्हें\nकिया॥457॥\n\nपुनः प्रणाम"} +{"id": "indic_deva_eval_000774_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000774_devanagari_digits_mixed_604e71d15fbc.jpg", "ocr": "३८1७6६4५397"} +{"id": "indic_deva_eval_000775_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000775_devanagari_page_ocr_c4cce0f795c4.jpg", "ocr": "धातुकथापाव्दि\n\n45\n\n१६७. कामावचरा धम्मा... परियापन्‍ना धम्मा... सउत्तरा धम्मा पज्चहि खन्‍्धेहि\nद्वादसहायतनेहि अद्वलारसहि धातूहि सड्गगहिता। कतिह्ि असड्गहिता? न केह्िचि खनन्‍्धेहि न केहिचि\nआयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्ग्गहिता।\n\n१६८. न कामाबचरा धम्मा... अपरियापन्‍ना धम्मा... अनुत्तरा धम्मा असड्ूखतं खन्‍्धतो\nठपेल्वा चतूहि खन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि द्वीहि धातूहि सडगहिता। कतिहि असडगहिता? एकेन खन्‍्धेन\nदसहायतनेह्ि सोव्ठसहि धातूहि असड्गहिता।\n\n१६९. रूपाबचरा धम्मा... अरूपाबचरा धम्मा... निः्यानिका धम्मा... नियता धम्मा.\nसरणा धम्मा चतूहि खन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि द्वीडि धातूृह्ठि सडःगछ्ठिता। कतिछ्ठि असड्गहिता? एकेन\nखन्‍्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि असड्ग्गहिता।\n\n१७०. न रूपावचरा धम्मा... न अरूपावचरा धम्मा... अनिय्यानिका धम्मा... अनियता\n\nत्सं.)- १६७. कामावचराः धर्मो:....पर्यापन्नाः धर्माः...... सोत्तराः धर्माः पदश्चभिः स्कन्‍थैः द्वादशायतनैः\nअष्टादशञ्रि: धातुझिः सड्ग्रहीता:। कतिभिः असड्ग्रहीताः? न कैश्वित्‌ स्कन्‍्धैः न कैश्चित्‌ आयतनैः न कैश्वित्‌\nधातुज्ि: असझ्ग्रहीता:।\n\n१६८. न कामाबचराः धर्माः....अपर्यापन्नाः धर्माः...... अनुत्तराः धर्माः असंस्कृत॑ स्कन्‍्धत: हित्वा\nअतुर्भि: स्कन्‍्धै: द्वास्याम, आयतनाभ्याम, द्वाभ्याम्‌ धातुभ्यां सडुग्रहीता:। कतिभिः असझुग्रहीता:? एकेन\nस्कन्धैन दशायतनैः घोडशभ्िः धातुजिः असड्ग््रहीताः।\n\n१६९. रूपावचराः धर्मा:.... अरूपावचराः धर्माः.... निर्याणिकाः धर्माः... नियताः धर्माः\nशरणाः धर्माः चतुर्भिः स्कन्‍धैः द्वाभ्याम्‌ आयतनाभ्याम्‌ द्वाभ्याम्‌, धातुभ्यां सड्ग्रहीताः। कतिभिः\nअसझग्रहीता:? एकेन स्कन्थेन दशायतनैः पोडशम्ि: धातुभिः असझग्रहीता:।\n\n१७०. न रूपावचराः धर्मा:... न अरूपाबचरा:ः धर्माः... अनिर्याणिका: धर्माः... अनियताः\nतहन्कक़ः ह ६5. जा बन काम्रावचर (जिन धर्मों का सम्बन्ध कामनाओं के लोक से है) है वे धर्म.... पर्यापन्न (जो धर्म\nआवागमन के चक्र में निहित हैं) धर्म.... सउत्तर (जिन से आगे बढ़कर भी कुछ धर्म हैं) धर्म पाँच स्कन्धों में, बारह\nआयततनों में और अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? न किन्हीं स्कनन्‍्धों, न किन्‍्हीं आयतनों और न\nकिन्हीं भी धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n१६८, जो धर्म कामाबचर नहीं हैं .... अपर्यापन्न धर्म हैं .... अनुत्तर धर्म हैं वे असंस्कृत निर्वाण को स्कन्‍्ध के\nरूप में छोड़कर चार स्कन्धों में, दो आयतनों में और दो धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? एक स्कन्ध में,\nदस आयतनों में और सोलह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n१६९. जो धर्म रूपावचर है वे धर्म.... अरूपाबचर धर्म... निर्याणिक (जो धर्म निर्वाण की प्राप्ति कराने वाले\nहैं)धर्म.... नियत (जिन धर्मों के परिणाम सुनिश्चित हैं) धर्म.... एवं सरण (जो धर्म दुःखदायी पाप- कर्मों से युक्त हैं) धर्म\nचार स्कन्‍्धों में, बारह आयतनों में और दो धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? एक स्कन्‍्ध में, दस आयतनों\nऔर न सोलह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n१७०, न रूपाबचर धर्म.... न अरूपावचर धर्म.... अनिर्यानिक धर्म.\n\nअनियत"} +{"id": "indic_deva_eval_000776_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000776_devanagari_digits_mixed_2388092ca932.jpg", "ocr": "३24५८०५२०6"} +{"id": "indic_deva_eval_000777_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000777_devanagari_page_ocr_9419167c88f2.jpg", "ocr": "मिलिन्दपज्हो 53\n\n““पटिकच्चेब त॑ कयिरा, यं जज्ञा हितमत्तनो।\n\nन साकटिकचिन्ताय, मन्‍्ताधीरो परक्‍्कमे॥\n\n“यथा साकटिको मट्ठ॑ सम हित्वा महाप्थ।\n\nविसम॑ मग्गमारुय्ह, अक्खच्छिन्नो व झायति॥\n\n“एवं धम्मा अपक्कम्म, अधम्ममनुवत्तिय।\n\nमनन्‍्दो मच्चु मुख पत्तो, अक्खच्छिननो व झायती\"”ति॥7\n\n“कल्लोसि, भन्‍्ते नागसेना\"ति।\n\n4. नेरयिको अग्गि2\n\nराजा आह- “भन्ते नागसेन, तुम्हे भणथ- “पाकतिकअग्गितो नेरयिको अग्गि\nमहाभितापतरो होति।\nसंस्कृतच्छाया- _ \"प्रतिगत्यैव तत्कुर्याद्‌ यज्जानीयाद छहितमात्मन:\n\nन शाकटिकचिन्तायां मन्‍्ताउधीर: पराक्रमे ।।\n\"यथा शाकटिकों मृष्टा सम॑ हित्वा महापथम्‌।\nविषम सार्गमारह्याक्षच्छिन्न इव ध्यायति ॥|\n\"एवं धर्मानपक्रम्याधर्ममनुवृत्य (च) ।\nअन्‍्दो मृत्युसुखं प्राप्तोउक्षच्छिन्न इब ध्यायती' \"ति ॥।\n\"कल्योडसि, भदन्‍्त नागसेने\"ति।\n4. नैरयिकोउग्िः\nराजा55ह- \"भदन्‍्त नागसेन, यूयं भणथ- 'प्राकृतिकाग्नितो नैरयिकोउग्रिर्महाभिता-\n\n'पतरो भवति।\nहिन्दी- “समय आ जाने पर बुद्धिमानों को वही काम करना चाहिए जिनमें अपना हित समझें। उन मूर्ख\nगाड़ीवानों की तरह न होकर, दृढ़ता के साथ अपने काम में डटे रहना चाहिए।\"\n\n“जिस तरह वह गाड़ीवान बड़ी और बराबर सड़क को छोड़ ऊभड़-खाभड़ रास्ते में पड़ गाड़ी के अक्ष के\nटूट जाने से विपत्ति में पड़ जाता है। इसी तरह धर्म को छोड़ अधर्म में पड़ मूर्ख लोग मृत्यु के मुख में आकर\nहतोत्साह होकर शोक करते हैं।\n\n“अन्ते! बहुत ठीक”\n4. नरकाझि\nराजा बोला- “भन्‍्ते! आप लोग कहते हैं- स्वाभाविक आग से नरक की आग कहीं अधिक तेज हैं.\n\n+ संबुत्तनिकायपालि, सगाथवस्गो, पू.-97-98\nनेरयिकस्गिउण्हभावपज्हों, मिलिन्दपज्हपालि, पृ.-85"} +{"id": "indic_deva_eval_000778_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000778_indic_mozhi_deva_word_ocr_dabf23009bef.jpg", "ocr": "नये"} +{"id": "indic_deva_eval_000779_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000779_devanagari_page_ocr_acd77a140bc9.jpg", "ocr": "थूपवंसो 33\n\nप्रथमतर: आगम्य कायबन्धनं बाधित्वा चीवर प्राप्॒ते, दृष्ट्वा अतीब प्रसन्लमानसः भूत्वा आगम्य राज्ः\nआरोचयत, आगता देव-स्थविरा” इति। राजा, रथम्‌, आरूढा” इति अपुच्छत्‌। ना आरूढ़ा देव, अपि\nचापृष्ठतो निष्क्रम्य प्रथमतरं आगम्य प्राचीनद्वारे स्थिता” इति। राजा, रथं न आरूढा” इति श्रुत्वा, तेन हि\nअणे भूम्यास्तरणसंक्षेपण आसनानि/ प्राज्ञापयत” इति उक्त्वा प्रतिपथम्‌ अगमत। आमात्य प्रथ्वीतले\nतट्टिकां प्राज्ञाप्य उपरि कौशेयआदीनि बिचित्रास्तरणानि प्राज़ापयन्‌ राजा अपि गत्वा स्थबिरान्‌\nबन्दित्वा महेन्‍्द्रस्थविरस्थ हस्ततः पात्र गृहीत्वा महत्या पूजया च सत्कारेण च स्थविरान्‌ नगरे प्रविश्य\nअन्तोनिवेशन प्राविशत���‌।\n\nउसके बाद रात्रि बीतने पर, राजा ने स्थविरों के लिए रथ भेजा। स्थविरों ने कहा, हम रथ में सवार नहीं होंगे,\nआय जाचे, हम बाद में आएंगें, कहकर, आकाश में ऊपर जाकर, अनुराधपुर के पश्चिम दिशा के प्रथम चैत्य स्थान में\nडतरे। राजा ने भी सारथी को भेजकर मंडप के भीतर प्रवेश कर व्यवस्था के विषय में सोचा कि- वास्तव में आया\nआसन में बैठना चाहिए या नहीं बैठना चाहिए? जबकि वे सोच ही रहे थे कि सारथी ने नगर द्वार पर पहुँच\nकर देखा कि सबसे पहले स्थविर आ रहे हैं जो कमर पर पट्टी बाँधकर और काषाय वस्त्र को ओढ़े हुए है, उन्हें\nदेखकर अतिप्रसन्न मन होकर राजा को आकर सूचना दी, महाराज! स्थविर आ रहे हैं। राजा ने पूछा- क्या वे रथ\nबोले नहीं, महाराज! वे सवार होकर नहीं आये, बल्कि इसके अलावा वे पीछे से\nनिकलकर सबसे पहले पश्चिम द्वार पर आ गए हैं। राजा यह सुनकर कि वे रथ से चढ़कर नहीं आये हैं, तो मेरे\nआदमियों ने आसनों को व्यवस्थित कर फर्श पर ढंग से कालीनों को बिछाकर तैयार करो, कहकर, उनके आगे\n(स्थविर के) नमस्कार के लिए चले गये। आमात्य प्रथम मंजिल पर छोटी चटाई फैलाकर और इसके ऊपर कई रंगों\nकी रोवेदार चादरे फैला कर रखी। राजा ने भी जाकर स्थविरों को बन्दना कर, महिन्द स्थविर के हाथ से पात्र को\nग्रहण कर स्थविर की आदर, पूजा और सत्कार के साथ उन्हें नगर में प्रवेश कराकर, अन्त:निवास में प्रवेश किया।\n\nनह ट0, अष्छा घवए ताहपाए १96 99552; घी ।द08 5७०६ 9 ८१३०६ ७ फोह हठछ3- 6 हातला5 53908, \"४४९ जता\n०6 9०87७ 8 0१800 १0 ॥7 80, ५५४ ७ज॥ 00008 ।हएछ/ 70560 फ2 अंत गाव पद्व॑लातल्प 90 पी अप्ट ० एी७\n#०फगाग(कलटए/० ० एो हवन ता 20८0०0#०02८7०. 76 ता ६००, जष्छा ॥8 ॥36 0859300060 पीह ८0०2७,\n86 9 93७॥00 27269 जलती ७१७ 93/926 304 72॥2८0०० १७७॥/ ॥06०००,; ० ५७१७३७७७ 0026 अध्व छ€\n3630७ 07 7०02. ५७४8 ॥6 ७०३६ च७४ 7टवीट८ता 8 छी8 लतथत०0०७/ (७3203 छी8 त0/8१०७ ३04 5907 0७ हिलेढ ७ ४४०\n090 बतए७० ७७०76 #ात 09976 पी९त52९७ जा छी8 0008 7008, #3७०8 97०१०, ९७ ०0 फल छए-\n#5 #९क०र 20४ 0७27८०/ा8 पनपी 7००७८ 0907 बढात 8 धी2०, ॥8 ८406 0300 374 7डए20/धटव १० घोल\nआए, शा 8 हि 078 37८ ८006. पल ॥त& १४4“ 0॥4 006/ 00%/8 घी दकडत ०६२ लि एलआलव, गव० आप, पलफ\n6 0०0 9०१748 १९६ छी७)/ 5०६ 0०५ बहा त6 300 376 १६ ९ 8१४५७) 890७ ॥वजा०8 बततए<त एटा 08.76\nहर, ७9०0 #8कता 8 पे. ०९ पी 06 ॥00 00370 (06 (030०6 07427०, ॥/ ३४ ७७ 50, 7४ ए/60, 27076 ३०३७७\n॥त ली तरल ला हि040सकडस5 आफ भा काशहलती लग। जम्पाई छिपा ऐ0 डाक धला गले गा तिशिल्तक कि र\nडक 0७९ 9 0036 00 08 ॥007 ह0त एड 806 0070 7०३०५ ००/०0/७० 507९० 0 हल ००एएएढ/7० हक 3\n30979: वा (06 ६००; परत ७छ 30 5१0९७ घी७ हा 909 0७वा8 पी8 000॥ #०0 एम ह30/ (50095\n309, ॥6 ९००१७८६९० 8 हवा ६० घी लए जल हा2अ९ ॥00006 300 तताताडतबघ0 304 28 छाछात ६० किड\n859८2.\n\nसन पर 7रतपआा॥ पडता शावबा/ लक ब्वाज(0क नआास्वफडउड बउतल्‍त :ंगवाकड\nएगींट3 एकांडबॉडत। पीाशठ0970 व॥५50970ग पविडडदद्वाउतेंट3 (07:00. 93॥00055720५8 ९((एआपगा\nमांञता, पराक० ॥ॉत0 59987]99559 00ा7/3(309/3559] ५3550700 9&(3५३(४७॥7-/#7ठ/3५/300१७॥-\nइत८वडगए पलट लय टथ, बठग) 30008 ध्वतार 2 टड पा व्जेाओ बा 04 ल बब०-वगत 5\n\nराजा थ्ेर पणीतेन खादनीयेन भोजनीयेन सहत्था सन्तप्पेत्वा अनुलादेवीपसुखा पश्च\nइत्थिसतानि थेरान॑ अभिवादनं पूजासक्रारश्व च करोन्‍्तू“ति पक्कोसापेत्वा एक अन्त॑ निसीदि।"} +{"id": "indic_deva_eval_000780_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000780_indic_vision_bench_deva_ocr_da30956a35cd.jpg", "ocr": "22 : प्रेमचंद रचनावली - 6\nदेनी पड़े। अपने मतलब के लिए सलामी करने जाता हूँ, पाँव में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है। घंटों खड़े रहो, तब जाके मालिक को ख़बर होती है। कभी बाहर निकलते हैं, कभी कहला देते हैं कि फ़ुरसत नहीं है।\n⁠\nगोबर ने कटाक्ष किया -- बड़े आदमियों की हाँ-में-हाँ मिलाने में कुछ-न-कुछ आनन्द तो मिलता ही है। नहीं लोग मेम्बरी के लिए क्यों खड़े हों?\n⁠\n'जब सिर पर पड़ेगी तब मालूम होगा बेटा, अभी जो चाहे कह लो। पहले मैं भी यही सब बातें सोचा करता था; पर अब मालूम हुआ कि हमारी गरदन दूसरों के पैरों के नीचे दबी हुई है अकड़ कर निबाह नहीं हो सकता।'\n⁠\nपिता पर अपना क्तोध उतारकर गोबर कुछ शान्त हो गया और चुपचाप चलने लगा। सोना ने देखा, रूपा बाप की गोद में चढ़ी बैठी है तो ईर्ष्या हुई। उसे डाँटकर बोली -- अब गोद से उतरकर पाँव-पाँव क्यों नहीं चलती, क्या पाँव टूट गये हैं?\n⁠\nरूपा ने बाप की गरदन में हाथ डालकर ढिठाई से कहा -- न उतरेंगे जाओ। काका, बहन हमको रोज़ चिढ़ाती है कि तू रूपा है, मैं सोना हूँ। मेरा नाम कुछ और रख दो।\n⁠\nहोरी ने सोना को बनावटी रोष से देखकर कहा -- तू इसे क्यों चिढ़ाती है सोनिया? सोना तो देखने को है। निबाह तो रूपा से होता है। रूपा न हो, तो रुपए कहाँ से बनें, बता।\n⁠\nसोना ने अपने पक्ष का समर्थन किया -- सोना न हो मोहन कैसे बने, नथुनियाँ कहाँ से आयें, कंठा कैसे बने?\n⁠\nगोबर भी इस विनोदमय विवाद में शरीक हो गया। रूपा से बोला -- तू कह दे कि सोना तो सूखी पत्ती की तरह पीला है, रूपा तो उजला होता है जैसे सूरज।\n⁠\nसोना बोली -- शादी-ब्याह में पीली साड़ी पहनी जाती है, उजली साड़ी कोई नहीं पहनता।\n⁠\nरूपा इस दलील से परास्त हो गयी। गोबर और होरी की कोई दलील इसके सामने न ठहर सकी। उसने क्षुब्ध आँखों से होरी को देखा।\n⁠\nहोरी को एक नयी युक्ति सूझ गयी। बोला -- सोना बड़े आदमियों के लिए है। हम ग़रीबों के लिए तो रूपा ही है। जैसे जौ को राजा कहते हैं, गेहूँ को चमार; इसलिए न कि गेहूँ बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं।\n⁠\nसोना के पास इस सबल युक्ति का कोई जवाब न था। परास्त होकर बोली -- तुम सब जने एक ओर हो गये, नहीं रुपिया को रुलाकर छोड़ती।\n⁠\nरूपा ने उँगली मटकाकर कहा -- ए राम, सोना चमार -- ए राम, सोना चमार।\n⁠\nइस विजय का उसे इतना आनन्द हुआ कि बाप की गोद में रह न सकी। ज़मीन पर कूद पड़ी और उछल-उछलकर यही रट लगाने लगी -- रूपा राजा, सोना चमार -- रूपा राजा, सोना चमार!\n⁠\nये लोग घर पहुँचे तो धनिया द्वार पर खड़ी इनकी बाट जोह रही थी। रुष्ट होकर बोली -- आज इतनी देर क्यों की गोबर? काम के पीछे कोई परान थोड़े ही दे देता है।\n⁠\nफिर पति से गर्म होकर कहा -- तुम भी वहाँ से कमाई करके लौटे तो खेत में पहुँच गये। खेत कहीं भागा जाता था!\n⁠\nद्वार पर कुआँ था। होरी और गोबर ने एक-एक कलसा पानी सिर पर उँड़ेला, रूपा को नहलाया और भोजन करने गये। जौ की रोटियाँ थीं; पर गेहूँ-जैसी सुफ़ेद और चिकनी। अरहर"} +{"id": "indic_deva_eval_000781_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000781_devanagari_page_ocr_47f20d3ebdc7.jpg", "ocr": "288 धम्मसज्भणि\n\nभावेति ...पे*... लोकुत्तरं चित्त भावेति निय्यानिकं अपचयगामिं दिद्लिगतानं पहानाय पठमाय\nभूमिया पत्तिया विविच्वेव कामेहि विविज्च अकुसलेहि धम्मेहि सवितक्क सविचारं विवेक\nपीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति दुकक्‍्खपटिपदं दन्धाभिज्ञं छन्दाधिपतेय्यं, तस्मि\nसमये फस्सो होति ...पे*... अविक्खेपो होति; ये वा पन तस्मिं समये अज्ञेपि अत्थि\nपटिज्वसमुप्पन्ता अरूपिनो धम्मा- इसमे धम्मा कुसला। तस्सेव लोकुत्तरस्स कुसलस्स झानस्स\nकतत्ता भावितत्ता विपाकं विविच्चेव कामेहि विविचज्च अकुसलेहि धम्मेह्ि सवितक्क सविचारं\nविवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति दुक्खपटिपदं दन्धाभिज्ञ सुछ्ञतं ...पे*...\nअनिमित्त॑ ...पे* अप्पणिहितं॑ छन्‍न्दाधिपतेय्यं ...पे*... वीरियाधिपतेय्य॑ ...पे*\nचित्ताधिपतेय्यं ...पे*... वीमंसाधिपतेय्यं, तस्मिं समये फस्सो होति ...पे*... अविक्खेपो होति;\nये वा पन तस्मिं समये अज्ञेपि अत्थि पटिघज्वसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा- इमे धम्मा अब्याकता।\n\nपठममग्गविपाको।\nल्स्कृतच्छाबा) जावे ...पे*... लोकोत्तरं चित्त भावयति नै्याणिकम्‌ अपचयगामिनं दृष्टिगतानां\nप्रहाणाय प्रथमाया: भूम्या: प्रस्थै विविच्यैव कामेभ्यो विविच्य अकुशलेभ्यो धर्मेभ्य: सबितर्क सबिचारं\nविवेक प्रीतिसुख॑ प्रथम ध्यानमुपसम्पद्य विहरति दुःखप्रतिपदं तन्द्राभिज्ञं छन्‍्दाधिपत्यम्‌, तस्मिन्‌ समये\nस्पर्शों भवति...पे*... अविक्षेपो भवति; ये वा पुन: तस्मिन्‌ समये अन्येडपि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना\nअरूपिणों धर्मा: - इसे धर्मा: कुशला:। तस्यैव लोकोत्तरस्य कुशलस्य ध्यानस्य कृतत्वात्‌ भावितत्वात्‌\nविपाकं विविच्यैव कामेभ्यो विविच्य अकुशलेभ्यो धर्मेभ्य: सबितर्क सविचारं विबेकर्ं प्रीतिसुखं प्रथमं\nध्यानस्‌ उपसम्पद्य विहरति दुःखप्रतिपद तन्द्राभिज शून्यतास्‌ ...पे*... अनिमित्तम्‌ ...पे*... अप्रणिहित॑\nछन्‍्दाधिपत्यम्‌ ...पे*... वीर्याधिपत्यम्‌ ...पे*... चित्ताधिपत्यम्‌ » वीमंसाधिपत्यम्‌, तस्मिन्‌\nसमये स्पर्शों भवति. ..पे*... अविक्षेपो भवति; ये वा पुन: तस्मिन्‌ समये अन्येडपि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना\nअरूपिणों धर्मा: - इसे धर्मा: अव्याकृता:।\n\nप्रथममार्मविपाक:।\nभावना नव सैर्याणिक एवं अपचयगामी लोकोत्तर ध्यान की मिथ्यादृष्टियों के प्रहाण\nहेतु तथा प्रथम भूमि की प्रासि हैतु भावना करता है, काम-भोगों की वासना का त्यागकर, पापमय अकुशल धर्मो\n\nका प्रहाण कर, अब बरिचार सहित और चिचक से जनित, प्रीति एवं सुख से यक्त, दःखप्रतिषद लन्द्रालिजा\nछल्द की प्रधानता के साथ प्रथम ध्यान को प्रासकर विहार करता है, उस समय स्पर्श होता है ...पूर्ववत्‌.\n\nअविक्षेप होता है; अथवा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यसमुत्पत्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म कुशल हैं। उस लोकोत्तर\nकुशल ध्यान के किये होने से, भावित होने से विपाक, काम-भोगों की वासना का त्यागकर, पापमय अकुशल धर्मों\nका प्रह्माण कर, वितर्क एवं विचार सहित और विवेक से जनित प्रीति हक से युक्त, दुःखप्रतिपद तन्द्राभिज्ञा\nशून्यता के साथ प्रथम ध्यान को प्रासकर बिहार करता है ...पूर्ववत्‌.... आ पूर्वबत्‌..\" अप्रणिह्ित छन्‍्द की\nप्रधानता ...पूर्ववत्‌... वीर्य की प्रधानता ...पूर्ववत्‌... चित्त की प्रधानता ...पूर्ववत्‌... वीमांसा की प्रधानता, उस\nसमय स्पर्श होता है ...पूर्ववत्‌... अविक्षेप होता है; अथवा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं-\nथे धर्म अब्याकृता हैं।\n\n��्रथम सार्गफल समास।"} +{"id": "indic_deva_eval_000782_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000782_devanagari_page_ocr_bc1888c035ca.jpg", "ocr": "पञ्चमो परिच्छेदो\n\n50\n\nसोरियानं खत्तियानं, वंसजातं सिरिधरं।\n\nचअनन्‍्दगुत्तो ति पछठ्ञातं, चाणक्को ब्राह्मणों ततो॥46॥\n\nनवमं धननन्दं तं, घातेत्वा चण्डकोधसा।\n\nसकले जम्बुदीपस्मि, रज्जे समभिसिडिच सो॥ 4 7॥\n\nसो चतुवीस वस्सानि, राजा रज्जमकारयि।\n\nतस्स पुत्तों बिन्दुसारो, अटद्टवीसति कारयि॥48॥\n\nबिन्दुसारसुता आसुं, सतं एको च विस्सुता।\n\nअसोको आसि तेसं तु, पुज्जतेजोबलिद्धिको॥ 9॥\n\nबेसमातिके भातरो सो, हन्त्वा एकूनकं सतं।\n\nसकले जम्बुदीपस्मं, एकरज्जमपापुणि॥20॥\n\nसंस्कृतच्छाया- . मौर्याणां क्षत्रियाणां वंशजातं श्रीधरम्‌।\nअन्द्रगुसोति प्रज्ञातं, चाणक्यो ब्राह्मण: ततः।46।।\nनवमं धनननदं तं, घातयित्वा चण्डक्रोधवान्‌।\nसकले जस्बुद्वीपे, राज्ये समभ्यसिंचत्‌ सः।॥47॥\nसः चतुर्विशतिवर्षाणि, राजा राज्यमकरोत्‌।\n'तस्य पुत्रो बिन्दुसारः, अष्टाविंशति अकरोत्‌।48॥॥\nबिन्दुसारसुता आसन्‌, शतमेकश्व विश्वुता।\nअशोक आसीतू तेषां तु, पुण्यतेजोबलर्द्धिक:।।49॥।\nविमातृकान्‌ भ्रातृन्‌ सः, हत्वा एकन्यूनकं शतम्‌।\nसकले जम्बुद्दीपे, एकराज्यं प्राप्नोत्‌।।20॥\n\nहिन्दी-फिर मौर्य वंश के क्षत्रियों में मूर्धन्य श्रीमान्‌ चन्द्रगुस राजा हुए, जिन्हें महाक्रोधी चाणक्य ब्राह्मण ने।46॥॥\n\nनवें धननन्द राजा को मरवाकर सकल जम्बुद्दीप का सम्राट्‌ बनाया।।47\n\nउसने चौबीस वर्ष राज्य किया तथा उसके पुत्र बिन्दुसार ने अट्टाईस वर्ष राज्य किया।।8॥।\nबिन्दुसार के एक सौ एक पुत्र हुए। उनमें सबसे अधिक पुण्यवान्‌ बलशाली, तेजस्वी तथा ऋद्धिसम्पन्न अशोक\n\nथे।।49॥4\nउन्होंने अपने निन्‍यानवे सौतेले भाइयों को मारकर समग्र जम्बुद्धीप पर एकच्छत्र राज्य किया।।20॥।"} +{"id": "indic_deva_eval_000783_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000783_indic_vision_bench_deva_ocr_7dee492b37d9.jpg", "ocr": "૪२\nबेचैन बना देनेवाली बात\n⁠\nमुक्तिका अर्थ यही है कि आदमी हर तरहसे अच्छा रहे। फिर आप अच्छे क्यों न रहे? अगर अच्छे रहेंगे, तो दूसरोको अच्छा रहनेका रास्ता दिखा सकेंगे, और अिससे भी बढकर अच्छे होनेके कारण आप दूसरोंकी सेवा कर सकेंगे। लेकिन अगर आप अच्छे होनेके लिअे पेनिसिलिन लेते है, हालाकि आप जानते है कि दूसरोंको वह नही मिल सकती, तो जरूर आप सरासर खुदगरज बनते है।\nमुझे पत्र लिखनेवाले अिन दोस्तकी दलीलम���ं जो गड़बडी है वह साफ है।\nहा, यह ज़रूर है कि कुनैनकी गोली या गोलिया खा लेना रामनामके अुपयोगके ज्ञानको पानेसे ज्यादा आसान है। कुनैनकी गोलिया खरीदनेकी कीमतसे अिसमें कही ज्यादा मेहनत पड़ती है। लेकिन यह मेहनत अुन करोडों के लिअे अुठानी चाहिए, जिनके नाम पर और जिनके लिए लेखक रामनामको अपने हृदय से बाहर रखा चाहते है।\nहरिजनसेवक, १-९-१९४६\n३५\nबेचैन बना देनेवाली बात\nजब कुछ महीनोकी गैरहाजिरीके बाद गाधीजी सेवाग्राम-आश्रममे लौटे, तो देखा कि आश्रमके एक सेवक की दिमागी हालत खराब हो गअी है। जब वे पहली बार आश्रम मे आये थे, तब भी अुनकी हालत ऐसीही थी। यह पागलपनका दूसरा हमला था। उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि उन्हे संभालना मुश्किल हो गया, इसलिए उनके बारे मे फौरन ही कुछ फैसला कर लेने की ज़रूरत पैदा हो गई। इसलिए वधकेि सरकारी अस्पताल के बडे डॉक्टर की यानी सिविल सर्जन की सलाह पूछी गई। उन्होने कहा कि वे वर्धाके सरकारी सिविल अस्पताल में तो बीमार को रख नही सकेंगे, लेकिन अगर उन्हें जेल के अस्पताल में रखा जाय, तो वे उनकी सार-संभाल कर सकेंगे और थोडा-बहुत इलाज भी करेंगे। इसलिए बीमार की और आश्रम की भलाई के खयाल से उनको जेल भेजना पडा। गांधीजी के लिए यह चीज़ बहुत ही दुखदायी हो गअी। अिसने अुन्हे"} +{"id": "indic_deva_eval_000784_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000784_devanagari_page_ocr_147756e0d9ab.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n309\n\nअज्ञेने। “बुत्त खो पनेत॑ भगवता, धम्मदायादा मे भिक्‍्खबे भवथ, मा आमिसदायादा\"तिआदीसु\nकथने। अत्रिदं बुच्चति -\nबप वतु बच्छुवच-धातूनं वसतो मतो।\nसोपसग्गो नोपसग्गो, बुत्तसद्दों यथारहं॥\nजपने चर बरापसमी-करणे सुण्डताय चा।\nजीबबुत्य॑ पमुत्तत्थे, बसा पावचनस्स तु।\nपवत्तिते च अज्झेने, कथने चाति लक्खये।\n'तच्छ तनुकरणे। तच्छति। तच्छको दारूं\nछकारन्तधातुरूपानि।\nजकारन्तधातु\nजिजये। जेति। जयति, पराजयति। धम्मं॑ चरन्तो सामिकं पराजेति। धम्म॑ चरन्तो\nपरज्जति। राजानं जयापेसुं। जयापेत्वा। एत्थ जयापेसुन्ति “जयतु भव\"न्ति आसीसवबचनं\nबदिंसूति अत्थो। जयनं, जितं, जयो, विजितं, जिनो, जेता, जेतो, जितो मारो, मारं जितो,\nजितवा, जितावी, विजितावी, मारजि, लोकजि, ओधिजिनो, अनोधिजिनो, जितो। विजितो,\nजेतुं, विजेतुं, जित्वा, विजित्वा। इमस्स पन धातुस्स कियादिगणं पत्तस्स “जिनाति\nजिनित्वा”त्यादीनि रूपानि भवन्ति।\nजि अभिभवने। जेति। जिनो। पुब्बे विय रूपानि। एत्थ च “तुम्हेहि आनन्द सप्पुरिसेहि\nविजितं, पच्छिमा जनतासालिमंसोदनं अतिमडिजिस्सती”ति पाछ्ठि अभिभवनत्थसाधका। एत्थ\nहि विजितन्ति अधिभूतन्ति अत्थो।\nजु गतियं। एत्थ सीघगति अधिप्पेता। जबति। जबनं, जवो, जबं, जबन्तो, जबनचित्तं,\nजवनपज्जो, जवनहंसो। मनोजवं गच्छति येनकामं।\nजेखये। जीयति। एकारस्स ईयादेसो। सासनानुरूपेन “किं मं धनेन जीयेथा”ति हि पाव्ठि\nदिस्सति। सद्दसत्थविद्‌ पन “जायती\"ति रूप॑ वदन्ति।\nसज्ज गतियं। सज्जति।\nकुजु खुजु थेय्यकरणे। कोजति। खोजति।\nबज गतियं। धज धजि च। वजति। अब्बजति। मनुस्सत्तज्व अब्बजे। बजो, वजनं, पवजनं,\nपब्बज्जा, पब्बजितो, पब्बाजितो।"} +{"id": "indic_deva_eval_000785_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000785_indic_mozhi_deva_word_ocr_fe99209a69e7.jpg", "ocr": "होने"} +{"id": "indic_deva_eval_000786_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000786_devanagari_page_ocr_9afff4742fa5.jpg", "ocr": "॥8 अपदानपालि\n\nइत्थं सुदं भगवा अत्तनो बुद्धचरियं सम्भावयमानो बुद्धापदानियं [बुद्धचरियं (सी*)\nबुद्धचरितं (स्या*)] नाम धम्मपरियायं अभासित्थाति।\nबुद्धापदानं समत्तं।\n\n2. पच्चेकबुद्धअपदानं\nअथ पच्चेकबुद्धापदानं सुणाथ -\n“तथागतं जेतवने वसन्तं, अपुच्छि वेदेहमुनी नतड्गो।\n“पज्चेकबुद्धा किर नाम होन्ति, भवन्ति ते हेतुभि केहि बीर' [धीर (सी०) धीरा (स्या\")] ॥83॥\n“तदाह सब्बज्जुवरो महेसी, आनन्दभद्द मधुरस्सरेन।\n“ये पुब्बबुद्धेस [सब्बबुद्धेस (स्था\" क*)] कताधिकारा, अलद्धमोक्खा जिनसासनेसु॥84॥\n\nइत्थं स्विद्‌ भगवान्‌\nअभाषिष्टेति।\n\nआत्मनो बुद्धचर्या सम्भाव्यमान: बुद्धापदान॑ नाम धर्मपर्यायम्‌\n\nअथ प्रत्येकबुद्धापदानं श्रुणुत-\nतथागत॑ जेतबने वसन्तम्‌, अपुच्छद्‌ वैदेहमुनिर्नताइग:।\n'प्रत्येकबुद्धा: किल नाम भवन्ति, भवन्ति ते हेतुभिः कैबीर'॥83॥\n\nतदा55ह सर्वजबरो महर्षि:,\n\nआनन्दभद्रं सधुरस्वरेण।\n“ये पूर्वबुद्धेपु कृताधिकारा:, आलब्धमोक्षा: जिनशासनेघु॥84॥\n\nइस प्रकार भगवान्‌ ने संस्मरणपूर्वक अपने बुद्धापदानिय नामक धर्मपर्याय का भाषण किया।\nअब प्रत्येकबुद्धापदान को सुनें-\n\nविनम्र होकर विदेहसुनि ने जेतवन में रहने वाले तथागत से पूछा- है बीर! ये जो प्रत्येक बुद्ध\nहोते हैं वे किन कारणों से होते हैं ॥83॥\n\nतब सर्वज्ञों में श्रेष्ठ महर्षि ने आनन्दभद्र को मधुरस्वर में कहा जिन्होंने पूर्व बुद्धों पर अधिकार\nप्रास कर लिया है और जिनशासन में मोक्ष प्रास कर लिया है-॥84॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000787_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000787_indic_mozhi_deva_word_ocr_17a2429ff1a0.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_000788_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000788_indic_vision_bench_deva_ocr_54002abd30a1.jpg", "ocr": "सिव्हिल सर्जनवर सोडून मोकळं होऊ शकणार नाही. काही खटले आपल्याला अखेरपर्यंत लढवावे लागतील. सर्वांत महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे, या विषयावर सर्वात आधी न्यायाधीशांच्या कार्यशाळा घ्यायला हव्यात. आव्हानं बहुपदरी होती. धावपळ होणार होती; पण थांबून चालणार नव्हतं. दरम्यान, त्याच काळात यासंदर्भातील केंद्रीय देखरेख समितीवर माझी निवड झाली. अर्थातच राज्याच्या सल्लागार समितीतही स्थान मिळालं आणि बैठकांमधून वादळी चर्चा होऊ लागल्या. अखेर युनायटेड नेशन्स पॉप्युलेशन फंडच्या (यूएनएफपीए) सहकार्यानं तब्बल दीड वर्ष आम्ही न्यायाधीशांच्या कार्यशाळा राबवल्या. या काळात एकाही शनिवारी मी घरी नसायचे.\nया कालावधीकडे आता जेव्हा मी पाहते, तेव्हा एक लक्षात येतं. खरी कार्यशाळा आमचीच सुरू होती. बऱ्याच गोष्टी आम्हीही नव्यानं शिकत होतो. लोकांचे मुखवटे आणि चेहरे याच काळात लक्षात येऊ लागले. आमचेच कार्यकर्ते काही प्रकरणांमध्ये फितूर झाले. अनेकांना त्याची मोठी किंमतही मिळाली. त्यामुळं खटल्याचा निकाल होईपर्यंत सावधगिरी बाळगण्याचं शिक्षण आपोआपच मिळालं. याच काळात पीसीपीएनडीटी कायद्यालाच आव्हान देणारेही समोर उभे ठाकले. दोन दाम्पत्यांनी याचिका दाखल केली होती. “आम्हाला दोन मुले आहेत आणि मुलगी हवी आहे. लिंगसमतोल राखण्याची सुरुवात घरापासून करायची आहे. हा आमचा घटनादत्त अधिकार असून, पीसीपीएनडीटी कायद्यामुळे तो हिरावला जातोय,\" अशी मांडणी या याचिकांमध्ये करण्यात आली होती. याचिकांचं ‘ड्राफ्टिंग' अत्यंत चपखल केलं होतं. आम्ही फक्त मुलींना जन्म घेण्याचा अधिकार मागत होतो; पण ही अडथळ्यांची शर्यत काही केल्या संपतच नव्हती. आमच्यासाठी ही कार्यशाळाच की!\n२०११ च्या जनगणनेची आकडेवारी समजायला अजून अवकाश होता. पण २००१ च्या जनगणनेची आकडेवारी आणि त्यानंतर त्यात वर्षी होणारे बदल ढोबळ स्वरूपात समोर येत होते. शून्य ते सहा वयोगटातल्या मुलींचं प्रमाण घटत चाललंय, ही अस्वस्थ करणारी माहिती समजत होती. अखेर जेव्हा जनगणना अहवाल आला, तेव्हा सगळेच अवाक् झाले. दरहजारी मुलांमागे बीड जिल्ह्यात अवघ्या ८०७ मुली आहेत, हे अंतिम आकडेवारीत समोर आलं. बीड जिल्ह्यातल्या ज्या तालक्यांमध्ये दर हजारी मुलांमागे मुलींची संख्या २००१ च्या जणगणनेत नऊशेच्या वर होती, त्यातल्या अनेक तालुक्यात ती धक्कादायकरीत्या साडेसातशे ते आठशेच्या दरम्यान उतरली होती.\n८"} +{"id": "indic_deva_eval_000789_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000789_devanagari_page_ocr_238a7901185e.jpg", "ocr": "मातिका\n\nब\n\n१९, (क) अतीतारम्मणा धम्मा।\n(ख) अनागतारम्मणा धम्मा।\n(ग) पच्चुप्पन्नारम्मणा धम्मा।\n२०. (क) अज्झत्ता धम्मा।\n(ख) बहिद्धा धम्मा।\n(ग) अज्झत्तबहिद्धा धम्मा।\n२१. (क) अज्झत्तारम्मणा धम्मा।\n(ख) बहिद्धारम्मणा धम्मा।\n(ग) अज्झत्तबहिद्धारम्मणा धम्मा।\n[संस्कृतच्छाया) १ ९. (क) अतीतालम्बना: धर्मा:।\n(ख) अनागतालम्बना: धर्मा:।\n\n(ग) प्रत्युत्पल्नालम्बना: धर्मा:।\n२०.(क) अध्यात्मा: धर्मा:।\n(ख) बहिर्धा: धर्मा:।\n(ग) अध्यात्मबहिर्धा: धर्मा:।\n२१ .(क) अध्यात्मालम्बना: धर्मा:।\n(ख) बहिर्धालिम्बना: धर्मा:।\n(ग) अध्यात्मबहिद्धालम्बना: धर्मा:।\n(हल्की? २. त्को बे धर्म, जिनका आलम्बन कोई अतीत की वस्तु हैं।\n(व) वे धर्म, जिनका आलम्बन कोई भविष्य की वस्तु हैं।\n(ग) वे धर्म, जिनका आलम्बन कोई वर्तमान की वस्तु हैं।\n२०. (क) वे धर्म, जो आन्तरिक रूप से स्थित हैं।\n(लव) वे धर्म, जो बाह्य रूप से स्थित हैं।\n(ग) वे धर्म, जो आन्तरिक एवं बाह्य दोनों जगह स्थित हैं।\n२१. (क) वे धर्म, जिनका आलम्बन कोई आन्तरिक वस्तु हैं।\n(ख) वे धर्म, जिनका आलम्बन कोई बाहरी वस्तु हैं।\n(ग) वे धर्म, जिनका आलम्बन आन्तरिक एवं बाहरी वस्तु दोनों हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000790_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000790_indic_mozhi_deva_word_ocr_59fa2ef0a0bb.jpg", "ocr": "करते"} +{"id": "indic_deva_eval_000791_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000791_indic_vision_bench_deva_ocr_8db1d9636fab.jpg", "ocr": "\nचौदा\nजनसुनावणी पूर्णतः यशस्वी झाल्याचा आनंद घेऊन आम्ही सातारला परतलो; पण मनात असंख्य विचार घोळत राहिले. आदेश, सूचना, निर्देश, कायदा... हे सगळं कधीपर्यंत ? प्रश्नाच्या मुळाशी आपण जाणार आहोत की नाही? या सगळ्या समस्या ज्यातून उद्भवल्या, त्या परिस्थितीचं काय करायचं? खूप काम करावं लागणार आहे. मुलींच्या या अवस्थेला त्यांच्या पालकांची परिस्थिती आणि त्याकडे झालेलं सगळ्यांचंच दुर्लक्ष कारणीभूत आहे. ही साधीसुधी, कष्टाळू आणि प्रामाणिक माणसं. स्थिरस्थावर होणं माहीतच नाही, अशा समाजातली. जिथं स्थैर्यच नाही, तिथं संस्कारांची अपेक्षा का करायची? भटकत-भटकत ही माणसं कधीतरी या भागात आली आणि सिंदफणा नदीकाठी विसावली. पूर्वी���्या हैदराबाद संस्थानचा हा भाग. यांच्या जमिनी मोठ्या आहेत; पण निसर्गाची साथ नाही. सततचा दुष्काळ. बारमाही पाण्याची कुठलीच व्यवस्था नाही. पश्चिम महाराष्ट्र सुजलाम्-सुफलाम् राहावा, तिथं स्वस्त श्रम उपलब्ध व्हावेत म्हणून मुद्दामच हा भाग मागास ठेवला असावा, असं साधार वाटण्याजोगी परिस्थिती.\nएका राज्यातून दुसऱ्या राज्यात स्थलांतर करणाऱ्यांंसाठी धोरण तयार होतं. आसाममधला माणूस त्याचे फायदे महाराष्ट्रात घेतो. पण राज्यातल्या राज्यात स्थलांतरित होणाऱ्या या आठ-दहा लाख लोकांसाठी धोरण तयार होऊ शकत नाही. त्यांची जी फरफट होते, त्याचा बळी ठरतात महिला आणि मुलीच. मुली नकोशा वाटतात आणि कोयता वाढणार असल्यामुळे मुलगा हवासा वाटतो. ती त्यांची आर्थिक मजबुरीच आहे.\n९०"} +{"id": "indic_deva_eval_000792_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000792_devanagari_page_ocr_b270bcf6059e.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n77\n\nपन बचनस्सत्थो यस्मा गहितपुब्बसड्केतेहि सुत्वा आयते, न उपदेसतो, तस्मा ब्रह्मदत्तेन रच्ञा\nवुत्तकालेपि सत्थारा तं कर्थ आहरित्वा वुत्तकालेपि सब्बे मनुस्सा विनापि उपदेसेन बचनत्थं\nजाननन्‍्तीति गहेतब्बं।\n\nतिंसड्चेब सहस्सानि,\n\nनवुति च सतानि तु।\n\nतिंस नावुतियों नाम,\n\nवक्ता उमझुगजातके॥\n\nयस्मा पावचने सन्ति,\n\nनया चेव अचिन्तिया।\n\nबोहारा च सुगुव्ठहत्था,\n\nदयापन्‍्नेन देसिता॥\n\nतस्मा साट्ठकथे धीरो,\n\nगम्भीरे जिनभासिते।\n\n'उपदेसं सदा गण्हे,\n\nगरूं सम्मा उपद्ठहं॥\n\nगरूपदेसहीनो हि,\n\nअत्थसारं न विन्दति।\n\nअत्थसारबिहीनो सो,\n\nसद्धम्मा परिहायति॥\n\nगरूपदेसलाभी च,\n\nअत्थसारसमायुतो।\n\nसद्धम्मं परिपालेन्तो,\n\nसद्धम्मस्मा न हायति॥\n\nसद्धम्मत्थाय मे तस्मा,\n\nसइसखब्यामालापि भासिता।\n\nसप्पयोगा यथायोगं,\n\nसहेवत्थविनिच्छया॥\nइति नवड्गे सादट्गकथे पिटकत्तये ब्यप्पथगतीसु विज्ञू्नं कोसल्‍्लत्थाय कते सद्दनीतिप्पकरणे\nसबिनिच्छयो सड्ख्यानामानं नामिकपदमालाबिभागों नाम तेरसमो परिच्छेदो।"} +{"id": "indic_deva_eval_000793_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000793_devanagari_page_ocr_01d69242d933.jpg", "ocr": "222 बोधिवन्दनवग्गो\n“एकनवुतितों कप्पे, यं फलमददिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, फलदानस्सिदं फलं॥022॥\n“किलेसा झापिता मझहं...पे*... बिहरामसि अनासबो॥4023॥\n“स्वागत वत मे आसि. ..पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं॥024॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो. ..पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥4025॥\nइत्थं सदं॑ आयस्मा उदुम्बरफलदायको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nउद॒म्बरफलदायकत्थेरस्सापदान ततिय।\n4. पिलक्खफलदायकत्थेरअपदानं\n“बनन्तरे बुद्ध दिस्‍्वा, अत्थदरस्सि महायसं।\nपसन्‍नचित्तो सुमनो, पिलक्खस्साददिं फलं [पिलक्खस्स फल अदं (सी०)]॥026॥\n“अद्वारसे कप्पसते, यं फलमददिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, फलदानस्सिदं फलं॥027॥\n“किलेसा झापिता मस्हं...पे*... विहरामि अनासबो॥028॥\n“एकनवलितसे कल्पे, यत्‌ फलमददां तदा।\nदुर्गतिं लाभिजानामि, फलदानस्येदं फलम्‌॥022॥\n“क्लेशा: ध्मापिता: मम...पे*... विहरामि अनाखबः॥023॥\n“स्वागत बत मे आसीत्‌...पे*... कृत बुद्धऑ्य शासनम्‌॥024॥\n“अ्रतिसंविदश्वतस््र:....पे०... कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥025॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ उद्स्बर्फलदायकस्थविर इमा गाथा अभापिछेति।\n“बनान्तरे बुद्ध दुष्ट्बा, अर्थदर्शी महायशम्‌।\nप्रसन्‍नचित्तः सुमनाः, प्लक्षस्य अददां फलम्‌॥026॥\n“अष्टादशे कल्पशते, यत्‌ फलमददां तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, फलदानस्येदं फलम्‌॥027॥\n“क्लेशा: ध्मापिता: मम...पे*... विहरामि अनास्रच:॥028॥\nजो फल का दान किया था, यह उस फलदान का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\n\nहो विचरण करता है,\n\nयहाँ से 9:\nको नहीं जानता॥022॥\n\nमेरे द्वारा भव के सभी क्लेश समूल नष्ट कर दिये गये हैं और जैसे हाथी बन्धनमुक्त\nवैसे मैं भी अनाख्रव हो विचरण करता हूँ॥023॥\n\nमेरा बुद्ध के समीप स्वागत हुआ और मैंने तीन प्रकार की विद्याओं को प्राप्त कर बुद्ध शासन को पूर्ण किया॥4024॥\n\nचार पटिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया॥025॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ उदुस्बरफलदायक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा।\n\nबन के मध्य महान्‌ यश वाले अर्थदर्शी बुद्ध को देखा और अत्यधिक प्रसन्नमन एवं सुन्दरमन\n'विलक्ख (अंजीर) का फल प्रदान किया॥026॥\n\nयहाँ से 8 वें कल्प में जो फल का दान किया था, यह उस फल-दान का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\nको नहीं जानता॥4027॥\n\nमेरे द्वारा भव के सभी क्लेश समूल नष्ट कर दिये गये हैं और जैसे हाथी बन्धनमुक्त हो विहरण करता है,\nमैं भी अनाखरव हो विचरण करता हूँ॥028॥\n\n[रमन से उन्हें"} +{"id": "indic_deva_eval_000794_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000794_indic_mozhi_deva_word_ocr_ba3780c03d67.jpg", "ocr": "आयेगा"} +{"id": "indic_deva_eval_000795_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000795_devanagari_page_ocr_a0836a02e332.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n445\n\nतस्मा अयं विसुंयेव, गणो इच्चेव आायति॥\n“सरा सरे लोप”मिति-आदीनि लक्खणानिबव।\nगम्भीरं लक्खणं एतं, दुज्जानं तक्कगाहिना॥\nउसादयोपि सनन्‍्धाय, आदिग्गहो कतो तहिं।\nतथा हि “उण्हापेती”ति, आदिरूपानि दिस्सरे॥\nइदानि पाक कत्वा, आदिसद्दफलं अहं।\nसप्पयोगं गहादीन॑, गण वक्‍्खामि में सुण॥\nगह उपादाने। उपादानं गहणं, न किलेसुपादानं। उपसद्दो हेत्थ न किडिच् अत्थविसेसं\nवदति। अथ वा कायेन चित्तेन वा उपगन्त्वा आदानं गहण्ण उपादानन्ति समीपत्थो उपसद्दो।\nकत्थचि हि उपसद्दो आदानसद्सहितो दव्व्हग्गहणे वत्तति “कामुपादान”न्तिआदीसु। इध पन\nदब्ठहग्गहर्ण वा होतु सिथिलग्गहर्ण वा, य॑ किडिच गहण्ण उपादानमेब, तस्मा गह॒धातु गहणे\nवत्ततीति अत्थों गहेतब्बो। घेप्पति, गण्हाति वा। परिग्गण्हाति, पटिग्गण्हाति, अधिगण्हाति,\nपर्गण्हाति, निर्गण्हाति। पधानगण्हनको। गण्हितुं, उग्गण्हितुं। गण्हित्वा, उग्गण्हित्वा।\nअज्ञजथापि रूपानि भवल्ति। अहं जालिं गहेस्सामि। गहेतुं। गहेत्वा। उग्गाहकों, सड्गाहको,\nअज्झोगाव्ठहों। कारिते “गण्हापेति, गण्हापयति, अज्ञतरं सतिपट्ठानं उग्गण्हापेन्ति, सद्धि\nअमचज्वसहस्सेन गण्हापेत्वा। उपज्ञं॑ गाहापेतब्बो। उपज्ञ॑गाहापेत्वा। गाहेति, गाहयति,\nगाहापेस्सति। गाहापयन्ति सब्भावं। गाहको, गाहेत्वा” इच्चादीनि। कम्मनि - गय्हति,\nसड्गय्हति, गण्हियति बा। तथा हि “गण्हियन्ति उग्गण्हियन्ती”ति निद्वेसपाक्ठि दिस्सति। “गेहं,\nगाहों, परिग्गहों, सझगाहको, सडुगहेता\" इच्त्चादीनि योजेतव्वानि।\nतत्र अकारानन्तरत्यन्तपदानं “चेप्पति, घेप्पन्ति। ेप्पसी”ति च “गण्हति, गण्हन्ति।\nगण्हसी”ति च आदिना नयेन सब्बासु विभत्तीसु सब्बथा पदमाला योजेतब्बा।\nआकारेकारानन्तरत्यन्तपदानं “गण्हाति गण्हापेती”तिआदिना यथासम्भवं पदमाला योजेतब्बा\nवज्जेतब्बद्ठानं वज्जेत्वा।\nइमानि पन पसिद्धानि कानिचि अज्जतनीरूपानि “अग्गही मत्तिकापत्तं। अग्गहुं, अग्गहिंसु,\nअग्गहेसु”न्ति। भविस्सन्‍्तीआदीसु गहेस्सति, गहेस्सन्ति। सेसं परिपुण्णं कातब्बं। अग्गहिस्सा,\nअग्गहिस्संसु। सेसं परिपुण्णं कातब्बं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000796_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000796_devanagari_page_ocr_26ca2b71d806.jpg", "ocr": "सद्दे भवन्ति कुसला\nसद्धम्मज्चस्स पूजेत्वा\nसद्धम्मत्थाय मे तस्मा\nसद्धा मेधा पड्ञा विज्जा\nसद्धानते सुद्धनि सण्ठपेमि\nसन्ति पुत्ता विदेहानं\nसब्ब॑ सतसहस्सानि\nसब्बज्ञ्ुता”ति य॑ बुत्तं\nसब्बज्ञ्ू सुगतो बुद्धो\nसब्बत्थ सेट्रभावेन\nसब्बथा विनिमुत्ता ये\nसब्बनासं सब्बनास\nसब्बसब्बपदेसेस\nसब्बसाधारणकानि\nसब्बा किरेव॑ परिनिद्धितानि\nसब्बा” इच्चादिकं रूप॑\nसब्बानि नयतो एवं\nसब्बाशिभू सब्बविदू\nसब्बाशिभू सब्बविदृहसस्मि\nसब्बे सद्धस्मगरुनो\nसभावतो सकम्मा तु\nसभावे चेव पच्ञायं\nसभावो हेस वल्थून\nसमन्‍्तभावे बोहारे\n\nगाथानुक्रमणिका\n\n60\n\n548\n377\n269\n205\n280\n268\n463\n222\n\nश्ाः\n3480\nशा\n49\n275\nछव\n3\nकट\nजव3\n446\n243\n240\nहै ६:\n“5 |\nजव5\nख3\nहा\n\n306\n496\n53\n\n488\n\nसमवाये खणे काले\n\nसमासकपदऊज्चेब\nसमासे इदंसदस्स\nसमासे एतसहस्स\nसमासे तुम्हअम्हाकं\nसम्पजज्ञज्च परिणायिका\nसम्पत्तियं लक्खणे च\nसम्पन्न सालिकेदारं\nसम्मासम्बुद्धो इति सो\nसम्मासम्बोधिसज्ञाता\nसम्मुतियुपपत्तीन॑\nसम्मोदमाना गच्छन्ति\nसयं सोधेति सो भूमिं\nसरा सरे लोप”मिति\nसरूपतो न दीपेति\nसरूपतो पकासेति\nसल्लक्खणा च कोसल्लं\nसहना च हिंसना च\nसहसा सम्पियायेन\nसहस्सक्खो दससत\nसहहिंसईहबसा\n\nसा सुनिधाति'मे सद्दा\nसा सो स्यन्तानि रूपानि\nसाट्ठकथे पिटकम्हि\nसाति केसि किमि बोन्दि\nसातिसयं गरुकारा\nसाधुक”न्ति पद्द विज्ञू\nसाम्यत्थसम्पदानत्था\nसालरुक्‍्खे जेट्टरुक्खे\nसालो धवों च खदिरो\nसासनज्ञूहि विज्जूहि\nसासना लोकतों चेते\n\nउत्व\n225\n250\n249\n264\n80\n464\n408\n\n509\n\n338\n508\n436\nजज\n283\n468\n20\n43\n264\n298\nछ्त\n457\nअवय\n\n|"} +{"id": "indic_deva_eval_000797_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000797_indic_mozhi_deva_word_ocr_eda0c1530344.jpg", "ocr": "जाती"} +{"id": "indic_deva_eval_000798_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000798_indic_mozhi_deva_word_ocr_2d0271b6ca63.jpg", "ocr": "थराला"} +{"id": "indic_deva_eval_000799_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000799_hindi_handwritten_word_ocr_f903f8826dc9.jpg", "ocr": "साईकिल"} +{"id": "indic_deva_eval_000800_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000800_hindi_handwritten_word_ocr_25292fe87e3b.jpg", "ocr": "जताई"} +{"id": "indic_deva_eval_000801_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000801_devanagari_page_ocr_cd819ac3ca4a.jpg", "ocr": "| अनुपिटके\n\n“यो हेतु यो पच्चयो, महाराज, पटिसन्दहनाय, तस्स हेतुस्स तस्स पच्चयस्स उपरमा\nजानाति सो- “न पटिसन्दहिस्सामी\"”ति।\n\n4. “ओपम्मं करोही”ति।\n\n“यथा, महाराज, कस्सको गहपतिको कसित्वा च वपित्वा च धज्ञागारं परिपूरेय्य। सो\nअपरेन समयेन नेव कस्सेय्य न वप्पेय्य। यथासम्भतं च धछज्जं परिभुज्जेय्य वा विसज्जेय्य वा\nयथा पच्चयं वा करेय्य। जानेय्य सो, महाराज, कस्सको गहपतिको “न में धज्ञागारं\nपरिपूरेस्सती'ति? “आम, भन्‍्ते, जानेय्या”ति। “कथ्थं जानेय्याति”ति? “यो हेतु यो पच्चयो\nधज्ञागारस्स परिपूरणाय, तस्स हेतुस्स तस्स पच्चयस्स उपरमा जानाति- 'न में धज्ञागारं\nपरिपूरेस्सती””'ति। “एवमेव खो, महाराज, यो हेतु यो पच्चयो पटिसन्दहनाय, तस्स हेतुस्स\nतस्स पच्चयस्स उपरमा जानाति सो “न पटिसन्दहिस्सामी'ति।\n\n'कल्लोसि, भन्‍्ते नागसेना”ति।\n\nसंस्कृतच्छाया- . \"यो हेतुर्य: प्रत्ययों, महाराज, प्रतिसन्धानाय, तस्य हेतोस्तस्यप्रत्ययस्योपरमात्‌\nजानाति सः- 'न प्रतिसन्धास्यामी \"ति।\n4. \"औपम्यं कुर्वि\"ति ।\n\n\"यथा महाराज, कर्षको गृहपतिक: कृष्ट्वा चोस्वा च धान्यागार॑ परिपूरयेत्‌। सोउपरेण समयेन\nसैव कर्षेत्‌, न वपेत्‌। यथासम्भूत॑ च धान्य॑ परिभुञीत वा विसूजेद्‌ वा यथाप्रत्ययें वा कुर्यात्‌। जानीयात्‌\nस, महाराज, कृषकों गृहपतिकः- 'न मे धान्यागारं परिपूर्थिष्यत\"इति? \"आम्‌, भदन्त, जानीयादि\"ति।\n>कर्थ जानीयादि\"ति? “यो हेतुर्य: प्रत्ययोधान्यागारस्य परिपूरणाय, तस्य हेतोस्तस्थ प्रत्ययस्योपरमात्‌\nजानाति- 'न से धान्यागारं परिपूर्यिष्यती\" ति। \"एकमेव खलु महाराज, यो हेतुर्य: प्रत्यय: प्रतिसन्‍्धानाय\nतस्य हेतोस्तस्य प्रत्ययस्योपरमात्‌ जानाति सः-'न प्रतिसन्धास्यामी\"ति।\n\n\"कल्योडसि, भदन्‍्त नागसेने\" ति।\n'महाराज! फिर भी जन्म ग्रहण करने के जो हेतु और प्रत्यय हैं उनके शान्त तथा नष्ट हो जाने से वह इस\n\nहिन्दी-\n\nबात को जानता है कि मैं फिर जन्म नहीं ग्रहण करूँगा।\"\n\n4. “कृपया उपसा देकर समझावें।”\n\n“महाराज! जैसे कोई किसान जोत-बोकर अपने भण्डार को भर ले, फिर कुछ समय तक न जोते, न\nबोये, एकत्र किए हुए अन्न को बैठ कर खाए, या बाँट दे या अपने दूसरे कामों में खर्च करे। महाराज! तो क्या वह\nकिसान नहीं जानेगा कि मेरा भण्डार अब भर नहीं रहा है (किन्तु खाली हो रहा है)?” “हाँ भन्‍्ते! जरूर जानेगा।”\n“कैसे जानेगा।\" “भण्डार के भरने के जो हेतु और प्रत्यय हैं उनके बन्द हो जाने से।” “महाराज! इसी तरह जन्म\nग्रहण करने के जो हेतु और प्रत्यय हैं, उनके शान्त तथा नष्ट हो जाने से वह इस बात को जानता है कि मैं फिर जन्म\nग्रहण नहीं करूँगा।”\n\n“भन्ते! आप ठीक कहते हैं।”"} +{"id": "indic_deva_eval_000802_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000802_hindi_handwritten_word_ocr_bd5290c15161.jpg", "ocr": "पैकज"} +{"id": "indic_deva_eval_000803_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000803_devanagari_page_ocr_2b3efafa2ce7.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 304\n\nतस्मिं समये समाधिन्द्रियं होति ...पे*... ये वा पन तस्मिं समये अज्ञेपि अत्थि\n'पटिज्वसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इमे धम्मा अब्याकता।\n\nतस���मिं खो पन समये चत्तारो खन्‍्धा होल्ति, द्वायतनानि होल्ति, द्वे धातुयो होल्ति, तयो\nआहारा होन्ति, पडिचिन्द्रियानि होन्ति, एको फस्सो होति, एका वेदना होति, एका सञ्ञा होति,\nएका चेतना होति, एक॑ चित्त होति, एको वेदनाक्खन्धो होति, एको सड्ञाक्खन्धो होति, एको\nसदल्लारक्खन्धो होति, एको विज्ञाणक्खन्धो होति, एक मनायतनं होति, एक मनिन्द्रियं होति,\n'एका मनोविज्ञाणधातु होति, एकं धम्मायतनं होति, एका धम्मधातु होति; ये वा पन तस्मि\nसमये अज्ञेपि अत्थि पटिच्चसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा - इमे धम्मा अब्याकता. ..पे*...।\n\n५७३. कतमो तस्मिं समये सल्लारक्खन्धो होति? फस्सो चेतना वितक्को विचारो पीति\nचित्तस्सेकग्गता वीरियिन्द्रियं समाधिन्द्रियं जीवितिन्द्रियं; ये वा पन तस्मिं समये अज्ञेपि\n्संस्कृतच्छाया) तस्मिन्‌ समये समाधीन्द्रियं भवति ...पे*... ये वा पुन: तस्मिन्‌ समये अन्येड्पि सन्ति\nप्रतीत्यसमुत्पन्ना अरूपिणों धर्मा:- इमे धर्मा: अव्याकृता:।\n\nतस्मिन्‌ खलु पुन: समये चत्वार: स्कन्‍्धा: भवन्ति, द्वे आयतने भवत:, द्वौ धातू भवत:, त्रयः\nआहारा: भवन्ति, त्रीणीन्द्रियानि भवन्ति, एक: स्पर्शों भवति, एका वेदना भवति, एका संज्ञा भवति,\n\nएका चेतना भवति, एकं चित्त भवति, एको\n\nगे बेदनास्कन्धो भवति, एक: संज्ञास्कन्धो भवति, एक:\n\n'एको विज्ञानस्कन्धो भवति, एक मनआयतनं भवति, एक॑ मनइन्द्रियं भवति, एको\nमसनोविज्ञानधातु: भवति, एक॑ धर्मायतनं भवति, एको धर्मधातु: भवति; ये वा पुनः तस्मिन्‌ समये\nअन्ये5पि सन्ति प्रतीत्यसमुत्पन्ना अरूपिणों धर्मा: - इसमे धर्मा: अव्याकृता:\n\nचे*...।\n५७३. कतम: तस्मिन्‌ समये संस्कारस्कन्धो भवति? स्पर्शश्वेतना वितर्कों विचार: प्रीति:\nचित्तस्थैकाग्रता बीर्यन्द्रियं समाधीन्द्रियं जीवितेन्द्रियम; ये बा पुन: तस्मिन्‌ समये अन्येडपि\nतहेन्दी) ...पूबबल्‌... अबबा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यससुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म अव्याकृत हैं।\nउस समय पुनः चार स्कन्‍्ध होते हैं, दो आयतन होते हैं, दो धातुएँ होती हैं, तीन आहार होते हैं, पाँच-\nइन्द्रियाँ होती हैं, एक स्पर्श होता है, एक वेदना होती है, एक संज्ञा होती है, एक चेतना होती है, एक चित्त होता\nहै, एक वेदनास्कन्ध होता है, एक संज्ञास्कन्ध होता है, एक संस्कारस्कन्ध होता है, एक विज्ञानस्कन्ध होता है, एक\n\n/आयतन होता है, एक मन-इन्द्रिय होती है, एक मनोविज्ञानधातु होती है, एक धर्मायतन होता है, एक धर्मधातु\nहोती है; अथवा उस समय जो भी अन्य प्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं- ये धर्म अव्याकृत हैं।\n\n५७३. उस समय कौन सा संस्कारस्कन्ध होता है? स्पर्श, चेतना, वितर्क, विचार, प्रीति, चित्त की एकाग्रता,"} +{"id": "indic_deva_eval_000804_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000804_indic_mozhi_deva_word_ocr_efc9b57c2cc6.jpg", "ocr": "निरंतर"} +{"id": "indic_deva_eval_000805_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000805_devanagari_page_ocr_0bbfec37e822.jpg", "ocr": "सद्नीतिप्पकरणं\n\n398:\n\n“किंनु सन्‍्तरमानोव, कासुं खनसि सारथि।\nपुद्ठो मे सम्म अक्खाहि, किंकासुया करिस्ससी \"ति\nएत्थ हि आवाटो कासु नाम। “अड्गारकासुं अपरे फुणन्ति, नरा रुदन्‍ता परिदड्जगत्ता”ति एत्थ\nरासि। कारिते - पकासेतीति पकासको। ओभासेतीति ओभासको। कम्मे पकासियतीति\nपकासितो। एवं भासितों। भावे - कासना। सड्कासना। पकासना। तुमन्तादित्ते “पकासितुं,\n'पकासेतुं, ओभासितुं, ओभासेतुं। पकासित्वा, पकासेत्वा, ओभासित्वा, ओभासेत्वा”ति रूपानि\nभवन्ति। तद्धिते भासु एतस्स अत्थीति भासुरो, पभस्सरो यो कोचि। भासुरोति वा केसरसीहो।\nइमस्मिं अत्थे भासुसद्धो “राज दित्तिय”न्ति एत्थ राजसद्दो विय विराजनवाचको सिया, तस्मा\nरूपसिरिया विराजनसम्पन्नताय भासु विराजनता एतस्स अत्थीति भासुरोति निब्बचन जेय्यं।\nनासु रासु सद्दे। नासति। रासति। नासा, नासिका।\nतत्र नासाति हत्थिसोण्डासि नासाति बुच्चति “सचे म॑ नागनासूरू, ओलोकेस्य\n'पभावती”तिआदीसु विय। मनुस्सादीनं नासिकापि नासाति वुच्चति “यो ते हत्थे च पादे च,\nकण्णनासड्च छेदयी ”तिआदीसु विय। नासन्ति अब्यत्तसूइं करोन्ति एतायाति नासा। नासा एव\nनासिका। यत्थ निव्बचन न वदाम, तत्थ त॑ सुविड्जेय्यत्ता अप्पसिद्धत्ता वा न वुत्तन्ति दड्ुब्बं,\nअवुत्तम्पि पयोगविचक्खणेहि उपपरिक्खित्वा योजेतब्बं। अत्रिदं वुच्चति -\nनासा सोण्डा करो हत्थो,\nहत्थिदब्बे समा मता।\nनासा च नासिका च द्वे,\nनरादीसु समा मता\"ति॥\nनस कोटिल्ले। नसति।\nभिसि भये। भिंसति। भिंसनको। तदासि यं भिंसनकं। भेस्माकायों।\nआसिसि इच्छायं। आपुब्बो सिसि इच्छायं वत्तति। आसिसति। आसिसतेव पुरिसो।\nआसिसना। आसिसत्तं। आसिसन्‍्तो, आसिसमानो, आसमानो। “सुग्गतिमासमाना\"ति पाछि एत्थ\nनिदस्सन।\nगसु अदने। गसति।\nचुसी कन्तिकरणे। ईकारन्तोयं, तेन इतो न निग्गहीतागमो। घुसति।\nचंसु भंसु अवसंसने। पंसति। भंसति।\nधंसु गतियं। धंसति। रजो नुद्धंसति उद्धं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000806_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000806_indic_mozhi_deva_word_ocr_735a631df9c7.jpg", "ocr": "नोट"} +{"id": "indic_deva_eval_000807_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000807_devanagari_page_ocr_5f728f01501f.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो\n\nव5\n\nपालि- “यदाहं मातुकुच्छितो, सम्पजानोब निक्‍खमिं।\nसाधुकारं पवत्तेन्ति, दससहस्सी पकम्पथ॥69॥\n“ओक्कन्ति से समो नत्थि, जातितो अभिनिक्खमे।\nसम्बोधियं अहं सेट्टो, धम्मचक्कप्पवत्तने॥70॥\n“अहो अच्छरियं लोके, बुद्धानं गुणमहन्तता।\nदससहस्सीलोकधातु, छण्पकारं पकम्पथ।\nओभासो च महा आसि, अच्छेरं लोमहंसनं”॥74॥\nभगवा तम्हि [भगवा च तस्हि (सी- स्था* क*)] समये, लोकजेट्लो नरासभों।\nसदेवक॑ दस्सयन्तो, इद्धिया चड्कमी जिनो॥72॥\nसंस्कृतच्छाया,.. यदाउह सानकक्षित:, सम्प्रजानन टव निरक्रमम।\nसाधुकारं प्रवर्त्यन्ति, दशसाहसन प्राकम्पत॥69॥\n“अबक्रान्तिर्मे समो नास्ति, जातितोउभिनिरक्रमेत्‌।\nसम्बोध्याम्‌ अहं श्रेष्ठ: धर्मचक्रप्नवर्त्ते॥70॥\n“अहो आश्चर्य लोके, बुद्धानां गुणमहत्त्वात्‌ ।\nदरशसाहख लोकधातवः, पट्प्रकारं प्राकम्पन्ता\nअवभासकश्च महान्‌ आसीत्‌, आश्चर्य रोमहर्षणम्‌”॥7॥\nअगवास्तस्मिन्‌ समये, लोकज्येछो नरर्पभः।\nसदेवकं दर्शयन्‌, ऋद्ध्या अचड्-क्रमीत्‌ जिन:॥72॥\n\nहिन्दी- “पुनः सानो जब मैं माता की कोख से संज्ञान (होश) पूर्वक बाहर आया, तब इस संसार ने हर्ष मनाया,\nजिससे दससाहखीलोक भी प्रकम्पित हो उठा॥69॥\n\n“इस प्रकार मेरे इस संसार में अवतरण तथा तदनन्‍्तर समय पर मेरे महाभिनिष्क्रमण (गृहत्याग) की\nकोई समानता (बराबरी) नहीं कर सकता। इसी प्रकार मैं ज्ञानप्राप्ति में तथा तदनुकुल धर्मोपदेश में भी सर्वश्रेष्ठ\nहूँ॥70॥\n\nलोक में ये छह आश्र्यमय कर्म बुद्धों का वैशिष्ट्य प्रकट करते हैं। यह समस्त दशसाहखी लोकधातु इन\nछहों कार्यों की समापत्ति के समय प्रत्येक बार हर्षातिरिक से कॉप उठी थी। उस समय अतिशय प्रकाश तथा अद्भुत\nरोमहर्पण भी हुआ था।74॥\n\nउस समय यह कहकर वे लोक में ज्ये्ठ तथा पुरुषों में श्रेष्ठ भगवान्‌ देवों सहित समस्त संसार को अपना\nऋद्धिप्रदर्शन करते हुये उस चड्क्रमणभूमि पर चड्क्रमण करने लगे।72॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000808_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000808_indic_mozhi_deva_word_ocr_74e2c60e171b.jpg", "ocr": "नाता"} +{"id": "indic_deva_eval_000809_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000809_indic_vision_bench_deva_ocr_fa6d61c4d463.jpg", "ocr": "बालसंगोपन, कुटुंब-नियोजन इत्यादी विषयांवर नवसाक्षर भगिनींची भाष��े ठेवण्यात आली होती, तीही ठीक वठली. यानंतर समूहगीतांचा कार्यक्रम. दोन-तीन गीतांपैकी एका गीताने तर सर्वांचेच लक्ष वेधून घेतले. अक्षरओळख नसल्याने किती अडचणी उभ्या राहतात याचे वर्णन करताना एक बाई म्हणते-\n‘पत्र आलं बंधवाचं वाचायला येईना।\nनेऊ कुठे वाचायला वाचनार भेटना ।\nगावाला मी जाते कुण्या मोटारीच समजंना |\nपाटी हाय तिच्यावर वाचायला येईना ।\nसाताऱ्या ग शहरामंदि पेट मला घावना ।\nखोलीचा ग नंबरय वाचायला येईना ।\nरात्रीच्या ग शाळा सुरू झाल्या आता गावाला ।'...\nसमूहगीतांच्या या कार्यक्रमानंतर राज्यपालांच्या शुभहस्ते साक्षरतेची ज्ञानज्योत प्रज्ज्वलित करण्यात आली व शिक्षणाची ही ज्योत जिल्ह्यातील सर्व भागात पोहोचविण्यासाठी उपस्थित अधिकारीवर्गानेही आपापल्या ज्योती ह्यावर प्रदीप्त करून घेतल्या. थेट गावापर्यंत या ज्योतीचा प्रकाश पोहोचावा यासाठी, खेड्यापाड्यांतून आलेल्या असंख्य नवसाक्षर बंधु-भगिनींनी आपापल्या ज्योती प्रज्वलित करून हाती घेतल्या आणि भवानीचे नामस्मरण करून सर्वच उपस्थितांनी 'शिक्षणाची ही पवित्र ज्योत आम्ही अशीच अखंड तेवत ठेवू' अशा अर्थाच्या प्रतिज्ञा घेऊन समारंभाला एक आगळेच गांभीर्य प्राप्त करून दिले. शिक्षणाधिकाऱ्यांनी घेतलेला कामाचा आढावा, राज्यपालांचे समयोचित भाषण, नवसाक्षर प्रौढाने केलेला समारोप, वंदेमातरम् वगैरे नेहमीच कार्यक्रम यापुढे थोडक्यात आटोपल्याने सभेच्या अखेरपर्यंत या गंभीर वातावरणाचा परिणाम कमी झाला नाही. प्रतापगडाच्या पराक्रमी परंपरेला साजेसाच हा नवमहाराष्ट्रातील विधायक कार्यकर्त्यांचा समारंभ होता, एवढे यासंबंधी सांगितले म्हणजे पुरे आहे.\nपूर्वीची लादलेली साक्षरता\nतसे पाहिले तर साक्षरतेची चळवळ सातारा जिल्ह्यात नवीन नाही. गेली बरीच वर्षे साक्षरतेचे वर्ग तुरळकपणे खेड्यापाड्यांतून चालू होते. पण या वर्गाचे अनुभव फारच निराशाजनक होते. वर्ग भरविण्याची जबाबदारी एकट्या प्राथमिक शिक्षकावर पडलेली होती. बिचारा प्राथमिक शिक्षक 'वर्गास या'म्हणून सर्वांना विनंत्या करून थकून जात असे. मोठ्या कष्टाने जमवलेल्या काही मंडळींना पदरचे रॉकेल तेल जाळून ' ग, म, भ, न' शिकवीत असे. ग्रामस्थांना माणसे जमविणे हे मास्तरांचे\n। २ ।"} +{"id": "indic_deva_eval_000810_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000810_devanagari_digits_mixed_3fa86ffdd582.jpg", "ocr": "5७2४5७४4"} +{"id": "indic_deva_eval_000811_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000811_indic_vision_bench_deva_ocr_e221bdf5e153.jpg", "ocr": "पुढे पडले हे खरे.घेवाण कमी, देवाण जास्त झाली. पण सूत्र लखनौ कराराचे होते! फार तर एवढे म्हणता येईल की, गंगेची मातीच थोडी मऊ ! गंगेचे खोरे अधिक दार, अधिक सहिष्णू !\nपण उपाय काय ? हेच तर हिंदुस्थानच्या राजकारणाचे मर्मक्षेत्र आहे. जी विचारसरणी, जो नेता हे खोरे काबीज करू शकतो तोच सर्व भारतावरही प्रभुत्व गाजवत रहातो. या हिंदी भाषिक प्रदेशाचा प्रचंड दबाव उर्वरित हिंदुस्थानावर पडलेला आहे. जसेजसे दक्षिणेकडे, पूर्वेकडे जावे तसतसे हे अधिक ध्यानात येते. आपण ज्यांना सरसकट फुटीरतेच्या चळवळी म्हणून संबोधतो, तो अनेकदा या दबावाविरुद्ध प्रकट झालेला असंतोष असतो. परंतु असंतोष असला आणि तो वाढला तरी हे सत्य आपण ओळखले पाहिजे की, हा दबाव पुढील काही दशके तरी कमी होण्याची मुळीच शक्यता नाही. कारण आपण लोकशाही पत्करलेली आहे, बहुसंख्याक हिंदी प्रदेशांचे वर्चस्व हा या लोकशाहीचाच एक अटळ परिणाम आहे. म्हणून पुढचा पेच येतो : लोकशाही हि तोवर दबाव आहे. दबाव आहे तोवर मुस्लिम तडजोडवाद आहे. मुस्लिम तडजोडवाद आहे तोवर नेहरूच काय, कुठलाही राजकीय नेता, पक्ष, तुला अभिप्रेत असलेली आधुनिकता मुस्लिम समाजावर लादू धजणार नाही. ही एक कोंडी आहे आणि जनसंघासारखा पक्षही--तो लोकशाहीवादी आहे. तोवर--या कोंडीत सापल्याशिवाय राहणार नाही. तुला भीती वाटते तसा 'जातीय' राहू शकणार नाही. खारीचे तुझे मुसलमान बांधव तुला फारच छळू लागले तेव्हा तूच नाही का चिडून एकदा लिहिलेस : And mind you, this is happening in a state wherein the Jan Sangh is a member of the coalition. जनसंघ संविद सरकारात सामील असतानाही मुसलमानांचा माजोरीपणा चालू होता हे तूच म्हणतोसः कसा कमी होईल हा माजोरीपणा ! मुसलमानांची वट्ट मते जनसंघाला नको आहेत असे थोडेच आहे!\nमित्रा, तुलाही ही कोंडी जाणवलेली असावी. म्हणून वैतागून अनेकदा एखाद्या लष्करशहाला तू हाका मारल्यास. त्याने यावे आणि ही सगळीच जुनी घाण साफ करून निघून जावे असे तुला वाटत होते. पण एकदा आल्यावर कुणी परत सहजासहजी जात नसतो आणि आलेला केमालपाशाच असेल याची शाश्वती नसते, हे तू कसे विसरलास ? एक खरे की, या तुझ्या हाकांमुळे तुझे अनेक सहकारी, हित चिंतक तुझ्यावर नाराज झाले, काही तर बिथरले. तुला त्यांनी रागारागाची पत्र पाठविली. तू कोणाला उत्तरे दिली नाहीस, पण आपले मत मात्र पुनः पुन्हा मांडत राहिलास : ही राजवट उलथली पाहिजे. हा समाज बदलला पाहिजे. Some drastic step is necessary.\n□\n। १६४ ।"} +{"id": "indic_deva_eval_000812_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000812_indic_vision_bench_deva_ocr_a119c26f7c23.jpg", "ocr": "आहे, याची जाणीव एकतर झाली नाही, किंवा त्याकडे समजूनही दुर्लक्ष करण्यात आलं. काळाप्रमाणे स्वत:ला ‘फिरविण्याचे’ आपण विसरलो.\nपरिणामी मालाचा दर्जा ढासळला. युरोप व अमेरिकेत तंत्रज्ञानाचा विकास झपाट्याने होत असताना मागे राहिले. कालांतराने चन व जपाननेही त्यांच्या तोडीस तोड आपण मजल मारली व काही बाबतीत आघाडीही घेतली. तरीही आपण जागे झालो नाही. आपलं कुठे तरी चुकत आह व भविष्यकाळात त्यांचे गंभीर परिणाम भोगावे लागणार आहेत, याची कल्पना मोठमोठ्या औद्योगिक घराण्यांना व जनतेच्या वतीने निर्णय घेणाच्या राजकारण्यांनाही आली नाही. आज सर्व व्यवस्थित आहे ना, मग उद्याची काळजी कशाला अशा भावनेत ते मश्गुल राहिले. पण काळ कुणासाठी थांबत नाही.\n१२ वर्षांपूर्वी रशियामधील कम्युनिझमचा अंत झाला आणि समाजवादी अर्थरचनेचा समाजवादाला जागतिक आधारस्तभ ढासळला. चतर चीनने अर्थव्यवस्थेबाबत २० वर्षांपूर्वीच तिलांजली देऊन अमेरिकेशी ‘आर्थिक दोस्ती’ केली व भांडवलशाही अर्थकारणाच्या दिशेने पावले टाकावयास सुरुवात केली. रशिया हा जसा भारताचा संरक्षणाच्या दृष्टीने आधार होता. तसा तो व त्याच्या इशाच्यावर चालणारी इतर पूर्व युरोपियन साम्यवादी राष्ट्रे ही भारताचा आर्थिक आधार होती. भारताची बरीचशी निर्यात याच देशांना होत असे. भारताशी मधुर संबंध ठेवणं रशियाला राजकीयदृष्ट्या आवश्यक असल्याने भारतातील कनिष्ठ दर्जाचा मालही रशिया घेत असेत्यामुळे आपल्या निर्यातप्रधान\nउद्योजकांना मालाच्या दर्जाबद्दल सावध न राहण्याची सवय जडली. बदलत्या अर्थव्यवस्थेत ती घातक ठरत आहे.\nरशियाच्या पतनाबरोबरच भारतीय मालांची निश्चित बाजारपेठही संपली. कोणत्याही देशाची अर्थव्यवस्था किती बळकट आहे, हे त्या देशाच्या निर्यातीवरून ठरवलं जातं केवळ निर्यातीच्या प्रमाणावर नव्हे, तर निर्यात मालाचा दर्जा, किंमत पुरवठा, त्याला असणारी ग्राहकांच्या भागवणंच नव्हे तर निर्माण मागणीसध्याच्या गरजा नव्या गरजा करून त्या भागवण्याचे कौशल्य या सर्वांवर अर्थव्यवस्था अवलंबून असते.\nयासाठी तंत्रज्ञानाचा विकास करावा लागतो. तंत्रज्ञान, मार्केटिंग, जाहिरात आ��ी क्षेत्रात बुडणारे नवे बदल स्वीकारावे तर लागतातच, पण स्वतःही बदल घडवून आणावे लागतातही सर्व जबाबदारी व्यवस्थापनावर असतेत्यासाठी व्यवस्थापकांमध्ये स्वत:ला व स्वतःबरोबर इतरांना फिरविण्याची’ क्षमता असावी लागते.\nबेसावध अवस्थेतील भारताय उद्योगांना ‘रशियोत्तर' जगात तीव्र जागतिक स्पर्धेचा सामना करावा लागत आहेकाहीही कसेही पिकवा आणि रशियात खपवा अशी स्थिती राहिली नाही. उघड्या जागतिक बाजारपेठेत जागतिक दर्जाचा माल तयार करून\nअदभुत दुनिया व्यवस्थापनाची / ४१"} +{"id": "indic_deva_eval_000813_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000813_hindi_handwritten_word_ocr_ef7ace63b182.jpg", "ocr": "ज़रूरतें"} +{"id": "indic_deva_eval_000814_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000814_devanagari_page_ocr_1fa1526e9b7f.jpg", "ocr": "44. सोभितवग्गो\n4. सोभितत्थेरअपदानं\n\n“पदुसुत्तरो नाम जिनो, लोकजेट्ठो नरासभो।\nमहतो जनकायस्स, देसेति अमतं पदं॥865॥\n“तस्साहं बचन॑ सुत्वा, बाचासभिमुदी रित॑ [बाचासभिसुदी रयिं (?)]।\nअज्जलिं परगहेत्वान, एकग्गो आसहं तदा॥866॥\n“यथा समुद्दो उदधीनमग्गो, नेरू नगानं पवरो सिलुच्चयो।\nतथेव ये चित्तवसेन वत्तरे, न बुद्धजाणस्स कल॑ उपेन्ति ते॥867॥\n“धम्मविधिं [धम्मे विधिं (सी*)] ठपेत्वान, बुद्धो कारुणिको इसि।\nभिक्खुसडूे निसीदित्वा, इमा गाथा अभासथ॥4868॥\n““यो सो ञाणं पकित्तेसि, बुद्धम्हि लोकनायके।\nकप्पानं सतसहस्सं, दुग्गतिं न गमिस्सति॥869॥\n\nपद्मोत्तरो नाम जिन:, लोकज्येष्ठ: नरार्षभ:।\n\nमहतः जनकायस्य, देशयति अमृतं पदम्‌॥4865॥\n\nतस्याहं वचन श्रुत्वा, वाचासभिमुदीरितम्‌।\n\nअड्जलिं पगृहीत्य, एकाग्र आसमहं तदा॥866॥\n\nयथा समुद्र: उदधीनमार्ग:, नेरू नगानां प्रवर: शिलोच्चय:।\n\nतथैब ये चित्तवसेन वर्चते, न बुद्धज्ञानस्थ कलाम्‌ उपयान्ति ते॥867॥\n\nधर्मविधिं स्थाप्य, बुद्धों कारुणिको ऋषि:।\n\nभिक्षुसक्चे निषीद्य, इमा गाथा अभाषत॥4868॥\n\n: सः ज्ञान प्राकीर्तयत्‌, बुद्धे लोकनायके।\n\nकल्पानां शतसहस्रम, दुर्गतिं न गमिष्यत्ति॥869॥\n\nलोकज्येछ, नरर्पभ पद्मोत्तर नामक जिन महान्‌ जन समूह को अमृत पद का उपदेश दिया करते\nे॥4865॥\n\nतब पद्मोत्तर के उपदेशपूर्ण बचनों को सुनकर अअजलिबद्ध होकर एकाग्रचित्त रहा॥4866॥\n\nजैसे सागर जलाशयों में अगाध है, जिस प्रकार पर्वतों में सुमेरु पर्वत महान्‌ है उसी प्रकार जो चित्त के वश में रहते\nहैं वे बुद्ध्ञान के एक अंश तक भी नहीं पहुँच पाते अर्थात्‌ बुद्धबान सागर और सुमेरु पर्वत के समान अगाध है॥4867॥\n\nधर्म की विधि को स्थापित करके बुद्ध, कारुणिक, ऋषि ने झिक्षुसडू में बैठकर इन गाथाओं को कहा-॥4868॥\n\nबह, जो बुद्ध लोकनायक में विद्यमान ज्ञान का प्रकीर्तन किया है, उस कारण सौ हजार कल्पों में भी\nदुर्गति को प्रा नहीं करेगा॥869॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000815_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000815_hindi_handwritten_word_ocr_63f70504b9e9.jpg", "ocr": "गायिकी"} +{"id": "indic_deva_eval_000816_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000816_indic_vision_bench_deva_ocr_abc251eadc7a.jpg", "ocr": "युगान्त / १८५\nत्रिदंडी संन्यास घ्यायला लावायचा, आणि यती म्हणून त्याला अंतःपुरात आणून बसवायचा; बलरामदादाला फसवायचे, वगैरे ज्याप्रमाणे कृष्णाने केले नाही, त्याचप्रमाणे पुढे काय होणार हे कळून सर्वांना वाचवण्याची शक्यता असताही पृथ्वीला भार झाला आहे, म्हणून सर्व योद्ध्यांना अश्वत्थाम्याच्या हातून मारवले, हेही कृष्णाने केले नाही.\nअभिमन्यूचा मुलगा परीक्षित म्हणजे सुभद्रेचा, कृष्णाच्या बहिणीचा नातू पुढे हस्तिनापूरच्या राज्यावर बसला. ह्यातही कृष्णाचे काही कर्तृत्व वा कारस्थान नव्हते. अज्ञातवासाच्या शेवटापर्यंत पांडवांच्या कुठल्याच मुलाचे लग्न झालेले नव्हते. निदान महाभारतात तसा उल्लेख नाही. सत्यभामेस घेऊन कृष्ण वनवास सरता-सरता पांडवांना भेटण्यास आला होता. मुलांची खुशाली व अस्त्रविद्येतील त्यांची प्रगती ह्याबद्दल त्याने द्रौपदीस सांगितले. मुलांची लग्ने झाली असती, तर तसा उल्लेख ह्या वेळी यावयास पाहिजे होता. अर्जुन बृहन्नडारूपाने मुलीला नृत्य शिकवीत होता, हे कळल्यानंतर, 'तूच उत्तरेशी लग्न कर, म्हणजे योग्य होईल.' असे विराटाने सांगितले. चार दिवस अंबा हस्तिनापुरात राहिली, तर शाल्व तिच्याशी लग्न करीना, तर वर्षभर अर्जुनाबरोबर नृत्य शिकणाऱ्या उत्तरेला दुसरा नवरा मिळणे जडच गेले असते. 'मी तिच्याकडे पितृभावनेने पाहतो. माझ्या मुलाशी तिचे लग्न होऊ दे', हे अर्जुनाचे उत्तर मिळाल्यावर द्वारकेहून अभिमन्यूला बोलावले; अर्जुनाला द्रौपदीच्या पोटी झालेला मुलगा होता, त्याला का नाही बोलावले ? उत्तर सरळ आहे. द्रौपदीला पाच मुले होती. त्यांपैकी धर्माचा मुलगा वडील होता. द्रौपदीने द्युताच्या वेळी त्याचा उल्लेख 'युवराज' म्हणून केला होता. द्रौपदीच्या मुलांची लग्ने एक तर एकामागून एक ओळीने झाली असती, किंवा सर्वांची एकदम झाली असती. त्यातल्या मधल्याचे सर्वांआधी होणे शक्यच नव्हते. अभिमन्यू अर्जुनाचा मुलगा, पण पांडवांच्या पट्टराणीचा नसल्यामुळे"} +{"id": "indic_deva_eval_000817_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000817_devanagari_page_ocr_13193ffd4658.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n“सिद्टघाटक॑ चच्चरज्च, सुविभत्तन्तरापणं।\n\nकारयेय्य सभं तत्थ, अत्थानत्थविनिच्छयं॥527॥\n\n“निरघातत्थं अमित्तानं, छिद्दाछिद्ज्च जानितुं।\n\nबलकायस्स रक्खाय, सेनापच्च॑ ठपेति [थपेसि (क*)] सो॥528॥\n“आरक्खत्थाय भण्डस्स, निधानकुसलं नरं।\n\nमा से भण्ड बिनस्सीति, भण्डरक्खं ठपेति सो॥529॥\n\n“ममत्तो [मामको (सी), समग्गो (स्या>)]\n\nहोति यो रज्ो, बुद्धि यस्स च इच्छति।\n\nतस्साधिकरणं देति, मित्तस्स पटिपज्जितुं॥530॥\n\nहअडगाटके चत्वरज्न, सविननकान्तरापणम।\n\nअकारयत्‌/कारयेत्‌ सभां तत्र, अर्थानर्थविनिश्चयम्‌॥527॥\n\nहनि्वालाथस जमिनाणाम, किद्राल्िदरज्न जञातम।\n\nबलकायस्य रक्षायै, सेनापत्यं स्थापयति स:॥528॥\n\n“आरक्ष्यर्थाय भण्डस्य, निधानकुशल नरम\n\nमा मे भण्डं विनश्येत्‌ इति, भण्डरक्षां स्थापयति स:॥529॥\n\n“मामको भवति यो राज्ञ:, वृद्धि यस्य च इच्छति।\n\nतस्याधिकरणं ददाति, मित्राय प्रतिपादितुम्‌॥530॥\n\nबहाँ रास्ते के मध्य सुव्यवस्थित चौराहा, आँगन और कोश्ठकों से युक्त बाजार तथा अर्थानर्थ के\nविनिश्चय के लिए न्‍्यायशाला का निर्माण कराए॥527॥\n\n-अदोष को जानने तथा सैन्यशक्ति की रक्षा के लिए\n28॥\n\nअमित्रों (शत्रु) के विनाश और उनके\nबह राजा सेनापति को स्थापित (नियुक्त) करता है॥\n\nजो मेरे धन-सम्पत्ति को सुरक्षित रखे, ऐसे निधानकुशल भाण्डारक्ष्य (व्यक्ति) को भाण्डागार\nकी पहरेदारी (रक्षा) हेतु बह (राजा) नियुक्त करता है॥529॥\n\nजो राजा ममत्वभाव से युक्त होता है मेरा अपना है और जो जिस राजा के वृद्धि की कामना\nकरता है ,उसको मित्रवत्‌ व्यवहार प्रदान करने के लिए उसको राजा अपना अधिपत्य प्रदान करते\nहैं॥530॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000818_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000818_indic_mozhi_deva_word_ocr_d0d22786d308.jpg", "ocr": "एकादा"} +{"id": "indic_deva_eval_000819_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000819_indic_mozhi_deva_word_ocr_bd1a64281eaa.jpg", "ocr": "मॉस्कोच्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000820_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000820_indic_mozhi_deva_word_ocr_d46c73fb917d.jpg", "ocr": "लांबचे"} +{"id": "indic_deva_eval_000821_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000821_indic_mozhi_deva_word_ocr_f50d63be7fd9.jpg", "ocr": "ईंधन"} +{"id": "indic_deva_eval_000822_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000822_indic_mozhi_deva_word_ocr_b6939242aa82.jpg", "ocr": "घटक"} +{"id": "indic_deva_eval_000823_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000823_indic_mozhi_deva_word_ocr_ee46ed138d0e.jpg", "ocr": "आणून"} +{"id": "indic_deva_eval_000824_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000824_indic_mozhi_deva_word_ocr_fc763daa573d.jpg", "ocr": "नंतरच्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000825_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000825_devanagari_page_ocr_d75f8b844b74.jpg", "ocr": "कं अपदानपालि\n\n“पड्चकप्पसहस्सम्हि, अट्ठ आसुं महातेजा [महावरा (सी०), महावीरा (स्या०)]।\nचतुत्तिंसे कप्पसते, चतुरो च महब्बला॥270॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥4274॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा सयनदायको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nसयनदायकत्थेरस्सापदानं ततियं।\n\n4. गन्धोदकियत्थेरअपदानं\n\n“पदुमुत्तरबुद्धस्स, महाबोधिमहो अहु।\n\nविचित्तं घटमादाय, गन्धोदकमदासहं॥4272॥\n“न्हानकाले च बोधिया, महामेघो पवस्सथा।\nनिन्‍नादो च महा आसि, असनया फलन्तिया॥4273॥\n\nपड्चकल्पसहसेउस्मिन्‌, अएट आसन्‌ महातेजा:।\n\nचतुस्य्रिशे कल्पशते, चल्वारश्व महाबला:॥270॥\nप्रतिसंविदश्वतस्र:...प्रे०... कृत॑ बुद्ध्य शासनम्‌\"॥4274॥\n\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ शयनदायकस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nसदह्मोत्तरबुद्धाय , महावोधिमहो5भूत्‌।\n\nविचित्र घटमादाय, गन्धोदकमदामहम्‌॥4272॥\n\nस्तनानकाले च संबोधौ, महामेघः प्रावर्षत।\n\nनिनादश्व महान्‌ आसीत्‌, अशन्‍्या: फलन्त्यास्‍॥4273॥\n\nपाँच हजारवें कल्प में आठ महातेजस्वी तथा चौतीसवें कल्प में चार महाबली राजा\nहॉंगे।॥4270॥\n\nचार प्रतिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों तथा पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को\nचूर्ण किया॥4274॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ शयनदायकस्थविर ने इन गाथाओं का भाषण किया।\n\nएक समय पह्मोत्तरसम्बुद्ध की महाबोधि की पूजा थी जिस पर मैंने सुगन्‍्धित जल से पूर्ण\nसुन्दर तथा शोभित घट द्वारा अभिसिश्वन किया।॥१272॥\n\nबोधिस्तान के अवसर पर महामेघ की वर्षा हुई साथ-साथ महा वज़पात और आकाशीय\nविद्युत की गर्जना भी हुई।॥4273॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000826_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000826_devanagari_page_ocr_503b22c7b303.jpg", "ocr": "॥नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥\nमिलिन्दपञ्हो\nपालि- मिलिन्दो नाम सो राजा सागलायं पुरुत्तमे।\n\nउपगछिछ नागसेनं गड्न्गा” व यथा! सागरं॥4॥॥\n\nआसज्ज राजा चित्रकर्थिं, उक्काधारं तमोनुदं।\n\nअपुच्छि निपुणे पड्हे, ठाना'ट्वानगते पुथू॥2।।\n\nपुच्छा विसज्जना चे'व गम्भीरत्थूपनिस्सिता।\n\nहृदयड्गमा कण्णसुखा, अब्भुता लोमहंसना॥ 3॥॥\nअभिधम्मविनयोगाव्ठ्हा, सुत्तजालसमत्थिता।\n\nनागसेनकथा चित्रा, ओपम्मेहि नयेहि च॥4।।\nतत्थ जञाणं पणिधाय हासयित्वान मानसं।\nसुणाथ निषुणे पडहे कडुखाठानविदालने'ति।।5।।\nसंस्कृतच्छाया-_ नमस्तस्मै भगवतेज्हते सम्यक्सम्बुद्धाय।\nमिलिन्दप्रश्नः\n\n, सागले पुरोत्तमे ।\nउपागमन्नागसेनं गडूगेव यथा सागरम्‌ ॥ 4॥।\nआसाद्य राजा चित्रकथिमुल्काधारं तमोनुदम्‌ ।\nअप्राक्षीज्षिपुणान्‌ प्रश्नान्‌, स्थानास्थानगतान्‌ पूथून्‌ ।। 2 ॥॥\nपृच्छा विसर्जना चैव गम्भीरार्थोपनि:श्रिता ।\nह्ृदयडगमा कर्णसुखा अद्भुता लोमहर्षणा ॥। 3 ॥।\nअभिधर्मविनयोद्धाढा, सूजजालसमर्थिता ।\nनागसेनकथा चित्रा औपस्गै्नयैश्व ।। 4 ॥।\nतत्र ज्ञानं प्रणिधाय, हासयित्वा मानसम्‌ ।\n_श्रणुत निषुणान्‌ प्रश्नाउशड्कास्थानविदालनानीति ॥ 5 ॥\nहिन्दी- मिलिन्दप्रश्न- जैसे गंगा नदी समुद्र से जा मिलती है उसी तरह सागल नामक उत्तम नगर में राजा मिलिन्द\n(यूनानी सम्राट) स्थविर नागसेन के पास गया।।4॥\n(अजञान रूपी) अंधकार को नाश करने वाले (ज्ञान रूपी) प्रकाश को धारण करने वाले तथा विचित्र\nवक्ता (नागसेन) के पास राजा ने जाकर अनेक विषयों के संबंध में सूक्ष्म प्रश्न पूछे।।2।।\nउन प्रश्नों के उत्तर गम्भीर अर्थों से युक्त, हृदयंगम, कर्णप्रिय, अद्भुत, अत्यन्त आनन्ददायक, अभिधर्म\nऔर विनय, के गाम्भीर्य से युक्त, सूत्रों के अनुकूल तथा उपमाओं और तर्कों की दृष्टि से न्‍्यायसंगत हैं।।3-4॥।\nशंकाओं को दूर करने वाले उन सूक्ष्म प्रश्नों को मन लगा कर प्रसन्नचित्त से आप सुनें।।5॥।\n\nसिलिन्दपण्हपालि, पु. 3, सम्पादक- स्वामी द्वारिकादासशास्त्री, प्रकाशक- बौद्धभारती, वाराणसी, 2006"} +{"id": "indic_deva_eval_000827_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000827_devanagari_page_ocr_1a7fa0f36278.jpg", "ocr": "30\n\nअपदानपालि\n\n“पकासिते पावचने, ब्रह्मवन्धु भविस्सति।\n\nब्रह्मज्जा अभिनिक्खम्म, पब्बजिस्सति तावबदे'॥624॥\n\n“पधानपहितत्तो सो, उपसन्‍्तो निरूपधि।\n\nसब्बासवे परिड्ञाय, निब्बायिस्सतिनासवो॥625॥\n\n“वबिजने पन्तसेस्यम्हि, वाव्ठमिगसमाकुले।\n\nसब्बासबे परिड्ञाय, निब्बायिस्सतिनासबो॥626॥\n\n“पटिसस्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अट्टठिमे।\n\nछव्कभिज्ञा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥627॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा पिण्डोलभारद्वाजों थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nपिण्डोलभारद्वाजत्थेरस्सापदानं अद्भमं।\n\nप्रकाशिते प्रबचने, ब्रह्मवन्धुर्भविष्यति।\nब्रह्मजों अभिनिष्क्रम्य, प्रत्रजिप्यति तावता'॥624॥\n“भ्रधानप्रहितात्मा स:, उपशान्तो निरूपधि:।\nसर्वाखवान्‌ परिज्ञाय, निर्वायिष्यत्यनाख्रव:॥625॥\n“विजने प्रान्तश्रे्ठे, व्यालमृगसमाकुले।\n\nसर्वाख्रवान्‌ परिज्ञाय, निर्वायिष्यत्यनाखरव:॥626॥\n“भ्रतिसंविदश्वतस्र:, विमोक्षा अपि चाष्टका:।\n'घडकिज्ञाः साक्षात्कृताः, कृतं बुद्धस्य शासनम्‌\"॥627॥\n\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ पिण्डोलभारद्वाज: स्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\n\nअगवान्‌ द्वारा प्रकाशित सद्धर्म को सुनकर वह ब्राह्मणकुल में उत्पन्न होगा तत्पश्चात्‌ ब्राह्मण\n\nकुल से अभिनिष्क्रमण कर प्रब्नज्या ग्रहण करेगा॥624॥\n\nबह शान्त, क्लेशशून्य तथा उत्साही पुरुष समस्त चित्तमलों का छेदन कर आखवरहित हो\n\nनिर्वाण को प्रास करेगा॥625॥\n\nसगे सम्बन्धियों से रहित वन्य प्राणियों से युक्त एकान्त व श्रेष्ठ स्थान पर सभी चित्तमलों का\n\nनाश कर आखवरहित निर्वाण को प्राप्त करेगा॥626।\n\nचार प्रतिसंबिदों, आठ विमोक्षों तथा षडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन\n\nकिया॥627॥\nइस प्रकार आयुप्सान्‌ पिण्डोल भारद्वाज स्थविर ने इन गाथाओं को कहा।"} +{"id": "indic_deva_eval_000828_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000828_indic_vision_bench_deva_ocr_b864a57a73cd.jpg", "ocr": "गोदान : 65\nमालती ने श्रद्धा-भरे स्वर में कहा-आप तकल्लुफ समझते होंगे, मैं समझती हूं, मैं अपना सम्मान बढ़ा रही हूं, यों आप अपने को कुछ न समझें और आपको शोभा भी यही देता है, लेकिन यहां जितने सज्जन जमा हैं, सभी आपकी राष्ट्र और साहित्य-सेवा से भली-भांति परिचित हैं। आपने इस क्षेत्र में जो महत्वपूर्ण काम किया है, अभी चाहे लोग उसका मूल्य न समझें, लेकिन\nवह समय बहुत दूर नहीं है—मैं तो कहती हूं वह समय आ गया है-जब हर एक नगर में आपके नाम की सड़कें बनेंगी, क्लब बनेंगे, टाऊनहालों में आपके चित्र लटकाए जांएगे। इस वक्त\nजो थोड़ी बहुत जागृति है, वह आप ही के महान् उद्योगों का प्रसाद है। आपको यह जानकर आनंद होगा कि देश में अब आपके ऐसे अनुयायी पैदा हो गए हैं, जो आपके देहात-सुधार\nआंदोलन में आपका हाथ बंटाने को उत्सुक हैं, और उन सज्जनों की बड़ी इच्छा है कि यह काम संगठित रूप से किया जाय और एक देहात सुधार-संध स्थापित किया जाय, जिसके आप\nसभापति हों।\nओंकारनाथ के जीवन में यह पहला अवसर था कि उन्हें चोटी के आदमियों में इतना सम्मान मिले। यों वह कभी-कभी आम जलसों में बोलते थे और कई सभाओं के मंत्री और उपमंत्री भी थे, लेकिन शिक्षित-समाज ने अब तक उनकी उपेक्षा ही की थी। उन लोगों में वह किसी तरह मिल न पाते थ��, इसलिए आम जलसों में उनकी निष्क्रियता और स्वार्थांधता की शिकायत किया करते थे, और अपने पत्र में एक-एक को रौंदते थे। कलम तेज थी, वाणी\nकठोर, साफगोई की जगह उच्छृखलता कर बैठते थे, इसीलिए लोग उन्हें खाली होल समझते थे। उसी समाज में आज उनका इतना सम्मान। कहां हैं आज 'स्वराज' और 'स्वाधीन भारत' \nऔर 'हंटर' के संपादक, आकर देखें और अपना कलेजा ठंडा करें। आज अवश्य ही देवताओं की उन पर कृपादृष्टि है । सदुद्योग कभी निष्फल नहीं जाता, यह ऋषियों का वाक्य है। वह स्वयं\nअपनी नजरों में उठ गए। कृतज्ञता से पुलकित होकर बोले-देवीजी आप तो मुझे कांटों में घसीट रही हैं। मैंने तो जनता की जो कुछ भी सेवा की, अपना कर्तव्य समझकर की। मैं इस सम्मान को व्यक्ति का सम्मान नहीं, उस उद्देश्य का सम्मान समझ रहा हूं, जिसके लिए मैंने अपना जीवन अर्पित कर दिया है, लेकिन मेरा नम्रनिवेदन है कि प्रधान का पद किसी प्रभावशाली पुरुष को दिया जाय, मैं पदों में विश्वास नहीं रखता। मैं तो सेवक हूं और सेवा करना चाहता हूं।\nमिस मालती इसे किसी तरह स्वीकार नहीं कर सकतीं। सभापति पंडितजी को बनना पड़ेगा। नगर में उसे ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति दूसरा नहीं दिखाई देता। जिसकी कलम में जादू है, जिसकी जबान में जादू है, जिसके व्यक्तित्व में जादू है, वह कैसे कहता है कि वह प्रभावशाली नहीं है। वह जमाना गया, जब धन और प्रभाव में मेल था। अब प्रतिभा और प्रभाव के मेल का युग है। संपादकजी को यह पद अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। मंत्री मिस मालती होंगी। इस सभा के लिए एक हजार का चंदा भी हो गया है और अभी तो सारा शहर और प्रान्त पड़ा हुआ है। चार-पांच लाख मिल जाना मामूली बात है।\nओंकारनाथ पर कुछ नशा-सा चढ़ने लगा। उनके मन में जो एक प्रकार की फुरहरी-सी उठ रही थी, उसने गंभीर उत्तरदायित्व का रूप धारण कर लिया। बोले-मगर यह आप समझ लें, मिस मालती, कि यह बड़ी जिम्मेदारी का काम है और आपको अपना बहुत समय देना पड़ेगा। मैं अपनी तरफ से आपको विश्वास दिलाता हूं कि आप सभा-भवन में मुझे सबसे पहले"} +{"id": "indic_deva_eval_000829_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000829_indic_mozhi_deva_word_ocr_2bbe7c93532e.jpg", "ocr": "स्वीकारावे"} +{"id": "indic_deva_eval_000830_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000830_indic_mozhi_deva_word_ocr_a97856b579bd.jpg", "ocr": "उठने"} +{"id": "indic_deva_eval_000831_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000831_hindi_handwritten_word_ocr_e55aea42bf31.jpg", "ocr": "पुरजोर"} +{"id": "indic_deva_eval_000832_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000832_hindi_handwritten_word_ocr_7c6779d8df86.jpg", "ocr": "छठें"} +{"id": "indic_deva_eval_000833_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000833_indic_mozhi_deva_word_ocr_c5801357b8ce.jpg", "ocr": "त्यांनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000834_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000834_devanagari_page_ocr_8aae2a689e7c.jpg", "ocr": "48. सिद्धत्थबुद्धवंसो\n458 जम\n\nपालि- सो बुद्धो सद्लिरतनं, अहोसि नभमुग्गतो।\nकड्चनग्धियसड्ककासो, दससहस्सी विरोचति॥750॥\n\nसोपि बुद्धो असमसमो, अतुलो अप्पटिपुग्गलो।\n\nवस्ससतसहस्सानि, लोके अट्भासि चक्खुमा॥754॥\n\nविपुल॑ पर दस्सयित्वा, पुप्फापेत्वान\n\nगपेत्वान साबके।\n\nबिलासेत्वा समापत्या, निब्बुतों सो ससावको॥752॥\nसिद्धत्थो मुनिवरो बुद्धों, अनोमारामम्हि निब्बुतो।\nतत्थेवस्स थ्रूपवरो, चतुयोजनमुग्गतोति॥753॥\nसिद्धत्थस्स भगबतो बंसो सोव्ठसमो।\nसंस्कृतच्छाया-. स बुद्ध: पष्टिसतम्‌, अभवत्‌ नभ उद्धतः।\nकाश्नार्ष्यसड्कासः, दशसाहसख॑ विरोचते॥750॥\nसोपचि बुद्ध असमसम: अप्रतिपुद्धलः।\nवर्षशतसहस्राणि, लोके अतिष्ठत्‌ चक्षुप्मान्‌॥754॥\nविपुलां प्रभां दर्शयित्वा, पुष्पयित्वा श्रावक:।\nबिलास्य समापत्याम्‌, निर्वुतः स सश्रावक:॥752॥\nसिद्धार्थों मुनिवरों बुद्ध:, अनोमारामे निर्वुतः।\nतत्रैव स स्तूपवरः, चतुर्योजनमुद्धत इति॥753॥\nहिन्दी- उन बुद्ध का शरीर साठ रब(द्वादशांगुलिप्रमाण) ऊँचा था। वह शरीर स्वर्णप्रतिमा के समान और इस की\nआशा से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आलोकित होता था॥750॥\nलोक में उन के समान या उन का कोई प्रतिद्वन्द्दी नहीं था। इस प्रकार वे ज्ञानी इस लोक में एक लाख\nवर्ष तक विराजमान रहे॥75॥\nइस प्रकार, वे सिद्धार्थ बुद्ध लोक में अपना विपुल धर्मप्रकाश दिखा कर, शिष्यों को साधना में पल्‍्लचित\nपुष्पित कर लथा उनको अपनी इस नवविध धर्मसाधना में अधिक से अधिक आगे बढ़ाकर, समय आने पर शिष्यों\nसहित परिनिर्वृत हो गये॥752॥\nइन सिद्धार्थ बुद्ध का परिनिर्वाण अनोमाराम में हुआ। वहीं इन की स्मृति मे चार योजन ऊँचे स्तूप का\nनिर्माण किया॥753॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000835_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000835_devanagari_page_ocr_3f14c600edce.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\nजव7\n\nदोसोयेव सिया, अत्थिसद्धादीन॑ं बिय पन नत्थिसद्स्सपि पठमाय योगतो “अत्तकारे”ति इर्द\n'पच्चत्तवचनमेवाति विज्ञायति। “बाले च पण्डिते च सन्धावित्वा संसरित्वा दुक्‍्खस्सन्तं\nकरिस्सन्‍्ती”ति एत्थापि पच्चत्तवचनस्स “भुम्मवचननिद्देसो”ति वा “उपयोगवचननिद्देसो”ति\nवा गहणे सति “बाला च पण्डिता चा”ति एत्तकम्पि वत्तुं अजाननदोसो सिया, “करिस्सन्‍्ती”त���\nपदयोगतोी पन “बाले चा”तिआदि पजक्चत्तवचनमेवाति विज्ञायति। यथा पन\nनिग्गहीतागमवसेनुच्चारिते “चक्खुं उदपादी”ति पदे पच्चत्तवचनस्स “चक्खुं में देहि\nयाचितो\"”ति एत्थ उपयोगवचनेन सुतिवसेन समानत्तेषि पच्चत्तवचनत्थोयेव सोतारे पटिभाति\n“उदपादी”तिआख्यातेन कथितत्ता, न पन॒ विभत्तिविपल्लासत्थभूतो उपयोगवचनत्थो\n“उदपादी\"तिआख्यातेन अवचनीयत्ता, “चक्खुं उदपादी”ति हि भगवता बुत्तकाले को “चक्खुं\nउदपादी”ति पदं॑ परिवत्तित्वा अत्थमाचिक्खति, तथा “बाले पण्डिते”तिआदीनम्पि\nपच्चत्तवचनानं अपरेहि “बाले पण्डिते”तिआदीहि भुम्मोपयोगवचनेहि सुतिवसेन समानत्तेषि\nपच्चत्तवचनत्थोयेव सोतारे पटिभाति, न इतरवचनत्थो यथापयोगं अत्थस्स गहेतब्बत्ता। इति\n\n“बनप्पगुम्बे, बाले, पण्डिते”तिआदीन॑ सुद्धपच्चत्तवचनत्तज्जेव सारतो पच्चेतब्बं, न\nसुतिसामज्जेन भुम्मोपयोगवचनत्तं।\nय॑ पनाचरियेन जातकट्ठकथायं -\n\n“तयो गिरिं तिअन्तरं कामयामि, पड्चाला कुरुयो केकके चा\n\nततुत्तरिं ब्राह्मण कामयामि, तिकिच्छ म॑ ब्राह्मण कामनीत\"क्ति -\nइमस्स कामनीतजातकस्स संवण्णनायं “केकके चाति पच्चत्ते उपयोगबचन, तेन केककस्स रह\nवदन्‍्तो च सो “पुरिसे पस्सति, पुरिसे पतिट्टठित”न्ति, “पस्सामि लोके सधने\nमनुस्सेटति च आदीसु येशुस्येन “\"पुरिसे, लोके, सधने, मनुस्से”तिआदीन॑\nउपयोगबहुवचनभुम्मेककचन भावेन आगतत्ता पच्चत्तेककचनबहुवचनभावस्स पन अपाकटत्ता\nयेभुय्यप्पवत्तिं सन्‍्धाय “इदसम्पि तादिसमेवा”ति मज्ञमानो वदति मज्ञे। आचरिया हि कत्थचि\n\nअत्तनों रुचियापि विसुं विसुं कथेन्ति। अय॑ पन अम्हाक॑ रुचि - “केकके”ति इ्द पत््चत्तवचनमेव\n“पड्चाला, कुरुयो\"एति सहजातपदानि विय, रह्भवाचकत्ता पन “कुरुयो\"ति पदमिव\nबहुवचनवसेन बुत्त। न हि भगवा “खत्तियो, ब्राह्मणों, वेस्सो”तिआदीसु विय समानविभत्तीहि\nनिद्विसितब्वेस सहजातपदेस्‌ पच्छिम॑ उपयोगवचनवसेन निद्दिसेय्य, युक्ति च न दिस्सति"} +{"id": "indic_deva_eval_000836_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000836_devanagari_page_ocr_b03cb298dd7a.jpg", "ocr": "अपदानपालि\nशा5\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अद्विमे।\nछव्ठभिज्ञा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥4007॥\n\nइत्थ॑ सुदं आयस्मा कुण्डधानों थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nकुण्डधानत्थेरस्सापदान पठम॑।\n\n2. सागतत्थेरअपदानं\n\n“सोभितो नाम नामेन, अहोसिं ब्राह्म��ों तदा।\n\nपुरकक्‍्खतो ससिस्सेहि, आराम॑ अगमासहं॥4008॥\n\n“भगवा तम्हि समये, भिक्खुसडूघपुरक्खतो।\n\nआरामद्वारा निक्‍्खम्म, अट्भासि पुरिसुत्तमो॥4009॥\n\n“तमदसासिं सम्बुद्ध, दन्तं दन्‍्तपुरक्खतं।\n\nसक॑ चित्त पसादेत्वा, सन्‍्थविं लोकनायकं॥4040॥\nप्रतिसंविदश्वतस्र:, विमोक्षा अपि चाष्टका:।\n'पडशिज्ञा: साक्षात्कृता, कृतं बुद्धस्य शासनम्‌\"॥4007॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ कुण्डधानस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nशोभितो नाम नासा, अभूव॑ ब्राह्मणस्तदा।\nपुरस्कृत: सशिष्यै:. आरामम्‌ अगममहम्‌॥008॥\nभगवांस्तस्मिन्‌ समये, भिक्षुसड्घपुरस्कृत:।\nआरामद्वारात्‌ निष्क्रम्य, अतिष्ठत्‌ पुरुषोत्तम:॥009॥\nतमद्राक्षे सम्बुद्धम, दान्‍्त॑ दान्तपुरस्कृतम।\nस्वक॑ चित्त प्रसाद्य, समस्‍्तों लोकनायकम्‌॥4040॥\n\nमैंने चार प्रतिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों तथा पडभ्िज्ञाओं का साक्षात्कार कर बुद्धशासन को\nचूर्ण किया॥१007॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ कुण्डधान स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nडस समय मैं शोभित नामक ब्राह्मण था तथा शिष्यों से पुरस्कृत हो मैं आराम को\nगया॥4008॥\n\nउस समय भिक्षुसंघ से पुरस्कृत पुरूषोत्तम भगवान्‌ आरामद्वार से निकलकर खड़े हुए\nथे॥009॥\n\nतब सैंने उन संयतेन्द्रिय तथा संयत शिष्यों से पुरस्कृत सम्बुद्ध को देखा और प्रसन्नतापूर्वक उन\nलोकनायक की स्तुति की॥040॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000837_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000837_hindi_handwritten_word_ocr_3f6d0acdb9c5.jpg", "ocr": "पोस्को"} +{"id": "indic_deva_eval_000838_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000838_hindi_handwritten_word_ocr_b9788d8ce187.jpg", "ocr": "सी-रीएक्टिव"} +{"id": "indic_deva_eval_000839_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000839_indic_mozhi_deva_word_ocr_c46bd43396ac.jpg", "ocr": "कुणी"} +{"id": "indic_deva_eval_000840_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000840_devanagari_page_ocr_b8adf22d55c4.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n208: न्‍\n\nकत्थचि “यस्स एते धना अत्थी”ति एत्थ विय। एत्थ हि यस्स एतानि धनानीति अत्थों। इदम्पेत्थ\nसललक्खितब्बं। मालासद्यो द्विलिडइगो इत्थिनपुंसकवसेन। तिड्ठतुतस्सित्थिलिड्गत्त\nसुविच्जेय्नत्ता, नपुंसकत्ते पन तीणि मालानि। \"मालेहि च ग्धेहि च भगवतो सरीरं\nपूजेन्ती”तिआदयो नपुंसकप्पयोगानिपि बह सन्दिस्सन्तीति।\n\nयदि पन भो मालसद्दो इत्थिनपुंसकवसेन द्विलिडगो, “सब्बे माला उपेन्ति म”न्ति एत्थ\nमसालासद्स्स इत्थिलिड्गभावपरिकप्पने को दोसो अत्थीति? अत्थेव इत्थिलिड्गसद्वस्स\nपुल्लिड्गभूतेन सब्बनामिकपदेन सद्धिं समानाधिकरणभ��वस्साभावतो, नपुंसकलिड्गस्स पन\nपुल्लिड्गभूतेन सब्बनामिकपदेन सद्धिं समानाधिकरणभावस्स उपलब्भनतो। तेनेव च “एते\nधना\"तिआदयो पयोगा पावचने बहुधा दिटद्ठा। एत्थापि पन वहदेख्युं “धनातिआदीनि\nविपल्लासवसेन पुल्लिड्गानियेव “एते”तिआदीहि समानाधिकरणपदेहि योजितत्ता”ति। न,\nनपुंसकानिय्रेवेतानि। यदि हि “धना\"तिआदीनि पुल्लिद्गानि सियुं, कल्थचि पच्चत्तेकवचनद्ाने\n'तिआदीहि. ओकारन्तसमानाधिकरणपदेहि योजिता ओकारन्तधनसद्दादयो सियुं।\nतथारूपानं अभावतो पन “धना इन्द्रिया विड्ञाणा”तिआदयो सद्दा नपुंसकलिडूगानियेव\nहोन्ति। अय॑ नयो पज्वत्तनहुबचनद्ठानेयेव लब्भति। नपुंसकलिड्गानि हि विसदाकारानि\nघुल्लिड्गरूपानि विय ह॒त्वा पुल्लिड्गेहिपि सद्धिं चरन्ति, नपुंसका विय पुरिसवेसधारिनो\nपरिसेह्लीति निड्मेत्थावगन्तब्बो।\n\nअथापि ते पुब्बे बुत्तवचन पुन परिवत्तेत्वा एवं वदेय्युं “चित्तों गहपति, चित्ता\nइत्थी”तिआदीसु चित्त एतस्स अत्थीति चिक्तो, चित्त एतिस्सा अत्थीति चित्ता यथा “सद्धो,\nसद्धा”ति एवं अस्सत्थीति अत्थवसेन गह्ेतब्बतो लिडगविपल्लासो निच्छितब्बो, “सतिपट्ठानो\nधम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा”तिआदीनि पन एवरूपस्स अत्थस्स अग्गहेतब्बतो\n\n“सतिपट्ठानं धम्मो, चित्त धम्मो, चित्तानि धम्मा”ति बत्तब्बे लिइ्गविपल्लासेन “सतिपट्ठानो\nधम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा\"तिआदि वुत्तन्ति लिड्गविपल्लासो इच्छितब्बो”ति? तन्‍्न,\n“चित्तो गहपती”तिआदीसु पन “सतिपट्ठानो धम्मो\"तिआदीसु च चित्तसतिपट्ठानसद्दादीनं\nगहपति धम्मादीनं अपेक्खनवसेन निच्च॑ पुल्लिड्गभावस्स इच्छितत्ता।\n\nतथा हि एकन्‍्तनपुंसकलिड्गोपि पुछ्ञसद्दो अभिसड्खारापेक्खनवसेन “पुज्जो\nअभिसड्ूखारो”ति पुल्लिड्गो जातो, तथा एकनन्‍्तनपुंसकलिड्गापि पदुम मडूगलसद्दादयो"} +{"id": "indic_deva_eval_000841_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000841_devanagari_page_ocr_9df503152b47.jpg", "ocr": "मसहावंसो\n\nज्ख््न्53\nसेनापतितस्स रज्ञो, थेरस्स दीघसन्दको।\nकारेसि चूबव्ण्पासादं, महाथम्भेहि अट्ठहि॥242॥\nदीघसन्द सेनापति-परिवेणन्ति तं तहिं।\nबुच्चते परिवेणं तं, पसुखं पमुखाकरं॥243॥\nदेवानंपियवचनो\"”पगुव्ठनामो, लंकायं पठममिमं महाविहारं।\nराजा सो सुमतिमहामहिन्दथेरं, आगम्मा मलमतिमेत्थकारयित्थाति॥244॥\n\nसुजनप्पसाद संवेगत्थाय कते महावंसे\n\nमसहावि��ारपटिग्गहको नाम\n\nपन्‍नरसमो परिच्छेदो।\nसंस्कृतच्छाया- _ सेनापति तस्य राज्ञ:, स्थविरस्य दीघसन्दक:।\n\nअकारयत्‌ चूलप्रासादं, महास्तम्भै अष्टभि:।।242।।\nदीघसन्दसेनापति-परिवेणमिति तं॑ तत्न।\n\nउच्यते परिवेणं तं, प्रमुखं प्रमुखाकरम्‌।।243॥।\nदेवानाम्प्रियवचनोपगूढनाम:, लंकायां प्रथममिदं महाविहारम्‌।\n\nराजा सः सुमतिमहामहेन्द्रस्थविरम्‌, आगम्यामलमतिमत्र अकारापयत्‌।।244॥।\n\nहिन्दी- उस राजा के दीर्घस्यन्दन नामक सेनापति ने स्थविर के लिये आठ ऊंचे स्तम्भों को पार कर एक छोटा\nप्रासाद बनवाया।।242॥॥\n\nतभी से वह वहाँ 'दीर्घस्यन्दनसेनापति परिवेण' कहलाया, जहाँ प्रधान पुरुष आकर ठहरते ये।।243॥।\n\n'देवानाम्प्रिय' इस उपनाम वाले उस सुबुद्धि राजा तिष्य ने लड्काद्वीप में विमलमति महामहेन्द्र स्थविर के लिये\nयह प्रथम महाविहार महामेघवनाराम बनवाया।।24।।"} +{"id": "indic_deva_eval_000842_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000842_devanagari_digits_mixed_67ab0cb9446d.jpg", "ocr": "५७3५९1089२"} +{"id": "indic_deva_eval_000843_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000843_indic_vision_bench_deva_ocr_86b7607eee98.jpg", "ocr": "अल्लामा मशरिक़ी\n३१\nअनुयायियों द्वारा दी गई उपाधि। जन्म २५ अगस्त सन् १८८८ को अमृतसर में हुआ। इनके पिता ख़ाँ अतामुहम्मद ख़ाँ कट्टर मुसलमान थे और इनकी देखरेख में इनायतुल्ला ख़ाँ बाल्यकाल से पूर्णतया इसलामी रँग में रँग गये। १९ वर्ष की आयु मे एम॰ ए॰ में सर्वप्रथम उत्तीर्ण हुए। पश्चात् कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गये और वहाँ से सनद हासिल की। इँगलैण्ड से वापस आने पर इस्लामिया कालिज, पेशावर, के उप-प्रधानाध्यापक तथा बाद मे प्रधानाध्यापक बने। सन् १९१७ में भारत-सरकार ने इन्हें शिक्षा-विभाग का उप-मंत्री (Under Secretary) नियुक्त किया। सन् १९१९ में आप आई॰ ई॰ एस॰ से युक्त होकर पेशावर गये। इन दिनो आपने सब सरकारी स्कूलों में क़ुरान का अध्ययन अनिवार्य कर दिया, यद्यपि सरकार ने उनके इस कार्य का विरोध किया।\nसन् १९३० में\nलाहोर\nके निकट इछरा गाँव में इन्होने ख़ाकसार दल की नींव डाली। किन्तु २ वर्ष मे केवल ९० व्यक्ति इसमें भर्ती हुए। इसके बाद जब\nलाहोर\nमे इसका काम शुरू हुआ तो क़रीब ३०० नवयुवक इसमे शामिल हो गये। २-३ वर्षों में यह आन्दोलन पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त, हैदराबाद और सिन्ध में फैल गया। तब इनायतुल्ला साहब ने 'अलइसलाह' नामक उर्दू-पत्र निकाला। सन् १९३५ के अन्त मे देहली मे इन्होने एक कैम्प खोला, जहा�� करीब ३०० जगहों से ख़ाकसार शामिल हुए। सन् १९३७ में जब कांग्रेस-मंत्रि-मण्डल स्थापित हुए और कांग्रेसी प्रान्तों में हिन्दू-मुसलिम उपद्रव होने लगे, तथा लखनऊ मे तबर्रा और मदहेसहाबा का आन्दोलन शुरू हुआ और संयुक्त-प्रदेश तथा उसके बाहर फैला, तब ख़ाकसारो ने संयुक्त-प्रान्त में सरकार के विरुद्ध ज़ोरो से आन्दोलन शुरू किया। जब अल्लामा की\nकाररवाइयाँ\nप्रान्त की शान्ति के लिए ख़तरनाक रूप धारण करने लगी, तब १ सितम्बर १९३९ को, संयुक्त-प्रान्त की सरकार की आज्ञा से, लखनऊ में उन्हें गिरफ्तार किया गया। २ सितम्बर १९३९ को अल्लामा मशरिक़ी ने जेल मे ख़ानबहादुर हाफिज़ वाजिदहुसैन रिज़वी, कर्नल जाफरी तथा अन्य अफसरों के सामने एक इक़रारनामा इस आशय का लिखा कि \"दफ़ा १०७ का नोटिस वापस हो जाने की तारीख़ से साल"} +{"id": "indic_deva_eval_000844_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000844_indic_mozhi_deva_word_ocr_cad84b053dee.jpg", "ocr": "तन्मय"} +{"id": "indic_deva_eval_000845_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000845_indic_mozhi_deva_word_ocr_ed7d7e540ba8.jpg", "ocr": "लगन"} +{"id": "indic_deva_eval_000846_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000846_hindi_handwritten_word_ocr_c24b8b5d362e.jpg", "ocr": "सामईन"} +{"id": "indic_deva_eval_000847_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000847_devanagari_page_ocr_582b483c2bb0.jpg", "ocr": "354 संयुत्तनिकायपालि\n\n६. सूकरखतवग्गो\n५१. सालसुत्तं\n\n५१. एवं मे सुतं - एकं समयं भगवा कोसलेसु विहरति सालाय ब्राह्मणगामे। तत्र खो\nभगवा भिक्खू आमन्तेसि -- “सेय्यथापि, भिक्खवे, ये केचि तिरच्छानगता पाणा, सीहो\nमिगराजा तेसं अग्गमक्खायति, यदिदं -- थामेन जवेन सूरेन; एवमेव खो, भिक्खवे, ये केचि\nबोधिपक्खिया धम्मा, पड्जिन्द्रियं तेसं अग्गमक्खायति, यदिदं -- बोधाय'”।\n\n““कतमे च, भिक्खवे, बोधिपक्खिया धम्मा? सद्दिन्द्रियं, भिकक्‍्खवे, बोधिपक्खियो\nधम्मो, त॑ बोधाय संबत्तति; वीरियिन्द्रियं बोधिपक्खियो धम्मो, त॑ बोधाय संबत्तति;\nसतिन्द्रियं बोधिपक्खियो धम्मो, त॑ बोधाय संवत्तति; समाधिन्द्रियं बोधिपक्खियो धम्मो, तं\nबोधाय संवत्तति; पडिजिन्द्रियं बोधिपक्खियो धम्मो, तं बोधाय संवत्तति। सेय्यथापि, भिक्‍्खवे,\nये केचि तिरक््छानगता पाणा, सीहो मिगराजा तेसं अग्गमक्खायति, यदिदं -- थामेन जबेन\nसूरेन; एवमेव खो, भिक्खवे, ये केचि बोधिपक्खिया धम्मा, पड्जिन्द्रियं तेसं अग्गमक्खायति,\n\nबोधाया''ति।\n[संस्कृतच्छाया)५ १. एवं मया श्रुतम। एकस्मिन्‌ समये भगवान्‌ कोसलेषु विहरति शालायां\nब्राह्मणग्रामे। तत्र खलु भगवान्‌ भिक्षून्‌ आम��्त्रयत - “तद्यथापि, भिक्षवः! ये केचित्‌ तिरश्वीनगता\nप्राणा:, सिंह: मृगराजा: तेषाम्‌ अग्रमाख्यायते, यदिदम्‌ - स्थाम्ना जबेन शौर्येण; एवमेव खलु,\nजझ्िक्षब:! ये केचित्‌ बोधिपक्षीया: धर्मा:, प्रज्ञेन्द्रियम्‌ तेघाम्‌ अग्रमाख्यायते, यदिदम्‌ - बोधाय”।\n\n“कतमे च, भिक्षव:, बोधिपक्षीया: धर्मा:? श्रद्धेन्द्रियम्‌, भिक्षब:! बोधिपक्षीय: धर्म:ः, तत्‌\nवीर्येन्द्रियं बोधिपक्षीय: धर्म:, तत्‌ बोधया संवर्तते; स्मृतीन्द्रियं बोधिपक्षीय: धर्म:,\nतत्‌ बोधया संवर्तते; समाधीन्द्रियं बोधिपक्षीय: धर्म:, तत्‌ बोधया संबर्तते; प्रज्ञेन्द्रियं बोधिपक्षीय:\nधर्म:, तत्‌ बोधया संवर्तते। तद्यथापि, भिक्षव:! ये केचित्‌ तिरश्वीनगता प्राणा:, सिंह: मृगराजा:\nतेषाम्‌ अग्रमाख्यायते, यदिदम्‌- स्थास्रा जवेन शौर्येण; एवमेव खलु, भिक्षव:! ये केचित्‌ बोधिपक्षीयाः\nधर्मा:, प्रजेन्द्रियम तेघाम्‌ अग्रमाख्यायते, यदिदम्‌ - बोधाय”इति।\nकहिन्दी) ५१. ऐसा मैंने सुना है। एक समय, भगवान्‌ कोशल में शाला नामक किसी ब्राह्मणों के ग्राम में विहार करते\nथओे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को बुलाया- भिक्षुओं! जैसे, जितने तिरश्वीन (>पशु) प्राणी हैं सभी में मृगराज सिंह\nबल, तेज, और वीरता में अग्र समझा जाता है। भिक्षुओं ! वैसे ही, जिनते ज्ञान-पक्ष के धर्म हैं सभी में ज्ञान-प्राप्ति के\nलिये प्रज्ञा-इन्द्रिय ही अग्र समझा जाता है।\n\nभिक्षुओं! बोधिपक्षीय धर्म कौन हैं? भिक्षुओं ! श्रद्धा-इन्द्रिय बोधिपक्षीय धर्म है, उससे ज्ञान की प्राप्ति होती\nहै। वीर्य-इन्द्रिय बोधिपक्षीय धर्म है, उससे ज्ञान की प्रासि होती है। समाधि- इन्द्रिय बोधिपक्षीय धर्म है, उससे ज्ञान\nकी प्रासि होती है। प्रज्ञा-इन्द्रिय बोधिपक्षीय धर्म है, उससे ज्ञान की प्राप्ति होती है। भिक्षुओं! जैसे, जितने तिरश्वीन\nप्राणी हैं सभी में मृगराज सिंह बल, तेज, और वीरता में अग्र समझा जाता है। भिक्षुओं ! वैसे ही, जिनते ज्ञान-पक्ष\nके धर्म हैं सभी में ज्ञान-प्राप्ति के लिये प्रज्ञा-डन्द्रिय ही अग्र समझा जाता है।"} +{"id": "indic_deva_eval_000848_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000848_hindi_handwritten_word_ocr_25ca8f6527e3.jpg", "ocr": "पड़ेंगे।"} +{"id": "indic_deva_eval_000849_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000849_indic_mozhi_deva_word_ocr_cca8173a10ca.jpg", "ocr": "मला"} +{"id": "indic_deva_eval_000850_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000850_devanagari_page_ocr_df6eb5defa96.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n249\n\nतस्मा 'आसं न कुज्झन्ति, इत्थीन॑ पण्डिता'इति।\nअत्���ोव भवते एबं, सुट्कु धारेहि पण्डिता\"ति॥\nअथ वा यस्मा निरुत्तिपिटके “नं पुरिसं पस्सति, ने पुरिसे पस्सती”तिआदिना पदतों\nअपरत्तेपि “नं, ने” इच्चादीनि पदानि वुत्तानि, तस्मा तेनापि नयेन पदतो अपरानिपि तानि\nकदाचि सियुं। मय॑ पन पाक्िनयानुसारेन तेसं पवत्तिं वदाम, इदं ठान॑ सुट्ठु विचारेतब्बं।\nएत्थ पन तसदस्स परपदेहि सद्धिं समासोषि वेदितब्बो “तंपुत्तो, तंसदिसो, तन्निन्‍्नों,\nतग्गुणो, तस्सदिसो\"लि।\n\nतप्पोणों, तप्पब्भारो, तब्भूतो,\nतसदइस्स समासम्हि, सद्धिं परपदेहि वे।\nनिग्गहीतागमो पुब्ब-पदे द्वित्तन्तु पच्छिमे॥\nएवं तसदस्स समासो सललकिखितव्वो।\nइदानि एतसहस्स नामिकपदमाला बुच्चते -\n'एसो, एते। एतं, एते। एत्तेन, एतेहि, एतेशि। एतस्स, एतेसं, एत्तेसानं। एतस्मा, एतम्हा,\nएतेहि, एतेमि। एतस्स, एतेसं, एतेसानं। एतस्मिं, एतम्हि, एतेसु। इदं पुल्लिड्-गं।\nएत॑, एतानि। एत॑, एतानि। सेस॑ पुल्लिड्गसदिसं, इदं नपुंसकलिडगं।\nएसा, एता, एतायो। एत॑, एता, एतायो। एताय, एताहि, एतामि। एताय, एतिस्सा,\n\nएतिस्साय, एलासे। एलाय, एताहि, एलालि। एलाय, एतिस्सा, एलिस्साय, एलास। एताय,\nएतिस्सं, एतासु। इदं इत्थिलिडुगं। एवं एतसद्वस्स नामिकपदमाला भवति।\nपरपदेनेत्थ सद्धिं समासोपिस्स वेदितब्बो “एतदत्थाय लोकस्मिं, 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चरित्र\n(चरित्र)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१८६/रु.२५०/तिसरी सुधारित आवृत्ती\n५. एकविसाव्या शतकातील शिक्षण\n(शैक्षणिक लेखसंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१७६/रु.२२५/दुसरी सुधारित आवृत्ती\n६. कोल्हापूरचे स्वातंत्र्योत्तर समाजसेवक\n(व्यक्तीलेखसंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१७५/रु.२००/तिसरी आवृत्ती\n७. प्रेरक चरित्रे\n(व्यक्तीलेखसंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.३१/रु.३५/तिसरी आवृत्ती\n८. दुःखहरण\n(वंचित कथासंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१३०/रु.१७५/दुसरी आवृत्ती\n९. निराळं जग, निराळी माणसं\n(संस्था/व्यक्तिविषयक लेखसंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१४८/रु.२००/दुसरी आवृत्ती\n१०. शब्द सोन्याचा पिंपळ\n(साहित्यविषयक लेखसंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.२११/रु.२७५/तिसरी सुधारित आवृत्ती\n११. आकाश संवाद\n(भाषण संग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१३३/रु.१५०/दुसरी सुधारित आवृत्ती\n१२. आत्मस्वर\n(आत्मकथनात्मक लेख व मुलाखती संग्रह)\nसाकेत प्रकाशन,औरंगाबाद/२०१४/पृ.१६०/रु.१८०/प्रथम आवृत्ती\n१३. एकविसाव्या शतकातील सामाजिक प्रश्न\n(सामाजिक लेखसंग्रह)\nअक्षर दालन, कोल्हापूर/२०१८/पृ.१९४/रु.२००/दुसरी आवृत्ती\n१४. समकालीन साहित्यिक\n(समीक्षा)\nमेहता पब्लिशिंग हाऊस, पुणे/२०१५/पृ.१८६/रु.२००/दुसरी आवृत्ती\nकोल्हापूरचे स्वातंत्र्योत्तर समाजसेवक/१७९"} +{"id": "indic_deva_eval_000852_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000852_devanagari_page_ocr_ff26bee4c6b1.jpg", "ocr": "छुचापिल्द प्दुचचरनलिल्जसेः\n\nयेरापदानपालि (27-42 वग्गो)\n\nहज (42\n\n ॥\n\nरष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानम्‌ (मानितविश्वविद्यालयः)\n०त ०9 '॥४००८\"' ५शांत \"२ 5छाउत०\n(केन्द्रीय-मानव-संसाधन-विकास-मन्त्रालयाधीनम्‌)\nलखजऊउ-'"} +{"id": "indic_deva_eval_000853_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000853_devanagari_page_ocr_dccf5097df2a.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n224- न्‍\n\nकतमानि तानि पदानि, यानि सविसेसानि?\nभवाभवादिकं लड्न्‍का-दीपो इच्चादिकानि च।\nबोधि सन्‍्धीति चादीनि, सबिसेसानि होन्ति तु॥\nएतेसु हि-\nभवाभवपदं देक-वचो बहुवचो क्वचि।\nसमासे असमासेपि, सम्भवो तस्स इच्छितो॥\nविग्गहड्च पदत्थउ्च, वत्वा पदस्सिमस्स मे।\nव॒च्चमानसविकिसित्ता, पदसाल निवोधथ॥।\n\nभवो च अभवों च भवाभवं। अथ वा भवो च अभवो च भवाभवानि, अयं विग्गहो। तत्र\nभवोति खुद्दको भवो। अभवोति महनन्‍्तो भवों। बुद्धत्थवाचको हेत्थ अकारो। एत्थ च\nसुगतिदुग्गतिवसेन हीनपणीतबसेन च खुद्���कमहन्तता बेदितब्बा। अथ वा भबोति बुद्धि।\n\nअभवोति अबुद्धि। अय॑ पदत्थो। अयं पन नामिकपदमाला -\n\nभवाभवं, भवाभवं, भवाभवेन, भवाभवस्स, भवाभवा,\n\nभवाभवस्स, भवाभवे, भवाभवस्मि, भवाभवम्हि, भो भवाभव। इति भवाभवपद एकवचनकं\n\nभवतति। दिस्‍्सति च तस्सेकवचनता पाछ्ियं अट्ठकथायड्च -\n“अतीतकप्पे चरितं, ठपयित्वा भवाभवे।\nइमस्मिं कप्पे चरितं, पबक्खिस्सं सुणोहि मे”\nइति बा,\n“एवं बहुविध॑ दुक्खं, सम्पत्तिड्च बहुविध।\nभवाभवे अनुभवित्वा, पत्तो सम्बोधिसुत्तमं”\nइति वा एवं पाछ्ियं भवाभव पदस्स एकवचनता दिद्ठा।\nअद्लकथायम्पि -\n'असस्बुर्ध बुद्धनिसेवित य॑,\nभवाभवं गच्छति जीवलोको।\nनमो अविज्जादिकिलेसजाल-\nविद्धंसिनो धम्मवरस्स तस्सा”ति\nएवं तस्सेकबचनता दिद्ला।"} +{"id": "indic_deva_eval_000854_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000854_indic_mozhi_deva_word_ocr_343bf7287a7f.jpg", "ocr": "मुद्दाम"} +{"id": "indic_deva_eval_000855_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000855_indic_mozhi_deva_word_ocr_91233c573b2e.jpg", "ocr": "औषधपाण्यासाठी"} +{"id": "indic_deva_eval_000856_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000856_indic_mozhi_deva_word_ocr_40fa6b756ed0.jpg", "ocr": "दूसरे"} +{"id": "indic_deva_eval_000857_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000857_hindi_handwritten_word_ocr_3bc91a561984.jpg", "ocr": "लटकाएं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000858_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000858_devanagari_page_ocr_a4be8a9fd253.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n409\n\nअस्मा पन पाछ्तो अद्लकथा बलबती नाम नत्थि, तस्मा पाक्किनयानुरूपेनेब आपसइस्स\nनामिकपदमालं योजेस्साम सोतूनमसम्मोहत्थं, किमेत्थ सद्दसत्थनयो करिस्सति। जत्नाय॑\nउदानपाकछ्ि “किं कयिरा उदपानेन, आपा चे सब्बदा सियु”न्ति।\nआपो, आपा। आपं, आपे। आपेन, आपेहि, आपेभि। आपस्स, आपानं। आपा, आपस्मा,\nआपम्हा, आपेहि, आपेभि। आपस्स, आपानं। आपे, आपस्मि, आपम्हि, आपेसु। भो आप, भवन्तो\nआपा।\nसब्बनामादीहिपि योजेस्साम - यो आपो, ये आपा। यं आपं, ये आपे। येन आपेन, सेसं\nनेय्यं, सो आपो, ते आपा। अतीतो आपो, अतीता आपा। सेसं नेय्यं। इच्चेवं -\nपुरिसेन समा आप-सद्दादी सब्बथा मता।\nन सब्बधाव गोसद्दो, पुरिसेन समो मतो॥\nमनादी एकदेसेन, पुरिसेन समा मता।\nसरादी एकदेसेन, सब्बथा वा समा मता॥\nये पनेत्थ सद्दा “मनोगणो”ति बुत्ता, कं तेसं मनोगणभावों सल्लक्खेतब्बोति? बुच्चते तेस॑\nमसनोगणभावसल्लक्खणः\n\n'कारणं -\n\nसनोगणों मनोगणा- दिका चेबा'सनोगणो।\nइति सद्दा तिधा जेय्या, मनोगणविभावने॥\nये ते ना स स्मिंविसये, सा सो स्यन्‍्ता भवन्ति चा।\nसमासतद्धितन्तत्ते, मज्ञोकारा च होन्ति हि॥\nसोकारन्तपयोगा च, क्रियायोगम्हि ���िस्सरे।\nएवंविधा च ते सद्दा, अेय्या “मनोगणो\"”इति॥\nअत्र तस्सत्थस्स साधकानि पयोगानि सासनतो च लोकतो चर यथारहमाहरित्वा\nदस्सेस्साम - मनसा चे पसन्‍नेन, भासति वा करोति वा। न मय्हं मनसो पियो। साधुक॑ मनसि\n\nकरोथ। मनोपुब्बड्झग्ा धम्मा। मनोरम॑, मनोधातु, मनोमयेन कायेन, इद्धिया उपसड्कमि। यो\nवे “दस्स”न्ति वत्वान, अदाने कुरुते मनो। वचसा परिचिता। वचसो वचसि।\n\nवचोरस्मीहि बोधेसि, वेने य्यकुसुदक््चिदं।\n\nरागो सारागरहितो, विसुद्धो बुद्धचन्दिमा॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000859_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000859_indic_vision_bench_deva_ocr_7f64cae9c470.jpg", "ocr": "चरित्रे यांची पहा जरा...\n‘प्रेरक चरित्रे' हे माझे छोटेखानी पुस्तक म्हणजे मला प्रेरक वाटणाऱ्या व्यक्तींविषयी लिहिलेल्या श्रद्धासुमनांची माळ होय. महाराष्ट्राचे शिल्पकार व संस्थापक मुख्यमंत्री नामदार यशवंतराव चव्हाण यांचा नि माझा कधी प्रत्यक्ष भेटीचा प्रसंग आला नाही तरी त्यांना मी अनेक समारंभात ऐकलं, पाहिलं आहे. कळत्या वयात त्यांची आत्मकथा, भाषणे वाचली आहेत. गेल्याच वर्षी त्यांच्या जन्मशताब्दी निमित्ताने प्रकाशित लेख, ग्रंथ आवर्जून वाचून मनन केलेले आहे. राजकीय जीवनात समाज, संस्कृती, साहित्य, सभ्यता व सोज्ज्वळता जपणारा हा नेता मला आपला का वाटतो नाही सांगता येणार. पण एक नक्की की असं नेतृत्व ज्या राज्याला लाभतं ते राज्य सर्वसामान्यांचे हित जपत प्रगती करत राहतं. राजकारणाला अपवाद आदर्श म्हणून त्यांची मजवर मोहिनी आहे खरी!\nसर्वोदयी कार्यकर्ते अण्णासाहेब सहस्त्रबुद्धे यांचा मला निकट सहवास लाभला ही माझ्या जीवनाची मोठी जमेली बाजू, मिळकत म्हणायला हरकत नाही. या साऱ्या व्यक्तींचं विधायकपण व परहितदक्षता यांनी मला नेहमीच कार्यप्रवण बनवलं आहे. समाज नुसता तत्त्व आणि ध्येयांनी मोठा होत नाही. त्यापुढे काही प्रतिदर्श (Model) आदर्श लागतात. वरील दोन्ही चरित्रे या संदर्भात अनुकरणीय म्हणून लक्षात घ्यायला हवी. अण्णासाहेबांनी मला दिलेलं पितृप्रेम मी कधी विसरू शकणार नाही. ते कर्मठ नि पारंपारिक सर्वोदयी नव्हते. त्यांचं प्रागतिकपण हा त्या काळी माझ्या आकर्षणाचा विषय होता नि अनुकरणाचाही!\nश्रीमती तारा अली बेग यांना मी कधी पाहिलं, ऐकलं नाही. त्यांच्या कार्याने प्रभावित होऊनच मी त्यांच्याबद्दल लिहिलं. स्वातंत्र्यपूर्व काळात समाजकार्य करणं नि तेही जात, धर्मापलीकडे जाऊन करणे ही सोपी गोष्ट नव्हती. महिला व बाल कल्याणासारख्या क्षेत्रात त्या रवींद्रनाथ टागोर,"} +{"id": "indic_deva_eval_000860_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000860_indic_mozhi_deva_word_ocr_9c47e4b28e30.jpg", "ocr": "यात्रा"} +{"id": "indic_deva_eval_000861_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000861_devanagari_page_ocr_a9dbb762d605.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\n373\n\nइतो यातो अयतो च, निष्फत्तिं समुदीरये।\nविज्जू समयसद्दस्स, समवायादिवाचिनों॥\nइतो यातो अयतो च, समानत्थेहि धातुहि।\nएवं समानरूपानि, भवन्तीति च ईरये॥\nनय रक्‍खणे च। चकारो गतिपेक्खको। नयति। नयो। नयोति नयनं गमनन्ति नयो,\nपाछ्ठिगति। नयन्ति वा रक्खन्ति अत्थं एतेनाति नयो, तथत्तनयादि।\nदय दानगतिहिंसादानरक्खासु। दयति। दया।\nदयाति मेत्तापि बुल्चति करुणापि। “दयापन्‍्नो”ति एत्थ हि मेत्ता “दया”ति, मेत्तचित्ततं\n'अदयापन्‍्नो”ति एत्थ पन करुणा “दया”ति बुज्चति। निक्‍करुणत॑\nबव॑ दयासद्दस्स मेत्ताकरुणासु पवत्ति वेदितब्बा। तथा हि अभिधम्मटीकायं\nबुत्त “दयासद्ो यत्थ यत्थ पवत्तति, तत्थ तत्थ अधिप्पायबसेन योजेतब्बो। दयासद्दो हि\nअनुरक्खणत्थं अन्तोनीत॑ कत्वा पवत्तमानों मेत्ताय च करुणाय च पवत्तती\"ति।\nवचनत्थो पनेत्थ एवं वेदितब्बो - दयति ददाति सत्तानं अभयं एतायाति दया। दयति\nगच्छति विभागं अकत्वा पापकल्याणजनेसु सम॑ वत्तति, सीतेन सम॑ फरन्तं रजोमलड्च पवाहेन्तं\n'उदकमिवातिपि दया, मेत्ता। दयति वा हिंसति कारुणिकं याब यथाधिप्पेतं परस्स हितनिष्फत्तिं\nन पापुणाति, तावाति दया। दयति अनुग्गण्हाति पापजनम्पि सज्जनों एतायातिपि दया। दयति\nअत्तनो सुखम्पि पहाय खेद॑ गण्हाति सज्जनो एतायाति दया। दयन्ति गण्हन्ति एताय\nमहाबोधिसत्ता बुद्धभावाय अभिनीहारकरणकाले हत्थगतम्पि अरहत्तफलं छड्डेत्वा\nसंसारसागरतो सत्ते समुद्धरितुकामा अनस्सासकरं अतिभयानकं महतन्त॑ संसारदुक्खं, पच्छिमभवे\nचच सह अमतधातुपटिलाभेन अनेकगुणसमलड्कतं सब्बज्जुतज्ञाणज्वातिपि दया, करुणा।\nकरूणामूलका हि सब्बे बुद्धणुणा।\nअपरो नयो - दयन्ति अनुरक्‍्खन्ति सत्ते एताय, सयय॑ वा अनुदयति, अनुदयमत्तमेव वा\nएतन्ति दया, सेना सेब करुणा च। किडिच पयोगसेल्य कथ्थाम “सेस्यथा्ि गहपति गिज्लों बा\nकड्को वा कुललो वा मंसपेसिं आदाय दयेय्य। पुत्तेसु मद्दी दयेसि, सस्सुया ससुरम्हि चा\nदयितब्बो रथेसभ”। तत्थ दयेय्याति उप्पतित्वा गच्छेय्य, गत्यत्थवसेने��ं वढ्लब्बं। दयेसीति\nमेत्तचित्तं करेय्यासि। दयितब्बोति पियायितब्बो। उभयम्पेतं विवरणं रक्खणत्थं अन्तोगरध॑ कत्वा\nअधिप्पायत्थवसेन कतन्ति वेदितब्बं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000862_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000862_indic_mozhi_deva_word_ocr_6092b0125859.jpg", "ocr": "अघटित"} +{"id": "indic_deva_eval_000863_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000863_devanagari_page_ocr_c2eda0822307.jpg", "ocr": "अपदानपालि उ&,\n\n““पध्ानपहितत्तों सो, उपसन्‍्तो निरूपधि।\n\nसब्बासबे परिज्ञाय, निब्बायिस्सतिनासबो'॥774॥\n\n“उद्भाय अभिनिक्खम्म, जहिता भोगसम्पदा।\n\nखेव्ठपिण्डेब भोगम्हि, पेम॑ मय्हं न विज्जति॥772॥\n\n“वीरियं मे धुरधोरय्हं, योगक्खेमाधिवाहनं।\n\nधारेमि अन्तिमं देहं, सम्मासम्बुद्धसासने॥773॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अट्टिमे।\n\nऋछत्छभिज्जा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥77व॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा रट्टपालो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\n\nरक्कपालत्थेरस्सापदानं अट्डमं।\n\nप्रधानप्रहितात्मा स:, उपशान्तो निरुषधिः।\nसर्वाखवान्‌ परिज्ञाय, निर्वास्यते अनाख्चः'॥777॥\n“डत्थायाशिनिष्क्रम्य, जहिता भोगसम्पदा।\nखेलपिण्ड इब भोगे, प्रेम मह्य॑ न विद्यते॥772॥\n\n“वीर्य मे धुरधौरव्यम्‌, योगक्षेमाधिवाहनम।\nधारयासि अल्तिमं देहम्‌, सम्यक्‍्सम्बुद्धशासने॥773॥\n“प्रतिसंविदश्वलस्र:, विमोक्षा अपि च अषटै।\n\nकृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥ 774॥\n\nघडकिज्ञाः साक्षात्कृता:\n\nइत्थ॑ स्विद्‌ आयुष्मान्‌ राष्ट्रपालस्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\n\nबह शान्तचित्त व आसक्तिरहित सभी आखवों को जानकर आख्वरहित हो, निर्वाण को\nअशिगत करेगा ॥77॥\n\nजिस प्रकार व्यक्ति मुख व नाक आदि के मल त्याग देता है, उसी प्रकार घर से अभिनिष्क्रमण\nकिये हुए मुझमें भोगसम्पदा के प्रति प्रेम नहीं है ॥772॥\n\nयोगश्षेम की प्रासि हेतु मेरा उत्साह एवं प्रयत्न ही मेरा वाहन है, सम्यक्सम्बुद्ध के शासन में मैं\nअन्तिम देह (शरीर) धारण करता हूँ ॥773॥\n\nचार प्रतिसस्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षाल्कार कर मैंने बुद्धशासन\nचूर्ण किया ॥774॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ राष्ट्रपाल स्थविर ने ये गाथाएँ कहीं-"} +{"id": "indic_deva_eval_000864_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000864_hindi_handwritten_word_ocr_6368cac29eec.jpg", "ocr": "दाने"} +{"id": "indic_deva_eval_000865_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000865_hindi_handwritten_word_ocr_b0c636354b73.jpg", "ocr": "अँखियाँ"} +{"id": "indic_deva_eval_000866_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000866_indic_mozhi_deva_word_ocr_ee5b833dc6ec.jpg", "ocr": "वैसे"} +{"id": "indic_deva_eval_000867_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000867_indic_mozhi_deva_word_ocr_8211f210251c.jpg", "ocr": "काळ्यांना"} +{"id": "indic_deva_eval_000868_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000868_indic_mozhi_deva_word_ocr_adc598ff4062.jpg", "ocr": "पगार"} +{"id": "indic_deva_eval_000869_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000869_devanagari_page_ocr_bf7c16cd5425.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\nवव5\n\nआदेससरपरत्ता। यथा च एत्थ, एवं “अलीनमनसो नरो\"तिआदीसुपि अय॑ं तिविधो नयो\nबेदितब्बो।\nनपुंसकलिड्गे पन वत्तब्बे “ब्यासत्तमनसं कुल॑, ब्यासत्तमनानि कुलानि। ब्यासत्तमनसं कुलं,\nब्यासत्तमनानि कुलानि। ब्यासत्तमनसा कुलेना”तिआदिना नामिकपदमाला योजेतब्बा। एत्थ\nपन पठमादतियाततियाचत्त्थीछट्टीसन्तमीन॑ एकवचनद्रानेयेव यथारह सागसो भवत्ति\nआदेससरविभत्तिसरपरत्ता, अयम्पि नयो सुखुमो साधुकं मनसि कातब्बो।\nइत्थिलिडगे पन वत्तब्बे “ब्यासत्तमनसा इत्थी”ति एवं पठमेकवचनट्ठानेयेव सागमं वत्वा\nततो “ब्यासत्तमना, ब्यासत्तमनायों इत्थियो। ब्यासत्तमनं इत्थि”न्ति कड्ञानयेन योजेतब्बा।\n>णवं सद्धेय्यवचसा 'उपासिका, सद्धेय्यवचायो उपासिकायो। सद्धेय्यवर्च\n'उपासिक\"”न्तिआदिनापि। “ब्यासत्तमनं कुलं, ब्यासत्तमना इत्थी”तिआदिना पन चित्तकज्ञानयेन\nयोजेतब्बा। एत्थ पन सब्बथापि सागमो नत्थि।\nसोतून॑ जाणप्पभेदजननत्थं अपरापि नामिकपदमालायो दस्सयिस्साम सहनिब्बचनेन -\nमनो एव मानसं, समुस्साहितं मानसं यस्स सोय॑ं समुस्साहितमानसो। “समुस्साहितमानसो,\nसमुस्साहितमानसा। _ समुस्साहितमानसं, . समुस्साहितमानसे। . समुस्साहितमानसेना”ति\nचुरिसनयेन योजेतब्बा। सुन्दरा मेधा अस्स अत्थीति सुमेधसो। “सुमेधसो, सुमेधसा। सुमेधसं,\nसुमेधसे। सुमेधसेना”ति पुरिसनयेन, एवं “भूरिमेधसो \"तिआदीनम्पि। तत्रिमे पयोगा -\n“यथं बदन्ति सुमेधोति, भूरिपज्ञ॑ सुमेधसं।\nकिं नु तम्हा विष्पवसि, मुहत्तमपि पिड्िगिय।\nगोतमा भुरिपण्जाणा, गोतमा भूरिसेधसा॥\nनाहं तम्हा विष्पवसामि, मुहृत्तमपि ब्राह्मण।\nगोतमा भूरिपण्जाणा, गोतमा भूरिसेधसा\"ति॥\nइल्थिलिड्गे वतक्तब्बे “समुस्साहितमानसा सुमेधसा”ति रूपानि, नपुंसके वत्तब्बे\n“समुस्साहितमानसं सुमेधस”न्ति रूपानि, कड्ञा चित्तनयेन एतेस पदमाला योजेतब्बा।\nओकारन्तपुल्लिड्गट्स्‍धाने इत्थिलिझ्गादिविनिच्छयो नयप्पकासनत्थं कतो। विसेसतो हि\nओकारन्तकथायेब इधाधिप्पेता। अपिच लोके नीति नाम नानप्पकारेहि कथिता एब सोभति,\nअयउ्च सासने नीति, तस्मा नानप्पकारेहि कथिताति।\n��ब्बानि नयतो एवं, ओकारन्तपदानिमे।"} +{"id": "indic_deva_eval_000870_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000870_indic_mozhi_deva_word_ocr_632ad8d43e16.jpg", "ocr": "रखी"} +{"id": "indic_deva_eval_000871_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000871_devanagari_page_ocr_79d7738876dd.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n66 द्दनी |\n\nअभवोति हानि। भवोति\nबीतिबत्तोति।\nसहोकासा खन्‍्धाषि भवों। “कामभवों रूपभवो” इच्चेवमादि एतस्सत्थस्स साधक बचन॑।\n\nएत्थ पन खन्‍्धा “यो पड्ञायति, सो सरूप॑ लभती\"”ति कत्वा “भवति अविज्जातण्हादिसमुदया\nनिरन्तर समुदेती\"लि अत्थेन वा “भवा\"तलि वुच््वन्ति। ओकासो पन “भवल्ति जायन्ति एल्थ सत्ता\nनामरूपधम्मा चा”ति अत्थेन “भवो”ति। अपिच कम्मभवोपषि भवो, उपपत्तिभवोषि भवों।\n“उपादानपच्चया भवो दुविधेन अत्थि कम्मभवों, अत्थि उपपत्तिभवो”ति इदमेतस्सत्थस्स\nसाधक वचन॑। तत्थ कम्मसेव भवों कम्मभवों। तथा उपपत्ति एवं भवो उपपत्तिभवों। एत्थूपपत्ति\nअवतीति भवो, कम्म॑ पन यथा सुखकारणत्ता “सुखो बुद्धानमुप्पादो”ति बुत्तो। एवं भवकारणत्ता\n'फलबोहारेन भवोति दट्ठछब्बं। अथ वा भावनलक्खणत्ता भावेतीति भवो। कि भावेति? उपपत्ति।\nइति उपपर्ति भावेतीति भवोति ब॒च्चति। भावेतीतिमस्स च निव्व्तेतीति हेतकलवसेनत्थो। अथ\nवा “भवपच्चया जाती”ति वचनतो भवति एतेनाति भवोति कम्मभवों वुच्चति।\n\n“खन्धानऊच पटिपाटि, धातुआयतनान च।\n\nअब्बोच्छिन्नं वत्तमाना, संसारोति पवुच्चती”ति\nबुत्तलक्खणो संसारोपि भवों। “भव दुक्‍्खं भवदुक्‍्खं, भवे संसरन्‍्तो”ति इमानेतस्सत्थस्स\nसाधकानि बचनानि। तज्न केनड्रेन संसारो भवोति कथीयति? भवति एत्थ सत्तसम्मुति\nखन्‍धादिपटिपाटिसड्खाते ध्म्मपुड्जस्मिन्ति अल्थेना इदं भवसदस्स\nभावकत्तुकरणाधिकरणसाधनवसेनत्थकथनं।\n\n'एत्थ भवसद्दस्स अत्थुद्धारं वदाम -\n\nबुद्धिसम्पत्तिपुज्जानि, खन्‍्धा सोकाससण्जिता।\n\nसंसारो सस्सतड्चेत॑, भवसद्देन सद्दितं॥\n\nअवतण्हा भवदविद्धि, उपपत्तिभवों तथा।\n\nजगणश नयी व राह्यन्त, मवसएस नादिता।\n\nभवतण्हाभवदिद्धि-द्वयं कल्थचि पाव्ठियं।\n\nउत्तरपदलोपेन, भवसद्देन सद्दितं॥\n\nअभवोति न भवो अभवो।\n\nविपत्ति हानि उच्छेदो, पापड्चेब चतुब्बिधा।\n\nत्रोति सस्सतं, अभवोति उच्छेदो। भवोति पुज्ञं, अभवोति पापं, त॑ सब्बं"} +{"id": "indic_deva_eval_000872_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000872_devanagari_page_ocr_fcc8d6607399.jpg", "ocr": "6\n\nपालि- “देवता देवकड्ञा च, पसन्‍ना तुद्ठमानसा।\n\nपड्चवण्णिकपुप्फेहि, पूजयन्त�� नरासभं॥25॥\n“पस्सन्ति तं॑ देवसडूघा, पसन्‍ना तुद्धमानसा।\n\n'पड्चवण्णिकपुप्फेहि, पूजयन्ति नरासभं॥26॥\n“अहो अच्छरियं लोके, अब्भुतं लोमहंसनं।\n\nहंसन॑।\n\nन मेदिसं भूतपुब्बं, अच्छेर॑ लोमहंसनं”॥27॥\nसकसकम्हि भबने, निसीदित्वान देवता।\n\nहसन्ति ता महाहसितं, दिस्वानच्छेरक॑ नभे॥28॥\nआकासद्ठा च भूमद्ठा, तिणपन्‍्थनिवासिनो।\nकतज्जली नमस्सन्ति, तुद्ठहद्ठा पमोदिता॥29॥\n\nसंस्कृतच्छाया-.. “देवता: देवकन्याश्व, प्रसन्‍नाः तुष्टमानसा/।\n\nहिन्दी\"\nथीं ॥25॥\n\nपड्चवर्णिकपुष्पैः, पूजयन्ति नरर्पभम्‌॥25॥\n“पश्यच्ति त॑ देवसडूाः, प्रसन्‍नास्तु.्टमानसा:।\nपड्चवर्णिकपुष्पैः/पुष्पेभि:, पूजयन्ति नरर्पभम्‌॥26॥\n'अहो आश्चर्य लोके, अद्‌भुतं रोमहर्षणम्‌।\nन मे ईदृश भूतपूर्वम, आश्यर्य रोमहर्पणम्‌\"॥27॥\nस्वकस्वके भवने, निषद्य/निषीदित्वा देवताः।\nहसन्ति ता: महाहसितम्‌, दृष्ट्वाश्रर्यक॑ नभसि॥28॥\nआकाशस्थाश्व भूमिष्ठा:, तृणपन्‍्थनिवासिनः।\nकुताउजलयो नमस्यन्ति, तुष्टहष्टाः प्रमुदिता:॥29॥\n\nइवता, देवकन्या प्रसन्न और सन्‍्तुष्ट मन से पाँच रंगों वाले फूलों से नरों में श्रेष्ठ तथागत की पूजा कर रही\n\nबहाँ उपस्थित देवसमूह उनको प्रसन्न और सुन्तुष्ट मन से देख रहे थे तथा वे भी पाँच रडगों वाले\n\nद्वारा जनों में श्रेष्ठ तथागत की पूजा कर रहे थे॥26॥\n\nअहो! यह लोक\n\nरोमहर्पण करनेबाला दृश्य मैंने नहीं देखा था॥27॥\n\nबे\n\nसन्‍्तुष्ट मन से हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥29॥\n\nमें आश्चर्यमय रोमहर्षक दृश्य है, क्‍योंकि पूर्व में कमी भी उस प्रकार का अद्भुत\n\nदेवता आकाश में इस आश्चर्य को देखकर अपने-अपने भवनों में बैठकर मुक्त हास्य करने लगे॥28॥\nइसी प्रकार आकाश में, भूमि पर, वृक्षों पर और मार्गों में निवास करनेवालों ने भी उन्हें"} +{"id": "indic_deva_eval_000873_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000873_devanagari_page_ocr_21594fc57171.jpg", "ocr": "गन्धोदकबग्गो व69\n\n9. धम्मसवनियत्थेरअपदानं\n“पदुसुत्तरो नाम जिनो, सब्बधम्मान पारगू।\nचतुसच्च पकासेन्तो, सन्‍्तारेसि बहुं जनं॥770॥\n“अहं तेन समयेन, जटिलो उग्गतापनो।\nध्ुनन्‍्तो वाकचीरानि, गच्छामि अम्बरे तदा॥774॥\n“बुद्धसेट्टस्स उपरि, गन्तुं न विसहामहं।\nपकक्‍खीव सेलमासज्ज [सेलमापज्ज (स्या*)], गमनं न लभामहं॥ 772॥\n“न मे इदं भूतपुब्बं, इरियस्स विकोपने।\nदके यथा उम्मुज्जित्बा, एवं गच्छामि अम्बरे॥773॥\n“उव्ठारभूतो मनुजो, हेड्भासीनो [हेद्ढापि नो (क\")] भविस्सति।\nहन्द मेन॑ गवेसिस्सं, अपि अत्थं लभेय्यहं॥774॥\n“पद्मोत्तरो नाम जिन:, सर्वधर्मान्‌ पारग:।\nचतुर्सत्य॑ प्रकाशयन्‌, समतारयत्‌ बहनि जनानि॥770॥\n“अहं तेन समयेन, जटिल उग्रतापन:।\nधुनन्तो बाकचीराणि, गच्छामि अम्बरे तदा॥774॥\n“बुद्धश्रेष्ठस्य उपरि, गन्तुं न विसह्यमहम्‌ ।\nपक्षीव शैलमापद्य, गमन॑ न लभेज्हम्‌॥772॥\n“न मे इदं भूतपूर्वम्‌, ईर्यस्य विकोपनम्‌।\nउदके यथा उन्मद्य, एवं गछ्छामि अम्बरे॥773॥\n“उदारभूतो मनुजः, अधस्तादपि नो भविष्यति।\nहन्द मे एत॑ं गवेषयिष्यम्‌, अपि अर्थ लभेयमहम्‌॥774॥\nसभी धर्मो में पासंगत पद्मोत्तर नामक जिन ने बहुत से सन्‍्तों को तारने के लिए चार सत्यों का उपदेश\nकिया॥770॥\nउस समय मैं जटाधारी उग्रतपस्वी था। तब मैं वल्कल चीवर को हिलाता हुआ अम्बर\nगया॥774॥\nबुद्धश्रेछ्ठ से ऊपर जाने का साहस मैंने नहीं किया, जैसे पक्षी पर्वत से ऊपर जाने का साहस नहीं करते,\nभी नहीं गया॥772॥\nइससे पूर्व मैंने अपनी चाल-ढाल से किसी को हानि नहीं पहचायी और जैसे जल में निमग्न की भाँति ही\nगया॥773:\nजो उदार मनुष्य है बह नीचे ही रहेगा। अच्छा हो कि मैं भी इनकी गवेषणा करूँ और अर्थ को प्रास\nकरूँ॥774॥\n\nचला\n\nमैं"} +{"id": "indic_deva_eval_000874_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000874_indic_mozhi_deva_word_ocr_0aed12a5e26e.jpg", "ocr": "उरलेल्या"} +{"id": "indic_deva_eval_000875_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000875_devanagari_page_ocr_c838187bd4db.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n2. मिनेलपुण्फियत्थेरअपदानं\n“सुवण्णवण्णो भगवा, सतरंसी\nअकंकाललो\n\n'पतापवा।\nन॑ समारूव्ठहों, मेत्तचित्तो सिखीसभो॥5॥\n“पसन्‍्नचित्तो सुमनो, वन्दित्वा [थोमेत्वा (स्या\")] जाणमुत्तमं।\nमिनेलपुप्फं पग्गय्ह, बुद्धस्स अभिरोपयिं॥6॥\n“एकत्तिंसे इतो कप्पे, य॑ पुप्फमभिपूजयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजायिदं फलं॥7॥\n“एकूनतिंसकप्पम्हि, सुमेघघननामको।\nसत्तरतनसम्पन्नों, चक्‍कबत्ती महब्बलो॥8॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं\"॥9॥\nइत्थं सुदं आयस्मा मिनेलपुण्फियो थेरो इसा गाथायो अभासित्थाति।\n'मुवर्णवर्णो भगवान्‌, शतरश्मिः प्रतापवान।\nचडुक्रमणं समारूढ:, मित्नचित्त: शिखीशभ:॥5॥\n“प्रसन्‍नचित्तः सुमनाः, वन्दित्वा ज्ञानमुत्तमम।\nमिनेलपुष्प॑ प्रगृह्य, बुद्धाय अभ्यरोपयम्‌॥6॥\n“एकल्िंशे इतः कल्पे, यत्‌ पुष्पमभ्यप्पुजम।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजाया इदं फलम्‌॥7॥\n“एकोनत्रिंशकल्पे, सुमेघघननामकः।\nसप्���रलसम्पन्‍नः, चक्रवर्त्ती महाबलः॥8॥\n“प्रतिसंचरिदश्वतस्त्र कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥9॥\n\n__ _ टव्यं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ सिनेलपुष्पीयस्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\nसौ रक्मियों से युक्त प्रतापवान्‌ मैत्री चित्त वाले स्वर्णवर्णी श्रेष्ठ शिखी भगवान्‌ चडक्रमण (पथ) पर\nआरूढ़ हुए॥5॥\nप्रसन्नचित्त और सौमनस्य पूर्वक मैंने ज्ञान में उत्तम भगवान्‌ बुद्ध की वन्‍्दना कर तथा मिनेलपुष्प को\nग्रहण कर बुद्ध को अभ्यर्षित किया॥6॥\nयहाँ से 3 वें कल्प में मैंने जो पुष्प अभ्यर्षित कर पूजा की थी इस कारण मैं दुर्गति को नहीं जानता यह\nचुद्ध-पूजा का ही सुपरिणाम है॥7॥\nयहाँ से 29 वें कल्प में सुमेघचन नाम से विख्यात ससरत्सम्पन्न, सहाबलशाली, चक्रवर्ती राजा हुआ॥8॥\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडक्िज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\n\nइस प्रकार आयुष्सान्‌ मिनेलपुष्पिय स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-"} +{"id": "indic_deva_eval_000876_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000876_devanagari_digits_mixed_1397032e3423.jpg", "ocr": "९5७5४३६२29"} +{"id": "indic_deva_eval_000877_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000877_indic_mozhi_deva_word_ocr_4d63cb9f0359.jpg", "ocr": "माँ-उसके"} +{"id": "indic_deva_eval_000878_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000878_devanagari_digits_mixed_37ad9f9cbedc.jpg", "ocr": "5३५२"} +{"id": "indic_deva_eval_000879_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000879_devanagari_page_ocr_2cb934e58d3b.jpg", "ocr": "अपदानपालि ब्क\n\n“पदुमुत्तरसम्बुद्ध॑ , मेत्तचित्त महासुनिं।\n\nउपेति जनता सब्बा, सब्बलोकर्गनायकं॥4458॥\n\n“सत्तुकजच बद्धकऊ्च [वर्त्थं सेनासनड्चेव (सी*), सत्तुककच पदकउ्च (सी* अद्भ०),\nसत्तुकज्च पवाकञ्च (स्या*)], आमिसं पानभोजनं।\n\nददन्ति सत्थुनो सब्बे, पुछ्ञक्खेत्ते अनुत्तरे॥459॥\n\n“अहम्पि दानं दस्सामि, देवदेवस्स तादिनो।\n\nबुद्धसेट्ठे निमन्‍्तेत्वा, सडूघम्पि च अनुत्तरं॥460॥\n\n“उय्योजिता मया चेते, निमन्‍्तेसुं तथागतं।\n\nकेवल भिक्खुसडःघउतच, पुछ्ञक्खेत्तं अनुत्तरं॥464॥\n\nसहझौत्तरसम्बुद्धम, मैत्यचित्त महासुनिम।\n\nउपैति जनता सर्वा, सर्वलोकाग्रनायकम्‌॥4458॥\n\nशत्रुकडच बद्धकडच, आमिषं पानभोजनम्‌।\n\nददल्ति शास्तृण: सर्वे, पुण्यक्षेत्रे अनुत्तरे॥459॥\n\nअहमपि दान॑ दास्यामि, देवदेवाय तायिने।\n\nबुद्धेक्षे्ठ त्िमन्त्र्य, सड्खमपि च अनुत्तरम्‌॥4460॥\n\nउद्योजिता मया चैते, न्‍्यममन्‍्त्रे तथागतम्‌।\n\nकेवल भिक्षुसड्घडच, पुण्यक्षेत्रम्‌ अनुत्तरम्‌॥4464॥\n\nएक समय समस्त जनता उन मैत्रीचित्त तथा सर्वलोकाग्रनायक घ���्यौत्तरसम्बुद्ध महामुनि के\nसमीष जाती है॥458॥\n\nबे सभी अनुत्तर पुण्यक्षेत्र शास्ता को सत्तभरी रोटी, आमिप भोजन और पानी आदि का दान\nदेते हैं॥59॥\n\nमैं भी देवों के देव उन बुद्धश्रेछ् को और साथ-साथ अनुत्तर सडूघ को भी त्तिमन्त्रित कर दान\nदूँगा॥7460॥\n\nभावनावशात्‌\nकिया गया-॥464॥\n\nमेरे द्वारा अनुत्तर पुण्यक्षेत्र, उन तथागत तथा सम्पूर्ण भिक्षुसकुच को निमन्त्रित\n\n“सतसहस्सपललड्कं, सोवण्णं गोनकत्थतं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000880_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000880_indic_vision_bench_deva_ocr_7f54a5bca522.jpg", "ocr": "आगे स्वर्ग की शीतल छाया है, या विध्वंस की भीषण ज्वाला, तो उसे क्या अधिकार है कि इतने प्राणियों की जान आफ़त में डाले। इसी मानसिक पराभय की दशा में उसके अन्तःकरण से निकला--ईश्वर मुझे प्रकाश दो, मुझे उबारो और वह रोने लगा।\nसुबह का वक्त था। क़ैदियों की हाज़िरी हो गयी थी। अमर का मन कुछ शान्त था। यह प्रचण्ड आवेग शान्त हो गया था और आकाश में छायी हुई गर्द बैठ गयी थी। चीजें साफ़-साफ़ दिखाई देने लगी थीं। अमर मन में पिछली घटनाओं की आलोचना कर रहा था। कारण और कार्य के सूत्रों को मिलाने की चेष्टा करते हए सहसा उसे एक ठोकर-सी लगी--नैना का वह पत्र और सुखदा की गिरफ्तारी। इसी से तो वह आवेश में आ गया था। और समझौते का सुसाध्य मार्ग छोड़कर उस दुर्गम पथ की ओर झुक पड़ा था। इस ठोकर ने जैसे उसकी आँखें खोल दीं। मालूम हुआ, यह यश-लालसा का, व्यक्तिगत स्पर्धा का, सेवा के आवरण में छिपे हुए अहंकार का खेल था। इस अविचार और आवेश का परिणाम इसके सिवा और क्या होता।\nअमर के समीप एक क़ैदी बैठा बान बट रहा था। अमर ने पूछा---तुम कैसे आये भाई?\nउसने कुतूहल से देखकर कहा---पहले तुम बताओ।\n'मुझे तो नाम की धुन थी।'\n'मुझे धन की धुन थी।'\nउसी वक्त जेलर में आकर अमर से कहा---तुम्हारा तबादला लखनऊ हो गया है। तुम्हारे बाप आये थे। तुमसे मिलना चाहते थे। तुम्हारी मुलाक़ात की तारीख न थी। साहब ने इन्कार कर दिया।\nअमर ने आश्चर्य से पूछा---मेरे पिताजी यहाँ आये थे?\n'हाँ-हाँ, इसमें ताज्जुब की क्या बात है। मि० सलीम भी उनके साथ थे।'\n'इलाके की कुछ नई खबर?'\n'तुम्हारे बाप ने शायद सलीम साहब को समझाकर गाँववालों से मेल\nकर्मभूमि\n३५५"} +{"id": "indic_deva_eval_000881_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000881_indic_mozhi_deva_word_ocr_09dd11296080.jpg", "ocr": "रोता-झींकता"} +{"id": "indic_deva_eval_000882_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000882_indic_mozhi_deva_word_ocr_e5143e49d839.jpg", "ocr": "आग्नेय"} +{"id": "indic_deva_eval_000883_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000883_indic_mozhi_deva_word_ocr_6ef5c9220dce.jpg", "ocr": "आला?"} +{"id": "indic_deva_eval_000884_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000884_indic_mozhi_deva_word_ocr_f7c69c953031.jpg", "ocr": "रुढींशी"} +{"id": "indic_deva_eval_000885_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000885_devanagari_page_ocr_67c4720673c7.jpg", "ocr": "45. पियदस्सीबुद्धवंसो\nपालि- सुजातस्स अपरेन, सयम्भू लोकनायको।\nदुरासदों असमसमों, पियदस्सी महायसो॥652॥\nसोपि बुद्धो अमितयसो, आदिच्चोव विरोचति।\nसब्बं तमं निहन्त्वान, धम्मचक्लं पबत्तयि॥653॥\nतस्सापि अतुलतेजस्स, अहेसुं अभिसमया तयो।\nकोटिसतसहस्सानं, पठमाभिसमयो अहु॥654॥\nसुदस्सनो देवराजा, मिच्छादिद्विमरोचयि।\nतस्स दिद्धिं विनोदेन्तो, सत्था धम्ममदेसयि॥655॥\nजनसन्निपातो अतुलो, महासन्निपती तदा।\nनवुतिकोटिसहस्सानं, दुतियाभिसमयो अहु॥656॥\nसंस्कृतच्छाया- . सुजातस्यापरेण, स्वयम्भू: लोकनायकः।\nदुरासदः असमसमः, प्रियदर्शी महायशः॥652॥\nसो5पि बुद्ध अभितयशः, आदित्य इव विरोचते।\nसर्व तमो निहत्य, धर्मचक्र प्रावर्तयत्‌॥653॥\nतस्यापि अतुलतेजसः, अभवन्‌ अभिसमया: त्रयः।\nकोटिशतसहस्राणाम्‌, प्रथमाभिसमयोउभूत्‌॥654॥\nसुदर्शनो देवराजः, मिथ्यादुृष्टिमरोचयत्‌।\nतस्य दृष्टि विनोदयन्‌, शास्ता धर्ममदेशयत्‌॥655॥\nजनसन्तिपातोउतुलः, महासक्ष्यपत्तदा।\nनवतिकोटिसहस्राणाम्‌, द्वितीयाभिसमयो5मूत्‌॥656॥\nहिन्दी-. भगवान्‌ खुजात बुद्ध के बाद लोकनायक प्रियदर्शी, महायशस्वी, अद्वितीय दुर्लभ,स्वयम्भू नाम के वृद्ध\nअवतरित हुए, जो किसी के भी द्वारा अक्रमणीय एवं अप्रतिम थे॥652॥\nबह बुद्ध भी अपरिमित यशवाले सूर्य के समान देदीप्यमान थे. जिन्होंने सम्पूर्ण\nसंसार में धर्मचक्र का प्रवर्तन किया॥653॥\nउन अतुल्य तेजस्वी बुद्ध के भी तीन धर्माभिसमय हुए। उनमें प्रथम अभिसमय एक लाख करोड़ का हुआ\nथरा॥654॥\nसुदर्शन देवराज जब मिथ्यादृष्टि से प्रभावित था, तब उस की मिशथ्यादृष्टि के निरोध के लिये प्रियदर्शीबुद्ध\nने धर्मोपदेश किया॥655॥\nइस द्वितीय धर्माभिसमय\n\nअन्धकार का नाश कर\n\nअवसर पर भी नब्बे हजार करोड़ धर्मजिज्ञास एकत्र हुए॥656॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000886_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000886_hindi_handwritten_word_ocr_59702f6b51e2.jpg", "ocr": "नीले"} +{"id": "indic_deva_eval_000887_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000887_devanagari_page_ocr_e4d26bc26bc8.jpg", "ocr": "4. सुजातबुद्धवंसो\n\n436\n\nपालि- तस्स पभा असमसमा, निद्धावति समन्‍्ततो।\nअप्पमाणों अतुलियो, ओपम्मेहि अनूपमो॥647॥\nनवुतिवस्ससहस्सानि , आयु विज्जति तावदे।\nतावता तिट्ठमानो सो, तारेसि जनतं बहुं॥648॥\nयथापि सागरे ऊमी, गगने तारका यथा।\nएबं तदा पाबचनं, अरहन्तेहि चित्तितं [चित्तकं (स्था* कं.)]॥649॥\nसो च बुद्धो असमसमो, गुणानि च तानि अतुलियानि।\nसब्बं तमन्तरहितं, ननु रित्ता सब्बसड्खारा॥650॥\nसुजातो जिनवरो बुद्धों, सिलारामम्हि निब्बुतो।\nतत्थेव तस्स चेतियो [तत्थेब चेतियो सत्थु (स्या* कं०)), तीणिगाबुतमुग्गतोति॥654॥\nसुजातस्स भगवतो वंसो द्वादसमो।\n\nसंस्कृतच्छाया- . तस्थ प्रभा असमसमा, निर्धावति समन्‍्ततः।\nअप्रमाण अतुल्यः, औपम्यैरनुपमः॥647॥\nनवतिवर्षसहस्नाणि, आयुर्विद्यते तावता।\nताबता तिप्ठन्‌ सः, अतारयत्‌ जानतां बहुम्‌॥648॥\nअथाऊचि सागरे ऊर्मि:, गगने तारका यथा।\nएवं तदा प्रवचनम, अ्हद्धिश्चित्रितम्‌॥649॥\nस च बुद्ध असमसमः, गुणाश्व ते अतुल्या:।\nसर्व तमन्तरहितम्‌, ननु रिक्ताः सर्वसंस्कारा:॥650॥\nसुजातो जिनबरो बुद्धः, शिलारामे निर्वृतः।\n'तत्रैब तस्य चैत्यः, त्रीणिगव्यूतमुद्धत इति॥654॥\nकहल्से उनकी अद्वितीय प्रभा चारों ओर फैल रही थी। यह अप्रमाण, अतुल्य और उपमाओं में अनुपम\nथ्री।॥647॥\n\nउनकी आयु नब्बे हजार वर्ष थी। सुदीर्ष काल तक धर्मोपदेश करते हुए उन्होंने बहत सी जनता को\nभवसागर से पार किया॥648॥\n\nजैसे सागर में उठती हुई उत्ताल तरडूगें शोभित होती हैं या आकाश में तारागण शोभित होते हैं, उसी\nप्रकार उनके प्रचचन भिन्न-भिन्न प्रकार के होते ये॥849॥\n\nवे अद्वितीय बुद्ध अतुल्य गुणवाले थे समस्त अन्धकार को नष्ट कर वे समग्र कर्मों, अनुशयों से रहित\nबे॥650॥\n\nवे श्रेष्ठ सुजात बुद्ध शिलाराम में परिनिर्वुत हुए थे, वहीं उनका चैत्य बनाया, जो कि तीन गव्यूति ऊँचा\nएबं विस्तृत था॥654॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000888_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000888_indic_mozhi_deva_word_ocr_2625e4ac771c.jpg", "ocr": "माणसाला"} +{"id": "indic_deva_eval_000889_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000889_indic_vision_bench_deva_ocr_e4fa39b7c81f.jpg", "ocr": "अधिकार आहे की नाही? असे अनेक प्रश्न इक्बाल यांच्या धार्मिक दृष्टिकोनातून निर्माण होतात. त्यांची उत्तरे त्यांनी दिलेली नाहीत.\nइक्बाल आधुनिक होते असे म्हटले जाते. इस्लामचे आधुनिक भाष्यकार म्हणून भारतीय आणि पाकिस्तानी मुस्लिम लेखक त्यांचा उदोउदो करीत असतात. इक्बाल यांच्यातील नेमकी आधुनिकता त्यांच्या पाश्चात्त्य वेषाखेरीज कोणती होती हे या मुस्लिम लेखकांनी एकदा सांगितले तर बरे होईल. त्यांनी बुरख्याचे समर्थन केले आहे. पाश्चात्त्य संस्कृतीची निंदा केली आहे आणि जमाते-इस्लामचे संस्थापक मौ. मौदुदी यांचे समर्थन केले आहे. राष्ट्रवादाची त्यांनी निर्भर्त्सना केली, परंतु त्याचबरोबर मुस्लिम राष्ट्रवादाचा पुरस्कार केला आहे.\nवेषाने आधुनिक असलेले इक्बाल मनाने कमालीचे संकुचित आणि सनातनी कसे होते हे त्यांनी अहमदियाविरोधी घेतलेल्या भूमिकेत दिसून येते. अहमदिया पंथाचे संस्थापक मिा बशीर अहमद यांनी आपण पैगंबर असल्याचे जाहीर केले. त्यांनी 'जेहादची घोषणा आता रद्द झाली आहे' असे म्हटले. अहमदियांविरुद्ध इक्बालने लाहोर येथून प्रचंड आघाडी उघडली. अहमदिया पंथाचे कडवे विरोधक आणि जमाते-इस्लामीचे संस्थापक मौ. मौददी यांना त्यांनी लाहोरला बोलावून आपल्या कॉलेजात आश्रय दिला. इक्बालनी अहमदियाविरोधी वातावरण असे तापविले की मुसलमान व अहमदिया यांच्यात तंग वातावरण निर्माण झाले. नेहरुनी इक्बालना पत्र लिहून या प्रकरणी हस्तक्षेप केला आणि प्रक्षोभक लिखाण न. करण्याची विनंती केली.\n(पहा - मुनीर अहवाल, पृ. २५९., Selected Works of Jawaharlal Nehru, Vol. VI, S Gopal (Ed), pp468 - 479. Report of the Court of Enquiry Constituted under Punjab Act II of 1954 to enquire into the Punjab Disturbances of 1953, Govt. Printing Press, Lahore, 1954.)\nमुसलमानांच्या वेगळ्या राष्ट्राच्या कल्पनेला अधिक आकार चौधरी रहिमतअली या इंग्लंडमध्ये शिकत असलेल्या मुस्लिम विद्यार्थ्यांने दिला. पाकिस्तान हा शब्ददेखील त्यानेच प्रथम वापरला. पंजाब, सरहद्द (अफगाण प्रांत) काश्मीर, सिंध इत्यादी प्रांतांच्या आद्याक्षरांवरून पाकिस्तान हे नाव त्यांनी प्रचारात आणले. 'नाऊ ऑर नेव्हर' या शीर्षकाखाली लिहिलेल्या एका पुस्तिकेत पाकिस्तानची कल्पना त्यांनी १९३४ साली मांडली. मुसलमान नेहमी करीत असलेला युक्तिवाद त्यात होता. भारत हे एक राष्ट्र नाही. भारतीय मुसलमान हे सर्वार्थाने वेगळे राष्ट्र आहे इत्यादी विधाने त्यात करण्यात आलेली आहेत. जीनांनी १९४० मध्ये या योजनेत थोडी भर घातली. त्यांनी मुस्लिम बहुसंख्यांक प्रांतांचे वेगळे राष्ट्र मागितले. त्यामळे संकल्पित मुस्लिम राष्ट्रात आता बंगालचाही समावेश झाला.\nसरदार महमद गुलखान यांनी प्रथम केलेल्या मागणीपासून वेगळ्या राष्ट्राच्या ह्या मागणीत एक निश्चित सूत्र दिसून येते. ही मागणी करताना त्यांची हिंदंबद्दल काही तक्रार नव्हती. हिंदू आणि आम्ही एकत्र नांदू शकणार नाही असे त्यांचे म्हणणे होते. इक्बाल यांनीदेखील हिंदूंबद���दल तक्रारी केलेल्या नाहीत. मुसलमानांचे कायदे मुसलमानच करू शकतात, मुसलमानांवर सत्ता मुसलमानच गाजवू शकतो. राज्य आणि धर्म यांची मुसलमान फारकत करू शकत नाहीत. म्हणून त्यांचे वेगळे राष्ट्र होणे आवश्यक आहे, असे इक्बाल यांचे म्हणणे\nपाकिस्तानची चळवळ/६७"} +{"id": "indic_deva_eval_000890_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000890_devanagari_page_ocr_1acb491dc175.jpg", "ocr": "धातुकथापाव्दि\n\nकक\n\nद्वीहि धातूहि सडःगहिता। कतिहि असड्गगहिता? एकेन खन्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि\nअसड्-गहिता।\n\n९७. परित्तारम्मणा [परित्तारमणा (?)] धम्मा चतूहि खन्धेहि द्वीहायतनेहि अद्ठहि धातूहि\nसड्गहिता। कतिट्ठि असडःगहिता? एकेन खनन्‍्धेन दसहायतनेहि दसहि धातूहि असड्गहिता।\n\n९८. महग्गतारम्मणा धम्मा... अप्पमाणारम्मणा धम्मा... हीना धम्मा... मिच्छत्तनियता\nधम्मा... सम्मत्तनियता धम्मा... मग्गारम्मणा धम्मा... मग्गहेतुका धम्मा... मग्गाधिपतिनो धम्मा\nचतूहि खनन्‍्धेहि द्वीहायतनेहि द्वीडि धातृहि सडगहिता। कतिह्ि असडूगहिता? एकेन खन्‍्धेन\nदसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि असड्गहिता।\n\n९९. मज्ञ्िमा धम्मा पञ्चहि खन्‍्धेषहि द्वादसहायतनेहि अद्लारसहि धातूहि सड्गगहिता। कतिहि\nअसडुगहिता? न केहिचि खन्धेहि न केिचि आयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्गहिता।\nत्लऊ-- आयतनाच्यों द्वाज्याम्‌ बातुभ्यां सड॒ग्रहीता:। कतिभि: असडग्रहीताः? एकेन स्कन्‍्धेन दशायतनैः\nघोडशमि: धातुभि: असड्ग्रहीताः।\n\n९७. प्ररिक्तालम्बना धर्माः चतुर्मि: स्कन्‍्धै: द्वाभ्याम्‌ आयतनाभ्यां अष्टभि: धातुभिः सड्ग्रहीता:।\nकतिभि: असडू-गग्रहीता:? एकेन स्कन्धेन दशायतनै: दशभि: धातुभि: असडगग्रहीता:।\n\n९८. महद्गतालम्बना धर्माः... अप्रमाणालम्बना धर्माः... हीनाः धर्मा:... मिथ्यात्वनियताः धर्माः...\nसम्यक्‍्त्वनियता धर्मा:... मार्गलिस्बना धर्माः... मार्हितुका धर्माः... सार्गाधिपतिनों धर्माः चतुर्मि: स्कन्‍्धैः\nद्वाभ्याम्‌ आयतनाभ्यां द्वाभ्याम्‌ धातुभ्यां सइुग्रहीता:। कतिभि: असइग्रहीता:? एकेन स्कन्‍्थ्ेन दशायतनैः\nघोडशश्नि: धातुशि: असड्ग्रहीताः।\n\n९९. सध्यमा धर्माः पदञ्चनभि: स्कन्‍्धै: द्वादशायतनै: अष्टादशभि: धातुभि: सड्ग्रहीता:। कतिभि:\nअसड्ग्रहीताः? न कैश्वित्‌ स्कन्‍्वै: न कैश्वित्‌ आयतनै: न कैश्वित्‌ च धातुभि: असड्ग्रहीता:।\nतुहन्क)- क्ष झतज मे सत्रहातत हा ककतनों में असंग्रहीत हैं? एक स्��न्ध, दस आयतनों और सोलह धातुओं में असंग्रहीत\nनल ७. प्ररिक्तालम्बन धर्म (ऐसी चित्त वृत्तियाँ जिनका आलम्बन अल्प आकार बाला है) चार स्कन्धों में,\nऔर आठ धातुओं में असंग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? एक स्कनन्‍्ध में, दस आयतनों\n\nआयतनों\n\nअसंग्रहीत हैं।\n\nधर्म (ऐसी चित्त वत्तियाँ जिनका आलम्बन महान आकार वाला\nकी जाने बाला धर्म..... सम्यकत्व की\nजिनका आलम्बन मार्ग है) मार्महतुक धर्म (ऐसा धर्म जिनका\nमार्गाधिपति धर्म (ऐसा धर्म जिनका एकमात्र उद्धेश्य मार्ग है) चार स्कन्धों में दो आयतनों में, दो धातुओं में संग्रहीत हैं।\nकितनों से असंग्रहीत हैं? एक स्कन्ध से, दस आयतनों, सोलह धातुओं में, असंग्रहीत हैं।\nमध्यम धर्म (मध्यम अवस्था की चित्त वृत्तियाँ) पाँच स्कन्धों में, बारह आयतनों में, अठारह धातुओं में\nसंग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? न किन्हीं स्कन्धों, न किन्हीं आयतनों और न किन्हीं भी धातुओं में असंग्रहीत हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000891_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000891_indic_mozhi_deva_word_ocr_b192e3bfbff9.jpg", "ocr": "भारत"} +{"id": "indic_deva_eval_000892_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000892_devanagari_page_ocr_60e9b292fc22.jpg", "ocr": "अपदानपालि हे\n\n4. किलड्जदायकत्थेरअपदानं\nकिलज्जदायकत्थेरअपदानं\n“तिबराय॑ पुरे रम्मे, नव्ठकारो अहं तदा।\nसिद्धत्थे लोकपज्जोते, पसन्‍ना जनता तहिं॥68॥\n“पूजत्थं लोकनाथस्स, किलड्ज॑ परियेसति।\nबुद्धपूर्ज करोन्‍्तानं, किलड्जं अददिं अहं॥69॥\n“चतुन्नवुतितों कप्पें, य॑ कम्ममकरिं तदा।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, किलज्जस्स इदं फलं॥470॥\n“सत्तसत्ततिकप्पम्हि, राजा आसिं जलद्धरो [जुतिन्धरो (सी-)]।\nसत्तरतनसम्पन्नों, चकक्‍्कवत्ती महब्बलो॥74॥\n“पटिसस्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासन\"॥72॥\nइत्थं सुदं आयस्मा किलज्जदायको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nकिलज्जदायकत्थेरस्सापदान चत्त्थं।\n'नत्रेबराये पुरे रम्ये, नलकारो अऊ्हँ तदा।\nसिद्धार्थ लोकप्रद्योते, प्रसन्‍ना जनतास्तत्र॥68॥\n“पूजार्थ लोकनाथस्य, किलिड्ज॑ पर्येघति।\nबुद्धपूजां कुर्वाणानाम्‌, किलिज्जम्‌ अददामहम्‌॥69॥\n“चतुर्णवतितमे कल्पे, यत्‌ कर्माकरवं तदा।\nदुर्गतिं नाभिजानामि, किलिड्जस्य इदं फलम्‌॥70॥\n“सप्तससतिकल्पे, राजा आसम्‌ जलद्धरः।\nसप्तरलसम्पन्‍्नः, चक्रवर्त्ती महाबलः॥74॥\n\n“प्रतिसंविदश्चतस्त्र: .... पे*.... कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥72॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ किलड्जदायकस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nजब में सुन्दर लिवरा पुर में टोकरी बनाने वाला था तब वहाँ लोकप्रकाशक सिद्धार्थ पर प्रसत्न\n\nजनला॥68॥\n\nलोकनाथ की पूजा के लिए चटाई का अन्वेष्ण कर रही थी, तब बुद्धपूजा करते हुए लोगों को मैंने चटाई\n\nप्रदान किया॥469।\n\nयहाँ से 94 वें कल्प में जो कर्म किया था, उसी किलिजदान यह सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति को नहीं\n\nजानता॥470॥\n\nयहाँ से 77 वें कल्प में जलद्धर नामक ससरव्सम्पन्न, महाबलशाली, चक्रवर्ती राजा हुआ॥74॥\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभ्िज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\n\nकिया॥72॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ किलञ्दायक स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-"} +{"id": "indic_deva_eval_000893_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000893_hindi_handwritten_word_ocr_46493254d527.jpg", "ocr": "भूपलम"} +{"id": "indic_deva_eval_000894_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000894_devanagari_digits_mixed_6e582920617d.jpg", "ocr": "३9९४०७९5519२९"} +{"id": "indic_deva_eval_000895_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000895_indic_mozhi_deva_word_ocr_04a626881134.jpg", "ocr": "है-चाय"} +{"id": "indic_deva_eval_000896_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000896_indic_mozhi_deva_word_ocr_5c1d3d201496.jpg", "ocr": "असे"} +{"id": "indic_deva_eval_000897_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000897_indic_vision_bench_deva_ocr_7c3ec33d8041.jpg", "ocr": "(१७)\nनारो महादेव.\n\"राजश्री नारो महादेऊ, दिमत मशारनिल्हे, यानीं कष्ट मेहनत बहुत केली या बाबे त्यांस कसबे भिलवडी सुभा प्रांत मिरज हा गांव कुलबाब कुलकानू देखील इनाम करून दिला.\"\nमशारनिल्हेकडे वजारतमाब सरंजाम करून सरदार दिले. १ संभाजी सोनोजी धारराऊ निंबाळकर. हजार फौजेचे दौलत. जातीस तैनात होनू ३००० तीन हजार. २ वेंकटराऊ नारायण पंचसदी (पांचशें) जमाव वागवावा. तैनात जातीस होनू २००० दोन हजार.\"\nयाप्रमाणें पांच कलमें या सरंजामजाबत्यांत लिहिलीं आहेत. ताराबाईंचा व घोरपडयांचा जर बिघाड असता तर छत्रपतींकडून असा सरंजामजबता पिराजीरावांस कधींच मिळाला नसता हें उघड आहे. या राजपत्रावरून नारो महादेव यांच्या कर्तृत्वाचें अनुमानही उत्तम प्रकारें होतें. कारण कीं, संताजीराव सेनापति दग्यानें मारले गेले व त्यांचे पुत्र राणोजी घोरपडे नुकते वयांत येतात तों एका लढाईत ठार पडले. याप्रमाणे घोरपडयांच्या घराण्यावर दुर्धर संकटें ओढवली असतांही नारो महादेव यांनी हिंमत धरून घोरपडयांची सरदारी इतक्या उत्तम रीतीने संभाळली कीं, आपले अल्पवयी धनी पिराजीराव यांच्या नांवें त्यांची वडिलोपार्जित वतनें छत्रपतींकडून त्यांस करार करून घेतां आ���ी; व घोरपडयांचे दिमतीस दोन नवीन सरदार नेमून घेतां येऊन शिवाय त्यांत आपले अल्पवयी पुत्र व्यंकटराव यांची पांचशें स्वारांच्या सरदारीवर नेमणूक करून घेतां आली ! त्या वेळीं छत्रपतींच्या दरबारात नारो महादेव यांचें फार मोठे वजन असल्याखेरीज या गोष्टी घडणें अशक्य आहे हें स्पष्ट आहे.\nसन १६९८ ते १७०५ पर्यंत बेदर, गुलबुर्गे व विजापूर या प्रांतीं घोरपड्यांची धामधूम व लुटालूट एकसारखी सुरू होती; व\n३"} +{"id": "indic_deva_eval_000898_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000898_indic_vision_bench_deva_ocr_277f87bd7fdc.jpg", "ocr": "स्वातंत्र्यपूर्व काळातील हैद्राबाद येथील सभा : १९४० चे दशक\nनाहीत. त्यांना इथिओपियाची विभागणी व्हायला पाहिजे आहे. बहुसंख्य मुस्लीम असलेल्या सोमालियात राहावयाची त्यांची तयारी आहे!\nयुगोस्लाव्हियाचा इतिहास थोडा वेगळा आहे. मुस्लिम राजवट तिथे दीर्घ काळ कधी स्थिर झाली नाही. ख्रिश्चन आणि मुस्लिम सत्ताधीशांची रस्सीखेच या प्रदेशात सतत होत राहिली. हा प्रदेश ख्रिश्चन आणि मुस्लिम सत्ताधाऱ्यांच्या हातात सतत येत-जात राहिला. परिणामत: तेथील मुस्लिम नागरिकांत निश्चित निष्ठा निर्माण झाल्या नाहीत. दुसरे असे की, शेजारी जवळच धर्माधिष्ठित बहसंख्याक मुस्लिम देश अस्तित्वात नाही; या भौगोलिक वस्तुस्थितीचाही युगोस्लाव्हियातील मुस्लिम मनोवृत्तीवर परिणाम झालेला आहे. त्यामुळे अल्पसंख्याक असल्याची तीव्र भावना युगोस्लाव्हियातील मुसलमानांत तेवढीशी आढळत नाही; तशी ती नसेल, असेही प्रतिपादन अर्थात येथे मला करायचे नाही. भारतीय मुसलमानांचे\nकानोसा : भारतातील मुस्लिम मनाचा । २५"} +{"id": "indic_deva_eval_000899_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000899_indic_mozhi_deva_word_ocr_3c421ffec641.jpg", "ocr": "खेळ"} +{"id": "indic_deva_eval_000900_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000900_devanagari_page_ocr_0e53a7e823a8.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\n437\n\nपस्साबो पूतिमुत्तन्ति तदहजातोषि सिड्गालो “जरसिड्गालो'ति, कोमलापि गव्ठाचीलता\n'\"पूतिलता'ति, सुबण्णबण्णोषि कायो 'पूतिकायो'ति बुच्चति, एवमेव बस्ससतिकोपषि सुनखो\n“कुकक्‍्कुरो'ति वुच्चलि, तस्मा महत्लका कायूपपन्‍नापि ते 'कुक्‍्क्रा'ल्वेव व॒त्ता\"\n\nकि हिंसायं। किणोति, किणाति, किणन्ति।\n\nसक सामत्थिये। समत्थभावो सामत्थियं, यथा दक्खियं। सक्‍कुणाति, सक्‍कुणन्ति।\nअसक्खि। सक्खिस्सति। सक्‍को। सक्‍की।\n\nएत्थ सक्‍कोति देवराजा। सो हि परहित॑ सकहितऊ्च कातुं सक्‍कुणातीति सक्‍को। अपिच\nसक्���यकुलजातो यो कोचिपि। तथा हि “अथ खो महानामो सक्‍को”तिआदि चुत्तं। “भगवन्तड्च\nपिछ्गयो म॑ सक्‍क समुद्धराहीति आलपि। सक्‍या वत भो कुमारा परमसक्या वत भो कुमारा\"ति\nबचनमुपादाय सब्बेषि सक्‍यकुले जाता “सक्‍्या”ति च “साकिया”ति च “सक्का”ति च बुच्चन्ति।\nएत्थ स्वादित्तेपि अनेकस्सरधातुतो एकोब उणापच्चयो होति, न णु णापच्वयाति दट्ब्बं।\n\nखी खये। खीणोति। खीणाति। खीणा जाति। खीणो। अयोगा भूरिसड्खयो।\n\nगे सद्दे। गिणोति, गिणाति।\n\nचि चये। णकारस्स नकारत्तं। पाकारं चिनोति। चितं कुसलं। चेतो पुग्गलो।\n\nरू उपतापे। रुणोति, रुणाति।\n\n'राध साध संसिद्धियं। राधुणाति। साधुणाति। राधनं। आराधनं। साधनं।\n\nपी पीतियं। पीणोति, पीणाति। पीति, पियो।\n\nअप पापुणे सम्भु च। पापुणोति, पापुणाति। पत्तो। सब्बज्ञुतं सत्था पत्तो। सम्पत्तो\nयमसाधन॑। सम्भुणाति, न किडिच अत्थं अभिसम्भुणाति। सम्भुणन्तो, अभिसम्भुणमानो।\n\nतत्थ पत्तोति पसद्दो उपसग्गो “पप्पोती”ति एत्थ पसद्दों विय। तथा हि “पत्तो\"ति एत्थ\nपाषुणीति अत्थे पपुब्बस्स अपधातुस्स पकारे लुत्ते तपच्चयस्स द्विभावों भवति। तत्थ न\nअभिसम्भुणातीति न सम्पापुणाति, न साधेतीति बुत्त होति।\n\nखिप खेपे। खिपुणाति। खिप्पं। खिप्पन्ति मच्छपड्जरो।\n\nआप ब्यापने। आपुणाति। आपो।\nमि पक्‍खेपने। मिनोति। मित्तो।\n\nएत्थ च सब्बगुस्हेस निभियति पक्खिपियतीति मित्तो। “मित्तो हवे सत्तपदेन होती“ति\nबचन॑ पन वोहारवसेन बुत्तं, न अत्थवसेन। बुच्चेय्य चे, यों कोचि अविस्सासिकों अत्तनों\nपटिविर्द्धोपि च मित्तो नाम भवेय्य, न चेव॑ दहुब्बं। एबडच पन टदहुब्बं"} +{"id": "indic_deva_eval_000901_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000901_indic_mozhi_deva_word_ocr_83786c3f39e1.jpg", "ocr": "त्यात"} +{"id": "indic_deva_eval_000902_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000902_indic_mozhi_deva_word_ocr_c8f388316ecd.jpg", "ocr": "विश्वास"} +{"id": "indic_deva_eval_000903_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000903_devanagari_digits_mixed_faa0747b0f36.jpg", "ocr": "६3१९2६४८77८८"} +{"id": "indic_deva_eval_000904_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000904_hindi_handwritten_word_ocr_ce4bfe087140.jpg", "ocr": "सोचते"} +{"id": "indic_deva_eval_000905_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000905_devanagari_page_ocr_ddb771db0d59.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\nउक्त\n\nअ्रम्भो रम्मो द्विपो चेब, हत्थिनी तु करेणुका।\nहत्थिपोतो हत्थिछ्छापो, भिड्कको च कलभो भवे॥\nचज चागे। चजति। परिच्चजति। चागो। परिच्चागों। चजनं। चर, चजन्तों। चजमानो।\nसन्‍ज सडूगे। सडूगो लगनं। सड्चति। सत्तो। सजनं, सत्ति। आसत्ति। सजितुं। स���ित्वा।\nईज गतियं। ईजति।\nभजि भज्जने। भज्जनं तापकरणं। तिलानि भज्जति। पुरिसेन भज्जमानानि तिलानि।\n'एज भेज भाज दित्तियं। दित्ति सोभा। एजति। भेजति। भाजति।\nतिज निसाने, खमायठ्व। निसानं तिक्खताकरणं। खमा खल्ति। तेजति। तितिक्खति।\nतेजनो। । तत्थ तेजनोति कण्डो सरो उसु। तेजोति सूरियो। अथ वा तेजोति तेजनं उस्मा\nउण्हत्तं तापो। तैजोति वा आनुभावो पभावों।\nसड्ज परिस्सग्गे, आलिड्गन॑ परिस्सग्गो। सड्जति।\nखजि दाने, गतियड्च। खठजति। खउ्जनं।\nराज दित्तियं भाज च। राजति। भाजति। राजा। राजिनी। बनराजि। राजित्वा।\nबिराजित्बा। अन्न विज्जूनमत्थविबरणे कोसललजननत्थं सिलोक॑ रचयाम -\n\nम'हा'राज महाराज, महाराज ममेब'हि।\nने'तस्स इति वत्वान, द्वे जता कलहं करूं॥\nएल्थ च पठमपादस्स दुतियपदे “मे अहि मही”ति छेदो “पुत्ता मे अत्थि पुत्ता मत्थी”ति\nविय। “महि अराज महाराजा”ति च छेदो “योपि अय॑ योपाय”न्ति विय। एत्थ अराजसद्दो\n“अतिकरमकराचरिया\"ति_ एत्थ अकरीति_ अत्थवाचको.._ अकरसद्दो. विय\nआख्यातपरोक्खाविभत्तिको दट्ठछब्बो। अराज विरोचीति अत्थो। अय॑ पन गाथाय पिण्डत्थो\n“महाराज मे अहि अराज, मम एब अहि अराज, न एतस्स इति वत्बा द्वे अहितुण्डिकजना कलहं\nकरिंसू\"ति।\nरन्ज रागे। भिक्खु चीवरं रजति। सत्तो रूपादीसु रझ्जति। रजनं। रजको। रागो। विरागो।\nहलिद्दिरागो। राजा। राजिनी। इमस्स च दिवादिगणं पत्तस्स “रज्जति विरज्जती”ति रूपानि\nभवन्ति। तत्थ रजनन्ति रजनवत्थु। रजकोति रजकारो वत्थधोवनको। रागोति रज्जन्ति सत्ता\nसेन, सययं वा रडजति, रड्जनमत्तमेव वा एतन्ति रागो, तण्हा। इमानि पन तदभिधानानि -\nरागो लोभो तसिणा च, तण्हा एजा विसत्तिका।\nसत्ति आसत्ति मुच्छा च, लुब्भितत्तज्च लुब्भना॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000906_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000906_indic_vision_bench_deva_ocr_ece811522403.jpg", "ocr": "बदलला. कारण पाकिस्तानचे विघटन झाले. भारतातील लीगवादी सुशिक्षित मुसलमान आता या दोन्ही देशांना एकत्र आणण्याची घोषणा देतील असे भविष्य मी १९७१ च्या एप्रिल महिन्यातच वर्तविले होते.\n(पहा - 'Quest' - April-May 1971 मधील माझा लेख - 'Meaning of Bangla Desh')\nवेगळे राष्ट्र निर्माण करून उपखंडात प्रभुत्व गाजविण्याच्या आकांक्षा नामोहरम झाल्यानंतर आता महासंघराज्यासारख्या योजनेत एकत्र राहून विस्कटलेला मुस्लिम समाज पुन्हा एकत्र कसा येईल याचा विचार सुशिक्षित मुसलमान करू लागला याचे हे निदर्शक आहे. सनातनी मौलाना वर्ग व सुशिक्षित मुसलमान यांच्यात उद्दिष्टे साध्य करण्याच्या कार्यपद्धतीविषयीचा हा झगडा मिटण्याची लक्षणे दिसू लागली आहेत आणि अलग राष्ट्राच्या मार्गाने उद्दिष्ट साधण्याचा प्रयत्न फसल्यानंतर हिंदूंबरोबर एकत्र रहावे पण उपखंडातील सर्व मुसलमानांची ताकद त्यांच्या विरुद्ध लावावी ह्या मुल्लामौलवींच्या धोरणाला आता सुशिक्षितांनी पाठिंबा द्यायला सुरुवात केली आहे ह्याचे हे निदर्शक आहे.\nमी येथे मुद्दामच सुशिक्षित मुसलमानांच्या ध्येयधोरणांची चिकित्सा करीत आहे. त्यातील इतर काही जणांच्या वागण्या-बोलण्याचा संदर्भ समजावून घेण्याची आवश्यकता आहे. कारण त्यातील बरीच मंडळी नेहमी धर्मनिरपेक्ष शब्दप्रयोगात भारतीय मुसलमानांच्या जातीयवादाचे आणि पाकिस्तानच्या विस्तारवादाचे समर्थन करीत असल्यामुळे या प्रश्नांची नीट जाणीव नसलेल्यांच्या मनात ही मंडळी गोंधळ निर्माण करू शकतात. सर्व सुशिक्षित मुसलमानांचे आदर्श असलेल्या जीनांना दोष देणे कुठल्याही जातीयवादी सुशिक्षित मुसलमानाला सोयीचे नाही. तो कितीही सुशिक्षित असला तरी तो धर्मसमुदायवादी असतो. कळत-नकळत मुस्लिम समाजाचे हितसंबंध सुरक्षित ठेवणे तो आपले कर्तव्य समजतो. मग मुस्लिम समाजाचा आततायीपणा, दंडेली आणि दोष यांच्यावर पांघरूण तरी घालणे किंवा त्यांचे समर्थन करणे हे पर्याय तो स्वीकारत असतो. आपण धर्म मानीत नाही आणि अधूनमधून व्हिस्कीचे घोट घेतो असे हे मुसलमान अनेकदा सांगत असतात. हे वाचल्यानंतर वाचकांची खात्री होऊन चुकते की या मंडळींना धार्मिक राजकारण अभिप्रेत नाही. परंतु धर्म न मानणे आणि धार्मिक राजकारण न करणे या दोन वेगवेगळ्या बाबी आहेत. कारण धर्म न मानणाऱ्या मुस्लिम नेत्यांनीच धार्मिक राजकारण केलेले आहे, हे सामान्य जनतेला कळणे कठीणच असते. खरा प्रश्न मुसलमानांच्या इतरांबरोबरच्या संबंधाचा आहे. याच्यावर या सुशिक्षितांनी सतत हिंदूविरोधी मुस्लिम गटांची भलावण केलेली आहे. सर्वप्रकारे धार्मिक आततायी मुस्लिम चळवळीचे समर्थन करणे आणि मी धर्म मानीत नाही असे सांगणे हा त्यांचा खाक्या आहे. धर्म न मानणाऱ्याने आततायी धार्मिक चळवळींचे समर्थन का करावे असा प्रश्न उपस्थित होईल. त्यांच्याजवळ या सर्व प्रश्नांची उत्तरे तयार आहेत. या चळवळी आततायी नाहीत�� असे ते उत्तर देतील. 'जीनांनी पाकिस्तान का मागितले?' या प्रश्नाला 'गांधींनी असमंजसपणा दाखविल्यामुळे' असे हे उत्तर देतील. 'भारतात सध्या हिंदू जातीयवाद का बोकाळला आहे?' यावर 'गांधी धार्मिक होते म्हणून' हे त्यांचे उत्तर आहे. गांधी धार्मिक असल्यामुळे भारतात हिंदू जातीयवाद बळकट झाला असे मानले, तर जीना धार्मिक नसल्यामुळे पाकिस्तानात धर्मनिरपेक्षवाद बळकट झाला असे त्यांनी अर्थात पुढे सांगायला हवे होते. परंतु पाकिस्तानचे\nभारतीय मुसलमान /१४९"} +{"id": "indic_deva_eval_000907_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000907_indic_mozhi_deva_word_ocr_f013c47c5fd2.jpg", "ocr": "होती."} +{"id": "indic_deva_eval_000908_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000908_hindi_handwritten_word_ocr_983022a9908a.jpg", "ocr": "मोहरा"} +{"id": "indic_deva_eval_000909_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000909_hindi_handwritten_word_ocr_afc350551197.jpg", "ocr": "मथक"} +{"id": "indic_deva_eval_000910_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000910_devanagari_page_ocr_3be3f8ac5c2e.jpg", "ocr": "4. (9) ५ंगणडतगफ्ताचफठातए छप्तताहतगा। परशच्छगल्‍गपाड ९'०एन\n5309025ग॥ 57० 40 ८3\nविज्जमानथूपान बुद्धानं थूपकथा चेव सब्बेसं सन्तिके अभिनीहारकथा च\n\nवर | छीएलबवा0,. 53070. 004#ाउक्तैआ। 9कडका0ठ, बता एचजआंगरापछत एजुंडएड\nए934गवक्ाएजए ॥(३0५5 93065. ॥& छा ८३(ए5३(353355३(ग0353५5 ७05) 90एए#2॥ ८३ चलता\n८० एणुंटए/७. 936 /#गाका। ॥(व(०त.. 9 वपआओता50... 02/गाआ\"डडठ ८9: प्वता2४३. 9ज|९0४७. ४गएताएथड\nएगवव्भातरता७७. 8009 ॥00 900#/53000 635303॥3953 ५/8/८३730३] ३०४७ 0000॥30/5/क |क३६३/3ए॒एक्रा।धठ\nएाकतिगाह00.. एकागएवरीप्व369/0.:. 5300650.. एउक्‍वकराप्लड७.. 53/ग5.. ७ए७॥8,9... 90ए/गवतवका॥ब\nएगाडत।गा... वजाणाएशव.. पाज0... 00क्‍9ग८कावबतीआाह.. एए30#ठाए0,...... ब्ीगाछ..._.का0,\n0040#करद्वाव(50॥03, ॥तत ७6609 3600 तड5७ जती/उ50'च, ३0006.9॥008 53८्डैजा कआ।3ताहपणा।,\nभला... 90क0अक०0/#99080.. ह9९श(७,.. छजंएछग.. एक). त3एडाखगगा ताउधछ,. (लएती3\n02व0भउथाउ0509].. ३0४8... ७५. जराज॑तरआ्षा3.. आ-जाहतताआा।।॥3-03ति8-ा।/उ-(कए-530:3-\n30कप803-९08- ७०2/660898377/0 ८9 5५8 (क/9 (५]55च80809 ॥६३९/8 6९५३७ १७।ा७७०\n(85) ३0000999730५3 ।॥3७३(9॥ ९७३ ३5\n\nततो दीपड्ककरों दसबलो बोधिसत्त॑ पसंसित्वा अद्गहि पुप्फमुट्टीहि पूजेत्वा\nपदक्खिणं कत्वा पक्कामि। ते पि चतुसतसहस्सखीणासबा बोधिसत्तं पुप्फेहि च॒ गन्धेहि च\nपूजेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्रमिंसु। देवमनुस्सा च तथेव पूजेत्वा वन्दित्वा पक्रमिंस। अथ\nखो बोधिसत्तो दसबलस्स व्याकरणं सुत्वा बुद्धभाव॑ करतलगतमिबव मज्ञमानो\n'पमुदितहदयो सब्बेसु पटिक्लन्तेसु सयना बुद्भाय पुप्फरासिमत्थके पल्‍लड्क आभुजित्वा निसिनज्नो\nबुद्धकारकधम्से उपधारेन्तो, कहन्नु खो बुद्धकारकरध��्मा, किं उद्धं अधो दिसासु बिदिसासु' ति,\nअनुक्रमेन सकल धम्मधातुं विचिनन्तो पोराणकवोधिसत्तेह़ि आसेवित- निसेबित॑ पठम॑\nदानपारमिं दिस्‍्वा तत्थ दत्वहसमादान कल्वा एवं अनुक़्सेन सील-नेक्खम्स-पच्ला-विसिय-\nखल्ति-सच्च-अधिद्रान-मेत्ता-उपेक्खापारमियो च॒ दिस्वा तत्थ दव्वहसमादानं कत्वा देवताहि\nअभित्थुतों आकासं अब्भुग्गन्त्वा हिमबन्त एव अगमासि।\n\nतलो दीपड्करो दशबलो बोधिसस्ब॑ प्रशंस्य अष्टाभिः पुष्पसुष्टिमि: पूजयित्वा प्रदक्षिणां कृत्वा\nप्राक्राम्यत्‌। तेषि चतुःशतसहखक्षीणाश्रवाः बोधिसत्त्व॑ पुष्पैश्च गन्धैश्च पूजयित्वा प्रदक्षिणां कृत्वा\nप्राक्रास्यन्‌। देवमनुष्याश्च तथैव पूजयित्वा वन्दित्वा प्राक्रास्यन्‌। अथ खलु बोधिसत्वों दशबलस्य\nव्याकरण श्रुत्वा बुद्धभावं करतलगतमेब मन्यमानः प्रमुदितह्दयः सर्वेषु प्रतिक्रान्तेषु शयनात्‌ उत्थाय\nपुष्पराशिसस्तके पर्यडूकम्‌ अभज्य निषण्ण: बुद्धकारकधर्मान्‌ उपधारयन्‌, कुह नु खलु बुद्धकारकधर्माः,\nकिम्‌ ऊर्ध्व॑ उताहो अधो दिशाषु विदिशाषु इति, अनुक्रमेण सकलां धर्मधातु विचिन्वन्‌\nपौराणिकबोधिसत्वैः आसेवितं_ निसेवित॑ प्रथमाम दानपारमिताम्‌ दृष्द्वा दृढ़समादान॑ कृत्वा\nएकमनुक्रमेण शीलनैप्क्रम्यप्रज्ञावीर्यक्षान्तिसत्याधिष्ठान-मैह्युपेक्षापारमसिता»च दुष्ट्वा तत्र दृढ्समादान\nकुल्वा देवतामि: अभिस्तुत: आकाशम्‌ अभ्यद्वत्वा हिसवन्‍तमेव अगमला\nतदन्तर दशबल दीपडूकर बोधिसच्त्व की प्रशंसा कर आठ मुट्ठी फूलों से उनकी पूजा एवं प्रदक्षिणा कर चले गये। वे\nचार लाख अ्हत्‌ भी फूलों तथा सुगन्धित द्रव्यों से बोधिसत्त्व की पूजा कर, प्रदक्षिणा कर वहाँ से आगे चले गये।\nदेवता तथा मनुष्य भी उसी प्रकार (बोधिसस््व) की पूजा वन्दना कर चले गए। तब बोधिसस्‍्व ने दशबल के\nभविष्यवाणी को सुनकर बुद्ध भाव को (अत्यंत सरलता) से अपनी मुट्ठी में आया सा मानते हए, प्रमुदित हृदय\nसभी के चले जाने पर लेटी हुई अवस्था से उठकर पुष्पों की ढेर पर पालथी मार बैठ गए। बुद्धकारक धर्मों का\nचिंतन करते हुए, 'बुद्धकारक धर्म कहाँ है?, क्या ऊपर नीचे या दिशाओं एवं कोण दिशाओं में?, इस प्रकार क्रमशः\nसभी धर्म धातु पर चिंतन करते हए, पूर्व काल के बोधिसच्त्वों द्वारा सेवित सर्वप्रथम दानपारमिता को देखकर और\nउसको दृढ़ रूप से ग्रहण कर और इसी प्रकार क्रम से शील- नैष्क्रम(संसार-त्याग)- प्रज्ञा- वीर्य- क्षान्ति"} +{"id": "indic_deva_eval_000911_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000911_devanagari_page_ocr_b18c230b0a59.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n488: न्‍\n\nकप्प वितक्के विधिम्हि छेदने च। कप्पेति, कप्पयति, मोरो वासमकप्पयि। कप्पितमस्सु।\nपकप्पेति, पकप्पयति। सड्कप्पेति, सड्कप्पयति। कप्पो, सड्कप्पो, विकप्पो। कप्पसमणो\nइच्च्चादीनि।\n\nतत्थ कप्पोति परिच्छेदबसेन कप्पियतीति कप्पो। सड्नकप्पोति सड्-कप्पनं। विकप्पोति\nविविधा कप्पनं, अत्थस्स अनेकस्तिकभावो। इध कप्पसद्दस्स अत्थुद्धारो भवत्ति।\n\nकप्पसद्दो अभिसद्वहनवोहारकालपड्ञजत्तिछेदनविकप्पलेससमन्तभावादिअनेकत्थो। तथा\nहिस्स “ओकप्पनीयमेत॑ भोतो गोतमस्स, यथा त॑ अरहतो सम्मासम्बुद्धस्सा/ति एबमादीसु\nअभिसद्दहनमत्थो। “अनुजानामि भिक्खवे पउ्चहि समणकप्पेहि फल॑ परिभुज्जितु\"न्ति\nएवमादीसु बोहारो। “येन सुदं निच्चकप्पं विहरामी”ति एवमादीसु कालो। “इच्चायस्मा\nकप्पो\"ति एवमादीसु पज्ञक्ति। “अलड्कतो कप्पितकेसमस्सू”ति एबमादीसु छेदनं। “कप्पति\nदरड्गुलकप्पो\"ति एवमादीसु विकप्पो। “अत्थि कप्पो निपज्जितु”\"न्ति एवमादीसु लेसो।\n“केवलकप्प॑ वेकछुवनं ओभासेत्वा”ति एवमादीसु समन्‍्तभावों।\n\nअथ 8 कप्पसद्दो सउपसग्गो अनुपसग्गो च्च\nवितक्कविधानपटिभागपज्ञत्षिकालपरमायुवोहारसमन्तभावाभिसद्ृहन छेदन विनियोग विनय\nक्रिया लेसन्तर _ कप्पतण्हादिद्लिअसड्ख्येय्यकप्पमहाकप्पादीसु दिस्सति। तथा हेस\n“नेक्खम्मसड््कप्पो. अब्यापादसडन्कप्पो\"तिआदीसु_ वितक्के आगतो। “चीवरे विकप्पं\nआपज्जेय्या”तिआदीसु विधाने, अधिकविधानं आपज्जेय्याति हि अत्थो। “सत्थुकप्पेन वत भो\nसावकेन सद्धिं मन्‍्तयमाना न जानिम्हा”तिआदीसु पटिभागे, सत्थुसदिसेनाति अयडिह तत्थ\nअत्थो। “इच्चायस्मा कप्पो”तिआदीसु पठ्ञत्तियं। “येन सुदं निच्चकप्पं विहरामी”तिआदीसु\nकाले। “आकड्खमानो आनन्द तथागतो कप्पं बातिड्रेस्य कप्पावसेस वा\"तिआदीस्‌ परमायम्हि।\nआयुकप्पो हि इध “कप्पो”ति अधिप्पेतो। “अनुजानामि भिक्खवे पठ्चहि समणकप्पेष्टि फलं\nपरिभुज्जितु\"न्तिआदीसु समणबोहारे। “केवलकप्पं बेछुबनं ओभासेत्वा”तिआदीसु समन्‍्तभावे।\n“सद्धासद्रहना ओकप्पना अभिप्पसादो”तिआदीसु अभिसद्दहने, सद्धायन्ति अत्थो। “अलड्कतो\nकप्पितकेसमस्सू”���िआदीसु छेदने। “एवमेव इतो दिन्नं, पेतानं उपकप्पती'\"तिआदीसु विनियोगे।\n“कप्पकतेन अकप्पकतं संसिब्बितं होती”तिआदीसु विनयक्रियायं। “अत्थि कप्पो निपज्जितुं,\nहन्दाहं निपज्जामी”तिआदीसु लेसे। “आपायिको नेरथिको, कप्पट्टो सडूघभेदको, कप्पं निरयम्हि\n'ति च आदीसु अन्तरकप्पे।"} +{"id": "indic_deva_eval_000912_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000912_devanagari_digits_mixed_bd1dc77a4d08.jpg", "ocr": "१४८1०३५8९५०८१1५31९७"} +{"id": "indic_deva_eval_000913_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000913_devanagari_page_ocr_9fa511a249e8.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\n403\n\nनिस बद्धायं। बद्धाति विनिबद्धो, अहड्कारस्सेत॑ं अधिबचनं। निसति।\n\nजुसि पीतिसेवनेसु। जोसति।\n\nइस परियेसने। एसति। इसि, इट्ठं, अनिद्ठं, एसं, एसमानो।\n\nसंकसे अच्छने। अच्छनं निसीदनं। सड्कसायति।\nसकारन्तधातुरूपानि।\nहकारन्तधातु\n\nहा चागे। जहति, विजह॒ति। विजहनं, जहितुं, जहातवे, जहित्वा, जहाय।\n\nम्ही ईसंहसने। म्हयते, उम्हयते विम्हयते।\n\n'तत्थ म्हयतेति सितं करोति। उम्हयतेति पहटद्ठाकारं दस्सेति। विम्हयतेति विम्हयनं करोति।\nतज्ञायं पाकछि “न नं उम्हयते दिस्वा। पेक्खितेन म्हितेन च। स्हितपुब्बंब भासति। यदा\nउम्हयमाना मं, राजपुत्ती उदिक्खति। उम्हापेय्य पभावती। पम्हापेय्य पभावती”ति।\n\nतत्थ उम्हयमानाति पहढ्लाकारं दस्सेत्वा हसमाना। उम्हापेय्याति सितवसेन पहंसेय्य।\n'पम्हापेय्याति महाहसितवसेन परिहासेय्य।\n\nहु दाने। हवति। हति।\n\nहु पसज्जकरणे। पसज्जकरणं पकारेन सज्जनक्रिया। हवति। ह॒तो, हतवा, हतावी, आहति।\n\nहू सत्तायं। होति, होन्ति। होसि, होथ। होमि, होम। पहोति, पहोन्ति। पहूतं, पहुता, कुतो\nपहता कलहा विवादा। होन्‍्तो, होन्‍्ता, होन्‍्तं, पहोन्‍तो। पच्छासमणेन होतब्बं। होतुं होतुये,\nपहोतुं, हत्वान। वत्तमानाविभत्तिरूपादीनि। एत्थ पसिद्धरूपानेव गहितानि।\n\nहोतु, होन्‍्तु। होसि, होथ। होमि, होम। पड्चमीविभत्तिरूपानि। एत्थापि पसिद्धरूपानेब\nगहितानि।\n\nह॒वेय्य, ह॒वेय्युं। हवेस्यासि, हवेल्याथ। ह॒वेय्यामि, हवेय्याम। हवेथ, हबेरं। हवेथो,\nहुवेय्याव्हो। ह॒वेय्यं, हुवेय्याम्हे। सत्तमिया रूपानि। एत्थ पन “उपको आजीबको 'हुवेय्य\nपावसोलि बत्वा सीस ओकस्पेल्वा उम्सरग गह़ेत्वा पक्‍क्मी“लि पाछिय हवेस्याति पदस्स\nदस्सनतो नयवसेन “ह॒वेय्य, ह॒वेय्यु”न्तिआदीनि वुत्तानि। ह॒पेय्यातिपि पाठो दिस्सति, यथा\nपह्ल्वपेक्खणा। तब्वसेन “हसे��्थ, हसेस्यें। हेस्थासी/तिआदिना बकारस्स पकारादेसभतानि\nरूपानिपि गहेतब्बानि।"} +{"id": "indic_deva_eval_000914_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000914_hindi_handwritten_word_ocr_e76ddfb726df.jpg", "ocr": "विधियों"} +{"id": "indic_deva_eval_000915_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000915_indic_mozhi_deva_word_ocr_2b66e66302f6.jpg", "ocr": "नाहक"} +{"id": "indic_deva_eval_000916_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000916_indic_mozhi_deva_word_ocr_da4c25eeef45.jpg", "ocr": "किया,"} +{"id": "indic_deva_eval_000917_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000917_hindi_handwritten_word_ocr_86ef73867169.jpg", "ocr": "दुपहिया"} +{"id": "indic_deva_eval_000918_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000918_indic_mozhi_deva_word_ocr_b77484c607eb.jpg", "ocr": "(प्रसन्न"} +{"id": "indic_deva_eval_000919_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000919_devanagari_page_ocr_4de2af1f16af.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n258: न्‍\n\nएकाकी, एकाकी, एकाकिनो। एकाकिं, एकाकी, एकाकिनो। दण्डीनयेन अेय्या।\n'एकाकियो, एकाकिया। एकाकियं, एकाकिये। एकाकियेन। पुरिसनयेन जेस्यं। पुल्लिड्गरूपानि।\n\n'एकाकि कुलं, एकाकी, एकाकीनि। एकाकिं, एकाकी, एकाकीनि। सेसं पुल्लिड्गसदिसं।\nएकाकियं, एकाकियानि। एकाकियं, एकाकियानि। सेसं पुल्लिड्गसदिसं। नपुंसकलिड्गरूपानि।\n\nएकाकिनी, एकाकिनी, एकाकिनियो। एकाकिनिं, एकाकिनी, एकाकिनियो।\nएकाकिनियाति इत्थीसदिसं। एकाकिया, एकाकिया, एकाकियायो। एकाकियं, एकाकिया,\nएकाकियायो।_ एकाकियायाति कज्ञासदिसं। _ इत्थिलिड्गरूपानि। सब्बानि पनेतानि\nअसब्बनासिकरूपानि अत्थन्तरविड्जापनत्थं वुत्तानीति दट्रब्बानि।\n\nइदानिद्विसद्ृपरियायस्स सदा बहुवचनन्तस्स सब्बनामसिकपदस्स उभसदस्स\nनामसिकपदसाला बच्लते -\n\n“उभो, उभो, उभोहि, उभोभि, उभिन्‍नं, उभोहि, उभोभि, उभिन्‍नं, उभोसू”ति अय॑\nपाछ्ठिनयानुरूपेन वुत्तपदमाला। अतिसे पयोगा - उभो कुमारा निक्‍कीता। उभो इत्थियो\nतिढ्न्ति, उभो चित्तानि तिद्॒न्ति, उभो पुत्ते अदासि। उभो कड्जायो पस्सति। उनो पादानि\nभिन्दित्वा, सड्ञमिस्सामि वो अहं। उभोहि हत्येहि। उभोहि बाहाहि, उभोषि चित्तेहि, उभिन्‍नं\nजनान॑, उभिन्‍न॑ इत्थीनं, उभिन्‍न॑ चित्तानं, उभोसु पुरिसेसु, उभोसु इत्थीसु, उभोसु पस्सेसूति,\nअयमस्माकं रुचि। आचरिया पन “उभेषहि, उभेभि, उभेसू”\"तिपि इच्छन्ति। कज्चायनेपि हि “उभे\nतप्पुरिसा\"ति बुत्त। सब्बानिधि एतानि मनसि कातव्वानियेव। उभसदस्स समासो अप्पसिद्धो।\nलिड्गत्तयसाधारणरूपानि।\n\nइदानि सदखावचनान॑ द्विति चतुसदान॑ सदा बहवचनन्तान॑. सब्बनासान\nनामसिकपदमालायो वुच्चन्ते -\n\nद्वे, द्वे, द्वीहि, द्वीभि, द्विन्नं, दुविन्नं, द्वीहि, द्वीभि, द्विन्नं, दुविन्नं, द्वीसु। चूव्ठनिरुत्तियं पन\n“ब्विन्तन्‍्न\"न्ति पदमाला आगता। इमानि अहंसद्दादीनि विय इत्थि लिड्गादिभावविनिमुत्तानिपि\nतीसु लिड्गेस युज्जन्ते “द्वे पुरिसा, द्वे इत्थियो, द्वे चित्तानि\"इच्चेबमादिना। इमानिपि\nकलटगनखरावारणानि रुपानि।\n\n“द्वे”ति रूप॑ द्विसद्वस्स, य॑ समासम्हि त॑ भवे।\nद्वितिप्पकतिकंयेव, नानादेसेहि सा सिया॥\nद्विभावों चेव द्वेभावो, द्विरत्तड्च दुवस्सको।"} +{"id": "indic_deva_eval_000920_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000920_hindi_handwritten_word_ocr_f7ca036aa936.jpg", "ocr": "अवैध"} +{"id": "indic_deva_eval_000921_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000921_indic_vision_bench_deva_ocr_90ac05bf97f4.jpg", "ocr": "गोदान : 163\nउसका शुभ परिणाम यही हुआ कि आपके सम्मान और प्रभाव और आमदनी में इजाफा हुआ है, अगर मेरे साथ भी आप वही चाल चल रहे हों, तो आपकी खातिर करने को तैयार हूं। रुपये न दूंगा, क्योंकि वह रिश्वत है। आपकी पत्नीजी के लिए कोई आभूषण बनवा दूंगा। है मंजूर?\nअब मैं आपसे सत्य कहता हूं कि आपको जो संवाद मिला, वह गलत है, मगर यह भी कह देना चाहता हूं कि अपने और सभी भाइयों की तरह मैं भी असामियों से जुरमाना लेता हूं और साल में दस-पांच हजार रुपये मेरे हाथ लग जाते हैं, और अगर आप मेरे मुंह से यह कौर छीनना चाहेंगे, तो आप घाटे में रहेंगे। आप भी संसार में सुख से रहना चाहते हैं, मैं भी चाहता हूं। इससे क्या फायदा कि आप न्याय और कर्त्तव्य का ढोंग रचकर मुझे भी जेरबार करें, खुद भी जेरबार हों। दिल की बात कहिए। मैं आपका बैरी नहीं हूं। आपके साथ कितनी ही बार एक चौके में एक मेज पर खा चुका हूं। मैं यह भी जानता हूं कि आप तकलीफ में हैं। आपकी हालत शायद मेरी हालत से भी खराब है। हां, अगर आपने हरिश्चन्द्र बनने की कसम खा ली है, तो आपकी खुशी। मैं चलता हूं।\nरायसाहब कुरसी से उठ खड़े हुए। ओंकारनाथ ने उनका हाथ पकड़कर संधि-भाव से\nकहा-नहीं-नहीं, अभी आपको बैठना पड़ेगा। मैं अपनी पोजीशन साफ कर देना चाहता हूं। आपने मेरे साथ जो सलूक किए हैं, उनके लिए मैं आपका आभारी हूं, लेकिन यहां सिद्धांत की बात आ गई है और आप तो जानते हैं, सिद्धांत प्राणों से भी प्यारे होते हैं।\nरायसाहब कुरसी पर बैठकर जरा मीठे स्वर में बोले-अच्छा भाई, जो चाहे लिखो। मैं तुम्हारे सिद्धांत को तोड़ना नहीं चाहता। और तो क्या होगा, बदनामी होगी। हां, कहां तक नाम के पीछे मरूं। कौन ऐसा ताल्लुकेदार है, जो असामियों को थो��़े बहुत नहीं सताता? कुत्ता हड्डी की रखवाली करे तो खाए क्या? मैं इतना ही कर सकता हूं कि आगे आपको इस तरह की कोई शिकायत न मिलेगी, अगर आपको मुझ पर कुछ विश्वास है, तो इस बार क्षमा कीजिए। किसी दूसरे संपादक से मैं इस तरह खुशामद नहीं करता। उसे सरे बाजार पिटवाता, लेकिन मुझसे आपकी दोस्ती है, इसलिए दबना ही पड़ेगा। यह समाचार-पत्रों का युग है। सरकार तक उनसे डरती है, मेरी हस्ती क्या। आप जिसे चाहें बता दें। खैर, यह झगड़ा खत्म हो। कहिए आजकल पत्र की क्या दशा है? कुछ ग्राहक बढ़े?\nओंकारनाथ ने अनिच्छा के भाव से कहा-किसी न किसी तरह काम चल जाता है और वर्तमान परिस्थिति में मैं इससे अधिक आशा नहीं रखता। मैं इस तरफ धन और भोग की लालसा लेकर नहीं आया था, इसलिए मुझे शिकायत नहीं है। मैं जनता की सेवा करने आया था और वह यथाशक्ति किए जाता हूं। राष्ट्र का कल्याण हो, यही मेरी कामना है। एक व्यक्ति के सुख-दुःख का कोई मूल्य नहीं है।\nरायसाहब ने जरा और सहृदय होकर कहा-यह सब ठीक है भाई साहब, लेकिन सेवा करने के लिए भी जीना जरूरी है। आर्थिक चिंताओं में आप एकाग्रचित्त होकर सेवा भी तो नहीं कर सकते। क्या ग्राहक-संख्या बिल्कुल नहीं बढ़ रही है?\n'बात यह है कि मैं अपने पत्र का आदर्श गिराना नहीं चाहता, अगर मैं भी आज सिनेमा स्टारों के चित्र और चरित्र छापने लगूं तो मेरे ग्राहक बढ़ सकते हैं, लेकिन अपनी तो यह नीति नहीं। और भी कितने ही ऐसे हथकंडे हैं, जिनसे पत्रों द्वारा धन कमाया जा सकता है, लेकिन मैं उन्हें गर्हित समझता हूं।'"} +{"id": "indic_deva_eval_000922_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000922_indic_mozhi_deva_word_ocr_a9254951fdd0.jpg", "ocr": "सकता"} +{"id": "indic_deva_eval_000923_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000923_indic_vision_bench_deva_ocr_dca61b9d29c6.jpg", "ocr": "सार्थकता\nकाल अमेरिकेत स्थायिक असलेले माझे भारतीय मित्र डॉ. अनंत लाभसेटवार भेटले नि मला परत एकदा जगण्यातील सार्थकता नव्याने उमजली. नागपूरजवळच्या दारव्हा गावी त्यांचा गरीब कुटुंबात जन्म झाला. ते परिस्थितीशी झगडत इथे बी. एस्सी. झाले. एम. एस्सी. साठी त्यांची अमेरिकेला निवड झाली. अमेरिकेस जाताना विमानाच्या तिकिटाएवढे पैसे नसल्याने ते बोटीने अमेरिकेस गेले. बोटीने जातानाही पॅसेंजर बोटीऐवजी ते मालवाहू बोटीने गेले. कारण ती पॅसेंजर बोटीपेक्षा स्वस्त असायची. महिनाभरचा प्रवास. वर डेकवर अमेरिकन पाव-लोणी खायचे. त्यांना तळघरात इटलीच्या उकड्या तांदळाचा भात व सूप म��ळायचं. अमेरिकेत जाऊन त्यांनी श्रमाची अनेक कामे केली व बोटीच्या प्रवासासाठी वडिलांनी काढलेले कर्ज फेडलं. अपार अभ्यास करून शिष्यवृत्ती मिळविली. एम.एस्सी.तर झालेच पण पुढे पी.एचडी. ही!\nअसा हा माणूस आज अमेरिकेत स्वतःची बँक असणारा पहिला भारतीय झाला. त्यानं रेडिओ स्टेशन खरेदी केलं. मॉल्स् (मोठी दुकानं) खरेदी केली. त्यांच्या घराचं आवारच मुळी पाच एकराचं. ही जमीन कमी पडली म्हणून की काय त्यांनी अमेरिकेत एक हजार एकर (हो! एक हजार एकर!) जमीन खरेदी केली. एक दिवस मनात आलं नि सारं विकून त्यांनी एक ट्रस्ट केला नि त्यातून ते दरवर्षी भारतातील लोकसंख्या नियंत्रणासाठी कार्य करणाच्या व्यक्ती व संस्थांना एक लाखाचा पुरस्कार देतात. मराठी भाषेवरचं प्रेम म्हणून श्रेष्ठ मराठी साहित्यिकास एक लाखाचा पुरस्कार\nजाणिवांची आरास/१५"} +{"id": "indic_deva_eval_000924_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000924_devanagari_page_ocr_c7160507b5a0.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n“तिन्दुकानि पियालानि, मधुका कासुमारयों [कासमारियों (स्था*)]।\nध्रुवं फलानि धारेन्ति, अविदूरे ममस्समं॥467॥\n“कोसम्बा [कोसुम्भा (सी स्या०)] सव्ठला निम्बा [सव्ठला नीपा (सी स्या>) पनसा\nअम्बा (?)], सादुफलसमायुता।\nध्रुबं फलानि धारेन्ति, अविदूरे ममस्समं॥468॥\n“हरीतका आमलका, अम्बजस्बुविभीतका।\nकोला भल्लातका बिलला, फलानि धारयन्ति ते॥69॥\n“आलुवा च कव्ठम्बा च, विव्ठालीतक्कव्ठानि चा।\nजीवका सुतका चेव, बहुका मम अस्समे॥470॥\n“अस्समस्साबिदूरम्हि, तव्ठाकासुं सुनिम्मिता।\nअच्छोदका सीतजला, सुपतित्था मनोरमा॥474॥\n'फ्न्दुका चियाला:, सधुका: काशुमारय:।\nश्वुवं फलानि धारयन्ति, अविदूरे ममाश्रमात्‌॥67॥\n“कुषुम्भाः सरलाः नीपा:, स्वादुफलसमायुता:।\nश्रुबं फलानि धारयन्ति, अविदूरे ममाश्रमात्‌॥68॥\n“हरीतक्यः आमलक्यः, आम्रजस्बूविभीतका:।\nकोलाः भल्लातका: बिल्वा:, फलानि धारयन्ति ते॥469॥\n“आलुकाश्व कदम्बाश्व, विडालीतक्कोलाश्व।\nजीवकाः सुतकाश्वैब, बहका मस आश्रमे॥70॥\n“आश्रमस्याविदूरे, तटाकास्म सुनिर्म्मिता:।\nअच्छोदका: शीतजलाः, सुप्रतिष्ठा मनोरमा:॥474॥\nमेरे आश्रम के निकट तिन्‍्दुक, पियाल, सधुका (सुलहटी), कार्प्मार आदि वृक्ष नित्य फल को\nधारण किये हुए विद्यमान रहते ये ॥67॥\nसेरे आश्रस के समीप कोसम्बा, सरला, नीपा आदि वृक्ष सर्वदा स्वादयुक्त फलों को धारण किये\nरहते थे ॥68॥\nमेरे आश्रम के समीप हरीतक (हरड़), ऑवला, आम, जासुन, बहेड़ा, रसभरी, भल्लातक,\nलोध, बिल्व (बेल) आदि वृक्ष सर्वदा फल धारण किए रहते थे ॥69॥\nअलुक, कदम्ब, विडाली, तक्कोल और सुतक, ये सभी मेरे आश्रम में प्रचुर मात्रा में थे ॥70॥\nमेरे आश्रम के समीप स्वच्छ एवं शीतल जल से पूर्ण एक सुन्दर, सुप्रतिष्ठित तथा सुनिर्मित\nतालाब था ॥47॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000925_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000925_devanagari_page_ocr_e86490d4a061.jpg", "ocr": "(ग) कि लक्खणा सज्ञा\n\n. ओपम्म॑ करोही ''ति\n(घ) कि लक्खणा चेतना\n\n. ओपम्मं करोही ''ति\n(डः) कि लक्खणा 'विज्ञाणं\n\n. ओपम्मं॑ करोही ''ति\n(च) कि लक्खणो वितक्को\n\n. ओपम्म॑ करोही ''ति\n(छ) कि लक्खणो विचारो\n\n. ओपम्मं करोही ''ति\n\n26. चतसिका धम्मा एकभावगता\n. ओपम्मं करोही ''ति\n\n।. पञ्चायतनानि नानाकम्मनिब्बत्तानि\n. ओपम्मं करोही ''ति\n2. कम्मस्सका सत्ता\n3. अकिच्चकरो किच्चकरो च जायामो\n. ओपम्मं॑ करोही ''ति\n2. भिय्यो ओपम्मं करोही ''ति\n3. भिय्यो ओपम्मं करोही ''ति\n4. नेरयिको अग्गि\n. भिय्यो ओपम्मं करोही ''ति\n2. भिय्यो ओपम्मं करोही ''ति\n5. महापथवी कत्थं पतिदट्विता\n'. निरोधो निब्बानं\nके लभन्ति निब्बानं\n\n| कफ\n\nज्पंज\n\n... दी\n\n004\n439\n440\nव्व\n442\n]42\n43\n43\nवृक्व\nवक्4\nवक्4व\n45\n448-209\nवक्8\nवक्ड\n48\n]49\n॥50\nव5\nब5\nह 8०5.\n]53\nकुछ\n]56\n॥57\n57\n859"} +{"id": "indic_deva_eval_000926_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000926_devanagari_page_ocr_29c91d9e0922.jpg", "ocr": "एन\n\nमहावंसो _ मनन\n\n443\nवत्थकानि गणेत्वान, मारेत्वा सेसदारके।\n\nगन्त्वा आरोचयुं सब्बे, दारका मारिता इति॥4॥\n\nगतेसु तेसु सो गन्त्वा, आयुत्तकघरं सकं।\n\nबसं अस्सासितो तेन, अहू द्वादसवस्सिको॥2॥\n\nचुन सुत्वान जीवन्तं, कुमारं तस्स मातुला।\n\nतत्थ गोपालके सब्बे, सारेतुं सन्नियोजयुं॥3॥\n\nतस्मि अहनि गोपाला, लद्धा एकं चतुप्पदं।\n\nअग्गि आहरितुं गामं, पेसेतुं तं कुमारकं॥4॥\n\nसो गन्त्वा घरमायुत्त-पुत्तकंयेव पेसयि।\n\nपादा रुजन्ति मे नेहि, अग्गि गोपालसन्तिकं॥5॥\n\nसंस्कृतच्छाया- _ वस्त्रकाणि गणयित्वा, मारयित्वा शेषदारकान्‌ ।\n\nगत्वा आरोचयन्‌ सर्वे, दारकाः मारिता इति।।44॥॥\nगतेषु तेषु सः गत्वा, आयुक्तकगृहं स्वकम्‌।\n\nअवसत्‌ आश्चासित: तत्र, अभूत्‌ द्वादशवार्षिक:।।42।।\nपुनः श्रुत्वा जीवन्तम्‌, कुमारं तस्य मातुलाः।\n\nतत्र गोपालकानु्‌ सर्वान्‌, मारयितुं सक्ष्य्योजयन्‌।।3॥।\n'तस्मिन्‌ अहनि गोपालान्‌, लब्धम्‌ एक चतुष्पदम्‌।\nअग्रिमाहर्तु ग्रामं, प्रैधिषु: त॑ं कुमारकम्‌।।4॥।\n\nस गत्वा गृहमायुक्तपुत्रकं एब अप्रेषयत्‌।\n\n'पादौ रुजत: मम नय, अग्निं ग���पालमन्तिकम्‌।।5।।\n\nहिन्दी-उन रखे वस्त्रों की गणना कर तदनुसार शेष बालकों की हत्या कर, महल में जाकर राजपुत्रों को बता दिया-\n“हमने सभी बालकों को मार दिया है।”।।4॥॥\n\nउनके चले जाने पर, वह अपने आयुक्तक के घर गया। वहाँ पर आयुक्तक से आश्थासन पाकर बारह वर्च की आयु तक\nसुखपूर्वक रहा।।42॥।\n\nफिर उस बालक को जीवित सुन कर उसके मामा लोगों ने सब ग्वालबालों को मार डालने के लिये पुन: हत्याकारी\nनियुक्त किये।।43॥।\n\nउस दिन उन ग्वालबालकों को एक पशु मिल गया। उसका मांस भूनने के लिये कुमार को अग्मि लाने के लिये ग्रास\nमें भेजा।।44॥\n\nघर जाकर उसने अपने पोषक के लड़के को यह कहकर भेज दिया कि “मेरा पैर दु:खता है, तूँ अग्वि लेकर चला जा,\n॥45॥॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000927_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000927_indic_mozhi_deva_word_ocr_6dec906aab4b.jpg", "ocr": "रहती"} +{"id": "indic_deva_eval_000928_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000928_devanagari_page_ocr_8d65074aace7.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n337\n\nकाकपेय्या, अथ पुरिसो आगच्छेय्य पारत्थिको पारगवेसी पारगामी पारं तरितुकामों, सो\nओरिमतीरे दव्छहाय अन्दुया पच्छाबाहं गाव्ठहबन्धनबन्धो”ति। तत्र अन्दूति य॑ किडिचि बन्धन\nवा। “यथा अन्दुघरे पुरिसो”ति हि वबुत्त। बन्धनविसेसो वा, “अन्दुबन्धनादीनि छिन्दित्वा\nपलायिंसू”ति हि बुत्त। अपिच अन्दनड्रेन बन्धनड्रेन अन्दु वियातिषि अन्दु, पडच कामगुणा।\nबुत्तज्हेते भगवता “इमे खो वासेट्ठ पठ्च कामगुणा अरियस्स विनये अन्दूतिषि बन्धनन्तिपि\nबुच्चन्ती”ति। निग्गहीतागमबसेनायं धातु वुत्ता। कत्थचि पन विगतनिग्गहीतागमोषि होति, तं॑\nयथा? “अविज्जा भिक्खवे पुब्बड्गमा अकुसलानं धम्मानं समापत्तिया अन्वदेव अहिरिक\"न्ति\nपाछि। एत्थ अनुअन्दति अनुबन्धतीति अन्वदि। अन्वदि एवं अन्वदेवाति कितविग्गहो\nसन्धिविग्गहो च वेदितब्बो। तथा हि अद्भकथायं “अन्वदेवाति अनुबन्धमानमेवा\"ति चुत्तं, तं\nअविज्जमहिरिकं अनुबन्धमानमेव होतीति अत्थो।\nइदि परमिस्सरिये इन्दति। इन्दनं, इन्दो।\nएत्थ इन्दोति अधिपतिभूतो यो कोचि। सो हि इन्दति परेसु इस्सरियं पापुणातीति इन्दोति\nबुच्चति। अपिच इन्दोति सक्‍को। सक्‍्कस्स हि अनेकानि नामानि -\nसकक्‍को पुरिन्ददो इन्दो, वजरभू पाकसासनों।\nसहस्सनेत्तो मघवा, देवराजा सुजम्पति॥\nसहस्सक्खो दससत-लोचनो वजिराबुधो।\nहतपति महिन्दों च, कोसियो देवकुज्जरो॥\nसुराधिपो सुरनाथो, वासवो तिदिवाधिभू।\nजम्बारि चेव वजिस-हत्थी असरसासनो।\nगन्धराजा देविन्दो, सुरिन्दो असुराभिभूति॥\nएवं अनेकानि नासानि। एकोपि हि अत्थो अनेकसदप्पवत्तिनिमित्तताय अनेकनामों। तेनाह\nभगवा -\n\nसकक्‍को महालि देवानमिन्दो पुब्बे मनुस्सभूतो समानो मघो नाम माणवों अहोसि,\nतस्मा “मघवा”ति बुच्चति। सक्‍को महालि देवानमिन्दो पुब्बे मनुस्सभूतों समानों पुरे\nदान॑ अदासि, तस्मा “पुरिन्ददो”ति बुच्चति। सक्‍को महालि देवानमिन्दो पुब्बे\nमनुस्सभूतो समानो सक्‍कच्च॑ दानं अदासि, तस्मा “सक्‍्को”ति वुच्चति। सक्‍को महालि\nदेवानमिन्दो पुब्बे मनुस्सभूतो समानो आवासं अदासि, तस्मा “बासवो”ति बुच्चति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000929_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000929_indic_mozhi_deva_word_ocr_a3fb9a1d85e3.jpg", "ocr": "प्रदेशातील"} +{"id": "indic_deva_eval_000930_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000930_devanagari_page_ocr_b1cb06d18904.jpg", "ocr": "महावंसो\n\nत॑ सुत्वान पिता तस्सा, नरे सब्बे अपेसयि।\nते गन्त्वा कलहं कत्वा, तज्जिता तेहि आगमुं॥44॥\nकलहनगरं नाम, गामो तत्थ कते अह।\nतं सुत्वा भातरो तस्सा, पछ्चयुद्धायु'पागमुं॥42॥\nसब्बे ते पण्डुलसुतो, चन्दोयेव अघातयि।\nलोहित वाहखण्डोति, तेसं युद्धमही अहु॥43॥\nमहता बल काधयन, ततो सो पण्डुकाभयो।\nगड्जाय पारिमे तिरे, दोव्छपब्बतकं अगा॥44॥\nतत्थ चत्तारि वस्सानि, वसि त॑ तत्थ मातुला।\nसुत्वा ठपेत्वा राजानं, त॑ युद्धत्थमुपागमुं॥45॥\nसंस्कृतच्छाया- त॑ श्र॒ुत्वा पिता तस्याः, नरान्‌ सर्वान्‌ अप्रेषयत्‌।\nते गत्वा कलह ं कृत्वा, तर्जिता तैः आगमन्‌।44|।\n“कलहनगरं” नाम, ग्रामः तत्र कृतेड्भूत्‌।\nत॑ श्रुत्वा श्रातरः तस्या:, पदञ्चयुद्धायोपागमन्‌।।42॥।\nसर्वान्‌ तान्‌ पाण्डुलब्राह्मणसुतः, चन्द्र एव अघातयत्‌।\n“लोहितवाहखण्ड:” इति, तेषां युद्धमही अभूत्‌।।43।।\nमहता बल-कायेन, ततः स पाण्डुकाभय:।\nगड़्न्‍्गाया: पारे तीरे, दोलापर्वतकेडगमत्‌।।44॥।\nतज्न चत्वारि वर्षाणि, बसति तं॑ तत्र मातुला:।\nश्रुत्वा स्थापयित्वा राजानें, त॑ युद्धार्थभुपागमन्‌।।45।।\nहिन्दी-कन्या का अपहरण सुनकर कन्या के पिता ने उसके पीछे अपने सभी आदमियों को उसे छुडाकर लाने के\nलिये भेजा। वे उस कुमार के सामने कलह करके भी लज्जित ही हुए।॥44॥।\nजहाँ यह युद्ध हुआ था, उस ग्राम का नाम ही “कलहतगर' हो गया। उधर उस कन्या का अपहरण सुनकर उसके\nपॉच भाई भी युद्ध हेतु सन्नद्ध हो कर आये।।42॥॥\nउन सब को पण्डुलब्राह्मण के पुत्र चन्द्र ने ही मार गिर���या। तथा वह युद्धस्थल\n\n'लोहितवाहस्वण्ड' नाम से जाना\n\nगया।।43॥\nफिर बह पण्ड्काभय अपने विशाल सैन्यसमूह के साथ गड्नगा के उस पार दोला पर्वत पर गया।।44॥।\nवह वहाँ चार वर्ष तक रहा। उस के मामा लोग, उसको वहाँ रहता हुआ सुनकर, उससे युद्ध करने के लिये\n\nआये।।45॥॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000931_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000931_devanagari_digits_mixed_89e6a7c1ddfd.jpg", "ocr": "3५९0२6"} +{"id": "indic_deva_eval_000932_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000932_devanagari_page_ocr_f33f836f6116.jpg", "ocr": "प56\n\nसीहासनियबग्गो\n\n“नगर रेणुवती नाम, इट्भकाहि सुमापितं।\n\nआयामतो तीणि सतं, चतुरस्ससमायुतं॥ 738॥\n\n““सुदस्सनो नाम पासादो, विस्सकम्मेन मापितों [विसुकम्मेन$मापितो (क*),\n\nविस्सकम्मेन निम्मितो (सी*)]।\n\nकूटागारबरूपेतो, सत्तरतनभूस्ितो॥739॥\n\nदससद्दाविवित्तं त॑ [अविवित्तं (सी*)], विज्ञाधरसमाकुलं।\n\nसुदस्सनंब नगरं, देवतानं भविस्सति॥740॥\n\nपभा निर्गच्छते तस्स, उग्गच्छन्तेव सूरिये।\n\nविरोचेस्सति त॑ निज्चं, समन्‍्ता अद्योजनं॥744॥\n\nकप्पसतसहस्सम्हि, ओक्नाककुलसम्भवो।\n\nगोतमो नाम गोत्तेन, सत्था लोके भविस्सति॥742॥\nनगर रेणसती नाम, इछकाओि: समाचितम।\nआयामतस्त्रीणि शतानि, चतुराश्वसमायुतम्‌॥738॥\n“सुदर्शनो नाम प्रासाद:, विश्वकर्मणा मापित:।\nकूटागारवरोपेत:, सप्तरत्नभूषित:॥739॥\nदशशब्दाबिविक्त तद, विद्याधरसमाकुलमा\nसुदर्शनमिव नगरम्‌, देवतानां भविष्यति॥740॥\nप्रभा निर्गल्छति तस्य, उद्धल््लल्तीब सर्वतः।\nविरोचिप्यते तन्नित्यम्‌, समन्‍ताद अएयोजनम्‌॥सवव॥\nकल्पशतसहूखे, टकचाकुकुलस स्भव:\n\nनाम गोत्रेण, शास्ता लोके भविष्यति॥742॥\nनामक नगर में विश्वकर्मा द्वारा ईटों से सुनिर्मित एक 300 योजन विस्तृत सुदर्शन\nनामक प्रासाद था ॥738॥\nविश्वकर्मा द्वारा सुनिर्मित सुदर्शन नामक प्रासाद पर ससरल्रभूचित कूटागार था ॥739॥\nसे युक्त विद्याधर (अर्थात्‌ देवताओं) से भरा हुआ, देवताओं का सुदर्शन के समान\nएक नगर होगा ॥740॥\n\nउसकी प्रभा (आभा) उगते हुए सूर्य के समान चारों ओर से आठ योजन पर्वन्त नित्य प्रकाश\nको फैलाती रहेगी ॥74॥\n\nअब से एक लाखवें कल्प में इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न वह गौतम नामक गोत्र\nहोगा ॥7420॥\n\nलोक में शास्ता"} +{"id": "indic_deva_eval_000933_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000933_indic_mozhi_deva_word_ocr_863eefe8fbf2.jpg", "ocr": "लागलो."} +{"id": "indic_deva_eval_000934_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000934_devanagari_page_ocr_bfd19f82c2f0.jpg", "ocr": "44 _संयुत्तनिकायपालि_ <:\n\nच, भिक्खवे, भिक्खु कल्याणमित्तो अरियं अट्ठड्ल्गिकं मग्गं ���ावेति, अरियं अद्ठड्िगिकं मग्गं\nबहलीकरोति? इध, भिक्‍्खवे, भिक्खु सम्मादिद्ठि भावेति रागविनयपरियोसान\nदोसविनयपरियोसानं मोहबविनयपरियोसान . « सम्मासमाधिं भावेति रागविनयपरियोसान\n\nदोसविनयपरियोसान मोहविनयपरियोसानं। एवं खो, भिकखवे, भिक्‍खु कल्याणमित्तो अरिय॑ अद्भक्िग्क\nमर्ग॑ भावेति, अरिय॑ अड्डड्िगक॑ मर्गं बहलीकरोती''ति।\n७१-७५. सीलसम्पदादिसुत्तपडचकं\n\n७१-७५. सावत्थिनिंदानं। “कधम्मो, भिक्खवे, बहूपकारों अरियस्स अट्ठड्गिकस्स\nउप्पादाय। कतमो एकधम्मो? यदिदं -- सीलसम्पदा ...पे०... यदिदं -- छन्‍दसम्पदा.\nअत्तसम्पदा ...पे*... यदिदं - दिद्धिसम्पदा...पे*... यदिदं -_ अप्पमादसम्पदा. ..पे*...।\n\n७६. योनिसोमनसिकारसम्पदासुत्तं\n\n७६.*“यदिदं- योत्तिसोमनसिकारसम्पदा। योनिसोमनसिकारसम्पन्नस्सेतं, भिक्‍्खवे, भिक्खुनो\nपाटिकड्खं- अरिय॑ अट्डड्िगक मग्गं भावेस्सति, अरिय॑ अट्डड्लिगक॑ मग्गं बहलीकरिस्सति। कथड्च,\nभिक्‍्खवे, भिक्खु योनिसोमनसिकारसम्पन्नो अरियं अद्भजछ्लिगकं मग्गं भावेति, अरियं अट्ठड्लिगिक॑ मग्गं\nइध, भिक्खवे, भिक्खु सम्मादिद्धिं भावेति...पे*. . .सम्मासमाधिं भावेति\nल्स्कृतच्छाया) च. सिक्षव:! भिक्षु: कल्याणमित्र: आर्यम्‌ अष्टाहिगक॑ मार्ग भावयति, आर्यम्‌ अष्टाडिगक\nमार्ग बहलीकरोलि? इह, भिक्षवः! झिक्षुः सम्यर्दर्शि भावयति रागविनयपर्यवसानां द्वेपविनयपर्यवसानां\nमोहबिनयपर्यवसानां ...पे( सम्यक्समाधिं भावयति रागविनयपर्यवसानं द्वेषविनयपर्यवसानं\nमोहवबिनयपर्यवसानम। एवं खल्‌, शभिक्षवः! झिक्ष्‌ः कल्याणमित्र: आर्यम अष्टादिगक मार्ग भावयति, आर्यम\nअष्टाडिगक मार्ग बहलीकरोति''इति।\n\n७१-७५.श्वावस्तीनिदानम्‌। एकधर्मः, भिक्षवः! बहपकार: आर्यस्य अष्टाडिगकस्य मार्गस्योत्पादाय।\nकतम: एकधर्म:? यदियम्‌- शीलसम्पद ...पे0.... यदियम्‌ .... छन्‍्दसम्पद ...पे0... यदियम्‌- आत्मसम्पद\n-«पे0... यदियम्‌- दृष्टिसम्पद ...पे0..... यदियम्‌- अप्रमादसम्पद ....पे0...।\n\n७६.यदियम्‌ू- योनिशोमनसिकारसम्पद। योनिशोमनसिकारसम्पन्नस्यैतत्‌, झिक्षवः! भिक्षो:,\nप्रतिकाइक्ष्यम्‌ - आर्यम्‌ अष्टाहडििगक॑ मार्ग भावयिष्यति, आर्यम्‌ अष्टाडिगकं मार्ग बहुलीकरिष्यति। कं च,\nभिक्षबः! भिक्षु: योनिशोमनसिकारसम्पन्न: आर्यम्‌ अष्टाहडिगक॑ मार्ग भावयति, आर्य अष्टाहडिकर्ग मार्ग\nबहुलीकरोति? इह, भिक्षव:! भिक्षु: सम्यग्दृष्टि: भावयति ...पे0...\nतहेन्दी) अछ्निक सार्ग की भावना करता है तथा आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना को बढाता है? भिक्षुओं! यह\nभिक्षु राग,द्वेष एवं मोह के पर्यवसान के लिये सम्यक्-दृष्टि का भावना करता है ...पूर्ववत्‌... भिक्षुओं! यह भिक्षु\nराग, द्वेष एवं मोह के पर्यवसान के लिये सम्यक्‌-समाधि का भावना करता है। इसी लिये बह साधक को आर्य\nअष्टांगिक मार्ग की भावना करता है तथा आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना को बढाता है।\n\n७१-७५. भिक्षुओं! आर्य अष्टांगिक मार्ग की उत्पाद में यह एक धर्म अहत ही उपकारक है। वह कौन सा एक\nधर्म है ? जैसे- शील की आचरण ...पूर्ववत्‌... जैसे- छन्दसम्पदा ...पूर्ववत्‌... अप्रमादसम्पदा ...पूर्ववत्‌... ।\n\n७६. योनिशोसनसिकार से ऐसी आशा की जाती है कि बह साधक को आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना\nकरेंगा है तथा आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना को बढाये गा। भिक्षुओं! किस प्रकार भिक्षु योनिशोमनसिकार मार्ग\nकी भावना करता है तथा आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना को बढाता है?\n\nयदिदं -"} +{"id": "indic_deva_eval_000935_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000935_devanagari_page_ocr_ecee975761f3.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो 25\n\nउप्पज्जन्ते च जायन्ते, बुज्झन्ते धम्मदेसने।\nचतुरो निमित्ते नाइसं, झानरतिसमप्पितो॥446॥\nपच्चन्तदेसविसये, निमन्‍्तेत्वा तथागतं।\n'तस्स आगमन मग्गं, सोधेन्ति तुद्ठमानसा॥447॥\nअहं तेन समयेन, निक्‍्खमित्वा सकस्समा।\nध्ुनन्तो वाकचीरानि, गच्छामि अम्बरे तदा॥448॥\nबेदजातं जन दिस्वा, तुद्ठहड्ठं पमोदितं।\nओरोहित्वान गगना, मनुस्से पुच्छि तावदे॥449॥\n“'तुद्ठहद्ढो पसुदितो, वेदजातों महाजनो।\nकस्स सोधीयति मग्गो, अड्जसं वटुमायनं”॥420॥\nसंस्कृतच्छाया-._ उत्पद्यन्ते च जायन्ते, बुद्ध्यन्ते धर्मदेशनानि।\nचअच्त्वारि निमित्तानि नाद्राक्षम, ध्यानरततिसमर्चितः॥46॥\nप्रत्यन्तदेशविषये, निमन्त्र्य/निमन्त्रयित्वा तथागतम्‌।\nतस्यागसनमार्गम्‌, शोधयन्ति तुष्टमानसा:॥47॥\nअहं तस्मिन्‌ समये, निष्क्रम्य स्वकाश्नमात्‌।\nधुनान्‌ वल्कची राणि, गच्छामि अम्बरे तदा॥48॥\nबेदजातं जन॑ दुष्ट्वा, तुष्हृएं प्रसुदितम्‌।\nअवरुह्य गगनात्‌, मनुष्यानपूच्छम्‌ तावता॥449॥\n“तुशह्नष्ट: प्रसुदितः, वेदजातो महाजन:।\nकस्मै शोधयति मार्गस्‌, अछ्जसं वर्त्मयानम्‌\"॥420॥\nहिन्दी- उस समय धर्मसाधना में रत मैं उनके (उन भगवान) चार निमित्तों- अबतरण, जन्म, बोधि-प्राप्ति तथा\nधर्मचक्रप्रवर्तन को नहीं देख पाया॥46॥\nसीमान्त प्रदेश में (वहाँ के निवासी) बुद्ध को निमन्त्रित कर, सन्‍्तुष्टचित्त होकर उनके आगमन के मार्ग को\nव्यवस्थित कर रहे थे ॥747॥\nमैं भी उस समय आश्षम से लिकल\nरहा था॥48॥\nतभी मैंने उन लोगों को प्रमुदित, प्रह्व एवं सन्‍्तुष्ट (मार्गशोधन कार्य करते हये) देखकर आकाशमार्ग से\nनीचे उतरकर उन लोगों से पूछा ॥449॥\n“यह जनसमूह प्रसुदित, प्रसन्न एवं सन्‍्तुष्ट होता हुआ किसके शुभागमन पर यह मार्ग व्यवस्थित एवं\nअलड्कृत कर रहा है॥420॥\n\nकर अपने वल्‍्कल बस्त्रों को हवा में लहराता हुआ आकाशमार्ग से जा"} +{"id": "indic_deva_eval_000936_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000936_indic_mozhi_deva_word_ocr_918963b9485a.jpg", "ocr": "दिलेला"} +{"id": "indic_deva_eval_000937_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000937_indic_mozhi_deva_word_ocr_89beba6aa4b9.jpg", "ocr": "बोलायचे"} +{"id": "indic_deva_eval_000938_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000938_indic_vision_bench_deva_ocr_a23c440717ed.jpg", "ocr": "आगर और पाल से संबंधित शब्दों की जानकारी श्री रमेश थानवी और श्री तपेश्वर भाई, पोस्ट जगतपुरा, वाया घोंघरडीहा, मधुबनी, बिहार से मिली है।\nशिवसागर की कलात्मक नेष्टा हमें श्री जयप्रकाश थानवी के सौजन्य से देखने को मिली। उनका पता है: मोची गली, फलौदी जोधपुर।\nसाद रोकने के अंगों का प्रारंभिक विवरण श्री शुभू पटवा और उन्हीं के गांव भीनासर, बीकानेर के श्री नारायण परिहार और जनसत्ता के संपादक श्री ओम थानवी से मिला है।\nसाद के अन्य नाम कपा और कापू भी हैं। साद निकालने की व्यवस्था उतनी ही पुरानी है जितने पुराने हैं तालाब। वास्तुशास्त्र के संस्कृत ग्रंथ 'मानसार' में इसे मीढ़-विधान कहा गया है।\nपठियाल, हथनी और घटोइया बाबा से संबंधित सामग्री श्री भगवानदास माहेश्वरी; श्री दीनदयाल ओझा, केलापाड़ा, जैसलमेर से हुई बातचीत पर आधारित है।\nस्तम्भों की विविधता को समझने में श्री राकेश दीवान और उनकी बहन सुश्री भारती दीवान से बहुत मदद मिली है।\n'पुरुष' नाप की बारीकियां हमें श्री नारायण परिहार से समझने को मिली हैं। इस संबंध में वास्तुशिल्प के प्राचीन ग्रंथ 'समरांगन सूत्रधार' में भी अणु से लेकर योजन तक के नाप देखे जा सकते हैं।\nलाखेटा के बारे में पूरी जानकारी उस्ताद निजामुद्दीनजी से मिली है। उनका पता है: बाल भवन, कोटला मार्ग, नई दिल्ली। इसी संदर्भ में भोपाल ताल के मंडीद्वीप का किस्सा श्री ब्रजमोहन पांडे की पुस्तक 'पुरातत्व प्रसंग' में देखा जा सकता है। इसमें मंडीद्वीप के अ���ावा अन्य कई सिंगल (सिंहल) द्वीपों का भी उल्लेख है। आज भी इस इलाके में सिंगलद्वीप नाम के कुछ गांव मिलते हैं।\nडाट से संबंधित सामग्री गोवा के श्री कलानंद मणि, अलवर के श्री राजेन्द्र सिंह तथा चाकसू, जयपुर के श्री शरद जोशी के साथ की गई यात्राओं के अलावा श्री रामचंद वर्म्मा के शब्दकोष में वर्णित इससे मिलते-जुलते चुरंडी, चुकरैंड आदि शब्दों के आधार पर तैयार की गई है।\nपानी की तस्करी के प्रसंग में आए बुंदेली शब्द श्री गुणसागर सत्यार्थी से मिले हैं।\n९७ आज भी खरे हैं तालाब"} +{"id": "indic_deva_eval_000939_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000939_devanagari_page_ocr_ca70483eae88.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n443\n\n“बारिजस्सेब मे सतो, बन्धस्स कुमिनासुखे।\nअक्कोसति पहरति, पिये पुत्ते अपस्सतो”ति\n\nपाछ्छि दिस्सति।\n\nमू बन्धने। सुनाति। सुनि।\n\nएत्थ मुनीति अत्तनो चित्त मुनाति मवति बन्धति रागदोसादिवसं गन्तुं न देतीति मुनि।\n\n'रि गतिदेसनेसु। रिकाति। रेणु। नकारस्स णत्तं।\n\nली सिलेसे। लिनाति, निलिनाति। लीनं, सल्‍लीनं, पटिसल्लानं।\n\nवी तन्‍्तसन्‍्ताने। वत्थं विनाति। इमिना सुत्तेन चीवरं विनाहि। कम्से - इदं खो आवुसो\nचीबरं म॑ उद्दिस्स बिय्यति। बीतं। सुवीतं। अप्पकं होति बेतब्बं। कारिते “वायापेति, तन्‍्तवायेहि\nचीवर वायापेस्सासा'ति चीवर वायासेस/ इच्वेवसादीनि भवन्ति।\n\nवी हिंसायं। विनाति। वेणु। वेणूति बंसो।\n\nलू छेदने। लुनाति। लोणं, कुसलं, बालो, लूतो।\n\nएत्थ च लोणन्ति लुनाति वीतरसभावं विनासेति सरसभावं करोतीति लोणं, लवणं। कुसो\nविय हत्थप्पदेस॑ अकुसलधम्मे लुनातीति कुसलं, अनवज्जइट्भविपाकलक्खणो धस्मो।\nदिद्वधम्मिकसम्परायिके द्वे अत्थे लुनातीति बालो, अविद्वा। लूतोति मक्कटको बुच्चति। तस्स हि\nसुत्त “लूतसुत्त”न्ति वदन्ति। यूसं पातुं पटडगमक्खिकादीनं जीवित लुनातीति लूतो।\n\nसि बन्धने। सिनाति। सीमा, सीसं।\n\nएत्थ सीमाति सिनीयते समग्गेन सडूघेन कम्मवाचाय बन्धियतेति सीमा। सा दुविधा\nबद्धसीमा अबद्धसीमाति। तासु अबद्धसीमा मरियादकरणवसेन “सीमा”ति वेदितब्बा। सिनाति\nबन्धति केसे मोव्ठिकरणवसेन एत्थाति सीसं। अड्ञानिपि योजेतब्बानि।\n\nसा पाके। सिनाति।\n\nसु हिंसाय॑। स॒णाति। परस। पर सुणन्ति हिंसस्ति एतेनाति परसु।\n\nअस भोजने। वुत्तानं फलमस्त्राति। असन॑।\n\nएत्थ असनन्ति आहारो। सो हि असियति भुज्जियतीति “असन”न्ति चुच्चति। “अस्ताथ\nखादथ पिवथा\"”ति इदमेत्थ निदस्सन।\n\nकिलिस विबाधने। किलिस्नाति। किलेसो।\n\nएल्थ च किलेसोति रागादयोपि दुकखम्पि वच्चति।\n\nउद्धस उड्छे। उड्छो परियेसनं। उद्धर्नाति।\n\nइस अभिक्खणे। इस्ताति।"} +{"id": "indic_deva_eval_000940_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000940_devanagari_page_ocr_ac3daa27815b.jpg", "ocr": "अभिधम्मपिटके\nव2\n\nकतिहि असड्ग्गहिता? एकेन खन्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूह्ि असड्गहिता। (दुकमूलकं।\n\n३९. अट्वारस कतिहि खन्‍्धेहि कतिहायतनेहि कतिहि धातूहि सड्ग्गहिता'\nखातयों असकसते ठपेत्वा पञ््चहि खन्धेहिं द्वादसहायतनेहि अड्भाइसलि पर गसहि खालहि\nकतिहि असड्गहिता? न केहिचि खन्धेहि न केहिचि आयतनेहि न धातूहि असडगहिता।\n(अद्भारसकं।)\n४. सच्चे\n\n४०. दुक्खसच्च॑ कतिहि खन्‍्धेहि कतिहायतनेहि कतिहि धातूहि सड्गहितं? दुक्खसच्च\n'पज्चहि खन्‍्धेहि द्वादसहायतनेहि अट्लारसहि धातूहि सड्गहितं। कतिहि असड्ग्गछ्ठितं? न केहिचि\nखन्‍्धेहि न केहिचि आयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्न्गहितं।\n\n४१. समुदयसच्चं ... मग्गसच्च॑ एकेन खन्‍्धेन एकेनायतनेन एकाय धातुया सडगहितं। कतिहि\nअसड्गहितं? चतूहि खनन्‍्धेहि एकादसहायतनेहि सत्तरसहि धातूहि असड्न्गहितं।\n\n४२. निरोधसच्च न केहिचि खन्धेहि एकेनायतनेन एकाय धातुया सड््गहितं।\nतल कतिमिः असझग्रहोत्तौठ एकेन स्कन्धेन दशायतनै: पोडशमि: धातुमि: असडगग्रहीतौ।\n\n३९. अष्टादश धातव: कतिशभि: स्कन्‍्थ्ै: कतिभि: आयतनै: कतिभि: धातुभि: सड्ठुग्रहीता:? अष्टादश\nधातव: असंस्कृत॑ स्कन्धत: हित्वा पड्चशि: स्कन्‍्धै: द्वादशायतनै: अष्टादशशि: धातुशि: सडन्‍ग्रहीता:। कतिमिः\nअसड्ग्रहीता:? न कैश्वित्‌ स्कन्धै: न कैश्वित्‌ आयतनैः न कैश्वित्‌ च धातुभि: असड्ग्रहीता:।\n\n४. सत्यम्‌ ४०. दुःखसत्य॑ कतिभि: स्कल्थै: कतिभि: आयतनै: कतिभि: धातुभि: सह्ग्रहीतम्‌? दुःखसत्य॑\n'पड्चै: स्कन्ध्ै: द्वादशायतनै: अष्टादशभि: धातुभि: सड्ग्रहीतम्‌। कतिभि: असडूगग्रहीतम्‌? न कैश्वित्‌ स्कन्‍्धै: न\nकैश्वित्‌ आयतनै: न कैश्वित्‌ च धातुभि: असड्ग्रहीतम्‌।\n\n४१. समुदयसत्यम्‌ ... मार्गसत्यं एकेन स्कन्‍्थेन एकेनायतनेन एकेन धातुना सड्ग्रहीतम्‌। कतिभिः\nअसडझग्रहीतम्‌? चतुर्भि: स्कन्‍्चै: एकादशायतनै: ससदशन्ि: धातुभि: असड्ग्रहीतम्‌।\n\n४२. निरोधसत्यं न कैश्वित्‌ एकेनायतनेन एकेन धातुना सह्ग्रहीतम्‌।\nतहल्ककाकतना मे जसभ्रहत्त हे? रक्त स्���न्‍ध, दस आयतनों तथा सोलह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n३५. अठारह धातु कितने स्कन्‍्धों, कितने आयतनों और कितने धातुओं में संग्रहीत हैं? अठारह धातु असंस्कृत\nनिर्वाण को स्कन्‍्ध के रूप में छोड़कर पाँच स्कन्धों, बारह धातुओं तथा अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में\nअसंग्रहीत हैं? न किन्ही स्कन्‍्धों, न किन्‍्ही आयतनों तथा न किन्‍्ही धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n४७. दुःखसत्य कितने स्कन्‍्धों, कितने आयतनों और कितने धातुओं में संग्रहीत है? दःखसत्य पाँच स्कन्‍्धों, बारह\nआयतनों तथा अठारह धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत हैं? न किन्ही स्कन्‍्धों, न किन्‍्ही आयतनों तथा न\nकिन्ही धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n\n४१. समुदयसत्य..... मार्गसत्य एक स्कन्‍्ध,\nहैं? चार\n\nएक आयतन तथा एक धातुओं में संग्रहीत हैं। कितनों में असंग्रहीत\nस्कर्धों, ग्यारह आयतनों तथा सत्रह धातुओं में असंग्रहीत हैं।\n४२. निरोधसत्य न किन्ही स्कन्‍्धों , एक आयतन तथा एक धातु में सग्रहीत हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000941_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000941_hindi_handwritten_word_ocr_fd970a431a3b.jpg", "ocr": "बजाय"} +{"id": "indic_deva_eval_000942_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000942_indic_vision_bench_deva_ocr_e5157780db66.jpg", "ocr": "दो बहनें\n\"ले जाइए\" कहकर ऊर्मि ने कुंजी उसके हाथ में दे दी। सितार की ओर एक बार नीरद की नज़र पड़ी किन्तु फिर दुविधा में पड़कर रुक गया।\nआख़िरकार नितान्त कर्तव्य के अनुरोध से ही नीरद को कहना पड़ा, \"मुझे केवल एक डर है। शशांकबाबू के घर की ओर तुम्हारा आना-जाना अधिक होता रहा तो इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम्हारी निष्ठा कमज़ोर हो जायगी। यह मत समझना कि शशांकबाबू की मैं निंदा कर रहा हूँ। वे बहुत ही अच्छे आदमी हैं। काम-धाम में उस प्रकार का उत्साह और वैसी बुद्धि मैंने बहुत कम बंगालियों में देखी है। उनका एकमात्र दोष यही है कि वे किसी भी आदर्श को नहीं मानते। कहता हूँ, उनके लिये कई बार मुझे भय होता है।\"\nइसपर से शशांक के अनेक दोषों की बात उठी और साथ ही नीरद इस अत्यन्त शोचनीय दुर्भावना को भी दबाकर नहीं रखसका कि उनमें बहुत से ऐसे दोष अभी ढके हुए हैं जो उम्र बढ़ने के साथ ही साथ एक-एक करके प्रबल आकार में प्रकट होंगे। लेकिन यह सब होने पर भो नीरद मुक्त-कंठ से ही स्वीकार करना चाहता है कि वे बहुत भले आदमी हैं। उसीके साथ यह भी\n४७"} +{"id": "indic_deva_eval_000943_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000943_indic_vision_bench_deva_ocr_171e05f13d80.jpg", "ocr": "आहे.\nतथापि, बांडगूळ, गोचीड किंवा व्यसनी पती नाहीसे करता आले नाहीत, तरी\nत्यांना वेळीच वेसण घालणं आवश्यक आहे. अन्यथा त्यांच्याकडून होणारं शोषण\nतुमचा नाश होईपर्यंत थांबणार नाही. भ्रष्टाचाराचंही तसेच आहे.\nभ्रष्टाचाराचे शास्त्र :\nसर्व संस्थांमध्ये कमी अधिक प्रमाणात भ्रष्टाचार चालतोच. उद्योग - व्यवसाय\nक्षेत्रांत त्याचं अधिष्ठान अधिक भक्कम आहे. त्यावर नियंत्रण मिळविण्यासाठी त्याचं \nशास्त्र समजून घेणं आवश्यक आहे.\nभ्रष्टाचाराची सुरुवात मुख्यतः सत्ताधीश व ज्याच्यावर सत्ता गाजविली जाते, अशी\nव्यक्ती यांच्यातील परस्पर संबंधांमधून होते. आपण सरकारी कार्यालयांत काही कामासाठी\nजाता. काम लवकर होणं आपल्या दृष्टीने आवश्यक असतं. सरकारी अधिकारी ही \nअडचण ओळखतो. 'रेट' ठरतो. देवाण-घेवाण होते. आपलं काम होतं. त्याचंही होतं.\nदोघेही ‘विन विन’ सिच्युएशनमध्ये असल्याने कुणाचीच तक्रार नसते. थोडक्यात,\nआपली गरज आणि त्याचा अधिकार यांच्यातील ‘अनैतिक संबंधा'तून अशा भ्रष्टाचाराचा\nजन्म होतो.\nनको इतकी बंधने व कठोर कायदे यातूनही भ्रष्टाचाराचा उगम होतो. जेव्हा भाडे\nनियंत्रण कायदा पूर्णपणे भाडेकरुंच्या बाजूने होता, तेव्हा न्यायालयात जाऊन २०-२०\nवर्षे भांडूनही मालकांना न्याय मिळत नसे. अशा वेळी गुंडांकरवी भाडेकरूला काढण्याचा\nमार्ग ताकदवान मालक वापरत होते. म्हणजेच भ्रष्टाचाराचा अवलंब करीत होते.\nभाडेनियंत्रण कायद्यात योग्य त्या सुधारणा झाल्यानंतर हे प्रकार बऱ्याच प्रमाणात थांबले \nआहेत.\nसाधनसंपत्तीची कमतरता हे देखील भ्रष्टाचाराचे एक निर्मितीस्थान आहे. उदाहरणार्थ,\nनोकरीच्या केवळ दहा जागा उपलब्ध आहेत. त्यासाठी दोन हजार अर्ज आले आहेत.\nअगदी योग्यतेचा विचार प्रथम केला तरी या दोन हजारांमधून त्या नोकऱ्यांसाठी योग्य\nअसे समान गणवत्तेचे ५० उमेदवार तरी सापडू शकतात. मग त्यापैकी जो पैसे देईल,\nत्याला नोकरी मिळण्याची शक्यता जास्त असते. सर्व ५० जण पैसे देण्यास तयार\nअसतील तर तो जास्त देईल त्याचा नंबर लागतो. सर्वत्र असं होतं असं नाही, पण ही\nशक्यता पूर्णपणे नाकारता येत नाही.\nपूर्वी रेल्वे, विमाने यांची संख्या कमी होती. तिकिटे मिळविण्यासाठी वरकड पैसे द्यावे लागत. नंतर या साधनांची संख्या वाढली. अधिक जागा उपलब्ध झाल्याखेरीज संगणकीकरणासारखं तंत्रज्ञान उपलब्ध झालं. यामुळे भ्रष्टाचाराच्या मार्गाने तिकिटं\nशास्त्र भ्रष्टाचाराचे/९८"} +{"id": "indic_deva_eval_000944_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000944_devanagari_page_ocr_b7d2d6b83721.jpg", "ocr": "अपदानपालि\n\n482\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो. ..पे*... कतं बुद्धस्स सासनं”॥2225॥\nइत्थं सुदं आयस्मा खण्डफुल्लियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nखण्डपुल्लियत्थेरस्सापदानं ततियं।\n\n4. असोकपूजकत्थेरअपदानं\n“तिवराय॑ं पुरे रम्मे, राजुय्यानं अहु तदा।\nउय्यानपालों तत्थासिं, रछ्जो बद्धचरो अहं॥2226॥\n“चदुसो नाम नामेन, सयम्भू सप्पभो अह।\nनिसिन्‍न॑ पुण्डरीकम्हि, छाया न जहि त॑ मुनिं॥2227॥\n“असोक पुष्फित॑ दिस्वा, पिण्डिभारं सुदस्सनं।\nबुद्धस्स अभिरोपेसिं, जलजुत्तमनामिनो॥2228॥\n“*चतुन्नबुतितो कप्पे, य॑ पुप्फमभिरोपयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजायिदं फलं॥2229॥\n'प्रतिसंविदश्वतस््र: .... पे... कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥2225॥\n\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ खण्डफुल्लीयस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\n\n“त्रिबराय॑ पुरे रम्ये, राजोद्यानम्‌ अभूत्‌ तदा।\n\nडद्यानपालः तत्रासम्‌, राज: बद्धचरो ज्हम्‌॥2226॥\n\n“पत्मो नाम नाम्ना, स्वम्भूः सप्रभोउ्भूत्‌।\n\nनिषण्णः पुण्डरीके, छाया नाजहत्‌ त॑ मुनिम्‌॥2227॥\n\n“अशोक पुष्पित॑ दुष्टूबा, पिण्डिभारं सुदर्शनमा\n\nबुद्धाय अभ्यरोपयम्‌, जलजोत्तमनास्न:॥2228॥\n\n“चतुर्नवतितसे कल्से, यत परफसम्यरोपयमा\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, बुद्धपूजाया इदं फलम्‌॥2229॥\n\nजार पटिसस्भिदाओं, आठ विसोक्षों और पडभ्िज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण\nकिया॥2225॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ खण्डफुल्लिय स्थविर ने इन गाथाओं को कहा-\n\nएक समय रमणीय त्रिवरापुर में राजोद्यान था तब मैं वहाँ राजा का उद्यानपालक अनुचर था॥2226॥\n\n'पद्मम नाम से विख्यात समर्थ स्वयस्भू हुए और श्वते कमल से निकले हुए उन मुनि को छाया ने नहीं\nत्यागा (छोड़ा) ॥2227॥\n\nखिले हुए अशोक पुष्प को देखकर और सुन्दर पिण्डभार को मैंने जलजोत्त नाम के बुद्ध को अभ्यर्षित\nकिया॥2228॥\n\nयहाँ से 94 वें कल्प में\nका ही सुपरिणाम है॥2229॥\n\nचुष्प अभ्यर्षित किया था इस कारण मैं दुर्गति को नहीं जानता, यह बुद्ध पूजा"} +{"id": "indic_deva_eval_000945_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000945_devanagari_page_ocr_29a87763c3ab.jpg", "ocr": "2\n\nग्र्थानुक्रमणिका\n\nदान सीलडच नेक्‍्खम्म॑76\nदिल्ब॑ चन्दनचुण्णज्व 34\nदिव्ब॑ मन्‍्दारव पुष्फ 30, 47, 764,\n258, 688\nदिव्वचक्खून यो जर्गो. 60\nदीपडकरस्स भ���वतों 4035\nदीपड्करस्स अपरेन 034, 300\nदीपड्करो जिनो सत्था 299\nडीपड्करो लोकचिदू 56\nइतियो कोटिसतसहस्सान॑ 346\nइतियो नव॒ुतिकोटीन॑ 758\nदुबे वस्ससहस्सानि 99॥\nदेवता देवकड्जा च 25\nदैवलो चसुजाती च 877\nदेवलोके बसित्वान_ 443\n\nदेवा दिव्बेहि तुरियेहि ॥29\nदेवा मनुस्से पस्सन्ति 428\nदेसेन्‍्ते पर धम्म॑649\nडोणमुखं हत्थि 657\nदेनबुते इतो कप्पे ॥047\nश्नड्चयो विसाखो च 802\nश्रम्मं विल्थारिक कल्बा 899\n\n846, 874, 904,\n303, 93, 960\n\nअम्मचेतिं समुस्सेल्वा 955\n\nश्म्मतब्हाक॑ मापयिल्वा _000\nधरम्मदस्सिस्स अपरेन 730\n\nश्म्मदस्सी महावीरो. 729\n\nश्म्ममेघ॑ पवस्सेत्वा 889\nश्म्मविमलमादास 004\nश्रम्मा चेव सुधम्मा च 698\n\nश्म्माषणण पसारेल्वा 926\nश्म्माभिसमयो तस्स 467\n\nअ्म्मोक्‍्क धारयित्वान 367\n\nशरणूपमो खमनेन304\n\nश्वातुवित्थारिकं आसि. 4070\n\nन केचि तेन समयेन 548\n\nन तस्स कण्टका होच्ति 644\n\nन हेते एच्तकायेब 206, 244, 23, 236\nन हैते जानन्ति सदेवमानुसा 3\n\nन होच्ति अरती सत्तान॑ 478\n\nन हेते जानस्ति सदेवमानुसा 4\n\nजकुला च सुजाता च 454\nजकुलो च निसभो च 699\nनगर अरुणवती नाम 858\nनगई कपिलवस्थु से 4024\nजगर खेमावती नाम 94\nनगर धज्जवली नाम 538\nनगर बन्धुसती नाम 830\nनगर बाराणसी नाम 989\nजगई सेखल॑ नाम 390\nनगर रम्मबली नाम 286,324\nनगर सोभवती नाम 944\nनगर चन्दवती नाम 479\nजगर सब्बसगसम्पन्‍्न 84\nजग सुधड्जवली नाम 449\nजगर हंसवती नाम 572\nनगरे असरवतिया 85\n\nजन्‍्दा चेव सुनन्‍्दा च 293\nजन्दिबद्नों सिरिबड्ढो 486\nजन्‍्दो चेब विसाखो च 362\nजस्देवस्स यक्‍्खस्स 906\nजरदेवस्स यक्‍खस्स 964\nनववस्ससहस्सानि 356, 449, 603,\n667, 796, 394, 636, 539\nनव॒ुलिवस्ससहस्सानि 364, 399, 459, 549,\n804, 62, 648,\nनव॒ुतिसलसहस्सान 785\n\nनारदस्स भगवतो 044\nनारदस्स अपरेन 554\n\nनारदो जिनवसभो_ 553\n\nनिज्जिनित्वा किलेसे सो 372\n\nनिमित्ते चतुरो दिस्वा 289, 327 358, 422,\n454, 482, 50, 575, 605, 638, 745, 772, 798,\n833. 864, 892, 9१9, 948, 993, 544, 4024.\n393, 669, 695,720\n\nनिरन्तर अकुटिल॑ 373\n\nनिरयेचि दससहस्से ॥73\n\nनिसभो च अनोमो च 484\n\nनेकान नागकोटीन॑_87\n\nनेरड्जराय तीरम्हि 45, 822, 976\n'पकरणे सत्त देसेन्तो 934"} +{"id": "indic_deva_eval_000946_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000946_indic_mozhi_deva_word_ocr_e49144d7d840.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_000947_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000947_devanagari_digits_mixed_78d28b7e203c.jpg", "ocr": "८79५०२०3५५९९"} +{"id": "indic_deva_eval_000948_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000948_indic_mozhi_deva_word_ocr_bc35f290a0a5.jpg", "ocr": "झालेली"} +{"id": "indic_deva_eval_000949_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000949_indic_mozhi_deva_word_ocr_77ff03e1996d.jpg", "ocr": "ऑगस्ट"} +{"id": "indic_deva_eval_000950_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000950_indic_mozhi_deva_word_ocr_f1415113d6d7.jpg", "ocr": "शेती"} +{"id": "indic_deva_eval_000951_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000951_indic_mozhi_deva_word_ocr_df608fc86995.jpg", "ocr": "बसायचो."} +{"id": "indic_deva_eval_000952_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000952_devanagari_page_ocr_8934e16e810e.jpg", "ocr": "धातुकथापाव्दि\n\n79\n\n२४९. उपायासो... सतिपट्ठानं... सम्मप्पधानं तीहि खनन्‍्धेहि एकेनायतनेन एकाय धातुया\nसम्पयुत्त; एकेन खन्‍्धेन एकेनायतनेन एकाय धातुया केहिलि सम्पयुत्त। कतिहि विष्पयुत्तं? एकेन\nखन्‍्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि विप्पयुत्त; एकेनायतनेन एकाय धातुया केहिचि विष्पयुत्तं।\n\n२५०. इद्धिपादो द्वीहि खन्धेहि सम्पयुत्तो; एकेन खन्धेन एकेनायतनेन एकाय धातुया केडिचि\nसम्पयुत्तो। कतिहि विप्पयुत्तो? _एकेन खन्‍्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि विप्पयुत्तो;\nएकेनायलनेन एकाय धात॒या, केहिसि विष्पयुत्ती वि' युत्ती|\n\n२५१. झानं द्वीहि खन्धेहि 'एकाय धातुया सम्पयुत्तं; एकेन खन्‍्धेन एकेनायतनेन\n'एकाय धातुया केहिचि सम्पयुत्त। कतिहि विप्पयुत्तं? एकेन खन्धेन दसहायतनेहि सोव्ठसहि धातूहि\nविष्पयुत्त; एकेनायतनेन एकाय धातुया केहिचि विप्पयुत्तं॥\n\n२५२. अप्पमज्ञा... पडिचिन्द्रियानि... पठच बलानि... सत्त बोज्झड्गा... अरियो अट्ठड्िग्गको\nमरगो तीहि खन्‍्धेज्ि एकनायतनेन एकाय धात्या सम्पयत्तो: एकेन खन्‍्धेन\nत्क)-.. ३७६. उपायासः .... स्मृतिप्रस्थानं... सम्यक्‌ प्रधान त्रिभिः स्कन्‍्लैः एकेनायतनेन एकेन धातुना\nसम्प्रयुक्तम; एकेन स्कन्‍्धेन एकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्वित्‌ सम्प्रयुक्तम्‌। कतिभिः विप्रयुक्तम्‌? एकेन\nस्कन्थेन दशायतनैः पोडशक्निः धातुज्िः विप्रयुक्तम; एकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्वित विप्रयुक्तमा\n\n२५०. ऋद्धिपादः द्वाभ्याम्‌ स्कन्धाभ्याम्‌ सम्प्रयुक्त: एकेन स्कन्धेन एकेनायतनेन एकेन धातुना\nकैश्वित्‌ सम्प्रयुक्त। कतिभिः विप्रयुक्त:? एकेन स्कन्धेन दशायतनैः घोडशभिः धातुझिः विष्रयुक्तः;\nएकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्वित्‌ विप्रयुक्तः।\n\n२५१. ध्यान द्वाभ्याम्‌ स्कन्‍्धाभ्याम्‌ एकेनायतनेन एकेन धातुना सम्प्रयुक्तम; एकेन स्कन्धेन\nएकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्वित्‌ सम्प्रयक्तम्‌। कतिभिः विप्रयक्तम्‌? एकेन स्कन्धेन दशायतनैः घोडशशिः\nशातुभिः विप्रयुक्तम्‌; एकेनायतनेन एकेन धातुना कैश्वित्‌ विप्रयुक्तमा।\n\n२५२. अप्रमाण्यं ... पश्लेन्द्रियानि.... पद्च बलानि.... सस बोध्यड्गानि... आर्य: अष्टांगिकः मार्गः\nत्रिजि: स्कन्‍्धै: एकेन��यतनेन एकेन धातुना सम्प्रयुक्तः ; एकेन स्कन्थेन\nतहेन्द- इजदए उत्ताकास..स्मृतिप्रस्थान.... सम्यक्‌ प्रधान तीन स्कन्‍्धों में एक आयतन और एक धातु के साथ\nसम्प्युक्त हैं; एक स्कन्‍ध, एक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से सम्प्रयुक्त है। कितनों से विप्रयुक्त हैं? एक स्कन्‍्ध,\nदस आयतनों और सोलह धातुओं के साथ विध्रयुक्त हैं; एक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से विप्रयुक्त है।\n\n२५०. ऋद्धिपाद दो स्कन्‍्धों में सम्प्रयुक्त हैं; एक स्कन्‍्ध से, एक आयतन से और एक धातु में आंशिक रूप से\nसम्प्रयुक्त है। कितनों से विप्रयुक्त हैं? एक स्कन्‍्ध से, दस आयतनों में और सोलह धातुओं से विप्रयुक्त हैं; एक आयतन\nऔर एक धातु में आंशिक रूप से विध्रयक्त है।\n\n२५१. ध्यान दो स्कन्धों में एक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से सम्प्रयुक्त हैं; एक स्कन्‍्ध से, एक\nआयतन और एक धातु में आंशिक रूप से सम्प्रयुक्त है। कितनों से विप्रयुक्त हैं? एक स्कन्‍्ध से, दस आयतनों में , सोलह\nधातुओं से विध्रयुक्त हैं; एक आयतन और एक धातु में आंशिक रूप से विप्रयुक्त है।\n\n२५२. अप्रमाण (ब्रह्मविहार).. - पांच -सात बोध्यंग..... आर्य अष्टांगिक मार्ग तीन\nस्कन्‍्धों में, एक आयतन और एक धातु से सम्प्रयुक्त हैं; एक स्कन्ध ,"} +{"id": "indic_deva_eval_000953_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000953_indic_mozhi_deva_word_ocr_0d99a6cb320e.jpg", "ocr": "दिली."} +{"id": "indic_deva_eval_000954_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000954_indic_mozhi_deva_word_ocr_e18f3e5983e2.jpg", "ocr": "सुद्धा"} +{"id": "indic_deva_eval_000955_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000955_devanagari_page_ocr_e2f914cd88ed.jpg", "ocr": "446 संयुत्तनिकायपालि\n\nनिरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं। एवं खो, भिक्खवे, भिक्खु योनिसोमनसिकारसम्पन्नो\nबोज्ञझगे भावेति, सत्त बोज्ञड्गे बहलीकरोती”ति।\n५०. बाहिरड-गसुत्तं\n५०. “बाहिरं, भिक्‍्खवे, अड्गन्ति करित्वा नाउजं एकड्गम्पि समनुपस्सामि सत्तन्नं\n\nबोज्झड्गगानं॑ उप्पादाय, कल्याणमित्तस्सेत॑ं, भिक्‍खवे,\nभिकक्‍्खुनो पाटिकड्खं - सत्त बोज्झड्ग्गे भावेस्सति, सत्त बोज्झड्गे बहलीकरिस्सति। कथड्च,\nभिक्खवे, भिक्‍्खु कल्याणमित्तो सत्त बोज्झड्गे भावेति, सत्त बोज्ञड्गे बहलीकरोति? इध,\nमिकक्‍खवे, भिक्‍्खू सतिसस्बोज्ञकगं भावेति विवेकनिस्सित॑...पे*... उपेक्खासम्वोज्ञकूग भावेति\nविवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं। एवं खो, भिक्खवे, भिक्‍्खु\nकल्याणमित्तो सत्त बोज्झड्ग्गे भावेति, ��त्त बोज्झड्गे बहुलीकरोती”ति। चक्‍कवत्तिवग्गो\n'पडचमो।\nतस्सुद्दानं - विधा चक्‍कवत्ति मारो, दुप्पड्जो पछ्ञवेन च।\n\nदलिद्दो अदलिद्दो च, आदिच्चड्ग्गेन ते दसाति॥\n\nसंस्कृतच्छाया) . निरोधनि:श्ित॑ व्यवसर्गपरिणामिनम्‌। एवं खलु,\nयोनिशोसनसिकारसम्पन्‍्न: बोध\n५०.“बाह्यम्‌, भिक्षब:! अड्गमिति कृत्वा नान्‍्यद्‌ एकाडइुगमपि समनुपश्यामि ससानां\nबोध्यड्गानास्‌ उत्पादाय, यथेदम्‌- झिक्षव:! कल्याणमित्रता। कल्याणमित्रस्थैतद्‌ भिक्षवः! सिक्षो:\nप्रातिकांक्यमू- सस बोध्यड्गानि भावयिष्यति, सप्त बोध्यछगानि बहलीकरिष्यति। कर्थ च, भिक्षबः!\nभिक्षु: कल्याणमित्र: सस बोध्यड्गानि भावयति, सस बोध्यड्गानि बहलीकरोति? इह, भिक्षवः! भिक्षुः\nस्मृतिसम्बोध्यछग भावयति विवेकनि:श्वितं ...पे0... उपेक्षासंबोध्यडुगं भावयति विवेकनि:ः\nविरागनि:श्षितं निरोधनि:श्वितं व्यवसर्गपरिणामिनम्‌। एवं खलु, भिक्षव:! भिक्षु: कल्याणमित्र:\nबोध्यड्गानि भावयति, सस बोध्यड्गानि बहलीकरोति”इति। चक्रवर्तिवर्ग:\nतस्योद्दानम्‌ - विधा चक्रवर्ती मार:, दुष्प्रज्ञ: प्रज्ञाबांश्व।\nदरिद्रोडदरिद्रश्व, आदित्या्यड्गैसतते दश इति॥\n\nतहेन्दी) ५०. सिक्षुओं! कल्याण-मित्र को अपना एक बाहर अंग बना लेने को छोड़, मैं किसी दूसरी चीज को नहीं\nदेखता हूँ जो सात बोध्यंग उत्पन्न कर सके। जैसे- भिक्षुओं! कल्याण-मित्र । भिक्षुओं! ऐसी आशा की जाती है कि\n\nकल्याण-मित्र भिक्षु सात बोध्यंग की भावना और अभ्यास करेगा। भिक्षुओं! कैसे कल्याण-मित्र भिक्षु सात बोध्यंग\nकी भावना और अभ्यास करेगा? यहा भिक्षुओं! भिक्षु विवेक...पूर्ववत्‌... स्मृति-संबोध्यंग...पूर्ववत्‌... उपेक्षा\nसंबोध्यंग की भावना और अभ्यास करता है। भिक्षुओं! इसी प्रकार कल्याण-मित्र वाला भिथ्ु सात बोध्यंग की\nभावना और अभ्यास करता है।\n\nइस वर्ग की सूची- विधासूत्र, चक्रवर्तिसूत्र, मारसूत्र, प्रज्ञावस्सुत्र, दुष्प्रजसूत्र, दरिद्रसूत्र, अदरिद्रसूत्र,\nआदित्यसूत्र, आध्यात्मिकांगसूत्र, बाह्यांगसूत्र।"} +{"id": "indic_deva_eval_000956_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000956_indic_mozhi_deva_word_ocr_3c0c403ad11e.jpg", "ocr": "बलवान्‌"} +{"id": "indic_deva_eval_000957_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000957_indic_mozhi_deva_word_ocr_a289a528e6f2.jpg", "ocr": "वाला"} +{"id": "indic_deva_eval_000958_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000958_indic_vision_bench_deva_ocr_a53e358744b5.jpg", "ocr": "चूूड़ीवाली\nपथिक एक बार ही उठकर बैठ गया और आँख गड़ाकर\nअँधेरे में ���ेखने लगा। सहसा बोल उठा---'चूड़ीवाली?'\n\"कौन, सरकार?\"\n\"हाँ, तुमने शोक हर लिया। मेरे अपराधजनक तामस त्याग में\nपुण्य का भी भाग था, यह मैं नहीं जानता था।\"\n\"सरदार! मैंने गृहस्थ-कुलवधू होने के लिये कठोर तपस्या की\nहै। इन चार बरसों में मुझे विश्वास हो गया है कि कुलवधू होने में\nजो महत्व है वह सेवा का है, न कि विलास का।\"\n\"सेवा ही नहीं चूड़ीवाली! उसमें विलास का अनन्त यौवन\nहै, क्योंकि केवल स्त्री पुरुष के शारीरिक बन्धन में वह पर्यवसित नहीं\nहैं। वाह्य साधनों के विकृत हो जाने तक ही उसकी सीमा नहीं,\nगार्हस्थ-जीवन उसके लिये प्रचुर उपकरण प्रस्तुत करता है इसलिये\nवह प्रेय भी है और श्रेय भी है। मुझे विश्वास है कि तुम अब\nसफल हो जाओगी!\"\n\"मेरी सफलता आपकी कृपा पर है। विश्वास है कि अब\nइतने निर्दय न होंगे।\" कहते-कहते चूड़ीवाली ने सरकार के पैर\nपकड़ लिये।\nसरकार ने उसके हाथ पकड़ लिये।\n_________\n--- १३५ ---"} +{"id": "indic_deva_eval_000959_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000959_hindi_handwritten_word_ocr_d26b9a0a245c.jpg", "ocr": "भीड़भाड़"} +{"id": "indic_deva_eval_000960_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000960_indic_mozhi_deva_word_ocr_1044cae18046.jpg", "ocr": "पहुँचा"} +{"id": "indic_deva_eval_000961_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000961_devanagari_page_ocr_211a198540e9.jpg", "ocr": "3. चिक्तवग्गो\n॥2 जे\nचालि-\n4.. अचिरं बतयं॑ कायो, पथर्विं अधिसेस्सति।\nछुद्यो अपेतविड्ञाणों, निरत्थं व कलिड्गरं॥3 /9॥\n42... दिसो दिसं यं त॑ कयिरा, वेरी वा पन जेरिनं।\nमिच्छापणिहितं चित्त, पापियो न॑ ततो करे॥3/40॥॥\n43... न त॑ माता पिता कयिरा, अठ्जे वापि च आतका।\nसम्मापणिहितं चित्त, सेय्यसो नं ततो करे॥3/44॥॥\nसंस्कृतच्छाया-\nअचिरं वताय॑ काय: पृथिवीमधिशेष्यते ।\nक्षुद्रोज्पेतविज्ञानो निरर्थमिव कलिज्भरम्‌।3/9।\nदिड्‌ द्विषं यत्‌ कुर्यात्‌ वैरी वा पुन: वैरिणम्‌ ।\nमिथ्याप्रणिहितं चित्त पापीयांसं एन तत: कुर्यात्‌ुत॥3/0॥।\nन तब्‌ मातापितरी कुर्यातामन्ये वापि च ज्ञातिका: ।\nसम्यक्‌ प्रणिहितं चित्त श्रेयांसं एन तत: कुर्यात्‌ ॥3/44 ॥।\nहिन्दी-\n\nअहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनारहित हो निरर्थक काठ की भाँति पृथिवी पर\nपड़ा रहेगा ।\n\nजितनी (हानि) शत्रु शज्षु की और बैरी बैरी की करता है झूठे (मार्ग पर) लगा चित्त\nउससे अधिक बुराई करता है ॥॥3/40॥\n\nजितनी भलाई न माता-पिता कर सकते हैं, न दूसरे भाई-बन्धु; उतनी भलाई ठीक\nमार्ग पर लगा चित्त करता है ॥॥3/44 ॥। ह\n\nचित्तवग्गो ततियो निद्ठितो।\n\nरी\n(एफ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टाारा"} +{"id": "indic_deva_eval_000962_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000962_hindi_handwritten_word_ocr_29060d4ff9b1.jpg", "ocr": "सालों"} +{"id": "indic_deva_eval_000963_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000963_indic_vision_bench_deva_ocr_2fcc1f203ae2.jpg", "ocr": "महाराष्ट्रातील १०० सामान्य पक्षी\nडॉ. राजू कसंबे : 2015\nचातक\n(छाया: डॉ. तारिक़ सानी)\nमराठी नाव:\nचातक\nइंग्रजी नाव: Pied Cuckoo (जुने नाव - Pied Crested Cuckoo).\nशास्त्रीय नाव:'\nClamator jacobinus.\nलांबी:\n३३ सेंमी.\nआकार:\nमैनेएवढा.\nओळख:\nठळक तुरा असलेला काळा पांढरा पक्षी. वरील बाजू काळी. प्राथमिक पिसांवर पांढरा पट्टा. शेपटीच्या पिसांची टोके पांढरी. पिल्लाचा रंग मळकट तपकिरी, खालील बाजू राखाडी.\nआवाज:\n'पियू-पियू...पी-पी-पियू' असा मधुर आवाज.\nव्याप्ती:\nपावसाळ्यात स्थलांतर करून येतो. संपूर्ण महाराष्ट्र.\nअधिवास:\nजंगल, झाडीचे प्रदेश, अर्ध-वाळवंटी प्रदेश.\nवीणः\nपरभृत. सातभाई आदि पक्ष्यांच्या घरट्यात अंडी घालतो.\nखाद्यः\nतुडतुडे, अस्वलअळ्या, कीटक व कधीकधी छोटी फळे. कधीकधी जमिनीवर उतरून कच-यात खाद्य हुसकतो.\n६७"} +{"id": "indic_deva_eval_000964_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000964_hindi_handwritten_word_ocr_7f9511ff0f9a.jpg", "ocr": "चॉको"} +{"id": "indic_deva_eval_000965_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000965_indic_vision_bench_deva_ocr_91eddc177729.jpg", "ocr": "चालक श्री दलीप कुमार, द्वारा श्री किशोरीलाल, मकान नं. ६२९, गली रॉबिन सिनेमा, सब्जी मंडी, मलकाग़ंज, दिल्ली-७१ से मिली थी।\nल्हास की संक्षिप्त जानकारी कर्नल टॉड द्वारा लिखित 'ऐनल्स एंड एन्टीक्विटीस ऑफ राजस्थान' के हिन्दी अनुवाद में दी गई सूचना पर आधारित है।\nनारनौल, हरियाणा के प्रसिद्ध तालाब में आज भी मुंडन संस्कार के बाद संतान के माता-पिता तालाब से मिट्टी निकाल कर पाल पर डालते हैं। इस परंपरा की विस्तृत जानकारी गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के श्री रमेश शर्मा से मिल सकती है।\nसहस्रनाम\nदिल्ली के श्री द्विजेन्द्र कालिया और उनकी पत्नी सुश्री मुकुल कालिया दिल्ली के तालाबों, डिग्गी, हौज़ और नहरों के अच्छे जानकार हैं। श्रीमती मुकुल ने पुरानी दिल्ली पर बच्चों के लिए एक सरस पुस्तिका भी लिखी है। प्रकाशक हैं: गांधी शांति केन्द्र। उनका पता है: १९९ सहयोग अपार्टमेंट्स मयूर विहार, दिल्ली।\nअंबाला की डिग्गियों की जानकारी हमें वहां के श्री देवीशरण देवेश से मिली। उनका पता है: गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र, १६३० जयप्रकाश नारायण मार्ग, अंबाला, हरियाणा। लाल किले के लाहौरी गेट के सामने बनी लाल डिग्गी की सूचना उर्दू में लिखी गई श्री सर सैयद अहमद खां की ��ुस्तक 'आसारूस सनादीद' (सन् १८६४) से मिली है। इस पुस्तक तक पहुंचने में हमें गांधी संग्रहालय के श्री हरिश्चन्द्र माथुर, गांधी शांति प्रतिष्ठान के श्री एच.एल. वधवा और श्री मुहम्मद शाहिद से मदद मिली है।\nपाठकों को यह जानकर अचरज होगा कि लाल डिग्गी तालाब एक अंग्रेज सर एलनबरो ने बनाया था और राज करने वालों के बीच यह इन्हीं के नाम पर जाना जाता था। लेकिन दिल्ली वाले इसे लाल डिग्गी ही कहते रहे क्योंकि ५०० फुट लंबा और १५० फुट चौड़ा यह तालाब लाल पत्थरों से बना था। श्री हर्न की सन् १९०६ में प्रकाशित हुई पुस्तक 'सेवन सिटीज़ ऑफ डैली' में लाल डिग्गी का सुन्दर विवरण मिलता है। दिल्ली के अन्य तालाबों, नहरों, बावड़ियों के बारे में श्री कॉर स्टीफन की 'आर्कियालॉजी एंड मान्यूमेंटल रीमेन्स ऑफ डैली, सन् १८७६;\n९९ आज भी खरे हैं तालाब"} +{"id": "indic_deva_eval_000966_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000966_devanagari_page_ocr_32ca0e2c5a56.jpg", "ocr": "अं धातुगब्भरूपवण्णनाकथा\n\nहतपल, ४७४९०७ातरमएछ बात 5० लिफ़त, पा सह त॑त 9९७०7न8९5 9७77055७(6 ता ७७९; (८॥९७४७ ०) 9 र्ज\n<०तध्भाजाएह एी2 गिए बतहारतालत७ धरती एशातंल चं छा2नफ फि्टाज0६, बताते <0ातात॥१5९०, १०६ पीठड8 जी\n४०0८ न पल का९ब७ 0९७५०, ७९ ०५ ॥0052॥06675 07 7९८।७५९३, ३॥8 पीछा ३5 ती९५ लकी; 90 00६ छाए\nअ09०त९ ६० ७४०0६ ्लफ्तातछए 7९०सजतह 9३,/९०६०१६-\n\n#क्तक४० छाश० ८2७५क८काए॥8 5303) ७080३70 ॥0८09700 ॥(00१9८93030॥508 ॥0300/८5 5350\n॥६क (४8. वा) 30/ां5वत03[970 30. 0 त॑भ। ९८७9: ॥॥8000008: 93202. अरतिशाक एव, छक2ए४ठ\nएभीव6७0४9/9%09], वा७)॥३ 7ल|क(था॥॥8 ५३#०९(४8 ५३१(03॥0553 305, 50 9क0/9760५३ 93(उता॥वएत\n॥8 78, 003४ 0४, पीलव5७8 तराछा(ीआा। 000९ एव्थ्डवॉट्ठाओ) विकधत, एवते09. ॥0व39 0\nगएा(बकाशा9 व 5७(५७ वेध्षआएधव ४३00वता। 9७०टत-एजतीआ। ताक छ]भ8 8९0. छत्रीकी0 बराताकातल\nहा फ्पारठ906. बता, 50. ९५आ03-,6७009/छ08. 308... छव्शा०,. वाताक्षाक. 70029. शब्षाव\nएताप्ठ9068 93020/5 ॥970५8 तक्षात एछ॥हा॥आा) कांविएोएएठ िआ॥त8 ७०376७॥70 \"३,270 0303 व99700/0,\n3,/क0 ॥6४वआ000 (अदा ]ं)वापे.\"7 809 का एज पीला ॥्रा3553 63592#7प. छ/(का। ॥03/9॥3/8 03 (त)97,\n५०000 त559 59706: (97७५ ५३0 (#३त 9009 व9व0३/(व8 एका पक्का 03॥300॥9559 03952 ५0 एव\nइीं0028 ॥उतीत0 8/052आ... रिछांडे (3559 5ठतितिगा) 3659, 70. ६७७, (३३४० ॥वए5७ज१99 एा0७॥9/000008\nहाी3004# आध०06 (न) ३१५8 9०04#329 (7902(५व 30000 गौ) 9503 ।(छ8 89970#(3558\n॥2७४3553 9प|90900)8)/3 ।70 4809, 9900#गठाआात ५१५५७ 0200. 83॥90000 ॥9त0 ४७७७॥७)७॥९५७\n३5७७ 0900॥#॥ गधा. छुवं3 (82.: वा. 00005, कं, 500।- उजता09553003600. ॥00श5\nज९350009 00028 63000009: 9970030090, ॥।१0४8 आठ५छए0॥अक ॥१७५७ 90000. 75\n८३05७ एीठ025७ ५ब0ताए४8 9उ2030४ठ78 बं]आत) 93993)/03 छापा एाञ05620/8 90009 7पुंआ। ठंग('0०\nअ((5ञ, 89|30000 एउ्ञा॥ा। (88 (थ॥ आ��ा) ७०93530/0आ7028 ५३0०४॥0८७ ०/बा8/83.- 89708: (#5/(900\n८20)वप्था॥08- बवा8/व)73५३0078/3_40009553, ॥00॥09: 730 (8//003559. ॥]तव करतकवै/का) ।वंठ\nउंकाह 920 बऐक00- धवा0690703 ४३0०87७00. पा ३७७४७ तीश0 ३3090 ३0, 89070 पाए\nएकआ02.. ६9१0, एज: ताजा, 00070 व030क(86/3... 50७७00570फ#570. ९६]. एव0॥९००0कगग\n05999. ((६७॥) 93550203 ७(४३72७ 93वछा,\n\nअथेको थेरो चेतियकम्मे सहायभावं इच्छन्तो कम्मकरणट्ठाने मत्तिकासदिसं कत्वा अत्तना\nअभिसड्खतं मत्तिकापिण्ड एकेन हत्थेन गहेत्वा अज्ञेन मालां गहेत्वा महाचेतियड्गनं आरुय्ह\nराजकम्मिके वच्चेत्वा वड्डकिस्स अदासि। सो गण्हन्तो”ब, पकतिमत्तिका न भवतीति जत्वा थेरस्स\nसु्ख ओलोकेसि। तस्साकारं ञअत्वा तत्थ कोलाहलं अहोसि। अनुक्लमेन राजा सुत्वा आगन्त्वा\nवड्डकिं पुच्छि:- तुय्ह॑ किर भणे एको भिक्खु अमूलकमत्तिकापिण्ड अदासीति। सो एवं आहः-\nयेभुस्येन अय्या एकेन हत्थेन पुप्फं, एकेन मत्तिकापिण्डे गहेत्वा आहरित्वा देन्ति, तेनाहं\nअजानित्वा कम्मे उपनेसि; अयं पन आगन्तुको अयं नेवासिको” ति एत्तकं जानामीति। तेन हि तं\nशेर इमस्स दस्सेहीति एकं महल्लकबलत्थं बड्गकिस्स सन्तिके ठपेसि। बड्डकी पुन आगतकाले त॑\nथेरं बलत्थस्स दस्सेसि। सो तं॑ सञ्ञानित्वा रज्जो आरोचेसि। राजा तस्स सउ्ञं अदासि। सो त्वं\n'तयो जातिसुमनमकुलकुम्भे महाबोधि-अड्जगने रासिं कत्वा गन्धञ्व ठपेत्वा महाबोधि-अड्ग्गणं\nगतकाले, आगन्तुकस्स थेरस्स पूजनत्थाय रज्जो दीपितं गन्धमालन्ति वत्वा देहीति। बलत्थो\nरज्ञा बुत्तनयेनेब तस्स बोधि-अडगणं गतकाले तं॑ गन्धमालं अदासि। सो पि सोमनस्सप्पत्तो\nह॒त्वा सेलसन्थरं धोवित्वा गन्धेन परिभण्ड कत्वा सिलासन्थरं कत्वा पुप्फं पूजेत्वा चुतुसु ठानेसु\nवन्दित्वा पाचीनद्वारे अजलिं पग्गय्ह पीत॑ उप्पादेत्वा पुप्फपूर्ज ओलोकेन्तो अद्डासि। बलत्थो\nतस्मि काले त॑ थेरं उपसड्कमित्वा बन्दित्वा एवं आह:- भन्‍्ते तुम्हाक॑ चेतियकम्मे\n\nसहायभावत्थाय दिन्नस्स अमूलकमत्तिकापिण्डस्स मूल॑ दिन्नभाव॑ राजा जानापेति, अत्तनो\nबन्दनेन बन्दापेतीति। त॑ सुत्वा थेरो अनत्तमनो अहोसि। बलत्थो:- तिट्ठन्तु भन्‍्ते तयो"} +{"id": "indic_deva_eval_000967_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000967_hindi_handwritten_word_ocr_e7b734024a46.jpg", "ocr": "पत्नियाँ"} +{"id": "indic_deva_eval_000968_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000968_devanagari_digits_mixed_77cdbc6ccb8b.jpg", "ocr": "17१49२४7९"} +{"id": "indic_deva_eval_000969_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000969_indic_vision_bench_deva_ocr_4ee9a9daed7e.jpg", "ocr": "२३\nकुदरती अिलाजमे रामनाम\nप्राकृति�� अुपचारकके अिलाजोमे सबसे समर्थ अिलाज रामनाम है। अिसमे अचम्भेकी कोअी बात नही। अेक मशहूर वैद्यने अभी अुस दिन मुझसे कहा था 'मैने अपनी सारी जिन्दगी मेरे पास आनेवाले बीमारोको तरह-तरहकी दवाकी पुडिया देनेमे बिताअी है। लेकिन जब आपने शरीरके रोगोको मिटानेके लिए रामनामकी दवा बताअी, तब मुझे याद पडा कि चरक और वाग्भट जैसे हमारे पुराने धन्वन्तरियोके वचनोसे भी आपकी बातको पुष्टि मिलती है।' आध्यात्मिक रोगोको (आधियोको) मिटानेके लिअे रामनामके जपका अिलाज बहुत पुराने जमानेसे हमारे यहा होता आया है। लेकिन चूकि बडी चीजमे छोटी चीज भी समा जाती है, अिसलिअे मेरा यह दावा है कि हमारे शरीरकी बीमारियोको दूर करनेके लिअे भी रामनामका जप सब अिलाजोका अिलाज है। प्राकृतिक अुपचारक अपने बीमारसे यह नही कहेगा कि 'तुम मुझे बुलाओ तो मै तुम्हारी सारी बीमारी दूर कर दू।' वह तो बीमारको सिर्फ यह बताअेगा कि प्राणीमात्रमे रहनेवाला और सब बीमारियोको मिटानेवाला तत्त्व कौनसा है। किस तरह अुस तत्त्वको जाग्रत किया जा सकता है, और कैसे अुसको अपने जीवनकी प्रेरक शक्ति बनाकर अुसकी मददसे अपनी बीमारियोको दूर किया जा सकता है। अगर हिन्दुस्तान अिस तत्त्वकी ताकतको समझ जाअे, तो हम आजाद तो हो ही जाअे, लेकिन अुसके अलावा आज हमारा जो देश बीमारियो और कमजोर तबीयतवालोका घर बन बैठा है, वह तन्दुरुस्त और ताकतवर शरीरवाले लोगोका देश बन जाय।\nरामनामकी शक्तिकी अपनी कुछ मर्यादा है और अुसके कारगर होनेके लिअे कुछ शर्तोका पूरा होना जरूरी है। रामनाम कोअी जतर-मतर या जादू-टोना नही। जो लोग खा-खा कर खूब मोटे हो गये है, और जो अपने मुटापेकी और अुसके साथ बढनेवाली बादीकी आफतसे बच जानेके बाद फिर तरह-तरहके पकवानोका मजा चखनेके लिअे अिलाजकी तलाशमे रहते है,\n२९"} +{"id": "indic_deva_eval_000970_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000970_indic_vision_bench_deva_ocr_c4be6bf95a6a.jpg", "ocr": "कलेक्टरांना झालेले दर्शन\nव्यवस्था आखून झाल्यावर कामासही तेवढ्याच तडफेने सुरुवात झाली. ल्हासुर्णे हे गाव कोरेगाव स्टेशनपासून दोन मैल अंतरावर येते. शाळेतील काही शिक्षक कोरेगावाहून ल्हासुर्ण्यास रोज येत असतात. वर्ग सुरू झाल्यावर त्यांना रोज दोन वेळा यावे-जावे लागत असे व त्यामुळे चार महिने त्यांना असह्य ताण सहन करावा लागला ही वस्तुस्थिती आहे. गावातच राहणाऱ्या शिक्षकांना तर चोवीस तासही अपुरे पडत. कंटाळा हा शब्दच गावकरी त्यांना उच्चारू देत नसत. रात्री दोन दोन वाजेपर्यंत वर्ग चालू रहात होते. वर्गा-वर्गामध्ये स्पर्धा लागून राहिल्या होत्या. भितीभितींवर म्हणी व बोधवचने लिहिली गेली होती. अधिकाऱ्यांच्या खेपा चालू झाल्या, तेव्हा त्यांना सारा गाव गाण्यांनी, कवितांनी व अभंगांनी अक्षरशः घुमत असल्याचे विलक्षण दृश्य पहावयास मिळाले. प्रत्यक्ष कलेक्टरमजकूर दोन तीन वेळा न सांगता एकदम रात्रीच्या वेळी गावात हजर झाले होते म्हणे! वर्गावर्गातून ते हिंडले. कुठे त्यांना गाणी ऐकायला मिळाली, कुठे एखादी नवसाक्षर महिला धार काढण्यावर भाषण देताना पहायला सापडली, तर एका ठिकाणी कलेक्टरांनाच 'आपली ओळख करून द्या' म्हणून सांगणारी खेडवळ पण शिक्षणाचे वारे प्यालेली एक बाई आढळून आली. चार महिने शिक्षणाचा एक प्रचंड डोह गावात उसळत होता. त्याच्या पवित्र निनादाने येणारे-जाणारे लहानमोठे पाहुणे स्तिमित होत होते. त्याच्या उसळणाऱ्या लाटा आसपासच्या पाच-दहा गावातून तर वाहू लागल्याच; पण सारा सातारा जिल्हाच या लाटांवर स्वार होणार की काय, अशी चिन्हेही दिसू लागली.\nल्हासुर्ण्याने अज्ञानासुर मारला\nदि. १० सप्टेंबर या दिवशी या समाजशिक्षण मोहिमेची सांगता झाली. एक हृदयस्पर्शी समारंभ या निमित्ताने गावात घडून आला. गावातील घरांच्या भिंती नव्याने रंगविण्यात आल्या होत्या. रस्ते झाडून स्वच्छ ठेवण्यात आले होते. सडासंमार्जने व रांगोळ्या यामुळे गावाला प्रसन्न शोभेची एक नवीनच झळाळी चढली होती. नवलाई देवीसमोर सभा भरली. शिक्षणाधिकारी श्री. पवार व कमिशनर श्री. मोहिते यांच्यासारखी बड़ी मंडळी पुण्याहून या समारंभासाठी मुद्दाम आली होती. पाहुण्यांना मिरवणुकीने सभास्थानी आणण्यात आले. सर्व सभा नवसाक्षर महिलांनीच चालविली. एकीने अध्यक्षांची सूचना मांडली; दुसरीने तिला अनुमोदन दिले. तिसरीने गाव-शिक्षणाची माहिती दिली. ग्रामपंचायतीच्या कारभाराबद्दल चौथी बोलली. गावाने श्रमदानाने केलेल्या कामाचे निवेदन पाचवीने केले. स्वयंपाकघर कसे असावे हे सहावीने सांगितले. शिक्षणाधिकाऱ्यांनी काहींच्या परीक्षा घेतल्या. तोही\n। ५ ।"} +{"id": "indic_deva_eval_000971_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000971_indic_mozhi_deva_word_ocr_82263a2ab540.jpg", "ocr": "लेता"} +{"id": "indic_deva_eval_000972_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000972_indic_mozhi_deva_word_ocr_cbfa3b108162.jpg", "ocr": "कंपनी"} +{"id": "indic_deva_eval_000973_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000973_devanagari_page_ocr_b58878239f80.jpg", "ocr": "पका-(सन्‍कतताकााकधाक 5\n\nअक्रामततक्राणता।श्ुएं नोट पएफमडव/रकषवाकाके -7#_\n\nत्रता वाज्लाहशांता)\n\n0एसक्त $-ाजताक्‍ब०लोक) से ब्ध्तत\nउ्क्लाहता:३००लै लैला फ्रजशाका पास्माडी जात <: छकाप्ता + 9. ड फद॒फ्श्ञात॑ज्ञाल\n\nव. शालंफ्न\nफरकन्‍्कपांफ७ सिक्याडोताए६ उद्लाजपैथा,\n\nपए३ल्‍०ल्ताल्व एतछ्लरऊां0\n(एकल १४/०0 पिष्ााका २९०३०७ए०९० [92७०॥०एए/८ए५ (5०७६ ० 99)\n\n( उलता०७ (कषएचर,(उठगप चिं्छका, [-७०६००७०- 22600 (0.2)\nछिजाक्षो :ाडाप्डॉफटता0७०6७ये+बॉ+०0.०एा\n\nठ्क्कलग छक्का : कर्ण: जपुं8३ ।< पका उक्त\nएज. उजफ्लीन्ा क्या चिल्डा\n\nक25 (१0प्रऑल्यड : ]. एफरांफच।, ॥७ड॥७ा/७ 5शाडएव 5ल्याडफीशा, [9९०0९१ ()ए7/टाआंक\n(एकल ७/०0 प्रण्ताक्का ३९९४०चा०० [92७2]०0एञा<ए६, (3०७६. ०7)\nप्‌.फलाए.०७० (.क्ाग्रएए5,७9०ापं वलडन, [.पलता०७- 22600 (0.2.)\nछ-माक्ों :कजस्डापलला०७०७2)/४४४००-००ा\n2. 22०॥ (प्र.(0.), ॥.& 58]25 लाश\nफन्‍्बडधां>व 5खा5ता 5क्चाडचाथा, [22८० एफ्रांएटाआप\n(एव )७/७० प्याना (९९७०चा८० [929९।०.एापर०६, (०७६. \"एक,\n56-57, पाडपष्प्घप॑गाब। 4ैकटक, उ्नाब्द्फचाय, )च०७ [>०0४-0058\n\nजब उ२5. 200/-\n\nक्याज5क्रंका : 2049\n\nछगाफथां शाल्ड, ॥६ एप २046, [-पलताठ७"} +{"id": "indic_deva_eval_000974_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000974_devanagari_page_ocr_db4b7c760b51.jpg", "ocr": "सहावंसो\n\n259\nएवं अचिन्तिया बुद्धा, बुद्धधम्मा अचिन्तिया।\n\nअचिन्तिये पसन्‍नानं, विपाको होति अचिन्तियो॥56॥\n\nत॑ पाटिहारियं दिस्वा, पसीदिंसु जिने जना।\n\nमत्ताभयो राजपुत्तो, कनिषट्ठी राजिनो पन॥57॥\n\nमुनिस्सरे पसीदित्वा, याचित्वान नरिस्सरं।\n\nपुरिसानं सहस्सेन, सह पब्बजि सासने॥58॥\n\nचेताविगामतो चा पि, द्वारमण्डलतो पि च।\n\nविहारबीजतो चा पि, तथा गललकपीठतो॥59॥\n\nतथो\"पतिस्सगामा च, पउठच पठच सतानि च।\n\nपब्बजुं दारका हट्ठा, जातसद्धा तथागते॥60॥\n\nसंस्कृतच्छाया- एवमचिन्‍्त्या बुद्धा:, बुद्धधर्मा अचिन्त्या:।\n\nअचिल्त्ये प्रसन्नानां, विपाको भवत्यचिन्त्य:॥॥56।॥\n\nत॑ प्रातिहारयय॑ दृष्ट्वा, प्रसीदन्‌ जिने जनाः।\n\nमत्ताभय: राजपुत्र:, कनिष्ठ: राज्ञ: पुन:ः॥57॥।\n\nसुनीश्चरं प्रसीद्य, याचित्वा नरेश्खरम्‌।\n\nपुरुषाणां सहस्त्रेण, सह प्रात्रजत्‌ शासने।।58॥।\n\nचेलाविग्रासतश्वापि, द्वारमण्डलतोऊपि च।\n\nविहारबीजतश्वापि, तथा गल्‍लकपीठतः।॥59॥\n\nतथोपतिष्य ग्रामात्‌ च, पञ्च पदञ्च शतानि च।\n\nप्राब्जजन्‌ दारका: हृष्टाः, जातश्रद्धा: तथागते।॥60॥।\nहिन्दी- इस प्रकार बुद्धों का माह��त्म्य है। उनके द्वारा उपदिष्ट धर्म भी अचिन्त्य हैं। इन “अचिन्त्यों में श्रद्धा में श्रद्धा\nरखने वालों को कर्मफल भी अचिन्‍्त्य ही होता है।।56।।\nइस चमत्कार को देखकर वहाँ उपस्थित जनसमूह बुद्ध के प्रति अत्यधिक श्रद्धालु हो गया। उसी समय राजा का\nमत्तामय नामक कनिष्ठ पुत्र।।57॥। सर अल किक\nमुनीख्चर भगवान्‌ बुद्ध के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु बनकर, राजा से आज्ञा लेकर, एक हजार पुरुषों के साथ बुद्धशासन\nमें प्रत्रजित हो गया।।58॥।\nइसी तरह चेतावी ग्राम, द्वारमण्डल, विहारबीज, गल्लक पीठ।59॥।\nतथा उपतिष्य ग्राम से पाँच-पाँच सौ युवकों ने बुद्ध के अति श्रद्धातिरेक के कारण प्रब्रज्या ग्रहण की।॥60॥॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000975_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000975_indic_mozhi_deva_word_ocr_041fd74c187d.jpg", "ocr": "तेव्हा"} +{"id": "indic_deva_eval_000976_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000976_devanagari_page_ocr_16529f140770.jpg", "ocr": "34 धम्मसज्भणि\n\n२४१. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये रूपूपपत्तिया मग्गं भावेति अज्झत्तं अरूपसजञ्जी\nबहिद्धा रूपानि पससति अप्पसमाणानि, तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामीति विविच्वेव कामेहि\nविविच्च अकुसलेहि धम्मेहि सबवितक्कं सबिचारं विवेकर्ज पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज\nविहरति सुखपटिपदं खिप्पाभिड्ञ परित्त अप्पमाणारम्मणं, तस्मि समये फस्सो होति...पे*...\nअविक्खेपो होति. ..पे*... इमे धम्मा कुसला।\n\n२४२. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये रूपूपपत्तिया मग्गं भावेति अज्झत्तं अरूपसज्जी\n\nबहिद्धा रूपानि पससति अप्पमाणानि, तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामीति विविच्वेब कामेहि\nविविच्च अकुसलेहि धम्मेह्टि सवितक्क सबिचारं विवेकर्ज पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज\nविहरति सुखपटिपदं खिप्पाभिष्ज॑ अप्पसाणं अप्पमाणारम्मणं, तस्मि समये फस्सो\nहोति. अविक्खेपो होति. ..पे*... इमे धम्मा कुसला।\n(संस्कृतच्छाया) २०७१. कतमे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये रूपोपपत्यै मार्ग भावयति अध्यात्मम्‌\nअरूपसंज्ञी बहिर्धा रूपानि पश्यति अप्रमाणानि, तानि अभिभूय जानामि पश्यामीति विविच्यैव\nकामेभ्य: विविच्यैव कामेभ्य: विविच्य अकुशलेभ्यो धर्मेभ्य: सवितर्क सविचारं विवेकजं प्रीतिसुखं प्रथम\nध्यानसुपसम्पतद्य बिहरति सुखप्रतिपदं क्षिप्राभिज्ञ परीत्तम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌, तस्मिन्‌ समये स्पर्शो\nभवति...पे*... अविक्षेपो भवति ...पे*... इमे धर्मा: कुशला:।\n\n२४२. कतमे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये ��ूपोपपत्यै मार्ग भावयति अध्यात्मम्‌ अरूपसंज्ञी\nबहिर्धा रूपानि पश्यति अप्रमाणानि, तानि अभिभूय जानामि पश्यामीति विविच्यैव कामेभ्य: विविच्य\nअकुशलेभ्यो धर्मेभ्य: सवितर्क 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विचार सहित\nऔर विव्रक से जनित प्रीति एवं सख से यक्त सुखप्रतिपद क्षिप्राभिज्ञाएतीदण-बुद्धि वाला) अप्रमाण अप्रमाणालम्बन\nबाले प्रथम ध्यान को प्रासकर विहार करता है, उस समय स्पर्श होता है ...पूर्ववत्‌... अविक्षेप होता है ...पूर्ववत्‌.\n\nधर्म कुशल हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_000977_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000977_hindi_handwritten_word_ocr_023d6c1210fe.jpg", "ocr": "हरकतें"} +{"id": "indic_deva_eval_000978_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000978_hindi_handwritten_word_ocr_f18cc43d6910.jpg", "ocr": "जगाने"} +{"id": "indic_deva_eval_000979_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000979_indic_mozhi_deva_word_ocr_27cf183e4e1e.jpg", "ocr": "पाले"} +{"id": "indic_deva_eval_000980_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000980_hindi_handwritten_word_ocr_42b60461f43f.jpg", "ocr": "सुपारी"} +{"id": "indic_deva_eval_000981_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000981_indic_mozhi_deva_word_ocr_245a29dd0fbb.jpg", "ocr": "सुरुवात"} +{"id": "indic_deva_eval_000982_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000982_indic_vision_bench_deva_ocr_f22cd6b53be5.jpg", "ocr": "२३६\nभारत\n\nइस देश-व्यापी घोर दमन से जनता में रोष पैदा होगया और पंजाब और सीमाप्रान्त को छोड़कर शेष सभी प्रान्तों में जनता ने सरकार के विरुद्ध ���िद्रोह करना शुरू कर दिया। रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं। टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट डाले गये। डाकख़ाने तथा पुलिस की चौकियाँ और थाने जला दिये गये अथवा लूट लिये गये। पुलिस तथा फौज के अफसरों की हत्यायें की गईं। डिपुटी मजिस्ट्रेटों तथा पुलिस कप्तानों आदि पर भी आक्रमण किए गए। सरकारी आफिसों में आग लगाई गई। रेलवे स्टेशनों में आग लगा दीगई। मदरास, बंबई, बिहार और संयुक्त-प्रदेश के पूर्वी भागों में इस विद्रोह ने भयंकर रूप धारण कर लिया। मदरास और बिहार प्रान्त के कई स्थानों पर १००० या इससे भी अधिक सशस्त्र भीड़ ने भयंकर उपद्रव किए।\nसरकार ने भी इन उपद्रवों के दमन के लिये प्रान्तीय सरकारों को पूरे अधिकार देदिये और भारत में अर्डिनेंस-राज और पुलिस-राज का जैसा भयानक दौरदौरा इन दिनों देखने में आया, वैसा ब्रिटिश शासन-काल में शायद ही कभी देखने में आया हो। २४ सितम्बर १९४२ को इस सम्बन्ध में वाइसराय की शासन-परिषद् के कानून-सदस्य माननीय सर सुलतान अहमद ने भारतीय केन्द्रिय असेम्बली के समक्ष अपने भाषण में बतलाया कि:––\n२५० रेलवे स्टेशनों को नष्ट किया गया अथवा उन्हें हानि पहुँचाई गई। ५५० डाकख़ानों पर हमले किए गए, ५० डाकख़ाने बिलकुल जला दिये गए और २०० को भारी नुकसान पहुँचाया गया। ३५०० से भी अधिक तार काटने की घटनाएँ हुई। ७० थाने और पुलिस चौकियों और ८५ सरकारी इमारतों पर हमले किए गए। ३१ पुलिस के लोग मार डाले गए और घायलों की संख्या इससे कई गुनी है। १८ फौज के अफसर मारे गये या घायल किए गए। ६० स्थानों पर फौज ने गोली चलाई। ६५८ जनता के व्यक्ति मारे गए। १००० जनता के लोग घायल हुए। सर सुलतान अहमद ने अपने भाषण में कहा कि कुछ हताहत व्यक्तियों को उपद्रवकारी उठाकर लेगए। इसलिए हताहतों की कुल संख्या २००० के लगभग होगी।\n२२ सितम्बर को कौंसिल आफ् स्टेट् के समक्ष माननीय सर मुहम्मद उसमान (डाक तथा हवाई विभाग के सदस्य) ने अपने भाषण में इन उपद्रवों"} +{"id": "indic_deva_eval_000983_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000983_hindi_handwritten_word_ocr_f84b0c4caf0d.jpg", "ocr": "मज़दूरों"} +{"id": "indic_deva_eval_000984_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000984_indic_vision_bench_deva_ocr_95f42d4c2177.jpg", "ocr": "को कितने अतुल आनन्द से वंचित कर रखा है, इसका अनुमान करके वह जैसे दब गये। आज उन्हें स्वयं अपने जीवन में एक अभाव का, एक रिक्तता का आभास हुआ। जिन कामनाओं का वह अपने विचार में संपूर्णत: दमन कर चुके थे, वह राख में छिपी हु�� चिनगारियों की भाँति सजीव हो गयीं।\nलल्लू ने हाथों की स्याही शांतिकुमार के मुख में पोतकर नीचे उतरने के लिए आग्रह किया, मानो इसीलिए वह उनकी गोद में गया था। नैना ने हँसकर कहा--जरा अपना मुंह तो देखिए डाक्टर साहब ! इस महान् पुरुष ने आपके साथ होली खेल डाली ! बड़ा बदमाश है।\nसुखदा हसी रोक न सकी। शांतिकुमार ने शीशे में मुंह देखा, तो वह भी ज़ोर से हँसे। वह कलंक का टीका उन्हें इस समय यश के तिलक से भी कहीं उल्लास-मय जान पड़ा।\nसहसा सुखदा ने पूछा--आपने शादी क्यों नहीं की डाक्टर साहब?\nशांतिकुमार सेवा और व्रत का जो आधार बनाकर अपने जीवन का निर्माण कर रहे थे, वह इस शय्या-सेवन के दिनों में कुछ नीचे खिसकता हुआ जान पड़ रहा था। जिसे उन्होंने जीवन का मुल सत्य समझा था, वह अब उतना दृढ़ न रह गया था। इस आपत्काल में ऐसे कितने ही अवसर आये, जब उन्हें अपना जीवन भार-सा मालूम हुआ। तीमारदारों की कमी न थी। आठों पहर दो-चार आदमी घेरे ही रहते थे। नगर के बड़े-बड़े नेताओं का आना-जाना भी बराबर होता रहता था; पर शांतिकुमार को ऐसा जान पड़ता था कि वह दूसरों की दया-शिष्टता पर बोझ हो रहे हैं। इन सेवाओं में वह माधुर्य, वह कोमलता न थी, जिससे आत्मा की तृप्ति होती। भिक्षुक को क्या अधिकार है कि वह किसी के दान का निरादर करे। दानस्वरूप उसे जो कुछ मिल जाय, वह सभी स्वीकार करना होगा। इन दिनों उन्हें कितनी ही बार अपनी माता की याद आयी थी। वह स्नेह कितना दुर्लभ था! नैना जो एक क्षण के लिए उनका हाल पूछने आ जाती थी, उसमें उन्हें न जाने क्यों एक प्रकार की स्फूर्ति का अनुभव होता था। वह जब तक रहती थी, उनकी व्यथा जाने कहाँ छिप जाती थी। उसके जाते ही फिर वहीं कराहना, वहीं बेचैनी ! उनकी\nकर्मभूमि\n२२१"} +{"id": "indic_deva_eval_000985_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000985_indic_mozhi_deva_word_ocr_91ef48fb5292.jpg", "ocr": "परिपाठ,"} +{"id": "indic_deva_eval_000986_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000986_indic_mozhi_deva_word_ocr_dd0cd73ae943.jpg", "ocr": "सोमवार,"} +{"id": "indic_deva_eval_000987_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000987_indic_mozhi_deva_word_ocr_ec67b4adb136.jpg", "ocr": "लोकांणा"} +{"id": "indic_deva_eval_000988_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000988_hindi_handwritten_word_ocr_5a6c520debbb.jpg", "ocr": "भतीजे"} +{"id": "indic_deva_eval_000989_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000989_devanagari_page_ocr_fbbdea17a444.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\nछ्श्ा\n\nचीबरीयति, धनीयति, पटीयति। हत्थिना अतिक्‍्कमति अतिहत्थयति। बीणाय उपगायति\nउपवीणयति। दव्ठ्ह॑ करोति वीरियं दव्हहयति। पमाणं करोति पमाणयति। कुसलं पुच्छति\nकुसलयति। विसुद्धा ���ोति रत्ति विसुद्धायति।\n\nतत्रायं पदमाला - “पब्बतायति, पब्बतायन्ति। पब्बतायसि, पब्बतायथ। पब्बतायामि,\n'पब्बतायामा”ति इमिना नयेन अट्ठटन्नं विभत्तीनं बसेन सेसं सब्बं योजेतब्बं, एवं “समुद्दायति,\nऋत्तीयती”तिआदीसु। तत्र कारितवसेनपि “पब्बतायन्तं पयोजयति पब्बतायति, पुत्तियन्तं\nपयोजयति पुत्तीयति” इच्चादि पदसिद्धि भवति। अय॑ पन पदमाला - पब्बतायति,\nपब्बतायन्ति। पब्बतायसि। सेसं योजेतब्बं। इच्चेव॑ धातुवसेन निष्फन्नानिप्फन्तपदानि\nविभावितानि।\n\nइदानि धातुगणलक्खणं, अधातुलक्खणं, कारितपच्वययोगं,\n\nसकारितेककम्मद्विकम्मतिकम्मपर्द,\nसुद्धकचुहेतुकत्तुपदरूपं, कम्मभावपदरूपं,\nसब्बमेतं यथारहं कथयाम।\n\nतत्र सब्बधातुकनिस्सिते सुद्धकत्तुप्पयोगे सुद्धस्सरधातुतो वा एकस्सरतो वा अनेकस्सरतो\nबा अपच्चयस्स परभावों भूवादिगणलक्खर्ण सामज्जलक्खणवसेन, विसेसलक्खणवसेन पन\nआख्यातत्ते इकारन्तानेकस्सरधातुतों सह अपच्चयेन निच्च॑ निग्गहीतागमनड्च नामिकत्ते\nनिग्गहीतागमनमत्तज्च भूवादिगणलक्खणं। _ आक्यातत्ते कत्तरि धातूृहि. अपच्चयेन\nसद्धिनियतवसेन निग्गहीतागमनं रुधादिगणलक्खणं सामजञ्जलक्खणवसेन, विसेसलक्खणवसेन\n'पन आख्यातत्ते कत्तरि धातूह्ि इवण्णेकारोकारपच्चयेहि सद्धिं नियतबसेन निग्गहीतागमनड्च\nनामकत्ते अनियतवसेन _ निग्गहीतागमनमत्तज्च रुधादिगणलक्खणं। _कत्तरि धातूहि\nआदेसलाभालाभिनो यपच्चयस्स परभावों दिवादिगणलक्खणं। कत्तरि धातृहि यथारहं णु णा\n'उणापच्चयानं॑ परभावों स्वादिगणलक्खणं। कत्तरि धातूहि नापच्चयस्स परभावो\nकियादिगणलक्खणं। _कत्तरि धातूहि _ आख्यातत्ते अप्पकतरप्पयोगवसेन नामिकत्ते\nपचुरप्पयोगवसेन प्पण्हापच्चयानं परभावों गहादिगणलक्खणं। कत्तरि धातृहि यथासम्भवं\nओयिरप्पच्चयानं॑ परभावों तनादिगणलक्खणं। आख्यातत्ते कत्तरि धातृहि सब्बथा\nजेणयप्पच्चयानं परभावो चुरादिगणलक्खरणणं सामज्ञजलक्खणवसेन, विसेसलक्खणवसेन पन\nआख्यातत्ते इकारन्तधातुतों सह णे णयपच्चयेहि निच्चे निग्गहीतागमनड्चव नामिकत्ते\nनिरगहीतागमनमत्तजच चुरादिगणलक्खणं। गणसूचकानं पत््चयानमपरत्त अधातुलक्खणं। इति\nधातुगणलक्खणमधातुलक्खण्ण विभावितं।\n\nकारितपच्चयस्स योगे “णे णयो णापे णापयो चा”ति इमे चत्तारो कारितपच्चया।\n\nदं, ऊहनीयरूपगणं, धातूनं एकगणिकद्विगणिकतेगणिकपदं,\nएककारितद्विकारितपदं, अकारितद्विकम्मकपदड्च"} +{"id": "indic_deva_eval_000990_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000990_hindi_handwritten_word_ocr_96d4afca7757.jpg", "ocr": "दुरुस्त"} +{"id": "indic_deva_eval_000991_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000991_indic_vision_bench_deva_ocr_b4440faaebf2.jpg", "ocr": "१२\nगांव-गाडा.\nकारास हक्क नव्हता. मिरास जमीनीबद्दल जर खुद्द सरकारला इतका हात आंखडून धरावा लागे, तर कर्ज उगवण्यासाठी सावकाराला ती विक्रीस काढतां येत नसे, हे सांगणे नलगे. मिरासदारांप्रमाणे उपऱ्यांचा जमिनीवर निरंतरचा असा काहीएक हक्क नसे. ते सरकारांतून सालोसाल कौलानें अगर मुदतीच्या पट्ट्याने परवडेल ती पड जमीन वाहण्यास घेत असत, आणि पेरल्या जमिनीपुरती पट्टी देत. जमिनीवर त्यांचा हक्क इतकाच की, त्यांना कौलाच्या मुदतीत तिची लागण करतां येई. कौलाची मुदत संपतांच सरकारला उपरी जमीन वाटेल त्याला लावतां येत असे, आणि तिजवरील पट्टी पण वाढवितां येत असे. इंग्रजी राज्यांत मिरासी व उपरी हा भेद उडाला. आतां कुणबी वगैरे अद्याप एकमेकांना मिरासदार किंवा उपरी म्हणतात, त्याचा अर्थ इतकाच की, गांवांत फार दिवस राहिलेला तो मिरासदार, नवीन वस्तीला आला तो उपरी, बाकी दोघाचा जमिनीवरील हक्क सारखेच. इंग्रज सरकारने रयतवारी पद्धत सुरू केली; आणि सरकार व रयत ह्यांचे जमीन धारण करण्यासंबंधाने हक्क व कर्तव्य ही मुंबईच्या जमीनमहसुलाच्या कायद्याने (इ. सन १८७९ चा ५ वा आक्ट) ठरवून टाकली. ह्या पद्धतीने प्रत्येक कुणबी थेट सरकाराकडून जमीन धारण करतो, व सरकारचा खातेदार होतो; आणि कमकसर उत्पन्नाचा सहावा हिस्सा सारा, नगदीच्या रूपाने भरतो. खातेदार आणि सरकार ह्यांच्या दरम्यान कोणीही मध्यस्थ नाही. खातेदाराने दर तीस वर्षांनी अगर कमी मुदतीने आकारण्यांत येईल तो सारा द्यावा, आणि खुशाल वंशपरंपरेनें जमीन जातीने कसून किंवा बटई, ठोक्याने (मक्त्याने) लावून तिचा उपभोग घ्यावा. सरकारसाऱ्यासाठी जमीन खालसा होते, व सावकारी कर्जासाठी ती विकली जाते. रयतेला जमीन गहाण, खरेदी देण्याची पूर्ण मुभा आहे. परंतु ह्या हक्काने पुष्कळ कुणबी कर्जबाजारी झाले, व काळी कुणब्यांकडून निघून अडाण्याकडे जाऊ लागली\n१\n[\n१\n]\n, हे पाहून सन\n↑\nसध्या सुमारे पांच हिस्से लावणी (जमीन) कुणब्यांकडे व एक हिस्सा अडाण्यांकडे आहे."} +{"id": "indic_deva_eval_000992_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000992_indic_vision_bench_deva_ocr_8794c1f9d279.jpg", "ocr": "\n६३\nबर वाफेचे पाणी ह��णार नाहीं. तितक्याच हवेला तितक्याच\nवाफेने विरण्याची परमावधीची स्थिति आणण्यास नियमित उष्णमान \nलागते. म्हणून उष्णता कमी कमी करितां वर सांगितलेल्या उष्णमानास \nउष्णता येऊन पोहोंचेपर्यंत त्या वाफेचे पाणी होणार नाहीं. \nह्या पुढे मात्र उष्णता कमी केली असतां वाफेचे पाणी होऊ लागेल; \nव जितकी जास्त उष्णता कमी करावी, तितकें जास्त वाफेचे पाणी \nहोईल. ह्याचप्रमाणे तसल्याच म्हणजे विरण्याची परमावधीची स्थिति \nप्राप्त न झालेल्या हवेमध्ये जास्त वाफ घालू लागलो, तर काय होईल ? \nहवेस ती स्थिति प्राप्त होईपर्यंत त्या हवेमध्ये जास्त वाफ \nमावेल. परंतु ती स्थिति प्राप्त झाल्यावर जितकी जास्त वाफ घालावी, \nतितकीचे पाणी होईल. ह्यावरून असे सिद्ध होते की, हवेमध्ये असलेल्या \nवाफेचे आपणांस पाणी करावयाचे झाल्यास त्या \nहवेची उष्णता कमी केली पाहिजे; अगर त्या हवेमध्ये आणखी \nवाफ घातली पाहिजे; अगर ह्या दोन्ही क्रिया एकदम केल्या \nपाहिजेत.*\nनैर्ऋत्येच्या नियतकालिक वाऱ्यामध्ये वाफ बहुतेक विरण्याच्या \nपरमावधीच्या स्थितीस प्राप्त झालेली असते. ती जामिनीकडे येऊ \nलागल्याबरोबर तिची समुद्राचे पृष्ठभागावर जितकी उष्णता असते, \nतिजपेक्षा कमी उष्णता जमिनीवर लागल्यामुळे, तसेच तिज-\n-----\n* हवेतील रजःकण व विद्युत् ही पाऊस पडण्यास कांहीं अंशी कारणीभूत \nहोतात म्हणून अलीकडे समजले आहे. परंतु ह्या गोष्टीचे ज्ञान \nअद्यापि अपुरे आहे."} +{"id": "indic_deva_eval_000993_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000993_indic_mozhi_deva_word_ocr_78bf490047e6.jpg", "ocr": "पोचली."} +{"id": "indic_deva_eval_000994_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000994_devanagari_page_ocr_d7cd6d4bfb3b.jpg", "ocr": "प48\n\nसीहासनियबग्गो\n\n“पुण्फच्छत्तं गहेत्वान, उपगच्छि नरासभं।\n\nसमाधि समापज्जन्तं, अन्तरायमकासहं॥ 700॥\n\n“उभो हत्थेहि पग्गय्ह, पुप्फच्छत्तं अदासहं।\n\nपटिग्गहेसि भगवा, पदुमुत्तरों महासुनि॥704॥\n\n“सब्बे देवा अत्तमना, हिमवन्त॑ उपेन्ति ते।\n\nसाधुकारं पवत्तेसुं, अनुमोदिस्सति चक्‍्खुमा॥702॥\n\n“इदं बत्वान ते देवा, उपगच्छुं नरुत्तमं।\n\nआकासे धारयन्तस्स [धारयन्तं मे (क), धारयतो में (2)], पदुमच्छत्तमुत्तमं॥703॥\n“सतपत्तछत्तं पर्गय्ह, अदासि तापसो मम\n\n“तमहं कित्तयिस्सामि, सुणाथ मम भासतो॥704॥\n\n'पृष्पच्छल्न॑ गृहीत्वा नु, उपागच्छे नरपमस।\n\nसमाधि समापच्न्तम्‌, अन्तरायमकार्पमहम्‌॥700॥\n“उभाश्यां हस्ताभ्यां प्रगृह्म, पुष्पच्छत्रम्‌ अदामहमा\nप्रत्यगृह्ञाद्‌ भगवान्‌, पद्मोत्तरो महामुनि:॥704॥\n\n“सर्वे देवा आसमनसः, हिमवन्तम्‌ उपयान्ति ते।\nसाथुकार॑ प्रावर्तयम्‌, अनुमोदयिष्यति चक्षुप्सान्‌॥702॥\n“इदमुकत्वा ते देवा:, उपागच्छन्‌ नरोत्तमम।\n\nआकाशे धारयन्तम्‌, पद्मच्छत्रमुत्तमम्‌॥703॥\n“शतपत्रच्छज्न॑ प्रगृह्मय, अदात्‌ तापसो मह्यम।\n\n\"तमहं कीर्च॑यिष्यामि, श्रुणुत मम भाषमाणस्य॥704॥\n\nपुष्पच्छल् को लेकर उन नरर्पभ (नरश्रेष्ठ) के पास गया तथा समाधिस्थ भगवान्‌ को समाधि\nकी अवस्था में ही- ॥#700॥\n\nमैंने दोनों हाथों से पकड़कर पुष्पच्छन्न दिया जिसे उन पद्मोत्तर, महासुनि भगवान्‌ ने ग्रहण\nकिया ॥704॥\n\nतब सभी आसमन (प्रसन्नमन) देवताओं ने विचार किया कि हम सभी हिमबन्त प्रदेश को जाते\nहैं और साधुकार प्रकट करते हैं, जिसका चक्षुष्मान्‌ अनुमोदन करेगें ॥702॥\n\nयह कह कर आकाश में उत्तम पद्मच्छत्न को धारण किए हुए वे देवतागण उन नरोत्तम भगवान्‌\nके समीप गए ॥703॥\n\nकमलच्छत्र ग्रहण कर जिस तापस ने मुझे दिया। अब मैं आपको उसकी इस दानकीर्ति का\n\nवर्णन करता हूँ, मेरे वचनों को सुनें- ॥704॥"} +{"id": "indic_deva_eval_000995_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000995_devanagari_page_ocr_127dc66ee1c2.jpg", "ocr": "47. सुपारिचरियवग्गो\n4. सुपारिचरियत्थेरअपदानं\n“पदुसों नाम नामेन, द्विपदिन्दो नरासभो।\n'पबना अभिनिक्खम्म, धम्म॑ देसेति चक्खुमा॥2046॥\n“यकक्‍्खानं समयो आसि, अविदूरे महेसिनो।\nयेन किल्वेन सम्पत्ता, अज्ञापेक्खिसु तावदे॥2047॥\n“बुद्धस्स गिरमछ्जाय, असतस्स च देसन।\nपसन्‍नचित्तों सुमनो, अप्फोटेत्वा उपद्ठहिं॥2048॥\n“सुचिण्णस्स फल पस्स, उपद्ठानस्स सत्थुनो।\nतिंसकप्पसहस्सेसु, दुग्गतिं नुपपज्जहं॥2049॥\n“ऊनतिंसे कप्पसते, समलड्कतनामको।\nसत्तरतनसम्पन्‍नो, चक्‍कवत्ती महब्बलो॥2050॥\n\nकतनामको।\n\nपद्मों नाम नाम्ना, द्विपदेन्द्रो नरर्षभ:।\n\nप्रबनात्‌ अभिनिष्क्रम्य, धर्म देशयति चक्षुप्मानु॥2046॥\nयक्षानां समयासीत्‌, अविदूरे महर्घिण:।\n\nयेन कृत्येन सम्प्रासा, अध्यप्रैक्षन्‌ तावदेव॥2047॥\nबुद्धस्य गिरमज्ञाय, अमृतस्य च देशनाम्‌।\n\nप्रसन्‍नचित्त: सुमन, अस्फोट्य उपास्थाम्‌॥2048॥\nशुचीर्णस्य फल\nज्रिंशकल्पसहसेषु, दुर्गतिं नोपपच्येजहम्‌॥2049॥\nऊनत्रिंशे कल्पशते, समलइकृतनामक:।\nसप्तरत्रसम्पन्न:, चक्रवर्ती महाबल:॥2050॥\n\nपश्य, उपस्थानस्य शास्तु:।\n\nअच्य नाम के द्विपदेन्द्र, नरर्पभ, चक्षुष्सान्‌ ने बनान्‍त से निक��� कर धर्म की देशना की॥2046॥\n\nमहर्षि से कुछ दूरी पर यक्षों का परिषद था और इस कृत्य सभा को प्राप्त कर वे प्रसन्न होकर उस तरफ\nदेखे॥2047॥\n\nबुद्ध की वाणी और अमृत देशना को जानकर प्रसन्न चित्त और सौमनस्य से ताली बजाते हुए वहाँ\nउपस्थित हए॥2048॥\n\nशास्ता की सेवा का और अभ्यास का फल देखों कि\nहुआ॥2049॥\n\n29 सौ कल्प में समलड्कृत नाम से सप्तरत्सम्पन्न, महाबलशाली, चक्रवर्ती राजा हुआ॥2050॥\n\nयहाँ से तीस हजार कल्प में मैं दुर्गति को नहीं प्रास"} +{"id": "indic_deva_eval_000996_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000996_indic_mozhi_deva_word_ocr_1b3121d46972.jpg", "ocr": "त्यांची"} +{"id": "indic_deva_eval_000997_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000997_indic_vision_bench_deva_ocr_9fe0b2513313.jpg", "ocr": "\nनई आवृत्तिकी प्रस्तावना\n['हिन्द स्वराज्य'की यह जो नई आवृत्ति प्रकाशित होती है, उसके दीबाचेके तौर पर ‘आर्यन पाथ' मासिकके ‘हिन्द स्वराज्य अंक'की जो समालोचना मैंने ‘हरिजन' में अंग्रेजीमें लिखी थी, उसका तरजुमा देना यहां नामुनासिब नहीं होगा। यह सही है कि ‘हिन्द स्वराज्य'की पहली आवृत्तिमें गांधीजीके जो विचार दिखाये गये हैं, उनमें कोई फेरबदल नहीं हुआ है। लेकिन उनका उत्तरोत्तर\n[\n१\n]\nविकास\n[\n२\n]\nतो हुआ ही है। मेरे नीचे दिये हुए लेखमें उस विकासके बारेमें कुछ चर्चा की गई है। उम्मीद है कि उससे गांधीजीके विचारोंको ज्यादा साफ समझनेमें मदद होगी। -म॰ह॰दे॰]\nमहत्त्वका प्रकाशन\n‘आर्यन पाथ' मासिकने अभी अभी ‘हिन्द स्वराज्य अंक' प्रकाशित किया है। जिस तरफ ऐसा अंक\n[\n३\n]\nनिकालनेका विचार अनोखा है, उसी तरह उसका रूप-रंग भी बढ़िया है। इसका प्रकाशन श्रीमती सोफिया वाड़ियाके भक्तिभाव-भरे श्रमका आभारी है। उन्होंने ‘हिन्द स्वराज्य'की नकलें परदेशमें अपने अनेक मित्रोंको भेजी थीं और उनमें जो मुख्य थे उन्हें उस पुस्तकके बारेमें अपने विचार लिख भेजनेके लिए कहा था। खुद श्रीमती वाड़ियाने तो उस पुस्तकके बारेमें लेख लिखे ही थे और ये विचार जाहिर किये थे कि उसमें भारतवर्षके उजले भविष्यकी आशा रही है। लेकिन उस पुस्तकमें यूरोपकी अंधाधुंधीको भी मिटानेकी शक्ति है, ऐसा यूरोपके विचारकों और लेखक-लेखिकाओंसे उन्हें कहलाना था। इसलिए उन्होंने यह योजना\n[\n४\n]\nनिकाली। उसका नतीजा अच्छा आया है। इस खास अंकमें अध्यापक सॉडी, कोल, डिलाइल बर्न्स, मिडलटन मरी, बेरेसफर्ड, ह्यू फॉसेट, क्लॉड हूटन, जिराल्ड\n१०\n↑\nलगातार\n↑\nखिलना\n↑\nनंबर\n↑\nतरकीब"} +{"id": "indic_deva_eval_000998_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000998_indic_mozhi_deva_word_ocr_954ee75b1ef2.jpg", "ocr": "आजकल"} +{"id": "indic_deva_eval_000999_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_000999_devanagari_page_ocr_40709bc8b6f6.jpg", "ocr": "बुद्धवंसो\n\nजब\nपालि- नकुलो च निसभो च, अहेसुं अग्गुपट्ठका।\n\nमसकिला च सुनन्दा च, अहेसुं अग्गुपट्ठिका॥699॥\n\nसोपि बुद्धो असमसमो, असीतिहत्थमुग्गतो।\n\nसोभते सालराजाव , उक्राजाव पूरितो॥700॥\n\nतस्स पाकतिका रंसी, अनेकसतकोटियो।\n\nउद्धं अधो दस दिसा, फरन्ति योजनं सदा॥704॥\nसोपि बुद्धो नरासभो, सब्बसत्तुत्तमो सुनि।\nवस्ससतसहस्सानि,\n\nलोके अट्ठासि चक्खुमा॥702॥\nअतुलं॑ दस्सेत्वा ओभासं, विरोचेत्वा सदेवके [अतुलं दस्सयित्वान, ओभासेत्वा सदेवके (सी-)| ।\nसोषि अनिच्चतं पत्तों, यथग्गुपादानसड्खया॥ 703॥\nसंस्कृतच्छाया-._ नकुलश्व नृषभश्य, अभवताम्‌ अग्रोपस्थायकौ।\nमकिला च सुनन्‍्दा च, अभवताम्‌ अग्रोपस्थायिके॥699॥\nसोडपि बुद्ध असमसमः, अशीतिहस्तमुदृतः।\nशौभते शालराज इब, वेणुराज इब पूरितः\nतस्य प्राकृतिका रश्मि:, अनेकशतकोटय:।\nऊरध्वम्‌ अधो दश दिशाः, स्फुरन्ति योजनं सदा॥704॥\nसोऊपि बुद्धो नरर्षभः, सर्वसत्त्वोत्तमो सुनिः।\nवर्षशतसहस्त्राणि, लोकेउस्था त्‌ चक्षुष्मान्‌॥702॥\nअतुल॑ दर्शयित्वा अवभासम्‌, विरोचस्य सदेवकाना\nसो5पि अनित्यतां प्राप्त, यथाग्रोपादानसड्ख्यया॥703॥\nहिन्दी- नकुल एवं नृषभ नामक दो प्रमुख उपासक थे तथा मकिला एवं सुनन्‍्दा ये दो प्रमुख उपासिकाएँ\nशीं॥699॥\nथे लोक में अतुल्य एवं अप्रतिम भगवान्‌ शरीर से ऊँचाई में अस्सी हाथ के थे। वे ऐसे ही शौभित होते थे\nपल्‍लवित पुष्पित कोई शाल वृक्ष हो या पूर्ण चन्द्रमण्डल हो॥700॥\nउनकी (शरीर से निकलने वाली आभा की) अनेक सौ करोड़ किरणें दशों दिशाओं में नीचे, ऊपर सदैव\nएक योजन तक फैलती थीं॥704॥\nबह पुरुषश्रेष्ठ बुद्ध सब प्राणियों में उत्तम चक्षुप्मान्‌ सुनि तथा एक लाख वर्ष तक इस संसार में\nरहे॥702॥\nउतने दीलकाल तथा इनलानसलित ससार मे वमेपकाल करत हा थे अगवान भी नन्‍्त से सरकारा के\nक्षय के कारण अनित्यता को प्राप्त (परिनिर्वृत) हो गये॥703॥\n\n700॥\n\nमानों"} +{"id": "indic_deva_eval_001000_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001000_devanagari_page_ocr_28d84d23acfa.jpg", "ocr": "सच्दनीतिप्पकरणं\n370- न्‍\n\n१६. भूवादिगणिकपरिच्छेद\nइतो परं अवग्गन्ता, मिस्सका चेव धातुयो।\nवक्‍खामि धातुभेदादि-कुसलस्स मतानुगा॥\nअकारन्तधातु\nया गतिपापुणेसु। याति, यन्ति। यातु, यन्तु। येय्य, येख्युं, अनुपरियेय्युं। यथासम्भवं\n'पदमसाला योजेतब्बा। यन्‍्तों पुरिसों। यन्‍्ती इत्थी। यन्त॑ कुल॑। यान, उपयान॑, उख्यानं इच्चादीनि।\nदिवादिगणिकस्स पनस्स “यायति, यायन्ती\"तिआदीनि रूपानि भवन्ति।\nतत्न यानन्तिआदीस्‌ यन्ति एतेनाति यानं, रथसकटादि। उपयन्ति एतेन इस्सरस्स वा\nपियमनापस्स वा सन्तिक॑ गच्छन्तीति उपयानं, पण्णाकारं। “उपयानानि मे दज्जुं, राजपुत्त तयि\nगते”ति एत्थ हि पण्णाकारानि “उपयानानी”ति बुच्चन्ति। सम्पन्नदस्सनीयपुप्फफलादिताय\nउद्ध॑ं ओलोकेन्ता यन्ति गच्छन्ति एत्थाति उय्यानं।\n\nब्या उम्मीसने। ब्याति, ब्यन्ति। ब्यासि, ब्याथ। ब्यामि, ब्याम। यथासम्भवं॑ पदमाला\nयोजेतब्बा। तत्र पनाय॑ पाव्ठि “याव ब्याति निम्मीसति, तत्रापि रसतिब्बयो”ति। तत्थ याव\nब्यातीति याव उस्मीसति, पुराणभासा एसा, अयडिह यस्मि काले बोधिसत्तो\n\nचूव्ठकबोधिपरिब्बाजको अहोसि, तस्मिं काले मनुस्सानं बोहारो।\n\nयु मिस्सने गतियड्च। योति, यवति। आयु, योत्ि।\n\nतत्थ “आयू”ति आसद्दो उपसग्गो। आयवन्ति मिस्सीभवन्ति सत्ता एतेनाति आयु। अथ वा\nआयवन्ति आगच्छन्ति पवत्तन्ति तस्मि सति अरूपधम्माति आयु। तथा हि अट्ठसालिनियं चुत्तं\n“आयवनड्रेन आयु। तस्मिडिहि सति अरूपधम्मा आयवन्ति आगच्छन्ति पवत्तन्ति, तस्मा आयूति\nबुच्चती\"ति। “आयु, जीवितं, पाणो” इच्चेते परियाया लोकबोहारवसेन। अभिधम्मवसेन पन\n“ठिति यपना यापना जीवितिन्द्रियं” इच्चेतेषि तेहेव सद्धिं परियाया। योनीति अण्डजादीनं\nअण्डजादी हि सद्धिं याय मिस्सीभावो होति, सा योनि। इदं पनेत्थ निब्बचनं “यबन्ति एत्थ सत्ता\n'एकजातिसमन्वयेन अज्ञमज्ञं मिस्सका होनन्‍्तीति योनि” इति। एत्थ च योनिसइहस्स अत्थुद्धारो\nनीयते। योनीति खन्‍्धकोट्रासस्सपि कारणस्सपि पस्सावमग्गस्सपि नामं। “चतस्सो नागयोनियो।\nचतस्सो सुपण्णयोनियो”ति एत्थ हि खन्‍्धकोटद्भासो योनि नाम। “योनि हेसा भूमिज फलस्स"} +{"id": "indic_deva_eval_001001_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001001_indic_vision_bench_deva_ocr_c285bee8523c.jpg", "ocr": "228 : प्रेमचंद रचनावली-6\nपकड़े हुए , तो किसकी मजाल है कि उन्हें पथ-भ्रष्ट कह सके?\nझिंगुरीसिंह ने कायल होकर कहा-मैंने तो भाई, जो सुना था, वह तुमसे कह दिया।\nदातादीन ने महाभारत और पुराणों से ब्राह्मणों द्वारा अन्य जातियों की कन्याओं के ग्रहण किए जाने की एक लंबी सूची पेश की और यह सिद्ध कर दिया कि उनसे जो संतान हुई, वह ब्राह्मण कहलाई और आजकल के जो ब्राह्मण हैं, वह उन्हीं संतानों की संतान हैं। यह प्रथा आदिकाल से चली आई है और इसमें कोई लज्जा की बात नहीं।\nझिंगुरीसिंह उनके पांडित्य पर मुग्ध होकर बोले-तब क्यों आजकल लोग वाजपेयी और सुकुल बने फिरते हैं?\n'समय-समय की परथा है और क्या। किसी में उतना तेज तो हो। बिस खाकर उसे पचाना तो चाहिए। वह सतयुग की बात थी, सतयुग के साथ गई। अब तो अपना निबाह बिरादरी के साथ मिलकर रहने में है, मगर करूं क्या, कोई लड़की वाला आता ही नहीं। तुमसे भी कहा औरों से भी कहा, कोई नहीं सुनता तो मैं क्या लड़की बनाऊं?'\nझिंगुरीसिंह ने डांटा-झूठ मत बोलो पंडित, दो आदमियों को फांस-फूंसकर लाया मगर तुम मुंह फैलाने लगे, तो दोनों कान खड़े करके निकल भागे। आखिर किस बिरते पर हजार पांच सौ मांगते हो तुम? दस बीघे खेत और भीख के सिवा तुम्हारे पास और है क्या?\nदातादीन के अभिमान को चोट लगी। दाढ़ी पर हाथ फेरकर बोले-पास कुछ न सही मैं भीख ही मांगता हूं, लेकिन मैंने अपनी लड़कियों के ब्याह में पांच-पांच सौ दिए हैं फिर लड़के के लिए पांच सौ क्यों न मांगू? किसी ने सेंत-मेंत में मेरी लड़की ब्याह ली होती तो मैं भी सेंत में लड़का ब्याह लेता। रही हैसियत की बात। तुम जजमानी को भीख समझो मैं तो उसे जमींदारी समझता हूं, बंकघर। जमींदार मिट जाय, बंकबर टूट जाय, लेकिन जजमानी अंत तक बनी रहेगी। जब तक हिन्दू-जाति रहेगी तब तक बांमन भी रहेंगे और जजमानी भी रहेगी। सहालग में मजे से घर बैठे सौ-दो-सौ फटकार लेते हैं। कभी भाग लढ़ गया, तो चार पांच सौ मार लिया। कपड़े, बरतन, भोजन अलग। कहीं-न-कहीं नित ही कार पराजन पड़ा ही रहता है। कुछ मिले तब भी एक-दो थाल और दो-चार आने दक्षिणा के मिल ही जाते हैं। ऐसा चैन न जमींदारी में है, न साहूकारों में। और फिर मेरा तो सिलिया से जितना उबार हाल है, उतना ब्राह्मण की कन्या से क्या होगा? वह तो बहुरिया बनी बैठी रहेगी। बहुत होगा रोटियां पका देगी। यहां सिलिया अकेली तीन आदमियों का काम करती है। और मैं उस रोटी के सिवा और क्या देता हूं? बहुत हुआ, तो साल में एक धोती दे दी।\nदूसरे पेड़ के नीच दातादीन का निजी पैरा था। चार बैलों से मंड़ाई हो रही थी। धन्ना चमार बैलों को हांक रहा था, सिलिया पैरे से अनाज निकाल निकालकर औसा रही थी और मातादीन दूसरी ओर बैठा अपनी लाठी में तेल मल रहा था।\nसिलि.ा सांवली सलोनी, छरहरी बालिका थी, जो रूपवती न होकर भो आकर्षक थी। उसके हास में, चितवन में, अंगों के विलास में हर्ष का उन्माद था , जिससे उसकी बोटी बोटी नाचती रहती थी, सिर से पांव तक भूसे के अणुओं में सनी, पसीने से तर, सिर के बाल आधे खुले, वह दौड़-दौड़कर अनाज ओसा रही थी, मानो तन-मन से कोई खेल खेल रही हो।\nमातादीन ने कहा-आज सांझ तक अनाज बाकी न रहे सिलिया। तू थक गई हो तो मैं\nआऊं?"} +{"id": "indic_deva_eval_001002_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001002_devanagari_page_ocr_1a0a1e20a3d1.jpg", "ocr": "4. इन्द्रियसंयुत्त ड्श\n\n३९. कट्ठोपमसुत्तं\n\n३९. “पडिचिमानि, भिक्खवे, इन्द्रियानि। कतमानि पड्च? सुखिन्द्रियं, दुक्खिन्द्रियं,\nसोमनस्सिन्द्रियं, दोसनस्सिन्द्रियं, उपेक्खिन्द्रियं। सुखवेदनियं, भिक्खवे, फस्स पटिचज्च\nउप्पज्जति सुखिन्द्रियं। सो सुखितोब समानो “सुखितोस्मी'ति पजानाति। तस्सेव सुखवेदनियस्स\n'फस्सस्स निरोधा “यं तज्जं वेदयितं सुखवेदनियं फस्सं पटिच्च उप्पन्नं सुखिन्द्रियं तं निरुज्मति,\nत॑ बूपसम्मती'ति पजानाति'”।\n\n*“दुक्खवेदनियं, भिक्खवे, फस्सं पटिच्च उप्पज्जति दुक्खिन्द्रियं|न सो दुक्खितोव\nसमानो“दुक्खितोस्मी 'ति पजानाति। तस्सेव दुक्खवेदनियस्स फस्सस्स निरोधा *“यं तज्जं वेदयितं\nदुक्खवेदनियं फस्सं पटिच्च उप्पन्नं दुक्खिन्द्रियं त॑ं निरुज्मति, त॑ वूपसम्मती'ति पजानाति””।\n\n“सोमनस्सवेदनियं, भिक्‍्खवे, फस्सं पटिच्च उप्पज्जति सोमनस्सिन्द्रियं। सो सुमनोव\nसमानों “सुमनोस्मी'ति पजानाति। तस्सेव सोमनस्सवेदनियस्स फस्सस्स निरोधा “यं तज्जं\n्संस्कृतच्छाया) ३ ९... “पड्चेमानि, भिक्षव:! इन्द्रियाणि। कतमानि पडठ्च? सुखेन्द्रियम्‌, दुःखेन्द्रियम्‌,\nसौमनस्येन्द्रियम्‌, दौर्मनस्थेन्द्रियम्‌, उपेक्षेन्द्रियम। सुखवेदनीयम्‌, भिक्षव:! स्पर्श प्रतीत्य उत्पद्मयते\nसुखेन्द्रियम। सः सुखित एवं समान: 'सुखितो-ःस्मि'इति प्रजानाति। तस्वैव सुखवेदनीयस्य स्पर्शस्य\nनिरोधात्‌ 'यत्‌ तज्ज॑ वेदयितं सुखबेदनीयं स्पर्श प्रतीत्य उत्पद्मते सुखेन्द्रियं तत्‌ निरुध्यते, तत्‌\nउपशास्यति'इति प्रजानाति”।\n\nदुःखवेदनीयम्‌, भिक्षव:! स्पर्श प्रतीत्य उत्पद्यते दु:खेन्द्रियम। सः दुःखित: एवं समानः\n“दु:खितो5स्मि'इति प्रजानाति। तस्यैव दु:खवेदनीयस्य स्पर्शस्य निरोधात्‌ “यत्‌ तज्जं वेदयितं दुःखवेदनीयं\nस्पर्श प्रतीत्य उत्पद्यते दुःखेन्द्रियम्‌ तन्निरुध्य��े, तत्‌ उपशाम्यति”इति प्रजानाति”।\n\n“सौमनस्यवेदनीयम्‌, भिक्षब:! स्पर्श प्रतीत्य उत्पद्यते सौसनस्थेन्द्रियम्‌। सः सुमन एवं समान:\n'सुमनोउस्मि'इति प्रजानाति। तस्यैव सौसनस्यवेदनीयस्य स्पर्शस्य निरोधात्‌ 'यत्‌ तज्ज॑\nतहेन्दी) ३ ९. सिक्षुओं! इन्द्रियाँ पाँच हैं। कौन से पाँच? सुख-इन्द्रिय...पूर्ववत्‌... उपेक्षा-इन्द्रिय। भिक्षुओं! सुख-\nवेदनीय स्पर्श के प्रत्यय से सुख-इन्द्रिय उत्पन्न होता है। वह सुखी रहते हुये जानता है कि “मैं सुखी हैँ। उसी सुख-\nबेदनीय स्पर्श के निरूद्ध हो जाने से, उससे उत्पन्न हुआ सुख-इन्द्रिय निरूद्ध एवं शान्त हो जाता है- ऐसा भी\nजानता है।\n\nभिक्षुओं! दुःख-वेदनीय स्पर्श के प्रत्यय से दुःख-इन्द्रिय उत्पन्न होता है। वह दुःखी रहते हये जानता है कि “मैं\nदुखी हूँ!। उसी दुःख -वेदनीय स्पर्श के निरूद्ध हो जाने से, उससे उत्पन्न हुआ दुःख -इन्द्रिय निरूद्ध एवं शान्त हो\nजाता है- ऐसा भी जानता है।\n\nभमिक्षुओं! सौसनस्य-वेदनीय स्पर्श के प्रत्यय से सौसनस्य-इन्द्रिय उत्पन्न होता है। वह सौमनस्य रहते हये\nजानता है कि “मैं सौमनस्य हूँ'। उसी सौमनस्य -बेदनीय स्पर्श के निरूद्ध हो जाने से, उससे उत्पन्न हुआ सौमनस्य -"} +{"id": "indic_deva_eval_001003_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001003_devanagari_page_ocr_eae79c709813.jpg", "ocr": "276 संयुत्तनिकायपालि\n\n““धम्मेस धम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके\nअभिज्ञादोमनस्सं। तस्स धम्मेसु धम्मानुपस्सिनों विहरतो यो धम्मेसु छन्‍्दो सो पहीयति।\nछलन्‍्दस्स पहाना अमतं सच्छिकतं होती””ति। सत्तमं।\n\n३८. परिज्ञातसुत्तं\n\n३८. ““चत्तारोमे, भिक्‍्खवे, सतिपट्ठाना। कतमे चत्तारो? इध, भिक्खवे, भिक्खु काये\nकायानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्ञादोमनस्सं। तस्स\nकाये कायानुपस्सिनों विहरतो कायो परिञज्ञातो होति। कायस्स परिड्ञातत्ता अमतं सच्छिकतं\nहोति।\n\n““बेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सततिमा, विनेय्य लोके\nअभिज्ञादोमनस्सं। तस्स वेदनासु वेदनानुपस्सिनो विहरतो वेदना परिज्ञाता होन्ति। वेदनानं\n'परिज्ञातत्ता अमतं सच्छिकतं होति।\n\n(संस्कृतच्छाया) “धर्मेषु धर्मानुपश्यी विहरति आतापी सम्प्रज: स्मृतिमान्‌, विनीय लोके\nअभिध्यादौर्मनस्ये। तस्य धर्मेषु धर्मानुपश्यिन: विहरत: य: धर्मेषु छन्‍्द: स: प्रहीयते। छल्दस्य प्र��ाणात्‌\nअमृतं साक्षात्कृतं भवति\"इति। सप्तमम्‌।\n\n३८. “चत्बारि इमानि, भिक्षव:! स्मृतिप्रस्थानानि। “कतमानि चत्वारि? इह, भिक्षव:! भिक्षुः\nकाये कायानुपश्यी विहरति आतापी सम्प्रज्ञ: स्मृतिमानूु, विनीय लोके अभिध्यादौर्मनस्ये। तस्य काये\nकायानुपश्यिन: विहरत: काय: परिज्ञातों भवति। कायस्य परिज्ञातत्त्वात्‌ अमृतं साक्षात्कृतं भवति।\n\nबेदनासु बेदनानुपश्यी विहरति आतापी सम्प्रज: स्मृतिमान्‌ु, बिनीय लोके अभिध्यादौर्मनस्ये।\nतस्य वेदनास वेदनानुपश्यिन: विहरत: वेदना: परिज्ञाता: भवन्ति। वेदनानां परिज्ञातक््वात्‌ अमृत\nसाक्षात्कृतं भवति।\n\n(हेन्‍्दी) धर्म में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता है- क्लेशों को तपाते हये आतापी, संप्रज्ञ, स्मृतिमान्‌ हो, संसार में\nलोभ और दौर्मनस्य को दबा कर। इस प्रकार विहार करते धर्म में उसकी जो तृष्णा है बह प्रहीण हो जाती है।\nके प्रहीण होने से उसे निर्वाण का साक्षात्कार होता है।\n\nऑ! स्मृतिप्रस्थान चार हैं। कौन से चार? भिक्षुओं ! भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार\nकरता है- क्लेशों को तपाते हये आतापी, संप्रज्ञ, स्मृतिमान्‌ हो, संसार में लोभ और दौर्मनस्य को दबा कर। इस\nप्रकार विहार करते बह काया को जान लेता है। काया को जान लेने से उसे निर्वाण का साक्षात्कार होता है।\n\nबदना में वेदतानपश्यी विहार करता है- क्लेशों को तपाते हये आतापी, संप्रज्, स्मृतिमान्‌ हो, संसार\nमें लोभ और दौर्मनस्य को दबा कर। इस प्रकार विहार करते बह वेदना को जान लेता है। बेदना को जान लेने से\nउसे निर्वाण का साक्षात्कार होता है।"} +{"id": "indic_deva_eval_001004_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001004_indic_mozhi_deva_word_ocr_af56beacee0e.jpg", "ocr": "यही"} +{"id": "indic_deva_eval_001005_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001005_indic_mozhi_deva_word_ocr_21051355d2cd.jpg", "ocr": "आहेत,"} +{"id": "indic_deva_eval_001006_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001006_devanagari_page_ocr_7a681698776a.jpg", "ocr": "26 अनुपिटके\n\nअथ खो आयस्मा नागसेनो येन कोटिसता अरहन्तो तेनुपसड्कमि, उपसड्कमित्वा\n\nकोटिसते अरहन्ते एतदवोच “अहं खो\n\n“कुसला धम्मा, अकुसला धम्मा , अब्याकता\nधम्मा'ति इमेसु तीसु पदेसु पक्खिपित्वा सब्बं त॑ अभिधम्मपिटकं वित्थारेन ओसारेस्सामी”ति।\n“साधु, नागसेन, ओसारेही”ति। अथ खो आयस्मा नागसेनो सत्त मासानि\n\nसत्तप्पकरणानि वित्थारेन ओसारेसि, पथवी उन्‍नदि, देवता साधुकारमदंसु, ब्रह्मानो अप्फोटेसुं,\nदिव्वानि चन्दनचुण्णानि दिव्वानि च मन���दारवपुप्फानि अभिष्पवरस्सिसु।\n40. आयस्मता नागसेनस्स दण्डकम्मं\n\n\"अथ खो कोटिसता अरहन्तो आयस्मन्तं नागसेनं परिपुण्णवीसतिवस्सं रक्खिततले\nउपसम्पादेसुं। उपसम्पन्नों च पनायस्मा नागसेनो तस्सा रक्तिया अच्चयेन पुब्बण्हसमयं\nनिवासेत्वा पत्तचीवरमादाय उपज्ञायेन सद्धिं गामं पिण्डाय पविसन्‍्तो एवरूपं परिवितक्कं\nउप्पादेसि-\n\nसंस्कृतच्छाया- अथ खलु आयुष्मान्‌ नागसेनो येन कोटिशता अर्हन्तस्तेनोपसमक्रमीत्‌। उपसडक्रम्य\nकोटिशतानर्हत एतदवोचत्‌- \"अहं खलु, भदन्ता, कुशला धर्मा:, अकुशला धर्मा:, अब्याकृता: धर्मा इत्येषु\nज्िप पदेप प्रक्षिप्य सर्व तदलिधर्मघिटक विस्तारेणावसारयिप्यामी\"ति।\n\n\"साधु, नागसेन, अवसारये\"ति। अथ खलु आयुष्मान्‌ नागसेन: सप्तमासानि सप्तप्रकरणानि\nविस्तारेणावासीसरत। प्रथ्चिवी उदनंसीत्‌ । देवा: साधुकारमदः ॥ ब्रह्माणोंल्लफोटिपत । दिव्यानि\nचन्दनचूर्णानि दिव्यानि च मन्दार-पुष्पाण्यभिप्रावर्षिषु:।\n\n40. आयुष्मतो नागसेनस्य दण्डकर्म\n\nअथ खलु कोटिशता अर्ईन्ता आयुष्मन्तं नागसेनं परिपूर्णविंशतिवर्ष रक्षिततले उपसमपीपदन।\nउपसम्पन्नश्व पुनरायुष्माज्नागसेनस्तस्या रात्र्या अत्ययेन पूर्वाह्नसमयं निवास्य पात्रचीबरमादायो-\nपाध्यायेन सार्थ॑ ग्राम पिण्डाय प्रविशज्नेवंरूपं परिवितर्कमुदपीपदत्‌--\nहिन्दी- तब आयुष्मान्‌ नागसेन ने जहाँ शतकोटि अर्हत्‌ थे, वहाँ जाकर उनसे कहा-'\n\nड्\n\n'भन्ले! मैं समग्र अभिधर्मपिटक\n\nको कुशल धर्म, अकुशलधर्म और अव्याकृत धर्म - इन्हीं तीन बातों में विभक्त कर विस्तार करूँगा।\"\n\n“बहुत अच्छा नागसेन, विस्तार करो”। तब आयुष्मान्‌ नागसेन ने सात महीनों में सातों प्रकरणों को\nविस्तारपूर्वक समझाया। तब पृथ्वी कम्पित हो उठी, देवताओं ने साधुवाद दिया, त्रह्म-देवों ने करतल-ध्वनि की,\nदिव्य चन्दन चूर्ण तथा मन्‍्दार पुष्पों की वर्षा होने लगी।\n40. आयुष्मान्‌ नागसेन का दण्डकर्म\nबीस वर्ष की आयु हो जाने के बाद उन कोटिशत अर्हतों ने रक्षिततल में आयुष्मान्‌ नागसेन की उपसम्पदा\nकी। उसके एक रात बाद सुबह में आयुष्मान्‌ नागसेन पात्र और चीवर ले अपने उपाध्याय के साथ झिक्षाटन के\nलिए गाँव में गए। उस समय उनके मन में यह बात उठी-\n\n+ १7. नागसेनस्स"} +{"id": "indic_deva_eval_001007_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001007_indic_mozhi_deva_word_ocr_b7b4933c356a.jpg", "ocr": "परिस्थिती"} +{"id": "indic_deva_eval_001008_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001008_indic_mozhi_deva_word_ocr_f86aea991dde.jpg", "ocr": "म्हणून"} +{"id": "indic_deva_eval_001009_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001009_devanagari_page_ocr_b4e6f8b6649c.jpg", "ocr": "27. पदुमुक्खिपवग्गो\n4. आकासुक्खिपियत्थेरअपदानं\nचालि- “सुवण्णवण्णं सिद्धत्थं, गच्छन्तं अन्तरापणे।\nजलजग्गे दुवे गय्ह, उपागचि्छि नरासभं॥274॥\n“एकड्च पुष्फ॑ पादेसु, बुद्धसेद्रस्स निक्खिपिं।\n'एकज््च पुप्फं पग्गय्ह, आकासे उक्खिपिं अहं॥272॥\n“चतुन्नवुतितो कप्पे, य॑ पुएफमभिरोपयिं।\nदुग्गतिं नाभिजानामि, पुण्फदानस्सिदं फलं॥273॥\n“इतो छत्तिसकप्पम्हि, एको आसिं महीपति।\nअन्तलिक्खकरो नाम, चक्‍कवत्ती महब्बलो॥274॥\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अट्ठिमे।\nछन्‍्ठछभिज्जा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासन॑”॥275॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा आकासुक्खिपियों थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nआकासुक्खिपियत्थेरस्सापदानं पठम॑।\n\nसंस्कृत- “सुवर्णवर्ण सिद्धार्थम्‌, गल्छन्तम्‌ अन्तरापणे।\nजलजाग्रे द्वौ ग्रह्म, उपागच्छे नररपभम्‌॥274॥\n\n“एकड्च पुष्प॑ पादयो:, बुद्धश्रेछाय न्‍्यक्षिपम्‌।\n\n'एकज्च पुष्प॑ प्रगृह्म, आकाशे उदक्षिपस्‌ अहम्‌॥272॥\n\n“अतुर्णवतितमे कल्पे, यत्‌ पुष्पमभ्यरोपयम।\n\nदुर्गतिं नाभिजानामि, पुष्पदानस्येदं फलम्‌॥273॥\n\n“इतः घद्ित्रशकल्पे, एक आसं महीपतिः\nअन्तरीक्षकरो नाम, चक्रवर्ती महाबलः\n“प्रतिसंविदश्वतस्रः, विमोक्षा अपि चाष्टकाः\nचडभिज्ञाः साक्षात्कृता, कुतं बुद्धस्य शासनम्‌॒\"॥275॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ आकाशुक्षिपीयस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\n\nकहेन्दी- मे द्षा कमल-पुष्पों को लेकर बाजार के मध्य जाते हुए सुवर्ण वर्ण वाले नरर्पभ\nसिद्धार्थ के समीप गया ॥27,\n\nएकपुष्पबुद्शेष्ठ के चरणों में चढ़ा दिया और एक पुष्प को ग्रहण कर मैंने आकाश की ओर उछाल दिया ॥272॥\n\nयहाँ से 94 वें कल्प में मैंने जो पुष्प अभ्यर्षित किया था, यह उस कर्म का ही सुपरिणाम है कि मैं दुर्गति\n\nको नहीं जानता ॥273॥\n\nयहाँ से 36 वें कल्प में एक अन्तरिक्षकर नामक चक्रवर्ती, सहावलशाली राजा हुआ ॥274॥\nचार पटिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों और पडभिज्ञाओं का साक्षात्कार कर मैंने बुद्धशासन को पूर्ण किया ॥275॥\n\nइस प्रकार आयुष्मान्‌ आकाशुक्षिपीयस्थविर ने इन गाधाओं को कहा-"} +{"id": "indic_deva_eval_001010_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001010_hindi_handwritten_word_ocr_fa5cc126a26b.jpg", "ocr": "गदा"} +{"id": "indic_deva_eval_001011_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001011_indic_vision_bench_deva_ocr_1f77e9d5631d.jpg", "ocr": "ने कुछ दिनों से मोटर रख लिया था; पर वह रहता था सुखदा ही की सवारी में। दोनों उस पर बैठकर चलीं। लल्लू भला क्यों अकेले रहने लगा था। नैना ने उसे भी ले लिया।\nसुखदा ने कुछ दूर जाने के बाद कहा--यह सब अमीरों के चोंचले हैं। मैं चाहूँ तो दो-तीन आने में अपना निर्वाह कर सकती हूँ।\nनैना ने विनीत-भाव से कहा--पहले करके दिखा दो, तो मुझे विश्वास आये। मैं तो नहीं कर सकती।\n'जब तक इस घर में रहूँगी, मैं भी न कर सकूँगी। इसीलिए तो मैं अलग रहना चाहती हूँ।'\n'लेकिन साथ तो किसी को रखना ही पड़ेगा?'\n'मैं कोई ज़रूरत नहीं समझती। इसी शहर में हजारों औरतें अकेली रहती हैं। फिर मेरे लिए क्या मुश्किल है। मेरी रक्षा करनेवाले बहुत हैं। मैं खुद अपनी रक्षा कर सकती हूँ। (मुसकराकर) हाँ, खुद किसी पर मरने लगूँ तो दूसरी बात है।'\nशांतिकुमार सिर से पाँव तक कंबल लपेटे, अँगीठी जलाये, कुरसी पर बैठे एक स्वास्थ्य सम्बन्धी पुस्तक पढ़ रहे थे। वह कैसे जल्द-से-जल्द भले-चंगे हो जायँ, आज-कल उन्हें यही चिन्ता रहती थी। दोनों रमणियों के आने का समाचार पाते ही किताब रख दी और कम्बल उतार कर रख दिया। अँगीठी भी हटाना चाहते थे; पर इसका अवसर न मिला। दोनों ज्योंही कमरे में आईं, उन्हें प्रणाम करके कुरसियों पर बैठने का इशारा करते हुए बोले--मुझे आप लोगों पर ईर्ष्या हो रही है। आप इस शीत में घूम-फिर रही हैं और मैं अँगीठी जलाये पड़ा हूँ। करूँ क्या, उठा ही नहीं जाता। जिन्दगी के छ: महीने मानो कट गये, बल्कि आधी उम्र कहिये। मैं अच्छा होकर भी आधा ही रहूँगा। कितनी लज्जा आती है कि देवियां बाहर निकलकर काम करें और मैं कोठरी में बन्द पड़ा रहूँ।\nसुखदा ने जैसे आँसू पोंछते हुए कहा--आपने इस नगर में जितनी जागृति फैला दी, उस हिसाब से तो आपकी उम्र चौगुनी हो गयी। मुझे तो बैठे-बैठाये यश मिल गया।\nशांतिकुमार के पीले मुख पर आत्मगौरव की आभा झलक पड़ी।\nकर्मभूमि\n२१९"} +{"id": "indic_deva_eval_001012_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001012_hindi_handwritten_word_ocr_26366d85ef89.jpg", "ocr": "ओवर"} +{"id": "indic_deva_eval_001013_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001013_hindi_handwritten_word_ocr_89d65ed068ef.jpg", "ocr": "मस्तिष्क"} +{"id": "indic_deva_eval_001014_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001014_indic_vision_bench_deva_ocr_463d0935d75d.jpg", "ocr": "उद्योग वाढला. पैसा आला आणि मुख्य म्हणजे संसार सुरळीत चालू झाला. मुलींची शिक्षणं नीट मार्गी लागली. सोनं घरात आलं. चेहऱ्यावर समाधान दिसू लागलं. आता सिझनला तीन लाखाच्या वर त्यांची उलाढा��� असते.\nद्वारकाबाईंना जेव्हा विचारलं, 'तुम्हाला हे सगळं केल्यामुळे काय मिळालं?' - यावर त्यांचं उत्तर फार बोलकं आहे. त्या म्हणतात - 'माझा संसार सुखाचा झालाच पण मला हे दाखवून द्यायचं होतं की बाई कशातही कमी नसते. शिक्षण नसलं पर जिद्द असली तर बाई सगळं करू शकते.\n***\nउद्योगाचं रोपटं मोठं केलं\n१४\nनाव - कल्पना बाबू बुचडे.\nराहणार - बोरमाळ, शिवरे, ता. भोर, जि. पुणे.\nशिक्षण - निरक्षर\nवय - ४० वर्ष\nव्यवसाय - केरसुण्या, दोरखंड वळणे\nभारतीय संस्कृतीनं स्वच्छतेला, टापटिपीला फार महत्त्व दिलंय. त्यातूनच 'हात फिरे तिथे लक्ष्मी वसे' अशी म्हण रूढ झाली. याचंच एक रूप म्हणजे लक्ष्मीपूजनाच्या दिवशी होणारी केरसुणीची पूजा.\nकल्पनाताई आणि त्यांचे यजमान बाबू बुचडे हे पति-पत्नी मिळून प्रत्यक्ष लक्ष्मी वळण्याचं म्हणजेच केरसुण्या वळण्याचं काम करतात. कल्पनाताई बचतगटाच्या सदस्या आहेत. काम चालू करताना त्यांनी गटातून भांडवल म्हणून उचल घेतली. गटामुळे धंदा मोठा केला.\nसरकारी योजनेचा लाभ -\nथोडं भांडवल स्वत:चं उभं केलं आणि जोड म्हणून सरकारी योजनेचाही लाभ करून घेतला. त्याअंतर्गत बाबू बुचडे यांनी घायपाताची भोरहून खरेदी केली.\nआता ही दोघं घायपातापासून दोर काढून दोरखंड वळतात, केरसुण्या वळतात. वाख काढतात. हा काढलेला वाख शोभवंत वस्तू करण्याच्या उद्योगाला विकतात. घायपात पाण्यात भिजवून, प्रक्रिया करून धागा\nथेंबे थेंबे तळे साचे.\n२९"} +{"id": "indic_deva_eval_001015_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001015_hindi_handwritten_word_ocr_b716f5cda7c5.jpg", "ocr": "थमने"} +{"id": "indic_deva_eval_001016_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001016_hindi_handwritten_word_ocr_012ebbb32604.jpg", "ocr": "बेस्ड"} +{"id": "indic_deva_eval_001017_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001017_devanagari_page_ocr_ef57b536c3e9.jpg", "ocr": "ब0 मेत्तेयवग्गो\n\n“सीहा ब्यग्घा च दीपी च, अच्छकोकतरच्छका।\nअनुसड्चरन्ता पबने , सोभेन्ति मम अस्समं॥4969॥\n“जटाभारेन भरिता, अजिनुत्तरवासना।\nअनुसड्चरन्ता पवने, सोभेन्ति मम अस्समं॥4970॥\n“अजिनानिधरा एते, निपका सन्‍्तवुत्तिनो।\nअप्पाहाराब ते सब्बे, सोभेन्ति मम अस्समं॥4974॥\n“खारिभारं गहेत्वान, अज्ञोगय्ह वन॑ तदा।\nमसूलफलानि भुड्जन्ता, वसन्ति अस्समे तदा॥4972॥\n“न ते दारुं आहरन्ति, उदकं॑ पादधोवनं।\n\nसब्बेसं आनुभावेन, सयमेवाहरीयति॥4973॥\n\n“सिंहाः व्याघ्ाश्व द्वीपी च, अच्छकोकतरच्छका:।\nअनुसऊ्चरन्तः प्रवणे, शोभयच्ति मम आश्रमम्‌॥4969॥\n“जटाभारेण भरिता, अजिनोत्तरवासना।\nअनु���ज्चरन्तः प्रवणे, शोभयन्ति मम आश्रमम्‌॥4970॥\n“अजिनानिधरा एते, निपक्राः शान्तवा्त्तिनः।\nअल्पाहारा इव ते सर्वे, शौभयन्ति मम आश्रमम्‌॥974॥\n“खारिशभार गृहीत्वा, अध्यवगाह्य बन॑ तदा।\nमूलफलानि भुड्जन्तः, वसन्ति आश्रमे तदा॥972॥\n“न ते दारुम आहरन्ति, उदक पादधोवनम।\nसर्वेघाम आनुभावेन, स्वयमेबाहरीयति॥4973॥\nसिंह, व्यान्न, द्वीपि भालू और रीछ प्रवण मे अनुचरण करते हुए मेरे आश्रम की शोभा बढ़ाते हैं।4969॥\nजटा के भार से भरित, अजिनचर्म से निर्मित उत्तरासडुग बाले, प्रवण में विचरण करते हुए मेरे आश्रम की\nशौा बढ़ाते हैं॥970।\nथे अजिनचर्म के वस्त्र को धारण करने वाले, बुद्धिमान्‌ तथा शान्ति का व्यवहार करने वाले सत्पुरुष और\nअल्पाहार ग्रहण करने वाले सभी मेरे आश्रम की शोभा बढ़ाते हैं॥97॥\nतब बे खारिभार को ग्रहण कर घने वन में जाकर मूलफल को खाकर मेरे आश्वम में वास किये॥4972॥\nन तो वे लकड़ी लाते हैं और न ही पाद-प्रक्षालन के लिए जल लाते हैं। वे सभी के प्रताप से अपने आप ही आ\nजाते हैं॥4973॥"} +{"id": "indic_deva_eval_001018_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001018_indic_vision_bench_deva_ocr_01f88d30b860.jpg", "ocr": "(४८)\nइचलकरंजी संस्थानाचा इतिहास.\nहोईल तर आपण गोंव्यावर स्वारी करितों. तेव्हां महाराजांस ती गोष्ट मान्य होऊन त्यांनीं मोठी फौज बरोबर देऊन\nस. १७३८\nव्यंकटरावांस सन १७३८ त गोंव्याच्या स्वारीस रवाना केलें. तिकडे गेल्यावर व्यंकटरावांनीं वाडीकर सावंत व सोंदेकर संस्थानिक यांजकडे राजकारण करून त्यांस आपणाकडे मिळवून घेतलें व गोवेकरांवर जरब बसवून उत्तर कोंकणांत कुमक पाठविण्याचे रहित करणे त्यांस भाग पाडिलें. पांच सहा महिने राहून पावसाळ्याचे प्रारंभीं ते फौजेसह परत आले.\nपुढच्या सालीं व्यंकटरावांची पुनः त्याच स्वारीवर नेमणूक झाली. त्या वेळीं राणोजी घोरपडे यांनीं त्यांस लाट हा गांव इनाम दिला. त्या वर्षाच्या मार्च महिन्याचे प्रारंभीं व्यंकटराव गोंव्याच्या हद्दीवर जाऊन पोहोंचले. प्रथम त्यांनी कोट फोंडा व मर्दनगड हे किल्ले काबीज केले. नंतर गोंव्याजवळ साष्टी व बारदेश म्हणून पोर्च्युगीज लोकांचे दोन तालुके आहेत त्यांवर स्वारी करून ते घेतले\nस. १७३९\nव खुद्द गोंव्यासच वेढा घालण्याचा डौल घातला. उत्तर कोंकणांत आतां पोर्च्युगीज लोकांचे वसई एवढें एकच ठाणें राहिलें होतें त्यासही पेशव्यांचे बंधु चिमाजीआपा यांनीं वेढा घालून तें जें��ीस आणिलें होतें. तिकडे कुमक पाठविण्याविषयीं गोंव्याच्या गव्हर्नराचा जीव तळमळत होता, पण व्यंकटराव अगदीं गोंव्याजवळ येऊन ठेपल्यामुळें आतां खुद्द गोंवेच कसें बचावलें जातें ही त्यास काळजी पडली. अर्थात त्याजकडून वसईवाल्यांस कुमक न पोंचल्यामुळें त्यानी ते ठाणे निरुपायानें चिमाजीआपांचे हवालीं केलें. गोमांतकाच्या सरहद्दीस लागून तळ कोंकणांत व घांटमाथ्यावर कोट सुपें व त्याच्या आसपासचीं किरकोळ ठाणीं कोट सांगें व जांबळी पंचमहाल व"} +{"id": "indic_deva_eval_001019_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001019_hindi_handwritten_word_ocr_8e6b8c699344.jpg", "ocr": "आढा"} +{"id": "indic_deva_eval_001020_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001020_devanagari_page_ocr_bf9237bcf002.jpg", "ocr": "सद्नीतिप्पकरणं\n\n482:\n\nतस्स कुज्झ महावीर, मा र्/ं विनस्स इदं।\nयो मे हत्थे च॒ पादे च, कण्णनासड्च छेदयि।\nचिरं जीवतु सो राजा, न हि कुज्झन्ति मादिसाति॥\n\nछद अपवारणे। छादेति, छादयति। छत्तं। पुरिसस्स भत्त छादयति।\n\nईदी सनन्‍्दीपने। ईदेति, ईदयति। ईकारन्तवसेन निदरिद्गत्ता सनिग्गहीतागमानि रूपानि न\nभवन्ति।\n\nअद्द हिंसायं। अद्देति, अद्यति।\n\nबद भासायं। बादेति, वादयति। बादो।\n\nतत्थ “बादेति, वादयती”ति इमेसं “वदती”ति सुद्धकत्तुबसेनेव अत्थो वह्लब्बों, न\nहेतुकत्तुवसेन। तथा हि “सड्केत॑ कत्वा विसंवादेति। ओवदेस्यानुसासेय्य। इदमेव सच्चन्ति च\nवादयन्ति। अविसंवादको लोकस्सा”ति सुद्धकत्तुदीपकपाक्ठिनया दिस्सन्ति, सद्दसत्थे कल\n“वादयती”ति सुद्धकत्तुप्द दिस्सति। तत्थ विसंवादेतीति मुसा वदेति, अथ वा विप्पलस्भेति,\nबादोति वचनं। “वादों जप्पो वितण्डा”ति एवंविधासु तीसु कथासु वादसड्खाता कथा।\n“वबादापेति, वादापयती”ति द्वेयेव हेतुकत्तुपदानि भवल्ति।\n\nछदी इच्छायं। ईकारन्तोयं धातु, तस्मा सनिग्गहीतागमानिस्स रूपानि न भवन्ति।\nपुरिसस्स भत्तं छादेति, छादयति, रुच्वतीति अत्थों। पुरिसस्स भत्तं छादयमानं तिट्ठति छादेन्त॑\nबा।\n\nबदी अभिवादनथुतीसु। अयम्पि ईकारन्तो धात, तस्समा इसस्सपि सनिग्गढीतागसानि\nरूपानि न भवन्ति। वादेति, वादयति, वन्दति, थोमेति वाति अत्थो। इमानि अनुपसग्गानि\nरूपानि। सद्दसत्थेषि च “वादयती”ति अनुपसग्गवन्दनथुतिअत्थ पद॑ बुत्त, सासने पन\n“अभिवादेति, अभिवादयति, अभिवादनं, भगवन्तं अभिवादेत्वा\"तिआदीनि सोपसग्गानि\nरूपानि दिस्सन्ति।\n\nतत्थ अभिवादेत्वाति बन्दित्वा, थोमेत्वा वा, अयमस्माकं रुचि। आगमट्ठकथायं पन\n“अभिवादेत्वाति 'सुखी अरोगो होतू'ति वदापेत्वा, वन्दन्तो हि अत्थतो एबं बदापेति नामा\"ति\nहेतुकत्तुवबसेन अभिवादनसद्त्थो बुत्तो, अम्हेहि पन वन्दनस्द सद्दसत्थनयमग्गहेत्वा\nसुद्धकत्तुबसेन अत्थो कथितो। अभिवादनडिह वन्दनंयेब, न बदापनं अभिसद्देन सम्बन्धितत्ता"} +{"id": "indic_deva_eval_001021_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001021_hindi_handwritten_word_ocr_bfbb387d840a.jpg", "ocr": "अंतर्राष्ट्रीय"} +{"id": "indic_deva_eval_001022_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001022_indic_mozhi_deva_word_ocr_7cef2a3599f2.jpg", "ocr": "कामगार"} +{"id": "indic_deva_eval_001023_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001023_devanagari_page_ocr_9c989d0c83f6.jpg", "ocr": "अपदानपालि\nव45\n\n“यथं य॑ योनुपपज्जामि, देवत्तं अथ मानुसं।\nअनुभोमि सुख सब्बं [सब्बमेतं (स्या*)], एकत्थम्भस्सिदं फलं॥687॥\n“चतुन्नवुतितो कप्पे, य॑ं थम्भमदर्द तदा।\n\nदुग्गतिं नाभिजानामि, एकत्थम्भस्सिदं फलं॥688॥\n\n“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक्खापि च अट्ठिमे।\n\nछब्ठभिज्जा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥689॥\n\nइत्थं सुदं आयस्मा एकत्थम्भिको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nएकत्थम्भिकल्थेरस्सापदानं दुतियं।\n3. नन्दत्थेरअपदानं\n“पदुसुत्तरस्स भगवतो, लोकजेट्र॒स्स तादिनो।\nबत्थं खोम॑ मया दिनुनं, सयम्भुस्स महेसिनो॥690॥\n“यां यां योनिसुपपचओेडहम्‌, देवक््व्म्‌ अथ मानुषम।\nअनुभवामि सुख सर्वम्‌, एकस्तम्भस्येदं फलम्‌॥687॥\n“चतर्णवत्तितसे कल्पे, यत्‌ स्तम्भ ददां\nदुर्गतिं नाभिजानामि, एकस्तम्भस्येदं फलम्‌॥688॥\n“प्रतिसंविदश्वतस््र:, विमोक्षा अपि चष्टका:।\nघडशिज्ञाः साक्षाल्कृता:, कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥689॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ एकस्तम्भिकस्थविर इसा गाथा अभाषिष्टेति।\n“पद्मयोत्तराय भगवते, लोकज्येछाय तायिने।\nबस्तर क्षौ्म मया दत्तम, स्वयम्भुवे महर्षये॥690॥\n\nयह उस एकस्तम्भ स्थापन का ही सुफल था कि मैं देव अथवा मानव, जिस-जिस योनि में\nउत्पन्न हुआ, सर्व सुखों का अनुभव किया ॥687॥\n\nअब से 94 वें कल्प पूर्व जिस स्तम्भ का मैंने दान किया था, उसी पुण्यकर्म का यह फल है कि\nमैं दुर्गति को नहीं जानता ॥688॥\n\nचार प्रतिसम्भिदाओं, आठ विमोक्षों तथा पडशिज्ञाओं को स्पष्ट (जान) कर मैंने बुद्धशासन को\nपूर्ण किया ॥989॥\n\nइस प्रकार एकस्तम्भिक स्थविर ने इन गाथाओं का भाषण किया।\n\nपूर्वकाल में मेरे द्वारा उन लोकज्येछ, स्वयम्भू, महर्षि तथा पद्ममोत्तर भगवान्‌ को क्षौस वस्त्र\nभ्रदान किया गया था॥690॥"} +{"id": "indic_deva_eval_001024_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001024_indic_mozhi_deva_word_ocr_21ea4e31e54a.jpg", "ocr": "उनकी"} +{"id": "indic_deva_eval_001025_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001025_devanagari_digits_mixed_ffa87afa9dc9.jpg", "ocr": "8515२६44५"} +{"id": "indic_deva_eval_001026_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001026_devanagari_page_ocr_dac6326b88a9.jpg", "ocr": "प58 सीहासनियबग्गो\n\n“पटिसस्भिदा चतस्सो, विमोक्‍्खापि च अट्ठिसे।\nछ्कभिज्जा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासन”॥748॥\n\nइत्थं सु्दं आयस्मा राहलों थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।\nराहलत्थेरस्सापदानं छड़ें।\n\n7. उपसेनवड्-गन्तपुत्तत्थे रअपदानं\n\n“पदुसुत्तरं भगवन्तं, लोकजेट्ठं नरासभं।\nपब्भारम्हि निसीदन्तं, उपगच्छि नरुत्तमं॥749॥\n“कणिकारपुष्फं [कणिकारं पुष्फितं (सी* स्या*)] दिस्वा, वण्टे छेत्वानहं तदा।\nअलड्-करित्वा छत्तम्हि, बुद्धस्स अभिरोपयिं॥750॥\n“पिण्डपात ञ्व पादासिं, परमह्न॑ सुभोजनं।\nबुद्धेन नवमे तत्थ, समणे अद्भ भोजयिं॥754॥\nप्रतिसंविदश्चतस्र:, विमोक्षा अपि चाष्टका:\nघडभिज्ञा: साक्षाल्कृताः, कृत॑ बुद्धस्य शासनम्‌\"॥748॥\nइत्थं स्विद्‌ आयुष्मान्‌ राहुलस्थविर इमा गाथा अभाषिष्टेति।\nसहद्यौत्तरं भगवन्तम्‌, लोकज्येझं नरपीभम्‌।\nप्राग्भारे निषीदल्तम्‌, उपागमं नरोत्तमम्‌॥749॥\nकर्णिकारपुष्प॑ दृष्ट्वा, वृन्ते छित्वाहँ तदा।\nअलडूककृत्य छत्रे, बुद्धाय अभ्यरोपयम्‌॥750॥\n“पिण्डपात शव प्राददास्‌, परमन्नं 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"indic_deva_eval_001029_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001029_indic_vision_bench_deva_ocr_66e17e4f0833.jpg", "ocr": "कोड स्वराज\nइस शुभ दिन पर हमारा आश्रम आने का उद्देश्य और सैम द्वारा ���ुझे भारत लाने का कारण था, \"गांधीजी, हिंसा पर चर्चा (Gandhi: Dialogue on Violence)\" नामक एक कार्यशाला जहाँ हमें भाग लेना था। दो महीने पहले सैम ने मुझे एक शाम को फोन किया, वह घबराए हुए और परेशान थे। उन्होंने आतंकवादियों द्वारा किए गए बम विस्फोटों, अनेक राज्य सरकारों के द्वारा उनके अपने ही लोगों पर किये गये हमलों, और लोगों के बीच एक दूसरे के खिलाफ बढ़ती हिंसा की भावना के बारे में मुझसे बात की। उन्होंने कहा, \"हमें जरूर कुछ करना चाहिये\"। उन्होंने इस कार्यशाला को गांधी आश्रम में आयोजित करने का फैसला किया। वह यह जानना चाहते थे कि क्या मैं इस कार्यशाला के लिए उनके साथ भारत आऊंगा।\nसैम ने समझाया कि वह चाहते हैं कि यह कार्यशाला मह़ज़ बात-चीत और दुनिया की स्थिति पर दुःख व्यक्त करने तक सीमित न हो। वह चाहते हैं कि यह कार्यशाला एक शांति आंदोलन की शुरुआत करें। आज दुनिया में जो कुछ गलत हो रहा है, उसे ठीक करने के लिए, यह आंदोलन गांधी जी के तरीकों और शिक्षाओं पर आधारित हो।\nजब सैम मुझसे कुछ करने को कहते हैं, तो अमूमन मैं हाँ ही कहता हूँ। अगले दिन सैम ने साबरमती आश्रम कॉल कर पता करने लगे कि क्या वे हमारी मेजबानी करेंगे और दूसरे लोगों को कॉल कर हमारे साथ जुड़ने के लिए चर्चा करने लगे। मैंने भी अपने वीज़ा आवेदन पर काम करना शुरू कर दिया।\n...\nजब सैम और दिनेश अपने प्रशंसकों का अभिवादन कर रहे थे, तब मैंने चारों ओर देखा। आश्रम सैकड़ों स्कूली बच्चों से भरा था, जो अनेक समूहों में एकत्रित थे। वे बिल्डिंग के चारों ओर घूम रहे थे। एक बिल्डिंग के बाहर अनेक संगीतकार एकत्रित थे। वे पारंपरिक भजन (प्रार्थना गीत) गा रहे थे, जो विशेषकर गांधीजी के प्रिय भजन थे। विद्यार्थी जमीन पर बैठे सूत कात रहे थे। गांधी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए गांधी जी के निवास के बाहर आगंतुकों का एक बहुत बड़ा समूह इकट्ठा था।\nजब मैं वहां खड़ा था, तो लाल रंग की शर्ट पहने एक लंबा युवक मेरे पास आया और उसने अपना परिचय दिया। वे श्रीनिवास कोडाली थे, जिनसे मैं व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं मिला था, लेकिन मैं उनके साथ कई वर्षों से काम कर रहा था। श्रीनिवास एक युवा परिवहन इंजीनियर हैं, जो भारत सरकार पर मुकदमा चलाने में मेरे साथ सह-वादी के रूप में जुड़े थे। मैंने उनका स्वागत किया और उनसे कहा कि वह मेरे पास ही रहें, अन्यथा वे खो जाएंगे।\nदिनेश की कोहनी ���कड़ कर सैम ने खुद को भीड़ से बाहर निकाला और उन्होंने मुझसे कहा, \"'बेयरफुट कॉलेज' के संस्थापक श्री बंकर राय को उपहार की प्रस्तुति\" श्रीनिवास कोडली के साथ, हम गांधी जी के पुराने घर, आश्रम और आश्रम की दुकानों और गलियारों में गए, जहां इडली और उपमा का नाश्ता परोसा जा रहा था।\n18"} +{"id": "indic_deva_eval_001030_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001030_indic_mozhi_deva_word_ocr_caa1583c3c87.jpg", "ocr": "देऊळ"} +{"id": "indic_deva_eval_001031_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001031_devanagari_page_ocr_80b2f483b117.jpg", "ocr": "१. चिक्तुप्पादकण्ड 435\n\n२४३. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये रूपूपपत्तिया मग्गं भावेति अज्त्तं अरूपसञ्जी\nबहिद्धा रूपानि पस्सति अप्पमाणानि, तानि अभिभुय्य जानामि पस्सामीति वितक्कविचारानं\nबूपसमा ...पे*... दुतियं झानं ...पे*... ततियं॑ झानं ...पे*... चतुत्थं झान॑ ...पे*... पठम॑ झान॑\n\n-पे*... पडचम झानं उपसम्पज्ज विहरति दुक्खपटिपदं दन्धाभिज्ञं परित्त अप्पमाणारम्म\nण॑...पे*... दुक्खपटिपदं दन्धाभिज्जं अप्पसाणं अप्पसाणारम्मणं ...पे*... दुक्खपटिपदं\nखिप्पाभिज्ज॑ परित्त अप्पमाणारम्मणं 'पे*... दुक्खपटिपदं खिप्पाशिड्ज॑ अप्पमाणं\nअप्पमाणारम्मणं ...पे' सुखपटिपदं दन्धाभिज्ञ॑ परित्त अप्पमाणारम्मणं ...पे*.\nसुखपटिपदं दन्धाभिज्ञं॑ अप्पमाणं अप्पमाणारम्मणं ...पे*... सुखपटिपदं खिप्पाभिज्ञ परित्तं\nअप्पमाणारम्मणं. ..पे*... सुखपटिपदं खिप्पाभिज्जं अप्पमाणं अप्पमाणारम्मणं, तस्मि समये\n'फस्सो होति ...पे*... अविक्खेपो होति ...पे*... इमे धम्मा कुसला।\n\nत्वस्कृतच्छायाा इछइए कतमे धर्मा: कुशला:? यस्मिन्‌ समये रूपोपपत्यै मार्ग भावयति अध्यात्मम्‌\nअरूपसंज्ञी बहिर्धा रूपानि पश्यति अप्रमाणानि, तानि अभिभूय जानामि पश्यामीति बितर्कविच्ारयो:\nव्युपशमात्‌ ...पे*... द्वितीय॑ ध्यानम्‌ ...पे*... तृतीय ध्यानम्‌ ...पे*... चतुर्थ ध्यानम्‌ ...पे*... प्रथम\nध्यानस्‌ *... पडचमं ध्यानमुपसम्पद्य विहरति दुःखप्रतिपदं तन्द्राभिज्ञं परीत्तम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌\n\n०... दुःखप्नतिपरद॑ तन्द्राभिज्मम्‌ अप्रमाणम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌ ...पे*... दुःखप्नतिपदं श्षिप्राभिज्ञ\n\nपरीत्तम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌ ...पे*... दुःखप्नतिपदं क्षिप्राभिज्मम्‌ अप्रमाणम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌ ...पे*...\n\nसुखप्रतिपदं॑ तन्द्राभिज्ञ परीत्तम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌ ...पे*... सुखप्रतिपदं तन्द्राभिज्ञम्‌ अप्रमाणम्‌\n\nअप्रमाणालम्बनम्‌ ...पे*... सुखप्रतिपदं क्षिप्राभिज्ञं परीत्��म्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌ ...पे*... सुखप्रतिपद\n\nक्षिप्राभिज्मम्‌ अप्रमाणम्‌ अप्रमाणालम्बनम्‌, तस्मिन्‌ समये स्पर्शों भवति...पे*... अविक्षेपो भवति\n-पे*... इसमे धर्मा: कुशला:।\n\n(हिन्दी) २४३. कौन से धर्म कुशल हैं? जिस समय रूपभव में पुनर्जन्म की प्राप्ति के लिए मार्ग की भावना करता\nहै, आन्तरिक अरूपसंज्ञी को जानता हुआ बाह्य रूपों को अपरिमित अवस्था में देखता है, उन्हें भली-भाँति जानता\nएबं देखता हूँ. ... द्वितीय ध्यान ...पूर्ववत्‌... तृतीय ध्यान...पूर्ववत्‌... चतुर्थ ध्यान...पूर्वबत्‌... प्रथम ध्यान\n\n'पूर्वबत्‌... दुःखप्नतिपद तन्द्राभिज्ञा अल्प अप्रमाणालम्बन वाले पश्चम ध्यान को प्रास्कर ...पूर्ववत्‌... दुःखप्नतिपद\nतन्‍्द्राभिज्ञा अप्रमाण अप्रमाणालम्बन ...पूर्ववत्‌... दुःखप्रतिपद क्षिप्राभिज्ञा अल्प अप्रमाणालम्बन ...पूर्ववत्‌...\n:खप्नतिपद क्षिप्राभिज्ञा अप्रमाण अप्रमाणालम्बन ...पूर्ववत्‌... सुखप्रतिपद तन्द्राभिज्ञा अल्प अप्रमाणालम्बन\n>-पूर्वबत्‌... सुखप्रतिपद तन्‍्द्राभिज्ञा अप्रमाण अप्रमाणालम्बन ...पूर्ववत्‌... सुखप्रतिषद क्षिप्राभिज्ञा अल्प\nअप्रमाणालम्बन...पूर्वबत्‌... सुखप्रतिपद क्षिप्राभिज्ञा अप्रमाण अप्रमाणालम्बन, उस समय स्पर्श होता है...पूर्वबत्‌...\n\nहोता है ...पूर्वबत्‌... ये धर्म कुशल हैं।"} +{"id": "indic_deva_eval_001032_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001032_indic_mozhi_deva_word_ocr_ab7343e7b861.jpg", "ocr": "पछाडलेला"} +{"id": "indic_deva_eval_001033_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001033_indic_vision_bench_deva_ocr_37c71dd19710.jpg", "ocr": "“आगत (इनपूट्स - गुंतवणूक) आपोआप उत्पादन (आऊटपूट) देत नाहीत. परिणामकारक उत्पादनासाठी मनुष्यबळ, कच्चा माल आणि यंत्रसामग्री यांची सुयोग्य जुळणी करावी लागते.\"\nव्यवस्थापनाचा हेतू\nपीटर डूकर म्हणतो त्याप्रमाणे : “व्यवस्थापन हा नेतृत्व, दिग्दर्शन आणि निर्णय यांचा क्रियाशील अवयव आहे. प्रत्येक देशातल्या प्रत्येक संघटनेत व्यवस्थापकाला एकसारखीच पायाभूत कामे करावी लागतात. व्यवस्थापनातून एखाद्या कार्याचाच निर्देश होत नसून ती कार्ये करणाच्या लोकांचाही निर्देश होतो. म्हणजे, त्यातून सामाजिक स्थान आणि पदाचा दर्जा तसेच शिस्त आणि अभ्यास-कार्यक्षेत्र यांचाही निर्देश होतो.\"\nसाधारणपणे, व्यावसायिक उद्योगगृहे वगळता इतर संस्था व्यवस्थापक किंवा व्यवस्थापन यांची चर्चा करीत नाहीत. उदाहरणार्थ, सरकारी अभिकरण (एजन्सी) प्रशासक अधिका-या��बरोबर कार्य करतात; संरक्षण खात्यात कमांडर असतात! तरीही या सर्व संघटनांमध्ये व्यवस्थापन हा मुख्य आधारभूत असा भाग असतो - व्यवस्थापन हे अत्यंत महत्त्वाचे व अत्यावश्यक असे कार्य असते.\nव्यवस्थापनाचे कार्य\nव्यवस्थापन हे सर्व स्तरावर लागू होणारे तत्त्व असते. ते व्यक्तिगत नसते. व्यवस्थापन खालील पायाभूत कामे करते :\n० ते ज्या संघटनेचे व्यवस्थापन करते त्याला योग्य दिशा देते.\n२३"} +{"id": "indic_deva_eval_001034_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001034_devanagari_page_ocr_705d1d3d4eac.jpg", "ocr": "घम्मपदपाब्ठि\n\nपालि-\n442.\n\n443.\n\n444.\n\n445.\n\n3\n\nयो च वस्ससतं जीवे, कुसीतो हीनवीरियो।\n\nएकाहं जीवितं सेय्यो, वीरियमारभतो दवब्व्हं॥ 8/3 ॥॥\nयो च वस्ससतं जीवे, अपस्सं उदयब्बयं।\n\nएकाहं जीवितं सेय्यो, पससतो उदयब्बयं॥ 8/44 ॥।\n\nयो च वस्ससतं जीवे, अपस्सं अमतं पदं।\n\nएकाहं जीवितं सेय्यो, पससतो अमतं पदं॥8/45 ॥।\n\nयो च वस्ससतं जीवे, अपस्सं धम्ममुत्तमं।\n\nएकाहं जीवितं सेय्यो, पस्सतो धम्ममुत्तमं॥ 8/46 ॥॥\n\nसंस्कृतच्छाया-\n\nहिन्दी-\n\nयश्च वर्षशतं जीवेद्‌ कुसीदो हीनवीर्य: ।\n\nएकाहं जीवितं श्रेयो वीर्यमारभतो दूृढम्‌ ॥। 8/43 ।॥।\nयश्च वर्षशर्तं जीवेदू अपश्यन्‌ उदयव्ययम्‌\n\nएकाहं जीवितं श्रेय: पश्यत उदयव्ययम्‌ ।। 8/44 ॥।\nयश्च वर्षशतं जीवेदू अपश्यन्‌ अमृतं पदम्‌ ।\n\nएकाहं जीवितं श्रेय: पश्यतो5मृतं पदम्‌ ।। 8/45॥॥\nयश्च वर्षशतं जीवेदपश्यन्‌ धर्ममुत्तमम्‌ ।\n\nएकाहं जीवितं श्रेय: पश्यतो धर्ममुत्तमम्‌ ॥॥ 8/ 46 ॥।\n\nआलसी और अनुद्योगी के सौ वर्ष के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले के जीवन का\n\nएक दिन श्रेष्ठ है ॥ 8/43 ॥।\n(संसार में वस्तुओं के) उत्पत्ति और विनाश का न ख्याल करने के सौ वर्ष के जीवन से,\n\nउत्पत्ति और विनाश का ख्याल करने वाले जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।। 8/44 ।।\nअमृतपद (दुःखनिर्वाण) को न ख्याल करने के सौ वर्ष के जीवन से अमृतपद को देखने\n\nवाले जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है 8/5 ॥।\nउत्तम धर्म को न देखने के सौ वर्ष के जीवन से, उत्तम धर्म के देखने वाले के जीवन का\n\nएक दिन श्रेष्ठ है।\nसहस्सवग्गो अट्टमो निद्ठितो।\n\n|!\n\n(फ 5८गाश०व ए्संफा 0/6६४ 5टकााढा"} +{"id": "indic_deva_eval_001035_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001035_indic_mozhi_deva_word_ocr_9ddb356a5861.jpg", "ocr": "किया"} +{"id": "indic_deva_eval_001036_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001036_hindi_handwritten_word_ocr_8d13ea1236c2.jpg", "ocr": "वंशज"} +{"id": "indic_deva_eval_001037_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001037_indic_mozhi_deva_word_ocr_f9adb57991c8.jpg", "ocr": "नहीं"} +{"id": "indic_deva_eval_001038_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001038_indic_mozhi_deva_word_ocr_3401daea12cd.jpg", "ocr": "बालकों"} +{"id": "indic_deva_eval_001039_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001039_devanagari_page_ocr_2515c1e714dd.jpg", "ocr": "सत्तमों परिच्छेदो _ ह\n]22 हु\n\nतम्बभूमिरजोफुट्रो , तम्बपण्णि यतो अहुं।\n\nसो देसो चेव दीपो च, तेन तनन्‍नामको अहु॥44॥\n\nसीहबाह नरिनन्‍्दो सो, सीहमादिननवा इति।\n\nसीहव्छो तेन सम्बन्धा, एते सब्बे पि सीहव्ठा॥42॥\n\nतत्थ तत्थ च गामे ते, तस्सामच्चा निवेससुं।\n\nअनुराधगामं तन्‍नामो, कदम्बनदियन्तिके॥43॥\n\nगम्भीरनदिया तीरे, उपतिस्सो पुरोहितो।\n\nउपतिस्सगामं मापेसि, अनुराधस्स ऊत्तरे॥44॥\n\nउज्जेनिं उरुवेलड्च, विजितं नगरं तथा।\n\nअज्ञे तयो अमच्चा ते, मापयिंसु विसुं विसुं॥45॥\n\nसंस्कृतच्छाया- ताम्रभूमिरजोस्पृष्ट:, ताम्रपाणि: यतो5भूत्‌।\nसः देश: चैब द्वीप: च, तेन तत्ञासको उभूत्‌ ॥॥444॥\nसिंहबाहुः नरेन्द्र: सः, सिंहमादत्तवान्‌ इति।\nसीहल: तेन सम्बन्धा:, एते सर्वेडपि सीहला: ॥॥42।॥\nतज्ञ तत्न च ग्रामे ते, तस्यामात्या: निवेशयन्‌।\nअनुराधग्रामं तन्नाम, कदम्बनदी सन्तिके ।॥43॥॥\nगम्भी रनआझा: तीरे, उपतिष्यः पुरोहछ्तितः।\nउपतिष्यग्रामसापयत्‌, अनुराधस्य उत्तरे ॥॥44॥।\nअन्ये त्रय अमात्या: ते, असापयन्‌ प्रथक पृथक\nउज्जयनी मुरूवेल स्र, विजितं नगरं तथा ॥॥45।।\n\nहिन्दी- वहाँ ताम्रवर्ण की मिट्टी लग जाने के कारण इनके हाथ ताम्र वर्ण के तुल्य हो गये। अत: इस देश एवं द्वीप का\nनाम 'ताम्रपर्णी' हो गया।।44॥॥\n\nतथा उस का राजा सिहबाहु कभी सिंह सारकर\nकारण इस द्वीप का नास 'सीहल'\n\nलाया था, अतः: उसके उत्तराधिकारियाँ द्वारा बसाये जाने क\nके निवासी भी 'सीहल' ही कहललाये।42।\n\nकुच्छ नगर बसाये। अनुराध नासक असमात्य ने कदम्ब नदी\nतट पर उपतिष्य पुरोहित ने अनुराध के उत्तर में उप\n\nपड़ गया। यहाॉ\n\nउसके बुरूढ समर्थ अमात्यों ने भी\n\nअनुराधग्रास बसाया। गम्भीर नदी\nबसाया।।44।॥\n\nअन्य तीन असात्यों ने उज्जयनी, उरूचल्त, लथा विजित नगर- ये तीन नगर वह्लॉ-वक्लॉ बसाये।45।।"} +{"id": "indic_deva_eval_001040_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001040_hindi_handwritten_word_ocr_e6af7db8c4b1.jpg", "ocr": "खींचने"} +{"id": "indic_deva_eval_001041_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001041_indic_mozhi_deva_word_ocr_dd8ed5eaca9f.jpg", "ocr": "मुसोलिनी"} +{"id": "indic_deva_eval_001042_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001042_devanagari_page_ocr_f471f596e8ec.jpg", "ocr": "॥82\n\nअपदानपालि\n\n“सरीरकिच्च॑ कत्वान, धातुं तत्थ समानयुं।\nसदेवमानुसा सब्बे, बुद्धथूपं अकंसु ते॥857॥\n“पठमा कड्चनमया, दुतियासि मणीमया।\nततिया रूपियमया, चतुत्थी फलिकामय���॥858॥\n'तथा [तत्थ (स्था* क०)] पड्चमिया भूमि [नेमि (सी०)], लोहितडःगमया अह।\nछट्ला मसारगल्लस्स, सब्बरतनमयूपरि॥859॥\n“जड्घा मणिमया आसि, बेदिका रतनमया।\nसब्बसोण्णमयो थूपो, उद्धं योजनमुग्गतो॥860॥\n“देवा तत्थ समागन्त्वा, एकतो मन्तयुं तदा।\nमयम्पि थूप॑ कस्साम, लोकनाथस्स तादिनो॥864॥\n\n“शरीरकृत्यं कृत्वा/करित्वा, धातुं तत्र समानयमा\n\nसदेबमानुषा: सर्वे, बुद्धस्तूपम्‌ अकार्पुस्ते॥857॥\n\n“प्रथमा काउचनमयी, द्वितीया आसीत्‌ मणिमयी।\n\nतृतीया रूप्यमयी, चतुर्थी फलिकामयी॥858॥\n\n“तथा पड्चमी भूमिः, लोहिताइुगसयी अभूत्‌।\n\nघष्ठी ससारगल्लस्य, सर्वरत्रमयोपरि॥859॥\n\n“जडूबे मणिमय्यौ आस्ताम्‌, वेदिकाः रत्तमस्यः।\n\nसर्व: स्वर्णमयः स्तूपः, ऊर्ध्व योजनमुद्गतः॥860॥\n\n“देवास्तत्र समागत्य, एकतोउमन्त्रयंस्तदा।\n\nवयमपि स्तूप॑ करिप्यामः, लोकनाथस्य तायिनः॥864॥\n\nशरीरकूल्य को करके वहाँ से धातु (अस्थि) को लाकर सभी देव-मनुष्यों ने उस पर बुद्धस्तूप का\nनिर्माण किया॥857॥\n\nस्तूप की प्रथम भूमि स्वर्णमयी, द्वितीय सणिमयी, तृतीय रजतमयी तथा चौथी\nसुफटिकसयी थी॥858॥\n\nऔर पाँचवीं लोहितमयी (रक्तवर्णी) तथा छठवीं भूमि हीरे, पन्ने आदि बहमूल्य\nरजों से जटित थी॥859॥\n\nस्तूप का मध्यभाग सणिमय तथा उसकी बेदिका (चबूतरा) रत्रमयी थी। इस प्रकार वह सर्व\n\nयोजन भर ऊँचा स्तूप था॥860॥\n\nतब देवताओं ने भी एकत्रित होकर\nस्तूप बनाएँगे॥864॥\n\nसौबर्ण एक\nवहाँ मन्त्रणा की कि हम सभी उन लोकनाथ भगवान्‌ का"} +{"id": "indic_deva_eval_001043_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001043_indic_mozhi_deva_word_ocr_ff9e937b0c8a.jpg", "ocr": "में"} +{"id": "indic_deva_eval_001044_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001044_indic_mozhi_deva_word_ocr_819e8a580585.jpg", "ocr": "भारतीय"} +{"id": "indic_deva_eval_001045_devanagari_digits_mixed", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001045_devanagari_digits_mixed_da3afd2da78c.jpg", "ocr": "१०5३08७6"} +{"id": "indic_deva_eval_001046_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001046_indic_mozhi_deva_word_ocr_ec9e1b157f7b.jpg", "ocr": "कमरे"} +{"id": "indic_deva_eval_001047_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001047_devanagari_page_ocr_f6a6038db03f.jpg", "ocr": "अभिधम्मपिटके\n50\n\n३. ततियनयो\n३. असडूगहितेनसड्गहितपदनिद्देसो\n\n१७९. वेदनाक्खन्धेन ये धम्मा... सड्ञाक्खन्धेन ये धम्मा... सड्खारक्खन्धेन ये धम्मा.\nसमुदयसच्चेन ये धम्मा... मग्गसच्चेन ये धम्मा खन्‍्धसडगहेन असड्ग्गहिता आयतनसडूगहेन\nसडगहिता धातुसडूगहेन सडगहिता, ते धम्मा कतिहि खन्‍्धेहि कतिहायतनेहि कतिहि धातूहि\nसड्गहिता? ते धम्मा असड्गखतं खन्‍धतो ठपेत्वा तीहि खन्‍्धेहि एकेनायतनेन एकाय धातुया\nसड्नगहित���।\n\n१८०. निरोधसच्चेन ये धम्मा खन्‍्धसडगहेन असडूगहिता आयतनसडूगहेन सड्गहिता\nधातुसड्गहेन सड्गगहिता. ..पे*... ते धम्मा चतूहि खन्धेहि एकेनायतनेन एकाय धातुया सड््गहिता।\n\n१८१. जीवितिन्द्रियेन ये धम्मा खन्‍्धसड्गहेन असड्गह्ठिता आयतनसडूगह्ेन सड्न्गहिता\nधातुसडुगहेन सड्गहिता...पे*... ते धम्मा असड्खतं खनन्‍्धतो ठपेत्वा द्वीहि खन्धेहि एकेनायतनेन\nएकाय धातुया सडगहिता।\n\n३. तृतियनयः\n३. असड्-ग्रहीतेनसड्गग्रही तपदनिर्देशः\n\n१७९. बेदनास्कन्धेन ये धर्माः... संज्ञास्कन्धेन ये धर्मा: संस्कारस्कन्धेन ये धर्माः.... समुदयसत्येन ये\n\nमार्गसत्येन ये धर्माः: स्कनन्‍्धसड्ग्ग्रहेन असड्ग्ग्रहीताः आयतनसड्ग्रहेन धातुसड्ग्ग्रहेन\n\nसड्ग्रही ता: ४ कतिभिः स्कन्थैः कतिभि: आयतनैः कतिभिः धातुभिः\nस्कन्धतः हित्वा त्रिभिः स्कन्‍्थैः एकेनायतनेन एकेन धातुना सड्गग्रही ता:।\n१८०. निरोधसत्येन ये धर्माः स्कन्धसड्ग्ग्रहेन असडपगग्रहीताः आयतनसड्ग्रहेन सड्त्ग्रहीताः\nधातुसड्ग्रहेन सड्ग्रहीताः., ...पू०...... ते धर्मा: चतुर्भि: स्कन्‍्थैः एकेनायतनेन एकेन धातुना सड्ग्रहीता:।\n१८१. जीवितेन्द्रियेन ये धर्माः स्कन्धसड्ग्रहेन असडग्रहीताः आयतनसडगहेन सडगग्रहीता:\nधातुसझग्रहेन सडग्रहीता:...पू०... ते धर्मा: असंस्कृत॑ स्कन्धतः हिल्वा द्वाभ्याम्‌ स्कन्धाभ्याम्‌ एकेनायतनेन\nएकेन धातुना सड्ग्रहीता:।\nतहेन्द)- ह? उदय. कितने स्कन्धो: कितसे आयतनों, कितने धातुओं में वे धर्म संग्रहीत हैं, जो वेदनास्कन्ध.... संज्ञास्कन्ध.\nसंस्कारस्कन्ध.... समुदयसत्य.... सार्गसत्य धर्मों के साथ समान स्कन्ध में संग्रहीत नहीं हैं, किन्तु समान आयतन और\nसमान धातु में संग्रहीत (सम्मिलित) है? वे धर्म असंस्क्त तीन स्कन्‍्धों, एक आयतन और एक थातु में संग्रहीत हैं,\nनिर्वाण को छोड़कर।\n१८०. निरोध सत्य से जो धर्म स्कन्ध संग्रह में संग्रहीत नहीं हैं, किन्तु आयतन संग्रह और धातु संग्रह में\nसंग्रहीत है ...पू०...... वे धर्म चार स्कन्धों में, एक आयतन में एक धातु में संग्रहीत हैं।\n१८१. जीवित्तेन्द्रिय से जो धर्म संग्रह में संग्रहीत नहीं हैं, आयतन संग्रह और धातु संग्रह में\n, ड़ >-पू०... वे धर्म असंस्कृत निर्वाण को स्कन्ध के रूप में छोड़कर दो स्कन्धों में, एक आयतन और एक धातु में\nसंग्रहीत हैं।\n\nते धर्माः असंस्कृत॑"} +{"id": "indic_deva_eval_001048_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001048_devanagari_page_ocr_a11a1bd9eea9.jpg", "ocr": "492 संयुत्तनिकायपालि\n\nसतिसम्बोज्झड्ग भावेति...पे*..... अद्लिकसज्ञासहगतं॑ उपेक्खासम्बोज्झड्गं_भावेति\nविवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं। एवं भाविताय खो, भिक्खवे,\nअष्लिकसज्ञाय एवं बहुलीकताय द्विन्न॑ं फलानं अज्ञजतरं फलं पाटिकड्खं - दिद्लेव धम्मे अड्ञा,\nसति वा उपादिसेसे अनागामिता”ति।\n\nमहत्थसुत्तं\n\n५९. “अट्लिकसञज्ञा, भिक्खवे, भाविता बहलीकता महतो अत्थाय संवत्तति। कर्थ भाविता\nच, भिक्खवे, अष्लिकसछ्ञा कथं बहलीकता महतो अत्थाय संवत्तति? इध, भिक्खवे, भिक्खु\nअटद्लिकसज्ञासहगतं सतिसम्बोज्झड्गगं भावेति...पे*... अश्लिकसड्ञासहगतं उपेक्खासम्बोज्झड्स्गं\nभावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं। एवं भाविता खो,\nभिक्‍्खवे, अट्लिकसड्ञा एवं बहलीकता महतो अत्थाय संवत्तती”ति।\n\nयोगक्खेमसुत्तं\n\n६०. “अट्लिकसज्ञा, भिक्खवे, भाविता बहुलीकता महतो योगक्खेमाय संवत्तति।\nत्म॑स्कृतच्छाया) स्मृतिसम्बोध्यडूगं भावयति ...पे*... अस्थिकसंज्ञासहगतम्‌ उपेक्षासंबोध्यडूग भावयति\nविवेकनि:श्लवितं विरागनि:श्वितं निरोधनि:श्वितं व्यवसर्गपरिणामिनम्‌॥। एवं भाविताया खलु, भिक्षव:!\nअस्थिकसंज्ञाया एवं बहलीकृताया द्यो: फलयो: अन्यतरत्‌ फल प्रातिकांब्यम- दुए एव धर्म आज्ञा, सति\nवा उपादिशेषे अनागामित्वम्‌'इति।\n\n५९. “अस्थिकसंज्ञा, भिक्षव:! भाविता बहुलीकृता महतोडर्थाय संबर्तते। कर्थ भाविताश्च,\nभिक्षव:! अस्थिकसंज्ञा: कं बहुलीकृता महतोउर्थाय संवर्तत? इह, भिक्षव:! भिक्षुरस्थिकसंज्ञासहगतं\nस्मृतिसम्बोध्यछगं भावयति...पे*... अस्थिकसंज्ञासहगतम्‌ उपेक्षासंजोध्यडगं भावयति विवेकनि:\n\nविरागनि:श्षितं निरोधनि:श्रितं व्यवसर्गपरिणामिनम्‌। एवं भाविता: खलु, भिक्षव:! अस्थिकसंज्ञा\nबहलीकृता महतोडर्थाय संवर्तते“इति।\n६०. “अस्थिकसंज्ञा:, भिक्षव:! भाविता बहलीकृता महतो योगक्षेमाय संवर्तते। कर्थ\n\nतहेन्दी) परम ज्ञान की प्राप्ति, या उपादान के कुछ शेष रहने पर अनागामी-फल का लाभ? यहाँ भिक्षुओं! भिक्षु\nविवेक ...पूर्ववत्‌... अस्थिक-संज्ञावाले स्मृति-सम्बोध्यंग की भावना करता है ...पूर्ववत्‌... अस्थिक संज्ञावाले\nडपेक्षा-सस्बोध्यंग की भावना करता है, जिससे मुक्ति सिद्ध होती है। भिक्षुओं! इस तरह, अस्थिक-संज्ञा के भावित\nऔर अभ्यस्त होने से दो में से एक फल अवश्य होता है ...पूर्वबत्‌.\n\n५९. भिक्षुओं! अस्थिक-संज्ञा के भावित और अभ्यस्त होने से महान्‌ अर्थ सिद्ध होता है। कैसे भिक्षुओं!\nअस्थिक-संज्ञा के भावित और अभ्यस्त होने से महान्‌ अर्थ सिद्ध होता है? यहाँ भिक्षुओं! भिक्षु अस्थिक-संज्ञा स्मृति-\nसम्बोध्यंग ...पूर्ववत्‌... अस्थिक-संज्ञा उपेक्षा-सम्बोध्यंग की भवना करता है। इस तरह बह इस को अपने लिये यह\n\nभावना करता हुआ बहुत अर्थकरी सिद्ध पाता है॥\n६०. भिक्षुओं! इस तरह, अस्थिक-संज्ञा के भावित और अभ्यस्त होने से महान्‌ योग-क्षेम होता है।"} +{"id": "indic_deva_eval_001049_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001049_devanagari_page_ocr_817ea06fad3a.jpg", "ocr": "4. सुजातबुद्धवंसो\n\n434\n\nचालि- तेवीसतिसहस्सानि, नारियो समलड्कता।\nसिरिनन्दा नाम नारी, उपसेनो नाम जत्रजो॥637॥\nनिमित्ते चतुरो दिस्वा, अस्सयानेन निक्खमि।\nअनूननवमासानि, पधानं पदही जिनो॥638॥\nब्रह्मुना याचितो सन्‍तो, सुजातों लोकनायको।\nबत्ति चक्‍के महावीरो, सुमडगलुय्यानमुत्तमे॥639॥\nसुदस्सनों सुदेवो च, अहेसुं अग्गसावका।\nनारदो नामुपद्ठाको, सुजातस्स महेसिनो॥640॥\nनागा च नागसमाला च, अहेसुं अग्गसाबिका।\nबोधि तस्स भगवतो, महाबेव्टूति बुल्चति॥644॥\n\nसंस्कृतच्छाया- . त्रयोविंशतिसहस्नाणि, नार्य्य: समलड्त्कृताः\n\nश्रीनन्दा नाम नारी, उपसेनो नाम आत्मज:॥637॥\n\nनिमित्तानि चतुरो दृष्ट्वा, अश्वयानेन निरक्रमता\nअन्यून॑ नवमासान्‌, प्रधान॑ प्रादहज्जिन:॥638॥\nब्रह्मणा याचितो सन्‌, सुजातों लोकनायकः।\n\nअबर्चय॑ चक्र महावीरः, सुमडुगलोद्यानमुत्तमे॥639॥\nसुदर्शनः सुदेवश्च, अभूताम्‌ अग्रस्नावकी।\nनारदो नामोपस्थायकः, सुजातस्य महर्षिण:॥640॥\nनागा च नागसमाला च, अभवताम्‌ अग्र्राविके।\nबोधिस्तस्यथ भगवतः, महावेणु इति उच्यते॥644॥\n|... वहाँ लेइस हजार सुसज्जित स्त्रियाँ थीं, उनमें श्रीनन्दा एक थी, जिसके पुत्र का नाम उपसेन था॥637॥\nये भी वृद्ध आदि चार निमित्तों को देख कर(वह) अश्वयान से (घर से ) निकल गये, नौ महीने तक कठिन\nतपस्या करके सम्यक्सम्बुद्ध(जिन) बन गये॥638॥\nब्ह्या द्वारा प्रार्थना किये जाने पर इन बुद्ध सहावीर ने सुमझुगल उद्यान में धर्मचक्रप्रवर्सन किया॥639॥\nउस समय, इन के सुदर्शन एवं सुदेव नामक दो प्रमुख शिष्य हुए तथा नारद नामक प्रधान सेवक\nबना॥640॥\nनागा एवं नागसमला- ये दोनों इन की प्रधान श्वाविकाये�� थीं तथा उस समय इनका बोधि(वृक्ष) महावेणु\nकहलाया॥64॥\n\n'हिन्दी-"} +{"id": "indic_deva_eval_001050_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001050_indic_mozhi_deva_word_ocr_78b344776a1d.jpg", "ocr": "तर्पणाचा"} +{"id": "indic_deva_eval_001051_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001051_devanagari_page_ocr_943203c52463.jpg", "ocr": "3. सतिपट्ठानसंयुत्तं 243\n\nभविस्सन्ति अनागतमद्धानं अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा, तेसम्पि भगवन्तानं एतप्परमंयेव\nसावकयुगं भविस्सति-- सेय्यथापि मस्हं सारिपुत्तमोग्गल्लाना। अच्छरियं, भिक्‍्खवे, सावकानं!\nअदभुत, भिक्‍खवे, सावकान॑! सत्थु च नाम सासनकरा भविस्सन्ति ओबादप्पटिकरा, चतुन्नक्च\nपरिसान पिया भविस्सन्ति मसनापा गरुभावनीया च! अच्छरियं, भिकक्‍्खवे, तथागतस्स,\nअड्भुतं, भिक्‍्खवे, तथागतस्स! एवरूपेपि नाम सावकयुगे परिनिव्युते नत्थि तथागतस्स सोको\nवा परिदेवो वा! त॑ कुतेत्थ, भिक्‍्खवे, लब्भा! य॑ तं जात॑ भूत॑ सड्खतं पलोकधम्मं, त॑ बत मा\nपलुज्जीति -- नेतं ठानं विज्जति। सेय्यथापि, भिक्खवे, महतो रुक्खस्स तिट्ठतो सारवबतों ये\nमहन्ततरा खन्धा ते पलुज्जेय्युं; एबमेव खो, भिक्‍्खवे, महतो भिक्खुसड्ः्घस्स तिट्ठतो सारबतो\nसारिपुत्तमोग्गल्लाना परिनिब्बुता। त॑ कुतेत्थ, भिक्खवे, लब्भा! यं त॑ जात॑ भूत॑ सड्ूखतं\nपलोकधम्मं, त॑ बत मा पलुज्जीति -- नेतं ठानं विज्जति। तस्मातिह, भिक्खबे, अत्तदीपा\nविहरथ अत्तसरणा अनड्ञजसरणा, धम्मदीपा धम्मसरणा अनड्ञसरणा।\n\nलिरवत छाया) भविप्यन्ति अनागतेस्वानि अर्हन्त: सम्यक्सम्बद्धा:, तेघासधि भगवलास एलल्परम एच\nश्रावकयुगम्‌ भविष्यति- तद्यथापि मह्यं शारिपुत्रमोग्गल्लानौ। आश्चर्यम्‌, भिक्षब:! श्राबकेभ्यः\nअद्भुतम्‌, झिक्षव:! श्रावकेम्य: शास्तु: च॒ नाम शासनकरा: भविष्यन्ति अववादप्रतिकरा:, चतुर्णाडच\nपरिषदां प्रिया: भविष्यन्ति मनापा गुरुभावनीयाश्व। आश्चर्यम्‌, झिक्षव:! तथागताय, अद्भुतम्‌,\nआझिक्षब:! तथागताय, एवंरूपेडचि नाम श्रावकयुगले परिनिर्वुते नास्ति तथागतस्य शोक: वा परिदेवन\nबा! तत्‌ कुतः अत, भिक्षव:! लक्य:! यत्‌ तत्‌ जात॑ भूत संस्कृत परलोकधर्म, तत्‌ बत मा प्रारुजत-\nचैतत्‌ ग्ुज्यते। तद्यथापि, भिक्षबः! महतो वृक्षस्य तिछ्ठत: सारबन्त: ये महत्तरा: स्कन्धा: ते प्ररुजेयु:;\nएवमेव खलु, भिक्षव:! महत: भिक्षुसडघस्य तिछत: सारवनूतौ शारिपुत्रमोग्गल्लानौ परिनिर्वुतो। तत्‌\nकुत: अन्न, भिक्षव:! लक्ष्य: यत्‌ तत्‌ जात॑ भूत॑ संस्कृत परलोकधर्म, तत्‌ बत मा प���रारुजेतू- नैतत्‌ युज्यते।\nतस्मादिह, भिक्षब:! आत्मदीपा: विहरत आत्मशरणा: अनन्यशरणा:, धर्मदीपा: धर्मशरणा:\nअनन्यशरणा:।\n\n(हिन्दी) जो भविष्य में अर्हत सम्यक-सम्ब॒द्ध भगवान्‌ होंगे उनके भी ऐसे ही दो अग्रश्चावक होगे- जैसे मेरे सारिपत्र\nऔर मोग्गलान थे। भिक्षुओं! श्रावकों के लिये आश्चर्य है, अद्भुत है! जो कि शास्ता के शासनकर तथा आज्ञाकारी\nहोंगे और चारों परिषदों के लिये प्रिय”मनाप, गौरबनीय और सम्माननीय होंगे। और, भिक्षुओं! तथागत के लिये\nभी यह आश्चर्य और अद्भुत है कि वैसे दोनों अग्र-श्लावकों के परिनिर्वाण पा लेने पर भी बुद्ध को कोई शोक या\nपरिदेव नहीं है। भिक्षुओं! वह मिलेगा भी कहाँ से, क्यों कि जो कुछ उत्पन्न हआ, बना हुआ, और नाश हो जाने के\nस्वभाव वाला है वह न नष्ट हो- ऐसा सम्भव नहीं। भिक्षुओं! जैसे, किसी सारवान्‌ बड़े वृक्ष की जो सबसे बड़ी डाली\nहो गिर जाय। आनन्द! वैसे ही, इस महान्‌ भिक्षु-संघ के रहते बड़े सारवान्‌ सारिपुत्र और मोग्गलान का परिनिर्वाण\nहो गया है। संसार का यही नियम है। जो उत्पन्न हुआ, बना हुआ, और नाश हो जाने के स्वभाव वाला है, वह न नष्ट\nहो- ऐसा सम्भव नहीं। भिक्षुओं! इसलिये, अपने आप ...पूर्ववत्‌... किसी दूसरे के भरोसे मत रहो।"} +{"id": "indic_deva_eval_001052_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001052_indic_mozhi_deva_word_ocr_45c646c0abe1.jpg", "ocr": "कौन-सी"} +{"id": "indic_deva_eval_001053_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001053_indic_mozhi_deva_word_ocr_678853e88665.jpg", "ocr": "सोविएत"} +{"id": "indic_deva_eval_001054_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001054_indic_mozhi_deva_word_ocr_4d35ec855d31.jpg", "ocr": "निरोप"} +{"id": "indic_deva_eval_001055_indic_vision_bench_deva_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001055_indic_vision_bench_deva_ocr_013f6c8fa98c.jpg", "ocr": "परशूदादा असेल कुणब्याचा. परवा मला बाजारात गरजावैनी भेटली होती. सध्या शेठजीच्या मळ्यात परशूदादा सालगडी आहे म्हणे-\n‘आगं पन रखमे–' भीमीला पुढे न बोलू देता रखमा म्हणाली, “पणबिण काही नाही. मी आत्ता येते बघ.' तिनं आपला ओचा गच्च केला. काटे टोचणार नाहीत या बेतानं तारेवर पाय ठेवीत वर चढली आणि पलीकडे मळ्यात उडी मारली.\nहरभरा व गव्हाच्या ओंब्यांतून वाट काढीत रखमा सरळ विहिरीजवळ आली, पण परशू काही दिसला नाही. कदाचित घरी भाकरतुकडा खायला गेला असावा. त्याची म्हातारी तिच्या भावाकडे दहिफळला गेली आहे, घरी वहिनी एकटीच आहे... या विचारानं रखमाला नकळत खुदकन हसू आलं.\n‘वा S-- काय माल आहे?' आवाजातून लाळेप्रमाणे वासना टपकत होती. रखमा दचकली, शहारली आणि पाहता पाहता संतप्त झाली.\nसमोर एक मवालीटाईप तरुण उभा होता. अंगात शहरी कपडे - टी शर्ट, जीन पॅट होती. क्षणार्धात रखमाला ओळख पटली... हा तर चंपकशेठचा वाया गेलेला दलपत होता. कधीकाळी तिच्या वर्गात होता, पण नापास झाल्यामुळे मागे पडला होता.\n‘दलपत तू? अरे, किती घाण बोलतोस? शरम नाही वाटत?'\nरखमानं त्याला चांगलंच सणकावलं, तसा तोही रागाने म्हणाला,\n‘वा गं वा, आमच्या मळ्यात एक तर वायर फेन्सिंगवरून आलीस, तेही चोरट्याप्रमाणे परवानगी न घेता व माझीच शरम काढतेस?'\n‘मी आलेय ते फक्त पाणी घेण्यासाठी; तुझ्या मळ्यातला माल चोरण्यासाठी नाही.' रखमा म्हणाली, 'दरवर्षी तर तहसीलदार तुमची विहीर जनतेला पाणी मिळावे म्हणून ताब्यात घेत होते... पण यंदा तर काय तुम्ही काटेरी तारेचे कुंपण घातलंय, आमची पायवाटही बंद केली.!'\n'ही जमीन आमची आहे व आम्ही यंदा पाण्याची विहीर अधिग्रहित करू नये म्हणून कोर्टातून स्टे घेतला आहे.'\n‘बरं ते जाऊ दे... मला फक्त पाणी हवंय दोन घागरी.'\nरखमा म्हणाली, ‘मिळेल ना?'\n‘जरूर! फक्त पाणीच काय मागतेस? दिल मांगो, वो भी देंगे...' दलपत रंगेलपणे म्हणाला.\nपाणी! पाणी!!/ ११८"} +{"id": "indic_deva_eval_001056_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001056_devanagari_page_ocr_e02728e0aa77.jpg", "ocr": "'पदमाला\n\n373\n\nइतो यातो अयतो च, निष्फत्तिं समुदीरये।\nविज्जू समयसद्दस्स, समवायादिवाचिनों॥\nइतो यातो अयतो च, समानत्थेहि धातुहि।\nएवं समानरूपानि, भवन्तीति च ईरये॥\nनय रक्‍खणे च। चकारो गतिपेक्खको। नयति। नयो। नयोति नयनं गमनन्ति नयो,\nपाछ्ठिगति। नयन्ति वा रक्खन्ति अत्थं एतेनाति नयो, तथत्तनयादि।\nदय दानगतिहिंसादानरक्खासु। दयति। दया।\nदयाति मेत्तापि बुल्चति करुणापि। “दयापन्‍्नो”ति एत्थ हि मेत्ता “दया”ति, मेत्तचित्ततं\n'अदयापन्‍्नो”ति एत्थ पन करुणा “दया”ति बुज्चति। निक्‍करुणत॑\nबव॑ दयासद्दस्स मेत्ताकरुणासु पवत्ति वेदितब्बा। तथा हि अभिधम्मटीकायं\nबुत्त “दयासद्ो यत्थ यत्थ पवत्तति, तत्थ तत्थ अधिप्पायबसेन योजेतब्बो। दयासद्दो हि\nअनुरक्खणत्थं अन्तोनीत॑ कत्वा पवत्तमानों मेत्ताय च करुणाय च पवत्तती\"ति।\nवचनत्थो पनेत्थ एवं वेदितब्बो - दयति ददाति सत्तानं अभयं एतायाति दया। दयति\nगच्छति विभागं अकत्वा पापकल्याणजनेसु सम॑ वत्तति, सीतेन सम॑ फरन्तं रजोमलड्च पवाहेन्तं\n'उदकमिवातिपि दया, मेत्ता। दयति वा हिंसति कारुणिकं याब यथाधिप्पेतं परस्स हितनिष्फत्तिं\nन पापुणाति, तावाति दया। दयति अ��ुग्गण्हाति पापजनम्पि सज्जनों एतायातिपि दया। दयति\nअत्तनो सुखम्पि पहाय खेद॑ गण्हाति सज्जनो एतायाति दया। दयन्ति गण्हन्ति एताय\nमहाबोधिसत्ता बुद्धभावाय अभिनीहारकरणकाले हत्थगतम्पि अरहत्तफलं छड्डेत्वा\nसंसारसागरतो सत्ते समुद्धरितुकामा अनस्सासकरं अतिभयानकं महतन्त॑ संसारदुक्खं, पच्छिमभवे\nचच सह अमतधातुपटिलाभेन अनेकगुणसमलड्कतं सब्बज्जुतज्ञाणज्वातिपि दया, करुणा।\nकरूणामूलका हि सब्बे बुद्धणुणा।\nअपरो नयो - दयन्ति अनुरक्‍्खन्ति सत्ते एताय, सय्य॑ वा अनुदयति, अनुदयमत्तमेव वा\nएतन्ति दया, सेना सेब करुणा च। किडिच पयोगसेल्य कथ्थाम “सेस्यथा्ि गहपति गिज्लों बा\nकड्को वा कुललो वा मंसपेसिं आदाय दयेय्य। पुत्तेसु मद्दी दयेसि, सस्सुया ससुरम्हि चा\nदयितब्बो रथेसभ”। तत्थ दयेय्याति उप्पतित्वा गच्छेय्य, गत्यत्थवसेनेतं वढ्लब्बं। दयेसीति\nमेत्तचित्तं करेय्यासि। दयितब्बोति पियायितब्बो। उभयम्पेतं विवरणं रक्खणत्थं अन्तोगरध॑ कत्वा\nअधिप्पायत्थवसेन कतन्ति वेदितब्बं।"} +{"id": "indic_deva_eval_001057_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001057_hindi_handwritten_word_ocr_d6fc237972cf.jpg", "ocr": "निरपेक्ष"} +{"id": "indic_deva_eval_001058_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001058_devanagari_page_ocr_aa256b2b1358.jpg", "ocr": "॥00 अस्सी,\nआविलवनरज्ता का वसिका अब्लात। वेब महरत सॉणिरफर्त जरबात। जनागत मरिय्रराजान:\nइस सर्णिं गृहीत्वा धातुनां सत्कार॑ कुर्वन्तु' इति अक्षरान अछेदयत्‌। शक्रो देवराजा विश्वकर्माणं आमन्त््य,\nलात! अजातशत्रुणा धातुनिदानां कृतम, अत्र आरक्षां स्थापय इति प्राहिणोत। सः आगस्य\nव्यालसइड्घाटयन्त अयोजयत्‌, काप्टरूपकानि तस्मिन्‌ धातुगर्भ स्फटिकवर्णखड्गे गृहीत्वा बातसदृशेन\nबेगेन अनुपर्या्य योजयित्वा एकया एव आण्या बध्वा समन्‍्ततो इष्टिकाबसथाकारेण शिलापरिक्षेपं कुत्वा\nडपरि एकया अपिधाय पांसु प्रप्नक्षिपत्‌ भूमिं सम॑ कृत्वा तस्योपरि पाषाणस्तूप॑ प्रत्यस्थापयत।\nतब आयुष्मान्‌ महाकाश्यप ने यह संकल्प लिया कि ये मालाए कभी भी नहीं मुरझाए, सुगन्ध कभी भी\nनष्ट नहीं हो, दीपक कभी भी नहीं बुझे, इसके लिए उन्होंने सोने की पट्टी पर निम्नलिखित अक्षर उत्कीर्ण करवाये-\n“आगे आने वाले समय में प्रियदर्शी राजकुमार राजछत्र धारणकर धर्मराज अशोक होगा। वह इन धातुओं के\nअचशषेपों का व्यापक विस्तार करेगा। तब राजा अजातशत्र ने पूरे शाही शानशौकत से उन धातु अवशेपों का पूजन\nकिया तथा प्रारम्भ से ही लेकर सभी द्वारों को बन्द करता हुआ बाहर निकल गया। ताम्रलौह के द्वारको बंद करके\nउसने शील करने वाली चाबी को अर्गला को खीचने वाली रस्सी के साथ बाँध दिया। उसी स्थान पर उस राजा ने\nसणियों का बहुत बड़ा ढेर रखवा दिया तथा निम्नलिखित अक्षर उत्कीर्ण करवा दिये- “आगे आने वाले समय में\nदरिद्र राजा लोग मणि के इस ढेर को लेकर इन धातु अवशेषों का सम्मान करें”। तब देवताओं के राजा श॒क्र ने\nविश्वकर्मा को यह कहा- मित्र राजा अजातशल्रु ने धातुओं को प्रतिष्ठापित करा दिया है। आप यहाँ इन धातुओं की\nरक्षा का उपाय कर दे। ऐसा कहकर विश्वकर्मा को वहाँ भेजा। विश्वकर्मा वहाँ आए तथा व्याल जैसे भीषण पशुओं\nकी अनेक आकृतियों की काठ से बनी रचनाएँ बनाकर धातु गृह के अंदर काष्ठ की अन्य आकृतियाँ भी बना दीं, जो\nअपने हाथों में स्फटिक मणि के रंगवाली वायु के वेग से घूम रही तलबारे धारण किये हुए थीं, ये सभी आकृतियाँ\nएक ही कील के साथ जुड़ी हुई थीं। उसने उस धातु गृह के चारों ओर ईटों से बनी आवास के आकार में चट्टानों की\nजित्ति को एक शिला से ढक दिया। उसके ऊपर मिट्टी छिड़का दी। भूमि को समतल भराकर उसके ऊपर एक\n\nपाषाण का एक स्तूप निर्मित कर दिया।\n\nवहल्‍ार७ए०), 8 हातल। गिशककात्तडडठ28 पाठ क7रवठापततत ता जा: १९६ छाल हलजतवड त०६ जलकर, एलफितालड\nए०ध छल) 30 40095 000 ७७ छतव्पा।805020,/ ग०० ॥९ ॥90॥20 ७७७ ॥॥ल5९9. 00. ३ 800 99406 (७१03): 40 छोड\nकतच्थाल, 3 जतत58 ताल शिकतत+० जज ॥ॉड९ 08 9आवड०। ता 5६३६९ ३09 96८00१6 3 #/६९०७७ ए]00कादक\nवी 88 45०8. 46 ७०॥ ॥3७० घौ।७5० 78॥05 रत ध5छ03७०० ॥॥86 दत& ॥000ज/24 पी 7ट॥ 8 ज्शक व श5 7079\n2 तब ९०७ 309 लैठ्कातह पी७ 4008 ९0त0१९१ठा08 जजछी फल ए००४ गिर ॥९ वढ0भप९००- 0008 घी ७/०02०-\n2॥0/ 4007 #6 घ९०७ फ2 3529-82, 00 घी 0004 0 90॥06 घी ।3040.॥0 ७१० 55०06 9/32० ॥6 ॥०० » [986\nकर जी हल 90९० खत #॥39 ७७5 02९० (५७५४8): 4.€६ #ताह९ाए( फज्रागद5 ० ए९ िए/छ एक प5 (0697 ०).\nहस्ताड।. 09, 60. एताताडगधका 50. पी. ॥ल॥ी05 अदा, पी वह. ता. धी&.. 0४०७... 39072552०\nिडडठाकापात०:५40075०600, 00५ 9९०; 98 त006. 8 ०तडत/रएड व पड एल: ०७ छ/०ज46 9700०८800\nफतटर०', 304 काञएगए८॥०व लाता, ॥2 ८कत७ ३09 कल६ ७० १ ००0ए०एतत जाए) ३ 0७0त0९ ठवीड/०६ 0 लि०ल०७७\n30ातागीड 304 इलएचा8 ७७ 02 ७8 (शा लीअछ2 (१0०527 ००१७००७७०७) प्ताली। 094० ७७ ००0०82० हि\nए०कातए ढ़ लावा 20007 5०००/१६ 72७०।७९ शी एकल 50269 0 ९ ७०७०, ॥2 ॥34 ॥६ 3॥ |002 ६० 00० 9/7/\nकडत 3 कराए ता हाउताएल 0 फल 0िए। का | १0त20]0/ 0७॥६ 0 ॥क्शगह।[ 60७९7९० ० (०० प्लप 9 आगहार\n(तकाढ-ज98) ॥98 ९०7७ ए.१०७0॥0 909 छीर ह00042ए७७॥26 304 ��94 3 ह30/08 ६॥०७७० ०६६३७७॥९०० ७७००७\n\nवक़र अलटगाहाव करी कट फजबन्‍एरंतदए रीकार कन्‍ल॥त"} +{"id": "indic_deva_eval_001059_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001059_devanagari_page_ocr_c6678ebe7ccf.jpg", "ocr": "अपदानपालि\nशार\n\n“यो सो हासं जनेत्वान, मम कित्तेसि ब्राह्मणो।\nकप्पानं सतसहस्सं, देवलोके रमिस्सति॥046॥\n““तुसिता हि चवित्वान, सुक्कमूलेन चोदितो।\nगोतमस्स भगवतो, सासने पब्बजिस्सति॥4047॥\n“तेन कम्मेन सुकतेन, अरहत्तं [तुद्ठहड़ं (स्या* क*)] लभिस्सति\nसागतो नाम नामेन, हेस्सति सत्थु सावको'\"॥048॥\n“पब्बजित्वान कायेन, पापकम्मं बिवज्जयिं।\nबचीदुच्चरितं हित्वा, आजीव॑ परिसोधयिं॥4049॥\n“एबं बिहरमानोहं, तेजोधातूसु कोविदो।\nसब्बासवे परिज्ञाय, विहरामि अनासवो॥4020॥\n\nअ; सः हासे जनयित्वा, मांमकीर्चयद्‌ ब्राह्मण:।\n\nकल्पानां शतसहस्रम्‌, देवलोके रंस्यते/रमिप्यति॥4046॥\n\nसुषिताद्धि च्युत्वा, शुक्लमूलेन चोदित:।\n\nगौतमस्य भगवत:, शासने प्रव्नजिष्यति॥047॥\n\nसेन कर्मणा सुकुते न, अर्ह््वं लप्स्यते।\n\nसागतो नाम नाम्ना, भविष्यति शास्तु: श्वावक:'॥4048॥\n\nप्रब्नज्य कायेन, पापकर्म व्यवर्जयम्‌।\n\nवचोदुरुच्चरितं हित्वा, आजीवं पर्यशोधयम्‌॥049॥\n\nएवं विहरमाणोंज्हम्‌, तेजोधातुषु कोविद:।\n\n____ सर्वाख्तवान्‌ परिज्ञाय, विहरामसि अनाखव:॥020॥\n\nबह ब्राह्मण जिसने हास पूर्वक मेरा कीर्तिगान किया, वह शतसहस््र (एक लाख) कल्पों तक\nदेबलाओं में रसण करेगा॥046॥\n\nशुक्लमूल (शुभकर्मों) से प्रेरित वह तुषित लोक से च्युत होकर\nप्रत्नज्या ग्रहण करेगा॥047॥\n\nउस सुकृत (सत्कर्म) के फलस्वरूप वह अर्हत्व का लाभी होगा और सागत नाम से शास्ता का\nश्राबक होगा॥4048।\n\nभ्रब्जित होकर मैंने काय से पापकर्म का त्याग किया और बाणी के दुश्वारित्य व्यागकर\nआजीविका का परिशोधन किया॥4049॥\n\nइस प्रकार तेजोधातुओं में विहार करता हुआ ज्ञानी मैं सर्वाख्रवों को जानकर आखबरहित हो\nबिहार करता हूँ॥020॥\n\nहै ॥\n\nहर भगवान्‌ गौतम के शासन में"} +{"id": "indic_deva_eval_001060_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001060_indic_mozhi_deva_word_ocr_c2a8bc2009c7.jpg", "ocr": "छूट"} +{"id": "indic_deva_eval_001061_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001061_devanagari_page_ocr_3ee7a9ce73ba.jpg", "ocr": "__आफ्जाः\n896--_\n\nउ थेरस्स आासतो।\nयथेद॑ सारिपुत्तस्स, हा देवसमागमो॥4॥\n\nतथा महिन्दत्येरल्स,\nराजा पभा ते पहैसि, र॑ सारथि सो गतो।\n\nहि रथ याम, नगर” इति ते'ब्रबि॥4:22॥\nना'रोहाम रथ॑ गच्छ, ग्लास तक सुमनोर्थ। ;\nइति वत्वान पेसेत्वा, सारथिं सुमनोरथं॥43॥\nवेहासमब्शुगन्त्वा, ते नगरस्स पुरत्थतो।\nपठमत्थूपट्टानम्हि, ओतरिंसु महिद्धिका॥ क्या\nयेरेहि पठमोतिण्ण-ठानम्हि कतचेतियं।\nअज्जापि वुच्चते तेन, एवं पठमचेतियं॥45॥\nझंस्कृतच्छाया-._ यथेदं सारिपुत्रस्य, सुत्त स्थविरसख्य भाषतः।\nतथा महेन्द्रस्थविरस्य,अभूत्‌ देवसमागमस:।॥44]]\nराजा प्रभाते प्राहार्षीत्‌, रथं सारथि सः गलः।\n“आरोहत्‌ रथ॑ं याम, नगरं” इति स' अज्रवी त्‌।।42।\n“नारोहम रथम्‌, गच्छ, गच्छाम तब पश्चतः।\nइत्युक्त्वा प्रेष्य, सारथिं सुमनो रथम्‌।॥43॥॥\nविहायसमभ्युद्ध त्य, ते नगरस्य पुरस्ततः।\nप्रथमस्तूपस्थाने, अवतरन्‌ महिद््धिका:।4-4।।\nलग प्रथमोवतीर्ण-स्थाने कृतचैत्यम्‌।\n\"-ज__---अझापि उच्यते तत्र, एवं प्रथमचैत्यम्‌।।45॥॥ देवसमागम\n+ 5 2 अल बे मी डुल खुला सूत्र का उपदेश करते समय जैसे देवसमाणगमस छुआ था, वैसा ही\nराजा ने प्रभात में सारथि के द्वारा २44 2पलमलओ के समय भी छहुआ।।44|] जलने की स्थविर से\nप्रार्थना की।॥42। ॥ बह गया और उसने रथ पर चढ़ नगर\nपरन्तु नह\nकम मेज कर, पा दो सच पर: नहीं बैठते, तुम चलो, हम तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहे हैं।\" ऐला कट कफ किर\nवे स्थिर अपनी, ४: हे स्तूप के स्थात\nपर उतरे॥44॥॥ मसण्डली के साथ आकाशमार्ग से चलकर नगर के पूर्व भाग में प्रथम\n\nस्थविर लोग सब से\nपूर्व “प्रथम\nकहलाता है॥45 , \"इसी स्थान पर उतरे थे, इसीलिये उस स्थान पर बना चैत्य आज भी प्र\n\nशा... रा"} +{"id": "indic_deva_eval_001062_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001062_hindi_handwritten_word_ocr_48ffa1ccc84e.jpg", "ocr": "वर्जित"} +{"id": "indic_deva_eval_001063_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001063_devanagari_page_ocr_0b47ea669f8f.jpg", "ocr": "मिलिन्दपज्हो\n\nकि नु खो, महाराज, अजड्ञा एव कललस्स माता, अज्ञा अब्बुदस्स माता, अच्ञा\nपेसिया माता, अज्ञा घनस्स माता, अज्ञा खुद्दकस्स माता, अज्ञा महन्तस्स माता, अज्ञो\nसिप्पं सिक्खति, अञ्ञजों सिक्खितो भवति, अज्ञों पापकम्म॑ करोति, अज्ञस्स हत्थपादा\nछिज्जन्ती”ति?\n\n“न हि, भन्‍्ते। त्वं पन, भन्‍्ते, एवं वुत्ते कि बदेय्यासी”ति? थेरो आह- “अहज्झेव खो,\nमहाराज, दहरो अहोसिं तरुणो मन्दों उत्तानसेय्यको, अहज्ञेव एतरहि महन्तो। इममेव काय॑\nनिस्साय सब्बे ते एकसड्ःगहिता”ति।\n\n2. “भिय्यो ओपम्मं करोही”ति।\n\n“यथा, महाराज, कोचिदेव पुरिसो पदीपं पदीपेय्य। किं सो सब्बरत्तिं पदीपेय्या\"ति?\n“आम, भन्‍्ते, सब्बरत्तिं पदीपेय्या”ति। “किं नु खो, महाराज, या पुरिसे यामे अच्चि, सा\nमज्झिमे यामे अच्ची”ति? “न हि भन्‍्ते”ति।\nसंस���कृतच्छाया- किन्नु खलु, महाराज, अन्यैव कललस्य माताउ्न्यारर्बुदस्थ माता, अन्या पेश्या माता,\nअन्या घनस्य माता, अन्‍्या क्षुद्रकस्य माता, अन्या महतो माता, अन्य: शिल्प॑ शिक्षति, अन्य: शिक्षितो\nभवति । अन्य: पापकर्म करोति, अन्यस्य हस्तपादौ छिल्येते\"इति ?\n\n\"न हि, भदन्त । ल्व॑ पुनर्भदन्‍त, एबसुक्ते कि वक्ष्यसी\"ति? स्थविर आह- \"अहमेव खलु,\nमहाराज, दारको5भूव॑ तरुणो मन्‍्द उत्तानशयक: अहमेबैतर्हि महान्‌। इममेव कायं नि:श्रित्य सर्वे ते\nएकसड्गृहीता\" इति।\n\n2. “भूय औपम्य कुर्वि”ति।\n\n“यथा, महाराज, कश्चिदेव पुरुषः प्रदीपं प्रदीपयेत्‌। कि स सर्वरात्रिं प्रदीपेदि\"ति। “आम्‌, भदन्‍्त,\nसर्वरात्रिं प्रदीपेदि”ति। किन्षु खलु, महाराज, या पूर्वे यामेउर्चिः, सा मध्यमे यामेउरचिंरि\"ति।\"न हि,\nभदन्ते\"ति।\n\nहिन्दी- महाराज! क्योंकि तब तो गर्भ की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की भी भिन्न-भिन्न माताएँ हो जाएँगी, बडे हो\nजाने पर माता भी भिन्न हो जाएंगी। जो शिल्पों को सीखता है, वह दूसरा और जो सीख कर तैयार हो जाता है,\nवह दूसरा होगा। यों दोष करने वाला दूसरा होगा और किसी दूसरे का हाथ पैर काटा जाएगा।\" “नहीं भन्‍्ते! किंतु\nआप इससे क्‍या दिखाना चाहते हैं?” थेर बोले- “महाराज! मैं बचपन में दूसरा था और इस समय बड़ा होकर\n\nदूसरा हो गया हूँ, किन्तु वे सभी भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ इस शरीर पर ही होने से एक ही में मानी जाती है।”\n\n2.. “कृपमा उपमा देकर समझावें।”\n\n“महाराज! यदि आदमी कोई दीपक जलावे, तो क्‍या वह रात भर जलता रहेगा?” “हाँ भन्‍्ते! जलता\n'पहर में जो दीपक की लौ थी, क्‍या वही दूसरे पहर में भी बनी रहती है?\"\n\nरहेगा।\" “महाराज! रात्रि के पहले\n“नहीं भन्ते!\"”\n\nहा"} +{"id": "indic_deva_eval_001064_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001064_indic_mozhi_deva_word_ocr_e21d541daeea.jpg", "ocr": "विसरता"} +{"id": "indic_deva_eval_001065_indic_mozhi_deva_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001065_indic_mozhi_deva_word_ocr_75f0909b6bbc.jpg", "ocr": "जन्म"} +{"id": "indic_deva_eval_001066_hindi_handwritten_word_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001066_hindi_handwritten_word_ocr_a533e3d6400a.jpg", "ocr": "मोरल"} +{"id": "indic_deva_eval_001067_devanagari_page_ocr", "image": "images/shard_00000/indic_deva_eval_001067_devanagari_page_ocr_989cf10fa85b.jpg", "ocr": "धातुमाला\n\n303\n\nपरोक्‍्खारूपानि बदाम - बच, बचु। बचे, वचित्थ। बचं, बचिम्हा। बचित्थ, बचिरे।\nबचित्थों, बचिज्हो। बचिं, बचिस्हे।\n\nहिय्यत्तनीरूपानि वदाम - अवचा, अवचू। अवचो, अवचुत्थ। अवोचं, अवचुम्ह। अवचुत्थ,\nअबचुत्थुं। अवचसे, अवचुव्हं। अव्चिं, अवचम्हसे।\n\nअज्जतनीरूपानि वदाम - अवचि, अवोचुं, अवचिंसु। अवोचो, अवोचुत्थ। अवोचिं,\nअवोचुम्ह। अवोचा, अवोचु। अवचसे, अवोचिवं। अवोचं, अवोचिस्हे।\n\nभविस्सन्तीरूपानि वदाम - वक्‍्खति, वक्‍्खल्ति। वक्‍्खसि, वक्‍खथ। वक्‍्खामि, वक्‍खाम।\nवक्‍खते, वक्‍्खन्‍्ते। वक्‍्खसे, वक्‍्खव्हे। वक्‍्खस्सं वक्‍्खम्हे।\n\nइमेसं पन पदानं “कथेस्सति, कथेस्सन्ती”तिआदिना अत्थो बत्तब्बो। वक्‍ख रोसेति धातुस्स\nच “वकक्‍्खति, वक्‍्खन्ति। वक्‍्खसी”तिआदीनि वत्वा अवसाने उत्तमपुरिसेकवचनद्वाने\n“वक्खेमी”ति वत्तब्बं। अत्थो पनिमेसं “रोसति, रोसन्ती”तिआदिना वत्तब्बो। अय॑\nवचवकक्‍्खधातून॑_ भविस्सन्तीवत्तमानावसेन ._ रूपसंसन्दनानयो। _ अपरानिपि वचधातुस्स\nभविस्सन्‍ती सहितानि रूपानि भवन्ति - वक्खिस्सति, वक्खिस्सन्ति। वक्खिस्ससि, बक्खिस्सथ।\nवक्खिस्सामि, वक्खिस्साम। वक्खिस्सते, वक्खिस्सन्ते। वक्खिस्ससे, वक्खिस्सव्हे। वक्खिस्सं,\nवक्खिस्साम्हे।\n\nअज्ञाय॑ पाछ्ि -\n\n“अभीतकप्पे चरितं, ठपयित्वा भवा भवे।\nइमम्हि कप्पे चरितं, पबक्खिस्सं सुणोहि मे”ति॥\n\nगद्गतपड्हेषि “राजा तुम्हेहि सद्धिं पटिसन्थारं कत्वा गहपति पतिरूपं आसन झत्वा\nनिसीद्थाति बक्खिस्सती”ति एवमादिअट्ठकथापाठो दिस्सति, तस्मायेब एदिसी पदमाला\nरखिता। वकख रोसेति धातुस्सपि भविस्सन्तीसहितानि रूपानि “वक्खिस्सति,\nवक्खिस्सन्ती”तिआदीनि भवन्ति। अत्थो पनिमेसं “रोसिस्सति, रोसिस्सन्ती\"तिआदिना\nअत्तब्बो। अय॑ वचवक्खधातूनं भविस्सन्‍्तीवसेनेव रूपसंसन्दनानयो।\n\nअवचिस्सा, वचिस्सा, अवचिस्संसु, वचिस्संसु। सेस॑ सब्बं नेय्यं। इध पन चुत्तसदस्स\nअत्थुद्धारं वत्तब्बम्पि अवत्वा उपरियेव कथेस्साम इतो अतिविय वत्तब्बद्भानत्ता।\n\nचु चबने। चवतलि। कारिते “चावेती”तलि रूप। देवकाया चुतो। चुत॑ पदर्म। चवित्‌, चवित्वा।\n\nलोच दस्सने। लोचति। लोचनं।"}