id stringlengths 42 50 | image imagewidth (px) 20 1.28k | ocr stringlengths 3 3.96k |
|---|---|---|
indic_deva_eval_000000_hindi_handwritten_word_ocr | पोट | |
indic_deva_eval_000001_hindi_handwritten_word_ocr | प्रबुद्घ | |
indic_deva_eval_000002_devanagari_digits_mixed | ४0८6८0 | |
indic_deva_eval_000003_devanagari_page_ocr | महावंसो
2्छा
“एवं भन््ते”ति वत्वा सो, सामणेरो महिद्धिको।
तह्जञणंयेव आगम्म, धम्मासोकस्स सन्तिकं॥46॥
सालमूलम्हि ठपितं, महाबोधिं तहिं सुभं।
कत्तिकल्छणपूजाहि, पूजियन्तं तड्च अदहस॥47॥
थ्रेरस्स वचन सुत्वा, राजतो लद्धधातुयो।
पत्तपूरं गहेत्वान, हिमवन्तमुपागमि॥48॥
हिमवन्ते ठपेत्वान, सधातु पत्तमुत्तमं।
देविन्दसन्तिकं गन्त्वा,... | |
indic_deva_eval_000004_indic_mozhi_deva_word_ocr | राही | |
indic_deva_eval_000005_hindi_handwritten_word_ocr | टीचर | |
indic_deva_eval_000006_indic_mozhi_deva_word_ocr | यांच्या | |
indic_deva_eval_000007_devanagari_digits_mixed | ४1२७7९9८४0३३3० | |
indic_deva_eval_000008_hindi_handwritten_word_ocr | सौंपी | |
indic_deva_eval_000009_indic_mozhi_deva_word_ocr | हज़ार | |
indic_deva_eval_000010_devanagari_page_ocr | अभिधम्मपिटके
४७. दुक्खसच्ञं च समुदयसच्ञं च निरोधसचज्जञं च असड्जखतं खन््धतो ठपेत्वा पड्चहि खन््धेहि
द्वादसहायतनेहि अद्लारसहि धातूहि सड्गहिता। कतिट्ि असड्गहिता? न केहिचि खनन््धेहि न केहिचि
आयतनेहि न काहिचि धातूहि असड्गहिता। (तिकसूलकं।)
४८. दुक््खसचन्ञ च समुदयसज्ञज च मग्गसच्च च निरोधसज्ञ॑ च असड्खतं खन्धतो ठपेत्वा प... | |
indic_deva_eval_000011_hindi_handwritten_word_ocr | बीओटी | |
indic_deva_eval_000012_devanagari_page_ocr | 4. इन्द्रियसंयुत्त 339
भिक्खवे, समये उण्णाभो ब्राह्मणो कालड्करेय्य, नत्थि संयोजन येन संयोजनेन संयुत्तो
'उण्णाभो ब्राह्मणों पुन इमं लोक॑ आगच्छेय्या''ति। दुतियं।
४३. साकेतसुत्तं
४३. एवं में सुतं - एकं समय॑ं भगवा साकेते विहरति अड्जनवने मिगदाये। तत्न खो
भगवा भिक्खू आमन््तेसि -- “अत्थि नु खो, भिक्खवे, परियायो यं परियायं ... | |
indic_deva_eval_000013_hindi_handwritten_word_ocr | बरत | |
indic_deva_eval_000014_indic_mozhi_deva_word_ocr | मेरी | |
indic_deva_eval_000015_indic_mozhi_deva_word_ocr | गर्दी | |
indic_deva_eval_000016_devanagari_page_ocr | अग्गवंसकतं ऋकमजिप्पकरो
सहनीतिप्पकरणं
'पदमाला धातुमाला तर
संरक्षक:
प्रो. परमेश्वरतारायणशास्त्री , कुलपति:
'पालि-अध्ययन-केन्द्रम्
रष्ट्रिवसंस्कृतसंस्थानम् (मानित-विश्वविद्यालय:)
2४))९ द्वारा 'ए' श्रेण्यां प्रत्यायित
(कन्द्रीय-मानव-संसाधन-विकास-मन्त्रालयाधीनम्)
लखनऊ-परिसर: . विशालखण्ड:-4 गोमतीनगरम्, लखनऊ (ऊ.प्र.) | |
indic_deva_eval_000017_devanagari_page_ocr | धातुगब्भरूपवण्णनाकथा
अढ धातुगब्भरूपवण्णनाकथा
को दिये थे!। वह उत्तर दिया “यह सत्य है देव! (राजा), और कहा, एक आर्य द्वारा दिया हुआ ईट और एक मेरे
ईट सदृश को मेरे द्वारा निर्माण में इस्तेमाल किया गया।” फिर राजा ने पूछा क्या तुम उस ईट को पहचान सकते
हो, उसने कहा उन स्वजन (भन््ते) द्वारा कौन सी ईट सहायता के लिये दिया गया, ... | |
indic_deva_eval_000018_indic_vision_bench_deva_ocr | ४१
हिन्दुस्तानकी दशा-५
बीचमें न आता तो कुदरत अपना काम करती, मेरा मन मजबूत बनता और अन्तमें निर्विषयी
[
१
]
होकर मैं सुखी होता।
अस्पतालें पापकी जड़ हैं। उनकी बदौलत लोग शरीरका जतन कम करते हैं और अनीतिको बढ़ाते हैं|
यूरोपके डॉक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ़ शरीरके ही गलत जतनके लिए लाखों जीवोंको हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों... | |
indic_deva_eval_000019_devanagari_page_ocr | कुण्डधान बग्गो
7. लसुणदायकत्थेरअपदानं
लसुणं उपजीवामि, लसुणं मय्हभोजनं॥4080॥
“खारियो पूरयित्वान, सड्खाराममगच्छहं।
हड्ढी हड्लेल चित्तेन, सडःघस्स लसुणं अदं॥4084॥
“विपस्सिस्स नरग्गस्स, सासने निरतस्सहं।
सड्ःघस्स लसुणं दत्वा, कप्पं सग्गम्हि मोदहं॥082॥
“एकनबुतितो कप्पे, लसुणं यमदं तदा।
दुग्गतिं नाभिजानामि, लसुणस्स इदं फलं॥4... | |
indic_deva_eval_000020_indic_vision_bench_deva_ocr | ३०
गांव-गाडा
हे अधिकारी जातीपैकींच असून वंशपरंपरेचे म्हणजे वतनदार असतात. जातीमध्ये जी कुळी किंवा घराणे मानाने सर्वांत अग्रगण्य असतें तें पाटलाचें. कदाचित् असेंही असेल की, पाटलाचे घराणे जातीचे आद्य घराणे असावें. ज्याप्रमाणे राज्य मिळविणाराचे घराणें तें राजघराणे असते, त्याप्रमाणे जात अस्तित्वात आणणारे घराणे त्या जातीच्या... | |
indic_deva_eval_000021_indic_mozhi_deva_word_ocr | तत्त्व | |
indic_deva_eval_000022_indic_mozhi_deva_word_ocr | बाहर | |
indic_deva_eval_000023_indic_mozhi_deva_word_ocr | मिळाली | |
indic_deva_eval_000024_indic_mozhi_deva_word_ocr | बापू | |
indic_deva_eval_000025_hindi_handwritten_word_ocr | निषेध | |
indic_deva_eval_000026_devanagari_digits_mixed | ०1८३८966७0६985७748३ | |
indic_deva_eval_000027_hindi_handwritten_word_ocr | टेंशन | |
indic_deva_eval_000028_hindi_handwritten_word_ocr | विनिवेश | |
indic_deva_eval_000029_devanagari_page_ocr | मसहावंसो
245
थेरा नागचतुक्कम्हि, नहात्वा रहदे तहिं।
पब्बतारोहणत्थाय, अट्ठंसु पटिपाटिया॥6॥
राजा रथा तदो"रुय्ह, अद्ठा थेरे'भिवादयि।
उण्हे किलनतो किंराज! आगतोसी'ति आहुते॥7॥
तुम्हाकं गसनासह्ली, आगतोम्ही'ति भासिते।
इचेव वस्सं बसितुं, आगतम्हा'ति भासिय॥8॥
वस्सूपनायिकं थेरो, खन््धकं खन्धको विदो।
कथेसि रजञ्ञो त॑ सुत्... | |
indic_deva_eval_000030_indic_vision_bench_deva_ocr | काही महत्त्वाच्या लेखांची भाषांतरे करून प्रकाशित करण्यात आली. हेतू हा की मूळ ग्रंथातील काही भाग थेट वाचकांपर्यंत पोहोचावा व त्यांनी जिज्ञासेने मूळ ग्रंथ वाचावेत. या मालेत पुढील ग्रंथ व त्यातील काही लेखांची प्रामुख्याने चर्चा करण्यात आली-
१. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह 'दिनकर. (१९५६)
२. भारत : इतिहास और संस्कृ... | |
indic_deva_eval_000031_indic_mozhi_deva_word_ocr | सहसा | |
indic_deva_eval_000032_hindi_handwritten_word_ocr | कपाट | |
indic_deva_eval_000033_indic_mozhi_deva_word_ocr | किसी | |
indic_deva_eval_000034_indic_vision_bench_deva_ocr | २८
व्यवस्थापनाची मूलतत्त्वे
व्यवस्थापकाने मालकांना आवश्यक तितके समाधानी ठेवायला हवं आणि त्यांची मंजुरी मिळवायला हवी. अन्यथा उत्तम कामगिरी बजावूनही त्यांना भागधारकांच्या असंतोषाला सामोरे जावे लागेल.
सामाजिक परिणाम
सहावे आणि शेवटचे (पण न्यूनतम खचितच नव्हे) असे व्यवस्थापकाचे काम म्हणजे संघटनेच्या सामाजिक परिणामाचे व्यवस्थ... | |
indic_deva_eval_000035_devanagari_page_ocr | 2.बोज्झडुगसंयुत्तं 433
“कथज्च, भिक्खवे, भिक्खु योनिसोमनसिकारसम्पन्नो सत्त बोज्ञड्गे भावेति, सत्त
बोज्झड्ग्गे बहलीकरोति? इध, भिक्खवे, भिक््खु सतिसम्बोज्झड्गं भावेति विवेकनिस्सितं
उपेक्खासम्बोज्झड्गं भावेति विवेकनिस्सितं विरागनिस्सितं निरोधनिस्सितं वोस्सग्गपरिणामिं।
एवं खो, भिक्खवे, भिक्खु योनिसोमनसिकारसम्पन्नो सत्त ब... | |
indic_deva_eval_000036_indic_mozhi_deva_word_ocr | होत्या. | |
indic_deva_eval_000037_indic_vision_bench_deva_ocr | राहणार. कारण त्यात वैश्विकता, मानवतावाद, आदर्श आशावाद, समता, बंधुतासारखी कालातीत मूल्यं आहेत.
आज जागतिकीकरणात सामान्य मनुष्य भरडला जात आहे. म्हणून ते थोपवलं पाहिजे असे म्हणणारे साहित्यिक डॉ. अनिल अवचट व जागतिकीकरण ही काळाची गरज आहे म्हणणारे ज्येष्ठ शास्त्रज्ञ डॉ. वसंत गोवारीकर या दोहोंच्या विधानात प्रस्तुतता असली तरी ए... | |
indic_deva_eval_000038_indic_mozhi_deva_word_ocr | पृष्ठ | |
indic_deva_eval_000039_devanagari_page_ocr | सच्दनीतिप्पकरणं
456: न्
पुरिसविपललासवसेन। तथा हि “पुत्त लभेथ वरद”न्ति इमस्स अट्ठकथाय॑ “लक्षेथा”ति
'उल्लिड्गित्वा “लभेय्य”न्ति पुरिसविपललासबसेन विवरणं कतं। “अधम्मं सारथि कयिरा"”ति
इमस्स पन अट्ठकथायं “कयिरा”ति उल्लिड्गत्वा “करेय्यासी”ति विवरणं
सारथि कयिरा"ति एत्थ पुरिसविपल्लासो न चिन्तेतब्बो। अथ वा यथा “पुत्त लभेथ वरद”... | |
indic_deva_eval_000040_devanagari_page_ocr | पालि-
433.
434.
435.
436.
37
मसावोच फरुसं कडिचि, चुत्ता पटिवदेय्यु तं।
दुक्खा हि सारम्भकथा, पटिदण्डा फुसेय्यु तं ॥0/5 ॥।
सचे नेरेसि जत्तानं, कंसो उपहतो यथा।
'एस पत्तोसि निब्बानं, सारम्भो ते न विज्जति॥40/6 ॥।
यथा दण्डेन गोपालो, गावो पाजेति गोचरं।
एवं जरा च मच्चु च, आयु पाजेन्ति पाणिनं॥40/7 ॥
अथ पापानि कम्मानि, ... | |
indic_deva_eval_000041_devanagari_page_ocr | चतुरासीतिसहस्सथूपकथा छ्रं
अथ राजा समआ्ञातपेमो सबहमानो, सामणेरं पक्कोसथा”ति अमच्चे पेसेसि।
अतिचिरायन्तीति पुन द्वे तयो पेसेसि, तुरितं आगच्छतृ”ति। सामणेरों अत्तनो पकतिया
एब“अगमासि। राजा, पतिरुपासनं ञअत्वा निसीदरथाःति आह। इतो च इतो ओलोकेत्बा, नत्थि
दानि अज्ञे भिक्खू”ति समुस्सितसेतच्छत्तं राजपललड्कं उपसड्कमित्वा पत्तगहणत्... | |
indic_deva_eval_000042_indic_vision_bench_deva_ocr | भी अच्छे बन जायें। इधर काम अच्छा मिला है, और मजूरी भी अच्छी मिल रही है। मगर सब इसी टीम-टाम में उड़ जाती है। यहाँ से थोड़ी दूर पर एक ईसाइन रहती है, वह रोज सुबह को पढ़ाने आती है। हमारे ज़माने में तो बेटा सिपारा और रोजा-नमाज का रिवाज था। कई जगह से शादी के पैग़ाम आये...
सकीना ने कठोर होकर कहा--अरे, तो अब चुप भी रहोगी। हो त... | |
indic_deva_eval_000043_hindi_handwritten_word_ocr | पात्र | |
indic_deva_eval_000044_hindi_handwritten_word_ocr | सौ-डेढ़ | |
indic_deva_eval_000045_indic_mozhi_deva_word_ocr | चढ़ावों, | |
indic_deva_eval_000046_indic_mozhi_deva_word_ocr | आपल्या | |
indic_deva_eval_000047_indic_mozhi_deva_word_ocr | सम्पूर्ण | |
indic_deva_eval_000048_devanagari_page_ocr | वरव 24. विपस्सीबुद्धवंसो
'खेसा उप्पलवण्णा च, अग्गा हेस्सन्ति साविका।
अनासवा वीतरागा, सन््तचित्ता समाहिता।
बोधि तस्स भगवतो, अस्सत्थोति पवुज्चति॥826॥
“चित्तो च हत्थाव्यवको, अग्गा हेस्सन्तुपट्ठका ।
नन््दमाता च उत्तरा, अग्गा हेस्सन्तुपढ्निका ।
आयु बस्ससतं तस्स, गोतमस्स यसस्सिनों ॥827॥
“इदं सुत्वान बचन॑...पे"... हेस्साम ... | |
indic_deva_eval_000049_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
263
संवण्णयिंसु, सामिअत्थवसेन पन “तव ममा”ति। सहसत्थे हि चतुत्थीछट्टीरूपानि सब्बथा
विसदिसानि, सासने पन सदिसानि। तस्मा सासने सामज्ञेन पबत्तानि चतुत्थीछड्टीरूपानि
सद्दसत्थे विसेसेन पवत्तेष्ठि चतुत्थीछट्टीरूपेहि समानगतिकानि कत्वा परेसमनुकम्पाय
सम्पदानत्थे तुय्ह॑ मय्हंसद्वानं पवत्तिनियमों, सामिअत्थे च तव ममसुद्दान... | |
indic_deva_eval_000050_indic_vision_bench_deva_ocr | साबरमती नहीं सब्र मति
माणूस गुजरातला जातो नि त्यास महात्मा गांधींची आठवण होत नाही असं सहसा घडत नाही. गुजरातला जायचं ठरल्यावर मी महात्मा गांधींचा साबरमती आश्रम पाहायचं ठरवून टाकलं होतं. किंबहुना गुजरात विद्यापीठातील बैठकीचं निमंत्रण न टाळण्याचे मुख्य कारण साबरमती आश्रमच होतं.
संथ वाहणाऱ्या साबरमती नदीच्या किनारीच महात्म... | |
indic_deva_eval_000051_hindi_handwritten_word_ocr | रुप | |
indic_deva_eval_000052_indic_vision_bench_deva_ocr | ४७.
'तंत्रज्ञानाचे अग्निदिव्य'
२२५
४८.
लोकमताच्या कौलाची दिशा
२३०
४९.
सीता वनवासीच आहे अजून
२३३
५०.
नेपाळमधील शाही शिरकाणाचा इशारा
२३७
५१.
ग्रामोद्धारक - शबनम ते संगणक
२४०
५२.
सरकारी आतंकवाद
२४५
५३.
'बिनपरती' ते 'परिवर्तनीय'
२५१
५४.
नर्मदा आंदोलनाची जलसमाधी
२५५
५५.
केल्याने होत आहे रे
२६१
५६.
'काळ आई'ला 'सोनेरी प्रणाम'... | |
indic_deva_eval_000053_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
47
अविस्सन्तियकालाति-पत्तीसु द्वीसु भासित॑।
बव्हत्ते बहुएकत्ते, ससंयोगं स्सथत्तयं॥
“तुम्हे भविस्सथि"'ज्वेतं, भविस्सन्तियतों मतं।
“अभविस्सथ तुम्हे”ति, “अभविस्सथ सो”ति च।
कालातिपत्तितो बुत्तं, एतडिहि वचनद्वयं॥
भविस्सन्तियकालाति-पत्तीसु समुदीरितं।
मज्झिमपुरिसद्वाने, ससंयोगं स्ससेयुगं॥
“भविस्ससे त्व"मिच्चेतं, “त्... | |
indic_deva_eval_000054_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
369
यस॑ इस्सरियं सुख।
पहासि लोकचित्तडच,
सुगतो भगवा ततो॥
तथा खन्धायतनधातादिभेदे धम्मकोट्ठासे सब्बं पपउ्च सब्बं योगं सब्बं गन्थं सब्बं संयोजन
समुच्छिन्दित्वा अमत॑ धातुं समधिगच्छन्तो वमि उग्गिरि अनपेक्खों छड़यि न पच्चावमीति
भगवा। अथ वा सब्बेषि कुसलाकुसले सावज्जानवज्जे हीनप्पणीते कण्हसुक्कसप्पटिभागे धम्मे
अर... | |
indic_deva_eval_000055_indic_mozhi_deva_word_ocr | येतील | |
indic_deva_eval_000056_hindi_handwritten_word_ocr | चुनने | |
indic_deva_eval_000057_indic_mozhi_deva_word_ocr | रूढ़िगत | |
indic_deva_eval_000058_devanagari_page_ocr | 20
अपदानपालि
40. खोमदायकत्थेरअपदानं
“नगरे बन्धुमतिया, अहोसिं वाणिजो तदा।
तेनेव दारं पोसेमि, रोपेमि बीजसम्पदं॥987॥
“रथियं पटिपन्नस्स, विपस्सिस्स महेसिनो।
एक॑ खोम॑ मया दिनन॑, कुसलत्थाय सत्थुनो॥988॥
>एकनव॒त्तितों काप्से, य॑ खोससददिं तदा।
दुग्गतिं नाभिजानामि, खोमदानस्सिदं फलं॥989॥
“सत्तरसे [सत्तवीसे (सी० स्या०)] इतो कप्प... | |
indic_deva_eval_000059_indic_mozhi_deva_word_ocr | दृढ़ | |
indic_deva_eval_000060_devanagari_page_ocr | सच्दनीतिप्पकरणं
366- न्
अजञाय॑ पाकछ्ि “ओमाति भन््ते भगवा इद्धिया मनोमयेन कायेन ब्रह्मलोकं
'उपसड्कमितु”न्ति। तत्थ ओमातीति पहोति सक्कोति।
तिमु अद्दभावे। अद्दभावो तिन्तभावो। तेमति। तिन्तो, तेमियो। तेमितुकामा तेमिंसु।
एल्थ तेमियोति एवंनामको कासिरज्ञो पुत्तो बोधिसत्तो। सो हि रज्जो चेव महाजनस्स च
हृदयं तेमेन्तो अद्दभ... | |
indic_deva_eval_000061_indic_vision_bench_deva_ocr | स्वप्नांचे वेड हा ज्याच्या स्वभावाचा स्थायीभावच असतो, त्याला मग नवे स्वप्न शोधावे लागते, नसले तर नवे निर्माण केल्याशिवाय त्याला चैनच पडत नाही. स्वप्नांशिवाय असा माणूस जगूच शकत नाही.
खरे म्हणजे आपणही, सर्वसामान्य माणसेही कुठलीतरी स्वप्ने उराशी बाळगल्याशिवाय जगत नसतो.
कुणाची स्वप्ने लहान, कुणाची मोठी.
जेवढी स्वप्ने मोठी ... | |
indic_deva_eval_000062_devanagari_page_ocr | १. चिक्तुप्पादकण्ड 485
३५४. कतमे धम्मा कुसला? यस्मिं समये लोकुत्तरं झानं भावेति निय्यानिकं अपचयगामिं
दिद्विगतान॑ पहानाय पठमाय भूमिया पत्तिया विविच्चेव कामेहि. ..पे*... पठम॑ झानं
उपसम्पज्ज विहरति सुखपटिपदं दन्धाभिज्ञ अप्पणिहितं, तस्मिं समये फस्सो होति...पे*...
अविक्खेपो होति. ..पे*... इमे धम्मा कुसला।
३५५. कतमे धम्मा ... | |
indic_deva_eval_000063_indic_vision_bench_deva_ocr | गोदान : 173
'हां, बेची है।'
'तुम्हारा यही वादा तो था कि ऊख बेचकर रुपया दूंगा।'
'हां, था तो।'
'फिर क्यों नहीं देते! और सब लोगों को दिए हैं कि नहीं?'
'हां, दिए हैं।'
'तो मुझे क्यों नहीं देते?'
'मेरे पास अब जो कुछ बचा है, वह बाल-बच्चों के लिए है।'
पटेश्वरी ने बिगड़कर कहा-तुम रुपये दोगे, सोभा और हाथ जोड़कर और आज ही। हां, अ... | |
indic_deva_eval_000064_indic_vision_bench_deva_ocr | ६३८
हिंदी-साहित्य का इतिहास
कौने भेजौं दूत पूत सों विद्या सुनावै।
बातन में बहराह जाए ताको यह लावै॥
त्यागि मधुपुरी को गयो छाँड़ि सबन के साथ।
सात समुंदर पै भयो दूर द्वारकानाथ॥
जाइगो को उहाँ?
नित नव परत अकाल, काल को चलत चक्र चहुँ।
जीवन को आनंद न देख्यो जात यहाँ कहुँ॥
बढ्यो यथेच्छाचारकृत जहँ देखौ तहँ राज।
होत जात दुर्बल वि... | |
indic_deva_eval_000065_indic_mozhi_deva_word_ocr | यायचा. | |
indic_deva_eval_000066_indic_vision_bench_deva_ocr |
आमची संस्कृती / १५
बुद्धाच्या प्रेरणेने हे कमी झाले म्हणावे तर ब्रह्मदेश, चीन व जपान ह्या देशांतून शेकडो बौद्धधर्मानुयायी गायीचे मांस खातात. जैन धर्माच्या प्रेरणेने म्हणावे तर जैनांना सर्वच प्राण्यांचे मांस वर्ज्य आहे. एका काळी गायीला हिंदू पूज्य मानीत; पण तेव्हासुद्धा मृत जनावर खाणाऱ्या काही जाती हिंदू समाजात होत्या... | |
indic_deva_eval_000067_indic_mozhi_deva_word_ocr | समय | |
indic_deva_eval_000068_indic_vision_bench_deva_ocr | 164 : प्रेमचंद रचनावली-6
‘इसी का यह फल है कि आज आपका इतना सम्मान है। मैं एक प्रस्ताव करना चाहता हूं। मालूम नहीं, आप उसे स्वीकार करेंगे या नहीं। आप मेरी ओर से सौ आदमियों के नाम फ्री पत्र जारी कर दीजिए। चंदा मैं दे दूंगा।
ओंकारनाथ ने कृतज्ञता से सिर झुकाकर कहा-मैं धन्यवाद के साथ आपका दान स्वीकार करता हूं। खेद यही है कि प... | |
indic_deva_eval_000069_indic_mozhi_deva_word_ocr | गाणे | |
indic_deva_eval_000070_indic_mozhi_deva_word_ocr | मान्य | |
indic_deva_eval_000071_indic_mozhi_deva_word_ocr | दर्शन | |
indic_deva_eval_000072_indic_mozhi_deva_word_ocr | त्याच | |
indic_deva_eval_000073_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
89
दूरक्वानेपि रस्सत्त, “जनिन्द''इति दिस्सति।
न कत्थचिपि दीघत्तं, इति नीति मया मता॥
इदम्पेत्थ वक्तब्ब॑ “कुतों नु भो इदमसायात॑ “दूसक्॒स्सालपनं अदूरद्रस्सालपनमि'ति"?
सद्दसत्थतो। सच्दस॒त्थं नाम न सब्बसो बुद्धवचनस्सोपकारकं,
इमस्मिं पकरणे “बहुवचन”न्ति वा “पुथुवचन”न्ति वा “अनेकवचन"”न्ति वा अत्थतो एकं,
ब्यड्जनमेव ... | |
indic_deva_eval_000074_indic_vision_bench_deva_ocr | ठरवू शकत नाहीत, पंतप्रधानांचा व मंत्रिमंडळाचा त्यांच्या धोरणाला पाठिंबा असला पाहिजे हे कळण्याची पात्रता छगलांच्या टीकाकारांत खचित होती. परंतु सरकारवर प्रत्यक्ष टीका करण्याचे टाळण्यासाठी छगलांना टीकेचे लक्ष्य ठरविण्यात आले. या विधेयकाविरुद्ध अलीगढ ओल्ड बॉयज् असोसिएशनने सर्वोच्च न्यायालयात अर्ज केला व हे विद्यापीठ मुस्लि... | |
indic_deva_eval_000075_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
405
हेहिति, हेहिन्ति। हेहिसि। सेसं बित्थारेतब्बं।
होहिति, होहिन्ति। होहिसि। सेसं बित्थारेतब्बं। भविस्सन्तिया रूपानि।
अहुविस्सा, अहविस्संसु। अहुविस्ससे, अहृविस्सथ। अहविस्सं, अहुविस्सम्हा। अहुविस्सथ,
अह्ृविस्सिसु। अह्वविस्ससे, अह्वविस्सव्हे। अहवविस्सि, अहृवविस्साम्हसे। कालातिपत्तिरूपानि।
ज्हे अव्हायने बद्धाय... | |
indic_deva_eval_000076_indic_mozhi_deva_word_ocr | भूमिका | |
indic_deva_eval_000077_devanagari_digits_mixed | 9९8०671७3२२८56२9 | |
indic_deva_eval_000078_hindi_handwritten_word_ocr | प्रज्ञनानंद | |
indic_deva_eval_000079_devanagari_page_ocr | 42 थूपबंसो
तस्स अपरभागे इतो एकनवुतिकप्पमत्थके विपस्सी नाम बुद्धो उदपादि। तदा बोधिसत्तो
महिद्धिको महानुभावों अतुलों नाम नागराजा ह॒त्वा सत्तरतनखचितं सोवण्णमहापीठं
अगवतो अदासि। सो पि न॑ इतो एकनबुतिकपण्पसत्थके बुद्धो भविस्सतीति व्याकासि। तस्स
पन भगवतों धातुयो न विकिरिंसु। सब्बे देवमनुस्सा सजन्निपतित्वा धातुयों गहेत्वा
सत्... | |
indic_deva_eval_000080_indic_mozhi_deva_word_ocr | केवल | |
indic_deva_eval_000081_hindi_handwritten_word_ocr | प्रश्नों | |
indic_deva_eval_000082_indic_mozhi_deva_word_ocr | अपनी | |
indic_deva_eval_000083_indic_mozhi_deva_word_ocr | कहा-वही | |
indic_deva_eval_000084_indic_vision_bench_deva_ocr | गोदान : 215
हो जाता और मैं इस झमेले में न पड़ता।'
मिस्टर तंखा ने घड़ी की तरफ देखकर कहा-तो रायसाहब, अगर आप साफ कहलाना चाहते हैं, तो सुनिए-अगर आपने दस हजार का चैक मेरे हाथ पर रख दिया होता, तो आज
निश्चय एक लाख के स्वामी होते। आप शायद चाहते होंगे, जब आपको राजा साहब से रुपये मिल जाते, तो आप मुझे हजार-दो-हजार दे देते। तो मैं... | |
indic_deva_eval_000085_devanagari_page_ocr | 4. इन्द्रियसंयुत्त 323
*“कतमउ्च, भिक्खवे, दुक्खिन्द्रियं? यं खो, भिक््खवे, कायिकं दुक््खं, कायिकं असातं,
कायसम्फस्सजं दुक््खं असातं वेदयितं -- इदं वुल्चति, भिक््खवे, दुक्खिन्द्रियं।
““कतमछ्चव, भिक्खवे, सोमनस्सिन्द्रियं? यं खो, भिक्खवे, चेतसिकं सुखं, चेतसिकं
सातं, मनोसम्फस्सजं सुखं सातं वेदयितं -- इदं बुज्चति, भिक... | |
indic_deva_eval_000086_indic_mozhi_deva_word_ocr | भांडण | |
indic_deva_eval_000087_indic_vision_bench_deva_ocr | ३१
वतन-वृत्ति.
(हुशार) ह्या संस्कृत शब्दापासून निघाला असावा; अथवा पट्ट म्हणजे मुख्य ह्या शब्दापासूनही तो निघाला असेल. कौलाला पट्टा म्हणतात, व इजारा म्हणजे मक्ता. ज्यावरून गांवाचें बाबवार घेणे देणे समजतें अशा गांवाच्या जमाबंदीच्या ताळेबंदाला पट्टा किंवा इजारपट म्हणतात, व तो पाटलाजवळ असतो, आणि पाटील त्याप्रमाणे वसूल करतो... | |
indic_deva_eval_000088_indic_mozhi_deva_word_ocr | भारत-जर्मन | |
indic_deva_eval_000089_indic_mozhi_deva_word_ocr | त्यांनी | |
indic_deva_eval_000090_devanagari_page_ocr | पश्चमों परिच्छेदो
68 +-
भूसापेत्वान नगरं, गन्त्वा सझूझघ॑ निमन्तिया
चरं नेत्वान भोजेत्वा, दत्वा सामणकं बहुं॥76॥
सत्थारा देसितों धम्मों, कित्तकोति अपुच्छथ।
ब्याकासि मोग्गलिपुत्तो, तिस्सत्थेरो तदस्स तं॥77॥
सुत्वान चतुरासी ति, धम्मक्खन्धा'ति सो "ब्रवि।
पूजेमि तेहं पच्चेकं, विहारेना'ति भूपति॥78॥
दत्वा तदा छन्नवुति-ध... | |
indic_deva_eval_000091_devanagari_page_ocr | 348 संयुत्तनिकायपालि
एकमन्तं निसिन्ना खो ते भिक््खू भगवनन््तं एतदवोचुं -
“*आयस्मता, भन््ते, पिण्डोलभारद्वाजेन अज्ञा ब्याकता - “खीणा जाति, बुसितं
ब्रह्मचरियं, कत॑ करणीयं, नापरं इत्थत्ताया'ति पजानामीति। कि नु खो, भन््ते, अत्थवसं
सम्पस्समानेन आयस्मता पिण्डोलभारद्वाजेन अज्ञा ब्याकता - “खीणा जाति, बुसितं
ब्रह्मचरियं,... | |
indic_deva_eval_000092_devanagari_digits_mixed | २804५0७5२610५ | |
indic_deva_eval_000093_hindi_handwritten_word_ocr | पड़ोसियों | |
indic_deva_eval_000094_devanagari_page_ocr | भूमिका
भगवान् बुद्ध ने अपने उपदेश छान्दस् में संग्रह करने क॑ ल्विए सना किया
अपनी भाषा में संग्रह करने की आज्ञा दी थी। त्रिपिटक में इस तरह के सन्दर्भ मिलते क गा ॥
सुरक्षित रखते थे। धम्मपदों के नाम से पाठ की परम्परा भी प्राप्त होती है तथा मिश्षुओं की श्रेष्ठता को गणना करते
समय धम्मधर विनयधर भिक्षुओं का उल्लेख मिलता है... | |
indic_deva_eval_000095_devanagari_page_ocr | सच्दनीतिप्पकरणं
74- न्
जिक्खून॑ आमसन्तनपाक्तियं गाथास् क्र दिस्सति, चुण्णियपदेस च॒ सन्धिविसय्रेयेव दिस्सलि।
सावकस्स पन भिकक््खून॑ आमन्तनपाछियं न दिस्सतीति अयं द्विन्न॑ विसेसो वट्ठब्बो। तथा हि
“एवड्ल पन भिक्खवे इम॑ सिक्खापदं॑ उद्दिसेय्याथा”तिआदीसु “भिक्खबे”ति पर्द
चुण्णियपदेस्वेव दिट्ठंं। “भिक्खवो तिसता इमे, याचन्ति... | |
indic_deva_eval_000096_indic_mozhi_deva_word_ocr | पटत | |
indic_deva_eval_000097_hindi_handwritten_word_ocr | एन्क्लेव | |
indic_deva_eval_000098_hindi_handwritten_word_ocr | बिट | |
indic_deva_eval_000099_indic_mozhi_deva_word_ocr | नाही' |
Subsets and Splits
No community queries yet
The top public SQL queries from the community will appear here once available.