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assignment_llm_1/assignment_image/code/c1.py
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| 12 |
+
3) Normalizing pixel values to [-1, 1]
|
| 13 |
+
4) Creating batched DataLoaders
|
| 14 |
+
5) Building a ViT encoder + classification head
|
| 15 |
+
6) Training with CrossEntropy + AdamW + LR scheduler
|
| 16 |
+
7) Evaluation accuracy + misclassification visualization
|
| 17 |
+
"""
|
| 18 |
+
import os
|
| 19 |
+
os.environ["CUDA_DEVICE_ORDER"] = "PCI_BUS_ID"
|
| 20 |
+
os.environ["CUDA_VISIBLE_DEVICES"] = "2"
|
| 21 |
+
from pathlib import Path
|
| 22 |
+
from typing import Any, Dict, List, Tuple
|
| 23 |
+
|
| 24 |
+
import torch
|
| 25 |
+
import torch.nn as nn
|
| 26 |
+
from torch.utils.data import DataLoader, random_split
|
| 27 |
+
from torchvision import datasets, transforms
|
| 28 |
+
|
| 29 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 30 |
+
# Dataset metadata
|
| 31 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 32 |
+
CLASS_NAMES: Tuple[str, ...] = (
|
| 33 |
+
"airplane",
|
| 34 |
+
"automobile",
|
| 35 |
+
"bird",
|
| 36 |
+
"cat",
|
| 37 |
+
"deer",
|
| 38 |
+
"dog",
|
| 39 |
+
"frog",
|
| 40 |
+
"horse",
|
| 41 |
+
"ship",
|
| 42 |
+
"truck",
|
| 43 |
+
)
|
| 44 |
+
|
| 45 |
+
|
| 46 |
+
def get_cifar10_dataloaders(
|
| 47 |
+
data_root: str = "./data",
|
| 48 |
+
image_size: int = 64,
|
| 49 |
+
batch_size: int = 128,
|
| 50 |
+
num_workers: int = 2,
|
| 51 |
+
pin_memory: bool = True,
|
| 52 |
+
val_ratio: float = 0.1,
|
| 53 |
+
seed: int = 42,
|
| 54 |
+
) -> Tuple[DataLoader, DataLoader, DataLoader]:
|
| 55 |
+
"""
|
| 56 |
+
Build CIFAR-10 train/val/test dataloaders with resize + normalization.
|
| 57 |
+
Uses CIFAR-10's official split:
|
| 58 |
+
- train=True -> 50,000 images
|
| 59 |
+
- train=False -> 10,000 images
|
| 60 |
+
|
| 61 |
+
Data source:
|
| 62 |
+
- https://www.cs.toronto.edu/~kriz/cifar.html
|
| 63 |
+
|
| 64 |
+
Args:
|
| 65 |
+
data_root: Directory to download/store CIFAR-10.
|
| 66 |
+
image_size: Target image size after resizing (square).
|
| 67 |
+
batch_size: Number of samples per batch.
|
| 68 |
+
num_workers: Number of subprocesses for data loading.
|
| 69 |
+
pin_memory: Pin memory for faster host-to-device transfer on CUDA.
|
| 70 |
+
val_ratio: Fraction of official train split reserved for validation.
|
| 71 |
+
seed: Random seed for deterministic train/val split.
|
| 72 |
+
|
| 73 |
+
Returns:
|
| 74 |
+
train_loader, val_loader, test_loader
|
| 75 |
+
"""
|
| 76 |
+
if not 0.0 < val_ratio < 1.0:
|
| 77 |
+
raise ValueError("val_ratio must be between 0 and 1.")
|
| 78 |
+
|
| 79 |
+
transform = transforms.Compose(
|
| 80 |
+
[
|
| 81 |
+
transforms.Resize((image_size, image_size)),
|
| 82 |
+
transforms.ToTensor(), # Scales uint8 [0,255] -> float [0,1]
|
| 83 |
+
transforms.Normalize(
|
| 84 |
+
mean=(0.5, 0.5, 0.5), std=(0.5, 0.5, 0.5)
|
| 85 |
+
), # [0,1] -> [-1,1]
|
| 86 |
+
]
|
| 87 |
+
)
|
| 88 |
+
|
| 89 |
+
data_root_path = Path(data_root)
|
| 90 |
+
data_root_path.mkdir(parents=True, exist_ok=True)
|
| 91 |
+
|
| 92 |
+
full_train_dataset = datasets.CIFAR10(
|
| 93 |
+
root=str(data_root_path),
|
| 94 |
+
train=True,
|
| 95 |
+
download=True,
|
| 96 |
+
transform=transform,
|
| 97 |
+
)
|
| 98 |
+
test_dataset = datasets.CIFAR10(
|
| 99 |
+
root=str(data_root_path),
|
| 100 |
+
train=False,
|
| 101 |
+
download=True,
|
| 102 |
+
transform=transform,
|
| 103 |
+
)
|
| 104 |
+
|
| 105 |
+
# pin_memory is useful only when CUDA is available.
|
| 106 |
+
use_pin_memory = pin_memory and torch.cuda.is_available()
|
| 107 |
+
|
| 108 |
+
val_size = int(len(full_train_dataset) * val_ratio)
|
| 109 |
+
train_size = len(full_train_dataset) - val_size
|
| 110 |
+
generator = torch.Generator().manual_seed(seed)
|
| 111 |
+
train_dataset, val_dataset = random_split(
|
| 112 |
+
full_train_dataset, [train_size, val_size], generator=generator
|
| 113 |
+
)
|
| 114 |
+
|
| 115 |
+
train_loader = DataLoader(
|
| 116 |
+
train_dataset,
|
| 117 |
+
batch_size=batch_size,
|
| 118 |
+
shuffle=True,
|
| 119 |
+
num_workers=num_workers,
|
| 120 |
+
pin_memory=use_pin_memory,
|
| 121 |
+
)
|
| 122 |
+
val_loader = DataLoader(
|
| 123 |
+
val_dataset,
|
| 124 |
+
batch_size=batch_size,
|
| 125 |
+
shuffle=False,
|
| 126 |
+
num_workers=num_workers,
|
| 127 |
+
pin_memory=use_pin_memory,
|
| 128 |
+
)
|
| 129 |
+
test_loader = DataLoader(
|
| 130 |
+
test_dataset,
|
| 131 |
+
batch_size=batch_size,
|
| 132 |
+
shuffle=False,
|
| 133 |
+
num_workers=num_workers,
|
| 134 |
+
pin_memory=use_pin_memory,
|
| 135 |
+
)
|
| 136 |
+
|
| 137 |
+
return train_loader, val_loader, test_loader
|
| 138 |
+
|
| 139 |
+
|
| 140 |
+
class PatchifyEmbedding(nn.Module):
|
| 141 |
+
"""
|
| 142 |
+
Step 2:
|
| 143 |
+
- Divide image into PxP patches
|
| 144 |
+
- Flatten each patch
|
| 145 |
+
- Project flattened patches to hidden dim D
|
| 146 |
+
"""
|
| 147 |
+
|
| 148 |
+
def __init__(
|
| 149 |
+
self,
|
| 150 |
+
image_size: int = 64,
|
| 151 |
+
patch_size: int = 4,
|
| 152 |
+
in_channels: int = 3,
|
| 153 |
+
embed_dim: int = 256,
|
| 154 |
+
) -> None:
|
| 155 |
+
super().__init__()
|
| 156 |
+
if image_size % patch_size != 0:
|
| 157 |
+
raise ValueError("image_size must be divisible by patch_size.")
|
| 158 |
+
|
| 159 |
+
self.image_size = image_size
|
| 160 |
+
self.patch_size = patch_size
|
| 161 |
+
self.in_channels = in_channels
|
| 162 |
+
self.embed_dim = embed_dim
|
| 163 |
+
|
| 164 |
+
self.num_patches_per_side = image_size // patch_size
|
| 165 |
+
self.num_patches = self.num_patches_per_side * self.num_patches_per_side
|
| 166 |
+
patch_dim = in_channels * patch_size * patch_size
|
| 167 |
+
|
| 168 |
+
self.unfold = nn.Unfold(kernel_size=patch_size, stride=patch_size)
|
| 169 |
+
self.proj = nn.Linear(patch_dim, embed_dim)
|
| 170 |
+
|
| 171 |
+
def forward(self, x: torch.Tensor) -> torch.Tensor:
|
| 172 |
+
"""
|
| 173 |
+
x: (B, C, H, W)
|
| 174 |
+
returns: (B, N, D), where N=num_patches, D=embed_dim
|
| 175 |
+
"""
|
| 176 |
+
patches = self.unfold(x) # (B, patch_dim, N)
|
| 177 |
+
patches = patches.transpose(1, 2) # (B, N, patch_dim)
|
| 178 |
+
embeddings = self.proj(patches) # (B, N, D)
|
| 179 |
+
return embeddings
|
| 180 |
+
|
| 181 |
+
|
| 182 |
+
class TransformerEncoderBlock(nn.Module):
|
| 183 |
+
"""
|
| 184 |
+
Step 4 single block:
|
| 185 |
+
LayerNorm -> MSA -> residual -> LayerNorm -> MLP -> residual
|
| 186 |
+
"""
|
| 187 |
+
|
| 188 |
+
def __init__(
|
| 189 |
+
self,
|
| 190 |
+
embed_dim: int,
|
| 191 |
+
num_heads: int,
|
| 192 |
+
mlp_ratio: float = 4.0,
|
| 193 |
+
dropout: float = 0.0,
|
| 194 |
+
) -> None:
|
| 195 |
+
super().__init__()
|
| 196 |
+
mlp_hidden_dim = int(embed_dim * mlp_ratio)
|
| 197 |
+
|
| 198 |
+
self.norm1 = nn.LayerNorm(embed_dim)
|
| 199 |
+
self.attn = nn.MultiheadAttention(
|
| 200 |
+
embed_dim=embed_dim,
|
| 201 |
+
num_heads=num_heads,
|
| 202 |
+
dropout=dropout,
|
| 203 |
+
batch_first=True,
|
| 204 |
+
)
|
| 205 |
+
self.norm2 = nn.LayerNorm(embed_dim)
|
| 206 |
+
self.mlp = nn.Sequential(
|
| 207 |
+
nn.Linear(embed_dim, mlp_hidden_dim),
|
| 208 |
+
nn.GELU(),
|
| 209 |
+
nn.Dropout(dropout),
|
| 210 |
+
nn.Linear(mlp_hidden_dim, embed_dim),
|
| 211 |
+
nn.Dropout(dropout),
|
| 212 |
+
)
|
| 213 |
+
|
| 214 |
+
def forward(self, x: torch.Tensor) -> torch.Tensor:
|
| 215 |
+
# MSA block + residual
|
| 216 |
+
x_norm = self.norm1(x)
|
| 217 |
+
attn_out, _ = self.attn(x_norm, x_norm, x_norm, need_weights=False)
|
| 218 |
+
x = x + attn_out
|
| 219 |
+
|
| 220 |
+
# MLP block + residual
|
| 221 |
+
x = x + self.mlp(self.norm2(x))
|
| 222 |
+
return x
|
| 223 |
+
|
| 224 |
+
|
| 225 |
+
class ViTEncoder(nn.Module):
|
| 226 |
+
"""
|
| 227 |
+
Steps 2-4:
|
| 228 |
+
- Patchify + projection
|
| 229 |
+
- Learnable CLS token + learnable positional embeddings
|
| 230 |
+
- Stacked Transformer encoder blocks
|
| 231 |
+
"""
|
| 232 |
+
|
| 233 |
+
def __init__(
|
| 234 |
+
self,
|
| 235 |
+
image_size: int = 64,
|
| 236 |
+
patch_size: int = 4,
|
| 237 |
+
in_channels: int = 3,
|
| 238 |
+
embed_dim: int = 256,
|
| 239 |
+
depth: int = 6,
|
| 240 |
+
num_heads: int = 8,
|
| 241 |
+
mlp_ratio: float = 4.0,
|
| 242 |
+
dropout: float = 0.0,
|
| 243 |
+
) -> None:
|
| 244 |
+
super().__init__()
|
| 245 |
+
self.patch_embed = PatchifyEmbedding(
|
| 246 |
+
image_size=image_size,
|
| 247 |
+
patch_size=patch_size,
|
| 248 |
+
in_channels=in_channels,
|
| 249 |
+
embed_dim=embed_dim,
|
| 250 |
+
)
|
| 251 |
+
num_patches = self.patch_embed.num_patches
|
| 252 |
+
|
| 253 |
+
# Step 3: CLS token + positional embedding
|
| 254 |
+
self.cls_token = nn.Parameter(torch.zeros(1, 1, embed_dim))
|
| 255 |
+
self.pos_embed = nn.Parameter(torch.zeros(1, num_patches + 1, embed_dim))
|
| 256 |
+
self.pos_drop = nn.Dropout(dropout)
|
| 257 |
+
|
| 258 |
+
self.blocks = nn.ModuleList(
|
| 259 |
+
[
|
| 260 |
+
TransformerEncoderBlock(
|
| 261 |
+
embed_dim=embed_dim,
|
| 262 |
+
num_heads=num_heads,
|
| 263 |
+
mlp_ratio=mlp_ratio,
|
| 264 |
+
dropout=dropout,
|
| 265 |
+
)
|
| 266 |
+
for _ in range(depth)
|
| 267 |
+
]
|
| 268 |
+
)
|
| 269 |
+
self.norm = nn.LayerNorm(embed_dim)
|
| 270 |
+
|
| 271 |
+
self._init_parameters()
|
| 272 |
+
|
| 273 |
+
def _init_parameters(self) -> None:
|
| 274 |
+
nn.init.trunc_normal_(self.cls_token, std=0.02)
|
| 275 |
+
nn.init.trunc_normal_(self.pos_embed, std=0.02)
|
| 276 |
+
|
| 277 |
+
def forward(self, x: torch.Tensor) -> torch.Tensor:
|
| 278 |
+
"""
|
| 279 |
+
x: (B, C, H, W)
|
| 280 |
+
returns: (B, D) CLS representation after encoder
|
| 281 |
+
"""
|
| 282 |
+
x = self.patch_embed(x) # (B, N, D)
|
| 283 |
+
batch_size = x.size(0)
|
| 284 |
+
|
| 285 |
+
cls_tokens = self.cls_token.expand(batch_size, -1, -1) # (B, 1, D)
|
| 286 |
+
x = torch.cat((cls_tokens, x), dim=1) # (B, N+1, D)
|
| 287 |
+
x = self.pos_drop(x + self.pos_embed) # add positional information
|
| 288 |
+
|
| 289 |
+
for block in self.blocks:
|
| 290 |
+
x = block(x)
|
| 291 |
+
|
| 292 |
+
x = self.norm(x)
|
| 293 |
+
cls_representation = x[:, 0] # (B, D)
|
| 294 |
+
return cls_representation
|
| 295 |
+
|
| 296 |
+
|
| 297 |
+
class ViTClassifier(nn.Module):
|
| 298 |
+
"""
|
| 299 |
+
Step 5:
|
| 300 |
+
- Extract CLS representation from encoder
|
| 301 |
+
- Map to class logits with a Linear layer
|
| 302 |
+
"""
|
| 303 |
+
|
| 304 |
+
def __init__(
|
| 305 |
+
self,
|
| 306 |
+
image_size: int = 64,
|
| 307 |
+
patch_size: int = 4,
|
| 308 |
+
in_channels: int = 3,
|
| 309 |
+
embed_dim: int = 256,
|
| 310 |
+
depth: int = 6,
|
| 311 |
+
num_heads: int = 8,
|
| 312 |
+
mlp_ratio: float = 4.0,
|
| 313 |
+
dropout: float = 0.1,
|
| 314 |
+
num_classes: int = 10,
|
| 315 |
+
) -> None:
|
| 316 |
+
super().__init__()
|
| 317 |
+
self.encoder = ViTEncoder(
|
| 318 |
+
image_size=image_size,
|
| 319 |
+
patch_size=patch_size,
|
| 320 |
+
in_channels=in_channels,
|
| 321 |
+
embed_dim=embed_dim,
|
| 322 |
+
depth=depth,
|
| 323 |
+
num_heads=num_heads,
|
| 324 |
+
mlp_ratio=mlp_ratio,
|
| 325 |
+
dropout=dropout,
|
| 326 |
+
)
|
| 327 |
+
self.head = nn.Linear(embed_dim, num_classes)
|
| 328 |
+
|
| 329 |
+
def forward(self, x: torch.Tensor) -> torch.Tensor:
|
| 330 |
+
cls_features = self.encoder(x) # (B, D)
|
| 331 |
+
logits = self.head(cls_features) # (B, num_classes)
|
| 332 |
+
return logits
|
| 333 |
+
|
| 334 |
+
|
| 335 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 336 |
+
# Training and evaluation helpers
|
| 337 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 338 |
+
def train_one_epoch(
|
| 339 |
+
model: nn.Module,
|
| 340 |
+
dataloader: DataLoader,
|
| 341 |
+
criterion: nn.Module,
|
| 342 |
+
optimizer: torch.optim.Optimizer,
|
| 343 |
+
device: torch.device,
|
| 344 |
+
) -> Tuple[float, float]:
|
| 345 |
+
"""
|
| 346 |
+
Run one optimization epoch over the training set.
|
| 347 |
+
|
| 348 |
+
Args:
|
| 349 |
+
model: Classifier to optimize.
|
| 350 |
+
dataloader: Training mini-batches.
|
| 351 |
+
criterion: Loss function (typically CrossEntropyLoss for CIFAR-10).
|
| 352 |
+
optimizer: Parameter optimizer (AdamW in this project).
|
| 353 |
+
device: CPU or CUDA device.
|
| 354 |
+
|
| 355 |
+
Returns:
|
| 356 |
+
(avg_loss, avg_accuracy) over all training samples in this epoch.
|
| 357 |
+
"""
|
| 358 |
+
model.train()
|
| 359 |
+
running_loss = 0.0
|
| 360 |
+
correct = 0
|
| 361 |
+
total = 0
|
| 362 |
+
|
| 363 |
+
for images, labels in dataloader:
|
| 364 |
+
images = images.to(device)
|
| 365 |
+
labels = labels.to(device)
|
| 366 |
+
|
| 367 |
+
optimizer.zero_grad()
|
| 368 |
+
logits = model(images)
|
| 369 |
+
loss = criterion(logits, labels)
|
| 370 |
+
loss.backward()
|
| 371 |
+
optimizer.step()
|
| 372 |
+
|
| 373 |
+
running_loss += loss.item() * images.size(0)
|
| 374 |
+
preds = logits.argmax(dim=1)
|
| 375 |
+
correct += (preds == labels).sum().item()
|
| 376 |
+
total += labels.size(0)
|
| 377 |
+
|
| 378 |
+
avg_loss = running_loss / total
|
| 379 |
+
avg_acc = correct / total
|
| 380 |
+
return avg_loss, avg_acc
|
| 381 |
+
|
| 382 |
+
|
| 383 |
+
@torch.no_grad()
|
| 384 |
+
def evaluate(
|
| 385 |
+
model: nn.Module,
|
| 386 |
+
dataloader: DataLoader,
|
| 387 |
+
criterion: nn.Module,
|
| 388 |
+
device: torch.device,
|
| 389 |
+
) -> Tuple[float, float]:
|
| 390 |
+
"""
|
| 391 |
+
Evaluate model performance without gradient updates.
|
| 392 |
+
|
| 393 |
+
Args:
|
| 394 |
+
model: Classifier to evaluate.
|
| 395 |
+
dataloader: Validation or test mini-batches.
|
| 396 |
+
criterion: Loss function used for reporting.
|
| 397 |
+
device: CPU or CUDA device.
|
| 398 |
+
|
| 399 |
+
Returns:
|
| 400 |
+
(avg_loss, avg_accuracy) over all samples from `dataloader`.
|
| 401 |
+
"""
|
| 402 |
+
model.eval()
|
| 403 |
+
running_loss = 0.0
|
| 404 |
+
correct = 0
|
| 405 |
+
total = 0
|
| 406 |
+
|
| 407 |
+
for images, labels in dataloader:
|
| 408 |
+
images = images.to(device)
|
| 409 |
+
labels = labels.to(device)
|
| 410 |
+
|
| 411 |
+
logits = model(images)
|
| 412 |
+
loss = criterion(logits, labels)
|
| 413 |
+
|
| 414 |
+
running_loss += loss.item() * images.size(0)
|
| 415 |
+
preds = logits.argmax(dim=1)
|
| 416 |
+
correct += (preds == labels).sum().item()
|
| 417 |
+
total += labels.size(0)
|
| 418 |
+
|
| 419 |
+
avg_loss = running_loss / total
|
| 420 |
+
avg_acc = correct / total
|
| 421 |
+
return avg_loss, avg_acc
|
| 422 |
+
|
| 423 |
+
|
| 424 |
+
def train_model(
|
| 425 |
+
model: nn.Module,
|
| 426 |
+
train_loader: DataLoader,
|
| 427 |
+
val_loader: DataLoader,
|
| 428 |
+
device: torch.device,
|
| 429 |
+
num_epochs: int = 10,
|
| 430 |
+
lr: float = 3e-4,
|
| 431 |
+
weight_decay: float = 1e-4,
|
| 432 |
+
save_dir: str = "./saved_model",
|
| 433 |
+
checkpoint_name: str = "vit_cifar10_best.pt",
|
| 434 |
+
model_config: Dict[str, Any] | None = None,
|
| 435 |
+
early_stopping_patience: int = 5,
|
| 436 |
+
) -> Tuple[Dict[str, List[float]], str]:
|
| 437 |
+
"""
|
| 438 |
+
Step 6:
|
| 439 |
+
- Loss: CrossEntropy
|
| 440 |
+
- Optimizer: AdamW
|
| 441 |
+
- LR scheduler: StepLR decay
|
| 442 |
+
- Validation each epoch
|
| 443 |
+
- Early stopping on validation accuracy
|
| 444 |
+
|
| 445 |
+
Hyperparameters:
|
| 446 |
+
- num_epochs: Max number of epochs before early stopping.
|
| 447 |
+
- lr: Initial learning rate for AdamW updates.
|
| 448 |
+
- weight_decay: L2-style regularization term in AdamW.
|
| 449 |
+
- early_stopping_patience: Number of non-improving epochs allowed.
|
| 450 |
+
This limits overfitting and unnecessary computation.
|
| 451 |
+
"""
|
| 452 |
+
criterion = nn.CrossEntropyLoss()
|
| 453 |
+
optimizer = torch.optim.AdamW(model.parameters(), lr=lr, weight_decay=weight_decay)
|
| 454 |
+
scheduler = torch.optim.lr_scheduler.StepLR(optimizer, step_size=5, gamma=0.5)
|
| 455 |
+
|
| 456 |
+
history: Dict[str, List[float]] = {
|
| 457 |
+
"train_loss": [],
|
| 458 |
+
"train_acc": [],
|
| 459 |
+
"val_loss": [],
|
| 460 |
+
"val_acc": [],
|
| 461 |
+
}
|
| 462 |
+
best_val_acc = 0.0
|
| 463 |
+
epochs_without_improvement = 0
|
| 464 |
+
save_dir_path = Path(save_dir)
|
| 465 |
+
save_dir_path.mkdir(parents=True, exist_ok=True)
|
| 466 |
+
best_checkpoint_path = str(save_dir_path / checkpoint_name)
|
| 467 |
+
|
| 468 |
+
model.to(device)
|
| 469 |
+
|
| 470 |
+
for epoch in range(num_epochs):
|
| 471 |
+
train_loss, train_acc = train_one_epoch(
|
| 472 |
+
model=model,
|
| 473 |
+
dataloader=train_loader,
|
| 474 |
+
criterion=criterion,
|
| 475 |
+
optimizer=optimizer,
|
| 476 |
+
device=device,
|
| 477 |
+
)
|
| 478 |
+
val_loss, val_acc = evaluate(
|
| 479 |
+
model=model,
|
| 480 |
+
dataloader=val_loader,
|
| 481 |
+
criterion=criterion,
|
| 482 |
+
device=device,
|
| 483 |
+
)
|
| 484 |
+
scheduler.step()
|
| 485 |
+
|
| 486 |
+
history["train_loss"].append(train_loss)
|
| 487 |
+
history["train_acc"].append(train_acc)
|
| 488 |
+
history["val_loss"].append(val_loss)
|
| 489 |
+
history["val_acc"].append(val_acc)
|
| 490 |
+
|
| 491 |
+
current_lr = optimizer.param_groups[0]["lr"]
|
| 492 |
+
print(
|
| 493 |
+
f"Epoch [{epoch + 1}/{num_epochs}] | "
|
| 494 |
+
f"Train Loss: {train_loss:.4f}, Train Acc: {train_acc * 100:.2f}% | "
|
| 495 |
+
f"Val Loss: {val_loss:.4f}, Val Acc: {val_acc * 100:.2f}% | "
|
| 496 |
+
f"LR: {current_lr:.6f}"
|
| 497 |
+
)
|
| 498 |
+
|
| 499 |
+
if val_acc > best_val_acc:
|
| 500 |
+
best_val_acc = val_acc
|
| 501 |
+
epochs_without_improvement = 0
|
| 502 |
+
checkpoint = {
|
| 503 |
+
"epoch": epoch + 1,
|
| 504 |
+
"best_val_acc": best_val_acc,
|
| 505 |
+
"model_state_dict": model.state_dict(),
|
| 506 |
+
"model_config": model_config or {},
|
| 507 |
+
}
|
| 508 |
+
torch.save(checkpoint, best_checkpoint_path)
|
| 509 |
+
print(f"Saved best checkpoint to: {best_checkpoint_path}")
|
| 510 |
+
else:
|
| 511 |
+
epochs_without_improvement += 1
|
| 512 |
+
if epochs_without_improvement >= early_stopping_patience:
|
| 513 |
+
print(
|
| 514 |
+
"Early stopping triggered "
|
| 515 |
+
f"(no validation improvement for {early_stopping_patience} epochs)."
|
| 516 |
+
)
|
| 517 |
+
break
|
| 518 |
+
|
| 519 |
+
final_checkpoint_path = str(save_dir_path / "vit_cifar10_last.pt")
|
| 520 |
+
torch.save(
|
| 521 |
+
{
|
| 522 |
+
"epoch": num_epochs,
|
| 523 |
+
"best_val_acc": best_val_acc,
|
| 524 |
+
"model_state_dict": model.state_dict(),
|
| 525 |
+
"model_config": model_config or {},
|
| 526 |
+
},
|
| 527 |
+
final_checkpoint_path,
|
| 528 |
+
)
|
| 529 |
+
print(f"Saved last checkpoint to: {final_checkpoint_path}")
|
| 530 |
+
|
| 531 |
+
return history, best_checkpoint_path
|
| 532 |
+
|
| 533 |
+
|
| 534 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 535 |
+
# Error analysis and visualization
|
| 536 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 537 |
+
@torch.no_grad()
|
| 538 |
+
def collect_misclassified(
|
| 539 |
+
model: nn.Module,
|
| 540 |
+
dataloader: DataLoader,
|
| 541 |
+
device: torch.device,
|
| 542 |
+
max_samples: int = 16,
|
| 543 |
+
) -> List[Tuple[torch.Tensor, int, int]]:
|
| 544 |
+
"""
|
| 545 |
+
Step 7 (Error analysis helper):
|
| 546 |
+
Collect misclassified samples: (image_tensor, true_label, pred_label).
|
| 547 |
+
"""
|
| 548 |
+
model.eval()
|
| 549 |
+
misclassified: List[Tuple[torch.Tensor, int, int]] = []
|
| 550 |
+
|
| 551 |
+
for images, labels in dataloader:
|
| 552 |
+
images = images.to(device)
|
| 553 |
+
labels = labels.to(device)
|
| 554 |
+
logits = model(images)
|
| 555 |
+
preds = logits.argmax(dim=1)
|
| 556 |
+
wrong_mask = preds != labels
|
| 557 |
+
|
| 558 |
+
wrong_images = images[wrong_mask]
|
| 559 |
+
wrong_labels = labels[wrong_mask]
|
| 560 |
+
wrong_preds = preds[wrong_mask]
|
| 561 |
+
|
| 562 |
+
for i in range(wrong_images.size(0)):
|
| 563 |
+
misclassified.append(
|
| 564 |
+
(
|
| 565 |
+
wrong_images[i].detach().cpu(),
|
| 566 |
+
int(wrong_labels[i].item()),
|
| 567 |
+
int(wrong_preds[i].item()),
|
| 568 |
+
)
|
| 569 |
+
)
|
| 570 |
+
if len(misclassified) >= max_samples:
|
| 571 |
+
return misclassified
|
| 572 |
+
|
| 573 |
+
return misclassified
|
| 574 |
+
|
| 575 |
+
|
| 576 |
+
def denormalize_image(img: torch.Tensor) -> torch.Tensor:
|
| 577 |
+
"""
|
| 578 |
+
Convert image from normalized [-1, 1] back to [0, 1] for visualization.
|
| 579 |
+
"""
|
| 580 |
+
return (img * 0.5 + 0.5).clamp(0.0, 1.0)
|
| 581 |
+
|
| 582 |
+
|
| 583 |
+
def visualize_misclassified(
|
| 584 |
+
samples: List[Tuple[torch.Tensor, int, int]],
|
| 585 |
+
class_names: Tuple[str, ...],
|
| 586 |
+
save_path: str = "misclassified_examples.png",
|
| 587 |
+
) -> None:
|
| 588 |
+
"""
|
| 589 |
+
Visualize wrongly predicted images and save to disk.
|
| 590 |
+
"""
|
| 591 |
+
if len(samples) == 0:
|
| 592 |
+
print("No misclassified samples to visualize.")
|
| 593 |
+
return
|
| 594 |
+
|
| 595 |
+
try:
|
| 596 |
+
import matplotlib.pyplot as plt
|
| 597 |
+
except ImportError:
|
| 598 |
+
print("matplotlib is not installed. Skipping visualization.")
|
| 599 |
+
return
|
| 600 |
+
|
| 601 |
+
n = len(samples)
|
| 602 |
+
cols = min(4, n)
|
| 603 |
+
rows = (n + cols - 1) // cols
|
| 604 |
+
fig, axes = plt.subplots(rows, cols, figsize=(4 * cols, 4 * rows))
|
| 605 |
+
|
| 606 |
+
if rows == 1 and cols == 1:
|
| 607 |
+
axes = [axes]
|
| 608 |
+
elif rows == 1 or cols == 1:
|
| 609 |
+
axes = list(axes)
|
| 610 |
+
else:
|
| 611 |
+
axes = axes.flatten()
|
| 612 |
+
|
| 613 |
+
for idx, ax in enumerate(axes):
|
| 614 |
+
if idx < n:
|
| 615 |
+
img, true_lbl, pred_lbl = samples[idx]
|
| 616 |
+
img = denormalize_image(img).permute(1, 2, 0).numpy()
|
| 617 |
+
ax.imshow(img)
|
| 618 |
+
ax.set_title(f"True: {class_names[true_lbl]}\nPred: {class_names[pred_lbl]}")
|
| 619 |
+
ax.axis("off")
|
| 620 |
+
else:
|
| 621 |
+
ax.axis("off")
|
| 622 |
+
|
| 623 |
+
fig.tight_layout()
|
| 624 |
+
fig.savefig(save_path, dpi=150)
|
| 625 |
+
print(f"Saved misclassified visualization to: {save_path}")
|
| 626 |
+
|
| 627 |
+
|
| 628 |
+
if __name__ == "__main__":
|
| 629 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 630 |
+
# Data preprocessing and loader setup
|
| 631 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 632 |
+
train_loader, val_loader, test_loader = get_cifar10_dataloaders(
|
| 633 |
+
data_root="./data",
|
| 634 |
+
image_size=64,
|
| 635 |
+
batch_size=128,
|
| 636 |
+
val_ratio=0.1,
|
| 637 |
+
)
|
| 638 |
+
|
| 639 |
+
train_images, train_labels = next(iter(train_loader))
|
| 640 |
+
val_images, val_labels = next(iter(val_loader))
|
| 641 |
+
test_images, test_labels = next(iter(test_loader))
|
| 642 |
+
|
| 643 |
+
print(f"Train batch images shape: {train_images.shape}")
|
| 644 |
+
print(f"Train batch labels shape: {train_labels.shape}")
|
| 645 |
+
print(f"Val batch images shape: {val_images.shape}")
|
| 646 |
+
print(f"Val batch labels shape: {val_labels.shape}")
|
| 647 |
+
print(f"Test batch images shape: {test_images.shape}")
|
| 648 |
+
print(f"Test batch labels shape: {test_labels.shape}")
|
| 649 |
+
print(f"Train dataset size: {len(train_loader.dataset)}")
|
| 650 |
+
print(f"Val dataset size: {len(val_loader.dataset)}")
|
| 651 |
+
print(f"Test dataset size: {len(test_loader.dataset)}")
|
| 652 |
+
print(
|
| 653 |
+
"Image value range (approx after normalization): "
|
| 654 |
+
f"[{train_images.min().item():.3f}, {train_images.max().item():.3f}]"
|
| 655 |
+
)
|
| 656 |
+
|
| 657 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 658 |
+
# Model architecture configuration (key hyperparameters)
|
| 659 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 660 |
+
# image_size=64: upscales CIFAR-10 from 32x32 for a richer patch grid.
|
| 661 |
+
# patch_size=4: produces (64/4)^2 = 256 image patches per sample.
|
| 662 |
+
# embed_dim=256: token representation size in attention/MLP blocks.
|
| 663 |
+
# depth=6, num_heads=8: transformer depth and multi-head attention width.
|
| 664 |
+
# mlp_ratio=4.0: hidden size in feed-forward layer = 4 * embed_dim.
|
| 665 |
+
# dropout=0.1: regularization inside encoder blocks.
|
| 666 |
+
model_kwargs: Dict[str, Any] = {
|
| 667 |
+
"image_size": 64,
|
| 668 |
+
"patch_size": 4,
|
| 669 |
+
"in_channels": 3,
|
| 670 |
+
"embed_dim": 256,
|
| 671 |
+
"depth": 6,
|
| 672 |
+
"num_heads": 8,
|
| 673 |
+
"mlp_ratio": 4.0,
|
| 674 |
+
"dropout": 0.1,
|
| 675 |
+
"num_classes": 10,
|
| 676 |
+
}
|
| 677 |
+
model = ViTClassifier(
|
| 678 |
+
image_size=64,
|
| 679 |
+
patch_size=4,
|
| 680 |
+
in_channels=3,
|
| 681 |
+
embed_dim=256,
|
| 682 |
+
depth=6,
|
| 683 |
+
num_heads=8,
|
| 684 |
+
mlp_ratio=4.0,
|
| 685 |
+
dropout=0.1,
|
| 686 |
+
num_classes=10,
|
| 687 |
+
)
|
| 688 |
+
|
| 689 |
+
patch_embeddings = model.encoder.patch_embed(train_images)
|
| 690 |
+
cls_features = model.encoder(train_images)
|
| 691 |
+
logits = model(train_images)
|
| 692 |
+
|
| 693 |
+
print(f"Patch embeddings shape (B, N, D): {patch_embeddings.shape}")
|
| 694 |
+
print(f"CLS feature shape (B, D): {cls_features.shape}")
|
| 695 |
+
print(f"Logits shape (B, num_classes): {logits.shape}")
|
| 696 |
+
|
| 697 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 698 |
+
# Training setup hyperparameters
|
| 699 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 700 |
+
# lr=3e-4: base AdamW learning rate.
|
| 701 |
+
# weight_decay=1e-4: regularization to improve generalization.
|
| 702 |
+
# num_epochs=10 and early_stopping_patience=5: train up to 10 epochs,
|
| 703 |
+
# but stop if validation accuracy does not improve for 5 epochs.
|
| 704 |
+
device = torch.device("cuda" if torch.cuda.is_available() else "cpu")
|
| 705 |
+
print(f"Using device: {device}")
|
| 706 |
+
|
| 707 |
+
history, best_ckpt_path = train_model(
|
| 708 |
+
model=model,
|
| 709 |
+
train_loader=train_loader,
|
| 710 |
+
val_loader=val_loader,
|
| 711 |
+
device=device,
|
| 712 |
+
num_epochs=10,
|
| 713 |
+
lr=3e-4,
|
| 714 |
+
weight_decay=1e-4,
|
| 715 |
+
save_dir="./saved_model",
|
| 716 |
+
checkpoint_name="vit_cifar10_best.pt",
|
| 717 |
+
model_config=model_kwargs,
|
| 718 |
+
early_stopping_patience=5,
|
| 719 |
+
)
|
| 720 |
+
|
| 721 |
+
final_val_acc = history["val_acc"][-1] * 100 if history["val_acc"] else 0.0
|
| 722 |
+
print(f"Final validation accuracy: {final_val_acc:.2f}%")
|
| 723 |
+
print(f"Best model checkpoint: {best_ckpt_path}")
|
| 724 |
+
|
| 725 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 726 |
+
# Final test evaluation and qualitative error analysis
|
| 727 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 728 |
+
# Evaluate on the held-out test set (not used for training/checkpointing).
|
| 729 |
+
best_checkpoint = torch.load(best_ckpt_path, map_location=device)
|
| 730 |
+
model.load_state_dict(best_checkpoint["model_state_dict"])
|
| 731 |
+
test_criterion = nn.CrossEntropyLoss()
|
| 732 |
+
test_loss, test_acc = evaluate(
|
| 733 |
+
model=model,
|
| 734 |
+
dataloader=test_loader,
|
| 735 |
+
criterion=test_criterion,
|
| 736 |
+
device=device,
|
| 737 |
+
)
|
| 738 |
+
print(f"Final test loss (best checkpoint): {test_loss:.4f}")
|
| 739 |
+
print(f"Final test accuracy (best checkpoint): {test_acc * 100:.2f}%")
|
| 740 |
+
|
| 741 |
+
wrong_samples = collect_misclassified(
|
| 742 |
+
model=model,
|
| 743 |
+
dataloader=test_loader,
|
| 744 |
+
device=device,
|
| 745 |
+
max_samples=12,
|
| 746 |
+
)
|
| 747 |
+
visualize_misclassified(
|
| 748 |
+
samples=wrong_samples,
|
| 749 |
+
class_names=CLASS_NAMES,
|
| 750 |
+
save_path="./results/misclassified_examples.png",
|
| 751 |
+
)
|
assignment_llm_1/assignment_image/code/c1_test.py
ADDED
|
@@ -0,0 +1,542 @@
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
"""
|
| 2 |
+
Separate testing/inference script for CIFAR-10 ViT model.
|
| 3 |
+
|
| 4 |
+
Loads a saved checkpoint, runs inference on the test set,
|
| 5 |
+
prints final performance, and saves misclassification analysis.
|
| 6 |
+
Also supports an optional transfer-learning experiment with
|
| 7 |
+
a pre-trained torchvision ViT model.
|
| 8 |
+
|
| 9 |
+
Experiment with pre-trained models: Consider fine-tuning pre-trained
|
| 10 |
+
Transformer models (e.g., ViT) on your task and evaluate their
|
| 11 |
+
performance to understand the impact of transfer learning.
|
| 12 |
+
"""
|
| 13 |
+
|
| 14 |
+
import argparse
|
| 15 |
+
from pathlib import Path
|
| 16 |
+
from typing import List
|
| 17 |
+
from typing import Any, Dict, Tuple
|
| 18 |
+
|
| 19 |
+
import torch
|
| 20 |
+
import torch.nn as nn
|
| 21 |
+
from torch.utils.data import DataLoader, random_split
|
| 22 |
+
from torchvision import datasets, models, transforms
|
| 23 |
+
from torchvision.models import ViT_B_16_Weights
|
| 24 |
+
|
| 25 |
+
from c1 import (
|
| 26 |
+
CLASS_NAMES,
|
| 27 |
+
ViTClassifier,
|
| 28 |
+
collect_misclassified,
|
| 29 |
+
visualize_misclassified,
|
| 30 |
+
)
|
| 31 |
+
|
| 32 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 33 |
+
# Evaluation and analysis helpers
|
| 34 |
+
# ---------------------------------------------------------------------------
|
| 35 |
+
|
| 36 |
+
@torch.no_grad()
|
| 37 |
+
def evaluate_model(
|
| 38 |
+
model: nn.Module,
|
| 39 |
+
dataloader: torch.utils.data.DataLoader,
|
| 40 |
+
device: torch.device,
|
| 41 |
+
) -> Tuple[float, float]:
|
| 42 |
+
"""
|
| 43 |
+
Compute average loss and accuracy for a model on a dataset split.
|
| 44 |
+
|
| 45 |
+
Args:
|
| 46 |
+
model: Trained model to evaluate.
|
| 47 |
+
dataloader: Batches from validation or test split.
|
| 48 |
+
device: CPU or CUDA device for inference.
|
| 49 |
+
|
| 50 |
+
Returns:
|
| 51 |
+
(avg_loss, accuracy) aggregated over all samples in `dataloader`.
|
| 52 |
+
"""
|
| 53 |
+
model.eval()
|
| 54 |
+
criterion = nn.CrossEntropyLoss()
|
| 55 |
+
total_loss = 0.0
|
| 56 |
+
correct = 0
|
| 57 |
+
total = 0
|
| 58 |
+
|
| 59 |
+
for images, labels in dataloader:
|
| 60 |
+
images = images.to(device)
|
| 61 |
+
labels = labels.to(device)
|
| 62 |
+
|
| 63 |
+
logits = model(images)
|
| 64 |
+
loss = criterion(logits, labels)
|
| 65 |
+
preds = logits.argmax(dim=1)
|
| 66 |
+
|
| 67 |
+
total_loss += loss.item() * images.size(0)
|
| 68 |
+
correct += (preds == labels).sum().item()
|
| 69 |
+
total += labels.size(0)
|
| 70 |
+
|
| 71 |
+
avg_loss = total_loss / total
|
| 72 |
+
acc = correct / total
|
| 73 |
+
return avg_loss, acc
|
| 74 |
+
|
| 75 |
+
|
| 76 |
+
def load_model_from_checkpoint(
|
| 77 |
+
checkpoint_path: str,
|
| 78 |
+
device: torch.device,
|
| 79 |
+
) -> ViTClassifier:
|
| 80 |
+
"""
|
| 81 |
+
Restore `ViTClassifier` from a saved checkpoint.
|
| 82 |
+
|
| 83 |
+
The checkpoint is expected to include:
|
| 84 |
+
- `model_state_dict` containing learned parameters
|
| 85 |
+
- optional `model_config` with architecture hyperparameters
|
| 86 |
+
|
| 87 |
+
If `model_config` is missing, the function falls back to the training
|
| 88 |
+
defaults used in `c1.py`.
|
| 89 |
+
"""
|
| 90 |
+
checkpoint = torch.load(checkpoint_path, map_location=device)
|
| 91 |
+
model_config: Dict[str, Any] = checkpoint.get("model_config", {})
|
| 92 |
+
|
| 93 |
+
if not model_config:
|
| 94 |
+
model_config = {
|
| 95 |
+
"image_size": 64,
|
| 96 |
+
"patch_size": 4,
|
| 97 |
+
"in_channels": 3,
|
| 98 |
+
"embed_dim": 256,
|
| 99 |
+
"depth": 6,
|
| 100 |
+
"num_heads": 8,
|
| 101 |
+
"mlp_ratio": 4.0,
|
| 102 |
+
"dropout": 0.1,
|
| 103 |
+
"num_classes": 10,
|
| 104 |
+
}
|
| 105 |
+
|
| 106 |
+
model = ViTClassifier(**model_config)
|
| 107 |
+
state_dict = checkpoint.get("model_state_dict", checkpoint)
|
| 108 |
+
model.load_state_dict(state_dict)
|
| 109 |
+
model.to(device)
|
| 110 |
+
model.eval()
|
| 111 |
+
return model
|
| 112 |
+
|
| 113 |
+
|
| 114 |
+
@torch.no_grad()
|
| 115 |
+
def collect_predictions(
|
| 116 |
+
model: nn.Module,
|
| 117 |
+
dataloader: DataLoader,
|
| 118 |
+
device: torch.device,
|
| 119 |
+
) -> Tuple[torch.Tensor, torch.Tensor]:
|
| 120 |
+
"""
|
| 121 |
+
Collect predicted labels and ground-truth labels for full-dataset analysis.
|
| 122 |
+
"""
|
| 123 |
+
model.eval()
|
| 124 |
+
all_preds: List[torch.Tensor] = []
|
| 125 |
+
all_labels: List[torch.Tensor] = []
|
| 126 |
+
for images, labels in dataloader:
|
| 127 |
+
images = images.to(device)
|
| 128 |
+
labels = labels.to(device)
|
| 129 |
+
logits = model(images)
|
| 130 |
+
preds = logits.argmax(dim=1)
|
| 131 |
+
all_preds.append(preds.cpu())
|
| 132 |
+
all_labels.append(labels.cpu())
|
| 133 |
+
return torch.cat(all_preds), torch.cat(all_labels)
|
| 134 |
+
|
| 135 |
+
|
| 136 |
+
def build_confusion_matrix(
|
| 137 |
+
preds: torch.Tensor,
|
| 138 |
+
labels: torch.Tensor,
|
| 139 |
+
num_classes: int,
|
| 140 |
+
) -> torch.Tensor:
|
| 141 |
+
"""
|
| 142 |
+
Build confusion matrix where rows=true class and cols=predicted class.
|
| 143 |
+
"""
|
| 144 |
+
confusion = torch.zeros((num_classes, num_classes), dtype=torch.int64)
|
| 145 |
+
for true_label, pred_label in zip(labels, preds):
|
| 146 |
+
confusion[int(true_label), int(pred_label)] += 1
|
| 147 |
+
return confusion
|
| 148 |
+
|
| 149 |
+
|
| 150 |
+
def format_error_analysis(
|
| 151 |
+
preds: torch.Tensor,
|
| 152 |
+
labels: torch.Tensor,
|
| 153 |
+
class_names: Tuple[str, ...],
|
| 154 |
+
) -> str:
|
| 155 |
+
"""
|
| 156 |
+
Create a readable report with per-class accuracy and top confusion pairs.
|
| 157 |
+
"""
|
| 158 |
+
num_classes = len(class_names)
|
| 159 |
+
confusion = build_confusion_matrix(preds=preds, labels=labels, num_classes=num_classes)
|
| 160 |
+
class_totals = confusion.sum(dim=1)
|
| 161 |
+
class_correct = confusion.diag()
|
| 162 |
+
|
| 163 |
+
lines: List[str] = []
|
| 164 |
+
lines.append("Per-class accuracy (lower = harder classes):")
|
| 165 |
+
per_class_scores = []
|
| 166 |
+
for idx, class_name in enumerate(class_names):
|
| 167 |
+
total = int(class_totals[idx].item())
|
| 168 |
+
correct = int(class_correct[idx].item())
|
| 169 |
+
acc = (correct / total) if total > 0 else 0.0
|
| 170 |
+
per_class_scores.append((acc, class_name, total))
|
| 171 |
+
per_class_scores.sort(key=lambda x: x[0])
|
| 172 |
+
for acc, class_name, total in per_class_scores:
|
| 173 |
+
lines.append(f" {class_name:<10} | acc={acc * 100:6.2f}% | n={total}")
|
| 174 |
+
|
| 175 |
+
lines.append("")
|
| 176 |
+
lines.append("Top confusion pairs (true -> predicted):")
|
| 177 |
+
confusions = []
|
| 178 |
+
for true_idx in range(num_classes):
|
| 179 |
+
for pred_idx in range(num_classes):
|
| 180 |
+
if true_idx == pred_idx:
|
| 181 |
+
continue
|
| 182 |
+
count = int(confusion[true_idx, pred_idx].item())
|
| 183 |
+
if count > 0:
|
| 184 |
+
confusions.append((count, true_idx, pred_idx))
|
| 185 |
+
confusions.sort(reverse=True, key=lambda x: x[0])
|
| 186 |
+
top_k = min(8, len(confusions))
|
| 187 |
+
if top_k == 0:
|
| 188 |
+
lines.append(" No confusions found (perfect classification).")
|
| 189 |
+
else:
|
| 190 |
+
for count, true_idx, pred_idx in confusions[:top_k]:
|
| 191 |
+
lines.append(
|
| 192 |
+
f" {class_names[true_idx]} -> {class_names[pred_idx]}: {count} samples"
|
| 193 |
+
)
|
| 194 |
+
return "\n".join(lines)
|
| 195 |
+
|
| 196 |
+
|
| 197 |
+
def print_error_analysis(
|
| 198 |
+
preds: torch.Tensor,
|
| 199 |
+
labels: torch.Tensor,
|
| 200 |
+
class_names: Tuple[str, ...],
|
| 201 |
+
) -> str:
|
| 202 |
+
"""
|
| 203 |
+
Print and return error-analysis summary.
|
| 204 |
+
"""
|
| 205 |
+
report = format_error_analysis(preds=preds, labels=labels, class_names=class_names)
|
| 206 |
+
print(f"\n{report}")
|
| 207 |
+
return report
|
| 208 |
+
|
| 209 |
+
|
| 210 |
+
def get_imagenet_style_cifar10_dataloaders(
|
| 211 |
+
data_root: str = "./data",
|
| 212 |
+
batch_size: int = 128,
|
| 213 |
+
num_workers: int = 2,
|
| 214 |
+
pin_memory: bool = True,
|
| 215 |
+
val_ratio: float = 0.1,
|
| 216 |
+
seed: int = 42,
|
| 217 |
+
) -> Tuple[DataLoader, DataLoader, DataLoader]:
|
| 218 |
+
"""
|
| 219 |
+
Build CIFAR-10 DataLoaders with ImageNet preprocessing for ViT-B/16.
|
| 220 |
+
|
| 221 |
+
Why this preprocessing:
|
| 222 |
+
- Resize to 224x224 because torchvision ViT-B/16 expects ImageNet-sized input.
|
| 223 |
+
- Use ImageNet mean/std so input statistics align with pre-training.
|
| 224 |
+
"""
|
| 225 |
+
if not 0.0 < val_ratio < 1.0:
|
| 226 |
+
raise ValueError("val_ratio must be between 0 and 1.")
|
| 227 |
+
|
| 228 |
+
transform = transforms.Compose(
|
| 229 |
+
[
|
| 230 |
+
transforms.Resize((224, 224)),
|
| 231 |
+
transforms.ToTensor(),
|
| 232 |
+
transforms.Normalize(
|
| 233 |
+
mean=(0.485, 0.456, 0.406),
|
| 234 |
+
std=(0.229, 0.224, 0.225),
|
| 235 |
+
),
|
| 236 |
+
]
|
| 237 |
+
)
|
| 238 |
+
|
| 239 |
+
data_root_path = Path(data_root)
|
| 240 |
+
data_root_path.mkdir(parents=True, exist_ok=True)
|
| 241 |
+
full_train_dataset = datasets.CIFAR10(
|
| 242 |
+
root=str(data_root_path),
|
| 243 |
+
train=True,
|
| 244 |
+
download=True,
|
| 245 |
+
transform=transform,
|
| 246 |
+
)
|
| 247 |
+
test_dataset = datasets.CIFAR10(
|
| 248 |
+
root=str(data_root_path),
|
| 249 |
+
train=False,
|
| 250 |
+
download=True,
|
| 251 |
+
transform=transform,
|
| 252 |
+
)
|
| 253 |
+
|
| 254 |
+
use_pin_memory = pin_memory and torch.cuda.is_available()
|
| 255 |
+
val_size = int(len(full_train_dataset) * val_ratio)
|
| 256 |
+
train_size = len(full_train_dataset) - val_size
|
| 257 |
+
generator = torch.Generator().manual_seed(seed)
|
| 258 |
+
train_dataset, val_dataset = random_split(
|
| 259 |
+
full_train_dataset, [train_size, val_size], generator=generator
|
| 260 |
+
)
|
| 261 |
+
|
| 262 |
+
train_loader = DataLoader(
|
| 263 |
+
train_dataset,
|
| 264 |
+
batch_size=batch_size,
|
| 265 |
+
shuffle=True,
|
| 266 |
+
num_workers=num_workers,
|
| 267 |
+
pin_memory=use_pin_memory,
|
| 268 |
+
)
|
| 269 |
+
val_loader = DataLoader(
|
| 270 |
+
val_dataset,
|
| 271 |
+
batch_size=batch_size,
|
| 272 |
+
shuffle=False,
|
| 273 |
+
num_workers=num_workers,
|
| 274 |
+
pin_memory=use_pin_memory,
|
| 275 |
+
)
|
| 276 |
+
test_loader = DataLoader(
|
| 277 |
+
test_dataset,
|
| 278 |
+
batch_size=batch_size,
|
| 279 |
+
shuffle=False,
|
| 280 |
+
num_workers=num_workers,
|
| 281 |
+
pin_memory=use_pin_memory,
|
| 282 |
+
)
|
| 283 |
+
return train_loader, val_loader, test_loader
|
| 284 |
+
|
| 285 |
+
|
| 286 |
+
def build_pretrained_vit_classifier(num_classes: int = 10) -> nn.Module:
|
| 287 |
+
"""
|
| 288 |
+
Load torchvision ViT-B/16 with ImageNet weights and replace classifier head.
|
| 289 |
+
"""
|
| 290 |
+
weights = ViT_B_16_Weights.IMAGENET1K_V1
|
| 291 |
+
model = models.vit_b_16(weights=weights)
|
| 292 |
+
in_features = model.heads.head.in_features
|
| 293 |
+
model.heads.head = nn.Linear(in_features, num_classes)
|
| 294 |
+
return model
|
| 295 |
+
|
| 296 |
+
|
| 297 |
+
def fine_tune_pretrained(
|
| 298 |
+
model: nn.Module,
|
| 299 |
+
train_loader: DataLoader,
|
| 300 |
+
val_loader: DataLoader,
|
| 301 |
+
device: torch.device,
|
| 302 |
+
epochs: int = 2,
|
| 303 |
+
lr: float = 1e-4,
|
| 304 |
+
weight_decay: float = 1e-4,
|
| 305 |
+
) -> None:
|
| 306 |
+
"""
|
| 307 |
+
Fine-tune a pre-trained ViT on CIFAR-10 and print epoch-level metrics.
|
| 308 |
+
|
| 309 |
+
Hyperparameters:
|
| 310 |
+
- epochs: Number of fine-tuning passes over training data.
|
| 311 |
+
- lr: AdamW learning rate for adaptation from ImageNet to CIFAR-10.
|
| 312 |
+
- weight_decay: Regularization to reduce overfitting.
|
| 313 |
+
"""
|
| 314 |
+
criterion = nn.CrossEntropyLoss()
|
| 315 |
+
optimizer = torch.optim.AdamW(model.parameters(), lr=lr, weight_decay=weight_decay)
|
| 316 |
+
model.to(device)
|
| 317 |
+
|
| 318 |
+
for epoch in range(epochs):
|
| 319 |
+
model.train()
|
| 320 |
+
running_loss = 0.0
|
| 321 |
+
correct = 0
|
| 322 |
+
total = 0
|
| 323 |
+
|
| 324 |
+
for images, labels in train_loader:
|
| 325 |
+
images = images.to(device)
|
| 326 |
+
labels = labels.to(device)
|
| 327 |
+
optimizer.zero_grad()
|
| 328 |
+
logits = model(images)
|
| 329 |
+
loss = criterion(logits, labels)
|
| 330 |
+
loss.backward()
|
| 331 |
+
optimizer.step()
|
| 332 |
+
|
| 333 |
+
running_loss += loss.item() * images.size(0)
|
| 334 |
+
preds = logits.argmax(dim=1)
|
| 335 |
+
correct += (preds == labels).sum().item()
|
| 336 |
+
total += labels.size(0)
|
| 337 |
+
|
| 338 |
+
train_loss = running_loss / total
|
| 339 |
+
train_acc = correct / total
|
| 340 |
+
val_loss, val_acc = evaluate_model(model=model, dataloader=val_loader, device=device)
|
| 341 |
+
print(
|
| 342 |
+
f"[Pretrained ViT] Epoch {epoch + 1}/{epochs} | "
|
| 343 |
+
f"Train Loss: {train_loss:.4f}, Train Acc: {train_acc * 100:.2f}% | "
|
| 344 |
+
f"Val Loss: {val_loss:.4f}, Val Acc: {val_acc * 100:.2f}%"
|
| 345 |
+
)
|
| 346 |
+
|
| 347 |
+
|
| 348 |
+
def build_comparison_report(
|
| 349 |
+
baseline_loss: float,
|
| 350 |
+
baseline_acc: float,
|
| 351 |
+
pretrained_loss: float,
|
| 352 |
+
pretrained_acc: float,
|
| 353 |
+
) -> str:
|
| 354 |
+
"""
|
| 355 |
+
Build a compact side-by-side comparison report for baseline vs pre-trained ViT.
|
| 356 |
+
"""
|
| 357 |
+
acc_delta = (pretrained_acc - baseline_acc) * 100.0
|
| 358 |
+
loss_delta = pretrained_loss - baseline_loss
|
| 359 |
+
|
| 360 |
+
lines = [
|
| 361 |
+
"Model comparison (baseline vs transfer learning)",
|
| 362 |
+
"-" * 56,
|
| 363 |
+
f"{'Model':<28}{'Test Loss':>12}{'Test Acc':>14}",
|
| 364 |
+
f"{'Baseline ViT (custom checkpoint)':<28}{baseline_loss:>12.4f}{baseline_acc * 100:>13.2f}%",
|
| 365 |
+
f"{'Pre-trained ViT-B/16':<28}{pretrained_loss:>12.4f}{pretrained_acc * 100:>13.2f}%",
|
| 366 |
+
"-" * 56,
|
| 367 |
+
f"Accuracy gain (pretrained - baseline): {acc_delta:+.2f} percentage points",
|
| 368 |
+
f"Loss delta (pretrained - baseline): {loss_delta:+.4f}",
|
| 369 |
+
"",
|
| 370 |
+
]
|
| 371 |
+
return "\n".join(lines)
|
| 372 |
+
|
| 373 |
+
|
| 374 |
+
if __name__ == "__main__":
|
| 375 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 376 |
+
# CLI arguments and runtime setup
|
| 377 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 378 |
+
parser = argparse.ArgumentParser(description="Evaluate baseline ViT and run analysis.")
|
| 379 |
+
parser.add_argument(
|
| 380 |
+
"--checkpoint-path",
|
| 381 |
+
type=str,
|
| 382 |
+
default="./saved_model/vit_cifar10_best.pt",
|
| 383 |
+
help="Path to custom ViT checkpoint.",
|
| 384 |
+
)
|
| 385 |
+
parser.add_argument(
|
| 386 |
+
"--batch-size",
|
| 387 |
+
type=int,
|
| 388 |
+
default=128,
|
| 389 |
+
help="Evaluation batch size.",
|
| 390 |
+
)
|
| 391 |
+
parser.add_argument(
|
| 392 |
+
"--run-pretrained-experiment",
|
| 393 |
+
action="store_true",
|
| 394 |
+
help="If set, fine-tune a pre-trained ViT-B/16 on CIFAR-10 and compare.",
|
| 395 |
+
)
|
| 396 |
+
parser.add_argument(
|
| 397 |
+
"--results-dir",
|
| 398 |
+
type=str,
|
| 399 |
+
default="./results",
|
| 400 |
+
help="Directory to save plots and analysis reports.",
|
| 401 |
+
)
|
| 402 |
+
args = parser.parse_args()
|
| 403 |
+
|
| 404 |
+
checkpoint_path = args.checkpoint_path
|
| 405 |
+
results_dir = Path(args.results_dir)
|
| 406 |
+
results_dir.mkdir(parents=True, exist_ok=True)
|
| 407 |
+
device = torch.device("cuda" if torch.cuda.is_available() else "cpu")
|
| 408 |
+
print(f"Using device: {device}")
|
| 409 |
+
print(f"Loading checkpoint: {checkpoint_path}")
|
| 410 |
+
print(f"Saving results to: {results_dir}")
|
| 411 |
+
|
| 412 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 413 |
+
# Baseline evaluation using custom ViT checkpoint
|
| 414 |
+
# -----------------------------------------------------------------------
|
| 415 |
+
# Keep preprocessing identical to training.
|
| 416 |
+
from c1 import get_cifar10_dataloaders
|
| 417 |
+
|
| 418 |
+
_, _, test_loader = get_cifar10_dataloaders(
|
| 419 |
+
data_root="./data",
|
| 420 |
+
image_size=64,
|
| 421 |
+
batch_size=args.batch_size,
|
| 422 |
+
val_ratio=0.1,
|
| 423 |
+
)
|
| 424 |
+
|
| 425 |
+
model = load_model_from_checkpoint(checkpoint_path=checkpoint_path, device=device)
|
| 426 |
+
test_loss, test_acc = evaluate_model(model=model, dataloader=test_loader, device=device)
|
| 427 |
+
|
| 428 |
+
print(f"Test Loss: {test_loss:.4f}")
|
| 429 |
+
print(f"Test Accuracy: {test_acc * 100:.2f}%")
|
| 430 |
+
|
| 431 |
+
preds, labels = collect_predictions(model=model, dataloader=test_loader, device=device)
|
| 432 |
+
baseline_analysis = print_error_analysis(
|
| 433 |
+
preds=preds, labels=labels, class_names=CLASS_NAMES
|
| 434 |
+
)
|
| 435 |
+
|
| 436 |
+
wrong_samples = collect_misclassified(
|
| 437 |
+
model=model,
|
| 438 |
+
dataloader=test_loader,
|
| 439 |
+
device=device,
|
| 440 |
+
max_samples=24,
|
| 441 |
+
)
|
| 442 |
+
visualize_misclassified(
|
| 443 |
+
samples=wrong_samples,
|
| 444 |
+
class_names=CLASS_NAMES,
|
| 445 |
+
save_path=str(results_dir / "misclassified_examples_test.png"),
|
| 446 |
+
)
|
| 447 |
+
baseline_report_path = results_dir / "baseline_analysis.txt"
|
| 448 |
+
baseline_report_path.write_text(
|
| 449 |
+
"\n".join(
|
| 450 |
+
[
|
| 451 |
+
"Baseline ViT (custom checkpoint) results",
|
| 452 |
+
f"Checkpoint: {checkpoint_path}",
|
| 453 |
+
f"Test Loss: {test_loss:.4f}",
|
| 454 |
+
f"Test Accuracy: {test_acc * 100:.2f}%",
|
| 455 |
+
"",
|
| 456 |
+
baseline_analysis,
|
| 457 |
+
"",
|
| 458 |
+
]
|
| 459 |
+
),
|
| 460 |
+
encoding="utf-8",
|
| 461 |
+
)
|
| 462 |
+
print(f"Saved baseline analysis to: {baseline_report_path}")
|
| 463 |
+
|
| 464 |
+
if args.run_pretrained_experiment:
|
| 465 |
+
# -------------------------------------------------------------------
|
| 466 |
+
# Optional transfer-learning experiment (pre-trained ViT-B/16)
|
| 467 |
+
# -------------------------------------------------------------------
|
| 468 |
+
# pretrained_epochs controls adaptation budget for ImageNet weights.
|
| 469 |
+
# In practice, 2-5 epochs is a quick sanity range for assignment runs.
|
| 470 |
+
pretrained_epochs = 2
|
| 471 |
+
print("\nRunning transfer-learning experiment with pre-trained ViT-B/16...")
|
| 472 |
+
train_loader_pt, val_loader_pt, test_loader_pt = (
|
| 473 |
+
get_imagenet_style_cifar10_dataloaders(
|
| 474 |
+
data_root="./data",
|
| 475 |
+
batch_size=args.batch_size,
|
| 476 |
+
val_ratio=0.1,
|
| 477 |
+
)
|
| 478 |
+
)
|
| 479 |
+
|
| 480 |
+
pretrained_model = build_pretrained_vit_classifier(num_classes=len(CLASS_NAMES))
|
| 481 |
+
fine_tune_pretrained(
|
| 482 |
+
model=pretrained_model,
|
| 483 |
+
train_loader=train_loader_pt,
|
| 484 |
+
val_loader=val_loader_pt,
|
| 485 |
+
device=device,
|
| 486 |
+
epochs=pretrained_epochs,
|
| 487 |
+
lr=1e-4,
|
| 488 |
+
weight_decay=1e-4,
|
| 489 |
+
)
|
| 490 |
+
pt_test_loss, pt_test_acc = evaluate_model(
|
| 491 |
+
model=pretrained_model,
|
| 492 |
+
dataloader=test_loader_pt,
|
| 493 |
+
device=device,
|
| 494 |
+
)
|
| 495 |
+
print(f"[Pretrained ViT] Test Loss: {pt_test_loss:.4f}")
|
| 496 |
+
print(f"[Pretrained ViT] Test Accuracy: {pt_test_acc * 100:.2f}%")
|
| 497 |
+
comparison_report = build_comparison_report(
|
| 498 |
+
baseline_loss=test_loss,
|
| 499 |
+
baseline_acc=test_acc,
|
| 500 |
+
pretrained_loss=pt_test_loss,
|
| 501 |
+
pretrained_acc=pt_test_acc,
|
| 502 |
+
)
|
| 503 |
+
print("\n" + comparison_report)
|
| 504 |
+
|
| 505 |
+
pt_preds, pt_labels = collect_predictions(
|
| 506 |
+
model=pretrained_model, dataloader=test_loader_pt, device=device
|
| 507 |
+
)
|
| 508 |
+
pretrained_analysis = print_error_analysis(
|
| 509 |
+
preds=pt_preds, labels=pt_labels, class_names=CLASS_NAMES
|
| 510 |
+
)
|
| 511 |
+
|
| 512 |
+
pt_wrong_samples = collect_misclassified(
|
| 513 |
+
model=pretrained_model,
|
| 514 |
+
dataloader=test_loader_pt,
|
| 515 |
+
device=device,
|
| 516 |
+
max_samples=24,
|
| 517 |
+
)
|
| 518 |
+
visualize_misclassified(
|
| 519 |
+
samples=pt_wrong_samples,
|
| 520 |
+
class_names=CLASS_NAMES,
|
| 521 |
+
save_path=str(results_dir / "misclassified_examples_pretrained_vit.png"),
|
| 522 |
+
)
|
| 523 |
+
pretrained_report_path = results_dir / "pretrained_vit_analysis.txt"
|
| 524 |
+
pretrained_report_path.write_text(
|
| 525 |
+
"\n".join(
|
| 526 |
+
[
|
| 527 |
+
"Pre-trained ViT-B/16 transfer learning results",
|
| 528 |
+
f"Fine-tuning epochs: {pretrained_epochs}",
|
| 529 |
+
f"Test Loss: {pt_test_loss:.4f}",
|
| 530 |
+
f"Test Accuracy: {pt_test_acc * 100:.2f}%",
|
| 531 |
+
"",
|
| 532 |
+
pretrained_analysis,
|
| 533 |
+
"",
|
| 534 |
+
]
|
| 535 |
+
),
|
| 536 |
+
encoding="utf-8",
|
| 537 |
+
)
|
| 538 |
+
print(f"Saved pre-trained analysis to: {pretrained_report_path}")
|
| 539 |
+
|
| 540 |
+
comparison_report_path = results_dir / "comparison_report.txt"
|
| 541 |
+
comparison_report_path.write_text(comparison_report, encoding="utf-8")
|
| 542 |
+
print(f"Saved model comparison report to: {comparison_report_path}")
|
assignment_llm_1/assignment_image/data/cifar-10-batches-py/readme.html
ADDED
|
@@ -0,0 +1 @@
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
<meta HTTP-EQUIV="REFRESH" content="0; url=http://www.cs.toronto.edu/~kriz/cifar.html">
|
assignment_llm_1/assignment_image/documentation/documentation.md
ADDED
|
@@ -0,0 +1,262 @@
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
# Assignment Image: Vision Transformer Documentation
|
| 2 |
+
|
| 3 |
+
## 1) Overview
|
| 4 |
+
|
| 5 |
+
This documentation explains two scripts:
|
| 6 |
+
|
| 7 |
+
- `assignment_image/code/c1.py`: end-to-end **training pipeline** for a custom Vision Transformer (ViT) on CIFAR-10.
|
| 8 |
+
- `assignment_image/code/c1_test.py`: **evaluation and analysis pipeline** for saved checkpoints, with an optional transfer-learning experiment using a pre-trained torchvision ViT.
|
| 9 |
+
|
| 10 |
+
Together, these scripts cover:
|
| 11 |
+
|
| 12 |
+
1. Data preprocessing and DataLoader creation
|
| 13 |
+
2. ViT architecture definition
|
| 14 |
+
3. Training, validation, checkpointing, and early stopping
|
| 15 |
+
4. Final test evaluation
|
| 16 |
+
5. Error analysis (per-class accuracy + confusion patterns + misclassified images)
|
| 17 |
+
|
| 18 |
+
---
|
| 19 |
+
|
| 20 |
+
## 2) Project Organization
|
| 21 |
+
|
| 22 |
+
Logical separation in the codebase:
|
| 23 |
+
|
| 24 |
+
- **Data preprocessing**
|
| 25 |
+
- `get_cifar10_dataloaders()` in `c1.py`
|
| 26 |
+
- `get_imagenet_style_cifar10_dataloaders()` in `c1_test.py` (for pre-trained ViT)
|
| 27 |
+
- **Model architecture**
|
| 28 |
+
- `PatchifyEmbedding`, `TransformerEncoderBlock`, `ViTEncoder`, `ViTClassifier` in `c1.py`
|
| 29 |
+
- **Training loop**
|
| 30 |
+
- `train_one_epoch()`, `train_model()` in `c1.py`
|
| 31 |
+
- **Evaluation**
|
| 32 |
+
- `evaluate()` in `c1.py`
|
| 33 |
+
- `evaluate_model()` in `c1_test.py`
|
| 34 |
+
- **Error analysis and visualization**
|
| 35 |
+
- `collect_misclassified()`, `visualize_misclassified()` in `c1.py`
|
| 36 |
+
- `collect_predictions()`, `build_confusion_matrix()`, `format_error_analysis()` in `c1_test.py`
|
| 37 |
+
|
| 38 |
+
---
|
| 39 |
+
|
| 40 |
+
## 3) `c1.py` (Training Script) Documentation
|
| 41 |
+
|
| 42 |
+
### Purpose
|
| 43 |
+
|
| 44 |
+
`c1.py` trains a custom ViT classifier on CIFAR-10 and saves:
|
| 45 |
+
|
| 46 |
+
- best checkpoint by validation accuracy: `vit_cifar10_best.pt`
|
| 47 |
+
- final checkpoint after training ends: `vit_cifar10_last.pt`
|
| 48 |
+
- optional misclassification visualization image
|
| 49 |
+
|
| 50 |
+
### Data Pipeline
|
| 51 |
+
|
| 52 |
+
`get_cifar10_dataloaders()` performs:
|
| 53 |
+
|
| 54 |
+
- resize CIFAR-10 images to `image_size x image_size` (default `64x64`)
|
| 55 |
+
- convert to tensor (`[0, 255] -> [0, 1]`)
|
| 56 |
+
- normalize channels from `[0,1]` to `[-1,1]` using mean/std `(0.5, 0.5, 0.5)`
|
| 57 |
+
- split official training set into train/validation by `val_ratio`
|
| 58 |
+
- build train/val/test DataLoaders with configurable batch size and workers
|
| 59 |
+
|
| 60 |
+
### Model Architecture
|
| 61 |
+
|
| 62 |
+
The custom ViT follows standard encoder-style design:
|
| 63 |
+
|
| 64 |
+
1. **Patchify + Projection**
|
| 65 |
+
`PatchifyEmbedding` creates non-overlapping patches and projects each patch to `embed_dim`.
|
| 66 |
+
|
| 67 |
+
2. **Token + Position Encoding**
|
| 68 |
+
`ViTEncoder` prepends a learnable CLS token and adds learnable positional embeddings.
|
| 69 |
+
|
| 70 |
+
3. **Transformer Blocks**
|
| 71 |
+
`TransformerEncoderBlock` applies:
|
| 72 |
+
- LayerNorm -> Multi-Head Self-Attention -> Residual
|
| 73 |
+
- LayerNorm -> MLP (GELU + Dropout) -> Residual
|
| 74 |
+
|
| 75 |
+
4. **Classification Head**
|
| 76 |
+
`ViTClassifier` extracts CLS representation and maps it to 10 class logits.
|
| 77 |
+
|
| 78 |
+
### Training and Validation
|
| 79 |
+
|
| 80 |
+
`train_model()` uses:
|
| 81 |
+
|
| 82 |
+
- loss: `CrossEntropyLoss`
|
| 83 |
+
- optimizer: `AdamW`
|
| 84 |
+
- scheduler: `StepLR(step_size=5, gamma=0.5)`
|
| 85 |
+
- early stopping: stop when validation accuracy does not improve for `early_stopping_patience` epochs
|
| 86 |
+
|
| 87 |
+
### Main Outputs
|
| 88 |
+
|
| 89 |
+
During training:
|
| 90 |
+
|
| 91 |
+
- epoch-wise train/validation loss, accuracy, and learning rate logs
|
| 92 |
+
- checkpoint files saved in `save_dir`
|
| 93 |
+
|
| 94 |
+
After training:
|
| 95 |
+
|
| 96 |
+
- final validation summary
|
| 97 |
+
- test loss/accuracy using best checkpoint
|
| 98 |
+
- optional plot of misclassified examples
|
| 99 |
+
|
| 100 |
+
---
|
| 101 |
+
|
| 102 |
+
## 4) `c1_test.py` (Evaluation + Analysis Script) Documentation
|
| 103 |
+
|
| 104 |
+
### Purpose
|
| 105 |
+
|
| 106 |
+
`c1_test.py` is a separate script for:
|
| 107 |
+
|
| 108 |
+
- loading a trained checkpoint
|
| 109 |
+
- evaluating on test data
|
| 110 |
+
- generating error analysis reports
|
| 111 |
+
- optionally running transfer learning with pre-trained ViT-B/16
|
| 112 |
+
|
| 113 |
+
### Baseline Evaluation Flow
|
| 114 |
+
|
| 115 |
+
1. Load checkpoint with `load_model_from_checkpoint()`
|
| 116 |
+
2. Recreate test DataLoader with same preprocessing used during training
|
| 117 |
+
3. Run `evaluate_model()` for test loss and accuracy
|
| 118 |
+
4. Collect predictions via `collect_predictions()`
|
| 119 |
+
5. Generate:
|
| 120 |
+
- per-class accuracy
|
| 121 |
+
- top confusion pairs (true -> predicted)
|
| 122 |
+
6. Save analysis text report and misclassified image grid
|
| 123 |
+
|
| 124 |
+
### Optional Transfer-Learning Experiment
|
| 125 |
+
|
| 126 |
+
When `--run-pretrained-experiment` is enabled:
|
| 127 |
+
|
| 128 |
+
- build pre-trained `vit_b_16` from torchvision
|
| 129 |
+
- replace classification head for 10 CIFAR-10 classes
|
| 130 |
+
- preprocess data with ImageNet normalization and `224x224` resize
|
| 131 |
+
- fine-tune with `fine_tune_pretrained()`
|
| 132 |
+
- evaluate and save separate analysis artifacts
|
| 133 |
+
|
| 134 |
+
### Baseline vs Pre-trained Comparison (Recorded Result)
|
| 135 |
+
|
| 136 |
+
From `results/comparison_report.txt`:
|
| 137 |
+
|
| 138 |
+
| Model | Test Loss | Test Accuracy |
|
| 139 |
+
|---|---:|---:|
|
| 140 |
+
| Baseline ViT (custom checkpoint) | 0.8916 | 68.57% |
|
| 141 |
+
| Pre-trained ViT-B/16 | 0.1495 | 95.15% |
|
| 142 |
+
|
| 143 |
+
Key comparison metrics:
|
| 144 |
+
|
| 145 |
+
- Accuracy gain (pre-trained - baseline): **+26.58 percentage points**
|
| 146 |
+
- Loss delta (pre-trained - baseline): **-0.7420**
|
| 147 |
+
|
| 148 |
+
Interpretation: transfer learning with pre-trained ViT-B/16 provides a large performance improvement over the baseline custom-trained ViT in this run.
|
| 149 |
+
|
| 150 |
+
---
|
| 151 |
+
|
| 152 |
+
## 5) Hyperparameters and Their Significance
|
| 153 |
+
|
| 154 |
+
### Core model hyperparameters (`c1.py`)
|
| 155 |
+
|
| 156 |
+
- `image_size=64`
|
| 157 |
+
Upscales CIFAR-10 images from `32x32` to allow richer patch tokenization.
|
| 158 |
+
|
| 159 |
+
- `patch_size=4`
|
| 160 |
+
Number of patches per image becomes `(64/4)^2 = 256`.
|
| 161 |
+
|
| 162 |
+
- `embed_dim=256`
|
| 163 |
+
Dimensionality of token embeddings; larger values increase representation capacity and compute cost.
|
| 164 |
+
|
| 165 |
+
- `depth=6`
|
| 166 |
+
Number of transformer encoder blocks; deeper models can learn more complex patterns but train slower.
|
| 167 |
+
|
| 168 |
+
- `num_heads=8`
|
| 169 |
+
Attention heads per block; controls multi-view attention decomposition.
|
| 170 |
+
|
| 171 |
+
- `mlp_ratio=4.0`
|
| 172 |
+
Hidden size of feed-forward block equals `4 * embed_dim`.
|
| 173 |
+
|
| 174 |
+
- `dropout=0.1`
|
| 175 |
+
Regularization in transformer blocks to reduce overfitting risk.
|
| 176 |
+
|
| 177 |
+
### Training hyperparameters (`c1.py`)
|
| 178 |
+
|
| 179 |
+
- `batch_size=128`
|
| 180 |
+
Balance between gradient stability, memory use, and throughput.
|
| 181 |
+
|
| 182 |
+
- `num_epochs=10`
|
| 183 |
+
Maximum training epochs before early stopping triggers.
|
| 184 |
+
|
| 185 |
+
- `lr=3e-4`
|
| 186 |
+
Initial learning rate for AdamW.
|
| 187 |
+
|
| 188 |
+
- `weight_decay=1e-4`
|
| 189 |
+
L2-style regularization used by AdamW.
|
| 190 |
+
|
| 191 |
+
- `early_stopping_patience=5`
|
| 192 |
+
Stops training if validation accuracy does not improve for 5 epochs.
|
| 193 |
+
|
| 194 |
+
- `StepLR(step_size=5, gamma=0.5)`
|
| 195 |
+
Learning rate decays by half every 5 epochs.
|
| 196 |
+
|
| 197 |
+
### Transfer-learning hyperparameters (`c1_test.py`)
|
| 198 |
+
|
| 199 |
+
- `pretrained_epochs=2` (default)
|
| 200 |
+
Short fine-tuning schedule for quick comparison against baseline.
|
| 201 |
+
|
| 202 |
+
- `lr=1e-4`, `weight_decay=1e-4`
|
| 203 |
+
Conservative adaptation from ImageNet features to CIFAR-10.
|
| 204 |
+
|
| 205 |
+
- ImageNet transform: `Resize(224,224)` + ImageNet mean/std
|
| 206 |
+
Matches input assumptions of pre-trained ViT-B/16.
|
| 207 |
+
|
| 208 |
+
---
|
| 209 |
+
|
| 210 |
+
## 6) CLI Usage
|
| 211 |
+
|
| 212 |
+
### Train custom ViT
|
| 213 |
+
|
| 214 |
+
From `assignment_image/code`:
|
| 215 |
+
|
| 216 |
+
```bash
|
| 217 |
+
python c1.py
|
| 218 |
+
```
|
| 219 |
+
|
| 220 |
+
### Evaluate custom checkpoint
|
| 221 |
+
|
| 222 |
+
```bash
|
| 223 |
+
python c1_test.py --checkpoint-path /path/to/vit_cifar10_best.pt
|
| 224 |
+
```
|
| 225 |
+
|
| 226 |
+
### Evaluate + run pre-trained ViT transfer experiment
|
| 227 |
+
|
| 228 |
+
```bash
|
| 229 |
+
python c1_test.py \
|
| 230 |
+
--checkpoint-path /path/to/vit_cifar10_best.pt \
|
| 231 |
+
--run-pretrained-experiment \
|
| 232 |
+
--pretrained-epochs 2
|
| 233 |
+
```
|
| 234 |
+
|
| 235 |
+
---
|
| 236 |
+
|
| 237 |
+
## 7) Generated Artifacts
|
| 238 |
+
|
| 239 |
+
Common artifacts produced by the scripts:
|
| 240 |
+
|
| 241 |
+
- `saved_model/vit_cifar10_best.pt`
|
| 242 |
+
- `saved_model/vit_cifar10_last.pt`
|
| 243 |
+
- `misclassified_examples.png` (training script visualization)
|
| 244 |
+
- `results/baseline_analysis.txt`
|
| 245 |
+
- `results/misclassified_examples_test.png`
|
| 246 |
+
- `results/pretrained_vit_analysis.txt` (if transfer experiment runs)
|
| 247 |
+
- `results/misclassified_examples_pretrained_vit.png` (if transfer experiment runs)
|
| 248 |
+
|
| 249 |
+
---
|
| 250 |
+
|
| 251 |
+
## 8) Notes and Best Practices
|
| 252 |
+
|
| 253 |
+
- Keep training and evaluation preprocessing consistent when testing custom checkpoints.
|
| 254 |
+
- Do not use test set for model selection; use validation split for checkpoint selection.
|
| 255 |
+
- Use error analysis outputs (per-class and confusion pairs) to guide augmentation or architecture tuning.
|
| 256 |
+
- If GPU memory is limited, reduce `batch_size` or `image_size`.
|
| 257 |
+
|
| 258 |
+
---
|
| 259 |
+
|
| 260 |
+
## 9) References
|
| 261 |
+
|
| 262 |
+
- Dosovitskiy, A., Beyer, L., Kolesnikov, A., Weissenborn, D., Zhai, X., Unterthiner, T., Dehghani, M., Minderer, M., Heigold, G., Gelly, S., Uszkoreit, J., and Houlsby, N. (2021). *An Image is Worth 16x16 Words: Transformers for Image Recognition at Scale*. ICLR 2021. https://arxiv.org/abs/2010.11929
|
assignment_llm_1/assignment_image/results/comparison_report.txt
ADDED
|
@@ -0,0 +1,8 @@
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
Model comparison (baseline vs transfer learning)
|
| 2 |
+
--------------------------------------------------------
|
| 3 |
+
Model Test Loss Test Acc
|
| 4 |
+
Baseline ViT (custom checkpoint) 0.8916 68.57%
|
| 5 |
+
Pre-trained ViT-B/16 0.1495 95.15%
|
| 6 |
+
--------------------------------------------------------
|
| 7 |
+
Accuracy gain (pretrained - baseline): +26.58 percentage points
|
| 8 |
+
Loss delta (pretrained - baseline): -0.7420
|
assignment_llm_1/assignment_image/results/pretrained_vit_analysis.txt
ADDED
|
@@ -0,0 +1,26 @@
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
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|
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|
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|
|
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|
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|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
Pre-trained ViT-B/16 transfer learning results
|
| 2 |
+
Fine-tuning epochs: 2
|
| 3 |
+
Test Loss: 0.1495
|
| 4 |
+
Test Accuracy: 95.15%
|
| 5 |
+
|
| 6 |
+
Per-class accuracy (lower = harder classes):
|
| 7 |
+
bird | acc= 87.30% | n=1000
|
| 8 |
+
cat | acc= 88.40% | n=1000
|
| 9 |
+
dog | acc= 94.30% | n=1000
|
| 10 |
+
frog | acc= 96.60% | n=1000
|
| 11 |
+
horse | acc= 96.80% | n=1000
|
| 12 |
+
truck | acc= 97.10% | n=1000
|
| 13 |
+
automobile | acc= 97.40% | n=1000
|
| 14 |
+
airplane | acc= 97.60% | n=1000
|
| 15 |
+
ship | acc= 97.90% | n=1000
|
| 16 |
+
deer | acc= 98.10% | n=1000
|
| 17 |
+
|
| 18 |
+
Top confusion pairs (true -> predicted):
|
| 19 |
+
cat -> dog: 57 samples
|
| 20 |
+
bird -> airplane: 46 samples
|
| 21 |
+
dog -> cat: 31 samples
|
| 22 |
+
cat -> airplane: 27 samples
|
| 23 |
+
truck -> automobile: 23 samples
|
| 24 |
+
bird -> cat: 22 samples
|
| 25 |
+
bird -> deer: 22 samples
|
| 26 |
+
automobile -> truck: 21 samples
|
results/v3_context/temp1.1_qwen3-14B_base_with_defs.json
ADDED
|
The diff for this file is too large to render.
See raw diff
|
|
|
synthetic_data_es_raw/10.json
ADDED
|
@@ -0,0 +1,25 @@
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
{
|
| 2 |
+
"id": "multiclinsum_gs_es_345.txt",
|
| 3 |
+
"original_text_language": "es",
|
| 4 |
+
"source_topic": "Hernia interna a través del hiato de Winslow en adolescente",
|
| 5 |
+
"readability_versions": {
|
| 6 |
+
"easy": {
|
| 7 |
+
"readability_level": "easy",
|
| 8 |
+
"fernandez_huerta_range": "70-100",
|
| 9 |
+
"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
|
| 10 |
+
"text": "Un joven de 15 años fue al hospital porque tenía dolor de barriga y vómitos durante cuatro días. Al principio pensaron que tenía una infección estomacal, pero como no mejoró, hicieron más estudios. Encontraron que una parte del intestino se había metido en un lugar donde no debía, lo que causaba el problema. Lo operaron y los doctores movieron el intestino a su lugar. Después de la operación, el joven mejoró poco a poco. Al principio tuvo el estómago muy lento, pero se recuperó con medicinas. A los diez días salió del hospital sintiéndose bien y sigue en control con el doctor."
|
| 11 |
+
},
|
| 12 |
+
"intermediate": {
|
| 13 |
+
"readability_level": "intermediate",
|
| 14 |
+
"fernandez_huerta_range": "50-70",
|
| 15 |
+
"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
|
| 16 |
+
"text": "Se presenta el caso de un adolescente de 15 años sin antecedentes médicos que acudió al servicio de urgencias con dolor abdominal y vómitos biliosos de varios días de evolución. Inicialmente se pensó en una gastroenteritis, pero la falta de mejoría motivó estudios adicionales. Una tomografía mostró signos de obstrucción intestinal por una hernia interna a través del hiato de Winslow. Se realizó primero una cirugía por laparoscopia, que no permitió resolver completamente el problema, por lo que se hizo una segunda intervención con cirugía abierta. Durante esta, se encontró un segmento de intestino delgado atrapado, el cual fue liberado sin necesidad de cerrar el hiato. El paciente tuvo una buena recuperación postoperatoria y fue dado de alta en buen estado general al décimo día."
|
| 17 |
+
},
|
| 18 |
+
"hard": {
|
| 19 |
+
"readability_level": "hard",
|
| 20 |
+
"fernandez_huerta_range": "0-50",
|
| 21 |
+
"target_audience": "Profesionales / Universidad o posgrado",
|
| 22 |
+
"text": "Paciente masculino de 15 años, sin antecedentes patológicos personales, que se presentó en urgencias con cuadro clínico de cuatro días de evolución consistente en dolor abdominal epigástrico de carácter cólico y vómitos biliosos persistentes, sin fiebre. Inicialmente tratado como una posible gastroenteritis aguda, la ausencia de respuesta llevó a realizar estudios por imágenes. La radiografía abdominal fue sugestiva de obstrucción intestinal, lo cual se confirmó mediante tomografía computarizada, evidenciando dilatación de asas de intestino delgado, ascitis y herniación de un segmento ileal a través del hiato de Winslow, con cambio súbito de calibre a dicho nivel. Se indicó laparoscopia exploradora, observándose asas distendidas y colon derecho móvil sin adherencias; sin embargo, debido a la dificultad para delimitar claramente el punto obstructivo y la escasa visualización por distensión intestinal, se decidió conversión a laparotomía media supraumbilical. La intervención evidenció herniación interna de aproximadamente 5 cm de íleon a través del hiato de Winslow, con impronta congestiva visible en los extremos del asa comprometida. No se realizó cierre profiláctico del hiato por encontrarse dentro de los parámetros anatómicos normales. El postoperatorio fue inicialmente complicado por íleo paralítico y formación de colección pélvica, ambas condiciones controladas de manera conservadora. El paciente fue dado de alta hospitalaria al décimo día, hemodinámicamente estable, sin recurrencia del cuadro obstructivo y actualmente continúa seguimiento en consultas externas de cirugía pediátrica."
|
| 23 |
+
}
|
| 24 |
+
}
|
| 25 |
+
}
|
synthetic_data_es_raw/107.json
ADDED
|
@@ -0,0 +1,25 @@
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1 |
+
{
|
| 2 |
+
"id": "multiclinsum_gs_es_342.txt",
|
| 3 |
+
"original_text_language": "es",
|
| 4 |
+
"source_topic": "caso clínico de cardiopatía congénita compleja post-Fontan con hemoptisis severa",
|
| 5 |
+
"readability_versions": {
|
| 6 |
+
"easy": {
|
| 7 |
+
"readability_level": "easy",
|
| 8 |
+
"fernandez_huerta_range": "73-100",
|
| 9 |
+
"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
|
| 10 |
+
"text": "Una joven de 16 años nació con una malformación del corazón. Ya le habían hecho dos cirugías importantes para que su corazón pudiera funcionar mejor. Un mes después de su última operación, empezó con tos con sangre, que fue aumentando hasta que tuvo que ir al hospital. Allí vieron que tenía líquido en el pulmón izquierdo y le colocaron un tubo para sacarlo. También le dieron medicamentos para detener el sangrado. Como el sangrado volvió a aparecer y era muy abundante, los médicos le hicieron un procedimiento especial por cateterismo. Le pusieron un pequeño tubo metálico (stent) y taparon algunas venas que llevaban demasiada sangre a los pulmones. Después de eso, el sangrado paró y pudo volver a tomar sus medicinas para el corazón. Con el tiempo, siguió mejor y no volvió a sangrar."
|
| 11 |
+
},
|
| 12 |
+
"intermediate": {
|
| 13 |
+
"readability_level": "intermediate",
|
| 14 |
+
"fernandez_huerta_range": "50-67",
|
| 15 |
+
"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
|
| 16 |
+
"text": "Se describe el caso de una paciente de 16 años con cardiopatía congénita compleja (situs inversus con ventrículo único y atresia tricuspídea), previamente intervenida con cirugía de Glenn y posteriormente con Fontan extracardíaco fenestrado y reemplazo valvular mecánico. Un mes después del alta, presentó hemoptisis progresiva que requirió ingreso hospitalario. Los estudios revelaron derrame pleural izquierdo y múltiples colaterales aortopulmonares con flujo anterógrado pulmonar conservado. A pesar del manejo inicial con reversión de anticoagulación y antifibrinolíticos, la paciente tuvo episodios repetidos de sangrado masivo, por lo que se decidió realizar cateterismo terapéutico. Se implantó un stent cubierto en la bifurcación pulmonar para bloquear el flujo anterógrado y se ocluyeron las colaterales más grandes con coils. La evolución posterior fue favorable, sin nuevos episodios de hemoptisis. En controles a 6 y 12 meses, se comprobó función cardíaca estable, sistema Fontan permeable y saturaciones aceptables."
|
| 17 |
+
},
|
| 18 |
+
"hard": {
|
| 19 |
+
"readability_level": "hard",
|
| 20 |
+
"fernandez_huerta_range": "0-45",
|
| 21 |
+
"target_audience": "Profesionales / Universidad o posgrado",
|
| 22 |
+
"text": "Paciente adolescente de 16 años con situs inversus en dextrocardia y fisiología univentricular secundaria a atresia tricuspídea con doble salida del ventrículo izquierdo e hipoplasia del anillo pulmonar, con paliación previa tipo Glenn con preservación de flujo anterógrado ventrículo-pulmonar y reciente derivación de Fontan extracardíaco fenestrado con sustitución de la válvula AV sistémica por prótesis mecánica. Consulta por hemoptisis masiva un mes postoperatorio, inicialmente de tipo hemoptoico y posteriormente franca (>500 mL), en contexto de anticoagulación con warfarina (INR 2,5). La radiografía evidenció derrame pleural izquierdo, drenándose 800 mL de líquido seroso. La angiotomografía confirmó permeabilidad del conducto de Fontan, hipoplasia del anillo pulmonar, ramas pulmonares dilatadas y múltiples colaterales aortopulmonares, la mayor de 2,5 mm. Dada la coexistencia de hemoptisis severa y necesidad de anticoagulación permanente por prótesis mecánica, se realizó cateterismo intervencionista bajo anestesia general. Se objetivó gradiente de presión elevado en el sistema Fontan (19 mmHg), flujo anterógrado persistente desde el tronco pulmonar y colaterales aortopulmonares de origen subclavio. Se implantó stent cubierto de 4,5 cm en la bifurcación de las ramas pulmonares para abolir el flujo anterógrado y se efectuó oclusión secuencial con coils de las principales colaterales. La paciente evolucionó sin nuevos episodios de hemoptisis, permitiéndose reinicio de anticoagulación. En controles posteriores (6 y 12 meses) se constató permeabilidad del circuito Fontan, funcionalidad adecuada de la prótesis mecánica y clase funcional II sin recurrencias hemorrágicas."
|
| 23 |
+
}
|
| 24 |
+
}
|
| 25 |
+
}
|
synthetic_data_es_raw/108.json
ADDED
|
@@ -0,0 +1,25 @@
|
|
|
|
|
|
|
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|
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|
|
|
| 1 |
+
{
|
| 2 |
+
"id": "multiclinsum_gs_es_424.txt",
|
| 3 |
+
"original_text_language": "es",
|
| 4 |
+
"source_topic": "caso pediátrico de MIS-C post COVID-19 con tratamiento en UCI",
|
| 5 |
+
"readability_versions": {
|
| 6 |
+
"easy": {
|
| 7 |
+
"readability_level": "easy",
|
| 8 |
+
"fernandez_huerta_range": "73-100",
|
| 9 |
+
"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
|
| 10 |
+
"text": "Un niño de 10 años se cayó por las escaleras y empezó a sentirse muy mal. Tenía fiebre, vómitos, dolor de cabeza y estaba muy mareado. En el hospital pensaron que se había golpeado la cabeza, pero las pruebas no mostraron daño. Luego vieron que también tenía los ojos rojos, los labios hinchados, la lengua roja como una fresa y manchas en la piel. Incluso tuvo convulsiones y dejó de respirar por unos momentos. Los médicos sospecharon una enfermedad llamada MIS-C, que aparece en algunos niños después de tener COVID-19. Le dieron medicinas fuertes por la vena, como antibióticos, antivirales, esteroides y una medicina especial llamada inmunoglobulina. Al principio estaba muy grave, pero después de unos días empezó a mejorar. Recuperó la conciencia, la fiebre bajó y dejó de tener problemas para respirar. Estuvo en el hospital 10 días y luego siguió con tratamiento en casa hasta recuperarse por completo."
|
| 11 |
+
},
|
| 12 |
+
"intermediate": {
|
| 13 |
+
"readability_level": "intermediate",
|
| 14 |
+
"fernandez_huerta_range": "50-67",
|
| 15 |
+
"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
|
| 16 |
+
"text": "Un niño de 10 años ingresó al hospital tras una caída, pero pronto se evidenció que presentaba un cuadro inflamatorio sistémico grave. Tenía fiebre, alteración del estado de conciencia, conjuntivitis, labios agrietados, lengua en fresa, erupciones cutáneas y edema en extremidades. También desarrolló convulsiones y apnea. Los estudios iniciales descartaron traumatismo craneal y meningitis. Dado el compromiso multiorgánico, se sospechó un síndrome inflamatorio multisistémico pediátrico (MIS-C) relacionado con COVID-19, lo que se confirmó posteriormente. Recibió antibióticos, antivirales, corticoides e inmunoglobulina intravenosa. Durante los primeros días hubo empeoramiento hemodinámico y aumento de marcadores inflamatorios, así como daño cardíaco y hepático. Tras el inicio de la inmunoglobulina y la metilprednisolona, mostró una recuperación progresiva: volvió a estar consciente, se estabilizaron los signos vitales y disminuyó la inflamación. Se le indicó aspirina como prevención de trombosis y fisioterapia. Fue dado de alta al décimo día, con seguimiento ambulatorio y tratamiento prolongado con corticoides y antiagregantes, logrando una recuperación completa en pocas semanas."
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"text": "Paciente masculino de 10 años que, tras un traumatismo menor por caída, desarrolló rápidamente un cuadro compatible con síndrome hiperinflamatorio. Al ingreso presentaba compromiso hemodinámico (PA <p5, taquicardia y taquipnea), encefalopatía aguda (GCS 8/15), mucocutis hiperémica con estigmas tipo Kawasaki (conjuntivitis bilateral no exudativa, mucositis con estomatitis fisurada, lengua en fresa, exantema polimorfo y edema acral), hepatomegalia dolorosa y episodios convulsivos. Tanto la neuroimagen como el LCR fueron normales, descartándose infección del SNC. Se instauró tratamiento empírico para shock séptico y meningoencefalitis (ceftriaxona + vancomicina luego sustituida por meropenem, aciclovir y dexametasona), junto con soporte ventilatorio no invasivo y anticonvulsivantes. La evolución inicial mostró progresión del síndrome inflamatorio con elevación escalonada de biomarcadores (PCR, ferritina, LDH, troponina T, procalcitonina, ALT/AST y dímero D) y disfunción miocárdica leve en ecocardiograma seriado. Ante la sospecha fundada de MIS-C según criterios CDC/OMS, se administró inmunoglobulina intravenosa a dosis de choque (2 g/kg) combinada con metilprednisolona (1 mg/kg/12 h). La respuesta fue significativa a partir de las 48-72 h, con recuperación del estado neurológico, estabilización cardiovascular y descenso sostenido de los parámetros de inflamación sistémica. Se añadió aspirina a 81 mg/día como profilaxis antitrombótica y se mantuvo prednisolona oral con pauta descendente durante 4 semanas. El alta se otorgó al décimo día, con normalización completa del dímero D al mes y resolución de la disfunción ventricular en controles posteriores. Se destaca la omisión inicial del antecedente familiar de COVID-19, lo que retrasó el diagnóstico diferencial inicial."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 47 años con cirrosis por alcohol tuvo una hemorragia digestiva causada por várices en el duodeno. Fue tratada con una sustancia llamada cianoacrilato para detener el sangrado. Al mes regresó con fiebre e infecciones repetidas en la sangre. Tras muchos estudios se descubrió que las bacterias provenían del material de cianoacrilato que se había colocado en el duodeno. No podía retirarse sin una cirugía muy riesgosa, así que se trató de manera conservadora con antibióticos, aunque las bacterias se volvían más resistentes. Finalmente, la paciente sufrió una nueva hemorragia al reiniciar el consumo de alcohol y falleció."
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"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
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"text": "Una mujer de 47 años con cirrosis alcohólica (Child-Pugh B) fue tratada por hemorragia de várices duodenales con inyección de cianoacrilato. Un mes más tarde ingresó por fiebre e infecciones recurrentes en sangre, en distintos episodios aislándose bacterias intestinales como E. coli y Klebsiella, cada vez más resistentes. Recibió tratamientos con distintos antibióticos, algunos suspendidos por efectos adversos, con mejorías temporales. Estudios con TAC, endoscopia y finalmente un PET mostraron que el foco de las bacterias era el material de cianoacrilato en el duodeno. Debido a que la cirugía para retirarlo tendría un riesgo muy alto, se decidió continuar con profilaxis antibiótica y seguimiento. Estuvo estable un tiempo, pero luego presentó un nuevo sangrado digestivo en contexto de recaída alcohólica y falleció."
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"text": "Mujer de 47 años con cirrosis alcohólica Child-Pugh B7, antecedente de HDA por várices duodenales aisladas tratadas con Histoacryl®/Lipiodol®. Evolución posterior con bacteriemias recurrentes por enterobacterias (E. coli multisuceptible inicial, Klebsiella pneumoniae ESBL+ progresivamente resistente), en contexto de foco infeccioso documentado mediante PET-FDG en duodeno concordante con material de cianoacrilato, con aislamiento microbiológico idéntico en hemocultivos y fragmento endoscópico del polímero. Manejo antibiótico secuencial (amox-clav, tigeciclina, colistina —suspendida por IRA—, ceftazidima, ertapenem) con respuestas parciales. Resección quirúrgica desestimada por implicar duodenopancreatectomía de alto riesgo. Se adoptó estrategia conservadora con profilaxis secundaria (cotrimoxazol) y vigilancia estrecha. Evolución final: episodio de HDA recurrente tras recaída etílica, con desenlace fatal. Caso ilustra complicación infecciosa tardía de materiales embólicos y la limitada capacidad resolutiva cuando la retirada quirúrgica no es viable."
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"text": "Un hombre de 31 años se cayó mientras montaba a caballo y se lastimó la rodilla derecha. Le dolía mucho, sobre todo cuando se movía, pero mejoraba si descansaba o tomaba medicinas. Fue al doctor y le tomaron radiografías y una resonancia. Vieron que tenía una fractura en un hueso de la rodilla y posibles daños en otros tejidos. Lo operaron para acomodar el hueso y le pusieron tornillos para sujetarlo. Después de un día, lo mandaron a casa y le dijeron que moviera la rodilla sin apoyar la pierna. En las revisiones, la herida sanó bien y pudo doblar y estirar la rodilla sin dolor. Luego comenzó rehabilitación para recuperar la fuerza."
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"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
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"text": "Un paciente de 31 años, previamente sano, sufrió una caída mientras montaba a caballo y recibió un golpe directo en la rodilla derecha. Presentó dolor punzante de intensidad moderada, que empeoraba con el movimiento y mejoraba con reposo y analgésicos. Fue valorado médicamente y las radiografías mostraron una fractura en el cóndilo femoral medial con desplazamiento de 3 mm. Una resonancia confirmó la fractura y sugirió posibles lesiones en los meniscos y el ligamento cruzado anterior. Se realizó una cirugía para reducir la fractura mediante un abordaje anteromedial y se fijó con dos tornillos canulados. El paciente fue dado de alta a las 24 horas y se le indicó mover la rodilla sin apoyar el peso. En los controles posteriores presentó buena cicatrización, movilidad completa sin dolor y fuerza normal. Posteriormente inició rehabilitación y apoyo progresivo de la extremidad."
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"text": "Varón de 31 años, sin antecedentes patológicos relevantes, presentó traumatismo directo en rodilla derecha tras caída mientras cabalgaba. Inició con gonalgia punzante EVA 5/10, continua, sin irradiación, incapacitante a la movilización y con alivio en reposo. La evaluación clínica evidenció derrame articular y limitación en arcos de movilidad sin datos de inestabilidad ligamentaria ni lesión meniscal evidente a la exploración. Radiografías anteroposterior y lateral demostraron trazo de fractura coronal del cóndilo femoral medial con desplazamiento articular de 3 mm, hallazgo corroborado por resonancia magnética, la cual además sugirió lesión concomitante meniscal bilateral y posible compromiso del ligamento cruzado anterior. Se realizó osteosíntesis mediante reducción abierta por abordaje anteromedial subvasto y fijación axial con dos tornillos canulados de 7.0 mm con arandela. La evolución posoperatoria inmediata fue satisfactoria, con egreso a las 24 horas e indicación de movilización activa sin carga. En control se documentó cicatrización adecuada, arcos de movilidad conservados (flexión 120°, extensión 0°), fuerza 5/5 y ausencia de dolor, por lo que se indicó rehabilitación dirigida y apoyo progresivo a partir de la décima semana."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Un jugador de fútbol americano de 20 años se lesionó la cadera derecha durante un partido. Su cadera se salió de lugar y los médicos tuvieron que acomodarla varias veces. Más tarde, le hicieron una cirugía para arreglar los huesos rotos y asegurar que la cadera quedara firme. Después de la operación, tuvo que caminar con cuidado y hacer ejercicios para recuperar la fuerza. Poco a poco mejoró y, después de varios meses, pudo volver a correr, entrenar y jugar sin dolor. Diez meses después de la lesión, volvió a ser el mariscal de campo titular de su equipo."
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"text": "Un mariscal de campo universitario de 20 años sufrió una luxación de cadera derecha durante un partido tras recibir un impacto. Aunque la cadera fue recolocada en el campo, seguía inestable y los estudios posteriores revelaron una fractura compleja. Fue sometido a una cirugía en la que se repararon la cabeza del fémur, el acetábulo y el labrum utilizando tornillos y placas. Después de la operación, tuvo restricciones de movimiento y apoyo de peso durante varias semanas, además de recibir medicación para prevenir coágulos. Con rehabilitación progresiva, comenzó a cargar peso gradualmente y realizó ejercicios de fortalecimiento. Cuatro meses después, las imágenes mostraban una cadera estable sin signos de necrosis avascular. A los seis meses ya trotaba y entrenaba sin dolor, y al décimo mes volvió a competir como titular, completando la temporada sin complicaciones."
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"text": "Jugador universitario de 20 años con luxofractura posterior de cadera derecha (Pipkin IV) secundaria a traumatismo de alta energía durante actividad deportiva. Tras múltiples intentos de reducción cerrada, fue derivado a centro de trauma para evaluación definitiva. TC post-reducción evidenció conminución de la cabeza femoral y fractura de pared acetabular posterior. Se realizó abordaje Gibson con osteotomía trocantérica, desbridamiento de partes blandas, dislocación quirúrgica anterior, extracción de fragmentos condrolábiles y fijación de la fractura cefálica con tornillos de compresión. Se emplearon placa de resorte y placa de reconstrucción para estabilización acetabular, además de reparación labral y reinserción de rotadores externos. El protocolo posoperatorio incluyó descarga parcial con pie plano, restricción de flexión y rotación por 6 semanas y profilaxis tromboembólica con enoxaparina y AAS. La evolución radiográfica mostró consolidación del trocánter, congruencia articular y ausencia de necrosis avascular. A los 10 meses retomó la actividad deportiva completa sin dolor, manteniéndose asintomático al año de seguimiento."
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"text": "Un hombre de 64 años que trabajaba en una granja de cerdos fue golpeado en el ojo por una máquina grande. Fue al hospital porque casi no podía ver con el ojo izquierdo. Los médicos vieron que tenía una herida muy seria y le sangraba el ojo. Lo operaron para cerrar la herida y le dieron medicinas para evitar una infección. Aunque le cuidaron bien, el ojo siguió muy dañado y la vista no mejoró. Más tarde aceptó otra operación para limpiar el interior del ojo, pero aun así no pudo volver a ver. El hombre decidió no hacerse más cirugías."
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"text": "Un agricultor de 64 años sufrió una lesión ocular severa cuando una carretilla elevadora le golpeó directamente el ojo izquierdo. Al ser evaluado en el hospital, se confirmó una pérdida visual casi total, acompañada de ruptura del globo ocular, sangrado intraocular y ausencia del lente artificial que tenía implantado por una cirugía previa de cataratas. Fue sometido a una intervención quirúrgica de emergencia para cerrar la herida y administrar antibióticos con el fin de evitar una infección interna. Aunque inicialmente se logró estabilizar el ojo, el sangrado persistió y no hubo recuperación visual significativa. Más adelante se le practicó una vitrectomía, un procedimiento que consiste en retirar el gel del interior del ojo para limpiar la sangre acumulada y reparar la retina. La cirugía requirió técnicas avanzadas debido a la inflamación y a la mala visibilidad, incluyendo el uso de aceite de silicona para mantener la retina en su lugar. A pesar de estos esfuerzos, el ojo desarrolló cicatrices internas y un nuevo desprendimiento de retina, lo que finalmente resultó en la pérdida completa de la visión. Ante este pronóstico desfavorable, el paciente decidió no someterse a más cirugías y continuar únicamente con revisiones periódicas."
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"text": "Varón de 64 años, ganadero porcino con antecedentes de comorbilidades metabólicas y seguimiento oftalmológico poscirugía de cataratas, presentó traumatismo orbitario severo con lesión penetrante del globo ocular izquierdo secundaria al impacto directo de una carretilla elevadora. La exploración inicial evidenció laceración escleral, cámara anterior profunda con hematócrito positivo, pérdida de lente intraocular y opacidad corneal que imposibilitó la visualización del fondo. Se realizó reparación escleral con irrigación antibiótica intracamara y terapia sistémica y tópica intensiva. Ante la persistencia de hemorragia vítrea y escasa respuesta electrorretinográfica, se efectuó vitrectomía pars plana con membranectomía, reaplicación retiniana con perfluorocarbono, fotocoagulación panretiniana y taponamiento con aceite de silicona. La evolución posterior cursó con vitreorretinopatía proliferativa recurrente, desprendimiento retiniano traccional y atrofia ocular progresiva, culminando en amaurosis completa sin desarrollo de oftalmitis simpática en el ojo contralateral."
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"text": "Una niña de 10 años se cansaba mucho y se ponía morada cuando hacía esfuerzo. Los doctores le hicieron varios estudios del corazón. Descubrieron que tenía el corazón del lado derecho del pecho en lugar del izquierdo. También tenía varios agujeros entre las cavidades del corazón y un conducto que debería haberse cerrado al nacer, pero seguía abierto. Además, la presión en los pulmones era muy alta. Con una tomografía especial vieron que las dos arterias principales del corazón salían del mismo ventrículo, lo cual no es normal. Las venas que traen la sangre al corazón también estaban conectadas de forma distinta a lo habitual. Los bronquios, que llevan aire a los pulmones, también tenían una forma diferente de lo normal. En resumen, la niña tenía varias malformaciones en el corazón y en los pulmones desde que nació."
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"text": "Una niña de 10 años que presentaba episodios frecuentes de coloración azulada en la piel y cansancio fue evaluada mediante ecocardiografía. El estudio mostró varias anomalías del corazón, entre ellas que estaba ubicado en el lado derecho del pecho (dextrocardia), tenía agujeros entre las cavidades cardíacas (defecto septal ventricular y auricular) y un conducto que permanecía abierto desde el nacimiento (conducto arterioso persistente). También se observó presión muy alta en las arterias pulmonares. Con una tomografía con contraste se confirmó que ambas arterias principales del corazón salían del mismo ventrículo derecho, una condición llamada doble salida del ventrículo derecho. Además, las venas que llevan la sangre al corazón estaban conectadas de forma diferente a lo habitual y algunas estructuras estaban invertidas. Se detectaron otras variaciones en los bronquios y en las arterias pulmonares. En conjunto, los hallazgos indicaban una cardiopatía congénita compleja que afectaba tanto al sistema circulatorio como al respiratorio."
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"text": "Paciente femenina de 10 años con clínica de cianosis paroxística y fatigabilidad, sometida a estudio ecocardiográfico que evidenció dextrocardia con situs inversus totalis, hipertensión pulmonar severa (SPAP 75 mmHg), defecto septal ventricular perimembranoso de 13 mm, defecto septal auricular tipo ostium secundum de 8,1 mm y conducto arterioso persistente de 13 mm. ECG con inversión del eje eléctrico (patrón P-QRS-T invertido en derivación I) y radiografía de tórax con cardiomegalia y prominencia del tronco de la arteria pulmonar. La angio-TC corroboró los hallazgos previos y demostró displasia bronquial, doble salida del ventrículo derecho (DSVD) y disposición en corazón cruzado, con cruce entre los tractos de entrada de ambos ventrículos. La aorta y la arteria pulmonar emergían paralelas del ventrículo derecho superior (aorta izquierda, pulmonar derecha), coexistiendo con VSD subpulmonar, ASD y PDA. Se identificó retorno venoso sistémico atípico, con vena cava superior e inferior desembocando en la aurícula izquierda morfológica, mientras que las venas pulmonares drenaban en la aurícula derecha morfológica. No se observaron estenosis del tracto de salida pulmonar, pero sí dilatación y tortuosidad de ramas pulmonares distales, además de arco aórtico derecho. El árbol bronquial mostró bronquio principal izquierdo alargado y estrecho, bronquio principal derecho corto y trifurcado, simétrico al izquierdo. El conjunto configura una cardiopatía congénita compleja con discordancia segmentaria múltiple y anomalías asociadas del sistema respiratorio."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 63 años llegó al hospital porque sentía un fuerte dolor en el pecho desde hacía tres horas. Tenía presión alta, pero no diabetes y nunca había fumado. Le hicieron un electrocardiograma y parecía que estaba teniendo un ataque al corazón. La llevaron rápido a hacerle un examen de las arterias del corazón, pero no encontraron obstrucciones. El dolor se le quitó y la vigilaron unos días. Sus análisis mostraron que sí había daño en el corazón, aunque las arterias estaban abiertas. Le dieron medicinas para el corazón y se fue a casa. \n\nDiez días después, volvió a sentirse mal, esta vez con dificultad para respirar. Los estudios mostraron que el corazón se había agrandado y que una parte estaba muy débil, formando una especie de bolsa llamada aneurisma. También tenía un coágulo dentro del corazón. Le dieron medicinas para eliminar líquidos y mejorar la circulación, y añadieron un anticoagulante para prevenir más coágulos.\n\nUna semana más tarde, regresó otra vez por palpitaciones y falta de aire. Tenía un tipo de arritmia peligrosa llamada taquicardia ventricular. Intentaron varias medicinas, pero no funcionaron. Tuvieron que darle descargas eléctricas para detener la arritmia varias veces. Luego le hicieron un procedimiento especial llamado ablación para quemar el área del corazón que causaba la arritmia. Al principio funcionó, pero dos semanas después volvió la taquicardia. Le colocaron un desfibrilador automático (ICD) para protegerla. Más adelante, los médicos decidieron operar para quitar el aneurisma del corazón. Un mes después de la cirugía, los estudios mostraron que su corazón funcionaba mucho mejor y no volvió a tener problemas en varios meses."
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"text": "Una paciente de 63 años ingresó por dolor torácico opresivo de 3 horas de evolución. Aunque tenía antecedentes de hipertensión, no presentaba diabetes ni consumo de tabaco. El ECG mostró elevación del segmento ST, por lo que se sospechó un infarto agudo de miocardio con elevación del ST. Se realizó un cateterismo coronario urgente, pero no se hallaron estenosis significativas, clasificándose como MINOCA. Los niveles de troponina fueron elevados y la ecocardiografía mostró una ligera disminución de la fracción de eyección. Recibió tratamiento estándar y fue dada de alta.\n\nSin embargo, diez días después regresó por disnea progresiva. La ecocardiografía reveló dilatación ventricular izquierda, reducción de la fracción de eyección al 38% y un aneurisma apical con trombo mural. Se diagnosticó insuficiencia cardíaca y se añadió anticoagulación al tratamiento. \n\nUna semana más tarde consultó nuevamente por palpitaciones e insuficiencia respiratoria. Presentaba taquicardia ventricular sostenida que no respondió a antiarrítmicos intravenosos, por lo que requirió múltiples cardioversiones eléctricas. Se realizó una ablación por radiofrecuencia del epicardio, logrando suprimir temporalmente la arritmia. No obstante, dos semanas después hubo recurrencia, por lo que se decidió implantar un desfibrilador automático implantable (ICD). \n\nDado que el aneurisma persistía y favorecía la arritmia, se indicó cirugía para su resección. Un mes tras la intervención, la función cardíaca mejoró notablemente y la paciente permaneció estable durante el seguimiento de 3 meses."
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"text": "Paciente femenina de 63 años, hipertensa crónica sin comorbilidades metabólicas ni hábitos tóxicos, que acude por síndrome coronario agudo con elevación del ST en derivaciones precordiales, desencadenando activación de protocolo de reperfusión. La angiografía coronaria inmediata evidenció coronarias epicárdicas sin lesiones obstructivas significativas (MINOCA), aunque la curva de troponina mostró un patrón ascendente compatible con necrosis miocárdica transmural. La ventriculografía y la TC contrastada documentaron hipocinesia anteroseptal con fracción de eyección ligeramente deprimida. Se instauró tratamiento médico estándar con doble antiagregación, IECA, betabloqueo y estatinas. \n\nA los 10 días, desarrolló insuficiencia cardíaca con remodelado adverso acelerado: dilatación significativa de cavidades izquierdas, FE reducida al 38%, aneurisma apical acinético con trombo mural laminar y péptidos natriuréticos marcadamente elevados. Se añadió anticoagulación plena y diuréticos. \n\nPosteriormente evolucionó a tormenta arrítmica con taquicardia ventricular monomórfica incesante refractaria a antiarrítmicos de clase III y IB, requiriendo múltiples cardioversiones sincronizadas. Se procedió a ablación epicárdica mediante acceso subxifoideo y mapeo electroanatómico tridimensional, logrando supresión aguda del foco arritmogénico. \n\nLa recurrencia precoz de la TV motivó el implante de desfibrilador automático implantable (ICD) como terapia secundaria con ATP efectivo en episodios posteriores. Dado el sustrato estructural persistente, se realizó cirugía de resección de aneurisma ventricular con reconstrucción geométrica del ventrículo izquierdo mediante parche endoventricular. El posoperatorio mostró reversión del remodelado, recuperación de la FE a 50% y disminución sustancial de la insuficiencia mitral funcional, permaneciendo libre de eventos arrítmicos durante el seguimiento temprano."
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"text": "Un hombre de 78 años fue al hospital porque tenía dolor en el abdomen que comenzó en la parte alta y luego se movió hacia el lado derecho. También tenía poco apetito y se sentía muy cansado. Los doctores revisaron su barriga y pensaron que podía ser apendicitis. Le hicieron una tomografía y descubrieron que una pieza de plástico que le habían puesto antes en las vías biliares se había movido y estaba tapando el apéndice. Para arreglarlo, los médicos decidieron sacarla usando una cámara que entra por el colon. Al día siguiente le hicieron el procedimiento y lograron sacar la prótesis sin problemas. El paciente mejoró rápido, ya no le dolía el abdomen, no tuvo fiebre y pudo irse a su casa dos días después. En el control a las dos semanas seguía bien."
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"text": "Un paciente masculino de 78 años, con antecedentes de cardiopatía coronaria, hiperplasia prostática y una colangitis tratada recientemente mediante colocación de una prótesis biliar, acudió a urgencias por un dolor abdominal de 24 horas de evolución, inicialmente epigástrico y luego localizado en fosa ilíaca derecha. En el examen físico presentó signos compatibles con apendicitis aguda, lo cual fue confirmado mediante tomografía computada, que mostró obstrucción del apéndice por migración de la prótesis biliar. Se decidió un manejo endoscópico, realizando colonoscopía al día siguiente. Durante el procedimiento se identificó la prótesis atrapada en el orificio apendicular y se extrajo exitosamente con un asa. El paciente evolucionó favorablemente, con mejoría del dolor y normalización de los parámetros inflamatorios, siendo dado de alta 48 horas después. En el control a las dos semanas se encontraba asintomático."
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"text": "Varón de 78 años con antecedentes de cardiopatía isquémica, hiperplasia prostática benigna bajo tratamiento farmacológico y episodio de colangitis grave dos meses antes, resuelto mediante CPRE con colocación de prótesis biliar plástica única, consultó por cuadro de abdomen agudo inflamatorio de 24 horas, caracterizado por dolor migratorio epigastrio-fosa ilíaca derecha, hiporexia y compromiso del estado general. El examen físico fue positivo para signos de McBurney y Rovsing, y los estudios laboratoriales evidenciaron leucocitosis con desviación izquierda. La tomografía computada contrastada de abdomen y pelvis reveló apendicitis aguda secundaria a obstrucción luminal por migración de la prótesis biliar al conducto apendicular. Se descartó abordaje quirúrgico inmediato, optándose por resolución endoscópica tras preparación colónica y cobertura antibiótica. Durante la colonoscopía terapéutica se visualizó la prótesis impactada en el orificio apendicular, ocluida por detritus, procediéndose a su extracción con asa sin complicaciones. La evolución posprocedimiento fue favorable, con rápida resolución del dolor y descenso de parámetros inflamatorios, permitiendo alta hospitalaria precoz. En control ambulatorio a las dos semanas permanecía asintomático, por lo que se otorgó alta definitiva."
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"text": "Un joven de 24 años fue al dentista porque tenía la boca seca y dolorida después de tomar medicamentos para la ansiedad. Dejó de tomar las pastillas porque sentía molestia en la boca. Los doctores vieron que tenía la lengua irritada, poca saliva y labios muy secos. Le recetaron un gel y un enjuague especial para hidratar la boca, además de vaselina para los labios. También le dijeron que tomara mucha agua, se cepillara bien y que durmiera mejor y hiciera ejercicio. En las siguientes visitas, la boca del paciente empezó a mejorar poco a poco. Después de tres meses, ya no tenía la boca seca y se sentía más tranquilo, aunque no volvió al psiquiatra ni siguió tomando los medicamentos de ansiedad."
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"text": "Un hombre de 24 años acudió a la clínica odontológica debido a una sensación persistente de sequedad bucal acompañada de ligera molestia, la cual apareció tras iniciar un tratamiento psiquiátrico con varios psicofármacos para controlar un trastorno de ansiedad generalizada. Al percibir que su boca se volvía incómoda, abandonó la medicación por iniciativa propia, sin consultar con el especialista. Durante el examen clínico se observaron signos claros de falta de lubricación oral, como labios agrietados, saliva con apariencia espumosa y una lengua con pérdida de papilas gustativas en ciertas áreas. Además, se detectó una higiene oral deficiente con presencia de placa bacteriana acumulada. Las pruebas de medición del flujo salival confirmaron una hiposalivación leve. El tratamiento consistió en la aplicación constante de productos con ácido hialurónico para mantener la humedad, junto con recomendaciones estrictas de higiene y cambios en los hábitos diarios. Con el paso de las semanas, el paciente fue mostrando mejoría gradual tanto en la producción de saliva como en su estabilidad emocional, aunque seguía evitando cualquier atención psiquiátrica. Al cabo de tres meses, la función salival se había normalizado y la sensación de sequedad prácticamente desapareció, aunque aún persistía cierta inestabilidad en el manejo de la ansiedad."
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"text": "Paciente masculino de 24 años, con antecedente psiquiátrico de trastorno de ansiedad generalizada en contexto postinfeccioso por SARS-CoV-2, sometido a politerapia con inhibidor selectivo de la recaptación de serotonina, benzodiacepina y antipsicótico benzamídico, desarrolla un cuadro de xerostomía sintomática de inicio subagudo. La interrupción abrupta del tratamiento psicofarmacológico condicionó una persistencia del componente ansioso sin un abordaje interdisciplinario adecuado. En la exploración estomatológica se objetivaron signos compatibles con hipofunción glandular salival, incluyendo queilitis descamativa, lengua con áreas de depapilación bien delimitadas y saliva de consistencia viscosa, todo ello asociado a un índice de higiene oral subóptimo según la escala OHI-S. La sialometría basal confirmó un flujo salival por debajo del umbral fisiológico, correlacionado con un puntaje CODS indicativo de xerostomía leve. Se instauró manejo tópico mediante formulaciones mucoadhesivas de ácido hialurónico y lubricantes oclusivos, complementado con intervención conductual centrada en la modificación de hábitos higiénico-dietéticos. A lo largo del seguimiento trimestral se constató una recuperación progresiva del volumen salival y un descenso sostenido de los indicadores psicométricos de ansiedad, a pesar de la ausencia de soporte psiquiátrico continuado. El caso evidencia la interacción bidireccional entre disfunción psicogénica y alteraciones de la homeostasis oral, subrayando la importancia de un enfoque terapéutico integrado entre odontología y salud mental."
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"text": "Un hombre de 64 años llegó al hospital porque se sentía muy cansado, no tenía ganas de comer, estaba amarillo de piel y había bajado mucho de peso. Los médicos le hicieron muchas pruebas y vieron que tenía una masa en el pulmón y problemas en el hígado y la sangre. También estaba un poco confundido. Le hicieron estudios especiales y encontraron una bacteria llamada Nocardia y también descubrieron que tenía una enfermedad del sistema de defensas llamada lupus. Le dieron antibióticos y medicación para controlar el lupus. Con el tratamiento empezó a mejorar. Después de dos meses pudo volver a su casa y, con el tiempo, recuperó su peso y se sintió bien."
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"text": "Un paciente de 64 años fue internado por un cuadro prolongado de cansancio, pérdida de apetito, ictericia y una importante pérdida de peso. En una radiografía se observó una masa en el pulmón derecho, por lo que se realizaron múltiples estudios. Los análisis mostraron alteraciones hepáticas, disminución de glóbulos rojos, blancos y plaquetas, junto con signos de inflamación y trastornos inmunológicos. También presentó confusión mental. Una punción de la masa pulmonar reveló una infección por la bacteria Nocardia cyriacigeorgica. Al mismo tiempo, cumplía varios criterios diagnósticos de lupus eritematoso sistémico. Se le administraron antibióticos combinados y tratamiento inmunosupresor con corticoides e hidroxicloroquina, luego reforzado con ciclofosfamida debido al compromiso neurológico. Tras dos meses de hospitalización, se observó mejoría clínica y reducción de la masa pulmonar. Fue dado de alta con seguimiento ambulatorio y, un año después, recuperó peso y se encontraba en buen estado general."
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"text": "Paciente masculino de 64 años con síndrome constitucional de 8 meses de evolución, caracterizado por astenia, anorexia, ictericia colestásica y pérdida ponderal marcada, asociado a masa pulmonar derecha en estudios por imagen. El laboratorio evidenció hepatopatía colestásica, tricitopenia, hipocomplementemia e hipergammaglobulinemia, con ANA título 1/1280 y positividad para múltiples autoanticuerpos (anti-ADNdc, anti-P ribosomal, anti-CCP, anti-C1q), cumpliendo 8 criterios SLICC 2012 y 24 puntos EULAR/ACR 2019 para lupus eritematoso sistémico con compromiso neuropsiquiátrico. La biopsia pulmonar guiada por TC demostró infección concomitante por Nocardia cyriacigeorgica confirmada por MALDI-TOF. Se instauró tratamiento combinado con ceftriaxona más trimetoprima-sulfametoxazol, seguido de minociclina-TMS por vía oral, asociado a meprednisona e hidroxicloroquina; posteriormente se añadieron pulsos de ciclofosfamida ante encefalopatía lúpica. Se obtuvo resolución progresiva de la masa pulmonar y mejoría del estado neurológico. Al año del egreso, el paciente se encontraba eutrófico, lúcido y en remisión clínica."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Un hombre de 21 años, de Brasil y viviendo en Portugal, trabajaba como albañil. Fue llevado al hospital porque tenía dolor en varias articulaciones como rodillas, codos, pies y manos, que ya duraba dos semanas. También tenía fiebre con escalofríos, cansancio, falta de apetito y sudores por la noche. No tenía dolor de cabeza ni de garganta, ni problemas de barriga, orina o heces. Tampoco había viajado ni tenido contactos de riesgo. Fumaba y a veces usaba cannabis, pero no tomaba medicinas.\n\nAl entrar al hospital estaba con fiebre, orientado y respiraba bien. Tenía hinchazón y dolor fuerte en las articulaciones, sobre todo rodillas, codos y pies. También tenía erupciones en la piel, con manchas rojas y redondas, algunas con ampollas y partes muertas en el centro. No tenía problemas en los ojos ni ganglios inflamados. Sus pruebas de corazón, rayos X y ecografía salieron normales. En los análisis de sangre tenía glóbulos blancos altos y signos de inflamación.\n\nLe hicieron varias pruebas y empezaron antibióticos, pero después de 8 días no mejoró. Entonces pensaron en una enfermedad de la piel llamada síndrome de Sweet y le dieron corticoides. Con eso, mejoró el dolor, la fiebre y las lesiones de la piel. Una biopsia después mostró una infección con bacterias llamadas bacilos ácido-alcohol resistentes. Luego confirmaron con otra prueba que era lepra, en su forma grave con una reacción en la piel llamada eritema nodoso leproso. Tras 17 días, salió del hospital tomando corticoides, pero no siguió el tratamiento con antibióticos porque dejó de ir a las consultas."
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"text": "Un hombre de 21 años, originario de Brasil y residente en Portugal desde hacía dos años, fue ingresado en urgencias por dolor articular simétrico en rodillas, tobillos, codos y manos, que llevaba dos semanas de evolución. Presentaba fiebre con escalofríos, cansancio, falta de apetito y sudores nocturnos. Negaba síntomas digestivos, urinarios o respiratorios, así como viajes recientes o contactos de riesgo. Tenía como antecedentes el tabaquismo y consumo ocasional de cannabis.\n\nEn la exploración, se encontró febril, con inflamación y dolor articular evidente, y lesiones cutáneas en rodillas y codos consistentes en manchas rojas y dolorosas, con ampollas y zonas centrales de necrosis. Los estudios iniciales (ECG, radiografía de tórax, ecografía abdominal y ecocardiograma) fueron normales. En los análisis destacaba leucocitosis con neutrofilia, PCR elevada y alteración hepática leve sin ictericia.\n\nSe iniciaron antibióticos con ceftriaxona, pero después de ocho días sin mejoría clínica se valoró la posibilidad de una dermatosis neutrofílica (síndrome de Sweet), comenzando corticoides con rápida mejoría de fiebre, dolor articular y lesiones cutáneas. La biopsia cutánea posterior mostró granulomas no caseosos con bacilos ácido-alcohol resistentes. Una baciloscopia nasal confirmó la presencia de estos bacilos, estableciendo el diagnóstico de lepra multibacilar con eritema nodoso leproso. El paciente fue dado de alta a los 17 días bajo corticoterapia, pero abandonó el seguimiento especializado sin iniciar tratamiento antibacteriano específico."
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"text": "Se trata de un varón de 21 años, natural de Brasil y residente en Portugal, trabajador de la construcción, admitido en urgencias por poliartralgias de carácter aditivo y simétrico de dos semanas de evolución, que comprometían articulaciones tibio-tarsianas, rodillas, codos y metacarpofalángicas. El cuadro se acompañaba de fiebre con escalofríos, astenia, anorexia y sudoración nocturna, sin otros síntomas sistémicos asociados. Como antecedentes solo destacaban tabaquismo y consumo ocasional de cannabis. Al ingreso presentaba fiebre, signos inflamatorios articulares, fluctuación en rodillas, entesopatía aquiliana bilateral y déficit neurológico parcial en la dorsiflexión del pie izquierdo. En la exploración cutánea se objetivaron pápulas y placas eritematosas dolorosas, de morfología circular, con borde bien delimitado, ampollas y necrosis central, localizadas de manera simétrica en las áreas articulares afectadas.\n\nLos estudios complementarios iniciales mostraron leucocitosis con neutrofilia marcada, PCR elevada y citocolestasis sin hiperbilirrubinemia. ECG, radiografía de tórax, ecografía abdominal y ecocardiografía transtorácica resultaron sin hallazgos relevantes. La autoinmunidad, serologías virales, ECA e IGRA fueron negativas salvo discreto aumento de ECA y factor reumatoide. Se inició antibioterapia empírica con ceftriaxona 2 g/día tras toma de hemocultivos y urocultivos. Ante la ausencia de respuesta tras 8 días, y considerando el diagnóstico diferencial de dermatosis neutrofílica, se instauró prednisolona oral con buena evolución clínica y bioquímica.\n\nEl estudio histopatológico de la biopsia cutánea realizada al décimo día mostró infiltrado linfohistiocitario intenso con granulomas no caseosos perineurales y presencia de bacilos ácido-alcohol resistentes. La baciloscopia en exudado nasal y linfa auricular confirmó BAAR, estableciendo el diagnóstico de lepra en su forma multibacilar, complicada con reacción tipo 2 (eritema nodoso leproso). El paciente fue dado de alta al día 17 con corticoterapia sistémica y derivación a consulta de Dermatología; sin embargo, no inició terapia antibacteriana específica debido al abandono del seguimiento especializado, lo que supone un riesgo de persistencia bacilar y complicaciones a largo plazo."
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"text": "Un hombre de 25 años de Siria fue al hospital porque tenía un dolor muy fuerte en el abdomen que empeoraba desde hacía 6 días. El dolor era alrededor del ombligo, aumentaba con comidas grasosas y lo calificaba como 9 de 10 en intensidad. También había vomitado varias veces, pero no tenía fiebre ni cambios en su peso o apetito. El examen físico mostró hinchazón en los párpados y en las piernas. Los estudios de sangre y orina enseñaron que estaba perdiendo muchas proteínas por la orina y que su riñón no estaba funcionando bien. También había señales de que su sangre se coagulaba más de lo normal. Una tomografía encontró un coágulo en la vena mesentérica superior, lo que reducía el flujo de sangre al intestino. La ecografía de los riñones mostró datos de síndrome nefrótico. El paciente empezó tratamiento con medicamentos anticoagulantes, esteroides y otros fármacos para proteger el riñón y el corazón. \n\nMás adelante, regresó al hospital varias veces porque no seguía bien el tratamiento. Tenía más hinchazón en la cara, el cuerpo y el escroto. Los médicos confirmaron con una biopsia de riñón que tenía una enfermedad llamada cambios mínimos, que afecta a los filtros del riñón. Con tratamiento, mejoró y fue dado de alta. Decidió seguir con sus medicinas en su país."
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"text": "Un hombre sirio de 25 años acudió el 8 de febrero de 2024 por dolor abdominal intenso, progresivo desde hacía 6 días, localizado en la región periumbilical y exacerbado tras comidas grasosas, con una intensidad de 9/10. Presentó vómitos en varias ocasiones, sin fiebre ni alteraciones del apetito o peso. En el examen físico destacaba edema periorbital, edema de extremidades inferiores y ascitis moderada. Los estudios de laboratorio mostraron proteinuria masiva, hematuria y niveles bajos de albúmina sérica, junto con deterioro de la función renal y un estado de hipercoagulabilidad. Una tomografía reveló trombosis de la vena mesentérica superior con isquemia intestinal, además de hallazgos compatibles con síndrome nefrótico en la ecografía renal. Se inició tratamiento hospitalario con anticoagulación, corticoides y medidas de soporte, además de una biopsia renal. \n\nEl paciente fue dado de alta con múltiples medicamentos, incluyendo anticoagulantes orales, inmunosupresores y diuréticos. Sin embargo, tuvo varios reingresos debido a un mal apego terapéutico, con empeoramiento del edema. El 1 de marzo se obtuvieron los resultados de la biopsia renal, que mostraron una podocitopatía de cambios mínimos, sin evidencia de depósitos inmunitarios. Tras estabilizarse, fue dado de alta nuevamente y decidió continuar su tratamiento en su país de origen."
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"text": "Varón sirio de 25 años que consulta el 8 de febrero de 2024 por dolor abdominal severo de 6 días de evolución, localizado en región periumbilical, tipo punzante, exacerbado con ingesta de alimentos lipídicos, EVA 9/10, con vómitos recurrentes. Negó fiebre, alteraciones ponderales, cambios en el apetito o disfunción intestinal/urinaria significativa. Al ingreso presentaba edema periorbitario, edema bilateral en extremidades inferiores y ascitis moderada, con TA 144/81 mmHg, FC 84 lpm, FR 18 rpm y SpO₂ 99%. Analítica: proteinuria nefrótica (>3.5 g/24h), hipoalbuminemia severa, hipoproteinemia, hematuria, creatinina sérica elevada, ESR incrementada, hipocomplementemia (C3 reducido), perfil de coagulación con TP prolongado, INR elevado y dímeros-D elevados. Estudio inmunológico negativo (ANA, ANCA, anti-ADN, anti-PLA2R). Hallazgos consistentes con síndrome nefrótico y estado protrombótico. \n\nTC abdominal contrastada: trombosis de vena mesentérica superior con isquemia veno-oclusiva e hipoperfusión de yeyuno, íleon, ciego y colon derecho, engrosamiento mesentérico difuso y ascitis moderada. Ecografía renal: aumento de ecogenicidad cortical bilateral y derrame pleural, hallazgos compatibles con síndrome nefrótico. Manejo inicial: anticoagulación con enoxaparina, esteroides a dosis altas (prednisolona 70 mg/día), biopsia renal y régimen empírico con ciclosporina, diuréticos y estatina, además de inhibidor de la ECA y soporte nefroprotector. \n\nDurante la evolución presentó múltiples reingresos por síndrome nefrótico recurrente asociado a incumplimiento terapéutico. El 1 de marzo, la biopsia renal reveló glomérulos sin semilunas, membranas basales glomerulares engrosadas de manera regular, borramiento difuso de procesos podocitarios y ausencia de depósitos inmunitarios o fibrillas osmófilas, hallazgos concluyentes para podocitopatía primaria tipo cambios mínimos. Tras inmunosupresión y anticoagulación, el paciente mejoró clínicamente y fue egresado con indicación de continuar seguimiento y manejo especializado en su país de origen."
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"text": "Una mujer de 35 años fue llevada al hospital 13 días después de haber dado a luz en su casa. Dijo que durante cinco días había tenido debilidad en su lado derecho y convulsiones. También contó que varios de sus hermanos habían muerto súbitamente con síntomas parecidos. Antes de eso, la mujer había sufrido un fuerte dolor de cabeza y visión borrosa. Buscó ayuda en una clínica local y le dieron medicinas, pero no mejoró. No recordaba el nombre del medicamento y dijo que no había usado remedios tradicionales, aunque se cree que tal vez usó alguno sin saberlo. \n\nAl llegar al hospital, los médicos notaron que estaba confundida y tenía rigidez en el cuello; no tenía fiebre, pero sí presión normal y respiración estable. Los exámenes mostraron anemia y algunos signos de infección leve. Luego le hicieron una tomografía del cerebro y encontraron una hemorragia en la parte izquierda de la cabeza, causada por un coágulo de sangre en las venas del cerebro. Esto se confirmó con otras imágenes (MRI/MRV). \n\nRecibió tratamiento en cuidados intensivos con medicamentos para bajar la presión en el cerebro y evitar más convulsiones, además de anticoagulantes para disolver el coágulo. Después de unos días, recuperó la conciencia, aunque seguía sin poder mover el lado derecho del cuerpo. Continuó recibiendo medicinas y fisioterapia. Dos semanas después, pudo irse a casa, y al mes ya caminaba con ayuda y hablaba mejor, aunque todavía tenía algo de debilidad en la mano derecha y leves problemas para dormir."
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"text": "Una mujer de 35 años, en el día 13 posparto tras un parto domiciliario sin complicaciones, acudió al hospital por cinco días de debilidad en el lado derecho y crisis convulsivas generalizadas. Refería antecedentes familiares con muertes súbitas y síntomas neurológicos similares. Antes de los episodios presentó cefalea intensa, visión borrosa y cambios de humor. Había recibido medicación no especificada sin mejoría y negó el uso consciente de remedios tradicionales, aunque no se descartó su posible consumo. \n\nAl ingreso, la paciente presentaba un nivel de conciencia disminuido (GCS 9/15), rigidez de cuello y signos vitales estables. Se observaron movimientos espontáneos de las extremidades izquierdas y debilidad flácida en el lado derecho. Los análisis mostraron anemia microcítica (Hb 7,5 g/dL), leucocitosis leve y plaquetas elevadas. El TAC cerebral reveló una lesión hemorrágica irregular en el lóbulo parieto-occipital izquierdo compatible con infarto venoso hemorrágico secundario a trombosis del seno sagital superior con edema cerebral y desplazamiento medio. La resonancia MRI/MRV confirmó trombosis del seno sigmoideo izquierdo e infarto hemorrágico subagudo. \n\nSe inició manejo en UCI con manitol, anticonvulsivantes (fenitoína) y anticoagulación con heparina no fraccionada seguida de warfarina oral, junto con acetazolamida y tratamiento de soporte. Evolucionó favorablemente: al tercer día recuperó la conciencia, quedando con hemiplejía espástica derecha. Fue dada de alta al día 16, con tratamiento anticoagulante. Al mes de control podía caminar con apoyo leve y presentaba mejoras motoras (fuerza 4/5) y leves dificultades para encontrar palabras."
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"text": "Paciente femenina de 35 años, multípara (G9 P8), admitida el día 13 posparto tras alumbramiento vaginal domiciliario atendido por comadrona tradicional, con evolución de cinco días de hemiparesia derecha y crisis tónico‑clónicas generalizadas. Antecedentes familiares: tres hermanos con fallecimiento súbito atribuible a cuadros neurológicos similares. El cuadro clínico fue precedido de cefalea holocraneana intensa, visión borrosa, escotomas y labilidad emocional. Recibió medicación oral inespecífica sin respuesta terapéutica; negó uso voluntario de preparados herbales, aunque no se descartó exposición inadvertida de origen cultural. \n\nA su ingreso, presentaba puntuación Glasgow 9/15, rigidez nucal y constantes hemodinámicas normales. Exploración neurológica: hemiparesia flácida derecha, hipotonía, hiperreflexia osteotendinosa y respuesta plantar equívoca. Hematología: anemia microcítica (Hb 7.5 g/dL; VCM 61.2 fL), neutrofilia moderada, plaquetas 455 × 10³/µL; función hepatorrenal conservada. TAC craneal: hemorragia hiperdensa irregular en región parieto‑occipital izquierda con edema perilesional y desplazamiento de la línea media, compatible con infarto venoso hemorrágico secundario a trombosis del seno sagital superior. RM/MRV corroboró isquemia hemorrágica subaguda temporo‑parieto‑occipital izquierda con trombosis concomitante del seno sigmoideo homolateral. \n\nManejo integral en UCI: control de hipertensión intracraneal mediante manitol (350 mL IV bolo + 200 mL TID × 3 días), profilaxis anticonvulsiva (fenitoína 100 mg VO TID) y anticoagulación progresiva (heparina no fraccionada 5 000 UI IV bolo + 17 500 UI SC BID, transición a warfarina 5 mg VO d/ INR objetivo 2–3). Se añadió acetazolamida 500 mg VO TID, hidratación IV y bromocriptina 2.5 mg BID. A las 72 h recuperó la conciencia completa, persistiendo hemiplejía espástica derecha; al día 9 mostró Glasgow 15/15 y estabilidad clínica. Fue dada de alta al día 16 con afasia expresiva leve y movimientos distónicos residuales (warfarina 2.5 mg VO/ día, INR ≈ 3). \n\nEn seguimiento mensual, presentó recuperación motora significativa (fuerza 4/5 en hemicuerpo derecho), anomia residual y trastornos del sueño ocasionales, sin recurrencia convulsiva ni eventos tromboembólicos adicionales. Diagnóstico final: trombosis del seno venoso cerebral puerperal con infarto venoso hemorrágico parieto‑occipital izquierdo subagudo, de probable etiología trombofílica multifactorial."
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"text": "Un hombre de 68 años, con diabetes e hipertensión, fue al hospital por dolor fuerte en la parte baja del abdomen, junto con fiebre, náuseas y vómitos. Al revisarlo, los médicos notaron que tenía dolor en el lado derecho del abdomen, lo que indicaba un problema en la vesícula biliar. \n\nLos estudios mostraron que tenía piedras tanto en la vesícula como en los conductos que llevan la bilis, lo que había causado una infección grave llamada colangitis. También tenía los riñones afectados y se encontraba algo confundido, por lo que su condición se consideró grave. Fue tratado con antibióticos y líquidos por vena para estabilizarlo. \n\nComo su estado no mejoraba, los médicos realizaron un procedimiento especial llamado CPRE, en el que usaron un tubo flexible con una cámara para limpiar los conductos y sacar las piedras. Después del tratamiento, el paciente mejoró rápidamente. Sus análisis de sangre se normalizaron, los riñones volvieron a funcionar bien y recuperó por completo la lucidez. Siete días después, le quitaron la vesícula mediante una cirugía laparoscópica sencilla. Fue dado de alta tras 16 días de hospitalización, recuperado y sin complicaciones."
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"text": "Un hombre de 68 años, con antecedentes de diabetes tipo 2 e hipertensión arterial, acudió al servicio de urgencias por dolor abdominal intenso de dos días de evolución, acompañado de fiebre, vómitos y malestar general. En la exploración física presentó dolor a la palpación en el hipocondrio derecho y signo de Murphy positivo, por lo que ingresó al servicio de gastrocirugía. \n\nEl ultrasonido mostró vesícula aumentada de tamaño con múltiples cálculos y dilatación biliar. Los análisis reportaron leucocitosis, creatinina elevada y enzimas hepáticas ligeramente alteradas. La tomografía y la colangiorresonancia revelaron litiasis vesicular y coledocolitiasis con dilatación de las vías biliares y presencia de un divertículo duodenal. Según las Guías de Tokio 2018, el caso se clasificó como colangitis severa (grado III) con falla renal y neurológica. Se administraron líquidos intravenosos y antibióticos de amplio espectro. \n\nDebido al deterioro clínico, se realizó una colangiopancreatografía retrógrada endoscópica (CPRE), donde se confirmaron varios cálculos en el colédoco y material purulento. Se practicó esfinterotomía corta y dilatación papilar de 12 mm con balón, extrayendo los cálculos por completo. Posteriormente, el paciente mostró recuperación progresiva, normalización de pruebas de laboratorio y mejoría neurológica. Siete días después se efectuó una colecistectomía laparoscópica sin complicaciones, siendo dado de alta tras 16 días de hospitalización en buenas condiciones."
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"text": "Varón de 68 años con antecedentes de diabetes mellitus tipo 2 e hipertensión arterial sistémica, con antecedente quirúrgico de hemorroidectomía remota. Ingresó con cuadro clínico de 48 horas de evolución caracterizado por dolor hipogástrico intenso, náuseas, vómitos de contenido gástrico, fiebre y taquicardia. A la exploración física: abdomen blando, ruidos hidroaéreos positivos y dolor localizado en hipocondrio derecho con signo de Murphy positivo. \n\nUltrasonido hepatobiliar: vesícula de 6 × 4,7 × 4,2 cm, pared de 2,5 mm, múltiples imágenes anecoicas con sombra acústica compatibles con colelitiasis y dilatación del colédoco de 9 mm. Resultados de laboratorio: creatinina 3,6 mg/dL, GGT 224 UI/L, fosfatasa alcalina 231 UI/L, leucocitos 15,5 × 10⁹/L (86 % neutrófilos). Tras reanimación hídrica y manejo por Nefrología, la TAC contrastada evidenció colédoco de 10 mm con múltiples imágenes ovoideas de hasta 9,3 mm; la colangiorresonancia confirmó litiasis vesicular, coledocolitiasis, hidrocolecisto y dilatación tanto intrahepática como extrahepática, además de divertículo duodenal sin inflamación. Diagnóstico conforme a Guías de Tokio 2018: colangitis grado III por coledocolitiasis asociada a disfunción renal y neurológica. \n\nSe inició antibioticoterapia empírica con carbapenémico. Ante el empeoramiento clínico, se realizó colangiopancreatografía retrógrada endoscópica (CPRE). Se evidenció papila intradiverticular (30 mm) con material purulento en su ostium y dilatación biliar (colédoco 12 mm) con cuatro litos de 10–14 mm. El conducto pancreático no se opacificó. Se ejecutó esfinterotomía corta, dilatación transpapilar con balón (12 mm) y barrido biliar, logrando extracción completa de cálculos y fragmentos. Control radiográfico final: vía biliar permeable, sin estenosis residual y flujo biliar libre. \n\nPosteriormente, el curso clínico fue favorable, con resolución de la sintomatología y normalización de los parámetros inflamatorios, bioquímicos y de función renal. A la semana se practicó colecistectomía laparoscópica sin complicaciones. Alta hospitalaria al día 16, con diagnóstico final de colangitis severa secundaria a coledocolitiasis resuelta mediante CPRE exitosa y cirugía laparoscópica diferida."
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"text": "Un hombre de 35 años fue al hospital porque tenía un fuerte dolor en la parte baja de la espalda desde hacía 8 semanas. El dolor empeoró a pesar de los medicamentos que tomaba. Dijo que se había golpeado levemente mientras hacía surf unas semanas antes. Ya le habían hecho radiografías que salieron normales y había probado fisioterapia sin mejoría. Poco antes de comenzar el dolor, tuvo un herpes labial. No tenía enfermedades importantes ni consumía mucho alcohol o tabaco. El dolor era más fuerte por las noches y le dificultaba dormir.\n\nCuando llegó a urgencias, los médicos notaron que había perdido los movimientos de la cara. Contó que su médico le había dicho una semana antes que se trataba de una parálisis causada por un virus del frío, pero no le indicó ningún tratamiento. La parálisis empezó en un lado del rostro y luego afectó a ambos. Además de eso, sentía ardor y molestia en la espalda.\n\nAl hacerle más pruebas, su cerebro y columna no mostraron daños graves. Sin embargo, el líquido cefalorraquídeo mostró signos de una infección por la bacteria *Borrelia*, que también puede causar la enfermedad de Lyme. Los médicos concluyeron que tenía *neuroborreliosis*, una infección que afecta los nervios. Fue tratado con antibióticos por 14 días, y poco a poco recuperó la movilidad de la cara y el dolor desapareció. Cuatro semanas después, estaba completamente recuperado."
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"text": "Un hombre de 35 años acudió al servicio de urgencias por dolor dorsolumbar severo de ocho semanas de evolución, que no mejoraba con los analgésicos. Había sufrido un leve traumatismo practicando surf cinco semanas antes de que apareciera el dolor. Se le habían realizado radiografías normales y había seguido fisioterapia sin alivio. Además, relataba un herpes labial previo al inicio del cuadro. No presentaba antecedentes autoinmunes y su consumo de alcohol, tabaco y cannabis era moderado. El dolor se intensificaba por la noche y era descrito como una sensación de ardor.\n\nDurante la exploración, los médicos observaron una parálisis facial que inicialmente afectaba solo un lado del rostro, pero que se volvió bilateral en 48 horas. El paciente comentó que su médico le había mencionado una “parálisis por frío”, sin iniciar tratamiento. No presentaba fiebre ni alteraciones visuales, aunque sí cierta rigidez cervical y sensibilidad aumentada en la zona lumbar. Los reflejos estaban ligeramente disminuidos en las extremidades y el signo de Lasègue era positivo de forma bilateral.\n\nEl análisis del líquido cefalorraquídeo mostró 29 células, en su mayoría linfocitos, proteínas elevadas y niveles muy altos de anticuerpos tipo IgM frente a *Borrelia*, confirmando neuroborreliosis diseminada en fase temprana. El tratamiento consistió en ceftriaxona intravenosa durante 14 días y aciclovir al inicio, que luego se suspendió al descartarse infección por herpes. Los síntomas mejoraron gradualmente y, tras cuatro semanas, el paciente recuperó por completo la movilidad facial y desapareció el dolor lumbar."
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"text": "Varón de 35 años evaluado en urgencias por dolor dorsolumbar de ocho semanas de evolución, refractario al tratamiento analgésico óptimo. Refería antecedente de traumatismo menor durante la práctica de surf cinco semanas antes del inicio del cuadro. Estudios radiográficos previos fueron normales y la fisioterapia no proporcionó mejoría clínica. Refería herpes labial reciente al comienzo de los síntomas, sin antecedentes autoinmunes relevantes y con consumo moderado de tabaco, alcohol y cannabis. El dolor, de carácter urente, se acentuaba durante la noche, limitando el descanso.\n\nEn la exploración física inicial se constató parálisis facial periférica completa, inicialmente unilateral izquierda, que progresó a diplejía en 48 horas. No presentaba fiebre ni alteraciones sensoriales oculares; pupilas isocóricas y reflejas, movimientos extraoculares conservados y signo de Bell bilateral. Existía discreta rigidez nucal, sin déficit motor o sensitivo en extremidades; reflejos osteotendinosos globalmente hipoactivos (2/4). El signo de Lasègue fue positivo bilateral a 60°, con hiperestesia lumbar concomitante. La TC dorsolumbar no mostró alteraciones estructurales.\n\nEl estudio del líquido cefalorraquídeo evidenció pleocitosis linfocitaria (29 cél/mm³, 75 % linfocitos), proteinorraquia 3662 mg/L y niveles elevados de anticuerpos IgM anti‑*Borrelia* > 190 UA/ml. Las PCR para HSV 1/2 fueron negativas; serologías HSV, VZV y Borrelia burgdorferi (VIDAS®): IgM indeterminada e IgG positiva. Hallazgos compatibles con neuroborreliosis diseminada precoz asociada a meningitis linfocítica y radiculopatía lumbociática. El paciente mencionó estancia reciente en la región de Les Landes, con picaduras de mosquitos y posible exposición a garrapatas, además de eritema axilar autolimitado de cuatro semanas.\n\nSe instauró antibioticoterapia dirigida con ceftriaxona 2 g IV/24 h durante 14 días, junto con aciclovir inicial hasta descartar coinfección herpética. La respuesta clínica fue favorable: resolución progresiva de la diplejía facial y desaparición del dolor neurítico a la primera semana de tratamiento. A las cuatro semanas, el examen neurológico se encontraba normal, con recuperación funcional completa. Este caso resalta la importancia de considerar neuroborreliosis diseminada dentro del diagnóstico diferencial de parálisis facial bilateral, incluso cuando las manifestaciones iniciales simulan cuadros benignos de origen viral."
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"text": "Un hombre de 51 años fue llevado al hospital porque tenía dolor de estómago, vómitos y diarrea fuertes durante más de un día. Esto le causó mucha pérdida de agua y bajada de presión, por lo que fue internado en terapia intensiva. Había comido hongos silvestres que había recogido en su campo, sin saber que eran venenosos. Después de comerlos, comenzó con dolor abdominal, náuseas y vómitos. En el hospital lo trataron con líquidos, carbón activado y medicinas para proteger el hígado. Los exámenes mostraron daño en el hígado y los riñones, pero con el tratamiento fue mejorando. Expertos identificaron los hongos como Lepiota brunneoincarnata, una especie muy tóxica. Luego de 11 días en el hospital, el paciente se recuperó totalmente y sus análisis volvieron a la normalidad. En el control, semanas después, estaba sano y sin secuelas."
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"text": "Un hombre de 51 años ingresó al hospital con vómitos, diarrea y dolor abdominal después de 36 horas de evolución, debido a una fuerte deshidratación e hipotensión que lo llevaron a cuidados intensivos. Relató que había comido hongos silvestres recogidos en su campo en Mendoza, sin sospechar que eran venenosos. Los síntomas aparecieron unas 10 horas después de la comida, con malestar general, vómitos intensos y diarrea sanguinolenta. En el hospital se lo trató con hidratación por vía venosa, carbón activado, N-acetilcisteína, penicilina, vitamina K y medicación protectora gástrica. Los análisis mostraron daño hepático, alteración renal y elevación de las transaminasas. Los familiares llevaron muestras de los hongos, que fueron identificados por expertos del Instituto de Micología y Botánica como Lepiota brunneoincarnata, especie capaz de producir amatoxinas similares a las de Amanita phalloides. Tras un tratamiento intensivo de 11 días, los valores hepáticos y renales se normalizaron progresivamente. El paciente fue dado de alta en buen estado y su control posterior mostró recuperación completa."
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"text": "Varón de 51 años (79 kg) derivado a hospital privado por cuadro gastrointestinal agudo de 36 horas de evolución, caracterizado por vómitos incoercibles, diarrea profusa, dolor abdominal tipo cólico y deshidratación severa, con hipotensión secundaria que motivó ingreso inmediato en unidad de cuidados intensivos. Antecedente de ingesta de hongos silvestres recolectados en su propiedad (Lavalle, Mendoza) el 15 de abril de 2020, procedentes de un cultivo de alfalfa, entorno propicio para especies micotóxicas. La sintomatología digestiva se instauró a las 10 h post ingesta, configurando un cuadro compatible con gastroenterocolitis tóxica. En UCI presentó deposiciones hematoides y presión venosa central de 0 cmH₂O. Se instauró tratamiento intensivo con fluidoterapia cristalina, N-acetilcisteína (70 mg/kg/4 h), penicilina G sódica (1.000.000 UI/4 h), fitomenadiona, metoclopramida, omeprazol y carbón activado por sonda nasogástrica (50 g/6 h durante 4 días). Laboratorios iniciales reportaron aumento marcado de GOT/GPT, elevación de creatinina y signos de insuficiencia hepatorrenal aguda. Se notificó al Centro de Información y Asesoramiento Toxicológico de Mendoza. Los familiares aportaron restos fúngicos remitidos al Instituto de Micología y Botánica (UBA), donde se confirmó *Lepiota brunneoincarnata* Chodat & C. Martín, portadora de amatoxinas alfa y beta, análogas a *Amanita phalloides*. Evolución favorable con restitución funcional progresiva: diuresis adecuada a las 12 h, normalización renal al cuarto día, descenso sostenido de transaminasas (GOT 435 UI/L; GPT 416 UI/L) desde el sexto día, e ictericia leve transitoria (bilirrubina total máxima: 4,01 mg/dL). Alta hospitalaria al undécimo día con parámetros hepatorrenales y de coagulación dentro de rango fisiológico. Control ambulatorio al 2 de junio sin alteraciones clínicas ni bioquímicas. Caso representativo de intoxicación amatoxínica severa por *Lepiota brunneoincarnata* con daño hepatorrenal reversible tras terapéutica intensiva protocolizada."
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"text": "Una mujer de 29 años tuvo fiebre, dolor de estómago y vómitos durante varios días. Al principio, los médicos pensaron que era una gripe tipo B, porque las primeras pruebas no mostraron nada malo. Pero luego empezó a tener muchas convulsiones seguidas. Aunque los primeros estudios del cerebro parecían normales, su estado empeoró mucho. Entró en una situación grave en la que las convulsiones no paraban. Las nuevas pruebas mostraron algunas zonas del cerebro afectadas, pero sin daño profundo. \nEn el hospital, los médicos vieron que su orina tenía un color anaranjado. Pensaron que podía tener una enfermedad poco común llamada porfiria aguda, que puede causar dolor, fiebre y convulsiones. Las pruebas confirmaron esa enfermedad. Le dieron un medicamento llamado hematina, y con el tratamiento su orina volvió al color normal y empezó a sentirse mejor. Poco a poco despertó y pudieron dejar de darle las medicinas que la mantenían dormida. Después de 20 días en el hospital, volvió a su casa completamente bien y sin ningún daño en el cerebro."
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"text": "Se presenta el caso de una mujer de 29 años que tuvo fiebre, vómitos y dolor abdominal durante la semana anterior, siendo diagnosticada inicialmente de gripe B. La tomografía de abdomen fue normal. Posteriormente comenzó con crisis epilépticas recurrentes y, aunque las primeras tomografías y resonancias de cerebro fueron normales, la evolución fue desfavorable, desarrollando un estatus epiléptico. Una TC de control realizada 72 horas después mostró múltiples lesiones confluentes en la corteza y sustancia blanca subcortical parietooccipital y frontoparietal bilateral. La RM craneal confirmó estos hallazgos y evidenció múltiples focos de realce leptomeníngeo y cortical, sin afectación de núcleos basales ni del tronco encefálico, y sin restricción a la difusión. \nSe realizó punción lumbar con resultados normales. Durante la hospitalización se observó orina con tinte anaranjado, por lo que se sospechó una porfiria aguda. Las pruebas confirmaron el diagnóstico al mostrar niveles elevados de porfobilinógeno, ALA y porfirinas en orina. Se inició tratamiento con hematina, logrando mejoría progresiva y recuperación completa. Tras 20 días de ingreso se suspendió la sedación, y la paciente fue dada de alta sin secuelas neurológicas."
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"text": "Se presenta el caso clínico de una paciente femenina de 29 años que, tras un pródromo de una semana caracterizado por fiebre, dolor abdominal tipo cólico y vómitos, fue inicialmente diagnosticada de infección por virus Influenza tipo B, con TC abdominopélvica sin hallazgos estructurales relevantes. La paciente desarrolló posteriormente crisis epilépticas tónico-clónicas recurrentes, que evolucionaron a un estatus epiléptico refractario a benzodiacepinas, levetiracetam y valproato. Las neuroimágenes iniciales (TC y RM craneales) no revelaron alteraciones, pero una nueva TC realizada a las 72 horas evidenció múltiples lesiones confluentes corticosubcorticales en regiones parietooccipitales y frontoparietales bilaterales. La RM cerebral contrastada confirmó compromiso difuso de sustancia blanca subcortical con focos de realce leptomeníngeo y cortical bilateral, preservándose ganglios basales, troncoencefálico y sin restricción a la difusión. La correlación imagenológica fue compatible con proceso encefalopático tóxico-metabólico agudo de etiología no filiada. \n\nEl análisis del líquido cefalorraquídeo (LCR) fue rigurosamente normal en citología, bioquímica y microbiología, descartando infecciones del sistema nervioso central. La observación de orina con cromaturia anaranjada junto con el contexto clínico condujo a la sospecha de porfiria aguda intermitente. Las determinaciones urinarias de porfobilinógeno (PBG), ácido δ-aminolevulínico (ALA) y porfirinas mostraron incremento marcado, confirmando la crisis neurovisceral porfirínica. \n\nSe instauró tratamiento con hematina intravenosa (3 mg/kg/día por 4 días) y medidas de soporte intensivo, con evolución favorable: resolución del estatus epiléptico, restitución del nivel de conciencia y normalización de la cromaturia. Se retiró la sedación al vigésimo día de hospitalización, observándose recuperación neurológica completa sin secuelas motoras ni cognitivas. El diagnóstico final fue de encefalopatía neurotóxica aguda secundaria a crisis de porfiria aguda intermitente, con remisión total en los controles de seguimiento."
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"text": "Un hombre de 71 años con diabetes y enfermedad de Chagas bajó mucho de peso. Fue diagnosticado con un problema serio en el esófago (megaesófago), que se trató con un procedimiento para abrirlo. Al hacerle más estudios encontraron obstrucciones muy fuertes en las arterias del corazón. La cirugía era muy riesgosa, por lo que decidieron colocar stents por cateterismo en dos etapas. En la primera le implantaron stents en varias arterias, y un mes después, en la segunda intervención, también pudieron tratarlas aunque ocurrió una complicación, que se resolvió de inmediato con otro stent. Al final, el flujo de sangre fue bueno y el corazón siguió funcionando normal. El paciente se recuperó bien y fue dado de alta en buenas condiciones."
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"text": "Un varón de 71 años con diabetes y enfermedad de Chagas presentó pérdida de peso importante y fue diagnosticado de megaesófago con obstrucción al nivel del cardias. Tras realizar una dilatación endoscópica exitosa, se valoró su estado cardiovascular y se detectó angina de esfuerzo. El cateterismo mostró enfermedad coronaria multivaso muy calcificada: lesiones graves en el tronco coronario izquierdo, descendente anterior, diagonales y vasos de la coronaria derecha, con oclusión crónica de la circunfleja. Considerando alto riesgo quirúrgico, se decidió realizar intervención coronaria percutánea (ICP) en dos etapas. En la primera se trataron tronco común, LAD y ramas diagonales mediante rotablación y colocación de stents farmacoactivos con técnica de mini-crush. En la segunda, un mes después, se trataron ramas posteriores de la coronaria derecha, donde se produjo una disección iatrogénica que fue corregida exitosamente con un DES adicional. El resultado final fue óptimo (flujo TIMI 3) y el paciente se recuperó sin eventos adversos relevantes, dado de alta en buenas condiciones y con función ventricular preservada."
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"text": "Paciente masculino de 71 años con DM2 e infección crónica por Trypanosoma cruzi (enfermedad de Chagas), ingresó con pérdida ponderal significativa y disfagia secundaria a megaesófago obstructivo, tratado con dilatación endoscópica. En estudio complementario presentó angina de esfuerzo y fue remitido a coronariografía, que demostró enfermedad coronaria multivaso difusa y severamente calcificada: tronco coronario izquierdo distal con estenosis crítica (≈80%), LAD medio 90%, ramas diagonales con lesiones ostiales/proximales 70–80%, RCA media con estenosis intermedia (≈50%) y enfermedad severa en PDA y RPLA (80% y 70%), con LCx ocluida crónicamente y circulación colateral grado II. FEVI conservada. Con STS score 15,8% y EuroSCORE II 4,67%, se descartó CABG por riesgo prohibitivo y fragilidad clínica, optándose por estrategia de ICP escalonada con rotablación (RA) y DES. Primera sesión: RA con burr 1,5 mm, predilatación 3,0×20 mm a 14 atm, implante progresivo de DES farmacoactivos en LM-LAD-DG mediante técnica de bifurcación mini-crush y kissing balloon final, logrando restauración de flujo TIMI 3. Segunda sesión (30 días): RA en PDA/RPLA con RotaWire, implante de DES 2,75 mm; se produjo disección extensa de RCA media secundaria a interacción agresiva burr-catéter guía 7F, corregida inmediatamente con colocación de DES 4,0×32 mm con resultado angiográfico óptimo. Evolución: elevación de CK-MB 2× sin compromiso clínico, cierre femoral con dispositivos AngioSeal 8F/6F, UCI 48h, alta al 3.º día en buen estado general. Caso destaca la viabilidad de revascularización percutánea avanzada (rotablación, técnicas de bifurcación, rescate de disección iatrogénica) en enfermedad coronaria multivaso altamente calcificada con comorbilidad chagásica, donde el riesgo quirúrgico contraindica CABG y la ICP compleja constituye alternativa resolutiva."
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"text": "Un bebé de cinco meses llegó al hospital con tos, mocos y dificultad para respirar. Tenía fiebre, comía poco y vomitaba después de las comidas. Al revisarlo, los médicos vieron que respiraba rápido y le costaba hacerlo. Le dieron oxígeno y se sintió mejor. Las pruebas mostraron que tenía una bronquiolitis causada por un virus. Pero en la radiografía del pecho, los doctores notaron que su corazón se veía más grande. Luego, las imágenes mostraron que había una masa dentro del corazón. Pensaron que podía ser un tumor, así que hicieron más estudios. Al final, los análisis confirmaron que era un fibroma, un tipo de tumor benigno (no canceroso), pero grande y difícil de quitar. El bebé necesitó varios tratamientos, pero su corazón seguía débil. Meses después, le hicieron un trasplante de corazón y se recuperó bien."
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"text": "Un lactante de cinco meses, previamente sano, fue ingresado al hospital por tos, obstrucción nasal y dificultad respiratoria, que empeoraron en las últimas 24 horas. Presentaba fiebre, vómitos y disminución del apetito. En los exámenes, se detectó hipoxemia y sonidos anormales en los pulmones, además de un agrandamiento de la silueta cardíaca en la radiografía. Se diagnosticó bronquiolitis viral por virus sincitial respiratorio, pero los estudios cardíacos revelaron una gran masa en el ventrículo izquierdo, con afectación de la función cardíaca. Las imágenes y biopsias iniciales no permitieron un diagnóstico definitivo, por lo que se intentó tratamiento con sirolimus, sin éxito. Finalmente, una segunda biopsia confirmó un fibroma cardíaco, un tumor benigno pero de comportamiento agresivo por su tamaño y localización. El paciente requirió hospitalización prolongada, múltiples medicamentos y apoyo hemodinámico. Debido al deterioro progresivo de la función cardíaca, fue incluido en lista de trasplante y, seis meses después, recibió un trasplante de corazón con buena evolución postoperatoria."
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"target_audience": "Profesionales / Universidad o posgrado",
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"text": "Se documenta el caso clínico de un lactante masculino de cinco meses con bronquiolitis viral aguda por virus respiratorio sincitial, en quien se detectó incidentalmente una masa cardíaca intramural localizada en la pared lateral del ventrículo izquierdo. El fibroma cardíaco, definido como una neoplasia benigna compuesta por fibroblastos y abundante matriz colágena, constituye el segundo tumor primario más frecuente del corazón en la población pediátrica tras el rabdomioma. El abordaje diagnóstico incluyó radiografía de tórax, ecocardiografía, tomografía computarizada y resonancia magnética cardíaca; estas pruebas mostraron una lesión heterogénea, parcialmente calcificada y con extensión extracardíaca que comprimía la cavidad ventricular izquierda y comprometía su función sistólica global. Dado que la resección quirúrgica resultaba inviable por la infiltración miocárdica, se instituyó tratamiento farmacológico con sirolimus, inhibidor de la vía mTOR que actúa bloquando la proliferación celular mediante detención del ciclo en fase G1; sin embargo, el efecto terapéutico fue nulo y la fracción de eyección descendió hasta el 35 %. Por consiguiente, ante el deterioro hemodinámico y la insuficiencia cardíaca refractaria, se procedió al trasplante cardíaco. Este caso ilustra la complejidad de las neoplasias cardíacas primarias en lactantes, las cuales presentan una paradoja clínica: benignidad histológica pero comportamiento expansivo, lo que genera desafíos significativos para la diferenciación diagnóstica, la planificación terapéutica y el pronóstico a largo plazo."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 65 años de Venezuela empezó a sentir dolor en el abdomen durante varios meses. Al principio el dolor era leve y se sentía en toda la barriga, pero luego se concentró en la parte baja derecha. También tuvo días de estreñimiento y otros con diarrea, fiebre y poco apetito. Cuando fue al hospital, los médicos sintieron una masa al tocar su abdomen y decidieron hacerle estudios. En la colonoscopia vieron una parte del intestino inflamada y con una posible masa. La tomografía mostró que una parte del intestino se había metido dentro de otra, algo que se llama intususcepción, causado por una lesión o tumor. \n\nLos médicos operaron para arreglar el intestino. Encontraron que una parte del intestino delgado estaba metida dentro del colon y que tenía un tumor. Sacaron la parte enferma y unieron los extremos del intestino. La operación salió bien y la mujer se recuperó poco a poco, pudiendo comer a los pocos días. Se fue del hospital sin complicaciones. Los exámenes del tejido del tumor mostraron un tipo de crecimiento anormal con inflamación alrededor, y los doctores confirmaron que se trataba de una lesión del intestino con características de malignidad moderada."
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"text": "Una mujer de 65 años procedente de Mérida, Venezuela, acudió al hospital por un cuadro de dolor abdominal de cuatro meses de evolución. Al comienzo el dolor era leve y difuso, pero con el tiempo se localizó en la parte inferior derecha del abdomen y se acompañó de fiebre, cambios en el hábito intestinal (alternancia entre estreñimiento y diarrea) y disminución del apetito. En el examen físico, los médicos detectaron una masa móvil y dolorosa en la fosa ilíaca derecha. El resto del examen fue normal. \n\nUna tomografía abdominal con doble contraste mostró una alteración característica del tránsito intestinal: un segmento del íleon se introducía dentro del colon derecho, hallazgo compatible con una intususcepción íleo-cólica causada probablemente por una lesión tumoral localizada. Ante estos hallazgos, se decidió intervenir quirúrgicamente. Durante la cirugía, se confirmó la intususcepción y se identificó una masa en el íleon y el ciego, acompañada de ganglios mesentéricos aumentados de tamaño. Se practicó una hemicolectomía derecha, se realizó una anastomosis íleo-transversa y se efectuó lavado y drenaje de la cavidad abdominal. La recuperación fue favorable: la paciente inició la alimentación oral a las 48 horas, fue dada de alta al quinto día y continuó el seguimiento sin complicaciones.\n\nEl análisis anatomo-patológico del tejido extirpado evidenció una neoplasia de tipo endotelial formada por estructuras tubulares con células de citoplasma eosinófilo y núcleos vesiculares. Estas células mostraban signos de inflamación, áreas de necrosis, fibrosis colágena y proliferación vascular irregular. Los resultados histológicos fueron compatibles con un hemangioendotelioma intestinal de comportamiento maligno intermedio, considerado el origen de la intususcepción."
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"text": "Se presenta una paciente femenina de 65 años, procedente de Mérida (Venezuela) y con antecedente de apendicectomía abierta, quien cursaba con una evolución clínica de cuatro meses caracterizada por dolor abdominal progresivo de inicio insidioso, inicialmente difuso y de leve intensidad, que posteriormente se localizó en fosa ilíaca derecha, acompañado de alteraciones del hábito intestinal (estreñimiento alternado con diarrea), fiebre intermitente e intolerancia a la vía oral. En la exploración física, el abdomen se encontraba plano y depresible, con una masa dolorosa y móvil de aproximadamente 5 × 5 cm en la fosa ilíaca derecha, sin signos de irritación peritoneal; el resto de la evaluación fue normal. La colonoscopia reveló una tumoración subepitelial cecal, lo que orientó hacia una probable lesión neoplásica ileocecal. \n\nLa tomografía abdominopélvica con doble contraste (oral e intravenoso) mostró pérdida de la arquitectura habitual ileocecal, dilatación del ciego y evidencia de intususcepción íleo‑cólica que se extendía hasta el ángulo esplénico del colon, configurando una masa compleja con doble realce y trayectos vasculares internos preservados. Estos hallazgos, en ausencia de signos de isquemia parietal, fueron interpretados como intususcepción secundaria a una lesión tumoral. Dado el riesgo de obstrucción y necrosis intestinal, se decidió realizar laparotomía exploradora.\n\nIntraoperatoriamente se constató la invaginación íleo‑cólica asociada a un tumor de 10 cm de diámetro en el íleon terminal y en la válvula ileocecal, con extensión a la serosa, compromiso luminal y múltiples linfadenopatías mesentéricas (<2 cm), sin lesiones hepáticas ni peritoneales. Se practicó una hemicolectomía derecha extendida hasta la emergencia de la arteria cólica derecha, con cierre de muñón de colon transverso y anastomosis íleo‑transversa término‑lateral, seguida de lavado y drenaje peritoneal. La paciente evolucionó de forma satisfactoria, reiniciando tolerancia oral a las 48 horas y recibiendo el alta hospitalaria al quinto día. \n\nEl examen histopatológico evidenció proliferación vasculiforme constituida por estructuras tubulares revestidas por células endoteliales de citoplasma intensamente eosinófilo, núcleos vesiculosos y vacuolas intracitoplasmáticas que conformaban luces endoteliales con eritrocitos intraluminales. Se observaron mitosis escasas, necrosis focal, infiltrado inflamatorio mixto y fibrosis colágena densa en el estroma circundante. Las coloraciones PAS y tricrómico de Gomori mostraron acentuada formación de tejido conjuntivo fibroso peritumoral. La correlación anatomoclínica y morfológica sustentó el diagnóstico definitivo de hemangioendotelioma intestinal de malignidad intermedia, entidad vascular infrecuente caracterizada por crecimiento infiltrante local y potencial metastásico limitado, responsable del cuadro de intususcepción invaginante observado en esta paciente."
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"text": "Un hombre de 35 años que trabajó muchos años como arenador llegó al hospital muy enfermo, con dificultad para respirar y muy delgado. Hace poco le habían dicho que tenía tuberculosis y estaba tomando medicamentos. También tenía una enfermedad llamada esclerosis sistémica. En los estudios, los médicos vieron que tenía aire fuera del pulmón (neumotórax) y manchas en los pulmones. Le pusieron un tubo para sacar el aire y le dieron oxígeno para usar en casa. No pudieron hacerle más estudios porque estaba muy enfermo. Siguió con los medicamentos para la tuberculosis y fue atendido por varios especialistas. No pudo recibir otros tratamientos porque tenía una infección activa. Diez meses después, volvió al hospital por problemas para respirar y falleció bajo cuidados especiales, con el acuerdo de su familia."
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"text": "Un hombre de 35 años, que trabajó como arenador durante ocho años, ingresó al hospital en mal estado general, con mucha dificultad para respirar y bajo peso. Tenía tuberculosis pulmonar diagnosticada un mes antes y estaba en tratamiento con cuatro medicamentos. También tenía esclerosis sistémica, y había fumado y consumido cocaína en el pasado. La radiografía de tórax mostró un neumotórax izquierdo, por lo que se le colocó un tubo de drenaje. La tomografía reveló masas en los pulmones, engrosamiento del tejido pulmonar y ganglios agrandados en el mediastino, compatibles con silicosis complicada y enfermedad pulmonar intersticial secundaria a esclerosis sistémica. No se pudieron hacer más estudios ni pruebas de función pulmonar porque el paciente estaba muy grave. Se continuó el tratamiento para la tuberculosis, se indicó oxígeno en casa y fue derivado a especialistas en enfermedades intersticiales y reumatología. No se pudo iniciar inmunosupresores por la infección activa. Diez meses después, el paciente volvió a internarse por insuficiencia respiratoria y falleció bajo cuidados paliativos, con el consentimiento de su familia."
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"text": "Se reporta el caso de un varón de 35 años, ex‑arenador con exposición ocupacional prolongada a sílice durante ocho años consecutivos, que ingresó en condiciones generales deterioradas, con disnea funcional clase III/IV (según NYHA) y saturación de oxígeno de 88 % al aire ambiente. Entre sus antecedentes destacaban tuberculosis pulmonar diagnosticada un mes antes por lavado broncoalveolar, bajo tratamiento antifímico cuádruple (isoniacida, rifampicina, pirazinamida y etambutol), antecedente de tabaquismo (5 paquetes/año), consumo previo de cocaína y diagnóstico reciente de esclerosis sistémica (ES) en tratamiento con meprednisona 20 mg/día. \n\nLa radiografía de tórax inicial evidenció un neumotórax izquierdo grado I que requirió colocación de tubo de drenaje pleural. En la tomografía computarizada de tórax se observaban masas hiperdensas confluentes, engrosamiento difuso del intersticio pulmonar con patrón de neumonía intersticial no específica (NSIP) y pérdida de volumen bilateral, además de adenomegalias mediastínicas múltiples. En virtud de los antecedentes ocupacionales, la morfología radiológica y la coexistencia de ES, se estableció el diagnóstico de silicosis pulmonar complicada asociada a enfermedad pulmonar intersticial secundaria a esclerosis sistémica, configurando un cuadro de afectación parenquimatosa mixta.\n\nEl estadio clínico avanzado y la situación funcional grave imposibilitaron la realización de espirometría y pruebas de difusión para determinar la magnitud de la restricción ventilatoria. Terapéuticamente, se decidió continuar el esquema antifímico y añadir oxigenoterapia domiciliaria permanente, con derivación a unidades de intersticiopatías y reumatología para manejo interdisciplinario. No se instauró inmunosupresión en virtud de la infección activa y del riesgo de reactivación tuberculosa. El curso posterior fue desfavorable: el paciente presentó una evolución hacia la insuficiencia respiratoria crónica con reagudizaciones sucesivas, lo que motivó su reingreso diez meses más tarde, falleciendo bajo cuidados paliativos. Este caso ilustra una complicación de la coexistencia entre silicosis y esclerosis sistémica (silico‑esclerosis), cuyo pronóstico es marcadamente ominoso por la sinergia deletérea entre la inflamación fibrosante y la injuria alveolar crónica inducida por sílice."
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"text": "Una mujer de 34 años fue al hospital. Se sentía muy cansada desde hace cinco días. Sudaba mucho y sentía calor. Su corazón latía muy rápido. Ya había sentido esto antes pero más leve. En cinco meses había bajado cinco kilos sin querer. El doctor la revisó. Su corazón latía 120 veces por minuto. Su presión estaba alta. Tenía el cuello hinchado. Le temblaban las manos. Sus ojos estaban saltones. Le hicieron análisis de sangre. Los resultados mostraron un problema en la tiroides. La tiroides es una glándula del cuello. Produce hormonas importantes. La de ella producía demasiadas hormonas. Esto se llama enfermedad de Graves. Le dieron medicinas para la tiroides. También le dieron medicina para el corazón. Pero no mejoró. Volvió al hospital tres veces. Las medicinas no funcionaban bien. Los doctores probaron otras medicinas más fuertes. Tampoco funcionaron. La mujer tomaba sus medicinas todos los días. Los doctores lo comprobaron. Después de muchos meses sin mejorar, decidieron operarla. Le quitaron la tiroides completa. La operación salió bien. Ahora toma una pastilla diaria. Se siente mucho mejor. Su corazón late normal. Ya no suda ni tiembla."
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"text": "Una mujer de 34 años sin antecedentes médicos acudió al hospital porque presentaba fatiga, palpitaciones, sudoración intensa e intolerancia al calor, síntomas que habían empeorado en los últimos días y que llevaba notando levemente desde hacía dos años. También había perdido alrededor de cinco kilos sin motivo aparente. En la revisión física, los médicos detectaron un bocio difuso (aumento del tamaño del cuello por la tiroides), temblores finos en las manos y ojos ligeramente saltones (proptosis). Los análisis de laboratorio mostraron niveles muy elevados de hormonas tiroideas (T3 y T4) y anticuerpos contra el receptor de la TSH positivos, lo que confirmó el diagnóstico de enfermedad de Graves. \n\nEl tratamiento se inició con carbimazol (CBZ) y propranolol, pero los valores tiroideos seguían fuera de rango a pesar de los aumentos progresivos de dosis. Más adelante, se cambió el medicamento a propiltiouracilo (PTU) y se agregaron corticoides, aunque la paciente continuó con hipertiroidismo. A pesar de seguir las indicaciones y tomar la medicación correctamente, la tiroides seguía muy activa, por lo que se consideró que el hipertiroidismo era resistente a los fármacos. \n\nAnte esta situación, los médicos recomendaron una tiroidectomía total como solución definitiva. La cirugía se realizó sin complicaciones y el análisis posterior confirmó una enfermedad de Graves avanzada. Desde entonces, la paciente recibe tratamiento de reemplazo hormonal con levotiroxina (75 µg diarios), y sus niveles de hormonas tiroideas se han mantenido normales, sin vuelta de los síntomas."
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"text": "Paciente femenina de 34 años sin antecedentes mórbidos que consultó por síndrome tirotóxico pentadiano caracterizado por astenia progresiva invalidante, termofobia marcada, diaforesis profusa y palpitaciones sin modulación circadiana, superpuesto a sintomatología prodrórmica bianual oligosintomática. Concomitantemente presentó pérdida ponderal involuntaria de 5 kilogramos en período quinquemestral. La exploración física reveló taquicardia sinusal persistente (120 lpm), hipertensión arterial sistémica grado I (140/100 mmHg), bocio difuso grado II según clasificación OMS, temblor postural distal de alta frecuencia y baja amplitud, además de oftalmopatía infiltrativa de Graves-Basedow con proptosis bilateral asimétrica, epífora secundaria y retracción palpebral de von Graefe predominantemente derecha. El perfil bioquímico tiroideo confirmó tirotoxicosis primaria severa con supresión completa del eje hipotálamo-hipófisis-tiroides (TSH <0.01 mIU/L; VN: 0.3-4.2), hiperfunción tiroidea marcada evidenciada por T3 libre 2.8 veces sobre límite superior (17.8 pmol/L; VN: 3.7-6.4) y T4 libre 2.3 veces elevada (52.5 pmol/L; VN: 11-23.3). La determinación de inmunoglobulinas estimulantes del receptor de TSH (TSI/TRAb) resultó francamente positiva (16.5 IU/L; punto de corte: 1.75 IU/L), estableciéndose diagnóstico inequívoco de enfermedad de Graves-Basedow autoinmune. Se instauró esquema terapéutico inicial con metimazol (carbimazol) 20 mg/día asociado a betabloqueo no selectivo mediante propranolol 80 mg de liberación prolongada. Sin embargo, tras período cuatrisemanal de tratamiento, persistió tirotoxicosis bioquímica refractaria (TSH <0.01, T3: 17.5, T4: 64.1 pmol/L), requiriendo titulación escalonada hasta dosis máxima de CBZ 60 mg/día fraccionada en tres tomas, sin lograr remisión bioquímica ni clínica satisfactoria. Habiéndose verificado exhaustivamente la adherencia farmacológica mediante estrategias múltiples convergentes (entrevista motivacional estructurada, auditoría de dispensación farmacéutica, neutropenia relativa secundaria a tionamida y descenso parcial de TRAb de 16.5 a 6.9 IU/L), y descartándose síndrome malabsortivo mediante panel celíaco negativo (IgA-tTG <7 U/mL) y parámetros nutricionales preservados (cianocobalamina: 425 pg/mL, albúmina: 4.2 g/dL), se estableció diagnóstico de enfermedad de Graves farmacorresistente a tionamidas tipo I. Por consiguiente, se implementó rotación a propiltiouracilo en dosis inicial de 300 mg/día, escalando progresivamente hasta 450 mg/día, complementado transitoriamente con terapia glucocorticoide (prednisolona 20 mg/día en pauta descendente octosemanal) sin alcanzar remisión bioquímica sostenida. La respuesta subóptima persistente al tratamiento médico máximo (último perfil: TSH <0.01, T3: 7 pmol/L, T4: 25.5 pmol/L), asociada al riesgo incrementado de hepatotoxicidad fulminante y agranulocitosis severa con tionamidas en dosis supraterapéuticas prolongadas, determinó indicación perentoria de tiroidectomía total como modalidad terapéutica definitiva. El procedimiento quirúrgico transcurrió sin complicaciones postoperatorias inmediatas ni tardías, lográndose eutiroidismo sustitutivo con levotiroxina 75 mcg/día (TSH actual: 3.42 mIU/L). Este caso paradigmático ilustra la complejidad diagnóstico-terapéutica de la enfermedad de Graves refractaria a antitiroideos de síntesis, entidad cuya prevalencia oscila entre 5-10% según series contemporáneas, requiriendo consideración temprana de modalidades ablativas definitivas (radioyodo I-131 o tiroidectomía) para prevenir complicaciones cardiovasculares graves derivadas de la tirotoxicosis persistente, incluyendo fibrilación auricular, insuficiencia cardíaca de alto gasto y crisis tirotóxica potencialmente letal."
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"text": "Una mujer japonesa de 35 años tenía una enfermedad en los riñones y necesitaba diálisis tres veces por semana. Al quedar embarazada, los médicos aumentaron sus tratamientos de diálisis para cuidar mejor su salud y la del bebé. A las 12 semanas, empezó a tener falta de aire y tos. Luego, a las 22 semanas, su corazón comenzó a fallar, y los médicos decidieron que era más seguro hacerle una cesárea antes de tiempo. \n\nAntes de la operación, le colocaron vías para aplicar medicamentos y controlar su presión. Le hicieron anestesia en la espalda para que no sintiera dolor durante la cirugía. La cesárea empezó cuando el efecto de la anestesia fue suficiente. Los médicos usaron distintos medicamentos para mantener su presión estable y ayudar a su corazón durante la operación. \n\nEl bebé nació cuatro minutos después de que comenzó la cirugía. La madre no sintió dolor ni falta de aire. Después de la operación, recibió tratamiento especial y diálisis. Su recuperación fue buena y salió del hospital junto a su bebé. Ambos estaban bien cuando se escribió este informe."
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"text": "Una mujer japonesa de 35 años con insuficiencia renal crónica causada por glomerulonefritis estaba en tratamiento con hemodiálisis tres veces por semana antes de quedar embarazada. Cuando se confirmó el embarazo, la frecuencia de diálisis se aumentó progresivamente hasta seis veces por semana, ya que presentó síntomas de falta de aire y tos acompañados de disminución de la función cardíaca (fracción de eyección del 40 %). A las 22 semanas, el empeoramiento de los síntomas y la aparición de congestión pulmonar llevaron a un nuevo ingreso en cuidados intensivos, donde se observó una fracción de eyección del 20 %. Con el apoyo de un equipo multidisciplinario, se decidió programar una cesárea a las 24 semanas de gestación para proteger la vida de la madre.\n\nAntes del procedimiento, se sustituyó la heparina por nafamostat como anticoagulante para la diálisis. En quirófano, se practicaron accesos intravenosos, arterial y yugular central para el monitoreo continuo. Se aplicó anestesia combinada espinal y epidural empleando bupivacaína, fentanilo y ropivacaína, junto con infusión de fenilefrina para prevenir la hipotensión. Durante la operación, la paciente permaneció estable y sin molestias. \n\nEl parto se completó cuatro minutos después de la incisión uterina y ambos pacientes —madre e hijo— evolucionaron de forma favorable. La madre fue trasladada a la UCI para recibir hemodiálisis posoperatoria y fue dada de alta al décimo día. La función cardíaca mejoró tras el parto y, al momento del seguimiento, tanto ella como el recién nacido se encontraban sin complicaciones."
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"target_audience": "Profesionales / Universidad o posgrado",
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"text": "Se presenta el caso de una paciente japonesa de 35 años (42,7 kg, 147 cm) con insuficiencia renal terminal secundaria a glomerulonefritis crónica, en programa de hemodiálisis trisemanal previo al embarazo. Tras confirmarse la gestación, el régimen dialítico se incrementó gradualmente a seis sesiones semanales para optimizar el equilibrio hidroelectrolítico y prevenir descompensación cardiovascular. A las 12 semanas desarrolló disnea progresiva y tos; la ecocardiografía transtorácica evidenció fracción de eyección del ventrículo izquierdo (FEVI) del 40 % e hipertensión pulmonar leve. Pese al ajuste dialítico y control intensivo, a las 22 semanas presentó recurrencia de la disnea con congestión pulmonar marcada y disminución de la FEVI al 20 %, con regurgitación mitral leve‑moderada. Ante la inminencia de insuficiencia cardiaca avanzada, se procedió a planificación de cesárea electiva a las 24 semanas, decisión consensuada entre obstetras, nefrólogos, cardiólogos, anestesiólogos y pediatras.\n\nEl protocolo preoperatorio incluyó sustitución de heparina por mesilato de nafamostat como anticoagulante biocompatible, profilaxis transfusional y monitorización invasiva hemodinámica (canulación venosa yugular y arterial radial bajo guía ecográfica). Se efectuó anestesia combinada espinal‑epidural: administración intratecal de bupivacaína hiperbárica 0,5 % (5 mg) + fentanilo 10 µg y ropivacaína 0,25 % (5 ml) a través de catéter epidural, seguida de infusión preventiva de fenilefrina 1 mg/h para evitar hipotensión. La intervención transcurrió sin variaciones hemodinámicas significativas; se empleó nitroglicerina 0,1 mg para relajación uterina antes de la extracción fetal. \n\nEl neonato fue extraído a los 4 minutos del inicio quirúrgico; la madre permaneció asintomática, sin eventos dolorosos ni disnéicos intraoperatorios. El tiempo quirúrgico total fue 49 minutos (anestesia 88 min), con pérdidas hemáticas equivalentes a 1029 ml y restitución de volumen 1050 ml. En el posoperatorio inmediato, la paciente ingresó en UCI para hemodiálisis temprana y manejo de fluidos. La extubación no fue requerida y la evolución cardiovascular fue favorable, con recuperación de la FEVI hacia valores de ≈ 50 %. Fue trasladada a planta al POD 5 y dada de alta al POD 10. \n\nEste caso ejemplifica la complejidad perioperatoria del manejo obstétrico en pacientes con doble compromiso cardiorrenal. La anestesia combinada neuroaxial, cuidadosamente titulada, permitió estabilidad hemodinámica y preservación de la perfusión uteroplacentaria en un contexto de hemodiálisis crónica y disfunción ventricular severa. Se destaca la utilidad del nafamostat como anticoagulante alternativo de corta vida media en cesáreas de pacientes dializadas, así como la viabilidad de protocolos anestésicos mixtos adaptados a cardiopatía avanzada."
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"fernandez_huerta_range": "79-100",
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"text": "Una niña de casi 2 años tenía un problema grave en el corazón. Su corazón no funcionaba bien y cada vez estaba peor. Los doctores decidieron que necesitaba un corazón nuevo. Mientras esperaba el trasplante, le pusieron una máquina especial para ayudar a su corazón a bombear sangre. Esta máquina se llama dispositivo de asistencia ventricular. La niña también tomaba medicinas para evitar coágulos en la sangre. Un día, la niña se puso muy irritable. De repente, el lado derecho de su cuerpo dejó de moverse bien. Los médicos hicieron estudios y encontraron que una arteria importante en su cerebro estaba tapada. Un coágulo había bloqueado el paso de la sangre. Los doctores no podían darle el medicamento común para disolver coágulos porque ya tomaba otras medicinas para la sangre. Así que decidieron abrir la arteria usando un tubo muy delgado. El procedimiento funcionó y abrieron la arteria. Sin embargo, un pedacito del coágulo se movió a otra arteria del cerebro. Al día siguiente, las imágenes mostraron daño en una parte del cerebro. La niña quedó con el lado derecho del cuerpo más rígido de lo normal. Siete meses después recibió su nuevo corazón. La operación salió bien al principio. Pero tres semanas más tarde, el lado derecho de su nuevo corazón comenzó a fallar. Por eso todavía estaba en cuidados intensivos cuando se escribió este reporte."
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"fernandez_huerta_range": "55-65",
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"text": "Se describe el caso de una niña de 23 meses con una enfermedad cardíaca llamada miocardiopatía dilatada no compactada, que fue empeorando con el tiempo. Debido a su insuficiencia cardíaca, fue incluida en la lista de trasplante y necesitó la ayuda de una bomba externa llamada dispositivo de asistencia ventricular Levitronix Centrimag. Recibía tratamiento con anticoagulantes y medicinas antiplaquetarias para prevenir coágulos.\n\nDurante la espera para el trasplante, presentó irritabilidad y debilidad repentina del lado derecho del cuerpo, lo que hizo sospechar un ictus por obstrucción de la arteria carótida interna izquierda. La tomografía y la angiografía confirmaron la obstrucción. Los análisis de sangre mostraron anemia leve y tiempos de coagulación prolongados por el tratamiento anticoagulante. No se aplicó tratamiento para disolver el coágulo debido al alto riesgo de sangrado, por lo que se realizó un procedimiento endovascular directo para destapar la arteria. La paciente tenía un peso bajo para su edad (9,3 kg, en torno al tercer percentil).\n\nDurante la intervención, los médicos lograron abrir la arteria en una sola sesión, aunque quedó un pequeño coágulo en una rama cerebral. La tomografía del día siguiente mostró un pequeño infarto en esa zona del cerebro. Después, la exploración neurológica reveló rigidez en el lado derecho del cuerpo. \n\nA los 30 meses de edad recibió el trasplante cardíaco, con una recuperación inicial favorable. Sin embargo, tres semanas más tarde presentó una alteración en el funcionamiento del nuevo corazón, por lo que permaneccía hospitalizada en la unidad de cuidados intensivos. Este caso muestra lo difícil que puede ser equilibrar los tratamientos de coagulación en niños con enfermedades cardíacas graves."
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"text": "Se documenta el caso clínico de una paciente pediátrica de 23 meses de edad cronológica con diagnóstico de miocardiopatía dilatada no compactada (definida como una cardiomiopatía caracterizada por trabeculaciones miocárdicas prominentes y recesos intertrabeculares profundos que se comunican con la cavidad ventricular, resultantes de la detención del proceso normal de compactación miocárdica durante la embriogénesis) con evolución clínica tórpida y deterioro hemodinámico progresivo que requirió inclusión en el programa de trasplante cardíaco ortotópico. Dada la insuficiencia cardíaca avanzada refractaria al tratamiento médico convencional, se implantó un dispositivo de asistencia ventricular mecánica tipo Levitronix Centrimag como terapia puente al trasplante, el cual proporciona soporte circulatorio extracorpóreo mediante una bomba centrífuga de levitación magnética. El protocolo terapéutico establecido incluía antiagregación plaquetaria dual y anticoagulación sistémica con heparina no fraccionada para prevenir eventos tromboembólicos inherentes a la circulación extracorpórea prolongada. A los 23 meses de edad la paciente presentó un cuadro neurológico agudo caracterizado por irritabilidad súbita y hemiparesia derecha de instauración abrupta, síndrome clínico altamente sugestivo de accidente cerebrovascular isquémico hemisférico izquierdo por oclusión arterial de gran vaso. La neuroimagen mediante tomografía computarizada craneal y posteriormente la angiografía cerebral confirmaron oclusi��n trombótica de la arteria carótida interna izquierda. El perfil hematológico evidenció anemia moderada (eritrocitos 3,41 × 10⁶/μL, hemoglobina 9,2 g/dL), tiempo de tromboplastina parcial activada marcadamente prolongado (APTT 134 segundos, rango normal 25-35 segundos) e índice internacional normalizado limítrofe (INR 1,2), hallazgos compatibles con anticoagulación terapéutica supraóptima. Análogamente al caso previamente descrito, la terapia fibrinolítica intravenosa con activador tisular del plasminógeno recombinante (rt-PA) se encontraba formalmente contraindicada en virtud del régimen antitrombótico intensivo preexistente (antiagregación dual más anticoagulación plena con heparina), dado que dicha combinación terapéutica incrementaría exponencialmente el riesgo de complicaciones hemorrágicas mayores, particularmente transformación hemorrágica del infarto cerebral. Por consiguiente, se planificó tratamiento endovascular intraarterial mediante trombectomía mecánica. Cabe señalar que, si bien la edad cronológica correspondía a 23 meses, la paciente presentaba un retraso estaturo-ponderal significativo con peso corporal en el tercer percentil (9,3 kilogramos), lo cual planteaba considerables desafíos técnicos en términos de acceso vascular femoral y navegabilidad del sistema de catéteres en una arquitectura vascular de calibre reducido. Se empleó la técnica neurointervencionista previamente descrita, lográndose recanalización arterial exitosa en una única maniobra de trombectomía. Sin embargo, durante la angiografía de control post-procedimiento se evidenció embolización distal de fragmentos trombóticos hacia el segmento A2 de la arteria cerebral anterior ipsilateral (rama cortical que irriga la cara medial del lóbulo frontal y el giro del cíngulo), fenómeno embólico iatrogénico ocasionalmente inherente a las maniobras de trombectomía mecánica. La tomografía computarizada de control a las 24 horas post-intervención documentó un infarto cerebral establecido en el territorio vascular de la división anterior de la arteria cerebral media y de la arteria cerebral anterior izquierda, con pérdida de la diferenciación córtico-subcortical y efecto de masa incipiente. La exploración neurológica objetivó hipertonía espástica del hemicuerpo derecho (manifestación clínica de lesión de la vía piramidal contralateral), configurando un síndrome piramidal deficitario residual. A los 30 meses de edad cronológica (siete meses posterior al evento cerebrovascular isquémico) la paciente fue sometida a trasplante cardíaco ortotópico con resultado postoperatorio inmediato satisfactorio desde el punto de vista técnico-quirúrgico. No obstante, tres semanas después del procedimiento de trasplante se detectó disfunción ventricular derecha (complicación relativamente frecuente en el postrasplante cardíaco que puede obedecer a múltiples etiologías: discordancia de tamaños donante-receptor, hipertensión pulmonar preexistente en el receptor, lesión por preservación-reperfusión del injerto, o rechazo agudo), requiriendo soporte inotrópico intensivo y monitorización hemodinámica invasiva continua en la unidad de cuidados intensivos pediátricos en el momento de la redacción del manuscrito. Este caso ilustra las complicaciones tromboembólicas neurológicas inherentes a los dispositivos de asistencia ventricular mecánica pese a la anticoagulación óptima, así como los desafíos terapéuticos del manejo endovascular del ictus isquémico agudo en pacientes pediátricos con trastornos hematológicos iatrogénicos y características anatómicas vasculares desfavorables, además de evidenciar las potenciales complicaciones cardiovasculares postrasplante que pueden comprometer el pronóstico a corto plazo."
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"text": "Una mujer de 44 años llegó al hospital con un fuerte dolor en el pecho. El dolor había durado seis horas. Sentía presión que subía hasta el hombro. Todo empezó después de una situación de mucho estrés. No tenía otras enfermedades conocidas. No tomaba medicinas. Cuando llegó al hospital, todavía le dolía el pecho. Su corazón latía muy rápido. Tenía la presión arterial un poco alta. Respiraba rápido pero no necesitaba oxígeno extra. Los doctores le hicieron análisis de sangre. Encontraron que tenía niveles altos de algunas sustancias del corazón. Le hicieron un electrocardiograma. Este mostró que su corazón latía rápido y tenía algunos problemas. La radiografía mostró líquido en los pulmones. Un ultrasonido del corazón mostró que algunas partes no se movían bien. Otras partes se movían demasiado. Los doctores pensaron que tenía el síndrome de Takotsubo. Esta es una enfermedad del corazón causada por estrés fuerte. En tres horas, ella empeoró mucho. Necesitó un ventilador para respirar. Le dieron medicinas para ayudar al corazón. Después le hicieron un estudio de las arterias del corazón. Los doctores encontraron algo raro. Ella tenía solo una arteria principal en lugar de dos. Esta arteria única alimentaba todo el corazón. No había bloqueos. Le hicieron más estudios con escáneres especiales. Confirmaron que tenía una arteria única desde el nacimiento. Esto era algo raro pero no era la causa del problema. Poco a poco ella mejoró. A las 48 horas ya respiraba sola. Ya no necesitaba las medicinas fuertes. Su corazón empezó a funcionar mejor. Le hicieron una resonancia magnética seis días después. Mostró que el corazón estaba casi normal otra vez. Esto confirmó el diagnóstico de síndrome de Takotsubo. La dieron de alta después de siete días. Le recetaron medicinas para el corazón. Dos meses después, estaba completamente bien. Su corazón funcionaba normal. El electrocardiograma salió normal también."
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"text": "Se presenta el caso de una mujer de 44 años, sin antecedentes cardiovasculares ni tratamiento previo, que acudió a urgencias por dolor opresivo torácico irradiado al hombro izquierdo de seis horas de evolución, desencadenado tras un episodio de estrés emocional. No presentaba otros síntomas asociados.\n\nA su llegada, mantenía dolor torácico con taquicardia (140 lpm), presión arterial 140/74 mmHg y signos leves de congestión pulmonar. Los análisis mostraron leucocitosis, leve elevación de troponina T (112 ng/ml), aumento del péptido natriurético (950 pg/ml) y sin evidencia de infección ni daño hepático‑renal. El electrocardiograma reflejó taquicardia sinusal, patrón QS en V1‑V4 y prolongación del PR. La ecocardiografía mostró disfunción severa del ventrículo izquierdo con hipocinesia apical y basales hiperquinéticas, sin obstrucción del tracto de salida, por lo que se orientó el diagnóstico hacia una miocardiopatía de Takotsubo.\n\nDurante las primeras horas, la paciente presentó shock cardiogénico que requirió ventilación mecánica y soporte inotrópico‑vasopresor con dobutamina y noradrenalina. La angiografía coronaria no evidenció obstrucciones, pero se observó una sola arteria coronaria originada en el seno derecho de Valsalva. Los vasos coronarios izquierdos estaban ausentes y sus territorios recibían sangre a través de colaterales procedentes de la arteria coronaria derecha, sin lesiones ateroscleróticas. La ventriculografía confirmó la forma típica en globo del ápex compatible con Takotsubo.\n\nLa evolución fue favorable: se retiró el soporte vasoactivo a las 48 horas, con mejoría progresiva de la función ventricular. La resonancia cardíaca posterior mostró edema miocárdico compatible con miocardiopatía de estrés y sin necrosis. La paciente fue dada de alta al séptimo día con tratamiento a base de betabloqueantes e inhibidores de la enzima convertidora de angiotensina. En la revisión a dos meses, permanecía asintomática, con función ventricular normal y sin anomalías electrocardiográficas."
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"text": "Una paciente de cuarenta y cuatro años, previamente asintomática y sin factores de riesgo cardiovascular identificados ni antecedentes médicos de relevancia clínica y que no se encontraba bajo tratamiento farmacológico alguno, acudió al servicio de urgencias de nuestra institución tras haber experimentado durante seis horas un cuadro caracterizado por opresión retroesternal que se irradiaba hacia la región del hombro, desencadenado a raíz de una situación de estrés emocional agudo, sin factores modificadores identificables que aliviaran o exacerbaran la sintomatología. No se documentaron síntomas asociados adicionales ni existía contexto clínico sugestivo de procesos infecciosos concomitantes. En el momento del ingreso hospitalario, la paciente persistía con dolor torácico y presentaba una presión arterial de 140/74 mmHg, taquicardia sinusal con frecuencia cardiaca de 140 latidos por minuto, polipnea leve sin requerimiento de oxigenoterapia suplementaria y estertores crepitantes bibasales a la auscultación pulmonar; no se evidenció edema periférico. Los resultados analíticos de laboratorio revelaron leucocitosis, niveles normales de proteína C reactiva, elevación moderada de troponina T (112 ng/ml; límite superior de normalidad inferior a 14 ng/l), péptido natriurético cerebral pro-N-terminal de 950 pg/ml y alteraciones del perfil lipídico compatible con dislipidemia. El registro electrocardiográfico (ECG) demostró taquicardia sinusal, patrón QS en derivaciones precordiales V1-V4 y bloqueo auriculoventricular de primer grado subsiguiente a una contracción ventricular prematura. El análisis gasométrico de sangre arterial evidenció hiperlactacidemia con concentraciones máximas de 3 mmol/l. La radiografía de tórax reveló signos radiológicos compatibles con congestión pulmonar. La ecocardiografía transtorácica (ETT) demostró acinesia de las paredes ventriculares medias y distales, hiperquinesia compensadora de los segmentos basales, disfunción ventricular izquierda (VI) severa y ausencia de obstrucción del tracto de salida del ventrículo izquierdo. La paciente fue admitida en la unidad de cuidados coronarios con el diagnóstico provisional de miocardiopatía de Takotsubo (también denominada miocardiopatía inducida por estrés o síndrome del corazón roto). En el transcurso de las tres horas subsiguientes, la paciente experimentó deterioro hemodinámico progresivo que evolucionó hacia shock cardiogénico, requiriendo ventilación mecánica invasiva e instauración de soporte inotrópico y vasopresor mediante perfusión continua de dobutamina y noradrenalina. La taquicardia sinusal persistió sin modificaciones electrocardiográficas adicionales significativas. Se procedió a realizar angiografía coronaria (AC), durante cuyo procedimiento no resultó factible la canulación selectiva de la arteria coronaria izquierda (ACI), y una inyección no selectiva no reveló la presencia de arterias coronarias emergentes del seno coronario izquierdo. Mediante inyección selectiva del seno coronario derecho, se visualizó un único ostium coronario. La arteria coronaria derecha (ACD) se identificó como un vaso de gran calibre, sin evidencia de lesiones estenóticas. La arteria descendente anterior izquierda (DAI) y la arteria circunfleja izquierda (ACx) recibían perfusión mediante vasos colaterales provenientes de la arteria coronaria derecha, ambas sin lesiones obstructivas identificables. La ventriculografía izquierda reveló acinesia apical con morfología en globo (característica del síndrome de Takotsubo), hiperquinesia basal y disfunción ventricular izquierda grave. La hipótesis diagnóstica más probable correspondía a un origen anómalo de la arteria coronaria, si bien no se pudo descartar de manera definitiva la presencia de una lesión ostial de la arteria coronaria izquierda. La angiografía coronaria por tomografía computarizada (ACTC) confirmó la presencia de una arteria coronaria única con su ostium localizado en el seno derecho de Valsalva (SDV), agenesia congénita del tronco coronario principal izquierdo e hipoplasia de la arteria descendente anterior izquierda. La arteria coronaria derecha seguía un trayecto anatómico normal, con flujo anterógrado a través de una rama lateral posterior (RLP) que proporcionaba irrigación a la arteria circunfleja izquierda y la arteria descendente anterior izquierda, además de múltiples colaterales que se originaban en la arteria descendente posterior (ADP) dirigiéndose hacia el segmento distal de la arteria descendente anterior izquierda. Todas las arterias coronarias demostraron permeabilidad completa sin evidencia de placas ateroscleróticas. La evolución clínica de la paciente fue favorable, alcanzándose ventilación espontánea y retiro del soporte inotrópico y vasopresor a las cuarenta y ocho horas, con respuesta diurética óptima y recuperación gradual de la función ventricular izquierda tanto global como segmentaria. La resonancia magnética cardíaca (RMC), realizada seis días después del ingreso hospitalario, evidenció hipocinesia leve de los segmentos medios de las paredes anterior y anteroseptal, preservación de la función sistólica global y presencia de edema miocárdico difuso, sin realce tardío significativo con gadolinio ni defectos de perfusión, hallazgos que constituyeron elementos clave para el diagnóstico definitivo de miocardiopatía de Takotsubo. Se estableció el diagnóstico de síndrome de Takotsubo con hallazgo incidental de arteria coronaria derecha única (variante anatómica coronaria congénita infrecuente). La evolución clínica de la paciente transcurrió sin incidencias y fue dada de alta hospitalaria el séptimo día, con prescripción de tratamiento farmacológico consistente en dosis bajas de betabloqueadores e inhibidores de la enzima convertidora de la angiotensina (IECA). En la consulta de seguimiento ambulatorio realizada a los dos meses del episodio índice, la paciente se encontraba asintomática, en clase funcional I según la clasificación de la New York Heart Association (NYHA). La ecocardiografía transtorácica de control reveló normalización completa de la función ventricular izquierda global y segmentaria, y el registro electrocardiográfico mostró características dentro de límites normales. Este caso ilustra la importancia del diagnóstico diferencial en pacientes con presentación aguda de insuficiencia cardiaca, dado que la coexistencia de anomalías coronarias congénitas (en este caso, arteria coronaria única) con síndromes cardiacos adquiridos como la miocardiopatía de Takotsubo puede representar un desafío diagnóstico significativo, requiriendo la utilización de múltiples modalidades de imagen cardiovascular avanzada para establecer la etiología precisa y las implicaciones pronósticas a largo plazo."
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"text": "Un hombre de 20 años trabajaba en una granja. Nunca había tenido problemas de salud. Un día llegó al hospital con un dolor muy fuerte. El dolor estaba en el lado derecho de la espalda baja. Se extendía hacia la ingle. También tenía fiebre alta. Vomitaba mucho. Dos semanas antes había tenido sangre en la orina. No le dolía cuando orinaba. También había tenido fiebre y síntomas como de gripe. Le dieron analgésicos y mejoró. Nunca había tenido piedras en los riñones. Tampoco había tenido infecciones de orina. Los doctores lo examinaron. Le dolía cuando le tocaban la ingle derecha. También le dolía en la espalda baja del lado derecho. El resto del examen era normal. Le hicieron varios análisis. Le sacaron sangre. Le revisaron la orina. También le revisaron las heces. Le hicieron un ultrasonido del abdomen. Los análisis de sangre mostraron muchos glóbulos blancos. Esto significaba infección. Los riñones funcionaban bien. La orina tenía sangre. También tenía cristales de calcio. En las heces encontraron un parásito llamado Entamoeba. No encontraron huevos ni gusanos. El ultrasonido mostró algo raro. Había una estructura cilíndrica en el tubo que va del riñón a la vejiga. Este tubo se llama uréter. La estructura medía 6 milímetros de ancho y 6 centímetros de largo. Estaba cerca de donde el uréter entra a la vejiga. El riñón derecho estaba un poco hinchado. También se veía un poco inflamado. No había piedras en los riñones. Los riñones tenían tamaño y forma normales. Lo internaron en el hospital. Al principio le dieron tratamiento con medicinas. Después le hicieron una tomografía. Esta mostró mejor lo que pasaba. Había una estructura tubular de 6 centímetros en el uréter. Estaba a 2.5 centímetros dentro de la vejiga. La pared tenía densidad de tejido blando. Por dentro tenía líquido. Esto causaba que el riñón se hinchara un poco. Una imagen mostró el uréter dilatado. Había algo redondo bloqueándolo. Era un parásito. Otra imagen mostró el parásito pasando parcialmente por la entrada a la vejiga. El riñón derecho se veía normal en tamaño. No tenía piedras ni masas. No había conexión entre el intestino y el sistema urinario. Le hicieron una ureteroscopia en el hospital. Metieron una cámara pequeña por el uréter. Encontraron una estructura como de cera. Medía 6 milímetros de ancho. Estaba en la parte baja del uréter derecho. Había mucho pus alrededor. También vieron algo que parecía un pólipo. Sacaron el objeto. Medía 6 centímetros de largo. Era de color marrón. No se movía. Era elástico y firme. Para sacar el pus, le pusieron un tubo especial. Este tubo se llama stent. Después revisaron el objeto muerto. Era un gusano llamado Ascaris lumbricoides. Le dieron una medicina llamada albendazol. Tomó 400 miligramos una vez al día. Lo tomó durante tres días. Se recuperó completamente sin problemas."
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"text": "Un hombre de 20 años que trabajaba como agricultor, sin antecedentes médicos ni quirúrgicos previos, fue admitido en el servicio de urgencias quejándose de dolor cólico severo en el flanco derecho que se irradiaba al área circundante y a la región inguinal. El dolor se asociaba con fiebre de alta temperatura y vómitos recurrentes. El paciente refirió un episodio de hematuria indolora, fiebre y síntomas similares a un cuadro gripal dos semanas antes de su ingreso hospitalario. La fiebre y los síntomas gripales habían sido tratados con analgésicos. No tenía antecedentes de litiasis urinaria ni de infecciones del tracto urinario. El examen físico mostró sensibilidad a la palpación en la ingle derecha y signo de Giordano positivo en el ángulo costovertebral derecho. El resto del examen fue normal. Se realizaron hemograma completo, análisis de orina, examen de heces y ecografía abdominal. Los análisis de laboratorio mostraron leucocitosis moderada de 20,000 células por milímetro cúbico, con rango normal de 4.5 a 11 × 10³ por milímetro cúbico. Había neutrofilia relativa y linfopenia relativa. La creatinina sérica estaba dentro de límites normales. El análisis de orina reveló hematuria grado 3+ y cristales de oxalato de calcio. El examen de heces mostró presencia de Entamoeba histolytica, sin detección de huevos o helmintos. El resto del análisis fecal fue normal. La ecografía abdominal demostró una estructura cilíndrica hiperecoica de 6 milímetros de diámetro y 6 centímetros de longitud en la porción distal del uréter derecho, comprometiendo la unión ureterovesical. Se asociaba con hidronefrosis derecha mínima y leve aumento en la ecogenicidad del riñón derecho. No se observaron cálculos renales definidos. Ambos riñones presentaban tamaño, posición y forma normales. No se realizó ecografía Doppler. El paciente fue hospitalizado en el departamento de urología, iniciándose tratamiento conservador. Se realizó tomografía computarizada con contraste que mostró una estructura tubular de 6 centímetros, correspondiente a un cuerpo extraño, localizada en el uréter distal, aproximadamente 2.5 centímetros dentro de la vejiga. La estructura presentaba densidad de tejido blando en la pared y densidad de líquido en el interior, causando hidronefrosis derecha mínima. Una imagen axial al nivel de la porción distal del uréter derecho mostró un uréter dilatado con defecto de llenado redondeado representando el parásito obstructor. Una imagen axial de tomografía computarizada al nivel de la unión ureterovesical con retraso de 10 minutos mostró el parásito atravesando parcialmente la unión vesicoureteral. El riñón derecho presentaba tamaño, ecotextura y grosor cortical normales, sin cálculos ni masas. No había evidencia de fístula entre el tracto gastrointestinal y el urinario. Se realizó ureteroscopia en el hospital. Durante el procedimiento se descubrió una estructura similar a cera de 6 milímetros en el tercio distal del uréter derecho, acompañada de cantidad significativa de material purulento. Además, se observó una proyección similar a pólipo dentro del campo visual del ureteroscopio. El objeto extraído medía 6 centímetros de longitud, presentaba coloración marrón, no era móvil y mostraba consistencia elástica y firme. Para facilitar el drenaje del pus se insertó un catéter doble J (stent ureteral). Posteriormente, el espécimen muerto se envió a revisión patológica, siendo identificado como Ascaris lumbricoides. El paciente recibió albendazol 400 miligramos una vez al día durante tres días, experimentando recuperación completa sin complicaciones."
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"text": "Un paciente masculino de veinte años de edad, cuya ocupación era agricultor (labor que implica contacto frecuente con suelo potencialmente contaminado con material fecal conteniendo huevos de helmintos), sin antecedentes médicos o quirúrgicos de relevancia clínica previa, fue admitido en el departamento de urgencias médicas refiriendo como sintomatología principal dolor de características cólicas (dolor intermitente con exacerbaciones y remisiones) de intensidad severa localizado en la región del flanco derecho (área lateral del abdomen entre la última costilla y la cresta ilíaca), con irradiación hacia el área circundante y la región inguinal derecha (patrón de dolor compatible con obstrucción ureteral aguda). El cuadro álgico se asociaba con pirexia de alta temperatura (fiebre superior a 38.5°C que sugiere componente infeccioso) y episodios eméticos recurrentes (vómitos repetidos secundarios al dolor visceral intenso). El paciente refirió antecedente de hematuria indolora (presencia de sangre en orina sin disuria asociada), fiebre y sintomatología similar a síndrome gripal (que incluye mialgias, cefalea y malestar general) aproximadamente dos semanas previas a su ingreso hospitalario actual. La fiebre y los síntomas pseudogripales habían sido manejados sintomáticamente mediante analgesia convencional. No existían antecedentes personales de enfermedad litiásica urinaria (formación de cálculos renales o ureterales) ni de infecciones del tracto urinario recurrentes. La exploración física reveló sensibilidad a la palpación superficial y profunda en la región inguinal derecha y signo de Giordano positivo (sensibilidad a la percusión del ángulo costovertebral derecho, también conocido como puñopercusión renal positiva, indicativo de afección del sistema colector renal derecho); el resto de la exploración física sistémica se encontró dentro de parámetros normales. Se solicitaron estudios complementarios de laboratorio que incluyeron hemograma completo, análisis elemental y sedimento urinario, examen coproparasitoscópico de heces y estudio de imagen mediante ecografía abdominal. Los resultados de laboratorio demostraron leucocitosis moderada con recuento leucocitario total de 20,000 células por milímetro cúbico (valor significativamente elevado respecto al rango de referencia normal de 4.5-11 × 10³ células por milímetro cúbico, indicativo de respuesta inflamatoria sistémica o proceso infeccioso), con desviación a la izquierda caracterizada por neutrofilia relativa (aumento porcentual de neutrófilos segmentados) y linfopenia relativa (disminución porcentual de linfocitos). La concentración sérica de creatinina se encontró dentro de límites fisiológicos normales, descartando disfunción renal significativa. El análisis de orina mediante tira reactiva y examen microscópico del sedimento urinario centrifugado reveló hematuria macroscópica grado 3+ (presencia abundante de eritrocitos por campo de alto poder, indicativo de lesión del epitelio urothelial) y presencia de cristales de oxalato de calcio (hallazgo que, si bien puede asociarse con litiasis urinaria, también puede observarse en orina normal concentrada). El examen coproparasitoscópico directo y mediante técnicas de concentración demostró la presencia de trofozoítos y/o quistes de Entamoeba histolytica (protozoario patógeno causante de amebiasis intestinal y ocasionalmente extraintestinal), sin detección de huevos de helmintos ni formas adultas parasitarias en las muestras fecales examinadas; el resto de los parámetros del análisis coprológico se encontraron dentro de rangos normales. El estudio de imagen mediante ecografía abdominal en modo B con transductor convexo de frecuencia media reveló la presencia de una estructura anatómica anómala cilíndrica de ecogenicidad aumentada (hiperecoica, más brillante que el parénquima renal circundante) con dimensiones de 6 milímetros de diámetro transversal y 6 centímetros de longitud longitudinal, localizada en la porción distal del uréter derecho (tercio inferior del conducto excretor que transporta la orina desde la pelvis renal hasta la vejiga urinaria), comprometiendo específicamente la unión ureterovesical (UVJ, zona anatómica donde el uréter perfora oblicuamente la pared vesical muscular, constituyendo un mecanismo valvular antirreflujo). Este hallazgo ecográfico se asociaba con hidronefrosis derecha de grado mínimo (dilatación leve del sistema pielocalicial renal secundaria a obstrucción parcial del flujo urinario) y leve incremento en la ecogenicidad del parénquima renal derecho (sugestivo de proceso inflamatorio incipiente o edema intersticial). No se visualizaron cálculos renales definidos (litiasis renal) en ninguno de los sistemas colectores; por lo demás, ambos riñones presentaban tamaño, situación topográfica y morfología dentro de parámetros anatómicos normales. No se realizó estudio complementario mediante ecografía Doppler color para evaluación de la vascularización renal. El paciente fue admitido para hospitalización en el servicio de urología, instaurándose inicialmente manejo terapéutico conservador consistente en hidratación parenteral, analgesia multimodal y antibioticoterapia empírica de amplio espectro. Se realizó estudio de tomografía computarizada multidetector de abdomen y pelvis con administración de medio de contraste yodado intravenoso en fases arterial, nefrográfica y excretora, que demostró con mayor resolución espacial la presencia de una estructura tubular de aproximadamente 6 centímetros de longitud, correspondiente a un cuerpo extraño de naturaleza orgánica (posteriormente identificado como helminto), localizada en el uréter distal derecho, con extensión de aproximadamente 2.5 centímetros dentro de la luz vesical. La estructura anatómica anómala presentaba densidad radiológica correspondiente a tejido blando en su pared externa (atenuación aproximada de 40-60 unidades Hounsfield) y densidad de líquido en su aspecto interior central (atenuación menor a 20 unidades Hounsfield, compatible con contenido líquido o necrótico del parásito), causando como consecuencia mecánica hidronefrosis del lado derecho de grado mínimo (distensión leve del sistema colector renal proximal a la obstrucción). Una imagen axial tomográfica adquirida al nivel de la porción distal del uréter derecho demostró dilatación ureteral proximal a la obstrucción y un defecto de llenado intraluminal de morfología redondeada u oval que representaba el parásito obstructor en sección transversal. Una imagen axial de tomografía computarizada adquirida al nivel de la unión ureterovesical con retraso temporal de 10 minutos después de la administración del medio de contraste (fase excretora tardía) mostró el parásito atravesando parcialmente la unión vesicoureteral, documentándose migración progresiva hacia la vejiga urinaria. El parénquima renal derecho presentaba tamaño, ecotextura tomográfica y grosor cortical preservados dentro de parámetros normales, sin evidencia de cálculos renales (litiasis), masas sólidas o quísticas, ni alteraciones vasculares significativas. Crucialmente, no se identificó evidencia de comunicación fistulosa anómala entre el tracto gastrointestinal y el sistema urinario (fístula enterovesical o enteroureteral) que pudiera explicar la vía de migración parasitaria. Se procedió a realizar intervención endoscópica mediante ureteroscopia diagnóstica y terapéutica en ambiente de quirófano bajo anestesia general o sedación consciente. Durante el procedimiento endoscópico, navegando con ureteroscopio semirrígido o flexible a través de la uretra, vejiga y meato ureteral derecho, se descubrió la presencia de una estructura anatómica anómala de aspecto similar a material ceroso o parafinoso de aproximadamente 6 milímetros de diámetro transversal localizada en el tercio distal del uréter derecho, acompañada de cantidad significativa de material purulento (pus, indicativo de sobreinfección bacteriana secundaria asociada con la obstrucción ureteral y probable pielonefritis aguda). Adicionalmente, se observó mediante visión endoscópica directa una proyección intraluminal de morfología similar a pólipo o masa sésil dentro del campo visual del ureteroscopio (posiblemente correspondiente a la porción anterior del helminto o a reacción inflamatoria granulomatosa de la mucosa ureteral). El objeto extraído mediante pinzas endoscópicas o dispositivo de captura tipo basket medía 6 centímetros de longitud total, presentaba coloración marrón amarillenta característica, no exhibía motilidad espontánea (confirmando que el parásito se encontraba muerto o moribundo), y mostraba consistencia elástica y tensa a la palpación (característica de la cutícula resistente de los nematodos). Para facilitar el drenaje adecuado del material purulento acumulado en el sistema colector superior y prevenir complicaciones sépticas, se insertó un catéter ureteral tipo doble J (stent ureteral de polímero biocompatible con extremos enrollados en espiral que previenen la migración, permitiendo drenaje pasivo de orina desde la pelvis renal hasta la vejiga mientras la mucosa ureteral se recupera del trauma mecánico y la inflamación). Posteriormente, el espécimen parasitario muerto extraído se remitió para análisis histopatológico y parasitológico en el laboratorio de patología, donde fue identificado mediante examen macroscópico y microscópico como Ascaris lumbricoides (nematodo intestinal de gran tamaño, helminto cilíndrico que constituye la geohelmintosis más prevalente a nivel mundial, cuyo ciclo de vida normal incluye migración larvaria transpulmonar pero excepcionalmente puede invadir el sistema biliar, pancreático o, como en este caso extraordinariamente infrecuente, el tracto urinario mediante migración aberrante desde el intestino). El paciente recibió tratamiento antiparasitario específico consistente en albendazol (benzimidazol de amplio espectro con actividad antihelmíntica mediante inhibición de la polimerización de tubulina en células parasitarias) en dosis de 400 miligramos administrados por vía oral una vez al día durante un período de tres días consecutivos (régimen terapéutico estándar para ascariasis que garantiza eliminación de formas adultas y larvarias residuales en el tracto gastrointestinal), experimentando subsecuentemente una evolución clínica postoperatoria favorable sin complicaciones significativas (ausencia de sepsis urinaria, deterioro de la función renal, perforación ureteral o recurrencia parasitaria), con resolución completa de la sintomatología inicial y recuperación ad integrum. Este caso clínico ilustra una presentación extraordinariamente infrecuente de ascariasis ectópica con migración aberrante del helminto hacia el tracto urinario superior, entidad que representa una rareza en la literatura médica urológica y parasitológica, dado que la localización anatómica habitual de Ascaris lumbricoides es exclusivamente el intestino delgado, y las migraciones ectópicas típicamente involucran el árbol biliar, conducto pancreático o, más raramente, el apéndice vermiforme, siendo la invasión del sistema urinario un fenómeno excepcional que plantea interrogantes fisiopatológicos respecto a la vía de migración parasitaria (posiblemente transperitoneal o linfohematógena, aunque no se documentó fístula comunicante), y que requiere alto índice de sospecha clínica en contextos epidemiológicos de alta endemicidad de geohelmintiasis, particularmente en poblaciones rurales con exposición ocupacional a suelo contaminado con material fecal humano."
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"fernandez_huerta_range": "79-100",
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"text": "Una mujer de 26 años fue al médico porque estaba perdiendo la vista. El problema empezó hace un mes. Primero fue en el ojo derecho y luego en el izquierdo. Veía borroso. No le dolían los ojos cuando los movía. Siete años antes había tenido problemas en la médula espinal. Empezó con hormigueo en el pie izquierdo. Después subió hasta la cintura. Le hicieron resonancias del cerebro y la columna. Encontraron varias lesiones. Los análisis de sangre salieron negativos para algunos anticuerpos. No tomaba medicinas. No fumaba ni bebía mucho. Su familia no tenía problemas de vista hereditarios. El médico de los ojos la examinó. Veía 20/100 con el ojo derecho y 20/30 con el izquierdo. No podía ver bien los colores. Solo veía 1 de 17 colores con el ojo derecho. Con el izquierdo veía 14 de 17. Le hicieron una prueba especial de los ojos. Los nervios ópticos estaban pálidos. Los médicos pensaron que podía ser neuritis óptica. Le dieron cortisona pero no mejoró. Las resonancias mostraron nuevas lesiones en el cerebro. Le diagnosticaron esclerosis múltiple. Las pruebas genéticas mostraron cambios en dos genes. También tenía síndrome de Harding. Le dieron una medicina llamada idebenona. Con esta medicina mejoró. Después de 4 años, su vista era mucho mejor. Veía 20/40 con el ojo derecho y 20/20 con el izquierdo."
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"text": "Paciente femenina de 26 años derivada por neurología por pérdida visual progresiva bilateral de un mes de evolución. Los síntomas comenzaron en el ojo derecho y posteriormente afectaron el izquierdo, sin dolor con los movimientos oculares. Presentaba antecedentes de síndrome clínicamente aislado con afectación medular desde hacía 7 años, iniciando con síntomas sensoriales en pie izquierdo que migraron hasta nivel torácico. Las resonancias magnéticas previas mostraron lesiones infratentoriales y medulares torácicas. Los estudios de seguimiento identificaron nuevas lesiones en niveles C4, C6-C7, T2 y T7-T8. Los anticuerpos anti-acuaporina-4 y anti-MOG fueron negativos. No recibía tratamiento al momento de la consulta. La evaluación neurooftalmológica reveló agudeza visual de 20/100 en ojo derecho y 20/30 en ojo izquierdo. Las placas de Ishihara demostraron visión de colores severamente afectada en el ojo derecho (1/17) y moderadamente en el izquierdo (14/17). La tomografía de coherencia óptica mostró adelgazamiento temporal bilateral. El fondo de ojo presentaba palidez de ambos nervios ópticos. Se consideró neuritis óptica bilateral versus neuropatía óptica hereditaria de Leber. Se administró prednisona oral sin mejoría clínica. La resonancia magnética cerebral mostró hiperintensidades en el quiasma óptico y nuevas lesiones periventriculares. Con bandas oligoclonales positivas, se confirmó esclerosis múltiple. Los campos visuales mostraron escotomas centrales bilaterales. Las pruebas genéticas revelaron variantes en los genes DNAJC30 y UQCRC1, diagnosticándose síndrome de Harding. Se inició idebenona 300 mg tres veces al día con mejoría progresiva. La agudeza visual final fue 20/40 en ojo derecho y 20/20 en ojo izquierdo tras 4 años de seguimiento."
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"text": "Paciente femenina de veintiséis años derivada por neurología por neuropatía óptica bilateral progresiva de características atípicas, manifestada como deterioro visual secuencial de un mes de evolución sin oftalmoplejía dolorosa concomitante. Sus antecedentes neurológicos incluían síndrome clínicamente aislado con compromiso medular siete años previos, caracterizado por síntomas sensoriales ascendentes desde extremidad inferior izquierda hasta nivel metamérico torácico. Las neuroimágenes iniciales evidenciaron lesiones desmielinizantes infratentoriales y medulares torácicas, mientras que los estudios subsecuentes identificaron lesiones temporalmente disociadas en segmentos cervicales C4, C6-C7 y torácicos T2, T7-T8. Los biomarcadores inmunológicos, específicamente anticuerpos anti-acuaporina-4 y anti-glicoproteína oligodendrocítica de mielina, resultaron negativos. La evaluación neurooftalmológica demostró agudeza visual corregida de 20/100 en ojo derecho y 20/30-2 en ojo izquierdo, con discromatopsia severa evidenciada mediante placas pseudoisocromáticas de Ishihara (1/17 OD, 14/17 OS). La tomografía de coherencia óptica reveló adelgazamiento del espesor promedio de la capa de fibras nerviosas retinianas (83 micrones OD, 93 micrones OS) con predominio temporal, mientras que la oftalmoscopía mostró palidez papilar bilateral. El diagnóstico diferencial incluyó neuritis óptica desmielinizante versus neuropatía óptica hereditaria de Leber. Tras fracaso terapéutico con corticosteroides sistémicos (prednisona 1250mg seguido de esquema descendente), la resonancia magnética cerebral demostró hiperintensidades T2 quiasmáticas derechas y lesiones periventriculares parietales izquierdas nuevas. La presencia de bandas oligoclonales en líquido cefalorraquídeo confirmó esclerosis múltiple según criterios McDonald 2017. Sin embargo, la perimetría automatizada evidenció escotomas cecocentrales bilaterales simétricos, sugiriendo etiología mitocondrial superpuesta. Por consiguiente, el análisis genético molecular, aunque negativo para mutaciones primarias del ADN mitocondrial, identificó heterocigosidad para la variante patogénica c.152A>G del gen DNAJC30 (asociada con neuropatía óptica hereditaria de Leber autosómica recesiva) y la variante c.1239C>T del gen UQCRC1 con patrón autosómico dominante, estableciéndose el diagnóstico de síndrome de Harding. El tratamiento con idebenona 300mg tres veces diarias produjo mejoría funcional progresiva, alcanzando agudeza visual final de 20/40-2 OD y 20/20-2 OS tras cuatro años de seguimiento, manteniéndose estabilidad morfológica mediante tomografía de coherencia óptica con palidez temporal bilateral persistente."
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"text": "Un hombre de 27 años vive en la Ciudad de México. Sus padres y hermanos están sanos. Cuando era bebé, le pusieron la vacuna BCG. A los dos meses tuvo problemas con la vacuna. Se le hincharon las axilas. La herida de la vacuna no sanaba bien. Le dieron medicina durante ocho meses. Le quedó una cicatriz grande. A los nueve meses le salieron hongos en la boca y en el área del pañal. Los hongos volvían muchas veces. Todavía tiene hongos en la boca. A los siete años tuvo hongos en la cabeza. Desde los 10 años tiene la cara roja con granitos. A los 15 años le salieron hongos en las uñas. Ha tomado muchas medicinas pero no mejora. También tiene asma y alergia. Le hicieron pruebas de alergia. Salió alérgico a los ácaros, pelos de animales y polen. Le dieron medicinas para respirar mejor. Los médicos pensaron que tenía problemas de defensas. Le hicieron pruebas de VIH que salieron negativas. A los 26 años se puso muy enfermo. Tenía fiebre y perdió peso. Tosía con sangre. Le costaba respirar. Tenía un absceso en el glúteo. Cuando llegó al hospital estaba muy mal. Estaba delgado y pálido. Le hicieron radiografías del pecho. Tenía líquido y neumonía. Los análisis mostraron anemia e infección. Encontraron hongos en la sangre y en la boca. También tenía tuberculosis. Le dieron varias medicinas. Mejoró con el tratamiento para tuberculosis. También le dio herpes que se curó en 10 días. Los médicos descubrieron que tiene un problema genético. Tiene una mutación en el gen STAT1. Esta mutación causa problemas con las defensas. Sus padres y hermanos no tienen esta mutación. Ahora está terminando su tratamiento para la tuberculosis."
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"text": "Se describe el caso de un varón de 27 años, residente en la Ciudad de México, con historia de infecciones recurrentes desde la infancia. Tras recibir la vacuna BCG al nacimiento, presentó reacción local con adenitis axilar bilateral y cicatrización anómala, tratada exitosamente con rifampicina. Desde los nueve meses padeció candidiasis oral y del área del pañal, cuadros que se tornaron persistentes. En la infancia presentó tiña del cuero cabelludo, onicomicosis refractaria, rosácea facial y ocular, asma y rinitis alérgica.\n\nA los 26 años ingresó por fiebre, pérdida de peso, hemoptisis, disnea y absceso glúteo. El examen mostró palidez, desnutrición, dificultad respiratoria y lesiones micóticas orales. Las imágenes evidenciaron neumonía multifocal y derrame pleural derecho. Los cultivos de sangre y mucosa oral crecieron *Candida albicans*; el esputo mostró *C. albicans* y *C. krusei*. La prueba de dihidrorrodamina fue normal, descartando enfermedad granulomatosa crónica. El tratamiento antibiótico inicial produjo mejoría parcial, pero la fiebre persistió. En la biopsia pleural se detectó *Mycobacterium tuberculosis* mediante PCR, iniciándose esquema antifímico con buena evolución clínica. Durante la hospitalización, desarrolló además herpes zóster, que respondió a valaciclovir.\n\nPor la combinación de antecedentes —infección por BCG, tuberculosis, candidiasis mucocutánea crónica, rosácea y herpes zóster— se sospechó una inmunodeficiencia primaria. El análisis molecular mediante secuenciación de nueva generación identificó la variante patogénica c.961A>G (p.Arg321Gly) en el gen **STAT1**, consistente con una mutación de ganancia de función. Sus padres y tres hermanos presentaron genotipo **STAT1 WT/WT**, confirmando la mutación de novo. Actualmente, el paciente continúa en seguimiento clínico con tratamiento antituberculoso en curso y control de infecciones micóticas."
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"text": "Paciente masculino de veintisiete años, originario y residente del área metropolitana de la Ciudad de México, sin antecedentes heredofamiliares patológicos relevantes, quien presenta inmunodeficiencia primaria caracterizada por susceptibilidad aumentada a infecciones micobacterianas, fúngicas y virales. El cuadro clínico se manifestó tempranamente con reacción adversa severa a la inmunización con bacilo de Calmette-Guérin administrada al nacimiento, desarrollando linfadenitis axilar bilateral supurativa y ausencia de cicatrización en el sitio de inoculación a los dos meses de vida, requiriendo tratamiento antimicobacteriano prolongado con rifampicina durante ocho meses, con formación subsecuente de cicatriz queloide hipertrófica. Posteriormente presentó candidiasis mucocutánea crónica desde los nueve meses de edad, manifestándose como candidiasis orofaríngea y del área del pañal con patrón recurrente-remitente a pesar de múltiples esquemas antifúngicos, persistiendo la afectación oral con placas pseudomembranosas en lengua y mucosa gingival hasta la actualidad. La susceptibilidad a dermatofitosis se evidenció con tiña capitis a los siete años. Desarrolló rosácea facial desde los diez años con componente papulopustuloso inicial y progresión hacia cambios fimatosos crónicos, además de manifestaciones oculares concomitantes. La onicomicosis generalizada desde los quince años ha mostrado refractariedad a múltiples esquemas antimicóticos sistémicos y tópicos. Coexiste sintomatología atópica con asma bronquial y rinitis alérgica, con pruebas epicutáneas positivas para aeroalérgenos comunes incluyendo ácaros del polvo doméstico, epitelios animales y pólenes. Por consiguiente, ante la cronicidad y severidad de las infecciones fúngicas, se consideró inicialmente el diagnóstico de enfermedad granulomatosa crónica, el cual fue posteriormente descartado mediante prueba de oxidación con dihidrorrodamina con resultado dentro de parámetros normales. A los veintiséis años presentó síndrome constitucional caracterizado por fiebre prolongada, pérdida ponderal significativa, astenia, adinamia e hiporexia, asociado a sintomatología respiratoria con tos productiva, hemoptisis y disnea progresiva, además de absceso glúteo profundo. La evaluación clínica evidenció compromiso del estado general con desnutrición proteico-calórica, palidez mucocutánea generalizada, dificultad respiratoria con saturación de oxígeno al ochenta y siete por ciento con fracción inspirada de oxígeno al veintiuno por ciento, lesiones papulopustulosas y telangiectasias faciales compatibles con rosácea, candidiasis pseudomembranosa oral activa, eritema gingival difuso, cicatriz post-BCG de cinco centímetros de diámetro con características queloides, hipoventilación pulmonar bilateral y onicomicosis generalizada con distrofia ungueal severa. Los estudios de imagen mediante tomografía computarizada de tórax revelaron derrame pleural derecho de moderada cuantía y consolidaciones pulmonares multifocales con distribución bilateral. La ultrasonografía glútea confirmó colección abscedada profunda. Los parámetros hematológicos mostraron anemia normocítica normocrómica, leucocitosis con desviación izquierda y elevación de reactantes de fase aguda. Los estudios microbiológicos aislaron Candida albicans en hemocultivos y cultivo de cavidad oral, mientras que el cultivo de esputo evidenció coinfección por C. albicans y C. krusei. La biopsia pleural con amplificación por reacción en cadena de polimerasa detectó Mycobacterium tuberculosis, estableciéndose el diagnóstico de tuberculosis pleural. Se instituyó tratamiento antituberculoso con esquema tetrafármaco (isoniazida, rifampicina, pirazinamida y etambutol) con respuesta clínica favorable. Durante la hospitalización desarrolló herpes zóster multimetamérico tratado exitosamente con valaciclovir. La constelación sindromática caracterizada por infección diseminada por BCG, tuberculosis, herpes zóster, candidiasis mucocutánea crónica y manifestaciones autoinmunes cutáneas orientó hacia síndrome de ganancia de función de STAT1. El análisis genético mediante secuenciación de nueva generación de panel de genes asociados a errores innatos de la inmunidad identificó la variante patogénica missense c.961A>G (p.Arg321Gly) en heterocigosis en el gen STAT1, confirmando el diagnóstico de inmunodeficiencia primaria por ganancia de función de STAT1. El estudio de segregación familiar mediante secuenciación dirigida confirmó ausencia de la variante en ambos progenitores y tres hermanos, estableciendo el carácter de novo de la mutación."
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"text": "Un hombre de 60 años se desmayó en la sauna de un hotel pequeño. Vivía allí desde hacía dos años. Una semana antes empezó a sentirse mal. No tenía hambre. Tenía diarrea y un poco de fiebre. Tres días antes le costaba respirar cada vez más. Los doctores no sabían nada de su historia médica. No tenía familia cerca. Respiraba tan mal que no podía hablar mucho. Cuando llegó al hospital tenía el corazón acelerado. Respiraba muy rápido. No le llegaba suficiente oxígeno. Su presión era de 128/85. Su corazón latía 120 veces por minuto. Respiraba 40 veces por minuto. Tenía 37.8 grados de temperatura. Respiraba rápido y usaba músculos extra para respirar. Los análisis mostraron muchos problemas. Tenía demasiado ácido en la sangre. Sus riñones no funcionaban bien. El hígado tampoco trabajaba normal. Tenía mucha inflamación. Sus glóbulos blancos estaban muy altos. Las plaquetas estaban muy bajas. Las pruebas de VIH y COVID salieron negativas. Una tomografía mostró infecciones graves en ambos pulmones. Había cavidades en el pulmón izquierdo. Le sacaron muestras del pulmón. Encontraron bacterias. Tenía neumonía grave y un absceso pulmonar. Lo intubaron en cuidados intensivos. Le dieron tres antibióticos diferentes. También le dieron cortisona. Necesitaba ayuda para respirar con una máquina. Su oxígeno seguía bajando. Le bloquearon los músculos por 48 horas. Lo pusieron boca abajo. Sus riñones fallaron. Empezó diálisis. Al tercer día empeoró mucho. Le dieron óxido nítrico pero no ayudó. Le pusieron una máquina especial llamada ECMO. Esta máquina oxigena la sangre fuera del cuerpo. Los cultivos solo mostraron una bacteria. Pero había visto más bacterias antes. Como vivía en un hotel pequeño, los doctores sospecharon tuberculosis. Al cuarto día confirmaron que tenía tuberculosis. Le dieron cuatro medicinas para la tuberculosis. Le dieron metilprednisolona por tres días. Le hacían broncoscopias todos los días para limpiar sus pulmones. Entre el día 9 y el 11 mejoró. Las radiografías mostraron mejoría. Sus pulmones respondían mejor. Le quitaron la máquina ECMO. Cinco días después le hicieron una traqueostomía. Esto ayuda cuando alguien necesita respirador por mucho tiempo. Dos días después las medicinas le dañaron el hígado. Cambiaron su tratamiento. Le dieron otras medicinas diferentes. Tres días después añadieron otra medicina llamada cicloserina. Seguía necesitando el respirador. Lo trasladaron a un hospital especial para tuberculosis. Esto fue 29 días después de llegar. Varios trabajadores del hospital estuvieron expuestos a la tuberculosis. Les hicieron pruebas a todos. Les tomaron radiografías. Les hicieron análisis de sangre. Nadie se contagió de tuberculosis."
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"text": "Un hombre de 60 años se desplomó en la sauna de un hotel cápsula donde había vivido durante dos años. Estos hoteles son alojamientos económicos con pequeñas unidades para dormir. El paciente reportó una semana de síntomas incluyendo falta de apetito, diarrea y fiebre baja. Durante los tres días previos al ingreso, su dificultad para respirar empeoró progresivamente. No se conocía su historial médico ni sus medicamentos debido a la falta de contactos familiares y a la disnea grave que impedía obtener información detallada. Al momento del ingreso, el paciente presentaba taquicardia, respiración acelerada e hipoxemia. Sus signos vitales eran: presión arterial 128/85 mmHg, frecuencia cardíaca 120 latidos por minuto, frecuencia respiratoria 40 respiraciones por minuto, saturación de oxígeno 88% con máscara de no recirculación de 15 litros, y temperatura corporal de 37.8°C. El examen físico mostró respiración rápida y superficial con uso de músculos respiratorios accesorios. Su puntaje en la escala de coma de Glasgow fue E4V5M6. Los análisis de laboratorio revelaron acidosis metabólica grave con compensación respiratoria. Los gases arteriales mostraron pH de 7.067, presión parcial de CO₂ de 63.1 mmHg, presión parcial de oxígeno de 126 mmHg, bicarbonato de 17.3 mmol/L y lactato de 11 mmol/L. También había disfunción renal grave con nitrógeno ureico de 147.2 mg/dL y creatinina de 8.82 mg/dL. Las enzimas hepáticas estaban elevadas: AST 268 U/L y ALT 108 U/L. La lactato deshidrogenasa alcanzó 1910 U/L y la creatina quinasa 1552 U/L. Había inflamación marcada con glóbulos blancos de 64 × 10⁹/L y proteína C reactiva de 17.13 mg/dL. El paciente tenía trombocitopenia con plaquetas de 8.6 × 10⁹/L. Las pruebas para VIH, COVID-19 y antígeno de legionela fueron negativas. La tomografía de tórax mostró consolidaciones bilaterales con lesiones cavitarias, predominantemente en el pulmón izquierdo. Las muestras de esputo obtenidas por lavado broncoalveolar revelaron cocos Gram positivos y bacilos Gram negativos. Se diagnosticó neumonía grave y absceso pulmonar por infección polimicrobiana. Fue intubado al ingresar a la UCI. Se iniciaron antibióticos empíricos: vancomicina, piperacilina-tazobactam y azitromicina. También recibió hidrocortisona 200 mg al día. La relación PaO₂/FiO₂ inicial fue de 110 en ventilación mecánica, indicando síndrome de dificultad respiratoria aguda moderado. Debido al empeoramiento de la hipoxia, se inició bloqueo neuromuscular por 48 horas y posición prona. Por el deterioro renal, se comenzó terapia de reemplazo renal. Se permitió hipercapnia con pH hasta 7.15. En el tercer día, su relación PaO₂/FiO₂ disminuyó rápidamente a 65. Se inició óxido nítrico inhalado sin mejoría significativa. Por lo tanto, se comenzó oxigenación con membrana extracorpórea venovenosa la noche del tercer día. Los cultivos de esputo solo mostraron Moraxella catarrhalis, discordante con la tinción de Gram inicial que sugería infección polimicrobiana. Considerando esta discrepancia y la residencia del paciente en un hotel cápsula, se sospechó neumonía refractaria y síndrome de dificultad respiratoria aguda de causa subyacente diferente. En el día cuatro, la prueba de bacilos ácido-alcohol resistentes fue muy positiva, y la PCR detectó Mycobacterium tuberculosis, confirmando tuberculosis pulmonar. Se inició terapia anti-tuberculosis con isoniazida, rifampicina, pirazinamida y etambutol. Se administró metilprednisolona 1 gramo por tres días para el síndrome de dificultad respiratoria asociado a tuberculosis. Se realizó broncoscopia diaria para manejo de secreciones. Entre los días 9 y 11, la condición clínica mejoró con resolución radiográfica de infiltrados pulmonares y aumento de la capacidad de respuesta del sistema respiratorio a 40 ml/cmH₂O, permitiendo retirar exitosamente la ECMO. Cinco días después se realizó traqueostomía para facilitar el soporte ventilatorio prolongado. Dos días después de la traqueostomía, la lesión hepática inducida por medicamentos requirió ajustar la terapia anti-tuberculosis a etambutol, estreptomicina y levofloxacina. Tres días después se agregó cicloserina. El paciente continuó dependiendo del ventilador y fue trasladado a un hospital especializado en tuberculosis 29 días después del ingreso. Como varios trabajadores de salud estuvieron expuestos a tuberculosis antes de su confirmación, se implementó un programa de detección de exposición. Esto incluyó evaluación médica, radiografía de tórax y pruebas de liberación de interferón gamma, sin identificar infecciones activas o latentes entre el personal."
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"text": "Se documenta el caso de un varón de 60 años de edad quien sufrió colapso súbito en la sauna de un hotel cápsula (establecimiento de alojamiento económico caracterizado por pequeñas unidades modulares para pernoctar), donde había residido de forma continua durante los dos años previos al evento índice. La anamnesis retrospectiva reveló un cuadro prodrómico de una semana de duración caracterizado por anorexia, diarrea y síndrome febril de bajo grado, al cual se superpuso un deterioro respiratorio progresivo manifestado como disnea de esfuerzo que evolucionó a disnea de reposo durante los tres días inmediatamente anteriores al ingreso hospitalario. La obtención de antecedentes médicos personales y farmacológicos resultó imposible debido a la ausencia de contactos familiares identificables y al compromiso respiratorio severo que imposibilitó la entrevista clínica exhaustiva. En el momento de la admisión hospitalaria, la evaluación inicial evidenció un cuadro de insuficiencia respiratoria aguda hipoxémica con taquicardia compensatoria, taquipnea severa e hipoxemia refractaria a oxigenoterapia convencional. Los parámetros vitales documentados fueron: presión arterial sistémica de 128/85 mmHg, frecuencia cardíaca de 120 latidos por minuto, frecuencia respiratoria de 40 respiraciones por minuto, saturación periférica de oxígeno del 88% bajo administración de oxígeno suplementario mediante mascarilla de no reinhalación con flujo de 15 litros por minuto, y temperatura corporal de 37.8°C, compatible con estado subfebril. La exploración física reveló patrón respiratorio rápido y superficial con reclutamiento de musculatura respiratoria accesoria (escalenos, esternocleidomastoideos e intercostales), y el nivel de consciencia evaluado mediante la escala de coma de Glasgow fue de 15 puntos (E4V5M6), indicando orientación y respuesta motora adecuadas. Los estudios analíticos iniciales demostraron acidosis metabólica severa con compensación respiratoria parcial, evidenciado mediante gasometría arterial que reveló pH de 7.067 (acidemia crítica), presión parcial de dióxido de carbono (pCO₂) de 63.1 mmHg (hipercapnia secundaria a fatiga respiratoria), presión parcial de oxígeno (pO₂) de 126 mmHg, concentración de bicarbonato (HCO₃⁻) de 17.3 mmol/L (significativamente reducido), y lactato sérico de 11 mmol/L (hiperlactatemia severa indicativa de hipoperfusión tisular y metabolismo anaeróbico). Los biomarcadores de función renal evidenciaron insuficiencia renal aguda severa con nitrógeno ureico en sangre (BUN) de 147.2 mg/dL (azotemia marcada) y creatinina sérica de 8.82 mg/dL (aproximadamente nueve veces el límite superior de normalidad). El perfil hepatocelular demostró elevación significativa de transaminasas con aspartato aminotransferasa (AST) de 268 U/L y alanina aminotransferasa (ALT) de 108 U/L, junto con lactato deshidrogenasa (LDH) de 1910 U/L (marcador inespecífico de daño celular sistémico) y creatina quinasa (CK) de 1552 U/L (sugestivo de rabdomiólisis incipiente). El perfil inflamatorio reveló leucocitosis extrema con recuento leucocitario de 64 × 10⁹/L (aproximadamente seis veces el límite superior normal) y proteína C reactiva (PCR) de 17.13 mg/dL, indicativos de respuesta inflamatoria sistémica masiva. Adicionalmente, se documentó trombocitopenia severa con recuento plaquetario de 8.6 × 10⁹/L, planteando riesgo hemorrágico significativo. Las pruebas serológicas para virus de inmunodeficiencia humana (VIH), coronavirus del síndrome respiratorio agudo severo tipo 2 (SARS-CoV-2, COVID-19) y antígeno urinario de Legionella pneumophila resultaron negativas, descartando estas etiologías infecciosas específicas. La tomografía computarizada de alta resolución de tórax evidenció consolidaciones parenquimatosas bilaterales extensas con múltiples lesiones cavitarias necrotizantes, predominantemente localizadas en el hemitórax izquierdo, patrón radiológico compatible con neumonía necrotizante y formación de abscesos pulmonares. Las muestras de esputo obtenidas mediante lavado broncoalveolar (LBA) demostraron en la tinción de Gram la presencia de cocos Gram positivos y bacilos Gram negativos, sugiriendo etiología polimicrobiana. Con base en la correlación clínico-radiológica, se estableció el diagnóstico presuntivo de neumonía adquirida en la comunidad de severidad crítica complicada con formación de abscesos pulmonares secundaria a infección polimicrobiana. El paciente fue sometido a intubación orotraqueal e ingresado a la unidad de cuidados intensivos (UCI) para soporte ventilatorio invasivo. Se instauró cobertura antibiótica empírica de amplio espectro que incluyó vancomicina (dirigida contra cocos Gram positivos resistentes a meticilina, incluyendo Staphylococcus aureus resistente a meticilina o SARM), piperacilina-tazobactam (β-lactámico con inhibidor de β-lactamasas de amplio espectro contra bacilos Gram negativos y anaerobios) y azitromicina (macrólido con cobertura para patógenos atípicos). Complementariamente, se administró hidrocortisona en dosis de 200 mg diarios como parte del manejo del shock séptico asociado. La relación entre presión parcial arterial de oxígeno y fracción inspirada de oxígeno (PaO₂/FiO₂) inicial fue de 110 mmHg bajo ventilación mecánica invasiva, valor que define síndrome de dificultad respiratoria aguda (SDRA, definido como insuficiencia respiratoria hipoxémica de inicio agudo con infiltrados bilaterales en la imagen radiológica y relación PaO₂/FiO₂ ≤300 mmHg) de severidad moderada según los criterios de Berlín. Ante el deterioro progresivo de la oxigenación refractaria a estrategias ventilatorias convencionales, se implementó bloqueo neuromuscular farmacológico continuo mantenido durante 48 horas para optimizar la sincronía paciente-ventilador y reducir el consumo de oxígeno, así como ventilación en decúbito prono (estrategia de reposicionamiento corporal que mejora la relación ventilación-perfusión y el reclutamiento alveolar en pacientes con SDRA severo). Dado el deterioro progresivo de la función renal con oliguria refractaria y sobrecarga de volumen, se inició terapia de reemplazo renal continuo (TRRC) mediante hemodiálisis veno-venosa continua. Se implementó estrategia de hipercapnia permisiva (tolerancia deliberada de elevación de pCO₂ mediante reducción del volumen corriente para minimizar el barotrauma y volutrauma alveolar) permitiendo descensos del pH hasta 7.15, límite inferior generalmente aceptado en ausencia de contraindicaciones específicas. En el tercer día de hospitalización, se documentó deterioro gasométrico crítico con disminución abrupta de la relación PaO₂/FiO₂ a 65 mmHg, clasificando el cuadro como SDRA de severidad extrema. Se inició terapia de rescate con óxido nítrico inhalado (vasodilatador pulmonar selectivo que teóricamente mejora la oxigenación mediante redistribución del flujo sanguíneo pulmonar hacia zonas ventiladas), sin embargo, no se observó mejoría significativa en los parámetros de oxigenación. Por consiguiente, y ante la refractariedad terapéutica documentada, se procedió a la implementación de oxigenación mediante membrana extracorpórea veno-venosa (OMEC-VV, también denominada ECMO-VV por sus siglas en inglés) durante la noche del tercer día hospitalario, técnica de soporte vital extracorpóreo que permite el intercambio gaseoso mediante una membrana semipermeable externa mientras los pulmones nativos permanecen en reposo relativo. Los cultivos microbiológicos del esputo procesado aislaron exclusivamente Moraxella catarrhalis (diplococo Gram negativo considerado patógeno respiratorio de baja virulencia), hallazgo discordante con la tinción de Gram inicial que había demostrado flora polimicrobiana compleja, sugiriendo que los patógenos predominantes iniciales no fueron recuperados en los medios de cultivo convencionales. Considerando esta incongruencia microbiológica significativa y el antecedente epidemiológico relevante de residencia prolongada en un hotel cápsula (establecimiento caracterizado por condiciones de hacinamiento, ventilación subóptima y proximidad estrecha entre ocupantes, factores de riesgo reconocidos para transmisión de patógenos respiratorios aerotransportados, particularmente Mycobacterium tuberculosis), se planteó la hipótesis diagnóstica de neumonía refractaria y SDRA secundarios a tuberculosis pulmonar no diagnosticada inicialmente. En el cuarto día de hospitalización, la baciloscopia (tinción de Ziehl-Neelsen para bacilos ácido-alcohol resistentes, BAAR) del aspirado bronquial resultó intensamente positiva (>10 bacilos ácido-alcohol resistentes por campo de inmersión en aceite de 1000×, indicativo de carga bacilar extremadamente elevada), y la reacción en cadena de la polimerasa (PCR) de amplificación de ácidos nucleicos específica detectó secuencias genómicas de Mycobacterium tuberculosis, estableciendo el diagnóstico microbiológico definitivo de tuberculosis pulmonar activa con presentación fulminante. Se inició de inmediato terapia antituberculosa de primera línea con el régimen estándar de cuatro fármacos: isoniazida (inhibidor de la síntesis de ácidos micólicos de la pared celular micobacteriana), rifampicina (inhibidor de la ARN polimerasa bacteriana), pirazinamida (agente que actúa en medio ácido contra bacilos metabólicamente inactivos) y etambutol (inhibidor de la síntesis de arabinogalactano de la pared celular). Para abordar el componente inflamatorio exacerbado del SDRA asociado a tuberculosis, se administró metilprednisolona en dosis de 1 gramo diario durante tres días consecutivos (pulsos de corticosteroides de alta dosis destinados a modular la respuesta inflamatoria pulmonar excesiva). Se implementó protocolo de broncoscopia terapéutica diaria para aspiración y eliminación de secreciones respiratorias espesas y detritus necróticos que obstaculizaban las vías aéreas. Entre los días 9 y 11 de hospitalización, se documentó mejoría clínica significativa evidenciada por resolución progresiva de los infiltrados pulmonares en los estudios radiológicos seriados y un incremento sustancial en la distensibilidad (compliance) del sistema respiratorio hasta 40 ml/cmH₂O (valor que indica recuperación parcial de las propiedades elásticas pulmonares), cambios que permitieron el destete exitoso y la descontinuación de la oxigenación mediante membrana extracorpórea. Posteriormente, cinco días después de la retirada de la ECMO, se realizó traqueostomía quirúrgica percutánea para facilitar el soporte ventilatorio mecánico prolongado anticipado, mejorar el confort del paciente y optimizar la higiene bronquial. Dos días después del procedimiento de traqueostomía, se documentó hepatotoxicidad inducida por fármacos (manifestada por elevación significativa de transaminasas hepáticas atribuible a isoniazida y/o rifampicina, medicamentos con reconocido potencial hepatotóxico), circunstancia que obligó a modificar el esquema terapéutico antituberculoso, sustituyéndolo por un régimen alternativo que incluyó etambutol, estreptomicina (aminoglucósido con actividad antituberculosa administrado por vía intramuscular) y levofloxacina (fluoroquinolona de tercera generación con excelente actividad contra M. tuberculosis). Tres días subsecuentes se incorporó cicloserina (agente bacteriostático de segunda línea que interfiere con la síntesis de peptidoglicano) al régimen terapéutico. El paciente permaneció dependiente de soporte ventilatorio mecánico invasivo a través de la traqueostomía y fue trasladado a un hospital especializado en el manejo de tuberculosis (institución designada con infraestructura de aislamiento respiratorio apropiada, conocida en Japón como hospital de enfermedades infecciosas) 29 días después de su ingreso inicial. Dado que múltiples profesionales de la salud estuvieron expuestos al paciente durante el período pre-diagnóstico cuando aún no se habían implementado las precauciones de aislamiento respiratorio apropiadas para tuberculosis aerotransmitida, se estableció un programa estructurado de detección y vigilancia de exposición ocupacional a tuberculosis. Este protocolo incluyó evaluación clínica sistemática mediante cuestionario de síntomas, estudios radiológicos con radiografía de tórax posteroanterior y lateral, y pruebas inmunológicas de liberación de interferón-gamma (IGRA, por sus siglas en inglés, ensayos in vitro que detectan respuesta inmune celular específica contra antígenos de M. tuberculosis, tales como QuantiFERON-TB Gold o T-SPOT.TB), sin que se identificaran casos de infección tuberculosa activa o latente entre el personal sanitario expuesto, resultado favorable que sugiere que las medidas de control de infecciones implementadas tras el diagnóstico fueron efectivas en prevenir transmisión nosocomial secundaria."
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"text": "Una mujer de 60 años, ex fumadora y con artritis reumatoide tratada con medicamentos, había tenido una cirugía por un tumor en la pelvis que afectó el recto y parte del sacro. El análisis mostró que era un teratoma quístico maduro (un tumor benigno con diferentes tipos de tejidos). Dos años después, sintió dolor en la parte baja de la espalda. Las imágenes mostraron un nuevo crecimiento de unos 6 cm en el mismo lugar. Una biopsia confirmó que el tumor había vuelto. En una nueva cirugía, se extrajo el tumor junto con parte del hueso sacro y los tejidos cercanos. El estudio del tumor mostró que tenía zonas sólidas, quistes con líquido y partes calcificadas. Al microscopio se vieron estructuras glandulares con células anormales y necrosis, indicando transformación maligna hacia un tipo de cáncer parecido al colorrectal (adenocarcinoma). Los márgenes de la cirugía estaban libres de tumor. Una colonoscopía descartó cáncer en el colon. La paciente fue controlada regularmente y estuvo bien por dos años. Luego empeoró, con aumento del marcador CA 19.9 y una tomografía con PET mostró metástasis en órganos, huesos y tejidos blandos. No pudo recibir quimioterapia y falleció dos meses después."
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"text": "Mujer de 60 años, ex tabaquista, con sobrepeso y artritis reumatoide tratada con metotrexato y golimumab. Antecedente de resección en bloc de un tumor pélvico con rectectomía, anastomosis colorrectal y sacrectomía distal (S4). Anatomía patológica: teratoma quístico maduro de 22 × 8,5 cm con pared fibrosa, epitelio escamoso y glandular maduro. Dos años después, presentó dolor sacro. La TC y RMN mostraron masa heterogénea de 6 cm sobre las últimas vértebras sacras. Biopsia: recurrencia de teratoma maduro. Sin enfermedad sistémica, se realizó resección en bloc con abordaje posterior, conservando raíces S3. Macroscopia: tumor de 7,8 × 6 × 4,5 cm sólido-quístico, heterogéneo, con focos calcificados y adherido al sacro. Histología: invasión ósea por estructuras glandulares neoplásicas con formación micropapilar, mucina y necrosis; epitelio columnar ciliado residual en periferia. Inmunohistoquímica: CK20, calretinina, p53 y CDX2 positivos; CK7, WT‑1, PAX8 y CA125 negativos. Diagnóstico: transformación maligna de teratoma maduro a adenocarcinoma tipo colorrectal. Colonoscopía sin hallazgos neoplásicos. Seguimiento multidisciplinario: libre de enfermedad 24 meses y posteriormente recaída con elevación de CA19.9. PET‑TC: metástasis viscerales, óseas y de partes blandas. Por deterioro funcional no recibió quimioterapia y falleció dos meses después."
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"text": "Se presenta el caso de una mujer de 60 años, exfumadora, con sobrepeso y artritis reumatoide en tratamiento inmunosupresor (metotrexato y golimumab), sometida previamente a exéresis en bloc de un tumor pélvico con resección rectal, anastomosis colorrectal y sacrectomía distal (S4). El examen anatomopatológico inicial reveló una formación quística multilocular de 22 × 8,5 cm, constituida por pared fibrosa revestida de epitelio escamoso o columnar pseudoestratificado con infiltrados linfohistiocitarios y vasos ectásicos, compatible con teratoma quístico maduro. A los dos años presentó dolor sacro; la tomografía y resonancia evidenciaron masa heterogénea de ≈ 6 cm en vértebras sacras bajas, asociada a rarefacción grasa perilesional. La biopsia confirmó recidiva de teratoma maduro. Tras estadificación negativa, se decidió resección quirúrgica en bloc con abordaje posterior, incluyendo resección parcial de músculos glúteos y piramidales, sección sacra S2–S3 preservando raíces S3 y liberación presacra. La pieza quirúrgica (7,8 × 6 × 4,5 cm) era sólida‑quística, con contenido líquido‑gelatinoso y áreas calcificadas. Histología: invasión ósea por glándulas neoplásicas con pleomorfismo moderado, formación micropapilar, mucinoproducción y necrosis; epitelio columnar ciliado maduro periférico. Margen quirúrgico libre. Inmunofenotipo: CK20+, calretinina+, p53+, CDX2 focal+, CK7–, WT1–, PAX8–, CA125–, suggestivo de transformación somática maligna de teratoma maduro hacia adenocarcinoma tipo colorrectal. Colonoscopía sin neoplasia primaria, corroborando origen teratomatoso. Evolución inicial favorable, con seguimiento multidisciplinario libre de enfermedad durante 24 meses, seguido de recaída sistémica (CA 19.9 elevado, PET/TC con focos hipercaptantes viscerales, óseos y de partes blandas). Ante rápido deterioro funcional se descartó tratamiento oncológico sistémico, falleciendo dos meses después. Este caso ejemplifica la transformación maligna de un teratoma sacro maduro —entidad infrecuente en adultos— que requiere resección completa y vigilancia prolongada dada su potencial diseminación metastásica tardía."
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"text": "Una mujer italiana de 56 años con talasemia mayor fue a resonancia magnética para medir hierro en corazón, hígado y páncreas. Tenía talasemia desde los 7 años y se quitó el bazo y la vesícula. Tomaba deferasirox, vitamina D y luspatercept. La resonancia encontró una masa en el mediastino. Era un poco más grande que en 2020. No tenía síntomas. Una PET-TC mostró leve actividad y no cáncer. También había quistes en los pulmones, como en linfangioleiomiomatosis (LAM). No fumaba ni tenía problemas respiratorios. Las pruebas de pulmón mostraron baja difusión de gas. Operaron para quitar el timo y parte del pulmón. Era un timoma B2. El pulmón confirmó LAM. Le recomendaron radioterapia para el timoma y sirolimus para LAM."
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"text": "Mujer italiana de 56 años con talasemia mayor dependiente de transfusiones desde la infancia. Había sido esplenectomizada y colecistectomizada. Recibía deferasirox, vitamina D y luspatercept, que redujo el número de transfusiones necesarias. Durante una resonancia para control de hierro corporal se encontró una masa prevascular en el mediastino, ligeramente mayor que en el estudio de 2020. La paciente estaba asintomática. La PET-TC mostró una captación mínima de FDG (SUV 4,3) y no se observaron adenopatías ni invasión local. En la tomografía pulmonar se identificaron quistes pequeños de pared delgada en ambos pulmones, compatibles con linfangioleiomiomatosis (LAM). Nunca fumó y las pruebas respiratorias revelaron una baja capacidad de difusión de gases (DLCO 42%). Se practicó cirugía por toracoscopía con timectomía izquierda y resección de un segmento pulmonar. El diagnóstico fue timoma tipo B2 (Masaoka-Koga IIa, R1) y LAM pulmonar. Se indicó radioterapia complementaria y tratamiento con sirolimus."
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"text": "Se describe el caso de una mujer italiana de 56 años con talasemia mayor transfusional (genotipo HBB: c.118C>T/HBB: c.93-21G>A), diagnosticada a los 7 años, esplenectomizada y colecistectomizada; por consiguiente, bajo quelación con deferasirox, vitamina D y luspatercept (iniciado 2 años antes, extendiendo intervalos transfusionales 35%), sometida a RM para cuantificación férrica miocárdica/hepática/pancreática, revelando masa sólida mediastinal prevascular lobulada (hiperintensa T2-WI, isointensa T1-WI), mínimamente agrandada desde 2020. Asintomática sin síndrome mediastínico. PET-TC: captación FDG leve (SUVmax 4,3), sin adenopatías/extratorácica. Ventana pulmonar: quistes parenquimales bilaterales de paredes finas simétricos, sugestivos de linfangioleiomiomatosis (LAM). Espirometría: DLCO 42% predicho (KCO 73%). Timectomía toracoscópica izquierda + segmentectomía lingular: timoma B2 (infiltración capsular focal, R1; Masaoka-Koga IIa, TNM Ia). Histología pulmonar: quistes revestidos por células miomatoides (actina+, ER/PR+, HMB45 focal), inflamación intersticial crónica. Diagnóstico: timoma + LAM. Indicación: radioterapia adyuvante y sirolimus. Este caso ilustra coexistencia infrecuente de timoma y LAM en talasemia, cuyo proceso diagnóstico multimodal y manejo quirúrgico resultan pivotales para estratificación oncológica, planteando desafíos en la terapia inmunosupresora concomitante."
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"text": "Un niño de 11 años tenía dolor de cabeza en la parte de atrás y frente, con vómitos por 12 horas después de una caída en el sacro. Tenía síndrome de Marfan por mutación en el gen FBN1. El examen era normal excepto por rasgos de Marfan. Análisis de sangre y rayos X del sacro fueron normales. El dolor mejoraba acostado pero volvía al pararse. Lo internaron. No respondía bien a los analgésicos. Una tomografía mostró densidad alta en senos venosos. Una resonancia mostró descenso de amígdalas y colecciones de líquido en la espalda, como fístula de líquido cefalorraquídeo (LCR), y quistes en el sacro. Le dieron líquidos, analgésicos, hidrocortisona, cafeína y reposo en posición inclinada. Mejoró en 5 días y salió a los 12 días. Cuatro meses después, volvió el dolor con deportes. La resonancia mostró menos colecciones. Repitieron tratamiento. Al año, la resonancia mostró hidromielia. Dos años después, nuevo dolor y resonancia mostró fístula en L5-S1. Le hicieron un parche de sangre epidural. Un año después, está sin síntomas."
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"text": "Un niño de 11 años con síndrome de Marfan debido a una mutación en el gen FBN1 consultó por cefalea occipital y frontal con vómitos tras una caída leve sobre la región sacra. Los estudios iniciales fueron normales, pero el dolor de cabeza persistió, mejorando al acostarse y empeorando al ponerse de pie, por lo que se sospechó una fuga de líquido cefalorraquídeo (LCR). La resonancia magnética mostró descenso amigdalar leve y colecciones líquidas compatibles con fístula de LCR, junto con quistes de Tarlov en la zona sacra. Se aplicó tratamiento conservador con reposo, hidratación, analgésicos, cafeína e hidrocortisona, con buena evolución. Cuatro meses después, el cuadro se repitió con la actividad física, repitiéndose el tratamiento con éxito. Un año más tarde se documentó resolución de las colecciones y una ligera hidromielia dorsal. Dos años después del episodio inicial, presentó una nueva fuga a nivel lumbar (L5-S1), tratada con un parche hemático epidural, permaneciendo asintomático desde entonces."
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"text": "Se documenta el caso de un paciente masculino de 11 años diagnosticado con síndrome de Marfan (mutación heterocigótica FBN1 c.2243G>A) que presentó cefalea occipitofrontal intensa asociada a vómitos tras traumatismo sacrocoxígeo banal. La exploración neurológica fue anodina salvo fenotipo marfanoide. Analítica y radiografía sacrococcígea sin alteraciones. Cefalea ortostática (remisión en decúbito, exacerbación al incorporarse) orientó a hipotensión intracraneal. TAC craneal: hiperdensidad de senos transversos sugestiva de enlentecimiento venoso; RM craneoespinal: descenso amigdalar 5 mm, separación dural con colecciones extradurales dorsolumbares y quistes sacros de Tarlov, sin ectasia dural. Diagnóstico: síndrome de hipotensión intracraneal espontáneo (SHIE) secundario a fístula meníngea. Manejo conservador: hiperhidratación, analgésicos, hidrocortisona IV 8 mg/kg/día, cafeína 2,5 mg/kg/día, reposo en Trendelemburg. Evolución inicial favorable. Recurrencia a 4 meses tras actividad deportiva; RM: desaparición dorsal, persistencia sacra; repetición terapéutica exitosa. Control 1 año: resolución de colecciones, hidromielia dorsal incidental. A 2 años: recurrencia cefalea ortostática; RM: refístula L5‑S1. Se practicó parche hemático epidural L4‑L5 con remisión clínica sostenida >12 meses. Este cuadro ejemplifica el SHIE en síndrome de Marfan, destacando el papel de la fragilidad meníngea fibrilínica y la efectividad del parche hemático epidural como abordaje definitivo, subrayando la necesidad de seguimiento prolongado mediante neuroimagen."
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"text": "Un hombre de 60 años tuvo cáncer en la próstata. Le hicieron una operación para quitar la próstata y algunos ganglios cercanos. Dos años después, los médicos vieron que el cáncer volvió con un examen de sangre y una imagen especial que mostró un ganglio pequeño cerca de la pelvis.\n\nLos doctores planearon una cirugía para quitar ese ganglio usando una técnica para marcarlo antes de la operación. Usaron anestesia local y una aguja para poner un marcador negro en el ganglio. Durante el procedimiento, el intestino se movió, así que usaron un líquido para moverlo y no dañarlo. Todo salió bien.\n\nDespués, el paciente fue al quirófano y le quitaron el ganglio marcado. Los exámenes confirmaron que el ganglio tenía cáncer."
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"text": "Un hombre de 60 años había sido tratado por un cáncer de próstata agresivo mediante una cirugía que incluyó la extracción completa de la glándula prostática y de los ganglios linfáticos cercanos. Luego de dos años sin evidencia de enfermedad, presentó una elevación moderada del antígeno prostático específico y una pequeña imagen sospechosa en la región pélvica observada en una tomografía con emisión de positrones. Ante estos hallazgos, un equipo multidisciplinario decidió realizar una nueva cirugía para retirar el ganglio afectado. Para ubicarlo con precisión antes del procedimiento, se efectuó una marcación especial utilizando carbón activado, guiada por tomografía computada y bajo anestesia local. Como el ganglio se encontraba junto a vasos sanguíneos y estructuras nerviosas importantes, se eligió un acceso desde el lado opuesto del cuerpo, atravesando el hueso sacro, con una aguja diseñada para biopsias óseas. Durante el avance de la aguja, el movimiento del intestino hizo que el colon se desplazara, por lo que se aplicó una técnica llamada hidrodisección: se inyectó líquido contrastado para separar las estructuras y evitar lesiones. Todo el proceso se controló por imágenes en tiempo real y no hubo complicaciones. La cirugía posterior se desarrolló sin incidentes, se extrajo el ganglio marcado y el estudio microscópico confirmó la presencia de células cancerosas, lo que indicó una recaída localizada de la enfermedad."
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"text": "Paciente masculino de 60 años, con diagnóstico previo de adenocarcinoma prostático Gleason 8 (4+4) con compromiso bilateral lobar, intervenido mediante prostatectomía radical y linfadenectomía ilio-obturatriz (pT3b-N0-Mx). Tras un período libre de enfermedad de dos años, se evidenció recaída bioquímica manifestada por elevación significativa del antígeno prostático específico (1.9 ng/mL) y aparición de adenopatía hipogástrica subcentimétrica con hipermetabolismo en PET-TC con Fluorocolina (SUV 3.8).\n\nEn el contexto de una discusión multidisciplinaria, se llevó a cabo planificación quirúrgica para linfadenectomía de rescate, integrando marcación prequirúrgica bajo guía tomográfica. Debido a la complejidad anatómica, con cercanía a estructuras vasculares esenciales (arteria y vena hipogástrica) y la raíz nerviosa L5, se optó por un abordaje trans-sacro contralateral, utilizando aguja T-Lok Bone Marrow Biopsy Standard calibre 11 Gauge bajo anestesia local con lidocaína al 2% hasta alcanzar el periostio sacro superficial.\n\nEl peristaltismo intestinal provocó desplazamiento del colon sigmoide, requiriendo maniobra de hidrodisección con solución contrastada diluida para prevenir lesión de víscera hueca. La progresión coaxial del instrumental se monitorizó continuamente mediante tomografía, permitiendo la inyección precisa de 1 ml de carbón activado al 4% a través de aguja tipo Chiba calibre 20 Gauge.\n\nEl control tomográfico post-procedimiento confirmó ausencia de complicaciones inmediatas. El paciente fue trasladado en condiciones hemodinámicas estables al quirófano, donde se extrajo con éxito el ganglio marcado. El análisis anatomopatológico confirmó infiltración carcinomatosa en el ganglio, corroborando la utilidad clínica y técnica de la marcación prequirúrgica en el manejo de recidivas locales del carcinoma prostático."
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"text": "Un bebé de seis meses fue llevado a urgencias con fiebre alta de hasta 40 °C, tos, moqueo y poco interés por comer desde hacía tres días. Había nacido a término y ya se había recuperado sin problemas de una neumonía al nacer. Tenía todas las vacunas al día y asistía a la guardería. Al llegar, el bebé estaba con fiebre pero estable, sin deshidratación ni palidez, y su cabeza se veía normal. Al poco tiempo, comenzó a estar más quieto y soñoliento, y la parte blanda de su cabeza (fontanela) se notaba hinchada. Los médicos sospecharon meningitis y le hicieron una punción lumbar. El líquido del estudio mostró una gran cantidad de células inflamatorias y poco azúcar, lo que confirmó una infección bacteriana. Se empezó el tratamiento con antibióticos y corticoides por vía venosa. También se dio un remedio preventivo a sus contactos con rifampicina. Las pruebas confirmaron que la infección estaba causada por *Haemophilus influenzae* tipo A, una bacteria sensible a los antibióticos usados. El bebé además tenía un virus llamado adenovirus, pero la evolución fue buena y la fiebre desapareció al cuarto día. Luego del tratamiento, el pequeño siguió creciendo y desarrollándose normalmente, sin secuelas ni problemas posteriores."
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"text": "Un lactante de seis meses, previamente sano y con vacunación completa, fue llevado al servicio de urgencias por fiebre alta de hasta 40 °C, tos, moqueo y rechazo alimentario desde hacía tres días. Había tenido una neumonía neonatal que se resolvió sin complicaciones y en la actualidad asistía a la guardería. Al ingreso se encontraba febril, pero estable y con hidratación normal. Horas después, comenzó a mostrarse somnoliento y la fontanela anterior se palpaba abultada, lo que hizo sospechar meningitis. Se realizó punción lumbar y el líquido cefalorraquídeo mostró aumento de células, bajo nivel de glucosa y proteínas elevadas, compatibles con meningitis bacteriana. Se inició enseguida tratamiento con ceftriaxona intravenosa en dosis altas, junto con dexametasona y profilaxis con rifampicina para los convivientes. El cultivo de líquido cefalorraquídeo y sangre identificó *Haemophilus influenzae* tipo A, una bacteria sensible a las cefalosporinas de tercera generación. También se detectó la presencia del virus adenovirus, pero este hallazgo no modificó el tratamiento. El cuadro evolucionó bien, con desaparición de la fiebre al cuarto día y recuperación completa del paciente. Durante los controles de seguimiento se observó un desarrollo normal y sin secuelas. El caso fue informado al sistema nacional de vigilancia epidemiológica como medida sanitaria preventiva."
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"text": "Se presenta el caso clínico de un lactante masculino de seis meses con antecedente de neumonía congénita complicada por neumotórax en el período neonatal, resuelta tras drenaje, antibioticoterapia y asistencia ventilatoria invasiva. El paciente, inmunizado según el calendario nacional (tres dosis de vacuna Hib, dos de MenB, dos de MenACWY y dos contra rotavirus), asistía a guardería y no presentaba antecedentes familiares relevantes. Consultó en el servicio de urgencia por fiebre persistente de 40 °C cada seis horas, rinorrea, tos y rechazo alimentario de tres días de evolución. Al examen físico inicial se lo halló febril, hemodinámicamente estable, con fontanela anterior normotensa; en horas posteriores evolucionó hacia hipotonía, somnolencia y abombamiento frontal, signos sugestivos de hipertensión endocraneana secundaria a meningoencefalitis aguda. Se practicó punción lumbar que evidenció líquido cefalorraquídeo (LCR) claro, con pleocitosis intensa (3509 células/mm³, > 90 % PMN), proteinorraquia elevada (198 mg/dL, VN < 60) e hipoglucorraquia crítica (8 mg/dL, < 50 % de glucemia), confirmando meningitis bacteriana. La búsqueda de antígeno capsular fue positiva para *Haemophilus influenzae*. Se inició antibioticoterapia empírica con ceftriaxona intravenosa en dosis meníngea (100 mg/kg/día), precedida de dexametasona para modulación inflamatoria, durante 10 días. El cultivo de LCR y hemocultivo aisló *H. influenzae* capsulado serotipo A; la prueba de sensibilidad (Etest) demostró cepa multisensible, particularmente a cefalosporinas de tercera generación. Se implementó profilaxis con rifampicina en convivientes y notificación al Sistema Nacional de Vigilancia Epidemiológica. Adicionalmente, las pruebas por inmunofluorescencia en LCR y aspirado nasofaríngeo fueron positivas para adenovirus, configurando coinfección viral. Los estudios hematológicos y bioquímicos revelaron leucocitos 6730/mL, PCR 127 mg/L y plaquetas 499 000/mL. El cuadro clínico evolucionó favorablemente, con defervescencia al cuarto día y restitución neuroclínica plena. Durante el seguimiento en consultas de pediatría, otorrinolaringología e inmunodeficiencias no se evidenciaron complicaciones auditivas ni déficit neurológico, y el desarrollo psicomotor permaneció acorde a la cronología etaria. Este caso reviste interés por la identificación de una meningitis bacteriana invasiva por *H. influenzae* serotipo A en un lactante correctamente inmunizado frente a *Hib*, lo cual sugiere una potencial reemergencia de serotipos no b y refuerza la importancia del diagnóstico microbiológico molecular y de la vigilancia epidemiológica sistemática ante infecciones invasivas en lactantes inmunocompetentes."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 53 años con artritis reumatoide tratada con metotrexato empezó a sentirse cada vez más cansada, con palidez, fiebre en las noches y bajó 15 kilos en seis meses sin proponérselo. Después presentó falta de aire al hacer esfuerzo y, más tarde, vómito con sangre y evacuaciones oscuras. Además, tuvo hinchazón y dolor en la pierna izquierda. Cuando llegó al hospital, se encontró que tenía anemia severa, coágulos en las venas de la pierna, daño en el hígado y el bazo, y ganglios muy grandes en el tórax y abdomen. Se le hizo una biopsia de ganglio y un estudio de médula ósea, que mostraron la presencia de cáncer en los ganglios y médula. El diagnóstico fue linfoma no Hodgkin difuso de células B. La paciente fue enviada a un hospital de tercer nivel para iniciar tratamiento con quimioterapia."
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"text": "Paciente femenina de 53 años con antecedente de artritis reumatoide de 15 años en tratamiento crónico con metotrexato. Ocho meses antes inició con astenia, adinamia y fiebre nocturna, acompañadas de pérdida de 15 kg en seis meses. Posteriormente presentó disnea progresiva y, días previos a su ingreso, sangrado digestivo alto con melena y hematemesis, además de dolor e inflamación en la pierna izquierda. En urgencias se documentó anemia severa que requirió transfusión, y un Doppler evidenció trombosis venosa profunda. El ultrasonido abdominal reveló infartos esplénicos y hepáticos y cambios crónicos hepáticos. La tomografía contrastada mostró hepatoesplenomegalia y múltiples adenopatías axilares, mediastinales y paraaórticas. Una biopsia de ganglio axilar y médula ósea evidenció infiltración linfoplasmocitaria compatible con linfoma no Hodgkin. En el hospital de referencia se confirmó linfoma difuso de células B CD20+, con sobrecrecimiento de células dendríticas, por lo que se dispuso inicio de quimioterapia."
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"target_audience": "Profesionales / Universidad o posgrado",
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"text": "Mujer de 53 años, con diagnóstico de artritis reumatoide de 15 años de evolución en manejo con metotrexato, que presentó síndrome constitucional de ocho meses (astenia, adinamia, fiebre vespertina/nocturna, pérdida ponderal de 15 kg) y disnea progresiva, complicándose cinco días previos a su ingreso con STDA (melena masiva y hematemesis escasa) y edema doloroso del MID. Al ingreso: anemia severa, TVP documentada en MID mediante Doppler, hepatopatía crónica secundaria a metotrexato con infartos hepatoesplénicos en USG, y endoscopia con várices esofágicas pequeñas sin sangrado activo. La TAC contrastada identificó hepatoesplenomegalia y conglomerados adenopáticos axilares, mediastinales y retroperitoneales. Biopsia de ganglio axilar derecho + aspirado medular: proliferación linfoplasmocitaria con células plasmáticas displásicas y reticulares, concluyente para infiltración linfoide. En nivel terciario, inmunohistoquímica confirmó linfoma no Hodgkin difuso de células B grandes (CD20+) con sobrecrecimiento de células dendríticas. Diagnóstico final: LNH difuso de células B estadio IV, en paciente inmunosuprimida por AR/metotrexato. Se planificó inicio de poliquimioterapia inmunomoduladora. Este caso subraya la asociación entre inmunosupresión crónica y linfomagénesis, con manifestaciones multiorgánicas y compromiso avanzado al diagnóstico."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 28 años fue al hospital porque tenía una masa en la pelvis desde hacía varios meses. Al principio pensaron que era endometriosis y le dieron tratamiento para el dolor. Más tarde, la masa creció y los médicos decidieron operarla. Durante la cirugía encontraron líquido con sangre en el abdomen y muchas zonas inflamadas. Le quitaron el útero y limpiaron las lesiones. Después de la operación se recuperó bien y recibió medicinas especiales por varios meses. Con el tiempo, dejó el tratamiento y sorprendentemente quedó embarazada de forma natural. Tuvo un bebé sano y no volvió a tener problemas."
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"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
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"text": "Una mujer asiática de 28 años fue atendida por una masa pélvica que llevaba 10 meses en progresión lenta pero constante. En la ecografía inicial se observó una lesión adyacente al útero junto con un aumento considerable del marcador CA125, lo que orientó inicialmente a un cuadro de endometriosis activa. Aunque recibió tratamiento médico y el marcador descendió de forma transitoria, el tamaño de la masa continuó aumentando, lo que obligó a reconsiderar el diagnóstico. Una nueva ecografía con contraste mostró características sugestivas de posible malignidad, motivo por el cual se decidió realizar una cirugía mayor con histerectomía y resección de múltiples implantes peritoneales. Durante la intervención se detectó ascitis hemorrágica y múltiples focos compatibles con endometriosis severa diseminada. El estudio anatomopatológico confirmó endometriosis extensa asociada a adenomiosis y fibrosis reactiva. Posteriormente, la paciente completó tratamiento hormonal prolongado con agonistas de GnRH y dienogest. De forma inesperada, tras suspender la medicación, consiguió un embarazo espontáneo y evolucionó sin complicaciones hasta el parto de un recién nacido sano, sin evidencia de recurrencia."
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"text": "Paciente asiática de 28 años con historia de masa pélvica de 10 meses, inicialmente manejada como endometriosis inflamatoria tras ecografía que evidenció lesión anexial heterogénea y CA125 sérico de 416 mU/mL. A pesar de la caída transitoria del marcador tumoral con tratamiento antiinfeccioso, la masa progresó a 8 cm con ascitis y realce mural en ecografía contrastada, planteando sospecha de transformación maligna. Se realizó laparotomía con liberación de adherencias, histerectomía total, resección parcial de epiplón y coagulación de implantes peritoneales difusos. Se drenaron 600 mL de ascitis hemorrágica. Macroscópicamente se observaron implantes friables en epiplón, superficies uterinas y peritoneales, similares a tejido necrótico. El análisis histopatológico reveló endometriosis profunda con cambios reactivos: vasodilatación, espongiosis, infiltrado linfohistiocitario, proliferación fibroblástica, adenomiosis y quistes foliculares ováricos bilaterales. La citología de ascitis fue negativa para neoplasia. El manejo posoperatorio incluyó GnRH-α mensual (leuprorelina) por 6 meses seguido de dienogest oral prolongado durante 3 años. Tras suspensión de terapia hormonal, la paciente concibió espontáneamente y cursó un embarazo eutócico, culminando en parto vaginal a término sin signos de recurrencia."
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"text": "Una mujer de 66 años había recibido hace muchos años un tratamiento con una máquina especial para aliviar la picazón por psoriasis en el cuero cabelludo. Con el tiempo, su piel se volvió muy sensible y le quedaron cicatrices. Muchos años después, le empezaron a salir pequeños tumores en la cabeza llamados cáncer de piel tipo BCC y también manchas dañadas por el sol. Al principio, los médicos se los quitaban con cirugías y con frío, pero seguían apareciendo más y cada vez dolía más tratarla. Entonces probaron otro tratamiento nuevo llamado HIFU, que usa ondas de sonido muy fuertes para quemar el tumor sin cortar la piel. Le pusieron anestesia para que no sintiera dolor y trataron cada lesión de forma rápida. Casi todas las heridas se curaron bien y sin problemas. Solo una regresó después de un tiempo, pero la trataron otra vez con el mismo método."
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"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
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"text": "Una paciente de 66 años, previamente tratada con rayos grenz para la psoriasis del cuero cabelludo en la década de 1980, desarrolló décadas más tarde múltiples carcinomas basocelulares (BCC) y queratosis actínicas (AK) en esa zona. Debido a la sensibilidad extrema de la piel y a las cicatrices previas, las opciones tradicionales como la cirugía de Mohs o la terapia tópica resultaban dolorosas y difíciles de realizar de forma repetida. Ante la aparición continua de nuevas lesiones, los médicos decidieron probar el tratamiento con ultrasonido focalizado de alta intensidad (HIFU). Cada lesión fue delimitada, se verificó su profundidad con ecografía y se aplicó anestesia local antes del procedimiento. Se utilizó una sonda especial para aplicar energía de forma precisa, logrando destruir los tumores sin necesidad de incisiones. Durante un seguimiento de 15 meses, se trataron 10 lesiones mediante HIFU, obteniendo una curación completa en la mayoría de los casos y solo una recurrencia, que fue nuevamente tratada con éxito."
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"text": "Paciente femenina de 66 años con antecedente de psoriasis del cuero cabelludo tratada extensivamente con rayos grenz en los años 80, complementados con alquitrán de hulla, ácido salicílico y corticosteroides sistémicos. A pesar del control sintomático inicial, desarrolló alopecia cicatricial progresiva y marcada alodinia cutánea. Aproximadamente 35 años después, presentó brotes múltiples de carcinoma basocelular (BCC) y queratosis actínicas (AK) confinados al cuero cabelludo irradiado. Entre 2020 y 2022 recibió múltiples procedimientos de criocirugía, curetaje y al menos 13 resecciones mediante cirugía de Mohs, sin lograr control sostenido debido a aparición continua de lesiones de novo y recidivas en tejido fuertemente fibrosado. Dada la limitada tolerancia al dolor y el deterioro tisular, se consideró la ablación mediante ultrasonido focalizado de alta intensidad (HIFU) como alternativa con mejor perfil terapéutico. Previa confirmación ecográfica de profundidad (0,5-1,3 mm), se administró anestesia infiltrativa y se aplicó HIFU con transductor de 1,3 mm, 150 ms/dosis y 0,9 J/dosis, con 20-200 disparos según extensión. Las lesiones evolucionaron con reepitelización espontánea sin infecciones ni necesidad de cuidados adicionales. En 15 meses de seguimiento se intervinieron 10 lesiones que de otro modo habrían requerido exéresis, con aclaramiento completo en 7/8 BCC y 2/2 AK; la única recurrencia fue susceptible de retratamiento con HIFU. Estos hallazgos sugieren que HIFU puede constituir una opción viable en pacientes con BCC múltiples sobre piel irradiada o quirúrgicamente comprometida."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 20 años llegó al hospital con dolor de barriga fuerte, mucha hinchazón, vómitos, y no podía ir al baño. Un día antes, tuvo un bebé por cesárea. También tenía presión alta durante el embarazo y estaba muy delgada. Nunca antes tuvo problemas parecidos ni otras enfermedades. \n\nEn el examen, estaba muy enferma. Tenía la presión baja, latidos rápidos y respiraba rápido. Su barriga estaba muy hinchada y le dolía mucho, sobre todo abajo a la derecha. Tenía una herida en el vientre por la cesárea que se veía bien. También tenía una pequeña herida en su parte íntima que parecía una quemadura.\n\nLe pusieron una sonda para orinar y le dieron suero. También le pusieron una manguera en la nariz, pero no salió mucho. Le hicieron análisis de sangre y una radiografía que mostró que sus intestinos estaban bloqueados. Como no había mucho equipo, no se pudo hacer una tomografía.\n\nLos médicos pensaron que tenía una obstrucción intestinal y decidieron operarla. Vieron que un pedazo de intestino estaba enredado causando el problema. Como el intestino aún estaba bien, lo quitaron parcialmente. Después de la operación, siguió con la presión muy baja. Le dieron antibióticos porque pensaban que tenía una infección fuerte.\n\nAl día siguiente, la herida en su parte íntima empeoró: tenía gangrena, una infección muy grave. La llevaron de nuevo al quirófano para limpiar la herida y luego a cuidados intensivos. A pesar de los esfuerzos, la joven murió por una infección muy fuerte que causó fallos en sus órganos."
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"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
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"text": "Una joven de 20 años acudió al hospital con dolor abdominal progresivo, vómitos frecuentes y dificultad para eliminar gases y heces. Un día antes había tenido una cesárea por una alteración del ritmo cardíaco del feto. También presentaba preeclampsia sin complicaciones graves y bajo peso, con un índice de masa corporal de 16,5. No tenía antecedentes médicos importantes ni cirugías abdominales previas.\n\nDurante el examen físico se encontró hipotensa, con taquicardia, y un abdomen muy distendido, doloroso al tacto, especialmente en el lado inferior derecho. Se observó una pequeña herida en el labio mayor izquierdo que inicialmente pareció una quemadura por yodo. Se le colocó una sonda vesical y una nasogástrica, y se le administró suero. Las pruebas de laboratorio mostraron leucocitos bajos con predominancia de neutrófilos, anemia leve y trombocitopenia. La radiografía abdominal evidenció obstrucción intestinal con acumulación de líquido.\n\nSe decidió explorar quirúrgicamente y se encontró un vólvulo del intestino delgado que causaba la obstrucción. A pesar de que la mayor parte del intestino era viable, se realizó una hemicolectomía derecha por inestabilidad hemodinámica. Durante y después de la cirugía, la paciente se mantuvo con presión baja. Se inició tratamiento antibiótico por sospecha de shock séptico.\n\nAl día siguiente, la herida en la vulva progresó a gangrena de Fournier, una infección grave del tejido. Se realizó desbridamiento quirúrgico radical y se trasladó a la unidad de cuidados intensivos. Lamentablemente, falleció al segundo día postoperatorio debido a un shock séptico severo y fallo multiorgánico."
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"target_audience": "Profesionales / Universidad o posgrado",
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"text": "Paciente femenina de 20 años presentó distensión abdominal progresiva, calambres, vómitos biliosos y ausencia de eliminación de gases y heces de 24 horas de evolución. Antecedente inmediato de cesárea por bradicardia fetal severa y diagnóstico de preeclampsia sin criterios de severidad. Presenta desnutrición grado moderado (IMC 16,5 kg/m²), sin antecedentes quirúrgicos abdominales ni patologías crónicas conocidas.\n\nEn la evaluación clínica: estado general comprometido, frecuencia cardíaca taquicárdica (116–120 lpm), presión arterial 90/70 mmHg, FR 22–24 rpm, afebril. Abdomen distendido, simétrico, con peristalsis visible, dolor difuso con mayor sensibilidad en el cuadrante inferior derecho. Signos clínicos de ascitis, herida quirúrgica suprapúbica sin complicaciones. Se identificó lesión superficial lineal en labio mayor izquierdo inicialmente interpretada como lesión por yodo. \n\nRecibió fluidoterapia (2 L de SSN) con diuresis de 200 ml/h. Sonda nasogástrica sin débito importante. Hemograma con leucopenia (1.780 células/µl), neutrofilia relativa (88 %), hemoglobina 12,7 mg/dl, trombocitopenia (78.000/µl), función renal conservada, enzimas hepáticas ligeramente elevadas. Radiografía simple reveló niveles hidroaéreos centrales y distensión intestinal con borramiento de la cavidad pélvica sugerente de líquido libre. No se realizó TC debido a limitaciones de recursos.\n\nSe indicó laparotomía exploratoria bajo anestesia general. Diagnóstico intraoperatorio: abdomen agudo secundario a vólvulo ileocólico con ileon distal girando sobre ciego y colon ascendente móviles. Intestino viable; apéndice involucrado y gangrenoso. Dilatación severa de intestino delgado proximal y colon distal. Presencia de 4 litros de líquido seroso libre. Se realizó hemicolectomía derecha por inestabilidad hemodinámica persistente, con fijación del colon al peritoneo posterolateral derecho.\n\nPersistió con shock posoperatorio refractario. Se instauró antibioterapia empírica con ceftriaxona y metronidazol. Evolucionó desfavorablemente con progresión de lesión vulvar a gangrena de Fournier. Se amplió cobertura antimicrobiana a meropenem, vancomicina y metronidazol, seguida de desbridamiento quirúrgico radical e ingreso a UCI quirúrgica intubada. La paciente falleció al segundo día postoperatorio por falla multiorgánica secundaria a shock séptico refractario."
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"target_audience": "Estudiantes de primaria/media (5º a 7º grado)",
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"text": "Una mujer de 82 años fue al hospital porque tenía dolor de barriga, diarrea y estaba muy cansada y confundida. Tenía presión alta y problemas de tiroides, pero no otras enfermedades importantes. Los médicos vieron que tenía fiebre y la barriga le dolía al tocarla. Le hicieron análisis y vieron que su orina olía mal y tenía señales de infección. Pensaron que podía ser una infección en la vejiga, así que le pusieron antibióticos. También le hicieron una radiografía especial y vieron que tenía una infección fuerte en la vejiga causada por una bacteria llamada Escherichia coli. Le dieron el medicamento durante 7 días y mejoró bien, así que pudo volver a su casa."
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"text": "Una mujer de 82 años acudió al servicio de urgencias tras varios días con dolor abdominal, diarrea y episodios de desorientación. Presentaba antecedentes conocidos de hipertensión e hipotiroidismo, ambos controlados con medicación. A la exploración se observaron fiebre y signos leves de deshidratación. El análisis de orina mostró nitritos positivos y presencia de glóbulos blancos y rojos, lo que sugería una infección urinaria complicada. Por este motivo, se decidió iniciar tratamiento antibiótico con ceftriaxona. Para descartar afectación más extensa, se realizó una tomografía abdominal, que evidenció una cistitis enfisematosa, una forma poco frecuente pero potencialmente grave de infección vesical. El cultivo confirmó la presencia de Escherichia coli sensible al antibiótico administrado. La paciente fue ingresada para observación y completó siete días de tratamiento con buena evolución clínica y analítica, permitiendo su posterior alta."
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"text": "Mujer de 82 años que consulta en urgencias por dolor abdominal difuso, diarrea acuosa y síndrome confusional subagudo en el contexto de deterioro del estado general. Antecedentes personales de hipertensión arterial e hipotiroidismo en tratamiento farmacológico estable. La exploración física evidenció febrícula, mucosas deshidratadas y abdomen doloroso sin signos de irritación peritoneal. Analíticamente destacó PCR elevada, hiponatremia e hipopotasemia, con hemograma y función renal conservados. El sedimento urinario mostró nitritos positivos y hematuria significativa, motivando el inicio de antibioterapia empírica con ceftriaxona ante sospecha de infección del tracto urinario complicada. La tomografía tóraco-abdominopélvica objetivó neumatosis parietal vesical compatible con cistitis enfisematosa. El urocultivo aisló Escherichia coli >100 000 UFC/mL sensible al antibiótico pautado, con hemocultivos concordantes. Se decidió ingreso en medicina interna, completándose 7 días de tratamiento con resolución clínica y bioquímica, procediéndose al alta hospitalaria."
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"text": "Un hombre de 50 años fue al hospital porque tenía un dolor muy fuerte en el abdomen que le dolía desde hacía una semana y se extendía hacia la espalda. También tenía náuseas, vómitos, cansancio y el estómago muy hinchado. El médico vio que estaba pálido y que tenía la presión baja y el corazón latiendo rápido. Le hicieron análisis de sangre y estudios con imágenes, y encontraron un gran coágulo y una arteria dañada cerca del estómago. Como estaba en riesgo, los doctores decidieron operarlo de inmediato para detener el sangrado. Le abrieron el abdomen, sacaron la sangre acumulada y repararon la arteria rota. Después de la operación, el paciente se recuperó bien y pudo volver a su casa diez días después."
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"target_audience": "Secundaria/Bachillerato (8º a 12º grado)",
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"text": "Un paciente de 50 años con antecedentes de diabetes e hipertensión mal controladas acudió al hospital debido a un dolor abdominal intenso y persistente que llevaba una semana. El dolor se concentraba en la parte superior del abdomen y se extendía hacia la espalda. Además, presentaba náuseas, vómitos, distensión abdominal marcada y cansancio extremo. Durante la exploración física, el personal médico notó palidez generalizada, presión arterial baja y un ritmo cardíaco acelerado. Los análisis de laboratorio indicaron anemia grave y un aumento en los glóbulos blancos, lo que sugería una respuesta inflamatoria. Las pruebas de imagen, como la ecografía y la tomografía, permitieron identificar un hematoma de gran tamaño en la cavidad abdominal, asociado con un aneurisma en la arteria gastroduodenal que probablemente se había roto. Ante la posibilidad de una hemorragia activa, el equipo médico decidió intervenir quirúrgicamente de urgencia. Durante la cirugía, se retiró una gran cantidad de sangre acumulada y se localizó el aneurisma, que fue abierto, limpiado y reparado mediante suturas específicas. También se cerró una pequeña perforación en el duodeno para evitar complicaciones posteriores. El paciente fue trasladado a la unidad de cuidados intensivos para vigilancia estrecha y mostró una recuperación progresiva. El drenaje se retiró al tercer día y fue dado de alta en buenas condiciones diez días después de la operación."
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"text": "Varón de 50 años, con antecedentes de diabetes mellitus tipo 2 e hipertensión arterial de control irregular, ingresó con dolor epigástrico agudo de una semana de evolución, de inicio súbito, irradiado a región dorsal y asociado a distensión abdominal, náuseas, vómitos y melena previa. Presentaba hipotensión (90/60 mmHg), taquicardia (120 lpm) y palidez cutaneomucosa. La analítica evidenció anemia microcítica hipocrómica severa (Hb 6 g/dL) y leucocitosis. La tomografía con angiografía reveló hematoma paraumbilical de 14,3 × 8,8 cm con aneurisma trombosado de la arteria gastroduodenal de 3,4 × 2,2 cm, con cambios inflamatorios adyacentes y evisceración diafragmática izquierda con herniación esplénica y gástrica. Se realizó laparotomía exploratoria urgente, con evacuación de aproximadamente 2 L de hemoperitoneo. Se identificó pseudoaneurisma gastroduodenal fistulizado al duodeno, que fue pinzado proximal y distalmente, abierto y sometido a aneurismorrafia con prolene 7-0. La perforación duodenal concomitante se reparó en dos planos y se colocó sonda nasogástrica translesional. Tras hemostasia e irrigación, se dejó drenaje peritoneal. La evolución postoperatoria fue favorable, con drenaje seroso escaso y alta hospitalaria al décimo día sin complicaciones."
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"text": "Una mujer de 63 años con obesidad e hipertensión fue al hospital porque tenía fiebre, tos seca, dolor muscular y había perdido el olfato. Le hicieron una prueba de COVID-19 y salió positiva. Al poco tiempo comenzó a respirar muy mal y tuvo que ser intubada y conectada a un respirador. Como seguía empeorando, la conectaron a una máquina especial llamada ECMO, que ayuda a oxigenar la sangre fuera del cuerpo cuando los pulmones no funcionan bien. Después de varios días, tuvo una infección en los pulmones causada por una bacteria, pero se curó con antibióticos. Poco a poco empezó a mejorar y pudieron quitarle la ECMO. Más adelante tuvo una convulsión, así que le hicieron estudios del cerebro. La resonancia mostró algunas pequeñas hemorragias y zonas inflamadas, pero no había signos de infección en el líquido del cerebro. A pesar de todo, la mujer se recuperó casi por completo y salió del hospital después de 44 días, para continuar su rehabilitación."
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"text": "Una mujer de 63 años con antecedentes de obesidad e hipertensión ingresó al hospital con siete días de síntomas compatibles con COVID-19: fiebre, tos seca, hiposmia y mialgias. Presentaba insuficiencia respiratoria moderada, linfopenia y elevación de proteína C reactiva. La prueba PCR confirmó infección por SARS-CoV-2. Su cuadro evolucionó rápidamente a insuficiencia respiratoria grave, requiriendo intubación y ventilación mecánica, incluyendo maniobras de prono y bloqueo neuromuscular. A pesar de ello, persistía la hipoxemia y fue conectada a soporte VV-ECMO con buena respuesta inicial. Posteriormente presentó neumonía asociada al ventilador por Pseudomonas aeruginosa, tratada exitosamente con antibióticos. Tras 20 días de internación, la función pulmonar mejoró y logró ser retirada de ECMO y traqueostomizada. En el día 34, luego del retiro de la sedación, presentó una crisis epiléptica generalizada, lo que motivó estudios neurológicos. La resonancia mostró leucoencefalopatía con microhemorragias múltiples, pero el líquido cefalorraquídeo fue normal y negativo para SARS-CoV-2. Evolucionó favorablemente, con recuperación casi completa del estado neurológico, y fue dada de alta tras 44 días."
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"target_audience": "Profesionales sanitarios o estudiantes avanzados de medicina",
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"text": "Paciente femenina de 63 años con comorbilidades metabólicas (obesidad e hipertensión arterial) ingresó con neumonía viral por SARS-CoV-2 confirmada mediante RT-PCR nasofaríngea, evolucionando rápidamente a síndrome de distrés respiratorio agudo (SDRA) grave refractario a ventilación mecánica convencional con parámetros protectores (VC 6 ml/kg, PEEP 14 cmH₂O). Ante hipoxemia persistente (PaO₂/FiO₂ < 100), se instauró asistencia extracorpórea veno-venosa (VV-ECMO), con estabilidad hemodinámica y adecuada oxigenación extracorpórea. Durante el soporte (455 h) presentó infección nosocomial por Pseudomonas aeruginosa, tratada con ceftazidima y vancomicina. Tras mejoría de la mecánica pulmonar, fue decanulada y posteriormente traqueostomizada. En fase de destete sedativo desarrolló crisis comicial generalizada, motivando neuroimagen. La RM cerebral evidenció leucoencefalopatía simétrica confluyente en sustancia blanca subcortical occipitoparietal (hiperintensidad FLAIR), sin restricción en DWI, junto con microhemorragias multifocales en cuerpo calloso y cápsulas externas, compatibles con síndrome encefalopático posterior reversible (SEPR) en contexto de disfunción endotelial e hipercoagulabilidad asociadas a COVID-19. El LCR fue bioquímica e inmunológicamente normal. Evolucionó con restitutio ad integrum neurológica casi completa y fue derivada a rehabilitación tras 44 días de estancia hospitalaria."
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