| Dhoop Bahut Hai Rahat Indori |
| धूप बहुत है राहत इन्दौरी |
| धूप बहुत है मौसम जल थल भेजो ना |
| धूप बहुत है मौसम जल थल भेजो न |
| बाबा मेरे नाम का बादल भेजो न |
| मौल्सरी की शाख़ों पर भी दिए जलें |
| शाख़ों का केसरिया आँचल भेजो न |
| नन्ही-मुन्नी सब चहकारें कहाँ गईं |
| मोरों के पैरों की पायल भेजो न |
| बस्ती-बस्ती दहशत किसने बो दी है |
| गलियों-बाज़ारों की हलचल भेजो न |
| सारे मौसम एक उमस के आदी हैं |
| छाँव की ख़ुशबू, धूप का संदल भेजो न |
| मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ |
| मेरे जैसा कोई पागल भेजो न |
| सिर्फ़ सच और झूठ की मीज़ान में रक्खे रहे |
| सिर्फ़ सच और झूठ की मीज़ान में रक्खे रहे |
| हम बहादुर थे मगर मैदान में रक्खे रहे |
| जुगनुओं ने फिर अँधेरों से लड़ाई जीत ली |
| चाँद-सूरज घर के रौशनदान में रक्खे रहे |
| धीरे-धीरे सारी किरनें ख़ुदकुशी करने लगीं |
| हम सहीफ़ा थे मगर जुज़दान में रक्खे रहे |
| बंद कमरे खोल कर सच्चाइयाँ रहने लगीं |
| ख़्वाब कच्ची धूप थे, दालान में रक्खे रहे |
| सिर्फ़ इतना फ़ासला है ज़िंदगी से मौत का |
| शाख़ से तोड़े गए गुलदान में रक्खे रहे |
| ज़िंदगी भर अपनी गूँगी धड़कनों के साथ-साथ |
| हम भी घर के क़ीमती सामान में रक्खे रहे |
| सर पर सात आकाश ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं |
| सर पर सात आकाश, ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं |
| आँखें छोटी पड़ जाती हैं इतने मंज़र बिखरे हैं |
| ज़िंदा रहना खेल नहीं है इस आबाद ख़राबे में |
| वो भी अक्सर टूट गया है, हम भी अक्सर बिखरे हैं |
| उस बस्ती के लोगों से जब बातें कीं तो ये जाना |
| दुनिया भर को जोड़ने वाले अंदर-अंदर बिखरे हैं |
| इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है |
| नींदें कमरों में जागी हैं, ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं |
| आँगन के मासूम शजर ने एक कहानी लिक्खी है |
| इतने फल शाख़ों पे नहीं थे जितने पत्थर बिखरे हैं |
| सारी धरती, सारे मौसम, एक ही जैसे लगते हैं |
| आँखों आँखों क़ैद हुए थे मंज़र मंज़र बिखरे हैं |
| हंसते रहते हैं मुसलसल हम-तुम |
| हंसते रहते हैं मुसल्सल हम-तुम |
| हों ना जायें कहीं पागल हम-तुम |
| जैसे दरिया किसी दरिया से मिले |
| आओ! हो जाएँ मुकम्मल हम-तुम |
| उड़ती फिरती है हवाओं में ज़मीं |
| रेंगते फिरते हैं पैदल हम-तुम |
| प्यास सदियों की लिए आँखों में |
| देखते रहते हैं बादल हम-तुम |
| धूप हमने ही उगाई है यहां |
| हैं इसी राह का पीपल हम-तुम |
| शहर की हद ही नहीं आती है |
| काटते रहते हैं जंगल हम-तुम |
| हौसले ज़िंदगी के देखते हैं |
| हौसले ज़िंदगी के देखते हैं |
| चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं |
| नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है |
| ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं |
| रोज़ हम इस अँधेरी धुँध के पार |
| क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं |
| धूप इतनी कराहती क्यों है |
| छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं |
| टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने |
| रास्ते वापसी के देखते हैं |
| पानियों से तो प्यास बुझती नहीं |
| आइए ज़हर पी के देखते हैं |
| हमें दिन-रात मरना चाहिए था |
| हमें दिन-रात मरना चाहिए था |
| मियाँ कुछ कर गुज़रना चाहिए था |
| बहुत ही ख़ूबसूरत है ये दुनिया |
| यहाँ कुछ दिन ठहरना चाहिए था |
| मुझे तू ने किनारे से है जाना |
| समंदर में उतरना चाहिए था |
| यहाँ सदियों से तारीकी जमी है |
| मेरी शब को सिहरना चाहिए था |
| अकेली रात बिस्तर पर पड़ी है |
| मुझे इस दिन से डरना चाहिए था |
| डुबोकर मुझको ख़ुश होता है दरिया |
| उसे तो डूब मरना चाहिए था |
| किसी से बेवफ़ाई की है मैंने |
| मुझे इक़रार करना चाहिए था |
| ये देखो किरचियाँ हैं आइनों की |
| सलीक़े से सँवरना चाहिए था |
| किसी दिन उसकी महफ़िल में पहुँचकर |
| गुलों में रंग भरना चाहिए था |
| फ़लक पर तब्सरा करने से पहले |
| ज़मीं का क़र्ज़ उतरना चाहिए था |
| दाव पर मैं भी, दाव पर तू भी है |
| दाव पर मैं भी, दाव पर तू भी है |
| बेख़बर मैं भी, बेख़बर तू भी |
| आस्मां ! मुझसे दोस्ती करले |
| दरबदर मैं भी, दरबदर तू भी |
| कुछ दिनों शहर की हवा खा ले |
| सीख जायेगा सब हुनर तू भी |
| मैं तेरे साथ, तू किसी के साथ |
| हमसफ़र मैं भी हमसफ़र तू भी |
| हैं वफ़ाओं के दोनों दावेदार |
| मैं भी इस पुलसिरात पर, तू भी |
| ऐ मेरे दोसत ! तेरे बारे में |
| कुछ अलग राय थी मगर, तू भी |
| कौन दरियाओं का हिसाब रखे |
| कौन दरियाओं का हिसाब रखे |
| नेकियाँ, नेकियों में डाल आया |
| ज़िंदगी किस तरह गुज़ारते हैं |
| ज़िंदगी भर न ये कमाल आया |
| झूठ बोला है कोई आईना |
| वर्ना पत्थर में कैसे बाल आया |
| वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम |
| आसमाँ की तरफ़ उछाल आया |
| क्यूँ ये सैलाब-सा है आँखों में |
| मुस्कुराए थे हम, ख़याल आया |
| मेरे मरने की ख़बर है उसको |
| मेरे मरने की ख़बर है उसको |
| अपनी रुसवाई का डर है उसको |
| अब वह पहला-सा नज़र आता नहीं |
| ऐसा लगता है नज़र है उसको |
| मैं किसी से भी मिलूँ, कुछ भी करूं |
| मेरी नीयत की ख़बर है उसको |
| भूल जाना उसे आसान नहीं |
| याद रखना भी हुनर है उसको |
| रोज़ मरने की दुआ माँगता है |
| जाने किस बात का डर है उसको |
| मंज़िलें साथ लिये फिरता है |
| कितना दुश्वार सफ़र है उसको |
| सर पर बोझ अँधियारों का है मौला ख़ैर |
| सर पर बोझ अँधियारों का है मौला ख़ैर |
| और सफ़र कुहसारों का है मौला ख़ैर |
| दुश्मन से तो टक्कर ली है सौ-सौ बार |
| सामना अबके यारों का है मौला ख़ैर |
| इस दुनिया में तेरे बाद मेरे सर पर |
| साया रिश्तेदारों का है मौला ख़ैर |
| दुनिया से बाहर भी निकलकर देख चुके |
| सब कुछ दुनियादारों का है मौला ख़ैर |
| और क़यामत मेरे चराग़ों पर टूटी |
| झगड़ा चाँद-सितारों का है मौला ख़ैर |
| लिख रहा है हुजरा पीर फ़क़ीरों का |
| और मंजर दरबारों का है मौला ख़ैर |
| चौराहों पर वर्दी वाले आ पहुंचे |
| मौसम फिर त्यौहारों का है मौला ख़ैर |
| एक ख़ुदा है, एक पयम्बर, एक किताब |
| झगड़ा तो दस्तारों का है मौला ख़ैर |
| वक़्त मिला तो मसजिद भी हो आएंगे |
| बाक़ी काम मज़ारों का है मौला ख़ैर |
| मैंने 'अलिफ़' से 'ये' तक ख़ुशबू बिखरा दी |
| लेकिन गांव गंवारों का है मौला ख़ैर |
| हमें अब इश्क़ का चाला पड़ा है |
| हमें अब इश्क़ का चाला पड़ा है |
| बड़े मुँहज़ोर से पाला पड़ा है |
| कई दिन से नहीं डूबा यह सूरज |
| हथेली पर मेरी छाला पड़ा है |
| यह साज़िश धूप की है या हवा की |
| गुलों का रंग क्यों काला पड़ा है |
| सफ़र पर मैं तो तनहा जा रहा हूं |
| यह बस्ती भर में क्यों ताला पड़ा है |
| मेरी पलकों पे उतरे फिर फ़रिश्ते |
| समुन्दर फिर तह-ओ-बाला पड़ा है |
| सुनहरा चांद उतरा है नदी में |
| किनारे चांद का हाला पड़ा है |
| यहां पर ख़त्म हैं ऊंची उड़ानें |
| ज़मीं पर आसमां वाला पड़ा है |
| उलझकर रह गए हैं सारे मंज़र |
| हमारी आंख में जाला पड़ा है |
| हवा है दोपहर तक भीगी-भीगी |
| सवेरे देर तक पाला पड़ा है |
| पुराने शहर के मंज़र निकलने लगते हैं |
| पुराने शहर के मंज़र निकलने लगते हैं |
| ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं |
| मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में |
| मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते हैं |
| हसीन लगते हैं जाड़ों में सुबह के मंज़र |
| सितारे धूप पहन कर निकलने लगते हैं |
| बुलन्दियों का तसव्वुर भी ख़ूब होता है |
| कभी-कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं |
| बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला ! |
| क़रीबी दोस्त भी बच कर निकलने लगते हैं |
| अगर ख़्याल भी आए कि तुझको ख़त लिक्खूँ |
| तो घोंसलों से कबूतर निकलने लगते हैं |
| अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं |
| अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं |
| घर के हालात घर से पूछते हैं |
| क्यूँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले |
| एक-एक हमसफ़र से पूछते हैं |
| कितने जंगल हैं इन मकानों में |
| बस यही शहर भर से पूछते हैं |
| यह जो दीवार है यह किस की है |
| हम इधर वह उधर से पूछते हैं |
| हैं कनीज़ें भी इस महल में क्या |
| शाहज़ादों के डर से पूछते हैं |
| क्या कहीं क़त्ल हो गया सूरज |
| रात से रात-भर से पूछते हैं |
| जुर्म है ख़्वाब देखना भी क्या |
| रात-भर चश्म-ए-तर से पूछते हैं |
| ये मुलाक़ात आख़िरी तो नहीं |
| हम जुदाई के डर से पूछते हैं |
| कौन वारिस है छाँव का आख़िर |
| धूप में हम-सफ़र से पूछते हैं |
| ये किनारे भी कितने सादा हैं |
| कश्तियों को भँवर से पूछते हैं |
| वो गुज़रता तो होगा अब तन्हा |
| एक-इक रहगुज़र से पूछते हैं |
| क्या कभी ज़िंदगी भी देखेंगे |
| बस यही उम्र-भर से पूछते हैं |
| ज़ख़्म का नाम फूल कैसे पड़ा |
| तेरे दस्त-ए-हुनर से पूछते हैं |
| हमने ख़ुद अपनी रहनुमाई की |
| हमने ख़ुद अपनी रहनुमाई की |
| और शोहरत हुई ख़ुदाई की |
| मैंने दुनिया से, मुझ से दुनिया ने |
| सैकड़ों बार बेवफ़ाई की |
| खुले रहते हैं सारे दरवाज़े |
| कोई सूरत नहीं रिहाई की |
| टूटकर हम मिले हैं पहली बार |
| ये शुरूआ'त है जुदाई की |
| सोए रहते हैं ओढ़ कर ख़ुद को |
| अब ज़रूरत नहीं रज़ाई की |
| मंज़िलें चूमती हैं मेरे क़दम |
| दाद दीजे शिकस्ता-पाई की |
| ज़िंदगी जैसे-तैसे काटनी है |
| क्या भलाई की, क्या बुराई की |
| इश्क़ के कारोबार में हमने |
| जान दे कर बड़ी कमाई की |
| अब किसी की ज़बाँ नहीं खुलती |
| रस्म जारी है मुँह-भराई की |
| शजर हैं अब समर आसार मेरे |
| शजर हैं अब समर आसार मेरे |
| उगे आते हैं दावेदार मेरे |
| मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे |
| मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे |
| यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं |
| समुंदर हैं समुंदर पार मेरे |
| अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें |
| अगर चाहें तो ये बीमार मेरे |
| हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन |
| गए बेकार सारे वार मेरे |
| मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ |
| यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे |
| हँसी में टाल देना था मुझे भी |
| ख़ता क्यूँ हो गए सरकार मेरे |
| तसव्वुर में न जाने कौन आया |
| महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे |
| तुम्हारा नाम दुनिया जानती है |
| बहुत रुस्वा हैं अब अशआर मेरे |
| भँवर में रुक गई है नाव मेरी |
| किनारे रह गए इस पार मेरे |
| मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ |
| अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे |
| इधर की शय उधर कर दी गई है |
| इधर की शय उधर कर दी गई है |
| ज़मीं ज़ेरो-ज़बर कर दी गई है |
| ये काली रात है दो चार पल की |
| ये कहने में सहर कर दी गई है |
| तआरुफ़ को ज़रा फैला दिया है |
| कहानी मुख्तसर कर दी गई है |
| इबादत में बसर करनी थी लेकिन |
| ख़राबों में बसर कर दी गई है |
| कई ज़र्रात बाग़ी हो चुके हैं |
| सितारों को ख़बर कर दी गई है |
| वह मेरी हम-क़दम होने न पाई |
| जो मेरी हम-सफ़र कर दी गई है |
| पाँव से आसमान लिपटा है |
| पाँव से आसमान लिपटा है |
| रास्तों से मकान लिपटा है |
| रौशनी है तेरे ख़यालों की |
| मुझसे रेशम का थान लिपटा है |
| कर गये सब किनारा कश्ती से |
| सिर्फ़ इक बादवन लिपटा है |
| दे तवानाईयां मेरे माबूद ! |
| जिस्म से ख़ानदान लिपटा है |
| और मैं सुन रहा हूँ क्या-क्या कुछ |
| मुझसे एक बेजुबान लिपटा है |
| सारी दुनिया बुला रही है मगर |
| मुझसे हिन्दोस्तान लिपटा है |
| सफ़र में जब भी इरादे जवान मिलते हैं |
| सफ़र में जब भी इरादे जवान मिलते हैं |
| खुली हवाएँ, खुले बादबान मिलते हैं |
| बहुत कठिन है मसाफ़त नई ज़मीनों की |
| क़दम-क़दम पे नये आसमान मिलते हैं |
| मैं उस मुहल्ले में एक उम्र काट आया हूँ |
| जहाँ पे घर नहीं मिलते, मकान मिलते हैं |
| बात आपस में जो ज़ोर-ज़ोर से करते हैं |
| सफ़र में ऐसे कई बेज़बान मिलते हैं |
| जहाँ-जहाँ भी चिराग़ों ने ख़ुदकुशी की है |
| वहाँ-वहाँ पे हवा के निशान मिलते हैं |
| रक़ीब, दोस्त, पड़ोसी, अज़ीज़, रिश्तेदार |
| मेरे ख़िलाफ़ सभी के बयान मिलते हैं |
| ऊँचे-ऊँचे दरबारों से क्या लेना |
| ऊँचे-ऊँचे दरबारों से क्या लेना |
| बेचारे हैं, बेचारों से क्या लेना |
| जो मांगेंगे तूफ़ानों से मांगेंगे |
| काग़ज़ की इन पतवारों से क्या लेना |
| हम ठहरे बंजारे हम बंजारों को |
| दरवाज़ों और दीवारों से क्या लेना |
| ख़्वाबों वाली कोई चीज़ नहीं मिलती |
| सोच रहा हूँ बाज़ारों से क्या लेना |
| ख़ाली हाथों जीतना है ये जंग हमें |
| लकड़ी की इन तलवारों से क्या लेना |
| आग में हम तो बाग़ लगाते हैं हमको |
| दोज़ख़ ! तेरे अंगारों से क्या लेना |
| चारागरी का दावा करते फिरते हैं |
| बस्ती के इन बीमारों से क्या लेना |
| साथ हमारे कई सुनहरी सदियाँ हैं |
| हमें शनीचर, इतवारों से क्या लेना |
| अपना मालिक अपना ख़ालिक़ अफ़ज़ल है |
| आती-जाती सरकारों से क्या लेना |
| पाँव पसारो सारी धरती अपनी है |
| यार ! इजाज़त मक्कारों से क्या लेना |
| काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं |
| काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं |
| और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं |
| आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत |
| हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं |
| हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है |
| हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं |
| देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की |
| आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं |
| ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने |
| बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं |
| एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे |
| उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं |
| किसने दस्तक दी है दिल पर कौन है |
| किसने दस्तक दी है दिल पर कौन है |
| आप तो अन्दर हैं बाहर कौन है |
| रौशनी ही रौशनी है हर तरफ़ |
| मेरी आँखों में मुन्नवर कौन है |
| आसमां झुक-झुक के करता है सवाल |
| आपके कद के बराबर कौन है |
| हम रखेंगें अपने अश्कों का हिसाब |
| पूछने वाला समंदर कौन है |
| सारी दुनिया हैरती है किसलिए |
| दूर तक मंज़र ब मंज़र कौन है |
| शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर |
| शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर |
| मगर ये हाथ में क्या लाल लाल है ठाकुर |
| कई मलूल से चेहरे तुम्हारे गाँव में हैं सुना है |
| तुम को भी इस का मलाल है ठाकुर |
| ख़राब हालों का जो हाल था ज़माने से |
| तुम्हारे फैज़ से अब भी बहाल है ठाकुर |
| इधर तुहारे ख़ज़ाने जवाब देते हैं |
| उधर हमारी अना का सवाल है ठाकुर |
| किसी गरीब दुपट्टे का कर्ज़ है इस पर |
| तुम्हारे पास जो रेशम की शाल है ठाकुर |
| तुम्हारी लाल हवेली छुपा न पाएगी |
| हमे ख़बर है कहाँ कितना माल है ठाकुर |
| दुआ को नन्हे गुलाबों ने हाथ उठाये हैं |
| बस अब यहाँ से तुम्हारा जवाल है ठाकुर |
| मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा |
| मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा |
| ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा |
| सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है |
| मैं आफ़्ताब से आगे निकल के देखूँगा |
| मज़ाक़ अच्छा रहेगा ये चाँद-तारों से |
| मैं आज शाम से पहले ही ढल के देखूँगा |
| वो मेरे हुक्म को फ़रियाद जान लेता है |
| अगर ये सच है तो लहजा बदल के देखूँगा |
| उजाले बाँटने वालों पे क्या गुज़रती है |
| किसी चराग़ की मानिंद जल के देखूँगा |
| अजब नहीं कि वही रौशनी मुझे मिल जाए |
| मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा |
| जितना देख आये हैं अच्छा है यही काफ़ी है |
| जितना देख आये हैं अच्छा है यही काफ़ी है |
| अब कहाँ जाइयेगा दुनिया है यही काफ़ी है |
| हमसे नाराज़ है एक सूरज कि पड़े सोते हो |
| जाग उठने की तमन्ना है बस यही काफ़ी है |
| अब ज़रूरी तो नहीं है कि वह फलदार भी हो |
| शाख से पेड़ का रिश्ता है यही काफ़ी है |
| लाओ मैं तुमको समुन्दर के इलाके लिख दूं |
| मेरे हिस्से में ये क़तरा है यही काफ़ी है |
| अब अगर कम भी जियें हम तो कोई रंज नहीं |
| हमको जीने का सलीक़ा है यही काफ़ी है |
| क्या ज़रूरी है कभी तुम से मुलाक़ात भी हो |
| तुमसे मिलने की तमन्ना है यही काफ़ी है |
| अब सितारों पे कहां जायें तनाबें लेकर, |
| ये जो मिट्टी का घरौंदा है यही काफ़ी है। |
| सब को रुस्वा बारी बारी किया करो |
| सब को रुस्वा बारी बारी किया करो |
| हर मौसम में फ़तवे जारी किया करो |
| रातों का नींदों से रिश्ता टूट चुका |
| अपने घर की पहरे-दारी किया करो |
| क़तरा क़तरा शबनम गिन कर क्या होगा |
| दरियाओं की दावे-दारी किया करो |
| रोज़ क़सीदे लिक्खो गूँगे बहरों के |
| फ़ुर्सत हो तो ये बेगारी किया करो |
| शब भर आने वाले दिन के ख़्वाब बुनो |
| दिन भर फ़िक्र-ए-शब-बेदारी किया करो |
| चाँद ज़ियादा रौशन है तो रहने दो |
| जुगनू-भय्या जी मत भारी किया करो |
| जब जी चाहे मौत बिछा दो बस्ती में |
| लेकिन बातें प्यारी प्यारी किया करो |
| रात बदन-दरिया में रोज़ उतरती है |
| इस कश्ती में ख़ूब सवारी किया करो |
| रोज़ वही इक कोशिश ज़िंदा रहने की |
| मरने की भी कुछ तय्यारी किया करो |
| ख़्वाब लपेटे सोते रहना ठीक नहीं |
| फ़ुर्सत हो तो शब-बेदारी किया करो |
| काग़ज़ को सब सौंप दिया ये ठीक नहीं |
| शेर कभी ख़ुद पर भी तारी किया करो |
| मौत की तफ़सील होनी चाहिये |
| मौत की तफ़सील होनी चाहिये |
| शहर में एक झील होनी चाहिये |
| चाँद तो हर शब निकलता है मगर |
| ताक़ में क़न्दील होनी चाहिये |
| रौशनी जो जिस्म तक महदूद है |
| रूह में तहलील होनी चाहिये |
| हुक्म गूंगों का है लेकिन हुक्म है |
| हुक्म की तामील होनी चाहिये |
| दिये जलाये तो अंजाम क्या हुआ मेरा |
| दिये जलाये तो अंजाम क्या हुआ मेरा |
| लिखा है तेज हवाओं ने मर्सिया मेरा |
| कहीं शरीफ नमाज़ी कहीं फ़रेबी पीर |
| कबीला मेरा नसब मेरा सिलसिला मेरा |
| किसी ने जहर कहा है किसी ने शहद कहा |
| कोई समझ नहीं पाता है जायका मेरा |
| मैं चाहता था ग़ज़ल आस्मान हो जाये |
| मगर ज़मीन से चिपका है काफ़िया मेरा |
| मैं पत्थरों की तरह गूंगे सामईन में था |
| मुझे सुनाते रहे लोग वाकिया मेरा |
| उसे खबर है कि मैं हर्फ़-हर्फ़ सूरज हूँ |
| वो शख्स पढ़ता रहा है लिखा हुआ मेरा |
| जहाँ पे कुछ भी नहीं है वहाँ बहुत कुछ है |
| ये कायनात तो है खाली हाशिया मेरा |
| बुलंदियों के सफर में ये ध्यान आता है |
| ज़मीन देख रही होगी रास्ता मेरा |
| मैं जंग जीत चुका हूँ मगर ये उलझन है |
| अब अपने आप से होगा मुक़ाबला मेरा |
| खिंचा-खिंचा मैं रहा ख़ुद से जाने क्यों वरना |
| बहुत ज्यादा न था मुझसे फ़ासला मेरा |
| सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए |
| सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए |
| ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए |
| शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं |
| शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए |
| मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है |
| मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए |
| मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में |
| तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए |
| ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में |
| ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए |
| मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया |
| इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए |
| धर्म बूढ़े हो गए मज़हब पुराने हो गए |
| धर्म बूढ़े हो गए मज़हब पुराने हो गए |
| ऐ तमाशागार तेरे करतब पुराने हो गए |
| कैसी चाहत क्या मुरव्वत क्या मुहब्बत क्या ख़ुलूस |
| इन सभी अल्फ़ाज़ के मतलब पुराने हो गए |
| आज-कल छुट्टी के दिन भी घर पड़े रहते हैं हम |
| शाम, साहिल ,तुम, समंदर सब पुराने हो गए |
| रेंगते रहते हैं हम सदियों से सदियाँ ओढ़कर |
| हम नए थे ही कहाँ जो अब पुराने हो गए |
| आस्तीनों में वही खंजर वही हमदर्दियाँ |
| है नए अहबाब लेकिन ढब पुराने हो गए |
| एक ही मरकज़ पे आँखें जंग-आलूदा हुईं |
| चाक पर फिर-फिर के रोज़ो-शब पुराने हो गए |
| मेरी तेज़ी, मेरी रफ़्तार हो जा |
| मेरी तेज़ी, मेरी रफ़्तार हो जा |
| सुबक रौ, उठ कभी तलवार हो जा |
| अभी सूरज सदा देकर गया है |
| ख़ुदा के वास्ते बेदार हो जा |
| है फ़ुर्सत तो किसी से इश्क कर ले |
| हमारी ही तरह बेकार हो जा |
| तेरी दुश्मन है तेरी सादालौही |
| मेरी माने तो तू कुछ दुशवार हो जा |
| शिकस्ता कश्तियों से क्या उम्मीदें |
| किनारे सो रहे हैं, पार हो जा |
| तुझे कया दर्द की लज़्ज़त बताएँ |
| मसीहा ! आ कभी बीमार हो जा |
| उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी |
| उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी |
| मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी |
| इरादा था कि मैं कुछ देर तूफ़ाँ का मज़ा लेता |
| मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी |
| मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को |
| मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी |
| मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता |
| यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी |
| वह शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे |
| बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी |
| मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूटा है |
| कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी |
| तेरे वादे की तेरे प्यार की मोहताज नहीं |
| तेरे वादे की तेरे प्यार की मोहताज नहीं |
| ये कहानी किसी किरदार की मोहताज नहीं |
| आसमां ओढ़ के सोए हैं खुले मैदां में |
| अपनी ये छत किसी दीवार की मोहताज नहीं |
| ख़ाली कशकौल पे इतराई हुई फिरती है |
| ये फ़क़ीरी किसी दस्तार की मोहताज नहीं |
| ख़ुद कफ़ीली का हुनर सीख लिया है मैंने |
| ज़िन्दगी अब किसी सरकार की मोहताज नहीं |
| मेरी तहरीर है चस्पां मेरी पेशानी पर |
| अब जुबां ज़िल्लत-ए-इज़हार की मोहताज नहीं |
| लोग होंठों पे सजाए हुए फिरते हैं मुझे |
| मेरी शोहरत किसी अख़बार की मोहताज नहीं |
| रोज़ आबाद नये शहर किया करती है |
| शायरी अब किसी दरबार की मोहताज नहीं |
| मेरे अख़लाक़ की एक धूम है बाज़ारों में |
| ये वह शय है जो ख़रीदार की मोहताज नहीं |
| इसे तूफ़ां ही किनारे से लगा देते हैं |
| मेरी कश्ती किसी पतवार की मोहताज नहीं |
| मैंने मुल्कों की तरह लोगों के दिल जीते हैं |
| ये हुकूमत किसी तलवार की मोहताज नहीं |
| ऊँघती रहगुज़र के बारे में |
| ऊँघती रहगुज़र के बारे में |
| लोग पूछेंगे घर के बारे में |
| मील के पत्थरों से पूछता हूँ |
| अपने एक हमसफ़र के बारे में |
| मश्वरा कर रहे हैं आपस में |
| चन्द जुगनू सहर के बारे में |
| एक सच्ची ख़बर सुनानी है |
| एक झूठी ख़बर के बारे में |
| उंगलियों से लहु टपकता है |
| क्या लिखें चारागर के बारे में |
| लाख वह गुमशुदा सही लेकिन |
| जानता है ख़िज़र के बारे में |
| दरबदर जो थे वह दीवारों के मालिक हो गये |
| दरबदर जो थे वह दीवारों के मालिक हो गये |
| मेरे सब दरबान, दरबारों के मालिक हो गये |
| लफ़्ज़ गूँगे हो चुके, तहरीर अंधी हो चुकी |
| जितने मुख़बिर थे वे अख़बारों के मालिक हो गये |
| लाल सूरज आसमां से घर की छत पर आ गया |
| जितने थे बेकार सब कारों के मालिक हो गये |
| और अपने घर में हम बैठे रहे मशअल बकफ़ |
| चन्द जुगनू चांद और तारों के मालिक हो गये |
| देखते ही देखते कितनी दुकानें खुल गईं |
| बिकने आए थे वह बाज़ारों के मालिक हो गये |
| सर बकफ़ थे तो सरों से हाथ धोना पड़ गया |
| सर झुकाए थे वह दस्तारों के मालिक हो गये |
| दो गज़ टुकड़ा उजले-उजले बादल का |
| दो गज़ टुकड़ा उजले-उजले बादल का |
| याद आता है एक दुपट्टा मलमल का |
| शहर के मंज़र देख के चीख़ा करता है |
| मेरे अन्दर इक सन्नाटा जंगल का |
| बादल हाथी-घोड़े ले कर आते हैं |
| लेकिन अपना रस्ता तो है पैदल का |
| मुझसे आकर मेरी जुबां में बात करे |
| लिखता रहता है जो खाता हर पल का |
| आते-जाते अंधी आँखें पढ़ती हैं |
| हर पत्थर पर नाम लिखा है मख़मल का |
| खुले-खुले से रहने के हम आदी हैं |
| ध्यान किसे है दरवाज़े की साँक़ल का |
| देखें किस दिन पहुँचोगे तुम तारों तक |
| ऊँचाई तक इक रस्ता है दलदल का |
| गीला दामन गीली-गीली आँखें हैं |
| हर मौसम में एक मौसम है जल-थल का |
| मुझको अपने रंग में ढाला दुनिया ने |
| साँप हुआ हूँ ख़ुद ही अपने सन्दल का |
| देखें कितना बाज़ारों में आए उछाल |
| हम सोना हैं और ज़माना पीतल का |
| दुआओं में वह तुम्हें याद करने वाला है |
| दुआओं में वह तुम्हें याद करने वाला है |
| कोई फ़क़ीर की इमदाद करने वाला है |
| ये सोच-सोच के शर्मिन्दगी-सी होती है |
| वह हुक्म देगा जो फ़रियाद करने वाला है |
| ज़मीन ! हम भी तेरे वारिसों में हैं कि नहीं |
| वह इस सवाल को बुनियाद करने वाला है |
| यही ज़मीन मुझे गोद लेने वाली है |
| ये आसमां मेरी इमदाद करने वाला है |
| ये वक़्त तू जिसे बरबाद करता रहता है |
| ये वक़्त ही तुझे बरबाद करने वाला है |
| ख़ुदा दराज़ करे उम्र मेरे दुश्मन की |
| कोई तो है जो मुझे याद करने वाला है |
| सबब वह पूछ रहे हैं उदास होने का |
| सबब वह पूछ रहे हैं उदास होने का |
| मिरा मिज़ाज नहीं बेलिबास होने का |
| नया बहाना है हर पल उदास होने का |
| ये फ़ायदा है तिरे घर के पास होने का |
| महकती रात के लम्हो ! नज़र रखो मुझ पर |
| बहाना ढूँढ़ रहा हूँ उदास होने का |
| मैं तेरे पास बता किस ग़रज़ से आया हूँ |
| सुबूत दे मुझे चेहरा-शनास होने का |
| मिरी ग़ज़ल से बना ज़ेहन में कोई तस्वीर |
| सबब न पूछ मिरे देवदास होने का |
| कहाँ हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ |
| ख़ुश-आमदीद है मौसम उदास होने का |
| कई दिनों से तबीअ'त मिरी उदास न थी |
| यही जवाज़ बहुत है उदास होने का |
| मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर |
| मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का |
| मिरे लबों से तबस्सुम मज़ाक़ करने लगा |
| मैं लिख रहा था क़सीदा उदास होने का |
| पता नहीं ये परिंदे कहाँ से आ पहुँचे |
| अभी ज़माना कहाँ था उदास होने का |
| मैं कह रहा हूँ कि ऐ दिल इधर-उधर न भटक |
| गुज़र न जाए ज़माना उदास होने का |
| अँधेरे चारों तरफ़ सांय-सांय करने लगे |
| अँधेरे चारों तरफ़ सांय-सांय करने लगे |
| चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे |
| तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर |
| ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे |
| लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज |
| परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे |
| ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू |
| बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे |
| झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले |
| वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे |
| अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी |
| सफ़ेद पोश उठे कांय-कांय करने लगे |
| अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है |
| अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है |
| ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है |
| लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में |
| यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है |
| मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन |
| हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है |
| हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है |
| हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है |
| सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में |
| किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है |
| जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे |
| किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है |
| रात की धड़कन जब तक जारी रहती है |
| रात की धड़कन जब तक जारी रहती है |
| सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है |
| जब से तू ने हल्की हल्की बातें कीं |
| यार तबीअत भारी भारी रहती है |
| पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में |
| हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है |
| वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं |
| जिन लोगों के पास सवारी रहती है |
| छत से उस की धूप के नेज़े आते हैं |
| जब आँगन में छाँव हमारी रहती है |
| घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया |
| घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है |
| बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते |
| बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते |
| एक सच के लिए किस-किस से बुराई लेते |
| आबले अपने ही अँगारों के ताज़ा हैं अभी |
| लोग क्यूँ आग हथेली पे पराई लेते |
| बर्फ़ की तरह दिसम्बर का सफ़र होता है |
| हम उसे साथ न लेते तो रज़ाई लेते |
| कितना मानूस-सा हमदर्दों का ये दर्द रहा |
| इश्क़ कुछ रोग नहीं था जो दवाई लेते |
| चाँद रातों में हमें डसता है दिन में सूरज |
| शर्म आती है अंधेरों से कमाई लेते |
| तुम ने जो तोड़ दिए ख़्वाब हम उन के बदले |
| कोई क़ीमत कभी लेते तो ख़ुदाई लेते |
| तो क्या बारिश भी ज़हरीली हुई है |
| तो क्या बारिश भी ज़हरीली हुई है |
| हमारी फ़स्ल क्यों नीली हुई है |
| ये किसने बाल खोले मौसमों के |
| हवा क्यों इतनी बर्फ़ीली हुई है |
| किसी दिन पूछिये सूरजमुखी से |
| कि रंगत किसलिये पीली हुई है |
| सफ़र का लुत्फ़ बढ़ता जा रहा है |
| ज़मीं कुछ और पथरीली हुई है |
| सुनहरी लग रहा है एक-एक पल |
| कई सदियों में तबदीली हुई है |
| दिखाया है अगर सूरज ने गुस्सा |
| तो बालू और चमकीली हुई है |
| चराग़ों को उछाला जा रहा है |
| चराग़ों को उछाला जा रहा है |
| हवा पर रोब डाला जा रहा है |
| न हार अपनी न अपनी जीत होगी |
| मगर सिक्का उछाला जा रहा है |
| वो देखो मय-कदे के रास्ते में |
| कोई अल्लाह-वाला जा रहा है |
| थे पहले ही कई साँप आस्तीं में |
| अब इक बिच्छू भी पाला जा रहा है |
| मिरे झूटे गिलासों की छका कर |
| बहकतों को सँभाला जा रहा है |
| हमी बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन |
| हमें घर से निकाला जा रहा है |
| जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो |
| मोहब्बत करने वाला जा रहा है |
| ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ |
| ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ |
| वह इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ |
| ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है |
| हैं इतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ |
| ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है |
| बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ |
| बिखर-बिखर सी गई है किताब साँसों की |
| ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ |
| रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़ हैं हम लोग |
| अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ |
| हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से |
| सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ |
| बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर |
| जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ |
| खुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है |
| खुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है |
| रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है |
| इक कहानी खत्म करके वो बहुत है मुतमईन |
| भूल बैठा है कि आगे इक कहानी और है |
| जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूँ मैं |
| एक बीमारी मुझे ये खानदानी और है |
| बोरिये पर बैठिए, कुल्हड़ में पानी पीजिए |
| हम कलन्दर हैं हमारी मेजबानी और है |
| एक दिन इस शहर की कीमत लगाईं जायेगी |
| गाँव में थोड़ी बहुत खेती-किसानी और है |
| कौन फिर पूछेगा गूंगे मुंसिफ़ों से खैरियत |
| एक ले-देकर हमारी बे-ज़बानी और है |
| हर मुसाफ़िर है सहारे तेरे |
| हर मुसाफ़िर है सहारे तेरे |
| कश्तियां तेरी, किनारे तेरे |
| तेरे दामन को ख़बर दे कोई, |
| टूटते रहते हैं तारे तेरे |
| धूप दरिया में रवानी थी बहुत |
| बह थक गए चांद सितारे तेरे |
| तेरे दरवाज़े को जुम्बिश न हुई |
| मैंने सब नाम पुकारे तेरे |
| बे तलब आँखों में क्या-क्या कुछ है |
| वो समझता है इशारे तेरे |
| कब पसीजेंगे ये बहरे बादल |
| हैं शज़र हाथ पसारे तेरे |
| मेरा इक पल भी मुझे मिल न सका |
| मैंने दिन-रात गुज़ारे तेरे |
| तेरी आँखें तेरी बीनाई है |
| तेरे मंज़र हैं नज़ारे तेरे |
| यह मेरी प्यास बता सकती है |
| क्यों समंदर हुए खारे तेरे |
| जो भी मनसूब तेरे नाम से थे |
| मैंने सब क़र्ज़ उतारे तेरे |
| तूने लिखा मेरे चेहरे पे धुंआ |
| मैंने आईने संवारे तेरे |
| और मेरा दिल वही मुफ़लिस का चिराग़ |
| चाँद तेरा है सितारे तेरे |
| ये हर सू जो फ़लक-मंज़र खड़े हैं |
| ये हर सू जो फ़लक-मंज़र खड़े हैं |
| न जाने किसके पैरों पर खड़े हैं |
| तुला है धूप बरसाने पे सूरज |
| शजर भी छतरियाँ लेकर खड़े हैं |
| उन्हें नामों से मैं पहचानता हूँ |
| मेरे दुश्मन मेरे अन्दर खड़े हैं |
| किसी दिन चाँद निकला था यहाँ से |
| उजाले आज भी छत पर खड़े हैं |
| जुलूस आने को है दीदावरों का |
| नजर नीची किये मंजर खड़े हैं |
| उजाला-सा है कुछ कमरे के अन्दर |
| ज़मीनो-आस्माँ बाहर खड़े हैं |
| अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ |
| अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ |
| मैं चाहता था चिराग़ों को आफ़्ताब करूँ |
| बुतों से मुझको इजाज़त अगर कभी मिल जाए |
| तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ |
| मैं करवटों के नए ज़ाविये लिखूँ शब-भर |
| ये इश्क़ है तो कहाँ ज़िंदगी अज़ाब करूँ |
| है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे-बहरों की |
| किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ |
| उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है |
| बहुत हसीं है ये दुनिया इसे ख़राब करूँ |
| ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़दार करती रही |
| कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ |
| ज़िन्दगी उम्र से बड़ी तो नहीं |
| ज़िन्दगी उम्र से बड़ी तो नहीं |
| ये कहीं मौत की घड़ी तो नहीं |
| ये अलग बात हम भटक जाएँ |
| वैसे दुनिया बहुत बड़ी तो नहीं |
| टूट सकता है ये तअल्लुक़ भी |
| इश्क है कोई हथकड़ी तो नहीं |
| आते-आते ही आयेगी मंज़िल |
| रास्ते में कहीं पड़ी तो नहीं |
| एक खटका-खा है बिछड़ने का |
| ये मुलाक़ात की घड़ी तो नहीं |
| एक जंगल है दूर-दूर तलक |
| ये मेरे शहर की कड़ी तो नहीं |
| हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते |
| हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते |
| जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते |
| अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है |
| उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते |
| रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना |
| हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते |
| मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद |
| लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते |
| अबकि मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के |
| जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते |
| हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे |
| कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते |
| मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था |
| तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते |
| मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है |
| मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है |
| वो एक मौज जो दरिया के पार रहती है |
| हमारे ताक़ भी बे-ज़ार हैं उजालों से |
| दिए की लौ भी हवा पर सवार रहती है |
| फिर उस के बा'द वही बासी मंज़रों के जुलूस |
| बहार चंद ही लम्हे बहार रहती है |
| इसी से क़र्ज़ चुकाए हैं मैंने सदियों से |
| वो ज़िंदगी जो हमेशा उधार रहती है |
| हमारी शहर के दानिशवरों से यारी है |
| इसी लिए तो क़बा तार-तार रहती है |
| मुझे ख़रीदने वालो ! क़तार में आओ |
| वो चीज़ हूँ जो पस-ए-इश्तिहार रहती है |
| सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है |
| सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है |
| हमारे पाँव की मिट्टी ने सर उठाया है |
| हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की |
| ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है |
| मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा था |
| मगर ये कौन है जिस ने समर उठाया है |
| यही ज़मीं में दबाएगा एक दिन हम को |
| ये आसमान जिसे दोश पर उठाया है |
| बुलंदियों को पता चल गया कि फिर मैं ने |
| हवा का टूटा हुआ एक पर उठाया है |
| महा-बली से बग़ावत बहुत ज़रूरी है |
| क़दम ये हम ने समझ सोच कर उठाया है |
| नाम लिक्खा था आज किस-किस का |
| नाम लिक्खा था आज किस-किस का |
| "हाथ दस्ता हुआ है नर्गिस का" |
| शाख पर उम्र कट गई गुल की |
| बाग़ है जाने कौन बेहिस का |
| ख़्वार फिरते हैं आइना होकर |
| जाने मुंह देखना है किस किस का |
| बुझ गये चांद सब हवेली के |
| जल रहा है चिराग़ मुफ़लिस का |
| सर पे रख कर ज़मीन फिरता हूँ |
| साथ उसका है मैं नहीं जिस का |
| 'मीर' जैसा था दो सदी पहले |
| हाल अब भी वही है मजलिस का |
| जितने अपने थे, सब पराए थे |
| जितने अपने थे, सब पराए थे |
| हम हवा को गले लगाए थे |
| जितनी कसमे थी, सब थी शर्मिंदा |
| जितने वादे थे, सर झुकाये थे |
| जितने आंसू थे, सब थे बेगाने |
| जितने मेहमां थे, बिन बुलाए थे |
| सब किताबें पढ़ी-पढ़ाई थीं |
| सारे किस्से सुने-सुनाए थे |
| एक बंजर जमीं के सीने में |
| मैने कुछ आसमां उगाए थे |
| सिर्फ दो घूंट प्यास कि खातिर |
| उम्र भर धूप में नहाए थे |
| हाशिए पर खड़े हूए है हम |
| हमने खुद हाशिए बनाए थे |
| मैं अकेला उदास बैठा था |
| सामने कहकहे लगाए थे |
| है गलत उसको बेवफा कहना |
| हम कौन सा धुले-धुलाए थे |
| आज कांटो भरा मुकद्दर है |
| हमने गुल भी बहुत खिलाए थे |
| उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो |
| उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो |
| खर्च करने से पहले कमाया करो |
| ज़िन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे |
| बारिशों में पतंगें उड़ाया करो |
| दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर |
| नीम की पत्तियों को चबाया करो |
| शाम के बाद जब तुम सहर देख लो |
| कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो |
| अपने सीने में दो गज़ ज़मीं बाँधकर |
| आसमानों का ज़र्फ़ आज़माया करो |
| चाँद सूरज कहाँ, अपनी मंज़िल कहाँ |
| ऐसे वैसों को मुँह मत लगाया करो |
| पहली शर्त जुदाई है |
| पहली शर्त जुदाई है |
| इश्क़ बड़ा हरजाई है |
| गुम हैं होश हवाओं के |
| किस की खुशबू आई है |
| ख़्वाब क़रीबी रिश्तेदार |
| लेकिन नींद पराई है |
| चांद तराशे सारी उमर |
| तब कुछ धूप कमाई है |
| मैं बिछड़ा हूँ डाली से |
| दुनिया क्यों मुरझाई है |
| दिल पर किसने दस्तक दी |
| तुम हो या तन्हाई है |
| दरिया दरिया नाप चुके |
| मुट्ठी भर गहराई है |
| सूरज टूट के बिखरा था |
| रात ने ठोकर खाई है |
| कोई मसीहा क्या जाने |
| ज़ख़्म है या गहराई है |
| वाह रे पागल वाह रे दिल |
| अच्छी किसमत पाई है |
| दरमियाँ एक ज़माना रखा जाए |
| दरमियां एक ज़माना रक्खा जाए |
| तब कोई पल सुहाना रक्खा जाए |
| सर पे सूरज सवार रहता है |
| पीठ पर शामियाना रक्खा जाए |
| तो यह अब तय हुआ कि अपने साथ |
| कोई अपने सिवा न रक्खा जाए |
| खूब बातें रहेंगी रस्ते भर |
| धूप से दोस्ताना रक्खा जाए |
| हों निगाहें ज़मीन पर लेकिन |
| आसमां पर निशाना रक्खा जाए |
| ज़ख़्म पर ज़ख़्म का गुमां न रहे |
| ज़ख़्म इतना पुराना रक्खा जाए |
| दिल लुटाने में एहतियात रहे |
| यह ख़ज़ाना खुला न रक्खा जाए |
| नील पड़ते रहें जबीनों पर |
| पत्थरों को ख़फ़ा न रक्खा जाए |
| यार! अब उस की बेवफ़ाई का |
| नाम कुछ शायराना रक्खा जाए |
| मौसम की मनमानी है |
| मौसम की मनमानी है |
| आँखों आँखों पानी है |
| साया साया लिख डालो |
| दुनिया धूप कहानी है |
| सब पर हँसते रहते हैं |
| फूलों की नादानी है |
| हाय ये दुनिया! हाय ये लोग |
| हाय! यह सब कुछ फ़ानी है |
| साथ इक दरिया रख लेना |
| रस्ता रेगिस्तानी है |
| कितने सपने देख लिये |
| आँखों को हैरानी है |
| दिलवाले अब कम कम हैं |
| वैसे क़ौम पुरानी है |
| बारिश, दरिया, सागर, ओस, |
| आँसू पहला पानी है |
| तुझ को भूले बैंठे हैं |
| क्या ये कम क़ुर्बानी है |
| दरिया हमसे आँख मिला |
| देखें कितना पानी है |
| दुनिया क्या है मुझसे पूछ |
| मैंने दुनिया छानी है |
| नींदें क्या-क्या ख़्वाब दिखाकर ग़ायब हैं |
| नींदें क्या-क्या ख़्वाब दिखाकर ग़ायब हैं |
| आंखें तो मौजूद हैं मंज़र ग़ायब हैं |
| बाक़ी जितनी चीज़ें थीं मौजूद हैं सब |
| नक्शे में दो-चार समुन्दर ग़ायब हैं |
| जाने ये तस्वीर में किसका लश्कर है |
| हाथों में शमशीरें हैं सर ग़ायब हैं |
| ग़ालिब भी है बचपन भी है शहरों में |
| मजनूं भी है लेकिन पत्थर ग़ायब हैं |
| धन्धेबाज़ मुजावर हाकिम बन बैठे |
| दरगाहों से मस्त कलन्दर ग़ायब हैं |
| दरवाज़ों पर दस्तक दें तो कैसे दें |
| घर वाले मौजूद मगर घर ग़ायब हैं |
| शाम से पहले शाम कर दी है |
| शाम से पहले शाम कर दी है |
| क्या कहानी तमाम कर दी है |
| आज सूरज ने मेरे आँगन में |
| हर किरन बे नयाम कर दी है |
| जिस से रहता है आसमां नाराज़ |
| वह ज़मीं मेरे नाम कर दी है |
| दोपहर तक तो साथ चल सूरज |
| तूने रस्ते में शाम कर दी है |
| चेहरा-चेहरा हयात लोगों ने |
| आईनों की गुलाम कर दी है |
| क्या पढ़ें हम कि कुछ क़िताबों ने |
| रोशनी तक हराम कर दी है |
| पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है |
| पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है |
| वो अब भी इक फटे रूमाल पर ख़ुश्बू लगाता है |
| उसे कह दो कि ये ऊँचाइयाँ मुश्किल से मिलती हैं |
| वो सूरज के सफ़र में मोम के बाज़ू लगाता है |
| मैं काली रात के तेज़ाब से सूरज बनाता हूँ |
| मिरी चादर में ये पैवंद इक जुगनू लगाता है |
| यहाँ लछमन की रेखा है न सीता है मगर फिर भी |
| बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है |
| नमाज़ें मुस्तक़िल पहचान बन जाती है चेहरों की |
| तिलक जिस तरह माथे पर कोई हिन्दू लगाता है |
| न जाने ये अनोखा फ़र्क़ इस में किस तरह आया |
| वो अब कॉलर में फूलों की जगह बिच्छू लगाता है |
| अँधेरे और उजाले में ये समझौता ज़रूरी है |
| निशाने हम लगाते हैं ठिकाने तू लगाता है |
| बढ़ गई है कि घट गई दुनिया |
| बढ़ गई है कि घट गई दुनिया |
| मेरे नक़्शे से कट गई दुनिया |
| तितलियों में समा गया मंज़र |
| मुट्ठियों में सिमट गई दुनिया |
| अपने रस्ते बनाये खुद मैंने |
| मेरे रस्ते से हट गई दुनिया |
| एक नागन का ज़हर है मुझमे |
| मुझको डस कर पलट गई दुनिया |
| कितने खानों में बंट गए हम तुम |
| कितनी हिस्सों में बंट गई दुनिया |
| जब भी दुनिया को छोड़ना चाहा |
| मुझसे आकर लिपट गई दुनिया |
| नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में |
| नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में |
| उजाले पाँव पटकने लगे हैं पानी में |
| ये कोई और ही किरदार है तुम्हारी तरह |
| तुम्हारा ज़िक्र नहीं है मिरी कहानी में |
| अब इतनी सारी शबों का हिसाब कौन रखे |
| बड़े सवाब कमाए गए जवानी में |
| चमकता रहता है सूरज-मुखी में कोई और |
| महक रहा है कोई और रात-रानी में |
| ये मौज मौज नई हलचलें सी कैसी हैं |
| ये किस ने पाँव उतारे उदास पानी में |
| मैं सोचता हूँ कोई और कारोबार करूँ |
| किताब कौन ख़रीदेगा इस गिरानी में |
| शाम होती है तो पलकों पे सजाता है मुझे |
| शाम होती है तो पलकों पे सजाता है मुझे |
| वह चिराग़ों की तरह रोज़ जलाता है मुझे |
| मैं हूं ये कम तो नहीं है तेरे होने की दलील |
| मेरा होना तेरा एहसास दिलाता है मुझे |
| अब किसी शख़्स में सच सुनने की हिम्मत है कहां |
| मुश्किलों ही से कोई पास बिठाता है मुझे |
| कैसे महफ़ूज़ रखूं खुद को अजायब घर में |
| जो भी आता है यहां हाथ लगाता है मुझे |
| जाने क्या बनना है तुझको मेरी गीली मिट्टी |
| कुज़ागर रोज़ बनाता है मिटाता है मुझे |
| आब-ओ-दाना किसी बिगड़े हुए बच्चे की तरह |
| मैं जहाँ शाख पे बैठूं के उड़ाता है मुझे |
| वो मुझे मिल ना सका, इसकी शिकायत कैसी |
| ये भी अहसान है कि, वो याद तो आता है मुझे |
| रात बहुत तारीक नहीं है |
| रात बहुत तारीक नहीं है |
| लेकिन घर नज़दीक नहीं है |
| फूलों को समझा दे कोई |
| हँसते रहना ठीक नहीं है |
| तनकीदें बारीक हैं जितनी |
| फ़न उतना बारीक नहीं है |
| कोई ताज़ा शेर हो नाज़िल |
| हक माँगा है भीक नहीं है |
| दिन हैं जितने काले-काले |
| रात उतनी तारीक नहीं है |
| आज तुम्हारी याद न आई |
| आज तबीअत ठीक नहीं है |
| मुझमें कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या |
| मुझमें कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या |
| बंद इक मुद्दत से हूँ, खुल जाऊँ क्या |
| आजिज़ी, मिन्नत, ख़ुशामद, इल्तिज़ा |
| और मैं क्या-क्या करूँ, मर जाऊँ क्या |
| कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो |
| मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या |
| तेरे जलसे में तेरा परचम लिए |
| सैकड़ों लाशें भी हैं, गिनवाऊँ क्या |
| एक पत्थर है वो मेरी राह का |
| गर ना ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या |
| फिर जगाया तूने सोये शेर को |
| फिर वही लहजादराज़ी, आऊँ क्या |
| उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे |
| उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे |
| ज़मीन आईना-ख़ाना थी चार-सू हम थे |
| दिनों के बाद अचानक तुम्हारा ध्यान आया |
| ख़ुदा का शुक्र कि उस वक़्त बा-वज़ू हम थे |
| वो आईना तो नहीं था पर आईने सा था |
| वो हम नहीं थे मगर यार हू-ब-हू हम थे |
| ज़मीं पे लड़ते हुए आसमाँ के नर्ग़े में |
| कभी कभी कोई दुश्मन कभू कभू हम थे |
| हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ |
| दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे |
| ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर |
| जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे |
| मसअला प्यास का यूं हल हो जाए |
| मसअला प्यास का यूं हल हो जाए |
| जितना अमृत है हलाहल हो जाए |
| शहर-ए-दिल में है अजब सन्नाटा |
| तेरी याद आए तो हलचल हो जाए |
| ज़िन्दगी एक अधूरी तस्वीर |
| मौत आए तो मुकम्मल हो जाए |
| और एक मोर कहीं जंगल में |
| नाचते-नाचते पागल हो जाए |
| थोड़ी रौनक है हमारे दम से |
| वरना ये शहर तो जंगल हो जाए |
| फिर खुदा चाहे तो आंखें ले ले |
| बस मेरा ख़्वाब मुकम्मल हो जाए |
| वो कभी शहर से गुज़रे तो ज़रा पूछेंगे |
| वो कभी शहर से गुज़रे तो ज़रा पूछेंगे |
| ज़ख़्म हो जाते हैं किस तरह दवा पूछेंगे |
| गुम न हो जाएं मकानों के घने जंगल में |
| कोई मिल जाये तो हम घर का पता पूछेंगे |
| मेरे सच से उन्हें क्या लेना है मैं जानता हूँ |
| हाथ कुरआन पे रखवा के वह क्या पूछेंगे |
| ये रहा नामा-ए-आमाल मगर तुझ से भी |
| कुछ सवालात तो हम भी ऐ ख़ुदा पूछेंगे |
| वह कहीं किरनें समेटे हुए मिल जायेगा |
| कब रफू होगी उजाले की क़बा पूछेंगे |
| वह जो मुंसिफ़ है तो क्या कुछ भी सज़ा दे देगा |
| हम भी रखते हैं ज़ुबां पहले ख़ता पूछेंगे |
| नज़ारा देखिये कलियों के फूल होने का |
| नज़ारा देखिये कलियों के फूल होने का |
| यही है वक्त दुआएं क़बूल होने का |
| उन्हें बताओ के ये रास्ते सलीब के हैं |
| जो लोग करते हैं दावा रसूल होने का |
| तमाम उम्र गुज़रने के बाद दुनिया में |
| पता चला हमें अपने फुजूल होने का |
| उसूल वाले हैं बेचारे इन फ़रिश्तों ने |
| मज़ा चखा ही नहीं बे उसूल होने का |
| है आसमां से बुलन्द उसका मर्तबा जिसको |
| शर्फ़ है आप के कदमों की धूल होने का |
| चलो फ़लक पे कहीं मन्ज़िलें तलाश करें |
| ज़मीं पे कुछ नहीं हासिल हसूल होने का |
| अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए |
| अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए |
| कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए |
| सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ |
| सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए |
| मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था |
| हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए |
| नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र |
| आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए |
| सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार |
| आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए |
| अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर |
| मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए |
| मौसम बुलाएंगे तो सदा कैसे आएगी |
| मौसम बुलाएंगे तो सदा कैसे आएगी |
| सब खिड़कियां हैं बन्द हवा कैसे आएगी |
| मेरा खुलूस इधर है उधर है तेरा गुरूर |
| तेरे बदन पे मेरी क़बा कैसे आएगी |
| रस्ते में सर उठाए हैं रस्मों की नागिनें |
| ऐ जान ए इन्तज़ार! बता कैसे आएगी |
| सर रख के मेरे ज़ानों पे सोई है ज़िन्दगी |
| ऐसे में आई भी तो कज़ा कैसे आएगी |
| आंखों में आंसूओं को अगर हम छुपाएंगे |
| तारों को टूटने की सदा कैसे आएगी |
| वह बे वफ़ा यहां से भी गुजरा है बारहा |
| इस शहर की हदों में वफ़ा कैसे आएगी |
| यहाँ कब थी जहाँ ले आई दुनिया |
| यहाँ कब थी जहाँ ले आई दुनिया |
| यह दुनिया को कहाँ ले आई दुनिया |
| ज़मीं को आसमानों से मिला कर |
| ज़मीं पर आसमां ले आई दुनिया |
| मैं ख़ुद से बात करना चाहता था |
| ख़ुदा को दरमियां ले आई दुनिया |
| चिराग़ों की लवें सहमी हुई हैं |
| सुना है आँधियां ले आई दुनिया |
| जहां मैं था वहां दुनिया कहां थी |
| वहां मैं हूँ जहां ले आई दुनिया |
| तवक़्क़ो हमने की थी शाखे-गुल की |
| मगर तीरो कमाँ ले आई दुनिया |
| ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी |
| ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी |
| हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी |
| पाँव पत्थर कर के छोड़ेगी अगर रुक जाइए |
| चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी |
| जुगनुओं को साथ ले कर रात रौशन कीजिए |
| रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी |
| ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती उम्र-भर |
| ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी |
| तुम ने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा |
| मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी |
| तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते |
| इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी |
| बरछी लेकर चाँद निकलने वाला है |
| बरछी ले कर चांद निकलने वाला है |
| घर चलिए अब सूरज ढलने वाला है |
| मंज़रनामा वही पुराना है लेकिन |
| नाटक का उनवान बदलने वाला है |
| तौर तरीके बदले नरम उजालों ने |
| हर जुगनू अब आग उगलने वाला है |
| धूप के डर से कब तक घर में बैठोगे |
| सूरज तो हर रोज निकलने वाला है |
| एक पुराने खेल खिलौने जैसी है |
| दुनिया से अब कौन बहलने वाला है |
| दहशत का माहौल है सारी बस्ती में |
| क्या कोई अख़बार निकलने वाला है |
| तेरा मेरा नाम ख़बर में रहता था |
| तेरा मेरा नाम ख़बर में रहता था |
| दिन बीते, एक सौदा सर में रहता था |
| मेरा रस्ता तकता था एक चांद कहीं |
| मैं सूरज के साथ सफ़र में रहता था |
| सारे मंज़र गोरे-गोरे लगते थे |
| जाने किस का रूप नज़र में रहता था |
| मैंने अक्सर आंखें मूंद के देखा है |
| एक मंज़र जो पस-मंज़र म रहता था |
| काठ की कश्ती पीठ थपकती रहती थी |
| दरियाओं का पांव भंवर में रहता था |
| उजली उजली तस्वीरें सी बनती हैं |
| सुनते हैं अल्लाह बशर में रहता था |
| मीलों तक हम चिड़ियों से उड़ जाते थे |
| कोई मेरे साथ सफ़र में रहता था |
| सुस्ताती है गर्मी जिस के साये में |
| ये पौधा कल धूप नगर में रहता था |
| धरती से जब खुद को जोड़े रहते थे |
| ये सारा आकाश असर में रहता था |
| सच का बोझ उठाये हूँ अब पलकों पर |
| पहले मैं भी ख़्वाब नगर में रहता था |
| इक नया मौसम नया मंज़र खुला |
| इक नया मौसम नया मंज़र खुला |
| कोई दरवाज़ा मेरे अन्दर खुला |
| एक ग़ज़ल कमरे की छत पर मुन्तसिर |
| एक कलम रखा है काग़ज़ पर खुला |
| लेकिन उड़ने की सकत बाकी नहीं |
| है कई दिन से क़फस का दर खुला |
| चलते रहने का इरादा शर्त है |
| जब भी दीवारें उठी हैं दर खुला |
| हो गया ऐलान फिर एक जंग का |
| जितने वक़्फ़े में मेरा बकतर खुला |
| साथ रहता है यही एहसास-ए-जुर्म |
| किस के ज़िम्मे छोड़ आये घर खुला |
| अब मयस्सर ही कहां वह तन लेहाफ़ |
| अब कहां रहता हूं मैं शब भर खुला |
| मैं ख़ुद अपने आप ही में बन्द था |
| मुद्दतों के बाद ये मुझ पर खुला |
| उम्र भर की नींद पूरी हो चुकी |
| तब कहीं जाकर मेरा बिस्तर खुला |
| कौन वह मिर्ज़ा असदुल्लाह खां |
| मुझ से वह तन्हाई में अक्सर खुला |
| मौसमों का ख़याल रक्खा करो |
| मौसमों का ख़याल रक्खा करो |
| कुछ लहू मैं उबाल रक्खा करो |
| ज़िंदग़ी रोज़ मरती रहती है |
| ठीक से देख-भाल रक्खा करो |
| सब लकीरों पे छोड़ रक्खा है |
| आप भी कुछ कमाल रक्खा करो |
| याद करते रहा करो माज़ी |
| इक-इक पल उजाल रक्खा करो |
| जाने कब सच का सामना हो जाए |
| कोई रस्ता निकाल रक्खा करो |
| ग़ालिबों को रखो दिमाग़ों में |
| दिल यग़ाना मिसाल रक्खा करो |
| सुल्ह करते रहा करो हरदम |
| दुश्मनों को निकाल रक्खा करो |
| ख़ाली-ख़ाली उदास-उदास आँखें |
| इनमें कुछ ख़्वाब पाल रक्खा करो |
| फिर वो चाकू चला नहीं सकता |
| हाथ गरदन में डाल रक्खा करो |
| लाख सूरज से दोस्ताना हो |
| चंद जुगनू भी पाल रक्खा करो |
| मुआफ़िक़ जो फ़िज़ा तैयार की है |
| मुआफ़िक़ जो फ़िज़ा तैयार की है |
| बड़ी तदबीर से हमवार की है |
| यहाँ तुझ-मुझ के हिस्से में ज़ियां है |
| ये दुनिया दरहमो-दीनार की है |
| यक़ीं कैसे करूं मैं मर चुका हूँ |
| मगर सुर्खी यही अख़बार की है |
| चराग़ों का घराना चल रहा है |
| चराग़ों का घराना चल रहा है |
| हवा से दोस्ताना चल रहा है |
| जवानी की हवाएँ चल रही हैं |
| बुज़ुर्गों का ख़ज़ाना चल रहा है |
| मिरी गुम-गश्तगी पर हँसने वालो |
| मिरे पीछे ज़माना चल रहा है |
| अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए |
| तआरुफ़ ग़ाएबाना चल रहा है |
| नए किरदार आते जा रहे हैं |
| मगर नाटक पुराना चल रहा है |
| वही दुनिया वही साँसें वही हम |
| वही सब कुछ पुराना चल रहा है |
| ज़्यादा क्या तवक़्क़ो हो ग़ज़ल से |
| मियाँ, बस आब-ओ-दाना चल रहा है |
| समुंदर से किसी दिन फिर मिलेंगे |
| अभी पीना-पिलाना चल रहा है |
| वही महशर वही मिलने का व'अदा |
| वही बूढ़ा बहाना चल रहा है |
| यहाँ इक मदरसा होता था पहले |
| मगर अब कार-ख़ाना चल रहा है |
| तूफ़ां तो इस शहर में अक्सर आता है |
| तूफ़ां तो इस शहर में अक्सर आता है |
| देखें अबकि किस का नम्बर आता है |
| यारों के भी दाँत बहुत ज़हरीले हैं |
| पर हमको भी साँपों का मंतर आता है |
| सूखे बादल होंठों पर कुछ लिखते हैं |
| आँखों में सैलाब का मंज़र आता है |
| तक़रीरों में सबके जौहर खुलते हैं |
| अंदर जो पलता है बाहर आता है |
| बच कर रहना, इक क़ातिल इस बस्ती में |
| काग़ज़ की पोशाक पहनकर आता है |
| बोता है वो रोज़ तअफ़्फ़ुन ज़हनों में |
| जो कपड़ों पर इत्र लगाकर आता है |
| रहमत मिलने आती है पर फैलाए |
| पलकों पर जब कोई पयम्बर आता है |
| सूख चुका हूँ फिर भी मेरे साहिल यर |
| पानी लेने रोज समुन्दर आता है |
| उन आँखों की नींदें गुम हो जाती हैं |
| जिन आँखों को ख़्वाब मयस्सर आता है |
| ख़ाक से बढ़कर कोई दौलत नहीं होती |
| ख़ाक से बढ़कर कोई दौलत नहीं होती |
| छोटी मोटी बात पे हिज़रत नहीं होती |
| पहले दीप जलें तो चर्चे होते थे |
| और अब शहर जलें तो हैरत नहीं होती |
| तारीखों की पेशानी पर मोहर लगा |
| ज़िंदा रहना कोई करामात नहीं होती |
| सोच रहा हूँ आखिर कब तक जीना है |
| मर जाता तो इतनी फुर्सत नहीं होती |
| रोटी की गोलाई नापा करता है |
| इसी लिए तो घर में बरकत नहीं होती |
| हमने ही कुछ लिखना पढ़ना छोड़ दिया |
| वरना ग़ज़ल की इतनी किल्लत नहीं होती |
| मिसवाकों से चाँद का चेहरा छूता है |
| बेटा ! इतनी सस्ती जन्नत नहीं होती |
| बाजारों में ढूंढ रहा हूँ वो चीज़े |
| जिन चीजों की कोई कीमत नहीं होती |
| कोई क्या राय दे हमारे बारे में |
| ऐसों वैसों की तो हिम्मत नहीं होती |
| ज़मीं बालिश्त भर होगी हमारी |
| ज़मीं बालिश्त भर होगी हमारी |
| यहाँ कैसे बसर होगी हमारी |
| ये काली रात होगी ख़त्म किस दिन |
| न जाने कब सहर होगी हमारी |
| इसी उम्मीद पर ये रतजगे हैं |
| किसी दिन रात भर होगी हमारी |
| दरे-मस्जिद पे कोई शय पड़ी है |
| दुआ-ए-बेअसर होगी हमारी |
| चला हूँ गुमरही को साथ लेकर |
| यही तो हमसफ़र होगी हमारी |
| न जाने दिन कहाँ निकलेगा अपना |
| न जाने शब किधर होगी हमारी |
| दुआ मांगेंगे कब तक आस्मा से |
| ज़मीं कब मोतबर होगी हमारी |
| ये दुनिया कहकशां कहती है जिसको |
| कभी ये रहगुज़र होगी हमारी |
| चुभे हैं किस कदर तलुवों में कंकर |
| सितारों पर नज़र होगी हमारी |
| बिछड़ने में ही शायद अब मज़ा है |
| ख़ुशी में आँख तर होगी हमारी |
| ये आईना फ़साना हो चुका है |
| ये आईना फ़साना हो चुका है |
| तुझे देखे ज़माना हो चुका है |
| वतन के मौसमों अब लौट आओ |
| तुम्हें देखे ज़माना हो चुका है |
| दवाएँ क्या, दवा क्या, बद्दुआ क्या |
| सभी कुछ ताजिराना हो चुका है |
| अब आंसू भी पुराने हो चुके हैं |
| समन्दर भी पुराना हो चुका है |
| चलो दीवाने-ख़ास अब काम आया |
| परिन्दों का ठिकाना हो चुका है |
| वही वीरानियां हैं शहरे-दिल में |
| यहाँ पहले भी आना हो चुका है |
| तेरी मसरूफ़ियत हम जानते हैं |
| मगर मौसम सुहाना हो चुका है |
| मोहब्बत में ज़रूरी हैं वफ़ाएँ |
| यह नुस्ख़ा अब पुराना हो चुका है |
| चलो अब हिज्र का भी हम मज़ा लें |
| बहुत मिलना मिलाना हो चुका है |
| हजारों सूरतें रोशन हैं दिल में |
| यह दिल आईना ख़ाना हो चुका है |
| बची हैं गिनती की चंद साँसें |
| इस घर का बयाना हो चुका है। |
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| Hindi Kavita |
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