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खुंटी हा झारखंडमधील लोकसभा मतदारसंघ आहे.
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छत्तीसगढचा मुख्यमंत्री हा भारताच्या छत्तीसगढ राज्याचा सरकारप्रमुख व विधानसभेचा प्रमुख नेता असतो. पाच वर्षांचा कार्यकाळ असलेला मुख्यमंत्री विधानसभा निवडणुकांद्वारे निवडला जातो व छत्तीसगढच्या राज्यपालाकडून पदनियुक्त केला जातो. मुख्यमंत्री व त्याने नियुक्त केलेले मंत्रीमंडळ छत्तीसगढ राज्याच्या कामकाजासाठी जबाबदार आहे.
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२००० सालच्या छत्तीसगढ राज्याच्या स्थापनेनंतर आजवर केवळ ३ व्यक्ती छत्तीसगढच्या मुख्यमंत्रीपदावर राहिल्या आहेत. भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसचे भूपेश बघेल हे विद्यमान मुख्यमंत्री आहेत.
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छत्तीसगढ उच्च न्यायालय भारताच्या छत्तीसगढ राज्यावर अधिक्षेत्र असलेले न्यायालय आहे. याची स्थापना १ नोव्हेंबर, इ.स. २००० रोजी बिलासपूर येथे केली गेली असून हे भारतातील १९वे उच्च न्यायालय आहे.[१]
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जस्टिस आर.एस. गर्ग या न्यायालयाचे सर्वप्रथम सरन्यायाधीश होते. या न्यायालयात अठरा न्यायाधीशांची नेमणूक होते.
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छत्तीसगढमधील आदिवासींची यादी.
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वरील ३४ मुख्य जमातींशिवाय भुमिया, सवरा, माझी, सहरिया, कोलाम, मवासी, भील आणि आंध या अन्य जमातीही छत्तीसगढ राज्यात अल्पसंख्येने राहतात.
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वरील सर्व आदिवासींच्या भाषा तीन मुख्य भाषा परिवारात मोडतात. (१) मुंडा भाषा परिवार, (२) द्रविड भाषा परिवार आणि (३) आर्य भाषा परिवार
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आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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विकिस्रोतावर काय चालेल ?
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प्रताधिकारमुक्त दस्तऐवज
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छत्रपती चौथे शिवाजीराजे (इ.स. १८१६ - ३ जानेवारी, १८२२) भोसले राजघराण्याच्या कोल्हापूर संस्थानचे राजा होते. २ जुलै १८२१ ते ३ जानेवारी १८२२ या काळात त्यांनी राज्य केले. त्यांच्या पश्चात दुसरे शहाजी गादीवर आले.
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गडदर्शन (पुस्तक) हे मराठीतील एक पुस्तक आहे.
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छत्रपती शिवाजी महाराज आंतरराष्ट्रीय विमानतळ मुंबई (आहसंवि: BOM, आप्रविको: VABB), शहरातील आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे. हा विमानतळ पूर्वी सहार विमानतळ म्हणून ओळखला जात असे. सुमारे १८५० एकर परिसरात विस्तारलेला हा विमानतळ भारतातील सर्वात मोठा राष्ट्रीय व आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे. मुंबई शहरातील अंधेरी या रेल्वे स्टेशनपासून हा सर्वात जवळ आहे . हा विमानतळ भारतातील तसेच दक्षिण आशियातील प्रवासी वाहतुकीच्या संदर्भात, सर्वात व्यस्त विमानतळ आहे.[१][२]
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यामुळे यास भारतीय उपखंडाचे प्रवेशद्वार म्हटले जाते.
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या विमानतळाला लागूनच देशांतर्गत वाहतुकीचा विमानतळ आहे. त्याचे नावही छत्रपती शिवाजी विमानतळ आहे. त्याचे प्रवेशद्वार मुंबईतील विलेपार्ले या रेल्वे स्टेशनजवळ आहे.
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इ.स. २०१४ चे सरासरी आकडे-
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हा विमानतळ एर इंडिया यांचा मुख्य विमानतळ आहे. येथून सध्या ४६ आंतरराष्ट्रीय विमानकंपन्यांची विमाने उडतात. याशिवाय गो फर्स्ट,स्पाइसजेट, इंडिगो एरलाइन्स , विस्तारा व एअर एशिया या कंपन्यांची अनेक उड्डाणे येथून होतात. या विमानतळावर सकाळी १०:०० ते संध्याकाळी ६:३० दरम्यान दिवसातील ४५ % उड्डाणे होतात. रात्री १०:०० नंतर बव्हंशी आंतरराष्ट्रीय उड्डाणे होतात.
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मुंबईत सुरुवातीस जुहू विमानतळ हा एकच प्रवासी विमानतळ होता. दुसऱ्या महायुद्धानंतर स्वातंत्र्यप्राप्तीच्या सुमारास मुंबईत मोठा विमानतळ बांधण्याचा बेत आखण्यात आला. जुहूचा विमानतळ समुद्राच्या किनारपट्टीस लागून असल्यामुळे पावसाळ्यात विमानांच्या उड्डाण-अवतरणांना हवामानाचा अडथळा होत असे तरी हा नवीन विमानतळ आतल्या बाजूस सांताक्रुझ आणि विले पार्ले या उपनगरांदरम्यान बांधण्यात आला. त्याला नाव मात्र सांताक्रुझ विमानतळ हे देण्यात आले. इ.स. १९४८ मध्ये येथील बांधकाम झाले व जून १९४८मध्ये एर इंडियाने येथील पहिले प्रवासी उड्डाण लंडनला केले. हा नवीन विमानतळ सुरुवातीस सार्वजनिक बांधकाम खात्याच्या अखत्यारीत होता व नंतर तो प्रवासी एव्हिएशन मंत्रालयाच्या अंमलाखाली आला. १९७९साली सांताक्रुझ विमानतळाला आग लागून मोठे नुकसान झाले होते तेव्हा काही काळाकरता एक तात्पुरते टर्मिनल बांधण्यात आले. त्यानंतर १९८१मध्ये सांताक्रुझच्या पूर्वेस सहार गावाजवळ अजून एक नवीन टर्मिनल[मराठी शब्द सुचवा] बांधण्यात आले व आंतरराष्ट्रीय उड्डाण/अवतरणे तेथून सुरू झाली. ते जुने टर्मिनल आता कार्गो टर्मिनल म्हणून ओळखले जाते.
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प्रत्यक्षात हे सर्व विमानतळ एकाच मैदानाच्या विविध बाजूंना आहेत. मुंबईत जुहू नावाचा एक छोटा विमानतळ आहे, तो मात्र स्वतंत्र आहे.
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२००६मध्ये मुंबई आंतरराष्ट्रीय विमानतळ मर्यादित कंपनीने जी.व्ही.के. इंडस्ट्रीज लिमिटेड आणि एरपोर्ट्स कंपनी साउथ आफ्रिका या कंपन्यांना विमानतळाचे आधुनिकीकरण करण्याचे कंत्राट दिले आणि नवीन विमानतळ बांधवून घेतला.
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हा विमानतळ भारतीय उपखंडातील दुसऱ्या क्रमांकाचा सगळ्यात व्यस्त विमानतळ आहे. ऑफिशियल एरलाइन गाइड (ओएजी) ने मुंबई-दिल्ली मार्गाला साप्ताहिक उड्डाणांनुसार जगातल्या तिसऱ्या क्रमांकाचा सगळ्यात व्यस्त मार्ग म्हणून मान्यता दिली आहे.
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+
एप्रिल २००६ ते फेब्रुवारी २००७ दरम्यान छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर १,८०,००० उड्डाणे व उतरणे झाली तर २,००,००,००० प्रवाशांनी येथून ये-जा केली, पैकी १,३५,६०,००० प्रवास देशांतर्गत उड्डाणांवर होते तर ६७,३०,००० प्रवासी परदेशांहून आले-परदेशांस गेले. २००५-०६ पेक्षा हा आकडा २१.२८ % जास्त आहे.[३] विमानतळावरून ये-जा करण्यात उशीर झालेल्या विमानांच्या संख्येनुसार २००७ आणि २००८ मध्ये हा विमानतळ जगातील सगळ्यात पहिल्या क्रमांकाचा होता. फक्त ४९.९५ % विमाने वेळेवर आली-गेली. उशीर झालेल्या विमानांपैकी ५८ % विमाने अर्ध्या तासापेक्षा जास्त खोळंबली.[४]
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छत्रपती शिवाजी महाराज आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर दोन मुख्य प्रवासी टर्मिनले आहेत. टर्मिनल १ (सांताक्रुझ) देशांतर्गत तर टर्मिनल २ (सहार) सर्व आंतरराष्ट्रीय उड्डाणे व काही राष्ट्रीय उड्डाणे-अवतरणांसाठी वापरली जातात. यांमध्ये साधारण १०-१५ मिनिटांचे अंतर आहे. दोन्ही टर्मिनलवरून निघालेली विमाने एकाच धावपट्टी व इतर सुविधांचा (एरसाइड सर्व्हिसेस) उपयोग करतात. या दोन्ही टर्मिनलदरम्यान प्रवाशांची ने-आण विमानतळाच्याच गाड्या करतात.
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गेल्या काही वर्षांत धावपट्टीवरील ताण कमी करण्यासाठी नवीन टॅक्सीवे बांधले गेले आहेत. एकाच माहितीदर्शकावर सांताक्रुझ आणि सहार अशा दोन्ही विमानतळांवरील विमानांच्या येण्याजाण्याची माहिती देण्यासाठीची प्रणालीही विकासाधीन आहे. ही माहिती एर ट्राफिक कंट्रोल, आरपोर्ट रॅम्प, विमानतळांची संकेतस्थळे तसेच आसपासच्य हॉटेलांमध्येही एकाच वेळी प्रसारित करण्याचाही प्रयत्न असेल. जरी अजून एक धावपट्टी बांधणे शक्य नसले तरी विमानांना ये-जा करण्यासाठी अधिक जागा मिळावी यास्तव एर ट्रॅफिक कंट्रोल टॉवरची जागा बदलण्यात येणार आहे.
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+
विमानतळावर प्रवाशांसाठी फुकट वायफाय सुविधा आहे.[६]
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नविनच बांधलेल्या या टर्मिनलद्वारे प्रवाशांना अनेक सुविधा पुरविण्यात आलेल्या आहेत.यासाठी एक इंग्लिश अक्षर 'X' या आकाराची एक इमारत बनविण्यात आलेली आहे. या नव्या इमारतीचे व या नव्या टर्मिनलचे बांधकाम, असलेल्या कोणत्याही सेवा,सुविधा बंद न करता,करण्यात आलेले आहे. असलेल्या सुविधा खालील प्रकारे आहेत:
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मुंबईतील सांताक्रुझ, विलेपार्ले, व अंधेरी या स्थानकांवरून,तसेच पश्चिम द्रुतगती महामार्गावरूनही, वाहतुकीच्या कोंडीमुळे या विमानतळावर येण्यास बराच कालापव्यय होत असे. त्यावर उपाय म्हणून १२ फेब्रुवारी २००१४ रोजी सहार उन्नत मार्ग वाहतुकीस खुला करण्यात आला. हा सहा मार्गिका (लेन) असलेला रस्ता आहे. २०२६ पर्यंत वाहतुकीत होणाऱ्या वाढीचा अंदाज घेऊन हा मार्ग बनविण्यात आलेला आहे.
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+
भारतातील विविध संस्कृती व कला पर्यटकांची ओळख व्हावी म्हणून तेथे एक संग्रहालय उभे करण्यात आले आहे. त्यात अनेक चीजवस्तू आहेत.
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| 18 |
+
यातील वैशिष्ट्य म्हणजे येथे एक तीन किलोमीटर. लांबीची एक आर्टवॉल आहे. यात सजावटीसाठी २७२ आकाशदिव्यांचा वापर करण्यात आला आहे. मोरपिसांनी सजविलेल्या ३० मोठ्या खांबांचा वापर येथे करण्यात आलेला आहे.[ चित्र हवे ]
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| 19 |
+
यासाठी एकूण ४,३९,२०३ चौरस मीटर क्षेत्रफळाचा वापर करण्यात आला.यासाठी सुमारे ५,५०० कोटी इतका खर्च आला. याद्वारे वर्षाकाठी सुमारे ४० लाख प्रवासी हाताळता येणार आहेत. हे सध्या कार्यान्वयाधीन असून तेथील तयारी पूर्ण झाल्यावर दि. १२ फेब्रुवारी इ.स. २०१४ रोजी ते वापरासाठी खुले करण्यात येईल.
|
| 20 |
+
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| 21 |
+
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| 22 |
+
आग्रा •
|
| 23 |
+
अराक्कोणम •
|
| 24 |
+
अंबाला •
|
| 25 |
+
बागडोगरा •
|
| 26 |
+
भूज रुद्रमाता •
|
| 27 |
+
कार निकोबार •
|
| 28 |
+
चबुआ •
|
| 29 |
+
छत्तीसगढ •
|
| 30 |
+
दिमापूर •
|
| 31 |
+
दुंडिगुल •
|
| 32 |
+
गुवाहाटी •
|
| 33 |
+
हलवारा •
|
| 34 |
+
कानपूर •
|
| 35 |
+
लोहगांव •
|
| 36 |
+
कुंभिरग्राम •
|
| 37 |
+
पालम •
|
| 38 |
+
सफदरजंग •
|
| 39 |
+
तंजावर •
|
| 40 |
+
येलहंका
|
| 41 |
+
|
| 42 |
+
|
| 43 |
+
बेगमपेट (हैदराबाद) • एचएएल बंगळूर (एचएएल/हिंदुस्थान)
|
| 44 |
+
|
| 45 |
+
|
| 46 |
+
जोगबनी विमानतळ •
|
| 47 |
+
मुझफ्फरपूर विमानतळ •
|
| 48 |
+
पाटना: लोकनायक जयप्रकाश विमानतळ •
|
| 49 |
+
पूर्णिया विमानतळ •
|
| 50 |
+
रक्सौल विमानतळ
|
| 51 |
+
|
| 52 |
+
|
| 53 |
+
बिलासपूर विमानतळ •
|
| 54 |
+
जगदलपूर विमानतळ •
|
| 55 |
+
Raipur: विमानतळ
|
| 56 |
+
|
| 57 |
+
|
| 58 |
+
चकुलिया विमानतळ •
|
| 59 |
+
जमशेदपूर: सोनारी विमानतळ •
|
| 60 |
+
|
| 61 |
+
|
| 62 |
+
बारवानी विमानतळ •
|
| 63 |
+
भोपाळ: राजा भोज विमानतळ •
|
| 64 |
+
ग्वाल्हेर विमानतळ •
|
| 65 |
+
इंदूर: देवी अहिल्याबाई होळकर विमानतळ •
|
| 66 |
+
जबलपूर विमानतळ •
|
| 67 |
+
खजुराहो विमानतळ •
|
| 68 |
+
ललितपूर विमानतळ •
|
| 69 |
+
पन्ना विमानतळ •
|
| 70 |
+
सतना विमानतळ
|
| 71 |
+
|
| 72 |
+
|
| 73 |
+
भुवनेश्वर: बिजु पटनायक विमानतळ •
|
| 74 |
+
हिराकुद विमानतळ •
|
| 75 |
+
झरसुगुडा विमानतळ •
|
| 76 |
+
रूरकेला विमानतळ
|
| 77 |
+
|
| 78 |
+
|
| 79 |
+
आग्रा: खेरीया विमानतळ •
|
| 80 |
+
अलाहाबाद: बमरौली विमानतळ •
|
| 81 |
+
गोरखपूर विमानतळ •
|
| 82 |
+
झांसी विमानतळ •
|
| 83 |
+
कानपूर: चकेरी विमानतळ •
|
| 84 |
+
ललितपूर विमानतळ
|
| 85 |
+
|
| 86 |
+
|
| 87 |
+
अलाँग विमानतळ •
|
| 88 |
+
दापोरिजो विमानतळ •
|
| 89 |
+
पासीघाट विमानतळ •
|
| 90 |
+
तेझू विमानतळ •
|
| 91 |
+
झिरो विमानतळ
|
| 92 |
+
|
| 93 |
+
|
| 94 |
+
दिब्रुगढ: मोहनबारी विमानतळ •
|
| 95 |
+
जोरहाट: रौरिया विमानतळ •
|
| 96 |
+
उत्तर लखिमपूर: लिलाबारी विमानतळ •
|
| 97 |
+
सिलचर: कुंभीरग्राम विमानतळ •
|
| 98 |
+
तेझपूर: सलोनीबारी विमानतळ
|
| 99 |
+
|
| 100 |
+
|
| 101 |
+
इंफाल: तुलिहाल विमानतळ
|
| 102 |
+
|
| 103 |
+
|
| 104 |
+
रुपसी विमानतळ •
|
| 105 |
+
शेला विमानतळ •
|
| 106 |
+
शिलाँग: उमरोई विमानतळ
|
| 107 |
+
|
| 108 |
+
|
| 109 |
+
ऐझ्वाल: लेंगपुई विमानतळ
|
| 110 |
+
|
| 111 |
+
|
| 112 |
+
दिमापूर विमानतळ
|
| 113 |
+
|
| 114 |
+
|
| 115 |
+
पाकयाँग विमानतळ
|
| 116 |
+
|
| 117 |
+
|
| 118 |
+
अगरतला: सिंगरभिल विमानतळ •
|
| 119 |
+
कैलाशहर विमानतळ •
|
| 120 |
+
कमलपूर विमानतळ •
|
| 121 |
+
खोवै विमानतळ
|
| 122 |
+
|
| 123 |
+
|
| 124 |
+
बालुरघाट विमानतळ •
|
| 125 |
+
बेहाला विमानतळ •
|
| 126 |
+
कूच बिहार विमानतळ •
|
| 127 |
+
इंग्लिश बझार: मालदा विमानतळ
|
| 128 |
+
|
| 129 |
+
|
| 130 |
+
चंदिगढ विमानतळ
|
| 131 |
+
|
| 132 |
+
|
| 133 |
+
धरमशाला: गग्गल विमानतळ •
|
| 134 |
+
कुलू: भुंतार विमानतळ •
|
| 135 |
+
शिमला विमानतळ
|
| 136 |
+
|
| 137 |
+
|
| 138 |
+
जम्मू: सतवारी विमानतळ •
|
| 139 |
+
कारगिल विमानतळ •
|
| 140 |
+
लेह: कुशोक बकुला रिम्पोचे विमानतळ
|
| 141 |
+
|
| 142 |
+
|
| 143 |
+
लुधियाना: साहनेवाल विमानतळ •
|
| 144 |
+
पठाणकोट विमानतळ
|
| 145 |
+
|
| 146 |
+
|
| 147 |
+
अजमेर विमानतळ •
|
| 148 |
+
बिकानेर: नाल विमानतळ •
|
| 149 |
+
जेसलमेर विमानतळ •
|
| 150 |
+
जोधपूर विमानतळ •
|
| 151 |
+
कोटा विमानतळ •
|
| 152 |
+
उदयपूर: महाराणा प्रताप विमानतळ (दबोक)
|
| 153 |
+
|
| 154 |
+
|
| 155 |
+
देहराडून: जॉली ग्रँट विमानतळ •
|
| 156 |
+
पंतनगर विमानतळ
|
| 157 |
+
|
| 158 |
+
|
| 159 |
+
पोर्ट ब्लेर: वीर सावरकर विमानतळ
|
| 160 |
+
|
| 161 |
+
|
| 162 |
+
कडप्पा विमानतळ •
|
| 163 |
+
दोनाकोंडा विमानतळ •
|
| 164 |
+
काकिनाडा विमानतळ •
|
| 165 |
+
नादिरगुल विमानतळ •
|
| 166 |
+
पुट्टपार्थी: श्री सत्य साई विमानतळ •
|
| 167 |
+
राजमुंद्री विमानतळ •
|
| 168 |
+
तिरुपती विमानतळ •
|
| 169 |
+
विजयवाडा विमानतळ •
|
| 170 |
+
विशाखापट्टणम विमानतळ •
|
| 171 |
+
वारंगळ विमानतळ
|
| 172 |
+
|
| 173 |
+
|
| 174 |
+
बेळगाव: सांबरे विमानतळ •
|
| 175 |
+
बेळ्ळारी विमानतळ •
|
| 176 |
+
विजापूर विमानतळ •
|
| 177 |
+
हंपी विमानतळ •
|
| 178 |
+
हस्सन विमानतळ •
|
| 179 |
+
हुबळी विमानतळ •
|
| 180 |
+
मैसुर: मंडकळ्ळी विमानतळ •
|
| 181 |
+
विद्यानगर विमानतळ
|
| 182 |
+
|
| 183 |
+
|
| 184 |
+
अगत्ती विमानतळ
|
| 185 |
+
|
| 186 |
+
|
| 187 |
+
पाँडिचेरी विमा���तळ
|
| 188 |
+
|
| 189 |
+
|
| 190 |
+
मदुरै विमानतळ •
|
| 191 |
+
सेलम विमानतळ •
|
| 192 |
+
तुतिकोरिन विमानतळ •
|
| 193 |
+
वेल्लोर विमानतळ
|
| 194 |
+
|
| 195 |
+
|
| 196 |
+
दमण विमानतळ •
|
| 197 |
+
दीव विमानतळ
|
| 198 |
+
|
| 199 |
+
|
| 200 |
+
भावनगर विमानतळ •
|
| 201 |
+
भूज: रुद्र माता विमानतळ •
|
| 202 |
+
जामनगर: गोवर्धनपूर विमानतळ •
|
| 203 |
+
कंडला विमानतळ •
|
| 204 |
+
केशोद विमानतळ •
|
| 205 |
+
पालनपूर विमानतळ •
|
| 206 |
+
पोरबंदर विमानतळ •
|
| 207 |
+
राजकोट विमानतळ •
|
| 208 |
+
सुरत विमानतळ •
|
| 209 |
+
उत्तरलाई विमानतळ •
|
| 210 |
+
वडोदरा: हरणी विमानतळ
|
| 211 |
+
|
| 212 |
+
|
| 213 |
+
अकोला विमानतळ •
|
| 214 |
+
औरंगाबाद: चिकलठाणा विमानतळ •
|
| 215 |
+
हडपसर विमानतळ •
|
| 216 |
+
कोल्हापूर विमानतळ •
|
| 217 |
+
लातूर विमानतळ •
|
| 218 |
+
मुंबई: जुहू विमानतळ •
|
| 219 |
+
नांदेड विमानतळ •
|
| 220 |
+
नाशिक: गांधीनगर विमानतळ •
|
| 221 |
+
रत्नागिरी विमानतळ •
|
| 222 |
+
शिर्डी विमानतळ •
|
| 223 |
+
सोलापूर विमानतळ
|
dataset/scraper_3/batch_0/wiki_s3_10107.txt
ADDED
|
@@ -0,0 +1,17 @@
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| 1 |
+
छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तुसंग्रहालय, ज्याचे मूळ नाव प्रिन्स ऑफ वेल्स म्युझियम ऑफ वेस्टर्न इंडिया, हे मुंबई येथील एक संग्रहालय आहे जे प्रागैतिहासिक काळापासून आधुनिक काळापर्यंतच्या भारताच्या इतिहासाचे दस्तऐवजीकरण करते.
|
| 2 |
+
२० व्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळात भारतातील ब्रिटिश राजवटीत, प्रिन्स ऑफ वेल्स (नंतर जॉर्ज पाचवा, राजे किंग युनायटेड किंग्डम आणि भारताचा सम्राट) यांच्या भेटीच्या स्मरणार्थ, सरकारच्या मदतीने बॉम्बे नावाच्या शहरातील प्रमुख नागरिकांनी त्याची स्थापना केली. हे दक्षिण मुंबईच्या मध्यभागी गेटवे ऑफ इंडिया जवळ आहे. १९९८ मध्ये मराठा साम्राज्याचे संस्थापक छत्रपती शिवाजी महाराज यांच्या नावावरून संग्रहालयाचे नामकरण करण्यात आले.
|
| 3 |
+
ही इमारत इंडो-सारासेनिक स्थापत्यशैलीमध्ये बांधली गेली आहे, ज्यात मुघल, मराठा आणि जैन यांसारख्या वास्तुकलेच्या इतर शैलींचे घटक समाविष्ट आहेत. संग्रहालयाची इमारत पाम वृक्षांच्या बागेने आणि औपचारिक फुलांच्या बेडांनी वेढलेली आहे.
|
| 4 |
+
संग्रहालयात प्राचीन भारतीय इतिहासाचे अंदाजे ५०,००० प्रदर्शने तसेच परदेशी भूमीवरील वस्तू आहेत, ज्यांचे प्रामुख्याने तीन विभागांमध्ये वर्गीकरण केले आहे: कला, पुरातत्व आणि नैसर्गिक इतिहास. या संग्रहालयात गुप्त, मौर्य, चालुक्य आणि राष्ट्रकूट यांच्या काळातील सिंधू संस्कृतीच्या कलाकृती आणि प्राचीन भारतातील इतर अवशेष आहेत.
|
| 5 |
+
या इमारतीचा आणि सभोवतालच्या परिसराचा आराखडा वास्तू विशारद, जॉर्ज विटेट याने तयार केला होता. विशेष म्हणजे ही वास्तू बघत असतानाही ती भारतीय शैलीची वाटते. ही इमारत बघताना जाळीदार नक्षीकामातून इस्लामी वास्तुतंत्राचा, ठिकठिकाणी असलेल्या झरोक्यांमुळे राजपूत शैलीचा आणि इतर कमानी किंवा व्हरांड्यांच्या रचनेतून हिंदू मंदिराच्या वास्तुतंत्राचा प्रत्यय येतो.
|
| 6 |
+
१९०४ मध्ये, मुंबईतील काही प्रमुख नागरिकांनी प्रिन्स ऑफ वेल्स, भावी राजा जॉर्ज पंचम यांच्या भेटीच्या स्मरणार्थ एक संग्रहालय प्रदान करण्याचा निर्णय घेतला. 14 ऑगस्ट 1905 रोजी समितीने एक ठराव पारित केला:
|
| 7 |
+
|
| 8 |
+
"संग्रहालयाची इमारत मुंबईच्या महान महानगराच्या उभारणीसाठी ब्रिटिश राजे त्यांच्या महत्वाकांक्षी योजनांसह पुढे जात असलेल्या वैभव आणि उंचीला मूर्त रूप देते". "स्थानिक आर्किटेक्चरच्या उत्कृष्ट शैलीला अनुसरून, अनेक इमारती बांधण्यात आल्या, त्यापैकी बॉम्बे हायकोर्टाची इमारत आणि नंतर गेटवे ऑफ इंडिया या इमारती सर्वात उल्लेखनीय होत्या".११ नोव्हेंबर १९०५ रोजी प्रिन्स ऑफ वेल्स यांनी पायाभरणी केली आणि संग्रहालयाला औपचारिकपणे "प्रिन्स ऑफ वेल्स म्युझियम ऑफ वेस्टर्न इंडिया" असे नाव देण्यात आले. १ मार्च १९०७ रोजी, बॉम्बे प्रेसिडेन्सीच्या सरकारने संग्रहालय समितीला "क्रिसेंट साइट" नावाचा एक तुकडा मंजूर केला, जिथे संग्रहालय आता उभे आहे. खुल्या डिझाईन स्पर्धेनंतर, १९०९ मध्ये वास्तुविशारद जॉर्ज विटेट यांना संग्रहालयाच्या इमारतीची रचना करण्यासाठी नियुक्त करण्यात आले. विटेट ने आधीच जनरल पोस्ट ऑफिसच्या डिझाईनवर काम केले होते आणि १९११ मध्ये मुंबईच्या सर्वात प्रसिद्ध खुणांपैकी एक, गेटवे ऑफ इंडियाची रचना केली होती.
|
| 9 |
+
संग्रहालयाला रॉयल व्हिजिट (१९०५) मेमोरियल फंडाद्वारे निधी दिला गेला. शिवाय, शासन व नगरपालिकेने रु. ३,००,००० आणि रु. २,५०,००० अनुक्रमे. सर करिमभॉय इब्राहिम (प्रथम बॅरोनेट) यांनी आणखी रु. ३,००,००० आणि सर कावासजी जहांगीर यांनी रु. ५०,०००. संग्रहालयाची स्थापना १९०९ च्या बॉम्बे ऍक्ट क्र. III अंतर्गत करण्यात आली. संग्रहालयाची देखभाल आता सरकार आणि मुंबई महानगरपालिकेच्या वार्षिक अनुदानाद्वारे केली जाते. नंतरचे संग्रहालय ट्रस्टच्या विल्हेवाटीवर असलेल्या निधीवर जमा होणाऱ्या व्याजातून या अनुदानांसाठी पैसे देतात.
|
| 10 |
+
संग्रहालय इमारत १९१५ मध्ये पूर्ण झाली, परंतु १९२० मध्ये समितीकडे सुपूर्द करण्यापूर्वी पहिल्या महायुद्धादरम्यान बाल कल्याण केंद्र आणि लष्करी रुग्णालय म्हणून वापरण्यात आले. प्रिन्स ऑफ वेल्स संग्रहालयाचे उद्घाटन १० जानेवारी १९२२ रोजी लेडी लॉईड, जॉर्ज लॉईड, मुंबईचे गव्हर्नर यांची पत्नी यांच्या हस्ते करण्यात आले.
|
| 11 |
+
संग्रहालय इमारत ही शहराची ग्रेड I हेरिटेज इमारत आहे आणि १९९० मध्ये भारतीय हेरिटेज सोसायटीच्या बॉम्बे चॅप्टरने हेरिटेज इमारतीच्या देखभालीसाठी प्रथम पारितोषिक (अर्बन हेरिटेज अवॉर्ड) प्रदान केले होते. १९९८ मध्ये संग्रहालयाचे नाव छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय असे ठेवण्यात आले. योद्धा राजा आणि मराठा साम्राज्याचा संस्थापक शिवाजी. १९९५ मध्ये शहराचे नाव बदलल्यानंतर संग���रहालयाचे नामकरण करण्यात आले, जेव्हा वसाहती नाव "बॉम्बे" हे मूळ "मुंबई" ने बदलले.
|
| 12 |
+
संग्रहालय इमारत ३ एकर (१२,००० m2) क्षेत्रात वसलेली आहे, तिचे बांधलेले क्षेत्र १२,१४२.२३ m चौरस आहे. हे पाम वृक्षांच्या बागेने आणि औपचारिक फुलांच्या बेडांनी वेढलेले आहे.
|
| 13 |
+
म्युझियमची इमारत, स्थानिकरित्या उत्खनन केलेल्या ग्रे कुर्ला बेसाल्ट आणि बफ रंगीत ट्रेचाइट मालाड दगडापासून बनलेली आहे. ही एक तीन-मजली आयताकृती रचना आहे, जी पायावर एका घुमटाने आच्छादित आहे, जी इमारतीच्या मध्यभागी एक अतिरिक्त मजला जोडते. पाश्चात्य भारतीय आणि इंडो-सारासेनिक वास्तुकला शैलीत बांधलेली, इमारत एक मध्यवर्ती प्रवेशद्वार पोर्च आहे, ज्याच्या वर एक घुमट आहे, मंद आणि सुधारित "पांढऱ्या आणि निळ्या फ्लेक्समध्ये टाइल केलेले, कमळ - पाकळ्याच्या आधारावर" आहे. मध्यवर्ती घुमटाभोवती लहान घुमटांसह शिखरांचा एक समूह. या इमारतीत मुघल राजवाड्याच्या वास्तुकलेने प्रेरित असलेल्या इस्लामिक घुमटासह फायनलसह पसरलेल्या बाल्कनी आणि जडलेल्या मजल्यासारख्या वैशिष्ट्यांचा समावेश केला आहे. वास्तुविशारद जॉर्ज विटेट यांनी गोलकोंडा किल्ल्यावरील घुमट आणि विजापूरमधील गोल गुम्बाझ येथील आतील कमानींचे मॉडेल तयार केले. संग्रहालयाच्या आतील भागात १८व्या शतकातील वाडा (एक मराठा वाडा) चे स्तंभ, रेलिंग आणि बाल्कनी जैन शैलीतील आतील स्तंभांसह एकत्रित केले आहे, जे मराठा बाल्कनीच्या खाली मध्य मंडपाचे मुख्य भाग बनवतात.
|
| 14 |
+
त्याच्या अलीकडील आधुनिकीकरण कार्यक्रमात (२००८), संग्रहालयाने पाच नवीन गॅलरी, एक संवर्धन स्टुडिओ, एक भेट देणारे प्रदर्शन गॅलरी आणि एक सेमिनार रूम, संग्रहालयाच्या पूर्व विंगमध्ये स्थापित करण्यासाठी ३०,००० चौरस फूट (२,८०० m2) जागा तयार केली. संग्रहालयात एक लायब्ररी देखील आहे.
|
| 15 |
+
मुख्य वस्तुसंग्रहालयात फिरताना वस्तू नाजूक आणि शतकानुशतके जपलेल्या आणि अमूल्य ऐतिहासिक वारसा जपणारा असल्याने त्यांना हात लावण्यास आणि जवळून बघण्यास परवानगी नसते. लहान मुलांना फार उत्सुकता, कुतूहल आणि जिज्ञासा असते आणि त्या जिज्ञासूपणाला वाव देण्यासाठी लहान मुलांसाठी खास वस्तुसंग्रहालय बनविले आहे.श्री.सव्यसाची मुखर्जी ह्यांच्या कल्पनेतून २९ मार्च २०१९ला हे साकारण्यात आले.ह्या वस्तुसंग्रहालयाला दरवर्षी सुमारे दोन लाख विद्यार्थी भेट देतात. हे संग्रहालय दहा हजार चौरस फुट परिसरात वसविले आहे. ह्यात ॲंम्पिथिएटर,कृती प्लाझा,आणि गच्ची आहे.यातील वस्तू मुलांना हाताळला येतात.'स्वतःच शोधा,शिका आणि इतरांनाही माहिती वाटा'अशी त्रिसूत्री कल्पना येथे राबविण्यात आली आहे. रोज नवनवीन प्रयोग येथे केले जातात. एक दिवस खोदकाम, दुसऱ्या दिवशी बोर्डगेम,तिसऱ्या दिवशी गोष्टी, चौथ्या दिवशी तंत्रज्ञान असे अनेक उपक्रम राबविले जातात. या परिसरात असलेल्या गोरखचिंचेच्या झाडाखाली बसून मुले गोष्टी ऐकत असतात. साहजिकच लहान मुले कला, इतिहास, निसर्ग, संस्कृती, माती अश्या सगळ्यांशी नाते जोडतात आणि नव्या कल्पना आणि नवा आनंद घेऊन जातात.
|
| 16 |
+
[१]
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| 17 |
+
https://csmvs.in/
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dataset/scraper_3/batch_0/wiki_s3_10108.txt
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या लेखातील काही मूळ उतारे विकिस्रोत या बंधुप्रकल्पात स्थानांतरित केले जातील तर काही उतारे कॉपीराईट संदिग्धतेमुळे वगळले जातील
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+
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| 3 |
+
छत्रपती शिवाजी महाराज हे साहित्यकार, नाटककार, चित्रपट निर्माते, कलाकार, शिल्पकार, शाहीर यांच्या स्फूर्तीचे स्रोत आहेत. शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर अनेक अजरामर कृती, केवळ मराठीतच नव्हे तर इतरही भाषांत प्रकाशित झाल्या आहेत. फक्त शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर आधारलेली ६० पेक्षा अधिक पुस्तके आहेत. याती बहुतांशी पुस्तके संशोधनावर आधारित असल्याने त्यांना संदर्भ ग्रंथांची मान्यता आहे; तसेच हजारो कथा, ललित कथा, स्तुतिपर लिखाणे ही विविध मासिके, वृतपत्रांतून प्रदर्शित होत असतात.
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शिवाजी महाराज हे साहित्यकार, नाटककार, चित्रपट निर्माते, कलाकार, शिल्पकार, शाहीर यांच्या स्फूर्तीचे स्रोत आहेत. शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर अनेक अजरामर कृती, केवळ मराठीतच नव्हे तर इतरही भाषेत प्रकाशित झाल्या आहेत. फक्त शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर आधारलेली ६० पेक्षा अधिक पुस्तके आहेत. यातील काही पुस्तके संशोधनावर आधारित असल्याने त्यांना संदर्भ ग्रंथांची मान्यता आहे. तसेच हजारो कथा, ललित कथा, स्तुतीपर लिखाणे विविध मासिके, वृतपत्रांतून प्रदर्शित होत असतात.
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सन १८६९ मध्ये महाराष्ट्रातील थोर समाजसुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले यांनी छत्रपती शिवाजी राजे यांच्या समाधीचा जीर्णोद्धार करून त्यांचा पोवाडा लिहिला. लोकमान्य टिळकांनी महाराष्ट्रात शिवजयंती या सार्वजनिक उत्सवाची सुरुवात केली.
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शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर आधारित भालजी पेंढारकर यांनी राजा शिवाजी हा चित्रपट दिग्दर्शित केला यात शिवाजी महाराजांची प्रमुख भूमिका चंद्रकांत मांढरे यांनी केली होती
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सन १८६९ मध्ये महाराष्ट्रातील थोर समाजसुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले यांनी छत्रपती शिवाजी राजे यांच्या समाधीचा जीर्णोद्धार करून त्यांचा पोवाडा लिहिला.
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लोकमान्य टिळकांनी महाराष्ट्रात शिवाजीच्या जयंतीनिमित्त ’शिवजयंती’ या सार्वजनिक उत्सवाची सुरुवात केली.
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शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर आधारित भालजी पेंढारकर यांनी राजा शिवाजी हा चित्रपट दिग्दर्शित केला यात शिवाजी महाराजांची प्रमुख भूमिका चंद्रकांत मांढरे यांनी केली होती.
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बाबासाहेब पुरंदरे यांनी लिहिलेल���या ’राजा शिवछत्रपति’ या हजारपानी चरित्रग्रंथाची आतापर्यंत अनेक पुनर्मुद्रणे झाली आहेत. त्याच पुस्तकावर आधारलेले ’जाणता राजा’ हे मोठ्या मैदानावर आणि फिरत्या रंगमंचावर दाखविले जाणारे महानाट्य आहे.
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बशीर मोमीन (कवठेकर) यांनी छत्रपती शिवाजी महाराजां नंतरच्या कालखंडाशी संबंधित परंतु शिव छत्रपतींची व्यक्तिरेखा असणारी 'भंगले स्वप्न महाराष्ट्रा' आणि 'वेडात मराठे वीर दौडले सात' अशी दोन नाटके लिहिली. यातील 'भंगले स्वप्नं महाराष्ट्रा' या नाटकाचे नाट्यझंकार ग्रुप यांनी भरत नाट्य मंदिर, पुणे येथे १९७६ मध्ये व्यावसायिक नाट्यप्रयोग केले तर
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'वेडात मराठे वीर दौडले सात' या नाटकाचे मळगंगा नाट्य निकेतन यांनी १९७७ मध्ये व्यावसायिक नाट्यप्रयोग केले. यातील, 'वेडात मराठे वीर दौडले सात' या नाटकात श्री. बशीर मोमीन यांनी स्वतः छत्रपती शिवाजी महाराजांची अप्रतिम भूमिका केली.
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२४ नोव्हेंबर २००८ पासून छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या जीवनावर आधारित नितीन देसाई यांनी दिग्दर्शित केलेली राजा शिवछत्रपती ही मालिका दूरचित्रवाणीच्या स्टार प्रवाह या वाहिनीवर चॅनेलवर दाखवली गेली.
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समर्थ रामदास यांनी हिंदवी स्वराज्याचे संस्थापक छत्रपती शिवाजी महाराज यांचे महान व युगप्रवर्तक असे व्यक्तिमत्त्व परिपूर्ण, आशयघन व वजनदार अशा शब्दांत तोलले आहे. छत्रपतींच्या व्यक्तिमत्त्वाच्या व कार्यकर्तृत्वाच्या प्रत्येक पैलूचा उल्लेख शिवकल्याण राजा या कवनात केलेला आहे.[१]
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निश्र्चयाचा महामेरू, बहुतजनांसी आधारू, अखंडस्थितीचा निर्धारू, श्रीमंत योगी ।।
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नरपती, हयपती, गजपती। गडपती, भूपती, जळपती।पुरंदर आणि शक्ती पृष्ठभागी।।
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यशवंत, कीर्तीवंत, सामर्थ्यवंत। वरदवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत। जाणता राजा ।।
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आचरशील, विचारशील, दानशील। धर्मशील सर्वज्ञपणे सुशील। सकळाठाई ।।
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धीर उदार गंभीर। शूर क्रियेसी तत्पर ।सावधपणे नृपवर तुच्छ केले।।
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देवधर्म गोब्राह्मण, करावया संरक्षण। हृदयस्थ झाला नारायण, प्रेरणा केलिया ||
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भूमंडळाचे ठाई, धर्मरक्षी ऐसा नाही। महाराष्ट्र धर्म राहिला काही, तुम्हा कारणी।।
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कित्येक दृष्ट संहारली। कित्येकासी धाक सुटला । कित्येकाला आश्रयो जाहला
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।शिवकल्याण राजा।
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शिवकाळात छत्रपती शिवाजी महाराजांनी समृद्ध, संपन्न असे ‘आंनदवनभुवन’च निर्माण केले होते. त्या आन���दवनभुवनाचे वर्णन समर्थ रामदासांनी पुढील शब्दांत केले आहे. हे काव्य म्हणजे छत्रपतींनी पार पाडलेले ‘इतिकर्तव्य’ होय.[१]
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स्वर्गीची लोटली जेथे, रामगंगा महानदी, तीर्थासी तुळणा नाही।आनंदवनभुवनी।।
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त्रैलोक्य चालील्या फौजा, सौख्य बंध विमोचने, मोहीम मांडिली मोठी।आनंदवनभुवनी।।
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येथून वाढला धर्मु रमाधर्म समागमे , संतोष मांडला मोठा।आनंदवनभुवनी।।
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भक्तांसी रक्षिले मागे आताही रक्षिते पहा, भक्तासी दिधले सर्वे।आनंदवनभुवनी।।
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येथूनी वाचती सर्वे ते ते सर्वत्र देखती, सामर्थ्य काय बोलावे।आनंदवनभुवनी ।।
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उदंड जाहले पाणी स्नानसंध्या करावया, जप-तप अनुष्ठानेआनंदवनभुवनी।।
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बुडाली सर्वही पापे, हिंदुस्थान बळावले, अभक्तांचा क्षयो झाला।
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आनंदवनभुवनी।।आनंदवनभुवनी।।
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पांडुरंग वामन काणे, शंकर दामोदर पेंडसे, गोविंद रामचंद्र राजोपाध्ये, रामकृष्ण परशुराम सबनीस, यशवंत खुशाल देशपांडे, वासुदेव आत्माराम देशप्रभू, जनार्दन सखाराम करंदीकर, महामहोपाध्याय रायबहादूर गौरीशंकर ओझा, शंकर वामन दांडेकर, श्रीक्रुष्ण व्यंकटेश पुणतांबेकर, भास्कर वामन भट, शिवराम काशीनाथ ओक, सुरेन्द्रनाथ सेन, पंडित वैद्यनाथन शास्त्री तसेच Sir Charles Malet अशा अनेक थोर इतिहास अभ्यासकांचे छत्रपती शिवाजीमहाराजांच्या संबंधित विविध विषयांवरील लेखही या ग्रंथात आहेत.
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छत्रपती संभाजीराजे शिवाजीराजे भोसले
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(१४ मे १६५७ - ११ मार्च १६८९) हे छत्रपती शिवाजी महाराज आणि महाराणी सईबाई यांचे थोरले चिरंजीव आणि मराठा साम्राज्याचे दुसरे छत्रपती होते.
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छत्रपती संभाजी महाराजांचा जन्म १४ मे १६५७ रोजी किल्ले पुरंदर येथे झाला. राजपुत्र असल्यामुळे रणांगणावरील मोहिमा आणि राजकारणातील डावपेच यांचे बाळकडू त्यांना लहानपणापासूनच मिळाले.
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संभाजी महाराजांच्या आई, महाराणी सईबाईंचे निधन महाराज लहान असतानाच झाले. त्यानंतर पुण्याजवळील कापूरहोळ गावची धाराऊ ही स्त्री त्यांची दूध आई बनली. संभाजी महाराजांचा सांभाळ त्यांची आजी राजमाता जिजाबाई यांनी केला.
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त्यांच्या सावत्र आई, पुतळाबाई[१] यांनी देखील त्यांच्यावर खूप माया केली. मात्र त्यांंची सावत्र आई सोयराबाई[२] यांनी संंभाजी महाराजांना पोरकेेेपणाने वागवले तसेच संभाजी महाराजांच्या राजकीय कारकिर्दीत ढवळाढवळ करण्याचा प्रयत्न केला.
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अनेक ऐतिहासिक नोंदींप्रमाणे संभाजी महाराज अत्यंत देखणे आणि शूर होते. तसेच ते अनेक भाषांत विद्याविशारद व अत्यंत धुरंदर राजकारणी होते. राजकारणातील बारकावे त्यांनी भराभर आत्मसात केले होते. मुघल दरबारातील घडामोडी आणि राजकारण त्यांना लहान वयातच कळले तर त्याचा त्यांना भविष्यात उपयोग होईल या विचाराने शिवाजी महाराजांनी त्यांना आग्रा भेटीच्या वेळी बरोबर नेले. त्यावेळी संभाजीराजे ९ वर्षाचे होते. शिवाजी महाराज कैदेतून निसटल्यानंतर स्वराज्यापर्यंतची धावपळ संभाजी राजांनी सोसू नये आणि त्यामुळे त्यांना काही काळ सुरक्षित ठिकाणी ठेवणे गरजेचे होते. त्यामुळे शिवाजी महाराजांनी त्यांना मोरोपंत पेशव्यांच्या मेहुण्याच्या घरी मथुरेला ठेवले. मुघल सैनिकांचा संभाजी राजांच्या मागचा ससेमिरा थांबवण्याच्या उद्देशाने शिवाजी महाराजांनी संभाजीराजांचे निधन झाल्याची अफवा पसरवून दिली. ते महाराष्ट्रात पोहोचल्यानंतर काही काळाने संभाजी महाराज सुखरूपपणे स्वराज्यात येऊन पोहोचले.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १६७४ मध्ये शिवाजी महाराजांचा राज्याभिषेक झाला तोपर्यंत संभाजीराजे राजकारणातील लहान बारकावे आणि रणांगणातील डावपेचांमध्ये तरबेज झाले होते. त्यांच्या विनम्र स्वभावाने राज्याभिषेकासाठी रायगडावर आलेल्या प्रतिनिधींना त्यांनी आपलेसे केले.[ स���दर्भ हवा ]
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शिवाजी महाराजांचा राज्याभिषेक झाल्यानंतर १२ दिवसात जिजाऊंचे निधन झाले. त्यानंतर संभाजीराजांकडे मायेने लक्ष देणारे कोणी राहिले नाही. शिवाजी महाराज स्वराज्याच्या राजकारणात आणि रणांगणावर गुंतले होते.[ संदर्भ हवा ]
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तरुण संभाजीराजांचे शिवाजी महाराजांच्या दरबारातील अनुभवी मानकऱ्यांशी अनेकदा मतभेद होऊ लागले. संभाजी महाराजांचा अमात्य अण्णाजी दत्तोंच्या कारभाराला सक्त विरोध होता. शिवाजी महाराजांनी अण्णाजी हे अनुभवी आणि कुशल प्रशासक असल्यामुळे त्यांच्या भ्रष्ट कारभाराकडे अनेकदा दुर्लक्ष केले. पण संभाजी महाराजांना ते मान्य होणे कठीण होते. अण्णाजी दत्तो आणि इतर अनुभवी मानकरी संभाजी महाराजांच्या विरोधात गेले.[ संदर्भ हवा ]
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दरबारातील काही मानकरी संभाजी महाराजांना अपमानास्पद वागणूक देऊ लागले; हे केवळ अण्णाजी दत्तोंच्या सांगण्यावरून केले. त्यांच्या विरोधामुळे त्यांना शिवाजी महाराजांबरोबर दक्षिण हिंदुस्थानच्या मोहिमेवर जाता आले नाही. तसेच शिवाजी महाराजांच्या अनुपस्थितीत संभाजी महाराजांचे हुकूम पाळण्यास अष्टप्रधानमंडळाने नकार दिला. त्यामुळे शिवाजी महाराजांना कोकणातील शृंगारपूरचे सुभेदार म्हणून संभाजी महाराजांना पाठवावे लागले.[ संदर्भ हवा ]
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श्री शंभो: शिवजातस्य मुद्राद्यौरिव राजते |
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यदं कसेविनी लेखा वतर्ते कस्यनोपरि ||
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अर्थ: छत्रपती शिवरायांचे पुत्र छत्रपती संभाजी महाराज यांची ही राजमुद्रा जणू काही स्वर्गीय तेजाने तळपत आहे, आकाशाप्रमाणे अमर्याद आहे. या राजमुद्रेच्या आश्रयात प्रत्येक माणूस, प्रत्येक प्राणिमात्र महाराजांच्या छत्रछायेखाली असेल. छत्रपतींच्या या राजमुद्रेपेक्षा कोणीही श्रेष्ठ नाही.[ संदर्भ हवा ]
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संभाजी महाराजांना साधुसंतांबद्दल आदरभाव होता. ज्येष्ठ मांत्रिक कुडाळ ग्रामनिवासी नामदेवभट्टपुत्र बाकरेशास्त्री यांना करून दिलेल्या संस्कृतमधील दानपत्रावरून त्यांचा आदरभाव कळतो. छत्रपती संभाजी महाराजांना राजपद महत्प्रयासाने प्राप्त झाले होते. त्यांनी राजपद प्राप्तीसाठी नवस केला होता आणि त्यांना राज्याधिकार मिळाल्यानंतर तो नवस फेडण्याच्या इच्छेने त्यांनी नामदेवभट्टपुत्र बाकरेशास्त्री (ज्यांना संभाजी महाराज स्वामी म्हणतात) यांना दरसाल १०,००० पादशाही होनांचे संस्कृत दानपत्र करून दिले. हे दानपत्र संभाजी महाराजांच्या मंचाकारोहणानंतर एका महिन्याने म्हणजे दि. २४ ऑगस्ट १६८० (भाद्रपद शुद्ध १० सोमवार शके १६०२) रोजी केले आहे. दानपत्र ३०० से.मी. लांब आणि २३.५ से.मी. रुंद आहे. या दानपत्राच्या सर्वात वर मधोमध संभाजी महाराजांची १६ बुरुजी मुद्रा आहे व खाली सुवाच्य अक्षरात संस्कृतमध्ये २ ओळी लिहिल्या आहेत. त्या स्वतः शंभूराजांच्या हस्ताक्षरातील आहेत.[ संदर्भ हवा ] त्या ओळी खालीलप्रमाणे :
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|| मतं मे श्री शिवराजपुत्रस्य श्रीशंभूराज ||
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|| छत्रपते: यद्त्रोपरिलेखितं || छं || श्री ||
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यात ते तत्कालीन दानपत्र लेखन पद्धतीप्रमाणे आपल्या पूर्वजांच्या व स्वतःच्या पराक्रमाचे व सद्गुणांचे वर्णन अतिशय सार्थ अशा शब्दांमध्ये करतात. आपले पणजोबा मालोजीराजे यांना शूरश्रेष्ठ व देवब्राम्हण प्रतिपालक असे संबोधतात तर आपले आजोबा महाराज शाहजीराजांस निशायुद्धप्रवीण, तसेच 'हैन्दवधर्मजीर्णोद्धाकरणघृतमति' म्हणजे स्वतःचा जीव धोक्यात घालून हिंदवी (हिंदू) धर्माचा जीर्णोद्धार करणारा असे संबोधतात. आपले वडील श्री छत्रपती शिवाजी महाराजांचा उल्लेख 'म्लेंव्छक्षयदीक्षित' म्हणजे आपल्या तारुण्यातच ज्यांनी म्लेंछ क्षयाची दीक्षा घेतली व अनेक ताम्रांना पराभूत केले असा करतात. यावरून छत्रपती संभाजी महाराजांना आपल्या पराक्रमी पूर्वजांविषयी वाटणाऱ्या भावनेचे यथार्थ दर्शन होते.[ संदर्भ हवा ]
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दि. ६ जानेवारी १६८१ रोजी छत्रपती संभाजी महाराजांनी गोपळभट अग्निहोत्री महाबलेश्वरकर यांच्या पुत्रास लिहिलेल्या पत्रात एक अतिशय समर्पक असे वाक्य आले आहे. ते वाक्य असे, ..राजश्री आबासाहेबांचे जे संकल्पित आहे ते चालवावे हे आम्हास अगत्य...[ संदर्भ हवा ] युवराज शंभू राजे छत्रपती झाल्यानंतर त्यांचे अलौकिक आणि अद्भुत अशा कार्याचा जर कुणी आढावा घेतला तर त्याला पदोपदी या वाक्याची प्रचीती येते. त्यांचे राजकीय धोरण, आर्थिक धोरण, प्रजाहितदक्षता या सर्व बाबींमध्ये त्यांनी आपल्या अद्वितीय अशा वडिलांचा आदर्श डोळ्यासमोर ठेवलेला दिसतो. या प्रमाणेच त्यांच्या धार्मिक धोरणावरही छत्रपती शिवाजी महाराजांचाच ठसा कोरलेला आढळतो.[ संदर्भ हवा ]
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संतजनांस राजाश्रयः
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१. संतश्रेष्ठ जगद्गुरू तुकाराम महाराज यांचे पुत्र महादोबा मोरे यांस छत्रपती संभाजी महाराजांनी वर्ष��सनाची नेमणूक करून दिली. (दि. १९ ऑगस्ट १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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२. शिवकालातील प्रसिद्ध पाटगावचे मौनीबाबा यांच्या पालखीस भोई व वाजंत्रीची कायमची व्यवस्था लावून दिली. त्यासाठी वार्षिक १२५ होनांचे आज्ञापत्र करून दिले. (दि.१३ सप्टेंबर १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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३. समर्थ रामदास स्वामींनी अंगापूरच्या डोहात मिळालेल्या राममूर्तीची चाफळ येथे स्थापना करून मंदिर उभारले. तेथील पूजेअर्चेसाठी व नैवेद्यासाठी छत्रपती शिवाजी महाराजांनी चैत्र शु. १ शके १५९७ रोजी सनद करून दिली. तीच पुढे छत्रपती संभाजी महाराजांनी चालू ठेवली. तसेच चाफळच्या यात्रेस जमणाऱ्या भाविकांना लष्करातील लोकांचा अथवा मुसलमानी सैन्याचा त्रास होऊ नये व यात्रा यथासांग पार पडावी म्हणून वासुदेव बाळकृष्ण या आपल्या अधिकाऱ्यास आज्ञापत्र लिहिले. (दि. १८ ऑक्टोबर १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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४. चिंचवडचे श्री मोरया गोसावी यांच्या 'माणसांस, शेतापोतांस तसेच गुरांढोरांस काडीचाही तसविज देऊ नये' यासाठी आपल्या लष्करी अधिकाऱ्यास ताकीदपत्र लिहिले. (दि. ६ नोव्हेंबर १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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५. प्रचंडगडाच्या पायथ्याशी गडाच्या संरक्षणासाठी आलेल्या लोकांच्या गाई व म्हशी यांची चराई (वणी) छत्रपती शिवाजी महाराजांप्रमाणेच संभाजी महाराजांनी पण माफ केली (दि. ३१ मार्च १६८१)[ संदर्भ हवा ]
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६. श्री समर्थांनी अवतारकार्य पूर्ण केल्यावर त्यांच्या मागे सज्जनगड व चाफळ येथील धर्मादाय ऐवज, उत्सव, देवस्थानांची व्यवस्था, यात्रा, समर्थांच्या निर्वाणस्थळी हनुमानाचे देवालय उभारणे इत्यादी गोष्टींकडे जातीने लक्ष पुरविले. त्या संबंधी आपल्या अधिकाऱ्यांना वेळोवेळी सूचना, आज्ञा, प्रसंगी ताकीद व कडक शब्दात कानउघाडणी देखील केली आहे. या संबधी एका पत्रात संभाजी महाराजांनी कऱ्हाड प्रांताचा सुभेदार रंगो विश्वनाथ यांस श्रीचे कार्यास हैगै कराया तुम्हास काय गरज?... अशा स्पष्ट शब्दात खडसावले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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७. चिंचवडच्या देवस्थानास आपल्या लष्कराकडून उपद्रव होतो अशी तक्रार आल्यावर छत्रपती संभाजी महाराजांनी पुणे प्रांताच्या सुभेदार व जुमलेदारांना ..जो धामधूम करील त्याला स्वामी जीवेच मारतील... अशी अत्यंत परखड शब्दात समज दिली आहे.[ संदर्भ हवा ]
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८. वाई प्रांताचा सुभेदार येसाजी मल्हार यास निंब येथील सदानंद गोसावींच्या मठास दरसाल नेमून दिलेला ऐवज पोचता न केल्याचे कळताच संभाजी महाराजांनी धर्मकार्यात खलेल न करणे. अशा शब्दांत ताकीद दिली आहे. व तेथील आनंदगिरी गोसावी यांना पत्र लिहून धर्माच्या कार्यास अंतर पडणार नाही... असे अभिवचन दिले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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सक्तीने धर्मांतरास विरोध:
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छत्रपती संभाजी महाराजांनी आपल्या वडिलांप्रमाणेच सक्तीने धर्मांतर करणाऱ्या इंग्रज, पोर्तुगीज, व मुसलमान सत्ताधीशांना कडाडून विरोध केलेला दिसतो. छत्रपती संभाजी महाराज व हेनरी ग्यारी यांच्यात इ.स. १६८४ साली झालेल्या तहातील एक कलम आहे,'That the English shall buy none of my people belonging to my dominion, to make them slaves or Christians'[ संदर्भ हवा ]
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अंत्रुज परगण्यातील अडकोळण गावचा शिलालेख:
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छत्रपती संभाजी महाराजांच्या कारकिर्दीत मराठी राज्याचा अंमल गोमंतक परिसरात सुरू झाला. तेव्हापासून व्यापारी माणसांकडून घेण्यात येणारा अंगभाडे कर संभाजी महाराजांच्या आज्ञेने माफ करण्यात आला. या संबंधी फोंड्याजवळ अंत्रुज येथील हडकोळण या गावी एक शिलालेख आहे. या शिलालेखात संभाजी महाराजांनी मुख्याधिकारी मामले फोंडा धर्माजी नागनाथ यास करमाफीसंबंधी आज्ञा करताना मराठी अंमलाला उद्देशून खालील वाक्य कोरले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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'...आता हे हिंदुराज्य जाहलेपासोन...पुढे या प्रमाणे सकळाहि चालवावे सहसा धर्मकृत्यास नाश करू नये करतील त्यांसी महापातक आहे...'
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सिंहासनाधीश्वर श्रीमंत छत्रपती - संभाजीराजे शिवाजीराजे भोसले
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(सेनाधीशांचे सेनाधीश - सर्वोच्च अधिकार असलेले)
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श्री सखी राज्ञी जयति छत्रपती येसूबाई संभाजीराजे भोसले
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(संभाजीराजांच्या गैरहजेरीत राजव्यवस्थेच्या कारभारी)
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औरंगजेबाने इ.स. १६८२ मध्ये मराठ्यांवर हल्ला केला.औरंगजेबाचे सैन्य मराठ्यांच्या सैन्याच्या पाचपटीने जास्त होते तर औरंगजेबाचे साम्राज्य संभाजी महाराजांच्या स्वराज्यापेक्षा कमीतकमी १५ पटींनी मोठे होते. त्याकाळी जगातील सर्वांत शक्तिशाली सैन्यांमध्ये औरंगजेबाच्या सैन्याचा समावेश होत होता. तरीही संभाजी महाराजांच्या नेतृत्वाखाली मराठ्यांनी हिमतीने लढा दिला.[ संदर्भ हवा ] मराठ्यांची प्रबळ इच्छाशक्ती आणि झुंझारपणाचे ठळक उदाहरण म्हणजे नाशिकजवळील रामशेज किल्ल्याचा लढा होय. औरंगजेबाच्या सरदारांची अशी अपेक्षा होती की तो किल्ला काही तासांतच शरणागती पत्करेल. पण मराठ्यांनी असा चिवट प्रतिकार केला की तो किल्ल�� जिंकण्यासाठी त्यांना तब्बल साडेसहा वर्षे लढावे लागले.[ संदर्भ हवा ] संभाजी महाराजांनी गोव्याचे पोर्तुगीज, जंजिऱ्याचा सिद्दी आणि म्हैसूरचा चिक्कदेवराय या शत्रूंना असा जोरदार धडा शिकवला की त्यांची संभाजी महाराजांविरुद्ध औरंगजेबाला मदत करायची हिंमत झाली नाही. तसेच त्यांपैकी कोणीही त्यांच्याविरुद्ध उलटू शकला नाही. संभाजी महाराजांच्या नेतृत्वाखाली मराठ्यांनी सर्व शत्रूंशी एकहाती झुंज दिली.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १६८७-८८ मध्ये महाराष्ट्रात मोठा दुष्काळ पडला. त्यामुळे परिस्थिती कठीण झाली होती.
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इ.स. १६८९च्या सुरुवातीला संभाजी महाराजांनी त्यांच्या महत्त्वाच्या सरदारांना बैठकीसाठी कोकणात संगमेश्वर येथे बोलावले. १ फेब्रुवारी, इ.स. १६८९ रोजी बैठक संपवून संभाजी महाराज रायगडाकडे रवाना होत असतानाच औरंगजेबाचा सरदार मुकर्रबखान याने महाराजांच्या नजीकच्या ब्राह्मणांच्या मदतीने संगमेश्वरावर हल्ला केला, फ्रेंच गवर्नर गेनरल मार्टीनने त्याच्या डायरीत याची नोंद करून ठेवली आहे, की जवळच्या ब्राम्हणांनी महाराजांशी दगाफटका केला.[३] कारवाईसाठी गुप्तता बाळगली आणि सर्व कारवाईची आखणी खूपच काळजीपूर्वक केली. मराठ्यांत आणि शत्रूच्या सैन्यात चकमक झाली. मराठ्यांचे संख्याबळ कमी होते. प्रयत्नांची शर्थ करूनही मराठे शत्रूचा हल्ला परतवून लावू शकले नाहीत. शत्रूने संभाजीमहाराजांना व त्यांच्यासोबत असलेल्या कवि कलश यांना जिवंत पकडले.
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छत्रपती संभाजी महाराज संगमेश्वरी पकडले गेल्यानंतर त्यांना वाचवण्याचे प्रयत्न झाले नाही असे नाही. महाराजांना वाचवण्यासाठी प्रयत्न मावळ्यांनी केले पण ते त्यात यशस्वी झाले नाही. यात सर्वात पहिला प्रयत्न हा जोत्याजी केसरकर यांनी केला. पुढे जाऊन अप्पा शास्त्री यांनी देखील महाराजांना सोडवण्याचा प्रयत्न केला पण हे दोन्ही प्रयत्न अयशस्वी ठरले.[ संदर्भ हवा ]
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मुघलांनी पकडल्या नंतर छत्रपती संभाजी महाराज आणि त्यांचे सल्लागार कवी कलश यांना औरंगजेबापुढे किल्ले बहादुरगड, आता धर्मवीरगड येथे आणण्यात आले. 'औरंगजेबाने संभाजी महाराजांना सर्व किल्ले त्याच्या स्वाधीन करून स्वतंत्र जिवन जगन्याचे' किंवा धर्मांतरण करून इस्लाम धर्म स्वीकार करून मुसलमान बनल्यास जीवनदान देण्याचे मान्य केले. पण संभाजी महाराजांनी त्याला स्पष्टपणे नकार दिला. त्यानंतर औरंगजेबाने संभाजी महाराज आणि कवी कलश यांची विदूषकाचे कपडे घालून अत्यंत मानहानीकारक अशी धिंड काढण्यात आली. शेवटी दोघांनाही नर्क यातना देउन क्रूरपणे अत्यंत हालहाल करून ठार मारायचा आदेश दिला. शेवटी एक मशाल शांत झाली.[ संदर्भ हवा ]
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अफाट मोगली सैन्याशी धैर्याने आणि असामान्य शौर्याने लढा देणारा हा छत्रपती उत्तम साहित्यिक आणि संस्कृत भाषेचा उत्तम जाणकारही होता.
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संभाजी महाराजांनी वयाच्या चौदाव्या वर्षी बुधभूषण-राजनीती हा संस्कृत ग्रंथ लिहिला.[ संदर्भ हवा ]
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बुधभूषण या ग्रंथात अतिशय सुंदर आणि अलंकारिक भाषेत आपले वडील शिवाजीराजे यांचा उल्लेख आहे :
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'कलिकालभुजंगमावलीढं निखिलं धर्मवेक्ष्य विक्लवं यः ।
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जगत: पतिरंशतोवतापो: (तीर्ण:)स शिवछत्रपतिजयत्यजेयः ॥
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अर्थ-"कलिकालरूपी भुजंग घालितो विळखा, करितो धर्माचा ऱ्हास
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तारण्या वसुधा अवतरला जगत्पाल, त्या शिवप्रभूंची विजयदुंदुभी गर्जू दे खास ॥ "
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याचबरोबर संभाजी महाराजांनी नायिकाभेद, नखशिखा, सातशतक या तीन ग्रंथांचे लिखाण केले. गागाभट्टांनी समयनय हा ग्रंथ लिहून संभाजी महाराजांना अर्पण केला.[ संदर्भ हवा ]
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(संभाजी महाराजांवरील ऐतिहासिक कथा कथने आणि कादंबऱ्या)
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संभाजी महाराजांवरील नाटके
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dataset/scraper_3/batch_0/wiki_s3_10128.txt
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@@ -0,0 +1,45 @@
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१९° ५२′ ४८″ N, ७५° १९′ १२″ E
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छत्रपती संभाजीनगर (पूर्वीचे औरंगाबाद) हे महाराष्ट्र राज्यातील एक शहर आहे आणि मराठवाडा विभागाचे मुख्यालय आहे. हे एक महत्त्वाचे मध्यवर्ती, औद्यौगिक केंद्र व ऐतिहासिक पर्यटनकेंद्र आहे. या शहराला ५२ दरवाजांचे शहर म्हणून ओळखले जाते. मुंबई उच्च न्यायालयाचे खंडपीठ सुद्धा येथे आहे. हे जगातले एक सर्वाधिक वेगाने वाढणारे औद्यौगिक शहर आहे. हे मराठवाड्याच्या व त्यासोबतच महाराष्ट्र पर्यटनाच्या राजधानीचे शहर आहे.[२] फेब्रुवारी २०२३ मध्ये भारत सरकारने शहराचे नाव "औरंगाबाद" बदलून "छत्रपती संभाजीनगर" असे केले.[३]
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पैठण ही सातवाहन राजघराण्याची शाही राजधानी, तसेच दौलताबाद किंवा देवगिरी ही यादव घराण्याची राजधानी, आधुनिक छत्रपती संभाजीनगरच्या हद्दीत स्थित आहेत. इ.स. १३०८ मध्ये इस्लामिक आक्रमक सुलतान अलाउद्दीन खलजीच्या कारकिर्दीत हा प्रदेश दिल्ली सल्तनतला जोडला गेला होता. १३२७ मध्ये, दिल्ली सल्तनतची राजधानी दिल्लीहून दौलताबाद (सध्याच्या संभाजीनगरमध्ये) येथे वेडा महंमद उर्फ सुलतान मुहम्मद बिन तुगलकांच्या कारकिर्दीत स्थानांतरित झाली, ज्याने दिल्लीच्या लोकसंख्येचे मोठ्या प्रमाणावर दौलताबाद येथे स्थलांतर करण्याचे आदेश दिले. तथापि, मुहम्मद बिन तुघलक यांनी १33४ मध्ये आपला निर्णय बदलला आणि राजधानी दिल्लीला परत नेली. १४९९ मध्ये, दौलताबाद अहमदनगर सल्तनतचा एक भाग बनला. इथिओपियाचे लष्करी नेते मलिक अंबर यांनी अहमदनगर सल्तनतची राजधानी म्हणून सेवा बजावण्यासाठी आधुनिक संभाजीनगरच्या ठिकाणी १६१० मध्ये खडकी नावाचे नवीन शहर स्थापन केले. अहमदनगर सल्तनतचे मलिक अंबर याच्यानंतर त्याचा मुलगा फतेह खान यांनी नाव बदलून फतेहनगर केले. १६३६ मध्ये औरंगजेब, जो त्यावेळी दख्खन प्रांताचा मोगल वाइसरॉय होता, त्यांनी या शहराला मोगल साम्राज्यात जोडले. १६५३ मध्ये औरंगजेबाने शहराचे नाव बदलून "औरंगाबाद" केले आणि त्यास मुगल साम्राज्याच्या दख्खन प्रदेशाची राजधानी बनविली. १७२४ मध्ये दख्खनचा मोगल गव्हर्नर निजाम असफ प्रथम, पहिला मोगल साम्राज्यातून निघाला आणि त्याने स्वतःच्या असफ जाही राजवंशाची स्थापना केली. १७६३ मध्ये हैदराबाद शहराकडे त्यांची राजधानी हस्तांतरित होईपर्यंत संभाजीनगरला हैदराबादची राजधानी बनवले होते. ब्रिट��श राजवटीत हैदराबाद राज्य एक राजसत्ता बनले आणि १५० वर्षे ते तसे राहिले. १९५५ पर्यंत छत्रपती संभाजीनगर हे हैदराबाद राज्याचा भाग राहिले. १९६० मध्ये छत्रपती संभाजीनगर व मराठी भाषिक मराठवाडा हा महाराष्ट्र राज्याचा एक भाग बनला.[४]
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औरंगाबाद हे शहर ज्या परिसरात वसलेले आहे, त्याचा इतिहास सातवाहन या काळापर्यंत आढळून येतो. विक्रमादित्य राजाच्या काळातही या परिसराचा उल्लेख आहे. सातवाहनाच्या काळात खाम नदीकिनारी अनेक लहान मोठी खेडी होती. त्यापैकी एक असलेले खडकी हे आजचे छत्रपती संभाजीनगर मानले जाते आहे. सातव्या शतकात या गावाच्या उत्तरेस बुद्धलेणी व विहार खोदण्यात आले. नंतरच्या शतकामध्ये या गावाचा राजतलक किंवा राजतडाग म्हणूनही उल्लेख आढळतो. चौदाव्या शतकापर्यंत या परिसरात देवगिरीच्या महान हिंदू साम्राज्याचे सम्राट राजे कृष्णदेव राया यांच्या वंशजांचे यादवांचे राज्य होते. त्या काळात येथे फार मोठ्या प्रमाणात भरभराट झाली. देवगिरी या प्रदेशाचा सुवर्णकाळ होता.
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इतिहासकारांच्या मते १६०४ मध्ये अहमदनगरचा निजामशहा मूर्तझा द्वितीय याचा मंत्री मलिक अंबर याने औरंगाबाद हे शहर वसवले आहे. परंतु हे गाव पूर्वीपासूनच अस्तित्वात होते मलिक अंबरने फक्त त्याचे नाव बदलून फतेहपूर ठेवले होते. १६३४ मध्ये औरंगजेब ह्या (खडकी/फतेहपूर) शहरात दख्खन विभागाचा सुभेदार म्हणून आले. १६४४ मध्ये तो आग्ऱ्याला परत गेला. त्यानंतर १६८१ मराठा साम्राज्याचा बिमोड् करण्यासाठी मध्ये औरंगजेब पुन्हा ह्या शहरात आला. १७०७ मध्ये औरंगजेब याचे अहमद नगर येथे निधन झाले. औरंगाबाद शहराजवळ असणाऱ्या खुलताबाद तालुक्यात औरंगजेब यांची कबर आहे.
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इ.स. १७०७ नंतर औरंगाबादचा ताबा हैदराबादच्या निझाम राजवटीकडे आला.
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इ.स. १८८९ मध्ये औरंगाबाद मध्ये पहिली कापूस प्रक्रिया गिरणी उभी राहिली, त्यात सातशे जणांना रोजगार मिळाला.
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निझाम राज्यात हैदराबाद-गोदावरी व्हॅली रेल्वेची सुरुवात झाल्यानंतर इ.स. १९०० च्या सुमारास शहर आणि परिसरात अनेक जिनिंग कारखाने सुरू झाले. औरंगाबादला महाविद्यालय सुरू झाले आणि उच्च शिक्षणाची मुहुर्तमेढ रोवली गेली. शहरात पदवीशिक्षण घेतलेल्यांची संख्या वाढली. उद्योगव्यवसायाला प्रारंभ झाला. विसाव्या शतकाच्या मध्यापर्यंत हैदराबाद संस्थांनातही देशाच्या अन्य भागाप्रमाणेच स्वातंत्र्यासाठी चळवळ सुरू झाली होती. हैदराबाद स्टेट काँग्रेसच्या नेतृत्वाखाली लढा उभारला गेला. औरंगाबाद हे या लढ्याचे एक केंद्र बनले.
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हैदराबाद संस्थानाच्या विलीनीकरणानंतर मराठवाड्यासह औरंगाबाद शहर ही भाषिक आधारावर महाराष्ट्राशी जोडण्यात आले. संयुक्त महाराष्ट्राची स्थापना १ मे, १९६०ला झाली. त्या दिवशीपासून औरंगाबाद महाराष्ट्राचा भाग बनले.
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या शहराला "औरंगाबाद" हे नाव औरंगजेब ह्या मुघल सम्राटाच्या नावावरून ठेवले गेले होते. त्यापूर्वी या शहराचे जुने नाव "खडकी" होते.[५] शिवसेना प्रमुख बाळासाहेब ठाकरे यांनी तत्कालीन औरंगाबाद शहराचे नाव संभाजीनगर व्हावे अशी अनेकदा मागणी केली होती.[६][७]
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२९ जून २०२२ रोजी औरंगाबाद शहराचे नाव बदलून 'संभाजीनगर' करण्याचा निर्णय तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरेंच्या मंत्रिमंडळात मंजूर झाला. त्यानंतर मुख्यमंत्री झालेले एकनाथ शिंदे यांनी १७ जुलै २०२२ रोजी "संभाजीनगर" नावाचा विस्तार करून "छत्रपती संभाजीनगर" असे शहराचे नामांतर केले. पुढे २४ फेब्रुवारी २०२३ ला नरेंद्र मोदी सरकार कडून सुद्धा औरंगाबाद या शहराला 'छत्रपती संभाजीनगर' करण्याचा निर्णयास मंजूरी देण्यात आली.[८] तथापि, यावेळी औरंगाबाद जिल्हा, औरंगाबाद विभाग, औरंगाबाद तालुका यांचे नामकरण झाले नव्हते.
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भौगोलिकदृष्ट्या छत्रपती संभाजीनगर उत्तर अक्षांश १९°५३'४७" - पूर्व रेखांश ७५°२३'५४" याठिकाणी वसलेले आहे. हे शहर चारही बाजूनीं टेकड्या आणि डोंगरांनी वेढलेले आहे. उत्तरेकडून दक्षिणेकडे असा जमिनीचा उतार आढळून येतो. अनेक लहानलहान टेकड्यांवर शहर वसलेले आहे. त्यामुळे शहरातून अनेक नाले वाहतात. ते दक्षिण- नैर्ऋत्येस वाहात जातात. शहराच्या उत्तरेस डोंगररांग आहे. दक्षिणेसही डोंगर आहेत. छत्रपती संभाजीनगर जिल्ह्यात मध्यम ते भारी स्वरूपाची काळी मृदा आहे जिच्या मध्ये कॅल्शिअम आणि मॅग्नेशिअमचे प्रमाण अधिक आढळून येते.
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तापमान : छत्रपती संभाजीनगरचे वार्षिक तापमान ९ ते ४० अंश सेल्सियस दरम्यान असते. शहराला भेट देण्याचा आल्हाददायक काळ हा हिवाळ्यात, ऑक्टोबर ते मार्च दरम्यान आहे.[९]
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पर्जन्यमान : पडत असलेल्या पावसापैकी सर्वाधिक पाऊस जून ते सप्टेंबर या काळात पडतो साधारणपणे ९.० ते ६९३ मिलीमीटर/महिना हे पावसाचे प्रमाण असते. सरासरी वार्षिक पर्जन��यमान हे ७२५ मिलीमीटर असते.
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साचा:Infobox Weather
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औरंगाबाद हे ऐतिहासिक दृष्ट्या महत्त्वाचे शहर आहे. शहरातील ५२ दरवाजे व खिडक्या प्रसिद्ध आहेत. सद्यस्थितीतील यातील अनेक दरवाजे हे शेवटची घटका मोजत आहेत. औरंगाबादला जागतिक महत्त्व आहे. औरंगाबाद या शहराला महाराष्ट्राची पर्यटनाची राजधानी म्हणून ओळखले जाते. औरंगाबादला राजतडाग, खडकी , फतेहपूर म्हणून सुद्धा ओळखले जाते.
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औरंगाबाद शहरातील दरवाजे पुढील प्रमाणे आहेत. भडकल गेट, मकई गेट, दिल्ली गेट, रोशन गेट, पैठण गेट, रंगीन दरवाजा, कटकट गेट, जाफर गेट, बारापुला गेट, नौबत गेट, हाथी गेट, नूर गेट इ. आहेत. सध्या काही दरवाजे हे इतिहास जमा झाले आहेत. एकूण ५२ पैकी २१ दरवाजे व १ खिडकी उभी आहेत. औरंगाबादचे विशेष असे की या शहराला ५२ दरवाजे, ५२ खिडक्या आणि ५२ पुरे (बेगमपुरा, उस्मानपुरा इ.) होते.
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छत्रपती संभाजीनगर महानगरपालिका ही छत्रपती संभाजीनगर शहराचा कारभार पाहणारी स्थानिक स्वराज्य संस्था आहे. एकूण आठ झोन मध्ये ११८ वॉर्डात महानगरपालिका क्षेत्राची विभागणी झाली आहे. शहरालगतच्या लष्कराच्या ताब्यातील परिसराचा कारभार पाहण्यासाठी छत्रपती संभाजीनगर छावणी मंडळ (कॅन्टोन्मेंट बोर्ड) ही संस्था अस्तित्वात आहे.
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औरंगाबाद लोकसभा मतदारसंघात संपूर्ण औरंगाबाद शहराचा समावेश होतो. महाराष्ट्राच्या विधानसभेच्या तीन जागा क्षेत्रात प्रामुख्याने आहेत.औरंगाबाद (पूर्व) औरंगाबाद (मध्य) आणि औरंगाबाद (पश्चिम) अशी या तीनही विधानसभा मतदारसंघांची नावे आहेत
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गुजरात आणि सिंधमधील व्यापारी ठाण्यांना दक्षिण भारताच्या व्यापारी केंद्रांशी जोडणारा महत्त्वाचा मार्ग औरंगाबाद जात होता. याच मार्गावरचा महत्त्वाचा थांबा म्हणून औरंगाबाद विकसित झाले असावे असे मानता येते. शहरात गुजराती व्यापारी समाजाचे वास्तव्य ऐतिहासिक काळापासून आहे. कापूस लोकर आणि वनस्पतीजन्य तेलांचा व्यवसाय इथे ऐतिहासिक काळापासून चालतो
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कापूस आणि रेशीम यांच्या एकत्रीकरणातून तयार झालेल्या हिमरू नावाच्या वस्त्रप्रकारासाठी औरंगाबाद ओळखले जाते. पैठणी या नावाने आजही लोकप्रिय असलेल्या रेशमी साड्यांचे उत्पादनही छत्रपती संभाजीनगर परिसरात मोठ्या प्रमाणात होई. पैठण या औरंगाबाद जवळच्या गावाच्या नावावरूनच या प्रकाराचे नाव पडले. हिमरू शाली आणि पैठण्यांच्या व्यवसायाची कालौघात बरीच पडझड झाली असली तर औरंगाबाद सिल्क मिल्स आणि स्टॅंडर्ड सिल्क मिल्स सारख्या उद्योगांमध्ये आजही रेशमी आणि हिमरू वस्त्रांचे उत्पादन चालते. औरंगाबादमध्ये औद्यौगिक वसाहती १९७० च्या दशकात सुरू झाल्या.
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येथील एमआयडीसी (महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेव्हलपमेन्ट काॅर्पोरेशन) बरीच मोठी असून येथे स्वयंचलित वाहने आणि वाहनांचे सुटे भाग, घरातील वापराच्या इलेक्ट्रॉनिक वस्तू, बिअर आणि व्हिस्की, चामडे, औषधनिर्मिती, रबर, बी-बियाणे आणि कीटकनाशके ही औरंगाबादतील प्रमुख उत्पादने होत. निर्लेप, लुपिन लॅबोरेटरी, ग्रीव्ह्ज कॉटन लिमिटेड, गरवारे पॉलिस्टर्स, औरंगाबाद सिल्क मिल्स, केविल सोल्यूशन इंडिया प्रायव्हेट लिमिटेड यांचे प्रकल्प आहेत. शिवाय अनेक भारतीय आणि परदेशी बहुराष्ट्रीय कंपन्या आणि उद्योगसमूहांचे कारखाने औरंगाबादमध्ये आहेत. अनेक नवीन उद्योग उभे राहत आहेत. ही एमआयडीसी पुणे रस्त्यावर आहे.
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प्रोझॉन मॉल येथील मोठा बाजार आहे.
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जेष्ठ साहित्यिक रा.रं.बोराडे, साहित्यिक प्र . ई. सोनकांबळे, कवी वीरा राठोड, कविवर्य प्रा.दासू वैद्य, बालकवी गणेश घुले आदी अनेक नावे उल्लेखनीय आहेत.
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ज्याप्रमाणे छत्रपती संभाजीनगर जिल्ह्यान पर्यटनाच्या दृष्टीतून अनेकांच्या भुवया उंचावल्या त्याच औरंगाबादने कितेक वर्षांपासून नाट्य व सिने क्षेत्रात आपलं वर्चस्व कायम अव्वल स्थानी राखून आहे. सुप्रसिद्ध साहित्यिक अजित दळवी द्वारा लिखित अनेक नाटकांनी महाराष्ट्रातील जनसामान्यांच्या मनावर कोरलीत. अलिकडे त्यांनी "कायद्याचे बोला" या चित्रपटाची पटकथा लिहीली. शिवाय प्रतिक्षा लोणकर, चंद्रकांत कुलकर्णी, मकरंद अनासपुरे, चला हवा फेम योगेश सिरसाठ, बाळू मामांच्या नावाने चांगभल, स्वराज्य रक्षक संभाजी या मालिकेतून प्रेक्षकांच्या मनावर अधिराज्य गाजवणारा रोहित देशमुख, राजा राणीची ग जोडी फेम शैलेश कोरडे, मंजिरी पवार, दिपक अंभुरे, प्रविण डाळिंबीकर, रमाकांत भालेराव, प्राजक्ता सुपेकर, सुनील कांबळे, आदी दिग्गज कलावंतानी आपल्या करीयरची सुरुवात छत्रपती संभाजीनगरपासून केली आणि मग ते मुंबईला चमकले. त्याआधी, कुमार देशमुख, आलोक चौधरी, विजय दिवाण, त्र्यंबक महाजन अशा अनेक नामवंत कलाकारांनी राज्य नाट्य स्पर्धा, कामगार राज्य नाट्य स्पर्धा गाजवलेल्या व अनेकदा जिंकल्यातह��. 'व-हाड निघालंय लंडनला' या विश्वविक्रमी नाटकाचे सर्वेसर्वा लक्ष्मणराव देशपांडे हेही औरंगाबादचे रहिवासी होते.
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नामांकित असे यशराज मुखाटे उत्कृष्ट संगीत करणारे हे देखील संभाजीनगर चे आहेत .
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छत्रपती संभाजीनगर येथील छत्रपती संभाजी महाराज आंतरराष्ट्रीय विमानतळ हे चिकलठाणा येथे स्थित आहे. येथून हैदराबाद, दिल्ली, उदैपूर, मुंबई, जयपूर, पुणे आणि नागपूर साठी विमान सेवा उपलब्ध आहे. २००८ पासून हज्ज यात्रा साठी विमान सेवा उपलब्ध झाली आहे. सद्यस्थितीत विमानतळाच्या इमारतीचे नवीनीकरण करण्यात आले आहे. विमानतळ औरंगाबाद शहराच्या मध्यवर्ती बसस्थानकापासून १० कि.मी. अंतरावर आहे.
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औरंगाबाद (छत्रपती संभाजीनगर) (स्टेशन कोड:AWB) हे दक्षिण-मध्य रेल्वेच्या नांदेड विभागाच्या सिकंदराबाद-मनमाड ब्रॉ़डगेज लोहमार्गावर असलेले एक रेल्वे-स्थानक आहे. छत्रपती संभाजीनगर पासून नांदेड, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, शिर्डी, नागपूर, नाशिक, पुणे, अमृतसर, अंबाला, निझामाबाद, कुर्नुल, रेनिगुंटा, विशाखापट्टनम्, इरोडे, मदुराई, भोपाळ, ग्वालियर, वडोदरा, चेन्नई, तिरुपती, रामेश्वरम , अहमदाबाद आणि राजकोटपर्यंत रेल्वे-सेवा उपलब्ध आहे.
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छत्रपती संभाजीनगर महाराष्ट्र आणि इतर राज्यांत विविध प्रमुख शहरे रस्त्यांनी जोडले आहे.राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक २११ हा शहरातूनच जातो.जालना, पुणे, अहिल्यानगर, नांदेड, नागपूर, बीड आणि मुंबई ही शहरे रस्त्याने जोडलेली आहेत आणि हा मार्ग सध्या राष्ट्रीय महामार्ग मानक चार लेन रोड मध्ये बदलविल्या जात आहे. नवीन नागपूर-छत्रपती संभाजीनगर-मुंबई एक्सप्रेस हायवे देखील विकसित केला जात आहे. छत्रपती संभाजीनगर येथून शिर्डी येथे जाता येते, रस्ताने हे अंतर ८५ कि.मी. एवढे आहे.
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छत्रपती संभाजीनगरमध्ये दोन विद्यापीठे आहेत — डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठ आणि महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधी विद्यापीठ.
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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठ हे विद्यापीठ मराठवाड्यातील छत्रपती संभाजीनगर, जालना, बीड, धाराशिव या जिल्ह्यात असलेल्या शासकीय मान्यताप्राप्त संस्थांचा कारभार पाहाते. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी वेरूळ-अजिंठ्यालगतच छत्रपती संभाजीनगर परिसरात एक मोठे शिक्षण, ज्ञानकेंद्र उभारण्याची योजना आखली होती. प्रामुख्याने आधुनिक शिक्षणापासून वंचित राहिले���्या समाजातील बहुसंख्यकांसाठी हे नियोजन होते. छत्रपती संभाजीनगर शहराजवळच्या भागाचे नागसेनवन असे नामकरण करून तेथे पीपल्स एज्युकेशन सोसायटीच्या मिलिंद महाविद्यालयाची स्थापना त्यांनी केली. याच परिसरात भारताला स्वातंत्र्य मिळाल्यानंतर मराठवाडा विद्यापीठ स्थापन करण्यात आले. पुढे नामांतराच्या लढ्यानंतर शरद पवार मुख्यमंत्री असताना महाराष्ट्र शासनाने "मराठवाडा विद्यापीठ" याचे नाव बदलून "डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठ" असे केले. या विद्यापीठाच्या परिसरामध्ये १६व्या शतकातील पहाडसिंग याने बांधलेला सोनेरी महाल आहे. त्यासोबत फुटा मकबरा व काही जुन्या वस्तू आहेत.
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महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधी विद्यापीठ हे छत्रपती संभाजीनगर एक राज्य विद्यापीठ आहे. महाराष्ट्र राष्ट्रीय कायदा विद्यापीठ अधिनियम, २०१४ च्या माध्यमातून महाराष्ट्र सरकारद्वारे २०१७ मध्ये स्थापण करण्यात आले. हे मुंबई व नागपूर नंतर राज्यातील तिसरे आणि अंतिम राष्ट्रीय विधी विद्यापीठ आहे. हे भारताच्या २१व्या क्रमांकाचे राष्ट्रीय विधी विद्यापीठ आहे.
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बुऱ्हानी नॅशनल हायस्कूल ही महाराष्ट्राच्या औरंगाबाद शहरातील शाळा आहे. ही शाळा १९७६मध्ये सुरू झाली. हिचा परिसर प्रगती कॉलोनी भागात आहे. या शाळेत सुमारे ४५० विद्यार्थी ८वी ते १०वीचे शिक्षण घेतात.
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इथे अंदाजे १५०० सुफी संतांना दफनविण्यात आलेले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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देवगड - दत्ताचे देवस्थान. मुघल शासनकाळात औरंगाबादला ४ मुख्य व ९ इतर दरवाजे होते. यातील पैठण गेट आणि रोशन गेट प्रसिद्ध आहेत
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हॉस्पिटल
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घाटी - मराठवाड्यातील सर्वात मोठे शासकीय रूग्णालय. याठिकाणी विदर्भ, खानदेशातील रूग्णही उपचारासाठी येतात. तसेच अद्यावत सुविधा आणि तंत्रज्ञानाचा वापर करून उपचार पद्धती केली जाते.
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भारतात इतर अनेक मध्ययुगीन शहरांपासून औरंगाबादला उभे राहिलेल्या गोष्टींपैकी 52 गोष्टी "गेट्स" आहेत, त्यापैकी प्रत्येक स्थानिक इतिहासाचा किंवा त्याच्याशी संबंध असलेल्या व्यक्ती होत्या. औरंगाबादला "सिटी ऑफ गेट्स" म्हणून मोठ्या प्रमाणात ओळखले जाते.
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52 पैकी केवळ 4 मुख्य आणि 9 इतर गेट टिकून आहेत, सर्वात प्रसिद्ध, सर्वात जुने आणि सर्वात मोठ्या निजाम पॅलेस (पॅलेस ऑफ निजाम) जवळ भडकल गेट आहे.
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वाडीचा किल्ला.
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सोयगाव शहारा पासून 4 किमी अंतरावर वडीचा किल्ल��� आहे येथील निसर्गरम्य वातावरण प्रेक्षणीय आहे.
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छत्रपूर भारताच्या ओडिशा राज्यातील एक शहर आहे.
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हे शहर गंजम जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे.
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गडपायळी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील कुही तालुक्यातील एक गाव आहे.
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छत्रपूर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील रामटेक तालुक्यातील एक गाव आहे.
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गुणक: 43°54′0″N 125°12′0″E / 43.90000°N 125.20000°E / 43.90000; 125.20000
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छांगछुन (मराठी लेखनभेद: चांगचुन; नवी चिनी चित्रलिपी: 长春 ; फीनयीन: Chángchūn), हे चीनच्या जनता-प्रजासत्ताकातील चीलिन प्रांताचे राजधानीचे शहर आहे. चीलिन प्रांतातील सर्वांत मोठे शहर असणाऱ्या छांगछुनास प्रशासकीय दृष्ट्या उप-प्रांतीय शहराचा दर्जा असून इ.स. २०१० च्या जनगणनेनुसार छांगछुन शहरांतर्गत मोडणाऱ्या सर्व परगण्यांची आणि परगणास्तरीय नगरांची एकूण लोकसंख्या ७६,७७,०८९ एवढी आहे.
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छांगछुनाच्या परिसरात वाहननिर्मिती क्षेत्रातील अनेक उद्योग वसले असल्यामुळे हे शहर चीनचे वाहन-उद्योगाचे शहर म्हणून ओळखले जाते.
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कागदावर शाईने यांत्रिक पद्धतीने छपाई करण्याच्या ठिकाणाला छापखाना म्हणतात.
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चाकाच्या शोधाने मानवी आयुष्याला गती दिली ; तर ' प्रिंटिंग प्रेस 'च्या शोधाने मानवी व्यवहाराला. व्यवसायाने सुवर्णकार असलेल्या आणि जर्मन देशामध्ये राहणाऱ्या जोहान्स गटेनबर्गच्या या शोधामुळे ' वाङ्मया 'ला एकदम ' साहित्या 'चा दर्जा प्राप्त करून दिला. अर्थात कागदाचा शोध अगोदरच लागल्याने ' प्रेस 'च्या कामाला अधिक ' अर्थ ' आला. पण हे फार पूर्वीचे... दरम्यान ' दिसामाजी काहीतरी लिहावे ' वाले लिहीतच होते ; पण ते सर्वदूर पोचत नव्हते. ते पोचले ' प्रिंटिंग प्रेस 'च्या उदयानंतर. या विषयासंबंधात फार मागे जायचे नाही , असे ठरवले आणि गेल्या २५ ते ३० वर्षांचा आढावा घेतला तरी ' प्रिंटिंग प्रेस 'च्या तंत्रात झालेला बदल हा इतर कोणत्याही व्यवसायातील बदलांच्या तुलनेत अधिक आणि जलद आहेत.
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' ट्रेडर ' या वरकरणी स्वयंपाकघरातील ' पोळपाट-लाटणे ' सारख्या दिसणाऱ्या प्रिंटरपासून ते ब्लॉक मेकिंग करावे लागणाऱ्या ' लेटरप्रेस ' आणि त्यानंतर ' प्लेटस ' पासून ते ' सीटीपी ' असा झालेला ' ऑफसेट ' प्रवास अगदी काही वर्षांतील आहे , हे सांगून खरे वाटणार नाही. पूर्वी हाताने खिळे जुळवून ' फॉर्म ' बनविण्यात येत असे. हा फॉर्म पाट्यावर बसवून मग तीवर शाईकाम करून छपाई करण्यात येई. त्या शाईचा एक विशिष्ट वास असे. आणि तो वास ज्याच्या नाकामध्ये बसला आहे , त्याला त्या जागेपासून दूर जाणे सहजपणे जमत नाही , असे गमतीने म्हटले जाई. आणि त्यामध्ये काहीसे तथ्यही होते. छापखान्यात काम करणारा माणूस तिथल्या वातावरणात इतका आणि असा काही रुळायचा की त्याला अन्य ठिकाणच्या नोकरीचे किंवा व्यवसायाचे आकर्षण वाटेनासे व्हायचे. त्यावेळचे छापखानेही वेगळे होते आणि त्यातील वातावरणही जरा हटकेच असायचे. विशेषतः लहान छापखान्यांबाबत तर हे फारच खरे होते. त्यामध्ये एक कौटुंबिक वातावरण असे आणि छपाईचे वेळापत्रक पाळावयाची सततची घाईगर्दीही असे. अर्थात त्याही काळात टंगळमंगळ करणारे आणि आपल्या दिरंगाईला किंवा चुकांना नामी सबब सांगणारेसुद्धा होते. त्यामुळेच ते काहीवेळा विनोदी लेखनाचे विषयही बनले. हे चित्र हळूहळु पालटत गेले. मात्र १९८० च्या दशकात या ' लेटरप्रेस ' वरील शाई उडू लागली आणि ' ऑफसेट ' तंत्रज्ञान ' सेट ' होऊ लागले. एक-एक अक्षर जुळवण्याचा आणि त्यामुळे अपरिहार्यपणे पुढे होणाऱ्या ' प्रिंटिंग ' साठी लागणाऱ्या वेळात कमालीची बचत झाली. पुस्तकासाठी टाइप केलेला ' ब्लॉक ' ( फॉर्म) लेटरप्रेसच्या जमान्यात फारकाळ जपून ठेवता येत नव्हता. त्याचा परिणाम पुस्तकाच्या पुनर्मुद्रणावर होत असे. कारण प्रत्येक वेळी तो फॉर्म सोडवून टेवावा लागत असे. पर्यायाने पुस्तकाच्या प्रत्येक नवीन आवृत्ती वा पुनर्मुद्रणाच्या वेळी तो पुन्हा पहिल्यापासून नव्याने जोडावा लागत असे. हे खूप वेळखाऊ काम होते. मात्र गेल्या २५ वर्षांमध्ये या व्यवसायात कम्प्युटरीकरणामुळे झालेल्या आमूलाग्र बदलांमुळे फॉर्म आता जुळवून आणि जपून ठेवावे लागत नाहीत. पॉझिटिव्ह आणि निगेटिव्हसुद्धा आता इतिहासजमा झाल्या आहेत. आणि आतातर डिजिटल प्रिंटिंगमुळे प्लेटसचे अस्तित्वसुद्धा धोक्यात आले आहे. मधल्या काळात स्क्रिन प्रिंटिंगवर मोठ्या प्रमाणात काम होत होते. स्क्रिन केलेले आर्टवर्क दिसायचेसुद्धा छान. मात्र तेसुद्धा सबुरीचे काम असल्याने आता सगळ्यांचा कल डिजिटल प्रिंटिंगकडे दिसतो.
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लेटरप्रेस आणि त्यासाठी होणारे ब्लॉक मेकिंग हे आज अगदी अभावानेच पाहायला मिळतात. प्रामुख्याने बँकांचे चलन , पीएच.डी.चे प्रबंध आणि नंबरिंग यासाठी ते वापरले जातात. बाकी सर्वत्र ऑफसेटचेच राज्य आहे. ऑफसेटमुळे छपाई जलद , सुबक आणि सुलभ झाली आहे. याचा सर्वाधिक फायदा झाला , तो रंगीत छपाईला.
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प्रिंटिंग आणि डिझाईन क्षेत्रात कार्यरत असणारे काही मुद्रणकार याबद्दल सांगतात , ' दगडावरील छपाई , ग्रॅव्ह्यूअर , लिथो ते आजच्या डिजिटल छपाईपर्यंत झालेले बदल या व्यवसायाने तत्परतेने स्वीकारले. त्यामुळेच व्यवसायाची भरभराट झाली. पूर्वी एखादा रंगीत फोटो छापायचा म्हणजे अगदी जिकिरीचे काम असे. विविध पातळ्यांवर आठ ते १० लोक त्या प्रक्रियेमध्ये गुंतलेले असत. आज अवघ्या काही मिनिटांत रंगीत फोटोची छपाई होते. या व्यवसायात आज दिसणारे प्रिंटर हे प्रामुख्याने दुसऱ्या वा तिसऱ्या पिढीतील आहेत. नवीन पिढी या व्यवसायाकडे वळताना फारशी दिसत नाही. याचे कारण क्षेत्रामध्ये दर काही वर्षांनी होणारे तांत्रिक बदल आणि त्यासाठी लागणारी अत्याधुनिक यंत्रणा बसविण्यासाठी फार मोठा खर्च येतो. तो सगळ्यांनाच झेपतो असे नाही. यावर उपाय म्हणून अनेकदा विदेशात वापरलेली मशीन्स ४० ते ५० टक्के किमतीत विक��� घेतली जातात. अर्थात , याचा ' उत्पादना 'च्या दर्जावर परिणाम होतोच. मात्र काही निवडक अपवाद वगळता बहुतांशी प्रिंटरकडे वापरलेली मशीन्स आहेत , हे सत्य आहे.
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कम्प्युटरीकरणाचा सर्वात जास्त फटका या व्यवसायाला बसला. ' पेपरलेस वर्ल्ड ' या संकल्पनेमुळे शक्य तेवढी कमी छपाई करण्याकडे कल वाढतो आहे. त्यामुळे नवीन मशीन विकत घेणे परवडत नाही. छपाईच्या कागदावरील इंचनइंच लीलया रंगवून देणाऱ्या या व्यावसायिकांच्या चेहऱ्यांवरील रंग मात्र उडाले आहेत. मुंबई-पुण्यातील वडिलोपार्जित प्रेसधारकांनीही मुख्य शहरातील जागा विकून अथवा भाड्याने देऊन शहराबाहेर स्थलांतर केले आहे. काहींनी डीटीपी युनिट , तर काहींनी कमी जागेत जास्त व्यवसाय देणारी डिजिटल प्रिंटिंग यंत्रणा बसवून व्यवसायासोबतची नाळ कायम राखण्याचा प्रयत्न चालवला आहे. तर काहींनी या व्यवसायाला रामराम केला आहे.
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सिनेमॅटोग्राफी ( प्राचीन ग्रीक κίνημα, kìnema "हालचाल" आणि γράφειν, gràphein "लिहिण्यासाठी") ही मोशन पिक्चरची कला आहे (आणि अलीकडे, इलेक्ट्रॉनिक व्हिडिओ कॅमेरा ) छायाचित्रण.
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सिनेमॅटोग्राफर वस्तूंमधून परावर्तित प्रकाश एका वास्तविक प्रतिमेमध्ये केंद्रित करण्यासाठी लेन्स वापरतात जी मूव्ही कॅमेऱ्यातील काही इमेज सेन्सर किंवा प्रकाश-संवेदनशील सामग्रीवर हस्तांतरित केली जाते. [१] हे एक्सपोजर क्रमाक्रमाने तयार केले जातात आणि नंतरच्या प्रक्रियेसाठी आणि मोशन पिक्चर म्हणून पाहण्यासाठी संरक्षित केले जातात. इलेक्ट्रॉनिक इमेज सेन्सरच्या सहाय्याने प्रतिमा कॅप्चर केल्याने प्रतिमेतील प्रत्येक पिक्सेलसाठी विद्युत शुल्क तयार होते, जे इलेक्ट्रॉनिक पद्धतीने प्रक्रिया केली जाते आणि त्यानंतरच्या प्रक्रियेसाठी किंवा प्रदर्शनासाठी व्हिडिओ फाइलमध्ये संग्रहित केली जाते. फोटोग्राफिक इमल्शनसह कॅप्चर केलेल्या प्रतिमांचा परिणाम फिल्म स्टॉकवर अदृश्य अव्यक्त प्रतिमांच्या मालिकेत होतो, ज्या रासायनिकरित्या दृश्यमान प्रतिमेत " विकसित " होतात. चित्रपट स्टॉकवरील प्रतिमा समान मोशन पिक्चर पाहण्यासाठी प्रक्षेपित केल्या जातात.
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सिनेमॅटोग्राफीचा उपयोग विज्ञान आणि व्यवसायाच्या अनेक क्षेत्रात तसेच मनोरंजनाच्या उद्देशाने आणि जनसंवादासाठी होतो .
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छिन राजवंश, अर्थात छिन राजघराणे (देवनागरी लेखनभेद: छिन् राजवंश, च्हिन राजवंश; चिनी: 秦朝 ; फीनयिन: Qín Cháo ; वेड-जाइल्स: Ch'in Ch'ao ; ) हे चीनवर साम्राज्य स्थापणारे पहिले राजघराणे होते. इ.स.पू. २२१ ते इ.स.पू. २०६ या कालखंडात ते अस्तित्वात होते. वर्तमान षा'न्शी प्रांतातील छिन परिसरात उदय पावलेले हे राज्य त्याच परिसराच्या नावाने उल्लेखले जाते.
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ज.द. गोंधळेकर (जन्म : अमरावती, २१ एप्रिल १९०९; - मुंबई, ४ डिसेंबर१९८१) हे मराठी चित्रकार होते. भारताच्या स्वातंत्र्योत्तर काळातील मुंबईच्या जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट या ख्यातनाम कलासंस्थेचे ते पहिले भारतीय डीन होते.
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गोंधळेकरांचा जन्म महाराष्ट्रात अमरावतीला झाला व शालेय शिक्षण पुण्यात नूतन मराठी विद्यालयात झाले. १९२६ साली मॅट्रिकची परीक्षा उत्तीर्ण झाल्यावर चित्रकलेचे पद्धतशीर शिक्षण घेण्यासाठी ते जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट या प्रसिद्ध कला शिक्षणसंस्थेत दाखल झाले. १९३१ साली त्यांनी 'जी.डी. आर्ट' हा पदविका अभ्यासक्रम पुरा केला.
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१९३७ साली गोंधळेकर लंडनच्या 'स्लेड स्कूल ऑफ फाईन आर्ट' या शिक्षणसंस्थेत शिकण्याकरता रवाना झाले. तेथे त्यांनी 'डिप्लोमा इन फाईन आर्ट' हा पदविका अभ्यासक्रम पुरा केला. त्यानंतर त्यांनी पॅरिसच्या ज्युलियन अकादमीमधून शिकून रंगचित्रकलेचे यंत्र आणि कौशल्य आत्मसात केले. पेंटिग्ज आणि अशाच कलात्मक वस्तूंचे जतन कसे करावे हे शिकण्यासाठी गोंधळेकर बेल्जियमच्या Laboratoria Centrale des Musees de Belgique या संस्थेत दाखल झाले. या शिक्षणासाठी इ.स. १९५०मध्ये युनेस्कोने त्यांना शिष्यवृत्ती दिली होती.
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परदेशांमधून शिकून १९३९ साली गोंधळेकर भारतात परतले. भारतात परतल्यानंतर गोंधळेकरांनी चित्रपटांत कलादिग्दर्शनाची कामे केली; तसेच व्यावसायिक चित्रपटनिर्मितीही सुरू केली. मात्र १९५३ साली ज्या 'जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट'मध्ये ते शिकले होते, तिच्याच 'डीन'पदावर नेमणूक होण्याचा मान त्यांना लाभला. विदेशांतील शिक्षणकाळात केलेल्या निरीक्षणांवर विचार करून त्यांनी जे.जे. स्कूल ऑफ आर्टच्या अभ्यासक्रमांत कालसुसंगत सुधारणा घडवून आणल्या. १९५९ साली तुलनेने अल्पशा कारकिर्दीनंतर त्यांनी जे.जे. स्कूल ऑफ आर्टचे डीनपद सोडले.
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ज.द. गोंधळेकर हे टाइम्स ऑफ इंडियाचे कलादिग्दर्शक होते. ते चांगले शिक्षक, संस्थाचालक आणि दूरदृष्टी असलेले कलावंत होते. जर्मनी, बेल्जियम या देशांत आणि लॅटिन अमेरिकेत भरलेल्या अनेक चित्रप्रदर्शनांत गोंधळेकरांची चित्रे झळकली आहेत. गोंधळेकरांची ५०-६० चित्रे जगातील कलादालनांची शोभा वाढवत आहेत.
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निवृत्तीनंतरदेखील गोंधळेकर मराठी विश्वकोश, शासकीय कलाशिक्षण विभाग इत्यादींतून चित्रकलाविषयक कामांत सक्रिय राहिले.
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४ डिसेंबर १९८१ रोजी गोंधळे���रांचे निधन झाले.
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नामशेष
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जंगलातून नामशेष
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अतिशय चिंताजनक
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चिंताजनक
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असुरक्षित
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Threatened
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Conservation Dependent
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Near Threatened
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मुबलक
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वर्ल्ड काँझरवेशन युनियन
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IUCN Red List
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जंगलातून नामशेष प्रजाती म्हणजे अशा प्रजाती ज्या संग्रहालय किंवा मानव-निर्मित वसतीस्थानांमध्येच आढळतात. ह्या प्रजाती त्यांच्या नैसर्गिक वसतीस्थानांतून नष्ट झालेले आहेत.
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जांजगिर-चांपा हा भारताच्या छत्तीसगढ राज्यातील जिल्हा आहे. याचे प्रशासकीय केंद्र जांजगिर येथे आहे.या जिल्ह्याचे हे जुळे नाव असले तरी ही गावे एकमेकांपासून सुमारे ८ ते १० किमी अंतरावर वसलेली आहेत.[१]
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जकाया म्रिषो किक्वेते (इंग्लिश: Jakaya Mrisho Kikwete; ७ ऑक्टोबर, १९५०) हा आफ्रिकेतील टांझानिया देशाचा विद्यमान राष्ट्राध्यक्ष आहे.
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पृथ्वीवरील मानवी वस्ती, त्यांची स्थिती यासाठी जग हा शब्द वापरला जातो. जगात साधारण ६.६ अब्ज लोक राहतात.जगात एकूण सात खंड आहेत .व चार महासागर आहेत.
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पृथ्वीच्या पृष्ठभागापैकी सुमारे २९% भाग हा जमिनीने व्यापलेला आहे.जमिनीच्या विस्तीर्ण सलग भागाला खंड असे म्हणतात. पुढीलप्रमाणे
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सगळ्यात मोठे खंड म्हणजे आशिया या खंडाचा विस्तार चारही गोलार्धांत आहे. या खंडाच्या उत्तरेकडे आक्टिर्टक महासागर ,पूर्वेकडे पॅसिफिक महासागर व दक्षिणेकडे हिंदी महासागर आहेत . आशिया खंड , युरोप व आफ्रिका या दोन खंडांना जोडलेले आहे . युरोप आणि आशिया ही सलग खंडे आहेत.यांच्या दरम्यान कोणताही महासागर नाही. या सलगतेमुळे या दोन खंडांचा उल्लेख युरेशिया असाही केला जातो. आफ्रिका व आशिया खंडे सिनाई द्रवीपकल्प या अरुंद भूभागाने जोडली गेली आहेत.
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आशिया विस्तार व सीमा:
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या खंडाचा अक्षवृत्तीय विस्तर १0 दक्षिण ते ८१उत्तर इतका आहे व रेखावृतीय विस्तार २६ पूर्व ते १७० पश्चिम याच्या दरम्यान आहे.
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जगदंबानगर हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वाशिम जिल्ह्यातील मानोरा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.दिवसा उष्ण आणि रात्री थंड असे वर्षभर तापमान असते. पावसाळ्यात येथे मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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जगद्गुरू रामभद्राचार्य (१९५०–), पूर्वाश्रमीचे नाव गिरिधर मिश्र , चित्रकूट (उत्तर प्रदेश, भारत) येथे राहणारे एक प्रख्यात विद्वान, शिक्षणतज्ज्ञ, बहुभाषाविद्, रचनाकार, प्रवचनकार, तत्त्वज्ञ व हिंदू धर्मगुरू आहेत. ते रामानंद संप्रदायाच्या वर्तमान चार जगद्गुरू रामानंदाचार्यांमधील एक आहेत, व या पदावर इ.स. १९८८ पासून विराजमान आहेत.[१][२][३] ते चित्रकूट येथील संत तुलसीदास यांच्या नावे स्थापन झालेल्या तुलसी पीठ या धार्मिक व सामाजिक सेवा संस्थेचे संस्थापक व अध्यक्ष आहेत.[४] तसेच ते चित्रकूट येथील जगद्गुरू रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालयाचे संस्थापक व आजीवन कुलाधिपती आहेत.[५][६] हे विश्वविद्यालय विकलांग विद्यार्थ्यांना पदवीपर्य़ंतचे व पदव्युत्तर शिक्षण व डिग्री प्रदान करते. जगद्गुरू रामभद्राचार्य वयाने दोन महिन्याचे असतांना दृष्टी गमावून बसले व तेव्हापासूनच ते प्रज्ञाचक्षु आहेत.[१][२][७][८] अध्ययन वा रचना करण्यासाठी त्यांनी कधीही ब्रेल लिपीचा वापर केला नाही. ते बहुभाषाविद् आहेत व २२ भाषा बोलू शकतात.[७][९][१०] ते संस्कृत, हिंदी, अवधी, मैथिली सहित अनेक भाषांमध्य काव्य करणारे शीघ्रकवी व रचनाकार आहेत. त्यांनी ८०हून अधिक पुस्तकांची व ग्रंथांची रचना केली आहे.त्यांत चार महाकाव्ये (दोन संस्कृतमध्ये व दोन हिंदीत), रामचरितमानसवर हिंदीत टीका, अष्टाध्यायीवर काव्यात्मक संस्कृत टीका, व प्रस्थानत्रयीवर (ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता व प्रमुख उपनिषदे) केलेल्या संस्कृत भाष्यांचा समावेश आहे.[११] त्यांना तुलसीदासांवरील भारतातील सर्वश्रेष्ठ तज्ज्ञांपैकी एक मानले जाते,[८][१२] व ते रामचरितमानसच्या एका टीकाग्रंथाचे संपादक आहेत. तुलसी पीठाने या ग्रंथाचे प्रकाशन केले आहे.[१३] स्वामी रामभद्राचार्य रामायण व भागवत यांचे प्रसिद्ध कथाकार आहेत. भारतातील अनेक शहरे तसेच विदेशांतहि नियमितपणे त्यांच्या कथाकथनाचे कार्यक्रम होत असतात व तेसंस्कार टी.व्ही., सनातन टी.व्ही. इत्यादी दूरचित्रवाणी वाहिन्यांवरून प्रसारित होत असतात.[१४][१५][१६][१७][१८][१९]
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त्यांनी कधीही अभ्यासासाठी किंवा रचना करण्यासाठी ब्रेल लिपी वापरली नाही.ते बहुभाषिक आहेत आणि 22 भाषा बोलतात. संस्कृत, हिंदी, अवधी, मैथिली यासह अनेक भाषांमध्ये तो एक छोटा कवी आणि निर्माता आहे. त्यांनी चार म��ाकाव्ये (दोन संस्कृत आणि दोन हिंदीत), रामचरितमानसवर एक हिंदी भाष्य, अष्टाध्यायीवरील काव्यात्मक संस्कृत भाष्य आणि प्रस्थानत्रयी (ब्रह्मसूत्रे, भगवद्गीता आणि) वरील संस्कृत भाष्य यासह 80 हून अधिक पुस्तके आणि ग्रंथांची रचना केली. प्रमुख उपनिषद). ते तुलसीदासांवरील भारतातील सर्वोत्कृष्ट तज्ञांपैकी एक मानले जातात आणि तुलसी पीठाने प्रकाशित केलेल्या रामचरितमानसच्या अस्सल प्रतीचे ते संपादक आहेत. स्वामी रामभद्राचार्य हे रामायण आणि भागवत यांचे प्रसिद्ध कथाकार आहेत – त्यांच्या कथा भारतातील आणि परदेशातील विविध शहरांमध्ये नियमितपणे आयोजित केल्या जातात आणि कथेचे कार्यक्रम संस्कार टीव्ही, सनातन टीव्ही इत्यादी चॅनेलवर प्रसारित केले जातात.
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2015 मध्ये भारत सरकारने त्यांना पद्मविभूषण देऊन सन्मानित केले.
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आई शची देवी आणि वडील पंडित राजदेव मिश्र यांचे पुत्र जगद्गुरू रामभद्राचार्य यांचा जन्म भारतातील उत्तर प्रदेश राज्यातील जौनपूर जिल्ह्यातील संदिखुर्द या गावात वसिष्ठगोत्रिय सरयुपारिन ब्राह्मण कुटुंबात झाला. माघ कृष्ण एकादशी विक्रम संवत 2006 (त्यानुसार 14 जानेवारी 1950) मकर संक्रांतीच्या तारखेला रात्री 10:34 वाजता बाळाची प्रसूती झाली. त्यांचे आजोबा मीराबाईंचे भक्त होते, पंडित सूर्यबली मिश्रा यांची चुलत बहीण आणि मीरा बाई त्यांच्या कवितांमध्ये श्रीकृष्णांना गिरीधर म्हणून संबोधत असत, म्हणून त्यांनी नवजात मुलाचे नाव गिरीधर ठेवले.
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23 ऑगस्ट 1996 रोजी स्वामी रामभद्राचार्य यांनी चित्रकूट येथे अंध विद्यार्थ्यांसाठी तुलसी प्रज्ञाचक्षू विद्यालयाची स्थापना केली. यानंतर त्यांनी केवळ दिव्यांग विद्यार्थ्यांसाठी उच्च शिक्षणासाठी संस्था सुरू करण्याचा निर्णय घेतला. या उद्देशाने त्यांनी 27 सप्टेंबर 2001 रोजी चित्रकूट, उत्तर प्रदेश येथे जगद्गुरू रामभद्राचार्य अपंग विद्यापीठाची स्थापना केली. हे भारतातील आणि जगातील पहिले अपंग विद्यापीठ आहे. विद्यापीठाची स्थापना उत्तर प्रदेश सरकारच्या अध्यादेशाद्वारे करण्यात आली, ज्याचे नंतर उत्तर प्रदेश राज्य कायदा 32 (2001) मध्ये रूपांतर करण्यात आले. या कायद्याने स्वामी रामभद्राचार्य यांची विद्यापीठाचे आजीवन कुलगुरू म्हणून नियुक्ती केली. या विद्यापीठात संस्कृत, हिंदी, इंग्रजी, समाजशास्त्र, मानसशास्त्र, संगीत, ���ित्रकला (स्केचेस आणि कलर्स), ललित कला, विशेष शिक्षण, प्रशिक्षण, इतिहास, संस्कृती, पुरातत्व, संगणक आणि माहिती विज्ञान, व्यावसायिक शिक्षण, न्यायशास्त्र, अर्थशास्त्र, असे अभ्यासक्रम उपलब्ध आहेत. ऑर्गन- अॅप्लिकेशन्स आणि ऑर्गन सपोर्टच्या क्षेत्रात अंडरग्रेजुएट, ग्रॅज्युएट आणि डॉक्टरेट डिग्री ऑफर करते. 2013 पर्यंत विद्यापीठात आयुर्वेद आणि चिकित्साशास्त्र (वैद्यकीय) शिकवण्याचा प्रस्ताव आहे. भारत सरकारच्या अपंगत्व कायदा, 1995 मध्ये परिभाषित केल्याप्रमाणे - दृष्टिहीन, बहिरे आणि मुके, ऑर्थोपेडिकल (अपंग किंवा हात नसलेले) आणि मानसिकदृष्ट्या विकलांग - केवळ चार प्रकारच्या अपंगांना विद्यापीठ प्रवेशाची परवानगी देते. उत्तर प्रदेश सरकारच्या मते, हे विद्यापीठ राज्यातील प्रमुख माहिती तंत्रज्ञान आणि इलेक्ट्रॉनिक्स शैक्षणिक संस्थांपैकी एक आहे. मार्च 2010 मध्ये विद्यापीठाच्या दुसऱ्या दीक्षांत समारंभात एकूण 354 विद्यार्थ्यांना विविध शैक्षणिक पदव्या प्रदान करण्यात आल्या. जानेवारी 2011 मध्ये झालेल्या तिसऱ्या दीक्षांत समारंभात 388 विद्यार्थ्यांना शैक्षणिक पदव्या प्रदान करण्यात आल्या.
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गोस्वामी तुलसीदासांनी 16 व्या शतकात आयुतादिक पदे असलेले रामचरितमानस रचले. त्यांचे कार्य उत्तर भारतात 400 वर्षे खूप लोकप्रिय झाले आणि बहुतेक वेळा पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट त्यांना उत्तर भारताचे बायबल म्हणतात. या काव्याच्या अनेक प्रती छापण्यात आल्या आहेत, ज्यात श्री व्यंकटेश्वर प्रेस (खेमराज श्रीकृष्णदास) आणि रामेश्वर भट्ट इत्यादींच्या जुन्या प्रती आणि गीता प्रेस, मोतीलाल बनारसीदास, कौदीराम, कपूरथला आणि पाटणा येथून छापलेल्या नवीन प्रतींचा समावेश आहे. मानसवर अनेक भाष्ये लिहिली गेली आहेत, ज्यात मानसपियुष, मानसगुद्धार्थचंद्रिका, मनसामानका, विनायकी, विजया, बालबोधिनी इ. अनेक ठिकाणी, या प्रती आणि भाष्य श्लोकांची संख्या, मूळ मजकूर, प्रचलित शब्दलेखन (जसे की अनुनासिक वापर) आणि प्रचलित व्याकरण नियम (जसे की विकृत स्वर) मध्ये भिन्न आहेत. मोतीलाल बनारसीदास आणि श्री वेंकटेश्वर प्रेसच्या प्रतींप्रमाणे काही प्रतींमध्ये आठवा कॅन्टो देखील परिशिष्ट म्हणून आढळतो.
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20 व्या शतकात, वाल्मिकी रामायण आणि महाभारताचे संपादन आणि अस्सल प्रत अनुक्रमे बडोदा येथील महाराजा सयाजीराव विद्याप���ठ आणि पुण्यातील भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इन्स्टिट्यूट यांनी केली होती, स्वामी रामभद्राचार्य यांनी बालपणापासून ते 2006 पर्यंत रामचरितमानसची 4000 पुनरावृत्ती केली होती. 50 प्रतींच्या धड्यांवर आठ वर्षांच्या संशोधनानंतर त्यांनी एक अस्सल प्रत संपादित केली. ही प्रत तुलसीपीठ आवृत्तीच्या नावाने छापण्यात आली. आधुनिक प्रतींच्या तुलनेत तुलसीपीठ प्रतमध्ये अनेक ठिकाणी मूळ मजकुरात तफावत आढळते - स्वामी रामभद्राचार्य यांनी मूळ ग्रंथासाठी जुन्या प्रती अधिक विश्वासार्ह मानल्या आहेत. याशिवाय तुळशीपीठाची प्रत ही आधुनिक प्रतींपेक्षा खालील प्रकारे शुद्धलेखन, व्याकरण आणि यमक या बाबतीत वेगळी आहे.
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जगन्नाथ शंकरशेट मुरकुटे ऊर्फ नाना शंकरशेट (इंग्रजी लेखन-भेद: Jagannath Shankarsheth) (जन्म : मुंबई, १० फेब्रुवारी १८०३, मृत्यू : मुंबई, ३१ जुलै १८६५) हे मराठी शिक्षणतज्ज्ञ, उद्योगपती होते. मुंबई शहराच्या घडणीत त्यांचा मोठा वाटा होता.[ संदर्भ हवा ]
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जगन्नाथ शंकरशेट यांचा जन्म मुंबईत दैवज्ञ ब्राह्मण सोनार व्यापारी व सावकारी कुटूंबात झाला. पूर्वजांप्रमाणे त्यांनी व्यापार केला व अतिशय विश्वासू आणि प्रामाणिक व्यापारी असल्याची ख्याती मिळविली. अनेक अरब, अफगाणी तसेच इतर परदेशी व्यापारी आपली भारतातील मालमत्ता बँकांकडे न देता शंकरशेट यांच्या हवाली करीत. 10 फेब्रुवारी 1803 (????) रोजी नाना शंकर शेठ यांचा जन्म झाला. त्यांच्या वडिलांनी व्यापारामध्ये मोठी संपत्ती मिळवलेले होते. त्यामुळे नानांचा बालपण हे अतिशय संपन्न तीमध्ये गेलं.[ संदर्भ हवा ] एकोणिसाव्या शतकाच्या प्रारंभीच्या काळातील मुंबई इलाख्याच्या सार्वजनिक जीवनात त्यांना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त झाले. या कार्यात त्यांना अनेक सामाजिक शैक्षणिक व सांस्कृतिक संस्थांच्या माध्यमातून सामाजिक कार्यामध्ये महत्त्वपूर्ण योगदान दिले. आपल्या संपत्तीची खरी गरज ही सामान्य माणसाच्या उद्धारासाठी व्हावी या हेतूने त्यांनी लोकसेवेचे व्रत घेऊन सामाजिक सुधारणेच्या पायाभरणीमध्ये महत्त्वपूर्ण योगदान दिलेले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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त्यांनी स्वतः मिळवलेल्या अमाप संपत्तीपैकी मोठा हिस्सा दान केला तसेच सार्वजनिक कामांकरीता खर्च करून टाकला.एक थोर समाजसेवक, शिक्षणप्रेमी व आधुनिक मुंबईच्या शिल्पकारांपैकी एक. त्यांचे पूर्ण नाव जगन्नाथ शंकरशेट मुर्कुटे, तथापि ते नाना शंकरशेट या नावानेच अधिक परिचित आहेत. त्यांचा जन्म एका दैवज्ञ ब्राह्मण व्यापारी कुटुंबात ठाणे जिल्ह्यातील मुरबाड गावी झाला. त्यांचे वडील व्यापारासाठी मुंबईस आले. म्हैसूरच्या १७९९ च्या टिपू-इंग्रज युद्धात वडिलांना अमाप पैसा मिळाला.[ संदर्भ हवा ] आई भवानीबाई नानांच्या लहानपणीच वारली. नानांनी तिच्या स्मरणार्थ पुढे भवानी शंकर मंदिर व एक धर्मशाळा गोवालिया तलावाजवळ बांधली. नानांचे वडील १८२२ मध्ये वारले व तरुणपणीच त्यांच्यावर प्रपंचाची व व्यापाराची सर्व जबाबदारी पडली. नाना शंकरशेट यांनी जवळजवळ अर्धशतकाच्या कालावधीत मुंबईच्या व पर्यायाने महाराष्ट्राच्या सार्वजनिक जीवनाचा, राजकीय चळवळीचा आणि अनेकविध अशा लोककल्याणकारी सुधारणांचा पाया घातला.[ संदर्भ हवा ] त्यांच्यावर सर जमशेटजी जिजीभाईंची छाप पडली होती. हिंदवासियांत शिक्षणाचा प्रसार झाला पाहिजे, यासाठी एल्फिन्स्टनने १८२२ मध्ये हैंदशाळा व शाळापुस्तक मंडळी काढली, त्यांचे आधारस्तंभ नानाच होते. ही पहिली शैक्षणिक संस्था स. का. छत्रे यांच्या साह्याने स्थापिली. पुढे हिचे १८२४ मध्ये बॉंम्बे नेटिव्ह एज्युकेशन सोसायटीत रूपांतर झाले. एल्फिन्स्टननंतर उच्च शिक्षणाच्या सोयीसाठी ४,४३,९०१ रुपयांचा एल्फिन्स्टन फंड जमविण्यात आला. त्याचे नाना हे विश्वस्त राहिले. या संस्थेचे एल्फिन्स्टन कॉलेज झाल्यावर (१८३७) तिला एल्फिन्स्टन इन्स्टिट्यूट म्हणण्यात येऊ लागले. १८५६ मध्ये महाविद्यालय व विद्यालय पृथक झाले.[ संदर्भ हवा ] बोर्ड ऑफ एज्युकेशनची स्थापना १८४१ मध्ये झाली. बोर्डातील तीन एतद्देशीय सभासदांत सतत सोळा वर्षे नाना निवडून आले. स्ट्यूडंट्स लिटररी व सायन्टिफिक सोसायटी (१८४८) आणि जगन्नाथ शंकरशेट मुलींची शाळा (१८४९) या त्यांनी स्वतःच्या वाड्यात चालू केल्या; १८५७मध्ये, द जगन्नाथ शंकरशेट फर्स्ट ग्रेड ॲंग्लो व्हर्नाक्युलर स्कूल सुरू केले. १८५५मध्ये त्यांनी विधी महाविद्यालयाचा पाया घातला. सर ग्रॅंटच्या मृत्यूनंतर ग्रॅंट मेडिकल कॉलेजची १८४५मध्ये स्थापना करून येथे आंग्ल वैद्यक-शिक्षणाची सोय त्यांनी केली व तेही पुढे मराठीतून देण्याची व्यवस्था केली. अॅग्रि-हॉर्टिकल्चरल सोसायटी ऑफ वेस्टर्न इंडिया व जिऑग्रॅफिकल सोसायटी या संस्थांचे प्रमुख व अध्यक्ष नाना शंकरशेट होते.[ संदर्भ हवा ] या शैक्षणिक कामाशिवाय त्यांनी १८५२मध्ये द बॉंबे असोसिएशन स्थापण्यात पुढाकार घेतला. मुंबई कायदे मंडळाच्या आरंभीच्या सभासदांत ते प्रमुख होते.नानांचे सामाजिक कार्यही मोठे आहे. त्यांनी सतीच्या चालीस बंदी घालणाऱ्या कायद्यास पाठिंबा दिला. सर्वांना शिक्षण मिळाले पाहिजे, या तत्त्वावर स्त्रीशिक्षणास प्राधान्य दिले. भारतीयांना कलाशिक्षण मिळावे, म्हणून सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्टच्या स्थापनेत सक्रिय भाग घेतला. याशिवाय ग्रँड ज्यूरीत भारतीयांचा समावेश व्हावा, तसेच जस्टिस ऑफ द पीस अधिकार भारतीयांस मिळावा, यासाठी त्यांनी खटपट केली व काही अ��िकार मिळविले. महानगरपालिकेत आयुक्त असताना त्यांनी आरोग्यव्यवस्था, विहिरी, तलाव वगैरे योजना अंमलात आणल्या. गॅंस कंपनी सुरू केली; धर्मार्थ दवाखाना काढून तसेच पुढे जे.जे. हॉस्पिटलचा पाया घालून त्यांनी रुग्णसेवेस चालना दिली.[ संदर्भ हवा ]
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बॉंबे स्टीम नेव्हिगेशन कंपनीची स्थापना, मुंबई-ठाणे रेल्वेचा प्रारंभ, नाटकांचे प्रेक्षागृह, सोनापूरच्या स्मशानभूमीचे रक्षण याही गोष्टींचे श्रेय नानांनाच द्यावे लागेल.[ संदर्भ हवा ]
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नानांनी अनेक मान्यवर संस्थांना देणग्या दिल्या : रॉयल एशियाटिक सोसायटीच्या मुंबई शाखेला रु. ५,०००; व्हिक्टोरिया ॲन्ड अल्बर्ट वस्तुसंग्रहालयाला रु. ५,०००; जगन्नाथ शंकरशेट स्कूलला रु. ३०,०००; एल्फिन्स्टन शिक्षण निधीस रु. २५,००० आणि जिजामाता (राणीच्या) बागेसाठी रु. २५,०००.[ संदर्भ हवा ]
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देशाच्या सर्वांगीण सुधारणेच्या साऱ्या चळवळींत पुढाकार घेणाऱ्या या थोर पुरुषाचा पुतळा जिजामाता बागेत उभारण्यासाठी लोकांनी स्वेच्छेने २५,००० रु जमविले होते. १८५७ मध्ये आलेले किटाळ पूर्णतः दूर होऊन त्यांचे कार्य अधिकच चमकले. नानांचे वयाच्या बासष्टाव्या वर्षी मुंबईत देहावसान झाले. नानांच्या स्मरणार्थ मॅट्रिकला संस्कृत विषयात पहिला येणाऱ्या विद्यार्थास शंकरशेट शिष्यवृती देण्यात येऊ लागली.[ संदर्भ हवा ]
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'नानांनी दिलेल्या अन्य देणग्या[ संदर्भ हवा ]'
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नाना एक दानशूर व्यक्तिमत्त्व होते. समाजोपयोगी कार्यासाठी त्यांनी कधीच कुणाला रिकाम्या हाताने परत पाठविले नाही. नानांनी आपल्या संपूर्ण कारकिर्दीमध्ये ज्या काही देणग्या दिल्या, दानधर्म केलेत त्याची थोडीशी माहिती :
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१) स्कूल ऑफ इंडस्ट्रीज (बालसुधारगृह)साठी ग्रॅंट रोड वरील पेन्शनर्स हाऊस जवळील आपल्या मालकीची जागा संस्थेला देणगीदाखल दिली.
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२) मुंबई शहराच्या विकासासाठी नानांनी स्वतःच्या जमिनी सरकारला दिल्या.
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३) एल्फिन्स्टन फंड जमविण्यासाठी नानांनी इतरांकडून तीन लक्ष रुपयांचा निधी जमवून दिला यात नानांनी स्वतः २५०००/- रुपयांची भर घातली.
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४) नानांनी मुलींच्या कन्याशाळेसाठी डॉ. विल्सन यांना स्वतःचा वाडा दिला.
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५) स्त्री शिक्षणाला चालना मिळावी यासाठी बक्षीस वितरणाचा कार्यक्रम स्वखर्चाने आपल्या वाड्यात घेतले.
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६) जगन्नाथ शंकरशेठ स्कूल काढली/ तिव्यातील शिक्षकांचा अर्धा पगार नाना दे��� त्याचबरोबर ४० विद्यार्थ्यांच्या शिक्षणाचा त्यांनी उचलला. या शाळेला कायम स्वरूप येण्यासाठी २०,०००/- रुपये देणगीदाखल दिले. पुढे ही शाळा एल्फिन्स्टन मिडल स्कूलमध्ये समाविष्ट करण्यात आली.
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८) जे.जे. स्कूल ऑफ आर्टसाठी एक लाख रुपयांची देणगी दिली.
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९) मुंबई विद्यापीठात संस्कृत विषयासाठी जगन्नाथ शंकरशेट शिष्यवृत्ती आजही चालू आहे.
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१०) मुंबई विद्यापीठात शिक्षण घेण्यासाठी बाहेरगावाहून येणाऱ्या विद्यार्थ्यांसाठी नानांनी खास शिष्यवृत्त्या दिल्या.
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११) ग्रॅंट मेडिकल कॉलेज स्थापनेसाठी १०००/- रुपये देणगी दिली.
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१२) मराठी भाषेतून शिक्षणाचा फायदा विद्यार्थ्यांनी घ्यावा म्हणून नानांनी प्रत्येकी दरमहा दहा रुपयांच्या शिष्यवृत्त्या चालू केल्या. तसेच त्या शिष्यवृत्त्या कायम चालू राहाव्यात यासाठी ५०००/- रुपये संस्थेकडे देऊन ठेवले.
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१३) ग्रंथसंग्रहालये वाढवीत अशी त्यांची इच्छा असे म्हणून त्यांनी ग्रंथ घेण्यासाठी नॅचरल हिस्टरी सोसायटीला ५०००/- रुपये देणगीदाखल दिले.
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१४) पुणे येथील संस्कृत ग्रंथालयासाठी ५०००/- रुपये देणगी दिले.
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१५) त्याचबरोबर नेटिव्ह लायब्ररी रिडींग रूम साठी १०००/- देणगीदाखल दिले.
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१६) बॉंबे बेनिव्हेलन्ट ॲन्ड रीडिंग रूमसाठी स्वतःची जागा दिली आणि ग्रंथसंपदा वाढविण्यासाठी वेळोवेळी मदत केली.
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१७) व्हिक्टोरिया वस्तुसंग्रहालयासाठी व उद्यानासाठी ५०००/- रुपये देणगी दिली.
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१८) बोटीच्या दळणवळणासाठी स्थापन झालेल्या संस्थेस १०००/- देणगी दिली.
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१९) ताडदेवमध्ये आपल्या वडिलांच्या नावे धर्मार्थ दवाखाना सुरू केला. त्याचा सर्व खर्च नाना करीत. हा धर्मार्थ दवाखाना कायम चालू राहावा यासाठी त्यांनी २४०००/- रुपये सरकार जमा केले. कालांतराने यामध्ये अजून ६०००/- रुपयांची भर घालण्यात आली. कालांतराने ही रक्कम ट्र्स्ट डीड द्वारे नायर हॉस्पिटलला देऊन तेथे एक कायमची खाट ठेवण्यात आली.
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नाना जगन्नाथ शंकरशेठ यांची पदे[ संदर्भ हवा ]
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नाना जगन्नाथ शंकरशेठ यांचे मुंबई आणि प्रांताच्या विकासासाठी खूप मोलाचे योगदान आहे. त्यांनी भूषविलेल्या काही महत्त्वाच्या पदांची माहिती खालीलप्रमाणे देता येईल.
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१) संस्थापक अध्यक्ष - बॉंम्बे असोसिएशन २) सभासद - बोर्ड ऑफ कॉन्झरवंसी ३) उपाध्यक्ष -स्कुल ऑफ इंडस्ट्रीज ४) अध्यक्ष - डेव्हिड ससून रिफॉर्मेटरी इन्स्टिटयूट ५) सद���्य - सिलेक्ट समिती (म्युनसिपल कायदा व बिल) ६) सदस्य - बोर्ड ऑफ एज्युकेशन ७) सदस्य- नेटिव्ह स्कुल बुक सोसायटी ८) विश्वस्त - एल्फिन्स्टन फंड. ९) अध्यक्ष - पोटसमिती (शिक्षण प्रसार समिती ) १०) संस्थापक - जगन्नाथ शंकरशेठ स्कुल ११) संस्थापक सभासद - जे. जे. आर्टस् कॉलेज १२) सदस्य - मुंबई विद्यापीठ व्यवस्थापक मंडळ १३) फेलो -मुंबई विद्यापीठ १४) अध्यक्ष - हॉर्टिकल्चर सोसायटी १५) अध्यक्ष - जिओग्राफिकल सोसायटी १६) डायरेक्टर - बॉंम्बे स्टीम नेव्हिगेशन कंपनी १७) ट्रस्टी - बॉंम्बे स्टीम नेव्हिगेशन कंपनी १८) सदस्य - द इनलॅंड रेल्वे असोसिएशन १९) संचालक /सदस्य - ग्रेट ईस्टर्न रेल्वे २०) आद्य संचालक - रेल्वे (मुंबई ते ठाणे पहिला रेल्वे प्रवास गोल्डन पासने) २१) संचालक - बँक ऑफ वेस्टर्न इंडिया २२) संचालक - कमर्शिअयल बँक ऑफ इंडिया २३) संस्थापक - द मर्कंटाईल बँक ऑफ इंडिया २ ४) संचालक/अध्यक्ष - बॉम्बे नेटिव्ह डिस्पेन्सरी (पहिला धर्मार्थ दवाखाना ) २५) अध्यक्ष - बादशाही नाट्यगृह ६) पहिले देशी मॅजिस्ट्रेट १ "जस्टिस ऑफ द पीस", "मुंबईचा अनभिषिक्त सम्राट", "मुंबईचे शिल्पकार" म्हणतात.
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ब्रिटिश राजवटीतील वर्णभेद नाहीस झाला पाहिजे असे ते म्हणत.
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इवलेसे| नाना शंकरशेठ यांच्यावरील पोस्टाचे तिकीट
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फार मोठे योगदान आहे.
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तत्कालीन राजकीय परिस्थिती आणि त्याचे परीणाम याविषयी त्यांनी जनजागरण केले.मुंबईतील सत्यशोधक परिषदेत त्यांचा उत्स्फूर्त सहभाग होता.
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आणि वीर नरीमन यांना अटक झाल्याची बातमी सोलापुरात थडकली. यातूनच हिंसाचार झाला.त्यावेळी युवक संघाने मिरवणूक काढली.त्यामध्ये जगन्नाथ शिंदे सहभागी
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झाले होते.जमावातील काही लोक रूपाभवानी मंदिर परिसरात शिंदीची झाडे तोडण्यासाठी गेले.त्यावेळी हिंसाचार,गोळीबार झाला.यात जगन्नाथ शिंदे यांचा सहभाग नव्हता
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तरी ब्रिटिश सरकारच्या रोषाला ते बळी पडले.
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जगन्नाथ शिंदे यांना सरकारने अटक केली आणि त्यांच्यासह चार हुतत्म्यांवर खटला चालवून पुणे येथील येरवडा कारागृहात दिनांक १२ जानेवारी १९३१ रोजी जगन्नाथ शिंदे,मल्लाप्पा धनशेट्टी,किसन सारडा आणि कुर्बान हुसेन या चार हुतात्म्यांना फाशी देण्यात आली.
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साचा:वर्गःसोलापूर शहर
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जगन्नाथराव हेगडे हे मुंबईचे माजी नगरपाल आहेत.
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मजकुर वगळणे किंवा त्याचे विकिकरण करणे प्रस्तावित आहे. हा साचा एखाद्या लेखात आढळल्यास, लवकरात लवकर सदरहू जाहिरात काढून टाकावी अथवा मजकुरात सुधारणा करावी आणि नंतर {{जाहिरात}} हा साचा लेखातून काढून टाकावा.
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हा प्रतिबंधन संकेत केवळ हितसंबधा बद्दल आहे;एखाद्या लेख विषयाबद्दल व्यक्तिगत आत्मियता सहानुभूतीपूर्ण दृष्टीकोण (पूर्वग्रहीत नव्हे) असलेल्या विषयांवर तटस्थ लेखन करण्याच्या आड येत नाही.
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तसेच आपल्या लेखनाचे संदर्भ विकिपीडियात इतरांना सहज घेण्याजोगे करण्या करिता आपण स्वतःचे काही लेखन/छायाचित्रे प्रताधिकार मुक्त करू इच्छित असल्यास आपण तसे आपल्या संकेतस्थळावर उद्घोषित करून विकिपीडिया:कायदा आणि प्रताधिकारमुक्ती प्रकल्प येथे तशी नोंद करून ठेवण्याचे स्वागत आहे.
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सर्वप्रथम, मराठी विकिपीडियावरील तुमच्या अलीकडील योगदानाबद्दल धन्यवाद. मराठी विकिपीडियावर सर्व विषयांतील तज्ज्ञ आणि जाणकारांच्या संपादनांचे स्वागतच आहे.
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वर नमुद केल्या प्रमाणे मराठी विकिपीडिया एक विश्वकोश आहे, त्यातील माहिती निष्पक्षता विश्वासार्हता आणि दर्जा जपण्याच्या दृष्टीने, जाहिरातसदृष्य मजकुर असणे,विशीष्ट वस्तुंच्या किमती नमूद करणे, कोणत्याही अव्यावसायिक किंवा व्यावसायिक, व्यक्तिगत किंवा संस्थात्मक प्रचाराचे, प्रबोधनाचे, वकिलीचे, जाहिरातीचे किंवा फायद्याच्या दृष्टीने प्रत्यक्ष किंवा अप्रत्यक्ष माहिती देण्याचे प्रयत्न करणे हे विकिपीडियाच्या उद्देश व आधारस्तंभ यांस सुसंगत ठरत नाही. अर्थात संबधित ज्ञानकोशीय उल्लेखनीयता असलेल्या माहितीची संदर्भासहीत तर्कसुसंगत योग्य नोंद घेण्याच्या आड हे धोरण नाही.
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मराठी विकिपीडिया हा एक विश्वकोश आहे. जाहिरातसदृष्य अथवा प्रचाराचे, प्रबोधनपर, वकिली (भलावण या अर्थाने), जाहिरात किंवा फायद्याच्या दृष्टीने (प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्ष दोन्हीही) सहभाग टाळावा असा विकिपीडिया लेखन संकेत आहे. जाहीरात, प्रचार,प्रबोधन, भलावण करण्यासाठी लेखात/हे पानात किंवा विभागात, सपांदने केल्यास अथवा जाणीवपूर्वक करवून घेतल्यास औचित्यभंग होऊन मराठी विकिपीडिया विश्वकोशिय विश्वासार्हतेस तडा जाण्याची शक्यता असते. असा औचित्यभंग झालेला आढळल्यास प्रचारकाचे प्रसिद्धी मिळण्याचे ध्येय बाजूस राहून विकिपीडियाच�� गैर उपयोग केल्याचा ठपका येऊन पत ढासळू शकते हेही लक्षात घ्यावे.
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निनावी अथवा वेगवेगळ्या नावांनी केलेला औचित्यभंग लक्षात येतो का ? जाणीवपुर्वक झालेले प्रचार-औचित्यभंग सरावलेलेल्या ज्ञानकोशीय संपादकांना बऱ्याच अंशी लक्षात येतात. शिवाय लेखन विषयक औचित्य पाळले न गेलेले लेखन वारंवार झाल्यास त्यास उत्पात (spam) समजून असे लेखन/लेख इतर विकिपीडिया संपादकांकडून वगळले जाण्याची शक्यता असते.
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विकिपीडियाचा परीघ, आवाका आणि मर्यादांशी अद्याप आपण परिचित नसल्यास त्याबद्दल येथे माहिती घ्या. नवीन सदस्यांकडून होणार्या सर्वसाधारण संपादन चुकांवर एकदा नजर घाला.
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आपल्या सहकार्या बद्दल धन्यवाद !
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कृपया या संबंधीची चर्चा, या लेखाचे चर्चापानावर पहावी.
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जगशांती प्रकाशन सांगली
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प्रकाशक - तानाजीराव ज. जाधव
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फोर्ब्स या व्यवसाय मासिकाने २००९ आणि २०१८ दरम्यान (२०१७ वगळता) जगातील सर्वात शक्तिशाली लोकांची वार्षिक यादी तयार केली होती. या यादीमध्ये प्रत्येक १०० दशलक्ष लोकांमागे एक स्लॉट होता, म्हणजे २००९ मध्ये यादीत ६७ लोक होते आणि २०१७ पर्यंत, ७५ लोक होते. त्यांनी किती मानवी आणि आर्थिक संसाधनांवर प्रभुत्व मिळवले होते तसेच जागतिक घटनांवर त्यांचा प्रभावानुसार स्लॉटचे वाटप करण्यात आले होते.[१][२][३]
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जनता दल (संयुक्त) हा एक भारतातील एक राजकीय पक्ष आहे. सध्या हा पक्ष प्रामुख्याने बिहार व झारखंड ह्या राज्यांमध्ये कार्यरत असून नितीश कुमार हे विद्यमान पक्षाध्यक्ष आहेत. बिहार राज्यामध्ये जनता दलाचे नितीश कुमार हे मुख्यमंत्री आहेत तर १५व्या लोकसभेमध्ये जनता दलाचे २० खासदार आहेत.
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२००३ साली जनता दल ह्या पक्षाच्या अनेक गटांनी एकत्रित येऊन संयुक्त जनता दलाची स्थापना केली. स्थापनेपासून भारतीय जनता पक्षाच्या राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीमधील घटक पक्ष असलेल्या जे.डी.यू.ने २०१३ साली एन.डी.ए.मधून बाहेर पडण्याचा निर्णय घेतला. २०१४ सालातील आगामी लोकसभा निवडणुकांमध्ये पंतप्रधानपदासाठी नरेंद्र मोदी ह्यांचे नाव पुढे आणण्याची भाजपची घोषणा हे ह्यामागील प्रमुख कारण होते.
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आता २०१७ मद्ये पुन्हा भाजपा बरोबर युती केली आहे. आणि बिहार मद्ये सत्तेत आहे
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जनता विद्यालय ही महाराष्ट्राच्या बुलढाणा जिल्ह्यातील पिंपळगाव सराई गावातील शाळा आहे. सैलानी परिसरातील या विद्यालयाची स्थापना शिक्षण प्रसारक मंडळ, चिखली यांच्या पुढाकाराने १९६८ मध्ये झाली.
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तमाशामध्ये पहिले गाणे सादर केले जाते त्याला 'गण' असे म्हणतात. गण व मुजरा झाल्यावर 'गौळण' सादर केली जाते.
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तत्त्ववेत्त्यांच्या ब्रह्मरूपापासून लोककथांमधील गौरीनंदनापर्यंत लोकाभिमुख झालेले गणपतीचे स्वरूप लोककलेच्या प्रत्येक आविष्कारात गणाच्या रूपात उभे राहते. लोककलाकार रंगमंचावर प्रवेश करतो आणि नम्रपणे गणेशाला वंदन करतो. तो असतो गण.
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गणाचे स्वरूप तात्त्विक आहे. गणातून शाहिराच्या प्रज्ञेचे आणि प्रतिभेचे खरे दर्शन घडते. गणातील प्रत्येक शब्द हा लोकवाणीतून अध्यात्मवाणीकडे सहजपणे जातो आणि याच शब्ददर्शनातून पुढे तत्त्वदर्शन उभे राहते.
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१९८० च्या राज्यस्तरीय स्पर्धेत प्रथम क्रमांकाचे पारितोषिक मिळालेला, लोकशाहीर बशीर मोमीन (कवठेकर) लिखित एक गण येथे उदाहरण म्हणुन उदहृत केला आहे. [१]
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हे गणराया l तव गुण गाया SS
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धावुनी ये मज l यश दयाया llध्रुll
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रसिकांच्या पुढे मी एक पामर l
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कवण अर्पितो तव चरणावर l
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स्मरण सरुदे l गित स्फुरुदे l भक्तिचे हे गणराया ll१ll
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अजाण बालक बोल बोबडे l
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मान्य करावे ते वाकुडे ll
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तु सुखकर्ता l तु दुःखहर्ता ll वेडा मी दर्शन घ्याया ll२ll
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विद्येचा रे तुची विधाता l
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वंदन करीतो जाता - जाता l
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मस्तकी आमुच्या l हाथ असुदे l पैलतीरावरती जाया ll ३ll
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गवळण हा तमाशातील एक भाग आहे. पारंपरिक तमाशा सादरीकरणामध्ये गणानंतर गवळण सादर करण्याची प्रथा आहे.
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गौळणीत कृष्णभक्तीची गाणी व त्यावरील नृत्ये असतात. गवळणीमध्ये निमित्त हे मथुरेच्या बाजारला निघालेल्या गवळणी असतात. त्यांची चेष्टा करून रस्ता कृष्ण आणि त्याचे मित्र रस्ता अडवतात. हा रस्ता सोडण्यासाठी विनवणीयुक्त गाणी व नृत्य म्हणजे गवळण.
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यातील विनोदाचा आणि मार्मिकतेचा भाग मावशी हे पात्र करते. मावशी म्हणजे एक पुरुष कलाकारच असावा लागतो. हा कलाकार सोंगाड्या असतो. यात या भागात कृष्णाची खूप चेष्टा केलेली असते. त्या निमित्ताने आध्यात्मिक चर्चादेखील घडवून आणली जाते. गौळणीतील मावशी आणि पेंद्या, मावशी आणि कृष्ण, मावशी आणि इतर गौळणी यांच्यातील संवाद अतिशय चटकदार आणि द्व्यअर्थी असतात. हे पूर्णपणे करमणूकप्रधान संवाद असतात. सर्व गौळणी, मावशी कृष्णाची विनवणी करतात. शेवटी कृष्ण आपले अस्सल दान म्हणजेच तमाशातील 'गौळण' मिळाल्यानंतर सर्व गौळणींना जाण्याची अनुज्ञा देतो आणि गौळण संपते. गवळण ही पारंपरिक पद्धतीने, राधाकृष्णाच्या शृंगारलीला नृत्य, नाट्य, संगीत या घटकांनी सादर केली जाते. गवळण सादरीकरणामागे निखळ मनोरंजन आणि समाजातील अनिष्ट प्रथांवर टीका असे स्वरूप असल्याचे दिसते. नाट्य व काव्याच्या सुरेख संगमातून गवळण लौकिक शृंगाराचा आविष्कारही करते. गण-गवळण हे देवाचे जागरण किंवा गोंधळ या प्रकारातही दिसून येते.
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महाराष्ट्र सरकारने २०१८ सालच्या, तमाशा सम्राज्ञी 'विठाबाई नारायणगांवकर ' जीवनगौरव पुरस्काराने सन्मानित केलेले, जेष्ठ साहित्यिक कवी बशीर मोमीन (कवठेकर) यांनी आपल्या लेखणीतून विविध प्रकारचे गण, गवळण व पोवाडे निर्माण केलेले आहेत.[२]१९७० ते २०२० या सर्वसाधारण पन्नास वर्षांच्या कालखंडात, विविध तमाशा फड मालक आणि सादरकर्ते यांनी, श्री मोमीन कवठेकर यांच्याकडून नावीन्यपूर्ण गण- गवळण लिहून नेल्या व आपल्या संचा द्वारे संपूर्ण महाराष्ट्रभर सादर केल्या आहेत[३]. अशाप्रकारे,तमाशा ग्रामीण जनतेच्या मनोरंजन सोबतच ही लोककला जिवंत ठेवण्यासाठी अमूल्य योगदान देत आले आहे.
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निवडणूक आयोगाने जनमत चाचण्या आणि मतदानोत्तर चाचण्यांवर बंदीचा निर्णय जाहीर केल्यानंतर त्यासंदर्भात काही नवे निकष जारी केले आहेत. त्यानुसार प्रत्यक्ष मतदानापूर्वी 48 तास कोणत्याही प्रकारच्या जनमत अथवा मतदानोत्तर चाचण्यांचे निष्कर्ष प्रसारित करता येणार नाहीत.[१]
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ज्या वेळी मतदान एकापेक्षा जास्त टप्प्यात होतं, तेव्हा सर्व टप्पे होईपर्यंत म्हणजेच शेवटच्या टप्प्यानंतर जनमत चाचण्यांचे निष्कर्ष प्रसारित करता येतील.
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प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक्स किंवा अन्य माध्यमांनी जनमत चाचण्या केल्या असतील तर त्यांना त्याचे निष्कर्ष प्रसारित करताना आयोगाची मार्गदर्शक तत्त्वे पाळावीच लागतील. त्यानुसार मतदानाला सुरुवात होण्यापूर्वी 48 तास आधी या जनमत चाचण्याचं प्रसारण पूर्ण करावं लागेल. तसंच एग्झिट पोलच्या बाबतीत मतदानाचे सर्व टप्पे पार पडल्यानंतरच जनमत चाचण्यांचे निष्कर्ष प्रसारित करता येतील.
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निवडणूक आयोगाने या सूचना जानेवारी 1998 मध्येच जारी केल्या होत्या, मात्र त्यावेळी त्याला सर्वोच्च न्यायालयात आव्हान देण्यात आलं होतं.
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जनमत चाचण्यांसंदर्भातला निर्णय निवडणूक आयोगानेच घ्यावा, असे निर्देश दिल्यानंतर आयोगाने या सूचना पुन्हा जारी केल्या आहेत.
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जनरल हे पायदळ सैन्यातील सर्वोच्च पद आहे. मराठीत जनरलला सरसेनापती म्हणतात.
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अमेरिकन वायुसेनेचे एक एफ-१६ सी विमान २००८ साली इराकवरून उडताना
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एफ-१६सी/डी: $१.८८ कोटी (१९९८)[२]
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एफ-१६ फायटिंग फॉल्कन हे अमेरिकन बहुउद्देशीय लढाऊ विमान आहे. अमेरिकेच्या जनरल डायनामिक्स या कंपनीने अमेरिकेच्या वायुसेनेसाठी बनवले होते. सुरुवातीला दिवसा लढण्यासाठी प्रमुख लढाऊ विमान म्हणून याला बनवले गेले होते. पण सततच्या सुधारणा आणि तांत्रिक विकासामुळे हे विमान सर्व प्रकारच्या वातावरणात लढण्यासाठी सक्षम आणि यशस्वी बहूद्देशीय लढाऊ विमान बनले. १९७६ पासून आजपर्यंत ४,५०० पेक्षा जास्त एफ-१६ विमाने वेगवेगळ्या देशांसाठी बनवण्यात आली आणि त्यातली बरीचशी अजुनही सेवेत कार्यरत आहेत. अमेरिकन वायुसेना आता ही विमाने खरेदी करत नाही आणि त्यांच्या ताफ्यातील जुन्या एफ-१६ विमानांना इतर विमानांनी बदलण्याची प्रक्रिया सुरू आहे. पण विदेशी वायुसेनांना या विमानाच्या सुधारीत आवृत्त्या अजूनही विकल्या जातात.
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भारतीय वायुसेनेसाठीच्या मध्यम बहुउद्देशीय लढाऊ विमानांच्या स्पर्धेमध्ये (एम.एम.आर.सी.ए.) लॉकहीड मार्टिनने एफ-१६आयएन सुपर व्हायपर देऊ केले होते.[३] ती स्पर्धा फ्रान्सच्या रफल विमानाने जिंकली.
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मिराज · एच.ए.एल. तेजस · हॉक मार्क १३२ · युरोफायटर टायफून · कॅनबेरा (विमान) · जॅग्वार · रफल · मिग-२१ · मिग-२३ · मिग-२७ · मिग-२९ के · मिग-३५ · सुखोई सु - ३० · ग्रिपेन · एफ-१६ · एफ-१८ · एफ-२२ रॅप्टर · एफ-३५ लाईटनिंग २ · छंतू थंडर ·
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जनाराववाडी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सांगली जिल्ह्यातील मिरज तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे आहे. येथे नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी मध्य हा हिवाळा हंगाम असतो. हिवाळ्यात दिवसा तापमान २९ सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान १७ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते. जून मध्य ते ऑक्टोबर हा पावसाळा हंगाम असतो. पावसाळ्यात दिवसा तापमान २८ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २२ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते. पावसाळ्यात मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो. वार्षिक पर्जन्यमान ७०० मिमी पर्यंत असते. फेब्रुवारी मध्य ते जून हा उन्हाळा मोसम असतो. उन्हाळ्यात दिवसा तापमान ३८ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २३ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते.
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७ सप्टेंबर, १९७९ (वय ७६)
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५ जुलै, इ.स. २०१२
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दुवा: [१] (इंग्लिश मजकूर)
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जनार्दन ग्यानोबा नवले (डिसेंबर ७, इ.स. १९०२; फुलगाव, मुंबई प्रांत, ब्रिटिश भारत – सप्टेंबर ७, इ.स. १९७९, पुणे, महाराष्ट्र, भारत) पहिल्या भारतीय क्रिकेट संघाचा कसोटी क्रिकेट खेळाडू होता.
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इ.स. १९३२ इंग्लड दौऱ्यात भारतीय संघाच्या एतिहासिक पहिल्या कसोटी सामन्यात नवेलंनी पहिला चेंडू खेळला. .[१] त्यांनी लॉर्ड्स वरिल सामन्यात, दोन्ही डावांमध्ये फलंदाजी ओपन केली. अनेक वर्षांसाठी त्यांनी हिंदू संघासाठी यष्टीरक्षण केले. त्यांनी हिंदू संघासाठी पदार्पण १६ व्या वर्षी केले.
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आयुष्याच्या सरत्या काळात त्यांनी साखर कारखान्यात चौकीदाराची नौकरी केली.
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डॉ. जनार्दन माधवराव वाघमारे, एम.ए. पीएच.डी. ( कौठा, तालुका-औसा, ११ नोव्हेंबर १९३४) हे स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाडा विद्यापीठ, नांदेडचे पहिले कुलगुरू होत.
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वाघमारे हे इंग्रजी साहित्याचे प्राध्यापक, निग्रो साहित्याचे भाष्यकार, दलित पुरोगामी साहित्य चळवळीचे अभ्यासक आणि शिक्षणतज्ज्ञ आहेत. त्यांचे शिक्षण कौठा, लातूर, हैद्राबाद, औरंगाबाद येथे झाले. ‘The Problem of Identity in the Postwar American Negro Novel’ हा त्यांच्या प्रबंधाचा विषय होता. डॉ. यांनी खासदार, कुलगुरू, प्राचार्य, प्राध्यापक अशा अनेक पदांवर काम केले.
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डॉ. जनार्दन माधवराव वाघमारे यांनी मराठी आणि इंग्लिश अशा दोन्ही भाषेत लेखन केले आहे.
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जपानमधील सौर ऊर्जेचा १९९० च्या दशकाच्या उत्तरार्धात विस्तार होताना दिसला. हा देश फोटोव्होल्टिक (पीव्ही) आणि घरात बसवता येण्याजोगी पीव्ही प्रणालीसाठीचा एक प्रमुख उत्पादक आणि निर्यातदार आहे. घरातील पीव्ही प्रणाली बहुतेकदा ग्रिडला जोडलेली असते.[१]
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देशाच्या धोरणात बदल झाल्यापासून सौर ऊर्जा ही एक महत्त्वाची राष्ट्रीय प्राथमिकता बनली आहे. स.न. २०११ मध्ये घडलेल्या फुकुशिमा दाइची अणु आपत्तीनंतर नपानेने नवीकरणीय (अपारंपरिक) ऊर्जेवर अधिक लक्ष केंद्रित केले.[२][३] २०१३ आणि २०१४ मध्ये सौर ऊर्जेच्या वाढीसाठी जपान जगातील दुसरा सर्वात मोठा बाजार बनला होता. ज्यामध्ये अनुक्रमे ६.९७ गिगावॅट आणि ९.७४ गिगावॅट क्षमता जोडली गेली. स.न. २०१७ च्या अखेरीस, एकूण क्षमता ५० गिगावॅटपर्यंत पोहोचली. ही चीननंतर जगातील दुसरी सर्वात मोठी सौर पीव्ही स्थापित क्षमता होती.[४][५] २०१६ मध्ये एकूण स्थापित क्षमता देशाच्या वार्षिक वीज मागणीच्या जवळजवळ ५% पुरवठा करण्यासाठी पुरेशी असल्याचे अंदाज लावण्यात आला होता.[४]
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जपानमधील फोटोव्होल्टिक उत्पादक आणि निर्यातदारांमध्ये क्योसेरा, मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक, मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज, सान्यो, शार्प सोलार, सोलार फ्रंटियर आणि तोशिबा यांचा समावेश होतो.
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जपान सरकार अनुदान देऊन सौर उर्जेचा विस्तार करण्याचा प्रयत्न करीत आहे. यासाठे ते फीड-इन दर (फिट) पद्धतीचाही वापर करीत आहेत. डिसेंबर २००८ मध्ये, अर्थ, व्यापार आणि उद्योग मंत्रालयाने ७०% नवीन घरांमध्ये सौर उर्जा स्थापित करण्याचे लक्ष्य ठेवले होते. २००९ च्या पहिल्या तिमाहीत घरगुती सौर उर्जेला प्रोत्साहन देण्यासाठी १४५ दशलक्ष डॉलर्स खर्च करण्याची घोषणा केली होती.[६] नोव्हेंबर २००९ मध्ये सरकारने एक फीड-इन टॅरिफ लागू केला ज्यामध्ये युटिलिटीजना घरे आणि व्यवसायांद्वारे ग्रिडमध्ये पाठविलेल्या अतिरिक्त सौर उर्जेची खरेदी करणे आणि त्या उर्जेसाठी मानक वीज दरापेक्षा दुप्पट पैसे देणे आवश्यक झाले होते.[७]
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१८ जून २०१२ रोजी ४२ येन/किलोवॅट तासाच्या नवीन फीड-इन टॅरिफला मान्यता देण्यात आली. या दरात १० किलोवॅट पेक्षा कमी प्रणालींसाठी पहिल्या दहा वर्षांच्या अतिरिक्त उत्पादनाचा समावेश आहे. , १० किलोवॅट पेक्षा अधिक प्रणालींसाठी पहिल्या वीस वर्षांच्या अतिरिक्त उत्पादनाचा समावेश आहे. १ जुलै २०१२ रोजी ते लागू झाले.[८] एप्रिल २०१३ मध्ये, एफआयटी ३७.८ येन/किलोवॅट प्रति तास पर्यंत कमी करण्यात आला.[९] एप्रिल २०१४ मध्ये एफआयटी ३२ येन/किलोवॅट प्रति तास पर्यंत कमी करण्यात आला.[१०]
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मार्च २०१६ मध्ये, फोटोव्होल्टिक उर्जेद्वारे तयार केलेल्या विजेसाठी नवीन फीड-इन दर मंजूर करण्यात आला. खरेदी किंमत गणना समितीने आर्थिक वर्ष २०१६ च्या खरेदी किंमती आणि त्या लागू होण्याच्या कालावधीबाबत शिफारसी तयार केल्या आणि प्रसिद्ध केल्या. या शिफारसींचा आदर करत एमईटीआयने या शिफारसींना खालीलप्रमाणे अंतिम स्वरूप दिले आहे:
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१० किलोवॅट पेक्षा कमी प्रणालींसाठी निवासी पीव्ही फीड-इन दर परिस्थितीनुसार २०१७ मध्ये केडब्ल्यूला २४ येन/किलोवॅट ते २८ येन/किलोवॅट दरम्यानच्या मूल्य निर्धारीत झाले. २०१९ पर्यंत हेच दर ठेवण्यात आले.[१२]
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सर्वात अलीकडील एफआयटी केवळ निवासी नसलेल्या सौर उर्जा प्रकल्पांशी संबंधित आहे. नवीन नॉन-रेसिडेन्शियल एफआयटी २०१७ मध्ये २१ येन/किलोवॅट वरून १८ येन/किलोवॅट पर्यंत तर एप्रिल २०१८ मध्ये आणि नंतर प्रमाणित सुविधांसाठी कमी करण्यात येणार होती.[१२]
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जपानचे शाही आरमार (क्युजिताई: 大日本帝國海軍, शिंजिताई: 大日本帝国海軍; दै निप्पॉन तैकोकु कैगुन, जपानी: 日本海軍; निप्पॉन कैगुन) किंवा बृहद् जपानचे शाही आरमार हे इ.स. १८६९ ते इ.स. १९४७ पर्यंत जपानचे नौसैन्य होते. जपानच्या नवीन संविधानानुसार याचे विघटन केले गेले. जपानच्या समुद्री स्वसंरक्षण दलाने आता याची जागा घेतली आहे.[१]
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जपानचे शाही सैन्
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जपानी साम्राज्य (जपानी: 大日本帝國) हे इ.स. १८६८ ते इ.स. १९४७ या कालखंडात अस्तित्वात असलेले, वर्तमान जपान देशाचे पूर्ववर्ती साम्राज्य होते. ३ जानेवारी, इ.स. १८६८ रोजी मेइजी पुनर्स्थापनेनंतर हे साम्राज्य उदय पावले व दुसऱ्या महायुद्धात पराभव झाल्यानंतर ३ मे, इ.स. १९४७ रोजी या साम्राज्याचा अस्त झाला.
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जपानी साम्राज्याने "फुकोकु क्योहेई" (जपानी: 富国強兵 ; अर्थ: देश श्रीमंत करा! सैन्याची ताकद वाढवा!) या प्रकल्पांतर्गत देशाचे सैनिकीकरण व उद्योगीकरण आरंभले. यामुळे जपानी साम्राज्य जागतिक शक्ती बनले.
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जपानी साम्राज्यकाळादरम्यान ह्या देशाने झपाट्याने प्रगती केली व तो जगातील एक प्रगत देश बनला. साम्राज्यवाढीने झपाटलेल्या जपानी राज्यकर्त्यांनी दुसऱ्या महायुद्धात अक्ष राष्ट्रांसोबत हातमिळवणी केली व पूर्व आशियामधील अनेक देशांवर लष्करी चढाया केल्या. हिरोशिमा व नागासाकीवरील अणुबॉम्ब हल्ल्यांनंतर जपानी साम्राज्याने २ सप्टेंबर १९४५ रोजी दोस्त राष्ट्रांसमोर शरणागती पत्कारली. त्यानंतर अमेरिकेच्या मदतीने जपान देशाचे संविधान पुन्हा लिहिले गेले व ३ मे, इ.स. १९४७ रोजी जपान ह्याच नावाने हा देश ओळखला जाऊ लागला.
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गणपत कृष्णाजी हे मराठी भाषेतील पहिल्या छापील पंचांगाचे निर्माते आहेत. हे मुंबईतील पहिले छाप कारखानदार म्हणून ओळखले जातात.
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१६ मार्च १८४१ च्या दिवशी गणपत कृष्णाजी यांनी शिळाप्रेसवर पहिले पंचांग छापले.[१] त्यापूर्वी त्यांनी ते हाताने लिहून काढले. प्रचलित पंचांग वापरणाऱ्या तत्कालीन व्यक्तींनी या पंचांगाला विरोध केला. पण काळाच्या ओघात हा विरोध मावळला आणि या पंचांगाचा स्वीकार केला गेला.
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हिंदू धर्म आणि संस्कृती यांच्या अभ्यासात आणि भारतीय जीवन पद्धतीत पंचांग महत्त्वाचे मानले जाते. फलज्योतिष आणि खगोलशास्त्र या विषयाच्या अभ्यासक व्यक्ती तसेच पौरोहित्य करणारे लोक यांना पंचांगाचा वापर करावा लागतो. गुढीपाडवा सणाच्या दिवशी नव्या वर्षाचे फल वाचण्यासाठी पंचांग वापरतात आणि त्याची पूजा करतात.[२] हे पंचांग पूर्वी हाताने लिहिले जात असे. १८३९ मध्ये ख्रिस्ती धर्मोपदेशक लोकांनी शिळाप्रेसवर पुस्तके छापण्यास सुरुवात केली. ते पाहून गणपत कृष्णाजी यांनी या पद्धतीने पंचांग छापले.[१]
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रखमाजी देवजी मुळे यांनी महाराष्ट्र राज्यात प्रथमच तिथी, वार, नक्षत्र यांच्या आधारे कालनिर्णय करणारे पंचांग रूढ केले आणि गणपत कृष्णाजी यांनी त्याची सजावट करून त्याला प्रकाशित केले.[३] शके १७५३ चे खर या नावाच्या संवत्सराचे हे पंचांग आहे.[३]
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पंचांग
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गुणक: 23°09′38″N 79°56′19″E / 23.16056°N 79.93861°E / 23.16056; 79.93861
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जबलपूर हे भारताच्या मध्यप्रदेश राज्यातील एक शहर आहे. हे शहर जबलपूर जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे. या शहरास संस्कारधानी असेही म्हणतात. याचे जुने नाव जाबालीपुरम असे होते. हे महर्षि जाबालीच्या नावावरून पडले होते. जबलपूर जवळच भेडाघाट हे प्रेक्षणीय स्थान आहे. तसेच नजीक मदन-महालचा किल्ला व चोसष्ठ योगिनी मंदिरही आहे. विंध्य पर्वतरांगेत असलेले जबलपूर हे नर्मदा नदीच्या काठावर वसले आहे.
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पुराण आणि पौराणिक कथेनुसार या शहराचे नाव पूर्वी जबालीपुरम होते, कारण ते महर्षि जबालीशी संबंधित आहे. त्यांचे येथे वास्तव्य होते असे म्हणतात. १७८१ नंतरच जेव्हा मराठ्यांचे मुख्यालय म्हणून निवडले गेले, तेव्हा या शहराची ख्याती वाढली, नंतर ते सागर आणि नर्मदा प्रांताच्या ब्रिटिश कमिशनचे मुख्यालय बनले. येथे १८६४ साली नगरपालिका स्थापन झाली. एका टेकडीवर मदन महलचा किल्ला आहे. राजा गोविंद किल्लेदार राजा मदनसिंग यांनी सुमारे ११०० इ. स. मध्ये रणनीतिक उद्देशाने बांधलेला हा किल्ला आहे. त्यात राहण्याची व्यवस्था नव्हती. याच्या पश्चिमेस हा किल्ला आहे, जे चौदाव्या शतकातील चार स्वतंत्र गोंड राज्यांचे प्रमुख शहर होते. भेडाघाट, ग्वारीघाट आणि जबलपूर येथून मिळालेल्या जीवाश्मांवरून असे दिसून येते की तो प्रागैतिहासिक काळातील पुरापाषाणीक माणसाचा वास होता. मदन महल, शहरातील अनेक तळे आणि गोंड राजांनी बांधलेली अनेक मंदिरे या ठिकाणच्या प्राचीन वैभवाची साक्ष आहेत. या प्रदेशात बौद्ध, हिंदू आणि जैन यांचेही अवशेष आहेत. असे म्हटले जाते की जबलपूरमध्ये असलेल्या ५२ पुरातन तलावांनी त्यांची ओळख वाढविली आहे, त्यापैकी केवळ काही तलाव बाकी आहेत परंतु त्या प्राचीन ताल-तलावांची नावे अजूनही प्रचलित आहेत. त्यापैकी काही आहेत; आधारताल, रनिताल, चेरीताल, हनुमानताल, फुटाताल, माथाताल, हथिताल, सुपुटाला, देवताल, कोतालल, बघताल, ठाकुरताला, गुलाआऊ ता, माधोटल, माथाताल, सुताल, खंबाताल, गोकलपूर तलाव, शहातीलब, महानदाडा तलाव, उखारीया तैलैया, टिळक भूमि तैलैया, बैनसिंह तलैया, तीर्थलैया, लोको तलैया, काकरैय तलैय्या, जुडितालैया, गंगासागर, संग्रामसागर. जबलपूर भेडाघाट मार्गावरील त्रिपुरा सुंदरी मंदिर हथियागार संस्कृत कवी राजशेखर यांच्याशी संबंधित आहे.
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विं��्या पर्वत रांगेत हे शहर पवित्र नर्मदा नदीच्या काठी वसलेले आहे. जबलपूर हे शहर दिल्ली हैदराबाद अहमदाबाद पुणे कोलकाता आणि मुंबईशी हवाई मार्गाने जोडले गेले आहे.
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त्याच्या आसपासच्या भागात अत्यंत सुपीक, नर्मदा नदीच्या खोऱ्याच्या पश्चिमेला गव्हाच्या लागवडीचा क्षेत्र आहे. भात, ज्वारी हरभरा आणि तेलबिया ही आसपासच्या भागातील इतर महत्त्वाची पिके आहेत. लोह धातू, चुनखडी बॉक्साइट, चिकणमाती, अग्निस चिकणमाती, शेल, फेलस्पर, मॅंगनीज आणि जेर येथे मोठ्या प्रमाणात खाणकाम केले जाते.
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राणी दुर्गावतीचा मदन महल - मदन महलचा किल्ला राजा मदन शाह यांनी १११६ मध्ये बांधला होता. आचार्य विनोबा भावे यांनी जबलपूरचे नाव 'संस्कारधानी' ठेवले.
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भेडाघाट - भारतीय पुरातत्त्व विभागाने संरक्षित चौसठ योगिनी मंदिर जवळच आहे - धुवाधार धबधबा, भेडाघाट हे एक आकर्षक पर्यटन स्थळ आहे.
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जमखंडी विधानसभा मतदारसंघ कर्नाटक विधानसभेचा मतदारसंघ आहे. हा मतदारसंघ बागलकोट लोकसभा मतदारसंघात असून बागलकोट जिल्ह्यात मोडतो.
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जामताडा तथा जमतारा हे भारताच्या झारखंड राज्यातील जामतारा जिल्ह्यातील एक शहर आणि जिल्ह्याचे प्रशासकीय केन्द्र आहे.
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जामताडाला भारताची फिशिंग राजधानी असेही टोपणनाव आहे. येथून जगभरातील लोकांची फसवणूक करण्यासाठी असंख्य फोन केले गेले. [१] एप्रिल २०१५ ते मार्च २०१७ या दोन वर्षांच्या कालावधीत, १२ भारतीय राज्यांतील पोलिसांनी सायबर गुन्ह्यांची चौकशी करण्यासाठी जामताडा येथे २३ वेळा छापे घातले. [२] फसवणूक करणाऱ्यांनी अमाप पैसा मिळवला व त्यातून आलिशान मोटरगाड्या घेतल्या आणि भव्य बंगले बनवले होते.
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जामताडाची समुद्रसपाटीपासून सरासरी उंची १५५ मी (५०८ फूट) आहे व येथील गुण 23°57′N 86°48′E / 23.95°N 86.8°E / 23.95; 86.8 [३] येथे आहे.
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जामताडा रांचीपासून २५० किमी तर धनबादपासून ५४ किमी अंतरावर आहे.
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जमशेदजी नसरवानजी टाटा (३ मार्च, इ.स. १८३९ - १९ मे, इ.स. १९०४) पारशी, भारतीय उद्योजक होते. टाटा उद्योगसमूह या भारतातल्या आघाडीच्या उद्योगसमूहाचे ते संस्थापक होते.
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त्यांचा जन्म गुजरातमध्ये नवसारी येथे झाला. त्यांना दोराबजी आणि रतनजी अशी दोन अपत्ये होती. जमशेदपूर येथील पोलाद कारखाना, मुंबईचे ताजमहाल हॉटेल, बंगळुरातील इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स अशा अनेक संस्थांची स्थापना ही त्यांची महत्त्वाची कार्ये होत. त्यांनी नंतर टाटा समूह उद्योगाची स्थापना केली. टाटांना "भारतीय उद्योगाचे जनक" म्हणून ओळखले जाते. आज त्यांच्या योगदानामुळे भारतीय उद्योगास विदेशांत ओळख मिळाली. ज्यावेळी भारत आर्थिक संकटांशी झगडत होता त्या वेळी त्यांनी चपळतेने टाटा ग्रुप आणि कंपनीची मुहूर्तमेढ रोवली. त्यांचे असे मत होते की आम्ही सरळ कोणतेच मोठे काम करू शकत नाही, कोणतेही मोठे काम करण्यासाठी आधी छोटी-छोटी कामे करण्याची आवश्यकता असते. उद्योगजगतात त्यांचा इतका प्रभाव होता की जवाहरलाल नेहरूंनी टाटा यांना वन-मॅन प्लॅनिंग कमिशन म्हणून संबोधले.
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"जेव्हा तुम्हाला कृतीत, कल्पनांमध्ये आघाडी द्यायची असते - अशी आघाडी जी मताच्या वातावरणाशी जुळत नाही - ते खरे धैर्य, शारीरिक किंवा मानसिक किंवा आध्यात्मिक, तुम्हाला जे आवडते ते म्हणा आणि हा प्रकार जमशेदजी टाटा यांनी दाखवलेले धैर्य आणि दूरदृष्टी आहे. आपण त्यांच्या स्मृतीचा सन्मान केला पाहिजे आणि आधुनिक भारताचे एक मोठे संस्थापक म्हणून त्यांचे स्मरण केले पाहिजे हे योग्य आहे." - जवाहरलाल नेहरूजमशेदजी नसरवानजी टाटा यांचा जन्म ३ मार्च १८३९ रोजी दक्षिण गुजरातमधील नवसारी शहरात झाला. त्यांचे वडील नसरवानजी व आई जीवनबाई टाटा हे त्यांच्या पारशी कुटुंबातील पहिले व्यापारी होते. कुटुंबाची परंपरा तोडून त्यांनी मुंबईत निर्यात व्यापार संस्था सुरू केली.
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जमशेदजी टाटा १४ व्या वर्षी मुंबईत आपल्या वडिलांकडे आले. आणि त्यांनी एलफिन्स्टन महाविद्यालयातून आपले ग्रॅज्युएशन पूर्ण केले. तेथे ते कॉलेजातील एक हुशार विद्यार्थी म्हणून ओळखले जात होते. त्यांची बुद्धिमत्ता पाहून काॅलेजच्या प्रिन्सिपाॅलांनी त्यांची डिग्री समाप्त होईपर्यंतची पूर्ण फी परत केली. जमशेदजीनी १६ वर्षाचे असताना १० वर्षाच्या हीराबाई दबू हिच्याशी विवाह केल��.
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१८५८ मध्ये जमशेदजींनी महाविद्यालयातून पदवी प्राप्त केली आणि आपल्या वडिलांच्या व्यवसायामध्ये प्रवेश घेतला. १८५७ सालचे भारतीय बंड ब्रिटिश शासनाने दडपून काढले होते. ब्रिटिश सरकारच्या विरुद्धचा विद्रोह त्यावेळी नवीनच होता. मात्र टाटांनी अशा परिस्थितीतही आपल्या व्यापारास शिखरावर घेऊन जाण्याचा निश्चय केला. आपल्या वडिलांच्या व्यवसायाच्या शाखा स्थापन करण्यासाठी टाटा यांनी इंग्लंड, अमेरिका, युरोप, चीन आणि जपान सारख्या परदेशांत अनेकदा प्रवास केला.
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१८६८ पर्यंत टाटा आपल्या वडिलांच्या कंपनीत काम करत होते. त्यावर्षी त्यांनी एका स्वतंत्र कंपनीची स्थापना केली. १८९६ मध्ये चिंचपोकळी येथील एक दिवाळखोर तेल गिरणी विकत घेतली आणि तिची एका कापडाच्या गिरणीत रूपांतर केले. या गिरणीचे नाव त्यांनी अलेक्झांड्रा मिल असे ठेवले. पुढे दोन वर्षांनंतर नफा मिळवण्यासाठी ती मिल टाटांनी विकली आणि १८७४ मध्ये नागपूरला एका स्पिनिंग मिलची स्थापना केली, १ जानेवारी १८७७ रोजी त्यांनी एम्प्रेस मिलची स्थापना केली.
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त्यांच्या जीवनात चार ध्येये होती. एक पोलाद कंपनी, एक जागतिक दर्जाची शिक्षण संस्था, एक अद्वितीय हॉटेल आणि एक हायड्रो-इलेक्ट्रिक वीजनिर्मिती कंपनी. ३ डिसेंबर १९०३ रोजी मुंबईतील कुलाबा वॉटरफ्रंट येथील ताजमहल हॉटेलचेया उद्घाटन झाले. त्यावेळी भारतात स्वतःची वीज असणारे ते एकमेव हॉटेल होते.
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टाटा स्टील (पूर्वी टिस्को - टाटा आयर्न आणि स्टील कंपनी लिमिटेड) ही आशियातील पहिली आणि भारतातील सर्वात मोठी स्टील कंपनी आहे. तिच्या कोरस ग्रुपने दरवर्षी २.८ कोटी टन स्टीलचे उत्पादन केल्यानंतर ती जगातील पाचव्या क्रमांकाची स्टील कंपनी ठरली.
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टाटांनी हिराबाई दाबू यांच्याशी विवाह केला. त्यांची मुले दोराबजी टाटा आणि रतन टाटा यांना सुद्धा टाटा ग्रुपचे अध्यक्ष म्हणून यश मिळाले. टाटाची बहीण जेरबाईने मुंबईतील एका व्यापाऱ्याशी लग्न केले. त्यांचा मुलगा त्यांना शापुरजी सकलातवाला हे बिहार आणि ओरिसामध्ये टाटा ग्रुपचे कोळशाचा व लोखंडाचा व्यापार सांभाळत होते. नंतर ते टाटांचे मॅन्चेस्टर कार्यालय सांभाळण्यासाठी इंग्लंडला निघून गेले आणि नंतर ब्रिटिश संसदेचे सदस्य झाले.
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१९०० साली व्यवसायानिमित्त जर्मनीला गेले असताना ते खूप आजारी पडले. १९ मे १९०४ रोजी बॅड नौहैम य�� ठिकाणी त्यांचा मृत्यू झाला. त्यांच्यावर इंग्लंडमधील पारशी समाजाच्या ब्रूकवूड दफन भूमीमध्ये अंत्यसंस्कार करण्यात आले.
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झारखंडमधील साचि गावात टाटांचा लोखंड व पोलाद प्रकल्प उभारला गेला. येथील रेल्वे स्टेशनचे नाव टाटानगर असे ठेवले गेले. आता झारखंडमधील जमशेदपूर या नावाने ओळखले जाणारे हे एक मोठे शहर आहे.
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प्रकाशन-राजहंस प्रकाशन.
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"स्वातंत्र्याचे समर्थन करण्याची ताकद नसणे आणि आवश्यक असल्यास त्याचे रक्षण करणे, हा एक क्रूर भ्रम असेल आणि स्वातंत्र्याचे रक्षण करण्याची ताकद केवळ व्यापक औद्योगिकीकरण आणि देशाच्या आर्थिक जीवनात आधुनिक विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाच्या ओतणेतूनच येऊ शकते."
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"मुक्त उपक्रमात, समुदाय हा केवळ व्यवसायातील दुसरा भागधारक नसून, खरे तर त्याच्या अस्तित्वाचा उद्देश आहे."
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"आमच्यात एक प्रकारचा दानधर्म पुरेसा आहे... तो म्हणजे गोधडी परोपकार जी चिंध्या झालेल्यांना कपडे घालते, गरिबांना खायला घालते आणि आजारी लोकांना बरे करते. मी गरीब किंवा दुःखी माणसाला मदत करू पाहणाऱ्या उदात्त भावनेचा निषेध करण्यापासून दूर आहे. असणं... एखाद्या राष्ट्राची किंवा समाजाची प्रगती ही त्याच्या सर्वात कमकुवत आणि असहाय्य सदस्यांना मदत करण्याइतकी नाही तर सर्वोत्तम आणि सर्वात प्रतिभावान व्यक्तींना उंचावणे, जेणेकरून त्यांना देशाची सर्वात मोठी सेवा करता येईल. ."
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"झटपट वाढणारी विविध प्रकारची सावली असलेली झाडे लावलेले रुंद रस्ते निश्चित करा. लॉन आणि बागांसाठी भरपूर जागा आहे याची खात्री करा. फुटबॉल, हॉकी आणि उद्यानांसाठी मोठी जागा राखून ठेवा. हिंदू मंदिरांसाठी जागा निश्चित करा, मोहम्मद मशिदी आणि ख्रिश्चन चर्च." -टाटा यांनी मुलगा दोराबला लिहिलेल्या पत्रात त्यांच्या टाउनशिपबद्दलच्या त्यांच्या दृष्टीबद्दल सांगितले जे कालांतराने जमशेदपूर होईल.
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"तो लोकांच्या नजरेत डोकावणारा माणूस नव्हता. त्याला सार्वजनिक मेळावे आवडत नव्हते, भाषणे करायची त्याची पर्वा नव्हती, त्याच्या चारित्र्याच्या बळकटपणाने कोणत्याही माणसावर कितीही मोठेपणा येण्यापासून रोखले, कारण तो स्वतः महान होता. स्वतःच्या मार्गाने, बहुतेक लोकांपेक्षा मोठे. त्याने सन्मान मागितला नाही आणि त्याने कोणत्याही विशेषाधिकाराचा दावा केला नाही, परंतु भारताची आणि तिच्या असंख्य लोकांची प्रगती ही त्याच्याबरोबर कायमची उत्कट इच्छा होती." टाटा यांच्या निधनाबद्दल टाइम्स ऑफ इंडिया
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"जरी इतर अनेकांनी गुलामगिरीच्या साखळ्या सोडवण्यावर आणि स्वातंत्र्याच्या पहाटेच्या दिशेने वाटचाल झपाट्याने करण्याचे काम केले, तर टाटांनी स्वप्न पाहिले आणि ते मुक्तीनंतर जसे घडले पाहिजे तसे जीवनासाठी काम केले. इतर बहुतेकांनी गुलामगिरीच्या वाईट जीवनातून मुक्तीसाठी काम केले. टाटांनी आर्थिक स्वातंत्र्याचे चांगले जीवन जगण्यासाठी स्वातंत्र्यासाठी काम केले." -डॉ झाकीर हुसेन, भारताचे माजी राष्ट्रपती
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"तो नशिबाचा माणूस होता हे स्पष्ट आहे. खरंच, जणू काही त्याच्या जन्माची वेळ, त्याचे जीवन, त्याची प्रतिभा, त्याची कृती, त्याने ज्या घटना घडवल्या किंवा प्रभावित केल्या त्या घटनांची साखळी आणि त्याने केलेल्या सेवा. आपल्या देशाला आणि त्याच्या लोकांसाठी प्रदान केलेले, हे सर्व भारताच्या महान नशिबाचा भाग म्हणून पूर्व-नियत होते." - जे. आर. डी. टाटा
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"आजच्या पिढीतील कोणत्याही भारतीयाने भारताच्या वाणिज्य आणि उद्योगासाठी यापेक्षा जास्त काम केले नव्हते." —लॉर्ड कर्झन, टाटा यांच्या निधनानंतर भारताचे व्हाईसरॉय
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जमशेदजी नसरवानजी टाटा (३ मार्च, इ.स. १८३९ - १९ मे, इ.स. १९०४) पारशी, भारतीय उद्योजक होते. टाटा उद्योगसमूह या भारतातल्या आघाडीच्या उद्योगसमूहाचे ते संस्थापक होते.
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त्यांचा जन्म गुजरातमध्ये नवसारी येथे झाला. त्यांना दोराबजी आणि रतनजी अशी दोन अपत्ये होती. जमशेदपूर येथील पोलाद कारखाना, मुंबईचे ताजमहाल हॉटेल, बंगळुरातील इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स अशा अनेक संस्थांची स्थापना ही त्यांची महत्त्वाची कार्ये होत. त्यांनी नंतर टाटा समूह उद्योगाची स्थापना केली. टाटांना "भारतीय उद्योगाचे जनक" म्हणून ओळखले जाते. आज त्यांच्या योगदानामुळे भारतीय उद्योगास विदेशांत ओळख मिळाली. ज्यावेळी भारत आर्थिक संकटांशी झगडत होता त्या वेळी त्यांनी चपळतेने टाटा ग्रुप आणि कंपनीची मुहूर्तमेढ रोवली. त्यांचे असे मत होते की आम्ही सरळ कोणतेच मोठे काम करू शकत नाही, कोणतेही मोठे काम करण्यासाठी आधी छोटी-छोटी कामे करण्याची आवश्यकता असते. उद्योगजगतात त्यांचा इतका प्रभाव होता की जवाहरलाल नेहरूंनी टाटा यांना वन-मॅन प्लॅनिंग कमिशन म्हणून संबोधले.
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"जेव्हा तुम्हाला कृतीत, कल्पनांमध्ये आघाडी द्यायची असते - अशी आघाडी जी मताच्या वातावरणाशी जुळत नाही - ते खरे धैर्य, शारीरिक किंवा मानसिक किंवा आध्यात्मिक, तुम्हाला जे आवडते ते म्हणा आणि हा प्रकार जमशेदजी टाटा यांनी दाखवलेले धैर्य आणि दूरदृष्टी आहे. आपण त्यांच्या स्मृतीचा सन्मान केला पाहिजे आणि आधुनिक भारताचे एक मोठे संस्थापक म्हणून त्यांचे स्मरण केले पाहिजे हे योग्य आहे." - जवाहरलाल नेहरूजमशेदजी नसरवानजी टाटा यांचा जन्म ३ मार्च १८३९ रोजी दक्षिण गुजरातमधील नवसारी शहरात झाला. त्यांचे वडील नसरवानजी व आई जीवनबाई टाटा हे त्यांच्या पारशी कुटुंबातील पहिले व्यापारी होते. कुटुंबाची परंपरा तोडून त्यांनी मुंबईत निर्यात व्यापार संस्था सुरू केली.
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जमशेदजी टाटा १४ व्या वर्षी मुंबईत आपल्या वडिलांकडे आले. आणि त्यांनी एलफिन्स्टन महाविद्यालयातून आपले ग्रॅज्युएशन पूर्ण केले. तेथे ते कॉलेजातील एक हुशार विद्यार्थी म्हणून ओळखले जात होते. त्यांची बुद्धिमत्ता पाहून काॅलेजच्या प्रिन्सिपाॅलांनी त्यांची डिग्री समाप्त होईपर्यंतची पूर्ण फी परत केली. जमशेदजीनी १६ वर्षाचे असताना १० वर्षाच्या हीराबाई दबू हिच्याशी विवाह केल��.
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१८५८ मध्ये जमशेदजींनी महाविद्यालयातून पदवी प्राप्त केली आणि आपल्या वडिलांच्या व्यवसायामध्ये प्रवेश घेतला. १८५७ सालचे भारतीय बंड ब्रिटिश शासनाने दडपून काढले होते. ब्रिटिश सरकारच्या विरुद्धचा विद्रोह त्यावेळी नवीनच होता. मात्र टाटांनी अशा परिस्थितीतही आपल्या व्यापारास शिखरावर घेऊन जाण्याचा निश्चय केला. आपल्या वडिलांच्या व्यवसायाच्या शाखा स्थापन करण्यासाठी टाटा यांनी इंग्लंड, अमेरिका, युरोप, चीन आणि जपान सारख्या परदेशांत अनेकदा प्रवास केला.
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१८६८ पर्यंत टाटा आपल्या वडिलांच्या कंपनीत काम करत होते. त्यावर्षी त्यांनी एका स्वतंत्र कंपनीची स्थापना केली. १८९६ मध्ये चिंचपोकळी येथील एक दिवाळखोर तेल गिरणी विकत घेतली आणि तिची एका कापडाच्या गिरणीत रूपांतर केले. या गिरणीचे नाव त्यांनी अलेक्झांड्रा मिल असे ठेवले. पुढे दोन वर्षांनंतर नफा मिळवण्यासाठी ती मिल टाटांनी विकली आणि १८७४ मध्ये नागपूरला एका स्पिनिंग मिलची स्थापना केली, १ जानेवारी १८७७ रोजी त्यांनी एम्प्रेस मिलची स्थापना केली.
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त्यांच्या जीवनात चार ध्येये होती. एक पोलाद कंपनी, एक जागतिक दर्जाची शिक्षण संस्था, एक अद्वितीय हॉटेल आणि एक हायड्रो-इलेक्ट्रिक वीजनिर्मिती कंपनी. ३ डिसेंबर १९०३ रोजी मुंबईतील कुलाबा वॉटरफ्रंट येथील ताजमहल हॉटेलचेया उद्घाटन झाले. त्यावेळी भारतात स्वतःची वीज असणारे ते एकमेव हॉटेल होते.
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टाटा स्टील (पूर्वी टिस्को - टाटा आयर्न आणि स्टील कंपनी लिमिटेड) ही आशियातील पहिली आणि भारतातील सर्वात मोठी स्टील कंपनी आहे. तिच्या कोरस ग्रुपने दरवर्षी २.८ कोटी टन स्टीलचे उत्पादन केल्यानंतर ती जगातील पाचव्या क्रमांकाची स्टील कंपनी ठरली.
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टाटांनी हिराबाई दाबू यांच्याशी विवाह केला. त्यांची मुले दोराबजी टाटा आणि रतन टाटा यांना सुद्धा टाटा ग्रुपचे अध्यक्ष म्हणून यश मिळाले. टाटाची बहीण जेरबाईने मुंबईतील एका व्यापाऱ्याशी लग्न केले. त्यांचा मुलगा त्यांना शापुरजी सकलातवाला हे बिहार आणि ओरिसामध्ये टाटा ग्रुपचे कोळशाचा व लोखंडाचा व्यापार सांभाळत होते. नंतर ते टाटांचे मॅन्चेस्टर कार्यालय सांभाळण्यासाठी इंग्लंडला निघून गेले आणि नंतर ब्रिटिश संसदेचे सदस्य झाले.
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१९०० साली व्यवसायानिमित्त जर्मनीला गेले असताना ते खूप आजारी पडले. १९ मे १९०४ रोजी बॅड नौहैम य�� ठिकाणी त्यांचा मृत्यू झाला. त्यांच्यावर इंग्लंडमधील पारशी समाजाच्या ब्रूकवूड दफन भूमीमध्ये अंत्यसंस्कार करण्यात आले.
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झारखंडमधील साचि गावात टाटांचा लोखंड व पोलाद प्रकल्प उभारला गेला. येथील रेल्वे स्टेशनचे नाव टाटानगर असे ठेवले गेले. आता झारखंडमधील जमशेदपूर या नावाने ओळखले जाणारे हे एक मोठे शहर आहे.
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प्रकाशन-राजहंस प्रकाशन.
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"स्वातंत्र्याचे समर्थन करण्याची ताकद नसणे आणि आवश्यक असल्यास त्याचे रक्षण करणे, हा एक क्रूर भ्रम असेल आणि स्वातंत्र्याचे रक्षण करण्याची ताकद केवळ व्यापक औद्योगिकीकरण आणि देशाच्या आर्थिक जीवनात आधुनिक विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाच्या ओतणेतूनच येऊ शकते."
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"मुक्त उपक्रमात, समुदाय हा केवळ व्यवसायातील दुसरा भागधारक नसून, खरे तर त्याच्या अस्तित्वाचा उद्देश आहे."
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"आमच्यात एक प्रकारचा दानधर्म पुरेसा आहे... तो म्हणजे गोधडी परोपकार जी चिंध्या झालेल्यांना कपडे घालते, गरिबांना खायला घालते आणि आजारी लोकांना बरे करते. मी गरीब किंवा दुःखी माणसाला मदत करू पाहणाऱ्या उदात्त भावनेचा निषेध करण्यापासून दूर आहे. असणं... एखाद्या राष्ट्राची किंवा समाजाची प्रगती ही त्याच्या सर्वात कमकुवत आणि असहाय्य सदस्यांना मदत करण्याइतकी नाही तर सर्वोत्तम आणि सर्वात प्रतिभावान व्यक्तींना उंचावणे, जेणेकरून त्यांना देशाची सर्वात मोठी सेवा करता येईल. ."
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"झटपट वाढणारी विविध प्रकारची सावली असलेली झाडे लावलेले रुंद रस्ते निश्चित करा. लॉन आणि बागांसाठी भरपूर जागा आहे याची खात्री करा. फुटबॉल, हॉकी आणि उद्यानांसाठी मोठी जागा राखून ठेवा. हिंदू मंदिरांसाठी जागा निश्चित करा, मोहम्मद मशिदी आणि ख्रिश्चन चर्च." -टाटा यांनी मुलगा दोराबला लिहिलेल्या पत्रात त्यांच्या टाउनशिपबद्दलच्या त्यांच्या दृष्टीबद्दल सांगितले जे कालांतराने जमशेदपूर होईल.
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"तो लोकांच्या नजरेत डोकावणारा माणूस नव्हता. त्याला सार्वजनिक मेळावे आवडत नव्हते, भाषणे करायची त्याची पर्वा नव्हती, त्याच्या चारित्र्याच्या बळकटपणाने कोणत्याही माणसावर कितीही मोठेपणा येण्यापासून रोखले, कारण तो स्वतः महान होता. स्वतःच्या मार्गाने, बहुतेक लोकांपेक्षा मोठे. त्याने सन्मान मागितला नाही आणि त्याने कोणत्याही विशेषाधिकाराचा दावा केला नाही, परंतु भारताची आणि तिच्या असंख्य लोकांची प्रगती ही त्याच्याबरोबर कायमची उत्कट इच्छा होती." टाटा यांच्या निधनाबद्दल टाइम्स ऑफ इंडिया
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"जरी इतर अनेकांनी गुलामगिरीच्या साखळ्या सोडवण्यावर आणि स्वातंत्र्याच्या पहाटेच्या दिशेने वाटचाल झपाट्याने करण्याचे काम केले, तर टाटांनी स्वप्न पाहिले आणि ते मुक्तीनंतर जसे घडले पाहिजे तसे जीवनासाठी काम केले. इतर बहुतेकांनी गुलामगिरीच्या वाईट जीवनातून मुक्तीसाठी काम केले. टाटांनी आर्थिक स्वातंत्र्याचे चांगले जीवन जगण्यासाठी स्वातंत्र्यासाठी काम केले." -डॉ झाकीर हुसेन, भारताचे माजी राष्ट्रपती
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"तो नशिबाचा माणूस होता हे स्पष्ट आहे. खरंच, जणू काही त्याच्या जन्माची वेळ, त्याचे जीवन, त्याची प्रतिभा, त्याची कृती, त्याने ज्या घटना घडवल्या किंवा प्रभावित केल्या त्या घटनांची साखळी आणि त्याने केलेल्या सेवा. आपल्या देशाला आणि त्याच्या लोकांसाठी प्रदान केलेले, हे सर्व भारताच्या महान नशिबाचा भाग म्हणून पूर्व-नियत होते." - जे. आर. डी. टाटा
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"आजच्या पिढीतील कोणत्याही भारतीयाने भारताच्या वाणिज्य आणि उद्योगासाठी यापेक्षा जास्त काम केले नव्हते." —लॉर्ड कर्झन, टाटा यांच्या निधनानंतर भारताचे व्हाईसरॉय
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पिकांना वाढीसाठी आवश्यक अन्नद्रव्ये बहुतांशी जमिनीतून मिळतात. मात्र काही प्रमाणात पिकांची ही अन्नद्रव्यांची गरज रासायनिक खते, हिरवळीची खते, शेणखत, कंपोस्ट, पीक फेरपालटीत, शेंगवर्गीय पिकांचा समावेश इत्यादी प्रकारे भागविता येते.
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प्रमुख अन्नद्रव्यांचे जमिनीतील प्रमाण, स्वरूप, उपलब्धता व त्याचबरोबर रासायनिक खतांची वापरण्याची पद्धत, प्रमाण इत्यादींची शास्त्रीय माहिती असणे आवश्यक आहे. पिकांच्या योग्य वाढीसाठी एकंदर १६ 'विविध अन्नद्रव्यांची' गरज भासते. ही अन्नद्रव्ये म्हणजे दुय्यम अन्नद्रव्ये आणि सुक्ष्म अन्नद्रव्ये. यांपैकी प्रमुख तीन अन्नद्रव्यांविषयी आपण थोडे जास्त जाणून घेऊ.
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नत्र(नायट्रोजन) -
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पिकातील नायट्रोजनच्या योग्य उपलब्धतेनुसार पिकातील हरितद्रव्यांचे प्रमाण वाढते. तसेच लूसलुसीत तजेलदार ठेवण्याचे काम नायट्रोजन करतो. तसेच नायट्रोजनमुळे पिकांची शाखीय वाढ मोठ्या प्रमाणात होते.
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नत्र कमतरतेची लक्षणे -
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पिकांची पाने पिवळी पडतात.
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पिकांची वाढ खुंटते.
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स्फुरद (फोस्फरस)-
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स्फूरद कमतरतेची लक्षणे -
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पिकाच्या पानांना जांभळट रंग येतो.
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पाने लांबट होऊन वाढ थांबते.
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पालाश (पोटॅशिअम) -
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पोटॅशियम कमतरतेचे लक्षणे -
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पानाच्या कडा तांबडसर रंगाच्या होतात.
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खोड आखूड होते व शेंडे गळतात.
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अधिक माहिती - पिकाच्या वाढीसाठी आवश्यक अन्नद्रव्ये खालील प्रमाणे -
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मुख्य अन्नद्रव्य - नत्र, स्फुरद, पालाश. दुय्यम अन्नद्रव्य - कॅल्शियम, मॅग्रेशियम, सल्फर.
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सुक्ष्म अन्नद्रव्य - कार्बन डाय ऑक्साईड, हायड्रोजन, ऑक्सिजन, लोह, मॅगनीज, बोरॉन, झिंक, कॉपर, मॉलिब्लेनम, क्लोरीन ही अन्नद्रव्ये पिकांन हवा व पाण्यातून मिळतात.
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पुस्तक-शेती व पशुपालन
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