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ममता बॅनर्जी
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तृणमूल काँग्रेस पक्ष
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ममता बॅनर्जी
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तृणमूल काँग्रेस पक्ष
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पश्चिम बंगाल विधानसभा निवडणूक २०१६ ही भारताच्या पश्चिम बंगाल राज्यातील विधानसभा निवडणुक होती. ४ एप्रिल ते ५ मे २०१६ दरम्यान सहा फेऱ्यांत घेण्यात आलेल्या ह्या निवडणुकीमध्ये पश्चिम बंगाल विधानसभेमधील सर्व २९४ जागांसाठी नवे आमदार निवडले गेले. ममता बॅनर्जीच्या नेतृत्वाखालील तृणमूल काँग्रेस पक्षाने २११ जागांवरील विजयासह सपशेल बहुमत मिळवले व पश्चिम बंगालमधील आपली सत्ता राखली.
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पश्चिम मिदनापूर हा भारताच्या पश्चिम बंगाल राज्यामधील एक जिल्हा आहे. २००२ साली मिदनापूर जिल्ह्याचे दोन तुकडे करून पूर्व मिदनापूर व पश्चिम मिदनापूर हे दोन वेगळे जिल्हे निर्माण करण्यात आले. हा जिल्हा पश्चिम बंगालच्या दक्षिण भागात झारखंड राज्याच्या सीमेवर आहे. मिदनापूर हे ह्या जिल्ह्याचे मुख्यालय कोलकातापासून १३० किमी अंतरावर आहे.
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पश्चिम बर्धमान जिल्हा हा पश्चिम बंगाल मधील २३ वा जिल्हा असून, हा ७ एप्रिल २०१७ रोजी पश्चिम बर्धमान जिल्ह्याचे विभाजन करून निर्माण करण्यात आला. या जिल्ह्याचे मुख्यालय आसनसोल येथे आहे
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ग्यालशिंग जिल्ह्याचे नकाशावरील स्थान
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ग्यालशिंग (जुने नाव: पश्चिम सिक्कीम जिल्हा) हा भारताच्या सिक्कीम राज्यामधील एक जिल्हा आहे. हा जिल्हा सिक्कीम राज्याच्या पश्चिम भागात नेपाळ देशाच्या सीमेजवळ स्थित आहे. नेपाळी हे येथील प्रमुख भाषा आहे. ग्यालशिंग जिल्हा हे सिक्कीममधील गिर्यारोहण केंद्र मानले जाते.
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ही भारतात उगवणारी एक आयुर्वेदिक औषधी वनस्पती आहे.
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पहाडफरीद हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वर्धा जिल्ह्यातील समुद्रपूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान वर्षभर कोरडे असते.उन्हाळी मोसम अतिउष्ण असतो.हिवाळा व उन्हाळा हे दोन्ही ऋतू तीव्र असतात.उन्हाळी मोसमात दिवसाच्या व रात्रीच्या तापमानात जास्त फरक असतो.मे हा अतिउष्णतेचा आणि जानेवारी हा कडाक्याच्या थंडीचा महिना असतो. वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान ११० सेंमी.पर्यंत असते.
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सब्बल कठीण पोलादापासून बनविलेले माती खोदण्याचे एक उपकरण आहे.
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[ चित्र हवे ]
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धामणी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील पुणे जिल्ह्यातील आंबेगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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धामणी हे पुणे जिल्ह्यातल्या आंबेगाव तालुक्यातील १३९३.७१ हेक्टर क्षेत्राचे गाव असून २०११ च्या जनगणनेनुसार ह्या गावात ६७३ कुटुंबे व एकूण 3८१४ लोकसंख्या आहे. ह्याच्या सर्वात जवळचे शहर [मंचर] ३२ किलोमीटर अंतरावर आहे. यामध्ये १३८४ पुरुष आणि १४३० स्त्रिया आहेत. यामध्ये अनुसूचित जातीचे लोक १८१ असून अनुसूचित जमातीचे ४२ लोक आहेत.ह्या गावाचा जनगणना स्थल निर्देशांक ५५५५१ आहे.[१]
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गावात १ शासकीय पूर्व-प्राथमिक शाळा आहेत.
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गावात १ शासकीय जिल्हा प्राथमिक शाळा आहेत.
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गावात १ शासकीय उच्च माध्यमिक व माध्यमिक शाळा आहे..
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सर्वात जवळील पदवी महाविद्यालय (पाबळ) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील अभियांत्रिकी महाविद्यालय (अवसरी) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील वैद्यकीय महाविद्यालय (पुणे) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील व्यवस्थापन संस्था (पुणे) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील पॉलिटेक्निक (अवसरी) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील व्यावसायिक प्रशिक्षण शाळा (घोडेगाव) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील अनौपचारिक प्रशिक्षणकेंद्र (पुणे) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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सर्वात जवळील अपंगांसाठी खास शाळा (पाबळ) १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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गावात १ इतर खाजगी शैक्षणिक सुविधा आहे.
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गावात १ शासकीय दवाखाना केंद्र आहे.
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सर्वात जवळील सामूहिक आरोग्य केंद्र १५ किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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गावात १ प्राथमिक आरोग्य केंद्र आहे.
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सर्वात जवळील प्राथमिक आरोग्य उपकेंद्र १५ किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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गावात १ प्रसूति व बालकल्याण केंद्र मंचर येथे आहे.
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सर्वात जवळील पर्यायी औषधोपचार रुग्णालय १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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गावात १ दवाखाना आहे.
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सर्वात जवळील पशुवैद्यकीय रुग्णालय १० किलोमीटरहून जास्त अंतरावर आहे.
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गावात १ कुटुंबकल्याण केंद्र आहे.
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गावात बंद गटारव्यवस्था उपलब्ध नाही. गावात गटारव्यवस्था उघडी आहे. सांडपाणी थेट जलस्रोतांमध्ये सोडले जाते. या क्षेत्राचा संपूर्ण स्वच्छता अभियानात समावेश आहे. गावात न्हाणीघरासह सार्वजनिक स्वच्छता गृह उपलब्ध नाही.
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वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी (मराठी लेखनभेद: वासिष्ठीपुत्र पुलुमावि) हा सातवाहन सम्राट होता. हा सातवाहन सम्राट गौतमीपुत्र सातकर्णी याचा पुत्र होता. गौतमीपुत्र सातकर्णीनंतर इ.स. १३२ सालाच्या सुमारास हा सातवाहनांचा राजा झाला.
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याच्या कारकिर्दीत क्षत्रपांनी उठाव करून नर्मदेच्या उत्तरेकडील भूप्रदेश व उत्तर कोकण जिंकून घेतले. वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी आणि रूद्रदामन (उज्जैनचा क्षत्रप राजा) यांच्यात दोनदा युद्ध झाले. या दोन्ही युद्धांत रूद्रदामनाने वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीचा पराभव केला. परंतु त्याची कन्या वासिष्ठीपुत्र सातकर्णीस (पुलुमावीचा धाकटा भाऊ) दिलेली असल्याने क्षत्रपांनी तडजोड करून घेतली. वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीने स्वतःचा मुखवटा असलेली चांदीची नाणी प्रचारात आणली.
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टॉलेमी या ग्रीक प्रवाशाने प्रतिष्ठानचा सम्राट म्हणून वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीचा (ग्रीकः सिरिस्तोलेमयोस, अर्थात श्री पुलुमायी) उल्लेख केलेला आहे[ संदर्भ हवा ].
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सिमुक सातवाहन · कृष्ण सातवाहन · सातकर्णी · पूर्णोत्संग · वेदिश्री · सतिसिरि · हाल सातवाहन · स्कंधस्तंभी · गौतमीपुत्र सातकर्णी · लंबोदर · अपिलक · मेघस्वती · स्वाती सातवाहन · स्कंदवस्ती · महेन्द्र सातकर्णी · कुंतल सातकर्णी · सुनंदन सातकर्णी · सुंदर · स्वातिकर्ण · वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी · वाशिष्ठीपुत्र सातकर्णी · शिवस्कंद सातकर्णी · यज्ञश्री सातकर्णी · वाशिष्टीपुत्र विजय सातकर्णी · चंडश्री सातकर्णी · पुलुमावी चौथा · मधरीपुत्र स्वामीशकसेन ·
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चतुरपण सातकर्णी · कौसिकीपुत्र सातकर्णी · चुटकुलानंद सातकर्णी
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साचा:Vakataka Infobox
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पृथ्वीसेन पहिला (इ.स. ३५५ - इ.स. ३८० ) हा वाकाटक राजवंशाच्या प्रवरापूर-नंदीवर्धन शाखेतील एक राजा होता. नंतरच्या वाकाटक शिलालेखात, त्यांचे वर्णन सरळपणा, प्रामाणिकपणा, नम्रता, करुणा आणि मनाची शुद्धता गुण असलेला राजा असे आहे आणि महाभारताच्या युधिष्ठिराशी या राज्याची तुलना केली आहे. त्यांनी पृथ्वीसेनला एक नीतिमान विजेता असेही म्हणतात. [१]
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पहिला फ्रांस्वा (१२ सप्टेंबर १४९४ - ३१ मार्च १५४७) हा इ.स. १५१५ ते इ.स. १५४७ दरम्यान फ्रान्सचा राजा होता.
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पहिला बायेझिद (१३५४ – ८ मार्च १४०३; ओस्मानी तुर्की: بايزيد اول,; तुर्की: Beyazıt) हा इ.स. १३८९ ते १४०२ दरम्यान ओस्मानी साम्राज्याचा सुलतान होता. पहिल्या मुरादचा मुलगा असलेला बायेझिद मुरादच्या कोसोव्होमधील मृत्यूनंतर सुलतान बनला.
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१३८९ ते १३९५ दरम्यान बायेझिदने बल्गेरिया व ग्रीसवर अधिपत्य मिळवले. १३९५ साली त्याने बायझेंटाईन साम्राज्याची राजधानी कॉंस्टॅंटिनोपोलला वेढा घातला. बायझेंटाईन सम्राट दुसऱ्या मॅन्युएलच्या मदतीसाठी हंगेरीचा सम्राट व पवित्र रोमन साम्राज्याचा सेनापती सिगिस्मंड धावून आला परंतु बायेझिदच्या सैन्याने त्याचा पराभव केला. इ.स. १४०० साली मध्य आशियातील तैमूरलंगने तुर्कांवर आक्रमण केले व अंकारा येथे झालेल्या लढाईदरम्यान बायेझिद पकडला गेला.
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ओस्मानी सुलतान शत्रूकडून पकडला जाण्याची ही पहिलीच वेळ होती. तैमूरांच्या कैदेत असतानाच बायेझिदचा १४०३ साली मृत्यू झाला. त्याच्या पश्चात त्याच्या ४ मुलांमध्ये सत्तेवरून अनेक लढाया झाल्या व पुढील १० वर्षे ओस्मानी साम्राज्याला सुलतान नव्हता. ह्यामुळे साम्राज्याची वाढ खुंटली.
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रिचर्ड कॉली वेलस्ली, पहिला मार्क्वेस वेलस्ली अर्थात लॉर्ड वेलस्ली (जन्म: २० जून, इ.स. १७६० मृत्यू: २६ सप्टेंबर, इ.स. १८४२) हा आयरिश ब्रिटिश राजकारणी आणि वसाहतीय प्रशासक होता. रिचर्ड वेल्लेस्लीचा जन्म इ.स. १७६० मध्ये इंग्लंडच्या उमराव घराण्यात झाला.[१] तो इ.स. १७९८ ते १८०५ च्या दरम्यान भारतात ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनीचा गव्हर्नर जनरल होता. त्याने तत्कालीन भारतीय राजकीय परिस्थितीचा पुरेपूर फायदा घेत ईस्ट इंडिया कंपनीला भारतातील सर्वश्रेष्ठ शक्ती बनवले आणि भारतात ब्रिटिश सत्तेची पाळमुळे आणखी घट्ट केली. यासाठी त्याने तैनाती फौजेच्या धोरणाचा अवलंब केला[२]. त्याने शांततेच्या धोरणाचा त्याग करून सरळसरळ युद्धनीतीचा वापर केला. या त्याच्या कर्तृत्वामुळे ब्रिटिश भारतात बलशाली तर झालेच परंतु त्यामुळे नेपोलिअनच्या भारतावरील संभावित आक्रमणाची भीतीही कमी झाली.
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पहिला मुराद (१३२६ – १५ जून १३८९; तुर्की: I. Murat Hüdavendigâr) हा ओऱ्हानचा मुलगा व इ.स. १३६२ ते १३८९ दरम्यान ओस्मानी साम्राज्याचा सुलतान होता. आपल्या कारकिर्दीत त्याने एदिर्ने येथे राजधानी वसवून ओस्मानी साम्राज्याचा सामाजिक विकास केला तसेच बाल्कनमधील मोठा भूभाग आपल्या अंमलाखाली आणला.
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पहिला राज वोडेयार पहिला (२ जून, १५५२ - २० जून, १६१७:मेलिकोटे) हा मैसुरुचा नववा राजा महाराजा होता. हा चौथ्या चामराज वोडेयारचा मोठा मुलगा होता. हा आपल्या चुलत भाऊ पाचव्या चामराज वोडेयारच्या मृत्यूनंतर १५७८ पासून १६१७ पर्यंत सिंहासनावर होता.
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आपल्या काका आणि वडीलांनी सुरू केलेले विजयनगरच्या राजदूतांना मैसुरु राज्यातून हाकलून देण्याचे काम राज वोडेयारने सुरू ठेवले. या दरम्यान त्याला स्वतःच्याच कुटुंबाकडूनही विरोध होता. राज वोडेयारने मैसुरुला विजयनगरपासून पूर्णपणे स्वतंत्र असल्याचे जाहीर केले. असे असताही त्याने विजयनगरच्या सम्राट व साम्राज्याला आदर दिला होता.
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पहिल्या राज वोडेयारने दर दसऱ्याच्या दिवशी आपल्या महालापासून बन्नीमंटप मधील शमीच्या झाडा पर्यंत मिरवणूक काढणे सुरू केले. आता याला जगप्रसिद्ध मैसुरु दसऱ्याचे रूप आहे.
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ही प्रथा १६१०पासून आजतगायत अखंड सुरू आहे. राज वोडेयारचा युवराज नरसराज नवरात्रीच्या आधी एक दिवस मृत्यू पावला असताही विद्वानांच्या सल्ल्यावरून राजाने यात खंड पाडला नाही व भविष्यातही राजघराण्याील व्यक्तीचा मृत्यू झाला तरीही या प्रथेत व्यत्यय आणू नये असे फर्मान काढले.
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धामणी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील वाशिम जिल्ह्यातील कारंजा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.दिवसा उष्ण आणि रात्री थंड असे वर्षभर तापमान असते. पावसाळ्यात येथे मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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पहिलीवाडी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील राजापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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| 3 |
+
१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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इंग्रज-अफगाण युद्धे ही इंग्रजांनी अफगाणिस्तानात स्वतःची किंवा आपल्या अंकिताची सत्ता स्थापन करण्यासाठी केलेली तीन युद्धे होती.
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अफगाणिस्तानातून रशिया हिंदुस्थानावर स्वारी करील, अशी धास्ती इंग्रजांना वाटतहोती. त्यातून इराणच्या शाहाने रशियाच्या मदतीने अफगाणिस्तानातील हेरातला १८३७ मध्ये वेढा दिल्यामुळे इंग्रजांना रशियाचे आक्रमण होणार, याची खात्री वाटली व त्या दृष्टीने त्यांनी प्रयत्न चालू केले. याच सुमारास रणजितसिंगाने घेतलेला पेशावर प्रांत परत जिंकून घेण्यासाठी अफगाणिस्तानच्या दोस्त महंमदाने इंग्रजांकडे मदत मागितली. इंग्रजांनी नकार दिल्यामुळे दोस्त महंमद रशियाकडे गेला. आपल्या वर्चस्वाखाली राहील असा अमीर अफगाणिस्तानात असावा, म्हणून गव्हर्नर जनरल ऑक्लंडने रणजितसिंग व शाह शुजा यांबरोबर त्रिपक्षीय तह करून शाह शुजाला अफगाणिस्तानचे अमीरपद देण्याचे ठरविले. दरम्यान १८३८ मध्ये हेरातचा वेढा उठला होता. तरीही ऑक्लंडने शाह शुजाला गादीवर बसविण्यासाठी सर जॉन किन व सर कॉटन यांना सैन्य देऊन काबूलास रवाना केले. सिंधच्या अमिराचा विरोध असतानाही इंग्रज सैन्याची एक तुकडी फिरोझपूरहून सिंध, बोलन खिंड, बलुचिस्तान या मार्गाने कंदाहार येथे पोहचली. शाह शुजाचा मुलगा तैमूर याच्या नेतृत्वाखाली शीख सैनिक व इंग्रज अधिकारी वॉड यांची दुसरी तुकडी पंजाब, पेशावर, खैबरखिंड या मार्गाने कंदाहारला पोहोचली. इंग्रजांनी १८३९ च्या एप्रिल महिन्यात कंदाहार, जुलैत गझनी आणि ऑगस्टमध्ये काबूल घेतले.
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दोस्त महंमद बूखाऱ्याला पळाला. त्यानंतर इंग्रजांनी त्याला कलकत्त्यात कैदेत ठेवले. इंग्रजांनी शाह शुजाला गादीवर बसवून त्याच्या संरक्षणासाठी तेथे फौज ठेवली. त्यामुळे अफगाण चिडले. दोस्त महंमदाचा मुलगा अकबरखान याने बंड करून १८४१ मध्ये बर्न्स, मॅकनॉटन व इतर अधिकारी यांचे खून केले. त्यानंतर मेजर हेन्री पॉटिंजर आला. त्याने पूर्वी झालेला तह अंमलात आणून जलालाबाद, गझनी व कंदाहार ही स्थळे सोडून देण्याचे ठरविले. परत जाणाऱ्या इंग्रजांची अफगाणांनी खैबर खिंडीत कत्तल केली. बाहेरुनही मदत मिळण्यास इंग्रजांना अडचण पडू लागली. गव्हर्नर जनरल नॉर्थब्रुकने सैनिकांना माघार घेण्यास सांगितले. अखेरीस खजिना व तोफा अफगाणांच्या स्वाधीन करून इंग्रजांनी माघा�� घेतली. या युद्धामुळे इंग्रजांचा काहीच फायदा झाला नाही. ज्या शाह शुजासाठी इंग्रजांनी अफगाणिस्तानात सैन्य पाठविले, त्याचाच अफगाणांनी खून केला. ऑक्लंडच्या आक्रमक धोरणामुळे निष्कारण पैसा खर्च होऊन २०,००० लोक मृत्युमुखी पडले.
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इंग्लंड व रशिया यांत अफगाणिस्तानात आपापले वर्चस्व स्थापन करण्याची स्पर्धा होती. यातूनच दुसरे अफगाण युद्ध उद्भवले. वारसाहक्काच्या भांडणाचा निकाल लागून १८६८ मध्ये शेरअली हा अमीर झाला. रशियाचे मध्य आशियात वर्चस्व वाढल्यामुळे शेरअलीने इंग्रजांकडे मदत मागितली; परंतु इंग्रजांच्या धरसोडीमुळे त्याने रशियाबरोबर मैत्रीची याचना केली. रशियाचा वकील काबूलला जाताच गव्हर्नर जनरल लिटनने शेरअलीस आपलाही वकील काबूल येथे ठेवून घेण्याचा आग्रह धरला. शेरअलीने ही विनंती नाकारताच गव्हर्नर जनरल लिटनने त्याविरुद्ध युद्ध पुकारले. जनरल रॉबर्ट, जनरल स्ट्यूअर्ट व सॅम ब्राउन हे खैबर खिंडीतून अफगाणिस्तानात पोहोचले. इंग्रजांनी कंदाहार घेताच शेरअली रशियाच्या हद्दीत पळाला. त्याचा मुलगा याकूबखान याने इंग्रजांबरोबर १८७९ मध्ये गंदमक येथे तह केला. या तहानुसार इंग्रज वकील काबूल येथे रहावयाचा होता. कुर्रम, पिशी आणि तिवी ही ठिकाणे इंग्रजांच्या ताब्यात आली. अफगाणांना हा तह मान्य नसल्यामुळे त्यांनी काही इंग्रज अधिकाऱ्यांचे खून केले व याकूबखानला कैद केले. त्याचा भाऊ अयूबखान याने बंड करून इंग्रज फौजेचा मैवंद येथे पराभव केला. शेवटी गव्हर्नर जनरल रिपनने शेरअलीचा पुतण्या अब्दुर रहमान याच्याशी तह करून दुसरे अफगाण युद्ध थांबविले. इंग्रजांनी अमिराकडून खंडणी घेऊन गंदमकच्या तहाने सोडलेला प्रदेश परत मिळविला. या युद्धामुळे इंग्रजांचे वर्चस्व अफगाणिस्तानात स्थापन होऊन रशियाच्या आक्रमक धोरणाला पायबंद बसला.
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पहिल्या दोन युद्धांत इंग्रजांनी अफगाणिस्तानावर स्वारी केली होती. तिसऱ्या वेळी मात्र अफगाणिस्तानने इंग्रजांविरुद्ध युद्ध पुकारले. अमीर ð अमानुल्ला याने अफगाण लोकांच्या दडपणामुळे १९१९ च्या एप्रिल महिन्यात ब्रिटिश प्रदेशावर आक्रमण केले. हे युद्ध फक्त दोनच महिने चालू होते. अफगाण लोकांनी खैबर खिंडीतून पेशावरच्या परिसरात हल्ले केले. इंग्रजांनी विमानासारख्या आधुनिक साधनांचा वापर केल्यामुळे ते यशस्वी झाले. १९१९ च्या नो��्हेंबर महिन्यात तह झाला. अफगाणिस्तानला परराष्ट्रीय धोरणाच्या बाबतीत स्वातंत्र्य मिळाले. इंग्रजांकडून अमिराला मिळणारे आर्थिक साहाय्य बंद झाले. या युद्धानंतर इंग्रज अफगाण संबंध सुधारले.
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सर्वोत्कृष्ट चित्रपट "विंग्स".
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पहिले इंग्रज-मराठा युद्ध हे मराठा साम्राज्य आणि ईस्ट इंडिया कंपनी यांच्यात इ.स. १७७५-१७८२ दरम्यान लढले गेलेले युद्ध होते. सुरतेच्या तहापासून सुरू झालेले हे युद्ध सालबाईच्या तहानिशी संपले.सदर युद्ध गव्हर्नर जनरल वॉरन हेस्टींगजच्या काळात घडले.
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सालबाईचा तह
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
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कर्नल किटींग
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थॉमस विंधम गोडार्ड
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नाना फडणवीस
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माधवराव
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हरिपंत फडके
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तुकोजी होळकर
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२३ जहाजे
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१४ जहाजे
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१७७२ मध्ये माधवराव पेशव्याच्या मृत्यूनंतर त्यांचे भाऊ नारायणराव मराठा साम्राज्याचे पेशवे (राज्यकर्ता) झाले. ऑगस्ट १७७३. मध्ये त्यांच्या राजवाड्यातील पहारेकऱ्यांनी नारायणरावाची हत्या केली आणि त्यांचे काका रघुनाथराव (राघोबा) पेशवे झाले. तथापि, नारायणरावाची विधवा पत्नी गंगाबाई यांनी (नारायणरावाच्या मरणोत्तर) एका मुलाला जन्म दिला, जो सिंहासनाचा कायदेशीर वारस होता. नवजात शिशुचे नाव 'सवाई' माधवराव (सवाई म्हणजे "एक आणि एक चतुर्थांश") होते. नाना फडणवीस यांच्या नेतृत्वात बाराभाई म्हणून ओळखले जाणारे बारा मराठा सरदारांनी शिशुला नवीन पेशवे म्हणून बसविण्याचा प्रयत्न केला व त्याच्या नावावर राजवंश म्हणून राज्य करु लागले. रघुनाथराव आपली सत्ता सोडून देण्यास तयार नसल्याने त्यांनी मुंबई येथे इंग्रजांकडून मदत मागितली आणि १७ मार्च १७७५ रोजी सूरतच्या करारावर स्वाक्षरी केली. या करारानुसार रघुनाथरावांनी ब्रिटिशांना सालसेट व वसई प्रांताचा काही भाग व सूरत आणि भरुच जिल्ह्यातील महसूलाचा अधिकार दिला. त्या बदल्यात ब्रिटिशांनी रघुनाथरावांना २,५०० सैनिक देण्याचे आश्वासन दिले.
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ब्रिटिश कलकत्ता कौन्सिलने सूरतच्या कराराचा निषेध केला, कर्नल अप्टनला पुकारण्यासाठी आणि नूतनीकरण करून नवीन करार करण्यास पुण्यात पाठवले. पुरंदर कराराने (१ मार्च १७७६) रघुनाथरावांना पेन्शन देण्यात आले आणि त्याचे कारण सोडले गेले, परंतु सलसेट आणि भरुच जिल्ह्यांचा महसूल ब्रिटिशांनी कायम ठेवला. मुंबई सरकारने हा नवीन करार नाकारला आणि रघुनाथरावांना आश्रय दिला. १७७६ मध्ये नाना फडणवीस यांनी पश्चिम किनाऱ्यावरील एक बंदर फ्रेंचाना देऊन कलकत्ता परिषदेशी केलेल्या कराराचे उल्लंघन केले.इंग्रजांनी पुण्याकडे फौज पाठवून प्रत्युत्तर दिले.
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कर्नल कीटिंगच्या नेतृत्वात ब्रिटिश सैन्यान��� १५ मार्च १७७५ रोजी पुण्याला निघत सुरत सोडली. परंतु त्यांना आडस (गुजरात) येथे मराठ्यांचे सरदार हरिपंत फडके यांनी अडवले आणि १८ मे १७७५ रोजी झालेल्या आडसच्या लढाईत ब्रिटिश सैन्याचा पूर्णपणे पराभव झाला. रघुनाथराव व केटिंगच्या सैन्याच्या झालेल्या या पराभवात ९६ सैनिक ठार झाले. मराठ्यांच्या मृत्यू पावलेल्यामध्ये १५० ठार सैनिकाचा समावेश होता.
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वॉरेन हेस्टिंग्जचा असा अंदाज होता की पुण्याविरूद्ध थेट कारवाई करणे हानिकारक आहे. म्हणूनच, बंगालच्या सर्वोच्च परिषदेने सूरतच्या कराराचा निषेध केला, कर्नल अप्टनला पुकारण्यासाठी आणि तातडीने नवीन तह करण्यास पुण्यात पाठवले. १ मार्च १७७६ रोजी अप्टन आणि पुण्यातील मंत्र्यांच्या दरम्यान पुरंदरचा तह नावाचा करार झाला.
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पुरंदरच्या कराराने (१ मार्च १७७६) रघुनाथराव यांना पेन्शन दिली गेली आणि त्याचे कारण सोडले गेले, परंतु सलसेट आणि भरुच जिल्ह्यांचा महसूल ब्रिटिशांनी कायम ठेवला.
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१७७६ मध्ये फ्रेन्च आणि पूना दरबार यांच्यात झालेल्या करारानंतर मुंबई ( ईस्ट इंडिया कंपनी) सरकारने राघोबाला गादीवर बसवन्याच्या हेतुने पून्यावर स्वारी करण्याचा निर्णय घेतला. त्यांनी कर्नल एजर्टनच्या खाली सैन्य पून्याच्या दिशेने पाठवले. या सैन्याने खोपोली गाठले आणि पश्चिम घाटच्या भोर घाटातून नंतर कार्लाकडे जाण्यास सुरुवात केली. ते मराठा हल्ल्याच्या भागात जाने. १ रोजी पोहोचले. लवकरच त्यांना घेराव घातला गेला व शेवटी इंग्रजांना वडगाव येथे माघार घ्यायला भाग पाडले गेले. मराठ्यांचा विजय झाला व १६ जानेवारी १७७९ रोजी वडगाव करारावर सही करन्यास इंग्रजांना भाग पाडले गेले.
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बंगालमधील ब्रिटिश गव्हर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्ज यांनी या निर्णयावर मुंबईच्या अधिकाऱ्यांना स्वाक्षरी करण्याचा कोणताही कायदेशीर अधिकार नाही या कारणास्तव हा करार नाकारला आणि थॉमस विन्डहॅम गॉडार्डला त्या भागातील ब्रिटिश हितसंबंध सुरक्षित ठेवण्याचा आदेश दिला. या आदेशानुसार मुम्बई सैन्याला वाचवण्यासाठी, मजबुत करण्यासाठी उत्तर भारतातील कर्नल(जनरल) थॉमस विन्डहॅम गोडार्ड सैन्यासह खुप उशीरा पोहोचला.
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गॉडार्डने ६,००० सैन्यासह भद्र किल्ल्यावर हल्ला केला आणि १ फेब्रुवारी, १७७९ रोजी अहमदाबाद ताब्यात घेतला. तेथे ६,००० अरब आणि सिंधी पायदळ आणि २,००० घोड��� होते. झालेल्या लढाईत गॉडार्डचा विजय झाला, दोन ब्रिटिशांसह एकूण १०८ चे नुकसान झाले. ११ डिसेंबर १७८० रोजी गॉडार्डने वसईलाही ताब्यात घेतले. कॅप्टन पोपम यांच्या नेतृत्वात बंगालच्या आणखी एका तुकडीने गोहडच्या राणा (राजा) यांच्या मदतीने महादजी शिन्दे (सिंधिया) लढाईची तयारी करण्यापूर्वी ४ ऑगस्ट १७८० रोजी ग्वाल्हेर ताब्यात घेतला. निर्विवादपणे महादजी सिंधिया आणि जनरल गोडार्ड यांच्यात गुजरातमधील संघर्ष झाला. महादजी शिंदे यांना त्रास देण्यासाठी हेस्टिंग्जने मेजर कॅमकच्या नेतृत्वात आणखी एक सैन्यतुकडी पाठविली.
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वसईला घेतल्यावर गोडार्डने पुण्याकडे कूच केले. पण त्याला एप्रिल १७८१ मध्ये भोर घाट येथे परशुरामभाउ, हरीपंत फडके आणि तुकोजी होळकर यांनी गाठले.
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मध्य भारतात, महादजी शिन्दे मेजर कॅमकला आव्हान देण्यासाठी मालवा येथे स्वतः उभे राहीले. प्रारंभी, महादजींचा वरचश्मा होता आणि मेजर कॅमकच्या नेतृत्वातील ब्रिटिश सैन्य त्रासलेले होते आणि सन्ख्येने कमी असल्याने त्याला हदूरपर्यत माघार घ्यावी लागली.
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फेब्रुवारी १७८१ मध्ये ब्रिटिशांनी महादजी शिंदे यांना सिप्री शहरात पराभूत केले, पण त्यानंतर ब्रिटिशांनी केलेल्या प्रत्येक हालचालीचा महादजी शिंदे यांच्या मोठ्या सैन्याने पाठलाग केला आणि ब्रिटिश सैन्याचा रसद पुरवठा खंडित झाला. ब्रिटिश सैन्याने मार्चच्या उत्तरार्धात एके दिवशी रात्रीच्या वेळी अचानक शिंदेंच्या सैन्यावर हल्ला केला आणि केवळ रसद पुरवठाच मिळविला नाही तर बंदूका आणि हत्तीदेखील पकडले. त्यानंतर शिंदेंच्या सैन्याचा ब्रिटिशांना असलेला लष्करी धोका कमी झाला होता.
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स्पर्धा आता बरोबरीत आली होती. यातच महादजीने सिरोंज येथे मेजर कॅमकवर महत्त्वपूर्ण विजय मिळविला. नंतर २४ मार्च, १७८१ रोजी झालेल्या दुर्दाहच्या युद्धात महादजी शिंदे यांनी सिप्री येथे झालेल्या पराभवाचा बदला घेतला.
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कर्नल मुरे एप्रिल, १७८१ मध्ये ताज्या सैन्यासह पोफॅम आणि कॅमकला मदत करण्यासाठी पोचले. सिप्री येथे झालेल्या पराभवानंतर महादजी शिंदे घाबरून गेले होते, पण त्यानंतर शेवटी १ जुलै, १७८१ रोजी निर्णायकपणे मुरेच्या सैन्याचा नाश केला. या विजयानन्तर महादजी खूप शक्तिशाली असल्याचे दिसत होते.
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सालबाईचा तह म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या या करारावर १७ मे १७८२ रोजी स��वाक्षरी झाली आणि हेस्टिंग्जने जून १७८२ मध्ये आणि नाना फडणवीस यांनी फेब्रुवारी १७८३ मध्ये या करारास मान्यता दिली. या कराराने प्रथम अँग्लो-मराठा युद्धाची समाप्ती केली, दोन्ही पक्षांमधील शांतता स्थापना केली आणि २० वर्षे यथास्थिती ठेवली.
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द लव्हर्स नावाचा २०१३ हा हॉलिवूड चित्रपट या युद्धाच्या पार्श्वभूमीवर आधारित आहे.
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महाराष्ट्र सरकारतर्फे भरणारे पहिले व्यसनमुक्ती साहित्य संमेलन २ व ३ ऑक्टोबर २०१२ रोजी पुण्यात झाले. संमेलनाध्यक्ष डॉ. अनिल अवचट होते. संमेलनाचे उद्घाटन महाराष्ट्राच्या तत्कालीन राज्यपालांनी केले. व्यसनमुक्ती क्षेत्रात काम करणाऱ्या व्यक्तींना मुख्यमंत्र्यांच्या हस्ते ’महात्मा गांधी व्यसनमुक्ती सेवा पुरस्कार’ देण्यात आले. संस्थेसाठी पुरस्काराची रक्कम ३० हजार रुपये तर वैयक्तिक पुरस्काराची रु.१५ हजार इतकी होती.
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संमेलनाला मानसोपचारतज्ज्ञ डॉ. आनंद नाडकर्णी, डॉ. कल्याण गंगवाल, संमोहनतज्ज्ञ नवनाथ गायकवाड वगैरे उपस्थित होते.
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अलका मुंजाळ (राक्षेवाडी, जि.पुणे), केसरीनाथ पाटील (मुंबई), जगन्नाथ पाटील (अक्कलकोप, जि. सांगली), साहित्यिक जेलसिंग पावरा (शहादा, जि. नंदुरबार), तुकाराम पवार (कुरुंदवाड, जि. कोल्हापूर), दीपक निकम (पुणे), शाहीर देवानंद माळी (मिरज, जि. सांगली), पंढरीनाथ खर्डेकर (लोही, जि. यवतमाळ), डॉ. बाळासाहेब कुमार (जळगाव), बाळासाहेब केदार, लेखक भाऊसाहेब येवले (त्रिमूर्तीनगर, जि. अहमदनगर), मारोतराव खैरकर (नेहरोली, जि. ठाणे),मोहन मसकर पाटील (शाहूनगर, गोंडाली, जि. सातारा), रघुनाथ देशमुख (जव्हार, जि. ठाणे), प्रा. डॉ. राजकुमार म्हस्के (जालना), रामकृष्ण दिग्रजकर (जव्हार, जि. ठाणे), राही भिडे (मुख्य संपादक, दै. पुण्यनगरी पुणे), डॉ. लियाकत रहेमानखान पठाण (परभणी), लोकनाटककार विनोद ढगे (जळगाव), विकास वैद्य (नागपूर), विलास चंदणे (औरंगाबाद), विलास ऊर्फ रमेश जवळ (जवळवाडी, जि. सातारा), डॉ. व्ही. व्ही. घाणेकर (पुणे), शांताबाई मुळुक (चाकसमान, जि. पुणे), संजय बुटले (चंद्रपूर), संतोष वळसे (मंचर, जि. पुणे), डॉ. संजय शिंदे (पोलीस उपायुक्त, पुणे), संतोष शेळके (शिरपूर, जि. बुलढाणा), सदाशिवराव देवरे (म्हसदी, जि. धुळे), सुरेश जाधव (अंबड, जि. नाशिक), ज्ञानोबा देवकाते (सहायक पोलीस निरीक्षक बिटरगाव, जि. यवतमाळ).
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अल्कोहोलिक ॲनॉनिमस(मुंबई), आकाशवाणी(मुंबई), इंडियन एक्सप्रेस(मुंबई), ए.बी.पी. माझा(मुंबई), कॉकलिया संस्था(पुणे), दैनिक नवभारत(नागपूर), नशाबंदी मंडळ(मुंबई), नांदेड विद्यापीठ, पुणे विद्यापीठ, पुण्यनगरी, सहकारी शिक्षण विकास समूहाचे मराठा हायस्कूल(मुंबई), मुक्तांगण व्यसनमुक्ती केंद्र(पुणे), मैत्री व्यसनमुक्ती केंद्र, (नागपूर), वर्ल्ड स्पिरिच्युअल ट्रस्ट(मुंबई), विनटेल प्रायव्हेट लिमिट��ड(जितेंद्र पंडित-पुणे), श्रमिक एल्गार (श्रीमती परिणीता गोस्वामी-चंद्रपूर), सन सिक्युरिटीज (कर्नल मागो), पुणे.
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पहा : साहित्य संमेलने
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मराठी माणसे आरंभशूर म्हणून प्रसिद्ध आहेत. वर्षानुवर्षे चालावीत या उद्देशाने महाराष्ट्रात अनेक संमेलने सुरू होतात, आणि त्यांतली काही पुढे कायमची भरायची थांबतात. अशीच सुरू होऊन बंद पडलेली संमेलने जगातही इतरत्र आहेत.
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विविध नावांच्या अशा पहिल्या संमेलनाचा तपशील खालील तक्त्यात दिला आहे.
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धामणी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सातारा जिल्ह्यातील पाटण तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे ऑक्टोबर ते मार्च हा हिवाळा हंगाम असतो. हिवाळ्यात दिवसा तापमान ३० सेल्सियस तर रात्री तापमान ११ अंश सेल्सियस असते.जून ते सप्टेंबर हा पावसाळा हंगाम असतो. पावसाळ्यात दिवसा तापमान २८ अंश सेल्सियस तर रात्री तापमान २२ अंश सेल्सियस असते. पावसाळ्यात चांगल्या प्रमाणात पाऊस पडतो. एप्रिल ते जून हा उन्हाळा मोसम असतो. उन्हाळ्यात दिवसा तापमान ३८ अंश सेल्सियस तर रात्री तापमान २० अंश सेल्सियस असते.
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महामहोपाध्याय डॉ. पांडुरंग वामन काणे (जन्म : पेढे परशुराम , तालुका चिपळूण , जिल्हा : रत्नागिरी, ७ मे १८८०, - १८ एप्रिल १९७२) हे एक उल्लेखनीय भारतशास्त्रज्ञ, संस्कृत विद्वान, भारतीय कायदेपंडित आणि धर्मशास्त्राचे अभ्यासक होते. १९६३ मध्ये त्यांना भारताचा सर्वोच्च नागरी पुरस्कार भारतरत्न प्राप्त झाला त्यांच्या अभ्यासपूर्ण कार्यासाठी ४० वर्षांपेक्षा जास्त सक्रिय शैक्षणिक संशोधन ज्याचा परिणाम धर्मशास्त्राच्या इतिहासाच्या ६,५०० पृष्ठांवर झाला. इतिहासकार राम शरण शर्मा म्हणतात: "पांडुरंग वामन काणे, एक महान संस्कृतशास्त्रज्ञ, ज्याने सामाजिक सुधारणेचा विवाह केला, त्यांनी विद्वत्तेची पूर्वीची परंपरा चालू ठेवली. विसाव्या शतकात पाच खंडांमध्ये प्रकाशित "धर्मशास्त्राचा इतिहास" हे त्यांचे स्मारक कार्य आहे. प्राचीन सामाजिक कायदे आणि रीतिरिवाजांचा ज्ञानकोश. हे आपल्याला प्राचीन भारतातील सामाजिक प्रक्रियांचा अभ्यास करण्यास सक्षम करते." त्यांच्या पन्नासाव्या स्मृतिदिनानिमित्त राजभवन महाराष्ट्र इथे महाराष्ट्र राज्याचे राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी यांच्या हस्ते टपाल तिकिटाचे प्रकाशन झाले.
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कोकणातील वेदशास्त्रपारंगत व विद्वत्तेची मोठी परंपरा असलेल्या अशा मध्यमवर्गीय कुटुंबात काणे यांचा जन्म झाला. त्यांचे पणजोबा उत्तम ज्योतिषी आणि पंचांगकर्ते, तर आजोबा वैदिक पंडित, ज्योतिषी आणि उत्तम वैद्य होते. वडील वामनरावांना वेद, उपनिषदे, भगवद्गीता यांचे सखोल ज्ञान होते. महत्त्वाचा असा ऋग्वेद तर त्यांचा तोंडपाठ होता. वामनराव पुढे वकिलीची परीक्षा उत्तीर्ण होऊन, न्यायालयात इंग्रजीतून कामकाज करणारे पहिलेच वकील ठरले. म्हणजे परंपरागत भारतीय ज्ञान आणि आधुनिक इंग्रजी भाषेतील कायद्याचे ज्ञान असा मिलाफ असलेले असे त्यांचे वडील वामनराव ! डॉ. पां. वा. काणे यांचे दुसरे आजोबा म्हणजे आईचे वडीलही वैदिक पंडित आणि वैद्यकीचे उत्तम ज्ञान असलेले असे होते.
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पां.वा. काणे यांना अमरकोशातील सर्व श्लोक लहानपणीच तोंडपाठ होते. लहान वयातच त्यांनी विविध नियतकालिकांतून आधी मराठीतून आणि नंतर इंग्रजीतून लेखन सुरू केले. त्यांच्या ज्ञान आणि विद्वत्तेचा आलेख सतत वरच चढत गेला. बी.ए. आणि संस्कृतमधून एम.ए. करतानाच त्यांनी अनेक विषयांमध्ये संशोधन सुरू केले. संस्कृत, मराठी, हिंदी इंग्रजी या भाषांबरोबरच त्यांनी फ्रेंच आणि जर्मनसह अनेक भाषांवर प्रभुत्व मिळवले. अश्या रीतीने त्यांनी अतिशय मेहनतीने स्कॉलरशिप मिळवत आणि एकीकडे शिकवत राहून खूप विद्या संपादन केली. संस्कृत भाषेवर अतिशय प्रेम, त्यामुळे बी.ए.ला संस्कृतमध्ये सर्वप्रथम आले. त्याबद्दल त्यांना भाऊ दाजी पारितोषिक मिळाले. मग एल्एल.बी. झाले. नंतर झाला वेदान्त पारितोषिकासह ते मुंबईच्या विल्सन महाविद्यालय येथून एम.ए. झाले. त्यानंतर ’हिंदू-मुसलमान कायदा’ घेऊन एल्एल.एम. झाले. या परीक्षेत त्यांना व्ही.एन. मंडलिक सुवर्णपदक मिळाले. त्यांना मराठी, हिंदी,इंग्रजी खेरीज संस्कृत, जर्मन, फ्रेंच इ. भाषा अवगत होत्या.
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काणेंनी १९०४ साली रत्नागिरी जिल्ह्यातील एका शाळेत शिक्षक म्हणून कामास सुरुवात केली. नंतर ते एल्फिन्स्टन हायस्कूल, मुंबई येथे नोकरीवर होते. मुंबईच्याच गव्हर्नमेंट लॉ कॉलेजमध्येसुद्धा त्यांनी शिकवले होते. मुंबई विद्यापीठाचे ते सन १९४७ ते १९४९ दरम्यान कुलगुरू होते.
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प्राचीन संस्कृत वाङ्मयाचा अभ्यास, सामाजिक अभिसरणाचे भान या दोन अगदी वेगळ्या वाटणाऱ्या गोष्टींमधून काण्यांनी ’धर्मशास्त्राचा पंचखंडात्मक इतिहास’ नावाचा ग्रंथ सिद्ध केला. १९४१ साली त्यांनी प्राच्यविद्येवरचा ग्रंथ लिहिला.१९४२ साली त्यांना 'महामहोपाध्याय' ही पदवी मिळाली. 'हिस्टरी ऑफ संस्कृत पोएटिक्स' हासुद्धा त्यांचा अजून एक महत्त्वाचा ग्रंथ. भारतरामायणकालीन समाजस्थिति (१९११) आणि धर्मशास्त्रविचार (१९३५) हे ग्रंथ त्यांच्या महत्त्वाच्या मराठी ग्रंथांपैकी होत. प्राचीन भाषा, वाङ्मय, काव्य महाकाव्य, अलंकारशास्त्र यांचे प्रेम आणि कायदेविषयक जाण, तार्किक मांडणी, प्रथा आणि परंपरांचा कालानुरूप अर्थ लावण्याची क्षमता या आणि अशा शेकडो पैलूंचे एक विस्मयकारी मिश्रण पांडुरंगशास्त्रींच्या लेखनात झाले. खगोलविद्या, सांख्य, योग, तंत्र,पुराणे आणि मीमांसा या विषयांचा सखोल अभ्यास करून त्यांनी त्यांवर भाष्य लिहिले. त्यांचे हे प्रकांड पांडित्य, हा साक्षेपी व्यासंग ही तैलबुद्धी आणि सखोल संशोधनाची आस पुढील कित्येक पिढ्यांपर्यंत झिरपली गेली.
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प्राचीन ज्योतिषशास्त्र, खगोलविद्या, योगशास्त्र, पुराणे, टीका आणि मीमांसा, सांख्य तत्त्वज्ञान, महाराष्ट्राचा सांस्कृतिक इ���िहास, कौटिल्याचे अर्थशास्त्र, गणित, धर्मशास्त्र, मराठी भाषेचा सर्वांगीण अभ्यास, काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र, अशा असंख्य विषयांवर त्यांनी सुमारे ४० ग्रंथ, ११५ लेख, ४४ पुस्तक परिचय/परीक्षणे लिहिली आहेत. यावरून त्यांच्या ज्ञानाचा आवाका आणि प्रचंड विस्तार लक्षात येतो.
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ब्रिटिशांनी येथे आपले बस्तान बळकट करतांनाच इथल्या संस्कृती, विद्या, ग्रंथ, प्रथा, समाज, रूढी यांची कुचेष्टा सुरू केली. मिशनऱ्यांनी हिंदू धर्माची विविधांगी टिंगल सुरू केली. त्यांमध्ये त्यांनी इथल्या काही तथाकथित विद्वानांनाही सामील करून घेतले. इंग्रजीतील एखादी कविता ही संपूर्ण संस्कृत काव्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे, असे अत्यंत उर्मट उद्गार, मेकॉलेसारख्या अधिकाऱ्याने काढले होते. लॉर्ड कर्झनने तर भारतीयांना सत्य म्हणजे काय याची कल्पनाच नसल्याची दर्पोक्ती केली होती. डॉ.काणे या सर्व गोष्टींनी व्यथित झाले होते. १९२६ मध्ये त्यांनी व्यवहारमयूख हा ग्रंथ प्रसिद्ध केला. त्यावेळी केलेला अभ्यास, जमविलेली कागदपत्रे आणि अन्य साधने, आजवरचे धर्म आणि कायदा यांचे ज्ञान अशा भक्कम तयारीनिशी त्यांनी भारतीय धर्मशास्त्राचा इतिहास लिहिण्यास सुरुवात केली. इंग्रज आणि इतर युरोपीय देशांना कळावे म्हणून त्यांनी हा परिपूर्ण इतिहास इंग्रजीत लिहिला. सुमारे ७००० पाने आणि ५ खंडांमध्ये त्यांनी लिहिलेला हा इतिहास आजही जागतिक पातळीवर अचूक आणि प्रमाण म्हणून मानला जातो.
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समाजसुधारणा आणि पुरोगामी विचारांचा पुरस्कार हे सुद्धा डॉ. काणेंची वैशिष्ट्ये होती.
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भारतीय कायदे आणि रुढींचा अभ्यास असलेल्या डॉ. काणेंनी तत्कालीन अनिष्ट चालींविरुद्ध आवाज उठवला होता.
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विधवांना केस कापून टाकण्याची सक्ती करणे, अस्पृश्यता यांसारख्या रुढींना त्यांनी तीव्र विरोध केला. एका केस न काढलेल्या विधवेला पंढरपुरात विठ्ठलाची पूजा करण्याचा अधिकार मिळावा यासाठी त्यांनी तिचे वकीलपत्र घेतले होते.
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आंतरजातीय विवाह, विधवाविवाह तसेच घटस्फोटाचा अधिकार याचाही त्यांनी पुरस्कार केला. पण वकिली आणि शिक्षणक्षेत्रात सक्रिय असणाऱ्या काणेंनी प्रत्यक्ष राजकारणात सहभाग घेतला नाही. सन १९५३ ते १९५९ या काळात पां.वा. काण्यांची राज्यसभेवर नियुक्ती झाली होती.
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महामहोपाध्याय पां.वा. काणे ह्यांना सन १९६३मध्ये भारताचा " भारतरत्न " ह��� सर्वोच्च नागरी 'किताब देण्यात आला.
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भारतात २०१९ सालापर्यंत ४५ व्यक्तींना भारतरत्न हा सन्मान देण्यात आला. भारतीय टपाल खात्याचा एक खास नियम आहे. सहसा जिवंत व्यक्तीवर टपाल तिकीट काढले जात नाही. तथापि या नियमाला अपवाद म्हणून आजवरच्या इतिहासात डॉ. विश्वेश्वरैय्या, महर्षी धोंडो केशव कर्वे, राजीव गांधी, मदर तेरेसा आणि सचिन तेंडुलकर या पाच व्यक्तींवर त्यांच्या हयातीतच टपाल तिकिटे प्रसिद्ध झाली. डॉ. विश्वेश्वरैय्या, महर्षी कर्वे यांना भारतरत्न सन्मान मिळाला आणि त्यांनी वयाची शंभरी पार केली म्हणून त्यांच्यावर हयातीतच टपाल तिकीट निघाले. काँग्रेसच्या शताब्दीनिमित्त तत्कालीन पक्षाध्यक्ष म्हणून राजीवजींवर तिकीट निघाले. मदर तेरेसांना नोबेल पारितोषिक जाहीर झाल्यावर, घाईघाईने आपल्या सरकारने त्यांना भारतरत्न दिले आणि तिकीटही प्रसिद्ध केले. २०० कसोटी पूर्ण करण्याच्या जागतिक विक्रमाबद्दल भारतरत्न सचिन तेंडुलकरवर दोन तिकिटे निघण्याचा विक्रम प्रस्थापित झाला. मात्र लता मंगेशकर आणि अमर्त्य सेन हे दोन्हीही भारतरत्न हयात असल्याने त्यांच्यावर टपाल तिकीट प्रसिद्ध झाले नाही.
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डॉ. पां. वा. काणे हे अत्यंत विद्वान पंडित म्हणून त्यांना अनेक सर्वोच्च सन्मान लाभले. त्यांना भारतरत्न देण्यात आल्यावर खरेतर त्या किताबाचीच शान वाढली. पण आजवर प्रत्येक भारतरत्नावर टपाल तिकीट काढणारे भारतीय टपाल खाते आणि सरकार, फक्त डॉ. पां. वा. काणे यांनाच साफ विसरले. नेहरू, इंदिराजी, राजीव गांधी, मोरारजी देसाई असल्या भारतरत्नांवर तर अनेकदा टपाल तिकिटे निघाली. मग फक्त डॉ. पां. वा. काणे यांच्यावरच एकदासुद्धा टपाल तिकीट न काढण्याचे कारण समजत नाही.
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त्यांच्या पन्नासाव्या स्मृतिदिनानिमित्त राजभवन महाराष्ट्र इथे महाराष्ट्र राज्याचे राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी यांच्या हस्ते टपाल तिकिटाचे प्रकाशन झाले....
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पांगरा तर्फे लसीना हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील परभणी जिल्ह्यातील पूर्णा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे आहे.येथे नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी हा हिवाळा हंगाम असतो. हिवाळ्यात दिवसा तापमान ३० सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान १५ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते.जून ते ऑक्टोबर हा पावसाळा हंगाम असतो. पावसाळ्यात दिवसा तापमान ३१ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २३ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते. पावसाळ्यात मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो. वार्षिक पर्जन्यमान ५६० मिमी असते.मार्च ते मे हा उन्हाळा मोसम असतो. उन्हाळ्यात दिवसा तापमान ३९ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २५ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते.
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पांगरी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील संगमेश्वर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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पांगरी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील मध्य कोकणातील रायगड जिल्ह्यातील महाड तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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धामणी हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील यवतमाळ जिल्ह्यातील यवतमाळ तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे असून उन्हाळ्यात अतिउष्ण तर हिवाळ्यात अतिथंड असते.पावसाळ्यात मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.
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पांगुळ गरुड (इंग्लिश: Short-toed Eagle; हिंदी: सापमार) हा एक पक्षी आहे.
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हा पक्षी आकाराने घारीपेक्षा मोठा असतो. याचा रंग काळा असून छातीखालचा रंग पांढरा असतो. छातीवर गडद बदामी रंगाच्या कड्या.घुबडसारखे मोठे डोके. उडताना खालचा भाग धूसर चंदेरी दिसतो. डोके काळसर. शेपटीवर काळपट आडवे पट्टे.(नेहमी ३ पट्टे) पायांवर पिसे नसतात. चेहऱ्यावर केसांसारखी दिसणारी पिसे. लहान पक्षी उदी रंगाचा. नर-मादी दिसायला सारखे असले, तरी मादी नरापेक्षा मोठी असते.
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भारतात निवासी. अलीकडे नेपाळात नोव्हेंबरमध्ये दिसल्याची नोंद.
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डिसेंबर ते मार्च महिन्यात वीण.
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विरळ जंगले, माळराने आणि समुद्रकिनारे.
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पाञ्चजन्य (अथवा पांचजन्य) हा भगवान विष्णू यांचा शंख आहे . श्रीकृष्ण, श्रीविष्णूंचे अवतार, हे पांचजन्य नावाचा शंख धारण करत असत असे वर्णन महाभारतात आढळते. महाभारताचा एक भाग असलेल्या श्रीमद्भगवद्गीतेमध्ये वासुदेवांनी कुरुक्षेत्र युद्धाच्या वेळी पाञ्चजन्य वापरल्याचे सांगितले आहे. हिंदू धर्मात शंख अत्यंत पवित्र मानला जातो. देवतांनाही शंखाच्या नादाने आवाहन केले जाते.भागवत पुराणानुसार, सांदीपनी ऋषींच्या आश्रमात कृष्णाचे शिक्षण पूर्ण झाल्यानंतर त्यांनी त्यांना गुरुदक्षिणा घेण्याचा आग्रह केला. तेव्हा ऋषी म्हणाले, समुद्रात बुडलेल्या माझ्या मुलाला घेऊन या, तीच माझी दक्षिणा.[१] तेव्हा श्रीकृष्णाने समुद्रकिनारी जाऊन शंखासुराचा वध केला. शंखासुराचा वध केल्यानंतर त्याच्या शरीराचे कवच वाचले. त्यातून या शंखाचा जन्म झाला म्हणून त्या शंखाचे नाव पंचजन्य असे झाले. दुसऱ्या आख्यायिकेनुसार, भगवान विष्णूने शंखासुर राक्षसाचा वध करण्यासाठी मत्स्य अवतार घेतला. शंखासुरने ब्रह्मदेवाचे सर्व वेद चोरले आणि समुद्रात लपला. मत्स्य अवतार घेऊन भगवान विष्णूने त्या सर्व वेदांना शंखासुरापासून मुक्त करण्यासाठी त्याचा वध केला.[२]
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पौराणिक कथेनुसार, शंखासुर हा कंसाने बाल श्रीकृष्णाला मारण्यासाठी पाठवलेला राक्षस होता. शंखासुर आपल्या मोठ्या आवाजाने लोकांना खूप वेदना देत असे. श्रीकृष्णाने शंखासुराचा वध केला. युद्धात पराभूत होऊन मृत्यू पावत असताना शंखासुराने परमेश्वराला ओळखले आणि त्याची क्षमा मागितली आणि त्याच्यावर दया करण्याची विनंती केली. भगवान श्रीकृष्णाने त्याला वरदान दिले की मी शंखाशिवाय किंवा शंखाशिवाय माझी पूजा स्वीकारणार नाही. या कारणास्तव पूजेत शंखाचे विशेष स्थान आहे.
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भगवान श्रीविष्णूचा पांचजन्य शंख श्रीलंकेची राजधानी कोलंबोच्या राष्ट्रीय संग्रहालयात ठेवण्यात आला आहे.
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पाचजन्य हे वेगवेगळ्या अर्थाने वापरले जाते. त्याचे काही अर्थ पुढीलप्रमाणे आहेत.
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पांजरेपार हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील उमरेड तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पांझरा नदी हा लेख अपूर्ण आहे आणि पूर्ण करण्यास आपण हातभार लावू शकता.
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हा लेख संपादित करण्यासाठी येथे टिचकी द्या.
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'विकिपीडिया' मध्ये अपूर्ण लेख संपादित करण्यासाठी मदतीचा लेख येथे उपलब्ध आहे.
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पांझरा ही महाराष्ट्रातील नाशिक जिल्ह्यातील एक नदी आहे. धुळे जिल्ह्यातील ही नदी तापीची उपनदी आहे. तिची लांबी सुमारे १६० कि.मी. आहे.
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हिचा उगम जिल्ह्यातील नैऋत्य कोपऱ्यात, सह्याद्रीतील गाळ्ण्याच्या डोंगरात व उजवीकडील गाळण्याच्या डोंगरात झाला असून, ती पिंपळनेरवरून डावीकडील धानोऱ्याचे डोंगर व उजवीकडील गाळण्याचा डोंगर यांमधून वाहते.
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ही पूर्ववाहिनी नदी धुळे शहरापासून पुढे ८ कि.मी. अंतर पूर्वेकडेच वाहत जाते. त्यानंतर तिच्या मार्गात आलेल्या भित्तिप्रस्तराला फोडून ती एका अरूंद दरीतून एकदम उत्तरेकडे वळसा घेते.
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नंतर थाळनरेपासून सुमारे ८ कि.मी. अंतरावर असलेल्या मुडावद येथे ती तापी नदीस मिळते. नदीच्या पूर्वप्रवाहाच्या भागात तिच्या डाव्या तीराला समांतर पसरलेल्या लांबट आकाराच्या अनेक डोंगररांगा आढळतात.
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पांझरा नदीपासून वर्षभर पाणीपुरवठा होत असून, अनेक ठिकाणी प्रवाहाचे पाणी अडवून सिंचनाच्या सोयी केल्या आहेत. मुख्यतः साक्री धुळे आणि सिंदखेड या तालुक्यातील जमिनीस जलसिंचनाचा फायदा झाला आहे. तापी-पांझरा संगमाजवळ महाशिवरात्रीस यात्रा भरते. पांझरा नदी काठावर झुलता पुल पर्यटनासाठी आणि १०५ फुट उंचीचा भगवान महादेवांचा पंचधातूचा पुतळा उभारण्यात आला आहे. पांझरा नदीकाठी धुळे शहरात, एकविरा मातेचे मंदिर आहे. या ठिकाणी भाविकांची नेहमी गर्दी असते, नवरात्रला यात्रा भरते, आणि गणपती मंदिरसुद्धा पांझरेचा तिरावरच वसले आहे, त्या ठिकाणी झुलता पूल आणि पूर्वीचा लहान पूल, इंग्रजाच्या काळातला पूल याच नदीवर आहे असे छोटे मोठे एकूण 7 पूल धुळे शहरातच आहेत.
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अडुळा नदी · अळवंड नदी · आरम नदी · आळंदी नदी · उंडओहोळ नदी · उनंदा नदी · कडवा नदी · कवेरा नदी · काश्यपी (कास) नदी · कोलथी नदी · खार्फ नदी · गिरणा नदी · गुई नदी · गोदावरी नदी · गोरडी नदी · चोंदी नदी · तान (सासू) नदी · तांबडी नदी · दमणगंगा (दावण) नदी · धामण नदी · नंदिनी (नासर्डी) नदी · नार नदी · पर्सुल नदी · पांझरा नदी · पार नदी · पिंपरी नदी · पिंपलाद नदी · पुणंद नदी · बाणगंगा नदी · बामटी (मान) नद�� · बारीक नदी · बोरी नदी · भोखण नदी · मान (बामटी) नदी · मासा नदी · मुळी नदी · मोसम नदी · म्हाळुंगी नदी · वडाळी नदी · वाकी नदी · वाग नदी · वाल नदी · वालदेवी नदी · वैतरणा नदी · वैनत नदी · वोटकी नदी · सासू (तान) नदी
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विठ्ठल (विठोबा (IAST: Viṭhobā), ज्याला विठ्ठल (IAST: Viṭṭhala), आणि पांडुरंग (IAST: Pāṇḍuraṅga) म्हणूनही ओळखले जाते, हा एक हिंदू देव आहे जो भारतातील महाराष्ट्र आणि कर्नाटक राज्यात प्रामुख्याने पूजला जातो. तो विष्णू देवाचे रूप आहे. विठोबाला अनेकदा एका सावळा रंगाच्या तरुण मुलाच्या रूपात चित्रित केले जाते, कटीवर हात ठेवून विटेवर उभा राहतो, कधीकधी त्याची पत्नी रखुमाई सोबत असते. विठोबा हे मूलत: एकेश्वरवादी, गैर-विधीवादी भक्ती-चालित[१][२] महाराष्ट्रातील वारकरी श्रद्धा आणि कर्नाटकातील द्वैत वेदांतात स्थापन झालेल्या ब्राह्मणी हरिदास संप्रदायाचे केंद्रस्थान आहे. विठोबा मंदिर, पंढरपूर हे त्यांचे मुख्य मंदिर आहे. विठोबाच्या आख्यायिका त्याच्या भक्त पुंडलिकाभोवती फिरतात ज्याला देवता पंढरपूरला आणण्याचे श्रेय दिले जाते आणि वारकरी श्रद्धेच्या कवी-संतांना तारणहार म्हणून विठोबाच्या भूमिकेभोवती फिरते. वारकरी कवी-संत हे विठोबाला समर्पित आणि मराठीत रचलेल्या भक्तीगीतांच्या अनोख्या शैलीसाठी ओळखले जातात. विठोबाला समर्पित इतर भक्ती साहित्यात हरिदासाची कन्नड स्तोत्रे आणि देवतेला प्रकाश अर्पण करण्याच्या विधींशी संबंधित सामान्य आरती गाण्याच्या मराठी आवृत्त्यांचा समावेश आहे. आषाढ महिन्यातील शयनी एकादशी आणि कार्तिक महिन्यात प्रबोधिनी एकादशीला विठोबाचे सर्वात महत्त्वाचे सण होतात. विठोबा आणि त्यांच्या संप्रदायाचे इतिहासलेखन हे त्यांच्या नावाबाबतही सतत चर्चेचे क्षेत्र आहे. जरी त्याच्या पंथाची उत्पत्ती आणि त्याचे मुख्य मंदिर अशाच प्रकारे वादविवाद होत असले तरी ते १३ व्या शतकापर्यंत अस्तित्वात असल्याचे स्पष्ट पुरावे आहेत.[३]
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हे वारकरी संप्रदायाचे (भागवत धर्माचे)प्रमुख दैवत मानले जाते.[४][३] विठोबा, विठुराया, पांडुरंग, किंवा पंढरीनाथ ही हिंदू देवता मुख्यतः भारताच्या महाराष्ट्र व कर्नाटक ह्या राज्यात पूजिली जाते. विठोबा, ज्याला वि(त) थल(अ) आणि पांडुरंगा म्हणूनही ओळखले जाते. त्याला सामान्यतः देव विष्णूचे किंवा तथा अवतार, कृष्णाचे रूप मानले जाते.[५]कटेवर हात ठेवून विठोबा उभा राहतो, कधीकधी त्याची पत्नी रखुमाई सोबत असते. विठोबा हा महाराष्ट्रातील मराठा, वैष्णव, हिंदू ,वारकरी संप्रदायाचे व कर्नाटकातील हरिदास संप्रदायाचे आराध्य दैवत आहे.[४][६]
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विठोबा या देवतेचा उगम आणि विकास ही विशेषतः वैष्णव संप्रदायातील म्ह्तावाची संकल्पना म्हणून ओळखली जाते.[३]
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विठोबा हा कृष्णाचा द्वापार युगातील दुसरा आणि दशावतारातील नववा अवतार आहे असे मानले जाते. परंतु शास्त्र-पुराणांमध्ये विठ्लाला बौध्य वा बोधराज म्हटले आहे.
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गरुड पुराणामध्ये वर्णन केल्याप्रमाणे बौध्य हा विशाल भाल असलेला, तेजस्वी नेत्रांचा, मौन धारण केलेला, कटि-कर ठेवून उभा असा आहे. हे वर्णन पूर्णपणे विठ्ठ्लाला लागू होते. विठोबाच्या प्रतिमा ह्या कटीवर हात ठेवून, भक्त पुंडलिकाने टाकलेल्या विटेवर उभ्या राहिलेल्या सावळ्या पुरुषाच्या वेषात दर्शवितात. त्याच्या संगे काही वेळा पत्नी रखुमाई उर्फ रुक्मिणी उभी असते. विठोबा गेली २८ युगांपासून विटेवर उभा आहे अशी मान्यता आहे. पुंडलिकाने वीट फेकाल्याने आजही वारकरी त्याचा उल्लेख " पुंडलिक वरदा हारी विठ्ठल श्री ज्ञानदेव तुकाराम पंढरीनाथ महाराज की जय." असा करतात.
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त्याचे प्रमुख मंदिर महाराष्ट्रातील सोलापूर जिल्ह्यातील
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संत नामदेव, संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर आणि संत एकनाथ इत्यादी विठोबाचे थोर भक्त १३व्या ते १७व्या शतकात होऊन गेले. वारकरी संतांनी विठोबाच्या स्तुतीत अनेक मराठी अभंगांची रचना केली आहे. कन्नड कवींनी कानडी श्लोक व आदि शंकराचार्यांनी पांडुरंगाष्टक स्तोत्र रचिले आहे.[९] विठोबाचे प्रमुख सण शयनी एकादशी व प्रबोधिनी एकादशी आहेत.
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पंढरीच्या सावळ्या परब्रह्मांची विविध काळात विविध नावांनी उपासना केली आहे. पंढरीनाथ, पांडुरंग, पंढरीराया, विठाई, विठोबा, विठुमाऊली, विठ्ठल गुरूराव, पांडुरंग, हरि, इ. नांवे भक्तांनी दिलेली आढळतात.[१०]आज सर्वपरिचित व प्रचलित नांव म्हणजे 'पांडुरंग'आणि 'श्रीविठ्ठल'. विठ्ठल शब्दाची उत्पत्ती कशी झाली याचा अनेक इतिहासकारांनी व संशोधकांनी अभ्यास केला आहे.बरेच लोक विठ्ठल हा शब्द विष्णू या शब्दाचा अपभ्रंश आहे असे म्हणतात. कानडी शिलालेखातही जे विठ्ठरस, विट्ट असे शब्द आले आहेत ते विष्णू शब्दाची व्याप्ती सांगणारेच आहेत असे मानले जाते.संत तुकोबारायांनी विठोबा शब्दाची उत्पत्ती आपल्या एका अभंगात अत्यंत सोप्या भाषेत केली आहे. तो असा की वि म्हणजे ज्ञान ठोबा म्हणजे आकार -ज्ञानाचा आकार किंवा ज्ञांनाची मूर्ती म्हणजे विठोबा किंवा वि म्हणजे गरूड अणि ठोबा म्हणजे आसन अर्थात गरूड ज्याचे आसन आहे तो विष्णू तोच कटीवर कर ठेवूनि विटेवरी उभा आहे. श्रीकृष्ण, श्रीविष्णू आणि श्रीविठोबा हे एकच आहेत. श्रीकृष्णाचा अवतार जन्म द्वापार युगात बुधवार दि. १३ जून इ.स.पु. -३२२८ श्रावण वद्य अष्टमी, श्रीमुख नाम संवत्सर ला पहाटे झाला. विठोबा म्हणजे श्रीकृष्ण म्हणून बुधवार हा विठ्ठलाचा वार मानला जातो. आजही वारकरी लोक बुधवारी पंढरपुरातून जात नाहीत.
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पुराणातील श्लोकाप्रमाणे:-
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वि कारो विधाताय, ठ कारो नीलकण्ठ |
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ल कारो लक्ष्मीकांत, विठ्ठलाभिधिनीयमे ||
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अर्थ-
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याप्रमाणे म्हणजेच ब्रह्मा विष्णू महेश हे एकाच ठिकाणी म्हणजेच विठ्ठल नावात आहेत.
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दिनांचा दयाळू, भक्तकामकल्पप्रदुम आणि योगियादुर्लभ असलेल्या विठुरायाची मूर्ती स्वयंभू अशी वालुकामय शिलेची आहे. श्रींच्या मस्तकी मुकुटासारखी उंच कंगोरेदार टोपी आहे. याचा आकार शिवलिंगासारखा असल्यामुळे त्यास शिवलिंग म्हणतात. श्रींचे मुख उभट आहे. गाल फुगीर आहेत. दृष्टी समचरण आहे. कानी मकर कुंडले आहेत. गळ्यात कौस्तुभमणी आहे. पाठीवर शिंके असून ह्रदयस्थानी श्रीवत्सलांछन आहे. दोन्ही दंडावर अंगद असून मनगटावर मणिबंध आहेत. नितंब कराभ्याम् धृतो येन तस्मात् असे आद्यशंकराचार्यांनी श्रीविठ्ठल मूर्तीचे पांडुरंगाष्टक लिहून सुंदर व मार्मिक वर्णन केलेले आहे. श्रीविठ्ठलाने हात कटेवर ठेवलेले आहेत. उजव्या हातात कमळाचा देठ असून हात उताणा, अंगठा खाली येईल असा टेकविला आहे, तर डाव्या हातात शंख आहे. श्रींचे कमरेला तिहेरी मेखला आहे. छातीवर उजवीकडे भृगुऋषींनी पादस्पर्श केलेली खूण आहे. ब्रह्मदेव निघालेली नाभी आहे. कमरेला वस्त्र आहे. वस्त्राचा सोगा पावलापर्यंत आहे. डाव्या पायावर मुक्तकेशी नावाच्या दासीने बोट लावलेची खूण आहे. अशी दगडी विटेवर उभी असलेली मूर्ती आहे.[११]
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श्रींचे चरणस्पर्शदर्शन अथवा चरणी मस्तक ठेवून दर्शन घेऊन समाधान प्राप्त करण्याचे भाग्य केवळ इथेच आहे.
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द्वापार युगात मुचकुंद नावाचा एक पराक्रमी राजा होवून गेला. देव-दैत्यांच्या युद्धात देवांनी त्याचे सहाय्य मागितले. मुचकुंद राजाने अतिशय पराक्रम गाजवून देवांना विजय मिळवून दिला. देवांनी प्रसन्न होवून वर मागण्यास सांगितले तेव्हा मुचकुंद म्हणाला, अत्यंत श्रमामुळे मी थकलो, मला एकांती गाढ निद्रा हवी. जो कोणी माझी निद्राभंग करील, तो माझ���या दृष्टीक्षेपाने भस्म होवून जावा. देवांनी तथास्तु म्हटले. राजा एका गुहेत निद्राधीन झाला. पुढे कृष्ण अवतारात जरासंधाकडून कालयौवन नावाचा अत्यंत बलाढ्य असा राक्षस कृष्णाकडे युद्धासाठी आला. हा राक्षस शस्त्र किंवा अस्त्राने मरणार नसल्याने भगवान श्रीकृष्णाने युक्तीने त्या दैत्यास ज्या गुहेत मुचकुंद राजा निद्राधीन झाला होता, त्या गुहेत नेले झोपलेल्या मुचकुंदावर आपल्या अंगावरचा शेला टाकला व स्वतः श्रीकृष्ण अंधारात लपले. भगवान श्रीकृष्णाचा शेला पाहून काळयौवनास वाटले की, कृष्णच झोपला आहे, म्हणून त्याने निद्रिस्त राजावर लत्ताप्रहार केले.मुचकुंद राजाची निद्राभंग झाली.क्रोधीत नजरेने कालयौवनाकडे पाहताच तो दैत्य कापराप्रमाणे जळून भस्म झाला. नंतर श्रीकृष्णाने राजाला दर्शन दिले. भगवान श्रीकृष्णांनी सर्व प्रसंग राजाला सांगितला. तेव्हा मुचकुंद राजाने आता दृष्टीपुढे ऐसाचि तू राहे अशी प्रार्थना केली. भगवान श्रीकृष्णाने पुढील जन्मी तुझी इच्छा पूर्ण करीन, असे अभिवचन दिले. हा मुचकुंद राजा कलियुगात भक्त पुंडलिकाच्या रूपाने जन्माला आला. दिंडीर वनात (पंढरपूर क्षेत्राजवळ) चंद्रभागेतिरी लोहदंड तीर्थाजवळ वास्तव्य करून राहिला.
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श्रीकृष्णास असलेल्या मुख्य ८ भार्यांपैकी राधिकादेवीस जवळ बसवून घेतल्याचे श्रीरूक्मिणी देवीने पाहिले असता सवतीमत्सरापोटी श्रीरूक्मिणी रागाने निघून येऊन दिंडिर वनात तपश्चर्या करीत बसली. त्यावेळी रूक्मिणीचे शोधार्थ भगवान श्रीक्षेत्र पंढरपूरात आले असता रूक्मिणीचा शोध घेतला असता दिंडीर वनात तपश्चर्या करीत असल्याचे दिसले म्हणून तपश्चर्या भंग करू नये व मुचकुंद राजास पूर्वजन्मी दिलेल्या वरानुसार रूक्मिणीच्या शोधाचे निमित्त साधून तीर्थक्षेत्री पुंडलिकासाठी आले.
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पुंडलिक पूर्वाश्रमी माता-पित्याचा द्रोह करीत असे. पत्नीच्या हट्टासाठी तो तिच्याबरोबर काशीयात्रेस निघाला. जाताना कुक्कुट मुनीच्या आश्रमात राहिला. कुक्कुटमुनी परम मातृ-पितृ भक्त होते. माता-पित्याची निस्सीम सेवा केल्यामुळे त्यांना अलौकिक सामर्थ्य प्राप्त झाले होते. पापी, दुराचारी अधमांनी स्नान केल्याने दूषित मलीन झालेल्या गंगा, यमुना, सरस्वती या नद्या मालिन्यनाशासाठी व शुद्धतेसाठी आश्रमात रोज सेवा करीत. त्यामुळे त्यांना पावित्र्य व शुद्धता प्राप्त होई. हा प्रसंग पुंडलिकाने अनुभवला. नद्यांनी देवीरूपात त्यास उपदेश केला. त्याला ज्ञान प्राप्त झाले.त्याने माता-पित्याची अखंड सेवेची दीक्षा घेतली.तो पुन्हा पंढरीस आला. भक्तिभावाने माता-पित्याची सेवा करू लागला.
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पुंडलिकाची मातृ-पितृ भक्ती व सेवाव्रत पाहून भगवंत संतुष्ट झाले. ते पुंडलिकाचे भेटीसाठी लोहदंड तीर्थाजवळ आले. पुंडलिक माता-पित्याच्या सेवेत मग्न होते. भगवंताने त्यास दर्शन दिले, वर दिला. पुंडलिकाने त्याचे माता-पित्याची सेवा पूर्ण होईपर्यंत देवाला विटेवर उभे राहून प्रतिक्षा करण्याची विनंती केली. भगवंतानी त्याची प्रार्थना मान्य केली. पुंडलिकांनी देवाला उभा राहण्यासाठी वीट फेकली, ती वीट म्हणजे वृत्रासुराच्या शापाने दग्ध झालेला इंद्रच होय. भीमातीर म्हणजे दुसरी द्वारका, भगवान श्रीकृष्ण विठ्ठल रूपात कटीवर हात ठेवून भक्तासाठी युगे अठ्ठावीस अजूनही उभा आहे. संत शिरोमणी नामदेवराय आरतीत म्हणतात || पुंडलिकाभेटी परब्रह्म आले गा ||
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महाराष्ट्राचे आराध्यदैवत प्रभु विठ्ठल पांडुरंगाची आषाढी एकादशी निमित्त शासकीय महापूजा ही महाराष्ट्राचे विद्यमान मुख्यमंत्री करतात. ती सर्वोच्च शासकीय महापूजा असते.[१२]
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दररोज पहाटे चार वाजता पंढरपुरातील विठ्ठलाचे मंदिर उघडल्यानंतर देवाला उठवण्यासाठी प्रार्थना म्हटली जाते.[३] प्रार्थनेचे मंत्र काकड्याच्या वैदिक आणि पौराणिक मंत्रांप्रमाणे असतात. सव्वाचार वाजता काकड्याला सुरुवात होते. कान्ह्या हरिदास रचित ‘अनुपम्य नगर पंढरपूर’ ही आरती म्हटली जाते. आरतीनंतर देवाला खडीसाखर आणि लोण्याचा प्रसाद दाखवला जातो. नंतर नित्यपूजा सुरू होते. त्यामध्ये प्रथम संकल्प, गणेशपूजा, भूमिपूजा, वरुणपूजा, शंखपूजा, घंटापूजा होते. त्यानंतर पुरुषसूक्ताचे पठण करत पूजा केली जाते. सकाळी ११ वाजता विविध पक्वान्नांचा महानैवेद्य दाखवला जातो.[१३]
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दुपारी चार वाजता विठ्ठलमूर्तीचा चेहेरा पुसून देवाला नवीन पोषाख आणि अलंकार घातले जातात. सायंकाळी सात वाजता धुपारती होते. या वेळी प्रथम पाद्यपूजा नंतर गंध लावून हार घालतात. धूप, दीप ओवाळून दहीभाताचा नैवेद्य दाखवतात. त्या वेळी उपस्थित हरिदास आणि भक्त मंडळी
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‘जेवी बा सगुणा सख्या हरी, जेवी बा सगुणा,
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कालविला दहीभात आले मिरे लवणा,
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साय दुधावरी साखर रायपुरी कानवले चिमणा,
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उद्धवचिद्घन शेष ही इच्छितो गोपाळा रमणा’’
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हे पद म्हणतात. शेवटी ‘युगे अठ्ठावीस’ ही आरती म्हटली जाते आणि धुपारती होऊन उपचार संपतो.
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नित्योपचारातील शेवटचा उपचार म्हणजे शेजारती. रात्री साडेअकरा ते पावणेबाराच्या सुमारास शेजारती केली जाते. प्रथम विठ्ठलमूर्तीची पाद्यपूजा होते. त्यानंतर देवाला दुपारी घातलेला पोषाख बदलला जातो. धोतर नेसवून अंगावर उपरणे घातले जाते. डोक्याला पागोटे बांधले जाते. पोषाख बदलत असताना देवाच्या आसनापासून शेजघरापर्यंत पायघड्या घातल्या जातात. देवाला गंध लावून नंतर हार घालतात. त्या वेळी ‘हरि चला मंदिरा ऐशा म्हणती गोपिका’ इत्यादी आरत्या म्हटल्या जातात. शेवटी मंत्रपुष्पांजली म्हणून देवाला फुले अर्पण केली जातात आणि शेजारती संपते.
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विठ्ठल भक्तीतून मंदिरातील सर्व उपासना, पूजाअर्चा करण्याची साग्रसंगीत व्यवस्था लावण्याचे श्रेय बाबा पाध्ये यांच्याकडे जाते.[१५] बडवे यांनी विठ्ठलाचे आणि उत्पात यांनी रखुमाईचे पालकत्व घ्यायचे असा दंडक त्यांनी घालून दिला. बडवे आणि पुजारी या दोघांनी विठ्ठलाची नित्य सेवा, काकडारती, महापूजा, दुपारचा नैवेद्य, सायंकाळची आरती आणि शेजारती हे सर्व पहायचे. सात सेवाधाऱ्यांनी त्यांना मदत करायची आणि त्यांची कामेदेखील ठरलेली, अशी चोख व्यवस्था बाबा पाध्ये यांनी लावून दिली होती.[१५]
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संस्कृत पंडित असलेल्या बाबा पाध्ये यांनी रचलेल्या, विठ्ठलाची महती कथन करणाऱ्या १८व्या शतकातील ‘श्रीविठ्ठल स्तवराज’ या संस्कृत काव्याचे हस्तलिखित पंढरपूर येथील मंजूळ घराण्याकडे आहे. या काव्यामध्ये ३५ श्लोक आहेत. हस्तालिखिताची सुरुवातच ‘नमो भगवते विठ्ठलाय’ अशी आहे. ‘छंद देवता कीलक न्यास’ या शास्त्रीय पद्धतीने हे काव्य रचले आहे. मात्र, हा काव्यग्रंथ अपूर्णावस्थेतच आहे.
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'विठ्ठलध्यानमानसपूजा " या ग्रंथात बाबा पाध्ये यांनी विठ्ठल देवतेच्या रूपाचे वर्णन केलेले आहे.[१५]
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देहू व आळंदीहून दरवषी लाखो वारकरी पायी वारीने पंढरपूरला जातात[३]. आळंदीहून संत ज्ञानेश्वर, सोपानदेवांची सासवडहून, मुक्ताईची मुक्ताईनगरहून आणि निवृत्तीनाथांची त्र्यंबकेश्वर तर संत तुकाराम महाराज यांची देहू येथून अश्या पालख्या पंढरपूरला येतात.[३] काही शतके ही परंपरा चालत आली आहे.[१६]
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विठोबा हा देव भक्त भक्तां���्या भेटीला आलेला आहे व वारकरी संतांचा कैवारी समजला जातो. श्रीहरी विठ्ठल नामे अवतार घेऊन परमभक्तांना भेटून स्वरूप दाखविले होते आणि भक्तांची सेवा केल्याचे फळ म्हणून मोक्षास पात्र केले होते.
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आजवर जी पांडुरंग माहात्म्ये उपलब्ध आहेत, त्यांत संस्कृतमधील स्कंदपुराण, पद्मपुराण आणि विष्णू पुराण यांतील तीन माहात्म्ये आहेत. मराठी भाषेत श्रीधर नाझरेकर, प्रल्हाद महाराज बडवे आणि गोपाळबोधो यांनी लिहिलेली माहात्म्ये प्रसिद्ध आहेत. शिवाय आणखीही काही माहात्म्ये आहेत.[१७]
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मराठी कवी श्रीधरस्वामी नाझरेकर यांनी मराठी भाषेत पांडुरंग माहात्म्य रचले तो काळ इ. स. १६९० ते १७२० दरम्यानचा आहे. मात्र तेनाली राम यांनी रचलेले तेलुगू पांडुरंग माहात्म्य त्यापूर्वी म्हणजे इ.स. १५६५ चे आहे. संस्कृत भाषेतील पंचमहाकाव्यांप्रमाणेच तेलुगू भाषेतही पाच महाकाव्ये प्रसिद्ध आहेत. त्यापैकी एक महाकाव्य म्हणून तेनाली राम यांच्या ‘पांडुरंग माहात्म्य्यनु’या रचनेचा उल्लेख केला जातो. तेनाली राम यांचे माहात्म्य स्कंद पुराणावर आधारित आहे. या काव्याचे पाच आश्वास (अध्याय) आहेत. शिव-पार्वती संवादातून या तेलुगू पांडुरंग माहात्म्याचे कथानक उलगडते. या माहत्म्यात दक्षिणतीरी पौंडरिक क्षेत्र असल्याचा उल्लेख आहे. हे महाकाव्य दक्षिणी भारतात भाविकांच्या पठणाचा भाग आहे.
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अकबर-बिरबल, कालिदास – भोज राजा यांच्या चातुर्यकथा जशा प्रसिद्ध आहेत, तशाच तेनाली राम (काळ इ.स. १५०५ ते १५८०) यांच्याही कथा विख्यात आहेत.
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पंढरपूरच्या विठ्ठलाशी संबंधित नवी माहिती, नवे विचार देणारे ‘कथा पांडुरंगाच्या’ हे पुस्तक वा.ल. मंजूळ यांनी लिहिले आहे. हस्तलिखितांतून सापडलेले विठ्ठलसहस्रनाम आणि इतर माहिती, अविंध संतांची विठ्ठलभक्ती, विठ्ठल मंदिरातली धार्मिक स्थळे आणि त्यांचा दुर्लक्षित इतिहास, पंढरपूरचा वास्तुवारसा, विठ्ठलावर संशोधन करणारे परकी संशोधक, विठ्ठलाव्यतिरिक्तचे पंढरपूर अशा वेगवेगळ्या विषयांवर मंजूळ यांनी लिहिले आहे. हस्तलिखितांतून आढळणारी संतचरित्रे, वेगवेगळ्या राज्यांतला विठ्ठल, कृष्णाचा विठ्ठल कसा झाला, विठ्ठल- पांडुरंग याविषयी माहिती देणाऱ्या हस्तलिखितांची सूची अशी माहितीही या पुस्तकांत आहे, याच बरोबर ही माहिती मंदिरांच्या भिंतींवरही कोरलेली आहे.[१८][१९]
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पत्रकार कव�� दशरथ यादव यांनी वारीच्या वाटेवर महाकादंबरी लिहिली असून त्यावर ’दिंडी निघाली पंढरीला’ हा चित्रपट तयार झाला आहे. यादव यांनी ‘दैनिक सकाळ’साठी वारीचे वार्तांकन केले होते. त्यावर अभ्यास करून त्यानी पुस्तक लिहिले आहे. वारीचे खंडकाव्य व अभंग रचनाही त्यांनी केली आहे.[ संदर्भ हवा ]
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याच वारी विषयावर चित्रपट दिग्दर्शक गजेंद्र अहिरे यांनी ‘विठ्ठल विठ्ठल’ नावाचा मराठी चित्रपट काढला. २००३ साली निघालेल्या या चित्रपटाला उत्तम चित्रपटाचा, गाण्यासाठीचा, संगीत दिग्दर्शनाचा आणि चित्रपट दिग्दर्शनासाठीचा असे चार पुरस्कार मिळाले.[ संदर्भ हवा ]
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२०१८ सालच्या डिसेंबर महिन्यात राजीव रुईया यांनी दिग्दर्शित केलेला 'विठ्ठल' नावाचा मराठी चित्रपट प्रकाशित झाला.[२०]
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विठ्ठल हे महाराष्ट्राचे आराध्य दैवत असल्याने विठ्ठलावर मराठी कवींनी अनेक गीते, भक्तिगीते, चित्रपटगीते, कविता आणि नाट्यगीते लिहिली आहेत. त्यांतली काही ही -
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(अपूर्ण यादी)
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१) युगे अठ्ठावीस
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युगे अठ्ठावीस विटेवरी ऊभा ।
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वामांगी रखुमाई दिसे दिव्य शोभा ।
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पुंडलिकाचे भेटी परब्रह्म आलें गा ।
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चरणी वाहे भीमा उद्धारी जगा ।। 1।।
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जय देव जय देव जय पांडुरंगा ।
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रखुमाईवल्लभा राईच्या वल्लभा पावे जिवलगा ।।धृ. ।।
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तुळसी माळा गळा कर ठेवुनी कटी ।
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कांसे पीतांबर कस्तुरी लल्लाटी ।
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देव सुरवर नित्य येती भेटी ।
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गरूड हनुमंत पुढे उभे राहती ।।
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जय देव ।। 2।।
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धन्य वेणुनाद अनुक्षेत्रपाळा ।
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सुवर्णाची कमळे वनमाळा गळा ।
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राई रखुमाबाई राणीया सकळा ।
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ओवळिती राजा विठोबा सावळा।।
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जय देव ।।3।।
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ओवाळू आरत्या कुर्वड्या येती ।
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चंद्रभागेमाजी सोडुनिया देती ।
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दिंड्या पताका वैष्णव नाचती ।
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पंढरीचा महिमा वर्णावा किती ।।
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जय देव ।।4।।
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आषाढी कार्तिकी भक्तजन येती ।
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चंद्रभागेमध्यें स्नाने जे करिती।।
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दर्शनहेळामात्रें तया होय मुक्ती।
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केशवासी नामदेव भावे ओंवळिती।।
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जय देव जय देव ||5||
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२) येई हो विठ्ठले
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येई हो विठ्ठले माझे माऊली ये ॥
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निढळावरी कर ठेवूनी वाट मी पाहे ॥ धृ. ॥
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आलिया गेलीया हातीं धाडी निरोप ॥
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पंढरपुरी आहे माझा मायबाप ॥ येई. ॥ १ ॥
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पिंवळा पीतांबर कैसा गगनी झळकला ॥
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गरुडावरी बैसून माझा कैवारी आला ॥ येई. ॥ २ ॥
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विठोबाचे राज आम्हां नित्य दिपवाळी ॥
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विष्णूदास नामा जीवेंभावे ओंवाळी ॥ येई हो. ॥ ३ ॥
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धामणेर हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सातारा जिल्ह्यातील कोरेगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे ऑक्टोबर ते मार्च हा हिवाळा हंगाम असतो. हिवाळ्यात दिवसा तापमान २८ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान १८ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते.जून ते सप्टेंबर हा पावसाळा हंगाम असतो. पावसाळ्यात दिवसा तापमान २७ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २१ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते. पावसाळ्यात मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो. वार्षिक पर्जन्यमान ६०० मिमी पर्यंत असते. एप्रिल ते जून हा उन्हाळा मोसम असतो. उन्हाळ्यात दिवसा तापमान ४० अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २५ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते.
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पांडुरंगशास्त्री आठवले अर्थात दादा (जन्म : ऑक्टोबर १९, १९२०; मृत्यू - ऑक्टोबर २५, २००३) हे मराठी तत्त्वज्ञ होते. ते स्वाध्याय परिवाराचे प्रणेते, संस्थापक होते. त्यांना रेमन मॅगसेसे, टेंम्पलटेंट पुरस्कार, महात्मा गांधी पुरस्कार, लोकमान्य टिळक पुरस्कार, पद्मविभूषण, अशा विविध पुरस्काराने गौरवण्यात आले. त्यांचा जन्मदिवस स्वाध्याय परिवार जगभर मनुष्य गौरव दिन म्हणून साजरा करतात.[ संदर्भ हवा ]
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पांडुरंग शास्त्री आठवले, हे दादाजी म्हणूनही ओळखले जाते, ज्याचे मराठीत अक्षरशः भाषांतर "मोठा भाऊ" असे केले जाते, ते एक भारतीय कार्यकर्ते, तत्त्वज्ञ, आध्यात्मिक नेते, सामाजिक क्रांतिकारक, आणि धर्म सुधारणावादी होते. 1954 मध्ये स्वाध्याय परिवारची स्थापना केली. स्वाध्याय ही भगवद्गीतेवर आधारित स्वयं-अध्ययन प्रक्रिया आहे जी भारतातील सुमारे 100,000 गावांमध्ये पसरली आहे, 5 दशलक्ष अनुयायी आहेत. भगवद्गीता, वेद आणि उपनिषदांवर प्रवचनासाठी प्रसिद्ध असलेले दादाजी त्यांच्या निःस्वार्थ कार्यासाठी आणि धर्मग्रंथातील उत्कृष्ट ज्ञानासाठी देखील ओळखले जातात.[ संदर्भ हवा ]
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पांडुरंगशास्त्री आठवलेंचा जन्म ऑक्टोबर १९, १९२० रोजी रोहे या कोकणातील गावात चित्पावन ब्राह्मण कुटुंबात झाला. संस्कृत शिक्षक वैजनाथ शास्त्री आठवले आणि त्यांची पत्नी पार्वती आठवले यांना जन्मलेल्या पाच मुलांपैकी ते एक होते. पारंपरिक शिक्षणाबरोबर 'सरस्वती संस्कृत पाठशाळेत' संस्कृत व्याकरणाबरोबर न्याय, वेदान्त, साहित्य, त्याचबरोबर इंग्रजी भाषा साहित्याचा अभ्यास पांडुरंगशास्त्री यांनी केला.[ संदर्भ हवा ] त्यांना रॉयल एशियाटिक सोसायटी मुंबई या संस्थेने सन्माननीय सदस्यत्व देऊन सन्मानित केले होते. या ग्रंथालयात त्यांनी कादंबरी विभाग सोडून सर्व मानव्य शाखेतील प्रमुख लेखकांचे, ग्रंथाचे अध्ययन केले. वेद, उपनिषदे, स्मृती, पुराणे यावर चिंतन केले. मुंबईतील माधवबाग येथील श्रीमद्भगवद्गीता पाठशाळेत पांडुरंगशास्त्री यांनी संस्थेच्या व्यासपीठावरून नियमितपणे न चुकता वैदिकांच्या तेजस्वी जीवनवादाचा (Way of life, way of worship & way of thinking) पुरस्कार केला.[ संदर्भ हवा ]
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आठवले बारा वर्षांचे असताना त्यांच्या वडिलांनी लहान मुलासाठी स्वतंत्र अभ्यासाचा अभ्यासक्रम तयार केला. अशा प्रकारे, आठवले यांना प्राचीन भारता���ील तपोवन पद्धतीप्रमाणेच शिकवले जात असे. 1942 मध्ये, त्यांनी श्रीमद भगवद्गीता पाठशाळा, माधवबाग, मुंबई येथे प्रवचन देण्यास सुरुवात केली, 1926 मध्ये त्यांच्या वडिलांनी स्थापन केलेले केंद्र.[ संदर्भ हवा ]
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आठवले यांनी रॉयल एशियाटिक लायब्ररीमध्ये 14 वर्षे परिश्रमपूर्वक वाचन केले; लहान वयातच, त्यांनी काल्पनिक साहित्याचा प्रत्येक भाग (मार्क्सच्या तत्त्वज्ञानापासून ते व्हाईटहेडच्या लेखनापर्यंत प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञानापर्यंत) वाचल्याबद्दल प्रसिद्ध होते. 1954 मध्ये त्यांनी जपानमध्ये झालेल्या दुसऱ्या जागतिक तत्त्वज्ञानी परिषदेत भाग घेतला. तेथे आठवले यांनी वैदिक आदर्शांच्या संकल्पना आणि भगवद्गीतेची शिकवण मांडली. अनेक सहभागी त्यांच्या कल्पनांनी प्रभावित झाले होते परंतु त्यांना भारतात अशा आदर्शांच्या अंमलबजावणीचा पुरावा हवा होता. नोबेल पारितोषिक-विजेते भौतिकशास्त्रज्ञ डॉ. आर्थर कॉम्प्टन हे आठवले यांच्या कल्पनांनी विशेषतः मंत्रमुग्ध झाले आणि त्यांनी त्यांना युनायटेड स्टेट्समध्ये एक आकर्षक संधी दिली,[१] जिथे ते त्यांच्या कल्पनांचा प्रसार करू शकतील. आठवले यांनी नम्रपणे नकार दिला, असे सांगून की त्यांना त्यांच्या मूळ भारतात बरेच काही साध्य करायचे आहे, जिथे त्यांनी वैदिक विचार आणि भगवद्गीतेचा संदेश शांतपणे आचरणात आणणारा आणि प्रसारित करणारा एक आदर्श समुदाय जगाला दाखवून देण्याची योजना आखली.[ संदर्भ हवा ]
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पांडुरंगशास्त्री आठवले यांचा विवाह १९४४ साली रत्नागिरी जिल्ह्यातील गावखडी येथील निर्मलाताई सिधये यांच्याशी झाला. निर्मलाताईंनी स्वाध्याय परिवाराच्या रचनात्मक कार्यातही दादांना भक्कम साथ दिली. स्वाध्याय कार्यातील बंधु-भगिनींना तसेच तत्त्वज्ञान विद्यापीठातील विद्यार्थ्यांना त्यांचे मोलाचे मार्गदर्शन कायम लाभत होते. दादांच्या देहावसनानंतर ताई ठाणे येथील तत्त्वज्ञान विद्यापीठात वास्तव्याला होत्या. ३ ऑगस्ट १९२६ रोजी जन्मलेल्या निर्मलाताई आठवले यांचे वयाच्या ९०व्या वर्षी ३१ जानेवारी २०१७ रोजी निधन झाले.[ संदर्भ हवा ]
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6 मे 1997 रोजी वेस्टमिन्स्टर अॅबे येथे आयोजित एका सार्वजनिक समारंभात पांडुरंग शास्त्री आठवले यांना धर्मातील प्रगतीसाठी टेम्पलटन पारितोषिक मिळाले.[ संदर्भ हवा ] मूळ वैदिक धर्माचे तत्त्वज्ञान ��ा या चळवळीचा पाया आहे. स्वाध्याय परिवाराने 1978 मध्ये भारतात प्रत्येक रविवारी अनुयायांच्या बैठकीसह स्वतःची स्थापना केली, जिथे प्रार्थना गायली गेली आणि आठवले यांचे व्हिडिओ रेकॉर्डिंग प्ले केले गेले. स्वाध्याय, ज्याचे जवळून भाषांतर "स्वतःचा अभ्यास" हे वैदिक तत्त्वज्ञानावर आधारित प्रक्रिया आहे आणि परिवारातील सदस्यांना "स्वाध्यायी" म्हणतात.[ संदर्भ हवा ] गेल्या काही वर्षांत, आठवलेंच्या अनुयायांनी भगवद्गीतेच्या अंतर्मनातील देव आणि देवाचे वैश्विक प्रेम या संकल्पना लाखो लोकांपर्यंत पोहोचवल्या आहेत: जात, सामाजिक आर्थिक अडथळे आणि धार्मिक भेद. आठवले यांनी वैयक्तिकरित्या हजारो गावांना भेट दिली (पैदल आणि भाड्याने सायकलने) आणि त्यांचे बंधू आणि भगिनी (स्वाध्यायी) वैयक्तिकरित्या प्रत्येक घरात गेले आणि प्रत्येक कुटुंबाशी निःस्वार्थ संबंध प्रस्थापित केले आणि घरोघरी जाऊन गीतेच्या विचारांचा प्रसार केला. अनुयायांनी संपूर्ण भारतातील अंदाजे 100,000 खेड्यांमध्ये आणि जगभरातील किमान 34 राष्ट्रांचे पालन केले आहे. दादाजी या गावांमध्ये, आठवलेंनी देवकेंद्रित भक्तीद्वारे सामाजिक कार्य करण्यासाठी विविध प्रयोग (प्रयोग) सुरू केले, ज्यात सामूहिक, दैवी श्रम (भक्ती)च्या भावनेने सहकारी शेती, मासेमारी आणि वृक्ष लागवड प्रकल्पांचा समावेश आहे. कॅनडामधील अँटीगोनिश चळवळ. सार्वभौमिक रक्तनिर्मात्याच्या तत्त्वाखाली एक जागतिक कुटुंब तयार करून जगाच्या समस्यांचे निर्मूलन करण्याची आठवले यांची दृष्टी पूर्ण करण्याचे स्वाध्यायांचे ध्येय आहे. त्यांना वाटले की भगवद्गीतेची सार्वत्रिकता सर्व मानवतेसाठी मार्गदर्शक ठरते. त्यामुळे त्याचे विचार शेवटच्या माणसापर्यंत पोहोचले पाहिजेत. आज, लाखो अनुयायी कॅरिबियन, अमेरिका, आशिया, युरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यू झीलंड, मध्य पूर्व आणि आफ्रिका यासह 35 पेक्षा जास्त देशांमध्ये प्रत्येक राहण्यायोग्य खंडात आढळू शकतात. रेव्ह. आठवले यांचे "देवाच्या दैवी पितृत्वाखाली वैश्विक बंधुत्व" हे स्वप्न पूर्ण करणे हे स्वाध्याय परिवाराचे ध्येय आहे.[ संदर्भ हवा ]
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२५ ऑक्टोबर २००३ रोजी मुंबई, भारत येथे आठवले यांचे वयाच्या ८३ व्या वर्षी हृदयविकाराच्या झटक्याने निधन झाले. २६ ऑक्टोबर रोजी सायंकाळी ठाणे जिल्ह्यातील तत्त्वज्ञान विद्यापीठात ��्यांच्यावर अंत्यसंस्कार करण्यात आले, जेथे २४ तासांच्या कालावधीत लाखो शोककर्त्यांनी त्यांना आदरांजली वाहिली होती. त्यानंतर, उज्जैन, पुष्कर, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, गया, जगन्नाथ पुरी आणि शेवटी रामेश्वरम येथे त्यांच्या अस्थींचे विसर्जन करण्यात आले.[ संदर्भ हवा ]
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१९९१ मध्ये श्याम बेनेगल यांनी आठवले यांच्या स्वाध्याय चळवळी किंवा प्रयोगांवर आधारित अंतरनाद (द इनर व्हॉईस) हा चित्रपट तयार आणि दिग्दर्शित केला, ज्यात शबाना आझमी आणि कुलभूषण खरबंदा यांच्या प्रमुख भूमिका होत्या. २००४ मध्ये अबीर बजाझ यांनी आठवले यांच्या जीवनावर आणि कार्यांवर आधारित स्वाध्याय या लघुपटाचे दिग्दर्शन केले.[ संदर्भ हवा ]
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दादाजींच्या प्रवचनावर आधारित वैदिक स्तोत्रे, गीता आणि रामायण यावर आधारित अनेक पुस्तके आहेत. वाल्मिकी रामायण, गीता अमृतम, संतांना श्रद्धांजली, प्रार्थना प्रीती, तुलसीदल, संस्कृती पूजन (संस्कृती आणि धर्माच्या योग्य व्याख्यांचे वर्णन), विजिगीशु जीवनवाद आणि बरेच काही ही त्यांची प्रसिद्ध पुस्तके आहेत. श्री पांडुरंग वैजनाथ आठवले शास्त्री (दादा) यांनी गुजराती, मराठी, हिंदी आणि संस्कृत द सिस्टीम्स: द वे अँड द वर्क (स्वाध्यायः द युनिक फिलॉसॉफी ऑफ लाईफ) यांसारख्या अनेक भाषांमध्ये लिहिलेले.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १९९२ मधे त्यांना टिळक पुरस्कार मिळाला. तो पुरस्कार देतांना तेव्हाचे राज्यपाल चिदंबरम सुब्रमणियम म्हणाले होते ' विद्वत्ता आणि दैवी शक्तीचा संगम झाल्यावरच समाजाचे आणि देशाचे हित सुरक्षित राहते. पांडुरंगशास्त्री आठवले यांची शिकवण सर्व समाजाने आचरण्यात आणण्याची गरज आहे. पांडुरंगशास्त्री हे आजच्या युगातील देदीप्यमान आशेचा किरण आहेत[२]
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धामदोड हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नंदुरबार जिल्ह्यातील नंदुरबार तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान सामान्यतः गरम आणि कोरडे आहे. येथे उन्हाळा, पावसाळा,आणि हिवाळा असे तीन वेगवेगळे ऋतू आहेत. उन्हाळा मार्चपासून चालू होऊन जूनमध्यापर्यंत असतो.उन्हाळा गरम आणि कोरडा असतो.मे महिन्यात तापमान फार असते.तापमान ४२ अंश सेल्सियसपर्यंत जाते.जूनच्या मध्यास किंवा अखेरीस पावसाळा सुरू होतो.पावसाळी हंगामात हवामान सामान्यतः आर्द्र आणि गरम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ७६० मि.मी.पर्यंत असते.हिवाळी मोसम नोव्हेंबरपासून साधारण फेब्रुवारीपर्यंत असतो.हिवाळा सौम्य थंड आणि कोरडा असतो.
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पांडे महाल महाराष्ट्राच्या भंडारा जिल्ह्यातील एक वास्तू आहे. सुमारे सव्वाशे वर्षांपूर्वी रायबहादूर यादवराव पांडे यांनी हा महाल बांधला होता. अठराव्या शतकात लॉर्ड हेस्टिंगच्या काळात सुमारे सव्वाशे वर्षांपूर्वी रामवहादूर यादवराव पांडे यांनी हा महाल बांधला होता. या महालाचे बांधकाम १८९६ मध्ये पूर्ण झाले. २०० हुन अधिक खोल्या असलेला हा महाल सुमारे ६० हजार वर्ग फूटमध्ये अबांधण्यात आयला आहे. या सर्व खोल्या व दिवाणखाने कलाकृतीने सजलेल्या आहे. या महालात नृत्य सभागृह तसेच पूजाघरही आहे. बेल्जियम काचेचे भव्य आरसे, झुंबर, इटालियन मार्बल टाईल्स, फवारे, सुंदर नक्षीकाम व भव्य आकर्षक बांधणी यामुळे पांडे महाल भंडाऱ्याचे भुषण आहे. आज मात्र या महालाची अवस्था अतिशय दयनीय आहे. महालाची स्थिती जीर्णावस्थेत पोहोचल्याने पांडे कुटुंबिय महाल सोडून नागपूर येथे स्थापिक झाले आहेत. दुर्लक्षामुळे महाताची स्थिती नाजूक झाली असून जागोजागी प्लॉस्टर निघालेले आहे. लोखंडी बीम पावसामुळे नष्ट होऊन काही भाग तुटून खाली पडलेला आहे. वरचा मजला नाजूक अवस्थेत असल्याने तो कधीही जमीनदोस्त होऊ शकतो. मुख्य दरवाजाने आत प्रवेश केल्यावर समोरच एका दालनात यादवराव पांडे यांचा संगमरवरी पुतळा आहे. संपुर्ण महाल फिरणे धोकादायक असल्याने केवळ पाच ठिकाणाहुन महाल पहाता येतो. याशिवाय सोबतच देवघरच्या भागात असलेल्या छपरीतील ऐतिहासिक वस्तू पहाता येतात. पुरातत्व विभागाने महालाचे सर्व्हेक्षण करून घेतले असुन सर्वेक्षणानंतर पुरातत्व विभागाने या महालला पुरातन वास्तू (हेरिटेज बिल्डिंग) म्हणून घोषित केले आहे. यादवराव पांडे इंग्रजांच्या काळात भंडारा सुभ्याचे मानद कमिश्नर होते. ७७ गावांची मालकी त्यांच्याकडे होती. नागपूरकर भोसल्यांचे ते सावकार होते. १८९८ मध्ये इंग्रजांनी पोलीस कारवाईने या महालावर मालकी मिळवली होती परंतु १९०१ मध्ये पांडे महालाचे मालकी हक्क गणपतराव पांडे यांना सुपूर्द केले गेले. पांडे परिवारही आर्थिकदृष्ट्या खचलेला असुन खाजगी मालकी हक्कामुळे पुरातत्व खात्याचे येथे फारसे लक्ष नाही. वेळीच लक्ष न दिल्यास ही वास्तु येणाऱ्या काळात नष्ट होण्याची शक्यता आहे. पांडे महालात बसणारा गणपती भंडारा शहराचा गणपती मानला जातो.[१] हा महाल सुमारे ६० हजार वर्ग फूटमध्ये असून हत्तीसुद्धा चालू शकतो.[१]
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सतराव्या अठराव्या शतकाच्या लॉर्ड हेस्टिंगच्या काळात येथे 60 हजार चौरस फुटात या महालाचे बांधकाम करण्यात आले होते. पुरातत्त्व व पर्यटन व सांस्कृतिक कार्य विभाग, महाराष्ट्र शासन राज्य संरक्षित स्मारक म्हणून घोषित केले होते. परंतु, दिवंगत यादवराव पांडे यांचे वारस व शासनाच्या उदासीनतेमुळे या वास्तूला अवकळा आली आहे. नागपूरकर भोसल्यांचे सावकार व भंडारा सुभ्याचे मानद कमिशनर असलेल्या यादवराव पांडे यांनी या महालाचे बांधकाम केले होते. १८९८ मध्ये इंग्रजांनी पोलिस कारवाई करून हा महाल ताब्यात घेतला. परंतु, १९०१ मध्ये या महालाची मालकी गणपतराव पांडे यांना सोपविण्यात आली.[२]
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दमंधारी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नांदेड जिल्ह्यातील किनवट तालुक्यातील एक गाव आहे.
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नैऋत्य मान्सूनमुळे पडणाऱ्या पावसाळ्याचा ऋतू वगळता येथील हवामान सर्वसाधारणपणे कोरडेच असते. येथे वर्षात चार ऋतू असतात. हिवाळा हा नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी अखेरपर्यंत असतो. त्यानंतर येणारा उन्हाळा मात्र जूनच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत खेचला जातो. नैऋत्य मान्सूनचा पाऊस त्याच्या पाठोपाठ येतो आणि ऑक्टोबरच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत टिकतो. शेष ऑक्टोबर आणि नोव्हेंबरचा पूर्वार्ध हा मान्सूनोत्तर गरमीचा काळ असतो. सरासरी वार्षिक पर्जन्यमान ९९५ मि.मी.आहे. नैऋत्य मोसमी वाऱ्यापासून पडणाऱ्या पावसाचे प्रमाण एकूण वार्षिक पर्जन्याच्या ८० टक्के आहे. जुलै आणि ऑगस्ट हे वर्षातील सर्वाधिक पर्जन्याचे महिने आहेत.
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पांढुरणा हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील कामठी तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पांतुर्ली हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील सिंधुदुर्ग जिल्ह्यातील दोडामार्ग तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती केली जाते.
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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| 6 |
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४.https://www.incredibleindia.org/
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| 7 |
+
५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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| 8 |
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६.https://www.mapsofindia.com/
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| 1 |
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पाइक काउंटी ही अमेरिकेच्या अलाबामा राज्यातील ६७ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र ट्रॉय येथे आहे.[१]
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२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या ३३,००९ इतकी होती.[२] या काउंटीला न्यू जर्सीच्या जनरल झेब्युलॉन पाइकचे नाव दिलेले आहे. ही काउंटी ट्रॉय नगरक्षेत्राचा भाग आहे.
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धामापूर तर्फे संगमेश्वर हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील दक्षिण कोकणातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील संगमेश्वर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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| 3 |
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१.https://villageinfo.in/
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२.https://www.census2011.co.in/
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३.http://tourism.gov.in/
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४.https://www.incredibleindia.org/
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५.https://www.india.gov.in/topics/travel-tourism
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६.https://www.mapsofindia.com/
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पाइक काउंटी, मिसिसिपी ही अमेरिकेच्या मिसिसिपी राज्यातील ८२ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र येथे आहे.
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२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या इतकी होती.
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पाइक काउंटी, मिसिसिपी काउंटीची रचना रोजी झाली. या काउंटीला यांचे नाव दिलेले आहे.
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पाइक्स पीक अमेरिकेतील रॉकी माउंटन्स पर्वतरांगेतील एक शिखर आहे. रॉकी माउंटन्सच्या इतर रांगांपेक्षा किंचित दूर असलेले हे शिखर पाइक्स पीक मासिफ या डोंगरावर आहे. कॉलोराडो स्प्रिंग्ज शहराजवळ असलेल्या या शिखराची उंची १४,२७६ फूट आहे. या शिखरापर्यंत चालत, रेल्वेगाडीने किंवा मोटारकारने जाता येते.
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स्पॅनिश शोधकांनी याला सुरुवातीस एल कॅपितान असे नाव दिले होते. त्यानंतर झेब्युलॉन पाइकचे नाव या डोंगरास दिले गेले. या डोंगराला स्थानिक अरापाहो भाषेत हीय ओतोयू असे नाव आहे.[१]
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कॅसल पीक • ग्रेझ पीक • माउंट अँटेरो • टोरीझ पीक • क्वांडारी पीक • माउंट एव्हान्स • लाँग्स पीक • माउंट विल्सन
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माउंट शाव्हानो • माउंट प्रिन्सटन • माउंट बेलफोर्ड • क्रेस्टोन नीडल • माउंट येल • माउंट ब्रॉस • किट कार्सन पीक • मरून पीक • टॅबेग्वाश पीक
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माउंट ऑक्सफर्ड • माउंट स्नेफेल्स • माउंट डेमोक्रॅट • कॅपिटोल पीक • पाइक्स पीक • स्नोमास माउंटन • माउंट इओलस
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विंडम पीक • चॅलेंजर पॉइंट • माउंट कोलंबिया • मिसूरी माउंटन • हम्बोल्ट पीक • माउंट बीयेरश्टाट • सनलाइट पीक
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हँडीस पीक • कुलेब्रा पीक • एलिंगवूड पॉइंट • माउंट लिंडसे • लिटल बेर पीक • माउंट शेर्मान • रेडक्लाउड पीक • पिरॅमिड पीक • विल्सन पीक
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सान लुइस पीक • वेटरहॉर्न पीक • माउंट ऑफ द होली क्रॉस • ह्युरॉन पीक • सनशाइन पीक
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पाईन वृक्ष हे सरळ उंच वाढणारे सुचिपर्णी झाड आहे.
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पाउल कारर (देवनागरी लेखनभेद: पॉल कारर; स्विस जर्मन: Paul Karrer) (एप्रिल २१, १८८९ - जून १८, १९७१) हा स्विस जैवरसायनशास्त्रज्ञ होता. १९३७ साली जैवरसायनशास्त्रातील कामगिरीबद्दल त्याला नोबेल पारितोषिक देऊन गौरवण्यात आले.
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पाउल फॉन हिंडनबुर्ग ( जन्म १८४७ - मृत्यु १९३४)
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अॅडॉल्फ हिटलरला जर्मनीच्या चान्सेलरपदी निवड करणारे जर्मनीचे राष्ट्राध्यक्ष. पहिल्या महायुद्दात जर्मनीचे नेतृत्व. जर्मनीच्या महान सेनानींमध्ये यांची गणना होते
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पॉलेट लिंच (जन्म दिनांक अज्ञात:वेस्ट इंडीज - हयात) ही १९७३ महिला क्रिकेट विश्वचषकात आंतरराष्ट्रीय XIतर्फे ४ महिला आंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय सामने खेळलेली क्रिकेट खेळाडू आहे.
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पाओलो चेझारे माल्दिनी (२६ जून, १९६८:मिलानो, इटली - ) हा इटलीकडून आंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खेळलेला खेळाडू आहे. याला इटलीचा सर्वोत्तम बचावपटू समजले जाते. काहींच्या मते हा जगातील सर्वोत्तम फुटबॉल खेळाडूंपैकी एक होता.[१][२][३][४][५][६]
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| 1 |
+
कसोटी किट
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| 2 |
+
वनडे किट
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| 3 |
+
टी२०आ किट
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| 4 |
+
पाकिस्तान राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने १९५२ पासून आंतरराष्ट्रीय क्रिकेटमध्ये पाकिस्तानचे प्रतिनिधित्व केले आहे.
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| 5 |
+
ऑस्ट्रेलिया · इंग्लंड · दक्षिण आफ्रिका · भारत · न्यू झीलंड · वेस्ट इंडीज · पाकिस्तान · श्रीलंका · झिम्बाब्वे · बांगलादेश · अफगानिस्तान · आयर्लंड
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| 6 |
+
बर्म्युडा · कॅनडा · केन्या · नेदरलँड्स · स्कॉटलंड
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| 7 |
+
आर्जेन्टीना ·
|
| 8 |
+
डेन्मार्क ·
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| 9 |
+
नामिबियन ·
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| 10 |
+
युगांडा ·
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| 11 |
+
बेल्जियम · बोत्स्वाना · केमॅन आयलंड · फिजी · फ्रांस · जर्मनी · जिब्राल्टर · हॉंगकॉंग · इस्त्राईल · इटली · जपान · कुवैत · मलेशिया · नेपाळ · नायजेरिया · पापुआ न्यू गिनी · सिंगापूर · टांझानिया · थायलंड · संयुक्त अरब अमीरात · अमेरिका · झांबिया
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| 12 |
+
ऑस्ट्रीया ·
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| 13 |
+
बहामास ·
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| 14 |
+
बहरैन ·
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| 15 |
+
बेलिझ ·
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| 16 |
+
भुतान ·
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| 17 |
+
ब्राझिल ·
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| 18 |
+
ब्रुनै ·
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| 19 |
+
चिली ·
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| 20 |
+
चीन ·
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| 21 |
+
कूक आयलंड ·
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| 22 |
+
कोस्टा रिका ·
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| 23 |
+
क्रोएशिया ·
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| 24 |
+
क्युबा ·
|
| 25 |
+
सायप्रस ·
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| 26 |
+
झेक प्रजासत्ताक ·
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| 27 |
+
फ़िनलंड ·
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| 28 |
+
गांबिया ·
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| 29 |
+
घाना ·
|
| 30 |
+
ग्रीस ·
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| 31 |
+
गुर्नसी ·
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| 32 |
+
इंडोनेशिया ·
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| 33 |
+
इराण ·
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| 34 |
+
आइल ऑफ मान ·
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| 35 |
+
जर्सी ·
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| 36 |
+
लेसोथो ·
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| 37 |
+
लक्झेंबर्ग ·
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| 38 |
+
मलावी ·
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| 39 |
+
मालदीव ·
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| 40 |
+
माली ·
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| 41 |
+
माल्टा ·
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| 42 |
+
मेक्सिको ·
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| 43 |
+
मोरोक्को ·
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| 44 |
+
मोझांबिक ·
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| 45 |
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म्यानमार ·
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| 46 |
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नॉर्वे ·
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| 47 |
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ओमान ·
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| 48 |
+
पनामा ·
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| 49 |
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फिलिपाईन्स ·
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| 50 |
+
पोर्तुगाल ·
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| 51 |
+
र्वांडा ·
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| 52 |
+
कतार ·
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| 53 |
+
सामोआ ·
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| 54 |
+
सौदी अरब ·
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| 55 |
+
सियेरा लिओन ·
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| 56 |
+
स्लोव्हेनिया ·
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| 57 |
+
दक्षिण कोरिया ·
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| 58 |
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स्पेन ·
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| 59 |
+
सेंट हेलन ·
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| 60 |
+
सुरिनम ·
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| 61 |
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स्विडन ·
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| 62 |
+
स्विझर्लंड ·
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| 63 |
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टोंगा ·
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| 64 |
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तुर्क आणि कैकोस द्विपे ·
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| 65 |
+
वनुतु ·
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| 66 |
+
पूर्व आफ्रिका ·
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| 67 |
+
पूर्व आणि मध्य आफ्रिका ·
|
| 68 |
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पश्चिम आफ्रिका
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| 69 |
+
बेलारूस ·
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| 70 |
+
बल्गेरिया ·
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| 71 |
+
एस्टोनिया ·
|
| 72 |
+
आइसलँड ·
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| 73 |
+
लात्व्हिया ·
|
| 74 |
+
न्यू कॅलिडोनिया ·
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| 75 |
+
पोलंड ·
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| 76 |
+
रशिया ·
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| 77 |
+
स्लोव्हेकिया ·
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| 78 |
+
तुर्कस्तान ·
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| 79 |
+
युक्रेन ·
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| 80 |
+
उरुग्वे
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