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केनी ही पावसाळ्यात उगवणारी एक रानभाजी आहे. या वनस्पतीचे शास्त्रीय नाव कॉमेलिना डीफ्युजा असे आहे.
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केनीच्या कॉमेलिना डीफ्युजा आणि कॉमेलिना डीफ्युजा व्हर. गिगाज या दोन प्रजाती आहेत. यातील दुसरी प्रजाती आशिया खंडातील स्थानिक प्रजाती आहे. या वनस्पतीला निळ्या रंगाची फुले येतात.
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केनी सामान्यपणे वार्षिक वनस्पती आहे. मात्र विषुववृत्तीय प्रदेशात ती बहुवार्षिक असू शकते.[१] केनीला जुलै ते सप्टेंबर या काळात फुले आणि फळे लागतात.
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केनी भारतात ओलसर, दलदलीच्या जागी तणाच्या स्वरूपात उगवते. कधीकधी शेतांमध्ये तण म्हणून उगवलेलीसुद्धा दिसते.[२]
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भारतात ही वनस्पती महराष्ट्र, आसाम, केरळ, ओरिसा, तामिळनाडू इ. राज्यात आढळते.[२]
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महाराष्ट्रात श्रावण महिन्यात उपास सोडताना केनीची भजी केली जातात.[३] केनीची भाजीसुद्धा केली जाते. केनी-कुर्डूच्या भाजीचा उल्लेख चातुर्मासाच्या कहाणीमध्ये आहे.
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चीनमध्ये या वनस्पतीचा औषधी वनस्पती म्हणून वापर केला जातो. फुलांपासून निळा रंगसुद्धा तयार केला जातो.
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केनेथ जेम्स पीस (इंग्लिश: Kenneth James Peace), ह्यांचा जन्म २८ सप्टेंबर १९६३ला पेसले (इंग्लिश: Paisley) या गावी झाला, हे स्कॉटिश संगीतकार, पियानोवादक आणि दृश्यमाध्यम कलाकार (विज्युअल आर्टिस्ट) आहेत.
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जेम्स पीस ह्यांचा जन्म २८ सप्टेंबर १९६३ला पेसले या गावी झाला.[१][२] त्यांचा बालपणीचा सर्वाधिक काळ पश्चिम स्कॉटलँडच्या (इंग्लिश: Scotland) समुद्रकिनाऱ्यावरील हेलेन्सबर्ग ह्या निसर्गोपचाराचे पर्यटन स्थळ म्हणून प्रसिद्ध असलेल्या गावी व्यतीत झाला. त्यांच्या कुटुंबात अनेक दृश्यकला माध्यमातील कलाकारांचा समावेश होता (उदा. जॉन मॅक्नी, इंग्लिश: John McGhie). शिवाय, विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीस नृत्यसंगीताच्या क्षेत्रात कार्यरत असलेले लोकप्रिय, प्रसिद्ध संगीतकार फेलिक्स बर्न्स (इंग्लिश: Felix Burns) हेही त्यांच्या नातेवाईकांपैकी होत.[१][३] जेम्स पीस ह्यांनी वयाच्या आठव्या वर्षापासून पियानोवादनाचे धडे घ्यायला सुरुवात केली, तेव्हाच ते स्वतंत्रपणे पियानो वादनाच्या सांगीतिक रचना करू लागले होते. त्यांचा पहिला सार्वजनिक जाहीर कार्यक्रम वयाच्या चौदाव्या वर्षी झाला. ह्या कार्यक्रमात त्यांनी स्कॉट जॉप्लिन (इंग्लिश: Scott Joplin) द्वारा निर्मित संगीत सादर केले. दोन वर्षानंतर त्यांना रॉयल स्कॉटिश अकादमी ऑफ म्युझिक अँड ड्रामा मध्ये (आता: स्कॉटलँड रॉयल संगीतविद्यालय, इंग्लिश: Royal Conservatoire of Scotland) सोळा वर्षांचा, म्हणजे सर्वात कमी वयाचा पूर्णवेळ विद्यार्थी म्हणून प्रवेश मिळाला.[१][३][४][५] १९८३ मध्ये त्यांनी ग्लासगो विश्वविद्यालय (इंग्लिश: Glasgow University) मधून पियानो: संगीतरचना, वादन व सिद्धांतविषयक शिक्षण पूर्ण करून विशिष्ट प्राविण्यासह B.A.[६][७]ची स्नातक पदवी मिळवली. त्यापुढच्या वर्षी त्यांनी RSAMD ऑर्केस्ट्राच्या समवेत मेंडेलझोन (जर्मन: Mendelssohn)च्या पियानो कॉन्सर्टो, क्रमांक १ची धून सादर केली.[१] हीच धून वाजवून त्यांनी संगीत सादरीकरणविषयक खास पदविका ही पदवी मिळवली आणि ते अनेक परितोषिकांचे विजेते ठरले. व्यावसायिक शिक्षण पूर्ण केल्यानंतर साथीदार सहकलाकार तसेच एकल पियानोवादक म्हणूनही त्यांना प्रचंड मागणी होती. एडिनबरा (इंग्लिश: Edinburgh) मध्ये १९८८ ते १९९१ पर्यन्त त्यांचा निवास होता.[१][३]
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जेम्स पीस १९९१ ते २००९ पर्यन्त बाड नाऊहाईम (जर्मन: Bad Nauheim) जर्मनी (जर्मन: Bundesrepublik Deutschland), मध्ये राहिले.[१][४][५][७][८] ह्या क���ळात त्यांनी टँगो ह्या नृत्यप्रकाराचा शास्त्रोक्त परिचय करून घेतला, त्यांच्या टँगो-प्रेरित पियानोवरील संगीतरचना त्यांनी टँगो एस्कॉस (tango escocés स्कॉटिश टँगो)[१][८][९] ह्या शीर्षकाच्या सीडीच्या स्वरूपात तयार केल्या आणि २००२ साली त्यांना विक्टोरिया कॉलेज ऑफ़ म्युझिकचे (इंग्लिश: Victoria College of Music) प्रतिष्ठित सदस्यत्व (इंग्लिश: “Fellow”) लाभले.[३][८] त्याच वर्षी सप्टेंबर – ऑक्टोबर मध्ये उत्तर जर्मनीच्या एकल संगीत मैफिलीत त्यांनी सादरीकरण केले व त्यानंतर नोव्हेंबर महिन्यात अतिपूर्व देशांत त्यांनी कार्यक्रमांची मालिका गाजवली, हाँग काँग (इंग्लिश: Hong Kong) मध्ये त्यांनी त्यांची रचना "टँगो XVII"चे प्रथम सादरीकरण केले.[८][१०][११][१२]
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त्यानंतरच्या काही वर्षांत त्यांनी त्यांचे लक्ष युरपवर केंद्रित केले आणि विविध देशांच्या राजधानीच्या शहरांत त्यांच्या संगीतकलेचे सादरीकरण केले: ॲम्स्टरडॅम, अथेन्स[१३], बर्लिन[१४], ब्रसेल्स, हेलसिंकी[१५], लिस्बन[१६], लंडन, माद्रिद[१७], ओस्लो[१८], रेक्जाविक[१९], व्हियेना[२०].
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२००८ मध्ये त्यांच्या टँगोमधील व्यासंगाच्या आणि कलात्मक आविष्काराच्या सन्मानार्थ त्यांना लंडन कॉलेज ऑफ म्युझिकचे (इंग्लिश: London College of Music) सदस्यत्व (इंग्लिश: “Fellow”) बहाल करण्यात आले.[१]
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काही काळ एडिनबरामध्ये व्यतीत केल्यानंतर फेब्रुवारी २०१० मध्ये ते जर्मनीत परतले व वीसबाडेन (जर्मन: Wiesbaden) मध्ये स्थायिक झाले.[१][२] हयानंतर त्यांच्या सर्जनशीलतेला नवीन आयाम लाभले आणि त्यांनी त्यांच्या काही संगीतमय रचनांवर लघुपट बनविले. “जेम्स पीस इन वीसबाडेन” हा माहितीपट त्यांची ह्या शैलीतील एक निर्मिती आहे.[२१][२२]
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● प्रथम पुरस्कार, "एग्नेस मिलर" स्पर्धा (इंग्लिश: Agnes Millar Prize for Sight-Reading). ग्लासगो, १९८३[४]
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● प्रथम पुरस्कार, "डनबार्टनशायर ई.आई.एस." स्पर्धा (इंग्लिश: Dunbartonshire E.I.S. Prize for Piano Accompaniment). ग्लासगो, १९८४[४]
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● प्रथम पुरस्कार, सिबेलियस निबंध स्पर्धा (इंग्लिश: Sibelius Essay Prize). ग्लासगो, १९८५[४]
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● प्रारंभकालीन टँगो रचनांच्या सन्मानार्थ पुरस्कार, टी.आई.एम. आंतरर्राष्ट्रीय रचना स्पर्धा (इटालियन भाषा: Torneo Internazionale di Musica). रोम, २०००[१][२][५]
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● टँगो ऑप. २६ ह्या रचनेसाठी सन्मान पदविका, IBLA फाउंडेशन. न्यू यॉर्क, २००२[१][२][५]
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● सन्मानपदक (प्रथम श्रेणी), इंटरनेशनल पियानो डुओ एसोसिएशन. तोक्यो, २००२[१][३][५][८][२३]
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● गोल्ड मेडल, ���ंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ लुटेस (फ्रेंच: Académie Internationale de Lutèce). पेरिस, २००५[१][३]
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• धबधबा (इंग्लिश: The Waterfall)[२४]• सुखद जीवन (इंग्लिश: Idylls)
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• सकाळचे प्रेमगीत (फ्रेंच: Aubade)
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• मूक अश्रू (इंग्लिश: Silent Tears)• हरवलेली पाने (इंग्लिश: Forgotten Leaves)
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• ओबो आणि पियानो सोनाटा (इंग्लिश: Oboe Sonata)
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• गाथागीत (इंग्लिश: Symphonic Ballade)
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• समारोह परेड क्र. १ (इंग्लिश: Ceremonial March no.1)
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• समारोह परेड क्र. २ (इंग्लिश: Ceremonial March no.2)
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• हेमंती सोने (इंग्लिश: Autumn Gold)
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• शाश्वत गीत (इंग्लिश: Eternal Song)[१]
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• जॉर्जिया साठी (जॉर्जियन भाषा: საქართველოსთვის)
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गीतिकाव्यः तामार चिकवैद्जे, ज़ुराब चिकवैद्जे आणि जेम्स पीस
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• २४ टँगोज् पियानो सोलो साठी[१][९][११][२२]
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लिस्ट अ आणि टी२०आ किट
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केन्या क्रिकेट संघ हा आफ्रिकेतील केन्या देशाचा राष्ट्रीय क्रिकेट संघ आहे. इ.स. १९८१ पासून आय.सी.सी.चा असोसिएट सदस्य असलेल्या केन्याने २००३ क्रिकेट विश्वचषक स्पर्धेत उपांत्य फेरीमध्ये धडक मारून सर्व क्रिकेट जगताला चकित केले होते. २००७ व २०११ सालच्या विश्वचषक स्पर्धांमध्ये पहिल्याच फेरीत पराभूत झालेल्या केन्याला २०१५ स्पर्धेत पात्रता मिळवण्यात अपयश आले. इ.स. २०१४ साली केन्याचा कसोटी क्रिकेट खेळण्याचा दर्जा काढून टाकण्यात आला.
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ऑस्ट्रेलिया · इंग्लंड · दक्षिण आफ्रिका · भारत · न्यू झीलंड · वेस्ट इंडीज · पाकिस्तान · श्रीलंका · झिम्बाब्वे · बांगलादेश · अफगानिस्तान · आयर्लंड
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बर्म्युडा · कॅनडा · केन्या · नेदरलँड्स · स्कॉटलंड
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आर्जेन्टीना ·
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डेन्मार्क ·
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नामिबियन ·
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युगांडा ·
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बेल्जियम · बोत्स्वाना · केमॅन आयलंड · फिजी · फ्रांस · जर्मनी · जिब्राल्टर · हॉंगकॉंग · इस्त्राईल · इटली · जपान · कुवैत · मलेशिया · नेपाळ · नायजेरिया · पापुआ न्यू गिनी · सिंगापूर · टांझानिया · थायलंड · संयुक्त अरब अमीरात · अमेरिका · झांबिया
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ऑस्ट्रीया ·
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बहामास ·
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बहरैन ·
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बेलिझ ·
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भुतान ·
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ब्राझिल ·
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ब्रुनै ·
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चिली ·
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चीन ·
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कूक आयलंड ·
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कोस्टा रिका ·
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क्रोएशिया ·
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क्युबा ·
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सायप्रस ·
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झेक प्रजासत्ताक ·
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फ़िनलंड ·
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गांबिया ·
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घाना ·
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ग्रीस ·
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गुर्नसी ·
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इराण ·
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आइल ऑफ मान ·
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जर्सी ·
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लेसोथो ·
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लक्झेंबर्ग ·
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मलावी ·
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मालदीव ·
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म्यानमार ·
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नॉर्वे ·
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ओमान ·
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फिलिपाईन्स ·
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सामोआ ·
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सौदी अरब ·
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सियेरा लिओन ·
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स्लोव्हेनिया ·
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दक्षिण कोरिया ·
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स्पेन ·
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सेंट हेलन ·
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सुरिनम ·
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स्विडन ·
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स्विझर्लंड ·
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टोंगा ·
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तुर्क आणि कैकोस द्विपे ·
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वनुतु ·
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पूर्व आफ्रिका ·
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पूर्व आणि मध्य आफ्रिका ·
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पश्चिम आफ्रिका
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बेलारूस ·
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बल्गेरिया ·
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एस्टोनिया ·
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आइसलँड ·
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लात्व्हिया ·
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| 72 |
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न्यू कॅलिडोनिया ·
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| 73 |
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पोलंड ·
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| 74 |
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रशिया ·
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| 75 |
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स्लोव्हेकिया ·
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| 76 |
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तुर्कस्तान ·
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युक्रेन ·
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उरुग्वे
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चुका उधृत करा: "lower-alpha" नावाच्या गटाकरिता <ref>खूणपताका उपलब्ध आहेत, पण संबंधीत <references group="lower-alpha"/> खूण मिळाली नाही.
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केन्सिंग्टन व चेल्सीचा शाही बरो (इंग्लिश: Royal Borough of Kensington and Chelsea) हा इंग्लंडमधील ग्रेटर लंडन शहराचा एक बरो आहे. केन्सिंग्टन व चेल्सी हे युनायटेड किंग्डममधील सर्वात घनदाट लोकसंख्येचे नगर आहे.
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गुणक: 51°30′N 0°11′W / 51.50°N 0.19°W / 51.50; -0.19
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नोशुवा मोबाईल केप कोब्राझ किंवा केप कोब्राझ हा मिवे चॅलेंज टी२० मधील संघ आहे. केप कोब्रा इतर दक्षिण आफ्रिकेतील स्थानिक स्पर्धेत देखिल सहभागी होतो.
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केप माटापान, काबो माटाटाक, केप टैनारोन, केप टेनारो तथा केप टॅनारम हे ग्रीसच्या मानी द्वीपकल्पाच्या दक्षिण टोकावरील भूशिर आहे. हे भूशिर ग्रीसच्या सगळ्यात दक्षिणेचा तर युरोपचा दुसऱ्या क्रमांकाचा दक्षिणेचा बिंदू आहे. हे भूशिर मेसेनियाचा आखात आणि लॅकोनियाच्या आखातांच्या संगमावर आहे.
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काबो व्हर्देचे प्रजासत्ताक (पोर्तुगीज: República de Cabo Verde; लोकप्रिय नाव: केप व्हर्दे) हा पश्चिम आफ्रिकेच्या किनाऱ्याजवळ १० बेटांच्या द्वीपसमूहावर वसलेला एक देश आहे. हा द्वीपसमूह अटलांटिक महासागरामध्ये पश्चिम आफ्रिकेच्या ५७० किमी पश्चिमेस स्थित आहे. १५व्या शतकापर्यंत पूर्णपणे निर्मनुष्य असलेला हा द्वीपसमूह १४६० साली पोर्तुगीजांनी शोधुन काढला व तिथे वसाहत स्थापन केली. आफ्रिकेतील गुलामांना युरोपामध्ये नेणारी जहाजे येथे थांबा घेत असत. ह्यामुळे १७व्या व १८व्या शतकात केप व्हर्देची भरभराट झाली. १९व्या शतकात गुलागिरीवर बंदी घालण्यात आल्यानंतर केप व्हर्देची अर्थव्यवस्था खालावत गेली. १९७५ मध्ये पोर्तुगालने केप व्हर्देला स्वातंत्र्य मंजूर केले. सध्या केप व्हर्दे संयुक्त राष्ट्रे, आफ्रिकन संघ इत्यादी आंतरराष्ट्रीय संघटनांचा सदस्य आहे. २०१५ साली ५.२५ लाख लोकसंख्या असलेल्या केप व्हर्देचे बहुसंख्य रहिवासी मिश्र युरोपीय व आफ्रिकन वंशाचे आहे.
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केप व्हर्दे आफ्रिकेमधील प्रगत व संपूर्ण लोकशाही असलेल्या देशांपैकी एक आहे. येथे फारशी नैसर्गिक संपत्ती उपलब्ध नसल्यामुळे केप व्हर्देची अर्थव्यवस्था पर्यटन व परकीय गुंतवणुकीवर अवलंबून आहे. २००७ साली केप व्हर्देला अविकसित देशांच्या गटातून विकसनशिल देशांच्या गटात बढती देण्यात आली. आफ्रिकेत हुकुमशाही व अराजकता वाढीस लागली असताना केप व्हर्देला येथील राजकीय व सामाजिक स्थैर्य व आर्थिक प्रगतीसाठी कौतुकाचे प्रमाणपत्र दिले जाते. २०१४ सालच्या लोकशाही निर्देशांकानुसार येथील लोकशाही जगात ३१व्या क्रमांकाची बळकट मानली जाते.
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टी.ए.सी.व्ही. काबो व्हेर्दे एरलाइन्स ही केप व्हर्देची राष्ट्रीय विमानकंपनी आहे. ही कंपनी केप व्हर्देला युरोपातील पॅरिस, मिलान, लिस्बन, माद्रिद, ॲम्स्टरडॅम इत्यादी प्रमुख विमानतळांसोबत जोडते. काबो व्हर्दे एरलाइन्सद्वारे अमेरिकेतील प्रॉव्हिडन्स तसेच ब्राझीलमधील रेसिफे व फोर्तालेझा ही शहरे देखील केप व्हर्देसोबत जॉडली गेली आहेत.
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केप व्हर्दे फुटबॉल संघ देशाचा राष्ट्रीय फुटबॉल संघ आहे. केप व्हर्देने आजवर २०१३ व २०१५ सालच्या आफ्रिकन देशांचा चषक स्पर्धांमध्ये पात्रता मिळवली आहे. ऑलिंपिक खेळात केप व्हर्दे १९९६ पासून सामील होत आहे.
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केपे हा गोव्याच्या दक्षिण गोवा जिल्ह्यातील एक तालुका आहे.
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केपे तालुका हा निसर्गाने नटलेला ,सौदर्याने बहरलेला असा तालुका आहे. हे एक छोटे शहर आहे. तसेच कुडचडे आणि केपें असे दोन मतदारसंघ यात येतात. कुडचडे शहरात अनेक सुंदर मंदिरे आहेत. श्री पुरुषम्हारू देवस्थान, श्री सातेरी देवस्थान,श्री शिवनाथ मंदिर,श्री गणेश मंदिर,श्री संतोषी मंदिर (कुडचडे),तसेच श्री बेताळ मंदिर,श्री लिंगदेव,श्री शिवनाथ,श्री धानुगाडी (काकोडा) या गावात आहे. केपें तालुक्यात दत्त मंदिराच्या बाजूला कुशावती नदीचे वास्तव आहे. या तालुक्यात सरकारी महाविद्यालय आहे. या विद्यालयात अनेक भागातून मुले शिकायला येतात. आधी केपें या तालुक्याचे नाव 'कुसमण' असे होते. कालांतराने त्याचे केपें असे नाव झाले. तसेच इथे भूतनाथ पर्वत हे केपे परिसरातील जागरूक देवस्थान आहे.
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उंचाल्ली धबधबा हा सुमारे ११६ मीटर (३८१ फूट) उंचीवरून कोसळणारा धबधबा आहे. हा अघनाशिनी नदीवर असून, कर्नाटकच्या उत्तर कन्नडा जिल्ह्याच्या सिद्दपूर तालुक्यात आहे. याला लशिंग्टन धबधबा असेही म्हणतात. सन १८४५ मध्ये जे.डी. लशिंग्टन नावाच्या जिल्हाधिकाऱ्याचे नाव या धबधब्यास देण्यात आले होते.
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हेग्गर्णे हे तेथील एक गाव आहे. ते सिद्दपूरपासून सुमारे ३५ कि.मी. अंतरावर आहे. या धबधब्यापर्यंत पोहोचण्यास हेग्गर्णे गावापासून ५ कि.मी. पायी जावे लागते. यास 'केप्पा जोगा' असेही नाव आहे.[ चित्र हवे ]
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२५ जानेवारी, इ.स. २००६
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दुवा: Cricinfo (इंग्लिश मजकूर)
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३० ऑक्टोबर, इ.स. २०१०
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दुवा: [CricketArchive] (इंग्लिश मजकूर)
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केमार आंद्रे जमाल रोच (जून ३०, इ.स. १९८८:सेट लुसी, बार्बाडोस - ) हा वेस्ट इंडीजकडून आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेळणारा खेळाडू आहे.
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केरसणे हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील सटाणा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४० सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ९०० मि.मी.पर्यंत असते.
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एप्रिल १७, इ.स. २००७
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दुवा: [---] (इंग्लिश मजकूर)
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कायलीन ग्रीन (जन्म ३ जून १९९८) ही नामिबियाची क्रिकेट खेळाडू आहे.[१] तिने २० ऑगस्ट २०१८ रोजी मलावी विरुद्ध, २०१८ बोत्सवाना क्रिकेट असोसिएशन महिला टी२०आ मालिकेत नामिबिया महिला क्रिकेट संघाकडून महिला ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय (मटी२०आ) पदार्पण केले.[२] नामिबियाकडून खेळलेला हा पहिला महिला टी२०आ सामना होता.[३]
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मूसा जातिच्या झाडांना आणि त्याच्या फळास केळी असे म्हणतात.केळीचे मूळस्थान दक्षिण पूर्व आशिया मानले जाते. सध्या संपूर्ण उष्णकटिबंधीय प्रदेशात याची लागवड केली जाते. प्रामुख्याने फळांच्या उत्पादनासाठीच याची लागवड करण्यात येते. केळाच्या झाडाची उंची २ ते ८ मीटर तर पानाची लांबी ही साडेतीन मीटर असू शकते. केळीची लागवड कंदापासून केली जाते. केळाच्या झाडाची उंची २ ते ८ मीटर तर याच्या पानाची लांबी ही साडेतीन मीटर असू शकते. केळीला येणारी फळे ही घडामध्ये येतात याला लोंगर असे म्हणतात. एक घडामध्ये साधारणत: १० फण्या असतात तर एका फणीस १६-१८ केळी असतात. याचे फुल/फुलोरा हे तपकिरी रंगाचे असते. कच्ची फळे हिरवी तर पिकलेली पिवळी किंवा लालसर दिसतात. [1] याला शास्त्रीय नाव मुसा इंडिका (Musa indica ) केळी ही वनस्पती वृक्ष असून सुद्धा तिला खोड नाही. केळी या वनस्पतीला संस्कृत भाषेमध्ये रंभा असे नाव आहे.या वनस्पतीचा जीवाश्म मध्येसुद्धा संदर्भ दिसतो .अतिशय जलद गतीने ऊर्जा देणारे उत्साहवर्धक महत्त्वाचे फळ आहे.
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केळफूल हे स्निग्ध, मधुर, तुरट, गुरू, कडसर, अग्निप्रदीपक, वातनाशक तसेच काही प्रमाणात उष्ण आहे. रक्तपित्त, कृमी, क्षय, कोड यावर ते गुणकारी आहे. आपल्या आहारात या केळफुलांचा वापर नक्कीच करू शकतो. बनाना फ्लॉवर म्हणजेच केळफूल आणून त्याची भाजी केली जाते. योग्य केळफूल निवडून चिरणे जरा किचकट व चिकित्सक काम आहे; परंतु त्याचे पौष्टिक गुणधर्म जास्त महत्त्वाचे आहेत.
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केळीचे रोप जेव्हा मोठे होते, तेव्हा त्याच्या मध्यभागातून एक दांडा फुटतो. या दांडय़ाच्या अग्रभागी लाल रंगाची फुले येतात व त्यांचे रूपांतर केळीत होते. केळ्याच्या एका घडात ३०० ते ४०० केळी तयार होतात. चंपाकदली, अमृतकदली, मर्त्यकदली, माणिक्यर कदली, लोटण, वेलची केळी, चंपाचिनी इत्यादी केळीच्या मुख्य जाती आढळतात. याशिवाय रंगभेदावरूनही केळीच्या जाती ठरतात. ७०-८० केळ्यांचा फणा ज्यातून निर्माण होतो ते केळफूल फुलासारखं दिसतच नाही. केळफुलाच्या वरची गुलाबी, लाल रंगाची जाड पानं उलगडत गेली की, आत पिवळसर फुलांचे केळ्याच्या घडासारखे घड दिसतात. केळफुलात कोलेस्टोरॉल नाही, साखर नाही, पण भरपूर चोथा आणि कॅल्शियम असतं. सोडियमने समृद्ध असलेल्या या केळफुलात चांगल्या प्रतीची प्रथिनं असतात, तसेच मॅग्नेशियम, आयर्न आण�� कॉपरही असतं. केळफुलाचा अर्क साखर नियंत्रणात ठेवतो, शरीरातल्या जंतूंची वाढ रोखतो.
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केळफुलाची भाजी निवडायला किचकट. कारण, त्यातल्या प्रत्येक फुलातला कडक दांडा आणि पातळ पापुद्रा काढावा लागतो. पण, ती अतिशय पौष्टिक असल्याने जरूर खावी. चिरल्यानंतर भाजी ताक किंवा लिंबू घातलेल्या पाण्यात घालावी, नाही तर काळी पडते. केळफुलाचा उपयोग भाजी, कोशिंबिरीमध्ये वाफवून किंवा कच्च्या स्वरूपातही खाल्ले जाते. केळफूल निवडताना ताज्या स्वरूपाचे निवडायचे असते. केळफूल सोलताना हाताला तेल लावावे म्हणजे चिकटपणा व डाग राहत नाहीत. मोठय़ा केळफुलांत लहान लहान फुलांच्या फण्या असतात. पूर्ण स्वरूपात या लहान फुलांचा वापर केला जातो. केळफुलाच्या बाहेरील जाड पाने काढून टाकतात. आतील लहान फुलांच्या फण्या बाहेर काढतात. प्रत्येक लहान फुलातील कडक दांडा व त्याच्या खालच्या बाजूला असलेला पांढरा पारदर्शक टोपीसारखा भाग काढून टाकतात; तो चिरला जात नाही व शिजत नाही. बाकी भाग स्वच्छ धुऊन चिरून घेतात.
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केळफुलातील गुणधर्मामुळे रक्त शुद्ध होते. केळफुलामुळे रक्तातील लोहाचे प्रमाण वाढण्यास मदत होते. म्हणून निमियामध्ये उपयुक्त. इरिटेबल बॉवेल सिन्ड्रोमसारख्या आजारात केळफूल उपयुक्त असते. केळफुलामुळे प्रोजेस्टेरॉन हे संप्रेरक स्र्वण्यास मदत होते. त्यामुळे मासिक पाळीमध्ये रक्तस्रवाचा जास्त त्रास होत नाही. जास्त रक्तस्रव होत असेल, तर केळफुले शिजवून दह्याबरोबर खाण्याचा सल्ला दिला जातो. केळफुलात जीवनसत्त्व ‘क’ ‘अ’, ‘ब,’ ‘के’ फॉस्फरस कॅल्शिअम व आयर्न भरपूर प्रमाणात आढळते. ब्रॉन्कायटिस व पेप्टिक अल्सरमध्ये केळफूल उपयोगी पडते. स्तनपान देणा-या स्त्रियांमध्ये दूधनिर्मितीसाठी उपयोगी. चवीत बदल म्हणूनही केळफूल खावे. भरपूर तंतुयुक्त असल्याने मधुमेही लोकांनी केळफूल जरूर खावे. त्यामुळे पोटही भरते, चवीत बदल होतो व साखर लगेच वाढत नाही. आतडय़ांचा, स्तनांचा कर्करोग टाळण्यासाठी आहारात केळफूल घ्यावे. केळफुलाचा केशरयुक्त भाग कापून त्यात मिरपूड भरून ठेवावी व सकाळी ते केळफूल तुपात तळून खावे. त्याने श्वानसविकार लवकर बरा होतो, असे वर्णन आयुर्वेदात केले आहे. सर्व वयोगटांसाठी केळफूल खाणे उत्तम.यापासून मुख्यत्वे भाजी तसेच किसमूर(गोवेकरी पदार्थ), कबाब, कटलेट इ. पदार्थ तयार केले जातात. ��लवृद्धीसाठी उपयुक्त.
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क्षेत्राच्या व उत्पन्नाच्या दृष्टीने आंब्याच्या खालोखाल केळीचा क्रमांक लागतो. केळीच्या उत्पन्नात भारताचा दुसरा क्रमांक लागतो. भारतात अंदाजे दोन लाख वीस हजार हेक्टर क्षेत्र केळीच्या लागवडीखाली आहे. केळी उत्पादन करणा-या प्रांतात क्षेत्राच्या दृष्टीने महाराष्ट्राचा जरी तिसरा क्रमांक लागत असला तरी व्यापारी दृष्टीने किंवा परप्रांतात विक्रीच्या दृष्टीने होणा-या उत्पादनात महाराष्ट्राचा पहिला क्रमांक लागतो. उत्पादनापैकी सुमारे ५० टक्के उत्पादन महाराष्ट्रात होते. सध्या महाराष्ट्रात एकूण चौवेचाळीस हजार हेक्टर क्षेत्र केळीच्या लागवडीखाली असून त्यापैकी निम्म्यापेक्षा अधिक क्षेत्र जळगांव जिल्हयांत आहे. म्हणून जळगांव जिल्हाला केळीचे आगार मानले जाते. मुख्यतः उत्तर भारतात जळगाव भागातील बसराई केळी पाठविली जाते. त्याचप्रमाणे सौदी अरेबिया इराण, कुवेत, दुबई, जपान व युरोपमधील बाजारपेठेत केळीची निर्यात केली जाते. त्यापासून मोठया प्रमाणावर परकीय चलन प्राप्त होते. केळीच्या ८६ टक्केहून अधिक उपयोग खाण्याकरीता होतो. पिकलेली केळी उत्तम पौष्टिक खाद्य असून केळफूले, कच्ची फळे व खोडाचा गाभा भाजीकरिता वापरतात. फळापासून टिकावू पूड, मुराब्बा, टॉफी, जेली इत्यादी पदार्थ बनवितात. वाळलेल्या पानाचा उपयोग आच्छादनासाठी करतात. केळीच्या खोडाची व कंदाचे तुकडे करून ते जनावरांचा चारा म्हणून उपयोगात आणतात. केळीच्या झाडाचा धार्मिक कार्यात मंगलचिन्ह म्हणून उपयोग केला जातो.
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केळीच्या लागवडीचा मोसम हवामानानुसार बदलत असतो. कारण हवामानाचा परिणाम केळीच्या वाढीवर, फळे लागण्यास व तयार होण्यास लागणारा कालावधी या वरच होत असतो. जळगांव जिल्हयात लागवडीचा हंगाम पावसाळयाच्या सुरुवातीस सुरू होतो. यावेळी या भागातील हवामान उबदार व दमट असते. जून जुलै मध्ये लागवड केलेल्या बागेस मृगबाग म्हणतात. सप्टेबर ते जानेवारी पर्यंत होणा-या लागवडीस कांदेबाग म्हणतात. जून जुलै लागवडीपेक्षा फेब्रूवारी मध्ये केलेल्या लागवडीपासून अधिक उत्पन्न मिळते. या लागवडी मुळे केळी १८ महिन्याऐवजी १५ महिन्यात काढणे योग्य होतात.
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लागवड करताना ०.५*०.५*०.५ मीटर आकाराचे खड्डे खोदून किंवा स-या पाडून लागवड करतात. दोन झाडातील अंतर बसराई जाती करिता १.२५ किंवा १.५० मीटर असते.
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या झाडाची मुळे उथळ असतात. त्यांची अन्नद्रव्यांची मागणी जास्त असते. त्यामुळे वाढीच्या सुरुवातीच्या काळात (पहिले चार महिने) नत्रयुक्त जोरखताचा हप्ता देणे महत्वाचे ठरते. प्रत्येक झाडास २०० ग्रॅम नत्र तीन समान हप्त्यात लावणीपासून दुस-या, तिस-या व चौथ्या महिन्यात द्यावे. प्रत्येक झाडास प्रत्येक वेळी ५०० ते ७०० ग्रॅम एरंडीची पेंड खतासोबत द्यावी. शेणखताबरोबर ४०० ग्रॅम ओमोनियम सल्फेट प्रत्येक झाडास लावणी करतांना देणे उपयुक्त ठरते.
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दर हजार झाडास १०० कि. नत्र ४० कि. स्फूरद व १०० कि. पालांश ( प्रत्येक खोडास) १०० ग्रॅम नत्र ४० ग्रॅम स्फूरद, ४० ग्रॅम पालाश म्हणजेच हेक्टरी ४४० कि. नत्र १७५ कि. स्फूरद आणि ४४० कि. पालाश द्यावे.
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केळीच्या उत्पादनात जागतिक पातळीवर भारत प्रथम आणि भारतात महाराष्ट्र राज्य प्रथम आहे. केळीच्या जागतिक उत्पादनापैकी भारतात २० टक्के उत्पादन होते तर भारतातील एकूण उत्पादनापैकी महाराष्ट्रात २५ टक्के उत्पादन होते. महाराष्ट्रात जळगाव जिल्ह्यात रावेर, चोपडा व यावल ही तालुके केळी उत्पादनात अग्रेसर आहे.
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बसराई, श्रीमंती, वेलची, सोनकेळी, लाल केळी, चक्रकेळी, कुन्नन, अमृतसागर, बोंथा, विरूपाक्षी, हरिसाल, सफेद वेलची, लाल वेलची, वामन केळी, ग्रोमिशेल, पिसांग लिलीन, जायंट गव्हर्नर, कॅव्हेन्डीशी, ग्रॅन्ड नैन, राजापुरी, बनकेळ, भुरकेळ, मुधेली, राजेळी, इ.
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पूर्वीपासून केळी फळाचा मुख्य उपयोग खाण्यासाठी केला जातो. सध्या केळी पासून केळीचे वेफर्स, केळीचा जॅम, केळीची भुकटी, केळीचे पीठ, केळीची प्युरी, सुकेळी, केळीचे पेठे, केळीची दारू, ब्रॅन्डी, शिरका, केळी बिस्कीट असे कितीतरी पदार्थ बनवले जातात.केळफूलापासून देखील कित्येक वेगवेगळे पदार्थ तयार केले जातात.केळफूल स्वच्छ करणे थोडे किचकट/क्लिष्ट काम असते.केळफूलाची भाजी व कटलेट हे पदार्थ लोकप्रिय आहेत.
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कच्च्या केळीची भाजी पूर्वीपासूनचा बनवतात. केळीच्या पानांचा उपयोग दक्षिण भारतात जेवण वाढण्यासाठी केला जातो. केळीच्या पानांचा उपयोग जनावरांना चारा म्हणूनही होतो. तसेच वाळलेली पाने इंधन म्हणून वापरता येते. केळी हे फळ शरीरासाठी खूप उपयुक्त आहे आणि याचा वापर नेहमी आहारात समावेश के��्यास आपले आरोग्य चांगले राहते. कच्च्या केळीमध्ये भरपूर प्रमाणात पोटॅशियम, विटॅमिन बी ६, विटॅमिन सी, स्टार्च तसेच अॅन्टिऑक्सिडेंट्स असतात.
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हिंदू धर्मात केळीच्या खांबांना म्हणजे झाडाच्या खोडाला, आंब्याच्या पानांच्या तोरणाप्रमाणेच शुभसूचक, मांगल्याचे प्रतीक मानले जाते. लग्न, मुंज अशा शुभकार्याच्या प्रसंगी प्रवेशद्वारावर दोन केळीचे उंच व पाने असलेले खांब रोवून त्याचे तोरण केले जाते. आपण हे सुद्धा अनेकदा आपण एकले असेल ही ज्या मुलांचे विवाह जुळत नाही त्या वेळेस ही याच झाडाची पूजा आपणास करावयास सांगितली जाते. की आपण जेव्हा केळीच्या पानावर गरम गरम वाढतो. तेव्हा पानमधील असलेले पोषक तत्त्वे अन्नात मिसळतात जे आपल्या शरीरासाठी योग्य असतातत. यामुळे आपल्या शरीरावर खाज, डाग, पुरळफोड अशा समस्या दूर होततात. केळीच्या पानामध्ये “एपिगोलो गट्लेत’’आणि ईजेसीजी सारखे पायलिफिलोस अँटी ऑक्सिडंट आढळतता. याच पणामुळे अँटी ऑक्सिडंट आपणास मिळतात. या मुळे आपल्याला त्वचेवर दीर्घकाळ तारुण्य टिकून राहण्यास मदत होते. मेंदूला होणारा रकतस्राव सुरळीत चालू शकतो. केळीच्या पानावर जेवण केल्यास अन्नपचन पण सोपे होते. केळीच्या पानावर खोबरेल तेल टाकून ते पण त्वचेवर गुंडाळून लावल्यास त्वचेचा आजार ठीक होतो
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५० टक्के पिकलेल्या केळीचा गर पाण्यात एकजीव करून १५ ते २० मिनिटे गरम करावा. तो गर गाळून घ्यावा. गाळलेल्या गरात समप्रमाणात साखर, ०.५ टक्के सायट्रेिक आम्ल व पेक्टीन टाकून उकळी येईपर्यंत मिश्रण शिजवावे. या वेळी मिश्रणाचे तापमान साधारणपणे १०४ अंश से. असते. तयार जेलीमध्ये एकूण घन पदार्थाचे प्रमाण ७० डिग्री ब्रिक्स इतके असते. जेली गरम असतानाच निर्जंतुक बाटल्यांमध्ये भरावी. पेरूच्या जेलीपेक्षा केळीची जेली पारदर्शक व स्वादिष्ट असते.
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कोणत्याही जातीच्या पूर्ण पिकलेल्या केळीचा वापर जॅम तयार करण्यासाठी करता येतो. गराच्या वजनाएवढी साखर मिसळून गर मंद अग्रीवर शिजवावा. साखर पूर्णपणे विरघळल्यावर ०.५ टक्के पेक्टीन, ०.३ टक्के सायट्रेिक आम्ल व रंग टाकून मिश्रण घट्ट होईपर्यंत शिजवावे. मिश्रणाचा ब्रिक्स ६८ ते ७० डिग्री झाल्यावर जॅम तयार झाला, असे समजावे. तयार जॅम कोरड्या व निर्जंतुक बाटल्यांमध्ये भरावा. हा पदार्थ एक वर्षापर्यंत टिकू शकतो.
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केळझर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील सटाणा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४० सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ९०० मि.मी.पर्यंत असते.
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केळवणे हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील मध्य कोकणातील रायगड जिल्ह्यातील पनवेल तालुक्यातील एक गाव आहे.
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पावसाळ्यात येथे भरपूर प्रमाणात पाऊस पडतो आणि हवामान समशीतोष्ण राहते. हिवाळ्यात येथील हवामान थंड असते व अनेकदा सकाळी धुके पडते. उन्हाळ्यात हवामान उष्ण असते. पावसाळ्यात येथे भातशेती, नागलीशेती केली जाते.
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केळविहीर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील पेठ तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४० सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान २,००० मि.मी.पर्यंत असते.
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केळापूर हा भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील यवतमाळ जिल्ह्यातील एक तालुक्याचे नांव आहे.
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या तालुक्याची निर्मिती १८७५ मध्ये तत्कालीन यवतमाळ आणि वणी तालुक्यातून काही गावे वगळून करण्यात आली. यवतमाळ जिल्ह्यातील पांढरकवडा नावाच्या शहराजवळ केळापूर नावाचे गांव आहे.
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पांढरकवडा आणि केळापूर गावांमधून खुनी नावाची नदी वाहते. ही पैनगंगा नदीची उप नदी आहे. दुसरे बाजीराव पेशवे यांचा पाडाव याच खुनी नदीच्या किनाऱ्यावर झाला.
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या भागात "कोलाम" आणि "गोंड" हे आदिम समाज मुख्य आहेत. कापूस, तूर, ज्वारी, सोयाबीन, ई. पिके महत्त्वाची आहेत. या तालुक्याच्या दक्षिणेस आंध्र प्रदेश राज्य आहे. उत्तर आणि दक्षिण भारतास जोडणारा राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक ७ या गावातून जातो.
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केळापूर गावापासून टिपेश्वर नावाचे वन्यजीव अभयारण्य अगदी जवळ आहे. या अभ्यारण्यात याच नावाचे गाव असून तेथे कोलाम आणि गोंड आदिवासी एकत्र राहतात. इथून जवळच टिपाई देवीचे प्राचीन देऊळ आहे. या देवीच्या नावावरूनच याला टिपेश्वर नाव पडले. हे अभयारण्य डोंगराळ असून येथे जाण्यासाठी रस्ता फार चांगला नाही.
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गावाला लागूनच इंग्रजांच्या काळातील एक छोटेसे विश्रामगृह आहे. अभयारण्यात विविध पक्षी, सस्तनी प्राणी, साप आणि झाडे आहेत. हे पानगळीचे जंगल आहे, पाऊस मध्यम स्वरूपाचा पडत असल्याने येथे वर्षभर पाण्याची उपलब्धता नसते. उन्हाळ्यात झाडांची पाने गळून गेलेली असतात.
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केळी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नंदुरबार जिल्ह्यातील नवापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान सामान्यतः गरम आणि कोरडे आहे. येथे उन्हाळा, पावसाळा,आणि हिवाळा असे तीन वेगवेगळे ऋतू आहेत. उन्हाळा मार्चपासून चालू होऊन जूनमध्यापर्यंत असतो.उन्हाळा गरम आणि कोरडा असतो.मे महिन्यात तापमान फार असते.तापमान ४३ अंश सेल्सियसपर्यंत जाते.जूनच्या मध्यास किंवा अखेरीस पावसाळा सुरू होतो.पावसाळी हंगामात हवामान सामान्यतः आर्द्र आणि गरम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ७६० मि.मी.पर्यंत असते.हिवाळी मोसम नोव्हेंबरपासून साधारण फेब्रुवारीपर्यंत असतो.हिवाळा सौम्य थंड आणि कोरडा असतो.
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केवाड हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सोलापूर जिल्ह्यातील माढा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मध्यम आणि चांगले हवामान असते. हे कोरड्या हवामान श्रेणीत येते. उन्हाळा, पावसाळा आणि हिवाळा हे ऋतू असतात. मार्च ते मे हे महिने उन्हाळ्याच्या काळात येतात आणि या काळात कमाल तापमान ३० ते ४० अंश सेल्सियस पर्यंत असते. एप्रिल आणि मे महिन्याचा कालावधी सर्वात उष्ण असतो. येथे पाऊस अल्प आणि अनिश्चित प्रमाणात पडतो. जूनच्या दुसऱ्या पंधरवड्यापासून ते सप्टेंबर अखेरपर्यंत मान्सूनचा कालावधी असतो. सरासरी ५४५ मि.मी. पाऊस पडतो. येथे हिवाळा नोव्हेंबरमध्ये सुरू होतो आणि फेब्रुवारी महिन्यात तापमान कधीकधी १० अंश सेल्सियसपेक्षा कमी होते. हिवाळ्याच्या हंगामातील किमान तापमान जानेवारीत सुमारे ९ अंश सेल्सियस असते.
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केव्हिन जॉन आर्नॉट (मार्च ८, इ.स. १९६१:सॅलिसबरी (हरारे), झिम्बाब्वे - ) हा झिम्बाब्वेकडून ४ कसोटी आणि १३ एकदिवसीय सामने खेळलेला क्रिकेट खेळाडू आहे.
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आर्नॉटने कसोटी सामन्यात झिम्बाब्वे संघाला टाकण्यात आलेल्या पहिल्या चेंडूचा सामना केला.
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ओड़िशा विधानसभा (ओड़िआ: ଓଡ଼ିଶା ବିଧାନ ସଭା) हे भारताच्या ओड़िशा राज्याच्या विधिमंडळाचे एकमेव सभागृह एक आहे. १४७ आमदारसंख्या असलेल्या ओड़िशा विधानसभेचे कामकाज भुवनेश्वर शहरामधून चालते. बिजू जनता दल पक्षाचे निरंजन पुजारी हे विधानसभेचे सभापती असून मुख्यमंत्री नवीन पटनायक विधानसभेचे नेते आहेत.
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भारताच्या इतर विधिमंडळांप्रमाणे ओडिशा विधानसभेचा कालावधी ५ वर्षांचा असतो व आमदारांची निवड निवडणुकीद्वारे होते. सरकार स्थापनेसाठी राजकीय पक्षाला अथवा राजकीय आघाडीकडे ७४ जागांचे बहुमत असणे अनिवार्य आहे. विद्यमान १६वी विधानसभा ओडिशा विधानसभा निवडणूक, २०१८ निवडणुकीनंतर अस्तित्वात आली. मागील निवडणुकीमध्ये प्रस्थापित केलेले आपले वर्चस्व बिजू जनता दलाने कायम राखले.
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नवीन पटनायक
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नवीन पटनायक
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बिजद
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ओड़िशा विधानसभा निवडणूक २०१४ ही भारताच्या ओड़िशा राज्यातील विधानसभा निवडणुक होती. १० एप्रिल व १७ एप्रिल २०१४ रोजी २ फेऱ्यांत घेण्यात आलेल्या ह्या निवडणुकीमध्ये ओड़िशा विधानसभेमधील सर्व १४७ जागांसाठी नवे आमदार निवडले गेले.
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२०१४ लोकसभा निवडणुकांच्या सोबतच घेण्यात आलेल्या ह्या निवडणुकीत नवीन पटनायकांच्या नेतृत्वाखाली बिजु जनता दलाने ११७ जागांवर विजय मिळवून जोरदार प्रदर्शन केले व आपले राज्यातील बहुमत अजूनच बळकट केले.
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केशरी डोक्याचा कस्तूर (शास्त्रीय नाव: जिओकिच्ला सिट्रिना) हा भारतीय उपखंडातील जंगल आणि बागांमध्ये आढळणारा एक सामान्य पक्षी आहे.
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हे पक्षी फळे तसेच कीडे, कीटक खातात. यांची घरटी झाडांमध्ये असतात. हे सहसा थव्यांतून आढळत नाहीत.
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त्यांचे संपूर्ण नाव केशव आत्माराम कुलकर्णी. आईचे नाव गंगाबाई. गंगाबाईंना म्हातारपणी हे अपत्य झाले. ते लातूरच्या दक्षिणेस असलेल्या कल्याणी नावाच्या इतिहासप्रसिद्ध गावचे. केशवस्वामी पाच वर्षाचे असेपर्यंत बोलत नव्हते. त्यावेळी जे कोणी शंकराचार्य पीठावर होते, त्यांचे एकदा कल्याणी गावी आगमन झाले. त्यांनी छोट्या केशवला कृपाप्रसाद दिला आणि त्याला वाचा आली, असे सांगितले जाते.
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केशवस्वामी विवाहित होते, प्रापंचिक होते. ते आध्यात्मिक विचाराचे होते, पण विषयोपभोगाचे त्यांना वावडे नव्हते. अध्यात्मपर विचार शृंगारिक काव्यात ते अशा बेमालूमपणे मिसळून देत के त्यांच्या काव्याने लोक थक्क होत.
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केशवस्वामींना लोक गीतगोविंदकर्त्या जयदेवाचा अवतार मानीत. त्यांच्या कीर्तनाने प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण प्रसन्न होई. त्यांच्या कीर्तनादरम्यान एकदा भिंतीवरील कृष्णाच्या चित्रातील राधेने दिलेला विडा चित्रातीलच श्रीकृष्णाने स्वीकारला आणि भक्षण केला, अशी आख्यायिका आहे. केशवस्वामींनी दाखवलेल्या चमत्कारांमुळे अनेक यवन अधिकारी आश्चर्यचकित होत असत. एकदा केशवस्वामींच्या कीर्तनात सुंठवड्यात चुकून बचनाग मिसळला गेला, पण कुणालाही विषबाधा झाली नाही. श्रीकृष्णाची मूर्ती मात्र काळवंडली.
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समर्थांच्या भेटीसाठी
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केशवस्वामी एकदा फार व्याकुळ झाले; पत्नीसह सज्जनगडाला निघाले. पति-पत्नी दोघांचेही वय झाले होते. ्डोंगर चहताना दोघेही थकून गेले. एका अनोळखी माणसाने त्यांचे सामा्न तर उचललेच, पण केशवस्वामींच्या पत्नीलाही खांद्यावर बसवून गडावर नेण्याची तयारी दाखवली. बाई संकोचाने नाही म्हणाल्या, पण केशवस्वामी म्हणाले, ‘संकोचू नकोस, तो आपला बाळच आहे’. गडावर पोहोचल्यावर बाई त्याला शोधू लागल्या, पण तो कोठे दिसे ना. तेव्हा केशवस्वामी म्हणाले, ‘तोआपला बाळ नव्हता, अंजनीचा बाळ होता.’
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पुढे केशवस्वामी भागानगरला गेले आणि त्यांनी तेथे स्वतःचा मठ स्थापन केला. समर्थ संप्रदाय्वाढवला. त्या मठात समर्थ पंचायतनातले इतर सत्पुरुष जात-येत असत. केशवस्वामींना समर्थ रामदासांच्या वागण्याचे मोठे कौतुक असे. समर्थांवर त्यांनी अनेक पदे रचली आहेत. ते म्हणतात :-
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या केशवस्वामींची समाधी हैदराबाद येथे आहे. हे केशवस्वामी समर्थ पंचायतनातले एक आहेत.
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उंब्रज मठपती केशवस्वामी हे कल्याण स्वामींचे शिष्य होते.
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ते इ.सन १६८२ ते १७१४ पर्यंत चाफळ येथे समर्थांच्या अस्थी असलेल्या वृंदावनाची व्यवस्था पाहत होते. त्यांनीच समर्थ रामदास व कल्याण स्वामी यांच्या अस्थींचे विसर्जन गंगेमध्ये केले. त्यांचा हस्तलिखित सोनेरी रंगाचा दासबोध आजही डोमगाव मठात पहाण्यास मिळतो. त्यांनी चाफळ येथील नदीला घाट बांधल्याचा उल्लेख समर्थप्रताप ग्रंथामध्ये आहे .
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डॉ. दाजी भाटवडेकर ऊर्फ केशवचंद्र मोरेश्वर भाटवडेकर (सप्टेंबर १५ १९२१ - डिसेंबर २६, २००६) हे मराठीतील प्रसिद्ध नाट्यअभिनेते होते. मराठी रंगभूमीबरोबरच इंग्रजी, संस्कृत आणि हिंदी रंगभूमीवरही त्यांनी काम केले.
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दाजी भाटवडेकर मूळचे मुंबईचे. स्वातंत्र्यपूर्व काळात दाजींचे आजोबा मुंबईतील एक प्रख्यात डॉक्टर होते. त्याकाळी त्यांना मुंबईचे महापौरपदही मिळाले होते. त्यांचे घराणे संपन्न असले तरी घरांत धार्मिक आणि संस्कृती जपणारे वातावरण होते.दर एकादशीला घरात कीर्तन आणि भजनाचा कार्यक्रम होत असे. दर पंधरवड्याला होणाऱ्या असल्या कार्यक्रमातील नाट्याचा आणि कथानकांचा दाजींच्या मनावर खोल परिणाम झाला. ते कीर्तनकार बुबांच्या आवाजाची आणि बोलण्याच्या ढंगाची हुबेहूब नक्कल करीत असत. अगदी बालवयात म्हणजे वयाच्या आठव्या वर्षी त्यांनी गिरगावातल्या ब्राह्मणसभेत तासभर कीर्तन करून "बालकीर्तनकार' असा लौकिक दाजींनी मिळवला होता. पुढे आर्यन हायस्कूलमध्येही अनेक वर्षे कृष्ण जयंतीला त्यांचे कीर्तन होत असे. नाशिकला गोऱ्या रामाच्या देवळातही त्यांचे कीर्तन झाले होते. १९४४मध्ये संस्कृत विषय घेऊन एम. ए. झाल्यावर मुंबईच्या ब्राह्मणसभेत केलेल्या कीर्तनानंतर त्यांनी कीर्तनात गुंतून न राहण्याचे ठरवले. त्यामंतर भरदार आवाजाची देणगी मिळालेल्या दाजींनी संगीत नाटकांत भूमिका करायला सुरुवात केली.
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दाजींच्या दुर्दैवाने पुढे मराठी संगीत रंगभूमीला उतरती कळा लागली. संभाषणात नाटकी अभिनिवेशाने बोलण्याच्या जागी वास्तव शैलीने बोलायची पद्धत पडू लागली. मग दाजींनी आपला मोहरा संस्कृत रंगभूमीकडे वळवला. दाजी स्वतः उच्चशिक्षित आणि संस्कृत नाटकांचे गाढे अभ्यासक असल्याने त्यांना संस्कृत रंगभूमीची चळवळ सुरू करायला फारशी अडचण पडली नाही.. मुंबईच्या ब्राह्मण सभेत त्यांनी १९५० ते १९८० या काळात दर वर्षाला एक नवे संस्कृत नाटक रंगभूमीवर आणले. कालिदास महोत्सवाच्या काळात दाजींनी ’अभिज्ञानशाकुंतल’ या संस्कृत नाटकाचा प्रयोग भारताचे तत्कालीन उपराष्ट्रपती, महाराष्ट्राचे राज्यपाल आणि अन्य सन्माननीय पाहुण्यांच्या उपस्थितीत सादर करून वाहवा मिळवली. रंगभूमीवर त्यांनी केवळ संस्कृत नाटकेच केली नाहीत, तर गाजलेल्या मराठी नाटकांचे संस्कृतमध्ये रूपांतर क��ून त्याचे प्रयोगही केले.
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संस्कृत नाटकांनाही पुढे प्रेक्षक मिळेनासे झाले. मात्र, ही नाटके सादर करताना काय काय अनुभव आणि अडचणी आल्या यावर दाजींनी लिहिलेला प्रबंध मुंबई विद्यापीठाने स्वीकारून त्यांनी डॉक्टरेट दिली.
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व्यावसायिक रंगभूमीवर त्यांनी ४० नाटकांत एकूण ५० भूमिका साकार केल्या. तुझे आहे तुजपाशी या नाटकातील "काकाजी' ही भूमिका त्यांनी अजरामर केली. दाजी भाटवडेकरानंतर ती भूमिका तेवढ्या ताकदीने कुठलाही अभिनेता करू शकलेला नाही.
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"घर गंगेच्या काठी' हा चित्रपट आणि अक्कलकोटच्या स्वामी समर्थांच्या जीवनावरील श्री स्वामी समर्थांची भूमिका यांसारख्या त्यांच्या चित्रपटांतील भूमिकाही गाजल्या. दूरदर्शनवरील मालिकांमधूनही ते चमकले. आकाशवाणीच्या अनेक श्रुतिकांमधूनही त्यांनी कामे केली. आपल्या सुमारे ६५ वर्षांहूनही अधिक काळातील नाट्य कारकिर्दीत त्यांनी सत्तराहून अधिक भूमिका केल्या. केंद्रीय चित्रपट परिनिरीक्षण मंडळाचे सदस्य तसेच राज्य रंगभूमी प्रयोग परिनिरीक्षण मंडळाचे अध्यक्ष म्हणून त्यांनी काम केले. अनेक पुरस्कारही त्यांच्याकडे चालत आले.
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मुंबई, ता. २७ : व्यावसायिक रंगभूमीवर आपल्या पहाडी आवाजाने, अभिनयाने अधिराज्य गाजविलेले नटश्रेष्ठ पद्मश्री दाजी भाटवडेकर यांचे मंगळवार दि. २६ डिसेंबर रोजी दुःखद निधन रात्री ११.३० वाजता झाले.
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१ सप्टेंबर रोजी घरी पाय घसरून पडल्यामुळे त्यांना मोतीबेन दळवी रुग्णालयात दाखल केले होते. परंतु प्रकृती अस्वास्थामुळे त्यांनी घरीच राहणे पसंत केले होते. निधनसमयी त्यांचे वय ८६ होते. त्यांच्या पश्च्यात त्यांची पत्नी चारुशीला भाटवडेकर, मुलगा दिलीप भाटवडेकर हे आहेत. त्यांच्या पार्थिवावर गिरगावच्या चंदनवाडी स्मशानभूमीत अंत्यसंस्कार करण्यात आले. दाजी भाटवडेकरांचा जन्म १९२० साली झाला. व्यावसायिक रंगभूमीवरील ते उच्चशिक्षित अभिनेते होते. मराठी, इंग्रजी आणि संस्कृत तशा तिन्ही भाषेचा गाढा अभ्यास होता. स्पष्ट शब्दोच्चार, पहाडी आवाज आणि आपल्या समर्थ अभिनयानी गेली चार तपं त्यांनी रसिकांना मंत्रमुग्ध केले. व्यावसायिक रंगभूमीवर त्यांनी ४० नाटकात एकूण ५० भूमिका साकार केल्या. तुझं आहे तुजपाशी या नाटकातील "काकाजी' ही भूमिका त्यांनी अजरामर केली. दाजी भाटवडेकरानंतर ती भूमिका तेवढ्या ताकदीनं ��ुठलाही अभिनेता करू शकलेला नाही. सुंदर मी होणार या नाटकातील "महाराज', "अंमलदार नाटकातील "डेरेसाहेब', मानापमान नाटकातील "लक्ष्मीघर' सौभद्र नाटकातील (बलराम), संशयकल्लोळ नाटकातील (फाल्गुनराव), एकच प्याला नाटकातील (सुधाकर), भावबंधन नाटकातील (घनश्याम) इत्यादी नाटकातील भूमिका गाजलेल्या आहेत. दाजी भाटवडेकरांच्या निधनाने रंगभूमीवरील एक सच्चा, पहाडी आवाजाचा, संस्कृतचा गाठा अभ्यासक, चार दशकं रंगभूमीची सेवा करणारा काकाजी गेला असेच म्हणावं लागेल. काकाजींच्या निरोप संध्येस सर्वथरातील मंडळी हजर होती.
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विचारवंत अभिनेता
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दाजी भाटवडेकर यांच्या निधनाने एका विचारवंत अभिनेत्याला आपण सारे मुकलो आहोत. दाजी हे मराठी रंगभूमीवरील म्हणून जसे ओळखले जात, तसेच संस्कृत रंगभूमी पुनरुज्जीवित करणारे गाढे विद्वान, इंग्रजी आणि हिंदीतूनही रंगभूमी फुलविणारे कलाकार आणि त्याचबरोबर साहित्य आणि सामाजिक क्षेत्रातही भरीव कामगिरी केलेले विचारवंत म्हणूनही दीर्घ काळ स्मरणात राहतील. केशवचंद्र मोरेश्वर तथा दाजी भाटवडेकर यांचा जन्म १५ सप्टेंबर १९२१ चा. सर भालचंद्र भाटवडेकर यांचे ते नातू. सर भालचंद्र यांच्या कर्तृत्वामुळे आणि वडील मोरेश्वर यांच्या संस्कारांमुळे दाजी लहानपणापासूनच गर्भश्रीमंत असूनही समाजाविषयी कळवळा असणारे दानशूर आणि अभ्यासू म्हणून ओळखले गेले. पु.ल. देशपांडे यांच्या "तुझे आहे तुजपाशी' नाटकातील रसिक सौंदर्यासक्त "काकाजी'ची भूमिका आपल्या अभिनयाने अजरामर करणारे दाजी व्यक्तिगत आयुष्यातही रसिक आणि सौंदर्यासक्त होते. या काकाजीचा त्यांच्या वैयक्तिक आयुष्यातही खूप मोठा प्रभाव होता. स्वाभाविकच, त्यांच्या भल्या मोठ्या परंपरागत घराचा दिवाणखानाही या काकाजीच्या दिवाणखान्यासारखाच भासावा, अशा रीतीने त्यांनी त्याची रचना केलेली होती. अगदी बालवयात म्हणजे वयाच्या आठव्या वर्षी त्यांनी गिरगावातल्या ब्राह्मणसभेत तासभर कीर्तन करून "बालकीर्तनकार' असा लौकिक मिळवला होता. पुढे आर्यन हायस्कूलमध्येही अनेक वर्षे कृष्ण जयंतीला त्यांचे कीर्तन होत असे. नाशिकला गोऱ्या रामाच्या देवळातही त्यांचे कीर्तन झाले होते. १९४४ मध्ये संस्कृत विषय घेऊन एम. ए. झाल्यावर मुंबईच्या ब्राह्मणसभेत केलेल्या कीर्तनानंतर त्यांनी कीर्तनात गुंतून न राहण्याचे ठरवले. शालेय आणि महाविद्यालयीन जीवनापासूनच ते अभिनयाच्या क्षेत्रात उतरले होते. शाळेच्या स्नेहसंमेलनात "पेस्तनजीकाकांची भूमिका त्यांनी केली होती. मुंबई मराठी साहित्य संघाचे डॉ. अ.ना. भालेराव यांनी त्यांना आमंत्रित केले. तेव्हापासून अखेरपर्यंत ते साहित्य संघाशी निगडित राहिले. के. नारायण काळे, गणपतराव बोडस आणि महामहोपाध्याय डॉ. पां.वा. काणे हे त्यांचे आदर्श होते. केशवराव दाते, मामा पेंडसे अशांसारख्या दिग्गजांचे मार्गदर्शन त्यांना लाभले. संस्कृतमध्ये त्यांनी केवळ संस्कृतातील नाटकेच केली नाहीत, तर गाजलेल्या मराठी नाटकांचे संस्कृतमध्ये रूपांतर करून त्याचे प्रयोगही केले. संस्कृत रंगभूमी समोरील समस्यांचा संशोधनपर ग्रंथ त्यांनी तयार केला. वयाच्या सत्तरीनंतर म्हणजे १९९३ मध्ये मुंबई विद्यापीठाची "डॉक्टरेट' पदवी त्यांनी मिळवली.
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डॉ. अ.ना. भालेरावांनी मराठी रंगभूमीची मरगळ दूर करण्यासाठी मराठी रंगभूमीवरील दिग्गजांना एकत्र आणून विविध नाटकांचे प्रयोग केले. अशा नाटकांमधून दाजींनी अनेक भूमिका केल्या. "संगीत संशयकल्लोळ'मधील "फाल्गुनराव', "सौंभद्रा'तील "बलराम', "एकच प्याला'तील "सुधाकर', "मानापमाना'तील "लक्ष्मीधर', "भाऊबंदकी'तील "राघोबा' यांबरोबरच "बेबंदशाही'मधील "कलुषा कब्जी' अशा विविधरंगी भूमिका त्यांनी केल्या. "पु.ल.'च्या "अंमलदार'मधील "ढेरेसाहेब' आणि "सुंदर मी होणार'मधील "महाराज' या त्यांच्या भूमिका जशा गाजल्या तशाच "घर गंगेच्या काठी' हा चित्रपट आणि अक्कलकोटच्या स्वामी समर्थांच्या जीवनावरील श्री स्वामी समर्थांची भूमिका यांसारख्या त्यांच्या चित्रपटांतील भूमिकाही गाजल्या. दूरदर्शनवरील मालिकांमधूनही ते चमकले. आकाशवाणीच्या अनेक श्रुतिकांमधूनही त्यांनी कामे केली. आपल्या सुमारे ६५ वर्षांहूनही अधिक काळातील नाट्य कारकिर्दीत त्यांनी सत्तराहून अधिक भूमिका केल्या. केंद्रीय चित्रपट परिनिरीक्षण मंडळाचे सदस्य तसेच राज्य रंगभूमी प्रयोग परिनिरीक्षण मंडळाचे अध्यक्ष म्हणून त्यांनी काम केले. अनेक पुरस्कारही त्यांच्याकडे चालत आले. "नाट्यकला समाजाची जडणघडण करते आणि म्हणूनच नाट्यकलेने समाजाच्या आरोग्याला धक्का पोचणार नाही, याची दक्षता घ्यायला हवी. या कलेचा रसस्वाद घेताना रसिकांना लाज वाटता कामा नये, लेखकाला आविष्कार स्वातंत्र्य जरूर मिळावे; पण समाजस्वास्थ्याला विघातक असे स्वातंत्र्य नको, ही कला माणसाच्या दैनंदिन जीवनाचा आरसाच त्याच्या पुढ्यात ठेवणारी हवी', असे मानणारे ते विचारवंत रंगकर्मी होते. रंगभूमीच्या पडत्या काळात तिला सावरण्याचे काम करणाऱ्या रंगकर्मींपैकी एक असणारे दाजी आज व्यावसायिक रंगभूमीला पुन्हा एकदा मरगळ आली असताना, नवी दिशा देण्यासाठी आपल्यामध्ये नाही.
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त; ही एकूण समाजाचीही हानी आहे.
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केशवराव मारोतराव जेधे (२१ एप्रिल, इ.स. १८९६ - नोव्हेंबर १२, १९५९) हे मराठी राजकारणी, बहुजन समाजोद्धार चळवळीचे नेते होते. जेधे कुटूंब कान्होजी नाईक यांचे वंशज होते. केशवराव जेधे यांचा जन्म २१ एप्रिल, इ.स. १८९६ रोजी पुणे येथे झाला.
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केशवरावांना तात्यासाहेब या नावाने ओळखले जाते. केशवराव जेधे यांचा संबंध ब्राह्मणेतर चळवळीशी होता. पुणे येथील जेधे मॅन्शन हे या चळवळीचे केंद्र होते. पुण्यातील प्रसिद्ध स्वारगेट चौक हे त्यांच्या नावावर आहे. केशवरावांनी शिवाजी मराठा हायस्कूल, पुणे येथे शिक्षकाची नोकरी केली. केशवराव जेधे यांनी छत्रपती मेळावा काढून टिळकांच्या शिवजयंतीला आव्हान दिले होते. त्यांनी "शांतीचा गांधी पुतळा। देशा प्यारा जाहला।" ही कविता लिहली.
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जेधे हे पुण्यातील देशमुख वंशाचे एक सधन मराठा कुटुंब होते. कुटुंबातील सदस्य सत्यशोधक समाजाचे होते आणि विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळात सामाजिक कार्यात त्यांनी सक्रिय सहभाग घेतला.[१] जेथे कुटुंबाकडे पुण्यात एक पितळ कारखान्याची मालकी होती. हा कारखाना जेधे यांच्या सर्वात मोठ्या भावाने चालविला होता. केशवराव सत्यशोधक समाजात सक्रिय कार्य करत असताना, त्यांचे एक भाऊ बाबुराव ब्राह्मणेतर चळवळीत सक्रिय होते. बाबुराव हे कोल्हापूर संस्थांचे छत्रपती शाहू महाराज यांचे निकटवर्तीय होते.[२]
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केशवराव मारोतराव जेधे (२१ एप्रिल, इ.स. १८९६ - नोव्हेंबर १२, १९५९) हे मराठी राजकारणी, बहुजन समाजोद्धार चळवळीचे नेते होते. जेधे कुटूंब कान्होजी नाईक यांचे वंशज होते. केशवराव जेधे यांचा जन्म २१ एप्रिल, इ.स. १८९६ रोजी पुणे येथे झाला.
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केशवरावांना तात्यासाहेब या नावाने ओळखले जाते. केशवराव जेधे यांचा संबंध ब्राह्मणेतर चळवळीशी होता. पुणे येथील जेधे मॅन्शन हे या चळवळीचे केंद्र होते. पुण्यातील प्रसिद्ध स्वारगेट चौक हे त्यांच्या नावावर आहे. केशवरावांनी शिवाजी मराठा हायस्कूल, पुणे येथे शिक्षकाची नोकरी केली. केशवराव जेधे यांनी छत्रपती मेळावा काढून टिळकांच्या शिवजयंतीला आव्हान दिले होते. त्यांनी "शांतीचा गांधी पुतळा। देशा प्यारा जाहला।" ही कविता लिहली.
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जेधे हे पुण्यातील देशमुख वंशाचे एक सधन मराठा कुटुंब होते. कुटुंबातील सदस्य सत्यशोधक समाजाचे होते आणि विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळात सामाजिक कार्यात त्यांनी सक्रिय सहभाग घेतला.[१] जेथे कुटुंबाकडे पुण्यात एक पितळ कारखान्याची मालकी होती. हा कारखाना जेधे यांच्या सर्वात मोठ्या भावाने चालविला होता. केशवराव सत्यशोधक समाजात सक्रिय कार्य करत असताना, त्यांचे एक भाऊ बाबुराव ब्राह्मणेतर चळवळीत सक्रिय होते. बाबुराव हे कोल्हापूर संस्थांचे छत्रपती शाहू महाराज यांचे निकटवर्तीय होते.[२]
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केशूभाई पटेल (२४ जुलै, १९२८ - ) हे भारतीय जनता पक्षाचे नेते आहेत.त्यांनी १९९५ आणि १९९८ ते इ.स. २००१ या काळात गुजरात राज्याचे मुख्यमंत्री म्हणून काम बघितले.
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वाडियार घराणे किंवा म्हैसूरचे वाडियार (लेखनभेद:वोडेयर किंवा ओडेयर कन्नड: ಒಡೆಯರು </link> , ज्यांना असेही संबोधले जाते ), हे भारताच्या सध्याच्या कर्नाटक राज्यातील मैसुरु संस्थानावर राज्य करणारे घराणे होते. हे घराणे या भागातील अर्स घराण्याला आपले पूर्वज मानतात.[१]
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म्हैसूरचे महाराज म्हणून, वडियारांनी १३९९पासून १९५० पर्यंत म्हैसूर राज्यावर राज्य केले. या राजांनी आपल्या भाऊबंदांना आणि अर्स घराण्यातील व्यक्तींनाच आपले कारभारी, दिवाण, सल्लागार तसेच सैन्याधिकारीही केले होते.[१]
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१३९९ च्या सुमारास विजयनगरचा सम्राट दुसऱ्या हरिहरने यदुराय अर्सला मैसुरु आणि आसपासच्या प्रदेशाची जहागीर बहाल केली. त्यावेळी यदुरायाने राजा हे पद घेतले आणि वडियार (सरदार, मालक) असे आडनाव घेतले. त्याने आणि त्याच्या वारसांनी १५५३ पर्यंत विजयनगर साम्राज्याच्या अधिपत्याखाली या प्रदेशावर राज्य केले राज्य केले.
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१५६५मध्ये मध्ये दख्खनी सल्तनतींनी विजयनगर साम्राज्याचा पराभव करून राजधानी हंपी आणि इतर प्रदेशाचा नाश केला. त्यावेळी यदुरायाचा पणतू दुसरा तिम्मराजा वडियारने मैसुरुला स्वतंत्र राज्य असल्याचे जाहीर केले. तिम्मराजाचा पुतण्या राज वोडेयार पहिला याने राज्याच्या सीमांचा विस्तार केला. १६१०मध्ये त्याने आपली राजधानी मैसुरु पासूनन कावेरी नदीवरील श्रीरंगपट्टण बेटावर हलवली. याचा चुलत भाऊ आणि उत्तराधिकारी कांतिरव नरसराज पहिला याने राज्याच्या सीमांचा विस्तार थेट सध्याच्या तामिळनाडूमधील त्रिचीपर्यंत केला. कांतिरवाचा पुतण्या चिक्कदेवराज तथा देवराजा वोडेयार दुसरा याच्या सत्ताकालात मैसुरुच्या राज्याच्या सीमा सर्वाधिक विस्तारलेल्या होत्या. याने आपल्या राज्याला १८ प्रशासकीय विभागांमध्ये (चावडी) विभाजित करून कर आकारणीची सुसंगत प्रणाली सुरू केली.
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कालांतराने दख्खनी सुलतानांनी वडियारांचा पराभव करून हे राज्य आपल्या आधीन करून घेतले. १७६० ते १७९९ दरम्यान वडियार घराण्याचे राजे नावापुरते असून वास्तविक सत्ता सेनापती आणि नंतर स्वयंघोषित सुलतान, हैदर अली आणि त्याचा मुलगा आणि उत्तराधिकारी टिपू यांच्या हातात होती. या दोघांनी, श्रीरंगपट्टणातून आक्रमकपणे राज्याचा विस्तार केला.
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१७९९ मध्ये चौथ्या इंग्रज-मैसुरु युद्धातील श्रीरंगपट्टणाच्या लढाईत इंग्रजांनी टिपू सुलतानला हरविले व नंतर फाशी दिले. त्यानंतर त्यांनी वाडियारांना आपले सामंत म्हणून पुन्हा सत्तेवर बसविले. सत्ता व करवसुली इंग्रजांनी स्वतःकडेच ठेवली आणि राजाला इंग्लंडच्या सम्राटाचे पगारी नोकर केले. याचबरोबर संस्थानाची राजधानी मैसुरुला परत नेण्यात आली. यावेळी शेवटचा वडियार राजा नववा चामराज वडियार याचा चार वर्षांचा मुलगा तिसरा कृष्णराज वडियार याला राजेपदी बसविण्यात आले.
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भारताला स्वातंत्र्य मिळून प्रजासत्ताकची स्थापना झाल्यावर १९५०-५६ दरम्यान जयचामराजेंद्र वडियार हे राजप्रमुख होते. १९५६मध्ये भाषिक आधारावर भारतीय राज्यांची पुनर्रचना झाल्यानंतर त्यांना एकत्रित म्हैसूर राज्याचे (सध्याचे कर्नाटक राज्य ) राज्यपाल केले गेले. हे या पदावर १९६४ पर्यंत होते. त्यानंतर दोन वर्षे ते मद्रासचे (आताचे तामिळनाडू) राज्यपाल होते.
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१७. सातवा चामराज वडियार
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१८. दुसरा कृष्णराज वडियार
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१९. नंजराज वडियार
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२०. आठवा चामराज वडियार
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२१. नववा चामराज वडियार
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२२. तिसरा कृष्णराज वडियार
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२३. दहावा चामराज वडियार (चामराजेंद्र, मद्दुर पाती)
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२४. चौथा कृष्णराज वडियार
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२५. जयचामराजेंद्र वडियार
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२६. श्रीकांतदत्त नरसिंहराज वडियार
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२७. यदुवीर कृष्णदत्त वडियार (सद्य)
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तोशिकी कैफू (1931-2022) हे १९८९ ते १९९१ दरम्यान जपानचे पंतप्रधान होते.[१]
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कैलाश बैठा ( जानेवारी १,इ.स. १९४८) हे भारतीय राजकारणी आहेत.ते जनता दल (संयुक्त) पक्षाचे उमेदवार म्हणून इ.स. २००४च्या लोकसभा निवडणुकांमध्ये बिहार राज्यातील बगाहा लोकसभा मतदारसंघातून लोकसभेवर निवडून गेले.
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कैलाश बैठा ( जानेवारी १,इ.स. १९४८) हे भारतीय राजकारणी आहेत.ते जनता दल (संयुक्त) पक्षाचे उमेदवार म्हणून इ.स. २००४च्या लोकसभा निवडणुकांमध्ये बिहार राज्यातील बगाहा लोकसभा मतदारसंघातून लोकसभेवर निवडून गेले.
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डॉ. कैलास अंभुरे (जन्म : कडसवंगी-जिंतूर तालुका, ५ जुलै, इ.स. १९७८) हे एक मराठी साहित्यिक आहेत.
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एम.ए.,पीएच.डी.(मराठी), बी.एड. एम.ए.(राज्यशास्त्र, शिक्षणशास्त्र), पाली ॲन्ड बुद्धिझम या विषयातली पदविका, शालेय व्यवस्थापन पदविका इत्यादी.
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कैलास अंभुरे औरंगाबाद येथील डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठात मराठी भाषा व वाङ्मय विभागात सहायक प्राध्यापक आहेत.(इ.स.२०१७)
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आधुनिक मराठी साहित्य व समीक्षा
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१. शोधप्रबंधिका- एम. फिल. (मराठी), ‘ऐसे कुणबी भूपाळ‘ या कादंबरीचा चिकित्सक अभ्यास, मार्गदर्शक प्रा. बाळकृष्ण कवठेकर, एप्रिल/मे २००२
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२. लघुशोधप्रबंध- एम.ए. (शिक्षणशास्त्र), इंग्रजी माध्यमाच्या अध्यापक विद्यालयातील छात्राध्यापकांच्या मराठी शुद्धलेखनाच्या चुकांचा अभ्यास, मार्गदर्शक प्रा. एम.ए. मजिद, ऑक्टोबर २००९
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३. कृतिसंशोधन अहवाल- शालेय व्यवस्थापन पदविका
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४. अौरंगाबादमधील एम.जी.एम. अध्यापक विद्यालयातील (इंग्रजी माध्यम) छात्राध्यापकांच्या मराठी शुद्धलेखनाच्या चुकांचा अभ्यास, मार्गदर्शक प्रा. संतोष जाधव, मे २०११
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५. शोधप्रबंध - पीएच.डी. (मराठी) : साहित्यिकांच्या पत्नींनी लिहिलेल्या आत्मचरित्रांचा अभ्यास (१९७० ते २००५) मार्गदर्शक : प्रा.डॉ. दादा गोरे, मार्च २०११.
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१. ग्रामीण कादंबरी : रंजकतेकडून आश्वासकतेकडे (क्रांतिदलचा २००५ सालचा दिवाळी अंक).
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२. ग्रामीण साहित्याला उभारी : साने गुरुजी प्रतिष्ठान (फेब्रुवारी, २००९,चा साहित्यपुष्पचा अंक).
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३. आद्यक्रांतिकारक तत्त्वचिंतक माता, गवाक्ष – संपा. स्नेहलता दत्ता, महात्मा गांधी मिशन, औरंगाबाद, एप्रिल २००९, पृ.११. ४. शैक्षणिक उत्कर्षासाठी बदल आवश्यक, स्वातंत्र्य शिक्षणाचे (शैक्षणिक विशेषांक), संपा. सचिन अंभोरे, जयभद्रा प्रकाशन, औरंगाबाद, १५ ऑगस्ट २००९.
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५. मूल्यसंवर्धनासाठी मौलिक परिपाठ, गवाक्ष – संपा. स्नेहलता दत्ता, महात्मा गांधी मिशन, औरंगाबाद, जानेवारी २०१०, पृ .३९.
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६. कुसुमाग्रज आणि विशाखा, दीपांजली (दिवाळी अंक), संपा. प्रा. जितेंद्र मगर, मॅक पब्लिकेशन, औरंगाबाद, २०१०.
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७. सुना सुना झाला पार, साद (त्रैमासिक), संपा. वैजनाथ वाघमारे, साद प्रकाशन, औरंगाबाद, फेब्रुवारी २०११, पृ. ९.
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८. नवोदितांच्या कवितेविषयीची परिभाषा बदलणारी कविता, व्हिजन २०११ (वार्षिक अंक), संपा. डॉ. कैलास अंभुरे/प्रा.अमरदीप असोलकर, महात्मा गांधी मिशन, औरंगाबाद, ऑक्टोबर २०११, पृ. ३१-३३.
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९. पायल शेलारची वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी -गवाक्ष (त्रैमासिक), संपा. स्नेहलता दत्ता, औरंगाबाद, सप्टेंबर २०१३, पृ. ४७.
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१०. आशयाभिव्यक्तीचे परिक्षेत्र विस्तारणारी कविता - ‘संकल्प’ दिवाळी अंक, साप्ता. वाळूज महानगर, संपा. गणेश घुले, नोव्हेंबर २०१३, पृ.३०.
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११. शिक्षणातून सामाजिक उन्नतीकडे – गवाक्ष (त्रैमासिक), संपा. स्नेहलता दत्ता, औरंगाबाद, डिसेंबर २०१३, पृ. ४२
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१. सखी आणि मी-एक विसंवाद : सखी आणि मी-एक विसंवाद-पी.विठ्ठल, अक्षर पुरवणी, दै. देवगिरी तरुण भारत, औरंगाबाद, २००१.
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२. स्त्री आणि पुरुष हे समान नव्हे एकच : स्त्री पुरुष तुलना-ताराबाई शिंदे, दै. सकाळ, औरंगाबाद, २६ फेब्रुवारी २००३.
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३. धाकटा वाडा-राजेंद्र माने, दै. सकाळ, औरंगाबाद, ७ एप्रिल २००३.
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४. हुंदका : ग्रामीण कवितेचे एक नवे अंग-गेणू शिंदे, शब्दगंध पुरवणी, दै. सार्वमत, अहमदनगर, २० एप्रिल २००३.
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५. सखीची मर्माबंधात्मक प्रीती : सखी आणि मी-एक विसंवाद-पी.विठ्ठल, युवामंच, दै. लोकमत, औरंगाबाद, २६ नोव्हें बर २००३.
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६. भारतमातेची व्यथा-कुणबी बाप-ललित अधाने, युवामंच, दै. लोकमत, औरंगाबाद, १३ जानेवारी २००४.
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७. आशयघन ग्रामीण काव्याविष्कार – मातीवेणा-रमेश रावळकर, सप्तरंग पुरवणी, दै. सकाळ, औरंगाबाद, ८ फेब्रुवारी २००४.
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८. हरवल्याची खंत - मातीवेणा-रमेश रावळकर, अक्षर पुरवणी, दै. तरुण भारत, औरंगाबाद, ८ फेब्रुवारी २००४.
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९. घोडा का अडतो?-पार्टनर-व. पु. काळे, युवामंच, दै. लोकमत, औरंगाबाद, १४ सप्टेंबर २००४.
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१०. हरवल्याची खंत - मातीवेणा-रमेश रावळकर, युवामंच दै. लोकमत, औरंगाबाद, ३० नोव्हेंबर २००४.
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११. मराठी भाषा अभ्यासाचा मौलिक ग्रंथ - आधुनिक भाषा विज्ञान आणि मराठी भाषा – डॉ.दादा गोरे, सप्तरंग पुरवणी, दै . सकाळ, औरंगाबाद, २२ जानेवारी २००६.
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१२. बदलत्या ग्रामवास्तवाचे देशी मय चित्रण-सवासीन- डॉ. विजय शिंदे, सप्तरंग पुरवणी, दै. सकाळ, औरंगाबाद, १२ फेब्रुवारी २००६.
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१३. साहित्यातील मानव्य व सत्त्ता संघर्षाचा वेध- देशीवाद-अशोक बाबर, सप्तरंग पुरवणी, दै. सकाळ, औरंगाबाद, १९ फेब्रुवारी २००६.
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१४. माणसाच्या शोधातील कविता- हुंदका- गेणू शिंदे, सप्तरंग पुरवणी, दै.सकाळ, औरंगाबाद,२६ फेब्रुवारी २००६.
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१५. खेड्याचा सामाजिक व सांस्कृतिक इतिहास- बखर एका खेड्याची-डॉ. जनार्दन वाघमारे, सप्तरंग पुरवणी, दै. सकाळ, औरंगा��ाद, १२ मार्च २००६.
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१६. न्यायदायी, मार्मिक समीक्षा ग्रंथ-कादंबरीकार महादेव मोरे : एक चिकित्सक अभ्यास-डॉ. ज्ञानेश्वर सोनवणे , सप्तरंग पुरवणी , दै. सकाळ, औरंगाबाद, १९ मार्च २००६.
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१७. परिवर्तनवादी विचारांचा जागृतीपर ग्रं थ-महिलांची व्रतवैकल्ये : दशा आणि दिशा – व्यंकटराव जाधव, सप्तरंग पुरवणी दै. सकाळ, औरंगाबाद, २६ मार्च २००६.
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१८. दलित साहित्य समीक्षेचे वास्तव सिंहावलोकन – दलित साहित्य समीक्षा : वास्तव दृष्टिकोन – राजा जाधव, सप्तरंग पुरवणी दै. सकाळ, औरंगाबाद, ०२ एप्रिल २००६.
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१९. बिलोरी कवितेचे सुबोध आकलन – अरुण कोलटकरांची बिलोरी कविता – विलास सारंग, सप्तरंग पुरवणी दै . सकाळ, औरंगाबाद, ०९ एप्रिल २००६.
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१. आशययुक्त अध्यापन पद्धती : मराठी
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२. समीक्षा : संदर्भलक्ष्यी
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सहलेखकार्य
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१. 'विशाखा : एक परिशीलन' (संपा. पी.विठ्ठल), चिन्मय प्रकाशन, औरंगाबाद
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२. 'जगी ऐसा बाप व्हावा : संदर्भ आणि समीक्षा' (संपा. डॉ.महेश खरात), संस्कृती प्रकाशन,
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३. 'ब,बळीचा विषयी' (संपा. शरयू असोलकर),
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४. 'ग्रामीण वाङ़मयाचा इतिहास' (संपा.डॉ.रामचंद्र काळुंखे), कैलाश पब्लिकेशन्स, औरंगाबाद.
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कैलासवादिवु सिवन किंवा के.सीवन ( १४ एप्रिल १९५७) हे भारतीय अवकाश शास्त्रज्ञ आणि भारतीय अवकाश संशोधन संस्थेचे ((इस्रो)) अध्यक्ष आहेत.[१] Archived 2022-01-13 at the Wayback Machine.
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ते विक्रम साराभाई अंतराळ केंद्र आणि लिक्विड प्रॉपल्शन स्पेस सेंटरचे माजी संचालक आहेत.[१] भारतीय अवकाश कार्यक्रमातील क्रायोजेनिक इंजिनाच्या विकासातील महत्त्वपूर्ण योगदानामुळे सिवन यांना 'रॉकेट मॅन' असे म्हटले जाते.
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शिवन यांचा जन्म भारताच्या तामिळनाडू राज्याच्या कन्याकुमारी जिल्ह्यातील मेला सरक्कलविलै या गावात झाला. त्यांच्या वडलांचे नाव कैलासवदिवू असून आईचे नाव चेल्लम आहे. त्यांचे वडील शेतकरी आहेत.
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शिवन यांचे प्राथमिक शिक्षण मेला सरक्कलविलै गावात तामिळ माध्यमाच्या सरकारी शाळेत झाले. १९८० मध्ये मद्रास येथील इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजीमधून त्यांनी एअरोस्पेस अभियांत्रिकीची पदवी घेतली. त्यांच्या कुटुंबातील ते पहिले पदवीधर आहेत. पुढे त्यांनी भारतीय विज्ञान संस्था, १९८२ मध्ये बेंगलोर येथून एअरोस्पेस अभियांत्रिकीची पदव्युत्तर पदवी घेतली. २००६ मध्ये त्यांना भारतीय तंत्रज्ञान संस्था, मुंबई येथून पीएच.डी.ची पदवी मिळाली.[२]
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१९८२ मध्ये त्यांनी इस्रोच्या पीएसएलव्ही प्रकल्पात प्रवेश केला. आणि मिशन प्लॅन, मिशन डिझाईन, मिशन एकत्रीकरण आणि विश्लेषणाच्या शेवटच्या दिशेने मोठे योगदान दिले.[३] त्यांनी इस्रोमध्ये मिशन संश्लेषण आणि विश्लेषणासाठी जागतिक स्तरीय सिम्युलेशन सुविधा चालू केली. जी मिशन डिझाइन, उप-प्रणाली पातळीचे प्रमाणीकरण आणि सर्व इस्रो प्रक्षेपण वाहनांमध्ये एव्हिओनिक्स सिस्टमच्या समाकलित प्रमाणीकरणासाठी वापरली जाते. त्यांनी एक अभिनव डे-ऑफ लॉंच पवन बायसिंग धोरण विकसित केले आणि अंमलात आणले. ज्यामुळे वर्षाच्या कोणत्याही दिवशी कोणत्याही हवामान आणि वाऱ्याच्या परिस्थितीत रॉकेट प्रक्षेपण शक्य झाले.[४]
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जानेवारी २०१८ मध्ये शिवन यांची इस्रोच्या संचालकपदी निवड झाली.[५] त्यांनी १५ जानेवारी २०१९ रोजी पदाची सूत्रे स्वीकारली. त्यांच्या अध्यक्षतेखाली इस्रोने २२ जुलै २०१९ रोजी चांद्रयानाचे प्रक्षेपण केले. चांद्रयान यशस्वीपणे चंद्रावर पोचल्यास ही कामगिरी करणारा भारत हा जगातील केवळ चौथा देश ठरेल.यापूर्वी अमेरिका, चीन आणि पूर्वाश्रमीच्या सोव्हिएत संघाने ही कामगिरी केली आहे.[६]
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2019 Abdul kalam award,tamilnadu government
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कैलाशहरचे नकाशावरील स्थान
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कैलाशहर (बंगाली: কৈলাসহর) हे भारताच्या त्रिपुरा राज्यातील एक शहर व उनाकोटी जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे.
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हे शहर भारत-बांगलादेश सीमेजवळ वसले असून २०१५ च्या अंदाजानुसार येथील लोकसंख्या २३,४१८ होती.
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क्यास अहमद (१५ ऑगस्ट, २०००:अफगाणिस्तान - हयात) हा अफगाणिस्तानच्या क्रिकेट संघाकडून खेळणारा खेळाडू आहे.[१]
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गुणक: 49°26′41″N 7°46′8″E / 49.44472°N 7.76889°E / 49.44472; 7.76889
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काइझरस्लाउटर्न (जर्मन: Kaiserslautern) हे जर्मनी देशाच्या ऱ्हाइनलांड-फाल्त्स ह्या राज्यातील एक शहर आहे. हे शहर जर्मनीच्या नैऋत्य भागात फ्रान्स देशाच्या सीमेजवळ वसले असून ते पॅरिसपासून ४५९ किमी, लक्झेंबर्गपासून १५० किमी तर फ्रांकफुर्टपासून ११७ किमी अंतरावर स्थित आहे.
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काइझरस्लाउटर्न येथे नाटोच्या लष्कराच्या ५०,००० सैनिकांचा तळ आहे.
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फुटबॉल हा काइझरस्लाउटर्नमधील सर्वात लोकप्रिय खेळ असून व बुंदेसलीगामधून खेळणारा १. एफ.से. काइझरस्लाउटर्न हा संघ येथेच स्थित आहे. काइझरस्लाउटर्न २००६ मधील फिफा विश्वचषक स्पर्धेच्या १२ यजमान शहरांपैकी एक होते. फ्रिट्झ-वॉल्टर-स्टेडियोन हे येथील प्रमुख स्टेडियम आहे.
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कॉंटाई हा पश्चिम बंगाल राज्यातील लोकसभा मतदारसंघ आहे
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कॉकपिट व्हॉईस रेकॉर्डर हे विमानात संवादाच्या नोंदी ठेवणारे उपकरण आहे. कॉकपिट व्हॉईस रेकॉर्डरमध्ये वैमानिक, सहवैमानिक व मुख्य अभियंता, हवाई सुंदरींचे संवाद नोंदवले जातात. पूर्वी त्यासाठी मॅग्नेटिक टेपचा वापर केला जात असे. आता मेमरी चिप वापरली जाते. वैमानिक व इतर कर्मचाऱ्यांतील संभाषण, वैमानिक कक्षातील आवाज, यंत्रांनी सावधगिरीचे इशारे होणारे आवाज यामध्ये ध्वनीमुद्रित होतात. याशिवाय विमानातळाच्या नियंत्रण कक्षाशी केलेले संभाषणही यात ध्वनीमुद्रित होत असते. विमानाला दिली गेलेली हवामानविषयक माहिती व इशारे इत्यादी सर्व गोष्टींचे ध्वनिमुद्रण यात होते. हे सुमारे दोन तासांसाठी होत असे व चुंबकीय फित पुसली जाऊन त्यावर नवीन ध्वनीमुद्रण घडत असे. यात काही काळाने फित खराब होऊन ती बदलावी लागत असे. आता नवीन डिजिटल तंत्रज्ञानामुळे हे करावे लागत नाही. तसेच ध्वनीमुद्रित करण्याला काल मर्यादाही मोठी झाली आहे. याचा अभ्यासाला उपयोग होतो.
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| 2 |
+
हे एक असे यंत्र आहे ज्यात विमानाच्या चालनकक्षातील सर्व आवाज नोंदविण्याची क्षमता असते.याचा उपयोग विमानापघातानंतर किंवा एखाद्या घटनेनंतर,त्याचे अन्वेषण करणे यासाठी करण्यात येतो.पायलटच्या मायक्रोफोन व इयरफोनशी तसेच कॉकपिटच्या छतावर लावण्यात आलेल्या क्षेत्रिय मायक्रोफोनशी हे संलग्न असते व ते तेथील सर्व आवाज नोंदविते.
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| 3 |
+
याची क्षमता,चार चॅनेलद्वारे सुमारे दोन तास संभाषण नोंदविण्याची असते.सध्या यात सुधारणा करण्यात येउन फ्लाइट डेटा रेकॉर्डर हे एकत्रित उपकरण करण्यात आले आहे.
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ऑत-आल्प (फ्रेंच: Hautes-Alpes; ऑक्सितान: Auts Aups) हा फ्रान्स देशाच्या प्रोव्हॉंस-आल्प-कोत देझ्युर प्रदेशातील एक विभाग आहे. हा विभाग फ्रान्सच्या आग्नेय भागात आल्प्स पर्वतरांगेत इटली देशाच्या सीमेवर वसला असून फ्रान्समधील सर्वात तुरळक लोकवस्तींपैकी एक आहे.
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| 2 |
+
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| 3 |
+
०१ एन ·
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| 4 |
+
०२ अएन ·
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| 5 |
+
०३ आल्ये ·
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| 6 |
+
०४ आल्प-दा-ऑत-प्रोव्हाँस ·
|
| 7 |
+
०५ ऑत-आल्प ·
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| 8 |
+
०६ आल्प-मरितीम ·
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| 9 |
+
०७ आर्देश ·
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| 10 |
+
०८ अॅर्देन ·
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| 11 |
+
०९ आर्येज ·
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| 12 |
+
१० ऑब ·
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| 13 |
+
११ ऑद ·
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| 14 |
+
१२ अॅव्हेरों ·
|
| 15 |
+
१३ बुश-द्यु-रोन ·
|
| 16 |
+
१४ काल्व्हादोस ·
|
| 17 |
+
१५ कांतॅल ·
|
| 18 |
+
१६ शारांत ·
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| 19 |
+
१७ शारांत-मरितीम ·
|
| 20 |
+
१८ शेर ·
|
| 21 |
+
१९ कोरेझ ·
|
| 22 |
+
२-ए कॉर्स-द्यु-सुद ·
|
| 23 |
+
२-बी ऑत-कॉर्स ·
|
| 24 |
+
२१ कोत-द'ओर ·
|
| 25 |
+
२२ कोत-द'आर्मोर ·
|
| 26 |
+
२३ क्रूझ ·
|
| 27 |
+
२४ दोर्दोन्य ·
|
| 28 |
+
२५ दूब ·
|
| 29 |
+
२६ द्रोम ·
|
| 30 |
+
२७ युर ·
|
| 31 |
+
२८ युर-ए-लुआर ·
|
| 32 |
+
२९ फिनिस्तर ·
|
| 33 |
+
३० गार्द ·
|
| 34 |
+
३१ ऑत-गारोन ·
|
| 35 |
+
३२ जेर ·
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| 36 |
+
३३ जिरोंद ·
|
| 37 |
+
३४ एरॉ ·
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| 38 |
+
३५ इल-ए-व्हिलेन ·
|
| 39 |
+
३६ एंद्र ·
|
| 40 |
+
३७ एंद्र-ए-लावार ·
|
| 41 |
+
३८ इझेर ·
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| 42 |
+
३९ श्युरॅ ·
|
| 43 |
+
४० लांदेस ·
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| 44 |
+
४१ लुआर-ए-शेर ·
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| 45 |
+
४२ लावार ·
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| 46 |
+
४३ ऑत-लावार ·
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| 47 |
+
४४ लावार-अतलांतिक ·
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| 48 |
+
४५ लुआरे ·
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| 49 |
+
४६ लॉत ·
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| 50 |
+
४७ लोत-एत-गारोन ·
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| 51 |
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४८ लोझेर ·
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| 52 |
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४९ मेन-एत-लावार ·
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| 53 |
+
५० मांच ·
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| 54 |
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५१ मार्न ·
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| 55 |
+
५२ ऑत-मार्न ·
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| 56 |
+
५३ मायेन ·
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| 57 |
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५४ म्युर्ते-ए-मोझेल ·
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| 58 |
+
५५ म्युझ ·
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| 59 |
+
५६ मॉर्बियां ·
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| 60 |
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५७ मोझेल ·
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| 61 |
+
५८ न्येव्र ·
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| 62 |
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५९ नोर ·
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| 63 |
+
६० वाझ ·
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| 64 |
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६१ ऑर्न ·
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| 65 |
+
६२ पा-द-कॅले ·
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| 66 |
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६३ पुय-दे-दोम ·
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| 67 |
+
६४ पिरेने-अतलांतिक ·
|
| 68 |
+
६५ ऑत-पिरेने ·
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| 69 |
+
६६ पिरेने-ओरिएंताल ·
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| 70 |
+
६७ बास-ऱ्हिन ·
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| 71 |
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६८ ऑत-ऱ्हिन ·
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| 72 |
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६९ रोन ·
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| 73 |
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७० ऑत-सॉन ·
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| 74 |
+
७१ सॉन-ए-लावार ·
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| 75 |
+
७२ सार्त ·
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| 76 |
+
७३ साव्वा ·
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| 77 |
+
७४ ऑत-साव्वा ·
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| 78 |
+
७५ पॅरिस ·
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| 79 |
+
७६ सीन-मरितीम ·
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| 80 |
+
७७ सीन-एत-मार्न ·
|
| 81 |
+
७८ इव्हलिन ·
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| 82 |
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७९ द्यू-सेव्र ·
|
| 83 |
+
८० सोम ·
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| 84 |
+
८१ तार्न ·
|
| 85 |
+
८२ तार्न-एत-गारोन ·
|
| 86 |
+
८३ व्हार ·
|
| 87 |
+
८४ व्हॉक्ल्युझ ·
|
| 88 |
+
८५ वांदे ·
|
| 89 |
+
८६ व्हियेन ·
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| 90 |
+
८७ ऑत-व्हियेन ·
|
| 91 |
+
८८ व्हॉझ ·
|
| 92 |
+
८९ योन ·
|
| 93 |
+
९० तेरितॉर दे बेल्फॉर ·
|
| 94 |
+
९१ एसोन ·
|
| 95 |
+
९२ ऑत-दे-सीन ·
|
| 96 |
+
९३ सीन-सेंत-देनिस ·
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| 97 |
+
९४ व्हाल-दे-मार्न ·
|
| 98 |
+
९५ व्हाल-द्वाज
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| 99 |
+
परकीय विभाग:
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| 100 |
+
९७१ ग्वादेलोप ·
|
| 101 |
+
९७२ मार्टिनिक ·
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| 102 |
+
९७३ फ्रेंच गयाना ·
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| 103 |
+
९७४ रेयूनियों ·
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| 104 |
+
९७६ मायोत
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कॉन्मेबॉल (CONMEBOL, दक्षिण अमेरिका फुटबॉल मंडळ) हे दक्षिण अमेरिकेच्या १० देशांमधील राष्ट्रीय फुटबॉल संस्थांचे मंडळ फिफाच्या जगभरातील सहा खंडीय मंडळांपैकी एक आहे. दक्षिण अमेरिकेमधील पुरूष व महिला फुटबॉल स्पर्धा पार पाडण्याची जबाबदारी कॉन्मेबॉलवर आहे.
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| 1 |
+
कॉफ्स हार्बर आंतरराष्ट्रीय मैदान (प्रायोजकत्त्वामुळे सी.एक्स कॉफ्स आंतरराष्ट्रीय मैदान म्हणून ओळखले जाते) हे ऑस्ट्रेलियाच्या न्यू साउथ वेल्स मधील समुद्रकिनाऱ्यावरील एक शहर कॉफ्स हार्बर येथे वसलेले आहे.
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| 2 |
+
मैदान जून १९९४ मध्ये खुले झाले, आणि स्टॅंड्सची आसनक्षमता फक्त १,००० इतकी असली तरी, मैदानाची प्रेक्षकक्षमता २०,००० इतकी आहे.[१] आजवरची खेळ पाहण्यासाठी आलेली सर्वात मोठी प्रेक्षकसंख्या १२,००० इतकी आहे.[२]
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| 3 |
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विश्वचषक पात्रता इतिहासात एका सामन्यात सर्वाधिक गोल ह्या मैदानावर झाल्याने फिफा विश्वचषकाच्या विक्रमांच्या यादीत मैदानाचे नाव नोंदवले गेले. ११ एप्रिल २००१ रोजी झालेल्या ह्या सामन्यात ऑस्ट्रेलियाने अमेरिकन सामोआला ३१-० ने हरविले होते.
|
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नॉर्थ कोस्ट फुटबॉलचे ३५ पेक्षा जास्त सामने आणि अंतिम सामने, कॉफ्स हार्बर आंतरराष्ट्रीय मैदानावर झाले खेळवले गेले आहेत.
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मैदानावर राष्ट्रीय रग्बी लीगचे सराव सामने नियमित पणे होत असतात. न्यू साउथ वेल्स ब्लूजचा समावेश असलेले आयएनजी चषक सामने मैदानावर याआधी खेळवले गेले आहेत. मागील दोन वर्षांपासून एफ.एफ.ए. राष्ट्रीय युवा चॅंपियनशीपचे सामने येथे भरवले जात आहेत.
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कॉफ्स हार्बर आंतरराष्ट्रीय मैदान (प्रायोजकत्त्वामुळे सी.एक्स कॉफ्स आंतरराष्ट्रीय मैदान म्हणून ओळखले जाते) हे ऑस्ट्रेलियाच्या न्यू साउथ वेल्स मधील समुद्रकिनाऱ्यावरील एक शहर कॉफ्स हार्बर येथे वसलेले आहे.
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मैदान जून १९९४ मध्ये खुले झाले, आणि स्टॅंड्सची आसनक्षमता फक्त १,००० इतकी असली तरी, मैदानाची प्रेक्षकक्षमता २०,००० इतकी आहे.[१] आजवरची खेळ पाहण्यासाठी आलेली सर्वात मोठी प्रेक्षकसंख्या १२,००० इतकी आहे.[२]
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विश्वचषक पात्रता इतिहासात एका सामन्यात सर्वाधिक गोल ह्या मैदानावर झाल्याने फिफा विश्वचषकाच्या विक्रमांच्या यादीत मैदानाचे नाव नोंदवले गेले. ११ एप्रिल २००१ रोजी झालेल्या ह्या सामन्यात ऑस्ट्रेलियाने अमेरिकन सामोआला ३१-० ने हरविले होते.
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नॉर्थ कोस्ट फुटबॉलचे ३५ पेक्षा जास्त सामने आणि अंतिम सामने, कॉफ्स हार्बर आंतरराष्ट्रीय मैदानावर झाले खेळवले गेले आहेत.
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मैदानावर राष्ट्रीय रग्बी लीगचे सराव सामने नियमित पणे होत असतात. न्यू साउथ वेल्स ब्लूजचा समावेश असलेले आयएनजी चषक सामने मैदानावर याआधी खेळवले गेले आहेत. मागील दोन वर्षांपासून एफ.एफ.ए. राष्ट्रीय युवा चॅंपियनशीपचे सामने येथे भरवले जात आहेत.
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कॉब काउंटी, जॉर्जिया ही अमेरिकेच्या जॉर्जिया राज्यातील १५९ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र येथे आहे.
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२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या इतकी होती.
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राष्ट्रकुल परिषद (इंग्रजी: Commonwealth of Nations) ही एक अशी आंतरराष्ट्रीय संघटना आहे ज्या मार्फत विविध सामाजिक, राजकीय व अर्थव्यवस्था असलेले देश एकत्र येऊन समान तत्वे व मुद्दांवर काम करतात, जे सिंगापुर घोषणेत [१] नमूद आहे.
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यात सामिल आहे लोकतंत्र, मानवी हक्क, चांगले सरकार, न्याय, व्यक्तिगत स्वातंत्र, खुला व्यापार व जागतिक शांती साठी काम करणे.[२]
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^ A. Unless otherwise noted, independence was gained from United Kingdom on date of joining the Commonwealth as shown in column 2.
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^ B. Not a member of the Commonwealth Foundation.
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^ C. The population figure is based on 2004 estimates.
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^ D. The population figure is based on 2005 estimates.
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^ A. Not a member of the Commonwealth Foundation.
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वरील राष्ट्रकुल परिषदेच्या सदस्यांपैकी १६ देश असे आहेत जेथे संविधानिक राजेशाही प्रकारचे सरकार अस्तित्वात आहे.
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अमेरिका
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युरोप
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ओशनिया
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राष्ट्रकुल खेळ ही राष्ट्रकुल परिषदेमधील सभासद राष्ट्रांची एक क्रीडा स्पर्धा आहे. इ.स. १९३० सालापासून राष्ट्रकुल खेळ स्पर्धा दर चार वर्षांनी भरवले जातात. सुरुवातीस ब्रिटिश एम्पायर खेळ, नंतर इ.स. १९५४ पासून ब्रिटिश एम्पायर व राष्ट्रकुल खेळ व इ.स. १९७० पासून ब्रिटिश राष्ट्रकुल खेळ ह्या नावंनी ही स्पर्धा ओळखली जात असे. १९७८ साली राष्ट्रकुल खेळ हे नाव ह्या स्पर्धेला दिले गेले.
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कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन ही लंडन येथे मुख्यालय असलेली संस्था ह्या खेळांचे आयोजन करण्यास जबाबदार आहे. राष्ट्रकुल खेळांत अनेक ऑलिंपिक खेळ तसेच इतर काही विशेष खेळ घेतले जातात.
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राष्ट्रकुल परिषदेचे ५४ सदस्य असले तरीही राष्ट्रकुल खेळांमध्ये ७१ देश भाग घेतात. अनेक ब्रिटिश परकीय प्रदेश तसेच युनायटेड किंग्डममधील इंग्लंड, स्कॉटलंड, आयर्लंड व वेल्स हे घटक देश वेगवेगळे संघ पाठवतात.
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2022= बर्मिंगहॅम इंग्लड
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१० १९५८–१९६२
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टीपा:
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dataset/scraper_2/batch_12/wiki_s2_10905.txt
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संगणक नेटवर्क टोपोलॉजीचे (नेटवर्क टोपॉलॉजीचे) खालील मूलभूत प्रकार आहेत:
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बस टोपॉलॉजी हे लहान ऑर्गनायझेशनद्वारा वापरले जाणारे सर्वात स्वस्त नेटवर्क आहे. बस टोपॉलॉजीमध्ये प्रत्येक नोड हा थेट केबलने जोडलेला असतो.
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फायदे (Advantages)-
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तोटे (Disadvantages)-
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स्टार नेटवर्कमध्ये उपकरणे बहुधा अनशील्ड ट्विस्टेड पेअर्ड (UTP) केबलने जोडलेली असतात.
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फायदे (Advantages)-
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• बस नेटवर्कच्या विपरीत, स्टार नेटवर्कमध्ये एखादा नोड किंवा केबल अपयशी झाल्यास संपूर्ण नेटवर्कवर परिणाम होत नाही.
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• नेटवर्कमध्ये दुसरे वर्क स्टेशन जोडणे सोपे आहे.
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• केंद्रीय नेटवर्किंग उपकरणाचा वापर केल्याने खर्च कमी होतो.
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तोटे (Disadvantages)-
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• केंद्रीय उपकरण अपयशी झाल्यास संपूर्ण नेटवर्कवर त्याचा परिणाम होतो.
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फायदे (Advantages)-
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• सेंट्रल होस्टचा वापर केल्याने खर्च कमी होतो. हा क्षमतेपेक्षा जास्त काम करू शकतो, पण असे झाल्यास याचा वेग मंदावतो.
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तोटे (Disadvantages)-
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फायदे (Advantages)-
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मेश टोपॉलॉजीच मुख्य फायदा म्हणजे जरी एखादी केबल जरी ब्रेक झाली तरी यातील ट्रॅफिक दुसऱ्या मार्गाने केला जाऊ शकतो..
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तोटे (Disadvantages)-
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यालाच हायरार्किकल असे म्हणतात.
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फायदे (Advantages)-
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तोटे (Disadvantages)-
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फायदे (Advantages)-
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तोटे (Disadvantages)-
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dataset/scraper_2/batch_12/wiki_s2_10908.txt
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कॉम्प्रेसर किंवा संपीडक हे एक यंत्र आहे. याच्या सहाय्याने वायूचा दाब वाढवला जातो.
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कॉम्प्रेसर हे पंपसारखेच असतात. दोन्ही द्रवपदार्थांवर दबाव वाढवतात आणि पाईपद्वारे वाहून आणू शकतात.
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