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भौतिकीत विद्युत क्षेत्र ही प्रारूप असून, एखादा विद्युत प्रभार दुसऱ्या प्रभारावर जे बल प्रयुक्त करते त्याचे स्पष्टीकरण करते.
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अवकाशातील एखाद्या बिंदूपाशीचे विद्युत तीव्रता खालीलप्रमाणे दिले जाते:
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येथे:
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संभाजीराव साहेबराव पाटील (८ सप्टेंबर, इ.स. १९३१ - १० मे, इ.स. २०२१ ) हे भारतीय राजकारणी आहेत. ते जनता पक्षाचे उमेदवार म्हणून सहाव्या आणि आठव्या लोकसभेत महाराष्ट्र राज्यातील बारामती लोकसभा मतदारसंघातून निवडून गेले.
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संयुक्त अरब अमिरातीचा ध्वज २ डिसेंबर १९७१ रोजी स्वीकारला गेला.
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जनता दल (संयुक्त) हा एक भारतातील एक राजकीय पक्ष आहे. सध्या हा पक्ष प्रामुख्याने बिहार व झारखंड ह्या राज्यांमध्ये कार्यरत असून नितीश कुमार हे विद्यमान पक्षाध्यक्ष आहेत. बिहार राज्यामध्ये जनता दलाचे नितीश कुमार हे मुख्यमंत्री आहेत तर १५व्या लोकसभेमध्ये जनता दलाचे २० खासदार आहेत.
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२००३ साली जनता दल ह्या पक्षाच्या अनेक गटांनी एकत्रित येऊन संयुक्त जनता दलाची स्थापना केली. स्थापनेपासून भारतीय जनता पक्षाच्या राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीमधील घटक पक्ष असलेल्या जे.डी.यू.ने २०१३ साली एन.डी.ए.मधून बाहेर पडण्याचा निर्णय घेतला. २०१४ सालातील आगामी लोकसभा निवडणुकांमध्ये पंतप्रधानपदासाठी नरेंद्र मोदी ह्यांचे नाव पुढे आणण्याची भाजपची घोषणा हे ह्यामागील प्रमुख कारण होते.
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आता २०१७ मद्ये पुन्हा भाजपा बरोबर युती केली आहे. आणि बिहार मद्ये सत्तेत आहे
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विवंता बाय ताज मडीकेरी, कूर्ग हे कर्नाटकातील मडीकेरी गावातील होटेल आहे.
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बारमाही हरित आणि वर्षभर पाऊस बरसत असणारे जंगल. म्हणजेच पर्जन्यवन ! बुडबुडे नाचवत वाहणारे झरे, इलायचीच्या हिरव्यागार वेली, ढब्बू मिरची आणि कॉफीचे मळे ! सर्व कांही खाजगी ! झाडे झुडपाणी पूर्ण अछादलेले पहाड की जो देखावा विस्मय कारक व असामान्य दृश्य नजरेत भरता येते. विवंता बाय ताज माडीकेरी हे तर अंतिम की जे पहाडाच्या कुशीत लपलेले आहे.[१] याचे ठिकाण म्हणजे हे समुद्र सपाटी पासून ५००० फूट उंचीवर आहे आणि माडीकेरी, शहरापासून ७ किमी अंतरावर आहे. या हॉटेलची विशेषता: म्हणजे सर्व खोल्यातून सर्व बाजूचा संपन्न नयनरम्य देखावा नजरेत सामावता येतो. या हॉटेल मध्ये डिलक्स डिलाईट, डिलक्स अल्लूरे, प्रीमियम टेम्टेशन, आणि आश्चर्य कारक असि प्रेसिडन्शियल निरवणा सूट उपलब्ध आहेत.[२] आथितींना येथील रेस्तरांमधील पदार्थ अचंबित करून टाकतात. आमचे जीवा स्पाला भेट द्या ! तेथे तुम्ही नैसर्गिक देखावे मनात साठऊन अत्यानंदाने बेभान व्हाल. कुर्ग येथील या अद्वितीय एकमेव हॉटेल मध्ये या आणि मोकळे व्हा ! स्वताहाला शोधण्यासाठी हे ठिकाण अतिशय परिपूर्ण आणि योग्य आहे.[३]
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या खोल्या ८५० स्क्वेअर फूट आहेत. त्या अतिशय आकर्षक आराखड्याने बनविलेल्या आहेत तेथून सर्व दर्शनीय ठिकाणांचे अवलोकन करता येते.
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कडाक्याच्या थंडीत या रूम उबदार केल्या जातात. या रूमची एरिया १००० स्क्वेअर फूट आहे. कोणत्याही सुविधेसाठी आथितींना बाहेर जावे लागत नाही.
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या खोल्या १४०० स्क्वेअर फूट एरियाच्या आहेत यात सर्व सुविधा आहेत. लक्झरी ब्लीस्स विल्ला विथ बाल्कनी अँड प्लुंग पूल आहे.[४] ३३०० स्क्वेअर फूट एरियाअसणाऱ्या या खोलीत प्रवेश करा आणि आनंद घ्या !
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संयुक्त राष्ट्रे निर्वासित उच्चायुक्त (United Nations High Commissioner for Refugees, संक्षेप: UNHCR) ही संयुक्त राष्ट्रसंघाची एक समिती आहे. ही समिती जगभरातील निर्वासितांचे रक्षण करते. जगात चालणाऱ्या विविध युद्ध, लढाया, संघर्ष इत्यादींमध्ये स्थानिक जनतेला निर्वासित व्हावे लागते. अशा वेळी यजमान देशाच्या अथवा संयुक्त राष्ट्रांच्या विनंतीवरून ही समिती ह्या निर्वासितांसाठी तात्पुरत्या सोयी करते व त्यांना संरक्षण पुरवते. आजवर पॅलेस्टाइन, इराक, अफगाणिस्तान, सीरिया, सुदान, काँगो इत्यादी देशांमध्ये यू.एन.एच.सी.आर.ने कार्य केले आहे. संयुक्त राष्ट्रे निर्वासित उच्चायुक्त कार्यालयाला आजवर १९५४ व १९८१ ह्या दोन वेळा नोबेल शांतता पुरस्कार मिळाला आहे.
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पोर्तुगालचा माजी पंतप्रधान अँतोनियो गुतेरेस २००५ सालापासून संयुक्त राष्ट्रे निर्वासित उच्चायुक्त पदावर आहे. प्रसिद्ध अमेरिकन अभिनेत्री अँजेलिना जोली संयुक्त राष्ट्रे निर्वासित उच्चायुक्त समितीची सदिच्छा राजदूत (Goodwill ambassador) आहे.
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सदस्य देश • आमसभा • सुरक्षा समिती • आर्थिक व सामाजिक परिषद • सचिवालय (सरचिटणीस) • आंतरराष्ट्रीय न्यायालय
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खाद्य व कृषी संस्था • आंतरराष्ट्रीय नागरी उड्डाण संस्था • आंतरराष्ट्रीय मजूर संस्था • आंतरराष्ट्रीय सागरी संस्था • IPCC • आंतरराष्ट्रीय अणुऊर्जा संस्था • संयुक्त राष्ट्रे औद्योगिक विकास संस्था • आंतरराष्ट्रीय दूरध्वनी संघ • संयुक्त राष्ट्रे एड्स कार्यक्रम • SCSL • UNCTAD • UNCITRAL • संयुक्त राष्ट्रे विकास समूह • संयुक्त राष्ट्रे विकास कार्यक्रम • UNDPI • संयुक्त राष्ट्रे पर्यावरण कार्यक्रम • युनेस्को • UNODC • UNFIP • संयुक्त राष्ट्रे लोकसंख्या निधी • संयुक्त राष्ट्रे मानवी हक्क उच्चायुक्त कार्यालय • संयुक्त राष्ट्रे निर्वासित उच्चायुक्त • संयुक्त राष्ट्रे मानवी हक्क समिती • UN-HABITAT • युनिसेफ • UNITAR • UNOSAT • UNRWA • UN Women • विश्व पर्यटन संस्था • जागतिक पोस्ट संघ • विश्व खाद्य कार्यक्रम • विश्व स्वास्थ्य संस्था • विश्व हवामान संस्था
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{{{लोकसंख्या_गणना_वर्ष}}}
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अमेरिकेची संयुक्त संस्थाने किंवा युनायटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका हा उत्तर अमेरिका खंडातील एक देश आहे. त्याला अमेरिका आणि युनायटेड स्टेट्स (संयुक्त संस्थाने) या नावानींही ओळखले जाते.
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अमेरिका हा राज्यकारभाराची लोकशाही प्रणाली मानणारा जगातील क्षेत्रफळाने मोठ्या देशांपैकी प्रमुख असून येथील राज्यप्रणाली 'अध्यक्षीय लोकशाही' आहे. अमेरिकेची राजधानी 'वॉशिंग्टन डी.सी.' (वाॅशिंग्टन, डिस्ट्रिक्ट कोलंबिया) येथे आहे. अमेरिकेत ५० राज्ये असून केंद्रीय स्तरावरील राष्ट्राध्यक्ष हा राष्ट्रप्रमुखपद भूषवतो. भौगोलिकदृष्ट्या कॅनडा, मेक्सिको हे अमेरिकेचे शेजारी देश आहेत, तसेच अमेरिकेच्या सागरी सीमा रशिया, कॅनडा व बहामाज् ह्या देशांना लागून आहेत.
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अमेरिका आर्थिक व लष्करीदृष्ट्या जगातील सर्वांत बलशाली देश आहे आणि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिती या महत्त्वाच्या जागतिक समितीमध्ये या देशास स्थायी सदस्यत्व असून नकाराधिकार देखील प्राप्त आहे.
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अमेरिकन डॉलर हे अमेरिकेचे चलन आहे.
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सुमारे १२,००० ते ४०,००० वर्षांपूर्वी, आशिया खंडातून अलास्कामार्गे मूळचे लोक अमेरिका खंडात आले व संपूर्ण दक्षिण व उत्तर अमेरिका खंडात पसरले. त्यांना मूळचे अमेरिकन (Native American, American Indian किंवा Amerindians) असे म्हणतात. त्यांच्या अनेक भटक्या जमाती अस्तित्वात होत्या. असे असले तरी अमेरीका खंड हा युरोपियन लोकांना माहीत नव्हता.
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१९ नोव्हेंबर १४९३ रोजी क्रिस्टोफर कोलंबस या युरोपियन दर्यावर्दीला अमेरिकेचा शोध लागला. त्यानंतर युरोपियन लोक अमेरिकेत स्थलांतरित होऊ लागले. युरोपातून आलेल्या अनेक साथीच्या रोगांमुळे व युरोपियनांशी झालेल्या संघर्षांमध्ये जवळजवळ ९५ टक्के मूळचे अमेरिकन लोक मृत्युमुखी पडले. युरोपियन लोकांच्या मोठ्या प्रमाणातील स्थलांतरामुळे त्यांचे प्राबल्य कमी होऊन ती भूमी युरोपियन अमेरिकन लोकांच्या ताब्यात गेली व मूळ अमेरिकन लोकांना छोट्या आरक्षित क्षेत्रांमध्ये राहावे लागले.
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४ जुलै, इ.स. १७७६ रोजी अमेरिकेला ब्रिटनपासून स्वातंत्र्य मिळाले.
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अमेरिका ही प्रथमपासूनच अनेक राज्यांमध्ये विभागलेली होती. सुरुवातीला पूर्व किनाऱ्यावरील १३ राज्यांमधील अमेरिका हळूहळू पश्चिमेकडे प्रसरत गेली. पश्चिम भागावर हक्क सांगणारे, स्पेन, फ्रान्स, रशिया, ���ेक्सिको, चिनी स्थलांतरित व स्थानिक अमेरिकन यांचा सर्वांचा लष्करी सामर्थ्याने विरोध मोडून काढत एकामागून एक राज्ये अमेरिकेला जोडत गेली व जगातील एक समर्थ देश म्हणून अमेिका उदयास आली.
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याच काळात प्रचंड भूभागाच्या उपलब्धीने कच्च्या मालाचा मोठा पुरवठादार म्हणून अमेरिकेची जागतिक स्तरावर ओळख निर्माण झाली. अन्नधान्ये, खनिज उत्पादने, जंगल उत्पादने, कापूस, तंबाखू यांचा प्रमुख निर्यातदार म्हणून अमेरिकाची भरभराट होऊ लागली. एवढ्या मोठ्या भूभागावर कामासाठी माणसे कमी पडत म्हणून आफ्रिकेतून गुलाम आणण्याची पद्धत सुरू झाली. प्रत्येकाला काम व स्वतःची जमीन या आशेने असाम्राज्यवादी युरोपीय देशातूनही मोठ्या प्रमाणावर अमेरिकेत स्थलांतर सुरू झाले. अशा प्रकारे अमेरिका हा एक स्थलांतरितांचा देश बनला.
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सन १८६० च्या दशकात अमेरिकेत अब्राहम लिंकनच्या सरकारने गुलामगिरीची प्रथा नष्ट करण्याचा निर्णय घेतला. याचा दक्षिणेकडील शेतीप्रधान राज्यांनी कडवा विरोध केला व अमेरिकेपासून वेगळे असे स्वतंत्र राज्यांमध्ये रहाण्याचा निर्णय घेतला. शेतीप्रधान मालावर ब्रिटन व फ्रान्ससारखे देश गरजू असल्याने ते युद्धात आपल्याला मदत करतील असा अंदाज होता. अब्राहम लिंकनच्या सरकारने देशाची फाळणी वाचवण्यासाठी हा सशस्त्र विरोध मोडून काढण्याचे ठरवले. याचा परिणती मानवी इतिहासातील सर्वाधिक रंक्तरंजित गृहयुद्धात झाली. याला अमेरिकन यादवी युद्ध असे म्हणतात. अमेरिकन गृहयुद्धात प्रचंड जीवित हानी झाली. हे युद्ध उत्तरेकडील राज्ये विरुद्ध दक्षिणेकडील राज्ये असे झाले. रॉबर्ट लींच्या नेतृत्वाखाली दक्षिणेकडील राज्यांनी सामर्थ्यशाली उत्तरेला जबरदस्त आव्हान दिले. जवळपास १० लाख लोक या युद्धात कामी आले. उत्तरेने शेवटी या युद्धावर नियंत्रण मिळवून हे बंड मोडून काढले. अब्राहम लिंकन यांची काही काळाने हत्या झाली. युद्धानंतर अमेरिकेत मोठ्या प्रमाणावर सामाजिक बदल घडून आले. गुलामगिरी हळूहळू सर्व राज्यांत संपवण्यात आली. युरोपप्रमाणेच अमेरिकेने उद्योगीकरण ,शास्त्रीय व सामाजिक सुधारणांचा अंगिकार करून झपाट्याने आर्थिक प्रगती केली.
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अमेरिकची राज्य संस्था ही फेडरेशन (इंग्लिश: federation) स्वरूपाची आहे. राज्यविभागणीची ही पद्धत भारतीय राज्यविभागणीपेक्षा मूलत: वेगळी आहे. भारतीय ��ाज्ये ही स्वातंत्र्योत्तर बहुतांशी एकसंध देशाची, प्रशासकीय उद्देशाने, भाषावार रचना आखणी करून अस्तित्वात आली. ह्याउलट, अमेरिकन राज्ये ही मूलत: वेगवेगळ्या वसाहती होत्या व ह्या वसाहतींनी एकत्र येऊन नवीन इंग्लंडहून स्वतंत्र होऊन सार्वभौम देश स्थापन केला. १७७६ सालच्या मूळ अमेरिकन स्वातंत्र्याच्या वेळेस १३ वसाहतींनी राज्य म्हणून स्वघोषणा करून संयुक्त संस्थानांची स्थापना केली. इतर बहुतांश राज्ये ही १८व्या व १९व्या शतकात या संघास येऊन मिळाली. अलास्का भूभाग हा रशियाकडून १८६७ साली खरेदी केला व अनेक प्रशासकीय घडामोडींनंतर १९५९ साली ४९वे राज्य म्हणून संघात सामील झाला.
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अमेरिका घटनात्मक प्रातिनिधिक लोकशाही देश आहे. अमेरिकन संघटना हे सर्वोच्च कायदाप्रमाण आहे. अमेरिकन प्रशासन संस्था "फेडरल" (राष्ट्रीय) (Federal), राज्य व स्थानिक अश्या पातळ्यांमध्ये विभागलेले आहे. राष्ट्रीय प्रशासनाच्या संसद, अध्यक्ष व न्याय ह्या तीन शाखा आहेत. संघटनेने अतिशय जाणीवपूर्वक ह्या तीन शाखांची रचना सत्तेचा समतोल राखण्यासाठी केली आहे.
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५० राज्यातील नागरिक संयुक्त संस्थानांचा (अमेरिकेचा) अध्यक्ष निवडतात. निवडून येण्यासाठी उमेदवारास ५३८ पैकी २७० मते मिळवावी लागतात. ही ५३८ मते ५० राज्यांत विभाजित झाली आहेत. प्रत्येक राज्यास त्या राज्याच्या अमेरिकन संसदेतील (काँग्रेस) प्रतिनिधींच्या संख्येइतकी मते आहेत. काँग्रेसमध्ये प्रत्येक राज्याचे २ प्रतिनिधी 'सिनेट' सभागृहामध्ये असतात व लोकसंख्येच्या प्रमाणानुसार काही प्रतिनिधी 'हाऊस ऑफ रिप्रेझेंटेटिव्ह्ज' मध्ये असतात. त्यामुळे प्रत्येक राज्यास (२ + 'हाऊस ऑफ रिप्रेझेंटेटिव्ह्ज'मधील प्रतिनिधी) इतकी मते मिळतात. उदा. उत्तर डाकोटास ३ (२+१) तर कॅलिफोर्नियास ५५ (२+५३) मते आहेत.
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प्रत्येक राज्यातील सगळी मते एकाच उमेदवारास मिळतात (काही अपवाद वगळता). ही मते मिळविण्यासाठी उमेदवारास त्या राज्यात साधे बहुमत मिळवावे लागते.
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राष्ट्राध्यक्षपदाचा कार्यकाल ४ वर्षे असून, राज्यघटनेनुसार कोणतीही व्यक्ती राष्ट्राध्यक्षपदावर दोन पूर्ण कार्यकालांहून अधिक वेळ राहू शकत नाही.
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अमेरिकेचे पहिले राष्ट्राध्यक्ष जॉर्ज वॉशिंग्टन यांच्यापासून ते इ..स. २०१६ मधील मावळते राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा यांच्यापर्यंतच्या सर्व राष्ट्राध्यक्ष���ंची माहिती देणारे ‘अमेरिकी राष्ट्रपती’ नावाचे पुस्तक अतुल कहाते यांनी लिहिले आहे.
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अमेरिकन काँग्रेस ही अमेरिकन संयुक्त संस्थानातील (अमेरिकेतील) केंद्रीय कायदेसंस्था आहे. अमेरिकन काँग्रेसमध्ये 'हाऊस ऑफ रिप्रेझेंटेटिव्ह्ज्' (कनिष्ठ सभागृह) व 'सिनेट' (वरिष्ठ सभागृह) ही दोन सभागृहे आहेत.
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काँग्रेस ही अमेरिकन केंद्रीय स्तरावरील मुख्य घटनात्मक संस्था आहे. राष्ट्रीय स्तरावरील बहुतांश विषयांसंबंधीचे अधिकार काँग्रेसकडे असून त्यात राष्ट्रीय स्तरावरील कायदे संमत करणे, व्यापार, कर इत्यादींबाबत धोरणे निश्चित करणे, युद्धाची घोषणा करणे ह्यांचा समावेश होतो.
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दोनही सभागृहांचे कार्यालय वॉशिंग्टन डी.सी. येथील 'कॅपिटॉल' नावाच्या इमारतीत आहे.
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संयुक्त अमेरिका देशात ५० राज्ये (संस्थाने) आहेत. ह्यांपैकी अलास्का व हवाई वगळता बाकी ४८ राज्ये एकसंध आहेत. डेलावेर हे संयुक्त अमेरिकेत (American Union) दाखल झालेले पहिले (७ डिसेंबर १७८७), तर हवाई हे ५०वे व शेवटचे (२१ ऑगस्ट १९५९) राज्य आहे. क्षेत्रफळाच्या दृष्टीने अलास्का हे सर्वांत मोठे (६,६३६२६७ चौरस मैल, १७,१७,८५४ चौरस किमी आकारमानाचे) तर ऱ्होड आयलंड हे सर्वांत लहान (१,५४५ चौरस मैल, ४,००२ चौरस किमी आकारमानाचे) राज्य आहे. कॅलिफोर्निया हे सर्वांत अधिक लोकसंख्येचे (३,६५,५३,२१५) तर वायोमिंग हे सर्वांत कमी लोकसंख्येचे (५,२२,८३०) राज्य आहे.
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प्रत्येक राज्य हे अनेक काउंट्यामध्ये (किंवा तत्सम प्रशासकीय प्रभागात) विभागलेले असते. प्रत्येक काउंटीचे प्रशासकीय केन्द्र असते. पन्नास राज्यांमध्ये एकूण ३,००७ काउंट्या आहेत. यांशिवाय २३६ काउंटी स्तराचे प्रभाग आहेत.
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अमेरिका देश आर्थिक आघाडीवर सर्वांत बलाढ्य मानला जातो. देशाचा वार्षिक सकल उत्पन्नात जगात पहिला क्रमांक आहे. अमेरिकेचा पहिला क्रमांक होण्यात या देशाची लोकसंख्या आकार व मोठ्या प्रमाणावर उपलब्ध असलेली नैसर्गिक साधनसंपत्ती हे आहे. याच जोडीला अमेरिकेने शास्त्रीय सुधारणांचा अंगीकार करून विज्ञान व तंत्रज्ञानात स्वतःला अग्रेसर ठेवले आहे. सध्या सर्वाधिक शोध अमेरिकेत लागतात. तसेच २०व्या शतकातील जवळपास सर्वच महत्त्वाचे शोध अमेरिकेत लागले. लोकसंख्येत अमेरिकेचा जगात तिसरा क्रंमाक आहे, लोकसंख्येचा मोठा भाग हा मध्यमवर्गीय असून श्रीमंत व अतिश्रीमंत लोकांचीही संख्या लक्षणीय आहे. हा लोकसंख्येचा मोठा भाग अमेरिकेची मोठी क्रयशीलता दर्शवतात. अमेरिकेत तयार उत्पादनांना अमेरिकेतच मोठ्या प्रमाणावर बाजारपेठ उपलब्ध होते. अमेरिकन अर्थव्यवस्था ही टोकाची भांडवलशाही (Extreme Capitalistic) अर्थव्यवस्था मानली जाते. या टोकाच्या भांडवलशाहीमुळे अमेरिकेत व्यापार अतिशय भरभराटीस आला, जास्तीजास्त नफा कमवण्याच्या दृष्टीने व्यापाराचे जागतिकीकरण करण्यात अमेरिकन अर्थव्यवस्था आघाडीवर होती. परंतु गेल्या काही वर्षात याच भांडवलशाहीचे दुष्परिणाम अमेरिकन अर्थव्यवस्थेवर दिसू लागले आहेत. २००८ मध्ये सबप्राईम संकटानंतर लेहमन ब्रदर्स या मोठ्या कंपनीने दिवाळखोर जाहीर केले व त्यानंतर आलेल्या मंदीने संपूर्ण जगाला ग्रासले आहे. कामगार कपातीचे नियम, सामाजिक सुरक्षितता, आरोग्य विम्याच्या बाबतीतील नियम हे भांडवलदारांच्या बाजूने असल्याने अमेरिकेतील सामान्य मध्यमवर्गात बेकारी व चिंतेचे वातावरण आहे.
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वाहन उद्योग हा अमेरिकेतील सर्वांत मोठा उद्योग आहे. दर-माणशी ०.७५ वहाने हे अमेरिकेतील वाहनांचे प्रमाण आहे जे जगात सर्वाधिक आहे[१]. गाड्यांचा खप वाढण्यामागे या देशाचे प्रचंड आकारमान कारणीभूत आहे. राज्यांचे आकारमान व शहरांचे अंतर प्रचंड असल्याने युरोपसारखी सार्वजनिक दळणवळणाची साधने अमेरिकेत विकसित झाली नाहीत. शिवाय हवामानही थंड असल्याने विसाव्या शतकात मोटारगाड्यांचा खप प्रचंड वाढला जो आजतागायत आहे. फोर्ड, जनरल मोटोर्स ही अमेरिकन उत्पादने प्रसिद्ध आहेत. अमेरिकेत जर्मन व जपानी गाड्यादेखील चांगल्याच खपतात. वाहन उद्योगाखालोखाल युद्ध सामग्री हा अमेरिकेतील सर्वांत जास्त नफा मिळवून देणारा उद्योग आहे. दुसऱ्या महायुद्धानंतर शीत युद्धाच्या काळात रशियाविरुद्ध सामरिक वर्चस्व मिळवण्याच्या प्रयत्नात अमेरिकेने मोठ्या प्रमाणात संशोधन करून विविध प्रकारची अस्त्रे, शस्त्रे, क्षेपणास्त्रे, विमाने, युद्धनौका, पाणबुड्या यांच्यांत शोध लावत वर्चस्व प्रस्थापित केले जे नजीकच्या काळात कोणाला मिळवता येईल असे दिसत नाही. अमेरिका हा देश शस्त्रांस्त्रांचा जगातील सर्वांत मोठा निर्यातदार आहे.
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अमेरिकेच्या जनगणना संस्थेच्या अंदाजानुसार अमेरिकेची लोकसंख्या ३०,६३,६०,००० इतकी आहे.[२] पैकी १ कोटी १२ लाख व्यक्ती अनधिकृतरीत्या तेथे राहतात.[३] २०१० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या ३०,८७,४५,५३८ इतकी आहे. लोकसंख्येनुसार अमेरिका चीन व भारतानंतर तिसऱ्या क्रमांकाचा देश आहे. येथील लोकसंख्येच्या वाढीचा वार्षिक दर ०.८९% आहे.[४] जन्मदर दरहजारी १४.१६ आहे.[५] २००७ च्या आर्थिक वर्षात १०,५०,००० व्यक्तींना अमेरिकेत कायम वास्तव्य करण्यास मुभा देण्यात आली. गेल्या वीस वर्षांत येथे स्थलांतरित होणारे बहुसंख्या मेक्सिकन आहेत. १९९८पासून भारत, चीन व फिलिपाईन्स येथूनही लोक मोठ्या प्रमाणात स्थलांतर झाले आहे.[६] ज्याची लोकसंख्या पुढील काही दशकांत वाढण्याचा अंदाज आहे असा जगातील प्रगत देशांतील अमेरिका हा एकमेव देश आहे.[७]
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१९ व्या शतकापासून बेसबॉल हा अमेरिकेचा राष्ट्रीय खेळ मानला जातो. अमेरिकन फुटबॉल, बास्केटबॉल व बर्फावरील हॉकी हे अमेरिकेतील सर्वांत लोकप्रिय व्यावसायिक खेळ आहेत. सध्या कॉलेज फुटबॉल व कॉलेज बास्केटबॉल हे अमेरिकेन विद्यार्थ्यांमधील सर्वाधिक लोकप्रिय खेळ आहेत.[८] मुष्टियुद्ध व घोड्यांची शर्यत हे एकेकाळी सर्वाधिक लोकप्रिय वैयक्तिक खेळा होते परंतु हळूहळू त्यांची जागा गोल्फ व गाड्यांच्या रेसिंगने घेतली. युरोपातील फुटबॉल जो अमेरिकेत सॉकर म्हणून ओळखला जातो त्यामानाने कमी लोकप्रिय आहे व प्रामुख्याने युवा खेळांडूंमध्ये खेळला जातो. टेनिसचीपण लोकप्रियता बरीच आहे.
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अमेरिकेतील बऱ्याचशा खेळांचे मूळ युरोपीय खेळांमध्ये आहे. परंतु बास्केटबॉल, व्हॉलीबॉल स्केटबोर्डिंग, स्नोबोर्डिंग चिअरलीडिंग हे अमेरिकेत जन्मलेले खेळ आहेत. सर्फिंग हा खेळ अमेरिकेत युरोपीय लोक येण्याआगोदर अस्तित्वात होता. अमेरिकेत आजवर सर्वांत जास्त आठ ऑलिंपिक स्पर्धा भरवल्या गेल्या आहेत व अमेरिकेनेच त्या स्पर्धांत कोणत्याही देशापेक्षा जास्त पदके मिळवली आहेत.[९] तर हिवाळी ऑलिंपिक मध्ये २१६ पदके मिळवली आहेत व सद्यस्थितीत दुसऱ्या क्रमांकावर आहे..[१०]नायगारा धबधबे (नायगारा फॉल्स)
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बर्म्युडा (युनायटेड किंग्डम) •
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कॅनडा •
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अमेरिका •
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ग्रीनलँड (डेन्मार्क) •
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मेक्सिको •
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सेंट पियेर व मिकेलो (फ्रान्स)
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बेलीझ •
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कोस्टा रिका •
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ग्वातेमाला •
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होन्डुरास •
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निकाराग्वा •
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पनामा •
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एल साल्व्हाडोर
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अँग्विला (युनायटेड किंग्डम) •
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अँटिगा आणि बार्बुडा •
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अरूबा (नेदरलँड्स) •
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बहामास •
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बार्बाडोस •
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केमन द्वीपसमूह (युनायटेड किंग्डम) •
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क्युबा •
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कुरसावो (नेदरलँड्स) •
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डॉमिनिकन प्रजासत्ताक •
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डॉमिनिका •
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ग्रेनेडा •
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ग्वादेलोप (फ्रान्स) •
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हैती •
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जमैका •
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मार्टिनिक (फ्रान्स) •
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माँटसेराट (युनायटेड किंग्डम) •
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नव्हासा द्वीप (अमेरिका) •
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पोर्तो रिको (अमेरिका) •
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सेंट बार्थेलेमी (फ्रान्स) •
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सेंट किट्स आणि नेव्हिस •
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सेंट मार्टिन (फ्रान्स) •
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सिंट मार्टेन (नेदरलँड्स) •
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सेंट व्हिन्सेंट आणि ग्रेनेडीन्स •
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सेंट लुसिया •
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त्रिनिदाद व टोबॅगो •
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टर्क्स आणि कैकास द्वीपसमूह (युनायटेड किंग्डम) •
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यु.एस. व्हर्जिन द्वीपसमूह (अमेरिका) •
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ब्रिटीश व्हर्जिन द्वीपसमूह (युनायटेड किंग्डम)
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आर्जेन्टिना •
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बोलिव्हिया •
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ब्राझील •
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चिली •
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कोलंबिया •
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इक्वेडोर •
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साउथ जॉर्जिया व साउथ सँडविच द्वीपसमूह (युनायटेड किंग्डम) •
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गयाना •
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फ्रेंच गयाना (फ्रान्स) •
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फॉकलंड द्वीपसमूह (युनायटेड किंग्डम) •
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पेराग्वे •
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पेरू •
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सुरिनाम •
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उरुग्वे •
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व्हेनेझुएला
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जर रविवारी सप्तमी किंवा बुधवारी प्रतिपदा येत असेल, तर त्या दिवशी संवर्तयॊग आहे मानले जाते. पंचांगात ह्या योगाचा उल्लेख असतो.
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राज्यसभा हे भारतीय संसदेतील जेष्ठ व कायमस्वरूपाचे सभागृह आहे. राज्यसभेत २५० सभासद असून त्यातील १२ सभासदांची नेमणुक राष्ट्रपती विविध क्षेत्रातील (कला, साहित्य, विज्ञान व समाजसेवा) मान्यावरांमधुन करतात. इतर २३८ सभासदांची निवड राज्य व केंद्रशासीत प्रदेश विधिमंडळ करतात.
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राज्यसभेचा कार्यकाळ ६ वर्षांचा असून एक तिमाही सभासदांची निवड दर दोन वर्षांनी होत असते.
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संसदीय राज्यपद्धती म्हणजे ज्यात कार्यकारी मंत्रिमंडळास प्रशासन राबविण्यास कायदेमंडळाच्या प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष पाठिंब्याची गरज असते अशा प्रकाराची लोकशाही शासनपद्धत आहे.
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गंगाधर गोपाळ गाडगीळ (ऑगस्ट २५, इ.स. १९२३ - सप्टेंबर १५, इ.स. २००८) हे मराठी लेखक, अर्थतज्ज्ञ व साहित्यसमीक्षक होते. मराठी साहित्यात कथा या साहित्यप्रकारातील त्यांच्या योगदानामुळे त्यांना 'नवकथेचे अध्वर्यू' असे संबोधले जाते. त्यांनी नवकथेमध्ये नवनिर्मिती घडवून आणली.कथेचे नवे वळण विकसित करण्याचे श्रेय गंगाधर गाडगीळ यांचेकडे जाते.
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गाडगीळ आपल्या कथेतून वाचकांसमोर मनोरम चित्र रेखाटतात, एकरूप होतात. संज्ञा प्रवाही लेखन स्वप्नाचा प्रयोग लेखनात केला.
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मुंबईत २५ ऑगस्ट इ.स. १९२३ रोजी जन्मलेल्या गाडगीळांचे शालेय शिक्षण गिरगावातील 'आर्यन एज्युकेशन सोसायटी'च्या शाळेत झाले. या शाळेत इ.स. १९३८ मध्ये मॅट्रिक झाल्यानंतर इ.स. १९४४ मध्ये त्यांनी चर्नीरोड येथील विल्सन महाविद्यालयातून अर्थशास्त्र, राज्यशास्त्र व इतिहास या विषयांमधून एमए केले.
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एमए झाल्यानंतर दोन वर्षांनी गाडगीळ यांनी आपल्या प्राध्यापकीला सुरुवात केली. आरंभीच्या काळात सुरतच्या किकाभाई प्रेमचंद या महाविद्यालयात व नंतर मुंबईतील पोद्दार, सिडनहॅम आणि रुपारेल या महाविद्यालयांत त्यांनी प्राध्यापक म्हणून काम पाहिले. इ.स. १९६४ ते इ.स. १९७१ या काळात ते मुंबईच्या ‘नरसी मोनजी कॉलेज ऑफ कॉमर्स ॲन्ड इकॉनॉमिक्स’चे प्राचार्य होते. इ.स. १९७१ ते इ.स. १९७६ या कालावधीत आपटे समूहाचे सल्लागार व त्यानंतर वालचंद उद्योगसमूहात आर्थिक सल्लागार ही पदे त्यांनी सांभाळली.
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लहानपणापासून गाडगीळांना वाचनाची आवड होती. त्यातूनच पुढे कॉलेजमध्ये असताना त्यांनी आपल्या लेखनाला सुरुवात केली. 'प्रिया आणि मांजर' ही त्यांची पहिली कथा जून इ.स. १९४१ मध्ये 'वाङ्मयशोभा' या मासिकात प्रकाशित झाली. पुढे बरीच प्रसिद्धी मिळालेली 'बाई शाळा सोडून जातात' ही त्यांची कथा देखील 'वाङ्मयशोभा' याच मासिकात इ.स. १९४४ मध्ये प्रसिद्ध झाली होती. काही कालावधीनंतर 'मानसचित्रे' हा त्यांचा पहिला कथासंग्रह इ.स. १९४६ साली प्रकाशित झाला.
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यानंतर ठरावीक काळाने त्यांचे लेखन प्रकाशित होत राहिले. विशेषतः कडू आणि गोड (इ.स. १९४८), नव्या वाटा (इ.स. १९५०), भिरभिरे (इ.स. १९५०), संसार (इ.स. १९५१), उध्वस्त विश्व (इ.स. १९५१), कबुतरे (इ.स. १९५२), खरं सांगायचं म्हणजे (इ.स. १९५४), तलावातले चांदणे (इ.स. १९५४), वर्षा (इ.स. १९५६), ओले उन्ह (इ.स. १९५७) हे त्यांचे उल्लेखनीय कथासंग्रह आहेत. वेगळी वाट चोखाळणाऱ्या या कथासंग्रहांमुळेच 'नवकथेचे अध्वर्यू' हे नामाभिधान त्यांना प्राप्त झाले.
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इ.स. १९५५ मध्ये पंढरपूर येथे झालेल्या साहित्य संमेलनात कथाशाखेचे अध्यक्षपद त्यांनी भूषवले. पुढे इ.स. १९५७ मध्ये रॉकफेलर फाउंडेशनची एक वर्षाची अभ्यासवृत्ती घेऊन ते हार्वर्ड आणि स्टॅनफोर्ड विद्यापीठात गेले. मध्यप्रदेश मधील रायपूर येथे इ.स. १९८१ मध्ये भरलेल्या अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलनाचे ते अध्यक्ष होते. ऑक्टोबर १ इ.स. १९८३ रोजी मुंबईत झालेल्या मराठी विनोद साहित्य संमेलनाचे उद्घाटन गाडगीळांच्या हस्ते झाले होते.
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'मुंबई मराठी साहित्य संघ' व 'मराठी साहित्य महामंडळ' या संस्थांचे अध्यक्ष तसेच साहित्य अकादमीच्या कार्यकारी मंडळावर सदस्य म्हणूनही त्यांनी काम पाहिले होते. मुंबईतील ग्राहक पंचायतीत सुमारे ३५ वर्षे त्यांचा सक्रिय सहभाग होता. याच ग्राहक पंचायतीचे ते २५ वर्षे अध्यक्ष देखील होते. एका बाजूला उद्योजक संस्थांचे सल्लागार तर दुसऱ्या बाजूला ग्राहक पंचायतीचे कार्यकर्ते या कामांचा त्यांनी उत्तम समन्वय साधलेला होता.
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गंगाधर गाडगीळ यांचे प्रकाशित झालेले साहित्य पुढीलप्रमाणे :
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संस्कृत भाषेत लेखन आणि काव्यरचना करणारे अनेक कवी होऊन गेले असले तरी त्यांपैकी ललितकाव्ये लिहिणाऱ्या चार कवींचा उल्लेख पुढील श्लोकात होतो. या श्लोकात प्रत्येक कवीचे वैशिष्ट्य सांगितले आहे. कालिदासाची उपमा, भारवी कवीची अर्थपूर्ण शब्दरचना, दंडी कवीचे पदलालित्य आणि माघ कवीमध्ये हे तीनही गुण आहेत.
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नैतिक मूल्यांचे शिक्षणाची तत्संबधी शिस्त आणि नियमनाची जबाबदारी पालक सांभाळत असतात.हे करतानासुद्धा पाल्यास अभिव्यक्त होण्यासाठी प्रोत्साहीत करणे आणि स्वतःकरिता चांगले काय आणि वाईट काय हे ठरवण्याची निर्णयक्षमता निर्माणकरण्या करिता पालक पाल्यांची पाठराखण करत असतात.
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मुक्त लोकशाही समाजांमध्ये आपली बुद्धी वापरून बरेवाईट ठरवण्याचे आणि निवड स्वातंत्र्य वापरण्याचे आणि अभिव्यक्ती स्वतांत्र्याची कक्षा अविष्कार स्वातंत्र्य अधिकाधिक जोपासेल हे पहाणे अभिप्रेत असते.पण समाजातील काही घटक इतर व्यक्ती किंवा इतर समाज घटकांवर त्यांचे स्वांत्र्य नाकारत स्वतःचे नियंत्रण प्रस्थापित करतात तेव्हा त्यास नैतिक सुभेदारी असे म्हटले जाते. नैतिक सुभेदारीची अमलबजावणीकरण्याकरिता बऱ्याचदा उपद्रव मुल्याचा आणि सार्वजनिक उपद्रवाचा उपयोग केला जातो.
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विशीष्ट वाद, विचारप्रणाली किंवा धर्माधारानी समाजाचे भलेच होणार आहे अशी धारणा असते अथवा करून दिली जाते.संस्कृतीरक्षणाच्याच नावाखाली बऱ्याचदा देशांचा, संस्थांचा, प्रसारमाध्यमाचा आणि शिक्षणपद्धतींचा ताबा घेतला जातो.या मागे शुद्ध हेतु असु शकतो अथवा बऱ्याचदा या मागे स्वार्थ असण्याची अथवा हुकुमशाही मनोवृत्ती यामागे दडली असल्याची शक्यताही नाकारता येत नाही.[१]
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ठेकेदार हर धर्म, जात और सम्प्रदाय में मिल जाते हैं। पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान एक रेडियो स्टेशन चलाता है। उसके माध्यम से वह संदेश प्रसारित करता है की लडकियों को स्कूल नहीं भेजना है। उन्हें ऐसे कपडे पहनने हैं जिसमें उनका पोर-पोर ढका हो। अब स्वात घाटी की क्या बात करें पिछले दिनों तक तो धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले अपने कश्मीर में ही लडकियों के जींस पहनने पर पाबंदी थी। वहां से थोडा नीचे उतरें तो पांच नदियों के प्रदेश में एक फरमान जारी किया गया की लडकियां सलवार कमीज के अलावा कुछ नहीं पहनेंगी। लडकी का जींस टोप पहनना नैतिकतावादियों की आंख में खटकता है। अब जरा देश के दक्षिण में चलें। अपने संगठन के आगे ईश्वर का नाम जोडकर नैतिक बनने वालों ने एक शहर में लडकियों को जम कर पीटा। उनके बाल पकड- पकड कर घसीटा। मजे की बात यह की यह तमाशा नैतिकता के नाम पर किया गया। कसम भोलेनाथ की। हमें तो अब नैतिकतावादियों से डर लगने लगा है। लगता है की किस��� भी वाद की ऐसी-तैसी उसे मानने वाले "वादियों" ने उस वाद के आलोचकों से ज्यादा की है। चाहे गांधीवाद हो या साम्यवाद। पूंजीवाद का बेडा गर्क उस महान देश में ही हो रहा है जो अपने आपको स्वतंत्रता का सबसे बडा अलम्बरदार मानता रहा है।[२]
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सई ताम्हणकर (२५ जुन, १९८६ - ) सई ताम्हणकर या मराठी-हिंदी चित्रपट सृष्ंटीतील एक नावाजलेल्या आणि यशस्वी अभिनेत्री आहेत. बिनधास्त अभिनेत्री म्हणून सई ताम्हणकर मराठी आणि हिंदी चित्रपट सृष्टींत ओळखल्या जातात. त्या मूळच्या सांगली या गावच्या आहेत. प्रामुख्याने मराठी चित्रपटसृष्टीमध्ये कार्यरत असलेल्या सईने आजवर अनेक चित्रपटांमध्ये भूमिका केल्या आहेत. २०१३ साली प्रदर्शित झालेल्या दुनियादारी या चित्रपटाच्या यशाने सई यांना मराठी चित्रपटसृष्टीत नवी ओळख मिळवून दिली.सई एक उत्कृष्ठ अभिनेत्री आहे तसेच ती चिंतामण महाविदयालयाची विदयार्थीनी आहे तिची शैक्षणिक कारकीर्द फार उत्तम होती कॉलेजमधील अनेक नाटक व एकाकिंका मध्ये भाग घेत होती.
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अभिनयाची आवड असल्याने ती कॉलेजमध्ये विविध नाटक व एकांकिका मध्ये भाग घेत. सईच्या आईच्या मित्राने दिग्दर्शित केलेल्या एका नाटकाद्वारे ती अभिन क्षेत्रात उतरली. अंतर-महाविद्यालयीन नाट्यस्पर्धेत तिचे आधे अधोरे या दुसऱ्या नाटकामुळे तिला सर्वोत्कृष्ट अभिनेत्रीचा पुरस्कार मिळाला.
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डाॅ. विनय अपसिंगकर हे एक मराठी कवी व लेखक आहेत. सन १९५७ च्या एप्रिल महिन्यात ते नववीत असताना त्यांची पहिली कविता प्रकाशित झाली. २००७ सालापर्यंत त्यांच्या कवितांचे ऩऊ संग्रह निघाले आहेत.
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अपसिंगकरांनीचा गुराखी, शेतमजूर, पोलीस, शिक्षक, प्राध्यापक असे व्यवासय केले आहेत. पोलीस खात्यातून.बाहेर पडल्यावर ते आठ-दहा वर्षे बेकार होते. या काळात अपसिंगकरांनी शेती केली, नोकरी शोधली, बी.ए. केले आणि वर एम.ए. पीएच.डी केले.
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अपसिंगकरांनी अंतरी ताळा पडे या नावाचे आत्मचरित्र लिहिले आहे. त्या आत्मचरित्रात निझामशाही, रझाकारांचे अत्याचार आणि त्याकाळच्या मराठवाड्याचे वर्णन आहे.
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ऑगस्ट १०, इ.स. २००६
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दुवा: [---] (इंग्लिश मजकूर)
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सय्यद किरमाणी हे भारतीय क्रिकेट संघात यष्टिरक्षक होते. भारतीय खेळपट्ट्यांवर फिरकी गोलंदाजीवर यष्टिरक्षण करताना त्यांना हेल्मेट वापरण्याची कधी गरजच भासली नाही.
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किरमाणी यांनी प्रथम वर्गीय क्रिकेटमधील २७५ सामन्यांत ३६७ झेल व ११२ यष्टिचीत अशी कामगिरी नोंदविली. त्यांच्या नावावर एक कसोटी बळीही आहे.
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फारूख इंजिनियर यांच्यानंतर किरमाणी यांनी भारतीय संघात यष्टिरक्षणाची जबाबदारी सांभाळली. १९७६मध्ये न्यू झीलंडविरुद्ध कसोटी पदार्पण करणाऱ्या किरमाणी यांनी भारताच्या बड्या स्पिनर्सच्या गोलंदाजीवर कठीण प्रसंगी नेटाने यष्टिरक्षण केले. आपल्या दशकभराच्या कारकिर्दीत त्यांची ऊर्जा आणि मैदानावरील वावर लक्षणीय असे. खालच्या क्रमांकावर फलंदाजीस येऊनही त्यांनी दोन कसोटी शतके झळकावली.
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१९८१-८२मधील भारताच्या इंग्लंडविरुद्धच्या सलग तीन कसोटींमध्ये किरमाणी यांनी एकही बाय दिला नव्हता. १९८३ च्या वर्ल्डकपमध्ये टनब्रिज वेल्स येथील झिम्बाब्वेविरुद्धच्या लढतीत किरमाणी यांनी कपिल देवसह नाबाद १२६ धावांची महत्त्वपूर्ण भागीदारी रचली होती. त्यावेळी बलाढ्य समजल्या जाणाऱ्या वेस्ट इंडीजविरुद्धच्या सहाव्या कसोटीत किरमाणी यांनी सुनील गावसकर यांच्यासह नवव्या विकेटसाठी रचलेली नाबाद १४३ धावांची भागीदारीही खास ठरली होती. त्यावेळी गावसकर यांनी नाबाद २३६ धावा केल्या होत्या. तेव्हा एखाद्या भारतीयाने विंडीजविरुद्ध केलेली ती सर्वोच्च खेळी ठरली होती.
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यष्टिरक्षक सय्यद किरमाणी यांची कर्नल कोटारी कंकय्या नायडू सी.के. नायडू जीवनगौरव पुरस्कारासाठी निवड झाली आहे. ट्रॉफी आणि २५ लाख रुपये असे या पुरस्काराचे स्वरूप आहे.
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इराणी सरकार
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इंग्लॅबच्या मुलींचा निषेध (फारसी: دختران انقلاب) इराणमधील अनिवार्य हिजाबच्या विरोधात निषेधांची मालिका होती. हा व्यापक इराणी लोकशाही चळवळीचा एक भाग होता. विदा मोव्हाहेद (फारसी: ویدا موحد), एक इराणी स्त्री ज्याला गर्ल ऑफ एंगेलाब स्ट्रीट (फारसी: دختر خیابان انقلاب) म्हणून ओळखले जाते. ती २७ डिसेंबर २०१७ रोजी तेहरानच्या एंगेलाब स्ट्रीट (रिव्होल्यूशन स्ट्रीट) मधील युटिलिटी बॉक्सवर २०१७-२०१८ च्या इराणी निषेधादरम्यान उभी होती. तिने तिचा हिजाब, पांढरा स्कार्फ, काठीला बांधला होता एका ध्वजासारखा.[२][३][४][५] तिला त्या दिवशी अटक करण्यात आली.[४][५] एका महिन्यानंतर २८ जानेवारी २०१८ रोजी तात्पुरत्या जामिनावर सुटका करण्यात आली.[६][७] काही लोकांनी मोवाहेदच्या या कृतीचा संबंध मसिह अलीनेजादच्या व्हाईट वेनडेसच्या आवाहनाशी जोडला. ती एक निषेध चळवळ होती. जी व्हीओए पर्शियन टेलिव्हिजनच्या प्रस्तुतकर्त्याने २०१७ च्या सुरुवातीला सुरू केली होती. इतर महिलांनी नंतर तिचा निषेध पुन्हा केला आणि त्यांच्या कृतीचे फोटो सोशल मीडियावर पोस्ट केले. इंग्रजी स्त्रोतांमध्ये या महिलांचे वर्णन "गर्ल्स ऑफ एंगेलाब स्ट्रीट" आणि "द गर्ल्स ऑफ रोव्हॉल्युशन स्ट्रीट"[८] असे केले होते. काही आंदोलकांचा दावा आहे की ते मसीह अलीनेजादच्या कॉलचे पालन करत नव्हते.
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1979 च्या इस्लामिक क्रांतीनंतर लागू झालेल्या इराणच्या इस्लामिक कायद्यामध्ये, इस्लामिक दंड संहितेच्या ५ व्या पुस्तकातील कलम ६३८ (ज्याला प्रतिबंध आणि प्रतिबंधक दंड म्हणतात) हिजाब न घालणाऱ्या महिलांना दहा दिवसांपासून दोन महिन्यांपर्यंत तुरुंगवासाची शिक्षा होऊ शकते आणि/किंवा इराणी रियाल ५०,००० ते ५,००,००० दंड भरणे आवश्यक आहे. चलनवाढीच्या निर्देशांकासाठी न्यायालयांमध्ये दंडाची पुनर्गणना केली जाते. कॉर्नेल लॉ स्कूलच्या कायदेशीर माहिती संस्थेने याचे भाषांतर आणि प्रकाशन केले आहे.[९]
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त्याच पुस्तकातील कलम ६३९ म्हणते, दोन प्रकारच्या लोकांना एक वर्ष ते दहा वर्षांच्या कारावासाची शिक्षा दिली जाईल; पहिली व्यक्ती जी अनैतिकता किंवा वेश्याव्यवसायाचे ठिकाण स्थापित करते किंवा निर्देशित करते, दुसरी, अशी व्यक्ती जी लोकांना अनैतिकता किंवा वेश्याव्यवसाय करण्यास मदत करते किंवा प्रोत्साहित करते.
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हे काही कायदे आहेत ज्यांच्या अंतर्गत काही आंदोलकांवर आरोप ठेवण्यात आले होते.
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१९७९ च्या इराणी इस्लामिक क्रांतीपूर्वी (इराणचा शेवटचा शाह मोहम्मद रेझा पहलवी यांच्या कारकिर्दीत) हिजाब अनिवार्य नव्हता. या काळात काही इराणी महिला डोक्यावर स्कार्फ किंवा चादर घालत होत्या.
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१९७९ च्या इस्लामिक क्रांतीनंतर हळूहळू हिजाब अनिवार्य झाला. स.न. १९७९ मध्ये रुहोल्ला खोमेनी यांनी महिलांनी इस्लामिक ड्रेस कोड पाळावा अशी घोषणा केली. त्यांच्या विधानामुळे निदर्शने झाली, १९७९ मध्ये तेहरानमधील आंतरराष्ट्रीय महिला दिन निदर्शने, जे विधान केवळ शिफारसी असल्याचे सरकारी आश्वासनाने पूर्ण झाले. त्यानंतर १९८० मध्ये सरकारी आणि सार्वजनिक कार्यालयांमध्ये हिजाब अनिवार्य करण्यात आला आणि १९८३ मध्ये तो सर्व महिलांसाठी अनिवार्य झाला.
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इ.स. २०१४ पासून सरकारने एक सर्वेक्षण चालवले होते. ते इ.स. २०१८ मध्ये अध्यक्ष हसन रुहानी यांनी प्रसिद्ध केले. त्यात असे दिसून आले आहे की ४९.८% इराणी अनिवार्य हिजाबच्या विरोधात होते. हा अहवाल सेंटर फॉर स्ट्रॅटेजिक स्टडीज, इराणच्या राष्ट्राध्यक्षांच्या कार्यालयाच्या संशोधन शाखा द्वारे जारी करण्यात आला. पीडीएफ स्वरूपात जुलै २०१४ मध्ये याचे शीर्षक "पहिल्या हिजाब विशेष बैठकीचा अहवाल" असे होते.
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२ फेब्रुवारी २०१८ रोजी, मेरीलँड येथील सेंटर फॉर इंटरनॅशनल अँड सिक्युरिटी स्टडीज द्वारे आयोजित केलेल्या सर्वेक्षणात असे दिसून आले की काही इराणी लोक "इराणची राजकीय व्यवस्था बदलण्यास किंवा कठोर इस्लामिक कायदा शिथिल करण्याशी" सहमत आहेत.[१०]
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इराण हा जगातील एकमेव देश आहे ज्यात बिगर मुस्लिम महिलांनाही हेडस्कार्फ घालणे आवश्यक आहे. उदाहरणार्थ, जानेवारी २०१८ मध्ये, एका चीनी महिला संगीतकाराला तिच्या मैफिलीच्या प्रदर्शनाच्या मध्यभागी जबरदस्तीने बुरखा घालण्यात आला.[११]
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२७ डिसेंबर २०१७ रोजी, "Where_is_she?" या हॅशटॅगद्वारे मोवाहेदचा स्कार्फ हलवतानाचे फोटो आणि व्हिडिओ व्हायरल झाले. (#دختر_خیابان_انقلاب_کجاست , सोशल मीडियावर पर्शियनमध्ये "इंगलाब स्ट्रीटची मुलगी कुठे आहे"). सुरुवातीला ती अनोळखी होती, काही दिवसांनी नसरीन सोतौदेह (फारसी: نسرین ستوده), ज्या मानवाधिकार कार्यकर्त्याला आणि वकिलालाही अटक करण्यात आली आहे, ती महिला ३१ वर्षांची असल्याचे आढळून आले आणि तिला तिच्या १९ महिन्यांच्य��� बाळासह घटनास्थळी अटक करण्यात आली.
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२८ जानेवारी २०१८ रोजी, या प्रकरणाचा तपास करणाऱ्या वकील नसरीन सोतौदेह यांच्या म्हणण्यानुसार, विदा मोवाहेदची सुटका तात्पुरता जामिनावर करण्यात आली.
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२९ जानेवारी २०१८ रोजी, तेहरानमध्ये एका महिलेला एनकेलाब स्ट्रीटवरील त्याच युटिलिटी बॉक्सवर उभे राहून, तिचा पांढरा हिजाब काढून आणि काठीवर धरून मोवाहेदच्या निषेधाची पुनरावृत्ती केल्यानंतर अटक करण्यात आली. सोशल मीडियावर पोस्ट करण्यात आलेले फोटो दाखवतात की २९ जानेवारी रोजी तेहरानमध्ये आणखी तीन महिलांनी मोवाहेदच्या निषेधाचे पुनरुत्थान केले, ज्यामध्ये एक फेरदौसी स्क्वेअरजवळ होती.
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३० जानेवारी २०१८ रोजी नसरीन सोतौदेह यांच्या मते, २९ जानेवारी २०१८ रोजी अटक करण्यात आलेली दुसरी महिला नर्गेस होसेनी (फारसी: نرگس حسینی) होती ; तिचे वय ३२ होते.
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३० जानेवारी २०१८ रोजी, अनेक महिलांनी, आणि पुरुषांनी देखील, अनिवार्य हिजाब कायद्याच्या विरोधात मोवाहेदच्या निषेधाची पुनरावृत्ती करून निषेध केला. हे तेहरान, तसेच शिराझ आणि इस्फहानसह इतर शहरांमध्ये घडले.
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१ फेब्रुवारी २०१८ रोजी इराणच्या पोलीस विभागाने घोषित केले की त्यांनी २९ महिलांना हिजाब काढल्याबद्दल अटक केली.
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नसरीन सोतौदेह, इराणी वकील यांच्या मते, नर्गेस होसेनी ही इंगेलाब स्ट्रीटची दुसरी मुलगी म्हणून ओळखली जाते. ती ३२ वर्षांची होती. तिच्या खटल्याच्या अध्यक्षस्थानी न्यायाधीशांनी सेट केलेला US$ १,३५,००० जामीन देण्यास अक्षम होती. तिला संभाव्य १० वर्षे तुरुंगवास भोगावा लागला आणि उघडपणे पापी कृत्य करण्यासह आरोपांनुसार ७४ चाबकाचे फटके मारण्यात आले.
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१५ फेब्रुवारी २०१८ रोजी सोशल मीडियावर शेअर केलेले नवीन फोटो आणि व्हिडिओ त्याच रस्त्यावर मोवाहेदच्या निषेधाची पुनरावृत्ती करणारी अजून एका महिलेला दर्शवितात. एंगेलाब स्ट्रीट (क्रांती स्ट्रीट) हिची ओळख आझम जंग्रावी (फारसी: اعظم جنگروی) म्हणून करण्यात आली. पोलिसांनी तिला आक्रमकपणे खाली घेतल्याचे व्हिडिओ दिसून येतात. तिच्या ताज्या इंस्टाग्राम चित्रानुसार, तिने सांगितले की ती इराणी महिला सुधारणावादी आणि बांधकाम पक्षाच्या कार्यकारिणीचा एक भाग आहे. तिने आतून किंवा देशाबाहेरून कोणाकडूनही आदेश घेतलेला नाही. तिने अनिवार्य हिजाबला विरोध करण्यासाठी असे केले हो��े.
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नर्गेस होसेनी आणि आझम जंग्रावी यांची तात्पुरत्या जामिनावर कोठडीतून सुटका करण्यात आली.
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शापरक शजरीजादेह नावाची दुसरी महिला आंदोलक (फारसी: شاپرک شجری زاده) हिने बुधवार, २१ फेब्रुवारी २०१८ रोजी गेतारीह रस्त्यावर पांढऱ्या स्कार्फसह निषेध करताना आढळून आली. तिला देखील अटक करण्यात आली. प्रत्यक्षदर्शींनी सांगितले की, पोलिसांनी तिच्यावर मागून हल्ला केला आणि तिला ताब्यात घेतले.
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सोशल मीडियावर शेअर केलेल्या फोटोवरून असे दिसून येते की सरकार युटिलिटी बॉक्सेसवर उलटे व्ही-आकाराचे लोखंडी स्ट्रक्चर ठेवत आहे जेणेकरून बॉक्सच्या वर उभे राहणे अवघड होईल. तिला १८ वर्षांच्या निलंबित तुरुंगवासाच्या व्यतिरिक्त दोन वर्षांच्या तुरुंगवासाची शिक्षा झाली.[१२] शिवाय, तिने इराण सोडल्याचे सांगितले.[१३]
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मरियम शरीयतमदारी नावाची दुसरी स्त्री (फारसी: مریم شریعتمداری) दुपारच्या वेळी युटिलिटी बॉक्सवर अनिवार्य हिजाबचा निषेध करत होती. पोलिसांनी तिला खाली येण्यास सांगितले आणि महिलेने नकार दिला. तिने पोलिसांना प्रश्न केला की तिचा गुन्हा काय आहे. त्यावर पोलिसांनी "शांतता भंग" करण्याचे कारण दिले. त्यानंतर पोलिसांनी तिला हिंसकपणे बाहेर काढल्याने ती जखमी झाली आणि तिचा पाय मोडला.[a]
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शापरक शजरीजादेह यांना कोठडीत मारहाण करण्यात आली. नंतर तात्पुरत्या जामिनावर तिची सुटका करण्यात आली.
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प्रत्यक्षदर्शींनी सांगितले की, हमराज सदेघी नावाची आणखी एक महिला (फारसी: همراز صادقی) शनिवार, 24 फेब्रुवारी 2018 रोजी सक्तीच्या हिजाबला विरोध करत असताना अचानक तिच्यावर अज्ञात सुरक्षा दलाने हल्ला केला, तिचा हात मोडला आणि तिला अटक करण्यात आली.
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८ जुलै २०१८ रोजी, इराणी किशोरी मादेह होजब्री हिला तिच्या इन्स्टाग्राम अकाउंटवर तिच्या स्कार्फशिवाय पाश्चात्य आणि इराणी संगीतावर नृत्य करतानाचे व्हिडिओ पोस्ट केल्यानंतर अटक करण्यात आली.[१५] तीचे ६,००,००० पेक्षा जास्त फॉलोअर्ससह होते. अनेक लोकप्रिय इन्स्टाग्राम वापरकर्त्यांपैकी ती एक होती.[१५] तिचे व्हिडिओ शेकडो लोकांनी शेअर केले.[१५] तिच्या अटकेच्या निषेधार्थ अनेक इराणी महिलांनी स्वतः नाचतानाचे व्हिडिओ पोस्ट केले.[१६]
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२७ ऑक्टोबर २०१८ रोजी, इस्लामिक आझाद विद्यापीठ, सेंट्रल तेहरान शाखेतील कॅम्पसमध्ये नैतिकता पोलिस व्हॅन प्रवेश केला आणि अयोग्य हिजाबसाठी अनेक महिलांना अटक करण्याचा प्रयत्न केला. त्यावेळी तेथील विद्यार्थ्यांनी पोलिसांचा निषेध केला. व्हिडिओमध्ये एक विद्यार्थिनी व्हॅनसमोर उभी राहून तिचा बाहेर पडण्याचा प्रयत्न करत असल्याचे दाखवले, ज्यामुळे व्हॅनचा चालक तिच्यावर धावून जाण्याचा प्रयत्न करत होता.[१७]
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२९ ऑक्टोबर २०१८ रोजी, एक इराणी महिला तेहरानमधील एंगेलाब स्क्वेअरच्या घुमटावर उभी राहिली आणि अनिवार्य हिजाबच्या निषेधार्थ तिचा स्कार्फ काढून टाकला. काही मिनिटांनंतर तिला पोलिसांनी अटक केली.[१८] १४ एप्रिल २०१९ रोजी, ती विदा मोवाहेद असल्याचे जाहीर करण्यात आले. ती एंगेलाब स्ट्रीटची मूळ मुलगी होती. जी दुसऱ्यांदा निषेध करत असल्याचे उघड झाले.[१९]
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१५ फेब्रुवारी २०१९ रोजी, नैतिकता पोलिसांनी तेहरानच्या नर्मक भागात अयोग्य हिजाबसाठी दोन मुलींना अटक करण्याचा प्रयत्न केला . पोलिसांना तेथील जवळच्या लोकांकडून प्रतिकार करण्यात आला. व्हॅनच्या भोवती जमलेल्या लोकांच्या टोळक्याने खिडक्या तोडल्या, दरवाजा फोडला आणि दोन मुलींना आत सोडवले. जमावाला पांगवण्यासाठी पोलीस हवेत गोळीबार करताना या घटनेच्या व्हिडिओमध्ये दिसत आहे. तेहरान पोलिसांनी नंतर या घटनेला दुजोरा दिला.[२०][२१]
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७ मार्च २०१९ रोजी, कंगावारमध्ये दोन महिलांना हिजाब न घालता शहरातील रस्त्यांवर फिरून सक्तीच्या हिजाबला विरोध केल्यानंतर त्यांना अटक करण्यात आली.[२२]
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आंतरराष्ट्रीय महिला दिनी (८ मार्च), तेहरानमधील महिलांच्या गटांनी अनावरण केले आणि महिलांच्या अत्याचाराचा निषेध केला. एका व्हिडिओमध्ये दोन अनावरण झालेल्या महिलांनी लाल चिन्ह धारण केलेले दाखवले आहे, ज्यावर लिहिले आहे की, "आंतरराष्ट्रीय महिला दिन संपूर्ण मानवतेसाठी न्याय्य जगाचे वचन आहे". दुसऱ्या व्हिडिओमध्ये तेहरान मेट्रो कारमधील अनावरण केलेल्या महिलांचा एक गट प्रवाशांना फुले देताना दिसला.[२३]
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११ मार्च २०१९ रोजी, एक माणूस इंग्लॅब रस्त्यावर एका बॉक्सवर उभा राहिला आणि त्याने काठीवर पांढरा स्कार्फ फिरवला. त्याला सुरक्षा दलाने घटनास्थळी अटक केली.
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१३ मे २०१९ रोजी, तेहरान विद्यापीठातील विद्यार्थी अनिवार्य हेडस्कार्फ नियमाचे पालन करण्याच्या वाढत्या दबावाचा निषेध करण्यासाठी एकत्र आले.[२४] आंदोलन करणाऱ्या विद्यार्थ्यांवर साध्या वेशातील सुरक्���ारक्षकांनी हल्ला केला. विद्यार्थ्यांनी स्वातंत्र्य आणि मुक्त निवडणुकांची मागणी करणारे फलकही हातात घेतले होते.[२५]
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ऑगस्ट २०१९ मध्ये, इराणच्या नागरी हक्क कार्यकर्त्या सबा कोर्ड अफशारी यांना २४ वर्षांच्या तुरुंगवासाची शिक्षा ठोठावण्यात आली होती. ज्यात सार्वजनिक ठिकाणी तिचा हिजाब काढल्याबद्दल १५ वर्षांच्या तुरुंगवासाची शिक्षा ठोठावण्यात आली होती, ज्या इराणी अधिकाऱ्यांनी "भ्रष्टाचार आणि वेश्याव्यवसाय" ला प्रोत्साहन दिल्याचे म्हटले आहे.[२६]
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१७ सप्टेंबर २०२२ रोजी, महसा अमिनी नावाच्या २२ वर्षीय इराणी महिलेचा तेहरानमध्ये संशयास्पद परिस्थितीत मृत्यू झाला. संभाव्यतः पोलिसांच्या क्रूरतेमुळे . जगभरातील अनेक लोकांनी अमिनीच्या मृत्यूवर प्रतिक्रिया व्यक्त केल्या. जे काही वृत्त स्रोतांनुसार, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ इराण अंतर्गत महिलांवरील हिंसाचाराचे प्रतीक बनले. देशभरात हिजाबविरोधी निषेधाची मालिका सुरू झाली.
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काही महिला निदर्शकांनी त्यांचे हिजाब काढले आणि त्यांना आगीत जाळले किंवा प्रतीकात्मकपणे त्यांचे केस कापले, व्हिडिओ फुटेज इन्स्टाग्राम आणि ट्विटरवर पसरले.
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सक्रिय दीर्घिकीय केंद्रक (इंग्रजी: Active Galactic Nucleus (AGN), लघुरूप: एजीएन) हा दीर्घिकेच्या केंद्राजवळचा दाट (compact) भाग आहे. याची तेजस्विता विद्युतचुंबकीय वर्णपटाच्या सर्व भागांत किंवा कमीत कमी काही भागांत सरासरीपेक्षा खूप जास्त असते. हे जास्तीचे उत्सर्जन रेडिओ, सूक्ष्मतरंग, अवरक्त, दृश्य, अतिनिल, क्ष-किरण आणि गॅमा किरण या तरंगलांबींमध्ये आढळून आले आहे. ज्या दीर्घिकांमध्ये एजीएन असते अशा दीर्घिकांना सक्रिय दीर्घिका म्हणतात. एजीएन मधील प्रारण त्याच्या केंद्रस्थानी असणाऱ्या प्रचंड वस्तुमानाच्या कृष्णविवराचे वस्तुमान वृद्धिंगत (ॲक्रिशन[श १]) होत असल्याने होते असे मानले जाते. एजीएन विद्युतचुंबकीय प्रारणाचे विश्वातील सर्वात तेजस्वी स्रोत आहेत. त्यांचा वापर अतिशय दूरच्या गोष्टी शोधण्यासाठी केला जाऊ शकतो.
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डॉ. स.गं. मालशे (जन्म : २४ सप्टेंबर १९२१; - ७ जून १९९२) हे मराठी लेखक, समीक्षक व संपादक होते.
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एम.ए. झाल्यावर मालशे मराठीचे प्राध्यापक झाले. 'फादर स्टीफन्सकृत ख्रिस्त पुराण’ भाषिक अभ्यास या विषयावर त्यांनी पीएच,डी केली. मराठी संशोधन पत्रिका, महाराष्ट्र साहित्य पत्रिका आदी नियतकालिकांचे ते संपादक होते.
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आपल्या लेखन कारकिर्दीच्या सुरुवातीला स.गं. मालशे यांनी 'व्यंकटेश माडगूळकर यांच्या कथा ', हसा आणि लठ्ठ व्हा’ ही संपादने केली. त्यांच्या ललित लेखांचा संग्रहही ' ‘आवडनिवड’ या नावाने प्रसिद्ध झाला. 'नीरक्षीर' हा त्यांच्या नाट्यविषयक लेखांचा संग्रह. या संग्रहातून पाश्चात्त्य नाट्यकृतींसंबंधी व दिग्दर्शकांसंबंधीचे लेख आहेत. कालांतराने मालशे ऐतिहासिक दृष्टीने विचार करणारे संहिताभ्यासक, संपादक व समीक्षक म्हणून ओळखले जाऊ लागले. 'केशवसुतांच्या कवितांचे हस्तलिखित', 'सावरकरांच्या अप्रसिद्ध कविता', 'लोकहितवादीकृत जातिभेद', 'दोन पुनर्विवाह प्रकरणे', स्त्री - पुरुष तुलना अशा अनेक संहितात्मक पुस्तिका त्यांनी प्रसिद्ध केल्या.
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मालशे यांनी धनंजय कीर यांच्या सहकार्याने जोतिबा फुलेकृत 'शेतकऱ्यांचा आसूड', 'महात्मा फुले समग्र वाङमय', 'झेंडूची फुले' हे सर्व ग्रंथ संपादन करून पुनःप्रकाशात आणले.
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मालश्यांचे आणखी एक मोलाचे कार्य म्हणजे ऑस्टिन वाॅरेन आणी रेने' वॆलेक यांनी लिहिलेल्या 'थिअरी ऑफ लिटरेचर' या पुस्तकाचा 'साहित्य सिद्धान्त' असा अनुवाद केला. या ग्रंथातून साहित्यसमीक्षा, साहित्य संशोधन, साहित्योतिहास, साहित्यभासाच्या पद्धती यासंबंधी चर्चा केली आहे.
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याशिवाय मालशे यांनी युजीन ओ'नीलच्या 'स्ट्रेंज इंटरल्यूड' या नाटकाचा अनुवाद 'सुख पाहता' असा केला. मालशे यांच्या एकूण लिखाणातून
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सगरोळी हे नांदेड जिल्ह्यातल्या बिलोली तालुक्यातील तेलंगण, कर्नाटक व महाराष्ट्र यांच्या सीमेवर असलेले एक प्राचीन गाव आहे.
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सगरोळी गावाची लोकसंख्या ७००० ते ८००० दरम्यान आहे. १२ चौरस किलोमीटर असे गावाचे शेतीसहित क्षेत्रफळ आहे.
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सगरोळी गावात सुमारे ७०% लोक साक्षर आहेत.
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महाराष्ट्रात प्रसिद्ध असलेले शिक्षण संकुल(कोणते?) याच गावात आहे. संस्कृती संवर्धन मंडळ ही संस्थाही येथे कार्यरत आहे.
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सगरोळी येथील उत्खननात काही प्राचीन जुने अवशेष सापडले आहेत. या गावात मिळालेला शिलालेख त्रिभुवनमल्ल चालुक्य या राजाचा आहे.
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विविध ज्ञानविस्तार हे इ.स. १८६७ साली[१] सुरू झालेले मराठी भाषेतील मासिक होते. रामचंद्र भिकाजी गुंजीकर यांनी या मासिकाची स्थापना केली. भौतिक व सामाजिक शास्त्रांतील विविध ज्ञानशाखांविषयी तत्कालीन विद्वानांनी, अभ्यासकांनी लिहिलेले लेख या मासिकात छापून येत असत. हे मासिक इ.स. १९३७ सालापर्यंत चालले[२].
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इ.स. १८६७ साली रामचंद्र भिकाजी गुंजीकरांनी विविध ज्ञानविस्ताराची सुरुवात केली. या मासिकाचे ते संस्थापक संपादक होते; मात्र त्यावर ते संपादक म्हणून आपले नाव घालत नसत [३]. मासिकाच्या आरंभिक काळापासून भाषा, व्याकरण, भाषिक व्युत्पत्ती इत्यादी विषयांवर त्यात लेख छापून येत असत. सात वर्षे संपादनाचा व्याप सांभाळल्यानंतर गुंजीकर विविधज्ञानविस्तारातून बाहेर पडले [३].
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शिवकालीन मराठा अष्टप्रधानमंडळातील रामचंद्र अमात्य यांनी ग्रथबद्ध केलेली आज्ञापत्रे विविध ज्ञानविस्तारातून इ.स. १८७२ - इ.स. १८७४ या काळात क्रमशः छापून येत होते [४].
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जुलै १८६७ ते जानेवारी १९३५ या कालावधीतील विविध ज्ञानविस्तारचे १०० अंक Archived 2016-08-12 at the Wayback Machine. ‘राज्य मराठी विकास संस्थे’च्या संकेतस्थळावर उतरवून घेण्यासाठी उपलब्ध आहेत. संकेतस्थळाच्या दुर्मिळ ग्रंथ या पानावरील ४९ ते ८६ या अनुक्रमांकावर ह्यातला अंक उतरवून घेण्याची कळ आहे.
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जिवंत, श्वसन करणारा व जिवंतपणाची इतर लक्षणे दाखवणारा प्राणी.
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सजीव ही व्याख्या सर्व सजीवाना लागू आहे.फक्त प्राण्याना नाही. जीव म्हणजे काय हा प्रश्न सुद्धा तसा जटिल आहे. सजीव सृष्टीमधील सर्वात लहान घटक म्हणजे पेशी. एकदा पेशी नष्ट झाली म्हणजे सजीवाचे आस्तित्व संपले. या पृथ्वीवर पेशी सजीव आहे. पेशीची व्याख्या- पेशी पटलाने बद्ध. पेशी अंतर्गत चयापचय श्वसन, अन्न ग्रहण, उत्सर्जन अशा क्रिया चालू आहेत. पेशीची वाढ होते,पेशी विभाजन होते. पेशी विघटन म्हणजे पेशीचा मृत्यू. सर्वसजीवाना मृत्यू आहे.पेशीचे कार्य ऊर्जा विनिमयाच्या नियमानुसार चालते. पेशीपटलामधून आलेल्या अन्न रेणूंच्या चयापचयामधून पेशी आवश्यक ऊर्जा निर्माण करते. थोडक्यात पृथ्वीवर पेशीबाहेर सजीव कोठेही नाही.
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संशोधकांनी सजीवांच्या संख्येचा अंदाज बांधण्यासाठी काही गणिती सिद्धांताचाही आधार घेतला. त्याच्या आधारे सजीवांची संख्या १०१२ एवढी असल्याचा म्हणजे '१०० अब्जांच्या' घरात असल्याचा अंदाज व्यक्त करण्यात आला.
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सजीव कुंपण किंव्हा जीवंत कुंपण हे शेतमालाची अथवा शेतीतील अवजारांची चोरी वाचविण्यासाठी, जनावरांचा उपद्रव व त्यामुळे होणारे नुकसान टाळण्यासाठी शेतीला करण्यात येणारे एक वनस्पतींचे कुंपण असते. यासाठी बहुतेकवेळी जलद वाढणाऱ्या, प्रतिकूल वातावरणातही तग धरणाऱ्या काटेरी वनस्पतींचा वापर करण्यात येतो. या वनस्पती अथवा झुडुपे ही जनावरांना खाण्यास निरुपयोगी असणे आवश्यक आहे.
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| 2 |
+
केतकी, बांबू, मेहंदी. बेशरम खैर, शिकेकाई घायपात काटेरी बाभूळ सागरगोटा करवंद, मोगली एरंड चिलार तोरणी निवडुंग घाणेरी अडुळसा बोगनव्हीला इत्यादी वनस्पती या सजीव कुंपणासाठी योग्य असतात. बहुतेककरून, ज्यांची पाने अथवा फांदी तोडली असता, त्यातून दुधासारखा द्रव निघतो अशा वनस्पती जनावरे खात नाहीत.
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| 1 |
+
सज्जाद हुसेन (१५ जून, १९१७ - २१ जुलै, १९९५) हे एक भारतीय संगीतकार होते. यांनी हिंदी चित्रपटांमध्ये संगीत दिले. हे स्वतः मँडोलिन वाजवीत असत.
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| 2 |
+
जुन्या काळातील एक चित्रपट संगीतकार.
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| 1 |
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सटर काउंटी ही अमेरिकेच्या कॅलिफोर्निया राज्यातील ५८ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र युबा सिटी येथे आहे.[१]
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| 2 |
+
२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या ९९,६३३ इतकी होती.[२]
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| 3 |
+
सटर काउंटी साक्रामेंटो-रोझव्हिल महानगरक्षेत्राचा भाग आहे. या काउंटीची रचना १८५०मध्ये झाली.
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| 4 |
+
साक्रामेंटो नदी या काउंटीतून वाहते.
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| 1 |
+
सणसनगर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील पुणे जिल्ह्यातील हवेली तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
+
येथील सर्वसाधारण हवामान उष्ण व कोरडे आहे. हवामानातील बदलानुसार प्रत्येक वर्षात मुख्यतः तीन ऋतू असतात.मार्च ते मे पर्यंत उन्हाळा, जून ते ऑक्टोबर पर्यंत पावसाळा आणि नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी पर्यंत हिवाळा असतो. हिवाळ्यात शीतल वातावरण असते. तालुक्यातील वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान ६१० मिमी पर्यंत असते.
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| 1 |
+
१७-सतरा ही एक संख्या आहे, ती १६ नंतरची आणि १८ पूर्वीची नैसर्गिक संख्या आहे.
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| 2 |
+
इंग्रजीत: 17 - seventeen
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| 1 |
+
हे भारताच्या जम्मू आणि काश्मीर राज्यातील जम्मू येथे असलेला विमानतळ आहे.यास सतवारी विमानतळ असेही म्हणतात.
|
| 2 |
+
|
| 3 |
+
|
| 4 |
+
आग्रा •
|
| 5 |
+
अराक्कोणम •
|
| 6 |
+
अंबाला •
|
| 7 |
+
बागडोगरा •
|
| 8 |
+
भूज रुद्रमाता •
|
| 9 |
+
कार निकोबार •
|
| 10 |
+
चबुआ •
|
| 11 |
+
छत्तीसगढ •
|
| 12 |
+
दिमापूर •
|
| 13 |
+
दुंडिगुल •
|
| 14 |
+
गुवाहाटी •
|
| 15 |
+
हलवारा •
|
| 16 |
+
कानपूर •
|
| 17 |
+
लोहगांव •
|
| 18 |
+
कुंभिरग्राम •
|
| 19 |
+
पालम •
|
| 20 |
+
सफदरजंग •
|
| 21 |
+
तंजावर •
|
| 22 |
+
येलहंका
|
| 23 |
+
|
| 24 |
+
|
| 25 |
+
बेगमपेट (हैदराबाद) • एचएएल बंगळूर (एचएएल/हिंदुस्थान)
|
| 26 |
+
|
| 27 |
+
|
| 28 |
+
जोगबनी विमानतळ •
|
| 29 |
+
मुझफ्फरपूर विमानतळ •
|
| 30 |
+
पाटना: लोकनायक जयप्रकाश विमानतळ •
|
| 31 |
+
पूर्णिया विमानतळ •
|
| 32 |
+
रक्सौल विमानतळ
|
| 33 |
+
|
| 34 |
+
|
| 35 |
+
बिलासपूर विमानतळ •
|
| 36 |
+
जगदलपूर विमानतळ •
|
| 37 |
+
Raipur: विमानतळ
|
| 38 |
+
|
| 39 |
+
|
| 40 |
+
चकुलिया विमानतळ •
|
| 41 |
+
जमशेदपूर: सोनारी विमानतळ •
|
| 42 |
+
|
| 43 |
+
|
| 44 |
+
बारवानी विमानतळ •
|
| 45 |
+
भोपाळ: राजा भोज विमानतळ •
|
| 46 |
+
ग्वाल्हेर विमानतळ •
|
| 47 |
+
इंदूर: देवी अहिल्याबाई होळकर विमानतळ •
|
| 48 |
+
जबलपूर विमानतळ •
|
| 49 |
+
खजुराहो विमानतळ •
|
| 50 |
+
ललितपूर विमानतळ •
|
| 51 |
+
पन्ना विमानतळ •
|
| 52 |
+
सतना विमानतळ
|
| 53 |
+
|
| 54 |
+
|
| 55 |
+
भुवनेश्वर: बिजु पटनायक विमानतळ •
|
| 56 |
+
हिराकुद विमानतळ •
|
| 57 |
+
झरसुगुडा विमानतळ •
|
| 58 |
+
रूरकेला विमानतळ
|
| 59 |
+
|
| 60 |
+
|
| 61 |
+
आग्रा: खेरीया विमानतळ •
|
| 62 |
+
अलाहाबाद: बमरौली विमानतळ •
|
| 63 |
+
गोरखपूर विमानतळ •
|
| 64 |
+
झांसी विमानतळ •
|
| 65 |
+
कानपूर: चकेरी विमानतळ •
|
| 66 |
+
ललितपूर विमानतळ
|
| 67 |
+
|
| 68 |
+
|
| 69 |
+
अलाँग विमानतळ •
|
| 70 |
+
दापोरिजो विमानतळ •
|
| 71 |
+
पासीघाट विमानतळ •
|
| 72 |
+
तेझू विमानतळ •
|
| 73 |
+
झिरो विमानतळ
|
| 74 |
+
|
| 75 |
+
|
| 76 |
+
दिब्रुगढ: मोहनबारी विमानतळ •
|
| 77 |
+
जोरहाट: रौरिया विमानतळ •
|
| 78 |
+
उत्तर लखिमपूर: लिलाबारी विमानतळ •
|
| 79 |
+
सिलचर: कुंभीरग्राम विमानतळ •
|
| 80 |
+
तेझपूर: सलोनीबारी विमानतळ
|
| 81 |
+
|
| 82 |
+
|
| 83 |
+
इंफाल: तुलिहाल विमानतळ
|
| 84 |
+
|
| 85 |
+
|
| 86 |
+
रुपसी विमानतळ •
|
| 87 |
+
शेला विमानतळ •
|
| 88 |
+
शिलाँग: उमरोई विमानतळ
|
| 89 |
+
|
| 90 |
+
|
| 91 |
+
ऐझ्वाल: लेंगपुई विमानतळ
|
| 92 |
+
|
| 93 |
+
|
| 94 |
+
दिमापूर विमानतळ
|
| 95 |
+
|
| 96 |
+
|
| 97 |
+
पाकयाँग विमानतळ
|
| 98 |
+
|
| 99 |
+
|
| 100 |
+
अगरतला: सिंगरभिल विमानतळ •
|
| 101 |
+
कैलाशहर विमानतळ •
|
| 102 |
+
कमलपूर विमानतळ •
|
| 103 |
+
खोवै विमानतळ
|
| 104 |
+
|
| 105 |
+
|
| 106 |
+
बालुरघाट विमानतळ •
|
| 107 |
+
बेहाला विमानतळ •
|
| 108 |
+
कूच बिहार विमानतळ •
|
| 109 |
+
इंग्लिश बझार: मालदा विमानतळ
|
| 110 |
+
|
| 111 |
+
|
| 112 |
+
चंदिगढ विमानतळ
|
| 113 |
+
|
| 114 |
+
|
| 115 |
+
धरमशाला: गग्गल विमानतळ •
|
| 116 |
+
कुलू: भुंतार विमानतळ •
|
| 117 |
+
शिमला विमानतळ
|
| 118 |
+
|
| 119 |
+
|
| 120 |
+
जम्मू: सतवारी विमानतळ •
|
| 121 |
+
कारगिल विमानतळ •
|
| 122 |
+
लेह: कुशोक बकुला रिम्पोचे विमानतळ
|
| 123 |
+
|
| 124 |
+
|
| 125 |
+
लुधियाना: साहनेवाल विमानतळ •
|
| 126 |
+
पठाणकोट विमानतळ
|
| 127 |
+
|
| 128 |
+
|
| 129 |
+
अजमेर विमानतळ •
|
| 130 |
+
बिकानेर: नाल विमानतळ •
|
| 131 |
+
जेसलमेर विमानतळ •
|
| 132 |
+
जोधपूर विमानतळ •
|
| 133 |
+
कोटा विमानतळ •
|
| 134 |
+
उदयपूर: महाराणा प्रताप विमानतळ (दबोक)
|
| 135 |
+
|
| 136 |
+
|
| 137 |
+
देहराडून: जॉली ग्रँ��� विमानतळ •
|
| 138 |
+
पंतनगर विमानतळ
|
| 139 |
+
|
| 140 |
+
|
| 141 |
+
पोर्ट ब्लेर: वीर सावरकर विमानतळ
|
| 142 |
+
|
| 143 |
+
|
| 144 |
+
कडप्पा विमानतळ •
|
| 145 |
+
दोनाकोंडा विमानतळ •
|
| 146 |
+
काकिनाडा विमानतळ •
|
| 147 |
+
नादिरगुल विमानतळ •
|
| 148 |
+
पुट्टपार्थी: श्री सत्य साई विमानतळ •
|
| 149 |
+
राजमुंद्री विमानतळ •
|
| 150 |
+
तिरुपती विमानतळ •
|
| 151 |
+
विजयवाडा विमानतळ •
|
| 152 |
+
विशाखापट्टणम विमानतळ •
|
| 153 |
+
वारंगळ विमानतळ
|
| 154 |
+
|
| 155 |
+
|
| 156 |
+
बेळगाव: सांबरे विमानतळ •
|
| 157 |
+
बेळ्ळारी विमानतळ •
|
| 158 |
+
विजापूर विमानतळ •
|
| 159 |
+
हंपी विमानतळ •
|
| 160 |
+
हस्सन विमानतळ •
|
| 161 |
+
हुबळी विमानतळ •
|
| 162 |
+
मैसुर: मंडकळ्ळी विमानतळ •
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विद्यानगर विमानतळ
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+
अगत्ती विमानतळ
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| 167 |
+
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| 169 |
+
पाँडिचेरी विमानतळ
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| 170 |
+
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| 171 |
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| 172 |
+
मदुरै विमानतळ •
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| 173 |
+
सेलम विमानतळ •
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| 174 |
+
तुतिकोरिन विमानतळ •
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| 175 |
+
वेल्लोर विमानतळ
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| 176 |
+
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| 177 |
+
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| 178 |
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दमण विमानतळ •
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| 179 |
+
दीव विमानतळ
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| 180 |
+
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| 181 |
+
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| 182 |
+
भावनगर विमानतळ •
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| 183 |
+
भूज: रुद्र माता विमानतळ •
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| 184 |
+
जामनगर: गोवर्धनपूर विमानतळ •
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| 185 |
+
कंडला विमानतळ •
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| 186 |
+
केशोद विमानतळ •
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| 187 |
+
पालनपूर विमानतळ •
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| 188 |
+
पोरबंदर विमानतळ •
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| 189 |
+
राजकोट विमानतळ •
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| 190 |
+
सुरत विमानतळ •
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| 191 |
+
उत्तरलाई विमानतळ •
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| 192 |
+
वडोदरा: हरणी विमानतळ
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| 193 |
+
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| 194 |
+
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| 195 |
+
अकोला विमानतळ •
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| 196 |
+
औरंगाबाद: चिकलठाणा विमानतळ •
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| 197 |
+
हडपसर विमानतळ •
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| 198 |
+
कोल्हापूर विमानतळ •
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| 199 |
+
लातूर विमानतळ •
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+
मुंबई: जुहू विमानतळ •
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| 201 |
+
नांदेड विमानतळ •
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नाशिक: गांधीनगर विमानतळ •
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| 203 |
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रत्नागिरी विमानतळ •
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| 204 |
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शिर्डी विमानतळ •
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| 205 |
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सोलापूर विमानतळ
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विद्याधर पुंडलिकांची ’सती’ ही दीर्घकथा सत्यकथेच्या १९७४ सालच्या दिवाळी अंकात प्रसिद्ध झाली होती. स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर यांच्या व्यक्तिगत जीवनावर आधारित त्यांच्या या कथेवरून मोठे वादळ उठले होते. पुंडलिकांच्या तोंडाला काळे फासण्यापर्यंत सावरकरभक्तांची मजल गेली होती. विचित्र योगायोग म्हणजे, स्वतः पुंडलिक सावरकरांचे चाहते व हिंदुत्ववादी प्रकृतीचे होते. पण या हल्ल्यामुळे ते डगमगले नाहीत. त्यामुळे सत्यकथेचे संपादक श्री.पु.भागवत आणि पुंडलिक यांना कोर्टातही खेटे मारावे लागले. पण दोघांनीही तडजोडवादी भूमिका घेतली नाही.
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सतीश गुजराल (२५ डिसेंबर, इ.स. १९२५ - ) हे एक भारतीय चित्रकार आहेत. भारताचे माजी पंतप्रधान इंद्रकुमार गुजराल यांचे धाकटे बंधू असलेल्या सतीश गुजराल यांचा जन्म ब्रिटिश भारतातील झेलम या पश्चिम पंजाबमधील गावी झाला. जगभरातील अनेक ठिकाणी त्यांच्या चित्रांची प्रदर्शने झालेली आहेत. न्यू यॉर्कमधील 'म्युझियम ऑफ मॉडर्न आर्ट', हिरोशिमामधील 'हिरोशिमा कलेक्शन', नवी दिल्लीमधील 'नॅशनल गॅलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट' यांसारख्या वेगवेगळ्या संग्रहालयात त्यांची चित्रे लावण्यात आलेली आहेत.
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सतीश मधुकर गुप्ते (जन्म : वसई, ४ ऑगस्ट १९४७) हे एक मराठी लेखक व समाजकार्यकर्ते आहेत. ते पश्चिम बोरीवलीत राहतात.
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सतीश गुप्ते यांचा बोरीवलीची कायस्थ प्रभु सभा, कोकण विकास परिषद, विकलांग पुनर्वसन केंद्र, शिवजयंती उत्सव समिती, दहिसरचा शिवाजी स्पोर्ट्स क्लब, बोरीवलीची शुक्रतारा संस्था आदी सांस्कृतिक संस्थांच्या कामकाजात सहभाग असतो.
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सतिश धवन (२५ सप्टेंबर १९२०– ३ जानेवारी २००२) यान्चे भारताच्या अंतराळ संशोधन कार्यक्रमच्या वाटचालीत महत्त्वाचे योगदान होते. ते भारताच्या अंतराळ संशोधन कार्यक्रमाचे जनक विक्रम साराभाई यांच्यानंतर ISRO (Indian Space Research Organisation)चे १९७२ साली अध्यक्ष झाले. त्यांना भारतातील प्रायोगिक fluid dynamicsच्या संशोधनाचे जनक मानले जाते. त्यांचा जन्म श्रीनगरमधे झाला आणि शिक्षण भारत तसेच अमेरिकेत झाले.
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त्यांनी ग्रामीण शिक्षण, Remote Sensing तसेच Satellite Communicationच्या क्षेत्रात मुलभूत संशोधन केले. त्यांच्या प्रयत्नांनी भारत INSAT - दूरसंचार उपग्रह, IRS - दूरसंवेद उपग्रह आणि PSLV - Polar Satellite Lanch Vehicle यासारखे प्रकल्प यशस्वी करू शकला.
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त्यांच्या स्मरणार्थ श्रीहरीकोटा येथील उपग्रह प्रक्षेपण स्थळाचे सतीश धवन अंतराळ केंद्र असे नामकरण करण्यात आले.
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प्रा. सतीश बडवे (२१ मे, १९५७ - ) हे एक मराठी लेखक आहेत. त्यांनी एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी. (मराठी) या पदव्या घेतलेल्या आहेत. त्यांनी श्रीरामपूर टाईम्स, दैनिक सार्वमत या दैनिकांमध्ये सहसंपादक म्हणून काम केले. त्यांनी गिरणा पब्लिक स्कूल, दाभाडी मालेगाव आणि बेलगंगा टेक्निकल पब्लिक स्कूल, बेलगंगा नगर - भाेरस, ता. चाळीसगाव या इंग्रजी शाळेत मराठी भाषा अध्यापनाचे कार्य केले. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विद्यापीठाच्या मराठी भाषा व वाड्.मय विभागात ते २०१४ ते २०१७ दरम्यान प्राध्यापक व विभागप्रमुख्ा म्हणून कार्यरत होते.
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१. मध्ययुगीन साहित्याविषयी
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२. संतसाहित्य समीक्षेचे बीजप्रवाह
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३. साहित्याची सामाजिकता
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१. दमयंती स्वयंवर
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२. मराठवाडयातील साहित्य (सहकार्याने)
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३. साहित्य : आस्वाद, अध्यापन आणि समीक्षा
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४. संत नामदेवविषयक अभ्यास
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५. संत एकनाथ – एक समग्र अभ्यास
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६. साहित्य संस्कृती आणि परिवर्तन
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७. मोरोपंताची श्लोककेकावली
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विवेक गोविलकर हे एक मराठी बिझिनेसमन आहेत. त्याशिवाय ते लेखकही आहेत. काॅर्पोरेट जगातील अनुभव हा त्यांच्या लेखनाचा प्रामुख्याने विषय असतो.
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मुंबईच्या आयआयटीमधून धातुशास्त्र विषयात एम.टेक केल्यानंतर गोविलकर यांनी हाॅर्वर्ड बिझिनेस स्कूलमधून ह्यूमन रिसर्च मॅनेजमेन्टमधील एक एक्झिक्यडिव्ह अभ्यासक्रम केला.
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विवेक गोविलकर यांनी टाटा युनिसिस (आता टाटा इन्फोटेक) कंपनीच्या लाॅस एंजेलिस, डेट्राॅईट, ब्रुसेल्स, न्यू जर्सी, आॅस्टिन, जमशेदपूर आदी ठिकाणच्या कार्यालयांमधून जानेवारी १९८२ ते मे १९९१ या काळात काम केले आहे. २०११ सालच्या डिसेंबरपासून ते बिझिनेस सल्लागार म्हणून काम करीत आले आहेत.
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सतीश शिवलिंगम (२३ जून, इ.स. १९९२:वेल्लोर, तमिळनाडू, भारत - ) हा भारतीय भारोत्तलक आहे. याने २०१६ उन्हाळी ऑलिंपिकमध्ये भारताचे प्रतिनिधित्व केले.
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सतेज पाटील हे एक भारतीय राजकारणी आहेत. ते महाराष्ट्राच्या गृह (शहरे), गृहनिर्माण, परिवहन, माहिती तंत्रज्ञान, संसदीय कार्य, माजी सैनिक कल्याण या विभागांचे विद्यमान राज्य मंत्री आहेत. ते महाराष्ट्र विधान परिषदेचे सदस्य आहेत.[१][२][३]
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पहा : साहित्य संमेलने
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विनय कुमार झा (जन्म २१ जून १९७१) हा नेपाळी क्रिकेट पंच आहे.[१] तो आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषदेने (आयसीसी) निवडलेल्या आयसीसी असोसिएट्स आणि ॲफिलिएट्स अंपायर पॅनेलमधील पंचांपैकी एक आहे.[२] २००९ आयसीसी वर्ल्ड क्रिकेट लीग डिव्हिजन सिक्स टूर्नामेंट[३][४] आणि मार्च २०१७ मध्ये नेपाळ आणि केन्या यांच्यातील २०१५-१७ आयसीसी वर्ल्ड क्रिकेट लीग चॅम्पियनशिप सामन्यांमध्ये तो उभा राहिला.[५][६]
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विवेक यादव (७ ऑक्टोबर, २००३:नेपाळ - हयात) हा नेपाळच्या क्रिकेट संघाकडून २०२२ पासून क्रिकेट खेळणारा खेळाडू आहे.
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सत्यकथा हे मराठी साहित्यातील एक मासिक होते. या मासिकात कथा छापून येणे म्हणजे यशस्वी लेखक होण्याची पायरी मानली जात असे.
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प्रसिद्ध लेखक व कथाकार जी. ए. कुलकर्णी यांच्या कथा ही या मासिकात प्रसिद्ध झाल्या होत्या.
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ऑस्कर पुरस्कार (१९९२)
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सत्यजित राय (बंगाली: সত্যজিৎ রায়) (मे २, इ.स. १९२१ - एप्रिल २३, इ.स. १९९२ ) हे ऑस्कर पुरस्कारविजेते भारतीय लेखक, पटकथालेखक, संगीतकार, निर्माते आणि दिग्दर्शक होते. चित्रपट जगतातील त्यांच्या कामगिरीबद्दल इ.स. १९९२ मध्ये त्यांना जीवनगौरव ऑस्कर पुरस्कार देण्यात आला. ऑस्कर मिळवणारे ते एकमेव भारतीय दिग्दर्शक आहेत. त्यांनी अपु के वर्ष (इ.स. १९५० ते इ.स. १९५८) व इ.स. १९५५ मध्ये पथेर पांचाली या चित्रपटाची निर्मिती केली. यांनी एकूण ३७ चित्रपटांची निर्मिती केली. ते स्वतःच चित्रपटांना संगीत देत, पटकथा लेखन, दिग्दर्शन व संपादन अशी अनेक कामे करत.
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यांच्या चित्रपटसृष्टीतील योगदानाबद्दल भारत सरकार तर्फे पद्मश्री हा पुरस्कार देण्यात आला. या शिवायही त्यांना युगोस्लाव्हियाचा रॅमन मॅगसेसे पुरस्कार, ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालयातर्फे डी. लिट. असे अनेक मान सन्मान प्राप्त झाले. फ्रान्स येथील कान चित्रपट महोत्सव यांसहित यांना एकूण ११ आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिळाले.
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सत्यजित राय यांचा जन्म कोलकाता येथे झाला. त्यांच्या घराण्यात कलात्मक सृजनशीलतेचा वारसा होता. त्यांचे आजोबा उपेंद्रकिशोर राय प्रसिद्ध लेखक, संगीतकार आणि चित्रकार होते. सत्यजित रायांचे वडील सुकुमार राय कवी, लेखक आणि चित्रकार होते. शाळेत असताना राय यांनी हॉलीवूडबद्दल मासिकांमध्ये वाचले आणि तेव्हापासून त्यांना चित्रपटांमध्ये गोडी वाटू लागली. याच काळात त्यांचा पाश्चात्य शास्त्रीय संगीताशीही परिचय झाला. शाळा संपवून महाविद्यालयीन शिक्षण घेताना रायांचा या विषयांमधील रस वृद्धिंगत झाला.
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कोलकाता येथील प्रेसिडेन्सी कॉलेजमधून पदवी घेतल्यानंतर राय यांचा शिक्षण थांबवण्याचा विचार होता. पण त्यांच्या आईच्या आग्रहाखातर ते रवींद्रनाथ टागोर यांनी स्थापन केलेल्या शांतिनिकेतन विश्वविद्यालयात शिक्षण घेण्यासाठी तयार झाले. शांतिनिकेतन येथे त्यांचा भारतीय, चिनी आणि जपानी कलांशी जवळून परिचय झाला. तिथे त्यांना बिनोद बिहारी मुखर्जी आणि नंदलाल बोस यांच्यासारख्या निष्णात चित्रकारांचा सहवास लाभला.
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शांतिनिकेतन येथे पाच वर्षे शिक्षण घेतल्यानंतर इ.स. १९४२ मध्ये राय कोलकात्याला परतले. तिथे त्यांनी डी. जे. केमर नावाच्या ब्रिटिश जाहिरात कंपनीमध्ये नोकरी पत्करली. इथे त्यां���ी निरनिराळ्या प्रकारच्या जाहिरातींची निर्मिती केली. नंतर त्यांची बदली त्यांचे ज्येष्ठ सहकारी डी. के.गुप्ता यांच्या 'सिग्नेट प्रेस' या प्रकाशनामध्ये झाली. इथे त्यांनी बऱ्याच पुस्तकांची मुखपृष्ठे बनवली. यात जवाहरलाल नेहरू यांचे डिस्कव्हरी ऑफ इंडिया आणि जिम कॉर्बेट यांचे मॅन इटर्स ऑफ कुमाऊं यांचा समावेश होता. याच संदर्भात बिभूतिभूषण बॅनर्जी यांची पाथेर पांचाली ही कादंबरी त्यांच्या वाचनात आली आणि या कथेचा राय यांच्या मनावर बराच प्रभाव पडला.
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इ.स. १९४७ मध्ये राय यांनी कलकत्ता फिल्म सोसायटीची स्थापना केली. इथे निरनिराळ्या विदेशी चित्रपटांची प्रदर्शने होत असत. याच काळात रायांनी चित्रपटांबद्दल वर्तमानपत्रे आणि मासिके यात लेख लिहिण्यास सुरुवात केली. राय बरेचदा आवडलेल्या कथांच्या पटकथाही लिहीत असत. इ.स. १९४९ मध्ये प्रसिद्ध फ्रेंच दिग्दर्शक ज्यां रेन्वार त्यांच्या द रिव्हर या चित्रपटाच्या चित्रीकरणासाठी कोलकाता येथे आलेले असताना राय यांची त्यांच्याशी भेट झाली. त्यांच्याशी बोलताना रायांनी पाथेर पांचाली या कथेवर चित्रपट बनवण्याची इच्छा व्यक्त केली. रेन्वार यांनी त्यांना या दिशेने जाण्यासाठी प्रोत्साहन दिले. इ.स. १९५० मध्ये कंपनीतर्फे लंडन दौऱ्यावर असताना रायांनी बरेच विदेशी चित्रपट बघितले. यातच इटालियन दिग्दर्शक व्हित्तोरिओ दी सिका यांच्या बायसिकल थीव्ह्ज या चित्रपटाचा समावेश होता. हा चित्रपट बघितल्यावर रायांचा चित्रपट बनवण्याचा निश्चय पक्का झाला.
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पाथेर पांचाली बनवण्याचा विचार पक्का झाल्यावर राय यांनी या चित्रपटासाठी निर्माता शोधणे सुरू केले. बरीच शोधाशोध करूनही निर्माता मिळणे अशक्य आहे असे दिसल्यावर त्यांनी स्वतःच्या बचतीमधील पैसे वापरून चित्रीकरण सुरू केले. राय आणि त्यांच्या सहकाऱ्यांचा हा पहिलाच प्रयत्न होता. यातून आपल्याला बरेच काही शिकता आले असे रायांनी नंतर नमूद केले. यादरम्यान राय पश्चिम बंगालचे तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी. सी रॉय यांना भेटले आणि चित्रपटासाठी सरकारकडून आर्थिक साहाय्याची हमी मिळाली. पाथेर पांचालीसाठी प्रसिद्ध संगीतकार पं. रविशंकर यांनी संगीत दिले.
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अनेक अडचणींना तोंड देत अखेर हा चित्रपट पूर्ण करण्यात राय यशस्वी झाले. याचे पहिले प्रदर्शन न्यू यॉर्क येथील म्यूझियम ऑफ मॉडर्न आर्ट येथे झाले. चित्रपटाची आंतरराष्ट्रीय पातळीवर प्रशंसा झाली. त्याचबरोबर काही ठिकाणी प्रखर टीकाही झाली. पाथेर पांचालीला राष्ट्रपती सुवर्ण पदक आणि राष्ट्रपती रजत पदक याबरोबरच इतर अनेक आंतरराष्ट्रीय चित्रपट महोत्सवांमध्ये पुरस्कार मिळाले. इ.स. २००५ मध्ये टाइम मासिकाच्या सर्वोत्कृष्ट १०० चित्रपटांमध्ये या चित्रपटाचा समावेश होता.
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पाथेर पंचालीच्या अभूतपूर्व यशाने राय यांना पुढील चित्रपटांसाठी हवे ते स्वातंत्र्य मिळाले. त्यांचे नंतरचे दोन चित्रपट, अपराजितो आणि ओपुर शोंशार हे पाथेर पांचालीच्या कथेतील मुलगा अपूचा बालपण ते प्रौढावस्था असा प्रवास दाखवतात. ओपुर शोंशारमध्ये रे यांनी सौमित्र चॅटर्जी आणि शर्मिला टागोर या कलाकारांना प्रथम संधी दिली. नंतर सौमित्र बंगाली चित्रपटांमध्ये तर शर्मिला बंगाली आणि हिंदी चित्रपटांमध्ये आघाडीचे कलाकार म्हणून ओळखले गेले.
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यानंतरचा राय यांचा प्रवास सृजनशीलतेचा एक दुर्मिळ आविष्कार होता. इ.स. १९५८ ते इ.स. १९८१ या वर्षांमध्ये त्यांनी एकाहून एक दर्जेदार चित्रपट काढले. त्यांचा निर्मितीचा वेग साधारणपणे वर्षाला एक असा होता. या प्रवासात रायांनी फँटसी, ऐतिहासिक कथा आणि सायन्स फिक्शन यासारखे विविध विषय हाताळले. यात अंधश्रद्धेवर आधारित देवी , आधुनिक शहरी आयुष्यातील समस्या हाताळणारा महानगर , चित्रपटजगतातील बेगडीपणाचे चित्रण करणारा नायक यांचा समावेश होता. याचबरोबर इ.स. १९६४ मधील रवींद्रनाथ टागोरांच्या कथेवर आधारित चारुलता हा त्यांचा सर्वोत्कृष्ट चित्रपट मानला जातो.
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राय यांच्या सुरुवातीच्या चित्रपटांना पं. रविशंकर, उस्ताद विलायत खान यांचे संगीत होते. इ.स. १९६१ मध्ये तीन कन्या या चित्रपटासाठी त्यांनी स्वतःच संगीत दिले आणि यानंतरच्या बहुतेक चित्रपटांमध्ये ते संगीतकार होते. याचबरोबर संवाद, पटकथालेखन यामध्येही त्यांचा महत्त्वाचा सहभाग असे. इ.स. १९६१ मध्ये तत्कालीन पंतप्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू यांच्या आग्रहाखातर रायांनी टागोरांवर माहितीपट काढला. इ.स. १९७७ मध्ये रायांनी मुन्शी प्रेमचंद यांच्या कथेवर आधारित शतरंज के खिलाडी हा चित्रपट काढून हिंदी चित्रपटसृष्टीत पदार्पण केले. या चित्रपटात संजीव कुमार ,सईद जाफरी ,शबाना आझमी ,अमजदखान ,व्हिक्टर बॅनर्जी आणि रिचर्ड ॲटनबरो यांच्य��सारखे नावाजलेले कलाकार होते. या चित्रपटात इ.स. १८५७च्या उठावापूर्वीचे भारतातील निजामशाहीचे प्रभावी चित्रण आहे. यात समालोचक म्हणून अमिताभ बच्चन यांचा आवाज वापरला आहे.
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इ.स. १९८३ मध्ये घरे बाइरे साठी काम करत असताना राय यांनी हृदयविकाराचा झटका आला. यानंतर पुढची नऊ वर्षे शारिरिक अस्वास्थ्यामुळे राय यांच्या कामावर बऱ्याच मर्यादा आल्या. यानंतरच्या त्यांच्या चित्रपटांचे चित्रीकरण मुख्यतः स्टुडिओतच झाले. यानंतर प्रकृती सुधारल्यानंतर त्यांनी आणखी तीन चित्रपट बनवले. आगंतुक हा त्यांचा शेवटचा चित्रपट होता.
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चित्रपटनिर्मितीबरोबरच सत्यजित राय यांनी विपुल लेखनही केले. बंगाली साहित्यामध्ये त्यांनी गुप्तहेर फेलूदा आणि प्रा. शोंकू या दोन लोकप्रिय पात्रांची निर्मिती केली. यापैकी फेलूदांचे पात्र शेरलॉक होम्सच्या पात्रावर आधारलेले आहे. प्रा शोंकू यांच्या कथा सायन्स फिक्शन या प्रकारात मोडतात. सत्यजित राय यांचे साहित्य इंग्लिशमध्ये अनुवादित झाल्यामुळे त्यांना मोठा वाचकवर्ग लाभला आहे. त्यांच्या बऱ्याच पटकथाही प्रसिद्ध झाल्या आहेत. याशिवाय भारतीय आणि परदेशी चित्रपटांवर तुलनात्मक पुस्तक अवर फिल्म, देअर फिल्म्स आणि त्यांचे आत्मचरित्र जाखान चोटो चिल्लम विशेष उल्लेखनीय आहेत.
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बंगाली भाषेत त्यांचे लेखन कार्यातील योगदान मोलाचे आहे.
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राय यांना त्यांच्या आयुष्यात अनेक पुरस्कार आणि सन्मान मिळाले. ऑक्सफर्ड विद्यापीठाने त्यांना मानद डॉक्टरेट पदवी प्रदान केली. चार्ली चॅप्लिननंतर हा सन्मान मिळवणारे ते पहिले चित्रपट दिग्दर्शक होते. त्यांना १९८५ मध्ये दादासाहेब फाळके पुरस्कार आणि १९८७ मध्ये फ्रान्सचा Lesions d'Onu पुरस्काराने सन्मानित करण्यात आले. त्यांच्या मृत्यूच्या काही काळापूर्वी त्यांना सन्माननीय अकादमी पुरस्कार आणि भारताचा सर्वोच्च सन्मान भारतरत्न प्रदान करण्यात आला. सॅन फ्रान्सिस्को इंटरनॅशनल फिल्म फेस्टिव्हलमध्ये दिग्दर्शनातील जीवनगौरव पुरस्कारासाठी त्यांना मरणोत्तर अकिरा कुरोसावा पुरस्कार मिळाला, जो त्यांच्या वतीने शर्मिला टागोर यांनी स्वीकारला. पूर्वीसारखाच जोम. त्यांचे वैयक्तिक जीवन कधीच मीडियाचे लक्ष वेधले गेले नाही, परंतु काहींच्या मते १९६० च्या दशकात चित्रपट अभिनेत्री माधवी मुखर्जी यांच्याशी त्यांचे ��्रेमसंबंध होते.
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सत्यजित रे हे भारतातील आणि जगभरातील बंगाली समुदायासाठी एक सांस्कृतिक प्रतीक आहेत. राय यांनी बंगाली चित्रपटसृष्टीवर अमिट छाप सोडली आहे. अपर्णा सेन, रितुपर्णा घोष, गौतम घोष, तारिक मसूद आणि तन्वीर मुकम्मल या अनेक बंगाली दिग्दर्शकांना त्यांच्या कामातून प्रेरणा मिळाली आहे. बुद्धदेव दासगुप्ता, मृणाल सेन आणि अदूर गोपालकृष्णन यांच्यासह सर्व शैलीतील दिग्दर्शकांनी भारतीय सिनेमावरील त्यांचा प्रभाव मान्य केला आहे. भारताबाहेरही, मार्टिन सोर्सी, जेम्स आयव्हरी, अब्बास किआरोस्तामी आणि एलिया कझान यांसारखे दिग्दर्शकही त्यांच्या शैलीने प्रभावित झाले आहेत. इरा सॅक्सचा फोर्टी शेड्स ऑफ ब्लू हा चित्रपट चारुलतावर आधारित होता. राय यांच्या कामातील कोटेशन्स सेक्रेड एविल, दीपा मेहताच्या द एलिमेंट्स ट्रायलॉजी आणि जीन-लुक गोडार्डच्या अनेक कामांसारख्या इतर अनेक चित्रपटांमध्ये दिसतात.
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१९९३ मध्ये, UC सांताक्रूझने राय यांच्या चित्रपटांचे आणि त्यावर आधारित साहित्याचे संकलन सुरू केले. १९९५ मध्ये, भारत सरकारने चित्रपटांशी संबंधित अभ्यासासाठी सत्यजित रे फिल्म अँड टेलिव्हिजन इन्स्टिट्यूटची स्थापना केली. लंडन फिल्म फेस्टिव्हल नियमितपणे सत्यजित रे पुरस्कार एका दिग्दर्शकाला प्रदान करतो ज्याने त्याच्या पहिल्या चित्रपटात "रे यांच्या दृष्टीची कला, संवेदनशीलता आणि मानवता" मूर्त स्वरूप दिली आहे. २००७ मध्ये, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशनने घोषणा केली की त्याच्या दोन फेलुदा कथांवर रेडिओ कार्यक्रम केले जातील.
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अमेरिकन व्यंगचित्र मालिकेतील अपू नहस्पिमापेटिलॉन या पात्राचे नाव राय यांच्या सन्मानार्थ ठेवण्यात आले होते. राय आणि माधवी मुखर्जी हे पहिले भारतीय चित्रपट व्यक्तिमत्त्व होते ज्यांची छायाचित्रे परदेशी टपाल तिकिटावर (डॉमिनिका देश) दिसली. राय यांच्या चित्रपटांचा उल्लेख अनेक साहित्यकृतींमध्ये करण्यात आला आहे - सोल बेलोची कादंबरी हर्झोग आणि जे.जे. एम. कोएत्झीचा युवक. सलमान रश्दी यांच्या बाल कादंबरी हारून अँड द सी ऑफ स्टोरीजमध्ये दोन माशांची नावे ‘गुपी’ आणि ‘बाघा’ आहेत.
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सत्यपाल चिंचोलीकर उर्फ सत्यपाल महाराज ( १६ मे, १९५२) हे महाराष्ट्रातील एक समाज प्रबोधक कीर्तनकार आहेत.[१] सप्तखंजिरीच्या माध्यमातून ग्रामस्वच्छतेचा संदेश देतात. तुकडोजी महाराज आणि गाडगे महाराज यांच्या विचारांनी प्रेरित होऊन चिंचोलीकर हातात झाडू घेत स्वच्छता करून आणि हातात खंजिरी घेत कीर्तनातून महाराष्ट्रातील विशेषतः विदर्भातील गावांत समाज प्रबोधन करत असतात. कीर्तनाच्या माध्यमातून त्यांनी स्वच्छता, अंधश्रद्धा, जातिभेद, व्यसनमुक्ती, घनकचरा नियोजन, स्त्री भ्रूणहत्या, शिक्षणाचे महत्त्व, हगणदारी मुक्त गाव या विषयी जागरूकता पसरवली आहे.[२]
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इ.स. १९५२ साली अकोला जिल्ह्यातल्या सिरसोली या छोट्याशा गावातील एका शिंपी कुटुंबात सत्यपाल चिंचोलीकरांचा जन्म झाला. त्यांचे कुटुंब गरीब होते. त्यांच्या आईचे नाव सुशीला, भाऊ उकर्डा व लहान बहीण वनमाला व वडिलांचे नाव विश्वननाथ चिंचोलीकर होते. त्यांचे वडील कपडे शिवण्याचा पारंपरिक व्यवसाय करत. लहानपणीच सत्यपालांना भजनांची आवड लागली. तुकडोजी महाराजांची व गाडगे बाबांची कीर्तने ऐकत ते लहानाचे मोठे झाले आणि वयाच्या तेराव्या वर्षी गावात भजन, कीर्तन करायला सुरुवात केली.
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अकोला जिल्ह्यातील अकोट गाव हे सत्यपाल चिंचोलीकर यांचे निवासस्थान आहे. आतापर्यंत देशभरातील १४,०००हून अधिक गावांत समाजप्रबोधनपर कीर्तने त्यांनी केली आहेत. जेथे अस्वच्छता दिसते तेथे सत्यपाल महाराज स्वतः हातात झाड़ू घेऊन तो परिसर स्वच्छ करतात. सत्यपाल महाराज आपली खंजिरी वाजवून एखाद्या सार्वजनिक गावच्या ठिकाणी किंवा गावाच्या पारावर लोकांना एकत्र करतात आणि प्रबोधनाचे कीर्तन सुरू करतात. "सामाजिक विषयांना आध्यात्मिकतेची आणि साथीला वादन कलेची जोड दिली की तो विषय थेट लोकांना भिडतो," असे सत्यपाल चिंचोलीकरांचे म्हणणे आहे. ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रातील अशिक्षित लोकांना संगीत व कलेची जोड देत मनोरंजनातून प्रबोधन करण्याचा त्यांचा मानस असतो.
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आपल्या भजनातून ते सत्य परिस्थिती आणि सामाजिक विषय मांडतात. त्यांनी खंजिरी या ग्रामीण भागातील चर्मवाद्याला विकसित करून सप्तखंजिरी म्हणजेच ७ खंजिरी एकत्र करून विविध आवाज काढायला सुरुवात केली. परिसर स्वच्छ करून ते आपल्या दिवसाची सुरुवात करतात. दिवसभर वाचन लेखन आणि रात्री गावा��� जाऊन कीर्तने करणे हा त्यांचा दिनक्रम आहे.[३]
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भारत देशातील परिवर्तनाच्या चळवळीतील बहुजनवादी संतांचे योगदान समाजापर्यंत पोहोचविण्यासाठी २१ व २२ मे २०११ रोजी पुणे शहरात अखिल भारतीय बहुजन संत साहित्य संमेलनाचे आयोजन करण्यात आले होते. २१ तारखेला सकाळी दहा वाजता महाराष्ट्राचे तत्कालीन बांधकाम मंत्री छगन भुजबळ यांनी संमेलनाचे उद्घाटन केले. सत्यपाल महाराज या संमेलनाच्या अध्यक्षस्थानी होते तर हनुमंत उपरे हे स्वागताध्यक्ष होते.
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सत्यपाल महाराजांना खालील पुरस्कार प्रदान करण्यात आले आहेत:
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सत्यबोध बाळकृष्ण हुदळीकर (जन्म : २६ नोव्हेंबर १८८०; - ??) हे मराठी लेखक, बालसाहित्यिक, जर्मन साहित्याचे अनुवादक आणि शिक्षणतज्ज्ञ होते.
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हुदळीकरांचे प्राथमिक शिक्षण सांगलीत तर, माध्यमिक जमखंडीत व पुण्याच्या फर्ग्युसन कॉलेजातून झाले. मुंबई विद्यापीठातून भूस्तरशास्त्राचा अभ्यास करून त्यांनी एम.एची पदवी संपादन केली. पुढे याच विषयात जर्मनीतून पीएच.डी. केली.
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हुदळीकरांचे जर्मन भाषेवर प्रभुत्व असल्याने त्यांनी जर्मन साहित्यातील अनेक पुस्तकांचे अनुवाद केले.
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जर्मन भाषाप्रवेश व जर्मन फॉर इंडियन स्टुडंट्स ही त्यांची भाषाविषयक दोन पुस्तके आहेत.
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त्यांची अन्य पुस्तके - पश्चिम आघाडीवर सामसूम, तरुण वेटरची दुःखे, फऊल हायसच्या स्फुट गोष्टी, दादांचे लग्न, वगैरे. जर्मन कवी गटेची सुभाषितेदेखील त्यांनी मराठीत आणली.
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बालशिक्षण या विषयाची हुदळीकरांना विशेष जाण होती. मुलांसाठी त्यांनी बालकमंदिर ही संस्था सुरू केली. बालविकास मासिकात त्यांनी लिहिलेल्या लेखांचा संग्रह 'मुलांनी अभ्यास कसा करावा ' या नावाने प्रसिद्ध झाला. याशिवाय, हुदळिकरांनी मुलांसाठी रंजक अशा बोधपर कथा लिहिल्या. 'मेवाडचा राजपुत्र प्रतापसिंह' ही त्यांनी मुलांसाठी लिहिलेली कादंबरी अतिशय लोकप्रिय ठरली.
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विवेक विनायक रानडे (१९६३ - ) हे भारतीय रसायन अभियंता, उद्योजक आणि क्लिअन्स युनिव्हर्सिटी ऑफ बेलफास्टच्या केमिस्ट्री आणि केमिकल इंजिनिअरिंगमध्ये रासायनिक अभियांत्रिकीचे एक प्राध्यापक आहेत. ते पुण्याच्या राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाळेचे| माजी चेर प्रोफेसर आणि उपसंचालक आहेत. त्यांच्या वैज्ञानिक संशोधनासाठी भारत सरकारची सर्वोच्च संस्था, वैज्ञानिक व औद्योगिक संशोधन परिषदेने २००४ साली त्यांना शांती स्वरूप भटनागर पुरस्कार दिला.
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डॉ. सदानंद श्रीधर मोरे (देहूकर) (जन्म : २५ जून, १९५२) हे मराठी लेखक, कवी, नाटककार, समीक्षक, इतिहास संशोधक, प्रवचनकार आणि कीर्तनकार आहेत. संत साहित्याचे (विशेषतः तुकारामांचे) ते अभ्यासक आहेत.[ संदर्भ हवा ]
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सदानंद मोरे यांनी एकदा तत्त्वज्ञान हा विषय, आणि दुसऱ्यांदा प्राचीन भारतीय संस्कृती आणि इतिहास हा विषय घेऊन, असे दोनदा एम.ए. केले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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‘द गीता – अ थिअरी ऑफ ह्यूमन ॲक्शन ‘ या विषयावर मोरे यांचे पीएच.डी.चे संशोधन होते. त्यासाठी लिहिलेल्या प्रबंधाला सर्वोत्कृष्ट प्रबंधलेखनाचा गुरुदेव दामले पुरस्कार मिळाला.[ संदर्भ हवा ]
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डॉ.सदानंद मोरे यांनी विद्यापीठीय अनुदान मंडळाकडून मिळालेल्या ‘कारकीर्द ॲवार्ड‘ या योजनेअंतर्गत ‘कृष्ण : द मॅन ॲन्ड हिज मिशन ‘ या विषयावर पोस्ट डॉक्टरल संशोधन केले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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डॉ. सदानंद मोरे पेशाने तत्त्वज्ञान या विषयाचे प्राध्यापक आहेत. पुणे विद्यापीठातील तत्त्वज्ञान विभागासहित विविध अन्य अध्यासनांचे ते समन्वयक आहेत.[ संदर्भ हवा ]
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तुकाराम महाराजांचे वंशज म्हणून मिळालेला सांस्कृतिक वारसा बहुविद्या शाखीय व्यासंगाने अधिक समृद्ध करणारे विचारवंत म्हणून त्यांना लोक मानतात.[ संदर्भ हवा ] मोरे यांनी अनेक संतसाहित्यविषयक तसेच सामाजिक ग्रंथांचे लेखन व संपादन केले आहे. विविध परिसंवाद आणि कार्यशाळांतून त्यांनी अनेक शोधनिबंधांचे वाचन केले आहे आणि अनेक व्याख्याने दिली आहेत.[ संदर्भ हवा ]
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डॉ. सदानंद मोरे हे इ.स. २०१५ साली पंजाबमधील घुमान येथे पार पडलेल्या ८८व्या अखिल भारतीय मराठी साहित्य संंमेलनाचे अध्यक्ष होते.[ संदर्भ हवा ] जळगाव येथे आयोजित राज्यस्तरीय सूर्योदय मराठी साहित्य संमेलनाचे अध्यक्ष.[ संदर्भ हवा ]
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सदाशिव पेठ, पुणे हा भारताच्या पुणे शहरातील एक भाग आहे. जुन्या शहरातील या भागाला सदाशिवराव भाऊंचे नाव देण्यात आले.
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पानिपतच्या लढाईमध्ये सदाशिवराव भाऊंना वीरगती प्राप्त झाली. त्यानंतर ह्या पेठेला सदाशिव पेठ असे नाव देण्यात आले.
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ही पेठ पुणे शहराच्या मध्यवर्ती भागात मोडते. या पेठेत मराठी ब्राह्मण वस्ती जास्त प्रमाणात आहे.
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पुण्यातील असंख्य जुने वाडे येथे आजही बघायला मिळतात.
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आणि इथे राहणाऱ्या लोकांनी स्वतःची एक नवीन शैली तयार केली आहे.
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ह्या शैलीमुळे मराठीमध्ये "सदाशिव पेठ" हे नवे विशेषण तयार झाले आहे.
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सदाशिव पेठेतील महत्त्वाची स्थळे:
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महत्त्वाची मंदिरे:
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सदाशिव चिमाजी अप्पा भट तथा सदाशिवरावभाऊ (३ ऑगस्ट , इ.स. १७३० - जानेवारी १४ / जानेवारी २०, इ.स. १७६१) हे मराठा साम्राज्यातील एक सेनापती व नासाहेब पेशव्यांचे चुलतभाऊ होते. त्यांनी पानिपतच्या तिसऱ्या लढाईत मराठ्यांचे नेतृत्व केले. या लढाईत मराठ्यांचा पराभव झाला. सदाशिवरावभाऊही या लढाईत मारले गेले असल्याचे समजले जाते.[१]
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चिमाजी अप्पांचे चिरंजीव सदाशिवरावभाऊ आईविना आजी राधाबाई साहेब यांच्याकडे लहानाचे मोठे झाले. अप्पा नेहमीच बाजीराव साहेबांबरोबर मोहिमेवर असायचे. लहानग्या सदाशिवाकडे फारसे लक्ष द्यायला त्यांना फुरसत नसायची. त्यानंतर सदाशिवराव शाहू महाराजांकडे दौलतीचे शिक्षण घेण्यासाठी दाखल झाले. जितके लेखणीमध्ये तरबेज तितकेच तलवारबाजीत. पुढे नानासाहेबांच्या लग्नानंतर नाना आणि भाऊमध्ये अंतर पडू लागले. याला कारण गोपिकाबाई. त्यांनी फक्त आपले आणि आपल्या मुलांचे कसे होईल याचाच विचार केला.[ संदर्भ हवा ] खूप दिवस गोपिकाबाईंमुळे भाऊ शनिवारवाड्यावर येऊ शकले नाही. ते साताऱ्याला होते. शेवटी शाहूराजांनी आज्ञा दिली आणि नानासाहेबांनी भाऊंना पुण्याला नेले. त्यानंतर भाऊंनी दौलतीचे कारभारी म्हणून सूत्रे हाती घेतली. त्यांच्या काळात मोठ्यातल्या मोठा माणूस भाऊंपुढे यायला घाबरायचा. त्यांचा हिशोब इतका पक्का की ते लगेच समोरच्याला कात्रीत पकडायचे.[ संदर्भ हवा ]
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भाऊंनी पहिल्यांदा लढाईमध्ये नेतृत्व दाखवले ते निजामाविरुद्ध, आणि त्यावेळी त्यांनी दौलताबादचा किल्ला सर केला. हरलेला निजाम जेव्हा हात बांधून आला, तेव्हा भाऊंनी इब्राहीमखान गारदी यास निजामाकडून मागून आपल्या सैन्यात घेतले.
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उमाबाई ही सदाशिवरावभाऊंची पत्नी. ती वारल्यावर भाऊंनी पेणचे सावकार कृष्णराव ऊर्फ भिकाजी नाईक कोल्हटकर यांची कन्या पार्वतीबाई यांच्याशी विवाह केला.
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जग्गी वासुदेव उर्फ सदगुरू हे एक योगी आणि दिव्यदर्शी आहे. ते इशा फाऊंडेशनचे संस्थापक आहेत. इशा फाऊंडेशन ही लोकहितासाठी काम करणारी लाभरहित संस्था आहे, जी योग शिबीर चालवते.[१] इशा फाऊंडेशन भारतासहित 'अमेरिका, इंग्लंड, लेबनन, सिंगापूर आणि आस्ट्रेलिया या देशातही योगा शिकविते. आणि त्याचबरोबर सामाजिक विकासासाठी योजना राबविते. युनायटेड नेशन्सच्या आर्थिक व सामाजिक परिषदेत (ECOSOC) इशा फाऊंडेशनला विशेष सल्लागार म्हणून मान्यता प्राप्त आहे.[२]
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जग्गी वासुदेव यांचा जन्म 3 सप्टेंबर 1957 रोजी कर्नाटक राज्यातील म्हैसूर शहरात एक तेलगू घराण्यात झाला. त्यांचे वडील डॉक्टरक्टर होते. त्यांच्या आर्इने एका ज्योतिषास त्यांचे भविष्य विचारले. तेव्हा त्यांनी सांगितले की, हया मुलाचे आयुष्य अतीशय भाग्यवान असेल म्हणून त्यांचे नाव जगदिश असे ठेवण्यात आले. जग्गी जसे जसे समजूतदार होत गेले तसे तसे त्यांची ओढ ही निसर्गाकडे वाढू लागली व ते जवळपासच्या जंगलात सहलीला जाऊ लागले. कधी कधी दोन तीन दिवसही त्यांचे वास्तव्य जंगलात असे. इतके ते निसर्गाशी एकरूप होत असत. वयाच्या 11व्या वर्षी जग्गी राघवेंद्र राव उर्फ मल्लाडीहल्ली स्वामी यांच्या सहवासात आले. त्यांच्या मार्गदर्शनाखाली त्यांनी योगाभ्यास सुरू केला व मनापासून तो आत्मसात केला.
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प्राथमिक शालेय शिक्षणानंतर त्यांनी म्हैसूर विश्वविदयालयातून इंग्रजी भाषा विषयात पदवी मिळवली. विश्वविदयालयात शिकत असताना त्यांना गिर्यारोहणात व मोटरसायकल चालवण्यात रूची वाढू लागली. म्हैसूरमधील चामुंडी टेकडी त्यांचे व त्यांच्या मित्रांचे आवडते ठिकाण होते. ते सर्व तिथे वारंवार जात असत. जग्गी भारतात ठिकठिकाणी मोटारसायकलवर प्रवास करत असत. भारत-नेपाळच्या सीमारेषेवर पासपार्ट नसल्यामुळे आडवण्यात आले तेव्हा त्यांच्या आयुष्याला वेगळी कलाटणी मिळाली व त्यांनी अर्थप्राप्ती करून स्वावलंबी होण्याचे ठरवले आणि त्यासाठी काही उदयोगही सुरू केले. उदा: पोल्ट्री फार्म, विटा बनवणे, बांधकाम इ.[ संदर्भ हवा ]
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वयाच्या पंचविसाव्या वर्षी 23 सप्टें. 1982 रोजी ते चामुंडी टेकडीवर एका दगडावर बसलेले असतांना त्यांना आध्यात्मिक अनुभूती झाली. त्या अनुभवासंदर्भात ते असे सांगतात की,"माझ्या आयुष्यात त्या क्षणा पर्यंत मी स्वतः व सृष्टीत फरक करू शकत होतो. पण त्या आत्मानुभूतीनंतर मी सृष्टीपासून वेगळा समजू शकत नव्हतो. जेथे तेथे मी स्वतःलाच बघू लागलो. जसे दगडात,आकाशात, सगळीकडे." हा अनुभव त्यांना वारंवार येऊ लागला. या घटनेनंतर त्यांची जीवनशैली पूर्णपणे बदलली. त्यांना आलेला अनुभव लोकांपर्यंत पोहोचवण्यासाठी त्यांनी आपले पूढील जीवन समर्पित करण्याचे ठरवले. त्यासाठी त्यांनी इशा फाऊंडेशन आणि इशा योगाची स्थापणा केली.[ संदर्भ हवा ]
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इशा फाऊंडेशन हे कोर्इंबतूर मधील वेलींगिरी पर्वताच्या पायथ्याशी एकशे पन्नास एकरमध्ये पसरलेले आहे. ही संस्था दोन लाखांपेक्षाही जास्त स्वयंसेवकांदवारे चालवली जाते. हया संस्थेने पर्यावरण संरक्षणासाठी प्रोजेक्ट ग्रीनहॅंन्डस योजना राबवली आहे. 17 आक्टो. 2006 मध्ये तमिळनाडूतील 27 जिल्हयात लोकांच्या मदतीने 8.52 लाख झाडे लावली. त्यामुळे गिनीजबुकमध्ये एक नवीन रेकार्ड बनले. 2008 मध्ये हया महत्त्वपूर्ण कार्यासाठी इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कारही मिळाला.[ संदर्भ हवा ]
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ध्यानलिंग इशा योगा केद्रात स्थापित करण्यात आले आहे. मनुष्याला उच्च स्तराच्या मानसिक पातळीवर पोहोचण्यासाठी याची स्थापणा करण्यात आली. इशा योगा केंद्र हे शक्तीशाली स्थान योगाच्या चार मार्गाने (ज्ञान, कर्म, क्रिया,भक्ती) मनुष्याला अंतरमुख होण्यास मदत करते. ध्यानलिंग योगमंदिराची प्रतिस्थापणा 1999 साली जग्गींनी पूर्ण केली. 13 फूट व 9 इंच असलेले ध्यान लिंग जगातील सर्वात मोठे लिंग आहे. ध्यानलिंग हे कुठल्याही एका संप्रदायाशी निगडीत नाही तर संपूर्ण मानवतेशी निगडीत आहे. ध्यान लिंगाच्या प्रवेशदवारावर सर्वधर्म स्तंभ स्थापित केले आहे ज्यात या स्तंभावर हिंदू, मुसिलम, इसार्इ, जैन, बौदध, शीख, ताओ, पारशी, यहूदि आणि शिन्तो धर्माचे प्रतिक कोरलेले आहे. हे धार्मिक मतभेदाच्या पलीकडे सर्व मानवतेला आमंत्रित करते.[ संदर्भ हवा ]
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कावेरी कॉलिंग प्रकल्पाचे उद्दीष्ट अग्रोफॉरेस्ट्रीच्या माध्यमातून अंदाजे २.४ अब्ज झाडे लावण्यात मदत करणे आहे, ज्यायोगे ते संवर्धनाचे साधन म्हणून कावेरी खोऱ्यात एक तृतीयांश झाडे झाडे व्यापतील. या प्रकल्पाला राजकारणी आणि चित्रपटसृष्टीतील सदस्यांकडून प्रशंसा मिळाली आहे.
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तथापि, पर्यावरणशास्त्रज्ञ आणि सार्वजनिक विचारवंतांचा असा आरोप आहे की हा कार्यक्रम नदी संवर्धनाचा साधेपणाचा दृष्टिकोन प्रस्तु�� करतो, सामाजिक प्रश्नांचा पाठपुरावा करतो आणि त्यात उपनद्या आणि वन्यजीव अधिवास हानी पोचविण्याची क्षमता आहे. कर्नाटक उच्च न्यायालयातही एक जनहित याचिका दाखल करण्यात आली असून या उपक्रमासाठी निधी उभारणीच्या पद्धतींच्या कायदेशीरपणाबद्दल, तसेच अभ्यासाला पाठिंबा न देता खासगी हेतूसाठी सरकारी मालकीच्या जमिनीचा वापर करण्यासंदर्भात प्रश्न विचारला गेला. जानेवारी २०२० मध्ये, हायकोर्टाने असा निर्णय दिला की फाउंडेशनला पुढाकाराशी संबंधित त्याच्या निधी उभारणीच्या पद्धतींचा तपशील जाहीर करण्याची आवश्यकता आहे.[ संदर्भ हवा ]
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टीकाकारांचा असा दावा आहे की वासुदेव भारतीय जनता पक्षाच्या हिंदू राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) या विचारसरणीचे आहेत आणि त्यांच्या माध्यमांमधून ते "असहिष्णु राष्ट्रवादी" भूमिका घेत आहेत. ते संपूर्ण गोहत्या बंदीचे समर्थन करतात. वसुदेव यांनी बालाकोट हवाई हल्ला, सर्वसमावेशक जीएसटी लागू करणे आणि नागरिकत्व (सुधारणा)विधेयक, 2019च्या बाजूने देखील भाष्य केले आहे, तर थुथुकुडी प्रकरणाचा निषेध केला.[ संदर्भ हवा ]
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गोलंदाज
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Support Staff
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→ अधिक संघ
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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→ More rosters
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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→ अधिक संघ
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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+
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| 27 |
+
→ अधिक संघ
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| 28 |
+
फलंदाज
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№
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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→ अधिक संघ
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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Support Staff
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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+
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→ अधिक संघ
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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प्रशिक्षण चमू
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→ अधिक संघ
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फलंदाज
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अष्टपैलू
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यष्टीरक्षक
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गोलंदाज
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प्रशिक्षण चमू
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→ अधिक संघ
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स्वामी विवेकानंदांच्या १५०व्या जयंतीनिमित्त पहिले विवेकानंद साहित्य संमेलन सोलापूर शहरात ९-१० नोव्हेंबर २०१३ या दिवसांत झाले. अध्यक्षस्थानी हिंदी साहित्यिक नरेंद्र कोहली होते. स्वामी विवेकानंद यांच्या साहित्यावर होणारे हे भारतातील पहिलेच संमेलन होते. संमेलनाच्या मिमित्ताने प्रकाशित झालेल्या विशेषांकाची प्रत https://docs.google.com/file/d/0BytTRFHTbvD5QXRfODdxX1dzSTA/edit?pli=1 या पत्त्यावर आहे.
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त्याच सभामंडपात तिसऱ्या दिवशी ११ नोव्हेंबरला युवती संमेलन झाले.
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