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स्नोबोर्डिंग हा खेळ १९९८ सालापासून हिवाळी ऑलिंपिक क्रीडा स्पर्धा स्पर्धांमध्ये खेळवला जात आहे.
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+
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+
तिरंदाजी •
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+
अॅथलेटिक्स •
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| 5 |
+
बॅडमिंटन •
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| 6 |
+
बेसबॉल •
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| 7 |
+
बास्केटबॉल •
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| 8 |
+
बीच व्हॉलीबॉल •
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| 9 |
+
बॉक्सिंग •
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| 10 |
+
कनूइंग •
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| 11 |
+
सायकलिंग •
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| 12 |
+
डायव्हिंग •
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| 13 |
+
इकेस्ट्रियन •
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| 14 |
+
हॉकी •
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| 15 |
+
तलवारबाजी •
|
| 16 |
+
फुटबॉल •
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| 17 |
+
जिम्नॅस्टिक्स •
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| 18 |
+
हँडबॉल •
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| 19 |
+
ज्युदो •
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| 20 |
+
मॉडर्न पेंटॅथलॉन •
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| 21 |
+
रोइंग •
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| 22 |
+
सेलिंग •
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| 23 |
+
नेमबाजी •
|
| 24 |
+
सॉफ्टबॉल •
|
| 25 |
+
जलतरण •
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| 26 |
+
तालबद्ध जलतरण •
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| 27 |
+
टेबल टेनिस •
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| 28 |
+
ताईक्वांदो •
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| 29 |
+
टेनिस •
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| 30 |
+
ट्रायथलॉन •
|
| 31 |
+
व्हॉलीबॉल •
|
| 32 |
+
वॉटर पोलो •
|
| 33 |
+
वेटलिफ्टिंग •
|
| 34 |
+
कुस्ती
|
| 35 |
+
आल्पाइन स्कीइंग •
|
| 36 |
+
बायॅथलॉन •
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| 37 |
+
बॉबस्ले •
|
| 38 |
+
क्रॉस कंट्री स्कीइंग •
|
| 39 |
+
कर्लिंग •
|
| 40 |
+
फिगर स्केटिंग •
|
| 41 |
+
फ्रीस्टाईल स्कीइंग •
|
| 42 |
+
आइस हॉकी •
|
| 43 |
+
लुज •
|
| 44 |
+
नॉर्डिक सामायिक •
|
| 45 |
+
शॉर्ट ट्रॅक स्पीड स्केटिंग •
|
| 46 |
+
स्केलेटन •
|
| 47 |
+
स्की जंपिंग •
|
| 48 |
+
स्नोबोर्डिंग •
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| 49 |
+
स्पीड स्केटिंग
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| 50 |
+
बास्क पेलोटा •
|
| 51 |
+
क्रिकेट •
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| 52 |
+
क्रोके •
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| 53 |
+
गोल्फ •
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| 54 |
+
जु दे पौमे •
|
| 55 |
+
लॅक्रॉस •
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| 56 |
+
पोलो •
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| 57 |
+
रॅकेट्स •
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| 58 |
+
रोक •
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| 59 |
+
रग्बी युनियन •
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| 60 |
+
रस्सीखेच •
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+
वॉटर मोटोस्पोर्ट्स
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केन्या राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने ३१ ऑक्टोबर ते २ नोव्हेंबर २००८ या कालावधीत दक्षिण आफ्रिकेचा दौरा केला. त्यांनी दक्षिण आफ्रिकेविरुद्ध दोन एकदिवसीय सामने खेळले.
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केन्या राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने २००८ मध्ये नेदरलँड्सचा दौरा केला होता. त्यांनी नेदरलँड्सविरुद्ध एक प्रथम श्रेणी सामना आणि एक एकदिवसीय सामना खेळला.
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२००७ केन्या ट्वेंटी२० चौरंगी मालिका ही १ ते ४ सप्टेंबर २००७ या कालावधीत केन्या येथे आयोजित ट्वेंटी२० आंतरराष्ट्रीय (टी२०आ) क्रिकेट स्पर्धा होती. बांगलादेश, केन्या, पाकिस्तान आणि युगांडा हे चार सहभागी संघ होते (युगांडाचे सामने टी२०आ सामने म्हणून वर्ग केले गेले नाहीत कारण संघाला असा दर्जा नव्हता). हे सर्व सामने नैरोबीच्या जिमखाना क्लब मैदानावर खेळवण्यात आले.[१]
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बांगलादेश, केन्या आणि पाकिस्तानसाठी, ही स्पर्धा सप्टेंबरच्या शेवटी होणाऱ्या आयसीसी विश्व ट्वेंटी२० कपासाठी सरावाची होती.[२]
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केनेडियन डॉलर हे इ.स. १८५८पासूनचे कॅनडाचे अधिकृत चलन आहे.
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ओटेरो काउंटी ही अमेरिकेच्या कॉलोराडो राज्यातील ६४ काउंटीपैकी एक आहे. २०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या १८,६९० होती.[१] या काउंटीचे प्रशासकीय केन्द्र ला हंटा येथे आहे .[२] ओटेरो काउंटीलाला हंटा शहराच्या स्थापकांपैकी एक मिगेल अँटोनियो ओटेरोचे नाव देण्यात आले आहे.
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साचा:Infobox academic
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केनेथ रॉय नॉर्मन एफबीए (१९२५-२०२०) [1] हे ब्रिटिश भाषाशास्त्रज्ञ होते. ते केंब्रिज विद्यापीठाचे भारतीय प्राध्यपक होते, [4] आणि पाली आणि इतर मध्य इंडो-आर्यन भाषांचे प्रमुख अधिकारी होते.
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केनेथ सेसिल केन जेम्स (१२ मार्च, १९०४:वेलिंग्टन, न्यू झीलंड - २१ ऑगस्ट, १९७६:वेलिंग्टन, न्यू झीलंड) हा न्यूझीलंडकडून १९३० ते १९३३ दरम्यान ११ कसोटी सामने खेळलेला क्रिकेट खेळाडू होता.
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ओटो काउंटी, नेब्रास्का ही अमेरिकेच्या नेब्रास्का राज्यातील ९३ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र येथे आहे.
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२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या इतकी होती.
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केन्द्रीकृत बँकिंग प्रणाली ही एकाच ठिकाणी असलेल्या केन्द्रीय संगणकाद्वारे चालविलेली बँकिंग प्रणाली आहे.
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यात बँकेच्या सर्व शाखा एका केंद्रीय संगणकाला जोडल्या जातात. सर्व ग्राहकांची माहिती या केंद्रीय संगणकात साठवलेली असते. त्यामुळे बँकेचा ग्राहक कुठल्याही शाखेत गेला तरी त्याच्या खात्याची माहिती उपलब्ध होते. ग्राहक आपली बँकेची कामे कुठल्याशी शाखेतून करू शकतो. संगणकीकृत केंद्रीय प्रणालीमुळे वेळेची बचत, त्वरित व्यवहार, व्यवहाराची अचूकता अशा अनेक गोष्टी साध्य झाल्या आहेत. या प्रणालीमुळे बँकेच्या अंतर्गत व्यवहारांचे प्रमाणीकरण शक्य होते.
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इन्फोसिसची फिनॅकल, ओरॅकलची फ्लेक्सक्यूब, टीसीएसची बँक्स, तेमेनोसची टी२४ हे केंद्रीकृत संगणक प्रणालींचे नमुने आहेत.
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अफगाणिस्तान आणि केन्या राष्ट्रीय क्रिकेट संघाने ३० सप्टेंबर २०१३ ते ९ ऑक्टोबर २०१३ या कालावधीत संयुक्त अरब अमिराती दौरा केला. या दौऱ्यात आयसीसी इंटरकॉन्टिनेंटल कपमधील एक सामना, आयसीसी वर्ल्ड क्रिकेट लीग चॅम्पियनशिपचे दोन एकदिवसीय सामने आणि दोन ट्वेंटी-२० आंतरराष्ट्रीय सामन्यांचा समावेश होता.
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केन्या एरवेझ (इंग्लिश: Kenya Airways) ही आफ्रिकेच्या केन्या देशाची राष्ट्रीय विमान वाहतूक कंपनी आहे. १९७७ साली स्थापन झालेल्या केन्या एरवेझचे मुख्यालय नैरोबी येथे असून तिचा मुख्य वाहतूकतळ नैरोबीच्या जोमो केन्याटा आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर आहे. १९९६ साली खाजगीकरण झालेली केन्या एरवेझ ही आफ्रिकेमधील पहिलीच कंपनी होती.
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| 2 |
+
प्रिल १९९५पर्यंत कंपनीची संपूर्ण मालकी सरकारकडे होती. १९९६मध्ये तिचे खाजगीकरण करण्यात आले जी पहिली अशी आफ्रिकन कंपनी होती जिचे खाजगीकरण यशस्वी झाले. केन्या एरवेझ सध्या सार्वजनिक-खाजगी भागीदारी तत्त्वावर चालवली जाते. त्यामध्ये सगळ्यात जास्त हिस्सा केन्या सरकारचा (२९.८%) असून त्यानंतर केएलएमचा (२६.७३%) आहे. उरलेले शेअर्स इतर खाजगी मालकांचे आहेत. २०१० सालापासून केन्या एरवेझ स्कायटीम समूहाचा सदस्य आहे.
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| 3 |
+
जानेवारी २०१३ला केन्या एरवेझ सहारन क्षेत्रातील आघाडीची विमानवाहतूक कंपनी होती.[१] आफ्रिकन विमानकंपन्यांमध्ये आसन क्षमतेनुसार केन्या एरवेझचा चौथा क्रमांक लागत होता.[२] ही कंपनी जून २०१० मध्ये स्काय टीमची पूर्ण सभासद झाली तसेच १९७७ पासून ती आफ्रिकन एरलाईनची सभासद आहे.[३]
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| 4 |
+
केन्या एरवेझची स्थापना केन्या सरकारने २२ जानेवारी १९७७ मध्ये केली होती.[४] ४ फेब्रुवारी १९७७[१५] मध्ये ब्रिटिश मिडलॅंड एरवेझ कंपनीकडून दोन बोईंग ७०७ विमाने भाड्याने घेऊन नैरोबी-फ्रॅंकफर्ट-लंडन या मार्गे सेवेला प्रारंभ करण्यात आला.[१६] १९७७ च्या उत्तरार्धात ३ बोईंग ७०७ विमाने नॉर्थवेस्ट ओरीएंट कडून घेण्यात आली.[१९] पुढच्या वर्षी कंपनीने एक चार्टर उपकंपनी सुरू केली जी मुख्य कंपनीकडून भाड्याने विमाने घेऊन आंतरराष्ट्रीय प्रवासी तसेच मालाची वाहतूक करत होती.
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| 5 |
+
जुलै १९८०मध्ये कंपनीचे २,१०० कर्मचारी , ३ बोईंग ७०७ मध्ये, १ बोईंग ७२०, १ डीसी ९-३० आणि ३ फोक्कर एफ-२७ होते.
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| 6 |
+
१९८२मध्ये नैरोबी-मुंबई विना थांबा सेवा सुरू करण्यात आली.[५] एक वर्षानंतर कंपनीची टांझानियासाठीची सेवा सुरू झाली.
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| 7 |
+
१९८६मध्ये केन्याच्या सरकारने देशाच्या आर्थिक विकास आणि वृद्धीची गरज व्यक्त केली. त्यावेळी सरकारने कंपनीचे हित खाजगीकरण करण्यातच असल्याचे सूचित केले आणि कंपनीच्या खाजगीकरणाचा पहिला प्रयत्न करण्यात आला. १९९३-१९९४ च्या वर्षी व्यापारीकरणानंतर पहिल्यांदा कंपनीला नफ��� झाला.[३२] १९९४मध्ये आंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थेला खाजगीकरणाची प्रक्रिया सुरळीत पार पाडण्यासाठी नियुक्त करण्यात आले.[३३]
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| 8 |
+
जानेवारी २००० मध्ये, कंपनीने पहिला अपघात अनुभवला जेव्हा १९८६मध्ये नवीन विकत घेतलेले एरबस A३१० विमान अब्दिजानहून उड्डाण घेतल्यावर आयवरी कोस्ट येथे कोसळले.[६] २००० साली कंपनीचे २,७८० कर्मचारी होते. २००२ मध्ये अजून ३ बोईंग विमानांची ऑर्डर देण्यात आली. तसेच या प्रकारचे आणखी एक विमान नोव्हेंबर २००५मध्ये घेण्यात आले. मार्च २००६ मध्ये ६ बोईंग ७८७ विमाने घेण्यात आली.[४२]
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| 9 |
+
जून २०१२मध्ये आणखी पैसा उभा करण्यासाठी कंपनीने २० बिलियन केनियन शिलिंग एवढ्या मूल्याचे मालकी हक्क विक्रीसाठी उपलब्ध केले.[४४][४५][४६] यातून झालेल्या शेअर्स विभागणी नंतर केएलएमचा हिस्सा २६% वरून २६.७३% वर आला, तसेच केनियन सरकारचा हिस्सा २३% वरून २९.८% होऊन ते सगळ्यात मोठे हिस्सेदार झाले.[७]
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| 10 |
+
स्वस्त दराची सेवा देणारी जंबोजेट, जिची स्थापना २०१३ मध्ये झाली आणि आफ्रिकन कार्गो हॅंडलिंग लि. या केन्या एरवेझची संपूर्ण मालकी असलेल्या उपकंपन्या आहेत.
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| 11 |
+
इतर कंपन्या ज्यात केन्या एरवेझची हिस्सेदारी आहे त्यात केन्या एरफ्रेट हॅंडलिंग लि.(५१%) आणि टांझानिअन कॅरिअर प्रेसिजन एर (४१.२३%)चा समावेश होतो.[८]
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| 12 |
+
जुलै २०१६ नुसार, डेनिस अवोरी हे कंपनीचे चेरमन आहेत.
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| 13 |
+
जुलै २०१७ नुसार, सेबेस्टीअन मिकोझ हे कंपनीचे व्यवस्थापकीय संचालक तसेच मुख्य कार्यकारी अधिकारी आहेत. मिकोझ त्याआधी एलओटी पोलिश एरलाईनचे मुख्य कार्यकारी अधिकारी होते आणि त्यांनी १ जून २०१७ला येथील कारभार हाती घेतला.[९]
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| 14 |
+
एप्रिल २०१२मध्ये कंपनीने प्रोजेक्ट माविंगु नावाची योजना घोषित केली ज्यानुसार २०२१ पर्यंत २४ नवीन गंतव्यस्थाने सुरू करण्याचे उद्दिष्ट्य आहे.
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| 15 |
+
ऑक्टोबर २०१३ मध्ये कंपनीने दरवर्षी ६ नवीन मार्ग सुरू करणार असल्याचे घोषित केले.[१०]
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+
न्यू झीलंड देश १९०८ सालापासून सर्व उन्हाळी व १९५२ सालापासून सर्व हिवाळी ऑलिंपिक क्रीडा स्पर्धा (१९५६ व १९६४चा अपवाद वगळता) स्पर्धांमध्ये सहभागी झाला असून त्याने आजवर ८७ पदके जिंकली आहेत. १९०८ व १९१२ च्या उन्हाळी स्पर्धांमध्ये न्यू झीलंड ऑस्ट्रेलियासोबत ऑस्ट्रेलेशिया ह्या संघाचा भाग होता.
|
| 2 |
+
|
| 3 |
+
अल्जीरिया •
|
| 4 |
+
अँगोला •
|
| 5 |
+
बेनिन •
|
| 6 |
+
बोत्स्वाना •
|
| 7 |
+
बर्किना फासो •
|
| 8 |
+
बुरुंडी •
|
| 9 |
+
कामेरून •
|
| 10 |
+
केप व्हर्दे •
|
| 11 |
+
मध्य आफ्रिकेचे प्रजासत्ताक •
|
| 12 |
+
चाड •
|
| 13 |
+
कोमोरोस •
|
| 14 |
+
काँगो •
|
| 15 |
+
डीआर काँगो •
|
| 16 |
+
कोत द'ईवोआर •
|
| 17 |
+
जिबूती •
|
| 18 |
+
इजिप्त •
|
| 19 |
+
इक्वेटोरीयल गिनी •
|
| 20 |
+
इरिट्रिया •
|
| 21 |
+
इथियोपिया •
|
| 22 |
+
गॅबन •
|
| 23 |
+
गांबिया •
|
| 24 |
+
घाना •
|
| 25 |
+
गिनी •
|
| 26 |
+
गिनी-बिसाउ •
|
| 27 |
+
केनिया •
|
| 28 |
+
लेसोथो •
|
| 29 |
+
लायबेरिया •
|
| 30 |
+
लिबिया •
|
| 31 |
+
मादागास्कर •
|
| 32 |
+
मलावी •
|
| 33 |
+
माली •
|
| 34 |
+
मॉरिटानिया •
|
| 35 |
+
मॉरिशस •
|
| 36 |
+
मोरोक्को •
|
| 37 |
+
मोझांबिक •
|
| 38 |
+
नामिबिया •
|
| 39 |
+
नायजर •
|
| 40 |
+
नायजेरिया •
|
| 41 |
+
रवांडा •
|
| 42 |
+
साओ टोमे आणि प्रिन्सिप •
|
| 43 |
+
सेनेगल •
|
| 44 |
+
सेशेल्स •
|
| 45 |
+
सियेरा लिओन •
|
| 46 |
+
सोमालिया •
|
| 47 |
+
दक्षिण आफ्रिका •
|
| 48 |
+
सुदान •
|
| 49 |
+
स्वाझीलँड •
|
| 50 |
+
टांझानिया •
|
| 51 |
+
टोगो •
|
| 52 |
+
ट्युनिसिया •
|
| 53 |
+
युगांडा •
|
| 54 |
+
झांबिया •
|
| 55 |
+
झिंबाब्वे
|
| 56 |
+
अँटिगा आणि बार्बुडा •
|
| 57 |
+
आर्जेन्टीना •
|
| 58 |
+
अरुबा •
|
| 59 |
+
बहामा •
|
| 60 |
+
बार्बाडोस •
|
| 61 |
+
बेलिझ •
|
| 62 |
+
बर्म्युडा •
|
| 63 |
+
बोलिव्हिया •
|
| 64 |
+
ब्राझील •
|
| 65 |
+
ब्रिटिश व्हर्जिन आयलँड्स •
|
| 66 |
+
कॅनडा •
|
| 67 |
+
केमन द्वीपसमूह •
|
| 68 |
+
चिली •
|
| 69 |
+
कोलंबिया •
|
| 70 |
+
कोस्टा रिका •
|
| 71 |
+
क्युबा •
|
| 72 |
+
डॉमिनिका •
|
| 73 |
+
डॉमिनिकन प्रजासत्ताक •
|
| 74 |
+
इक्वेडर •
|
| 75 |
+
एल साल्वाडोर •
|
| 76 |
+
ग्रेनाडा •
|
| 77 |
+
ग्वाटेमाला •
|
| 78 |
+
गयाना •
|
| 79 |
+
हैती •
|
| 80 |
+
होन्डुरास •
|
| 81 |
+
जमैका •
|
| 82 |
+
मेक्सिको •
|
| 83 |
+
नेदरलँड्स •
|
| 84 |
+
निकाराग्वा •
|
| 85 |
+
पनामा •
|
| 86 |
+
पेराग्वे •
|
| 87 |
+
पेरू •
|
| 88 |
+
पोर्तो रिको •
|
| 89 |
+
सेंट किट्टस आणि नेव्हिस •
|
| 90 |
+
सेंट लुसिया •
|
| 91 |
+
सेंट व्हिंसेंट आणि ग्रेनेडिन्स •
|
| 92 |
+
सुरिनाम •
|
| 93 |
+
त्रिनिदाद-टोबॅगो •
|
| 94 |
+
अमेरिका •
|
| 95 |
+
उरुग्वे •
|
| 96 |
+
व्हेनेझुएला •
|
| 97 |
+
व्हर्जिन आयलँड्स •
|
| 98 |
+
ऐतिहासिक: ब्रिटिश वेस्ट इंडीझ
|
| 99 |
+
अफगाणिस्तान •
|
| 100 |
+
इस्रायल •
|
| 101 |
+
बहारिन •
|
| 102 |
+
बांग्लादेश •
|
| 103 |
+
भूतान •
|
| 104 |
+
ब्रुनेई •
|
| 105 |
+
कंबोडिया •
|
| 106 |
+
चीन •
|
| 107 |
+
चिनी ताइपेइ •
|
| 108 |
+
हाँग काँग •
|
| 109 |
+
भारत •
|
| 110 |
+
इंडोनेशिया •
|
| 111 |
+
इराण •
|
| 112 |
+
इराक •
|
| 113 |
+
जपान •
|
| 114 |
+
जॉर्डन •
|
| 115 |
+
कझाकस्तान •
|
| 116 |
+
उत्तर कोरिया •
|
| 117 |
+
दक्षिण कोरिया •
|
| 118 |
+
कुवैत •
|
| 119 |
+
किर्गिझिस्तान •
|
| 120 |
+
लाओस •
|
| 121 |
+
लेबेनॉन •
|
| 122 |
+
मलेशिया •
|
| 123 |
+
मालदीव •
|
| 124 |
+
मंगोलिया •
|
| 125 |
+
म्यानमार •
|
| 126 |
+
नेपाळ •
|
| 127 |
+
ओमान •
|
| 128 |
+
पाकिस्तान •
|
| 129 |
+
पॅलेस्टाइन •
|
| 130 |
+
फिलिपाइन्स •
|
| 131 |
+
कत���र •
|
| 132 |
+
सौदी अरेबिया •
|
| 133 |
+
सिंगापूर •
|
| 134 |
+
श्रीलंका •
|
| 135 |
+
सिरिया •
|
| 136 |
+
ताजिकिस्तान •
|
| 137 |
+
थायलंड •
|
| 138 |
+
पूर्व तिमोर •
|
| 139 |
+
तुर्कमेनिस्तान •
|
| 140 |
+
संयुक्त अरब अमिराती •
|
| 141 |
+
उझबेकिस्तान •
|
| 142 |
+
व्हियेतनाम •
|
| 143 |
+
येमेन •
|
| 144 |
+
ऐतिहासिक: उत्तर बोमियो
|
| 145 |
+
आल्बेनिया •
|
| 146 |
+
आंदोरा •
|
| 147 |
+
आर्मेनिया •
|
| 148 |
+
ऑस्ट्रिया •
|
| 149 |
+
अझरबैजान •
|
| 150 |
+
बेलारूस •
|
| 151 |
+
बेल्जियम •
|
| 152 |
+
बॉस्निया आणि हर्झगोव्हिना •
|
| 153 |
+
बल्गेरिया •
|
| 154 |
+
क्रोएशिया •
|
| 155 |
+
सायप्रस •
|
| 156 |
+
चेक प्रजासत्ताक •
|
| 157 |
+
डेन्मार्क •
|
| 158 |
+
एस्टोनिया •
|
| 159 |
+
फिनलंड •
|
| 160 |
+
फ्रान्स •
|
| 161 |
+
जॉर्जिया •
|
| 162 |
+
जर्मनी •
|
| 163 |
+
ग्रेट ब्रिटन •
|
| 164 |
+
ग्रीस •
|
| 165 |
+
हंगेरी •
|
| 166 |
+
आइसलँड •
|
| 167 |
+
आयर्लँड •
|
| 168 |
+
इटली •
|
| 169 |
+
लात्विया •
|
| 170 |
+
लिश्टनस्टाइन •
|
| 171 |
+
लिथुएनिया •
|
| 172 |
+
लक्झेंबर्ग •
|
| 173 |
+
मॅसिडोनिया •
|
| 174 |
+
माल्टा •
|
| 175 |
+
मोल्दोव्हा •
|
| 176 |
+
मोनॅको •
|
| 177 |
+
माँटेनिग्रो •
|
| 178 |
+
नेदरलँड्स •
|
| 179 |
+
नॉर्वे •
|
| 180 |
+
पोलंड •
|
| 181 |
+
पोर्तुगाल •
|
| 182 |
+
रोमेनिया •
|
| 183 |
+
रशिया •
|
| 184 |
+
सान मरिनो •
|
| 185 |
+
सर्बिया •
|
| 186 |
+
स्लोव्हाकिया •
|
| 187 |
+
स्लोव्हेनिया •
|
| 188 |
+
स्पेन •
|
| 189 |
+
स्वीडन •
|
| 190 |
+
स्वित्झर्लंड •
|
| 191 |
+
तुर्कस्तान •
|
| 192 |
+
युक्रेन •
|
| 193 |
+
ऐतिहासिक: बोहेमिया •
|
| 194 |
+
चेकोस्लोव्हाकिया •
|
| 195 |
+
पूर्व जर्मनी •
|
| 196 |
+
सार •
|
| 197 |
+
सोव्हियेत संघ •
|
| 198 |
+
युगोस्लाव्हिया
|
| 199 |
+
अमेरिकन सामोआ •
|
| 200 |
+
ऑस्ट्रेलिया •
|
| 201 |
+
कूक द्वीपसमूह •
|
| 202 |
+
फिजी •
|
| 203 |
+
गुआम •
|
| 204 |
+
किरिबाटी •
|
| 205 |
+
मायक्रोनेशिया •
|
| 206 |
+
नौरू •
|
| 207 |
+
न्यू झीलंड •
|
| 208 |
+
पलाउ •
|
| 209 |
+
पापुआ न्यू गिनी •
|
| 210 |
+
सामोआ •
|
| 211 |
+
सॉलोमन द्वीपसमूह •
|
| 212 |
+
टोंगा •
|
| 213 |
+
व्हानुआतू •
|
| 214 |
+
ऐतिहासिक: ऑस्ट्रेलेशिया
|
dataset/scraper_2/batch_2/wiki_s2_10101.txt
ADDED
|
@@ -0,0 +1,79 @@
|
|
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|
|
|
|
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| 1 |
+
लिस्ट अ आणि टी२०आ किट
|
| 2 |
+
केन्या क्रिकेट संघ हा आफ्रिकेतील केन्या देशाचा राष्ट्रीय क्रिकेट संघ आहे. इ.स. १९८१ पासून आय.सी.सी.चा असोसिएट सदस्य असलेल्या केन्याने २००३ क्रिकेट विश्वचषक स्पर्धेत उपांत्य फेरीमध्ये धडक मारून सर्व क्रिकेट जगताला चकित केले होते. २००७ व २०११ सालच्या विश्वचषक स्पर्धांमध्ये पहिल्याच फेरीत पराभूत झालेल्या केन्याला २०१५ स्पर्धेत पात्रता मिळवण्यात अपयश आले. इ.स. २०१४ साली केन्याचा कसोटी क्रिकेट खेळण्याचा दर्जा काढून टाकण्यात आला.
|
| 3 |
+
ऑस्ट्रेलिया · इंग्लंड · दक्षिण आफ्रिका · भारत · न्यू झीलंड · वेस्ट इंडीज · पाकिस्तान · श्रीलंका · झिम्बाब्वे · बांगलादेश · अफगानिस्तान · आयर्लंड
|
| 4 |
+
बर्म्युडा · कॅनडा · केन्या · नेदरलँड्स · स्कॉटलंड
|
| 5 |
+
आर्जेन्टीना ·
|
| 6 |
+
डेन्मार्क ·
|
| 7 |
+
नामिबियन ·
|
| 8 |
+
युगांडा ·
|
| 9 |
+
बेल्जियम · बोत्स्वाना · केमॅन आयलंड · फिजी · फ्रांस · जर्मनी · जिब्राल्टर · हॉंगकॉंग · इस्त्राईल · इटली · जपान · कुवैत · मलेशिया · नेपाळ · नायजेरिया · पापुआ न्यू गिनी · सिंगापूर · टांझानिया · थायलंड · संयुक्त अरब अमीरात · अमेरिका · झांबिया
|
| 10 |
+
ऑस्ट्रीया ·
|
| 11 |
+
बहामास ·
|
| 12 |
+
बहरैन ·
|
| 13 |
+
बेलिझ ·
|
| 14 |
+
भुतान ·
|
| 15 |
+
ब्राझिल ·
|
| 16 |
+
ब्रुनै ·
|
| 17 |
+
चिली ·
|
| 18 |
+
चीन ·
|
| 19 |
+
कूक आयलंड ·
|
| 20 |
+
कोस्टा रिका ·
|
| 21 |
+
क्रोएशिया ·
|
| 22 |
+
क्युबा ·
|
| 23 |
+
सायप्रस ·
|
| 24 |
+
झेक प्रजासत्ताक ·
|
| 25 |
+
फ़िनलंड ·
|
| 26 |
+
गांबिया ·
|
| 27 |
+
घाना ·
|
| 28 |
+
ग्रीस ·
|
| 29 |
+
गुर्नसी ·
|
| 30 |
+
इंडोनेशिया ·
|
| 31 |
+
इराण ·
|
| 32 |
+
आइल ऑफ मान ·
|
| 33 |
+
जर्सी ·
|
| 34 |
+
लेसोथो ·
|
| 35 |
+
लक्झेंबर्ग ·
|
| 36 |
+
मलावी ·
|
| 37 |
+
मालदीव ·
|
| 38 |
+
माली ·
|
| 39 |
+
माल्टा ·
|
| 40 |
+
मेक्सिको ·
|
| 41 |
+
मोरोक्को ·
|
| 42 |
+
मोझांबिक ·
|
| 43 |
+
म्यानमार ·
|
| 44 |
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नॉर्वे ·
|
| 45 |
+
ओमान ·
|
| 46 |
+
पनामा ·
|
| 47 |
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फिलिपाईन्स ·
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| 48 |
+
पोर्तुगाल ·
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| 49 |
+
र्वांडा ·
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| 50 |
+
कतार ·
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| 51 |
+
सामोआ ·
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| 52 |
+
सौदी अरब ·
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| 53 |
+
सियेरा लिओन ·
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| 54 |
+
स्लोव्हेनिया ·
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| 55 |
+
दक्षिण कोरिया ·
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| 56 |
+
स्पेन ·
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| 57 |
+
सेंट हेलन ·
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| 58 |
+
सुरिनम ·
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| 59 |
+
स्विडन ·
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| 60 |
+
स्विझर्लंड ·
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| 61 |
+
टोंगा ·
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| 62 |
+
तुर्क आणि कैकोस द्विपे ·
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| 63 |
+
वनुतु ·
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| 64 |
+
पूर्व आफ्रिका ·
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| 65 |
+
पूर्व आणि मध्य आफ्रिका ·
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| 66 |
+
पश्चिम आफ्रिका
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| 67 |
+
बेलारूस ·
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| 68 |
+
बल्गेरिया ·
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| 69 |
+
एस्टोनिया ·
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| 70 |
+
आइसलँड ·
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| 71 |
+
लात्व्हिया ·
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| 72 |
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न्यू कॅलिडोनिया ·
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| 73 |
+
पोलंड ·
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| 74 |
+
रशिया ·
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| 75 |
+
स्लोव्हेकिया ·
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तुर्कस्तान ·
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युक्रेन ·
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उरुग्वे
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चुका उधृत करा: "lower-alpha" नावाच्या गटाकरिता <ref>खूणपताका उपलब्ध आहेत, पण संबंधीत <references group="lower-alpha"/> खूण मिळाली नाही.
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केन्याने फेब्रुवारी आणि मार्च २००६ मध्ये पाच एकदिवसीय सामन्यांच्या मालिकेसाठी झिम्बाब्वेचा दौरा केला. या दौऱ्यापूर्वी, २००३ विश्वचषकाच्या उपांत्य फेरीपर्यंत पोहोचल्यापासून केन्याने फक्त पाच एकदिवसीय सामने खेळले होते, जे सर्व ते हरले होते. २००७ च्या विश्वचषकापूर्वी ते अधिक आंतरराष्ट्रीय अनुभव घेण्यास उत्सुक होते. झिम्बाब्वेला त्या देशातील सततच्या राजकीय संकटांदरम्यान खेळाडूंच्या विवादांची मालिका आणि खराब निकालांचा सामना करावा लागला, ज्यामुळे त्यांना कसोटी क्रिकेटमधून स्वतः ला निलंबित करण्यात आले.[१]
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मालिका २-२ ने बरोबरीत संपली आणि एक सामना रद्द झाला.[२] केन्याने यापूर्वी कधीही एकदिवसीय आंतरराष्ट्रीय मालिका ड्रॉ किंवा जिंकली नव्हती.
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२००७ केन्या ट्वेंटी२० चौरंगी मालिका ही १ ते ४ सप्टेंबर २००७ या कालावधीत केन्या येथे आयोजित ट्वेंटी२० आंतरराष्ट्रीय (टी२०आ) क्रिकेट स्पर्धा होती. बांगलादेश, केन्या, पाकिस्तान आणि युगांडा हे चार सहभागी संघ होते (युगांडाचे सामने टी२०आ सामने म्हणून वर्ग केले गेले नाहीत कारण संघाला असा दर्जा नव्हता). हे सर्व सामने नैरोबीच्या जिमखाना क्लब मैदानावर खेळवण्यात आले.[१]
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+
बांगलादेश, केन्या आणि पाकिस्तानसाठी, ही स्पर्धा सप्टेंबरच्या शेवटी होणाऱ्या आयसीसी विश्व ट्वेंटी२० कपासाठी सरावाची होती.[२]
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लिस्ट अ आणि टी२०आ किट
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| 2 |
+
केन्या क्रिकेट संघ हा आफ्रिकेतील केन्या देशाचा राष्ट्रीय क्रिकेट संघ आहे. इ.स. १९८१ पासून आय.सी.सी.चा असोसिएट सदस्य असलेल्या केन्याने २००३ क्रिकेट विश्वचषक स्पर्धेत उपांत्य फेरीमध्ये धडक मारून सर्व क्रिकेट जगताला चकित केले होते. २००७ व २०११ सालच्या विश्वचषक स्पर्धांमध्ये पहिल्याच फेरीत पराभूत झालेल्या केन्याला २०१५ स्पर्धेत पात्रता मिळवण्यात अपयश आले. इ.स. २०१४ साली केन्याचा कसोटी क्रिकेट खेळण्याचा दर्जा काढून टाकण्यात आला.
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| 3 |
+
ऑस्ट्रेलिया · इंग्लंड · दक्षिण आफ्रिका · भारत · न्यू झीलंड · वेस्ट इंडीज · पाकिस्तान · श्रीलंका · झिम्बाब्वे · बांगलादेश · अफगानिस्तान · आयर्लंड
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| 4 |
+
बर्म्युडा · कॅनडा · केन्या · नेदरलँड्स · स्कॉटलंड
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| 5 |
+
आर्जेन्टीना ·
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| 6 |
+
डेन्मार्क ·
|
| 7 |
+
नामिबियन ·
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| 8 |
+
युगांडा ·
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| 9 |
+
बेल्जियम · बोत्स्वाना · केमॅन आयलंड · फिजी · फ्रांस · जर्मनी · जिब्राल्टर · हॉंगकॉंग · इस्त्राईल · इटली · जपान · कुवैत · मलेशिया · नेपाळ · नायजेरिया · पापुआ न्यू गिनी · सिंगापूर · टांझानिया · थायलंड · संयुक्त अरब अमीरात · अमेरिका · झांबिया
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| 10 |
+
ऑस्ट्रीया ·
|
| 11 |
+
बहामास ·
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| 12 |
+
बहरैन ·
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| 13 |
+
बेलिझ ·
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| 14 |
+
भुतान ·
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| 15 |
+
ब्राझिल ·
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| 16 |
+
ब्रुनै ·
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| 17 |
+
चिली ·
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| 18 |
+
चीन ·
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| 19 |
+
कूक आयलंड ·
|
| 20 |
+
कोस्टा रिका ·
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| 21 |
+
क्रोएशिया ·
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| 22 |
+
क्युबा ·
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| 23 |
+
सायप्रस ·
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| 24 |
+
झेक प्रजासत्ताक ·
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| 25 |
+
फ़िनलंड ·
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| 26 |
+
गांबिया ·
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| 27 |
+
घाना ·
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| 28 |
+
ग्रीस ·
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| 29 |
+
गुर्नसी ·
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| 30 |
+
इंडोनेशिया ·
|
| 31 |
+
इराण ·
|
| 32 |
+
आइल ऑफ मान ·
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| 33 |
+
जर्सी ·
|
| 34 |
+
लेसोथो ·
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| 35 |
+
लक्झेंबर्ग ·
|
| 36 |
+
मलावी ·
|
| 37 |
+
मालदीव ·
|
| 38 |
+
माली ·
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| 39 |
+
माल्टा ·
|
| 40 |
+
मेक्सिको ·
|
| 41 |
+
मोरोक्को ·
|
| 42 |
+
मोझांबिक ·
|
| 43 |
+
म्यानमार ·
|
| 44 |
+
नॉर्वे ·
|
| 45 |
+
ओमान ·
|
| 46 |
+
पनामा ·
|
| 47 |
+
फिलिपाईन्स ·
|
| 48 |
+
पोर्तुगाल ·
|
| 49 |
+
र्वांडा ·
|
| 50 |
+
कतार ·
|
| 51 |
+
सामोआ ·
|
| 52 |
+
सौदी अरब ·
|
| 53 |
+
सियेरा लिओन ·
|
| 54 |
+
स्लोव्हेनिया ·
|
| 55 |
+
दक्षिण कोरिया ·
|
| 56 |
+
स्पेन ·
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| 57 |
+
सेंट हेलन ·
|
| 58 |
+
सुरिनम ·
|
| 59 |
+
स्विडन ·
|
| 60 |
+
स्विझर्लंड ·
|
| 61 |
+
टोंगा ·
|
| 62 |
+
तुर्क आणि कैकोस द्विपे ·
|
| 63 |
+
वनुतु ·
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| 64 |
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पूर्व आफ्रिका ·
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| 65 |
+
पूर्व आणि मध्य आफ्रिका ·
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| 66 |
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पश्चिम आफ्रिका
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| 67 |
+
बेलारूस ·
|
| 68 |
+
बल्गेरिया ·
|
| 69 |
+
एस्टोनिया ·
|
| 70 |
+
आइसलँड ·
|
| 71 |
+
लात्व्हिया ·
|
| 72 |
+
न्यू कॅलिडोनिया ·
|
| 73 |
+
पोलंड ·
|
| 74 |
+
रशिया ·
|
| 75 |
+
स्लोव्हेकिया ·
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| 76 |
+
तुर्कस्तान ·
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| 77 |
+
युक्रेन ·
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| 78 |
+
उरुग्वे
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| 79 |
+
चुका उधृत करा: "lower-alpha" नावाच्या गटाकरिता <ref>खूणपताका उपलब्ध आहेत, पण संबंधीत <references group="lower-alpha"/> खूण मिळाली नाही.
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केप जिरार्दू काउंटी, मिसूरी ही अमेरिकेच्या मिसूरी राज्यातील ११४ पैकी एक काउंटी आहे. याचे प्रशासकीय केन्द्र येथे आहे.
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+
२०२० च्या जनगणनेनुसार येथील लोकसंख्या इतकी होती.
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+
केप जिरार्दू काउंटी, मिसूरी काउंटीची रचना रोजी झाली. या काउंटीला यांचे नाव दिलेले आहे.
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केप टाउन स्टेडियम (आफ्रिकान्स: Kaapstad-stadion; कौसा: Inkundla yezemidlalo yaseKapa) हे दक्षिण आफ्रिका देशाच्या केप टाउन शहरामधील एक फुटबॉल स्टेडियम आहे. डिसेंबर २००९ मध्ये खुले करण्यात आलेले व ६४,००० आसनक्षमता असलेले हे स्टेडियम २०१० फिफा विश्वचषकासाठी वापरले गेले.
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केप टाउन मैदान (केप टाउन) •
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इलिस पार्क मैदान (जोहान्सबर्ग) •
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फ्री स्टेट मैदान (ब्लूमफाँटेन) •
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लोफ्टस वर्सफेल्ड मैदान (प्रिटोरिया) •
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बोंबेला मैदान (नेल्सप्रुइट) •
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मोझेस मभिंदा मैदान (दर्बान) •
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नेल्सन मंडेला बे मैदान (पोर्ट एलिझाबेथ) •
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+
पीटर मोकाबा मैदान (पोलोक्वाने) •
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रॉयल बफोकेंग मैदान (रुस्टेनबर्ग) •
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सॉकर सिटी (जोहान्सबर्ग)
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२५ जानेवारी, इ.स. २००६
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दुवा: Cricinfo (इंग्लिश मजकूर)
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खालील यादी केमन द्वीपसमूह क्रिकेट संघाने आतापर्यंत खेळलेल्या सर्व अधिकृत आंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय सामन्यांची आहे. केमन द्वीपसमूहने १८ ऑगस्ट २०१९ रोजी कॅनडा विरुद्ध पहिला आंतरराष्ट्रीय ट्वेंटी२० सामना खेळला.
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केमापूर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील परभणी जिल्ह्यातील सेलू तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान उष्ण व कोरडे आहे.येथे नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी मध्य हा हिवाळा हंगाम असतो. हिवाळ्यात दिवसा तापमान २९ सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान १५ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते. जून मध्य ते ऑक्टोबर हा पावसाळा हंगाम असतो.पावसाळ्यात दिवसा तापमान ३१ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २३ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते. पावसाळ्यात मध्यम प्रमाणात पाऊस पडतो.वार्षिक पर्जन्यमान ५५५ मिमी असते. फेब्रुवारी मध्य ते जून मध्य हा उन्हाळा मोसम असतो. उन्हाळ्यात दिवसा तापमान ४१ अंश सेल्सियस पर्यंत वाढते आणि रात्री तापमान २७ अंश सेल्सियस पर्यंत खाली जाते.
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ऑट्टो पहिला (२३ नोव्हेंबर ९१२ - मृत्यु: ७ मे ९७३ ) पारंपारिकरित्या ज्यास 'महान ऑट्टो पहिला' म्हणून ओळखल्या जात असे,हा सन ९३६ पासून असलेला एक जर्मन सम्राट होता. २ फेब्रुवारी, इ.स. ९६२ ते मृत्युपर्यंत, तो पवित्र रोमन राज्याचा सम्राट होता.तो हेन्री पहिला याचा ज्येष्ठ पुत्र होता.त्याचे वडिलांचा सन ९३६ मध्ये मृत्यु झाल्यावर, सॅक्सनीची डची व जर्मनीचे राज्य त्याला वारश्याने मिळाले.त्याने त्याच्या वडिलांचे, सर्व जर्मन जमातींना एकत्र करून एक राज्य बनविण्याचे काम पुढे सुरू ठेवले. त्याने मोठ्या घराण्यातील लोकांचे खर्चाने,राजाचे अधिकार फारच वाढविलेत.
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केयरटेकर ही स्टार ट्रेक कथानाकातील एक काल्पनिक पात्र आहे. played by Basil Langton.
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केरळ उच्च न्यायालय हे केरळ राज्य आणि केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीपमधील एक उच्च न्यायालय आहे. ते कोची येथे असून भारतीय राज्यघटनेच्या अनुच्छेद २२६ अन्वये आपले अधिकार वापरते.
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+
सध्या केरळ उच्च न्यायालयाचे मंजूर न्यायाधीश संख्या मुख्य न्यायाधीश आणि 12 अतिरिक्त न्यायाधीशांसह 35 स्थायी न्यायाधीश आहेत. निर्णय घेण्याच्या प्रश्नाचे महत्त्व आणि स्वरूप यावर अवलंबून, न्यायाधीश एकल (एक न्यायाधीश), विभागीय (दोन न्यायाधीश), पूर्ण (तीन न्यायाधीश) किंवा अशा मोठ्या ताकदीचे इतर खंडपीठ म्हणून बसतात.
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आता केरळ उच्च न्यायालयाच्या नवीन बहुमजली इमारतीची पायाभरणी 14 मार्च 1994 रोजी भारताचे तत्कालीन सरन्यायाधीश एम. एन. व्यंकटचलिया यांच्या हस्ते करण्यात आली. बांधकामाचा अंदाजे खर्च 10 कोटी रुपये होता. बांधकाम 2005 मध्ये 85 कोटी रुपयाच्या खर्चाने पूर्ण झाले. पूर्ण झालेल्या उच्च न्यायालयाच्या इमारतीचे उद्घाटन भारताचे सरन्यायाधीश न्यायमूर्ती वाय.के. सभरवाल यांच्या हस्ते 11 फेब्रुवारी 2006 रोजी करण्यात आले. नवीन उच्च न्यायालयाची इमारत व्हिडिओ कॉन्फरन्सिंग, वातानुकूलित कोर्टरूम, इंटरनेट, ऑर्डरच्या प्रती पुनर्प्राप्त करण्यासाठी आणि प्रकाशनाच्या सुविधांसारख्या आधुनिक सुविधांनी सुसज्ज आहे. ही इमारत 5 एकर (20,000 m2) जमिनीवर बांधली गेली आहे आणि तिचे नऊ मजल्यांवर 550,000 चौरस फूट (51,000 m2) क्षेत्रफळ आहे. इमारतीमध्ये पोस्ट ऑफिस, बँक, मेडिकल क्लिनिक, लायब्ररी, कॅन्टीन आणि अशा इतर अत्यंत आवश्यक सुविधा आणि सेवा आहेत. केरळचे उच्च न्यायालय त्याच्या उद्घाटनाच्या तारखेपासून त्याच्या नवीन इमारतीत, शेजारच्या राजवाड्यातून, जिथे ते कार्यरत होते, तिथे गेले आहे.
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केरळ काँग्रेस (मणी) किंवा केरळ काँग्रेस मणि ग्रुप किंवा केरळ काँग्रेस (म) हा भारताच्या केरळ राज्यातील एक राज्यस्तरीय राजकीय पक्ष आहे. केरळ काँग्रेसमधून फुटल्यानंतर १९७९ मध्ये के.एम. मणी यांनी त्याची स्थापना केली होती. त्यांचे पुत्र जोस के. मणी हे पक्षाचे सध्याचे अध्यक्ष आहेत. हा पक्ष ऑक्टोबर २०२० पासून डाव्या लोकशाही आघाडीचा (LDF) भाग आहे.[१][२]
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केरळ काँग्रेस (मणी) किंवा केरळ काँग्रेस मणि ग्रुप किंवा केरळ काँग्रेस (म) हा भारताच्या केरळ राज्यातील एक राज्यस्तरीय राजकीय पक्ष आहे. केरळ काँग्रेसमधून फुटल्यानंतर १९७९ मध्ये के.एम. मणी यांनी त्याची स्थापना केली होती. त्यांचे पुत्र जोस के. मणी हे पक्षाचे सध्याचे अध्यक्ष आहेत. हा पक्ष ऑक्टोबर २०२० पासून डाव्या लोकशाही आघाडीचा (LDF) भाग आहे.[१][२]
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केरावा राष्ट्रीय क्रिकेट मैदान हे फिनलंडच्या केरावा शहरातील एक मैदान आहे.
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१७ ऑगस्ट २०१९ रोजी फिनलंड आणि स्पेन या दोन संघांमध्ये या मैदानावरचा पहिला आंतरराष्ट्रीय ट्वेंटी२० सामना खेळवला गेला.
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करिया तथा केरिया हे प्राचीन तुर्कस्तानातील एक प्रदेश आहे. हा प्रदेश पश्चिम अनातोलियामध्ये आयोनियाच्या मध्यापासून लिसिया आणि फ्रिजियापर्यंत पसरलेला होता.[१]
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विनायक लक्ष्मण ऊर्फ केरुनाना छत्रे (जन्म : नागाव, १६ मे १८२५; - १९ मार्च १८८४) हे प्राचीन भारतीय तसेच आधुनिक गणित व खगोलशास्त्र यांचे अभ्यासक होते. विष्णूशास्त्री चिपळूणकर, लोकमान्य टिळक, सुधारकाग्रणी गोपाळ गणेश आगरकर ह्यांचे ते गुरू होते.
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केरुनानांचा जन्म अलिबाग तालुक्यातल्या नागाव येथे झाला. आई-वडिलांना बालपणीच अंतरल्याने त्यांना शिक्षणासाठी मुंबईस चुलत्यांकडे यावे लागले. त्यांच्यामुळेच केरुनानांना वाचनाची गोडी व कोणत्याही प्रश्नाकडे वस्तुनिष्ठ दृष्टीने पाहण्याची सवय लागली.
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गणित, खगोल आणि पदार्थविज्ञानासारख्या कठीण शास्त्रांत त्यांना पुढं जी गती प्राप्त झाली, त्याचे मूळ त्यांना एल्फिन्स्टन इन्स्टिटय़ूटमध्ये आचार्य बाळशास्त्री जांभेकर व प्रो. आर्लिबार या व्यासंगी गुरूंकडून मिळालेल्या मूलभूत ज्ञानात सापडते. त्याच्या जोरावर केरुनानांनी प्रगल्भ ग्रंथांचे परिशीलन करून या विषयांवर घट्ट पकड बसण्याएवढे त्यातले प्रगत ज्ञान प्राप्त केले. याच्या जोडीला त्यांची असाधारण बुद्धिमत्ता लक्षात घेतली की, पुढे त्यांनी अध्यापन कौशल्य दाखवले आणि सरकारदरबारी त्यांना मिळालेल्या मानाच्या जागा मिळवल्या.
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मुंबईस कुलाब्याच्या दांडीवर अंतरिक्ष चमत्कार व लोहचुंबक यांचे अनुभव घेण्यासाठी इ.स. १८४० मध्ये प्रो. आर्लिबार यांनी एक वेधशाळा काढली. तिथे केरुनानांची असिस्टंटच्या जागी नेमणूक करण्यात आली. अवघ्या १५ व्या वर्षी द.म. ५० रु. पगारावर मिळालेल्या या नोकरीत नानांनी पुढली १० वर्षे जागरुकपणे हवामानशास्त्राचे प्रशिक्षण घेतले. पुढील आयुष्यात कोणतेही तत्त्व अथवा संकल्पना सिद्ध होऊन पडताळा आल्याशिवाय ते स्वीकारीत नसत, याचे मूळ या नोकरीत आढळते.
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इ.स. १८५१ पासून त्यांच्या बदल्या पुणे कॉलेजचे नॉर्मल स्कूल, व्हर्नेक्युलर कॉलेज (याचे नाव पुढे ट्रेनिंग कॉलेज झाले.) आणि अहमदनगरच्या इंग्रजी शाळेचे हेडमास्तर अशा सरकारी संस्थांतून झाल्या. या प्रत्येक ठिकाणी गणित, सृष्टिशास्त्र व पदार्थविज्ञान हेच विषय ते जरुरीप्रमाणे इंग्रजी व मराठीत सराईतपणे शिकवीत असत. दरम्यान, त्यांनी इंजीनिअरिंग कॉलेजातसुद्धा सृष्टिशास्त्रावर व्याख्याने दिली.. मात्र १८६५ पासून सेवानिवृत्तीपर्यंत केरुनाना पुण्याच्या डेक्कन कॉलेजात स्थिरपणे होत���. प्रोफेसर व शेवटी हंगामी प्राचार्य म्हणून जागोजागी जबाबदारीची पदे सांभाळूनसुद्धा आपल्या अध्यापनात कधी त्यांनी हयगय केली नाही की खंड पडू दिला नाही. मुलांना समजेल अशा सोप्या रीतीने शिकविण्याची त्यांची हातोटी त्यांच्या अनेक विद्यार्थ्यांनी वाखाणलेली आहे. गणिताशिवाय विद्यार्थ्यांना इतर शास्त्रांचे थोडेबहुत ज्ञान देण्यावर त्यांचा कटाक्ष असे. विद्यार्थ्यांने केव्हाही- कुठेही शंका विचारली तरी ते हसत-खेळत हरप्रयत्नाने तिची उकल करीत असत.
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चिपळूणकर- आगरकर या केरुनानांच्या नामवंत शिष्यांच्या चरित्रांत व ते दिवंगत झाल्यावर खुद्द आगरकरांनी लिहिलेल्या मृत्युलेखात त्यांचे विद्याव्यासंग, अध्यापन कौशल्य, स्वभावातील सौजन्य तसेच गरजू व गरीब विद्यार्थ्यांना आसरा देणे, प्रसंगी फी-पुस्तकांची त्यांची नड भागवणे, या गुणांचे प्रामुख्याने उल्लेख आलेले आहेत. त्यांनी केलेल्या आर्थिक मदतींचे ठळक उदाहरण म्हणजे, पहिल्या वर्षांच्या परीक्षेची फी भरायला आगरकरांजवळ पैसे नव्हते म्हणून एक नाटक लिहून ते, ती उभी करणार असल्याचे कळल्यावर केरुनानांनी त्यांनी अर्धवट लिहिलेल्या नाटकाचे कागद काढून घेऊन त्यांची फी भरून टाकली.
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मेजर कँडीच्या मराठीतून शालेय पुस्तके तयार करण्याच्या उपक्रमात केरुनानांनी सुबोध भाषेत लिहिलेली पुस्तके लोकप्रिय झाली. अंकगणितात मूलभूत क्रियांबरोबर कर्जव्यवहार, रोखे, सुतार व गवंडी यांच्या कामाची आकारणी इत्यादी व्यावहारिक उदाहरणे घातली आहेत. तर पदार्थविज्ञानात आजूबाजूच्या सृष्टीत घडणारे व्यापार, निसर्ग चमत्कार व पदार्थाचे गुणधर्म यांच्या परिचयाबरोबर प्रयोगासाठी लागणाऱ्या वस्तू व त्यांच्या किमती पुस्तकाच्या परिशिष्टात दिल्या आहेत. कधी कधी या पुस्तकात त्यांनी संवादाचे माध्यमही वापरले आहे.
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शास्त्रीय ज्ञान स्वभाषेत व्यक्त करण्यासाठी मुंबईत १८४८ साली स्थापन झालेल्या, ‘ज्ञान प्रसारक सभे’च्या व्यासपीठावरून केरोपंतांनी ‘हवा’, भरतीओहोटी, कालज्ञान, सूर्यावरील डाग आणि पर्जन्यवृष्टी यांचा संबंध असे विविध विषयांवर १७ निबंध वाचले. त्यापैकी भरती-ओहोटीच्या निबंधात, भरती अंतराच्या घनाच्या प्रमाणात कमी होते असे कलनाच्या मदतीने त्यांनी दाखवले आहे.
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केरुनानांनी लक्ष घातलेला आणखी एक विषय म्हणजे पंचांग शुद्ध���करणाचा. आपल्या सूक्ष्म अभ्यासाने त्यांच्या असे लक्षात आलं की, परंपरागत पंचांगात केलेले अशुद्ध गणित व घेतलेली ग्रहस्थितींची स्थूलमाने या चुकांमुळे ऋतुकाल तसेच पंचांगात दाखवलेल्या ग्रहस्थितीचा प्रत्यक्षातल्या ग्रहस्थितीशी मेळ बसत नाही. तेव्हा ही विसंगती दूर करण्यासाठी त्यांनी पंचांग सुधारण्यासाठी बरेच दिवस आपला बहुमोल वेळ खर्च केला. पण त्यांच्या हयातीत हा उद्योग पूर्णत्वास गेला नाही. मात्र लो. टिळकांसारख्या त्यांच्या नामवंत शिष्याने राजकारणाच्या धकाधकीतही गुरूऋण जाणून व स्वतःस त्यात असलेला रस म्हणूनही ही चळवळ पुढे नेली.
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केरुनानांच्या पुरोगामी विचारसरणीचे द्योतक म्हणजे स्त्रियांच्या सामाजिक सुधारणेस त्यांचा पाठिंबा होता. शिवाय ते मुलींच्या शाळेच्या व्यवस्थापक मंडळावर होते, श्रीमती रमाबाई रानडे यांच्या प्रेरणेने भरणाऱ्या स्त्रियांच्या सभांना हजर राहून त्यांचे शिक्षण करत. स्त्रियांना जड विषयांऐवजी गृहजीवनोपयोगी शिक्षण देण्याच्या मताचे ते होते.
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अशा गहन विषयांच्या व्यासंगात गढलेल्या केरुनानांना शास्त्रीय संगीत, संगीत नाटके व स्वतः पियानो वाजवण्याचीही आवड होती. शिवाय किर्लोस्कर नाटक मंडळीत त्यांचे जाणेयेणे होते. नाटकांच्या तालमींना हजर राहून ते मोरोबा वाघोलीकर आणि बाळकोबा नाटेकर या गायक नटांना गाण्याच्या अतिरेकाने नाटकाचा रसभंग होतो, असा सल्ला देत असत. त्यांच्या या गुणांवर लुब्ध होऊन अण्णासाहेब किर्लोस्करांनी आपले ‘सौभद्र’ हे नाटक त्यांना अर्पण केले आहे.
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केरुनाना दिवंगत झाल्यावर, टाइम्स ऑफ इंडियाने वाहिलेल्या श्रद्धांजलीत, ‘‘जर प्रो. छत्रे यांना जर युरोपात पद्धतशीर शिक्षण मिळाले असते तर ते एक युगप्रवर्तक शास्त्रज्ञ म्हणून गाजले असते’’ असे म्हटले होते. त्यावरून त्यांचा मोठेपणा ध्यानात येईल. असा हा थोर व्यासंगी पुरुष १९ मार्च १८८४ रोजी निधन पावला.
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केरूपाटीलनगर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील सिन्नर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४१ सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ९८० मि.मी.पर्यंत असते.
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जाने, इ.स. २०१४
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दुवा: cricketarchive.com (इंग्लिश मजकूर)
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काईल कोएट्झर ( १४ एप्रिल १९८४) हा एक स्कॉटिश क्रिकेट खेळाडू व स्कॉटलंड क्रिकेट संघाचा विद्यमान कर्णधार आहे.
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केलुचरण मोहपात्रा (जन्म : ८ जानेवारी १९२६; - ७ एप्रिल २००४ ) हे अभिजात भारतीय ओडिसी नर्तक आणि गुरू होते. [१] त्यांनी विसाव्या शतकात ओडिसी नृत्य कलेचे पुनरुज्जीवन केले.[२] पद्मविभूषण हा पुरस्कार मिळवणारे ते ओरिसातील पहिली व्यक्ती आहेत.[३]
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भगवान जगन्नाथाला प्रसन्न करण्यासाठी सादर केला जाणारा गोतीपुआ हा ओरिसातील पारंपरिक नृत्यप्रकार गुरू केलुचरण मोहपात्रा यांनी तरुणपणीच सादर केला. यात स्त्रियांची वेशभूषा करून पुरुष नृत्य करीत असत.
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नंतरच्या आयुष्यात त्यांनी गोतीपुआ व माहारी या नृत्य प्रकारांत संशोधन केले, व त्यांतून त्यांनी एकूणच ओडिसी नृत्याची पुनर्बांधणी केली.[४]गुरू केलुचरण मोहपात्रा हे तालवाद्यवादनात कुशल होते. मृदंग, पखवाज व तबला ह्यांतील त्यांचे कौशल्य त्यांनी केलेल्या नृत्यरचनांतून दिसून येते. पारंपरिक पट्टचित्रकला प्रकारातही ते प्रवीण होते.
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गुरू केलुचरण मोहपात्रा, त्यांच्या पत्नी लक्ष्मीप्रिया व मुलगा रतिकांत ह्यांनी सन १९९३मध्ये सृजन ही नृत्यसंस्था स्थापन केली.
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केल्विन हे तापमान मोजण्याचे एकक आहे. केल्विन हे रसायनशास्त्रदृष्ट्या व थर्मोडायनामिकदृष्ट्या गणितात वापरले जाणारे तापमानाचे एकक आहे. व्यवहारात सेल्सियस अथवा फॅरनहाइट असलेले एकक शास्त्रज्ञ व अभियंते वापरणे पसंत करतात. मात्र गणिते सोडवताना केल्विनच वापरणे सोईस्कर असते. केल्विन व सेल्सियस यांच्यात होणारी वाढ वा घट एकास एक अशी असते.
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तापमानात १ अंश सेल्सियसची वाढ = तापमानात १ केल्विनची वाढ परंतु ० केल्विन = –२७३ अंश सेल्सियस म्हणजेच ० अंश सेल्सियस = २७३ केल्विन
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अश्या प्रकारे अंश सेल्सियचे केल्विनमध्ये रूपांतर करण्यासाठी खालील सूत्राचा वापर करतात.
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केल्विन = अंश सेल्सियस + २७३
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केल्विन अभिषेक (जन्म १३ मे १९९४ - बेंगलोर, भारत) हा एक भारतीय फुटबॉल खेळाडू आहे जो एआरए एफसीसाठी गोलकीपर म्हणून खेळतो.[१]
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२०१६ मध्ये केल्विनने एसएआय आणि बेंगलुरू एफसी युवा संघांकडून खेळल्यानंतर बेंगळुरू एफसीमध्ये आपल्या कारकिर्दीची सुरुवात केली. २०१६ एएफसी कप फायनलमध्ये तो क्लबसाठी खंडपीठावर होता. फेडरेशन कपमध्ये त्याने क्लबच्या खंडपीठावरही काम केले.२३ जुलै २०१७ रोजी आयएसएल ड्राफ्टमध्ये बेंगलुरू एफसीने २०१७-१८ च्या हंगामात पुन्हा करार केला.[२]
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२०१८-१९ मध्ये अभिषेकने नवीन आय-लीग २ प्रभाग क्लब, एआरए एफ.सी. त्याने १६ जानेवारी २०१९ रोजी हिंदुस्तान एफसी विरुद्ध व्यावसायिक पदार्पण केले
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केळपाडा हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नंदुरबार जिल्ह्यातील नवापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान सामान्यतः गरम आणि कोरडे आहे. येथे उन्हाळा, पावसाळा,आणि हिवाळा असे तीन वेगवेगळे ऋतू आहेत. उन्हाळा मार्चपासून चालू होऊन जूनमध्यापर्यंत असतो.उन्हाळा गरम आणि कोरडा असतो.मे महिन्यात तापमान फार असते.तापमान ४३ अंश सेल्सियसपर्यंत जाते.जूनच्या मध्यास किंवा अखेरीस पावसाळा सुरू होतो.पावसाळी हंगामात हवामान सामान्यतः आर्द्र आणि गरम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ७६० मि.मी.पर्यंत असते.हिवाळी मोसम नोव्हेंबरपासून साधारण फेब्रुवारीपर्यंत असतो.हिवाळा सौम्य थंड आणि कोरडा असतो.
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केळवड हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील सावनेर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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केळी हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील पुणे जिल्ह्यातील जुन्नर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील सर्वसाधारण हवामान उष्ण व कोरडे आहे. हवामानातील बदलानुसार प्रत्येक वर्षात मुख्यतः तीन ऋतू असतात.मार्च ते मे पर्यंत उन्हाळा, जून ते ऑक्टोबर पर्यंत पावसाळा आणि नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी पर्यंत हिवाळा असतो. वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान ७२० मिमी पर्यंत असते.
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मूसा जातिच्या झाडांना आणि त्याच्या फळास केळी असे म्हणतात.केळीचे मूळस्थान दक्षिण पूर्व आशिया मानले जाते. सध्या संपूर्ण उष्णकटिबंधीय प्रदेशात याची लागवड केली जाते. प्रामुख्याने फळांच्या उत्पादनासाठीच याची लागवड करण्यात येते. केळाच्या झाडाची उंची २ ते ८ मीटर तर पानाची लांबी ही साडेतीन मीटर असू शकते. केळीची लागवड कंदापासून केली जाते. केळाच्या झाडाची उंची २ ते ८ मीटर तर याच्या पानाची लांबी ही साडेतीन मीटर असू शकते. केळीला येणारी फळे ही घडामध्ये येतात याला लोंगर असे म्हणतात. एक घडामध्ये साधारणत: १० फण्या असतात तर एका फणीस १६-१८ केळी असतात. याचे फुल/फुलोरा हे तपकिरी रंगाचे असते. कच्ची फळे हिरवी तर पिकलेली पिवळी किंवा लालसर दिसतात. [1] याला शास्त्रीय नाव मुसा इंडिका (Musa indica ) केळी ही वनस्पती वृक्ष असून सुद्धा तिला खोड नाही. केळी या वनस्पतीला संस्कृत भाषेमध्ये रंभा असे नाव आहे.या वनस्पतीचा जीवाश्म मध्येसुद्धा संदर्भ दिसतो .अतिशय जलद गतीने ऊर्जा देणारे उत्साहवर्धक महत्त्वाचे फळ आहे.
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केळफूल हे स्निग्ध, मधुर, तुरट, गुरू, कडसर, अग्निप्रदीपक, वातनाशक तसेच काही प्रमाणात उष्ण आहे. रक्तपित्त, कृमी, क्षय, कोड यावर ते गुणकारी आहे. आपल्या आहारात या केळफुलांचा वापर नक्कीच करू शकतो. बनाना फ्लॉवर म्हणजेच केळफूल आणून त्याची भाजी केली जाते. योग्य केळफूल निवडून चिरणे जरा किचकट व चिकित्सक काम आहे; परंतु त्याचे पौष्टिक गुणधर्म जास्त महत्त्वाचे आहेत.
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केळीचे रोप जेव्हा मोठे होते, तेव्हा त्याच्या मध्यभागातून एक दांडा फुटतो. या दांडय़ाच्या अग्रभागी लाल रंगाची फुले येतात व त्यांचे रूपांतर केळीत होते. केळ्याच्या एका घडात ३०० ते ४०० केळी तयार होतात. चंपाकदली, अमृतकदली, मर्त्यकदली, माणिक्यर कदली, लोटण, वेलची केळी, चंपाचिनी इत्यादी केळीच्या मुख्य जाती आढळतात. याशिवाय रंगभेदावरूनही केळीच्या जाती ठरतात. ७०-८० केळ्यांचा फणा ज्यातून निर्माण होतो ते केळफूल फुलासारखं दिसतच नाही. केळफुलाच्या वरची गुलाबी, लाल रंगाची जाड पानं उलगडत गेली की, आत पिवळसर फुलांचे केळ्याच्या घडासारखे घड दिसतात. केळफुलात कोलेस्टोरॉल नाही, साखर नाही, पण भरपूर चोथा आणि कॅल्शियम असतं. सोडियमने समृद्ध असलेल्या या केळफुलात चांगल्या प्रतीची प्रथिनं असतात, तसेच मॅग्नेशियम, आयर्न आण�� कॉपरही असतं. केळफुलाचा अर्क साखर नियंत्रणात ठेवतो, शरीरातल्या जंतूंची वाढ रोखतो.
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केळफुलाची भाजी निवडायला किचकट. कारण, त्यातल्या प्रत्येक फुलातला कडक दांडा आणि पातळ पापुद्रा काढावा लागतो. पण, ती अतिशय पौष्टिक असल्याने जरूर खावी. चिरल्यानंतर भाजी ताक किंवा लिंबू घातलेल्या पाण्यात घालावी, नाही तर काळी पडते. केळफुलाचा उपयोग भाजी, कोशिंबिरीमध्ये वाफवून किंवा कच्च्या स्वरूपातही खाल्ले जाते. केळफूल निवडताना ताज्या स्वरूपाचे निवडायचे असते. केळफूल सोलताना हाताला तेल लावावे म्हणजे चिकटपणा व डाग राहत नाहीत. मोठय़ा केळफुलांत लहान लहान फुलांच्या फण्या असतात. पूर्ण स्वरूपात या लहान फुलांचा वापर केला जातो. केळफुलाच्या बाहेरील जाड पाने काढून टाकतात. आतील लहान फुलांच्या फण्या बाहेर काढतात. प्रत्येक लहान फुलातील कडक दांडा व त्याच्या खालच्या बाजूला असलेला पांढरा पारदर्शक टोपीसारखा भाग काढून टाकतात; तो चिरला जात नाही व शिजत नाही. बाकी भाग स्वच्छ धुऊन चिरून घेतात.
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केळफुलातील गुणधर्मामुळे रक्त शुद्ध होते. केळफुलामुळे रक्तातील लोहाचे प्रमाण वाढण्यास मदत होते. म्हणून निमियामध्ये उपयुक्त. इरिटेबल बॉवेल सिन्ड्रोमसारख्या आजारात केळफूल उपयुक्त असते. केळफुलामुळे प्रोजेस्टेरॉन हे संप्रेरक स्र्वण्यास मदत होते. त्यामुळे मासिक पाळीमध्ये रक्तस्रवाचा जास्त त्रास होत नाही. जास्त रक्तस्रव होत असेल, तर केळफुले शिजवून दह्याबरोबर खाण्याचा सल्ला दिला जातो. केळफुलात जीवनसत्त्व ‘क’ ‘अ’, ‘ब,’ ‘के’ फॉस्फरस कॅल्शिअम व आयर्न भरपूर प्रमाणात आढळते. ब्रॉन्कायटिस व पेप्टिक अल्सरमध्ये केळफूल उपयोगी पडते. स्तनपान देणा-या स्त्रियांमध्ये दूधनिर्मितीसाठी उपयोगी. चवीत बदल म्हणूनही केळफूल खावे. भरपूर तंतुयुक्त असल्याने मधुमेही लोकांनी केळफूल जरूर खावे. त्यामुळे पोटही भरते, चवीत बदल होतो व साखर लगेच वाढत नाही. आतडय़ांचा, स्तनांचा कर्करोग टाळण्यासाठी आहारात केळफूल घ्यावे. केळफुलाचा केशरयुक्त भाग कापून त्यात मिरपूड भरून ठेवावी व सकाळी ते केळफूल तुपात तळून खावे. त्याने श्वानसविकार लवकर बरा होतो, असे वर्णन आयुर्वेदात केले आहे. सर्व वयोगटांसाठी केळफूल खाणे उत्तम.यापासून मुख्यत्वे भाजी तसेच किसमूर(गोवेकरी पदार्थ), कबाब, कटलेट इ. पदार्थ तयार केले जातात. ��लवृद्धीसाठी उपयुक्त.
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क्षेत्राच्या व उत्पन्नाच्या दृष्टीने आंब्याच्या खालोखाल केळीचा क्रमांक लागतो. केळीच्या उत्पन्नात भारताचा दुसरा क्रमांक लागतो. भारतात अंदाजे दोन लाख वीस हजार हेक्टर क्षेत्र केळीच्या लागवडीखाली आहे. केळी उत्पादन करणा-या प्रांतात क्षेत्राच्या दृष्टीने महाराष्ट्राचा जरी तिसरा क्रमांक लागत असला तरी व्यापारी दृष्टीने किंवा परप्रांतात विक्रीच्या दृष्टीने होणा-या उत्पादनात महाराष्ट्राचा पहिला क्रमांक लागतो. उत्पादनापैकी सुमारे ५० टक्के उत्पादन महाराष्ट्रात होते. सध्या महाराष्ट्रात एकूण चौवेचाळीस हजार हेक्टर क्षेत्र केळीच्या लागवडीखाली असून त्यापैकी निम्म्यापेक्षा अधिक क्षेत्र जळगांव जिल्हयांत आहे. म्हणून जळगांव जिल्हाला केळीचे आगार मानले जाते. मुख्यतः उत्तर भारतात जळगाव भागातील बसराई केळी पाठविली जाते. त्याचप्रमाणे सौदी अरेबिया इराण, कुवेत, दुबई, जपान व युरोपमधील बाजारपेठेत केळीची निर्यात केली जाते. त्यापासून मोठया प्रमाणावर परकीय चलन प्राप्त होते. केळीच्या ८६ टक्केहून अधिक उपयोग खाण्याकरीता होतो. पिकलेली केळी उत्तम पौष्टिक खाद्य असून केळफूले, कच्ची फळे व खोडाचा गाभा भाजीकरिता वापरतात. फळापासून टिकावू पूड, मुराब्बा, टॉफी, जेली इत्यादी पदार्थ बनवितात. वाळलेल्या पानाचा उपयोग आच्छादनासाठी करतात. केळीच्या खोडाची व कंदाचे तुकडे करून ते जनावरांचा चारा म्हणून उपयोगात आणतात. केळीच्या झाडाचा धार्मिक कार्यात मंगलचिन्ह म्हणून उपयोग केला जातो.
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केळीच्या लागवडीचा मोसम हवामानानुसार बदलत असतो. कारण हवामानाचा परिणाम केळीच्या वाढीवर, फळे लागण्यास व तयार होण्यास लागणारा कालावधी या वरच होत असतो. जळगांव जिल्हयात लागवडीचा हंगाम पावसाळयाच्या सुरुवातीस सुरू होतो. यावेळी या भागातील हवामान उबदार व दमट असते. जून जुलै मध्ये लागवड केलेल्या बागेस मृगबाग म्हणतात. सप्टेबर ते जानेवारी पर्यंत होणा-या लागवडीस कांदेबाग म्हणतात. जून जुलै लागवडीपेक्षा फेब्रूवारी मध्ये केलेल्या लागवडीपासून अधिक उत्पन्न मिळते. या लागवडी मुळे केळी १८ महिन्याऐवजी १५ महिन्यात काढणे योग्य होतात.
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लागवड करताना ०.५*०.५*०.५ मीटर आकाराचे खड्डे खोदून किंवा स-या पाडून लागवड करतात. दोन झाडातील अंतर बसराई जाती करिता १.२५ किंवा १.५० मीटर असते.
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या झाडाची मुळे उथळ असतात. त्यांची अन्नद्रव्यांची मागणी जास्त असते. त्यामुळे वाढीच्या सुरुवातीच्या काळात (पहिले चार महिने) नत्रयुक्त जोरखताचा हप्ता देणे महत्वाचे ठरते. प्रत्येक झाडास २०० ग्रॅम नत्र तीन समान हप्त्यात लावणीपासून दुस-या, तिस-या व चौथ्या महिन्यात द्यावे. प्रत्येक झाडास प्रत्येक वेळी ५०० ते ७०० ग्रॅम एरंडीची पेंड खतासोबत द्यावी. शेणखताबरोबर ४०० ग्रॅम ओमोनियम सल्फेट प्रत्येक झाडास लावणी करतांना देणे उपयुक्त ठरते.
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दर हजार झाडास १०० कि. नत्र ४० कि. स्फूरद व १०० कि. पालांश ( प्रत्येक खोडास) १०० ग्रॅम नत्र ४० ग्रॅम स्फूरद, ४० ग्रॅम पालाश म्हणजेच हेक्टरी ४४० कि. नत्र १७५ कि. स्फूरद आणि ४४० कि. पालाश द्यावे.
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केळीच्या उत्पादनात जागतिक पातळीवर भारत प्रथम आणि भारतात महाराष्ट्र राज्य प्रथम आहे. केळीच्या जागतिक उत्पादनापैकी भारतात २० टक्के उत्पादन होते तर भारतातील एकूण उत्पादनापैकी महाराष्ट्रात २५ टक्के उत्पादन होते. महाराष्ट्रात जळगाव जिल्ह्यात रावेर, चोपडा व यावल ही तालुके केळी उत्पादनात अग्रेसर आहे.
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बसराई, श्रीमंती, वेलची, सोनकेळी, लाल केळी, चक्रकेळी, कुन्नन, अमृतसागर, बोंथा, विरूपाक्षी, हरिसाल, सफेद वेलची, लाल वेलची, वामन केळी, ग्रोमिशेल, पिसांग लिलीन, जायंट गव्हर्नर, कॅव्हेन्डीशी, ग्रॅन्ड नैन, राजापुरी, बनकेळ, भुरकेळ, मुधेली, राजेळी, इ.
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पूर्वीपासून केळी फळाचा मुख्य उपयोग खाण्यासाठी केला जातो. सध्या केळी पासून केळीचे वेफर्स, केळीचा जॅम, केळीची भुकटी, केळीचे पीठ, केळीची प्युरी, सुकेळी, केळीचे पेठे, केळीची दारू, ब्रॅन्डी, शिरका, केळी बिस्कीट असे कितीतरी पदार्थ बनवले जातात.केळफूलापासून देखील कित्येक वेगवेगळे पदार्थ तयार केले जातात.केळफूल स्वच्छ करणे थोडे किचकट/क्लिष्ट काम असते.केळफूलाची भाजी व कटलेट हे पदार्थ लोकप्रिय आहेत.
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कच्च्या केळीची भाजी पूर्वीपासूनचा बनवतात. केळीच्या पानांचा उपयोग दक्षिण भारतात जेवण वाढण्यासाठी केला जातो. केळीच्या पानांचा उपयोग जनावरांना चारा म्हणूनही होतो. तसेच वाळलेली पाने इंधन म्हणून वापरता येते. केळी हे फळ शरीरासाठी खूप उपयुक्त आहे आणि याचा वापर नेहमी आहारात समावेश के��्यास आपले आरोग्य चांगले राहते. कच्च्या केळीमध्ये भरपूर प्रमाणात पोटॅशियम, विटॅमिन बी ६, विटॅमिन सी, स्टार्च तसेच अॅन्टिऑक्सिडेंट्स असतात.
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हिंदू धर्मात केळीच्या खांबांना म्हणजे झाडाच्या खोडाला, आंब्याच्या पानांच्या तोरणाप्रमाणेच शुभसूचक, मांगल्याचे प्रतीक मानले जाते. लग्न, मुंज अशा शुभकार्याच्या प्रसंगी प्रवेशद्वारावर दोन केळीचे उंच व पाने असलेले खांब रोवून त्याचे तोरण केले जाते. आपण हे सुद्धा अनेकदा आपण एकले असेल ही ज्या मुलांचे विवाह जुळत नाही त्या वेळेस ही याच झाडाची पूजा आपणास करावयास सांगितली जाते. की आपण जेव्हा केळीच्या पानावर गरम गरम वाढतो. तेव्हा पानमधील असलेले पोषक तत्त्वे अन्नात मिसळतात जे आपल्या शरीरासाठी योग्य असतातत. यामुळे आपल्या शरीरावर खाज, डाग, पुरळफोड अशा समस्या दूर होततात. केळीच्या पानामध्ये “एपिगोलो गट्लेत’’आणि ईजेसीजी सारखे पायलिफिलोस अँटी ऑक्सिडंट आढळतता. याच पणामुळे अँटी ऑक्सिडंट आपणास मिळतात. या मुळे आपल्याला त्वचेवर दीर्घकाळ तारुण्य टिकून राहण्यास मदत होते. मेंदूला होणारा रकतस्राव सुरळीत चालू शकतो. केळीच्या पानावर जेवण केल्यास अन्नपचन पण सोपे होते. केळीच्या पानावर खोबरेल तेल टाकून ते पण त्वचेवर गुंडाळून लावल्यास त्वचेचा आजार ठीक होतो
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५० टक्के पिकलेल्या केळीचा गर पाण्यात एकजीव करून १५ ते २० मिनिटे गरम करावा. तो गर गाळून घ्यावा. गाळलेल्या गरात समप्रमाणात साखर, ०.५ टक्के सायट्रेिक आम्ल व पेक्टीन टाकून उकळी येईपर्यंत मिश्रण शिजवावे. या वेळी मिश्रणाचे तापमान साधारणपणे १०४ अंश से. असते. तयार जेलीमध्ये एकूण घन पदार्थाचे प्रमाण ७० डिग्री ब्रिक्स इतके असते. जेली गरम असतानाच निर्जंतुक बाटल्यांमध्ये भरावी. पेरूच्या जेलीपेक्षा केळीची जेली पारदर्शक व स्वादिष्ट असते.
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कोणत्याही जातीच्या पूर्ण पिकलेल्या केळीचा वापर जॅम तयार करण्यासाठी करता येतो. गराच्या वजनाएवढी साखर मिसळून गर मंद अग्रीवर शिजवावा. साखर पूर्णपणे विरघळल्यावर ०.५ टक्के पेक्टीन, ०.३ टक्के सायट्रेिक आम्ल व रंग टाकून मिश्रण घट्ट होईपर्यंत शिजवावे. मिश्रणाचा ब्रिक्स ६८ ते ७० डिग्री झाल्यावर जॅम तयार झाला, असे समजावे. तयार जॅम कोरड्या व निर्जंतुक बाटल्यांमध्ये भरावा. हा पदार्थ एक वर्षापर्यंत टिकू शकतो.
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केवडा (अन्य मराठी नावे: केतकी ; शास्त्रीय नाव: Pandanus Odoratissimus, पांदानस ओडोटिसिमस ; इंग्लिश: Screw Pine, स्क्रू पाइन ;) ही आग्नेय आशिया, दक्षिण आशिया या प्रदेशांत आढळणारी सुगंधी वनस्पती आहे. केवड्याची नर व मादी झाडे वेगवेगळी असतात. याचे कणीस म्हणजे नरफूल २५-५० से.मी. लांब असते. त्यात ५-१० से.मी. लांब अनेक तुरे असतात व त्यावर पांढरट पिवळे सुगंधी आवरण असते, तर मादी फूल लहान असून (५ से. मी.) त्याचे पुढे पिवळे व पिकल्यानंतर लाल रंगाचे लंबगोल १५-२५ से. मी. लांबीचे फळ तयार होते.
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लागवडीसाठी ३-४ इंच जाडीचे २/२.५ फूट लांबीच्या फुटव्यांची अथवा फांद्याची लागण करावी. याच्या खोडाला जमिनीपासून थोडय़ाशा अंतरावर आधारमुळे येतात. वाढणाऱ्या झाडास या हवेतील मुळांपासून आधार मिळतो. केवड्याची अभिवृद्धी जमिनीतून निघालेल्या फुटव्यांपासून अथवा जुन्या फांद्यांपासून करतात. सुगंधी कणसाकरिता नर झाडांची लागवड करतात.
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भारतात केवडा आंध्र प्रदेश, तमिळनाडू, ओरिसा, गुजरात, अंदमान व कोकणात आढळतो. ओरिसामध्ये मोठय़ा प्रमाणावर याचे उत्पादन घेतले जाते.
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केवडा ही बहुउपयोगी वनस्पती असून सुगंधी औषधी व इतर उत्पादनासाठी केवडय़ाचा उपयोग होतो. फुलांचा वापर केवडा अत्तर, केवडा तेल व केवडा पाणी यासाठी करतात. जल ऊर्ध्वपतनाने केवडा तेल व केवडा पाणी मिळते. केवड्याचे तेल काढताना केवड्याच्या कणीसापासून हिरवी पाने वेगळी करतात व कणसाचे ३-४ तुकडे करून स्टेनलेस स्टीलच्या ऊर्ध्वपतन यंत्रात पाण्यासह घालून गुलाबाप्रमाणेच ऊर्ध्वपतन प्रक्रिया करतात. केवड्याच्या तेलात सुमारे ७.५ टक्के मिथाईल बीटा फिनाईल इथाईल ईथर हे रासायनिक घटक द्रव्य असते. केवड्याच्या पाण्याचा वापर विविध प्रकारांच्या मिठायांत केला जातो. सरबते तयार करण्यासाठी देखील केवडा पाणीचा वापर केला जातो. केवडा तेलाचा वापर पान मसाल्यात, जर्दा तसेच उच्च प्रतीच्या सौंदर्यप्रसाधनात केला जातो.
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केशरी हा एक रंग आहे. हा रंग ९५.७ भाग तांबडा, ७६.९ भाग हिरवा आणि १८.८ भाग निळा यांच्या मिश्रणातून बनला आहे.
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भारताच्या राष्ट्रध्वजाच्या वरील भागात केशरी रंगाचा आडवा पट्टा आहे.[१]
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केशवराव आंधळे (६ एप्रील १९५३) हे मराठी, भारतीय राजकारणी आहेत. केशव आंधळेच्या राजकीय कारकिर्दीची सुरुवात बीड जिल्ह्यातील चौसाळामधून झाली. २००४ सालच्या अटीतटीच्या निवडणुकीत राष्ट्रवादी काँग्रेस पक्षाचे मंत्री जयदत्त क्षीरसागर यांचा पराभव करून ऊसतोड मजुरांचे नेते केशवराव आंधळे यांना विजय मिळाला होता.
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प्रा. के. वि. बेलसरे: (केशव विष्णू बेलसरे तथा 'बाबा बेलसरे')
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( ८ फेब्रुवारी १९०९ - निधन: ३ जानेवारी १९९८)
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तत्त्वज्ञानाचे प्राध्यापक. श्रीब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराजांचे शिष्य. पौर्वात्य व पाश्चात्त्य तत्त्वज्ञानाचा अभ्यास. भारतीय अध्यात्म विशद करणारे अनेक ग्रंथ लिहिले. ग्रंथ व प्रवचने यांच्या माध्यमातून नामस्मरणाचा प्रसार.[ संदर्भ हवा ]
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केशव सखाराम देशमुख हे एक मराठी लेखक आणि कवी आहेत. ते मराठी भाषा हा विषय घेऊन एम.ए.पीएच.डी. झाले आहेत. बी.ए.च्या आणि एम.ए.च्या अंतिम परीक्षांत ते मराठवाडा विद्यापीठातून सर्वोच्च गुण मिळवून उत्तीर्ण झाले होते. मेरतमध्ये आल्याबद्दल त्यांना विद्यापीठाची चौदा पारितोषिके प्राप्त झाली होती. पीएच.डी. झाल्यावर ते नांदेड विद्यापीठात प्राध्यापक झाले आणि पुढे मराठी विभागाचे प्रमुख झाले.
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१) कवी केशवसुत राज्य पुरस्कार, महाराष्ट्र पुरस्कार
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२) महाराष्त्र सरकारचा बालकवी पुरस्कार
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३) कोपरगावचा भी.ग.रोहमारे ग्रामीण पुरस्कार
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४) येशवंत चव्हाण पुरस्कार, पुणे
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५) शेतकरी साहित्य पुरस्कार, औरंगाबाद
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६) ना.ध. देशपांडे पुरस्कार, मेहकर
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७) नानासाहेब वैराळे पुरस्कार, अकोला
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८) संजीवनी खोजे काव्य पुरस्कार, अहमदनगर
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९) विशाखा काव्य पुरस्कार, नाशिक.
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१०) साहित्य साधना पुरस्कार, यवतमाळ.
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११) सुजाता पाब्रेकर पुरस्कार, मुंबई.
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१२) धोंडीबा माने पुरस्कार, औरंगाबाद
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१३) साहित्य सेवा वाड्मय पुरस्कार, नाशिक रोड.
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केशवराव कोरटकर (इ.स. १८६७:वसमत, परभणी जिल्हा, महाराष्ट्र - २१ मे, इ.स. १९३२) हैदराबाद संस्थानचे मुख्य नायाधीश होते.
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केशवरावांचा जन्म १८६७ साली पूरजळ, ता. वसमत, परभणी येथे झाला. घरची गरिबी असल्याने केशवरावांचे वडील संतुकराव यांनी केशवरावांना वयाच्या नवव्या वर्षी आपल्या मोठ्या मुलीच्या घरी गुलबर्ग्याला पाठवले. केशवरावांनी जेमतेम प्राथमिक शिक्षण घेऊन नोकरी पत्करली. पुढे केशवरावांनी स्वकष्टाने १८९० साली वकिलीची परीक्षा पूर्ण केली. त्यानंतर काही वर्षे गुलबर्ग्यात सत्र न्यायालयात वकिली केल्यानंतर १८९६ साली केशवरावांनी हैद्राबादेस स्थलांतर केले. पुढे पंचवीस वर्षे हैदराबाद हायकोर्टात वकिली करून केशवराव एक कर्तबगार वकील म्हणून नावाजले गेले. केशवरावांच्या गुणांना पारखून निजाम सरकारने १९२३ साली केशवरावांना न्यायमूर्तीपदी नियुक्त केले. पुढील पाच वर्षे केशवरावांनी न्यायमूर्तींच्या उच्चपदी काम केले. केशवरावांचा विवाह गीताबाईंशी झाला. दाम्पत्यापोटी तीन मुले आणि एक मुलगी जन्माला आली. तिन्ही मुलांनी विलायतेत उच्च शिक्षण घेऊन यशस्वी व्यावसायिक वाटचाल केली.
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केशवरावांचे दोन दशकाहून अधिक काळ आर्यसमाज संघटनेशी घनिष्ट संबंध होते. त्यांच्या अंतापर्यंत केशवराव हैद्राबाद आर्यसमाजाचे अध्यक्ष होते. हैदराबाद सामाजिक सुधारणा संघाच्या स्थापनेत केशवरावांचा मोठा सहभाग होता. ते संस्थेचे प्रथम अध्यक्ष होते. केशवरावांच्या प्रयत्नाने हैद्राबाद राज्यातील मराठी भाषिकांच्या सोयीसाठी २५ ऑक्टोबर १९०७ रोजी विवेक वर्धिनी पाठशाळेची स्थापना करण्यात आली. केशवराव संस्थेचे पहिले अध्यक्ष होते. त्याच सुमारास केशवरावांचे मित्र श्री विठ्ठलराव देऊळगावकर यांनी गुलबर्गा येथे नूतन विद्यालयाची स्थापना केली. शाळेच्या स्थापनेत केशवरावांचा सक्रिय सहभाग होता. १९१८ साली हैदराबादमध्ये इन्फ्लूएंझाचा सामना करण्यासाठी “सोशल सर्व्हिस लीग” सुरू करण्यात त्यांचा सक्रिय सहभाग होता. त्यांच्या या निस्वार्थ कार्यासाठी हैद्राबाद सरकारने त्यांचा विशेष गौरव केला. श्री लक्ष्मणराव फाटक यांनी १९२० मध्ये सुरू केलेल्या “निजाम विजय” या मराठी वृत्तपत्राला त्यांनी सक्रिय पाठिंबा दिला. बळवंत गणेश खापर्डे यांनी १९२३ मध्ये सुरू केलेल्या “विदर्भ साह���त्य संघ” याचे पहिले अध्यक्ष म्हणून केशवरावांची निवड झाली.
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केशूभाई पटेल (२४ जुलै, १९२८ - ) हे भारतीय जनता पक्षाचे नेते आहेत.त्यांनी १९९५ आणि १९९८ ते इ.स. २००१ या काळात गुजरात राज्याचे मुख्यमंत्री म्हणून काम बघितले.
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केस हा त्वचेचा अविभाज्य घटक आहे. केस केवळ काही नॅनो मीटर जाडीचा असतो. केस हे केराटिन नावाच्या प्रथिनापासून बनलेले असतात.
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केस हा घटक विघटनक्षम आहे
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केसांमधे गंधक हा घटक असतो.केसांचा रंग काळा किंवा लाल आसू शकतो .
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केस(Hair) स्तनधारी प्राण्यांच्या बाह्य चर्मचे उद्वर्ध (outer growth) आहे. कीटकामध्ये शरीरावर जे तंतुमय उद्वर्ध असते, त्यांना ही केस म्हणतात. केस मऊ ते कडक, (जसे की सूअर) आणि टोकदार सुद्धा(जसे की साही चे) असते. प्रकृति ने थंड आणि गरम प्रभाव वाले क्षेत्रांमद्धे राहणारे जीवांना केस दिले आहे., जे थंडीत थंडी पासून रक्षा करतात आणि गर्मीत जास्त ताप ने डोक्याची रक्षा करते. जेव्हा शरीरात असहनशील गर्मी पडते, तेव्हा शरीरातून घाम वाहून बाहेर पडतो.
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केसांचे स्थान मुलगा व मुलगी यांत वेगवेगळे असते.
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मुलगा-मस्तक, गाल(दाढी),ओठांच्या वरील भाग (मिशी),छाती,काखा,हात, पाय,जांघा इ.
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मुलगी-मस्तक, हात,पाय,काखा,जांघा इ.
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केसांचा रंग शरीरातील मेलॅनिन नावाच्या रंगद्रव्याच्या प्रमाणावर ठरतो.
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केस लाल, काळ्या, सोनेरी व राखाडी रंगाचे असतात. त्यातील सोनेरी केस सर्वात जास्त जाडीचे असतात. काळे, राखाडी व लाल केस अनुक्रमे कमीकमी जाडीचे होत जातात.
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कमी वयातच केस गळत असतील तर ते अनुवांशिक असते. याला अँड्रोजेनिक एलोपेसिया असेही म्हणतात.
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त्याच बरोबर चुकीचा आहार, पर्यावरण प्रदूषण, औषधे या मुले ही केस गळती होऊ शकते. यावर काही घरगुती उपाय
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१. जटामासी या वनस्पतीला नारळाच्या तेलामध्ये उकळा थंड झाल्यावर वापर करा.[ संदर्भ हवा ]
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केसांची रचना: कातडीच्या बाहेर केसांचा जो अंश राहतो त्याला कांड (sheft) म्हणतात. कांडचे तीन भाग आहे. सर्वात बाहेर असणाऱ्या भागाला क्यूटिकल (cuticle) म्हणतात. क्यूटिकलच्या खाली एक कडक अस्तर असते, ज्याला वल्कुट (cortex) म्हणतात वल्कुटच्या खाली मध्य भागला मध्यांश (medulla) म्हणतात. कातडीच्या आत असणाऱ्या केसाच्या भागाला मूळ(root) म्हणतात. केस वाढल्या ने मूळ हळू हळू कांड मध्ये बदलते. भिन्न-भिन्न जंतू मध्ये केसांची वृद्धि भिन्न-भिन्न दर ने होते.
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साधारणत: म्हणटले जाते की एका महिण्यात केसं अर्धा इंच, किंवा एका वर्षात पाच ते सहा इंच वाढतात. मूळ एका खड्डयात असते त्याला पुटक (follicle)म्हणतात. पुटक मधुनच केसं निघतात. एका पुटकातून एक केस, किंवा एकपेक्षा अधिक केसं निघुन शकतात. पुटक नासपातीच्या आकाराची पैपिला मध्ये बनलेला असतो. हे पैपिला चर्मचे बनलेले असते. पैपिला आणि पुटकच्या संगमावरच केस बनते. पैपिला रुधिरवाहिनी शी संबद्ध असते. या पासुनच मूळाला ते सर्व मिळते ज्या पासून केसांचे निर्माण होते व वाढ होते. जो पर्यंत पैपिला आणि पटक नष्ट नही होतात तो पर्यंत केसं वाढत राहतात. खोपड़ीचे केसं दोन ते सहा वर्षांपर्यंत जीवित राहतात. त्या नंतर ते गळतात आणि त्या जागी नवीन केसं येतात. हे क्रम वयस्क काळा पर्यंत चालू राहते. केस का गळतात वयस्कर मध्ये त्या जागी नवीन केस का नाही येत, याचे कारण अजून पर्यंत ठीक प्रकारे समझे नाही. काही जन खोपड़ीच्या रोगांमुळे गंजे होतात.
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किरणन द्वारे ही काही लोकं बहुधा अस्थायी रूपेण गंजे होतात. अंतःस्रावी ग्रंथीच्या स्रावात कमी, वंशागत कारण आणि जीर्णन मुळे ही केस झड़तात. अपौष्टिक आहारा मुळे केस शुष्क आणि द्युतिहीन (dull) होऊन काही प्रमाणात झडू शकतात, परंतु सामान्य गंजेपनाचे हे कारण नाही.
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केसांचे रंग: वर्णकांमुळे केस काळे, भूरकट, किंवा लाल होउ शकतात. ते वर्णक वल्कुटच्या कोशिकांमध्ये निक्षिप्त असते. केस का पांढरे होतात याचे कारण ज्ञात नाही. हे संभव आहे की वय वाढते, रुग्णता, चिंता, शोक, आघात किंवा काही विटामिनच्या कमतरतेमुळे असे होउ शकते. डाक्टरांचे मत आहे की पांढरे केस होने हे वंशागत असते.
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बाल प्रधानत: खालील प्रमाणे चार प्रकारची असतात:
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1. आदिवासी (ऑस्ट्रेलिया और भारत के आदिवासी अपवाद हैं) आणि हबाशींचे केस छोटे-छोटे, कुंचित आणि कुरूळकर असतात. यांना लोकरीचे केसवाले पण म्हणतात. या केसांचे अनुप्रस्थ परिच्छेद दीर्घवृत्तीय, किंवा वृक्कनुमा आकार असते. या केसांचा रंग नेहमी काळा असतो. असे केस दोन प्रकारचे असतात. मेलानीशियाई आणि अधिकांश हबशींचे केस अपेक्षा लांब आणि त्यांचे घूँघर मोठे असतात. काही आदिवासी समाजातील लोकांचे हबशीचे केस छोटे आणि त्यांचे घूँघर छोटे असतात.
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2. पीत जातीचे (चीनियों, मंगोलों) आणि अमरीकी इंडियनचे केस सरळ अकुंचित आणि रफ असतात यांच्या केसांचे अनुप्रस्थ परिच्छेद गोलाकार असतात आणि या केसांचा रंग पण बिना अपवाद काळा असतो.
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3. यूरोपवाल्यांचे केस लहरदार, कुरूळे, चिकणे आणि रेशमा सारखे मऊसूत असतात केसांचे अनुप्रस्थ परिच्छेद अंडाभ होते. यात मध्यांश नलाकार असतो. यांचा रंग काळा, भूरकट, लाल, किंवा सनच्या रेशे या सारखे असते. भारतीयांचे केस ही याच प्रकाराचे असतात.
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केस धुतल्यानंतर ते अतिशय हलक्या हाताने कोरडे करणे गरजेचे असते. जोर लावून केस पुसल्यास ते तुटण्याची शक्यता जास्त असते. पाणी शोषून घेईल असा अतिशय पातळ टॉवेल केस पुसण्यासाठी वापराल्यास केस तुटत नाहीत. अनेकींना केस जोरजोरात झटकण्याचीही सवय असते. हीहि सवय चुकीची आहे. त्यामुळे केस तुटू शकतात. तसेच ओले केस न विंचरता हातांनी हे केस तुम्ही सारखे केल्यास तुटण्याची शक्यता नसते.
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केस असो या शरीराचा अन्य अवयव, मसाज हा चांगलाच असतो. केसांच्या मुळांशी योग्य पद्धतीने केलेला मसाज फायदेशीर असतो. त्यामुळे शरीरातील रक्तप्रवाह सुरळीत होण्यास मदत होते. खोबरेल तेल किंवा बदाम तेलाने मुळांना मसाज केल्यास केसांची गुणवत्ता सुधारण्यास मदत होते. यामध्ये स्वतःच्या हाताने, कुटुंबातील व्यक्तीकडून, मैत्रिणींकडून किंवा पार्लरमध्ये मसाज करण्याचे पर्याय उपलब्ध आहेत.
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केसांमध्ये नैसर्गिकरीत्या तेल तयार होत असते आणि हे तेल केसांच्या आरोग्यासाठी आवश्यक असते. अनेकांना विशेषतः मुलींना केस चांगले दिसावेत यासाठी रोज केस धुण्याची सवय असते. परंतु ही सवय धोकादायक आहे .अशामुळे केसात निर्माण होणारे नैसर्गिक तेल नष्ट होते आणि केसांची गुणवत्ता खराब होते नैसर्गिक केस हेच उत्तम केस असतात.
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शरीराच्या अवयवांप्रमाणेच केसांनाही योग्य पद्धतीने पोषण होणे अतिशय गरजेचे असते. केसांच्या मुळांना तेल लावल्याने केसांच्या वाढीसाठी आवश्यक ती पोषकद्रव्ये मिळतात. त्यामुळे केस लांब आणि मजबूत राहतात. केसांना कोमट तेल लावल्यानंतर केसांच्या मुळांना हलक्या हाताने मसाज करतात. तेल लावल्यानंतर टॉवेल गरम पाण्यात टाकून तो पिळून केसांना बांधतात. असे १० मिनिटांसाठी केल्यास केसांमध्ये तेल योग्य पद्धतीने मुरण्यास मदत होते. दोन तासांनी केस शाम्पूने धुऊन टाकणे. ह्या पद्धतीने तेल लावल्यामुळे रक्तप्रवाह चांगला होण्यासही मदत होते.
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केस चांगले ठेवायचे असतील तर कंडिशनर वापरणे अतिशय आवश्यक असते. शाम्पू रोज वापरायचा नाही, परंतु कंडिशनरमुळे केसांत आर्द्रता राहण्यास मदत होते; प्रदूषण आणि धूळ यांपासून केसांचे रक्षण होते. स्वतःच्या केसांची गुणवत्ता लक्षात घेऊन योग्य तो शाम्पू आणि कंडिशनर यांची निवड करणे हेही महत्त्वाचे आहे.
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हे कालामा, अशा (तत्त्वां)चा (सर्वथा) त्याग करा।
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गायकवाडवाडा हा महाराष्ट्राच्या पुणे शहरातल्या नारायण पेठेतील वाडा आहे. या वाड्यात बाळ गंगाधर टिळकांचे वास्तव्य होते. हा वाडा लोकमान्य टिळकांनी १९०५ साली विकत घेतला. केसरी व मराठा या वृत्ततपत्रांची कार्यालयेही या वाड्यात हलवली. टिळकांनी स्थापन केलेल्या केसरी वृत्तपत्राचे कार्यालयही याच वाड्यात आहे. याच वाड्याला टिळक वाडा अथवा केसरी वाडा असेही म्हणतात.
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बडोद्याचे महाराज सयाजीराव गायकवाड यांनी बाळ गंगाधर टिळकांना हा वाडा विकत दिला. या वाड्यात येण्यापूर्वी लोकमान्य टिळक सरदार विंचूरकर वाड्यात वास्तव्य करत असत.
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या वाड्यास जसा टिळकवाद्यांचा सहवास लाभला तसाच लोकमान्य टिळकांचे पुत्र हे सुधारणावादी आणि रविकिरण मंडळ यात आघाडीत असल्यामुळे सुधारणावादी चळवळी आणि काव्य वाचनांचाही लाभ झाला.
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इ.स. १९०५ पासून टिळक वाड्यात केसरी संस्थेचा गणेश उत्सव होऊ लागला. लोकमान्य टिळकांची व्याख्याने तेथे होत असत.
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इ.स. १९२५ नंतर लोकमान्यांचे चिरंजीव श्रीधरपंत टिळक आंबेडकरांकडे ओढले गेले. त्यांच्या अनेक कार्यक्रमात श्रीधरपंत हजर असल्याचे उल्लेख बहिष्कृतमध्ये आहेत. महाड चवदार तळ्याच्या सत्याग्रहातही श्रीधरपंतांची शुभेच्छांची तार सर्वांत आधी वाचून दाखवण्यात आली होती. लोकमान्य टिळक यांचे पुत्र रामचंद्र आणि श्रीधर हे दोघे बंधू मुंबईस आले तर आंबेडकरांना भेटल्याशिवाय पुण्यास जात नसत. साहेब पुण्यास गेले तर साहेबांना गायकवाडवाड्यातील आपल्या राहात्या घरी घेऊन जाण्याचे ते प्रयत्न करीत. माझ्यामुळे तुम्हाला त्रास होईल, असे त्यांना समजावून सांगून साहेब त्यांना परत पाठवीत.
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इ.स. १९२५ साली प्रबोधनकार ठाकऱ्यांच्या पुण्यातील वास्तव्यात श्रीधरपंत टिळकांनी त्यांची पहिल्याच दिवशी भेट घेतली. त्या भेटीत मागास बहुजनसमाज आणि प्रामुख्याने अस्पृश्य समाज यांच्या उत्कर्षाविषयी आपली कळकळ त्यांनी मनमोकळी व्यक्त केली होती.
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श्रीधरपंत टिळकांनी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांच्या चवदार तळ्यावर सत्याग्रहात सहभाग घेतला होता. ८ एप्रिल, इ.स. १९२८ रोजी समता संघाची पुण्याची शाखा त्यांनी स्वतःच्या गायकवाड वाड्यात सुरू केली. उद्घाटनाकरिता स्वतः डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर हजर होते.
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समतासंघाच्या स्थापनेच्या वेळच्या त्या सहभोजनाच्या वेळी ग्रंथालयाच्या स��ागृहात जेवणाच्या पंक्ती मांडल्या होत्या. दलित नेते पां.ना. राजभोज तेथे होते. श्रीधरपंतांनी टिळकवाड्यात समाजसमता संघाची स्थापना केल्यामुळे आणि सहभोजनाच्या कार्यक्रमामुळे पुराणमतवादी मंडळींना राग आला व त्यांनी अनेक तऱ्हेने श्रीधरपंतांना त्रास देण्यास सुरुवात केली. सहभोजनाच्या वेळी वीजपुरवठा खंडित करण्यात आला. खोट्या अफवा उठवल्या गेल्या, पण गोड्या तेलाचे दिवे पेटवून डॉ. आंबेडकरांसह सहभोजन आनंदाने पार पडले.
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ब्राह्मणेतर मंडळींच्या पाठिंब्याने टिळकबंधू रामभाऊ आणि बापू मनात आणतील ते करत असल्यामुळे त्यांनी अस्पृश्यांचा मेळा गायकवाड वाड्यात आणू नये म्हणून वाड्याच्या ट्रस्टींनी दोन गोष्टी केल्या. पहिली ही अस्पृश्य मेळा वाड्यात आणू नये असा मनाई हुकूम बजावून घेतला. पण टिळक बंधूंनी असे हुकूम बेधडक झुगारून फेटाळण्याचा आणि परिणामांना तोंड देण्याचा धीटपणा अनेक वेळा दाखविला होता. तो अनुभव लक्षात घेऊन ट्रस्टींनी दुसरी एक शक्कल काढली. फौजदारी प्रतिबंधाला ठोकरून त्या पोरांनी मेळा आत घुसवलाच, तर निदान गणपतीबाप्पाला अस्पृश्यांच्या स्पर्श तरी होऊ नये, एवढ्यासाठी वाड्यातल्या गणपतीच्या मखराभोवती लोखंडी पिंजरा उभारून त्याला भलेभक्कम टाळे ठोकले. पण हे टाळेही फोडले तर? त्याचाही एक मनाई हुकूम ट्रस्टींनी मिळवून तो टिळक बंधूंवर बजावण्यासाठी बेलिफाला वाड्याच्या दरवाजावर आणून बसवला.
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सकाळी एकदोन वेळा वाड्यात येऊन बेलिफाने रामभाऊनी बापू यांना नोटीस घेण्याबद्दल विनंती केली. दोघांनीही बाहेर बस, आत वाड्यात पाऊल टाकलेस तर याद राखून ठेव, असे धमकावून त्याला बाहेर घालवला. एकदा तर रामभाऊ त्याच्या अंगावर धावून गेले. सामोपचाराने बेलिफाला नोटीस लागू करता येणार नाही, असे दिसतातच, ट्रस्टींपैकी एकाने कोर्टाकडे धाव घेऊन खुद्द नाझरलाच वाड्यात आणले. त्यांनी टिळकबंधूंशी शक्य तितक्या सभ्यतेने आणि शांततेने चर्चा केली. हा प्रकार गणपतीच्या पिंजऱ्याजवळच चालला होता. रामभाऊंनी एक मोठा हातोडा सदऱ्याखाली लपवून आणला होता. नाझर साहेबांचा कायदेबाजीचा सगळा वेदान्त ऐकल्यावर रामभाऊ ठासून म्हणाला, अहो नाझर साहेब, आमच्या थोर वडिलांची सारी हयात तुमच्या सरकारने तुरुंगातच खतम केलीत ना? आता सहन होणार नाही, तुमची नोटीस ठेवा तुमच्या खिशात. आमचे काम हेच. ���से म्हणून रामभाऊने ताडकन हातोड्याचा प्रहार करून पिंजऱ्याचे टाळे फोडले आणि सगळा पिंजरा उखडून दूर भिरकावून दिला. बिचारा नाझर काय करणार? आला तसा निमूट परत गेला.
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याच दिवशी संध्याकाळी पांडोबा राजभोज यांचा अस्पृश्यांचा श्रीकृष्ण मेळा गायकवाड वाड्यात जाणार होता. वरील प्रकार झाल्यानंतर मेळा बरोबर आणल्याशिवाय पुन्हा इकडे फिरकू नकोस. मी आहे येथे खबरदार, असे बजावून रामभाऊने श्रीधरपंतांना प्रबोधनकार ठाकऱ्यांकडे जाऊन बसण्यास सांगितले. वाड्यात काय चालले आहे याची माहिती श्रीधरपंतांनी प्रबोधनकारांना दिली. श्रीधरपंत सबंध दिवस ठाकऱ्यांकडे बसलेले होते.
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संध्याकाळी दिवेलागणी होताच श्रीधरपंत पुणे कॅंपात भोकरवाडीला गेला. रात्री ८ वाजता मेळ्याला घेऊन ते प्रबोधन कचेरीवर आले. तेथे सडकेवरच मेळ्याच्या गायनाचा कार्यक्रम झाला. कचेरी असलेल्या सदाशिव पेठेसारख्या ब्राम्हणी अड्डयात अस्पृश्यांच्या मेळ्याचा कार्यक्रम एक चमत्कारिक आकर्षणाची बाब होती. आजूबाजूला बघ्यांची खूप गर्दी जमली होती. मेळा तेथून गायकवाड वाड्यात जाणार असा सगळीकडे बोभाटा झालाच होता.
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इकडे गायकवाड वाड्याच्या दरवाजावर दोन गोऱ्याया सार्जंटांच्या अधिपत्याखाली एक पोलिसपार्टी अडसरासारखी उभी होती. रामभाऊ वाड्याबाहेर दरवाजासमोर एकटाच शतपावली घालीत फिरत होता. आमच्याकडून एक सायकलस्वार ५-५, १०-१० मिनिटांनी तिकडे फेऱ्या घालून रामभाऊंच्या सूचना आणीत होता. खुशाल या, असा रामभाऊचा सिग्नल मिळताच मेळा गाणी गात वाड्याकडे निघाला. रस्त्यात बघ्यांची गर्दी होतीच. छत्रपती मेळ्याची मंडळीही वाड्यासमोर चंग बांधून तयार होती.
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मेळा गात गर्जत वाड्याजवळ येताच बापू (श्रीधपंत टिळक) आणि रामभाऊ आघाडीला उभे राहिले. दरवाजाजवळ येताच पोलीसपार्टीने दरवाजाला आपले कूस घातले. एका सार्जंटाने दोन्ही हात पसरून 'यू कॅनॉट एंटर द वाडा' असा दम भरला. रामभाऊने एक मुसंडी मारून त्याला बाजूला सारले आणि पोलिसांची फळी फोडून तो आत घुसताच बरीच मंडळीही घुसली. त्या प्रचंड जनप्रवाहाला पाहून पोलीस आणि सार्जंट बाजूला झाले. मेळा गणपतीसमोर जाऊन थांबताच पद्य गायनाला जोरात सुरुवात झाली. सुमारे अर्धा तास कार्यक्रम झाल्यावर, गुलाल प्रसाद वगैरे शिष्टाचार झाले आणि मेळा शांतपणे आला तसा बाहेर गेला. कार्यक्रम चालू असतानाही बिचारा कोर्टाचा बेलीफ दोन तीन वेळा नोटिशीचा कागद हालवीत बापूजवळ आला. त्याने त्याला हुसकावून बाजूला बसायला सांगितले गेले. मेळा निघून गेल्यावर तो पुन्हा बापूजवळ आला. वास्तविक ज्या कामाची मनाई करण्यात आली होती ते काम तर झालेच होते. बापूने नोटीशीचा कागद हातात घेतला आणि टराटरा फाडून टाकला.
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मेळा गेल्यावर बापू आणि इतर ५-६ मंडळी प्रबोधन कचेरीत आली. हा शुक्रवारचा दिवस होता. प्रबोधनकारांनी केलेल्या लोकहितवादी साप्ताहिकाचा अंक दुसऱ्या दिवशी म्हणजे शनिवारी बाहेर पडायचा होता. मेळ्याची सविस्तर माहिती देण्यासाठी शेवटचे ८ वे पान राखून ठेवण्याचे बापूने सांगितले होते. मंडळी छापखान्यात येताच बापूने झाल्या हकीकतीचा वृत्तान्त सांगितला आणि तो श्रीपतराव शिंद्यांच्या चिरंजीवाने (माधवरावने) लिहून काढला. कंपोझिटर्स तयार होतेच. मजकूर कंपोझ होऊन, 'गायकवाड वाड्यावर अस्पृश्यांच्या मेळ्याची स्वारी', या मथळ्याखाली लोकहितवादी साप्ताहिकात सबंध पानभर हकीकत छापून वक्तशीरपणे बाहेर पडली.
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लोकमान्यांचे सुपुत्र श्रीधरपंत टिळक यांच्या प्रोत्साहनाने आणि आधारामुळे रविकिरण मंडळाच्या काव्यमैफली टिळकांच्या गायकवाड्यातच व्हायच्या.
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पुण्याच्या केसरी सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडळ या संस्थेचा गणपती इ.स. १८९४ पासून बसू लागला. त्यावेळी लोकमान्य टिळक हे विंचूरकर वाड्यात राहात होते. इ.स. १९०५ पासून टिळक वाड्यात केसरी संस्थेचा उत्सव होऊ लागला. लोकमान्य टिळकांची व्याख्याने तेथे होत असत. या गणपतीची पालखीतून मिरवणूक निघते. हा पुण्यातील मानाच्या पाच गणपतीपैकी एक समजला जातो. इ.स. १९९८ मध्ये श्रींची मूर्ती संत ज्ञानेश्वरांच्या ज्ञानेश्वरीमधील वर्णनाप्रमाणे तयार करण्यात आली.
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या वास्तूत आता संग्रहालय आहे. वास्तूतील लोकमान्यांचा पुतळ्याचे अनावरण मोतीलाल नेहरूंच्या हस्ते झाले होते. हा पुतळा मुंबईच्या गिरगाव चौपाटीवरील टिळकांच्या पहिल्या पुतळ्याची प्रतिकृती आहे. (टिळकांचा पहिला पुतळा त्यांच्या हयातीतच वाघ स्टुडिओचे संस्थापक विनायकराव वाघ यांनी १९१६ साली लोकमान्यांच्या इच्छेनुसार समोर बसवून हा पुतळा बनवून घेतला होता.)
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केसळापूर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नागपूर जिल्ह्यातील उमरेड तालुक्यातील एक गाव आहे.
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