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छंद हा शब्द 'पद्याची घडण' ह्या अर्थानेही वापरतात. या प्रकाराचा वापर मराठी, संस्कृत, पंजाबी, हिंदी, उर्दू भाष़ांत वापर जातो. एखादी कविता कोणत्या छंदात लिहिली आहे असे विचारताना छंद ह्या शब्दाचा वरील अर्थ अभिप्रेत असतो. छंदःशास्त्र हे पद्याच्या म्हणजे लयबद्ध अक्षररचनेच्या घटनेचा अभ्यास करणारे शास्त्र आहे. पद्याची घडण तपासून छंदःशास्त्र त्यातील आकृतिबंध निश्चित करते. असा आकृतिबंध म्हणजेच छंद होय.
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विविध भाषांत पद्य म्हणजे लयबद्ध अक्षररचना निर्माण करण्याचे मार्ग वेगवेगळे असतात. उदा. संस्कृतासारख्या भाषेत पद्य हे मुख्यत्वे उच्चाराचा कालावधी कमी-अधिक असलेल्या स्वरांच्या विशिष्ट क्रमाने येणाऱ्या रचनेतून निर्माण होते. इंग्रजीसारख्या भाषेत शब्दावयवावर येणारा आघात लय निर्माण करतो. छंदःशास्त्री ह्या असे लयनिर्मितीमागचे निकष शोधून पद्याच्या घडणीची व्यवस्था लावतात.
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माधवराव पटवर्धन ह्यांनी आपल्या छंदोरचना ह्या ग्रंथात छंदांची विभागणी पुढील तीन प्रकारांत केली आहे.
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या छंदांचे विस्तृत विवरण संस्कृत - विकिपीडियावर छंद या वर्गात उपलब्ध आहे. त्यात छंदाचे नाव, प्रत्येक पादातील अक्षरसंख्या, छंदाचे लक्षण, गणविवरण आणि उदाहरण एवढ्या बाबींचा समावेश आहे.
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गडचिरोली-चिमूर हा महाराष्ट्रातील ४८ लोकसभा संसद मतदारसंघांपैकी एक आहे. ह्या मतदारसंघामध्ये गोंदिया जिल्ह्यामधील १, गडचिरोली जिल्ह्यामधील ३ व चंद्रपूर जिल्ह्यामधील २ असे एकूण ६ विधानसभा मतदारसंघ समाविष्ट केले गेले आहेत. हा मतदारसंघ २००८ साली निर्माण करण्यात आला असून तो अनुसुचित जमातीच्या (ST) उमेदवारांसाठी राखीव ठेवला गेला आहे..
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{{Election box begin | शीर्षक = सामान्य मतदान २००९
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|state=uncollapse
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| मतदारसंघ = गडचिरोली-चिमूर
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|- class="vcard"
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! style="background-color:orange; width: 5px;" |
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| class="org" style="width: 130px" | भाजप
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| class="fn" | अशोक नेते
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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|-
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|- class="vcard"
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! style="background-color:#00BFFF; width: 5px;" |
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| class="org" style="width: 130px" | काँग्रेस
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| class="fn" | नामदेव उसेंडी
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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|-
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|- class="vcard"
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! style="background-color:#0072B0 ; width: 5px;" |
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| class="org" style="width: 130px" | आम आदमी पार्टी
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| class="fn" | डॉ. रमेशकुमार गजबे
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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+
| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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|-
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+
|- style="background-color:#F6F6F6"
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| colspan="3" style="text-align: right; margin-right: 0.5em" | बहुमत
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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+
| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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+
| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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+
|-
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+
|- style="background-color:#F6F6F6"
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| colspan="3" style="text-align: right; margin-right: 0.5em" | मतदान
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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+
| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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| style="text-align: right; margin-right: 0.5em" |
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२१° १६′ १२″ N, ८१° ३६′ ००″ E
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छत्तीसगढ हे नाव १५ व्या शतकात परिसरातील ३६ गडांवरून पडले असावे असा अंदाज आहे. यापैकी रायपूर आणि रतनपूर क्षेत्रात प्रत्येकी १८ गड आहेत. या काळाच्या आधी या भागास दंडकारण्य-दक्षिणकोशल या नावाने ओळखले जात होते. प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ रामायणनुसार, भगवान श्रीरामांनी आपला वनवासाचा काळ याच भागात घालवला. अशा रीतीने त्याकाळी दंडकारण्य म्हणून ओळखले जाणारे हे क्षेत्र श्रीरामाची कार्यभूमी होती. इ.स.पूर्व ७२ ते २०० इ.स.पर्यंत सातवाहन राजांनी राज्य केले. इसवी सन पूर्व ६०० ते १३२४ पर्यंत या भागात नल आणि नाग या भागात आदिवासी हिंदू राजांचे गोंड संस्कृती असलेले राज्य होते.[१] स्वातंत्र्यपूर्व काळात छत्तीसगढ राज्य मध्य प्रांताचा भाग होते. छत्तीसगड वर काही काळ मराठा साम्राज्याचे नियंत्रण होते. येथे बस्तर, कांकेर, नांदगाव, खैरागढ, छुईखदान, कावर्धा, रायगढ, सक्ती, सारंगगढ, सुरगुजा, जशपूर, कोरिया, चांगभरवार आणि उदयपूर संस्थान ही १४ छोटी हिंदू संस्थाने होती. तर रायपूर, बिलासपूर, दुर्ग ही खालसा राज्ये होती. भारताच्या स्वातंत्र्यानंतर १९४८ साली छत्तीसगढचा समावेष मध्य भारतात करण्यात आला. १९५० साली मध्य भारतचे नाव बदलून ते मध्य प्रदेश करण्यात आले. १ नोव्हेंबर १९५६ला एकदा आणि महाराष्ट्र राज्याची निर्मिती झाल्यावर एकदा मध्य प्रदेश राज्याची नवी रचना करण्यात आली. या प्रत्येक वेळी छत्तीसगढ राज्य मध्य प्रदेशचाच भाग होते. १ नोव्हेंबर २०००ला छत्तीसगढ नावाच्या नव्या, २६ व्या, राज्याची रचना करण्यात आली.
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छत्तीसगढ राज्य आकारमानाच्या दृष्टीने भारतातील ९ व्या क्रमांकाचे मोठे राज्य आहे. याची पूर्व-पश्चिम लांबी सुमारे ७०० कि. मी. असून उत्तर-दक्षिण रुंदी सुमारे ४३५ कि. मी. आहे.
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छत्तीसगढ राज्यात पुढील नद्या आहेत[३]:
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छत्तीसगढ राज्याच्या उत्तरेला उत्तर प्रदेश व झारखंड, वायव्येला मध्य प्रदेश, पश्चिमेला महाराष्ट्र, दक्षिणेला आंध्र प्रदेश व पूर्वेला ओडीशा ही राज्य आहेत.
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छत्तीसगढ राज्यात २७ जिल्हे आहेत. यावरील विस्तृत लेख येथे आहे.
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राज्यात ३ राष्ट्रीय उद्याने आणि १० अभयारण्ये आहेत. यावरील माहितीसाठी छत्तीसगढमधील राष्ट्रीय उद्याने आणि छत्तीसगढमधील अभयारण्ये येथे भेट द्या.
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dataset/scraper_3/batch_3/wiki_s3_10051.txt
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छत्रपती चौक मेट्रो स्थानक हे नागपूर मेट्रोच्या केशरी मार्गिकेतील बारावे स्थानक आहे. हा मार्ग नागपूरातून उत्तर-दक्षिण असा आहे. हे स्थानक उन्नत (एलिव्हेटेड) आहे. या मार्गिकेहून निळ्या मार्गिकेत असणाऱ्या स्थानकावर जाण्यासाठी अदला-बदली (इंटरचेंज)[मराठी शब्द सुचवा] स्थानक हे सिताबर्डी येथे आहे.[१])
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आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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विकिस्रोतावर काय चालेल ?
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प्रताधिकारमुक्त दस्तऐवज
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छत्रपती तिसरे संभाजी (1801 - 2 जुलै, 1821) भोसले राजघराण्याचा कोल्हापूरचा राजा होता. 24 एप्रिल, 1813 ते 2 जुलै 1821 पर्यंत त्यांनी राज्य केले.
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छत्रपती शाहू महाराज टर्मिनस हे महाराष्ट्राच्या कोल्हापूर शहरामधील प्रमुख रेल्वे स्थानक आहे. मिरज-कोल्हापूर रेल्वेमार्ग येथे संपतो. कोल्हापुरातून मुंबई, पुणे, नागपूर इत्यादी शहरांकडे गाड्या सुटतात. मिरज-कुर्डुवाडी मार्गाचे रुंदीकरण पूर्ण झाल्यानंतर कोल्हापूरपासून सोलापूर व हैदराबाद पर्यंत रेल्वेप्रवास शक्य झाला आहे.
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कोल्हापूरचे मराठा सम्राट छत्रपती शाहूराजे भोसले ह्यांच्या नावावरून ह्या रेल्वे स्थानकाचे नाव दिले गेले आहे. भारतीय रेल्वेच्या मध्य रेल्वे विभागाद्वारे ह्या स्थानकाचे नियंत्रण केले जाते.
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आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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विकिस्रोतावर काय चालेल ?
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प्रताधिकारमुक्त दस्तऐवज
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छत्रपती शाहूराजे भोसले (१८ मे १६८२ ते १५ डिसेंबर १७४९), छत्रपती कार्यकाल १७०७-१७४९, भारताचा इतिहासातील धुरंधर राजकारणी, उत्कृष्ट योद्धा, प्रभावशाली मराठा शासनकर्ता,मराठा साम्राज्याचा सर्वाधिक विस्तार करणारा राजा म्हणून भारतीय आणि विशेषत्वाने महाराष्ट्रीय इतिहासावर महत्त्वपूर्ण ठसा उमटवला.
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शाहू महाराजांच्या कारकिर्दीत शिवाजी महाराजांनी उभ्या केलेल्या आणि संभाजी महाराजांनी मोठ्या शौर्याने सांभाळलेल्या स्वराज्याचा सर्वात मोठा विस्तार झाला.सातारा हे त्याकाळात भारताच्या राजकारणाचे केंद्रस्थान आणि सत्तास्थान ठरले.मध्य भारत,उत्तर भारत,माळवा,गुजरात हे महाराष्ट्राबाहेरील प्रांत मराठ्यांच्या अधिपत्याखाली आले,मुघल साम्राज्याचा अस्त होऊन मराठा साम्राज्याचा झेंडा भारतभर फडकला.
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छत्रपती शिवाजी महाराजांनी स्थापन केलेल्या मराठी राज्याच्या कोल्हापूर व सातारा अशा दोन स्वतंत्र छत्रपतींच्या गाद्या औरंगजेबाच्या मृत्यूनंतर (१७०७) निर्माण झाल्या. औरंगजेबाच्या अझमनामक मुलाने शाहूंची सुटका करून त्यांना राजपदाची वस्त्रे व राजपद दिले; मात्र चौथाई व सरदेशमुखीसाठी १७१३ पर्यंत मराठ्यांच्या अंतर्गत संघर्षामुळे त्यांना वाट पाहावी लागली. ⇨छत्रपती शाहू (कार. १७०८–४९) यांनी १२ जानेवारी १७०८ रोजी राज्याभिषेक करून घेऊन विधिवत मराठी राज्याचे अधिपती असल्याचे जाहीर केले. त्यांनी सातारा ही राजधानी केली. अष्टप्रधान मंडळ स्थापन करून मातब्बर सरदारांकडे खाती सुपूर्त केली. त्यांनी अनेक गुणी, कर्तृत्त्ववान व पराक्र मी माणसे निवडून राज्यविस्तार केला. या कामी त्यांना धनाजी जाधवराव, बाळाजी विश्वनाथ, खंडेराव दाभाडे, सेखोजी थोरात, चिमणाजी दामोदर, सुभानजी आटोळे, पुरंदरे यांसारखे कर्तबगार व निष्ठावान सरदार लाभले. दक्षिण हिंदुस्थानातील मोगलांचा सुभेदार सय्यद हुसेन अली याने छत्रपती शाहूंबरोबर १७१३ मध्ये तह केला. त्यानुसार मोगलांच्या दक्षिणेतील मुलखावर चौथाई व सरदेशमुखीचे हक्क मराठ्यांनी स्वतःहून वसूल करावे आणि त्याबदल्यात मोगल मुलखाचा बंदोबस्त करून मराठ्यांनी बादशहास दहा लाख रु. खंडणी द्यावी आणि १५,००० फौज मराठ्यांनी बादशहाच्या मदतीस ठेवावी; तसेच शाहूंच्या मातोश्री, कुटुंब वगैरेंची दिल्लीच्या बादशहाच्या कबजात असलेल्या आप्तेष्टांची मुक्तता करावी असे ठरले. त्याची शाहूंनी तत्काळ अंमलबजावणी केली; तथापि मोगल बादशहा फर्रुखसियार यास हा तह मान्य नव्हता. म्हणून त्याने सय्यद बंधूंबरोबर युद्घाची तयारी केली, तेव्हा सय्यदहु सेन अली वरील करारानुसार मराठ्यांची फौज घेऊन दिल्लीला गेला. त्या सोबत बाळाजी विश्वनाथ, राणोजी शिंदे, खंडो बल्लळ, सरसेनापती खंडेराव दाभाडे, बाजीराव, संताजी भोसले वगैरे मातब्बर सरदार होते. हे सर्व सैन्य यथावकाश फेब्रू वारी, १७१९ मध्ये दिल्लीत पोहोचले. सय्यद बंधूंनी फर्रुखसियार यास पदच्युत करून तुरुंगात टाकले आणि रफी-उद्-दरजत यास बादशाही तख्तावर बसविले. सय्यद बंधूंनी या नामधारी बादशहाकडून मराठ्यांना विधिवत सनदा दिल्या. त्यामुळे दक्षिणेतील मोगलांच्या सहा सुभ्यांतून चौथाई व सरदेशमुखी वसूल करण्याचे हक्क मराठ्यांना मिळाले आणि छ. शाहूंना स्वराज्याचा सनदशीर हक्क प्राप्त झाला. शिवाय बादशहाच्या कैदेत असलेले शाहूंच्या मातोश्री येसूबाई यांची सुटका करण्यात आली; परंतु महाराणी ताराबाई संस्थापित करवीरच्या गादीबरोबरचा म्हणजे छ. संभाजी राजांबरोबरचा संघर्ष संपला नव्हता. निजामाच्या मदतीने संभाजींनी शाहूंविरुद्घ मोहीम उघडली. ती आठ-दहा वर्षे चालली. अखेर दुसरा पेशवा पहिला बाजीराव याने निजामाचा पालखेड युद्घात पराभव करून ६ मार्च १७२८ रोजी मुंगी-शेगाव येथे तह होऊन शाहू हेच मराठ्यांचे एकमेव छत्रपती असून चौथ व सरदेशमुखीचा तोच खरा धनी आहे, हे निजामाने मान्य केले. त्यानंतर संभाजी व शाहू या बंधूंत १३ एप्रिल १७३१ रोजी वारणेचा तह झाला. या तहानुसार वारणा नदी दोन्ही राज्यांची सरहद्द म्हणून मान्य करण्यात आली.
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गडदर्शन (पुस्तक) हे मराठीतील एक पुस्तक आहे.
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छत्रपती शिवाजी महाराज आंतरराष्ट्रीय विमानतळ मुंबई (आहसंवि: BOM, आप्रविको: VABB), शहरातील आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे. हा विमानतळ पूर्वी सहार विमानतळ म्हणून ओळखला जात असे. सुमारे १८५० एकर परिसरात विस्तारलेला हा विमानतळ भारतातील सर्वात मोठा राष्ट्रीय व आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे. मुंबई शहरातील अंधेरी या रेल्वे स्टेशनपासून हा सर्वात जवळ आहे . हा विमानतळ भारतातील तसेच दक्षिण आशियातील प्रवासी वाहतुकीच्या संदर्भात, सर्वात व्यस्त विमानतळ आहे.[१][२]
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यामुळे यास भारतीय उपखंडाचे प्रवेशद्वार म्हटले जाते.
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या विमानतळाला लागूनच देशांतर्गत वाहतुकीचा विमानतळ आहे. त्याचे नावही छत्रपती शिवाजी विमानतळ आहे. त्याचे प्रवेशद्वार मुंबईतील विलेपार्ले या रेल्वे स्टेशनजवळ आहे.
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इ.स. २०१४ चे सरासरी आकडे-
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हा विमानतळ एर इंडिया यांचा मुख्य विमानतळ आहे. येथून सध्या ४६ आंतरराष्ट्रीय विमानकंपन्यांची विमाने उडतात. याशिवाय गो फर्स्ट,स्पाइसजेट, इंडिगो एरलाइन्स , विस्तारा व एअर एशिया या कंपन्यांची अनेक उड्डाणे येथून होतात. या विमानतळावर सकाळी १०:०० ते संध्याकाळी ६:३० दरम्यान दिवसातील ४५ % उड्डाणे होतात. रात्री १०:०० नंतर बव्हंशी आंतरराष्ट्रीय उड्डाणे होतात.
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मुंबईत सुरुवातीस जुहू विमानतळ हा एकच प्रवासी विमानतळ होता. दुसऱ्या महायुद्धानंतर स्वातंत्र्यप्राप्तीच्या सुमारास मुंबईत मोठा विमानतळ बांधण्याचा बेत आखण्यात आला. जुहूचा विमानतळ समुद्राच्या किनारपट्टीस लागून असल्यामुळे पावसाळ्यात विमानांच्या उड्डाण-अवतरणांना हवामानाचा अडथळा होत असे तरी हा नवीन विमानतळ आतल्या बाजूस सांताक्रुझ आणि विले पार्ले या उपनगरांदरम्यान बांधण्यात आला. त्याला नाव मात्र सांताक्रुझ विमानतळ हे देण्यात आले. इ.स. १९४८ मध्ये येथील बांधकाम झाले व जून १९४८मध्ये एर इंडियाने येथील पहिले प्रवासी उड्डाण लंडनला केले. हा नवीन विमानतळ सुरुवातीस सार्वजनिक बांधकाम खात्याच्या अखत्यारीत होता व नंतर तो प्रवासी एव्हिएशन मंत्रालयाच्या अंमलाखाली आला. १९७९साली सांताक्रुझ विमानतळाला आग लागून मोठे नुकसान झाले होते तेव्हा काही काळाकरता एक तात्पुरते टर्मिनल बांधण्यात आले. त्यानंतर १९८१मध्ये सांताक्रुझच्या पूर्वेस सहार गावाजवळ अजून एक नवीन टर्मिनल[मराठी शब्द सुचवा] बांधण्यात आले व आंतरराष्ट्रीय उड्डाण/अवतरणे तेथून सुरू झाली. ते जुने टर्मिनल आता कार्गो टर्मिनल म्हणून ओळखले जाते.
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प्रत्यक्षात हे सर्व विमानतळ एकाच मैदानाच्या विविध बाजूंना आहेत. मुंबईत जुहू नावाचा एक छोटा विमानतळ आहे, तो मात्र स्वतंत्र आहे.
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२००६मध्ये मुंबई आंतरराष्ट्रीय विमानतळ मर्यादित कंपनीने जी.व्ही.के. इंडस्ट्रीज लिमिटेड आणि एरपोर्ट्स कंपनी साउथ आफ्रिका या कंपन्यांना विमानतळाचे आधुनिकीकरण करण्याचे कंत्राट दिले आणि नवीन विमानतळ बांधवून घेतला.
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हा विमानतळ भारतीय उपखंडातील दुसऱ्या क्रमांकाचा सगळ्यात व्यस्त विमानतळ आहे. ऑफिशियल एरलाइन गाइड (ओएजी) ने मुंबई-दिल्ली मार्गाला साप्ताहिक उड्डाणांनुसार जगातल्या तिसऱ्या क्रमांकाचा सगळ्यात व्यस्त मार्ग म्हणून मान्यता दिली आहे.
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एप्रिल २००६ ते फेब्रुवारी २००७ दरम्यान छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर १,८०,००० उड्डाणे व उतरणे झाली तर २,००,००,००० प्रवाशांनी येथून ये-जा केली, पैकी १,३५,६०,००० प्रवास देशांतर्गत उड्डाणांवर होते तर ६७,३०,००० प्रवासी परदेशांहून आले-परदेशांस गेले. २००५-०६ पेक्षा हा आकडा २१.२८ % जास्त आहे.[३] विमानतळावरून ये-जा करण्यात उशीर झालेल्या विमानांच्या संख्येनुसार २००७ आणि २००८ मध्ये हा विमानतळ जगातील सगळ्यात पहिल्या क्रमांकाचा होता. फक्त ४९.९५ % विमाने वेळेवर आली-गेली. उशीर झालेल्या विमानांपैकी ५८ % विमाने अर्ध्या तासापेक्षा जास्त खोळंबली.[४]
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छत्रपती शिवाजी महाराज आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर दोन मुख्य प्रवासी टर्मिनले आहेत. टर्मिनल १ (सांताक्रुझ) देशांतर्गत तर टर्मिनल २ (सहार) सर्व आंतरराष्ट्रीय उड्डाणे व काही राष्ट्रीय उड्डाणे-अवतरणांसाठी वापरली जातात. यांमध्ये साधारण १०-१५ मिनिटांचे अंतर आहे. दोन्ही टर्मिनलवरून निघालेली विमाने एकाच धावपट्टी व इतर सुविधांचा (एरसाइड सर्व्हिसेस) उपयोग करतात. या दोन्ही टर्मिनलदरम्यान प्रवाशांची ने-आण विमानतळाच्याच गाड्या करतात.
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गेल्या काही वर्षांत धावपट्टीवरील ताण कमी करण्यासाठी नवीन टॅक्सीवे बांधले गेले आहेत. एकाच माहितीदर्शकावर सांताक्रुझ आणि सहार अशा दोन्ही विमानतळांवरील विमानांच्या येण्याजाण्याची माहिती देण्यासाठीची प्रणालीही विकासाधीन आहे. ही माहिती एर ट्राफिक कंट्रोल, आरपोर्ट रॅम्प, विमानतळांची संकेतस्थळे तसेच आसपासच्य हॉटेलांमध्येही एकाच वेळी प्रसारित करण्याचाही प्रयत्न असेल. जरी अजून एक धावपट्टी बांधणे शक्य नसले तरी विमानांना ये-जा करण्यासाठी अधिक जागा मिळावी यास्तव एर ट्रॅफिक कंट्रोल टॉवरची जागा बदलण्यात येणार आहे.
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विमानतळावर प्रवाशांसाठी फुकट वायफाय सुविधा आहे.[६]
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नविनच बांधलेल्या या टर्मिनलद्वारे प्रवाशांना अनेक सुविधा पुरविण्यात आलेल्या आहेत.यासाठी एक इंग्लिश अक्षर 'X' या आकाराची एक इमारत बनविण्यात आलेली आहे. या नव्या इमारतीचे व या नव्या टर्मिनलचे बांधकाम, असलेल्या कोणत्याही सेवा,सुविधा बंद न करता,करण्यात आलेले आहे. असलेल्या सुविधा खालील प्रकारे आहेत:
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+
मुंबईतील सांताक्रुझ, विलेपार्ले, व अंधेरी या स्थानकांवरून,तसेच पश्चिम द्रुतगती महामार्गावरूनही, वाहतुकीच्या कोंडीमुळे या विमानतळावर येण्यास बराच कालापव्यय होत असे. त्यावर उपाय म्हणून १२ फेब्रुवारी २००१४ रोजी सहार उन्नत मार्ग वाहतुकीस खुला करण्यात आला. हा सहा मार्गिका (लेन) असलेला रस्ता आहे. २०२६ पर्यंत वाहतुकीत होणाऱ्या वाढीचा अंदाज घेऊन हा मार्ग बनविण्यात आलेला आहे.
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भारतातील विविध संस्कृती व कला पर्यटकांची ओळख व्हावी म्हणून तेथे एक संग्रहालय उभे करण्यात आले आहे. त्यात अनेक चीजवस्तू आहेत.
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+
यातील वैशिष्ट्य म्हणजे येथे एक तीन किलोमीटर. लांबीची एक आर्टवॉल आहे. यात सजावटीसाठी २७२ आकाशदिव्यांचा वापर करण्यात आला आहे. मोरपिसांनी सजविलेल्या ३० मोठ्या खांबांचा वापर येथे करण्यात आलेला आहे.[ चित्र हवे ]
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| 19 |
+
यासाठी एकूण ४,३९,२०३ चौरस मीटर क्षेत्रफळाचा वापर करण्यात आला.यासाठी सुमारे ५,५०० कोटी इतका खर्च आला. याद्वारे वर्षाकाठी सुमारे ४० लाख प्रवासी हाताळता येणार आहेत. हे सध्या कार्यान्वयाधीन असून तेथील तयारी पूर्ण झाल्यावर दि. १२ फेब्रुवारी इ.स. २०१४ रोजी ते वापरासाठी खुले करण्यात येईल.
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| 20 |
+
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| 21 |
+
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| 22 |
+
आग्रा •
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| 23 |
+
अराक्कोणम •
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| 24 |
+
अंबाला •
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| 25 |
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बागडोगरा •
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| 26 |
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भूज रुद्रमाता •
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| 27 |
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कार निकोबार •
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| 28 |
+
चबुआ •
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| 29 |
+
छत्तीसगढ •
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| 30 |
+
दिमापूर •
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| 31 |
+
दुंडिगुल •
|
| 32 |
+
गुवाहाटी •
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| 33 |
+
हलवारा •
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| 34 |
+
कानपूर •
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| 35 |
+
लोहगांव •
|
| 36 |
+
कुंभिरग्राम •
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| 37 |
+
पालम •
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| 38 |
+
सफदरजंग •
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| 39 |
+
तंजावर •
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| 40 |
+
येलहंका
|
| 41 |
+
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| 42 |
+
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| 43 |
+
बेगमपेट (हैदराबाद) • एचएएल बंगळूर (एचएएल/हिंदुस्थान)
|
| 44 |
+
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| 45 |
+
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| 46 |
+
जोगबनी विमानतळ •
|
| 47 |
+
मुझफ्फरपूर विमानतळ •
|
| 48 |
+
पाटना: लोकनायक जयप्रकाश विमानतळ •
|
| 49 |
+
पूर्णिया विमानतळ •
|
| 50 |
+
रक्सौल विमानतळ
|
| 51 |
+
|
| 52 |
+
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| 53 |
+
बिलासपूर विमानतळ •
|
| 54 |
+
जगदलपूर विमानतळ •
|
| 55 |
+
Raipur: विमानतळ
|
| 56 |
+
|
| 57 |
+
|
| 58 |
+
चकुलिया विमानतळ •
|
| 59 |
+
जमशेदपूर: सोनारी विमानतळ •
|
| 60 |
+
|
| 61 |
+
|
| 62 |
+
बारवानी विमानतळ •
|
| 63 |
+
भोपाळ: राजा भोज विमानतळ •
|
| 64 |
+
ग्वाल्हेर विमानतळ •
|
| 65 |
+
इंदूर: देवी अहिल्याबाई होळकर विमानतळ •
|
| 66 |
+
जबलपूर विमानतळ •
|
| 67 |
+
खजुराहो विमानतळ •
|
| 68 |
+
ललितपूर विमानतळ •
|
| 69 |
+
पन्ना विमानतळ •
|
| 70 |
+
सतना विमानतळ
|
| 71 |
+
|
| 72 |
+
|
| 73 |
+
भुवनेश्वर: बिजु पटनायक विमानतळ •
|
| 74 |
+
हिराकुद विमानतळ •
|
| 75 |
+
झरसुगुडा विमानतळ •
|
| 76 |
+
रूरकेला विमानतळ
|
| 77 |
+
|
| 78 |
+
|
| 79 |
+
आग्रा: खेरीया विमानतळ •
|
| 80 |
+
अलाहाबाद: बमरौली विमानतळ •
|
| 81 |
+
गोरखपूर विमानतळ •
|
| 82 |
+
झांसी विमानतळ •
|
| 83 |
+
कानपूर: चकेरी विमानतळ •
|
| 84 |
+
ललितपूर विमानतळ
|
| 85 |
+
|
| 86 |
+
|
| 87 |
+
अलाँग विमानतळ •
|
| 88 |
+
दापोरिजो विमानतळ •
|
| 89 |
+
पासीघाट विमानतळ •
|
| 90 |
+
तेझू विमानतळ •
|
| 91 |
+
झिरो विमानतळ
|
| 92 |
+
|
| 93 |
+
|
| 94 |
+
दिब्रुगढ: मोहनबारी विमानतळ •
|
| 95 |
+
जोरहाट: रौरिया विमानतळ •
|
| 96 |
+
उत्तर लखिमपूर: लिलाबारी विमानतळ •
|
| 97 |
+
सिलचर: कुंभीरग्राम विमानतळ •
|
| 98 |
+
तेझपूर: सलोनीबारी विमानतळ
|
| 99 |
+
|
| 100 |
+
|
| 101 |
+
इंफाल: तुलिहाल विमानतळ
|
| 102 |
+
|
| 103 |
+
|
| 104 |
+
रुपसी विमानतळ •
|
| 105 |
+
शेला विमानतळ •
|
| 106 |
+
शिलाँग: उमरोई विमानतळ
|
| 107 |
+
|
| 108 |
+
|
| 109 |
+
ऐझ्वाल: लेंगपुई विमानतळ
|
| 110 |
+
|
| 111 |
+
|
| 112 |
+
दिमापूर विमानतळ
|
| 113 |
+
|
| 114 |
+
|
| 115 |
+
पाकयाँग विमानतळ
|
| 116 |
+
|
| 117 |
+
|
| 118 |
+
अगरतला: सिंगरभिल विमानतळ •
|
| 119 |
+
कैलाशहर विमानतळ •
|
| 120 |
+
कमलपूर विमानतळ •
|
| 121 |
+
खोवै विमानतळ
|
| 122 |
+
|
| 123 |
+
|
| 124 |
+
बालुरघाट विमानतळ •
|
| 125 |
+
बेहाला विमानतळ •
|
| 126 |
+
कूच बिहार विमानतळ •
|
| 127 |
+
इंग्लिश बझार: मालदा विमानतळ
|
| 128 |
+
|
| 129 |
+
|
| 130 |
+
चंदिगढ विमानतळ
|
| 131 |
+
|
| 132 |
+
|
| 133 |
+
धरमशाला: गग्गल विमानतळ •
|
| 134 |
+
कुलू: भुंतार विमानतळ •
|
| 135 |
+
शिमला विमानतळ
|
| 136 |
+
|
| 137 |
+
|
| 138 |
+
जम्मू: सतवारी विमानतळ •
|
| 139 |
+
कारगिल विमानतळ •
|
| 140 |
+
लेह: कुशोक बकुला रिम्पोचे विमानतळ
|
| 141 |
+
|
| 142 |
+
|
| 143 |
+
लुधियाना: साहनेवाल विमानतळ •
|
| 144 |
+
पठाणकोट विमानतळ
|
| 145 |
+
|
| 146 |
+
|
| 147 |
+
अजमेर विमानतळ •
|
| 148 |
+
बिकानेर: नाल विमानतळ •
|
| 149 |
+
जेसलमेर विमानतळ •
|
| 150 |
+
जोधपूर विमानतळ •
|
| 151 |
+
कोटा विमानतळ •
|
| 152 |
+
उदयपूर: महाराणा प्रताप विमानतळ (दबोक)
|
| 153 |
+
|
| 154 |
+
|
| 155 |
+
देहराडून: जॉली ग्रँट विमानतळ •
|
| 156 |
+
पंतनगर विमानतळ
|
| 157 |
+
|
| 158 |
+
|
| 159 |
+
पोर्ट ब्लेर: वीर सावरकर विमानतळ
|
| 160 |
+
|
| 161 |
+
|
| 162 |
+
कडप्पा विमानतळ •
|
| 163 |
+
दोनाकोंडा विमानतळ •
|
| 164 |
+
काकिनाडा विमानतळ •
|
| 165 |
+
नादिरगुल विमानतळ •
|
| 166 |
+
पुट्टपार्थी: श्री सत्य साई विमानतळ •
|
| 167 |
+
राजमुंद्री विमानतळ •
|
| 168 |
+
तिरुपती विमानतळ •
|
| 169 |
+
विजयवाडा विमानतळ •
|
| 170 |
+
विशाखापट्टणम विमानतळ •
|
| 171 |
+
वारंगळ विमानतळ
|
| 172 |
+
|
| 173 |
+
|
| 174 |
+
बेळगाव: सांबरे विमानतळ •
|
| 175 |
+
बेळ्ळारी विमानतळ •
|
| 176 |
+
विजापूर विमानतळ •
|
| 177 |
+
हंपी विमानतळ •
|
| 178 |
+
हस्सन विमानतळ •
|
| 179 |
+
हुबळी विमानतळ •
|
| 180 |
+
मैसुर: मंडकळ्ळी विमानतळ •
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विद्यानगर विमानतळ
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| 184 |
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अगत्ती विमानतळ
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| 187 |
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पाँडिचेरी विमा���तळ
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| 188 |
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| 189 |
+
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| 190 |
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मदुरै विमानतळ •
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| 191 |
+
सेलम विमानतळ •
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| 192 |
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तुतिकोरिन विमानतळ •
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| 193 |
+
वेल्लोर विमानतळ
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| 194 |
+
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| 195 |
+
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| 196 |
+
दमण विमानतळ •
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| 197 |
+
दीव विमानतळ
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| 198 |
+
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| 199 |
+
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| 200 |
+
भावनगर विमानतळ •
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| 201 |
+
भूज: रुद्र माता विमानतळ •
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| 202 |
+
जामनगर: गोवर्धनपूर विमानतळ •
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| 203 |
+
कंडला विमानतळ •
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| 204 |
+
केशोद विमानतळ •
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| 205 |
+
पालनपूर विमानतळ •
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| 206 |
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पोरबंदर विमानतळ •
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| 207 |
+
राजकोट विमानतळ •
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| 208 |
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सुरत विमानतळ •
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| 209 |
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उत्तरलाई विमानतळ •
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| 210 |
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वडोदरा: हरणी विमानतळ
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| 211 |
+
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| 212 |
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| 213 |
+
अकोला विमानतळ •
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| 214 |
+
औरंगाबाद: चिकलठाणा विमानतळ •
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| 215 |
+
हडपसर विमानतळ •
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| 216 |
+
कोल्हापूर विमानतळ •
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| 217 |
+
लातूर विमानतळ •
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| 218 |
+
मुंबई: जुहू विमानतळ •
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| 219 |
+
नांदेड विमानतळ •
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| 220 |
+
नाशिक: गांधीनगर विमानतळ •
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| 221 |
+
रत्नागिरी विमानतळ •
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| 222 |
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शिर्डी विमानतळ •
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| 223 |
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सोलापूर विमानतळ
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छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तुसंग्रहालय, ज्याचे मूळ नाव प्रिन्स ऑफ वेल्स म्युझियम ऑफ वेस्टर्न इंडिया, हे मुंबई येथील एक संग्रहालय आहे जे प्रागैतिहासिक काळापासून आधुनिक काळापर्यंतच्या भारताच्या इतिहासाचे दस्तऐवजीकरण करते.
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२० व्या शतकाच्या सुरुवातीच्या काळात भारतातील ब्रिटिश राजवटीत, प्रिन्स ऑफ वेल्स (नंतर जॉर्ज पाचवा, राजे किंग युनायटेड किंग्डम आणि भारताचा सम्राट) यांच्या भेटीच्या स्मरणार्थ, सरकारच्या मदतीने बॉम्बे नावाच्या शहरातील प्रमुख नागरिकांनी त्याची स्थापना केली. हे दक्षिण मुंबईच्या मध्यभागी गेटवे ऑफ इंडिया जवळ आहे. १९९८ मध्ये मराठा साम्राज्याचे संस्थापक छत्रपती शिवाजी महाराज यांच्या नावावरून संग्रहालयाचे नामकरण करण्यात आले.
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ही इमारत इंडो-सारासेनिक स्थापत्यशैलीमध्ये बांधली गेली आहे, ज्यात मुघल, मराठा आणि जैन यांसारख्या वास्तुकलेच्या इतर शैलींचे घटक समाविष्ट आहेत. संग्रहालयाची इमारत पाम वृक्षांच्या बागेने आणि औपचारिक फुलांच्या बेडांनी वेढलेली आहे.
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संग्रहालयात प्राचीन भारतीय इतिहासाचे अंदाजे ५०,००० प्रदर्शने तसेच परदेशी भूमीवरील वस्तू आहेत, ज्यांचे प्रामुख्याने तीन विभागांमध्ये वर्गीकरण केले आहे: कला, पुरातत्व आणि नैसर्गिक इतिहास. या संग्रहालयात गुप्त, मौर्य, चालुक्य आणि राष्ट्रकूट यांच्या काळातील सिंधू संस्कृतीच्या कलाकृती आणि प्राचीन भारतातील इतर अवशेष आहेत.
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या इमारतीचा आणि सभोवतालच्या परिसराचा आराखडा वास्तू विशारद, जॉर्ज विटेट याने तयार केला होता. विशेष म्हणजे ही वास्तू बघत असतानाही ती भारतीय शैलीची वाटते. ही इमारत बघताना जाळीदार नक्षीकामातून इस्लामी वास्तुतंत्राचा, ठिकठिकाणी असलेल्या झरोक्यांमुळे राजपूत शैलीचा आणि इतर कमानी किंवा व्हरांड्यांच्या रचनेतून हिंदू मंदिराच्या वास्तुतंत्राचा प्रत्यय येतो.
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१९०४ मध्ये, मुंबईतील काही प्रमुख नागरिकांनी प्रिन्स ऑफ वेल्स, भावी राजा जॉर्ज पंचम यांच्या भेटीच्या स्मरणार्थ एक संग्रहालय प्रदान करण्याचा निर्णय घेतला. 14 ऑगस्ट 1905 रोजी समितीने एक ठराव पारित केला:
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"संग्रहालयाची इमारत मुंबईच्या महान महानगराच्या उभारणीसाठी ब्रिटिश राजे त्यांच्या महत्वाकांक्षी योजनांसह पुढे जात असलेल्या वैभव आणि उंचीला मूर्त रूप देते". "स्थानिक आर्किटेक्चरच्या उत्कृष्ट शैलीला अनुसरून, अनेक इमारती बांधण्यात आल्या, त्यापैकी बॉम्बे हायकोर्टाची इमारत आणि नंतर गेटवे ऑफ इंडिया या इमारती सर्वात उल्लेखनीय होत्या".११ नोव्हेंबर १९०५ रोजी प्रिन्स ऑफ वेल्स यांनी पायाभरणी केली आणि संग्रहालयाला औपचारिकपणे "प्रिन्स ऑफ वेल्स म्युझियम ऑफ वेस्टर्न इंडिया" असे नाव देण्यात आले. १ मार्च १९०७ रोजी, बॉम्बे प्रेसिडेन्सीच्या सरकारने संग्रहालय समितीला "क्रिसेंट साइट" नावाचा एक तुकडा मंजूर केला, जिथे संग्रहालय आता उभे आहे. खुल्या डिझाईन स्पर्धेनंतर, १९०९ मध्ये वास्तुविशारद जॉर्ज विटेट यांना संग्रहालयाच्या इमारतीची रचना करण्यासाठी नियुक्त करण्यात आले. विटेट ने आधीच जनरल पोस्ट ऑफिसच्या डिझाईनवर काम केले होते आणि १९११ मध्ये मुंबईच्या सर्वात प्रसिद्ध खुणांपैकी एक, गेटवे ऑफ इंडियाची रचना केली होती.
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संग्रहालयाला रॉयल व्हिजिट (१९०५) मेमोरियल फंडाद्वारे निधी दिला गेला. शिवाय, शासन व नगरपालिकेने रु. ३,००,००० आणि रु. २,५०,००० अनुक्रमे. सर करिमभॉय इब्राहिम (प्रथम बॅरोनेट) यांनी आणखी रु. ३,००,००० आणि सर कावासजी जहांगीर यांनी रु. ५०,०००. संग्रहालयाची स्थापना १९०९ च्या बॉम्बे ऍक्ट क्र. III अंतर्गत करण्यात आली. संग्रहालयाची देखभाल आता सरकार आणि मुंबई महानगरपालिकेच्या वार्षिक अनुदानाद्वारे केली जाते. नंतरचे संग्रहालय ट्रस्टच्या विल्हेवाटीवर असलेल्या निधीवर जमा होणाऱ्या व्याजातून या अनुदानांसाठी पैसे देतात.
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संग्रहालय इमारत १९१५ मध्ये पूर्ण झाली, परंतु १९२० मध्ये समितीकडे सुपूर्द करण्यापूर्वी पहिल्या महायुद्धादरम्यान बाल कल्याण केंद्र आणि लष्करी रुग्णालय म्हणून वापरण्यात आले. प्रिन्स ऑफ वेल्स संग्रहालयाचे उद्घाटन १० जानेवारी १९२२ रोजी लेडी लॉईड, जॉर्ज लॉईड, मुंबईचे गव्हर्नर यांची पत्नी यांच्या हस्ते करण्यात आले.
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संग्रहालय इमारत ही शहराची ग्रेड I हेरिटेज इमारत आहे आणि १९९० मध्ये भारतीय हेरिटेज सोसायटीच्या बॉम्बे चॅप्टरने हेरिटेज इमारतीच्या देखभालीसाठी प्रथम पारितोषिक (अर्बन हेरिटेज अवॉर्ड) प्रदान केले होते. १९९८ मध्ये संग्रहालयाचे नाव छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय असे ठेवण्यात आले. योद्धा राजा आणि मराठा साम्राज्याचा संस्थापक शिवाजी. १९९५ मध्ये शहराचे नाव बदलल्यानंतर संग���रहालयाचे नामकरण करण्यात आले, जेव्हा वसाहती नाव "बॉम्बे" हे मूळ "मुंबई" ने बदलले.
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संग्रहालय इमारत ३ एकर (१२,००० m2) क्षेत्रात वसलेली आहे, तिचे बांधलेले क्षेत्र १२,१४२.२३ m चौरस आहे. हे पाम वृक्षांच्या बागेने आणि औपचारिक फुलांच्या बेडांनी वेढलेले आहे.
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म्युझियमची इमारत, स्थानिकरित्या उत्खनन केलेल्या ग्रे कुर्ला बेसाल्ट आणि बफ रंगीत ट्रेचाइट मालाड दगडापासून बनलेली आहे. ही एक तीन-मजली आयताकृती रचना आहे, जी पायावर एका घुमटाने आच्छादित आहे, जी इमारतीच्या मध्यभागी एक अतिरिक्त मजला जोडते. पाश्चात्य भारतीय आणि इंडो-सारासेनिक वास्तुकला शैलीत बांधलेली, इमारत एक मध्यवर्ती प्रवेशद्वार पोर्च आहे, ज्याच्या वर एक घुमट आहे, मंद आणि सुधारित "पांढऱ्या आणि निळ्या फ्लेक्समध्ये टाइल केलेले, कमळ - पाकळ्याच्या आधारावर" आहे. मध्यवर्ती घुमटाभोवती लहान घुमटांसह शिखरांचा एक समूह. या इमारतीत मुघल राजवाड्याच्या वास्तुकलेने प्रेरित असलेल्या इस्लामिक घुमटासह फायनलसह पसरलेल्या बाल्कनी आणि जडलेल्या मजल्यासारख्या वैशिष्ट्यांचा समावेश केला आहे. वास्तुविशारद जॉर्ज विटेट यांनी गोलकोंडा किल्ल्यावरील घुमट आणि विजापूरमधील गोल गुम्बाझ येथील आतील कमानींचे मॉडेल तयार केले. संग्रहालयाच्या आतील भागात १८व्या शतकातील वाडा (एक मराठा वाडा) चे स्तंभ, रेलिंग आणि बाल्कनी जैन शैलीतील आतील स्तंभांसह एकत्रित केले आहे, जे मराठा बाल्कनीच्या खाली मध्य मंडपाचे मुख्य भाग बनवतात.
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त्याच्या अलीकडील आधुनिकीकरण कार्यक्रमात (२००८), संग्रहालयाने पाच नवीन गॅलरी, एक संवर्धन स्टुडिओ, एक भेट देणारे प्रदर्शन गॅलरी आणि एक सेमिनार रूम, संग्रहालयाच्या पूर्व विंगमध्ये स्थापित करण्यासाठी ३०,००० चौरस फूट (२,८०० m2) जागा तयार केली. संग्रहालयात एक लायब्ररी देखील आहे.
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मुख्य वस्तुसंग्रहालयात फिरताना वस्तू नाजूक आणि शतकानुशतके जपलेल्या आणि अमूल्य ऐतिहासिक वारसा जपणारा असल्याने त्यांना हात लावण्यास आणि जवळून बघण्यास परवानगी नसते. लहान मुलांना फार उत्सुकता, कुतूहल आणि जिज्ञासा असते आणि त्या जिज्ञासूपणाला वाव देण्यासाठी लहान मुलांसाठी खास वस्तुसंग्रहालय बनविले आहे.श्री.सव्यसाची मुखर्जी ह्यांच्या कल्पनेतून २९ मार्च २०१९ला हे साकारण्यात आले.ह्या वस्तुसंग्रहालयाला दरवर्षी सुमारे दोन लाख विद्यार्थी भेट देतात. हे संग्रहालय दहा हजार चौरस फुट परिसरात वसविले आहे. ह्यात ॲंम्पिथिएटर,कृती प्लाझा,आणि गच्ची आहे.यातील वस्तू मुलांना हाताळला येतात.'स्वतःच शोधा,शिका आणि इतरांनाही माहिती वाटा'अशी त्रिसूत्री कल्पना येथे राबविण्यात आली आहे. रोज नवनवीन प्रयोग येथे केले जातात. एक दिवस खोदकाम, दुसऱ्या दिवशी बोर्डगेम,तिसऱ्या दिवशी गोष्टी, चौथ्या दिवशी तंत्रज्ञान असे अनेक उपक्रम राबविले जातात. या परिसरात असलेल्या गोरखचिंचेच्या झाडाखाली बसून मुले गोष्टी ऐकत असतात. साहजिकच लहान मुले कला, इतिहास, निसर्ग, संस्कृती, माती अश्या सगळ्यांशी नाते जोडतात आणि नव्या कल्पना आणि नवा आनंद घेऊन जातात.
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शिवाजीनगर (पूर्वीच भांबुर्डे) पुणे शहरातील एक भाग आहे. पुण्याचे न्यायालय, शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय, शेतकी महाविद्यालय, इ. अनेक महत्त्वाच्या संस्था या भागात आहेत. शिवाजीनगर रेल्वे स्थानक पुणे-मुंबई लोहमार्गावरील स्थानक आहे तर शिवाजीनगर बस स्थानक पुण्याला महाराष्ट्र तसेच इतर राज्यांतील महत्त्वाच्या शहरांशी जोडते.
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आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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विकिस्रोतावर काय चालेल ?
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प्रताधिकारमुक्त दस्तऐवज
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शिवाजी सातवा (२२ नोव्हेंबर १९४१ - २२ सप्टेंबर १९४६) कोल्हापूरच्या छत्रपती भोसले राजघराण्यातील होते. १९४१ पासून १९४६ पर्यंत ते राज्य करीत होते. छत्रपती राजारामराजे (दुसरे) यांना फक्त एक मुलगी होती. इतकेच लहान असल्याने, राज्याच्या कारकिर्दीत त्यांनी कोणतेही पद धारण केले नाही. १९४६ साली वयाच्या ४ व्या वर्षी ते मरण पावले आणि त्यानंतर शाहजी दुसरा यशस्वी झाला.
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त्यांचे पूर्ण नाव छत्रपती शिवाजी (सातवा) महाराज साहेब बहादूर होते.
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छत्रपती संभाजीराजे शिवाजीराजे भोसले
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(१४ मे १६५७ - ११ मार्च १६८९) हे छत्रपती शिवाजी महाराज आणि महाराणी सईबाई यांचे थोरले चिरंजीव आणि मराठा साम्राज्याचे दुसरे छत्रपती होते.
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छत्रपती संभाजी महाराजांचा जन्म १४ मे १६५७ रोजी किल्ले पुरंदर येथे झाला. राजपुत्र असल्यामुळे रणांगणावरील मोहिमा आणि राजकारणातील डावपेच यांचे बाळकडू त्यांना लहानपणापासूनच मिळाले.
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संभाजी महाराजांच्या आई, महाराणी सईबाईंचे निधन महाराज लहान असतानाच झाले. त्यानंतर पुण्याजवळील कापूरहोळ गावची धाराऊ ही स्त्री त्यांची दूध आई बनली. संभाजी महाराजांचा सांभाळ त्यांची आजी राजमाता जिजाबाई यांनी केला.
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त्यांच्या सावत्र आई, पुतळाबाई[१] यांनी देखील त्यांच्यावर खूप माया केली. मात्र त्यांंची सावत्र आई सोयराबाई[२] यांनी संंभाजी महाराजांना पोरकेेेपणाने वागवले तसेच संभाजी महाराजांच्या राजकीय कारकिर्दीत ढवळाढवळ करण्याचा प्रयत्न केला.
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अनेक ऐतिहासिक नोंदींप्रमाणे संभाजी महाराज अत्यंत देखणे आणि शूर होते. तसेच ते अनेक भाषांत विद्याविशारद व अत्यंत धुरंदर राजकारणी होते. राजकारणातील बारकावे त्यांनी भराभर आत्मसात केले होते. मुघल दरबारातील घडामोडी आणि राजकारण त्यांना लहान वयातच कळले तर त्याचा त्यांना भविष्यात उपयोग होईल या विचाराने शिवाजी महाराजांनी त्यांना आग्रा भेटीच्या वेळी बरोबर नेले. त्यावेळी संभाजीराजे ९ वर्षाचे होते. शिवाजी महाराज कैदेतून निसटल्यानंतर स्वराज्यापर्यंतची धावपळ संभाजी राजांनी सोसू नये आणि त्यामुळे त्यांना काही काळ सुरक्षित ठिकाणी ठेवणे गरजेचे होते. त्यामुळे शिवाजी महाराजांनी त्यांना मोरोपंत पेशव्यांच्या मेहुण्याच्या घरी मथुरेला ठेवले. मुघल सैनिकांचा संभाजी राजांच्या मागचा ससेमिरा थांबवण्याच्या उद्देशाने शिवाजी महाराजांनी संभाजीराजांचे निधन झाल्याची अफवा पसरवून दिली. ते महाराष्ट्रात पोहोचल्यानंतर काही काळाने संभाजी महाराज सुखरूपपणे स्वराज्यात येऊन पोहोचले.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १६७४ मध्ये शिवाजी महाराजांचा राज्याभिषेक झाला तोपर्यंत संभाजीराजे राजकारणातील लहान बारकावे आणि रणांगणातील डावपेचांमध्ये तरबेज झाले होते. त्यांच्या विनम्र स्वभावाने राज्याभिषेकासाठी रायगडावर आलेल्या प्रतिनिधींना त्यांनी आपलेसे केले.[ स���दर्भ हवा ]
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शिवाजी महाराजांचा राज्याभिषेक झाल्यानंतर १२ दिवसात जिजाऊंचे निधन झाले. त्यानंतर संभाजीराजांकडे मायेने लक्ष देणारे कोणी राहिले नाही. शिवाजी महाराज स्वराज्याच्या राजकारणात आणि रणांगणावर गुंतले होते.[ संदर्भ हवा ]
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तरुण संभाजीराजांचे शिवाजी महाराजांच्या दरबारातील अनुभवी मानकऱ्यांशी अनेकदा मतभेद होऊ लागले. संभाजी महाराजांचा अमात्य अण्णाजी दत्तोंच्या कारभाराला सक्त विरोध होता. शिवाजी महाराजांनी अण्णाजी हे अनुभवी आणि कुशल प्रशासक असल्यामुळे त्यांच्या भ्रष्ट कारभाराकडे अनेकदा दुर्लक्ष केले. पण संभाजी महाराजांना ते मान्य होणे कठीण होते. अण्णाजी दत्तो आणि इतर अनुभवी मानकरी संभाजी महाराजांच्या विरोधात गेले.[ संदर्भ हवा ]
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दरबारातील काही मानकरी संभाजी महाराजांना अपमानास्पद वागणूक देऊ लागले; हे केवळ अण्णाजी दत्तोंच्या सांगण्यावरून केले. त्यांच्या विरोधामुळे त्यांना शिवाजी महाराजांबरोबर दक्षिण हिंदुस्थानच्या मोहिमेवर जाता आले नाही. तसेच शिवाजी महाराजांच्या अनुपस्थितीत संभाजी महाराजांचे हुकूम पाळण्यास अष्टप्रधानमंडळाने नकार दिला. त्यामुळे शिवाजी महाराजांना कोकणातील शृंगारपूरचे सुभेदार म्हणून संभाजी महाराजांना पाठवावे लागले.[ संदर्भ हवा ]
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श्री शंभो: शिवजातस्य मुद्राद्यौरिव राजते |
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यदं कसेविनी लेखा वतर्ते कस्यनोपरि ||
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अर्थ: छत्रपती शिवरायांचे पुत्र छत्रपती संभाजी महाराज यांची ही राजमुद्रा जणू काही स्वर्गीय तेजाने तळपत आहे, आकाशाप्रमाणे अमर्याद आहे. या राजमुद्रेच्या आश्रयात प्रत्येक माणूस, प्रत्येक प्राणिमात्र महाराजांच्या छत्रछायेखाली असेल. छत्रपतींच्या या राजमुद्रेपेक्षा कोणीही श्रेष्ठ नाही.[ संदर्भ हवा ]
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संभाजी महाराजांना साधुसंतांबद्दल आदरभाव होता. ज्येष्ठ मांत्रिक कुडाळ ग्रामनिवासी नामदेवभट्टपुत्र बाकरेशास्त्री यांना करून दिलेल्या संस्कृतमधील दानपत्रावरून त्यांचा आदरभाव कळतो. छत्रपती संभाजी महाराजांना राजपद महत्प्रयासाने प्राप्त झाले होते. त्यांनी राजपद प्राप्तीसाठी नवस केला होता आणि त्यांना राज्याधिकार मिळाल्यानंतर तो नवस फेडण्याच्या इच्छेने त्यांनी नामदेवभट्टपुत्र बाकरेशास्त्री (ज्यांना संभाजी महाराज स्वामी म्हणतात) यांना दरसाल १०,००० पादशाही होनांचे संस्कृत दानपत्र करून दिले. हे दानपत्र संभाजी महाराजांच्या मंचाकारोहणानंतर एका महिन्याने म्हणजे दि. २४ ऑगस्ट १६८० (भाद्रपद शुद्ध १० सोमवार शके १६०२) रोजी केले आहे. दानपत्र ३०० से.मी. लांब आणि २३.५ से.मी. रुंद आहे. या दानपत्राच्या सर्वात वर मधोमध संभाजी महाराजांची १६ बुरुजी मुद्रा आहे व खाली सुवाच्य अक्षरात संस्कृतमध्ये २ ओळी लिहिल्या आहेत. त्या स्वतः शंभूराजांच्या हस्ताक्षरातील आहेत.[ संदर्भ हवा ] त्या ओळी खालीलप्रमाणे :
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|| मतं मे श्री शिवराजपुत्रस्य श्रीशंभूराज ||
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|| छत्रपते: यद्त्रोपरिलेखितं || छं || श्री ||
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यात ते तत्कालीन दानपत्र लेखन पद्धतीप्रमाणे आपल्या पूर्वजांच्या व स्वतःच्या पराक्रमाचे व सद्गुणांचे वर्णन अतिशय सार्थ अशा शब्दांमध्ये करतात. आपले पणजोबा मालोजीराजे यांना शूरश्रेष्ठ व देवब्राम्हण प्रतिपालक असे संबोधतात तर आपले आजोबा महाराज शाहजीराजांस निशायुद्धप्रवीण, तसेच 'हैन्दवधर्मजीर्णोद्धाकरणघृतमति' म्हणजे स्वतःचा जीव धोक्यात घालून हिंदवी (हिंदू) धर्माचा जीर्णोद्धार करणारा असे संबोधतात. आपले वडील श्री छत्रपती शिवाजी महाराजांचा उल्लेख 'म्लेंव्छक्षयदीक्षित' म्हणजे आपल्या तारुण्यातच ज्यांनी म्लेंछ क्षयाची दीक्षा घेतली व अनेक ताम्रांना पराभूत केले असा करतात. यावरून छत्रपती संभाजी महाराजांना आपल्या पराक्रमी पूर्वजांविषयी वाटणाऱ्या भावनेचे यथार्थ दर्शन होते.[ संदर्भ हवा ]
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दि. ६ जानेवारी १६८१ रोजी छत्रपती संभाजी महाराजांनी गोपळभट अग्निहोत्री महाबलेश्वरकर यांच्या पुत्रास लिहिलेल्या पत्रात एक अतिशय समर्पक असे वाक्य आले आहे. ते वाक्य असे, ..राजश्री आबासाहेबांचे जे संकल्पित आहे ते चालवावे हे आम्हास अगत्य...[ संदर्भ हवा ] युवराज शंभू राजे छत्रपती झाल्यानंतर त्यांचे अलौकिक आणि अद्भुत अशा कार्याचा जर कुणी आढावा घेतला तर त्याला पदोपदी या वाक्याची प्रचीती येते. त्यांचे राजकीय धोरण, आर्थिक धोरण, प्रजाहितदक्षता या सर्व बाबींमध्ये त्यांनी आपल्या अद्वितीय अशा वडिलांचा आदर्श डोळ्यासमोर ठेवलेला दिसतो. या प्रमाणेच त्यांच्या धार्मिक धोरणावरही छत्रपती शिवाजी महाराजांचाच ठसा कोरलेला आढळतो.[ संदर्भ हवा ]
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संतजनांस राजाश्रयः
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१. संतश्रेष्ठ जगद्गुरू तुकाराम महाराज यांचे पुत्र महादोबा मोरे यांस छत्रपती संभाजी महाराजांनी वर्ष��सनाची नेमणूक करून दिली. (दि. १९ ऑगस्ट १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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२. शिवकालातील प्रसिद्ध पाटगावचे मौनीबाबा यांच्या पालखीस भोई व वाजंत्रीची कायमची व्यवस्था लावून दिली. त्यासाठी वार्षिक १२५ होनांचे आज्ञापत्र करून दिले. (दि.१३ सप्टेंबर १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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३. समर्थ रामदास स्वामींनी अंगापूरच्या डोहात मिळालेल्या राममूर्तीची चाफळ येथे स्थापना करून मंदिर उभारले. तेथील पूजेअर्चेसाठी व नैवेद्यासाठी छत्रपती शिवाजी महाराजांनी चैत्र शु. १ शके १५९७ रोजी सनद करून दिली. तीच पुढे छत्रपती संभाजी महाराजांनी चालू ठेवली. तसेच चाफळच्या यात्रेस जमणाऱ्या भाविकांना लष्करातील लोकांचा अथवा मुसलमानी सैन्याचा त्रास होऊ नये व यात्रा यथासांग पार पडावी म्हणून वासुदेव बाळकृष्ण या आपल्या अधिकाऱ्यास आज्ञापत्र लिहिले. (दि. १८ ऑक्टोबर १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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४. चिंचवडचे श्री मोरया गोसावी यांच्या 'माणसांस, शेतापोतांस तसेच गुरांढोरांस काडीचाही तसविज देऊ नये' यासाठी आपल्या लष्करी अधिकाऱ्यास ताकीदपत्र लिहिले. (दि. ६ नोव्हेंबर १६८०)[ संदर्भ हवा ]
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५. प्रचंडगडाच्या पायथ्याशी गडाच्या संरक्षणासाठी आलेल्या लोकांच्या गाई व म्हशी यांची चराई (वणी) छत्रपती शिवाजी महाराजांप्रमाणेच संभाजी महाराजांनी पण माफ केली (दि. ३१ मार्च १६८१)[ संदर्भ हवा ]
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६. श्री समर्थांनी अवतारकार्य पूर्ण केल्यावर त्यांच्या मागे सज्जनगड व चाफळ येथील धर्मादाय ऐवज, उत्सव, देवस्थानांची व्यवस्था, यात्रा, समर्थांच्या निर्वाणस्थळी हनुमानाचे देवालय उभारणे इत्यादी गोष्टींकडे जातीने लक्ष पुरविले. त्या संबंधी आपल्या अधिकाऱ्यांना वेळोवेळी सूचना, आज्ञा, प्रसंगी ताकीद व कडक शब्दात कानउघाडणी देखील केली आहे. या संबधी एका पत्रात संभाजी महाराजांनी कऱ्हाड प्रांताचा सुभेदार रंगो विश्वनाथ यांस श्रीचे कार्यास हैगै कराया तुम्हास काय गरज?... अशा स्पष्ट शब्दात खडसावले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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७. चिंचवडच्या देवस्थानास आपल्या लष्कराकडून उपद्रव होतो अशी तक्रार आल्यावर छत्रपती संभाजी महाराजांनी पुणे प्रांताच्या सुभेदार व जुमलेदारांना ..जो धामधूम करील त्याला स्वामी जीवेच मारतील... अशी अत्यंत परखड शब्दात समज दिली आहे.[ संदर्भ हवा ]
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८. वाई प्रांताचा सुभेदार येसाजी मल्हार यास निंब येथील सदानंद गोसावींच्या मठास दरसाल नेमून दिलेला ऐवज पोचता न केल्याचे कळताच संभाजी महाराजांनी धर्मकार्यात खलेल न करणे. अशा शब्दांत ताकीद दिली आहे. व तेथील आनंदगिरी गोसावी यांना पत्र लिहून धर्माच्या कार्यास अंतर पडणार नाही... असे अभिवचन दिले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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सक्तीने धर्मांतरास विरोध:
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छत्रपती संभाजी महाराजांनी आपल्या वडिलांप्रमाणेच सक्तीने धर्मांतर करणाऱ्या इंग्रज, पोर्तुगीज, व मुसलमान सत्ताधीशांना कडाडून विरोध केलेला दिसतो. छत्रपती संभाजी महाराज व हेनरी ग्यारी यांच्यात इ.स. १६८४ साली झालेल्या तहातील एक कलम आहे,'That the English shall buy none of my people belonging to my dominion, to make them slaves or Christians'[ संदर्भ हवा ]
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अंत्रुज परगण्यातील अडकोळण गावचा शिलालेख:
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छत्रपती संभाजी महाराजांच्या कारकिर्दीत मराठी राज्याचा अंमल गोमंतक परिसरात सुरू झाला. तेव्हापासून व्यापारी माणसांकडून घेण्यात येणारा अंगभाडे कर संभाजी महाराजांच्या आज्ञेने माफ करण्यात आला. या संबंधी फोंड्याजवळ अंत्रुज येथील हडकोळण या गावी एक शिलालेख आहे. या शिलालेखात संभाजी महाराजांनी मुख्याधिकारी मामले फोंडा धर्माजी नागनाथ यास करमाफीसंबंधी आज्ञा करताना मराठी अंमलाला उद्देशून खालील वाक्य कोरले आहे.[ संदर्भ हवा ]
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'...आता हे हिंदुराज्य जाहलेपासोन...पुढे या प्रमाणे सकळाहि चालवावे सहसा धर्मकृत्यास नाश करू नये करतील त्यांसी महापातक आहे...'
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सिंहासनाधीश्वर श्रीमंत छत्रपती - संभाजीराजे शिवाजीराजे भोसले
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(सेनाधीशांचे सेनाधीश - सर्वोच्च अधिकार असलेले)
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श्री सखी राज्ञी जयति छत्रपती येसूबाई संभाजीराजे भोसले
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(संभाजीराजांच्या गैरहजेरीत राजव्यवस्थेच्या कारभारी)
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औरंगजेबाने इ.स. १६८२ मध्ये मराठ्यांवर हल्ला केला.औरंगजेबाचे सैन्य मराठ्यांच्या सैन्याच्या पाचपटीने जास्त होते तर औरंगजेबाचे साम्राज्य संभाजी महाराजांच्या स्वराज्यापेक्षा कमीतकमी १५ पटींनी मोठे होते. त्याकाळी जगातील सर्वांत शक्तिशाली सैन्यांमध्ये औरंगजेबाच्या सैन्याचा समावेश होत होता. तरीही संभाजी महाराजांच्या नेतृत्वाखाली मराठ्यांनी हिमतीने लढा दिला.[ संदर्भ हवा ] मराठ्यांची प्रबळ इच्छाशक्ती आणि झुंझारपणाचे ठळक उदाहरण म्हणजे नाशिकजवळील रामशेज किल्ल्याचा लढा होय. औरंगजेबाच्या सरदारांची अशी अपेक्षा होती की तो किल्ला काही तासांतच शरणागती पत्करेल. पण मराठ्यांनी असा चिवट प्रतिकार केला की तो किल्ल�� जिंकण्यासाठी त्यांना तब्बल साडेसहा वर्षे लढावे लागले.[ संदर्भ हवा ] संभाजी महाराजांनी गोव्याचे पोर्तुगीज, जंजिऱ्याचा सिद्दी आणि म्हैसूरचा चिक्कदेवराय या शत्रूंना असा जोरदार धडा शिकवला की त्यांची संभाजी महाराजांविरुद्ध औरंगजेबाला मदत करायची हिंमत झाली नाही. तसेच त्यांपैकी कोणीही त्यांच्याविरुद्ध उलटू शकला नाही. संभाजी महाराजांच्या नेतृत्वाखाली मराठ्यांनी सर्व शत्रूंशी एकहाती झुंज दिली.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १६८७-८८ मध्ये महाराष्ट्रात मोठा दुष्काळ पडला. त्यामुळे परिस्थिती कठीण झाली होती.
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इ.स. १६८९च्या सुरुवातीला संभाजी महाराजांनी त्यांच्या महत्त्वाच्या सरदारांना बैठकीसाठी कोकणात संगमेश्वर येथे बोलावले. १ फेब्रुवारी, इ.स. १६८९ रोजी बैठक संपवून संभाजी महाराज रायगडाकडे रवाना होत असतानाच औरंगजेबाचा सरदार मुकर्रबखान याने महाराजांच्या नजीकच्या ब्राह्मणांच्या मदतीने संगमेश्वरावर हल्ला केला, फ्रेंच गवर्नर गेनरल मार्टीनने त्याच्या डायरीत याची नोंद करून ठेवली आहे, की जवळच्या ब्राम्हणांनी महाराजांशी दगाफटका केला.[३] कारवाईसाठी गुप्तता बाळगली आणि सर्व कारवाईची आखणी खूपच काळजीपूर्वक केली. मराठ्यांत आणि शत्रूच्या सैन्यात चकमक झाली. मराठ्यांचे संख्याबळ कमी होते. प्रयत्नांची शर्थ करूनही मराठे शत्रूचा हल्ला परतवून लावू शकले नाहीत. शत्रूने संभाजीमहाराजांना व त्यांच्यासोबत असलेल्या कवि कलश यांना जिवंत पकडले.
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छत्रपती संभाजी महाराज संगमेश्वरी पकडले गेल्यानंतर त्यांना वाचवण्याचे प्रयत्न झाले नाही असे नाही. महाराजांना वाचवण्यासाठी प्रयत्न मावळ्यांनी केले पण ते त्यात यशस्वी झाले नाही. यात सर्वात पहिला प्रयत्न हा जोत्याजी केसरकर यांनी केला. पुढे जाऊन अप्पा शास्त्री यांनी देखील महाराजांना सोडवण्याचा प्रयत्न केला पण हे दोन्ही प्रयत्न अयशस्वी ठरले.[ संदर्भ हवा ]
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मुघलांनी पकडल्या नंतर छत्रपती संभाजी महाराज आणि त्यांचे सल्लागार कवी कलश यांना औरंगजेबापुढे किल्ले बहादुरगड, आता धर्मवीरगड येथे आणण्यात आले. 'औरंगजेबाने संभाजी महाराजांना सर्व किल्ले त्याच्या स्वाधीन करून स्वतंत्र जिवन जगन्याचे' किंवा धर्मांतरण करून इस्लाम धर्म स्वीकार करून मुसलमान बनल्यास जीवनदान देण्याचे मान्य केले. पण संभाजी महाराजांनी त्याला स्पष्टपणे नकार दिला. त्यानंतर औरंगजेबाने संभाजी महाराज आणि कवी कलश यांची विदूषकाचे कपडे घालून अत्यंत मानहानीकारक अशी धिंड काढण्यात आली. शेवटी दोघांनाही नर्क यातना देउन क्रूरपणे अत्यंत हालहाल करून ठार मारायचा आदेश दिला. शेवटी एक मशाल शांत झाली.[ संदर्भ हवा ]
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अफाट मोगली सैन्याशी धैर्याने आणि असामान्य शौर्याने लढा देणारा हा छत्रपती उत्तम साहित्यिक आणि संस्कृत भाषेचा उत्तम जाणकारही होता.
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संभाजी महाराजांनी वयाच्या चौदाव्या वर्षी बुधभूषण-राजनीती हा संस्कृत ग्रंथ लिहिला.[ संदर्भ हवा ]
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बुधभूषण या ग्रंथात अतिशय सुंदर आणि अलंकारिक भाषेत आपले वडील शिवाजीराजे यांचा उल्लेख आहे :
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'कलिकालभुजंगमावलीढं निखिलं धर्मवेक्ष्य विक्लवं यः ।
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जगत: पतिरंशतोवतापो: (तीर्ण:)स शिवछत्रपतिजयत्यजेयः ॥
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अर्थ-"कलिकालरूपी भुजंग घालितो विळखा, करितो धर्माचा ऱ्हास
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तारण्या वसुधा अवतरला जगत्पाल, त्या शिवप्रभूंची विजयदुंदुभी गर्जू दे खास ॥ "
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याचबरोबर संभाजी महाराजांनी नायिकाभेद, नखशिखा, सातशतक या तीन ग्रंथांचे लिखाण केले. गागाभट्टांनी समयनय हा ग्रंथ लिहून संभाजी महाराजांना अर्पण केला.[ संदर्भ हवा ]
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(संभाजी महाराजांवरील ऐतिहासिक कथा कथने आणि कादंबऱ्या)
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संभाजी महाराजांवरील नाटके
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आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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विकिस्रोतावर काय चालेल ?
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प्रताधिकारमुक्त दस्तऐवज
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छत्रपती संभाजी द्वितीय(1698 - 18 डिसेंबर 1760) भोसले वंशजातीचा कोल्हापूरचा राजा होता. छत्रपती थोरले शिवाजी महाराजांचे नातु आणि छत्रपती पहीले राजाराम महाराजांचे द्वितीय पुत्र (थोरले राजाराम व महाराणी राजसबाई यांचे पुत्र) होते. दुसऱ्या सम्भाजींच्या सावत्र आई महाराणी ताराबाई यांनी थोरल्या शाहूच्या पराभवानन्तर कोल्हापूर येथे 1710 ते 1714 पर्यन्त आपल्या पुत्र शिवाजी द्वितीयसह कोल्हापूरचे राज्य म्हणून कोल्हापूर राजगादीची स्थापना केली. त्या वेळी, राजसाबाईंनी ताराबाईंच्या विरोधात बण्ड केले आणि स्वतःचा पुत्र दुसऱ्या सम्भाजीला गादीवर बसवले. कोल्हापूरचे सिंहासनावर सम्भाजी द्वितीय ने 1714 ते 1760 पर्यन्त राज्य केले. आपल्या कारकिर्दीच्या सुरुवातीच्या काळात, सम्भाजींनी आपल्या चुलत भावाकडून म्हणजे थोरल्या शाहूकडून मराठा साम्राज्य प्रस्थापित करण्यास सहमती दर्शवली. 1731 मध्ये वारणेच्या तहात दोन्ही बाजूंनी स्वाक्षरी केली तेव्हा राज्याच्या वाटणीचा संघर्ष सम्पला. या करारानुसार दोन्ही बाजूंनी कृष्ण आणि तुंगभद्रा नद्यांमधील प्रदेश दुसरा सम्भाजी व थोरल्या शाहू महाराजांनी वाटून घेतला. दुसऱ्या सम्भाजी नन्तर गादीवर आलेल्या तिसऱ्या शिवाजीच्या काळात राजमाता म्हणून जिजीबाईंनी त्यांचे नेतृत्व केले.
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छत्री म्हणजे प्राथमिकरित्या ऊन आणि पाऊस यापासून रक्षण करण्यासाठी बनवलेली वस्तू. धातूच्या तारांवर किंवा बांबूच्या कामट्यांवर ताणून बसवलेले कापड आणि कापडावर तेलाचा थर अशी याची रचना असते. मध्यभागी धरण्यास एक दांडा असतो. काही वेळा छत्रीची घडी ही करता येते.छत्रीचा वापर पावसापासून व उन्हापासून संरक्षण व्हावे म्हणून यासाठी केला जातो.
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फार पुर्वी वनस्पतींची कमळाची पाने वापरून छत्री बनवली जात असे. आताच्या काळात वेगवेगळ्या वस्तूपासून छत्री बनवली जाते . उदा प्लास्टिक .
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चीनमध्ये ३५०० वर्षांपासून छत्र्या बनवतात. चीनमध्ये छत्रीचा वापर समारंभात व धार्मिक विधीत केला जातो.
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भारतात पूर्वीपासून छत्री प्रचलित होती. सामर्थ्य व सार्वभौमत्व याचे ती प्रतीक असे. शिवाजी महाराजांना राज्याभिषेकानंतर छत्रधारी हा किताब बहाल करण्यात आला होता.
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छत्रीचे अनेक प्रकार आहेत. इरले- बांबूचे सांगाडे बनवून त्यावर पळस किंवा रुंद पाने लावून आच्छादन बनवतात त्याला इरले असे म्हणतात.
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आता अनेक वेगवेगळ्या प्रकारच्या आकाराच्या छत्र्या येतात तसेच आता उलट्या बाजूने उघडणाऱ्या सुधा छत्र्या येतात.
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छायाचित्रकार किंवा छायाचित्रण दिग्दर्शक (कधीकधी डीपी किंवा डीओपी म्हणून लहान केले जाते) ही व्यक्ती चित्रपट, टेलिव्हिजन निर्मिती, संगीत व्हिडिओ किंवा इतर थेट अॅक्शन पीसचे छायाचित्रण किंवा रेकॉर्डिंगसाठी जबाबदार असते. सिनेमॅटोग्राफर हा अशा प्रकल्पांवर काम करणाऱ्या कॅमेरा आणि लाइट क्रूचा प्रमुख असतो आणि सामान्यत: प्रतिमेशी संबंधित कलात्मक आणि तांत्रिक निर्णय घेण्यासाठी आणि कॅमेरा, फिल्म स्टॉक, लेन्स, फिल्टर इ. निवडण्यासाठी जबाबदार असतो. याचा अभ्यास आणि सराव या क्षेत्राला सिनेमॅटोग्राफी असे म्हणतात.
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सिनेमॅटोग्राफर हा दिग्दर्शकाचा अधीनस्थ असतो, ज्याला दिग्दर्शकाच्या दृष्टीनुसार दृश्य कॅप्चर करण्याचे काम दिले जाते. सिनेमॅटोग्राफर आणि दिग्दर्शक यांच्यातील संबंध वेगवेगळे असतात. काही घटनांमध्ये, दिग्दर्शक सिनेमॅटोग्राफरला पूर्ण स्वातंत्र्याची परवानगी देतो, तर काहींमध्ये, दिग्दर्शक अगदी अगदी कॅमेरा प्लेसमेंट आणि लेन्स निवड निर्दिष्ट करण्यासाठी अगदी कमी किंवा काहीही परवानगी देत नाही. जेव्हा दिग्दर्शक आणि सिनेमॅटोग्राफर एकमेकांशी सोयीस्कर असतात तेव्हा अशा प्रकारच्या सहभागाची पातळी कमी असते. दिग्दर्शक सामान्यत: सिनेमॅटोग्राफरला दृश्यातून काय हवे आहे ते सांगेल आणि तो परिणाम साध्य करण्यासाठी सिनेमॅटोग्राफरला अक्षांश परवानगी देईल.
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सिनेमॅटोग्राफरने रेकॉर्ड केलेल्या प्रतिमा संपादनासाठी चित्रपट संपादकाकडे पाठवल्या जातात.
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सिनेमॅटोग्राफी ( प्राचीन ग्रीक κίνημα, kìnema "हालचाल" आणि γράφειν, gràphein "लिहिण्यासाठी") ही मोशन पिक्चरची कला आहे (आणि अलीकडे, इलेक्ट्रॉनिक व्हिडिओ कॅमेरा ) छायाचित्रण.
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सिनेमॅटोग्राफर वस्तूंमधून परावर्तित प्रकाश एका वास्तविक प्रतिमेमध्ये केंद्रित करण्यासाठी लेन्स वापरतात जी मूव्ही कॅमेऱ्यातील काही इमेज सेन्सर किंवा प्रकाश-संवेदनशील सामग्रीवर हस्तांतरित केली जाते. [१] हे एक्सपोजर क्रमाक्रमाने तयार केले जातात आणि नंतरच्या प्रक्रियेसाठी आणि मोशन पिक्चर म्हणून पाहण्यासाठी संरक्षित केले जातात. इलेक्ट्रॉनिक इमेज सेन्सरच्या सहाय्याने प्रतिमा कॅप्चर केल्याने प्रतिमेतील प्रत्येक पिक्सेलसाठी विद्युत शुल्क तयार होते, जे इलेक्ट्रॉनिक पद्धतीने प्रक्रिया केली जाते आणि त्यानंतरच्या प्रक्रियेसाठी किंवा प्रदर्शनासाठी व्हिडिओ फाइलमध्ये संग्रहित केली जाते. फोटोग्राफिक इमल्शनसह कॅप्चर केलेल्या प्रतिमांचा परिणाम फिल्म स्टॉकवर अदृश्य अव्यक्त प्रतिमांच्या मालिकेत होतो, ज्या रासायनिकरित्या दृश्यमान प्रतिमेत " विकसित " होतात. चित्रपट स्टॉकवरील प्रतिमा समान मोशन पिक्चर पाहण्यासाठी प्रक्षेपित केल्या जातात.
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सिनेमॅटोग्राफीचा उपयोग विज्ञान आणि व्यवसायाच्या अनेक क्षेत्रात तसेच मनोरंजनाच्या उद्देशाने आणि जनसंवादासाठी होतो .
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छारी धांड (गुजराती: छारी ढंढ) हे गुजरातमशील एक पक्षी-आश्रयवन आहे. कच्छमधील भूज शहरापासून ते ८० किलोमीटर अंतरावर आहे.
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छारी धांड भूजजवळच्या नखत्राणा तालुक्यात येते. हा सगळा भाग बन्नी ग्रासलॅंड म्हणून कच्छच्या नकाशावर दिसतो. त्यात छारी आणि फुलाय गावांच्या मधल्या प्रदेशात येणाऱ्या छारी धांडने २२७ चौरस किलोमीटर एवढे क्षेत्र व्यापले आहे. या आश्रयवनात ५५ जातींचे सुमारे ५०,००० पक्षी असल्याचे सांगण्यात येते.
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छारी धांडच्या माळरानावर दूरपर्यंत पक्षीच पक्षी दिसतात. त्यांत शेकडोंच्या संख्येत क्रौंच पक्षी असतात. तिथल्याच एका पाणथळ जागेत सारस पक्ष्यांबरोबर फ्लेमिंगोही विहरत असतात. मोठय़ा चोचींचे पेलिकन्स पाण्यात उभे असतात. त्याच पाण्यात आंघोळ करणारे रानटी उंटही पहावयास मिळतात.
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छारी धांड येथे छारी धांड इको टुरिझम सेंटरने चालविलेले एक विश्रामगृह आहे. पक्षी बघण्यासाठी बांधलेले निरीक्षण मनोरेही आहेत.
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छिंग राजवंश हे चीन मधील शेवटचे राजेशाही साम्राज्य होते.
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छिनळकुवा हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नंदुरबार जिल्ह्यातील अक्राणी तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील हवामान सामान्यतः गरम आणि कोरडे आहे. येथे उन्हाळा, पावसाळा,आणि हिवाळा असे तीन वेगवेगळे ऋतू आहेत. उन्हाळा मार्चपासून चालू होऊन जूनमध्यापर्यंत असतो.उन्हाळा गरम आणि कोरडा असतो.मे महिन्यात तापमान फार असते.तापमान ४४ अंश सेल्सियसपर्यंत जाते.जूनच्या मध्यास किंवा अखेरीस पावसाळा सुरू होतो.पावसाळी हंगामात हवामान सामान्यतः आर्द्र आणि गरम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ७५० मि.मी.पर्यंत असते.हिवाळी मोसम नोव्हेंबरपासून साधारण फेब्रुवारीपर्यंत असतो.हिवाळा सौम्य थंड आणि कोरडा असतो.
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शिनेल अखालिया हेन्री (१७ ऑगस्ट, १९९५:जमैका - ) ही वेस्ट इंडीजच्या महिला क्रिकेट संघाकडून २०१३ पासून आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेळणारी खेळाडू आहे. ही उजव्या हाताने फलंदाजी आणि मध्यम-जलदगती गोलंदाजी करते.
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छिन्नमस्ता ही देवी पार्वतीचे रूप असून दहा महाविद्यांपैकी एक आहे. या देवीचे प्रचंड कालिका,प्रचंडचंडिका[१] असेही अनेक नावे आहेत.
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या देेेवीच्या एका हातात तिचे मस्तक व एका हातात शस्त्र आहे. गळ्यात हाडकांची माळ आहे. यज्ञात छिन्नमस्ता देवीला आवाहन केल्यास तिचे डोके तिच्या धडावर येते.
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छिन्नमस्ता जयंती ही वैशाख शुद्ध चतुर्दशीला असते.
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हिंदू धर्मातील देवी-केंद्रित परंपरेनुसार शाक्त पंथातील कालीकुला संप्रदायामध्ये छिन्नमस्ताची पूजा करतात. जरी छिन्नमस्ता देवी हिला महाविद्यांपैकी एक म्हणून संरक्षित स्थान प्राप्त झाले असले तरी तिची मंदिरे मुख्यतः नेपाळात आणि पूर्व भारतात आढळतात, आणि तिची सार्वजनिक पूजा दुर्लभ आहे. ती एक तांत्रिक देवता आहे आणि गूढ तांत्रिक अभ्यासक तिची उपासना करतात. 'छिन्नमस्ता ही चिन्नमुंडाशी संबंधित आहे - ती तिबेट बौद्ध देवी वज्रयोगिनीचे तुच्छ-मुंडक रूप आहे. शाक्तपंथमतानुसार छिन्नमस्ताची उपासना करणारे राहूच्या प्रभावापासून मुक्त होतात.[१]
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छिन्नमस्ता भगवती मंदिर[२]-छिन्नमस्ता भगवती हे नेपाळमधील सप्तरी जिल्ह्यातील राजविराजच्या दक्षिणेस सीमावर्ती भागात असलेल्या छिन्नमस्ताच्या सखडा गावात आहे.[३]
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छिन्नमास्तिका (प्रचंडचंडिके[४]) मंदिर [५]- रजरप्पा[४] ,रामगढ जिल्हा,झारखंड
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छिन्नमास्तिका मंदिर विष्णूपुर ,पश्चिम बंगाल.
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छोटा उदेपूर, छोटाउदेपूर किंवा छोटा उदयपूर हे गुजरातमधील एक छोटे शहर आहे. हे छोटा उदेपूर जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे.
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२००१ च्या जनगणनेनुसार येथील जनसंख्या २७,१६५ होती.[१] छोटा उदेपूरचे साक्षरता प्रमाण ६९% होते.
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छोटा बहिरी ससाणा किंवा बेसरा चिमणमार ससाणा याला इंग्रजी मध्ये southern besra sparrow hawk असे म्हणतात. हा ससाणा जातीतील एक शिकारी पक्षी आहे.
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छोटा बहिरी ससाण्याचा आकार कावळ्यापेक्षा लहान असतो. नराचा वरील भाग काळसर फिकट ते गडद राखाडी असतो. डोके काळसर व पोटाचा रंग तांबूस राखाडी ते लालसर काळा असतो. छातीवर पांढरे, काळसर पट्टे आणि शेपटीखालचा भाग पांढरा असतो. मादीच्या छातीवर व पोटावर तांबूस-पिंगट रेषा असतात .
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छोटा बहिरी ससाणा हा निलगिरी, पलनी केरळ, मुंबई ही पश्चिम घाटाची पट्टी, अशा भागात दिसतो. श्रीलंकेमध्ये मार्च ते मे मध्ये हा पक्षी स्थायिक असतो.
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छोटे बहिरी ससाणे हे चीरपल्लवी व पानगळीची दमट जंगले अशा ठिकाणी राहतात .
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छोटा उदेपूर, छोटाउदेपूर किंवा छोटा उदयपूर हे गुजरातमधील एक छोटे शहर आहे. हे छोटा उदेपूर जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे.
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२००१ च्या जनगणनेनुसार येथील जनसंख्या २७,१६५ होती.[१] छोटा उदेपूरचे साक्षरता प्रमाण ६९% होते.
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छोटी बडी बातें दूरदर्शन वरील अंधश्रद्धेवरील एक जुनी मालिका होती. या मालिकेत सुलभा देशपांडे, अरविंद देशपांडे, बब्लू मुकर्जी व अशोक सराफ यांनी काम केले आहे. सुलभा देशपांडे यांचा या मालिकेत अंधश्रद्धेवर खूपच विश्वास असतो तर परिवारातील इतर मंडळी तिला चुकीचे ठरविण्याचा प्रयत्न करीत असतात. शेवटच्या भागात सर्व पात्रे आपल्या भूमिका सोडून वावरले आहेत. आणि त्यात अशोक सराफ हे खुपच अंधश्रद्धाळू असल्याचे दाखवले आहे.
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जंगपुरा विधानसभा मतदारसंघ हा दिल्लीमधील एक विधानसभा मतदारसंघ आहे. याची रचना १९९३मध्ये झाली.
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हा विधानसभा मतदारसंघ पूर्व दिल्ली लोकसभा मतदारसंघाच्या क्षेत्रांतर्गत येतो.
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गडाळे हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील पुणे जिल्ह्यातील मुळशी तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील सर्वसाधारण हवामान उष्ण व कोरडे आहे. हवामानातील बदलानुसार प्रत्येक वर्षात मुख्यतः तीन ऋतू असतात. मार्च ते मे पर्यंत उन्हाळा, जून ते ऑक्टोबर पर्यंत पावसाळा आणि नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी पर्यंत हिवाळा असतो. हिवाळ्यात शीतल वातावरण असते. तालुक्यातील वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान १६२० मिमी पर्यंत असते.
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जंगीपूर हा पश्चिम बंगाल राज्यातील लोकसभा मतदारसंघ आहे
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जकात (अरबी: زكاة; [zaˈkaːt], "जे शुद्ध करते"[१], तसेच जकात अल-माल [zaˈkaːt alˈmaːl] زكاة المال, "संपत्तीवर जकात"[२] किंवा जकात)[३] हा दानाचा एक प्रकार आहे, जो बहुधा मुस्लिम उम्माने[४] गोळा केला जातो. इस्लाममध्ये हे एक धार्मिक बंधन मानले जाते[५][६] आणि कुराणाच्या क्रमवारीनुसार, प्रार्थना (नमाज) नंतर महत्त्व जकातला आहे.
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इस्लामच्या पाच स्तंभांपैकी एक म्हणून, जकात हे सर्व मुस्लिमांसाठी एक धार्मिक कर्तव्य आहे जे गरजूंना मदत करण्यासाठी संपत्तीचे आवश्यक निकष पूर्ण करतात.[७][८] हे एक अनिवार्य धर्मादाय योगदान आहे, जे सहसा कर मानले जाते. [९] [१०] इस्लामच्या इतिहासात, विशेषतः रिद्दाच्या युद्धांदरम्यान, जकातचे पैसे आणि विवादांनी मोठी भूमिका बजावली आहे.[११] [१२]
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हा एक अप्रत्यक्ष कर असून स्थानिक स्वराज्य संस्था आपल्या भौगोलिक क्षेत्रात प्रवेशित व विकल्या जाणाऱ्या वस्तूवर हा कर आकारते.या करच्या माध्यमातूनच स्थानिक स्वराज्य संस्था आपली विकासकामे पूर्ण करीत असते.सध्या हा कर आकारला जात नसून त्याची भरपाई राज्य शासन देते.या कराऐवजी एल.बी.टी.हा कर आकारला जातो.
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गुणक: 6°12′S 106°48′E / 6.200°S 106.800°E / -6.200; 106.800
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जकार्ता ही इंडोनेशियाची राजधानी व सगळ्यात मोठे शहर आहे. जावा बेटाच्या वायव्य किनाऱ्यावर वसलेले जकार्ता शहर इंडोनेशियाचा विशेष प्रांत आहे.
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जकार्ता शहराचे क्षेत्रफळ ६६१.५२ कि.मी.२ तर लोकसंख्या अंदाजे ९५,८०,००० इतकी आहे. जकार्ता हे आग्नेय आशियातील सर्वांत मोठे तर जगातील १२वे मोठे शहर आहे.
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हे देवीचे एक रूप असून अनेकांचे दैवत आहे.
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टाहाकरी हे अहमदनगर जिल्ह्याच्या अकोले तालुक्यातील एक गाव आहे. येथे पुरातन हेमाडपंती स्थापत्यशैलीतील एक जगदंबा मंदिर आहे. या मंदिराच्या दगडींवर कलात्मक शैलीत स्त्रियांच्या कोरीव मू्र्ती आहेत.
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हे मंदिर भूमिज प्रकारचे असून त्याचा तलविन्यास सप्तरथ प्रकारचा आहे.[१]
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हे मंदिर उत्तराभिमुख आहे. मुखमंडप, त्यामागे दोन बाजूस एक एक अंतराळयुक्त उपगर्भगृह असलेला मंडप, त्यामागे अंतराळ व मुख्य गर्भगृह अशी या मंदिराची रचना आहे. मुखमंडपाला वामनभिंत असून त्यावर प्रत्येक बाजूस पाच वामनस्तंभ आहेत. याबरोबरच पुढे दोन आणि मागे दोन असे एकूण चार मुख्य स्तंभ आहेत. एकूण बारा स्तंभांवर मंडपाचे घुमटाकार छत पेललेले आहे. या छताच्या उत्तरोत्तर लहान होत जाणाऱ्या वर्तुळाकार भागांमध्ये ठरावीक अंतरावर नर्तकांच्या आणि वादकांच्या मूर्ती आहेत. मंडपाच्या मुख्य स्तंभांवर खांबाच्या चारी बाजूंवर ठरावीक पातळीत असणाऱ्या पट्ट्यांवर आकृतीशिल्पे आहेत. स्तंभावर कीचकहस्त आहेत. अर्धस्तंभ आणि चतुर्थकस्तंभ तुलनेने साधे असून त्यावर नागशीर्षहस्त आहेत. अंतराळाला आयताकृती छत असून त्यात मधोमध छोटा घुमट आहे. अंतराळाच्या मागे चौरसाकृती गर्भगृह असून त्यात मागील बाजूस मूर्तीकरिता पीठ आहे.
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मंदिराचे बाह्यांग साधे आहे. खाली पीठांचे तीन थर आहेत. सर्वात वरच्या थरावर चौकटची नक्षी आहे. त्यावर कलश आणि मंची आहे. गर्भगृहाच्या बाहेरील तीन भद्रांवर तीन देवकोष्ठे आहेत.
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या मंदिराला ४ मार्च, इ.स. १९०९ रोजी राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक म्हणून घोषित करण्यात आले.[२]
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जगदलपूर भारताच्या छत्तीसगढ राज्यातील एक शहर आहे.हे शहर बस्तर जिल्ह्याचे प्रशासकीय केंद्र आहे.
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येथील 'बस्तर राजवाडा' ही राजघराण्याची वास्तू आहे.यास जगदलपूर पॅलेसही म्हणतात.येथे गंगामुंडा व दलपत लेक नावाचे दोन तलाव आहेत.[१]
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| 3 |
+
येथून जवळच सुमारे ४५ किमी अंतरावर चित्रकोट धबधबे आहेत. हे धबधबे इंद्रावती नदीवर आहेत.हे घोड्याच्या नालेच्या आकाराचे असून सुमारे १०० फूट उंचीवरून ते खाली कोसळतात.याजवळच नारायणपल नावाचे एक विष्णूंचे मंदिर आहे.तसेच या गावाच्या दक्षिणेला तीरथगड नावाचा अजून एक धबधबा आहे.येथे जाणारा महामार्ग हा कांगर व्हॅली राष्ट्रीय उद्यानातून जातो.हा धबधबा सुमारे ३०० फूट खाली कोसळतो.या धबधब्यांशिवाय येथे मांडवना, चित्रधारा व थामाद घुमार आदी धबधबे आहेत.[१]
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| 4 |
+
याजवळ असलेल्या कांगर व्हॅली राष्ट्रीय उद्यानात कैकश अथवा कुतुमसर नावाची एक गुहा आहे.ही गुफा सुमारे २०-३० फूट खोल आहे. येथे चुनखडीपासून निसर्गतःच बनलेल्या आकृती आहेत.[१]
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| 5 |
+
येथून सुमारे ५५ किमी दूर दंतेश्वरी देवीचे मंदिर असलेले दंतेवाडा हे ठिकाण आहे.शाकिनी व डाकिनी नद्यांच्या संगमावर वसलेले हे मंदिर येथील मुख्य आकर्षण आहे.[१]
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खुर्रम शहजाद (२५ ऑक्टोबर, १९८८:कतार - ) हा कतारकडून क्रिकेट खेळणारा खेळाडू आहे.
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घराणे- जगदाळे
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जात- ९६ कुळी हिंदू-मराठा
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वंश- चंद्र वंश
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| 4 |
+
गोत्र - कपिल
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| 5 |
+
देवक- धारेची तलवार, पंचपल्लव
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| 6 |
+
कुलदैवत- जोतिबा
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| 7 |
+
कुलदेवता- पिंगळजाई(पिंगळी बुद्रुक) / तुळजाभवानी(तुळजापूर)/ खंडोबा, (जेजुरी)
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| 8 |
+
गावे-
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| 9 |
+
ता. पुरंदर:- गराडे,
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| 10 |
+
ता. कराड:- मसूर,
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| 11 |
+
ता.कोरेगाव:- कुमठे, कवडेवाडी.
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| 12 |
+
ता.माण:- पिंगळी बुद्रुक, बोथे, शिरवली, बिदाल, पाचवड, मोगराळे,डंगीरवाडी
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| 13 |
+
ता.खटाव:- बुध,पेडगाव,अंभेरी
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| 14 |
+
ता.जि. सातारा:- नांदगाव
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| 15 |
+
ता.बारामती:- शिरवली, मूर्ती
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| 16 |
+
ता. फलटण:- साखरवाडी
|
| 17 |
+
ता.बार्शी:- बार्शी, चारे
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| 18 |
+
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| 19 |
+
ता. दौंड:- दौंड, लिंगाळी
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| 20 |
+
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| 21 |
+
ता. शिरूर:- कर्डे, शिरूर
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| 22 |
+
पदव्या- पाटील, देशमुख, सर-पाटील, सरदेशमुख, सरदार, सेनापती.
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| 23 |
+
आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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| 24 |
+
विकिस्रोतावर काय चालेल ?
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| 25 |
+
प्रताधिकारमुक्त दस्तऐवज
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+
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"जगदाळे घराणे" हे मुळचे धार(माळवा) येथील सम्राट परमार/पवांर/पवार यांच्या घराण्याची शाखा होय.पवार घराण्यापासून जगदाळे,निंबाळकर आणि दळवी ही घराणी निर्माण झाली.
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| 28 |
+
श्रीमंत जगदाळे , पोकळे घराणे ९६ कुळी मराठा घराणे आहे.हे घराणे १६५९ पासून मराठा साम्राज्यात म्हणजेच स्वराज्यात समाविष्ट झाले.पानिपतच्या युद्धात गाजवलेल्या भीम पराक्रमासाठी हे घराणे प्रसिद्ध आहे.
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| 29 |
+
श्रीमंत सरदार जगदेवराव जगदाळे हे मसूर या शाखेचे मूळ पुरुष आहेत.
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| 30 |
+
जगदेवराव जगदाळे यांना चार पुत्र होते पैकी
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| 31 |
+
महादजी नाईक जगदाळे-देशमुख हे मसूर परगणा,आणि औन्ध परगणाची देशमुखी आणि पाटीलकी पाहत होते.
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| 32 |
+
विठोजी नाईक जगदाळे (मोकसदार) हे पेडगाव.
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| 33 |
+
तर कुमाजीराव जगदाळे देशमुख हे कराडची देशमुखीआणि आंबकची पाटीलकी पाहत होते.
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| 34 |
+
तर त्यांचे एक बंधू रामराव(रामराउ) जगदाळे देशमुख हे शिरवडेचे पाटीलकी करीत होते.
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| 35 |
+
पैकी आंबक शाखेतील जगदाळे देशमुख यांचा वाडा सध्या पिंगळी बुद्रुक या ठिकाणी पिंगळजाई(तुळजाभवानी)
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| 36 |
+
रक्षणार्थ व इनाम गावी स्थित आहे.
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| 37 |
+
या बाबतची दंतकथा अशी की, जगदाळे हे जगदंबेचे म्हणजेच देवी तुळजाभवानीचे रक्षक किंवा उपासक आहेत. यांपैकीच एक भक्त तुळजापूरला देवीच्या दर्शनाला गेले असता देवी तुळजाभवानी प्रकट झाली व त्याच्या डोक्यावर टोपली ठेवत म्हणाली "मी या टोपलीत बसत आहे तू मला घेऊन कोकणात चल. आणि जाताना कोठेही थांबू नकोस आणि मागे वळून पाहू नकोस. जर मला कोकणात पोचवलेस तर राजा होशील आणि थांबलास तर पाटील होशील." देवीच्या आज्ञेप्रमाणे भक्त देवीला घेऊन निघाला. परंतु पिंगळी बुद्रुक गावापाशी आल्यावर त्याला राहवेना. म्हणून तो मागे वळला, तत्क्षणी देवी टोपलीतून उतरली आणि मूर्तीरूपात पिंगळी गावात स्थानापन्न झाली. पिंगळी गावावरून देवीचे नाव पिंगळजाई झाले. तेव्हापासून जगदाळे सर्वत्र पाटील झाले आणि पिंगळजाई जगदाळ्यांची कूलदेवी झाली.
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जगदाळे, पोकळे, पवार, दळवी आणि नाईक निंबाळकर हे एकाच वंशातील आहेत.
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बहामनी काळापासून या घराण्याला सुमारे १६८ गावाची मसूर परगणा येथील देशमुखी होती.नंतर शिवशाही आल्यामुळे वतनदारी पद्धत बंद झाली आणि देशमुखीच्या ऐवजी जगदाळे घराण्याने सर-पाटीलकी स्वीकारली.मसूर परगण्यातीलच काही गावाची पिढीजात सर-पाटीलकी शिवाजी महाराजांकडे सुद्धा होती.त्यावेळी या घराण्याला मसूर,गराडे व दौंड-लिंगाळी येथील दीडशे गावांची सर-पाटीलकी मिळाली[१].जगदेवराव जगदाळे हे या घराण्याचे मूळ पुरुष समजले जातात.
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सरदार जगदेवराव जगदाळे, सरदार महादजी जगदाळे, सरदार मल्हारराव जगदाळे, सेनापती आबाजीराव जगदाळे, सरदार यशवंतराव जगदाळे, सरदार पिराजीराव जगदाळे असे अनेक पराक्रमी मराठा योद्धे या घराण्यात होऊन गेले.
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सरदार यशवंतराव जगदाळे व सरदार पिराजीराव जगदाळे यांनी पानिपतच्या लढाईत भीम-पराक्रम गाजवला दत्ताजीराव शिंदे यांच्यासमवेत ते नजीबखान याच्या विरुद्ध बुराडीघाटच्या लढाईत लढले. शिंदे यांच्या बरोबरच या दोन सरदारांनी आपल्या प्राणाची आहुती या संग्रामात दिली[२].
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श्रीमंत छत्रपती शाहू (थोरले) महाराजांच्या आदेशावरून सरदार आबाजीराव जगदाळे (वय ७३) यांनी निजामाविरुद्ध १७४२ साली बेलूर मोहीम काढली, त्यावेळी त्यांनी महादजी शिंदे (वय ११) यांना मांडीवर बसवून मोहिमेस नेले. ....(संदर्भ- शिंदे दफ्तर)
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या संदर्भातच १७३२ मधील नोंद उपलब्ध असून, गराडे या सासवडजवळील गावाची सर-पाटीलकी जगदाळे यांची होती.तर पोट-पाटीलकी थोरले बाजीराव पेशवे आणि त्यांचे बंधू चिमाजी अप्पा यांनी विकत घेतली होती. ती नानासाहेब पेशवे यांनी पुरंदरे यांना देऊन टाकली. या पाटीलकीचे हक्क आणि मानपान याविषयी कलम असून, "गणेश गौरी पुरंदऱ्यांच्या पुढे व मागे जगदाळे यांच्या' असा स्पष्ट उल्लेख आहे.गराडेसारख्या गावातदेखील गणेश-गौरीची प्रथा पूर्वापार चालत होती आणि तेथेसुद्धा मिरवणुकीने मानाच्या क्रमांकासह प्रतिष्ठापना होत होती.वंश परंपरेनुसार पहिला मान जगदाळे यांना होता [३]
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जगदीश शरण वर्मा ( १८ जानेवारी, इ.स. १९३३ - २२ एप्रिल, २०१३) हे भारताचे सरन्यायाधीश होते. ते २५ मार्च १९९७ पासून १८ जानेवारी १९९८ या कालावधीत सरन्यायाधीश होते.
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जगदीश वळवी महाराष्ट्राच्या तेराव्या विधानसभेतील आमदार आहे.
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जगन्नाथ केशव कुंटे (जन्म : १५ मे १९४३; - पुणे, ४ मार्च २०२१): ऊर्फ स्वामी अवधूतानंद हे त्यांनी केलेल्या नर्मदा परिक्रमांसाठी प्रसिद्ध आहेत. इ.स.२०१० सालापर्यंत त्यांनी चार वेळा नर्मदा परिक्रमा केली आहे. ही परिक्रमा अतिशय खडतर असते. या परिक्रमांच्या अनुभवांवर आधारलेली ’नर्मदेऽऽ हर हर’ आणि ’साधनामस्त’ ही दोन पुस्तके कुंटे यांनी लिहिली.
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जगन्नाथ कुंटे हे कतार येथे काही वर्षे वास्तव्यास होते. त्यांनी बरेच लिखाण केले; पण ते प्रकाशित झाले नाही. तीन नर्मदा परिक्रमा केल्यानंतर त्यांनी 'नर्मदे हर हर' हे पहिले पुस्तक लिहिले. प्राजक्त प्रकाशनाने २००५ मध्ये प्रकाशित केलेल्या या पुस्तकाला अफाट लोकप्रियता मिळाली. कुंटे यांच्या ओघवत्या आणि भारावून टाकणाऱ्या लेखनशैलीचे हजारो चाहते निर्माण झाले. पुढच्या परिक्रमेनंतर त्यांनी 'साधनामस्त' हे पुस्तक लिहिले. या पुस्तकाच्या प्रकाशनानंतर २००६मध्ये त्यांनी संन्यास घेतला. तेव्हापासून त्यांचे वास्तव्य वाचक व साधक यांच्या घरी, नदी किनारी किंवा आश्रमात असे.
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'नर्मदे हर हर' पुस्तकाची आता (२०२१ साली) २४ वी आवृत्ती प्रसिद्ध होत आहे. त्यानंतर प्रसिद्ध झालेल्या 'साधनामस्त', 'नित्यनिरंजन', 'कालिंदी', 'धुनी' या पुस्तकांच्या प्रत्येकी दहापेक्षा जास्त आवृत्त्या निघाल्या आहेत. नऊ वर्षांच्या खंडानंतर २०१९ मध्ये 'प्रकाशपुत्र' हे त्यांचे पुस्तक प्रसिद्ध झाले. पहिले पुस्तक नागिणीच्या पिल्लासारखे असेल, हे त्यांचे शब्द 'नर्मदे हर हर' पुस्तकाच्या लोकप्रियतेने खरे ठरले. पुरस्कारासाठी पुस्तक पाठवण्याला त्यांचा विरोध होता. त्यामुळे त्यांच्या एकाही पुस्तकाला पुरस्कार मिळाला नाही. कुंटे यांनी महाराष्ट्रात राज्यभर व्याख्याने दिली, ती खूप गाजली. एक पुस्तक वाचले की सगळी पुस्तके विकत घेणारा वाचक वर्ग त्यांनी वेगळ्या लेखन शैलीने तयार केला. त्यांच्या पुस्तकांना आजही जगभरातून मागणी आहे.
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'अक्षरधारा बुक गॅलरी'तर्फे २०११ साली पुण्यातील टिळक स्मारक मंदिरात कुंटे यांची मुलाखत झाली होती; तिला इतकी गर्दी झाली होती की, काही प्रेक्षक टिळक रस्त्यावर थांबून होते.
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त्यांची पाचही पुस्तके पुण्याच्या ’प्राजक्त प्रकाशन’ने प्रकाशित केली आहेत.
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महाराष्ट्र-भाषाभूषण ज.र. आजगावकर (जन्म : वराड (मालवण तालुका-सिंधुदुर्ग जिल्हा), १६ ऑगस्ट, इ.स. १८७९, - मुंबई, ऑगस्ट २७, १९५५) हे मराठी चरित्रकार, लेखक, पत्रकार होते.
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आजगावकरांचे मूळ गाव महाराष्ट्रातील सावंतवाडी संस्थानातले आजगांव. तेथेच त्यांचे इंग्रजी पाचव्या इयत्तेपर्यंतचे शालेय शिक्षण झाले. चरितार्थासाठी त्यांनी मुंबई, पुणे, कोल्हापूर अशा ठिकाणी लहानमोठ्या नोकऱ्या केल्या.
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आजगावकरांनी पुढे पत्रकारितेस आरंभ केला. पुण्याच्या 'ज्ञानप्रकाशात' उपसंपादक म्हणून व मुंबईच्या 'इंदुप्रकाशात' संपादकीय विभागात काम केले. डिसेंबर २८, १९२८ रोजी आजगावकरांनी व रामकृष्ण विठ्ठल मतकरी यांनी 'सुदर्शन' नावाचे साप्ताहिक सुरू केले. आजगावकरांनी 'ज्ञानांजन' नावाचे मासिकही चालवले. अच्युतराव कोल्हटकरांचे ’संदेश’ हे पत्र, तसेच ’सुधाकर’ व ’रणगर्जना’ या पत्रांचे अप्रकट संपादक म्हणूनही त्यांनी काही काळ काम केले.
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पत्रकारितेखेरीज आजगावकरांनी साहित्यनिर्मितीही केली. १९०१ साली त्यांनी 'कवनकुतूहल' नावाचे दीर्घकाव्य रचले. 'प्रणयविकसन' व 'प्रणयानंद' अशी दोन नाटकेही त्यांनी लिहिली. परंतु ज्या कार्याकरता आजगावकरांना ओळखले जाते, अशी त्यांची साहित्यनिर्मिती म्हणजे 'महाराष्ट्र कविचरित्रमाला'. १९०८ साली पहिला खंड प्रकाशित झालेल्या या चरित्रमालेचे एकूण अकरा खंड प्रकाशित झाले. १९३९ साली 'महाराष्ट्र संत कवयित्री' हा चरित्रपर ग्रंथही त्यांनी लिहिला. संत कवींची चरित्रे लिहिताना आजगावकरांनी परिश्रमपूर्वक माहिती गोळा केली. ज्ञानेश्वर-तुकारामांबरोबरच हरी नारायण, लिंगनाथ योगी, चिदंबरदास राजाराम, रघुपती महाजन, गणपतराव साधू, ठाकुरदास बावा, दादा नाईक भिडे, नगाजी महाराज, पांडुरंग दाढी, नाथभुजंग यांसारख्या सर्वस्वी अप्रसिद्ध व उपे्क्षित कवींना ज.र. आजगावकरांनी प्रकाशात आणले. संतचरित्रकार महिपतीनंतर प्राचीन कवींची चरित्रे एवढ्या परिश्रमाने व एवढ्या मोठ्या संख्येने लिहिणारे लेखक म्हणून आजगावकरांचे नाव महत्त्वाचे आहे.
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ऑगस्ट २७, १९५५ रोजी मुंबईत त्यांचे निधन झाले.
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वाग्येकरा पं. जगन्नाथबुवा पुरोहित हे आग्रा घराण्याचे गवई. बंदिशकार. तबलावादक होते.
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उस्ताद विलायत हुसेन खान हे त्यांचे गुरू.
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पं राम मराठे, पं जितेंद्र अभिषेकी, पं यशवंतबुवा जोशी, श्रीमती माणिक वर्मा, पं सुरेश तथा भाई गायतोंडे हे जगन्नाथबुवांच्या शिष्यांपैकी काही जण.
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'गुणीदास' या टोपणनावाने जगन्नाथबुवा बंदिशी करत असत.
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जगन्नाथबुवा पुरोहित यांना वाग्येयकार म्हणत. (प्राचीन काळामध्ये जी व्यक्ती पदरचना व स्वररचना या दोन्हीमध्ये प्रवीण असे तिला वाग्येयकार म्हटले जात होते. वाक् अर्थात पद्य व गेय अर्थात संगीत; या दोन्हीमध्ये ज्ञात असणारा वाग्येयकार.)
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जगमोहन मल्होत्रा (सप्टेंबर २५, इ.स. १९२७ - मे ३, २०२१ ) हे भारतीय राजकारणी होते. त्यांनी १९८४ ते १९८९ आणि जानेवारी १९, १९९० ते मे २६, १९९० या काळात जम्मू काश्मीर राज्याचे राज्यपाल म्हणून कार्यभार सांभाळला. तसेच १९९६, १९९८ आणि १९९९च्या लोकसभा निवडणुकीत ते भारतीय जनता पक्षाचे उमेदवार म्हणून नवी दिल्ली लोकसभा मतदारसंघातून निवडून गेले.
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गढ़वाल रेजिमेंट हे भारतीय सेनेतील एक् सैन्यदल असून हे सर्वात जुन्या सैन्यदलांपैकी एक आहे. याची स्थापना इ.स. मध्ये झाली. सुरुवातीला याची ओळख ब्रिटिश लष्करातील एक पलटण म्हणून होती. इ.सच्या सुमारास याला रेजिमेंटचा दर्जा देण्यात आला.
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भारतीय सैन्याच्या गढ़वाल रेजिमेंट या भूदलाने अनेक प्रकारचा पराक्रम गाजवला आहे. भारतीय सैन्याची यशोगाथा फडकत ठेवण्यात या दलाचा सिंहाचा वाटा आहे.
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गढ़वाल रेजिमेंट या दलाला युद्धातील पराक्रमांबद्दल अनेक सन्मान व पदके प्रदान केली गेली आहेत.
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ब्रिगेड ऑफ गार्डस • द पॅराशूट रेजिमेंट • मॅकॅनाईज्ड इन्फंट्री रेजिमेंट • पंजाब रेजिमेंट • मद्रास रेजिमेंट • बॉम्बे ग्रेनेडियर्स • मराठा लाइट इन्फंट्री रेजिमेंट • राजपूताना रायफल्स • राजपूत रेजिमेंट • सिख रेजिमेंट • सिख लाइट इन्फंट्री • डोगरा रेजिमेंट • गढवाल रेजिमेंट• कुमाऊं रेजिमेंट • आसाम रेजिमेंट • बिहार रेजिमेंट • महार रेजिमेंट • जम्मू काश्मीर रायफल्स • जम्मू काश्मीर लाइट इन्फंट्री • जाट रेजिमेंट • नागा रेजिमेंट • १ गुरखा रायफल्स • ३ गुरखा रायफल्स • ४ गुरखा रायफल्स • ५ गुरखा रायफल्स • ८ गुरखा रायफल्स• ९ गुरखा रायफल्स • ११ गुरखा रायफल्स • लद्दाख स्काउट
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खालील यादीत जगातील देशांचे राष्ट्रप्रमुख व सरकारप्रमुख दिले आहेत.
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जगावेगळी पैज हा १९९२ मध्ये निर्मित एक मराठी चित्रपट आहे.यातील कलाकार अजिंक्य देव, सुकन्या कुलकर्णी, सचिन खेडेकर, रवींद्र महाजनी, सुलभा देशपांडे, नंदा शिंदे हे आहेत.ए.व्ही.ए. फिल्म्स या संस्थेतर्फे तो निर्मित करण्यात आलेला आहे.या चित्रपटास विजय वर्गीस यांनी दिग्दर्शित केले आहे व तसेच विजय वर्गीस यांनी याचे कथालेखनही केले आहे.या चित्रपटाचे संवाद अशोक समेळ यांचे आहेत. याचे छायांकन शरद चव्हाण यांनी केले आहे. या चित्रपटातील साहसदृश्ये अशोक पैलवान यांची आहेत.
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या चित्रपटात खालील गाणी आहेत.
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गढवाली ही भारत देशामधील एक भाषा आहे. हिंदीशी मिळतीजुळती असलेली गढवाली प्रामुख्याने भारताच्या उत्तराखंड राज्याच्या गढवाल भागात बोलली जाते.
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एखादा सण अथवा ग्रामदेवतेचा उत्सव पंचक्रोशीतील लोकांनी एकत्र येऊन साजरा करण्याच्या पद्धतीला जत्रा किंवा मेळा असे म्हणतात.
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लोक संपर्क वाढविणे हा जत्रेचा मुख्य उद्देश असतो. बऱ्याच ठिकाणी जत्रेमध्ये बोकड कापले जाते. एखाद्या देवाच्या नावाने लोकांना आमंत्रित करून त्यांना देवाचा प्रसाद म्हणून अन्न वाटले जाते. महाराष्ट्रामध्ये जवळजवळ प्रत्येक गावामध्ये अशी प्रथा आढळते. एका ठरविलेल्या दिवशी गावातील प्रत्येक कुटुंब आपापल्या पाहुण्यांना, मित्र मंडळींना आमंत्रित करून जेवू घालतात. त्या दिवशी गावामध्ये मनोरंजनाचे विविध कार्यक्रम आयोजित केले जातात. तमाशा हा त्यापैकीच एक असा मनोरंजनाचा प्रकार ग्रामीण भागामध्ये अतिशय लोकप्रिय आहे. महाराष्ट्रातील ग्रामीण भागामध्ये लोकसंपर्काच्या ज्या अनेक पद्धती आहेत त्यापैकी जत्रा ही एक अतिशय महत्त्वाची पद्धती आहे. अशा या जत्रेत लहान मुलांपासून ते वयोवृद्धांपर्यंत सर्व स्तरातील, सर्व जाती-धर्मातील समुदाय या जत्रेत मोठ्या आनंदाने सहभागी होताना दिसतात. या अशा जत्रेतून सामाजिक एकोपा जपला जातो. ह्या धार्मिक कारणां बरोबरच आर्थिक व व्यावहारिक उलाढालींसाठी सोयीचे केंद्र असते. (उदा. शहाद्या जवळील सारंगखेडच्या जत्रेतला घोडे बाजार कोट्यवधींच्या उलाढाली साठी संपूर्ण भारतात प्रसिद्ध आहे. [१] [२]) काही गावामध्ये जत्रेच्या दिवशी लोकविधी म्हणून ' दशावतार ' हा लोक नाट्य प्रकार सादर करण्याची प्रथा असते.
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काही अनिष्ठ प्रथांनी देशांतल्या बहुतेक जत्रांमध्ये शिरकाव केलेला आढळतो. उदा.
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अंगणेवाडी जत्रा, जातेगाव मुखई कालभैरव जत्रा, श्रीनाथ म्हस्कोबा जत्रा वीर व कोडीत पुणे.महालक्ष्मी जत्रा, वज्रेश्वरी जत्रा. खंडोबा यात्रा माळेगाव जि.नांदेड ही दक्षिण भारतातील सर्वात मोठी यात्रा आहे.
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जत्रा हा महाराष्ट्र राज्यातील अनेक गावांमध्ये साजरे होणारे वार्षिक सण आहे. जानेवारी ते मे महिन्यात साजरा केलेल्या जात्र्याला उरूस म्हणतात . [१] [२]हा सण बहुतेकदा गावातल्या हिंदू दैवत किंवा सुफी पीर यांचे थडगे (किंवा एक स्थानिक दर्गा ) वगैरेच्या सन्मानात साजरा होतो . [३] काही घटनांमध्ये ग्राम दैवत किंवा थडग्यात असलेला एकाच माणसाला अनुक्रमे हिंदू व मुसलमान वेगवेगळ्या नावाने पूजतात. [४] धार्मिक निरीक्षणाव्यतिरिक्त, बैलगाडी रेसिंग, कबड्डी, कुस्ती स्पर्धा, लावणी / तमाशा शो सारख्या सुंदर नृत्य आणि करमणुकीचा कार्यक्रम अशा प्रकारच्या नृत्य मंडळाचा समावेश असू शकतो. [५] [६] [७] या काळात काही कुटुंबे मांसाहार करतात आणि इतर लोकं फक्त शाकाहारी अन्न खातात. काही खेड्यांमध्ये, महिलांना स्वयंपाक आणि इतर कामांसाठी विराम दिला जातो. [८]
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