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शिवसेना पक्षाद्वारे मराठवाड्यातील औरंगाबाद या शहर/जिल्ह्यास संभाजीनगर असे संबोधले जाते.
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पुणे शहरातील डेक्कन जिमखाना भागाचेही अधिकृतरीत्या संभाजीनगर असे नामकरण झालेले आहे. या विभागात पुढील लेख आहेत.
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संभुखेड हे भारतातील महाराष्ट्र राज्यातील सातारा जिल्ह्यातील माण तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथील वार्षिक तापमान साधारणपणे १५ अंश सेल्सियस ते ४० अंश सेल्सियस दरम्यान असते.येथे उन्हाळा गरम आणि कोरडा असतो.उन्हाळ्यात कमाल तापमान ४० डिग्री सेल्सियसपेक्षा जास्त असते आणि सामान्यत: उन्हाळ्यातील तापमान ३८ ते ४५ डिग्री सेल्सियस दरम्यान असते.हिवाळ्याच्या हंगामात तापमान १५ अंश सेल्सियस ते २८ अंश सेल्सियसपर्यंत असते.जून ते सप्टेंबर मध्ये पाऊस पडतो.पावसाचे प्रमाण कमी असते.हिवाळा नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी दरम्यान असतो.
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संयुक्त अरब अमिराती क्रिकेट संघाने तीन आंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय सामने (वनडे) खेळण्यासाठी फेब्रुवारी २०२२ मध्ये ओमानचा दौरा केला. हे सामने २०१९-२२ आयसीसी क्रिकेट विश्वचषक लीग दोन स्पर्धेचे भाग होते आणि स्पर्धेच्या चौथ्या आणि आठव्या फेरीदरम्यान आधी पुढे ढकलण्यात आलेल्या दोन्ही पक्षांमधील सामने भरून काढण्यासाठी हे सामने खेळवण्यासाठी व्यवस्था करण्यात आली. सर्व सामने मस्कत मधील अल् अमारत क्रिकेट मैदानवर झाले. संयुक्त अरब अमिरातीने पहिले दोन सामने जिंकत मालिका जिंकली. शेवटचा सामना टाय झाला.
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एकदिवसीय मालिकेनंतर संयुक्त अरब अमिरातीने मस्कतमध्येच ट्वेंटी२० चौरंगी मालिका आणि २०२२ ट्वेंटी२० क्रिकेट विश्वचषक पात्रता गट अ स्पर्धेत भाग घेतला.
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संयुक्त अरब अमिराती फुटबॉल संघ (अरबी: الامارات العربية المتحدة لكرة القدم; फिफा संकेत: UAE) हा संयुक्त अरब अमिराती देशाचा राष्ट्रीय फुटबॉल संघ आहे.
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dataset/scraper_9/batch_4/wiki_s9_10051.txt
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स्वतंत्र भारतात मराठी भाषकांचे राज्य स्थापन करण्यासाठी संयुक्त महाराष्ट्र चळवळ हा लढा उभारला गेला. या चळवळीमुळे १ मे इ. स. १९६० रोजी महाराष्ट्र राज्य अस्तित्वात आले. महाराष्ट्र राज्यात मराठी भाषा बोलणारे मुंबई, कोकण, देश, विदर्भ, मराठवाडा, खानदेश व अजूनही महाराष्ट्राबाहेरच असलेले डांग, बेळगाव, निपाणी, कारवार व बिदर हे भाग अभिप्रेत होते. साहित्यिक, सांस्कृतिक, वैचारिक, राजकीय या सर्व अंगानी ही चळवळ उभी राहिली.
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ब्रिटिशांनी आपल्या राज्यकारभारासाठी भारताची विभागणी वेगवेगळ्या प्रांतात केली होती परंतु ती भाषेप्रमाणे नव्हती. इ. स. १९२० रोजी नागपुरात झालेल्या काँग्रेस अधिवेशनाच्या वेळी भाषावर प्रांतरचेनेचा मुद्दा महात्मा गांधींनी मान्य केला होता. लोकमान्य टिळक हे देखील भाषावर प्रांतरचनेच्या बाजूने होते. काँग्रेसनेच एकेकाळी मान्य केलेला हा मुद्दा स्वातंत्र्यानंतर मात्र पक्षाला ,विशेषतः नेहरुंना , संकुचित व राष्ट्रीय एकात्मकतेला धोका वाटू लागला. मुंबईतील भांडवलदारांना जे मुख्यत: अमहाराष्ट्रीय होते, त्यांचा मुंबई महाराष्ट्राला द्यायला कडाडून विरोध होता.
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+
इ. स. १९३८ रोजी पटवर्धन [ संदर्भ हवा ] व इ. स. १९४० मध्ये ग.त्र्यं. माडखोलकरांनी महाराष्ट्र एकीकरणाचा विषय उपस्थित केला[ संदर्भ हवा ]. माडखोलकरांनी महाराष्ट्र समाजात व्यापार व उद्योग भूमिपुत्रांच्या ताब्यात नसल्याचं व महाराष्ट्राचे काँग्रेस पुढारी एकीकरणासाठी प्रयत्न करत नसल्याचे म्हटले. इ. स. १९४६चे साहित्य संमेलन माडखोलकरांच्या अध्यक्षतेखाली झाले. या संमेलनात 'संयुक्त महाराष्ट्र समिती' स्थापन झाले व संयुक्त महाराष्ट्राची मागणी करणारे तीन ठराव साहित्यकांनी पाठवले ज्याला राजकीय नेत्यांनी पाठिंबा दिला.
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+
इ. स. १९४६ रोजीच भरलेल्या महाराष्ट्र एकीकरण परिषदेत स.का.पाटील यांनी मुंबईला महाराष्ट्राची राजधानी करण्यास विरोध केला. महाराष्ट्रातील डाव्या पक्षांनी सुरुवातीपासूनच मुंबईसह महाराष्ट्राला पाठिंबा दिला.
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| 5 |
+
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांचा संयुक्त महाराष्ट्र चळ्वळीला पाठिंबा होता. या चळ्वळीला पाठिंबा दर्शविण्याकरिता अनेक ठिकाणी सभा त्यांनी घेतल्या होत्या. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया हा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांचा पक्ष संयुक्त महाराष्ट्र चळ्वळीतील एक घटक पक्ष होता.. २८ नोव्हेंबर १९४९ रोजी मुंबई महापालिकेत संयुक्त महाराष्ट्राचा पहिला ठराव आचार्य अत्रे व डॉ. आर.डी. भंडारे यांनी ‘मुंबईसह महाराष्ट्र’चा ठराव शेडयुल्ड कास्ट फेडरेशनच्या (Scheduled Caste Federation) वतीने मांडला.
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| 6 |
+
स्वातंत्र्यानंतर भाषिक राज्यांची मागणी होऊ लागली. आंध्र प्रदेश राज्याची मागणी पोट्टी श्रीरामल्लू यांच्या बलिदानानंतर पूर्ण झाली. भाषावार प्रांतरचेनेसाठी नेमलेल्या कमिशनाने महाराष्ट्र राज्याची मागणी डावलली.
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डिसेंबर इ. स. १९४८ रोजी प्रसिद्ध झालेल्या दार कमिशनच्या अहवालात भाषावर प्रांतरचनेला विरोध दर्शविण्यात आला होता व महाराष्ट्रीय लोकांवर अपमानास्पद टिप्पणी होती. जे.व्ही.पी कमिटीने महाराष्ट्र व कर्नाटक यांच्या मागणीला पाठिंबा दिला नाही व मुंबई महाराष्ट्रात देण्यास विरोध केला. मुंबई अनेक भाषांच्या व वर्णाच्या लोकांचे, उद्योगधंद्याचे शहर आहे असे अहवालात म्हटले होते. वल्लभभाई पटेलांनी मुंबईचा विकास गुजराती भाषकांनी केल्याचे नमूद केले.
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डिसेंबर इ. स. १९५३ रोजी फाजलअली यांच्या अध्यक्षेतेखाली राज्य पुनर्रचना आयोगाची नियुक्ती झाली. संयुक्त महाराष्ट्राच्या वतीने एस.एम.जोशी,धनंजय गाडगीळसह इतरांनी आयोगासमोर आपली बाजू मांडली. इ. स. १९५५ रोजी आयोगाचा निवाडा जाहीत झाला. पुनर्रचनेबाबत पायाभूत तत्त्व सगळ्यांना सारखी लागू केलेली नव्हती आणि त्यात मोठी विसंगती होती. हैद्राबादसाठी एक भाषिकाच तत्त्व तर मुंबईसाठी द्वैभाषिकाचं. मुंबई प्रांतात गुजराती भाषिक सौराष्ट्र समाविष्ट करून मराठी भाषिक विदर्भ ,बेळगाव-कारवार बाहेर ठेवले गेले. मुंबईच्या विकासासाठी तिला गुजरातपासून वेगळे ठेवणे योग्य नाही व बेळगाव भाग कर्नाटकाशी 'आर्थिकदृष्ट्या' जोडला असल्याचे तसेच विदर्भ महाराष्ट्रात घातल्यास नागपूर शहराचे महत्त्व कमी होईल असे अहवालात नमूद करण्यात आले. आयोगाला या द्वैभाषिकात मराठी भाषिकांची संख्या गुजराती भाषिकांपेक्षा जास्त होऊ द्यायची नव्हती असेच या विसंगतीचे कारण म्हणावे लागेल.
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या आयोगाच्या विरोधात महाराष्ट्रभर असंतोषाचा डोंब उसळला. नेहरूनी त्यामुळे सौराष्ट्रासह गुजरात, विदर्भासह महाराष्ट्र व स्वतंत्र मुंबई अशा त्रिराज्य योजना जाहीर केली. त्रिराज्य योजनेत महाराष्ट्रापासून मुंबई तोडण्यामुळे अन्यायाची भावना मराठीजनांत पसरली व संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीने पेट घेतला. 'मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्र झालाच पाहिजे' हे या आंदोलनाचे घोषवाक्य बनलं.महाराष्ट्रीय काँग्रेस नेत्यांनी केंद्रीय नेतृत्वासमोर गुडघे टेकले. यामुळे काँग्रेसनेते जनतेच्या नजरेतून उतरले. यशवंतराव चव्हाण यांच्यासारखे ज्येष्ठ नेत्याने तर नेहरु व संयुक्त महाराष्ट्रात ,मला नेहरु महत्त्वाचे वाटतात असे म्हटले. महाराष्ट्रातील कम्युनिस्ट, सोशालीस्ट व प्रजासमाजवादी पक्षातील डावे पुढारी व काँग्रेसेतरांनी संयुक्त महाराष्ट्राचा लढा हातात घेतला. सेनापती बापट, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, एस.एम.जोशी, प्रल्हाद केशव अत्रे, श्रीपाद डांगे, शाहीर अमर शेख,भाई उद्धवराव पाटील, प्रबोधनकार ठाकरे हे चळवळीतील महत्त्वाचे नेते ठरले. एस.एम. जोशी, श्रीपाद डांगे यांनी लढ्याचे नेतृत्व केले. अत्र्यांनी आपल्या 'मराठा' या दैनिकात संयुक्त महाराष्ट्राचा जोरदार पुरस्कार केला तर विरोधकांवर बोचरी व कठोर टीका केली. त्यांच्या भाषणातून संयुक्त महाराष्ट्राला विरोध करणाऱ्याचा खरपूस समाचार घेतला. शाहीर अमर शेख,शाहिर अण्णाभाऊ साठे,शाहिर गव्हाणकर ह्यांनी आपल्या कलाविष्काराने मराठी अस्मिता जागृत ठेवली.
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+
२० नोव्हेंबर इ. स. १९५५ मोरारजी देसाई व स.का.पाटील या काँग्रेस नेत्यांनी चौपाटीवर सभा घेऊन प्रक्षोभक विधाने केली. पाटलांनी 'पाच हजार वर्षांनी सुद्धा मुंबई महाराष्ट्राला मिळणार नाही व मोरारजींनी 'काँग्रेस जिवंत असेपर्यंत मुंबई महाराष्ट्राला मिळणार नाही, गुंडगिरीला योग्य जबाब मिळेल' अशी मुक्ताफळं उधळली. लोकांनी संतापून सभा उधळली. २१ नोव्हेंबर इ. स. १९५५ रोजी झालेल्या आंदोलनावेळेस पोलिसांनी केलेल्या गोळीबारामुळे १५ जणांना प्राण गमवावा लागला. जाने-फेब्रु इ. स. १९५६ रोजी केंद्रशासित मुंबईची घोषणा केल्यानंतर लोक रस्त्यावर उतरली. हरताळ, सत्याग्रह व मोर्चे सुरू झाली. मोरारजीच्या सरकारने सत्तेचा दुरुपयोग करून निष्ठूरपणे ८० लोकांना गोळीबारात मारले. संयुक्त महाराष्ट्रातील आंदोलनात एकूण १०५ जणांनी आपल्या प्राणाची आहुती दिली. त्यांच्या स्मरणार्थ मुंबईच्या फ्लोरा फाउंटन भागात हुतात्मा स्मारक उभारले गेले. संयुक्त महाराष्ट्र समितीने दिल्ली येथे प्रचंड सत्याग्रह घडवून आणला.चळवळीच्या काळात जनतेच्���ा असंतोषामुळ, नेहरुंना महाराष्ट्रात सुरक्षारक्षकांसोबत फिरावे लागे व त्यांचे स्वागत काळ्या झेंड्यांनी व निषेधानेच होई. भारताचे अर्थमंत्री सी.डी देशमुखांनी महाराष्ट्रावरील होणाऱ्या अन्यायाच्या निषेधार्थ आपला राजीनामा दिला. या राजीनाम्यामुळे चळवळीला अधिक बळ मिळाले.
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| 11 |
+
१ नोव्हेंबर इ. स. १९५६ला केंद्राने सौराष्ट्र, गुजरात,मराठवाडा, विदर्भ व मुंबई इलाख्यातील सर्व मराठी प्रदेश मिळून (परंतु बेळगाव-कारवार वगळून) विशाल द्विभाषिक स्थापले. परंतु या द्विभाषिकाचे महाराष्ट्र व गुजरात येथेही कडाडून विरोध झाला. या समितीने १९५७ सालची लोक सभा आणि विधानसभा निवडणूक लढवली. या सार्वत्रिक निवडणुकीत समितीला भरघोस यश मिळाले. त्यात बलाढ्य काँग्रेसच्या विरोधात निवडणुकीत या समितीला ३९८ जागांपैकी तब्बल १५५ जागांवर विजय मिळाला. स्वाभाविकच ही समिती प्रमुख विरोधी पक्ष बनली. आणि डाॅ. आर.डी. भंडारे यांनी संयुक्त महाराष्ट्राच्या पहिल्या विरोधी पक्षनेते पदाचा मान भुषविला. काँग्रेसचे नेतृत्व या सर्व प्रकारामुळे व १९६२ला होणाऱ्या निवडणुकीला सामोरे जायचे असल्यामुळे संयुक्त महाराष्ट्राला अनुकूल झाले. इंदिरा गाधींने नेहरूंचे मन वळवले. द्वैभाषिकाची विभागणी करताना महाराष्ट्र राज्याने गुजरात राज्याला १० कोटी द्यायचे व पुढील ४ वर्षात ती रक्कम कमी करत आणायची अशी अट मान्य झाली.[१] तसेच मुंबईचा विकास व उभारणी गुजराती भांडवलदारांनी केली असा दावा गुजराती भाषिक करत होते व त्याचं 'व्याज' म्हणून एकूण ५० कोटी देऊनच मुंबई महाराष्ट्राला मिळाली.[२] मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्र स्थापन झाला तरी त्यात बेळगाव, कारवार, निपाणी, बिदर व डांगचा समावेश झाला नाही. बेळगावबाबतचा महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमाप्रश्न आजही चालू आहे. नेहरूंना राज्याला हवे असलेले 'मुंबई' नाव वगळून समितीने 'महाराष्ट्र'असे नाव ठरवले व राज्याची स्थापना १९६० सालच्या कामगारदिनी म्हणजे १ मे १९६० रोजीझाली. महाराष्ट्र स्थापनेचा कलश महाराष्ट्राचे पहिले मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण यांचे हस्ते दिल्लीहून आणला गेला. नव्या राज्याची मुंबई ही राजधानी व नागपूर उपराजधानी निश्चित झाली.
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| 12 |
+
२१ नोव्हेंबर इ. स. १९५५चे हुतात्मे[३]
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| 13 |
+
१] सिताराम बनाजी पवार
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| 14 |
+
२] जोसेफ डेव्हिड पेजारकर
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| 15 |
+
३] चिमणलाल डी. शेठ
|
| 16 |
+
४] भास्कर नारायण कामतेकर
|
| 17 |
+
५] रामचंद्र सेवाराम
|
| 18 |
+
६] शंकर खोटे
|
| 19 |
+
७] धर्माजी गंगाराम नागवेकर
|
| 20 |
+
८] रामचंद्र लक्ष्मण जाधव
|
| 21 |
+
९] के. जे. झेवियर
|
| 22 |
+
१०] पी. एस. जॉन
|
| 23 |
+
११] शरद जी. वाणी
|
| 24 |
+
१२] वेदीसिंग
|
| 25 |
+
१३] रामचंद्र भाटीया
|
| 26 |
+
१४] गंगाराम गुणाजी
|
| 27 |
+
१५] गजानन ऊर्फ बंडू गोखले
|
| 28 |
+
१६] निवृत्ती विठोबा मोरे
|
| 29 |
+
१७] आत्माराम पुरुषोत्तम पानवलकर
|
| 30 |
+
१८] बालप्पा मुतण्णा कामाठी
|
| 31 |
+
१९] धोंडू लक्ष्मण पारडूले
|
| 32 |
+
२०] भाऊ सखाराम कदम
|
| 33 |
+
२१] यशवंत बाबाजी भगत
|
| 34 |
+
२२] गोविंद बाबूराव जोगल
|
| 35 |
+
२३] पांडूरंग धोंडू धाडवे
|
| 36 |
+
२४] गोपाळ चिमाजी कोरडे
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| 37 |
+
२५] पांडूरंग बाबाजी जाधव
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| 38 |
+
२६] बाबू हरी दाते
|
| 39 |
+
२७] अनुप माहावीर
|
| 40 |
+
२८] विनायक पांचाळ
|
| 41 |
+
२९] सिताराम गणपत म्हादे
|
| 42 |
+
३०] सुभाष भिवा बोरकर
|
| 43 |
+
३१] गणपत रामा तानकर
|
| 44 |
+
३२] सिताराम गयादीन
|
| 45 |
+
३३] गोरखनाथ रावजी जगताप
|
| 46 |
+
३४] महमद अली
|
| 47 |
+
३५] तुळशीराम पुंजाजी बेलसरे
|
| 48 |
+
३६] देवाजी सखाराम पाटील
|
| 49 |
+
३७] शामलाल जेठानंद
|
| 50 |
+
३८] सदाशिव महादेव भोसले
|
| 51 |
+
३९] भिकाजी पांडूरंग रंगाटे
|
| 52 |
+
४०] वासुदेव सुर्याजी मांजरेकर
|
| 53 |
+
४१] भिकाजी बाबू बांबरकर
|
| 54 |
+
४२] सखाराम श्रीपत ढमाले
|
| 55 |
+
४३] नरेंद्र नारायण प्रधान
|
| 56 |
+
४४] शंकर गोपाल कुष्टे
|
| 57 |
+
४५] दत्ताराम कृष्णा सावंत
|
| 58 |
+
४६] बबन बापू भरगुडे
|
| 59 |
+
४७] विष्णू सखाराम बने
|
| 60 |
+
४८] सिताराम धोंडू राडये
|
| 61 |
+
४९] तुकाराम धोंडू शिंदे
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| 62 |
+
५०] विठ्ठल गंगाराम मोरे
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| 63 |
+
५१] रामा लखन विंदा
|
| 64 |
+
५२] एडविन आमब्रोझ साळवी
|
| 65 |
+
५३] बाबा महादू सावंत
|
| 66 |
+
५४] वसंत द्वारकानाथ कन्याळकर
|
| 67 |
+
५५] विठ्ठल दौलत साळुंखे
|
| 68 |
+
५६] रामनाथ पांडूरंग अमृते
|
| 69 |
+
५७] परशुराम अंबाजी देसाई
|
| 70 |
+
५८] घनश्याम बाबू कोलार
|
| 71 |
+
५९] धोंडू रामकृष्ण सुतार
|
| 72 |
+
६०] मुनीमजी बलदेव पांडे
|
| 73 |
+
६१] मारुती विठोबा म्हस्के
|
| 74 |
+
६२] भाऊ कोंडीबा भास्कर
|
| 75 |
+
६३] धोंडो राघो पुजारी
|
| 76 |
+
६४] हृदयसिंग दारजेसिंग
|
| 77 |
+
६५] पांडू माहादू अवरीरकर
|
| 78 |
+
६६] शंकर विठोबा राणे
|
| 79 |
+
६७] विजयकुमार सदाशिव भडेकर
|
| 80 |
+
६८] कृष्णाजी गणू शिंदे
|
| 81 |
+
६९] रामचंद्र विठ्ठल चौगुले
|
| 82 |
+
७०] धोंडू भागू जाधव
|
| 83 |
+
७१] रघुनाथ सखाराम बीनगुडे
|
| 84 |
+
७२] काशीनाथ गोविंद चिंदरकर
|
| 85 |
+
७३] करपैया किरमल देवेंद्र
|
| 86 |
+
७४] चुलाराम मुंबराज
|
| 87 |
+
७५] बालमोहन
|
| 88 |
+
७६] अनंता
|
| 89 |
+
७७] गंगाराम विष्णू गुरव
|
| 90 |
+
७८] रत्नू गोंदिवरे
|
| 91 |
+
७९] सय्यद कासम
|
| 92 |
+
८०] भिकाजी दाजी
|
| 93 |
+
८१] अनंत गोलतकर
|
| 94 |
+
८२] किसन वीरकर
|
| 95 |
+
८३] सुखलाल रामलाल बंसकर
|
| 96 |
+
८४] पांडूरंग विष्णू वाळके
|
| 97 |
+
८५] फुलवरी मगरू
|
| 98 |
+
८६] गुलाब कृष्णा खवळे
|
| 99 |
+
८७] बाबूराव देवदास पाटील
|
| 100 |
+
८८] लक्ष्मण नरहरी थोरात
|
| 101 |
+
८९] ठमाबाई विठ्ठल सूर्यभान
|
| 102 |
+
९०] गणपत रामा भुते
|
| 103 |
+
९१] मुनशी वझीऱअली
|
| 104 |
+
९२] दौलतराम मथुरादास
|
| 105 |
+
९३] विठ्��ल नारायण चव्हाण
|
| 106 |
+
९४] देवजी शिवन राठोड
|
| 107 |
+
९५] रावजीभाई डोसाभाई पटेल
|
| 108 |
+
९६] होरमसजी करसेटजी
|
| 109 |
+
९७] गिरधर हेमचंद लोहार
|
| 110 |
+
९८] सत्तू खंडू वाईकर
|
| 111 |
+
—नाशिक --
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| 112 |
+
९९] गणपत श्रीधर जोशी
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| 113 |
+
१००] माधव राजाराम तुरे(बेलदार)
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| 114 |
+
-- बेळगांव --
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| 115 |
+
१०१] मारुती बेन्नाळकर
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| 116 |
+
१०२] मधूकर बापू बांदेकर
|
| 117 |
+
१०३] लक्ष्मण गोविंद गावडे
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| 118 |
+
१०४] महादेव बारीगडी
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| 119 |
+
-- निपाणी --
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| 120 |
+
१०५] कमलाबाई मोहिते
|
| 121 |
+
-- मुंबई—
|
| 122 |
+
१०६] सिताराम दुलाजी घाडीगांवकर
|
| 123 |
+
१०७] शंकरराव तोरस्कर
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| 124 |
+
१०८] बंडु गोखले
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स्वतंत्र भारत देशाची पुर्नरचना मुख्यत्वे भाषिक तत्त्वावर झाली तरी महाराष्ट्राला स्वतंत्र राज्य नाकारण्यात आले. त्यामुळे येथील जनतेला विराट आंदोलन करावे लागले. भारताच्या भाषिक चळवळींचा अभ्यास करणाऱ्या तज्ज्ञांना संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीची नोंद त्यांच्या ग्रंथांतून करावी लागल्यामुळे संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीबद्दलची माहिती राष्ट्रीय राजकीय विश्लेषकांचे ग्रंथ, मह्राराष्ट्रातील राजकीय विशेषकांचे ग्रंथ, चळ्वळीत सहभागी लोकांची आत्मचरित्रे आणि ललित साहित्य अशा स्वरूपात उपलब्ध होते.
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| 2 |
+
संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीच्या पार्श्वभूमीवर चळवलीतील अग्रभागी असलेले एक तत्कालीन कार्यकर्ते लालजी पेंडसे यांनी चळवळीबद्दलचा पहिला ग्रंथ ’महाराष्ट्राचे महामंथन] हा १९६२ साली लिहून पूर्ण केला. ह्या इतिहासाचे कथन त्यांनी निष्पक्ष विश्लेषणासोबत घडलेल्या घटनांचे वर्णन, संयुक्त संयुक्त महाराष्ट्र समितीच्या बैठकांचे वृत्तान्त, चर्चांचे तपशील, वृत्तपत्रांतील बातम्या यांच्या माध्यमातून केले आहे.
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| 3 |
+
संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीचे नेते अत्यंत टोकदार टीका करत होते पण महात्मा गांधींच्या अहिंसा चळवळीवर साऱ्यांचीच श्रद्धा होती. भर मुख्यत्वे शाब्दिदीक मारावरच होता. संयुक्त महाराष्ट्र चळवळ यशस्वी झाल्याच्या पार्श्वभूमीवर बाळासाहेब ठाकरेंनी काढलेल्या स्वतःच्या व्यंगचित्राबद्दल बाळासाहेब महाराष्ट्र टाइम्सला दिलेल्या मुलाखतीत म्हणतात
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| 4 |
+
"...मुळात मला यशवंतरावांनी संयुक्त महाराष्ट्राचा ' मंगल कलश ' आणला , हेच मान्य नाही. उलट मी त्यापूर्वी एक व्यंगचित्र काढले होते. एसेम, डांगे हे यशवंतरावांना दगड मारत आहेत आणि त्यानंतर ते दगड एकत्र करून यशवंतरावांनी त्यांची एक भिंत बांधली आहे, असेसं ते चित्र होते. त्या भिंतीवर यशवंतरावांनी लिहिले होते 'संयुक्त महाराष्ट्र!' त्यानंतर १३ ऑगस्ट १९६० रोजी 'मार्मिक'च्या पहिल्या अंकाच्या प्रकाशनाला यशवंतराव बालमोहन विद्यामंदिरात आले. तेव्हा ते म्हणाले होते : 'बाळच्या कुंचल्याचे फटकारे अजूनही माझ्या पाठीवर आहेत. पण याच्याच कुंचल्याने मला न्यायही दिला आहे... ' (संदर्भ: http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/2722504.cms?prtpage=1 Archived 2012-11-22 at the Wayback Machine.)
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युनायटेड नेशन्स सुरक्षा समितीचा नकाराधिकार हा UN सुरक्षा परिषदेच्या पाच स्थायी सदस्यांचा ( चीन, फ्रान्स, रशिया, युनायटेड किंग्डम आणि युनायटेड स्टेट्स ) कोणत्याही "महत्त्वपूर्ण" ठरावाला व्हेटो करण्याचा अधिकार आहे. तथापि, स्थायी सदस्याची अनुपस्थिती किंवा अनुपस्थिती मसुदा ठराव मंजूर होण्यापासून प्रतिबंधित करत नाही.[१] हा नकाराधिकार "प्रक्रियात्मक" मतांवर लागू होत नाही, जे स्वतः स्थायी सदस्यांनी ठरवले आहे. एक स्थायी सदस्य महासचिवाची निवड देखील अवरोधित करू शकतो, जरी मतदान बंद दरवाजाच्या मागे घेतले जात असल्याने औपचारिक व्हेटो अनावश्यक आहे.
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| 2 |
+
नकाराधिकार हा वादग्रस्त आहे. समर्थक याला आंतरराष्ट्रीय स्थिरतेचे प्रवर्तक मानतात,[२] लष्करी हस्तक्षेपाविरूद्ध एक तपासणी,[३] आणि अमेरिकेच्या वर्चस्वाविरूद्ध एक गंभीर संरक्षण.[४] टीकाकार म्हणतात की व्हेटो हा यूएनचा सर्वात अलोकतांत्रिक घटक आहे,[५] तसेच युद्ध गुन्ह्यांवर आणि मानवतेविरुद्धच्या गुन्ह्यांवर निष्क्रियतेचे मुख्य कारण आहे, कारण ते स्थायी सदस्य आणि त्यांच्या सहयोगींच्या विरुद्ध संयुक्त राष्ट्रांच्या कारवाईला प्रभावीपणे प्रतिबंधित करते.[६] 'वीटो' हा मूळ लॅटिन शब्द आहे. याचा अर्थ 'मी परवानगी देत नाही'... प्राचीनकाळात रोममध्ये काही निवडून आलेल्या अधिकाऱ्यांना अतिरिक्त अधिकार देण्यात आले होते. रोमन सरकारची कोणतीही कृती थांबवण्यासाठी ते या अधिकारांचा वापर करू शकत होते. तेव्हापासून या शब्दाचा एखादी गोष्ट रोखण्यासाठी एखाद्या 'शक्ती'प्रमाणे वापर केला जाऊ लागला.
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| 3 |
+
सध्या सुरक्षा परिषदेचे पाच स्थायी सदस्य चीन, फ्रान्स, रशिया, ब्रिटन आणि अमेरिका यांच्याकडे 'वीटो'चा अधिकार आहे. जर एखाद्या सदस्याला स्थायी सदस्यांचा निर्णय मान्य नसेल तर तो सदस्य 'वीटो'चा वापर करून हा निर्णय रोखू शकतो.
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संयुक्त राष्ट्रसंघाचे सध्या १९३ सदस्य देश आहेत. हे सर्व सदस्य संयुक्त राष्ट्रसंघाच्या आमसभेचे सभासद आहेत.[१] कायद्यानुसार केवळ सार्वभौम देशांनाच हे सदस्यत्व प्राप्त करता येते. जगातील सध्याच्या सार्वभौम देशांपैकी केवळ व्हॅटिकन सिटी हा देश सदस्य नाही.
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| 3 |
+
संयुक्त राष्ट्रसंघाची स्थापना १९४५ साली करण्यात आली व मूळ सदस्य राष्ट्रांची संख्या ५१ इतकी होती.[२] ह्यांपैकी चेकोस्लोव्हाकिया व युगोस्लाव्हिया ह्या देशांव्यतिरिक्त इतर सर्व देश आजही सदस्य आहेत. ह्या दोन देशांचे विघटन होऊन तयार झालेल्या सर्व देशांना संयुक्त राष्ट्रसंघात वेगळा प्रवेश देण्यात आला. सोव्हिएत संघाच्या विघटनानंतर रशियाने ती जागा घेतली.
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| 4 |
+
खालील यादीत संयुक्त राष्ट्रसंघाचे सर्व विद्यमान सदस्य दिले आहेत. (मूळ सदस्य निळ्या पार्श्वभूमीवर दाखवले आहेत).[३]
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| 5 |
+
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| 6 |
+
सदस्य देश • आमसभा • सुरक्षा समिती • आर्थिक व सामाजिक परिषद • सचिवालय (सरचिटणीस) • आंतरराष्ट्रीय न्यायालय
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| 7 |
+
खाद्य व कृषी संस्था • आंतरराष्ट्रीय नागरी उड्डाण संस्था • आंतरराष्ट्रीय मजूर संस्था • आंतरराष्ट्रीय सागरी संस्था • IPCC • आंतरराष्ट्रीय अणुऊर्जा संस्था • संयुक्त राष्ट्रे औद्योगिक विकास संस्था • आंतरराष्ट्रीय दूरध्वनी संघ • संयुक्त राष्ट्रे एड्स कार्यक्रम • SCSL • UNCTAD • UNCITRAL • संयुक्त राष्ट्रे विकास समूह • संयुक्त राष्ट्रे विकास कार्यक्रम • UNDPI • संयुक्त राष्ट्रे पर्यावरण कार्यक्रम • युनेस्को • UNODC • UNFIP • संयुक्त राष्ट्रे लोकसंख्या निधी • संयुक्त राष्ट्रे मानवी हक्क उच्चायुक्त कार्यालय • संयुक्त राष्ट्रे निर्वासित उच्चायुक्त • संयुक्त राष्ट्रे मानवी हक्क समिती • UN-HABITAT • युनिसेफ • UNITAR • UNOSAT • UNRWA • UN Women • विश्व पर्यटन संस्था • जागतिक पोस्ट संघ • विश्व खाद्य कार्यक्रम • विश्व स्वास्थ्य संस्था • विश्व हवामान संस्था
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विवर म्हणजे खगोलीय वस्तू (उदा. पृथ्वी, इतर ग्रह व उपग्रह)चा पृष्ठभाग धसल्याने तयार झालेला खड्डा.
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| 2 |
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| 3 |
+
विवरांचा आकार बहुदा वर्तुळाकार असतो.
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| 4 |
+
विवर निर्माण होण्यास खालील नैसर्गिक किंवा मानव निर्मित प्रक्रिया कारणीभूत असतात.
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| 5 |
+
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संवादिनी (हार्मोनियम/बाजाची पेटी/पेटी) हिचा शोध पॅरिस शहरातील अलेक्झांडर डिबेन यांनी इ.स. १७७० मध्ये लावला. भारतात हे वाद्य इ.स. १८००नंतर युरोपीय लोकांनी आणले.
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| 2 |
+
हाताने किंवा पायाने भात्याद्वारे हवा भरून पितळी कंपन तयार करणाऱ्या (सूर) शिट्ट्यांच्या मार्फत सुरेल ध्वनी निर्माण होतो. या वाद्यात डावीकडील बाजूकडून सुरुवात केल्यास प्रथम २ व नंतर ३ असे काळ्या पट्ट्यांचे तीन समूह असतात. भारतीय संगीतात या बाजाच्या पेटीचा गायकाला साथ देण्यासाठी किंवा एकलवादनासाठी उपयोग होतो. कीर्तने, सुगम संगीत इत्यादी ठिकाणी पेटी साथीला असते.
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| 3 |
+
हार्मोनियममध्ये दोन घटक महत्त्वाचे असतात : स्वराची पत्ती व हवेचा भाता. आवाज निघतो तो पत्तीतून. पत्तीत भरल्या जाणाऱ्या हवेला नियंत्रित करण्याचे काम भाता करतो. प्रत्येक स्वरासाठी एक लांबट चौकट असते. चौकटीच्या खाचेत पत्ती खाली-वर होऊ शकते. ह्या स्वरचौकटी एका ओळीत एक फळीवर चिकटवितात व ती फळी पेटीत अशा रीतीने बसवितात की, भात्यातून येणारी हवा त्या फळीतून शिरेल. उच्च प्रतीच्या स्वरचौकटी पूर्वी परदेशांतून, विशेषतः जर्मनी व फ्रान्समधून, मागवीत असत पण आता त्या भारतात तयार होऊ लागल्या असून पालिताणा( गुजरात) येथे मोठ्या प्रमाणावर तयार होतात. भाता दाबला म्हणजेे त्यातून निघालेली हवा स्वरपत्तिकेच्या खाली बंद असलेल्या चौकटीत कोंडली जाते. या चौकटीत चार-पाच मोठी छिद्रे अंतराअंतरावर असतात व ती छोट्या लाकडी पट्ट्यांनी बंद असतात. त्यांना लोखंडी सळ्या जोडून त्या सळ्यांची टोके पेटीच्या बाहेर काढलेली असतात. हार्मोनिअम वाजविताना ह्या सळ्या ओढून बंद चौकटीतील एक किंवा अधिक छिद्रे उघडतात त्यामुळे भात्यातून आलेली हवा या छिद्रांतून स्वरपत्तिकेत शिरते. स्वर-पत्तिकेच्या वर, पेटीच्या बाहेर, वरच्या चौकटीत प्रत्येक स्वरचौकटीला जोडणारी एक अशा खाचा केलेल्या असतात व त्यांवर प्रत्येक स्वराची एक अशा, समोर काळ्या व पांढऱ्या रंगांच्या आणि मागे टणक तारेनेदाबून धरलेल्या लांब पट्ट्या असतात. एक एक पट्टी बोटाने दाबलीकी, तिच्याखालची खाच उघडी पडते व तिच्यातून तसेच आतल्यास्वरचौकटीतून आलेली हवा बाहेर पडते. हवेच्या या संचलनामुळे स्वरचौकटीतील पत्ती कंपित होऊन आवाज निघतो. स्वरपट्टीवरून बोट काढले की, मागची खाच बंद होते व हवेला बाह���र पडण्यास वाव न मिळाल्यामुळे पत्ती कंपित होत नाही. यात साडेतीन सप्तकाचे स्वर मिळतात. हार्मोनियममध्ये स्वर टेंपर्ड स्केलमध्ये लावलेले असतात. टेंपर्ड स्केलमध्ये स्वरसप्तकातील कोमल व शुद्ध स्वरांचे स्वरूप सप्तकाचेसमान बारा भाग करून योजलेले असते कारण सप्तकात प्रमुख स्वरसात म्हणजे शुद्ध किंवा तीव्र व उपप्रमुख किंवा कोमल मिळून बारा, सात पट्ट्या पांढऱ्या व पाच काळ्या रंगाच्या असतात. स्वरभरणा आणि हाताळ-ण्यास सुलभता यांमुळे भारतात या वाद्याचा प्रसार व प्रचार झपाट्याने झाला.
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संवादिनी हे नाव भारतीय वाद्याचे आहे असे वाटते, पण ते तसे नाही. हार्मोनियम या मूळ पाश्चात्त्य वाद्याचे ते भारतीय नाव आहे. १७७० इ.स.च्या आसपास आँर्गन या रीङवाल्या वाद्यामध्ये काही नवे प्रयोग होण्यास सुरुवात झाली. मुळात तीन स्वरांचा मेळ जो पाश्चात्त्य संगीतात आवश्यक असतो, तो साध्य करण्याचे उद्दिष्ट ज्या वाद्याने साध्य होते, तशा वाद्यांची आवश्यकता नव्या रीङ वाद्यांमध्ये निर्माण होऊ लागली. त्या प्रयत्नांतूनच १८४० मध्ये फ्रान्समध्ये अलेक्झांर दिबेन याने अशा स्वरपट्ट्या असणारे हे हलक्या वजनाचे वाद्य शोधून काढले. हार्मनी म्हणजे स्वरांच्या मिश्रणाने साधला जाणारा संवाद. यालाच सहज भाषेत स्वरमिश्रण म्हणण्यास हरकत नाही. एकमेकास अनुकूल असणाऱ्या स्वरांच्या संवादामुळे भारतीय संगीतकारांनी या वाद्याचे नाव संवादिनी ठेवले.
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हार्मोनियम विदेशातून आलेले हे पहिलेच वाद्य नाही. यापूर्वी व्हायोलिन भारतात आले होते, आणि या वाद्याचा प्रवेश पहिल्यांदा दाक्षिणात्य संगीतात झाला, त्यानंतर ते वाद्य हिंदुस्तानी संगीतात आले.
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हिंदुस्तानी संगीतासाठी या वाद्याचा प्रथम प्रयोग मराठी संगीत नाटकांच्या माध्यमातून सुरू झाला तो १८८२ साली. संगीत शाकुंतल या पहिल्या संगीत नाटकाने आँर्गनचा उपयोग केला. त्यानंतर संगीत साैभद्र हे नाटकही त्यातल्या संगीतासाठी आणि
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+
ऑर्गनच्या साहाय्याने गाजले. मराठी संगीत नाटकानी शास्त्रीय संगीतातल्या बंदिशींचाही पदांसाठी उपयोग केला आणि त्यातूनच हार्मोनियमने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतामधले आपले स्थान बळकट केले. नाट्यसंगीताच्या माध्यमातूनच एका स्वतंत्र स्वरवाद्याची देणगी भारतीय संगीताला मिळाली.
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भारतीय संगीत हे मूलतः बैठकीचे असल्यामुळे खाली बसून वाजिवण्यासाठी या वाद्यामध्ये मूलभूत बदल झाले ते बंगालच्या कारागिरानी बनविलेल्या हातपेटीमुळे. कलकत्त्याच्या द्वारिकानाथ घोष यांनी १८७५ मध्ये सर्वप्रथम भारतीय संगीताल उपयुक्त हार्मोनियमची निर्मिती केली. द्वारिका दास या त्यांच्या फर्मने आधुनिक हातपेटीची भारतात पहिल्यांदा निर्मिती आणि विक्री केली. त्यानंतर टी. एस्. रामचंद्र ॲन्ड कंपनीने महाराष्ट्रात याची निर्मिती सुरू केली. त्यानंतर गुजरातमध्ये अहमदाबाद येथे गणपतराव बर्वे यांनी हातपेट्या बनवल्या. दुसऱ्या महायुद्धानंतर युरोपमधून आँर्गनची आयातही बंद झाली. मग भावनगरमध्ये आणि पालिटाणामध्ये पेट्यांसहित ध्वनिपट्ट्यांचीही निर्मिती सुरू झाली. महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल आणि पंजाब प्रांतात दर्जेदार हार्मोनियम बनविले जाऊ लागल्या. बेळगावातही झीलु सुतार आणि रामचंद्र हुदलीकर यानी उत्तम दर्जाचे हार्मोनियम बनविलेया. २२ श्रुतियुक्त हार्मोनियम बनिवण्यात हुदलीकर यांचा हातखंडा होता.
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पाश्चात्त्य सुरावटींप्रमाणे बनलेले हार्मोनियम हिंदुस्तानी संगीतासाठी कधी उपयोगात आणले जाण्याची शक्यताच नव्हती. परंतु उस्ताद अब्दुल करीमखाँ यांचे शिष्य बाळकृष्णबुवा कपिलेश्वरी यानी गंधार ट्यून्ङ हार्मोनियम बनवून ते हिंदुस्तानी गायकीला योग्य बनविले. गं. बा. आचरेकर यानी श्रुति हार्मोनियम बनविले. त्यांचेच चिरंजीव बा. गं आच्ररेकर यानीही ते कार्य पुढे चालविले. ङाँ. विद्याधर ओक यानीही २२ श्रुतींची मेलोङियम बनविली आहे. बेळगावचेच हरी गोरे यानी पितळेचा रस तयार करून रीड्स बनविण्याचा कारखाना सुरू केला. स्वदेशी चळवळीला प्राधान्य देऊन त्यानी संपूर्ण भारतीय बनावटीचे हार्मोनियम बनविले. कलकत्ता, दिल्ली आणि इतर संगीतपेठांत त्यांच्या हार्मोनियमला मागणी होती. वाद्यसंगीताला आवश्यक स्वरपेट्याही ते उत्तम बनवीत. म्हैसूरच्या महाराजानी त्यांचा या कार्याबद्दल गौरवही केला होता. हरिभाऊ गोरे यांनी चार स्वर असणाऱ्या वाद्यांना षड्ज-पंचम- मध्यमाचा स्वरपुरवठा करणाऱ्या छोट्या तंबोरापेट्याही निर्माण केल्या. पंडित पन्नालाल घोष, पंडित व्ही जी. जोग या महान वादक कलाकारांनी या सुलभ तंबोरा पेट्यांचा वापर सुरू केला आणि वजनाने हलक्या व प्रवासात सहज नेऊ शकणाऱ्या या वाद्याला प्रतिष्ठा मिळवून दि���ी.
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पं.विश्वनाथ कान्हेरे ,अजय जोगळेकर, अप्पा जळगावकर (पुणे), अरविंद थत्ते, आदित्य ओक, एकनाथ ठाकुरदास, केदार नाफडे, गणपतराव पुरोहित, गुलाम रसुल बशीरखाँ (बडोदा), गोविंदराव टेंबे (कोल्हापूर-१८८१-१९५७), गुंडोपंत वालावलकर गोविंदराव पटवर्धन, चिन्मय कोल्हटकर, चैतन्य कुंटे, जयंत बोस, तन्मय देवचक्के,मिलिंद कुलकर्णी,वरद सोहनी तुळशीदास बोरकर, श्रीराम हसबनीस, दिनकर शर्मा, दीपक मराठे, नन्हेबाबू कुंवर (बिदर), निर्मला काकोडे, ङाॅ. पाबळकर, पी. मधुकर (मुंबई-१९१६-१९६७), पुट्टराज गवई, पुरुषोत्तम वालावलकर (मुंबई), पु. ल. देशपांडे, प्रमोद मराठे, बच्चुभाई भंडारे (मुंबई-१८७८-१९०९), बंडूभैय्या चाैघुले (इंदूर), बबन मांजरेकर, बलदेव मिश्र (वाराणसी), बाबुराव बोरकर (बेळगाव), बाबुसिंह (हैद्राबाद), बाळ माटे, भीष्मदेव चॅटर्जी, मनोहर चिमोटे (मुंबई), मुनेश्वर दयाल, मोहनलाल, रवींद्र काटोटी, रवींद्र माने, राजाभाऊ कोसके, राजेंद्र वेैशंपायन, रामभाऊ विजापुरे (बेळगाव- १९१७-२०१०), लक्ष्मणसिंंह, वसंत कनकापूर (धारवाड), वासंती म्हापसेकर, विजय घासकडवी, विठ्ठलराव कोरगावकर (बेळगाव-१८८४- १९७४), विनय मिश्र, शेषाद्री गवई, सारंग कुलकर्णी, सीमा शिरोडकर, सुधांशु कुलकर्णी, सुधीर नायक, अश्विन वालावलकर, सुयोग कुंडलकर, सुवेंदु बॅनर्जी, सोहनलाल, हणमंतराव वाळवेकर (धारवाड), ज्ञानप्रकाश घोष, पुंडलिक कोल्हटकर डोंबिवली
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संवादिनी हे साथीचे वाद्य म्हणून एकोणीसाव्या शतकाच्या आरंभापासून सर्वमान्य झालेले वाद्य आहे. सर्व ख्यालगायकानी या वाद्याला अगदी खुशीने अंगीकारिले. ज्यांचे गायन श्रुतियुक्त असे त्यानीही हार्मोनियम साथीला घेतले आणि गायकांचे कणसुर सहजपणे सामावून घेऊन त्याना जोरकसपणा देण्याचे कामही हार्मोनियमने केले. परंतु मींडकाम करता न येणे, गमक न निघणे अशा काही कारणांमुळे स्वतंत्र वाद्य म्हणून त्याची मान्यता आकाशवाणीने बाळकृष्ण केसकरांच्या केंद्रीय मंत्रिपदाच्या कारकिर्दीत रद्द केली. (केसकरांनी चित्रपट संगीत, क्रिकेट समालोचन यांनाही अकाशवाणीवरून बंद केले!) बेळगावचे हार्मोनियमवादक रामभाऊ विजापुरे यानी १९४५ साली हैदराबाद आकाशवाणीवर स्वतंत्र वादनाचा सर्वात पहिला कार्यक्रम केला. निजाम सरकारचे कायदे कानून इतर परगण्यांपेक्षा वेगळे असल्याने हे शक्य झाले. पण इतरत्र कुठेही आकाशवाणीवर हार्म��नियमला मान्यता नव्हतीच. पुण्याचे हार्मोनियमवादक डाँ. पाबळकर, बेळगावचे विठ्ठलराव कोरगावकर यांच्यासारख्यानी स्वतंत्र वादनाच्या मागणीसाठी केंद्रसरकारकडे जोर लावला होता. अनेक वर्षांनंतर (सुमारे २० वर्षांनंतर) त्या प्रयत्नांना यश मिळाले व १९७२मध्ये हार्मोनियमला आकाशवाणीची मान्यता मिळाली. त्यानंतर बऱ्याच वादकांचे स्वतंत्र वादनाचे कार्यक्रम आकाशवाणीच्या विविध केंद्रांवरून प्रसारित झाले. १९७२ आणि ७३ मध्ये रामभाऊ विजापुरे आणि वसंत कनकापूर यांचे धारवाड केंद्रावर अनेकवेळा वादन झाले. त्यानंतर एका वादकाच्या बेसुर वादनामुळे हार्मोनियमवर पुन्हा बंदी आली. त्यानंतर कित्येक वर्षांनी १ एप्रिल २०१८ रोजी बेळगावचे रविंद्र काटोटी यांचा रविवारच्या राष्ट्रीय संगीत प्रसारणात स्वतंत्र संवादिनीवादनाचा कार्यक्रम झाला.
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विद्वान बी. अरुणाचलप्पा, विद्वान टी. चौडय्या, विद्वान नरसिंहय्या, विद्वान पल्लदम वेंकटरमण राव, विद्वान आर. परमशिवन, एस. श्रीनिवास, सी. रामदास अशा अनेकांनी कर्नाटक संगीतासाठी संवादिनीचा प्रभावी उपयोग केला. कर्नाटक संगीत संवादिनीवर सादर करणारे कलाकार आकाशवाणीच्या ग्रेडेशन पासूनही वंचित नव्हते.
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१. भारतीय संगीत व संगीतशास्त्र-बा. गं. आचरेकर, महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति मंङळ
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२. विश्व संवादिनी शृंग स्मरणिका ५,६,७ जाने. २०१८
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३. स्वरऋणी - लेखिका स्मिता सुनील नाईक
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संवृता सुनिल ही मल्याळम, तेलुगू आणि तमिळ चित्रपटांतून अभिनय करणारी अभिनेत्री आहे. हीने ३०पेक्षा जास्त मल्याळम चित्रपटांतून काम केलेले आहे.
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संसदीय कामकाज मंत्रालय हे भारत सरकारचे एक मंत्रालय आहे. संसदीय कामकाजाचे केंद्रीय कॅबिनेट मंत्री याचे नेतृत्व करतात.
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हे भारताच्या संसदेशी संबंधित व्यवहार हाताळते आणि लोकसभा ("लोकांचे सभागृह," खालचे सभागृह ) आणि राज्यसभा ("राज्यांची परिषद," वरचे सभागृह ) या दोन सभागृहांमधील दुवा म्हणून काम करते. हे १९४९ मध्ये एक विभाग म्हणून तयार केले गेले परंतु नंतर ते पूर्ण मंत्रालय बनले.
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संसदीय कामकाज मंत्री हे मंत्रीपरिषदेचे सदस्य म्हणून कॅबिनेट दर्जाचे असतात. सध्याचे मंत्री प्रल्हाद जोशी आहेत. संसदीय कामकाज मंत्रालय संसदीय कामकाजावरील कॅबिनेट समितीच्या संपूर्ण निर्देशानुसार काम करते.
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'सरकारने स्थापन केलेल्या समित्या आणि इतर संस्थांवरील संसद सदस्यांचे नामनिर्देशन' हा विषय संसदीय कामकाज मंत्रालयाला भारत सरकार (व्यवसाय वाटप) नियम, १९६१ अन्वये राष्ट्रपतींनी कलम ७७(३) दिलेला आहे.
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भारत सरकारच्या (व्यवसाय वाटप) नियम, १९६१ अंतर्गत राष्ट्रपतींनी भारतीय राज्यघटनेच्या कलम ७७(३) अंतर्गत मंत्रालयाला नियुक्त केलेली कार्ये:-
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संसदेच्या दोन्ही सभागृहांना बोलावणे आणि स्थगित करणे, लोकसभा विसर्जित करणे, राष्ट्रपतींचे संसदेला अभिभाषण. दोन्ही सभागृहातील विधान आणि इतर अधिकृत कामकाजाचे नियोजन आणि समन्वय. सदस्यांनी सूचना दिलेल्या प्रस्तावांवर चर्चेसाठी संसदेत सरकारी वेळेचे वाटप. संसदेत प्रतिनिधित्व करणाऱ्या विविध पक्ष आणि गटांचे नेते आणि व्हिप यांच्याशी संपर्क. विधेयकांवरील निवडक आणि संयुक्त समित्यांच्या सदस्यांच्या याद्या. सरकारने स्थापन केलेल्या समित्या आणि इतर संस्थांवर संसद सदस्यांची नियुक्ती. विविध मंत्रालयांसाठी संसद सदस्यांच्या सल्लागार समित्यांचे कार्य. संसदेत मंत्र्यांनी दिलेल्या आश्वासनाची अंमलबजावणी. खाजगी सदस्यांच्या विधेयकांवर आणि ठरावांवर सरकारे उभी असतात. संसदीय कामकाजावरील कॅबिनेट समितीला सचिवीय सहाय्य. प्रक्रियात्मक आणि इतर संसदीय बाबींवर मंत्रालयांना सल्ला. संसदीय समित्यांनी केलेल्या सर्वसाधारण अर्जाच्या शिफारशींवर मंत्रालयांद्वारे कारवाईचे समन्वय. संसद सदस्यांच्या प्रेक्षणीय स्थळांना अधिकृतरीत्या प्रायोजित भेटी. संसद सदस्यांचे अधिकार, विशेषाधिकार आणि प्रतिकारशक्ती यांच्याशी संबंधित मुद्दे. संसदीय सचिव - कार्ये. देशभरातील शाळा/महाविद्यालयांमध्ये युवा संसद स्पर्धांचे आयोजन. अखिल भारतीय सचेतक सम्मेलनचे आयोजन. इतर देशांसोबत संसद सदस्यांच्या सरकार प्रायोजित शिष्टमंडळांची देवाणघेवाण. लोकसभेतील कार्यपद्धती आणि कामकाजाच्या नियमांच्या नियम ३७७ अन्वये आणि राज्यसभेत विशेष उल्लेखांद्वारे उपस्थित केलेल्या प्रकरणांबाबत धोरण निश्चित करणे आणि पाठपुरावा करणे. मंत्रालये/विभागांमध्ये संसदीय कामकाज हाताळण्यासाठी नियमपुस्तिका. संसद कायदा, १९५३ (१९५३चा २०) वेतन आणि भत्ते. संसद सदस्यांचे वेतन, भत्ते आणि निवृत्तीवेतन अधिनियम, १९५४ (१९५४चा ३०). संसद कायदा, १९७७ (१९७७चा ३३) मध्ये विरोधी पक्षाच्या नेत्यांचे वेतन आणि भत्ते. संसदेतील मान्यताप्राप्त पक्ष आणि गटांचे नेते आणि मुख्य चाबूक (सुविधा) अधिनियम, १९९८ (१९९९चा ५).
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सआदत हसन मंटो (जन्म : समराला-लुधियाना, ११ मे १९१२; - लाहोर, १८ जानेवारी १९५५) हे एक हे एक संवेदनशील, प्रतिभाशाली उर्दू साहित्यिक होते. त्यांनी अडीचशे पेक्षा जास्त कथा, शेकडो श्रुतिका, स्मृतिचित्रे, कादंबरी, अनुवाद, अनेक लेख व निबंध लिहिले. त्यांच्या लेखनात जीवनातील संघर्ष, जाणिवा यांचे उघडपणे दर्शन होते. त्यांच्या आयुष्यातील भळाळती जखम म्हणजे भारत-पाकिस्तान फाळणी. दोन्ही देशांतील दंगली, जाळपोळ, हिंसा, धर्मांधतेने व्यथित केले. या काळातील वेदनामय घटना त्यांनी कथांमधून व्यक्त केल्या आहेत. समाजातील घटनांचे सत्य आणि विद्रूप त्यांनी निर्भीडपणे मांडले. त्यांची कथा भारताची फाळणी, समाजातील दारिद्ऱ्य, वेश्यावृत्ती, इत्यादी विषयांच्या आसपास फिरते. [१] लिखाणातील अश्लीलतेच्या आरोपावरून त्यांना हिंदुस्थानच्या फाळणीपूर्वी व फाळणीनंतर असे एकूण सहा वेळा तुरुंगातही जावे लागले, परंतु त्यांच्यावरील आरोप सिद्ध होऊ शकले नाहीत. आपल्या ४२ वर्षांच्या आयुष्यात त्यांनी एकूण २२ कथासंग्रह, एक कादंबरी व इतर फुटकळ साहित्य लिहिले.[२][३] मंटो याच्या टोबा टेकसिंह या कथेवर एक चित्रपट निर्माणाधीन आहे. (२००९ साल)[४]
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मंटो यांचा जन्म लुधियाना जिल्ह्यातील समराला इथे झाला. त्यांचे प्राथमिक शिक्षण अमृतसर इथे झाले. आपल्या कारकिर्दीची सुरुवात त्यांनी व्हिक्टर ह्युगो यांच्या The Last Days of a Condemned Man या कादंबरीच्या अनुवादाने केली. या सुरुवातीच्या काळात त्यांच्यावर व्हिक्टर ह्यूगो, मॅक्झिम गॉर्की, आंतोन चेखव, इत्यादी फ्रेंच व रशियन लेखकांचा प्रभाव होता.[५]
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भारताच्या फाळणीनंतर मंटो जानेवारीमध्ये मुंबई सोडून लाहोरला गेले. मंटोच्या आयुष्याची अंतिम वर्षे त्यांच्यासाठी आर्थिक व आरोग्याच्या दृष्टीने हलाखीची होती, परंतु त्यांचे सर्वोत्कृष्ट लिखाण याच काळात झाले.[५] मंटो यांचा मृत्यू १८ जानेवारी १९५५ रोजी लाहोर इथे झाला.
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मंटो या लेखकाचे नाव जितके विचित्र, तितकाच तो माणूसही विचित्र होता. मंटो जेमतेम त्रेचाळीस वर्षे जगला, पण त्याची ही वर्षे एखाद्या निखाऱ्यासारखी होती. कमालीचे संवेदनशील मन, उपजत प्रतिभा आणि लिखाणावर मेहनत करण्याची तयारी असा त्रिवेणी संगम घडून आला की लेखन बावनकशी होणारच. मंटोच्या साहित्यात हेच झालेले दिसते. मंटोचा आयुष्यपट बघताना त्याच्या व इतर काही थोर साहित्यिकांच्या जीवनातील काही विस्मयकारक साम्ये डोळ्यांसमोर येतात. साहीरप्रमाणे मंटोचे त्याच्या वडिलांशी कधी पटले नाही. गालिबसारखा तो ’आधा मुसलमान’ होता आणि दारूच्या जबरदस्त आहारी गेलेला होता.
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मंटोचे घराणे मूळचे काश्मिरवासी. नंतर ते पंजाबमध्ये येऊन स्थायिक झाले. मंटोची भावंडे धार्मिक वृत्तीची, प्रतिष्ठित आणि संयमी स्वभावाची होती. मंटो बाकी पहिल्यापासूनच क्रांतिकारक, बंडखोर, नास्तिक आणि बेफाम प्रवृत्तीचा होता. मंटोला वाचनाची जबरदस्त आवड होती. वाचलेली पुस्तके विकून टाकून त्या पैशांतून तो उंची सिगारेटी ओढायचा. तरुण वयात शिक्षणावरून लक्ष उडाल्याने तो बेछूटपणे जगत असे. स्वातंत्र्यपूर्व काळात तो कधी सशस्त्र क्रांतीची स्वप्ने बघे तर कधी वैफल्यग्रस्त होऊन स्मशानात जाऊन बसे. तरुण वयातला अस्वस्थपणा दूर करण्यासाठी दारु, चरस, कोकेनसारखी व्यसनॆ केलेल्या मंटोला एकदा लेखन हेच आपले खरे काम याची जाणीव झाल्यावर झपाटल्यासारखा त्याणे तुफानी वेगाने नाटके, निबंध, व्यक्तिचित्रेरं आणि सगळ्यात महत्त्वाचे म्हणजे कथा लिहिल्या.
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मंटोने विशेषतः परदेशी साहित्यिकांचे उत्तमोत्त्म साहित्य वाचलेले होते. लिहायला सुरुवात केल्यानंतर प्रथम पत्रकारिता, नंतर हिंदी सिनेसृष्टीशी संबंधित लिखाण आणि मग स्वतंत्र नाटके, कथा असा मंटोचा लेखनप्रवास घडला. मंटोच्या मुंबईतील सिनेमाच्या विश्वातील सफरीबद्दल त्याच्या पुस्तकांत फारसे नाही. पण एकंदरीत या मायानगरीला मंटो फारसा पसंत पडला नाही, असेच दिसते. मंटोने त्याच्या मुंबईतील मुक्कामात बकालातले बकाल आयुष्य अनुभवलेले होते. भायखळा आणि नागपाडा भागातल्या अंधाऱ्या चाळी, म्हशींचे गोठे, घोड्यांचे तबेले, इराण्यांची हॉटेले आणि वेश्यांची मोठी वस्ती असलेला फोरास रोड हे सगळे त्याने बघितले, अनुभवले. यातूनच त्याने उर्दू भाषेत ’टंटा, मस्तक, मस्का-पॊलिश, मालपानी, दादा, घोटाला, फोकट, कंडम’ अशा अनेक शब्दांची भर घातली. त्यामुळे मंटोची स्वतःची उर्दू लेखनाची एक शैली विकसित झाली असावी असे वाटते.
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१९४८ साली मंटो पाकिस्तानात निघून गेला आणि पाकिस्तानात गेल्याचा त्याला (साहिरप्रमाणेच) पश्चाताप होत राहिला. त्याने अहमद नदीम कासमी यांना लिहिलेल्या पत्रात लिहिले आहे: ’वास्तविक मी आता अशा अवस्थेला पोहोचलो आहे जिथे नकार आणि विश्वास यात फरकच राहिलेला नाही’. पाकिस्तानात त्याने विपुल लिखाण केले हे खरे, पण वैयक्तिक जीवनात त्याची घसरणच होत राहिली. त्याचे मद्यपान तो मुंबईत असतानाच वाढले होते, पाकिस्तानात गेल्यावर मात्र ’दारूनेच त्याला प्यायला सुरुवात केली’.
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पाकिस्तानी टपाल खात्याने मंटोंच्या सन्मानार्थ जानेवारी १८, २००५ रोजी एक टपाल तिकिट प्रकाशित केले.[६]
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सई मांजरेकर (जन्म २३ डिसेंबर १९९८) ही एक भारतीय अभिनेत्री आहे जी हिंदी आणि तेलुगु चित्रपटांमध्ये काम करते. अभिनेते महेश मांजरेकर आणि मेधा मांजरेकर यांची मुलगी, तिने 2019 मध्ये दबंग 3 मधून पदार्पण केले आणि सर्वोत्कृष्ट महिला पदार्पणासाठी फिल्मफेअर पुरस्कारासाठी नामांकन मिळवले. मांजरेकरने 2022 मध्ये घनी या चित्रपटातून तेलगू चित्रपटात पदार्पण केले.[१]
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मांजरेकर यांचा जन्म २३ डिसेंबर १९९८ रोजी चित्रपट अभिनेते मेधा आणि महेश मांजरेकर यांच्या पोटी झाला. तिने मुंबईच्या धीरूभाई अंबानी इंटरनॅशनल स्कूलमध्ये शिक्षण घेतले.[२]
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Ref.
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द्विभाषिक चित्रपट
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सकाळ (वृत्तपत्र) हे भारताच्या पुणे शहरातून प्रसिद्ध होणारे वृत्तपत्र आहे.
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सकाळ हे वृत्तपत्र डॉ. नानासाहेब परूळेकर यांनी पुण्यात एक जानेवारी १९३२ रोजी सुरू केले. २१ सप्टेंबर १९८७ पासून या वृत्तपत्राचा ताबा पुण्यातील उद्योजक प्रताप पवार यांच्याकडे आला. सकाळ पुणे शहरातील अव्वल क्रमांकाचे दैनिक असून, त्याच्या आवृत्त्या सांगली, सोलापूर, कोल्हापूर, मुंबई, नाशिक, जळगाव, औरंगाबाद, व नागपूर या शहरांतूनसुद्धा प्रसिद्ध होतात. सध्या सकाळ हे महाराष्ट्रातील आघाडीच्या खपाच्या दैनिकांपैकी एक आहे. वृत्तपत्र म्हणून सुरू झालेला सकाळ आता बहुमाध्यम समूह झालेला आहे.
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सकाळ वृत्तपत्र समूहाची इतर प्रकाशने :
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दैनिके:
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नियतकालिके:
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दूरचित्रवाणी :
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न्यूझ पोर्टल :
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'सकाळ' वृत्तपत्राच्या आवृत्त्या :
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'सकाळचे संपादक
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सकाळ टुडे
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स्थानिक पातळीवरील बातम्यांसाठी 'सकाळ'ने स्वतंत्र पुरवणी सुरू केली. या पुरवणीसाठी 'सकाळ'ने 'टुडे' हे इंग्रजी नाव वापरले. २००६-२००७ या कालावधीमध्ये 'सकाळ'च्या महाराष्ट्रातील सर्व आवृत्त्यांमध्ये स्थानिक बातम्यांसाठी 'टुडे' पुरवणी प्रसिद्ध होण्यास सुरुवात झाली. या बदलाची सुरुवात 'सकाळ'च्या पुणे आवृत्तीपासून झाली 'पुणे टुडे' ही पहिली पुरवणी १४ ऑगस्ट, २००६ रोजी प्रसिद्ध झाली. रोज मुख्य अंकाबरोबर ही १० किंवा १२ पानी पुरवणी प्रसिद्ध होते. यामुळे स्थानिक पातळीवरील बातम्या आणि जाहिरातदार यांना नवे व्यासपीठ उपलब्ध झाले.
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आफ्टरनून
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• महाराष्ट्र टाइम्स
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• मिड-डे
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• मिरर बझ
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• मुंबई मिरर
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• नवा काळ
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• नवभारत टाइम्स
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• द इकॉनॉमिक टाइम्स
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• प्रहार
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आपल्याला १००% कॉपीराइटमुक्त पब्लीक डॉमेन इतिहास संशोधनातील केवळ प्रमाण संशोधन साधने अथवा मूळ ग्रंथ इंटरनेटवर उपलब्ध करून देणे शक्य असल्यास विकिपीडियाच्या विकिस्रोत या मुक्तस्रोत बन्धू प्रकल्पात आपल्या अशा योगदानाचे आणि परिश्रमाचे स्वागत असेल.
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महाराणी सगुणाबाई भोसले ह्या छत्रपती शाहू महाराजांच्या पत्नी होत्या. त्या मोहिते घराण्यातील होत्या. त्यांच्या मुलीचे नाव राजसबाई होते. छत्रपती शाहू महाराज आणि महाराणी सगुणाबाई यांचे पुत्र संभाजीराजे बालपणीच वारले. त्यामुळे छत्रपती शाहू महाराजांचे दत्तक पुत्र रामराजे छत्रपती हे शाहू राजांच्या मृत्यूनंतर छत्रपती झाले. त्यांचा मृत्यू इ.स. १७४८ साली सातारा येथे झाला. त्यांची समाधी संगम माहुली येथे आहे.
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सचिन: अ बिलियन ड्रीम्स हा २०१७ साली प्रदर्शित झालेला चित्रपट आहे. हा चित्रपट क्रिकेट खेळाडू सचिन तेंडुलकर ह्याच्या जीवनावर आधारित चित्रपट आहे. हा चित्रपट मराठी,हिंदी व इंग्लिश भाषेत आहे.
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सडकपूर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नांदेड जिल्ह्यातील नायगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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नैऋत्य मान्सूनमुळे पडणाऱ्या पावसाळ्याचा ऋतू वगळता येथील हवामान सर्वसाधारणपणे कोरडेच असते. येथे वर्षात चार ऋतू असतात. हिवाळा हा नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी अखेरपर्यंत असतो. त्यानंतर येणारा उन्हाळा मात्र जूनच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत खेचला जातो. नैऋत्य मान्सूनचा पाऊस त्याच्या पाठोपाठ येतो आणि ऑक्टोबरच्या पहिल्या आठवड्यापर्यंत टिकतो. शेष ऑक्टोबर आणि नोव्हेंबरचा पूर्वार्ध हा मान्सूनोत्तर गरमीचा काळ असतो. सरासरी वार्षिक पर्जन्यमान ९८५ मि.मी.आहे. नैऋत्य मोसमी वाऱ्यापासून पडणाऱ्या पावसाचे प्रमाण एकूण वार्षिक पर्जन्याच्या ८० टक्के आहे. जुलै आणि ऑगस्ट हे वर्षातील सर्वाधिक पर्जन्याचे महिने आहेत.
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सर्व धन, ऋण आणि शून्य संख्या म्हणजे सत् संख्या किंवा वास्तविक संख्या (इंग्लिश भाषेत - real numbers) होत.
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... -५, -४, -३, -२, -१, ०, १, २, ३, ४, ५, ...२.७, π, ५⅔, ७३.
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सतरावी कला - हिलाच अमृतकला, जीवनकला अशी अन्य नावे आहेत.
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ब्रह्मरंध्र किंवा सहस्त्रदल चक्र यामधून अमृत पाझरते असे शास्त्र सांगते, म्हणून मेंदूच्या त्या भागाला योगाच्या परिभाषेत चंद्र किंवा चंद्रामृत तळे (सत्रावीचे तळे) असे म्हणतात.
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स्वरूपानुभव आणि त्याचा आनंद ही सत्रावी कला. [१]
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सोळा कलांचा पुरुष कोणता असा प्रश्न उपनिषदात विचारला गेला आहे, त्याचे उत्तर आत्मा असे देण्यात आले आहे. [१]
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सतसई हा हिंदी काव्यरचनेचा एक प्रकार आहे. या रचनेत, कमीतकमी सतसई म्हणजे सातशे कडवी असतात. एका कडव्याच्या विषयाचा दुसऱ्या कडव्याशी काही संबंध असलाच पाहिजे असे नाही. त्या अर्थाने या रचना स्वैर(मुक्तक) समजल्या जातात.
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सतसई या परंपरेची सुरुवात सातवाहन राजा हालने संग्रहित केलेल्या गाथा सप्तशतीपासून सुरू झाली. संस्कृतमध्ये गोवर्धनाचार्यांची आर्यासप्तशती प्रसिद्ध आहे. हिंदीमध्ये बिहारी नावाच्या कवीने ’बिहारी सतसई’ नावाचे काव्य लिहून ही परंपरा हिंदीत आणली. या ’बिहारी सतसई’चे मराठी रूपांतर राजा बढे यांनी रसलीना या नावाने केले आहे.
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हिंदीत ’बिहारी सतसई’नंतर, ’चंदन सतसई’, ’तुलसी सतसई’, भूपति सतसई, मतिराम सतसई, रसनिधि सतसई, रहीम सतसई, राम सतसई, विक्रम सतसई, वृंद सतसई, आदी सतसया लिहिल्या गेल्या.
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आधुनिक काळातही हरिऔध कवीची ’हरिऔध सतसई’, वियोगी हरि कवीची ’वीर सतसई’ वगैरे सतसया आहेत.
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सतीश दुभाषी (जन्मदिनांक : डिसेंबर १४, १९३९ - सप्टेंबर १२, इ.स. १९८०) हे मराठी रंगभूमी, चित्रपटसृष्टीतील अभिनेते होते. अल्पशः आजारानंतर त्यांचे मुंबईतील एका रुग्णालयात निधन झाले.
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दुभाषी हे ज्येष्ठ मराठी लेखक पु. ल. देशपांडे यांचे मामेभाऊ होते.[१] त्यांचे आजोबा, वामन मंगेश दुभाषीहे कवी आणि साहित्याचे पारखी होते, ते कारवार येथील हिंदू हायस्कूलचे संस्थापक देखील होते.[२]
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डॉ. श्रीराम लागू यांच्यानंतर प्रख्यात मराठी नाटककार कुसुमाग्रज यांच्या ‘नटसम्राट' या प्रतिष्ठित आणि मैलाचा दगड असलेल्या मराठी नाटकात दुभाषी यांनी नटसम्राटची भूमिका साकारली होती.[३][४][५] पु.ल. देशपांडे यांनी लिहिलेल्या ती फुलराणी नाटकात भक्ती बर्वे आणि सतीश दुभाषी यांनी प्रमुख भूमिका साकारली होती. हे नाटक ७० च्या दशकात दरम्यान अतिशय लोकप्रिय झाले होते.[६]
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दुभाषीच्या उल्लेखनीय चित्रपट भूमिकांमध्ये जब्बार पटेल दिग्दर्शित 1979च्या मराठी राजकीय नाटक चित्रपट सिंहासन (चित्रपट) मधील व्यावहारिक युनियन लीडर डी'कोस्टा (जॉर्ज फर्नांडिस यांच्यावर आधारित) यांचा समावेश आहे.[७][८] त्यांनी १९७३ मध्ये "बिरबल माय ब्रदर" या इंग्रजी चित्रपटातही काम केले.
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अल्पायुषी अभिनेते
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सतीश जकातदार (२७ ऑक्टोबर, इ.स. १९५५ - ) हे सिनेपत्रकार, आशय फिल्म क्लबचे संस्थापक-सचिव आणि चित्रपट चळवळीचे संयोजक आहेत.
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सतीश जकातदार मनोहर मासिकांत सिनेमावर लेखन करीत. शिवाय माणूसमध्ये ते कलात्मक चित्रपटांवर लेखन करत असत. अमोघ श्रीवास्तव, सलील आदर्श, अशी टोपणनावे घेऊन ते लेखन करीत.
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कॉलेजमध्ये असताना सतीश जकातदार यांनी प्रभाकर वाडेकरांच्या अर्थ काय या बेंबीचा नाटकात अभिनय केला होता.
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सतीश जकातदार, वंदना भाले, दीपक देवधर, प्रभाकर वाडेकर, प्रसन्नकुमार अकलूजकर आणि मुकुंद संगोराम या चित्रपटप्रेमी मंडळींनी एकत्र येऊन १ ऑगस्ट, इ.स. १९८५ रोजी आशय फिल्म क्लबची स्थापना केली. जकातदार या संस्थेचे संचालक आहेत.
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सतीश जकातदार यांनी चित्रपट संग्रहालयाच्या वाटचालीवर आधारलेल्या प्रिझव्र्हेशन ऑफ मूव्हिंग इमेजेस या लघुपटाचे दिग्दर्शन केले आहे. लघुपटाची निर्मिती वंदना भाले यांची आहे. सतीश जकातदार यांनी वंदना भाले यांच्या साथीने मल्लिकार्जुन मन्सूर यांच्यावर एक लघुपट तसेच टोवर्डस बेटर टुमॉरो हा अनुबोधपटही काढला होता.
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जकातदारांनी मराठी चित्रपटांचा इतिहास या विषयावर महाराष्ट्र राज्यभर दृकश्राव्य व्याख्याने दिली आहेत.
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मायबोली या संकेतस्थळावर सतीश यांनी प्रभातचे संगीतकार, राजकमलचे संगीतकार, आनंदघन, वसंत पवार, पु.ल. देशपांडे यांच्यावरच्या मालिकांचे लेखन - संपादन केले होते. सतीशच्या संकल्पनेनुसार माणूस ते लिमिटेड माणुसकी हा मराठी चित्रपट गीतांचा इतिहास मांडणारा दृक्श्राव्य कार्यक्रम सुधीर गाडगीळ यांचा गट सादर करत असे.
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लेफ्टनंट जनरल सतीश दुआ हे भारतीय लष्कराचे निवृत्त जनरल ऑफिसर आहेत.[१] त्यांनी भारतीय सशस्त्र दलाच्या चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी (सिसक) चे अध्यक्ष आणि काश्मीरमधील माजी १५ कॉर्प्स (एक्स.वी कॉर्प्स) चे इंटिग्रेटेड डिफेन्स स्टाफ म्हणून काम केले. सप्टेंबर २०१६ मध्ये 'सर्जिकल स्ट्राईक' दरम्यान जनरल ऑफिसर काश्मीर कॉर्प्स कमांडर होते. ते जम्मू आणि काश्मीर लाईट इन्फंट्री रेजिमेंटचे कर्नल होते.[२]
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दुआ यांनी आर्मी वॉर कॉलेज, महू येथे हायर कमांड कोर्सला शिक्षण घेतले आहे; संरक्षण सेवा कर्मचारी महाविद्यालय, वेलिंग्टन; आणि राष्ट्रीय संरक्षण महाविद्यालय, दिल्ली
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दुआ यांना डिसेंबर १९७९ मध्ये ८ जम्मू आणि काश्मीर लाइट इन्फंट्री (सियाचीन) मध्ये नियुक्त करण्यात आले. त्यांनी त्यांच्या कारकिर्दीत विविध कमांड, कर्मचारी आणि प्रशिक्षक नियुक्त्या केल्या आहेत. त्यांनी जम्मू आणि काश्मीर आणि एक्स.वी कॉर्प्स (श्रीनगर) (२०१५-२०१६) मध्ये दहशतवादविरोधी ऑपरेशन्समध्ये बटालियन आणि ब्रिगेडचे नेतृत्व केले आहे. आसाम रायफल्समध्ये मेजर जनरल म्हणून ते ईशान्य भारतात आगार (पूर्व) नावाची नवीन रचना उभारण्यात गुंतले होते. कारगिल ब्रिगेडचे ब्रिगेड मेजर ते संरक्षण नियोजन समितीचे संस्थापक सदस्य सचिव होते.संरक्षण अधिग्रहण परिषदेचे सदस्य या नात्याने त्यांनी सैन्य, नौदल आणि हवाई दल यांच्यातील आधुनिकीकरण आणि परस्पर प्राधान्यक्रमात महत्त्वपूर्ण भूमिका बजावली. त्यांनी मानवतावादी सहाय्य आणि आपत्ती निवारण क्षेत्रात सक्रियपणे काम केले. नॅशनल क्रायसिस मॅनेजमेंट ग्रुपचे सदस्य म्हणून, राष्ट्रीय संकट आणि आपत्तीच्या परिस्थितीत लष्कर, नौदल आणि हवाई दलाच्या प्रयत्नांचे समन्वय साधले. लेफ्टनंट जनरल सतीश दुआ यांनी भारत-यू.एस. मिलिटरी कोऑपरेशन ग्रुप (२०१६-२०१८). सेवानिवृत्तीनंतर जनरल दुआ यांनी 'इंडियास ब्रेव्ह हार्ट' नावाचे पुस्तक लिहिले आहे.[३]
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13°43′12″N 80°13′49″E / 13.72000°N 80.23028°E / 13.72000; 80.23028
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सतीश धवन अंतराळ केंद्र हे आंध्र प्रदेश राज्यातील श्रीहरीकोटा येथे असलेले इस्रोचे उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र आहे. इ.स. २००२ साली इस्रोचे अध्यक्ष राहिलेले सतीश धवन यांच्या मृत्यूनंतर या प्रक्षेपण केंद्राला त्यांचे नाव देण्यात आले.
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सतीश राजवाडे ( ९ जानेवारी १९७३) हा एक भारतीय चित्रपट अभिनेता, दिग्दर्शन, लेखक, पटकथाकार आणि संवाद लेखक आहे.
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सतीश राजवाडे यांनी त्याच्या करीअरची सुरुवात केली ती अभिनयाने केली. त्यांनी अनेक हिंदी-मराठी चित्रपटांमध्ये अभिनय केला आहे. तसेच रंगभूमीवरही काम केले आहे. अभिनयाची वाट त्यांची मागे पडली आणि सतीश यांनी चित्रपट आणि मालिका दिग्दर्शनाकडे लक्ष केन्द्रित केले. त्यांनी दिग्दर्शित केलेल्या अनेक मालिका जरी संपल्या असतील तरी नंतरही त्या मालिका प्रेक्षकांच्या स्मरणात ताज्या आहेत. त्याने दिग्दर्शित केलेल्या जवळपास सर्वच मालिका लोकप्रिय ठरल्या.
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सतीश शाह ( २५ जून १९५१) हा एक भारतीय अभिनेता आहे. सतीशने आजवर अनेक मराठी व हिंदी चित्रपटांमध्ये तसेच दूरचित्रवाणीवर विनोदी भूमिका केल्या आहेत. गम्मत जम्मत, जाने भी दो यारों, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे इत्यादी चित्रपटांमधून त्याने काम केले आहे.
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८७-सत्त्याऐंशी ही एक संख्या आहे, ती ८६ नंतरची आणि ८८ पूर्वीची नैसर्गिक संख्या आहे.
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इंग्रजीत: 87 - eighty-seven.
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सत्त्वशीला विठ्ठल सामंत (२५ मार्च, इ.स. १९४५:मुंबई, महाराष्ट्र - १ मे, इ.स. २०१३:पुणे, महाराष्ट्र) या मराठीतील एक भाषाशास्त्रज्ञ होत्या. त्यांच्या आईचे नाव सुनंदा देसाई व वडलांचे नाव परशुराम देसाई होते. सत्त्वशीलाबाईंनी संस्कृत-मराठी विषयात मुंबई विद्यापीठाची पदवी मिळवली. त्यानंतर त्यांनी मुंबई विद्यापीठातून एल्एल.बी आणि भाषाशास्त्र पदविका (डिप्लोमा इन लिन्ग्विस्टिक्स) हे अभ्यासक्रम पूर्ण केले. महाराष्ट्र सरकारच्या भाषा संचालनालयात त्या प्रथम अनुवादक आणि नंतर उप-संचालक होत्या.
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निवृत्तीनंतर त्यांनी भाषाविषयक विविध बौद्धिक उपक्रमांत भाग घेतला. मराठी शुद्धलेखन या विषयावर त्यांनी रुची, भाषा आणि जीवन या नियतकालिकांतून आणि मराठी वृत्तपत्रांतून लेख लिहिले, वाचकांच्या पत्रव्यवहारांत त्यांनी आपले विचार मांडले आणि इतरांच्या मतांमधील चुकीच्या कल्पना दुरुस्त करायचा प्रयत्न केला. मानस-सरोवर हे बरोबर असून मान-सरोवर चुकीचे शुद्धलेखन असल्याबद्दल त्यांनी लेख लिहून व भारत सरकारशी पत्रव्यवहार करून आपली मते ठामपणे मांडली.
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सामंत शुद्धलेखनाच्या जुन्या नियमांच्या पुरस्कर्त्या होत्या. शुद्धलेखनाचे नियम हे कृत्रिमरीत्या तयार करायचे नसतात, तर बांधायचे असतात असे त्यांचे मत होते. शुद्धलेखनाचे जुने नियम भाषेच्या विकासक्रमामध्ये घडत गेलेले असल्यामुळे त्या नियमांचा त्या पुरस्कार करीत. शुद्धलेखनाच्या नव्या नियमांना विरोध करण्यामागे त्यांची ही तात्त्विक भूमिका होती. या भूमिकेपायी त्यांनी अनेक वाद ओढवून घेतले . सरकारदरबारी पत्रव्यवहार केला. त्यांच्यावर टीकाही झाली. मात्र, त्या मागे हटल्या नाहीत. जुन्या नियमांबद्दल त्या आग्रही असल्या, तरी शुद्धलेखनाचे नियम अजिबातच नको, असे म्हणण्याला त्यांचा विरोध होता . शुद्धलेखनाचे नियम हद्दपार करणे भाषेसाठी घातक असल्याचे त्या आवर्जून सांगत. शुद्धलेखन म्हणजे भाषिक शिस्त आहे, असे नमूद करीत त्या या शिस्तीची तुलना वाहतुकीच्या नियमांशी करीत. ' वाहतुकीची शिस्त मोडली, की प्राणाशी गाठ पडते; त्याप्रमाणेच भाषिक शिस्त मोडली, की सांस्कृतिक मरण जवळ ओढवून घेतले जाते,' असे त्यांचे म्हणणे होते. म्हणूनच त्या सदैव शुद्धलेखनाच्या बाजूने झटत राहिल्या. भाषेबद्दलची कमालीची आस्था हीच त्यांची यामागची प्रेरणा होती. या प्रेरणेतूनच त्यांनी 'मराठी शुद्धलेखन प्रणाली' हे पुस्तक लिहिले. मराठी - हिंदी - इंग्रजी या तिन्ही भाषांमधील शब्दांचा व्यवहारोपयोगी कोशही त्यांनी ' शब्दानंद ' या नावाने सिद्ध केला. त्यांच्या या दोन्ही पुस्तकांची आवर्जून दखल घेतली गेली. त्यांना वेगवेगळे पुरस्कार मिळाले. भाषेबद्दलची अतिशय सूक्ष्म जाण त्यांना होती. म्हणूनच त्या याबाबत अतिशय संवेदनशील होत्या. भाषेची मोडतोड होताना दिसली, तंत्रज्ञानामुळे अक्षरांच्या वळणात बदल झालेले दिसले, की त्या व्यथित होत. भाषाविषयक बौद्धिक उपक्रमात त्या आवर्जून सहभागी होत. हा सहभाग मुक्तपणे व्हावा, यासाठी त्यांनी १९८६मध्ये प्रकृति-अस्वास्थ्याचे कारण सांगून स्वेच्छानिवृत्ती घेतली होती.
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निवृत्तीनंतर ऑक्टोबर १९९५मध्ये आपल्या पतीबरोबर पुण्यात येऊन स्थायिक झाल्लेल्या सत्त्वशीला सामंत यांचे १ मे २०१३ रोजी रात्री हृदयक्रिया बंद पडून निधन झाले.
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शब्दांच्या क्षेत्रातील धर्मयोद्ध्या
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डॉ. सत्यपालसिंह (२९ नोव्हेंबर, १९५५:बसौली, मीरत जिल्हा, उत्तरप्रदेश - ) हे मुंबईचे माजी पोलीस कमिशनर असून उत्तर प्रदेशातील बागपत येथून लोकसभेवर निवडून गेलेले खासदार आहेत. त्यांचा २ सप्टेंबर २०१७ रोजी नरेंद्र मोदी पंतप्रधान असलेल्या भारताच्या केंद्रीय मंत्रिमंडळात समावेश झाला. त्यांना मनुष्यबळ विकास हे खाते मिळाले आहे. हे २०१७ त२ २०१९ पर्यंत भारताचे मनुष्यबळ राज्यमंत्री होते.
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सत्यपालसिंह हे रसायनशास्त्रातील एम.एस्सी. असून त्यांनी दिल्ली विद्यापीठातून एम.फिल. केले आहे. त्यांनी ऑस्ट्रेलियातून एम.बी.ए. ही पदवी घेतली. नागपूर विद्यापीठातून ते लोकप्रशासन या विषयात एम.ए. झाले असून नक्षलवाद या विषयावर प्रबंध लिहून त्यांनी त्या विद्यापीठाची पीएच.डी. मिळवली आहे. ते आय.पी.एस (इंडियन पोलीस सर्व्हिस) अधिकारी आहेत.
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ऑस्कर पुरस्कार (१९९२)
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सत्यजित राय (बंगाली: সত্যজিৎ রায়) (मे २, इ.स. १९२१ - एप्रिल २३, इ.स. १९९२ ) हे ऑस्कर पुरस्कारविजेते भारतीय लेखक, पटकथालेखक, संगीतकार, निर्माते आणि दिग्दर्शक होते. चित्रपट जगतातील त्यांच्या कामगिरीबद्दल इ.स. १९९२ मध्ये त्यांना जीवनगौरव ऑस्कर पुरस्कार देण्यात आला. ऑस्कर मिळवणारे ते एकमेव भारतीय दिग्दर्शक आहेत. त्यांनी अपु के वर्ष (इ.स. १९५० ते इ.स. १९५८) व इ.स. १९५५ मध्ये पथेर पांचाली या चित्रपटाची निर्मिती केली. यांनी एकूण ३७ चित्रपटांची निर्मिती केली. ते स्वतःच चित्रपटांना संगीत देत, पटकथा लेखन, दिग्दर्शन व संपादन अशी अनेक कामे करत.
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यांच्या चित्रपटसृष्टीतील योगदानाबद्दल भारत सरकार तर्फे पद्मश्री हा पुरस्कार देण्यात आला. या शिवायही त्यांना युगोस्लाव्हियाचा रॅमन मॅगसेसे पुरस्कार, ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालयातर्फे डी. लिट. असे अनेक मान सन्मान प्राप्त झाले. फ्रान्स येथील कान चित्रपट महोत्सव यांसहित यांना एकूण ११ आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिळाले.
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सत्यजित राय यांचा जन्म कोलकाता येथे झाला. त्यांच्या घराण्यात कलात्मक सृजनशीलतेचा वारसा होता. त्यांचे आजोबा उपेंद्रकिशोर राय प्रसिद्ध लेखक, संगीतकार आणि चित्रकार होते. सत्यजित रायांचे वडील सुकुमार राय कवी, लेखक आणि चित्रकार होते. शाळेत असताना राय यांनी हॉलीवूडबद्दल मासिकांमध्ये वाचले आणि तेव्हापासून त्यांना चित्रपटांमध्ये गोडी वाटू लागली. याच काळात त्यांचा पाश्चात्य शास्त्रीय संगीताशीही परिचय झाला. शाळा संपवून महाविद्यालयीन शिक्षण घेताना रायांचा या विषयांमधील रस वृद्धिंगत झाला.
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कोलकाता येथील प्रेसिडेन्सी कॉलेजमधून पदवी घेतल्यानंतर राय यांचा शिक्षण थांबवण्याचा विचार होता. पण त्यांच्या आईच्या आग्रहाखातर ते रवींद्रनाथ टागोर यांनी स्थापन केलेल्या शांतिनिकेतन विश्वविद्यालयात शिक्षण घेण्यासाठी तयार झाले. शांतिनिकेतन येथे त्यांचा भारतीय, चिनी आणि जपानी कलांशी जवळून परिचय झाला. तिथे त्यांना बिनोद बिहारी मुखर्जी आणि नंदलाल बोस यांच्यासारख्या निष्णात चित्रकारांचा सहवास लाभला.
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शांतिनिकेतन येथे पाच वर्षे शिक्षण घेतल्यानंतर इ.स. १९४२ मध्ये राय कोलकात्याला परतले. तिथे त्यांनी डी. जे. केमर नावाच्या ब्रिटिश जाहिरात कंपनीमध्ये नोकरी पत्करली. इथे त्यां���ी निरनिराळ्या प्रकारच्या जाहिरातींची निर्मिती केली. नंतर त्यांची बदली त्यांचे ज्येष्ठ सहकारी डी. के.गुप्ता यांच्या 'सिग्नेट प्रेस' या प्रकाशनामध्ये झाली. इथे त्यांनी बऱ्याच पुस्तकांची मुखपृष्ठे बनवली. यात जवाहरलाल नेहरू यांचे डिस्कव्हरी ऑफ इंडिया आणि जिम कॉर्बेट यांचे मॅन इटर्स ऑफ कुमाऊं यांचा समावेश होता. याच संदर्भात बिभूतिभूषण बॅनर्जी यांची पाथेर पांचाली ही कादंबरी त्यांच्या वाचनात आली आणि या कथेचा राय यांच्या मनावर बराच प्रभाव पडला.
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इ.स. १९४७ मध्ये राय यांनी कलकत्ता फिल्म सोसायटीची स्थापना केली. इथे निरनिराळ्या विदेशी चित्रपटांची प्रदर्शने होत असत. याच काळात रायांनी चित्रपटांबद्दल वर्तमानपत्रे आणि मासिके यात लेख लिहिण्यास सुरुवात केली. राय बरेचदा आवडलेल्या कथांच्या पटकथाही लिहीत असत. इ.स. १९४९ मध्ये प्रसिद्ध फ्रेंच दिग्दर्शक ज्यां रेन्वार त्यांच्या द रिव्हर या चित्रपटाच्या चित्रीकरणासाठी कोलकाता येथे आलेले असताना राय यांची त्यांच्याशी भेट झाली. त्यांच्याशी बोलताना रायांनी पाथेर पांचाली या कथेवर चित्रपट बनवण्याची इच्छा व्यक्त केली. रेन्वार यांनी त्यांना या दिशेने जाण्यासाठी प्रोत्साहन दिले. इ.स. १९५० मध्ये कंपनीतर्फे लंडन दौऱ्यावर असताना रायांनी बरेच विदेशी चित्रपट बघितले. यातच इटालियन दिग्दर्शक व्हित्तोरिओ दी सिका यांच्या बायसिकल थीव्ह्ज या चित्रपटाचा समावेश होता. हा चित्रपट बघितल्यावर रायांचा चित्रपट बनवण्याचा निश्चय पक्का झाला.
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पाथेर पांचाली बनवण्याचा विचार पक्का झाल्यावर राय यांनी या चित्रपटासाठी निर्माता शोधणे सुरू केले. बरीच शोधाशोध करूनही निर्माता मिळणे अशक्य आहे असे दिसल्यावर त्यांनी स्वतःच्या बचतीमधील पैसे वापरून चित्रीकरण सुरू केले. राय आणि त्यांच्या सहकाऱ्यांचा हा पहिलाच प्रयत्न होता. यातून आपल्याला बरेच काही शिकता आले असे रायांनी नंतर नमूद केले. यादरम्यान राय पश्चिम बंगालचे तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी. सी रॉय यांना भेटले आणि चित्रपटासाठी सरकारकडून आर्थिक साहाय्याची हमी मिळाली. पाथेर पांचालीसाठी प्रसिद्ध संगीतकार पं. रविशंकर यांनी संगीत दिले.
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अनेक अडचणींना तोंड देत अखेर हा चित्रपट पूर्ण करण्यात राय यशस्वी झाले. याचे पहिले प्रदर्शन न्यू यॉर्क येथील म्यूझियम ऑफ मॉडर्न आर्ट येथे झाले. चित्रपटाची आंतरराष्ट्रीय पातळीवर प्रशंसा झाली. त्याचबरोबर काही ठिकाणी प्रखर टीकाही झाली. पाथेर पांचालीला राष्ट्रपती सुवर्ण पदक आणि राष्ट्रपती रजत पदक याबरोबरच इतर अनेक आंतरराष्ट्रीय चित्रपट महोत्सवांमध्ये पुरस्कार मिळाले. इ.स. २००५ मध्ये टाइम मासिकाच्या सर्वोत्कृष्ट १०० चित्रपटांमध्ये या चित्रपटाचा समावेश होता.
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पाथेर पंचालीच्या अभूतपूर्व यशाने राय यांना पुढील चित्रपटांसाठी हवे ते स्वातंत्र्य मिळाले. त्यांचे नंतरचे दोन चित्रपट, अपराजितो आणि ओपुर शोंशार हे पाथेर पांचालीच्या कथेतील मुलगा अपूचा बालपण ते प्रौढावस्था असा प्रवास दाखवतात. ओपुर शोंशारमध्ये रे यांनी सौमित्र चॅटर्जी आणि शर्मिला टागोर या कलाकारांना प्रथम संधी दिली. नंतर सौमित्र बंगाली चित्रपटांमध्ये तर शर्मिला बंगाली आणि हिंदी चित्रपटांमध्ये आघाडीचे कलाकार म्हणून ओळखले गेले.
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यानंतरचा राय यांचा प्रवास सृजनशीलतेचा एक दुर्मिळ आविष्कार होता. इ.स. १९५८ ते इ.स. १९८१ या वर्षांमध्ये त्यांनी एकाहून एक दर्जेदार चित्रपट काढले. त्यांचा निर्मितीचा वेग साधारणपणे वर्षाला एक असा होता. या प्रवासात रायांनी फँटसी, ऐतिहासिक कथा आणि सायन्स फिक्शन यासारखे विविध विषय हाताळले. यात अंधश्रद्धेवर आधारित देवी , आधुनिक शहरी आयुष्यातील समस्या हाताळणारा महानगर , चित्रपटजगतातील बेगडीपणाचे चित्रण करणारा नायक यांचा समावेश होता. याचबरोबर इ.स. १९६४ मधील रवींद्रनाथ टागोरांच्या कथेवर आधारित चारुलता हा त्यांचा सर्वोत्कृष्ट चित्रपट मानला जातो.
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राय यांच्या सुरुवातीच्या चित्रपटांना पं. रविशंकर, उस्ताद विलायत खान यांचे संगीत होते. इ.स. १९६१ मध्ये तीन कन्या या चित्रपटासाठी त्यांनी स्वतःच संगीत दिले आणि यानंतरच्या बहुतेक चित्रपटांमध्ये ते संगीतकार होते. याचबरोबर संवाद, पटकथालेखन यामध्येही त्यांचा महत्त्वाचा सहभाग असे. इ.स. १९६१ मध्ये तत्कालीन पंतप्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू यांच्या आग्रहाखातर रायांनी टागोरांवर माहितीपट काढला. इ.स. १९७७ मध्ये रायांनी मुन्शी प्रेमचंद यांच्या कथेवर आधारित शतरंज के खिलाडी हा चित्रपट काढून हिंदी चित्रपटसृष्टीत पदार्पण केले. या चित्रपटात संजीव कुमार ,सईद जाफरी ,शबाना आझमी ,अमजदखान ,व्हिक्टर बॅनर्जी आणि रिचर्ड ॲटनबरो यांच्य��सारखे नावाजलेले कलाकार होते. या चित्रपटात इ.स. १८५७च्या उठावापूर्वीचे भारतातील निजामशाहीचे प्रभावी चित्रण आहे. यात समालोचक म्हणून अमिताभ बच्चन यांचा आवाज वापरला आहे.
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इ.स. १९८३ मध्ये घरे बाइरे साठी काम करत असताना राय यांनी हृदयविकाराचा झटका आला. यानंतर पुढची नऊ वर्षे शारिरिक अस्वास्थ्यामुळे राय यांच्या कामावर बऱ्याच मर्यादा आल्या. यानंतरच्या त्यांच्या चित्रपटांचे चित्रीकरण मुख्यतः स्टुडिओतच झाले. यानंतर प्रकृती सुधारल्यानंतर त्यांनी आणखी तीन चित्रपट बनवले. आगंतुक हा त्यांचा शेवटचा चित्रपट होता.
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चित्रपटनिर्मितीबरोबरच सत्यजित राय यांनी विपुल लेखनही केले. बंगाली साहित्यामध्ये त्यांनी गुप्तहेर फेलूदा आणि प्रा. शोंकू या दोन लोकप्रिय पात्रांची निर्मिती केली. यापैकी फेलूदांचे पात्र शेरलॉक होम्सच्या पात्रावर आधारलेले आहे. प्रा शोंकू यांच्या कथा सायन्स फिक्शन या प्रकारात मोडतात. सत्यजित राय यांचे साहित्य इंग्लिशमध्ये अनुवादित झाल्यामुळे त्यांना मोठा वाचकवर्ग लाभला आहे. त्यांच्या बऱ्याच पटकथाही प्रसिद्ध झाल्या आहेत. याशिवाय भारतीय आणि परदेशी चित्रपटांवर तुलनात्मक पुस्तक अवर फिल्म, देअर फिल्म्स आणि त्यांचे आत्मचरित्र जाखान चोटो चिल्लम विशेष उल्लेखनीय आहेत.
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बंगाली भाषेत त्यांचे लेखन कार्यातील योगदान मोलाचे आहे.
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राय यांना त्यांच्या आयुष्यात अनेक पुरस्कार आणि सन्मान मिळाले. ऑक्सफर्ड विद्यापीठाने त्यांना मानद डॉक्टरेट पदवी प्रदान केली. चार्ली चॅप्लिननंतर हा सन्मान मिळवणारे ते पहिले चित्रपट दिग्दर्शक होते. त्यांना १९८५ मध्ये दादासाहेब फाळके पुरस्कार आणि १९८७ मध्ये फ्रान्सचा Lesions d'Onu पुरस्काराने सन्मानित करण्यात आले. त्यांच्या मृत्यूच्या काही काळापूर्वी त्यांना सन्माननीय अकादमी पुरस्कार आणि भारताचा सर्वोच्च सन्मान भारतरत्न प्रदान करण्यात आला. सॅन फ्रान्सिस्को इंटरनॅशनल फिल्म फेस्टिव्हलमध्ये दिग्दर्शनातील जीवनगौरव पुरस्कारासाठी त्यांना मरणोत्तर अकिरा कुरोसावा पुरस्कार मिळाला, जो त्यांच्या वतीने शर्मिला टागोर यांनी स्वीकारला. पूर्वीसारखाच जोम. त्यांचे वैयक्तिक जीवन कधीच मीडियाचे लक्ष वेधले गेले नाही, परंतु काहींच्या मते १९६० च्या दशकात चित्रपट अभिनेत्री माधवी मुखर्जी यांच्याशी त्यांचे ��्रेमसंबंध होते.
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सत्यजित रे हे भारतातील आणि जगभरातील बंगाली समुदायासाठी एक सांस्कृतिक प्रतीक आहेत. राय यांनी बंगाली चित्रपटसृष्टीवर अमिट छाप सोडली आहे. अपर्णा सेन, रितुपर्णा घोष, गौतम घोष, तारिक मसूद आणि तन्वीर मुकम्मल या अनेक बंगाली दिग्दर्शकांना त्यांच्या कामातून प्रेरणा मिळाली आहे. बुद्धदेव दासगुप्ता, मृणाल सेन आणि अदूर गोपालकृष्णन यांच्यासह सर्व शैलीतील दिग्दर्शकांनी भारतीय सिनेमावरील त्यांचा प्रभाव मान्य केला आहे. भारताबाहेरही, मार्टिन सोर्सी, जेम्स आयव्हरी, अब्बास किआरोस्तामी आणि एलिया कझान यांसारखे दिग्दर्शकही त्यांच्या शैलीने प्रभावित झाले आहेत. इरा सॅक्सचा फोर्टी शेड्स ऑफ ब्लू हा चित्रपट चारुलतावर आधारित होता. राय यांच्या कामातील कोटेशन्स सेक्रेड एविल, दीपा मेहताच्या द एलिमेंट्स ट्रायलॉजी आणि जीन-लुक गोडार्डच्या अनेक कामांसारख्या इतर अनेक चित्रपटांमध्ये दिसतात.
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१९९३ मध्ये, UC सांताक्रूझने राय यांच्या चित्रपटांचे आणि त्यावर आधारित साहित्याचे संकलन सुरू केले. १९९५ मध्ये, भारत सरकारने चित्रपटांशी संबंधित अभ्यासासाठी सत्यजित रे फिल्म अँड टेलिव्हिजन इन्स्टिट्यूटची स्थापना केली. लंडन फिल्म फेस्टिव्हल नियमितपणे सत्यजित रे पुरस्कार एका दिग्दर्शकाला प्रदान करतो ज्याने त्याच्या पहिल्या चित्रपटात "रे यांच्या दृष्टीची कला, संवेदनशीलता आणि मानवता" मूर्त स्वरूप दिली आहे. २००७ मध्ये, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशनने घोषणा केली की त्याच्या दोन फेलुदा कथांवर रेडिओ कार्यक्रम केले जातील.
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अमेरिकन व्यंगचित्र मालिकेतील अपू नहस्पिमापेटिलॉन या पात्राचे नाव राय यांच्या सन्मानार्थ ठेवण्यात आले होते. राय आणि माधवी मुखर्जी हे पहिले भारतीय चित्रपट व्यक्तिमत्त्व होते ज्यांची छायाचित्रे परदेशी टपाल तिकिटावर (डॉमिनिका देश) दिसली. राय यांच्या चित्रपटांचा उल्लेख अनेक साहित्यकृतींमध्ये करण्यात आला आहे - सोल बेलोची कादंबरी हर्झोग आणि जे.जे. एम. कोएत्झीचा युवक. सलमान रश्दी यांच्या बाल कादंबरी हारून अँड द सी ऑफ स्टोरीजमध्ये दोन माशांची नावे ‘गुपी’ आणि ‘बाघा’ आहेत.
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सत्यनाथन अतलुरी हे अमेरिकेतील युनिव्हर्सिटी ऑफ कॅलिफोर्निया ॲट अर्व्हाइन येथील एरोस्पेस इंजिनिअरींगचे प्राध्यापक आहेत. त्यांनी इ.स. १९६६ मध्ये बंगळूरमधील भारतीय विज्ञान संस्थामधून एम.टेक. तर इ.स. १९६९ मध्ये अमेरिकेतील मॅसॅच्युसेट्स इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजीमधून डी.एस.सी. या पदव्या मिळविल्या आहेत. त्यानंतर त्यांनी जॉर्जिया इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, युनिव्हर्सिटी ऑफ कॅलिफोर्निया ॲट लॉस एंजेलस यासारख्या विद्यापीठांमध्ये अध्यापन केले. इ.स. १९८८ मध्ये भारताचे पंतप्रधान राजीव गांधी यांचे भारताला संशोधनात पुढे न्यायला काय करता येईल यासाठी सल्लागार होते. इ.स. २००२ मध्ये भारतीय विज्ञान संस्थाचा त्यांना सर्वोत्तम माजी विद्यार्थी हा सन्मान मिळाला. तसेच इ.स. २०१२ मध्ये त्यांचा भारत सरकारने पद्मभूषण देऊन गौरव केला.
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सर्वे सत्यनारायण ( - ) हे भारतीय राजकारणी आहेत. हे मतदारसंघातून भाजपतर्फे १५व्या लोकसभेवर निवडून गेले.
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सत्यपाल चिंचोलीकर उर्फ सत्यपाल महाराज ( १६ मे, १९५२) हे महाराष्ट्रातील एक समाज प्रबोधक कीर्तनकार आहेत.[१] सप्तखंजिरीच्या माध्यमातून ग्रामस्वच्छतेचा संदेश देतात. तुकडोजी महाराज आणि गाडगे महाराज यांच्या विचारांनी प्रेरित होऊन चिंचोलीकर हातात झाडू घेत स्वच्छता करून आणि हातात खंजिरी घेत कीर्तनातून महाराष्ट्रातील विशेषतः विदर्भातील गावांत समाज प्रबोधन करत असतात. कीर्तनाच्या माध्यमातून त्यांनी स्वच्छता, अंधश्रद्धा, जातिभेद, व्यसनमुक्ती, घनकचरा नियोजन, स्त्री भ्रूणहत्या, शिक्षणाचे महत्त्व, हगणदारी मुक्त गाव या विषयी जागरूकता पसरवली आहे.[२]
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इ.स. १९५२ साली अकोला जिल्ह्यातल्या सिरसोली या छोट्याशा गावातील एका शिंपी कुटुंबात सत्यपाल चिंचोलीकरांचा जन्म झाला. त्यांचे कुटुंब गरीब होते. त्यांच्या आईचे नाव सुशीला, भाऊ उकर्डा व लहान बहीण वनमाला व वडिलांचे नाव विश्वननाथ चिंचोलीकर होते. त्यांचे वडील कपडे शिवण्याचा पारंपरिक व्यवसाय करत. लहानपणीच सत्यपालांना भजनांची आवड लागली. तुकडोजी महाराजांची व गाडगे बाबांची कीर्तने ऐकत ते लहानाचे मोठे झाले आणि वयाच्या तेराव्या वर्षी गावात भजन, कीर्तन करायला सुरुवात केली.
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अकोला जिल्ह्यातील अकोट गाव हे सत्यपाल चिंचोलीकर यांचे निवासस्थान आहे. आतापर्यंत देशभरातील १४,०००हून अधिक गावांत समाजप्रबोधनपर कीर्तने त्यांनी केली आहेत. जेथे अस्वच्छता दिसते तेथे सत्यपाल महाराज स्वतः हातात झाड़ू घेऊन तो परिसर स्वच्छ करतात. सत्यपाल महाराज आपली खंजिरी वाजवून एखाद्या सार्वजनिक गावच्या ठिकाणी किंवा गावाच्या पारावर लोकांना एकत्र करतात आणि प्रबोधनाचे कीर्तन सुरू करतात. "सामाजिक विषयांना आध्यात्मिकतेची आणि साथीला वादन कलेची जोड दिली की तो विषय थेट लोकांना भिडतो," असे सत्यपाल चिंचोलीकरांचे म्हणणे आहे. ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रातील अशिक्षित लोकांना संगीत व कलेची जोड देत मनोरंजनातून प्रबोधन करण्याचा त्यांचा मानस असतो.
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आपल्या भजनातून ते सत्य परिस्थिती आणि सामाजिक विषय मांडतात. त्यांनी खंजिरी या ग्रामीण भागातील चर्मवाद्याला विकसित करून सप्तखंजिरी म्हणजेच ७ खंजिरी एकत्र करून विविध आवाज काढायला सुरुवात केली. परिसर स्वच्छ करून ते आपल्या दिवसाची सुरुवात करतात. दिवसभर वाचन लेखन आणि रात्री गावा��� जाऊन कीर्तने करणे हा त्यांचा दिनक्रम आहे.[३]
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भारत देशातील परिवर्तनाच्या चळवळीतील बहुजनवादी संतांचे योगदान समाजापर्यंत पोहोचविण्यासाठी २१ व २२ मे २०११ रोजी पुणे शहरात अखिल भारतीय बहुजन संत साहित्य संमेलनाचे आयोजन करण्यात आले होते. २१ तारखेला सकाळी दहा वाजता महाराष्ट्राचे तत्कालीन बांधकाम मंत्री छगन भुजबळ यांनी संमेलनाचे उद्घाटन केले. सत्यपाल महाराज या संमेलनाच्या अध्यक्षस्थानी होते तर हनुमंत उपरे हे स्वागताध्यक्ष होते.
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सत्यपाल महाराजांना खालील पुरस्कार प्रदान करण्यात आले आहेत:
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विवेक राम चौधरी हे भारतीय वायुसेनेचे २७ ले प्रमुख आहेेत.
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’सत्यमेव जयते’ हा आमीर खान यांचा दूरचित्रवाणीवरील कार्यक्रम दूरदर्शन (डीडी नॅशनल) तसेच स्टार नेटवर्क वर ६ मे २०१२ पासून प्रदर्शित व्हायला सुरुवात झाली आहे.
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कार्यक्रमाची संकल्पना गोपनीय ठेवण्यात आली होती. मालिकेतील ६ मे रोजी प्रक्षेपित झालेले पहिले पुष्प ’स्त्रीभ्रूण-हत्या’ या विषयावर होते. ह्या कार्यक्रमाची निर्मिती सर्वसाधारण भारतीय नागरिकाला केंद्रस्थानी ठेवून कार्यक्रमाची केली गेली आहे.
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उदय प्रकाश, स्टार इंडियाचे संचालक, यांनी आमीर खान यांना टेलिव्हिजनच्या क्षेत्रात येण्याचे आवाहन केले. खान आधी तयार नव्हते, पण नंतर फक्त दोन वर्षे या विषयावर कार्यक्रम करण्यास ते तयार झाले. झी न्यूजच्या एका मुलाखतीमध्ये ते म्हणाले होते, "आधी मी हा कार्यक्रम करण्यास तयार नव्हतो, कारण याचा मार्ग सोपा नाही. आम्ही काहीतरी वेगळे करत आहोत हे आम्हाला माहीत होते. ती थेट आमच्या हृदयातून निघालेली गोष्ट होती."[१] त्याने हेही सांगितले, "मी अजून दूरचित्रवाणीला जाणून घेतलेले नाही. मी फक्त एवढेच म्हणू शकतो की, मी हा कार्यक्रम पूर्ण प्रामाणिकपणे केला आहे, आणि तोही कसलीही तडजोड न करता! "
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या कार्यक्रमाचे चित्रीकरण भारतातल्या विविध राज्यांमध्ये झाले आणि खान यांनी कित्येक आठवडे त्यासाठी राजस्थान, काश्मीर, केरळ, दिल्ली, पंजाब, आणि ईशान्य भारत या भागांत प्रवास केला.[१] कार्यक्रमाचा स्टुडिओतील भाग वृंदावन स्टुडिओमध्ये चित्रित केला गेला. [२] आणि यशराज स्टुडिओ मुंबईमध्ये .[३] खान या कार्यक्रमाला 'सत्यमेव जयते' हे नाव ठेवताना ते जरा विचलित झाले होते. हे नाव भारतीय जनतेच्या मालकीचे आहे. 'ते' देशाशी निगडित आहे आणि म्हणून कोणाच्याही नावावर नोंदलेले असू शकत नाही, आणि त्यामुळे कॉपीराईटचा प्रश्नच येत नाही, अशी खान यांना जाणीव झाली. या नावाचा कुठल्याही प्रकारे अन्य प्रदर्शनासाठी वापर होता कामा नये, म्हणून या शोचे सहकारी हेच नाव शीर्षक म्हणून ठेवण्यास तयार झाले.[४]
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६ मेच्या पहिल्या भागात "स्त्री-भ्रूणहत्या" या विषयावरील चर्चा हाताळण्यात आली. दर हजारी पुरुषांमागे घटत्या स्त्री संख्येवर प्रकाश टाकण्यात आला, व अशी घटत्या संख्येला आळा घालण्यासंबंधी जनजागृती करण्याचा प्रयत्न केला गेला. कार्यक्रमात अनुभवी वैद्य (डॉक्टर) तसेच भ्रूण हत्येमधून गेलेल्या ���हिलांच्या मुलाखती दाखवण्यात आल्या.
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१३ मे इ.स. २०१२च्या दुसऱ्या भागात लहान मुलांच्या लैंगिक शोषणाबद्दल माहिती देण्यात आली, व ते रोखण्यासाठी कार्यक्रमाशेवटी मुलांची कार्यशाळा घेण्यात आली.
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२० मे २०१२. यामध्ये हुंडा पद्धतीबद्दल चर्चा करण्यात आली. हुंडा द्यायला नकार देणाऱ्या एका मुलीची मुलाखत यात दाखवण्यात आली."मुझे क्या बेचेगा ....रुपैय्या" हे गाणे यात सादर झाले
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२७ में २०१२ला चौथा भाग झाला. या भागामध्ये डॉक्टरांवर वक्तव्य करण्यात आले. फक्त पैसे उकलण्यासाठी काम करत असलेल्या काही डॉक्टरांच्या कामाचे नमुने यात दाखवण्यात आले. तसेच औषधांच्या वाढत्या किमतीवर यात भाष्य करण्यात आले. तसेच त्यासाठी काही उपायही सुचवण्यात आले.
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आचार्य सत्यवान नामदेव सूर्यवंशी (जन्म : हातगा-अहमदनगर जिल्हा, ३१ मार्च, १९१६) हे एक मराठी कादंबरीकार, नाटककार, आणि कीर्तनकार होते. ते 'आपण' नावाच्या साप्ताहिकाचे संस्थापक संपादक होते. त्यांनी लिहिलेल्या पुस्तकांची संख्या २०० च्या आसपास आहे.
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सत्यवान सावित्री ही झी मराठीवर प्रसारित झालेली एक मालिका आहे. या मालिकेची पहिली झलक १९ डिसेंबर २०२१ रोजी करण्यात आली होती, परंतु काही कारणांमुळे ही मालिका १२ जून २०२२ पासून प्रसारित झाली होती.
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विवेक लागू (जन्मदिनांक : ऑक्टोबर १५, इ.स. १९५३ - हयात) हे मराठी नाटककार आणि नाट्यअभिनेते आहेत. नाट्य-चित्रपट अभिनेत्री रीमा लागू यांचे ते पती आहेत.
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सत्य नादेला (जन्म : १९ ऑगस्ट, इ.स. १९६७ हैदराबाद-तेलंगणा) हे मायक्रोसॉफ्ट कंपनीचे मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) आहेत. कंपनीच्या कारकिर्दीतील ते तिसरे सीईओ आहेत.
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सत्या नाडेला यांचे शालेय शिक्षण हैद्राबाद पब्लिक स्कूलमध्ये झाले. त्यांचे वडील बी.एन. युंगधर हे भारतीय प्रशासकीय सेवेत अधिकारी होते.
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सत्य नादेला यांनी मणिपाल युनिव्हर्सिटीतून इलेक्ट्रानिक्स आणि टेलिकम्युनिकेशन या विषयात बी.ई., अमेरिकेतील व्हिस्कॉनसीन युनिव्हर्सिटीमधून एम.एस. आणि शिकागो युनिव्हर्सिट बूथ स्कूल ऑफ बिझनेस येथून एम.बी.ए. केले. इ.स. १९९२ मध्ये ते मायक्रोसॉफ्टमध्ये रुजू झाले. इ.स. २०११ पूर्वी नाडेला यांनी मायक्रोसॉफ्ट कंपनीच्या ऑनलाईन सेवेच्या संशोधन आणि विकास विभागाचे उपाध्यक्ष म्हणून तसेच मायक्रोसॉफ्टच्या व्यापार विभागाचे उपाध्यक्ष म्हणून देखील काम पाहिले आहे.
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२०११मध्ये मायक्रोसॉफ्टच्या क्लाउड अँड एन्टरप्राईज विभागाची धुरा हाती आल्यानंतर त्यांनी आपले कौशल्य आणि नेतृत्वगुणांच्या बळावर या विभागाच्या उत्पन्नात भरघोस वाढ करून दाखवली. त्यामुळेच नादेला यांची फेब्रुवारी २०१४ मध्ये "मायक्रोसॉफ्ट‘च्या प्रमुखपदी नियुक्ती झाली.
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सत्याग्रही हे मराठी साहित्यातील एक मानाचे मासिक आहे.
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श्री सत्यात्म तीर्थ, हे भारतीय आहे हिंदू तत्त्वज्ञानी, गुरू, विद्वान, आध्यात्मिक नेते, संत आणि उपस्थित पीताधिपती उत्तराडी मठ, एक गणित समर्पित द्वैत वेदांत मध्ये मोठ्या खालील आहे, दक्षिण भारत . [१] मुख्य प्रवक्ते आणि या द्वैत तत्त्वज्ञानाचे पुनरुज्जीवन करणारे माधवचार्य हे उत्तरादी मठाचे nd२ वे पन्टीफ आहेत.[२][३] [४] ते विश्व माधवा महा परशातचे संस्थापक आहेत.[५]
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तो विद्वान एक प्रमुख कुटुंबात त्यांचा जन्म झाला [१] 8 मार्च 1973 पंडित रंगाचार्य गुट्टल आणि केन रुक्माबाई करण्यासाठी मुंबई, महाराष्ट्र, भारत आणि सर्वज्ञचार्य नाव देण्यात आले.[६] पंडित रंगाचार्य हे पार्श्वश्रमा ( संन्यास आदेशापूर्वी ) श्री सत्यप्रमोदा तीर्थ स्वामीजी यांचे पुत्र आहेत.[७]
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सर्वज्ञचार्य एक झाले संन्यासी 23 वयाच्या, थेट ब्रम्हचर्य येथे रघुत्तमा तीर्थ ब्रिंदावन, तिरुकोइलूर (मध्ये तामिळनाडू ) यांच्या उपस्थितीत श्री सत्यप्रमोदा तीर्थ स्वामीजींनी 24 एप्रिल 1996 [६] आणि सत्यात्म तीर्थ म्हणून नामकरण करण्यात आले. त्यांना थेट ब्रह्मचर्य कडून संन्यास प्राप्त झाल्यामुळे त्यांना अभिनव रघुतामा तर्तरू म्हणूनही ओळखले जाते.[८] श्री सत्यात्मा स्वामीजी हे ब्रह्मचर्य कडून संन्यास प्राप्त करणारे उत्तराडी मठाचे दुसरे पोन्टीफ आहेत.[९]
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श्री सत्यात्मा तीर्थ यांनी उत्तरादी मठाच्या माध्यमातून जलसंचलन व व्यवस्थापन तज्ज्ञ, वॉटरमन ऑफ इंडिया आणि रामन मॅग्सेसे पुरस्कार विजेते राजेंद्र सिंह यांना जलसंधारण व इतर विषयांवर व्याख्यान देण्यास प्रोत्साहित केले.[१०] उत्तरादी मठ आणि विश्व माधव महा परशात यांच्या संयुक्त विद्यमाने दरवर्षी गरजू विद्यार्थ्यांना .00.०० लाख रुपये (सुमारे १०,००० अमेरिकन डॉलर्स) पर्यंत मदत करण्यात त्यांचे महत्त्वपूर्ण योगदान आहे.[११]
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२०० पूरच्या दरम्यान त्यांनी बेल्लारी, विजापूर, रायचूर आणि बागलकोट जिल्ह्यातील पूरग्रस्तांना मदत साहित्य पुरवले आहे आणि पूरात घरे गहाळ झालेल्यांसाठी १०० कमी किमतीची घरे बांधण्याचे उपाय देखील त्यांनी केले आहेत.[११] खेड्याच्या एकात्मिक विकासासाठी त्यांनी कर्नाटकातील रायचूर [२] मधील ग्रामीण गाव दत्तक घेतले आहे. आधुनिक समाजातील धार्मिक 'गणिता'ची भूमिका पुन्हा परिभाषित करण्याचा प्रयत्न करीत आहेत, जेणेकरून सध्याचे' गणित 'आधुनिक समाजातील वाईट गोष्टींपासून मुक्त होण्यासाठी प्रयत्न केला पाहिजे.
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त्याच्या आत्मिक प्रवचन (pravachana) प्रामुख्याने माधवाचार्य अनुयायी पासून, मोठ्या एकत्र आकर्षित आणि तो वैदिक विषयांवर चर्चा विशेषज्ञ.[१२] त्याने बंगलोर,[१३] गुलबर्गा, मालखेडा, उडुपी, राजामुंद्री, हैदराबाद (भारत),[२] पुणे,[३] रायचूर, धारवाड आणि चेन्नई अशा अनेक ठिकाणी आध्यात्मिक प्रवचन केले. त्यांनी व्यक्तिमत्त्व विकास कार्यक्रमांचे आयोजन केले असून व्यक्तिमत्त्व विकास, धर्म आणि तत्त्वज्ञान या विषयांवर अनेक पुस्तके लिहिली आहेत.[१४] सत्त्यमा तीर्थ, उत्तरादि मठाचे विद्यमान प्रमुख म्हणून इतर लेखकांना धार्मिक अनुभवांवर पुस्तके लिहिण्यास प्रोत्साहित केले आहे.[१५]
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सामान्यता "परिव्राजक" (दांडी स्वामी) चालू आहेत कारण "व्रज" हा शब्द सूचित करतो पण चातुर्मासाच्या काळात त्यांना एका जागी रहावे लागते. [१६] यात्रा किंवा इतर कारणांसाठी बाहेर पडणे म्हणजे शास्त्र आणि यती धर्माचे उल्लंघन होय. चातुर्मास्याच्या या seasonतूत, भटकंती करणारे (यती) चातुर्मास्य दीक्षा घेतात, योग्य ठिकाणी रहातात आणि भगवंताच्या चिंतनात पूर्णपणे मग्न होतात.[१७] 2017 मध्ये, सत्यात्मा तीर्थाने (18 जुलै 2017 - 6 सप्टेंबर 2017) पासून तेलंगणाच्या पालामूरमध्ये आपला चातुर्मास्य दीक्षा खर्च केली.[१८]
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सदफ शमास (जन्म १३ डिसेंबर १९९८) ही पाकिस्तानी क्रिकेट खेळाडू आहे जी उजव्या हाताची फलंदाज म्हणून खेळते.[१]
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ध्रुवीय प्रकाश किंवा ॲरोरा किंवा नॉर्दर्न लाइट्स (अरोरा बोरेलिस) किंवा सदर्न लाइट्स (अरोरा ऑस्ट्रेलिस) हे पृथ्वीच्या आकाशातील एक नैसर्गिक प्रकाश प्रदर्शन आहे. हे प्रामुख्याने उच्च-अक्षांश प्रदेशांमध्ये (आर्क्टिक आणि अंटार्क्टिकच्या आसपास) पाहिले जाते. हे तेजस्वी प्रकाशांचे गतिमान नमुने प्रदर्शित करतात जे पडदे, किरण, चक्राकार किंवा संपूर्ण आकाश झाकणारे दिसतात.[१]
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ध्रुवीय प्रकाश हा सौर वाऱ्यामुळे चुंबकीय क्षेत्रामध्ये होणाऱ्या व्यत्ययाचे परिणाम आहेत. ध्रुवीय प्रकाशहा सूर्यमालेतील बहुतेक ग्रह, काही नैसर्गिक उपग्रह आणि धूमकेतूंवर देखील दिसतो.
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ॲरोरा हा शब्द पहाटेच्या रोमन देवीच्या नावावरून आला आहे, जी सूर्य येण्याची घोषणा करत पूर्वेकडून पश्चिमेकडे प्रवास करत असे. बोरेलिस आणि ऑस्ट्रेलिस हे शब्द ग्रीक पौराणिक कथेतील उत्तरेकडील वारा ( बोरियास ) आणि दक्षिणेकडील वारा ( ऑस्टर ) या प्राचीन देवतांच्या नावांवरून आले आहेत.[२][३]
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सदाफ मोहम्मद सैयद उर्फ सदा( १७ फेब्रुवारी, १९८४, - हयात)हि एक कॉलीवूड म्हणजे तमिळ चित्रपटात काम करणारी भारतीय चित्रपट अभिनेत्री आहे.
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सदा मोहम्मद चा जन्म १७ फेब्रुवारी १९८४ रोजी महाराष्ट्रातील रत्नागिरी जिल्ह्यातील एका मुस्लिम कुटुंबात झाला. तिने अनेक तमिळ, मल्याळम, कन्नड आणि तेलुगु चित्रपटात काम केले आहे. जयम, अन्नीयन व उन्नाले उन्नाले हे तिचे काही गाजलेले चित्रपट आहेत. सदा तमिळ चित्रपटातील एक आघाडीची नायिका आहे.
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०१) अरविंद दोहन (धार पहिली) - अध्यात्मविकास, श्रीकृष्ण प्रकाशन, बेळगाव. (१९५६)
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०२) अरविंद दोहन (धार दुसरी)
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०३) शिवाजीचे अवतारकार्य
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०४) मार्क्सवाद - नवयुगाचे तत्त्वज्ञान
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०५) मार्क्सवादाचा प्रयोग - सोव्हिएत रशिया
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०६) राघोभरारी
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०७) व्हाईटहेड - तत्त्वज्ञान आणि सामाजिक नीति
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०८) टोवर्डस् फ्युचर (इंग्रजी)
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०९) हिंदी राष्ट्रवाद - विकास व भवितव्य [१]
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गणेशकुमार नरवाडे उर्फ सदाशिव अमरापूरकर ( ११ मे १९५०, अमरापूर - ३ नोव्हेंबर २०१४, मुंबई) हे एक मराठी नाट्य अभिनेते तसेच हिंदी, मराठी, ओरिया, हरियाणी, भोजपुरी, बंगाली व गुजराती भाषांतील चित्रपटांत काम करणारे अभिनेते होते.
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शेवगाव तालुक्यातील अमरापूर हे त्यांचे मूळ गाव. त्याचे वडील शेती करत. शेत नांगरणे, बैलांना चारा घालणे, मोट चालवणे, गाईचे दूध काढणे, जत्रेत बैल पळविणे या सगळ्या गोष्टी अमरापूरकर यांनी बालपणी केल्या होत्या. त्यांच्याकडे १०० शेळ्या होत्या. रोज त्यांना चरायला घेऊन जाण्याचे काम अमरापूरकर करीत. आपल्या आळंदीला राहणाऱ्या आत्याबरोबर त्यांनी तीन चार वेळेला आळंदी ते पंढरपूर अशी पायी यात्रा केली होती.
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त्यांचे मूळचे नाव गणेशकुमार नरवाडे. नाटकांतील भूमिकांसाठी त्यानी सदाशव अमरापूरकर हे नाव घेतले. कॉलेजमध्ये असताना त्यांनी 'पेटलेली अमावास्या' या एकांकितेत नायकाची आणि त्यांची पहिली-वहिली भूमिका केली होती.
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सामाजिक जाणिवेतून सार्वजनिक जीवनात काम करणाऱ्या संस्था-संघटानांशीही अमरापूरकरांचा संबंध होता. सामाजिक कृतज्ञता निधीसाठी 'लग्नाची बेडी' या नाटकाचे गावोगावी प्रयोग झाले होते. त्या नाटकात सदाशिव अमरापूरकर भूमिका करत असत. मेधा पाटकरांच्या नर्मदा आंदोलनात त्यांचा सक्रिय सहभाग होता. वर्ध्याच्या गांधी आश्रमात ते नेहमी जात. अभय बंग, बाबा आढाव, नरेंद्र दाभोलकर आदी सामाजिक कार्यकर्ते यांच्याशीही अमरापूरकरांचे जिव्हाळ्याचे नाते होते.
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अमरापूरकरांनी श्याम बेनेगल यांच्या 'डिस्कव्हरी ऑफ इंडिया' या दूरचित्रवाणी मालिकेत महात्मा फुले यांची भूमिका केली होती.
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मार्च २०१४ मध्ये होळीच्या उत्सवात पाण्याची नासाडी रोखण्याचा प्रयत्न करीत असताना अमरापूरकर यांना सहा व्यक्तींनी मारहाण केली होती.
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सदाशिव अमरापुरकरांना शिसपेन्सिलीने चित्रे काढायचा छंद होता. एका जपानी शेती शास्त्रज्ञाचे पुस्तक वाचून त्यांनी शेती करायचे ठरविले. त्यासाठी अमरापूरकरांनी सिंहगडाच्या पायथ्याशी अर्धा एकर शेतजमीन विकत घेतली होती. तेथे त्यांनी शेताच्या कडेला अनेक झाडे लावली. तीन वर्षे पीक जळून गेल्यावरही प्रयत्न न सोडता ते भुईमुगाची नैसर्गिक शेती करत राहिले आणि चौथ्या वर्षी त्यांनी भरघोस उत्पन्न मिळविले.
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सडक या हिंदी चित्रपटात केलेल्या महाराणी या तृतीयपंथी खलनायकाच्या भूमिकेसाठी फिल्मफेर पुरस्कार.[१]
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महाराष्ट्राचा गौरवशाली इतिहास / The History of Maharashtra.....
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सदाशिव काशीनाथ ऊर्फ बापू छत्रे (इ.स. १७८८:वाळकेश्वर, मुंबई, महाराष्ट्र - इ.स. १८३०) हे इंग्रजी व संस्कृत गद्य पुस्तकांचे मराठीत अनुवाद करणारे एक लेखक होते. ते कवीही होते, पण त्यांच्या कविता उपलब्ध नाहीत.
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मुंबई इलाख्यांत प्रथमतः शाळा स्थापन करणें हे काम इंग्रज सरकारकडून सुरू करताना कर्नल कौपर व जॉर्ज जार्व्हिस या अधिकाऱ्यांनी यांनी छत्र्यांची मदत घेतली होती.
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छत्रे हे देशी भाषांमधून पुस्तके करवून घेणाऱ्या मुंबईच्या हैंदशाळा व शाळापुस्तक मंडळी (स्थापना - १८२२) या संस्थेचे डेप्युटी नेटिव्ह सेक्रेटरी होते. त्यांनी जॉर्ज जार्व्हिस यांच्या मदतीने अनेक मराठी पुस्तके लिहिली. ही पुस्तके बहुतेक भाषांतरित आणि बालवाङ्मयात मोडणारी होती.
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छत्र्यांनी बाळमित्र, इसापनीती, आणि वेताळपंचविशी[ संदर्भ हवा ] ही पुस्तके इंग्रजीतून मराठीत रूपांतरित केली.
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सदाशिव काशीनाथ छत्र्यांचे बाळमित्र हे पुस्तक इ.स. १८२८मध्ये प्रकाशित झाले. बर्क्विन या फ्रेंच लेखकाने लिहिलेल्या पुस्तकाच्या चिल्ड्रन्स फ्रेन्ड या इंग्रजी अनुवादावरून छत्र्यांनी हे पुस्तक मराठीत आणले. हे पुस्तक अतिशय लोकप्रिय झाले होते.
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