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मराठी विकिपीडियाचा वाचक आणि संपादक वर्ग वैविध्यपूर्ण आहे त्यांच्या तेवढ्याच विविध अपेक्षा असतात आणि काही जणांना विकिपीडियाची पूर्ण माहिती असते ,काहींना काहीच पूर्व कल्पना नसते तर काही वेळा आपण गृहीत धरतो त्यापेक्षा स्वरूप वेगळे असते.त्या करिता खालील गोष्टींची नोंद घ्या.
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मराठी विकिपीडिया मध्यवर्ती चर्चा पानावर म्हणजेच चावडीवर आपले स्वागत आहे.
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चर्चा पानांवर चर्चेचे प्रस्ताव अथवा चर्चेत सहभागी होण्यापूर्वी खालील चर्चा संकेतांची माहिती घ्यावी.मागील चर्चा शोधता आणि संदर्भ शोधता येतात.जुन्या चर्चांचा शोध घेऊन नेहमी विचारले जाणारे प्रश्न पाने सहाय्य पाने व सहाय्य पानांच्या आधारे ऑनलाईन पॉवर पॉईंट प्रेझंटेशन बनवण्यात सदस्यांनी वेळोवेळी पुढाकार घ्यावा.खालील सूचनांचे वाचन झाल्या नंतर सुयोग्य चर्चा पान निवडावे.
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विकिपीडिया ज्ञानकोश सामूहीक लेखन योगदानाचे स्थान आहे.विकिपीडिया संस्कृतीत प्रत्येक सदस्याने इतर सदस्यांच्याबद्दल विश्वास आणि आदर ठेवणे अभिप्रेत आहे.इतर सदस्यांवर कोणत्याही कारणाने व्यक्तिगत,भाषिक,प्रांतीय, जातीय, धार्मिक स्वरूपांचे आरोप करू नयेत. असे लेखन वगळले जाते.असा मजकूर आढळल्यास तो काढून टाकण्यात येते.
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विकिपीडियाचे वापरकर्ते मतांबद्दल सहमत नसतात तेव्हासुद्धा एकमेकांचा व त्यांच्या विरोधी मतांचा आदर करतात. एकमेकांबद्दल असाधारण विधाने तसेच वैयक्तिक आरोप करण्याचे टाळतात. सभ्य आणि शांत रहातात. शक्य तेथे संपादनाकरिता योग्य संदर्भ उद्धृत करून देतात. विचार जुळले नाहीत तर
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वृत्ती सतत सर्वांना साभाळून नेणारी, मनमोकळी व स्वागतेच्छू ठेवावी ही अपेक्षा आहे.
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या लेखातील काही लेखन/वगळणन योगदानांच्या संदर्भाने विकिपीडिया:चावडी/प्रचालकांना निवेदन येथे सदस्य विनंती आली. 'संबंधीत चर्चा पानावर सदस्यांनी परिच्छेदातील वाक्यवार आणि यादीतील घटकांबद्दल घटकवार विश्वकोशीय उल्लेखनीयते बद्दल चर्चा करावी आणि नंतर विश्वकोशीय निकषांस अनुसरून असलेला मजकुर तेवढाच लेखात घ्यावा अशी सहकार्य विनंती समस्त सदस्यांना केली जात आहे. पुरेशा विश्वकोशीय उल्लेखनीयता चर्चेशिवाय मजकुर जोडणे अथवा वगळणे दोन्हीही टाळले जाणे अभिप्रेत आहे.
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'शिवाजी' आणि शिवाजीच्या कुटुंबातील व्यक्तींचे नाव असलेल्या सं���्था भारतभर आहेत. अशा संस्थांची ही यादी.(यादीमधील घटकांची अकारविल्हे मांडणी करताना 'शिवाजी' या शब्दाच्या आगेमागे असलेले 'श्री', 'छत्रपती', 'राजे', 'श्रीमंत', 'महाराज' हे शब्द, तसेच संस्थांच्या नावात असलेले 'इन्स्टिट्यूशन', 'कॉलेज' 'ऑफ' हे शब्द विचारात घेतलेले नाहीत.) :-
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या यादीमध्ये शिवाजीच्या फक्त प्रसिद्ध पुतळ्यांचा निर्देश आहे. एकट्या पुणे शहरात, जानेवारी.२०११ पर्यंत, सार्वजनिक खर्चाने सार्वजनिक जागी उभे केलेले शिवाजीचे चाळीसहून अधिक पुतळे होते.[ संदर्भ हवा ] शिवाजीखेरीज संभाजी, शाहू वगैरेंचेही पुतळे महाराष्ट्रात आहेत.
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शिवाजीचे पुण्यातील पुतळे [१] (मृत दुवा)
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शिवाजी महाराजांचा पोवाडा - शाहिर: महात्मा ज्योतिबा फुले
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+
चौक १
|
| 3 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा । छत्रपती शिवाजीचा ॥ध्रु०॥
|
| 4 |
+
लंगोटयांस देई जानवीं पोषींदा कूणब्याचा । काल तो असे यवनांचा ॥
|
| 5 |
+
शिवाजीचा पिता शहाजी पुत्र मालोजीचा । असे तो डौल जहागिरीचा ॥
|
| 6 |
+
पंधराशें एकूणपन्नास साल फळलें । जुन्नर तें उदयासी आलें ॥
|
| 7 |
+
शिवनेरी किल्ल्यामध्यें बाळ शिवाजी जन्मलें । जिजीबाईस रत्न सांपडलें ॥
|
| 8 |
+
हातापायांचीं नखं बोटं शुभ्र प्याजी रंगीलें । ज्यांनीं कमळा लाजिवलें ॥
|
| 9 |
+
वरखालीं टिर्याख पोटर्याय गांठी गोळे बांधले । स्फटिकापरि भासले ॥
|
| 10 |
+
सान कटी सिंहापरी छाती मांस दुनावलें । नांव शिवाजी शोभलें ॥
|
| 11 |
+
राजहौंसी उंच मान माघें मांदे दोंदीलें । जसा का फणीवर डोले ॥
|
| 12 |
+
एकसारखे शुभ्र दंत चमकूं लागले । मोतीं लडीं गुंतविलें ॥
|
| 13 |
+
रक्तवर्ण नाजूक होटीं हासूं छपिवले । म्हणोन बोबडें बोले ॥
|
| 14 |
+
सरळ नीट नाक विशाळ डोळ्या शोभलें । विषादें मृग वनीं गेले ॥
|
| 15 |
+
नेत्र तीखे बाणी भवया कमठे ताणीले । ज्यांनी चंद्रा हाटिवलें ॥
|
| 16 |
+
सुंदर विशाळ भाळवटी जावळ लोंबलें । कुरळे केंस मोघीले ॥
|
| 17 |
+
आजानबाहू पायांपेक्षां हात लांबलेले । चिन्ह गादिचें दिसलें ॥
|
| 18 |
+
जडावाचीं कडीं तोडे सर्व अलंकार केले । धाकटया बाळा लेविवलें ॥
|
| 19 |
+
किनखाबी टंकोचें मोतीं घोसानें जडलें । कलाबतुचे गोंडे शोभले ॥
|
| 20 |
+
लहान कुंची पैरण बिरडी बंद लावले । डाग लाळीचे पडलेले ॥
|
| 21 |
+
हातापायांचे आंगठे चोखी मुखामधी रोळे । पायीं घुंगरुं खुळखुळे ॥
|
| 22 |
+
मारी पाठोपाठ लाथाबुक्या आकाश शोभले । खेळण्यावर डोळे फिरवीले ॥
|
| 23 |
+
मजवर हा कसा खेळणा नाहीं आवडले । चिन्ह पाळणीं दिसलें ॥
|
| 24 |
+
टाहीपेटे रडूं लागला सर्व घाबरले । पाळण्या हलवूं लागले ॥
|
| 25 |
+
धन्य जिजाबाई जिनें जो जो जो जो जो केलें । गातों गीत तिनें केलें ॥
|
| 26 |
+
चाल
|
| 27 |
+
जो जो जो जो जो जो गाऊ, जी जी जी जी जीजी गाऊं ।
|
| 28 |
+
चला वेरुळास जाऊं, दौलताबादा पाहूं ॥
|
| 29 |
+
मूळ बाबाजीस ध्याऊं, कीर्ति आनंदाने गाऊं ।
|
| 30 |
+
सरदारांत उमराऊ, सोबतीस जाधवराऊ ॥
|
| 31 |
+
पाटील होते गांवोगाऊ, पुत्रावरी अती जीऊ ।
|
| 32 |
+
थोर विठोजी नांव घेऊं, सान मालोजी त्याचा भाऊ ।
|
| 33 |
+
दीपाबाई त्यास देऊं, छंदाजोगा गिती गाऊं ॥
|
| 34 |
+
चाल
|
| 35 |
+
मालोजी राजा । तुझा बा आजा ॥
|
| 36 |
+
यवनी काजा । पाळिल्या फौजा ॥
|
| 37 |
+
लाविल्या ध्वजा । मारिल्या मौजा ॥
|
| 38 |
+
वेळेस मुक्का । साधल्या बुक्का ॥
|
| 39 |
+
विचारी पक्का । जाधवा धक्का ॥शेशाप्पा नायका । ठेविचा पैका ।
|
| 40 |
+
द्रव्य���ची गर्दी । चांभारगोंदी ॥
|
| 41 |
+
देवळें बांधी । तळीं ती खांदी ॥
|
| 42 |
+
आगळी बुद्धि । गुणानें निधि ॥
|
| 43 |
+
लिहिलें विधि । लोकांस बोधी ॥
|
| 44 |
+
संधान साधी । जसा पारधी ॥
|
| 45 |
+
भविषी भला । कळलें त्याला ॥
|
| 46 |
+
सांगोनी गेला । गादी बा तुला ॥
|
| 47 |
+
चाल
|
| 48 |
+
उपाय नाहीं जाणोन चाकर झाला यवनाचा । शिपाई होता बाणीचा ॥
|
| 49 |
+
खोटया दैवा कोण खोडी बेत देवाजीचा । पवाडा गातो शिवाजीचा ॥
|
| 50 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा । छत्रपती शिवाजीचा ॥१॥
|
| 51 |
+
चौक २
|
| 52 |
+
वडील बंधु संभाजीनें लळे पुरवीले । धाकटयासवें खेळले ॥
|
| 53 |
+
उभयतांचें एक चित्त तालमींत गेले । फरीगदग्या शिकले ॥
|
| 54 |
+
आवडीनें खमठोकीं कुस्ती पेंचानें खेळे । पवित्रे दस्तीचे केले ॥
|
| 55 |
+
द्वादशवर्षी उमर आली नाहीं मन धालें । घोडी फिरवूं लागले ॥
|
| 56 |
+
आट्टल घोडेस्वार भाला बोथाटी शीकले । गोळी निशान साधले ॥
|
| 57 |
+
कन्या वीर जाधवाची जिनें भारथ लावलें । पुत्रा नीट ऐकविलें ॥
|
| 58 |
+
अल्पवयाचे असतां शिकार करुं लागले । माते कौतुक वाटलें ॥
|
| 59 |
+
नित्य पतीचा आठव डोंगर दुःखाचे झाले । घर सवतीनें घेतले ॥
|
| 60 |
+
छाती कोट करून सर्व होतें साटिवलें । मुखमुद्रेनें फसविले ॥
|
| 61 |
+
चतुर शिवाजीनें आईचें दुःख ताडिले । पित्यास मनीं त्यागिले ॥
|
| 62 |
+
पुत्राचे डोळे फिरले माते भय पडलें । हीत उपदेशा योजिलें ॥
|
| 63 |
+
मनीं पतिभक्ति पुता बागेमधीं नेलें । वृक्षछायीं बसीवलें ॥
|
| 64 |
+
पूर्वजांचे स्मरण करून त्यास न्याहाळीलें । नेत्रीं पाणी टपटपलें ॥
|
| 65 |
+
या क्षेत्राचे धनी कोणकोणी बुडविले । सांगतें मुळीं कसें झालें ॥
|
| 66 |
+
क्षेत्रवासी म्हणोन नांव क्षत्रिय धरलें । क्षेत्रीं सुखी राहिले ॥
|
| 67 |
+
अन्यदेशिचे दंगेखोर हिमालयीं आले । होते लपून राहिले ॥
|
| 68 |
+
पाठीं शत्रु भौती झाडी किती उपासी मेले । गोमासा भाजून धाले ॥
|
| 69 |
+
पाला फळें खात आखेर ताडपत्रा नेसले । झाडी उल्लंघून आले ॥
|
| 70 |
+
लेखणीचा धड शीपाया सैनापति केलें । मुख्य ब्रह्मा नेमलें ॥
|
| 71 |
+
बेफाम क्षत्रिय होते अचूक टोळ उतरले । कैदी सर्वांस केलें ॥
|
| 72 |
+
सर्व देशीं चाल त्याचें गुलाम बनीवले । डौलानें क्षुद्र म्हणाले ॥
|
| 73 |
+
मुख्य ब्रह्म राजा झाला जानें कायदे केले । त्याचे पुढें भेद केले ॥
|
| 74 |
+
ब्रह्मा मेल्यावर परशराम पुंड माजले । उरल्या क्षत्रिया पिडीले ॥महारमांग झाले किती देशोधडी केले । ब्राह्मण चिरंजीव झाले ॥
|
| 75 |
+
देश निक्षत्रिय झाल्यामुळें यवना फावलें । सर्वांस त्यांहीं पिडीलें ॥
|
| 76 |
+
शुद्र म्हणती तुझ्या हृदयीं बाण टोचले । आज बोधाया फावलें ॥
|
| 77 |
+
गाणें गातें ऐक बा���ा तुझ्या आजोळीं शिकले । बोलीं नाहीं मन धालें ।
|
| 78 |
+
चाल
|
| 79 |
+
क्षेत्र क्षत्रियांचें घर, तुझे पितृ माहावीर । सुखा नसे त्यांच्या पार,
|
| 80 |
+
आल्या गेल्याचें माहेर ॥ शीखराकार डोंगर, नानावल्ली तरुवर ॥
|
| 81 |
+
परीं खोरीं वाहे नीर खळखळे निरंतर । झाडा फुलें झाला भार,
|
| 82 |
+
सुगंधी वाहे लहर । पक्षी गाती सोळा स्वर, मंजूळ वाणी मनोहर ॥
|
| 83 |
+
नदी नाले सरोवर, शोभे कमळांचा भार । भूमी अती काळसर,
|
| 84 |
+
क्षेत्र देई पीका फार ॥ धाव घेती दंगेखोर, दिला क्षेत्रियास मार ।
|
| 85 |
+
दास केले निरंतर, ब्रह्मा झाला मनीं गार ॥ लोभी मेले येथें फार, विधवा झाल्या घरोघर ।
|
| 86 |
+
उपाय नाहीं लाचार, स्त्रिया वंदी पाटावर ॥ दुसरा झाला शीरजोर, परशा तोबा कठोर ।
|
| 87 |
+
मार त्याचा अनीवार, केला क्षत्रियां संव्हार ॥ क्षत्रिय केले जरजर, भये कांप थरथर ।
|
| 88 |
+
दुःखा नाहीं त्यांच्या पार, ठाव नाहीं निराधार ॥ बहु केले देशापर, बाकी राहि मांगमाहार ।
|
| 89 |
+
निःक्षेत्रीं झाल्यावर, म्लेंच्छें केलें डोकें वर । आले सिंधुनदावर, स्वाऱ्याि केल्या वारोंवार ।
|
| 90 |
+
गातें कटावांत सार, लक्ष देई अर्थावर ।
|
| 91 |
+
चाल
|
| 92 |
+
काबुला सोडी । नदांत उडी ॥
|
| 93 |
+
ठेवितो दाढी । हिंदूस पीडी ॥
|
| 94 |
+
बामना बोडी । इंद्रियें तोडी ॥
|
| 95 |
+
पिंडीस फोडी । देवळें पाडी ॥
|
| 96 |
+
चित्रास तोडी । लेण्यास छेडी ॥
|
| 97 |
+
गौमांसी गोडी । डुकरां सोडी ॥
|
| 98 |
+
खंडयास ताडी । जेजूरी गडी ॥
|
| 99 |
+
भुंग्यास सोडी । खोडीस मोडी ॥
|
| 100 |
+
मूर्तीस काढी । काबूला धाडी ॥
|
| 101 |
+
झाडीस तोडी । लुटली खेडीं ॥
|
| 102 |
+
गडास वेढी । लावली शीडी ॥
|
| 103 |
+
हिंदूस झोडी । धर्मास खोडी ॥
|
| 104 |
+
राज्यास बेडी । कातडी काढी ॥
|
| 105 |
+
गर्दना मोडी । कैलासा धाडी ॥
|
| 106 |
+
देवळें फोडी । बांधीतो माडी ॥
|
| 107 |
+
उडवी घोडी । कपाळा आढी ॥
|
| 108 |
+
मीजास बडी । ताजीम खडी ॥
|
| 109 |
+
बुरखा सोडी । पत्नीखस पीडी ॥
|
| 110 |
+
गायनीं गोडी । थैलीतें सोडी ॥
|
| 111 |
+
चाल
|
| 112 |
+
माताबोध मनीं हसतां राग आला यवनांचा ।
|
| 113 |
+
बेत मग केला लढण्याचा ॥ तान्हाजी मालुसरे बाजी फसलकराचा ।
|
| 114 |
+
स्नेह येशजी कंकाचा ॥ मित्रा आधीं ठेवी जमाव केला मावळ्यांचा ।
|
| 115 |
+
पूर करी हत्यारांचा ॥ मोठया युक्तीनें सर केला किल्ला तोरण्याचा ।
|
| 116 |
+
रोविला झेंडा हिंदूचा ॥ राजगड नवा बांधला उंच डोंगराचा ।
|
| 117 |
+
भ्याला मनीं विजापुरचा । दुसरा भ्याला मेला बेत नव्हता पूर्वीचा ।
|
| 118 |
+
दादोजी कोंडदेवाचा ॥ मासा पाणीं खेळे गुरू कोण असे त्याचा ।
|
| 119 |
+
पवाडा गातो शिवाजीचा ॥ कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा ।
|
| 120 |
+
छत्रपती शिवाजीचा ॥२॥
|
| 121 |
+
चौक ३
|
| 122 |
+
जाहागीरचा पैसा सारा लावी खर्चास । चाकरी ठेवी लोकांस ॥
|
| 123 |
+
थाप देऊन हात���ं घेई चाकण किल्ल्यास । मुख्य केले फिङ्र्गोजीस ॥
|
| 124 |
+
थोडया लोकांसहीत छापा घाली सुप्यास । कैद पहा केलें मामास ॥
|
| 125 |
+
सुप्यासोबत हातीं घेतलें तीनशें घोडयास । करामत केली रात्रीस ॥
|
| 126 |
+
मुसलमानां लाच देई घेई कोंडाण्यास । सिंहगड नांव दिलें त्यास ॥
|
| 127 |
+
पुरंधरी जाई जसा भला माणूस न्यायास । कैद पहा केलें सर्वांस ॥
|
| 128 |
+
गांव इनाम देऊन सर्वां ठेवी चाकरीस । मारलें नाहीं कोणास ॥
|
| 129 |
+
वाटेमधीं छापा घालून लुटी खजीन्यास । सांठवी राजगडास ॥
|
| 130 |
+
राजमाचीं लोहगडीं लढे घेई तिकोण्यास । बाकी चार किल्ल्यांस ॥
|
| 131 |
+
मावळ्यांस धाडी कोकणीं गांव लुटायास । धूर्त योजी फितूरास ॥
|
| 132 |
+
सन्मान कैद्यां देई पाठवि वीजापूरास । मुलान्या सुभेदारास ॥
|
| 133 |
+
विजापुरीं मुसलमाना झाला बहु त्रास । योजना केली कपटास ॥
|
| 134 |
+
करनाटकीं पत्र पाठवी बाजी घोरपडयास । कैद तुम्ही करा शहाजीस ॥
|
| 135 |
+
भोजनाचें निमित्त केलें नेलें भोसल्यास । दग्यानें कैद केलें त्यास ॥
|
| 136 |
+
थेट शहाजी कैदी आणिला विजापूरास । खुशी मग झाली यवनास ॥
|
| 137 |
+
चिरेबंदी कोठडीमध्यें बंद केलें त्यास । ठेविलें भोक वाऱ्यास ॥
|
| 138 |
+
शहाजीला पिडा दीली कळलें शिवाजीस । ऐकून भ्याला बातमीस ॥
|
| 139 |
+
पिताभक्ति मनीं लागला लागला शरण जायास । विचारी आपला स्त्रियेस ॥
|
| 140 |
+
साजे नांव सईबाई स्त्री सुचवी पतीस । ताडा दंडीं दुसमानास ॥
|
| 141 |
+
स्त्रीची सुचना सत्य भासली लिहिलें पत्रास । पाठवी दिल्ली मोगलास ॥
|
| 142 |
+
चाकर झालों तुमचा आतां येतों चाकरीस । सोडवा माझ्या पित्यास ॥
|
| 143 |
+
मोलग थैली गेली थेट मुसलमानास ठेविले किल्ल्यावर त्यास ॥
|
| 144 |
+
बाजी शामराज का लाजला जात सांगायास । धरुं पाही शिवाजीस ॥
|
| 145 |
+
धेड म्हणावा नाक नाही द्यावा कोणास । अडचण झाली बखरीस ॥
|
| 146 |
+
सिद्धिस बेत गेला नाहीं अंतीं भ्याला जिवास । काळें केलें महाडास ॥
|
| 147 |
+
शाहाजीचा बाजी आखेर घेईल बक्षीस । हा पाजी मुकला जातीस ॥
|
| 148 |
+
करनाटकीं आज्ञा झाली शाहाजीस । यवन भ्याला सिंहास ॥
|
| 149 |
+
वर्षे चार झालीं शिवला नाहीं कबजास । पिताभक्ति पुत्रास ॥
|
| 150 |
+
चंद्रराव मोर्यास मारी घेई जावळीस । दुसरे वासोटा किल्ल्यास ॥
|
| 151 |
+
प्रतापगड बांधी पेशवा केला एकास । नवे योजी हुद्यास ॥
|
| 152 |
+
आपली बाकी काढी धाडी पत्र तगाद्यास । चलाखी दावी मोंगलांस ॥
|
| 153 |
+
रात्रीं जाऊन एकाएकीं लुटी जुन्नरास । पाठवी गडी लुटीस ॥
|
| 154 |
+
आडमाग करी हळूंच गेला नगरास । लुटी हत्तीघोडयांस ॥
|
| 155 |
+
उंच वस्त्रे, रत्नेंु होन कमती नाहीं द्रव्यास । चाकरि ठेवि बारगिरांस ॥
|
| 156 |
+
समुद्रतीरीं किल्ले ���ेई पाळी गलबतांस । चाकरी ठेवि पठाणास ॥
|
| 157 |
+
सिद्दि पेशव्या आपेश देई घेई यशास । उदासी लाभ शिवाजीस ॥
|
| 158 |
+
आबझूलखान शूर पठाण आला वांईस । शोभला मोठा फौजेस ॥
|
| 159 |
+
हातीं बारा हजार घोडा त्याचे दिमतीस । कमी नाहीं दारुगोळीस ॥
|
| 160 |
+
कारकुनाला वचनीं दिलें हिवरें बक्षीस । फितविलें लोभी ब्राह्मणांस ॥
|
| 161 |
+
गोपीनाथ फसवी पठाणा आणि एकांतास । चुकला नाहीं संकेतास ॥
|
| 162 |
+
मातेपायीं डोई ठेवी, लपवी इत्यारास । बरोबर आला बेतास ॥
|
| 163 |
+
समीप येतां शिवाजी जसा भ्याला व्याघ्रास । कमी करी आपल्या चालीस ॥
|
| 164 |
+
गोपीनाथ सुचना देई भोळ्या यवनास । भ्याला तुमच्या शिपायांस ॥
|
| 165 |
+
वर भेटभाव वाघनख मारीं पोटास । भयभित केलें पठाणास ॥
|
| 166 |
+
पोटीं जखम सोसी केला वार शिवाजीस । झोंबती एकमेकांस ॥
|
| 167 |
+
हातचलाखी केली बिचवा मारी शत्रूस । पठाण मुकला प्राणास ॥
|
| 168 |
+
स्वामीभक्ती धाव घेई कळले शिपायास । राहिला उभा लढण्यास ॥
|
| 169 |
+
त्याची धोप घेई शिवाजी बचवी आपल्यास । तान्हाजी भिडे बाजूस ॥
|
| 170 |
+
दांती दाढी चावी तोडी घेई धनी सूडास । घाबरें केलें दोघांस ॥नांव सय्यदबंधू साजे शोभा आणी बखरीस । लाथाळी जीवदानास ॥
|
| 171 |
+
तान्हाजीला हूल देई मारी हात शिवाजीस । न्याहाळी प्रेतीं धण्यास ॥
|
| 172 |
+
उभयतांसीं लढतां मुकला आपल्या प्राणास । गेला जन्नत स्वर्गास ॥
|
| 173 |
+
छापा घाली मारी करी कैद बाकी फौजेस । पठाणपुत्र खाशा स्त्रियेस ॥
|
| 174 |
+
चार हजार घोडा लूट कमी नाहीं द्रव्यास । दुसऱ्याख सरंजामास ॥
|
| 175 |
+
अलंकार वस्त्रें देई सर्व कैदी जखम्यांस । पाठवि विजापूरास ॥
|
| 176 |
+
वचनीं साचा शिवाजी देई हिवरें बक्षीस । फितुर्या गोपीनाथास ॥
|
| 177 |
+
नाचत गात सर्व गेले प्रतापगडास । उपमा नाहीं आनंदास ॥
|
| 178 |
+
चाल
|
| 179 |
+
शिवाचा गजर जयनामाचा झेंडा रोविला ॥
|
| 180 |
+
क्षेत्र्याचा मेळा मावळ्याचा शिकार खेळला ॥
|
| 181 |
+
मातेपायीं ठेवी डोई गर्व नाहीं काडीचा ।
|
| 182 |
+
आशिर्वाद घेई आईचा ॥ आलाबला घेई आवडता होता जिजीचा ।
|
| 183 |
+
पवाडा गातो शिवाजीचा ॥ कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा ।
|
| 184 |
+
छत्रपती शिवाजीचा ॥३॥
|
| 185 |
+
चौक ४
|
| 186 |
+
लढे रांगणीं विशाळगडीं घेई पन्हाळ्यास । केले मग शुरु खंडणीस ॥
|
| 187 |
+
रुस्तुल जमाना आज्ञा झाली विजापूरास । नेमिला कोल्हापूरास ॥
|
| 188 |
+
स्वार तीन हजार घेई थोडया पायदळास । आला थेट पन्हाळ्यास ॥
|
| 189 |
+
मार देत शिवाजी पिटी कृष्णा पैलतडीस । अती जेर केलें त्यास ॥
|
| 190 |
+
खंडणी घेत गेला भिडला विजापूरास । परत मग आला गडास ॥
|
| 191 |
+
राजापुर दाभोळ लुटी भरी खजीन्यास । मात गेली विजापुरास ॥
|
| 192 |
+
सिद्दी जोहरा नेमी मोठी फौज दिमत���स । सावंत सिद्दी कुमकेस ॥
|
| 193 |
+
बंदोबस्त करी शिवाजी राही पन्हाळ्यास । करी मग जमा बेगमीस ॥
|
| 194 |
+
वारंवार छापे घाली लुटी भौंती मुलखास । केलें महाग दाण्यास ॥
|
| 195 |
+
त्रासानें खवळून वेढा घाली शिवाजीस । कोंडिले गडीं फौजेस ॥
|
| 196 |
+
चार मास लोटले शिवाजी भ्याला वेढयास । योजना करी उपायास ॥
|
| 197 |
+
कोंकणामधीं सिद्दी झोडी रघुनाथास । उपद्रव झाला रयतेस ॥
|
| 198 |
+
फासलकर बाजीराव पडले वाडीस । दुःख मग झालें शिवाजीस ॥
|
| 199 |
+
सिद्दी जोहरा निरोपानें गोंवी वचनास । खुशाल गेला भेटीस ॥
|
| 200 |
+
वेळ करून गेला उरला नाहीं आवकास । कच्चा मग ठेवी तहास ॥
|
| 201 |
+
सिद्दीस लाडी गोडी मधी मान डुकलीस । गेला थाप देऊन गडास ॥
|
| 202 |
+
सिद्धया पोटीं खुष्याली जाई झोपीं सावकास । हयगय झाली जप्तीस ॥
|
| 203 |
+
तों शिवाजी पळून गेला घेई पाठी रात्रीस । फसविलें मुसलमानास ॥
|
| 204 |
+
सिद्दी सकाळीं खाई मनीं लाडू चुरमुर्या्स । स्वार दळ लावी पाठीस ॥
|
| 205 |
+
चढत होता खिंड शिवाजी गांठलें त्यास । बंदुका लावी छातीस ॥
|
| 206 |
+
बाजीपरभु मुख्य केला ठेवि मावळ्यास । एकटा गेला रांगण्यास ॥
|
| 207 |
+
स्वामीला वेळ दिला बाजी भिडला शत्रूस । हरवी नित्य मोगलास ॥
|
| 208 |
+
दोन प्रहर लढे वाट दिली नाहीं त्यास । धन्य त्याच्या जातीस ॥
|
| 209 |
+
मोठी मोगल फौज दाखल झाली साह्यास । खवळला बाजी युद्धास ॥
|
| 210 |
+
अर्धे लोक उरले सरला नाहीं पाउलास । पडला परभू भूमीस ॥तो शिवाजी सुखी पोहंचला कान सुचनेस । अंती मनीं हाच ध्यास ॥
|
| 211 |
+
बार गडीं ऐकून सुखी म्हणे आपल्यास । नीघून गेला स्वर्गास ॥
|
| 212 |
+
सय्यद मागें सरे जागा देई बाजीरावास । पाहून स्वामीभक्तीस ॥
|
| 213 |
+
विजापुरीं मुसलमान करी तयारीस । खासा आला लढण्यास ॥
|
| 214 |
+
कराडास डेरे दिले घेई बहू किल्ल्यांस । वश करी चाचे लोकांस ॥
|
| 215 |
+
दळव्यासीं लडून घेई शृंगारपुरास । मारलें पाळेगारांस ॥
|
| 216 |
+
लोकप्रीतिकरितां करी गुरू रामदासास । राजगडीं स्थापी देवीस ॥
|
| 217 |
+
मिष्ट अन्न भोजन दिलें सर्वां बक्षीस । केली मग मोठी मजलस ॥
|
| 218 |
+
तानसैनी भले गवय्या बसवी गायास । कमी नाहीं तालस्वरास ॥
|
| 219 |
+
चाल
|
| 220 |
+
जीधर उधर मुसलमानी । बीसमिलाही हिंमानी ॥
|
| 221 |
+
सच्चा हरामी शैतान आया । औरंगजीब नाम लिया ॥
|
| 222 |
+
छोटे भाइकूं कैद हूल दिया । बडे भाईकी जान लिया ॥
|
| 223 |
+
छोटेकूंबी कैद किया । लोक उसके फितालिया ॥
|
| 224 |
+
मजला भाई भगा दिया । आराकानमें मारा गया ॥
|
| 225 |
+
सगे बापकूं कैद किया । हुकमत सारी छिनलीया ॥
|
| 226 |
+
भाईबंदकूं इजा दिया । रयत सब ताराज किया ॥
|
| 227 |
+
मार देके जेर किया । खाया पिया रंग उडाया ॥
|
| 228 |
+
आपण होके बेलगामी । शिवाजीकू कहे गुलामी ॥
|
| 229 |
+
आ��ण होके ऐशआरामी । शिवाजीकूं कहे हरामी ॥
|
| 230 |
+
बरे हुवा करो सलामी । हिंदवाणी गाव नामी ॥
|
| 231 |
+
चाल
|
| 232 |
+
आदी आंत न । सर्वां कारण ॥
|
| 233 |
+
जन्ममरण । घाली वैरण ॥
|
| 234 |
+
तोच तारण । तोच मारण ॥
|
| 235 |
+
सर्व जपून । करी चाळण ॥
|
| 236 |
+
नित्य पाळण । लावी वळण ॥
|
| 237 |
+
भूतीं पाहून । मनीं ध्याईन ॥
|
| 238 |
+
नांव देऊन । जगजीवन ॥
|
| 239 |
+
सम होऊन । करा शोधन ॥
|
| 240 |
+
सार घेऊन । तोडा बंधन ॥
|
| 241 |
+
चाल
|
| 242 |
+
सरनौबती डंका हुकूम पालेकराचा । घेई मुजरा शाईराचा ॥
|
| 243 |
+
सुखसोहळे होतां तरफडे सावंत वाडीचा । पवाडा गातो शिवाजीचा ॥
|
| 244 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा । छत्रपती शिवाजीचा ॥४॥
|
| 245 |
+
चौक ५
|
| 246 |
+
सावंत पत्र लिही पाठवी विजापूरास । मागे फौज कुमकेस ॥
|
| 247 |
+
बाजी घोरपडा बल्लोळखान येती साह्यास । शिवाजी करी तयारीस ॥
|
| 248 |
+
त्वरा करून गेला छापा घाली मुधोळांस । मारिलें बाजी घोरपडयास ॥
|
| 249 |
+
भाऊबंद मारिलें बाकी शिपाई लोकांस । घेतलें बाप सूडास ॥
|
| 250 |
+
सावंताची खोड मोडून ठेवी चाकरीस । धमकी देई पोर्च्युग्यास ॥
|
| 251 |
+
नवे किल्ले बांधी डागडुजी केली सर्वांस । बांधिलें नव्या जाहाजास ॥
|
| 252 |
+
जळीं सैनापती केले ज्यास भीती पोर्च्युग्यीस । शोभला हुद्दा भंडार्याीस ॥
|
| 253 |
+
विजापूरचा वजीर गुप्त लिही शिवाजीस । उभयतां आणलें एकीस ॥
|
| 254 |
+
व्यंकोजी पुत्रा घेई शाहाजी आला भेटीस । शिवाजी लागे चरणास ॥
|
| 255 |
+
शाहाजीचे सद्गुण गाया नाहीं आवकास । थोडेसे गाऊ अखेरीस ॥
|
| 256 |
+
सुखसोहळे झाले उपमा लाजे मनास । उणें स्वर्गी सुखास ॥
|
| 257 |
+
अपूर्व वस्तू घेऊन जाई विजापूरास । भेट मग देई यवनास ॥
|
| 258 |
+
पराक्रमी शिवाजी पाळी पाऊण लक्षास । साजे यवनी स्नेहास ॥
|
| 259 |
+
विजापूरचा स्नेह होता लढे मोगलास । घेतले बहूतां किल्ल्यास ॥
|
| 260 |
+
सर्व प्रांतीं लूट धुमाळी आणिलें जेरीस । घावरें केलें सर्वांस ॥
|
| 261 |
+
संतापानें मोंगल नेमी शाइस्तेखानास । जलदि केली घेई पुण्यास ॥
|
| 262 |
+
चाकणास जाऊन दावी भय फिङ्र्गोजीस । फुकट मागे किल्ल्यास ॥
|
| 263 |
+
मास दोन लढला घेऊन सर्व फौजेस । खान खाई मनास ॥
|
| 264 |
+
अखेर दारु घालून उडवी एका बुर्जास । वाट केली आंत जायास ॥
|
| 265 |
+
वारोंवार हल्ले गर्दी करुं पाहे प्रवेश । शाइस्ता पठाण पाठीस ॥
|
| 266 |
+
मागें पळति सर्व कोणी मानिना हुकूमास । भीति आंतल्या मर्दास ॥
|
| 267 |
+
लागोपाठ मार देत हटवि पठाणास । खचला खान हिंमतीस ॥
|
| 268 |
+
प्रातःकाळीं संतोषानें खाली केले किल्ल्यास । देई मुसलमानास ॥
|
| 269 |
+
फिङर्गोजीला भेट देती खुषी झाली यवनास । देऊन मान सोडी सर्वांस ॥
|
| 270 |
+
शिवाजीची भेट घेतां सन्मान दिला त्यास । वाढवी मोठया पदवीस ॥
|
| 271 |
+
फिड्र्गोजीचें नांव घेतां मनीं होतो उल्हास । पीढीजाद चाकरीस ॥
|
| 272 |
+
येशवंतशिंग आले घेऊन मोठया फौजेस । मदत शाईस्तेखानास ॥
|
| 273 |
+
सरनौबत भौती लुटी नगरी मुलखास । जाळून पाडिला ओस ॥
|
| 274 |
+
पाठी लागून मोंगल भारी त्याच्या स्वारांस । जखमा केल्या नेटाजीस ॥
|
| 275 |
+
राजगड सोडून राहीला सिंव्हगडास पाहून मोगलसेनेस ॥
|
| 276 |
+
जिजाबाईचें मुळचें घर होतें पुण्यास । खान राही तेथें वस्तीस ॥
|
| 277 |
+
मराठयांस चौकी बंदी गांवांत शिरण्यास । होता भीत शिवाजीस ॥
|
| 278 |
+
लग्नवर्हाचडी रुपें केला पुण्यांत प्रवेश । मावळे सोबत पंचवीस ॥
|
| 279 |
+
माडीवर जाऊन फोडी एका खिडकीस । कळालें घरांत स्त्रीयांस ॥
|
| 280 |
+
शाइस्त्यास कळतां दोर लावी कठडयास । लागला खालीं जायास ॥
|
| 281 |
+
शिवाजीनें जलदी गांठून वार केला त्यास । तोडीलें एका बोटास ॥
|
| 282 |
+
स्त्रिपुत्रां सोडून पळे पाठ दिली शत्रूस । भित्रा जपला जिवास ॥
|
| 283 |
+
आपल्या पाठिस देणें उणें शिपायगिरीस । उपमा नाहीं हिजडयास ॥
|
| 284 |
+
सर्व लोकांसहित मारिलें खानपुत्रास । परतला सिंहगडास ॥
|
| 285 |
+
डौलानें मोंगल भौती फिरवी तरवारीस । दावी भय शिवाजीस ॥
|
| 286 |
+
समीप येऊं दिले हुकूम सरबत्तीस । शत्रू पळाला भिऊन मारास ॥
|
| 287 |
+
करनाटकी बदली धाडी शाइस्तेखानास । मुख्य केलें माजमास ॥
|
| 288 |
+
राजापुरीं जाई शिवाजी जमवी फौजेस । दावी भय पोर्च्यूग्यास ॥
|
| 289 |
+
सर्व तयारी केली निघाला नाशिक तीर्थास । हुल कसी दिली सर्वांस ॥
|
| 290 |
+
मध्यरात्रीं घेई बरोबर थोडया स्वारांस । दाखल झाला सुर्तेस ॥
|
| 291 |
+
यथासांग साहा दिवस लुटी शहरास । सुखी मग गेला गडास ॥
|
| 292 |
+
बेदनूराहून पत्र आलें देई वाचायास । आपण बसे ऐकायास ॥
|
| 293 |
+
शिपायाचे बच्चे शाहाजी गेले शिकारीस । लागले हरणापाठीस ॥
|
| 294 |
+
घोडया ठेंच लागे उभयतां आले जमीनीस । शाहाजी मुकला प्राणास ॥
|
| 295 |
+
पती कैलासा गेले कळलें जिजीबाईस । पार मग नाहीं दुःखास ॥
|
| 296 |
+
भुमी धडपडे बैसे रडून गाई गुणांस । घेई पुढे शिवाजीस ॥
|
| 297 |
+
चाल
|
| 298 |
+
अतीरुपवान बहु आगळा । जैसा रेखला चित्री पूतळा ॥
|
| 299 |
+
सवतीवर लोटती बाळा । डाग लाविला कुणबी कुळा ॥
|
| 300 |
+
सवतीला कसें तरी टाळा । कज्जा काढला पती मोकळा ॥
|
| 301 |
+
खऱ्याा केंसानें कापि का गळा । नादीं लागला शब्द कोकिळा ॥
|
| 302 |
+
मूख दुर्बळ राही वेगळा । अती पिकला चिंतेचा मळ ॥
|
| 303 |
+
झाला शाहाजी होता सोहळा । मनीं भूलला पाहूनी चाळा ॥
|
| 304 |
+
बहुचका घेती जपमाळा । जाती देऊळा दाविती मोळा ॥
|
| 305 |
+
थाट चकपाक नाटकशाळा । होती कोमळा जशा निर्मळा ॥
|
| 306 |
+
खऱ्याा डंखिणी घाली वेटोळा । विषचुंबनीं देती गरळा ॥
|
| 307 |
+
झाला संसारीं अती घोटाळा । करी कंटाळा आठी कपाळा ॥
|
| 308 |
+
मनीं भिऊन पित्याच्या कुळा । पळ काढला गेले मातुळा ॥
|
| 309 |
+
छातीवर ठेवल्या शिळा । नाहीं रुचला सवत सोहळा ॥
|
| 310 |
+
चाल
|
| 311 |
+
कमानीवर । लावले तीर ॥
|
| 312 |
+
नेत्रकटार । मारी कठोर ॥
|
| 313 |
+
सवदागर । प्रीत व्यापार ॥
|
| 314 |
+
लावला घोर । सांगतें सार ॥
|
| 315 |
+
शिपाई शूर । जुना चाकर ॥
|
| 316 |
+
मोडक्या धीर । राखी नगर ॥
|
| 317 |
+
आमदानगर विजापूरकर ॥ मंत्री मुरार ॥
|
| 318 |
+
घेई विचार ॥ वेळनसार ।
|
| 319 |
+
देई उत्तर ॥ धूर्त चतुर ।
|
| 320 |
+
लढला फार ॥ छाती करार ॥
|
| 321 |
+
करी फीतूर ॥ गुणगंभीर ।
|
| 322 |
+
लाविला नीर ॥ होता लायक ।
|
| 323 |
+
पुंडनायक ॥ स्वामीसेवक ।
|
| 324 |
+
खरा भाविक ॥
|
| 325 |
+
चाल
|
| 326 |
+
सिंहगडावर गेला बेत केला क्रियेचा । बजावला धर्म पुत्राचा ॥
|
| 327 |
+
रायगडी जाई राही शोक करी पित्याचा । शत्रु होता आळसाचा ॥
|
| 328 |
+
दुःखामधीं सुरू बंदोबस्त करी राज्याचा । पवाडा गातो शिवाजीचा ॥
|
| 329 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा ॥ छत्रपती शिवाजीचा ॥५॥
|
| 330 |
+
चौक ६
|
| 331 |
+
सर्व तयारी केली राजपद जोडी नांवास । शिक्का सुरू मोर्तबास ॥
|
| 332 |
+
अमदानगरीं नटून पस्त केलें पेठेस । भौतीं औरंगाबादेस ॥
|
| 333 |
+
विजापूरची फौज करी बहुत आयास । घेई कोकणपट्टीस ॥सावध शिवाजी राजे आले घेऊन फौजेस । ठोकून घेई सर्वांस ॥
|
| 334 |
+
जळीं फौज लढे भौती मारी गलबतास । दरारा धाडी मक्केस ॥
|
| 335 |
+
माल्वणीं घेऊन गेला अवचित फौजेस । पुकारा घेतो मोगलास ॥
|
| 336 |
+
जाहाजावर चढवी फौज गेला गोव्यास । लुटलें बारशिलोरास ॥
|
| 337 |
+
जलदी जाऊन गोकर्णी घेई दर्शनास । लुटलें मोंगल पेठांस ॥
|
| 338 |
+
पायवाटेनें फौज पाठवी बाकी लुटीस । आज्ञा जावें रायगडास ॥
|
| 339 |
+
स्वतां खासी स्वारी आज्ञा लोटा जाहाजास । निघाला मुलखीं जायास ॥
|
| 340 |
+
मोठा वारा सुटला भ्याला नाहीं तुफानास । लागले अखेर कडेस ॥
|
| 341 |
+
औरंगजीब पाठवी राजा जयशिंगास । दुसरे दिलीरखानास ॥
|
| 342 |
+
ठेवले मोगल अमीर येऊन पुण्यास । वेढिलें बहुतां किल्ल्यांस ।
|
| 343 |
+
मानकरी शिवाजी घेई बसे मसलतीस । सुचेना कांहीं कोणास ॥
|
| 344 |
+
बाजी परभू भ्याला नाहीं दिलीरखानास । सोडिलें नाहीं धैर्यास ॥
|
| 345 |
+
हेटकरी मावळे शिपाइ होते दिमतीस । संभाळी पुरंधरास ॥
|
| 346 |
+
चातुर्यानें लढे गुंतवी मोगल फौजेस । फुरसत दिली शिवाजीस ॥
|
| 347 |
+
फार दिवस लोटले पेटला खान इर्षेस । भिडला किल्लया माचीस ॥
|
| 348 |
+
बुर्जाखालीं गेला लागे सुरंग पाडायास । योजी अखेर उपायास ॥
|
| 349 |
+
हेटकरी मावळे जाती छापे घालण्यास । पिडीलें फार मोगलास ॥
|
| 350 |
+
मोगलाने श्रम केले बेत नेला सिद्धीस । काबीज केलें माचीस ॥
|
| 351 |
+
यशस्वी भोसले लागले निर्भय लुटीस । चुकले सावधपणास ॥
|
| 352 |
+
हेटकर्यांसचा थाटनी मारी लुटार्यावस । मोगल हटले नेटास ॥
|
| 353 |
+
बाजी मावळ्यां जमवी हातीं घेई खांडयास । भिडून मारी मोगलास ॥
|
| 354 |
+
मोगल पळ काढी पाठ दिली मावळ्यास । मर्द पहा भ्याले उंद्रास ॥
|
| 355 |
+
लाजे मनीं दिलीरखान जमवी फौजेस । धीर काय देई पठाणास ॥
|
| 356 |
+
सर्व तयारी पुन्हा केली परत हल्ल्यास । जाऊन भिडला मावळ्यास ॥
|
| 357 |
+
बाजी मार देई पठाण खचले हिमतीस । हटती पाहून मर्दास ॥
|
| 358 |
+
पराक्रम बाजीचा पाही खान खोच मनास । लावीला तीर कमानीस ॥
|
| 359 |
+
नेमानें तीर मारी मुख्य बाजी परभूस । पाडिला गबरु धरणीस ॥
|
| 360 |
+
सय्यद बाजी ताजीम देती घेती बाजूस । सरले बालेकिल्ल्यास ॥
|
| 361 |
+
मोगल चढ करती पुन्हा घेती माचीस । धमकी देती मावळ्यास ॥
|
| 362 |
+
हेटकरी मारी गोळी फेर हटवि शत्रूस । पळवी इशानी कोणास ॥
|
| 363 |
+
वज्रगडाला शिडी लाविली आहे बाजूस । वरती चढवी तोफांस ॥
|
| 364 |
+
चढला मोगल मारी गोळे बालेकिल्ल्यास । आणले बहू खराबीस ॥
|
| 365 |
+
हेटकरी मावळे भ्याले नाहीं भडिमारास । मोगल भ्याला पाऊसास ॥
|
| 366 |
+
मोगल सल्ला करी शिवाजी नेती मदतीस । घेती यवनी मुलखास ॥
|
| 367 |
+
कुलद्रोही औरंगजीब योजी कपटास । पाठवि थैली शिवाजीस ॥
|
| 368 |
+
शिवाजीला वचन देऊन नेई दिल्लीस । नजरकैद करी त्यास ॥
|
| 369 |
+
धाडी परत सर्व मावळे घोडेस्वारांस । ठेविले जवळ पुत्रास ॥
|
| 370 |
+
दरबार्यांस घरीं जाई देई रत्नव भेटीस । जोडिला स्नेह सर्वांस ॥
|
| 371 |
+
दुखणें बाहाणा करी पैसा भरी हकीमास । गूल पहा औरंगजीबास ॥
|
| 372 |
+
आराम करून दावी शुरु दानधर्मास । देई खाने फकीरास ॥
|
| 373 |
+
मोठे टोकरे रोट भरी धाडी मशीदीस । जसा का मुकला जगास ॥
|
| 374 |
+
दानशूर बनला हटवि हातिमताईस । चुकेना नित्यनेमास ॥
|
| 375 |
+
औरंगजीबा भूल पडली पाहून वृत्तीस । विसरला नीट जप्तीस ॥
|
| 376 |
+
निरास कैदी झाला शिवाजी भास मोगलास । चढला मोठया दिमाखास ॥
|
| 377 |
+
पितापुत्र निजती टोकरी बदली रोटास । बाकी सोपी चाकरास ॥
|
| 378 |
+
जलदी करीती चाकर नेती टोकरास । करामत केली रात्रीस ॥
|
| 379 |
+
दिल्ली बाहेर गेले खुलें केले शिवाजीस । नेली युक्ती सिद्धीस ॥
|
| 380 |
+
मोगल सकाळीं विचकी दांत खाई होटांस । लावी पाठी माजमास ॥
|
| 381 |
+
चाल
|
| 382 |
+
औरंगजीबा धूर दीला । पुत्रासवें घोडा चढला ॥
|
| 383 |
+
मधींच ठेवी पुत्राला । स्वतां गोसावी नटला ॥
|
| 384 |
+
रात्रिचा दिवस केला । गाठलें रायगडाला ॥
|
| 385 |
+
माते चरणीं लागला । हळूच फोडी शत्रूला ॥
|
| 386 |
+
स्नेह मोगलाचा केला । दरारा देई सर्वांला ॥
|
| 387 |
+
चाल
|
| 388 |
+
हैद्राबादकर । विजापूरकर ॥
|
| 389 |
+
कापे थरथर । देती कारभार ॥
|
| 390 |
+
भरी कचेरी । बसे विचारी ॥
|
| 391 |
+
कायदे करी । निट लष्करी ॥
|
| 392 |
+
चाल
|
| 393 |
+
शिवाजीचा बेत पाहून जागा झाला गोव्याचा । बंदोबस्त केला किल्ल्याचा ॥
|
| 394 |
+
वेढा घालून जेर केला ���िद्दी जंजिर्याचचा । पवाडा गाती शिवाजीचा ॥
|
| 395 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा । छत्रपती शिवाजीचा ॥६॥
|
| 396 |
+
चौक ७
|
| 397 |
+
शिवाजी तों मसलत देई मित्र तान्हाजीला । बेत छाप्याचा सुचवीला ॥
|
| 398 |
+
तान्हाजीनें भाऊ धाकटा सोबत घेतला । मावळी हजार फौजेला ॥
|
| 399 |
+
सुन्या रात्रीं सिंहगड पायीं जाऊन ठेपला । योजिलें दोर शिडीला ॥
|
| 400 |
+
दोरीची शिडी बांधली शिपाई कमरेला । हळुच वर चढवीला ॥
|
| 401 |
+
थोडी चाहूल कळली सावध उदेबानाला । करी तयार लोकांला ॥
|
| 402 |
+
थोडया लोकांसवें तान्हाजी त्यांवर पडला । घाबरा गडकरी केला ॥
|
| 403 |
+
रणीं तान्हाजी पडे मावळे पळती बाजूला । सूर्याजी येऊन ठेपला ॥
|
| 404 |
+
धीर मोडक्या देई परत नेई सर्वांला । उगवी बंधू सूडाला ॥
|
| 405 |
+
उदेबान मारिला बाकिच्या राजपुत्राला । घेतलें सिंहगडाला ॥
|
| 406 |
+
गड हाती लागला तान्हाजी बळी घेतला । झालें दुःख शिवाजीला ॥
|
| 407 |
+
सिंहगडीं मुख्य केलें धाकटया सुर्याजीला । रुप्याचीं कडीं मावळ्याला ॥
|
| 408 |
+
पुरंधर माहूली घेई वरकड किल्ल्याला ॥ पिडा जंजिरी सिद्दयाला ॥
|
| 409 |
+
सुरत पुन्हां लुटी मार्गी झाडी मोगलाला । मोगल जेरदस्त केला ॥
|
| 410 |
+
कैद करी शिवाजी बाकी उरल्या फौजेला । त्यांमधीं अनेक स्त्रीयाला ॥
|
| 411 |
+
सुंदर स्त्रीया परत पाठवी नाहीं भाळला । लाजवी औरंगजीबाला ॥
|
| 412 |
+
सरनौबत वीर पाठवी खानदेशाला । शुरु केलें चौथाईला ॥
|
| 413 |
+
जलदी मोगल धाडी मोहबतखानाला । देई मोठया फौजेला ॥
|
| 414 |
+
औंढापट्टा घेऊन वेढी साल्हेर किल्ल्याला । धिंगाणा दक्षिणेंत केला ॥
|
| 415 |
+
गुजर उडी घाली सामना शत्रूचा केला । मोरोबा पठाण पंक्तीला ॥
|
| 416 |
+
लढतां पळ काढी दावी भ्याला मोगलाला । जसा खरा मोड झाला ॥
|
| 417 |
+
तों मराठे पळती मोगल गर्वानें फुगला । आळसानें ढिला पडला ॥
|
| 418 |
+
गुजर संधी पाहून परत मुरडला । चुराडा मोगलाचा केला ॥
|
| 419 |
+
बेवीस उमराव पाडले रणभूमीला । नाहीं गणती शिपायांला ॥
|
| 420 |
+
लहान मोठे कैदी बाकी सर्व जखम्यांला । पाठवी रायगडाला ॥
|
| 421 |
+
मोगल वेढा झोडून मार देत पिटीला । खिदाडी औरंगाबादेला ॥रायगडीं नित्य शिवाजी घेई खबरेला । गोडबोल्या गोवी ममतेला ॥
|
| 422 |
+
एकसारखें औषधपाणी देई सर्वांला । निवडलें नाहीं शत्रुला ॥
|
| 423 |
+
जखमा बऱ्याष होतां खुलासा सर्वांचा केला । राहिले ठेवी चाकरीला शिवाजीची कीर्ती चौमुलखीं डंका वाजला ।
|
| 424 |
+
शिवाजी धनी आवडला ॥ मोगल यवनी शिपायी सोडी चाकरीला ।
|
| 425 |
+
हाजरी देती शिवाजीला ॥ पोर्च्युग्यास धमकी देई मागे खंडणीला ।
|
| 426 |
+
बंदरी किल्ला वेढीला ॥ मधींच इंग्रज भ्याला जपे मुंबै किल्ल्याला ।
|
| 427 |
+
बनया ��र्मा आड झाला ॥ दिल्लीस परत नेलें सुलतान माजूमाला ।
|
| 428 |
+
दुजें मोहबतखानाला ॥ उभयतांचा बदली खानजाहान आला ।
|
| 429 |
+
मुख्य दक्षणेचा केला ॥ मोगलाला धूर देऊन लुटलें मुलखाला ।
|
| 430 |
+
गोवळकुंडीं उगवला ॥ मोठी खंडणी घेई धाकीं धरी निजामाला ।
|
| 431 |
+
सुखें मग रायगडीं गेला ॥ मोगलाचे मुलखीं धाडी स्वार लुटायाला ।
|
| 432 |
+
लुटलें हुबळी शहराला ॥ समुद्रकांठीं गावें लुटी घेई जाहाजांला ।
|
| 433 |
+
केलें खुलें देसाईला ॥ परळी सातारा किल्ले घेई पांडवगडाला ।
|
| 434 |
+
आणिक चार किल्ल्यांला ॥
|
| 435 |
+
चाल
|
| 436 |
+
हुकूम विजापुरी झाला । सोडिलें बहुत फौजेला ॥
|
| 437 |
+
द्यावा त्रास शिवाजीला । घ्यावें त्याचे मुलखाला ॥
|
| 438 |
+
शिवाजी सोदी गुजराला । कोंडी आबदुल करीमाला ॥
|
| 439 |
+
केला माहग दाण्याला । शत्रु अती जेर केला ॥
|
| 440 |
+
आर्जव करणें शिकला । भोंदिलें सैनापतीला ॥
|
| 441 |
+
निघून विजापुरीं गेला । क्रोध शिवाजीस आला ॥
|
| 442 |
+
रागावून लिहिलें पत्राला । निषेधी प्रतापरावाला ॥
|
| 443 |
+
गुजर मनांत लाजला । निघून वराडांत गेला ॥
|
| 444 |
+
चाल
|
| 445 |
+
आबदुल्यानें । बेशर्म्यानें ॥
|
| 446 |
+
फौज घेऊन । आला निघून ॥
|
| 447 |
+
रावा प्रताप । झाला संताप ॥
|
| 448 |
+
आला घाईनें । गांठी बेतानें ॥
|
| 449 |
+
घुसे स्वतानें । लढे त्वेषानें ॥
|
| 450 |
+
घेई घालून । गेला मरून ॥
|
| 451 |
+
चाल
|
| 452 |
+
प्रतापराव पडतां मोड फौजेचा झाला । पाठलाग मराठयाचा केला ॥
|
| 453 |
+
तोफ गोळया पोटीं दडती भिडती पन्हाळयाला । गेले नाहीं शरण शत्रूला ॥
|
| 454 |
+
अकस्मात हंसाजी मोहिता प्रसंगीं आला । हल्ला शत्रूवर केला ॥
|
| 455 |
+
गुजर दल मागें फिरून मारी यवनाला । पळीवलें विजापुराला ॥
|
| 456 |
+
शिवाजीनें हंसाजीला सरनौबत केला । मोठा अधिकार दिला ॥
|
| 457 |
+
हंबिरराव पद जोडलें त्याच्या नांवाला । शिवाजी मनीं सुखी झाला ॥
|
| 458 |
+
सेनापतीचे गुण मागें नाहीं विसरला । पोशी सर्व कुटुंबाला ॥
|
| 459 |
+
प्रतापराव-कन्या सून केली आपल्याला । व्याही केलें गुजराला ॥
|
| 460 |
+
काशीकर गंगाभट घाली डौल धर्माचा । केला खेळ गारुडयाचा ॥
|
| 461 |
+
लुटारु शिवाजी सुटला धाक गृह फौजेचा । खर्च नको दारुगोळीचा ॥
|
| 462 |
+
बहुरुपी सोंग तूलदान सोनें घेण्याचा । पवाडा गातो शिवाजीचा ॥
|
| 463 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा । छत्रपती शिवाजीचा ॥७॥
|
| 464 |
+
चौक ८
|
| 465 |
+
विश्वासू चाकर नेमी मुलखीं लुटायाला । शिवाजी कोकणांत गेला ॥
|
| 466 |
+
छोटे मोठे गड घेई बांधी नव्या किल्ल्याला । जमाव फौजेचा केला ।
|
| 467 |
+
गोवळकुंडीं जाई मागुन घेई तोफांला । फितीवलें कसें निजामाला ॥
|
| 468 |
+
करनाटकीं गेला भेटे सावत्र भावाला । वाटणी मागे व्यंकोजीला ॥
|
| 469 |
+
लोभीं व्यंकोजी हिस्सा देईना बळासी आला । आशेनें फिरवी पगडीला ॥
|
| 470 |
+
बंधू आज्ञा मोडून गर्वानें हट्टीं पेटला । बिर्हाेडीं रागावून गेला ॥
|
| 471 |
+
शिवाजीला राग आला कोट छातीचा केला । कैदी नाहीं केलें भावाला ॥
|
| 472 |
+
तंजोर बाकी ठेवी घेई सर्व मुलखाला । खडा कानाला लावला ॥
|
| 473 |
+
दासीपुत्र संताजी बंधु होता शिवाजीला । करनाटकीं मुख्य केला ॥
|
| 474 |
+
हंबीरराव सेनापती हाताखालीं दिला । निघाला परत मुलखाला ॥
|
| 475 |
+
वाटेमधी लढून घेई बिलरी किल्ल्याला । तेथें ठेवी सुमंताला ॥
|
| 476 |
+
शिवाजीचे मागें व्यंकोजीने छापा घातला । घेतलें स्वतां अपेशाला ॥
|
| 477 |
+
जेर झाला व्यंकोजी देई उरल्या हिश्याला । शिवाजी रायगडीं गेला ॥
|
| 478 |
+
विजापूरचा साह्य नेई राजे शिवाजीला । मोगल मुलखीं सोडला ॥
|
| 479 |
+
मुलखीं धिंगाणा धुळीस देश मिळीवला । सोडिलें नाहीं पिराला ॥
|
| 480 |
+
वाटेमधीं मोगल गांठी राजे शिवाजीला । घाबरा अतिशय केला ॥
|
| 481 |
+
भिडला शिवाजी मोगल मागें हाटीवला । वाट पुढें चालूं लागला ॥
|
| 482 |
+
दुसरी फौज आडवी माहाराज राजाला । थोडेसें तोंड दिलें तिजला ॥
|
| 483 |
+
काळ्या रात्रीं हळुच सुधरी आडमार्गाला । धूळ नाहीं दिसली शत्रूला ॥
|
| 484 |
+
फौजसुद्धां पोंहचला पटा किल्ल्याला । फसिवलें आयदि मोगलाला ॥
|
| 485 |
+
विजापूरचा आर्जव करी धाडी थैलीला । आश्रय मागे शिवाजीला ॥
|
| 486 |
+
हांबीरराव मदत पाठवी विजापुराला । बरोबर देई फौजेला ॥
|
| 487 |
+
नऊ हजार मोंगलांचा पराभव केला । त्यांनीं मार्ग अडीवला ॥
|
| 488 |
+
विजापुरीं जाऊन जेर केलें मोंगलाला । केला महाग दाण्याला ॥
|
| 489 |
+
शत्रूला पिडा होतां त्रासून वेढा काढला । मोगल भिऊन पळाला ॥
|
| 490 |
+
दिल्लीचा परत बोलवी दिलीरखानाला । पाठवी शाहाजाहानाला ॥
|
| 491 |
+
जलदी करून शिवाजी वळवी पुत्राला । लाविला नीट मार्गाला ॥
|
| 492 |
+
तह करून शिवाजी नेती विजापुरला । यवन घेती मसलतीला ॥
|
| 493 |
+
शिवाजीचें सोंवळें रुचले नाहीं भावाला । व्यंकोजी मनीं दचकला ॥
|
| 494 |
+
निरास मनीं होऊन त्यागी सर्व कामाला । निरा संन्यासी बनला ॥
|
| 495 |
+
शिवाजीने पत्र लिहिलें बधुं व्यंकोजीला । लिहितों पत्र अर्थाला ॥
|
| 496 |
+
वीरपुत्र म्हणवितां गोसावीअ कसे बनलां । हिरा कां भ्याला कसाला ॥
|
| 497 |
+
आपल्या पित्याचा ठसा कसा जलदी वीटला । मळावांचून काटला ॥
|
| 498 |
+
कनिष्ठ बंधू माझ्या लाडक्या पाठी साह्याला । तुम्ही कां मजवर रुसला ॥
|
| 499 |
+
बोध घ्या तुम्ही माझा लागा प्रजापालनाला । त्यागा ढोंगधतोर्यारला ॥
|
| 500 |
+
मन उत्तम कामीं जपा आपल्या फौजेला । संभाळा मुळ आब्रूला ॥
|
| 501 |
+
कीर्ति तुझी ऐकूं यावी ध्यास माझ्या मनाला । नित्य जपतों या जपाला ।
|
| 502 |
+
कमी पडता तुम्ही कळव�� माझ्या लोकांला । सोडा मनच्या आढीला ॥
|
| 503 |
+
सुभोधाचें पत्र ऐकता शुद्धीवर आला । व्यंकोजी लागे कामाला ॥
|
| 504 |
+
शिवाजीला रायगडीं गुडघी रोग झाला । रोगानें अती जेर केला ॥
|
| 505 |
+
त्याचे योगें नष्ट ज्वर फारच खवळला । शिवाजी सोसी दुःखाला ॥
|
| 506 |
+
यवनीं बिरास भिडतां नाहीं कुचमला । शिवाजी रोगाला भ्याला ॥
|
| 507 |
+
सतत सहा दिवस सोसी ताप दाहाला । नाहीं जरा बरळला ॥
|
| 508 |
+
सातव्या दिवशीं शिवाजी करी तयारीला । एकटा पुढें आपण झाला ॥
|
| 509 |
+
काळाला हूल देऊन स्वतां गेला स्वर्गाला । पडले सुख यवनाला ॥
|
| 510 |
+
कुळवाडी मनीं खचले करती शोकाला । रडून गाती गुणांला ॥
|
| 511 |
+
चाल
|
| 512 |
+
महाराज आम्हासीं बोला । धरला कां तुम्ही अबोला ॥
|
| 513 |
+
मावळे गडी सोबतीला । शिपाई केले उघडयाला ॥
|
| 514 |
+
सोसिलें उन्हातान्हाला । भ्याला नाहीं पाउसाला ॥
|
| 515 |
+
डोंगर कंगर फिरलां । यवन जेरीस आणला ॥
|
| 516 |
+
लुटलें बहुत देशांला । वाढवी आपुल्या जातीला ॥
|
| 517 |
+
लढवी अचाट बुद्धीला । आचंबा भुमीवर केला ॥
|
| 518 |
+
बाळगी जरी संपत्तीला । तरी बेताने खर्च केला ॥
|
| 519 |
+
वांटणी देई शिपायांला । लोभ द्रव्याचा नाहीं केला ॥
|
| 520 |
+
चतुर सावधपणाला । सोडिलें आधीं आळसाला ॥
|
| 521 |
+
लहान मोठया पागेला । नाहीं कधीं विसरला ॥
|
| 522 |
+
राजा क्षेत्र्यांमध्यें पहिला । नाहीं दुसरा उपमेला ॥
|
| 523 |
+
कमी नाहीं कारस्तानीला । हळूच वळवी लोकांला ॥
|
| 524 |
+
युक्तीहनें बचवी जीवाला । कधीं भिईना संकटाला ॥
|
| 525 |
+
चोरघस्ती घेईअ किल्ल्याला । तसेंच बाकी मुलखांला ॥
|
| 526 |
+
पहिला झटे फितुराला । आखेर करी लढाईला ॥
|
| 527 |
+
युद्धीं नाहीं विसरला । लावी जीव रयतेला ॥
|
| 528 |
+
टळेना रयत सुखाला । बनवी नव्या कायद्याला ॥
|
| 529 |
+
दाद घेईअ लहानसानाची । हयगय नव्हती कोणाची ।
|
| 530 |
+
आकृती वामनमुर्तीची । बळापेक्षां चपळाईची ॥
|
| 531 |
+
सुरेख ठेवण चेहऱ्याची । कोंदली मुद्रा गुणरत्नालची ॥
|
| 532 |
+
चाल
|
| 533 |
+
भिडस्त भारी । साबडा घरीं ॥
|
| 534 |
+
प्रिय मधुरी । भाषण करी ॥
|
| 535 |
+
मोठा विचारी । वर्चड करी ॥
|
| 536 |
+
झटून भारी । कल्याण करी ॥
|
| 537 |
+
आपासोयरीं। ठेवी पदरीं ॥
|
| 538 |
+
लाडावरी । रागावे भारी ॥
|
| 539 |
+
चाल
|
| 540 |
+
इंग्लिश ज्ञान होतां म्हणे मी पुत्र क्षेत्र्याचा । उडवी फट्टा ब्रह्मयाचा ॥
|
| 541 |
+
जोतीराव फुल्यानें गाईला पुत क्षुद्राचा । मुख्य धनी पेशव्याचा ॥
|
| 542 |
+
जिजीबाईचा बाळ काळ झाला यवनाचा । पवाडा गातो शिवाजीचा ॥
|
| 543 |
+
कुळवाडी-भूषण पवाडा गातो भोसल्याचा । छत्रपती शिवाजीचा ॥८॥
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_10213.txt
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| 1 |
+
छिंदवाडा लोकसभा मतदारसंघ भारताच्या मध्य प्रदेश राज्यातील मतदारसंघ आहे.
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| 1 |
+
छिन षी ह्वांग (देवनागरी लेखनभेद: छिन ष ह्वांग, छिन्-ष हुआंग, च्हिन ष हुआंग ; नवी चिनी चित्रलिपी: 秦始皇; जुनी चिनी चित्रलिपी: 秦始皇; फीनयीन: Qín Shǐ Huáng; उच्चार: छिन्-षऽ-हुआऽऽङ्ग) (इ.स.पू. २५९ - सप्टेंबर १०, इ.स.पू. २१०) हा छिन् राज्याचा राजा, एकीकृत चिनाचा पहिला सम्राट, छिन् राजवंशाचा आणि पहिल्या चिनी साम्राज्याचा संस्थापक होता.
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_10254.txt
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| 1 |
+
छोटा हत्ती भारतातील बऱ्याच भागात वापरले जाणारे एक प्रकारचे मालवाहू वाहन आहे. याचे उत्पादक व अधिकृत नाव छोटा हत्ती नसले तरी या प्रकारच्या वाहनांच्या आकार आणि भारवहनक्षमतेमुळे त्यांना हे नाव दिले गेले आहे. महाराष्ट्रात याला छोटा हत्ती असे म्हणतात.
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_10258.txt
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| 1 |
+
छोटाधानपूर हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नंदुरबार जिल्ह्यातील तळोदा तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
+
येथील हवामान सामान्यतः गरम आणि कोरडे आहे. येथे उन्हाळा, पावसाळा,आणि हिवाळा असे तीन वेगवेगळे ऋतू आहेत. उन्हाळा मार्चपासून चालू होऊन जूनमध्यापर्यंत असतो.उन्हाळा गरम आणि कोरडा असतो.मे महिन्यात तापमान फार असते.तापमान ४३ अंश सेल्सियसपर्यंत जाते.जूनच्या मध्यास किंवा अखेरीस पावसाळा सुरू होतो.पावसाळी हंगामात हवामान सामान्यतः आर्द्र आणि गरम असते.वार्षिक पर्जन्यमान ७४० मि.मी.पर्यंत असते.हिवाळी मोसम नोव्हेंबरपासून साधारण फेब्रुवारीपर्यंत असतो.हिवाळा सौम्य थंड आणि कोरडा असतो.
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| 1 |
+
जंक्शन हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील पुणे जिल्ह्यातील इंदापूर तालुक्यातील एक गाव आहे.
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| 2 |
+
येथील सर्वसाधारण हवामान उष्ण व कोरडे आहे. हवामानातील बदलानुसार प्रत्येक वर्षात मुख्यतः तीन ऋतू असतात.मार्च ते मे पर्यंत उन्हाळा, जून ते ऑक्टोबर पर्यंत पावसाळा आणि नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी पर्यंत हिवाळा असतो. तालुक्यातील वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान ४६० मिमी पर्यंत असते.
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| 1 |
+
जंगली लावा, गेरजा, किंवा बेरडा लावा (इंग्रजी: Jungle Bush-quail) हा एक पक्षी आहे.
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| 2 |
+
हा पक्षी आकाराने मोठ्या लाव्या पेक्षा लहान असून वरून पिगट तपकिरी रंगाचा असतो. त्यावर काळ्या व बदामी रंगाचे ठिपके व पट्टे असतात. ते थव्याने जमिनीवर आढळतात .
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| 3 |
+
हा पक्षी भारतात गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओरिसा, कर्नाटक आणि उत्तर आंध्र प्रदेशात आढळतो.
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| 4 |
+
जॉन लॅथम यांनी १७९० मध्ये "महारट्टा प्रदेश" मधील नमुन्यांच्या आधारे जंगली लव्याचा Perdix asiatica (पर्डिक्स एशियाटिका) असे वर्णन केले होते.[१] १८३७ मध्ये ब्रायन हॉजसन यांनी हे Perdicula (पर्डिक्युला) या वंशात हलवले.[२] Perdicula हे वंशीय नाव Perdix या वंशाचे लॅटिन अल्पार्थवाचक शब्द आहे आणि त्याचा अर्थ "छोटा तीतर" आहे. asiatica हे नाव लॅटिन asiaticus मधून आले आहे आणि त्याचा अर्थ "आशियाई" आहे.[३] ह्याचे मराठीत नाव जंगली लावा आहे आणि इंग्रजीत नाव "jungle bush quail" (जंगल बुश क्वेल) आहे.[४]
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| 5 |
+
गवताळ आणि झुडपी जंगले तसेच दुय्यम दर्जाची पानगळीची वने .डोंगराळ भागात १२५० मिटर उंचीपर्यंत असते .
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@@ -0,0 +1 @@
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| 1 |
+
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_10451.txt
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@@ -0,0 +1 @@
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| 1 |
+
जगन्नाथ मिश्रा (जन्म : बिहार, १९३७; - १९ ऑगस्ट २०१९)हे बिहारचे एकेकाळचे मुख्यमंत्री होते. त्यांनी आपल्या आयुष्यात तीन वेळा मुख्यमंत्रिपद उपभोगले. १९७५मध्ये पहिल्यांदा, १९८० मध्ये दुसऱ्यांदा आणि १९८९मध्ये तिसऱ्यांदा. १९९०मध्ये केंद्र सरकारमध्ये मंत्रिपद मिळाल्यानंतर त्यांनी बिहार सोडले.
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@@ -0,0 +1,12 @@
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| 1 |
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मजकुर वगळणे किंवा त्याचे विकिकरण करणे प्रस्तावित आहे. हा साचा एखाद्या लेखात आढळल्यास, लवकरात लवकर सदरहू जाहिरात काढून टाकावी अथवा मजकुरात सुधारणा करावी आणि नंतर {{जाहिरात}} हा साचा लेखातून काढून टाकावा.
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| 2 |
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हा प्रतिबंधन संकेत केवळ हितसंबधा बद्दल आहे;एखाद्या लेख विषयाबद्दल व्यक्तिगत आत्मियता सहानुभूतीपूर्ण दृष्टीकोण (पूर्वग्रहीत नव्हे) असलेल्या विषयांवर तटस्थ लेखन करण्याच्या आड येत नाही.
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तसेच आपल्या लेखनाचे संदर्भ विकिपीडियात इतरांना सहज घेण्याजोगे करण्या करिता आपण स्वतःचे काही लेखन/छायाचित्रे प्रताधिकार मुक्त करू इच्छित असल्यास आपण तसे आपल्या संकेतस्थळावर उद्घोषित करून विकिपीडिया:कायदा आणि प्रताधिकारमुक्ती प्रकल्प येथे तशी नोंद करून ठेवण्याचे स्वागत आहे.
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सर्वप्रथम, मराठी विकिपीडियावरील तुमच्या अलीकडील योगदानाबद्दल धन्यवाद. मराठी विकिपीडियावर सर्व विषयांतील तज्ज्ञ आणि जाणकारांच्या संपादनांचे स्वागतच आहे.
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वर नमुद केल्या प्रमाणे मराठी विकिपीडिया एक विश्वकोश आहे, त्यातील माहिती निष्पक्षता विश्वासार्हता आणि दर्जा जपण्याच्या दृष्टीने, जाहिरातसदृष्य मजकुर असणे,विशीष्ट वस्तुंच्या किमती नमूद करणे, कोणत्याही अव्यावसायिक किंवा व्यावसायिक, व्यक्तिगत किंवा संस्थात्मक प्रचाराचे, प्रबोधनाचे, वकिलीचे, जाहिरातीचे किंवा फायद्याच्या दृष्टीने प्रत्यक्ष किंवा अप्रत्यक्ष माहिती देण्याचे प्रयत्न करणे हे विकिपीडियाच्या उद्देश व आधारस्तंभ यांस सुसंगत ठरत नाही. अर्थात संबधित ज्ञानकोशीय उल्लेखनीयता असलेल्या माहितीची संदर्भासहीत तर्कसुसंगत योग्य नोंद घेण्याच्या आड हे धोरण नाही.
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मराठी विकिपीडिया हा एक विश्वकोश आहे. जाहिरातसदृष्य अथवा प्रचाराचे, प्रबोधनपर, वकिली (भलावण या अर्थाने), जाहिरात किंवा फायद्याच्या दृष्टीने (प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्ष दोन्हीही) सहभाग टाळावा असा विकिपीडिया लेखन संकेत आहे. जाहीरात, प्रचार,प्रबोधन, भलावण करण्यासाठी लेखात/हे पानात किंवा विभागात, सपांदने केल्यास अथवा जाणीवपूर्वक करवून घेतल्यास औचित्यभंग होऊन मराठी विकिपीडिया विश्वकोशिय विश्वासार्हतेस तडा जाण्याची शक्यता असते. असा औचित्यभंग झालेला आढळल्यास प्रचारकाचे प्रसिद्धी मिळण्याचे ध्येय बाजूस राहून विकिपीडियाच�� गैर उपयोग केल्याचा ठपका येऊन पत ढासळू शकते हेही लक्षात घ्यावे.
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निनावी अथवा वेगवेगळ्या नावांनी केलेला औचित्यभंग लक्षात येतो का ? जाणीवपुर्वक झालेले प्रचार-औचित्यभंग सरावलेलेल्या ज्ञानकोशीय संपादकांना बऱ्याच अंशी लक्षात येतात. शिवाय लेखन विषयक औचित्य पाळले न गेलेले लेखन वारंवार झाल्यास त्यास उत्पात (spam) समजून असे लेखन/लेख इतर विकिपीडिया संपादकांकडून वगळले जाण्याची शक्यता असते.
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विकिपीडियाचा परीघ, आवाका आणि मर्यादांशी अद्याप आपण परिचित नसल्यास त्याबद्दल येथे माहिती घ्या. नवीन सदस्यांकडून होणार्या सर्वसाधारण संपादन चुकांवर एकदा नजर घाला.
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आपल्या सहकार्या बद्दल धन्यवाद !
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कृपया या संबंधीची चर्चा, या लेखाचे चर्चापानावर पहावी.
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जगशांती प्रकाशन सांगली
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प्रकाशक - तानाजीराव ज. जाधव
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खुर्रम शहजाद (जन्म २५ नोव्हेंबर १९९९) हा एक पाकिस्तानी आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेळाडू आहे जो उजव्या हाताचा मध्यम-वेगवान गोलंदाज म्हणून खेळतो.[१]
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जगातील सात आश्चर्ये ही पृथ्वीवरील अद्भुत (व काही अंशी काल्पनिक) अशा नैसर्गिक किंवा बांधल्या गेलेल्या ठिकाणे/वास्तू ह्यांची यादी आहे. संपूर्ण इतिहासात, अशा विविध आश्चर्यांची यादी तयार केली गेली आहे आणि लोकांनी ती स्वीकारली आहे. खाली अशा विविध याद्यांचा सारांश आहे.
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पुरातन काळातील सात आश्चर्ये मध्ये खालील आश्चर्यांचा समावेश होतो. ही यादी ग्रीक इतिहासकार हिरोडोटस आणि विद्वान कॅलिमाचस यांनी बनवली होती.[१]
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याशिवाय, संपूर्ण मध्य युगात, इतर विविध ठिकाणे देखील जगातील आश्चर्य मानली जात होती.[२][३][४]
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अमेरिकन सोसायटी ऑफ सिव्हिल इंजिनिअर्सने १९९४ मध्ये मानवनिर्मित बांधकामांचे सात आश्चर्ये जाहिर केले.[५][६]
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नोव्हेंबर २००६ मध्ये, अमेरिकन वृत्तपत्र "यूएसए टुडे" ने नवीन सात आश्चर्ये प्रकाशित केली. यात नैसर्गिक आश्चर्ये आणि मानवनिर्मित आश्चर्ये दोन्ही समाविष्ट होते. लोकांच्या आग्रहास्तव ह्या यादीत ग्रँड कॅनियनचा समावेश करण्यात आला.[७][८]
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१९९७ मध्ये सीएनएनने जगातील सात नैसर्गिक आश्चर्यांची यादी संकलित केली.[९]
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२००१ मध्ये, स्विस कॉर्पोरेशन न्यू७ वंडर्स फाऊंडेशनने ऑनलाइन मतांद्वारे २०० विद्यमान स्मारकांमधून जगातील नवीन सात आश्चर्ये निवडण्यासाठी एक उपक्रम सुरू केला. त्यानंतर त्यांनी अनेक असे "नवीन सात निसर्गाचे आश्चर्य" (२००७-११) आणि "नवीन सात आश्चर्य शहरे" (२०११-१४) चे देखील आयोजन केले.
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२००७ साली जगभर झालेल्या मतदानातून खालील सात आधुनिक आश्चर्यांची निवड करण्यात आली.[१०][११][१२]
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समुद्र संरक्षण आणि संशोधनासाठी समर्पित असलेल्या डायव्हर्ससाठी अमेरिकन-आधारित गट, CEDAMने "पाण्याखालील जगाची सात आश्चर्यांची" यादी तयार केली आहे. १९८९ मध्ये, CEDAM ने युजेनी क्लार्कसह सागरी शास्त्रज्ञांचे एक पॅनल एकत्र आणले व संरक्षणासाठी योग्य वाटतील अशी पाण्याखालील क्षेत्रे निवडली.[१३]
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ब्रिटिश लेखिका डेबोरा कॅडबरी यांनी औद्योगिक जगाचे सात आश्चर्य लिहिले, हे पुस्तक १९ व्या आणि २० व्या शतकाच्या सुरुवातीच्या अभियांत्रिकीच्या सात महान पराक्रमांच्या कथा सांगणारे पुस्तक आहे. २००३ मध्ये, बीबीसीने सात भागांचा माहितीपट प्रसारित ज्याच्या निर्माता कॅडबरी होत्या.[१४][१५]
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१९९९ च्या एका लेखात, खगोलशास्त्र या अमेरिकन मासिकाने "सूर्यमालेचे सात आश्चर्य" सूचीबद्ध केले.[१६]
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जग्गय्यपेट विधानसभा मतदारसंघ - ८४ हा आंध्र प्रदेश राज्य विधानसभेच्या १७५ मतदारसंघांपैकी एक आहे. परिसीमन आदेश, १९५१ नुसार, हा मतदारसंघ १९५१ साली स्थापन केला गेला. जग्गय्यपेट हा विधानसभा मतदारसंघ विजयवाडा लोकसभा मतदारसंघात मोडतो.
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जदुनाथ सरकार (१० डिसेंबर १८७० - १९ मे १९५८) हे एक बंगाली इतिहासकार होते. त्यांची शिवाजी महाराज आणि मोगल साम्राज्याच्या इतिहासावरची पुस्तके प्रसिद्ध आहेत. [१]
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जिद्दू कृष्णमूर्ती (११ मे, इ. स. १८९५ - १७ फेब्रुवारी, इ. स. १९८६) हे तत्त्वज्ञान व आध्यात्मिक विषयांमधील भारतीय वक्ते व लेखक होते. विश्वगुरू म्हणून ते ओळखले जात असले तरी हे बिरूद त्यांना मान्य नव्हते. त्यांच्या विषयक्षेत्रांमध्ये पुढील गोष्टींचा समावेश होता : मानसिक क्रांती, मनाचे स्वरूप, ध्यान, अभिप्सा, मानवी संबंध व समाजात आमूलाग्र परिवर्तन घडवून आणणे. प्रत्येक मानवाच्या मनामध्ये क्रांती घडवून आणण्याच्या आवश्यकतेवर त्यांनी सतत भर दिला आणि अशी क्रांती कोणत्याही बाह्य सत्तेद्वारा - मग ती धार्मिक, राजकीय वा सामाजिक असो - घडवून आणली जाऊ शकत नाही, हेही त्यांनी ठासून सांगितले.
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पौगंडावस्थेत असतानाच तत्कालीन मद्रासमधील अड्यार इथे असलेल्या थिऑसॉफिकल सोसायटीच्या मुख्यालयात विख्यात गूढवादी व उच्च कोटीचे ईश्वरविद (थिऑसफिस्ट) चार्ल्स वेब्स्टर लेडबीटर यांच्याशी कृष्णमूर्तींची भेट झाली. त्यानंतर अॅनी बेझंट व लेडबीटर या सोसायटीच्या तत्कालीन नेत्यांच्या देखरेखीखाली कृष्णमूर्ती वाढले. विश्वगुरू पदासाठी कृष्णमूर्ती लायक उमेदवार आहेत, अशी या नेत्यांची खात्री होती. नवयुवक कृष्णमूर्तींनी मात्र ही संकल्पना नाकारली आणि या संकल्पनेच्या समर्थनासाठी उभारलेल्या जागतिक संस्थेचे (दी ऑर्डर ऑफ द स्टार) त्यांनी विसर्जन केले. कोणतेही राष्ट्रीयत्व, जात, धर्म वा तत्त्वज्ञान कृष्णमूर्तींनी आपले मानले नाही आणि उरलेले आयुष्य जगभर प्रवास करीत व्यक्तींशी, छोट्या-मोठ्या गटांशी चर्चा करण्यात व्यतीत केले. त्यांनी लिहिलेल्या पुस्तकांमध्ये द फर्स्ट अँड लास्ट फ्रीडम, दी ओन्ली रेवल्युशन आणि कृष्णमूर्तीज् नोटबुक यांचा समावेश होतो. त्यांची अनेक भाषणे आणि चर्चा प्रकाशित झाल्या आहेत. जानेवारी १९८६ मध्ये मद्रासमध्ये त्यांनी शेवटचे सार्वजनिक भाषण केले. त्यानंतर महिनाभरात ओहाय (कॅलिफोर्निया) येथे त्यांचा मृत्यू झाला.[ संदर्भ हवा ]
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कृष्णमूर्तींचे अनुयायी ना-नफा तत्त्वावर भारत, इंग्लंड आणि अमेरिकेत त्यांच्या शिक्षणविषयक दृष्टिकोनावर आधारित अनेक स्वतंत्र शाळा चालवीत आहेत. विविध भाषांमध्ये विविध माध्यमांच्या वापरातून कृष्णमूर्तींचे विचार, भाषणे व साहित्य प्रसारित करण्याचा प्रयत्नही त्यांचे समर्थक करीत आहेत.[ संदर्भ हवा ]
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कृष्णमू���्तींचा जन्म ११ मे १८९५ रोजी तत्कालीन मद्रास प्रांतातील (आताच्या आंध्र प्रदेशातील चित्तूर जिल्हा) मदनपल्ले या छोट्या नगरात तेलुगूभाषिक कुटुंबात झाला. आठवा मुलगा झाला तर कृष्णाचे नाव त्याला द्यायचे या हिंदू प्रथेनुसार कृष्णमूर्ती हे नाव ठेवण्यात आले. जिद्दू हे कुलनाम.[१] कृष्णमूर्तींचे वडील जिद्दू नारायणैय्या हे वासाहतिक ब्रिटिश प्रशासनाच्या सेवेत होते. संजीवम्मा या आपल्या आईचा कृष्णमूर्तींना लळा होता पण ते दहा वर्षांचे असताना संजीवम्मांचा मृत्यू झाला. नारायणैया-संजीवम्मा या दांपत्याला एकूण अकरा अपत्ये झाली, त्यांपैकी पाच जणांचा बालपणातच मृत्यू झाला.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १९०३ मध्ये जिद्दू कुटुंब कडप्पा इथे स्थिर झाले. त्याआधीच कृष्णमूर्तींना हिवताप जडलेला होता. अनेक वर्षांपर्यंत त्यांना हिवतापाच्या उद्रेकाचा सामना करावा लागला. संवेदनशील, आजारी, स्वप्नांच्या दुनियेत असणारे हे बालक मतिमंद आहे असे सर्वांना वाटे आणि त्यामुळे शाळेत शिक्षकांचा तर घरी वडिलांचा मार कृष्णमूर्तींना नियमितपणे खावा लागे.[२] अठरा वर्षांचे असताना लिहिलेल्या आपल्या आठवणींमध्ये त्यांनी १९०४ मध्ये मृत्यू पावलेली आपली बहीण व १९०५ मध्ये मृत्यू पावलेली आपली आई "दिसली" अशा परामानसी अनुभवांचे वर्णन केलेले आहे.[३] बालपणातच निसर्गाशी त्यांचे भक्कम बंध जुळले आणि हे बंध आयुष्यभर टिकले.
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१९०७ मध्ये ब्रिटिशांच्या सेवेतून निवृत्त झाल्यानंतर जिद्दू नारायणैय्या यांनी अड्यारच्या थिऑसॉफिकल सोसायटीत नोकरी धरली. रूढीप्रिय ब्राह्मण असण्याबरोबरच नारायणैया १८८२ पासून थिऑसॉफिस्टही होते. जानेवारी १९०९ मध्ये जिद्दू कुटुंब अड्यारला आले. थिऑसॉफिकल कुंपणाच्या बाहेर असलेल्या अस्वच्छ झोपडीत नारायणैय्या व त्यांचे पुत्र राहू लागले. सभोवतालच्या खराब परिस्थितीमुळे हे पुत्र कुपोषित बनले, त्यांना उवांचाही त्रास होऊ लागला.[ संदर्भ हवा ]
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एप्रिल १९०९ मध्ये लेडबीटर व कृष्णमूर्तींची पहिली भेट झाली. लेडबीटर हे आपल्याला अतींद्रिय दृष्टी असल्याचा दावा करणारे गृहस्थ होते. अड्यार नदीच्या किनारी हे दोघेही नेहमी जात. लेडबीटरच्या म्हणण्यानुसार कृष्णमूर्तींचे प्रभामंडल (ऑरा) त्यांनी पाहिलेल्या सर्वोत्तम प्रभामंडलांपैकी एक होते आणि त्यात स्वार्थाचा लेशही नव्हता. ल��डबीटरच्या मते कृष्णमूर्तींमध्ये आध्यात्मिक गुरू व उत्कृष्ट वक्ता बनण्याची पात्रता होती. थिऑसॉफीतील एका सिद्धान्तानुसार मानवजातीच्या उत्क्रांतीला दिशा देण्यासाठी एक प्रगत आध्यात्मिक शक्ती नियतकालाने पृथ्वीवर येते आणि विश्वगुरू म्हणून कार्य करते.[४] हे सामर्थ्यही कृष्णमूर्तींमध्ये लेडबीटरला दिसले.
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या "शोधा"नंतर अड्यारच्या थिऑसॉफिकल सोसायटीच्या सदस्यांनी कृष्णमूर्तींना विशेष वागणूक देण्यास आरंभ केला. अपेक्षित विश्वगुरुपदासाठी "माध्यम" म्हणून कृष्णमूर्तींच्या शिक्षणाची, संरक्षणाची आणि तयारीची जबाबदारी लेडबीटर व त्याच्या काही विश्वासू सहकाऱ्यांनी घेतली. कृष्णमूर्ती (यांना नंतर कृष्णाजी असेही म्हटले जाई) आणि त्यांचा धाकटा भाऊ नित्यानंद (नित्या) यांना खाजगी शिकवणी देण्यात आली व नंतर परदेशातील शिक्षणादरम्यान युरोपीय उच्चभ्रू समाजाशी त्यांचा परिचय करवून देण्यात आला. शाळेतील गृहपाठ पूर्ण न करू शकणारे आणि क्षमतांबद्दल व आरोग्याबद्दल अनेक अडचणी असणारे कृष्णाजी सहा महिन्यातच इंग्रजी बोलू आणि लिहू लागले. कृष्णाजींच्या मते लेडबीटरला लागलेला त्यांचा "शोध" ही त्यांच्या आयुष्यातील क्रांतिकारक घटना होती; अन्यथा लवकरच त्यांचा मृत्यू ओढवला असता.
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या काळात कृष्णाजी अॅनी बेझंट यांच्याकडे आई म्हणून पाहू लागले होते. कृष्णाजींच्या वडिलांनी कृष्णाजींचे कायदेशीर पालकत्व बेझंटबाईंना दिले होते. कृष्णाजींना मिळणाऱ्या प्रसिद्धीमुळे त्यांचे वडील झाकोळले गेले. इ.स. १९१२ मध्ये कायदेशीर पालकत्व रद्द करण्यासाठी त्यांनी न्यायालयात दावा दाखल केला. प्रदीर्घ न्यायालयीन लढाईनंतर अॅनी बेझंटला कृष्णाजी व नित्याचा कायदेशीर "ताबा" मिळाला. कुटुंब व घरापासून दूर गेलेल्या कृष्णाजी व नित्यामधील संबंध यामुळे अधिक मजबूत झाले आणि नंतरच्या काळात या दोघांनी सोबतच प्रवास केला.[ संदर्भ हवा ]
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१९११ मध्ये थिऑसॉफिकल सोसायटीने आगामी विश्वगुरूच्या स्वागतास जगाला तयार करण्यासाठी ऑर्डर ऑफ द स्टार इन दी इस्ट (ओएसई) या संस्थेची स्थापना केली. कृष्णमूर्तींना मुख्याधिकारी बनविण्यात आले. विश्वगुरूच्या आगमनाच्या तत्त्वावर विश्वास ठेवणाऱ्या कुणालाही सदस्यत्व उपलब्ध होते. लवकरच सोसायटीच्या आत आणि बाहेर हिंदू वर्तुळात, भारतीय प्रसारमाध्यमांत वादविवाद सुरू झाले.[ संदर्भ हवा ]
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मेरी ल्युटेन्स या कृष्णाजींच्या मैत्रिणीच्या व चरित्रकर्तीच्या म्हणण्यानुसार आपल्याला विश्वगुरू बनायचे आहे यावर एके काळी कृष्णमूर्तींचा विश्वास होता. एप्रिल १९११ मध्ये कृष्णाजी व नित्या इंग्लंडला गेले. तिकडे कृष्णमूर्तींनी आपले पहिले सार्वजनिक भाषण दिले आणि लिखाणास सुरुवात केली. पहिल्या महायुद्धाच्या आरंभापूर्वी या बंधूंनी अनेक युरोपीय देशांना भेटी दिल्या. युद्धसमाप्तीनंतरही कृष्णमूर्तींची भाषणे आणि लेखन सुरू राहिले. इ.स. १९२१ मध्ये ते हेलेन नॉद या सतरावर्षीय अमेरिकन युवतीच्या प्रेमात पडले; पण हे संबंध फार काळ टिकले नाहीत.[ संदर्भ हवा ]
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१९२२ मध्ये कृष्णा व नित्या कॅलिफोर्नियाहून सिडनीला गेले. कॅलिफोर्नियात असताना क्षयरोगी नित्यानंदाच्या प्रकृतीला उतार पडावा म्हणून ओहायो खोऱ्यातील एका कुटिरात ते राहत होते. ओहायोमध्ये या बंधूंना रोझलिंड विल्यम्स या अमेरिकन युवतीची मदत मिळाली. ओहायोमधील काळात प्रथमच जिद्दू बंधू थिऑसॉफिकल सोसायटीच्या सभासदांच्या निरीक्षणाखाली नव्हते. हे ठिकाण जिद्दूंना आवडले. अखेर त्यांच्या अनुयायांनी एक विश्वस्त संस्था स्थापन करून हे कुटीर व सभोवतालची जागा विकत घेतली. मग हे स्थान कृष्णमूर्तींचे अधिकृत निवासस्थान झाले.[ संदर्भ हवा ]
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ओहायोमध्ये ऑगस्ट-सप्टेंबर १९२२ मध्ये कृष्णमूर्तींना काही आयुष्य बदलविणारे अनुभव आले. या अनुभवांना आध्यात्मिक जागृती, मानसिक परिवर्तन अशी विविध संबोधने दिलेली आहेत. साक्षीदारांच्या म्हणण्यानुसार १७ ऑगस्टला कृष्णाजींना मानेत तीव्र वेदना जाणवू लागल्या. पुढच्या दोन दिवसांमध्ये वेदना बळावल्या, त्यांना भूक लागेनाशी झाली आणि अधूनमधून असंबद्धपणे ते बरळू लागले. ते बेशुद्ध पडल्यासारखे दिसत असले तरी नंतर त्यांनीच सांगितल्यानुसार त्यांना भोवताल दिसत होता आणि त्या अवस्थेत गूढ ऐक्याचा अनुभवही त्यांना येत होता. पुढच्या दिवशी लक्षणांची व अनुभवांची तीव्रता वाढली आणि "असीम शांती"चा अनुभव त्यांना आला. यानंतर त्यांना जवळपास रोज रात्री 'प्रक्रिया' या नावाने ओळखले जाणारे अनुभव येऊ लागले. या अनुभवांमध्ये वेदना, शारीरिक कष्ट आणि संवेदनशीलता, बालकासारख्या अवस्थेत जाणे आणि काही वेळा त्यांचे शरीर वेदनांना शरण जाणे किंवा ते स्वतःच "निघून जाणे" अशा बाबींचा समावेश होता.[ संदर्भ हवा ]
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प्रक्रियेपासून वेगळे व "आशीर्वाद", "अमर्यादता", "पावित्र्य", "अनंतता" आणि सर्वाधिक वेळा "अन्यता" किंवा "अन्य" या संबोधनाने उल्लेखिले जाणारे काही अनुभव या काळात व नंतर कृष्णाजींना आले. ल्युटेन्सच्या म्हणण्यानुसार हा "अन्यते"चा अनुभव जवळपास आयुष्यभर त्यांच्यासोबत राहिला आणि त्यांना संरक्षित असल्याची भावना देत राहिला.[ संदर्भ हवा ]
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इ.स. १९२२ पासून या गूढ अनुभवांची अनेक स्पष्टीकरणे मांडण्याचा प्रयत्न केला गेलेला आहे. लेडबीटर व इतर थिऑसॉफिस्टांनी आपल्या 'माध्यमा'ला काही परामानसिक अनुभव येतील हे गृहीत धरले होते पण या अनुभवांनी तेही अचंबित झाले. नंतर कृष्णाजींनी केलेल्या चर्चांमधून या अनुभवांवर थोडासा प्रकाश पडला पण अंतिमतः शोधक दृष्टीने हाती काहीही लागले नाही. रोलंड व्हर्नॉन या चरित्रकाराच्या म्हणण्यानुसार ही प्रक्रिया आणि लेडबीटरकडे नसलेल्या उत्तरांमुळे मोठा परिणाम घडून आला. कृष्णमूर्तींनी स्वतंत्र व्यक्ती म्हणून काही पावले टाकली. भविष्यातील गुरू या भूमिकेसाठी ही प्रक्रिया हा आधारस्तंभ होता.
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१९२५ मध्ये थिऑसॉफिकल सोसायटी स्थापनेनंतरची पन्नास वर्षे पूर्ण करणार होती. या काळात कृष्णमूर्तींच्या मसिहासदृश व्यक्तिमत्त्वाबद्दलच्या चर्चांना ऊत आला. थिऑसोफिकल सोसायटीत राजकारण सुरू झाले. अनेक सभासद आपली आध्यात्मिक प्रगती झाल्याचे बोलू लागले आणि इतर अनेक त्यावर शंका घेऊ लागले. अशा घटनांमुळे खुद्द कृष्णमूर्ती मात्र मनाने सोसायटीपासून दूर गेले.
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१३ नोव्हेंबर १९२५ रोजी वयाच्या सत्ताविसाव्या वर्षी नित्यानंदांचे शीतज्वर व क्षयाच्या प्रादुर्भावांमुळे निधन झाले. नित्यानंद आजारग्रस्त असले तरी त्यांचा मृत्यू अनपेक्षित होता. या घटनेमुळे कृष्णाजींचा थिऑसॉफीवरील व सोसायटीच्या नेत्यांवरील विश्वास उडाला. नित्यानंदांच्या तब्येतीबद्दल कृष्णाजींना वारंवार आश्वस्त केले जात होते. आपल्या जीवितकार्यासाठी नित्यानंदाची आवश्यकता आहे, त्यामुळे त्याचा मृत्यू होणार नाही असे अॅनीबाईंसह कृष्णाजींना वाटत होते. प्रत्यक्षदर्शींच्या म्हणण्यानुसार या बातमीने कृष्णमूर्ती जवळपास कोसळले. नित्यानंदांच्या मृत्यूनंतर बारा दिवसांनी मात्र ते "अतिशय शांत, तेजस्वी आणि सर्व भाव���ांमधून मुक्त" झाल्यासारखे वाटले.
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नित्यानंदांच्या मृत्यूमुळे "विश्वगुरूचे आगमन" वगैरे चर्चा बंद झाल्या.[ संदर्भ हवा ]
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३ ऑगस्ट १९२९ रोजी कृष्णमूर्तींनी ऑर्डर ऑफ दी स्टारचे विसर्जन केले. मागील दोन वर्षांदरम्यान केलेल्या गंभीर विचारमंथनानंतर हा निर्णय घेतल्याचे त्यांनी सांगितले. सोबतच त्यांनी नमूद केले की,
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सत्य ही मार्गरहित भूमी आहे आणि तुम्ही कोणत्याही मार्गाने, कोणत्याही धर्माने, कोणत्याही पंथाने त्याच्या जवळ जाऊ शकत नाही ह्या म्हणण्यावर मी ठाम आहे. हा माझा दृष्टिकोन आहे आणि त्याच्याशी मी विनाशर्त पूर्णपणे बांधिल आहे. सत्य अमर्याद, अशर्त व कोणत्याही मार्गाने मिळण्यासारखे नसल्याने संघटित केले जाऊ शकत नाही; लोकांना दिशा देण्यासाठी किंवा विशिष्ट मार्गावर चालविण्यास प्रवृत्त करण्यासाठी कोणतीही संस्था बनविली जाऊ नये. ... हे महान कृत्य नाही, कारण मला अनुयायी नको आहेत आणि खरेच नको आहेत. एखाद्याचा अनुनय सुरू झाला की सत्याचा अनुनय समाप्त होतो. मी म्हणतो त्याकडे तुम्ही लक्ष देता की नाही याचीही मला चिंता नाही. जगात मला एक गोष्ट करावयाची आहे आणि अढळ अवधानाने मी ती करणार आहे. मी एकाच आवश्यक गोष्टीचा विचार करतो : मानवास मुक्त करणे. मी मानवाला सर्व पिंजऱ्यापासून, सर्व भयांपासून मुक्त करण्याची अभिलाषा धरतो; धर्म किंवा पंथ स्थापण्याची, नवे सिद्धान्त किंवा नवे तत्त्वज्ञान मांडण्याची नाही.[ संदर्भ हवा ]विसर्जनानंतर अनेक विख्यात थिऑसॉफिस्ट्स, अगदी लेडबीटरही कृष्णमूर्तींच्या विरोधात गेले. आपण विश्वगुरू आहोत याचा कृष्णमूर्तींनी साफ इन्कार केल्याचा पुरावा उपलब्ध नाही पण जेव्हा जेव्हा त्यांना त्यांची भूमिका विचारण्यात आली तेव्हा तेव्हा त्यांनी एकतर ही बाब असंबद्ध आहे असे म्हटले किंवा त्यांच्याच शब्दांमध्ये "जाणूनबुजून संदिग्ध" उत्तरे दिली. विसर्जनानंतर लवकरच त्यांनी थिऑसॉफिकल सोसायटी, तिचे उपदेश किंवा प्रथा-पद्धती यांच्यापासून फारकत घेतली.
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आपल्या उपदेशाला कृष्णमूर्तींनी कधीही माझा उपदेश म्हटले नाही. ते नेहमी उपदेशाबद्दल दक्ष असत, उपदेशकाबद्दल नाही. शिक्षकाला महत्त्व नव्हते आणि सर्व प्रकारच्या सत्तांचा, विशेषतः मानसिक सत्तांचा त्याग त्यांना अभिप्रेत होता :
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कोणत्याही प्रकारची सत्ता, विशेषतः चिंतन व आकलनाच्या क्षेत��रातील सत्ता ही सर्वाधिक विनाशकारी, वाईट गोष्ट आहे. नेते अनुयायांचा नाश करतात व अनुयायी नेत्यांचा नाश करतात. तुम्हाला स्वतःच स्वतःचा शिक्षक व विद्यार्थी बनावे लागते. माणसाने मूल्यवान, आवश्यक म्हणून स्वीकारलेल्या प्रत्येक गोष्टीबाबत तुम्ही सवाल करावयास हवेत. सोसायटीशी फारकतीनंतर संबंधित सर्व पदांचा कृष्णमूर्तींनी त्याग केला, दान म्हणून मिळालेल्या वस्तू व मालमत्ता ज्याच्या त्याला परत केल्या. उरलेले आयुष्य त्यांनी जगभरातील लोकांशी विश्वास, सत्य, दुःख, स्वातंत्र्य, मृत्यू यांच्या स्वरूपाबाबत व अध्यात्मसंपन्न आयुष्याबाबत चर्चा करण्यात व्यतीत केले. अनुयायी किंवा पूजकांचा त्यांनी स्वीकार केला नाही. गुरू आणि शिष्य या नात्यात अवलंबित्व व शोषण येते असे त्यांचे मत होते. आपल्या कार्याने प्रभावित झालेल्या लोकांकडून भेटवस्तू व आर्थिक मदतीचा त्यांनी स्वीकार केला आणि व्याख्यानमाला, लेखन या गोष्टी पन्नास वर्षांहून अधिक काळ सुरू ठेवल्या. त्यांनी लोकांना सतत स्वतंत्रपणे विचार करण्यास प्रवृत्त केले आणि विवक्षित विषयांबाबत चर्चेसाठी लोकांना आमंत्रित केले.[ संदर्भ हवा ]
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कृष्णाजींचे मध्यायुष्य व्याख्यानदौऱ्यांमध्ये आणि प्रकाशनामध्ये गेले. ऑर्डर ऑफ द स्टारमधील एक मित्र आणि सहकारी असलेल्या देसिकाचार्य राजगोपाल (डी. राजगोपाल) याच्यासोबत त्यांनी स्टार पब्लिशिंग ट्रस्ट (एसपीटी) ही प्रकाशनसंस्था स्थापन केली. ओहायमध्ये आर्य विहार नावाच्या भवनात या काळी कृष्णमूर्ती, राजगोपाल आणि १९२७ मध्ये राजगोपालशी विवाहबद्ध झालेली रोझलिंड विल्यम्स हे राहत होते. 'एसपीटी'ची व्यावसायिक व संस्थात्मक बाजू डी. राजगोपाल सांभाळीत. कृष्णाजींचा वेळ भाषणे व ध्यान यांमध्ये जाई. राजगोपालचे वैवाहिक आयुष्य सुखमय नव्हते. १९३१ मध्ये राधा नावाच्या मुलीच्या जन्मानंतर राजगोपाल व रोझलिंड भौतिकदृष्ट्या विभक्त झाले. आर्य विहाराच्या सापेक्ष एकांतात कृष्णमूर्ती व रोझलिंड यांच्या दरम्यान असलेल्या निकट मैत्रीचे रूपांतर प्रेमप्रकरणात झाले. इ.स. १९९१ पर्यंत या संबंधांची जाहीर वाच्यता झाली नाही.
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१९३० च्या दशकात यूरोप, लॅटिन अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका या देशांचे दौरे कृष्णमूर्तींनी केले. १९३८ मध्ये हक्स्ले घराण्यातील आल्डस हक्स्ले या प्रसिद्ध ��ेखकाशी त्यांचा परिचय झाला. या दोघांमधील मैत्री अनेक वर्षे टिकली. युरोपात तेव्हा येऊ घातलेल्या संकटाबाबत दोघांनाही चिंता होती. राष्ट्रवादाच्या अपायकारक परिणामामुळे हे संकट उभे राहिले, असे या दोघांचेही मत होते. इ.स. १९४०-१९४४ या काळात कृष्णमूर्तींनी सार्वजनिक वक्तव्ये केली नाहीत. आर्य विहारात या काळात त्यांनी काम केले. बव्हंशी स्वयंपूर्ण असलेल्या आर्य विहाराने या काळात शिल्लक माल युरोपातील संकटग्रस्तांसाठी दिला.
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मे १९४४ मध्ये ओहायो येथे भाषणमाला सुरू करून कृष्णमूर्तींनी सार्वजनिक मौन सोडले. 'एसपीटी'ची जागा घेतलेल्या कृष्णमूर्ती राइटिंग्ज इंकॉर्पोरेशनने (केडब्ल्यूआयएनसी) ही भाषणे व इतर साहित्य प्रकाशित केले. 'केडब्ल्यूआयएनसी'चे एकमेव उद्दिष्ट कृष्णमूर्तींच्या उपदेशाचा प्रसार करणे हे होते. भारतातील काही सहकाऱ्याच्या संपर्कात कृष्णमूर्ती होतेच. १९४७ च्या शिशिरात ते भारतात आले. अनेक तरुण बुद्धिवाद्यांना त्यांनी आकर्षित केले. या दौऱ्यातच पुपुल (जयकर) आणि नंदिनी या मेहता भगिनींचा कृष्णाजींशी संपर्क आला आणि त्या कृष्णमूर्तींच्या विश्वासू सहकारी बनल्या. ऊटकमंड इथे असताना कृष्णमूर्तींना पुन्हा 'प्रक्रिये'चा अनुभव आला तेव्हा मेहता भगिनी तिथे हजर होत्या.
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या दौऱ्यात कृष्णमूर्तींना भेटावयास आलेल्या लोकांमध्ये तत्कालीन पंतप्रधान जवाहरलाल नेहरू यांचा समावेश होता. भेटींदरम्यान कृष्णमूर्तींनी विस्तारपूर्वक आपला उपदेश नेहरूंला दिला. एका भेटीत कृष्णमूर्ती म्हणाले होते : "स्वचे आकलन संबंधांमधूनच होते. ... स्व ज्याच्यात उघड होतो असा आरसा म्हणजे संबंध. आत्मज्ञानाशिवाय सम्यक विचार आणि कृतीसाठी अधिष्ठानच नाही." यावर नेहरूंनी "सुरुवात कशी करावी?" असा प्रश्न केला होता. यावर कृष्णमूर्तींनी "जिथे आहात तिथून सुरुवात करा. मनाचा प्रत्येक शब्द, प्रत्येक शब्दसमूह, प्रत्येक परिच्छेद वाचा, कारण मन विचारांच्या माध्यमातून कार्य करते."
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जगभरात सार्वजनिक भाषणे, गटचर्चा हे कृष्णमूर्तींचे नेहमीचे कार्यक्रम उत्तरायुष्यातही सुरू राहिले. १९६० च्या दशकाच्या प्रारंभी डेव्हिड बॉम या भौतिकविद्वानाशी कृष्णमूर्तींचा परिचय झाला. भौतिक विश्वाचे सार, मनुष्यजातीची मानसिक व सामाजिक अवस्था याबाबत बॉमच्या तात्त्विक व शास्त्रीय मतांना जुळ���ारी स्थळे कृष्णमूर्तींच्या तत्त्वज्ञानामध्ये होती. हे दोघे लवकरच घनिष्ट मित्र बनले. वैयक्तिक संवाद, गटचर्चा या माध्यमांमधून विचारांचे आदानप्रदान या दोघांमध्ये सुमारे दोन दशके सुरू राहिले. ह्या चर्चा पुस्तकरूपांत प्रसिद्ध झाल्याने कृष्णमूर्तींच्या विचारांचा शास्त्रीय वर्तुळात शिरकाव झाला. कृष्णमूर्तींचे तत्त्वज्ञान धार्मिक अभ्यास, शिक्षण, मानसशास्त्र, भौतिकी, चेतनेचा अभ्यास अशा विविध विषयांवरील असले तरी विद्यापिठीय वर्तुळात त्यांची आजवर चर्चा झाली नव्हती. फ्रिजॉफ काप्रा, जॉर्ज सुदर्शन हे भौतिकविद्, जीवशास्त्रज्ञ रुपर्ट शेल्ड्रेक, मानसशास्त्रज्ञ डेव्हिड शेनबर्ट यांच्यासोबत अनेक मानसोपचारतज्ज्ञांशी कृष्णमूर्तींनी चर्चा केल्या. नंतरच्या काळात कृष्णमूर्ती-बॉम यांच्या मैत्रीत कटू प्रसंग आले आणि आधीसारखी घनिष्ट नसली तरी या दोघांमधील मैत्री कृष्णमूर्तींच्या निधनापर्यंत टिकून राहिली.
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अनेक विषयांमध्ये कृष्णमूर्तींच्या प्रतिभेने विहार केला असला तरी त्यांची मूलभूत शिकवण टिकून राहिली. १९२९ मध्ये ज्या गोष्टींशी असलेली बांधिलकी त्यांनी बोलून दाखविली होती, त्याबद्दल १९८० च्या दशकात कोअर ऑफ द टीचिंग या लिखित वक्तव्यात ते पुन्हा 'बोलले' :
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"'सत्य ही मार्गरहित भूमी आहे.' कोणत्याही संस्थेतून, विश्वासातून, तत्त्वातून, यागातून, तात्त्विक ज्ञानातून किंवा मानसशास्त्रीय पद्धतीने माणूस तिथे पोहचू शकत नाही. बौद्धिक विश्लेषण आणि अंतर्मुखीय विच्छेदनातून नव्हे तर संबंधांच्या आरशातून, स्वतःच्या मनाच्या विषयघटकांच्या आकलनातून, निरीक्षणातून त्याला ते शोधावे लागेल. सुरक्षिततेच्या भावनेपोटी मानवाने स्वतःमध्ये धार्मिक, राजकीय, वैयक्तिक प्रतिमा उभ्या केल्या आहेत. त्या प्रतिमा चिन्हे, आदर्श, श्रद्धा या माध्यमांतून आविष्कृत होतात. यांच्या ओझ्याचा माणसाच्या विचारांवर, संबंधांवर व दैनंदिन आयुष्यावर प्रभाव पडतो. प्रत्येक संबंधात माणसाला माणसापासून वेगळ्या करीत असल्याने त्या [प्रतिमा] आपल्या समस्यांचे मूळ आहेत." १९७० च्या दशकात अनेक वेळा पंतप्रधान इंदिरा गांधी यांनी कृष्णमूर्तींची भेट घेतली. या दोघांमध्ये विविध विषयांवर प्रदीर्घ व काही वेळा गंभीर चर्चा झाल्या असल्या तरी कृष्णमूर्तींचा भारतीय राजकारणावरील प्��भाव अजून अज्ञातच आहे.
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दरम्यानच्या काळात राजगोपाल व कृष्णमूर्तीं यांच्यामधील संबंध न्यायालयीन लढाईपर्यंत ताणले गेले होते. १९७१ मध्ये सुरू झालेले प्रताधिकारासंबंधीच्या आरोप-प्रत्यारोपांचे प्रकरण अनेक वर्षे चालले. कृष्णमूर्तींच्या आयुष्यकाळातच राजगोपालांकडे असलेली कृष्णमूर्तींची पत्रे, हस्तलिखिते, दानस्वरूपात मिळालेली मालमत्ता, देणग्यांचे पैसे वगैरे बरीचशी सामग्री परत करण्यात आली. १९८६ मध्ये कृष्णमूर्तींच्या मृत्यूनंतर प्रतिस्पर्धी पक्षांनी हा प्रश्न निकालात काढला.
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१९८४ व १९८५ मध्ये न्यू यॉर्कमध्ये संयुक्त राष्ट्रांमध्ये भाषणासाठी कृष्णमूर्तींना आमंत्रित करण्यात आले. नोव्हेंबर १९८५ मध्ये ते भारतात आले. जानेवारी १९८६ पर्यंत अनेक ठिकाणी त्यांनी "निरोपाची" भाषणे दिली. कृष्णमूर्तींना नेहमी विचारण्यात आलेल्या प्रश्नांसोबतच यावेळी त्यांना विज्ञान-तंत्रज्ञानातील प्रगतीचा मानववंशावर काय परिणाम होईल याबद्दलही प्रश्न विचारण्यात आले. मृत्यूला मी आमंत्रित करू इच्छित नाही असे त्यांनी मित्रांना सांगितले होते पण शरीर किती काळ टिकेल (त्यांचे वजन खूप कमी झाले होते) याबाबत ते साशंक होते. बोलणे बंद झाल्यावर जगण्यास उद्देश उरणार नाही असेही त्यांनी म्हटले होते. चार जानेवारी १९८६ रोजी मद्रासमध्ये त्यांनी दिलेले भाषण अखेरचे ठरले.
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आपल्या वारशाबाबत कृष्णमूर्ती सजग होते. आपल्या शिकवणीचा अर्थबोधक कुणीही बनू नये अशी त्यांची इच्छा होती. मृत्यूपश्चात आपल्या सहकाऱ्यांनी कृष्णमूर्तींचे प्रवक्ते किंवा वारसदार असल्यासारखे वागू नये असे त्यांनी कित्येकदा बजावून ठेवले होते.
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मृत्यूच्या काही दिवस आधी केलेल्या वक्तव्यात त्यांनी आपल्याला काय झाले होते ते कुणालाही समजलेले नाही आणि आपली शिकवणही कुणाला कळालेली नाही असे म्हटले होते. आपल्या आयुष्यकाळात कार्यरत असलेली अफाट ऊर्जा आपल्यासोबत जाईल असेही त्यांनी म्हटले होते. "...शिकवण जगल्यास" लोक त्या ऊर्जेकडे जाऊ शकतील आणि आकलन करवून घेऊ शकतील असा आशावादही त्यांनी मांडला होता. चर्चांदरम्यान कृष्णमूर्तींनी आपल्या भूमिकेची तुलना टॉमस एडिसन व कोलंबस यांच्याशी केली होती. नव्या जगाच्या शोधासाठी कोलंबसाला कष्टमय प्रवास करावा लागला, त्याच जगात आज जेटने सहज जाता येते असे कृष्���मूर्ती म्हणाले होते. याचा अर्थ काही प्रमाणात कृष्णमूर्ती "खास" असले तरी त्यांच्या आकलनाच्या स्तरापर्यंत पोहचण्यासाठी इतरांना खास असण्याची गरज नाही असा लावता येतो.
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स्वादुपिंडाच्या कर्करोगाने वयाच्या एक्क्याण्णवाव्या वर्षी १७ फेब्रुवारी १९८६ रोजी जे.कृष्णमूर्तींचे निधन झाले.
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दैनंदिन आयुष्यात विचारांच्या समुचित स्थानास कृष्णमूर्तींनी महत्त्व दिले. भूतकाळातील ज्ञानाचे शिलीभूत प्रक्षेपण म्हणून विचारांचा असलेला धोकाही त्यांनी दाखवून दिला. कृष्णमूर्तींच्या मते, अशा क्रियेने आपण राहत असलेल्या जगाबाबतचे आपले बोधन, समग्र आकलन आणि विशेषतः जगाला व्याख्यित करणारे संबंधांचे आकलन विकृत होते. ज्ञानाकडे त्यांनी मनाचे आवश्यक पण यांत्रिक कार्य म्हणून पाहिले. नोंद घेण्याच्या मनाच्या क्षमतेमुळे अडथळेही उत्पन्न होतात. उदाहरणार्थ, दुखावणारे शब्द क्रियेला प्रभावित करणाऱ्या स्मृती ठरू शकतात. म्हणून ज्ञान संबंधांमध्ये भेद आणून विनाशक ठरू शकते.
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सॅन दिएगो येथे १९७० मध्ये दिलेल्या वक्तव्यात कृष्णमूर्ती म्हणतात :
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"भय कशाशी तरी संबंधित असते; ते स्वतःहून असत नाही. ... काल मला वेदना झाल्या, मला त्या उद्या नको आहेत. कालच्या वेदनांच्या स्मृतीचा समावेश असणारा विचार उद्या वेदना असण्याचे भय प्रक्षेपित करतो. म्हणून विचार भय आणतात. विचार भयाला जन्म देतात; विचार आनंदाचीही लागवड करतात. भय समजण्यासाठी आनंद समजणे आवश्यक आहे. ... भय आणि आनंद ह्या एकाच नाण्याच्या दोन बाजू आहेत."
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ध्यानाकडे कृष्णमूर्तींनी महान कला म्हणून पाहिले. तंत्राशिवाय सराव करून ही कला शिकावी असे त्यांचे मत होते. खरे ध्यान म्हणजे "विचारांचा अंत" जो "काळापलीकडे...वेगळ्या मितीत" घेऊन जातो असे कृष्णमूर्तींचे मत होते. "ज्ञात गोष्टी काढून टाकून मन रिकामे करणे" म्हणजे ध्यान असेही त्यांनी म्हटलेले आहे.
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कृष्णमूर्तींनी जगभर अनेक शाळा काढल्या. शैक्षणिक लक्ष्ये म्हणून त्यांनी पुढील बाबी सांगितल्या होत्या :
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१९२८ मध्ये कृष्णमूर्ती व अॅनी बेझंट यांनी स्थापन केलेले कृष्णमूर्ती फाऊंडेशन अनेक शाळा चालविते. १९३४ साली वाराणसीत स्थापन झालेले राजघाट बेझंट स्कूल हे आरंभीच्या शाळांपैकी एक आहे.
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कृष्णमूर्तींच्या मतानुसार दारिद्ऱ्य, युद्धे, आण्विक संकट आणि इतर दुर्दैवी गोष्टींचे मूळ आपल���या विचारांमध्ये आहे. आपल्या विचारांप्रमाणे आपण जगतो आणि वागतो त्या प्रमाणेच युद्धे आणि सरकारे त्याच विचारांचा परिपाक आहेत. स्वकेंद्रित क्रिया बाह्य दिशेने राष्ट्रवाद व धार्मिक असहिष्णुता म्हणून आविष्कृत होतात, विभाजित जग निर्माण करतात, अशा जगात विश्वासापोटी आपण एखाद्याला मारण्यास तयार होतो.
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गढ़वाल रेजिमेंट हे भारतीय सेनेतील एक् सैन्यदल असून हे सर्वात जुन्या सैन्यदलांपैकी एक आहे. याची स्थापना इ.स. मध्ये झाली. सुरुवातीला याची ओळख ब्रिटिश लष्करातील एक पलटण म्हणून होती. इ.सच्या सुमारास याला रेजिमेंटचा दर्जा देण्यात आला.
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भारतीय सैन्याच्या गढ़वाल रेजिमेंट या भूदलाने अनेक प्रकारचा पराक्रम गाजवला आहे. भारतीय सैन्याची यशोगाथा फडकत ठेवण्यात या दलाचा सिंहाचा वाटा आहे.
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गढ़वाल रेजिमेंट या दलाला युद्धातील पराक्रमांबद्दल अनेक सन्मान व पदके प्रदान केली गेली आहेत.
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ब्रिगेड ऑफ गार्डस • द पॅराशूट रेजिमेंट • मॅकॅनाईज्ड इन्फंट्री रेजिमेंट • पंजाब रेजिमेंट • मद्रास रेजिमेंट • बॉम्बे ग्रेनेडियर्स • मराठा लाइट इन्फंट्री रेजिमेंट • राजपूताना रायफल्स • राजपूत रेजिमेंट • सिख रेजिमेंट • सिख लाइट इन्फंट्री • डोगरा रेजिमेंट • गढवाल रेजिमेंट• कुमाऊं रेजिमेंट • आसाम रेजिमेंट • बिहार रेजिमेंट • महार रेजिमेंट • जम्मू काश्मीर रायफल्स • जम्मू काश्मीर लाइट इन्फंट्री • जाट रेजिमेंट • नागा रेजिमेंट • १ गुरखा रायफल्स • ३ गुरखा रायफल्स • ४ गुरखा रायफल्स • ५ गुरखा रायफल्स • ८ गुरखा रायफल्स• ९ गुरखा रायफल्स • ११ गुरखा रायफल्स • लद्दाख स्काउट
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जनक राम ( - ) हे भारतीय राजकारणी आहेत. हे मतदारसंघातून भाजपतर्फे १६व्या लोकसभेवर निवडून गेले.
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१७° ४३′ १२″ N, ७९° १०′ ४८″ E
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जनगांव (इंग्रजी :Jangaon)हे भारताच्या तेलंगणा राज्यातील जनगांव जिल्ह्याचतील शहर आणि जनगांव जिल्ह्याचे मुख्यालय आहे. हे जनगाव मंडळ आणि जनगाव महसूल विभागाचे मुख्यालय देखील आहे. हे राज्याची राजधानी हैदराबादपासून सुमारे ८५ किलोमीटर (५३ मैल) अंतरावर आहे. हे राष्ट्रीय महामार्ग १६३ वर आहे. जनगाव हे नाव “जैनगाव” यावरून विकसित झाले, ज्याचा अर्थ “जैनांचे गाव”.[१]
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शहरात जैन लोकांचे अस्तित्व हे फार काळापासूनचे दिसते, त्यामुळेच जनगाव हे नाव “जैनगाव” यावरून विकसित झाले, ज्याचा अर्थ “जैनांचे गाव”. १९४८ पूर्वी हा भाग हैदराबाद संस्थानामध्ये होता त्यानंतर हे भारतामध्ये सामील झाले. आंध्र प्रदेश राज्याच्या स्थापनेपासून ते २०१४ पर्यंत म्हणजेच तेलंगणा राज्याच्या निर्मिती पर्यंत हे शहर आंध्र प्रदेश राज्यामध्ये होते.
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२०११ च्या जनगणनेनुसार, शहराची लोकसंख्या १२,२७६ कुटुंबांसह ५२,३९४ होती. एकूण लोकसंख्येमध्ये २६,७६४ पुरुष आणि २५,६३० स्त्रिया आहेत- लिंग गुणोत्तर १,००० पुरुषांमागे ९५८ स्त्रिया. ०-६ वर्षे वयोगटातील ५,१२३ मुले आहेत, त्यापैकी ७,३४७ मुले आणि ६,९९३ मुली आहेत—हे प्रमाण १,००० प्रति ९५२ आहे. ३८,९४८ साक्षरांसह सरासरी साक्षरता दर ८२.३९% होता.[२]
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८६.०८% लोक हिंदू आणि (११.५५%) मुस्लिम होते. इतर धार्मिक अल्पसंख्याकांमध्ये ख्रिश्चन (१.८३%), शीख (०.२३%), बौद्ध (०.०२%) आणि कोणताही धर्म नसलेले (०.२७%) यांचा समावेश होतो.[३]
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जनगाव शहरातील लोक ८६% तेलगू, ११.५ उर्दू, ०.३ मराठी, ०.२ पंजाबी, ०.४ इतर भाषिक आहेत.
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जनगाव हे पूर्वेकडील दख्खनच्या पठारावर स्थित आहे आणि त्याची सरासरी उंची ३८२ मीटर (१,२५३ फूट) आहे.[४]
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जनगाव येथे उष्णकटिबंधीय हवामान आहे. भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणानुसार, हा भाग अवर्षणप्रवण आहे आणि खूप उष्ण उन्हाळा, मध्यम हिवाळा आणि सरासरीपेक्षा कमी पाऊस पडतो.[५] जानगावमधील हवामानाला स्थानिक गवताळ हवामान म्हणून संबोधले जाते. वार्षिक पाऊस कमी आहे; येथील हवामान कोपेन-गीजर प्रणालीनुसार BSh म्हणून वर्गीकृत केले आहे. सरासरी वार्षिक तापमान २७.३ °C (८१.१ °F) आहे. वार्षिक सरासरी पर्जन्यमान ७८८ मिलिमीटर (३१.० इंच) आहे.
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कोलानुपाका मंदिर, जैनांसाठी एक धार्मिक स्थळ.
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जनगाव नगरपालिका ही शहराच्या नागरी गरजांवर देखरेख करणारी नागरी संस्था आहे. तिसऱ्या दर्जा��ी नगरपालिका म्हणून १९५३ मध्ये त्याची स्थापना झाली. २०१० मध्ये २८ नगरपालिका प्रभागांसह द्वितीय श्रेणीत श्रेणीसुधारित करण्यात आले. नागरी संस्थेचे कार्यक्षेत्र १७.४९ किमी२ (६.७५ चौरस मैल) मध्ये पसरलेले आहे.[६]
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TSRTC (तेलंगणा राज्य मार्ग परिवहन महामंडळ)चा शहरात बस डेपो आहे आणि सार्वजनिक वाहतूक सुविधा पुरवते.
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जनगाव रेल्वे स्थानक शहराला रेल्वे कनेक्टिव्हिटी प्रदान करते आणि दक्षिण मध्य रेल्वे विभागाच्या सिकंदराबाद रेल्वे विभागाच्या अखत्यारीत आहे.[७]
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जनरल वेन ए. डाउनिंग पियोरिया आंतरराष्ट्रीय विमानतळ [३], पियोरिया आंतरराष्ट्रीय विमानतळ[४] किंवा पूर्वीचा ग्रेटर पियोरिया प्रादेशिक विमानतळ[५] [६] (आहसंवि: PIA[७], आप्रविको: KPIA, एफ.ए.ए. स्थळसूचक: PIA) हा अमेरिकेच्या इलिनॉय राज्यातील पियोरिया शहरातील विमानतळ आहे. हा विमानतळ शहराच्या पश्चिमेस पाच मैलांवर , पिओरिया काउंटीमध्ये आहे. या विमानतळावर अमेरिकेच्या वायुसेनेचा तळ आहे.
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हा विमानतळ इलिनॉय मधील १२ व्यावसायिक विमानतळांपैकी चौथा सर्वाधिक व्यस्त विमानतळ आहे. [८]
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या विमानतळावर पियोरिया एर नॅशनल गार्डचा तळ आहे. येतथे इलिनॉय एर नॅशनल गार्डची १८२ एरलिफ्ट विंग ठाण मांडून आहे. ही तुकडी लॉकहीड C-130H हर्क्युलीस विमाने वापरते. याशिवाय येथे इलिनॉय आर्मी नॅशनल गार्डची आर्मी एव्हिएशन सपोर्ट फॅसिलिटी क्रमांक ३, १ली बटालियन, १०६वी एव्हिएशन रेजिमेंट स्थित आहे, जी बोईंग सीएच-४७ "चिनूक" हेलिकॉप्टर चालवते.
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विमानतळाला ये-जा करण्यासाठी ग्रेटर पियोरिया मास ट्रान्झिट डिस्ट्रिक्टद्वारे चालविल्या जाणाऱ्या सार्वजनिक परिवहन सेवेचा मार्ग ७ शहराच्या मध्यवर्ती भागापासून उपलब्ध आहे.. [१५]
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जनालिन कॅस्टेलिनो (इंग्रजी : Janalynn Castelino; 18 ऑक्टोबर, 1998), ही एक पॉप - ऱ्हिदम अँड ब्लूज संगीतशैलीतील गायिका, गीतकार आणि डॉक्टर आहे.[१] इंग्रजी, लॅटिन आणि हिंदीत गाणारी ती एक बहुमुखी कलाकार आहे.[२][३]
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यूट्यूबवर तिच्या संगीतामुळे जनालिनला लोकप्रियता मिळवली. विद्यापीठात वैद्यकशास्त्र शिकत असताना जनालिनने तिच्या संगीत कारकिर्दीची सुरुवात केली.[४][५] तिने फायर ऑन फायर आणि डायमंड्स सारखी हिट गाणी सादर केली आहेत.
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वर्ष २०२० मध्ये, ती यूट्यूब आंतरराष्ट्रीय म्युझिक चार्टवर वैशिष्ट्यीकृत झाली.[२] L'idea मासिकाने 2021च्या इंग्रजी आवृत्तीत तिला बहुआयामी कलाकार म्हणून उद्धृत केले.[६]
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अधिकृत संकेतस्थळ
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शेळी
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गाय,म्हैस, बैल
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१)सर्व प्रथम जनावराच्या तोंडात किती दात आहेत याची माहिती घेण्यासाठी त्याच्या मालकाच्या मदतीने जनावराचा जबडा उघडावा.
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२)जबड्यात दिसणाऱ्या दातांचे व्यवस्थित निरीक्षण करावे.
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+
३)निरीक्षण करताना या गोष्टीचे निरीक्षण नक्की करावे कि त्या जनावराचे दुधाचे दात किती आहेत व कायम दात किती आहेत.
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४)निरीक्षण करून झाल्यानंतर केलेल्या निरीक्षणानुसार जबड्यातील दातांची आकृती बनवावी.
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+
५)बनवलेल्या आकृतीच्या नुसार जनावराच्या वयाचा सटीक अंदाज लावावा.
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+
१)जनावराचा जबडा उघडून दातांचे निरीक्षण करताना जनावर हाताला चावा घेणार नाही याची काळजी घ्यावी.
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२)अनोळखी जनावराचा जबडा उघडून दातांचे निरीक्षण करताना त्याच्या मालकाची मदत घ्यावी.कि जेणे करून ते आपल्याला
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+
चावा घेणार नाही
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दाताच्या संख्येवरून जनावराच्या वयचा अंदाज खालील माहितीच्या आधारे करता येईल.
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+
गाय,म्हैस, बैल
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+
१) जन्माबरोबर - २ दुधाचे
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+
२) १५ दिवसानंतर - ४ दुधाचे
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| 15 |
+
३) २१ दिवसानंतर - ६ दुधाचे
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+
४) ३० दिवसानंतर - ८ दुधाचे
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+
५) २ ते ३ वर्ष - २ कायमचे, ६ दुधाचे
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+
६) ३ ते ४ वर्ष - ४ कायमचे, ४ दुधाचे
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+
७) ४ ते ५ वर्ष - ६ कायमचे, २ दुधाचे
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+
८) ५ वर्षाच्यापूढे - ८ कायमचे
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+
शेळी
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१) जन्माबरोबर - ६ दुधाचे
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+
२) १५ दिवसानंतर - ८ दुधाचे
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+
३) २१ दिवसानंतर - २ कायमचे, ६ दुधाचे
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+
४) ३० दिवसानंतर - ४ कायमचे, ४ दुधाचे
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| 26 |
+
५) २ ते ३ वर्ष - ६ कायमचे, २ दुधाचे
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| 27 |
+
[१] ६) ३ ते ४ वर्ष - ८ कायमचे
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जपानी ग्रांप्री (जपानी: 日本グランプリ) ही एक फॉर्म्युला वन शर्यत आहे. ही शर्यत १९६३ सालापासून जपान देशाच्या सुझुका शहरामध्ये खेळवली जाते. फॉर्म्युला वन हंगामाच्या अखेरीस असल्यामुळे अनेकदा ही शर्यत अजिंक्यपदासाठी महत्त्वाची ठरते.
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सुझुका आंतरराष्ट्रीय रेसिंग कोर्स[१] (Japanese: 鈴鹿国際レーシングコース Suzuka Kokusai Rēsingu Kōsu), अथवा सुझुका सर्किट (Japanese: 鈴鹿サーキット Suzuka Sākitto), हा ५.८०७ किमी (३.६०८ मैल) लांब मोटरस्पोर्ट रेस ट्रॅक आहे जो सुझुका येथे आहे. हा सर्किट होंडा मोबिलिटीलँड आणि होंडा मोटर कं, लि द्वारे संचालितआहे. या सर्किटची क्षमता १५५,००० आहे.
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ठळक दर्शवलेले चालक फॉर्म्युला वनच्या चालु हंगामात भाग घेत आहेत.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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ठळक दर्शवलेले कारनिर्माता फॉर्म्युला वनच्या चालु हंगामात भाग घेत आहेत.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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ठळक दर्शवलेले इंजिन निर्माता फॉर्म्युला वनच्या चालु हंगामात भाग घेत आहेत.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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जपानी ग्रांप्री (जपानी: 日本グランプリ) ही एक फॉर्म्युला वन शर्यत आहे. ही शर्यत १९६३ सालापासून जपान देशाच्या सुझुका शहरामध्ये खेळवली जाते. फॉर्म्युला वन हंगामाच्या अखेरीस असल्यामुळे अनेकदा ही शर्यत अजिंक्यपदासाठी महत्त्वाची ठरते.
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सुझुका आंतरराष्ट्रीय रेसिंग कोर्स[१] (Japanese: 鈴鹿国際レーシングコース Suzuka Kokusai Rēsingu Kōsu), अथवा सुझुका सर्किट (Japanese: 鈴鹿サーキット Suzuka Sākitto), हा ५.८०७ किमी (३.६०८ मैल) लांब मोटरस्पोर्ट रेस ट्रॅक आहे जो सुझुका येथे आहे. हा सर्किट होंडा मोबिलिटीलँड आणि होंडा मोटर कं, लि द्वारे संचालितआहे. या सर्किटची क्षमता १५५,००० आहे.
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ठळक दर्शवलेले चालक फॉर्म्युला वनच्या चालु हंगामात भाग घेत आहेत.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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ठळक दर्शवलेले कारनिर्माता फॉर्म्युला वनच्या चालु हंगामात भाग घेत आहेत.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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ठळक दर्शवलेले इंजिन निर्माता फॉर्म्युला वनच्या चालु हंगामात भाग घेत आहेत.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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गुलाबी दर्शवलेली शर्यत, फॉर्म्युला वनची शर्यत नाही आहे.
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जमखंडी विधानसभा मतदारसंघ कर्नाटक विधानसभेचा मतदारसंघ आहे. हा मतदारसंघ बागलकोट लोकसभा मतदारसंघात असून बागलकोट जिल्ह्यात मोडतो.
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जमनालाल बजाज व्यवस्थापकीय अध्ययन संस्था मुंबई विद्यापीठाचा व्यवस्थापन अभ्यास विभाग आहे. या संस्थेला भारतीय उद्योगपती आणि दानशूर जमनालाल बजाज यांचे नाव देण्यात आले आहे.
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याची स्थापना १९६५मध्ये स्टॅनफर्ड विद्यापीठाच्या सहकार्याने करण्यात आली होती.
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जमशेटजी फ्रामजी तथा जे.एफ. मादन (१८५६ – १९२३) हे भारतीय चित्रपटव्यवसायाच्या आद्य प्रवर्तकांपैकी एक होते. त्यांनी एलफिन्स्टन बायोस्कोप कंपनीची स्थापना करून अनेक चित्रपटांचे निर्माण केले तसेच एलफिन्स्टन नावाचे कायम स्वरूपाचे पहिले चित्रपटगृह १९०७ मध्ये कोलकातामध्ये सुरू केले.
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जमशेदजी नसरवानजी रुस्तुम (७ जानेवारी, १८८६ - १९८८) हे पाकिस्तानच्या कराची शहराचे महापौर आणि समाजसेवक होते.
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रुस्तुम कराची शहराचे बादशहा म्हणून ओळखले जात.
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पहिल्या महायुद्धानंतर जगभरात जशी इन्फ्लुएंझाची साथ आली, तशी ती कराचीतही आली. कराचीत रोगी जास्त आणि डाॅक्टर कमी होते. लोक आपल्यालाही हे दुखणे लागू नये म्हणून इन्फ्लुएंझाच्या रोग्यापासून दूर पळत. घरचे कुटुंबीयपण रोग्याची सेवा करायला घाबरत. अश्या वेळी जमशेटजी दुखणेकऱ्यांच्या मदतीसाठी पुढे आले. मृत्यूलाही न घाबरणारे जमशेटजी पाहून लोक त्यांना भगवान मानू लागले.
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जन्माने पारशी असले तरी जमशेटजींनी आपले सगळे आयुष्य धर्मांध लोकांना जाहीर विरोध करत व्यतीत केले. त्यांचे साधे व्यक्तिमत्त्व हे धार्मिक तत्त्वज्ञान, एकी आणि मैत्रीचे मूर्तरूप होते. यांच्याच आधारे जमशेटजी आपल्या आजूबाजूच्या लोकांशी सलोख्याचे संबंध टिकवून होते. त्यांचे आपलेपण हे जात, धर्म, वंश यांच्या पलीकडे होते. ते दुर्दैवाच्या फेऱ्यात गरीब झालेल्या खानदानी लोकांना नेहमी आर्थिक मदत करीत. दर महिन्याच्या पहिल्या तारखेला जमशेटजी त्यांच्या यादीत असलेल्या गरिबी आलेल्या कुटुंबीयांचे नाव लिहून रोख रकमेचे लिफाफे बनवत आणि त्यांना पोचते करत. कराचीच्या बाहेर राहणाऱ्या लोकांना ते मनीऑर्डरीने किंवा चेकने पैसे पाठवत.
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सन १९३३मध्ये जमशेटजी नसरवानजी कराचीचे मेयर झाले. त्यांच्या मेयरपदाच्या कारकिर्दीत त्यांनी कराची शहराला प्रगतिपथावर आणले. त्याकाळी कराचीतले रस्ते रोज पाण्याने धुतले जात. जमशेटजींसारखे लोकसेवक जेव्हा संपतील तेव्हा याच रस्त्यांवरून पुढे रक्ताचे पाट वाहतील याची कल्पना जमशेटजींनाही आली नव्हती.
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| 7 |
+
कराची शहरात एकेकाळी रस्त्यारस्त्यांवर आणि चौकाचौकांत महान लोकसेवकांचे पुतळे होते, जमशेटजींचाही होता. परंतु नंतर आलल्या सुल्तानशाहीत हे सर्व पुतळे उखडून फेकून दिले गेले.
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शहरात 'मामा पारसी गर्ल्स हायस्कूल' नावाची मुलीची एक उच्च दर्जाची शाळा आहे, तिला जमशेटजींनी आपल्या वडिलांच्या, खान बहादुर नसरवान यांच्या नावाने एक लाख पस्तीस हजाराची देणगी दिली होती, या देणगीची आज कुणालाच आठवण नाही.
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कराचीतले वयोवृद्ध लोक आजही कराचीचे बादशहा म्हणून जमशेटजी नसरवान रुस्तुम यांची आठवण काढतात.
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पाकिस्तान सरकारने जमशेटजीचे छायाचित्र असलेले एक ३ रुपये किंमतीचे पोस्टाचे तिकीट काढले आहे.
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जमानत हा एक हिंदी भाषा भाषेतील चित्रपट आहे. या मध्ये अमिताभ बच्चन यांनी काम केले होते.
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जमुगा हा चंगीझ खानाचा एके काळाचा जीवलग मित्र होता. पुढे दोघांचे बिनसल्याने आपापसात लढाया झाल्या. अशाच एका लढाईत जमुगाला बंदिवान करण्यात आले. चंगीझने झाले गेले सर्व विसरून पुन्हा आपल्या टोळीत येण्याचे आमंत्रण जमुगाला दिले. यावर भावुक होऊन जमुगाने त्याला विनंती केली की मी जरी टोळीत सामील झालो आणि झाले गेले विसरून जायचा प्रयत्न केला, तरी ते वाटते तितके आपल्या दोघांनाही सोपे जाणार नाही. जिवंत राहून एकमेकांच्या आयुष्यात अधिक दुःख आणण्यापेक्षा मी मरण पत्करतो.
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मंगोलियन रिवाजाप्रमाणे माणसाचे रक्त जमिनीवर सांडणे अपशकुनी मानले जाई; म्हणून जमुगाने आपल्या रक्ताचा एकही थेंब जमिनीवर न सांडता मृत्यू मिळावा अशी इच्छा प्रकट केली. त्याप्रमाणे त्याला चंगीझने गुदमरवून मृत्यू दिला व इमानाने त्याचा अंत्यविधी केला.
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गणपतराव देशमुख (१० ऑगस्ट १९२६ - ३० जुलै २०२१) हे एक भारतीय राजकारणी होते. महाराष्ट्र विधानसभेवर ५४ वर्षे ते सांगोला विधानसभा मतदारसंघातून आमदार म्हणून निवडून गेले. त्यांना लोक प्रेमाने आणि आपुलकीने "आबासाहेब" म्हणत. समानतेच्या तत्त्वांसह ते आदर्श व्यक्ती मानले जायचे. शेतकरी आणि कामगारांकडून त्यांना "भाई" म्हटले जाते. गरीब, महिला, मागासलेले, शेतकरी, कामगार यांच्यासाठी त्यांनी अनेक लढाया लढल्या.
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| 2 |
+
शेतकरी कामगार पक्ष या महाराष्ट्रातील राजकीय पक्षातील राजकारणी होते. सांगोला विधानसभा मतदारसंघातून १९६२पासून अनेक दशके ते महाराष्ट्र विधानसभेत निवडून गेले. महाराष्ट्रातील सर्वात ज्येष्ठ आमदार असण्याचा मान मिळालेल्या गणपतराव देशमुख यांनी अकरा वेळेस विधानसभा निवडणूक जिंकली होती. सोलापूर जिल्ह्यातील सांगोला मतदारसंघातून गणपतराव देशमुख शेतकरी कामगार पक्षाकडून अकरा वेळेस निवडून आले. तामिळनाडूचे माजी मुख्यमंत्री एम करुणानिधी हे १० वेळेस विजयी झाले होते.[१]
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| 3 |
+
महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुकीत सोलापूर जिल्ह्यातील सांगोला मतदारसंघातून ११व्यांदा त्यांनी विक्रमी विजय मिळविला.[२] २००९ च्या निवडणुकीत विजय मिळवून, करुणानिधी यांच्या पाठोपाठ दहाव्यांदा आमदारकीची निवडणूक जिंकणारे देशमुख हे देशातले दुसरे आमदार ठरले होते. गणपतरावांनी तब्बल ५४ वर्षे सांगोल्याचे प्रतिनिधित्व केले. २०१४ महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुकीत त्यांनी ९४ हजार ३७४ मते मिळवून शिवसेनेचे शहाजीबापू पाटील यांचा २५ हजार २२४ मतांनी पराभव केला.
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| 4 |
+
राष्ट्रवादी काँग्रेसने गणपतराव देशमुख यांच्याविरोधात उमेदवार उभा केला नव्हता. देशमुख हे सांगोल्यात सर्वप्रथम १९६२ च्या निवडणुकीत विजयी झाले. त्यानंतर १९७२ आणि १९९५चा अपवाद वगळता प्रत्येक निवडणुकीत सांगोल्यातील मतदारांनी त्यांनाच निवडून दिले. २०१२मध्ये आमदार म्हणून विधानसभेतील त्यांच्या सहभागास ५० वर्षे पूर्ण झाल्याबद्दल सभागृहाने तसेच सरकारने त्यांचा गौरव केला होता.[१]
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| 5 |
+
गणपतराव देशमुख हे बहुतांश काळ विरोधी बाकांवर होते. १९७८मध्ये शरद पवार यांनी पुलोद सरकार स्थापन केल्यावर आणि १९९९मध्ये शेकापने काँग्रेस आघाडी सरकारला पाठिंबा दिला तेव्हा, अशा दोन वेळा गणपतराव देशमुख यांचा मंत्रिमंडळात समावेश झाला होता. ३० जुलै २०२१ रोजी त्यांचे निधन झाले.[२]
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| 6 |
+
गणपतराव देशमुख यांच्यानंतर त्यांच्या घरातील इतर सदस्य राजकारणात सक्रिय झाले आहेत.[३] २०१९ साली गणपतराव देशमुख यांचे नातू अनिकेत देशमुख यांनी विधानसभा निवडणूक लढवली. पण त्यांना पराभव स्वीकारावा लागला.[४][५]
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जम्मू आणि काश्मीर आणि लडाख उच्च न्यायालय हे जम्मू आणि काश्मीर व लडाख या केंद्रशासित प्रदेशांसाठी सामायिक उच्च न्यायालय आहे. २६ मार्च १९२८ रोजी जम्मू आणि काश्मीरच्या महाराजांनी जम्मू आणि काश्मीर उच्च न्यायालय म्हणून त्याची स्थापना केली. न्यायालयाची जागा उन्हाळी राजधानी श्रीनगर आणि हिवाळी राजधानी जम्मू दरम्यान बदलते.
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न्यायालयाची मंजूर न्यायाधीश संख्या १७ आहे, त्यापैकी १३ स्थायी न्यायाधीश आहेत, आणि ४ अतिरिक्त न्यायाधीश आहेत. ४ जानेवारी २०२१ पासून न्यायालयाचे मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ती पंकज मिथल आहेत.[१]
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26 मार्च 1928 रोजी महाराजा हरी सिंह यांनी जारी केलेल्या आदेश क्रमांक १ द्वारे जम्मू आणि काश्मीर उच्च न्यायालयाची स्थापना करण्यात आली. महाराजांनी लाला कंवर सैन यांची पहिले मुख्य न्यायाधीश म्हणून आणि लाला बोधराज साहनी आणि खान साहिब आगा सय्यद हुसेन यांची पुसने म्हणून नियुक्ती केली. जम्मूची हिवाळी राजधानी आणि श्रीनगरची उन्हाळी राजधानी या दोन्ही ठिकाणी उच्च न्यायालय काम करते. महाराजांनी 10 सप्टेंबर 1943 रोजी उच्च न्यायालयात पत्रांचे पेटंट बहाल केले. न्यायाधीश खान साहिब आगा सय्यद हुसेन हे उच्च न्यायालयाचे पहिले मुस्लिम न्यायाधीश होते. ते महाराजांच्या राजवटीत जम्मू आणि काश्मीरचे गृह आणि न्यायमंत्री म्हणून निवृत्त झाले.
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ऑगस्ट 2018 मध्ये उच्च न्यायालयाला न्यायमूर्ती म्हणून नियुक्त करण्यात आलेल्या न्यायमूर्ती सिंधू शर्मा आणि मुख्य न्यायमूर्ती म्हणून नियुक्त करण्यात आलेल्या न्यायमूर्ती गीता मित्तल यांच्यासह पहिल्या आणि दुसऱ्या महिला न्यायमूर्ती मिळाल्या.
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ऑगस्ट 2019 मध्ये, भारतीय संसदेच्या दोन्ही सभागृहांनी पुनर्रचना विधेयक मंजूर केले. या विधेयकाने 31 ऑक्टोबर 2019 पासून जम्मू आणि काश्मीर राज्याची दोन केंद्रशासित प्रदेशांमध्ये-जम्मू आणि काश्मीर आणि लडाखमध्ये पुनर्रचना केली. या पुनर्रचनेनंतर, जम्मू आणि काश्मीर उच्च न्यायालय जम्मू आणि काश्मीर आणि लडाखचे उच्च न्यायालय म्हणून काम करत राहिले.
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न्यायमूर्ती पंकज मिथल यांची 4 जानेवारी 2021 रोजी उच्च न्यायालयाचे सर्वात अलीकडील मुख्य न्यायाधीश म्हणून नियुक्ती करण्यात आली.
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जय भीम: एका महानायकाची गाथा ही अँड टीव्ही वाहिनीवरील एक महानायक: डॉ. बी.आर. आंबेडकर या हिंदी मालिकेची मराठी भाषेत डब केलेली झी चित्रमंदिर आणि झी मराठी वाहिनीवर प्रसारित होणारी मालिका आहे.
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पौराणिक आणि इतर प्राचीन ग्रंथांत ज्यांचे उल्लेख आहेत अशा, आणि पूर्वी होऊन गेलेल्या अन्य थोर व्यक्तींच्या जन्मदिवसास जयंती असे म्हणतात. पंचागांतील तिथीनुसार देवादिकांच्या आणि ऋषिमुनींच्या जयंत्या साजऱ्या करण्याची पद्धत भारतात पूर्वपरंपरेने आहे. एकोणिसाव्या शतकापासून ग्रेगोरियन कालगणनेचा वापर जसा वाढत गेला तसा नव्या पिढ्यांतील लोकांचे जन्मदिवस आणि जयंत्या या भारतीय पंचागांपेक्षा ग्रेगोरियन कालगणनेनुसार पाळल्या जाऊ लागल्या. तरीसुद्धा, जुन्या काळातील लोकांच्या जयंत्या या अजूनही तिथीनुसारच साजऱ्या होतात. उदा० छत्रपती शिवाजी महाराज जयंती [ संदर्भ हवा ]
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जयंतीच्या उत्सवाची पारंपरिक प्रथा बहुशः धार्मिक अथवा भक्तिस्वरूपी असते. भक्तीच्या नवविधा प्रकारांपैकी एक प्रकार म्हणजे जयंत्या साजऱ्या करणे, असे समर्थ रामदास दासबोधाच्या चवथ्या दशकात श्रवणभक्ती संदर्भातील समासात सांगतात. विसाव्या शतकापासून भारतात जशी राजकीय जागृतीस सुरुवात झाली तसे लोकोत्तर स्त्री-पुरुषांच्या जयंत्या या सामाजिक आणि राजकीय अभिसरणाचे माध्यम म्हणून सार्वजनिक कार्यक्रमाच्या रूपाने साजऱ्या होऊ लागल्या. यांत लोकमान्य टिळकांनी सार्वजनिकरीत्या साजरी करण्याची सुरुवात केलेल्या छत्रपती शिवाजी महाराज जयंतीचे उदाहरण ठळकपणे मांडण्यासारखे आहे.
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पुढे दिलेल्या यादीतील तिथीसाठी दिलेल्या महिन्याचे नाव महाराष्ट्रात प्रचलित असलेल्या अमावास्यान्त महिन्याच्या पद्धतीनुसार आहे. पौर्णिमान्त पद्धतीनुसार वद्य पक्ष पुढच्या महिन्यात येतो. उदा0 त्या पद्धतीनुसार, मराठी ज्येष्ठ वद्य त्रयोदशी ही आषाढ वद्य त्रयोदशी होते.
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सौ. जयंती कठाळे 'पूर्णब्रम्ह'च्या व्यवस्थापकीय संचालिका (एम.डी.) आहेत. पूर्णब्रम्ह हा 'मनस्विनी फुड्स प्रायव्हेट लिमिटेड'चा प्रकल्प असून जगभरात मराठी खाद्यपदार्थांची गुणवत्तापूर्ण उपहारगृहे उभारणे व मराठी खाद्यसंस्कृती सर्वदूर पोहचविणे हे त्यांचे संकल्पित कार्य आहे.
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जयंती कठाळे या मूळच्या नागपूरच्या आहेत. त्यांनी 'एम.सी.ए.'ची पदवी घेतली आहे व त्या एक सॉफ्टवेर इंजिनिअर आहेत. 'माहिती तंत्रज्ञान' (आयटी) क्षेत्रात 'इन्फोसिस' या कंपनीमध्ये त्या कार्यरत होत्या. सन २०१२ पर्यंत १३ वर्षे त्यांनी माहिती तंत्रज्ञान क्षेत्रात काम केले आहे. नोकरीनिमित्त सन २००० साली बंगळूरू येथे बदली झाल्यावर मराठी पदार्थांची कमतरता त्यांना भासली. हाच अनुभव त्यांना विमानप्रवासातही आला. परप्रांतात, विमानतळावर व विमानातील दीर्घ प्रवासात मराठी पूर्णान्न न मिळाल्याने मराठी माणसांची होणारी अडचण लक्षात घेऊन त्याचेच निवारण करण्याचे स्वप्न त्यांनी पहिले. एकत्र कुटुंबात वाढलेल्या जयंती कठाळे यांना बालपणीपासूनच स्वयंपाकाची आवड होती. मराठी खाद्यसंस्कृतीत 'अन्न हे पूर्णब्रम्ह' असते असा प्रसार करून स्वतः मराठी उपाहारगृह उभारण्याचा त्यांनी निश्चय केला. बंगळूरूमध्ये व्यावसायिक संशोधन करून, खाद्य-पदार्थांची मागणी व पुरवठा लक्षात घेऊन, प्रत्येक प्रदेशाची वेगळी अशी चव चाखून पूर्णब्रम्हचा आराखडा त्यांनी तयार केला.
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सन २०१२ साली २० जणांना बसता येईल असे पहिले उपहारगृह त्यांनी ६० स्क्वेअरफुटच्या जागेत उभारले. तेथे साधा वरण भात, पुरणपोळी, थालीपीठ यांसारखे पदार्थ त्यांनी विकण्यास सुरुवात केली. बंगळूरूमधील अमराठी लोकांना रोजगार उपलब्ध करून देऊन त्यांना स्वयंपाक शिकवला. तेथे भाषा न समजणे, मराठी पदार्थ कसे असतात, ते कसे खातात हेही न समजणे अशा अनेक अडचणी त्यांना तेथील लोकांमध्ये जाणवल्या. कानडी पदार्थ व मराठी पदार्थ यांमधील फरक समजावून सांगून त्यांनी त्यांच्या कर्मचाऱ्यांना प्रशिक्षित केले. चवीबरोबरच उपहारगृहाचे वातावरण देखील मराठमोळे असावे असा त्यांचा आग्रह असतो. पूर्णब्रम्हमध्ये ग्राहकांना बसण्यासाठी चौरंग-पाटाच्या पंगती मांडल्या जातात. सौ. कठाळे या स्वतः नऊवारी साडीत वावरतात. तेथील कर्मचारी साडी, धोतर पगडी अशाच वेशात असतात. सध्या बंग��ूरूमध्ये ५७०० स्क्वेअरफुटमध्ये पूर्णब्रम्ह उभे आहे.
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संपूर्ण जगभरात पूर्णब्रम्हच्या एकूण ५,००० शाखा उभारण्याचे कठाळे यांचा बेत आहे. बंगळूरू, चेन्नई, हैदराबाद अशा शहरात; मुंबई, दिल्ली येथील आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर; तसेच अमेरिका, लंडन अशा परदेशातील अनेक प्रदेशात शाखा त्या उभारणार आहेत.[ संदर्भ हवा ]
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जयंतीलाल छोटालाल शाह (२२ जानेवारी, इ.स. १९०६:अहमदाबाद, गुजरात, भारत - ४ जानेवारी, इ.स. १९९१) हे भारताचे माजी सरन्यायाधीश होते. ते १७ डिसेंबर, इ.स. १९७० ते २१ जानेवारी, इ.स. १९७१ या एक महिन्याच्या कालावधीत सरन्यायाधीश होते. त्याआधी ते मुंबई उच्च न्यायालयाचे न्यायाधीश होते.
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जयदेव सुब्बराव हट्टंगडी ( २८ ओगस्ट १९४८ - ५ डिसेंबर २००८ ) हे मराठीतले एक नामवंत नाट्यदिग्दर्शक आणि नाट्यपरीक्षक होते. पंडित सत्यदेव दुबे यांच्याकडून त्यांनी नाट्यदिग्दर्शनाचे धडे घेतले. त्यानंतर जयदेव हट्टंगडी हे दिल्लीच्या ’राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयात (नॅशनल स्कूल ऑफ ड्रामा-NSD) दाखल झाले तिथून त्यांनी नाट्यशास्त्राची पदवी घेतली. यावेळी इब्राहिम अल्काझी त्यांचे गुरू होते.
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जयदेव हट्टंगडी यांची नाट्य कारकीर्द ’आविष्कार’ या नाट्यसंस्थेतून सुरू झाली. त्या संस्थेने प्रायोगिक रंगभूमीवर केलेल्या ’चांगुणा’ या नाटकामुळे हट्टंगडी प्रसिद्धीस आले. ‘आविष्कार’मध्ये असताना जयदेव हट्टंगडींनी ’चांगुणा’खेरीज, ’गौराई’, ’पोस्टर’, ’भिंत’, ’मेडिया’, आणि ’सोनेरी शहामृगाचा वग’, आदी नाटके दिग्दर्शित करून सादर केली.
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इ.स.१९xx मध्ये हट्टंगडी यांनी स्वतःची,’कलाश्रय’ नावाची नाट्यसंस्था स्थापन केली. या नाट्यसंस्थेने ’अपराजित’ (मराठी-हिंदी), ’एवं इंद्रजित’(हिंदी)आणि ’वाडा भवानी आईचा’ ही नाटके प्रायोगिक रंगभूमीवर आणली. ’कलाश्रय’च्या स्थापनेनंतरसुद्धा, जयदेव हट्टंगडी हे ’आविष्कार’चे अविभाज्य घटक राहिले.
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जयदेव हट्टंगडी हे आधी बडोद्याच्या सयाजीराव गायकवाड विद्यापीठात नाट्यशास्त्र शिकवीत. नंतर ते मुंबई विद्यापीठाच्या ’अॅकॅडमी ऑफ थिएटर आर्ट्स’ या नाट्यशास्त्र विभागात अध्यापन करू लागले. त्या काळी महाराष्ट्रात नाट्यशिक्षण देणारे ते एकमेव शिक्षक होते.
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जयदेव हट्टंगडी यांची नाट्यपरीक्षक म्हणून कारकीर्द फार मोठी होती. ’आविष्कार’ नाट्यसंस्थेचे ते आधारस्तंभ होते. त्यांच्याचमुळे संस्थेचे नाट्यशिक्षणाचे उपक्रम यशस्वी झाले. त्यांच्यासारखा दुसरा नाट्यपरीक्षक विरळाच. त्या संस्थेत हट्टंगडी वर्षाला दोन नाट्यशिबिरे घ्यायचे. या शिबिरांमधून त्यांनी कितीतरी नाट्यकलावंत घडवले. इ.स. १९७४पासून ते अगदी मरेपर्यंत हट्टंगडींनी हे काम केले.
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जयदेव हट्टंगडींनी खालील नाटकांतून भूमिका केल्या :
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मराठी :
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हिंदी :
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हिंदी-इंग्रजीतील अॅटनबरो-दिग्दर्शित गांधी चित्रपटात कस्तुरबांची भूमिका, आणि इतर असंख्य हिंदी-मराठी नाटक-चित्रपटांतून वेगवेगळ्या भूमिका करणाऱ्या रोहिणी हट्टंगडी या जयदेव हट्टंगडींच्या पत्नी होत.
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चालता बोलता नॅशनल स्���ूल ऑफ ड्रामा म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या जयदेव हट्टंगडी, यांचे वयाच्या साठाव्या वर्षी कॅन्सरने निधन झाले.
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गणपती विघ्नेश (११ ऑगस्ट, ११८१ - ) हा भारतीय क्रिकेट खेळाडू आहे. हा भारतीय क्रिकेट लीगमध्ये चेन्नई सुपरस्टार्स आणि भारतीय प्रीमियर लीगमध्ये चेन्नई सुपर किंग्सकडून खेळला.
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बुलढाणा जिल्ह्यातील मोताळा तालुक्यात जयपूर हे गाव आहे.
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जयप्रकाश सावंत हे एक मराठी लेखक आहेत. त्यांनी अनेक हिंदी पुस्तकांचे मराठी अनुवाद केले आहेत. लोकवाङ्मयगृह ह्या प्रकाशनसंस्थेचे एक संपादक म्हणून ते प्रसिद्ध आहेत.[१]
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सावंत हे हाफकिन इन्स्टिट्यूट येथे कामाला होते. सेवानिवृत्तीनंतर लोकवाङ्मयगृहाचे एक संपादक म्हणून ते काम पाहू लागले.[१]
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जयरामण मदनगोपाळ (७ नोव्हेंबर, १९७४:मद्रास (आता चेन्नई), भारत - हयात) हे भारताचे पूर्वाश्रमीचे क्रिकेट खेळाडू तर सद्य क्रिकेट पंच आहेत.
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मदनगोपाळ हे तमिळनाडूतर्फे १९९८ ते २००६ दरम्यान एकूण १०५ प्रथम-श्रेणी आणि ५४ लिस्ट-अ सामने खेळले.
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त्यांचा पंच म्हणून पहिला सामना हा २०२१ साली होता.
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जयशंकर प्रसाद (३० जानेवारी १८८९ - १५ नोव्हेंबर १९३७) [१] [२] हे हिंदी कवी, नाटककार, कथा लेखक, कादंबरीकार आणि निबंधकार होते. हिंदीच्या छायायुगाच्या चार प्रमुख स्तंभांपैकी ते एक आहेत. त्यांनी हिंदी कवितेमध्ये छायावाद अशा प्रकारे प्रस्थापित केला ज्यातून खरीबोलीच्या काव्यात दुर्मिळ गोडीचा रससिद्ध प्रवाह तर प्रवाहित केलाच, पण जीवनाचे सूक्ष्म आणि व्यापक परिमाण चित्रित करण्याचे सामर्थ्यही त्यांच्यात जमा झाले आणि कामायनीमध्ये पोहोचल्यानंतर ती कविता प्रेरणादायी शक्तिकाव्य ठरली. फॉर्ममध्येही प्रतिष्ठित झाले. नंतरच्या काळात पुरोगामी आणि नवीन काव्यप्रवाहातील प्रमुख समीक्षकांनी त्यांची ही शक्ती मान्य केली आहे. याचा अतिरिक्त परिणाम असा झाला की 'खडीबोली' ही हिंदी कवितेची निर्विवाद सिद्ध भाषा बनली.
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आधुनिक हिंदी साहित्याच्या इतिहासात त्यांच्या कार्याचा गौरव अबाधित आहे. कविता, नाटक, कथा आणि कादंबरी या क्षेत्रात एकाच वेळी हिंदीला अभिमानास्पद काम देणारे ते युगप्रवर्तक लेखक होते. निराला, पंत, महादेवी यांच्यासह कवी म्हणून त्यांना छायावादाचे प्रमुख आधारस्तंभ म्हणून ओळखले जाते; नाट्यलेखनात भारतेंदूनंतर, एक वेगळा प्रवाह पेलणारे ते युगप्रवर्तक नाटककार होते, ज्यांची नाटके आजही वाचक वाचतातच, पण त्यांची अर्थपूर्णता आणि नाट्यसंगतीही दिवसेंदिवस वाढत आहे. या दृष्टिकोनातून, वीरेंद्र नारायण, शांता गांधी, सत्येंद्र तनेजा आणि आता सर्वात महत्त्वाचे म्हणजे महेश आनंद यांनी त्यांचे महत्त्व ओळखण्यात आणि स्थापित करण्यात प्रशंसनीय ऐतिहासिक योगदान दिले आहे. याशिवाय कथा, कादंबरी क्षेत्रातही त्यांनी अनेक अविस्मरणीय कामे दिली. भारतीय दृष्टी आणि हिंदीच्या मांडणीनुसार ते गंभीर निबंध-लेखक म्हणून प्रसिद्ध आहेत. आपल्या विविध निर्मितींद्वारे त्यांनी मानवी करुणेचे आणि भारतीय मनाच्या अनेक वैभवशाली पैलूंचे कलात्मक स्वरूपात उद्घाटन केले आहे.
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जयशंकर प्रसाद यांचा जन्म माघ शुक्ल दशमी, संवत १९४६ [१] (त्यानुसार ३० जानेवारी १८९० दिवस-गुरुवार) [२] काशी येथील गोवर्धनसराय येथे झाला. त्यांचे आजोबा बाबू शिवरतन साहू देणगीसाठी प्रसिद्ध होते आणि त्यांचे वडील बाबू देवीप्रसाद सुद्धा देणगी देण्यासाठी तसेच कलाकारांचा आदर करण्यासाठी प्रसिद्ध होते. त्यांना काशीमध्ये खूप आदर होता आणि काशीचे लोक बाबू देवी प्रसादाचे 'हर हर महादेव' ने काशीनरेश नंतर स्वागत करायचे. [३] [४] वयाच्या १५ व्या वर्षी त्यांची आई श्रीमती मुन्नी देवी यांचा १९०५ मध्ये पौष कृष्ण सप्तमीला मृत्यू झाला आणि वयाच्या १७ व्या वर्षी, १९०७ मध्ये भाद्रकृष्ण षष्ठी या दिवशी त्यांचा मोठा भाऊ शंभूरत्न मरण पावला [५] जणू काही पर्वतच होते. प्रसादजींवर त्यांच्या किशोरावस्थेतच संकटे आली होती. कच्चं घर, घरात आधार म्हणून फक्त विधवा वहिनी, दुसरीकडे कुटुंबातील सदस्य आणि कुटुंबाशी संबंधित इतरांची मालमत्ता बळकावण्याचे कारस्थान, या सगळ्याचा त्यांनी संयमाने आणि गांभीर्याने सामना केला. [३] [५]
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प्रसादजींचे प्रारंभिक शिक्षण काशी येथील क्वीन्स कॉलेजमध्ये झाले, परंतु हे शिक्षण अल्पकाळ टिकले. सहाव्या इयत्तेपासून तेथे शिक्षण सुरू झाले [६] आणि ते फक्त सातव्या इयत्तेपर्यंतच शिकू शकले. [५] त्यांच्या शिक्षणाची व्यापक व्यवस्था घरीच करण्यात आली होती, जिथे त्यांनी हिंदी आणि संस्कृतचे शिक्षण घेतले. श्री मोहिनीलाल गुप्ता हे प्रसाद जींचे प्रारंभिक शिक्षक होते. ते कवी होते आणि त्यांचे टोपणनाव 'रसमय सिद्ध' होते. शिक्षक म्हणून ते खूप प्रसिद्ध होते. [७] चेतगंजच्या प्राचीन दलहट्टा परिसरात त्यांची स्वतःची छोटी बाल पाठशाळा होती. [६] 'रसमय सिद्ध' जी यांनी प्रसादजींना प्राथमिक शिक्षण दिले आणि हिंदी आणि संस्कृतमध्ये चांगली प्रगती केली. [७] प्रसादजींनी संस्कृतचे सखोल शिक्षण घेतले होते. तीन संस्कृत शिक्षकांची नावे त्यांच्या जवळच्या तीन सुधी व्यक्तींमार्फत सापडली आहेत. डॉ. राजेंद्र नारायण शर्मा यांच्या म्हणण्यानुसार, "चेतगंजच्या तेलियानेच्या पातळ गल्लीत, इटावा येथील एक प्रख्यात विद्वान राहत होते. संस्कृत साहित्यातील त्या ऋषींचे नाव गोपाळबाबा होते. प्रसाद जी यांना संस्कृत साहित्य शिकवण्यासाठी त्यांची निवड करण्यात आली. [८] विनोदशंकर व्यास यांच्या मते "श्री दीनबंधू ब्रह्मचारी त्यांना संस्कृत आणि उपनिषदे शिकवत असत. [५] राय कृष्णदास यांच्या म्हणण्यानुसार, रसमय सिद्धाकडून सूचना मिळाल्यानंतर, "प्रसादजींनी एका विद्वान हरिहर महाराजांकडून संस्कृतचा पुढील अभ्यास केला. ते लहुराबीर परिसरात राहत होते. प्रसादजींचे संस्कृतवरचे प्रेम वाढतच गेले. त्यांनी स्वतः ��्याचा चांगला सराव केला होता. नंतर त्यांनी स्व-अभ्यासातून वैदिक संस्कृतवर प्रभुत्व मिळवले. " [७] महामहोपाध्याय पं. देवीप्रसाद शुक्ल कवि-चक्रवर्ती, बनारस हिंदू विद्यापीठातील संस्कृत शिक्षक, यांना प्रसादचे काव्यगुरू मानले जाते. [९]
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घरच्या वातावरणामुळे त्यांना सुरुवातीपासूनच साहित्य आणि कलेची आवड होती आणि वयाच्या नवव्या वर्षी त्यांनी 'कलाधर' या नावाने व्रजभाषेत सवैया लिहून 'रसमय सिद्ध' यांना दाखविल्याचे सांगितले जाते. . [१०] त्यांनी वेद, इतिहास, पुराणे आणि साहित्य यांचा अतिशय गांभीर्याने अभ्यास केला होता . त्याला बागकाम आणि स्वयंपाकाची आवड होती आणि तो बुद्धिबळपटूही होता. ते नियमित व्यायाम, सात्विक आहार आणि गंभीर स्वभावाचे होते. [३] त्यांची पहिली कविता 'सावक पंचक' १९०६ मध्ये भारतेंदू पत्रिकामध्ये कलाधर नावाने प्रकाशित झाली. ते नित्यनेमाने गीतेचे पठण करायचे, पण त्यांनी संस्कृतमधील गीतेचे केवळ पठण पुरेसे मानले नाही आणि गीतेचा अर्थ जीवनात आत्मसात करणे आवश्यक मानले. [११]
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प्रसादजींचा पहिला विवाह १९०९ मध्ये विंध्यवासिनी देवीसोबत झाला. त्यांच्या पत्नीला क्षयरोग झाला होता. १९१६ मध्ये विंध्यवासिनी देवी यांचे निधन झाले. तेव्हापासून त्यांच्या घरात क्षयरोगाचे जंतू शिरले होते. १९१७ मध्ये त्यांनी सरस्वती देवीसोबत दुसरे लग्न केले. त्याच्या दुसऱ्या लग्नानंतर त्याच्या दुसऱ्या पत्नीनेही पहिल्या पत्नीच्या साड्या वगैरे नेसल्या आणि काही काळानंतर तिलाही क्षयरोग झाला आणि इ.स.च्या दोन वर्षांनी बाळंतपणात तिचाही क्षयरोगामुळे मृत्यू झाला. [१२] यानंतर त्याला पुन्हा स्थायिक होण्याची इच्छा नव्हती, परंतु अनेकांना समजावून सांगण्यासाठी आणि सर्वात जास्त आपल्या वहिनीचे रोजचे हलाखीचे जीवन सोडवण्यासाठी त्याला लग्न करण्यास भाग पाडले गेले. १९१९ मध्ये त्यांचे तिसरे लग्न कमला देवीसोबत झाले. त्यांचा एकुलता एक मुलगा रत्नशंकर प्रसाद हा तिसऱ्या पत्नीचा मुलगा होता, [५] ज्याचा जन्म सन १९२२ मध्ये झाला होता. प्रसाद जी यांनाही आयुष्याच्या अखेरीस क्षयरोग झाला आणि बराच काळ अॅलोपॅथी व्यतिरिक्त होमिओपॅथिक आणि आयुर्वेदिक औषधांचा अवलंब करूनही या आजारातून सुटका होऊ शकली नाही आणि अखेर १५ नोव्हेंबर रोजी या आजाराने त्यांचे निधन झाले. १९३७ (दिवस-सोमवार) (वय ४७) ��काळी काशी येथे त्यांचे निधन झाले. [१३]
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जयसिंगराव मानसिंगराव घोरपडे.
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जुलै ९, इ.स. २००६
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दुवा: [१] (इंग्लिश मजकूर)
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_11311.txt
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टी२०आ किट
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जर्मन राष्ट्रीय क्रिकेट संघ हा पुरुषांचा संघ आहे जो आंतरराष्ट्रीय क्रिकेटमध्ये जर्मनी देशाचे प्रतिनिधित्व करतो.
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चुका उधृत करा: "lower-alpha" नावाच्या गटाकरिता <ref>खूणपताका उपलब्ध आहेत, पण संबंधीत <references group="lower-alpha"/> खूण मिळाली नाही.
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_11425.txt
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२६° ४२′ ००″ N, ८९° ००′ ००″ E
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जलपाइगुडी हा भारताच्या पश्चिम बंगाल राज्यातील जिल्हा आहे. याचे प्रशासकीय केंद्र जलपाइगुडी येथे आहे.
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_11430.txt
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पावसाच्या पाण्याची साठवण (Rainwater harvesting) म्हणजे पुनर्वापरासाठी पावसाचे पाणी जमा करणे.पावसाचे पाणी घराच्या,इमारत छतावरून एका मोठ्या जमिनीखालच्या टाकीमध्ये गोळा करतात व वर्षभर पिण्यासाठी वापरतात. काही ठिकाणी साठवावयाचे पाणी खोल खड्डा (विहीर, शाफ्ट किंवा बोअरहोल), पाझर असलेल्या जलाशयांत साठवतात. पाणी जाळी किंवा इतर साधनांसह दंव किंवा धुक्यातूनही गोळा केले जाते. हे माणसासाठी अपेय असलेले पाणी गार्डन, पशुधन, सिंचन वा घरगुती वापरासाठी योग्य असते. कापणीचे पाणी, पिण्याचे पाणी हे दीर्घ मुदतीची साठवण करून वापरले जाऊ शकते.
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सहा कॅरिबियन देशाच्या मिशन्सनंतर असे दिसून आले आहे नंतरच्या वापरात आणण्यासाठी पावसाचे पाणी साठवल्याने मातीच्या किंवा पाण्याच्या टंचाईमुळे काही किंवा सर्व वर्षांसाठी होणारा कापणीचा धोका कमी होण्यास मदत होते. याव्यतिरिक्त, अतिवृष्टीच्या हंगामात पुरांमुळे माती वाहून जाण्याची जोखीम कमी होण्याची शक्यता असते. लहान शेतकऱ्यांना, विशेषतः हिमाच्छादित प्रदेशात शेती करणाऱ्यांना पावसाच्या पाण्याची साठवण करण्यापासून बहुतेक फायदे होऊ शकतात. त्यांना वाहतूक कॅंप्ले (?) जाऊ शकते आणि मातीची धूप कमी होण्यास मदत होते.
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चीन,अर्जेंटिना आणि ब्राझीलमध्ये छतावरील पावसाचे पाणी साठवण्याकरता पिण्याचे पाणी, घरगुती पाणी, पशुपालकांसाठी पाणी, लहान सिंचनासाठी पाणी आणि भूजल पातळी पुन्हा भरण्याचा मार्ग वापरला जातो. चीनमधील गांसु प्रांत आणि अर्धवाह्य उत्तरपूर्व ब्राझीलमध्ये सर्वात मोठ्या छप्पर पावसाचे पाणी साठवण प्रकल्प चालू आहेत. थायलंडच्या सुमारे ४०% लोकसंख्या पावसाच्या पाण्याची साठवण करते. १९८० च्या दशकात पावसाचे पाणी साठवण्याच्या प्रक्रियेस सरकारने मोठ्या प्रमाणात प्रोत्साहन दिले. १९९० च्या दशकात संकलन टंकांसाठी सरकारी निधी संपल्या नंतर खाजगी क्षेत्रातील लोकांनी खाजगी घराण्यांनी पायउतार केले आणि खाजगी घरांना अनेक दशलक्ष टॅंक प्रदान केले, त्यापैकी बरेच आजही वापरतात. हे जगभरातील पाण्याच्या स्वयंपूर्णतेचे सर्वात मोठे उदाहरण आहे.
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आंध्र प्रदेश, भारत, भूजल तक्ता सामान्य ग्राउंड स्तरापेक्षा सुमारे ७ मीटर कमी आहे. पावसाच्या पाण्याच्या साठवणीच्या विविध पद्धतींमुळे, मान्सूनच्या हंगामात पावसाचे पाणी वापरून ४ मीटरने जमिनीवर पाणी ठेवू शकते. भूजल पुनर्भरण हे महत्त्वाचे आहे कारण पाण्याचा तुटवडा न करता पाणी तुटपुंजेच जमिनीवर पाणी जाऊ शकते.
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https://divyamarathi.bhaskar.com/news/EDT-rain-water-saving-and-harvesting-2277039.html
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http://prahaar.in/%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A8-%E0%A4%B5%E0%A5%89%E0%A4%9F%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%8D/[permanent dead link]
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https://en.wikipedia.org/wiki/Rainwater_harvesting
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_11458.txt
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जलसंपदा विभाग मंत्रालय हे महाराष्ट्र शासनचे एक मंत्रालय आहे . महाराष्ट्र राज्याच्या विकासासाठी वार्षिक योजना तयार करण्याची जबाबदारी आहे.
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मंत्रालयाचे नेतृत्व कॅबिनेट स्तरावरील मंत्री करतात. देवेंद्र फडणवीस हे सध्या जलसंपदा विभाग मंत्री आहेत. आणि महाराष्ट्राचे उप मुख्यमंत्री.[१][२]
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https://wrd.maharashtra.gov.in/
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_11484.txt
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जलावरण शास्त्र पृथ्वी आणि इतर ग्रह, जलचक्र, जल संसाधने आणि पर्यावरण पाणलोट टिकाव समावेश चळवळ, वितरण, आणि पाण्याची गुणवत्ता यांचा शास्त्रीय अभ्यास आहे.जलावरणशाञ व्यवसायी पृथ्वी किंवा पर्यावरण विज्ञान, भौतिक भूगोल, जिऑलॉजी किंवा नागरी आणि पर्यावरण अभियांत्रिकी शेतात आत काम, एक जलवैज्ञानिअक आहे. [1]अशा पर्यावरण संरक्षण, नैसर्गिक आपत्ती, आणि पाणी व्यवस्थापन, पाणी संबंधित समस्या सोडविण्यास मदत करण्यासाठी डेटा विविध विश्लेषणात्मक पद्धती आणि वैज्ञानिक तंत्रांचा वापर करून, ते गोळा आणि विश्लेषण. [2]
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मार्कस Vitruvius पहिल्या शतक इ.स.पू. 17 जल चक्राचा एक तात्त्विक सिद्धांत मांडला यामधे त्यांनी सांगितले कि पर्वतांवर पडणारे पाणी प्रुथ्वीच्या पृष्ठभागात च्आणि. पश्चिमे प्रवाह. आणि झरे साधला जे पर्जन्य वर्णन.अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोन उचलून सह, लिओनार्दो दा विंची आणि बर्नार्ड Palissy स्वतंत्रपणे hydrologic सायकल एक अचूक प्रतिनिधित्त्व गाठली.hydrologic चल सुरुवात केली की 17 व्या शतकात पर्यंत बळावर करणे नव्हते.
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Hydrology आधुनिक विज्ञान आद्यप्रवर्तक पियरे Perrault, Edme Mariotte आणि एडमंड हॅले याने समावेश आहे.पाऊस, वाहणारे पाणी, आणि क्षेत्र पाण्याखाली आहे मोजण्यासाठी करून, Perrault पाऊस सिएन प्रवाह खाते पुरेसा होता की झाली.Marriotte एकत्र गती आणि नदी क्रॉस विभागात मोजमाप सिएन पुन्हा स्त्राव प्राप्त करण्यासाठी.हॅले झाली भूमध्य समुद्र पासून बाष्पीभवन समुद्रात नद्या निचरा साठी खाते पुरेसा होता.
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18 व्या शतकातील प्रगती सेंट पीटर्सबर्ग, रशिया piezometer आणि डॅनियल सेंट पीटर्सबर्ग, रशिया यांनी सेंट पीटर्सबर्ग, रशिया समीकरण, आणि Pitot ट्यूब, हेन्री Pitot समाविष्ट.19 व्या शतकात Darcy नियम, Dupuit-Thiem तसेच सूत्र, आणि Hagen-Poiseuilleच्या केसासारखे प्रवाह समीकरण समावेश, भू hydrology विकास पाहिले.
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सरकारी संस्था त्यांच्या स्वतःच्या hydrological संशोधन कार्यक्रम सुरुवात केली, तर योग्य कारणाचा विश्लेषणातून, 20 व्या शतकात प्रायोगिक तत्त्वाचा वापर पुनर्स्थित सुरुवात केली.विशिष्ट महत्त्व Leroy शेर्मान युनिट hydrograph, रॉबर्ट ई Horton भिनणे सिद्धांत, आणि सीव्ही Theisच्या सच्छिद्र चाचणी / समीकरण तसेच hydraulics वर्णन होते.
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1950 पासून, hydrology पूर्वी पेक्षा अधिक सैद्धांतिक तत्त्वावर संपर्क साधला आले आहे, hydrological प्रक्रिया भौतिक समजून आणि संगणक आणि विशेषतः भौगोलिक माहिती प्रणाली (जीआयएस) घटने किंवा प्रसंगाचे आगमन करून प्रगती करून देण्यात.
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dataset/scraper_3/batch_15/wiki_s3_11527.txt
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जळगाव हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील नाशिक जिल्ह्यातील मालेगाव तालुक्यातील एक गाव आहे.
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येथे मार्चच्या मध्यापासून जूनच्या पूर्वार्धापर्यंत उन्हाळा असतो. उन्हाळ्यात हवामान सामान्यतः उष्ण असून तापमान ३८ ते ४० सेल्सियसपर्यंत असते.जून महिन्याच्या मध्यापासून पावसास सुरुवात होऊन ऑक्टोबरच्या मध्यापर्यंत पावसाळा असतो. सर्वसाधारण नोव्हेंबर ते फेब्रुवारी या काळात थंडी असते.वार्षिक सर्वसाधारण हवामान उष्ण व विषम असते.वार्षिक पर्जन्यमान १,००० मि.मी.पर्यंत असते.
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