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कांग्रेस दल का नेता कौन है ?
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"भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस\n1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस भारत के मुख्य राजनैतिक दलों में से एक रही है। इस दल के कई प्रमुख नेता भारत के प्रधानमन्त्री रह चुके हैं। जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री,पण्डित नेहरू की पुत्री इन्दिरा गाँधी एवं उनके नाती राजीव गाँधी इसी दल से थे। राजीव गाँधी के बाद सीताराम केसरी काँग्रेस के अध्यक्ष बने जिन्हे सोनिया गाँधी के समर्थकों ने नामंजूर कर दिया तथा सोनिया गाँधी को हाईकमान बनाया, राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया गाँधी काँग्रेस की अध्यक्ष तथा यूपीए की चेयरपर्सन भी रह चुकी हैं। कपिल सिब्बल, काँग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल, राशिद अल्वी, राज बब्बर, मनीष तिवारी आदि काँग्रेस के वरिष्ट नेता हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह भी काँग्रेस से ताल्लुक रखते हैं।",
"गरम दल\nगरम दल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अन्दर ही सदस्यों के मतभेद के कारण उपजा एक धड़ा था जिसके नेता लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल थे। बंगाल विभाजन के बाद काँग्रेस के नरम दल के लोगों के साथ इस दल के स्पष्ट विरोध सामने आये।स्वदेशी आंदोलन की शुरूआत बंगाल विभाजन के परिणामस्वरूप (1905ई) हुई जिसमें ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित किया गया। गरम दल नेता अरविंद घोष, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल तथा लाल लाजपत राय स्वदेशी आंदोलन को पूरे देश में लागू करना चाहतें थे जबकि नरमपंथ सिर्फ इसे बंगाल तक सीमित रखना चाहतें थे। मतभेद बढ़तें गये तथा 1907 के कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस ’नरमदल’ व गरमदल’ में विभाजित हो गई। गरम दल वाले वन्देमातरम् को राष्ट्र गान बनाना चाहते थे जबकि नरम दल वाले जन गण मन के समर्थक थे।",
"प्रणब मुखर्जी\nसन 1985 के बाद से वह कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के भी अध्यक्ष हैं। सन 2004 में, जब कांग्रेस ने गठबन्धन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनायी, तो कांग्रेस के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह सिर्फ एक राज्यसभा सांसद थे। इसलिए जंगीपुर (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया। उन्हें रक्षा, वित्त, विदेश विषयक मन्त्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मन्त्रालयों के मन्त्री होने का गौरव भी हासिल है। वह कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधायक दल के नेता रह चुके हैं, जिसमें देश के सभी कांग्रेस सांसद और विधायक शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोकसभा में सदन के नेता, बंगाल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्रिपरिषद में केन्द्रीय वित्त मन्त्री भी रहे। लोकसभा चुनावों से पहले जब प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने अपनी बाई-पास सर्जरी कराई, प्रणव दा विदेश मन्त्रालय में केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद राजनैतिक मामलों की कैबिनेट समिति के अध्यक्ष और वित्त मन्त्रालय में केन्द्रीय मन्त्री का अतिरिक्त प्रभार लेकर मन्त्रिमण्डल के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।"
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"जनता दल (सेक्युलर)\nजनता दल (सेक्युलर) भारत का एक राजनैतिक दल है जिसके नेता भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री एच. डी. देवेगौड़ा हैं। यह दल कर्नाटक और केरल में प्रान्तीय दल के रूप में पंजीकृत है। इसकी स्थापना १९९९ में जनता दल से टूटकर हुई।",
"उत्तराखण्ड क्रान्ति दल\nपार्टी के वर्तमान चेहरे काशी सिंह ऐरी, उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के एक प्रमुख नेता, उत्तर प्रदेश विधान सभा में तीन बार (१९८५-१९८९, १९८९-१९९१, १९९३-१९९६) विधायक और उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के एक वरिष्ठ नेता हैं जो प्रथम उत्तराखण्ड विधान सभा २००२ में विधायक और उक्राद के अध्यक्ष भी रहे हैं। पार्टी के वर्तमान उपाध्यक्ष भुवन चंद्र जोशी और बीना बहुगुणा, वरिष्ठ राज्य आन्दोलनकारी और उत्तराखण्ड राज्य के गठन में सबसे आगे से संघर्ष करने वाले उत्तराखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन के प्रमुख चेहरे हैं। जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार निर्वाचित विधायक थे। अन्य विभूतियों में बिपिन चन्द्र त्रिपाठी, इन्द्रमणि बडोनी जो अलग राज्य आन्दोलन के लिए उक्राद के संस्थापक सदस्यों और लंबे समय से राज्य आन्दोलनकारियों में से एक थे, शामिल हैं।",
"नरम दल\nउदारवादी नेताओं का यह विश्वास था कि ब्रिटिश शासन न्यायप्रिय है। टी. माधवराव ने कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन में स्वागत-समिति के अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए कहा था कि, कांग्रेस ब्रिटिश शासन का यश शिखर है और ब्रिटिश जाति की कीर्ति मुकुट है।",
"भारतीय चुनाव\nभारतीय लोक दल के नेता चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम, जिन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी, जनता गठबंधन के सदस्य थे, लेकिन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के से वे खुश नहीं थे।",
"भारतीय क्रांति दल\nभारतीय क्रांति दल भारत का एक राजनैतिक दल था जिसकी स्थापना १९६७ में चौधरी कुम्भाराम आर्य , चौधरी चरण सिंह ने की थी। सन १९७७ के आम चुनावों के बाद यह दल जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। 1966 में राजस्थान के किसान नेता चौधरी कुंभाराम आर्य राजस्थान व मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया से भूमि सुधार कानून, पंचायती राज, व सहकरिक्ता के सबंध में गंभीर मतभेद उतपन्न होने के बाद 27 दिसम्बर 1966 में कांग्रेस पार्टी के सभी पदों व मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। उत्तरप्रदेश में चौधरी चरणसिंह कांग्रेस से वर्ष 1967 में अलग हो गए उसके बाद चौधरी कुम्भाराम आर्य व चौधरी चरण सिंह ने साथ मिलकर भारतीय क्रांति दल की स्थापना की थी चौधरी चरण सिंह को भारतीय क्रांति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष,चौधरी कुम्भाराम आर्य राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने, उसके बाद उत्तर प्रदेश एवं बिहार में भारतीय क्रांति दल अपनी सरकार बनाने में सफल रहा चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हेमवंती नंदन बहगुणा को कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया तथा महामाया प्रसाद सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने, 1968 में चौधरी कुंभाराम आर्य भारतीय क्रांति दल के टिकट पर राज्यसभा सदस्य चुने गए राजस्थान से। 1975 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी ने देश में फैली अशांति व अराजकता से निपटने के लिए आपात स्थिति लागू कर दी। देश में आपातकाल की घोषणा के बाद देशभर के विरोधी दलों के नेता एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया उसी समय भारतीय क्रांति दल के नेताओं को भी जेल में बंद कर दिए गया, उसके बाद 1977 में सभी गैर कांग्रेसी दलों ने मिलकर जनता पार्टी के नाम से साझा मोर्चा बनाया था,संयुक्त रूप से कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ा जिसमें भारतीय क्रांतिदल का विलय जनता पार्टी में हो गया, जनसंघ, तथा अन्य दल भी शामिल थे।",
"झलनाथ खनाल\nझलनाथ खनाल (जन्म:१९ मार्च १९५०, साँखेजुङ (इलाम जिला) नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक शीर्ष नेता और नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री है। ३ फ़रवरी २०११ को निर्वाचित हुए खनाल नेकपा (एमाले) के अध्यक्ष भी है। खनाल हाल ही में इलाम जिला क्षेत्र नं. १ से संविधान सभा सदस्य के रूप में चुने गए। इसके पहले वे कई बार मन्त्री भी बन चुके हैं। विद्यार्थी जीवन से भूमिगत कम्युनिष्ट राजनीति में लगे खनाल तत्कालीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के पोलित ब्यूरो सदस्य बनने के बाद महासचिव पद पर आसीन हुए। २०४७ साल में नेकपा मार्क्सवादी और नेकपा माले मिलकर नेकपा (एकिकृत माक्सवादी लेनिनवादी) बनने के बाद वे उस पार्टी के स्थायी समिति सदस्य हुए। २०६६ साल के बुटवल अधिवेशन के बाद वे एमाले के अध्यक्ष में निर्वाचित हुए। खनाल ने २०६७ माघ २३ गते राष्ट्रपति रामवरण यादवके सामु पद और गोपनीयताके सपथ ग्रहण किया। नेपाल के सबसे असफल प्रधानमंत्री बनने का रेकॉर्ड हैं इनके पास।",
"भारतीय चुनाव\nप्रथम आम चुनाव से ठीक पहले नेहरू के दो पूर्व कैबिनेट सहयोगियों ने कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अलग राजनीतिक दलों की स्थापना कर ली थी। जहां एक ओर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर 1951 में जनसंघ की स्थापना की, वहीं दूसरी ओर दलित नेता भीमाराव अम्बेडकर ने अनुसूचित जाति महासंघ (जिसे बाद में रिपब्लिकन पार्टी का नाम दिया गया) को पुनर्जीवित किया। जो अन्य दल उस समय आगे आए उनमें आचार्य कृपालनी की किसान मजदूर प्रजा परिषद, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हैं। हालांकि, इन छोटे दलों को पता था कि वे वास्तव में कांग्रेस के खिलाफ कहीं खड़े नहीं होते हैं।"
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पाकिस्तान में कोनसा धर्म सबसे बढ़ा है?
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"सिन्धी लोग\nइस्लामी विजय से पहले हिंदू धर्म सिंध में प्रमुख धर्म था। पाकिस्तान की 1998 की जनगणना के अनुसार, हिंदुओं ने सिंध प्रांत की कुल आबादी का लगभग 8% हिस्सा बनाया था। उनमें से ज्यादातर कराची, हैदराबाद, सुक्कुर और मीरपुर खास जैसे शहरी इलाकों में रहते हैं। हैदराबाद पाकिस्तान में सिंधी हिंदुओं का सबसे बड़ा केंद्र है, जहाँ 100,000-150,000 लोग रहते हैं। 1947 में पाकिस्तान की स्वतंत्रता से पहले हिंदुओं का अनुपात अधिक था।"
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"पंजाब, पाकिस्तान में हिंदू धर्म\nपाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हिंदू धर्म अल्पसंख्यक धर्म है, जिसके बाद इसकी आबादी लगभग 0.2% है। हिंदू धर्म मुख्य रूप से रहीम यार खान और बहावलपुर के दक्षिणी पंजाब जिलों में पालन किया जाता है।",
"पाकिस्तान में सिख धर्म\nपाकिस्तान में सबसे बड़ी सिख जनसंख्या पेशावर में ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पाई जाती है, जहाँ \"नानावती\" (संरक्षण) के पश्तून कानून ने हिंसा के पैमाने को बचाया जो पंजाब के सिंधु नदी में था। दक्षिण एशिया में सिख और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय तक तनाव के बावजूद, पश्तून सिखों के धार्मिक अल्पसंख्यक के प्रति सहिष्णु थे |",
"पाकिस्तान में हिन्दू धर्म\nहिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म की जनसंख्या का पाकिस्तान में ऐतिहासिक अधःपतन देखा गया है। ये होने की पृष्ठिभूमि में कई प्रकार के कारण हैं, फिर भी पाकिस्तान के पूर्वीय सीमा क्षेत्रों में इनका विकास अविरत चल रहा है। भी इन धर्मों के लिए जारी रखा है पनपने से परे पूर्वी सीमाओं का पाकिस्तान है। दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल साम्राज्य के कालखण्ड में मिशनरी सूफी संतों के कारण ये धर्म मुख्य रूप से मुस्लिम बन गये, जिनकी दरगाह पाकिस्तान और अन्य दक्षिण एशिया में हैं। मुख्य रूप से मुस्लिम जनता ने मुस्लिम लीग और पाकिस्तान आंदोलन का समर्थन किया। 1947 में स्वतंत्रता के पश्चात् पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों ने भारत की ओर स्थानान्तरण किया। जबकि मुसलमानों ने भारत को छोड़ कर पाकिस्तान को अपना लिया। लगभग 6 लाख हिंदुओं और सिखों ने स्थानान्तरण किया, जबकि लगभग समान संख्या में मुसलमान पाकिस्तान में चले गये। कुछ हिन्दूओं को पाकिस्तान में लगता कि उनके साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिके समान व्यवहार होता है, अतः उन्होंने भारत की ओर स्थानान्तरण कर लिया।",
"पाकिस्तान में धर्म\nआधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्र में सिख धर्म की व्यापक विरासत और इतिहास है, हालांकि सिख वर्तमान रूप से पाकिस्तान में एक छोटा सा समुदाय बनाते हैं। अधिकांश सिख पंजाब प्रांत में रहते हैं, जो बड़े पंजाब क्षेत्र का हिस्सा है जहाँ से यह धर्म मध्य युग में पैदा हुआ था, और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत में पेशावर। ननकाना साहिब, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान पंजाब प्रांत में स्थित है। 18 वीं और 19वीं शताब्दी में, सिख समुदाय एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत बन गया, सिख नेता रणजीत सिंह ने पहला सिख साम्राज्य स्थापित किया, जिसकी राजधानी लाहौर में हुई थी, जो आज पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। सिखों की महत्वपूर्ण आबादी पंजाब के सबसे बड़े शहरों जैसे लाहौर, रावलपिंडी और फैसलाबाद में बसे। 1947 में भारत के विभाजन के बाद, अल्पसंख्यक हिंदू और सिख भारत चले गए जबकि भारत के कई मुस्लिम शरणार्थियों ने पाकिस्तान में बसना पसंद किया था। पाकिस्तान में हिंदु धर्म का अनुसरण करने वाले कुल जनसंख्या के लगभग 2% है। पूर्वतन जनगणना के समय पाकिस्तानी हिंदुओं को \"जाति\" (1.6%) और अनुसूचित जाति (0.25%) में विभाजित किया गया। पाकिस्तान को ब्रिटेन से स्वतन्त्रता 14 अगस्त, 1947 मिली उसके बाद 44 लाख हिंदुओं और सिखों ने आज के भारत की ओर स्थानान्तरण किया, जबकि भारत से 4.1 करोड़ मुसलमानों ने पाकिस्तान में रहने के लिये स्थानातरण किया। 1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में 1.6% भारतीय जनसंख्या थी, जबकि पूर्वी पाकिस्तान (आधुनिक बांग्लादेश) में 22.05% थी। सैतालिस वर्षों के पश्चात् 1997 में पाकिस्तान की हिन्दू जनसंख्या में वृद्धि नहीं हुई, अतः 1.6% हिन्दु थे और बांगलादेश में हिन्दू-जनसंख्या भारी गिरावट आयी और केवल 10.2% हिन्दु ही बचे। 1998 की पाकिस्तान की जनगणना में अभिलिखित है कि, 2.5 लाख हिन्दु जनसंख्या पाकिस्तान में बची है। अधिकतर हिंदु पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहते हैं। पाकिस्तान में दशकों से अल्पसंख्यक हिन्दु और क्रिश्चन आदि उत्पीड़न सह रहे हैं। जो 2014 तक अत्यन्त गम्भीर स्तर पर पहोंच गया था।",
"पाकिस्तान में सिख धर्म\nआधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्र में सिख धर्म की व्यापक विरासत और इतिहास है, हालांकि सिख वर्तमान रूप से पाकिस्तान में एक छोटा सा समुदाय बनाते हैं। अधिकांश सिख पंजाब प्रांत में रहते हैं, जो बड़े पंजाब क्षेत्र का हिस्सा है जहाँ से यह धर्म मध्य युग में पैदा हुआ था, और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत में पेशावर। ननकाना साहिब, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान पंजाब प्रांत में स्थित है।",
"पाकिस्तान में बौद्ध धर्म\nपाकिस्तान की असली बौद्ध खजाना पहाड़ के पार तक्षशिला में है जो आधुनिक शहर इस्लामाबाद से 35 किलोमीटर दूर है। तक्षशिला के अधिकांश पुरातात्विक स्थल तक्षशिला संग्रहालय के आसपास स्थित हैं जो ज्यादातर बौद्ध धर्म से जुड़े हैं। सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से कुछ हैं: धर्मराजिका स्तूप और मठ, भीर टीला (600-200 ईसा पूर्व), सिरकप, जंडियाल मंदिर और जुलियन मठ।",
"एशिया में धर्म\n(हिंदू धर्म) सनातन धर्म 1 अरब से अधिक अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म एशिया का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे पुराना धर्म है | जनसांख्यिकीय, यह [भारत] में सबसे बड़ा धर्म (80%), नेपाल (81%), और बाली द्वीप (83.5%), [भूटान], फिजी, इंडोनेशिया, मलेशिया, [बांग्लादेश] के एशियाई देशों में मजबूत अल्पसंख्यकों के साथ है। [पाकिस्तान], सिंगापुर, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, यमन, रूस, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, कतर, म्यांमार, फिलीपींस और अफगानिस्तान। आज सनातन धर्म को हिंदू धर्म कहा जाता है।",
"पाकिस्तान में जैन धर्म\nइस देश भर में कई प्राचीन जैन मंदिर बिखरे पड़े हुए हैं। बाबा धरम दास एक संत व्यक्ति थे जिनकी समाधि पाकिस्तान के पंजाब में सियालकोट शहर के पास, पसरूर में कृषि मुख्य कार्यालय के पीछे, चावंडा फाटिक के पास एक नाले के किनारे स्थित है जिसे देओका या देओके या देग नाम से भी जाना जाता हैं। इस क्षेत्र के एक अन्य प्रमुख जैन भिक्षु गुजरांवाला के विजयनंदसूरी थे, जिनकी समाधि (स्मारक मंदिर) आज भी शहर में उपस्थित है।",
"एशिया में धर्म\nलगभग 30 मिलियन अनुयायियों के साथ सिख धर्म दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा संगठित धर्म है। और यह धर्म बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। यह 1500 के दशक में गुरु नानक देव द्वारा स्थापित एक एकेश्वरवादी धर्म है। धर्म पंजाब के क्षेत्र में अपनी जड़ों का दावा करता है, जिनके क्षेत्र भारत और पाकिस्तान का हिस्सा हैं।"
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गूगल की खोज किसने की थी ?
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"गूगल खोज\nगूगल खोज या गूगल वेब खोज वेब पर खोज का एक इंजन है, जिसका स्वामित्व गूगल इंक के पास है और यह वेब पर सबसे ज्यादा उपयोग किया जाने वाला खोज इंजन है। अपनी विभिन्न सेवाओं के जरिये गूगल प्रति दिन कई सौ लाख विभिन्न प्रश्न प्राप्त करता है। गूगल खोज का मुख्य उद्देश्य अन्य सामग्रियों, जैसे गूगल चित्र खोज के मुकाबले वेबपृष्ठों से सामग्री की खोज करना है। मूलतः गूगल खोज का विकास 1997 में लैरी पेज और सेर्गेई ब्रिन ने किया।"
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"गूगल खोज\nअगस्त 2009 में गूगल ने एक नई खोज प्रणाली की घोषणा की, जिसका कूट नाम \"कैफीन\" था। नई प्रणाली परिणामों को तेजी से दिख्नाने फेसबुक और ट्विटर सहित सेवाओं की शीघ्रता से अद्यतन सूचना से बेहतर तरीके से निपटने के लिए डिजाईन की गई है। गूगल के डेवलपर्स ने कहा कि अधिकतर उपयोगकर्ताओं ने तत्काल परिवर्तन पर थोड़ा ही ध्यान दिया, लेकिन डेवलपर्स को अपने सैंडबॉक्स में नई खोज का परीक्षण करने के लिए आमंत्रित किया। भारी खोज शब्द और डोमेन की उम्र के महत्व को शामिल करते हुए खोज इंजन अनुकूलन पर उनके प्रभाव को लेकर मतभेद दर्ज किये गये। कुछ हलकों में इस पहल को माइक्रोसॉफ्ट की हाल की अपनी खोज सेवा, जिसे बिंग के रूप में पुनर्नानामित किया गया, के उन्नत संस्करण जारी करने की प्रतिक्रिया के रूप में व्याख्यायित किया गया। 8 जून 2010 को गूगल ने कैफीन के पूरा होने की घोषणा करते हुए यह दावा किया कि अपनी अनुक्रमणिका को निरंतर अद्यतन करते रहने के कारण 50% नये परिणाम दिखे. कैफीन के साथ गूगल ने पीछे की ओर खत्म होने वाली अनुक्रमण प्रणाली को मैपरिड्युस से अलग ले जाकर बिग टेबल की ओर मोड़ दिया, जो कंपनी का वितरित डेटाबेस आधार है। कैफीन कोलोसस या जीएसफएस2 (GFS2) पर भी आधारित है, जो जीएफएस (GFS) द्वारा वितरित फाइल प्रणाली की पूरी तरह मरम्मत की गई प्रणाली है।",
"गूगल समूह\nडेजा न्यूज़ रिसर्च सर्विसेस एक यूज़नेट चर्चा समूह के लिए पोस्टेड संदेशों का एक संग्रह था, जिसकी शुरूआत ऑस्टिन, टेक्सास में स्टीव मडेरे द्वारा मार्च 1995 में हुआ था। इसके शक्तिशाली खोज इंजन की क्षमताओं ने सेवा प्रशंसा हासिल की, विवाद उत्पन्न किया और ऑनलाइन चर्चा के कथित प्रकृति में काफी बदलाव को हासिल किया।",
"गूगल\nमार्च 1999 में कम्पनी ने अपने कार्यालयों को पालो अल्टो, कैलिफ़ोर्निया में स्थानान्तरित किया, जो कि कई अन्य बड़ी सिलिकॉन वैली कम्पनियों का ठिकाना है। इसके एक वर्ष बाद पेज और ब्रिन के शुरूआती विमुखता के बावजूद, गूगल ने खोज-शब्दों/संकेतशब्द (Keywords) से जुड़े विज्ञापनों को बेचना शुरू किया। खोज-पृष्ठ को साफ-सुथरा तथा गति बनाये रखने के लिए, विज्ञापन केवल पाठ आधारित थे। संकेतशब्द की बिक्री उसकी बोली तथा क्लिकों के संयोजन के आधार पर की जाती थी। इसके लिए न्यूनतम बोली पाँच सेन्ट प्रति क्लिक थी। संकेतशब्द से विज्ञापनों को बेचने का यह मॉडल पहली बार गोटू.कॉम (Goto.com)—आइडियालैब के बिल ग्रौस का एक उपोत्पाद द्वारा किया गया। इस कम्पनी ने अपना नाम ओवरचर सर्विसेस रख लिया और गूगल पर उसके ॠण-प्रति-क्लिक और बोली के पेटेंट्स का कथित उल्लंघन करने का मुकदमा किया। ओवरचर सर्विसेस बाद में याहू द्वारा खरीद लिया गया और इसका नया नाम याहू! सर्च मार्केटिंग रखा गया। पेटेंट्स के उल्लंघन का मामला आपस में सुलझा लिया गया। इसके लिए गूगल ने अपने सामान्य शेयरों में से कुछ की हिस्सेदारी याहू! को दी और उसके बदले पेटेंट्स का शाश्वत लाईसेंस अपने नाम करवा लिया।",
"गूगल समूह\n2001 तक खोज सेवा बंद हो गई थी। फरवरी 2001 में, गूगल ने डेजा न्यूज़ का अधिग्रहण किया और इसकी संपत्ति को groups.google.com में परिवर्तित किया। उस समय प्रयोक्ता नए गूगल ग्रुप इंटरफ़ेस के माध्यम से इन यूज़नेट समाचारसमूह का उपयोग कर सकते थे।",
"गूगल\nगूगल बुक्स्, एक और विवादास्पद खोज सेवा है जिसकी गूगल मेज़बानी करता है। कम्पनी ने पुस्तकों की स्कैनिंग तथा सीमित पूर्वावलोकन और अनुमति के साथ पुस्तकों की पूर्ण अपलोडिंग अपने नये पुस्तक खोज इंजन में चालू किया। 2005 में, ऑथर्स गिल्ड, एक समूह जो 8000 अमेरिकी लेखकों का प्रतिनिधित्व करता है, ने न्यूयॉर्क शहर के एक संघीय अदालत में इस नयी सेवा पर गूगल के खिलाफ एक वर्ग कार्रवाई मुकदमा दायर किया। पुस्तकों के सम्बन्ध में गूगल ने कहा है कि यह सेवा कॉपीराइट कानून के सभी मौजूदा और ऐतिहासिक अनुप्रयोगों का अनुपालन करती है। अंततः एक संशोधित निपटान के लिए 2009 में गूगल ने स्कैनिंग अमेरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की किताबों तक सीमित कर दिया। इसके अलावा, पेरिस सिविल कोर्ट ने 2009 के अन्त में गूगल के खिलाफ़ उसके डेटाबेस से ला मार्टिनियर () का काम हटाने का फ़ैसला सुनाया। अमेज़न.कॉम (Amazon.com) से आगे निकलने के लिए गूगल नयी किताबों का डिजिटल संस्करण बेचने की योजना कर रहा है। इसी तरह, नवागंतुक बिंग के जवाब में, 21 जुलाई 2010 को गूगल ने अपने छवि खोज में का प्रवाहित क्रम चालू किया, जो इंगित करने पर फ़ैल (बड़े हो) जाते हैं। हालाँकि वेब खोज अभी भी एक थोक (बैच) प्रति पृष्ठ के प्रारूप के अनुसार दिखाई देते हैं, 23 जुलाई 2010 से, कुछ अंग्रेजी शब्दों के शब्दकोश परिभाषा वेब खोजों के लिए लिंक किये गये परिणामों के ऊपर दिखने लगे। उच्च-गुणवत्ता को महत्त्व देते हुए मार्च 2011 में गूगल ने अपना एल्गोरिथम परिवर्तित किया।",
"गूगल\nगूगल का उद्यम बाज़ार में प्रवेश फरवरी 2002 में के साथ हुआ गूगल खोज उपकरण, जो बड़े संगठनों को खोज तकनीक प्रदान करने की ओर लक्षित है। गूगल ने छोटे संगठनों को ध्यान में रखते हुए मिनी तीन साल बाद बाज़ार में उतारा। 2006 के अन्त में गूगल ने परिपाटी (कस्टम) खोज व्यवसाय संस्करण बेचना चालू किया, जिससे ग्राहकों को Google.com के सूची में विज्ञापन मुक्त विंडो उपलब्ध होता है। 2008 में इस सेवा का नाम गूगल साइट सर्च रख दिया गया। गूगल के उद्यम उत्पादों में से एक उत्पाद गूगल ऐप्स प्रीमियर संस्करण है। यह सेवा और उसके साथ गूगल ऐप्स शिक्षण संस्करण तथा सामान्य संस्करण, कम्पनियों, विद्यालयों और अन्य संगठनों को गूगल के ऑनलाइन अनुप्रयोगों को, जैसे कि जीमेल और गूगल डॉक्यूमेंट्स, अपने डोमेन में डालने की अनुमति देते हैं। प्रीमियर संस्करण, विशेष रूप से सामान्य संस्करण से अधिक सुविधाएँ, जैसे कि अधिक डिस्क स्पेस, एपीआई का उपयोग और प्रीमियम सहायता 50 डॉलर प्रति उपयोगकर्ता प्रति वर्ष के दर से प्रदान करता है। गूगल ऐप्स का एक बड़ा कार्यान्वयन 38,000 उपयोगकर्ताओं के साथ थंडर बे, ओंटारिओ, कनाडा में लेकहेड विश्वविद्यालय में किया गया है। उसी वर्ष गूगल ऐप्स शुरू किया गया। गूगल ने पोस्तिनी को अधिकृत किया और गूगल ने इस कम्पनी के सुरक्षा प्रौद्योगिकी को गूगल ऐप्स से गूगल पोस्तिनी सेवाएँ के अन्तर्गत संगठित किया।",
"पे-पर-क्लिक (प्रति क्लिक भुगतान)\nगूगल ने खोज इंजन विज्ञापन की शुरुआत दिसंबर 1999 में की. एडवर्ड्स प्रणाली को अक्टूबर 2000 में पेश किया गया, जहां विज्ञापनदाता गूगल खोज इंजन पर दिखाए जाने के लिए टेक्स्ट विज्ञापन का निर्माण कर सकते थे। हालांकि, पीपीसी को 2002 में ही पेश किया जा सका; उस समय तक विज्ञापन के लिए प्रति हजार की लागत के हिसाब से भुगतान प्राप्त किया जाता था।",
"खोज इंजन\nलगभग 2000 में गूगल खोज इंजन () ने प्रमुखता पाई.अनेक खोजों तथा पृष्ठ श्रेणी () जैसे नवीन प्रयास के आह्वान से कंपनी ने बेहतर परिणाम पाया। पुनरावृतिये एल्गोरिथम वेब पन्नों का श्रेणी अन्य वेब साइट्स के संख्या और पृष्ठ श्रेणी तथा जोड़ने वाले पन्नों पर इस तथ्य पर आधारित है की अच्छा या वाँछित पन्ने दूसरों से अधिक वेब साइटों से जुड़े हों.खोज इंजन के लिए गूगल ने भी अल्पतम अन्तरफलक को बनाये रखा इसके विपरीत इसके कई प्रतियोगियों ने वेब पोर्टल () में खोज इंजन सन्निहित किया",
"गूगल\nगूगल सर्च, एक वेब खोज इंजन, कम्पनी की सबसे लोकप्रिय सेवा है। नवम्बर 2009 में कॉमस्कोर (comScore) द्वारा प्रकाशित एक शोध के अनुसार, गूगल संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के बाजार में प्रमुख खोज इंजन है, जिसकी बाज़ार में 65.6% की है। गूगल अरबों वेब पृष्ठों को अनुक्रमित करता है, ताकि उपयोगकर्ता, खोजशब्दों और प्रचालकों (ऑपरेटरों) के प्रयोग के माध्यम से सही जानकारी की खोज कर सके। इसकी लोकप्रियता के बावजूद, गूगल सर्च को कई संगठनों से आलोचना मिली है। 2003 में, न्यूयॉर्क टाइम्स ने गूगल अनुक्रमण के बारे में शिकायत की, उसने अपने साइट के सामग्री की गूगल कैशिंग को उस सामग्री पर लागू उनके कॉपीराइट का उल्लंघन बताया। इस मामले में नेवादा के संयुक्त राज्य जिला न्यायालय ने फील्ड बनाम गूगल और पार्कर बनाम गूगल का फैसला गूगल के पक्ष में सुनाया। इसके अलावा, प्रकाशन ने उन शब्दों की एक ऐसी सूची तैयार की है जिनमें इस दिग्गज कम्पनी की नयी त्वरित खोज सुविधा खोज नहीं करेगी। गूगल वॉच ने गूगल पेजरेंक एल्गोरिथम की आलोचना करते हुए कहा कि यह नयी वेबसाइटों के खिलाफ़ भेदभाव और स्थापित साइटों के पक्ष में है और गूगल और एनएसए और सीआईए के बीच सम्बन्ध होने का आरोप लगाया। आलोचना के बावजूद, बुनियादी खोज इंजन विशिष्ट सेवाओं, जैसे कि छवि खोज इंजन, गूगल समाचार खोज साइट, गूगल नक्शा और अन्य सहित फैल गया है। 2006 की शुरूआत में कम्पनी ने गूगल वीडियो का शुभारम्भ किया, जिसका प्रयोग उपयोगकर्ता इंटरनेट पर वीडियो अपलोड, खोज और देखने के लिए कर सकते हैं। 2009 में तथापि, खोज सेवा के पहलु पर ध्यान केंद्रित करने के लिए गूगल ने गूगल वीडियो में अपलोड की सेवा बन्द कर दी। यहाँ तक कि उपयोगकर्ता के कम्प्यूटर में फाइलों की खोज के लिए गूगल ने गूगल डेस्कटॉप विकसित किया। गूगल की खोज में सबसे हाल ही की गतिविधि संयुक्त राज्य पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय से साझेदारी की है, जिससे पेटेंट और ट्रेडमार्क के बारे में जानकारी मुफ़्त में उपलब्ध होगी।"
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एलोन मस्क का जन्म कब हुआ था?
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"एलन मस्क\nएलन मस्क का जन्म 28 जून, 1971 को, दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया, ट्रांसवाल, मेय मस्क के बेटे (नी हल्दमैन) के यहाँ हुआ था, जो रेजिना, सस्केचेवान, कनाडा, से एक मॉडल और आहार विशेषज्ञ थे और एक दक्षिण अफ्रीकी विद्युत इंजीनियर, पायलट और नाविक भी थे। उनका एक छोटा भाई, किम्बल (1972 का जन्म), और एक छोटी बहन, तोस्का (1974 का जन्म) है। उनके नाना, डॉ। जोशुआ हाल्डमैन, अमेरिकी मूल के कनाडाई थे। उनकी धर्मपत्नी ब्रिटिश थीं। 1980 में उनके माता-पिता के तलाक के बाद, मस्क ज्यादातर अपने पिता के साथ प्रिटोरिया के उपनगरीय इलाके में रहते थे, यह विकल्प उन्होंने अपने माता-पिता के अलग होने के दो साल बाद बनाया था, लेकिन बाद में उन्हें इसका पछतावा हुआ। उनका एक सौतेली बहन और एक सौतेला भाई भी है।",
"एलन मस्क\nईलॉन रीव मस्क (; जन्म 28 जून 1971) एक दक्षिण अफ्रीकी-कनाडाई-अमेरिकी दिग्गज व्यापारी, निवेशक और इंजीनियर हैं। एलन स्पेसएक्स के संस्थापक, सीईओ और मुख्य डिजाइनर; टेस्ला कंपनी के सह-संस्थापक, सीईओ और उत्पाद के वास्तुकार; ओपनएआई के सह-अध्यक्ष; न्यूरालिंक के संस्थापक और सीईओ और द बोरिंग कंपनी के संस्थापक हैं। इसके अलावा वे सोलरसिटी के सह-संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष, ज़िप2 के सह-संस्थापक और एक्स.कॉम के संस्थापक हैं, जोकि बाद में कॉन्फ़िनिटी के साथ विलय हो गया और उसे नया नाम पेपैल मिला।"
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"एम्बर हर्ड\nअगस्त 2017 तक, एलोन मस्क को लगभग एक साल तक सुना गया।",
"अल कपोन\nएल्फोंसे गेब्रिएल कपोन का जन्म न्यू यॉर्क सिटी के ब्रुकलीन बोरो में हुआ था। उनके पिता का नाम गेब्रिएल कपोन (12 दिसम्बर 1864 - 14 नवम्बर 1920) तथा माँ का नाम टेरेसिना कपोन (28 दिसम्बर 1867 - 29 नवम्बर 1952) था। गेब्रिएल नेपल्स, इटली के लगभग दक्षिण में स्थित एक शहर कैस्टेलामेयर डी स्टेबिया के एक नाई (बार्बर) थे। टेरेसिना एक दर्जिन (सिलाई-कढ़ाई करने वाली) थीं और सालेर्मो प्रान्त में स्थित एक शहर आन्ग्री के निवासी एंजेलो रायोला की पुत्री थीं।",
"एलन मस्क\nअपने बचपन के दौरान, मस्क एक शौकीन चावला पाठक थे। 10 वर्ष की आयु में, उन्होंने कमोडोर VIC-20 का उपयोग करते हुए कंप्यूटिंग में रुचि विकसित की। उन्होंने खुद को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सिखाई और, 12 साल की उम्र तक, उन्होंने एक बेसिक-आधारित वीडियो गेम का कोड बेच दिया, जिसे उन्होंने ब्लास्टार टू पीसी और ऑफिस टेक्नोलॉजी पत्रिका में लगभग 500 डॉलर में बेचा। उनके बचपन के पढ़ने में इसहाक असिमोव की फाउंडेशन श्रृंखला शामिल थी, जिसमें से उन्होंने सबक लिया कि \"आपको उन कार्यों के सेट को लेने की कोशिश करनी चाहिए जो सभ्यता को लम्बा करने की संभावना रखते हैं, एक अंधेरे युग की संभावना को कम करते हैं और एक अंधेरे युग की लंबाई को कम करते हैं।\" एक है\"।",
"एलन मस्क\n2000 के दशक की शुरुआत से 2020 के अंत तक, मस्क कैलिफ़ोर्निया में रहते थे, जहां टेस्ला और स्पेसएक्स दोनों की स्थापना हुई थी और जहां उनका मुख्यालय अभी भी स्थित है।",
"अल कपोन\nकपोन परिवार 1893 में संयुक्त राज्य अमेरिका में आकर 95 नेवी स्ट्रीट पर बस गया। वह स्थान डाउनटाउन ब्रुकलिन के नेवी यार्ड सेक्शन में था और 29 पार्क एवेन्यू में स्थित बार्बर शॉप (नाई की दुकान) के नजदीक ही था जहाँ गेब्रिएल काम करते थे। जब अल 11 वर्ष के थे तब कपोन परिवार पार्क स्लोप, ब्रुकलीन में 38 गारफील्ड प्लेस में रहने के लिए चला गया।",
"एंड्रयू आइंस्ली कॉमन\nकॉमन का जन्म 7 अगस्त 1841 को न्यूकैसल अपॉन टाइन में हुआ था। उनके पिता, थॉमस कॉमन, एक सर्जन, जो मोतियाबिंद के इलाज के लिए जाने जाते थे, की मृत्यु तब हो गई जब एंड्रयू एक बच्चा था, जिससे उन्हें मजदूरी की दुनिया में जल्दी जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 1860 के दशक में उन्होंने मैथ्यू हॉल एंड कंपनी की सैनिटरी इंजीनियरिंग कंपनी में एक चाचा के साथ मिलकर काम किया। उन्होंने 1867 में शादी की। 1890 में वह मैथ्यू हॉल से सेवानिवृत्त हुए। एंड्रयू आइंस्ली कॉमन की 2 जून 1903 को हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई।",
"अल्फांसो क्वारोन\nअल्फोंसो क्वारोन ओरोज़्को का जन्म मेक्सिको सिटी में 28 नवंबर 1961 को हुआ था, वे अल्फ्रेडो क्यूरोन के बेटे थे, जो परमाणु चिकित्सा में विशेषज्ञता वाले डॉक्टर थे और क्रिस्टीना ओरोज़्को, जो एक दवा जैव रसायनविद् है। उनके दो भाई हैं, कार्लोस, एक फिल्म निर्माता और अल्फ्रेडो, एक संरक्षण जीवविज्ञानी है। क्वारोन ने नेशनल ऑटोनॉमस यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेक्सिको में दर्शनशास्त्र और उसी विश्वविद्यालय के एक स्कूल सीयूईसी में फिल्म निर्माण की पढ़ाई की। वहां, उनकी मुलाकात निर्देशक कार्लोस मार्कोविच और छायाकार इमैनुएल लुबज़्की से हुई और उन्होंने उनकी पहली लघु फिल्म, \"वेंजेस इज़ माइन\" बनाई। क्वारोन शाकाहारी है और 2000 से लंदन में रह रहे हैं।",
"जेम्स क्लर्क मैक्सवेल\nयह एक सुखद संयोग कहा जाएगा कि जिस वर्ष मैक्सवेल की मृत्यु हुई उसी वर्ष (1879) महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन का जन्म हुआ । शायद प्रकृति को इस महान वैज्ञानिक का पद रिक्त रखना गवारा न हुआ.उनकी खोजों ने आधुनिक दुनिया के तकनीकी नवाचारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया और अगली शताब्दी में भौतिकी को अच्छी तरह से प्रभावित करना जारी रखा, साथ ही अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे विचारकों ने उनके अपरिहार्य योगदान के लिए प्रशंसा की।"
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प्रथम विश्व युद्ध कब हुआ था ?
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"पहला विश्व युद्ध\nप्रथम विश्व युद्ध (WWI या WW1 के संक्षिप्त रूप में जाना जाता है) यूरोप में होने वाला यह एक वैश्विक युद्ध था जो 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चला था। इसे महान युद्ध या \"सभी युद्धों को समाप्त करने वाला युद्ध\" के रूप में जाना जाता था। इस युद्ध ने 6 करोड़ यूरोपीय व्यक्तियों (गोरों) सहित 7 करोड़ से अधिक सैन्य कर्मियों को एकत्र करने का नेतृत्व किया, जो इसे इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में से एक बनाता है। यह इतिहास में सबसे घातक संघर्षों में से एक था, जिसमें अनुमानित 9 करोड़ लड़ाकों की मौत और युद्ध के प्रत्यक्ष परिणाम के स्वरूप में 1.3 करोड़ नागरिकों की मृत्यु, जबकि 1918 के स्पैनिश फ्लू महामारी ने दुनिया भर में 1.7-10 करोड़ की मौत का कारण बना, जिसमें कि यूरोप में अनुमानित 26.4 लाख मौतें और संयुक्त राज्य में 6.75 लाख स्पैनिश फ्लू से हुई यह पूरी तरह सेेे 1919 खत्म हुुई!",
"जलियाँवाला बाग हत्याकांड\nप्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में भारतीय नेताओं और जनता ने खुल कर ब्रिटिशों का साथ दिया था। 13 लाख भारतीय सैनिक और सेवक यूरोप, अफ़्रीका और मिडल ईस्ट में ब्रिटिशों की तरफ़ से तैनात किए गए थे जिनमें से 43,000 भारतीय सैनिक युद्ध में शहीद हुए थे। युद्ध समाप्त होने पर भारतीय नेता और जनता ब्रिटिश सरकार से सहयोग और नरमी के रवैये की आशा कर रहे थे परंतु ब्रिटिश सरकार ने मॉण्टेगू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार लागू कर दिए जो इस भावना के विपरीत थे।",
"उबैदुल्लाह सिंधी\n1914 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के साथ, दारुल उलूम देवबंद ने विश्व के अन्य सहानुभूतिपूर्ण राष्ट्रों की सहायता से ब्रिटिश भारत में पैन-इस्लाम के कारण को आगे बढ़ाने के प्रयास किए। महमूद अल हसन के नेतृत्व में, ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी फ्रंटियर प्रांत के जनजातीय बेल्ट में शुरू होने वाली विद्रोह के लिए योजनाएं तैयार की गई थीं।. महमूद अल हसन ने हिजाज के तुर्की गवर्नर गलीब पाशा की मदद लेने के लिए भारत छोड़ दिया, जबकि हसन के निर्देशों पर, उबायदुल्ला ने अमीर हबीबुल्लाह के समर्थन की तलाश में काबुल की ओर अग्रसर किया। शुरुआती योजनाएं इस्लामी सेना (हिजब अल्लाह) का मुख्यालय मदीना में हुई थीं, काबुल में एक भारतीय दल के साथ। मौलाना हसन इस सेना के जनरल-इन-चीफ थे। . उबायदुल्ला के कुछ छात्र वहां पहुंचने से पहले उबायदुल्ला के कुछ लोग काबुल गए थे। काबुल में रहते हुए, उबायदुल्ला इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने से पैन इस्लामी कारण सबसे अच्छा होगा।. उबायदुल्ला ने अफगान अमीर को प्रस्ताव दिया था कि वह ब्रिटिश भारत के खिलाफ युद्ध घोषित करे।. मौलाना अबुल कलाम आजाद 1916 में उनकी गिरफ्तारी से पहले आंदोलन में शामिल होने के लिए जाने जाते थे।."
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"राष्ट्र संघ\n1918 में जब तक युदध समाप्त हुआ युद्ध ने बहुत गहरे प्रभाव छोड़े थे, पूरे यूरोप में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तंत्रों को प्रभावित किया था तथा उप महाद्वीप को मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षति पहुंचाई थी। दुनिया भर में युद्ध विरोधी भावना उभरी, प्रथम विश्व युद्ध को “सभी युद्धों का अंत करने वाला युद्ध” बताया गया था। पहचाने गए कारणों में हथियारों की दौड़, गठबंधन, गुप्त कूटनीति और संप्रभु राष्ट्र की स्वतंत्रता शामिल थे जिनकी वजह से वे अपने हित में युद्ध में गए थे। इनके उपचारों के रूप में एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन की रचना को देखा गया जिसका उद्देश्य निरस्त्रीकरण, खुली कूटनीति, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, युद्ध छेड़ने के अधिकार पर रोक तथा ऐसे दंड जो युद्ध को राष्ट्रों के लिए अनाकर्षक बना दे, था।",
"पहला विश्व युद्ध\nप्रथम विश्वयुद्ध को 'लोकतंत्र की लड़ाई' भी कहा जा रहा था। ब्रिटेन ने तो आधिकारिक तौर पर ऐलान किया था कि यह युद्ध लोकतंत्र के लिए लड़ा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन भी यही चाहते थे। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए 14 सूत्री मांग रखी थी। इसी कारण बहुत से उपनिवेश आजादी की उम्मीद में इस लड़ाई में इन देशों का साथ दे रहे थे। भारत में तो यह भावना बहुत मजबूत थी। इस कारण सैनिकों के जाने का समर्थन भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े नेता भी कर रहे थे। उन्हें झटका तब लगा जब युद्ध खत्म होने पर ब्रिटेन ने इस बारे में बात करने से साफ पल्ला झाड़ लिया। जब रॉलैट एक्ट आया, जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ, युद्ध के तुरन्त बाद 1919 में ही गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट आया तो भारतीय नेताओं को बड़ी निराशा हुई।",
"इंग्लिश चैनल\n31 जनवरी 1917 को जर्मनों ने एक बार फिर से अप्रतिबंधित पनडुब्बी युद्ध शुरू किया जिसमें नौसेना विभाग की खतरनाक भविष्यवाणियाँ थीं कि पनडुब्बियाँ नवम्बर तक ब्रिटेन को परास्त कर देंगीं, जो किसी भी विश्व युद्ध में ब्रिटेन के सामने आयी सबसे अधिक खतरनाक परिस्थिति थी। 1917 में पासचेंडीले का युद्ध बेल्जियम के समुद्र तट पर पनडुब्बी ठिकानों पर कब्जा कर खतरे को कम करने के लिए लड़ा गया था हालांकि यह काफिलों का प्रवेश और ठिकानों पर कब्जा नहीं होना ही था जिसने हार को टाल दिया था। अप्रैल 1918 में डोवर की गश्ती ने यू-बोट ठिकानों के खिलाफ प्रसिद्ध जीब्रूज छापे को अंजाम दिया. चैनल और उत्तरी सागर से होकर प्रभावित नौसेना की नाकाबंदी 1918 में जर्मनों की हार के निर्णायक पहलुओं में से एक था।",
"प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध\nकैम्पबेल अब प्रोम तक बढ़ने का निर्णय ले चुका था; जो इर्रावड्डी नदी से लगभग ऊंचाई पर स्थित था। वह 13 फ़रवरी 1825 को दो भागों में अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा, एक सेना भूमार्ग से बढ़ रही थी और दूसरी जनरल विलोबाई कॉटन के नेतृत्व में फ्लोटिला से प्रारंभ होकर बढ़ रही थी, यह सेना दानुब्यू को जीतने के उद्देश्य से भेजी गयी थी। भूमार्ग से बढ़ रही सेना की कमान संभालते हुए वह 11 मार्च तक आगे बढ़ता रहा, तभी उसे यह बोध हुआ कि दानुब्यू पर उसके द्वारा किया गया हमला विफल हो जायेगा. फिर वह पीछे हट गया और 27 मार्च को कॉटन की सेना के साथ सम्मिलित हो गया, वह 2 अप्रैल को बिना किसी प्रतिरोध के दानुब्यू में अतिक्रमण करके घुस गया, अब तक बन्दुला एक बम के द्वारा मारा जा चुका था। ब्रिटिश जनरल 25 अप्रैल 1825 को प्रोम में प्रवेश कर गए और वर्षा के मौसम तक वहीं रहे।",
"प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध\nप्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध (; ; 5 मार्च 1824 - 24 फ़रवरी 1826), 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासकों और बर्मी साम्राज्य के मध्य हुए तीन युद्धों में से प्रथम युद्ध था। यह युद्ध, जो मुख्यतया उत्तर-पूर्वी भारत पर अधिपत्य को लेकर शुरू हुआ था, पूर्व सुनिश्चित ब्रिटिश शासकों की विजय के साथ समाप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप ब्रिटिश शासकों को असम, मणिपुर, कछार और जैनतिया तथा साथ ही साथ अरकान और टेनासेरिम पर पूर्ण नियंत्रण मिल गया। बर्मी लोगों को 1 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग की क्षतिपूर्ति राशि की अदायगी और एक व्यापारिक संधि पर हस्ताक्षर के लिए भी विवश किया गया था।",
"प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना\nयुद्ध के प्रयास के समर्थन में भारत को अफगानिस्तान से शत्रुतापूर्ण कार्रवाई के प्रति असुरक्षित छोड़ दिया गया था। अक्टूबर 1915 में स्पष्ट सामरिक उद्देश्य के साथ एक तुर्क-जर्मन मिशन काबुल पहुंचा था। हबीबुल्लाह खान ने अपनी संधि के दायित्वों का पालन किया और तुर्क सुल्तान के साथ अलग रहने के लिए उत्सुक गुटों से आतंरिक विरोध की स्थिति में अफगानिस्तान की तटस्थता को बनाए रखा। इसके बावजूद सीमा पर स्थानीय स्टार पर कार्रवाई होती रही और इसमें तोची में कार्रवाई (1914-1915), मोहमंद, बनरवाल और स्वातियों के खिलाफ कार्रवाई (1915), कलात की कार्रवाई (1915-16), मोहमंद की नाकाबंदी (1916-1917), महसूदों के खिलाफ कार्रवाई (1917) और मारी एवं खेत्रण जनजातियों के खिलाफ कार्रवाई शामिल थी (1918).",
"बाल्कन युद्ध\nबाल्कन युद्ध से आशय सन् १९१२ और १९१३ में बाल्कन प्रायदीप में हुए दो युद्धों से है। बाल्कन के प्रथम युद्ध में चार बाल्कन राज्यों ने तुर्क साम्राज्य को हरा दिया था। दूसरे बाल्कन युद्ध बुल्गारिया और प्रथम बाल्कन युद्ध के पाँच देशों (सर्बिया, यूनान, रुमानिया, मांटीनीग्रो और रोमानिया) के बीच हुआ था। इसमें बल्गारिया की बड़ी मानहानि हुई और उसे कई क्षेत्रों से हाथ धोना पड़। ये दोनों युद्ध तुर्की साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुए और उसे अपने अधिकांश यूरोपीय क्षेत्र से हाथ धोना पड़ा। ये युद्ध प्रथम विश्वयुद्ध के महत्वपूर्ण कारणों में से एक कारण माने जाते हैं।"
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भगत सिंह की मृत्यु कब हुयी थी?
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"भगत सिंह\nभगत सिंह (जन्म: 28 सितम्बर 1907 , वीरगति: 23 मार्च 1931) भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे। चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। पहले लाहौर में बर्नी सैंडर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। इन्होंने असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। भगत सिंह का जन्म 24 सितंबर 1906 (अश्विन कृष्णपक्ष सप्तमी) को प्रचलित है परन्तु तत्कालीन अनेक साक्ष्यों के अनुसार उनका जन्म 27 सितंबर 1907 ई० को एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक किसान परिवार से थे। अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।"
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"भगत सिंह\n१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गए। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० lवी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।",
"भगत सिंह\nउनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।",
"भगत सिंह\n१७ दिसंबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिससे वह पहले ही मर जाता। लेकिन तुरन्त बाद भगत सिंह ने भी ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - \"आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।\" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी और वो वहीं पर मर गया। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।",
"भगत सिंह\nभगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।",
"बटुकेश्वर दत्त\nइस घटना के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 12 जून 1929 को इन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा सुनाने के बाद इन लोगों को लाहौर फोर्ट जेल में डाल दिया गया। यहाँ पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षडयंत्र केस चलाया गया। उल्लेखनीय है कि साइमन कमीशन के विरोध-प्रदर्शन करते हुए लाहौर में लाला लाजपत राय को अंग्रेजों के इशारे पर अंग्रेजी राज के सिपाहियों द्वारा इतना पीटा गया कि उनकी मृत्यु हो गई। इस मृत्यु का बदला अंग्रेजी राज के जिम्मेदार पुलिस अधिकारी को मारकर चुकाने का निर्णय क्रांतिकारियों द्वारा लिया गया था। इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप लाहौर षड़यंत्र केस चला, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दी गई थी। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए।",
"भगत सिंह\nभगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने \"इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!\" का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।",
"भगत सिंह\nउस समय भगत सिंह करीब बारह वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण उनमें थोड़ा रोष उत्पन्न हुआ, पर पूरे राष्ट्र की तरह वो भी महात्मा गाँधी का सम्मान करते थे। पर उन्होंने गाँधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की जगह देश की स्वतन्त्रता के लिए हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि थे। काकोरी काण्ड में ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।",
"साइमन कमीशन\nइसके बाद दोनों को लाहौर ले जाया गया, पर भगत सिंह को मियांवाली जेल में रखा गया। लाहौर में सांडर्स की हत्या, असेंबली में बम धमाका आदि मामले चले और ७ अक्टूबर १९३० को ट्रिब्यूनल का फैसला जेल में पहुंचा। जो इस प्रकार था-भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी, कमलनाथ तिवारी, विजय कुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, शिव वर्मा, गया प्रसाद, किशोर लाल और महावीर सिंह को आजीवन, कुंदनलाल को सात तथा प्रेमदत्त को तीन साल का कठोर कारावास। दत्त को असेंबली बम कांड के लिए उम्रकैद का दंड सुनाया गया था ।",
"सुखदेव\nसुखदेव (पंजाबी: ਸੁਖਦੇਵ ਥਾਪਰ; जन्म: 15 मई 1907; मृत्यु: 23 मार्च 1931) का पूरा नाम सुखदेव थापर था। सुखदेव थापर ने लाला लाजपत राय का बदला लिया था | इन्होने भगत सिंह को मार्ग दर्शन दिखाया था | इन्होने ही लाला लाजपत राय जी से मिलकर चंद्रशेखर आजाद जी को मिलने कि इच्छा जाहिर कि थी | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्हें भगत सिंह और राजगुरु के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था। इनके बलिदान को आज भी सम्पूर्ण भारत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आज़ादी का सपना पाले हुए थे। ये दोनों 'लाहौर नेशनल कॉलेज' के छात्र थे। दोनों एक ही वर्ष पंजाब में पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हो गए।"
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मनुष्य के शरीर में कितनी हड्डियां होती है?
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"चरक संहिता\nमनुष्य की शरीर-रचना के बारे में किया गया चरक का वर्णन काफी अल्पविकसित है। शरीर में दांत एवं नाखूनों सहित अस्थियों की कुल संख्या ३६० बताई गई है। ३२ दांत होते हैं। ३२ दाँतों के कोटर, २० नाखून, ६० अंगुलास्थियां, २० लम्बी अस्थियां, ४ लम्बी अस्थियों के आधार, २ एड़ी, ४ टखने की हड्डी, ४ कलाई की हड्डी, ४ अग्रबाहु की हड्डी, ४ टांग की हड्डी, २ बाहु की कोहनी के पटल, २ जांघ की खोखली हड्डी, ५ स्कन्धास्थि, २ हंसली, २ नितम्बफलक, १ सार्वजनिक अस्थि, ४५ पीठ की हड्डीयाँ, १४ वक्षास्थि, २४ पसलियाँ, २४ गर्तों में स्थित गुलिकाएँ, १५ कण्ठास्थि, १ श्वास-नली, २ तालुगर्त, १ निचले जबड़े की हड्डी, २ जबड़े की आधार-बन्ध अस्थि, १ नाक, गालों एवं भौंहों की हड्डी, २ कनपटी तथा ४ पान के आकार की कपालास्थि। (सुश्रुत के अनुसार कुल मिलकर अस्थियों की संख्या ३०० है)।",
"मानव कंकाल\nमानव कंकाल शरीर की आन्तरिक संरचना होती है। यह जन्म के समय नवजात शिशु में 270 हड्डियां होती है ,बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या 350 हो जाती है और किशोरावस्था व प्रौढ़ावस्था में कुछ हड्sex ke lia rat bhar chune तंत्रिका में हड्डियों का द्रव्यमान 30 वर्ष की आयु के लगभग अपने अधिकतम घनत्व पर पहुँचती है। मानव कंकाल को अक्षीय कंकाल और उपांगी कंकाल में विभाजित किया जाता है। अक्षीय कंकाल मेरूदण्ड, पसली पिंजर और खोपड़ी से मिलकर बना होता है। उपांगी कंकाल अक्षीय कंकाल से जुड़ा हुआ होता है तथा अंस मेखला, श्रोणि मेखला और अधः पाद एवं ऊपरी पाद की हड्डियों से मिलकर बना होता है।",
"कंकाल\nमानव कंकाल स्नायुबंधन, मांसपेशियों और उपास्थि द्वारा समर्थित और पूरक दोनों जुड़े हुए हैं और व्यक्तिगत हड्डियों के होते हैं। यह एक अंग का समर्थन करता है जो पाड़, एंकर मांसपेशियों के रूप में कार्य करता है और इस तरह के मस्तिष्क, फेफड़े, दिल और रीढ़ की हड्डी के रूप में अंगों की रक्षा करता है। शरीर में सबसे बड़ी हड्डी ऊपरी पैर में जांध की है और सबसे छोटी मध्य कान में स्टेपीज़ हड्डी है। एक वयस्क में, कंकाल शरीर के कुल वजन का लगभग 14% शामिल हैं और इस वजन का आधा पानी है। वयस्क मानव कंकाल में 206 हड्डियां हैं। यह पूरी तरह से विकसित करने से पहले मानव कंकाल 20 साल लग जाते हैं। कई जानवरों में, कंकाल हड्डियों रक्त कोशिकाओं का उत्पादन जो मज्जा, होते हैं।",
"अस्थि\nअस्थियाँ या हड्डियाँ रीढ़धारी जीवों का वह कठोर अंग है जो अन्तःकंकाल का निर्माण करती हैं। यह शरीर को चलाने (स्थानांतरित करने), सहारा देने और शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा करने मे सहायता करती हैं साथ ही यह लाल और सफेद रक्त कोशिकाओं का निर्माण करने और खनिज लवणों का भंडारण का कार्य भी करती हैं। अस्थियाँ विभिन्न आकार और आकृति की होने के साथ वजन मे हल्की पर मजबूत होती हैं। इनकी आंतरिक और बाहरी संरचना जटिल होती है। अस्थि निर्माण का कार्य करने वाले प्रमुख ऊतकों मे से एक उतक को खनिजीय अस्थि ऊतक, या सिर्फ अस्थि ऊतक भी कहते हैं और यह अस्थि को कठोरता और मधुकोशीय त्रिआयामी आंतरिक संरचना प्रदान करते हैं। अन्य प्रकार के अस्थि ऊतकों मे मज्जा, अन्तर्स्थिकला और पेरिओस्टियम, तंत्रिकायें, रक्त वाहिकायें और उपास्थि शामिल हैं। वयस्क मानव के शरीर में 206 हड्डियां होती हैं वहीं शिशुओं में 270 से 300 तक हड्डियाँ पायी जातीं हैं ।"
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"मेरुदण्ड\nमानव शरीर रचना में 'रीढ़ की हड्डी' या मेरुदंड (vertebral column या backbone या spine)) पीठ की हड्डियों का समूह है जो मस्तिष्क के पिछले भाग से निकलकर गुदा के पास तक जाती है। इसमें ३३ खण्ड (vertebrae) होते हैं। मेरुदण्ड के भीतर ही मेरूनाल (spinal canal) में मेरूरज्जु (spinal cord) सुरक्षित रहता है।",
"पसली पिंजर\nपसली पिंजर (rib cage) मानवों और अधिकांश अन्य कशेरुकी प्राणियों के वक्ष में स्थित एक हड्डियों का ढांचा होता है। इसकी हड्डियों को पसलियाँ कहा जाता है। यह वक्ष गुहा में स्थित महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करता है, जिनमें हृदय, फेफड़े, श्वासनली, ग्रासनली, थाइमस ग्रंथि, इत्यादि शामिल हैं। पसलियाँ शरीर के पीछे मेरुदण्ड से जुड़ी होती हैं। साधारण मानव पसली पिंजर में 24 पसलियाँ होती हैं।",
"स्त्री जननांग\nमहिलाओं के शरीर की हडिड्यों की रचना प्रकृति ने विशेष रूप से की है जिससे महिलाएं बच्चे का आसानीपूर्वक जन्म दे सकती है। स्त्रियों के कूल्हे की हड्डी पुरूष के कूल्हे की हड्डी की तुलना में अधिक स्थान रखती है। स्त्रियों की कूल्हे की हडिड्यों का आकार सेब की तरह का तथा पुरूषों के कूल्हे हडिड्यां दिल के आकार की होती है। कूल्हे की हडिड्यां मुख्य रूप से तीन प्रकार की हडिड्यों से बना होता है। पीछे की तरफ की हड्डी को सेक्रम, दोनों तरफ की हडिड्यों को ईलियास तथा सामने की ओर हड्डी को प्युबिस कहते है। सेक्रम के नीचे पूंछ के आकार की नुकीली हड्डी होती है जिसको कोसिक्स कहते है। कूल्हे की हडिड्यों का प्रमुख कार्य कूल्हे की मांसपेशियों, अंगों तथा बच्चे को जन्म के लिए पर्याप्त जगह देना होता है। जब स्त्रियां प्रसव के समय बच्चे को जन्म देती है। उस समय अधिक स्थान देने के लिए प्रत्येक जोड़ कुछ खुलता और ढीला होता है ताकि स्त्रियों बच्चे को आसानी से जन्म दे सके।",
"कंधा\nकंधा तीन हड्डियों का बना होता है : हंसली (हंसली), कंधे की हड्डी (कंधे ब्लेड) और प्रगंडिका (ऊपरी बांह की हड्डी) और उसके साथ ही मास्पेशिया, कंडर के शोथ और बंध भी सम्मिलित हैं। कंधे की हड्डियों के बीच के जोड़ो से कंधे का जोड़ बनता है कंधे का प्रमुख जोड़ है- ग्लेनोह्युमरल जोड़ (कंधे का जोड़) मानव के शरीर रचना विज्ञान के अनुसार, कंधे के जोड़ में शरीर के वे हिस्से होते है जहाँ प्रगंडिका कंधे की हड्डी से जुडती है। कंधा जोड़ के क्षेत्र में संरचनाओ का समूह है।",
"युवावस्था\nयुवावस्था के अंत तक, वयस्क पुरुषों की हड्डियां अपेक्षाकृत भारी हो जाती हैं और कंकाल की मांसपेशियों से लगभग दुगनी हो जाती है। कुछ हड्डियों का विकास (जैसे कंधे की चौड़ाई तथा जबड़ा) तुलनात्मक रूप से अत्याधिक असंगत ढंग से होता है, जिसके कारण नर और मादा के कंकाल में लक्षणीय अंतर पाया जाता है। औसतन एक वयस्क पुरुष में एक औसत महिला के भार का का लगभग 150% और शरीर की वसा का लगभग 50% पाया जाता है",
"ज्ञानेन्द्रियाँ\nज्ञानेन्द्रियाँ मनुष्य के वे अंग है जो देखने, सुनने, महसूस करने, स्वाद-ताप-रंग अदि का पता लगाते हैं। मानव शरीर में त्वचा, आँख, कान, नाक और जिव्हा आदि पाँच प्रकार की ज्ञानेन्द्रियाँ होती है। त्वचा महसूस करने का, आँखे देखने का, कान सुनने का, नाक गंध का पता लगाने का और जिह्वा स्वाद को परखने का काम करती है।"
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किस प्रकार के खाने से रक्तचाप के होने की संभावना होती है?
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"रक्तचाप\nकभी रक्तचाप थोड़ा बढ़ा हो, जैसे (१४६/९६) तो तुरंत दवा लेनी नहीं चाहिये। इससे पूर्व कुछ समय तक अपनी जीवन-शैली में बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिये। इसका असर ३ महीने में दिखाई देगा। इसके लिये प्रथम तो भोजन में सोडियम की मात्रा कम करनी चाहिये, सामान्यतः १० ग्राम नमक लोग एक दिन में खाते हैं। इसे कम करके ३ ग्राम तक लाना चाहिये। नमकीन चीजें जैसे दालमोठ, अचार, पापड़ का पूर्णतः परहेज करें। शरीर में ज्यादा सोडियम होने से पानी का जमाव होता है जिससे रक्त का आयतन बढ़ जाता है जिसके कारण रक्तचाप बढ़ जाता है। भोजन में पोटाशियम युक्त चीजें बढ़ाएं, जैसे ताजे फल, डाब का पानी आदि। डिब्बे में बंद सामाग्री का प्रयोग बंद कर दें। भोजन में कैलशियम (जैसे दूध में) और मैगनिशियम की मात्रा संतुलित करनी चाहिये। रेशेयुक्त पदार्थों को खूब खायें, जैसे फलों के छिलके, साग/चोकर युक्त आटा/इसबगोल आदि। संतृप्त वसा (मांस/वनस्पति घी) की मात्रा कम करनी चाहिये।"
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"रक्तचाप\nयदि किसी को निम्न रक्तचाप के कारण चक्कर आता हो या मितली आती हो या खड़े होने पर बेहोश होकर गिर पड़ता हो तो उसे आर्थोस्टेटिक उच्च रक्तचाप कहते हैं। खड़े होने पर निम्न दाब के कारण होने वाले प्रभाव को सामान्य व्यक्ति शीघ्र ही काबू में कर लेता है। लेकिन जब पर्याप्त रक्तचाप के कारण चक्रीय धमनी में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति को सीने में दर्द हो सकता है या दिल का दौरा पड़ सकता है। जब गुर्दों में अपर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति होती है तो गुर्दे शरीर से यूरिया और क्रिएटाइन जैसे अपशिष्टों को निकाल नहीं पाते जिससे रक्त में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है।",
"उच्च रक्तचाप\nनवजात शिशुओं और युवा शिशुओं में बढ़त में कमी, दौरे, चिड़चिड़ापन, ऊर्जा में कमी और साँस लेने में कठिनाई को उच्च रक्तचाप के साथ जोड़ कर देखा जा सकता है। बड़े शिशुओं और बच्चों में, उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, अस्पष्ट चिड़चिड़ापन, थकान, बढ़त में कमी धुंधली दृष्टि, नकसीर फूटना, और चेहरे का पक्षाघात हो सकता है।",
"त्रिफला\nसंयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने वाले व्यक्तियों को हृदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नेत्ररोग, पेट के विकार, मोटापा आदि होने की संभावना नहीं होती। यह कोई 20 प्रकार के प्रमेह, विविध कुष्ठरोग, विषमज्वर व सूजन को नष्ट करता है। अस्थि, केश, दाँत व पाचन-संस्थान को बलवान बनाता है। इसका नियमित सेवन शरीर को निरामय, सक्षम व फुर्तीला बनाता है। यदि गर्म पानी के साथ सोते समय एक चम्मच ले लिया जाए तो क़ब्ज़ नही रहता।",
"रक्तचाप\nइसके साथ ही नियमित व्यायाम करना चाहिये। खूब तेज लगातार ३० मिनट पैदल चलना सर्वोंत्तम व्यायाम है। योग/ध्यान/प्राणायाम रोज करना चाहिये। यदि धूम्रपान करते हों तो पूरा बंद कर दें, वजन संतुलित करनी चाहिये और मदिरापान करते हों तो एक पैग से ज्यादा न पीयें। अन्य गैर-मानव स्ताधारी प्राणियों में रक्तचाप मानव के रक्तचाप जैसा ही है। किन्तु उनके हृदय की धड़कन की गति मानव के हृदय गति से बहुत अलग हो सकती है (बड़े प्राणियों की हृदयगति अपेक्षाक्र्त धीमी होती है।). मनुष्य की ही तरह अन्य प्राणियों का रक्तचाप आयु, लिंग, दिन के पहर, और स्थ्तियों के अनुसार बालग-अलग होता है। चूहों, कुत्तों और खरगोश पर अनेकानेक प्रयोग करके उच्च रक्तचाप के कारणों को जानने का प्रयत्न किया गया है।",
"निम्न रक्तचाप\nयदि किसी को निम्न रक्तचाप के कारण चक्कर आता हो या मितली आती हो या खड़े होने पर बेहोश होकर गिर पड़ता हो तो उसे आर्थोस्टेटिक उच्च रक्तचाप कहते हैं। खड़े होने पर निम्न दाब के कारण होने वाले प्रभाव को सामान्य व्यक्ति शीघ्र ही काबू में कर लेता है। लेकिन जब पर्याप्त रक्तचाप के कारण चक्रीय धमनी में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति को सीने में दर्द हो सकता है या दिल का दौरा पड़ सकता है। जब गुर्दों में अपर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति होती है तो गुर्दे शरीर से यूरिया और क्रिएटाइन जैसे अपशिष्टों को निकाल नहीं पाते जिससे रक्त में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है। कोरोनरी आर्टेरी यानि वह धमनी जो हृदय के मांस पेशियों को रक्त की आपूर्ति करती है।",
"रक्तचापमापी\nहृदय, जिसका अन्य अंगों से धमनियों द्वारा संबंध होता है, स्पंदन द्वारा रक्त का परिसंचरण कर, शारीरिक अंगों का पोषण करता हैं। धमनियाँ अपने लचीलेपन द्वारा रुधिर को आगे बढ़ाती हैं, परंतु चिंता, क्रोध, अतिपरिश्रम तथा अन्य मानसिक परिवर्तनों के कारण यह लचीलापन कम हो जाता है, जिससे रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इसके फलस्वरूप धमनियों की दीवार पर रक्त का दबाव बढ़ जाता है। इसी को \"उच्च रक्तचाप' कहते हैं। इस अवस्था में सिर घूमना, पलकों का भारीपन, चेहरे पर लाली, मानसिक विकृति, अरुचि, थकावट, क्षुधानाश इत्यादि लक्षण प्रकट होते हैं। इसी समय रक्तचाप का मापन करना चाहिए। रक्तचाप निम्नलिखित दो प्रकार का होता है :",
"डेंगू बुख़ार\nयदि किसी व्यक्ति को गंभीर संक्रमण हैं तो वायरस उसके शरीर में और अधिक तेजी से बढ़ता है। क्योंकि वायरस की संख्या बहुत अधिक है इसलिये ये कई और अंगों (जैसे जिगर तथा अस्थि मज्जा) को प्रभावित कर सकता है। छोटी रक्त केशिकाओं की दीवारों से रक्त रिस करके शरीर के कोटरों में चला जाता है। इस कारण से रक्त केशिकाओं में कम रक्त का प्रवाह (या शरीर में कम रक्त का प्रवाह होता है) होता है। व्यक्ति का रक्तचाप इतना कम हो जाता है कि हृदय महत्वपूर्ण अंगों को पर्याप्त रक्त की आपूर्ति नहीं कर पाता है। साथ ही, अस्थि मज्जा पर्याप्त प्लेटलेट्स का निर्माण नहीं कर पाती है, जो रक्त का थक्का बनाने के लिये जरूरी है। पर्याप्त प्लेटलेट्स के बिना, व्यक्ति को रक्तस्राव होने की समस्या होने की काफी संभावना है। रक्तस्राव, डेंगू के कारण पैदा होने वाली मुख्य जटिलता (किसी भी बीमारी से होने वाली सबसे गंभीर समस्याओं में से एक) है।",
"रक्तचाप\nनिम्न रक्तचाप (हाइपोटेंशन) वह दाब है जिससे धमनियों और नसों में रक्त का प्रवाह कम होने के लक्षण या संकेत दिखाई देते हैं। जब रक्त का प्रवाह कफी कम होता हो तो मस्तिष्क, हृदय तथा गुर्दे जैसे महत्वपूर्ण इंद्रियों में ऑक्सीजन और पौष्टिक पदार्थ नहीं पहुंच पाते जिससे ये इंद्रियां सामान्य रूप से काम नहीं कर पाती और इससे यह स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। उच्च रक्तचाप के विपरीत, निम्न रक्तचाप की पहचान मूलतः लक्षण और संकेत से होती है, न कि विशिष्ट दाब संख्या के। किसी-किसी का रक्तचाप ९०/५० होता है लेकिन उसमें निम्न रक्त चाप के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं और इसलिए उन्हें निम्न रक्तचाप नहीं होता तथापि ऐसे व्यक्तियों में जिनका रक्तचाप उच्च है और उनका रक्तचाप यदि १००/६० तक गिर जाता है तो उनमें निम्न रक्तचाप के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।",
"उच्च रक्तचाप\nआहार परिवर्तन जैसे कम सोडियम आहार लाभदायक है। उच्च रक्तचाप वाले लोगों में और सामान्य रक्तचाप वाले लोगों में कॉकेशियन्स में एक लंबी अवधि (4 चार सप्ताह से अधिक) तक कम सोडियम आहार रक्तचाप को कम करने में प्रभावी है। इसके अलावा, DASH आहार, एक आहार जो बादाम आदि, साबुत अनाज, मछली, अंडा, फल और सब्जियों से भरपूर है, जिसे राष्ट्रीय हृदय, फेफड़े और रक्त संस्थान द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है रक्तचाप कम करता है। योजना की एक प्रमुख विशेषता सोडियम की मात्रा सीमित करना है, हालांकि आहार पोटेशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और प्रोटीन में भी समृद्ध है।"
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भारत का गणतंत्र दिवस किस तारीख पर आता है?
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"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nगणतन्त्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 को भारत सरकार अधिनियम (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था। यह भारत के तीन राष्ट्रीय अवकाशों में से एक है, अन्य दो स्वतन्त्रता दिवस और गांधी जयंती हैं।",
"गणतन्त्र दिवस (भारत)\n26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा को फहराया जाता हैं और इसके बाद सामूहिक रूप में खड़े होकर राष्ट्रगान गाया जाता है। फिर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को सलामी दी जाती है। गणतंत्र दिवस को पूरे देश में विशेष रूप से भारत की राजधानी दिल्ली में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर के महत्व को चिह्नित करने के लिए हर साल राजपथ पर एक भव्य परेड इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन (राष्ट्रपति के निवास) तक राजधानी नई दिल्ली में आयोजित की जाती है। इस भव्य परेड में भारतीय सेना के विभिन्न रेजिमेंट, वायुसेना, नौसेना आदि सभी भाग लेते हैं। इस समारोह में भाग लेने के लिए देश के सभी हिस्सों से राष्ट्रीय कडेट कोर व विभिन्न विद्यालयों से बच्चे आते हैं, समारोह में भाग लेना एक सम्मान की बात होती है। परेड प्रारंभ करते हुए प्रधानमंत्री राजपथ के एक छोर पर इंडिया गेट पर स्थित अमर जवान ज्योति (सैनिकों के लिए एक स्मारक) पर पुष्प माला अर्पित करते हैं। इसके बाद शहीद सैनिकों की स्मृति में दो मिनट मौन रखा जाता है। यह देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए लड़े युद्ध व स्वतंत्रता आंदोलन में देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों के बलिदान का एक स्मारक है। इसके बाद प्रधानमंत्री, अन्य व्यक्तियों के साथ राजपथ पर स्थित मंच तक आते हैं, राष्ट्रपति बाद में अवसर के मुख्य अतिथि के साथ आते हैं।",
"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nगणतंत्र दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि 26 जनवरी 1950 को पूरे 2 साल 11 महीने और 18 दिन लगा कर बनाया गया संविधान लागू किया गया था और हमारे देश भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया गया।",
"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nइस दिन हर भारतीय अपने देश के लिए प्राण देने वाले अमर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं। स्कूलों, कॉलेजों आदि मे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भारत के राष्ट्रपति दिल्ली के लाल किले पर भारतीय ध्वज फहराते हैं। राजधानी दिल्ली में बहुत सारे आकर्षक और मनमोहक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दिल्ली को अच्छी तरह सजाया जाता है। राजपथ पर बड़ी धूम-धाम से परेड निकलती है जिसमें विभिन्न प्रदेशों और सरकारी विभागों की झांकियाँ होतीं हैं। देश के कोने कोने से लोग दिल्ली मे 26 जनवरी की परेड देखने आते हैं। भारतीय सेना अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन होता है। 26 जनवरी के दिन धूम-धाम से राष्ट्रपति की सवारी निकाली जाती है तथा बहुत से मनमोहक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।"
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"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nदेश के हर कोने मे जगह जगह ध्वजवन्दन होता है और कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विश्व भर में फैले हुए भारतीय मूल के लोग तथा भारत के दूतावास भी गणतंत्र दिवस को हर्षोल्लास के साथ मनातहैं।",
"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nवेसे तो हमारा देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ों के चंगुल से आज़ाद हो गया था परंतु इस आज़ादी को रूप 26 जनवरी को दिया गया। तब से अब तक हम इस दिवस को आज़ादी के दिन के रूप मे मनाते है आज हमे आज़ादी मिले हुए पूरे 73 साल हो चुके है",
"गणतंत्र दिवस (नाइजर)\nगणतंत्र दिवस, नाइजर गणराज्य में एक राष्ट्रीय अवकाश है, यह हर साल 18 दिसंबर को मनाया जाता है। हालांकि यह फ्रांस से औपचारिक, पूर्ण स्वतंत्रता की तारीख नहीं है, 18 दिसंबर फ्रांसीसी पांचवें गणराज्य के संवैधानिक परिवर्तनों और 4 दिसंबर 1958 के चुनावों के बाद गणतंत्र की स्थापना और नाइजर गणराज्य के राष्ट्रपति पद के निर्माण का प्रतीक है। नाइजीरियाई इस तिथि को अपने राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना मानते हैं। 18 दिसंबर 1958 और 3 अगस्त 1960 के बीच, नाइजर फ्रांसीसी समुदाय के भीतर एक अर्ध-स्वायत्त गणराज्य बना रहा।",
"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nएक स्वतन्त्र गणराज्य बनने और देश में कानून का राज स्थापित करने के लिए 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा इसे अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। इसे लागू करने के लिये 26 जनवरी की तिथि को इसलिए चुना गया था क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था।",
"संविधान दिवस (भारत)\nभारत गणराज्य का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ था। संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को पहली बार भारत सरकार द्वारा संविधान दिवस सम्पूर्ण भारत में मनाया गया तथा 26 नवम्बर 2015 से प्रत्येक वर्ष सम्पूर्ण भारत में संविधान दिवस मनाया जा रहा है। इससे पहले इसे राष्ट्रिय कानून दिवस के रूप में मनाया जाता था। संविधान सभा ने भारत के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में 26 नवम्बर 1949 को पूरा कर राष्ट्र को समर्पित किया। गणतंत्र भारत में 26 जनवरी 1950 से संविधान अमल में लाया गया।",
"गणतन्त्र दिवस (भारत)\nसन् 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित एकाई बन जाने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरंभ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ० भीमराव अम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितीयाँ थी जिसमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टींग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण ‘संविधान लिखना’ या ‘निर्माण करना’ था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ० भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर जी ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान सुपूर्द किया, इसलिए 26 नवंबर दिवस को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है। संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 284 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई। जैसा कि आप सभी जानते है कि को अपना देश हजारों देशभक्तों के बलिदान के बाद अंग्रेजों की दासता (अंग्रेजों के शासन) से मुक्त हुआ था। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को अपने देश में भारतीय साशन और कानून व्यवस्था लागू हुई। भाईयो और बहनों ने इस स्वतन्त्रता को पाने में अपने देश की हजारों-हजारों माताओं की गोद सूनी हो गई थी, हजारों बहनों बेटियों के माँग का सिंदूर मिट गया था, तब कहीं इस महान बलिदान के बाद देश स्वतंत्र हो सका था। जिस तरह देश का संविधान है, ठीक उसी तरह परमात्मा का भी संविधान है, यदि हम सब देश की संविधान की तरफ परमात्मा के संविधान का पालन करें तो समाज अपराध मुक्त व सशक्त बन सकता है।"
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ईसा मसीह ने किस देश में जन्म लिया था?
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"बेथलहम\nनया करार (New Testament) में दो स्थानों पर इस बाद का वर्णन है कि ईसा का जन्म बेथलहम में हुआ था। ल्युक के धर्मोपदेश (Gospel of Luke) के अनुसार, ईसा के माता-पिता नाज़ारेथ में निवास करते थे, लेकिन वे 6 ईस्वी की जनगणना के लिये बेथलहम आए थे और उनके परिवार के नाज़ारेथ लौटने से पूर्व वहीं ईसा का जन्म हुआ था।",
"बेथलहम\nमैथ्यू के धर्मोपदेश (Gospel of Matthew) में दिये गये वर्णन के अनुसार जब ईसा का जन्म हुआ, तो यह परिवार पहले से ही बेथलहम में रह रहा था और बाद में वे लोग नाज़ारेथ चले गए। मैथ्यू के अनुसार, हेरोड महान (Herod the Great) ने बताया कि बेथलहम में ‘यहूदियों के एक राजा’ का जन्म हो चुका था और उसने उस नगर में और उसके आस-पास के स्थानों में रहने वाले दो वर्ष और उससे कम आयु के सभी बच्चों को मार डालने की आज्ञा दी. ईसा के लौकिक पिता जोसेफ को एक स्वप्न में इस बात की चेतावनी दी गई और उनका परिवार इस दुर्भाग्य से बचने के लिये मिस्र की ओर पलायन कर गया तथा वे लोग हेरोड की मृत्यु के बात ही वापस लौटे. परंतु, एक अन्य स्वप्न में जुडिया न लौटने की चेतावनी दिये जाने के कारण जोसेफ अपने परिवार को गैलिली में ही छोड़ देते हैं और नाज़ारेथ जाकर रहने लगते हैं।",
"यीशु\nबाइबिल के अनुसार ईसा की माता मरियम गलीलिया प्रांत के नाज़रेथ गाँव की रहने वाली थीं। उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी यूसुफ नामक बढ़ई से हुई थी। विवाह के पहले ही वह कुँवारी रहते हुए ही ईश्वरीय प्रभाव से गर्भवती हो गईं। ईश्वर की ओर से संकेत पाकर यूसुफ ने उन्हें पत्नीस्वरूप ग्रहण किया। इस प्रकार जनता ईसा की अलौकिक उत्पत्ति से अनभिज्ञ रही। विवाह संपन्न होने के बाद यूसुफ गलीलिया छोड़कर यहूदिया प्रांत के बेथलेहेम नामक नगरी में जाकर रहने लगे, वहाँ ईसा का जन्म हुआ। शिशु को राजा हेरोद के अत्याचार से बचाने के लिए यूसुफ मिस्र भाग गए। हेरोद 4 ई.पू. में चल बसे अत: ईसा का जन्म संभवत: 4 ई.पू. में हुआ था। हेरोद के मरण के बाद यूसुफ लौटकर नाज़रेथ गाँव में बस गए। ईसा जब बारह वर्ष के हुए, तो यरुशलम में तीन दिन रुककर मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उन की सुनते और उन से प्रश्न करते हुए पाया। लूका 2:47 और जिन्होंने उन को सुना वे सब उनकी समझ और उनके उत्तरों से चकित थे। तब ईसा अपने माता पिता के साथ अपना गांव वापिस लौट गए। ईसा ने यूसुफ का पेशा सीख लिया और लगभग 30 साल की उम्र तक उसी गाँव में रहकर वे बढ़ई का काम करते रहे। बाइबिल (इंजील) में उनके 13 से 29 वर्षों के बीच का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने यूहन्ना (जॉन) से पानी में डुबकी (दीक्षा) ली। डुबकी के बाद ईसा पर पवित्र आत्मा आया। 40 दिन के उपवास के बाद ईसा लोगों को शिक्षा देने लगे।",
"बेथलहम\nबेथलहम में ईसा के जन्म के काल से जुड़ी प्राचीन परंपरागत मान्यता को ईसाई धर्ममण्डक जस्टिन मार्टर (Justin Martyr) द्वारा अनुप्रमाणित किया गया है, जिन्होंने \"ट्राइफो (Trypho) के साथ हुई एक चर्चा\" (सी. 155–161) में कहा कि इस पवित्र परिवार ने इस नगर के बाहर स्थित एक गुफा में शरण ली हुई थी। अलेक्ज़ेन्ड्रिया के ओरिजेन (Origen of Alexandria) ने वर्ष 247 के आस-पास किये गए अपने लेखन में बेथलहम शहर में स्थित एक गुफा का उल्लेख किया है, जिसे स्थानीय लोग ईसा का जन्मस्थान मानते थे। यह गुफा संभवतः वही थी, जो पहले तामुज़ (Tammuz) के संप्रदाय का स्थान रह चुकी थी।",
"बेथलहम\nप्रारंभिक ईसाइयों ने मिकाह की पुस्तक (Book of Micah) में लिखी एक पंक्ति की व्याख्या बेथलहम में एक मसीहा के जन्म की भविष्यवाणी के रूप में की. अनेक आधुनिक विद्वान इस बात पर प्रश्न उठाते हैं कि क्या सचमुच ईसा का जन्म बेथलहम में हुआ था और उनका सुझाव है कि ईसा के जन्म को प्रस्तुत करने के लिये धर्मोपदेशों में विभिन्न उल्लेखों का आविष्कार भविष्यवाणी को सच साबित करने और राजा डेविड की वंशावली से उनका संबंध सूचित करने के लिये किया गया। मार्क के धर्मोपदेश (Gospel of Mark) और जॉन के धर्मोपदेश (Gospel of John) में ईसा के जन्म का वर्णन या इस बात का कोई संकेत भी शामिल नहीं है कि ईसा का जन्म बेथलहम में हुआ था और वे उनका उल्लेख केवल नाज़ारेथ निवासी के रूप में ही करते हैं। \"आर्किओलॉजी (Archaeology)\" पत्रिका में 2005 में प्रकाशित एक लेख में पुरातत्वविद् अविराम ओशरी (Aviram Oshri) ने इस ओर सूचित किया कि जिस काल में ईसा का जन्म हुआ, उस अवधि में उस क्षेत्र में कोई बस्ती होने के प्रमाण उपस्थित नहीं हैं और उनका दृढ़ मत है कि ईसा का जन्म गैलिली के बेथलहम (Bethlehem of Galilee) में हुआ था। उनका विरोध करते हुए, जेरोम मर्फी-ओ’कॉनर (Jerome Murphy-O’Connor) पारंपरिक विचार का ही समर्थन करते हैं।"
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"ईसा इब्न मरियम\nइस्लाम में ईसा मसीह को एक आदरणीय नबी (मसीहा) माना जाता है, जो ईश्वर (अल्लाह) ने इस्राइलियों को उनके संदेश फैलाने को भेजा था। क़ुरान के अनुसार, अल्लाह ने ईसा को इंजील नमक पवित्र किताब का इल्हाम दिया था, जोकि इस्लामिक मान्यता के अनुसार, अल्लाह द्वारा मानवता को प्रदान किये गए चार पवित्र किताबों में से एक है। क़ुरान में ईसा के नाम का ज़िक्र मुहम्मद से भी ज़्यादा है और मुसलमान ईसा के कुँवारी माता द्वारा जन्मा मानते हैं।",
"इस्लाम का इतिहास\nमुहम्मद साहब का जन्म 570 ई. में \"मक्का\"(सऊदी अरब) में हुआ। उनके परिवार का मक्का के एक बड़े धार्मिक स्थल पर प्रभुत्व था। उस समय अरब में यहूदी, ईसाई धर्म और बहुत सारे समूह जो मूर्तिपूजक थे क़बीलों के रूप में थे। मक्का में काबे में इस समय लोग साल के एक दिन जमा होते थे और सामूहिक पूजन होता था। आपने ख़ादीजा नाम की एक विधवा व्यापारी के लिए काम करना आरंभ किया। बाद (५९५ ई.) में २५ वर्ष की उम्र में उन्हीं(४० वर्ष की पड़ाव) से शादी भी कर ली। सन् ६१३ में आपने लोगों को ये बताना आरंभ किया कि उन्हें परमेश्वर से यह संदेश आया है कि ईश्वर एक है और वो इन्सानों को सच्चाई तथा ईमानदारी की राह पर चलने को कहता है। उन्होंने मूर्तिपूजा का भी विरोध किया। पर मक्का के लोगों को ये बात पसन्द नहीं आई।",
"यहूदी धर्म\nमूसा का जन्म मिस्र के गोशेन शहर में हुआ था। यहूदी इतिहास के अनुसार इन्होंने इब्रानियों को मिस्र की 400 वर्ष की गुलामी से बाहर निकालकर उन्हें कनान देश तक पहुँचाने में उनका नेतृत्व किया। मूसा को ही यहूदी धर्मग्रन्थ की प्रथम पाँच किताबों, तोराह का रचयिता माना जाता है। इन्होंने ही ईश्वर के दस विधान व व्यवस्था इब्रानियों को प्रदान की थी। तनख़ के अनुसार मूसा मिस्र में रामेसेस द्वितीय के शासन में थे, जो कि लगभग 1300 ई॰पू॰ था।",
"बास्मा कोदमानी\nबास्मा कोडमनी का जन्म 1958 में दमिश्क, सीरिया में हुआ था। एक बच्चे के रूप में वह दमिश्क में एक फ्रांसीसी ईसाई स्कूल \"इकोले फ्रांसिसकाइन\" में भाग लिया। उसके पिता एक राजनयिक के रूप में सीरिया के विदेश मंत्रालय में काम करते थे। 1967 के युद्ध में हार के बाद , उन्होंने विदेश मंत्री के साथ एक झड़प की और बाद में 6 महीने के लिए जेल गए। इसने उन्हें अपने परिवार के साथ सीरिया छोड़ने और लेबनान जाने के लिए प्रेरित किया जहां वे 1968 से 1971 तक 3 साल तक रहे। 1971 में, वे लंदन चले गए, जहाँ बासमा कोडमानी के पिता ने संयुक्त राष्ट्र में नौकरी पाई थी।",
"धर्मप्रचार (ईसाई)\nयेरुसलेम से ईसाई धर्म प्रथम शताब्दी ई. में ही पूर्व की ओर फारस और संभवत: भारत तक फैल गया। दक्षिण भारत के ईसाई मानते हैं कि संत तोमस केरल आए थे। चौथी शताब्दी ई. में एथियोपिया ईसाई बन गया। नेस्तोरियन ईसाइयों ने अरब, फारस, मध्य एशिया, भारत तथा चीन में अपने मत का प्रचार किया थ किंतु इसलाम के प्रसार से उन देशों में ईसाई धर्म नाम मात्र बच गया है।"
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तुर्की में किस भाषा का उपयोग होता है?
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"तुर्की\nतुर्की में ज्यादातर लोग तुर्की भाषा बोलते हैं। यह तुर्की भाषा समूह है, जो भी कई अन्य ऐसे अज़रबैजानी और तातारी के रूप में एशिया भर में बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल हैं, के अंतर्गत आता है। तुर्की भाषा मध्य एशिया से आया है, लेकिन अब यह मध्य एशिया में बोली जाने वाली भाषाओं से थोड़ा अलग है।",
"तुर्किस्तान\nतुर्किस्तान () मध्य एशिया के एक बड़ा भूभाग का पारम्परिक नाम है जहाँ तुर्की भाषाएँ बोलने वाले तुर्क लोग रहते हैं। इस नाम द्वारा परिभाषित इलाक़े की सीमाएँ समय के साथ बदलती रहीं हैं और इसका प्रयोग भी तुर्किस्तान से बाहर रहने वाले लोग ही अधिक करते थे। आधुनिक युग में तुर्कमेनिस्तान, उज़बेकिस्तान, काज़ाख़स्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और चीन का शिनजियांग प्रांत आते हैं। इनके अतिरिक्त उत्तरी ईरान और अफ़्ग़ानिस्तान के कुछ भाग, रूस के साइबेरिया क्षेत्र का छोटा सा भाग और मंगोलिया का सुदूर पश्चिमी भाग भी शामिल हैं। ध्यान दें कि ताजिकिस्तान को छोड़कर इन सभी क्षेत्रों में तुर्की भाषाएँ सबसे अधिक बोली जाती हैं। ताजिकिस्तान में बोली जाने वाली ताजिक भाषा एक ईरानी भाषा है, लेकिन ताजिकिस्तान को फिर भी तुर्किस्तान का भाग माना जाता है।",
"तुर्की भाषा परिवार\nमंगोलिया की ओरख़ोन घाटी में स्थित ओरख़ोन शिलालेख किसी भी तुर्की भाषा में मिले सब से पुराने लेख हैं और इनमें प्रयोगित भाषा को पुरानी तुर्की भाषा कहा जाता है। यह शिलाएँ 732 और 735 ई॰ के बीच के काल में कुल तिगिन और बिलगे क़ाग़ान नामक दो गोकतुर्क क़बीले के सरदारों के सम्मान में खड़ी की गई थीं। तुर्की भाषाओँ पर सबसे पहला गहरा अध्ययन काराख़ान सल्तनत के वासी कश्गरली महमूद ने अपनी 11वीं शताब्दी में लिखी किताब \"दिवानुए लुग़ातित तुऍर्क\" में पूरा किया। यह तुर्की बोलियों का सब से पहला विस्तृत शब्दकोश था और इसमें तुर्की भाषाएँ बोलने वालों के फैलाव का सब से पहला ज्ञात नक़्शा था।",
"तुर्की भाषा परिवार\nतुर्की भाषाएँ पैंतीस से भी अधिक भाषाओँ का एक भाषा-परिवार है। तुर्की भाषाएँ पूर्वी यूरोप और भूमध्य सागर से लेकर साईबेरिया और पश्चिमी चीन तक बोली जाती हैं। कुछ भाषावैज्ञानिक इन्हें अल्ताई भाषा परिवार की एक शाखा मानते हैं। विश्व में लगभग 16.5 से 18 करोड़ लोग तुर्की भाषाएँ अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं और अगर सभी तुर्की भाषाओँ को बोल सकने वालों की गणना की जाए तो क़रीब 25 करोड़ लोग इन्हें बोल सकते हैं। सब से अधिक बोली जाने वाली तुर्की भाषा का नाम भी तुर्की है, हालाँकि कभी-कभी इसे अनातोल्वी भी कहा जाता है (क्योंकि यह अनातोलिया में बोली जाती है)।",
"तुर्की की भाषाएं\nतुर्की यूरेशिया में स्थित एक देश है। इसकी राजधानी अंकारा है। इसकी मुख्य- और राजभाषा तुर्की भाषा है। ये दुनिया का अकेला मुस्लिम बहुमत वाला देश है जो कि धर्मनिर्पेक्ष है। ये एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है। इसके एशियाई हिस्से को अनातोलिया और यूरोपीय हिस्से को थ्रेस कहते हैं | तुर्की की भाषाएं, एकमात्र आधिकारिक भाषा तुर्की के अलावा, व्यापक कुरमानजी, आम तौर पर प्रचलित अल्पसंख्यक भाषाओं अरबी और ज़ज़ाकी और कम आम अल्पसंख्यक भाषाओं में शामिल हैं, जिनमें से कुछ को 1923 की लॉज़ेन संधि द्वारा दी जाती है। तुर्की के संविधान के अनुच्छेद 3 तुर्की को तुर्की की एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में परिभाषित करता है| संविधान के अनुच्छेद 42 में तुर्की के नागरिकों को मातृभाषा के रूप में है| तुर्की के अलावा किसी अन्य भाषा को पढ़ाने के लिए शैक्षणिक संस्थानों को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया जाता है| निम्नलिखित तालिका तुर्की में लोगों के मातृभाषा को उनके वक्ताओं के प्रतिशत से सूचीबद्ध करती है। तुर्की भाषा आधुनिक तुर्की और साइप्रस की प्रमुख भाषा है। पूरे विश्व में कोई 6.3 करोड़ लोग इस मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। यह तुर्क भाषा परिवार की सबसे व्यापक भाषा है जिसका मूल मध्य एशिया माना जाता है। बाबर, जो मूल रूप से मध्य एशिया (आधुनिक उज़्बेकिस्तान) का वासी था, चागताई भाषा बोलता था जो तुर्क भाषा परिवार में ही आती है। 2015 में, तुर्की के शिक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि 2016-17 शैक्षणिक वर्ष के अनुसार, दूसरे कक्षा में शुरू होने वाले प्राथमिक विद्यालय के छात्रों को अरबी पाठ्यक्रम (दूसरी भाषा के रूप में) की पेशकश की जाएगी। अरबी पाठ्यक्रम जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी जैसे वैकल्पिक भाषा पाठ्यक्रम के रूप में पेश किए जाएंगे। एक तैयार पाठ्यक्रम के मुताबिक, दूसरे और तीसरे ग्रेडर श्रवण-समझ और बोलकर अरबी सीखना शुरू कर देंगे, जबकि लेखन के लिए परिचय चौथे स्तर में इन कौशल में शामिल होगा और पांचवीं कक्षा के बाद के छात्र अपने सभी चार बुनियादी कौशल में भाषा सीखना शुरू कर देंगे।"
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"विकिमैपिया\nफ़िर भी विकिमपिया भाषा के लिए अपने विस्तार का उपयोग करता है, उदाहारंस्वरूप तुर्की के लिए यह \"TK\" का प्रयोग करता है।",
"तुर्कीयाई भाषा\nतुर्की भाषा (Türkçe), आधुनिक तुर्की और साइप्रस की प्रमुख भाषा है। पूरे विश्व में कोई 6.3 करोड़ लोग इस मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। यह तुर्क भाषा परिवार की सबसे व्यापक भाषा है जिसका मूल मध्य एशिया माना जाता है। बाबर, जो मूल रूप से मध्य एशिया (आधुनिक उज़्बेकिस्तान) का वासी था, चागताई भाषा बोलता था जो तुर्क भाषा परिवार में ही आती है। Selam: सलाम/नमस्कार",
"पाकिस्तान की भाषाएँ\nतुर्क भाषाओं का उपयोग मुगलों और उपमहाद्वीप के पूर्व के सुल्तानों जैसे तुर्को-मंगोलों द्वारा किया जाता था। पूरे देश में तुर्किस बोलने वालों के छोटे-छोटे हिस्से पाये जाते हैं, विशेष रूप से उत्तरी क्षेत्रों में घाटियों में, जो मध्य एशिया से सटे हुए हैं, पश्चिमी पाकिस्तानी का वज़ीरिस्तान क्षेत्र मुख्य रूप से कनिगोरम के आसपास, जहाँ बुर्की जनजाति निवास करती है और पाकिस्तान के कराची, लाहौर और इस्लामाबाद के नगरीय केन्द्रों में हैं। मुगल राजा बाबर की आत्मकथा तुज़क बाबरी भी तुर्की भाषा में लिखी गयी थी। 1555 में सफ़विद फ़ारस में निर्वासन से लौटने के बाद, मुगल राजा हुमायूँ ने आगे फारसी भाषा और संस्कृति को न्यायालय और राजकीय कार्यों में प्रस्तुत किया। चगताई भाषा, जिसमें बाबर ने अपने संस्मरण लिखे थे, दरबारी कुलीन वर्ग की संस्कृति से लगभग पूरी तरह से गायब हो गयी, और मुगल राजा अकबर इसे नहीं बोल सका। कहा जाता है कि बाद के जीवन में, हुमायूँ ने स्वयं फ़ारसी पद्य में अधिक से अधिक बार बात की थी।",
"तुर्की\nतुर्की में भी अल्पसंख्यकों जैसे अरबी, कुर्द, अर्मेनियाई, यूनानी या लादीनो, और कई दूसरों के रूप में जो भाषाओं में बात कर रहे हैं।",
"तुर्की भाषा परिवार\nध्यान दें कि इस लेख में और तुर्की भाषाओँ में प्रयोग होने वाले 'ख़' वर्ण का सही उच्चारण 'ख' से ज़रा भिन्न होता है। इसी तरह 'ग़' वर्ण का सही उच्चारण 'ग' से भिन्न होता है।"
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बांग्लादेश किस वर्ष में आज़ाद हुआ था?
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"स्वतंत्रता दिवस (बांग्लादेश)\nबंगबंधु के नाम से विख्यात शेख मुजीबुर्रहमान के द्वारा २५ मार्च १९७१की आधी रात के बाद पाकिस्तान से अपने देश की आजादी की घोषणा की गई, उसके बाद उन्हें पाकिस्तानी सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। २६ मार्च १९७१ को बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही मुक्ति युद्ध की शुरुआत हो गई थी। अंत में जीत १६ दिसम्बर को एक ही वर्ष में हासिल किया गया था, जो विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। शेख मुजीबुर्रहमान ने पाकिस्तान के खिलाफ सशस्त्र संग्राम की अगुवाई करते हुए बांग्लादेश को मुक्ति दिलाई। वे बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति बने और बाद में प्रधानमंत्री भी बने।",
"बांग्लादेश\n26 मार्च को प्रत्येक वर्ष यह देश अपना स्वतन्त्रता दिवस मानता है। इस दिन यहाँ राष्ट्रीय अवकाश होता है। उल्लेखनीय है, कि 26 मार्च 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की गई है और मुक्ति युद्ध शुरू कर दिया गया था। ईस्ट बंगाल के लोगों के सभी वर्गों के मुक्ति के लिए पाकिस्तानी सेना के शासकों के निरंतर उत्पीड़न से बचाने के बांग्लादेश युद्ध में भाग लिया। स्वतंत्रता नौ महीने मानव जीवन के मामले में पाकिस्तानी सेना और के बारे में 3 मिलियन की हानि के खिलाफ गृहयुद्ध के माध्यम से प्राप्त किया गया था। अंत में जीत 16 दिसम्बर को एक ही वर्ष में हासिल किया गया, जो विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस प्रकार सन् १९७१ में पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना।",
"बांग्लादेश मुक्ति युद्ध\nबांग्लादेश का स्वतंत्रता संग्राम १९७१ में हुआ था, इसे 'मुक्ति संग्राम' भी कहते हैं। यह युद्ध वर्ष १९७१ में २५ मार्च से १६ दिसम्बर तक चला था। इस रक्तरंजित युद्ध के माध्यम सेे बांलादेश ने पाकिस्तान से स्वाधीनता प्राप्त की। 16 दिसम्बर सन् 1971 को बांग्लादेश बना था। भारत की पाकिस्तान पर इस ऐतिहासिक जीत को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाकिस्तान पर यह जीत कई मायनों में ऐतिहासिक थी। भारत ने ९३ हजार पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।",
"स्वतंत्रता दिवस (बांग्लादेश)\n26 मार्च 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की है और मुक्ति युद्ध शुरू कर दिया गया था। ईस्ट बंगाल के लोगों के सभी वर्गों के मुक्ति के लिए पाकिस्तानी सेना के शासकों के निरंतर उत्पीड़न से बचाने के बांग्लादेश युद्ध में भारत ने साथ दिया। स्वतंत्रता हेतु युद्ध के नौ महीने में मानव जीवन के मामले में पाकिस्तानी सेना को 3 मिलियन की हानि इस गृहयुद्ध के दौरान हुई थी। अंत में जीत 16 दिसम्बर को एक ही वर्ष में हासिल किया गया था, जो विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।",
"बंगाल का विभाजन (1947)\n6 जुलाई 1947 को, सिलेत जनमत संग्रह ने असम से सिलेह को तोड़ने और इसे पूर्वी बंगाल में विलय करने का फैसला किया। 14-15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान और भारत में स्थानांतरित होने वाली शक्ति के साथ विभाजन \"3 जून योजना\" या \"माउंटबेटन प्लान\" के रूप में जाना जाने वाला था। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी भारतीय उपमहाद्वीप में 150 वर्षों से अधिक ब्रिटिश प्रभाव से समाप्त हो गई। 1971 बांग्लादेश लिबरेशन वार के बाद पूर्वी बंगाल बाद में बांग्लादेश नामक स्वतंत्र देश बन गया।.",
"अब्दुल हामिद (बांग्लादेशी राजनीतिज्ञ)\nअब्दुल हमीद का जन्म 1 जनवरी, 1944 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में हुआ था। 20वां सदी के मध्य में ब्रिटिश भारत के विभाजन हुआ, और ईस्ट बंगाल, पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, और पिर विभिन्न राजनीतिक और सांस्कृताक कारणों एवं पश्चिमी पाकिस्तानी स्थापिना की साम्राज्यवदी गतिविधियों के कारण 1960 और 1970 के शुरुआती दिनों में बांग्लादेश में स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो उठी। अभी भी एक छात्र, हामिद, ने पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष में भाग लिया था एवं इस दौरान उन्हों गिरफ्तार भी किया गया था और जेल में डाल दिया गया था।. 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, अब्दुल हामिद बांग्लादेश की संसद में सात बार चुने गए। 20वीं सदी के अंत में, वह अवामी लीग के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक बन गए। जुलाई से अक्टूबर 2001 में वे पहली बार जब देश की संसद की अध्यक्षता करने के लिए चुने गए, एवं दूसरी बार, वह संसद के अध्यक्ष जनवरी 25, 2009 को बनाए गए। मध्य-मार्च 2013 को, ततकालीन राष्ट्रपति जिल्लुर रहमान को बीमारी की वजह से सिंगापुर में इलाज के लिए भेजा गया था, उस अवसर पर अब्दुल हमीद को कार्यवहक उनका बनाया गया।",
"बांग्लादेश\n1971 के समय पाकिस्तान में जनरल याह्या खान राष्ट्रपति थे और उन्होंने पूर्वी हिस्से में फैली नाराजगी को दूर करने के लिए जनरल टिक्का खान को जिम्मेदारी दी। लेकिन उनके द्वारा दबाव से मामले को हल करने के प्रयास किये गये जिससे स्थिति पूरी तरह बिगड़ गई। 25 मार्च 1971 को पाकिस्तान के इस हिस्से में सेना एवं पुलिस की अगुआई में जबर्दस्त नरसंहार हुआ। इससे पाकिस्तानी सेना में काम कर रहे पूर्वी क्षेत्र के निवासियों में जबर्दस्त रोष हुआ और उन्होंने अलग मुक्ति वाहिनी बना ली। पाकिस्तानी फौज का निरपराध, हथियार विहीन लोगों पर अत्याचार जारी रहा। जिससे लोगों का पलायन आरंभ हो गया जिसके कारण भारत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से लगातार अपील की कि पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति सुधारी जाए, लेकिन किसी देश ने ध्यान नहीं दिया और जब वहां के विस्थापित लगातार भारत आते रहे तो अप्रैल 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुक्ति वाहिनी को समर्थन देकर, बांग्लादेश को आजादी मे सहायता करने का निर्णय लिया।"
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"बांग्लादेश\nबांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने स्थानीय नेताओं और धार्मिक चरमपंथियों की मदद से मानवाधिकारों का हनन किया। २५ मार्च १९७१ को शुरू हुए ऑपरेशन सर्च लाइट से लेकर पूरे बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में जमकर हिंसा हुई। बांग्लादेश सरकार के मुताबिक इस दौरान करीब ३० लाख लोग मारे गए। हालांकि, पाकिस्तान सरकार की ओर से गठित किए गए हमूदूर रहमान आयोग ने इस दौरान सिर्फ २६ हजार आम लोगों की मौत का नतीजा निकाला।",
"बांग्लादेश मुक्ति युद्ध\nबांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने स्थानीय नेताओं और धार्मिक चरमपंथियों की मदद से मानवाधिकारों का हनन किया। २५ मार्च १९७१ को शुरू हुए ऑपरेशन सर्च लाइट से लेकर पूरे बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में जमकर हिंसा हुई। बांग्लादेश सरकार के मुताबिक इस दौरान करीब ३० लाख लोग मारे गए। हालांकि, पाकिस्तान सरकार की ओर से गठित किए गए हमूदूर रहमान आयोग ने इस दौरान सिर्फ २६ हजार आम लोगों की मौत का नतीजा निकाला।",
"बांग्लादेश का इतिहास\nभारत का विभाजन होने के फलस्वरुप बंगाल भी दो हिस्सों में बँट गया। इसका हिन्दू बहुल इलाका भारत के साथ रहा और पश्चिम बंगाल के नाम से जाना गया तथा मुस्लिम बहुल इलाका पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना जो पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना गया। जमींदारी प्रथा ने इस क्षेत्र को बुरी तरह झकझोर रखा था जिसके खिलाफ १९५० में एक बड़ा आंदोलन शुरु हुआ और १९५२ के बांग्ला भाषा आंदोलन के साथ जुड़कर यह बांग्लादेशी गणतंत्र की दिशा में एक बड़ा आंदोलन बन गया। इस आंदोलन के फलस्वरुप बांग्ला भाषियों को उनका भाषाई अधिकार मिला। १९५५ में पाकिस्तान सरकार ने पूर्वी बंगाल का नाम बदलकर पूर्वी पाकिस्तान कर दिया। पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान की उपेक्षा और दमन की शुरुआत यहीं से हो गई। और तनाव स्त्तर का दशक आते आते अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। पाकिस्तानी शासक याहया खाँ द्वारा लोकप्रिय अवामी लीग और उनके नेताओं को प्रताड़ित किया जाने लगा, जिसके फलस्वरुप बंगबंधु शेख मुजीवु्ररहमान की अगुआई में बांग्लादेशा का स्वाधीनता आंदोलन शुरु हुआ। बांग्लादेश में खून की नदियाँ बही, लाखों बंगाली मारे गये तथा १९७१ के खूनी संघर्ष में दस लाख से ज्यादा बांग्लादेशी शरणार्थी को पड़ोसी देश भारत में शरण लेनी पड़ी। भारत इस समस्या से जूझने में उस समय काफी परेशानियों का सामना कर रहा था और भारत को बांग्लादेशियों के अनुरोध पर इस सम्स्या में हस्तक्षेप करना पड़ा जिसके फलस्वरुप १९७१ का भारत पाकिस्तान युद्ध शुरु हुआ। बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी सेना का गठन हुआ जिसके ज्यादातर सदस्य बांग्लादेश का बौद्धिक वर्ग और छात्र समुदाय था, इन्होंने भारतीय सेना की मदद गुप्तचर सूचनायें देकर तथा गुरिल्ला युद्ध पद्धति से की। पाकिस्तानी सेना ने अंतत: १६ दिसम्बर १९७१ को भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, लगभग ९३००० युद्ध बंदी बनाये गये जिन्हें भारत में विभिन्न कैम्पों में रखा गया ताकि वे बांग्लादेशी क्रोध के शिकार न बनें। बांग्लादेश एक आज़ाद मुल्क बना और मुजीबुर्र रहमान इसके प्रथम राष्ट्रपति बने।"
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मनुष्य के शरीर में सबसे महत्वपूर्ण अंग क्या है?
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"गलतुंडिका\nगला हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका महत्व इसी बात से स्पष्ट है कि शरीर के भीतर पहुंचने वाले खाद्य−पदार्थ तथा हवा−पानी के प्रवेश का दायित्व इसी पर है। इसी महत्वपूर्ण कार्य को निभाने के कारण यही हिस्सा हमारे द्वारा ग्रहण किये जाने वाले भोजन, जल तथा वायु में उपस्थित किसी भी जहरीले तत्व से सबसे पहले प्रभावित होता है। नाक और कान भी इससे अछूते नहीं रहते। हालांकि बाहरी रूप से देखने से हमारे नाक, गला व कान अलग−अलग दिखाई देते हैं परन्तु गले के भीतर जाकर इन तीनों अंगों की कोशिकाएं आपस में मिल जाती हैं। इस कारण इन तीनों अंगों में से किसी एक भी अंग में किसी प्रकार का संक्रमण हो जाता है तो उसका प्रभाव तीनों अंगों पर पड़ता है। इस कारण जरूरी है कि कोई भी संक्रमण होते ही जल्दी से उसका उपचार किया जाए।"
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"अंग तंत्र\nहमारे शरीर के लिए सभी तंत्र महत्वपूर्ण है |",
"आयुर्वेद\nसमस्त चेष्टाओं, इंद्रियों, मन ओर आत्मा के आधारभूत पंचभौतिक पिंड को 'शरीर' कहते हैं। मानव शरीर के स्थूल रूप में छह अंग हैं; दो हाथ, दो पैर, शिर और ग्रीवा एक तथा अंतराधि (मध्यशरीर) एक। इन अंगों के अवयवों को प्रत्यंग कहते हैं-",
"अंग (शारीरिकी)\nहृदय, फेफडे (फुफ्फुस), मस्तिष्क, आँख, आमाशय (stomach), प्लीहा (spleen), अस्थियाँ (bone), अग्न्याश (pancreas), वृक्क या गुर्दे (kidneys), यकृत (liver), आंतें (intestines), त्वचा (skin) (त्वचा, मनुष्य का सबसे विशाल अंग है), मूत्राअशय (urinary bladder), योनि (मादाओं में), शिश्न (penis), गुदाद्वार (anus) आदि।",
"मानव मस्तिष्क\nमस्तिष्क में प्रतिचित्र के स्तर पर शरीर के सभी अंगो का संरचनात्मक निरूपण होता है। प्रमस्तिष्क वल्कुट का भाग समस्त संरचनात्मक निरूपण के लिए उत्तरदाई होता है। यह निरूपण प्रतिपार्श्विक (Contraleteral) अर्थात् शरीर सममिति के दाहिने अक्ष का निरूपण बाएं प्रमस्तिष्क गोलार्ध एवं बाएं अक्ष का निरूपण दाहिनी ओर होता है। चित्र में शरीर की विरूपता इसके विभिन्न भागों एवं अंगो के मस्तिष्क में निरूपित भाग को प्रदर्शित करती है। मस्तिष्क में इस निरूपण के चिकित्सकीय प्रमाण भी मिलते हैं। जब मस्तिष्क का कोई भाग चोट या किसी अन्य कारण से प्रभावित हो जाता है तो उससे संबंधित अंग या अंग तंत्र भी स्पष्टतः प्रभावित होता है। यह घटना प्रायः पक्षाघात (Paralysis) के रूप में देखने को मिलती है।",
"नेत्रविज्ञान\nनेत्रविज्ञान (Ophthalmology), चिकित्साविज्ञान का वह अंग है जो आँख की रचना, कार्यप्रणाली, उसकी बीमारियों तथा चिकित्सा से संबधित है। नेत्रचिकित्सा, चिकित्सा व्यवसाय का एक प्रधान महत्वपूर्ण अंग समझा जाना चाहिए। नेत्र जीवन के लिए अनिवार्य तो नहीं, किंतु इसके बिना मानव शरीर के अस्तित्व का मूल्य कुछ नहीं रहता। ऐसे अंग की जीवन पर्यंत रक्षा का प्रबंध रखना रोगी, उसके परिचायक एवं चिकित्सक का पुनीत कर्तव्य होना चाहिए।",
"शारीरिकी\nधरातलीय शारीरिकी (Superficial or surface anatomy) शरीरशास्त्र की यह महत्वपूर्ण शाखा है और शल्य चिकित्सा तथा रोग निदान में अत्यन्त सहायक होती है। इसी से ज्ञात होता है कि दाहिनी दसवीं पर्शुका के कार्टिलेज के नीचे पित्ताशय रहता है; या हृदय का शीर्ष (apex) 5वीं अंतरपर्शुका से सटा, शरीर की मध्य रेखा से 9 सेमी. बाईं ओर होता है; अथवा भगास्थि, ट्यूबरकल से 1 सेमी. ऊपर होती है तथा 1 सेमी. पार्श्व में बाह्य उदरी मुद्रिका छिद्र रहता है। शरीर में स्थित जहाँ बिंदु त्वचा पर पहचाने जा सकते हैं, वहाँ से त्वचा के अंतः स्थित अंगों को त्वचा पर खींचकर, उस स्थान पर काटने पर वही अंग हमें मिलना चाहिए।",
"अंग (शारीरिकी)\nमानव शरीर में मुख्यतः ग्यारह (११) अंग तन्त्र हैं:",
"ज्ञानेन्द्रियाँ\nज्ञानेन्द्रियाँ मनुष्य के वे अंग है जो देखने, सुनने, महसूस करने, स्वाद-ताप-रंग अदि का पता लगाते हैं। मानव शरीर में त्वचा, आँख, कान, नाक और जिव्हा आदि पाँच प्रकार की ज्ञानेन्द्रियाँ होती है। त्वचा महसूस करने का, आँखे देखने का, कान सुनने का, नाक गंध का पता लगाने का और जिह्वा स्वाद को परखने का काम करती है।",
"काँख\nकाँख (बगल या कक्ष भी) मानव शरीर पर जहाँ बाँह कंधे से जुड़ती उस संधि के नीचे वाला क्षेत्र है। यह बाँह के नीचे स्वेद-ग्रन्थि भी प्रदान करता है। मनुष्यों में, शरीर की गंध की रचना ज्यादातर काँख-संबंधी क्षेत्र में होती है। ये गंध फेरोमोन पदार्थ के रूप में कार्य करती है जो समागम से संबंधित भूमिका निभाती है। काँख-संबंधी क्षेत्र शरीर की गंध के लिए जननांग क्षेत्र से अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है जो मानव द्विपाद से संबंधित हो सकता है।"
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अंतरिक्ष में कितने ग्रह है?
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"बहिर्ग्रह\nअनुमान लगाया जाता है के सूरज की श्रेणी के लगभग 10% तारों के इर्द-गिर्द ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं, हालांकि यह संख्या उस से भी अधिक हो सकती है। कॅप्लर अंतरिक्ष क्षोध यान द्वारा एकत्रित जानकारी के बूते पर कुछ वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है के आकाशगंगा (हमारी गैलेक्सी) में कम-से-कम 50 अरब ग्रहों के होने की सम्भावना है। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने जनवरी 2013 में अनुमान लगाया कि आकाशगंगा में इस अनुमान से भी दुगने, यानि 100 अरब, ग्रह हो सकते हैं।",
"महापृथ्वी\nकॅप्लर अंतरिक्ष यान ने अपने शोध में बहुत सी महापृथ्वियाँ ढूंढी हैं। फ़रवरी २०११ में एक सूची की घोषणा हुई जिसमें कॅप्लर यान द्वारा ढूंढें गए १,२३५ ग्रह थे। इनमें से ६८ की महापृथ्वी की श्रेणी में होने की संभावना है और ६ शायद पृथ्वी से दुगने भार से कम हैं। इसके आधार पर प्रसिद्ध खगोलशास्त्री सॅथ़ शोस्टैक (Seth Shostak) ने भविष्यवाणी की है कि पृथ्वी से १,००० प्रकाश वर्षों की दूरी के भीतर कम-से-कम ३०,००० ग्रह वास-योग्य हैं। कॅप्लर शोध दल ने अनुमान लगाया है कि आकाशगंगा (हमारी गैलेक्सी) के भीतर कम-से-कम ५० अरब ग्रह हैं जिनमें से कम-से-कम ५० करोड़ वासयोग्य क्षेत्रों में हैं।",
"अंतरिक्ष विज्ञान\nसौर प्रणाली ग्रहों के भूविज्ञान में बुध का भूविज्ञान, शुक्र का भूविज्ञान, चंद्रमा का भूविज्ञान, मंगल का भूविज्ञान, बृहस्पति का भूविज्ञान, शनि का भूविज्ञान, यूरेनस का भूविज्ञान, नेपच्यून का भूविज्ञान व प्लूटो का भूविज्ञान शामिल है।",
"ग्रह\nसूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोल पिण्डों को ग्रह कहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं - बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, युरेनस और नेप्चून। इनके अतिरिक्त तीन बौने ग्रह और हैं - सीरीस, प्लूटो और एरीस। प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने तारों और ग्रहों के बीच में अन्तर इस तरह किया- रात में आकाश में चमकने वाले अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं, एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्डों के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे - यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है इधर-उधर घूमने वाला। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया। शनि के परे के ग्रह दूरबीन के बिना नहीं दिखाई देते हैं, इसलिए प्राचीन वैज्ञानिकों को केवल पाँच ग्रहों का ज्ञान था, पृथ्वी को उस समय ग्रह नहीं माना जाता था।"
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"बुध (ग्रह)\nअभी तक दो अंतरिक्ष यान मैरीनर १० तथा मैसेन्जर बुध ग्रह जा चुके है। मैरीनर- १० सन १९७४ तथा १९७५ के मध्य तीन बार इस ग्रह की यात्रा कर चुका है। बुध ग्रह की सतह के ४५% हिस्से का नक्शा बनाया जा चुका है। (सूर्य के काफी समीप होने की वजह से होने वाले अत्यधिक प्रकाश व चकाचौंध के कारण हब्ब्ल दूरबीन उसके बाकी क्षेत्र का नक्शा नहीं बना पाती है।) मेसेन्जर यान २००४ में नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। इसने २०११ में बुध ग्रह की परिक्रमा की। इसके पहले जनवरी २००८ में इस यान ने मैरीनर १० द्वारा न देखे गये क्षेत्र की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरे भेंजी थी।",
"बृहस्पति (ग्रह)\nबृहस्पति का अनेक अवसरों पर रोबोटिक अंतरिक्ष यान द्वारा, विशेष रूप से पहले पायोनियर और वॉयजर मिशन के दौरान और बाद में गैलिलियो यान के द्वारा, अन्वेषण किया जाता रहा है। फरवरी २००७ में \"न्यू होराएज़न्ज़\" प्लूटो सहित बृहस्पति की यात्रा करने वाला अंतिम अंतरिक्ष यान था। इस यान की गति बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल कर बढाई गई थी। इस बाहरी ग्रहीय प्रणाली के भविष्य के अन्वेषण के लिए संभवतः अगला लक्ष्य यूरोपा चंद्रमा पर बर्फ से ढके हुए तरल सागर शामिल हैं। इसके उपग्रहों की संख्या 79 है।",
"अंतरिक्ष विज्ञान\nएक्स्ट्रासोलर ग्रहों का वायुमंडल अभी एक नया विज्ञान है क्योंकि केवल हाल ही में एक्स्ट्रासोलर ग्रहों का पता चला है। वर्तमान में खगोलविद इस विषय पर सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे। हैं कि हाल ही में खोजे गए बृहस्पति के आकार के एक्स्ट्रासोलर ग्रहों की सतह पर हजारों मील प्रति घंटा की रफ़्तार से निरंतर बहने वाली हवा का कारण उनकी अत्यन्त अण्डाकार कक्षा है जो उन्हें अपने अभिभावक तारे के करीब लाती है।",
"मंगल ग्रह\nवर्तमान में मंगल ग्रह की परिक्रमा तीन कार्यशील अंतरिक्ष यान मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस और टोही मार्स ओर्बिटर है, यह सौर मंडल में पृथ्वी को छोड़कर किसी भी अन्य ग्रह से अधिक है। मंगल पर दो अन्वेषण रोवर्स (स्पिरिट और् ओप्रुच्युनिटी), लैंडर फ़ीनिक्स, के साथ ही कई निष्क्रिय रोवर्स और लैंडर हैं जो या तो असफल हो गये हैं या उनका अभियान पूरा हो गया है। इनके या इनके पूर्ववर्ती अभियानो द्वारा जुटाये गये भूवैज्ञानिक सबूत इस ओर इंगित करते हैं कि कभी मंगल ग्रह पर बडे़ पैमाने पर पानी की उपस्थिति थी साथ ही इन्होने ये संकेत भी दिये हैं कि हाल के वर्षों में छोटे गर्म पानी के फव्वारे यहाँ फूटे हैं। नासा के मार्स ग्लोबल सर्वेयर की खोजों द्वारा इस बात के प्रमाण मिले हैं कि दक्षिणी ध्रुवीय बर्फीली चोटियाँ घट रही हैं। नासा ने २०२० में में परसेवरेंस रोवर मंगल पर भेजा है जिसके साथ इनसाइट लघु वायूविमान की प्रथम परग्रही उड़ान के लिए तत्पर है, इसके शुरुआती २०२१ में मंगल पर पहुंचने की संभावना है।",
"बृहस्पति (ग्रह)\n१९७३ के बाद से कई स्वचालित अंतरिक्ष यानों ने बृहस्पति का दौरा किया है, विशेष रूप से उल्लेखनीय पायोनियर १० अंतरिक्ष यान है, बृहस्पति के इतना पर्याप्त करीब पहुँचने वाला पहला अंतरिक्ष यान, जो सौरमंडल के इस बड़े ग्रह के गुणों और तथ्यों की जानकारी वापस भेज सके। सौरमंडल के भीतर अन्य ग्रहों के लिए उड़ान, ऊर्जा की कीमत पर संपन्न होती है ; जो अंतरिक्ष यान के वेग में शुद्ध परिवर्तन या धक्का या डेल्टा-v के द्वारा वर्णित किया जाता है। पृथ्वी से बृहस्पति के लिए, निम्न पृथ्वी कक्षा से होहमान्न स्थानांतरण कक्षा में प्रवेश के लिए एक ६.३ कि॰मी॰/सेकण्ड डेल्टा-v की आवश्यकता होती है। तुलना के लिए, निम्न पृथ्वी कक्षा पर पँहुचने के लिए ९.७ कि॰मी॰/सेकण्ड डेल्टा- v की जरुरत होगी। सौभाग्य से, बृहस्पति पहुँचने के लिए ग्रहीय उड़ानों की ऊर्जा की जरुरत को गुरुत्वाकर्षण की सहायता से कम किया जा सकता है, अन्यथा लम्बी अवधि की उड़ान की कीमत काफी हो सकती है।",
"मंगल ग्रह\nभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने कहा है कि भारत २०१३ तक मंगल के लिए एक अभियान शुरू करेगा। इसरो ने मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। इस यान को लाल ग्रह के वातावरण के अध्ययन के लिए मंगल की कक्षा में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) की सहायता से भेजा जाएगा। मंगल परिक्रमा यान ग्रह के चारों ओर ५०० x ८०,००० कि॰मी॰ की कक्षा में रखा जाएगा और करीबन २५ किलो के वैज्ञानिक पेलोड को ले जाने का एक प्रावधान होगा।"
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आमिर ख़ान ने बॉलीवुड में पहली फिल्म कब की थी?
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"आमिर ख़ान\nख़ान का पहला मुख्य किरदार 1988 के दौरान फ़िल्म \"क़यामत से क़यामत तक\" में नज़र आया, जिसे उनके भतीजे और नासिर हुसैन के बेटे मंसूर ख़ान ने निर्देशित किया था।\" क़यामत से क़यामत तक\" बॉक्स ऑफिस पर काफी सफल रही और इसने ख़ान के करियर को एक लीडिंग अभिनेता के तौर पर आगे बढाया.एक टिपिकल 'चॉकलेट अभिनेता' के रूप में उन्हें किशोरों का आदर्श माना जाने लगा। उसके बाद वे '80 और '90 की शुरुआत में कई फ़िल्मों में दिखे: \"दिल\" (1990), जो साल का सबसे बड़ा व्यवसायिक हिट रही, \"दिल है की मानता नहीं\" (1991), \"जो जीता वही सिकंदर\" (1992), \"हम हैं राही प्यार के\" (1993) (जिसके लिए उन्होंने पटकथा भी लिखा) और \"रंगीला\" (1995).इनमे से अधिकतर फ़िल्में आलोचनात्मक व व्यवसायिक दृष्टि से सफल रहीं। दूसरी सफल फ़िल्में \"अंदाज अपना अपना\", जिसमें सह-अभिनेता सलमान ख़ान थे। इसके रिलीज के समय फ़िल्म असफल रही परन्तु बाद में इसने अच्छी स्थिति बना ली।"
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"सलमान ख़ान\nसूरज बड़जात्या के निर्देशन में दूसरी बार सहयोग करने से रोमांस फिल्म \"हम आपके हैं कौन\" में सह कलाकार माधुरी दीक्षित के साथ ख़ान ने १९९४ में अपनी पहली सफलता का इतिहास पुन: दोहराया। उस साल की यह सबसे बड़ी हिट फिल्म थी और बॉलीवुड में सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता के अलावा इस फिल्म को दूर दूर से प्रशंसा मिलती रही और ख़ान को भी उनके प्रदर्शन के लिए तारीफ मिली जिसके चलते उन्हें दूसरी बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामांकन मिला। उस वर्ष ख़ान की भूमिका वाली तीन और फिल्में रिलीज़ हुईं लेकिन किसी ने भी इतनी सफलता नहीं दिलाई जितनी कि पहली वाली फिल्म ने दिलाई थी। हालाँकि सह कलाकार आमिर ख़ान के साथ इनकी फिल्म \"अंदाज अपना अपना\"के रिलीज होने के बाद से ही इनके प्रदर्शन के लिए इन्हें प्रशंसा मिल गई थी। १९९५ में इन्होंने राकेश रोशन की ब्लॉकबस्टर फिल्म \"करण अर्जुन\" से अपनी सफलता को मजबूत किया जिसमें शाहरुख़ ख़ान इनके सह कलाकार थे। यह फिल्म वर्ष की दूसरी सबसे बड़ी हिट फिल्म और इसमें करन की भूमिका ने उसके नाम को एक बार फिर फिल्मफेयर के \"सर्वश्रेष्ठ अभिनेता\" के लिए नामित कर दिया गया जिसमें \"करन अर्जुन\" के सह कलाकार शाहरूख ख़ान को यह पुरस्कार दे दिया गया था।",
"आमिर ख़ान\nउनकी 2007 की फ़िल्म, \"तारे ज़मीन पर\" (एक शिक्षक के बारे में जो \"डाइस्लेक्सिक\" से ग्रस्त बच्चे से दोस्ती व सहायता करता है), जिसे ख़ान ने निर्माण किया और अभिनय भी किया, उनका निर्देशन के क्षेत्र में पहला कदम था। यह फ़िल्म \"आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स\" की दूसरी फ़िल्म थी, जिसे सराहना और दर्शकों दोनों से अच्छा रेस्पॉन्स मिला। उन्हें फ़िल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार मिला, एक अच्छे निर्देशक और कहानी लेखक के रूप में जगह बने।",
"कब? क्यूं? और कहां?\nकब? क्यूं? और कहां? (कब? क्यों? और कहाँ?), अर्जुन हिंगोरानी द्वारा निर्देशित 1970 की एक बॉलीवुड रहस्यपूर्ण फिल्म है। फिल्म में धर्मेंद्र, बबीता और प्राण हैं। यह फ्रांसीसी कालजयी फिल्म लेस डायबोलिक्स (फिल्म) (1955) से प्रेरित है, जिसमें बाथटब दृश्य भी शामिल है।",
"आमिर ख़ान\nराकेश ओमप्रकाश मेहरा की पुरस्कार विजेता फ़िल्म, \"रंग दे बसंती\", 2006 में ख़ान का पहला रिलीज था। उन्हें आलोचकों की तारीफ मिली, सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए फिल्मफेयर आलोचना और \"सर्वश्रेष्ठ अभिनेता\" पुरस्कार जीता। यह फ़िल्म साल की सबसे कमाई करने वाली फ़िल्म रही, और इसे \"ऑस्कर में भारत के आधिकारिक प्रवेश सूचि में चुना गया\".जबकि फ़िल्म को नामिति के तौर पर नहीं चुना गया, इसे इंग्लैंड में BAFTA पुरस्कार के दौरान सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म का नामांकन मिला। ख़ान की अगली फ़िल्म, \"फना\" (2006) की भी तारीफ की गई, और 2006 की सर्वाधिक कमाई करने वाला भारतीय फ़िल्म रही।",
"आमिर ख़ान\nख़ान साल में एक या दो फ़िल्में ही करते हैं, जो मेनस्ट्रीम हिन्दी सिनेमा अभिनेता के लिए कुछ अलग बात है। उनकी 1996 में एकमात्र रिलीज थी धर्मेश दर्शन द्वारा निर्देशित व्यवसायिक ब्लॉकबस्टर \"राजा हिन्दुस्तानी\" जिसमे उनके विपरीत करिश्मा कपूर थी। इस फ़िल्म से उन्हें पिछले 8 नामांकनों के बाद पहला फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला जो 1990 साल का बहुत बड़ी हिट थी और तीसरा सर्वाधिक कमाई करने वाला भारतीय फ़िल्म रही। ख़ान के कैरियर ने इस समय तक ठहराव पा लिया था और उनकी ज्यादातर फ़िल्में आने वाले समय में कम सफल रही। 1997 में उन्होंने अजय देवगन और जूही चावला के विपरीत फ़िल्म \"इश्क\" में काम किया, जो आलोचकों के लिए ख़राब परन्तु बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। १९९८ में, ख़ान मध्यम सफल फ़िल्म \"ग़ुलाम\" में नज़र आए, जिसमें उन्होंने पार्श्व गायन भी किया। जॉन मेथ्यु मथान की \"सरफ़रोश\" (1999) ख़ान की 1999 के दौरान पहला रिलीज था थोडी सफल और बॉक्स ऑफिस पर औसत रही, जबकि फ़िल्म को आलोचकों ने सराहा. एक समर्पित, इमानदार और भ्रष्टता से दूर पुलिस के रूप में ख़ान का अभिनय सीमा पार आतंक को रोकना था, जिसकी तारीफ हुई। उन्होंने दीपा मेहता की कलात्मक फ़िल्म \"अर्थ\" में काम किया। 1999 के दौरान पहली रिलीज थी जो थोड़ी सफल और बॉक्स ऑफिस पर औसत रही, जबकि फ़िल्म को आलोचकों ने सराहा. नए शताब्दी में उनकी पहली रिलीज,\"मेला\" थी जिसमे उन्होंने वास्तविक जीवन के भाई फैसल ख़ान, के साथ काम किया, यह एक बॉक्स-ऑफिस और आलोचकों की नज़र में हिटबोम्ब () साबित हुई।",
"आमिर ख़ान\nअपने चाचा नासिर हुसैन की फ़िल्म \"यादों की बारात\" (1973) में एक बाल कलाकार की भूमिका में नज़र आए थे और ग्यारह साल बाद ख़ान का करियर फ़िल्म \"होली\" (1984) से आरम्भ हुआ उन्हें अपने चचेरे भाई मंसूर ख़ान के साथ फ़िल्म \"क़यामत से क़यामत तक\" (1988) के लिए अपनी पहली व्यवसायिक सफलता मिली और उन्होंने फ़िल्म में एक्टिंग के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ मेल नवोदित पुरस्कार () जीता। पिछले आठ नामांकन के बाद 1980 और 1990 के दौरान, ख़ान को \"राजा हिन्दुस्तानी\" (1996), के लिए पहला फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला जो अब तक की उनकी एक बड़ी व्यवसायिक सफलता थी।",
"आमिर ख़ान\nख़ान ने अपना फ़िल्मी करियर की शुरुआत एक बाल कलाकार के रूप में नासिर हुसैन द्बारा गृह निर्मित, निर्माण व निर्देशित फ़िल्म \"यादों की बारात\" (1973) और \"मदहोश\" (1974) से की। ग्यारह साल बाद, उन्हें एडल्ट अभिनय डेब्यू का मौका मिला जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, वह थी केतन मेहता की \"होली\" (1984).",
"शाहरुख़ ख़ान\n१९९५ में उन्होंने आदित्य चोपड़ा की पहली फ़िल्म \"दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे\" में मुख्य भूमिका निभाई। यह फ़िल्म बॉलीवुड के इतिहास की सबसे सफल और बड़ी फ़िल्मों में से एक मानी जाती है। मुम्बई के कुछ सिनेमा घरों में यह १२ सालों से चल रही है। इस फ़िल्म के लिए उन्हें एक बार फिर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार हासिल हुआ।",
"आमिर ख़ान\nख़ान ने अपना निर्माण कंपनी, \"आमिर ख़ान प्रोडक्शन\" बनाकर अपने पुराने दोस्त आशुतोष गोवारिकर की स्वप्निल फ़िल्म \"लगान\" को वित्तीय सहायता किया। यह फ़िल्म 2001 में रिलीज हुई, जिसमें आमिर ख़ान मुख्य अभिनेता थे। यह फ़िल्म आलोचकों और कॉमर्शियल की नज़र से सफल रही और इसे सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फ़िल्म के लिए 74 वें एकेडमी पुरस्कार में भारत के आधिकारिक सूची () में चुन लिया गया। फलतः यह चुन लिया गया और अन्य चार विदेशी फ़िल्मों के साथ उसी वर्ग में नामांकन हुआ, लेकिन \"नो मेंस लैंड\" से हार गया। इसके अलावा फ़िल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल्स में सराहा गया, साथ ही बॉलीवुड के कई पुरस्कार मिले जिनमें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी शामिल है। ख़ान अपना दूसरा फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार जीता जबकि ऑस्कर में \"लगान\" को निराशा मिला। परन्तु चीज़ें हमारा उत्साह बनाये रखती है, कि सारा देश हमारे साथ है।\""
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भारत में हीरे की खान कहां है?
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"भारत के दुर्लभ हीरे\n18वीं शताब्दी में दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में हीरों की खानों का पता चलने से पहले तक दुनियाभर में भारत की गोलकुंडा खान से निकले हीरों की धाक थी। आज अधिकांश भारतीय हीरे जहां लापता हैं। वहीं कुछ विदेशी संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।",
"जवाहरात\nदुर्लभ हीरे मुख्य लेख: भारत के दुर्लभ हीरे हीरा खान से निकाला जाता है और बाद में पॉलिश कर के चमकाया जाता है। १८वीं शताब्दी में दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में हीरों की खानों का पता चलने से पहले तक दुनिया भर में भारत की गोलकुंडा खान से निकले हीरों की धाक थी।[2] लेकिन यहाँ से निकले अधिकांश भारतीय हीरे या तो लापता हैं या विदेशी संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमें से एक हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा कोहिनूर भी है। सबसे अधिक वजन वाला हीरा ग्रेट मुगल गोलकुंडा की खान से १६५० में जब निकला तो इसका वजन ७८७ कैरेट था। जो कोहिनूर से करीब छह गुना अधिक था[3] आज यह हीरा आज कहाँ है किसी को पता नहीं। ऐसा ही एक बहुमूल्य हीरा अहमदाबाद डायमंड था जो बाबर ने १५२६ में पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के राजा विक्रमजीत को हराकर हासिल किया था। इस दुर्लभ हीरे को आखिरी बार १९९० में लंदन के क्रिस्ले ऑक्सन हाउस की नीलामी में देखा गया था। द रिजेंट नामक १७०२ के आसपास गोलकुंडा की खान से निकला हीरा ४१० कैरेट था। जो बाद में नेपोलियन के पास पहुँचा। यह हीरा अब १४० कैरेट का हो चुका है और पेरिस के लेवोरे म्यूजियम में रखा गया है। इसी प्रकार ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। ९०.८ कैरेट के ब्रोलिटी जिसे कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है, १२वीं शताब्दी में फ्रांस की महारानी ने खरीदा। आज यह कहाँ है कोई नहीं जानता। एक और गुमनाम हीरा २०० कैरेट का ओरलोव था जिसे १८वीं शताब्दी में मैसूर के मंदिर की एक मूर्ति की आंख से फ्रांस के व्यापारी ने चुराया था। कुछ गुमनाम भारतीय हीरे: ग्रेट मुगल (२८० कैरेट), ओरलोव (२०० कैरेट), द रिजेंट (१४० कैरेट), ब्रोलिटी ऑफ इंडिया (९०.८ कैरेट), अहमदाबाद डायमंड (७८.८ कैरेट), द ब्लू होप (४५.५२ कैरेट), आगरा डायमंड (३२.२ कैरेट), द नेपाल (७८.४१)",
"हीरा\nहीरा खान से निकाला जाता है और बाद में पॉलिश कर के चमकाया जाता है। १८वीं शताब्दी में दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में हीरों की खानों का पता चलने से पहले तक दुनिया भर में भारत की गोलकुंडा खान से निकले हीरों की धाक थी। लेकिन यहाँ से निकले अधिकांश भारतीय हीरे या तो लापता हैं या विदेशी संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमें से एक हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा कोहिनूर भी है। सबसे अधिक वजन वाला हीरा ग्रेट मुगल गोलकुंडा की खान से १६५० में जब निकला तो इसका वजन ७८७ कैरेट था। जो कोहिनूर से करीब छह गुना अधिक था आज यह हीरा आज कहाँ है किसी को पता नहीं। ऐसा ही एक बहुमूल्य हीरा अहमदाबाद डायमंड था जो बाबर ने १५२६ में पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के राजा विक्रमजीत को हराकर हासिल किया था। इस दुर्लभ हीरे को आखिरी बार १९९० में लंदन के क्रिस्ले ऑक्सन हाउस की नीलामी में देखा गया था। द रिजेंट नामक १७०२ के आसपास गोलकुंडा की खान से निकला हीरा ४१० कैरेट था। जो बाद में नेपोलियन के पास पहुँचा। यह हीरा अब १४० कैरेट का हो चुका है और पेरिस के लेवोरे म्यूजियम में रखा गया है। इसी प्रकार ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। ९०.८ कैरेट के ब्रोलिटी जिसे कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है, १२वीं शताब्दी में फ्रांस की महारानी ने खरीदा। आज यह कहाँ है कोई नहीं जानता। एक और गुमनाम हीरा २०० कैरेट का ओरलोव था जिसे १८वीं शताब्दी में मैसूर के मंदिर की एक मूर्ति की आंख से फ्रांस के व्यापारी ने चुराया था। कुछ गुमनाम भारतीय हीरे: ग्रेट मुगल (२८० कैरेट), ओरलोव (२०० कैरेट), द रिजेंट (१४० कैरेट), ब्रोलिटी ऑफ इंडिया (९०.८ कैरेट), अहमदाबाद डायमंड (७८.८ कैरेट), द ब्लू होप (४५.५२ कैरेट), आगरा डायमंड (३२.२ कैरेट), द नेपाल (७८.४१)",
"कोहिनूर हीरा\nअनुवाद निवेदित भारत की गोलकुंडा की खानों से कोहिनूर के अलावा भी दुनिया के कई बेशकीमती हीरे निकले। ग्रेट मुगल, ओरलोव, आगरा डायमंड, अहमदाबाद डायमंड, ब्रोलिटी ऑफ इंडिया जैसे न जाने कितने ऐसे हीरे हैं, जो कोहिनूर जितने ही बेशकीमती हैं।",
"नासक हीरा\nनासक हीरा एक का बडा हीरा है जो भारत में १५वीं शताब्दी में एक बड़े ८९ कैरेट के हीरे के रूप में उत्पन्न हुआ। ये कोल्लूर की गोलकोंडा खदानों में पाया गया और मूल रूप से भारत में काटा गया थी। ये हीरा महाराष्ट्र राज्य के नासिक के पास, त्र्यंबकेश्वर शिव मंदिर, में कम से कम सन् १५०० से सन् १८१७ तक था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के माध्यम से हीरे पर कब्जा कर लिया और इसे १८१८ में ब्रिटिश जौहरी रुंडेल और ब्रिज को बेच दिया। रुंडेल और ब्रिज ने १८१८ में हीरे को वापस तराशा, जिसके बाद इसे वेस्टमिंस्टर के पहले मार्केज़ की तलवार के हैंडल में सजाया।"
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"कोहिनूर हीरा\nइस हीरे के बारे में, दक्षिण भारतीय कथा, कुछ पुख्ता लगती है। यह सम्भव है, कि हीरा, आंध्र प्रदेश की कोल्लर खान, जो वर्तमान में गुंटूर जिला में है, वहां निकला था। दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश का अंत १३२० में होने के बाद गियासुद्दीन तुगलक ने गद्दी संभाली थी। उसने अपने पुत्र उलुघ खान को १३२३ में काकातीय वंश के राजा प्रतापरुद्र को हराने भेजा था। इस हमले को कड़ी टक्कर मिली, परन्तु उलूघ खान एक बड़ी सेना के साथ फिर लौटा। इसके लिये अनपेक्षित राजा, वारंगल के युद्ध में हार गया। तब वारंगल की लूट-पाट, तोड़-फोड़ व हत्या-काण्ड महीनों चली। सोने-चांदी व हाथी-दांत की बहुतायत मिली, जो कि हाथियों, घोड़ों व ऊंटों पर दिल्ली ले जाया गया। कोहिनूर हीरा भी उस लूट का भाग था। यहीं से, यह हीरा दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकारियों के हाथों से मुगल सम्राट बाबर के हाथ १५२६ में लगा।",
"भारत का आर्थिक इतिहास\nबहुमुल्य रत्नों का विदेशों से आयात भी होता था और दक्षिण भारत की खानों से भी हीरे निकाले जाते थे। टेवरनियर हीरों का एक प्रसिद्ध व्यापारी था। दक्षिण भारत में हीरों की एक खान का वर्णन करते हुए टेवरनियर लिखता है कि इसमें हजारों की संख्या में मजदूर काम करते थे। भूमि के एक बड़े प्लाट को खोदा जाता था। आदमी इसे खोदते थे, स्त्रियांॅ और बच्चे उस मिट्टी को एक स्थान पर ले जाते थे। जो चारों ओर दीवारों से घिरा होता था। मिट्टी के घड़ों में पानी लाकर उस मिट्टी को धोया जाता था। ऊपरी मिट्टी दीवार में छेदों के द्वारा बहा दी जाती थी और रेत बच रहता था। इस प्रकार जो तत्त्व बचता था, उसे लकड़ी डण्डों से पीटा जाता था और अंत से हाथ से हीरे चुन लिये जाते थे।",
"भारत में ज्वैलरी डिजाइन\nहैदराबाद के पास गोदावरी नदी के तट पर पहले से खनन, हीरा भारतीय सांस्कृतिक काल्पनिक में एक अद्वितीय स्थिति का आयोजन किया। हिंदुओं का मानना था कि जब बिजली मारा चट्टानों भगवान कृष्ण चांदनी में उसकी सुंदरता को प्रतिबिंबित करने के लिए एक हीरे के साथ उसके प्रेमी राधा प्रस्तुत वे बनाए गए थे। पत्थर माना गया है, बीमारी चंगा करने की शक्ति है लड़ाई में मौत वार्ड और सांप, आग, जहर, चोर, बाढ़ और बुरी आत्माओं से पहनने की रक्षा करने के लिए। यहाँ तक कि 19 वीं सदी तक, यह धनी भारतीयों को अपने दांतों बिजली हमलों और मरम्मत दाँत क्षय को रोकने के लिए हीरा पाउडर के साथ साफ है करने के लिए आम था।",
"हीरा\nहीरे का कारोबार करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी डी बियर्स की सहयोगी इकाई डायमंड ट्रेडिंग कंपनी (डीटीसी) के मुताबिक दुनिया के ९० फीसदी हीरों के तराशने का काम भारत में होता है, ऐसे में यहाँ हीरा उद्योग के फलने-फूलने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं।",
"जवाहरात\nहीरे का कारोबार करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी डी बियर्स की सहयोगी इकाई डायमंड ट्रेडिंग कंपनी (डीटीसी) के मुताबिक दुनिया के ९० फीसदी हीरों के तराशने का काम भारत में होता है, ऐसे में यहाँ हीरा उद्योग के फलने-फूलने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं।[4]"
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पंजाबी भाषा विश्व के किन देशों में बोली जाती है?
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"पंजाबी भाषा\nइस समय पर पंजाबी पाकिस्तान के सूबा पंजाब में लहजो के मामूली फ़र्क साथ और सूबा सरहद में कोहाट, बनेगा और पेशावर के आसपास (हिंदको के नाम साथ) डेरा इस्माइल ख़ान में (डेरी के नाम साथ) और एबटाबाद, हरी परंतु और हज़ारा डिविज़न के दूसरे स्थानों में (हिंदको के नाम साथ), आज़ाद कश्मीर के स्थानों में (पहाड़ी और गुजरी के नाम साथ) और सिंध के पंजाब साथ लगते इलाकों में और भारत में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा के काफ़ी इलाकों में दिल्ली और राजस्थान के पंजाब साथ लगते ज़िलें और कब्ज़ा किया हुआ जम्मू और कश्मीर में जम्मू के ज़िलें में बोली जाती है। इसके अलावा अमेरीका, कैनेडा, ऑस्ट्रेलिया और बरतानिया में अकलियती ज़बान के तौर और बोली जाती है।"
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"पंजाबी भाषा\nपंजाबी (गुरमुखी: ਪੰਜਾਬੀ ; शाहमुखी: پنجابی) एक हिंद-आर्यन भाषा है और ऐतिहासिक पंजाब क्षेत्र (अब भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित) के निवासियों तथा प्रवासियों द्वारा बोली जाती है। इसके बोलने वालों में सिख, मुसलमान और हिंदू सभी शामिल हैं। पाकिस्तान की १९९८ की जनगणना और २००१ की भारत की जनगणना के अनुसार, भारत और पाकिस्तान में भाषा के कुल वक्ताओं की संख्या लगभग ९-१३ करोड़ है, जिसके अनुसार यह विश्व की ११वीं सबसे व्यापक भाषा है। कम से कम पिछले ३०० वर्षों से लिखित पंजाबी भाषा का मानक रूप, माझी बोली पर आधारित है, जो ऐतिहासिक माझा क्षेत्र की भाषा है।",
"पंजाबी भाषा\nपंजाबी पाकिस्तान में सबसे बड़ी भाषा है। यह ४५ फ़ीसद पकिस्तानियों की मातृभाषा जब कि ७० फ़ीसद पाकिस्तानी इस को बोलना जानते हैं। पंजाबी की कई उपभाषाएँ हैं परन्तु एक-दूसरे से करीबी होने के कारण सब को आसानी से समझा जा सकता है। पंजाब के साथ यह पूरे आज़ाद कश्मीर में बोली और समझी जाती है। इसके के अलावा भारत की सिर्फ़ 3 फ़ीसद आबादी पंजाबी बोलती है, परंतु पंजाबी को भारत के सूबा पंजाब में सरकारी बोली और दिल्ली और हरियाणा में दूसरी बोली का दर्जा है।",
"पंजाबी भाषा\nपंजाबी भाषा पंजाब की आधुनिक भारतीय आर्यभाषा है। ग्रियर्सन ने (लिंग्विस्टिक सर्वे भाग 1,8 तथा 9 में) पूर्वी पंजाबी को \"पंजाबी\" और पश्चिमी पंजाबी को \"लहँब्रा\" कहा है। वास्तव में पूर्वी पंजाबी और पश्चिमी पंजाबी पंजाबी की दो उपभाषाएँ हैं जैसे पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी हिंदी की। यह अलग बात है कि पाकिस्तान बन जाने के कारण दोनों भाषाओं का विकास इतनी भिन्न दिशाओं में हो रहा है कि इनके अलग अलग भाषाएँ हो जाने की संभावना है। पंजाबी की एक तीसरी उपभाषा \"डोगरी\" है जो जम्मू-कश्मीर के दक्षिण-पूर्वी प्रदेश और काँगड़ा के आसपास बोली जाती है। साहित्य में मध्यकाल में लहँदी का मुलतानी रूप और आधुनिक काल में अमृतसर और उसके आसपास प्रचलित पूर्वी पंजाबी का माझी रूप व्यवहृत होता रहा है। अमृतसर सिक्खों का प्रधान धार्मिक तीर्थ और केंद्र है। ईसाई मिशनरियों ने लुधियाना-पटियाला की मलबई बोली को टंकसाली बनाने का प्रयत्न किया। उसका परिणाम इतना तो हुआ है कि मलवई का प्रभाव सर्वत्र व्याप्त है, किंतु आदर्श साहित्यिक भाषा के रूप में माझी ही सर्वमान्य रही है। पश्चिमी पंजाब की बोलियों में मुलतानी, डेरावाली, अवाणकारी और पोठोहारी, एव पूर्वी पंजाबी की बोलियों में पहाड़ी, माझी, दूआबी, पुआधी, मलवई और राठी प्रसिद्ध हैं। पश्चिमी पंजाबी और पूर्वी पंजाबी की सीमारेखा रावी नदी मानी गई है।",
"पंजाबी भाषा\nपंजाबी, अंग्रेज़ के आने से पहले और भारत और मिल मारने से पहले, दिल्ली से ले कर पेशावर तक फैले हुए पंजाब के छोटे छोटे फ़र्कों साथ बोली जाने वाली बोली थी। १९०१ई. में अंग्रेज़ों ने उस समय पर के पंजाब के ऊपर वाले लेते तरफ़ को काट कर सूबा सरहद बना दिया और फिर १९४७ई. में रहता पंजाब भी 2 टुकड़ों: चढ़ते पंजाब और उतरते पंजाब में बँटा गया। १९६०ई. में इस चढ़ते या भारती पंजाब के भी 3 टुकड़े करके हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में बाँट दिया गया। अअऐनज पंजाबी भी भाग गई और राजनैतिक फ़ायदे के लिए इस को हिमाचल प्रदेश में हिंदी का एक लहजा बताया गया जब कि हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली बोली पंजाबी का अंगीठी लहजा है।",
"हिन्दको भाषा\nहिन्दको भाषा को अफ़गानिस्तान के हिन्दकी लग बोलते हैं। पाकिस्तान के सरहदी राज्य का हज़ारे का देश जिसमें मानसहरा, काग़ान, नारान, बालाकोट, ऐबटाबाद हरीपुर, सवाबी, पेशावर, कोहाट, डेरा इसमाईल ख़ान आदि जगहों पर यह बहुसंख्यक लोगों के बीच बोली जाती है। पंजाब के ज़िला अटक में भी लोग अपनी बोली को हिन्दको कहते हैं। पंजाबी बोलने वाले लोगों को हिन्दको समझने में कोई परेशानी नहीं होती और ना ही हिन्दको बोलने वालों को पंजाबी या पोठोहारी समझने में कोई दिक्कत आती है।",
"बाङ्ला भाषा\nबाङ्ला भाषा अथवा बांग्ला भाषा या बंगाली भाषा (बाङ्ला लिपि में : বাংলা ভাষা/ \"बाङ्ला\"), बांग्लादेश और भारत के पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी भारत के त्रिपुरा तथा असम राज्यों के कुछ प्रान्तों में बोली जानेवाली एक प्रमुख भाषा है। भाषाई परिवार की दृष्टि से यह हिन्द यूरोपीय भाषा परिवार का सदस्य है। इस परिवार की अन्य प्रमुख भाषाओं में हिन्दी, नेपाली, पंजाबी, गुजराती, असमिया, ओड़िया, मैथिली इत्यादी भाषाएँ हैं। बंगाली बोलने वालों की सँख्या लगभग २३ करोड़ है और यह विश्व की छठी सबसे बड़ी भाषा है। इसके बोलने वाले बांग्लादेश और भारत के अलावा विश्व के बहुत से अन्य देशों में भी फैले हैं।",
"पंजाब (भारत)\n1.40 अन्य भाषाएं अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों ओर के पंजाबों की भाषा पंजाबी है, परंतु लिपि भिन्न है। भारतीय पंजाब में जहां गुरुमुखी का प्रयोग होता है वहीं पाकिस्तानी पंजाब में शाहमुखी लिपि का प्रयोग होता है। भारतीय पंजाब की लगभग 11 % जनता हिन्दी बोलती है, विशेष तौर पर हरियाणा और राजस्थान से सटे इलाकों में। हिन्दी को लगभग पूरी जनसंख्या द्वारा समझा जाता है जबकि शहरों में रहने वाले धाराप्रवाह हिंदी और अन्य भाषा बोल भी सकते हैं।",
"शिमला\nहिंदी शहर की सम्पर्क भाषा है - यह शहर में बोली जाने वाली और आधिकारिक उद्देश्यों के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है। अंग्रेजी भी एक बड़ी आबादी द्वारा बोली जाती है, और शहर की दूसरी आधिकारिक भाषा है। हिंदी के अलावा, पहाड़ी भाषाएँ जातीय पहाड़ी लोगों द्वारा बोली जाती हैं, जो शहर में स्थानीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं। शहर की जातीय पंजाबी प्रवासी आबादी के बीच पंजाबी भाषा प्रचलित है, जिनमें से अधिकांश पश्चिम पंजाब के शरणार्थी हैं, जो 1947 में भारत के विभाजन के बाद शहर में बस गए थे।",
"पंजाबी भाषा\nध्वनिविकास की दृष्टि से पंजाबी अभी तक अपनी प्राकृत अवस्था से बहुत आगे नहीं बढ़ी है। तुलना कीजिए पंजाबी हत्थ, कन्न, जंघ, सत्त, कत्तणा, छडणा और हिंदी हाथ, कान, जाँघ, सात, कातना, छोड़ना आदि। पूर्वी पंजाबी में सघोष महाप्राण ध्वनियाँ (घ, झ, ढ, ध, भ) अघोष आरोही सुर के साथ बोली जाती हैं। यह पंजाबी की अपनी विशेषता है। पंजाबी बोलनेवालों की कुल संख्या करोड़ों में है।"
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क्षेत्रफल में भारत का सबसे बड़ा राज्य कौन है?
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"राजस्थान का भूगोल\nराजस्थान भारत का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है। इसकी राजधानी जयपुर है, जिसे गुलाबी नगरी के नाम से भी जाना जाता है। राज्य का क्षेत्रफल 3 42 239 वर्ग किमी है।",
"राजस्थान के शहर\nराजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यहाँ कम जनसंख्या घनत्व के कारण जनसंख्या की दृष्टि से भारत का सातवाँ सबसे बड़ा राज्य है। जयपुर राजस्थान का सबसे बड़ा और सबसे अधिक जनसंख्या वाला और राज्य का राजधानी क्षेत्र है। जोधपुर, कोटा और बिकानेर इसके बाद में आते हैं। भिवंडी, अलवर और उदयपुर जनसंख्या की दृष्टि से हाल में सबसे तेजी से वृद्धि वाले नगर हैं। वर्ष 2031 तक राजस्थान में 5 नगर 10 लाख से अधिक संख्या को प्राप्त करने की सम्भावना है जिनमें से 3 नगरों की जनसंख्या 20 लाख और एक नगर की जनसंख्या 50 लाख से अधिक होने की सम्भावना है।",
"राजस्थान\nराजस्थान भारत गणराज्य का क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है।इस राज्य की एक अंतरराष्ट्रीय सीमा पाकिस्तान के साथ लगती है। इसके अतिरिक्त यह देश के अन्य पाँच राज्यों से भी जुड़ा है।इसके दक्षिण-पश्चिम में गुजरात, दक्षिण-पूर्व में मध्यप्रदेश, उत्तर में पंजाब (भारत), उत्तर-पूर्व में उत्तरप्रदेश और हरियाणा है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि॰मी॰ (132139 वर्ग मील) है। 2011 की गणना के अनुसार राजस्थान की साक्षरता दर 66.11% हैं।"
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"नागालैण्ड\nनागालैण्ड (नागालैंड) भारत का एक उत्तर पूर्वी राज्य है। इसकी राजधानी कोहिमा है, जबकि दीमापुर राज्य का सबसे बड़ा नगर है। नागालैण्ड की सीमा पश्चिम में असम से, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश से, पूर्व मे बर्मा से और दक्षिण मे मणिपुर से मिलती है। भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, इसका क्षेत्रफल 16,579 वर्ग किलोमीटर है, और जनसंख्या 19,80,602 है, जो इसे भारत के सबसे छोटे राज्यों में से एक बनाती है।",
"राजस्थान\nराज्य का क्षेत्रफल ३.४२ लाख वर्ग कि.मी है जो भारत के कुल क्षेत्रफल का १०.४० प्रतिशत है। यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। वर्ष १९९६-९७ में राज्य में गांवों की संख्या ३७८८९ और नगरों तथा कस्बों की संख्या २२२ थी। राज्य में ३३ जिला परिषदें, २३५ पंचायत समितियां और ९१२५ ग्राम पंचायतें हैं। नगर निगम ४ और सभी श्रेणी की नगरपालिकाएं १८० हैं।",
"उत्तराखण्ड में लोकसभा क्षेत्र\nआकार की दृष्टि से उत्तराखण्ड भारत का उन्नीसवां सबसे बड़ा राज्य है जिसका क्षेत्रफल ५३,५६६ वर्ग किमी है। यह आकार की दृष्टि से देश की राजधानी दिल्ली से लगभग सैंतीस गुणा बड़ा है लेकिन यहाँ की जनसंख्या कुल ८५ लाख (२००१) है जो दिल्ली की जनसंख्या का लगभग ६०% है। इसलिए यहाँ जनसंख्या घनत्व को देखते हुए पाँच लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं, जो इस प्रकार हैं:",
"उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले शहरों की सूची\nउत्तर प्रदेश एक भारतीय राज्य है, जिसकी सीमाऐं नेपाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के साथ मिलती हैं। राज्य के उत्तर में हिमालय है और दक्षिण में दक्कन का पठार स्थित है। इन दोनों के बीच में, गंगा, यमुना, सरयू समेत कई नदियां पूरब की तरफ बहती हैं। उत्तर प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल है। 2011 के जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या 19,95,81,477 है। उत्तर प्रदेश को 18 मण्डलों के अंतर्गत 75 जिलों में विभाजित किया गया है। 2011 में 199,581,477 की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का 6.88 प्रतिशत मात्र है, लेकिन भारत की 16.49 प्रतिशत आबादी यहां निवास करती है। 2011 तक राज्य में 64 ऐसे नगर हैं, जिनकी जनसंख्या 100,000 से अधिक है। 1,640 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 45,42,184 की जनसंख्या के साथ कानपुर राज्य का सर्वाधिक जनसंख्या वाला नगर है।",
"हरियाणा\nहरियाणा उत्तर भारत में स्थित एक स्थलरुद्ध राज्य है। इसका विस्तार २७°३९' उत्तर से ३०°५५' उत्तर तक के अक्षांशों तक, और ७४°२८' पूर्व से ७७°३६' पूर्व तक के देशान्तरों तक है। राज्य की सीमायें उत्तर में पंजाब और हिमाचल प्रदेश, तथा दक्षिण एवं पश्चिम में राजस्थान से जुड़ी हुई हैं। उत्तर प्रदेश राज्य के साथ इसकी पूर्वी सीमा को यमुना नदी परिभाषित करती है। हरियाणा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को भी तीन ओर से घेरता है। राज्य का क्षेत्रफल ४४,२१२ वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का १.४ प्रतिशत है, और इस प्रकार क्षेत्रफल के आधार पर यह भारत का बीस वाँ सबसे बड़ा राज्य है। समुद्र तल से हरियाणा की ऊँचाई ७०० से ३६०० फीट (२०० मीटर से १२०० मीटर) तक है।",
"जनसंख्या के आधार पर भारत के राज्य और संघ क्षेत्र\nभारत का कुल् भौगोलिक क्षेत्रफल 32,87,240 वर्ग किमी है। जनसंख्या घनत्व निकटतम पूर्णांक के लिए पूर्णित है।",
"प्रदेश संख्या १\nप्रदेश संख्या १ नेपाल का सबसे पूर्वी राज्य है, जिसका कुल क्षेत्रफल २५,९०५ किमी है। यह उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण के तराई तक फैला हुआ है। उत्तर में आठ हज़ारी पर्वत श्रृंखला हैं तो दक्षिण में फैले हुए मैदानी क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र कि सबसे बड़ी नदी कोशी नदी है। नेपाल में कोशी के पश्चिम से शिवालिक कि पहाड़ियां शुरू होती है जो उत्तराखंड से आगे तक जाती है। शिवालिक को नेपाल में चूरे कहते हैं। विश्व कि सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट इसी राज्य में तिब्बत सिमा से सटा हुआ है।"
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जैन धर्म के लोग प्याज क्यों नही खाते?
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"श्वेताम्बर\nअहिंसा पर जैन धर्म का रुख शाकाहार से परे है। जैनों ने अनावश्यक क्रूरता के साथ प्राप्त भोजन को मना कर दिया। रूढ़िवादी जैन आहार ज्यादातर मूल सब्जियों को शामिल नहीं करता है, क्योंकि उनका मानना है कि इससे जीवन अनावश्यक रूप से नष्ट हो जाता है। रूट सब्जियों को मना करने का एक अन्य कारण पूरे पौधों को नष्ट करने से बचना है। यदि आप सेब खाते हैं, तो आप पूरे पेड़ों को नष्ट नहीं करते हैं, लेकिन रूट सब्जियों के लिए, पूरे पौधों को उखाड़ दिया जाता है। लहसुन और प्याज से परहेज किया जाता है क्योंकि इन्हें जुनून, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या पैदा करने के रूप में देखा जाता है। पर्यवेक्षक जैन सूर्यास्त (जिसे चौविहार कहते हैं) के बाद खाना, पीना या यात्रा नहीं करते हैं और हमेशा सूर्योदय से पहले उठते हैं।",
"भारतीय खाना\nभारतीय भोजन में बहुत सारे सामग्रीयो का उपयोग होता है, जैसे की दालचीनी, काली मिर्च, लौंग, इलायची का प्रयोग होता है। अदरक लहसुन और प्याज का भी प्रयोग होता है, लेकिन जैन धर्म व कुछ ब्राह्मण जड़(रूट) सब्जियों को नहीं खाते। मौसमी सामग्री क भी प्रयोग होता है। अलग -अलग प्रकार के दाल का भी उपयोग होता है जैसे मसूर, तूर, उड़द मूंग दाल जैसे भिन्न-भिन्न दालो का इस्तमल होता है।"
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"शाकाहार\nजैन धर्म के अनुयायी आत्मा का असतित्व स्वीकारते हैं और इस अपेक्षा से सभी को समान मानते है। जानवर मनुष्य की तरह ही सुख दुख का अनुभव करते है इसी वजह से न्यूनतम हिंसा करने का अधिकतम प्रयास करते हैं। अधिकांश जैनी लैक्टो-शाकाहारी होते हैं, लेकिन अधिक धर्मनिष्ठ जैनी कंद-मूल सब्जियाँ नहीं खाते क्योंकि इससे पौधों की हत्या होती है। इसके बजाय वे फलियां और फल खाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिनकी खेती में पौधों की हत्या शामिल नहीं है। मृत पशुओं से प्राप्त उत्पादों के उपभोग या उपयोग की अनुमति नहीं है। आध्यात्मिक प्रगति के लिए यह उनके लिए एक अपरिहार्य स्थिति है। कुछ विशेष रूप से समर्पित व्यक्ति फ्रुटेरियन हैं। शहद से परहेज किया जाता है, क्योंकि इसके संग्रह को मधुमक्खियों के खिलाफ हिंसा के रूप में देखा जाता है। कुछ जैनी भूमि के अंदर पैदा होने वाले पौधों के भागों को नहीं खाते, जैसे कि मूल और कंद; क्योंकि पौधा उखाड़ते समय सूक्ष्म प्राणी मारे जा सकते हैं।",
"जैन धर्म\nरागद्वेषी शत्रुओं पर विजय पाने के कारण 'वर्धमान महावीर' की उपाधि 'जिन' थी। अतः उनके द्वारा प्रचारित धर्म 'जैन' कहलाता है। जैन पन्थ में अहिंसा को परमधर्म माना गया है। सब जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता, अतएव इस धर्म में प्राणिवध के त्याग का सर्वप्रथम उपदेश है। केवल प्राणों का ही वध नहीं, बल्कि दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाले असत्य भाषण को भी हिंसा का एक अंग बताया है। महावीर ने अपने शिष्यों तथा अनुयायियों को उपदेश देते हुए कहा है कि उन्हें बोलते-चालते, उठते-बैठते, सोते और खाते-पीते सदा यत्नशील रहना चाहिए। अयत्नाचार पूर्वक कामभोगों में आसक्ति ही हिंसा है, इसलिये विकारों पर विजय पाना, इन्द्रियों का दमन करना और अपनी समस्त वृत्तियों को संकुचित करने को जैन पन्थ में सच्ची अहिंसा बताया है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जीवन है, अतएव पृथ्वी आदि एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा का भी इस धर्म में निषेध है।",
"जैन धर्म\nजैन पन्थ के सभी तीर्थकर क्षत्रिय कुल में हुए थे। इससे मालूम होता है कि पूर्वकाल में जैन धर्म क्षत्रियों का धर्म था, लेकिन आजकल अधिकांश वैश्य लोग ही इसके अनुयायी हैं। वैसे दक्षिण भारत में सेतवाल आदि कितने ही जैन खेतीबारी का धंधा करते हैं। पंचमों में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों के धंधे करनेवाले लोग पाए जाते हैं। जिनसेन मठ (कोल्हापुर) के अनुयायियों को छोड़कर और किसी मठ के अनुयायी चतुर्थ नहीं कहे जाते। चतुर्थ लोग साधारणतया खेती और जमींदारी करते हैं। सतारा और बीजापुर जिलों में कितने ही जैन धर्म के अनुयायी जुलाहे, छिपी, दर्जी, सुनार और कसेरे आदि का पेशा करते हैं।",
"जैन धर्म\nअहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। इसे बड़ी सख्ती से पालन किया जाता है खानपान आचार नियम मे विशेष रुप से देखा जा सकता है। जैन दर्शन में कण कण स्वतंत्र है इस सॄष्टि का या किसी जीव का कोई कर्ताधर्ता नही है। सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगते है। जैन दर्शन में भगवान न कर्ता और न ही भोक्ता माने जाते हैं। जैन दर्शन मे सृष्टिकर्ता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। जैन धर्म में अनेक शासन देवी-देवता हैं पर उनकी आराधना को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता। जैन धर्म में तीर्थंकरों जिन्हें जिनदेव, जिनेन्द्र या वीतराग भगवान कहा जाता है इनकी आराधना का ही विशेष महत्व है। इन्हीं तीर्थंकरों का अनुसरण कर आत्मबोध, ज्ञान और तन और मन पर विजय पाने का प्रयास किया जाता है।",
"सामायिक\nजैन ग्रन्थो में सामायिक का बहुत महत्व बताया गया है । जैन मान्यतानुसार सामायिक से जुड़ा एक प्रसंग है कि एक बार राजा श्रेणिक ने, भगवान महावीर से एक सामायिक का मूल्य पूछा, तो भगवान महावीर ने उत्तर दिया- ‘हे राजन् ! तुम्हारे पास जो चाँदी, सोना व जवाहर राशि हैं, उनकी थैलियों को ढेर यदि सूर्य और चाँद को छू जाएँ, फिर भी एक सामायिक का मूल्य तो क्या, उसकी दलाली भी पर्याप्त नहीं होगी।' इस प्रकार से जैन धर्म में धर्म के मुल्य कि स्थापना कि है कि धर्म कोई बिकाऊ वस्तु नही है , जिसे खरीदा जा सके यह तो आत्म अनुभूती का विषय है।",
"शाकाहार\nजैन धर्म नैतिक आचरण के रूप में शाकाहार होने की शिक्षा देता है, उसी तरह जैसा कि हिंदू धर्म के कुछ प्रमुख संप्रदाय करते हैं। सामान्य तौर पर बौद्ध धर्म, मांस खाने का निषेध नहीं करता है, जबकि महायान बौद्ध धर्म दया की भावना के लाभप्रद विकास के लिए शाकाहारी होने को प्रोत्साहित करता है। अन्य पंथ जो पूरी तरह शाकाहारी भोजन की वकालत करते हैं उनमें सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट्स, रस्ताफरी आन्दोलन और हरे कृष्णा शामिल हैं। सिख धर्म आध्यात्मिकता के साथ आहार को नहीं जोड़ता और शाकाहारी या मांसाहारी आहार निर्दिष्ट नहीं करता है।",
"रक्षाबंधन(जैन धर्म)\nजब तीसरे डग के लिए जमीन नहीं बची तो उन्होंने बलि से कहा अब क्या करूं तो बलि ने कहा अब मेरे पास जमीन तो नहीं है आप मेरी पीठ पर डग रख लीजिए। मुनि ने तीसरा डग बलि की पीठ पर रखा तो बलि कांपने लगा। देव व असुरों के आसन कंपायमान हो गए। सभी अवधि ज्ञान से वृत्तांत जान वहां आए और मुनि से क्षमा की प्रार्थना की। मुनि ने बलि की पीठ से चरण हटाया और असली रूप में प्रकट हुए। उसी समय बलि ने यज्ञ बंद कर मुनियों को उपसर्ग से दूर किया। राजा भी मुनि के दर्शनार्थ वहां पहुंच गए।",
"रक्षाबंधन(जैन धर्म)\nनगरवासी सभी श्रावकों ने मुनियों की वैयावृत्ति की उनकी सेवा की और मुनियों को चैतन्य अवस्था में लाए। मुनि पूर्णतः स्वस्थ हो आहार पर निकले तो श्रावकों ने खीर, सिवैया आदि मिष्ठान्न आहार हेतु बनाए थे। मुनियों को आहार करा श्रावकों ने भी खाना खाया और खुशियां मनाई। कथा:- यह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। इसी दिन मुनियों की रक्षा हुई थी। इस दिन को याद रखने के लिए लोगों ने हाथ में सूत के डोरे बांधे। तभी से यह रक्षा बंधन के पर्व के रूप में माना जाने लगा।"
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कौन सी भारतीय निशानेबाज १० मीटर एयर राइफल वर्ग में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनीं है?
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"अपूर्वी चंदेला\nअपूर्वी चंदेला (जन्म: 4 जनवरी 1993; जयपुर) एक भारतीय निशानेबाज हैं, जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्म, ग्लासगो में 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग इवेंट में 206.7 का स्कोर बनाकर भारत को दूसरी बार निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाया।"
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"अभिनव बिंद्रा\nअभिनव बिंद्रा १० मीटर एयर रायफल स्पर्धा में भारत के एक प्रमुख निशानेबाज हैं। वे ११ अगस्त २००८ को बीजिंग ओलंपिक खेलों की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए हैं। क्वालीफाइंग मुकाबले में ५९६ अंक हासिल करने के बाद बिंद्रा ने जबर्दस्त मानसिक एकाग्रता का परिचय दिया और अंतिम दौर में १०४.५ का स्कोर किया। उन्होंने कुल ७००.५ अंकों के साथ स्वर्ण पर निशाना साधने में कामयाबी हासिल की। बिंद्रा ने क्वालीफाइंग मुकाबले में चौथा स्थान हासिल किया था, जबकि उनके प्रतियोगी गगन नारंग बहुत करीबी अंतर से फाइनल में पहुंच पाने से वंचित रह गए। वे नौवें स्थान पर रहे थे। पच्चीस वर्षीय अभिनव बिंद्रा एयर राफल निशानेबाजी में वर्ष २००६ में विश्व चैम्पियन भी रह चुके हैं।",
"सौरभ चौधरी\nसौरभ चौधरी एक भारतीय निशानेबाज हैं। उन्होंने २०१८ एशियाई खेल की निशानेबाजी की १० मी॰ एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता है। उन्होंने पहले स्वर्ण पदक जीता था और जर्मनी के सुहल में आईएसएसएफ जूनियर विश्व कप में एक नया जूनियर विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया था। बाद में उन्होंने २४५.५ के स्कोर के साथ अपना खुद का विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया और कोरिया के चांगवन में २०१८ विश्व चैम्पियनशिप में जूनियर मेन १० मीटर एयर पिस्तौल में स्वर्ण का दावा किया। उनके कोच का नाम अमित शिओरन हैं |",
"मेहुली घोष\nमेहुली घोष (जन्म 20 नवंबर 2000) एक भारतीय निशानेबाज है। वे दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय जूनियर निशानेबाजी प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं। 123 प्रतियोगियों के बीच, वे चेक गणराज्य में आयोजित 2018 जूनियर निशानेबाजी प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचने वाली एकमात्र भारतीय निशानेबाज थीं। वे वहां सातवें स्थान पर रही। 2018 में, ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित XXI राष्ट्रमंडल खेलों में, उन्होंने मार्टिना वेलोसो के साथ शूट-ऑफ के बाद महिला 10 मीटर एयर राइफल में रजत पदक जीता। इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट फेडरेशन (ISSF) के अनुसार, उनका एशिया में तीसरा और विश्व में छठी रैंकिंग है l उसने 2017 में जापान में एशियाई एयरगन चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।",
"राही सरनोबत\nलंदन ओलंपिक्स 2012 में राही भारत की सबसे कम उम्र की निशानेबाज थीं। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में 25 मीटर एयर पिस्टल में राही सरनोबत ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता। तथा 2014 के एशियाई खेलों में कांस्य पदक हासिल किया। 2018 एशियाई खेलों में राही ने निशानेबाजी की 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में खेल रिकॉर्ड के साथ भारत को स्वर्ण पदक दिलवाया। इस प्रकार से वह एशियाई खेलों में निशानेबाजी में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनीं।",
"गगन नारंग\nगगन नारंग () भारत का एक राईफ़ल निशानेबाज (विशेषतया ऑलंपिक गोल्ड क्वेस्ट द्वारा समर्थित हवाई राईफ़ल शूटिंग) खिलाड़ी है। ये लंदन ऑलंपिक्स हेतु अर्हता लेने वाले प्रथम भारतीय थे। इन्होंने लंदन 2012 ओलंपिक में हुई पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल इवेंट में 701.1 अंकों के साथ कांस्य पदक हासिल किया। इनका जन्म ६ मई १९८३ को चेन्नई में हुआ था। इनके पूर्वज हरियाणा के पानीपत जिले में स्थित समल्खा में रहा करते थे। उसके बाद उनके दादा पानीपत से हैदराबाद जाकर बस गए। उनके माता-पिता का नाम भीमसेन नारंग और अमरजीत हैं। गगन नारंग का जन्मस्थल चेन्नई था, पर उनका पालन पोषण हैदराबाद में ही हुआ।",
"अंजली भगवत\nअंजली ने आईएसएसएफ चैंपियन ऑफ चैंपियंस पुरस्कार जीता और 2002 में म्यूनिख में एयर राइफल पुरुष और वे महिला मिश्रित इवेंट में आईएसएसएफ चैंपियंस ट्रॉफी जीतने वाली एकमात्र भारतीय हैं। वह लगातार तीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, और 2000 के सिडनी ओलंपिक में फाइनलिस्ट थीं। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स और कॉमनवेल्थ शूटिंग चैंपियनशिप में 12 स्वर्ण और 4 रजत पदक जीते हैं। वह 10 मीटर एयर राइफल और स्पोर्ट्स राइफल 3P में राष्ट्रमंडल रिकॉर्ड धारक हैं। 2003 के एफ्रो-एशियाई खेलों में, भागवत ने क्रमशः 3P और एयर राइफल स्पर्धाओं में स्वर्ण और एक रजत पदक प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला निशानेबाज बनकर इतिहास रच दिया ।",
"प्रकाश नन्जप्पा\nप्रकाश नन्जप्पा (जन्म: 29 फ़रवरी 1976) भारत के एक खिलाड़ी हैं। इन्होंने ग्लासगो में हुए 2014 राष्ट्रमण्डल खेलों में निशानेबाज़ी की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त किया।",
"अवनीत कौर सिधु\nअवनीत कौर सिधु (बठिंडा, 30 अक्टूबर 1981) एक भारतीय शूटर हैं। उन्होंने 2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में तेजस्वनी सावंत के साथ महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल (जोड़ी) में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 2008 में बीजिंग ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में 10 मीटर एयर राइफल और 50 मीटर राइफल थ्री पोजिशन में प्रतिस्पर्धा की। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में विभिन्न अवतार हैं।",
"अयोनिका पॉल\nअयोनिका पॉल (जन्म:23 सितंबर 1992; मुंबई) एक भारतीय महिला निशानेबाज हैं, जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्म, ग्लासगो में 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग इवेंट में जीत हासिल कर भारत को रजत पदक दिलाया।She had earlier won Bronze in ISSF World Cup 2014 in Slovenia."
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प्रशिद व्यक्तित्व ‘अन्ना राजम मल्होत्रा’ का निधन हुआ है, वह कौन थी?
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"अन्ना राजम मल्होत्रा\nअन्ना का जन्म एर्नाकुलम में हुआ। पहले कालीकट और बाद में मद्रास में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात उन्होने 1951 में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की और भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल होने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। 1951 में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित आर एन बनर्जी और चार आईसीएस अधिकारियों के शामिल साक्षात्कार बोर्ड में उन्हें काफी हतोत्साहित किया गया और उन्हें विदेश सेवा और केन्द्रीय सेवाओं को चुनने हेतु कहा गया, किन्तु उन्होने बिना हतोत्साहित हुये मद्रास काडर चुना और पहले प्रयास में ही उसी वर्ष उनका चयन हुआ। उनका प्रारंभिक नाम अन्ना जॉर्ज है। उन्हें १९८९ में भारत सरकार द्वारा प्रशासकीय सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हेतु पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। 17 सितम्बर 2018 को उनका निधन हो गया।"
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"जगदीश राज\nजगदीश राज ने 1992 में अपने फ़िल्मी कैरियर से सन्यास ले लिया। अन्तिम समय में वे श्वास संबंधी बीमारी से पीड़ित थे और 28 जुलाई 2013 को इनका निधन इनके जुहू स्थित घर में हो गया। फ़िल्म निर्देशक राहुल रवैल, फ़िल्म निर्माता अशोक पंडित, अभिनेत्री सौम्या टंडन सहित विभिन्न अभिनेताओं ने उनकी मृत्यु पर शोक प्रकट किया। इनके सम्बंधियों और रिश्तेदारों में उनकी दो पुत्रियाँ अनीता राज एवं रूपा मल्होत्रा और दामाद राकेश मल्होत्रा शामिल हैं।",
"शीला रमानी\n१५ जुलाई २०१५ को महू में निधन हो गया। १९५० के दशक में उनको कुछ रोचक फ़िल्में मिलीं। १९६० में बनी पहली सिन्धी फ़िलम अबना में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई और इस फ़िल्म में उनकी छोटी बहन का रोल साधना ने निभाया था। जब साधना उनके पास उनका ऑटोग्राफ़ माँगने गईं तो शीला ने कहा कि तुम मेरा ऑटोग्राफ़ क्या माँग रही हो एक दिन ऐसा आयेगा जब मैं तुम्हारा ऑटोग्राफ़ माँगूंगी। उनकी बात सच साबित हुयी।",
"प्रेमा श्रीनिवासन्\nउनका सबसे हालिया प्रकाशन, \"ए विजनरीज़ रीच\", डॉ। एपीजे अब्दुल कलाम (भारत के पूर्व राष्ट्रपति) द्वारा 7 जनवरी, 2014 को मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (अब अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई का एक हिस्सा) में जारी किया गया था। पुस्तक मे चिन्नास्वामी राजम (डॉ। प्रेमा श्रीनिवासन के दादा) के जीवन की कहानी का पता लगाती है, जिन्होंने 1949 में अपनी राजमहल हवेली, इंडिया हाउस को बेचकर प्रौद्योगिकी के इस संस्थान की स्थापना की थी। पुस्तक में श्री अब्दुल कलाम सहित कई योगदानकर्ता हैं। प्रेमा श्रीनिवासन, ने अपने पिता सीआर रामास्वामी की स्मृति मे प्रस्तावना, उपसंहार और पहले अध्याय को लिखा है, उन्होंने अपने जीवनकाल में अपने पिता के काम को आगे बढ़ाया।",
"हार्ड रॉक कैफे\n8 फ़रवरी 2007 को, अधिक मात्रा में दवा खा लेने के कारण अन्ना निकोल स्मिथ की मृत्यु हॉलीवुड फ्लोरिडा के सेमिनोल हार्ड रॉक होटल और कैसीनो के एक कमरे में हो गई।",
"विनोद खन्ना\nइनके तीन पुत्र और एक पुत्री है जिसमें अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना जो कि दोनों फ़िल्म अभिनेता है। २७ अप्रैल २०१७ को लम्बे समय से कैंसर से पीड़ित रहने के कारण मुम्बई के \"एच एन रिलायंस अस्पताल\" में निधन हो गया।",
"८ अक्तूबर\n१९८५ मदन सिंह आर्य, महान कर्मयोगी, आर्य वीर दल राजस्थान के अधिष्ठाता और संघी षड्यंत्र के दौर में भारत मे आर्य वीर दल की पहचान अक्षुण्ण रखने वाले दयानन्द के सिपाही, भारतीय थलसेना के रिसालदार और सिविल डिफेंस इन्स्ट्रक्टर का माउण्ट आबू में रोवर्स को प्रशिक्षित करते समय निधन। अंत्येष्टि जोधपुर में ०९.१०.१९८५ को की गई। हजारों युवकों को आर्यत्व में दीक्षित करने वाले चुम्बकीय व्यक्तित्व के धनी।",
"अर्चना महंत\nअर्चना महंत असमिया लोक गायक खगेन महंत की पत्नी और लोकप्रिय गायक पापोन की मां थीं। अर्चना महंत का निधन 27 अगस्त 2020 को हुआ था। वह मधुमेह, उच्च रक्तचाप और पार्किंसंस रोग से पीड़ित थीं।",
"कलामंडलम कल्याणिकुट्टी अम्मा\nकल्याणिकुट्टी अम्मा को केरल संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, दोनों ही मिले थे। 12 मई 1999 को त्रिपुनिथुरा (जहाँ युगल बसे थे) में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनका बेटा कलसाला बाबू सिनेमा और टेलीविजन अभिनेता थे, जबकि उनकी पोती स्मिथा राजन प्रसिद्ध मोहिनीअट्टम कलाकार हैं। उन्हें प्रसिद्ध कवि वल्लथोल नारायण मेनन से 'काव्यत्री' पुरस्कार मिला।",
"अन्नपूर्णानन्द\nवह काफी दिनों तक राष्ट्रकर्मी दानवीर श्री शिवप्रसाद गुप्त के सचिव भी रहे। आपकी निम्नलिखित छह रचनाएँ पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुकी हैं- मेरी हजामत, मगन रहु चोला, मंगल मोद, महकवि चच्चा, मन मयूर तथा मिसिर जी। आपका निधन जयपुर में ४ दिसंबर, १९६२ को ६७ वर्ष की आयु में हुआ।"
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लीची’ की किस किस्म को जीआई टैग प्राप्त हुआ है?
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"मुज़फ्फरपुर\nमुज़फ़्फ़रपुर उत्तरी बिहार का एक प्रमुख शहर है। अपने सूती वस्त्र उद्योग,लाह (लाख)की चूड़ियों, शहद तथा आम और लीची जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिये यह जिला पूरे विश्व में जाना जाता है, खासकर यहाँ की शाही लीची का कोई जोड़ नहीं है। यहाँ तक कि भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी यहाँ से लीची भेजी जाती है। बिहार के जर्दालु आम, मगही पान और कतरनी धान को जीआइ टैग (ज्योग्रफिकल इंडिकेशन) मिल चुका है। अब शाही लीची को भी जल्द जीआइ मिल जाएगा।"
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"चीन ३ लीची\nचीन ३ () लीची फल का एक प्रकार हैं। वैज्ञानिकों ने लीची की विभिन्न किस्मों का विकास किया है, इस सबसे अच्छी किस्मों दक्षिण एशिया में लीची है। यह सामान्यतः भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, ताइवान, वियतनाम पायी जाती है। इसका मध्यम ऊंचाई का सदाबहार पेड़ होता है, जो कि 5-7 मीटर तक होता है, ऑल्टर्नेट पाइनेट पत्तियां, लगभग 15-25 सें.मी. लम्बी होती हैं। पेड़ प्रति 124 किलो की औसत उपज। हालांकि, हर साल एक नियमित आधार पर, या फल सहन नहीं करता है। लीची फल की किस्मों काफी बड़ी और 25-30 ग्राम के एक औसत वजन के साथ दौर है। टीएसएस -18%। भोजन और बीज 15:1 के पात्र अनुपात।",
"लीची\nलीची वियतनाम, चीनी और दक्षिण एशियाई बाजारों में ताज़ी बिकतीं हैं और विश्व भर के सुपरमार्किटों में भी। इसके प्रशीतन में रखने पर भी इसका स्वाद नहीं बदलता है, हां रंग कुछ भूरेपन पर आ जाता है। 1962 में, यह पाया गया कि लीची के बीजों में (मिथाइलीनसाइक्लोप्रोपाइलग्लाइसिन (MCPG) नामक एक रसायन होता है, जो जानवरों के अध्ययन में अधोमधुरक्तता का कारण बनता है। 1990 के दशक के अंत के बाद से, इंसेफेलोपैथी (चमकी बुखार) का अस्पष्टीकृत प्रकोप दिखाई दिया है, जिसने मई से जून तक लीची की फसल के मौसम के दौरान भारत और उत्तरी वियतनाम में केवल बच्चों को प्रभावित किया है।",
"ज़िवोंशी\n1957 में मिस हेपबर्न के एकमात्र उपयोग के लिए गिवेंची ने एक पुष्प एल्डिहाइड सुगंध, \"एल `इन्टरडिट\" बनाया। उनके अन्य प्रसिद्ध संरक्षक में महारानी फराह पहलवी, ग्लोरिया गिनीज और मारेला अगनेल्ली के साथ-साथ गिनीज, ग्रिमाल्डी, केनेडी और रोथ्सचाइल्ड परिवार शामिल हैं, जिन्होंने जॉन एफ कैनेडी के अंतिम संस्कार के लिए प्रसिद्ध कपड़े पहने थे।",
"गूची\n\"गिनेस वर्ल्ड रेकॉर्ड\" में - गूची के \"जीनियस जीन्स\" के विश्व भर में सबसे महंगे जीन्स होने का दाखिला मिलता है। गूची के एक जीन्स को पूरी तरह से उधेड़कर उसकी दुर्गति की गयी और फिर उसे अफ्रीकी मोतियों से आच्छादित करके अक्टूबर 1998 में, प्रप्रथम मिलान में 3,134 CD अमरीकी डॉलर्स के दाम पर पेश किया गया।",
"पेपे जीन्स\nफरवरी 2015 में, पेपे जींस और हैकेट लंदन (पेपे जींस ग्रुप का हिस्सा) को लेबनानी समूह एम 1 और एलवीएमएच सहायक, एल कैपिटल एशिया द्वारा खरीदा गया था। ये कंपनियाँ पहले टोरियल फंड्स (31 प्रतिशत), आर्टा कैपिटल (16.4 प्रतिशत), एल कैपिटल यूरोप (11.5 प्रतिशत) और इसके प्रबंधकों के स्वामित्व में थीं।",
"जीनी\nज़ीनी (Geany) छोटा, अलग-अलग ऑपरेटिंग तंत्रों पर चलने वाला, जीयूआई युक्त पाठ सम्पादित्र (टेक्स्ट एडिटर) है। इसे इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि यह कम समय में फाइलें लोड करने में सक्षम है तथा अन्य पकेजों एवं बाहरी लाइब्रेरी आदि पर इसकी निर्भरता बहुत कम है। यह बीएसडी, लिनक्स, Mac OS X, सोलैरिस और विण्डोज आदि प्रचालन तंत्रों के लिये उपलब्ध है।",
"ग्लाइसेमिक इंडेक्स\nजीआई प्रतीक कार्यक्रम एक स्वतंत्र विश्वव्यापी जीआई प्रमाणन कार्यक्रम है जो उपभोक्ताओं को निम्न-जीआई खाद्य पदार्थ और पेय पदार्थों की पहचान करने में मदद करता है। प्रतीक केवल भोजन या पेय पर होते हैं जो मानक के अनुरूप अपने जीआई मान की परीक्षा करवा चुके होते हैं और जीआई फाउंडेशन के प्रमाणन मानदंडों को उनके खाद्य समूह के स्वास्थ्यप्रद विकल्पों के रूप में पूरा करते हैं, अतः वे किलोजूल्स, वसा और/या नमक में निम्न होते हैं।",
"लीवाइस\n1999 – टाइम्स पत्रिका ने 501® जीन्स को सदी का फैशन आइटम का दरजा दिया।",
"जिका विषाणु\nजीका वायरस मुख्य रूप से एडीज जीन से संक्रमित मच्छर के काटने से फैलता है, मुख्यतः एडीज एजिप्टी, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। एडीज मच्छर आम तौर पर दिन के दौरान काटते हैं, जो सुबह जल्दी और देर दोपहर शाम को बढ़ते हैं। यह वही मच्छर है जो डेंगू, चिकनगुनिया और पीले बुखार को प्रसारित करता है। जीका वायरस भी गर्भावस्था के दौरान मां से भ्रूण में, यौन संपर्क, रक्त और रक्त उत्पादों के आधान और अंग प्रत्यारोपण के माध्यम से प्रसारित होता है।"
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भारतीय सेना की ट्रेनिंग कमान का मुख्यालय कहां है?
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"प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना\nक्षेत्रीय सैन्य बल के मुख्यालय दिल्ली में स्थित थे और वरिष्ठ अधिकारी (भारत के कमांडर-इन-चीफ) को भारत के जनरल स्टाफ के प्रमुख द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता था। भारतीय सेना के सभी वरिष्ठ कमान और स्टाफ पदों को ब्रिटिश और भारतीय सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वैकल्पिक रूप से इस्तेमाल किया जाता था। 1914 में जनरल सर ब्यूचैम्प डफ भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ थे और ब्रिटिश सेना के लेफ्टिनेंट जनरल सर पर्सी लेक जनरल स्टाफ के प्रमुख थे। प्रत्येक भारतीय बटालियन में स्टाफ के रूप में भारत की ब्रिटिश सेना के 13 अधिकारियों और भारतीय सेना से 17 अधिकारियों को शामिल किया गया था -- प्रवासी ब्रिटिश अधिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक भारतीय प्रशासन के तहत सेवारत थे। युद्ध तेज होने और अधिकारियों के हताहत होने से उनकी जगह ब्रिटिश मूल के अधिकारियों को कार्यभार सौंपने की क्षमता बेहद मुश्किल में पड़ गयी और कई मामलों में बटालियनों में अधिकारियों के आवंटन को तदनुसार कम कर दिया गया। केवल 1919 में जाकर भारतीय मूल के पहले ऑफिसर कैडेटों को रॉयल मिलिटरी कॉलेज में अधिकारी प्रशिक्षण के लिए चुने जाने की अनुमति दी गयी।"
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"मध्य कमान (भारतीय सेना)\nमध्य कमान भारतीय सेना की सात कमानों में से एक है। इसका मुख्यालय लखनऊ, उत्तर प्रदेश में स्थित है। लेफ्टिनेंट जनरल अभय कृष्ण इस कमान के वर्तमान जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ हैं।",
"दक्षिणी कमान (भारतीय सेना)\nआज की कमान मुख्यालय स्थित है पर दिल्ली में पुणे, महाराष्ट्र. यह के होते हैं दो कोर और दो सैन्य क्षेत्रों में। दो क्षेत्रों के लिए प्रकट हो सकता है : एक पर मुंबई, महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात क्षेत्र (मिलीग्राम&G क्षेत्र), के लिए जिम्मेदार उन राज्यों में और एक चेन्नई में, आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल क्षेत्र (ATNK और कश्मीर क्षेत्र) के लिए जिम्मेदार आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल.",
"तैंतीसवीं कोर (भारत)\nकोर मुख्यालय में एक भारतीय वायु सेना इकाई है यह, 3 टीएसी, एक ग्रुप कैप्टन द्वारा कमान की जाती है। कोर कमांडर एक लेफ्टिनेंट जनरल हैं। तथा कर्मचारी प्रमुख एक मेजर जनरल हैं। XXXIII कोर की कुल सेना की ताकत 45,000 और 60,000 सैनिकों के बीच होने का अनुमान है। भारतीय वायु सेना बागडोगरा (सिलीगुड़ी) और हाशिमारा में स्थित हैं, जो हवाई इकाइयां हैं, जो XXXIII कोर के जिम्मेदारी क्षेत्र में कार्यरत हैं। इसमें वर्तमान में शामिल हैं:",
"मध्य कमान (भारतीय सेना)\n१९६२ के भारत-चीन युद्ध के कारण १ मई १९६३ को कमान फिर से स्थापित की गई। लेफ्टिनेंट जनरल कंवर बहादुर सिंह इस नवीन मध्य कमान के पहले सेना कमांडर थे। कमान का मुख्यालय लखनऊ में स्थापित किया गया, जो इससे पहले पूर्वी कमान का मुख्यालय था।",
"शिलांग\nदिनांक १० जून, १९६३ को, भारतीय वायु सेना के पूर्वी वायु कमान (मुख्यालय, ईएसी) को कोलकाता से शिलांग में स्थानांतरित किया गया था। यह ऊपरी शिलांग में नोंगलीर गांव में स्थित पुरानी इमारतों में रखा गया था, जो मुख्य शिलांग से लगभग १० किमी दूर है एवं सागर सतह से लगभग ६,००० फ़ीट की ऊँचाई पर है। प्रारंभ में एक ब्रिटिश सैन्य अड्डा था, जिसे १९४७ में स्वतंत्रता उपरान्त भारतीय सेना के नंबर-५८ गोरखा रेजिमेंट ने अपने अधिकार में ले लिया था। १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद रेजिमेंट को पुनः तैयार किया गया था। तब इससे भारतीय वायुसेना के पूर्वी वायु कमान से १२.७ हेक्टेयर (३१.३ एकड़) के हेलीपैड का उपयोग करके केवल हेलिकॉप्टर का रास्ता तय किया जा सकता था।",
"भारत में सैन्य अकादमियाँ\nभारतीय नौसेना के विभिन्न स्थानों में कई प्रशिक्षण प्रतिष्ठान हैं। भारतीय नौसेना अकादमी इलिमला वर्तमान में केरल राज्य में कन्नूर के पास स्थित है।भारतीय वायु सेना के पास एक प्रशिक्षण कमान और कई प्रशिक्षण प्रतिष्ठान हैं। जबकि तकनीकी और अन्य सहयोगी स्टाफ, विभिन्न ग्राउंड ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षित किये जाते हैं, पायलटों को हैदराबाद, आंध्र प्रदेश के नज़दीक डुंडीगल में स्थित वायुसेना अकादमी में प्रशिक्षित किया जाता है।",
"चण्डीमन्दिर छावनी\nचण्डीमन्दिर हरियाणा राज्य के पंचकुला जिले में स्थित भारतीय सेना की एक सैन्य छावनी है। शिवालिक पहाड़ियों के तलहटी में घग्गर नदी के तट पर स्थित यह छावनी पंचकुला नगर से सटी हुई है। भारतीय सेना की पश्चिमी कमान का मुख्यालय चण्डीमन्दिर में ही स्थित है।",
"सुदर्शन चक्र कॉर्प्स\nकोर सुधार किया गया था के रूप में XXI कोर 1990 में. यह केवल स्ट्राइक कोर में भारतीय सेना के'पूना-आधारित दक्षिणी कमांड (वहाँ रहे हैं तीन अन्य हड़ताल फसलों - मैं कोर, द्वितीय वाहिनी, XVII कोर, लेकिन उनके मुख्यालय के विभिन्न स्थानों में हैं). के बाद भारत के हस्तक्षेप में श्रीलंका, अनंतिम मुख्यालय को नियंत्रित करने के भारत के अभियान सेना मुख्यालय में भारतीय शांति स्थापना बलबन गया है, मुख्यालय XXI कोर में अप्रैल 1990. यह तो था करने के लिए ले जाया भोपाल. यह दोनों एक स्ट्राइक कोर और भी इस्तेमाल किया जा सकता है अगर भारत के थे बनाने के लिए एक और बड़ी विदेशी हस्तक्षेप है।",
"दक्षिणी कमान (भारतीय सेना)\nदक्षिणी कमान 1895 से सक्रिय भारतीय सेना का गठन है। इसमें 1961 के गोवा के भारतीय अनुबंध के दौरान, और 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तानी युद्धों के दौरान आधुनिक भारत में कई प्रिंसिपल राज्यों के एकीकरण के दौरान कार्रवाई हुई है। लेफ्टिनेंट जनरल पी.एम. हरीज जनरल ऑफिसर कमांडिंग हैं।"
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“फ्रेंड्स” अमेरिकी टेलीविज़न सीरीज के कितने सीजन है?
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"फ़्रेंड्स\n\"फ्रेंड्स\" एक अमेरिकी स्थितिपरक कॉमेडी (सिटकॉम) है, जिसे डेविड क्रेन और मार्टा कॉफ़मैन ने निर्मित किया और जो NBC (नेशनल ब्रॉडकास्टिंग कंपनी) पर 22 सितंबर 1994 को पहली बार प्रदर्शित हुई। यह मूल रूप से 22 सितंबर 1994 से लेकर 6 मई 2004 तक एन बी सी पर दस सत्रों के लिए प्रसारित किया गया था। यह श्रृंखला न्यूयॉर्क शहर के मैनहट्टन क्षेत्र में बसे छह मित्रों के एक समूह पर केंद्रित है, जो यदा-कदा साथ रहते हैं और अपना निर्वाह-खर्च आपस में साझा करते हैं। यह श्रृंखला वार्नर ब्रदर्स टेलीविज़न के संग ब्राईट/कॉफ़मैन/क्रेन प्रोडक्शन द्वारा निर्मित की गई। मूल कार्यकारी निर्माता थे डेविड क्रेन, मार्टा कॉफ़मैन और केविन एस ब्राईट, जबकि बाद के सीज़न में कई अन्य लोगों को आगे बढ़ाया गया।"
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"फ़्रेंड्स\nनवंबर 1993 और दिसंबर 1993 के बीच में \"इनसोमनिया कफ़े\" शीर्षक से कॉफ़मैन और क्रेन ने \"फ्रेंड्स\" पर काम शुरू किया। उन्होंने अपने विचार ब्राईट को प्रस्तुत किए, जिसके साथ वे पहले काम कर चुके थे और उन्होंने मिलकर सात-पृष्टीय श्रृंखला का निरूपण NBC को प्रस्तुत किया। पटकथा के कई बार पुनर्लेखन और परिवर्तन के बाद, एक दूसरा शीर्षक बदलाव \"फ्रेन्ड्स लैक अस\" करके, अंत में श्रृंखला का नाम \"फ्रेंड्स\" रखा गया और NBC के बेहद मांग वाले गुरुवार रात 8:30 बजे की समयावधि में पहली बार प्रदर्शित किया गया। इस श्रृंखला का फ़िल्मांकन प्रत्यक्ष दर्शकों के सामने बरबैंक, कैलिफोर्निया के वार्नर ब्रदर्स स्टूडियो में किया गया। इस नेटवर्क पर दस सीज़न के बाद, श्रृंखला का समापन अंक NBC द्वारा प्रचारित किया गया और लगभग पूरे US में दर्शक दलों का आयोजन किया गया। श्रृंखला का समापन अंक, जो पहली बार 6 मई 2004 को प्रसारित किया गया था, 52.5 मिलियन अमेरिकी दर्शकों द्वारा देखा गया, जो कि टेलीविज़न इतिहास में चौथा सबसे अधिक देखा गया श्रृंखलाओं का समापन रहा.",
"हीरोज़ (टी वी शृंखला)\nतीन सीज़न पूरे प्रसारित हो चुके हैं और चौथे का प्रीमियर 21 सितम्बर 2009 को हुआ. समीक्षकों द्वारा प्रशंसित पहले सीज़न के 23 कडियों को संयुक्त राज्य अमेरिका में औसतन 14.3 लाख दर्शकों ने देखा, जो NBC ड्रामा प्रीमियर की पांच साल में सर्वाधिक उच्च रेटिंग है. \"हीरोज़\" के दूसरे सीज़न ने अमेरिका में औसतन 13.1 लाख दर्शकों को आकर्षित किया और 2007-2008 के सीज़न में देखे जाने वाले शीर्ष 20 कार्यक्रमों में यह NBC की एकमात्र श्रृंखला थी. \"हीरोज़\" ने प्राइमटाइम एमी पुरस्कार, गोल्डन ग्लोब, पीपुल्स च्वाइस अवार्ड और ब्रिटिश एकेडमी टेलीविज़न पुरस्कार सहित कई पुरस्कार और नामांकन जीते हैं.",
"फ्रैंड्स: दा रीयूनियन\nफ्रैंड्स:दा रीयूनियन, अमेरिकी टेलीविजन सिटकॉम का 2021 का रीयूनियन स्पेशल है। शो की मेजबानी जेम्स कॉर्डन द्वारा की जाती है और शो के सह-निर्माता, और , , शो के मुख्य कलाकार और बेन विंस्टन (जिन्होंने विशेष का निर्देशन भी किया) द्वारा निर्मित है। विशेष देखता है कि मुख्य कलाकार मूल शो (जैसे फ्रेंड्स अपार्टमेंट, सेंट्रल पर्क कॉफी शॉप, और सिग्नेचर वाटर फाउंटेन) के सेट पर फिर से आते हैं, शो में आने वाले मेहमानों के साथ-साथ सेलिब्रिटी मेहमानों से मिलते हैं, टेबल करते हैं फ्रेंड्स एपिसोड को पढ़ता है और फिर से अधिनियमित करता है, और परदे के पीछे के फुटेज साझा करता है।नवंबर 2019 में, अपनी नई स्ट्रीमिंग सेवा, के लिए फ्रेंड्स रीयूनियन स्पेशल विकसित कर रहा था। विशेष में पूरी कास्ट और सह-कलाकार होंगे। फरवरी 2020 में, सभी मूल कलाकारों और सह-निर्माताओं के लौटने के साथ एक अप्रकाशित फ्रेंड्स को कमीशन किया गया था।",
"द अमेज़िंग रेस (अमेरिकी टीवी शृंखला)\nअमेरिकी संस्करण \"द अमेज़िंग रेस\" फ्रेंचाइज़ का मूल संस्करण है जिसका प्रसारण 2001 से सीबीएस पर हो रहा है। फ़रवरी 17, 2013, से शृंखला अपने बाइसवे सीज़न में प्रवेश कर गई। अनेक अन्तराष्ट्रीय संस्करण इसकी मूल संरचना के आधार पर विकसित किए गए, जबकि अमेरिकी संस्करण विश्व के कई अन्य बाजारों में प्रसारित किया जाता है।",
"फ़्रेंड्स\n\"फ्रेंड्स\" ने अपने संपूर्ण प्रसारण अवधि में सकारात्मक समीक्षाएं ही प्राप्त की और अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय स्थितिपरक कॉमेडी बन गया। इस श्रृंखला ने कई पुरस्कार जीते और 63 प्राइमटाइम एम्मी पुरस्कार के लिए नामित हुई. यह श्रृंखला मूल्यांकन के मामले में भी बहुत सफल रही और लगातार अंतिम प्राइमटाइम रेटिंग के टॉप टेन में चुनी जाती रही है। \"फ्रेंड्स\" ने भारी सांस्कृतिक प्रभाव जमाया. इस श्रृंखला में प्रदर्शित प्रख्यात द सेंट्रल पर्क कॉफ़ी हाउस ने दुनिया भर में कई प्रतिरूपों को प्रेरित किया। इस श्रृंखला का पुनर्प्रसारण दुनिया भर में जारी है और सभी सीज़न DVD पर रिलीज़ किए गए हैं। श्रृंखला समापन के बाद, अतिरिक्त श्रृंखला जोई बनाई गई।",
"फ्रैंड्स: दा रीयूनियन\nयूनाइटेड किंगडम में, फ्रेंड्स: द रीयूनियन स्काई वन पर प्रसारित हुआ और अपने इतिहास में चैनल का सबसे अधिक देखा जाने वाला कार्यक्रम बन गया, जिसमें 5.3 मिलियन दर्शकों ने इसे देखा। [26]",
"चीयर्स\nरीजन 2 में पहले 7 सीज़नों को डीवीडी पर जारी किया गया है।केल्से ग्रामर का उप-निर्माण \"फ्रेज़िएर,\" संभवतः सर्वाधिक सफल रहा, जो \"चीयर्स\" के समान ही ग्यारह सीज़न चला, साथ ही साथ \"सिम्प्सन्स\" पर स्लाइडशो बॉब के रूप में एक आवर्ती अतिथि भूमिका भी थी। \"फ्रेज़िएर\" के अंतिम सीज़न तक, टेलीविजन का सबसे महंगा अभिनेता बन चुका था, जो प्रति कड़ी लगभग $1.6 मिलियन कमा रहा था।",
"फ़ियर द वॉकिंग डेड\nचौथे सीज़न के प्रारंभ (प्रारम्भ), शृंखला की शिफ्ट \"मॉर्गन जोंस\" की ओर केंद्रित (केन्द्रित) है, जो मूल शृंखला के एक चरित्र है, जो समूह के जीवित सदस्यों और [[टेक्सास]] में बचे लोगों का सामना करता है।पहले सीज़न में [[६|6]] [[प्रकरण]] एपिसोड हैं। दूसरे सीज़न में [[१५|15]] [[प्रकरण]] (एपिसोड) हैं, जिसका प्रथम प्रसारण [[१०|10]] अप्रैल, [[२०१६|2016]] को हुआ था। [[१५|15]] अप्रैल [[२०१६|2016]] को, [[एएमसी]] ([[AMC]]) ने घोषणा की कि शृंखला [[१६|16]] [[प्रकरण]] (एपिसोड) वाले तीसरे सीज़न के लिए नवीनीकृत की गई थी, जिसका प्रथम प्रसारण [[४|4]] जून, [[२०१७|2017]] को हुआ था। अप्रैल [[२०१७|2017]] में, [[एएमसी]] का नवीनीकरण हुआ। [[१६|16]] [[प्रकरण]] (एपिसोड) वाली चौथी सीरीज़ की घोषणा की। चौथे सीज़न का प्रथम प्रसारण [[१५|15]] अप्रैल, [[२०१८|2018]] को हुआ। [[२८|28]] जुलाई, [[२०१८|2018]] को, सीरीज़ की पाँचवीं सीज़न के लिए नवीनीकरण किया गया, जिसका प्रथम प्रसारण [[२|2]] जून, [[२०१९|2019]] को हुआ। [[१९|19]] जुलाई, [[२०१९|2019]] को सीरीज़ की छठवीं सीज़न के लिए सीरीज़ का नवीनीकरण किया गया, जिसका प्रथम प्रसारण हुआ [[११|11]] अक्टूबर, [[२०२०|2020]] को। [[३|3]] [[दिसंबर|दिसम्बर]], [[२०२०|2020]] को, शृंखला को सातवें सीज़न के लिए नवीनीकृत किया गया था, जिसका [[२०२१|2021]] के अंत में प्रथम प्रसारण होगा।",
"फ्रैंड्स: दा रीयूनियन\nविशेष को लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में स्टेज 24 पर फिल्माया गया था, जिसे में \"द फ्रेंड्स स्टेज\" के रूप में भी जाना जाता है, जहां फ्रेंड्स को इसके दूसरे सीज़न से फिल्माया गया था। पुनर्मिलन का फिल्मांकन अप्रैल 2021 में शुरू हुआ। विशेष के फिल्मांकन में दो बार देरी हुई, पहली मार्च 2020 में, और दूसरी अगस्त 2020 में, दोनों के कारण।"
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श्रीलंका को पहले किस नाम से जाना जाता था?
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"श्रीलंका\nश्रीलंका (आधिकारिक नाम \"श्रीलंका समाजवादी जनतांत्रिक गणराज्य\") दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में स्थित एक द्वीपीय देश है। भारत के दक्षिण में स्थित इस देश की दूरी भारत से मात्र ३१ किलोमीटर है। 1972 तक इसका नाम सीलोन (अंग्रेजी:Ceylon) था, जिसे 1972 में बदलकर लंका तथा 1978 में इसके आगे सम्मानसूचक शब्द \"श्री\" जोड़कर श्रीलंका कर दिया गया। श्रीलंका का सबसे बड़ा नगर कोलम्बो समुद्री परिवहन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बन्दरगाह है। श्री लंका में (वेदास) जनजाति पायी जाती है। पाक जलसंधि भारत-श्री लंका के मध्य में ही है । श्रीलंका और भारत के बीच राम सेतु भी है मौजूद है।",
"श्रीलंका की भाषाएं\nश्रीलंका (आधिकारिक नाम \"श्रीलंका समाजवादी जनतांत्रिक गणराज्य\") दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में स्थित एक द्वीपीय देश है। भारत के दक्षिण में स्थित इस देश की दूरी भारत से मात्र ३१ किलोमीटर है। १९७२ तक इसका नाम सीलोन (अंग्रेजी:Ceylon) था, जिसे १९७२ में बदलकर लंका तथा १९७८ में इसके आगे सम्मानसूचक शब्द \"श्री\" जोड़कर श्रीलंका कर दिया गया। श्रीलंका का सबसे बड़ा नगर कोलम्बो समुद्री परिवहन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बन्दरगाह है। श्रीलंका में भारत-यूरोपीय, द्रविड़ और ऑस्ट्रोनियन परिवारों के भीतर कई भाषाएं बोली जाती हैं। श्रीलंका सिंहली और तमिल को आधिकारिक दर्जा देता है। द्वीप राष्ट्र पर बोली जाने वाली भाषा पड़ोसी भारत, मालदीव और मलेशिया की भाषाओं से गहराई से प्रभावित होती है। अरब बसने वालों और पुर्तगाल, नीदरलैंड और ब्रिटेन की औपनिवेशिक शक्तियों ने श्रीलंका में आधुनिक भाषाओं के विकास को भी प्रभावित किया है। 2016 तक, सिंहला भाषा ज्यादातर सिंहली लोगों द्वारा बोली जाती है, जो राष्ट्रीय आबादी का लगभग 74.9% और कुल 16.6 मिलियन है। यह सिंहला अबुगिदा लिपि का उपयोग करता है, जो प्राचीन ब्रह्मी लिपि से लिया गया है। सिंधला की बोलीभाषा रोडिया भाषा, चोडोदी वेदहास के निम्न जाति समुदाय द्वारा बोली जाती है। माना जाता है कि वेदहा लोग 2002 में केवल 2,500 थे, माना जाता है कि एक बार एक अलग भाषा बोली जाती है, तमिल भाषा श्रीलंकाई तमिलों के साथ-साथ पड़ोसी भारतीय राज्य तमिलनाडु के तमिल प्रवासियों और अधिकांश श्रीलंकाई मूरों द्वारा बोली जाती है। तमिल वक्ताओं की संख्या लगभग 4.7 मिलियन है। श्रीलंकाई क्रेओल मलय भाषा के 50,000 से अधिक वक्ताओं हैं, जो मलय भाषा से काफी प्रभावित हैं।"
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"रामसेतु\nपश्चिमी जगत ने पहली बार 9वीं शताब्दी में इब्न खोरादेबे द्वारा अपनी पुस्तक \" रोड्स एंड स्टेट्स ( 850 ई ) में ऐतिहासिक कार्यों में इसका सामना किया, इसका उल्लेख सेट बन्धई या\" ब्रिज ऑफ़ द सी \"है। [५] कुछ प्रारंभिक इस्लामिक स्रोत, एडम के पीक के रूप में श्रीलंका के एक पहाड़ का उल्लेख करते हैं, (जहाँ एडम माना जाता है कि पृथ्वी पर गिर गया) और पुल के माध्यम से एडम को श्रीलंका से भारत के पार जाने के रूप में वर्णित किया; एडम ब्रिज के नाम से जाना जाता है। [६] अल्बेरुनी ( सी। १०३० ) शायद इस तरह से इसका वर्णन करने वाला पहला व्यक्ति था। [५] इस क्षेत्र को आदम के पुल के नाम से पुकारने वाला सबसे पहला नक्शा १ ] ०४ में एक ब्रिटिश मानचित्रकार द्वारा तैयार किया गया था। [३]",
"श्रीलंका का इतिहास\nस द्वीप पर बालंगोडा लोगों (इस नाम के स्थान पर नामकृत) का निवास कोई ३४,००० वर्ष पूर्व से था। उन्हें मेसोलिथिक शिकारी संग्रहकर्ता के रूप में मान्यता दी गई है। जौ और कुछ अन्य खाद्यान्नों से द्वीपनिवासियों का परिचय ईसापूर्व १५,००० इस्वी तक हो गया था। प्राचीन मिस्रईसा पूर्व १५०० ईस्वी के आसपास दालचीनी (दारचीनी) उपलब्ध थी जिसका मूल श्रीलंका समझा जाता है, अर्थात् उस समय से इन दो देशों के बीच व्यापारिक सम्बंध रहे होंगे। अंग्रेज यात्री और राजनयिक सर जेम्स इमर्सन टेनेन्ट ने श्रीलंका के शहर गाले की पहचान हिब्रू बाइबल में वर्णित स्थान टार्शिश से की है।",
"श्रीलंका का इतिहास\nइस द्वीप पर बालंगोडा लोगों (इस नाम के स्थान पर नामकृत) का निवास कोई ३४,००० वर्ष पूर्व से था। उन्हें मेसोलिथिक शिकारी संग्रहकर्ता के रूप में मान्यता दी गई है। जौ और कुछ अन्य खाद्यान्नों से द्वीपनिवासियों का परिचय ईसापूर्व १५,००० इस्वी तक हो गया था। प्राचीन मिस्र में ईसा पूर्व १५०० ईस्वी के आसपास दालचीनी (दारचीनी) उपलब्ध थी जिसका मूल श्रीलंका समझा जाता है, अर्थात् उस समय से इन दो देशों के बीच व्यापारिक सम्बंध रहे होंगे। अंग्रेज यात्री और राजनयिक सर जेम्स इमर्सन टेनेन्ट ने श्रीलंका के शहर गाले की पहचान हिब्रू बाइबल में वर्णित स्थान टार्शिश से की है।",
"श्रीलंका की संस्कृति\nऐसा विश्वास किया जाता है कि राजकुमार विजय और उसके 700 अनुयायी ई. पू. 543 में श्रीलंका में जहाज से उतरे थे। ये लोग \"सिंहल\" कहलाते थे, क्योंकि पहले पहल \"सिंहल\" की उपाधि धारण करने वाले राजा सिंहबाहु से इनका निकट संबंध था। (सिंह को मारने के कारण यह राजा \"सिंहल\" कहलाया)। विजय ही श्रीलंका का पहला राजा था और उसने जिस राज्य की स्थापना की वह करीब 2358 वर्ष तक कायम रहा। बीच में एकाध बार चोल या पांड्य के राजा ने इस पर अधिकार कर लिया किंतु देर-सबेर सिंहलियों ने उन्हें देश से निकाल बाहर किया।",
"श्रीलंका क्रिकेट टीम\nश्रीलंका क्रिकेट टीम, (, तमिल:இலங்கை தேசிய கிரிக்கெட் அணி) जिसे द लायंस के नाम से भी जाना जाता है, पुरुषों की अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में श्रीलंका का प्रतिनिधित्व करता है। यह टेस्ट, एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय (वनडे) और ट्वेंटी 20 अंतर्राष्ट्रीय (टी20आई) स्थिति के साथ अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) का पूर्ण सदस्य है। टीम ने पहली बार 1926-27 में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट (सीलोन के रूप में) खेला, और बाद में 1981 में टेस्ट दर्जा दिया गया, जिससे श्रीलंका टेस्ट क्रिकेट खेलने वाला आठवां देश बना गया। टीम का संचालन श्रीलंका क्रिकेट द्वारा किया जाता है।",
"वृहद भारत\nसन् 1939 ई. तक थाईलैंड को 'स्याम' नाम से ही जाना जाता था। इस देश में भारतीय संस्कृति का प्रवेश ईसा की प्रथम शताब्दी में होना शुरू हुआ। सबसे पहले यह कार्य व्यापारियों ने किया तथा उनके पश्चात् प्रचारकों और धर्माचार्यों ने इसे आगे बढ़ाया। भारतीय संस्कृति अनेक प्रकार से वहां पहुंची। वहां के राज्यों के नाम संस्कृत में रखे गये जैसे- द्वारावती, श्रीविजय, अयोध्या और सुखोदय आदि। थाईलैंड में नगरों के नाम भी भारतीयता के द्योतक हैं जैसे-कंचनपुरी के तर्ज पर कांचनबुरी, राजपुरी के समान राजबुरी और लवपुरी के समान लोबपुरी। यहां शहरों के प्राचीनबुरी, सिहबुरी जैसे नाम मिलते है जो संस्कृत भाषा के प्रभाव को दर्शाते हैं। यहां तक कि राजाराम, राजा-रानी, महाजया और चक्रवंश जैसे गलियों के नाम यहां रामायण की लोकप्रियता का साक्ष्य देते हैं।",
"उत्पलवर्ण\nउत्पलवर्ण ( , पालि : उप्पलवन्न ; संस्कृत : उत्पलवर्ण) श्रीलंका के एक संरक्षक देवता (पालि : खेत्तपाल ; संस्कृत : क्षेत्रपाल) हैं। इन्हें विष्णु ( \"विष्णु देवियो\" ) के नाम से भी जाना जाता है। श्रीलंकाई बौद्ध उन्हें देश में बौद्ध धर्म के संरक्षक के रूप में भी मानते हैं। उपुल्वन् नाम उनके शरीर के रंग को दर्शाता है जिसका अर्थ है \"नीले कमल के रंग वाले\"। उपुल्वन् पंथ की शुरुआत मध्यकाल में श्रीलंका में हुई थी। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, उपुल्वन् वह देवता हैं जिसे बुद्ध ने श्रीलंका और और उसके बुद्ध शासन का संरक्षकता सौंपी थी।",
"कुमाना राष्ट्रीय उद्यान\nकुमाना राष्ट्रीय उद्यान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्वी तट पर कोलंबो के दक्षिणपूर्व स्थित 391 कि॰मी॰ विस्तृत उद्यान है। श्रीलंका में कुमाना राष्ट्रीय उद्यान अपने पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है। कुमाना को पहले याला ईस्ट राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जाना जाता था, लेकिन 5 सितंबर 2006 को अपने वर्तमान नाम में बदल गया।"
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ज्ञान प्राप्ति से पूर्व इब्राहीम क़ुली का नाम क्या था?
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"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\nइब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली (1518 - 5 जून 1580), जिसे तेलुगू नाम \"माल्की भाराम\" भी पुकारा जाता है, दक्षिणी भारत में गोलकुंडा राज्य के चौथे शासक थे। वह \" सुल्तान \" शीर्षक का उपयोग करने वालों में कुतुब शाही राजवंश के पहले सुलतान थे। उन्होंने 1550 से 1580 तक शासन किया। विजयनगर के दरबार में वे एक सम्मानित अतिथि के रूप में निर्वासन में सात साल तक रहे थे, लेकिन अपने राज्य वापस जाने के पंद्रह साल बाद, उन्होंने अपने पूर्व मेजबान और दोस्तों से ही लड़ बैठे, कुछ अन्य मुस्लिम शासकों के साथ विजयनगर पर हमला बोलै और कब्ज़ा कर लिया।"
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"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\nइब्राहिम का जन्म गोलकुंडा के कुतुब शाही राजवंश में हुआ, वे गोलकोंडा के संस्थापक कुली कुतुब मुल्क के पुत्र थे। उनके पिता, एक जातीय तुर्कमेनिस्तान, अपने परिवार के साथ एक युवा व्यक्ति के रूप में भारत आए थे और दक्कन में बहमानी सल्तनत की अदालत में रोजगार ले लिया था। वह सेना में तेजी से आगे बढ कर तरक्की पायी थी, और जब बहामनी सल्तनत अलग हो गया था और गिर गया तो उसने सेना के बल से खुद की एक बड़ी रियासत बनाई थी। इब्राहिम उनके पुत्रों में से कनिष्ट पुत्र थे।",
"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\nएक छोटी बीमारी के बाद, इब्राहिम की मृत्यु 1580 में हुई थी। उनका उत्तराधिकारी उनका पुत्र मुहम्मद कुली कुतुब शाह बना, जो उनकी हिंदू पत्नी भागीरथी से पैदा हुए था।",
"अल-तिर्मिज़ी\nअत-तिर्मिधि अल बुखारी का एक छात्र था, जो खुरासन में स्थित था। आधा-धाहाबी ने लिखा, \"हदीस का उनका ज्ञान अल बुखारी से आया था।\" आत्म-तिर्मिधि ने अपने जामी में अल बुखारी का नाम 114 बार उल्लेख किया। उन्होंने हदीस या उसके ट्रांसमीटरों के पाठ में विसंगतियों का जिक्र करते हुए अल-बुखारी के किताब-तारिख का एक स्रोत के रूप में उपयोग किया, और हदीस की विसंगतियों के विज्ञान में इराक या खुरासन में सबसे ज्यादा जानकार व्यक्ति होने के रूप में अल बुखारी की प्रशंसा की। न्यायविदों के फैसलों का जिक्र करते समय, उन्होंने अबू हनीफा के नाम का जिक्र नहीं करने के अल-बुखारी के अभ्यास का पालन किया। क्योंकि उन्हें कभी भी अबू हनीफा के नियमों का जिक्र करने के लिए कथाकारों की रिलायब श्रृंखला नहीं मिली, बल्कि उन्हें \"कुफा के कुछ लोगों\" के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अल-बुखारी ने उच्च सम्मान में-तिर्मिधि में भी आयोजित किया। उन्होंने टिमिधि में बताया है, \"मैंने मुझसे आपके से अधिक लाभ कमाया है,\" और उनके साहिह में उन्होंने दो हदीस को-तिर्मिधि से सुनाया।",
"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\nसमय के साथ, जमशेद कुली की मृत्यु हो गई, और थोड़ी देर बाद, जमशेद के शिशु पुत्र सुबान भी मर गए। तब इब्राहिम गोलकोंडा लौट आया और 1550 में सिंहासन ले लिया। यहां फिर से, इब्राहिम ने अपने सल्तनत के भीतर प्रशासनिक, राजनयिक और सैन्य उद्देश्यों के लिए हिंदुओं को नियुक्त किया। कला और तेलुगू साहित्य के संरक्षक, इब्राहिम ने कई अदालतों के कवियों को प्रायोजित किया, जैसे सिंगानाचार्युडू, अदंकी गंगाधरुडू, और कंदुकुरु रुद्रकावी। परंपरा से एक ब्रेक में तेलुगू कवि थे। उन्होंने अपनी अदालत में अरबी और फारसी कवियों का भी संरक्षण किया। वह तेलुगू साहित्य में माल्की भरमा (उनके अपना हिंदू नाम) के रूप में भी जाना जाता है। इब्राहिम ने अपने लोगों के कल्याण में गहरी दिलचस्पी ली। उन्होंने गोलकोंडा किले की मरम्मत और मजबूत किया और हुसैन सागर झील और इब्राहिम बाग विकसित किया। किले में \"मक्की दरवाजा\" पर शिलालेखों में से एक में \"महानतम संप्रदायों\" के रूप में वर्णित किया गया है।",
"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\n1543 में, इस तरह के असाधारण जीवन को इतने ज्यादा और जीवित रहने के बाद, कुली कुतुब मुल्क अपने छोटे बेटे जमशेद ने मारे गए, जबकि वह एक दिन अपनी प्रार्थनाएं दे रहे थे। इब्राहिम के भाई इसासिन ने अपने सभी भाइयों को पकड़ने या मारने या विचलित करने के हर संभव प्रयास किए। वह अपने सबसे बड़े भाई, ताज राजकुमार कुतुबुद्दीन को पकड़ने और अंधा करने में कामयाब रहे, लेकिन इब्राहिम किसी भी तरह से भागने में कामयाब रहे। वह गोलकोंडा से भाग गया और विजयनगर के शक्तिशाली हिंदू शासक की अदालत में शरण ली। यहां वह विजयनगर, अली्या राम राय के शक्तिशाली कुलपति के सम्मानित अतिथि के रूप में निर्वासन में रहते थे। वह विजयनगर अदालत में सात साल (1543-50) के लिए रहते थे।",
"सउदी अरब\n६१३ इस्वी के आसपास एक अरबी दफ़तर ने लोगों में एक दिव्य ज्ञान का प्रचार किया। आपका कहना था कि आपको इसका ज्ञान अल्लाह के फरिश्ते जिब्राईल ने दिया और प्रत्येक इन्सान को उन्हीं तरीकों को अपनाना चाहिए। आपका का नाम मुहम्मद (स्०) था और उनकी बीवी का नाम खादीजा था। लोगों को उनकी बात पर या तो यकीन नहीं आया या साधारण सी लगी। पर गरीबों को ये बात बहुत पसन्द आई कि किसी का शोषण नहीं करना चाहिए जो यह करेगा उसे कयामत के दिन नरक का प्राप्ति होगी। लोगों के बीच समानता के भाव की बात दलितों और निचले तबकों में लोकप्रियता मिलने लगी। फिर धीरे धीरे और लोग भी उनके अनुयायी बनने लगे। उनकी बढ़ती ख्याति देखकर मक्का के कबीलों को अपनी लोकप्रियता और सत्ता खो देने का भय हुआ और उन्होंने मुहम्मद (स्०) को सन् ६२२ (हिजरी) में मक्का छोड़ने को विवश कर दिया। वो मदीना चले आए जहाँ लोगों,खासकर संभ्रांत कुल के लोग और यहूदियों से उन्हें समर्थन मिला। इसके बाद उनके अनुचरों की संख्या और शक्ति बढती गई। मुहम्मद (स्०) ने मक्का पर चढ़ाई कर दी और वहाँ के प्रधान ने हार मान ली। उनके 'संदेश' से और लोग प्रभावित होने लगे और उनकी प्रभुसत्ता में विश्वास करने लगे। उसके बाद मुहम्मद ने अपने नेतृत्व में कई ऐसे सैनिक अभियान भी चलाए जिनमें उनका विरोध करने वालों को हरा दिया गया। सन् ६३२ में मुहम्मद साहब की मृत्यु तक लगभग सारा अरब प्रायद्वीप मुहम्मद साहब के संदेश को कुबूल कर चुका था। इन लोगों को मुस्लिम कहा जाने लगा।",
"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\nविजयनगर में, हिब्रू संस्कार और रीति-रिवाजों के अनुसार, इब्राहिम ने बागिरधी से शादी की (सही ढंग से: \"भागीरथी\"), एक हिंदू महिला। बागिरधी को \"काव्य कन्याका\" भी कहा जाता था और वह संगीत और नृत्य में एक समृद्ध विरासत वाले परिवार से आईं, जो फिर से हिंदू, दक्षिण भारतीय परंपराओं में निहित हैं। इब्राहिम और भागीरथी, अर्थात् मुहम्मद कुली कुतुब शाह के लिए पैदा हुआ पुत्र, अपने पिता को वंश के 5 वें शासक बनने में सफल रहेगा।",
"इब्राहीम (उस्मानी साम्राज्य)\nइब्राहीम (, ; 5 नवम्बर 1615 – 18 अगस्त 1648) 1640 से 1648 तक उस्मानी साम्राज्य के सुल्तान रहे। उनका जन्म क़ुस्तंतुनिया में हुआ था। उनके पिता अहमद प्रथम थे और उनकी माँ नस्लन यूनानी कौसम सुल्तान थीं, जिनका मूल नाम आनास्तासिया था। उनकी ख़राब दिमाग़ी हालत की वजह से बीसवीं सदी के इतिहासकारों ने उनका नाम पागल इब्राहीम रखा।",
"इब्राहीम क़ुली क़ुतुब शाह वली\n1565 में, इब्राहिम ने विजयनगर में आंतरिक संघर्षों का लाभ उठाया, जिसने उन्हें 1543-1550 के दौरान निर्वासन में आश्रय दिया था। वह छोटे राज्यों के मुस्लिम शासकों के एक कैबल का हिस्सा बन गए जो विजयनगर के शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य को नष्ट करने के लिए एक साथ बंधे थे। इस प्रकार उन्होंने विजयनगर के अली्या राम राय को व्यक्तिगत रूप से धोखा दिया, जिन्होंने 1543 से 1550 में अपने निर्वासन के दौरान उन्हें आश्रय दिया था। तालिकोटा की लड़ाई में, अलीया राम राय की हत्या हुई थी और शहर जहां इब्राहिम ने सात खुश और सुरक्षित वर्षों बिताए थे जमीन पर; अपनी पूर्व महिमा के अवशेष आज हम्पी के दंगों में देखे जा सकते हैं। 1565 में तालिकोटा की लड़ाई के बाद, इब्राहिम अदोनी और उदयगिरी के महत्वपूर्ण पहाड़ी किलों को लेकर अपने राज्य का विस्तार करने में सक्षम था, जिसने एक व्यापक क्षेत्र का आदेश दिया था और जिसकी संपत्ति उसके पूर्व मेजबान की संपत्ति थी।"
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राजा राममोहन राय कहाँ के संस्थापक थे?
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"राजा राममोहन राय\nराजा राममोहन रॉय(22 मई 1772 - 27 सितंबर 1833) को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है। इनके पिता का नाम रमाकांत तथा माता का नाम तारिणी देवी था।भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की। उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी, वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया",
"भारतीय राष्ट्रवाद\nइन महान व्यक्तियों में राजा राम मोहन राय को भारतीय राष्ट्रीयता का अग्रदूत कहा जा सकता है। उन्होंने समाज तथा धर्म मे व्याप्त बुराईयों को दूर करने हेतु अगस्त 1828 ई0 मे ब्रह्म समाज की स्थापना की। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा, छुआ-छूत जाति मे भेदभाव एवं मूर्ति पूजा आदि बुराईयों को दूर करने का प्रयास किया। उनके प्रयासो के कारण आधुनिक भारत का निर्माण सम्भव हो सका। इसलिए उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। डॉ॰ आर0 सी0 मजुमदार ने लिखा है कि राजा राम मोहन राय को बेकन तथा मार्टिन लुकर जैसे प्रसिद्ध सुधारकों की श्रेणी में गिना जा सकता है। ए0सी0 सरकार तथा के0के0 दत्त का मानना है कि राजा राम मोहन राय के आधुनिक भारतवर्ष में राजनीति जागृति एवं धर्म सुधार का आध्यात्मिक युग प्रारम्भ किया वे एक युग प्रवर्तक थे। इसलिए डॉ॰ जकारिया ने उन्हें सुधारकों का आध्यात्मिक पिता कहा है। बहुत से विद्वान उन्हें आधुनिक ’भारत का पिता’ तथा ’नये युग का अग्रदूत’ मानते हैं। राजा राममोहन राय ने भारतीयों के लिए राजनीतिक अधिकारों की माँग की। 1823 ई0 में प्रेस आर्डिनेन्स के द्वारा समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। इस पर राजा राम मोहन राय ने इस आर्डिनेन्स का प्रबल विरोध किया और उसे रद्द करवाने का हर सम्भव किया इसके पश्चात् उन्होंने ज्यूरी एक्ट एक आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। डॉ॰ आर0सी0 मजुमदार के शब्दों में ”राजा राम मोहन राय“ पहले भारतीय थे जिन्होंने अपने देशवासियों की कठिनाई तथा शिकायतों को ब्रिटिश सरकार के सम्मुख प्रस्तुत किया और भारतीयों को संगठित होकर राजनीतिक आन्दोलन चलाने का मार्ग दिखलाया उन्हें आधुनिक आन्दोलन का अग्रदूत होने का भी श्रेय दिया जा सकता है।“",
"राजा राममोहन राय\nराजा राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। धर्म प्रचार के क्षेत्र में अलेक्जेंडर डफ्फ ने उनकी काफी सहायता की। देवेंद्र नाथ टैगोर उनके सबसे प्रमुख अनुयायी थे। आधुनिक भारत के निर्माता, सबसे बड़ी सामाजिक - धार्मिक सुधार आंदोलनों के संस्थापक, ब्रह्म समाज, राजा राम मोहन राय सती प्रणाली जैसी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह भी अंग्रेजी, आधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी और विज्ञान के अध्ययन को लोकप्रिय भारतीय समाज में विभिन्न बदलाव की वकालत की। यह कारण है कि वह \"मुगल सम्राट 'राजा के रूप में भेजा गया था।",
"राजा राममोहन राय\nराजा राममोहन राय का जन्म बंगाल में 1772 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 15 वर्ष की आयु तक उन्हें बंगाली, संस्कृत, अरबी तथा फ़ारसी का ज्ञान हो गया था। किशोरावस्था में उन्होने काफी भ्रमण किया। उन्होने 1809-1814 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए भी काम किया। उन्होने ब्रह्म समाज की स्थापना की तथा विदेश (इंग्लैण्ड तथा फ़्रांस) भ्रमण भी किया।",
"१८३३\nराजाराममोहन राय (भारत), ब्रह्म समाज के संस्थापक।"
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"हिन्दी पत्रिकाओं की सूची\nहिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा। भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया। समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किये और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की। राय ने कई पत्र शुरू किये। जिसमें अहम हैं-साल 1780 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’। बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है। इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे। इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना फैलाई। 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदन्त मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है।",
"भारतीय मीडिया\nउन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में कलकत्ता के पास श्रीरामपुर के मिशनरियों ने और तीसरे दशक में राजा राममोहन राय ने साप्ताहिक, मासिक और द्वैमासिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। पत्रकारिता के ज़रिये यह दो दृष्टिकोणों का टकराव था। श्रीरामपुर के मिशनरी भारतीय परम्परा को निम्नतर साबित करते हुए ईसाइयत की श्रेष्ठता स्थापित करना चाहते थे, जबकि राजा राममोहन राय की भूमिका हिंदू धर्म और भारतीय समाज के आंतरिक आलोचक की थी। वे परम्परा के उन रूपों की आलोचना कर रहे थे जो आधुनिकता के प्रति सहज नहीं थे। साथ में राजा राममोहन परम्परा के उपयोगी आयामों को ईसाई प्रेरणाओं से जोड़ कर एक नये धर्म की स्थापना की कोशिश में भी लगे थे। इस अवधि में मीडिया की सारवस्तु पर धार्मिक प्रश्नों और समाज सुधार के आग्रहों से संबंधित विश्लेषण और बहसें हावी रहीं।",
"रामचन्द्र राय\nरामचंद्र विद्याबागिस (बंगाली: रामचंद्र बीदैबागिश) (१७८६- २ मार्च १८४५) एक भारतीय भाषाशास्त्रज्ञ और संस्कृत विद्वान थे। वह अपने बंगाभाशभाषण के लिए जाना जाता है, पहला मोनोलिंग्यूअल बंगाली डिक्शनरी १८१७ में प्रकाशित हुआ। उन्होंने राजा राममोहन रॉय द्वारा स्थापित वेदांत कॉलेज में पढ़ाया और बाद में १८२७-३७ में संस्कृत कॉलेज में पढ़ाया। कोलकाता में राजा राममोहन रॉय के काम से जुड़े हुए, वह 1828 में स्थापित ब्राह्मो सभा के पहले सचिव थे और उन्होंने १८४३ में देबेन्द्रनाथ टैगोर और 21 अन्य युवाओं को ब्राह्मो समाज में शुरू किया। राजा राममोहन रॉय इंग्लैंड गए, उसके अनूठे युग और बिष्णु चक्रवर्ती के भक्ति गायन ने ब्रह्मो समाज के अस्तित्व में मदद की। वह नंदकुमार विद्यालंकर (बाद में कुलवधुत श्रीमद हरिहरनन्द तीर्थस्वामी) के छोटे भाई थे, एक भटकती साधु, जिन्होंने अपने छोटे दिनों से राजा राममोहन के परिचित थे। वह महानिवाण तंत्र के अनुसार एक सच्चे ईश्वर का भक्त था।",
"विजयमोहन सिंह\nउन्होंने 1964 से 1968 तक पटना से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘नई धारा’का सम्पादन भी किया था। लेखन तथा संपादन के अतिरिक्त उन्होंने नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित यूनेस्को कूरियर के कुछ महत्त्वपूर्ण अंकों तथा एन.सी.ई.आर.टी. के लिए राजा राममोहन राय की जीवनी का हिन्दी अनुवाद भी किया।",
"राजा राममोहन राय\nराजा राममोहन राय ने 'ब्रह्ममैनिकल मैग्ज़ीन', 'संवाद कौमुदी', मिरात-उल-अखबार ,(एकेश्वरवाद का उपहार) बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया। बंगदूत एक अनोखा पत्र था। इसमें बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया जाता था। उनके जुझारू और सशक्त व्यक्तित्व का इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि सन् 1821 में अँग्रेज जज द्वारा एक भारतीय प्रतापनारायण दास को कोड़े लगाने की सजा दी गई। फलस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। इस बर्बरता के खिलाफ राय ने एक लेख लिखा।"
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लोगों के द्वारा विश्वास एवं उद्देश्यपूर्वक किये गये कार्य को क्या कहते हैं?
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"इच्छाशक्ति\nमनोविज्ञान के सन्दर्भ में इच्छाशक्ति या संकल्प (विल / Will या Volition) वह संज्ञानात्मक प्रक्रम है जिसके द्वारा व्यक्ति किसी कार्य को किसी विधि का अनुसरण करते हुए करने का प्रण करता है। संकल्प मानव की एक प्राथमिक मानसिक क्रिया है। इसके अलावा प्रभावन (affection), अभिप्रेरण (motivation), अभिज्ञान (cognition या thinking) भी मानव के प्राथमिक मानसिक क्रियाएँ हैं।"
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"तवक्कुल\nतवक्कुल के तीन दरजे बयान किये गये हैं: विश्वासियों का विश्वास, चयन का विश्वास, और चयन के चयन का विश्वास। इनमें से प्रत्येक दरजे को मन और स्वयं के सक्रिय सुधार के माध्यम से प्राप्त किया जा सकती है। विश्वासियों का विशवास यह है कि बस एक दिन में एक दिन जीना है और इस बात की चिंता नहीं करना है कि आने वाला कल आपके लिए क्या लाएगा; केवल परमेश्वर ने जो योजना बनाई है उस पर भरोसा करना है। चयन का विशवास बिना किसी मकसद या इच्छा के अल्लाह पर भरोसा करना है। यह सभी इच्छाओं को दरकिनार कर रहा है। और अंत में चयन के चयन का विशवास अपने आप को पूरी तरह से अल्लाह के सुपु्र्द करना है ताकि उनकी इच्छाएं आपकी हो जाएं। दूसरे शब्दों में, \"अल्लाह पर भरोसा करने का अर्थ है परमप्रधान अल्लाह तआला से संतुष्ट होना और उस पर भरोसा करना।\" यह कहा जाता है कि क्योंकि ईश्वर ने सब कुछ बनाया है सब कुछ उसी का है, यह सवार्थ है कि अल्लाह जो चाहता है उसके अलावा कुछ और चाहा जाये और जा अल्लाह देता है उसको ना चाहा जाये।",
"नेतृत्व\nनोअम चोमस्की ने नेतृत्व की अवधारणा की आलोचना की और कहा कि यह लोगों को अपने अधीनस्थ आवश्यकताओं से अलग किसी और को शामिल करना है। जबकि नेतृत्व का परंपरागत दृष्टिकोण यह है कि लोग चाहते है कि 'उनको यह बताया जाए कि उन्हें क्या करना है। व्यक्ति को यह सवाल करना चाहिए कि वे क्यों कार्यों के अधीन हैं जो तर्कसंगत और वांछनीय है। जब 'नेता', 'मुझ पर विशवास कीजिए', 'विशवास रखिए' कहते हैं तो उसमें प्रमुख तत्व - तर्कशक्ति की कमी होती है। यदि तर्कशक्ति पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है तो लोगों को 'नेता' का अनुसरण चुपचाप करना पड़ता है। [60] नेतृत्व की अवधारणा की एक और चुनौती यह है कि यह दलों और संगठनों के 'अनुसरण की भावना' को बनाता है। कर्मचारिता की अवधारणा हालाँकि, एक नयी विकसित जिम्मेदारी है जो उसके कार्य क्षेत्र में उसके कौशल और नजरिये को उजागर करते हैं, जो सभी लोगों में आम होते हैं और नेतृत्व को एक अस्तित्व रूप में अलग रखता है।",
"मनोमिति\nअनेक अभिरुचि प्रश्नावलियों का निर्माण किया गया जिनमें \"क्यूडर प्रेफरेंस रेकार्ड (वोकेशनल) प्रमुख है। यह प्रश्नावली अनेक प्रकार के कार्यों के प्रति व्यक्ति की अभिरुचि का मूल्यांकन करने का प्रयास करती है। यह वर्णनात्मक मान है जिसमें परीक्ष्य व्यक्ति को तीन संभव क्रियाओं से संबद्ध प्रत्येक पद के अनुसार अपनी रुचि को--किसे वह सबसे अधिक चाहता है और किसे सबसे कम—व्यक्त करना पड़ता है। इस प्रकार हमें इन नव क्षेत्रों में से प्रत्येक व्यक्ति की मापें उपलब्ध होती हैं : यांत्रिक, संगणनात्मक, वैज्ञानिक, अननयी, कलात्मक, साहित्यिक, संगीतात्मक, सामाजिक सेवा और लिपिक। स्ट्रांग का \"वोकेशनल इंटरेस्ट ब्लैंक\" एक अन्य बहुप्रयुक्त व्यावसायिक अभिरुचि तालिका है। स्ट्रांग का सर्वविषयक चार्ट पचास व्यवसायों और कार्यों के क्षेत्र में, जिनमें कानून, चिकित्सा, शिक्षण, इंजीनियरिंग, विक्रेता का कार्य और लेखा आते हैं, व्यक्ति की अभिरुचियों की शक्ति की माप प्रदान करता है।",
"संगठनात्मक व्यवहार\n5. भागीदारी की इच्छा - प्रत्येक व्यक्ति में सम्मान की ललक होती है। वह अपनी क्षमता सिद्ध करके महत्वपूर्ण अनुभव करना चाहता है। संगठन में प्रत्येक कर्मचारी यह विश्वास रखता है कि उसमें कार्य करने की क्षमता है वह अपनी भूमिकाओं का निर्वाह कर सकता है तथा चुनौतीपूर्ण स्थिति का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है। आज अनेक कर्मचारी नीति व निर्णयों के निर्धारण में भाग लेना चाहते हैं। अतः प्रबन्धक को संगठन में व्यवहार करते समय कर्मचारियों की कार्य क्षमता, गुण एवं भागीदारी की आकांक्षा को ध्यान में रखना चाहिए।",
"निर्देश\nनिर्देश की क्रिया में निर्देशदाता (सजेस्टर) के उच्चरित शब्दों का महत्व होता है। निर्देशप्राप्त व्यक्ति की इच्छाशक्ति इस प्रबलतर मन:शक्ति के संमुख आत्मसमर्पण कर देती है। निर्देश हमारे आचरण एवं विश्वास को प्रभावित करनेवाली बुद्धि की विशेष क्षमता का ही दूसरा नाम है। इसमें किसी सीधी आज्ञा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और कार्य अथवा विश्वास पर इच्छित प्रभाव पड़ जाता है। सर्वप्रथम कुछ प्रेरक तत्व (स्टिम्यूलाई) \"निर्देश्य' व्यक्ति के संमुख उपस्थित किए जाते हैं। ये प्रेरक (चाहे वे विचाररूप में हों अथवा वस्तुरूप में अथवा दोनों के ही मिले जुले रूप में) व्यक्ति की किसी अंतर्निहित प्रवृत्ति का उकसाकर बाहर लाते और उसे एक रूप देते हैं। अनुकूल प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होने पर उनमें आवश्यक परिवर्धन भी करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में व्यक्ति किसी भी प्रकार के ऊहापोह अथवा असमंजस में नहीं पड़ता। ऐसी किसी भी प्रक्रिया को, जिसमें व्यक्ति बिना किसी आगापीछा या विवेकपूर्ण निर्णय के, मानसिक रूप से ही नहीं बल्कि अपनी समग्र चेतना एवं कायिक व्यापारों के साथ, पूर्वार्जित सभी धाराणाआें को नकारता हुआ निर्दिष्ट कार्य को पूरा करने के लिए तत्पर होता है, निर्देश की कोटि में रखा जा सकता है।",
"बहिष्कार\nबहिष्कार आमतौर पर नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, या पर्यावरणीय कारणों के लिए विरोध की अभिव्यक्ति के रूप में किसी व्यक्ति, संगठन या देश के उपयोग से स्वैच्छिक और जानबूझकर रोकथाम का कार्य है। बहिष्कार का उद्देश्य किसी आपत्तिजनक व्यवहार को कुछ आर्थिक नुकसान कर या नैतिक आक्रोश कर मजबूरन बदलने की कोशिश है। जब एक समान अभ्यास किसी राष्ट्रीय सरकार द्वारा कानूनित किया जाता है, तो उसे प्रतिबन्ध के रूप में जाना जाता है। बहिष्कार का व्यवहार की वैधता अलग-अलग है।",
"व्यवहार प्रक्रिया\nपरिस्थिति के साथ समायोजन (adjustment) तो व्यक्ति की सहज प्रकृति है। वह कभी अनुकूल और कभी प्रतिकूल मनोवृत्ति से प्रतिक्रिया करना है। यदि किसी अभियोजन के विधान से व्यक्ति वा समाज को सुख वा प्रगति की आशा होती है, तो उसे उचित, अन्यथा अनुचित कह देते हैं। किंतु तात्कालिक और दीर्घकालीन दृष्टिकोण में अंतर भी हो सकता है। यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात को विषपान का मृत्युदंड भी एक ऐसी सामाजिक अभियोजन की घटना थी, जिसपर वर्तमान काल में उभय पक्ष से वादविवाद होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अभियोजन का विधान, नियम अथवा क्रिया तो सरल है। परिस्थिति के मोहक तथा भयानक अंशों के अनुमान से मनुष्य अधिक सुखप्राप्ति के निमित्त कार्य करता है। किंतु परिस्थिति विशेष के प्रतिकूल अवयव के नित्य के संघर्ष से वह या तो उससे उदासीन हो जाता है, या उसके मूल्यांकन का परिवर्तन कर उसको परोक्ष रूप से न्यूनाधिक लाभप्रद मानने लगता है। जब एक ग्रामीण युवक सेना में भरती होता है, तो उसे सारा दिन चुस्त वरदी वा भारी बूट आदि पहनकर रहना प्राय: खलता है। परंतु कुछ ही दिनों में वह उस वेश भूषा को सैनिक मर्यादा का संकेत कहकर, तथा उसमें आत्मसम्मान का आभास देखकर, उससे सलंग्न दु:ख को भी सहने की आदत बना लेता है। इस अभियोजन प्रक्रिया से मनुष्य दुखांश के प्रति उदासीन होता है और समय बीतने से वह उस अनिवार्य दु:ख को भूल भी जाता है, या उसे ही सुखद समझने लगता है।",
"सैनिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण\n( 6 ) प्रभाव के नियम - व्यक्ति का एक उद्देश्य आनन्द की प्राप्ति भी होता है। इस सिद्धान्त पर आधारित प्रभाव का नियम प्रेरणा के क्षेत्र में सफल भूमिका या निर्वहन करता है। प्रत्येक कार्य सुख अथवा दुख का सृजक होता है। स्वभावतः व्यक्ति उन्हीं लक्ष्यों को चुनना पसन्द करता है जो आनन्ददायक होते हैं। प्रगति और फल ज्ञान के सिद्धान्त में इस नियम का प्रभाव पड़ता है। सन्तोषजनक प्रगति होने पर व्यक्ति उत्साहित और असन्तोषजनक प्रगति होने पर वह हतोत्साहित होता ( 7 ) लगन के साथ कार्यान्वयन - प्रेरणा के वशीभूत होकर किये जाने वाले कार्य से समूचे व्यक्तित्व को सन्तुष्टि प्राप्त होती है। कभी-कभी इससे प्रत्यक्ष निषेध का अभिप्रेरण भी व्यक्तित्व में प्रवेश कर जाता है जिससे व्यक्ति में असामाजिकता और स्वार्थपरता की भावना जन्म लेने लगती है। इन प्रेरणाओं के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता होती है।",
"परामर्श\nकिसी व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्याओं एवं कठिनाइयों को दूर करने के लिये दी जाने वाली सहायता, सलाह और मार्गदर्शन, परामर्श (Counseling) अथवा उपबोधन कहलाता है। परामर्श देने वाले व्यक्ति को परामर्शदाता (काउन्सलर) कहते हैं। निर्देशन (गाइडेंस) के अन्तर्गत परामर्श एक आयोजित विशिष्ट सेवा है। यह एक सहयाेगी प्रक्रिया है। इसमें परामर्शदाता साक्षात्कार एवं प्रेक्षण के माध्यम से सेवार्थी के निकट जाता है उसे उसकी शक्ति व सीमाओं के बारे में उसे सही बोध कराता है।"
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भारत में पंचायती राज की अनुशंसा की थी?
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"पंचायती राज\nभारत में प्राचीन काल से ही पंचायती राज व्यवस्था आस्तित्व में रही हैं। आधुनिक भारत में प्रथम बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान के नागौर जिले के बगधरी गांव में 2 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई।"
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"पंचायती राज\n24 अप्रैल 1993 भारत में पंचायती राज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था क्योंकि इसी दिन संविधान (73वाँ संशोधन) अधिनियम, 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ और इस तरह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को वास्तविकता में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया गया था।",
"पंचायतीराज में महिला सहभागिता\nभारत में महिलाओं का स्थान विषय पर गठित समिति ने 1974 में अनुशंसा की थी कि ऐसी पंचायतें बनाई जाऐं जिनमें केवल महिलाएं ही हों। नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर द विमेन, 1988 ने ग्राम पंचायत से लेकर जिला परिषद तक 30 प्रतिशत सीटों के आरक्षण की अनुशंसा की थी। महिलाओं को प्रदत्त आरक्षण को पंचायतीराज संस्थानों में राव समिति द्वारा प्रस्तुत संतुतियों की सबसे महत्पूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें पहली बार महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था रखी गई। वर्तमान सृजनषील समाज में नारीवादियों द्वारा आत्मनिर्णय एवं स्वाषासन के लिए सामाजिक रूपांतरण की मांग प्रबल हुई है। इसकी अभिव्यक्ति भारतीय संसद में 110वें व 112वें संविधान संषोधन विधेयक, 2009 के रूप मंे हुई, जिनका संबंध क्रमषः पंचायतीराज और शहरी निकायों के सभी स्तरों में महिलाओं के लिए निर्धारित 33 प्रतिषत सीटों को बढ़ाकर 50 प्रतिषत करने से था।",
"राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस\nभारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने 24 अप्रैल 2010 को पहला राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस घोषित किया था। उन्होंने उल्लेख किया कि अगर पंचायती राज संस्थाओं ने ठीक से काम किया और स्थानीय लोगों ने विकास प्रक्रिया में भाग लिया, तो माओवादी खतरे का मुकाबला किया जा सकता है।",
"पंचायती राज\nवर्ष 1993 में 73वें व 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर), पंचायत समिति (मध्यवर्ती स्तर पर) और ज़िला परिषद (ज़िला स्तर पर) शामिल हैं।",
"पंचायती राज\nभारत में ब्रिटिश शासनकाल में लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक माना जाता है। वर्ष 1882 में उन्होंने स्थानीय स्वशासन सम्बंधी प्रस्ताव दिया।",
"पंचायती राज\n1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रान्तों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई तथा स्थानीय स्वशासन को हस्तान्तरित विषयों की सूची में रखा गया। स्वतंत्रता के पश्चात् वर्ष 1957 में योजना आयोग (अब नीति आयोग) द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम (वर्ष 1952) और राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम (वर्ष 1953) के अध्ययन के लिये ‘बलवंत राय मेहता समिति’ का गठन किया गया। नवंबर 1957 में समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था- ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर एवं ज़िला स्तर लागू करने का सुझाव दिया। वर्ष 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें स्वीकार की तथा 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश की पहली त्रि-स्तरीय पंचायत का उद्घाटन किया गया।",
"७३वां संविधान संशोधन अधिनियम, १९९२ (पंचायती राज)\nयह अधिनियम १९९२ में पारित किया गया और यह भारत में पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के दिशा में एक बड़ा कदम था। स्थानीय स्वशासन की दृष्टि से इस संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायतों के गठन को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान में एक नवीन भाग ९ जोड़ा गया जो पंचायतों के विषय में है। संविधान के इस भाग में २४३, २४३क से २४३ण तक ( 243 (a) से लेकर अनुच्छेद 243(o) तक) के अनुच्छेद हैं।",
"राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस\nप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल 2015 को निर्वाचित प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए, \"सरपंच पति\" की प्रथा को समाप्त करने का आह्वान किया, ताकि वे सत्ता में चुने जाने वाले उनके कामों पर अनुचित प्रभाव डाल सकें।",
"भारत के मूल अधिकार, निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्य\nनिर्वाचित ग्राम परिषदों का एक तंत्र पंचायती राज के नाम से जाना जाता है, यह लगभग भारत के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है। पंचायती राज में प्रत्येक स्तर पर कुल सीटों की संख्या की एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं, बिहार के मामले में आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। जम्मू एवं काश्मीर तथा नागालैंड को छोड़ कर सभी राज्यों और प्रदेशों में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग कर दिया गया है। भारत की विदेश नीति निदेशक सिद्धांतों से प्रभावित है। भारतीय सेना द्वारा संयुक्त राष्ट्र के शांति कायम करने के 37 अभियानों में भाग लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति प्रयासों में सहयोग दिया है।"
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ग्रामीण विकास कार्यक्रम की जिला स्तर पर देखरेख किस द्वारा की जाती है?
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"महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम\nमनरेगा ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है। मनरेगा यह उल्लेख करता है कि कार्य को ग्रामीण विकास गतिविधियों के एक विशिष्ट सेट की ओर उन्मुख होना चाहिए जैसे: जल संरक्षण और संचयन, वनीकरण, ग्रामीण संपर्क-तंत्र, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षा जिसमें शामिल है तटबंधों का निर्माण और मरम्मत, आदि। नए टैंक/तालाबों की खुदाई, रिसाव टैंक और छोटे बांधों के निर्माण को भी महत्व दिया जाता है। कार्यरत लोगों को भूमि समतल, वृक्षारोपण जैसे कार्य प्रदान किये जाते हैं।"
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"ग्रामीण विकास मंत्रालय\nप्रधानमंत्री ग्रामीण विकास अध्येतावृत्ति योजना गृह मंत्रालय ने देश के 60 जिलों की पहचान वामपंथी चरमपंथ (LWE) से प्रभावित जिलों के रूप में की है। भारत सरकार ने इन जिलों में एक विशेष कार्यक्रम चलाया है जिसे समेकित कार्य योजना (IAP) का नाम दिया गया है। सभी समेकित कार्य योजना जिलों में जिला अधीक्षक की मदद करने के लिए युवा पेशेवरों की तैनाती हेतु 13 सितम्बर,2011 को तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के ग्रामीण विकास फेलोज़ नामक योजना की घोषणा की थी।मिशन मूल रूप से प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास अध्येतावृत्ति प्राप्त लोग विकास को सुगम बनाने वाली एक योजना के रूप में कार्य करेंगे, वे समेकित कार्य योजना के जिलों के कलेक्टरों तथा उन्के सहकर्मियों को मदद देंगे और उन्हें परिस्थितियों का आवश्यक विश्लेषण प्रदान करेंगे कि उनसे कैसे निपटा जाए' फेलोज़ सक्रिय रूप से एक जिला कार्यक्रम का संचालन करेंगे, जिसमें निम्नांकित तीन महत्वपूर्ण रणनीतियां शामिल होंगी 'सभी नियोजित गतिविधियों तथा उचित बजट प्रक्रिया के संचालन द्वारा प्रोग्रामिंग हेतु जिला संसाधन बेस को मजबूत करना।अतिवंचित समुदायों तक सेवाओं की पहुंच स्थापित करने के लिए वैकल्पिक तरीकों को खोजकर इस प्रणाली को सुस्थापित तथा सुदृढ़ बनाना।ऐसी प्रक्रियाओं को चालू करना जो इस विधि (अर्थात ग्राम नियोजन ) में शामिल किए गए परिवर्तनों को बढ़ावा देती हो।यह पूर्ण रूप से सहायक कार्यों के एक समूह द्वारा पूरा किया जाएगा, जैसे जिला तथा ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की क्षमता का निर्माण करना, जिले में सामाजिक लामबंदी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना, खासकर युवाओं के बीच; जमीनी समर्थन हासिल करना तथा पंचायतों के साथ मजबूत संबंध बनाना'",
"लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद\nकपार्ट ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यप्रणाली के सुधार का उद्देश्य लेकर कार्यरत है, विशेषतया समाज के दलित तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए कार्यरत है। अत: गरीबी रेखा के स्तर से नीचे वाले लोगों, अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोगों, बंधुआ मज़दूरों, अपंगों, बच्चों तथा स्त्रियों को प्रमुखता देना कपार्ट का प्रमुख उद्देश्य है।",
"ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स\nगरीबी उन्मूलन की समस्या का सामना करने के लिए आधारभूत स्तर पर आयोजना प्रक्रिया में जन-सहभागिता के लिए एक ओर कार्यकम्रम शुरू किया। ग्रामीण प्रोजेक्ट का उद्देश्य गरीबी का उन्मूलन करना है और सफलता अथवा असफलता के लिए जिम्मेवार कारणों को चिन्हित करना है। ओरियन्टल बैंक ऑफ कामर्स जिला देहरादून (उत्तर प्रदेश) और जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान) में ग्रामीण प्रोजेक्ट चला रहा है। बांग्लादेश ग्रामीण बैंक के ढांचे पर बनाई गई इस योजना में 75/-रु0 (2 अमरीकी डालर) व इससे अधिक राशि के छोटे ऋणों का संवितरण करने की अनूठी विशेषता है। ग्रामीण प्रोजेक्ट के लाभग्राही अधिकांशतः महिलाएं हैं। बैंक ग्रामीणों को प्रशिक्षण देता है ताकि वह स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल से अचार, जैम इत्यादि बना सके। इससे ग्रामीणों को स्व-रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं और उनकी आय में वृद्धि होने से उनके जीवन स्तर में सुधार आया है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा मिला है। ओबीसी ने बैसाखी के पावन दिवस पर 13 अप्रैल 1997 को पंजाब के तीन गांवों में अर्थात् रूड़की कलान (जिला संगरूर., राजे माजरा (जिला रोपड़) और खैरा माझा (जिला जालंधर) और हरियाणा के दो गांवों अर्थात खुंगा (जिला जींद) और नरवाल (जिला कैथल) में 'व्यापक ग्रामीण विकास कार्यक्रम' नामक एक और अनूठी योजना आरंभ की। पायलट आधार पर प्रवर्तित यह योजना अत्यन्त सफल हुई। इसकी सफलता से उत्साहित होकर बैंक ने इस कार्यक्रम का विस्तार अन्य गांवों में भी किया। इस समय यह कार्यक्रम 15 गांवों में लागू है जिसमें से 10 पंजाब में, 6 हरियाणा में और 1 राजस्थान में है। इस कार्यक्रम में ग्रामीण विकास को केद्रित करते हुए ग्रामवासियों को ग्राम वित्त प्रदान करने हेतु व्यापक और समेकित पैकेज प्रदान करने पर जोर दिया गया है। इस प्रकार यह कार्यक्रम गांव के प्रत्येक किसान की आय बढ़ाने और बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए सहायता प्रदान करता है। बैंक ने महिलाओं को ऋण देने में तेजी लाने के लिए 14 सूत्री कार्ययोजना लागू की है और 5 शाखाओं को महिला उद्यमियों के लिए विशेषीकृत शाखाओं के रूप में नामित किया गया है। १४ अगस्त २००४ को ग्लोबल ट्रस्ट बैंक का विलय इस बैंक में हुआ। ग्लोबल ट्रस्ट बैंक निजी क्षेत्र का एक अग्रणी बैंक था किंतु कुछ वित्तीय अनियमितताओं के चलते रिज़र्व बैंक द्वारा कुछ प्रतिबंध लगाए जाने के कुछ समय पश्चात् ही इसे ओ बी सी में मिला दिया गया।",
"सांसद आदर्श ग्राम योजना\nसांसद आदर्श ग्राम योजना गाँँवों के निर्माण और विकास हेतु कार्यक्रम है। जिसका मुख्य लक्ष्य ग्रामीण इलाकों में विकास करना है। इस कार्यक्रम का शुभारम्भ (शुभारंभ) भारत के प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी जी ने जयप्रकाश नारायण के जन्म दिन 11 अक्टूबर 2014 को शुरू किया।",
"सामुदायिक विकास खंड\nकई पंचायतों को मिला कर एक विकास खंड होता है इसका मुख्यालय सामुदायिक विकास केन्द्र कहलाता है। एक जिले में कई सामुदायिक विकास केन्द्र होते हैं। विकास खंडों और सामुदायिक विकास केंद्रों के सामंजस्य से जनविकास से सम्बंधित जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू कराया जाता है। विकास खंड का मुखिया विकास खंड अधिकारी या बी डी ओ यानी ब्लाक डवलपमेंट आफिसर कहलाता है, जो ग्रामीण विकास के मसलों के लिए जवाबदेह होता है, सामुदायिक विकास के अन्य कार्यक्रमों का संचालन निम्न अनुसार किया/कराया है जाता",
"राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक\nविकास और सहयोग के लिए स्विस एजेंसी की सहायता के माध्यम से, नाबार्ड ने ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि की स्थापना की. आरआईडीएफ योजना के तहत 2,44,651 परियोजनाओं के लिए रू. 512830000000 मंजूर दी गई हैं जिसके अंतर्गत सिंचाई, ग्रामीण सड़कों और पुलों के निर्माण, स्वास्थ्य और शिक्षा, मिट्टी का संरक्षण, जल की परियोजनाएं इत्यादि शामिल हैं। ग्रामीण नवोन्मेष कोष एक ऐसा कोष है जिसे इस प्रकार डिजाइन किया गया है जिसमे नवोंमेश का समर्थन, जोखिम के प्रति मित्रवत व्यवहार, इन क्षेत्रों में अपरंपरागत प्रयोग करेगा जिसमे ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के अवसर और रोजगार को बढ़ावा देने की क्षमता होगी. व्यक्तियों, गैर सरकारी संगठनों, सहकारिता, स्वावलंबी समूहों और पंचायती राज संस्थाओं को सहायता के हाथ बढ़ा दिये गए हैं, जिनमे ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने की दक्षता और नवोन्मेषी विचारों को लागू करने की इच्छा है। लाख 2 करोर 50 लाख की सदस्यता के जरिये, 600000 सहकारिता संस्थाएं भारत में जमीनी मौलिक स्तर पर लगभग अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। स्वसहायता समूहों और अन्य प्रकार के संस्थानों के बीच सहकारी समितियों के साथ संबंध हैं।",
"जिला योजना समिति\nजिला योजना समिति पंचायतों तथा नगर पालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित करने और सम्पूर्ण जिला के लिए विकास योजना का प्रारूप तैयार करने हेतु सरकार प्रत्येक जिले में एक जिला योजना समिति का गठन करेगी। जिला योजना समिति में निम्नलिखित होंगें:- जिला परिषद के अध्यक्ष जिला मुख्यालय पर अधिकारिता रखने वाली नगरपालिका के महापौर या अध्यक्ष सरकार द्वारा यथा विनिर्दिष्ट समिति के सदस्यों की कुल संख्या के कम से कम 4/5 भाग सदस्य, जो जिला परिषदके निर्वाचित सदस्यों, जिले की नगर पंचायत और नगर निगम तथा नगरपालिका पर्षद के निर्वाचित पार्षदों के बीच से उनके द्वारा विहित रीति से ग्रामीण क्षेत्र और जिले के शहरी क्षेत्रों के बीच आबादी के अनुपात में राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देषन, नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण में निर्वाचित होंगे। परन्तु यह कि निर्वाचित सदस्यों में से व्यवहारिक रूप से यथाषक्य पचास (50%) प्रतिशत महिलायें होंगी। परन्तु यह और कि यदि अनुसूचित जातियों या पिछड़े वर्ग की कोटियों में से कोई निर्वाचित सदस्य नहीं हो तो सरकार, जिला की पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के सदस्यों में से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों या पिछड़े वर्ग की कोटियों के सदस्यों को इतनी संख्या में मनोनीत कर सकती है, जितना वह उचित समझे।",
"राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन\nगांव में स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करना - आशा/ सहिया द्वारा। उप केंद्रों की क्षमताओं के विकास के लिए:- जरूरत के अनुसार नये उपकेंद्र उपकेंद्र की बिल्डिंग का निर्माण जरूरत के अनुसार एक और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम की नियुक्ति जो उसी क्षेत्र की होगी। हर उप-केंद्र को रुपया 10,000 की गैर मद निर्धारित अनुदान राशि दी जायेगी जो सरपंच और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम के नाम से बैंक में जमा होगा। महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल ग्राम स्वास्थ्य समिति से चर्चा करके कर सकती है। सारी आवश्यक दवाईयां उपलब्ध होंगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के क्रियान्वयन हेतु / के क्षमता विकास के लिए निम्न कार्य किये जायेंगे - जरूरत के अनुसार बिल्डिंग का निर्माण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 24 घंटे खुले रहेंगे और नर्सिंग की सुविधा उपलब्ध होगी कुछ चुनिंदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 24 घंटे का अस्पताल बनाया जायेगा जिसमें आपातकालीन सेवाएं प्राप्त हो सकें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दो और नर्स की नियुक्ति - कुल तीन नर्स जरूरत के अनुसार एक और डॉक्टर आयुश डॉक्टर - आयुर्वेदिक, यूनानी होमियोपैथी की नियुक्ति हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को रुपया 10,000 का अनुदान मिलेगा जिसे स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी कार्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के रख-रखाव के लिए रुपया 50,000 दिया जायेगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को चलाने के लिए इनमें रोगी कल्याण समिति का गठन। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को प्रोत्साहित करने के लिए रुपया 1,00,000 की अनुदान राशि। शर्त यह है कि यह राशि राज्य को तभी दी जाये जब राज्य यह वचन दे कि रोगी कल्याण समित जो पैसा इकटठा करती है उसे वह उसी के पास रहेगा, राज्य के खाते में नहीं जायेगा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए :- सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता का विकास / उच्च स्तरीय ताकि उनमें 24 घंटे चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होंगी। निष्चेतना विशेषज्ञ की नियुक्ति आयुर्वेदिक युनानी होमियोपैथी क्लिनिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बिल्डिंग का निर्माण/ पुननिर्माण रोगी कल्याण समिति का गठन - जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए मापदंड - आइपीएचएस का पालन जरूरत के अनुसार नये सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शुरू करना सारे राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे मलेरिया,पोलिओ,टीबी आदि और परिवार कल्याण कार्यक्रमों का राज्य और ज़िला स्तर पर समन्वयन राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए जो ज़िला स्तर पर टीम बनेगी उसमें निजी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया जायेगा `आशा´ कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए एक निगरानी समूह का गठन जननी सुरक्षा योजना सामाजिक निगरानी और जवाबदेही के लिए प्रबंध - गांव, ज़िला और राज्य के स्तर पर कमेटियां होंगी। ज़िला स्तर पर जन संवाद, राज्य स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं, सुनििश्चत करना सरकार, राज्य और ज़िला अपने स्तर पर जन- स्वास्थ्य की रिपोर्ट पेश करेगी।",
"गौतमबुद्ध नगर\nजिला प्रशासन एक आईएएस अधिकारी है और जब भी आवश्यक जिले के सभी मामलों पर मेरठ डिवीजन के डिवीजनल कमिश्नर कच्छा कौन जिलाधिकारी की अध्यक्षता में किया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य और केंद्र सरकार के लिए संपत्ति के रिकॉर्ड और राजस्व संग्रह के प्रभार में है, और शहर में आयोजित सभी चुनावों की देखरेख। उन्होंने यह भी शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि एक मुख्यमंत्री देवेलोपेमेंट अधिकारी द्वारा सहायता प्रदान की है, तीन अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (कार्यपालिका, वित्त / राजस्व और भूमि अधिग्रहण), एक शहर Magistrate.The जिले के सदर, Daadri और Jewar एक सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में प्रत्येक के रूप में नामित तीन तहसीलों में विभाजित किया गया है जो भी जिले magistrate.District करने के लिए रिपोर्ट 3 विकास अधिकारियों को दिया गया है: -Noida, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे प्राधिकरणों के अध्यक्ष की अध्यक्षता में जो कर रहे हैं और प्रत्येक अधिकार भी आईएएस अधिकारी हैं, जो अपने स्वयं के मुख्य कार्यकारी अधिकारी है। पुलिस प्रशासन का एक आईपीएस अधिकारी हैं और कानून व्यवस्था लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के प्रति जवाबदेह है जो वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में है, उन्होंने कहा कि पुलिस (शहर, ग्रामीण, आवागमन और अपराध) के चार अधीक्षकों और पुलिस के आठ उप अधीक्षकों द्वारा सहायता प्रदान की है। इसके वर्तमान जिलाधिकारी श्री एल०वाई०सुहास (आई०ए०एस) हैं।"
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प्रदर्शन' प्रसार शिक्षा के जिन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कौन करता है?
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"विकास प्रशासन\n(१) पोस्डकॉर्ब सिद्धान्त : चूँकि विकास प्रशासन लोक प्रशासन का ही विस्तृत अंग है इसलिए लूथर गुलिक द्वारा प्रतिपादित पोस्डकॉर्ब सिद्धान्त (POSDCORB) विकास प्रशासन के क्षेत्र के लिए प्रासंगिक है। यह शब्द निम्नलिखित शब्दों से बना हैः इन सभी सिद्धान्तों की विकास प्रशासन में आवश्यकता पड़ती है।"
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"पाउलो फ्रेइरे\nदमदार सम्मेलन के अध्यापनशास्त्र और थिएटर प्रत्येक वसंत का आयोजन किया जाता है और फ्रेयर और अगस्तो बयाल के सिद्धांत और अभ्यास द्वारा निर्देशित किया जाता है। सम्मेलन नेटवर्क इन दो स्वतंत्र विचारकों - स्वतंत्र शिक्षा और थियेटर, सामुदायिक आयोजन, समुदाय-आधारित विश्लेषण, टीआईई, जाति / लिंग / कक्षा / यौन अभिविन्यास / भूगोल विश्लेषण, प्रदर्शन / प्रदर्शन कला, तुलनात्मक शिक्षा मॉडल, आदि",
"अभिप्रेरणा\nउपलब्धि अभिप्रेरणा के मामले में नवीनतम प्रस्ताव एकीकृत दृष्टि है, जैसा कि हाइंज स्कूलर, जॉर्ज सी थोर्नटन III, एंडरिअस फ्रिंट्रप और रोज मुलर-हनसन द्वारा प्रतिपादित \"ओनियन-रिंग मॉडल ऑफ एचीवमेंट मोटिवेशन\" में प्रतिपादित किया गया है। इस विचार का आधार यह है कि प्रदर्शन अभिप्रेरणा के कारण व्यक्तित्व का मुख्य घटक प्रदर्शन की ओर रुख कर लेता है। नतीजतन, यह आयामों के एक अनुक्रम को शामिल करता है जो कि काम में सफलता के लिए प्रासंगिक हैं, लेकिन जिन्हें पारंपरिक तौर पर प्रदर्शन अभिप्रेरणा का हिस्सा नहीं माना जाता. विशेष रूप से यह पूर्व में अलग रहे दृष्टिकोणों को वर्चस्व जैसे सामाजिक उद्देश्यों के साथ उपलब्धि की ज़रुरत के लिए एकीकृत करता है। उपलब्धि प्रेरणा सूची (Achievement Motivation Inventory AMI) (स्कूलर, थोर्नटन, फ्रिंट्रप और मुइलर-हैनसन, 2003) इसी सिद्धांत पर आधारित हैं और व्यवसायिक व पेशेवर सफलता के आकलन के लिए तीन कारक (17 अलग स्केल) प्रासंगिक हैं।",
"वर्धा शिक्षा योजना\nबुनियादी शिक्षा की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है जिससे लोग साधारणतया सहमत हों। बुनियादी शिक्षा के वास्तविक मूल तत्व एवं निश्चित लक्ष्य के संबंध में बहुत ही गड़बड़ी दिखाई देती है। गांधी जी ने बुनियादी शिक्षा के सिद्धांतों को प्रतिपादित करते समय एक निश्चित सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की थी। वह उत्पादक कार्य को शिक्षा का केंद्र मानते थे किंतु वास्तविक प्रयोग में उत्पादक कार्य द्वारा शिक्षा के सिद्धांत के भिन्न भिन्न अर्थ हो गए हैं। कुछ शिक्षाविद्, जो गांधी जी के अनुयायी होने का दावा करते हैं, विद्यालयों में प्रयोग योग्य वस्तुओं के वास्तविक उत्पादन पर जोर देते हैं। कुछ लोगों का मत है कि इसका अर्थ खेल विधि द्वारा शिक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं है।",
"पाश्चात्य काव्यशास्त्र\nप्लेटो ने काव्य की सामाजिक उपादेयता का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उसके अनुसार काव्य को उदात्त मानव-मूल्यों का प्रसार करना चाहिए। देवताओं तथा वीरों की स्तुति एवं प्रशंसा काव्य का मुख्य विषय होना चाहिए। काव्य-चरित्र ऐसे होने चाहिए जिनका अनुकरण करके आदर्श नागरिकता प्राप्त की जा सके। प्लेटो ने जब अपने समय तक प्राप्त काव्य की समीक्षा की तो उन्हें यह देख कर घोर निराशा हुई कि कविता कल्पना पर आधारित है। वह नागरिकों को उत्तमोत्तम प्रेरणा एवं विचार देने के बजाय दुर्बल बनाती है। प्लेटो के विचार से सुव्यवस्थित राज्य में कल्पनाप्रणव कवियों को रखना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इस प्रकार के कलाकार झूठी भावात्मकता उभार कर व्यक्ति की तर्क-शक्ति कुंठित कर देते है जिससे भले-बुरे का विवेक समाप्त हो जाता है।",
"अरस्तु का विरेचन सिद्धांत\nविरेचन का उल्लेख अरस्तू की रचनाओं में केवल दो स्थानों पर मिलता है। प्रथम उल्लेख उसके ‘पोयटिक्स’ (काव्यशास्त्र) ग्रंथ में, जहाँ ट्रैजेडी के स्वरूप की ओर संकेत किया गया है और दूसरा ‘राजनीतिक’ नामक ग्रंथ में जहाँ उन्होंने संगीत की उपयोगिता प्रतिपादित की है। इन स्थलों पर उन्होंने विरेचन शब्द का सूत्र रूप में एवं उसके स्वरूप की चर्चा की है। अरस्तू का कथन है- ‘‘संगीत का अध्ययन एक नहीं वरन् अनेक उद्देश्यों की सिद्धि के लिए होना चाहिए, अर्थात् शिक्षा के लिए विरेचन (शुद्धि) के लिए। संगीत से बौद्धिक आनन्द की भी उपलब्धि होती है। ... धार्मिक रागों के प्रभाव से वे शान्त हो जाते हैं, मानों उनके आवेश का शमन और विरेचन हो गया हो।",
"आर्य प्रवास सिद्धान्त\nहाँलांकि आज योरोप में इस सिद्धान्त को ख़ारिज़ किया चुका है, परन्तु पूर्ण् रूप में नहीं । इस सिद्धान्त की आलोचना का विशेष कारण यह है कि सिद्धान्त पूर्णरूप से अंग्रेजी इतिहासकारों के द्वारा प्रतिपादित किया गया जिनका कहना था कि वह भारतीय तथा यूरोपीय अध्ययन के माध्यम से ही इस बात पर जोर दे रहे हैं। इसको आगे बढ़ाने में चर्च के अधिकारियों (जैसे रॉबर्ट कॉल्डवेल आदि) और औपनिवेशिक हितों का बड़ा हाथ रहा था। ध्यान दें कि सिद्धान्त के मुख्य प्रस्तावकों में से एक, मैक्समूलर कभी भारत नहीं आया ।",
"अरस्तु का विरेचन सिद्धांत\nविरेचन सिद्धांत (Catharsis / कैथार्सिस ) द्वारा अरस्तु ने प्रतिपादित किया कि कला और साहित्य के द्वारा हमारे दूषित मनोविकारों का उचित रूप से विरेचन हो जाता है। सफल त्रासदी विरेचन द्वारा करुणा और त्रास के भावों को उद्बुद करती है, उनका सामंजन करती है और इस प्रकार आनंद की भूमिका प्रस्तुत करती है। विरेचन से भावात्मक विश्रांति ही नहीं होती, भावात्मक परिष्कार भी होता है। इस तरह अरस्तु ने कला और काव्य को प्रशंसनीय, ग्राह्य और सायास रक्षनीय सिद्ध किया है।",
"महर्षि अरविन्द का शिक्षा दर्शन\nअरविंद के अनुसार \"शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य विकासशील आत्मा के सर्वागीण विकास में सहायक होना तथा उसे उच्च आदर्शों के लिए प्रयोग हेतु सक्षम बनाना हैं।\" अरविंद के विचार महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित शिक्षा के लक्ष्यों के समान हैं। अरविंद की धारणा थी कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में यह विश्वास जागृत करना है कि मानसिक तथा आत्मिक दृष्टि से पूर्ण सक्षम है तथा वह शनै: शनै: अतिमानव (superman) की स्थिति में आ रहा है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति की अन्तर्निहित बौद्धिक एवं नैतिक क्षमताओं का सर्वोच्च विकास होना चाहिए। अरविंद का विश्वास था कि मानव दैवी शक्ति से समन्वित है और शिक्षा का लक्ष्य इस चेतना शक्ति का विकास करना है। इसीलिए वे मस्तिष्क को 'छठी ज्ञानेन्द्रिय' मानते थे। शिक्षा का प्रयोजन इन छ: ज्ञानेन्द्रियों का सदुपयोग करना सिखाना होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि-\"मस्तिष्क का उच्चतम सीमा तक पूर्ण प्रशिक्षण होना चाहिए अन्यथा बालक अपूर्ण तथा एकांगी रह जायेगा। अत: शिक्षा का लक्ष्य मानव-व्यक्तित्व के समेकित विकास हेतु अतिमानस (supermind) का उपयोग करना है।\"",
"अभिहितान्वयवाद\nअभिहितान्वयवाद कुमारिल भट्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार पद और वाक्य में पद की सत्ता है और वाक्य सार्थक पदों के योग से बनता है। इन्होंने इस सिद्धांत के केंद्र में तात्पर्य शक्ति को रखा अर्थात हमारे कहने का जो तात्पर्य है जो वाच्य है उसके अनुसार हम पदों को सजाकर वाक्य बनाते हैं। इसके अनुसार पद ही महत्वपूर्ण है जो हमारे भावानुकूल वाक्य बनाते हैं।"
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देश में निर्मित पहली परमाणु पनडुब्बी का नाम क्या है?
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"भारत में सामूहिक विनाश के हथियार\nपहली पनडुब्बी आधारित लॉन्च प्रणाली है जिसमें परमाणु शक्ति चालित अरिहंत वर्ग की कम से कम चार 6,000 टन वाली पनडुब्बियाँ व बैलिस्टिक मिसाइल हैं। पहली पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत समुद्री परीक्षणों को पूरा करने के बाद परिचालन हेतु कमीशन की गई। वह भारत द्वारा बनायी गयी पहली परमाणु संचालित पनडुब्बी है। सीआईए की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस के नौसैना ने परमाणु प्रणोदन कार्यक्रम के लिए तकनीकी सहायता प्रदान की है। पनडुब्बियों को परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम 12 सागरिका (के-15) मिसाइलों से युक्त किया जाएगा। भारत के डीआरडीओ ने अग्नि 3 मिसाइल के एक पनडुब्बी लांच बैलिस्टिक मिसाइल संस्करण पर भी काम शुरू कर दिया है। जिसे अग्नि 3 एसएल के रूप में जाना जाता है। भारतीय रक्षा सूत्रों के अनुसार, अग्नि 3 एसएल की सीमा 3,500 किलोमीटर (2,200 मील) है। नई मिसाइल पुरानी और कम सक्षम पनडुब्बी लांच सागरिका बैलिस्टिक मिसाइलों की कमी को पूरा करेगी। हालांकि, अरिहंत वर्ग की पनडुब्बियाँ अधिकतम केवल चार अग्नि 3 एसएल बैलिस्टिक मिसाइल ले जाने में सक्षम होगी।",
"अरिहंत श्रेणी की पनडुब्बियाँ\nअरिहंत श्रेणी की पनडुब्बियां उन्नत प्रौद्योगिकी वेसल (एटीवी) परियोजना के तहत बनाई गई परमाणु शक्ति वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं। ये भारत द्वारा डिजाइन और बनाया गयी पहली परमाणु पनडुब्बिया होगी। पनडुब्बियां, 11 मीटर (36 फीट) बीम के साथ 112 मीटर (367 फीट) लंबी, 10 मीटर (33 फीट) का प्रारूप, 6,000 टन का विस्थापन और 300 मीटर (980 फीट) की गोताखोरी गहराई है। क्रू लगभग 95 है, जिसमें अधिकारी और नाविक शामिल हैं। पोतों को एक एकल सात ब्लेड प्रोपेलर द्वारा संचालित किया जाता है जिसे 83 मेगावाट (111,000 एचपी) दबावित जल रिएक्टर द्वारा संचालित किया जाता है और सतह पर 12-15 समुद्री मील (22-28 किमी/घंटा) की अधिकतम गति और जल में 24 समुद्री मील (44 किमी/घंटा) की अधिकतम गति प्राप्त कर सकता है।",
"अरिहंत श्रेणी की पनडुब्बियाँ\nअरिहंत श्रेणी (Arihant-class submarine) भारतीय नौसेना के लिए बनाई जाने वाली परमाणु शक्ति वाले बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों की एक श्रेणी है। इन्हे $2.9 बिलियन वाले \"उन्नत टेक्नोलॉजी वेसल\" (एटीवी) प्रोजेक्ट के तहत विकसित किया गया था ताकि परमाणु-शक्ति वाली पनडुब्बियों को डिजाइन और निर्मित किया जा सके। इस श्रेणी के प्रमुख पोत, आईएनएस अरिहंत को 2009 में लॉन्च किया गया था और व्यापक समुद्री परीक्षणों के बाद, अगस्त 2016 में शुरू होने की पुष्टि हुई थी। अरिहंत पनडुब्बी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के अलावा किसी अन्य देश द्वारा बनाई जाने वाली पहली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी है।"
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"अरिहंत श्रेणी की पनडुब्बियाँ\n1990 के दशक में परमाणु पनडुब्बी का डिजाइन और निर्माण करने के लिए भारतीय नौसेना के \"उन्नत प्रौद्योगिकी पोत\" परियोजना ने आकार लिया। फिर रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने 1998 में इस परियोजना की पुष्टि की। परियोजना का प्रारंभिक इरादा परमाणु-शक्ति वाली तेज आक्रमक पनडुब्बियों को डिजाइन करना था। हालांकि पोखरण टेस्ट रेंज में 1998 में भारत द्वारा परमाणु परीक्षणों के बाद और भारत के परमाणु त्रिगुट (परमाणु हथियार वितरण) को पूरा करने के लिए इस परियोजना को एक बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी के डिजाइन की ओर फिर से गठबंधित किया गया था।",
"आई एन एस अरिहंत\nभारतीय नौसेना पोत (आई एन एस) अरिहंत (\"अरि:\" शत्रु \"हंतः\" मारना अर्थात शत्रु को मारने वाला) परमाणु शक्ति चालित भारत की प्रथम पनडुब्बी है। इस 6000 टन के पोत का निर्माण उन्नत प्रौद्योगिकी पोत (ATV) परियोजना के अंतर्गत पोत निर्माण केंद्र विशाखापत्तनम में 2.9 अरब अमेरिका डॉलर की लागत से किया गया है। इसको बनाने के बाद भारत वह छठा देश बन गया जिनके पास इस तरह की पनडुब्बियां है। अन्य पाँच देश हैं, अमेरिका (71), रूस (50), चीन (7), ब्रिटेन (6) और फ्रांस (5) ।",
"अरिहंत श्रेणी की पनडुब्बियाँ\nपनडुब्बियों को अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम ईंधन युक्त एक दबाव वाले जल रिएक्टर द्वारा संचालित किया जाता है। काल्पकम् में इंदिरा गांधी केंद्र परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) द्वारा रिएक्टर के लघु संस्करण का निर्माण किया गया था। इसमें पनडुब्बी के दबाव वाले पतवार का 42 मीटर (138 फीट) अनुभाग शामिल था जिसमें पानी और रिएक्टर, एक कंट्रोल रूम, साथ ही बचाव के लिए सुरक्षा मानकों की निगरानी के लिए एक नियंत्रण कक्ष भी शामिल था। प्रोटोटाइप रिएक्टर 11 नवंबर 2003 को गंभीर बना और 22 सितंबर 2006 को इसे चालू कर दिया गया। तीन साल के लिए प्रोटोटाइप के सफल संचालन ने अरिहंत के रिएक्टर के उत्पादन संस्करण को सक्षम किया। विशाखापत्तनम में मशीनरी टेस्ट सेंटर में रिएक्टर सबसिस्टम का परीक्षण किया गया था। बार्टेड पनडुब्बियों में नौसेना रिएक्टरों के ईंधन कोर को लोड करने और बदलने की सुविधा भी स्थापित की गई थी।",
"आई एन एस अरिहंत\nनाम न छापने की शर्त पर, परियोजना से परिचित एक परमाणु वैज्ञानिक ने उस मीडिया कवरेज के जवाब में इस रिपोर्ट को उठाया जिसमें कहा गया कि भारत ने पूरी तरह से पूर्ण परमाणु पनडुब्बी लॉन्च की है। यह भी उम्मीद थी कि भारत के भूमि आधारित रिएक्टर, सिस्टम का एकीकरण, और समुद्री परीक्षणों का दोहराव तीन से पांच वर्ष तक होने की उम्मीद है।",
"आईएनएस कुर्सुरा (एस20)\nसेवामुक्त करने के बाद, पनडुब्बी को विशाखापत्तनम के आरके बीच में ले जाया गया और इसे संग्रहालय के रूप में स्थापित किया गया। यह दक्षिण एशिया में पहला पनडुब्बी संग्रहालय है। इसे संग्रहालय के रूप में स्थापित करने का विचार देने का श्रेय एडमिरल वी. पसरीचा को दिया जाता है। पनडुब्बी को संग्रहालय बनाने के स्थान पर लाने के लिये 600 मीटर अंदर लाया गया जिसमें 18 महीने लगे और 5.5 करोड़ लागत लगी। 9 अगस्त 2002 को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू द्वारा इसका उद्घाटन किया गया था और यह 24 अगस्त 2002 को जनता के लिए खुला। इसमें छह सेवानिवृत्त नौसैनिक कार्मिक गाइड के रूप में और एक अन्य क्यूरेटर के रूप में काम करते हैं।",
"युद्धपोत\nपहली व्यावहारिक पनडुब्बी 19वीं शताब्दी के अंत में बनायी गयी थी, परन्तु पनडुब्बियां टौरपीडो के विकास के बाद वास्तव में खतरनाक (तथा इसीलिए उपयोगी) हो गयीं। पनडुब्बियों ने प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक अपनी क्षमता साबित कर दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन नौसेना के पनडुब्बी बेड़े की यू-बोट्स ने ब्रिटेन को समर्पण की कगार तक पराजित कर दिया था साथ ही संयुक्त राष्ट्र के तटीय जलयानों को भी बड़ी क्षति पहुंचाई थी। पनडुब्बियों की सफलता ने प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पनडुब्बी-रोधी कॉन्वॉय एस्कॉर्ट्स के विकास का मार्ग प्रशस्त किया, जैसे कि विध्वंसक एस्कॉर्ट. भ्रमपूर्ण ढंग से, इन नए प्रकारों के नाम पाल युग के छोटे युद्धपोतों से लिए गए हैं, जैसे कौर्वेट, स्लूप तथा फ्रिगेट.",
"पनडुब्बी\nविश्व की सभी प्रमुख नौसेनाओं के समान ही भारतीय नौसेना ने भी अपने बेड़े में पनडुब्बियों को सम्मिलित किया है। भारतीय नौसेना के बेड़े में वर्तमान में १६ डीज़ल चलित पनडुब्बियाँ हैं। ये सभी पनडुब्बियाँ मुख्य रूप से रुस या जर्मनी में बनीं हुईं हैं। वर्ष २०१०-११ में इस बेड़े मे ६ और पनडुब्बियाँ सम्मिलित कर ली जाएगीं। भारतीय नौसेना पोत (आई एन एस) अरिहंत (अरि: शत्रु हंतः मारना अर्थात शत्रु को मारने वाला) परमाणु शक्ति चालित भारत की प्रथम पनडुब्बी है। इस ६००० टन के पोत का निर्माण उन्नत प्रौद्योगिकी पोत (ATV) परियोजना के अंतर्गत पोत निर्माण केंद्र विशाखापत्तनम में २.९ अरब डॉलर की लागत से किया गया है। इसको बनाने के बाद भारत वह छठा देश बन गया जिनके पास इस प्रकार की पनडुब्बियां है।"
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किसने कहा था कि ”हिन्दू और मुसलमान” भारत की दो आँखें हैं?
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"हिन्दी–उर्दू विवाद\nसाम्प्रदायिक हिंसा भड़कने लग गयी और यह तेजतर्रार हो गया। सैयद अहमद खान ने एक बार कहा, \"मैं हिन्दुओं और मुस्लिमों को एक हीं आँख से देखता हूँ और उन्हें एक दुल्हन की दो आँखों की तरह देखता हूँ। राष्ट्र से मेरा अर्थ केवल हिन्दू और मुस्लिम है तथा और कुछ भी नहीं। हम हिन्दू और मुस्लिम एक साथ एक ही सरकार के अधीन समान मिट्टी पर रहते हैं। हमारी रुचि और समस्याएँ भी समान हैं अतः दोनों गुटों को मैं एक ही राष्ट्र के रूप में देखता हूँ।\" भाषायी विवाद से क्रोधित वाराणसी के गर्वनर मिस्टर शेक्सपीयर ने एक बार कहा, \"मुझे अब यकीन हो गया है कि हिन्दू और मुस्लिम कभी भी एक राष्ट्र में नहीं रह सकते जैसे कि उनके पन्थ और जीवन का तरीका एक दूसरे से पूर्णतः पृथक हैं।\""
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"भारत का विभाजन\nहिन्दू महासभा जैसे हिन्दू संगठन भारत के बंटवारे के प्रबल विरोधी थे, लेकिन मानते थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों में मतभेद हैं। 1937 में इलाहाबाद में हिन्दू महासभा के सम्मेलन में एक भाषण में विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था - \"आज के दिन भारत एक राष्ट्र नहीं है, यहाँ पर दो राष्ट्र हैं-हिन्दू और मुसलमान।\" कांग्रेस के अधिकतर नेता पंथ-निरपेक्ष थे और संप्रदाय के आधार पर भारत का विभाजन करने के विरुद्ध थे। महात्मा गांधी का विश्वास था कि हिन्दू और मुसलमान साथ रह सकते हैं और उन्हें साथ रहना चाहिए। उन्होंने विभाजन का घोर विरोध किया।",
"भारत का विभाजन\nउन्होंने कहा: \"मेरी पूरी आत्मा इस विचार के विरुद्ध विद्रोह करती है कि हिन्दू और मुसलमान दो विरोधी मत और संस्कृतियाँ हैं। ऐसे सिद्धांत का अनुमोदन करना मेरे लिए ईश्वर को नकारने के समान है।\" बहुत सालों तक गांधी और उनके अनुयायियों ने कोशिश की कि मुसलमान कांग्रेस को छोड़ कर न जाएं और इस प्रक्रिया में हिन्दू और मुसलमान गरम दलों के नेता उनसे बहुत चिढ़ गए।",
"ऑल इंडिया सुन्नी कांफ्रेंस\nइमाम अहमद रजा बरेलवी और हम मसलक विद्वानों का धार्मिक और इस्लामी बिंदु दृष्टिकोण था कि अंग्रेज और हिंदू दोनों ही हमारे दुश्मन हैं। हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं। येही दो राष्ट्रीय दृष्टिकोण था। जिसे बाद में अल्लामा मुहम्मद इक़बाल और का़इद ए आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह ने अपनाया और इसी कृरिए के आधार पर पाकिस्तान अस्तित्व में आया।",
"भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा\nहिंदू राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा हिंसा के लिए भारत के ऐतिहासिक अधीनता का उपयोग करते हैं। उन्हें लगता है कि विभाजन के बाद से, भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान से संबद्ध किया गया है और संभवतः कट्टरपंथी हैं और इसलिए, हिंदुओं को अतीत के गलतियों को दोहराने से बचने के लिए रक्षात्मक कदम उठाने चाहिए और अपने गौरव को फिर से बढ़ाना चाहिए। मुसलमानों के बीच उच्च प्रजनन दर हिंदू अधिकार की बयानबाजी में एक आवर्ती विषय रहा है। वे दावा करते हैं कि मुसलमानों के बीच उच्च जन्म दर अपने ही देश के भीतर हिंदुओं को अल्पसंख्यक में बदलने की योजना का हिस्सा है।",
"हिंदू-मुस्लिम एकता\n1857 में भारतीय स्वतंत्रता के पहले युद्ध (जिसे भारतीय विद्रोह भी कहा जाता है) में, भारत में हिंदू और मुस्लिम मिलकर अंग्रेजों से लड़ने के लिए भारतीय बन गए। ब्रिटिश भारतीय राष्ट्रवाद में इस वृद्धि के बारे में चिंतित हो गए और इसलिए उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश की ताकि वे ताज शासन को उखाड़ फेंकने के लिए फिर से एकजुट न हों। उदाहरण के लिए, मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के प्रिंसिपल थियोडोर बेक ने सैयद अहमद खान से कहा था कि मुसलमानों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्देश्यों के साथ कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए और \"एंग्लो-मुस्लिम एकता संभव थी, लेकिन हिंदू- मुस्लिम एकता असंभव थी ”।",
"जम्मू और कश्मीर में विद्रोह\nहिन्दू बहुल भारत में, जम्मू और कश्मीर एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य है। जबकि खुद भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, पूरे भारत में हिंदुओं की तुलना में मुसलमान राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं। इसके चलते मुसलमानों का मानना है वे भारत के वासी नहीं हैं और इन्होंने कश्मीरी लोगों को विमुख किया। 99 एकड़ वन ज़मीन एक हिन्दू संगठन को हस्तांतरित करने के सरकारी फैसले ने विरोधी भावना को और तेज किया और जम्मू और कश्मीर में एक विशालतम विरोध रैली को प्रेरित किया।",
"हिन्दी आन्दोलन\nकिसी एक ही धर्म के मानने वाले एक ही भाषा बोलें यह भी आवश्यक नहीं। अरब, ईरान, तुर्की तीनों मुसलमान देश हैं किन्तु तीनों की भाषाएँ अलग-अलग ही नहीं, तीन भिन्न परिवारों की हैं। जब हम यह विचार करें कि भारत में मुसलमानों के आने से वहाँ की भाषाओं एवं संस्कृति में क्या परिवर्तन हुए, तो ये प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए - ये मुसलमान कहाँ के निवासी थे? इनकी मातृभाषा क्या थी? दिल्ली में शासन करने वाले मुसलमान न इरानी थे न अरब।",
"भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा\n१९४७ के भारत विभाजन के बाद मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक हिंसा के कई मिसाल है। प्रायशः हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ द्वारा मुसलमानों पर हिंसक हमले होते हैं जो हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच स्वाभाविक संप्रदायिक हिंसा का एक पैटर्न बनाते हैं। १९५४ से १९८२ तक सांप्रदायिक हिंसा के ६९३३ मामलों में १०००० से ज्यादा लोग मारे गए हैं हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों में।",
"केशव बलिराम हेडगेवार\nइस श्लोक के अनुसार “भारत के वह सभी लोग हिंदू हैं जो इस देश को पितृभूमि-पुण्यभूमि मानते हैं”l इनमे सनातनी, आर्यसमाजी, जैन, बौद्ध, सिख आदि पंथों एवं धर्म विचार को मानने वाले व उनका आचरण करने वाले समस्त जन को हिंदू के व्यापक दायरे में रखा गया था l मुसलमान व ईसाई इस परिभाषा में नहीं आते थे अतः उनको इस मिलीशिया में ना लेने का निर्णय लिया गया और केवल हिंदुओं को ही लिया जाना तय हुआ, मुख्य मन्त्र था “अस्पृश्यता निवारण एवं हिंदुओं का सैनिकी कारण”l"
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भारतीय राष्ट्रीय चिह्न कहाँ से लिया गया है?
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"भारत के राष्ट्रीय चिन्ह\nअशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ स्थित राष्ट्रीय स्तंभ का शीर्ष भाग राष्ट्रीय प्रतिज्ञा चिह्न के रूप में लिया गया है। मूल रूप इसमें चार शेर हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं। इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर एक हाथी के एक दौड़ता घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं। ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है। हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है। राष्ट्र के प्रतीक में जिसे २६ जनवरी १९५० में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्य चक्र की बाहरी रेखा बिल्कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड़ दिया जाता है। प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में अंकित है। शब्द सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्चाई की विजय होती है।",
"भारत\nभारत का राष्ट्रीय चिह्न सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ की अनुकृति है जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है। भारत सरकार ने यह चिह्न २६ जनवरी १९५० को अपनाया। उसमें केवल तीन सिंह दिखाई पड़ते हैं, चौथा सिंह दृष्टिगोचर नहीं है। राष्ट्रीय चिह्न के नीचे देवनागरी लिपि में 'सत्यमेव जयते' अंकित है।",
"राष्ट्रीय चिन्ह\nअशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ में मिली अशोक लाट से लिया गया है। मूल रूप इसमें चार शेर हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं। इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर एक हाथी के एक दौड़ता घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं। ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है। हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है। राष्ट्र के प्रतीक में जिसे 26 जनवरी 1950 में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्य चक्र की बाहरी रेखा बिल्कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड़ दिया जाता है। प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में अंकित है। शब्द सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्चाई की विजय होती है।"
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"भारत के राष्ट्रीय चिन्ह\nयह चिह्न भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई के पोस्ट ग्रेजुएट डिजाइन श्री डी. उदय कुमार ने बनाया है। इस चिह्न को वित्त मंत्रालय द्वारा आयोजित एक खुली प्रतियोगिता में प्राप्त हजारों डिजायनों में से चुना गया है। इस प्रतियोगिता में भारतीय नागरिकों से रुपए के नए चिह्न के लिए डिजाइन आमंत्रित किए गए थे। भारतीय रुपये को एक विशेष प्रतीक मिलने के बाद अब यह अन्य प्रायद्वीपीय मुद्राओं (श्री लंका, पाकिस्तान, इंडोनेशिया) से अलग एवं विशिष्ट बन चुकी है ।",
"भारत के राष्ट्रीय चिन्ह\nभारतीय रुपए का प्रतीक चिह्न अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान तथा आर्थिक संबलता को परिलक्षित कर रहा है। रुपए का चिह्न भारत के लोकाचार का भी एक रूपक है। रुपए का यह नया प्रतीक देवनागरी लिपि के 'र' और रोमन लिपि के अक्षर 'आर (R)' को मिला कर बना है,(₹) जिसमें एक क्षैतिज रेखा भी बनी हुई है। यह रेखा हमारे राष्ट्रध्वज तथा बराबर (=) के चिह्न को प्रतिबिंबित करती है। भारत सरकार ने 15 जुलाई 2010 को इस चिह्न को स्वीकार कर लिया है।",
"भारतीय रुपया\nभारतीय मुद्रा के लिए एक आधिकारिक प्रतीक-चिह्न दिनांक १५ जुलाई, २०१० को चुन लिया गया है जिसे आईआईटी, गुवाहाटी के प्रोफेसर डी. उदय कुमार ने डिज़ाइन किया है। अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पाउण्ड, जापानी येन और यूरोपीय संघ के यूरो के बाद रुपया पाँचवी ऐसी मुद्रा बन गया है, जिसे उसके प्रतीक-चिह्न से पहचाना जाएगा। इसके लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसके अन्तर्गत सरकार को तीन हज़ार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषाओं के साथ ही आधुनिक युग के बेहतर सामंजस्य वाले इस प्रतीक को अंतिम तौर पर चयन करने की सिफारिश की थी। इसे यूनीकोड मानक में शामिल करने हेतु आवेदन कर दिया गया है। इस चिह्न को यूनीकोड में U+20A8 पर स्थान मिलेगा, जो पहले ही रुपये के Rs जैसे दिखने वाले चिह्न के लिए आवंटित है। फिलहाल इस चिह्न को कम्प्यूटर पर मुद्रित करने के लिये कुछ नॉन-यूनिकोड फॉण्ट बनाये गये हैं।",
"राष्ट्रीय चिन्ह\nराष्ट्रीय चिह्न एक प्रतीक या मुहर है जिसे किसी राष्ट्र या बहु-राष्ट्रीय राज्य द्वारा अपने प्रतीक के रूप में उपयोग के लिए आरक्षित किया जाता है। इस चिह्न का प्रयोग सरकारी कागजों- दस्तावेजों, अभिलेखों, प्रपत्रों, मुद्रा आदि पर किया जाता है। यह चिह्न संबंधित देश के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक इतिहास एवं वर्तमान मूल्यों औ्र आदर्शों से संबंधित होता है। राष्ट्रीय चिह्न राष्ट्र में मौजूद किसी प्रसिद्ध ऐतिहासिक निर्मिति से भी चुने जाते हैं और ये बिल्कुल नवीन निर्मिति भी हो सकते हैं।",
"भारतीय रुपया चिह्न\nभारतीय रुपया चिह्न (₹) भारतीय रुपये (भारत की आधिकारिक मुद्रा) के लिये प्रयोग किया जाने वाला मुद्रा चिह्न है। यह डिजाइन भारत सरकार द्वारा १५ जुलाई २०१० को सार्वजनिक किया गया था। अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पाउण्ड, जापानी येन और यूरोपीय संघ के यूरो के बाद रुपया पाँचवी ऐसी मुद्रा बन गया है, जिसे उसके प्रतीक-चिह्न से पहचाना जाएगा। भारतीय रुपये के लिये अन्तर्राष्ट्रीय तीन अंकीय कोड (अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) मानक ISO 4217 के अनुसार) INR है।",
"भारतीय रुपया चिह्न\nभारत सरकार नये चिह्न को देश में छह महीनों तथा विश्व में १८ से २४ महीनों में अपनाने की कोशिश करेगी।.भारतीय रुपया चिह्न वर्तमान में यूनिकोड कैरक्टर सेट में ऍन्कोड किये जाने हेतु प्रस्तावना के प्रथम चरण में है, एक ऐसे चिह्न के तौर पर जो मौजूदा सामान्य रुपया चिह्न \"₨\" जो कि U+20A8 पर ऍन्कोड किया गया है, से भिन्न हो। फिलहाल इस चिह्न को कम्प्यूटर पर मुद्रित करने के लिये कुछ नॉन-यूनिकोड फॉण्ट बनाये गये हैं।। इसके अतिरिक्त लिनक्स के \"लोहित-देवनागरी\" नामक फॉण्ट में यह चिह्न शामिल किया जा चुका है। उबण्टू १०.१० पहला ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसमें भारतीय रुपया चिह्न का प्रतीक शामिल किया गया है",
"भारतीय रुपया चिह्न\nमूलतः यह नया चिह्न देवनागरी अक्षर 'र' पर आधारित है किन्तु यह रोमन के कैपिटल अक्षर का बिना उर्ध्वाकार डण्डे का भी आभास देता है। अतः इस चिह्न को इन दोनो अक्षरों का मिश्रण माना जा सकता है। मूल रूप से तमिल भाषी इसके अभिकल्पक उदय के अनुसार जब वो इसका डिजाइन सोच रहे थे तो उन्हें लगा कि सिर्फ देवनागरी लिपि से संबंधित कोई चिन्ह ही भारतीय भावनाओं को व्यक्त कर सकता है। ऊपर की तरफ समान्तर रेखायें (उनके बीच में खाली जगह समेत) भारतीय झण्डे तिरंगे का आभास देती हैं।"
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स्वर्णिम चतुर्भुज का सम्बन्ध किससे है?
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"स्वर्णिम चतुर्भुज\nस्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral) भारत का एक प्रसिद्ध राजमार्ग है जो कई औद्योगिक, सांस्कृतिक एवं कृषि सम्बन्धी नगरों को जोड़ता है। इसका आकार बहुत सीमा तक चतुर्भुज के समान दिखता है, इस कारण इसका नामक सार्थक है। इस मार्ग पर स्थित प्रमुख नगर हैं- दिल्ली, मुम्बई, चेन्नै, कोलकाता, अहमदाबाद, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, जयपुर, कानपुर, पुणे, सूरत, गुंटुर, विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम।",
"स्वर्णिम चतुर्भुज\nभाग 3 चेन्नई और मुंबई के बिच फैला है, जिसकी कुल लंबाई 1,290 किलोमीटर है और अंतिम और चौथा भाग मुंबई से दिल्ली के बिच फैला है और इसकी कुल लंबाई 1,419 किलोमीटर है।स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग देश के लगभग 13 राज्यों के मध्य से होकर गुजरता है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश राज्यों से होकर जाता है।स्वर्णिम चतुर्भुज भारत के मुख्य शहरों के बीच परिवहन का एक बेहद ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।",
"स्वर्णिम चतुर्भुज\nवर्ष 1999 में योजना बनकर पूरी और वर्ष 2001 में आधिकारिक रूप से इसके निर्माण कार्य की शुरुआत की गई और वर्ष 2012 में जाकर यह परियोजना पूर्ण हुई। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत बने इस राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 5,846 कि.मी. है और इसके निर्माण में लगभग 6 खरब रुपए का खर्च आया । यह परियोजना भारत की सबसे बड़ी और दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी परियोजना में शामिल है।स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को पूरा करने के लिए इसे चार भागों में बांटा गया था। भाग 1 में दिल्ली से कोलकाता को जोड़ता है, जिसकी कुल लंबाई 1454 किलोमीटर है। भाग 2 कोलकाता से चेन्नई तक विस्तृत है, जिसकी कुल लंबाई 1,684 किलोमीटर है।"
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"समलम्ब चतुर्भुज\nजिस चतुर्भुज की सम्मुख भुजाओं का केवल एक युग्म समान्तर होता है, समलम्ब चतुर्भुज कहलाता है।",
"चतुर्भुज\nअन्य संबंध",
"समान्तर चतुर्भुज नियम\nजैसा की हम जानते हैं कि त्रिभुज के कर्णं पर बने वर्ग उसके दोनों भुजाओं पर बने वर्ग के योग के बराबर होता है। उसी प्रकार *समांतर चतुर्भुज के दोनों विकर्णो के वर्गों का योग उसके चारों भुजाओं पर बने वर्गों के योग के बराबर होता है*। जैसे कि हम मान लेते हैं कि समांतर चतुर्भुज भुजा A है और दूसरी भुजा B है और उसके विकर्ण की भुजा c तथा d है तब यह नियम है कि जहा A तथा B चतुर्भुज की भुजाएं हैं।",
"स्वर्णिम चतुर्भुज\nवर्ष 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के चार बड़े महानगरों - दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नै - को चार से छह लेन वाले राजमार्गों के नेटवर्क से जोड़ने की एक योजना बनाई। मैप पर देखे जाने पर यह राजमार्ग चतुर्भुज आकार का दिखता है और शायद इसी कारण इसे स्वर्णिम चतुर्भुज कहा गया।",
"हावड़ा-चेन्नई मुख्य रेलमार्ग\nहावड़ा-चेन्नई मुख्य रेलमार्ग स्वर्णिम चतुर्भुज का एक हिस्सा है। चार प्रमुख महानगरों (नई दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता) को जोड़ने वाले मार्ग, उनके विकर्णों के साथ, जिन्हें स्वर्णिम चतुर्भुज के रूप में जाना जाता है, लगभग आधा माल और लगभग आधा यात्री यातायात ले जाते हैं, हालांकि यह कुल रेलमार्ग का केवल 16 प्रतिशत ही हैं।",
"चतुर्भुज\nस्पर्शी चतुर्भुज (Tangential Quadrilateral): चारों भुजाएँ एक अंतःवृत्त की स्पर्श रेखाएं होती हैं। एक उत्तल चतुर्भुज, एक चक्रीय चतुर्भुज होगा यदि इसकी सम्मुख भुजाओं का योग समान हो।",
"श्री अक्रूरेश्वर महादेव उज्जैन\nयह स्थान त्रिदेवों की एकरूपता के साथ शिव पार्वती की एकरूपता को वर्णित करता है । भगवान शिव का अर्धनारीश्वररूप जगत्पिता और जगन्माता के सम्बन्ध को दर्शाता है। सत्-चित् और आनन्द–ईश्वर के तीन रूप हैं। इनमें सत्स्वरूप उनका मातृस्वरूप है, चित्स्वरूप उनका पितृस्वरूप है और उनके आनन्दस्वरूप के दर्शन अर्धनारीश्वररूप में ही होते हैं, जब शिव और शक्ति दोनों मिलकर पूर्णतया एक हो जाते हैं। सृष्टि के समय परम पुरुष अपने ही वामांग से प्रकृति को निकालकर उसमें समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। शिव गृहस्थों के ईश्वर और विवाहित दम्पत्तियों के उपास्य देव हैं क्योंकि अर्धनारीश्वर शिव स्त्री और पुरुष की पूर्ण एकता की अभिव्यक्ति हैं। संसार की सारी विषमताओं से घिरे रहने पर भी अपने मन को शान्त व स्थिर बनाये रखना ही योग है। भगवान शिव अपने पारिवारिक सम्बन्धों से हमें इसी योग की शिक्षा देते हैं। अपनी आत्मा में मिलकर ही मनुष्य आनन्दरूप शिव को प्राप्त कर सकता है।"
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११९१ ई. में तराइन का युद्ध मोहम्मद गोरी और किसके बीच हुआ था?
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"तराइन का युद्ध\nतराइन का युद्ध अथवा तरावड़ी का युद्ध युद्धों (1191 और 1192) की एक ऐसी शृंखला है, जिसने पूरे उत्तर भारत को मुस्लिम नियंत्रण के लिए खोल दिया। ये युद्ध मोहम्मद ग़ौरी (मूल नाम: मुईज़ुद्दीन मुहम्मद बिन साम) और अजमेर तथा दिल्ली के चौहान (चहमान) राजपूत शासक पृथ्वी राज तृतीय के बीच हुये। युद्ध क्षेत्र भारत के वर्तमान राज्य हरियाणा के करनाल जिले में करनाल और थानेश्वर (कुरुक्षेत्र) के बीच था, जो दिल्ली से 113 किमी उत्तर में स्थित है।",
"मोहम्मद ग़ोरी\nमुहम्मद ग़ौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच तराईन के मैदान में दो युद्ध हुए। ११९१ ई. में हुए तराईन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की विजय हुई किन्तु अगले ही वर्ष ११९२ ई. में पृथ्वीराज चौहान को तराईन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद ग़ौरी ने बुरी तरह पराजित किया। मुहम्मद ग़ौरी ने चंदावर के युद्ध (११९४ ई.) में दिल्ली के गहड़वाल वंश के शासक जयचंद को पराजित किया। मुहम्मद ग़ौरी ने भारत में विजित साम्राज्य का अपने सेनापतियों को सौंप दिया और वह ग़ज़नी चला गया। जिनमें प्रमुख थे (१)ऐबक (२)ऐल्दोज (३) कुबाचा। बाद में ग़ौरी के ग़ुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने ग़ुलाम राजवंश की स्थापना की।",
"११९१\nतराइन का प्रथम युद्ध- दिल्ली (भारत) के शासक पृथ्वीराज चौहान द्वारा मुहम्मद गोरी की पराजय",
"भारतीय इतिहास तिथिक्रम\n1191- तराइन का प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान द्वारा मुहम्मद गोरी की पराजय",
"मोइनुद्दीन चिश्ती\n16वीं शताब्दी के मुस्लिम इतिहासकार फिरिश्ता की मानें तो पृथ्वीराज चौहान की सेना विशाल थी और उसमें 2 लाख घोड़ों के अलावा 3000 हाथी भी थे। असल में मोहम्मद गोरी ने तबारहिंदह (ताबर-ए-हिन्द) पर कब्जा कर लिया था। आज इस क्षेत्र को बठिंडा के नाम से जानते हैं। ये खबर सुन कर वहाँ पृथ्वीराज पहुँचे और तराइन का प्रथम युद्ध हुआ। मोहम्मद गोरी गोरी घायल हुआ और पकड़ा गया। पृथ्वीराज चौहान ने हारी हुई सेना का पीछा तक नहीं किया और सभी को जाने दिया।",
"तराइन का युद्ध\nमुहम्मद गोरी ने 1186 में गजनवी वंश के अंतिम शासक से लाहौर की गद्दी छीन ली और वह भारत के हिन्दू क्षेत्रों में प्रवेश की तैयारी करने लगा। 1191 में उन्हें पृथ्वी राज तृतीय के नेतृत्व में राजपूतों की मिलीजुली सेना ने जिसे कन्नौज और बनारस वर्तमान में वाराणसी के राजा जयचंद का भी समर्थन प्राप्त था। अपने साम्राज्य के विस्तार और सुव्यवस्था पर पृथ्वीराज चौहान की पैनी दृष्टि हमेशा जमी रहती थी। अब उनकी इच्छा पंजाब तक विस्तार करने की थी। किन्तु उस समय पंजाब पर मोहम्मद ग़ौरी का राज था। 1190 ई० तक सम्पूर्ण पंजाब पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो चुका था। अब वह भटिंडा से अपना राजकाज चलता था। पृथ्वीराज यह बात भली भांति जानता था कि मोहम्मद ग़ौरी से युद्ध किये बिना पंजाब में चौहान साम्राज्य स्थापित करना असंभव था। यही विचार कर उसने गौरी से निपटने का निर्णय लिया। अपने इस निर्णय को मूर्त रूप देने के लिए पृथ्वीराज एक विशाल सेना लेकर पंजाब की और रवाना हो गया। तीव्र कार्यवाही करते हुए उसने हांसी, सरस्वती और सरहिंद के किलों पर अपना अधिकार कर लिया। इसी बीच उसे सूचना मिली कि अनहीलवाडा में विद्रोहियों ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। पंजाब से वह अनहीलवाडा की और चल पड़े। उनके पीठ पीछे गौरी ने आक्रमण करके सरहिंद के किले को पुन: अपने कब्जे में ले लिया। पृथ्वीराज ने शीघ्र ही अनहीलवाडा के विद्रोह को कुचल दिया। अब उसने गौरी से निर्णायक युद्ध करने का निर्णय लिया। उसने अपनी सेना को नए ढंग से सुसज्जित किया और युद्ध के लिए चल दिया। रावी नदी के तट पर पृथ्वीराज के सेनापति खेतसिंह खंगार की सेना में भयंकर युद्ध हुआ परन्तु कुछ परिणाम नहीं निकला। यह देख कर पृथ्वीराज गौरी को सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ा। थानेश्वर से १४ मील दूर और सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर यह युद्ध लड़ा गया। तराइन के इस पहले युद्ध में राजपूतों ने गौरी की सेना के छक्के छुड़ा दिए। गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे। जो भाग गया उसके प्राण बच गए, किन्तु जो सामने आया उसे गाजर-मूली की तरह काट डाला गया। सुल्तान मुहम्मद गौरी युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ। अपने ऊँचे तुर्की घोड़े से वह घायल अवस्था में गिरने ही वाला था की युद्ध कर रहे एक उसके सैनिक की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने बड़ी फुर्ती के साथ सुल्तान के घोड़े की कमान संभाल ली और कूद कर गौरी के घोड़े पर चढ़ गया और घायल गौरी को युद्ध के मैदान से निकाल कर ले गया। नेतृत्वविहीन सुल्तान की सेना में खलबली मच चुकी थी। तुर्क सैनिक राजपूत सेना के सामने भाग खड़े हुए। पृथ्वीराज की सेना ने 80 मील तक इन भागते तुर्कों का पीछा किया। पर तुर्क सेना ने वापस आने की हिम्मत नहीं की। इस विजय से पृथ्वीराज चौहान को 7 करोड़ रुपये की धन सम्पदा प्राप्त हुई। इस धन सम्पदा को उसने अपने बहादुर सैनिको में बाँट दिया। इस विजय से सम्पूर्ण भारतवर्ष में पृथ्वीराज की धाक जम गयी और उनकी वीरता, धीरता और साहस की कहानी सुनाई जाने लगी।",
"११९२\nतराइन के दूसरे युद्ध में दिल्ली (भारत) के शासक पृथ्वीराज चौहान की मुहम्मद गोरी द्वारा पराजय और मृत्यु",
"धरती का वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान\nउसने अपना साम्राज्य को बढाया, इस दौरान मोहम्मद घोरी ने 1191 में भारत पर आक्रमण किया और तराइन के पहले युद्ध में उसे हरा दिया। अगले वर्ष, 1192 में, घोरी सेना प्रथ्विराज को तराइन के दूसरे युद्ध में चुनौती देने लौट आई.सुल्तान मुहम्मद शाहब-उद-दिन घोरी भारत के तरफ एक बड़ी बल संख्या 120,000 के साथ बड़ा. . जब वह लाहोर पहुंचा, उसने अपने दूत को पृथ्वीराज चौहान का समर्पण का अधिकार माँगने भेजा, लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने पालन करने से इनकार किया। पृथ्वीराज चौहान तब अपने साथी राजपूत प्रमुखों को मुस्लिम आक्रमण के खिलाफ अपने मदद के लिए एक औपचारिक सहायता की मांग रखता है। करीब 150 राजपूत प्रमुखों ने उसके अनुरोध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।",
"मोइनुद्दीन चिश्ती\n‘पृथ्वीराज रासो’ और ‘प्रबंध कोष’ की मानें तो पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को 20 बार हराया था और 21वीं बार वो खुद हार गए। हर बार उन्होंने गोरी को बिना नुकसान पहुँचाए छोड़ दिया। तराइन के प्रथम युद्ध के विवरणों से ही स्पष्ट है कि पृथ्वीराज चौहान ने या तो मोहम्मद गोरी की अति-महत्वाकांक्षा को पढ़ने में भूल कर दी, या निर्दयी शत्रु के सामने रूरत से ज्यादा उदारता दिखा दी और उसे छोड़ दिया।"
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"मोइनुद्दीन चिश्ती\nइस पुस्तक में लिखा है कि पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ गद्दारी वाला युद्ध लड़ने के लिए ही मोईनुद्दीन चिश्ती भारत आया था, ताकि वो मोहम्मद गोरी की तरफ से उसकी सहायता कर सके और उसका काम आसान कर सके। ये इतिहास है कि तराइन का दूसरा युद्ध 1192 में हुआ और उसमें पृथ्वीराज चौहान की हार हुई। चौहान ने भले ही गोरी को छोड़ दिया हो, गोरी ने ऐसा बिलकुल भी नहीं किया और उनकी आँखें फोड़वा दीं।"
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परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन किस वर्ष हुआ था?
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"भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी\n10 अगस्त 1948 को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए डॉ॰ होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों से परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन हुआ था। तब से लेकर आज तक हुए विकास के फलस्वरूप हम खनिज अनुसंधान के लिए ईंधन निर्माण, व्यर्थ पदार्थों से ऊर्जा उत्पादन, कृषि चिकित्सा उद्योग एवं अनुसंधान में आत्मनिर्भर हो गए हैं। परमाणु ऊर्जा के अंतर्गत नाभिकीय अनुसंधान के क्षेत्र में मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की भूमिका सराहनीय है। यहाँ हो रहे नित नए अनुसंधानों के कारण हम पोखरण-2 का सफल परीक्षण कर विश्व की परमाणु शक्ति वाले देशों की पंक्ति में आ खड़े हुए हैं।"
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"भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र\nभारत का परमाणु कार्यक्रम डा॰ होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में आरम्भ हुआ। 6 जनवरी सन् 1954 को परमाणु उर्जा आयोग के द्वारा परमाणु उर्जा संस्थान (ए ई ई टी) के नाम से आरम्भ हुआ और तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा २० जनवरी सन् 1957, को राष्ट्र को समर्पित किया गया। इसके बाद परमाणु उर्जा संस्थान को पुनर्निर्मित कर 12 जनवरी सन् 1967 को इसका नया नाम भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र किया गया, जो कि 24 जनवरी सन् 1966 में डा॰ भाभा की विमान दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु के लिये एक विनम्र श्रद्धांजलि थी।",
"परमाणु ऊर्जा शिक्षण संस्था\nपरमाणु ऊर्जा शिक्षण संस्था की स्थापना वर्ष 1969 में की गई थी। इसका मुख्यालय मुम्बई में है।",
"नाभिकीय ऊर्जा\nबाद में 1954 में, अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग (U.S. AEC, अमेरिकी परमाणु नियामक आयोग और अमेरिकी ऊर्जा विभाग का अग्रदूत) के उस वक्त के अध्यक्ष, लुईस स्ट्रास ने भविष्य में बिजली के बारे में कहा कि यह \"इतनी सस्ती होगी कि मीटर से नापने की आवश्यकता नहीं होगी\". स्ट्रास, हाइड्रोजन संलयन का जिक्र कर रहे थे - जिसे गुप्त रूप से उस वक्त शेरवुड परियोजना के हिस्से के रूप में विकसित किया जा रहा था - लेकिन स्ट्रास के बयान को परमाणु विखंडन से मिलने वाली अत्यंत सस्ती ऊर्जा के एक वादे के रूप में समझा गया। U.S. AEC ने कुछ महीने पहले अमेरिकी कांग्रेस में, परमाणु विखंडन के बारे में कहीं अधिक रूढ़िवादी गवाही जारी की, यह दर्शाते हुए कि \"लागत को नीचे लाया जा सकता है।.. परंपरागत स्रोतों से मिलने वाली बिजली की लागत के बराबर ही.. \" महत्वपूर्ण निराशा बाद में तब पनपी जब नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों ने \"अत्यंत सस्ती\" ऊर्जा प्रदान नहीं की।",
"नाभिकीय ऊर्जा\n1955 में, संयुक्त राष्ट्र संघ के \"प्रथम जिनेवा सम्मेलन\", उस वक्त वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का दुनिया का सबसे बड़ा जमावड़ा, ने प्रौद्योगिकी को और खंगालने के लिए मुलाकात की। 1957 में EURATOM को यूरोपीय आर्थिक समुदाय (जो अब यूरोपीय संघ है) के साथ शुरू किया गया। उसी वर्ष अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का भी गठन किया गया।",
"भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम\n१९५७ में स्पूतनिक के प्रक्षेपण के बाद, उन्होंने कृत्रिम उपग्रहों की उपयोगितो को भांपा। भारत के प्रथम प्रधान मन्त्री जवाहर लाल नेहरू, जिन्होंने भारत के भविष्य में वैज्ञानिक विकास को अहम् भाग माना, १९६१ में अंतरिक्ष अनुसंधान को परमाणु उर्जा विभाग की देखरेख में रखा। परमाणु उर्जा विभाग के निदेशक होमी भाभा, जो कि भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं, १९६२ में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति (इनकोस्पार) का गठन किया, जिसमें डॉ॰ साराभाई को सभापति के रूप में नियुक्त किया",
"भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन\n1962: परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा अंतरिक्ष अनुसंधान के लिये एक राष्ट्रीय समिति का गठन और त्रिवेन्द्रम के समीप थुम्बा में राकेट प्रक्षेपण स्थल के विकास की दिशा में पहला प्रयास प्रारंभ।",
"पोखरण\nभारतीय परमाणु आयोग ने यहाँ अपना पहला भूमिगत परिक्षण १८ मई १९७४ को किया था। हालांकि उस समय भारत सरकार ने घोषणा की थी कि भारत का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण कार्यो के लिये होगा और यह परीक्षण भारत को उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिये किया गया है। बाद में ११ और १३ मई १९९८ को पाँच और भूमिगत परमाणु परीक्षण किये और भारत ने स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया।",
"हरीशचंद्र अनुसंधान संस्थान\nजनवरी 1983 में बम्बई विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर और गणित एवं सांख्यिकी विभाग के अध्यक्ष, प्रोफ़ेसर एस० एस० श्रीखडें, ने इस संस्थान के अगले निर्देशक के रूप मेम कार्य-भार संभाला। इनके ही कार्य-काल में परमाणु ऊर्जा विभाग के साथ चल रही बातचीत एक निर्णायक मोड पर पहुंची और परमाणु ऊर्जा विभाग ने इस संस्थान के भविष्य के बारे में अध्ययन करने के लिये पुनरीक्षा समिति का गठन किया।",
"होमी सेठना\nपरमाणु वैज्ञानिक एवं रासायनिक इंजीनियर सेठना ने ही वर्ष 1959 में ट्रांबे में भारत के पहले प्लूटोनियम संयंत्र की स्थापना की थी। वह मुंबई जाने से पहले केरल में इंडियन रेअर अर्थ्स के निदेशक थे। सेठना वर्ष 1984 में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष पद से रिटायर हुए थे। वे 1989 से 2000 तक टाटा पावर के अर्थ के भी अध्यक्ष रहे। वह टाटा संस, बांबे डायिंग समेत कई अन्य कंपनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल रहे। उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। सेठना के निर्देशन में ही 1967 में बिहार के जादूगोडा में यूरेनियम मिल की स्थापना की गई थी।"
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मुगल शासक बाबर ने दिल्ली की सत्ता पर कब अधिकार किया था?
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"बाबर\nदिल्ली सल्तनत पर ख़िलज़ी राजवंश के पतन के बाद अराजकता की स्थिति बनी हुई थी। तैमूरलंग के आक्रमण के बाद सैय्यदों ने स्थिति का फ़ायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता पर अधिपत्य कायम कर लिया। तैमुर लंग के द्वारा पंजाब का शासक बनाए जाने के बाद खिज्र खान ने इस वंश की स्थापना की थी। बाद में लोदी राजवंश के अफ़ग़ानों ने सैय्यदों को हरा कर सत्ता हथिया ली थी। बाबर को लगता था कि दिल्ली की सल्तनत पर फिर से तैमूरवंशियों का शासन होना चाहिए। एक तैमूरवंशी होने के कारण वो दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा करना चाहता था। उसने सुल्तान इब्राहिम लोदी को अपनी इच्छा से अवगत कराया (स्पष्टीकरण चाहिए)। इब्राहिम लोदी के जबाब नहीं आने पर उसने छोटे-छोटे आक्रमण करने आरंभ कर दिए। सबसे पहले उसने कंधार पर कब्ज़ा किया। इधर शाह इस्माईल को तुर्कों के हाथों भारी हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध के बाद शाह इस्माईल तथा बाबर, दोनों ने बारूदी हथियारों की सैन्य महत्ता समझते हुए इसका उपयोग अपनी सेना में आरंभ किया। इसके बाद उसने इब्राहिम लोदी पर आक्रमण किया। पानीपत में लड़ी गई इस लड़ाई को पानीपत का प्रथम युद्ध के नाम से जानते हैं। यह युद्ध बाबरनामा के अनुसार 21 अप्रैल 1526 को लड़ा गया था। इसमें बाबर की सेना इब्राहिम लोदी की सेना के सामने बहुत छोटी थी। पर सेना में संगठन के अभाव में इब्राहिम लोदी यह युद्ध बाबर से हार गया। इस युद्ध में बाबर ने तुलुगमा पद्धति का प्रयोग किया था। इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर बाबर का अधिकार हो गया और उसने सन १५२६ में मुगलवंश की नींव डाली।"
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"मध्यकालीन भारत\nपंद्रहवीं सदी के शुरुआत में मध्य एशिया में फ़रगना के निर्वासित राजकुमार जाहिरुद्दीन ([[बाबर]]) काबुल में आ बसे। वहा वे फारसी साम्राज्य का [[काबुल]] प्रान्त का अधिपति नियुक्त थे। दिल्ली के निर्बल शासक और दौलत खान (पंजाब का अधिपति) के बुलावे में [[बाबर]] ने दिल्ली की ओर कुच किया जहाँ उसका [[इब्राहीम लोदी]] [[पानीपत का प्रथम युद्ध|के साथ युद्ध हुआ]]। जिसमें लोदी की हार हुई और इसके साथ ही भारत में मुगल वंश की नींव पड़ गई जिसने अगले 300 वर्षों तक एकछत्र राज्य किया। दिल्ली में स्थापित होने के बाद बाबर को राजपूत विद्रोह का सामना करना पड़ा। राजपूत शासक [[राणा सांगा]] के साथ खानवा का युद्ध हुआ जिसमें बाबर फिर विजयी हुआ। बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हूमाय़ूं शासक बना। उसे दक्षिण बिहार के सरगना [[शेरशाह सूरी]] ने हराकर सत्ताच्युत कर दिया, लेकिन शेरशाह की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली की सत्ता पर वापस अधिकार कर लिया।",
"मुग़ल साम्राज्य\nफ़रग़ना वादी से आए एक तुर्की मुस्लिम तिमुरिड सिपहसालार बाबर ने मुग़ल राजवंश को स्थापित किया। उन्होंने उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर हमला किया और दिल्ली के शासक इब्राहिम शाह लोधी को 1526 में पानीपत के पहले युद्ध में हराया। मुग़ल साम्राज्य ने उत्तरी भारत के शासकों के रूप में दिल्ली के सुल्तान का स्थान लिया। समय के साथ, उमेर द्वारा स्थापित राज्य ने दिल्ली के सुल्तान की सीमा को पार किया, अंततः भारत का एक बड़ा हिस्सा घेरा और साम्राज्य की पदवी प्राप्त की। बाबर के बेटे हुमायूँ के शासनकाल के दौरान एक संक्षिप्त राजाए के भीतर (1540-1555), एक सक्षम और अपने ही अधिकार में कुशल शासक शेर शाह सूरी के अंतर्गत अफगान सूरी राजवंश का उदय देखा। हालाँकि, शेर शाह की असामयिक मृत्यु और उनके उत्तराधिकारियों की सैन्य अक्षमता ने 1555 में हुमायूँ को अपनी गद्दी हासिल करने के लिए सक्षम किया। हालाँकि, कुछ महीनों बाद हुमायूं का निधन हुआ और उनके 13 वर्षीय बेटे अकबर ने गद्दी हासिल करी।",
"बाबर\nराणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत काफी संगठित तथा शक्तिशाली हो चुके थे। राजपूतों ने एक बड़ा-सा क्षेत्र स्वतंत्र कर लिया था और वे दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ होना चाहते थे। बाबर की सेना राजपूतों की आधी भी नहीं थी। 17 मार्च 1527 में खानवा की लड़ाई राजपूतों तथा बाबर की सेना के बीच लड़ी गई। राजपूतों का जीतना निश्चित लग रहा था पर युद्ध के दौरान राणा सांगा घायल हो गये और घायल अवस्था में उनके साथियो ने उन्हें युद्ध से बाहर कर दिया और एक आसान-सी लग रही जीत उसके हाथों से निकल गई। इसके एक साल के बाद राणा सांगा की 30 जनवरी 1528 को मौत हो गई। इसके बाद बाबर दिल्ली की गद्दी का अविवादित अधिकारी बन गया। आने वाले दिनों में मुगल वंश ने भारत की सत्ता पर 231 सालों तक राज किया।",
"अफ़ग़ानिस्तान\nमध्यकाल में कई अफ़्गान शासकों ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें लोदी वंश का नाम प्रमुख है। अफगानिस्तान पर सिख साम्राज्य के प्रतापी राजा दिलीप सिंह का कई वर्षों तक अधिकार रहा l अफगान से मिलकर बाबर, नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली ने दिल्ली पर आक्रमण किए अफ़ग़ानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे।",
"बाबर\nमेवाड़ विजय के पश्चात बाबर ने अपने सैनिक अधिकारियों को पूर्व में विद्रोहियों का दमन करने के लिए भेजा क्योंकि पूरब में बंगाल के शासक नुसरत शाह ने अफ़गानों का स्वागत किया था और समर्थन भी प्रदान किया था इससे उत्साहित होकर अफ़गानों ने अनेक स्थानों से मुगलों को निकाल दिया था बाबर को भरोसा था कि उसका अधिकारी अफगान विद्रोहियों का दमन करेंगे अतः उसने चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चिय कर लिया। चंदेरी का राजपूत शासक मेेेेेदिनीराय खंगार खानवा का युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ा था और अब चंदेरी मैं राजपूत सत्ता का पुनर्गठन हो रहा था चंदेरी पर आक्रमण करने के निश्चय से ज्ञात होता है कि बाबर की दृष्टि में राजपूत संगठन अफगानों की अपेक्षा अधिक गंभीर था अतः वह राजपूत शक्ति को नष्ट करना अधिक आवश्यक समझता था चंदेरी का अपना एक व्यापारिक तथा सैनिक महत्व भी था, वह मालवा तथा राजपूताने में प्रवेश करने के लिए उपयुक्त स्थान था बाबर ने सेना चंदेरी पर आक्रमण करने के लिए भेजी थी उसे राजपूतों ने पराजित कर दिया इससे बाबर ने स्वयं चंदेरी जाने का निश्चय किया क्योंकि यह संभव है कि चंदेरी राजपूत शक्ति का केंद्र बन जाए। उसने चंदेरी के विरुद्ध लड़ने के लिए 21 जनवरी 1528 की तारीख को घोषित किया क्योंकि इस घोषणा से उसे चंदेरी की मुस्लिम जनता का जो बड़ी संख्या में समर्थन प्राप्त होने की आशा थी और जिहाद के द्वारा राजपूतों तथा इन मुस्लिमों का सहयोग रोका जा सकता था उसने के पास संदेश भेजा कि वह शांति पूर्ण रूप से चंदेरी का समर्पण कर दे तो उसे शमशाबाद की जागीर दी जा सकती है मेेेेेदिनीराय खंगार ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। राजपूतों ने भयंकर युद्ध किया और राजपूती वीरांगनाओं ने जौहर किया लेकिन बाबर के अनुसार उसने तोप खाने की मदद से एक ही घंटे मेंचंदेरी पर अधिकार कर लिया उसने चंदेरी का राज्य मालवा सुल्तान के वंशज अहमद शाह को दे दिया और उसे आदेश दिया कि वह 20 लाख दाम प्रति वर्ष शाही कोष में जमा करें।",
"खानवा का युद्ध\n1524 तक, बाबर का उद्देश्य मुख्य रूप से अपने पूर्वज तैमूर की विरासत को पूरा करने के लिए पंजाब तक अपने शासन का विस्तार करना था, क्योंकि यह उसके साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। उत्तर भारत के बड़े हिस्से लोदी वंश के इब्राहिम लोदी शासन के अधीन थे, लेकिन साम्राज्य चरमरा रहा था और कई रक्षक थे। बाबर ने पहले ही 1504 और 1518 में पंजाब में छापा मारा था। 1519 में उसने पंजाब पर आक्रमण करने की कोशिश की, लेकिन वहां जटिलताओं के कारण उसे काबुल लौटना पड़ा। 1520-21 में बाबर ने फिर से पंजाब को जीतने के लिए हामी भरी, उसने आसानी से भीरा को पकड़ लिया। और सियालकोट जिसे \"हिंदुस्तान के लिए जुड़वां द्वार\" के रूप में जाना जाता था। बाबर लाहौर तक कस्बों और शहरों का विस्तार करने में सक्षम था, लेकिन फिर से क़ंदराओं में विद्रोह के कारण रुकने के लिए मजबूर हो गया था। 1523 में उन्हें दौलत सिंह लोदी, पंजाब के गवर्नर से निमंत्रण मिला। और अला-उद-दीन, इब्राहिम के चाचा, दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण करने के लिए। बाबर के आक्रमण की जानकारी होने पर, मेवाड़, राणा सांगा के राजपूत शासक ने बाबुल के एक राजदूत को सुल्तान पर बाबर के हमले में शामिल होने की पेशकश करते हुए भेजा। संगा ने आगरा पर हमला करने की पेशकश की, जबकि बाबर हमला करेगा दिल्ली। दौलत खान ने बाद में बाबर के साथ विश्वासघात किया और 40,000 की संख्या में उसने सियालकोट पर मुग़ल जेल से कब्जा कर लिया और लाहौर की ओर कूच कर दिया। दौलत खान लाहौर पर बुरी तरह से हार गया और इस जीत के माध्यम से बाबर पंजाब का निर्विरोध स्वामी बन गया, बाबर ने अपनी विजय जारी रखी और लोदी सल्तनत की सेना का सफाया कर दिया। पानीपत की पहली लड़ाई में, जहाँ उन्होंने सुल्तान को मारकर मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की।",
"इब्राहिम लोदी\nइब्राहीम के असंतुष्ट सरदारों में पंजाब का शासक ‘दौलत ख़ाँ लोदी’ एवं इब्राहीम लोदी के चाचा ‘आलम ख़ाँ’ ने काबुल के तैमूर वंशी शासक बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया। बाबर ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया और वह भारत आया। 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी और बाबर के मध्य हुए भयानक संघर्ष में लोदी की बुरी तरह हार हुई और उसकी हत्या कर दी गई। इब्राहिम लोदी की सबसे बड़ी दुर्बलता उसका हठी स्वभाव था। उसके समय की प्रमुख विशेषता उसका अपने सरदारों से संघर्ष था। इब्राहीम की मृत्यु के साथ ही दिल्ली सल्तनत समाप्त हो गई और बाबर ने भारत में एक नवीन वंश ‘मुग़ल वंश’ की स्थापना की।",
"कराची\nसोलहवीं सदी में मध्य-एशिया से भाग कर आए हुए बाबर ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया और पाकिस्तान मुगल साम्राज्य का अंग बन गया। मुगलों ने काबुल तक के क्षेत्र को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। अठारहवीं सदी के अन्त तक विदेशियों (खासकर अंग्रेजों) का प्रभुत्व भारतीय उपमहाद्वीप पर बढ़ता गया . सन् 1857 के गदर के बाद सम्पूर्ण भारत अंग्रेजों के शासन में आ गया।",
"बख़्त खान\nजब बख्त खान ने मेरठ में विद्रोह के बारे में सुना, तो उन्होंने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की सेना का समर्थन करने के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। उस समय तक बखत खान 1 जुलाई 1857 को दिल्ली पहुंचे, बड़ी संख्या में रोहिला सिपाही के साथ, शहर को विद्रोही बलों ने लिया था और मुगल शासक बहादुर शाह जफर को भारत के सम्राट घोषित किया गया था। सम्राट के सबसे बड़े बेटे मिर्जा मुगल को मिर्जा जहीरुद्दीन भी कहा जाता है, उन्हें मुख्य जनरल का खिताब दिया गया था, लेकिन इस राजकुमार के पास कोई सैन्य अनुभव नहीं था। यही वह समय था जब बख्तर खान अपनी सेनाओं के साथ बुधवार 1 जुलाई 1857 को दिल्ली पहुंचे। उनके आगमन के साथ, नेतृत्व की स्थिति में सुधार हुआ। बखत खान की श्रेष्ठ क्षमताओं को जल्द ही स्पष्ट हो गया, और सम्राट ने उन्हें वास्तविक अधिकार और साहेब-ए-आलम बहादुर, या भगवान गवर्नर जनरल का खिताब दिया। खान सिपाही बलों के आभासी कमांडर थे, हालांकि मिर्जा जहीरुद्दीन अभी भी कमांडर-इन-चीफ थे।"
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किसने दिल्ली व आगरा को जीतकर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की?
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"हेमचन्द्र विक्रमादित्य\nदिल्ली पर नियंत्रण करने के बाद, हेमू ने शाही स्थिति का दावा किया और विक्रमादित्य (या \"बिक्रमजीत\" ) की उपाधि धारण की, जो भारत के प्राचीन अतीत में कई हिंदू राजाओं द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक पदवी है। हालाँकि, यह जो दर्शाता है वह इतिहासकारों के बीच अटकलों का विषय है।",
"हेमचन्द्र विक्रमादित्य\nहेमू ने 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली की लड़ाई में अकबर की मुगल सेना को हराने के बाद शाही स्थिति का दावा किया और विक्रमादित्य की प्राचीन उपाधि धारण की जिसे अतीत में कई हिंदू राजाओं ने अपनाया था। एक महीने बाद, हेमू पानीपत की दूसरी लड़ाई के दौरान एक मौका तीर से घायल हो गया और बेहोश हो गया। इसके तुरंत बाद अकबर के रीजेंट, बैरम खान ने लगभग मृत हेमू का सिर काट दिया।",
"हेमचन्द्र विक्रमादित्य\nपानीपत की लड़ाई से प्राप्त लूट में हेमू के युद्ध के 120 हाथी शामिल थे, जिनके विनाशकारी प्रकोप ने मुगलों को इतना प्रभावित किया कि जानवर जल्द ही उनकी सैन्य रणनीतियों का एक अभिन्न अंग बन गए। \"रेवाड़ी में अपनी विनम्र शुरुआत से राजा विक्रमादित्य\" की शाही उपाधि धारण करने के लिए हेमू का उदय इतिहास में एक उल्लेखनीय मोड़ माना जाता है। लेकिन अगर युद्ध में आवारा तीर के लिए नहीं, जहां वह ताकत की स्थिति में था, तो हेमू विक्रमादित्य एक ऐसे क्षेत्र में \"संस्कृत / ब्राह्मणवादी राजशाही परंपरा\" की बहाली कर सकते थे, जो सदियों से मुस्लिम शासन के अधीन था। ।।",
"हेमचन्द्र विक्रमादित्य\nहेमू उर्फ़ हेमचन्द्र, हेमू विक्रमादित्य अथवा हेमचंद्र विक्रमादित्य (निधन: 5 नवम्बर 1556) हिन्दू कमाण्डर थे जो पहले एक सामान्य रूप में सेवा के मुख्यमंत्री के आदिल शाह सूरी के सूरी वंश में एक अवधि के दौरान भारतीय इतिहास जब मुगल और अफगान पूरे उत्तर भारत में सत्ता के लिए होड़ में थे। उन्होंने पंजाब से बंगाल तक उत्तर भारत में अफगान विद्रोहियों और आगरा और दिल्ली में हुमायूं और अकबर की मुगल सेनाओं से लड़ा, आदिल शाह के लिए 22 लड़ाई जीती।"
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"सत्यव्रत केदान\nउन्होने तुर्की के अली बोनकेगुल को हरा कर कांस्य पदक हासिल किया था। उन्होने सुशील कुमार और योगेश्वर दुत्त के साथ तय्यारी की थी।",
"हेमचन्द्र विक्रमादित्य\nसतीश चंद्र जैसे इतिहासकार यह नहीं मानते कि इसका अर्थ यह है कि हेमू ने खुद को एक \"स्वतंत्र\" राजा घोषित किया था। उनका तर्क है कि उस समय के मुगल लेखकों में से कोई भी अपने इतिहास में स्पष्ट रूप से ऐसा नहीं कहता है। अकबरनामा में, अबुल-फ़ज़ल लिखते हैं कि तुगलकाबाद में हेमू की जीत के बाद, \"संप्रभुता की महत्वाकांक्षा\" उसके भीतर हलचल कर रही थी। बदाउनी के अनुसार, हेमू ने हिंदुस्तान के एक महान राजा की तरह \"बिक्रमजीत की उपाधि धारण की।\" निज़ामुद्दीन अहमद नाम के एक अन्य समकालीन इतिहासकार ने केवल यह कहा है कि हेमू ने उक्त उपाधि धारण की, लेकिन कुछ और कहने से परहेज किया। दूसरे, यह एक अनुचित कदम होता क्योंकि हेमू की सैन्य शक्ति लगभग पूरी तरह से अफगानों से बनी थी। बदाउनी के अनुसार, अफगानों के बीच हेमू के खिलाफ कुछ बड़बड़ाहट भी थी जो \"उसके हड़पने से बीमार थे ... उसके पतन के लिए प्रार्थना की\"।",
"कृष्ण तृतीय\nकृष्ण तृतीय ( 939 – 967 ई), मान्यखेत के राष्ट्रकूट राजवंश का अन्तिम महान एवं योग्य शासक था। इसने अपने राज्यारोहण के समय 'अकालवर्ष ' की उपाधि धारण की एवं कांची और तंजौर को जीतने के बाद 'कांचीयुम तंजेयमकोंड' (कांची तंजौर का विजेता ) की उपाधि भी ग्रहण की थी ।",
"ईवाँ तृतीय\n१४७१-७८ की दो लड़ाइयों में इसने नोवगोरोदें को जीता। हैप्सवर्ग पवित्र रोमन सम्राट् द्वारा दी 'राजा' की उपाधि अस्वीकृत करते हुए इसने कहा, \"अपने देश में हम अपने पूर्वजों के समय से प्रभुत्वसंपन्न रहे हैं और ईश्वर से हमें प्रभुत्वशक्ति प्राप्त हुई है।\" धमकी या युद्ध द्वारा उसने यारस्लावो (१४६३), रोस्तोव (१४७४) और त्रंवेर (१४८५) हथियाह लिए। १४८० में तातार को खिराज देना बंद कर तातारों की दासता का जुआ उसने उतार फेंका।",
"हेमचन्द्र विक्रमादित्य\n23 जुलाई 1555 को आदिल शाह के बहनोई सिकंदर शाह सूरी पर हुमायूँ की जीत के बाद, मुगलों ने अंततः दिल्ली और आगरा को पुनः प्राप्त कर लिया। 26 जनवरी 1556 को जब हुमायूँ की मृत्यु हुई तब हेमू बंगाल में था। उनकी मृत्यु ने हेमू को मुगलों को हराने का एक आदर्श अवसर दिया। उसने बंगाल से एक रैपिड मार्च शुरू किया और बयाना, इटावा, संभल, कालपी और नारनौल से मुगलों को खदेड़ दिया। आगरा में, राज्यपाल ने शहर खाली कर दिया और हेमू के आक्रमण की बात सुनकर बिना किसी लड़ाई के भाग गए।",
"विक्रमादित्य ६\nविक्रमादित्य षष्ठ (1076 – 1126 ई) पश्चिमी चालुक्य शासक था। वह अपने बड़े भाई सोमेश्वर द्वितीय को अपदस्थ कर गद्दी पर बैठा। चालुक्य-विक्रम संवत् उसके शासनारूढ़ होने पर आरम्भ किया गया। सभी चालुक्य राजाओं में वह सबसे अधिक महान, पराक्रमी था तथा उसका शासन काल सबसे लम्बा रहा। उसने 'परमादिदेव' और त्रिभुवनमल्ल' की उपाधि धारण की।"
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रहनुमाई मजदयासन सभा के संस्थापक कौन थे?
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"रहनुमाए माजदायासन सभा\nरहनुमाई मजदेसन सभा की स्थापना नौरोजी फुरदान जी दादाभाई नौरोजी और एस एस बंगाली के द्वारा 1851 ईस्वी में बंबई में की गई थी! यह सभा एक पारसी धर्म सुधार आंदोलन था!"
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"ठाकुर शिवकुमार सिंह\nठाकुर शिवकुमार सिंह (1870-1968) काशी नागरीप्रचारिणी सभा के संस्थापकों में से एक थे। आपने चंदौली के मिडिल स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् स्वर्गीय पं॰ श्री रामनारायण मिश्र और बाबू श्यामसुंदर दास जी तथा अन्य सहयोगियों को साथ लेकर ये सभा की उन्नति में लग गए।",
"मिन्नतुल्लाह रहमानी\nमिन्नतुल्लाह रहमानी (7 अप्रैल 1913 - 20 मार्च 1991) एक भारतीय सुन्नी मुस्लिम विद्वान थे, जिन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पहले महासचिव के रूप में काम किया। वह दारुल उलूम नदवतुल उलमा और दारुल उलूम देवबंद के पूर्व छात्र और बिहार विधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने जमीयत उलमा बिहार के महासचिव के रूप में भी काम किया। उनके पिता मुहम्मद अली मुंगेरी नदवतुल उलमा के संस्थापकों में से थे और उनके बेटे वली रहमानी ने रहमानी 30 संस्थान की स्थापना की थी।",
"रहनुमाए माजदायासन सभा\nस्थापना वर्ष - १८५१ नौरोजी फरदोनजी, दादाभाई नौरोजी, आर.के.कामा और एस एन बंगाली। पारसियों की सामजिक अवस्था का पुनरुद्धार करना तथा पारसियों के धर्म में पुनः शुद्ध करना।",
"रामनारायण मिश्र\nपंडित रामनारायण मिश्र (1873-1953) महान हिन्दीसेवी थे जिन्होने श्यामसुन्दर दास और ठाकुर शिवकुमार सिंह के साथ मिलकर नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना की थी। वे सन् १९३७ में इसके सभापति हुए।",
"सैफुद्दीन किचलू\nकिथकलू नौजवान भारत सभा (भारतीय युवा कांग्रेस) के एक संस्थापक नेता थे, जिन्होंने सैकड़ों हजारों छात्रों और युवा भारतीयों को राष्ट्रवादी कारणों से आगे बढ़ाया। वह जामिया मिलिया इस्लामिया की फाउंडेशन कमेटी के सदस्य थे, जो 29 अक्टूबर 1920 को मिले और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की नींव का नेतृत्व किया।",
"जगन्मोहन मण्डल\nजगन्मोहन मंडल, हिन्दी की एक साहित्यिक संस्था थी जिसका निर्माण काशी के भारतेन्दु मंडल की तर्ज पर हुआ था। इसके संस्थापक भारतेन्दुयुगीन कवि, आलोचक और उपन्यासकार ठाकुर जगन्मोहन सिंह थे। छत्तीसगढ़ में ठाकुर जगमोहनसिंह का साहित्यिक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने सन् 1880 से 1882 तक धमतरी में और सन् 1882 से 1887 तक शिवरीनारायण में तहसीलदार और मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य किया। यही नहीं, छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को जगन्मोहन मंडल बनाकर एक सूत्र में पिरोया और उन्हें लेखन की सही दिशा भी दी।",
"धीरेन्द्र मजूमदार\nधीरेन्द्र मजूमदार () भारत के एक गांधीवादी कारयकर्ता थे जिन्होने १९५२ में मुंगेर के जमुई में श्रमभारती नामक अशासकीय संस्था की स्थापना की।",
"लक्ष्मणराव इनामदार\nलक्ष्मणराव इनामदार (१९१७ - १९८४) गुजरात के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारम्भिक नेताओं में से एक तथा सहकार भारती के संस्थापक थे। वे 'वकील साहब' नाम से अधिक प्रसिद्ध थे। गुजरात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के नाते वे आजीवन अविवाहित और सादे जीवन के नियम का पालन करते रहे। माना जाता है कि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवनपथ के निर्माण में लक्ष्मणराव की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब लक्ष्मणराव गुजरात के प्रान्त-प्रचारक थे, उसी कालखण्ड में नरेन्द्र मोदी प्रचारक ब्ने थे।",
"गोस्वामी गणेश दत्त\nत्यागमूर्ति गोस्वामी गणेशदत्त (२ नवम्बर १८८९ -- १९५९) महान हिन्दी-प्रेमी, शिक्षाविद एवं सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, पंजाब के संस्थापक थे। उन्होने अविभाजित भारत के पंजाब में चार सौ से अधिक शिक्षण संस्थान खोले एवं हिन्दी की निःशुल्क रात्रिकालीन कक्षाएँ चलवायीं। इन्होने इसके लिए घर-घर जाकर लोगों से धन एकत्र किया। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ बड़ा आंदोलन चलाया और दिल्ली के बिरला मंदिर में दलितों को मंदिर में प्रवेश कराया और पूजा का अधिकार दिलवाया। वे महामना मदनमोहन मालवीय के एकमात्र मंत्र दीक्षित शिष्य थे और वे उनके मानस पुत्र थे। सन १९४४ के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वे अध्यक्ष रहे।"
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जैविक खेती के प्रमाणीकरण के लिए कौन सा एक अवयव आवश्यक है?
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"जैविक खाद्य पदार्थ\nजैविक खाद्य में दिलचस्पी लेने वाले पूर्व उपभोक्ता गैर-रासायनिक रूप से पोषित, ताजा या कम संसाधित खाद्य पसंद करते है। उन्हें ज्यादातर सीधे उत्पादकों से खरीदना पड़ता था: \"अपने किसान को जानो, अपने खाद्य को पहचानो\" उनका आदर्श था। \"जैविक\" के निर्माण में भाग लेने वाले तत्वों की निजी परिभाषाओं का विकास प्रत्यक्ष अनुभव: किसानों से बात करके, खेतों की दशा देखकर और खेती की गतिविधियों, के माध्यम से हुआ। प्रमाणीकरण प्राप्त कर या प्रमाणीकरण के बिना जैविक खेती की प्रथाओं का उपयोग कर छोटे-छोटे खेतों में सब्जियां उगाई गई (और पशुओं का पालन-पोषण किया गया) और व्यक्तिगत उपभोक्ता की निगरानी की गई। जैसे-जैसे जैविक खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती गई, वैसे-वैसे सुपरमार्केट जैसी बड़ी-बड़ी दुकानों के माध्यम से होने वाली अधिकाधिक बिक्रियों ने बड़ी तेज़ी से किसानों के साथ होने वाले प्रत्यक्ष संपर्क की जगह लेना शुरू कर दिया. आजकल जैविक खेतों के लिए कोई सीमा नहीं है और वर्तमान में कई बड़ी कंपनियों के पास एक जैविक विभाग है। हालांकि, सुपरमार्केट उपभोक्ताओं के लिए, खाद्य उत्पादन आसानी से दिखाई देने योग्य नहीं है और उत्पाद लेबलिंग जैसे \"प्रमाणित जैव\" पर निर्भर है। इन सभी बातों के आश्वासन के लिए यह सरकारी विनियमों और तृतीय-पक्ष निरीक्षकों पर निर्भर होता है। एक \"प्रमाणित जैविक\" लेबल आम तौर पर उपभोक्ताओं के पास यह पता करने के लिए एकमात्र तरीका है कि संसाधित उत्पाद \"जैविक\" है या नहीं.",
"जैविक खेती\nजैविक खेती, की विधि रासायनिक खेती की विधि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है इसके साथ ही कृषक भाइयों को आय अधिक प्राप्त होती है तथा अंतराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक भाई अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शकि्त का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है। मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, शुद्ध वातावरण रहे एवं पौषि्टक आहार मिलता रहे, इसके लिये हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियाँ को अपनाना होगा जोकि हमारे नैसर्गिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी। भारतीय जैविक कृषि संगठन भारत में जैविक खेती कर रहें कृषिको का सबसे बढा समूह है।"
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"जैविक खाद्य पदार्थ\nप्रमाणित जैविक होने के लिए, उत्पादों को इस तरह विकसित और निर्मित किया जाना चाहिए जिससे वे उस देश के निर्धारित मानकों का पालन कर सके जिसके तहत उन्हें बेचा जाता है:खेती की पारंपरिक और जैविक प्रणालियों की तुलना और जांच करने के लिए कई सर्वेक्षण और अध्ययन किये गए हैं। इन सर्वेक्षणों में सामान्य सर्वसम्मति यह है कि जैविक कृषि निम्नलिखित कारणों के कारण कम हानिकारक हैं:हालांकि, जैविक कृषि के तरीकों के कुछ आलोचकों का मानना है कि एक ही मात्रा में खाद्य के उत्पादन के लिए परंपरागत खेतों की तुलना में जैविक खेतों के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता होती है (नीचे 'उपज' अनुभाग देखें). उनका तर्क है कि अगर यह सच है तो जैविक खेत संभावित रूप से वर्षावनों को नष्ट कर सकते है और कई पारितंत्रों का सफाया कर सकते है।",
"जैविक खाद्य पदार्थ\nजैविक खाद्य उत्पादन अत्यंत विनियमित उद्योग है, जो निजी बागवानी से भिन्न है। वर्तमान में, यूरोपीय संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जापान और कई अन्य देशों में विशेष प्रमाणीकरण प्राप्त करने के लिए निर्माताओं की आवश्यकता होती है जिससे वे अपनी सीमाओं के भीतर आहार को \"जैविक\" रूप में बेच सके. अधिकांश प्रमाणपत्र कुछ रसायनों और कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं, इसलिए उपभोक्ताओं को अपने संबंधित स्थलों में उन मानकों के बारे में पता होना चाहिए जिनके आधार पर खाद्य पदार्थ को \"जैविक\" माना जायेगा.",
"जैविक खेती\nभारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरको एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है जिससे सीमान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैं। इसलिए इस प्रकार की उपरोक्त सभी समस्याओं से निपटने के लिये गत वर्षों से निरन्तर टिकाऊ खेती के सिद्धान्त पर खेती करने की सिफारिश की गई, जिसे प्रदेश के कृषि विभाग ने इस विशेष प्रकार की खेती को अपनाने के लिए, बढ़ावा दिया जिसे हम जैविक खेती प्रचार-प्रसार कर रही है।",
"जैविक खाद्य पदार्थ\nयूएसडीए (USDA) जैविक किसानों का निरीक्षण नहीं करता है। 30 तीसरी पार्टी निरीक्षकों में से 15 निरीक्षकों को अंकेक्षण के बाद परिवीक्षा के तहत रखा जाता है। 20 अप्रैल 2010 को कृषि विभाग ने कहा कि यह लेखा परीक्षक के जैविक खाद्य उद्योग के परस्पर स्वीकृत निरीक्षण में प्रमुख अंतराल उजागर होने के बाद कीटनाशकों की खोज के लिए जैविक रूप से उत्पन्न खाद्य पदार्थों के परीक्षण की आवश्यकता के चलते नियमों को लागू करना शुरू करेगा.",
"जैविक खेती\nजैविक खेती की परिभाषा ऐसी खेती जिसमें दीर्घकालीन व स्थिर उपज प्राप्त करने के लिए कारखानों में निर्मित । रसायनिक उर्वरकों , कीटनाशियों व खरपतवारनाशियों तथा वृद्धि नियन्त्रक का प्रयोग न करते । हुए जीवांशयुक्त खादों का प्रयोग किया जाता है तथा मृदा एवं पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण । होता है , कहलाती है ।",
"जैविक खाद्य पदार्थ\nडेनमार्क की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी द्वारा किये गए एक अध्ययन से पता चला है कि क्षेत्र दर क्षेत्र आलू, चुकंदर और बीज घास के जैविक खेतों का उत्पादन पारंपरिक खेती के उत्पादन का आधा है। इस तरह के निष्कर्ष और कम उपज वाले मवेशियों से खाद पर जैविक खाने की निर्भरता ने वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही आलोचना को प्रोत्साहित किया है कि जैविक कृषि पर्यावरण की दृष्टि से अस्वस्थ है और पूरे विश्व को खिलाने में असमर्थ है। इन आलोचकों में नोर्मन बोर्लौग, \"हरित क्रांति\" (Green Revolution) के उत्पादक और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता है जो यह दावा करते है कि जैविक कृषि प्रथाएं नाटकीय रूप से क्रोपलैंड का विस्तार करके और प्रक्रिया में पारितंत्रों को नष्ट करने के बाद कम से कम 4 अरब लोगों का पालन-पोषण करती है। माइकल पोलन, \"ओम्निवोर'स डिलिमा\" के लेखक, ने इस बात पर यह प्रतिक्रिया दी है कि दुनिया की कृषि की औसत पैदावार आधुनिक दीर्घकालिक खेती उपज की तुलना में काफी कम है। औसत वैश्विक पैदावार को आधुनिक जैव स्तरों के अनुसार करने से दुनियाभर की खाद्य पदार्थ आपूर्ति में 50% तक की वृद्धि की जा सकती है।",
"जैविक खाद्य पदार्थ\nएक अध्ययन में पता चला है कि 50% कम उर्वरक और 97% कम कीटनाशक का प्रयोग करके जैविक खेतों की उपज 20% कम हो गयी हैं। पैदावार की तुलना करने वाले अध्ययनों के परिणाम मिश्रित है। समर्थकों का दावा है कि जैविक रूप से प्रबंधित मिट्टी की गुणवत्ता उच्च होती है और इसमें पानी प्रतिधारण अधिक होता है। यह सूखे के समय में जैविक खेतों के लिए पैदावार बढ़ाने में मदद कर सकता है।",
"औषधनिर्माण\nजैविकीय प्रमाणन (बायोलॉजिकल स्टैंडर्डाइज़ेशन) यदि कोई औषधि रसायनविशेष हो तो ओषधि को रासायनिक विधियों द्वारा प्रमापित किया जा सकता है। परंतु कुछ ओषधियों की माप घटा बढ़ाकर जीवित प्राणी पर उसके प्रभाव की न्यूनाधिकता से ही उसका प्रमापण संभव है; उदाहरणार्थ हारमोन, हीपेरिन, पेनिसिलिन आदि। ऐसे प्रमापण को जैविकीय प्रमापण कहते हैं।"
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अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर मिस्टर ओलम्पिया किस वर्ष में जीता था?
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"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\nश्वार्ज़नेगर का लक्ष्य विश्व का सबसे बड़ा बॉडीबिल्डर बनने का था, जिसका मतलब था मि.ओलम्पिया बनना. इसका पहला प्रयास उन्होंने 1969 में किया था, जब वे तीन बार चैंपियन सर्जियो ओलिव से हारे थे। हालांकि, श्वार्ज़नेगर 1970 में वापस आये और 23 साल की उम्र में अब तक सबसे कम उम्र में मि.ओलंपिया प्रतियोगिता जीतने का रिकॉर्ड बनाया।"
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"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\nउन्होंने 1971 - 1974 में प्रतियोगिताएं जीतने का दौर जारी रखा। 1975 में श्वार्जनेगर एक बार फिर शीर्ष के रूप में थे और फ्रेंको कोलुम्बू को हराकर लगातार छठीं बार खिताब जीता। 1975 में मि.ओलंपिया प्रतियोगिता के बाद श्वार्ज़नेगर ने पेशेवर बॉडी बिल्डिंग से अपने संन्यास की घोषणा की।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\nपहली प्रतियोगिताओं में से जूनियर मि.यूरोप प्रतिस्पर्धा 1965 में हुई थी, जिसे उन्होंने जीती थी। अगले वर्ष उन्होंने 19 साल की उम्र में मि.यूरोप जीता। उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया और बहुत सी शरीर सौष्ठव प्रतियोगिताएं जीतीं, साथ ही साथ उन्होंने कुछ भारोत्तोलन प्रतियोगिताओं में भाग लिया जिनमें पांच उन्होंने जीतीं मि.यूनिवर्स (4 NABBA [इंग्लैंड], 1 IFBB [USA] और सात मि.ओलम्पिया जीते, जो तब तक एक रिकॉर्ड था, जब तक ली हनी ने अपना आठवां लगातार मि.ओलंपिया का खिताब वर्ष 1991 में नहीं जीता था।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\nश्वार्ज़नेगर ने पंद्रह वर्ष की आयु में भारोत्तोलन का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। 22 साल की उम्र में उन्हें मि. यूनिवर्स (Mr. Universe) की उपाधि से सम्मानित किया गया और उन्होंने मि. ओलम्पिया (Mr. Olympia) प्रतियोगिता में कुल सात बार जीत हासिल की। अपनी सेवानिवृत्ति के बहुत समय बाद भी श्वार्जनेगर बॉडीबिल्डिंग के खेल में एक प्रमुख चेहरा बने हुए हैं और उन्होंने खेल पर कई पुस्तकें और अनेक लेख लिखे हैं।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\n1975 मि.ओलंपिया प्रतियोगिता से महीनों पहले फिल्म निर्माता जॉर्ज बटलर और रॉबर्ट फिओरे ने श्वार्जनेगर को इस बात के लिए राजी किया था कि प्रतियोगिता में भाग लें ताकि वे फिल्म \"पंपिंग आयरन\" (Pumping Iron) में बॉडी बिल्डिंग पर वृत्तचित्र में उनके प्रशिक्षण का फिल्मांकन कर सकें. जेफ ब्रिडगेस के साथ फिल्म \"स्टे हंगरी\" में भूमिका अदा करने के लिए श्वार्ज़नेगर ने उल्लेखनीय वजन कम किया था, जिसके बाद प्रतिस्पर्धा की तैयारी के लिए उनके पास केवल तीन महीने थे। लो फेर्रिग्नो खतरा साबित नहीं हुए और सामान्य से हल्के श्वार्ज़नेगर ने प्रभावशाली तरीके से 1975 में मि.ओलंपिया प्रतियोगिता जीत ली।",
"मनोहर आइच\nमनोहर आइच (17 मार्च 1912 - 5 जून 2016) एक भारतीय बॉडी बिल्डर थे। ‘पॉकेट हरक्यूलिस’ के नाम से प्रसिद्ध मनोहर आइच ने वर्ष 1950 में 36 वर्ष की आयु में मिस्टर हरक्यूलिस टाइटल जीता था। आज़ादी के पश्चात (1951 में मोनोतोष राय के बाद) वर्ष 1952 में मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीतने वाले वे दूसरे भारतीय थे। वर्ष 1942 में वे रॉयल इंडियन एयर फोर्स में शामिल हुए थे। वर्ष 2015 में पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें ‘बंगविभूषण अवॉर्ड’ से सम्मानित किया था।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\n\"मि.यूनिवर्स खिताब मेरे लिए अमेरिका का टिकट था, अवसर का मैदान, जहां मैं एक सितारा बन सकता था और धनी हो सकता था।\" श्वार्ज़नेगर ने 1966 में अपनी पहली विमान यात्रा की, लंदन में NABBA मि.यूनिवर्स प्रतियोगिता में भाग लिया। वे मि.यूनिवर्स प्रतियोगिता में द्वितीय रहे, वे अमेरिकी विजेता चेस्टर योर्तों की मांसपेशियों की परिभाषा नहीं जानते थे।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\nश्वार्ज़नेगर 1980 की मि.ओलंपिया प्रतिस्पर्धा के लिए सेवानिवृत्ति से बाहर आये। श्वार्ज़नेगर ने \"कॉनन\" में अपनी भूमिका के लिए प्रशिक्षण लिया था और दौड़ने, घुड़सवारी और तलवारबाजी की वजह से उनके शरीर का गठन अच्छा हो गया था, जिसके कारण उन्होंने निर्णय लिया कि वे आखिरी बार मि.ओलंपिया प्रतियोगिता जीतना चाहते हैं। उन्होंने इस योजना को गुप्त रखा था, ताकि कार्यक्रम में प्रशिक्षण के दौरान कोई दुर्घटना उनके प्रवेश को न रोक ले और वे भाग न ले पायें. श्वार्जनेगर को कलर कामेंट्री के लिए नेटवर्क टेलीविज़न उपलब्ध करवाया गया था, इसलिए वह वहां मौजूद थे और आखिरी मौके पर घोषणा की कि: \"वे प्रतिस्पर्धा में भाग क्यों नहीं लेंगे?\" श्वार्ज़नेगर ने केवल सात हफ्तों की तैयारी में जीत के इस कार्यक्रम को अंजाम दिया था। सातवीं बार मि.ओलंपिया घोषित किये जाने के बाद श्वार्जनेगर आधिकारिक तौर पर प्रतियोगिता से सेवानिवृत्त हो गये।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\n7 अक्टूबर 2003 को पुनर्मतदान में आये परिणाम में गवर्नर ग्रे डेविस को अपने पद से हटना पड़ा क्योंकि पुनर्मतदान के पक्ष में 55.4% \"यस\" (Yes) वोट पड़े. श्वार्ज़नेगर कैलिफोर्निया के गवर्नर निर्वाचित किये गये, उन्हें दूसरे प्रश्न के अंतर्गत डेविस के उत्तराधिकारी चुनने के लिए हुए मतदान में 48.6% वोट मिले। श्वार्ज़नेगर ने डेमोक्रेट क्रूज़ बस्टामेंटे, साथी रिपब्लिकन टॉम मैक क्लिंटोक और दूसरों को हरा दिया। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी बस्टामेंटे को 31% वोट प्राप्त किया। श्वार्ज़नेगर ने कुल 1.3 मिलियन वोटों से चुनाव जीता। कैलिफोर्निया के संविधान के नियम के अनुसार अब किसी और चुनाव की आवश्यकता नहीं थी। 1862 में जन्म से आयरिश मूल के गवर्नर जॉन जी. डोनी के बाद श्वार्ज़नेगर कैलिफोर्निया के पहले विदेश में पैदा हुए गवर्नर बने।",
"अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर\nपूरी तरह झुककर (नितंबों के पास जमीन पर) श्वार्जनेगर ने 181 kg/400 lbs उठाने का एक निजी रिकॉर्ड बनाया और बारह बार उन्होंने यह रिकार्ड बनाने की पुनरावृत्ति की।"
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विश्व के सात नए अजूबों में एक चिचेन इट्जा को सम्मिलित किया गया है यह कहाँ स्थित है?
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"चीचेन इट्ज़ा\nचीचेन इट्ज़ा, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, है, मैक्सिको के पुरातात्विक स्थलों में दूसरा सबसे अधिक दौरा किया जाने वाला है। यह पुरातात्विक स्थल कानकन रिसोर्ट से बहुत सारे यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो टूर बसों द्वारा वहां दिन में यात्रा करते हैं। 2007 में, चीचेन इट्ज़ा के अल कैस्टिलो को एक विश्व स्तरीय वोट के आधार पर दुनिया के सात नए अजूबों में से एक चुना गया। यह वोट एक व्यावसायिक उद्यम द्वारा प्रायोजित था और इसकी कार्यप्रणाली की आलोचना किए जाने जैसे तथ्यों के बावजूद, इस चुनाव का मेक्सिको के सरकारी और पर्यटन अधिकारियों द्वारा स्वागत किया गया, जिन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि इस प्रचार के परिणाम स्वरूप चीचेन में आने वाले पर्यटकों की संख्या 2012 तक दुगनी हो जाने की उम्मीद है। आगामी प्रचार ने मेक्सिको में साइट के स्वामित्व पर बहस को पुनः प्रज्वलित कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप 29 मार्च 2010 को युक्टान राज्य ने हैंस ज्युएर्ग्न थिएस बारबाचानो से वह भूमि क्रय कर लिया जिसपर सबसे ज्यादा स्मारक स्थित हैं।"
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"चीचेन इट्ज़ा\nकासा कोलोराडा, जो रेड हाउस के लिए स्पेनिश शब्द है, चीचेन इट्ज़ा में सबसे बेहतर संरक्षित इमारतों में से एक है। इसका एक माया नाम भी है, चिचानचोब, जिसका अर्थ INAH के अनुसार \"छोटे छेद\" हो सकता है। एक कक्ष में वहां व्यापक रूप से उकेरी गई हाइरोग्लिफ्स हैं जो चीचेन इट्ज़ा के शासकों का और संभवतः पास के शहर एक बालम का उल्लेख करती है और उस पर माया की एक तारीख खुदी है जो 869 a.d.e के साथ सम्बंधित है, यह सम्पूर्ण चीचेन इट्ज़ा में पाई जाने वाली ऐसी तारीखों में सबसे पुरानी है।",
"चीचेन इट्ज़ा\nइस स्थान पर परिरक्षण की विभिन्न स्थितयों में तराशे पत्थर की इमारतें हैं और कई का जीर्णोद्धार कर दिया गया है। ये इमारतें पूर्व में पक्की सड़कों के सघन नेटवर्क द्वारा जुडी थीं, जिन्हें \"साक्बिओब\" कहा जाता है। पुरातत्वविदों को करीब 100 \"साक्बिओब\" मिले हैं जो इस स्थान पर फैले हैं और शहर से सभी दिशाओं में गए हैं।",
"चीचेन इट्ज़ा\nचीचेन इट्ज़ा पुरातात्विक क्षेत्र के लगभग पश्चिम की ओर पवित्र गुफाओं का एक जाल है जिसे बालानकान्चे के नाम से जाना जाता है (), आधुनिक माया में यह बालमका'अंचे के नाम से जाना जाता था). गुफाओं में चुने हुए प्राचीन बर्तनों और मूर्तियों का संग्रह मौजूद है जो सम्भवतः उसी स्थान पर देखा जा सकता है जहां उन्हें पूर्व-कॉलमबियाई समय में रखा गया होगा।",
"चीचेन इट्ज़ा\nअल कैस्टिलो के पूर्व में इमारतों की एक श्रृंखला है, सबसे उत्तर में टेबल का मंदिर है। इसका नाम उस संरचना के शीर्ष पर स्थित वेदियों की श्रृंखला पर रखा गया है जो हाथ उठाए हुए इंसानों की छोटी नक़्क़ाशीदार आकृतियों द्वारा समर्थित हैं, जिन्हें \"अटलांटेस\" कहा जाता है।",
"चीचेन इट्ज़ा\nउत्तर समूह के दक्षिण में एक छोटा मंच है जिसमें कई महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं, जिनमें से कई चीचेन इट्ज़ा, टोलोक में दूसरे सबसे बड़े सेनोट की ओर उन्मुख होते दिखाई देते हैं।",
"चीचेन इट्ज़ा\nओसारियो समूह के दक्षिण एक और छोटा सा मंच है जिसमें कई संरचनाएं हैं जो चीचेन इट्ज़ा पुरातात्विक क्षेत्र में सबसे प्राचीन हैं।",
"चीचेन इट्ज़ा\nयह मंच शुक्र ग्रह को समर्पित है। इसके अन्दर पुरातत्वविदों ने पत्थर से बने नक़्क़ाशीदार शंकु के एक संग्रह की खोज की है, जिनका उद्देश्य अज्ञात है। यह मंच अल कैस्टिलो और सेनोट साग्राडो के बीच रखा गया है।",
"चीचेन इट्ज़ा\nचीचेन इट्ज़ा के भवन वास्तुकला-विषयक सेट की श्रृंखला में वर्गीकृत हैं और प्रत्येक सेट कभी छोटी दीवारों की एक श्रृंखला द्वारा दूसरे सेट से अलग था। इन परिसरों में सबसे बेहतर ज्ञात तीन हैं ग्रेट नॉर्थ प्लेटफोर्म, जिसमें शामिल हैं अल कैस्टिलो के स्मारक, योद्धाओं का मंदिर और ग्रेट बॉल कोर्ट; ओसेरियो समूह, जिसमें शामिल है इसी नाम का पिरामिड और साथ ही टोलोक के मंदिर; और केन्द्रीय समूह, जिसमें शामिल है काराकोल, लास मोंजास और अकब दज़िब.",
"चीचेन इट्ज़ा\nकाराकोल के पूर्व में स्थित, अकब डज़िब का माया में अर्थ है, \"काली (\"रहस्यमय\" अर्थों में) लिखावट.\" कासा कोलोराडा में ग्लिफ़्स के अनुवादों के अनुसार इमारत का एक पूर्व नाम Wa(k)wak Puh Ak Na है, \"अत्यधिक कक्षों वाला एक सपाट घर\" और यह चिचेन इट्ज़ा के व्यवस्थापक कोकोम यहावाल चो के अक (Cho' K’ak’) का निवास स्थान था। INAH ने 2007 में इमारत की जीर्णोद्धार का कार्य पूरा किया। इसकी लंबाई अपेक्षाकृत कम है, केवल ऊंची और लंबी और चौड़ी है। लंबे, पश्च-मुखी अगवाड़े में सात दरवाजे हैं। पूर्वी अगवाड़े में केवल चार दरवाजे हैं, जो छत को जाने वाली एक बड़ी सीढ़ी द्वारा खंडित है। ज़ाहिर है कि यह इस संरचना के सामने का हिस्सा था और इसका मुख एक खड़ी, लेकिन सूखी, सेनोट की ओर है। इमारत के दक्षिणी छोर पर एक प्रवेश द्वार है। यह दरवाजा एक छोटे से कक्ष में खुलता है और उसके सामने की दीवार पर एक और द्वार है, जिसके ऊपर सरदल पर जटिलता पूर्वक ग्लिफ़ खुदे हुए हैं - यह वह \"रहस्यात्मक\" या \"अस्पष्ट\" लेखन है जिस पर आज इमारत का नाम आधारित है। सरदल के नीचे दरवाज़े के चौखट पर बैठी हुई आकृति का एक नक़्क़ाशीदार पैनल है जो अन्य ग्लिफ़ से घिरा हुआ है। एक कक्ष के अंदर, छत के पास पेंट से बनाया हुआ एक हाथ का निशान है।"
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भारत में नालंदा विश्वविद्यालय किस राज्य में स्थित था?
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"भारत के सात आश्चर्य\nभारत के बिहार राज्य में स्थित नालंदा, 427 ई. से 1197 ई. के बीच एक बौद्ध शिक्षा केन्द्र था और आंशिक रूप से पाल साम्राज्य के अधीन था।. इसे \"लिखित इतिहास के प्रथम महान विश्वविद्यालयों में से एक\" कहा गया है।. ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय को गुप्त वंश के सम्राटों द्वारा 450 ई. में स्थापित किया गया था; इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम कुमारगुप्त का है।. दुनिया के पहले आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में माने जाने वाले नालंदा में छात्रों के शयनकक्ष मौजूद थे और 10,000 से अधिक छात्र और लगभग 2,000 शिक्षक यहां रहते थे। इस विश्वविद्यालय को वास्तुशिल्प का एक बेहतरीन नमूना माना जाता था जिसमे एक ऊंची दीवार और एक ही प्रवेश द्वारा था। नालंदा में आठ अलग-अलग परिसरों तथा दस मंदिरों के साथ-साथ कई अन्य ध्यान लगाने के भवन तथा कक्षाएं मौजूद थीं। अनेक झीलें तथा उद्यान भी थे। पुस्तकालय एक नौ मंजिला इमारत में था जहां ग्रंथों की प्रतियां को अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया जाता था। नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षण के लगभग सभी विषयों को सिखाया जाता था और कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, तुर्की, फारस तथा इंडोनेशिया जैसे सुदूर क्षेत्रों से भी विद्यार्थी तथा विद्वान यहां आते थे। तांग वंश के चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग ने 7 वीं सदी में इस विश्वविद्यालय का विस्तृत विवरण प्रदान किया है।",
"भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय\nभारतीय उपमहाद्वीप में कई स्थान अत्यंत पुराने शिक्षण केन्द्र रहे हैं:-नालंदा विश्वविद्यालय, आधुनिक बिहार की राजधानी पटना से 55 मील दक्षिण-पूर्व (450 ईसवी पूर्व से – 1193 इसवी)- राजा कुमार गुप्त (ई०सन 415-455) ने नालंदा में पहला मठ बनाया। यह बौद्ध भिक्षुओं को प्रशिक्षित करने के लिए एक छोटा विहार था । यह साइट न तो शहर-गाम-कस्बों से बहुत अधिक दूर थी और न ही करीब थी। इसलिए यह भिक्षुओं द्वारा बौद्ध अध्ययन की एवं खोज के लिए एक आदर्श केंद्र के रूप में चुना गया था। नालंदा विश्वविद्यालय इस बोद्ध विहार का और अधिक विस्तार करके बनाया था । राजा बुद्ध गुप्त (ई०सन 455-467) जटगाथा गुप्त (ई०सन 467-500) बालादित्य (500-525) और विजरा (525) ने भवनों में परिवर्धन और विस्तार किया। राजा बालदित्य ने एक तीर्थस्थल बनाया, जो 300 फीट ऊँचा था । उनके बेटे विजरा ने पांचवा मठ बनवाया । राजा हर्ष सिलादित्य ने छठा मठ बनाया और 9 'ऊंची दीवार के साथ विश्वविद्यालय की इमारतों को घेर किया । 10 वीं शताब्दी में जब ह्वेन त्सांग ने विश्वविद्यालय में प्रवेश किया था, तब 10,000 निवासी-छात्र थे । वे भारत के सभी हिस्सों और विदेशी भूमि से आए थे । यह भारत का अग्रणी विश्वविद्यालय था । जब ह्वेन-त्सांग ने नालंदा का दौरा किया तो सीलभद्र महाथेर नालन्दा के कुलाधिपति(=चांसलर) थे , तो यह पदवी भारत के सबसे बड़े बौद्ध विद्वान के लिए आरक्षित थी । उस समय नालंदा में 10,000 छात्र, 1510 शिक्षक और लगभग 1,500 कार्यकर्ता थे । तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, सुमात्रा, जावा और श्रीलंका जैसे विदेशी देशों के छात्र वहां पाए गए । नालंदा में प्रवेश मौखिक परीक्षा द्वारा किया जाता था । यह प्रवेश हॉल में एक प्रोफेसर द्वारा किया जाता था । उन्हें द्वार पंडित कहा जाता था । संस्कृत में दक्षता आवश्यक थी, क्योंकि यह शिक्षा का माध्यम था । बौद्ध धर्म में उच्च अध्ययन के लिए भारत जाने वाले सभी चीनी भिक्षुओं को जावा में जाना था और अपनी संस्कृत उन्नत करना था । ह्वेन त्सांग की रिपोर्ट है कि विदेशी छात्रों में से केवल 20% ही कड़ी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो पाए । भारतीय छात्रों में से केवल 30% ही उत्तीर्ण हुए और प्रवेश प्राप्त किया । इसलिए आवश्यक मानक उच्च थे । जाति, पंथ और राष्ट्रीयता बौद्ध भावना को ध्यान में रखते हुए कोई बाधा नहीं थे। विश्वविद्यालय में कोई बाहरी छात्र नहीं थे । नालंदा को सात गांवों के राजस्व से बनाए रखा गया था जो राजा द्वारा प्रदान किए गए थे । बौद्धों के लिए महायान का अध्ययन अनिवार्य था। कोई 18 अन्य बौद्ध संप्रदायों के सिद्धांतों का भी अध्ययन कर सकता है । कोई विज्ञान, चिकित्सा, ज्योतिष, ललित-कला, साहित्य आदि जैसे धर्मनिरपेक्ष विषयों का भी अध्ययन कर सकता था । वैदिक दर्शन की छह प्रणालियाँ भी सिखाई जाती थीं । कोई बौद्ध धर्म के हीनयान स्वरूपों का अध्ययन कर सकता था । इसमें थेरवाद वाणिज्य, प्रशासन और खगोल विज्ञान भी शामिल थे । विश्वविद्यालय का वेधशाला एक बहुत ऊंची इमारत में स्थित था । व्याख्यान, बहस और चर्चा शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा थे । ह्वेन त्सांग कहता है कि हर दिन 100 व्याख्यान दिए जाते थे। अनुशासन अनुकरणीय था। नालंदा विश्वविद्यालय ने 30 एकड़ के क्षेत्र पर विस्तृत था । रत्न-सागर, रत्न-निधि और रत्न-रंजना नाम के तीन बड़े पुस्तकालय थे । इनमें से एक नौ मंजिला ऊँचा था । नालंदा भारत की सबसे शानदार बौद्ध चमकते-सितारों से अभिभूत था । उनमें से कुछ नागार्जुन, आर्यदेव, धर्मपाल, सिलभद्र, संतराक्षिता, कमलासेला, भाविका, दिगनागा, धर्मकीर्ति आदि थे । उनके द्वारा छोड़े गए कार्य अधिकतर 14 तिब्बती और चीनी अनुवाद हैं । बख़क्तियार खिलजी के नेतृत्व में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नालंदा में आग लगा दी और भिक्षुओं को मार डाला । (१०३७ ई०) से पहले नालंदा एक हजार साल तक फलता-फूलता रहा, दुनिया में यह पहला ज्ञान और विद्या का प्रकाश स्तंभ है । मगध के आक्रमणकारी बख़क्तियार खिलजी ने नालंदा में आग लगा दी ,जब भिक्षु अपना भोजन करने वाले थे । यह उन पुरातत्व अवशेषों में सामने आया है जो भोजन को बहुत जल्दी में छोड़कर भागे। अन्न भंडार से चराचर चावल भी इस दुखद कथा को बताते हैं । नालंदा के खंडहर और खुदाई भारत सरकार द्वारा एक संग्रहालय में संरक्षित हैं। 19.11.58 को भारत के राष्ट्रपति, राजेंद्र प्रसाद ने प्राचीन विश्वविद्यालय के करीब एक स्थल पर नव नालंदा विहार का उद्घाटन किया । त्रिपिटक के मास्टर भिक्खु जगदीश कश्यप को 12. 01. 1957 को संस्था का प्रमुख नियुक्त किया गया था, दलाई लामा ने पंडित नेहरू की अध्यक्षता में भारत सरकार को नालंदा के प्रसिद्ध पूर्व छात्रों - ह्वेन त्सांग की राख सौंप दी । चीनी सरकार ने एक बिल्डिंग के लिए पांच लाख रुपये का दान दिया जो इन अवशेषों को सुनिश्चित करता है । मुसलमानों ने विश्वविद्यालय के विचार को पश्चिम में पहुँचाया, और उसके बाद विश्वविद्यालय पश्चिमी दुनिया में आए ।[3]",
"नालन्दा महाविहार\nनालंदा प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में पटना से ८८.५ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से ११.५ किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शताब्दी में भारत के इतिहास को पढ़ने आया था के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। यहाँ १०,००० छात्रों को पढ़ाने के लिए २,००० शिक्षक थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ७ वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।",
"नालंदा जिला\nनालंदा भारत के बिहार प्रान्त का एक जिला है जिसका मुख्यालय बिहार शरीफ है। नालंदा अपने प्राचीन् इतिहास के लिये विश्व में प्रसिद्ध है। यहाँ विश्व कि सबसे प्राचीन् नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष आज भी मौज़ूद है, जहाँ सुदूर देशों से छात्र अध्ययन के लिये भारत आते थे।"
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"नालन्दा महाविहार\nयह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। सातवीं सदी में जब ह्वेनसांन आया था उस समय १०,००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी।",
"नालंदा जिला\nनालंदा प्राचीन् काल का सबसे बड़ा अध्ययन केंद्र था तथा इसकी स्थापना पांँचवी शताब्दी ई० में हुई थी। दुनिया के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष बोधगया से 62 किलोमीटर दूर एवं पटना से 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित हैं। माना जाता है कि बुद्ध कई बार यहां आए थे। यही वजह है कि पांचवी से बारहवीं शताब्दी में इसे बौद्ध शिक्षा के केंद्र के रूप में भी जाना जाता था। सातवी शताब्दी ई० में ह्वेनसांग भी यहां अध्ययन के लिए आया था तथा उसने यहां की अध्ययन प्रणाली, अभ्यास और मठवासी जीवन की पवित्रता का उत्कृष्टता से वर्णन किया। उसने प्राचीनकाल के इस विश्वविद्यालय के अनूठेपन का वर्णन किया था। दुनिया के इस पहले आवासीय अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में दुनिया भर से आए 10,000 छात्र रहकर शिक्षा लेते थे, तथा 2,000 शिक्षक उन्हें दीक्षित करते थे। यहां आने वाले छात्रों में बौद्ध यात्रियों की संख्या ज्यादा थी। गुप्त राजवंश ने प्राचीन कुषाण वास्तुशैली से निर्मित इन मठों का संरक्षण किया। यह किसी आंँगन के चारों ओर लगे कक्षों की पंक्तियों के समान दिखाई देते हैं। सम्राठ अशोक तथा हर्षवर्धन ने यहां सबसे ज्यादा मठों, विहार तथा मंदिरों का निर्माण करवाया था। हाल ही में विस्तृत खुदाई यहां संरचनाओं का पता लगाया गया है। यहां पर सन् 1951 में एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शिक्षा केंद्र की स्थापना की गई थी। इसके नजदीक बिहारशरीफ है, जहां मलिक इब्राहिम बाया की दरगाह पर हर वर्ष उर्स का आयोजन किया जाता है। छठ पूजा के लिए प्रसिद्ध सूर्य मंदिर भी यहां से दो किलोमीटर दूर बडागांव में स्थित है। यहां आने वाले नालंदा के महान खंडहरों के अलावा 'नव नालंदा महाविहार संग्रहालय भी देख सकते हैं।",
"नालन्दा विश्वविद्यालय\nनालन्दा विश्वविद्यालय, राजगृह (वर्तमान राजगीर) में स्थित एक विश्वविद्यालय है।",
"आर्यभट\nभारतके इतिहास में जिसे 'गुप्तकाल' या 'स्वर्णयुग' के नाम से जाना जाता है, उस समय भारत ने साहित्य, कला और विज्ञान क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। उस समय मगध स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय ज्ञानदान का प्रमुख और प्रसिद्ध केंद्र था। देश विदेश से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए यहाँ आते थे। वहाँ खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे।",
"वृहद भारत\nसांस्कृतिक आदान-प्रदान में यहां के प्राचीन विश्वविद्यालयों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण रही है। इन्होंने बड़ी संख्या में विद्वानों और छात्रों को आकर्षित किया। विदेश से आने वाले विद्वान अक्सर नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जाते थे। कहा जाता है कि यह विश्वविद्यालय सात मंजिला था। इन विश्वविद्यालयों के शिक्षक और छात्र धर्म और विद्या के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को भी विदेश में ले गये। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्नेन-सांग ने भारत के उन सभी विश्वविद्यालयों का विस्तार से वर्णन किया है जिनमें वह गए अथवा जहां रह कर इन्होंने अध्ययन किया। उदाहरण के लिए, इनमें से दो विश्वविद्यालयों का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है - पूर्व में नालंदा ओर पश्चिम में वल्लभी। गंगा के पूर्वी तट पर एक अन्य विश्वविद्यालय था -विक्रमशिला। तिब्बती विद्वान् तारानाथ ने इसका विस्तृत वर्णन किया है। यहां के शिक्षक और विद्वान तिब्बत में इतने प्रसिद्ध थे कि कहा जाता है एक बार तिब्बत के राजा ने इस विश्वविद्यालय के प्रधान को तिब्बत में आमंत्रित करने के लिए दूत भेजे थे ताकि स्वदेशी ज्ञान ओर जन-सामान्य की संस्कृति में रुचि जगाई जा सके। बिहार में एक अन्य प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था- ओदन्तपुरी। पालवंश के राजाओं के संरक्षण में इसकी प्रतिष्ठा बढ़ी। इस विश्वविद्यालय से बहुत सारे बौद्ध भिक्षु तिब्बत में जाकर बस गए थे।",
"गुप्त राजवंश\nकुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल की प्रमुख घटनओं का निम्न विवरण है-माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण गुप्त राजा कुमारगुप्ता द्वारा किया गया था । नोलानाडा को दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय निवासी विश्वविद्यालय माना जाता है नालंदा संस्कृत शब्द 'नालम् + दा' से बना है। संस्कृत में 'नालम' का अर्थ 'कमल' होता है। कमल ज्ञान का प्रतीक है। नालम् + दा यानी कमल देने वाली, ज्ञान देने वाली। कालक्रम से यहाँ महाविहार की स्थापना के बाद इसका नाम 'नालंदा महाविहार' रखा गया।"
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कौन सा एक खरपतवारनाशी है?
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"गाजर घास\nगाजर घास या 'चटक चांदनी' (Parthenium hysterophorus) एक घास है जो बड़े आक्रामक तरीके से फैलती है। यह एकवर्षीय शाकीय पौधा है जो हर तरह के वातावरण में तेजी से उगकर फसलों के साथ-साथ मनुष्य और पशुओं के लिए भी गंभीर समस्या बन जाता है। इस विनाशकारी खरपतवार को समय रहते नियंत्रण में किया जाना चाहिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस घास को चिड़िया बाड़ी के नाम से भी पुकारते है।"
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"सांड की आँख\nसांड की आँख एक आगामी भारतीय बायोपिक फिल्म है, जो तुषार हीरानंदानी द्वारा निर्देशित और अनुराग कश्यप, रिलायंस इंटरटेनमेंट और निधि परमार द्वारा निर्मित है। फिल्म में भूमि पेडनेकर, तापसी पन्नू और प्रकाश झा मुख्य भूमिका में हैं। यह शार्पशूटर चंद्रो और प्रकाशी तोमर के जीवन पर आधारित है। बागपत में 10 फरवरी 2019 को इस फ़िल्म का फिल्मांकन शुरू हुआ। फ़िल्म के कुछ हिस्सों को हस्तिनापुर और मवाना में फिल्माया जाएगा। इसे 25 अक्टूबर 2019 को रिलीज़ किया जाना तय है। शुरुआत में भूमि पेडनेकर और तापसी पन्नू अभिनीत इस फिल्म का नाम वुमनिया तय किया गया था, लेकिन शीर्षक के कानूनी अधिकारों पर विवाद के कारण, जो कि प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस के पास हैं, फिल्म का नाम बदलकर \"सांड की आंख\" रख दिया गया। प्रकाश झा को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए कलाकारों के दल में शामिल किया गया। फरवरी 2019 के अंतिम सप्ताह में, विनीत कुमार सिंह को कलाकारों के दल में शामिल किया गया। फिल्म के विवरण देते हुए, सह निर्माता अनुराग कश्यप ने कहा कि यह फिल्म सबसे पुराने शार्पशूटर, चंद्रो तोमर और उनकी भाभी प्रकाशी तोमर के जीवन पर आधारित एक बायोपिक है।",
"शाकनाशक\nशाकनाशक, शाकनाशी या खरपतवारनाशक या अपतृणनाशी (अंग्रेजी: herbicide) ऐसे रसायन होते हैं, जिनका प्रयोग कृषि क्षेत्र में अवांछित खरपतवारों को नष्ट करने के लिये किया जाता है। विशेष शाकनाशक से सिर्फ चुने हुए खरपतवार ही नष्ट होते हैं जबकि शेष फसल को कोई नुकसान नहीं होता। अधिकतर शाकनाशक पौधे के प्राकृतिक हार्मोनों की नकल कर उसकी वृद्धि को अवरोधित करते हैं। बेकार पड़ी जमीन, औद्योगिक स्थलों, रेलवे और रेलवे तटबंध आदि को पादपमुक्त करने में प्रयुक्त शाकनाशक कुछ खास खरपतवारों को नष्ट करने की बजाए इनके संपर्क में आने वाली समूची वनस्पति का नाश कर देते हैं।",
"आखिरी पत्ता (कहानी)\nसू ने बेहरमैन को अपने अंधेरे अड्डे में पड़ा पाया। उसमें से बेर की गुठलियों-सी गन्ध आ रही थी। एक कोने में वह कोरा कनवास खड़ा था, जो उसकी उत्क्रष्ट कलाक्रति की पहिली रेखा का अंकन पाने की, पच्चीस वर्षो से बाट जोह रहा था। उसने बूढ़े को बताया कि कैसे जान्सी उन पत्तों के साथ अपने पत्ते जैसे कोमल शरीर का सम्बन्ध जोड़ कर, उनके समान बह जाने की भयभीत कल्पना करती है और सोचती है कि उसकी पकड़ संसार पर ढीली हो जायेगी।",
"खरीफ फसलों के खर-पतवार\n● खरपतवारनाशी रसायनों को की पहुंच से दूर रखे।",
"जड़त्वाघूर्णों की सूची\n||—",
"पथरचटा (खरपतवार)\nपत्थरचट्टा (वानस्पतिक नाम: ट्राइन्थिमा मोनोगाइना / Trianthema monogyna) खरीफ ऋतु का एकवर्षीय खरपतवार है। वर्षा ऋतु में यह बहुत बढता हैं व फूलता-फलता है। इसकी वृद्धि उपजाऊ तथा नम भूमि में बहुत अधिक होती है। भूमि में जड़ें गहराई तक जाती हैं। इसके तने फैलने वाले, बहुशाखीय व सरस होते हैं जिनकी लम्बाई २५-३० सेमी होती है। पत्तियां विभिन्न आकार की रसदार व मोटी होती हैं। पुष्प सलिटरी व्रत्तहीन, सफेद अथवा लालिमा युक्त होते हैं। फूल कैप्सूल के आकार का होता हैं तथा फल काले अनेक रखाओं से युक्त होते हैं।",
"टोमैटॊ खजूर खाट्टा\nटोमैटॊ खजूर खाट्टा एक उड़िया व्यंजन है।",
"शिस्पर\nशिस्पर (Shispare), जो शिस्पर सर (Batura I) और शिस्पारे सर भी कहलता है, विश्व का 38वाँ सबसे ऊँचा पर्वत है। यह काराकोरम पर्वतमाला की पश्चिमतम उपश्रेणी, बातूरा मुज़ताग़, का एक ऊँचा पहाड़ है। प्रशासनिक रूप से यह पाक-अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में आता है जिसपर भारत अपनी सम्प्रभुता का दावा करता है। शिस्पर पर्वत बातूरा मुज़ताग़ में एक रीढ़ की तरह ऊँची दीवार-सी प्रतीत होने वाली \"बातूरा दिवार\" (जो एक-के-बाद-एक पर्वतों की कतार है) से पूर्व में स्थित है।",
"द हार्टफुलनेस वे\n‘द हार्टफुलनेस वे’ के लोकार्पण तथा समीक्षाओं को कई जाने-माने अख़बार एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया है| इसे हिन्दुस्तान टाइम्स के ‘नीलसन टॉप 10 सूची में भारत में सर्वश्रेष्ठ कथेतर साहित्य /नॉन-फिक्शन चार्ट में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है| 1st जून 2018 को इसे अमेरिकी बाज़ार में प्रस्तुत किया गया तथा जल्द हीं यह ‘बार्न्स एंड नोबल’ एवं ‘अमेज़ॉन’ पर सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तक बन गयी| कई अन्तराष्ट्रीय प्रेस / संस्करणों में इसकी समीक्षाएं प्रकाशित हुई हैं|"
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जैन तीर्थंकरों के कर्म में अंतिम कौन थे?
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"प्राचीन भारत\nजैन धर्म के दो तीर्थकरों - ऋषभनाथ तथा अरिष्टनेमि- का उल्लेख ऋग्वेद में पाया जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि हड़प्पा की खुदाई में जो नग्न धड़ की मूर्ति मिली है वो किसी तीर्थकर की है। पार्श्वनाथ तेइसवें तीर्थकर तथा भगवान महावीर चौबीसवें तीर्थकर थे। वर्धमान महावीर जो कि जैनों के सबसे प्रमुख तथा अन्तिम तीर्थकर थे, का जन्म 540 ईसापूर्व के आसपास वैशाली के पास कुंडग्राम में हुआ था। 42 वर्ष की अवस्था में उन्हें कैवल्य (परम ज्ञान) प्राप्त हुआ।",
"तीर्थंकर\nब्रह्मांड के इस भाग में समय के प्रत्येक अर्ध चक्र में चौबीस (प्रत्येक पूरे चक्र में अड़तालीस) तीर्थंकर जन्म लेते हैं। वर्तमान में अवसर्पिणी (अवरोही) अर्ध चक्र में, पहले तीर्थंकर ऋषभदेव अरबों वर्ष पहले रहे और तीसरे युग की समाप्ति की ओर मोक्ष प्राप्ति की। चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी (५९९-५२७ ईसा पूर्व) थे, जिनका अस्तित्व एक ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार कर लिया गया है।",
"अरिहंत\nजैनों के णमोकार मंत्र में पंचपरमेष्ठियों में सर्वप्रथम अरिहंतो को नमस्कार किया गया है। सिद्ध परमात्मा हैं लेकिन अरिहंत भगवान लोक के परम उपकारक हैं, इसलिए इन्हें सर्वोत्तम कहा गया है। एक में एक ही अरिहंत जन्म लेते हैं। जैन आगमों को अर्हत् द्वारा भाषित कहा गया है। अरिहन्त तीर्थंकर, केवली और सर्वज्ञ होते हैं। महावीर जैन धर्म के चौबीसवें (अंतिम) तीर्थकर माने जाते हैं। बुरे कर्मों का नाश होने पर केवल ज्ञान द्वारा वे समस्त पदार्थों को जानते हैं इसलिए उन्हें 'केवली' कहा है। सर्वज्ञ भी उसे ही कहते हैं।"
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"शिखरजी\nजैन नीति शास्त्रों में वर्णन है कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से प्रथम तीर्थंकर भगवान 'आदिनाथ' अर्थात् भगवान ऋषभदेव ने कैलाश पर्वत पर, 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य ने चंपापुरी, 22वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ ने गिरनार पर्वत और 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया। शेष 20 तीर्थंकरों ने सम्मेद शिखर में मोक्ष प्राप्त किया। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ने भी इसी तीर्थ में कठोर तप और ध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया था। अत: भगवान पार्श्वनाथ की टोंक इस शिखर पर स्थित है।",
"जैन धर्म का इतिहास\nजैन मान्यता के अनुसार जैन धर्म अनादि काल से चला आया है अनंत काल तक चलता रहेगा। इस धर्म का प्रचार करने के लिये समय-समय पर अनेक तीर्थंकरों का आविर्भाव होता रहता है। जैन धर्म के २४ तीर्थंकरों में ऋषभ प्रथम और महावीर अंतिम तीर्थंकर थे।",
"हिन्दू देवी-देवता\nजैनियों के देववाद में तीर्थंकर प्रमुख है। इनकी संख्या चौबीस है। मूर्तिविधान की दृष्टि से इनमें परस्पर भेद नहीं होता। जैन तीर्थंकरो को सामान्यतया आजानबाहु, शांत, निर्वस्त्र और श्रीवत्स चिन्ह से अंकित दिखाया गया है। जैन तीर्थंकरों में परस्पर भेद उनके ध्वज, वर्ण, शासन, देवता, देवी, यक्ष यक्षिणी, केवल वृक्ष तथा चामरधारी या चामरधारिणी के अधार पर प्रदर्शित किया जाता है। सभी जिन प्रतिमाएँ अशोकद्रुम सहित प्रदर्शित होनी चाहिए। इनके अतिरिक्त जैन मूर्तियों के अन्य आवश्यक तत्व, तीन छत्र, तोरणयुक्त तीन रथिकाएँ, देवदुंदुभि, अष्ट परिवार, सुरगज सिंह आदि से विभूषित सिंहासन गो, सिंह आदि से अलंकृत वाहिका, तोरण और रथिकाओं पर ब्रम्हा, विष्णु, चंडिका, गौरी, गणेश आदि की प्रतीमाएँ है। कभी कभी मुख्य तीर्थकर के साथ अन्य तेईस तीर्थंकर भी गौण रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं।",
"कुलकर\nजैन धर्म में कुलकर उन बुद्धिमान पुरुषों को कहते हैं जिन्होंने लोगों को जीवन निर्वाह के श्रमसाध्य गतिविधियों को करना सिखाया। जैन ग्रन्थों में इन्हें मनु भी कहा गया है। जैन काल चक्र के अनुसार जब अवसर्पिणी काल के तीसरे भाग का अंत होने वाला था तब दस प्रकार के कल्पवृक्ष (ऐसे वृक्ष जो इच्छाएँ पूर्ण करते है) कम होने शुरू हो गए थे, तब १४ महापुरुषों का क्रम क्रम से अंतराल के बाद जन्म हुआ। इनमें अंतिम कुलकर नाभिराज थे, जो प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पिता थे।",
"जैन धर्म\nअहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। इसे बड़ी सख्ती से पालन किया जाता है खानपान आचार नियम मे विशेष रुप से देखा जा सकता है। जैन दर्शन में कण कण स्वतंत्र है इस सॄष्टि का या किसी जीव का कोई कर्ताधर्ता नही है। सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगते है। जैन दर्शन में भगवान न कर्ता और न ही भोक्ता माने जाते हैं। जैन दर्शन मे सृष्टिकर्ता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। जैन धर्म में अनेक शासन देवी-देवता हैं पर उनकी आराधना को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता। जैन धर्म में तीर्थंकरों जिन्हें जिनदेव, जिनेन्द्र या वीतराग भगवान कहा जाता है इनकी आराधना का ही विशेष महत्व है। इन्हीं तीर्थंकरों का अनुसरण कर आत्मबोध, ज्ञान और तन और मन पर विजय पाने का प्रयास किया जाता है।",
"जैन मूर्तियाँ\nजैन धर्म के अनुयाइयों द्वारा पूजनीय मूर्तियां जैन मूर्तियां कहलाती है। जैन धर्मावलम्बियों द्वारा २४ तीर्थंकरों की मूर्तियाँ या प्रतिमाएँ पूजी जाती हैं। जैन तीर्थंकरों के वक्ष के मध्य में श्रीवत्स होता है। प्रायः सिर के ऊपर तीन छत्र होते हैं। जैन धर्म के देवताओं में 21 लक्षणों का वर्णन आता है। जिसमें धर्म, चक्र, चँवर, सिंहासन, तीन क्षत्र, अशोक वृक्ष आदि प्रमुख है।",
"जैन समुदाय\nभारतीय जैन श्रमण परम्परा के अंतिम प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं। जैन जैन धर्म के अनुयायी हैं जो धार्मिक निष्ठा के उन चौबीस प्रवर्तकों द्वारा बताया गया जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है।"
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राजस्थानी विचारधारा की चित्रकला का आरम्भिक मुख्य केंद्र था?
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"राजस्थान की चित्रकला\nमारू गुर्जर चित्रकला राजस्थान का प्राचीन कला है जो ६ठी शताब्दी के आरम्भिक दिनों में राजस्थान और उसके आसपास के क्षेत्रों में विकसित हुई। राजस्थान की वास्तुकला के अलावा, राजस्थान की दृश्य कला के सबसे उल्लेखनीय रूप मध्यकालीन युग में हिंदू और जैन मंदिरों पर स्थापत्य मूर्तिकला, धार्मिक ग्रंथों के चित्रण में, मध्ययुगीन काल के अंत में और मुगल के बाद की लघु पेंटिंग हैं। प्रारंभिक आधुनिक काल में, जहां विभिन्न विभिन्न दरबारी विद्यालयों का विकास हुआ, जिन्हें एक साथ राजपूत चित्रकला के रूप में जाना जाता है। दोनों ही मामलों में, राजस्थानी कला में गुजरात के पड़ोसी क्षेत्र की कई समानताएं थीं, दोनों \"पश्चिमी भारत\" के अधिकांश क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जहां कलात्मक शैली अक्सर एक साथ विकसित होती है।"
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"मालवा शैली\nमालवा चित्रकला 17वीं सदी में पुस्तक चित्रण की राजस्थानी शैली है जिसका केंद्र मुख्यतः मालवा और बुंदेलखंड थे। भौगोलिक विस्तार की दृष्टि से इसे कई बार 'मध्य भारतीय चित्रकला' भी कहते हैं।",
"राजस्थान की चित्रकला\nराजस्थान की अधिकांश आबादी हिंदू है, और ऐतिहासिक रूप से काफी संख्या में जैन अल्पसंख्यक रहे हैं; यह मिश्रण क्षेत्र के कई मंदिरों में परिलक्षित होता है। मारू-गुर्जर वास्तुकला, या \"सोलंकी शैली\" एक विशिष्ट शैली है जो 11 वीं शताब्दी के आसपास राजस्थान और पड़ोसी गुजरात में शुरू हुई, और इसे पुनर्जीवित किया गया और हिंदुओं और जैन दोनों द्वारा भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में ले जाया गया। यह हिंदू मंदिर वास्तुकला में क्षेत्र के मुख्य योगदान का प्रतिनिधित्व करता है। 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर इस शैली के सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हैं।",
"राजस्थान की चित्रकला\nअजमेर में अढ़ाई दिन का झोंपरा मस्जिद (अब धार्मिक उपयोग में नहीं है) एक राज्य में भारत-इस्लामी वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक उदाहरण है जो इसके लिए अन्यथा उल्लेखनीय नहीं है; हालांकि अजमेर शरीफ दरगाह एक और प्रारंभिक इमारत है। हालांकि, महलों और घरों में मुगल वास्तुकला से काफी प्रभाव है, और राजस्थान का कुछ दावा है कि झरोखा संलग्न बालकनी और छतरी खुले मंडप जैसे तत्वों में प्रभाव वापस भेज दिया गया है।",
"राजपूत शैली\nभौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर राजपूत चित्रकला को चार शैलियों में विभक्त कर सकते हैं। एक शैली में एक से अधिक उपशैलियाँ हैं-राजस्थान भित्ति चित्रों की दृष्टि से बहुत समृद्ध प्रदेश है। यहाँ भवन के मुख्य द्वार पर गणपती ,द्वार के दोनों ओर भारी आकृतियाँ ,अश्वारोही ,लड़ते हुए हाथी ,सेवक ,दौड़ते ऊँट ,रथ ,घोड़े आदि देखे जाते है। राजस्थान में भित्ति चित्रों को चिरकाल तक जीवित रखने के लिए एक विशेष आलेखन पद्धति है , जिसे आराइश कहते हैं।",
"राजस्थान की चित्रकला\nराजस्थान की वास्तुकला आमतौर पर उस समय उत्तर भारत में प्रचलित भारतीय वास्तुकला की शैली का एक क्षेत्रीय रूप रही है। राजस्थान कई राजपूत शासकों के किलों और महलों के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण हैं।",
"राजपूत शैली\nराजपूत चित्रशैली का पहला वैज्ञानिक विभाजन आनन्द कुमार स्वामी ने किया था। उन्होंने 1916 में ‘राजपूत पेन्टिंग’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने राजपूत पेन्टिंग में पहाड़ी चित्रशैली को भी शामिल किया। इस शैली के अन्तर्गत केवल राजस्थान की चित्रकला को ही स्वीकार करते हैं। वस्तुतः राजस्थानी चित्रकला से तात्पर्य उस चित्रकला से है, जो इस प्रान्त की धरोहर है और पूर्व में राजस्थान में प्रचलित थी।",
"पाल शैली\nयह एक प्रमुख भारतीय चित्रकला शैली हैं। ९वीं से १२वीं शताब्दी तक बंगाल में पालवंश के शासकों धर्मपाल और देवपाल के शासक काल में विशेष रूप से विकसित होने वाली चित्रकला पाल शैली थी। पाल शैली की विषयवस्तु बौद्ध धर्म से प्रभावित रही हैं। इस शैली के विषय बौद्ध व जैन कथाएं थी। इसके दो केंद्र थे –1पश्चिमी भारत जिसमे मुख्यत गुजरात व राजस्थान थे तथा 2उतरी –पूर्वी शैली का केंद्र बना बिहार तथा बंगाल । तथा इस शैली की मुख्य पहचान है –गरुड़ की सी आगे निकली हुई नाक, पतली आंखे, छोटी ठुड्डी , ऐंठी अंगुलिया, पतली कमर इत्यादि।",
"राजस्थान की आधुनिक कला (१९६० से २०१० तक)\nकथाकार-चित्रकार \"राम जैसवाल\" (1937) के जलरंग-चित्रों में (बंगाल शैली के प्रभाव के साथ) प्रकृति के भिन्न-भिन्न स्वरूप आकार ग्रहण करते हैं। लेखन, खास तौर पर कहानी के क्षेत्र में वह पांच कहानी संग्रहों और एक कविता-संग्रह के लेखक हैं। अपने आरम्भिक शिक्षक दौर में वह पहले मेरठ गए, बाद में लखनऊ के कॉलेज ऑफ आर्ट में अध्यापन से जुड़ गये। 1964 में वह राजस्थान में स्नात्कोत्तर स्तर पर कला का अध्यापन शुरू होने के बाद दयानन्द कॉलेज, अजमेर में प्राध्यापक पद पर आ गए और तब इन्होंने यहां आ कर मौसमों, वृक्षावलियों, स्थानीय पहाड़ों, घरों, जानवरों, बाजारों, गलियों और रोजमर्रा के दृश्यों का वाश-शैली में चित्रण किया। उन्होंने न केवल भारतीय देवी-देवताओं को ही रंगों में उतारा, पर जयशंकर ‘प्रसाद‘ की कुछ कविताओं पर आधारित कल्पनाशील चित्र भी बनाये। अपने व्यक्तिचित्रों को लेकर इन्हें कला-जगत में खास जगह और पहचान मिली। अजमेर में जैसवाल ने जलरंग चित्रण की बहुत सी बारीकियों का स्पर्श करते हुए कई सैरे और पोर्टेट रचे, किन्तु राम जैसवाल की प्रतिभा पर परम्परागत बंगाल और लखनऊ घरानों के अंकन का प्रभाव ही ज्यादा मुखर रहा। वह हमेशा से एक सुन्दर फलक दर्शक को उपलब्ध कराने के लिए सचेत रहे हैं, भले ही कथित आधुनिकता के नाम पर उन्होंने ‘स्ट्रीट सिंगर्स‘ या ‘नीतिज्ञ‘ जैसे कुछ एक चित्र भी बनाए हों।",
"राजपूत शैली\n(9) मुगल दरबार की अपेक्षा राजस्थान के चित्रकारों को अधिक स्वतन्त्रता थी। यही कारण था कि राजस्थानी चित्रकला में आम जनजीवन तथा लोक विश्वासों को अधिक अभिव्यक्ति मिली।"
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ग्रेट बेरियर रीफ किस देश में है?
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"ग्रेट बैरियर रीफ\nग्रेट बैरियर रीफ, क्वींसलैंड (आस्ट्रेलिया) के उत्तरी-पूर्वी तट के समांतर बनी हुई, विश्व की यह सबसे बड़ी मूँगे की दीवार है। इसे पानी का बगीचा भी कहते हैं ।इस दीवार की लंबाई लगभग १,२०० मील तथा चौड़ाई १० मील से ९० मील तक है। यह कई स्थानों पर खंडित है एवं इसका अधिकांश भाग जलमग्न है, परंतु कहीं-कहीं जल के बाहर भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। महाद्वीपीय तट से इसकी दूरी १० से १५० मील तक है। समुद्री तूफान के समय अनेक पोत इससे टक्कर खाकर ध्वस्त हो जाते हैं। फिर भी, यह पोतचालकों के लिये विशेष सहायक है, क्योंकि दीवार के भीतर की जलधारा इस बृहत शैलभित्ति (reef) द्वारा सुरक्षित रहकर तटगामी पोतों के लिये अति मूल्यवान् परिवहन मार्ग बनाती है तथा पोत इसमें से गुजरने पर खुले समुद्री तूफानों से बचे रहते हैं। महाद्वीपीय तट तथा अवशेषी शैल भित्ति (barrier reef) के बीच का क्षेत्र (८०,००० वर्ग मील) पर्यटकों के लिये अत्यंत आकर्षक स्थल है। जलवायु परिवर्तन के बुरे असर से ग्रेट बैरियर रीफ के बचने की संभावना बहुत कम है और ऐसी आशंका है कि २०५० तक रीफ पूरी तरह नष्ट हो जएगी।"
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"ग्रेट बियर झील\nग्रेट बेयर झील (स्लाव: \"सहतु\"; फ्रेंच: \"ग्रांड लैक डी'ऑर्स\"), उत्तरी अमेरिका के बोरियल जंगल की एक झील है। यह पूरी तरह से कनाडा में स्थित वहां की सबसे बड़ी झील है (सुपीरियर झील और ह्यूरॉन झील कनाडा-अमेरिकी सीमा पर हैं)। यह उत्तरी अमेरिका में चौथी सबसे बड़ी और दुनिया में आठवीं सबसे बड़ी झील है। झील उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में, आर्कटिक सर्कल पर उत्तरी अक्षांश के 65 और 67 डिग्री और समुद्र तल से 118 और 123 डिग्री पश्चिमी देशांतर के बीच, समुद्र तल से 156 मीटर (512 फीट) ऊपर स्थित है।",
"ग्रेट बियर झील\nझील के दक्षिण में साहोएयू (ग्रिजली बियर माउंटेन) प्रायद्वीप और पश्चिम की ओर एडाचो (सुगंधित घास की पहाड़ियाँ) प्रायद्वीप कनाडा के सायू-डेह्डाको राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल के रूप में है।",
"बर्गर किंग\nबर्गर किंग, जिसे अक्सर संक्षेप में बीके कहा जाता है, हैमबर्गर फास्ट फूड रेस्तरां की एक वैश्विक श्रृंखला है जिसका मुख्यालय अनिगमित मियामी-डेड काउंटी, फ्लोरिडा, अमेरिका में है। इस कंपनी की शुरुआत 1953 में एक जैक्सनविल, फ्लोरिडा आधारित रेस्तरां श्रृंखला के रूप में हुई थी जिसे मूलतः इंस्टा-बर्गर किंग के नाम से जाना जाता था। 1955 में वित्तीय कठिनाइयों से गुजरने के बाद इस कंपनी की दो मियामी आधारित फ्रेंचाइजी डेविड एडगरटन और जेम्स मैकलामोर ने कंपनी को खरीद लिया और इसका नाम बर्गर किंग रखा। अगली आधी शताब्दी में इस कंपनी के स्वामित्व में चार बार बदलाव हुआ; और इसके मालिकों के तीसरे समूह अर्थात् टीपीजी कैपिटल, बेन कैपिटल और गोल्डमैन साक्स कैपिटल पार्टनर्स की एक भागीदारी ने 2002 में इस कंपनी को सार्वजनिक कर दिया गया। वर्तमान में इसका स्वामित्व ब्राजील के 3जी कैपिटल के पास है जिसने 2010 के अंतिम दौर में मूल्य के एक सौदे में कंपनी के ज्यादातर शेयरों को हासिल कर लिया।",
"ग्लेशियर नेशनल पार्क\nग्लेशियर नेशनल पार्क (; उच्चा.: ग्लेशियर नेशनल पार्क) अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान है, जो कि कनाडा-संयुक्त राज्य अमेरिका की सीमा पर स्थित है। उद्यान संयुक्त राज्य के उत्तर-पश्चिमी मोंटाना राज्य में स्थित है और कनाडा की ओर अल्बर्टा और ब्रिटिश कोलम्बिया प्रांतों से सटा हुआ है। उद्यान दस लाख एकड़ (4,000 किमी) से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है और इसमें दो पर्वत श्रृंखला (रॉकी पर्वत की उप-श्रेणियाँ), 130 से अधिक नामित झीलें, 1,000 से अधिक विभिन्न पौधों की प्रजातियाँ और सैकड़ों वन्यजीवों की प्रजातियाँ शामिल हैं। इस विशाल प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र को जो कि 16,000 वर्ग मील (41,000 किमी) में शामिल संरक्षित भूमि का भाग है, \"क्राउन ऑफ़ द कॉन्टिनेंट इकोसिस्टम\" के रूप में संदर्भित किया गया है।",
"रॉक गन बैटरी\nरॉक गन बैटरी () ब्रिटिश प्रवासी शासित प्रदेश जिब्राल्टर में स्थित तोपखाने की बैटरी है। यह रॉक ऑफ़ जिब्राल्टर के उत्तरी मुख पर अपर रॉक नेचर रिजर्व के उत्तरी सिरे पर ग्रीन्स लोज बैटरी के ऊपर स्थित है। यह जिब्राल्टर की महान घेराबंदी बनाई गई थी चूँकि रणनीतिक तौर पर यह लाभप्रद स्थान पर है और ग्रीन्स लोज बैटरी से ज्यादा सफ़ल थी। महान घेराबंदी के दौरान इसका प्रभावशाली रूप से उपयोग हुआ था तथा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसका पुनः निर्माण किया गया। बीसवी शताब्दी के मध्य में यूनाईटेड किंगडम के रक्षा मंत्रालय इसका हवाई फ़ार्म के तौर पर इस्तेमाल करने लगा और 1958 में इसका ढ़ाचागत सुधार भी कराया।",
"बर्जर पेंट्स\nबर्जर पेंट्स लिमिटेड एक भारतीय बहुराष्ट्रीय पेंट कंपनी है, जो कोलकाता, बंगाल, भारत में स्थित है। इस कंपनी की भारत में 16 विनिर्माण इकाइयां हैं, नेपाल में 2, पोलैंड और रूस में 1-1 इकाइयां हैं। हावड़ा और रिशरा, अरिनसो, तलोजा, नलटोली, गोवा, देवला, हिंदुपुर, जेजुरी, जम्मू, पुडुचेरी और उद्योगनगर में इसकी विनिर्माण इकाइयां हैं। कंपनी की मौजूदगी पांच देशों- भारत, रूस, पोलैंड, नेपाल और बांग्लादेश में है। उनके पास 3,600 से अधिक कर्मचारी हैं और 25,000+ डीलरों का देशव्यापी वितरण नेटवर्क है।",
"बेल्वेडियर एस्टेट\nबेल्वेडियर एस्टेट, भारत के राज्य पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित एक ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। बेल्वेडियर एस्टेट परिसर में \"बेल्वेडियर हाउस\" है, जिसमें 1948 से भारत का राष्ट्रीय पुस्तकालय कार्यरत है। बेल्वेडियर एस्टेट में बेल्वेडियर हाउस के अलावा एक 30 एकड़ (12 हेक्टेयर) का मैदान भी है। यह कोलकाता के इलाके अलीपुर में, कोलकाता चिड़ियाघर के निकट स्थित है। राष्ट्रीय पुस्तकालय की शुरुआत से पहले बेल्वेडियर हाउस भारत के वायसराय और उसके बाद में बंगाल के राज्यपाल का आधिकारिक निवास भी था।",
"कोरल सागर\nकोरल सागर (Coral Sea) दक्षिणी प्रशांत महासागर का एक सीमांत सागर है, जो ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तट पर यॉर्क अंतरीप प्रायद्वीप से पूर्वोत्तर में स्थित है। इसके पश्चिम में क्वीन्सलैण्ड का पूर्वी तट है और पूर्व में वानूआतू स्थित है। पश्चिमोत्तर में यह पूर्वी नया गिनी के दक्षिण तट से मिलता है और टोरेस जलसन्धि द्वारा आराफ़ूरा सागर से जुड़ा हुआ है। पूर्व में यह प्रशांत महासागर और सोलोमन सागर से जुड़ा हुआ है। विश्व-प्रसिद्ध ग्रेट बैरियर रीफ, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवाल शैल-श्रेणी मंडल है, कोरल सागर में ही स्थित है।",
"नॉर्थ फ्रंट सिमेट्री\nनॉर्थ फ्रंट सिमेट्री औबेरियन प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर पर ब्रिटिश प्रवासी क्षेत्र जिब्राल्टर के उत्तरी जिले में स्थित है। यह रॉक ऑफ़ जिब्राल्टर के उत्तरी चेहरे से दक्षिण तक और जिब्राल्टर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उत्तर तक के बीच के हिस्से में स्थित है। जिब्राल्टर सिमेट्री और गैरीसन सिमेट्री के नामों से भी इस कब्रिस्तान को जाना जाता है। यह 1756 में तटस्थ मैदान और स्पेन के साथ सीमा के दक्षिण में स्थापित किया गया था। निवर्तमान समय में यह कब्रिस्तान जिब्राल्टर में दफनाने के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला एकमात्र कब्रिस्तान है।"
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कुतुबमीनार का आखिरी भाग कैसे बनाया गया था?
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"क़ुतुब मीनार\nअफ़गानिस्तान में स्थित, जाम की मीनार से प्रेरित एवं उससे आगे निकलने की इच्छा से, दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक क़ुतुबुद्दीन ऐबक, ने सन ११९३ में आरंभ करवाया, परंतु केवल इसका आधार ही बनवा पाया। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसमें तीन मंजिलों को बढ़ाया और सन १३६८ में फीरोजशाह तुगलक ने पाँचवीं और अंतिम मंजिल बनवाई । मीनार को लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है, जिस पर कुरान की आयतों की एवं फूल बेलों की महीन नक्काशी की गई है।"
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"१२२६\nकुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा कुतुबमीनार बनवाई गयी",
"दिल्ली के दर्शनीय स्थल\nकुतुब मीनार का निर्माण कुतुब-उद-दीन ऐबक ने 1199 में शुरू करवाया था और इल्तुमिश ने 1368 में इसे पूरा कराया। इस इमारत का नाम ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। ऐसा माना जाता है कि इसका प्रयोग पास बनी मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहां से अजान दी जाती थी। लाल और हल्के पीले पत्थर से बनी इस इमारत पर कुरान की आयतें लिखी हैं। कुतुबमीनार मूल रूप्ा से सात मंजिल का था लेकिन अब यह पांच मंजिल का ही रह गया है। कुतुब मीनार की कुल ऊँचाई 72.5 मी. है और इसमें 379 सीढ़ियां हैं। समय-समय पर इसकी मरम्मत भी हुई हैं। जिन बादशाहों ने इसकी मरम्मत कराई उनका उल्लेख इसकी दीवारों पर मिलता है। कुतुब मीनार परिसर में और भी कई इमारते हैं। भारत की पहली कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलई दरवाजा और इल्तुमिश का मकबरा भी यहां बना हुआ है। मस्जिद के पास ही चौथी शताब्दी में बना लौहस्तंभ भी है जो पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है",
"चारमीनार\nचारमीनार ग्रेनाइट, चूना पत्थर, मोर्टार और चूर्णित संगमरमर से बना है। शुरूआत में इसके चार मेहराब के साथ स्मारक के लिए ऐसी सटीक योजना बनाई थी कि जब चारमीनार खोला गया था तब प्रत्येक मेहराब से हैदराबाद शहर के चारों कोनों की झलक मिलती थी, क्योंकि प्रत्येक मेहराब किसी एक सबसे सक्रिय शाही पैतृक सड़कों के सामने था। वहाँ भी एक भूमिगत सुरंग चारमीनार, संभवतः एक घेराबंदी के मामले में कुतुब शाही शासकों के लिए एक भागने मार्ग के रूप में इरादा गोलकुंडा को जोड़ने के एक किंवदंती है, हालांकि सुरंग के स्थान अज्ञात है।",
"महरौली\nवास्तुकला का सबसे दृश्यमान हिस्सा कुतुब मीनार है जो प्राचीन हिन्दू और बौद्ध मंदिरों पर बनाया गया था जिसे क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने शुरू किया था। बाद में इसमें इल्तुतमिश और अलाउद्दीन खिलजी द्वारा विकास किया गया था। कुतुब परिसर आज यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है। कुतुब मीनार से सटे मंदिरों के कई स्तंभ हैं लेकिन वे क्षतिग्रस्त स्थिति में हैं। 13वीं शताब्दी के सूफी संत ख्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी का मकबरा भी कुतुब मीनार परिसर के पास स्थित है। दरगाह परिसर में बाद के मुगल सम्राटों, बहादुर शाह प्रथम, शाह आलम द्वितीय और अकबर द्वितीय की कब्रें हैं। दरगाह के बाईं ओर एक छोटी मस्जिद मोती मस्जिद है जिसे औरंगजेब के बेटे बहादुर शाह प्रथम द्वारा निजी प्रार्थना के लिए बनाया गया था।",
"चारमीनार\n2007 में, हैदराबादी पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमानों के एक छोटे से छोटा कराची में बहादुराबाद पड़ोस के मुख्य क्रासिंग पर चारमीनार के अर्ध प्रतिकृति का निर्माण किया।",
"क़ुतुब मीनार\nकुवत उल इस्लाम मस्जिद मीनार के उत्तर - पूर्व ने स्थित है, जिसका निर्माण क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने ए डी 1198 के दौरान कराया था। यह दिल्ली के सुल्तानों द्वारा निर्मित सबसे पुरानी ढह चुकी मस्जिद है। इसमें नक्काशी वाले खम्भों पर उठे आकार से घिरा हुआ एक आयातकार आंगन है और ये 27 हिन्दु तथा जैन मंदिरों के वास्तुकलात्मक सदस्य हैं, जिन्हें क़ुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा नष्ट कर दिया गया था, जिसका विवरण मुख्य पूर्वी प्रवेश पर खोदे गए शिला लेख में मिलता है। आगे चलकर एक बड़ा अर्ध गोलाकार पर्दा खड़ा किया गया था और मस्जिद को बड़ा बनाया गया था। यह कार्य शम्स उद्दीन इतुतमिश ( ए डी 1210-35) द्वारा और अला उद्दीन खिलजी द्वारा किया गया था।",
"कीर्ति स्तम्भ\nचित्तौड़ के महाराण कुंभा ने गुजरात नरेश महमूद को पराजित करने के बाद चित्तौड़ के किले में एक विशाल कीर्तिस्तंभ का निर्माण करवाया था। यह कीर्तिस्तंभ अपने वास्तुशिल्प के साथ साथ देवप्रतिमाओं के अलंकरण के कारण विशेष महत्व रखता है। कुतुबमीनार के संबंध में भी समझा जाता है कि वह कीर्तिस्तंभ है।",
"दखमा\nमुंबई के मालाबार हिल पर एक टावर ऑफ साइलेंस स्थित है। मालाबार हिल्स मुंबई का सबसे पॉश इलाका है। यह चारों ओर से घने जंगल से घिरा हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि इसका निर्माण 19 वीं सदी में हुआ था। टावर ऑफ़ साइलेंस में केवल एक ही लोहे का दरवाज़ा है। टावर का ऊपरी हिस्सा खुला रहता हैं, जहां शवों को रखा जाता है। यहाँ सिर्फ पारसियों के शवों को रखा जाता है क्योंकि उनका मानना है कि आग, पानी बहुत पवित्र है; इन्हें अपवित्र नहीं करना चाहिए इसलिए वह अपनों का शरीर पशु, पक्षी, जानवर, आकाश के हवाले कर देते हैं।",
"इल्तुतमिश\nस्थापत्य कला के अन्तर्गत इल्तुतमिश ने कुतुबुद्दीन ऐबक के निर्माण कार्य (कुतुबमीनार) को पूरा करवाया। भारत में सम्भवतः पहला मक़बरा निर्मित करवाने का श्रेय भी इल्तुतमिश को दिया जाता है। इल्तुतमिश ने बदायूँ की जामा मस्जिद एवं नागौर में अतारकिन के दरवाज़ा का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली में एक विद्यालय की स्थापना की। इल्तुतमिश का मक़बरा दिल्ली में स्थित है, जो एक कक्षीय मक़बरा है।"
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अंगूर में फलों के गिरने को रोकने के लिये कौन सा रसायन उपयुक्त है?
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"अंगूर\nअंगूर एक बलवर्द्धक एवं सौन्दर्यवर्धक फल है। अंगूर फल माँ के दूध के समान पोषक है। फलों में अंगूर सर्वोत्तम माना जाता है। यह निर्बल-सबल, स्वस्थ-अस्वस्थ आदि सभी के लिए समान उपयोगी होता है। बहुत से ऐसे रोग हैं जिसमें रोगी को कोई पदार्थ नहीं दिया जाता है। उसमें भी अंगूर फल दिया जा सकता है। पका हुआ अंगूर तासीर में ठंडा, मीठा और दस्तावर होता है। यह स्पर को शुद्ध बनाता है तथा आँखों के लिए हितकर होता है। अंगूर वीर्यवर्घक, रक्त साफ करने वाला, रक्त बढ़ाने वाला तथा तरावट देने वाला फल है। अंगूर में जल, शर्करा, सोडियम, पोटेशियम, साइट्रिक एसिड, फलोराइड, पोटेशियम सल्फेट, मैगनेशियम और लौह तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। अंगूर ह्वदय की दुर्बलता को दूर करने के लिए बहुत गुणकारी है। ह्वदय रोगी को नियमित अंगूर खाने चाहिए। अंगूर के सेवन से फेफड़े में जमा कफ निकल जाता है, इससे खाँसी में भी आराम आता है। अंगूर जी मिचलाना, घबराहट, चक्कर आने वाली बीमारियों में भी लाभदायक है। श्वास रोग व वायु रोगों में भी अंगूर का प्रयोग हितकर है। नकसीर एवं पेशाब में होने वाली रुकावट में भी हितकर है। अंगूर का शरबत तो \"\"अमृत तुल्य\"\" है। शरीर के किसी भी भाग से रक्त स्राव होने पर अंगूर के एक गिलास ज्यूस में दो चम्मच शहद घोलकर पिलाने पर रक्त की कमी को पूरा किया जा सकता है जिसकी कि रक्तस्राव के समय क्षति हुई है। अंगूर का गूदा \" ग्लूकोज व शर्करा युक्त \" होता है। विटामिन \"ए\" पर्याप्त मात्रा में होने से अंगूर का सेवन \" भूख \" बढाता है, पाचन शक्ति ठीक रखता है, आँखों, बालों एवं त्वचा को चमकदार बनाता है। हार्ट-अटैक से बचने के लिए बैंगनी (काले) अंगूर का रस \"एसप्रिन\" की गोली के समान कारगर है। \"एसप्रिन\" खून के थक्के नहीं बनने देती है। बैंगनी (काले) अंगूर के रस में \" फलोवोनाइडस \" नामक तत्व होता है और यह भी यही कार्य करता है। पोटेशियम की कमी से बाल बहुत टूटते हैं। दाँत हिलने लगते हैं, त्वचा ढीली व निस्तेज हो जाती है, जोडों में दर्द व जकड़न होने लगती है। इन सभी रोगों को अंगूर दूर रखता है। अंगूर फोडे-फुन्सियों एवं मुहासों को सुखाने में सहायता करता है। अंगूर के रस के गरारे करने से मुँह के घावों एवं छालों में राहत मिलती है। एनीमिया में अंगूर से बढ़कर कोई दवा नहीं है। उल्टी आने व जी मिचलाने पर अंगूर पर थोड़ा नमक व काली मिर्च डालकर सेवन करें। पेट की गर्मी शांत करने के लिए 20-25 अंगूर रात को पानी में भिगों दे तथा सुबह मसल कर निचोडें तथा इस रस में थोड़ी शक्कर मिलाकर पीना चाहिए। गठिया रोग में अंगूर का सेवन करना चाहिए। इसका सेवन बहुत लाभप्रद है क्योंकि यह शरीर में से उन तत्वों को बाहर निकालता है जिसके कारण गठिया होता है। अंगूर के सेवन से हड्डियाँ मजबूत होती हैं। अंगूर के पत्तों का रस पानी में उबालकर काले नमक मिलाकर पीने से गुर्दो के दर्द में भी बहुत लाभ होता है। भोजन के आघा घंटे बाद अंगूर का रस पीने से खून बढ़ता है और कुछ ही दिनों में पेट फूलना, बदहजमी आदि बीमारियों से छुटकारा मिलता है। अंगूर के रस की दो-तीन बूंद नाक में डालने से नकसीर बंद हो जाती है।",
"भारत में अंगूर की खेती\nअंगूर की फसल में प्रोजिब इजी का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है. पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए. प्रोजिब इजी के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है. यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है. फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है. यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 – 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं."
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"भारत में अंगूर की खेती\nफसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है. अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं. अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 – 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 – 15 गुच्छे छोड़े जाएं. अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें.",
"आँवला\nइसके फल पूरा पकने के पहले व्यवहार में आते हैं। वे ग्राही (पेटझरी रोकनेवाले), मूत्रल तथा रक्तशोधक बताए गए हैं। कहा गया है, ये अतिसार, प्रमेह, दाह, कँवल, अम्लपित्त, रक्तपित्त, अर्श, बद्धकोष्ठ, वीर्य को दृढ़ और आयु में वृद्धि करते हैं। मेधा, स्मरणशक्ति, स्वास्थ्य, यौवन, तेज, कांति तथा सर्वबलदायक औषधियों में इसे सर्वप्रधान कहा गया है। इसके पत्तों के क्वाथ से कुल्ला करने पर मुँंह के छाले और क्षत नष्ट होते हैं। सूखे फलों को पानी में रात भर भिगोकर उस पानी से आँख धोने से सूजन इत्यादि दूर होती है। सूखे फल खूनी अतिसार, आँव, बवासरी और रक्तपित्त में तथा लोहभस्म के साथ लेने पर पांडुरोग और अजीर्ण में लाभदायक माने जाते हैं। आँवला के ताजे फल, उनका रस या इनसे तैयार किया शरबत शीतल, मूत्रल, रेचक तथा अम्लपित्त को दूर करनेवाला कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार यह फल पित्तशामक है और संधिवात में उपयोगी है। ब्राह्मरसायन तथा च्यवनप्राश, ये दो विशिष्ट रसायन आँवले से तैयार किए जाते हैं। प्रथम मनुष्य को नीरोग रखने तथा अवस्थास्थापन में उपयोगी माना जाता है तथा दूसरा भिन्न-भिन्न अनुपानों के साथ भिन्न-भिन्न रोगों, जैसे हृदयरोग, वात, रक्त, मूत्र तथा वीर्यदोष, स्वरक्षय, खाँसी और श्वासरोग में लाभदायक माना जाता है।",
"अंगूर\nअंगूर (संस्कृत: \"द्राक्षा\") एक फल है। अंगूर एक बलवर्द्धक एवं सौन्दर्यवर्धक फल है। अंगूर फल माँ के दूध के समान पोषक है। फलों में अंगूर सर्वोत्तम माना जाता है। यह निर्बल-सबल, स्वस्थ-अस्वस्थ आदि सभी के लिए समान उपयोगी होता है। ये अंगूर की बेलों पर बड़े-बड़े गुच्छों में उगता है। अंगूर सीधे खाया भी जा सकता है,",
"भारत में अंगूर की खेती\nअंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए. शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं. फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए. उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें. पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें. अंगूर के अच्छे रख – रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 – 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं. परलेट किस्म के 14 – 15 साल के बगीचे से 30 – 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 – 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है.",
"भारत में अंगूर की खेती\nछंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए. शेष मात्र फल लगने के बाद दें. खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें. खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें.",
"भारत में अंगूर की खेती\nयह किस्म कर्नाटक में उगाई जाती है। बेरियां पतली त्वचा वाली छोटी आकार की, गहरे बैंगनी, अंडाकार और बीजदार वाली होती है। इसका रस बैंगनी रंग वाला, साफ और आनन्दमयी सुगंधित 16-18% टीएसएस वाला होता है। फल अच्छी क्वालिटी का होता है और इसका उपयोग मुख्यत: जूस और शराब बनाने में होता है। यह एन्थराकनोज से प्रतिरोधी है लेकिन कोमल फफूदी के प्रति अतिसंवेदनशील है।",
"सिरका\nसिरके के बनने में शर्करा ही आधार है क्योंकि शर्करा ही पहले ऐंजाइमों से किण्वित होकर मदिरा बनती है और बाद में उपयुक्त जीवाणुओं से एसिटिक अम्ल में किण्वित होती है। अंगूर, सेब, संतरे, अनन्नास, जामुन तथा अन्य फलों के रस, जिनमें शर्करा पर्याप्त है, सिरका को तैयार करने के लिए बहुत उपयुक्त हैं क्योंकि उनमें जीवाणुओं के लिए पोषण पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होते हैं। फलशर्करा और द्राक्ष-शर्करा का ऐसीटिक अम्ल में रासायनिक परिवर्तन निम्नलिखित सूत्रों से अंकित किया जा सकता है:",
"भारत में अंगूर की खेती\nअंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है. अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है. अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है. अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है. जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है. इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है. अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है. इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है. अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है."
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कर्पूरमंजरी' नाटक के रचयिता राजशेखर को किस प्रतिहार शासक ने संरक्षण दिया?
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"कर्पूरमंजरी\nकर्पूरमंजरी संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार एवं काव्यमीमांसक राजशेखर द्वारा रचित प्राकृत का नाटक (सट्टक) है। प्राकृत भाषा की विशुद्ध साहित्यिक रचनाओं में इस कृति का विशिष्ट स्थान है।",
"राजशेखर\n'बालभारत' या 'प्रचंडपांडव' और 'बालरामायण' क्रमश: रामायण और महाभारत की कथा के आधार पर निर्मित नाटक हैं। ये नाटक संभवत: 'बालानां सुखबोधाय' न होकर राजेश्वर की प्रारंभिक कृतियाँ रही हैं। 'कर्पूरमंजरी' सट्टक में प्रेमकथा निबद्ध है। 'विद्धशालभंजिका' भी एक प्रेमाख्यान है। कर्पूरमंजरी और काव्यमीमांसा प्रौढ़ काल की रचनाएँ हैं।",
"स्टेन कोनो\nउन्होंने संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार एवं काव्यमीमांसक राजशेखर के प्राकृत नाटक कर्पूरमंजरी का अनुवाद किया था जिसे हारवर्ड ओरिएंटल सीरीज़ के चौथे अंक के तौर पर 1901 में छापा गया।",
"गुर्जर-प्रतिहार राजवंश\nभोज प्रथम के दरबार में भट्ट धनेक का पुत्र वालादित्य रहता था। जिसने ग्वालियर प्रशस्ति जैसे प्रशिध्द ग्रंथ की रचना की थी। इस काल के कवियों में राजशेखर कि प्रशिध्दि सबसे अधिक थी। उसकी अनेक कृतियाँ आज भी उपलब्ध है। कवि और नाटककार राजशेखर सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम का गुरु था। राजशेखर बालकवि से कवि और फिर कवि से राजकवि के पद से प्रतिष्ठित हुआ। इसी दौरान \"कर्पूरमंजरी\" तथा संस्कृत नाटक \"बालरामायण\" का अभिनीत किया गया।",
"महेन्द्रपाल प्रथम\nमहेन्द्रपाल प्रथम एक अच्छा प्रशासक होने के साथ-साथ साहित्य का भी एक आश्रयदाता था। महाकवि राजशेखर का उसके दरबार में काफी महत्व था साथ ही वह महेन्द्रपाल का अध्यात्मिक गुरु भी था। उसके प्राकृत नाटक \"कर्पूरमंजरी\" तथा संस्कृत 'महानाटक', \"बालरामायण\" सर्वप्रथम महेन्द्रपाल के शासनकाल में ही अभिनीत किये गये थे। महेन्द्रपाल की मृत्यु के बाद भी राजशेखर उसके उत्तराधिकारी महिपाल के दरबार में बने रहे।",
"कर्पूरमंजरी\nप्राकृत भाषा में पाँच सट्टकों (1. विलासवती, 2. चंदलेहा, 3. आनंदसुंदरी, 4. सिंगारमंजरी और 5. कर्पूरमंजरी) की प्रसिद्धि है जिनमें विलासवती के अतिरिक्त सभी उपलब्ध हैं। इन सबमें कर्पूरमंजरी सर्वोत्कृष्ट और प्रौढ़ रचना है। राजशेखर का संस्कृत और प्राकृत भाषाओं पर असाधारण अधिकार था। वे सर्वभाषानिषणण कहे जाते थे। कर्पूरमंजरी की प्राकृत प्रौढ़ एवं प्रांजल है। पहले कहा जाता था कि इसका पद्यभाग शौरसेनी प्राकृत में हैं। पर डॉ॰ मनमोहन घोष ने इस मत को अमान्य सिद्ध किया है। इसमें मुख्यत: शौरसेनी का ही प्रयोग है। इसमें कवि ने स्रग्धरा, शार्दूलविक्रीडित, बसंततिलका आदि संस्कृत के छंदों का प्रौढ़ एवं सफल प्रयोग किया है। प्राकृत के छंद भी इसमें हैं। प्राकृत में इस सट्ट के लिखने का कारण कर्पूरमंजरी (1.7) में कवि ने बताया है कि संस्कृत बंध पुरुष होते हैं और प्राकृत भाषा के बंध सुकुमार। दोनों में पुरुष और ललना के समान अंतर है। प्राकृत भाषा के प्रौढ़ आद्यंत प्रयोग के कारण इस सट्टक में दिखाया गया है कि राजा चंद्रपाल ने कुंतलराजपुत्री कर्पूरमंजरी से विवाह करके चक्रवर्तीपद प्राप्त किया। ऐंद्रजालिक भैरवानंद ने इंद्रजाल द्वारा इसमें अद्भुत रस की योजना की गई है।"
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"गुर्जर-प्रतिहार राजवंश\nबडी-बडी सभाओं में प्रश्नोत्तरों और शास्त्रार्थ के द्वारा विद्वानों कि योग्यता कि पहचान की जाती थी। विजेता को राजा की ओर से जयपत्र प्रदान किया जाता था, और जुलुस निकाल कर उसका सम्मान किया जाता था। इसके अलवा विद्वान गोष्ठियों में एकत्र हो कर साहित्यक चर्चा करते थे। पुर्व मध्यकाल में कान्यकुब्ज (कन्नौज) विद्या का सबसे बड़ा केन्द्र था। राजशेखर ने कन्नौज में कई गोष्ठियों का वर्णन किया है। राजशेखर ने \"ब्रम्ह सभा\" की भी चर्चा की हैं। ऐसी सभा उज्जैन और पाटलिपुत्र में हुआ करती थी। इस प्रकार की सभाएं कवियों कि परीक्षा के लिये उपयोगी होती थी। परीक्षा में उत्तीर्ण कवि को रथ और रेशमी वस्त्र से सम्मानित किया जाता था। उपर्युक्त वर्णन से प्रमाणित होता है कि सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद भी उत्तर भारत से विद्या का का वातावरण समाप्त नहीं हुआ था। गुर्जर प्रतिहार शासक स्वयं विद्वान थे और वे विद्वानों को राज्याश्रय भी प्रदान करते थे।",
"कलचुरि राजवंश\nचेदि नरेश दूर-दूर के ब्राह्मणों को बुलाकर उनके अग्रहार अथवा ब्रह्मस्तंब स्थापित करते थे। इस राजवंश के नरेश स्वयं विद्वान् थे। मायुराज ने उदात्ताराघव नाम के एक नाटक और संभवम: किसी एक काव्य की भी रचना की थी। भीमट ने पाँच नाटक रचे जिनमें स्वप्नदशानन सर्वश्रेष्ठ था। शंकरगण के कुछ श्लोक सुभाषित ग्रंथों में मिलते हैं। राजशेखर के पूर्वजों में अकालजलद, सुरानंद, तरल और कविराज चेदि राजाओं से ही संबंधित थे। राजशेखर ने भी कन्नौज जाने से पूर्व ही छ: प्रबंधों की रचना की थी और बालकवि की उपाधि प्राप्त की थी। युवराजदेव प्रथम के शासनकाल में वह फिर त्रिपुरी लौटा जहाँ उसने विद्धशालभंजिका और काव्यमीमांसा की रचना की। कर्ण का दरबार कवियों के लिए पसिद्ध था। विद्यापति और गंगाधर के अतिरिक्त वल्लण, कर्पूर और नाचिराज भी उसी के दरबार में थे। बिल्हण भी उसके दरबार में आया था। कर्ण के दरबार में प्राय: समस्यापूरण की प्रतियोगिता होती थी। कर्ण ने प्राकृत के कवियों को भी प्रोत्साहन दिया था।",
"मांडव्यपुर के प्रतिहार\nराणा की उपाधि की पुष्टि गौरीशंकर हीराचंद ओझा लिखित 'राजपूतों का इतिहास' के इस अंश से भी होती है कि बाउक प्रतिहार को राणा की उपाधि से विभूषित किया गया था । मण्डौर के प्रतिहारों से ली हुई राणा की पदवी के कारण ही कालान्तर में चितौड़ के सिसोदिया शासक 'महाराणा' कहलाने लगे। अंतिम मण्डौर शासक हम्मीर जिसे चारणों ने राणा लिखा है , राठौर चूड़ा ने 1394 ई. में दुर्ग छीना था । मण्डौर के प्रतिहारों की ज्येष्ठ शाखा गुजरत्रा क्षेत्र का जालौर था। भीनमाल में राजधानी स्थापित कर शासन करने की पुष्टि इतिहासकारों के मतानुसार होती है।",
"गुर्जर-प्रतिहार राजवंश की उत्पत्ति\nप्रतिहारों के साथ-साथ मंडोर के प्रतिहारों ने स्व-पदनाम \"प्रतिहार\" का उपयोग किया। उन्होंने महान नायक लक्ष्मण से वंश का दावा किया, जिन्हें संस्कृत महाकाव्य \" रामायण 'में राजा राम के भाई के रूप में वर्णित किया गया है। मंडोर प्रतिहार शासक बाकुका के 837 सीई जोधपुर शिलालेख में कहा गया है कि रामभद्र (राम) के छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को 'प्रतिहारी' (द्वारपाल) के रूप में सेवा दी, जिसकी वजह से इस कबीले को प्रतिहार के नाम से जाना जाने लगा. सागर-ताल (ग्वालियर) प्रतिहार राजा का शिलालेख मिहिरा भोज कहता है उस सौमित्रि (\"सुमित्रा का पुत्र\", यानी लक्ष्मण) ने अपने बड़े भाई के लिए एक द्वारपाल के रूप में काम किया क्योंकि उसने मेघनाद के साथ युद्ध में दुश्मनों को हराया था।"
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१७५७ में सिराजुद्दौला किसके द्वारा पराजित किया गया?
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"१७५७\nपलासी का युद्ध (भारत)। अंगरेजों ने लार्ड क्लाइव के नेतृत्व में बंगाल के शासक सिराजुद्दौला को पराजित किया।",
"भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन\nप्लासी का युद्ध अंग्रेजों और बंगाल के शासक सिराजुद्दौला के बीच सन् 1757 में लड़ा गया था। यह युद्ध केवल आठ घण्टे चला और कुल तेईस सैनिक मारे गए। युद्ध में सिराजुद्दौला की ओर से मीर जाफर ने गद्दारी की और रॉबर्ट क्लाइव ने उसका भरपूर लाभ उठाया। प्लासी-विजय के पश्चात् भारतवर्ष में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ गई।",
"लाल दीघि\n18 जून, 1756 को फोर्ट विलियम के कब्जे के लिए (और कलकत्ता के नियंत्रण के लिए) लाल दीघि की लड़ाई इसी जलाशय के पास हुई थी। बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब सिराजुद्दौला ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को करारी शिकस्त देते हुए शहर पर कब्जा कर लिया हालांकि 23 जून, 1757 को प्लासी में रॉबर्ट क्लाइव की अगुआई में अंग्रेजी सेना ने नबाव को हराकर एक बार फिर से कलकत्ता का नियन्त्रण अपने हाथों में ले लिया।"
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"रॉबर्ट क्लाइव\nअंग्रेजों ने वहां अपना समुद्री बेड़ा भेजने की तैयारी आरंभ कर दी। १४ मार्च १७५७ को चंद्रनगर पर आक्रमण हुआ और एक ही दिन के बाद फ्रांसीसियों ने हथियार डाल दिए। वाटसन ने नदी की ओर से और क्लाइव ने दूसरी ओर से फ्रांसीसियों पर आक्रमण किया। सिराजुद्दौला इस लड़ाई में खुलकर भाग न ले सका। अब्दाली के आक्रमण के कारण वह फ्रांसीसियों की सहायता और अंग्रेजों से लड़ाई करने में संभवत: समर्थ न था।",
"सिराजुद्दौला\nमिर्ज़ा मुहम्मद सिराज उद-दावला, (फारसी:مرزا محمد سراج الدولہ,बांग्ला: নবাব সিরাজদৌল্লা) प्रचलित नाम सिराज-उद्दौला (१७३३-२ जुलाई,१७५७) वैधानिक रूप से मुगल साम्राज्य केेे बंगाल प्रांंत जिसमें वर्तमान भारत के पश्चिम बंगाल बिहार झारखंड उड़ीसा तथा बांग्लादेश सम्मिलित था। अप्रैल सन 1756 में नवाब बना उसके शासन का अंत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का आरंभ माना जाता है। अंग्रेज़ उसे हिन्दुस्तानी सही ना बोल पाने के कारण सर रोजर डॉवलेट कहते थे।",
"रॉबर्ट क्लाइव\nदिसंबर में क्लाइव हुगली पहुंचा। उसकी सेना की संख्या लगभग एक हजार थी। वह नदी की ओर से कलकत्ते की तरफ बढ़ा और २ जनवरी १७५७ को उसपर अपना अधिकार कर लिया। सिराजुद्दौला को जब इसकी खबर मिली तो उसने कलकत्ते की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया मगर असफल रहा और संधि करने पर विवश हुआ। इस संधि से अंग्रेजों को अधिक लाभ हुआ। सिराजुद्दौला ने कलकत्ते की लूटी हुई दौलत वापस करने का वादा किया; कलकत्ता को सुरक्षित करने की इजाजत दी और वाट को मुर्शिदाबाद में अंग्रेजी प्रतिनिधि के रूप में रखना स्वीकार किया।",
"रॉबर्ट क्लाइव\n९ अप्रैल १७५६ को बंगाल और बिहार के सूबेदार की मृत्यु हो गई। १७५२ में अल्लावर्दी खाँ ने सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। अल्लावर्दी खाँ की मृत्यु के पश्चात् सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। १८वीं शताब्दी के आरंभ में ही अंग्रजों ने फोर्ट विलियम की नींव डाली थी और १७५५ तक उसके आसपास काफी लोग बस चुके थे, इसी लिये उसने नगर का रूप ले लिया था जो बाद में कलकत्ता कहलाया। बंगाल में फोर्ट विलियम अंगेजी कंपनी का केंद्र था। सिराजुद्दौला ने नवाबी पाने के बाद ही अपने एक सम्बन्धी सलामन जंग के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई आरंभ की और पुर्णिया पर आक्रमण किया। २० मई १७५६ को राजमहल पहँुचने के पश्चात् उसने अपना इरादा बदल दिया और मुर्शिदाबाद लौट आया और कासिम बाजारवाली अंग्रेजी फैक्ट्री पर अधिकार कर लिया। यह घटना ४ जून १७५६ को घटी। ५ जून को सिराजुद्दौला की सेना कलकत्ते पर आक्रमण करने को रवाना हुई और १६ जून को कलकत्ता पहुंची। १९ जून को कलकत्ता के गवर्नर, कमांडर और कमेटी के सदस्यों को नगर और दुर्ग छोड़कर जहाज में पनाह लेना पड़ा। २० जून को कलकत्ता पर नवाब का कब्जा हो गया। जब इसकी खबर मद्रास पहुंची तो वहां से सेना भेजी गई, जिसका नेतृत्व क्लाइव के हाथ में था।",
"भारत में इस्लाम\nहैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया। बहरहाल, 1799 में टीपू सुल्तान अंततः श्रीरंगापटनम में पराजित हुए। बंगाल में नवाब सिराजुद्दौला ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तारवादी उद्देश्य का सामना किया और ब्रिटिशों से युद्ध किया। हालांकि, 1757 में वे प्लासी की लड़ाई में हार गए। ब्रिटिश के खिलाफ पहले भारतीय विद्रोही को 10 1806 के वेल्लोर गदर में देखा गया जिसमें लगभग 200 ब्रिटिश अधिकारी और सैनिकों को मृत या घायल के रूप में पाया गया। लेकिन ब्रिटिश द्वारा इसका बदला लिया गया और विद्रोहियों और टीपू सुल्तान के परिवार वालों को वेल्लोर किले में बंदी बनाया गया और उन्हें उस समय इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।सिपाही विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजों द्वारा ज्यादातर ऊपरी वर्ग के मुस्लिम लक्षित थे क्योंकि वहां और दिल्ली के आसपास इन्हें के नेतृत्व में युद्ध किया गया था। हजारों की संख्या में मित्रों और सगे संबंधियों को दिल्ली के लाल किले पर गोली मार दी गई या फांसी पर लटका दिया गया जिसे वर्तमान में खूनी दरवाजा (ब्लडी गेट) कहा जाता है। प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब (1797-1869) ने अपने पत्रों में इस प्रकार के ज्वलंत नरसंहार से संबंधित कई विवरण दिए हैं जिसे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा 'गालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स' के नाम के प्रकाशित किया है और राल्फ रसेल और खुर्शिदुल इस्लाम द्वारा संकलित और अनुवाद किया गया है (1994).",
"बरेली का इतिहास\n१७५४ में जब शुजाउद्दौला अवध के अगले वज़ीर बने, तो हाफिज भी रुहेलखण्ड की सेना के साथ उन पर आक्रमण करने निकली मुगल सेना में शामिल हो गये, लेकिन वज़ीर ने उन्हें ५ लाख रुपये देकर खरीद लिया। १७६१ में हाफ़िज़ रहमत खान ने पानीपत के तृतीय युद्ध में अफ़ग़ानिस्तान तथा अवध के नवाबों का साथ दिया, और उनकी संयुक्त सेनाओं ने मराठों को पराजित कर उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य के विस्तार को अवरुद्ध कर दिया। अहमद शाह के आगमन, और शुजाउद्दौला के ब्रिटिश सत्ता से संघर्षों का फायदा उठाकर हाफ़िज़ ने उन वर्षों के दौरान इटावा पर कब्ज़ा किया, और लगातार अपने शहरों को मजबूत करने के साथ-साथ और नए गढ़ों की स्थापना करते रहे। १७७० में, नजीबाबाद के रुहेला शासक नजीब-उद-दौला सिंधिया और होल्कर मराठा सेना के साथ आगे बढ़े, और उन्होंने हाफ़िज़ खान को हरा दिया, जिस कारण हाफ़िज़ को अवध के वज़ीर से सहायता मांगनी पड़ी।",
"बरेली का इतिहास\nशुजाउद्दौला ने मराठों को ४० लाख रुपये का भुगतान किया, और वे रुहेलखण्ड से वापस चले गए। इसके बाद, अवध के नवाब ने हाफ़िज़ खान से इस मदद के लिए भुगतान करने की मांग की। जब हाफ़िज़ उनकी यह मांग पूरी नहीं कर पाए, तो उन्होंने ब्रिटिश गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स और उनके कमांडर-इन-चीफ, अलेक्जेंडर चैंपियन की सहायता से रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया। १७७४ में दौला और कंपनी की संयुक्त सेना ने हाफ़िज़ को हरा दिया, जो मीराँपुर कटरा में युद्ध में मारे गए, हालाँकि अली मुहम्मद के पुत्र, फ़ैजुल्लाह ख़ान युद्ध से बचकर भाग गए। कई वार्ताओं के बाद उन्होंने १७७४ में ही शुजाउद्दौला के साथ एक संधि की, जिसके तहत उन्होंने सालाना १५ लाख रुपये, और ९ परगनों को अपने शासनाधीन रखा, और शेष रुहेलखण्ड वज़ीर को दे दिया।"
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तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध को रोकने के लिए टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के साथ कौन-सी संधि की?
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"चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध\nतीन सैन्यदल - एक बॉम्बे से और दो ब्रिटिशों से (जिसमें से एक दल का नेतृत्व कर्नल आर्थर वैलेस्ली -भविष्य के पहले वेलिंगटन के ड्यूक- ने किया था), 1799 में मैसूर में घुस गये और टीपू के साथ कुछ शुरूआती लड़ाई के बाद राजधानी श्रीरंगपट्ट्नम को घेर लिया गया। 8 मार्च को, एक अग्र बल, सीडसेसर की लड़ाई में टीपू के आक्रमण को रोकने में कामयाब रहे। 4 मई को, श्रीरंगपट्टणम् की घेराबंदी के दौरान, रक्षा दीवारों को तोड़ दिया गया। टिपू सुल्तान, दिवार की सुरक्षा बढाने के लिये वहां पहुचे, और उनकी गोली लगने से मृत्यु हो गई।",
"पजहस्सी राजा\nलेकिन, तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू की हार के बाद अंग्रेजों और टीपू के बीच हुई सेरिंगापटम संधि (1792) के तहत मालाबार अंग्रेजों को सौंप दिया गया। तब अंग्रेजों ने मालाबार में अपना वर्चस्व स्थापित करना शुरू किया। इस मामले में अंग्रेजों और पजहस्सी की राय एक-दूसरे के विपरीत थी - पजहस्सी ने अंग्रेजों की मदद इसलिए नहीं की थी वे ब्रिटिश संप्रभुता स्वीकार करने को तैयार थे, बल्कि इसलिए की थी कि वे अपने देश कोट्टयम को स्वतंत्र देखना चाहते थे।"
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"चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध\nयह आंग्ल-मैसूर के हुए युद्धों में चौथी और अंतिम लड़ाई थी। अंग्रेजों ने मैसूर की राजधानी पर कब्जा कर लिया। युद्ध में शासक टीपू सुल्तान की मौत हो गई। ब्रिटेन ने ओडेयर राजवंश (एक ब्रिटिश आयुक्त के साथ उसे सभी मुद्दों पर सलाह देने के लिए) को मैसूर सिंहासन में बहाल कर, मैसूर पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण कर लिया। टीपू सुल्तान के युवा उत्तराधिकारी फतेह अली को निर्वासन में भेजा दिया गया था। मैसूर साम्राज्य ब्रिटिश भारत के साथ सहायक गठबंधन में एक रियासत बन गया और कोयंबटूर, दक्षिणी कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ अंग्रेजों को सौंप दिया गया।",
"तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध\nतृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (अंग्रेजी: \"Third Anglo-Mysore War\", \"थर्ड अँग्लो-मायसोर वॉर\") यह मैसूर राज्य के शासक टीपू सुल्तान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच १७८९ से १७९२ के दौरान हुआ था। यह युद्ध आंग्ल-मैसूर युद्ध मालिका का तृतीय युद्ध था।",
"टीपू सुल्तान\nमंगलोर की संन्धि से भी अंग्रेजों और मैसूर युद्ध समाप्त नहीं हो पाया दोनों पक्ष इस सन्धि को चिरस्थाई नहीं मानते थे। 1786 ई. में लार्ड कार्नवालिस भारत का गवर्नर जनरल बना । वह भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के मामले में सामर्थ नहीं था लेकिन उस समय की परिस्थिति को देखते हुए उसे हस्तक्षेप करना पड़ा क्योंकि उस समय टीपू सुल्तान उनका प्रमुख शत्रु था इसलिए अंग्रेजों ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए निजाम के साथ सन्धि कर ली इस पर टीपू ने भी फ्रांसीसियो से मित्रता के लिए हाथ बढ़ाया ताकि दक्षिण में अपना वर्चस्व स्थापित करें। कार्नवालिस जानता था कि टिपु के साथ उसका युद्ध अनिवार्य है इसलिए वह महान शक्तियों के साथ मित्रता स्थापित करना चाहता था। उसने निजाम और मराठों के साथ सन्धि कर एक संयुक्त मोर्चा कायम किया और इसके बाद उसने टीपू के खिलाफ युद्ध कि घोषणा कर दी इस तरह तृतीय मैसुर युद्ध प्रारम्भ हुआ यह युद्ध दो वर्षों तक चलता रहा प्रारमँभ में अंग्रेज असफल रहे लेकिन अन्त में उनकी विजय हुई। मार्च 1792 ई. में श्री रंगापटय कि सन्धि के साथ युद्ध समाप्त हुआ टीपू ने अपने राज्य का आधा हिस्सा और 30 लाख पौंड संयुक्त मोर्चे को दण्ड स्वरूप दिया इसका सबसे बड़ा हिस्सा कृष्ण ता पन्द नदी के बीच का प्रदेश निजाम को मिला।",
"टीपू सुल्तान\n2. टीपू द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद एवं निजाम ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेजों से संधि का प्रस्ताव दिया। वैसे अंग्रेजों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था इसलिए छिपे मन से वे भी संधि चाहते थे। दोनों पक्षों में वार्ता मार्च, 1784 में हुई और इसी के फलस्वरूप 'मंगलौर की सन्धि' सम्पन्न हुई। 3. टीपू ने 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों के विरुद्ध पहला युद्ध जीता था।",
"चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध\nब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कई सदस्यों का मानना था कि कार्नाटक के नवाब उमदत उल-उमरा ने चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान गुप्त रूप से टीपू सुल्तान को सहायता प्रदान की थी; और संघर्ष के अंत के बाद उन्होंने नवाब को अपदस्थ करने की मांग की।",
"नाना फडणवीस\n1775 से 1782 ई. तक उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध प्रथम मराठा युद्ध का संचालन किया। सालबाई की सन्धि से इस युद्ध की समाप्ति हुई। उक्त संधि के अनुसार राघोबा को पेंशन जारी की गई और मराठों को साष्टी के अतिरिक्त अन्य किसी भूभाग से हाथ नहीं धोना पड़ा। 1784 ई. में ही नाना फडणवीस ने मैसूर के शासक टीपू सुल्तान से युद्ध किया और कुछ ऐसे इलाके पुन: प्राप्त कर लिये, जिन्हें टीपू ने बलपूर्वक अपने अधिकार में ले लिया था। 1789 ई. में टीपू सुल्तान के विरुद्ध उन्होंने अंग्रेज़ों और निज़ाम का साथ दिया तथा तृतीय मैसूर युद्ध में भी भाग लिया। जिसके फलस्वरूप मराठों को टीपू के राज्य का एक भूभाग प्राप्त हुआ।",
"द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध\nइस युद्ध के बीच ही हैदर अली की मृत्यु हो गई थी, किंतु उसके पुत्र और उत्तराधिकारी टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा और बेदनूर पर अंग्रेज़ों के आक्रमण को असफल करके मंगलोर जा घेरा। अब मद्रास की सरकार ने समझ लिया कि आगे युद्ध बढ़ाना उसकी सामर्थ्य के बाहर है। अत: उसने 1784 ई. में सन्धि कर ली, जो मंगलोर की सन्धि कहलाती है, और जिसके आधार पर दोनों पक्षों ने एक दूसरे के भू-भाग वापस कर दिए।.",
"पजहस्सी राजा\n1782 तक, कोट्टयम एक स्वतंत्र देश था। लेकिन आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद मंगलौर की संधि [1784] से अंग्रेजों ने मालाबार पर टीपू सुलतान के अधिकार को मान्यता दे दी। इस प्रकार उसने अपना एकमात्र मूल्यवान सहयोगी खो दिया, मैसूर का एक मातहत राज्य बनने के लिए कोट्टयम तैयार हो गया था। एक बार फिर, जैसा कि 1779 में सरदार खान ने किया था, मैसूर ने भेंट की बहुत अधिक दर तय की। हालांकि पजहस्सी राजा के बड़े भाई रवि वर्मा प्रति वर्ष 65,000 रुपये देने पर सहमत हुए, लेकिन मैसूर ने 81,000 रुपये की मांग की। भेंट की बढ़ी हुई दर से किसानों [खासकर तियार/इझावा] की मुश्किलें बढ़ गयीं जो पहले से ही वर्षों से विदेशी कब्जे से पीड़ित थे। तब पजहस्सी राजा ने इस मुद्दे को अपने हाथों में लिया और एक बार फिर जन प्रतिरोध आंदोलन की शुरुआत की।"
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प्रकाश संश्लेषण क्रिया के दौरान पौधों में co2 को कौन ग्रहण करता है?
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"प्रकाश-संश्लेषण\nहरे पौधों में होने वाली प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पौधों एवं अन्य जीवित प्राणियों के लिये एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्रिया है। इस क्रिया में पौधे सूर्य के प्रकाशीय उर्जा को रासायनिक उर्जा में परिवर्तित कर देते हैं तथा CO पानी जैसे साधारण पदार्थों से जटिल कार्बन यौगिक कार्बोहाइड्रेट्स बन जाते हैं। इन कार्बोहाइड्रेट्स द्वारा ही मनुष्य एवं जीवित प्राणियों को भोजन प्राप्त होता है। इस प्रकार पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा सम्पूर्ण प्राणी जगत के लिये भोजन-व्यवस्था करते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स प्रोटीन एवं विटामिन आदि को प्राप्त करने के लिये विभिन्न फसलें उगाई जाती हैं तथा इन सब पदार्थों का निर्माण प्रकाश संश्लेशण द्वारा ही होता है। रबड़, प्लास्टिक, तेल, सेल्यूलोज एवं कई औषधियाँ भी पौधों में प्रकाश संश्लेषण क्रिया में उत्पन्न होती है। हरे वृक्ष प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड को लेते हैं और ऑक्सीजन को निकालते हैं, इस प्रकार वातावरण को शुद्ध करते हैं। ऑक्सीजन सभी जंतुओं को साँस लेने के लिए अति आवश्यक है। पर्यावरण के संरक्षण के लिए भी इस क्रिया का बहुत महत्व है। मत्स्य-पालन के लिए भी प्रकाश संश्लेषण का बहुत महत्व है। जब प्रकाश संश्लेषण की क्रिया धीमी हो जाती है तो जल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। इसका ५ सी0सी0 प्रतिलीटर से अधिक होना मत्स्य पालन हेतु हानिकारक है। प्रकाश संश्लेषण जैव ईंधन बनाने में भी सहायक होता है। इसके द्वारा पौधे सौर ऊर्जा द्वारा जैव ईंधन का उत्पादन भी करते हैं। यह जैव ईंधन विभिन्न प्रक्रिया से गुज़रते हुए विविध ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन करता है। उदाहरण के लिए पशुओं को चारा, जिसके बदले हमें गोबर प्राप्त होता है, कृषि अवशेष के द्वारा खाना पकाना आदि। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीव जन्तुओं में भी प्रकाश-संश्लेषण का बहुत महत्व है। मानव अपनी त्वचा में प्रकाश के द्वारा विटामिन डी का संश्लेषण करते हैं। विटामिन डी एक वसा में घुलनशील रसायन है, इसके संश्लेषण में पराबैंगनी किरणों का प्रयोग होता है। कुछ समुद्री घोंघे अपने आहार के माध्यम से शैवाल आदि पौधों को ग्रहण करते हैं तथा इनमें मौजूद क्लोरोप्लास्ट का प्रयोग प्रकाश-संश्लेषण के लिए करते हैं। प्रकाश-संश्लेषण एवं श्वसन की क्रियाएं एक दूसरे की पूरक एवं विपरीत होती हैं। प्रकाश-संश्लेषण में कार्बनडाइऑक्साइड और जल के बीच रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप ग्लूकोज का निर्माण होता है तथा ऑक्सीजन मुक्त होती है। श्वसन में इसके विपरीत ग्लूकोज के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप जल तथा कार्बनडाइऑक्साइड बनती हैं। प्रकाश-संश्लेषण एक रचनात्मक क्रिया है इसके फलस्वरूप सजीव के शुष्क भार में वृद्धि होती है। श्वसन एक नासात्मक क्रिया है, इस क्रिया के फलस्वरूप सजीव के शुष्क भार में कमी आती है। प्रकाश-संश्लेषण में सौर्य ऊर्जा के प्रयोग से भोजन बनता है, विकिरण ऊर्जा का रूपान्तरण रासायनिक ऊर्जा में होता है। जबकि श्वसन में भोजन के ऑक्सीकरण से ऊर्जा मुक्त होती है, भोजन में संचित रासायनिक ऊर्जा का प्रयोग सजीव अपने विभिन्न कार्यों में करता है। इस प्रकार ये दोनों क्रियाए अपने कच्चे माल के लिए एक दूसरे के अन्त पदार्थों पर निर्भर रहते हुए एक दूसरे की पूरक होती हैं।",
"प्रकाश-संश्लेषण\nप्रकाश संश्लेषण की क्रिया केवल हरे पौधों से होती है और समीकरण अत्यन्त साधारण है। फिर भी यह एक विवादग्रस्त प्रश्न है कि किस प्रकार CO एवं पानी जैसे सरल पदार्थ, कार्बोहाइड्रेट्स जैसे जटिल पदार्थों का निर्माण करते हैं। समय-समय पर विभिन्न पादप कार्यिकी विशेषज्ञों ने इस क्रिया को समझने के लिये विभिन्न मत प्रकट किये हैं। इनमें बैयर, विल्सटेटर तथा स्टाल तथा आरनोन के मत प्रमुख हैं। बैयर, विल्सटेटर तथा स्टाल के मतों का केवल ऐतिहासिक महत्व है। इनको बाद के परीक्षणों में सही नहीं पाया गया। १९६७ में आरनोन ने बताया कि क्लोरोप्लास्ट में पायी जाने वाली प्रोटीन फैरोडोक्सिन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में मुख्य कार्य करती है। आधुनिक युग में सभी वैज्ञानिकों द्वारा यह मान्य है कि प्रकाश संश्लेषण में स्वतन्त्र आक्सीजन पानी से आती है। आधुनिक समय में अनेक प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया निम्न दो चरणों में सम्पन्न होती है। पहले चरण में प्रकाश प्रक्रिया अथवा हिल प्रक्रिया अथवा फोटोकेमिकल प्रक्रिया। और दूसरे चरण में अंधेरी प्रक्रिया अथवा ब्लेकमैन प्रक्रिया या प्रकाशहीन प्रक्रिया। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में दोनों प्रक्रियायें एक दूसरे के पश्चात होती है। प्रकाश प्रक्रिया अंधेरी प्रक्रिया की उपेक्षा अधिक तेजी से होती है।",
"प्रकाश-संश्लेषण\nप्रकाश-संश्लेषण की क्रिया पौधे के सभी क्लोरोप्लास्ट युक्त कोशिकाओं में होती है। अर्थात पौधे के समस्त हरे भागों में होती है। यह क्रिया विशेषतः पत्तियों के मीसोफिल ऊतक में होती है क्योंकि पत्तियों के मीसोफिल उतक की पेरेन्काइमा कोशिकाओं में अन्य कोशिकाओं की उपेक्षा क्लोरोप्लास्ट की मात्रा अधिक होती है।",
"चयापचय\nसूर्यप्रकाश और कार्बन डाईआक्साइड (CO) से कार्बोहाइड्रेटों के संश्लेषण को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। पौधों, सयानोबैक्टीरिया और शैवाल में, आक्सीजनीय प्रकाश-संश्लेषण पानी का विच्छेद करता है, जिससे आक्सीजन व्यर्थ उत्पाद के रूप में उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया में, उपर्लिखित विवरण के अनुसार, प्रकाश-संश्लेषक प्रतिक्रिया केंद्रों द्वारा उत्पन्न एटीपी और एनएडीपीएच का प्रयोग CO को ग्लिसरेट 3-फास्फेट में बदलने के लिये किया जाता है, जिसको फिर ग्लुकोज में बदला जा सकता है। यह कार्बन-स्थिरीकरण प्रतिक्रिया कैल्विन-बेन्सन चक्र के हिस्से के रूप में एंजाइम रूबिस्को द्वारा फलीभूत की जाती है। पौधों में तीन प्रकार का प्रकाश-संश्लेषण हो सकता है, सी3 कार्बन स्थिरीकरण, सी4 कारब्न स्थिरीकरण और सीएऐम प्रकाश-संश्लेषण. इनमें कैल्विन चक्र तक पहुंचने के लिये CO द्वारा अपनाए गए मार्ग के अनुसार भिन्नता होती है, सी3 पौधे सीधे CO का स्थिरीकरण करते हैं, जबकि सी4 और सीएऐम प्रकाश-संश्लेषण में तीव्र सूर्यप्रकाश और शुष्क परिस्थितियों से निपटने के लिये, सीओ2 को पहले अन्य यौगिकों में समाविष्ट किया जाता है।",
"प्रकाश-संश्लेषण\nप्रकाश-संश्नेषण की क्रिया में चार मुख्य अवयव हैं, जल, कार्बनडाइऑक्साइड, प्रकाश एवं पर्ण हरित। इन चारों की उपस्थिति इस क्रिया के लिए अति आवश्यक है। इनमें से जल एवं कार्बनडाइऑक्साइड को प्रकाश-संश्लेषण का कच्चा माल कहते हैं क्योंकि इनके रचनात्मक अवयवों द्वारा ही प्रकाश-संश्लेषण के मुख्य उत्पाद कार्बोहाइड्रेट की रचना होती है। इन अवयवो को पौधा अपने आस-पास के वातावरण से ग्रहण करता है।"
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"प्रकाश-संश्लेषण\nबहुत प्राचीन काल से यह ज्ञात है कि पौधे अपना पोषण जड़ों द्वारा प्राप्त करते हैं। १७७२ में स्टीफन हेलेस ने बताया कि पौधों की पत्तियाँ वायु से भोजन ग्रहण करती हैं तथा इस क्रिया में प्रकाश की कुछ महत्वपूर्ण क्रिया है। प्रीस्टले ने १७७२ में पहले बताया कि इस क्रिया के दौरान उत्पन्न वायु में मोमबत्ती जलाई जाये तो यह जलती रहती है। मोमबत्ती जलने के पश्चात् उत्पन्न वायु में यदि अब एक जीवित चूहा रखा जाये तो वह मर जाता है। उसने १७७५ में पुनः बताया कि पौधों द्वारा दिन के समय में निकली गैस आक्सीजन होती है। इसके पश्चात इंजन हाउस ने १७७९ में बताया कि हरे पौधे सूर्य के प्रकाश में co ग्रहण करते हैं तथा आक्सीजन निकालते हैं। डी. सासूर ने १८०४ में बताया पौधे दिन और रात श्वसन मे तो आक्सिजन ही लेते है पर प्रकाश संश्लेषण के दौरन ओक्सिजन मुक्त करते है। अत: ओक्सिजन पूरे दिन काम मे आती है पर कार्बन डाइ ओक्साइड से ओक्सिजन केवल प्रकाश संश्लेषण मे ही बनती है। सास ने १८८७ में बताया कि हरे पौधों के co ग्रहण करने तथा o निकालने से पौधों में स्टार्च का निर्माण होता है।",
"प्रकाश संश्लेषण क्रिया विधि : विभिन्न मत\nआधुनिक मत - पौधों में प्रकाश संश्लेषण क्रिया से यह स्पष्ट है कि इसमें यह CO2 व पानी के मध्य एक आक्सीकरण अवकरण विधि है। इसमें पानी आक्सीकरण होकर O2 को स्वन्त्र कर हाइड्रोजन को कार्बन-डाइ-आक्साइड पर भेज देता है। इस क्रिया अपेक्षा अधिक तेजी से होती है।",
"खाद्य शृंखला\nसभी प्रकाश संश्लेषण करने वाले पौधे उत्पादक की श्रेणी में आते हैं। ऐसे पौधे प्रकाश, कार्बन डाइ-ऑक्साइड और जल की सहायता से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हेतु पौधों का क्लोरोफिल (हरित लवक) पाया जाता है। क्लोरोफिल पौधों के हरे रंग के लिए भी उत्तरदायी होता है।",
"प्रकाश-संश्लेषण\nजल जल प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया का कच्चा माल है। स्थलीय पौधे इसे मिट्टी से जड़ के मूलरोमों द्वारा अवशोषित करते हैं। जलीय पौधे अपने जल के सम्पर्क वाले भागों की बाह्य सतह से जल का अवशोषण करते हैं। ऑर्किड जैसे उपररोही पौधे अपने वायवीय मूलों द्वारा वायुमंडलीय जलवाष्प को ग्रहण करते हैं। प्रकाश-संश्लेषण के प्रकाशीय अभिक्रिया में जल के प्रकाशीय विघटन से ऑक्सीजन उत्पन्न होता है। यही ऑक्सीजन उपपदार्थ के रूप में वातावरण में मुक्त होता है। अधेरी अभिक्रिया में बनने वाली ग्लूकोज के अणुओं में हाइड्रोजन तत्व के अणु जल से ही प्राप्त होते हैं। प्रकाश-संश्लेषण के समय जल अप्रत्यक्ष रूप से भी कई कार्य करता है। यह जीवद्रव्य की क्रियाशीलता तथा इनजाइम की सक्रियता को बनाए रखता है।",
"प्रकाश संश्लेषण क्रिया विधि : विभिन्न मत\nबैयर का मत - बैयर के मतानुसार कार्बन डाई-आक्साइड पानी से संयोग कर पहले फार्मल्डिहाइड बनता है जो शीघ्र ही पुरुभाजन की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट्स में परिवर्तित हो जाते हैं। इन्होंने इस क्रिया को निम्न प्रकार से दर्शाया- CO2+H2O→H2CO3H2CO3+H2O→ H2O2+HCOOHHCOOH+H2O→HCHO+H2O CO2+H2O→HCHO+O2HCHO→C6H12O6 यह मत आधुनिक रूप से पूर्ण रूप से अमान्य है तथा इसका केवल ऐतिहासिक महत्व है।"
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भारत प्रमुख आयातक किसका है?
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"एम एम टी सी\nएमएमटीसी भारत के कृषि उत्पादों के अग्राणी निर्यातकों व आयातकों में से एक है। कंपनी के थोक निर्यात में चावल, गेहू, गेहू का आटा, सोयामील, दालें, चीनी, प्रोसेस्ड फूडस तथा चाय, काफी, जूट इत्यादि का निर्यात शामिल है।",
"एम एम टी सी\nएमएमटीसी भारतीय उप महाद्वीप में सोने व चांदी का सबसे बड़ा आयातक है जिसका १०० मी० टन सोने का तथा ५०० मी० टन चांदी का वार्षिक कारोबार है। एमएमटीसी ने मुम्बई स्थित मेकर भवन में आभूषणों की खुदरा बिक्री के लिए एक शोरुम खोला है। एमएमटीसी सोने की हॉलमार्क युक्त ब्राण्डेड तथा जडाऊ आभूषणों की सप्लाई करती है। एमएमटीसी ने भारत के मुम्बई स्थित इंटरनेशनल एयरपोर्ट के प्रस्थान लॉज में एक ड्यूटी फ्री ज्वेलरी स्टोर भी खोला है। सोने व सोने की मदों की शुद्वता की जांच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत अग्नि परीक्षण प्रणाली हेतु नई दिल्ली में एक हॉलमार्किंग यूनिट स्थापित की गई है।",
"भारत\nभारत के निर्यातों में कृषि उत्पाद, चाय, कपड़ा, बहुमूल्य रत्न व आभूषण, साफ़्टवेयर सेवायें, इंजीनियरिंग सामान, रसायन तथा चमड़ा उत्पाद प्रमुख हैं जबकि उसके आयातों में कच्चा तेल, मशीनरी, बहुमूल्य रत्न, उर्वरक (फ़र्टिलाइज़र) तथा रसायन प्रमुख हैं। वर्ष २००४ के लिये भारत के कुल निर्यात $६९१८ करोड़ डालर के थे जबकि उसके आयात $८९३३ करोड़ डालर के थे।"
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"भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अर्धचालक निर्माण उद्योग\nभारत इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों का एक शुद्ध आयातक है। भारत का अधिकांश आयात चीन से आता है। 2015 में, इलेक्ट्रॉनिक्स आयात सोने के आयात से भी अधिक हो गया। इस प्रकार कच्चे तेल के तुरंत बाद इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं का आयात सबसे अधिक हुआ। IIT दिल्ली में भौतिकी में प्रोफ़ेसर विक्रम कुमार ने 2019 में खुलासा किया कि भारत तेल की तुलना में अर्धचालक के आयात पर अधिक पैसा खर्च कर रहा है।",
"एम एम टी सी\nएमएमटीसी भारत का, तेल आयात को छोड़कर, सबसे बड़ा आयातक है।",
"रेशमकीट पालन\nपिछले तीन दशकों से, भारत का रेशम उत्पादन धीरे-धीरे बढ़कर जापान और पूर्व सोवियत संघ देशों से ज्यादा हो गया है, जो कभी प्रमुख रेशम उत्पादक हुआ करते थे। भारत इस समय विश्व में चीन के बाद कच्चे सिल्क का दूसरा प्रमुख उत्पादक है। वर्ष 2009-10 में इसका 19,690 टन उत्पादन हुआ था, जो वैश्विक उत्पादन का 15.5 फीसदी है। भारत रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता होने के साथ-साथ पांच किस्मों के रेशम-मलबरी, टसर, ओक टसर, एरि और मुगा सिल्क का उत्पादन करने वाला अकेला देश है और यह चीन से बड़ी मात्रा में मलबरी कच्चे सिल्क और रेशमी वस्त्रों का आयात करता है। भारत के रेशम उत्पादन में वर्ष 2009-10 में पिछले वर्ष की तुलना में 7.2 फीसदी वृद्धि हुई। टसर, एरि और मुगा जैसे वन्य सिल्क के उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2009-10 में 22 फीसदी वृद्धि हुई। रेशम की इन किस्मों का उत्पादन मध्य और पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय लोग करते हैं। वन्य सिल्क को ‘‘पर्यावरण के अनुकूल हरित रेशम’’ के रूप में बढ़ावा देने और वैश्विक बाजार में विशेष बाजार तैयार किए जाने की व्यापक सम्भावना है।",
"भारतीय अर्थव्यवस्था\nवर्ष २००३-२००४ में भारत का कुल व्यापार १४०.८६ अरब अमरीकी डालर था जो कि सकल घरेलु उत्पाद का २५.६% है। भारत का निर्यात ६३.६२% अरब अमरीकी डालर था और आयात ७७.२४ अरब डालर। निर्यात के मुख्य घटक थे विनिर्मित सामान (७५.०३%) कृषि उत्पाद (११.६७%) तथा लौह अयस्क एवं खनिज (३.६९%)।",
"हिंदुजा समूह\nनिजी क्षेत्र के बैंकों में इंडसइंड एक प्रमुख बैंक है। और यह केवल अकेला बैंक है जिसे एनआईआर (अप्रवासी भारतीयों) ने स्थापित किया है। और भारत में यह केवल अकेला व्यावसायिक बैंक है, जिसे नेटवर्क शाखा के लिए प्रमाणीकरण प्राप्त है। इसने 1 बिलियन रुपए की पूंजी से 1994 में कॉरपोरेट तथा एसएमई को ऋण देने के साथ अपना परिचालन शुरू किया और इसके बाद अशोक लेलैंड फाइनेंस लिमिटेड (एएलएफएल) के साथ 2004 में विलय इसका हो गया। इसने खुदरा बैंकिंग पर विशेष जोर डाला और फिर यह 10 बिलियन डॉलर की पूंजी वाले बैंक के रूप में विकसित हो गया, और अब इसकी कुल परिसंपत्ति 200 बिलियन रुपए के करीब है। 1.5 मिलियन ग्राहक और 170 शाखाओं तथा दूर-दराज के स्थानों में 99 एटीएमों (31 मार्च 2007 तक) के साथ यह भारत के 141 भौगोलिक स्थानों में फैला हुआ है।",
"इंडियामार्ट\nइंडियामार्ट एक अंतरजाल (IndiaMART.com) के रूप में भारत के छोटे और मझोले व्यापार से जड़ी संस्थाओं के वैश्विक विक्रेताओं और खरीदारों को जोड़ने वाला बाज़ार है। यह कम्पनी का दावा है कि वह 1.5 औद्योगिक उत्पादों के बेचनों के लिए प्लैटफ़ॉर्म और सहायक औज़ार प्रस्तुत करती है। इससे लगभग 10 मिलियन खरीदार विश्वस्नीय और प्रतिस्पर्थक रूप से औद्योगिक उत्पादों के बेचने वालों को चुन सकते हैं। इस कम्पनी के 3373 कर्मचारी हैं जो भारत के 85 से अधिक कार्यालयों से काम कर रहे हैं। इसके वर्तमान निवेषकों में इंटेल कैपिटल (Intel Capital) और बेनेट, कोलमन ऐण्ड कम्पनी (Bennett, Coleman & Co. Ltd) शामिल हैं।",
"भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक\nसूक्ष्म और लघु उद्यमों (एमएसई) के लिए भारत के पहले सेंटिमेंट सूचकांक क्रिसिडेक्स को क्रिसिल और सिडबी द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। यह एक समग्र सूचकांक है जो 8 मापदण्डों के प्रसार सूचकांक पर आधारित है और यह 0 (अत्यंत नकारात्मक) से 200 (अत्यंत सकारात्मक) के पैमाने पर एमएसई व्यापार सेंटिमेंट को मापता है। क्रिसिडेक्स का प्रमुख लाभ यह है कि इसकी रीडिंग संभावित विपरीत परिस्थितियों और उत्पादन चक्रों के बदलावों को अंकित करेगी और इस प्रकार यह बाजार क्षमता के सुधार में मदद करेगी। निर्यातकों और आयातकों के सेंटिमेंट को समझकर, यह विदेशी व्यापार पर कार्रवाई योग्य संकेतक भी प्रदान करेगा।"
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किसने अकबर की जीवन-कथा लिखी थी?
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"मध्यकालीन भारतीय इतिहास की जानकारी के स्रोत\nयह ग्रंथ अकबर के वजीर अबुल फजल ने लिखा था। वह 1575 ई. के लगभग अकबर के सम्पर्क में आया एवं उसका विश्वासपात्र बन गया। 1602 ई. में सलीम ने वीरसिंह बुन्देला द्वारा उसकी हत्या करवा दी। अबुल फजल बहुत बड़ा विद्वान था। अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ तीन जिल्दों में है। प्रथम जिल्द में अकबर के पूर्वजों, उसके आरंभिक जीवन एवं उसके शासनकाल के 17 वर्ष तक का वर्णन है। द्वितीय जिल्द में 17 से 46वें वर्ष तक का इतिहास है। तीसरी जिल्द आइने-अकबरी है, जो पृथक ग्रंथ माना जाता है।"
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"एम॰ जे॰ अकबर\nउन्होने कई पुस्तकें लिखी है, जिसमें जवाहर लाल नेहरू की जीवनी \"द मेकिंग ऑफ इंडिया\" और कश्मीर पर आधारित \"द सीज विदिन\" चर्चित रही है। वे \"दि शेड ऑफ शोर्ड\" और \"ए कोहेसिव हिस्टरी ऑफ जिहाद\" के भी लेखक हैं। उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक \"ब्लड ब्रदर्स\" है, जिसमें भारत में घटनाओं की जानकारी और दुनिया, खासकर हिंदू-मुस्लिम के बदलते संबंधों के साथ तीन पीढ़ियों की गाथा है। उनकी यह पुस्तक \"फ्रेटेली डी संग\" के नाम से इतालवी में अनुवादित हुई है, जो 15 जनवरी 2008 को रोम में जारी किया गया था। पाकिस्तान में पहचान के संकट और वर्ग संघर्ष पर आधारित उनकी पुस्तक \"\" जनवरी 2012 में प्रकाशित हुई है।",
"अक़बर इलाहाबादी\nहालांकि अकबर एक अनिवार्य रूप से एक जीवंत, आशावादी कवि थे, उसके बाद के जीवन में चीजों के बारे में उनकी दृष्टि घर पर उसकी त्रासदी के अनुभव से घिर गई थी। उन्के बेटे और पोते का निधन कम उम्र में ही हो गया। यह उसके लिये बड़ा झटका था और निराशा का कारण बना। फलस्वरूप वह अपने जीवन के अंत की ओर काफी, वश में हो गया और तेजी से चिंताग्रस्त और धार्मिक होने लगे थे। व ७५ साल की उम्र में १९२१ में अकबर की मृत्यु हो गई।",
"अल्पना मिश्र\nअल्पना मिश्र हिंदी कथा साहित्यकार हैं। उनकी पहली कहानी 'ऐ अहिल्या ' 'हंस' पत्रिका के अक्तूबर १९९६ अंक में प्रकाशित हुई थी। उन्हें हिंदी का ' अनकन्वेंशनल राईटर' माना जाता है। उनकी प्रसिद्द कहानियों में 'उपस्थिति',' 'मुक्ति प्रसंग' , ' मिड डे मील', 'कथा के गैर जरूरी प्रदेश में', 'बेदखल',' इस जहाँ में हम','स्याही में सुरखाब के पंख' 'गैर हाजिरी में हाज़िर' आदि हैं। उनकी लिखी 'छावनी में बेघर' कहानी हिंदी कथा जगत में सैन्य जीवन पर लिखी कहानी है जो सैनिक जीवन का परिचय कराती है। उनके कहानी संग्रह : भीतर का वक्त्त ,छावनी में बेघर, कब्र भी कैद औ जंजीरे भी,' स्याही में सुरखाब के पंख', के साथ ही उपन्यास :'अन्हियारे तलछट में चमका' भी प्रसिद्ध साहित्य हैं। उनकी कहानियो का अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है। उन्हें अनेक सम्मानों से भी सम्मानित किया गया।",
"आनंदीबाई जोशी\n1888 में, अमेरिकी नारीवादी लेखक कैरोलिन वेल्स हीली डैल ने आनंदीबाई की जीवनी लिखी थी। डॉल आनंदीबाई से परिचित थी और उसकी बहुत प्रशंसा करती थी। हालाँकि, जीवनी में कुछ बिंदु, विशेष रूप से गोपालराव जोशी के कठोर व्यवहार ने, जोशी के दोस्तों के बीच विवाद को जन्म दिया।",
"तजकिरात उल वाकियात\nतजकिरात उल वाकियात पुस्तक की रचना अकबर के आदेश से हुमायूँ के सेवक जौहर आफताबची ने सन् १५८७ ई० में की थी। इस पुस्तक में हुमायूँ के जीवन की घटनाओं का वणॅन मिलता है। यह पुस्तक फारसी भाषा में लिखी गई थी।",
"बाबरी मस्जिद\nबांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन द्वारा 1993 में लिखे गए विवादास्पद बांग्ला उपन्यास \"लज्जा\" में कहानी विध्वंस के बाद के दिनों पर आधारित है। इसके विमोचन के बाद लेखिका को उनके गृह देश में जान से मारने की धमकी मिली है और तब से वे निर्वासन में रह रही हैं।",
"मुगल रामायण\nअकबर की रामायण मे १७६ चित्र हैं। इसमें एक चित्र पर दो चित्रकार के नामोल्लेख मिलतें हैं एक 'तरह' अर्थात् 'रेखांकन' तथा 'अमल' अर्थात् 'चित्रांकन'। इसके मुख्य चित्रकार बासवान, केशव, लाल और मिस्कीन हैं।अकबर के मंत्री खान-ए-खानां रहीम ने भी रामायण लिखवायी थीं जो वर्तमान समय में 'फ्रिर गैलरी ऑफ़ आर्ट, वाशिंगटन' में हैं जिसे १५० रुपये देकर बनवाया गया था। इस प्रति के ३४९ पृष्ठ हैं। इसमें उल्लेख हैं कि रामायण मे ६२० कथा और २४५६० श्लोक हैं जिसमें से ९० कथा और ३९६० श्लोक रहीम कि रामायण मे लेखांकित किये गए है। इसमें बालकांड को आदिकांड कहा गया हैं जो पृष्ठ १३बी से आरंभ होता हैं। अयोध्याकाण्ड पृष्ठ ६९ए, अरण्यकाण्ड ११५बी, किष्किंधाकाण्ड १४०ए, सुंदरकाण्ड १६२ए, युद्धकाण्ड १८७ए और उत्तरकाण्ड २८६ए पृष्ठ से प्रारंभ होता हैं। इसके १बी पृष्ठ मे 'श्री गणेश के नाम पर' लिखा है।",
"फ़ारसी साहित्य\nअकबर की आज्ञा से \"तारीखे अलफी\" लिखी गई, जिसमें इसलाम के पैंगबर की मृत्यु के अनंतर एक सहस्र वर्ष तक का इतिहास आया है। अकबर कवियों का बड़ा सत्कार करता था। सुश्फिकी बुखाराई, जो सन् 1588 ई. में मरा, गजल का सुकवि था। हुसेन सनाई मशहदी मसनवी लेखक था। ये दोनों अकबर के दरबार में थे, किंतु अकबरी दरबार का सबसे बड़ा कवि जमालुद्दीन ऊर्फी था। यह शीराज में पैदा हुआ था पर हिंदुस्तान चला आया था। उर्फी के कसीदे प्रसिद्ध हैं, जिनमें कल्पना की समर्थ उड़ानें हैं। उर्फी सन् 1590 ई. मरा। फैजी ने निज़ामी के \"लैली व मजनूँ\" की चाल पर एक हिंदी प्रेमगाथा को \"नलदमन\" के नाम से कविताबद्ध किया है। नलदमन मूलत: संस्कृत में नलदयमंती है। इसी काल में जुहूरी तेहरानी ने हाफिज के ढंग पर साकीनामा मसनवी लिखी है, जिसकी अच्छी प्रसिद्धि है।",
"नारायण सीताराम फड़के\nकलासम्राट् ना. सी. फड़के की शिक्षा पूना में हुई। ये मेधावी विद्यार्थी थे। 1917 ई. में इनका पहला उपन्यास \"अल्ला हो अकबर\" प्रकाशित हुआ जो मेरी कॉरेली के \"टेंपोरल पावर\" उपन्यास के आधार पर रचा गया था। इसी समय इनको दादाभाई नौरोजी की जीवनी लिखने पर बंबई विश्वविद्यालय की ओर से पुरस्कार दिया गया। कलापूर्ण वक्ता होने के कारण इनकी भाषाशैली प्रसादयुक्त है। एम. ए. होते ही ये पूना कालेज में तर्कशास्त्र के प्राध्यापक बने और इन्होंने अंग्रेजी उपन्यास साहित्य का गहरा अध्ययन कर मराठी में उपन्यासों की रचना करना प्रारंभ किया। इनके अभी तक पचास उपन्यास प्रकाशित हुए और इधर पाँच वर्षों से ये प्रति वर्ष दो उपन्यासों की रचना करते हैं। इनके 49 उपन्यासों में निम्नलिखत विशेष उल्लेखनीय हैं - जादूगर, दौलत, आशा, प्रवासी, समरभूमि, शाकुंतल, झंझावात, उद्धार, शोनान तूफान।"
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मुगल चित्रकारी किसके शासनकाल में चरमोत्कर्ष प्राप्त किया?
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"बिचित्र\nमुगल काल के दौरान, बिचित्र एक भारतीय चित्रकार था, जिसे जहाँगीर और शाहजहाँ बादशाहों द्वारा संरक्षण प्राप्त था।"
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"भारतीय चित्रकला\nकुछ ही वर्षों में पारसी और भारतीय-शैली के मिश्रण से एक सशक्त शैली विकसित हुई और स्वतंत्र 'मुगल चित्रकला' शैली का विकास हुआ। 1562 और 1577 ई. के मध्य नई शैली के आधार पर प्रायः 1400 वस्त्रचित्रों की रचना हुई और इन्हें शाही कलादीर्घा में रखा गया। अकबर ने प्रतिकृति बनाने की कला को भी प्रोत्साहित किया। चित्रकला जहांगीर के काल में अपनी चरम सीमा पर थी। वह स्वयं भी उत्तम चित्रकार और कला का पारखी था। इस समय के कलाकारों ने चटख रंग जैसे मोर के गले सा नीला तथा लाल रंग का प्रयोग करना और चित्रों को त्रि-आयामी प्रभाव देना प्रारंभ कर दिया था। जहांगीर के शासन काल के मशहूर चित्रकार थे- मंसूर, बिशनदास तथा मनोहर। मंसूर ने चित्रकार अबुलहसन की अद्भुत प्रतिकृति बनाई थी। उन्होंने पशु-पक्षियों को चित्रित करने में विशेषता प्राप्त की थी। यद्यपि शाहजहाँ भव्य वास्तु कला में अधिक रुचि रखता था, उसके सबसे बड़े बेटे दाराशिकोह ने अपने दादा की तरह ही चित्रकला को बढ़ावा दिया। उसे भी प्राकृतिक तत्त्व जैसे पौधे, पशु आदि को चित्रित करना अधिक पसंद था। तथापि औरंगजेब के समय में शाहीसंरक्षण के अभाव में चित्रकारों को देश के विभिन्न भागों में पनाह लेने को बाध्य होना पड़ा। इससे राजस्थान और पंजाब की पहाड़ियों में चित्रकला के विकास को प्रोत्साहन मिला और चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ जैसे राजस्थानी शैली और पहाड़ी शैली विकसित हुईं। ये कृतियाँ एक छोटी सी सतह पर चित्रित की जाती थीं और इन्हें 'लघुचित्रकारी' कहां जाने लगा। इन चित्रकारों ने महाकाव्यों, मिथकों और कथाओं को अपने चित्रों की विषयवस्तु बनाया। अन्य विषय थे बारहमासा, रागमाला (लय) और महाकाव्यों के विषय आदि। लघुचित्रकला स्थानीय केन्द्रों जैसे कांगड़ा, कुल्लू, बसोली, गुलेर, चम्बा, गढ़वाल, बिलासपुर और जम्मू आदि में विकसित हुई।",
"मनोहर दास\nमनोहर के पिता बसावन मुगल दरबार के एक शाही चित्रकार थे, जहाँ मनोहर बड़े हुए। उनके पिता ने ही संभवतः उन्हें चित्रकारी सिखाई, और बाद में मनोहर स्वयं भी शाही चित्रकार बने। उनकी शुरुआती रचनाएँ अकबर के लिए चित्रित की गईं, और बाद में वे अकबर के बेटे और उत्तराधिकारी जहाँगीर की सेवा में कार्यरत हुए। मनोहर के कार्यों में अक्सर शाही परिवारों और दरबार के जीवन को दर्शाया गया है। उनके कुछ काम ब्रिटिश संग्रहालय और विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय में पाए जा सकते हैं।",
"राजपूत शैली\nजयपुरी शैली का काल 1600 से 1900 तक माना जाता है। सवाई जयसिंह के काल में दिल्ली से मुगल बादशाह औरंगजेब की बेरूखी का सामना कर अनेक कलाकार जयपुर आये थे। मुगलों के यहाँ से आये चित्रकारों के कारण प्रारम्भ में इस शैली पर मुगल प्रभाव काफी था। इस शैली के चित्रों में पुरूषों के चेहरे पर चोट एवं चेचक के दागों के निशान दर्शाये गये हैं।हरे रंग का मुख्यतः प्रयोग है।",
"ईरानी चित्रकला\nशाहरुख़ की मृत्यु (1447) के बाद उस समय कला और साहित्य के प्रसिद्ध उन्नायकों में हरात के सुल्तान हुसैन बेकरा (मृत्यु 1506) का नाम आता है। वास्तव में हराती शैली के संस्थापक सुल्तान हुसैन के मंत्री अली शोर नवाई थे। चित्रों की माँग होने से बहुत से चित्रकार हेरात में इकट्ठा हो गए, जिनमें बिहज़ाद का स्थान मुख्य था। हेरात के चित्रकारों ने कोई नई शैली न चलाकर प्रचलित ईरानी शैली को खूब माँजा। बिहज़ाद की कला के बारे में अभाग्यवश विद्वानों में मतैक्य नहीं है। जो चित्र बिहज़ाद के माने जाते हैं वे उनकी कृतियाँ हैं अथवा नहीं, इसपर भी कुछ विद्वान् बहुत खोज के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि रंगयोजना नक्काशी और सैरा के आलेखन में वे बेजोड़ थे तथा युद्ध चित्रण उनकी विशेषता थी। सफ़ावी युग ईरान की चित्रकला का राष्ट्रीय युग कहा जा सकता है। सफ़ावी शैली का रुख रूढ़ि की ओर था। इस युग के पहले ही ईरानी शैली काफी मँज चुकी थी इसलिए चित्रकारों ने इसमें कोई नवीनता लाने की आवश्यकता नहीं समझी। अब उनका ध्यान सब ओर से हटकर आलेखन और विषयसंकलन की ओर लग गया। फिरदौसी, निजामी और सादी के काव्यों के चित्रण की मांग बढ़ गई थी। शाह सफ़ावी ईरान के ही थे, इसलिए उनकी कलम में कुछ प्राचीन रूढ़ियों की आशा की जा सकती है; पर वास्तव में चित्रकला में इस रूढ़ि के चिह्न कम ही मिलते हैं। तहमास्पकालीन चित्रों में पशुपक्षियों से अलंकृत हाशिए की प्रथा चल पड़ी। चित्रकारों का ध्यान राजसी दृश्यों से हटकर कभी-कभी देहाती दुनिया पर भी पड़ने लगा। तत्कालीन वेशभूषा और रस्म रिवाज के अध्ययन के लिए ये चित्र अपनी वशेषता रखते हैं। प्रसिद्ध चित्रकारों में मीर सय्यद अली, मीरक और सुल्तान मुहम्मद, जो पशुओं के चित्रण में प्रसिद्ध थे, के नाम लिए जा सकते हैं। शाह तहमास्प के अंतिम दिनों में (1574) ईरानी चित्रकार धीरे-धीरे पुस्तकचित्रण की प्राचीन प्रथा से विलग होने लगे तथा अच्छे चित्रकार शबोह बनाने और वनभोजन इत्यादि के अंकन में लग गए। चित्रकला और लिपिकला के संबंधविच्छेद से कला ने एक नया रूप ग्रहण किया जिसके फलस्वरूप ईरानी कपड़ों में भी शबीहा की नकल होने लगी।",
"बीकानेर की चित्र शैली\nबीकानेर के राजा कल्याणमल ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से कर मुगलों से संबंध स्थापित किया। इस दृष्टि से बीकानेर के राजाओं का मुगल दरबार में महत्वपूर्ण स्थान था। महाराजा राय सिंह ने सन् १६०४ से १६११ ई. तक दक्षिण में बुरहानपुर का गर्वनर रहकर कलाकृतियों का संग्रह किया। रागमाला चित्रावली इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त उन्होंने आमेर, जोधपुर एवं उदयपुर आदि अन्य राजस्थान के राज्यों से भागवत और रसिक-प्रिया के चित्रों का संकलन किया। ऐसा कहा जाता है कि महाराजा कर्ण सिंह (१६३१-६९ ई.) ने अलीरजा नाम के मुगल चित्रकार को अपना प्रिय चित्रकार बनाया था।बीकानेर शैली का दूसरा मोड़ महाराजा अनूपसिंह के समय (१६६९-९८ ई.) से प्रारंभ होता है, पर बीकानेर शैली की बीच की कड़ी भी कम महत्वपूर्ण नहीं रही होगी। चित्रों की अनुपलब्धता के कारण इस समय के बारे में कुछ कह पाना कठिन है। सूरज सिंह का पुत्र अनूपसिंह के काल में जो चित्र तैयार हुए उनमें विशुद्ध बीकानेरी शैली का दर्शन होता है। महाराजा अनूपसिंह वीर होने के साथ-साथ विद्वान व संगीतज्ञ भी था। उसके दरबार में भाव भ जैसे संगीतज्ञ और कई विद्वान आश्रय पाते थे। इनके आश्रय में रहकर तत्कालीन चित्रकारों ने एक मौलिक किंतु स्थानीय परिमार्जित चित्रशैली को जन्म दिया। जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में बीकानेर धराने का गहन संबंध रहा जिससे कला और कलाकारों का आदान-प्रदान स्वभाविक था। सन् १६०६ ई. में नूर मोहम्मद के पुत्र शाह मुहम्मद का बनाया बीकानेर शैली का सर्वाधिक पुराना व्यक्ति चित्र है। संग्रहालयों एवं निजी संग्रह में बहुत से ऐसे चित्र हैं जिनके माध्यम से इस समय के चित्रों का अध्ययन संभव है।",
"बूँदी\nमुग़लों की मित्रता के बाद यहाँ की चित्रकला में नया मोड़ आया। यहाँ की चित्रकला पर उत्तरोत्तर मुग़ल प्रभाव बढ़ने लगा। राव रत्नसिंह (1631- 1658 ई.) ने कई चित्रकारों को दरबार में आश्रय दिया। शासकों के सहयोग एवं समर्थन तथा अनुकूल परिस्थितियों और नगर के भौगोलिक परिवेश की वजह से सत्रहवीं शताब्दी में बूँदी ने चित्रकला के क्षेत्र में काफ़ी प्रगति की। चित्रों में बाग, फ़व्वारे, फूलों की कतारें, तारों भरी रातें आदि का समावेश मुग़ल प्रभाव से होने लगा और साथ ही स्थानीय शैली भी विकसित होती रही। चित्रों में पेड़ पौधें, बतख तथा मयूरों का अंकन बूँदी शैली के अनुकूल है। सन 1692 ई. के एक चित्र बसंतरागिनी में बूँदी शैली और भी समृद्ध दिखायी देती है। कालांतर में बूँदी शैली समृद्धि की ऊँचाइयों को छूने लगी।",
"अकबर\nअकबर के शासन का प्रभाव देश की कला एवं संस्कृति पर भी पड़ा। उसने चित्रकारी आदि ललित कलाओं में काफ़ी रुचि दिखाई और उसके प्रासाद की भित्तियाँ सुंदर चित्रों व नमूनों से भरी पड़ी थीं। मुगल चित्रकारी का विकास करने के साथ साथ ही उसने यूरोपीय शैली का भी स्वागत किया। उसे साहित्य में भी रुचि थी और उसने अनेक संस्कृत पाण्डुलिपियों व ग्रन्थों का फारसी में तथा फारसी ग्रन्थों का संस्कृत व हिन्दी में अनुवाद भी करवाया था। अनेक फारसी संस्कृति से जुड़े चित्रों को अपने दरबार की दीवारों पर भी बनवाया। अपने आरम्भिक शासन काल में अकबर की हिन्दुओं के प्रति सहिष्णुता नहीं थी, किन्तु समय के साथ-साथ उसने अपने आप को बदला और हिन्दुओं सहित अन्य धर्मों में बहुत रुचि दिखायी। उसने हिन्दू राजपूत राजकुमारियों से वैवाहिक संबंध भी बनाये। अकबर के दरबार में अनेक हिन्दू दरबारी, सैन्य अधिकारी व सामन्त थे। उसने धार्मिक चर्चाओं व वाद-विवाद कार्यक्रमों की अनोखी शृंखला आरम्भ की थी, जिसमें मुस्लिम आलिम लोगों की जैन, सिख, हिन्दु, चार्वाक, नास्तिक, यहूदी, पुर्तगाली एवं कैथोलिक ईसाई धर्मशस्त्रियों से चर्चाएं हुआ करती थीं। उसके मन में इन धार्मिक नेताओं के प्रति आदर भाव था, जिसपर उसकी निजि धार्मिक भावनाओं का किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ता था। उसने आगे चलकर एक नये धर्म दीन-ए-इलाही की भी स्थापना की, जिसमें विश्व के सभी प्रधान धर्मों की नीतियों व शिक्षाओं का समावेश था। दुर्भाग्यवश ये धर्म अकबर की मृत्यु के साथ ही समाप्त होता चला गया।",
"भारत कला भवन (वाराणसी)\nभारतीय इतिहास में मुगल चित्रकला एक सुखद संयोग के रूप में दरबारी सभ्यता और भोग-विलास का उल्लास अपने में संचित किए है। मुगल चित्रकला का जन्म अनेक विदेशों और स्वदेशी चित्रकारों के परिश्रम और शिल्पसाधना का परिणाम है। बाबर भारत आते समय जिन पुस्तकों को अपने साथ लाया, उनमें शाहनामा की सचित्र प्रति भी थी। यह प्रति २०० वर्ष तक मुगल कुतुबखाने में रही जो बाद में अंग्रेजों के हाथ चली गई, संयोग से इस शाहनामा के छह महत्वपूर्ण चित्रों का संकलन इस संग्रहालय में सुरक्षित है।",
"भारत की प्रसिद्ध मस्जिदें\nमुगलों का शासनकाल भारत की स्थापत्य कला का स्वर्ण-युग माना जाता है। उनके शासनकाल में कई खूबसूरत इमारतों, स्तूपों का निर्माण किया गया। उन्हीं के काल में निर्मित मस्जिदें आज भी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना मानी जाती हैं। ऐसी ही कुछ मस्जिदें भारत में हैं, जो देखने वालों को हतप्रभ कर देती है।"
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ट्रिप्टोफैन के जैव संश्लेषण के लिये आवश्यक तत्व कोनसा है?
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"प्रोटीन ( पोषक तत्व )\nनौ आवश्यक अमीनो अम्ल होते हैं जो प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण और परिणामस्वरूप मृत्यु को रोकने के लिए मनुष्यों को अपने आहार से प्राप्त करना चाहिए। वे फेनिलएलनिन, वेलिन, थ्रेओनीन, ट्रिप्टोफैन, मेथिओनिन, ल्यूसीन, आइसोलेसीन, लाइसिन और हिस्टिडाइन हैं । इस पर बहस हुई है कि क्या 8 या 9 आवश्यक अमीनो अम्ल हैं। हिस्टिडीन वयस्कों में संश्लेषित नहीं होने के कारण सर्वसम्मति 9 की ओर झुकाव लगती है। पांच अमीनो अम्ल होते हैं जो मानव शरीर में संश्लेषित करने में सक्षम होते हैं। ये पांच अलैनिन, एसपारटिक अम्ल, एस्पेरेगिन, ग्लूटामिक अम्ल और सेरीन हैं । छह सशर्त रूप से आवश्यक अमीनो अम्ल होते हैं जिनके संश्लेषण को विशेष पैथोफिजियोलॉजिकल स्थितियों के तहत सीमित किया जा सकता है, जैसे कि शिशु में अपरिपक्वता या गंभीर catabolic संकट में व्यक्तियों। ये छह हैं आर्गिनिन, सिस्टीन, ग्लाइसिन, ग्लूटामाइन, प्रोलिन और टायरोसिन । प्रोटीन के आहार स्रोतों में मीट, डेयरी उत्पाद, मछली, अंडे, अनाज, फलियां, नट्स और खाद्य कीड़े शामिल हैं ।",
"ट्रिप्टोफेन\nट्रिप्टोफेन एक कार्बनिक यौगिक है। यह एक अमीनो अम्ल है जिससे प्रोटीन का निर्माण होता है।",
"ट्रिप्टोफैन दमनकारी\nट्रिप्टोफैन रिप्रेसर' (या \" टीआरपी रिप्रेसर \"\") एक ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर है जो एमिनो एसिड मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करता है। इसका सबसे अच्छा अध्ययन \"एस्चेरिचिया कोली\" में किया गया है, जहां यह एक डिमेरिक प्रोटीन है जो ट्रिप्टोफैन ऑपरॉन में 5 जीनों के प्रतिलेखन को नियंत्रित करता है।"
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"भोजन में फल व सब्जियां\nभोजन में पोटैशियम की पूर्ति फलों और सब्जियों के माध्यम से ही होती है, पोटैशियम की शारीरिक ऊर्जा उपापचय में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसकी कमी होने से मांसपेशियों में कमजोरी और कई मानसिक विषमताएं हो जाती हैं। ये कमियां हृदय की कार्यक्षमता में दिखाई देती है। टिटोफन एक आवश्यक एमिनो एसिड है जो फलों और सब्जियों में पाया जाता है। कई प्रकार के ट्रेस एलिमेन्ट्स और अकार्बनिक तत्वों की शरीर के एन्जाइम तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिससे शरीर की प्रोटीन और हार्मोन संरचना बनी रहती है। कई प्रकार के खनिज लवण और अन्य सूक्ष्मात्रिक तत्व फलों और सब्जियों में पाये जाते हैं जिनकी मात्र मौसम, कृषि कार्य, मृदा प्रकार और किस्मों की मात्र पर निर्भर करती है।",
"प्रोटीन\nप्रोटीन त्वचा, रक्त, मांसपेशियों तथा हड्डियों की कोशिकाओं के विकास के लिए आवश्यक होते हैं। जन्तुओं के शरीर के लिए कुछ आवश्यक प्रोटीन एन्जाइम, हार्मोन, ढोने वाला प्रोटीन, सिकुड़ने वाला प्रोटीन, संरचनात्मक प्रोटीन एवं सुरक्षात्मक प्रोटीन हैं। प्रोटीन का मुख्य कार्य शरीर की आधारभूत संरचना की स्थापना एवं इन्जाइम के रूप में शरीर की जैवरसायनिक क्रियाओं का संचालन करना है। आवश्यकतानुसार इससे ऊर्जा भी मिलती है। एक ग्राम प्रोटीन के प्रजारण से शरीर को ४.१ कैलीरी ऊष्मा प्राप्त होती है। प्रोटीन द्वारा ही प्रतिजैविक (एन्टीबॉडीज़) का निर्माण होता है जिससे शरीर प्रतिरक्षा होती है। जे. जे. मूल्डर ने १८४० में प्रोटीन का नामकरण किया। प्रोटीन बनाने में २० अमीनो अम्ल भाग लेते हैं। पौधे ये सभी अमीनो अम्ल अपने विभिन्न भागों में तैयार कर सकते हैं। जंतुओं की कुछ कोशिकाएँ इनमें से कुछ अमीनो अम्ल तैयार कर सकती है, लेकिन जिनको यह शरीर कोशिकाओं में संश्लेषण नहीं कर पाते उन्हें जंतु अपने भोजन से प्राप्त कर लेते हैं। इस अमीनो अम्ल को अनिवार्य या आवश्यक अमीनो अम्ल कहते हैं। मनुष्य के अनिवार्य अमीनो अम्ल लिउसीन, आइसोलिउसीन, वेलीन, लाइसीन, ट्रिप्टोफेन, फेनिलएलानीन, मेथिओनीन एवं थ्रेओनीन हैं।",
"इम्यूनोफ्लोरेसेंस\nइम्यूनोफ्लोरेसेंस को ऊतक वर्गों, कल्चर किए हुए कोशिका रेखाओं, या व्यक्तिगत कोशिकाओं पर उपयोग किया जाता है और इसका उपयोग प्रोटीन, ग्लाईकन और छोटे जैविक और गैर जैविक अणुओं के वितरण का विश्लेषण करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि कोशिका झिल्ली की टोपोलॉजी अभी तक निर्धारित नहीं की गई है, तो प्रोटीन में एपिटॉप सम्मिलन का उपयोग संरचनाओं को निर्धारित करने के लिए इम्यूनोफ्लोरेसेंस के संयोजन के साथ किया जा सकता है। इम्यूनोफ्लोरेसेंस का उपयोग डीएनए मिथाइलीकरण के स्तर और स्थानीयकरण पैटर्न में अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए \"अर्ध-मात्रात्मक\" विधि के रूप में भी किया जा सकता है क्योंकि यह वास्तविक मात्रात्मक तरीकों से अधिक समय लेने वाली विधि है और मिथाइलीकरण के स्तर के विश्लेषण में कुछ व्यक्तिपरकता है।",
"ट्रयकोमोइसीस\nमानव जननांग पथ इस प्रजाति के लिए एकमात्र जलाशय है। ट्रायकोमोनास यौन या जननांग संपर्क के माध्यम से फैलता है। सिंगल-सेलड प्रोटोज़ोन मेजबान कोशिकाओं पर यांत्रिक तनाव पैदा करता है और फिर सेल मौत के बाद कोशिका के टुकड़े में प्रवेश करता है।",
"क्रिया विभव\nजैविक जीवों के भीतर विद्युत संकेत, सामान्यतः, आयन द्वारा संचालित होते हैं। ऐक्शन पोटेंशिअल के लिए सबसे महत्वपूर्ण धनायन, सोडियम (Na) और पोटेशियम (K) है। दोनों ही \"मोनोवैलेन्ट\" फैटायन हैं, जो एक एकल धनात्मक चार्ज वहन करते हैं। ऐक्शन पोटेंशिअल में कैल्शियम (Ca) भी शामिल हो सकता है, जो एक \"द्विसंयोजक\" फैटायन है जो दोहरा सकारात्मक चार्ज वहन करता है। क्लोराइड एनायन (Cl) कुछ शैवाल के ऐक्शन पोटेंशिअल में एक बड़ी भूमिका निभाता है, लेकिन अधिकांश जानवरों के ऐक्शन पोटेंशिअल में एक नगण्य भूमिका निभाता है।",
"संश्लेषित रेशा\nबड़ी उच्च दृढ़ता (tenacite) के सेज्युलूसीय तंतु हैं। टेनास्को का उपयोग मोटरों तथा वायुयानों के टायरों की रस्सी, वाहक पट्टों तथा रस्सियों के बनाने में होता है। संश्लिष्ट रेशों में फॉर्टिसन सबसे अधिक पुष्ट होता है इसकी दृढ़ता 7 ग्राम प्रति डेनियर होता है। इसका मुख्य उपयोग टायर की रस्सी बनाने में किया जाता है। पैराशूट के कपड़े बनाने में भी इसका व्यापक उप्योग होता है।",
"कोलेजन\nकोलेजन तंतु/समुच्चय भिन्न ऊतक गुणों को उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न ऊतकों के अलग-अलग संयोजन और सांद्रताओं में व्यवस्थित होते हैं। अस्थि में, संपूर्ण कोलेजन ट्रिपल हेलिक्स एक समानांतर, टेढ़े-मेढ़े विन्यास में पड़े रहते हैं। ट्रोपोकोलेजन उप-इकाइयों के सिरों पर 40 nm अंतराल (लगभग अंतर के क्षेत्र के बराबर) संभवतः खनिज घटक के लंबे, मज़बूत, महीन क्रिस्टल जमा करने के लिए केंद्रक स्थल का काम करते हैं, जोकि (लगभग) हाइड्रॉक्सियापटाइट, कुछ फ़ास्फ़ेट सहित Ca(PO)(OH) है।"
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टीपू सुल्तान अंग्रेजों के साथ युद्ध में कब मारे गये थे?
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"टीपू सुल्तान\n4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टना में टीपू सुल्तान की बहुत धूर्तता से अंग्रेजों द्वारा हत्या कर दी गयी। हत्या के बाद उनकी तलवार अंग्रेज अपने साथ ब्रिटेन ले गए। टीपू की मृत्यू के बाद सारा राज्य अंग्रेजों के हाथ आ गया।",
"टीपू सुल्तान\nउनकी वीरता से प्रभवित होकर उनके पिता हैदर अली ने ही उन्हें शेर-ए-मैसूर के खिताब से नवाजा था। अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए 4 मई 1799 को टीपू सुल्तान की मौत हो गई।",
"टीपू का बाघ\nइस मशीन पर अंग्रेजों का कब्ज़ा तब हुआ जब उन्होंने चौथी एंग्लो-मैसूर जंग में टीपू सुल्तान की राजधानी स्रीरंगपटनम पर कब्ज़ा कर उन्हें ४ मई १७९९ को मौत के घाट उतारा।",
"डोड्डा वीरा राजेंद्र\nडोड्डा वीरा राजेंद्र ने ब्रिटिश बॉम्बे आर्मी को टीपू सुल्तान की राजधानी श्रीरंगपटना के रास्ते में कूर्ग से गुजरने की अनुमति दी। उन्होंने ४ मई १७९९ को टीपू सुल्तान की मृत्यु तक, अंग्रेजों के खिलाफ उनकी लड़ाई में सहायता की।",
"श्रीरंगपट्टणम् की घेराबंदी (1799)\nश्रीरिंगपट्टम की घेराबंदी (5 अप्रैल - 4 मई 1799) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मैसूर साम्राज्य के बीच चौथा आंग्लो-मैसूर युद्ध का अंतिम टकराव था। अंग्रेजों के हैदराबाद के सहयोगी निजाम के साथ अंग्रेजों ने सेरिंगपट्टम में किले की दीवारों का उल्लंघन करने और गढ़ पर हमला करने के बाद निर्णायक जीत हासिल की। मैसूर के शासक टीपू सुल्तान लड़ाई में मारे गए थे।. जीत के बाद अंग्रेजों ने वोडेयार वंश को सिंहासन में बहाल कर दिया, लेकिन राज्य के अप्रत्यक्ष नियंत्रण को बरकरार रखा। युद्ध में अप्रैल और मई 1799 के महीनों में श्रीरिंगपट्टम (श्रीरंगापत्तनम का अंग्रेजी संस्करण) के आसपास मुठभेड़ों की एक श्रृंखला शामिल थी, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और उनके सहयोगियों की संयुक्त सेनाओं के बीच, 50,000 से अधिक सैनिकों की संख्या और मैसूर साम्राज्य के, टीपू सुल्तान द्वारा शासित, 30,000 सैनिक संख्या थी। चौथा एंग्लो-मैसूर युद्ध युद्ध में टीपू सुल्तान की हार और मौत के साथ खत्म हो गया था। जब चौथा एंग्लो-मैसूर युद्ध टूट गया, तो अंग्रेजों ने जनरल जॉर्ज हैरिस के तहत दो बड़े स्तंभ एकत्र किए। पहले 26,000 से अधिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक शामिल थे, जिनमें से 4,000 यूरोपीय थे जबकि शेष स्थानीय भारतीय सिपाही थे। दूसरा स्तंभ हैदराबाद के निजाम द्वारा प्रदान किया गया था, और इसमें दस बटालियन और 16,000 से अधिक घुड़सवार शामिल थे। साथ में, सहयोगी बल 50,000 से अधिक सैनिकों की संख्या में गिना गया। टिपू की सेना तीसरा आंग्लो-मैसूर युद्ध से समाप्त हो गई थी और इसके परिणामस्वरूप आधे राज्य का नुकसान हुआ था।"
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"चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध\nयह आंग्ल-मैसूर के हुए युद्धों में चौथी और अंतिम लड़ाई थी। अंग्रेजों ने मैसूर की राजधानी पर कब्जा कर लिया। युद्ध में शासक टीपू सुल्तान की मौत हो गई। ब्रिटेन ने ओडेयर राजवंश (एक ब्रिटिश आयुक्त के साथ उसे सभी मुद्दों पर सलाह देने के लिए) को मैसूर सिंहासन में बहाल कर, मैसूर पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण कर लिया। टीपू सुल्तान के युवा उत्तराधिकारी फतेह अली को निर्वासन में भेजा दिया गया था। मैसूर साम्राज्य ब्रिटिश भारत के साथ सहायक गठबंधन में एक रियासत बन गया और कोयंबटूर, दक्षिणी कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ अंग्रेजों को सौंप दिया गया।",
"टीपू सुल्तान\n19वीं सदी में ब्रिटिश सरकार के एक अधिकारी और लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब 'मालाबार मैनुअल' में लिखा है कि टीपू सुल्तान ने किस प्रकार अपने 30 हजार सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी। टीपू सुल्तान हाथी पर सवार था और उसके पीछे उसकी विशाल सेना चल रही थी। पुरुषों और महिलाओं को सरेआम फाँसी दी गई। उनके बच्चों को भी उन्हीं के साथ फाँसी पर लटकाया गया। सारे इतिहास को खंगालने से साफ़ पता चलता की टीपू एक इस्लामिक धर्मांध शासक था जिसकी तलवार पर ही लिखा था की \" मालिक मेरी सहायता कर की मैं काफ़िरों का सफाया कर दूँ \" कुर्ग के 80 हजार लोगों को या तो मार डाला गया या उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बना दिया गया ! 1791 में रघुनाथ राव पटवर्धन के कुछ मराठा सवारों ने शृंगेरी शंकराचार्य के मंदिर और मठ पर छापा मारा। उन्होंने मठ की सभी मूल्यवान सम्पत्ति लूट ली। इस हमले में कई लोग मारे गए और कई घायल हो गए। शंकराचार्य ने मदद के लिए टीपू सुल्तान को अर्जी दी। शंकराचार्य को लिखी एक चिट्ठी में टीपू सुल्तान ने आक्रोश और दु:ख व्यक्त किया। इसके बाद टीपू ने बेदनुर के आसफ़ को आदेश दिया कि शंकराचार्य को 200 राहत (फ़नम) नक़द धन और अन्य उपहार दिये जायें। शृंगेरी मन्दिर में टीपू सुल्तान की दिलचस्पी काफ़ी सालों तक जारी रही, और 1790 के दशक में भी वे शंकराचार्य को खत लिखते रहे। टीपू के यह पत्र तीसरे मैसूर युद्ध के बाद लिखे गए थे, जब टीपू को बंधकों के रूप में अपने दो बेटों देने सहित कई झटकों का सामना करना पड़ा था। यह सम्भव है कि टीपू ने ये खत अपनी हिन्दू प्रजा का समर्थन हासिल करने के लिए लिखे थे।",
"भारत में इस्लाम\nहैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया। बहरहाल, 1799 में टीपू सुल्तान अंततः श्रीरंगापटनम में पराजित हुए। बंगाल में नवाब सिराजुद्दौला ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तारवादी उद्देश्य का सामना किया और ब्रिटिशों से युद्ध किया। हालांकि, 1757 में वे प्लासी की लड़ाई में हार गए। ब्रिटिश के खिलाफ पहले भारतीय विद्रोही को 10 1806 के वेल्लोर गदर में देखा गया जिसमें लगभग 200 ब्रिटिश अधिकारी और सैनिकों को मृत या घायल के रूप में पाया गया। लेकिन ब्रिटिश द्वारा इसका बदला लिया गया और विद्रोहियों और टीपू सुल्तान के परिवार वालों को वेल्लोर किले में बंदी बनाया गया और उन्हें उस समय इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।सिपाही विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजों द्वारा ज्यादातर ऊपरी वर्ग के मुस्लिम लक्षित थे क्योंकि वहां और दिल्ली के आसपास इन्हें के नेतृत्व में युद्ध किया गया था। हजारों की संख्या में मित्रों और सगे संबंधियों को दिल्ली के लाल किले पर गोली मार दी गई या फांसी पर लटका दिया गया जिसे वर्तमान में खूनी दरवाजा (ब्लडी गेट) कहा जाता है। प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब (1797-1869) ने अपने पत्रों में इस प्रकार के ज्वलंत नरसंहार से संबंधित कई विवरण दिए हैं जिसे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा 'गालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स' के नाम के प्रकाशित किया है और राल्फ रसेल और खुर्शिदुल इस्लाम द्वारा संकलित और अनुवाद किया गया है (1994).",
"गजेंद्रगढ़ की लड़ाई\nईस्ट इंडिया कंपनी के साथ युद्ध समाप्त हो जाने के बाद, मराठा अभिभावक मंत्री नाना फडणवीस ने हैदर अली के बेटे टीपू सुल्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लेने का फैसला किया। चूंकि सिंधिया रोहिल्ला के खिलाफ अपने युद्ध में व्यस्त थे, तुकोजीराव होलकर, महाराजा इंदौर को टीपू सुल्तान के खिलाफ युद्ध के मोर्चे का नेतृत्व करने के लिए कहा गया और पेशवा जनरल हरिपंत फड़के को सहायता प्रदान करने के लिए कहा गया था। हैदराबाद के निजाम अली, आसिफजा भी मराठों में शामिल हो गए और उन्होंने जून 1786 में गजेंद्रगढ़ पर छापा मारा। टीपू की सेना गणेश व्यंकाजी के नेतृत्व में तोपखाने के हमले का सामना नहीं कर सकी। उनकी बेराड पैदल सेना को हरिपंत और मालोजीराजे के नेतृत्व में मराठा घुड़सवार सेना ने परास्त कर दिया।",
"टीपू सुल्तान\nटीपु सुल्तान रंगापट्टी की अपमानजनक सन्धि से काफी दुखी थे और अपनी बदनामी के कारण वह अंग्रेजो को पराजित कर दूर करना चाहते थे, प्रकृति ने उन्हें ऐसा मौका भी दिया लेकिन भाग्य ने टीपु का साथ नहीं दिया। जिस समय इंग्लैण्ड और फ्रांस में युद्ध चल रहा था ,इस अंतरराष्ट्रीय विकट परिस्थिति से लाभ उठाने के लिए टीपू ने विभिन्न देशों में अपना राजदुत भेजे।"
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थे जंगल बुक में बगीरा किस जानवर का नाम था?
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"जंगल बुक (1967 की फ़िल्म)\nमोगली (ब्रूस रीदरमैन) मध्य प्रदेश, भारत के घने जंगलों में एक टोकरी में शिशु के रूप में पाया जाता है। बघीरा (सेबेस्टियन कोबोट), काला तेंदुआ, जो लड़के को ढूंढता है, तुरंत उसे एक भारतीय भेड़िये के पास ले जाता है जिसने अभी हाल ही में बच्चे दिए हैं। वह अपने बच्चों के साथ उसका पालन पोषण करती है और मोगली शीघ्र ही जंगली जीवन से परिचित हो जाता है। दस साल के बाद मोगली को भेड़ियों के पास जाते हुए और उसके आने पर बेसब्री से उसका मुंह चूमते हुए दिखाया गया है। उस रात, जब भेड़ियों के झुण्ड को पता लगता है कि एक आदमखोर बंगाल बाघ शेर खान (जॉर्ज सैंडर्स) जंगल में वापिस लौट आया है, तो उन्हें लगता हैं कि उसे तथा उसके आसपास रहने वालों को बचाने के लिए मोगली को \"मनुष्यों के गांव\" में ले जाया जाना चाहिए। वापिस जाने के दौरान बघीरा उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेता है।"
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"रुडयार्ड किपलिंग\nकिपलिंग के इससे जुड़ जाने से स्काउटिंग आंदोलन काफी मजबूत हो गए थे। स्काउटिंग के संस्थापक बाडेन-पॉवेल ने \"द जंगल बुक\" और \"किम\" की कहानियों के कई विषयों का प्रयोग वोल्फ कब्स जूनियर आंदोलन के लिए किया था। ये सम्पर्क आज भी मौजूद हैं। इस आंदोलन का नाम केवल भेड़िए परिवार द्वारा मोगली को अपनाने के बाद नहीं रखा गया, वोल्फ कब पैक्स के वयस्क सहायकों का नाम द जंगल बुक से लिया गया था, विशेष कर सीओनी वोल्फ पैक के नेता के बाद वयस्क नेता जिसका नाम अकेला था।",
"जंगल बुक (1967 की फ़िल्म)\n14 फ़रवरी 2003 को ऑस्ट्रलिया में डिज़्नी टून स्टूडियो ने द जंगल बुक 2 के नाम से 1967 क्लासिक की एक उत्तरकथा जारी की, जिसमे मोगली मनुष्यों के उस गांव से, जिसमे वह फिल्म के अंत में लौटता है, अपने जानवर दोस्तों से मिलने के लिए भाग जाता है, वह शेर खान का सामना होने से पैदा होने होने वाले खतरे से अनजान है जो शुरू में शर्मिंदा होने के कारण उसे मारने के लिए पहले से अधिक प्रतिबद्ध है। आलोचकों से नकारात्मक प्रतिक्रिया के बावजूद दुनिया भर 136 मिलियन डॉलर कमा कर, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल थी।",
"जंगल बुक (1967 की फ़िल्म)\nतूफान आने के दौरान, उदास मोगली का सामना गंभीर किन्तु दयालु गिद्धों (जे. पैट ओ'मैली, डिग्बी वुल्फ, लोर्ड टिम हडसन और चाड स्टुअर्ट) से होता है, जो द बीटल्स सदृश हैं, तथा वे कहते हैं वे उसके दोस्त बनेंगे क्योंकि उन्हें भी लगता है कि वे निर्वासित जीवन जी रहे हैं और महसूस करते हैं कि हर किसी का दोस्त होना चाहिए। (दैट्स वट फ्रेंड्स आर फॉर (That's What Friends Are For))। मोगली उनके दोस्ती के सुझाव का स्वागत करता है, किन्तु उसके कुछ देर बाद ही गिद्धों को डराते हुए तथा मोगली को मौत की लड़ाई की चुनौती देते हुए शेर खान प्रकट होता है। बलू बचाव के लिए जाता है, लेकिन शेर खान द्वारा बुरी तरह से पीट दिया जाता है। पेड़ पर बिजली गिरने से इसके जलने के बाद, गिद्ध शेर खान से वापिस लड़ाई करते हैं जबकि मोगली क्रूर बाघ को भगाने के लिए आग का प्रयोग करता है। अपने आगमन पर बघीरा मोगली को बलू के बलिदान के लिए रोते हुए देखता है, लेकिन बघीरा द्वारा एक नाटकीय भाषण के पश्चात्, केवल बेहोश किन्तु युद्ध में घायल बलू जाग जाता है। मोगली बहुत खुश होता है लेकिन बघीरा इस \"चाल\" से नाराज होता है।",
"मंगल पांडे: द राइज़िंग\nगॉर्डन ने एक जवान विधवा, ज्वाला (अमिशा पटेल) को सती करने से (अपने पति को अंतिम संस्कार के लिए जाने का कार्य) बचाया; और बाद में, वह उसके साथ प्यार में गिर जाता है इस बीच, हीरा (रानी मुखर्जी) को वेश्यावृत्ति में बेच दिया गया है, जो कि लोल बिबी (किरण खेर) के लिए काम करता है। उसके और पांडे के बीच आकर्षण का एक चिंगारी है और एक संपर्क इस प्रकार है।",
"जंगल बुक (1967 की फ़िल्म)\nबघीरा और बलू मोगली को मनुष्य के गांव की सीमा तक ले जाते हैं, लेकिन मोगली को अभी भी प्रवेश करने में हिचकिचाहट होती है। शीघ्र ही उसका मन बदल जाता है जब वह गांव की एक युवा लड़की के प्रति आकर्षित हो जाता है जो नदी के किनारे पानी भरने आती है (माई ऑन होम (My Own Home))। मोगली को देखने के बाद, वह \"दुर्घटनावश\" अपना घड़ा गिरा देती है और मोगली उसके लिए इसे उठता है और प्रेम वश उसका मनुष्यों के गांव तक पीछा करता है। शुरुआत में बलू का दिल टूट जाता है लेकिन बघीरा उसे विश्वास दिलाता है कि उसने सही काम किया है और अब मोगली मनुष्यों के गांव में, जहां से वह आया है, सुरक्षित है। बलू अभी भी अफसोस जताता है लेकिन मोगली की सुरक्षा के लिए सहमत हो जाता है। दोनों जानवर द बेयर नेसेसिटीज़ (The Bare Necessities) गीत को दोहराते हुए घर लौटने का निर्णय करते हैं।लिओ दे ल्योन, बिल ली, हैल स्मिथ, टेरी थॉमस और डिग्बी वुल्फ के अलावा आवाज़ देने वाले सभी अभिनेताओं का नाम फिल्म की नामावली में दिखाया गया है।",
"जंगल बुक (1967 की फ़िल्म)\nफिल्म के सीमित बजट के कारण बाद में \"द जंगल बुक\" के तत्वों का पुनर्नवीनीकरण डिज़्नी फीचर फिल्म \"रॉबिन हुड\" में किया गया था, जैसे लिटिल जॉन के लिए बालू का प्रेरणा बनना (जो ना केवल एक भालू था, बल्कि उसे फिल हैरिस द्वारा आवाज़ दी गयी थी)। विशेष रूप से, बालू और राजा लुई के बीच नृत्य अनुक्रम की नक़ल लिटिल जॉन और लेडी क्लक के नृत्य में की गई थी।",
"सफ़ेद बाघ\nअरविंद अदिगा के उपन्यास \"द व्हाइट टाइगर\" ने 2008 में मैन बुकर प्राइज जीता. मुख्य किरदार और सूत्रधार अपने आपको \"द व्हाइट टाइगर\" कहता है। यह बच्चे के रूप में उसे दिया गया एक उपनाम था जो दर्शाता है कि \"जंगल\" (उसका शहर) में वह अनोखा था, यह भी कि वह दूसरों से कहीं अधिक होशियार था।",
"जंगल बुक (1967 की फ़िल्म)\n1990-91 की एनिमेटेड श्रृंखला \"टेलस्पिन\" में कई चरित्र प्रकट हुए. 1996 और 1998 के बीच टीवी श्रृंखला \"जंगल कब्स\" ने बालू, हठी, बघीरा, लुई, का और शेर खान की कहानियां दिखाईं, जब वे बच्चे थे।",
"द जंगल बुक\nद जंगल बुक (अंग्रेजी:The Jungle Book; \"जंगल की किताब\") (1894) नोबेल पुरस्कार विजेता अंग्रेजी लेखक रुडयार्ड किपलिंग की कहानियों का एक संग्रह है। इन कहानियों को पहली बार कालीचरण 1893-94 में पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया था। मूल कहानियों के साथ छपे कुछ चित्रों को रुडयार्ड के पिता जॉन लॉकवुड किपलिंग ने बनाया था। रुडयार्ड किपलिंग का जन्म भारत में हुआ था और उन्होने अपनी शैशव अवस्था के प्रथम छह वर्ष भारत में बिताये। इसके उपरान्त लगभग दस वर्ष इंग्लैण्ड में रहने के बाद वे फिर भारत लौटे और लगभग अगले साढ़े छह साल तक यहीं रह कर काम किया। इन कहानियों को रुडयार्ड ने तब लिखा था जब वो वर्मोंट में रहते थे। जंगल बुक के कथानक में मोगली नामक एक बालक है जो जंगल मे खो जाता है और उसका पालन पोषण भेड़ियों का एक झुंड करता है, अंत मे वह गाँव में लौट जाता है।"
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सम्पूर्ण भारत में गेहूँ की ट्रिटिकम एस्टीवम प्रजाति उगाई जाती है तथा अन्य मुख्य प्रजाति है?
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"गेहूँ\nभारत में मुख्य रूप से ट्रिटिकम की तीन जातियों जैसे ऐस्टिवम, डयूरम एवं डाइकोकम की खेती की जाती है। इन जातियों द्वारा सन्निकट सस्यगत क्शेत्र क्रमश: ९५, ४ एवं १ प्रतिशत है। ट्रिटिकम ऐस्टिवम की खेती देश के सभी क्षेत्रों में की जाती है जबकि डयूरम की खेती पंजाब एवं मध्य भारत में और डाइकोकम की खेती कर्नाटक में की जाती है।",
"गेहूँ\nट्रिटिकम ऐस्टिवम (रोटी गेहूँ) मृदु गेहूँ होता है और ट्रिटिकम डयूरम कठोर गेहूँ होता है।"
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"गेहूँ\nगेहूँ (ट्रिटिकम जाति) विश्वव्यापी महत्व की फसल है। यह फसल नानाविध वातावरणों में उगाई जाती है। यह लाखों लोगों का मुख्य खाद्य है। विश्व में कुल कृष्य भूमि के लगभग छठे भाग पर गेहूँ की खेती की जाती है यद्यपि एशिया में मुख्य रूप से धान की खेती की जाती है, तो भी गेहूँ विश्व के सभी प्रायद्वीपों में उगाया जाता है। यह विश्व की बढ़ती जनसंख्या के लिए लगभग २० प्रतिशत आहार कैलोरी की पूर्ति करता है। वर्ष २००७-०८ में विश्वव्यापी गेहूँ उत्पादन ६२.२२ करोड़ टन तक पहुँच गया था। चीन के बाद भारत गेहूँ दूसरा विशालतम उत्पादक है। गेहूँ खाद्यान्न फसलों के बीच विशिष्ट स्थान रखता है। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन गेहूँ के दो मुख्य घटक हैं। गेहूँ में औसतन ११-१२ प्रतिशत प्रोटीन होता हैं। गेहूँ मुख्यत: विश्व के दो मौसमों, यानी शीत एवं वसंत ऋतुओं में उगाया जाता है। शीतकालीन गेहूँ ठंडे देशों, जैसे यूरोप, सं॰ रा॰ अमेरिका, आस्ट्रेलिया, रूस राज्य संघ आदि में उगाया जाता है जबकि वसंतकालीन गेहूँ एशिया एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के एक हिस्से में उगाया जाता है। वसंतकालीन गेहूँ १२०-१३० दिनों में परिपक्व हो जाता है जबकि शीतकालीन गेहूँ पकने के लिए २४०-३०० दिन लेता है। इस कारण शीतकालीन गेहूँ की उत्पादकता वंसतकालीन गेहूँ की तुलना में अधिक हाती है। गेहूँ की फसल के बीज वाले भाग को बाली या दंगी कहते हैं।",
"गेहूँ\nगेहूं (Wheat ; वैज्ञानिक नाम : Triticum aestivum.), मध्य पूर्व के लेवांत क्षेत्र से आई एक घास है जिसकी खेती दुनिया भर में की जाती है। विश्व भर में, भोजन के लिए उगाई जाने वाली अन्य फसलों मे मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाले फसल है, धान का स्थान गेहूं के ठीक बाद तीसरे स्थान पर आता है। यह घास कुल का पौधा है गेहूं के दाने और दानों को पीस कर प्राप्त हुआ आटा रोटी, डबलरोटी (ब्रेड), कुकीज, केक, दलिया, पास्ता, रस, सिवईं, नूडल्स आदि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। गेहूं का किण्वन कर बियर, शराब, वोद्का और जैवईंधन बनाया जाता है। गेहूं की एक सीमित मात्रा मे पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है और इसके भूसे को पशुओं के चारे या छत/छप्पर के लिए निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।",
"सूत्रकृमिविज्ञान\nभारत की महत्वपूर्ण सूत्रकृमि संबंधी समस्याएं जड़ गांठ सूत्रकृमि (मेलाइडोगायने प्रजातियां) तथा रेनिफार्म (रोटिलैंकलस रेनिफार्मिस) सूत्रकृमि हैं जो सब्जियों तथा दलहनी फसलों पर लगते हैं। इनमें से गेहूं में लगने वाला अनाज का पुटि एवं बाली-कॉकल सूत्रकृमि, सुरंग बनाने वाला सूत्रकृमि (रोडोफोलस सिमिलेस) जो दक्षिण भारत की रोपण फसलों पर लगता है, हमारे देश के प्रमुख सूत्रकृमि हैं। साथ ही, पूर्वी भारत में धान की फसल में तने पर लगने वाला (डिटाइलेंकस एंगस्टस) तथा पत्ती और कली पर लगने वाला (एफेलेंकॉयडिस बेसेई) सूत्रकृमि इन फसलों को काफी क्षति पहुंचाते हैं। कुछ अन्य महत्वपूर्ण सूत्रकृमि हैं नीलगिरि पहाड़ियों में आलू में लगने वाली ग्लोबोडेरा प्रजातियां; सब्जियों, दलहनी एवं तिलहनी फसलों पर आक्रमण करने वाली रेटिलेंकस प्रजातियां, तथा दलहनी फसलों में लगने वाला सूत्रकृमि हेटेरोडेरा कैजानी।",
"भारतीय आम\nभारत में उगायी जाने वाली आम की किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फज़ली, बम्बई ग्रीन, बम्बई, अलफ़ॉन्ज़ो, बैंगन पल्ली, हिम सागर, केशर, किशन भोग, मलगोवा, नीलम, सुर्वन रेखा, वनराज, जरदालू हैं। नई किस्मों में, मल्लिका, आम्रपाली, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल तथा दशहरी-५१ प्रमुख प्रजातियाँ हैं। उत्तर भारत में मुख्यत: गौरजीत, बाम्बेग्रीन, दशहरी, लंगड़ा, चौसा एवं लखनऊ सफेदा प्रजातियाँ उगायी जाती हैं।",
"भारत के जीव-जंतु\nकई जीवाश्म पेड़ की प्रजातियां इंटरट्रिपियन बेड में पाई गई हैं, जिसमें यूरोकिन से ग्रेवोक्सिलीन और केरल में मध्य मियोसीन से हेरिटेरोक्सिलीन केरलेंसिस और अरुणाचल प्रदेश के एमियो-प्लियोसीन से हेरिटियरोक्सिलॉन अरुनाचलेंसिस और कई अन्य स्थानों पर हैं। भारत और अंटार्कटिका से ग्लोसोप्टेरिस फर्न जीवाश्मों की खोज ने गोंडवानालैंड की खोज की और महाद्वीपीय बहाव को अच्छी तरह से समझा जा सका। फॉसिल \"साइकैड्स\" भारत से जाने जाते हैं जबकि सात साइकैड प्रजातियाँ भारत में जीवित रहती हैं।",
"ब्लैक-रम्प्ड फ्लेमबैक\nगंगा के मैदानों में पायी गयी इसी प्रजाति की तुलना में उत्तर पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के शुष्क क्षेत्रों में पायी जाने वाली प्रजाति, \"डाईल्यूटम\", में पीले रंग का ऊपरी हिस्सा, एक लम्बी क्रेस्ट तथा सफ़ेद सा नीचे का भाग पाया जाता है। ऊपरी भाग में कम चकत्ते होते हैं। वे पुराने तथा गांठदार टैमेरिस्क, \"अकासिया\", तथा \"डालबर्गिया\" की शाखों में प्रजनन करना पसंद करते हैं। इस प्रजाति की आबादी भारत भर में 1000 मीटर तक की कम ऊंचाई पर मिलती है। दक्षिणी प्रायद्वीपीय रूप \"पंक्टीकोल\" की गर्दन छोटे सफ़ेद तिकोनाकर चकत्तों के साथ काली होती है तथा ऊपरी भाग उज्ज्वल सुनहरा-पीला होता है। पश्चिमी घाट में मिलने वाली उप-प्रजातियों को कभी-कभी \"तहमीने\" (सालिम अली की पत्नी का नाम) के रूप में अलग वर्गीकृत किया जाता है, ऊपर से ये जैतूनी रंग वाली होती हैं, गाली गर्दन पर सफ़ेद चकत्ते होते हैं तथा पंखों के निचले बाग़ पर पर ये चकत्ते नहीं दिखते है। दक्षिणी श्रीलंका की उप-प्रजाति \"डी.बी. सैरोड्स\" की पीठ गहरे लाल रंग की तथा गहरे रंग के निशान और अधिक गहरे तथा स्पष्ट होते हैं। यह छोटी चोंच वाली श्रीलंका की प्रजाति \"जैफनेन्स\" के साथ संकरण करती है। श्रीलंका की प्रजाति \"सैरोड्स\" को कभी-कभी एक अलग प्रजाति माना जाता है, हालांकि इसे पुत्तालम, केकिरावा तथा त्रिंकोमाली में \"जैफनेन्स\" के साथ इंटरग्रेड करने वाला माना जाता है।",
"भारत के जीव-जंतु\nपूर्वी हिमालय भूटान, पूर्वोत्तर भारत, और मध्य, मध्य और पूर्वी नेपाल क्षेत्र को मिला कर बना है। यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से युवा है और उच्च ऊंचाई में भिन्नता दर्शाता है। यहाँ लगभग 163 विश्व स्तर पर खतरे की प्रजातियाँ, जिसमें एक सींग वाले गैंडे (राइनोसेरोस यूनिकॉर्निस), वाइल्ड एशियन वाटर बफेलो (बुबलस बुबलिस (अर्नी)) और 45 स्तनधारी, 50 पक्षियाँ, 17 सरीसृप, 12 उभयचर, 3 अकशेरुकी और 36 पौधों शामिल हैं, पाये जाते है। रिलीफ ड्रैगनफ्लाई (एपियोफ्लेबिया सेलावी) एक लुप्तप्राय प्रजाति है जो जापान में पाए जाने वाले जीनस में केवल अन्य प्रजातियों के साथ यहां पाई जाती है। यह क्षेत्र हिमालयन न्यूट (टायलटोट्रिटोन वर्चुकोस) का भी घर है, जो भारतीय सीमा के भीतर पाया जाने वाला एकमात्र सैलामैंडर प्रजाति है।",
"भारत के जीव-जंतु\nउल्लेखनीय स्तनपायी जो देश के भीतर विलुप्त हो गए या कगार पर है, उनमें भारतीय / एशियाई चीता, जावन गैंडा और सुमात्रान गैंडा शामिल हैं। जबकि इन बड़ी स्तनपायी प्रजातियों में से कुछ के विलुप्त होने की पुष्टि हो गई है, कई छोटे जानवर और पौधों की प्रजातियां हैं जिनकी स्थिति निर्धारित करना कठिन है। कई प्रजातियों को उनके विवरण के बाद से नहीं देखा गया है। लिंगमबक्की जलाशय के निर्माण से पहले जॉग फॉल्स के स्प्रे ज़ोन में उगने वाली घास की एक प्रजाति हुब्बार्डिया हेप्टेन्यूरॉन को विलुप्त माना जाता था, लेकिन कुछ कोल्हापुर के पास फिर से खोजा गया।आईयूसीएन प्रजातियों के अस्तित्व आयोग (एसएससी) ई-बुलेटिन - दिसम्बर 2002. अभिगमन तिथि: अक्टूबर 2006."
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हाल के वर्षों में संघीय सरकार के बजट में व्यय का सबसे बड़ा मद रहा है?
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"वेस्ट इंडीज़ संघ\nऔर न ही संघीय सरकार कार्य करने के लिए अपने घटक राज्यों को ला पाई। प्रारंभिक संघीय बजट काफी अल्प था, जिसने संघीय सरकार को अपनी वित्तीय उदारता को एक गाजर के रूप में उपयोग करने से प्रतिबंधित किया। वह यूनाइटेड किंगडम और अपने सदस्य देशों के अनुदान पर निर्भर था। जमैका और त्रिनिदाद एंड टोबैगो के प्रांतीय बजट दोनों संघीय बजट से बड़े थे। इसके चलते उन राज्यों से संघीय सरकार के लिए अधिक से अधिक वित्त पोषण प्रदान के अनुरोधों को दोहराया गया। इन अनुरोधों को नजरअंदाज किया गया क्योंकि जमैका और त्रिनिदाद एंड टोबैगो, दोनों ने मिलकर संघीय राजस्व में पहले ही लगभग 85 प्रतिशत का योगदान कर दिया था, लगभग बराबर भागों में।"
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"लोक सभा\nअनु 116 इस प्रावधान का वर्णन करता है इसके अनुसार लोकसभा वोट ओन अकाउंट नामक तात्कालिक उपाय प्रयोग लाती है इस उपाय द्वारा वह भारत सरकार को भावी वित्तीय वर्ष मे भी तब तक व्यय करने की छूट देती है जब तक बजट पारित नही हो जाता है यह सामान्यत बजट का अंग होता है किंतु यदि मंत्रिपरिषद इसे ही पारित करवाना चाहे तो यही अंतरिम बजट बन जाता है जैसा कि 2004 मे एन.डी.ए. सरकार के अंतिम बजट के समय हुआ था फिर बजट नयी यू.पी.ए सरकार ने पेश किया था \"'वोट ओन क्रेडिट\"[प्रत्यानुदान] लोकसभा किसी ऐसे व्यय के लिये धन दे सकती है जिसका वर्णन किसी पैमाने या किसी सेवा मद मे रखा जा सक्ना संभव ना हो मसलन अचानक युद्ध हो जाने पे उस पर व्यय होता है उसे किस शीर्षक के अंतर्गत रखे?यह लोकसभा द्वारा पारित खाली चैक माना जा सकता है आज तक इसे प्रयोग नही किया जा सका है जिलेटीन प्रयोग—समयाभाव के चलते लोकसभा सभी मंत्रालयों के व्ययानुदानॉ को एक मुश्त पास कर देती है उस पर कोई चर्चा नही करती है यही जिलेटीन प्रयोग है यह संसद के वित्तीय नियंत्रण की दुर्बलता दिखाता है",
"सरकार का बजट\nकिसी [सरकार] के वार्षिक आय और व्यय का कथन उस सरकार का बजट कहलाता है। सरकार का बजट प्रायः विधिवत ढंग से [वित्तमन्त्री] द्वारा एक नियत तिथि को प्रस्तुत किया जाता है, इसे विधायिका पारित करती है और मुख्य कार्यकारी या राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति देते हैं। बजट में, आरम्भ हो रहे वित्तीय वर्ष के लिए, सरकार को होने वाली सम्भावित आय (राजस्व) तथा प्रस्तावित व्यय का विस्तृत विवरण होता है।",
"मुद्रास्फीतिजनित मंदी (स्टैगफ्लेशन)\nराजकोषीय नीति के लिए समस्या अब तक कम स्पष्ट है। राजस्व और व्यय दोनों ही मुद्रास्फीति के साथ बढ़ते हैं और संतुलित बजट राजनीति के साथ, वे विकास की गति धीमी होते ही गिर जाते हैं। जब तक की मुद्रास्फीतिजनित मंदी के कारण राजस्व या खर्चे पर एक अंतर प्रभाव नहीं होता, बजट के संतुलन पर मुद्रास्फीतिजनित मंदी का प्रभाव पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। विचारों की एक धारा का यह मानना है कि सर्वोत्तम नीति मिश्रण वह है जिसमें सरकार खर्च को बढ़ा कर और करों को घटा कर विकास को बढ़ावा देती है, जबकि केंद्रीय बैंक उच्च ब्याज दरों के माध्यम से मुद्रास्फीति से जूझती है। जो भी सिद्धांत प्रयुक्त है, राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच समन्वय कायम करना आसान कार्य नहीं है।",
"बजट\nकेंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2020 को संसद में वित्तीय वर्ष 2020-21(Financial Year 2020-21) के लिए केंद्रीय बजट 2020 (Union Budget 2020) पेश किया। यह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया दूसरा बजट है।बजट पेश करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह बजट मुख्य रूप से तीन विषयों पर केंद्रित है:- महत्वाकांक्षी भारत, आर्थिक विकास और जिम्मेदार समाज। वित्त मंत्री ने कहा कि 5 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।",
"राष्ट्रीय स्वास्थ सेवा\nजब एनएचएस को 1948 में लॉन्च किया गया था, तब इसका बजट 437 मिलियन पाउंड (2019 के दर के अनुसार में £ 16.01 बिलियन के बराबर) था। 2016-2017 में, इसका बजट £122.5 बिलियन होगया।. 1955/6 में ब्रिटेन का स्वास्थ्य व्यय सार्वजनिक सेवाओं के बजट का 11.2% था। 2015/16 में यह 29.7% हुआ। यह मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए एक साल में लगभग 4% की 60 साल की अवधि में खर्च में औसत वृद्धि के बराबर है। ब्लेयर सरकार के खर्च के स्तर में औसतन प्रति वर्ष लगभग 6% की वृद्धि हुई। 2010 के बाद से खर्च में वृद्धि को केवल 1% से अधिक करने के लिए विवश किया गया है। इस कारणवश, कई छोटी प्रक्रियाएं अब 2019 से उपलब्ध नहीं हो सकती हैं और इसकी असली वजह बजट कटौती हो सकती है।",
"लोक सभा\nबजट सरकार की आय व्यय का विवरण पत्र है। 1. अनुमानित आय व्यय जो कि भारत सरकार ने भावी वर्ष मे करना हो 2. यह भावी वर्ष के व्यय के लिये राजस्व उगाहने का वर्णन करता है 3. बजट मे पिछले वर्ष के वास्तविक आय व्यय का विवरण होता है बजट सामान्यत वित्तमंत्री द्वारा सामान्यतः फरवरी के पहले दिन लोकसभा मे प्रस्तुत किया जाता है उसी समय राज्यसभा मे भी बजट के कागजात रखे जाते है यह एक धन बिल है। बजट में सामान्यतः- १- पिछले वर्ष के वास्तविक अनुमान, २- वर्तमान वर्ष के संशोधित अनुमान, ३- आगामी वर्ष के प्रस्तावित अनुमान प्रस्तुत किए जाते है। अतः बजट का संबंध 3 वर्ष के आकडो़ से होता है।",
"2000 के दशक के उत्तरार्द्ध की आर्थिक मंदी\nदिसंबर की शुरुआत में जर्मन वित्त मंत्री पीयर स्टेनब्रक ने संकेत दिया कि वे एक \"बड़ी बचाव योजना (ग्रेट रेस्क्यू प्लान)\" पर विश्वास नहीं करते हैं और इस संकट का सामना करने के लिए अधिक धनराशि खर्च करने में अपनी अनिच्छा जाहिर की। मार्च 2009 में यूरोपीय संघ की प्रेसीडेंसी ने यह पुष्टि कर दी कि यूरोपीय संघ यूरोपीय बजट घाटों को बढ़ाने के अमेरिकी दबाव का दृढ़ता से प्रतिरोध करती है।",
"लघु वित्त\nदानियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। ग़रीबों की मदद करने के लिए सलाहकारी दल (CGAP) ने हाल में टिप्पणी की कि खर्च किये गये उनके पैसों का बड़ा हिस्सा प्रभावोत्पादक नहीं होता है, या तो इसलिए कि वह, असफल और अक्सर जटिल निधियन तंत्र के बीच में ही (उदाहरण के लिए सरकारी शीर्ष सुविधा) लटक जाता है। कुछ मामलों में, बाजार को विकृत करते हुए और अल्प ब्याज अथवा ब्याज रहित मुद्रा के साथ घरेलू वाणिज्यिक पहल करते हुए, ख़राब तरीक़े से बनाए कार्यक्रमों के कारण, समग्र वित्तीय प्रणाली का विकास थम गया है।\"",
"सबप्राइम मोर्टगेज क्राइसिस\nअमेरिका की संघीय सरकार के वैश्विक वित्तीय प्रणाली के समर्थन के प्रयासों ने महत्वपूर्ण नई वित्तीय प्रतिबद्धताओं को जन्म दिया है, जो नवम्बर 2008 तक 7 ट्रिलियन डॉलर के कुल योग तक पहुंच गया है। इन प्रतिबद्धताओं की लक्षणिक विशेषताओं को निवेशों, ऋणों एवं ऋण गारंटियों के रूप में वर्णित किया जा सकता है न कि प्रत्यक्ष व्यय के रूप में. कई मामलों में सरकार ने निश्चल बाजारों में नकदी की अभिवृद्धि के लिए वित्तीय परिसंपत्तियों की खरीद की है, जैसे कि वाणिज्यिक पत्रों, गिरवी समर्थित प्रतिभूतियों अथवा दूसरे प्रकार की परिसंपत्तियों से समर्थित कागजात. ज्यों-ज्यों संकट गहराता गया, फेड ने संपार्श्विक जमानत को प्रसारित किया जिसके खिलाफ उच्च जोखिम वाली परिसंपत्तियों को शामिल कर यह ऋण देना चाहती है।"
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क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली गेंद कितने प्रकार की होती है?
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"क्रिकेट की गेंद\nक्रिकेट की गेंदें काफी महंगी होती हैं। 2007 तक इंग्लैंड में प्रथम श्रेणी के क्रिकेट मैचों में इस्तेमाल की जाने वाली गेंदों की खुदरा कीमत 70 पाउंड स्टर्लिंग रखी गई थी। टेस्ट मैच क्रिकेट में इस गेंद को कम से कम 80 ओवरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है (सिद्धांततः करीब पांच घंटे और बीस मिनट के खेल में). पेशेवर एक-दिवसीय क्रिकेट के प्रत्येक मैच में कम से कम दो नई गेंदों का इस्तेमाल किया जाता है। शौकिया क्रिकेट खिलाड़ियों को अक्सर पुरानी गेंदों या सस्ते विकल्पों का इस्तेमाल करना पड़ता है, ऐसे में उन्हें पेशेवर क्रिकेट की तुलना में गेंदों की बदलती स्थिति का उतना सटीक आभास नहीं मिल पाता है। सभी एक-दिवसीय मैच कूकाबुरा गेंदों से खेले जाते हैं लेकिन भारत में टेस्ट मैच एसजी क्रिकेट गेंदों से खेले जाते हैं। और जब इंग्लैंड किसी अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच की मेजबानी करता है तो वे \"ड्यूक क्रिकेट गेंद\" का इस्तेमाल करते हैं, जबकि बाकी सभी टेस्ट मैचों के लिए कूकाबुरा गेंदों का ही इस्तेमाल किया जाता है।"
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"क्रिकेट की गेंद\nक्रिकेट की गेंद एक सख्त, ठोस गेंद होती है जिसका इस्तेमाल क्रिकेट खेलने में किया जाता है। चमड़े और काग (कॉर्क) से तैयार क्रिकेट की गेंद, प्रथम श्रेणी स्तर पर पूर्णतया क्रिकेट के नियमों के अधीन होती है। गेंदबाजी करने और बल्लेबाज को आउट करने में क्रिकेट की गेंद की विभिन्न विशेषताओं के इस्तेमाल और जोड़तोड़ की प्रमुख भूमिका होती है - हवा और जमीन पर गेंद का घुमाव, गेंद की स्थिति और गेंदबाज की कोशिशों पर निर्भर करता है, जबकि क्षेत्ररक्षण करने वाले दल की एक प्रमुख भूमिका है अपने अधिकतम फायदे के लिए गेंद को एक आदर्श अवस्था प्रदान करना। बल्लेबाज रन बनाने के लिए मुख्यतः क्रिकेट की गेंद का इस्तेमाल करता है, इसके लिए वह गेंद को ऐसी जगह मारता है जहां रन लेना सुरक्षित होता है, या फिर गेंद को सीमा पार पहुंचा देता है।",
"क्रिकेट की गेंद\nकई दिनों तक चलने वाले टेस्ट क्रिकेट और ज्यादातर घरेलू मैचों में पारंपरिक लाल रंग की गेंद का इस्तेमाल किया जाता है। कई एकदिवसीय क्रिकेट मैचों में सफेद रंग की गेंद का इस्तेमाल किया जाता है। ट्रेनिंग के लिए सफेद, लाल और गुलाबी गेंद भी आम हैं, इसके अलावा ट्रेनिंग या आधिकरिक मैचों के लिए विंड गेंदों और टेनिस गेंदों का भी इस्तेमाल किया जाता है। क्रिकेट मैच के दौरान गेंद ऐसी स्थिति में पहुंच जाती है जहां वो इस्तेमाल के लायक नहीं रहती है, इस दौरान गेंद की विशेषताएं बदल जाती हैं और ये मैच को प्रभावित करती हैं। मैच के दौरान क्रिकेट के नियमों के मुताबिक एक हद के बाहर गेंद से छेड़छाड़ करने की मनाही होती है और गेंद के साथ छेड़छाड़ करने की घटनाओं से कई विवाद खड़े हो चुके हैं।",
"क्रिकेट की गेंद\nपारंपरिक रूप से क्रिकेट की गेंदों को लाल रंग से रंगा जाता है और यही लाल गेंदें टेस्ट क्रिकेट और प्रथम श्रेणी क्रिकेट में इस्तेमाल की जाती हैं। सफेद गेंदों का इस्तेमाल एक दिवसीय मैचों में तब शुरू हुआ जब ये रात में फ्लडलाइट्स में खेला जाने लगा जिससे कि ये रात में भी दिखाई दे सकें. अब तो रात में नहीं होने के बावजूद पेशेवर एक-दिवसीय मैच सफेद गेंदों से ही खेले जाते हैं। दूसरे रंगों की गेंदों का भी प्रयोग किया गया, जैसे रात में बेहतर तरीके से दिखाई देने वाली पीली और नारंगी रंगों की गेंदें, लेकिन अब तक इन गेंदों को पेशेवर खेल के लिए उपयुक्त नहीं माना गया क्योंकि इनको रंग करने की प्रक्रिया के कारण ये मानक गेंदों से अलग तरीके से व्यवहार करती हैं। जुलाई, 2009 में पहली बार एक गुलाबी गेंद का इस्तेमाल किया गया था; उस मैच में वॉर्म्सले में इंग्लैंड की महिला टीम ने ऑस्ट्रेलिया को शिकस्त दी थी . पारी के शुरुआती हाफ में लाल गेंद की तुलना में सफेद गेंद ज्यादा स्विंग करती है और साथ ही यह लाल गेंद की तुलना में जल्दी खराब भी होने लगती है, वैसे इन गेंदों के उत्पादक दावा करते हैं कि सफेद और लाल गेंदें एक ही तरीके और कच्चे माल का इस्तेमाल कर बनाई जाती हैं।",
"क्रिकेट के नियम\n\"नियम 5: गेंद\" क्रिकेट की गेंद की परिधि 8 13/16 और 9 इंच (22.4 सेमी और 22.9 सेमी) के बीच होती है और इसका वजन 5.5 और 5.75 औंस (155.9 ग्राम और 163 ग्राम) के बीच होता है। एक बार में केवल एक गेंद का इस्तेमाल किया जाता है जब तक कि यह खो नहीं जाता, जब इसकी जगह इसके सामान घिसावट वाली एक दूसरी गेंद ली जाती है। इसे प्रत्येक पारी की शुरुआत में भी बदला जाता है और क्षेत्ररक्षण पक्ष के अनुरोध पर भी, जब ओवरों की एक ख़ास संख्या (टेस्ट मैचों में 80, एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में 34) की गेंदबाजी कर लिए जाने के बाद इसकी जगह नयी गेंद ले ली जाती है। पारी के दौरान गेंद का क्रमिक विरूपण खेल का एक महत्वपूर्ण पहलू है।",
"क्रिकेट की गेंद\nक्रिकेट की गेंदों का वजन 155.9 ग्राम और 163 ग्राम के बीच होता है और इन्हें अपनी कठोरता तथा इस्तेमाल से जख्मी होने के खतरे के लिए जाना जाता है। क्रिकेट की गेंद से होने वाले खतरे की वजह से ही सुरक्षात्मक उपकरणों को क्रिकेट के खेल में शामिल किया गया था। क्रिकेट मैच के दौरान अक्सर खिलाड़ियों के जख्मी होने के मामले सामने आते रहते हैं, इनमें से कुछ मामले क्रिकेट गेंद की वजह से होते हैं।",
"क्रिकेट की गेंद\n20-20 की शुरुआत के बाद थोड़ी नरम सफेद गेंदों का इस्तेमाल शुरू हुआ। इसे क्रिकेट के फटाफट स्वरूप के हिसाब से डिजाइन किया गया है और सभी सफेद गेंदों के बारे में कहा जाता है कि टेस्ट मैचों की मानक गेंदों के मुकाबले इन्हें अधिकतम 29.5 मीटर ज्यादा दूर तक मारा जा सकता है। हवा में भी यह ज्यादा रफ्तार से चलती है और इसे एक-दिवसीय और 20-20 की जरूरत के मुताबिक ही तैयार किया गया है। इससे स्ट्राइक रेट और मैच में लगने वाले छक्कों की संख्या भी बढ़ती है।",
"क्रिकेट की गेंद\nक्रिकेट की गेंदें काग के बीजकोष से बनाई जाती हैं, जो धागे से कसकर बंधी होती हैं और चमड़े की एक परत से ढंकी होती हैं तथा इनकी सीम थोड़ा उठी रहती है। उच्च स्तर के मुकाबले के लिए उपयुक्त और अच्छी गुणवत्ता वाली गेंदें चमड़े के चार टुकड़ों से ढंकी होती हैं, ये टुकड़े उसी तरह दिखते हैं जैसे किसी नारंगी के छिलके के चार टुकड़े दिखते हैं लेकिन एक गोलार्द्ध में यह 90 डिग्री कोण में घूमते हुए दिखते हैं। गेंद का \"इक्वेटर\" धागों की कुल छह पंक्तियों से इस तरह सिला हुआ होता है जिससे गेंद का सीम उभरा हुआ दिखाई पड़ता है। बाकी बचे चमड़े के दो टुकड़े अंदर से जुड़े होते हैं। कीमत कम होने की वजह से दो टुकड़ों से ढंकी निम्न स्तर की गेंदें अभ्यास और निम्न-स्तरीय मुकाबलों के लिए भी काफी लोकप्रिय हैं।",
"क्रिकेट की गेंद\nपुरुषों के क्रिकेट के लिए गेंद का वजन 5.5 और 5.75 आउंस (155.9 और 163.0 ग्राम) के बीच होना जरूरी है और इसकी परिधि 8 13/16 और 9 (224 और 229 मिलीमीटर) के बीच होनी चाहिए। महिलाओं और युवाओं के मैच में इससे थोड़ी छोटी गेंदें इस्तेमाल की जाती हैं।",
"1999 क्रिकेट विश्व कप\n1999 के विश्व कप में पहली बार एक नए प्रकार की क्रिकेट बॉल, सफेद 'ड्यूक' को पेश किया गया था। निर्माताओं द्वारा ब्रिटिश क्रिकेट बॉल्स लिमिटेड के दावों के बावजूद कि गेंदों ने पिछले विश्व कप में इस्तेमाल की गई गेंदों के लिए समान रूप से व्यवहार किया, प्रयोगों से पता चला कि वे कठिन थे और अधिक झूलते थे।"
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भारत की कौन सी फैक्ट्रियां पुर्तगालियों द्वारा स्थापित की?
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"भारत में यूरोपीय आगमन\nसन् 1500 में पुर्तगालियों ने कोचीन(केरल) के पास अपनी कोठी बनाई। शासक सामुरी (जमोरिन) से उसने कोठी की सुरक्षा का भी इंतजाम करवा लिया क्योंकि अरब व्यापारी उसके ख़िलाफ़ थे। इसके बाद कालीकट और कन्ननोर में भी पुर्तगालियों ने कोठियाँ बनाई। उस समय तक पुर्तगाली भारत में अकेली यूरोपी व्यापारिक शक्ति थी। उन्हें बस अरबों के विरोध का सामना करना पड़ता था। सन् 1510 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अपना अधिकार कर लिया तथा उसे अपना प्रशासनिक केंद्र बनाया । ये घटना जमोरिन को पसन्द नहीं आई और वो पुर्तगालियों के खिलाफ हो गया। पुर्तगालियों के भारतीय क्षेत्र का पहला वायसऱय था डी-अल्मोड़ा। उसके बाद [अल्फांसो डी अल्बूकर्क ] पुर्तगालियों का वॉयसराय नियुक्त हुआ। उसने 1510 में कालीकट के शासक जमोरिन का महल लूट लिया।",
"मध्यकालीन भारत\nसन् 1500 में पुर्तगालियों ने कोचीन के पास अपनी कोठी बनाई। शासक [[सामुरी]] (जमोरिन) से उसने कोठी की सुरक्षा का भी इंतजाम करवा लिया क्योंकि [[अरब]] व्यापारी उसके ख़िलाफ़ थे। इसके बाद कालीकट और कन्ननोर में भी पुर्तगालियों ने कोठियाँ बनाई। उस समय तक पुर्तगाली भारत में अकेली यूरोपी व्यापारिक शक्ति थी। उन्हें बस अरबों के विरोध का सामना करना पड़ता था। सन् 1506 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अपना अधिकार कर लिया। ये घटना जमोरिन को पसन्द नहीं आई और वो पुर्तगालियों के खिलाफ हो गया। पुर्तगालियों के भारतीय क्षेत्र का पहला वायसऱय डी-अल्मीडा था। उसके बाद [[अल्बूकर्क](1509)] पुर्तगालियों का वायसराय नियुक्त हुआ। उसने 1510 में कालीकट के शासक जमोरिन का महल लूट लिया।"
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"मृत्तिकाशिल्प\nभारत में उच्चतापीय श्वेत भांडो का निर्माण 20वीं शती मे प्रारंभ हुआ। श्री डी0 सी0 मजुमदार ने ग्वालियर में पहली फैक्टरी स्थापित की। इसके बाद कई फैक्टरियाँ स्थापित हुई। बर्न एण्ड कम्पनी ने सन् 1859 मे उष्मसह ईटें बनाई। 1909 ई0 में 'टाटा आयरन एण्ड स्टील वर्क्स' की स्थापना के बाद देश भर में उष्मसह निर्माण फैक्टरियाँ फैल गई।",
"भारत में यूरोपीय आगमन\nपुर्तगालियों की समृद्धि देख कर डच भी भारत और श्रीलंका की ओर आकर्षित हुए। सर्वप्रथम 1598 में डचों का पहला जहाज अफ्रीका और जावा के रास्ते भारत पहुँचा। 1602 में प्रथम डच ईस्ट कम्पनी की स्थापना की गई जो भारत से व्यापार करने के लिए बनाई गई थी। इस समय तक अंग्रेज और फ्रांसिसी लोग भी भारत में पहुँच चुके थे पर नाविक दृष्टि से डच इनसे वरीय थे। डचो ने मसाले के स्थान पर भारतीय कपड़ों के निर्यात की अधिक महत्व दिया। सन् 1602 में डचों ने अम्बोयना पर पुर्तगालियों को हरा कर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1612 में श्रीलंका में भी डचों ने पुर्तगालियों को खदेड़ दिया। उन्होंने मसुलिपटृम (1605),पुलीकट (1610), सूरत (1616), बिमिलिपटृम (1641), करिकल (1653),चिनसुरा (1653), क़ासिम बाज़ार, बड़ानगर, पटना, बालेश्वर (उड़ीसा) (1658), नागापट्टनम् (1658) और कोचीन (1663) में अपनी कोठियाँ स्थापित कर लीं। पर, एक तो डचों का मुख्य उद्येश्य भारत से व्यापार न करके पूर्वी एशिया के देशों में अपने व्यापार के लिए कड़ी के रूप में स्थापित करना था और दूसरे अंग्रेजों ओर फ्रांसिसियों ने उन्हें यहाँ और यूरोप दोनों जगह युद्धों में हरा दिया। इस कारण डचों का प्रभुत्व बहुत दिनों तक भारत में नहीं रह पाया था",
"भारत में यूरोपीय आगमन\nइसके बाद बालासोर (बालेश्वर), हरिहरपुर, मद्रास (1633), हुगली (1651) और बंबई (1688) में अंग्रेज कोठियाँ स्थापित की गईं। पर अंग्रेजों की बढ़ती उपस्थिति और उनके द्वारा अपने सिक्के चलाने से मुगल नाराज हुए। उन्हें हुगली, कासिम बाज़ार, पटना, मछली पट्टनम्, विशाखा पत्तनम और बम्बई से निकाल दिया गया। 1690 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह औरंगजेब से क्षमा याचना की और अर्थदण्ड का भुगतानकर नई कोठियाँ खोलने और किलेबंदी करने की अनुमति प्राप्त करने में सफल रहे।",
"मध्यकालीन भारत\nपुर्तगालियों की समृद्धि देख कर डच भी भारत और श्रीलंका की ओर आकर्षित हुए। सर्वप्रथम 1598 में डचों का पहला जहाज [[अफ्रीका]] और [[जावा]] के रास्ते भारत पहुँचा। 1602 में प्रथम डच कम्पनी की स्थापना की गई जो भारत से व्यापार करने के लिए बनाई गई थी। इस समय तक अंग्रेज और फ्रांसिसी लोग भी भारत में पहुँच चुके थे पर नाविक दृष्टि से डच इनसे वरीय थे। सन् 1602 में डचों ने अम्बोयना पर पुर्तगालियों को हरा कर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1612 में श्रीलंका में भी डचों ने पुर्गालियों को खदेड़ दिया। उन्होंने [[पुलीकट]] (1610), सूरत (1616), [[चिनसुरा]] (1653), [[क़ासिम बाज़ार]], बड़ानगर, [[पटना]], [[बालेश्वर]] (उड़ीसा), [[नागापट्टनम्]] (1659) और कोचीन (1653) में अपनी कोठियाँ स्थापित कर लीं। पर, एक तो डचों का मुख्य उद्येश्य भारत से व्यापार न करके पूर्वी एशिया के देशों में अपने व्यापार के लिए कड़ी के रूप में स्थापित करना था और दूसरे अंग्रेजों ओर फ्रांसिसियों ने उन्हें यहाँ और यूरोप दोनों जगह युद्धों में हरा दिया। इस कारण डचों का प्रभुत्व बहुत दिनों तक भारत में नहीं रह पाया था।",
"मध्यकालीन भारत\nइसके बाद बालासोर (बालेश्वर), हरिहरपुर, मद्रास (1633), हुगली (1651) और बंबई (1688) में अंग्रेज कोठियाँ स्थापित की गईं। पर अंग्रेजों की बढ़ती उपस्थिति और उनके द्वारा अपने सिक्के चलाने से मुगल नाराज हुए। उन्हें हुगली, कासिम बाज़ार, पटना, मछलीपट्नम्, विशाखा पत्तनम और बम्बई से निकाल दिया गया। 1690 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह औरंगजेब से क्षमा याचना की और अर्थदण्ड का भुगतानकर नई कोठियाँ खोलने और किलेबंदी करने की आज्ञा प्राप्त करने में सफल रहे।",
"मध्यकालीन केरल\nमध्ययुगीन केरल में यदि कोई पुर्तगालियों का सामना कर सका तो वह मात्र सामुतिरि ही थे। पुर्तगालियों के अधीनस्थ प्रदेशों के प्रतिनिधि बनकर 1505 में फ्रान्सिस्को अलमेयदा पहुँचे। उन्होंने कण्णूर और कोच्चि में किले बनवाये। राजा कोलत्तिरि ने पुर्तगालियों से मित्रता की। परंतु सामूतिरि की प्रेरणा से कोलत्तिरि पुर्तगालियों के विरुद्ध हो गये। सामूतिरि के सैनिकों ने कई बार पुर्तगालियों का सामना किया।",
"ब्रिटिश भारत के प्रेसिडेंसी और प्रांत\nईस्ट इंडिया कंपनी, जिसे 31 दिसंबर 1600 को निगमित किया गया था, ने भारतीय शासकों के साथ व्यापार संबंध स्थापित कर 1611 में पूर्वी तट पर मछलीपट्टनम और 1612 में पश्चिम तट पर सूरत में उपनिवेश स्थापित किया था। कंपनी ने 1693 में मद्रास में एक छोटी व्यापार चौकी किराए पर ली। बॉम्बे 1661 में, ब्रैगन के कैथरीन के शादी के दहेज के रूप में पुर्तगालियों ने ब्रिटिश को सौंप दिया था।",
"फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी\nसूरत मुगल-साम्राज्य का प्रसिद्ध बन्दरगाह और संसार का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। 1613 ई. और 1618 ई. में यहाँ अंग्रेज़ और डच फैक्टरियों की स्थापना हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त मिशनरी, यात्री और व्यापारियों के द्वारा फ्रांसीसियों को मुग़ल-साम्राज्य और उसके बन्दरगाह सूरत के विषय में विस्तृत जानकारी मिल चुकी थी। थेबोनीट, बर्नियर और टेवर्नियर फ्रांस के थे जिन्होंने अपने देशवासियों को भारत के बारे में जानकारी दी है। अत: कम्पनी ने सूरत में अपनी फैक्टरी स्थापित करने का निश्चय किया इस हेतु अपने दो प्रतिनिधि भेजे जो मार्च 1666 ई. में सूरत पहुँचे। सूरत गवर्नर ने इन प्रतिनिधियों का स्वागत किया, परन्तु पहले स्थापित इंगलिश और डच फैक्टरी के कर्मचारियों को एक नये प्रतियोगी का आना अच्छा नहीं लगा। ये प्रतिनिधि सूरत से आगरा पहुँचे, उन्होंने लुई-चौदहवें के व्यक्तिगत पत्र को औरंगजेब को दिया और इन्हें सूरत में फैक्टरी स्थापित करने की आज्ञा मिल गयी। कम्पनी ने केरोन को सूरत भेजा और इस प्रकार 1668 ई. में भारत में सूरत के स्थान पर प्रथम फ्रेंच फैक्टरी की स्थापना हुई।"
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अमेरिका संविधान में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है?
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"संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रपति महाभियोग\nअनुच्छेद II, अमेरिकी संविधान की धारा 4 में \"राजद्रोह, रिश्वत, या अन्य उच्च अपराध और दुष्कर्म\" के लिए राष्ट्रपति को महाभियोग लगाने के आधार को सीमित किया गया है। चूँकि \" उच्च अपराध और दुष्कर्म \" वाक्यांश का सटीक अर्थ संविधान में ही परिभाषित नहीं है, इसलिए इसे कांग्रेस की व्याख्या के लिए खुला छोड़ दिया गया है, खासकर जब से अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने \"निक्सन v\" में निर्णय लिया है \"।\" \"संयुक्त राज्य अमेरिका के\" पास यह निर्धारित करने का अधिकार नहीं था कि सीनेट ने प्रतिवादी को \"ठीक से\" कोशिश की या नहीं। हालाँकि, कांग्रेस ने महाभियोग के लिए आधार बनाने वाले तीन सामान्य प्रकारों की पहचान की है, हालाँकि इन श्रेणियों को संपूर्ण नहीं समझा जाना चाहिए: उपरोक्त संवैधानिक प्रावधानों से इतर, राष्ट्रपति महाभियोग प्रक्रिया का सटीक विवरण कांग्रेस पर छोड़ दिया गया है। इस प्रकार, कई नियमों को सदन और सीनेट द्वारा अपनाया गया है और परंपरा द्वारा सम्मानित किया गया है। उनमें से, \"द हाउस प्रैक्टिस: ए गाइड टू द रूल्स, हाउस\" प्रेसीडेंट द्वारा तैयार \"सदन की प्रक्रियाएं और प्रक्रियाएँ\", नियमों की जानकारी और सदन प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाली चुनिंदा मिसालों के लिए एक संदर्भ स्रोत है। प्रत्येक कांग्रेस अपने स्वयं के नियमों को अपनाती है। 1974 में, निक्सन महाभियोग जाँच में प्रारंभिक जाँच के हिस्से के रूप में, हाउस ज्यूडिशियरी कमेटी की महाभियोग जाँच के कर्मचारियों ने एक रिपोर्ट तैयार की, \"राष्ट्रपति चुनाव के लिए संवैधानिक आधार\" । 1974 की इस रिपोर्ट का कांग्रेस के अनुसंधान सेवा द्वारा कई मौकों पर विस्तार और संशोधन किया गया, जिसे अब \"महाभियोग और निष्कासन के\" रूप में जाना जाता है। सीनेट में \"महाभियोग के परीक्षण पर\" औपचारिक \"नियम और प्रक्रिया के अभ्यास हैं\" । फिर भी, दोनों सदन और सीनेट क्रमशः प्रत्येक राष्ट्रपति महाभियोग और परीक्षण के लिए प्रक्रियाओं को संशोधित करने के लिए स्वतंत्र हैं।"
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"बन्दी प्रत्यक्षीकरण\n7 अक्टूबर 2008 को, अमेरिका के जिला न्यायालय के न्यायाधीश रिकार्डो एम. उर्बिना ने फैसला सुनाया कि 17 उईघुर, चीन के पश्चिमोत्तर झिंजियांग क्षेत्र से मुस्लिमों को, तीन दिन बाद वाशिंगटन DC में उसकी अदालत में लाना होगा: \"क्योंकि संविधान, कारण के बिना अनिश्चितकालीन हिरासत को प्रतिबंधित करता है, जारी हिरासत गैर कानूनी है।\"",
"मालदीव\nमालदीव के संविधान के अनुसार, \"न्यायाधीश स्वतंत्र हैं और केवल संविधान एंव कानून के अधीन हैं। जब ऐसे मामले तय किये जाने हों जिस पर संविधान या कानून निःशब्द हैं, तब न्यायाधीशों को इस्लामी शऋअह पर विचार करना चाहिए.\"",
"भारत के सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम\nभारत के संविधान के अनुच्छेद 124 में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है. इस अनुच्छेद के अनुसार “राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से, जिनसे परामर्श करना वह आवश्यक समझे, परामर्श करने के पश्चात् उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा.” इसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश से जरुर परामर्श किया जाएगा. संविधान में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के सम्बन्ध में अलग से कोई प्रावधान नहीं किया गया है. पर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किये जाने की परम्परा रही है. हालाँकि संविधान इस पर खामोश है. पर इसके दो अपवाद भी हैं अर्थात् तीन बार वरिष्ठता की परम्परा का पालन नहीं किया गया. एक बार स्वास्थ्यगत कारण व दो बार कुछ राजनीतिक घटनाक्रम के कारण ऐसा किया गया. 6 अक्टूबर, 1993 को एडवोकेट्स ऑन रेकॉर्ड असोसिएसन बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए एक निर्णय के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए.",
"भारत का उच्चतम न्यायालय\nसंविधान में तैतीस (33) न्यायधीश तथा एक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान है। उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के परामर्शानुसार की जाती है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस प्रसंग में राष्ट्रपति को परामर्श देने से पूर्व अनिवार्य रूप से चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह से परामर्श प्राप्त करते हैं तथा इस समूह से प्राप्त परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति को परामर्श देते हैं।",
"भारत की न्यायपालिका\n8 अक्टूबर 2012 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड की गई अधिसूचना के मुताबिक 19 ट्रिब्यूनल हैंःभारत के संविधान में सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और जिला न्यायालय में न्यायधीशों की नियुक्ति को लेकर नियम बनाए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश की सलाह से होती है। उनकी नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठ जजों के समूह के तहत होती है। उसी तरह हाई कोर्ट के लिए राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश, उस राज्य के राज्यपाल और उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर नियुक्ति करता है। जज बनने के लिए किसी व्यक्ति की पात्रता यह है कि उसे भारत का नागरिक होना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए उसका पांच साल अधिवक्ता के तौर पर या किसी हाई कोर्ट में जज के तौर पर दस साल कार्य किया होना आवश्यक है। हाई कोर्ट जज के लिए जरुरी है कि उस व्यक्ति ने किसी हाई कोर्ट में कम से कम दस साल अधिवक्ता के तौर पर कार्य किया हो।",
"पाकिस्तान के मुख्य निर्वाचन आयुक्त\nसन 1973 के पूर्व इस पद पर केवल प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों को ही नियुक्त किया जाता था और यह नियुक्ति केवल पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी, परंतु सन् 1973 के संविधान में, जिसमें पूर्व संविधानों के मुकाबले, अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए थे, के परवर्तन के बाद इस पद पर नियुक्ति को केवल न्यायपालिका पर संकुचित कर दिया गया। 1973 का संविधान इस बात को अनिवार्य करता है की मुख्य निर्वाचन आयुक्त केवल न्यायिक शाखा से ही नियुक्त किया जाएगा। अतः मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार केवल वरिष्ठ न्यायाधीश ही इस पद पर नियुक्त होने के लिए योग्य हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति व कार्यकाल शपथ, संविधान या (अन्य अवसरों पर) राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।",
"संवैधानिक उपचार\nसंविधान के अंतर्गत बनाए गए कानूनों द्वारा सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों की शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालयों की शक्ति की समाप्ति अथवा उनमें न्यूनता केवल संविधान में संशोधन करने के पश्चात् ही की जा सकती है। अथवा संविधान की धारा 359 (1) के अनुसार राष्ट्रपति मूलभूत अधिकारों का न्यायालयों द्वारा प्रवर्तन स्थगित कर सकता है। सारांश यह कि युद्ध अथवा बाह्य आक्रमणकाल में या देश की अथवा देश के किसी भाग की सुरक्षा खतरे में डालनेवाले किसी गृहसंकट के समय मूलभूत अधिकारों का न्यायालय द्वारा प्रवर्तन स्थगित किया जा सकता है। पर ऐसे समय में भी उच्च न्यायालयों के अधिकार प्रवर्तन की शक्ति - मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति को छोड़कर - अक्षुण्ण रहती है।",
"अंतरराष्ट्रीय न्यायालय\nजब किसी दो राष्ट्रों के बीच का संघर्ष अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के सामने आता है, वे राष्ट्र चाहे तो किसी समदेशी तदर्थ न्यायाधीश को मनोनीत कर सक्ती हैं। इस प्रक्रिया का कारण था कि वह देश जो न्यायालय में प्रतिनिधित्व नहीं है भी अपने संघर्षों के निर्णय अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय को लेने दे।",
"विधि शासन\nसंविधान द्वारा प्रदत्त अपने मूल अधिकारों के अपहरण पर कोई नागरिक न्यायालय में सरकार के विरुद्ध मामला चला सकता है। संविधान में यह निर्देश दिया गया है कि राज्यों के उच्च न्यायालय तथा देश का सर्वोच्च न्यायालय इन मूल अधिकारों की रक्षा करें। निष्पक्ष तथा निर्भीक न्यायाधीशों द्वारा न्याय का विधान किया गया है। इनके आदेशों का पालन करना शासन का कर्तव्य है। निष्पक्ष एवं स्वतंत्र समाचारपत्र तथा जागरूक जनमत, जनाधिकार के प्रहरी हैं।"
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संसदीय समिति प्रणाली के तहत अप्रैल से कितने समिति ने कार्य करना शुरू किया?
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"पाकिस्तानी संविधान सभा\nसत्ता में आने के बाद, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने 17 अक्टूबर, 1972 को संसदीय दलों के नेताओं को उनसे मिलने के लिए आमंत्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप गहन चर्चा के बाद एक समझौते को 'संवैधानिक समझौते' के रूप में जाना गया। पीपीपी द्वारा मंगाई गई सलाह के अनुसार, पाकिस्तान के स्थायी संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए, पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने 17 अप्रैल, 1972 को एक 25-सदस्यीय समिति नियुक्त की। महमूद अली कसूरी समिति के निर्वाचित अध्यक्ष थे। 20 अक्टूबर 1972 को संविधान के प्रारूप विधेयक पर नेशनल असेंबली के सभी संसदीय समूहों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान के लिए एक संविधान प्रदान करने का विधेयक 2 फरवरी 1973 को विधानसभा में पेश किया गया था। असेंबली ने 10 अप्रैल, 1973 को लगभग सर्वसम्मति से विधेयक पारित किया और इसे 12 अप्रैल, 1973 को कार्यवाहक राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने समर्थन दिया। 14 अगस्त, 1973 को संविधान लागू हुआ। उसी दिन, भुट्टो ने प्रधान मंत्री और चौधरी फजल-ए-इलाही ने राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। 5 जुलाई 1977 को, जनरल ज़िया ने एक सैन्य तख्तापलट किया और संविधान को निलंबित कर दिया, जिसे 1985 में बहाल किया गया था। इसी तरह, जब जनरल मुशर्रफ ने 1999 में पदभार संभाला, तब संविधान कई वर्षों के लिए निलंबित था।"
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"संसदीय राजभाषा समिति\nसंसदीय समिति ने राष्ट्रपति को वर्ष 1959 से अब तक नौ रिपोर्टें दी हैं। आखिरी बार इस तरह की रिपोर्ट (नौवाँ खण्ड) जून 2011 में दी गई थी जिसकी बहुत सी सोफारिशों को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अप्रैल २०१७ में स्वीकार कर लिया। 2011 में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम इस समिति के अध्यक्ष थे।",
"संसदीय राजभाषा समिति\nसंसदीय राजभाषा समिति का गठन राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा (4) के तहत वर्ष 1976 में किया गया। सुलभ संदर्भ के लिए इस धारा को नीचे उद्धृत किया गया है: (1) जिस तारीख को धारा 3 प्रवृत्त होती है उससे दस वर्ष की समाप्ति के पश्चात् राजभाषा के सम्बन्ध में एक समिति, इस विषय का संकल्प संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से प्रस्तावित और दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने पर, गठित की जाएगी। (2) इस समिति में तीस सदस्य होंगे, जिनमें 20 लोकसभा के सदस्य होंगे तथा 10 राज्यसभा के सदस्य होंगे, जो क्रमश: लोकसभा के सदस्यों तथा राज्यसभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे। (3) इस समिति का कर्तव्य होगा कि संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग में की गई प्रगति का पुनर्विलोकन करे और उस पर सिफारिशें करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन प्रस्तुत करे। राष्ट्रपति उस प्रतिवेदन को संसद के हर सदन के समक्ष रखने के लिए आदेश जारी करते हैं और उसे सभी राज्य सरकारों को भिजवाया जाता है। (4) राष्ट्रपति उपधारा (3) में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर और उस पर राज्य सरकारों ने यदि कोई मत अभिव्यक्त किए हों तो उस पर विचार करने के पश्चात् उस समस्त प्रतिवेदन या उसके किसी भाग के अनुसार निदेश जारी करते हैं। \"परन्तु इस प्रकार निकाले गए निदेश धारा 3 के उपबन्धों से असंगत नहीं होंगे। \" (5) समिति के अध्यक्ष का चुनाव समिति के सदस्यों द्वारा किया जाता है। परम्परा के अनुसार केन्द्रीय गृह मंत्री जी को समय समय पर समिति का अध्यक्ष चुना जाता रहा है।",
"संसदीय राजभाषा समिति\nसंसदीय राजभाषा समिति भारत में राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा (4) के तहत गठित की गई एक प्रमुख समिति है। इसका गठन वर्ष 1976 में किया गया। राजभाषा के क्षेत्र में यह सर्वोच्च अधिकार प्राप्त समिति है। यह समिति केन्द्र सरकार के अधीन आने वाले (या सरकार द्वारा वित्तपोषित) सभी संस्थानों का समय-समय पर निरीक्षण करती है और राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करती है। राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के प्रत्येक सदन में रखवाते हैं और राज्य सरकारों को भिजवाते हैं।",
"पाकिस्तान का संविधान\n1970 के संवैधानिक संकट के बाद नई सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक एक नए संविधान का मसौदा तैयार करना था। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन के बाद 1972 को 1970 के चुनाव के आधार पर विधायिका बनाई गई। एक समिति विभिन्न राजनीतिक दलों के पार अनुभाग से स्थापित की गई। इस समिति का उद्देश्य देश में एक संविधान बनाना था, जिस पर सभी राजनीतिक पार्टियाँ सहमत हूँ। समिति के अन्दर एक अन्तर यह था कि क्या देश में संसदीय सत्ता प्रणाली होनी चाहिए या राष्ट्रपति प्रणाली। इसके अलावा प्रान्तीय स्वायत्तता के मुद्दे पर अलग अलग विचार थे। संवैधानिक समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने में आठ महीने किए, अन्ततः 10 अप्रैल 1973 को समिति ने, संविधान के बारे में अपनी रिपोर्ट पेश की। संघीय विधानसभा(\"नेशनल असेम्ब्ली\") में बहुमत यानी 135 सकारात्मक मतों के साथ यह अपनाया गया और 14 अगस्त 1973 को यह संविधान पाकिस्तान में लागू कर दिया गया।पाकिस्तानी संविधान में बारह भाग और पाँच अनुसूचियाँ हैं, इसके अलावा संविधान के प्रस्तावना के रूपमें ऑब्जेक्टिव्स रेज़ोल्यूशन(उद्देश्य संकल्प) को भी, बतौर पूरकांश, 1985 में जोड़ा गया है। इसके अलावा संविधान में 21 संशोधन भी हैं, जिन्हें भिन्न अवसरों पर संविधान में जोड़ा गया है।",
"संसदीय राजभाषा समिति\nसमिति के कार्यकलाप और गतिविधियां मुख्यतः राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4 में दी गई हैं।",
"भारतीय संसद\nसामान्यतः प्रतिवर्ष संसद के तीन सत्र या अधिवेशन होते हैं। यथा बजट अधिवेशन (फरवरी-मई), मानसून अधिवेशन (जुलाई-अगस्त) और शीतकालीन अधिवेशन (नवंबर-दिसंबर)। किंतु, राज्यसभा के मामले में, बजट के अधिवेशन को दो अधिवेशनों में विभाजित कर दिया जाता है। इन दो अधिवेशनों के बीच तीन से चार सप्ताह का अवकाश होता है। इस प्रकार राज्यसभा के एक वर्ष में चार अधिवेशन होते हैं।",
"यूनाइटेड किंगडम\n1973 से उत्तरी आयरलैंड में स्थानीय सरकार, 26 जिला परिषदों में आयोजित की गई है, प्रत्येक एकल संक्रमणीय मत द्वारा सेवाओं तक सीमित शक्तियों के साथ निर्वाचित हैं जैसे की कूड़ा इकट्ठा करना, कुत्तों को नियंत्रित करना और पार्क की देखबाल करना और कब्रिस्तान. हलाँकि, 13 मार्च 2008 को, कर्यपलिकों ने मौजूदा व्यवस्था को बदलने के लिए 11 नई परिषदों को बनाने के प्रस्तावों को सहमती दी और इसके लिए अगले स्तर के चुनाव 2011 तक स्थगित कर दिया जाएगा.",
"पंचायती राज\n1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रान्तों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई तथा स्थानीय स्वशासन को हस्तान्तरित विषयों की सूची में रखा गया। स्वतंत्रता के पश्चात् वर्ष 1957 में योजना आयोग (अब नीति आयोग) द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम (वर्ष 1952) और राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम (वर्ष 1953) के अध्ययन के लिये ‘बलवंत राय मेहता समिति’ का गठन किया गया। नवंबर 1957 में समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था- ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर एवं ज़िला स्तर लागू करने का सुझाव दिया। वर्ष 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें स्वीकार की तथा 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश की पहली त्रि-स्तरीय पंचायत का उद्घाटन किया गया।",
"अनुशीलन समिति\nबंगाल में बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ही क्रांतिकारी संगठित होकर कार्य करना आरम्भ कर चुके थे। सन् १९०२ में कोलकाता में अनुशीलन समिति के अन्तर्गत तीन समितियाँ कार्य कर रहीं थीं। इस अनुशीलन समिति की स्थापना कोलकाता के बैरिस्टर प्रमथनाथ मित्र ने की थी। इन तीन समितियों में से पहली समिति प्रमथनाथ मित्र की थी, दूसरी समिति का नेतृत्व सरला देवी नामक एक बंगाली महिला के हाथों में था तथा तीसरी के नेता थे अरविन्द घोष जो उस समय उग्र राष्ट्रवाद के सबसे बड़े समर्थक थे।P.mitra and pulin das"
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च्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने की शक्ति किसके पास है?
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"भारत का उच्चतम न्यायालय\nन्यान्याधीशों के वेतन और भत्ते- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 125 मे कहा गया कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन व भत्ते दिये जाये जो संसद (भारत की संचित) निधि निर्मित करे। न्यायाधीश के लिए वेतन भत्ते अधिनियम 1 जनवरी 2009 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 2,80,000 मासिक आय और न्यायाधीश को 2,50,000 मासिक आय प्राप्त हुए है। निःशुल्क आवास, मनोरंजन कर्मी, कार और यातायात भत्ता मिलता है। इनके लिए वेतन संसद तय करती है जो कि संचित निधि से पारित होती है। कार्यकाल के दौरान वेतन मे कोई कटौती नही होती है। न्यायाधीश के कार्यकाल- 65 वर्ष की आयु। वर्तमान में उच्चतम न्यायलाय के मुख्य न्यायधीश नूतलपाटि वेंकटरमण हैं।"
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"भारत का उच्चतम न्यायालय\nभारत के संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय के लिए मूल रूप से दी गयी व्यवस्था में एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों को अधिनियमित किया गया था और इस संख्या को बढ़ाने का दायित्व संसद पर छोड़ा गया था। प्रारंभिक वर्षों में, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मामलों को सुनने के लिए उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ एक साथ बैठा करती थी। जैसे जैसे न्यायालय के कार्य में वृद्धि हुई और लंबित मामले बढ़ने लगे, भारतीय संसद द्वारा न्यायाधीशों की मूल संख्या को आठ से बढ़ाकर 1956 में ग्यारह (11), 1960 में चौदह (14), 1978 में अठारह (18), 1986 में छब्बीस (26), 2008 में इकत्तीस (31) और 2019 में चौंतीस (34) तक कर दिया गया। न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है, वर्तमान में वे दो या तीन की छोटी न्यायपीठों (जिन्हें 'खंडपीठ' कहा जाता है) के रूप में सुनवाई करते हैं। संवैधानिक मामले और ऐसे मामले जिनमें विधि के मौलिक प्रश्नों की व्याख्या देनी हो, की सुनवाई पांच या इससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ (जिसे 'संवैधानिक पीठ' कहा जाता है) द्वारा की जाती है। कोई भी पीठ किसी भी विचाराधीन मामले को आवश्यकता पड़ने पर संख्या में बड़ी पीठ के पास सुनवाई के लिए भेज सकती है।",
"अंतरराष्ट्रीय न्यायालय\nन्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 15 है, गणपूर्ति संख्या नौ है। निर्णय बहुमत निर्णय के अनुसार लिए जाते है। बहुमत से सहमती न्यायाधीश मिलकर एक विचार लिख सकते है, या अपने विचार अलग से लिख सकते है। बहुमत से विरुद्ध न्यायाधीश भी अपने खुद के विचार लिख सकते है।",
"न्यायिक सुधार\n120वें विधि आयोग की रिपोर्ट में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि भारत, दुनिया में आबादी एवं न्यायाधीशों के बीच सबसे कम अनुपात वाले देशों में से एक है। अमरीका और ब्रिटेन में 10 लाख लोगों पर करीब 150 न्यायाधीश हैं जबकि इसकी तुलना में भारत में 10 लाख लोगों पर सिर्फ 10 न्यायाधीश हैं। अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने सरकार को न्यायाधीशों की संख्या में 2007 तक चरणबध्द ढंग से वृद्धि करने का निर्देश दिया था ताकि 10 लाख की आबादी पर 50 न्यायाधीश हो जाएं, जो अब तक पूरा नहीं किया गया है।",
"न्यायिक सुधार\nन्यायाधीशों की अनुमोदित रिक्तियों को भरने के लिए भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। केवल प्रक्रियागत देरी के कारण न्यायाधीशों के 25 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। उच्च न्यायालयों में 6 जनवरी 2009 को 886 न्यायाधीशों की नियुक्ति की मंजूरी थी मगर वहां सिर्फ 608 न्यायाधीश कार्य कर रहे थे जिससे स्पष्ट है कि न्यायाधीशों के 278 पद रिक्त पड़े थे। इसी प्रकार, पहली मार्च 2007 को 11,767 अधीनस्थ न्यायाधीश कार्य कर रहे थे और 2710 पद रिक्त पड़े थे।",
"भारत का उच्चतम न्यायालय\nउच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष होती है। न्यायाधीशों को केवल (महाभियोग) दुर्व्यवहार या असमर्थता के सिद्ध होने पर संसद के दोनों सदनों द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव के आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।",
"अंतरराष्ट्रीय न्यायालय\nअन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में महासभा द्वारा 15 न्यायाधीश चुने जाते हैं। यह न्यायाधीश नौ वर्ष के लिए चुने जाते हैं तथा फिर से भी चुने जा सकते हैं। प्रत्येक तीसरे वर्ष इन 15 न्यायाधीशों में से पाँच चुने जा सकते है। इनकी सेवानिवृत्ति की आयु, कोई भी दो न्यायाधीश एक ही राष्ट्र के नहीं हो सकते है और किसी न्यायाधीश की मौत पर उनकी जगह किसी समदेशी को दी जाती है। इन न्यायाधीशों को किसी और पद रखना मना है। किसी एक न्यायाधीश को हटाने के लिए बाकी के न्यायाधीशों का सर्वसम्मत निर्णय आवश्यक है। न्यायालय द्वारा सभापति तथा उपसभापति का निर्वाचन और रजिस्ट्रार की नियुक्ति होती है।",
"भारत का उच्चतम न्यायालय\nभारत का सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है और संविधान के तहत भारत गणराज्य का सर्वोच्च न्यायालय है। यह सबसे वरिष्ठ संवैधानिक न्यायालय है, और इसके पास न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति है। भारत का मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख और मुख्य न्यायाधीश होता है, जिसमें अधिकतम 34 न्यायाधीश होते हैं और इसके पास मूल, अपीलीय और सलाहकार क्षेत्राधिकार के रूप में व्यापक शक्तियाँ होती हैं।",
"अटल पेंशन योजना\nग्राहकों को मासिक वृत्ति का विकल्प चुनना होगा १,००० से ५,००० रुपये और नियमित रूप से नियत मासिक भुगतान सुनिश्चित करना होगा। उपलब्ध मासिक वृत्ति राशि के अनुसार, संचय चरण के दौरान ग्राहक वृत्ति राशि में कमी या वृद्धि कर सकते हैं। हालांकि, स्विचिंग विकल्प अप्रैल माह के दौरान वर्ष में एक बार प्रदान की जाएगी। यह योजना प्रधान मंत्री जन धन योजना के अंतर्गत खोले गए बैंक खातों से जुड़ी होगी और योगदान स्वचालित रूप से कट जाएगा। इन खातों में से अधिकांश शून्य शेष शुरू में थी। भारत सरकार का उद्देश्य इस और संबंधित योजनाओं का उपयोग करके ऐसे शून्य शेष खातों की संख्या को कम करना है।",
"न्यायिक सुधार\n11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर बनाई गई फास्ट ट्रैक अदालतें भी लंबित पड़े मुकदमों को निपटाने में प्रभावी सिध्द हुई हैं। इसके मद्देनज़र सरकार ने राज्यों को केंद्रीय सहायता उपलब्ध करवा कर सत्र स्तर पर संचालित 1,562 फास्ट ट्रैक अदालतों की समय अवधि बढ़ा दी है। केंद्रीय विधि मंत्रालय के अनुसार, इन अदालतों में 28 लाख 49 हजार मुकदमें स्थानांतरित किए गए थे जिनमें से 21 लाख 83 हजार का निपटारा हो चुका है। केंद्र सरकार का, ग्रामीण आबादी को उसके घर पर ही न्याय प्रदान करने के लिए ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत पंचायत स्तर पर 5 हजार से अधिक ग्राम न्यायालय स्थापित करने का प्रस्ताव है। इन अदालतों में सरल एवं लचीली प्रक्रिया अपनाई जाएगी ताकि इन मुकदमों की सुनवाई और निपटारा 90 दिन के भीतर किया जा सके।"
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पृथ्वी के अतिरिक्त किस ग्रह पर ऋतु परिवर्तन संभव है?
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"बृहस्पति (ग्रह)\nबृहस्पति का अक्षीय झुकाव बहुत कम, केवल ३.१३° होने से, पृथ्वी और मंगल जैसे महत्वपूर्ण मौसमी परिवर्तनों का इस ग्रह को कोई भी अनुभव नहीं है।",
"मंगल ग्रह\nमंगल का अक्षीय झुकाव २५.१९ डिग्री है, जो कि पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के बराबर है। परिणामस्वरूप, मंगल की ऋतुएँ पृथ्वी के जैसी है, हालांकि मंगल पर ये ऋतुएँ पृथ्वी पर से दोगुनी लम्बी है। वर्त्तमान में मंगल के उत्तरी ध्रुव की स्थिति ड़ेनेब तारे के करीब है। मंगल अपने से मार्च २०१० में गुजरा और अपने से मार्च २०११ में। अगला फरवरी २०१२ में और अगला उपसौर जनवरी २०१३ में होगा।",
"सिद्धान्त ज्योतिष\nजस प्रकार ग्रह सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य की परिक्रमा करते हैं, उसी प्रकार उपग्रह ग्रहों की परिक्रमा करते हैं। व्यापक गुरुत्वाकर्षण नियम से यह स्पष्ट है कि इनकी द्रव्यमात्राएँ अपने ग्रहों से कम होती हैं। पृथ्वी के उपग्रह का चंद्रमा कहते हैं। चंद्रमा का हमारे जीवन से बहुत संबंध है। धार्मिक कृत्यों के लिये अभी बहुत से देशों में चांद्र मासों का व्यवहार किया जाता है। चंद्रमा को प्राचीन काल में ग्रह माना जाता था। पृथ्वी के अतिरिक्त मंगल के दो, गुरु के 12, शनि के 9, वारुणी (यूरेनस) के 5, तथा वरुण (नेप्चून) के 2 उपग्रह हैं। बुध, शुक्र तथा यम का कोई भी उपग्रह नहीं है1",
"मंगल ग्रह\nसौरमंडल के सभी ग्रहों में, समान घूर्णन अक्षीय झुकाव के कारण मंगल और पृथ्वी पर ऋतुएँ ज्यादातर एक जैसी है। मंगल के ऋतुओं की लम्बाइयां पृथ्वी की अपेक्षा लगभग दोगुनी है, सूर्य से अपेक्षाकृत अधिक से अधिक दूर होने से मंगल के वर्ष, लगभग दो पृथ्वी-वर्ष लम्बाई जितने आगे हैं। मंगल सतह का तापमान भी विविधतापूर्ण है, ध्रुवीय सर्दियों के दौरान तापमान लगभग −८७° से. (−१२५° फे.) नीचे से लेकर गर्मियों में −५° से. (२३° फे.) ऊँचे तक रहता है। व्यापक तापमान विस्तार, निम्न वायुमंडलीय दाब, निम्न तापीय जड़त्व और पतले वायुमंडल, जो ज्यादा सौर ताप संग्रहित नहीं कर सकता, के कारण है। यह ग्रह पृथ्वी की तुलना में सूर्य से १.५२ गुना अधिक दूर भी है, परिणामस्वरूप मात्र ४३% सूर्य प्रकाश की मात्रा ही पहुँच पाती है।",
"मंगल ग्रह\nयदि मंगल की एक पृथ्वी-सदृश्य कक्षा थी, तो उसकी ऋतुएँ भी पृथ्वी-सदृश्य रही होगी क्योंकि दोनों ग्रहों का अक्षीय झुकाव लगभग समान है। तुलनात्मक रूप से मंगल की बड़ी कक्षीय विकेन्द्रता एक महत्वपूर्ण प्रभाव रखती है। मंगल के नजदीक होता है तब दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मी और उत्तर में सर्दी होती है और के नजदीक होता है तब दक्षिणी गोलार्द्ध में सर्दी और उत्तर में गर्मी होती है। परिणामस्वरूप, दक्षिणी गोलार्द्ध में मौसम अधिक चरम और उत्तरी गोलार्द्ध में मौसम मामूली होता है अन्यथा मामला कुछ अलग ही होता। दक्षिण में ग्रीष्म तापमान ३०° से. (८६° फे.) तक पहुँच सकता है जो उत्तर में समतुल्य ग्रीष्म तापमान से ज्यादा तप्त होता है।"
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"ऋतु\nभारत में परंपरागत रूप से मुख्यतः छः ऋतुएं परिभाषित की गयी हैं। - ऋतु परिवर्तन का कारण पृथ्वीद्वारा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण और पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है। पृथ्वी का डी घूर्णन अक्ष इसके परिक्रमा पथ से बनने वाले समतल पर लगभग 66.5 अंश का कोण बनता है जिसके कारण उत्तरी या दक्षिणी गोलार्धों में से कोई एक गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका होता है। यह झुकाव सूर्य के चारो ओर परिक्रमा के कारण वर्ष के अलग-अलग समय अलग-अलग होता है जिससे दिन-रात की अवधियों में घट-बढ़ का एक वार्षिक चक्र निर्मित होता है। यही ऋतु परिवर्तन का मूल कारण बनता है।",
"ग्रहण ऋतु\nयदि चन्द्रमा की कक्षा का तल भी पृथ्वी की कक्षा के तल पर ही होता तब हर चंद्रमास में दो ग्रहण होते , हर अमावस्या को सूर्य ग्रहण और हर पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण। सभी सूर्य ग्रहण भी एक जैसे ही होते और सभी चंद्र ग्रहण भी एक जैसे ही होते। लेकिन चन्द्रमा और पृथ्वी की कक्षाएँ एक तल में नहीं हैं , तो ग्रहण उन्ही बिन्दुओ पर सम्भव जहाँ पर पृथ्वी और चन्द्रमा की कक्षाएँ एक दुसरे को काटती हैं। इन बिंदुओं को चन्द्रपात कहते हैं। ग्रहण होने के लिए चन्द्रपातों का पृथ्वी और सूर्य को मिलाने वाली रेखा पर के निकट आवश्यक है और ऐसा वर्ष में केवल दो हो बार हो पाता है जब सूर्य चन्द्रपातों के आसपास हो । ग्रहण ऋतु ही ऐसा समय होता है जब सूर्य (पृथ्वी के देखने पर ) किसी एक चन्द्रपात के इतना निकट होता है कि ग्रहण हो सके। ग्रहण ऋतु के दौरान, जब भी पूर्णिमा होगी, चंद्र ग्रहण होगा और जब भी अमावस्या होगी तो सूर्य ग्रहण होगा। यदि सूर्य एक चन्द्रपात के काफी करीब है, तो पूर्ण ग्रहण होगा। प्रत्येक ग्रहण ऋतु 31 से 37 दिनों तक चलती है, और ग्रहण ऋतुएँ लगभग हर 6 महीने में दोहराई जाती हैं। प्रत्येक ग्रहण ऋतु में कम से कम दो ग्रहण होते हैं (एक सूर्य ग्रहण और एक चंद्र ग्रहण , किसी भी क्रम में), और अधिकतम तीन ग्रहण होते हैं । ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्णिमा और अमावस्या के बीच लगभग 15 दिन (एक पखवाड़ा ) है । यदि ग्रहण ऋतु की शुरुआत में ही कोई ग्रहण होता है, तो दो और ग्रहणों के लिए पर्याप्त समय (30 दिन) होता है।",
"वर्ष\nएक वर्ष या साल सूर्य की चारों ओर अपनी कक्षा में चलती पृथ्वी की कक्षीय अवधि है। पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण, एक वर्ष का कोर्स ऋतुओं के गुजरने को देखता है, और वह चिन्हित होता हैं मौसम में, दिवालोक के घंटों में, और परिणामस्वरूप, वनस्पति और मिट्टी उर्वरता में बदलावों द्वारा। ग्रह के शीतोष्ण और उपध्रुवीय क्षेत्रों में, चार ऋतु आमतौर पर पहचाने जाते हैं: \"वसंत\", \"ग्रीष्म\", \"शरद\" और \"शीत ऋतु\"। उष्णकटिबन्धीय और उपोष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में, कई भौगोलिक क्षेत्र परिभाषित मौसम प्रस्तुत नहीं करते हैं; लेकिन मौसमी उष्णकटिबन्ध में, वार्षिक \"आर्द्र\" (गीले) और \"शुष्क\" (सूखे) ऋतु पहचाने जाते हैं और ट्रैक किए जाते हैं। चालू वर्ष 2022 है।",
"ग्रहण ऋतु\nप्रत्येक वर्ष के दौरान केवल दो सत्र ऐसे होते हैं जब ग्रहण हो सकते हैं । इन सत्रों में से प्रत्येक ग्रहण ऋतु है। प्रत्येक ग्रहण ऋतु लगभग 35 दिनों तक रहती है और लगभग छह महीने बाद ही फिर से आती है। इस प्रकार हर साल दो पूर्ण ग्रहण ऋतुएँ होती हैं। ग्रहण ऋतु का कारण चन्द्रमा की कक्षा का तल पृथ्वी की कक्षा के ताल से अलग होना है। प्रत्येक ग्रहण ऋतु में या तो दो या तीन ग्रहण होते हैं। ग्रहण ऋतु के दौरान, सूर्य किसी एक चन्द्रपात के निकट होता है जिससे अगले 35 दिनों में सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी लगभग एक सीध में आ सकें और ग्रहण संभव हो पाए। ग्रहण ऋतु के अतिरिक्त चन्द्रमा की कक्षा और सूर्यपथ (क्रांतिवृत्त) में काफी अंतर होता है और ग्रहण की सम्भावना नहीं होती।",
"पृथ्वी का इतिहास\nयुवा पृथ्वी के लिये इस संघात के कुछ परिणाम बहुत महत्वपूर्ण थे। इससे ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा निकली, जिससे पृथ्वी व चंद्रमा दोनों ही पूरी तरह पिघल गए। इस संघात के तुरंत बाद, पृथ्वी का आवरण अत्यधिक संवाहक था, इसकी सतह मैग्मा के एक बड़े महासागर में बदल गई थी। इस संघात के कारण ग्रह का पहला वातावरण अवश्य ही पूरी तरह नष्ट हो गया होगा। यह भी माना जाता है कि इस संघात के कारण पृथ्वी के अक्ष में भी परिवर्तन हो गया व इसमें 23.5° का अक्षीय झुकाव उत्पन्न हुआ, जो कि पृथ्वी पर मौसम के बदलाव के लिये ज़िम्मेदार है (ग्रह की उत्पत्तियों के एक सरल मॉडल का अक्षीय झुकाव 0° रहा होता और इसमें कोई मौसम नहीं रहे होते). इसने पृथ्वी के घूमने की गति भी बढ़ा दी होती."
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राजस्थान के केंद्रीय स्तर पर लेखांकन तथा लेखा परीक्षण किसके अधिकार क्षेत्र में आता है?
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"भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा\nआईएण्डएएस या भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा एक भारतीय केन्द्रीय सरकारी सेवा है जो भारत के महालेखापरीक्षक और लेखानियंता के अधीन है और किसी भी कार्यकारी अधिकारी के नियंत्रण से मुक्त है। भारतीय लेखा परीक्षा एवं लेखा विभाग के अधिकारी एक लेखा परीक्षण प्रबंधक की हैसियत से कार्य करते हैं। आईएण्डएएस पर केन्द्र और राज्य सरकारों और सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के खातों के लेखापरीक्षण और राज्य सरकारों के खातों के रखरखाव की जिम्मेदारी होती है। आईएएण्डएएस सरकार का वित्तीय प्रहरी है और सरकार से संबंधित जांच-पड़ताल में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी भूमिका कुछ हद तक अमेरिकी जीएओ और राष्ट्रीय लेखापरीक्षण कार्यालय (यूनाइटेड किंगडम) के समान है।"
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"भारत का सातवाँ केंद्रीय वेतन आयोग\nकेन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 28 फ़रवरी 2014 को सातवें केन्द्रीय वेतन आयोग की रूपरेखा को मंजूरी दी। इस संबंध में वेतन, भत्तों और अन्य सुविधाओं को ध्यान में रखकर रूपरेखा तैयार की गई। इसमें औद्योगिक और अनौद्योगिक केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी, अखिल भारतीय सेवाओं के कर्मी, केंद्रशासित प्रदेशों के कर्मी, भारतीय लेखा एवं परीक्षण विभाग के अधिकारी एवं कर्मी, रिजर्व बैंक को छोड़कर संसद अधिनियम के तहत गठित नियामक संस्थाओं के सदस्यों तथा उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों एवं कर्मियों को शामिल किया गया है।",
"राजस्थान प्रशासनिक सेवा परिषद्\nराजस्थान प्रशासनिक सेवा परिषद् राजस्थान के ९०० से अधिक राज्य सिविल सेवा अधिकारियों का जयपुर में स्थित स्वैच्छिक संगठन है जो अपने सदस्यों के प्रशासनिक हितों की रक्षा और जनता के हित में विविध सामाजिक कार्यक्रमों योजनाओं कार्यों में योगदान करता है|",
"रक्षा लेखा महानियंत्रक\n250 वर्ष पुराना रक्षा लेखा विभाग भारत सरकार के सबसे पुराने विभागों में से एक है। रक्षा लेखा महानियंत्रक द्वारा संचालित रक्षा लेखा विभाग वर्तमान में रक्षा लेखा सेवाओं तथा रक्षा से जुड़े अन्य संगठनों जैसे भारतीय तटरक्षक बलों, सीमा सड़क तथा कैन्टीन भंडार विभाग को वित्तीय सलाह प्रदान करने तथा उनके व्यय तथा प्राप्तियों के भुगतान, लेखांकन एवं आंतरिक लेखा परीक्षा के लिए उत्तरदायी है। रक्षा लेखा महानियंत्रक, 04 रक्षा लेखा अपर महानियंत्रकों, 19 प्रधान नियंत्रकों तथा सेना, नौसेना, वायुसेना, आयुद्ध निर्माणियों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठनों, तटरक्षक बल एवं सीमा सड़क संगठन आदि से संबंधित कार्य देखने वाले क्षेत्रीय नियंत्रकों (सेना ), प्रयोजनमूलक नियंत्रकों /एकीकृत वित्तीय सलाहकारों का कार्य देखने वाले 70 रक्षा लेखा नियंत्रक स्तर के अधिकारियों की सहायता से विभाग का संचालन करते हैं । प्रयोजनमूलक नियंत्रक सीमा सड़क संगठन, पेंशन एवं पेंशन संवितरण तथा कैन्टीन भंडार विभाग आदि जैसे विशेष संगठनों को अपनी सेवा प्रदान करते हैं",
"भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा\n60,000 से अधिक कर्मचारियों वाले भारतीय लेखापरीक्षण एवं लेखांकन विभाग के कर्मचारियों को प्रबंधित करने के लिए आईएएण्डएएस के अधिकारियों को एक लेखाकार एवं लेखापरीक्षक का पेशेवर कौशल ही नहीं बल्कि प्रशासनिक क्षमता भी हासिल करनी पड़ती है। उन्हें जटिल ठेकों की जांच करने, कर एवं राजस्व कानूनों को समझने, वाणिज्यिक संस्थानों की वित्तीय स्थिति का आकलन करने जैसे कार्य करने पड़ते हैं। तेल की खोज की जटिलताओं या किसी परमाणु ऊर्जा संयंत्र की कार्यप्रणाली को समझने और ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा इत्यादि के लिए देशव्यापी योजनाओं के कार्यान्वयन की प्रभावकारिता की व्यापक समीक्षा करने के लिए उद्योग संबंधी ज्ञान की भी जरूरत पड़ सकती है।",
"प्रतापगढ़, राजस्थान\nराष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (नेशनल इन्फोर्मेटिक्स सेंटर)भारत सरकार और राजस्थान के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सम्पूर्ण सहयोग से प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय में अगस्त २००८ से नेशनल इन्फोर्मेटिक्स सेंटर (एन आई सी) स्थापित है- जो न केवल विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, बल्कि सरकारी कामकाज में कंप्यूटर के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए राजस्व, भू अभिलेख, जिला कोषालय और अन्य विभागों के 'हस्तलिखित डाटा' को 'इलेक्ट्रोनिक डाटा' में बदलने के लिए भी सफल हुआ है। वीडियो कांफ्रेंसिंग सुविधा कलेक्टर और सचिवालय (राजधानी जयपुर) के बीच पहले से है ही, अब जिला स्तर से पाँचों उपखंडों को वीडियो कान्फ्रेंसिंग सुविधा से जोड़े जाने की योजना पर काम चल रहा है। जनता की शिकायतें सीधे 'ऑन-लाइन' दर्ज की जा रही हैं, पूरे जिले में बिजली पानी टेलीफोन के बिल भी 'ई-मित्र' सुविधा के सहारे भी जमा किये जाते हैं।",
"लेखांकन मानकों की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NACAS)\nलेखांकन मानकों की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NACAS) कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 210A के तहत भारत सरकार द्वारा स्थापित संस्थान है | इसका काम केन्द्रीय सरकार को कंपनियों पर लागु होने वाली लेखांकन नीतियों और लेखा मानको पर सलाह देना है |लेखा मानकों को तैयार करने की जिम्मेदारी भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान की है |",
"राजस्थान लोक सेवा आयोग\nराजस्थान लोक सेवा आयोग का गठन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21 के अनुसार किया गया है राजस्थान लोक सेवा आयोग एक राजस्थान सरकार का आयोग है। जो विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओँ का आयोजन करती है। इसके माध्यम से राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आर.ए.एस), राजस्थान पुलिस सेवा (आर.पी.एस) तथा राजस्थान तहसीलदार सेवा (आर.टी.एस) में उत्तीर्ण अभ्यर्थियोँ का चयन किया जाता है। इसका मुख्यालय अजमेर में स्थित है। जिसे सत्य नारायण राव समिति की सिफारिश पर जयपुर से अजमेर स्थानांतरित किया गया था!",
"राजस्थान की अर्थव्यवस्था\n8वीं योजना के प्रारम्भ में यह जयपुर एवं बीकानेर संभाग में चालू किय गया था, परन्तु वर्तमान में यह कार्यक्रम प्रदेश के कोटा, जयपुर, बीकानेर, अजमेर, उदयपुर संभागों के 21 ज़िलों में लागू हैं, जहाँ 749 उपकेन्द्र स्थापित किये गये हैं। इस योजना में पशुओं के स्वास्थ्य के अतिरिक्त कृत्रिम गर्भाधान, बेकार पशुओं का बन्ध्याकरण तथा उन्नत किस्म के चारे के बीजों का वितरण का उद्देश्य शामिल है।",
"राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय\nराजस्थान राज्य सरकार ने जयपुर-अजमेर रोड NH-8 पर किशनगढ़ के पास बांदर सिंदरी में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थायी साइट के लिए 518 एकड़ जमीन आवंटित की है। अब केंद्रीय विश्वविद्यालय सफलतापूर्वक अपने स्थायी परिसर में चल रहा है।"
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पंजाब के इतिहास में सबसे अमीर राजा कौन था?
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"महाराजा रणजीत सिंह\nमहाराजा रणजीत सिंह (पंजाबी: ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ) (१७८०-१८३९) पंजाब प्रांत के राजा थे। वे शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाराजा रणजीत एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा, बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं भटकने दिया। रणजीत सिंह का जन्म सन् 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) संधावालिया महाराजा महा सिंह के घर हुआ था। उन दिनों पंजाब पर सिखों और अफ़ग़ानों का राज चलता था जिन्होंने पूरे इलाके को कई मिसलों में बांट रखा था। रणजीत के पिता महा सिंह सुकरचकिया मिसल के कमांडर थे। पश्चिमी पंजाब में स्थित इस इलाके का मुख्यालय गुजरांवाला में था। छोटी सी उम्र में चेचक की वजह से महाराजा रणजीत सिंह की एक आंख की रोशनी चली गयी थी। वे महज़ 12 वर्ष के थे जब उनके पिता चल बसे और राजपाट का सारा बोझ उन्हीं के कंधों पर आ गया। 12 अप्रैल 1801 को रणजीत सिंह ने महाराजा की उपाधि ग्रहण की। गुरु नानक जी के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और सन 1802 में अमृतसर की ओर रूख किया।",
"महाराजा रणजीत सिंह\nमहाराजा रणजीत ने अफ़ग़ानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया। अब पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर उन्हीं का अधिकार हो गया। यह पहला मौक़ा था जब पश्तूनों पर किसी ग़ैर-मुस्लिम ने राज किया। उसके बाद उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर पर भी अधिकार कर लिया। पहली आधुनिक भारतीय सेना - \"सिख ख़ालसा सेना\" गठित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उनकी सरपरस्ती में पंजाब अब बहुत शक्तिशाली सूबा था। इसी ताक़तवर सेना ने लंबे अर्से तक ब्रिटेन को पंजाब हड़पने से रोके रखा। एक ऐसा मौक़ा भी आया जब पंजाब ही एकमात्र ऐसा सूबा था, जिस पर अंग्रेजों का क़ब्ज़ा नहीं था। ब्रिटिश इतिहासकार जे टी व्हीलर के मुताबिक़, अगर वह एक पीढ़ी पुराने होते, तो पूरे हिंदूस्तान को ही फतह कर लेते। महाराजा रणजीत खुद अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को बहुत प्रोत्साहन दिया।"
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"महाराजा आला सिंह\nराजा आला सिंह (१६९५-१७६५) (सरदार आलासिंह) (जन्म: १६९५, मृत्यु: १७ अगस्त १७६५१) पंजाब के बठिंडा जिले के रामपुरा फूल गांव के एक जाट सिक्ख सरदार थे। वह पटियाला राज्य के संस्थापक थे। उनके उत्तराधिकारी महाराजा अमर सिंह थे।राजा बाबा आला सिंह (1691-1765) राजसी के पहले राजा था राज्य की पटियाला । उनका जन्म १६९१ में फुल्कियां मिस्ल के चौधरी राम सिंह के यहां पंजाब के वर्तमान बठिंडा जिले के फूल में हुआ था। उनके पिता के छह बच्चे थे, सबसे बड़े से लेकर सबसे छोटे दुन्ना, सुभा, आला, बखा, बुद्ध, लुधा तक। १५२६ ईस्वी में पानीपत की पहली लड़ाई के बाद, मिस्ल के चौधरी को मूल रूप से बाबर द्वारा उनके पूर्वज ब्रह्म को प्रदान किया गया था",
"पाब्लो एस्कोबार\nपाब्लो एमिलियो एस्कोबार गैविरिया (1 दिसम्बर 1949 - 2 दिसम्बर 1993) एक कोलंबियाई ड्रग लॉर्ड था। कभी \"दुनिया का सबसे बड़ा अपराधी\" कहा जाने वाला पाब्लो एस्कोबार संभवतः कोकीन का अबतक का सबसे चालबाज सौदागर था। उसे विश्व इतिहास में सबसे अमीर और सबसे कामयाब अपराधी माना जाता है क्योंकि, वर्ष 1989 में, \"फ़ोर्ब्स\" पत्रिका ने एस्कोबार को दुनिया का सातवाँ सबसे अमीर व्यक्ति घोषित किया था, जिसकी अनुमानित व्यक्तिगत संपत्ति 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी। उसके पास असंख्य लक्जरी आवास एवं गाड़ियां थीं और 1986 में उसने कोलंबिया की राजनीति में प्रवेश करने का प्रयास किया, यहाँ तक कि उसने देश के 10 बिलियन डॉलर के राष्ट्रीय कर्ज को चुका देने की पेशकश भी रखी. कहा जाता है कि पाब्लो एस्कोबार ने एक बार सफ़र करते समय गर्मी के लिए 2 मिलियन डॉलर की नगदी रकम जला दी थी। कुछ इन्हीं किस्सों और अन्य कुख्यात उपलब्धियों ने एस्कोबार को अपराध की दुनिया का एक महारथी बना दिया.",
"पंजाब (भारत)\nपंजाब अखंड भारत का हिस्सा रहा है। यहां मौर्य, बैक्ट्रियन, यूनानी, शक, कुषाण, गुप्त जैसी अनेक शक्तियों का उत्थान और पतन हुआ। मध्यकाल में पंजाब मुसलमानों के अधीन रहा। सबसे पहले गज़नवी, ग़ोरी, गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुग़लक़, लोधी और मुगल वंशो का पंजाब पर अधिकार रहा। पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में पंजाब के इतिहास ने नया मोड़ लिया। गुरु नानक देव की शिक्षाओं से यहां भक्ति आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। सिख पंथ ने एक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म और समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना था। दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने सिखों को खालसा पंथ के रूप में संगठित किया तथा एकजुट किया। उन्होंने देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता और मानवीय मूल्यों पर आधारित पंजाबी राज की स्थापना की। एक फारसी लेख के शब्दों में महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब को सिख साम्राज्य में बदल दिया। किंतु उनके देहांत के बाद अंदरूनी साजिशों और अंग्रेजों की चालों के कारण पूरा साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। अंग्रेजों और सिखों के बीच दो निष्फल युद्धों के बाद 1849 में पंजाब ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया।",
"राणा सांगा\nमुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राणा सांगा हिंदुस्तान में सबसे शक्तिशाली शासक थे, जब उन्होंने इस पर आक्रमण किया, और कहा कि \"उन्होंने अपनी वीरता और तलवार से अपने वर्तमान उच्च गौरव को प्राप्त किया।\" 80 हज़ार घोड़े, उच्चतम श्रेणी के 7 राजा, 9 राव और 104 सरदारों व रावल, 500 युद्ध हाथियों के साथ युद्ध लडे। अपने चरम पर, संघ युद्ध के मैदान में 100,000 राजपूतों का बल जुटा सकते थे। मालवा, गुजरात और लोधी सल्तनत की संयुक्त सेनाओं को हराने के बाद मुसलमानों पर अपनी जीत के बाद, वह उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बन गए। कहा जाता है कि सांगा ने 100 लड़ाइयां लड़ी थीं और विभिन्न संघर्षों में उनकी आँख तथा हाथ और पैर खो गए थे।",
"चेरमान् पेरुमाल की किंवदंतिया\nयह कहानी 63 नयनमारों (शिव संतों) के इतिहास में एक नहीं होती है। चेरामन पेरुमल, जिसे पेरुमाकोथैयार और कलारितु अरिवार के नाम से भी जाना जाता है, एक संत चेरा राजा था, जो कोडुंगल्लूर से शासन करता था और कोडुंगल्लूर से सिर्फ 3 किमी दूर तिरुवनंतपुरम के भगवान महादेव का एक भक्त था। शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि इस कहानी में कोई सच्चाई नहीं है क्योंकि मुहम्मद 570 से 631 ईस्वी तक रहते थे और चेरामन पेरुमल, जो संत सुंदरार के समकालीन थे, जो बाद में संत थिरुगनन सांबंदर और संत थिरुवुक्ककरसर की तुलना में रहते थे, जो समकालीन हैं और रहते हैं। मुहम्मद के समय के दौरान।संत सुंदरार और उनके मित्र संत चेरामन पेरुमल का जन्म 7 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 8 वीं 17 वीं शताब्दी के आरंभिक भाग में हुआ था। संत सुंदरार ने थिरुथोंडार ठोकाई ’लिखा, जिसमें वे अपने से पहले रहने वाले शिव संतों के जीवन, उपलब्धियों और चमत्कारों का वर्णन करते हैं, जिनमें संत तिरुगन्नान सांबंदर और संत थिरुनावुक्करकर शामिल हैं। यदि वह पैगंबर के समय रहने वाले इन दो संतों के बारे में गाता है, तो वह बाद में उनके मुकाबले जीवित रहना चाहिए, जिसका अर्थ है कि उनके दोस्त चेरामन पेरुमल मुहम्मद की तुलना में बाद में जीवित रहे होंगे। इस कहानी की सत्यता को सत्यापित करना होगा।",
"अनोरथ\nराजा अनोरथ या अनिरुद्ध (बर्मी भाषा में: အနော်ရထာ မင်းစော / अनौरथा मंचो ; 11 मई, 1014 – 11 अप्रैल, 1077) बर्मा के प्रसिद्ध पगान साम्राज्य का संस्थापक था। उसे बर्मा राष्ट्र का जनक माना जाता है। उसने सन १०४४ से १०७८ तक शासन किया। उसने शुष्क ऊपरी बर्मा के एक छोटे से राज्य को बर्मा के प्रथम साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया जो बाद में आधुनिक बर्मा का आधार बना। ऐतिहासिक रूप से सत्यापित करने योग्य बर्मा का इतिहास १०४४ में उसके राजा बनने से ही शुरू होता है।",
"पलामू\nसत्रहवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में दक्षिण बिहार में चेरो राजा सबसे प्रभावशाली थे। भगवंत राय (१६१३-१६३०) एक दिलेर योद्धा था जिसने मुगलों से क्षेत्र छीनकर राज्य स्थापित किया था। अगले चेरो राजा अनंत राय (१६३०-१६६१) ने लंबे समय तक राज किया। उसका राज्यकाल संग्रामशील रहा क्योंकि उसे मुगलों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। मेदिनी राय (१६६२-१६७४) ने केवल १३ साल राज किया, लेकिन वह सबसे अधिक विख्यात चेरो राजा है। वह बड़ा ही न्यायप्रिय था और अपनी प्रजा से बहुत कम कर वसूलता था। पलामू के किलों में से पुराने किले का निर्माण इसी राजा ने करवाया था। मेदिनी राय के बाद प्रताप राय (१६७५-१६८१) का राज्यकाल शुरू हुआ। उसने पलामू के दूसरे किले का निर्माण कार्य आरंभ करवाया, लेकिन वह किले को पूरा नहीं कर सका। आज भी किला बनाने के लिए लाए गए पत्थरों का ढेर और अपूर्ण किले के हिस्सों का खंडहर पलामू के जंगलों में विद्यमान है।",
"राजा मुहम्मद असद खान\nराजा मुहम्मद असद खान एक राजनीतिज्ञ है पाकिस्तान के राष्ट्रीय विधानसभा में | वह NA-63 निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है पाकिस्तानी पंजाब के लिए |"
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क्रिकेट नाम किस प्रसिद्ध ब्रिटिश व्यक्ति ने दिया था?
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"डब्ल्यू॰ जी॰ ग्रेस\nविलियम गिलबर्ट \"डब्ल्यू॰ जी॰\" ग्रेस (18 जुलाई 1848 - 23 अक्टूबर 1915) अंग्रेज शौकिया क्रिकेटर थे जो इस खेल के विकास में अहम योगदान रखते हैं और जिन्हें व्यापक रूप से इसके सबसे बड़े खिलाड़ी में से एक माना जाता है। उन्होंने 1865 से 1908 तक रिकार्ड 44 सत्र के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेला, जिसके दौरान उन्होंने इंग्लैंड, ग्लूस्टरशायर, मेरीलेबोन क्रिकेट क्लब (एमसीसी), और कई अन्य टीमों की कप्तानी की।",
"क्रिकेट\nडब्लू जी ग्रेस () ने १८६५ में अपना लंबा केरियर शुरू किया; अक्सर कहा जाता है कि उसके केरियर ने खेल में क्रन्तिकारी परिवर्तन किया।इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रतिद्वंद्विता ने 1882 में दी ऐशस () को जन्म दिया। यह टेस्ट क्रिकेट की सबसे प्रसिद्ध प्रतियोगिता थी। टेस्ट क्रिकेट 1888-89 में विस्तृत हो गया जब दक्षिण अफ्रीका ने इंग्लैंड के विरुद्ध खेला प्रथम विश्व युद्धसे पहले के दो दशक \"क्रिकेट के स्वर्ण युग\" के नाम से जाने जाते हैं। यह उदासीन नाम युद्ध की हानि के परिणामस्वरूप सामूहिक अर्थ में उत्पन्न हुआ। लेकिन इस अवधि में महान खिलाड़ी हुए और यादगार मैच खेले गए। विशेष रूप से काउंटी में आयोजित प्रतियोगिता और टेस्ट स्तर का विकास हुआ।"
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"केरल में आधुनिक खेल कूद\nप्रायः सभी नवीन मनोविनोद की सामग्री ब्रिटिशों की देन है। जैसे-जैसे केरल में अंग्रेज़ी शिक्षा लोकप्रिय हो गई वैसे-वैसे ब्रिटिशों द्वारा लाई क्रीडाएँ भी लोकप्रिय हो गईं। इस प्रकार जिस विदेशी खेल को यहाँ स्थान दिया गया वह क्रिकेट है। पष़श्शि राजा पर कब्जा करने सेनाधिपति बनकर आए आर्थर वेल्लस्ळि (ड्यूक ऑफ वेल्लिंग्टन) ने केरल में क्रिकेट आंरभ किया था। 18 वीं शताब्दी के अंतिम चरण तथा 19 वीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में मलाबार में कई बार आए वेल्लस्ळि ने तलश्शेरि के अपने बँगले के सामने पहली बार स्टम्प लगाए। वेल्लस्ळि से तलश्शेरि के लोगों ने क्रिकेट सीखा। तलश्शेरि में अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ भी आयोजित हुईं। कई खानदानों ने अपने नाम पर क्रिकेट टीमें गठित कीं। इनमें मंपाणि खानदान प्रमुख था जो आज भी मध्य एवं दक्षिण केरल में क्रिकेट का प्रचार कर रहा है। यद्यपि केरल का अपना क्रिकेट इतिहास है फिर भी 1950 के बाद वह अपने गौरवपूर्ण पद से अपदस्थ हो गया। यहाँ तक कि रंजीत ट्रॉफी में भी केरल कोई प्रभाव नहीं डाल सका। बड़े - बड़े सितारों के रहते हुए भी केरल रंजीत प्रतियोगिता में पिछड़ गया। राष्ट्रीय टीम में मलयालियों की भागीदारी महत्वपूर्ण नहीं बनी। टिनु योहन्नान और श्रीशांत दो ही व्यक्ति हैं जिनको भारतीय टीम में खेलने का अवसर मिला।",
"गयाना क्रिकेट टीम\nक्रिकेट टीम को दो अन्य नामों के तहत जाना जाता है - वे पहली बार डेमरेरा के नाम से जाने जाते थे, जब वे 1865 में बारबाडोस के खिलाफ वेस्टइंडीज के प्रथम प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेल में खेले, और उन्होंने 1899 तक उस नाम को बरकरार रखा, जब अंत में ब्रिटिश गुयाना में बदल गया (वे 1895 में ब्रिटिश गुयाना के रूप में प्रथम श्रेणी क्रिकेट भी खेला था)। ब्रिटिश गुयाना का नाम 1965-66 तक फंस गया था, जब राष्ट्र और इस प्रकार टीम को अपने वर्तमान नाम में बदल दिया गया था 1971 से 1980 के मध्य तक दो क्षेत्रीय पक्ष जोन्स कप के लिए वार्षिक प्रथम श्रेणी मैच में और बाद में गाइस्तैक ट्रॉफी में भाग गए।",
"कीथ फ्लेचर\nकीथ विलियम रॉबर्ट फ्लेचर (जन्म 20 मई 1944)) एक अंग्रेजी पूर्व प्रथम श्रेणी के क्रिकेटर हैं जो एसेक्स और इंग्लैंड के लिए खेले हैं। बाद में वह इंग्लैंड के टीम मैनेजर बने। उनका उपनाम \"द गनोम ऑफ एसेक्स\" था, इसलिए उनके एसेक्स टीममेट, रे ईस्ट द्वारा नामांकित किया गया, क्योंकि फ्लेचर के विंकलपिकर्स ने पहनने के कारण पैर की उंगलियों पर कर्ल करना शुरू कर दिया था।",
"सुशील दोषी\nउनका जन्म इन्दौर में १९४३ में हुआ। सुशील दोषी ने क्रिकेट की कमेंटरी हिन्दी में शुरू की, तब लोग उन पर हँसते थे और कहते थी कि क्रिकेट तो अँग्रेजों का खेल है, उसकी कमेंटरी हिन्दी में कैसे होगी? लेकिन जब सुशील दोषी ने हिन्दी में अपने शब्द और अपनी शैली विकसित कर ली, तब उनके नाम का डंका बजने लगा। धर्मयुग के संपादक डॉ॰ धर्मवीर भारती की राय उनके बारे में यह थी कि सुशील दोषी ने क्रिकेट के बहाने हिन्दी की बहुत बड़ी सेवा की है और वे जितने बड़े सेवक क्रिकेट के हैं, उससे बड़े सेवक हिन्दी के हैं। इंदौर के होलकर क्रिकेट स्टेडियम के कमेंटरी बॉक्स का नाम सुशील दोषी के नाम पर रखा गया है।",
"१७२५ तक क्रिकेट का इतिहास\nरिचमॉन्ड और गेज के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मेडस्टोन के एडवर्ड स्टेड (कभी-कभी \"एडविन स्टीड\" कहा जाता था) थे, जो केंट के पहले संरक्षक के रूप में जाने जाते हैं। रिचमॉन्ड और गेज की ससेक्स की टीमों के स्टेड की केंट टीम के साथ अंतर-काउंटी प्रतिद्वंद्विता का लुत्फ उठाए जाने से काउंटी चैंपियनशिप की अवधारणा जन्म लेती है।",
"१७२५ तक क्रिकेट का इतिहास\nएक खिलाड़ी डार्टफोर्ड का विलियम बाडले (1680-1768) था, जिसने हो सकता है 1709 के मैच में भाग लिया था, वह प्रारंभिक समय का बढ़िया खिलाड़ी था, जिसका नाम दर्ज है। वह \"इंग्लैंड का सबसे अनुभवी खिलाड़ी माना गया\" है और 1700 से 1725 की में वह जरूर प्रमुख खिलाड़ी रहा होगा। 1720 के दशक में जिन्हें सक्रिय होने के लिए जाना जाता है, ऐसे दूसरे अच्छे खिलाड़ियों में केंट के एडवर्ड स्टेड, सरे के एडमंड चैपमैन और स्टीफन डिंगेट, लंदन के टिम कोलमैन और ससेक्स के थॉमस वेमार्क थे।",
"भारतीय क्रिकेट टीम का ऑस्ट्रेलिया दौरा 1947-48\nयह एक अविश्वसनीय उपलब्धि थी, विचार है कि ऑस्ट्रेलिया के गेंदबाजी आक्रमण लगभग रूप में अपनी बल्लेबाजी में अच्छा था। उनकी गेंदबाजी लाइनअप कुछ तारकीय नामों का दावा: कीथ मिलर, जो एक वास्तविक हरफनमौला खिलाड़ी बल्ले और गेंद दोनों, रे लिंडवाल, जो किसी भी हालत में गेंदबाजी की पूर्ण स्वामित्व अधिकारी करने के लिए कहा गया था के साथ बहुत अच्छा प्रदर्शन देने में सक्षम था, एक था जो सही गेंदबाजी, छेदक के साथ और गेंदबाजी पर हमला, और इयान जॉनसन और बिल जॉनसन, जो टीम में दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण कॉग्स थे। हजारे के इस विशेष पारी उसका रूप में भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है, के रूप में अच्छी तरह से कहा गया था। इस प्रक्रिया में, हजारे ब्रैडमैन, जो पिछले परीक्षण में ही किया था नकल करते।",
"कीथ फ्लेचर\nक्रिकेट लेखक कॉलिन बेटमैन ने कहा कि \"फ्लेचर एक कठिन कुकी था, एक चतुर व्यक्ति जो विरोधियों को पोकर खिलाड़ियों के सबसे घृणित जैसे दोष दे सकता था। उन्होंने अपने साथियों में निष्ठा विकसित की और अपने विरोधियों से प्रशंसा प्राप्त की, यहां तक कि जब उन्हें चूसने वाले पंच द्वारा पीटा गया \"। बेटमैन ने कहा, \"इंग्लैंड के कप्तान के रूप में फ्लेचर को बर्खास्त करना अंग्रेजी क्रिकेट के सबसे शानदार सागों में से एक है।\""
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भारत के संपरीक्षा एवं लेखा प्रणालियों का प्रधान कौन होता है?
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"भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक\nभारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (; संक्षिप्त नाम: CAG कैग), भारतीय संविधान के अध्याय ५ द्वारा स्थापित एक प्राधिकारी है जो भारत सरकार तथा सभी प्रादेशिक सरकारों के सभी तरह के लेखों का अंकेक्षण करता है। वह सरकार के स्वामित्व वाली कम्पनियों का भी अंकेक्षण करता है। उसकी रिपोर्ट पर सार्वजनिक लेखा समितियाँ ध्यान देती है। भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक एक स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्य करते हैं और इस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता| भारत के नियंत्रण और महालेखापरीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं| नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक ही भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा का भी मुखिया होता है। इस समय पूरे भारत की इस सार्वजनिक संस्था में ५८ हजार से अधिक कर्मचारी काम करते हैं।"
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"भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा\nइस सेवा के लिए भारत के प्रत्येक राज्य के लिए प्रधान महालेखाकार और महालेखाकारों की व्यवस्था है। आम तौर पर प्रत्येक राज्य में लेखापरीक्षण कार्यों के लिए एक प्रधान महालेखाकार प्रभारी होता है। प्रधान महालेखाकार के अलावा प्रत्येक राज्य में लेखांकन और हकदारी संबंधी कार्यों (वेतन, भविष्य निधि, पेंशन इत्यादि) के लिए महालेखाकार प्रभारी भी होता है। बड़े राज्यों में प्रधान महालेखाकार के अलावा एक महालेखाकार (लेखापरीक्षण) भी हो सकता है।",
"भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक\n(1) वह भारत की संचित निधि , प्रत्येक राज्य की संचित और प्रत्येक संघ शाषित प्रदेश, जहाँ विधानसभा हो, से सभी व्यय सम्बन्धी लेखाओं की लेखा परीक्षा करता है।",
"रक्षा लेखा प्रधान नियंत्रक, लखनऊ\nरक्षा लेखा प्रधान नियंत्रक, लखनऊ (Principal Controller of Defence Accounts, Lucknow) भारत के रक्षा लेखा विभाग के लखनऊ क्षेत्र का नेतृत्व रक्षा लेखा महानियंत्रक के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करते हैं। रक्षा लेखा विभाग के प्रमुख कार्य भारतीय सशस्त्र बलों से संबंधित सभी प्रकार के भुगतानों पर निगरानी करना, खातों का लेखा जोखा रखना और जांच करना है। इनमें आपूर्ति और सेवाओं के बिल और निर्माण / मरम्मत कार्यों, वेतन और भत्तों के विविध शुल्क, पेंशन, आदि के बिल शामिल हैं।",
"रक्षा लेखा महानियंत्रक\n250 वर्ष पुराना रक्षा लेखा विभाग भारत सरकार के सबसे पुराने विभागों में से एक है। रक्षा लेखा महानियंत्रक द्वारा संचालित रक्षा लेखा विभाग वर्तमान में रक्षा लेखा सेवाओं तथा रक्षा से जुड़े अन्य संगठनों जैसे भारतीय तटरक्षक बलों, सीमा सड़क तथा कैन्टीन भंडार विभाग को वित्तीय सलाह प्रदान करने तथा उनके व्यय तथा प्राप्तियों के भुगतान, लेखांकन एवं आंतरिक लेखा परीक्षा के लिए उत्तरदायी है। रक्षा लेखा महानियंत्रक, 04 रक्षा लेखा अपर महानियंत्रकों, 19 प्रधान नियंत्रकों तथा सेना, नौसेना, वायुसेना, आयुद्ध निर्माणियों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठनों, तटरक्षक बल एवं सीमा सड़क संगठन आदि से संबंधित कार्य देखने वाले क्षेत्रीय नियंत्रकों (सेना ), प्रयोजनमूलक नियंत्रकों /एकीकृत वित्तीय सलाहकारों का कार्य देखने वाले 70 रक्षा लेखा नियंत्रक स्तर के अधिकारियों की सहायता से विभाग का संचालन करते हैं । प्रयोजनमूलक नियंत्रक सीमा सड़क संगठन, पेंशन एवं पेंशन संवितरण तथा कैन्टीन भंडार विभाग आदि जैसे विशेष संगठनों को अपनी सेवा प्रदान करते हैं",
"ऐश्वर्या रुटुपर्णा प्रधान\nऐश्वर्या रुटुपर्णा प्रधान (पूर्व रत्कांत प्रधान) (जन्म 12 नवंबर 1 9 83) ओडिशा वित्तीय सेवाओं (ओएफएस) में एक वाणिज्यिक कर अधिकारी के रूप में काम करने वाले भारत के पहले खुले तौर पर ट्रांसजेंडर सिविल सेवर्स हैं। प्रधान ने 2010 में रत्कांत प्रधान के रूप में ओएफएस में सफलतापूर्वक शामिल हो गए। भारतीय सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले के बाद, उन्होंने ट्रांजेन्डर समुदाय को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता देते हुए, कानूनी रूप से 2015 में अपनी लिंग पहचान को बदल दिया।",
"भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा\n60,000 से अधिक कर्मचारियों वाले भारतीय लेखापरीक्षण एवं लेखांकन विभाग के कर्मचारियों को प्रबंधित करने के लिए आईएएण्डएएस के अधिकारियों को एक लेखाकार एवं लेखापरीक्षक का पेशेवर कौशल ही नहीं बल्कि प्रशासनिक क्षमता भी हासिल करनी पड़ती है। उन्हें जटिल ठेकों की जांच करने, कर एवं राजस्व कानूनों को समझने, वाणिज्यिक संस्थानों की वित्तीय स्थिति का आकलन करने जैसे कार्य करने पड़ते हैं। तेल की खोज की जटिलताओं या किसी परमाणु ऊर्जा संयंत्र की कार्यप्रणाली को समझने और ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा इत्यादि के लिए देशव्यापी योजनाओं के कार्यान्वयन की प्रभावकारिता की व्यापक समीक्षा करने के लिए उद्योग संबंधी ज्ञान की भी जरूरत पड़ सकती है।",
"भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक\nभारत का महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक सरकार द्वारा किए गए खर्च तथा आयोग का आय का प्रत्येक वर्ष जांच करता है यह किसी देश के ऑडिटर का प्रमुख माना जाता है वर्तमान में श्रीमान राजीव महर्षि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा प्रमुख है",
"लेखापरीक्षा\nइन्सटीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट ऑफ इण्डिया, आई॰एफ॰ए॰सी॰ का सदस्य है और यह आई॰एफ॰ए॰सी॰ द्वारा जारी मार्गदर्शकों के कार्यान्वयन में कार्य करने के लिये वचनबद्ध है। जुलाई, 2002 में अंकेक्षण व्यवहार समिति को संस्थान की परिषद द्वारा 'अॉडिटिंग ऐण्ड एश्योरेंस स्टैण्डर्ड्स बोर्ड' में परिवर्तित किया जा चुका है ताकि यह अन्तर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति के समकक्ष आ सके। विभिन्न हित वर्गों तथा समाज के विभिन्न प्रखण्डों के प्रतिनिधियों की भागीदारी द्वारा अॉडिटिंग ऐण्ड एश्योरेंस स्टैण्डर्ड्स बोर्ड अंकेक्षण के कामकाज में वांछनीय पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा चुका है। स्टैण्डर्ड अॉडिटिंग प्रक्टिसेस (Standard Auditing practice / SAPs) का नाम भी बदलकर 'अॉडिटिंग ऐण्ड एश्योरेंस स्टैण्डर्ड' (Auditing and Assurance Standards / AAs) कर दिया गया है। अब तक 34 अंकेक्षण व आश्वासन मानक जारी किये जा चुके हैं।",
"रक्षा लेखा प्रधान नियंत्रक, लखनऊ\nरक्षा लेखा विभाग उपभोक्ता की संतुष्टि के लिए दक्ष सही तथा तत्काल लेखाकंन भुगतान तथा वित्तीय सलाह प्रदान करने के लिए प्रतिबद्व है । यह लोक जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए दक्ष लेखापरीक्षा सेवा प्रदान करने के लिए भी प्रतिबद्व है।"
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दलहनी फसलों में किस उर्वरक को बेसल डोज़ के रूप में डालना चाहिये?
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"राइजोबियम\nराइजोबियम (Rhizobium) भूमि का जीवाणु (बैक्टिरिया) है जो |नाइट्रोजन का यौगीकीकरण]] करता है। यह दलहनी फसल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त जैविक उर्वरक ।एजोला नीले वायु शैवाल को ठीक करने वाले नाइट्रोजन के साथ मिलकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करता है",
"हरी खाद\nकम उपजाऊ समस्याग्रस्त मृदा में इन फसलों को कम समय में अच्छी बढ़वार के लिए दलहनी फसलों में 20 से 25 किग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टेयर तथा गैर-दलहनी फसलों में 40 से 50 किग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के समय डालने से काफी लाभ होता है। इन फसलों को परती अवस्था में उचित नमी के समय बीज को छिड़कर बो दिया जाता है एवं एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके पाटा चला दिया जाता है। मृदा में थोड़ी मात्रा में 40 से 50 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर तथा 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर पोटाश की मात्रा डालने से सड़ने गलने की क्रिया शीघ्रता से पूर्ण होने में सहायता मिलती है।",
"स्फूर घोलक जैव उर्वरक\nफसल उत्पादन में जिन 16 आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें प्रमुख रूप से नत्रजन व स्फूर (फास्फोरस) तत्व का महत्व सबसे अधिक होता है। इन तत्वों में से किसी भी एक तत्व की कमी से जहां फसल उत्पादन में गंभीर रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अब यह भी देखा और अनुभव किया जा रहा है कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जिस फसल की 10-15 वर्ष में जो उत्पादकता थी, या तो उस उत्पादकता में कमी आयी है अथवा पहले जैसा उत्पादन लेने में डेढ़ से दो गुना अधिक उर्वरक देना पड़ रहा है जिससे भूमि की गुणवत्ता भी नष्ट हो रही है। फास्फोरस युक्त रासायनिक उर्वरक जैसे सुपर फास्फेट आदि की जो भी मात्रा, हम फसल उत्पादन के लिए खेतों में डालते हैं उसका सिर्फ 20 से 25 प्रतिशत भाग ही पौधों को उपलब्ध हो पाता है, शेष स्फूर मिट्टी के कणों द्वारा स्थिर कर लिया जाता है अथवा रासायनिक क्रियाओं द्वारा अघुलनशील मिश्रण में परिवर्तित हो जाता है। फलस्वरूप यह महत्वपूर्ण तत्व पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता। स्फूर तत्व की यह स्थिति विशेषकर काली मिट्टी (कन्हार) तथा हल्की मिट्टी (भाटा) में देखने को ज्यादा मिली है।",
"शुष्कभूमि कृषि\nफसल में नत्रजन की अपूर्ति यूरिया जैसे उर्वरकाें द्वारा की जाती है। हमारे वायुमण्डल में लगभग 78 प्रतिशत नत्रजन है। वायुमण्डल की इस नत्रजन काे पाैधाें काे राईजोबियम एवं एजेटोबैक्टर आदि जीवाणु खाद का उपयोग कर उपलब्ध कराया जा सकता है। राइजोबियम जीवाणु दलहनी फसलों की जड़ों में सहजीवी के रूप में ग्रन्थि (गांठ) बनाकर रहते हैं। ये वायुमण्डल से नत्रजन प्राप्त करके सीधे पौंधों को उपलब्ध करा देते हैं। एजेटोबैक्टर स्वतन्त्र रूप से जमीन में रहते हैं तथा वायुमण्डल की नत्रजन को जमीन में पौंधों के लिए उपलब्ध अवस्था में छोड़ देते हैं। इस प्रकार ये भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। इसी प्रकार फॉस्फेट विलेयक (पी.एस.बी.) जीवाणु खाद जमीन में बेकार पड़े फॉस्फोरस को घोलकर पौधों को उपलब्ध करा देता है। इससे पहले खेत में उपयोग किये गये डी.ए.पी व सिंगल सुपर फॉस्फेट का भी समुचित उपयोग हो जाता है।"
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"सस्य आवर्तन\nआज न तो केवल उत्पाद वृद्धि रूक गयी है बल्कि एक निश्चित मात्रा में उत्पादन प्राप्त करने के लिए पहले की अपेक्षा न बहुत अधिक मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना पड़ रहा है क्योंकि भूमि में उर्वरक क्षमता उपयोग का हृस बढ़ गया है। इन सब विनाशकारी अनुभवों से बचने के लिए हमें फसल चक्र, फसल सघनता, के सिद्धान्तों को दृष्टिगत रखते हुए फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश जरूरी हो गया है क्योंकि दलहनी फसलों से एक टिकाऊ फसल उत्पादन प्रक्रिया विकसित होती है।",
"हरी खाद\nहरी खाद के लिए दलहनी फसलों में सनैइ (सनहेम्प), ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ग्वार आदि फसलों का उपयोग किया जा सकता है। इन फसलों की वृद्धि शीघ्र, कम समय में हो जाती है, पत्तियाँ बड़ी वजनदार एवं बहुत संख्या में रहती है, एवं इनकी उर्वरक तथा जल की आवश्यकता कम होती है, जिससे कम लागत में अधिक कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो जाता है। दलहनी फसलों में जड़ों में नाइट्रोजन को वातावरण से मृदा में स्थिर करने वाले जीवाणु पाये जाते हैं।",
"बवासीर\nमधुमेह/डाइबिटीज से पीड़ित रोगी पाइल्स की गोल्ड कैप्सूल का सेवन कर सकते हैं। यह विशेष विधि द्वारा बनाया जाता है, जो खूनी व बादी बवासीर की समस्या से हमेशा के लिए निजात दिलाने में मददगार है।",
"भार प्रशिक्षण (वेट ट्रेनिंग)\nअन्य कोच, प्रशिक्षुओं को व्यायाम के दौरान वल्साल्वा हरकत करने की सलाह देते हैं जो रीढ़ पर बल डालता है, क्योंकि धमनीविस्फार द्वारा स्ट्रोक का खतरा धड़ की अपर्याप्त कठोरता के कारण होने वाली एक आर्थोपेडिक चोट की तुलना में काफी कम होता है।",
"शुष्कभूमि कृषि\nरबी फसलाें जैसे सरसाें में मैन्कोजेब 2 ग्राम/एप्रोन 35 एस.डी. 4 ग्राम (सिफारिश के अनुसार), जौ व चना में कार्बेण्डेजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिये। बारानी क्षेत्रों में दीमक से बचाव के लिए 25 किलो क्यूनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण प्रति हैक्टर की दर से बुवाई से पूर्व खेतों में मिलायें। सामान्यतः फसलों में रस चूसने एवं काटकर/कुतरकर हानि पहुंचाने वाले कीटों का प्रकोप होता है। रस चूसने वाले कीटों जैसे मोयला/चेंपा, तेला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी, मकड़ी आदि कीट प्रायः पत्तियों की निचली सतह पर मिलते है। इनकी रोकथाम के लिए मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी., डाइमिथोएट 30 ई.सी., मोनोक्रोटोफास 36 डब्ल्यू. एस.सी. आदि में से किसी एक दवा की एक लीटर मात्रा प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिये। इसी प्रकार पाैधाें के उपरी भागाें काे काटकर/कुतरकर खाने वाली लटों/सुण्डियों, फड़का, कातरा आदि कीटों की रोकथाम के लिए क्यूनालफॉस 25 ई.सी., मोनोक्रोटोफास 36 उब्ल्यू.एस.सी., मैलाथियॉन 50 ई.सी. आदि में से किसी एक दवा का एक लीटर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिए। दवाओं के छिड़काव के लिए पानी की व्यवस्था नहीं होने पर मिथाइल पैराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 किलो हैक्टर की दर से भुरकाव करें।",
"अश्वगंधा\nऔषधीय पौधे जिनकी जड़ों का प्रयोग व्यावसायिक रूप से किया जाता है, उनमें रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। सामान्यतः इस फसल में उर्वरकों का प्रयोग नहीं किया जाता है। परन्तु शोध पश्चात यह ज्ञात हुआ है कि अमोनियम नाइट्रेट के प्रयोग से जड़ो की अधिकतम उपज प्राप्त होती है। कुछ शोध में जिब्रेलिक एसिड के प्रयोग से भी जड़ों के विकास में अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं।"
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भारत में संघ राज्यों का प्रशासन किसके द्वारा होता है?
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"भारत के प्रशासनिक विभाग\nभारत २८ राज्यों और ८ केंद्र शासित प्रदेशों (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सहित) से मिलकर बना है। केंद्र शासित प्रदेश उप-राज्यपाल द्वारा संचालित होते हैं, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। सातों प्रदेशों में से दो (दिल्ली और पुडुचेरी) को आंशिक राज्य का दर्जा दिया गया है। इन प्रदेशों में सीमित शक्तियों वाली निर्वाचित विधायिकाओं और मंत्रियों की कार्यकारी परिषदों का प्रावधान है।",
"भारत सरकार\nभारत की शासन व्यवस्था केन्द्रीय और राज्यीय दोनो सिद्धान्तों का मिश्रण है। लोकसभा, राज्यसभा सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता, संघ लोक सेवा आयोग इत्यादि इसे एक संघीय ढांचे का रूप देते हैं तो राज्यों के मंत्रीमंडल, स्थानीय निकायों की स्वायत्ता इत्यादि जैसे तत्त्व इसे राज्यों से बनी शासन व्यवस्था की ओर ले जाते हैं। प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होता है जो राष्ट्रपति द्वारा ५ वर्षों के लिए नियुक्त किये जाते हैं।"
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"भारत के राज्य और संघ क्षेत्र\nभारत राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों (संघ क्षेत्र) का एक संघ है। राज्य और संघ क्षेत्र फिर जिलों और अन्य छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित हैं।",
"भारत\nभारत का संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित करता है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी द्विसदनात्मक संसद वेस्टमिन्स्टर शैली की संसदीय प्रणाली द्वारा संचालित है। भारत का प्रशासन संघीय ढांचे के अन्तर्गत चलाया जाता है, जिसके अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार और राज्य स्तर पर राज्य सरकारें हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बंटवारा संविधान में दी गई रूपरेखा के आधार पर होता है। वर्तमान में भारत में २८ राज्य और ८ केंद्र-शासित प्रदेश हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में, स्थानीय प्रशासन को राज्यों की तुलना में कम शक्तियां प्राप्त होती हैं। भारत का सरकारी ढाँचा, जिसमें केंद्र राज्यों की तुलना में ज़्यादा सशक्त है, उसे आमतौर पर अर्ध-संघीय (सेमि-फ़ेडेरल) कहा जाता रहा है, पर १९९० के दशक के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक बदलावों के कारण इसकी रूपरेखा धीरे-धीरे और अधिक संघीय (फ़ेडेरल) होती जा रही है।",
"भारत के राज्यों और संघ क्षेत्रों की राजधानियाँ\nसभी राज्यों और दो केन्द्र-शासित प्रदेशों, दिल्ली और पौण्डिचेरी, में चुनी हुई सरकारें और विधानसभाएँ हैं, जो वॅस्टमिन्स्टर प्रतिमान पर आधारित हैं। अन्य केन्द्र-शासित प्रदेशों पर देश की केन्द्र सरकार का शासन है। 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अन्तर्गत राज्यों का निर्माण भाषाई आधार पर किया गया था, और तबसे यह व्यवस्था लगभग अपरिवर्तित रही है। प्रत्येक राज्य और केन्द्र-शासित प्रदेश प्रशासनिक इकाईयों में बँटा होता है।",
"संघ (प्रशासन)\nएक संघ या फेडरेशन, (जिसे संघीय राज्य भी कहते हैं), एक राजनीतिक सत्त्व हैं, जो किसी केन्द्रीय (संघीय) सरकार के अंतर्गत आंशिक रूप से स्वशासित राज्यों या क्षेत्रों के संघ (यूनियन) से चिन्हित होता हैं।",
"संघ (प्रशासन)\nसंघ या फेडरेशन ऐसा राष्ट्र है जिसमें बहुत से स्वराजित राज्य, प्रदेश या देश एक केंद्रीय सरकार के अधीन गठित होते हैं। सोवियत संघ के कुछ राज्यों (जैसे के बेलारूस) को अपनी विदेश नीति चलाने का अधिकार था लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका के राज्यों को यह अधिकार नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के हर राज्य को अपना अलग संविधान, राज्यगान और झंडा रखने का अधिकार है",
"भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश\nभारत राज्यों का एक संघ है। इसमें 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। ये राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश पुनः जिलों और अन्य क्षेत्रों में बाँटे गये हैं।",
"भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश\nभारत के इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप पर विभिन्न जातीय समूहों ने शासन किया और इसे अलग-अलग प्रशासन-संबन्धी भागों में विभाजित किया। आधुनिक भारत के वर्तमान प्रशासनिक प्रभाग नए घटनाक्रम हैं, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान विकसित हुए। ब्रिटिश भारत में, वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश, साथ ही अफ़्गानिस्तान प्रांत और उससे जुड़े संरक्षित प्रांत, बाद में उपनिवेश बना, बर्मा (म्यांमार) आदि, सभी राज्य समाहित थे। इस अवधि के दौरान, भारत के क्षेत्रों में या तो ब्रिटिशों का शासन था या उन पर स्थानीय राजाओं का नियंत्रण था। १९४७ में स्वतन्त्रता के बाद इन विभागों को संरक्षित किया गया और पंजाब तथा बंगाल के प्रांतों को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया गया। नए राष्ट्र के लिए पहली चुनौती थी राजसी राज्यों का संघों में विलय।",
"भारत सरकार\nभारत के नागरिकों से संबंधित बुनियादी दीवानी और फौजदारी कानून जैसे नागरिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता, अपराध प्रक्रिया संहिता, आदि मुख्यतः संसद द्वारा बनाया जाता है। संघ और हरेक राज्य सरकार तीन अंगो कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका के अन्तर्गत काम करती है। संघीय और राज्य सरकारों पर लागू कानूनी प्रणाली मुख्यतः अंग्रेजी साझा और वैधानिक कानून (English Common and Statutory Law) पर आधारित है। भारत कुछ अपवादों के साथ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्याय अधिकारिता को स्वीकार करता है। स्थानीय स्तर पर पंचायती राज प्रणाली द्वारा शासन का विकेन्द्रीकरण किया गया है। भारत का संविधान भारत को एक सार्वभौमिक, समाजवादी गणराज्य की उपाधि देता है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसका द्विसदनात्मक संसद वेस्टमिन्स्टर शैली के संसदीय प्रणाली द्वारा संचालित है। इसके शासन में तीन मुख्य अंग हैं: न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका।"
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संविधान का वह कौन-सा भाग है जो संविधान के निर्माताओं के मस्तिष्क और उद्देश्यों को प्रतिबिम्बित करता है?
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"भारतीय संविधान की उद्देशिका\nसंविधान किन आदर्शों, आकांक्षाओं को प्रकट करता है, इसका निर्धारण भी उद्देशिका से हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के मतानुसार उद्देशिका का प्रयोग संविधान निर्माताओ के मस्तिष्क में झांकने और उनके उद्देश्य को जानने में प्रयोग की जा सकती है। उद्देशिका यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है। इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’ से प्रारम्भ होती है। केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद में कहा गया कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नहीं करती थी अत: संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नहीं कर सकता है परंतु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। परम्परागत मत -- उद्देशिका को संविधान का भाग नहीं मानता है क्योंकि यदि इसे विलोपित भी कर दे तो भी संविधान अपनी विशेष स्थिति बनाये रख सकता है। इसे पुस्तक के पूर्व परिचय की तरह समझा जा सकता है यह मत सर्वोच्च न्यायालय ने बेरुबारी यूनियन वाद 1960 में प्रकट किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जहाँ संविधान की भाषा संदिग्ध हो, वहाँ प्रस्तावना विविध निर्वाचन में सहायता करती है। इसीलिए \"विधायिका\" प्रस्तावना में संशोधन नहीं कर सकती।"
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"संविधान\nभारतीय संविधान की रचना के समय निर्माताओं के सम्मुख कई मूल प्रश्न थे, जैसे नागरिकों कें मूल स्वाधिकारों की सुरक्षा, केंद्र एवं राज्यों के कार्यक्षेत्र की स्पष्ट व्याख्या जिससे दोनों अपनी निर्धारित सीमाओं के अंतर्गत ही विधिव्यवहार सीमित रखें, संविधान का रूप परिदृढ़ रखना, तथा राज्यों में पारस्परिक वाणिज्य व्यवसाय, स्वातंत्र्य की रक्षा इत्यादि। देश में कार्यपालिका या विधायिका के समस्त कार्यों की शुद्धता तथा औचित्य इसी पर निर्भर करता है कि वह देश के संवैधानिक उद्देश्य बन्धनों के अनुकूल है अथवा नहीं, यदि कोई कार्य इन मूल उद्देश्यों के प्रतिकूल होता है तो वह शक्ति बाह्य कहा जाता है। राज्य के सर्वोच्च न्यायलय में जहाँ विधि प्रयुक्ति एवं व्याख्या होती है, अधिकांशत: वहीं यह भी निश्चित होता है कि अमुक विधिनियम शक्तिबाह्य (अल्ट्रा वायर्स) है अथवा नहीं।",
"अमेरिकी कांग्रेस\nसंयुक्त राज्य अमरीका का संविधान, संघीय संविधान है। इस संविधान में शक्तिसंतुलन एवं अधिकारविभाजन के सिद्धांत को मान्यता दी गई है। संविधान निर्माताओं ने संयुक्त राज्य अमरीका की विधिनिर्माण की सत्ता को एक कांग्रेस के अधीन रखा है, जिसके सिनेट और हाउस ऑव रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ नाम से दो सदन हैं। राष्ट्रीय कनवेंशन में अत्यधिक मतभेद रहा है। अंत में संविधान निर्माताओं ने अपनी व्यावहारिक कुशलता का परिचय देते हुए यह निर्णय किया कि हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ का संगठन राष्ट्रीय आधार पर किया जाए तथा सिनेट को संघांगों की स्वतंत्र अस्तित्व की भावना को बनाए रखने की दृष्टि से संगठित किया जाए। अत: सिनेट एवं हाउस ऑव रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ का सम्मिलित रूप ही कांग्रेस है। संविधान निर्माताओं ने सिनेट के संगठन में संघांगों की स्वतंत्रता की भावना को एवं हाउस ऑव रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ के संगठन में राष्ट्रीय एकता की भावना को यथायोग्य स्थान दिया है। इस प्रकार कांग्रेस के संगठन में विरोधी भावनाओं का सुंदर समन्वय दिखलाई पड़ता है। संयुक्त राज्य अमरीका ने संघीय विधानमंडल का नाम कांग्रेस इसलिए रखा कि यह शब्द संघात्मक सरकार का परिचायक है। यह सत्य है कि साधारणतया कांग्रेस के संगठन एवं अधिकारों में बहुत ही कम परिवर्तन हुआ है। संविधान निर्माताओं ने कांग्रेस के संगठन एवं अधिकारों के संबंध में जो कल्पना की थी, उसका पूर्ण आभास वर्तमान कांग्रेस में है।",
"भारतीय संविधान का इतिहास\nकिसी भी देश का संविधान उसकी राजनीतिक व्यवस्था का बुनियादी सांचा-ढांचा निर्धारित करता है, जिसके अंतर्गत उसकी जनता शासित होती है। यह राज्य की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे प्रमुख अंगों की स्थापना करता है, उसकी शक्तियों की व्याख्या करता है, उनके दायित्वों का सीमांकन करता है और उनके पारस्परिक तथा जनता के साथ संबंधों का विनियमन करता है। इस प्रकार किसी देश के संविधान को उसकी ऐसी 'आधार' विधि (कानून) कहा जा सकता है, जो उसकी राजव्यवस्था के मूल सिद्धातों को निर्धारित करती है। वस्तुतः प्रत्येक संविधान उसके संस्थापकों एवं निर्माताओं के आदर्शों, सपनों तथा मूल्यों का दर्पण होता है। वह जनता की विशिष्ट सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रकृति, आस्था एवं आकांक्षाओं पर आधारित होता है।",
"भारतीय संविधान के तीन भाग\nकिसी भी देश मे रहने वाले व्यक्ति नागरिक तथा विदेशी दो भागों में विभाजित किये जाते हैं। नागरिक वह है जो राजनैतिक समाज का हिस्सा है तथा संविधान तथा अन्य कानूनों में दिये सभी लाभो का लाभ उठाता है संविधान के अंर्तगत नागरिकता के मात्र सैद्धांतिक निर्देश ही दिये गये है यथा",
"भारत का संविधान\nसंविधान की सातवीं अनुसूची में संसद तथा राज्य विधायिकाओं के बीच विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है। अवशिष्ट शक्तियाँ संसद में विहित हैं। केन्द्रीय प्रशासित भू-भागों को संघराज्य क्षेत्र कहा जाता है।",
"पाकिस्तानी संविधान सभा\nइसके बाद, लियाकत अली खान ने तीन साल तक इसकी अध्यकक्षता की और उद्देश्य संकल्प का निर्माण किया, जिसे 1949 में संविधान सभा में पाकिस्तान के संविधान के लिए एक दृष्टिकोण के रूप में अपना गया। यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि 69 में से 21 सदस्यों ने उद्देश्य संकल्प के लिए मतदान किया।",
"बांग्लादेशी संविधान की प्रस्तावना\nयह उद्देशिका, संविधान का प्रथम पृष्ठ है, मुखभंज रूपी, इसके लेख में बांग्लेदेश के संविधान-निर्माताओं ने आलेवाली सरकारों, विधी निर्माताओं व पीढ़ियों से संविधान व उनके बांग्लादेश की कल्पना के संदर्भ में, उनके विचार, मूल सिद्धांतों व संविधान सचना की मूल नीतियों को अंकित किया है। हालाँकि, यह बांग्लादेशी संविधान का अंश है, परंतु यह एक न्यायिक लेख नहीं है, अतः किसी भी कानून या अन्य वस्तु को उद्देशिका में लिखी बातों के आधार पर न्यायिक चुनौती नहीं दी जा सकती है।",
"संविधान\nअमरीकी संविधान के एक प्रमुख रचयिता हैमिल्टन के अनुसार संविधान वास्तव में मूल विधि है तथा न्यायाधीशों को सदा इस तथ्य को स्वीकार कर मान्यता देनी चाहिए। जब विधानमंडलों द्वारा निर्मित साधारण विधिनियमों तथा संविधान में विरोध उपस्थित हो तो संविधान को उच्च एवं प्राथमिक मानकर अधिक मान्यता देनी चाहिए। कारण यह है कि संविधान स्वयं देश की जनता के आंतरिक उद्देश्यों की अभिव्यक्ति है जब कि अन्य विधि उस जनता की प्रतिनिधि सभाओं की भावनाओं की प्रतीक होती है। स्वभावत: संविधान मूल एवं श्रेष्ठ है। अमरीका के प्रधान न्यायाधीश मार्शल ने 1803 में मारबरो बनाम मैडिसन का निर्णय इसी नियम के अनुसार किया था।",
"भारतीय संविधान की उद्देशिका\nनवीन मत-- इसे संविधान का एक भाग बताता है केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य 1973 में दिये निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान का भाग बताया है। संविधान का एक भाग होने के कारण ही संसद ने इसे 42वें संविधान संशोधन से इसे सशोधित किया था तथा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंण्डता शब्द जोड़ दिये थे। वर्तमान में नवीन मत ही मान्य है।"
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कौन सा पेन अंतरिक्ष में भी चलता है?
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"अन्तरिक्ष कलम\nस्पेस पेन या अन्तरिक्ष कलम(या शुन्य गुरूत्व कलम) अन्तरिक्ष में लिखने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसे पानी के भीतर या किसी भी दिशा या गुरुत्वाकर्षण या तापमान में उपयोग किया जा सकता है।"
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"पायोनियर ११\nपायोनियर ११ एक २५९ किलोग्राम का अमेरिकी अंतरिक्ष यान है। इसे ६ अप्रैल १९७३ को अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसन्धान संस्था नासा ने एक रॉकेट के ज़रिये अंतरिक्ष में छोड़ा। हमारे सौर मंडल के क्षुद्रग्रह घेरे (ऐस्टरौएड बॅल्ट) और बृहस्पति ग्रह से गुजरने वाला यह दूसरा मानव-कृत यान था। २ दिसम्बर १९७४ में यह बृहस्पति से केवल ४३,००० किमी की दूरी से निकला। १९७९ में यह पहला यान बना जिसने शनि ग्रह के समीप जाकर उसपर अनुसन्धान किया और उसकी तस्वीरें वापस पृथ्वी भेजीं। चलते-चलते यह हमारे सौर मंडल के बाहरी क्षेत्रों में जा पहुँचा है। कम ऊर्जा के कारण ३० नवम्बर १९९५ के बाद इस यान का पृथ्वी से संपर्क टूट गया।",
"पायोनियर १०\nपायोनियर १० एक २५८ किलोग्राम का अमेरिकी अंतरिक्ष यान है। इसे २ मार्च १९७२ को अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसन्धान संस्था नासा ने एक ऐटलस-सेंटौर रॉकेट के ज़रिये अंतरिक्ष में छोड़ा। १५ जुलाई १९७२ से १५ फ़रवरी १९७३ के काल में यह हमारे सौर मंडल के क्षुद्रग्रह घेरे (ऐस्टरौएड बॅल्ट) को पार करने वाला पहला मानव-कृत यान बना। ६ नवम्बर १९७३ को इसने बृहस्पति ग्रह की तस्वीरें लेना शुर किया और ४ दिसम्बर १९७३ को बृहस्पति से केवल १,३२,२५२ किमी की दूरी पर पहुँचकर फिर उस से आगे निकल गया। चलते-चलते यह हमारे सौर मंडल के बाहरी क्षेत्रों में जा पहुँचा है। कम ऊर्जा के कारण २३ जनवरी २००३ के बाद इस यान का पृथ्वी से संपर्क टूट गया। उस समय यह पृथ्वी से १२ अरब किमी (८० खगोलीय ईकाईयों) की दूरी पर था।",
"परसेवेरेंस\nपरसेवेरेंस (\"Perseverance\" शब्दार्थ: \"दृढ़ता\") एक अन्तरिक्ष यान है जिसे नासा द्वारा बनाया गया है। यह 30 जुलाई 2020 को यूटीसी पर \"एटलस 5\" रॉकेट से मंगल ग्रह के लिये छोड़ा जा चुका है जहाँ यह 18 फरवरी, 2021 में \"स्काईक्रेन\" की सहायता से \"जेज़रो क्रेटर\" की सतह पर उतर कर अनुसंधान करेगा। यह अपने साथ एक विशेष हेलीकॉप्टर भी ले जाएगा, जिसे इनजेनुईटी नाम दिया गया है।",
"उपग्रह\n[[संयुक्त राज्य अमेरिकी अंतरिक्ष निगरानी नेटवर्क|संयुक्त राज्य अमेरिका अंतरिक्ष निगरानी नेटवर्क]] ([[:en:United States Space Surveillance Network|United States Space Surveillance Network]]) (एसएसएन) 1957 से, जब से सोवियत संघ ने स्पुतनिक के प्रक्षेपण के साथ अंतरिक्ष युग को खोला है, तब से अंतरिक्ष पिंडों पर नज़र रखी है और अब तक एसएसएन पृथ्वी की परिक्रमा करते 26000 अंतरिक्ष पिंडों को खोज चुका है। एसएसएन अभी 8,000 से ज्यादा आदमी द्वारा बनाये गए कक्षीय पिंडों को खोज चुका है। बाकियों ने फिर से पृथ्वी के अशांत वातावरण में प्रवेश किया है एवं विघटित, या बचने के बाद पुनः प्रवेश किया है और पृथ्वी पर असर डाला है। पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे अंतरिक्ष पिंडों में कई टन वजनी उपग्रहों से लेकर 10 पाउंड वजन के रॉकेट के टुकड़े शामिल हैं। अंतरिक्ष पिंडों का सात प्रतिशत परिछालित उपग्रह हैं (यानी ~ 560 उपग्रह), बाकी [[अन्तरिक्षीय मलबा|अन्तरिक्षीय मलबे]] ([[:en:space debris|space debris]]) हैं।[[USSTRATCOM|यूएसएसटीआरऐटीसीओएम्]] ([[:en:USSTRATCOM|USSTRATCOM]]) को मुख्य रूप से सक्रिय उपग्रहों में दिलचस्पी है, लेकिन अन्तरिक्षीय मलबे पर भी नज़र रखता है जो पुनःप्रवेश पर आने वाली मिसाइलों का गलत आभास दे सकता है। एसएसएन 10 सेंटीमीटर या उससे बड़े व्यास के (बेसबॉल के आकार का) अंतरिक्ष पिंडों को खोज लेता है।",
"सौर पवन\nनासा द्वारा सूर्य के कोरोना व सौर वायु का रहस्य जानने के लिए एक अंतरिक्ष यान प्रस्तावित है। सोलर प्रोब प्लस नामक यह यान वर्ष २०१५ में भेजा जाएगा। सोलर प्रोब प्लस सूर्य के काफी निकट तक पहुंचेगा और इसका डिजाइन व निर्माण कार्य अनुभवी एप्लाइड फिजिक्स लैब (एपीएल) द्वारा किया जाएगा। इस अभियान को भेजे जाने में सात वर्ष का समय लग जाएगा। ये यानसूर्य के काफी निकट पहुंचकर लगभग ७० लाख किमी दूरी पर रहकर अपना कार्य करेगा। सूर्य के कोरोना व सौर वायु के बारे में इससे काफी तथ्य उजागर होने की संभावनाएं हैं। नासा का यह अभियान एरीज के वैज्ञानिकों द्वारा सूर्य पर किए जा रहे अध्ययन में भी लाभकारी सिद्ध होगा।",
"सोलर प्रोब प्लस\nसोलर प्रोब प्लस नासा द्वारा सूर्य के कोरोना व सौर वायु का रहस्य जानने के लिए भेजा गया एक अंतरिक्ष यान है। यह यान मूलतः वर्ष २०१५ में भेजा जाना प्रस्तावित था, परन्तु कई देरियों के बाद अंततः इसे १२ अगस्त २०१८ को अंतरिक्ष में भेज दिया गया। इस यान का नाम फिजिसिस्ट यूजीन न्यूमैन पार्कर के नाम पर रखा गया है। इन्होंने तारों द्वारा ऊर्जा संचारित करने के कई अवधारणाएं पेश की थीं। नासा के इस यान का नाम पहली बार किसी जीवित वैज्ञानिक के नाम पर रखा गया है। सोलर प्रोब प्लस सूर्य के काफी निकट तक पहुँचेगा और इसका डिजाइन व निर्माण कार्य अनुभवी एप्लाइड फिजिक्स लैब (एपीएल) द्वारा किया जाएगा। इस अभियान को भेजे जाने में सात वर्ष का समय लग जाएगा। ये यान सूर्य के काफी निकट पहुँचकर लगभग ७० लाख कि॰मी॰ दूरी पर रहकर अपना कार्य करेगा। सूर्य के कोरोना व सौर वायु के बारे में इससे काफी तथ्य उजागर होने की संभावनाएँ हैं। नासा का यह अभियान एरीज के वैज्ञानिकों द्वारा सूर्य पर किए जा रहे अध्ययन में भी लाभकारी सिद्ध होगा।",
"स्टार ट्रेक\n\"स्टार ट्रेक: डीप स्पेस नाइन\", जो \"DS9\" के रूप में भी जाना जाता है, अंतिम वर्षों और \"द नेक्स्ट जनरेशन\" (2369-2375) के तत्काल पूर्व के वर्षों के दौरान स्थापित और 3 जनवरी 1993 को पहली बार प्रदर्शित होते हुए, सात सीज़नों तक निर्माणाधीन था। \"स्टार ट्रेक: द नेक्स्ट जनरेशन\" के समान, यह भी संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में समूहन में प्रसारित किया गया. यह एकमात्र \"स्टार ट्रेक\" श्रृंखला है, जो मुख्य रूप से स्टारशिप की बजाय एक अंतरिक्ष स्टेशन में घटित होता है। यह कार्डेसियन-निर्मित अंतरिक्ष स्टेशन डीप स्पेस नाइन में स्थापित है, जो सुदूर गामा चक्र के लिए तत्काल पहुंच प्रदान करने वाले, बजोर ग्रह और एक विशिष्ट स्थिर वर्महोल के समीप अवस्थित है। शो, एवरी ब्रुक्स द्वारा अभिनीत कमांडर (बाद में कप्तान) बेंजमिन सिस्को, तथा नाना विज़िटर द्वारा अभिनीत मेजर (बाद में कर्नल) कीरा नेरीस के नेतृत्व में स्टेशन दल की घटनाओं का इतिहास दर्शाता है। आवर्ती कथानक तत्वों में शामिल हैं बजोर के लंबे और क्रूर कार्डेसियन अभिग्रहण का प्रतिघात, भविष्यद्वक्ताओं के दूत के रूप में बजोरनों के लिए सिस्को की आध्यात्मिक भूमिका और बाद के सीज़नों में डोमिनियन के साथ युद्ध. \"डीप स्पेस नाइन\" अपने लंबे धारावाहिक कहानी, चालक दल के भीतर संघर्ष और धार्मिक विषयों के लिए पिछली ट्रेक श्रृंखलाओं से अलग है, जो सभी ऐसे तत्व हैं जिनकी आलोचकों और दर्शकों ने प्रशंसा की थी, लेकिन जिन्हें रॉडेनबेरी ने ओरीजिनल सिरीज़ और \"द नेक्स्ट जनरेशन\" में मना कर दिया था। बहरहाल, उनकी मौत से पहले \"DS9\" के निर्माण की योजना के बारे में बता दिया गया था, अतः यह अंतिम \"स्टार ट्रेक\" श्रृंखला थी, जिससे वे जुड़े थे।",
"ट्राँसफॉर्मर्स: चांद का अंधेरा (फ़िल्म)\nवहीं पृथ्वी लौटकर, ऑप्टिमस मैट्रिक्स ऑफ लीडरशिप की ऊर्जा से सेन्टिनल प्राइम को पुनर्जीवित करता है। उधर सैम स्वतंत्र रूप से काफी अमीर हो चुके भूतपूर्व एजेंट सेमाॅर सिमाॅन्स को काॅन्टेक्ट कर मेगाट्राॅन और डिसेप्टिकाॅन्स द्वारा आर्क से संबंधित अंतरिक्ष अभियान से जुड़े लोगों की रहस्यमय हत्याओं पर विशेष विमर्श करता है। फिर दो जीवित रूसी काॅस्मोनाॅट्स (खगोल विशेषज्ञ) द्वारा दिखाई गई सैटेलाइट तस्वीरों यह उजागर होता है कि वहां सैकड़ों स्तंभ पहले मौजूद थे। सैम को समझ आता है कि डिसेप्टिकाॅन्स ने ऑटोबाॅट्स के आर्क अभियान पर रवाना होने से काफी पहले स्तंभो को हटा लिया था फिर पूर्वयोजना के तहत सेन्टिनल और पांचों स्तंभों को ऑटोबाॅट्स के लिए छोड़ दिया – क्योंकि सिर्फ सेन्टिनल ही उन स्तंभों को सक्रिय करने की कुंजी है और डिसेप्टिकाॅन्स को उसके ऑप्टिमस के जरिए पुनर्जीवित होने तक उनकी जरूरत थी। ऑटोबाॅट्स फौरन सेन्टिनल के साथ बेस पहुँचकर स्तंभो की सुरक्षा करते, आयरनहाइड को मारकर सेन्टिनल इस विश्वासघात का खुलासा करता है, उसने महज मेगाट्राॅन से साइबरट्राॅन ग्रह के पुनर्निर्माण के लिए समझौता किया था।",
"मैक्स पेन\nनशे की अत्यधिक मात्रा से उबरने और जागने के बाद पेन अपने एकमात्र मकसद को पूरा करने को उद्यत होता है, जो उसे एक गुप्त सैन्य अनुसन्धान कंपनी के ऊपर स्थित एक स्टील फाउंड्री तक ले जाता है। वहां उसे पता चलता है कि वाल्किर वलहाला परियोजना का नतीजा है, जिसे पूर्ववर्ती लैडर प्रयोग के बाद 1990 के दशक में सैनिकों की सहनशक्ति और मनोबल में सुधार लाने के लिए अमेरिकी सेना द्वारा तैयार किया गया था। यह परियोजना ख़राब परिणामों की वजह से तेज़ी से रोक दी गयी लेकिन इसे हॉर्न तथा एसिर ने पुनः शुरू कर दिया. उसे यह भी पता चलता है कि उसकी पत्नी को संयोगवश उस परियोजना के बारे में पता चल गया था तथा हॉर्न ने वाल्किर परीक्षण के मत्त लोगों को उसके घर में छोड़ दिया था। एसिर वैज्ञानिकों सहित सबूतों और गवाहों से छुटकारा पाने के लिए भूमिगत बंकर का आत्मघाती \"ऑपरेशन डेड आइज़\" शुरू करता है। मैक्स आखिरी पल में उस बंकर से भाग खड़ा होता है।"
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प्राचीन संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष कौन थे?
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"भारतीय संसद\nसंविधान सभा (विधायी) की एक अलग निकाय के रूप में पहली बैठक 17 नवम्बर 1947 को हुई। इसके अध्यक्ष सभा के प्रधान डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद थे। संविधान अध्यक्ष पद के लिए केवल श्री जी.वी. मावलंकर का एक ही नाम प्राप्त हुआ था। इसलिए उन्हें विधिवत चुना हुआ घोषित किया गया। 14 नवम्बर 1948 को संविधान का प्रारूप संविधान सभा में प्रारूप समिति के सभापति बी॰आर॰ अम्बेडकर ने पेश किया। प्रस्ताव के पक्ष में बहुमत था। 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत के गणराज्य का संविधान लागू हो गया। इसके कारण आधुनिक संस्थागत ढांचे और उसकी अन्य सब शाखा-प्रशाखाओं सहित पूर्ण संसदीय प्रणाली स्थापित हो गई। संविधान सभा भारत की अस्थायी संसद बन गई। वयस्क मताधिकार के आधार पर पहले आम चुनावों के बाद नए संविधान के उपबंधों के अनुसार संसद का गठन होने तक इसी प्रकार कार्य करती रही।",
"भारत का संविधान\nभारतीय संविधान लिखने वाली सभा में 299 सदस्य थे जिसके अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 में अपना काम पूरा कर लिया और 26 जनवरी 1950 को यह संविधान लागू हुआ। इसी दिन कि याद में हम हर वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। भारतीय संविधान को पूर्ण रूप से तैयार करने में 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन का समय लगा था।"
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"गणेश वासुदेव मावलंकर\nमावलंकर 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि तक केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष रहे। उसके बाद भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत, केंद्रीय विधान सभा और राज्यों की परिषद का अस्तित्व समाप्त हो गया और भारत की संविधान सभा ने देश के शासन के लिए पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिए। भारत की स्वतंत्रता के मद्देनजर, जी.वी. मावलंकर ने संविधान सभा की भूमिका को अपनी विधायी भूमिका से अलग करने की आवश्यकता पर अध्ययन और रिपोर्ट करने के लिए समिति का नेतृत्व किया।",
"हरेन्द्र कुमार मुखर्जी\n1946 में उन्हें भारत की संविधान सभा का सदस्य चुना गया और सभा का उपाध्यक्ष बनाया गया। जब वह अल्पसंख्यक अधिकार उप-समिति और प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष थे, उन्होंने राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए आरक्षण का सुझाव देना शुरू किया। भारत के विभाजन के साथ, उन्होंने अपना रुख बदल दिया और अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए इसे सीमित कर दिया।",
"बी पोकर साहिब बहादुर\n1946 में मद्रास विधानसभा से भारत की संविधान सभा के लिए पोकर चुने गए। भारत के विभाजन (1947) के बाद, अखिल भारतीय मुस्लिम लीग वस्तुतः छिन्न-भिन्न हो गई थी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की नींव रखी। जिसका प्रथम अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल साहिब को चुना गया। एक महीने के भीतर, संविधान सभा ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचकों को समाप्त करने के लिए मतदान किया। पोकर और के टी.एम. अहमद इब्राहिम ने पृथक निर्वाचकों को बनाए रखने के लिए एक संशोधन किया। यह प्रस्ताव संविधान सभा में हार गया था।",
"सरदार हुकम सिंह\nहुकम सिंह ने राजनीति में प्रवेश शिरोमणि अकाली दल के माध्यम से किया और वे तीन सालों तक इसके अध्यक्ष रहे. वे तीन साल के लिए मोंटगोमरी सिंह सभा के सदस्य और इसके अध्यक्ष भी रहे. विभाजन के बाद भारत की संविधान सभा में कुछ सीटें खाली हो गयीं थीं। 27 जनवरी 1948 को गुरमुख सिंह मुसाफिर के प्रस्ताव पर विधानसभा पूर्वी पंजाब से दो सिक्खों तथा दो हिन्दुओं को सदस्य के रूप में शामिल करने पर सहमत हो गयी। हुकम सिंह को 30 अप्रैल 1948 को भारत की संविधान सभा के एक सदस्य के रूप में शिरोमणि अकाली दल से निर्वाचित किया गया। उन्होंने सक्रिय रूप से संविधान सभा की बहस में भाग लिया और अपनी प्रविष्टि के एक वर्ष के भीतर ही वे इसके अध्यक्ष के पैनल के लिए नामित कर दिए गए। 20 मार्च 1956 को लोकसभा के उपाध्यक्ष के पद पर सर्वसम्मति से चुने जाने तक वे इसके पेनल में बने रहे और इस निर्णय के समय वे विरोधी दल के सदस्य थे। यह सिर्फ उनकी लोकप्रियता की ही नहीं, बल्कि उनके द्वारा कुशल और निष्पक्ष तरीके से सदन चलाने की क्षमता में सदस्यों के विश्वास की भी गवाही थी। हालांकि मार्च, 1948 में शिरोमणि अकाली दल का निर्देश था कि सभी अकाली विधायक सामूहिक रूप से कांग्रेस विधायक दल में शामिल हो जायें, परन्तु हुकम सिंह ने विपक्ष में ही कार्य करना जारी रखा. वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए हठपूर्वक लड़े, सिखों के लिए धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में सुरक्षा प्राप्त करने में असफल रहने पर उन्होंने नए संविधान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. वे अंतरिम संसद (1950-52) के सदस्य भी थे।",
"एस निजलिंगप्पा\nवह मैसूर कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1946 से 1950 तक ऐतिहासिक संविधान सभा के सदस्य भी रहे। बाद में, उन्हें 1952 में चितलदुर्ग निर्वाचन क्षेत्र (अब चित्रदुर्ग) से पहली लोकसभा के सदस्य के रूप में चुना गया।",
"व्यौहार राममनोहर सिंहा\nसंविधान के अलंकरण में राम मनोहर सिंहा का प्रत्यक्ष और उनके पिता एवं प्रसिद्ध हिन्दीसेवी व्यौहार राजेन्द्र सिंह का परोक्ष रूप से योगदान रहा है। 1935 में जबलपुर में ही डॉ.राजेन्द्र प्रसाद, काका कालेल्कर, व्यौहार राजेन्द्र सिंहा ने एक चर्चा के दौरान कहा था कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को जन-जन तक चित्रों के माध्यम से पहुंचाया जाए। वर्तमान संविधान का निर्माण हो रहा था। डॉ.राजेन्द्र संविधान सभा के अध्यक्ष थे। तब उन्हें उस चर्चा की याद आई और उन्होंने संविधान को अलंकृत किए जाने की बात कही। उन्होंने शांति निकेतन के व्योवृद्ध चित्रकार नंदलाल बसु जो कि लगभग 70 वर्ष के थे, उनसे इस बारे में चर्चा की। नंदलाल बसु ने अपने प्रिय शिष्य व्यौहार राम मनोहर सिंहा को यह जिम्मेदारी सौंपी कि वे भारत भ्रमण पर जाएं। सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत, धरोहरों को चित्रों में शामिल करें।",
"पाकिस्तानी संविधान सभा\nसत्ता में आने के बाद, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने 17 अक्टूबर, 1972 को संसदीय दलों के नेताओं को उनसे मिलने के लिए आमंत्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप गहन चर्चा के बाद एक समझौते को 'संवैधानिक समझौते' के रूप में जाना गया। पीपीपी द्वारा मंगाई गई सलाह के अनुसार, पाकिस्तान के स्थायी संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए, पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने 17 अप्रैल, 1972 को एक 25-सदस्यीय समिति नियुक्त की। महमूद अली कसूरी समिति के निर्वाचित अध्यक्ष थे। 20 अक्टूबर 1972 को संविधान के प्रारूप विधेयक पर नेशनल असेंबली के सभी संसदीय समूहों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान के लिए एक संविधान प्रदान करने का विधेयक 2 फरवरी 1973 को विधानसभा में पेश किया गया था। असेंबली ने 10 अप्रैल, 1973 को लगभग सर्वसम्मति से विधेयक पारित किया और इसे 12 अप्रैल, 1973 को कार्यवाहक राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने समर्थन दिया। 14 अगस्त, 1973 को संविधान लागू हुआ। उसी दिन, भुट्टो ने प्रधान मंत्री और चौधरी फजल-ए-इलाही ने राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। 5 जुलाई 1977 को, जनरल ज़िया ने एक सैन्य तख्तापलट किया और संविधान को निलंबित कर दिया, जिसे 1985 में बहाल किया गया था। इसी तरह, जब जनरल मुशर्रफ ने 1999 में पदभार संभाला, तब संविधान कई वर्षों के लिए निलंबित था।",
"सच्चिदानन्द सिन्हा\nडॉ सच्चिदानन्द सिन्हा (10 नवम्बर 1871 - 6 मार्च 1950) भारत के प्रसिद्ध सांसद, शिक्षाविद, अधिवक्ता तथा पत्रकार थे। वे भारत की संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष थे। बिहार को बंगाल से पृथक राज्य के रूप में स्थापित करने वाले लोगों में उनका नाम सबसे प्रमुख है। 1910 के चुनाव में चार महाराजों को परास्त कर वे केन्द्रीय विधान परिषद में प्रतिनिधि निर्वाचित हुए। प्रथम भारतीय जिन्हें एक प्रान्त का राज्यपाल और हाउस ऑफ् लार्डस का सदस्य बनने का श्रेय प्राप्त है। वे प्रिवी कौंसिल के सदस्य भी थे। डॉ सचिबनन्द सिन्हा का जन्म वास्तव में शाहाबाद जिले के मुरार गाँव के एक कायस्थ कुल में हुआ था वर्तमान में इनका गाँव बक्सर जिले में है"
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अल्जीरिया के प्रधानमंत्री कौन सी भाषा बोलते है?
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"अल्जीरिया\nआळ्जीरिया 48 सूबों और 1541 प्रगणों वाला अर्द्ध राष्ट्रपति प्रधान गणराज्य है। 3.7 करोड़ से अधिक आबादी से यह विश्व का 34वाँ सबसे बढ़ आबादी वाला देश है। भाषाई तौर पर यह अरबी मुल्क है जिसकी कुछ स्थानिक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इसकी अर्थ व्यवस्था तेल-आधारित है जो डच रोग (अर्थ-शात्र की एक धारणा) से प्रभावित है। सोनातराच, जो कि राष्ट्रीय तेल-कंपनी है, अफ्रीका में सबसे बड़ी है। इसकी सेना अफ्रीका और अरब-जगत में मिस्र के बाद सबसे बड़ी है और रूस और चीन इसके युद्धनैतिक एहतियाती मुल्क और सस्तर पूर्तिकर्ता हैं।"
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"अल्जीरिया के प्रधान मंत्री\nयह अल्जीरिया के सरकार के प्रमुखों की सूची है, जो १९५८ में काहिरा, मिस्र में निर्वासन में अल्जीरियाई गणराज्य (जीपीआरए) की अनंतिम सरकार के गठन के बाद से १९६२ में स्वतंत्रता के माध्यम से, आज तक अल्जीरियाई युद्ध के दौरान है। कुल अठारह लोगों ने अल्जीरिया के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया है (जीपीआरए के दो अध्यक्षों और दो कार्यवाहक प्रधानमंत्रियों की गिनती नहीं)। इसके अतिरिक्त, एक व्यक्ति, अहमद औयाहिया ने लगातार तीन अवसरों पर सेवा की है।",
"ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी\n2012 में ऑस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने एक नई नीति के तहत एशियाई देशों से अच्छे संबंध स्थापित करने हेतु एशिया के कुछ भाषाओं को भी ऑस्ट्रेलिया में सीखने की सुविधा शुरू की। क्योंकि एशिया के कई देशों का विकास हो रहा है और हो सकता है कि वह फिर से नेतृत्व करने लगे।",
"अल्जीरिया के राष्ट्रपति\nअल्जीरिया की पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के अध्यक्ष है राज्य के सिर और के मुख्य कार्यकारी अल्जीरिया , साथ ही कमांडर-इन-चीफ की अल्जीरियाई पीपुल्स राष्ट्रीय सशस्त्र बलों ।",
"अफ़्रीका की भाषाएं\nहामी भाग की भाषाएँ समस्त उत्तरी अफ्रीका में फैली हुई हैं और इनको बोलनेवाली कुछ जातियाँ दक्षिण और मध्यवर्ती अफ्रीका में घुसती चली गई हैं। सामी भाग की भाषाएँ मुख्य रूप से एशिया मे बोली जाती हैं पर उनकी प्रधान भाषा अरबी ने सारे अत्तरी अफ्रीका में भी घर कर लिया है। पश्चिम मे मोरक्को से लेकर पूरव में स्वेज तक तथा समस्त मिस्र में यही शासन तथा साहित्य की मुख्य भाषा है। अल्जीरिया और मोरक्को की राजभाषा अरबी है ही। हब्शी राजभाषा सामी है।",
"बेजैअ\nबेजैअ जिसे पहले बौगी या बुगिया नाम से जाना जाता था, अल्जीरिया में बेजैअ की खाड़ी पर एक भूमध्य बंदरगाह शहर है; यह बेजैअ प्रांत और काबिलीया की राजधानी है। यहाँ सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा काबिली है।",
"अल्जीरिया के राष्ट्रपति\nत्रिपोली कार्यक्रम, जो 1962 में फ्रांस से स्वतंत्रता के लिए अपना युद्ध जीतने के बाद अल्जीरिया के संविधान के रूप में कार्य करता है , ने राष्ट्रपति को सरकार के संचालन में सहायता करने वाले प्रधान मंत्री के रूप में स्थापित किया। आंतरिक राजनीतिक पैंतरेबाज़ी के परिणामस्वरूप 1963 में एक नया संविधान बना जिसने प्रधानमंत्री पद को समाप्त कर दिया और राष्ट्रपति के कार्यालय में सभी कार्यकारी शक्ति को समाप्त कर दिया। स्वतंत्रता के पहले चार दशकों के लिए सरकार को नेशनल लिबरेशन फ्रंट या एफएलएन द्वारा एक-पार्टी राज्य के रूप में नियंत्रित किया गया था । राष्ट्रपति पद के लिए एफएनएन सदस्यों का उत्तराधिकार था; अहमद बेन बेला , Houari Boumedienne और चैडली बेंग्जेदिड। 1976 में लिखे गए संविधान ने राष्ट्रपति पद की कार्यकारी शक्ति को बनाए रखा, लेकिन 1979 के संशोधनों ने कार्यालय से सरकार का दर्जा छीन लिया।",
"अल जज़ीरा\nसितम्बर २०१२ में ब्रितानी अखबार द गार्जियनने बताया कि अल जज़ीरा अंग्रेजी की सम्पादकीय स्वतन्त्रता उस समय सवालों के घेरे में आ गई, जब चैनल के प्रमुख समाचार संपादक, सलाह नज्म ने अन्तिम मिनट में आदेश दिया कि सीरियाई नागरिक पर संयुक्त राष्ट्र की बहस को कवर करने वाले दो मिनट के वीडियो में क़तर के तत्कालीन स्वयंभू हमद बिन खलीफा अल थानी का भाषण तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण से पहले चलाना होगा। पत्रकारों ने विरोध किया कि भाषण बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नहीं था, और यह अरब हस्तक्षेप के लिए पिछली कॉल की पुनरावृत्ति मात्र थी। उसी रपट में इस अखबार ने यह भी दावा किया कि क़तर ने हाल के वर्षों में अल जज़ीरा अंग्रेजी के नियंत्रण को मजबूत करने के लिए कदम उठाए थे।",
"अल्जीरिया के उपराष्ट्रपति\nअल्जीरिया के उपराष्ट्रपति अल्जीरिया में एक राजनीतिक पद पर थे। होउरी बौमेडियन के कार्यकाल के दौरान उपराष्ट्रपति पद खाली छोड़ दिया गया था। उपराष्ट्रपति की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी",
"निबारन चंद्र लास्कर\nवे असम राज्य के कछार जिले के पहले कॉलेज गुरुचरण कॉलेज के संस्थापक प्रोफेसर थे। वर्ष 1961 में, उन्होंने असम को असम की राज्य भाषा बनाने के असम विधानसभा के फैसले के विरोध में सक्रिय राजनीति से इस्तीफा दे दिया, इस तथ्य पर विचार करते हुए कि बंगाली भी राज्य की एक प्रमुख भाषा थी। बराक घाटी की 90% आबादी बांग्ला भाषी थी। 13 मई 1961 को सिलचर रेलवे स्टेशन पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में 11 प्रदर्शनकारी पुलिस की गोलीबारी में मारे गए। उस घटना के बाद कई सांसदों और विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और प्रो. एनसी लास्कर उनमें से एक सांसद थे। इस्तीफा के बाद वह अपने जीवन के बाद के हिस्से में समाज सेवा और परोपकार में लगे रहे।"
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लोकसभा में किसी विधेयक को धन विधेयक के रूप में कौन प्रमाणित करता है?
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"लोकसभा अध्यक्ष\nलोकसभा-अध्यक्ष लोकसभा के सत्रों की अध्यक्षता करता है और सदन के कामकाज का संचालन करता है। वह निर्णय करता है कि कोई विधेयक, धन विधेयक है या नहीं। वह सदन का अनुशासन और मर्यादा बनाए रखता है और इसमें बाधा पहुँचाने वाले सांसदों को दंडित भी कर सकता है। वह विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव और संकल्पों, जैसे अविश्वास प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, सेंसर मोशन, को लाने की अनुमति देता है और अटेंशन नोटिस देता है। अध्यक्ष ही यह तय करता है कि सदन की बैठक में क्या एजेंडा लिया जाना है।"
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"राज्य सभा\nधन विधेयक केवल लोक सभा में पुर्नस्थापित किया जा सकता है। इसके उस सभा द्वारा पारित किए जाने के उपरान्त इसे राज्य सभा को उसकी सहमति अथवा सिफारिश के लिए प्रेषित किया जाता है। ऐसे विधेयक के संबंध में राज्य सभा की शक्ति सीमित है। राज्य सभा को ऐसे विधेयक की प्राप्ति से चौदह दिन के भीतर उसे लोक सभा को लौटाना पड़ता है। यदि यह उस अवधि के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है तो विधेयक को उक्त अवधि की समाप्ति पर दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें इसे लोक सभा द्वारा पारित किया गया था। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन भी नहीं कर सकती; यह केवल संशोधनों की सिफारिश कर सकती है और लोक सभा, राज्य सभा की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगी।",
"भारतीय संसद\nविधेयक का मसौदा उस विषय से संबंधित सरकार के मंत्रालय में विधि मंत्रालय की सहायता से तैयार किया जाता है। मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद इसे संसद के सामने लाया जाता है। संबंधित मंत्री द्वारा उसे संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। केवल धन विधेयक के मामले में यह पाबंदी है कि वह राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता। अधिनियम का रूप लेने से पूर्व विधेयक को संसद में विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक विधेयक के प्रत्येक सदन में तीन वचन होते हैं। अर्थात पहला वाचन, दूसरा वाचन और तीसरा वाचन। विधेयक ‘पेश करना,’ विधेयक का पहला वाचन है। प्रथा के अनुसार इस अवस्था में चर्चा नहीं की जाती है। विधेयक का दूसरा वाचन सबसे अधिक विस्तृत एवं महत्वपूर्ण अवस्था है क्योंकि इसी अवस्था में इसकी विस्तृत एवं बारीकी से जांच की जाती है। जब विधेयक के सभी खंडो पर और अनुसूचियों पर, यदि कोई हों, सदन विचार कर उन्हें स्वीकृत कर लेता है। तब मंत्री यह प्रस्ताव कर सकता है कि विधेयक को पास किया जाए। यह तीसरा वाचन कहलाता है। जिस सदन में विधेयक पेश किया गया हो उसमें पास किए जाने के बाद उसे सहमति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। वहाँ विधेयक फिर इन तीनों अवस्थाओं में से गुजरता है।",
"लोक सभा\nविधेयक जो पूर्णतः एक या अधिक मामलों जिनका वर्णन अनुच्छेद 110 में किया गया हो से जुडा हो धन विधेयक कहलाता है ये मामलें है 1. किसी कर को लगाना, हटाना, नियमन 2. धन उधार लेना या कोई वित्तेय जिम्मेदारी जो भारत सरकार ले 3. भारत की आपात/संचित निधि से धन की निकासी/जमा करना 4.संचित निधि की धन मात्रा का निर्धारण 5. ऐसे व्यय जिन्हें भारत की संचित निधि पे भारित घोषित करना हो 6. संचित निधि मे धन निकालने की स्वीकृति लेना 7. ऐसा कोई मामला लेना जो इस सबसे भिन्न हो धन विधेयक केवल लोकसभा मे प्रस्तावित किए जा सकते है इसे लाने से पूर्व राष्ट्रपति की स्वीकृति आवशय्क है इन्हें पास करने के लिये सदन का सामान्य बहुमत आवश्यक होता है धन बिल मे ना तो राज्य सभा संशोधन कर सकती है न अस्वीकार जब कोई धन बिल लोकसभा पारित करती है तो स्पीकर के प्रमाणन के साथ यह बिल राज्यसभा मे ले जाया जाता है राज्यसभा इस बिल को पारित कर सकती है या 14 दिन के लिये रोक सकती है किंतु उस के बाद यह बिल दोनॉ सदनॉ द्वारा पारित माना जायेगा राज्य सभा द्वारा सुझाया कोई भी संशोधन लोक सभा की इच्छा पे निर्भर करेगा कि वो स्वीकार करे या ना करे जब इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा तो वह सदैव इसे स्वीकृति दे देगा फायनेसियल बिल वह विधेयक जो एक या अधिक मनीबिल प्रावधानॉ से पृथक हो तथा गैर मनी मामलॉ से भी संबधित हो एक फाइनेंस विधेयक मे धन प्रावधानॉ के साथ साथ सामान्य विधायन से जुडे मामले भी होते है इस प्रकार के विधेयक को पारित करने की शक्ति दोनो सदनॉ मे समान होती",
"संसदीय शब्दावली (हिन्दी)\n(6) विनियोग विधेयक -- यह किसी वित्तीय वर्ष अथवा उसके एक भाग की सेवाओं के लिए लोक सभा द्वारा दत्तमत धन और भारत की संचित निधि पर प्रभारित धन के भारत की संचित निधि से प्रत्याहरण अथवा विनियोग का उपबंध करने के लिए वार्षिक रूप से (अथवा वर्ष में कई बार) पारित किया जाने वाला धन विधेयक है।",
"भारतीय संसद\nकानून बनाना संसद का प्रमुख काम माना जाता है। इसके लिए पहल अधिकांशतः कार्यपालिका द्वारा की जाती है। सरकार विधायी प्रस्ताव पेश करती है। उस पर चर्चा तथा वाद विवाद के पश्चात संसद उस पर अनुमोदन की अपनी मुहर लगाती है। सभी कानूनी प्रस्ताव विधेयक के रूप में संसद में पेश किए जाते हैं। विधेयक विधायी प्रस्ताव का मसौदा होता है। विधेयक संसद के किसी एक सदन में सरकार द्वारा या किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा पेश किया जा सकता है। इस प्रकार मोटे तौर पर, विधेयक दो प्रकार के होते हैं: (क) सरकारी विधेयक और (ख) गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयक। विधि का रूप लेने वाले अधिकांश विधेयक सरकारी विधेयक होते हैं। वैसे तो गैर सरकारी सदस्यों के बहुत कम विधेयक विधि का रूप लेते हैं। फिर भी उनके द्वारा यह बात सरकार और लोगों के ध्यान में लाई जाती है कि मौजूदा कानून में संशोधन करने या कोई आवश्यक विधान बनाने की आवश्यकता है।",
"विधेयक\nबिल या विधेयक एक प्रस्ताव होता है जिसे विधि का स्वरूप देना होता है। कुछ देशों में, जैसे इंग्लैंड या भारत में, विधेयकों की दो श्रेणियाँ होती हैं- सार्वजनिक तथा असार्वजनिक विधेयक। इसके अतिरिक्त यदि कोई विधेयक सरकार द्वारा प्रेषित होता है तो उसे सरकारी विधेयक कहते हैं। सरकारी विधेयक दो प्रकार के होते हैं। सामान्य सार्वजनिक विधेयक तथा धन विधेयक। पर जब संसद का कोई साधारण सदस्य सार्वजनिक विधेयक प्रस्तुत करता है तब इसे प्राइवट सदस्य का सार्वजनिक विधेयक कहते हैं। सार्वजनिक तथा असार्वजनिक विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया में अंतर होता है। संयुक्तराष्ट्र अमेरिका में सार्वजनिक या असार्वजनिक विधेयक जैसे भेद नहीं हैं। साधारणतया संसद के दोनों सदनों में समान कार्यविधि की व्यवस्था होती है।",
"राज्य सभा\nधन विधेयक के अलावा, वित्त विधेयकों की कतिपय अन्य श्रेणियों को भी राज्य सभा में पुर्नस्थापित नहीं किया जा सकता। तथापि, कुछ अन्य प्रकार के वित्त विधेयक हैं जिनके संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं है। ये विधेयक किसी भी सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं और राज्य सभा को ऐसे वित्त विधेयकों को किसी अन्य विधेयक की तरह ही अस्वीकृत या संशोधित करने का अधिकार है। वस्तुत: ऐसे विधेयक संसद की किसी भी सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किए जा सकते, जब तक राष्ट्रपति ने उस पर विचार करने के लिए उस सभा से सिफारिश नहीं की हो।",
"हाउस ऑफ कॉमन्स\nविधेयकों को किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, परंतु सामान्यतः महत्वपूर्ण विधेयकों की उत्पत्ति हाउस ऑफ कॉमन्स में ही होती है। विधायी मामलों में कॉमन्स की सर्वोच्चता को \"पार्लियामेंट अधिनियमों\" द्वारा आश्वासित किया गया है, जिसके तहत महारानी को शाही स्वीकृति के लिए हाउस ऑफ लॉर्ड्स की सहमति के बिना भी कुछ प्रकार के बिल प्रस्तुत किए जा सकते हैं। लॉर्ड्स सदन एक महीने से अधिक के लिए किसी भी वित्तीय विधेयक (एक बिल, जो हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष के विचार में, केवल राष्ट्रीय कराधान या सार्वजनिक धन से सम्बंधित है) में देरी नहीं कर सकता है। इसके अलावा, लॉर्ड्स सदन दो से अधिक संसदीय सत्रों, या एक वर्ष से अधिक समय के लिए अन्य किसी भी सार्वजनिक विधेयक को टाल नहीं सकता। हालाँकि, ये प्रावधान केवल उन सार्वजनिक विधेयकों पर लागू होते हैं जो कॉमन्स सदन में उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा, पांच साल से अधिक के संसदीय कार्यकाल का विस्तार करने वाले विधेयक को लॉर्ड्स की सहमति की आवश्यकता होनी अनिवार्य है।",
"अमेरिकी कांग्रेस\nमोटे तौर से देखते हुए यह ज्ञात होता है कि दोनों भवनों के अधिकार समान हैं। प्रत्येक विधेयक का दोनों भवनों में पारित होना आवश्यक है। प्रजातंत्र की भावना को जागृत रखने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि धन विधेयकों का प्रारंभ हाउस ऑव रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ में हो। प्रजातंत्र प्रणाली में निष्ठा रखनेवाले सभी देशों में यह परंपरा है कि धन विधेयक तथा वार्षिक आय व्यय के ब्योरे के लिए प्रथम सदन ही अधिक अधिकारी हो। किंतु संसार के अन्य दूसरे सदनों की तुलना में यह कहा जा सकता है कि संयुक्त राज्य अमरीका का दूसरा सदन बहुत शक्तिशाली और प्रभावशाली सिद्ध हुआ है क्योंकि एक ओर यह अपनी अनुमति एवं मंत्रणा के अधिकार द्वारा राष्ट्रपति को निरंकुश होने से रोकता है और दूसरी और हाउस ऑव रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ के आवेशपूर्ण तथा कम विवेकशील विधेयकों को रोकने में सहायक होता है।"
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पेंगुइन अंटार्कटिका के किस हिस्से में रहना पसंद करते है?
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"पेंगुइन\nआधुनिक पेंगुइन का निर्माण निर्विवाद रूप से दो क्लेड और दो अन्य बेसल जातियों से हुआ है जिनका संबंध और अधिक अस्पष्ट है। स्फेनिस्कीनाई का मूल शायद वर्तमान पेलियोजीन में है और भौगोलिक दृष्टि से भी ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि इन जातियों का विकास इसी क्षेत्र में हुआ है : ऑस्ट्रेलिया - न्यूजीलैंड के क्षेत्रों के बीच के महासागर और अंटार्कटिक 40 mya के आसपास के दूसरे पेंगुइन से अनुमान लगाते हुए, ऐसा लगता है कि स्फेनिस्कीनाई अपने पैतृक क्षेत्र में कुछ समय तक सीमित थे, क्योंकि अंटार्कटिक प्रायद्वीप और पेटागोनिया के अच्छी तरह से किये गये शोधों में उपप्रजाति के पेलियोजीन जीवाश्म नहीं मिले. इसके अलावा, पहले की स्फेनिस्किन वंशावली वो है जो सबसे ज्यादा दक्षिण में पाई जाती है।"
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"पेंगुइन\nहालांकि सभी पेंगुइन प्रजातियां दक्षिणी गोलार्द्ध की मूल निवासी हैं, लेकिन ये केवल अंटार्कटिक जैसे ठंडे मौसम में ही नहीं पाए जाते. वास्तव में, पेंगुइन की केवल कुछ प्रजातियों वास्तव में दक्षिण में इतनी दूर रहती हैं। कम से कम 10 प्रजातियां शीतोष्ण, क्षेत्र में पाई जाती हैं, इनमे से एक गैलापागोस पेंगुइन, उत्तर में गैलापागोस द्वीप समूह जितना दूर रहता है, किन्तु यह केवल अंटार्कटिक धारा के ठंडे, प्रचुर पानी के द्वारा संभव हो सका है जो इन द्वीपों के आसपास बहता है।",
"पेंगुइन\nबेसल पेंगुइन क्रीटेशस-टियर्टरी विलुप्त होने घटना के आसपास के समय (दक्षिणी) न्यूजीलैंड और ब्यर्ड लैंड, अंटार्कटिक के सामान्य क्षेत्रों में रहते थे। प्लेट टेक्टोनिस के कारण, इन क्षेत्रों की आपस में दूरी आज की तुलना में कम थी। सबसे हाल ही में पेंगुइन के आम पूर्वज और उनके उप वंशजों को कैम्पेनियन-मास्त्रीशीयन, 70-68 mya के आसपास का माना जाता है। प्रत्यक्ष सबूत (जीवाश्म) के अभाव में कहा जा सकता है कि क्रीटेशस के अंत तक, पेंगुइन वंश अलग ढंग से विकसित हो गये थे, यद्यपि आकृति के रूप में आज जैसे नहीं थे; यह काफी संभावना है कि वे उस समय पूरी तरह उड़ानविहीन नहीं थे, चूंकि उड़ने में असमर्थ पक्षियों की क्षमता आम तौर पर बहुत कम होती है, जिससे कम क्षमता के चलते उनके सामूहिक रूप से विलुप्त होने की वजह का प्रारंभिक चरण शुरू होता है। (\"यह भी देखें\" फ्लाईटलेस कॉर्मोरांट)",
"पेंगुइन\nपीढ़ी स्फेनिस्कस और यूडीप्टुला की प्रजातियाँ अधिकतर दक्षिण अमेरिका के अंटार्कटिक उपमहाद्वीप में पाई जाती हैं; तथापि, कुछ उत्तर की ओर काफी दूर तक भी हैं। इन सब में कैरोटीनोइड रंग की कमी होती है और पूर्व पीढ़ियों के सर पर विशिष्ट कलगी पाई जाती है; बिलों में घोंसले बनाने के कारण वे जीवित पेंगुइन में अद्वितीय हैं। यह समूह लगभग 28 mya पहले, संभवतः आधुनिक पेंगुइन के वंशजों द्वारा अंटार्कटिक ध्रुव की धाराओं के साथ साथ पूर्व की ओर चैटियन तक फैला था (अंतिम ओलिगोसीन). जबकि दो पीढ़ी इस दौरान अलग हो गईं, वर्तमान विविधता पिलोसिन विकिरण के परिणामस्वरूप है, जो 4-2 Mya पहले फैला.",
"पेंगुइन\nहालाँकि सभी पेंगुइन प्रजातियाँ दक्षिणी गोलार्द्ध की मूल निवासी हैं, लेकिन ये केवल अंटार्कटिक जैसे ठंडे मौसम में ही नहीं पाई जातीं। वास्तव में, पेंगुइन की कुछ प्रजातियों में अब केवल कुछ ही दक्षिण में रहती हैं। कई प्रजातियाँ शीतोष्ण क्षेत्र में पाई जाती हैं और एक प्रजाति गैलापागोस पेंगुइन भूमध्य रेखा के पास रहती है।",
"पेंगुइन\nपेंगुइन को इंसानों से कोई विशेष डर नहीं लगता है और वे बिना हिचकिचाहट के खोजकर्ताओं के समूहों के पास आते हैं। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि जमीन पर पेंगुइन का अंटार्कटिक या पास के अपतटीय टापुओं पर कोई शिकारी नहीं है। इसके बजाय, पेंगुइन को समुद्र में लेपर्ड सील जैसे शिकारियों से खतरा है। आमतौर पर, पेंगुइन 3 मीटर (10 फुट) से ज्यादा पास नहीं आते क्योंकि इसके बाद वे परेशान हो जाते हैं। अंटार्कटिक के पर्यटकों को भी पेंगुइन से यही दूरी बनाने के लिए कहा जाता है (पर्यटक 3 मीटर से अधिक करीब नहीं जा सकते, किन्तु उनसे उम्मीद की जाती है कि पेंगुइन के करीब आने पर वे पीछे न हटें).",
"पेंगुइन\nभौगोलिक और टेम्पोरल पैटर्न या स्फेनिस्सिन विकास पेलियोक्लाईमेटिक रिकॉर्ड के ग्लोबल कूलिंग के दो एपिसोड से सम्बंधित है। बर्टोनियन के अंत में अंटार्कटिक उपमहाद्वीप वंश का उदभव कूलिंग अवधि की धीमी शुरुआत के साथ हुआ जो अंततः बाद में कुछ 35 लाख हिमयुगों तक रहा. अंटार्कटिक पर प्रियाबोनियन द्वारा निवास में गिरावट का मुख्य कारण अंटार्कटिक की अपेक्षा अंटार्कटिक के उपक्षेत्रों में ज्यादा अनुकूल परिस्थितियों का होना है. विशेष रूप से, ठंडे अंटार्कटिक ध्रुव का वर्तमान की तरह सतत प्रवाह केवल लगभग 30 mya के आस पास शुरू हुआ, जिसने एक ओर अंटार्कटिक को ठंडा किया तथा दूसरी ओर \"स्फेनिस्कस\" को दक्षिण अमेरिका और अंततः इससे परे के क्षेत्रों में फैलाया। इस के बावजूद, पेलिओजीन के अंटार्कटिक महाद्वीप में क्राउन विकिरण के समर्थन में कोई सबूत जीवाश्म के रूप में नहीं मिला है.",
"पेंगुइन\n\"एप्टेनोडाईट्स\" जाति जीवित पेंगुइन में बैसल के सबसे करीब है, इनकी गर्दन, छाती और चोंच के धब्बे चमकीले पीले-नारंगी होते हैं, अपने पैरों पर रख कर अंडे सेते हैं और जब अंडों से निकलने वाले चूज़े लगभग नंगे होते हैं। यह प्रजाति अंटार्कटिक के तट के पास फैली हुई है और वर्तमान में अंटार्कटिक उपमहाद्वीपों पर मुश्किल से मिलती है।",
"पेंगुइन\nपेंगुइन (पीढ़ी स्फेनिस्कीफोर्मेस, प्रजाति स्फेनिस्कीडाई) जलीय समूह के उड़ने में असमर्थ पक्षी हैं जो केवल दक्षिणी गोलार्द्ध, विशेष रूप से अंटार्कटिक में पाए जाते हैं। पानी में जीवन के लिए अत्याधिक अनुकूलित, पेंगुइन विपरीत रंगों, काले और सफ़ेद रंग के बालों वाला पक्षी है और उनके पंख हाथ (फ्लिपर) बन गये हैं। पानी के नीचे तैराकी करते हुए अधिकांश पेंगुइन पकड़ी गयी छोटी मछलियों, मछलियों, स्क्विड और अन्य जलीय जंतुओं को भोजन बनाते हैं। वे अपना लगभग आधा जीवन धरती पर और आधा जीवन महासागरों में बिताते हैं।",
"पेंगुइन\nपेंगुइन की प्रमुख आबादियाँ यहाँ पाई जाती हैं: अंटार्कटिक, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका."
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ऑनलाइन बैंक खाता कैसे खुलवा सकते है?
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"ऑनलाइन बैंकिंग\nऑनलाइन बैंकिंग, ग्राहकों को उनके नेट बैंकिंग खाते से वित्तीय और गैर-वित्तीय लेनदेन करने की सुविधा प्रदान करती है। यूजर वेबसाइट या ऑनलाइन एप्लीकेशन का उपयोग करके उसी बैंक / विभिन्न बैंक के अन्य खातों में अपने खाते से धनराशि ट्रान्सफर कर सकता है। ग्राहक वित्तीय लेनदेन करने के लिए रिसोर्स और माध्यम का उपयोग करता है। ग्राहक द्वारा उपयोग किया जाने वाला संसाधन कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल फोन की तरह एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हो सकता है। इंटरनेट वह माध्यम है जो तकनीक को संभव बनाता है।",
"ऑनलाइन बैंकिंग\nनेट बैंकिग जिसे ऑनलाइन बैंकिंग या इंटरनेट बैंकिंग भी कहते हैं, एक इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणाली है जो बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान के ग्राहकों को वित्तीय संस्था की वेबसाइट के माध्यम से वित्तीय लेनदेन की एक शृंखला का संचालन करने में सक्षम बनाती है।"
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"बचत खाता\nयदि आप government bank में saving account खुलवाना चाहतें हैं तो आपको किसी एक व्यक्ति को पहचानकर्ता के रूप में बताना होगा । जिसका उसी bank में पहले से खाता हो। यदि आपके पास ऐसा परिचित व्यक्ति नहीं हैं , जिसका उसी bank में पहले से अकाउंट हो , तो आप ऐसी स्थिति में bank manager से सम्पर्क कर सकते है । हालाँकि अब कई प्राइवेट बैंक आपके घर आकर आपका वेरिफिकेशन करके अकाउंट ओपन कर सकतें हैं | जिससे आपको किसी पहचानकर्ता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | लेकिन ये सुविधा अभी सभी बैंको में उपलब्ध नहीं है |",
"बचत खाता\nबचत खाते से निकासी कभी-कभार अधिक महँगी होती है और डिमांड/करेंट अकाउंट (चालू खाते) में समान वित्तीय लेनदेन की अपेक्षा काफी अधिक होती है और इसमें समय भी काफी अधिक लग सकता है। हालांकि, अधिकांश बचत खातों में (जमा प्रमाणपत्रों के विपरीत) निकासी को सीमित नहीं किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में नियम डी का उल्लंघन करने पर अक्सर एक सेवा शुल्क देना पड़ता है या खाते के दर्जे को घटाकर उसे चेकिंग अकाउंट भी बनाया जा सकता है। ऑनलाइन खातों की सबसे बड़ी खामी, ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस द्वारा ऑनलाइन खाते से धन को \"इंट और पत्थर\" के एक बैंक (वास्तविक बैंक) में ट्रांसफर (हस्तांतरित) करने में लगने वाला समय है। ऑनलाइन बैंक से धन को निकालकर स्थानीय बैंक में हस्तांतरित किये जाने की अवधि के दौरान कोई ब्याज नहीं मिलता है |",
"तत्काल सकल निपटान\nऑनलाइन : अगर आपके पास इन्टरनेट की सुविधा उपलब्ध है तो आप घर बैठे ऑनलाइन ही मोबाइल बैंकिंग या नेट बैंकिंग के माध्यम से किसी भी RTGS Enabled बैंक में पैसे का ट्रांसफर कर सकते है। नेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग से RTGS द्वारा पैसे भेजने के लिए आपको जिसे पैसे भेजने हैं उसे लाभार्थी या beneficiary के रूप में जोड़ना होता है। इसके लिए आपको लाभार्थी का बैंक खाता नम्बर, बैंक का नाम और शाखा और आईएफएससी संख्या भर कर एक बार लाभार्थी को जोड़ना होता है। इसके बाद आप जब भी पैसे ट्रान्सफर करना चाहें अपने नेट बैंकिंग में पहले से जुड़े हुए लाभार्थी को चुन कर उसे पैसे भेज सकते हैं।",
"बैंक खाता\nबैंक या अन्य वित्तीय संस्थाएँ अपने ग्राहकों के लेन-देन का विस्तृत विवरण वितरण रखती हैं, जिसे बैंक खाता (बैंक एकाउन्ट) कहते हैं। बैंक खाते कई प्रकार के हो सकते हैं जिसमें से बचत खाता, क्रेडिट कार्ड खाता, चालू खाता आदि प्रमुख हैं। समय की आवश्यकता के अनुसार बैंक नए प्रकार के खाते भी प्रस्तुत कर सकते हैं जिसके नियम और शर्ते पहले से मौजूद खातों से कुछ अलग हों। खातों में यह विवरण होता है कि ग्राक ने कब कितना लेन-देन किया, कितना ब्याज आदि लगाया गया। अर्थात किसी भी दिन उस खाते की क्या स्थिति है (उसमें कितना पैसा जमा है, कितना अधिकतम निकालना सम्भव है, आदि) का पता चल जाता है।",
"डेबिट कार्ड से धोखाधड़ी\nकभी–कभी हम अपना पासवर्ड या अकाउंट नंबर आदि अपने फोन में लिख कर रख लेते हैं या ऑनलॉन शॉपिंग करने के दौरान या किसी अन्य माध्यम से इसे दूसरों से साझा करते हैं। ऑनलाइन उपलब्ध आंकड़ों को हैक करना हैकरों के लिए आसान हो जाता है। यदि आपका फोन चोरी हो जाए या जब आप अपना फोन बेचते हैं तो फोन में उपलब्ध सारी जानकारी निकाली जा सकती है। आपने अपना फोन लॉक भी कर रखा हो तब भी यह सुरक्षित नहीं है। इसलिए, हमें सावधान रहना होगा।",
"बुक बिल्डिंग\nछोटे स्तर पर निवेश करने वाले निवेशकों को कम प्राइज बैंड पर बोली लगानी चाहिये। खुदरे निवेशक अधिकतम एक लाख रुपये का निवेश कर सकते हैं। अधिकतर कंपनियां खुदरे निवेशकों को फ्लोर प्राइज पर ५ प्रतिशत की छूट देती हैं। बुक–बिल्ट इश्यू में यह अनिवार्य होता है कि मांग और बोली अवधि के दौरान बोलियों का ऑनलाइन प्रदर्शन किया जा रहा हो। इसे खुली बुक प्रणाली (ओपेन बुक सिस्टम) के रूप में जाना जाता है। बंद बुक-बिल्डिंग के अंतर्गत, बुक सार्वजनिक नहीं होती है और बोली लगाने के लिए कॉल कर निवेशक अन्य बोलीदाताओं द्वारा प्रस्तुत बोली पर किसी भी जानकारी के बिना एक बोली लगाने की मंशा बना सकते हैं। सेबी के नियमानुसार इलेक्ट्रानिक सुविधा को प्रयोग करने की अनुमति केवल बुकबिल्डिंग के इश्यू में दी जाती है।",
"बैंक खाता\nहर देश के अपने-अपने बैंक सम्बन्धी नियम होते हैं। इन नियमों के आधार पर जाना जा सकता है कि तिस-किस प्रकार के खाते खोले जा सकते हैं, अर्थात ग्राहक बैंक के साथ किस-किस प्रकार के लेन-देन या क्रियाकलाप कर सकता है। बैंक खातों के खोलने से लेकर, उनके चलाने और् उनके बन्द होने तक के सारे नियम/विवरण लिखित रूप में होते हैं। उदाहरण के लिए खाता खोलने से सम्बन्धित नियमों में यह भी बताया गया हो सकता है कि कौन खाता खोल सकता है और कौन नहीं; ग्राहक अपने सही व्यक्ति होने का प्रमाण किस प्रकार दे सकते हैं (हस्ताक्षर आदि); एक दिन में कितना अधिकतम पैसा निकाला जा सकता है आदि। प्रायः अधिकांश देशों में खाता खोलने वाले व्यक्ति की आयु १८ वर्ष या उअससे अधिक होनी चाहिए। सामान्यतः गलत नाम से खाता खोलना अवैध है।",
"शिवालिक बैंक\nइन सभी सदस्यों के अपना अपना बचत खाता शिवालिक बैंक की निकटतम शाखा में खुलवाया जाता है। साथ ही एक खाता स्वयं सहायता समूह के नाम से खुलवाया जाता है। सभी सदस्य महिलाएं मासिक बैठक आयोजित करती हैं और अपनी अपनी बचत कोषाध्यक्ष के पास जमा करती हैं जो बैंक खाते में जमा होती रहती है। इस बचत राशि में से यदि किसी सदस्य को ऋण की जरूरत हो तो वह समूह की बैठक में ऋण मांग सकती है। चार महीने तक ग्रुप सफलतापूर्वक चलता रहे और बचत जमा होती रहे तो बैंक उस स्वयं सहायता समूह को रु. 5 लाख रुपये की ऋण सीमा स्वीकृत कर देता है। इस प्रकार समूह के पास इतनी पूंजी आ जाती है कि विभिन्न सदस्यों की ऋण जरूरतों को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। बैंक स्वयं सहायता समूह की बचत को देखते हुए आहरण सीमा बढ़ाता चला जाता है।"
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ब्रिटिश राज्य ने किन किन देशों पर राज किया?
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"ब्रिटिश राज\nब्रिटिश राज 1858 और 1947 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश द्वारा शासन था। क्षेत्र जो सीधे ब्रिटेन के नियंत्रण में था जिसे आम तौर पर समकालीन उपयोग में \"इंडिया\" कहा जाता था- उसमें वो क्षेत्र शामिल थे जिन पर ब्रिटेन का सीधा प्रशासन था (समकालीन, \"ब्रिटिश इंडिया\") और वो रियासतें जिन पर व्यक्तिगत शासक राज करते थे पर उन पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोपरिता थी।"
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"सेंट किट्स और नेविस का राजतंत्र\nसेंट किट्स और नेविस में राजतंत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ब्रिटिश औपनिवेशिकता में है, जब १८वीं सदी में ब्रिटेन ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और विश्व के विभिन्न कोनों में अपने उपनिवेश स्थापित किया। धीरे-धीरे इन उपनिवेशों को अपनी प्रशासन पर संप्रभुता प्रदान कर दी गई, और वेस्टमिंस्टर की संविधि, 1931 द्वारा इन सारे राज्यों को राष्ट्रमण्डल के अंदर, पूर्णतः समान पद दे दिया गया था। जो पूर्व उपनिवेश, ब्रिटिश शासक को आज भी अपना शासक मानते है, उन देशों को राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमि या राष्ट्रमण्डल प्रदेश कहा जाता है। इन अनेक राष्ट्रों के चिन्हात्मक समानांतर प्रमुख होने के नाते, ब्रिटिश एकराट् स्वयं को राष्ट्रमण्डल के प्रमुख के ख़िताब से भी नवाज़ते हैं। हालांकि शासक को आम तौरपर ब्रिटिश शासक के नाम से ही संबोधित किया जाता है, परंतु सैद्धान्तिक तौर पर सारे राष्ट्रों का संप्रभु पर सामान अधिकार है, तथा राष्ट्रमण्डल के तमाम देश एक-दुसरे से पूर्णतः स्वतंत्र और स्वायत्त हैं।",
"भारत में ब्रिटिश राज\nयह भी पाया गया कि रियासतों के मालिक और जमींदारों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया था जिसे लॉर्ड कैनिंग के शब्दों में \"तूफान में बांध\" कहा गया। उन्हें ब्रितानी राज सम्मानित भी किया गया और उन्हें आधिकारिक रूप से अलग पहचान तथा ताज दिया गया। कुछ बड़े किसानों के लिए भूमि-सुधार कार्य भी किये गये जिसे बादमें 90 वर्षों तक वैसा ही रखा गया।",
"ब्रिटिश साम्राज्य\nयह भी पाया गया कि रियासतों के मालिक और जमींदारों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया था जिसे लॉर्ड कैनिंग के शब्दों में \"तूफान में बांध\" कहा गया। उन्हें ब्रितानी राज सम्मानित भी किया गया और उन्हें आधिकारिक रूप से अलग पहचान तथा ताज दिया गया। कुछ बड़े किसानों के लिए भूमि-सुधार कार्य भी किये गये जिसे बादमें 90 वर्षों तक वैसा ही रखा गया।",
"ब्रिटिश साम्राज्य\nब्रिटिश साम्राज्य की नींव तब रखी गई थी जब इंग्लैंड और स्कॉटलैंड अलग-अलग राज्य थे। अपने देश की सीमाओं का विस्तार दुनिया के अन्य भूभागों तक करके एक \"साम्राज्य\" स्थापित करने की मंशा यूरोप की कई राजशाहियों में, अटलांटिक के उसपर अमेरिका की खोज के कारण उठी थी। तथा इस कार्य में स्पेन और पुर्तगाल जैसे देशों की सफलता ने साम्राज्य सत्यापन की इस स्वप्न को और भी प्रोत्साहना दी, इसके बाद कई यूरोपीय राज्यों में समुद्र पार बस्तियाँ स्तापित करने और अपने राज्य का विस्तार करने की होड़ लग गयी। शुरूआती समय में अटलांटिक पर करके पश्चिम के रस्ते एशिया पहुंच कर एशियाई देशों (चीन, भारत, इत्यादि) से व्यापार सम्बन्ध स्तापित करने की इच्छा से समुद्री अभियान भेजे गए थे। जिसके कारण सर्वप्रथम क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका के तट पर पहुँचे और यह सोचकर की यह एशिया है। कोलंबस के अभियान के कुछ वर्ष बाद यह सिद्ध हुआ की वह भूभाग एक नयी ज़मीन है (जिसे बाद में \"अमेरिका\" कहा गया)। 1496 में, इंग्लैंड के राजा हेनरी सप्तम ने परदेशिक अन्वेषण में स्पेन और पुर्तगाल की सफलताओं का अनुसरण करते हुए, उत्तरी अटलांटिक महासागर के माध्यम से एशिया का समुद्री रास्ता खोजने हेतु खोज यात्रा का नेतृत्व करने के लिए जॉन कैबट को आयुक्त किया। यूरोपीय खोज के पांच साल बाद, कैबट 1497 में अमेरिका की यात्रा पर रवाना हुए थे, लेकिन वे न्यूफाउंडलैंड के तट पर पहुंचे, जो उन्हें गलती से एशिया मालूम पड़ा, कैबट ने औपनिवेशिक बस्ती स्थापित करते का प्रयास नहीं किया। अगले वर्ष कैबट पुनः अमेरिका के लिए रवाना हुए मगर इस बार उनके जहाजों का कुछ पता नहीं चला।",
"भारत में ब्रिटिश राज\nइनके अतिरिक्त मुख्य आयुक्त द्वारा प्रशासित कुछ लघु प्रान्त भी थे: देशी राज्य, या रियासत, बिरिटिश राज के साथ सहायक गठबंधन के अधीन, एवं स्वदेशी भारतीय शासक द्वारा शासित एक संप्रभु इकाई को कहा जाता था। अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान के ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के समय 565 रियासत अस्तित्व में थे। यह देशी राज्य ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थे, क्यूंकी वह सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं आते थे। ब्रिटिश शासकों को मान्यता देकर, या उनसे मान्यता छीन कर राज्यों की आंतरिक राजनीति पर अपना प्रभाव कायम रखते थे।",
"ब्रिटिश राज\nइनके अतिरिक्त मुख्य आयुक्त द्वारा प्रशासित कुछ लघु प्रान्त भी थे: देशी राज्य, या रियासत, बिरिटिश राज के साथ सहायक गठबंधन के अधीन, एवं स्वदेशी भारतीय शासक द्वारा शासित एक संप्रभु इकाई को कहा जाता था। अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान के ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के समय 565 रियासत अस्तित्व में थे। यह देशी राज्य ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थे, क्यूंकी वह सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं आते थे। ब्रिटिश शासकों को मान्यता देकर, या उनसे मान्यता छीन कर राज्यों की आंतरिक राजनीति पर अपना प्रभाव कायम रखते थे।",
"ब्रिटिश राजतंत्र\n१८ वीं और १९वीं सदी के दौरान ब्रिटेन के औपनिवेशिक विस्तार द्वारा, ब्रिटेन ने विश्व के अन्य अनेक भू-भागों वे क्षेत्रों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। जिनमें से अधिकतर देशों ने मध्य २०वीं सदी तक ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल कर ली। हालाँकि उन सभी देशों ने यूनाइटेड किंगडम की सरकार की अधिपत्यता को नकार दिया, परंतु उनमें से कई राष्ट्र, ब्रिटिश शासक को अपने अधिराट् के रूप में मान्यता देते हैं। ऐसे देहों राष्ट्रमण्डल प्रदेश या राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमि कहा जाता है। वर्त्तमान काल में, यूनाइटेड किंगडम के अधिराट् केवल यूनाइटेड किंगडम के ही नहीं बल्कि उसके अतिरिक्त कुल १५ अन्य राष्ट्रों के अधिराट् भी हैं। हालांकि इन राष्ट्रों में भी उन्हें लगभग सामान पद व अधिकार प्राप्त है जैसा की ब्रिटेन में, परंतु उन देशों में, उनका कोई वास्तविक राजनीतिक या पारंपरिक कर्त्तव्य नहीं है, शासक के लगभग सारे कर्त्तव्य उनके प्रतनिधि के रूप में उस देश के महाराज्यपाल(गवर्नर-जनरल) पूरा करते हैं। ब्रिटेन की सरकार का राष्ट्रमण्डल प्रदेशों की सरकारों के कार्य में कोई भी भूमिका या हस्तक्षेप नहीं है। ब्रिटेन के अलावा राष्ट्रमण्डल आयाम में: एंटीगुआ और बारबुडा, ऑस्ट्रेलिया, बहामा, बारबाडोस, बेलिज, ग्रेनेडा, जमैका, कनाडा, न्यूजीलैंड, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप, सेंट लूसिया, सेंट किट्स और नेविस, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस और तुवालु जैसे देश शामिल हैं।",
"ब्रिटिश राज\nयह भी पाया गया कि रियासतों के मालिक और जमींदारों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया था जिसे लॉर्ड कैनिंग के शब्दों में \"तूफान में बांध\" कहा गया। उन्हें ब्रितानी राज सम्मानित भी किया गया और उन्हें आधिकारिक रूप से अलग पहचान तथा ताज दिया गया। कुछ बड़े किसानों के लिए भूमि-सुधार कार्य भी किये गये जिसे बादमें 90 वर्षों तक वैसा ही रखा गया।",
"सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस का राजतंत्र\nसेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस में राजतंत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ब्रिटिश औपनिवेशिकता में है, जब १८वीं सदी में ब्रिटेन ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और विश्व के विभिन्न कोनों में अपने उपनिवेश स्थापित किया। धीरे-धीरे इन उपनिवेशों को अपनी प्रशासन पर संप्रभुता प्रदान कर दी गई, और वेस्टमिंस्टर की संविधि, 1931 द्वारा इन सारे राज्यों को राष्ट्रमण्डल के अंदर, पूर्णतः समान पद दे दिया गया था। जो पूर्व उपनिवेश, ब्रिटिश शासक को आज भी अपना शासक मानते है, उन देशों को राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमि या राष्ट्रमण्डल प्रदेश कहा जाता है। इन अनेक राष्ट्रों के चिन्हात्मक समानांतर प्रमुख होने के नाते, ब्रिटिश एकराट् स्वयं को राष्ट्रमण्डल के प्रमुख के ख़िताब से भी नवाज़ते हैं। हालाँकि शासक को आम तौर पर ब्रिटिश शासक के नाम से ही संबोधित किया जाता है, परंतु सैद्धान्तिक तौर पर सारे राष्ट्रों का संप्रभु पर समान अधिकार है, तथा राष्ट्रमण्डल के तमाम देश एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र और स्वायत्त हैं।"
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वर्ष १९८५ में भारत का प्रधानमंत्री कौन था?
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"मनमोहन सिंह\nमनमोहन सिंह (; जन्म : २६ सितंबर १९३२) भारत गणराज्य के १३वें प्रधानमन्त्री थे। साथ ही साथ वे एक अर्थशास्त्री भी हैं। लोकसभा चुनाव २००९ में मिली जीत के बाद वे जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमन्त्री बने, जिनको पाँच वर्षों का कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था। इन्हें २१ जून १९९१ से १६ मई १९९६ तक पी वी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मन्त्री के रूप में किए गए आर्थिक सुधारों के लिए भी श्रेय दिया जाता है।"
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"लालबहादुर शास्त्री\nजवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का पद भार ग्रहण किया। उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी। ताशकंद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया।",
"भारत का प्रधानमन्त्री\nवर्ष १९४७ से २०१५ तक, प्रधानमन्त्री के इस पद पर कुल १४ पदाधिकारी अपनी सेवा दे चुके हैं। और यदि गुलज़ारीलाल नंदा को भी गिनती में शामिल किया जाए, जोकि दो बार कार्यवाही प्रधानमन्त्री के रूप में अल्पकाल हेतु अपनी सेवा दे चुके हैं, तो यह आंकड़ा १५ तक पहुँचता है। १९४७ के बाद के कुछ दशकों ने भारत के राजनैतिक मानचित्र पर कांग्रेस पार्टी की लगभग चुनौतीहीन राज देखा। इस कल के दौरान, कांग्रेस के के नेतृत्व में कई मज़बूत सरकारों का राज देखा, जिनका नेतृत्व कई शक्तिशाली व्यक्तित्व के प्रधानमन्त्रीगण ने किया। भारत के पहले प्रधानमन्त्री, जवाहरलाल नेहरू थे, जिन्होंने १५ अगस्त १९४७ में कार्यकाल की शपथ ली थी। उन्होंने अविरल १७ वर्षों तक सेवा दी। उन्होंने ३ पूर्ण और एक निषपूर्ण कार्यकालों तक इस पद पर विराजमान रहे। उनका कार्यकाल, मई १९६४ में उनकी मृत्यु पर समाप्त हुआ। वे इस समय तक, सबसे लंबे समय तक शासन संभालने वाले प्रधानमन्त्री हैं। जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद, उन्हीके पार्टी के, लाल बहादुर शास्त्री इस पद पर विद्यमान हुए, जिनके लघुकालीय १९-महीने के कार्यकाल ने वर्ष १९६५ की कश्मीर युद्ध और उसमे पाकिस्तान की पराजय देखी। युद्ध के पश्चात्, ताशकंद के शांति-समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, ताशकंद में ही उनकी अकारण व अकस्मात् मृत्यु हो गयी। शास्त्री के बाद, प्रधानमन्त्रीपद पर, नेहरू की पुत्री, इंदिरा गांधी इस पद पर, देश की पहली महिला प्रधानमन्त्री के तौर पर निर्वाचित हुईं। इंदिरा का यह पहला कार्यकाल ११ वर्षों तक चला, जिसमें उन्होंने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजपरिवारों को मिलने वाले शाही भत्ते और राजकीय उपादियों की समाप्ती, जैसे कठोर कदम लिया। साथ ही १९७१ का युद्ध और बांग्लादेश की स्थापना, जनमत-संग्रह द्वारा सिक्किम का भारत में अभिगमन और पोखरण में भारत का पहला परमाणु परिक्षण जैसे ऐतिहासिक घटनाएँ भी इंदिरा गांधी के इस शासनकाल में हुआ। परंतु इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद, १९७५ से १९७७ तक का कुख्यात आपातकाल भी इंदिरा गांधी ने ही लगवाया था। यह समय सरकार द्वारा, आंतरिक उथल-पुथल और अराजकता को \"नियंत्रित\" करने हेतु, लोकतांत्रिक नागरिक अधिकारों की समाप्ति और राजनैतिक विपक्ष के दमन के लिए कुख्यात रहा।",
"भारत के प्रधान मंत्रियों की सूची\nवर्ष १९४७ से २०१७ तक, प्रधानमन्त्री के इस पद पर कुल १४ पदाधिकारी अपनी सेवा दे चुके हैं। और यदि गुलज़ारीलाल नन्दा को भी गिनती में शामिल किया जाए, जो कि दो बार कार्यवाही प्रधानमन्त्री के रूप में अल्पकाल हेतु अपनी सेवा दे चुके हैं, तो यह आंकड़ा १५ तक पहुँचता है। १९४७ के बाद के, कुछ दशकों तक. भारतीय राजनैतिक मानचित्र पर, कांग्रेस पार्टी का लगभग चुनौती विहीन, निरंतर राज रहा। इस काल के दौरान भारत ने, कांग्रेस के नेतृत्व में कई मज़बूत सरकारों का राज देखा, जिनका नेतृत्व कई शक्तिशाली व्यक्तित्व के प्रधान-मन्त्री-गणों ने किया। भारत के पहले प्रधानमन्त्री, जवाहरलाल नेहरू थे, जिन्होंने १५ अगस्त १९४७ में, भारत के स्वाधीनता समारोह के साथ, अपने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उन्होंने अविरल १७ वर्षों तक भारत को अपनी सेवायें दी। वे ३ पूर्ण और एक खण्डित कार्यकाल तक इस पद पर विराजमान रहे। उनका कार्यकाल, मई १९६४ में उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हुआ। वे अब तक के, सबसे लंबे समय तक शासन संभालने वाले प्रधानमन्त्री हैं। जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद, उन्हीके पार्टी के, लाल बहादुर शास्त्री इस पद पर विद्यमान हुए, जिनके लघुकालिक १९-महीने के कार्यकाल में भारत ने वर्ष १९६५ का कश्मीर युद्ध और उसमे पाकिस्तान की पराजय देखी। युद्ध के पश्चात्, ताशकन्द के शांति-समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, ताशकन्द में ही उनकी अकारण व अकस्मात् मृत्यु हो गयी। शास्त्री के बाद, प्रधानमन्त्री पद पर, ज ला नेहरू की पुत्री, इंदिरा गांधी इस पद पर, देश की पहली महिला प्रधानमन्त्री के तौर पर निर्वाचित हुईं। इंदिरा के पहले दो कार्यकाल ११ वर्षों तक चले, जिसमें उन्होंने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजपरिवारों को मिलने वाले शाही भत्ते और राजकीय उपाधियों की समाप्ती, जैसे कठोर कदम उठाये। साथ ही पाकिस्तान से १९७१ का युद्ध और बांग्लादेश की स्थापना, जनमत-संग्रह द्वारा सिक्किम का भारत में अभिगमन, पोखरण में भारत के पहले परमाणु परीक्षण जैसे ऐतिहासिक घटनाएँ भी इंदिरा गांधी के इस शासनकाल में हुआ। परंतु इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद, १९७५ से १९७७ तक का कुख्यात आपातकाल भी इंदिरा गांधी ने ही लगवाया था। यह समय सरकार द्वारा, आंतरिक उथल-पुथल और अराजकता को \"नियंत्रित\" करने हेतु, लोकतांत्रिक नागरिक अधिकारों की समाप्ती और 'राजनैतिक विपक्ष के दमन' के लिए कुख्यात रहा।",
"भारत\nगणराज्य के पहले तीन चुनावों (१९५१–५२, १९५७, १९६२) में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉंग्रेस ने आसान जीत पाई। १९६४ में नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री कुछ समय के लिये प्रधानमंत्री बने, और १९६६ में उनकी खुद की मौत के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। १९६७ और १९७१ के चुनावों में जीतने के बाद १९७७ के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पडा। १९७५ में प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय आपात्काल की घोषणा कर दी थी। इस घोषणा और इससे उपजी आम नाराज़गी के कारण १९७७ के चुनावों में नवगठित जनता पार्टी ने कॉंग्रेस को हरा दिया और पूर्व में कॉंग्रेस के सदस्य और नेहरु के केबिनेट में मंत्री रहे मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी। यह सरकार सिर्फ़ तीन साल चली, और १९८० में हुए चुनावों में जीतकर इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बनीं। १९८४ में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी कॉंग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री बने। १९८४ के चुनावों में ज़बरदस्त जीत के बाद १९८९ में नवगठित जनता दल के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय मोर्चा ने वाम मोर्चा के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई, जो केवल दो साल चली। १९९१ के चुनावों में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, परंतु कॉंग्रेस सबसे बडी पार्टी बनी, और पी वी नरसिंहा राव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार बनी जो अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रही।",
"इन्दिरा गांधी\nइन्दिरा प्रियदर्शिनी गाँधी (जन्म उपनाम: नेहरू) (19 नवंबर 1917-31 अक्टूबर 1984) वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार 3 पारी के लिए भारत गणराज्य की प्रधानमन्त्री रहीं और उसके बाद चौथी पारी में 1980 से लेकर 1984 में उनकी राजनैतिक हत्या तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। वे भारत की प्रथम और अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रहीं।",
"भारत का प्रधानमन्त्री\n१७ अप्रैल १९९९ को जयललिता की पार्टी आइएदमक ने सरकार से अपना समर्थन हटा लिया, और नए चुनावों की घोषणा करनी पड़ी। तथा अटल सरकार को चुनाव तक, सामायिक शासन के स्तर पर घटा दिया गया। इस बीच, कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की खबर आई, और अटलजी की सरकार ने सैन्य कार्रवाई के आदेश दे दिए। यह कार्रवाई सफल रही और करीब २ महीनों के भीतर, भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर विजय प्राप्त कर ली। १९९९ के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बहुमत प्राप्त की, और प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी कुर्सी पर बरकरार रहे। अटल ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को बरक़रार रखा और उनके शासनकाल में भारत ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास दर प्राप्त किया। साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर और बुनियादी सहूलियतों के विकास के लिए सरकार ने कई निर्णायक कदम उठाए, जिनमें राजमार्गों और सड़कों के विकास के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजनाएँ शामिल हैं। परंतु, उनके शासनकाल के दौरान, वर्ष २००२ में, गुजरात में गोधरा कांड के बाद भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने विशेष कर गुजरात एवं देश के अन्य कई हिस्सों में, स्वतंत्रता-पश्चात् भारत के सबसे हिंसक और दर्दनाक सामुदायिक दंगों को भड़का दिया। सरकार पर और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री , नरेंद्र मोदी, पर उस समय, दंगो के दौरान रोक-थाम के उचित कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया गया था। प्रधानमन्त्री वाजपेयी का कार्यकाल मई २००४ को समाप्त हुआ। वे देश के पहले ऐसे ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री थे, जिन्होंने अपना पूरे पाँच वर्षों का कार्यकाल पूर्ण किया था। २००४ के चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने में अक्षम रहा, और कांग्रेस सदन में सबसे बड़ी दल बन कर उभरी। वामपंथी पार्टियों और कुछ अन्य दलों के समर्थन के साथ, कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए(संयुक्त विकासवादी गठबंधन) की सरकार स्थापित हुई, और प्रधानमन्त्री बने मनमोहन सिंह। वे देश के पहले सिख प्रधानमन्त्री थे। उन्होंने दो पूर्ण कार्यकालों तक इस पद पर अपनी सेवा दी थी। उनके कार्यकाल में, देश ने प्रधानमन्त्री वाजपेयी के समय हासिल की गयी आर्थिक गति को बरक़रार रखा। इसके अलावा, सरकार ने आधार(विशिष्ट पहचान पत्र) और सूचना अधिकार जैसी सुविधाएँ पारित की। इसके अलावा, मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अनेक सामरिक और सुरक्षा-संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ा। २६ नवंबर २००८ को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद, देश में कई सुरक्षा सुधार कार्यान्वित किये गए। उनके पहले कार्यकाल के अंत में अमेरिका के साथ, नागरिक परमाणु समझौते के मुद्दे पर, लेफ़्ट फ्रंट के समर्थन-वापसी से सरकार लगभग गिरने के कागार पर पहुँच चुकी थी, परंतु सरकार बहुमत सिद्ध करने में सक्षम रही। २००९ के चुनाव में कांग्रेस और भी मज़बूत जनादेश के साथ सदन में आई और प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री के आसान पर विद्यमान रहे। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल, अनेक उच्चस्तरीय घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा। साथ ही आर्थिक उदारीकरण के बाद आई प्रशंसनीय आर्थिक गति भी सुस्त पड़ गयी और अनेक महत्वपूर्ण परिस्थितियों में ठोस व निर्णायक कदम न उठा पाने के कारण सरकार सरकार की छवि काफी ख़राब हुई थी। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह का कार्यकाल, २०१४ में समाप्त हो गया। २०१४ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, जिसने भ्रष्टाचार और आर्थिक विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था, ने अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त किया, और नरेंद्र मोदी को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया गया। वे पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री हैं, जोकि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर विद्यमान हुए हैं। साथ ही वे पहले ऐसे प्रधानमन्त्री हैं, जोकि आज़ाद भारत में जन्मे हैं।",
"भारत के प्रधान मंत्रियों की सूची\n१७ अप्रैल १९९९ को जयललिता की पार्टी आइएदमक ने सरकार से अपना समर्थन है दिया, और नए चुनावों की घोषणा करनी पड़ी। तथा अटल सरकार को चुनाव तक, सामायिक शासन के स्तर पर घटा दिया गया। इस बीच, कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की खबर आई, और अटलजी की सरकार ने सैन्य कार्रवाई के आदेश दे दिए। यह कार्रवाई सफल रही और करीब २ महीनों के भीतर, भारतीय सऐना ने पाकिस्तान पर विजय प्राप्त कर ली। १९९९ के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बहुमत प्राप्त की, और प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी कुर्सी पर बरकरार रहे। अटल ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को बरक़रार रखा और उनके शासनकाल में भारत ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास दर प्राप्त किया। साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर और बुनियादी सहूलियतों के विकास के लिए सरकार ने कई निर्णायक कदम उठाए, जिनमें, राजमार्गों और सडकों के विकास के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजनाएँ शामिल हैं। परंतु, उनके शासनकाल के दौरान, वर्ष २००२ में, गुजरात में गोधरा कांड के बाद भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने विशेष कर गुजरात एवं देश के अन्य कई हिस्सों में, स्वतंत्रता-पश्चात् भारत के सबसे हिंसक और दर्दनाक सामुदायिक दंगों को भड़का दिया। सरकार पर और गुजरटी के तत्कालीन मुख्यमंत्री , नरेंद्र मोदी, पर उस समय, दंगो के दौरान रोक-थाम के उचित कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया गया था। प्रधानमन्त्री वाजपेयी का कार्यकाल मई २००४ को समाप्त हुआ। वे देश के पहले ऐसे ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री थे, जिन्होंने अपना पूरे पाँच वर्षों का कार्यकाल पूर्ण किया था। २००४ के चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने में अक्षम रहा, और कांग्रेस सदन में सबसे बड़ी दल बन कर उबरी। वामपंथी पार्टियों और कुछ अन्य दलों के समर्थन के साथ, कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए(संयुक्त विकासवादी गठबंधन) की सरकार स्थापित हुई, और प्रधानमन्त्री बने, मनमोहन सिंह। वे देश के पहले सिख प्रधानमन्त्री थे। उन्होंने, दो पूर्ण कार्यकालों तक इस पद पर अपनी सेवा दी थी। उनके कार्यकाल में, देश ने प्रधानमन्त्री वाजपेयी के समय हासिल की गए आर्थिक गति को बरक़रार रखा। इसके अलावा, सरकार ने आधार(विशिष्ट पहचान पत्र), और सूचना अधिकार जैसी सुविधाएँ पारित की। इसके अलावा, मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अनेक सामरिक और सुरक्षा-संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ा। २६ नवंबर २००८ को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद, देश में कई सुरक्षा सुधर कार्यान्वित किये गए। उनके पहले कार्यकाल के अंत में अमेरिकाके के साथ, नागरिक परमाणु समझौते के मुद्दे पर, लेफ़्ट फ्रंट के समर्थन वापसी से सरकार लगभग गिरने के कागार पर पहुँच चुकी थी, परंतु सरकार बहुमत सिद्ध करने में सक्षम रही। २००९ के चुनाव में कांग्रेस, और भी मज़बूत जनादेश के साथ, सदन में आई, और प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री के आसान पर विद्यमान रहे। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल, अनेक उच्चस्तरीय घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी रही। साथ ही आर्थिक उदारीकरण के बाद आई प्रशंसनीय आर्थिक गति भी सुस्त पद गयी, और अनेक महत्वपूर्ण परिस्थितियों में ठोस व निर्णायक कदम न उठा पाने के कारण सरकार सरकार की छवि काफी ख़राब हुई थी। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह का कार्यकाल, २०१४ में समाप्त हो गया। २०१४ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, जिसने भ्रस्टाचार और आर्थिक विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था, ने अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त किया, और नरेंद्र मोदी को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया गया। वे पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री हैं, जोकि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर विद्यमान हुए हैं। साथ ही वे पहले ऐसे प्रधानमन्त्री हैं, जोकि आज़ाद भारत में जन्मे हैं।",
"हुन सेन\nहुन सेन जनवरी १९८५ में पहली बार प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए, जब एक-दलीय राष्ट्रीय असेम्बली ने उन्हें चान सी का उत्तराधिकारी घोषित किया था। दिसंबर १९८४ में चान सी की मृत्यु के पश्चात उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ़ हो गया। उन्होंने यह पद १९९३ तक संयुक्त राष्ट्र समर्थित चुनाव होने तक संभाला, जिसमे किसी को बहुमत नहीं मिला। फुन्किन्पेक से आम सहमति के पश्चात सेन नोरदम रानारिद्ध के साथ द्वितीय प्रधानमंत्री बने और १९९७ के तख्तापलट तक इस पद पर रहे। १९९८ के चुनावों में उन्होंने अपनी पार्टी सीपीपी को विजय तो दिलाई मगर फुन्किन्पेक के साथ गठबंधन सरकार बनानी पड़ी। हुन सेन तबसे छह बार लगातार प्रधानमंत्री का कार्यकाल संभाल रहे हैं। जून २०१५ में चेया सिम की मृत्यु के पश्चात वे सीपीपी के अध्यक्ष चुने गये। २०१८ में वह बिना विपक्ष के हुए चुनाव में वे छठी बार प्रधानमंत्री चुने गये।",
"अटल बिहारी वाजपेयी\nअटल बिहारी वाजपेयी (25 दिसंबर 1924 – 16 अगस्त 2018) भारत के तीन बार के प्रधानमंत्री थे। वे पहले 16 मई से 1 जून 1996 तक, तथा फिर 1998 मे और फिर19 मार्च 1999 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे हिंदी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता थे। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में एक थे, और 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लंबे समय तक राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया।"
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विश्व में कितने देश ईसा मसीह को जानते है?
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"विश्व में ईसाई धर्म\nईसाई धर्म; में लगभग 2.4 अरब अनुयायी हैं, जो कि लगभग 7.2 अरब लोगों में से हैं।. दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और विश्व में सबसे बड़ा धर्म है, जिसमें कैथोलिक चर्च, प्रोटेस्टेंटिज़म और पूर्वी रूढ़िवादी चर्च होने वाले ईसाई में तीन सबसे बड़े समूह हैं। सबसे बड़ा ईसाई संप्रदाय कैथोलिक चर्च है, जिसमें 1.0 9 अरब अनुयायी हैं। दूसरी सबसे बड़ी ईसाई शाखा या तो प्रोटेस्टेंटिज्म है (यदि इसे एक समूह माना जाता है) या पूर्वी रूढ़िवादी चर्च (यदि प्रोटेस्टेंट को कई संप्रदाय में विभाजित माना जाता है) ईसाई धर्म यूरोप, रूस, अमेरिका, फिलीपींस, पूर्वी तिमोर, दक्षिणी अफ्रीका, मध्य अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका और ओशिनिया में प्रमुख धर्म है। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी बड़े ईसाई समुदाय हैं, जैसे इंडोनेशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व, जहां ईसाई धर्म इस्लाम धर्म के बाद दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। संयुक्त राज्य अमेरिका में दुनिया की सबसे बड़ी ईसाई आबादी है, उसके बाद ब्राजील और मेक्सिको का स्थान है। ईसाई धर्म, एक या किसी अन्य रूप में, निम्नलिखित 15 देशों का राज्य धर्म है: अर्जेंटीना (रोमन कैथोलिक चर्च), अर्मेनिया (अर्मेनियाई अपोस्टोलिक चर्च) तुवालु (तुवालु का चर्च), टोंगा (टोंगा का फ्री वेस्लेयन चर्च) इंग्लैंड (चर्च ऑफ इंग्लैंड), ग्रीस (पूर्वी रूढ़िवादी चर्च), जॉर्जिया (पूर्वी रूढ़िवादी चर्च), कोस्टा रिका (रोमन कैथोलिक चर्च), किंगडम ऑफ़ डेनमार्क (डेनमार्क नेशनल चर्च), आइसलैंड (चर्च ऑफ आइसलैंड), लिकटेंस्टीन (कैथोलिक चर्च), माल्टा (कैथोलिक चर्च), मोनाको (कैथोलिक चर्च), वैटिकन सिटी (कैथोलिक चर्च), और जाम्बिया (कैथोलिक चर्च)।",
"अफगानिस्तान में धर्म\nकुछ पुष्टिकृत रिपोर्ट बताते हैं कि 500 से 8,000 देश में गुप्त रूप से ईसाई धर्म के विश्वास का के अनुयायी हैं। एक अध्ययन में देश में रहने वाले एक मुस्लिम पृष्ठभूमि में ईसाई धर्म के मानने वालों की संख्या 3,300 के लगभग अनुमान लगाई गई है।"
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"शराब पर ईसाई विचार\nईसाइयों के कुछ समूह पूरी तरह या पूरी तरह से इन श्रेणियों में से एक में गिर जाते हैं, जबकि अन्य उनके बीच विभाजित होते हैं। दुनियाभर के 52% इवाजेलिकल नेताओं का कहना है कि शराब पीना अच्छा इंजील के साथ असंगत है। अब भी नाममात्र \"ईसाई\" देशों में अभी भी 42% हैं जो कहते हैं कि यह असंगत है। एशिया, अफ्रीका, और मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में इवाजनालिकल्स, पीने के खिलाफ निश्चित हैं।",
"प्राच्य कलीसिया\nरोम से अलग रहने वाले प्राच्य चर्चों की सिंहावलोकन उनके अलग हो जाने के कालक्रमानुसार यहाँ प्रस्तुत है।नेस्तोरियन ईसाइयों की संख्या आजकल लगभग एक लाख है, वे मुख्य रूप से अमरीका, रूस, ईराक, ईरान तथा दक्षिण भारत में (लगभग ५,०००) रहते हैं। उत्पत्ति की दृष्टि से वे सभी समुदाय कुस्तुंतुनिया से संबद्ध हैं, किंतु सन् १४४८ ई. में रूस का चर्च स्वाधीन हो गया और बाद में बहुत से राष्ट्रीय समुदायों ने अपने को स्वतंत्र घोषित किया। फिर भी आजकल पूर्व यूरोप के बहुत से अर्थोदोक्स चर्च (यूनान, साइप्रस, अलबानिया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड) कुस्तुंतुनिया अथवा पेत्रियार्क को अपना अध्यक्ष मानते हैं, यथापि व उनका हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करते। सर्विया (यूगोस्लाविया), बुलगारिया, रूमानिया तथा जार्जिया के आर्थोदोक्स समुदाय अपने को पूर्ण रूप से स्वतंत्र घोषित कर चुके हैं।",
"इस्लाम\nविश्व में आज लगभग 1.9 अरब (या फिर 190 करोड़) से 2.0 अरब (200 करोड़) मुसलमान हैं। इन्में से लगभग 85% सुन्नी और लगभग 15% शिया हैं। सुन्नी और शिया के अतिरिक्त इस्लाम में कुछ अन्य वर्ग भी हैं परन्तु इन का प्रभाव बहुत कम है। सबसे अधिक मुसलमान दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के देशों में रहते हैं। मध्य पूर्व, अफ़्रीका और यूरोप में भी मुसलमानों के बहुत समुदाय रहते हैं। विश्व में लगभग 56 देश ऐसे हैं जहां मुसलमान बहुमत में हैं। विश्व में कई देश ऐसे भी हैं जहां की मुसलमान जनसंख्या के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है।",
"ईसाई धर्म का इतिहास\nसन् 100 ई. तक भूमध्यसागर के सभी निकटवर्ती देशों और नगरों में, विशेषकर एशिया माइनर तथा उत्तर अफ्रीका में ईसाई समुदाय विद्यमान थे। तीसरी शताब्दी के अंत तक ईसाई धर्म विशाल रोमन साम्राज्य के सभी नगरों में फैल गया था; इसी समय फारस तथा दक्षिण रूस में भी बहुत से लोग ईसाई बन गए। इस सफलता के कई कारण हैं। एक तो उस समय लोगों में प्रबल धर्मजिज्ञासा थी, दूसरे ईसाई धर्म प्रत्येक मानव का महत्व सिखलाता था, चाहे वह दास अथवा स्त्री ही क्यों न हो। इसके अतिरिक्त ईसाइयों में जो भातृभाव था उससे लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।",
"महाअमेरिका\nमहाअमेरिका में ईसाई धर्म प्रधान है, लेकिन दोनों महाद्वीपों में फैले ईसाई धर्म में बहुत अन्तर पाया जाता है। उत्तर अमेरिका में (मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में) प्रोटेस्टेन्ट ईसाईयत का प्रभुत्व है तो दक्षिण अमेरिका और उत्तर अमेरिका के स्पेनी भाषी देशों में रोमन कैथोलिक ईसाईयत का प्रभुत्व है। इसके अतिरिक्त यहाँ यहूदी, बौद्ध, मुसलमान, हिन्दू, सिख और अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं जो मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में बसे हुए हैं।",
"विश्व में इस्लाम धर्म\nइस्लाम; दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह है। 2010 के एक अध्ययन के अनुसार जनवरी 2011 में जारी किया गया था, इस्लाम के पास 1.6 अरब अनुयायी हैं, जो विश्व की आबादी का 23% हिस्सा बनाता हैं। 2015 में एक और अध्ययन के अनुसार इस्लाम में 1.7 बिलियन अनुयायी हैं। अधिकांश मुस्लिम दो संप्रदायों में हैं: सुन्नी (87-90%, करीब 1.5 अरब लोग) या शिया (10-13%, लगभग 200 मिलियन लोग)। मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, अफ्रीका का हॉर्न, सहारा, मध्य एशिया और एशिया के कुछ अन्य हिस्सों में इस्लाम प्रमुख धर्म है। मुस्लिमों के बड़े समुदाय भी चीन, बाल्कन, भारत और रूस में पाए जाते हैं। दुनिया के अन्य बड़े हिस्सो में मुस्लिम आप्रवासी समुदायों की मेजबानी करते हैं; पश्चिमी यूरोप में, उदाहरण के लिए, ईसाई धर्म के बाद इस्लाम धर्म दूसरा सबसे बड़ा धर्म है, जहां यह कुल आबादी का 6% या 24 मिलियन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। ऐतिहासिक रूप से, इस्लाम को तीन प्रमुख धार्मिक संप्रदाय में विभाजित किया गया था जिसे अच्छी तरह से सुन्नी, ख्वारज और शिया के रूप में जाना जाता था आधुनिक युग में, सुन्नी कुल मुस्लिम आबादी का 87-90% से है, जबकि शिया 10-13% है। मौजूदा समूह में यमन के जयादी शिया शामिल है, जिनकी आबादी विश्व की मुस्लिम आबादी का लगभग 0.5% है पाकिस्तान, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, सुदूर में महत्वपूर्ण आबादी हैं, इस्लाम धर्म में सुन्नी और शिया इन दो मुख्य समप्रदायो से अलग अनेक समप्रदायें है। लेकिन सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया में है, जो दुनिया के मुसलमानों के 12.7% घर है, उसके बाद पाकिस्तान ( 11.0% ) और भारत ( 10.9% ) है। लगभग 20% मुस्लिम अरब देशों में रहते हैं। मध्य पूर्व में, तुर्की, पाकिस्तान और ईरान गैर-अरब देशों में सबसे बड़ा मुस्लिम बहुमत वाले देश हैं; अफ्रीका, मिस्र और नाइजीरिया में सबसे अधिक आबादी वाले मुस्लिम समुदाय है।",
"एशिया में धर्म\n2010 में प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार ईसाई धर्म 286 मिलियन से अधिक अनुयायियों के साथ एशिया में एक व्यापक अल्पसंख्यक धर्म है, और ब्रिटानिका बुक ऑफ द ईयर 2014 के अनुसार यह संख्या लगभग 364 मिलियन है। एशिया की कुल जनसंख्या का लगभग 12.6% का इस धर्म को अपना चुका है।",
"विश्व में इस्लाम धर्म\nवर्ष 2100 तक मुस्लिमों की वैश्विक जनसंख्या ईसाइयो को पिछे कर सर्वाधिक हो जाएगी यही स्थिति भारत में होगी भारत में 2050 तक मुस्लिमों की जनसंख्या सर्वाधिक होने का अनुमान है। इसके साथ ही भारत मुस्लिमों की जनसंख्या के मामले में विश्व प्रथम देश बन जाएगा। वर्तमान में मुस्लिमों की सर्वाधिक आबादी बाला देश इंडोनेशिया है। यह रिपोर्ट अमेरिकी संस्था प्यू रिसर्च सेंटर ने अपनी वर्ष 2011 रिपोर्ट में कि थी इसके लिए संस्था ने करीब 39 देशों का सर्वे किया।"
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पुर्तगाल से गोवा में लोग रहने क्यों आये थे?
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"गोवा का इतिहास\n1498 में वास्को डी गामा यहाँ आनेवाला पहला युरोपीय यात्री बना जो समुद्र के रास्ते यहाँ आया था। उसके इस सफल अभियान ने युरोप की अन्य शक्तियों को भारत पहुँचने के लिये दूसरे समुद्री रास्तों की तलाश के लिये प्रेरित किया क्योंकि तुर्कों द्वारा पारंपरिक स्थल मार्गों को बंद कर दिया गया था। 1510 में पुर्तगाली नौसेना द्वारा तत्कालीन स्थानीय मुगल राजा को पराजित कर पुर्तगालियों ने यहाँ के कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया गया। यहाँ वे अपना एक आधार बनाना चाहते थे जहाँ से वे मसालों का व्यापार कर सकें। सोलहवीं सदी के मध्य तक पुर्तगालियों ने आज के गोवा क्षेत्र में पूरी तरह अपनी स्थिती सुदृढ कर ली थी।",
"गोवा इंक्विज़िशन\nवास्को द गामा की वापसी के बाद, पुर्तगाल ने भारत में एक कॉलोनी (उपनिवेश) स्थापित करने के लिए एक सशस्त्र बेड़ा भेजा। 1510 में, पुर्तगाली एडमिरल अफोंसो डी अल्बुकर्क (लगभग 1453-1515) ने गोवा में अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं, जिसमें पुर्तगाली अंततः जीत गए। गोवा के शासक आदिल शाह से कब्जा करने के उनके प्रयास में विजयनगर साम्राज्य के क्षेत्रीय एजेंट तिमय्या ने पुर्तगालियों की सहायता की थी। तिमय्याके विचारों इसलिए पुर्तगाली इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे बुतपरस्त कहने के बजाय \"होली स्पिरिट का एक मेसेंजर\" (पवित्र आत्मा का दूत) होने की उपाधि दी। गोवा भारत में पुर्तगाली औपनिवेशिक संपत्ति और एशिया के अन्य हिस्सों में गतिविधियों का केंद्र बन गया। यह अब पुर्तगालियों के लिए प्रमुख और आकर्षक व्यापारिक केंद्र बन गया था, जिसके ज़रिए वे पूर्व में स्थित विजयनगर साम्राज्य और बीजापुर सल्तनत के साथ व्यापार कर सकते थे। बीजापुर सल्तनत और पुर्तगाली सेनाओं के बीच दशकों तक युद्ध चलता रहा।"
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"पुराना गोवा\nपुराने गोवा को \"गोवा वेल्हा\" भी कहा जाता है (पुर्तगाली भाषा में \"वेल्हा\" यानि पुराना)। पुराना गोवा शहर को 15वीं सदी में बहमनी सल्तनत द्वारा स्थापित किया गया था और सोलहवीं शताब्दी से लेकर अठाहरवीं शताब्दी तक यह पुर्तगालियों की राजधानी रहा, जब प्लेग के कारण इस शहर को खाली कर दिया गया। कहा जाता है कि पुर्तगालियों के शासन के दौरान शहर की जनसंख्या लगभग 200,000 तक पहुँच गयी थी, जहां से पुर्तगाली पूरे ईस्ट इंडीज में मसाले के व्यापार चलाया करते थे। शहर के अवशेष यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल हैं। पुराना गोवा, राज्य की राजधानी पणजी से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व में स्थित है।",
"गोवा मुक्ति संग्राम\nगोवा को मुक्त कराने में डॉक्टर राममनोहर लोहिया का बहुत बड़ा योगदान था। 1946 में वह गोवा गए थे, जहां उन्होंने देखा कि पुर्तगाली तो अंग्रजों से भी बदतर थे। 18 जून 1946 को बीमार राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगाली प्रतिबंध को पहली बार चुनौती दी। वहां नागरिकों को सभा सम्बोधन का भी अधिकार नहीं था। लोहिया से ये सब देखा नहीं गया और उन्होंने तुरन्त 200 लोगों की एक सभा बुलाई। तेज बारिश के बावजूद उन्होंने पहली बार एक जनसभा को संबोधित किया, जिसमें उन्होंने पुर्तगाली दमन के विरोध में आवाज उठाई। उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और मड़गांव की जेल में रखा गया। लेकिन जनता के भारी आक्रोश के कारण बाद में उन्हें छोड़ना पड़ा। पुर्तगालियों ने लोहिया के गोवा आने पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन इसके बावजूद भी गोवा की आजादी की लड़ाई लगातार जारी रही।",
"गोवा इंक्विज़िशन\nइंक्विज़िशन का लक्ष्य लोगों को धार्मिक \"अपराधों\" के लिए दंडित करना था। गोवा से पहले ये पुर्तगाल और स्पेन में भी था। गोवा में इसके शुरू होने से पहले से भी, वहाँ पुर्तगालियों द्वारा धार्मिक उत्पीड़न चलता आ रहा था। 30 जून 1541 को एक पुर्तगाली आदेश आया था, जिसके तहत हिंदू मंदिरों को तबाह करके उनकी संपत्ति ज़ब्त करके कैथोलिक मिशनरियों को हस्तांतरित कर दी जाए।",
"गोवा मुक्ति संग्राम\n11 जून 1953 को पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में भारत ने अपने दूतावास बन्द किए। फिर पुर्तगाल पर दबाव डालना शुरू किया। गोवा, दमन और दीव के बीच आने जाने पर बंदिशे लग गईं। 15 अगस्त 1955 को तीन से पांच हजार आम लोगों ने गोवा में घुसने की कोशिश की। लोग निहत्थे थे और पुर्तगाल की पुलिस ने गोली चला दी। 30 लोगों की जान चली गई। तनाव बढ़ने के बाद गोवा पर सेना की चढ़ाई की तैयारी की गई। 1 नवम्बर 1961 में भारतीय सेना के तीनों अंगों को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा। भारतीय सेना ने अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने के साथ आखिरकार दो दिसंबर को गोवा मुक्ति का अभियान शुरू कर दिया। बहुत से लोगों का विचार है कि नेहरू ने अपनी अन्तरराष्ट्रीय छबि चमकाने के लिये गोवा को समय से आजाद नहीं कराया।",
"गोवा इंक्विज़िशन\nशुरुआत में पुर्तगाली पादरियों ने कोंकणी भाषा का गहन अध्ययन किया और उसे लोगों का धर्मांतरण करने के लिए एक संचार माध्यम के रूप में इसका प्रयोग किया। इसके विपरीत, इंक्विज़िशन के दौरान उन्होंने नए ईसाइयों को ग़ैर-कैथोलिंक लोगों से अलग रखने का हरसंभव प्रयास कर नस्लभेद का एक नया नमूना पेश किया। 17 वीं शताब्दी के अंत में और इससे पहले 18 वीं शताब्दी में मराठों के गोवा पर आक्रमण करने के प्रयासों के समय कोंकणी का दमन किया गया। मराठों के बढ़ते पराक्रम को पुर्तगालियों ने अपने गोवा के नियंत्रण और भारत में व्यापार के रखरखाव के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में देखा। मराठा खतरे के कारण, पुर्तगाली अधिकारियों ने गोवा में कोंकणी को दबाने के लिए एक दमनकारी कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया। पुर्तगाली का ज़बरन उपयोग लागू किया गया, और कोंकणी केवल सीमांत लोगों की भाषा बनकर रह गई।",
"गोवा\n1843 में पुर्तगाली राजधानी को वेल्हा गोवा से पंजिम ले गए। मध्य 18 वीं शताब्दी तक, पुर्तगाली गोवा का वर्तमान राज्य सीमा के अधिकांश भाग तक विस्तार किया गया था।",
"गोवा इंक्विज़िशन\nफ्रांसिस जेवियर (Francis Xavier) ने मई 1546 में पुर्तगाली राजा को गोवा के इंक्विज़िशन के लिए मूल अनुरोध भेजा था। जेवियर के अनुरोध से तीन साल पहले, पुर्तगाल के भारतीय उपनिवेशों में अधिग्रहण शुरू करने की अपील विकर जनरल मिगुएल वाज़ (Vicar General Miguel Vaz) द्वारा भेजी गई थी। इंडो-पुर्तगाली इतिहासकार टोटोनियो आर डी सूजा के अनुसार, मूल अनुरोधों के निशाने पर \"मूर\" (मुस्लिम), नए ईसाई और हिंदू थे, और इसने गोवा को कैथोलिक पुर्तगालियों द्वारा संचालित उत्पीड़न नरक बना डाला।",
"गोवा इंक्विज़िशन\nइंक्विज़िशन की यातनाओं के कारण पहले हिंदुओं और बाद में ईसाइयों और मुसलमानों को बड़ी संख्या में गोवा से भागकर ऐसे गोवा से आसपास के उन क्षेत्रों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा जो जेसुइट्स और पुर्तगाली भारत के नियंत्रण में नहीं थे। अपने मंदिरों के विध्वंस के चलते हिंदू अपने पुराने मंदिरों के खंडहरों से मूर्तियों को निकालकर और पुर्तगाली नियंत्रित क्षेत्रों की सीमाओं के बाहर नए मंदिरों का निर्माण करके उन्हें वहाँ पुनर्स्थापित करते। गोवा की आज़ादी के बाद, कुछ मामलों में जहां पुर्तगालियों ने नष्ट किए गए मंदिरों के स्थान पर चर्चों का निर्माण किया था, हिंदुओं ने वार्षिक जुलूस शुरू किए, जहाँ वे अपने देवी-देवताओं को ले जाते, और अपने नए मंदिरों को उस स्थान से जोड़कर देखते जहां अब चर्च खड़े हैं।"
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रडार में किस प्रकार की तरंगें होती हैं ?
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"रडार\nरडार (Radar) वस्तुओं का पता लगाने वाली एक प्रणाली है जो सूक्ष्मतरंगों का उपयोग करती है। इसकी सहायता से गतिमान वस्तुओं जैसे वायुयान, जलयान, मोटरगाड़ियों आदि की दूरी (परास), ऊंचाई, दिशा, चाल आदि का दूर से ही पता चल जाता है। इसके अलावा मौसम में तेजी से आ रहे परिवर्तनों (weather formations) का भी पता चल जाता है। 'रडार' (RADAR) शब्द मूलतः एक संक्षिप्त रूप है जिसका प्रयोग अमेरिका की नौसेना ने १९४० में 'रेडियो डिटेक्शन ऐण्ड रेंजिंग' (radio detection and ranging) के लिये प्रयोग किया था। बाद में यह संक्षिप्त रूप इतना प्रचलित हो गया कि अंग्रेजी शब्दावली में आ गया और अब इसके लिये बड़े अक्षरों (कैपिटल) का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसकी खोज का श्रेय रॉबर्ट वाटसन वाट्ट को दिया जाता है।",
"रेडियो वर्णक्रम\nरेडियो वर्णक्रम या रेडियो स्पेक्ट्रम से तात्पर्य विद्युतचुम्बकीय वर्णक्रम के उस भाग से है जिसकी आवृत्ति 30 हर्ट्ज से लेकर 300 गीगाहर्ट्ज तक होती है। इस आवृत्ति-परास (रेंज) वाली विद्युतचुम्बकीय तरंगों को रेडियो तरंगें कहते हैं और आधुनिक युग में इनके अनेक उपयोग हैं जिनमें सबसे बड़ा उपयोग दूरसंचार है।"
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"अवरक्त\nसभी राडार द्वारा।जिनकी तरंग दैर्घ्य प्रत्यक्ष प्रकाश के रक्त यनी red£] वर्ण से बङा हो एवं सूक्ष्म तरंग से कम हो। इनकी ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि, इनका वर्णक्रम लिए होता है विद्युत चुम्बकीय तरंग जिनकी आवृत्ति मानव द्वारा दर्शन योग्य लाल वर्ण से नीचे या अध: होती हैं। इन्हें अँग्रेजी में \"इन्फ्रारेड\" कहा जाता है।",
"चिकित्सा भौतिकी\nभौतिकी में विविध प्रकार की विद्युत्तंरगों का अध्ययन होता है। उत्तरोत्तर घटती तरंग के अनुसार ये हैं रेडियो तरंगें, अवरक्त (इन्फ्रारेड) रश्मियाँ, प्रकाश, पराकासनी (अलट्रावायलेट) रश्मियाँ, एक्स किरण और रेडियम से निकलनेवाली रश्मियाँ। इनमें से अनेक प्रकार की तरंगों का उपयोग आयुर्विज्ञान में किया गया है। कुछ से केवल सेंकने का काम लिया जाता है, कुछ से त्वचा के रोग अच्छे होते हैं, कुछ उचित मात्रा में दी जाने पर शरीर के भीतर घुसकर अवांछनीय जीवाणुओं का नाश करती हैं, यद्यपि अधिक मात्रा में दी जाने पर वे शरीर की कोशिकाओं को भी नष्ट कर सकती हैं।",
"राजेंद्र रडार\nराजेन्द्र राडार आकाश मिसाइल के लिए निर्मित एक त्रिविमीय 3D राडार है । यह भारत का प्रमुख राडार है।यह रेडियो तरंगों के माध्यम से किसी भी वस्तु की गति, आकार, दूरी, स्थिति आदि का निर्धारण करने में सक्षम है।",
"रेडियो आवृत्ति\n3 किलोहर्ट्ज से 300 गीगा हर्ट्ज़ की आवृत्ति वाली तरंगों को रेडियो आवृत्ति (RF) कहते हैं। रेडियो तरंगें, रेडियो आवृत्ति की तरंगे ही होतीं हैं। रेडियो आवृत्ति के कम्पन - यांत्रिक कम्पन और वैद्युत कम्पन दोनों हो सकते हैं किन्तु प्रायः रेडियो आवृत्ति से आशय विद्युत कम्पन से ही होता है न कि यांत्रिक कम्पन से।",
"लाउडस्पीकर\nबंकन तरंग ट्रान्सड्यूसर्स जानबूझकर लचीला रखे गए डायाफ्राम का उपयोग करते हैं। सामग्री की कठोरता केंद्र से बाहर की ओर बढ़ती है। लघु तरंग दैर्घ्य मुख्य रूप से भीतरी क्षेत्र से विकिरण करती हैं, जबकि लंबी तरंगें स्पीकर के किनारे तक पहुँचती हैं। बाहर से वापस केंद्र की ओर परावर्तन रोकने के लिए, दीर्घ तरंगों को आसपास के स्पंज द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। ऐसे ट्रान्सड्यूसर्स व्यापक आवृत्ति सीमा को (80 हर्ट्ज से 35,00 हर्ट्ज) कवर कर सकते हैं तथा एक आदर्श बिंदु ध्वनि स्रोत के रूप में प्रोत्साहित किया जाता है। इस असामान्य दृष्टिकोण को केवल कुछ निर्माताओं द्वारा बहुत अलग व्यवस्था में अपनाया जा रहा है। ओम वॉल्श स्पीकरों की लाइन में लिंकन वॉल्श द्वारा डिजाइन किए गए एक अद्वितीय ड्राइवर का उपयोग किया जाता है। लिंकन वॉल्श एक प्रतिभाशाली इंजीनियर थे, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रडार विकसित करने वाली इंजीनियरिंग टीम का हिस्सा थे। बाद में उन्होंने ऑडियो एम्पलीफायर डिजाइन किए और उनकी अंतिम परियोजना एक अद्वितीय, एक ड्राइवर के साथ एक-मार्गी स्पीकर था। यह एक बड़ा शंकु था जिसका मुंह नीचे एक सीलबंद, वायुरोधक अंतःक्षेत्र में था। पारंपरिक स्पीकरों की तरह आगे-और-पीछे गति करने की बजाय शंकु लहराया और \"संचरण लाइन” नामक सिद्धांत का उपयोग करके ध्वनि उत्पन्न की. नए स्पीकर ने एक एकल, पूर्णतासे प्रस्तुत की गई उल्लेखनीय स्पष्टता वाली ध्वनि तरंग का निर्माण किया। वॉल्श के नए स्पीकर डिजाइन का विकास और विपणन करने के लिए एक नई कंपनी ओम एकाउस्टिक्स बनाई गई। लिंकन वॉल्श का स्पीकर जनता के लिए जारी होने से पहले उसकी मृत्यु हो गई। प्रोटोटाइप ओम ए विकसित करने के बाद, 1973 में ओम ने ओम एफ स्पीकर जारी करके महक्वपूर्ण प्रशंसा प्राप्त की.",
"अवरक्त\nअवरक्त किरणें, अधोरक्त किरणें या इन्फ़्रारेड वह विद्युत चुम्बकीय विकिरण है जिसका तरंग दैर्घ्य (वेवलेन्थ) प्रत्यक्ष प्रकाश से बड़ा हो एवं सूक्ष्म तरंग से कम हो। इसका नाम 'अधोरक्त' इसलिए है क्योंकि विद्युत चुम्बकीय तरंग के वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में यह मानव द्वारा दर्शन योग्य लाल वर्ण से नीचे (या अध:) होती है। इसका तरंग दैर्घ्य 750 nm and 1 mm के बीच होता है। सामान्य शारिरिक तापमान पर मानव शरीर 10 माइक्रॉन की अधोरक्त तरंग प्रकाशित कर सकती है इसकी खोज वैज्ञानिक हेर्शेल के द्वारा किया गया है।",
"रेडियो तरंग\nरेडियो तरंगें (radio waves) वे विद्युत चुम्बकीय तरंगें हैं, जिनका तरंगदैर्घ्य १० सेण्टीमीटर से १०० किमी के बीच होता है। ये मानवनिर्मित भी होती हैं और प्राकृतिक भी। मानव की कोई इंद्रिय इन्हें पहचान नहीं सकती बल्कि ये किसी अन्य तकनीकी उपकरण (जैसे, रेडियो संग्राही) द्वारा पकड़ी एवं अनुभव की जातीं हैं। इनका प्रयोग मुख्यतः बिना तार के, वातावरण या बाहरी व्योम के द्वारा सूचना का आदान प्रदान या परिवहन में होता है। इन्हें अन्य विद्युत चुम्बकीय तरंगों से इनकी तरंग दैर्घ्य के अधार पर पृथक किया जाता है, जो अपेक्षाकृत अधिक लम्बी होती है।",
"अनुनाद\nलेजर:लेजर एक विद्युतचुम्बकीय तरंग है। किन्तु इसकी विशेष बात यह है कि यह अत्यनत समवर्णी होता है। अर्थात इसके सभी फोटानों की आवृत्ति किसी एक आवृत्ति के बराबर या बहुत पास होती है। इसके साथ ही सभी कम्पनों की कलायें (फेज) भी समान होते हैं। लेजर भी किसी प्रकाशीय कैविटी में प्रकाशीय अनुनाद का उपयोग करके उत्पन्न किया जाता है। कुछ अन्य उदाहरण हैं:यदि किसी रेखीय दोलित्र (linear oscillator) की अनुनाद आवृत्ति Ω हो और यह किसी ω आवृत्ति वाले स्रोत से चलाया जा रहा है तो दोलनों की तीव्रता \"I\" निम्नलिखित समीकरण से प्रकट होती है:"
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हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने की थी ?
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"दयाराम साहनी\nराय बहादुर दयाराम साहनी (१६ दिसम्बर १८७९ – ७ मार्च १९३९) भारतीय पुरातत्त्ववेत्ता थे जिन्होंने वर्ष १९२१-२२ में हड़प्पा में खुदाई का नेतृत्व किया जो सिन्धु घाटी की सभ्यता का प्रमुख स्थान है। इस नवीनतम स्थान के प्रकाश में आने के उपरान्त यह मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता सिन्धु नदी के घाटी तक ही सीमित है, अतः इस सभ्यता का नाम 'सिन्धु घाटी की सभ्यता' या 'सैंधव सभ्यता' रखा गया। जॉन मार्शल के सहायक के रूप में वर्ष १९३१ में साहनी प्रथम भारतीय बने जिन्हें भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग का महानिदेशक नियुक्त किया गया। वे सन् १९३५ तक इस पद पर रहे। लगभग एक वर्ष के बाद सन् 1922 में श्री राखालदास बनर्जी ने खुदाई के समय एक और स्थान का पता लगाया।",
"सिंधु घाटी सभ्यता\n7वीं शताब्दी में पहली बार जब लोगो ने पंजाब प्रान्त में ईंटो के लिए मिट्टी की खुदाई की तब उन्हें वहाँ से बनी बनाई ईंटें मिली जिसे लोगो ने भगवान का चमत्कार माना और उनका उपयोग घर बनाने में किया उसके बाद 1826 में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता को खोजा। कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बन्धुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी। इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेण्डर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की गयी। 1902 में \"लार्ड कर्जन\" द्वारा \"जॉन मार्शल\" को भारतीय पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक बनाया गया। फ्लीट ने इस पुरानी सभ्यता के बारे में एक लेख लिखा। 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया व राखलदास बेनर्जी को मोहनजोदड़ो का खोजकर्ता माना गया।"
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"प्रोमिथियस (फ़िल्म)\nवर्ष 2089 में, आर्कियोलाॅजिस्ट (पुरातत्ववक्ता) एलिज़ाबेथ शाॅ और चार्ली हाॅलोवे स्काॅटलैंड में एक स्टारमैप खोज निकालते हैं जो अन्य प्राचीन सभ्यताओं के समान होने के बावजूद उनसे असंबंधित थी। उन्होंने इनका यही निष्कर्ष लगाया कि यह उन \"इंजीनियर्स\" का न्यौता होगा, जिन्होंने मानवजाति की नींव रखी। पीटर वेयलैंड, जो वेयलैंड कार्पोरेशन के सबसे बुजुर्ग सीइओ है, वे इसपर शीघ्र खोज के लिए पुंजी व्यवस्था करते हैं ताकि उस नक्षत्र नक्शे के जरिए सुदूरवर्ती चाँद एलवी-223 तक पहुंचाने के लिए प्रोमिथियस नाम के वैज्ञानिक जहाज को रवाना कर सके। जहाज में मौजूद सभी दल डेविड नाम के ह्युमैनाॅयड की देखरेख पर सुप्तावस्था में यह अंतरिक्ष यात्रा करते हैं। पृथ्वी से लांच हुए लगभग दो साल बाद 2093 में, मिशन डायरेक्टर मेरेडिथ विकर्स उन इंजीनियर्स को ढुंढ़ने के अभियान के लिए सचेत करती है, और साथ ही बिना इजाजत उनसे किसी तरह की बातचीत न करने की हिदायत देती है।",
"मेसोपोटामिया का इतिहास\n18 वी शताब्दी तक संसार इस महान मानव सभ्यता के ज्ञान से बहुत दूर था 19 वी शताब्दी के प्रारभ्भ में इंग्लैण्ड व फ्रांस के पुराविदो ने इस सभ्यता को खोज निकाले में सफलता प्राप्त की 1850 ईस्वी में अंग्रेजी पुराविद् रालिन्सन ने बिहिस्तून के पास एक उँचे टीले पर ईरानी शासक डेरियस द्वारा उत्कीर्ण कराया गया एक शिलालेख खोज निकाला इस सिलालेख पर फारसी और बेबीलोनियन भाषा का मिश्रण अंकित था और अधिक प्रयास के बाद रालिन्सन ने इसे पढ़ने में सफलता अर्जित की और परिणामस्वरुप मेसोपोटामिया सभ्यता का आवरण खुल गया। काले पत्थर से एक दूसरा शिलालेख सन् 1901 में सूसा प्राप्त हुआ इस शिलापट्ट पर बेबीलोनिया की भाषा में एक कानूनी संहिता लिपिबध्द थी। 19 वी सदी 1ए आरभ्भ मेंही सर लियोनार्ड वूली ने ईरान के अति प्राचीन नगर उर के उत्खनन द्वारा कतिपय महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त किये इस नगर की खुदाई में मिट्टी की तख्तियाँ इमारतो के खण्डहर, विभिन्न कलात्मक वस्तुएँ तथा शासकों की समाधिया आदि प्राप्त हुई उत्खनन में प्राप्त विभिनन वस्तुओ व शिलालेखो को पढ़ने के फलस्वरुप मेसोपोटामिया की महान सभ्यता मानव प्रकाश में आयी। सुमेरियन सभ्यता के जनक कौन थे यह प्रशन अद्यतन विवादगस्त है इस सभ्यता के मूल निवासियो के सम्बन्ध में सुपुष्ट प्रमाणो का अभाव है अत विध्दानो में मतवैभिन्य बना हुआ है कुछ विध्दानो का मत है कि सुमेरिया के मूल निवासी मंगोल अथव द्रविड़ रहें होंगे तो कुछ विध्दानो मत है कि सुमेरियान सभ्यता में आर्य और द्रविड़ सभ्यताओ के तत्वो का समावेश है कुछ इतिहासकारो के अनुसार भूमध्य सागरीय लोग सुमेरिया सभ्यता के जनक थे। लेकिन डा. कीथ का मत है कि सन्धु और सुमेरियन दोनो सभ्यताओ में पर्याप्त सामनता प्रतीत होती है।",
"मालदीव\nमालदीव की प्रारंभिक सभ्यता के पहले के अवशेष का अध्ययन, सीलोन देशीय सर्विस के एक ब्रिटिश अधिकारी, H.C.P. बेल के काम के साथ शुरू हुआ। 1879 में द्वीपों पर बेल की नौका का नाश हो गया और वह कई बार प्राचीन बौद्ध अवशेषों की जांच करने लौटे. उन्होंने मालदीव के लोगो द्वारा प्राचीन \"हविता\" और \"उस्तुबू\" (यह नाम चेतिया और स्तूपा से उत्पन किए गए हैं) () नामक टीलों के बारे में अध्ययन किया जो कई प्रवाल द्वीपों पर पाए जाते हैं।",
"दलसिंहसराय प्रखण्ड (समस्तीपुर)\nकाशी शोध संसाधन के निदेशक प्रो. विजय कुमार चौधरी के निर्देश पर यहां की खुदाई हुई थी। यहां कम से कम 5500 से 6000 वर्ष पुराना इतिहास छुपा है। इसमें सबसे अधिक कुषाण काल की धरोहरें हैं। सबसे जाग्रत सभ्यता का अवशेष उसी काल का मिला है। कुषाण सभ्यता के तीन हजार वर्ष पहले न्यूलीथिक एज के अवशेष मिले हैं। इसकी खुदाई का बीजा रोपण 1991-92 में प्रसिद्ध प्रो. स्व. रामशरण शर्मा जी के निर्देश पर काशी प्रसाद जायसवाल संस्था की देख-रेख में किया गया था। पांडव स्थान से संग्रहित अवशेषों को देखने के बाद ही प्रो. शर्मा ने इस स्थल पर प्राचीन सभ्यता विकसित होने की बात कही थी। ऐतिहासिक रूप से तथ्यों की खोज हो चुकी है। अब मात्र इसे विकसित करने की आवश्यकता है।",
"आर्य\nआईआईटी खड़गपुर और भारतीय पुरातत्व विभाग के वैज्ञानिकों ने सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीनता को लेकर नए तथ्य सामने रखे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह सभ्यता 5500 साल नहीं बल्कि 8000 साल पुरानी थी। इस लिहाज से यह सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से भी पहले की है। मिस्र की सभ्यता 7,000 ईसा पूर्व से 3,000 ईसा पूर्व तक रहने के प्रमाण मिलते हैं, जबकि मोसोपोटामिया की सभ्यता 6500 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व तक अस्तित्व में थी। शोधकर्ता ने इसके अलाव हड़प्पा सभ्यता से 1,0000 वर्ष पूर्व की सभ्यता के प्रमाण भी खोज निकाले हैं।",
"सिंधु घाटी सभ्यता\nपरिपक्व अवस्था वाले कम जगह ही हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता (The Indus Civilization) की जानकारी से पूर्व भू-वैज्ञानिकों एवं विद्वानों का मानना था कि मानव सभ्यता का आविर्भाव आर्यों से हुआ। लेकिन सिन्धुघाटी के साक्ष्यों के बाद उनका भ्रम दूर हो गया और उन्हें यह स्वीकारना पड़ा कि आर्यों के आगमन से वर्षों पूर्व ही प्राचीन भारत की सभ्यता पल्लवित हो चुकी थी। इस सभ्यता को सिन्धुघाटी सभ्यता या सेन्धव सभ्यता नाम दिया गया। इनमें से आधे दर्जनों को ही नगर की संज्ञा दी जा सकती है। इनमें से दो नगर बहुत ही महत्वपूर्ण हैं - पंजाब का हड़प्पा तथा सिन्ध का मोहेनजोदड़ो (मूल उच्चारण: मुअनजोदारो, शाब्दिक अर्थ - प्रेतों का टीला)। दोनो ही स्थल वर्तमान पाकिस्तान में हैं। दोनो एक दूसरे से 483 कि॰मी॰ दूर थे और अन्दुस नदी द्वारा जुड़े हुए थे। तीसरा नगर मोहें जो दड़ो से 130 कि॰मी॰ दक्षिण में चन्हुदड़ो स्थल पर था तो चौथा नगर गुजरात के खंभात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थल पर। इसके अतिरिक्त राजस्थान के उत्तरी भाग में कालीबंगा (शाब्दिक अर्थ - काले रंग की चूड़ियाँ) तथा हरियाणा के हिसार जिले का बनावली। इन सभी स्थलों पर परिपक्व तथा उन्नत हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुतकागेंडोर तथा सुरकोतड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति की परिपक्व अवस्था दिखाई देती है। इन दोनों की विशेषता है एक एक नगर दुर्ग का होना। उत्तर हड़प्पा अवस्था गुजरात के कठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी स्थलों पर भी पाई गई है। इस सभ्यता की जानकारी सबसे पहले 1826 में चार्ल्स मैसन को प्राप्त हुई।",
"विश्व के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और उनके अविष्कारों का संक्षिप्त वर्णन\nइटालियन खगोलविद और भौतिकशास्त्री गेलीलियो गेलीलि (१५६४-१६४२) ने सन १६१० में बहुत शक्तिशाली टेलीस्कोप का निर्माण किया। इस टेलीस्कोप की सहायता से उन्होने सैकड़ो तारो को देखा जो पहले कभी देखे नहीं गये थे। मंदाकिनी का अवलोकन कर उन्होने बताया कि इसमें विभिन्न आकारो के असंख्य तारो और क्लस्टरो के समूह एक साथ रहते हैं।",
"ईगर सीद\n1995 में ईगर सीद ने ’जीओपोएटिक्स’ (Geopoetics) नामक एक नई वैज्ञानिक अवधारणा प्रस्तुत की थी और उसके सिद्धान्त पेश किए थे। 1996, 2009 और 2018 में वे ’जीओपोएटिक्स’ पर रूस में हुए तीन अन्तरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलनों के आयोजक और मेज़बान रहे। इसके अलावा वे रूसी यात्रा सिद्धान्त के विकास में भी प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। ईगर सीद पशु दृष्टान्त संग्रह के अन्वेषण में भी सक्रिय हैं और विभिन्न युगों में विभिन्न संस्कृतियों में पाए जाने वाले वास्तविक जीव-जन्तुओं और काल्पनिक जीव-जन्तुओं की छवियों का अध्ययन भी कर रहे हैं। हर वर्ष वे मास्को में ’टोटेम कास्टिंग’ (गणचिह्नों का चयन) का आयोजन करते हैं, जिसमें विभिन्न देशों के बुद्धिजीवी मतसंग्रह के माध्यम से अपने -अपने देशों और प्रदेशों के नए राष्ट्रीय प्रतीकात्मक प्राणियों का चयन करते हैं"
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विश्व का प्रथम नगर जिस पर परमाणु बम गिराया गया ?
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"हिरोशिमा\nहिरोशिमा (जापानी: 広島市) जापान का एक नगर है जहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराया गया था जिससे पूरा का पूरा नगर बरबाद हो गया था। इस विभिषका के परिणाम आज भी इस नगर के लोग भुगत रहे हैं। जापान के एक दूसरे नगर नागासाकी पर भी परमाणु बम से हमला किया गया था। इसी का परिणाम है कि जापान ने परमाणु हथियार कभी निर्माण न करने की नीति स्थापित की है।",
"हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बमबारी\nहिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बमबारी 6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिकी वायु सेना ने जापान के हिरोशिमा पर परमाणु बम \"लिटिल बॉय\" गिराया था। तीन दिनों बाद अमरीका ने नागासाकी शहर पर \"फ़ैट मैन\" परमाणु बम गिराया। हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को अमेरीका पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट के सन्दर्भ में \"लिटिल ब्वाय\" और नागासाकी के बम को विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में \"फ़ैट मैन\" कहा गया।"
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"अप्रैल 2017 नांगहार हवाई हमला\n13 अप्रैल 2017 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने दूसरा सबसे बड़ा गैर-परमाणु बम गिराय जिसे जीबीयू-43/ बी एयर ब्लास्ट के रूप में भी जाना जाता है। अमेरिका द्वारा गिराए गये इस बम का उद्देश्य पूर्वी अफगानिस्तान के नांगहार प्रांत के अचिंन जिले में आईएसआईएस द्वारा उपयोग किए जाने वाले सुरंग परिसरो को नष्ट करने के लिए गिराया गया था आईएसआईएस ने इस क्षेत्र में 2015 कब्जा किया था जो किसी अरब क्षेत्र के बहार आईएसआईएस की पहली शाखा थी। जीबीयू -43 एक 9797 किग्रा भार, और जीपीएस- निर्देशित बम है, अमेरिका के शस्त्रागार में सबसे शक्तिशाली पारंपरिक बम है, पहले मार्च 2003 में परीक्षण किया गया, इराक युद्ध की शुरूआत से कुछ दिन पहले उपयोग किया गया था। ये बम बड़े आकार का होने के कारण इसे केबल बड़े कार्गो विमान के पिछले हिस्से में ही ढोकर ले जाया जा सकता है और कार्गो विमान के पिछले हिस्से से ही दागा जा सकता है।",
"बम\nबड़े बमों की शक्ति को आमतौर में TNT(Mt) मेगाटन में मापा जाता है। अभी तक युद्ध में प्रयोग की जा चुकी सबसे शक्तिशाली दो परमाणु बम हैं जो हिरोशिमा और नागासाकी पर हमले करने के लिए संयुक्त राज्य द्वारा गिराया गया था और यह अब तक का सबसे शक्तिशाली परीक्षण सार बोम्बा (Tsar Bomba) था। सबसे शक्तिशाली गैर परमाणु बम हैं संयुक्त राज्य वायु सेना का MOAB (आधिकृत तौर पर भारी आयुध वायु धमाका, या जिसे सबसे ज्यादा 'सभी बमों की जननी\", के रूप में जाना जाता है) और रूस का 'सभी बमों का जनक'.",
"पैलेस ऑफ़ वेस्ट्मिन्स्टर\nन्यू पैलेस के साथ-साथ टावर ऑफ लन्दन 24 जनवरी 1885 को फिनीयाई बमों का निशाना बने. प्रथम बम जो कि डायनामाईट का बना था और एक काले रंग के बैग में रखा हुआ था। इस बम को एक दर्शक ने देख लिया था जो संत मेरी अंडर क्राफ्ट की सीढ़ियों के पास रखा हुआ था। पुलिस के सिपाही विलियम कोले उसे नए पैलेस तक ले जाने का प्रयास किया परन्तु बैग इतन गर्म हो गया था कि कोले ने उसे वही पटक दिया, परिणामत: बम फट गया। विस्फोट के कारण फ़र्स में बड़ा सा गड्डा हो गया और बड़े परिधि में चैपल का छत भी क्षतिग्रस्त हो गई, इसके साथ महल के खिड़कियों के कांच भी टूट गये जिसमें संत स्टेफन के पोर्च में लगे चित्रित शीशे भी शामिल हैं। कोल और उसका साथी पी सी काक्स जिसने उसकी मदद की थी, उस विस्फोट में बुरी तरह से घायल हो गये। इसके साथ ही कामन्स चेंबर में एक दूसरा विस्फोट भी हुआ,-परिणामत: इसके दक्षिणी भाग को काफी नुकसान पहुंचा, परन्तु इस विस्फोट में कोई घायल नहीं हुआ, क्योंकि उस समय वह स्थान खाली था। इस घटना के परिणामस्वरूप वेस्टमिन्स्टर हॉल को दर्शकों के लिए कई सालों तक बंद कर दिया गया और सन 1889 में कुछ प्रतिबंधों के साथ खोला गया, कि दोनों सदनों के बैठक के दौरान कोई भी दर्शक अन्दर प्रवेश नहीं कर सकता है।",
"मुम्बई\nसन १८१७ के बाद, नगर को वृहत पैमाने पर सिविल कार्यों द्वारा पुनर्ओद्धार किया गया। इसमें सभी द्वीपों को एक जुड़े हुए द्वीप में जोडने की परियोजना मुख्य थी। इस परियोजना को हॉर्नबाय वेल्लार्ड कहा गया, जो १८४५ में पूर्ण हुआ, तथा पूरा ४३८bsp;कि॰मी॰² निकला। सन १८५३ में, भारत की प्रथम यात्री रेलवे लाइन स्थापित हुई, जिसने मुंबई को ठाणे से जोड़ा। अमरीकी नागर युद्ध के दौरान, यह नगर विश्व का प्रमुख सूती व्यवसाय बाजार बना, जिससे इसकी अर्थ व्यवस्था मजबूत हुई, साथ ही नगर का स्तर कई गुणा उठा। १८६९ में स्वेज नहर के खुलने के बाद से, यह अरब सागर का सबसे बड़ा पत्तन बन गया। अगले तीस वर्षों में, नगर एक प्रधान नागरिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। यह विकास संरचना के विकास एवं विभिन्न संस्थानों के निर्माण से परिपूर्ण था। १९०६ तक नगर की जनसंख्या दस लाख के लगभग हो गयी थी। अब यह भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता के बाद भारत में, दूसरे स्थान सबसे बड़ा शहर था। बंबई प्रेसीडेंसी की राजधानी के रूप में, यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार बना रहा। मुंबई में इस संग्राम की प्रमुख घटना १९४२ में महात्मा गाँधी द्वारा छेड़ा गया भारत छोड़ो आंदोलन था। १९४७ में भारतीय स्वतंत्रता के उपरांत, यह बॉम्बे राज्य की राजधानी बना। १९५० में उत्तरी ओर स्थित सैल्सेट द्वीप के भागों को मिलाते हुए, यह नगर अपनी वर्तमान सीमाओं तक पहुंचा।",
"बोरोबुदुर\nबोरोबुदुर को कई सदियों तक ज्वालामुखीय राख और जंगल विकास ने छुपाये रखा। इसके परित्याग के पिछे के कारण भी रहस्यमय हैं। यह ज्ञात नहीं है कि स्मारक का उपयोग और तीर्थयात्रियों के लिए इसे कब बन्द किया गया था। सन् ९२८ और १००६ के मध्य शृंखलाबद्ध ज्वालामुखियाँ फुटने के कारण राजा मपु सिनदोक ने माताराम राजवंश की राजधानी को पूर्वी जावा में स्थानान्तरित कर दिया; यह निश्चित नहीं है कि इससे परित्याग प्रभावित है लेकिन विभिन्न स्रोतों के अनुसार यह परित्याग का सबसे उपयुक्त समय था। स्मारक का अस्पष्ट उल्लेख मध्यकाल में १३६५ के लगभग मपु प्रपंचा की पुस्तक \"नगरकरेतागमा\" में मिलता है जो मजापहित काल में लिखी गई तथा इसमें \"बुदुर में विहार\" का उल्लेख है। सोेक्मोनो (१९७६) ने भी लौकिक मत का उल्लेख किया है जिसके अनुसार १५वीं सदी में जब लोगों ने इस्लाम में धर्मान्तरित करना आरम्भ किया तो मंदिर को उजाड़ना आरम्भ कर दिया।",
"परमाणु बम\nद्वितीय विश्वयुद्ध में सबसे अधिक शक्तिशाली विस्फोटक, जो प्रयुक्त हुआ था, उसका नाम 'ब्लॉकबस्टर' (blockbuster) था। इसके निर्माण में तब तक ज्ञात प्रबलतम विस्फोटक ट्राईनाइट्रोटोलुईन (TNT) का 11 टन प्रयुक्त हुआ था। इस विस्फोटक से 2000 गुना अधिक शक्तिशाली प्रथम परमाणु बम था जिसका विस्फोट टी. एन. टी. के 22,000 टन के विस्फोट के बराबर था। अब तो प्रथम परमाणु बम से बहुत अधिक शक्तिशाली परमाणु बम बन गए हैं।",
"रॉबर्ट ओपेनहाइमर\nजूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर (Julius Robert Oppenheimer) (२२ अप्रैल १९०४ - १८ फ़रवरी १९६७) एक सैद्धान्तिक भौतिकविद् एवं अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कली) में भौतिकी के प्राध्यापक थे जो परमाणु बम के जनक के रूप में अधिक विख्यात हैं। वे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय परमाणु बम के निर्माण के लिये आरम्भ की गयी मैनहट्टन परियोजना के वैज्ञानिक निदेशक थे। न्यू मैक्सिको में जब ट्रिनिटी टेस्ट हुआ और इनकी टीम ने पहला परमाणु परीक्षण किया तो उनके मुंह से भगवद गीता का एक श्लोक निकल पड़ा। दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद् भासस्तस्य महात्मनः॥१२॥",
"रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन\nइसी बीच दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। जर्मनी मे परमाणु बम बनाने का काम हो रहा था, यदि पहले वहां बन जाता तो हिटलर अजेय था। अमेरिका की लॉस एलमॉस लेबॉरेटरी मे दुनिया के वैज्ञानिक इक्कठा होकर परमाणु बम बनाने के लिये एकजुट हो गये। फाइनमेन को भी वहां बुलाया गया और उन्होने वहां काम किया।"
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समुद्र मंथन से प्राप्त उस हाथी का क्या नाम था, जो श्वेत वर्ण का था?
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"समुद्र मन्थन\n\"विष को शंकर भगवान के द्वारा पान कर लेने के पश्चात् फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया। फिर उच्चैःश्रवा घोड़ा निकला जिसे असुरराज बलि ने रख लिया। उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया। ऐरावत के पश्चात् कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया। फिर कल्पवृक्ष निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया। आगे फिर समु्द्र को मथने से महलक्ष्मी जी निकलीं। महालक्ष्मी जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु को वर लिया। उसके बाद कन्या के रूप में वारुणी प्रकट हई जिसे असुरों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।\" धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को असुरों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे असुरों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये उनका आपस में लड़ना देखते रहे। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु तत्काल मोहिनी रूप धारण कर आपस में लड़ते असुरों के पास जा पहुँचे। उस विश्वमोहिनी रूप को देखकर असुरों तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने लगे। जब असुरों ने उस नवयौवना सुन्दरी को अपनी ओर आते हुये देखा तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त होकर एकटक देखने लगे।",
"ऐरावत\nऐरावत इंद्र का हाथी। समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में ऐरावत भी था। इसे शुक्लवर्ण और चार दाँतोवाला बताया गया है। रत्नों के बॅटवारे के समय इंद्र ने उक्त दिव्यगुणयुक्त हाथी को अपनी सवारी के लिए ले लिया था। इसलिए इसका इंद्रहस्ति अथवा इंद्रकुंजर नाम पड़ा। इसके अन्य नाम अभ्रमातंग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेतहस्ति, मल्लनाग, हस्तिमल्ल, सदादान, सुदामा, श्वेतकुंजर, गजाग्रणी तथा नागमल्ल हैं।"
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"श्वेत\nयह वर्ण हाथी के दांत, यानी हाथीदांत के रंग का होता है।",
"कूर्म अवतार\nवे समुद्र का मंथन करने लगे, जहाँ एक तरफ असुर थे और दूसरी तरफ देव थे। लेकिन इस मंथन करने से एक घातक जहर निकलने लगी जिससे घुटन होने लगी और सारी दुनिया पर खतरा आ गया। लेकिन भगवान महादेव बचाव के लिए आए और उस ज़हर का सेवन किया और अपने कंठ में उसे बरकरार रखा जिससे उनका नीलकंठ नाम पड़ा। मंथन जारी रहा लेकिन धीरे धीरे पर्वत डूबने लगा। तभी भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार (कछुआ) में अवतीर्ण हुए एक विशाल कछुए का अवतार लिया ताकि अपने पीठ कर पहाड़ को उठा सकें। उस कछुए के पीठ का व्यास 100,000 योजन था। कामधेनु जैसे अन्य पुरस्कार समुद्र से प्रकट हुए औरे धन्वतरि अपने हाथो में अमृत कलश के साथ प्रकट हुए। इस प्रकार से भगवान का कूर्म अवतार हुआ।",
"संख्यावाची विशिष्ट गूढ़ार्थक शब्द\nचौदह रत्न (समुद्र मंथन से प्राप्त)- श्री, रम्भा, विष, वारुणी, अमृत, शंख, हाथी, धेनु, धन्वन्तरि, चन्द्रमा, कल्पद्रुम, कौस्तुभमणि, धनु, बाजि",
"कौस्तुभ\nपरन्तु कालिदास के समय में प्रचलित उपर्युक्त पुराकथा पुराणकार व्यास के हाथ में सर्वथा बदल दी गई। श्रीमद्भागवत में तो कहा गया है कि कौस्तुभ मणि की प्राप्ति तो समुद्र मंथन के समय हुई थी। चतुर्भुज विष्णु के वक्ष:स्थल पर कौस्तुभ मणि शोभायमान हो रहा है। पुराण काल में प्रचलित हुई ऐसी नवीन मिथक का कारण यही हो सकता है कि विष्णु के हाथ में रहा सुदर्शन चक्र जैसे 'सूर्य देवता है', इस बात का द्योतक बन जाता है, उसी तरह से यह कौस्तुभ मणि भी विष्णु के सूर्य होने का प्रतीक है।",
"प्रतिज्ञायौगन्धरायण\nइस प्रकार उदयन को वासवदत्ता के साथ मुक्त कराने का उपाय सोचते हुये यौगन्धरायण ने अपनी युक्ति से राजा प्रद्योत के नलगिरि हाथी को उन्मत्त कर दिया। वत्सराज कैसे भी हाथी को अपने वश में करने के लिये पहले से ही प्रख्यात् था, अतएव नलगिरि को वश में करने के लिये वह मुक्त कर दिया गया। इस अवसर का सदुपयोग करते हुये वत्सराज वासवदत्ता के साथ उसकी तेज धावन करने वाली भद्रवती नाम की हथिनी पर सवार होकर भाग निकलता है। प्रद्योत की सेना यौगन्धरायण और उसके साथियो को घेर लेती है, दुर्भाग्य से यौगन्धरायण की तलवार टूट जाती है, वह शत्रु द्वारा पकड़ा जाता है। उसका साथी भट इसकी सूचना अमात्य से कहने के लिये आश्चर्य प्रकट करता है - 'यह क्या? प्राकार और तोरण को छोड़कर सभी कौशाम्बी है। ' - \"किन्नु खल्वेतत्। प्राकारतोरणवर्जं सर्वं कौशाम्बी खल्विदम्। 'कारागार में प्रद्योत के मंत्री भरतरोहक के साथ उसका वाद विवाद और वत्सराज के कपट पूर्वक भागने की भर्त्सना करता है। तभी कंचुकी महासेन प्रद्योत द्वारा प्रदत्त एक भृङ्गार जो एक प्रकार का सुवर्ण पात्र था , उसमें उपायन लिये हुये उपस्थित हुआ। वह यौगन्धरायण की राजभक्ति और उसके गुणगान की प्रशस्ति में राजा की ओर से उपहार भेंट किया गया था। पहले तो उसने उसे स्वीकार करने से मना किया किन्तु जब यह ज्ञात हुआ कि प्रद्योत ने वासवदत्ता और वत्सराज का विवाह एक चित्रफलक पर सम्पन्न कर दिया है तो वह सहर्ष उस उपहार को स्वीकार कर प्रसन्न चित्त हो जाता है।",
"समुद्र मन्थन\nभगवान की इस चाल को स्वरभानु नामक दानव समझ गया। वह देवता का रूप बना कर देवताओं में जाकर बैठ गया और प्राप्त अमृत को मुख में डाल लिया। जब अमृत उसके कण्ठ में पहुँच गया तब चन्द्रमा तथा सूर्य ने पुकार कर कहा कि ये राहु दैत्य है। यह सुनकर भगवान विष्णु ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर गर्दन से अलग कर दिया। अमृत के प्रभाव से उसके सिर और धड़ राहु और केतु नाम के दो ग्रह बन कर अन्तरिक्ष में स्थापित हो गये। वे ही बैर भाव के कारण सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण कराते हैं।",
"जालन्धर दैत्य\nसमुद्र मन्थन के समय भगवान शंकर का वीर्य समुद्र में चला गया था और उस वीर्य से जालन्धर का जन्म हुआ। शिवमहापुराण के अनुसार जालन्धर का वास्तविक नाम शंखचूड़ था किन्तु जल से उत्पन्न होने के कारण उसे जालन्धर कहा गया। लिंगपुराण के अनुसार जालन्धर की कद काठी और सूरत भगवान शिव के ही समान थी।",
"कंथक\nकंथक, राजकुमार सिद्धार्थ के प्रिय घोड़े का नाम था। कन्थक १८ हाथ लम्बा और श्वेत वर्ण था। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णित है कि राजकुमार सिद्धार्थ संन्यास ले के पहले सभी महत्वपूर्ण कार्यों के लिए कन्थक का ही उपयोग करते थे। जब ज्ञान के अन्वेषण के लिए राजकुमार सिद्धार्थ ने गृह त्याग किया तो दुःख के कारण कन्थक ने भी शरीर त्याग दिया।"
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कोयला किस चट्टान में पाया जाता है?
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"भारत में खनन\n(ख) सिंगरैनी युग के कोयला क्षेत्र : सम्पूर्ण भारत का 2 प्रतिशत कोयला टर्शियरी युग की चट्टानों से प्राप्त होता है। इसके मुख्य क्षेत्र राजस्थान, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु हैं। राजस्थान में लिग्नाइट कोयले के भण्डार पलाना, बरसिंगरसर, बिथनोक (बीकानेर) कपूरकड़ी, जालिप्पा (बाड़मेर) और कसनऊ-इग्यार (नागैर) में है।"
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"कोयला\nखानों से निकाले जाने वाला यह शक्तिप्रदायक खनिज मुख्यतः - चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत में पाया जाता है। भारत में यह मुख्यतः झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आंध्र प्रदेश/तेलंगाना एवं तमिनाडु में पाया जाता है। जनवरी 2000 में किए गए आकलन के अनुसार भारत की खानों में कुल 211.5 अरब टन कोयले का भंडार है।",
"कोयल (एशियाई)\nएशिया में पाया जाने वाला कोयल (Eudynamys scolopaceus) कुकुलीफोर्म्स नामक कोयल गण का पक्षी है। यह दक्षिण एशिया, चीन एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाया जाता है ब्लेक बिल व प्रशांति कोयल के साथ उप प्रजाति दर्शाता है, यह पक्षी कभी भी अपने अंडों के लिए हौसला नहीं बनाता यह अपने अंडे अन्य पक्षियों के घोंसले में रख देता है, ज्यादातर ये कौवा के अंडे को नीचे गिरा कर अपने अंडे उसके घोंसले में रख देता है यह शर्मिला अकेला रहने वाला पक्षी है एशियाई कोयल ज्यादातर फलभक्षी होते हैं कोयल भारत में कई जगह कविताओं में अच्छा प्रतीक माना जाता है!",
"कोयला खनन\nकोयला जमीन के अन्दर पाया जाता है। विद्युत उत्पादन के लिये प्रयुक्त कोयला 'ऊष्मीय कोयला' कहलाता है जबकि इस्पात निर्माण के लिये आवश्यक कोक के उत्पादन के लिये को कोयला प्रयुक्त होता है उसे 'कोकिंग कोल' कहते हैं",
"कोयल (एशियाई)\nइस प्रजाति की कई विविधता द्विप आबादी व विस्तृत श्रृंखला के साथ वर्गीकृत किए हैं पहला समावेशी का ब्लैक बिल्ड व दूसरा प्रशांत कोयल जो ऑस्ट्रेलिया में रहती है |और इन दोनों प्रजातियों को आम कोयला के रूप में भी माना जाता है |इनके चौच का रंग व आवाज़ इनके पंखों का अलग होना इन तीनों को एक उप प्रजाति के रूप में प्रदर्शित करता है |इसमें वैकल्पिक रूप से सुलावेसी की काली चोंच को ही उप प्रजाति के रूप में माना जाता है| यह प्रशांत कोयल की श्रेणी है जो ऑस्ट्रेलिया में प्रजनन करते हैं. उनको ऑस्ट्रेलियन कोयल कहते हैं!",
"कोयला\nयह कोयला भी अच्छी गुणवत्ता वाला माल्ना जाता है। इसमें कार्बन की मात्रा 77 से 86 प्रतिशत तक पाई जाती है। यह एक ठोस अवसादी चट्टान है, जो काली या गहरी भूरी रंग की होती है। इस प्रकार के कोयले का उपयोग भाप तथा विद्युत संचालित ऊर्जा के इंजनों में होता है। इस कोयले से कोक का निर्माण भी किया जाता है।",
"पाकिस्तान में खनिज\nपाकिस्तान में कई जगहों पर कोयला पाया जाता है। लेकिन एक तरफ यह अच्छा नहीं है और दूसरी तरफ यह देश की जरूरतों के लिए काफी नहीं है। देश की खपत का 11% घरेलू कोयले से आता है। [[सिंध]], [[झाम्पीर]] और [[लाखरा]] [[जमशोरो जिला | जमशोरो जिला]] और [[थार पारकर जिला | थार पारकर जिला]] के क्षेत्रों में कोयला खदानें हैं। यहां बड़ी मात्रा में भंडार हैं। कोयले की। [[पंजाब]] में, पहली हवा [[खुशब]] के ३२ किमी उत्तर से ख्योरा के २४ किमी उत्तर-पूर्व में साल्ट रेंज में हुई। इसका क्षेत्रफल 160 वर्ग किलोमीटर होगा। धनदोट और पाड़ कोयला खनन केंद्र हैं। [[मियांवाली]] में सबसे बड़ा मकड़ी का भोजन है। [[बलूचिस्तान]] में शार्क, तट, हरनाई, सर, डेगरी, शिरीन और मच [[कोयला]] पाए जाते हैं।",
"कोयला\nभारत में गोंडवाना युग के प्रमुख क्षेत्र झरिया (झारखंड) तथा रानीगंज (बंगाल) में स्थित है। अन्य प्रमुख क्षेत्रों में बोकारो, गिरिडीह, करनपुरा, पेंचघाटी, उमरिया, सोहागपुर, सिगरेनी, कोठा गुदेम आदि उल्लेखनीय हैं। भारत में उत्पादित संपूर्णै कोयले का ७० प्रतिशत केवल झरिया और रानीगंज से प्राप्त होता है। तृतीय कल्प के कोयले, लिग्नाइट और बिटूमिनश आदि के निक्षेप असम, कशमीर, राजस्थान, तमिलनाडू और गुजरात राज्यों में है।",
"कोयला\nकोयले में मुख्यतः कार्बन तथा उसके यौगिक रहते है। कार्बन तथा हाइड्रोजन के अतिरिक्त नाईट्रोजन, ऑक्सीजन तथा गंधक (Sulphur) भी रहते हैं। इसके अतिरिक्त फॉस्फोरस तथा कुछ अकार्बनिक द्रव्य भी पाया जाता है।",
"कोकलास\nकोकलास () (Pucrasia macrolopha) फ़ीज़ॅंट कुल का पक्षी है जो अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल तथा चीन में पाया जाता है। इसको कश्मीर में \"प्लास\", हिमाचल प्रदेश के चाम्बा ज़िले में \"कुकरौला\", कुलू तथा मंडी ज़िले में \"कोक\", शिमला से अल्मोड़ा तक \"कोकलास\" या \"कोकला\", और गढ़वाल, कुमाऊँ और पश्चिमी नेपाल के भोट इलाकों में \"पोकरास\" के नाम से जाना जाता है। इस पक्षी के नर और मादा के पंखों का रंग अलग होने के कारण दोनों लिंगों को आसानी से पहचाना जा सकता है। नर की लंबाई तक़रीबन २४ इंच (६०.९६ से.मी.), पूँछ की लंबाई ९-११ इंच (२२.८६-२७.९४ से.मी.) और पंखों का फैलाव ९.५ इंच (२४.१३ से.मी.) तक का होता है जबकि मादा की लंबाई तक़रीबन २१ इंच (५३.२४ से.मी.), पूँछ की लंबाई ८ इंच (२०.३२ से.मी.) और पंखों का फैलाव ८.५ इंच (२१.५९ से.मी.) तक हो सकता है। यह पक्षी मुख्यतः पत्तियाँ और कलियाँ खाता है लेकिन बीज, बॅरी, फल तथा कीड़े-मकोड़े भी यदा कदा खा लेता है। यह अप्रैल से जून के बीच प्रजनन करते हैं और लगभग ९ तक फीके बादामी रंग के अण्डे देते हैं जिनका औसतन आकार २.०८ इंच (५.२८ से.मी.) लंबे और १.४७ इंच (३.७३ से.मी.) चौड़े होते हैं। यह अपने अण्डे बिना कोई घोंसला बनाए ज़मीन में गड्ढा खोदकर देते हैं।"
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भारतीय रूपये का प्रतीक चिह्न किसने डिजायन किया था?
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"भारत के राष्ट्रीय चिन्ह\nयह चिह्न भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई के पोस्ट ग्रेजुएट डिजाइन श्री डी. उदय कुमार ने बनाया है। इस चिह्न को वित्त मंत्रालय द्वारा आयोजित एक खुली प्रतियोगिता में प्राप्त हजारों डिजायनों में से चुना गया है। इस प्रतियोगिता में भारतीय नागरिकों से रुपए के नए चिह्न के लिए डिजाइन आमंत्रित किए गए थे। भारतीय रुपये को एक विशेष प्रतीक मिलने के बाद अब यह अन्य प्रायद्वीपीय मुद्राओं (श्री लंका, पाकिस्तान, इंडोनेशिया) से अलग एवं विशिष्ट बन चुकी है ।",
"रुपया\nवर्ष २०१० में भारत सरकार द्वारा एक रुपये के लिये प्रतीक चिह्न निर्धारित करने हेतु एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जूरी द्वारा सभी प्रविष्टियों में से पाँच डिजाइनों को चुना गया जिनमें से अन्तिम रूप से आइआइटी के प्रवक्ता उदय कुमार के डिजाइन को चुना गया।",
"भारतीय रुपया\nभारतीय मुद्रा के लिए एक आधिकारिक प्रतीक-चिह्न दिनांक १५ जुलाई, २०१० को चुन लिया गया है जिसे आईआईटी, गुवाहाटी के प्रोफेसर डी. उदय कुमार ने डिज़ाइन किया है। अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पाउण्ड, जापानी येन और यूरोपीय संघ के यूरो के बाद रुपया पाँचवी ऐसी मुद्रा बन गया है, जिसे उसके प्रतीक-चिह्न से पहचाना जाएगा। इसके लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसके अन्तर्गत सरकार को तीन हज़ार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषाओं के साथ ही आधुनिक युग के बेहतर सामंजस्य वाले इस प्रतीक को अंतिम तौर पर चयन करने की सिफारिश की थी। इसे यूनीकोड मानक में शामिल करने हेतु आवेदन कर दिया गया है। इस चिह्न को यूनीकोड में U+20A8 पर स्थान मिलेगा, जो पहले ही रुपये के Rs जैसे दिखने वाले चिह्न के लिए आवंटित है। फिलहाल इस चिह्न को कम्प्यूटर पर मुद्रित करने के लिये कुछ नॉन-यूनिकोड फॉण्ट बनाये गये हैं।",
"उदय कुमार\nउदय कुमार धर्मलिंगम्, ( \"utaya kumār tarumaliṅkam\"}}) भारतीय रुपया चिह्न के अभिकल्पक हैं। वे चेन्नई, तमिलनाडु के निवासी हैं। वे आई आई टी गुवाहाटी में असिस्टेण्ट प्रोफेसर हैं। उनका चिह्न पाँच अन्तिम शॉर्ट लिस्ट किये गये चिह्नों में से चुना गया था। उदय कुमार ने व्याख्या की कि डिजाइन भारतीय तिरंगे पर आधारित है।"
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"भारतीय रुपया चिह्न\n५ मार्च २००९ को भारत सरकार ने भारतीय रुपये के लिये एक चिह्न निर्माण हेतु एक प्रतियोगिता की घोषणा की। इसके अन्तर्गत सरकार को तीन हज़ार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। यूनियन बजट २०१० के दौरान वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि प्रस्तावित चिह्न भारतीय संस्कृति को प्रकट करेगा। प्राप्त ३३३१ आवेदनों में से मनॉन्दिता कोरिया-मेहरोत्रा, हितेश पद्मशैली, शिबिन केक, शाहरुख जे ईरानी तथा डी उदय कुमार द्वारा निर्मित किये गये पाँच चिह्न शॉर्ट लिस्ट किये गये तथा उनमें से एक २४ जून २०१० को यूनियन कैबिनेट की मीटिंग में फाइनल किया जाना था। वित्त मन्त्री के अनुरोध पर निर्णय स्थगित किया गया, तथा १५ जुलाई २०१० की मीटिंग में निर्णय लिया गया तथा उदय कुमार द्वारा निर्मित चिह्न चुना गया। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषाओं के साथ ही आधुनिक युग के बेहतर सामंजस्य वाले इस प्रतीक को अन्तिम तौर पर चयन करने की सिफारिश की थी।",
"भारतीय रुपया चिह्न\nभारतीय रुपया चिह्न (₹) भारतीय रुपये (भारत की आधिकारिक मुद्रा) के लिये प्रयोग किया जाने वाला मुद्रा चिह्न है। यह डिजाइन भारत सरकार द्वारा १५ जुलाई २०१० को सार्वजनिक किया गया था। अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पाउण्ड, जापानी येन और यूरोपीय संघ के यूरो के बाद रुपया पाँचवी ऐसी मुद्रा बन गया है, जिसे उसके प्रतीक-चिह्न से पहचाना जाएगा। भारतीय रुपये के लिये अन्तर्राष्ट्रीय तीन अंकीय कोड (अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) मानक ISO 4217 के अनुसार) INR है।",
"भारतीय रुपया चिह्न\nमूलतः यह नया चिह्न देवनागरी अक्षर 'र' पर आधारित है किन्तु यह रोमन के कैपिटल अक्षर का बिना उर्ध्वाकार डण्डे का भी आभास देता है। अतः इस चिह्न को इन दोनो अक्षरों का मिश्रण माना जा सकता है। मूल रूप से तमिल भाषी इसके अभिकल्पक उदय के अनुसार जब वो इसका डिजाइन सोच रहे थे तो उन्हें लगा कि सिर्फ देवनागरी लिपि से संबंधित कोई चिन्ह ही भारतीय भावनाओं को व्यक्त कर सकता है। ऊपर की तरफ समान्तर रेखायें (उनके बीच में खाली जगह समेत) भारतीय झण्डे तिरंगे का आभास देती हैं।",
"बौद्ध मूर्ति कला\n100 ईसा पूर्व मे साँची के ग्रेट स्तूप में भी यही प्रतीक चिह्न बनाया गया है । जिसे सातवाहन नरेश सत्कर्नी ने बनाया था यहां चार तोरण बनायें गाए है।",
"राष्ट्रीय चिन्ह\nअशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ में मिली अशोक लाट से लिया गया है। मूल रूप इसमें चार शेर हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं। इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर एक हाथी के एक दौड़ता घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं। ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है। हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है। राष्ट्र के प्रतीक में जिसे 26 जनवरी 1950 में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्य चक्र की बाहरी रेखा बिल्कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड़ दिया जाता है। प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में अंकित है। शब्द सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्चाई की विजय होती है।"
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अगर किसी देश का भुगतान संतुलन विपरीत हो गया हो तो उसे किस संस्था से मदद लेनी पड़ेगी?
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"भुगतान शेष\nकिसी एक देश को दूसरे देशों से भुगतान प्राप्त करने का अधिकार तथा अवसर तब आता है जब वह देश उन देशों को माल निर्यात करे, अथवा अपने जहाजों, बैंकों, इंश्योरेंस कंपनियों तथा कुशल विशेषज्ञों द्वारा अपनी सेवाएँ प्रदान करे अथवा उन देशों के उद्योग व्यापार में अपनी पूँजी लगाकर लाभांश तथा ब्याज प्राप्त करें। ऐसा भी हो सकता है कि उस देश के द्वारा अन्य देशों को दिए गए ऋणों की मूलराशि का उसे भुगतान प्राप्त होता हो या अन्य देशों से ही उसे ऋण स्वरूप राशि मिलती हो। इसके अतिरिक्त यह भी संभव है कि अन्य देशों के देशाटक पर्यटक उस देश में आकर माल खरीदें या सेवाओं का उपभोग करे। इन सभी परिस्थितियों में उस देश को अन्य देशों से भुगतान प्राप्त करने का अवसर होगा। इसके विपरीत, संभव है, इन्हीं मदों पर उस देश को अन्य देशों का कुछ भुगतान चुकाना भी हो। इस प्रकार किसी एक तिथि को इन सभी मदों पर एक देश की सफल लेनदारी का अंतर निकालने से उस देश का भुगतान शेष ज्ञात हो जायगा।",
"भुगतान शेष\nभुगतान शेष के घटक 1. चालू खाता 2.पूँजीगत खाता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सामान्यत: सभी देश एक दूसरे के साथ माल का आयात निर्यात करते हैं, सेवाओं का आदान प्रदान करते हैं और राशि का लेन देन भी करते हैं। इस प्रकार एक निश्चित अवधि के पश्चात् इन सभी मदों पर लेन देन का यदि हिसाब निकाला जाय तो किसी एक देश को दूसरे से भुगतान लेना शेष होता है और दूसरे देश को किसी किसी तीसरे देश का भुगतान चुकाना शेष रहता है। विभिन्न देशों के बीच इस प्रकार के परस्परिक लेन देन के शेष को भुगतान शेष (Balance of payments) कहते हैं। यों कहना चाहिए कि किसी निश्चित तिथि को एक देश द्वारा अन्य देशों को चुकाई जानेवाली सकल राशि तथा अन्य देशों से उसे प्राप्त होनेवाली सकल राशि के अंतर को उस देश का 'भुगतान शेष' कहते हैं।",
"बहुराष्ट्रीय कंपनियां\n३)भुगतान स्थिती के संतुलन में सुधार-बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मेजबान देशों ने अपने निर्यात को बढ़ाने के लिये मदद करते हैं। जैसे, वे मेजबान देश भुगतान की स्थिती की अपनी बैलेंस पर सुधार करने के लिये मदद करते हैं।"
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"विनिमय दर\nउपर्युक्त लेन-देन का भुगतान करने के लिए कुछ देशों में तो सोने चाँदी के सिक्के प्रचलित हैं और उनका लेन देन इन्हीं सिक्कों में कूता जाता है। यदि किसी कारण से देश को अपना कर्ज चुकाने का कोई अन्य साधन नहीं मिलता, तो उसे सोना या चाँदी भेजने के लिए बाध्य होना पड़ता है। व्यापारी लोग प्राय: भुगतान विदेशी हुंडियों से ही करते हैं क्योंकि अब सरकार द्वारा सोना चाँदी बाहर भेजने पर रोक लगा दी गई है। हुंडी एक प्रकार का आज्ञापत्र है। हुंडी लिखनेवाला किसी व्यक्ति या संस्था को यह आज्ञा देता है कि वह हुंडी में लिखी रकम नामोल्लेख किए हुए व्यक्ति को दे दे। ऐसी हुंडी को 'व्यापारी हुंडी' कहते हैं। व्यापारी हुंडी के अतिरिक्त एक और दूसरी तरह की हुंडियों का उपयोग किया जाता है जिन्हें 'रोजगारी हुंडी' कहते हैं। इसके अतिरिक्त यात्री हुंडी, सरकारी हुंडी और बैंकों द्वारा जारी की गई हुंडियों का उपयोग भी विदेशी व्यापारिक लेन देन चुकाने में होता है।",
"भुगतान शेष\nवैसे तो देश के बीच इस प्रकार का लेन देन किसी न किसी मद पर निरंतर चलता रहता है, पर यदि किसी निश्चित तिथि को एक देश का विभिन्न मदों पर लेन देन का अंतर निकाला जाए तो अवश्य निम्न परिस्थितियों में से कोई एक परिस्थिति सामने आती है:",
"भुगतान शेष\nकिसी देश का अनुकूल तथा प्रतिकुल भुगतान शेष उस देश की आंतरिक आर्थिक स्थिति का परिचायक माना जाता है। यदि भुगतान शेष अनुकूल रहा तो इसका अर्थ होगा उस देश द्वारा निर्यात का बाहुल्य, उत्पादन की प्रचुरता, उद्योग व्यापार की सबलता, विदेशी मुद्रा की कमाई और राष्ट्र के स्वर्णकोश में वृद्धि। इसके विपरीत प्रतिकूल भुगतान शेष का अर्थ होगा आयात का बाहुल्य, व्यापार उद्योग की शिथिलता, उत्पादन में गिरावट, विनियोग का अभाव, विदेशी मुद्रा और राष्ट्र के स्वर्णकोश में कमी। आयोजन व विकास के वर्तमान युग में विकसित देशों से पूँजीगत माल एवं कुशल विशेषज्ञों की आवश्यक मात्रा आयात करने के हेतु यह अनिवार्य हो गया है कि भुगतान शेष देश के पक्ष में अर्थात अनुकूल बना रहे। आज प्रत्येक देश इसी उद्देश्य के लिये सतत प्रयत्नशील है।",
"रॉयल्टी\nतेल और खनिज संसाधनों के मालिक, दुसरे पार्टी को अपने संसाधनों का इस्तमाल करने की इजाज़त देते हैं और बदले में वे मूल भाव या मुनाफे पर एक भाग रॉयल्टी के रूप में लेते हैं। जब किसी प्रांत या देश के सरकार इन संसाधनों के मालिक होते हैं, तब सारे नियम विनियमित है। रॉयल्टी भुगतान के दर कई देशों और व्यापारियों द्वारा उनके प्रांत में तय की जाती हैं। जंगल सम्भंदित रॉयल्टी को 'स्टमपेज' कहाँ जाता हैं। पेटेंट-रॉयल्टी की सहायता से पेटेंट के मालिक को अपने पेटेंट द्वारा हुए लाभ का एक हिस्सा मिलेगा और इस अधिकार की सुरक्षा उस देश के अधिकारी करेंगे जहां पेटेंट लिया गया था। अगर किसी ने बिना मुआवजा पेटेंट का उपयोग किया तो मुकदमा चलेगा और नियम उल्लंघन करने के लिए उस व्यक्ति अथवा संस्था को जेल में सज़ा काटनी पड़ेगी या मौद्रिक नुकसान देना पड़ेगा। रॉयल्टी का भुगतान करके लोग पेटेंट की सहायता से उत्पादन कर सकते हैं, उसका उपयोग कर सकते हैं,बिक्री या फिर उस पेटेंट का विज्ञापन कर सकते हैं।",
"आर्थिक संतुलन\nअब यह देखा जा सकता है की यदि मुक्त बाज़ार में खरीदने वाले उपभोक्ताओं (विद्यालय व विद्यार्थी) और बेचने वाले उत्पादकों (गणित-शिक्षकों) को स्वतंत्रता से खरीदने व बेचने की छूट दी जाए, तो कीमत वहाँ पर जाकर टिकेगी जहाँ माँग और आपूर्ति बराबर होगी। यही आर्थिक संतुलन की स्थिति है। इस संतुलित स्थिति में बेचने वाले (गणित-शिक्षा देने में सक्षम लोग) और खरीदने वाले (गणित-शिक्षा सेवाएँ लेने के इच्छुक) स्वतंत्र स्वेछा से यह सेवा खरीद और बेच रहे हैं। किसी से ज़बरदस्ती नहीं की जा रही है।",
"मुद्रास्फीति\nमुद्रास्फीति के समय वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि होती है। इसके कारण हमारे निर्यात महँगे हो जाएँगे तथा आयात सस्ते हो जाएँगे। नियार्तों में कमी होगी तथा आयतों में वृद्धि होगी जिसके कारण भुगतान सन्तुलन प्रतिकूल हो जाएगा।",
"विकासशील देश\nअन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्राथमिक वस्तुओं के निर्यात में व्याप्त प्रतिद्वन्दिता के कारण अर्द्धविकासत देशों को अधिक निर्यात मूल्य भी प्राप्त नहीं हो पाता। वहीं इन्हें विनिर्मित वस्तुओं, पूँजीगत यन्त्र उपकरण व विनिर्मित वस्तुओं के आयात का उच्च मूल्य चुकाना पड़ता है। अर्द्धविकसित देशों की व्यापार शर्त प्रायः विपरीत रहती है तथा इन्हें भुगतान संतुलन के असाम्य से पीड़ित रहना पड़ता है ।"
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पीएचडी डिग्री को हासिल करने के लिए कौनसी रिसर्च करनी पढ़ती है?
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"पीएचडी\nपीएचडी एक उन्नत शैक्षणिक डिग्री है। जिसे विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित किया गया है। अधिकांश अंग्रेजी बोलने वाले देशों में, पीएचडी सर्वोच्च डिग्री है जिसे अर्जित किया जा सकता है (जैसे हालाँकि कुछ देशों में ब्रिटेन, आयरलैंड और राष्ट्रमंडल देश कानून और चिकित्सा के उच्च doctorates से सम्मानित कर रहे हैं )। पीएचडी या समकक्ष डिग्री के रूप में एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर या शोधकर्ता के रूप में कैरियर की शुरुआत के लिए एक आवश्यकता बन गई है।",
"पीएचडी\nपीएचडी करने के लिए आपके पास मास्टर डिग्री होनी चाहिए दुसरे शब्दों में कहे तो आपकी Post Graduation पूरी होनी चाहिए. Post Graduation डिग्री में आपके 60% के आस पास होने चाहिए.",
"पीएचडी\nपीएचडी एक स्नातकोत्तर (Postgraduate) डॉक्टरेट (Doctoral) की डिग्री है, जो उन छात्रों को प्रदान की जाती है जो अपने विषय में ज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान देने वाले एक प्रमुख शोध को पूरा करने की पुर्णतः कोशिश करते है.",
"पीएचडी\nपीएचडी की डिग्री सभी विषयों में उपलब्ध हैं और आम तौर पर एक व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सर्वोच्च शैक्षणिक डिग्री का उच्चतम स्तर है."
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"स्नातकोत्तर डिग्री\nफ्रांस में स्नातकोत्तर डिग्री के पिछले समकक्षों (डीईए (DEA) और डीईएसएस (DESS)) को बोलोग्ना प्रक्रिया के बाद एक रिसर्च मास्टर (मास्टर रिसर्चे) और एक प्रोफेशनल मास्टर (मास्टर प्रोफेसियोनेल) द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। पहले वाले को पीएचडी के लिए और दूसरे वाले को व्यावसायिक जीवन के लिए तैयार किया गया था लेकिन इन दोनों स्नातकोत्तर के बीच अंतर गायब हो गया और लोग अब केवल एक \"स्नातकोत्तर\" के बारे में बात करते हैं। एक रिसर्च या व्यावसायिक स्नातकोत्तर एक 2 साल का स्नातकोत्तर प्रशिक्षण है जिसे आमतौर पर एक 3 साल के प्रशिक्षण, लाइसेंस के बाद पूरा किया जाता है। स्नातकोत्तर का प्रथम वर्ष को \"मास्टर 1\" (M1) कहा जाता है और स्नातकोत्तर के दूसरे वर्ष को \"मास्टर 2\" (M2) कहा जाता है। ग्रान्डेस इस्कोलेस आमतौर पर लाइसेंस के तृतीय वर्ष में भर्ती करता है और लाइसेंस का तृतीय वर्ष और एक पूर्ण 2 वर्षीय स्नातकोत्तर डिग्री, दोनों प्रदान करता है।",
"इनसीड\nइनसीड के पीएचडी प्रोग्राम में प्रवेश बहुत प्रतिस्पर्धी है, जिसमें 5 प्रतिशत से भी कम आवेदकों को प्रवेश मिलता है। आवेदकों के पास विश्वविद्यालय स्तर की डिग्री होनी चाहिए और अंग्रेजी में काम करने का ज्ञान होना चाहिए। अधोस्नातक स्तर की शिक्षा के सम्बंधित क्षेत्र की कोई खास जरुरत नहीं होती है। कमजोर गणितीय पृष्ठभूमि वाले आवेदकों को प्रोग्राम में प्रवेश करने से पहले अपनी गणित में सुधार पर काम करना होता है। प्रवेश के लिए जीएमएटी या जीआरई आवश्यक है। औसत जीएमएटी स्कोर 750 है और 800 का जीआरई मात्रात्मक स्कोर असामान्य नहीं है। आवेदक जिनकी राष्ट्र भाषा अंग्रेजी नहीं है, उन्हें टीओईएफएल परीक्षा पास करनी होती है, अगर उन्होंने ऐसे संस्थान से विश्विद्यालय की डिग्री नहीं ली है, जिसका पाठ्यक्रम विशेष रूप से अंग्रेजी में ना हो।",
"प्रमाणित वित्तीय नियोजक (सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर)\nCFP पद प्राप्त करने के लिए उम्मीदवारों को कई आवश्यकताएं पूरी करनी पड़ती हैं - जिनमें सबसे पहली है शैक्षणिक आवश्यकता, जिसके अंतर्गत उम्मीदवार के पास अमेरिका के एक मान्यता प्राप्त कॉलेज या विश्वविद्यालय से स्नातक या उससे ऊपर की डिग्री होनी चाहिए। मौजूदा CFP प्रमाणन मापदंडों के पहले कदम के रूप में, छात्रों को एकीकृत वित्तीय नियोजन के लगभग 100 विषयों में श्रेष्ठता हासिल करनी होती है। इन विषयों में योजना से संबंधित प्रमुख क्षेत्र शामिल होते हैं, जैसे कि:शैक्षणिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए छात्रों को ऊपर सूचीबद्ध विषय क्षेत्रों में कोर्स प्रशिक्षण पूरा करना होता है ताकि 10 घंटे की CFP बोर्ड प्रमाणन परीक्षा में बैठने की पहली आवश्यकता को वे पूरा कर सकें. CFP प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए एक मान्यता प्राप्त कॉलेज या विश्वविद्यालय से एक स्नातक (या उच्चतम), या किसी अन्य विषय में उसके समकक्ष डिग्री आवश्यक है। प्रारंभिक प्रमाणीकरण के लिए स्नातक की डिग्री होना आवश्यकहै; यह CFP प्रमाणन परीक्षा के योग्य होने के लिए आवश्यक नहीं है .",
"नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च\nहर साल जून में, एनआईपीईआर अपने एम.एस.(फार्म)/एम.टेक/एम.फार्म., एमबीए और पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है। एमबीए (फार्मास्युटिकल मैनेजमैंट) और डॉक्टरेट कार्यक्रमों में रूचि रखने वाले उम्मीदवारों की प्रवेश परीक्षा के बाद व्यक्तिगत साक्षात्कार द्वारा जांच की जाती है। उम्मीदवारों को एक उपयुक्त विषय में इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट (GATE) या वर्तमान में ग्रेजुएट फार्मेसी एप्टीट्यूड टेस्ट (GPAT) में योग्यता हासिल करनी होती है यद्यपि कुछ प्रोग्रामों में अपवाद है। वर्तमान में GATE को GPAT द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है और फार्मेसी स्नातक को GPAT में योग्यता हासिल करनी होती है। प्रवेश परीक्षाएं चंडीगढ़, नई दिल्ली, कोलकाता, नागपुर, पुणे, बंगलौर और अहमदाबाद में आयोजित होती हैं। प्रवेश परीक्षा में प्राप्त रैंक और विभाग में उपलब्ध सीटों की संख्या के आधार पर, आवेदकों को एक परामर्श सत्र में अपनी पसंद के लिए चुनते हैं। नाइपर में अनुसूचित जाति, विकलांग और जम्मू कश्मीरी प्रवासी उम्मीदवारों के लिए भी आरक्षण दिया जाता है। डॉक्टरेट कार्यक्रम के लिए विषय और/या विशिष्ट विभाग की परीक्षा होती है। डॉक्टरेट अध्ययन के लिए, सामान्य रूप से पीआई के पास छात्रों की आर्थिक सहायता के लिए पर्याप्त धन होती है, लेकिन इसकी अनुपस्थिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के माध्यम से फैलोशिप दिया जाता है या इस तरह के छात्र समर्थन योजनाएं आवेदक के मामले को मजबूत बनाता है।",
"आन्ध्र विश्वविद्यालय\n85% से अधिक संकाय सदस्यों के पास भारत और विदेशों में संस्थानों से पीएचडी डिग्री हासिल की गई है। संकाय शक्ति 500 है।",
"एसोसिएशन ऑफ चार्टर्ड सर्टिफाइड एकाउंटेंट्स\nप्रोफेशनल स्कीम एसीसीए की प्राथमिक योग्यता है और 14 प्रोफेशनल परीक्षाओं तक को पूरा करने एवं तीन सालों के पर्यवेक्षण, संबंधित एकाउंटेंसी के अनुभव को हासिल करने के बाद कोई व्यक्ति एक चार्टर्ड सर्टिफिकेट एकाउंटेंट बनता है।"
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किस राज्य ने राज्य में शराब का सेवन पूरी बंद कर दिया है?
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"मादक पेय\nभारत में, गुजरात और बिहार राज्य में शराब की बिक्री और उपभोग निषिद्ध है। कई अन्य भारतीय राज्यों में, अतीत में कई स्थानों पर भिन्न-भिन्न अवधियों में निषेध कानून थे।"
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"प्रतापगढ़, राजस्थान\nअफीम का बड़ा उत्पादक जिला होने के बावजूद प्रतापगढ़ में अफीमची इने-गिने ही होंगे, विवाह और अन्य अवसरों पर देसी शराब का प्रचलन आम है, यों प्रतिदिन सेवन के लिए हर आदिवासी-परिवार अपने लिए महुआ के फूलों से बनी (कानूनन प्रतिबन्धित) शराब ज़रूर बनाता है। शहर में मदिराप्रेमियों के लिए कुछ एक लाइसेन्सशुदा मैखाने (बार-रेस्तरां) हैं। शराब की सरकारी दुकानों के बंद होने का वक्त रात ८ बजे है।",
"प्रतापगढ़ (राजस्थान) की संस्कृति\nअफीम का बड़ा उत्पादक जिला होने के बावजूद प्रतापगढ़ में अफीमची इने-गिने ही होंगे, विवाह और अन्य अवसरों पर देसी शराब का प्रचलन आम है, यों प्रतिदिन सेवन के लिए हर आदिवासी-परिवार अपने लिए महुआ के फूलों से बनी (कानूनन प्रतिबन्धित) शराब ज़रूर बनाता है। शहर में मदिराप्रेमियों के लिए कुछ एक लाइसेन्सशुदा मैखाने (बार-रेस्तरां) हैं। शराब की सरकारी दुकानों के बंद होने का वक्त रात ८ बजे है।",
"मादक पेय\nकई राज्यों शराब केवल शराब की दुकान में बेचे जा सकते हैं। मादक पेय नियंत्रण करने वाले राज्यों में से उन्नीस में, शराब की बिक्री पर राज्य का एकाधिकार है। नेवादा, मिसौरी और लुइसियाना में, राज्य के कानून में शराब बेचने के लिए कोई स्थान निर्दिष्ट नहीं है।",
"मादक पेय\nअन्य सभी शराब प्रतिबंधों की तरह, शराब बेचे या रखे जाने वाले स्थानों में भी, राज्य दर राज्य भिन्नता हो सकती है। नेवादा, लुइसियाना, मिसूरी और कनेक्टिकट जैसे कुछ राज्यों में, बहुत अनुमोदक शराब कानून हैं, जबकि अन्य राज्यों जैसे कान्सास, ओकलाहोमा में बहुत सख्त शराब कानून है।",
"मादक पेय\nपांच अमेरिकी राज्यों में बीयर और 3.2 % अल्कोहल से कम मात्रा वाले शराब किराने की दुकानों और गैस स्टेशन में बेचने की अनुमति देते हैं: कोलोराडो, कान्सास, मिनेसोटा, ओकलाहोमा और उताह. इन राज्यों में, शराब की दुकानों में अधिक नशीले पेय प्रतिबंधित हैं। ओकलाहोमा में, शराब की दुकानों में 3.2% अल्कोहल से अधिक मात्रा युक्त शराब को ठंडे स्थानों में रखने की मनाही है। मिसूरी में भी बीयर 3.2% अल्कोहल युक्त बीयर प्रतिबंधित हैं, लेकिन इससे संबंधित स्वंत्रत अल्कोहल कानून (अन्य राज्यों की तुलना में) इस प्रकार के बीयर का मिलना दुर्लभ कर देते हैं।",
"शराब\nशराब अक्सर हमारे समाज में आनन्द के लिए पी जाती है। ज्यादातर शुरूआत दोस्तों के प्रभाव या दबाव के कारण होता है और बाद में भी कई अन्य कारणों से लोग इसका सेवन जारी रखते है। जैसे- बोरियत मिटाने के लिए, खुशी मनाने के लिए, अवसाद में, चिन्ता में, तीव्र क्रोध या आवेग आने पर, आत्माविश्वास लाने के लिए या मूड बनाने के लिए आदि। इसके अतिरिक्त शराब के सेवन को कई समाज में धार्मिक व अन्य सामाजिक अनुष्ठानों से भी जोड़ा जाता है। परन्तु कोई भी समाज या धर्म इसके दुरूपयोग की स्वीकृति नहीं देता है।",
"भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों का विमुद्रीकरण\nअनेक बाजारों में दुकानों को आयकर विभाग के छापे के डर के कारण से बंद कर दिया गया। हवाला ऑपरेटर भी भागे-भागे फिरने लगे और सोचने लगे कि इस तरह की भारी नकदी के साथ क्या करना चाहिए। देश के कई राज्यों में आयकर विभाग ने छापे मारे। आयकर विभाग ने दिल्ली के चांदनी चौक, मुंबई में तीन जगहों और चंडीगढ़ लुधियाना के साथ-साथ कई शहरों में अवैध तरीके से नोट बदलने और हवाला कारोबार के शक में छापे डाले। 18 नवंबर को व्यवसाय चलाने के लिए पैसे नहीं होने का हवाला देते हुए मणिपुर में अखबारों ने अपने कार्यालय बंद कर दिए। इसके परिणामस्वरूप शुक्रवार के बाद से मणिपुर में अखबार नहीं छपे। जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती और पैसे की उपलब्धता नहीं हो जाती, तब तक कार्यालय बंद रहेंगे, ऐसी बात बताई गई। नोटबंदी का विरोध करने वाले दलों (कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम आदि) ने 28 नवंबर को भारत बंद का आह्वान किया था।",
"बरेली का इतिहास\n१९९० के दशक का अंत होते होते नगर में कई उद्योग बन्द हो गए। अप्रैल १९९८ में इंडियन टरपेंटाइन & रोजिन फैक्ट्री (आइटीआर) और सितंबर १९९८ में नेकपुर की चीनी मिल बंद हो गई। उप्र. शुगर कारपोरेशन के अधीन इस गन्ना फैक्ट्री को वर्ष १९९६ में ही लक्ष्य से अधिक उत्पादन करने के लिए गोल्ड मेडल मिला था। १५ जुलाई १९९९ फतेहगंज पश्चिमी स्थित रबड़ फैक्ट्री भी बंद हो गई। फैक्ट्री के उत्पाद पूरे एशिया के देशों में प्रसिद्ध थे, और लगभग दो हजार लोग इस फैक्ट्री में सेवाएं दे रहे थे। सीबीगंज स्थित विमको फैक्ट्री, जहां से पूरे देश भर में माचिस की सप्लाई होती थी, वर्ष २०१४ में बंद हो गई।",
"द सेटेनिक वर्सेज़\n1998 में ईरान के एक संवादात्मक बयान के बावजूद, और रुश्दी की घोषणा कि वह छिपने में रहना बंद कर देगा, ईरानी राज्य समाचार एजेंसी ने 2006 में बताया कि फतवा स्थायी रूप से बना रहेगा क्योंकि फतवा केवल उसी व्यक्ति द्वारा बचाया जा सकता है जिसने उन्हें पहले जारी किया था, और खोमैनी की मृत्यु हो गई थी।"
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ब्रह्मांड में एक मनुष्य ने किस वस्तु को पृथ्वी से दूर से बनाया है?
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"तारायान\nसूरज के बाद, पृथ्वी का सब से निकटतम तारा प्रॉक्सिमा सॅन्टौरी है जो मित्र तारे के बहु तारा मंडल में मिलता है और हमसे ४.२४ प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। वॉयेजर प्रथम मानवों द्वारा बनाया गया सब से तेज़ गति का यान है और इसका वेग वर्तमान में प्रकाश की गति का १/१८,००० हिस्सा है (यानि १८ हज़ार गुना कम)। अगर इस गति पर मनुष्य पृथ्वी से प्रॉक्सिमा सॅन्टौरी जाने का प्रयास करें, तो उन्हें ७२,००० साल लगेंगे। इसलिए यदि मनुष्य कभी कोई तारायान बनाते हैं तो उन्हें नयी तकनीकों का आविष्कार करने की ज़रुरत है जिनकी गति वॉयेजर प्रथम से बहुत अधिक होगी। बिना इसके मनुष्यों का किसी अन्य सौर मंडल में पहुँच पाने का कोई ज्ञात ज़रिया नहीं है।"
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"खगोल शास्त्र\nदूरबीन से ब्रह्मांड को देखने पर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हम इस ब्रह्मांड के केंद्रबिंदु हैं और बाकी चीजें हमसे दूर भागती जा रही हैं। यदि अन्य आकाश गंगाओं में प्रेक्षक भेजे जाएँ तो वे भी यही पाएंगे कि इस ब्रह्मांड के केंद्र बिंदु हैं, बाकी आकाश गंगाएँ हमसे दूर भागती जा रही हैं। अब जो सही चित्र हमारे सामने आता है, वह यह है कि ब्रह्मांड का समान गति से विस्तार हो रहा है। और इस विशाल प्रारूप का कोई भी बिंदु अन्य वस्तुओं से दूर हटता जा रहा है।",
"खगोल शास्त्र\nचंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिस पर मानव के कदम पहुँच चुके हैं। इस ब्रह्मांड में सबसे विस्मयकारी दृश्य है- आकाश गंगा (गैलेक्सी) का दृश्य। रात्रि के खुले (जब चंद्रमा न दिखाई दे) आकाश में प्रत्येक मनुष्य इन्हें नंगी आँखों से देख सकता है। देखने में यह हल्के सफेद धुएँ जैसी दिखाई देती है, जिसमें असंख्य तारों का बाहुल्य है। यह आकाश गंगा टेढ़ी-मेढ़ी होकर बही है। इसका प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर है। पर प्रात:काल होने से थोड़ा पहले इसका प्रवाह पूर्वोत्तर से पश्चिम और दक्षिण की ओर होता है। देखने में आकाश गंगा के तारे परस्पर संबद्ध से लगते हैं, पर यह दृष्टि भ्रम है। एक दूसरे से सटे हुए तारों के बीच की दूरी अरबों मील हो सकती है। जब सटे हुए तारों का यह हाल है तो दूर दूर स्थित तारों के बीच की दूरी ऐसी गणनातीत है जिसे कह पाना मुश्किल है। इसी कारण से ताराओं के बीच तथा अन्य लंबी दूरियाँ प्रकाशवर्ष में मापी जाती हैं। एक प्रकाशवर्ष वह दूरी है जो दूरी प्रकाश एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड की गति से एक वर्ष में तय करता है। उदाहरण के लिए सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सवा नौ करोड़ मील है, प्रकाश यह दूरी सवा आठ मिनट में तय करता है। अत: पृथ्वी से सूर्य की दूरी सवा आठ प्रकाश मिनट हुई। जिन तारों से प्रकाश आठ हजार वर्षों में आता है, उनकी दूरी हमने पौने सैंतालिस पद्म मील आँकी है। लेकिन तारे तो इतनी इतनी दूरी पर हैं कि उनसे प्रकाश के आने में लाखों, करोड़ों, अरबों वर्ष लग जाता है। इस स्थिति में हमें इन दूरियों को मीलों में व्यक्त करना संभव नहीं होगा और न कुछ समझ में ही आएगा। इसीलिए प्रकाशवर्ष की इकाई का वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया है।",
"रेडियोधर्मी डेटिंग\nपृथ्वी न केवल मानव का अपितु अन्य लाखों प्रजातियों का भी घर है[21] और साथ ही ब्रह्मांड में एकमात्र वह स्थान है जहाँ जीवन का अस्तित्व पाया जाता है। इसकी सतह पर जीवन का प्रस्फुटन लगभग एक अरब वर्ष पहले प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिये आदर्श दशाएँ (जैसे सूर्य से सटीक दूरी इत्यादि) न केवल पहले से उपलब्ध थी बल्कि जीवन की उत्पत्ति के बाद से विकास क्रम में जीवधारियों ने इस ग्रह के वायुमंडल और अन्य अजैवकीय (abiotic) परिस्थितियों को भी बदला है और इसके पर्यावरण को वर्तमान रूप दिया है। पृथ्वी के वायुमंडल में आक्सीजन की वर्तमान प्रचुरता वस्तुतः जीवन की उत्पत्ति का कारण नहीं बल्कि परिणाम भी है। जीवधारी और वायुमंडल दोनों अन्योन्याश्रय के संबंध द्वारा विकसित हुए हैं। पृथ्वी पर वायुजीवी जीवों के प्रसारण के साथ ओजोन परत का निर्माण हुआ जो पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ हानिकारक विकिरण को रोकने वाली दूसरी परत बनती है और इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन की अनुमति देता है।[22]",
"क़ुरआन\nब्रह्मांड विज्ञान; कुरान की आयतों के शाब्दिक और प्रत्यक्ष अर्थों के अनुसार, दुनिया को अल्लाह ने सपाट बनाया था। कुरान की कथा में, अल्लाह अर्श पर बैठता है और ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है, (जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी शामिल है), उसने 6 दिनों में बनाया। इस ब्रह्मांड में देवदूत एस, दानव एस, जिन्न एस, शैतान जैसे जीव हैं। सितारों को कभी-कभी राक्षसों को बाहर निकालने के लिए पत्थरों को फेंकने के रूप में उपयोग किया जाता है \"जो समाचार चुराने के लिए आकाश में चढ़ते हैं\"। (सूरह 67: 1-5) प्रलय का दिन दृश्य भी कुरान के ब्रह्मांड और ईश्वर के मॉडल का प्रतिबिंब है। जब सर्वनाश आएगा, तारे पृथ्वी पर गिरेंगे, गर्भवती महिलाओं का गर्भपात होगा, और लोग डर के मारे भागते रहेंगे। फिर एक वर्ग स्थापित किया जाता है और भगवान को न्याय के वर्ग में लाया जाता है जो एन्जिल्स द्वारा उठाए गए सिंहासन पर होता है और अपने बछड़े को दिखाता है।(68:42)",
"गोलोक\nगर्ग संहिता के गोलोक खंड मे गोलोक का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। इस खंड की एक कथा के अनुसार जब पृथ्वी दानव, दैत्य व असुर स्वभाव के मनुष्य और दृष्ट राजाओं के दुराचार के भारी भार से दुखी होकर गौ का रूप धारण करके ब्रह्म देव के पास गई तो ब्रह्म देव ने पृथ्वी की समस्या के निवारण के लिए सभी देवताओं सहित विष्णुलोक (वैकुंठ) जाने का निर्णय किया। जब वे सब भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होने उन्हे भगवान कृष्ण के पास चलने का अनुग्रह किया। यह सुनकर की भगवान विष्णु से बड़ी भी कोई शक्ति है, सभी बहुत आश्चर्यचकित हुए, उन्होने तो आजतक येही जाना कि एक ब्रह्मांड है और उसमे त्रिमूर्ति ही परंब्रह्म भगवान हैं।वे सब ब्रह्मांड के शिरोभाग की ओर चले जिसका वामन के बाएँ पैर के अंगूठे से भेदन हो गया था, उसमे ब्रह्मद्रव्य भरा हुआ था। वे सभी जलयान से, उससे बाहर निकले। बाहर निकलने पर उन्होने देखा की ब्रह्मांड कलिंगबिम्ब (तूंबे) की भांति प्रतीत हो रहा है और इन्द्रायन फल के जैसे अनेक ब्रह्मांड इधर-उधर लुढ़क रहे हैं। वें जब करोड़ों योजन ऊपर की ओर बढ़े तो उन्होने वहाँ अत्यंत सुंदर आठ नगर देखे और विरजा नदी का सुंदर तट भी देखा। वहीं ऊपर उन्हे करोड़ों सूर्यों की ज्योति का पुंज दिखाई पड़ा, जिससे देवताओं की आँखें चौंधिया गयीं। देवताओं ने उस ज्योतिर्पुंज की, भगवान विष्णु के कहने पर, प्रार्थना की जिससे वह ज्योतिर्पुंज परम शांतिमय धाम प्रतीत होने लगा। उसमे प्रवेश करने पर उन्हे सर्वप्रथम हज़ार मुख वाले शेषनाग के दर्शन हुए। उन सभी ने शेषनाग को प्रणाम किया और आगे धाम मे प्रवेश किया। उन सबने देखा की वह स्थान अपने अंदर असीम सुख, शांति व समृद्धि अपने अंदर समेटे था, उन्हे उस धाम का कही अंत ही नहीं दिखता था। समय से परे, माया से परे, तीनों गुणो से परे, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार व समस्त 16 विकारों से भी परे उस सनातन गोलोक धाम के दर्शन करके सभी देवता मुग्ध हो गए। उन्होने ऐसा आलोकिक व अद्भुत धाम पहले कभी भी नहीं देखा था। धाम के मुख्य द्वार पर कामदेव के समान मनोहर रूप, लावण्य, शलिनी श्यामसुंदर विग्रहा, श्री कृष्ण पार्षदा द्वारपाल का काम करती थी। देवताओं ने अपना परिचय देकर उन्हे अंदर जाने की अनुमति मांगने का निवेदन किया। उन सखियों ने अंदर जाकर देवताओं के आने की बात कही तो अंदर से एक सखी, जिसका नाम शतचंद्रानना था, हाथ मे बेंतकी छड़ी लिए आयी, और देवताओं से बोली कि आप सभी किस ब्रह्मांड के निवासी हैं? तभी वो कृष्ण को सूचित करेगी। यह देखकर सभी एक दूसरे का मुख ताकने लगे और पूछा कि क्या और भी ब्रह्मांड हैं? शतचंद्रानना बोली कि क्या उन्हे नहीं पता कि विरजा नदी मे असंख्य ब्रह्मांड तैर रहे है और वो तो ऐसे बोल रहें कि उन्हे अपने ब्रह्मांड के अलावा किसी दूसरे का पता ही नहीं, ठीक गुलर के फल मे रहने वाले कीड़े कि तरह, जैसे उन्हे अपने फल के अलावा किसी दूसरे का पता ही नहीं होता। तब विष्णु ने कहा कि वे उस ब्रह्मांड से हैं जिसमे वामन के पग के अंगूठे से भेदन हो गया है और जिसमे भगवान का पृश्निगर्भ सनातन अवतार हुआ है। तब शतचंद्रानना अंदर गयी और उन्हे अंदर बुला लिया। वहाँ उन्हे गोवर्धन के दर्शन हुए जहां गोपियों द्वारा वसंत के उत्सव कि तैयारियाँ चल रही थी। कल्पवृक्ष व कल्पलताओं से सुशोभित रासमंडल अलंकृत हो रहा था । श्याम वर्ण यमुना नदी चारों और अपनी आभा बिखेर रही थी। विभिन्न पक्षियों का कलरव, भ्रमरों का भ्रमर गीत, वातावरण मे फैला सौन्दर्य, मंद-मंद बहती शीतल वायु उन सबका मन मोह रही थी। बत्तीस वनों से घिरा निज निकुंज चारदीवारी व खाइयों से अत्यंत सुंदर लग रहा था, आँगन का भाग लाल रंग वाले वटों से अलंकृत था। सात प्रकार की मणियों से बनी दीवारें तथा आँगन का फर्श शोभा पा रहा था। करोड़ों चंद्रमाओं के मण्डल की छवि जैसे चंदोवे चमक रहे थे, दिव्य पताकाएँ, खिले हुए फूल, मत्त-मयूर और कोयल का कलरव चारों दिशाओं को आनंदित कर रहा था। ये सब देख देवता आश्चर्य व आनंद से भरे जा रहे थे।",
"सौर मण्डल\nकुछ उल्लेखनीय अपवादों को छोड़ कर, मानवता को सौर मण्डल का अस्तित्व जानने में कई हजार वर्ष लग गए। बाइबल के अनुसार पृथ्वी, ब्रह्माण्ड का स्थिर केंद्र है और आकाश में घूमने वाली दिव्य या वायव्य वस्तुओं से स्पष्ट रूप में अलग है। लेकिन 140 इ. में क्लाडियस टॉलमी ने बताया (जेओसेंट्रिक अवधारणा के अनुसार) की पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में है और सारे गृह पिंड इसकी परिक्रमा करते हैं लेकिन कॉपरनिकस ने १५४३ में बताया की सूर्य ब्रह्माण्ड के केंद्र में है और सारे ग्रह पिंड इसकी परिक्रमा करते हैं। सौरमंडल सूर्य और उसकी परिक्रमा करते ग्रह, क्षुद्रग्रह और धूमकेतुओं से बना है। इसके केन्द्र में सूर्य है और सबसे बाहरी सीमा पर वरुण (ग्रह) है। वरुण के परे यम (प्लुटो) जैसे बौने ग्रहो के अतिरिक्त धूमकेतु भी आते है।",
"गुप्त ऊर्जा\nसुपरनोवा (अधिनव तारा) ब्रह्माण्ड विज्ञान के लिए उपयोगी हैं क्योंकि वे संपूर्ण ब्रह्मांड संबंधी दूरियों में उत्कृष्ट मानक बत्ती हैं। वे ब्रह्मांड के विस्तार इतिहास का मापन किसी वस्तु से दूरी एवं इसके लंबे तरंग दैर्घ्य (लाल रंग) की तरफ इसके विस्थापन के बीच संबंध की तरफ देखकर करने देते हैं, जो यह बताता है कि यह हमसे कितनी तेजी से पीछे हट रहा है। हबल के नियम के अनुसार, संबंध मोटे तौर पर रैखिक होता है। लंबे तरंग दैर्घ्य (लाल रंग) की तरफ विस्थापन की माप करना अपेक्षाकृत रूप से आसान है, लेकिन किसी वस्तु से दूरी का पता लगाना अधिक कठिन है। आमतौर पर, खगोलविद मानक बत्तियों: वस्तुएं जिनके लिए आंतरिक चमक, निरपेक्ष परिमाण, ज्ञात होता है, का उपयोग करते हैं। यह वस्तु की दूरी का मापन इसके वास्तविक रूप से देखी गई चमक, या स्पष्ट परिमाण से करने देता है। टाइप ला सुपरनोवा अपने चरम, एवं अत्यधिक संगत, चमक के कारण ब्रह्माण्ड संबंधी संपूर्ण दूरियों में सर्वोत्तम-ज्ञात मानक बत्ती हैं।",
"एण्ड्रोमेडा गैलेक्सी\n1920 में, हार्ले शॉर्पले और कर्टिस के बीच आकाश गंगा, सर्पिलाकार नेबुला और ब्रह्मांड के आयाम से संबंधित महान बहस आरंभ हो गई। महान एंड्रोमेडा नेबुला (M31) बाह्या तारापुंज था, दावे के समर्थन में कर्टिस ने हमारे तारापुंज में धुंधले बादलों से मिलती जुलती गहरी रेखाओं की बनावट देखी एवं विशेष डॉपलर शिफ्ट को देखा गया। 1922 में, अर्नेस्ट ओपिक ने M31 की दूरी के आकलन का एक बहुत ही सुंदर और सरल खगोलीय विधि प्रस्तुत की। उसने हमारे तारापुंज को एंड्रोमेडा से लगभग 450 केपीसी (किलो प्रति सेकंड) रखा, जो लगभग 1500 केएलवाई (किलो प्रकाश वर्ष) है। एडविन हूबल ने इस बहस का आरंभ 1925 में किया जब उन्होंने पहली बार M31 के खगोल चित्र के लिए आकाश गंगा के परे विभिन्न सेफेइड तारों की पहचान की। इन्हें हूकर टेलीस्कोप का उपयोग करके लिया गया था और उन्होंने महान एंड्रोमेडा नेबुला की दूरी का निर्धारण करने में सक्षम बनाया। जिसके परिणामस्वरूप उसकी माप का प्रदर्शन किया गया कि उसकी विशेषता हमारी आकाशगंगा में तारों और गैस का पुंज नहीं थी, लेकिन वह हमारी आकाशगंगा से पूरी तरह से अलग विशेष दूरी पर स्थित थी।",
"मूलाधार चक्र\nमानव के भीतर एक रहस्यमयी शक्ति निवास करती है । जो गहरे आवरण में छिपी हुई है । जो सरपरी की तरह मुलाधार चक्र में गोल घूम रही हैं । मनुष्य ने सहस्त्र वर्षो के अनुसंधान से अपनी भीतर की इस शक्ती को ढुंढ निकाला । यह शक्ति मानव के भीतर मूलाधार चक्र से लेकर मस्तिष्क तक प्रकाशित होती रहती हैं ओर यह शक्ति ब्रह्मांड से जुडी है । संपूर्ण ब्रह्मांड एक चक्र से जुडा है । जिसे सहस्त्रहार चक्र कहा जाता है । हमारे शरीर में सप्त प्रकार के सप्तचक्र होते है । एक - एक चक्र में सहस्त्र प्रकार की शक्तियां और अनेक प्रकार के अनुभव छूपे हुये है । जिन्हे शब्दों में वर्णित नहीं कर सकते । यदि साधक इस शक्ति को जागृत कर ले तो उसका जीवन बदलने लगता है ओर यह संपूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करने वाली ऊर्जा मनुष्य के भीतर धीरे - धीरे उतरने लगती हैं और साधक विराट अस्तित्व से जुडकर उसका स्वामी बनने लगता है । हमारे सप्त चक्रो में से मूलाधार चक्र एक दिव्य चक्र है । इसको जागृत करने के लिये हमें एक अच्छे गुरु के सानिध्य में इस विराट आसक्ति को जागृत करना चाहिये ।इस चक्र का अनुरूप तत्त्व पृथ्वी है।२. https://www.sahitydrshan.com/2021/05/Muladhar-chakra-in-hindi.html"
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यूरोप के अलावा, कौन सा एकमात्र महाद्वीप है जिसमें से देशों ने पुरुषों के लिए फुटबॉल विश्व कप जीता है?
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"ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में वॉलीबॉल\nब्राज़ील, संयुक्त राज्य अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ, पुरुषों की टूर्नामेंट से कई स्वर्ण पदक जीतने वाली एकमात्र टीम हैं। पुरुषों की ओलंपिक वॉलीबॉल टूर्नामेंट के शेष पांच संस्करणों में जापान, पोलैंड, नीदरलैंड, रूस और निरंतर यूगोस्लाविया सहित एक अलग देश द्वारा जीत हासिल की गई।"
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"फुटबॉल\nविश्व कप के बाद महाद्वीपीय प्रतियोगिता सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता है, जिसका आयोजन प्रत्येक महाद्वीप संघ के द्वारा होता है और जिसमें राष्ट्रीय टीमों के बीच संघर्ष/प्रतियोगिता होती है। ये हैं यूरोपीय चैंपियनशिप () (यु ई ऍफ़ ऐ) कोपा अमेरिका () (सी ओ एन एम् बी ओ एल) राष्ट्रीय अफ्रीकन कप () (सी ऐ ऍफ़), एशिया कप () (ऐ ऍफ़ सी), सी ओ एन सी ऐ सी ऐ ऍफ़ गोल्ड कप () (सी ओ एन सी ऐ सी ऐ ऍफ़) और ओ ऍफ़ सी राष्ट्रीय कप () (ओ ऍफ़ सी) क्लब फुटबॉल का सबसे सम्मानजनक प्रतियोगिता महाद्वीपीय चैंपियनशिप है, जिसमें आम तौर पर राष्ट्रीय चम्पिओनों के बीच प्रतियोगिता होती है, उदाहरण के लिए यूरोप में यु ई ऍफ़ ऐ चैंपियंस लीग () और दक्षिण अमेरिका में कोपा लिबर्ता डोर्स द अमेरिका ()। प्रत्येक महाद्वीपीय प्रतियोगिता का विजेता फीफा क्लब विश्व कप () में भाग लेता है।",
"ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में बास्केटबॉल\nसंयुक्त राज्य अमेरिका ओलंपिक बास्केटबाल में अब तक सबसे सफल देश है, जिसमें संयुक्त राज्य पुरुषों की टीमों ने 15 से 18 टूर्नामेंट जीते जिनमें उन्होंने भाग लिया, जिसमें 1936 से 1968 के सात लगातार खिताब शामिल थे। संयुक्त राज्य अमेरिका की महिलाओं की टीम ने 10 टूर्नामेंटों में से 8 खिताब जीते जिनमें से उन्होंने 1996 से 2016 तक छह राउंड में हिस्सा लिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा, अर्जेंटीना अभी भी अस्तित्व में है, जो कि पुरुष या महिला टूर्नामेंट जीता है। सोवियत संघ, यूगोस्लाविया और यूनिफाइड टीम अब मौजूद नहीं हैं, जिन्होंने टूर्नामेंट जीता है। संयुक्त राज्य अमेरिका पुरुष और महिला दोनों टूर्नामेंट में बचाव चैंपियन हैं।",
"जर्मनी राष्ट्रीय फुटबॉल टीम\nजर्मनी एकमात्र ऐसा देश है जिसने पुरुषों और महिलाओं के विश्व कप दोनों जीते हैं और 2017 कन्फेडरेशंस कप के बाद यह ब्राजील, अर्जेंटीना और फ्रांस के साथ-साथ केवल चार देशों में से एक बन गया - फीफा द्वारा मान्यता प्राप्त सभी तीन सबसे महत्वपूर्ण पुरुषों के खिताब जीतने के लिए: विश्व कप, कन्फेडरेशंस कप, और ओलंपिक टूर्नामेंट। उन्होंने अपनी संबंधित महाद्वीपीय चैंपियनशिप (अर्जेंटीना और ब्राजील के लिए कोपा अमरीका और फ्रांस और जर्मनी के लिए यूईएफए यूरोपीय चैंपियनशिप) भी जीती है।",
"उबर कप\nआजतक सिर्फ पांच देशों ने उबर कप का खिताब जीता है जिसमें चीन ने सबसे ज्यादा १३ प्रतियोगिताएँ, जापान ५, इंडोनेशिया ३, संयुक्त राज्य अमेरिका ३, और कोरिया ने १ खिताब जीता है। उबर कप आजतक दू ही महाद्वीपों एशिया और उत्तर अमेरिका में आयोजित हुई है।",
"मिलानो\nमिलान (AC मिलान) यूरोप में एकमात्र ऐसा शहर है, जिसकी टीमों ने दोनों, यूरोपीय कप (अब UEFA चैंपियंस लीग) और इंटरकांटिनेंटल कप (अब FIFA क्लब विश्व कप) जीता है। संयुक्त तौर पर नौ चैंपियंस लीग ख़िताबों के साथ, शहर द्वारा सर्वाधिक ख़िताबें जीतने के मामले में मिलान, मैड्रिड के बराबर स्तर पर है। दोनों टीमों UEFA 5-स्टार दर्जा पाने वाले, 85,700 लोगों के बैठने की व्यवस्था सहित जियुसेप मीज़ा स्टेडियम में खेलती हैं, जिसे सामान्यतः सैन सिरो के नाम से जाना जाता है। सैन सिरो, सीरी A के सबसे बड़े स्टेडियमों में से एक है। सिर्फ इंटर ही ऐसी टीम है जिसने अपना पूरा इतिहास सीरी A में बिताया है, जबकि मिलान ने शीर्ष-संघर्ष में 2 सत्रों के अलावा सभी यहीं बिताया है।",
"एशियाई फुटबॉल संघ\nएशियाई फुटबॉल संघ (एएफसी), एशिया और ऑस्ट्रेलिया में फुटबॉल एसोसिएशन का शासी निकाय है। इसके 47 सदस्य देश है, जिनमें से ज्यादातर एशियाई और ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप पर स्थित है, हालांकि इसमें यूरोप और एशिया दोनो क्षेत्र के अंतरमहाद्वीपीय देश – अज़रबाइजान, जॉर्जिया, कज़ाख़िस्तान, रूस, और तुर्की – शामिल नहीं है, इसके बजाय ये यूईएफए के सदस्य है। तीन अन्य देश – साइप्रस, आर्मीनिया और इज़राइल – जो भौगोलिक स्थिती के अनुसार एशिया के पश्चिमी किनारे पर हैं, पर ये यूईएफए के सदस्य हैं। दूसरी ओर, पूर्व में ओएफसी से जुड़े ऑस्ट्रेलिया, 2006 में एशियाई फुटबॉल संघ से जुड़ गया, और औशेयनियन के पास स्थित गुआम द्वीप, संयुक्त राज्य का एक क्षेत्र, भी एएफसी का सदस्य बन गया, इसके साथ ही संयुक्त राज्य के दो राष्ट्रमंडल देशों मे से एक उत्तरी मारियाना द्वीप, भी इसका सदस्य है। हॉन्ग कॉन्ग और मकाउ जोकि, हालांकि स्वतंत्र देश (दोनों चीन के विशेष प्रशासनिक क्षेत्र कहलाते है।) नहीं है, फिर भी एएफसी के सदस्य हैं।",
"यूनाइटेड किंगडम\nअंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड अलग देशों के रूप में मुकाबला करते हैं और इसके परिणाम स्वरुप, ओलंपिक खेलों के फुटबॉल खेल में UK एक टीम की तरह मुकाबला नहीं करता है। UK की एक टीम को 2012 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भाग दिलवाने का प्रस्ताव है लेकिन स्कॉटिश, वेल्श और उत्तरी आयरलैंड के फुटबॉल संघों ने भाग लेने से मना कर दिया है, डरते हुए की उनका स्वतंत्र दर्जा कम हो जाएगा - FIFA के अध्यक्ष सेप्प ब्लैट्र द्वारा इस डर की पुष्टि की गई। गृह राष्ट्रों में इंग्लैंड सबसे सफल रहा है, 1966 में अपनी मात्र भूमि में विश्व कप जीता, हलाँकि इतिहास में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच निकट प्रतिद्वंद्विता रही है।",
"2019 प्रशांत खेलों में क्रिकेट-पुरुषों का टूर्नामेंट\nटीम के पुरुष टूर्नामेंट में शामिल मेजबान राष्ट्र समोआ, पापुआ न्यू गिनी, वानुअतु और न्यू कैलेडोनिया थे। टोंगा और कुक द्वीपों को मूल रूप से शामिल किया गया था, लेकिन वापस ले लिया गया और न्यू कैलेडोनिया द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। न्यू कैलेडोनिया से जुड़े मैचों में टी20ई की स्थिति नहीं थी क्योंकि वे आईसीसी के एसोसिएट सदस्य नहीं थे।",
"उबर कप\n, इस प्रतियोगिता के इतिहास के फ़ाइनल चरण में पहुंचने वाले कुल २१ देश हैं। एशिया के सबसे ज्यादा १० देश हैं और यूरोप के ६। अमेरिका और ओसेनिया के दो दो व अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका ने फ़ाइनल खेलने के लिये योग्यता पाई।"
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एलुमिना का विद्युत अपघटन करने पर एनोड पर कौन सी गैस जमा होती है?
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"एनोडीकरण\nएनोडीकरण (Anodizing या anodising) एक प्रक्रिया है जिसमें विद्युत-धारा का उपयोग करके किसी धातु के सतह पर स्थित प्राकृतिक आक्साइड के स्तर को और अधिक मोटा किया जाता है। एनोडिकरण ( Anodizing ) एल्युमीनियम की धातु के पृष्ठभाग पर हवा की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया होने से प्राकृतिक रूप से एक संरछक परत निर्मित होती है ।एनोडीकरण प्रक्रिया दवारा यह परत वांछित मोटाई की बनाई जा सकती है ।विद्युत अपघटन ।उदधति का उपयोग करके एनोडीकरण किया जाता है ।विद्युत अपघटन सेल में तनु अम्ल लेकर उसमें एल्युमीनियम की वस्तु को धनाग्र के रूप में डुबाते हैं ।विद्युत प्रवाह शुरू करने पर ऋणाग्र के पास हाइड्रोजन गैस तो धनाग्र के पास आक्सीजन गैस मुक्त होती है ।ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया होने से एल्युमीनियम वस्तु रूपी धनाग्र पर हाइड्रेटेड एल्युमीनियम ऑक्साइड की परत तैयार होती है ।इस बीच सेल में रंग डालकर इस परत को आकर्षक बनाया जा सकता है ।"
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"विद्युत-धातुकर्म विज्ञान\nवैद्युत परिष्करण विधि से उत्तम तथा उच्च कोटि की शुद्धता की धातु प्राप्त की जाती है। जिस धातु को शुद्ध करना होता है, उसे लवणीय अथवा अम्लीय विलयन में उपयुक्त आकार का ऐनोड, तथा उसी की शुद्ध निक्षिप्त धातु का कैथोड बनाकर लटका देते हैं। विद्युत्-अपघटन द्वारा बहुत ही शुद्ध धातु कैथोड पर लेप के रूप में प्राप्त हो जाती है। बहुमूल्य धातुओं की अशुद्ध ऐनोड से उपलब्धि, साधारण वैद्युत्परिष्करण कला में, एक महत्वपूर्ण गौण परिष्करण है। बहुधा ताँबा, विस्मथ, सोना, चाँदी, सीसा और राँगा जलीय विलयन विद्युत् अपघटन से शुद्ध किए जाते हैं।",
"जल (अणु)\nजल में एक विद्युत प्रवाह को प्रवाहित करने के माध्यम से, जल को उसके घटक तत्वों, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को विद्युत अपघटन कहा जाता है। जल के अणु स्वाभाविक रूप से, और आयनों में अलग हो जाते हैं, जो क्रमशः, कैथोड और एनोड की ओर आकर्षित होते हैं। कैथोड पर, दो आयन, इलेक्ट्रॉनों को लेते हैं और गैस का निर्माण करते हैं। एनोड पर, चार आयन संयुक्त होते हैं और गैस, आणविक जल और चार इलेक्ट्रॉनों को छोड़ते हैं। गैसें सतह पर बुलबुले बनती है जहां पर इसे एकत्र किया जा सकता है। जल विद्युत अपघटन सेल की मानक क्षमता 25 डिग्री सेल्सियस पर 1.23 V है।",
"विद्युतधातुकर्म\nवैद्युत् प्राप्ति वह विधि है जिसमें वैद्युत परिष्करण विधि से उत्तम तथा उच्च कोटि की शुद्धता की धातु प्राप्त की जाती है। जिस धातु को शुद्ध करना होता है, उसे लवणीय अथवा अम्लीय विलयन में उपयुक्त आकार का ऐनोड, तथा उसी की शुद्ध निक्षिप्त धातु का कैथोड बनाकर लटका देते हैं। विद्युत्-अपघटन द्वारा बहुत ही शुद्ध धातु कैथोड पर लेप के रूप में प्राप्त हो जाती है। बहुमूल्य धातुओं की अशुद्ध ऐनोड से उपलब्धि, साधारण वैद्युत्परिष्करण कला में, एक महत्वपूर्ण गौण परिष्करण है। बहुधा ताँबा, विस्मथ, सोना, चाँदी, सीसा और राँगा जलीय विलयन विद्युत् अपघटन से शुद्ध किए जाते हैं।",
"सोना\nऊपर बताई क्रियाओं से प्राप्त स्वर्ण में अपद्रव्य उपस्थित रहते हैं। इसके शोधन की आधुनिक विधि विद्युत् अपघटन पर आधारित है। इस विधि में गोल्ड क्लोराइड को तनु (dilute) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में विलयित कर लेते हैं। विलयन में अशुद्ध स्वर्ण के धनाग्र और शुद्ध स्वर्ण के ऋणाग्र के बीच विद्युत् प्रवाह करने पर अशुद्ध स्वर्ण विलयित हो ऋणाग्र पर जम जाता है।",
"अवशोषण प्रशीतक\nइस यंत्र की कार्यप्रणाली चित्र द्वारा समझाई गई है। जनित्र (जेनेरेटर) (क) में अमोनिया का सांद्र (कांसेंट्रेटेड) जलीय (ऐकुअस) घोल भरा होता है और ज्वालक से या भाप की नलियों से इसको गरम किया जाता है। घोल में से अमोनिया गैस निकलकर संघनित्र (ख) में डूबी सर्पिल में से जाती है। (ख) में शीतल पानी निरंतर प्रवाहित होता रहता है। अत: सर्पिल में गैस स्वयं अपनी ही दाब से संघनित हो जाती है। यह द्रव एक सँकरे नियामक (रेगुलेटिंग) वाल्व (च) के मार्ग से शीत संग्रहागार (कोल्ड स्टोरेज) (ग) में रखी सर्पिल में प्रवेश करता है जिसमें निम्न दाब के कारण द्रव वाष्पित हो जाता है। वाल्व (ब) को इस तरह से समायोजित (ऐडजस्ट) किया जाता है कि उसके दोनों सिरों के बीच दाब का अभीष्ट अंतर बना रहे। शीतसंग्रहागार (ग) में से नमक का घोल प्रवाहित होता रहता है, जो सर्पिल में अमोनिया के वाष्पन से शीतल होता जाता है और फिर कहीं भी जाकर प्रशीतन का काम करता है।",
"एनोड किरणें\nबहुत कम दाब पर किसी गैस नलिका में विद्युता विसर्जन करने पर कैथोड किरणों की उत्पत्ति होती है। ये कैथोड किरणें इलेक्ट्रॉनों की धाराएँ मात्र हैं, यह तथ्य फैराडे और क्रुक्स ने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही ज्ञात कर लिया था और इसकी भली प्रकार पुष्टि कर ली थी। अत्यंत तीव्र विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में इलेक्ट्रॉन गैसीय परमाणुओं से विलग हो जाते हैं और तत्काल प्रबल वेग से धनाग्र की ओर भागते हैं। तेज पलायन के क्रम में वे गैस के उदासीन परमाणुओं से टकराते हैं और उनके एक एक इलेक्ट्रॉन को भी मुक्त कर देते हैं। इस प्रकार मुक्त होनेवाले इलेक्ट्रॉन भी अपने मुक्तिदाता इलेक्ट्रॉनों की भाँति बड़े वेग से धनाग्र की ओर भागते हैं और इन्हीं के प्रवाह से कैथोड किरणों की सृष्टि होती है।",
"अलिंद विकम्पन\nसामान्य के हृदय प्रणाली विद्युत प्रवाहकत्त्व दिल की अनुमति देता है आवेग का यह है कि उत्पन्न द्वारा सिनोअत्रिअल एसए नोड नोड दिल होना प्रचारित की मांसपेशी और म्योकार्दियम प्रोत्साहित जब म्योकार्दियम प्रेरित है, यह अनुबंध यह म्योकार्दियम कि दिल के कुशल संकुचन की अनुमति देता का आदेश दिया उत्तेजना है, जिससे शरीर की अनुमति रक्त पंप करने के लिए किया जा करने के लिए",
"एन्टेना\nप्रसारणके लिए जब रेडियो ट्रांसमीटर में जब रेडियो तरंग अर्थात विद्युत चुंबकीय तरंगे पैदा करने के लिए विद्युत धारा को प्रवाहित किया जाता है तब एंटीना में लगा धातु इस विद्युत ऊर्जा को विद्युत चुम्बकीय तरंगो के रूप में उत्सर्जित करता है।",
"प्रशीतित्र\nअवशोषण के सिद्धांत पर चलनेवाले प्रशीतित्रों में अमोनिया गैस ठंडे पानी में सरलता से घुल जाती है और पानी के गरम होने पर सरलता से निकल भी जाती है। अत: पानी को गरम करने के लिये तेल या गैस की ज्वाला का प्रयोग किया जाता है। पानी से अलग होने पर अमोनिया गैस सघनन कुंडलियों में जाकर द्रवित हो वाष्पित्र में बह आती है, जहाँ हाइड्रोजन के माध्यम से संघनित्र की दाब इतनी कम हो जाती है कि वह द्रव फिर से वाष्पित होने लगता है। फिर, वाष्पित्र से हाइड्रोजन और अमोनिया गैस का मिश्रण अवशोषक प्रकोष्ठ में ज्योंही पहुँचता है, उसमें पानी की एक बारीक फुहार मिलती है। इससे अमोनिया गैस तो पानी में घुल जाती है तथा पानी में अविलेय हाइड्रोजन वाष्पित्र में वापस लौट जाता है। इधर अमोनियम हाइड्रॉक्साइड वाष्पजनित्र में आकर क्रियाचक्र को पुन: चालू कर देता है। इस प्रकार के यंत्र में गरमी और ठंडक का आदान प्रदान निरंतर होते रहने के कारण इसकी बनावट तो बड़ी ही पेचीदा हो जाती है, लेकिन यंत्र की कार्यक्षमता अच्छी रहती है।"
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भारत में द्वितीय अधिकतम जनजातीय आबादी कहाँ है?
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"आदिवासी (भारतीय)\nभारत में आदिवासियों को प्रायः 'जनजातीय लोग' के रूप में जाना जाता है। आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि में बहुसंख्यक व गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक है जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों में यह बहुसंख्यक हैं, जैसे मिजोरम। भारत सरकार ने इन्हें भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में \" अनुसूचित जनजातियों \" के रूप में मान्यता दी है। अक्सर इन्हें अनुसूचित जातियों के साथ एक ही श्रेणी \" अनुसूचित जाति एवं जनजाति \" में रखा जाता है।"
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"माओवाद\nभारत में एक बड़ी आबादी जनजातीय समुदाय की हैं लेकिन इसे मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर आज तक नहीं मिला हैं आज भी सबसे धनी संसाधनों वाली धरती झारखंड तथा उडीसा के जनजातीय समुदाय के लोग निर्धनता और एकाकीपन के पाश में बंधे हुए हैं।",
"झारखंड का पर्यटन\nझारखंड के संथाल भारत के सबसे प्राचीनतम जनजातियों में से है। यह आदिवासी वर्ग उनके संगीत, नृत्य और रंगबिरंगे पोशाक के लिए जाना जाता है। झारखंड में जनजातीय पर्यटन की यात्रा संथाल के विभिन्न गांवों में और छोटानागपुर पठार में कर सकते हैं। संथाल के किसी गांवों में यात्रा करके बांस हस्तशिल्प और अन्य रंगबिरंगे हस्तनिर्मित वस्त्र को भी खरीद सकते हैं। आदिवासी समुदाय के मेलों और त्यौहारों में भी आपको उनके सामाजिक जीवन की झलक मिलेगी | सबसे प्राचीन जनजातीय समुदायों में से एक है, ये अपने सदियों पुरानी \" लोहे के प्रगालन \" कौशल के लिए जाने जाते हैं। पुरुष और महिलाएं साथ मिलकर काम करते है, साथ मिलकर खाते हैं, एक साथ वंश की देखभाल करते हैं और रोटी कमाने के लिए संघर्ष करते हैं और अपने परिवार के साथ रहते है। श्रम का विभाजन अद्वितीय है सामाजिक, आर्थिक एकता भी है। तथाकथित आधुनिक समाज को इन लोगों से बहुत कुछ सीखना चाहिए। एक अन्य ऑस्ट्रो-एशियाई जाति की आबादी के अनुसार झारखण्ड में तीसरा स्थान है। इतिहास बताता है कि वे यहाँ पश्चिमी भागों से पलायन से आये हैं। मुंडा महिलाएं आभूषण के बहुत शौकीन हैं।",
"भारत की जनसांख्यिकी\nऐसा अनुमान है कि विश्व के सबसे जनाकुल राष्ट्र के रूप में भारत चीन को 2030 तक लाँघ लेगा। भारत की जनसंख्या वृद्धि ने इन चिन्ताओं को जन्म दिया है कि इससे व्यापक बेरोज़गारी और राजनीतिक अस्थिरता फैलेंगी। ध्यान रखें कि ये अनुमान, भविष्य की प्रजनन और मृत्यु दरों के बारे में कल्पनाएँ करते हैं, जो घटनास्वरूप सही नहीं भी हो सकते हैं। प्रजनन दर भी क्षेत्रानुसार भिन्न-भिन्न हैं; कुछ राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं तो कुछ नीचे।",
"जनजाति\nइस समय भारत में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 700 से ऊपर है। किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने के आधार हैं-",
"भारत की जनगणना २०११\nजनसंख्यकी से अनंतिम आंकड़ों को 31 मार्च 2011 को जारी किया गया। सम्पूर्ण रिपोर्ट के वर्ष 2012 में जारी किये जाने की उम्मीद है। जनसंख्या का कुल लिंग अनुपात 2011 में प्रत्येक 1,000 पुरुषों के लिए 944 महिलाओं की है। भारत में ट्रांसजेंडर(तीसरे लिंग) की आधिकारिक संख्या 4.9 लाख है। छह सबसे अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में आधी से अधिक आबादी निवास करती है। 1.21 अरब भारतीयों में से 833 मिलियन (68.84%) ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं जबकि 377 मिलियन शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। भारत में 453.6 मिलियन लोग प्रवासी हैं, जो कुल आबादी का 37.8% है। भारत हिंदू, इस्लाम धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म और जैन धर्म जैसे प्रमुख विश्वास प्रणालियों की मातृभूमि है, जबकि कई स्वदेशी धर्मों और आदिवासी धर्मों के घर भी हैं जो सदियों से प्रमुख धर्मों के प्रभाव से बच गए हैं। २०११ की जनगणना के अनुसार, भारत में कुल परिवारों की संख्या २४.4 of करोड़ है, जिनमें २०.२४ करोड़ हिंदू हैं, ३.१२ करोड़ मुसलमान हैं, ६.३ करोड़ ईसाई हैं, ४.१ करोड़ सिख हैं और १.९ करोड़ जैन हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 30.1 लाख पूजा स्थल हैं।",
"भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची जनसंख्या अनुसार\nभारत एक संघ है, जो २8 राज्यों एवं 8 केन्द्र शासित प्रदेशों से बना है। यहां की २००८ की अनुमानित जनसंख्या 1 अरब 13 करोड़ के साथ भारत विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनाकीर्ण देश बन गया है। इससे पहले इस सूची में बस [चीन] ही आता है। भारत में विश्व की कुल भूमि का २.४% भाग ही आता है। किंतु इस २.४% भूमि में विश्व की जनसंख्या का १६.९% भाग रहता है। भारत के गांगेय-जमुनी मैदानी क्षेत्रों में विश्व का सबसे बड़ा ऐल्यूवियम बहुल उपत्यका क्षेत्र आता है। यही क्षेत्र विश्व के सबसे घने आवासित क्षेत्रों में से एक है। यहां के दक्खिन पठार के पूर्वी और पश्चिमी तटीय क्षेत्र भी भारत के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में आते हैं। पश्चिमी राजस्थान में थार मरुस्थल विश्व का सबसे घनी आबादी वाला मरुस्थल है। हिमालय के साथ साथ उत्तरी और पूर्वोत्तरी राज्यों में शीत-शुष्क मरुस्थल हैं, जिनके साथ उपत्यका घाटियां हैं। इन राज्यों में अदम्य आवासीय स्थितियों के कारण अपेक्षाकृत कम घनत्व है।",
"भारत के अनुसूचित जनजातियों की सूची\nस्वायत्त जिलों में बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद, कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कछार हिल्स जिले शामिल हैं।अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, १९७६ के अनुसार। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, १९७६ के अनुसार और २००० के अधिनियम २८ द्वारा डाला गया है। संविधान (दादरा और नगर हवेली) अनुसूचित जनजाति आदेश, १९६२ के अनुसार। संविधान (गोवा, दमन और दीव) अनुसूचित जनजाति आदेश, १९६८ के अनुसार और १९८७ के अधिनियम १८ द्वारा डाला गया है। संविधान (गोवा, दमन और दीव) अनुसूचित जनजाति आदेश, १९६८ के अनुसार और १९८७ के अधिनियम १८ द्वारा डाला गया है। इस सूची को जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित तीन को जोड़ने के लिए अद्यतन किया गया है।",
"सिक्किम\n५,४०,४९३ की जनसंख्या के साथ सिक्किम भारत का न्यूनतम आबादी वाला राज्य है, जिसमें पुरुषों की संख्या २,८८,२१७ है और महिलाओं की संख्या २,५२,२७६ है। सिक्किम में जनसंख्या का घनत्व ७६ मनुष्य प्रतिवर्ग किलोमीटर है पर भारत में न्यूनतम है। विकास दर ३२.९८% है (१९९१-२००१)। लिंगानुपात ८७५ स्त्री प्रति १००० पुरुष है। ५०,००० की आबादी के साथ गंगटोक सिक्किम का एकमात्र महत्तवपूर्ण शहर है। राज्य में शहरी आबादी लगभग ११.०६% है। प्रति व्यक्ति आय ११,३५६ रु० है, जो राष्ट्र के सबसे सर्वाधिक में से एक है।",
"भारत के लोग\nभारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बडी जनसंख्या वाला देश है। भारत की विभिन्नताओं से भरी जनता में भाषा, जाति और धर्म, सामाजिक और राजनीतिक संगठन के मुख्य शत्रु हैं। मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई भारत के सबसे बड़े महानगर हैं। भारत में ६४.८ प्रतिशत साक्षरता है जिसमे से ७५.३ % पुरुष और ५३.७% स्त्रियाँ साक्षर है। लिंग अनुपात की दृष्टि से भारत में प्रत्येक १००० पुरुषों के पीछे मात्र ९३३ महिलायें है। कार्य भागीदारी दर (कुल जनसंख्या मे कार्य करने वालों का भाग) ३९.१% है। पुरुषों के लिये यह दर ५१.७% और स्त्रियों के लिये २५.६% है। भारत की १००० जनसंख्या में २२.३२ जन्मों के साथ बढती जनसंख्या के आधे लोग २२.६६ वर्ष से कम आयु के हैं।"
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शुष्क सेल मे किस तरह की ऊर्जा विधुत होती है?
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"शुष्क सेल\nशुष्क सेल (dry cell) एक प्रकार के विद्युतरासायनिक सेल है जो कम बिजली से चल सकने वाले पोर्टेबल विद्युत-युक्तियों (जैसे ट्रांजिस्टर रेडियो, टार्च, कैलकुलेटर आदि) में प्रयुक्त होते हैं। इसके अन्दर जो विद्युत अपघट्य (electrolyte) उपयोग में लाया जाता है वह लेई-जैसा कम नमी वाला होता है। इसमें किसी द्रव का प्रयोग नहीं किया जाता जिसके कारण इसे \"शुष्क\" सेल कहा जाता है। (कार आदि में प्रयुक्त बैटरियों में प्रयुक्त विद्युत अपघट्य द्रव के रूप में होता है।) चूंकि इसमें कुछ भी चूने (लीक) लायक द्रव नहीं होता, पोर्टेबल युक्तियों में इसका उपयोग सुविधाजनक होता है।",
"गैल्वानी सेल\nजिस सेल से वैधुत ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है उसे गैल्वैनी सेल कहते हैं। [[गैल्वैनी सेल में रासायनिक ऊर्जा का वैधुत ऊर्जा में परिवर्तन होता है। इस सेल का आविष्कार सन 1799 ईस्वी में इन जिलों बोल्ट ने किया।"
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"वैद्युत-रासायनिक सेल\nउन सभी युक्तियों को वैद्युत-रासायनिक सेल (electrochemical cell) कहते हैं जो रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं या जिनमें विद्युत ऊर्जा देने से उनके अन्दर रासायनिक अभिक्रिया होने लगती है या उसकी गति बढ़ जाती है। 1.5-वोल्ट का शुष्क सेल इसका एक सर्वसामान्य उदाहरण है। कई सेलों को श्रेणीक्रम या समान्तर क्रम में जोड़ने से बैटरी बनती है। वाहनों की १२ वोल्ट की बैटरी इसका आम उदाहरण है।",
"शुष्क सेल\nसामान्यत: प्रयोग में आने वाला शुष्क सेल वस्तुत: एक जिंक-कार्बन बैटरी होती है जिसे शुष्क लेक्लांची सेल (Leclanché cell) भी कहते हैं। इसकी सामान्य स्थिति (बिना धारा की स्थिति में) में वोल्टता १.५ वोल्ट होती है जो कि अल्कलाइन बैटरी के सामान्य वोल्टता के बराबर ही है। जहाँ १.५ वोल्ट से अधिक वोल्टेज की जरूरत होती है वहाँ कई ऐसे सेल श्रेणी क्रम (series) में जोड़ दिये जाते हैं। (३ सेल श्रेणी क्रम में जोड़ने पर ४.५ वोल्ट देते हैं; ९ वोल्ट की बहुप्रचलित बैटरी में ६ कार्बन-जिंक या अल्कलाइन-सेल सीरीज में जुड़े होते हैं)। इसी तरह जहाँ अधिक धारा की आवश्यकता होती है वहाँ कई सेलों को समान्तर क्रम (parallel) में जोड़ दिया",
"सौर सेल\nसौर बैटरी या सौर सेल फोटोवोल्टाइक प्रभाव के द्वारा सूर्य या प्रकाश के किसी अन्य स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करता है। अधिकांश उपकरणों के साथ सौर बैटरी इस तरह से जोड़ी जाती है कि वह उस उपकरण का हिस्सा ही बन जाती जाती है और उससे अलग नहीं की जा सकती। सूर्य की रोशनी से एक या दो घंटे में यह पूरी तरह चार्ज हो जाती है। सौर बैटरी में लगे सेल प्रकाश को समाहित कर अर्धचालकों के इलेक्ट्रॉन को उस धातु के साथ क्रिया करने को प्रेरित करता है। एक बार यह क्रिया होने के बाद इलेक्ट्रॉन में उपस्थित ऊर्जा या तो बैटरी में भंडार हो जाती है या फिर सीधे प्रयोग में आती है। ऊर्जा के भंडारण होने के बाद सौर बैटरी अपने निश्चित समय पर डिस्चार्ज होती है। ये उपकरण में लगे हुए स्वचालित तरीके से पुनः चालू होती है, या उसे कोई व्यक्ति ऑन करता है।",
"सौर सेल\nबेहद छोटे उपकरणों जैसे परिकलक में भी सौर बैटरियों का प्रयोग है, लेकिन उनमें लगी बैटरियां काफी छोटी होती हैं और अधिक ऊर्जा संग्रहित नहीं कर पातीं। फिर भी यह ऊर्जा प्रवाह के लिये प्रायः प्रयोगनीय तरीके जैसे तारों आदि से छुटकारा दिलाती हैं। अतः इस अर्थ में ये बेहतर है। विज्ञान पत्रिका साइंस-डेली में छपी रिपोर्ट के अनुसार स्वानसी विश्वविद्यालय के डेव वर्सली लचीले इस्पात के सतह को रंगने का तरीका ढूंढ रहे हैं। इससे वर्तमान सौर सेलों की तुलना में कई गुना ज्यादा ऊर्जा का उत्पादन हो सकता है। दक्षिण फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक सेंटीमीटर से भी छोटा सौर सेल बनाया है। इन्हें या पॉलीमर सेल भी कहते हैं। इन २० सेलों को कतारबद्ध कर एक इकाई में जोड़ा जा सकता है, जो छोटी सूक्ष्मदर्शी मशीनों को उर्जा प्रदान कर सकती है। पारम्परिक सौर सेल सिलिकॉन से बनाए जाते हैं लेकिन ये नेनो सौर सेल कार्बनिक पॉलीमर से बनाए गए हैं जिनके विद्युत गुण सिलिकॉन जैसे ही होते हैं। इनका प्रमुख लाभ ये है कि इन्हे किसी भी पदार्थ पर छिड़का जा सकता है, यानि कि कार की छत पर भी इस पॉलीमर का छिडकाव कर इस तरह के सौर सेल चिपकाए जा सकते है। इस समय इस तरह के सेल ७ वॉट विद्युत पैदा कर सकते हैं। वैज्ञानिक प्रयासरत हैं कि इनकी क्षमता को और बढाया जा सके जिससे भविष्य में ऐसे सेलों का अधिकाधिक उपयोग किया जा सके।",
"बहुसंधीय प्रकाश वोल्टीय सेल\nबहुसंधीय प्रकाश वोल्टीय सेल (मल्टीजंक्शन फोटोवोल्टाइक सेल) ऐसे सौर सेल हैं जिनमें एक से अधिक पी-एन जंक्शन (संधियाँ) होते हैं जो अलग-अलग अर्धचालक पदार्थों से बने होते हैं।अलग-अलग पदार्थों के पी-एन जंक्शन अलग-अलग तरंगदैर्घ्य के प्रकाश के प्रति संवदनशील होते हैं। अतः बहुसंधीय प्रकाश वोल्टीय सेल से लाभ यह है कि यह एक विस्तृत तरंगदैर्घ्य वाले प्रकाश को विद्युत ऊर्जा में बदलने का कार्य अधिक दक्षता से करता है।एक संधि वाले परम्परागत प्रकाश वोल्टीय सेलों की अधिकतम सैद्धान्तिक दक्षता ३४% होती है जबकि बहुसंधीय प्रकाश वोल्टीय सेल की अधिकतम दक्षता 86.8% तक हो सकती है।",
"विद्युत्-रसायन\nरासायनिक क्रियाओं में साधारणतया ऊष्मा परिवर्तन, ऊष्मा का निष्कासन, या ऊष्मा का अवशोषण होता है, पर कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में रासायनिक क्रियाओं से विद्युत् ऊर्जा का भी उत्पादन हो सकता है। रासायनिक ऊर्जा के विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तन का अच्छा उदाहरण प्राथमिक सेल और बैटरियाँ हैं। शुष्क बैटरियाँ भी इसी सिद्धांत पर बनी हैं। विद्युत् रासायनिक परिवर्तनों में विद्युत् प्रवाह से सोडियम और क्लोरीन में विघटित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप हमें दाहक सोडा, हाइड्रोजन और क्लोरीन प्राप्त होते हैं। वे तीनों ही उत्पाद औद्योगिक दृष्टि से बड़े महत्व के हैं।",
"प्रकाश का वेग\nघूमनेवाले दंतुरचक्र जैसा ही कर सेल एक वैद्युत प्रकाशिक कपाठ है। कर सेल में एक काँच के पात्र में धातु की दो समांतर पट्टियों के बीच में नाइट्रोबेंजीन द्रव भरते हैं। इसके दोनों ओर दो निकल (nicol) प्रिज्म इस स्थिति में रखते हैं कि सेल में से किरणें निकल नहीं सकती। किंतु यदि पहियों पर वैद्युत विभव लगाया जाए, तो द्रव में द्विवर्तन उत्पन्न होगा और अब निकल में से प्रकाश आ सकेगा। यदि उच्च आवृत्तिवाला वैद्युत विभव लगाया जाय, तो सेल प्रकाश को अधिकतम विभव पर जाने देगा और शून्य विभव पर रोक देगा। यदि प्रत्यावर्ती क्षेत्र की आवृत्ति 108 हो तो 2' 108 बार प्रति सेकंड प्रकाश रुकेगा एवं जा सकेगा।",
"ईंधन सेल\nयदि शुद हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन के रूप में होता है तो फ्यूल सेल उप उत्पाद के रूप में ऊष्मा एवं जल का उत्सर्जन करता है। फ्यूल सेल दिष्ट धारा के रूप मे विहात उत्पादन करते है।"
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अगर किसी मिश्रधातु में एक धातु पारद है तो इसे क्या कहते हैं?
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"पारा\nपारद श्वेत रंग की चमकदार द्रव धातु है, जिसके मुख्य भौतिक गुणधर्म निम्नांकित हैं : पारद अनेक धातुओं से मिलकर मिश्रधातु बनाता है, जिन्हें अमलगम (amalgam) कहते हैं। सोडियम तथा अन्य क्षारीय धातुओं के अमलगम अपचायक (reducing agent) होने के कारण अनेक रासायनिक क्रियाओं में उपयोगी सिद्ध हुए हैं।",
"संलय\nपारा तथा अन्य किसी धातु की मिलावट से बनी मिश्रधातु को संलय या संरस (amalgam) कहते हैं। केवल लोहे को छोड़कर प्राय: सभी धातुएँ पारे के साथ मिलकर मिश्रधातु बनाती हैं। कुछ समय पूर्व संरसों का व्यवहार स्वर्ण, चाँदी, जस्ता जैसी धातुओं में किया जाता था। दाँत के डाक्टरों द्वारा खोखले दाँत भरने के लिये भी संरसों का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है, किंतु अब अन्य अधिक उपयोगी साधनों के सुलभ होने के कारण संरसों का उपयोग कम होता जा रहा है।"
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"मिश्रातु\nसब मिश्रधातुओं को साधारणतया लौह तथा अलौह मिश्रधातुओं में विभाजित किया गया है। जब मिश्रधातु में लोहा आधार धातु रहता है, तब वह लौह तथा जब आधार धातु कोई अन्य धातु होती है, तब वह अलौह मिश्रधातु कहलाती है।",
"मिश्रातु\nधातुएँ जब किसी सामान्य विलयन, जैसे अम्ल, में घुलती है तब वे अपने धात्विक गुणों को छोड़ देती हैं और साधारणतया लवण बनाती हैं, किंतु पिघलाने पर जब वे परस्पर घुलती हैं तब वे अपने धात्विक गुणों के सहित रहती हैं। धातुओं के ऐसे ठोस विलयन को मिश्रधातु कहते हैं। अनेक मिश्रधातुओं में अधातुएँ भी अल्प मात्रा में होती हैं, किंतु संपूर्ण का गुण धात्विक रहता है। अत: 1939 ई0 में अमरीका वस्तु परीक्षक परिषद् ने मिश्रधातु की निम्नलिखित परिभाषा की- प्रारंभ में मिश्रधातु का अधिकतम उपयोग सिक्कों और आभूषणों के बनाने में होता था। ताँबे के सिक्कों में ताँबा, टिन और जस्ता क्रमश: 95/4 तथा 1 प्रतिशत रहते हैं। सन् 1920 तक इंग्लैंड में चाँदी के सिक्के, 'स्टर्लिंग' चाँदी के बनाए जाते थे, जिसमें चाँदी और ताँबा क्रमश: 92.5 और 7.5 प्रतिशत होते थे। अमरीका में चाँदी के सभी सिक्कों में चाँदी और ताँबा क्रमश: 90 तथा 10 प्रतिशत होते हैं। इंग्लैंड के सोने के सिक्कें में सोना और ताँबा क्रमश: 91.67 और 8.33 प्रतिशत होते हैं और अमरीका के सोने के सिक्कों में सोना 90 प्रतिशत तथा शेष अन्य धातुएँ, विशेषकर ताँबा रहता है। प्लैटिनयम, सोना तथा चाँदी के आभूषणों के रंगो में सुंदरता लाने के लिये उनको कठोर, मजबूत तथा टिकाऊ बनाने के लिये, या उन्हें सस्ते मूल्यों में विक्रय के लिये दूसरी धातुओं के साथ मिलाकर काम में लाते हैं।",
"मिश्रातु\nयह निश्चय करना कि मिश्रधातुएँ साधारण मिश्रण हैं या रासायनिक यौगिक, एक जटिल समस्या है। कुछ अर्थों में ये रासायनिक यौगिक हैं, क्योंकि जब सोडियम सरस बनाया जाता है, तब सोडियम के हर एक टुकड़े को पार में डालने से प्रकाश की तीव्र ज्वाला निकलती है और पारा गरम हो जाता है, यह यौगिक बनने का लक्षण है। इसी प्रकार पिघलते हुए सोने में जब ऐल्युमिनियम धातु का एक टुकड़ा डालते हैं, तब इतनी अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है कि संपूर्ण पिघली हुई धातु उज्जवल प्रकाशमय हो जाती है। अनेक मिश्र धातुओं का रंग अपने अवयव धातुओं के रंगों से बिल्कुल भिन्न होता है। उदाहरणार्थ, चाँदी और जस्ता दोना श्वेत रंग के होते हैं, किंतु इनसे जो मिश्रधातु बनती है उसका रंग अति सुंदर गुलाबी होता है। सोना पीला और ऐल्युमीनियम श्वेत होता है, किंतु इनकी मिश्रधातु का रंग अति चमकीला नीललोहित होता है। यह गुण भी यौगिकों का है।",
"मिश्रातु\nइस प्रकार की मिश्रधातुओं में अवयव धातुएँ जब पिघली हुई होती हैं, तब वे एक दूसरे में घुली हुई रहती हैं, किंतु ठोस होने पर धातुओं के क्रिस्टल अलग-अलग हो जाते हैं, अर्थात् धातुएँ परस्पर अविलेय हैं। इस प्रकार मिश्रधातु प्रत्येक अवयव धातु के शुद्ध क्रिस्टल का मिश्रण होती है और ठंडा करने पर कोई एक अवयव धातु ठोस रूप में पृथक् हो जाती है। उदाहरणार्थ, एक तरल मिश्रधातु, जिसमें मात्रानुसार 10 भाग सीसा और 90 भाग टिन होते हैं, जब ठंडी की जाती है तब शुद्ध टिन के क्रिस्टल प्रथम उसी प्रकार से पृथक् होते हैं जिस प्रकार शुद्ध हिम के क्रिस्टल चीनी के तनु विलयन में से ठंडा करने पर पृथक् होते हैं। जिस ताप पर टिन के क्रिस्टल पृथक होना प्रारंभ करते है, वह ताप शुद्ध टिन के गलनांक से कम होता है। टिन के गलनांक को जब उसमें सीसा घुला रहता है, ज्ञात कर सीसे का अणुभार उसी नियम द्वारा निकालते हैं जिस नियम से पानी में घुली वस्तओं का अणुभार निकालते हैं। इस विधि से उन कई धातुओं का अणुभार निकाला गया है, जो तनुघात्विक विलयन में अलग परमाणु के रूप में रहती है। सीसा-ऐंटीमनी मिश्रधातु मिश्रण श्रेणी की है। ऐंटीमनी भंगुर होता है और सीसा मुलायम। मुद्रण धातु सीसी, ऐंटीमनी और अत्यंत कम मात्रा में टिन की मिश्रधातु है। इस मिश्रधातु में ऐंटीमनी की कठोरता तो होती है, किंतु यह उसकी तरह भंगुर नहीं होती।",
"मिश्रातु\nदो या अधिक धात्विक तत्वों के आंशिक या पूर्ण ठोस-विलयन को मिश्र धातु कहते हैं। इस्पात एक मिश्र धातु है। प्रायः मिश्र धातुओं के गुण उस मिश्रधातु को बनाने वाले संघटकों के गुणों से भिन्न होते हैं। इस्पात, लोहे की अपेक्षा अधिक मजबूत होता है। काँसा, पीतल, टाँका (सोल्डर) आदि मिश्र धातु हैं।",
"अष्टधातु\nसुश्रुतसंहिता में केवल प्रथम सात धातुओं का ही निर्देश देखकर आपातत: प्रतीत होता है कि सुश्रुत पारा (पारद, रस) को धातु मानने के पक्ष में नहीं हैं, पर यह कल्पना ठीक नहीं। उन्होंने अन्यत्र रस को भी धातु माना है (\"ततो रस इति प्रोक्त: स च धातुरपि स्मृत:\")। अष्टधातु का उपयोग प्रतिमा के निर्माण के लिए भी किया जाता था। तब रस के स्थान पर पीतल का ग्रहण समझना चाहिए; भविष्यपुराण के एक वचन के आधार पर हेमाद्रि का ऐसा निर्णय है।",
"धातु\nधातुओं का ताप बढ़ने पर उनका आकार बढ़ जाता है। इस गुण को तापीय प्रसार (Thermal expansion) कहते हैं। थर्मामीटर में पारद के इसी गुण का लाभ उठाया जाता है। कुछ ऐसी मिश्रधातुएँ भी बनी हैं जिनका ताप के साथ तापीय प्रसार अति सूक्ष्म है।",
"मिश्रातु\nअनेक अंतराधातुक यौगिक बहुत स्थायी होते हैं और अपने गलनांक से अधिक ताप पर गरम करने से भी अपनी अवयव धातुओं में विघटित नहीं होते। ये यौगिक तरल अमोनिया में घुलते हैं और इस प्रकार से जो विलयन तैयार होता है, वह वैद्युत् चालक होता है। जब इनका वैद्युत अपघटन किया जाता है, तब एक अवयव धातु, जो दूसरी की अपेक्षा न्यून धनविद्युती (electropositive) होती है, धनाग्र पर जमती है और दूसरी ऋणाग्र पर। अंतराधातुक यौगिक क्यों बनाता है, इसकी अभी तक सैद्धांतिक व्याख्या नहीं हुई। केवल इतना ही प्रतिपादित हो पाया है कि वे धातुएँ, जिनके गुण एक से हैं, एक दूसरे के साथ संयोग नहीं करती हैं। चूँकि इस प्रकार की मिश्रधातुएँ कठोर, भंगुर, बहुत ही कम तन्यशील तथा लचीली होती हैं, अत: इनमें से केवल कुछ ही उपयोगी हैं।"
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