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|---|---|---|---|
1 | 1.27 | null | श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान् समीक्ष स कौंतेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७॥ |
1 | null | 175 | जेथ भीष्माद्रोणादिक । जवळिकेचि सन्मुख । पृथिविपति आणिक । बहुत आहाति ॥ १७५॥ |
1 | null | 176 | तेथ स्थिर करूनि रथु । अर्जुन असे पाहतु । तो दळभार समस्तु । संभ्रमेसी ॥ १७६॥ |
1 | null | 177 | मग देवा म्हणे देख देख । हे गोत्रगुरु अशेख । तंव कृष्णा मनीं नावेक । विस्मो जाहला ॥ १७७॥ |
1 | null | 178 | तो आपणयां आपण म्हणे । एथ कायि कवण जाणे । हें मनीं धरिले येणें । परि कांही आश्चर्य असे ॥ १७८॥ |
1 | null | 179 | ऐसी पुढील से घेतु । तो सहजें जाणे हृदयस्थु । परि उगा असे निवांतु । तिये वेळीं ॥ १७९॥ |
1 | null | 180 | तंव तेथ पार्थु सकळ । पितृपितामह केवळ । गुरू बंधु मातुळ । देखता जाहला ॥ १८०॥ |
1 | null | 181 | इष्टमित्र आपुले । कुमरजन देखिले । हे सकळ असती आले । तयांमाजि ॥ १८१॥ |
1 | null | 182 | सुहृज्जन सासरे । आणिकही सखे सोईरे । कुमर पौत्र धनुर्धरें । देखिले तेथ ॥ १८२॥ |
1 | null | 183 | जयां उपकार होते केले । कां आपदीं जे राखिले । हे असो वडील धाकुले - । आदिकरुनि ॥ १८३॥ |
1 | null | 184 | ऐसे गोत्रचि दोहीं दळीं । उदित जालें असे कळीं । हें अर्जुने तिये वेळीं । अवलोकिलें ॥ १८४॥ |
1 | 1.28 | null | कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्नमब्रवीत । |
1 | null | 185 | तेथ मनीं गजबज जाहली । आणि आपैसी कृपा आली । तेणें अपमानें निघाली । वीरवृत्ति ॥ १८५ ॥ |
1 | null | 186 | जिया उत्तम कुळींचिया होती । आणि गुणलावण्य आथी । तिया आणिकींते न साहति । सुतेजपणें ॥ १८६॥ |
1 | null | 187 | नविये आवडीचेनि भरें । कामुक निजवनिता विसरे । मग पाडेंविण अनुसरें । भ्रमला जैसा ॥ १८७॥ |
1 | null | 188 | कीं तपोबळें ऋद्धी । पातलिया भ्रंशे बुद्धी । मग तया विरक्ततासिद्धी । आठवेना॥ १८८॥ |
1 | null | 189 | तैसें अर्जुना तेथ जाहले । असतें पुरुषत्व गेले । जें अंतःकरण दिधले । कारुण्यासी ॥ १८९॥ |
1 | null | 190 | देखा मंत्रज्ञु बरळु जाये । मग तेथ कां जैसा संचारु होये । तैसा तो धनुर्धर महामोहें । आकळिला ॥ १९०॥ |
1 | null | 191 | म्हणऊनि असता धीरु गेला । हृदया द्रावो आला । जैसा चंद्रकळीं सिंपिला । सोमकांतु ॥ १९१॥ |
1 | null | 192 | तयापरी पार्थु । अतिस्नेहें मोहितु । मग सखेद असे बोलतु । अच्युतेसी ॥ १९२॥ |
1 | 1.28 | null | दृष्ट्वेनं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थिताम् ।।२८॥ |
1 | 1.29 | null | सीदन्ती मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमाहर्षश्च जायते ॥ २९॥ |
1 | 1.30 | null | गांडीवम् स्त्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३०॥ |
1 | null | 193 | तो म्हणे अवधारी देवा । म्यां पाहिला हा मेळावा । तंव गोत्रवर्गु आघवा । देखिला एथ ॥ १९३॥ |
1 | null | 194 | हे संग्रामीं अति उद्यत । जाहाले असती कीर समस्त । पण आपणपेयां उचित । केवीं होय ॥ १९४॥ |
1 | null | 195 | येणें नांवेंचिं नेणों कायी । मज आपणपें सर्वथा नाहीं । मन बुद्धी ठायीं । स्थिर नोहे ॥ १९५ ॥ |
1 | null | 196 | देखें देह कांपत । तोंड असे कोरडें होत । विकळता उपजत । गात्रांसी ॥ १९६ ॥ |
1 | null | 197 | सर्वांगा कांटाळा आला । अति संतापु उपनला । तेथ बेंबळे हातु गेला । गांडीवाचा ॥ १९७ ॥ |
1 | null | 198 | तें न धरताचि निष्टलें । परि नेणेंचि हातोनि पडिले । ऐसे हृदय असे व्यापिलें । मोहें येणें ॥ १९८ ॥ |
1 | null | 199 | जें वज्रापासोनि कठिण । दुर्धर अतिदारुण । तयाहून असाधारण । हें स्नेह नवल ॥ १९९ ॥ |
1 | null | 200 | जेणे संग्रामी हरू जिंतिला । निवातकवचांचा ठावो फेडिला । तो अर्जुन मोहें कवळिला । क्षणामाजि ॥ २०० ॥ |
1 | null | 201 | जैसा भ्रमर भेदी कोडें । भलतैसें काष्ठ कोरडें । परि कळिकेमाजीं सापडें । कोवळियें ॥ २०१ ॥ |
1 | null | 202 | तेथ उत्तीर्ण होईल प्राणें । परीं ते कमळदळु चिरूं नेणे । तैसे कठीण कोवळेंपणे । स्नेह देखा ॥ २०२ ॥ |
1 | null | 203 | हे आदिपुरुषाची माया । ब्रह्मेयाहि नयेचि आया । म्हणऊनी भुलविला ऐकें राया । संजयो म्हणे ॥ २०३ ॥ |
1 | null | 204 | अवधारीं मग तो अर्जुनु ।देखोनि सकळ स्वजनु । विसरला अभिमानु । संग्रामींचा ॥ २०४ ॥ |
1 | null | 205 | कैसी नेणों सदयता । उपनली येथे चित्ता । मग म्हणे कृष्णा आता । नसिजे एथ ॥ २०५ ॥ |
1 | null | 206 | माझें अतिशय मन व्याकुळ । होतसे वाचा बरळ । जे वधावे हे सकळ । येणें नांवे ॥ २०६ ॥ |
1 | 1.31 | null | निमितानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥ |
1 | null | 207 | या कौरवां जरी वधावें । तरी युधिष्ठिरादिक कां न वधावे । हे येर येर आघवे । गोत्रज आमुचे ॥ २०७ ॥ |
1 | null | 208 | म्हणोनि जळो हें झुंज । प्रत्यया न ये मज । एणें काय काज । महापापें ॥ २०८ ॥ |
1 | null | 209 | देवा बहुतं परीं पाहता । एथ वोखटें होईल झुंजतां । वर काहीं चुकवितां । लाभु आथी ॥ २०९ ॥ |
1 | 1.32 | null | न काङक्षे विजयं कृष्ण न च राज्य सुखानि च । किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥ |
1 | 1.33 | null | येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । ते इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥ |
1 | null | 210 | तया विजयवृत्ती कांही । मज सर्वथा काज नाहीं । एथ राज्य तरी कायी । हें पाहुनियां ॥ २१० ॥ |
1 | null | 211 | यां सकळांते वधावे । मग जे भोग भोगावे । ते जळोत आघवे । पार्थु म्हणे ॥ २११ ॥ |
1 | null | 212 | तेणें सुखेविण होईल । तै भलतेही साहिजेल । वरि जीवितही वेंचिजेल । याचिलागीं ॥ २१२ ॥ |
1 | null | 213 | परीं यासी घातु कीजे । मग आपण राज्य भोगिजे । हे स्वप्नींही मन माझे । करूं न शके ॥ २१३ ॥ |
1 | null | 214 | तरी आम्ही का जन्मावें । कवणालागीं जियावें । जें वडिलां यां चिंतावें । विरुद्ध मनें ॥ २१४ ॥ |
1 | null | 215 | पुत्रातें इप्सी कुळ । तयाचें कायि हेंचि फळ । जे निर्दाळिजे केवळ । गोत्र आपुले ॥ २१५ ॥ |
1 | null | 216 | हें मनींचि केवि धरिजे । आपण वज्राचेयां बोलिजे । वरी घडे तरी कीजे । भले एयां ॥ २१६ ॥ |
1 | null | 217 | आम्हीं जें जें जोडावें । तें समस्तीं इहीं भोगावें । हे जीवितही उपकारावें । काजीं यांचां ॥ २१७ ॥ |
1 | null | 218 | आम्ही दिगंतीचे भूपाळ । विभांडूनि सकळ । मग संतोषविजे कुळ । आपुलें जें ॥ २१८ ॥ |
1 | null | 219 | तेचि हे समस्त । परी कैसें कर्म विपरीत । जे जाहले असती उद्यत । झुंजावया ॥ २१९ ॥ |
1 | null | 220 | अंतौरिया कुमरें । सांडोनियां भांडारें । शस्त्राग्रीं जिव्हारें । आरोपुनी ॥ २२० ॥ |
1 | null | 221 | ऐसियांते कैसेनि मारुं । कवणावरी शस्त्र धरूं । निज हृदया करूं । घातु केवीं ॥ २२१ ॥ |
1 | 1.34 | null | आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहः । मातुलः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥ ३४॥ |
1 | null | 222 | हे नेणसी तूं कवण । परी पैल भीष्म द्रोण । जयांचे उपकार असाधारण । आम्हां बहुत ॥ २२२ ॥ |
1 | null | 223 | एथ शालक सासरे मातुळ । आणी बंधु कीं हें सकळ । पुत्र नातू केवळ । इष्टही असती ॥ २२३ ॥ |
1 | null | 224 | अवधारीं अति जवळिकेचे । हे सकळही सोयरे आमुचे । म्हणोनि दोष आथि वाचे । बोलतांचि ॥ २२४ ॥ |
1 | 1.35 | null | एतान्न हन्तुमिछामि घ्नतोऽपि मघुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं न महीकृते ॥ ३५ ॥ |
1 | null | 225 | हे वरी भलतें करितु । आंताचि एथें मारितु । परि आपण मनें घातु । न चिंतावा ॥ २२५ ॥ |
1 | null | 226 | त्रैलोक्यींचे अनकळित । जरी राज्य होईल एथ । तरी हें अनुचित । नाचरें मी ॥ २२६ ॥ |
1 | null | 227 | जरी आज एथ ऐसें कीजे । तरी कवणांचा मनीं उरिजे । सांग मुख केवीं पाहिजे । तुझे कृष्णा ॥ २२७ ॥ |
1 | 1.36 | null | निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापनेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ ३६ ॥ |
1 | null | 228 | जरी वधु करूनी गोत्रजांचा । तरी वसौटा होऊन दोषांचा । मज जोडलासि तूं हातींचा । दूरी होसी ॥ २२८ ॥ |
1 | null | 229 | कुळहरणीं पातकें । तिये आंगीं जडती अशेखें । तयें वेळी तूं कवण कें । देखावासी ॥ २२९ ॥ |
1 | null | 230 | जैसा उद्यानामाजीं अनळु । संचरला देखोनि प्रबळु । मग क्षणभरी कोकिळु । स्थिर नोहे ॥ २३० ॥ |
1 | null | 231 | सकर्दम सरोवरु । अवलोकूनि चकोरु । न सेवितु अव्हेरु । करूनि निघे ॥ २३१ ॥ |
1 | null | 232 | तयापरी तूं देवा । मज झकों न येसी मावा । जरी पुण्याचा वोलावा । नाशिजेल ॥ २३२ ॥ |
1 | 1.37 | null | तस्मान्नार्हा वयं हन्तुम् धार्तराष्ट्रान्स्वबांधवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥ |
1 | null | 233 | म्हणोनि मी हें न करीं । इये संग्रामीं शस्त्र न धरीं । हें किडाळ बहुतीं । परीं दिसतसे ॥ २३३ ॥ |
1 | null | 234 | तुझा अंतराय होईल । मग सांगें आमचें काय उरेल । तेणें दुःखे हियें फुटेल । तुजवीण कृष्णा ॥ २३४ ॥ |
1 | null | 235 | म्हणावूनि कौरव हे वधिजती । मग आम्हीं भोग भोगिजती । हे असो मात अघडती । अर्जुन म्हणे ॥ २३५ ॥ |
1 | 1.38 | null | यद्यप्यते न पश्यंति लोभोपहृतचेतसः । कुलक्षयकृतंदोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥ |
1 | 1.39 | null | कथं ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतम् दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥ |
1 | null | 236 | हे अभिमानपदे भुलले । जरी पां संग्रामा आले । तर्ही आम्हीं हित आपुलें । जाणावें लागे ॥ २३६ ॥ |
1 | null | 237 | हें ऐसें कैसें करावें । जे आपुले आपण मारावे । जाणत जाणतांचि सेवावें । कालकूट ॥ २३७ ॥ |
1 | null | 238 | हां जी मार्गीं चालतां । पुढां सिंह जाहला अवचितां । तो तंव चुकवितां । लाभु आथी ॥ २३८ ॥ |
1 | null | 239 | असता प्रकाशु सांडावा । मग अंधकूप आश्रावा । तरी तेथ कवणु देवा । लाभु सांगे ॥ २३९ ॥ |
1 | null | 240 | का समोर अग्नि देखोनी । जरी न वचिजे वोसंडोनी । तरी क्षणा एका कवळूनि । जांळू सके ॥ २४०॥ |
1 | null | 241 | तैसे दोष हे मूर्त । अंगी वाजों असती पहात । हें जाणतांही केवीं एथ । प्रवर्तावें ॥ २४१ ॥ |
1 | null | 242 | ऐसें पार्थ तिये अवसरीं । म्हणे देवा अवधारीं । या कल्मषाची थोरी । सांगेन तुज ॥ २४२ ॥ |
1 | 1.40 | null | कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्सनमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ४० ॥ |
1 | null | 243 | जैसें काष्ठें काष्ठ मथिजे । येथ वन्हि एक उपजे । तेणें काष्ठजात जाळिजे । प्रज्वळलेनि ॥ २४३ ॥ |
1 | null | 244 | तैसा गोत्रींची परस्परें । जरी वधु घडे मत्सरें । तरी तेणें महादोषें घोरें । कुळचि नाशे ॥ २४४॥ |
1 | null | 245 | म्हणवूनि येणें पापें । वंशजधर्मु लोपे । मग अधर्मुचि आरोपे । कुळामाजि ॥ २४५ ॥ |
1 | 1.41 | null | अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः । स्त्रीसु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥ |
1 | null | 246 | एथ सारासार विचारावें । कवणे काय आचरावें । आणि विधिनिषेध अघवे । पारुषति ॥ २४६ ॥ |
1 | null | 247 | असता दीपु दवडीजे । मग अंधकारीं राहाटिजे । जे उजूंचि का आडळिजे । जयापरी ॥ २४७ ॥ |
1 | null | 248 | तैसा कुळीं कुळक्षयो होय । तये वेळी तो आद्य धर्मु जाय । मग आन कांहीं आहे । पापांवाचुनि ॥ २४८ ॥ |
1 | null | 249 | जैं यमनियम ठाकती । तेथ इंद्रियें सैरा विचरती । म्हणवूनि व्यभिचार घडती । कुळस्त्रियांसी ॥ २४९ ॥ |
1 | null | 250 | उत्तम अधमीं संचरती । ऐसे वर्णावर्ण मिसळती । तेथ समूळ उपडती । जातिधर्म ॥ २५० ॥ |
1 | null | 251 | जैसी चोहटाचिया बळी । पाविजे सैरा काऊळीं । तैसीं महापापें कुळीं प्रवेशती ॥ २५१ ॥ |
1 | 1.42 | null | संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतंति पितरि ह्येषां लुप्तपिंडिदकक्रियाः ॥ ४१॥ |
1 | null | 252 | मग कुळा देखा अशेखा । आंणि कुळघातका । येरयेरा नरक । जाणें आथी ॥ २५२ ॥ |
1 | null | 253 | देखें वंशवृद्धि समस्त । यापरी होय पतित । मग मग वोवांडिती स्वर्गस्थ । पूर्वपुरुष ॥ २५३ ॥ |
1 | null | 254 | जेथ नित्यादि क्रिया ठाके । आणि नैमित्तिक पारुखे । तेथ कवणा तिळोदकें । कवण अर्पी ॥ २५४ ॥ |
1 | null | 255 | तरी पितर काय करिती । कैसेनि स्वर्गीं बसती । म्हणोनि तेही येती । कुळापासी ॥ २५५ ॥ |
1 | null | 256 | जैसा नखाग्रीं व्याळु लागे । तो शिखांत व्यापी वेगें । तेवी आब्रह्म कुळ अवघें । आप्लविजे ॥ २५६ ॥ |
1 | 1.43 | null | दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वतः ॥ ४३ ॥ |
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