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|---|---|---|---|
1 | null | 1 | ॐ नमोजी आद्या । वेद प्रतिपाद्या । जय जय स्वसंवेद्या । आत्मरुपा ॥१॥ |
1 | null | 2 | देवा तूंचि गणेशु | सकलमति प्रकाशु | म्हणे निवृत्ति दासु | अवधारिजो जी ||२|| |
1 | null | 3 | हें शब्दब्रह्म अशेष | तेचि मूर्ति सुवेष | तेथ वर्णवपु निर्दोष | मिरवत असे ||३|| |
1 | null | 4 | स्मृति तेचि अवयव | देखा अंगिकभाव | तेथ लावण्याची ठेव | अर्थशोभा ||४|| |
1 | null | 5 | अष्टादश पुराणे | तीचि मणिभूषणे | पदपद्धती खेवणे | प्रमेयरत्नांची ||५|| |
1 | null | 6 | पदबंध नागर | तेचि रंगाथिले अंबर | जेथ साहित्यवाणे | सपूर उजाळाचे ||६|| |
1 | null | 7 | देखा काव्यनाटका | जे निर्धारिता सकौतुका | त्याचि रुणझुणती क्षुद्रघंटिका | अर्थध्वनी || ७|| |
1 | null | 8 | नाना प्रमेयांचि परी | निपुणपणे पाहता कुसरी | दिसती उचित पदे माझारी | रत्नें भली || ८|| |
1 | null | 9 | तेथ व्यासादिकांच्या मति | तेचि मेखळा मिरवती | चोखाळपणे झळकती | पल्लवसडका || ९|| |
1 | null | 10 | देखा षड्दर्शने म्हणिपती | तेचि भुजांची आकृती || म्हणऊनि विसंवादे धरिती | आयुधे हाती || १०|| |
1 | null | 11 | तरी तर्क तोचि परशु | नीतिभेदु अंकुशु | वेदांतु तो महारसु | मोदकाचा || ११ || |
1 | null | 12 | एके हाति दंतु | जो स्वभावता खंडितु | तो बौद्धमत संकेतु | वार्तिकांचा || १२ || |
1 | null | 13 | मग सहजे सत्कारवादु | तो पद्मकरु वरदु | धर्मप्रतिष्ठा तो सिद्धु | अभयहस्तु || १३ || |
1 | null | 14 | देखा विवेकमंतु सुविमळु | तोचि शुंडादंडु सरळु | जेथ परमानंदु केवळु | महासुखाचा || १४ || |
1 | null | 15 | तरी संवादु तोचि दशनु | जो समताशुभ्रवर्णु | देवो उन्मेषसुक्ष्मेक्षणु | विघ्नराजु || १५ || |
1 | null | 16 | मज अवगमलिया दोनी | मीमांसा श्रवणस्थानी | बोधमदामृत मुनी | अलि सेविती || १६ || |
1 | null | 17 | प्रमेयप्रवाल सुप्रभ | द्वैताद्वैत तेचि निकुंभ | सरिसे एकवटत | इभ मस्तकावरी || १७ || |
1 | null | 18 | उपरि दशोपनिषदे | जिये उदारे ज्ञानमकरंदे | तिये कुसुमे मुगुटी सुगंधे | शोभती भली || १८ || |
1 | null | 19 | अकार चरणयुगुल | उकार उदर विशाल | मकार महामंडल | मस्तकाकारे || १९ || |
1 | null | 20 | हे तिन्ही एकवटले | तेथ शब्दब्रह्म कवळले | ते मियां गुरूकृपा नमिले | आदिबीज || २० || |
1 | null | 21 | आतां अभिनव वाग्विलासिनी | जे चातुर्यार्थकला कामिनी | ते शारदा विश्वमोहिनी | नमिली मियां || २१ || |
1 | null | 22 | मज हृदयी सद्गुरू | तेणे तारिलो हा संसारपूरु | म्हणऊनि विशेष अत्यादरू | विवेकावरी || २२ || |
1 | null | 23 | जैसे डोळ्यां अंजन भेटे | मग दृष्टीसी फांटा फुटे | मग वास पाहे तेथ प्रकटे | महानिधी || २३ || |
1 | null | 24 | का चिंतामणी जालया हाती | सदा विजयवृत्ति मनोरथी | तैसा मी पूर्णकाम निवृत्ती | ज्ञानदेवो म्हणे || २४ || |
1 | null | 25 | म्हणोन जाणतेनो गुरू भजिजे | तेणे कृतकार्य होईजे | जैसे मूळसिंचने सहजे | शाखापल्लव संतोषती || २५ || |
1 | null | 26 | का तीर्थे जिये भुवनी | तिये घडती समुद्रावगहनी | ना तरी अमृतरसास्वादनीं | रस सकळ || २६ || |
1 | null | 27 | तैसा पुढतपुढती तोची | मियां अभिवंदिला श्रीगुरूचि | जे अभिलषित मनोरुची | पुरविता तो || २७ || |
1 | null | 28 | आता अवधारा कथा गहन | जे सकळां कौतुका जन्मस्थान | की अभिनव उद्यान | विवेकतरूचे || २८ || |
1 | null | 29 | ना तरी सर्व सुखांची आदि | जे प्रमेयमहानिधी | नाना नवरससुधाब्धि | परिपूर्ण हे || २९ || |
1 | null | 30 | की परमधाम प्रकट | सर्व विद्यांचे मूळपीठ | शास्त्रजाता वसिष्ठ | अशेषांचे || ३० || |
1 | null | 31 | ना तरी सकळ धर्मांचे माहेर । सज्जनांचे जिव्हार । लावण्यरत्नभांडार । शारदियेचे ॥ ३१॥ |
1 | null | 32 | नाना कथारूपे भारती । प्रकटली असे त्रिजगती । आविष्करोनी महामती । व्यासाचिये ॥ ३२॥ |
1 | null | 33 | म्हणोनी हा काव्यां रावो । ग्रंथ गुरुवतीचा ठावो । एथुनि रसां आला आवो । रसाळपणाचा ॥ ३३॥ |
1 | null | 34 | तेवींचि आइका आणिक एक । एथुनि शब्दश्री सच्छास्त्रिक । आणि महाबोधि कोवळीक । दुणावली ॥ ३४॥ |
1 | null | 35 | एथ चातुर्य शहाणे झाले । प्रमेय रुचीस आले । आणि सौभाग्य पोखले । सुखाचे एथ ॥ ३५॥ |
1 | null | 36 | माधुर्यी मधुरता । शृंगारी सुरेखता । रूढपण उचितां । दिसे भले ॥ ३६॥ |
1 | null | 37 | एथ कळाविदपण कळा । पुण्यासी प्रतापु आगळा । म्हणऊनि जनमेजयाचे अवलीळा । दोष हरले ॥ ३७॥ |
1 | null | 38 | आणि पाहता नावेक । रंगी सुरंगतेची आगळीक । गुणां सगुणतेचे बिक । बहुवस एथ ॥ ३८॥ |
1 | null | 39 | भानुचेनि तेजें धवळले । जैसे त्रैलोक्य दिसे उजळले । तैसे व्यासमती कवळले । अवघे विश्व ॥ ३९॥ |
1 | null | 40 | कां सुक्षेत्रीं बीज घातले । ते आपुलेयापरी विस्तारले । तैसे भारतीं सुरवाडले । अर्थजात ॥ ४०॥ |
1 | null | 41 | ना तरी नगरांतरी वसिजे । तरी नागराचि होइजे । तैसे व्यासोक्तितेजे । धवळित सकळ ॥ ४१॥ |
1 | null | 42 | कीं प्रथमवयसाकाळीं । लावण्याची नव्हाळी । प्रकटे जैसी आगळी । अंगनाअंगी ॥ ४२॥ |
1 | null | 43 | ना तरी उद्यानी माधवी घडे । तेथ वनशोभेचि खाणी उघडे । आदिलापासोनि अपाडे । जियापरी ॥ ४३॥ |
1 | null | 44 | नाना घनीभूत सुवर्ण । जैसे न्याहाळितां साधारण । मग अलंकाती बरवेपण । निवाडु दावी ॥ ४४॥ |
1 | null | 45 | तैसे व्यासोक्ती अळंकारिले । आवडे ते बरवेपण पातले । ते जाणोनि काय आश्रयिले । इतिहासी ॥ ४५॥ |
1 | null | 46 | नाना पुरतिये प्रतिष्ठेलागीं । सानीव धरुनी आंगी । पुराणे आख्यानरूपे जगीं । भारता आली ॥ ४६॥ |
1 | null | 47 | म्हणऊनि महाभारतीं जे नाही । ते नोहेचि लोकी तिहीं । येणे कारणे म्हणिपे पाहीं । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥ ४७॥ |
1 | null | 48 | ऐसी सुरस जगीं कथा । जे जन्मभूमि परमार्था । मुनि सांगे नृपनाथा । जनमेजया ॥ ४८॥ |
1 | null | 49 | जे अद्वितीय उत्तम । पवित्रैक निरुपम । परम मंगलधाम । अवधारिजो ॥ ४९॥ |
1 | null | 50 | आता भारतीं कमळपरागु । गीताख्यु प्रसंगु । जो संवादिला श्रीरंगु । अर्जुनेसी ॥ ५०॥ |
1 | null | 51 | ना तरी शब्दब्रह्माब्धि। मथिलेया व्यासबुद्धि । निवडिले निरवधि । नवनीत हे ।। ५१॥ |
1 | null | 52 | मग ज्ञानाग्निसंपर्के । कडसिलें विवेके । पद आले परिपाकें । आमोदासी ॥ ५२॥ |
1 | null | 53 | जे अपेक्षिजे विरक्ति । सदा अनुभविजे संतीं । सोहंभावे पारंगती । रमिजे जेथ ॥ ५३॥ |
1 | null | 54 | जे आकर्णिजे भक्ती । जें आदिवंद्य त्रिजगतीं । ते भीष्मपर्वीं संगती । सांगीजैल ॥ ५४॥ |
1 | null | 55 | जें भगवद्गीता म्हणीजे । जें ब्रह्मेशांनीं प्रशंसिजे। जे सनकादिकीं सेविजे । आदरेसीं ॥ ५५॥ |
1 | null | 56 | जैसे शारदियेचे चंद्रकळे- । माजीं अमृतकण कोंवळे । तें वेंचती मवाळें । चकोरतलगें ॥ ५६॥ |
1 | null | 57 | तियापरी श्रोतां । अनुभवावी हे कथा । अति हळुवारपणे चित्ता । आणूनियां ॥ ५७॥ |
1 | null | 58 | हे शब्देविण संवादिजे । इंद्रियां नेणता भोगिजे । बोलाआधि झोंबिजे । प्रमेयासी ॥ ५८॥ |
1 | null | 59 | जैसे भ्रमर परागु नेती । परी कमळदळे नेणती । तैसी परी आहे सेविती । ग्रंथी इये ॥ ५९॥ |
1 | null | 60 | का आपुला ठावो न सांडिता । आलिंगिजे चंद्रु प्रकटता । हा अनुरागु भोगितां । कुमुदिनी जाणे ॥ ६०॥ |
1 | null | 61 | ऐसेनि गंभीरपणे । स्थिरावलेनि अंत:करणे । आथिला तोचि जाणे । मानूं इये ॥ ६१॥ |
1 | null | 62 | अहो अर्जुनाचिये पांती । जे परिसणया योग्य होती । तिहीं कृपा करून संतीं । अवधान द्यावे ॥ ६२॥ |
1 | null | 63 | हे सलगीं म्यां म्हणितले । चरणां लागोनि विनविलें । प्रभू सखोल हृदय आपुलें । म्हणऊनियां ॥ ६३॥ |
1 | null | 64 | जैसा स्वभावो मायबापांचा । अपत्य बोले जरी बोबडी वाचा । तरी अधिकचि तयाचा । संतोष आथी ॥ ६४॥ |
1 | null | 65 | तैसा तुम्हीं मी अंगीकारिलां । सज्जनीं आपुला म्हणितला । तरी सहज उणें उपसाहला । प्रार्थूं कायी ॥ ६५॥ |
1 | null | 66 | परी अपराधु तो आणिक आहे । जें मी गीतार्थ कवळुं पाहें । ते अवधारा विनवूं लाहें । म्हणऊनियां ॥ ६६॥ |
1 | null | 67 | हे अनावर न विचारितां । वायांचि धिंवसा उपनला चित्ता । येर्हवीं भानुतेजीं काय खद्योता । शोभा आथी ॥ ६७॥ |
1 | null | 68 | का टिटिभू चांचूवरी । माप सूये सागरी । मी नेणतु त्यापरी । प्रवर्तें येथ ॥ ६८॥ |
1 | null | 69 | आइका आकाश गिंवसावे । तरी त्याहूनि थोर होआवें । म्हणऊनि अपाडु हें आघवें । निर्धारिता ॥ ६९॥ |
1 | null | 70 | या गीतार्थाची थोरी । स्वयें शंभू विवरी । जेथ भवानी प्रश्नु करी । चमत्कारोनी ॥ ७०॥ |
1 | null | 71 | तेथ हरू म्हणे नेणिजे । देवी जैसें का स्वरूप तुझें । तैसें नित्यनूतन देखिजे । गीतातत्व ॥ ७१॥ |
1 | null | 72 | हा वेदार्थसागरू । जया निद्रिताचा घोरू । तो स्वयें सर्वेश्वरू । प्रत्यक्ष अनुवादला ॥ ७२॥ |
1 | null | 73 | ऐसें जें अगाध । जेथ वेडावती वेद । तेथ अल्प मी मतिमंद । काय होय ॥ ७३॥ |
1 | null | 74 | हें अपार कैसेनि कवळावे । महातेज कवणें धवळावे । गगन मुठीं सुवावे । मशके केवीं ॥ ७४॥ |
1 | null | 75 | परी एथ असे एक आधारु । तेणेचि बोलें मी सधरु । जे सानुकूळ श्रीगुरु । ज्ञानदेवो म्हणे ॥ ७५॥ |
1 | null | 76 | येर्हवीं तरी मी मुर्खू । जरी जाहला अविवेकु । तरी संतकृपादीपु । सोज्वळु असे ॥ ७६॥ |
1 | null | 77 | लोहाचे कनक होये । हे सामर्थ्य परिसींच आहे । की मृतही जीवित लाहे । अमृतसिद्धी ॥ ७७ ॥ |
1 | null | 78 | जरी प्रकटे सिद्धसरस्वती । तरी मुकया आथी भारती । एथ वस्तुसामर्थ्यशक्ति । नवल कायी ॥ ७८॥ |
1 | null | 79 | जयातें कामधेनू माये । तयासी अप्राप्य काही आहे । म्हणऊनि मी प्रवर्तों लाहे । ग्रंथी इये ॥ ७९॥ |
1 | null | 80 | तरी न्यून ते पुरतें । अधिक ते सरते । करून घ्यावे हें तुमते । विनवीतु असे ॥ ८०॥ |
1 | null | 81 | आता देईजो अवधान । तुम्हीं बोलविल्या मी बोलेन । जैसे चेष्टे सूत्राधीन । दारुयंत्र ॥ ८१॥ |
1 | null | 82 | तैसा मी अनुग्रहीतु । साधूंचा निरोपितु । ते आपुला अलंकारितु । भलतयापरी ॥ ८२॥ |
1 | null | 83 | तंव श्रीगुरू म्हणती राहीं । हे तुज बोलावे न लगे कांही । आता ग्रंथा चित्त देईं । झडकरी वेगा ॥ ८३॥ |
1 | null | 84 | या बोला निवृत्तिदासु । पावूनि परम उल्हासु । म्हणे परियेसा मना अवकाशु । देऊनियां ॥ ८४॥ |
1 | 1.01 | null | धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | |
1 | null | 85 | तरी पुत्रस्नेहे मोहितु । धृतराष्ट्र असे पुसतु ॥ म्हणे संजया सांगे मातु । कुरुक्षेत्रींची ॥ ८५॥ |
1 | null | 86 | जें धर्मालय म्हणिजे । तेथ पांडव आणि माझे । गेले असती व्याजें । झुंजाचेनि ॥ ८६॥ |
1 | null | 87 | तरी तिहीं येतुला अवसरीं । काय किजत असे येरयेरीं । तें झडकरी कथन करी । मजप्रती ॥ ८७॥ |
1 | 1.02 | null | संजय उवाच | दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा | |
1 | null | 88 | तिये वेळी तो संजय बोले । म्हणे पांडवसैन्य उचलले । जैसें महाप्रळयीं पसरले । कृतांतमुख ॥ ८८॥ |
1 | null | 89 | तैसे तें घनदाट । उठावले एकवाट । जैसें उसळले कालकूट । धरीं कणव ॥ ८९॥ |
1 | null | 90 | ना तरी वडवानलु सादुकला । प्रलयवाते पोखला । सागर शोषूनि उधवला । अंबरासी ॥ ९०॥ |
1 | null | 91 | तैसे दळ दुर्धर । नाना व्यूहीं परिकर । अवगमले भयासुर । तिये काळीं ॥ ९१॥ |
1 | null | 92 | तें देखिलेयां दुर्योधनें । अव्हेरिले कवणे माने । जैसें न गणिजे पंचाननें । गजवटांते ॥ ९२ ॥ |
1 | 1.03 | null | पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् | व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता || ३|| |
1 | null | 93 | मग द्रोणापासी आला । तयाते म्हणे हा देखिला । कैसा दळभारु उचलला । पांडवांचा ॥ ९३॥ |
1 | null | 94 | गिरिदुर्ग जैसे चालते । तैसे विविध व्यूह संभवते । हे रचिले आथि बुद्धिमंते । द्रुपद्कुमरें ॥ ९४॥ |
1 | null | 95 | जो का तुम्हीं शिक्षापिला । विद्या देऊनी कुरुठा केला । तेणे हा पाखरिला । देखदेख ॥ ९५॥ |
1 | 1.04 | null | अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: ॥ ४॥ |
1 | null | 96 | आणिकही असाधारण । जे शस्त्रास्त्रीं प्रवीण । जे क्षात्रधर्मीं निपुण । वीर आहाती ॥ ९६॥ |
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