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शेख गालिब साहिब एक भारतीय राष्ट्रवादी मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी थे, जो भारत की संविधान सभा के सदस्य तथा बाद में उन्होंने राज्यसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया। जीवन परिचय शेख गालिब साहिब का जन्म 15 जुलाई 1904 ई• में आंध्र प्रदेश राज्य के ज़िला गुंटूर में हुआ था। उनके पिता शेख चिंगी शाह और माता अमीना बी थी। वह गुंटुर में स्वतंत्रता सेनानियों की निस्वार्थ गतिविधियों से प्रेरित होकर 1928 में कांग्रेस में शामिल हों गए और खुद को राष्ट्रीय आंदोलन में समर्पित करने में लग गए। 1930 में उन्हें गांधी जी की दांडी मार्च में भाग लेने पर जेल में डाल दिया गया। उन्होंने (1937 -1941) तक मुस्लिम जनसंपर्क आन्दोलन का नेतृत्व किया। उसी अवधि के दौरान उन्हें गुंटूर नगर परिषद का सदस्य चुना गया। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। जिसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा। कठोर कारावास की वजह से उनका स्वास्थ्य खराब होने लगा था, इस कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। 1947 के भारत विभाजन का तथा मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति से लोगों को सचेत किया स्वतंत्रता के बाद वह भारत की संविधान सभा का सदस्य मनोनीत किया गया बाद उन्होंने (1958-69) आंध्र प्रदेश राज्य विधानपरिषद के सदस्य के रूप में काम किया। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में तथा देश और लोगों की सेवा करने वाले 21 अगस्त 1970 को शेख साहब का निधन हो गया। स्वतंत्रता सेनानी
पिपरिया लखीसराय, बिहार का एक प्रखण्ड है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ लखीसराय जिला बिहार के प्रखण्ड
मनाखेत, गरुङ तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के बागेश्वर जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा मनाखेत, गरुङ तहसील मनाखेत, गरुङ तहसील
अर्थशास्त्र में आपूर्ति (supply) किसी संसाधन की वह मात्रा होती है जो उस संसाधन के उत्पादक किसी कीमत के बदले उस संसाधन के उपभोक्ताओं को देने के लिए तैयार होते हैं। अलग-अलग उत्पादक भिन्न कीमतों पर उस संसाधन को बनाने के लिए तैयार होते हैं। इसलिए अक्सर किसी क्षेत्र के बाज़ार में किसी संसाधन की आपूर्ति को उसके आपूर्ति वक्र (supply curve) के रूप में दर्शाया जाता है। आपूर्ति वक्र का उदाहरण फर्ज़ करें कि किसी देश में कृषि के लिए इतनी भूमि उपलब्ध है कि उसमें करोड़ों टन अनाज उगाया जा सकता है। लेकिन यह भूमि अलग-अलग प्रकार की है: कहीं उपजाऊ है और उसे नदी द्वारा मुफ्त सिंचाई का पानी मिलता है, जबकि अन्य स्थानों पर धरती बहुत शुष्क और बंजर है और उसमें खाद की बड़ी मात्रा चाहिए तथा मेहनत व खर्च से भूमिगत जल कुँओं से निकालना पड़ता है। बहुत से स्थानों में इन दोनों अवस्थाओं के बीच की परिस्थिति है, यानि भूमि मध्यम-दर्जे की उपजाऊँ है और सीमित मात्रा में जल सस्ता है लेकिन अधिक मात्रा में महंगा। कुल मिलाकर देखा जाता है कि: बाज़ार में 15 ₹ प्रति किलोग्राम कीमत मिले, तो अधिक ऊपजाऊ क्षेत्रों के किसान ही अनाज उगाते हैं और 10 करोड़ किलोग्राम तक अनाज उगा लेते हैं। कम ऊपजाऊ क्षेत्रों वाले किसान अनाज नहीं उगाते, क्योंकि इस कीमत पर उनका अनाज उगाने का खर्चा पूरा नहीं होता। यदि बाज़ार में कीमत बढ़े तो और किसान अनाज उगाने लगते हैं। अगर कीमत 30 ₹/किलो मिल जाए, तो 30 करोड़ किलोग्राम तक अनाज उगाया जाएगा। यह चित्र 1 में दर्शाया गया है। लम्ब अक्ष (P) पर ₹/किलो में कीमत है, और क्षितिज अक्ष (Q) पर करोड़ो किलोग्राम में अनाज उत्पादन की मात्रा है। बाज़ार में किसी कीमत पर कितना अनाज उत्पादित होगा वह इस आपूर्ति वक्र से आसानी देखा जा सकता है। ऐसे ही आपूर्ति वक्र बाज़ार में किसी भी संसाधन के लिए बनाए जा सकते हैं, जिनमें विद्युत उत्पादन, बाज़ार में बाल काटने वाले नाईयों की संख्या, वाहनों का उत्पादन, गणित सिखाने वाले शिक्षकों की संख्या, नए घरों का निर्माण, निवास के लिए किराए के कमरों की उप्लब्ध संख्या,सभी माल और सेवाएँ शामिल हैं। आपूर्ति में मूल्य संकेत बाज़ार में अनाज का मूल्य (कीमत) उत्पादकों के लिए एक संकेत जैसा काम करता है। जब मूल्य बढ़ता है तो कुछ उत्पादकों को संकेत मिलता है कि अब उन्हें भी अनाज उगाना चाहिए। अर्थव्यवस्था में कीमत की इस संकेत की भूमिका को मूल्य संकेत (price signal) कहा जाता है। इस मूल्य संकेत का अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए अत्यंत महत्त्व है। मान लीजिए कि बाज़ार में किसी समय पर अनाज की कीमत है और उसके अनुसार कुछ भूमि पर अनाज उगाया जाता है। किसी कारणवश अपेक्षा से अधिक वर्षा हो जाती है और जनसंख्या को अपनी खपत के लिए जितना अनाज चाहिए, उसे से अधिक अनाज उगाया जाता है। गोदाम भर जाते हैं और इस कारण से अगले साल कम अनाज उगाया जाना चाहिए ताकि बाज़ार में अनाज की इतनी थोक न हो कि अनाज पड़ा-पड़ा सड़ने लगे। अगर अर्थव्यवस्था मुक्त बाज़ार के सिद्धांतों पर चल रही है, तो अधिक अनाज होने से दाम गिरते हैं। दाम गिरने से कई किसान अनाज नहीं उगाते - इसकी बजाय सम्भव है कि वे सब्ज़ियाँ या कोई अन्य चीज़ उगाएँ। गोदामों में अतिरिक्त अनाज का उपभोग हो जाता है। यानि बाज़ार में उतना ही अनाज आता है, जितने की आवश्यकता है। इस स्थिति को आर्थिक दक्षता (economic efficiency) कहते हैं। मुल्य संकेत में हस्तक्षेप करने से आर्थिक अदक्षता उत्पन्न होती है: विभिन्न उत्पादन गलत मात्राओं में बनने लगते हैं। इन्हें भी देखें माँग (अर्थशास्त्र) आर्थिक संतुलन मुक्त बाज़ार आर्थिक दक्षता सन्दर्भ बाज़ार (अर्थशास्त्र)
बरहमपुर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र भारत के ओड़िशा राज्य का एक लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र है। ओड़िशा के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र
अन्तरिक्षीय अभियान्त्रिकी या अन्तरिक्षीय तकनीकी (:en:Astronautical engineering or :en:Space technology) बाहरी अन्तरिक्ष से जुड़ी हुई तमाम तकनीकियों का समूह है, जिसमें अन्तरिक्ष यात्रा, अन्तरिक्ष यान और उनकी बनावट और चाल, वगैरह शामिल हैं। ये वैमानिक और अन्तरिक्षीय अभियान्त्रिकी (:en:Aerospace engineering के दो बड़े हिस्सों में से एक है। अभियान्त्रिकी, अन्तरिक्षीय
बिजना घरघोडा मण्डल में भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के अन्तर्गत रायगढ़ जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक छत्तीसगढ जनजातियां कला खेल गोठ सतनाम पंथ छत्तीसगढ़ की विभूतियाँ रायगढ़ जिला, छत्तीसगढ़
रासबिहारी बोस(बांग्ला: রাসবিহারী বসু / रासबिहारी बसु , जन्म: २५ मई १८८६ - मृत्यु : २१ जनवरी १९४५) भारत के एक क्रान्तिकारी नेता थे जिन्होने ब्रिटिश राज के विरुद्ध भारत की आज़ादी के लिए गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन का कार्य किया। इन्होंने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, अपितु विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होने हिन्दू महासभा की जापानी शाखा की स्थापना भी की तथा इसके अध्यक्ष बने। यद्यपि देश को स्वतन्त्र कराने के लिये किये गये उनके ये प्रयास उनके जीवनकाल में सफल नहीं हो पाये, तथापि स्वतन्त्रता संग्राम में उनका योगदान अत्यन्त महान है। जीवन रासबिहारी बोस का जन्म २५ मई १८८६ को बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गाँव में के एक बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा सुबलदह में हुई, जहाँ उनके पिता विनोद बिहारी बोस थे। रासबिहारी बोस बचपन से ही देश की स्वतन्त्रता के स्वप्न देखा करते थे और क्रान्तिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। प्रारम्भ में रासबिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया। उसी दौरान उनका क्रान्तिकारी जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले युगान्तर नामक क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ जुड़ गये। बाद में वह अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे यतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रान्त, (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के निकट आये। दिल्ली में जार्ज पंचम के १२ दिसंबर १९११ को होने वाले दिल्ली दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी। अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसन्त कुमार विश्वास ने उन पर बम फेंका लेकिन निशाना चूक गया। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गयी और वह बचने के लिये रातों-रात रेलगाडी से देहरादून खिसक लिये और आफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। अगले दिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी, जिसमें उन्होंने वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की। इस प्रकार उन पर इस षडयन्त्र और काण्ड का प्रमुख सरगना होने का किंचितमात्र भी सन्देह किसी को न हुआ। १९१३ में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी। फरवरी १९१५ में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी। जापान में युगान्तर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूँकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गये हुये हैं, अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति के लिये जून १९१५ में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान के शहर शंघाई में पहुँचे और वहाँ रहकर भारत देश की आजादी के लिये काम करने लगे। इस प्रकार उन्होंने कई वर्ष निर्वासन में बिताये। जापान में भी रासबिहारी बोस चुप नहीं बैठे और वहाँ के अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतन्त्रता के लिये निरन्तर प्रयास करते रहे। उन्होंने जापान में अंग्रेजी अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने वहाँ न्यू एशिया नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने जापानी भाषा भी सीखी और १६ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने टोकियो में होटल खोलकर भारतीयों को संगठित किया तथा 'रामायण' का जापानी भाषा में अनुवाद किया। ब्रिटिश सरकार अब भी उनके पीछे लगी हुई थी और वह जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की माँग कर रही थी, इसलिए वह लगभग एक साल तक अपनी पहचान और आवास बदलते रहे। १९१६ में जापान में ही रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और १९२३ में वहाँ की नागरिकता ले ली। जापान में वह पत्रकार और लेखक के रूप में रहने लगे। जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और देश की आजादी के आन्दोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की अहम भूमिका रही। उन्होंने २८ मार्च १९४२ को टोक्यो में एक सम्मेलन बुलाया जिसमें 'इंडियन इंडीपेंडेंस लीग' की स्थापना का निर्णय किया गया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत की आजादी के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया। आई०एन०ए० का गठन २२ जून १९४२ को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। जापान ने मलय और बर्मा के मोर्चे पर कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। आई०एन०ए० का गठन रासबिहारी बोस की इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर १९४२ को किया गया। बोस ने एक झण्डे का भी चयन किया जिसे आजाद नाम दिया गया। इस झण्डे को उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया। रासबिहारी बोस शक्ति और यश के शिखर को छूने ही वाले थे कि जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में इसी ढाँचे पर सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई०एन०एस० का पुनर्गठन किया। भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने की जी-तोड़ मेहनत करते हुए किन्तु इसकी आस लिये हुए २१ जनवरी १९४५ को इनका निधन हो गया। उनके निधन से कुछ समय पहले जापानी सरकार ने उन्हें आर्डर ऑफ द राइजिंग सन के सम्मान से अलंकृत भी किया था। मुख्य कालक्रम २५ मई, १८८६ -- बंगाल के बर्धमान जिले के सुबलदह गाँव में जन्म १९०५ -- बंग भंग के समय वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में सम्मिलित होने लगे। १९०८ -- अरविन्द घोष और जतिन मुखर्जी के साथ अलीपुर बम काण्ड में शामिल ; ट्रायल से बचने के लिए बंगाल छोड़कर संयुक्त प्रान्त आदि में रहने लगे। २३ दिसम्बर, १९१२ -- हाथी पर सवार गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग पर दिल्ली के चांदनी चौक में बम फेंकने की योजना एवं क्रियान्यवन फरवरी, १९१५ -- भारत में १८५७ जैसा विद्रोह करने की योजना पर कार्य ; लेकिन पुलिस को योजना का पता चल गया। १२ मई, १९१५ -- "प्रियनाथ ठाकुर" के छद्म नाम का सहारा लेकर कोलकाता से जापान निकल गये। १९१५-१९१८ -- जापान में अपना स्थान बदल-बदल शरणार्थी की तरह रहे; कुल १७ बार स्थान बदला। १९१८ -- जापान में वहीं की कन्या टोशिको से विवाह १९२३ -- जापानी नागरिकता प्राप्त १९२४ -- पत्नी का निधन २८ मार्च, १९४२ -- इंडियन इंडिपेन्डेन्स लीग की स्थापना २२ जून, १९४२ -- लीग की द्वितीय बैठक बैंकाक में बुलाई। इसी लीग में निर्णय हुआ कि सुभाष चन्द्र बोस को बुलाकर इस लीग की कमान उन्हें सौंप दी जाय। ०१ सितम्बर, १९४२ -- आजाद हिन्द फौज की स्थापना २१ जनवरी, १९४५ -- क्षयरोग के कारण निधन चित्रावली सन्दर्भ इन्हें भी देखें अलीपुर बम काण्ड हिंदू-जर्मन षड्यंत्र गदर राज्य-क्रान्ति आजाद हिंद फ़ौज मोहन सिंह बाहरी कड़ियाँ महान स्वतंत्रता सेनानी रासबिहारी बोस क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक थे रासबिहारी बोस (हिन्दुस्तान) स्मरण: रासबिहारी बोस (जागरण) सशस्त्र क्रान्ति के संयोजक - रास बिहारी बोस (खबर इंडिया) रास बिहारी बोस जयंती और पुण्यतिथि कब है? भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम भारतीय क्रांतिकारी
क्रोमाइल क्लोराइड एक अकार्बनिक यौगिक है। क्रोमाइल क्लोराइड एक रासायनिक यौगिक है जिसका सूत्र CrO2Cl2 है। यह यौगिक एक हाइग्रोस्कोपिक गहरा लाल तरल है। अणु टेट्राहेड्रल है, जैसा कि आमतौर पर पाए जाने वाले क्रोमियम (VI) व्युत्पन्न क्रोमेट, [CrO₄] t की तरह है। भौतिक गुणों और संरचना के संदर्भ में, यह SO₂Cl and जैसा दिखता है। क्रोमियम यौगिक क्लोराइड धातु हैलाइड ऑक्सोहैलाइड ऑक्सीकारक अकार्बनिक यौगिक
अराणमुला (Aranmula) भारत के केरल राज्य के पतनमतिट्टा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह पम्पा नदी के किनारे और कोड़ेनचेरी के समीप स्थित है। इन्हें भी देखें पतनमतिट्टा ज़िला सन्दर्भ केरल के शहर पतनमतिट्टा ज़िला पतनमतिट्टा ज़िले के नगर
नाइजीरिया महिला राष्ट्रीय क्रिकेट टीम अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में नाइजीरिया देश का प्रतिनिधित्व करती है। टीम नाइजीरिया क्रिकेट फेडरेशन द्वारा आयोजित की जाती है, जो 2002 से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) का सदस्य रहा है। संदर्भ
आर्यसत्य की संकल्पना बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत है। इसे संस्कृत में 'चत्वारि आर्यसत्यानि' और पालि में 'चत्तरि अरियसच्चानि' कहते हैं आर्यसत्य चार हैं- (1) दुःख : संसार में दुःख है, (2) समुदय : दुःख के कारण हैं, (3) निरोध : दुःख के निवारण हैं, (4) मार्ग : निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं। प्राणी जन्म भर विभिन्न दु:खों की शृंखला में पड़ा रहता है, यह दु:ख आर्यसत्य है। संसार के विषयों के प्रति जो तृष्णा है वही समुदय आर्यसत्य है। जो प्राणी तृष्णा के साथ मरता है, वह उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है। इसलिए तृष्णा की समुदय आर्यसत्य कहते हैं। तृष्णा का अशेष प्रहाण कर देना निरोध आर्यसत्य है। तृष्णा के न रहने से न तो संसार की वस्तुओं के कारण कोई दु:ख होता है और न मरणोंपरांत उसका पुनर्जन्म होता है। बुझ गए प्रदीप की तरह उसका निर्वाण हो जाता है। और, इस निरोध की प्राप्ति का मार्ग आर्यसत्य - आष्टांगिक मार्ग है। इसके आठ अंग हैं-सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इस आर्यमार्ग को सिद्ध कर वह मुक्त हो जाता है। बाहरी कड़ियाँ गौतम बुद्ध का अद्भुत् जीवन The Buddhist: The Four Noble Truths by Nalaka Priyantha. Buddhism: The Four Noble Truths by Geshe Kelsang Gyatso. At Access to Insight: The Four Noble Truths: A Study Guide (by Thanissaro Bhikkhu) Wings to Awakening Section 3.H.i: The Four Noble Truths (translated by Thanissaro Bhikkhu) Talks given by Ajahn Sumedho: At Amaravati Monastery's web: The Four Noble Truths PDF version at Buddhanet.net: The Four Noble Truths eBook From the Ten Lecture Series, Lecture on the Four Noble Truths by Bhikkhu Bodhi: The Four Noble Truths A View on the Four Noble Truths The Light of Asia (Book Eight), a poem in iambic pentameter by Sir Edwin Arnold. Buddhism - the Four Noble Truths The Feeling Buddha: An alternate interpretation of the Four Noble Truths. Sixteen Aspects of the Four Noble Truths बौद्ध धर्म दर्शन
विक्रम सिंह बर्ण (जन्म २ अगस्त १९९५), जिन्हें विकस्टार१२३ और उपनाम विक के नाम से जाना जाता है, एक अंग्रेजी यूट्यूबर और इंटरनेट हस्ती हैं। वह ब्रिटिश यूट्यूब समूह साइडमेन के सदस्य और सह-संस्थापक हैं। प्रारंभिक जीवन और शिक्षा बर्ण का जन्म २ अगस्त १९९५ को गिल्डफोर्ड, सरी, इंग्लैंड में हुआ था जहाँ वह आठ साल की उम्र तक रहे। बाद में वह शेफ़ील्ड में रहे जहाँ उन्होंने सिल्वरडेल स्कूल में पढ़ाई की। वह तीन बच्चों में सबसे छोटे हैं। बर्ण को यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन करने के लिए जगह की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने अपने यूट्यूब करियर को पूर्णकालिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। आजीविका बर्ण २०१० में यूट्यूब से जुड़े; अपने दोस्तों के साथ गेम खेलने के बाद वह यूट्यूबरों को देखने और उनके खुद के वीडियो बनाने में लग गए। अंततः उन्होंने यह कहते हुए अपना स्वयं का चैनल लॉन्च करने का निर्णय लिया:मैं यह सोचकर इसमें शामिल हुआ कि मैं उनसे थोड़ा बेहतर करने में सक्षम हो सकता हूँ जो वे कर रहे हैं, और इसमें शामिल हो जाऊँ और इसमें कुछ मजा कर सकूँ। मैंने कॉल ऑफ ड्यूटी: मॉडर्न वारफेयर २ खेलते हुए खुद को रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया। मैंने ऐसे ट्यूटोरियल वीडियो बनाना शुरू किया जिन्हें लोग देख सकें - उनमें से कुछ चाकुओं के लिए थे और आप उन्हें मानचित्र पर कैसे फेंक सकते हैं। मैंने ऐसे स्थान दिखाने वाले वीडियो बनाए जहाँ आप चाकू या टॉमहॉक फेंक सकते हैं और मार सकते हैं। मैंने सोचा कि इन बेतुके हत्याओं को दिखाना अच्छा रहेगा।जैसे-जैसे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई, उन्होंने इसे और अधिक गंभीरता से लेते हुए माइनक्राफ्ट खेलना शुरू कर दिया। २०१३ में वह साइडमेन में शामिल हो गए जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। बाद में वह तीन अन्य सदस्यों के साथ चले गए, २०१४ से २०१८ तक उनके साथ एक घर साझा किया, जब उन्होंने घोषणा की कि वह साइडमेन हाउस से बाहर जा रहे थे। वह ड्रीम एसएमपी सर्वर का भी हिस्सा है। जनवरी २०२१ में उन्होंने अपने चैनल पर घोषणा की कि वह धोखाधड़ी के प्रसार के कारण कॉल ऑफ ड्यूटी: वारज़ोन खेलना छोड़ रहे हैं, यह कहते हुए कि अगर इसे ठीक नहीं किया गया तो हैकर्स गेम की मौत होंगे। कई अन्य हाई-प्रोफाइल स्ट्रीमर्स की आलोचना के साथ-साथ परिणामी हंगामे के कारण एक्टिविज़न को गेम के एंटी-चीट सॉफ़्टवेयर को अपडेट करना पड़ा। अन्य उद्यम बर्ण ईस्पोर्ट्स टीमों में एक निवेशक है और उसने इस बारे में बात की है कि उन्होंने कॉल ऑफ ड्यूटी की एक टीम, लंदन रॉयल रेवेन्स में कैसे निवेश किया है, और खेल को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाने के लिए एक ब्लूप्रिन्ट बनाने की अपनी इच्छा के बारे में बताया है। व्यक्तिगत जीवन दिसंबर २०२१ में बर्ण ने अपनी लंबे समय से प्रेमिका ऐली हार्लो से अपनी सगाई की घोषणा की। फिल्मोग्राफी पुरस्कार एवं नामांकन संदर्भ बाहरी संबंध जीवित लोग 1995 में जन्मे लोग Pages with unreviewed translations
सत्‍ये सिंह राणा,भारत के उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के टेहरी गढ़वाल जिले के 4 - देवप्रयाग विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय की ओर से चुनाव में भाग लिया। दिनाँक 23-11-1961 से 20-071963 तक जिला पंचायत टिहरी, टिहरी गढ़वाल के प्रथम अध्यक्ष रहे। सत्ये सिंह राणा जी का जन्म टिहरी गढ़वाल जिले की नैलचामी पट्टी के चौंरा गाँव में हुआ। सन्दर्भ उत्तर प्रदेश की प्रथम विधान सभा के सदस्य 4 - देवप्रयाग के विधायक टेहरी गढ़वाल के विधायक निर्दलीय के विधायक
जा फ़ॉनल रिसर्व कैमेरून मे स्थित एक विश्व धरोहर स्थल है। अफ़्रीका कैमरुन में विश्व धरोहर स्थल
परथौला, भिकियासैण तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के अल्मोड़ा जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा परथौला, भिकियासैण तहसील परथौला, भिकियासैण तहसील
करछना (Karchhana) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज ज़िले में स्थित एक गाँव है। यह इसी नाम की तहसील में स्थित है, जो ज़िले की आठ तहसीलों में से एक है। यातायात प्रयागराज से कोहडार मार्ग (लगभग दूरी २२ किलोमीटर) करछना रेलवे स्टेशन (कोड KCN) से करीब २ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। करछना मे प्रसिद्ध मदन मोहन मालवीय इंटर कॉलेज है जहाँ से पढ़ के कई छात्र सेना और अन्य सरकारी कार्यालयों मे सेवारत है इसमे NCC का प्रमाण पत्र भी मिलता है जिससे बहुत सारे छात्र यहाँ पर आते है करछना के निकट ही करछना तहसील है और पास मे थाना है थोड़ी ही 5 km की दूरी पर बराव है जिसके राजा कभी भूतपूर्व सांसद रेवती रमन थे अभी वर्तमान मे वही उनकी कोठी है इन्हें भी देखें प्रयागराज ज़िला सन्दर्भ प्रयागराज ज़िला उत्तर प्रदेश के गाँव प्रयागराज ज़िले के गाँव
गागरोन का युद्ध 1519 में मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय और राणा सांगा के राजपूत संघ के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध गागरोन (वर्तमान भारतीय राज्य राजस्थान में) क्षेत्र में हुआ और इसके परिणामस्वरूप सांगा की जीत हुई, जिसमें उसने महमूद को बंदी बना लिया और महत्वपूर्ण क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। पृष्ठभूमि मालवा के सुल्तान नासिर-उद-दीन खिलजी की मृत्यु के बाद, उनके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष छिड़ गया। महमूद खिलजी द्वितीय मुख्य रूप से राजपूत प्रमुख मेदिनी राय की सहायता से विजयी हुआ। मेदिनी राय का प्रभाव काफ़ी बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ के मुस्लिम रईसों की दुश्मनी हो गई, यहां तक कि नए सुल्तान ने भी गुजरात के मुजफ्फर शाह द्वितीय से सहायता के लिए अपील करना आवश्यक समझा। गुजरात सल्तनत की एक सेना को मांडू भेजा गया और उसे घेर लिया गया, जहां मेदिनी राय का बेटा अधिकार में था । बदले में मेदिनी राय ने मेवाड़ के राणा सांगा से सहायता मांगी, जो अपनी सेना को मालवा में सारंगपुर तक ले गए। हालांकि, तब तक गुजरात सल्तनत की सेना मांडू पर कब्जा कर लिया गया था, जिस कारण सांगा को मेदिनी राय के साथ मेवाड़ लौटना पड़ा। मेवाड़ में मेदिनी राय सांगा की सेवा में कार्यरत रहा। युद्ध मालवा क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रतिशोध में, महमूद ने गुजरात के आसफ खान के साथ मेवाड़ियों के खिलाफ एक सेना का नेतृत्व किया और इसे गागरोन के मार्ग से ले गया। इसके जवाब में राव वीरमदेव के अधीन मेड़ता के राठौरों के सहित चित्तौड़ से एक बड़ी सेना के साथ सांगा आगे बढ़ा। मेवाड़ी घुड़सवारों ने गुजराती घुडसवारियों के मध्य में से प्रहार किया, जिससे वे बिखर के भागने लगे। बाद में उन्होंने मालवा की सेना के साथ भी ऐसा ही किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें निर्णायक जीत मिली। महमूद घायल हो गया था और हरिदास केसरिया द्वारा बंदी बना लिया गया था। उसके अधिकांश अधिकारियों की मृत्यु हो गई थी और उसकी सेना को नष्ट कर दिया गया था। आसफ खान का बेटा मारा गया, हालांकि वह खुद भागने में सफल रहा। परिणाम सांगा ने बाद में गागरोन के साथ-साथ ही भीलसा, रायसेन, सारंगपुर, चंदेरी और रणथंभौर के क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया। महमूद को 6 महीने तक चित्तौड़ में बंदी बनाकर रखा गया था, हालांकि कहा जाता है कि राणा खुद व्यक्तिगत रूप से उसके घावों के इलाज की देखभाल की। बाद में सांगा ने महमूद को "सम्मानजनक" मांडू वापसी की अनुमति दी, हालांकि उसका एक बेटा मेवाड़ में बंधक के रूप में रहा। महमूद ने बाद में सांगा को उपहार के रूप में एक गहना और मुकुट भेजा। सांगा ने अपनी जीत के बाद हरिदास केसरिया को चित्तौड़ का किला भेंट किया, जिन्होंने इसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करके बदले में 12 गांवों की जागीर स्वीकार की। संदर्भ राजस्थान का इतिहास
अयनांत / अयनान्त (अंग्रेज़ी:सोलस्टिस) एक खगोलीय घटना है जो वर्ष में दो बार घटित होती है जब सूर्य खगोलीय गोले में खगोलीय विषुवत वृत्त के सापेक्ष अपनी उच्चतम अथवा निम्नतम अवस्था में भ्रमण करता है। विषुव और अयनान्त मिलकर एक ऋतु का निर्माण करते हैं। विभिन्न सभ्यताओं में अयनान्त को ग्रीष्मकाल और शीतकाल की शुरुआत अथवा मध्य बिन्दु माना जाता है। 21 जून को जब सूर्य जब उत्तरी चरम बिंदु पर होता है , इसे उत्तर अयनान्त कहते हैं। इस समय उत्तरी गोलार्ध में सर्वाधिक लम्बे दिन होते हैं और ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में इसके विपरीत सर्वाधिक छोटे दिन होते हैं और शीत ऋतु का समय होता है। २१ दिसंबर को जब सूर्य मकर रेखा के ठीक ऊपर होता है उसे दक्षिण अयनांत कहते हैं। दक्षिण अयनांत के बात सूर्य उत्तर की और गमन करता प्रतीत होता है , इसे उत्तरायण कहते हैं। उत्तर अयनांत के बाद सूर्य दक्षिण की और गमन करता प्रतीत होता है , उसे दक्षिणायन कहते हैं। इनका भ्रम संक्रांति से नहीं होना चाहिए। संक्रांति सूर्य के किसी राशि में प्रवेश करने का समय है। मकर संक्रांति १४ या १५ जनवरी को होती है , २१ दिसंबर को नहीं। मार्च और सितम्बर में जब दिन और रात्रि दोनों १२-१२ घण्टों के होते हैं तब उसे विषुवदिन कहते हैं. इन्हें भी देखें दक्षिण अयनांत उत्तरायण, दक्षिणायन, अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ वर्ष का सबसे लंबा दिन: सोलस्टिस कैलंडर खगोलीय घटनाएँ खगोलशास्त्र में समय सौर मंडल की गतिकी ज्योतिष के तकनीकी आयाम सौर मंडल की खगोलीय घटनाएँ
योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं। (अविद्याऽस्मिता रागद्वेषभिनिवेशा: पंच क्लेशा:, योगदर्शन २.३)। भाष्यकर व्यास ने इन्हें विपर्यय कहा है और इनके पाँच अन्य नाम बताए हैं- तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अंधतामिस्र (यो. सू. १.८ का भाष्य)। इन क्लेशों का सामान्य लक्षण है - कष्टदायिकता। इनके रहते आत्मस्वरूप का दर्शन नहीं हो सकता। अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। वह प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार चार रूपों में प्रकट होती है। पातंजल योगदर्शन (२.५) के अनुसार अनित्य, अशुचि, दु:ख तथा अनांत्म विषय पर क्रमश: नित्य, शुचि सुख और आत्मस्वरूपता की ख्याति ‘अविद्या’ है। दूसरे शब्दों में अविद्या वह भ्रांत ज्ञान है जिसके द्वारा अनित्य विषय, नित्य प्रतित होता है। अभिनिवेश नामक क्लेश में भी यही भाव प्रधान होता है। अशुचि को शुचि समझना अविद्या है। अर्थात्‌ अनेक अपवित्रताओं और मलों के गेह शरीर को पवित्र मानना अविद्या है। जैन विद्वान स्थान, बीज, उपहम्भ, निस्यंद, निधन और आधेय शौचत्व के कारण शरीर को अशुचि मानते हैं किंतु वे यह स्वीकार नहीं करते कि वह अविद्याग्रस्त है। नित्यता, शुचिता, सुख और आत्म नामक भ्रमों पर आश्रित होने के कारण अविद्या को चतुष्पदा कहा गया है। संतों ने इन्हीं चार पदों को ध्यान में रखकर अविद्या (माया) का गाय की उपमा दी हैं। अस्मिता अर्थात्‌ अहंकार बुद्धि और आत्मा को एक मान लेना दूसरा क्लेश है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अनुभूति का ही नाम अस्मिता है। सुख और उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा और लोभ का नाम राग हैं (सुखानुप्रायी राग:) यह तीसरा क्लेश है। चौथा क्लेश द्वेष पतंजाति के अनुसार दुखानुशयी है। दु:ख या दु:ख जनक वृत्तियों के प्रति क्रोध की जो अनुभूति होती हैं उसी का नाम द्वेष है। क्रोध की भावना तभी जाग्रत होती है जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को किसी अनुचित अथवा अपने अनुकूल मान लेते हैं। यह साधारण अविद्याजन्य है। आत्मा अकर्ता है अत: द्वेष के वशीभूत होना अकारण क्लेश का आह्वान करना है। पतंजलि के अनुसार जो सहज अथवा स्वाभाविक क्लेश विद्वान्‌ और अविद्वान्‌ सभी को समान रूप से होता है वह पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। प्रत्येक प्राणी-विद्वान्‌, अविद्वान्‌ सभी की आकांक्षा रही है कि उसका नाश न हो, वह चिरजीवी रहे। इसी जिजीविषा के वशीभूत होकर मनुष्य न्याय अन्याय, कर्म कुकर्म सभी कुछ करता है और ऊँच नीच का विचार न कर पाने के कारण नित्य नए क्लेशों में बँधता जाता है। योगशास्त्र में इन क्लेशों का क्षय कैवल्यप्राप्ति के लिए आवश्यक बताया गया है। यौगिक क्रियाओं द्वारा योगी इन क्लेशों का नाश करता हैं और उनका नाशकर परमार्थ की सिद्धि करता हैं। इन्हें भी देखें क्लेश (बौद्ध धर्म) बाहरी कड़ियाँ International Nath Order (INO) perspectives: Five Kleshas - International Nath Order Mahendranath, Shri Gurudev. "Twilight Yoga II: The Magnum Opus of Twilight Yoga" भारतीय दर्शन
कटरीसरायपुर कछोहा कन्नौज, कन्नौज, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ कन्नौज जिला के गाँव
मिटेगी लक्ष्मणरेखा भारतीय हिन्दी धारावाहिक है, जिसका प्रसारण एंड टीवी पर 28 मई 2018 से 31 अगस्त 2018 तक चला। इसका निर्माण शशि सुमित मित्तल और सुमित हुकुमचंद मित्तल ने किया है। इसमें मुख्य किरदार में राहुल शर्मा और शिवानी तोमर हैं। इसका प्रसारण सोमवार से शुक्रवार, रात 9:30 बजे होता था। इसके बंद होने के बाद इसके स्थान पर परफेक्ट पति का प्रसारण शुरू हुआ। कहानी ये कहानी कंचन (शिवानी तोमर) की है, जो लड़कियों को आत्म-रक्षा की शिक्षा देती है। वहीं राजकुमार विशेष (राहुल शर्मा) अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी कर घर आने वाला होता है। शीतल की शादी दस बार तय होते होते रुक जाती है, जिससे उसका पिता बलदेव काफी परेशान रहता है। एक दिन उसकी शादी की बात चलते रहती है कि कंचन राजभवन की गाड़ी से अपने घर आती है, जिसे देख कर लड़के वाले उस गाड़ी के पास खड़े सेवक से फोन की बातें सुनते हैं, और उन्हें लगता है कि कंचन की शादी राजकुमार विशेष से तय हो गई है। अपने आप को राज परिवार से जुड़ा देखने के लिए वे लोग शादी के लिए हाँ कर देते हैं। कहीं इस बार भी शादी टूट न जाये, इस कारण कंचन भी झूठ को सही कह देती है। शीतल की शादी तय हो जाती है। इस खबर को सुन कर उसका प्रेमी, जग्गी आत्महत्या करने की कोशिश करता है, तभी विशेष आ कर उसे बचा लेता है। वो दोनों शीतल की शादी में बावर्ची और सहायक बन कर चले जाते हैं। वहीं कंचन भी शीतल की शादी की तैयारी करते रहती है और वहीं उन दोनों की मुलाक़ात होती है। जग्गी विशेष को बावर्ची के रूप में मिलाता है और उसका नाम पप्पी बताता है। बाद में कंचन को पता चल जाता है कि शीतल और जग्गी एक दूसरे से प्यार करते हैं और पप्पी उन दोनों का साथ दे रहा है। कंचन कहती है कि उसे पहले से शक था कि ये बावर्ची नहीं है, वो उसके बारे में सही जानकारी पुछती है, तो जग्गी बताता है कि उसका नाम राजकुमार है और वो मैकेनिक है। शीतल की शादी से एक दिन पहले ही उसके पिता को सच्चाई पता चल जाती है कि शीतल और जग्गी एक दूसरे से प्यार करते हैं। उसे ये भी पता चल जाता है कि जग्गी और पप्पी उसे भगा कर ले जाने आए हैं। वो उन दोनों को मार मार कर भगा देता है। बाद में कंचन को पता चलता है कि पप्पी ही राजकुमार विशेष है। विशेष उससे जानकारी छिपाने बोलता है ताकि जग्गी और शीतल की शादी उनके प्यार के कारण ही हो, न कि मजबूरी में, और अगले दिन शीतल के पिता शीतल की शादी जग्गी के साथ करा देते हैं। जब वे लोग जाते रहते हैं, तब सभी को पता चलता है कि पप्पी ही राजकुमार विशेष है। इसके बाद कंचन और विशेष की मुलाक़ात होते रहती है और उन दोनों को एक दूसरे से प्यार भी हो जाता है, लेकिन जब विशेष उसे शादी के लिए पूछता है तो वो मना कर देती है। विशेष को मना करने का कारण समझ नहीं आता है और उसे ये भी पता चलता है कि एक दुर्घटना के बाद से उसके मन में डर समाया हुआ है। वो उस डर के कारण को जानने का प्रयास करते रहता है। कंचन ने जो अपनी माँ को चिट्ठी लिखी थी, उससे विशेष को सारी घटना का पता चलता है। इसके बाद वो कंचन की हिम्मत बढ़ाता है। उसके कुछ दिनों बाद वो भी शादी के लिए मान जाती है। कलाकार राहुल शर्मा - राजकुमार विशेष देवयानी ठाकुर शिवानी तोमर - कंचन वैष्णवी महंत राहुल गोस्सैन अमित ठाकुर जयश्री सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ
वैयक्तिक उपयोग की वस्तुएं, अर्जित आय तथा बचत साथ ही उत्पादन के कतिपय साधन जो व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं, वैयक्तिक संपत्ति (Personal Property) कहलाते हैं। वैयक्तिक संपत्ति की प्रकृति निजी संपत्ति से मूलतः भिन्न होती है। निजी संपत्ति मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के, दूसरों के श्रम के फलों को हड़पने के साधन के रूप में काम करती है परन्तु वैयक्तिक संपत्ति की मान्यता का अर्थ उसकी असीमित संवृद्धि नहीं है। समाजवाद के अंतर्गत अनर्जित आय की प्राप्ति के उद्देश्य से वैयक्तिक संपत्ति के दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। परंतु साम्यवाद के अंतर्गत वैयक्तिक संपत्ति की संकल्पना का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, क्योंकि वैयक्तिक आवश्यकताओं की पूर्ति मुख्यतया सामाजिक कोषों से होगी। सन्दर्भ दर्शन अर्थशास्त्र
सराय ममरेज हंडिया, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ इलाहाबाद जिला के गाँव
इंदर सभा () एक उर्दू का नाटक और ओपेरा है जिसे लखनऊ के अवध दरबार से सम्बन्ध रखने वाले लेखक व कवि आग़ा हसन अमानत​ ने लिखा और जिसे मंच पर सबसे पहले सन् १८५३ में प्रस्तुत किया गया। यह उर्दू की सबसे पहली रचाई जाने वाली नाटकीय कृति मानी जाती है। इन्दर सभा की अश्लीलता और भौंडेपन से क्षुब्ध होकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'बन्दर सभा' नामक नाटक की रचना की थी। १८६३ में इसे फ़्रीडरिख़ रोज़न (Friedrich Rosen) ने यूरोपीय पाठकों के लिए जर्मन भाषा में अनुवादित किया, जो कि उस समय के समीक्षकों के द्वारा सराहा गया था। १९३२ में मदन थियेटर ने इसपर आधारित एक फ़िल्म 'इन्द्रसभा' भी बनाई थी। ध्यान दें कि जबकि मूल नाटक का नाम लोक-बोली के अनुसार 'इंदर सभा' था, इसपर आधारित फ़िल्म का नाम संस्कृत-प्रथानुसार 'इन्द्रसभा' था। नाटक यह ओपेरा दिव्यलोक में महराज इन्द्र के राजदरबार को पृष्ठभूमि बनाकर लिखा गया है। पूरा नाटक काव्य-रूप में लिखा हुआ है और इसकी मुख्य कहानी एक परी (अप्सरा) और एक राजकुमार के बीच की प्रेमकथा है। नाटक में पटाख़ों और नक़ाबों जैसी नाटकीय तकनीकों का प्रयोग किया गया है। वैसे तो अमानत ने यह नाटक अवध के राजदरबार में रचाने के लिए ही लिखा था लेकिन इसके गीत जल्द ही लोक-संस्कृति में प्रवेश कर गए और "आने वाली कम-से-कम दो पीढ़ियों तक अवध के गीतकार और कलाकार इंदर सभा के गाने गाते थे"। इसका हिन्दी-उर्दू की गीत परम्परा के विकास पर भी प्रभाव पड़ा। नाटक में "३१ ग़ज़लें, ९ ठुमरियाँ, ४ होलियाँ, १५ गीत, २ चौबोले और ५ छंद सम्मिलित थे जिनपर आधारित कई नृत्य प्रस्तुत किये जा सकते थे"। इस नाटक का सीधा प्रभाव १९वीं और २०वीं में बाद में आने वाले कई उर्दू नाटकों पर बड़ा जिनमें ख़ादिम हुसैन अफ़सोस का 'बज़्म-ए-सुलयमान' (सन् १८६२), भैरों सिंह अस्मत​ का 'जश्न-ए-परिस्तान' और ताज महल फ़ार्रूख़​ का 'निगारिस्तान-ए-फ़ार्रूख़​' शामिल हैं। फ़िल्म १९३२ में प्रस्तुत की गई फ़िल्म 'इन्द्रसभा' भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे पहली बोलने वाली (टाकीज़) फ़िल्म थी। सबसे पहली भारतीय ध्वनिपूर्ण फ़िल्म 'आलम आरा' थी और 'इन्द्रसभा' ठीक उस से अगले ही वर्ष रिलीज़ हुई। यह २११ मिनट लम्बी थी और इसमें 71 गाने थे, जो विश्व-इतिहास में किसी भी बनी हुई फ़िल्म में सर्वाधिक हैं। 'इन्द्रसभा' फ़िल्म जमशेदजी फ़्रामजी मदन की 'मदन थियेटर' नामक कम्पनी ने बनाई थी। गीत का उदाहरण इंदर सभा के एक दृश्य में देवताओं के राजा इन्द्र अपने दरबार में प्रवेश करते हैं और एक चौबोले में कहते हैं कि: इन्हें भी देखें ओपेरा नौटंकी अवध पारसी थिएटर सन्दर्भ उर्दू साहित्य उर्दू नाटक हिन्दी फ़िल्में
तल्लीसेठी (दरियामद), कालाढूगी तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के नैनीताल जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा ), तल्लीसेठी (दरियामद, कालाढूगी तहसील ), तल्लीसेठी (दरियामद, कालाढूगी तहसील
आयरलैंड 'ए' टीम बांग्लादेश 'ए' टीम के खिलाफ एक प्रथम श्रेणी मैचों और पांच सीमित ओवरों मैच खेलने के लिए वर्तमान में बांग्लादेश का दौरा कर रही है। केवल प्रथम श्रेणी का मैच सिल्हेत इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम, सिल्हेत और कॉक्स बाजार में सीमित ओवरों के मैचों में खेला जाएगा। प्रथम श्रेणी मैच Cricbuzz केवल प्रथम श्रेणी मैच लिस्ट ए सीरीज 1ला मैच 2रा मैच 3रा मैच 4था मैच 5वा मैच सन्दर्भ क्रिकेट प्रतियोगितायें
चुराडी, अल्मोडा तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के अल्मोड़ा जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा चुराडी, अल्मोडा तहसील चुराडी, अल्मोडा तहसील
654 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। घटनाएँ जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर १८६४८४ +/९ अक्टूबर-दिसंबर अज्ञात तारीख़ की घटनाएँ जन्म जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसंबर निधन जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसंबर 654 वर्ष
ट्राइब्यूटाइलफोस्फिन एक कार्बनिक यौगिक है। कार्बनिक यौगिक
दिलीप ताहिल (जन्म: 30 अक्टूबर, 1952) हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं। व्यक्तिगत जीवन प्रमुख फिल्में नामांकन और पुरस्कार सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ बॉलीवुड अभिनेता हिन्दी अभिनेता 1952 में जन्मे लोग जीवित लोग
बिलग्राम (Bilgram) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई ज़िले में स्थित एक नगर है। विवरण बिलग्राम को भीलग्राम भी कहा जाता है। इस जगह की स्थापना भीलों ने करी थी और उन्हीं के आधार पर यह जगह भीलग्राम यानी 'भीलों का गांव ' नाम पड़ा , इस स्थान का इतिहास काफी पुराना है यह क्षेत्र राजा हिरण्य के समय से ही अस्तित्व में है , करीब 9 से 12 शताब्दी के बीच बाहरी आक्रमणकारियों ने भील राजाओं पर आक्रमण करना शुरू किए और क्षेत्र पर बाहरी लोगो ने आधिपत्य कर लिया। बहुत ही ऐतिहासिक तथा परम्पराओं वाला यह शहर अपने आप में एक मिशाल है । ‘जनाब’ शब्द का जन्म इसी बिलग़्राम से हुआ। तथा बादशाह औरंगज़ेब के सलाहकार इसी शहर से हुए है । इस छोटे से शहर ने बहुत मशहूर शख़्सियत दी । जिनकी लिखी हुई किताबें आज भी इस्लामिक देशों में पढ़ाई जाती है । भौगोलिक स्थिति बिलग्राम की स्थिति है और इसकी मानक समूद्र तल से ऊँचाई 136 मीटर (446 फुट) है। इन्हें भी देखें हरदोई ज़िला सन्दर्भ हरदोई ज़िला उत्तर प्रदेश के नगर हरदोई ज़िले के नगर
ज़म्बोआंगा देल सूर (Zamboanga del Sur) दक्षिणपूर्वी एशिया के फ़िलिपीन्ज़ देश का एक प्रान्त है। यह मिन्दनाओ द्वीप में स्थित है और ज़म्बोआंगा प्रायद्वीप नामक प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल है। चित्रदीर्घा शीर्षकों के लिए बिना क्लिक करे माउस चित्र पर लाएँ और एक क्षण ठहरें इन्हें भी देखें ज़म्बोआंगा प्रायद्वीप फ़िलिपीन्ज़ के प्रान्त सन्दर्भ फ़िलिपीन्ज़ के प्रान्त ज़म्बोआंगा प्रायद्वीप
बॊंतलपल्लॆ (अनंतपुर) में भारत के आन्ध्रप्रदेश राज्य के अन्तर्गत के अनंतपुर जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ आंध्र प्रदेश सरकार का आधिकारिक वेबसाइट आंध्र प्रदेश सरकार का पर्यटन विभाग NIC की वेबसाइट पर आंध्र प्रदेश पोर्टल आंध्र प्रदेश राज्य पुलिस की सरकारी वेबसाइट आन्ध्र प्रदेश अनंतपुर जिला
साष्ट्रीय साक्षरता मिशन (N.L.M) की स्थापना सन १९८८ में १५ से ३५ वर्ष की आयु के बीच के निरक्षरों को कामकाजी तौर पर साक्षर बनाने के लिए हुई थी। शिक्षा प्रमुख शिक्षा योजनाएं
दिल्ली का एक आवासीय क्षेत्र है। दिल्ली के आवासीय क्षेत्र
पूर्वांचल उत्तर-मध्य भारत का एक भौगोलिक क्षेत्र है जो उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित है। यह उत्तर में नेपाल, पूर्व में बिहार, दक्षिण मे मध्य प्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र और पश्चिम मे उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र द्वारा घिरा है। इसे एक अलग राज्य बनाने के लिए लंबे समय से राजनीतिक मांग उठती रही है। वर्तमान में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उत्तर प्रदेश विधानसभा में 117 विधायकों द्वारा होता है तो वहीं इस क्षेत्र से 23 लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं। पूर्वांचल के मुख्यतः तीन भाग हैं- पश्चिम में पूर्वी अवधी क्षेत्र, पूर्व में पश्चिमी-भोजपुरी क्षेत्र और उत्तर में नेपाल क्षेत्र। यह भारतीय-गंगा मैदान पर स्थित है और पश्चिमी बिहार के साथ यह दुनिया में सबसे अधिक घनी आबादी वाला क्षेत्र है। उत्तर प्रदेश के आसपास के जिलों की तुलना में मिट्टी की समृद्ध गुणवत्ता और उच्च केंचुआ घनत्व के कारण कृषि के लिए अनुकूल है। अवधी और भोजपुरी क्षेत्र में प्रमुख भाषा है। 1991 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने पूर्वांचल विकास निधि की स्थापना की जिसका उद्देश्य था क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं के लिये धन इकट्ठा करना जिससे भविष्य में संतुलित विकास के जरिए स्थानीय जरूरतों को पूरा करते हुए क्षेत्रीय असमानताओं का निवारण हो सके। लेकिन आजादी के 70 सालों बाद तक भी नहीं हो सका। सिर्फ पूर्वांचल के पिछड़ेपन के नाम पर वोटों की सियासत की जा रही है। हर चुनाव में विकास की बातें की जाती है मगर वोट लेने के बाद सभी राजनीतिक दल पूर्वांचल की बदहाली को भुला देते हैं। यही वजह है कि अब अलग राज्य की मांग तेजी से उठने लगी है।पूर्वांचल विकास परिवार संस्था पूर्वांचल के 6 करोड़ लोगों के बीच काम कर रही है। परिचय पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है। इसकी वजह जाति आधारित राजनीति तथा एक विशाल जनसंख्या है। पूर्वांचल के प्रमुख मुद्दों मे बुनियादी सुविधाओं की कमी, उचित ग्रामीण शिक्षा और रोजगार का अभाव, कानून व्यवस्था को चिह्नित किया गया है। पूर्वांचल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र है। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायक मंगल पांडे इसी क्षेत्र के बलिया के मूल निवासी थे। भदोही और मिर्जापुर एशिया में कालीन निर्माण में प्रमुख खिलाड़ी रहे हैं। प्रयागराज इसका प्रमुख और बड़ा शहर है। जिला वाराणसी भारतीय पर्यटन और विशेष रूप से साड़ी के निर्माण का केंद्र है। सोनभद्र पूर्वांचल का एक जिला, ७०००MW बिजली का उत्पादन करता है, जो उत्तर प्रदेश के राज्य में कुल बिजली उत्पादन के लगभग आधा है और भारत क सबसे बड़ा और केवल चूना पत्थर की प्रमुख खदान है। वाराणसी और कुशीनगर कुल उत्तर प्रदेश में आने के पर्यटकों के ६५% से अधिक लोगो को आकर्षित करता है। मिर्जापुर और सोनभद्र प्राकृतिक संसाधनों के साथ बहुत समृद्ध हैं। सब के बावजूद पूर्वांचल अभी भी राज्य में सबसे पिछड़े क्षेत्रो मे से एक है। जिसका मुख्य कारण राज्य सरकार और केन्द्र सरकार द्वारा उचित ध्यान की कमी है। वाराणसी को पूर्वांचल की राजधानी कहा जाता है। पूर्वांचल अपराध और भ्रष्टाचार के के कारण अति पिछड़े क्षेत्रों में सम्मिलित है,जिसके कारण आम जनता के लिए पर्याप्त शिक्षा और रोजगार के अवसरों का अभाव है। भारत के किसी भी क्षेत्र के लोगों से अधिक शोषण ब्रिटिशों ने इस क्षेत्र के लोगों का किया क्योंकि यहां के लोगों में प्रबल राष्ट्रवाद एवं देशभक्ति की भावना कूट कूट कर भरी थी, जो गुलामी का विरोध करते थे। पूर्वांचल के जिले गोण्डा गोण्डा पूर्वांचल का प्रमुख शहर और जिला है, यह जिला ब्रिटिश राज में गोरखपुर से जुड़ा था बाद मैं अलग करदिया गया। गोंडा नजदीकी जिले बस्ती , बलरामपुर ,श्रावस्ती और अयोध्या है। यह जिला देवीपाटनमंडल मैं आता है। वाराणसी वाराणसी शहर उत्तरी भारत की मध्य गंगा घाटी में, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर गंगा नदी के बायीं ओर के वक्राकार तट पर स्थित है। यहां वाराणसी जिले का मुख्यालय भी स्थित है। वाराणसी शहरी क्षेत्र — सात शहरी उप-इकाइयों का समूह है और ये ११२.२६ वर्ग कि॰मी॰ (लगभग ४३ वर्ग मील) के क्षेत्र फैला हुआ है।[49] शहरी क्षेत्र का विस्तार (८२°५६’ पूर्व) - (८३°०३’ पूर्व) एवं (२५°१४’ उत्तर) - (२५°२३.५’ उत्तर) के बीच है।[49] उत्तरी भारत के गांगेय मैदान में बसे इस क्षेत्र की भूमि पुराने समय में गंगा नदी में आती रहीं बाढ़ के कारण उपत्यका रही है। वाराणसी में विभिन्न कुटीर उद्योग कार्यरत हैं, जिनमें बनारसी रेशमी साड़ी, कपड़ा उद्योग, कालीन उद्योग एवं हस्तशिल्प प्रमुख हैं। बनारसी पान विश्वप्रसिद्ध है और इसके साथ ही यहां का कलाकंद भी मशहूर है। वाराणसी में बाल-श्रमिकों का काम जोरों पर है। बनारसी रेशम विश्व भर में अपनी महीनता एवं मुलायमपन के लिये प्रसिद्ध है। बनारसी रेशमी साड़ियों पर बारीक डिज़ाइन और ज़री का काम चार चांद लगाते हैं और साड़ी की शोभा बढ़ाते हैं। इस कारण ही ये साड़ियां वर्षों से सभी पारंपरिक उत्सवों एवं विवाह आदि समारोहों में पहनी जाती रही हैं। कुछ समय पूर्व तक ज़री में शुद्ध सोने का काम हुआ करता था। वाराणसी के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (आई.सी.एस.ई), केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई) या उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यू.पी.बोर्ड) से सहबद्ध हैं। जौनपुर जौनपुर जिला वाराणसी प्रभाग के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित है। इसकी भूमिक्षेत्र २४.२४०N से २६.१२०N अक्षांश और ८२.७०E और ८३.५०E देशांतर के बीच फैली हुई है। गोमती और सई मुख्य नदियाँ हैं। इनके अलावा, वरुण, पिली और मयुर आदि छोटी नदियाँ हैं। मिट्टी मुख्य रूप से रेतीली, चिकनी बलुई है। जिले मे खनिजों की कमी है। जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल ४०३८ किमी२ है। जौनपुर जिला की वास्तविक जनसंख्या ४,४७६,०७२ (भारतीय जनगणना २०११) है। जिनमे २,२१७,६३५ पुरुष तथा २,२५८,४३७ महिलाएँ है। जिले का आर्थिक विकास मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। इस का मुख्य कारण जिले में भारी उद्योग का अभाव है। कई उद्योग वाराणसी-जौनपुर राजमार्ग के साथ आ रहे हैं। भदोही भदोही, उत्तर प्रदेश का एक जिला है। यह कालीन निर्माण के लिये प्रसिद्ध है। उत्‍तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के प्रमुख जनपद वाराणसी से 1996 में बना भदोही जिला आम जन के द्वारा 'कालीन नगरी' नाम से जाना जाता है। इलाहाबाद, जौनपुर, वाराणसी, मीरजापुर की सीमाओं को स्‍पर्श करता यह जिला अपने कालीन उद्योग के कारण विश्‍व में अत्‍यन्‍त प्रसिद्ध है। भारत के भौगोलिक मानचित्र पर यह जिला मध्‍य गंगा घाटी में 25.09 अक्षांश उत्‍तरी से 25.32 उत्‍तरी अक्षांश तक तथा 82.45 देशान्‍तर पूर्वी तक फैला है। 1056 वर्ग कि॰मी॰ क्षेत्रफल वाले इस जिले की जनसंख्‍या 10,77630 है। ज्ञानपुर, औराई, भदोही तीन तहसील मुख्‍यालयों के अधीन डीघ, अभोली, सुरियावां, ज्ञानपुर, औराई और भदोही विकास खण्‍ड कार्यालय है। इलाहाबाद की 2 विधानसभा सीटें हंडिया और प्रतापपुर के साथ मिलकर संसदीय क्षेत्र बनाने वाले इस जनपद में 3 विधान सभा क्षेत्र ज्ञानपुर,औराई और भदोही हैं। इस जनपद का मुख्‍य व्‍यवसाय कालीन है। मिर्ज़ापुर मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश राज्य का एक शहर है। यह मिर्ज़ापुर जिला का मुख्यालय है। पर्यटन की दृष्टि से मिर्जापुर काफी महत्वपूर्ण जिला माना जाता है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक वातावरण बरबस लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। मिर्जापुर स्थित विन्ध्याचल धाम भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। इसके अतिरिक्त, यह जिला सीता कुण्ड, लाल भैरव मंदिर, मोती तालाब, टंडा जलप्रपात, विन्धाम झरना, तारकेश्‍वर महादेव, महा त्रिकोण, शिव पुर, चुनार किला, गुरूद्वारा गुरू दा बाघ और रामेश्‍वर आदि के लिए प्रसिद्ध है। मिर्जापुर वाराणसी,भदोही जिले के उत्तर, सोनभद्र जिले के दक्षिण और इलाहाबाद जिले के पश्चिम से घिरा हुआ है। मिर्जापुर की स्थिति 25.15, 82.58 पर है। यहां की औसत ऊंचाई है 80 मीटर (265 फीट)। प्रमुख आकर्षण तारकेश्वर महादेव, मिर्जापुर महात्रिकोण, मिर्जापुर शिवपुर, मिर्जापुर सीता कुंड, मिर्जापुर चुनार का किला भारत का मानक समय मिर्ज़ापुर जिले के विंध्याचल शहर के अमरावती चौराहे से निर्धारित किया जाता है। गाज़ीपुर गाजीपुर, पूर्वांचल का पुराना जिला एवं नगर है। इसका प्राचीन नाम गाधिपुरी था जो कि लगभग सन १३३० में सैय्यद मसूद ग़ाज़ी नामक एक मुल्स्लिम शासक द्वारा बदल दिया गया। गाजीपुर, अंग्रेजों द्वारा १८२० में स्थापित, विश्व में सबसे बड़े अफीम के कारखाने के लिए प्रख्यात है। यहाँ हथकरघा तथा इत्र उद्योग भी है। ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस की मृत्यु यहीं हुई थी तथा वे यहीं दफन हैं। शहर उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा के बहुत नजदीक स्थित है। यहाँ की स्थानीय भाषा भोजपुरी है। यह पवित्र शहर बनारस के ७० की मी पूर्व में स्थित है गोरखपुर गोरखपुर, पूर्वांचल का प्रमुख जिला एवं नगर है। यह गोरखपुर जिला, और गोरखपुर कमीशनरी तथा पूर्वोत्तर रेलवे का प्रशासनिक मुख्यालय है। यह नगर गीता प्रेस एवं गोरखनाथ मन्दिर के लिये विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यह महान संत परमहंस योगानन्द का भी जन्म स्थान है। शहर में भी कई ऐतिहासिक बौद्ध स्थल है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर पूर्वाचल का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय है। यहां पर 4 विश्विद्यालय हैं। यहां पर 2 मेडिकल कॉलेज भी हैं। पिछले दिनों गोरखपुर एम्स का लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कर कमलों से हुआ। अब गोरखपुर का उर्वरक कारखाना भी चालू हो गया है। यहां पर एयरफोर्स बेस स्टेशन भी है,जो कि 1963 में बनाया गया था। ये 6 सेंतुरारी में 16 जनपद में से एक था जिसे माला के नाम से जानते थे।चौरी चौरा कांड यही पर हुआ था। यहां पर मिया साहेब का इमामबाड़ा भी है ,जिसमे सोने और चांदी की ताझिया रखी हुई है। इमामबाड़े में एक धुनि है जो कई दसको से जल रही। कुशीनगर कुशीनगर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला एवं एक एक छोटा सा कस्बा है। इस जनपद का मुख्यालय कुशीनगर से कोई १५ किमी दूर पडरौना में स्थित है। कुशीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग २८ पर गोरखपुर से कोई ५० किमी पूरब में स्थित है। महात्मा बुद्ध का निर्वाण यहीं हुआ था। यहाँ अनेक सुन्दर बौद्ध मन्दिर हैं। इस कारण से यह एक अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी है जहाँ मुख्यत: विश्व भर के बौद्ध तीर्थयात्री भ्रमण के लिये आते हैं। कुशीनगर कस्बे के और पूरब बढ़ने पर लगभग २० किमी बाद बिहार राज्य आरम्भ हो जाता है। हाल में कुशीनगर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी बना है, जिसका लोकार्पण भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर, 2021 को किया। देवरिया देवरिया भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर एवं जिला मुख्यालय है। देवरिया जनपद में मुख्य रूप से हिन्दी भाषा बोली जाती है। देवरिया जनपद की कुल जनसंख्या की लगभग ९६ प्रतिशत जनता हिन्दी, लगभग ३ प्रतिशत जनता उर्दू और एक प्रतिशत जनता के बातचीत का माध्यम अन्य भाषाएँ हैं। बोली की बात करें तो ग्रामीण जनता के साथ-साथ अधिकांश शहरी जनता भी प्रेम की बोली भोजपुरी बोलती है। कुल जनसंख्या की दृष्टि से इस जनपद में लगभग चौरासी प्रतिशत हिन्दू, लगभग पंद्रह प्रतिशत मुस्लिम और एक प्रतिशत अन्य धर्म को मानने वाले हैं। इस जनपद की जनता आपस में प्रेम-भाव से रहते हुए सबके दुख-सुख में सहभागी बनती है। या यूँ कहें "देवरिया जनपद रूपी उपवन को हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध आदि पुष्प अपनी सुगंध से महकाते हैं और ये सुगंध आपस में मिलकर पूरे भारत को गमकाती है।" आज़मगढ़ आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में से एक महत्वपूर्ण जिला है । जो सरयू नदी के दक्षिण और गंगा नदी के उत्तर में तमसा नदी के किनारे बसा है । महाकाब्यों के अनुसार तमसा नदी को भगवान श्रीराम पार करके चित्रकूट की तरफ गयें थें। प्रथम पंचवर्षी योजना यहां के लिए बहुत ही लाभकारी रही थी। यहां पर अवधि और भोजपुरी भांषाओं का संगम है।उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में से एक, आजमगढ़, अपने उत्तर-पूर्वी हिस्से को छोड़कर कभी प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा था। आजमगढ़ को ऋषि दुर्वासा की भूमि के रूप में भी जाना जाता है, जिसका आश्रम फूलपुर तहसील में स्थित था, जो फूलपुर तहसील मुख्यालय से 6 किलोमीटर (3.7 मील) उत्तर में तमसा और मझुए नदियों के संगम के पास स्थित था। इसकी स्थापना शाहजहां के शासनकाल के दौरान 1665 में विक्रमजीत के बेटे आजम ने की थी। विक्रमाजीत परगना निज़ामाबाद में मेहनगर के गौतम राजपूतों के वंशज थे जिन्होंने अपने कुछ पूर्ववर्तियों की तरह इस्लाम अपनाया था। उसकी एक मुस्लिम पत्नी थी, जिससे उसके दो बेटे आज़म और अज़मत हुए। आज़म ने अपने नाम से शहर का नाम आज़मगढ़ शहर, और किला को अपना नाम दिया, जबकी अज़मत ने परगना सगरी में किले और अज़मतगढ़ बाजार का निर्माण करवाया था। चैबील राम के हमले के बाद, अज़मत खान अपने सैनिकों के साथ उत्तर की ओर भाग गया। उन्होंने गोरखपुर में घाघरा पार करने का प्रयास किया, लेकिन दूसरी तरफ के लोगों ने उसके आने का विरोध किया, और उन्हें या तो मध्य धारा में गोली मार दी गई या बचने के प्रयास में डूब गया। आजमगढ़ स्वतंत्रा आंदोलन के लिए भी पहचाना जाता है, गांधीजी के आव्हान पर सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अतरौलिया खंड के रामचरित्र सिंह व उनके नाबालिक बेटे सत्यचरण सिंह ने एक साथ अंग्रेजो का डटकर मुकाबला किया और गोली खायी। पिता पुत्र का एकसाथ स्वतंत्रा के आंदोलन में कूदने का विरला ही उदाहरण देखने को मिलता है। महान यायावर साहित्यकार महापंडित राहुल सांकृत्यायन और शायर कैफी आजमी का संबंध पर आजमगढ़ से रहा है। वीर रस के महान कवि अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिओंध और श्याम नारायण पांडेय का जन्म भी आजमगढ़ में ही हुआ। झारखंड के प्रसिद्ध स्वयंसेवी संस्था विकास भारती के संस्थापक सह सचिव अशोक भगत का जन्म भी आजमगढ़ जिले में हुआ. आदिवासियों के बीच सेवा और विकास के प्रकल्प चलाने के लिए भारत सरकार ने श्री अशोक भगत को प्रतिष्ठित पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह एक पूर्वांचल का सबसे रंगबाज जिला माना जाता है। मऊ मऊ उत्तर प्रदेश के मऊ जिला का मुख्यालय है। इसका पूर्व नाम मऊनाथ भंजन (उर्दु:امئو نات بنجن)) था। अवन्तिकापुरी, गोविन्द साहिब, दत्तात्रेय, दोहरी घाट, दुर्वासा, मेहनगर, मुबारकपुर, महाराजगंज, नि‍जामाबाद और आजमगढ़ मऊ के प्रमुख स्थलों में से है। यह जिला लखनऊ के दक्षिण-पूर्व से 282 किलोमीटर और आजमगढ़ के पूर्व से 56 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह शहर तमसा नदी के किनारे बसा है। तमसा नदी शहर के बीच से निकलती/गुजरती है। भामऊ जिले के इतिहास को लेकर कई भ्रम है। सामान्यत: यह माना जाता है कि मऊ शब्द तुर्किश शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ गढ़, पांडव और छावनी होता है। वस्तुत: इस जगह के इतिहास के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। माना जाता है प्रसिद्ध शासक शेर शाह सूरी के शासन काल के दौरान इस क्षेत्र में कई आर्थिक विकास करवाए गए। वहीं मिलिटरी बेस और शाही मस्जिद के निर्माण में काफी संख्या में श्रमिक और कारीगर मुगल सैनिकों के साथ यहां आए थे। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय में भी मऊ की महत्वपूर्ण भूमिका रही महाराजगंज भारत-नेपाल सीमा के समीप स्थित महाराजगंज उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है। इसका जिला मुख्यालय महाराजगंज शहर मे स्थित है। पहले इस जगह को कारापथ के नाम से जाना जाता था। यह जिला नेपाल के दक्षिण , गोरखपुर जिले के उत्तर, कुशीनगर जिले के पश्चिम और सिद्धार्थ नगर व संत कबीर नगर जिले के पूर्व मे स्थिति है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण स्थल है।नौतनवा ,सौनोली, आनंद नगर, कोल्हुई,सिसवा,परतावल और निचलोल ।यहां की मुख्य बाज़ार और कस्बे है। बस्ती यह भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर और बस्ती जिला का मुख्यालय है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। बस्ती जिला संत कबीर नगर जिले के पश्चिम में और गोण्डा के पूर्व में स्थित है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भी यह उत्तर प्रदेश का सातवां बड़ा जिला है। प्राचीन समय में बस्ती को 'कौशल' के नाम से जाना जाता था। संत कबीर नगर संत कबीर नगर जिला उत्तरी भारत के उत्तर प्रदेश राज्य 75 जिलों में से एक है। खलीलाबाद शहर जिला मुख्यालय है| संत कबीर नगर जिला बस्ती मंडल का एक हिस्सा है। यह जिला उत्तर में सिद्धार्थ नगर जिले से पूर्व में गोरखपुर जिले से दक्षिण में अम्बेडकर नगर जिले से और पश्चिम में बस्ती जिला द्वारा घिरा है। इस जिले का क्षेत्रफल 1659.15 वर्ग किलोमीटर है।यह तीन तहसीलो मे बटा है धनघटा,खलीलाबाद, मेहदावल । भगवान शिव का विश्वव प्रसिद्ध मंदिर श्री तामेश्वरनाथ धाम,अवधी के मसहूर कवि रंगपाल हरिहरपुर,विश्व प्रसिध्द संत कबीर की निर्वाण स्थली मगहर और बखिर पक्षी विहार झील,हैंसर आदि यहां के प्रमुख स्थलों में से हैं। घाघरा, राप्‍ती,आमी और कुआनो यहां की प्रमुख नदियां है। मगहर एक कस्बा है जो आमी नदी के किनारे स्थित है|मगहर में संत कबीरदास की मृत्यु हुई थी|जिनके नाम पर जिले का नाम पड़ा है|मेहदावल विधानसभा से ही उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला विधायक श्रीमती सुचेता कृपलानी(पूर्व मुख्यमन्त्री) चुनी गयी थी। सिद्धार्थ नगर सिद्धार्थनगर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय सिद्धार्थनगर है। प्राचीन काल के शाक्य गणराज्य की राजधानी भगवान बुद्ध जहां के राजकुमार थे "कपिलवस्तु" इसी जनपद में स्थित है। भगवान बुद्ध के वास्तविक नाम "सिद्धार्थ" के ऊपर ही इस जनपद का नाम सिद्धार्थनगर रखा गया है। इस जनपद में नौगढ़,शोहरतगढ़,इटवा, डुमरियागंज और बांसी 5 तहसीलें हैं। कपिलवस्तु, शोहरतगढ़, इटवा,डुमरियागंज और बांसी 5 विधानसभा क्षेत्र हैं। सिद्धार्थनगर के पूर्व में जनपद महराजगंज और संतकबीरनगर, पश्चिम में जनपद बलरामपुर, उत्तर में नेपाल देश और दक्षिण में जनपद बस्ती स्थित है।इस जिले की प्रमुख नदियां राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बाणगंगा आदि नदियां हैं। इस जिले में चार बड़े रेलवे स्टेशन नौगढ़, बढ़नी, शोहरतगढ व उसका है। इस जिले में 5 तहसील, 14 व्लाक व 6 नगर हैं। यहां की मुख्य भाषा हिन्दी, अवधी, उर्दू व भोजपुरी है। मुख्य व्यवसाय कृषि है।उपजाऊ मिट्टी के पाये जाने के कारण यहां पर धान (प्रसिद्ध कालानमक), गेहूं व गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। सिद्धार्थनगर का "कालानमक" चावल अपने स्वाद और सुगंध के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसके अलावा सिद्धार्थनगर में 'सिद्धार्थ विश्वविद्यालय सिद्धार्थनगर, कपिलवस्तु भी अवस्थित है, जो पठन-पाठन के लिए एवं बौद्ध अध्ययन के लिए जाना जाता है। और अभी हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने ,स्व० माधव प्रसाद त्रिपाठी,मेडिकल कॉलेज का लोकार्पण भी किया है, यह पर घरेलू हवाई अड्डा भी प्रस्तावित है, बलिया बलिया पूर्वांचल का प्रमुख जिला एवं नगर है। शहर की पूर्वी सीमा गंगा और घाघरा के संगम में निहित है। बलिया, गाजीपुर से 76 किलोमीटर और वाराणसी से 150 किलोमीटर स्थित है। पूर्वांचल के अन्य जिलों की भांति भोजपुरी यहाँ के लोगों की मुख्य बोली है। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बलिया बागी बलिया (विद्रोही बलिया) के रूप में अपना महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय बलिया ने एक छोटी अवधि के लिये ब्रिटिश शासन के जिला सरकार का तख्ता पलट किया और चित्तू पांडे के अधीन एक स्वतंत्र प्रशासन स्थापितकिया। एक वार्षिक मेले के ददरी मेला, एक मैदान पर शहर की पूर्वी सीमा पर गंगा और सरयू नदियों के संगम पर मनाया जाता है। मऊ, आजमगढ़, देवरिया,गोरखपुर,गाजीपुर और वाराणसी के रूप में पास के जिलों के साथ नियमित संपर्क में रेल और सड़क के माध्यम से मौजूद है। रसड़ा - यहाँ से ३५ किलोमीटर पश्चिम में स्थित एक क़स्बा है। यहाँ नाथ बाबा का मंदिर है जो स्थानीय सेंगर राजपूतों के देवता हैं। इसके अलावा यहाँ दरगाह हज़रत रोशन शाह बाबा, दरगाह हज़रत सैयद बाबा और लखनेसर डीह के प्राचीन अवशेष दर्शनीय स्थल हैं। सोनभद्र सोनभद्र भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय राबर्ट्सगंज है। स्वतंत्रता मिलने के लगभग 10 वर्षों तक यह क्षेत्र (तब मिर्जापुर जिले का भाग) अलग-थलग था तथा यहां यातायात या संचार के कोई साधन नहीं थे। पहाड़ियों में चूना पत्थर तथा कोयला मिलने के साथ तथा क्षेत्र में पानी की बहुतायत होने के कारण यह औद्योगिक स्वर्ग बन गया। यहां पर देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्रियां, बिजली घर (थर्मल तथा हाइड्रो), एलुमिनियम एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। साथ ही कई सारी सहायक इकाइयां एवं असंगठित उत्पादन केन्द्र, विशेष रूप से स्टोन क्रशर इकाइयां, भी स्थापित हुई हैं। . रायबरेली रायबरेली भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है। या मुख्यतः अवध के अंतर्गत आता है। इसके पड़ोसी जिले राजधानी लखनऊ, फतेहपुर, उन्नाव, अमेठी, सुल्तानपुर और बाराबंकी है। इसका मुख्यालय रायबरेली में ही स्थित है। शिक्षा पूर्वांचल के प्रमुख विश्वविद्यालय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, (बीएचयू) वाराणसी सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु सिद्धार्थ नगर जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय,बलिया महाराजा सुहेलदेव राज्य विश्वविद्यालय,आज़मगढ़ मदन मोहन प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर महायोगी गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय, गोरखपुर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर महत्वपूर्ण सड़क, रेल और हवाई अड्डे प्रमुख सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग-२, ७, १९, २८, ५६, ९७ स्वर्णिम चतुर्भुज रेलवे पूर्वांचल के महराजगंज जिला को छोड़कर सभी जिले रेलवे से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। प्रयागराज, उत्तर मध्य रेलवे का मुख्य़ालय है जबकि गोरखपुर, पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय है। सन्दर्भ
गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ यथा शीघ्र करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देने के लिए वानप्रस्थ संस्कार कराया जाता है। इसी आधार पर समाज को परिपक्व ज्ञान एवं अनुभव सम्पन्न, निस्पृह लोकसेवी मिलते रहते हैं। समाज में व्याप्त अवांछनीयताओं, दुष्प्रवृत्तियों, कुरीतियों के निवारण तथा सत्प्रवृत्तियों, सत्प्रयोजनों के विकास का दायित्व यही भली प्रकार संभाल सकते हैं। ये ही उच्च स्तरीय समाज सेवा, परमार्थ करने के साथ उच्च आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त करने में सफल होते हैं। युग निर्माण अभियान के अंतर्गत इनके भी बड़े सार्थक एवं सफल प्रयोग हो रहे हैं। व्याख्या ढलती उम्र का परम पवित्र कर्त्तव्य है- वानप्रस्थ। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ जैसी ही हल्की होने लगें, घर को चलाने के लिए बड़े बच्चे समर्थ होने लगें और अपने छोटे भाई-बहिनों की देखभाल करने लगें, तब वयोवृद्ध आदमियों का एक मात्र कर्त्तव्य यही रह जाता है कि वे पारिवारिक जिम्मेदारियों से धीरे-धीरे हाथ खींचे और क्रमशः वह भार समर्थ लड़कों के कन्धों पर बढ़ाते चलें। ममता को परिवार की ओर से शिथिल कर समाज की ओर विकसित करते चलें। सारा समय घर के ही लोगों के लिए खर्च न कर दें, वरन् उसका कुछ अंश क्रमशः अधिक बढ़ाते हुए समाज के लिए समर्पित करते चलें। धर्म और संस्कृति का प्राण- वानप्रस्थ संस्कार भारतीय धर्म और संस्कृति का प्राण है। जीवन को ठीक तरह जीने की समस्या उसी से हल हो जाती है। युवावस्था के कुसंस्कारों का शमन एवं प्रायश्चित इसी साधना द्वारा होता है। जिस देश, धर्म जाति तथा समाज में उत्पन्न हुए हैं, उनकी सेवा करने का, ऋण मुक्त होने का अवसर भी इसी स्थिति में मिलता है। इसलिए जिन नर-नारियों की स्थिति इसके लिए उपयुक्त हो, उन्हें वानप्रस्थ ले लेना चाहिए। एक प्रतिज्ञा बन्धन में बँध जाने पर व्यक्ति अपने जीवनक्रम को तदनुरूप ढालने में अधिक सफल होता है, बिना संस्कार कराये मनोभूमि पर वैसी छाप गहराई तक नहीं पड़ती। इसलिए कदम कभी आगे बढ़ते, कभी पीछे हटते रहते हैं। विवाह न होने तक प्रेमी का सहचरत्व संदिग्ध रहता है, पर जब विवाह हो गया हो, तो सब कुछ स्थायी एवं सुनियोजित हो जाता है। संस्कार के बिना पारमार्थिक भावनाओं का तूफान कभी शिथिल या समाप्त भी हो सकता है, पर यदि विधिवत् संस्कार कराया गया, तो अन्तःप्रेरणा तथा लोकलाज दोनों ही निर्धारित गतिविधि अपनाये रहने की प्रेरणा देते रहेंगे, इसलिए शास्त्र मर्यादा के अनुरूप जिन्हें सुविधा हो, वे विधिवत् संस्कार करा लें। जिन्हें सुविधा न हो, वे बिना संस्कार के भी उपयुक्त प्रकार की रीति-नीति अपनाने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न करते रहें। लोक शिक्षण की आवश्यकता- इस गतिविधि को अपनाने से समाज की भी भारी सेवा होती है। प्राचीनकाल में लोक निर्माण की सारी गतिविधियों एवं प्रवृत्तियों के संचालन का उत्तरदायित्व साधु-ब्राह्मण, वानप्रस्थों पर ही था, वे अपनी सारी शक्तियाँ परमार्थ भावना से प्रेरित होकर जनमानस को सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त किये रहने में लगाये रहते थे। फलस्वरूप चारों ओर धर्म, कर्त्तव्य, सदाचार का ही वातावरण बना रहता था। वयोवृद्ध अनुभवी परमार्थ-परायण लोकसेवियों का प्रभाव जन साधारण पर स्वभावतः बहुत गहरा पड़ता है, वह टिकाऊ भी होता है। ऐसे लोग जन नेतृत्व करने के लिए जब धमर्तन्त्र का उचित उपयोग करते थे, तो सारे समाज में सत्प्रवृत्तियों के लिए उत्साह उमड़ पड़ता था। शिक्षा, स्वास्थ्य, सदाचार, न्याय, विवेक, वैभव, शासन, विज्ञान, सुरक्षा, व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में वे वयोवृद्ध लोग ही नेतृत्व करते थे। इतने अधिक अनुभवी और धर्म् परायण व्यक्तियों की निःशुल्क सेवा जिस देश या समाज को उपलब्ध होती हो, व उसको संसार का मुकुटमणि होना ही चाहिए, प्राचीनकाल में ऐसी ही स्थिति थी। आज वानप्रस्थ की परम्परा नष्ट हुई, बूढ़े लोगों को लोभ-मोह के बन्धनों में ही ग्रसित रहना प्रिय लगा, तो फिर देश का पतन अवश्यम्भावी हुआ भी, हो भी रहा है। विशेष व्यवस्था- वानप्रस्थ संस्कार जितने व्यक्तियों का हो, उनके लिए समुचित आसन तैयार रखे जाएँ। वानप्रस्थ परम्परा को महत्त्व देने की दृष्टि से उनके लिए सुसज्जित मंच बनाया जा सके, तो बनाना चाहिए। पूजन की सामान्य सामग्री के साथ-साथ संस्कार के लिए प्रयुक्त विशेष वस्तुओं को पहले से देख-सँभाल लेना चाहिए। उनका विवरण इस प्रकार है- वानप्रस्थों को पीले रंग के वस्त्रों में पहले से तैयार रखना चाहिए। पंचगव्य एक पात्र में पहले से तैयार रहे। संस्कार कराने वाले जितने व्यक्ति हों, उतने (१) पीले यज्ञोपवीत (२) पंचगव्य पान कराने के लिए छोटी कटोरियाँ, (३) मेखला-कोपीन (कमरबन्द सहित लँगोटी) (४) धमर्दण्ड (हाथ में लेने योग्य गोल दण्ड) रूल एवं (५) पीले दुपट्टे तैयार रखे जाएँ। ऋषि पूजन के लिए सात कुशाएँ एक साथ बँधी हुई। वेदपूजन हेतु वेद या कोई पवित्र पुस्तक पीले कपड़े में लपेटी हुई। यज्ञ पुरुष पूजन के लिए कलावा लपेटा हुआ नारियल का गोला। अभिषेक के लिए स्वच्छ लोटे या कलश एक जैसे, कम से कम ५, अधिक २४ तक हों, तो अच्छा है। अभिषेक के लिए कन्याएँ अथवा सम्माननीय साधकों को पहले से निश्चित कर लेना चाहिए। विधिवत् स्नान करके, पीत वस्त्र पहनाकर वानप्रस्थ लेने वालों को संस्कार स्थल पर लाया जाए। प्रवेश एवं आसन ग्रहण के समय पुष्प-अक्षत वृष्टि के साथ मंगलाचरण बोला जाए। सबके यथास्थान बैठ जाने पर नपे-तुले शब्दों में संस्कार का महत्त्व तथा उसके महान उत्तरदायित्वों पर सबका ध्यान दिलाकर भावनापूवर्क कमर्काण्ड प्रारम्भ कराएँ। विशेष कमर्काण्ड प्रारम्भ में षट्कर्म के बाद ही संकल्प करा दिया जाए। तिलक और रक्षासूत्र बन्धन के उपचार करा दिये जाएँ। समय की सीमा का ध्यान रखते हुए सामान्य प्रकरण, पूजन आदि को समुचित विस्तार या संक्षेप में किया जाए। रक्षाविधान के बाद विशेष कमर्काण्ड इस प्रकार कराये जाएँ। संकल्प दिशा एवं प्रेरणा- साधक हाथ में पुष्प, अक्षत, जल लेकर संकल्प करता है। संकल्प की सावर्जनिक घोषणा करता है कि आज से मैंने वानप्रस्थ व्रत ग्रहण कर लिया। अब मैं अपना या अपने परिवार का न रहकर समस्त समाज का बन गया। मेरा जीवन सावर्जनिक सम्पत्ति समझा जाए, उसे अपने या परिवार वालों के लाभ के लिए नहीं, वरन् विश्वमानस के लाभ की, आवश्यकता-पूर्ति का ध्यान रखते हुए माना जाए। क्रिया और भावना- संकल्प के लिए अक्षत, जल, पुष्प हाथ में दिये जाएँ। भावना करें कि देवसंस्कृति के मेरुदण्ड वानप्रस्थ जीवन का शुभारम्भ करने के लिए अपने अन्तरंग और अन्तरिक्ष की सद्शक्तियों से सहयोग की विनय करते हुए साहस भरी घोषणा कर रहे हैं- ॐ तत्सदद्य श्रीमद् भवगतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवत्तर्मानस्य अद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीये पराधेर् श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे भूलोर्के जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आयार्वत्तैर्क - देशान्तगर्ते ......... क्षेत्रे......... मासानां मासोत्तमेमासे......... पक्षे......... तिथौ......... वासरे......... गोत्रोत्पन्नः......... नामाऽहं स्वजीवनं व्यक्तिगतं न मत्वा सम्पूर्ण- समाजस्य एतत् इति ज्ञात्वा, संयम-स्वाध्याय-उपासनेषु विशेषतश्च लोकसेवायां निरन्तरं मनसा वाचा कमर्णा च संलग्नो भविष्यामि इति संकल्पं अहं करिष्ये। यज्ञोपवीत परिवतर्न नये जीवन की ओर पहला कदम त्याग, पवित्रता, तेजस्विता एवं परमार्थ के प्रतीक व्रतबन्ध स्वरूप यज्ञोपवीत का नवीनीकरण किया जाता है। यज्ञोपवीत का सिंचन करके पाँच देव शक्तियों के आवाहन स्थापन के उपरान्त उसे धारण कर लिया जाता है, पुराना उतार दिया जाता है। यह क्रम यज्ञोपवीत संस्कार प्रकरण में भी दिया गया है। यज्ञोपवीत सिंचन मन्त्र बोलते हुए यज्ञोपवीत पर जल छिड़कें, पवित्र करें, नमस्कार करें- ॐ प्रजापतेयर्त्सहजं पवित्रं, कापार्ससूत्रोद्भवब्रह्मसूत्रम्॥ ब्रह्मत्वसिद्ध्यै च यशः प्रकाशं, जपस्य सिद्धिं कुरु ब्रह्मसूत्र॥ पंचदेवावाहन निम्नस्थ मन्त्रों के साथ यज्ञोपवीत में विभिन्न देवताओं का आवाहन करें- (१) ब्रह्मा- ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्, विसीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्याऽउपमाऽ अस्यविष्ठाः, सतश्चयोनिमसतश्च विवः॥ ॐ ब्रह्मणे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१३.३ (२) विष्णु - ॐ इदं विष्णुविर्चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पा सुरे स्वाहा॥ ॐ विष्णवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -५.१५ (३) शिव - ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽ, उतो तऽइषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥ ॐ रुद्राय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१६.१ (४) यज्ञपुरुष - यज्ञोपवीत खोल लें। दोनों हाथों की कनिष्ठा और अँगूठे से फँसाकर सीने की सीध में करें, फिर यज्ञ भगवान का आवाहन मन्त्र बोलते हुए यज्ञ पुरुष का पूजन करें। ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्। तेह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः॥ ॐ यज्ञपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥ -३१.१६ (५) सूर्य - फिर दोनों हाथ ऊपर उठाकर सूयर्देव का आवाहन करें- ॐ आकृष्णेन रजसा वत्तर्मानो, निवेशयन्नमृतं मत्यर्ं च। हिरण्ययेन सविता रथेना, देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ ॐ सूयार्य नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -३३.४३ यज्ञोपवीतधारण ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ -पार०गृ०सू० २.२.११ जीणोर्पवीत विसजर्न ॐ एतावद्दिन पयर्न्तं, ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीणर्त्वात्ते परित्यागो, गच्छ सूत्र यथासुखम्॥ पंचगव्यपान शिक्षण और प्रेरणा पंचगव्य का पान पिछले जीवन में हुई भूलों के प्रायश्चित के लिए कराया जाता है। मैल हटे तो रंग चढ़े, दोषों की स्वीकारोक्ति, उनसे सम्बन्ध विच्छेद, जो प्रवृत्तियाँ इस ओर तो ले जाती है, उनका नियमन, भूलों से हुई हानियों को पूरा करने का साहस भरा शुभारम्भ यह सब मिलकर प्रायश्चित कर्म् पूरा होते हैं। प्रायश्चित से शुद्ध चित्त पर देव अनुग्रह सहज ही बरस पड़ते हैं। क्रिया और भावना- पंचगव्य की कटोरी बायें हाथ में ले और दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली से मन्त्रोच्चार के साथ उसे घोलें-चलाएँ। भावना करें कि इन गौ द्रव्यों को दिव्य चेतना से अभिमन्त्रित कर रहे हैं। ॐ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं, दधि सप्पिर्ः कुशोदकम्। निदिर्ष्टं पंचगव्यं, तु पवित्रं मुनिपुंगवैः॥ कटोरी दाहिने हाथ में लेकर मन्त्रोच्चार के साथ पान करें। भावना करें कि दिव्य संस्कारों से पापों की जड़ पर प्रहार और पुण्यों को उभारने का क्रम आरम्भ हो रहा है, जो निष्ठापूवर्क चलाया जाता रहेगा। ॐ यत्त्वगस्थिगतंपापं, देहे तिष्ठति मामके। प्राशनात्पंचगव्यस्य, दहत्वग्निरिवेन्धनम्॥ मेखला-कोपीन धारण शिक्षण एवं प्रेरणा- अभिसिंचन के उपरान्त वानप्रस्थ लेने वालों के हाथों में धमर्दण्ड और मेखला-कोपीन का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। कोपीन धारण करने का अर्थ है- इन्द्रिय संयम बरतना। वानप्रस्थी को सन्तानोत्पादन बन्द कर देना चाहिए। अब तक की उत्पन्न हुई सन्तान का ही पालन-पोषण, विकास-निमार्ण ठीक तरह हो जाए, यही बहुत है। पचास वर्ष की आयु के बाद बच्चे पैदा करते रहना, तो एक लज्जा की बात है, इससे कठिनाई बढ़ती है। बच्चे दुबले पैदा होते हैं, अनाथ रह जाते हैं तथा उनकी जिम्मेदारी मरते समय तक बनी रहने से समाजसेवा, परमार्थ साधना जैसे जीवन को साथर्क बनाने वाले प्रयोजनों के लिए अवसर ही नहीं मिलता। जिसके पीछे जितनी कम घरेलू जिम्मेदारी है, वह उतनी ही अच्छी तरह वृद्धावस्था का सदुपयोग कर सकेगा। फिर जिसने वानप्रस्थ धारण कर लिया, तो उसके लिए सन्तानोत्पादन एक विसंगति ही है, अतः उसे इस प्रकार की मयार्दाओं का पालन करने के लिए इन्द्रिय संयम का मार्ग अपनाना पड़ता है, उसी भावना का प्रतिनिधित्व कोपीन करती है, वानप्रस्थी उसे धारण करता है। कमर में रस्सी बाँधना कोपीन धारण के लिए तो आवश्यक है ही, साथ ही वह सैनिकों की तरह कमर कसकर, पेटी बाँधकर परमार्थ के मोर्चे पर आगे बढ़ने की मानसिक स्थिति का भी प्रतीक है। कमर कसना, मुस्तैदी, सतकर्ता, तत्परता निरालस्यता जैसी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति बनाये रखने का प्रतीक है। निमार्ण के दो मोर्चो पर एक साथ लड़ने वाले सैनिक को जिस सतकर्ता से कार्य करना होता है, वैसा ही उसे भी करना चाहिए। क्रिया और भावना- मेखला-कोपीन हाथों के सम्पुट में ली जाए। मन्त्रोच्चार के साथ भावना की जाए कि तत्परता, सक्रियता तथा संयमशीलता का वरण किया जा रहा है। मन्त्र पूरा होने पर उसे कमर में बाँध लें। ॐ इयं दुरुक्तं परिबाधमानां, वर्णं पवित्रं पुनतीमऽआगात्। प्राणापानाभ्यां बलमादधाना, स्वसा देवी सुभगा मेखललेयम्॥ -पार० गृ०सू० २.२.८ धमर्दण्डधारण शिक्षण एवं प्रेरणा- वानप्रस्थी को हाथ में लाठी दी जाती है। गुरुकुलों में विद्याध्ययन करने वालों को वन्य प्रदेश की आवश्यकता के अनुरूप लाठी सुविधा की दृष्टि से आवश्यक भी होती थी। इसके अतिरिक्त यह धमर्दण्ड इस मन्तव्य का भी प्रतीक है कि राजा जिस प्रकार राज्याभिषेक के समय शासन सत्ता का प्रतीक राजदण्ड छोटा लकड़ी का डण्डा हाथ में विधिवत् समारोह के साथ ग्रहण करता है, उसी प्रकार वानप्रस्थी संसार में धर्म व्यवस्था कायम रखने की अपनी जिम्मेदारी को हर घड़ी स्मरण रखे रहे और तदनुरूप अपना जीवनक्रम बनाये रहे, इसलिए भी यह धमर्दण्ड है। क्रिया और भावना- दण्ड दोनों हाथों से पकड़ें। भूमि के समानान्तर हृदय की सीध में स्थिर करें। मन्त्र पूरा होने पर मस्तक से लगाएँ और दाहिनी ओर रख लें। भावना करें कि धर्म चेतना को जीवन्त, व्यवस्थित एवं अनुशासित रखने का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व स्वीकार किया जा रहा है। इसके साथ दिव्य शक्तियाँ ब्राह्मणत्व और ब्रह्मवचर्स प्रदान कर रही है। ॐ यो मे दण्डः परापतद्, वैहायसोऽधिभूम्याम्। तमहं पुनराददऽआयुषे, ब्रह्मणे ब्रह्मवचर्साय॥ - पार०गृ०सू० २.२.१२ पीतवस्त्रधारण शिक्षण एवं प्रेरणा- पीतवस्त्र वीरों, त्यागियों और परमार्थ परायणों का बाना कहा गया है। अज्ञान, अभाव एवं अनीति से संघर्ष करने के लिए विचारशीलों को संत, सुधारक और शहीदों की भूमिका निभाने की तैयारी करनी पड़ती है। संस्कृति की प्रतिष्ठा, उसके सनातन गौरव की रक्षा के लिए यही रंग प्रेरणा देता रहा है। क्रिया और भावना- दोनों हाथों की हथेलियाँ सीधी करके दुपट्टा लें। मन्त्र के साथ ध्यान करें कि सत् शक्तियों से पवित्रता, शौर्य और त्याग का संस्कार प्राप्त कर रहे हैं। मन्त्र पूरा होने पर दुपट्टा कन्धों पर धारण कर लें। ॐ सूर्यो मे चक्षुवार्तः, प्राणो३न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्। अस्तृतो नामाहमयमस्मि स, आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय॥ -अथवर्० ५.९.७ ऋषिपूजन शिक्षण एवं प्रेरणा- सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत्-जीवन्त रखने, जीवन के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों की शोध और उनका लाभ जन-जन तक पहुँचाने, ईश्वरीय उद्देश्यों के लिए समपिर्त पवित्र और तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी उन महामानवों की परम्परा का अनुगमन, आत्मकल्याण-लोकमंगल दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है, उनके अनुगमन के शुभारम्भ के रूप में पूजन किया जाता है। क्रिया और भावना- हाथ में पुष्प-अक्षत लेकर ऋषियों का ध्यान कर मन्त्रोच्चारण के साथ भावना करें कि हम भी उन्हीं की परिपाटी के व्यक्ति हैं, उनके गौरव के अनुरूप बनने के लिए अपने पुरुषार्थ के साथ उनके अनुग्रह को जोड़ रहे हैं, उसे पाकर अन्याय उन्मूलन के मोर्चे को सुदृढ़ बनायेंगे। ॐ इमावेव गोतमभरद्वाजा, वयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजऽ, इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी, अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निः, इमावेव वसिष्ठकश्यपौ, अयमेव वस्ाष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिवार्चाह्यन्नमद्यतेऽत्तिहर् वै, नामैतद्यत्रिरिति सवर्स्यात्ता भवति, सवर्मस्यान्नं भवति य एवं वेद॥ -बृह० उ० २.२.४ ॐ सप्तऋषीनभ्यावतेर्। ते मे द्रविणं यच्छन्तु, ते मे ब्राह्मणवचर्सम्। ॐ ऋषिभ्यो नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। -अथवर्० १०.५.३९ वेदपूजन शिक्षण एवं प्रेरणा- वेद कहते हैं ज्ञान को। अज्ञान हजार दुःखों का कारण है। ज्ञान-सद्विचार की स्थापना से ही समाज में सुख-सद्गति सम्भव है। स्वयं ज्ञान की आराधना करने तथा जन-जन को उसमें लगाने का भाव वेदपूजन के साथ रहता है। क्रिया और भावना- पूजन सामग्री हाथ में लें। मन्त्रोच्चार के साथ भावना करें कि ज्ञान की सनातन धारा के वतर्मान युग के अनुरूप प्रवाह को अपने लिए सारे समाज के लिए पतित पावनी माँ गंगा की तरह प्रवाहित करने के लिए अपनी भूमिका निधार्रित की जा रही है। अज्ञान का निवारण इसी से सम्भव होगा। ॐ वेदोऽसि येन त्वं देव वेद, देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः। देवा गातुविदो गातुं, वित्त्वा गातुमित। मनसस्पतऽ इमं देव, यज्ञ स्वाहा वाते धाः। ॐ वेदपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। -२.२१ यज्ञपुरुष पूजन शिक्षण एवं प्रेरणा- यज्ञ देवत्व का आधार है। इसी से देव शक्तियाँ कल्याणीकारी प्रवृत्तियाँ पुष्ट होती हैं। यज्ञीय भावना के आधार पर ही व्यक्ति और समाज अभावों से मुक्त होगा, अन्यथा कुबेर जैसी सम्पदा प्राप्त कर लेने के बाद भी शोषण, उत्पीड़न और कंगाली का वातावरण बना रहेगा। यज्ञीय भावना, यज्ञीय दशर्न और यज्ञीय जीवन क्रम अपनाने-फैलाने का संकल्प यज्ञ पुरुष पूजन के साथ जुड़ा रहेगा। क्रिया और भावना-पूजन सामग्री हाथ में लें। मन्त्र के साथ भावना करें कि धर्म और देवत्व के प्रमुख आधार को अंगीकार करते हुए, उसे पुष्ट और प्रभावशाली बनाया जा रहा है। ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः। ॐ यज्ञपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। व्रत धारण शिक्षण एवं प्रेरणा महानता की मंजिल पर मनुष्य एकाएक नहीं पहुँच जाता, उसके लिए एक-एक करके सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। श्रेष्ठ प्रवृत्तियाँ, आचरण एवं स्वभाव बनाने के लिए व्रतशील होकर चलना पड़ता है। छोटे ही सही, व्रत लेने, उन्हें पूरा करने, फिर नये व्रत लेने का क्रम विकास के लिए अनिवार्य है। व्रतशीलता के लिए कुछ देवशक्तियों को साक्षी करके व्रतशील बनने की घोषणा की जाती है। इन्हें अपना प्रेरक, निरीक्षक और नियंत्रक बनाना पड़ता है। सम्बन्धित देवशक्तियों की प्रेरणाएँ इस प्रकार हैं- अग्निदेव- ऊर्जा के प्रतीक। ऊर्जा, स्फुरणा, गर्मी, प्रकाश से भरे-पूरे रहने, अन्यों तक उसे फैलाने, दूसरों को अपना जैसा बनाने, ऊध्वर्गामी-आदशर्निष्ठ रहने, यज्ञीय चेतना के वाहन बनने की प्रेरणा के स्रोत। वायुदेव- स्वयं प्राणरूप, किन्तु बिना अहंकार सबके पास स्वयं पहुँचते हैं। कोई स्थान खाली नहीं छोड़ते, निरन्तर गतिशील। सुगन्धित और मेघों जैसे परोपकारी तत्त्वों के विस्तारक सहायक। सूयर्देव- जीवनी शक्ति के निझर्र, तमोनिवारक, जागृति के प्रतीक, पृथ्वी को सन्तुलन और प्राण-अनुदान देने वाले, स्वयं प्रकाशित, सविता देवता। चन्द्रदेव- स्वप्रकाशित नहीं, पर सूर्य का ताप स्वयं सहन करके निमर्ल प्रकाश जगती पर फैलाने वाले, तप अपने हिस्से में-उपलब्धियाँ सबके लिए। इन्द्रदेव- व्रतपति देवों में प्रमुख, देव प्रवृत्तियों-शक्तियों को संगठित-सशक्त बनाये रखने के लिए सतत जागरूक, हजार आँखों से सतर्क रहने की प्रेरणा देने वाले। क्रिया और भावना- साधक मन्त्रोच्चार के समय दोनों हाथ ऊपर उठाकर रखें। भावना करें कि हाथ उठाकर व्रतशीलता की साहसिक घोषणा कर रहे हैं, साथ ही सत्प्रवृत्तियों को अपना हाथ थमा रहे हैं। वे हमें मागर्दशर्क की तरह प्रेरणा एवं सहारा देती रहेंगी। एक देवता का मन्त्र पूरा होने पर हाथ जोड़कर नमस्कार करें, फिर पहले जैसी मुद्रा बना लें। ॐ अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ अग्नये नमः॥१॥ ॐ वायो व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ वायवे नमः॥२॥ ॐ सूयर् व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ सूयार्य नमः॥३॥ ॐ चन्द्र व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ चन्द्राय नमः॥४॥ ॐ व्रतानां व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ इन्द्राय नमः॥५॥ -मं०ब्रा०१.६.९.१३ अभिषेक शिक्षण एवं प्रेरणा- अभिषेक कृत्य ठीक उसी तरह का है, जैसा कि किसी राजा को राजगद्दी देते समय राज्याभिषेक किया जाता है। राजा का, दरबारी लोगों के संरक्षण में राज्याभिषेक होता है। प्रजाजनों और धर्म संरक्षकों के द्वारा वानप्रस्थ का धर्माभिषेक किया जाता है। राजा अपनी प्रजा की सुरक्षा एवं साधन-व्यवस्था के भौतिक उपकरण जुटाता है, इसलिए उसे प्रजापालक कहकर सम्मानित किया जाता है। वानप्रस्थ प्रजा की आत्मिक सुरक्षा, सुव्यवस्था एवं सुख-शांति के उपकरण जुटाता है, उसे सन्मार्ग पर चलने की सद्भावना से ओत-प्रोत रहने की सत्प्रेरणाएँ प्रदान करता रहता है। यह अनुदान सभी भौतिक साधनों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। राजा केवल एक सीमित प्रदेश में रहने वाली प्रजा की भौतिक सुरक्षा के लिए ही उत्तरदायी है, पर वानप्रस्थ के कन्धों पर संसार के समस्त मानवो-प्राणियों को न्याय एवं धर्म का प्रकाश उपलब्ध कराना है। भौतिक सुरक्षा की तुलना में आत्मिक प्रगति का मूल्य महत्त्व असंख्य गुना बड़ा है। इसी प्रकार एक सीमित क्षेत्र में रहने वाली प्रजा के साज-सँभाल की तुलना में समस्त विश्व के प्राणियों को सत्प्रेरणा देना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। अतएव राजा की तुलना में धर्म-सेवी महात्मा का, वानप्रस्थ का पद तथा गौरव भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, उसको अपना उत्तरदायित्व पूरी सावधानी से, जिम्मेदारी से निभाना है। इसी भावना को हृदयंगम कराने के लिए यह अभिषेक क्रिया की जाती है। समाज के सम्भ्रान्त, धमर्सेवी एवं विचारशील २४ व्यक्ति, जो यह अभिषेक करने खड़े हुए हैं, समाज का प्रतिनिधित्व करते हैँ। जल से वानप्रस्थी का अभिषिंचन करते हुए वे लोग समाज की ओर से नई भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। क्रिया और भावना- निधार्रित मात्रा में कन्याएँ या संस्कारवान् व्यक्ति कलश लेकर मन्त्रोच्चार के साथ साधकों का अभिषेक करें। भावना करें कि ईश्वरीय ऋषिकल्प जीवन के अनुरूप स्थापनाओं, बीजरूप प्रवृत्तियों को सींचा जा रहा है, समय पाकर वे फूलें-फलेंगी। जीवन के श्रेष्ठतम रस में भागीदारी के लिए परमात्म सत्ता से प्राथर्ना की जा रही है, अनुदानों को धारण किया जा रहा है। ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः ता न ऽऊजेर् दधातन। महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरंगमाम वो, यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः। -३६.१४-१६ विशेष आहुति अभिषेक के बाद अग्निस्थापना करके विधिवत् यज्ञ किया जाए। स्विष्टकृत के पूर्व सात विशेष आहुतियाँ दी जाएँ। भावना की जाए कि युग देवता एक विशाल यज्ञ चला रहे हैं। उस यज्ञ में समिधा, द्रव्य बनकर हम भी सम्मिलित हो रहे हैं, उनसे जुड़कर हमारा जीवन धन्य हो रहा है। ॐ ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा, ब्रह्मणा स्वरवो मिताः। अध्वयुर्ब्रर्ह्मणो जातो, ब्रह्मणोऽन्तहिर्तं हविः स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम। -अथवर्० १९.४२.१ प्रव्रज्या दिशा एवं प्रेरणा- परिव्राजक का काम है चलते रहना। रुके नहीं, लक्ष्य की ओर बराबर चलता रहे, एक सीमा में न बँधे, जन-जन तक अपने अपनत्व और पुरुषार्थ को फैलाए। जो परिव्राजक लोकमंगल के लिए संकीणर्ता के सीमा बन्धन तोड़कर गतिशील नहीं होता, सुख-सुविधा छोड़कर तपस्वी जीवन नहीं अपनाता, वह पाप का भागीदार होता है। क्रिया और भावना- यज्ञ की चार परिक्रमाएँ चरैवेति मन्त्रों के साथ करें। भावना करें कि हम सच्चे परिव्राजक बनकर गतिशीलों को मिलने वाले दिव्य अनुदानों के उपयुक्त सत्पात्र बन रहे हैं। १-ॐ नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, इति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन, इन्द्र इच्चरतः सखा। चरैवेति चरैवेति॥ २- पुष्पिण्यौ चरतो जंघे, भूष्णुरात्मा फलग्रहिः। शेरेऽस्य सवेर् पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः। चरैवेति चरैवेति॥ ३- आस्ते भग आसीनस्य, ऊध्वर्स्तिष्ठति तिष्ठतः। शेते निपद्यमानस्य, चराति चरतो भगः। चरैवेति चरैवेति॥ ४- कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन्। चरैवेति चरैवेति॥ ५- चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूयर्स्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन्। चरैवेति चरैवेति॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ७.१५) इसके बाद यज्ञ समापन पूणार्हुति आदि उपचार कराये जाएँ। अन्त में मन्त्रों के साथ पुष्प, अक्षत की वर्षा करें, शुभ कामना-आशीवार्द आदि दें। देखें हिन्दू धर्म संस्कार
धौलीयापाटा, कांडा तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के बागेश्वर जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा धौलीयापाटा, कांडा तहसील धौलीयापाटा, कांडा तहसील
बोयल, गंगोलीहाट तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के पिथोरागढ जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा बोयल, गंगोलीहाट तहसील बोयल, गंगोलीहाट तहसील
टीवीएन (tvN) (टेलीविजन नेटवर्क) एक दक्षिण कोरियाई राष्ट्रव्यापी पे-टेलीविजन नेटवर्क है जिसका स्वामित्व सीजे ईएनएम के मनोरंजन विभाग सीजे ईएंडएम के पास है। टीवीएन प्रोग्रामिंग में विभिन्न प्रकार की मनोरंजन सामग्री शामिल होती है, जो टेलीविजन श्रृंखला और विभिन्न प्रकार के शो में केंद्रित होती है। यह केबल पर, सैटेलाइट पर स्काईलाइफ के माध्यम से, और दक्षिण कोरिया में आईपीटीवी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। 2014 से, नेटवर्क का नेतृत्व री म्युंग-हान कर रहे हैं। 28 जून 2010 से 30 अप्रैल 2013 तक, कोरिया डीएमबी से एक चैनल किराए पर लेकर टीवीएन गो का प्रसारण किया गया था।Korea. सन्दर्भ टीवी चैनल दक्षिण कोरिया
प्रभात झा एक भारतीय राजनेता हैं जो भारत के वरिष्ठ सदन राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। सन्दर्भ Prabhatjha.com सांसद राज्यसभा जीवित लोग 1957 में जन्मे लोग
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