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शेख गालिब साहिब एक भारतीय राष्ट्रवादी मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी थे, जो भारत की संविधान सभा के सदस्य तथा बाद में उन्होंने राज्यसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया। जीवन परिचय शेख गालिब साहिब का जन्म 15 जुलाई 1904 ई• में आंध्र प्रदेश राज्य के ज़िला गुंटूर में हुआ था। उनके पिता शेख चिंगी शाह और माता अमीना बी थी। वह गुंटुर में स्वतंत्रता सेनानियों की निस्वार्थ गतिविधियों से प्रेरित होकर 1928 में कांग्रेस में शामिल हों गए और खुद को राष्ट्रीय आंदोलन में समर्पित करने में लग गए। 1930 में उन्हें गांधी जी की दांडी मार्च में भाग लेने पर जेल में डाल दिया गया। उन्होंने (1937 -1941) तक मुस्लिम जनसंपर्क आन्दोलन का नेतृत्व किया। उसी अवधि के दौरान उन्हें गुंटूर नगर परिषद का सदस्य चुना गया। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। जिसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा। कठोर कारावास की वजह से उनका स्वास्थ्य खराब होने लगा था, इस कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। 1947 के भारत विभाजन का तथा मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति से लोगों को सचेत किया स्वतंत्रता के बाद वह भारत की संविधान सभा का सदस्य मनोनीत किया गया बाद उन्होंने (1958-69) आंध्र प्रदेश राज्य विधानपरिषद के सदस्य के रूप में काम किया। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में तथा देश और लोगों की सेवा करने वाले 21 अगस्त 1970 को शेख साहब का निधन हो गया। स्वतंत्रता सेनानी
पिपरिया लखीसराय, बिहार का एक प्रखण्ड है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ लखीसराय जिला बिहार के प्रखण्ड
मनाखेत, गरुङ तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के बागेश्वर जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा मनाखेत, गरुङ तहसील मनाखेत, गरुङ तहसील
अर्थशास्त्र में आपूर्ति (supply) किसी संसाधन की वह मात्रा होती है जो उस संसाधन के उत्पादक किसी कीमत के बदले उस संसाधन के उपभोक्ताओं को देने के लिए तैयार होते हैं। अलग-अलग उत्पादक भिन्न कीमतों पर उस संसाधन को बनाने के लिए तैयार होते हैं। इसलिए अक्सर किसी क्षेत्र के बाज़ार में किसी संसाधन की आपूर्ति को उसके आपूर्ति वक्र (supply curve) के रूप में दर्शाया जाता है। आपूर्ति वक्र का उदाहरण फर्ज़ करें कि किसी देश में कृषि के लिए इतनी भूमि उपलब्ध है कि उसमें करोड़ों टन अनाज उगाया जा सकता है। लेकिन यह भूमि अलग-अलग प्रकार की है: कहीं उपजाऊ है और उसे नदी द्वारा मुफ्त सिंचाई का पानी मिलता है, जबकि अन्य स्थानों पर धरती बहुत शुष्क और बंजर है और उसमें खाद की बड़ी मात्रा चाहिए तथा मेहनत व खर्च से भूमिगत जल कुँओं से निकालना पड़ता है। बहुत से स्थानों में इन दोनों अवस्थाओं के बीच की परिस्थिति है, यानि भूमि मध्यम-दर्जे की उपजाऊँ है और सीमित मात्रा में जल सस्ता है लेकिन अधिक मात्रा में महंगा। कुल मिलाकर देखा जाता है कि: बाज़ार में 15 ₹ प्रति किलोग्राम कीमत मिले, तो अधिक ऊपजाऊ क्षेत्रों के किसान ही अनाज उगाते हैं और 10 करोड़ किलोग्राम तक अनाज उगा लेते हैं। कम ऊपजाऊ क्षेत्रों वाले किसान अनाज नहीं उगाते, क्योंकि इस कीमत पर उनका अनाज उगाने का खर्चा पूरा नहीं होता। यदि बाज़ार में कीमत बढ़े तो और किसान अनाज उगाने लगते हैं। अगर कीमत 30 ₹/किलो मिल जाए, तो 30 करोड़ किलोग्राम तक अनाज उगाया जाएगा। यह चित्र 1 में दर्शाया गया है। लम्ब अक्ष (P) पर ₹/किलो में कीमत है, और क्षितिज अक्ष (Q) पर करोड़ो किलोग्राम में अनाज उत्पादन की मात्रा है। बाज़ार में किसी कीमत पर कितना अनाज उत्पादित होगा वह इस आपूर्ति वक्र से आसानी देखा जा सकता है। ऐसे ही आपूर्ति वक्र बाज़ार में किसी भी संसाधन के लिए बनाए जा सकते हैं, जिनमें विद्युत उत्पादन, बाज़ार में बाल काटने वाले नाईयों की संख्या, वाहनों का उत्पादन, गणित सिखाने वाले शिक्षकों की संख्या, नए घरों का निर्माण, निवास के लिए किराए के कमरों की उप्लब्ध संख्या,सभी माल और सेवाएँ शामिल हैं। आपूर्ति में मूल्य संकेत बाज़ार में अनाज का मूल्य (कीमत) उत्पादकों के लिए एक संकेत जैसा काम करता है। जब मूल्य बढ़ता है तो कुछ उत्पादकों को संकेत मिलता है कि अब उन्हें भी अनाज उगाना चाहिए। अर्थव्यवस्था में कीमत की इस संकेत की भूमिका को मूल्य संकेत (price signal) कहा जाता है। इस मूल्य संकेत का अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए अत्यंत महत्त्व है। मान लीजिए कि बाज़ार में किसी समय पर अनाज की कीमत है और उसके अनुसार कुछ भूमि पर अनाज उगाया जाता है। किसी कारणवश अपेक्षा से अधिक वर्षा हो जाती है और जनसंख्या को अपनी खपत के लिए जितना अनाज चाहिए, उसे से अधिक अनाज उगाया जाता है। गोदाम भर जाते हैं और इस कारण से अगले साल कम अनाज उगाया जाना चाहिए ताकि बाज़ार में अनाज की इतनी थोक न हो कि अनाज पड़ा-पड़ा सड़ने लगे। अगर अर्थव्यवस्था मुक्त बाज़ार के सिद्धांतों पर चल रही है, तो अधिक अनाज होने से दाम गिरते हैं। दाम गिरने से कई किसान अनाज नहीं उगाते - इसकी बजाय सम्भव है कि वे सब्ज़ियाँ या कोई अन्य चीज़ उगाएँ। गोदामों में अतिरिक्त अनाज का उपभोग हो जाता है। यानि बाज़ार में उतना ही अनाज आता है, जितने की आवश्यकता है। इस स्थिति को आर्थिक दक्षता (economic efficiency) कहते हैं। मुल्य संकेत में हस्तक्षेप करने से आर्थिक अदक्षता उत्पन्न होती है: विभिन्न उत्पादन गलत मात्राओं में बनने लगते हैं। इन्हें भी देखें माँग (अर्थशास्त्र) आर्थिक संतुलन मुक्त बाज़ार आर्थिक दक्षता सन्दर्भ बाज़ार (अर्थशास्त्र)
बरहमपुर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र भारत के ओड़िशा राज्य का एक लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र है। ओड़िशा के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र
अन्तरिक्षीय अभियान्त्रिकी या अन्तरिक्षीय तकनीकी (:en:Astronautical engineering or :en:Space technology) बाहरी अन्तरिक्ष से जुड़ी हुई तमाम तकनीकियों का समूह है, जिसमें अन्तरिक्ष यात्रा, अन्तरिक्ष यान और उनकी बनावट और चाल, वगैरह शामिल हैं। ये वैमानिक और अन्तरिक्षीय अभियान्त्रिकी (:en:Aerospace engineering के दो बड़े हिस्सों में से एक है। अभियान्त्रिकी, अन्तरिक्षीय
बिजना घरघोडा मण्डल में भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के अन्तर्गत रायगढ़ जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक छत्तीसगढ जनजातियां कला खेल गोठ सतनाम पंथ छत्तीसगढ़ की विभूतियाँ रायगढ़ जिला, छत्तीसगढ़
रासबिहारी बोस(बांग्ला: রাসবিহারী বসু / रासबिहारी बसु , जन्म: २५ मई १८८६ - मृत्यु : २१ जनवरी १९४५) भारत के एक क्रान्तिकारी नेता थे जिन्होने ब्रिटिश राज के विरुद्ध भारत की आज़ादी के लिए गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन का कार्य किया। इन्होंने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, अपितु विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होने हिन्दू महासभा की जापानी शाखा की स्थापना भी की तथा इसके अध्यक्ष बने। यद्यपि देश को स्वतन्त्र कराने के लिये किये गये उनके ये प्रयास उनके जीवनकाल में सफल नहीं हो पाये, तथापि स्वतन्त्रता संग्राम में उनका योगदान अत्यन्त महान है। जीवन रासबिहारी बोस का जन्म २५ मई १८८६ को बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गाँव में के एक बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा सुबलदह में हुई, जहाँ उनके पिता विनोद बिहारी बोस थे। रासबिहारी बोस बचपन से ही देश की स्वतन्त्रता के स्वप्न देखा करते थे और क्रान्तिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। प्रारम्भ में रासबिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया। उसी दौरान उनका क्रान्तिकारी जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले युगान्तर नामक क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ जुड़ गये। बाद में वह अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे यतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रान्त, (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के निकट आये। दिल्ली में जार्ज पंचम के १२ दिसंबर १९११ को होने वाले दिल्ली दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी। अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसन्त कुमार विश्वास ने उन पर बम फेंका लेकिन निशाना चूक गया। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गयी और वह बचने के लिये रातों-रात रेलगाडी से देहरादून खिसक लिये और आफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। अगले दिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी, जिसमें उन्होंने वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की। इस प्रकार उन पर इस षडयन्त्र और काण्ड का प्रमुख सरगना होने का किंचितमात्र भी सन्देह किसी को न हुआ। १९१३ में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी। फरवरी १९१५ में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी। जापान में युगान्तर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूँकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गये हुये हैं, अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति के लिये जून १९१५ में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान के शहर शंघाई में पहुँचे और वहाँ रहकर भारत देश की आजादी के लिये काम करने लगे। इस प्रकार उन्होंने कई वर्ष निर्वासन में बिताये। जापान में भी रासबिहारी बोस चुप नहीं बैठे और वहाँ के अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतन्त्रता के लिये निरन्तर प्रयास करते रहे। उन्होंने जापान में अंग्रेजी अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने वहाँ न्यू एशिया नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने जापानी भाषा भी सीखी और १६ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने टोकियो में होटल खोलकर भारतीयों को संगठित किया तथा 'रामायण' का जापानी भाषा में अनुवाद किया। ब्रिटिश सरकार अब भी उनके पीछे लगी हुई थी और वह जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की माँग कर रही थी, इसलिए वह लगभग एक साल तक अपनी पहचान और आवास बदलते रहे। १९१६ में जापान में ही रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और १९२३ में वहाँ की नागरिकता ले ली। जापान में वह पत्रकार और लेखक के रूप में रहने लगे। जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और देश की आजादी के आन्दोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की अहम भूमिका रही। उन्होंने २८ मार्च १९४२ को टोक्यो में एक सम्मेलन बुलाया जिसमें 'इंडियन इंडीपेंडेंस लीग' की स्थापना का निर्णय किया गया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत की आजादी के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया। आई०एन०ए० का गठन २२ जून १९४२ को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। जापान ने मलय और बर्मा के मोर्चे पर कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। आई०एन०ए० का गठन रासबिहारी बोस की इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर १९४२ को किया गया। बोस ने एक झण्डे का भी चयन किया जिसे आजाद नाम दिया गया। इस झण्डे को उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया। रासबिहारी बोस शक्ति और यश के शिखर को छूने ही वाले थे कि जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में इसी ढाँचे पर सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई०एन०एस० का पुनर्गठन किया। भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने की जी-तोड़ मेहनत करते हुए किन्तु इसकी आस लिये हुए २१ जनवरी १९४५ को इनका निधन हो गया। उनके निधन से कुछ समय पहले जापानी सरकार ने उन्हें आर्डर ऑफ द राइजिंग सन के सम्मान से अलंकृत भी किया था। मुख्य कालक्रम २५ मई, १८८६ -- बंगाल के बर्धमान जिले के सुबलदह गाँव में जन्म १९०५ -- बंग भंग के समय वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में सम्मिलित होने लगे। १९०८ -- अरविन्द घोष और जतिन मुखर्जी के साथ अलीपुर बम काण्ड में शामिल ; ट्रायल से बचने के लिए बंगाल छोड़कर संयुक्त प्रान्त आदि में रहने लगे। २३ दिसम्बर, १९१२ -- हाथी पर सवार गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग पर दिल्ली के चांदनी चौक में बम फेंकने की योजना एवं क्रियान्यवन फरवरी, १९१५ -- भारत में १८५७ जैसा विद्रोह करने की योजना पर कार्य ; लेकिन पुलिस को योजना का पता चल गया। १२ मई, १९१५ -- "प्रियनाथ ठाकुर" के छद्म नाम का सहारा लेकर कोलकाता से जापान निकल गये। १९१५-१९१८ -- जापान में अपना स्थान बदल-बदल शरणार्थी की तरह रहे; कुल १७ बार स्थान बदला। १९१८ -- जापान में वहीं की कन्या टोशिको से विवाह १९२३ -- जापानी नागरिकता प्राप्त १९२४ -- पत्नी का निधन २८ मार्च, १९४२ -- इंडियन इंडिपेन्डेन्स लीग की स्थापना २२ जून, १९४२ -- लीग की द्वितीय बैठक बैंकाक में बुलाई। इसी लीग में निर्णय हुआ कि सुभाष चन्द्र बोस को बुलाकर इस लीग की कमान उन्हें सौंप दी जाय। ०१ सितम्बर, १९४२ -- आजाद हिन्द फौज की स्थापना २१ जनवरी, १९४५ -- क्षयरोग के कारण निधन चित्रावली सन्दर्भ इन्हें भी देखें अलीपुर बम काण्ड हिंदू-जर्मन षड्यंत्र गदर राज्य-क्रान्ति आजाद हिंद फ़ौज मोहन सिंह बाहरी कड़ियाँ महान स्वतंत्रता सेनानी रासबिहारी बोस क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक थे रासबिहारी बोस (हिन्दुस्तान) स्मरण: रासबिहारी बोस (जागरण) सशस्त्र क्रान्ति के संयोजक - रास बिहारी बोस (खबर इंडिया) रास बिहारी बोस जयंती और पुण्यतिथि कब है? भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम भारतीय क्रांतिकारी
क्रोमाइल क्लोराइड एक अकार्बनिक यौगिक है। क्रोमाइल क्लोराइड एक रासायनिक यौगिक है जिसका सूत्र CrO2Cl2 है। यह यौगिक एक हाइग्रोस्कोपिक गहरा लाल तरल है। अणु टेट्राहेड्रल है, जैसा कि आमतौर पर पाए जाने वाले क्रोमियम (VI) व्युत्पन्न क्रोमेट, [CrO₄] t की तरह है। भौतिक गुणों और संरचना के संदर्भ में, यह SO₂Cl and जैसा दिखता है। क्रोमियम यौगिक क्लोराइड धातु हैलाइड ऑक्सोहैलाइड ऑक्सीकारक अकार्बनिक यौगिक
अराणमुला (Aranmula) भारत के केरल राज्य के पतनमतिट्टा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह पम्पा नदी के किनारे और कोड़ेनचेरी के समीप स्थित है। इन्हें भी देखें पतनमतिट्टा ज़िला सन्दर्भ केरल के शहर पतनमतिट्टा ज़िला पतनमतिट्टा ज़िले के नगर
नाइजीरिया महिला राष्ट्रीय क्रिकेट टीम अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में नाइजीरिया देश का प्रतिनिधित्व करती है। टीम नाइजीरिया क्रिकेट फेडरेशन द्वारा आयोजित की जाती है, जो 2002 से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) का सदस्य रहा है। संदर्भ
आर्यसत्य की संकल्पना बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत है। इसे संस्कृत में 'चत्वारि आर्यसत्यानि' और पालि में 'चत्तरि अरियसच्चानि' कहते हैं आर्यसत्य चार हैं- (1) दुःख : संसार में दुःख है, (2) समुदय : दुःख के कारण हैं, (3) निरोध : दुःख के निवारण हैं, (4) मार्ग : निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं। प्राणी जन्म भर विभिन्न दु:खों की शृंखला में पड़ा रहता है, यह दु:ख आर्यसत्य है। संसार के विषयों के प्रति जो तृष्णा है वही समुदय आर्यसत्य है। जो प्राणी तृष्णा के साथ मरता है, वह उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है। इसलिए तृष्णा की समुदय आर्यसत्य कहते हैं। तृष्णा का अशेष प्रहाण कर देना निरोध आर्यसत्य है। तृष्णा के न रहने से न तो संसार की वस्तुओं के कारण कोई दु:ख होता है और न मरणोंपरांत उसका पुनर्जन्म होता है। बुझ गए प्रदीप की तरह उसका निर्वाण हो जाता है। और, इस निरोध की प्राप्ति का मार्ग आर्यसत्य - आष्टांगिक मार्ग है। इसके आठ अंग हैं-सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इस आर्यमार्ग को सिद्ध कर वह मुक्त हो जाता है। बाहरी कड़ियाँ गौतम बुद्ध का अद्भुत् जीवन The Buddhist: The Four Noble Truths by Nalaka Priyantha. Buddhism: The Four Noble Truths by Geshe Kelsang Gyatso. At Access to Insight: The Four Noble Truths: A Study Guide (by Thanissaro Bhikkhu) Wings to Awakening Section 3.H.i: The Four Noble Truths (translated by Thanissaro Bhikkhu) Talks given by Ajahn Sumedho: At Amaravati Monastery's web: The Four Noble Truths PDF version at Buddhanet.net: The Four Noble Truths eBook From the Ten Lecture Series, Lecture on the Four Noble Truths by Bhikkhu Bodhi: The Four Noble Truths A View on the Four Noble Truths The Light of Asia (Book Eight), a poem in iambic pentameter by Sir Edwin Arnold. Buddhism - the Four Noble Truths The Feeling Buddha: An alternate interpretation of the Four Noble Truths. Sixteen Aspects of the Four Noble Truths बौद्ध धर्म दर्शन
विक्रम सिंह बर्ण (जन्म २ अगस्त १९९५), जिन्हें विकस्टार१२३ और उपनाम विक के नाम से जाना जाता है, एक अंग्रेजी यूट्यूबर और इंटरनेट हस्ती हैं। वह ब्रिटिश यूट्यूब समूह साइडमेन के सदस्य और सह-संस्थापक हैं। प्रारंभिक जीवन और शिक्षा बर्ण का जन्म २ अगस्त १९९५ को गिल्डफोर्ड, सरी, इंग्लैंड में हुआ था जहाँ वह आठ साल की उम्र तक रहे। बाद में वह शेफ़ील्ड में रहे जहाँ उन्होंने सिल्वरडेल स्कूल में पढ़ाई की। वह तीन बच्चों में सबसे छोटे हैं। बर्ण को यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन करने के लिए जगह की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने अपने यूट्यूब करियर को पूर्णकालिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। आजीविका बर्ण २०१० में यूट्यूब से जुड़े; अपने दोस्तों के साथ गेम खेलने के बाद वह यूट्यूबरों को देखने और उनके खुद के वीडियो बनाने में लग गए। अंततः उन्होंने यह कहते हुए अपना स्वयं का चैनल लॉन्च करने का निर्णय लिया:मैं यह सोचकर इसमें शामिल हुआ कि मैं उनसे थोड़ा बेहतर करने में सक्षम हो सकता हूँ जो वे कर रहे हैं, और इसमें शामिल हो जाऊँ और इसमें कुछ मजा कर सकूँ। मैंने कॉल ऑफ ड्यूटी: मॉडर्न वारफेयर २ खेलते हुए खुद को रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया। मैंने ऐसे ट्यूटोरियल वीडियो बनाना शुरू किया जिन्हें लोग देख सकें - उनमें से कुछ चाकुओं के लिए थे और आप उन्हें मानचित्र पर कैसे फेंक सकते हैं। मैंने ऐसे स्थान दिखाने वाले वीडियो बनाए जहाँ आप चाकू या टॉमहॉक फेंक सकते हैं और मार सकते हैं। मैंने सोचा कि इन बेतुके हत्याओं को दिखाना अच्छा रहेगा।जैसे-जैसे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई, उन्होंने इसे और अधिक गंभीरता से लेते हुए माइनक्राफ्ट खेलना शुरू कर दिया। २०१३ में वह साइडमेन में शामिल हो गए जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। बाद में वह तीन अन्य सदस्यों के साथ चले गए, २०१४ से २०१८ तक उनके साथ एक घर साझा किया, जब उन्होंने घोषणा की कि वह साइडमेन हाउस से बाहर जा रहे थे। वह ड्रीम एसएमपी सर्वर का भी हिस्सा है। जनवरी २०२१ में उन्होंने अपने चैनल पर घोषणा की कि वह धोखाधड़ी के प्रसार के कारण कॉल ऑफ ड्यूटी: वारज़ोन खेलना छोड़ रहे हैं, यह कहते हुए कि अगर इसे ठीक नहीं किया गया तो हैकर्स गेम की मौत होंगे। कई अन्य हाई-प्रोफाइल स्ट्रीमर्स की आलोचना के साथ-साथ परिणामी हंगामे के कारण एक्टिविज़न को गेम के एंटी-चीट सॉफ़्टवेयर को अपडेट करना पड़ा। अन्य उद्यम बर्ण ईस्पोर्ट्स टीमों में एक निवेशक है और उसने इस बारे में बात की है कि उन्होंने कॉल ऑफ ड्यूटी की एक टीम, लंदन रॉयल रेवेन्स में कैसे निवेश किया है, और खेल को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाने के लिए एक ब्लूप्रिन्ट बनाने की अपनी इच्छा के बारे में बताया है। व्यक्तिगत जीवन दिसंबर २०२१ में बर्ण ने अपनी लंबे समय से प्रेमिका ऐली हार्लो से अपनी सगाई की घोषणा की। फिल्मोग्राफी पुरस्कार एवं नामांकन संदर्भ बाहरी संबंध जीवित लोग 1995 में जन्मे लोग Pages with unreviewed translations
सत्‍ये सिंह राणा,भारत के उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के टेहरी गढ़वाल जिले के 4 - देवप्रयाग विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय की ओर से चुनाव में भाग लिया। दिनाँक 23-11-1961 से 20-071963 तक जिला पंचायत टिहरी, टिहरी गढ़वाल के प्रथम अध्यक्ष रहे। सत्ये सिंह राणा जी का जन्म टिहरी गढ़वाल जिले की नैलचामी पट्टी के चौंरा गाँव में हुआ। सन्दर्भ उत्तर प्रदेश की प्रथम विधान सभा के सदस्य 4 - देवप्रयाग के विधायक टेहरी गढ़वाल के विधायक निर्दलीय के विधायक
जा फ़ॉनल रिसर्व कैमेरून मे स्थित एक विश्व धरोहर स्थल है। अफ़्रीका कैमरुन में विश्व धरोहर स्थल
परथौला, भिकियासैण तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के अल्मोड़ा जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा परथौला, भिकियासैण तहसील परथौला, भिकियासैण तहसील
करछना (Karchhana) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज ज़िले में स्थित एक गाँव है। यह इसी नाम की तहसील में स्थित है, जो ज़िले की आठ तहसीलों में से एक है। यातायात प्रयागराज से कोहडार मार्ग (लगभग दूरी २२ किलोमीटर) करछना रेलवे स्टेशन (कोड KCN) से करीब २ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। करछना मे प्रसिद्ध मदन मोहन मालवीय इंटर कॉलेज है जहाँ से पढ़ के कई छात्र सेना और अन्य सरकारी कार्यालयों मे सेवारत है इसमे NCC का प्रमाण पत्र भी मिलता है जिससे बहुत सारे छात्र यहाँ पर आते है करछना के निकट ही करछना तहसील है और पास मे थाना है थोड़ी ही 5 km की दूरी पर बराव है जिसके राजा कभी भूतपूर्व सांसद रेवती रमन थे अभी वर्तमान मे वही उनकी कोठी है इन्हें भी देखें प्रयागराज ज़िला सन्दर्भ प्रयागराज ज़िला उत्तर प्रदेश के गाँव प्रयागराज ज़िले के गाँव
गागरोन का युद्ध 1519 में मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय और राणा सांगा के राजपूत संघ के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध गागरोन (वर्तमान भारतीय राज्य राजस्थान में) क्षेत्र में हुआ और इसके परिणामस्वरूप सांगा की जीत हुई, जिसमें उसने महमूद को बंदी बना लिया और महत्वपूर्ण क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। पृष्ठभूमि मालवा के सुल्तान नासिर-उद-दीन खिलजी की मृत्यु के बाद, उनके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष छिड़ गया। महमूद खिलजी द्वितीय मुख्य रूप से राजपूत प्रमुख मेदिनी राय की सहायता से विजयी हुआ। मेदिनी राय का प्रभाव काफ़ी बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ के मुस्लिम रईसों की दुश्मनी हो गई, यहां तक कि नए सुल्तान ने भी गुजरात के मुजफ्फर शाह द्वितीय से सहायता के लिए अपील करना आवश्यक समझा। गुजरात सल्तनत की एक सेना को मांडू भेजा गया और उसे घेर लिया गया, जहां मेदिनी राय का बेटा अधिकार में था । बदले में मेदिनी राय ने मेवाड़ के राणा सांगा से सहायता मांगी, जो अपनी सेना को मालवा में सारंगपुर तक ले गए। हालांकि, तब तक गुजरात सल्तनत की सेना मांडू पर कब्जा कर लिया गया था, जिस कारण सांगा को मेदिनी राय के साथ मेवाड़ लौटना पड़ा। मेवाड़ में मेदिनी राय सांगा की सेवा में कार्यरत रहा। युद्ध मालवा क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रतिशोध में, महमूद ने गुजरात के आसफ खान के साथ मेवाड़ियों के खिलाफ एक सेना का नेतृत्व किया और इसे गागरोन के मार्ग से ले गया। इसके जवाब में राव वीरमदेव के अधीन मेड़ता के राठौरों के सहित चित्तौड़ से एक बड़ी सेना के साथ सांगा आगे बढ़ा। मेवाड़ी घुड़सवारों ने गुजराती घुडसवारियों के मध्य में से प्रहार किया, जिससे वे बिखर के भागने लगे। बाद में उन्होंने मालवा की सेना के साथ भी ऐसा ही किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें निर्णायक जीत मिली। महमूद घायल हो गया था और हरिदास केसरिया द्वारा बंदी बना लिया गया था। उसके अधिकांश अधिकारियों की मृत्यु हो गई थी और उसकी सेना को नष्ट कर दिया गया था। आसफ खान का बेटा मारा गया, हालांकि वह खुद भागने में सफल रहा। परिणाम सांगा ने बाद में गागरोन के साथ-साथ ही भीलसा, रायसेन, सारंगपुर, चंदेरी और रणथंभौर के क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया। महमूद को 6 महीने तक चित्तौड़ में बंदी बनाकर रखा गया था, हालांकि कहा जाता है कि राणा खुद व्यक्तिगत रूप से उसके घावों के इलाज की देखभाल की। बाद में सांगा ने महमूद को "सम्मानजनक" मांडू वापसी की अनुमति दी, हालांकि उसका एक बेटा मेवाड़ में बंधक के रूप में रहा। महमूद ने बाद में सांगा को उपहार के रूप में एक गहना और मुकुट भेजा। सांगा ने अपनी जीत के बाद हरिदास केसरिया को चित्तौड़ का किला भेंट किया, जिन्होंने इसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करके बदले में 12 गांवों की जागीर स्वीकार की। संदर्भ राजस्थान का इतिहास
अयनांत / अयनान्त (अंग्रेज़ी:सोलस्टिस) एक खगोलीय घटना है जो वर्ष में दो बार घटित होती है जब सूर्य खगोलीय गोले में खगोलीय विषुवत वृत्त के सापेक्ष अपनी उच्चतम अथवा निम्नतम अवस्था में भ्रमण करता है। विषुव और अयनान्त मिलकर एक ऋतु का निर्माण करते हैं। विभिन्न सभ्यताओं में अयनान्त को ग्रीष्मकाल और शीतकाल की शुरुआत अथवा मध्य बिन्दु माना जाता है। 21 जून को जब सूर्य जब उत्तरी चरम बिंदु पर होता है , इसे उत्तर अयनान्त कहते हैं। इस समय उत्तरी गोलार्ध में सर्वाधिक लम्बे दिन होते हैं और ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में इसके विपरीत सर्वाधिक छोटे दिन होते हैं और शीत ऋतु का समय होता है। २१ दिसंबर को जब सूर्य मकर रेखा के ठीक ऊपर होता है उसे दक्षिण अयनांत कहते हैं। दक्षिण अयनांत के बात सूर्य उत्तर की और गमन करता प्रतीत होता है , इसे उत्तरायण कहते हैं। उत्तर अयनांत के बाद सूर्य दक्षिण की और गमन करता प्रतीत होता है , उसे दक्षिणायन कहते हैं। इनका भ्रम संक्रांति से नहीं होना चाहिए। संक्रांति सूर्य के किसी राशि में प्रवेश करने का समय है। मकर संक्रांति १४ या १५ जनवरी को होती है , २१ दिसंबर को नहीं। मार्च और सितम्बर में जब दिन और रात्रि दोनों १२-१२ घण्टों के होते हैं तब उसे विषुवदिन कहते हैं. इन्हें भी देखें दक्षिण अयनांत उत्तरायण, दक्षिणायन, अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ वर्ष का सबसे लंबा दिन: सोलस्टिस कैलंडर खगोलीय घटनाएँ खगोलशास्त्र में समय सौर मंडल की गतिकी ज्योतिष के तकनीकी आयाम सौर मंडल की खगोलीय घटनाएँ
योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं। (अविद्याऽस्मिता रागद्वेषभिनिवेशा: पंच क्लेशा:, योगदर्शन २.३)। भाष्यकर व्यास ने इन्हें विपर्यय कहा है और इनके पाँच अन्य नाम बताए हैं- तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अंधतामिस्र (यो. सू. १.८ का भाष्य)। इन क्लेशों का सामान्य लक्षण है - कष्टदायिकता। इनके रहते आत्मस्वरूप का दर्शन नहीं हो सकता। अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। वह प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार चार रूपों में प्रकट होती है। पातंजल योगदर्शन (२.५) के अनुसार अनित्य, अशुचि, दु:ख तथा अनांत्म विषय पर क्रमश: नित्य, शुचि सुख और आत्मस्वरूपता की ख्याति ‘अविद्या’ है। दूसरे शब्दों में अविद्या वह भ्रांत ज्ञान है जिसके द्वारा अनित्य विषय, नित्य प्रतित होता है। अभिनिवेश नामक क्लेश में भी यही भाव प्रधान होता है। अशुचि को शुचि समझना अविद्या है। अर्थात्‌ अनेक अपवित्रताओं और मलों के गेह शरीर को पवित्र मानना अविद्या है। जैन विद्वान स्थान, बीज, उपहम्भ, निस्यंद, निधन और आधेय शौचत्व के कारण शरीर को अशुचि मानते हैं किंतु वे यह स्वीकार नहीं करते कि वह अविद्याग्रस्त है। नित्यता, शुचिता, सुख और आत्म नामक भ्रमों पर आश्रित होने के कारण अविद्या को चतुष्पदा कहा गया है। संतों ने इन्हीं चार पदों को ध्यान में रखकर अविद्या (माया) का गाय की उपमा दी हैं। अस्मिता अर्थात्‌ अहंकार बुद्धि और आत्मा को एक मान लेना दूसरा क्लेश है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अनुभूति का ही नाम अस्मिता है। सुख और उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा और लोभ का नाम राग हैं (सुखानुप्रायी राग:) यह तीसरा क्लेश है। चौथा क्लेश द्वेष पतंजाति के अनुसार दुखानुशयी है। दु:ख या दु:ख जनक वृत्तियों के प्रति क्रोध की जो अनुभूति होती हैं उसी का नाम द्वेष है। क्रोध की भावना तभी जाग्रत होती है जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को किसी अनुचित अथवा अपने अनुकूल मान लेते हैं। यह साधारण अविद्याजन्य है। आत्मा अकर्ता है अत: द्वेष के वशीभूत होना अकारण क्लेश का आह्वान करना है। पतंजलि के अनुसार जो सहज अथवा स्वाभाविक क्लेश विद्वान्‌ और अविद्वान्‌ सभी को समान रूप से होता है वह पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। प्रत्येक प्राणी-विद्वान्‌, अविद्वान्‌ सभी की आकांक्षा रही है कि उसका नाश न हो, वह चिरजीवी रहे। इसी जिजीविषा के वशीभूत होकर मनुष्य न्याय अन्याय, कर्म कुकर्म सभी कुछ करता है और ऊँच नीच का विचार न कर पाने के कारण नित्य नए क्लेशों में बँधता जाता है। योगशास्त्र में इन क्लेशों का क्षय कैवल्यप्राप्ति के लिए आवश्यक बताया गया है। यौगिक क्रियाओं द्वारा योगी इन क्लेशों का नाश करता हैं और उनका नाशकर परमार्थ की सिद्धि करता हैं। इन्हें भी देखें क्लेश (बौद्ध धर्म) बाहरी कड़ियाँ International Nath Order (INO) perspectives: Five Kleshas - International Nath Order Mahendranath, Shri Gurudev. "Twilight Yoga II: The Magnum Opus of Twilight Yoga" भारतीय दर्शन
कटरीसरायपुर कछोहा कन्नौज, कन्नौज, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ कन्नौज जिला के गाँव
मिटेगी लक्ष्मणरेखा भारतीय हिन्दी धारावाहिक है, जिसका प्रसारण एंड टीवी पर 28 मई 2018 से 31 अगस्त 2018 तक चला। इसका निर्माण शशि सुमित मित्तल और सुमित हुकुमचंद मित्तल ने किया है। इसमें मुख्य किरदार में राहुल शर्मा और शिवानी तोमर हैं। इसका प्रसारण सोमवार से शुक्रवार, रात 9:30 बजे होता था। इसके बंद होने के बाद इसके स्थान पर परफेक्ट पति का प्रसारण शुरू हुआ। कहानी ये कहानी कंचन (शिवानी तोमर) की है, जो लड़कियों को आत्म-रक्षा की शिक्षा देती है। वहीं राजकुमार विशेष (राहुल शर्मा) अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी कर घर आने वाला होता है। शीतल की शादी दस बार तय होते होते रुक जाती है, जिससे उसका पिता बलदेव काफी परेशान रहता है। एक दिन उसकी शादी की बात चलते रहती है कि कंचन राजभवन की गाड़ी से अपने घर आती है, जिसे देख कर लड़के वाले उस गाड़ी के पास खड़े सेवक से फोन की बातें सुनते हैं, और उन्हें लगता है कि कंचन की शादी राजकुमार विशेष से तय हो गई है। अपने आप को राज परिवार से जुड़ा देखने के लिए वे लोग शादी के लिए हाँ कर देते हैं। कहीं इस बार भी शादी टूट न जाये, इस कारण कंचन भी झूठ को सही कह देती है। शीतल की शादी तय हो जाती है। इस खबर को सुन कर उसका प्रेमी, जग्गी आत्महत्या करने की कोशिश करता है, तभी विशेष आ कर उसे बचा लेता है। वो दोनों शीतल की शादी में बावर्ची और सहायक बन कर चले जाते हैं। वहीं कंचन भी शीतल की शादी की तैयारी करते रहती है और वहीं उन दोनों की मुलाक़ात होती है। जग्गी विशेष को बावर्ची के रूप में मिलाता है और उसका नाम पप्पी बताता है। बाद में कंचन को पता चल जाता है कि शीतल और जग्गी एक दूसरे से प्यार करते हैं और पप्पी उन दोनों का साथ दे रहा है। कंचन कहती है कि उसे पहले से शक था कि ये बावर्ची नहीं है, वो उसके बारे में सही जानकारी पुछती है, तो जग्गी बताता है कि उसका नाम राजकुमार है और वो मैकेनिक है। शीतल की शादी से एक दिन पहले ही उसके पिता को सच्चाई पता चल जाती है कि शीतल और जग्गी एक दूसरे से प्यार करते हैं। उसे ये भी पता चल जाता है कि जग्गी और पप्पी उसे भगा कर ले जाने आए हैं। वो उन दोनों को मार मार कर भगा देता है। बाद में कंचन को पता चलता है कि पप्पी ही राजकुमार विशेष है। विशेष उससे जानकारी छिपाने बोलता है ताकि जग्गी और शीतल की शादी उनके प्यार के कारण ही हो, न कि मजबूरी में, और अगले दिन शीतल के पिता शीतल की शादी जग्गी के साथ करा देते हैं। जब वे लोग जाते रहते हैं, तब सभी को पता चलता है कि पप्पी ही राजकुमार विशेष है। इसके बाद कंचन और विशेष की मुलाक़ात होते रहती है और उन दोनों को एक दूसरे से प्यार भी हो जाता है, लेकिन जब विशेष उसे शादी के लिए पूछता है तो वो मना कर देती है। विशेष को मना करने का कारण समझ नहीं आता है और उसे ये भी पता चलता है कि एक दुर्घटना के बाद से उसके मन में डर समाया हुआ है। वो उस डर के कारण को जानने का प्रयास करते रहता है। कंचन ने जो अपनी माँ को चिट्ठी लिखी थी, उससे विशेष को सारी घटना का पता चलता है। इसके बाद वो कंचन की हिम्मत बढ़ाता है। उसके कुछ दिनों बाद वो भी शादी के लिए मान जाती है। कलाकार राहुल शर्मा - राजकुमार विशेष देवयानी ठाकुर शिवानी तोमर - कंचन वैष्णवी महंत राहुल गोस्सैन अमित ठाकुर जयश्री सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ
वैयक्तिक उपयोग की वस्तुएं, अर्जित आय तथा बचत साथ ही उत्पादन के कतिपय साधन जो व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं, वैयक्तिक संपत्ति (Personal Property) कहलाते हैं। वैयक्तिक संपत्ति की प्रकृति निजी संपत्ति से मूलतः भिन्न होती है। निजी संपत्ति मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के, दूसरों के श्रम के फलों को हड़पने के साधन के रूप में काम करती है परन्तु वैयक्तिक संपत्ति की मान्यता का अर्थ उसकी असीमित संवृद्धि नहीं है। समाजवाद के अंतर्गत अनर्जित आय की प्राप्ति के उद्देश्य से वैयक्तिक संपत्ति के दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। परंतु साम्यवाद के अंतर्गत वैयक्तिक संपत्ति की संकल्पना का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, क्योंकि वैयक्तिक आवश्यकताओं की पूर्ति मुख्यतया सामाजिक कोषों से होगी। सन्दर्भ दर्शन अर्थशास्त्र
सराय ममरेज हंडिया, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ इलाहाबाद जिला के गाँव
इंदर सभा () एक उर्दू का नाटक और ओपेरा है जिसे लखनऊ के अवध दरबार से सम्बन्ध रखने वाले लेखक व कवि आग़ा हसन अमानत​ ने लिखा और जिसे मंच पर सबसे पहले सन् १८५३ में प्रस्तुत किया गया। यह उर्दू की सबसे पहली रचाई जाने वाली नाटकीय कृति मानी जाती है। इन्दर सभा की अश्लीलता और भौंडेपन से क्षुब्ध होकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'बन्दर सभा' नामक नाटक की रचना की थी। १८६३ में इसे फ़्रीडरिख़ रोज़न (Friedrich Rosen) ने यूरोपीय पाठकों के लिए जर्मन भाषा में अनुवादित किया, जो कि उस समय के समीक्षकों के द्वारा सराहा गया था। १९३२ में मदन थियेटर ने इसपर आधारित एक फ़िल्म 'इन्द्रसभा' भी बनाई थी। ध्यान दें कि जबकि मूल नाटक का नाम लोक-बोली के अनुसार 'इंदर सभा' था, इसपर आधारित फ़िल्म का नाम संस्कृत-प्रथानुसार 'इन्द्रसभा' था। नाटक यह ओपेरा दिव्यलोक में महराज इन्द्र के राजदरबार को पृष्ठभूमि बनाकर लिखा गया है। पूरा नाटक काव्य-रूप में लिखा हुआ है और इसकी मुख्य कहानी एक परी (अप्सरा) और एक राजकुमार के बीच की प्रेमकथा है। नाटक में पटाख़ों और नक़ाबों जैसी नाटकीय तकनीकों का प्रयोग किया गया है। वैसे तो अमानत ने यह नाटक अवध के राजदरबार में रचाने के लिए ही लिखा था लेकिन इसके गीत जल्द ही लोक-संस्कृति में प्रवेश कर गए और "आने वाली कम-से-कम दो पीढ़ियों तक अवध के गीतकार और कलाकार इंदर सभा के गाने गाते थे"। इसका हिन्दी-उर्दू की गीत परम्परा के विकास पर भी प्रभाव पड़ा। नाटक में "३१ ग़ज़लें, ९ ठुमरियाँ, ४ होलियाँ, १५ गीत, २ चौबोले और ५ छंद सम्मिलित थे जिनपर आधारित कई नृत्य प्रस्तुत किये जा सकते थे"। इस नाटक का सीधा प्रभाव १९वीं और २०वीं में बाद में आने वाले कई उर्दू नाटकों पर बड़ा जिनमें ख़ादिम हुसैन अफ़सोस का 'बज़्म-ए-सुलयमान' (सन् १८६२), भैरों सिंह अस्मत​ का 'जश्न-ए-परिस्तान' और ताज महल फ़ार्रूख़​ का 'निगारिस्तान-ए-फ़ार्रूख़​' शामिल हैं। फ़िल्म १९३२ में प्रस्तुत की गई फ़िल्म 'इन्द्रसभा' भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे पहली बोलने वाली (टाकीज़) फ़िल्म थी। सबसे पहली भारतीय ध्वनिपूर्ण फ़िल्म 'आलम आरा' थी और 'इन्द्रसभा' ठीक उस से अगले ही वर्ष रिलीज़ हुई। यह २११ मिनट लम्बी थी और इसमें 71 गाने थे, जो विश्व-इतिहास में किसी भी बनी हुई फ़िल्म में सर्वाधिक हैं। 'इन्द्रसभा' फ़िल्म जमशेदजी फ़्रामजी मदन की 'मदन थियेटर' नामक कम्पनी ने बनाई थी। गीत का उदाहरण इंदर सभा के एक दृश्य में देवताओं के राजा इन्द्र अपने दरबार में प्रवेश करते हैं और एक चौबोले में कहते हैं कि: इन्हें भी देखें ओपेरा नौटंकी अवध पारसी थिएटर सन्दर्भ उर्दू साहित्य उर्दू नाटक हिन्दी फ़िल्में
तल्लीसेठी (दरियामद), कालाढूगी तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के नैनीताल जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा ), तल्लीसेठी (दरियामद, कालाढूगी तहसील ), तल्लीसेठी (दरियामद, कालाढूगी तहसील
आयरलैंड 'ए' टीम बांग्लादेश 'ए' टीम के खिलाफ एक प्रथम श्रेणी मैचों और पांच सीमित ओवरों मैच खेलने के लिए वर्तमान में बांग्लादेश का दौरा कर रही है। केवल प्रथम श्रेणी का मैच सिल्हेत इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम, सिल्हेत और कॉक्स बाजार में सीमित ओवरों के मैचों में खेला जाएगा। प्रथम श्रेणी मैच Cricbuzz केवल प्रथम श्रेणी मैच लिस्ट ए सीरीज 1ला मैच 2रा मैच 3रा मैच 4था मैच 5वा मैच सन्दर्भ क्रिकेट प्रतियोगितायें
चुराडी, अल्मोडा तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के अल्मोड़ा जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा चुराडी, अल्मोडा तहसील चुराडी, अल्मोडा तहसील
654 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। घटनाएँ जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर १८६४८४ +/९ अक्टूबर-दिसंबर अज्ञात तारीख़ की घटनाएँ जन्म जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसंबर निधन जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसंबर 654 वर्ष
ट्राइब्यूटाइलफोस्फिन एक कार्बनिक यौगिक है। कार्बनिक यौगिक
दिलीप ताहिल (जन्म: 30 अक्टूबर, 1952) हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं। व्यक्तिगत जीवन प्रमुख फिल्में नामांकन और पुरस्कार सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ बॉलीवुड अभिनेता हिन्दी अभिनेता 1952 में जन्मे लोग जीवित लोग
बिलग्राम (Bilgram) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई ज़िले में स्थित एक नगर है। विवरण बिलग्राम को भीलग्राम भी कहा जाता है। इस जगह की स्थापना भीलों ने करी थी और उन्हीं के आधार पर यह जगह भीलग्राम यानी 'भीलों का गांव ' नाम पड़ा , इस स्थान का इतिहास काफी पुराना है यह क्षेत्र राजा हिरण्य के समय से ही अस्तित्व में है , करीब 9 से 12 शताब्दी के बीच बाहरी आक्रमणकारियों ने भील राजाओं पर आक्रमण करना शुरू किए और क्षेत्र पर बाहरी लोगो ने आधिपत्य कर लिया। बहुत ही ऐतिहासिक तथा परम्पराओं वाला यह शहर अपने आप में एक मिशाल है । ‘जनाब’ शब्द का जन्म इसी बिलग़्राम से हुआ। तथा बादशाह औरंगज़ेब के सलाहकार इसी शहर से हुए है । इस छोटे से शहर ने बहुत मशहूर शख़्सियत दी । जिनकी लिखी हुई किताबें आज भी इस्लामिक देशों में पढ़ाई जाती है । भौगोलिक स्थिति बिलग्राम की स्थिति है और इसकी मानक समूद्र तल से ऊँचाई 136 मीटर (446 फुट) है। इन्हें भी देखें हरदोई ज़िला सन्दर्भ हरदोई ज़िला उत्तर प्रदेश के नगर हरदोई ज़िले के नगर
ज़म्बोआंगा देल सूर (Zamboanga del Sur) दक्षिणपूर्वी एशिया के फ़िलिपीन्ज़ देश का एक प्रान्त है। यह मिन्दनाओ द्वीप में स्थित है और ज़म्बोआंगा प्रायद्वीप नामक प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल है। चित्रदीर्घा शीर्षकों के लिए बिना क्लिक करे माउस चित्र पर लाएँ और एक क्षण ठहरें इन्हें भी देखें ज़म्बोआंगा प्रायद्वीप फ़िलिपीन्ज़ के प्रान्त सन्दर्भ फ़िलिपीन्ज़ के प्रान्त ज़म्बोआंगा प्रायद्वीप
बॊंतलपल्लॆ (अनंतपुर) में भारत के आन्ध्रप्रदेश राज्य के अन्तर्गत के अनंतपुर जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ आंध्र प्रदेश सरकार का आधिकारिक वेबसाइट आंध्र प्रदेश सरकार का पर्यटन विभाग NIC की वेबसाइट पर आंध्र प्रदेश पोर्टल आंध्र प्रदेश राज्य पुलिस की सरकारी वेबसाइट आन्ध्र प्रदेश अनंतपुर जिला
साष्ट्रीय साक्षरता मिशन (N.L.M) की स्थापना सन १९८८ में १५ से ३५ वर्ष की आयु के बीच के निरक्षरों को कामकाजी तौर पर साक्षर बनाने के लिए हुई थी। शिक्षा प्रमुख शिक्षा योजनाएं
दिल्ली का एक आवासीय क्षेत्र है। दिल्ली के आवासीय क्षेत्र
पूर्वांचल उत्तर-मध्य भारत का एक भौगोलिक क्षेत्र है जो उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित है। यह उत्तर में नेपाल, पूर्व में बिहार, दक्षिण मे मध्य प्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र और पश्चिम मे उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र द्वारा घिरा है। इसे एक अलग राज्य बनाने के लिए लंबे समय से राजनीतिक मांग उठती रही है। वर्तमान में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उत्तर प्रदेश विधानसभा में 117 विधायकों द्वारा होता है तो वहीं इस क्षेत्र से 23 लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं। पूर्वांचल के मुख्यतः तीन भाग हैं- पश्चिम में पूर्वी अवधी क्षेत्र, पूर्व में पश्चिमी-भोजपुरी क्षेत्र और उत्तर में नेपाल क्षेत्र। यह भारतीय-गंगा मैदान पर स्थित है और पश्चिमी बिहार के साथ यह दुनिया में सबसे अधिक घनी आबादी वाला क्षेत्र है। उत्तर प्रदेश के आसपास के जिलों की तुलना में मिट्टी की समृद्ध गुणवत्ता और उच्च केंचुआ घनत्व के कारण कृषि के लिए अनुकूल है। अवधी और भोजपुरी क्षेत्र में प्रमुख भाषा है। 1991 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने पूर्वांचल विकास निधि की स्थापना की जिसका उद्देश्य था क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं के लिये धन इकट्ठा करना जिससे भविष्य में संतुलित विकास के जरिए स्थानीय जरूरतों को पूरा करते हुए क्षेत्रीय असमानताओं का निवारण हो सके। लेकिन आजादी के 70 सालों बाद तक भी नहीं हो सका। सिर्फ पूर्वांचल के पिछड़ेपन के नाम पर वोटों की सियासत की जा रही है। हर चुनाव में विकास की बातें की जाती है मगर वोट लेने के बाद सभी राजनीतिक दल पूर्वांचल की बदहाली को भुला देते हैं। यही वजह है कि अब अलग राज्य की मांग तेजी से उठने लगी है।पूर्वांचल विकास परिवार संस्था पूर्वांचल के 6 करोड़ लोगों के बीच काम कर रही है। परिचय पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है। इसकी वजह जाति आधारित राजनीति तथा एक विशाल जनसंख्या है। पूर्वांचल के प्रमुख मुद्दों मे बुनियादी सुविधाओं की कमी, उचित ग्रामीण शिक्षा और रोजगार का अभाव, कानून व्यवस्था को चिह्नित किया गया है। पूर्वांचल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र है। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायक मंगल पांडे इसी क्षेत्र के बलिया के मूल निवासी थे। भदोही और मिर्जापुर एशिया में कालीन निर्माण में प्रमुख खिलाड़ी रहे हैं। प्रयागराज इसका प्रमुख और बड़ा शहर है। जिला वाराणसी भारतीय पर्यटन और विशेष रूप से साड़ी के निर्माण का केंद्र है। सोनभद्र पूर्वांचल का एक जिला, ७०००MW बिजली का उत्पादन करता है, जो उत्तर प्रदेश के राज्य में कुल बिजली उत्पादन के लगभग आधा है और भारत क सबसे बड़ा और केवल चूना पत्थर की प्रमुख खदान है। वाराणसी और कुशीनगर कुल उत्तर प्रदेश में आने के पर्यटकों के ६५% से अधिक लोगो को आकर्षित करता है। मिर्जापुर और सोनभद्र प्राकृतिक संसाधनों के साथ बहुत समृद्ध हैं। सब के बावजूद पूर्वांचल अभी भी राज्य में सबसे पिछड़े क्षेत्रो मे से एक है। जिसका मुख्य कारण राज्य सरकार और केन्द्र सरकार द्वारा उचित ध्यान की कमी है। वाराणसी को पूर्वांचल की राजधानी कहा जाता है। पूर्वांचल अपराध और भ्रष्टाचार के के कारण अति पिछड़े क्षेत्रों में सम्मिलित है,जिसके कारण आम जनता के लिए पर्याप्त शिक्षा और रोजगार के अवसरों का अभाव है। भारत के किसी भी क्षेत्र के लोगों से अधिक शोषण ब्रिटिशों ने इस क्षेत्र के लोगों का किया क्योंकि यहां के लोगों में प्रबल राष्ट्रवाद एवं देशभक्ति की भावना कूट कूट कर भरी थी, जो गुलामी का विरोध करते थे। पूर्वांचल के जिले गोण्डा गोण्डा पूर्वांचल का प्रमुख शहर और जिला है, यह जिला ब्रिटिश राज में गोरखपुर से जुड़ा था बाद मैं अलग करदिया गया। गोंडा नजदीकी जिले बस्ती , बलरामपुर ,श्रावस्ती और अयोध्या है। यह जिला देवीपाटनमंडल मैं आता है। वाराणसी वाराणसी शहर उत्तरी भारत की मध्य गंगा घाटी में, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर गंगा नदी के बायीं ओर के वक्राकार तट पर स्थित है। यहां वाराणसी जिले का मुख्यालय भी स्थित है। वाराणसी शहरी क्षेत्र — सात शहरी उप-इकाइयों का समूह है और ये ११२.२६ वर्ग कि॰मी॰ (लगभग ४३ वर्ग मील) के क्षेत्र फैला हुआ है।[49] शहरी क्षेत्र का विस्तार (८२°५६’ पूर्व) - (८३°०३’ पूर्व) एवं (२५°१४’ उत्तर) - (२५°२३.५’ उत्तर) के बीच है।[49] उत्तरी भारत के गांगेय मैदान में बसे इस क्षेत्र की भूमि पुराने समय में गंगा नदी में आती रहीं बाढ़ के कारण उपत्यका रही है। वाराणसी में विभिन्न कुटीर उद्योग कार्यरत हैं, जिनमें बनारसी रेशमी साड़ी, कपड़ा उद्योग, कालीन उद्योग एवं हस्तशिल्प प्रमुख हैं। बनारसी पान विश्वप्रसिद्ध है और इसके साथ ही यहां का कलाकंद भी मशहूर है। वाराणसी में बाल-श्रमिकों का काम जोरों पर है। बनारसी रेशम विश्व भर में अपनी महीनता एवं मुलायमपन के लिये प्रसिद्ध है। बनारसी रेशमी साड़ियों पर बारीक डिज़ाइन और ज़री का काम चार चांद लगाते हैं और साड़ी की शोभा बढ़ाते हैं। इस कारण ही ये साड़ियां वर्षों से सभी पारंपरिक उत्सवों एवं विवाह आदि समारोहों में पहनी जाती रही हैं। कुछ समय पूर्व तक ज़री में शुद्ध सोने का काम हुआ करता था। वाराणसी के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (आई.सी.एस.ई), केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई) या उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यू.पी.बोर्ड) से सहबद्ध हैं। जौनपुर जौनपुर जिला वाराणसी प्रभाग के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित है। इसकी भूमिक्षेत्र २४.२४०N से २६.१२०N अक्षांश और ८२.७०E और ८३.५०E देशांतर के बीच फैली हुई है। गोमती और सई मुख्य नदियाँ हैं। इनके अलावा, वरुण, पिली और मयुर आदि छोटी नदियाँ हैं। मिट्टी मुख्य रूप से रेतीली, चिकनी बलुई है। जिले मे खनिजों की कमी है। जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल ४०३८ किमी२ है। जौनपुर जिला की वास्तविक जनसंख्या ४,४७६,०७२ (भारतीय जनगणना २०११) है। जिनमे २,२१७,६३५ पुरुष तथा २,२५८,४३७ महिलाएँ है। जिले का आर्थिक विकास मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। इस का मुख्य कारण जिले में भारी उद्योग का अभाव है। कई उद्योग वाराणसी-जौनपुर राजमार्ग के साथ आ रहे हैं। भदोही भदोही, उत्तर प्रदेश का एक जिला है। यह कालीन निर्माण के लिये प्रसिद्ध है। उत्‍तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के प्रमुख जनपद वाराणसी से 1996 में बना भदोही जिला आम जन के द्वारा 'कालीन नगरी' नाम से जाना जाता है। इलाहाबाद, जौनपुर, वाराणसी, मीरजापुर की सीमाओं को स्‍पर्श करता यह जिला अपने कालीन उद्योग के कारण विश्‍व में अत्‍यन्‍त प्रसिद्ध है। भारत के भौगोलिक मानचित्र पर यह जिला मध्‍य गंगा घाटी में 25.09 अक्षांश उत्‍तरी से 25.32 उत्‍तरी अक्षांश तक तथा 82.45 देशान्‍तर पूर्वी तक फैला है। 1056 वर्ग कि॰मी॰ क्षेत्रफल वाले इस जिले की जनसंख्‍या 10,77630 है। ज्ञानपुर, औराई, भदोही तीन तहसील मुख्‍यालयों के अधीन डीघ, अभोली, सुरियावां, ज्ञानपुर, औराई और भदोही विकास खण्‍ड कार्यालय है। इलाहाबाद की 2 विधानसभा सीटें हंडिया और प्रतापपुर के साथ मिलकर संसदीय क्षेत्र बनाने वाले इस जनपद में 3 विधान सभा क्षेत्र ज्ञानपुर,औराई और भदोही हैं। इस जनपद का मुख्‍य व्‍यवसाय कालीन है। मिर्ज़ापुर मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश राज्य का एक शहर है। यह मिर्ज़ापुर जिला का मुख्यालय है। पर्यटन की दृष्टि से मिर्जापुर काफी महत्वपूर्ण जिला माना जाता है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक वातावरण बरबस लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। मिर्जापुर स्थित विन्ध्याचल धाम भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। इसके अतिरिक्त, यह जिला सीता कुण्ड, लाल भैरव मंदिर, मोती तालाब, टंडा जलप्रपात, विन्धाम झरना, तारकेश्‍वर महादेव, महा त्रिकोण, शिव पुर, चुनार किला, गुरूद्वारा गुरू दा बाघ और रामेश्‍वर आदि के लिए प्रसिद्ध है। मिर्जापुर वाराणसी,भदोही जिले के उत्तर, सोनभद्र जिले के दक्षिण और इलाहाबाद जिले के पश्चिम से घिरा हुआ है। मिर्जापुर की स्थिति 25.15, 82.58 पर है। यहां की औसत ऊंचाई है 80 मीटर (265 फीट)। प्रमुख आकर्षण तारकेश्वर महादेव, मिर्जापुर महात्रिकोण, मिर्जापुर शिवपुर, मिर्जापुर सीता कुंड, मिर्जापुर चुनार का किला भारत का मानक समय मिर्ज़ापुर जिले के विंध्याचल शहर के अमरावती चौराहे से निर्धारित किया जाता है। गाज़ीपुर गाजीपुर, पूर्वांचल का पुराना जिला एवं नगर है। इसका प्राचीन नाम गाधिपुरी था जो कि लगभग सन १३३० में सैय्यद मसूद ग़ाज़ी नामक एक मुल्स्लिम शासक द्वारा बदल दिया गया। गाजीपुर, अंग्रेजों द्वारा १८२० में स्थापित, विश्व में सबसे बड़े अफीम के कारखाने के लिए प्रख्यात है। यहाँ हथकरघा तथा इत्र उद्योग भी है। ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस की मृत्यु यहीं हुई थी तथा वे यहीं दफन हैं। शहर उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा के बहुत नजदीक स्थित है। यहाँ की स्थानीय भाषा भोजपुरी है। यह पवित्र शहर बनारस के ७० की मी पूर्व में स्थित है गोरखपुर गोरखपुर, पूर्वांचल का प्रमुख जिला एवं नगर है। यह गोरखपुर जिला, और गोरखपुर कमीशनरी तथा पूर्वोत्तर रेलवे का प्रशासनिक मुख्यालय है। यह नगर गीता प्रेस एवं गोरखनाथ मन्दिर के लिये विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यह महान संत परमहंस योगानन्द का भी जन्म स्थान है। शहर में भी कई ऐतिहासिक बौद्ध स्थल है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर पूर्वाचल का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय है। यहां पर 4 विश्विद्यालय हैं। यहां पर 2 मेडिकल कॉलेज भी हैं। पिछले दिनों गोरखपुर एम्स का लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कर कमलों से हुआ। अब गोरखपुर का उर्वरक कारखाना भी चालू हो गया है। यहां पर एयरफोर्स बेस स्टेशन भी है,जो कि 1963 में बनाया गया था। ये 6 सेंतुरारी में 16 जनपद में से एक था जिसे माला के नाम से जानते थे।चौरी चौरा कांड यही पर हुआ था। यहां पर मिया साहेब का इमामबाड़ा भी है ,जिसमे सोने और चांदी की ताझिया रखी हुई है। इमामबाड़े में एक धुनि है जो कई दसको से जल रही। कुशीनगर कुशीनगर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला एवं एक एक छोटा सा कस्बा है। इस जनपद का मुख्यालय कुशीनगर से कोई १५ किमी दूर पडरौना में स्थित है। कुशीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग २८ पर गोरखपुर से कोई ५० किमी पूरब में स्थित है। महात्मा बुद्ध का निर्वाण यहीं हुआ था। यहाँ अनेक सुन्दर बौद्ध मन्दिर हैं। इस कारण से यह एक अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी है जहाँ मुख्यत: विश्व भर के बौद्ध तीर्थयात्री भ्रमण के लिये आते हैं। कुशीनगर कस्बे के और पूरब बढ़ने पर लगभग २० किमी बाद बिहार राज्य आरम्भ हो जाता है। हाल में कुशीनगर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी बना है, जिसका लोकार्पण भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर, 2021 को किया। देवरिया देवरिया भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर एवं जिला मुख्यालय है। देवरिया जनपद में मुख्य रूप से हिन्दी भाषा बोली जाती है। देवरिया जनपद की कुल जनसंख्या की लगभग ९६ प्रतिशत जनता हिन्दी, लगभग ३ प्रतिशत जनता उर्दू और एक प्रतिशत जनता के बातचीत का माध्यम अन्य भाषाएँ हैं। बोली की बात करें तो ग्रामीण जनता के साथ-साथ अधिकांश शहरी जनता भी प्रेम की बोली भोजपुरी बोलती है। कुल जनसंख्या की दृष्टि से इस जनपद में लगभग चौरासी प्रतिशत हिन्दू, लगभग पंद्रह प्रतिशत मुस्लिम और एक प्रतिशत अन्य धर्म को मानने वाले हैं। इस जनपद की जनता आपस में प्रेम-भाव से रहते हुए सबके दुख-सुख में सहभागी बनती है। या यूँ कहें "देवरिया जनपद रूपी उपवन को हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध आदि पुष्प अपनी सुगंध से महकाते हैं और ये सुगंध आपस में मिलकर पूरे भारत को गमकाती है।" आज़मगढ़ आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में से एक महत्वपूर्ण जिला है । जो सरयू नदी के दक्षिण और गंगा नदी के उत्तर में तमसा नदी के किनारे बसा है । महाकाब्यों के अनुसार तमसा नदी को भगवान श्रीराम पार करके चित्रकूट की तरफ गयें थें। प्रथम पंचवर्षी योजना यहां के लिए बहुत ही लाभकारी रही थी। यहां पर अवधि और भोजपुरी भांषाओं का संगम है।उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में से एक, आजमगढ़, अपने उत्तर-पूर्वी हिस्से को छोड़कर कभी प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा था। आजमगढ़ को ऋषि दुर्वासा की भूमि के रूप में भी जाना जाता है, जिसका आश्रम फूलपुर तहसील में स्थित था, जो फूलपुर तहसील मुख्यालय से 6 किलोमीटर (3.7 मील) उत्तर में तमसा और मझुए नदियों के संगम के पास स्थित था। इसकी स्थापना शाहजहां के शासनकाल के दौरान 1665 में विक्रमजीत के बेटे आजम ने की थी। विक्रमाजीत परगना निज़ामाबाद में मेहनगर के गौतम राजपूतों के वंशज थे जिन्होंने अपने कुछ पूर्ववर्तियों की तरह इस्लाम अपनाया था। उसकी एक मुस्लिम पत्नी थी, जिससे उसके दो बेटे आज़म और अज़मत हुए। आज़म ने अपने नाम से शहर का नाम आज़मगढ़ शहर, और किला को अपना नाम दिया, जबकी अज़मत ने परगना सगरी में किले और अज़मतगढ़ बाजार का निर्माण करवाया था। चैबील राम के हमले के बाद, अज़मत खान अपने सैनिकों के साथ उत्तर की ओर भाग गया। उन्होंने गोरखपुर में घाघरा पार करने का प्रयास किया, लेकिन दूसरी तरफ के लोगों ने उसके आने का विरोध किया, और उन्हें या तो मध्य धारा में गोली मार दी गई या बचने के प्रयास में डूब गया। आजमगढ़ स्वतंत्रा आंदोलन के लिए भी पहचाना जाता है, गांधीजी के आव्हान पर सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अतरौलिया खंड के रामचरित्र सिंह व उनके नाबालिक बेटे सत्यचरण सिंह ने एक साथ अंग्रेजो का डटकर मुकाबला किया और गोली खायी। पिता पुत्र का एकसाथ स्वतंत्रा के आंदोलन में कूदने का विरला ही उदाहरण देखने को मिलता है। महान यायावर साहित्यकार महापंडित राहुल सांकृत्यायन और शायर कैफी आजमी का संबंध पर आजमगढ़ से रहा है। वीर रस के महान कवि अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिओंध और श्याम नारायण पांडेय का जन्म भी आजमगढ़ में ही हुआ। झारखंड के प्रसिद्ध स्वयंसेवी संस्था विकास भारती के संस्थापक सह सचिव अशोक भगत का जन्म भी आजमगढ़ जिले में हुआ. आदिवासियों के बीच सेवा और विकास के प्रकल्प चलाने के लिए भारत सरकार ने श्री अशोक भगत को प्रतिष्ठित पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह एक पूर्वांचल का सबसे रंगबाज जिला माना जाता है। मऊ मऊ उत्तर प्रदेश के मऊ जिला का मुख्यालय है। इसका पूर्व नाम मऊनाथ भंजन (उर्दु:امئو نات بنجن)) था। अवन्तिकापुरी, गोविन्द साहिब, दत्तात्रेय, दोहरी घाट, दुर्वासा, मेहनगर, मुबारकपुर, महाराजगंज, नि‍जामाबाद और आजमगढ़ मऊ के प्रमुख स्थलों में से है। यह जिला लखनऊ के दक्षिण-पूर्व से 282 किलोमीटर और आजमगढ़ के पूर्व से 56 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह शहर तमसा नदी के किनारे बसा है। तमसा नदी शहर के बीच से निकलती/गुजरती है। भामऊ जिले के इतिहास को लेकर कई भ्रम है। सामान्यत: यह माना जाता है कि मऊ शब्द तुर्किश शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ गढ़, पांडव और छावनी होता है। वस्तुत: इस जगह के इतिहास के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। माना जाता है प्रसिद्ध शासक शेर शाह सूरी के शासन काल के दौरान इस क्षेत्र में कई आर्थिक विकास करवाए गए। वहीं मिलिटरी बेस और शाही मस्जिद के निर्माण में काफी संख्या में श्रमिक और कारीगर मुगल सैनिकों के साथ यहां आए थे। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय में भी मऊ की महत्वपूर्ण भूमिका रही महाराजगंज भारत-नेपाल सीमा के समीप स्थित महाराजगंज उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है। इसका जिला मुख्यालय महाराजगंज शहर मे स्थित है। पहले इस जगह को कारापथ के नाम से जाना जाता था। यह जिला नेपाल के दक्षिण , गोरखपुर जिले के उत्तर, कुशीनगर जिले के पश्चिम और सिद्धार्थ नगर व संत कबीर नगर जिले के पूर्व मे स्थिति है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण स्थल है।नौतनवा ,सौनोली, आनंद नगर, कोल्हुई,सिसवा,परतावल और निचलोल ।यहां की मुख्य बाज़ार और कस्बे है। बस्ती यह भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर और बस्ती जिला का मुख्यालय है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। बस्ती जिला संत कबीर नगर जिले के पश्चिम में और गोण्डा के पूर्व में स्थित है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भी यह उत्तर प्रदेश का सातवां बड़ा जिला है। प्राचीन समय में बस्ती को 'कौशल' के नाम से जाना जाता था। संत कबीर नगर संत कबीर नगर जिला उत्तरी भारत के उत्तर प्रदेश राज्य 75 जिलों में से एक है। खलीलाबाद शहर जिला मुख्यालय है| संत कबीर नगर जिला बस्ती मंडल का एक हिस्सा है। यह जिला उत्तर में सिद्धार्थ नगर जिले से पूर्व में गोरखपुर जिले से दक्षिण में अम्बेडकर नगर जिले से और पश्चिम में बस्ती जिला द्वारा घिरा है। इस जिले का क्षेत्रफल 1659.15 वर्ग किलोमीटर है।यह तीन तहसीलो मे बटा है धनघटा,खलीलाबाद, मेहदावल । भगवान शिव का विश्वव प्रसिद्ध मंदिर श्री तामेश्वरनाथ धाम,अवधी के मसहूर कवि रंगपाल हरिहरपुर,विश्व प्रसिध्द संत कबीर की निर्वाण स्थली मगहर और बखिर पक्षी विहार झील,हैंसर आदि यहां के प्रमुख स्थलों में से हैं। घाघरा, राप्‍ती,आमी और कुआनो यहां की प्रमुख नदियां है। मगहर एक कस्बा है जो आमी नदी के किनारे स्थित है|मगहर में संत कबीरदास की मृत्यु हुई थी|जिनके नाम पर जिले का नाम पड़ा है|मेहदावल विधानसभा से ही उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला विधायक श्रीमती सुचेता कृपलानी(पूर्व मुख्यमन्त्री) चुनी गयी थी। सिद्धार्थ नगर सिद्धार्थनगर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय सिद्धार्थनगर है। प्राचीन काल के शाक्य गणराज्य की राजधानी भगवान बुद्ध जहां के राजकुमार थे "कपिलवस्तु" इसी जनपद में स्थित है। भगवान बुद्ध के वास्तविक नाम "सिद्धार्थ" के ऊपर ही इस जनपद का नाम सिद्धार्थनगर रखा गया है। इस जनपद में नौगढ़,शोहरतगढ़,इटवा, डुमरियागंज और बांसी 5 तहसीलें हैं। कपिलवस्तु, शोहरतगढ़, इटवा,डुमरियागंज और बांसी 5 विधानसभा क्षेत्र हैं। सिद्धार्थनगर के पूर्व में जनपद महराजगंज और संतकबीरनगर, पश्चिम में जनपद बलरामपुर, उत्तर में नेपाल देश और दक्षिण में जनपद बस्ती स्थित है।इस जिले की प्रमुख नदियां राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बाणगंगा आदि नदियां हैं। इस जिले में चार बड़े रेलवे स्टेशन नौगढ़, बढ़नी, शोहरतगढ व उसका है। इस जिले में 5 तहसील, 14 व्लाक व 6 नगर हैं। यहां की मुख्य भाषा हिन्दी, अवधी, उर्दू व भोजपुरी है। मुख्य व्यवसाय कृषि है।उपजाऊ मिट्टी के पाये जाने के कारण यहां पर धान (प्रसिद्ध कालानमक), गेहूं व गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। सिद्धार्थनगर का "कालानमक" चावल अपने स्वाद और सुगंध के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसके अलावा सिद्धार्थनगर में 'सिद्धार्थ विश्वविद्यालय सिद्धार्थनगर, कपिलवस्तु भी अवस्थित है, जो पठन-पाठन के लिए एवं बौद्ध अध्ययन के लिए जाना जाता है। और अभी हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने ,स्व० माधव प्रसाद त्रिपाठी,मेडिकल कॉलेज का लोकार्पण भी किया है, यह पर घरेलू हवाई अड्डा भी प्रस्तावित है, बलिया बलिया पूर्वांचल का प्रमुख जिला एवं नगर है। शहर की पूर्वी सीमा गंगा और घाघरा के संगम में निहित है। बलिया, गाजीपुर से 76 किलोमीटर और वाराणसी से 150 किलोमीटर स्थित है। पूर्वांचल के अन्य जिलों की भांति भोजपुरी यहाँ के लोगों की मुख्य बोली है। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बलिया बागी बलिया (विद्रोही बलिया) के रूप में अपना महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय बलिया ने एक छोटी अवधि के लिये ब्रिटिश शासन के जिला सरकार का तख्ता पलट किया और चित्तू पांडे के अधीन एक स्वतंत्र प्रशासन स्थापितकिया। एक वार्षिक मेले के ददरी मेला, एक मैदान पर शहर की पूर्वी सीमा पर गंगा और सरयू नदियों के संगम पर मनाया जाता है। मऊ, आजमगढ़, देवरिया,गोरखपुर,गाजीपुर और वाराणसी के रूप में पास के जिलों के साथ नियमित संपर्क में रेल और सड़क के माध्यम से मौजूद है। रसड़ा - यहाँ से ३५ किलोमीटर पश्चिम में स्थित एक क़स्बा है। यहाँ नाथ बाबा का मंदिर है जो स्थानीय सेंगर राजपूतों के देवता हैं। इसके अलावा यहाँ दरगाह हज़रत रोशन शाह बाबा, दरगाह हज़रत सैयद बाबा और लखनेसर डीह के प्राचीन अवशेष दर्शनीय स्थल हैं। सोनभद्र सोनभद्र भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय राबर्ट्सगंज है। स्वतंत्रता मिलने के लगभग 10 वर्षों तक यह क्षेत्र (तब मिर्जापुर जिले का भाग) अलग-थलग था तथा यहां यातायात या संचार के कोई साधन नहीं थे। पहाड़ियों में चूना पत्थर तथा कोयला मिलने के साथ तथा क्षेत्र में पानी की बहुतायत होने के कारण यह औद्योगिक स्वर्ग बन गया। यहां पर देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्रियां, बिजली घर (थर्मल तथा हाइड्रो), एलुमिनियम एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। साथ ही कई सारी सहायक इकाइयां एवं असंगठित उत्पादन केन्द्र, विशेष रूप से स्टोन क्रशर इकाइयां, भी स्थापित हुई हैं। . रायबरेली रायबरेली भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है। या मुख्यतः अवध के अंतर्गत आता है। इसके पड़ोसी जिले राजधानी लखनऊ, फतेहपुर, उन्नाव, अमेठी, सुल्तानपुर और बाराबंकी है। इसका मुख्यालय रायबरेली में ही स्थित है। शिक्षा पूर्वांचल के प्रमुख विश्वविद्यालय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, (बीएचयू) वाराणसी सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु सिद्धार्थ नगर जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय,बलिया महाराजा सुहेलदेव राज्य विश्वविद्यालय,आज़मगढ़ मदन मोहन प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर महायोगी गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय, गोरखपुर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर महत्वपूर्ण सड़क, रेल और हवाई अड्डे प्रमुख सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग-२, ७, १९, २८, ५६, ९७ स्वर्णिम चतुर्भुज रेलवे पूर्वांचल के महराजगंज जिला को छोड़कर सभी जिले रेलवे से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। प्रयागराज, उत्तर मध्य रेलवे का मुख्य़ालय है जबकि गोरखपुर, पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय है। सन्दर्भ
गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ यथा शीघ्र करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देने के लिए वानप्रस्थ संस्कार कराया जाता है। इसी आधार पर समाज को परिपक्व ज्ञान एवं अनुभव सम्पन्न, निस्पृह लोकसेवी मिलते रहते हैं। समाज में व्याप्त अवांछनीयताओं, दुष्प्रवृत्तियों, कुरीतियों के निवारण तथा सत्प्रवृत्तियों, सत्प्रयोजनों के विकास का दायित्व यही भली प्रकार संभाल सकते हैं। ये ही उच्च स्तरीय समाज सेवा, परमार्थ करने के साथ उच्च आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त करने में सफल होते हैं। युग निर्माण अभियान के अंतर्गत इनके भी बड़े सार्थक एवं सफल प्रयोग हो रहे हैं। व्याख्या ढलती उम्र का परम पवित्र कर्त्तव्य है- वानप्रस्थ। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ जैसी ही हल्की होने लगें, घर को चलाने के लिए बड़े बच्चे समर्थ होने लगें और अपने छोटे भाई-बहिनों की देखभाल करने लगें, तब वयोवृद्ध आदमियों का एक मात्र कर्त्तव्य यही रह जाता है कि वे पारिवारिक जिम्मेदारियों से धीरे-धीरे हाथ खींचे और क्रमशः वह भार समर्थ लड़कों के कन्धों पर बढ़ाते चलें। ममता को परिवार की ओर से शिथिल कर समाज की ओर विकसित करते चलें। सारा समय घर के ही लोगों के लिए खर्च न कर दें, वरन् उसका कुछ अंश क्रमशः अधिक बढ़ाते हुए समाज के लिए समर्पित करते चलें। धर्म और संस्कृति का प्राण- वानप्रस्थ संस्कार भारतीय धर्म और संस्कृति का प्राण है। जीवन को ठीक तरह जीने की समस्या उसी से हल हो जाती है। युवावस्था के कुसंस्कारों का शमन एवं प्रायश्चित इसी साधना द्वारा होता है। जिस देश, धर्म जाति तथा समाज में उत्पन्न हुए हैं, उनकी सेवा करने का, ऋण मुक्त होने का अवसर भी इसी स्थिति में मिलता है। इसलिए जिन नर-नारियों की स्थिति इसके लिए उपयुक्त हो, उन्हें वानप्रस्थ ले लेना चाहिए। एक प्रतिज्ञा बन्धन में बँध जाने पर व्यक्ति अपने जीवनक्रम को तदनुरूप ढालने में अधिक सफल होता है, बिना संस्कार कराये मनोभूमि पर वैसी छाप गहराई तक नहीं पड़ती। इसलिए कदम कभी आगे बढ़ते, कभी पीछे हटते रहते हैं। विवाह न होने तक प्रेमी का सहचरत्व संदिग्ध रहता है, पर जब विवाह हो गया हो, तो सब कुछ स्थायी एवं सुनियोजित हो जाता है। संस्कार के बिना पारमार्थिक भावनाओं का तूफान कभी शिथिल या समाप्त भी हो सकता है, पर यदि विधिवत् संस्कार कराया गया, तो अन्तःप्रेरणा तथा लोकलाज दोनों ही निर्धारित गतिविधि अपनाये रहने की प्रेरणा देते रहेंगे, इसलिए शास्त्र मर्यादा के अनुरूप जिन्हें सुविधा हो, वे विधिवत् संस्कार करा लें। जिन्हें सुविधा न हो, वे बिना संस्कार के भी उपयुक्त प्रकार की रीति-नीति अपनाने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न करते रहें। लोक शिक्षण की आवश्यकता- इस गतिविधि को अपनाने से समाज की भी भारी सेवा होती है। प्राचीनकाल में लोक निर्माण की सारी गतिविधियों एवं प्रवृत्तियों के संचालन का उत्तरदायित्व साधु-ब्राह्मण, वानप्रस्थों पर ही था, वे अपनी सारी शक्तियाँ परमार्थ भावना से प्रेरित होकर जनमानस को सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त किये रहने में लगाये रहते थे। फलस्वरूप चारों ओर धर्म, कर्त्तव्य, सदाचार का ही वातावरण बना रहता था। वयोवृद्ध अनुभवी परमार्थ-परायण लोकसेवियों का प्रभाव जन साधारण पर स्वभावतः बहुत गहरा पड़ता है, वह टिकाऊ भी होता है। ऐसे लोग जन नेतृत्व करने के लिए जब धमर्तन्त्र का उचित उपयोग करते थे, तो सारे समाज में सत्प्रवृत्तियों के लिए उत्साह उमड़ पड़ता था। शिक्षा, स्वास्थ्य, सदाचार, न्याय, विवेक, वैभव, शासन, विज्ञान, सुरक्षा, व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में वे वयोवृद्ध लोग ही नेतृत्व करते थे। इतने अधिक अनुभवी और धर्म् परायण व्यक्तियों की निःशुल्क सेवा जिस देश या समाज को उपलब्ध होती हो, व उसको संसार का मुकुटमणि होना ही चाहिए, प्राचीनकाल में ऐसी ही स्थिति थी। आज वानप्रस्थ की परम्परा नष्ट हुई, बूढ़े लोगों को लोभ-मोह के बन्धनों में ही ग्रसित रहना प्रिय लगा, तो फिर देश का पतन अवश्यम्भावी हुआ भी, हो भी रहा है। विशेष व्यवस्था- वानप्रस्थ संस्कार जितने व्यक्तियों का हो, उनके लिए समुचित आसन तैयार रखे जाएँ। वानप्रस्थ परम्परा को महत्त्व देने की दृष्टि से उनके लिए सुसज्जित मंच बनाया जा सके, तो बनाना चाहिए। पूजन की सामान्य सामग्री के साथ-साथ संस्कार के लिए प्रयुक्त विशेष वस्तुओं को पहले से देख-सँभाल लेना चाहिए। उनका विवरण इस प्रकार है- वानप्रस्थों को पीले रंग के वस्त्रों में पहले से तैयार रखना चाहिए। पंचगव्य एक पात्र में पहले से तैयार रहे। संस्कार कराने वाले जितने व्यक्ति हों, उतने (१) पीले यज्ञोपवीत (२) पंचगव्य पान कराने के लिए छोटी कटोरियाँ, (३) मेखला-कोपीन (कमरबन्द सहित लँगोटी) (४) धमर्दण्ड (हाथ में लेने योग्य गोल दण्ड) रूल एवं (५) पीले दुपट्टे तैयार रखे जाएँ। ऋषि पूजन के लिए सात कुशाएँ एक साथ बँधी हुई। वेदपूजन हेतु वेद या कोई पवित्र पुस्तक पीले कपड़े में लपेटी हुई। यज्ञ पुरुष पूजन के लिए कलावा लपेटा हुआ नारियल का गोला। अभिषेक के लिए स्वच्छ लोटे या कलश एक जैसे, कम से कम ५, अधिक २४ तक हों, तो अच्छा है। अभिषेक के लिए कन्याएँ अथवा सम्माननीय साधकों को पहले से निश्चित कर लेना चाहिए। विधिवत् स्नान करके, पीत वस्त्र पहनाकर वानप्रस्थ लेने वालों को संस्कार स्थल पर लाया जाए। प्रवेश एवं आसन ग्रहण के समय पुष्प-अक्षत वृष्टि के साथ मंगलाचरण बोला जाए। सबके यथास्थान बैठ जाने पर नपे-तुले शब्दों में संस्कार का महत्त्व तथा उसके महान उत्तरदायित्वों पर सबका ध्यान दिलाकर भावनापूवर्क कमर्काण्ड प्रारम्भ कराएँ। विशेष कमर्काण्ड प्रारम्भ में षट्कर्म के बाद ही संकल्प करा दिया जाए। तिलक और रक्षासूत्र बन्धन के उपचार करा दिये जाएँ। समय की सीमा का ध्यान रखते हुए सामान्य प्रकरण, पूजन आदि को समुचित विस्तार या संक्षेप में किया जाए। रक्षाविधान के बाद विशेष कमर्काण्ड इस प्रकार कराये जाएँ। संकल्प दिशा एवं प्रेरणा- साधक हाथ में पुष्प, अक्षत, जल लेकर संकल्प करता है। संकल्प की सावर्जनिक घोषणा करता है कि आज से मैंने वानप्रस्थ व्रत ग्रहण कर लिया। अब मैं अपना या अपने परिवार का न रहकर समस्त समाज का बन गया। मेरा जीवन सावर्जनिक सम्पत्ति समझा जाए, उसे अपने या परिवार वालों के लाभ के लिए नहीं, वरन् विश्वमानस के लाभ की, आवश्यकता-पूर्ति का ध्यान रखते हुए माना जाए। क्रिया और भावना- संकल्प के लिए अक्षत, जल, पुष्प हाथ में दिये जाएँ। भावना करें कि देवसंस्कृति के मेरुदण्ड वानप्रस्थ जीवन का शुभारम्भ करने के लिए अपने अन्तरंग और अन्तरिक्ष की सद्शक्तियों से सहयोग की विनय करते हुए साहस भरी घोषणा कर रहे हैं- ॐ तत्सदद्य श्रीमद् भवगतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवत्तर्मानस्य अद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीये पराधेर् श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे भूलोर्के जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आयार्वत्तैर्क - देशान्तगर्ते ......... क्षेत्रे......... मासानां मासोत्तमेमासे......... पक्षे......... तिथौ......... वासरे......... गोत्रोत्पन्नः......... नामाऽहं स्वजीवनं व्यक्तिगतं न मत्वा सम्पूर्ण- समाजस्य एतत् इति ज्ञात्वा, संयम-स्वाध्याय-उपासनेषु विशेषतश्च लोकसेवायां निरन्तरं मनसा वाचा कमर्णा च संलग्नो भविष्यामि इति संकल्पं अहं करिष्ये। यज्ञोपवीत परिवतर्न नये जीवन की ओर पहला कदम त्याग, पवित्रता, तेजस्विता एवं परमार्थ के प्रतीक व्रतबन्ध स्वरूप यज्ञोपवीत का नवीनीकरण किया जाता है। यज्ञोपवीत का सिंचन करके पाँच देव शक्तियों के आवाहन स्थापन के उपरान्त उसे धारण कर लिया जाता है, पुराना उतार दिया जाता है। यह क्रम यज्ञोपवीत संस्कार प्रकरण में भी दिया गया है। यज्ञोपवीत सिंचन मन्त्र बोलते हुए यज्ञोपवीत पर जल छिड़कें, पवित्र करें, नमस्कार करें- ॐ प्रजापतेयर्त्सहजं पवित्रं, कापार्ससूत्रोद्भवब्रह्मसूत्रम्॥ ब्रह्मत्वसिद्ध्यै च यशः प्रकाशं, जपस्य सिद्धिं कुरु ब्रह्मसूत्र॥ पंचदेवावाहन निम्नस्थ मन्त्रों के साथ यज्ञोपवीत में विभिन्न देवताओं का आवाहन करें- (१) ब्रह्मा- ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्, विसीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्याऽउपमाऽ अस्यविष्ठाः, सतश्चयोनिमसतश्च विवः॥ ॐ ब्रह्मणे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१३.३ (२) विष्णु - ॐ इदं विष्णुविर्चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पा सुरे स्वाहा॥ ॐ विष्णवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -५.१५ (३) शिव - ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽ, उतो तऽइषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥ ॐ रुद्राय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१६.१ (४) यज्ञपुरुष - यज्ञोपवीत खोल लें। दोनों हाथों की कनिष्ठा और अँगूठे से फँसाकर सीने की सीध में करें, फिर यज्ञ भगवान का आवाहन मन्त्र बोलते हुए यज्ञ पुरुष का पूजन करें। ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्। तेह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः॥ ॐ यज्ञपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥ -३१.१६ (५) सूर्य - फिर दोनों हाथ ऊपर उठाकर सूयर्देव का आवाहन करें- ॐ आकृष्णेन रजसा वत्तर्मानो, निवेशयन्नमृतं मत्यर्ं च। हिरण्ययेन सविता रथेना, देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ ॐ सूयार्य नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -३३.४३ यज्ञोपवीतधारण ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ -पार०गृ०सू० २.२.११ जीणोर्पवीत विसजर्न ॐ एतावद्दिन पयर्न्तं, ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीणर्त्वात्ते परित्यागो, गच्छ सूत्र यथासुखम्॥ पंचगव्यपान शिक्षण और प्रेरणा पंचगव्य का पान पिछले जीवन में हुई भूलों के प्रायश्चित के लिए कराया जाता है। मैल हटे तो रंग चढ़े, दोषों की स्वीकारोक्ति, उनसे सम्बन्ध विच्छेद, जो प्रवृत्तियाँ इस ओर तो ले जाती है, उनका नियमन, भूलों से हुई हानियों को पूरा करने का साहस भरा शुभारम्भ यह सब मिलकर प्रायश्चित कर्म् पूरा होते हैं। प्रायश्चित से शुद्ध चित्त पर देव अनुग्रह सहज ही बरस पड़ते हैं। क्रिया और भावना- पंचगव्य की कटोरी बायें हाथ में ले और दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली से मन्त्रोच्चार के साथ उसे घोलें-चलाएँ। भावना करें कि इन गौ द्रव्यों को दिव्य चेतना से अभिमन्त्रित कर रहे हैं। ॐ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं, दधि सप्पिर्ः कुशोदकम्। निदिर्ष्टं पंचगव्यं, तु पवित्रं मुनिपुंगवैः॥ कटोरी दाहिने हाथ में लेकर मन्त्रोच्चार के साथ पान करें। भावना करें कि दिव्य संस्कारों से पापों की जड़ पर प्रहार और पुण्यों को उभारने का क्रम आरम्भ हो रहा है, जो निष्ठापूवर्क चलाया जाता रहेगा। ॐ यत्त्वगस्थिगतंपापं, देहे तिष्ठति मामके। प्राशनात्पंचगव्यस्य, दहत्वग्निरिवेन्धनम्॥ मेखला-कोपीन धारण शिक्षण एवं प्रेरणा- अभिसिंचन के उपरान्त वानप्रस्थ लेने वालों के हाथों में धमर्दण्ड और मेखला-कोपीन का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। कोपीन धारण करने का अर्थ है- इन्द्रिय संयम बरतना। वानप्रस्थी को सन्तानोत्पादन बन्द कर देना चाहिए। अब तक की उत्पन्न हुई सन्तान का ही पालन-पोषण, विकास-निमार्ण ठीक तरह हो जाए, यही बहुत है। पचास वर्ष की आयु के बाद बच्चे पैदा करते रहना, तो एक लज्जा की बात है, इससे कठिनाई बढ़ती है। बच्चे दुबले पैदा होते हैं, अनाथ रह जाते हैं तथा उनकी जिम्मेदारी मरते समय तक बनी रहने से समाजसेवा, परमार्थ साधना जैसे जीवन को साथर्क बनाने वाले प्रयोजनों के लिए अवसर ही नहीं मिलता। जिसके पीछे जितनी कम घरेलू जिम्मेदारी है, वह उतनी ही अच्छी तरह वृद्धावस्था का सदुपयोग कर सकेगा। फिर जिसने वानप्रस्थ धारण कर लिया, तो उसके लिए सन्तानोत्पादन एक विसंगति ही है, अतः उसे इस प्रकार की मयार्दाओं का पालन करने के लिए इन्द्रिय संयम का मार्ग अपनाना पड़ता है, उसी भावना का प्रतिनिधित्व कोपीन करती है, वानप्रस्थी उसे धारण करता है। कमर में रस्सी बाँधना कोपीन धारण के लिए तो आवश्यक है ही, साथ ही वह सैनिकों की तरह कमर कसकर, पेटी बाँधकर परमार्थ के मोर्चे पर आगे बढ़ने की मानसिक स्थिति का भी प्रतीक है। कमर कसना, मुस्तैदी, सतकर्ता, तत्परता निरालस्यता जैसी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति बनाये रखने का प्रतीक है। निमार्ण के दो मोर्चो पर एक साथ लड़ने वाले सैनिक को जिस सतकर्ता से कार्य करना होता है, वैसा ही उसे भी करना चाहिए। क्रिया और भावना- मेखला-कोपीन हाथों के सम्पुट में ली जाए। मन्त्रोच्चार के साथ भावना की जाए कि तत्परता, सक्रियता तथा संयमशीलता का वरण किया जा रहा है। मन्त्र पूरा होने पर उसे कमर में बाँध लें। ॐ इयं दुरुक्तं परिबाधमानां, वर्णं पवित्रं पुनतीमऽआगात्। प्राणापानाभ्यां बलमादधाना, स्वसा देवी सुभगा मेखललेयम्॥ -पार० गृ०सू० २.२.८ धमर्दण्डधारण शिक्षण एवं प्रेरणा- वानप्रस्थी को हाथ में लाठी दी जाती है। गुरुकुलों में विद्याध्ययन करने वालों को वन्य प्रदेश की आवश्यकता के अनुरूप लाठी सुविधा की दृष्टि से आवश्यक भी होती थी। इसके अतिरिक्त यह धमर्दण्ड इस मन्तव्य का भी प्रतीक है कि राजा जिस प्रकार राज्याभिषेक के समय शासन सत्ता का प्रतीक राजदण्ड छोटा लकड़ी का डण्डा हाथ में विधिवत् समारोह के साथ ग्रहण करता है, उसी प्रकार वानप्रस्थी संसार में धर्म व्यवस्था कायम रखने की अपनी जिम्मेदारी को हर घड़ी स्मरण रखे रहे और तदनुरूप अपना जीवनक्रम बनाये रहे, इसलिए भी यह धमर्दण्ड है। क्रिया और भावना- दण्ड दोनों हाथों से पकड़ें। भूमि के समानान्तर हृदय की सीध में स्थिर करें। मन्त्र पूरा होने पर मस्तक से लगाएँ और दाहिनी ओर रख लें। भावना करें कि धर्म चेतना को जीवन्त, व्यवस्थित एवं अनुशासित रखने का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व स्वीकार किया जा रहा है। इसके साथ दिव्य शक्तियाँ ब्राह्मणत्व और ब्रह्मवचर्स प्रदान कर रही है। ॐ यो मे दण्डः परापतद्, वैहायसोऽधिभूम्याम्। तमहं पुनराददऽआयुषे, ब्रह्मणे ब्रह्मवचर्साय॥ - पार०गृ०सू० २.२.१२ पीतवस्त्रधारण शिक्षण एवं प्रेरणा- पीतवस्त्र वीरों, त्यागियों और परमार्थ परायणों का बाना कहा गया है। अज्ञान, अभाव एवं अनीति से संघर्ष करने के लिए विचारशीलों को संत, सुधारक और शहीदों की भूमिका निभाने की तैयारी करनी पड़ती है। संस्कृति की प्रतिष्ठा, उसके सनातन गौरव की रक्षा के लिए यही रंग प्रेरणा देता रहा है। क्रिया और भावना- दोनों हाथों की हथेलियाँ सीधी करके दुपट्टा लें। मन्त्र के साथ ध्यान करें कि सत् शक्तियों से पवित्रता, शौर्य और त्याग का संस्कार प्राप्त कर रहे हैं। मन्त्र पूरा होने पर दुपट्टा कन्धों पर धारण कर लें। ॐ सूर्यो मे चक्षुवार्तः, प्राणो३न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्। अस्तृतो नामाहमयमस्मि स, आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय॥ -अथवर्० ५.९.७ ऋषिपूजन शिक्षण एवं प्रेरणा- सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत्-जीवन्त रखने, जीवन के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों की शोध और उनका लाभ जन-जन तक पहुँचाने, ईश्वरीय उद्देश्यों के लिए समपिर्त पवित्र और तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी उन महामानवों की परम्परा का अनुगमन, आत्मकल्याण-लोकमंगल दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है, उनके अनुगमन के शुभारम्भ के रूप में पूजन किया जाता है। क्रिया और भावना- हाथ में पुष्प-अक्षत लेकर ऋषियों का ध्यान कर मन्त्रोच्चारण के साथ भावना करें कि हम भी उन्हीं की परिपाटी के व्यक्ति हैं, उनके गौरव के अनुरूप बनने के लिए अपने पुरुषार्थ के साथ उनके अनुग्रह को जोड़ रहे हैं, उसे पाकर अन्याय उन्मूलन के मोर्चे को सुदृढ़ बनायेंगे। ॐ इमावेव गोतमभरद्वाजा, वयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजऽ, इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी, अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निः, इमावेव वसिष्ठकश्यपौ, अयमेव वस्ाष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिवार्चाह्यन्नमद्यतेऽत्तिहर् वै, नामैतद्यत्रिरिति सवर्स्यात्ता भवति, सवर्मस्यान्नं भवति य एवं वेद॥ -बृह० उ० २.२.४ ॐ सप्तऋषीनभ्यावतेर्। ते मे द्रविणं यच्छन्तु, ते मे ब्राह्मणवचर्सम्। ॐ ऋषिभ्यो नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। -अथवर्० १०.५.३९ वेदपूजन शिक्षण एवं प्रेरणा- वेद कहते हैं ज्ञान को। अज्ञान हजार दुःखों का कारण है। ज्ञान-सद्विचार की स्थापना से ही समाज में सुख-सद्गति सम्भव है। स्वयं ज्ञान की आराधना करने तथा जन-जन को उसमें लगाने का भाव वेदपूजन के साथ रहता है। क्रिया और भावना- पूजन सामग्री हाथ में लें। मन्त्रोच्चार के साथ भावना करें कि ज्ञान की सनातन धारा के वतर्मान युग के अनुरूप प्रवाह को अपने लिए सारे समाज के लिए पतित पावनी माँ गंगा की तरह प्रवाहित करने के लिए अपनी भूमिका निधार्रित की जा रही है। अज्ञान का निवारण इसी से सम्भव होगा। ॐ वेदोऽसि येन त्वं देव वेद, देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः। देवा गातुविदो गातुं, वित्त्वा गातुमित। मनसस्पतऽ इमं देव, यज्ञ स्वाहा वाते धाः। ॐ वेदपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। -२.२१ यज्ञपुरुष पूजन शिक्षण एवं प्रेरणा- यज्ञ देवत्व का आधार है। इसी से देव शक्तियाँ कल्याणीकारी प्रवृत्तियाँ पुष्ट होती हैं। यज्ञीय भावना के आधार पर ही व्यक्ति और समाज अभावों से मुक्त होगा, अन्यथा कुबेर जैसी सम्पदा प्राप्त कर लेने के बाद भी शोषण, उत्पीड़न और कंगाली का वातावरण बना रहेगा। यज्ञीय भावना, यज्ञीय दशर्न और यज्ञीय जीवन क्रम अपनाने-फैलाने का संकल्प यज्ञ पुरुष पूजन के साथ जुड़ा रहेगा। क्रिया और भावना-पूजन सामग्री हाथ में लें। मन्त्र के साथ भावना करें कि धर्म और देवत्व के प्रमुख आधार को अंगीकार करते हुए, उसे पुष्ट और प्रभावशाली बनाया जा रहा है। ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः। ॐ यज्ञपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। व्रत धारण शिक्षण एवं प्रेरणा महानता की मंजिल पर मनुष्य एकाएक नहीं पहुँच जाता, उसके लिए एक-एक करके सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। श्रेष्ठ प्रवृत्तियाँ, आचरण एवं स्वभाव बनाने के लिए व्रतशील होकर चलना पड़ता है। छोटे ही सही, व्रत लेने, उन्हें पूरा करने, फिर नये व्रत लेने का क्रम विकास के लिए अनिवार्य है। व्रतशीलता के लिए कुछ देवशक्तियों को साक्षी करके व्रतशील बनने की घोषणा की जाती है। इन्हें अपना प्रेरक, निरीक्षक और नियंत्रक बनाना पड़ता है। सम्बन्धित देवशक्तियों की प्रेरणाएँ इस प्रकार हैं- अग्निदेव- ऊर्जा के प्रतीक। ऊर्जा, स्फुरणा, गर्मी, प्रकाश से भरे-पूरे रहने, अन्यों तक उसे फैलाने, दूसरों को अपना जैसा बनाने, ऊध्वर्गामी-आदशर्निष्ठ रहने, यज्ञीय चेतना के वाहन बनने की प्रेरणा के स्रोत। वायुदेव- स्वयं प्राणरूप, किन्तु बिना अहंकार सबके पास स्वयं पहुँचते हैं। कोई स्थान खाली नहीं छोड़ते, निरन्तर गतिशील। सुगन्धित और मेघों जैसे परोपकारी तत्त्वों के विस्तारक सहायक। सूयर्देव- जीवनी शक्ति के निझर्र, तमोनिवारक, जागृति के प्रतीक, पृथ्वी को सन्तुलन और प्राण-अनुदान देने वाले, स्वयं प्रकाशित, सविता देवता। चन्द्रदेव- स्वप्रकाशित नहीं, पर सूर्य का ताप स्वयं सहन करके निमर्ल प्रकाश जगती पर फैलाने वाले, तप अपने हिस्से में-उपलब्धियाँ सबके लिए। इन्द्रदेव- व्रतपति देवों में प्रमुख, देव प्रवृत्तियों-शक्तियों को संगठित-सशक्त बनाये रखने के लिए सतत जागरूक, हजार आँखों से सतर्क रहने की प्रेरणा देने वाले। क्रिया और भावना- साधक मन्त्रोच्चार के समय दोनों हाथ ऊपर उठाकर रखें। भावना करें कि हाथ उठाकर व्रतशीलता की साहसिक घोषणा कर रहे हैं, साथ ही सत्प्रवृत्तियों को अपना हाथ थमा रहे हैं। वे हमें मागर्दशर्क की तरह प्रेरणा एवं सहारा देती रहेंगी। एक देवता का मन्त्र पूरा होने पर हाथ जोड़कर नमस्कार करें, फिर पहले जैसी मुद्रा बना लें। ॐ अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ अग्नये नमः॥१॥ ॐ वायो व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ वायवे नमः॥२॥ ॐ सूयर् व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ सूयार्य नमः॥३॥ ॐ चन्द्र व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ चन्द्राय नमः॥४॥ ॐ व्रतानां व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ इन्द्राय नमः॥५॥ -मं०ब्रा०१.६.९.१३ अभिषेक शिक्षण एवं प्रेरणा- अभिषेक कृत्य ठीक उसी तरह का है, जैसा कि किसी राजा को राजगद्दी देते समय राज्याभिषेक किया जाता है। राजा का, दरबारी लोगों के संरक्षण में राज्याभिषेक होता है। प्रजाजनों और धर्म संरक्षकों के द्वारा वानप्रस्थ का धर्माभिषेक किया जाता है। राजा अपनी प्रजा की सुरक्षा एवं साधन-व्यवस्था के भौतिक उपकरण जुटाता है, इसलिए उसे प्रजापालक कहकर सम्मानित किया जाता है। वानप्रस्थ प्रजा की आत्मिक सुरक्षा, सुव्यवस्था एवं सुख-शांति के उपकरण जुटाता है, उसे सन्मार्ग पर चलने की सद्भावना से ओत-प्रोत रहने की सत्प्रेरणाएँ प्रदान करता रहता है। यह अनुदान सभी भौतिक साधनों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। राजा केवल एक सीमित प्रदेश में रहने वाली प्रजा की भौतिक सुरक्षा के लिए ही उत्तरदायी है, पर वानप्रस्थ के कन्धों पर संसार के समस्त मानवो-प्राणियों को न्याय एवं धर्म का प्रकाश उपलब्ध कराना है। भौतिक सुरक्षा की तुलना में आत्मिक प्रगति का मूल्य महत्त्व असंख्य गुना बड़ा है। इसी प्रकार एक सीमित क्षेत्र में रहने वाली प्रजा के साज-सँभाल की तुलना में समस्त विश्व के प्राणियों को सत्प्रेरणा देना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। अतएव राजा की तुलना में धर्म-सेवी महात्मा का, वानप्रस्थ का पद तथा गौरव भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, उसको अपना उत्तरदायित्व पूरी सावधानी से, जिम्मेदारी से निभाना है। इसी भावना को हृदयंगम कराने के लिए यह अभिषेक क्रिया की जाती है। समाज के सम्भ्रान्त, धमर्सेवी एवं विचारशील २४ व्यक्ति, जो यह अभिषेक करने खड़े हुए हैं, समाज का प्रतिनिधित्व करते हैँ। जल से वानप्रस्थी का अभिषिंचन करते हुए वे लोग समाज की ओर से नई भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। क्रिया और भावना- निधार्रित मात्रा में कन्याएँ या संस्कारवान् व्यक्ति कलश लेकर मन्त्रोच्चार के साथ साधकों का अभिषेक करें। भावना करें कि ईश्वरीय ऋषिकल्प जीवन के अनुरूप स्थापनाओं, बीजरूप प्रवृत्तियों को सींचा जा रहा है, समय पाकर वे फूलें-फलेंगी। जीवन के श्रेष्ठतम रस में भागीदारी के लिए परमात्म सत्ता से प्राथर्ना की जा रही है, अनुदानों को धारण किया जा रहा है। ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः ता न ऽऊजेर् दधातन। महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरंगमाम वो, यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः। -३६.१४-१६ विशेष आहुति अभिषेक के बाद अग्निस्थापना करके विधिवत् यज्ञ किया जाए। स्विष्टकृत के पूर्व सात विशेष आहुतियाँ दी जाएँ। भावना की जाए कि युग देवता एक विशाल यज्ञ चला रहे हैं। उस यज्ञ में समिधा, द्रव्य बनकर हम भी सम्मिलित हो रहे हैं, उनसे जुड़कर हमारा जीवन धन्य हो रहा है। ॐ ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा, ब्रह्मणा स्वरवो मिताः। अध्वयुर्ब्रर्ह्मणो जातो, ब्रह्मणोऽन्तहिर्तं हविः स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम। -अथवर्० १९.४२.१ प्रव्रज्या दिशा एवं प्रेरणा- परिव्राजक का काम है चलते रहना। रुके नहीं, लक्ष्य की ओर बराबर चलता रहे, एक सीमा में न बँधे, जन-जन तक अपने अपनत्व और पुरुषार्थ को फैलाए। जो परिव्राजक लोकमंगल के लिए संकीणर्ता के सीमा बन्धन तोड़कर गतिशील नहीं होता, सुख-सुविधा छोड़कर तपस्वी जीवन नहीं अपनाता, वह पाप का भागीदार होता है। क्रिया और भावना- यज्ञ की चार परिक्रमाएँ चरैवेति मन्त्रों के साथ करें। भावना करें कि हम सच्चे परिव्राजक बनकर गतिशीलों को मिलने वाले दिव्य अनुदानों के उपयुक्त सत्पात्र बन रहे हैं। १-ॐ नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, इति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन, इन्द्र इच्चरतः सखा। चरैवेति चरैवेति॥ २- पुष्पिण्यौ चरतो जंघे, भूष्णुरात्मा फलग्रहिः। शेरेऽस्य सवेर् पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः। चरैवेति चरैवेति॥ ३- आस्ते भग आसीनस्य, ऊध्वर्स्तिष्ठति तिष्ठतः। शेते निपद्यमानस्य, चराति चरतो भगः। चरैवेति चरैवेति॥ ४- कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन्। चरैवेति चरैवेति॥ ५- चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूयर्स्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन्। चरैवेति चरैवेति॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ७.१५) इसके बाद यज्ञ समापन पूणार्हुति आदि उपचार कराये जाएँ। अन्त में मन्त्रों के साथ पुष्प, अक्षत की वर्षा करें, शुभ कामना-आशीवार्द आदि दें। देखें हिन्दू धर्म संस्कार
धौलीयापाटा, कांडा तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के बागेश्वर जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा धौलीयापाटा, कांडा तहसील धौलीयापाटा, कांडा तहसील
बोयल, गंगोलीहाट तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के पिथोरागढ जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा बोयल, गंगोलीहाट तहसील बोयल, गंगोलीहाट तहसील
टीवीएन (tvN) (टेलीविजन नेटवर्क) एक दक्षिण कोरियाई राष्ट्रव्यापी पे-टेलीविजन नेटवर्क है जिसका स्वामित्व सीजे ईएनएम के मनोरंजन विभाग सीजे ईएंडएम के पास है। टीवीएन प्रोग्रामिंग में विभिन्न प्रकार की मनोरंजन सामग्री शामिल होती है, जो टेलीविजन श्रृंखला और विभिन्न प्रकार के शो में केंद्रित होती है। यह केबल पर, सैटेलाइट पर स्काईलाइफ के माध्यम से, और दक्षिण कोरिया में आईपीटीवी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। 2014 से, नेटवर्क का नेतृत्व री म्युंग-हान कर रहे हैं। 28 जून 2010 से 30 अप्रैल 2013 तक, कोरिया डीएमबी से एक चैनल किराए पर लेकर टीवीएन गो का प्रसारण किया गया था।Korea. सन्दर्भ टीवी चैनल दक्षिण कोरिया
प्रभात झा एक भारतीय राजनेता हैं जो भारत के वरिष्ठ सदन राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। सन्दर्भ Prabhatjha.com सांसद राज्यसभा जीवित लोग 1957 में जन्मे लोग
अंदाज़ 1949 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है। इसका निर्देशन और निर्माण महबूब ख़ान ने किया और नौशाद का संगीत है। इसमें प्रेम त्रिकोण में दिलीप कुमार, नर्गिस और राज कपूर हैं। गीत मजरुह सुल्तानपुरी द्वारा लिखें गए। अपने जारी होने के समय, अंदाज़ सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बनी थी, जब तक कि उसी साल राज कपूर की बरसात ने इसका रिकॉर्ड तोड़ दिया। संक्षेप नीना (नर्गिस) एक अमीर व्यापारी (मुराद) की बिगड़ैल बेटी है। एक दिन घुड़सवारी करते हुए, वह अपने घोड़े पर नियंत्रण खो देती है और दिलीप (दिलीप कुमार) नाम के एक युवक द्वारा उसे बचाया जाता है। दिलीप तुरंत उसे पसंद करने लगता है और अक्सर उसके घर जाने लगता है जहां वह नीना की मित्र शीला (कुक्कू) के साथ अपने गायन के साथ मनोरंजन करता है। नीना के पिता ने इसे नापसंद करते हैं; वह उसे यह महसूस कराने की कोशिश करते हैं कि दिलीप के साथ इतना समय बिताना बुद्धिमानी नहीं है, क्योंकि दिलीप उनकी दोस्ती को प्यार के रूप में गलत तरीके से देख सकता है। शीला की जन्मदिन की पार्टी के दिन, दिलीप को पता चलता है कि वह नीना के साथ प्यार में पड़ गया है और उसे ये बताने की कोशिश करता है। हालांकि, उसी दिन त्रासदी हो जाती है जब नीना के पिता दिल के दौरे से मर जाते हैं, जिससे नीना बर्बाद हो जाती है। दिलीप उसे सहानुभूति देता है और नीना उसे अपने पिता के व्यवसाय की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी और अपने घर में एक अतिरिक्त कमरे में रहने देती है। दिलीप ने नीना को उसकी भावनाओं के बारे में विश्वास दिलाने की कोशिश की, लेकिन जब उसका मंगेतर राजन (राज कपूर) लंदन से लौट आया तो वो चौंक गया। अंततः राजन और नीना शादी कर लेते हैं, और दिलीप भी शादी के दिन नीना के लिए अपनी असली भावनाओं को प्रकट करता है। दिलीप के रहस्योद्घाटन से नीना चौंक गई क्योंकि वह केवल उसे दोस्त के रूप में सोचती है। दिलीप जाने की कोशिश करता है, लेकिन राजन के किसी भी संदेह से बचने के लिए वहीं रहता है। कुछ साल बाद, राजन और नीना बेटी के माता-पिता बनते हैं। अपनी बेटी के जन्मदिन पर, दिलीप उपहार के साथ आता है। जब बिजली चली जाती है और उनके घर में अंधेरा हो जाता है। तब नीना गुप्त रूप से दिलीप को यह बताने की कोशिश करती है कि वह उससे प्यार नहीं करती है और उसे चले जाना चाहिए। वो इस बात से अनजान है कि उसने यह सब राजन से कहा है। राजन ने नीना पर दिलीप के साथ संबंध रखने का आरोप लगाया और दिलीप ने राजन की गलतफहमी को दूर करने की कोशिश की। वो उसे मनाने की कोशिश करता है कि वह नीना के बारे में गलत सोच रहा है। क्रोध में, राजन ने दिलीप पर हमला किया और उसे बेहोश कर दिया। वह घर छोड़ देता है और अपनी बेटी को अपने साथ ले जाता है। नीना दिलीप की सहायता के लिए आती है और डॉक्टर को उसे बचाने के लिए कहती है। जब दिलीप जागता है, तो वह आधा पागल होता है और नीना से छेड़छाड़ करने की कोशिश करता है। वो जोर देकर कहता है कि वह वास्तव में उससे प्यार करती है। नीना एक बंदूक उठाती है और दिलीप को मार देती है और फिर कैद की जाती है। राजन ने दिलीप के साथ नीना के संबंध के बारे में और उसने अपनी बेवफाई को छिपाने के लिए उसे कैसे मार दिया अदालत के समक्ष रखा। जबकि नीना न्यायाधीश के फैसले का इंतजार कर रही होती है, राजन अपनी बेटी को बताता है कि वह वापस नहीं आ रही है और उस गुड़िया को तोड़ देता है जिसे दिलीप ने उसे जन्मदिन पर दिया था। गुड़िया के अंदर उसे नीना के लिए लिखा गया एक पत्र मिलता है, जिसमें कहा गया कि राजन भाग्यशाली है जिसे वह प्यार करती है और उसने अब यह महसूस किया है। पत्र पढ़ने पर, राजन को पता चलता है कि वह नीना के बारे में गलत था और नीना केवल उससे प्यार करती थी। न्यायाधीश ने नीना को उम्रकैद की सजा सुनाई और राजन और उनकी बेटी उसे जेल ले जाने से पहले देखने आए। मुख्य कलाकार दिलीप कुमार — दिलीप राज कपूर — राजन नर्गिस — नीना कुक्कू — शीला मुराद — बद्रीप्रसाद संगीत सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ 1949 में बनी हिन्दी फ़िल्म नौशाद द्वारा संगीतबद्ध फिल्में
लेफ्टिनेंट जनरल अब्देल फतह अब्देल्रहमान बुरहान ( अरबी : عبد الفتاح عبد الرحمن البرهان ; जन्म 1960) सूडानी राजनीतिज्ञ और सूडानी सेना के जनरल हैं, जो वर्तमान में सूडान की संप्रभुता परिषद के अध्यक्ष के रूप में सेवारत हैं , जो देश का सामूहिक संक्रमणकालीन प्रमुख है। अगस्त 2019 में इस भूमिका संभालने से पहले, वह था वास्तविक सूडान के राज्य के सिर के अध्यक्ष के रूप संक्रमणकालीन सैन्य परिषद के बाद पूर्व अध्यक्ष अहमद अवाद इब्न Auf इस्तीफा दे दिया और अप्रैल 2019 में नियंत्रण हस्तांतरित 1960 में जन्मे लोग
२जी स्पेक्ट्रम मामला भारत का एक कथित घोटाला था जो सन् २०११ के आरम्भ में प्रकाश में आया था। दिसम्बर 2017 में CBI कोर्ट ने इस मुकद्दमे के सभी आरोपियों को रिहा कर दिया और कहा की ये ग़लत मुकद्दमा किया गया था। वास्तव में ये घोटाला हुआ ही नहीं था। परिचय केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों जिनको त्याग करना पड़ा उनमे सर्व श्री सुरेश कलमाड़ीजी जो कि कामनवेल्थ खेल में ७०,००० हजार करोड़ का खेल किये। दुसरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हद जिनको कारगिल शहीदों के लिए बने आवास में ही उलटफेर किया। तीसरे ए राजा। किसी भी विभाग या संगठन में कार्य का एक विशेष ढांचा निर्धारित होता है, टेलीकाम मंत्रालय इसका अपवाद हो गया है। विभाग ने सीएजी कि रिपोर्ट के अनुसार नियमो कि अनदेखी के साथ साथ अनेक उलटफेर किये। २००३ में मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत नीतियों के अनुसार वित्त मंत्रालय को स्पेक्ट्रम के आबंटन और मूल्य निर्धारण में शामिल किया जाना चाहिए। टेलीकाम मंत्रालय ने मंत्रिमंडल के इस फैसले को नजरंदाज तो किया ही आईटी, वाणिज्य मंत्रालयों सहित योजना आयोग के परामर्शो को कूड़ेदान में डाल दिया। प्रधानमंत्री के सुझावों को हवा कर दिया गया। यह मामला २००८ से चलता चला आ रहा है, जब ९ टेलीकाम कंपनियों ने पूरे भारत में आप्रेसन के लिए १६५८ करोड़ रूपये पर २जी मोबाईल सेवाओं के एयरवेज और लाईसेंस जारी किये थे। लगभग १२२ सर्कलों के लिए लाईसेंस जारी किये गए इतने सस्ते एयरवेज पर जिससे अरबों डालर का नुकसान देश को उठाना पड़ा। स्वान टेलीकाम ने १३ सर्कलों के लाईसेंस आवश्यक स्पेक्ट्रम ३४० मिलियन डालर में ख़रीदे किन्तु ४५ % स्टेक ९०० मिलियन डालर में अरब कि एक कंपनी अतिस्लास को बेच दिया। एक और आवेदक यूनिटेक लाईसेंस फीस ३६५ मिलियन डालर दिए और ६०% स्टेक पर १.३६ बिलियन डालर पर नार्वे कि एक कम्पनी तेल्नेतर को बेच दिया। इतना ही नहीं सीएजी ने पाया कि स्पेक्ट्रम आबंटन में ७०% से भी अधिक कंपनिया हैं जो ना तो पात्रता कि कसौटी पर खरी उतरती है ना ही टेलीकाम मंत्रालय के नियम व शर्ते पूरी करती है। रिपोर्ट के अनुसार यूनिटेक अर्थात युनिनार, स्वान याने अतिस्लत अलएंज जो बाद में अतिस्लत के साथ विलय कर लिया। इन सभी को लाईसेंस प्रदान करने के १२ महीने के अन्दर सभी महानगरो, नगरों और जिला केन्द्रों पर अपनी सेवाएँ शुरू कर देनी थी। जो इन्होंने नहीं किया, इस कारण ६७९ करोड़ के नुकसान को टेलीकाम विभाग ने वसूला ही नहीं। इस पूरे सौदेबाजी में देश के खजाने को १७६,००० हजार करोड़ कि हानि हुई। जब २००१ से अब तक २जी स्पेक्ट्रम कि कीमतों में २० गुना से भी अधिक कि बढ़ोत्तरी हुई है तो आखिर किस आधार पर इसे २००१ कि कीमतों पर नीलामी कि गई? देश के ईमानदार अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते रहे कि हमारे कमुनिकेसन मंत्री राजा ने किसी भी नियम का अतिक्रमण नही किया और भ्रष्ट मंत्री के दोष छिपाते रहे क्यों ? बाहरी कड़ियाँ स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच अब सीधे प्रधानमन्त्री तक २जी स्पेक्ट्रम घोटाला और साजिश Tehelka's January 2011 infographic explaining the scam CAG Performance Audit report on the issue of Licenses and allocation of spectrum इस घोटले में देश के अच्छे पत्रकार राजत रार्मा भी शमिल थे..... मनमोहन सिंह प्रशासन भारत में भ्रष्टाचार
नीड़ का निर्माण फिर हरिवंश राय बच्चन की एक प्रसिद्ध कृति है।ये पद्यखंड श्री हरिवंश राय ‘बच्चन’ के सतरंगिनी नामक काव्य से है | यह उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग है, जिसका प्रकाशन 1970 में हुआ। डॉ॰ हरिवंश राय बच्चन को इसके लिए प्रथम सरस्वती सम्मान दिया गया था। ‘मधुशाला’, ‘एकांत संगीत’, ‘आकुल अंतर’, ‘निशा निमंत्रण’, ‘सतरंगिनी’ इत्यादि इनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं | इनकी काव्य रचना ‘दो चट्टानों’ पर इन्हें साहित्य अकादमी की ओर से पुरस्कार प्रदान किया गया | सन् १९७६ में इन्हें पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया | उनकी आत्मकथा के चार खण्ड हैं- क्या भूलूं क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, तथा दशद्वार से सोपान तक हरिवंश राय बच्चन आत्मकथाएँ १९७० में प्रकाशित हिन्दी पुस्तकें सरस्वती सम्मान से सम्मानित कृति भुमिका इन्हें भी देखें क्या भूलूँ क्या याद करूँ बाहरी कड़ियाँ 'नीड़ का निर्माण फिर' की भूमिका (हरिवंशराय बच्चन द्वारा ) तथा प्रारम्भिक अंश
ऎंडपल्लि (कृष्णा) में भारत के आन्ध्रप्रदेश राज्य के अन्तर्गत के कृष्णा जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ आंध्र प्रदेश सरकार का आधिकारिक वेबसाइट आंध्र प्रदेश सरकार का पर्यटन विभाग NIC की वेबसाइट पर आंध्र प्रदेश पोर्टल आंध्र प्रदेश राज्य पुलिस की सरकारी वेबसाइट आन्ध्र प्रदेश कृष्णा जिला
सांता मारिया ला ब्लैंका का गिरजाघर (स्पेनिश में: Iglesia de Santa María la Blanca) मैड्रिड महानगरीय क्षेत्र, स्पेन के ऐतिहासिक केन्द्र में स्थित एक गिरजाघर है। यह चर्च एक मध्ययुगीन मस्जिद के स्थल पर है कि ऐसा लोगों का मानना है हालांकि कोई अवशेष इस्लामी अवधि से यहाँ नहीं पाए गए हैं। इमारत की मौजूदा सामग्री सोलहवीं सदी से पहले की होने का कोई सबूत नहीं है। गिरजाघर स्पेन की विरासत के रूप में सुरक्षित है। 1994 में इसे बिएन दे इंतेरेस कल्चरल की सूची में शामिल किया गया था। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Spain By Zoran Pavlovic, Reuel R. Hanks, Charles F. Gritzner Some Account of Gothic Architecture in SpainBy George Edmund Street Romanesque Churches of Spain: A Traveller's Guide Including the Earlier Churches of AD 600-1000 Giles de la Mare, 2010 - Architecture, Romanesque - 390 pages A Hand-Book for Travellers in Spain, and Readers at Home: Describing the ...By Richard Ford The Rough Guide to Spain स्पेन के गिरजाघर स्पेन के स्मारक
उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल () भारत के झारखण्ड राज्य के पांच प्रमंडलों में से एक है। इस प्रमंडल में निम्नलिखित जिले शामिल हैं: बोकारो, चतरा, धनबाद, गिरिडीह, हज़ारीबाग, कोडरमा और रामगढ़। यह पहले छोटानागपुर प्रमंडल का हिस्सा था। 2011 की जनगणना के अनुसार इसकी जनसंख्या 11,635,374 है। सन्दर्भ झारखण्ड झारखंड का भूगोल
सोडियम बाईकार्बोनेट एक कार्बनिक यौगिक है। इसे मीठा सोडा या 'खाने का सोडा' (बेकिंग सोडा) भी कहते हैं क्योंकि विभिन्न व्यंजनों को बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इसका अणुसूत्र NaHCO3 है। इसका आईयूपीएसी नाम 'सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट' है। सोडियम बाय कार्बोनेट भी कहते है। सोडियम बाई कार्बोनेट (NaHCO3) का उपयोग प्रतिअम्लों (अम्लीयता कम करने) के रूप मे, सोडायुक्त पेय पदार्थ के रूप मे, अग्निशामक के रूप मे किया जाता है। सोडियम बाई कार्बोनेट (NaHCO3) आसानी से कार्बन डाई आक्साइड उत्पन्न कर सकता है व कार्बन डाई आक्साइड गैस हवा से भारी होनेे के कारण आग तथा वायु के मध्य एक परत का निर्माण कर लेती है, जिससे आग का वायु से संपर्क टूट जाता है व आग बुझ जाती है। सोडियम बाई कार्बोनेट (NaHCO3) आसानी से कार्बन डाई आक्साइड उत्पन्न कर सकता है व कार्बन डाई आक्साइड गैस हवा से भारी होनेे के कारण आग तथा वायु के मध्य एक परत का निर्माण कर लेती है, जिससे आग का वायु से संपर्क टूट जाता है व आग बुझ जाती है। टिप्पणी : यदि प्रयोगशाला(Laboratory) आदि मे क्षार(Base) के कारण आग लगी हो वहाँ पर NaHCO3 का प्रयोग नही कर सकते है अन्यथा आग और प्रचण्ड(भीषण) रूप ले सकती है। वहाँँ हम अग्निशामक के रूप मे पायरीन (CCl4) का प्रयोग करते है। सन्दर्भ इन्हें भी देखें सोडियम कार्बोनेट (धावन सोडा) बाहरी कड़ियाँ मीठे सोडे के 61 उपयोग (अंग्रेजी में) अकार्बनिक यौगिक सोडियम यौगिक
परासिया (Parasia), जिसका पुराना नाम डोंगर परासिया (Dongar Parasia) था, भारत के मध्य प्रदेश राज्य के छिंदवाड़ा ज़िले में स्थित एक नगर है। इन्हें भी देखें छिंदवाड़ा ज़िला संदर्भ मध्य प्रदेश के शहर छिंदवाड़ा जिला छिंदवाड़ा ज़िले के नगर
लाँगफ़र्ड (अंग्रेज़ी: Longford) एक पश्चिम लंदन में हिलिंगडन बरो का जिला है।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, सिक्किम, जो कि आम तौर पर संदर्भित करने के लिए एनआईटी सिक्किम या एनआईटी एसकेएम के रूप में जाना जाता है, रावंगला शहर के पास सिक्किम, भारत में  स्थित एक सार्वजनिक अभियांत्रिकी संस्थान है। यह भारत के ३१ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक है और भारत सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्थान के रूप में घोषित किया गया है है।यह एक स्वायत्त संस्थान है और मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार तत्वावधान में कार्य करती है। इतिहास राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, सिक्किम २००९ कि  ११वीं पंचवर्षीय योजना के तहत भारत सरकार द्वारा स्वीकृत दस नव राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में से एक है। आईटी सिक्किम में अगस्त २०१० से कामकाज शुरू कर दिया है। परिसर वर्तमान में यह दक्षिण सिक्किम के रावंगला उप डिवीजन के बरफंग ब्लॉक में अपने अस्थायी परिसर में संचालित किया जा रहा है। यह संभावना है कि संसथान, पकयोंग, सिक्किम में अपने स्थायी परिसर के तैयार होने तक अपनी गतिविधियों को रावंगला परिसर में जारी रखेगा। उपलब्ध पाठ्यक्रम  सभी पाठ्यक्रम और परीक्षाएं केवल अंग्रेजी भाषा में आयोजित की जाती हैं। एनआईटी सिक्किम, अभियांत्रिकी के विभिन्न क्षेत्रों में ४-वर्षीय प्रौद्योगिकी स्नातक (बी. टेक) कार्यक्रम,  २- वर्षीय प्रोद्योगिकी स्नातकोत्तर (एम. टेक) कार्यक्रम और पीएचडी कार्यक्रम प्रदान करता है। स्नातक कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए चयन जेईई (मुख्य) के माध्यम से किया जाता है. स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए चयन गेट (एम.टेक) के माध्यम से कर रहे हैं। विभाग शैक्षणिक विभागों में निम्नलिखित शामिल हैं: अभियांत्रिकी जैव प्रौद्योगिकी विभाग सिविल अभियांत्रिकी विभाग  कंप्यूटर विज्ञान और अभियांत्रिकी विभाग इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स अभियांत्रिकी विभाग इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार अभियांत्रिकी विभाग यांत्रिक अभियांत्रिकी विभाग विज्ञान रसायन विज्ञान विभाग भौतिकी विभाग गणित विभाग संबद्ध विभाग मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग छात्र गतिविधियाँ पाठ्येतर गतिविधियों में एक नवीनता सेल, समुदाय विकास समाज (Aayas), यांत्रिकी अभियंता समाज (Yantrikaa), नृत्य क्लब (Illusion) और फोटोग्राफी क्लब शामिल हैं। एनआईटी सिक्किम छात्रों का एक वार्षिक प्रौद्योगिकी महोत्सव (उत्सव)  Abhiyantran और तीन दिन की सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव UGDAM आयोजित करता है। इन्हें भी देखें राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान मानव संसाधन विकास मंत्रालय सिक्किम सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ  आधिकारिक वेबसाइट
कृपा शंकर,भारत के उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 293 - हरैया (पूर्व)-बस्‍ती (पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया। सन्दर्भ उत्तर प्रदेश की प्रथम विधान सभा के सदस्य 293 - हरैया (पूर्व)-बस्‍ती (पश्चिम) के विधायक बस्‍ती के विधायक कांग्रेस के विधायक
हवेली सोदनपल्लॆ (अनंतपुर) में भारत के आन्ध्रप्रदेश राज्य के अन्तर्गत के अनंतपुर जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ आंध्र प्रदेश सरकार का आधिकारिक वेबसाइट आंध्र प्रदेश सरकार का पर्यटन विभाग NIC की वेबसाइट पर आंध्र प्रदेश पोर्टल आंध्र प्रदेश राज्य पुलिस की सरकारी वेबसाइट आन्ध्र प्रदेश अनंतपुर जिला
1701 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। घटनाएँ जनवरी-मार्च अप्रैल-जून = जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसम्बर अज्ञात तारीख़ की घटनाएँ जन्म जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसम्बर निधन जनवरी-मार्च अप्रैल-जून जुलाई-सितंबर अक्टूबर-दिसम्बर १७०१ १७०१
कुनैन (, ) एक प्राकृतिक श्वेत क्रिस्टलाइन एल्कलॉएड पदार्थ होता है, जिसमें ज्वर-रोधी, मलेरिया-रोधी, दर्दनाशक (एनल्जेसिक), सूजन रोधी गुण होते हैं। ये क्वाइनिडाइन का स्टीरियो समावयव होता है, जो क्विनाइन से अलग एंटिएर्हाइमिक होता है। ये दक्षिण अमेरिकी पेड़ सिनकोना पौधै की छाल से प्राप्त होता है। इससे क्यूनीन नामक मलेरिया बुखार की दवा के निर्माण में किया जाता है। इसके अलावा भी कुछ अन्य दवाओं के निर्माण में इसका प्रयोग होता है। इसे टॉनिक वाटर में भी मिलाया जाता है और अन्य पेय पदार्थों में मिलाया जाता है। यूरोप में सोलहवीं शताब्दी में इसका सबसे पहले प्रयोग किया गया था। ईसाई मिशन से जुड़े कुछ लोग इसे दक्षिण अमेरिका से लेकर आए थे। पहले-पहल उन्होंने पाया कि यह मलेरिया के इलाज में कारगर होता है, किन्तु बाद में यह ज्ञात होने पर कि यह कुछ अन्य रोगों के उपचा में भी काम आ सकती है, उन्होंने इसे बड़े पैमाने पर दक्षिण अमेरिका से लाना शुरू कर दिया। १९३० तक कुनैन मलेरिया की रोकथाम के लिए एकमात्र कारगर औषधि थी, बाद में एंटी मलेरिया टीके का प्रयोग भी इससे निपटने के लिए किया जाने लगा। मूल शुद्ध रूप में कुनैन एक सफेद रंग का क्रिस्टल युक्त पाउडर होता है, जिसका स्वाद कड़वा होता है। ये कड़वा स्वाद ही इसकी पहचान बन चुका है। कुनैन पराबैंगनी प्रकाश संवेदी होती है, व सूर्य के प्रकाश से सीधे संपर्क में फ़्लुओरेज़ हो जाती है। ऐसा इसकी उच्चस्तरीय कॉन्जुगेटेड रेसोनॅन्स संरचना के कारण होता है। रासायनिक संरचना कुनैन में दो प्रधान फ्यूज़्ड-रिंग होते हैं: एक ऍरोमैटिक क्वीनोलिन और दूसरा द्विचक्रीय क्वीन्यूक्लिडाइन। पी. फ़ैल्सिपैरम के विरुद्ध प्रक्रिया अन्य क्वीनोलिन मलेरिया-रोधी औषधियों के संग क्विनाइन की क्रिया के भांति ही इसकी क्रिया का भी अभी तक पूर्ण ज्ञान नहीं हो पाया है। कुनैन का सर्वाधिक प्रचलित एवं मान्य हाइपोथीसिस इसके निकट संबंधी और पूर्ण अध्ययन किये गए क्विनोलिन ड्रग क्लोरोक्वीन पर आधारित है। इस प्रतिरूप में हीमोज़ोइन बायोक्रिस्टलाइज़ेशन का इन्हिबिशन शामिल है, जिसमें साइटोटॉक्सिक हीमि का एग्रीगेशन सम्मिलित होता है। मुक्त साइटोटॉक्सिक हीमि परजीवियों के शरीर में एकत्रित होता जाता है, जो उनकी मृत्यु का कारण बन जाता है। प्रयोग इसे टॉनिक वाटर में मिलाने के कारण एक समय ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले कई लोगों की मृत्यु हो गई थी, जहां इसे रोग-निरोधी के रूप में प्रयोग के लिए ले जाया गया था। इस टॉनिक वाटर को एंटी मलेरिया औषधि के रूप में विकसित किया गया, लेकिन बाद में लोगों ने इसे मदिया में मिलाना शुरू कर दिया क्योंकि इससे उन्हें शराब का स्वाद बेहतर लगने लगता था। अमरीका के एफ़डीए द्वारा कुनैन को संदिग्ध औषधि रूप में निषेध कर दिया गया है। आज के टॉनिक वाटर में पर्याप्त मात्र में कुनैन नहीं मिलाई जाती, जिस कारण यह मलेरिया के लिए रोगनिरोधक के तौर पर प्रयोग नहीं होती। कुनैन को बाजार से गोली या फिर तरल रूप में खरीदा जा सकता है। इसका प्रयोग हड्डियों के मरोड़ में भी किया जाता है। प्रसव (बच्चे के जन्म) के दौरान गर्भाशय में संकुचन के लिए भी किया जाता है। इसीलिए गर्भवती महिलाओं को कुनैन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कृत्रिम कुनैन सिन्कोना के पेड़ अभी तक कुनैन के एकमात्र वाणिज्यिक, मितव्ययी व व्यवहारिक स्रोत हैं। वैसे युद्धों के समय आवश्यकता के दबाव में इसके कृत्रिम उत्पादन के प्रयास भी किये गए थे। इसके लिये एक औपचारिक रासायनिक संश्लेषण को १९४४ में अमरीकी रासायनज्ञ [[रॉबर्ट बर्न्स वुडवर्डएवं डब्लु ई डोरिंग द्वारा मूर्त रूप दिया गया था। तबसे कई अधिक दक्ष क्विनाइन टोटल सिंथेसिस तरीके प्राप्त कर लिये गए हैं। किन्तु इन सभी में से प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त एल्केलॉएड के आइसोलेशन की प्रक्रिया सबसे सस्ता है। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ कुनैन पर डाटाबेस संचिका रेनट्री.कॉम पर कैटालिटिक एसिमिट्रिक सिंथिसिस ऑफ क्विनाइन एण्ड क्विनिडाइन जीव विज्ञान मलेरिया हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना
पश्चिमी यमुना नहर (Western Yamuna Canal) भारत की यमुना नदी से निकाली जाने वाली एक नहर है। इसका निर्माण सन् 1335 में हुआ था, लेकिन 1750 तक इसमें हुए अवसादन से इसमें पानी बहना बन्द हो गया। 1817 में ब्रिटिश राज काल में इसमें खुदाई से जलप्रवाह फिर बहाल करा गया और बहाव की मात्रा नियंत्रित करने के लिए इसपर 1832-33 में ताजेवाला बराज (बाँध) बनाया गया। 1875-76 में दादुपुर में पथराला बराज और यमुना की एक उपनदी, सोम्ब नदी, पर बाँध बनाया गया। 1889-95 में नहर की सिरसा शाखा बनाई गई, जो इसकी सबसे बड़ी शाखा है। समय के साथ ताजेवाला बराज पर भी अवसादन हो गया और 1999 में हथिनीकुंड बराज बनाया गया। आधुनिक काल में इस नहर की अपनी शाखाओ सहित कुल लम्बाई 3,226 किलोमीटर है। इसके द्वारा अंबाला, करनाल, सोनीपत, रोहतक, हिसार और सिरसा जिलों तथा दिल्ली और राजस्थान के कुछ भागों की लगभग 5 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई की जाती है। इन्हें भी देखें यमुना नदी हथिनीकुंड बराज ताजेवाला बराज पथराला बराज यमुनानगर ज़िला सन्दर्भ हरियाणा में नहरें हरियाणा में सिंचाई यमुना नदी यमुनानगर ज़िला
गोपाल कृष्ण गोखले (9 मई 1866 – 19 फरवरी 1915) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक थे। महादेव गोविन्द रानडे के शिष्य गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ और उस पर अधिकारपूर्वक बहस करने की क्षमता से उन्हें भारत का 'ग्लेडस्टोन' कहा जाता है। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सबसे प्रसिद्ध नरमपंथी थे। चरित्र निर्माण की आवश्यकता से पूर्णतः सहमत होकर उन्होंने 1905 में सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की ताकि नौजवानों को सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। उनका मानना था कि वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। स्व-सरकार व्यक्ति की औसत चारित्रिक दृढ़ता और व्यक्तियों की क्षमता पर निर्भर करती है। महात्मा गांधी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। परिचय गोपालकृष्ण गोखले का जन्म रत्‍‌नागिरी कोटलुक ग्राम में एक सामान्य परिवार में कृष्णराव के घर 9 मई 1866 को हुआ। पिता के असामयिक निधन ने गोपालकृष्ण को बचपन से ही सहिष्णु और कर्मठ बना दिया था। देश की पराधीनता गोपालकृष्ण को कचोटती रहती। राष्ट्रभक्ति की अजस्र धारा का प्रवाह उनके अंतर्मन में सदैव बहता रहता। इसी कारण वे सच्ची लगन, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता की त्रिधारा के वशीभूत होकर कार्य करते और देश की पराधीनता से मुक्ति के प्रयत्न में लगे रहते। न्यू इंग्लिश स्कूल पुणे में अध्यापन करते हुए गोखले जी बालगंगाधर तिलक के संपर्क में आए। 1886 में वह फर्ग्यूसन कालेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक के रूप में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी में सम्मिलित हुए। वह श्री एम.जी. रानाडे के प्रभाव में आए। सार्वजनिक सभा पूना के सचिव बने। 1890 में कांग्रेस में उपस्थित हुए। 1896 में वेल्बी कमीशन के समज्ञा गवाही देने के लिए वह इंग्लैण्ड गए। वह 1899 में बम्बई विधान सभा के लिए और 1902 में इम्पीरियल विधान परिषद के निर्वाचित किए गए। वह अफ्रीका गए और वहां गांधी जी से मिले। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की भारतीय समस्या में विशेष दिलचस्पी ली। अपने चरित्र की सरलता, बौद्धिक क्षमता और देश के प्रति दीर्घकालीन स्वार्थहीन सेवा के लिए उन्हें सदा सदा स्मरण किया जाएगा। वह भारत लोक सेवा समाज के संस्थापक और अध्यक्ष थे। उदारवादी विचारधारा के वह अग्रणी प्रवक्ता थे। 1915 में उनका स्वर्गवास हो गया। अफ्रीका से लौटने पर महात्मा गांधी भी सक्रिय राजनीति में आ गए और गोपालकृष्ण गोखले के निर्देशन में 'सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी' की स्थापना की, जिसमें सम्मिलित होकर लोग देश-सेवा कर सकें। परन्तु इस सोसाइटी की सदस्यता के लिए गोखले जी एक-एक सदस्य की कड़ी परीक्षा लेकर सदस्यता प्रदान करते थे। इसी सदस्यता से संबंधित एक घटना है - मुंबई म्युनिस्पैलिटी में एक इंजीनियर थे अमृत लाल वी. ठक्कर। वे चाहते थे कि गोखले जी की सोसाइटी में सम्मिलित होकर राष्ट्र-सेवा से उऋण हो सकें। उन्होंने स्वयं गोखले जी से न मिलकर देव जी से प्रार्थना-पत्र सोसाइटी में सम्मिलित होने के लिए लिखवाया। अमृतलाल जी चाहते थे कि गोखले जी सोसाइटी में सम्मिलित करने की स्वीकृति दें तो मुंबई म्युनिस्पैलिटी से इस्तीफा दे दिया जाए, पर गोखले जी ने दो घोड़ों पर सवार होना स्वीकार न कर स्पष्ट कहा कि यदि सोसाइटी की सदस्यता चाहिए तो पहले मुंबई म्युनिस्पैलिटी से इस्तीफा दें। गोखले की स्पष्ट और दृढ़ भावना के आगे इंजीनियर अमृतलाल वी. ठक्कर को त्याग-पत्र देने के उपरांत ही सोसाइटी की सदस्यता प्रदान की गई। यही इंजीनियर महोदय गोखले जी की दृढ़ नीति-निर्धारण के कारण राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत सेवा-क्षेत्र में भारत विश्रुत 'ठक्कर बापा' के नाम से जाने जाते हैं। गोखले जी 1905 में आजादी के पक्ष में अंग्रेजों के समक्ष लाला लाजपतराय के साथ इंग्लैंड गए और अत्यन्त प्रभावी ढंग से देश की स्वतंत्रता की वहां बात रखी। 19 फ़रवरी 1915 को गोपालकृष्ण गोखले इस संसार से सदा-सदा के लिए विदा हो गए। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष 1866 में जन्मे लोग १९१५ में निधन
जठरांत्र शोथ (गैस्ट्रोएन्टराइटिस) एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसे जठरांत्र संबंधी मार्ग ("-इटिस") की सूजन द्वारा पहचाना जाता है जिसमें पेट ("गैस्ट्रो"-) तथा छोटी आंत ("इन्टरो"-) दोनो शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप कुछ लोगों को दस्त, उल्टी तथा पेट में दर्द और ऐंठन की सामूहिक समस्या होती है। जठरांत्र शोथ को आंत्रशोथ, स्टमक बग तथा पेट के वायरस के रूप में भी संदर्भित किया जाता है। हलांकि यह इन्फ्लूएंजा से संबंधित नहीं है फिर भी इसे पेट का फ्लू और गैस्ट्रिक फ्लू भी कहा जाता है। वैश्विक स्तर पर, बच्चों में ज्यादातर मामलों में रोटावायरस ही इसका मुख्य कारण हैं। वयस्कों में नोरोवायरस और कंपाइलोबैक्टर अधिक आम है। कम आम कारणों में अन्य बैक्टीरिया (या उनके जहर) और परजीवी शामिल हैं। इसका संचारण अनुचित तरीके से तैयार खाद्य पदार्थों या दूषित पानी की खपत या संक्रामक व्यक्तियों के साथ निकट संपर्क के कारण से हो सकता है। प्रबंधन का आधार पर्याप्त जलयोजन है। हल्के या मध्यम मामलों के लिए, इसे आम तौर पर मौखिक पुनर्जलीकरण घोल के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। अधिक गंभीर मामलों के लिए, नसों के माध्यम से दिये जाने वाले तरल पदार्थ की जरूरत हो सकती है। जठरांत्र शोथ प्राथमिक रूप से बच्चों और विकासशील दुनिया के लोगों को प्रभावित करता है। लक्षण एवं संकेत जठरांत्र शोथ में आम तौर पर दस्त और उल्टी दोनों शामिल हैं, या कम आमतौर पर इसमे केवल एक या दूसरा शामिल होता है। पेट में ऐंठन भी मौजूद हो सकती है। संकेत और लक्षण आमतौर पर संक्रामक एजेंट से संपर्क के 12-72 घंटे बाद आरंभ होते हैं। यदि यह एक वायरल एजेंट के कारण हुआ हो तो स्थिति आमतौर पर एक सप्ताह के भीतर ठीक हो जाती है। कुछ वायरल स्थितियां बुखार, थकान, सिरदर्द, और मांसपेशियों में दर्द के साथ जुड़ी हो सकती हैं। यदि मल खूनी है, तो इसके वायरस जनित होने की संभावना कम है और बैक्टीरिया जनित होने की संभावना अधिक है। कुछ बैक्टीरिया संक्रमण गंभीर पेट दर्द के साथ संबद्ध किये जा सकते है और कई हफ्तों तक बने रह सकते हैं। रोटावायरस से संक्रमित बच्चे आमतौर पर तीन से आठ दिनों के भीतर पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं। हालांकि, गरीब देशों में गंभीर संक्रमण के लिए उपचार अक्सर पहुँच से बाहर होता है और लगातार दस्त आम स्थिति है। निर्जलीकरण, दस्त की एक आम समस्या है, और निर्जलीकरण की काफी महत्वपूर्ण मात्रा वाले बच्चे को लंबे समय तक केशिका फिर से भरना, खराब त्वचा खिचाव और असामान्य साँस की समस्या हो सकती है। खराब स्वच्छता वाले क्षेत्रों में संक्रमणों का फिर से होना आमतौर पर देखा जाता है और परिणास्वरूप कुपोषण, अवरुद्ध विकास तथा लंबी अवधि का संज्ञानात्मक विलंब हो सकता है। कंपाइलोबैक्टर प्रजातियों के साथ संक्रमण के बाद 1% लोगों में प्रतिक्रियाशील गठिया हो जाता है और 0.1% लोगों मेंगुलियन-बैरे सिंड्रोम हो जाता है। एस्केरेशिया कॉलि का निर्माण करने वाले शिगा टॉक्सिन या शिगेला प्रजातियों के साथ संक्रमण के परिणामस्वरूप रक्तलायी (हीमोलिटिक) यूरेमिक सिंड्रोम (HUS) हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप निम्न प्लेटलेट संख्या, खराब गुर्दा गतिविधि तथा निम्न रक्त कोशिका संख्या (उनमें टूटन के फलस्वरूप) की समस्या हो सकती है। HUS होने की संभावना के मामले में, वयस्कों की तुलना में बच्चे अधिक संवेदनशील होते हैं। कुछ वायरल संक्रमण मामूली शिशु दौरे भी पैदा कर सकते हैं। कारण वायरस (विशेष रूप से रोटावायरस) और बैक्टीरिया एस्केरेशिया कॉलि और कंपाइलोबैक्टर प्रजातियां जठरांत्र शोथ का प्राथमिक कारण हैं। हलांकि, कई अन्य संक्रामक एजेंट भी इस रोग का कारण बन सकते हैं। कुछ अवसरों पर गैर संक्रामक कारणों को भी देखा गया है लेकिन उनके होने की संभावना वायरल या बैक्टीरियल एटियॉलॉजि से कम है। प्रतिरक्षा की कमी और अपेक्षाकृत खराब स्वच्छता के कारण बच्चों में संक्रमण का जोखिम अधिक होता है। विषाणुजनित (वायरल) वे वायरस जो जठरांत्र शोथ के होने के कारणों में शामिल हैं उनको रोटावायरस, नोरोवायरस, एडेनोवायरस और एस्ट्रोवायरस कहा जाता हैं। रोटावायरस बच्चों में जठरांत्र शोथ का सबसे आम कारण है, और विकसित तथा विकासशील दुनिया, दोनों में समान प्रकार की दर से इसको पैदा करता है। बाल उम्र समूह में संक्रामक दस्त के मामलों का 70% कारण वायरस है। सक्रिय रोगक्षमता के कारण वयस्कों में रोटावायरस, कम आम कारण है। अमरीका में वयस्कों के बीच जठरांत्र शोथ का प्रमुख कारण नोरोवायरस है, जिसका प्रकोप 90% से अधिक मामलों में हो सकता है। ये सभी स्थानीयकृत महामारियां आम तौर पर तब होती हैं जब लोगों के समूह, एक दूसरे के करीब शारीरिक निकटता में समय बिताते हैं, जैसे कि क्रूज जहाज पर, अस्पतालों में, या रेस्तरां में। दस्त के समाप्त होने के बाद भी लोग संक्रामक रह सकते हैं। नोरोवायरस, बच्चों में लगभग 10% मामलों का कारण होता है। जीवाण्विक (बैक्टीरियल) विकसित दुनिया में कंपाइलोबैक्टर जेजुनि बैक्टीरियल जठरांत्र शोथ का प्राथमिक कारण है जिसमें से आधे मामले पोल्ट्री से जुड़े हुये हैं। बच्चों में,15% मामले बैक्टीरिया के कारण होते हैं, जिसमें सबसे आम प्रकार एस्केरेशिया कॉलि, साल्मोनेला, शिगेला और कंपाइलोबैक्टर प्रजातियाँ हैं। यदि भोजन, बैक्टीरिया से संदूषित हो जाय और कई घंटे तक कमरे के तापमान पर रहे तो जीवाणु बढ़ते हैं तथा इस भोजन का उपभोग करने वालों में संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं। कुछ खाद्य जो आमतौर पर बीमारी से संबंधित हैं उनमें कच्चा या कम पका मांस, पोल्ट्री, समुद्री भोजन तथा अंडे, गैर पास्चरीकृत दूध तथा नरम चीज़ फल व सब्जी के रस शामिल हैं। विकासशील दुनिया में, विशेष रूप से उप-सहारा अफ्रीका और एशिया में हैजा, जठरांत्र शोथ का एक आम कारण है। यह संक्रमण आम तौर पर दूषित पानी या भोजन के द्वारा फैलता है। जहर पैदा करने वाला क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल दस्त का एक महत्वपूर्ण कारण है जो कि बुजुर्गों में अधिक होता है। शिशु, इन बैक्टीरिया का संवहन, विकासशील लक्षणों के बिना, कर सकते हैं। यह उन उन लोगों में दस्त का आम कारण है जो अस्पताल में भर्ती होते हैं और एंटीबायोटिक के उपयोग के साथ अक्सर जुड़ा हुआ है। उनको स्टैफलोकॉकस ऑरीस संक्रामक दस्त भी हो सकता है जिन्होनें एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया है। "ट्रैवेलर्स डायरिया" आमतौर पर जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न जठरांत्र शोथ का एक प्रकार है। एसिड का दमन करने वाली दवा, कई जीवों से प्रभावित होने के बाद महत्वपूर्ण जोखिम को बढ़ाती हुई प्रतीत होती है, इन जीवों में क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल, सेल्मोनेला और कंपाइलोबैक्टर प्रजातियां शामिल हैं। यह जोखिम H2 एंटागोनिस्ट के साथ वालों से प्रोटॉन पंप इनहिबटर्स में अधिक है। परजीवीय कई सारे एक कोशीय जीव, जठरांत्र शोथ का कारण बन सकते हैं - सबसे आमतौर पर जियार्डिया लैम्बलिया - लेकिन एन्टामोएबा हिस्टोलिटिका तथा क्रिप्टोस्पोरिडियम प्रजातियों को भी शामिल पाया गया है। एक समूह के रूप में, ये एजेंट के 10% बच्चों के मामलों में शामिल होते हैं। जियार्डिया सामान्यतः विकासशील दुनिया में होता है, लेकिन यह इटियॉलॉजिक एजेंट इस तरह की बीमारी कुछ हद तक हर जगह पैदा करता है। यह उन लोगों में अधिक आम तौर पर होता है जो इसके अधिक होने वाली जगहों पर यात्रा करते हैं, बच्चे जो डे-केयर में शामिल होते हैं, पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते हैं और आपदाओं के बाद। प्रसारण (प्रसार) इसका प्रसार दूषित पानी की खपत से या व्यक्तिगत वस्तुओं को आपस में साझा करने हो सकता है। नम और शुष्क मौसमों वाले स्थानों में, पानी की गुणवत्ता आम तौर पर नम मौसम के दौरान बिगड़ जाती है और यह प्रकोपों के समय के साथ संबद्ध है। ऐसे मौसम वाले दुनिया के क्षेत्रों में संक्रमण, सर्दियों में आम हैं। अनुचित तरीके से साफ की गयी बोतलों के साथ बच्चों को दूध पिलाना वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण कारण है। विशेष रूप से बच्चों में, भीड़ भरे घरों में, और पहले से मौजूद खराब पोषण की स्थिति वाले लोगों में प्रसार दर, खराब स्वच्छता से भी संबंधित है। सहनशक्ति विकसित करने के बाद, संकेतों या लक्षणों के प्रदर्शन के बिना वयस्क कुछ ऐसे जीवों के वाहक हो सकते हैं और छूत के प्राकृतिक कुण्ड की तरह काम कर सकते हैं। जबकि कुछ एजेंट (जैसे शिंगेला के रूप में) केवल नर वानरों में पाए जाते हैं जबकि दूसरे, जानवरों की एक विस्तृत विविधता (जैसे जियार्डिया के रूप में) में हो सकते हैं। गैर संक्रामक जठरांत्र संबंधी मार्ग की सूजन के कई सारे गैर संक्रामक कारण हैं। कुछ अधिक आम कारणों में शामिल हैं दवाएं (जैसे NSAIDs), कुछ खाद्य पदार्थ जैसे लैक्टोज़ (जो लोग इसके प्रति असिहष्णु हैं उनमें) और ग्लूटेन (सीलिएक रोग से पीड़ितों में)। क्रोहन का रोग भी जठरांत्र शोथ (अक्सर गंभीर) का गैर- संक्रमण स्रोत है। ऐसे रोग जो विषों का परिणाम हो वे भी हो सकती हैं। मतली, उल्टी और दस्त से संबंधित कुछ खाद्य स्थितियों में शामिल हैं: दूषित शिकारी मछली की खपत के कारण सिग्वाटेरा विषाक्तता, कुछ प्रकार की खराब मछलियों की खपत से जुड़ी स्कॉमब्रॉएड, कई अन्य साथ पफर मछली की खपत से टेट्रोडॉक्सिन विषाक्तता तथा आम तौर पर अनुचित तरीके से संरक्षित भोजन के कारण बॉटुलिस्म। पैथोफिज़ियोलॉजी (रोग के कारण पैदा हुए क्रियात्मक परिवर्तन) जठरांत्र शोथ को छोटी या बड़ी आंत के संक्रमण के कारण से उल्टी या दस्त के रूप में परिभाषित किया जाता है। छोटी आंत में परिवर्तन आम तौर सूजन रहित होते हैं जबकि बड़ी आंत में सूजन के साथ परिवर्तन होते हैं। एक संक्रमण के लिये आवश्यक रोगजनकों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है जो कम से कम एक (क्रिप्टोस्पोरिडियम के लिये) से लेकर 10 8 (विब्रियो कॉलरा के लिए) हो सकते हैं। रोग के लक्षण जठरांत्र शोथ आमतौर पर चिकित्सीय रूप से पहचाना जाता है, जो कि किसी व्यक्ति के लक्षणों और चिह्नों पर आधारित होता है। सटीक कारण के निर्धारण की आम तौर पर जरूरत नहीं होती है क्योंकि यह हालात के प्रबंधन में परिवर्तन नहीं करता नहीं है। हालांकि, उन लोगो पर मल कल्चर परीक्षण किया जाना चाहिये जिनके मल में रक्त आ रहा हो, जो खाद्य विषाक्तता के शिकार हुये हों तथा जो हाल ही में विकासशील दुनिया की यात्रा कर के आये हों। नैदानिक परीक्षण, निगरानी के लिए भी किया जा सकता है। जैसे रक्त में शर्करा की कमी लगभग 10% शिशुओं और युवा बच्चों में होती है, इस आबादी में सीरम ग्लूकोज को मापने की सिफारिश की जाती है। जहाँ पर गंभीर निर्जलीकरण चिंता का विषय है वहाँ पर इलेक्ट्रोलाइट्स और गुर्दे की क्रिया की जाँच की जानी चाहिए। निर्जलीकरण किसी व्यक्ति को निर्जलीकरण है या नहीं इसका निर्धारण, मूल्यांकन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। निर्जलीकरण को आम तौर पर हल्के (3-5%), मध्यम (6-9%) और गंभीर मामलों (≥ 10%) में विभाजित किया गया है। बच्चों में, मध्यम या गंभीर निर्जलीकरण के सबसे सटीक संकेत विलंबित केशिका पुर्नभरण, खराब त्वचा खिचाव और असामान्य श्वसन हैं। अन्य उपयोगी निष्कर्षों (जब संयोजन में उपयोग किये जायें) में धंसी हुयी आँखें, कम गतिविधि, आँसू की कमी है और मुँह की शुष्कता शामिल हैं। सामान्य मूत्र उत्पादन और मौखिक तरल पदार्थ का सेवन आश्वस्त करता है। प्रयोगशाला परीक्षण, निर्जलीकरण के स्तर का निर्धारण करने में चिकित्सीय रूप से लाभप्रद है। विभेदक रोगनिदान जठरांत्र शोथ में दिखने वाले संकेतों और लक्षणों के समान दिखने वाले लक्षणों के अन्य कारण जिनको अलग करने की आवश्यकता है उनमें उण्डुक-शोथ (अपेंडिसाइटिस), आंत में असामान्य घुमाव के कारण रुकावट (वॉल्वलस), सूजन वाला आंत्र रोग, मूत्र पथ के संक्रमण तथा मधुमेह शामिल हैं। अग्नाशयी कमी, लघु आंत्र सिंड्रोम, व्हिपिल्स रोग, कोलिएक रोग और रेचक समस्या पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये। यदि व्यक्ति केवल उल्टी या दस्त (किसी एक से) से पीड़ित हो तो विभेदक निदान कुछ जटिल हो सकता है। 33% मामलों में उण्डुक-शोथ (अपेंडिसाइटिस) उल्टी, पेट दर्द और हल्के दस्त के साथ उपस्थित हो सकता है। यह हल्का दस्त जठरांत्र शोथ के कारण होने वाले दस्त की तीव्रता के वितरीत है। बच्चों में मूत्र पथ या फेफड़ों के संक्रमण भी उल्टी या दस्त का कारण हो सकते हैं। क्लासिकल मधुमेह केटोएसिडोसिस (DKA) में पेट का दर्द, मतली और उल्टी होती है लेकिन दस्त नहीं होता है। एक अध्ययन में पाया है कि DKA से पीड़ित बच्चों में से 17% में शुरू में जठरांत्रशोथ का निदान किया गया गया। रोकथाम जीवनशैली संक्रमण की दरों और चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण जठरांत्र शोथ को कम करने के लिए आसानी से सुलभ शुद्ध पानी की आपूर्ति और अच्छी स्वच्छता आदतें महत्वपूर्ण हैं। विकासशील और विकसित दुनिया दोनो में, व्यक्तिगत उपायों (जैसे हाथ धोना) को जठरांत्र शोथ की घटनाओं और प्रसार की दर में 30% तक की कमी करते देखा गया है। एल्कोहल-आधारित जैल भी प्रभावी हो सकता है। विशेष रूप से, खराब स्वच्छता वाले स्थानों में, आम तौर पर स्वच्छता के सुधार के रूप में स्तनपान महत्वपूर्ण पाया गया है। स्तनपान से प्राप्त दूध संक्रमणों की आवृत्ति और उनकी अवधि दोनों को कम कर देता है। दूषित भोजन या पेय से बचना भी प्रभावी होना चाहिए। टीकाकरण इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा, दोनों कारणों से, 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बात की सिफारिश की है कि रोटावायरस वैक्सीन सभी दुनिया भर में सभी बच्चों को दिया जाये। दो वाणिज्यिक रोटावायरस टीके मौजूद हैं और कई अन्य विकसित हो रहे हैं। अफ्रीका और एशिया में इन टीकों ने शिशुओं में गंभीर बीमारी कम की है तथा वे देश जिन्होनें राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम को ठीक प्रकार से लागू किया है वहाँ पर रोग की दरों और रोग की गंभीरता में एक गिरावट देखी गयी है। यह टीका उन बच्चों में बीमारी को रोक सकेगा जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है क्योंकि यह परिसंचारी संक्रमणों की संख्या को कम करेगा। 2000 के बाद से, संयुक्त राज्य अमेरिका में रोटावायरस टीकाकरण कार्यक्रम के कार्यान्वयन के कारण, दस्त के मामलों की संख्या में 80% तक की कमी आई है। शिशुओं को टीके की पहली खुराक 6 से 15 सप्ताह की उम्र के बीच दी जानी चाहिए। मौखिक हैजा टीका को 2 साल से अधिक समय तक 50-60% प्रभावी पाया गया है। प्रबंधन जठरांत्र शोथ आमतौर पर एक तीव्र और अपने आप को खुद से सीमित करने वाली बीमारी है जिसके लिये दवा की आवश्यकता नहीं होती है। हल्के तथा मध्यम निर्जलीकरण से पीड़ित लोगों के लिये बेहतर उपचार मौखिक पुनर्जलीकरण चिकित्सा (ORT) है। मेटोक्लोप्रामाइड और/या ओडनसेन्ट्रन हलांकि कुछ बच्चों में सहायक हो सकते हैं और ब्यूटिलस्कोपामाइन पेट दर्द के इलाज में उपयोगी है। पुनर्जलीकरण बच्चों और वयस्कों, दोनों में आंत्रशोथ का प्राथमिक उपचार पुनर्जलीकरण है। अधिमानतः इसे मौखिक पुनर्जलीकरण चिकित्सा द्वारा हासिल किया जाता है, हलांकि यदि चेतना का स्तर कम हो या निर्जलीकरण गंभीर स्तर का हो तो इसे नसों के माध्यम से देने की आवश्यकता भी पड़ सकती है। जटिल कार्बोहाइड्रेट के साथ बनाये गये मौखिक रिप्लेसमेंट थेरेपी उत्पाद (अर्थात गेहूं या चावल से बने) साधारण शर्करा आधारित उत्पादों से बेहतर हो सकते हैं। साधारण शर्करा की उच्च मात्रा वाले पेय जैसे कि शीतल पेय और फलों के रसों को 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए के रूप में सरल शर्करा, विशेष रूप से उच्च पेय 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अनुशंसा नहीं की जाती है क्योंकि वे दस्त को बढ़ा सकते हैं। यदि अधिक विशिष्ट और प्रभावी ORT मिश्रण अनुपलब्ध हो या स्वीकार्य न हों तो सादा पानी इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि आवश्यक हो तो युवा बच्चों में तरल पदार्थ देने के लिये नैसोगेस्ट्रिक ट्यूब का इस्तेमाल किया जा सकता है। आहार-संबंधी यह सिफारिश की जाती है कि है कि स्तनपान कराये जा रहे शिशुओं को सामान्य देखभाल जारी रखनी चाहिये तथा फॉर्मूला-पोषित शिशुओं को ORT के साथ पुनर्जलीकरण के तुरंत बाद उनका फॉर्मूला पोषण दिया जाना जारी रखना चाहिए। लैक्टोज-मुक्त या कम-लैक्टोज फॉर्मूले आमतौर पर आवश्यक नहीं हैं। दस्त के प्रकरणों के दौरान बच्चों को उनका आम आहार देना जारी रखना चाहिये तथा इसमें अपवाद स्वरूप साधारण शर्करा की उच्च मात्रा वाले खाद्यों से बचना चाहिये। BRAT आहार (केले, चावल, सेब का सॉस, टोस्ट और चाय) की सिफारिश नहीं की जाती है क्योंकि इसमें अपर्याप्त पोषक तत्व होते हैं और ये सामान्य भोजन से बेहतर नहीं होते है। बीमारी की अवधि को और दस्त की आवृत्ति, दोनो को कम करने में कुछ प्रोबायोटिक्स फायदेमंद पाये गये हैं। ये एंटीबायोटिक से जुड़े दस्त के इलाज तथा रोकथाम में भी उपयोगी हो सकते है। किण्वित दूध उत्पाद (जैसे दही) समान रूप से फायदेमंद होते हैं। विकासशील देशों में, बच्चों में दस्त के इलाज तथा रोकथाम दोनो में जिंक पूरक प्रभावी पाया गया है। वमनरोधी (एंटीमेटिक्स) वमनरोधी दवाएं बच्चों में उल्टी के इलाज के लिए सहायक हो सकती है। नसों के माध्यम से तरल पदार्थों को देने की कम आवश्यकता, अस्पताल में भर्ती होने की कम दर तथा कम उल्टी के साथ जुड़े होने के कारण ऑनडेन्स्ट्रॉन की एक खुराक कुछ उपयोगी है। मेटोक्लोप्रामाइड भी सहायक हो सकता है। हालांकि, ऑनडेन्स्ट्रॉन का उपयोग संभवतः बच्चों में अस्पताल में वापसी की वृद्धि दर के लिए जुड़ा हुआ हो सकता है। यदि नैदानिक निर्णय के अनुसार आवश्यक हो तो ऑनडेन्स्ट्रॉन की नसों के माध्यम से दिया जाने वाला मिश्रण मौखिक रूप से दिया जा सकता है। उल्टी को कम करने के लिए डाइमेनहाइड्रिनेट, महत्वपूर्ण नैदानिक लाभ नहीं प्रदर्शित करता है। एंटीबायोटिक्स जठरांत्र शोथ के लिए आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल नहीं होता है, हलांकि यदि लक्षण विशेष रूप से गंभीर हों या अतिसंवेदनशील बैक्टीरिया की पहचान हो या उसका संदेह हो तो कभी-कभी उनकी अनुशंसा की जाती है। यदि एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाना है तो फ़्लोरोक्विनोलोन में उच्च प्रतिरोध के कारण मैक्रोलाइड (जैसे एज़ीथ्रोमाइसिन) को अधिक पसंद किया जाता है। स्यूडोमेम्ब्रेनस बृहदांत्रशोथ, जो कि आमतौर पर एंटीबायोटिक के प्रयोग की वजह से होता है, प्रेरक एजेंट को रोक कर तथा मेट्रोनिडाज़ोल या वैंकोमाइसिन द्वारा उपचार करके प्रबंधित किया जाता है। बैक्टीरिया और प्रोटोज़ोन जो कि इलाज के लिए उत्तरदायी हैं, उनमें शिंगेला साल्मोनेला टाइफी, और जियार्डिया प्रजातियां शामिल हैं। जियार्डिया प्रजाति या एंटामोएबा हिस्टोलिटिका वाले मामलों में, टिनिडाज़ोल उपचार की सिफारिश की जाती है जो कि मेट्रोनिडाज़ोल से बेहतर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) उन युवा बच्चों के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग की सिफारिश करता है जिनमें खूनी पेचिश और बुखार दोनों की समस्या हो। जठरांत्र गतिशीलताविरोधी एजेंट (ऐंटीमोटिलिटी एजेंट) जठरांत्रगतिशीलता विरोधी चिकित्सा में जटिलताओं को पैदा करने का एक सैद्धांतिक जोखिम है और हालांकि नैदानिक अनुभव इसकी संभावना को नकारते हैं, इन दवाओं को खूनी पेचिश या बुखार द्वारा जटिल हो गये डायरिया से पीड़ित लोगों के लिये उपयोग किये जाने को हतोत्साहित किया जाता है। लोपरामाइड जो कि एक ओपियॉएड अनुरूप है, आम तौर पर दस्त के लाक्षणिक उपचार के लिए प्रयोग की जाती है। बच्चों के लिये लोपरामाइड की सिफारिश नहीं की जाती है, क्योंकि यह अपरिपक्व रक्त मस्तिष्क बाधा पार करके विषाक्तता पैदा कर सकती है। बिस्मथ सबसैलिसिलेट, जो कि बिस्मथ तथा सैलिसिलेट का एक त्रिसंयोजक अघुलशील यौगिक है, हल्के से लेकर मध्यम स्तर तक के मामलों में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन सैलिसिलेट विषाक्तता एक सैद्धांतिक संभावना है। महामारी विज्ञान यह अनुमान है कि जठरांत्र शोथ के तीन से पांच बिलियन मामले हर वर्ष होते हैं जो कि प्राथमिक रूप से बच्चों तथा विकासशील दुनिया के लोगों को प्रभावित करते हैं। इसके कारण 2008 में पाँच वर्ष से कम की आयु के 1.3 मिलियन बच्चों की मृत्यु हुई है, जिनमें से अधिकांश दुनिया के सबसे गरीब देशों के बच्चे हैं। इन मौतों में से 4,50,000 से अधिक वे मौतें है जो पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में रोटावायरस के कारण हुई थीं। हैजा, के कारण रोग के तीन से पांच लाख मामले होते हैं तथा यह वार्षिक रूप से लगभग 1,00,000 लोगों को मारता है। विकासशील दुनिया के दो वर्ष से कम की आयु के बच्चों को अक्सर एक वर्ष में छः या अधिक संक्रमण होते हैं जिनके परिणामस्वरूप चिकित्सीय रूप से महत्वपूर्ण जठरांत्रशोथ होता है। यह वयस्कों में कम आम है, आंशिक रूप से जिसका कारण सक्रिय प्रतिरक्षा का विकास होना है। 1980 में सभी कारणों से पैदा हुये जठरांत्र शोथ के कारण 4.6 मिलियन बच्चों की मृत्यु हुई, जिनमें से अधिकांश विकासशील दुनिया में हुई। वर्ष 2000 तक मृत्यु दर में काफी कम हो गई थी (लगभग 1.5 मिलियन वार्षिक मृत्यु), जिसका मुख्य कारण मौखिक पुनर्जलीकरण चिकित्सा की शुरुआत तथा व्यापक उपयोग था। अमेरिका में जठरांत्र शोथ के कारण होने वाले संक्रमण दूसरे सबसे आम संक्रमण (आम सर्दी के बाद) हैं और इनके कारण 200 से 375 मिलियन मामलों मे गंभीर दस्त हो जाता है तथा वार्षिक तौर पर लगभग दस हजार मौतें होती हैं, जिनमें से 150 से 300 पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत होती है। इतिहास "जठरांत्र शोथ (गैस्ट्रोएन्टराइटिस)" शब्द को सबसे पहले 1825 में उपयोग किया गया था। इस समय से पहले इसे अधिक विशिष्ट रूप से टाइफाइड बुखार या दूसरे नामों के साथ "कॉलरा मॉर्बस", अथवा कम विशिष्ट रूप से "ग्रिपिंग ऑफ गट्स", "सर्फीट","फ्लक्स","बॉवल कंप्लेनेट" या गंभीर दस्त के लिये दूसरे कई पुरातन नामों में से किसी एक नाम से जाना जाता था। समाज और संस्कृति जठरांत्र शोथ कई बोलचाल वाले नामों के साथ जुड़ा है, जिनमें कई अन्य नामों के साथ "मॉन्टेज़ूमा रीवेंज", "दिल्ली बेली", "लॉ टूरिस्टा" तथा "बैक डोर स्प्रिंट" शामिल है। इसने कई सैन्य अभियानों में एक भूमिका निभाई है और माना जाता है कि कहावत "नो गट्स नो ग्लोरी" की उत्पत्ति का मूल यही है। जठरांत्र शोथ के कारण अमरीका में चिकित्सकों के पास प्रत्येक वर्ष 3.7 मिलियन तथा फ्रांस में प्रत्येक वर्ष 3 मिलियन चिकित्सीय दौरे किये जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में जठरांत्र शोथ, समग्र रूप से 23 बिलियन अमरीकी डालर प्रति वर्ष के व्यय के लिये उत्तरदायी है, जिसमें से अकेले रोटावायरस के कारण एक वर्ष में एक बिलियन अमरीकी डालर का अनुमानित व्यय होता है। शोध जठरांत्र शोथ के खिलाफ कई सारे टीके विकास की प्रक्रिया में हैं। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया में जठरांत्र शोथ के दो मुख्य बैक्टीरिया जनित कारणों, शिगेला और एन्टेरोटॉक्सिजेनिक {0एस्केरेशिया कॉलि, (ETEC), के खिलाफ टीके। अन्य प्राणियों में बिल्लियों और कुत्तों में जठरांत्र शोथ, कई ऐसे एजेंटों के कारण होता है जो मनुष्यों के समान हैं। सबसे आम जीव हैं: कैम्पाइलोबैक्टर, क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल,क्लोस्ट्रीडियम परफ्रिंजेंस तथा साल्मोनेला। विषैले पौधों की एक बड़ी संख्या भी लक्षणों को पैदा कर सकती है। कुछ एजेंट कुछ प्रजातियों के लिए अधिक विशिष्ट हैं। संक्रामक जठरांत्र शोथ कोरोनावायरस (TGEV) सुअरों में होता है जिसके कारण उल्टी, दस्त तथा निर्जलीकरण होता है। ऐसा माना जाता है कि यह जंगली पक्षी द्वारा सूअरों में प्रवेश करता है और इसका कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है। यह मनुष्य के लिए संक्रामक नहीं है। सन्दर्भ नोट्स बाहरी कड़ियाँ बालचिकित्सा भोजन द्वारा होने वाली बीमारियां संक्रामक रोग सूजन पेट दर्द मल परीक्षण द्वारा निदान स्थितियां गैर संक्रामक जठरांत्र शोथ और बृहदांत्रशोथ दस्त
2017 में गुरमीत राम रहीम सिंह को यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराये जाने के बाद हरियाणा के पंचकुला में हिंसा शुरू हुई और बाद में उत्तरी भारत के अन्य राज्यों में फैलने लगी, जिसमें हरियाणा, पंजाब और राजधानी नई दिल्ली शामिल है। इस उपद्रव के कारण कम से कम 31 लोग मारे गए और 300 से अधिक लोग घायल हुए। प्रदेश सरकार निष्क्रिय साबित हुुई। घटना 25 अगस्त 2017 को दोपहर 3 बजे के आसपास सीबीआई की जांच एजेंसी ने डेरा सच्चा सौदा के दो महिला अनुयायियों के 2002 में हुए यौन उत्पीड़न मामले में अपना फैसला सुनाया। इस फैसले में गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराया गया। उसे 28 अगस्त 2017 को सजा सुनाया जाएगा। उसे कम से कम सात साल की सजा हो सकती है। इसके बाद सिंह को न्यायिक हिरासत में ले लिया गया। सिंह ने फैसले से पहले अपने अनुयायियों को शांत रहने का अनुरोध किया था। 23 अगस्त 2017 से ही हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के क्षेत्रों में सुरक्षा का इंतजाम किया गया था, क्योंकि सिंह के दो लाख समर्थकों ने फैसले से पहले ही पंचकुला में अपना डेरा बना लिया था। सुरक्षा के लिए 97 सीआरपीएफ कंपनियों के साथ साथ 16 रैपिड एक्शन फोर्स; 37 सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी); 12 भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और 21 सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को रखा गया था। इसके अलावा 10 अन्य कंपनियों को अलग से रखा था। हिंसा फैसले की खबर मिलते ही सिंह के समर्थकों ने हिंसा शुरू कर दी। रेलवे में काम करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि उन लोगों ने दो रेल स्टेशन में आग लगाई और रेवा एक्सप्रेस के खाली पड़े दो कोच में भी आग लगा दी थी, जो दिल्ली के आनंद विहार स्टेशन में था। इन लोगों ने डागरु रेलवे स्टेशन में भी आग लगाने की कोशिश की थी। इन लोगों ने एनडीटीवी के प्रसारण करने वाले वैन और उसके इंजीनियर पर भी हमला कर दिया। सिरसा में इंडिया टुडे में काम करने वाले कैमरामैन और अन्य लोगों पर भी हमला किया गया था। उसी दिन पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने गुरमीत राम रहीम सिंह की संपत्ति जब्त करके हिंसा के नुकसान की भरपाई करने का फैसला किया। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ डेरा सच्चा सौदा हरियाणा का इतिहास 2017 में भारत
बखरी में भारत के बिहार राज्य के अन्तर्गत मगध मण्डल के औरंगाबाद जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ बिहार - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर बिहार सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ बिहार के गाँव औरंगाबाद, बिहार गाँव
कटंगपाली, सांरगढ मण्डल में भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के अन्तर्गत रायगढ़ जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक छत्तीसगढ जनजातियां कला खेल गोठ सतनाम पंथ छत्तीसगढ़ की विभूतियाँ रायगढ़ जिला, छत्तीसगढ़
बरेली लोकमान्य तिलक एक्स्प्रेस 4314 भारतीय रेल द्वारा संचालित एक मेल एक्स्प्रेस ट्रेन है। यह ट्रेन बरेली रेलवे स्टेशन (स्टेशन कोड:BE) से 10:45AM बजे छूटती है और लोकमान्य तिलक टर्मिनस रेलवे स्टेशन (स्टेशन कोड:LTT) पर 08:00PM बजे पहुंचती है। इसकी यात्रा अवधि है 33 घंटे 15 मिनट। मेल एक्स्प्रेस ट्रेन
सोनला, थराली तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत गढ़वाल मण्डल के चमोली जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) सोनला, थराली तहसील सोनला, थराली तहसील
द होली सी रोमन कैथोलिक चर्च और पोप का राजनयिक प्रतिनिधि है, जिसका मुख्यालय वेटिकन सिटी में है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान रोम में उपस्थिति बनाए रखी
डिजिटल वॉटरमार्किंग सूचना को डिजिटल सिग्नल में एक ऐसे तरीक़े से अंतःस्थापित करने की प्रक्रिया है, जिसे हटाना मुश्किल है। यह सिग्नल, उदाहरण के लिए, ऑडियो, चित्र या वीडियो हो सकता है। यदि सिग्नल की नक़ल उतारी जाती है, तो सूचना भी प्रतिलिपि में उतर जाती है। एक सिग्नल में एक ही समय में कई अलग-अलग वॉटरमार्क हो सकते हैं। दृश्य वॉटरमार्किंग में सूचना, चित्र या वीडियो में दिखाई देती है। आम तौर पर सूचना, पाठ या लोगो होती है, जो मीडिया के मालिक की पहचान कराती है। दाईं ओर छवि पर एक दृश्य वॉटरमार्क है। जब एक टेलीविज़न प्रसारक संप्रेषित वीडियो के कोने में अपने लोगो को जोड़ता है, तो यह भी एक दृश्य वॉटरमार्क है। अदृश्य वॉटरमार्किंग में, सूचना को ऑडियो, चित्र या वीडियो में डिजिटल डेटा के रूप में जोड़ा जाता है, लेकिन उसे प्रत्यक्ष देखा नहीं जा सकता (हालांकि यह पता लगाना संभव हो सकता है कि कुछ सूचना प्रच्छन्न है). वॉटरमार्क व्यापक उपयोग के उद्देश्य से हो सकता है और इस प्रकार आसानी से पुनः प्राप्त करने या स्टीगेनोग्राफ़ी के रूप में हो सकता है, जहां पक्ष डिजिटल सिग्नल में अंतर्स्थापित गुप्त संदेश को संप्रेषित करती है। दोनों ही मामलो में उद्देश्य, दृश्य वॉटरमार्किंग की तरह, स्वामित्व या अन्य कोई वर्णनात्मक सूचना सिग्नल में कुछ इस तरह जोड़ना है कि उसे हटाना मुश्किल है। यह भी संभव है कि व्यक्तियों के बीच गुप्त संचार के साधन के रूप में प्रच्छन्न अंतर्स्थापित सूचना का उपयोग किया जाए. वॉटरमार्किंग का एक अनुप्रयोग कॉपीराइट संरक्षण प्रणाली है, जो डिजिटल मीडिया के अप्राधिकृत नक़ल को रोकने या निवारण के इरादे से प्रयुक्त होता है। इस प्रयोग में एक प्रतिलिपि साधन प्रतिलिपि बनाने से पहले सिग्नल से वॉटरमार्क को पुनःप्राप्त करता है; वह साधन वॉटरमार्क की अंतर्वस्तु के आधार पर प्रतिलिपि बनाने या ना बनाने का निर्णय लेता है। एक अन्य अनुप्रयोग स्रोत ट्रैकिंग में है। एक वॉटरमार्क प्रत्येक वितरण बिंदु पर डिजिटल सिग्नल में अंतःस्थापित किया जाता है। यदि कार्य की प्रतिलिपि बाद में पाई जाती है, तो वॉटरमार्क को प्रतिलिपि से पुनःप्राप्त किया जा सकता है और वितरण के स्रोत का पता लग सकता है। कथित तौर पर इस तकनीक का इस्तेमाल अवैध तरीके से फ़िल्मों की नक़ल तैयार करने वाले स्रोत का पता लगाने के लिए किया जाता है। अदृश्य वॉटरमार्किंग का एक और अनुप्रयोग है वर्णनात्मक जानकारी के साथ डिजिटल तस्वीरों की व्याख्या. जहां डिजिटल मीडिया के कुछ फ़ाइल प्रारूपों में मेटाडाटा नामक अतिरिक्त सूचना शामिल हो सकती है, डिजिटल वॉटरमार्किंग इस अर्थ में भिन्न है कि डेटा सिग्नल में ही शामिल होता है। वॉटरमार्किंग शब्द का उपयोग काग़ज़ पर दृश्य वॉटरमार्क रखने के बहुत ही पुरानी धारणा से व्युत्पन्न है। अनुप्रयोग डिजिटल वॉटरमार्किंग का उपयोग अनुप्रयोगों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए किया जा सकता है: कॉपीराइट संरक्षण स्रोत ट्रैकिंग (अलग प्राप्तकर्ताओं को अलग वॉटरमार्क की सामग्री मिलती है) प्रसारण निगरानी (टेलीविजन समाचारों में अक्सर अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों से वॉटरमार्क वाले वीडियो शामिल होते हैं) गुप्त संचार वॉटरमार्किंग जीवन-चक्र के चरण जो सूचना अंतःस्थापित की जानी हो वह डिजिटल वॉटरमार्क कहलाती है, हालांकि कुछ संदर्भों में वाक्यांश डिजिटल वॉटरमार्क का अर्थ वाटरमार्क किए गए सिग्नल और कवर सिग्नल के बीच का अंतर है। सिग्नल जहां वॉटरमार्क को अंतर्स्थापित किया जाना हो, पोषक सिग्नल कहलाता है। आम तौर पर वॉटरमार्किंग प्रणाली तीन अलग चरणों में विभाजित होती है, अंतःस्थापना, हमला और पता लगाना. अंतःस्थापना में, एक एल्गोरिदम अंतःस्थापित किए जाने वाले पोषक और डेटा को स्वीकार करता है और एक वॉटरमार्क सिग्नल पैदा करता है। इसके बाद वॉटरमार्क किया गया सिग्नल प्रसारित या संग्रहीत किया जाता है, आम तौर पर किसी अन्य व्यक्ति को संप्रेषित होता है। अगर वह व्यक्ति कोई संशोधन करता है, तो यह हमला कहलाता है। जबकि संशोधन दुर्भावनापूर्ण नहीं हो सकता है, शब्द हमला कॉपीराइट संरक्षण अनुप्रयोग से आया है, जहां पाइरेट संशोधन के माध्यम से डिजिटल वॉटरमार्क को हटाने के प्रयास करते हैं। कई संभावित संशोधन मौजूद हैं, उदाहरण के लिए, डेटा का हानिपूर्ण संपीड़न, एक छवि या वीडियो का दृश्यांकन, या जानबूझकर शोर जोड़ना. संसूचन (अक्सर जिसे निष्कर्षण कहा जाता है) एक एल्गोरिदम है, जिसे आक्रमित सिग्नल पर लागू किया जाता है ताकि उससे वॉटरमार्क निकालने का प्रयास किया जाए. यदि प्रसारण के दौरान सिग्नल अपरिवर्तित था, तो वॉटरमार्क अभी भी मौजूद है और उसे निकाला जा सकता है। ठोस वाटरमार्किंग अनुप्रयोगों में, निष्कर्षण एल्गोरिदम सही ढंग से वॉटरमार्क उत्पादित करने में सक्षम होना चाहिए, भले ही संशोधन मज़बूत हों. नाज़ुक वॉटरमार्किंग में, निष्कर्षण एल्गोरिदम को असफल होना चाहिए यदि सिग्नल में कोई परिवर्तन किया जाए. वर्गीकरण एक डिजिटल वॉटरमार्क को परिवर्तनों के संबंध में ठोस कहा जाता है यदि अंतःस्थापित सूचना को चिह्नित सिग्नलों से विश्वसनीय तरीक़े से पहचाना जा सके, भले ही वह कितने ही परिवर्तनों के साथ विकृत हो। विशिष्ट छवि विकृतियां हैं JPEG संपीड़न, आवर्तन, दृश्यांकन, शोर संयोजन और क्वांटमन. वीडियो सामग्री अस्थायी संशोधन और MPEG संपीड़न अक्सर इस सूची में जुड़ जाते हैं। एक वॉटरमार्क को अगोचर कहा जाता है यदि कवर सिग्नल और चिह्नित सिग्नल उपयुक्त अवधारणात्मक मीट्रिक के मामले में अप्रभेद्य हैं. सामान्य तौर पर ठोस वॉटरमार्क या अगोचर वॉटरमार्क को तैयार करना आसान है, लेकिन ठोस और अगोचर वॉटरमार्क को तैयार करना काफ़ी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। ठोस अगोचर वॉटरमार्क को डिजिटल सामग्री के संरक्षण के लिए साधन के रूप में प्रस्तावित किया गया है, उदाहरण के लिए, पेशेवर वीडियो सामग्री में एक अंतःस्थापित 'प्रतिलिपि अनुमत नहीं' ध्वज के रूप में. डिजिटल वॉटरमार्किंग तकनीक को कई तरीक़ों से वर्गीकृत किया जा सकता है। मज़बूती अगर थोड़े से परिवर्तन के बाद पहचानने में विफल रहता है तो वॉटरमार्क को नाज़ुक कहा जाता है। नाज़ुक वॉटरमार्क को सामान्यतः छेड़छाड़ का पता लगाने (अखंडता सबूत) के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामान्यतः मूल कार्य के साथ परिवर्तन जो स्पष्ट रूप से दिखाई दें उन्हें वॉटरमार्क के रूप में निर्दिष्ट नहीं किया जाता, बल्कि आम तौर पर बारकोड कहा जाता है। एक वॉटरमार्क को अर्द्ध-नाज़ुक कहा जाता है यदि वह सुसाध्य रूपांतरण का प्रतिरोध करता है, लेकिन असाध्य रूपांतरणों के बाद उन्हें पहचानने में चूकता है। अर्द्ध नाज़ुक वॉटरमार्क का इस्तेमाल सामान्यतः असाध्य परिवर्तनों का पता लगाने के लिए किया जाता है। अगर वॉटरमार्क रूपांतरणों के नामित वर्ग का प्रतिरोध करता है तो उसे मज़बूत कहा जाता है। मज़बूत वॉटरमार्क का उपयोग कॉपी और अभिगम नियंत्रण सूचना वहन करने के लिए, प्रतिलिपि संरक्षण अनुप्रयोगों में किया जा सकता है। अवगम्यता एक वॉटरमार्क को अगोचर कहा जाता है यदि मूल कवर सिग्नल और चिह्नित सिग्नल (लगभग) प्रत्यक्ष रूप से अप्रभेद्य हों. एक वॉटरमार्क को प्रत्यक्ष कहा जाता है अगर चिह्नित सिग्नल में उसकी उपस्थिति सुस्पष्ट है, लेकिन अनुचित हस्तक्षेप संभव नहीं। कार्यक्षमता अंतर्स्थापित संदेश की लंबाई दो अलग मुख्य वॉटरमार्किंग योजनाओं के वर्गों को निर्धारित करता है: संदेश संकल्पनात्मक रूप से शून्य-बिट लंबा है और सिस्टम को चिह्नित वस्तु में वॉटरमार्क की उपस्थिति या अनुपस्थिति का पता लगाने के लिए परिकल्पित किया गया है। इस प्रकार की वॉटरमार्किंग योजनाओं को आम तौर पर इटैलिक ज़ीरो-बिट या इटैलिक प्रेसेन्ज़ वॉटरमार्किंग स्कीम्स के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है। कभी-कभी, इस प्रकार की वॉटरमार्किंग योजना को 1-बिट वॉटरमार्क कहा जाता है, क्योंकि एक 1 वॉटरमार्क की उपस्थिति (और 0 उसकी अनुपस्थिति) को सूचित करता है। संदेश एक n-बिट-लंबी धारा ( सहित ) या है और वॉटरमार्क में अनुकूलित होता है। इस प्रकार की योजनाओं को आम तौर पर मल्टिपल बिट वॉटरमार्किंग या नॉन ज़ीरो-बिट वॉटरमार्किंग योजनाओं के रूप में संदर्भित किया जाता है। अंतःस्थापन पद्धति यदि चिह्नित सिग्नल को योगात्मक संशोधन द्वारा प्राप्त किया जाता है, तो ऐसी वॉटरमार्किंग पद्धति को स्प्रेड-स्पेक्ट्रम के रूप में संदर्भित किया जाता है। स्प्रेड-स्पेक्ट्रम वॉटरमार्क साधारणतः मज़बूत के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन पोषक हस्तक्षेप के कारण इनमें न्यून सूचना क्षमता भी होती है। यदि परिमाणीकरण द्वारा चिह्नित सिग्नल प्राप्त हो, तो ऐसी वॉटरमार्किंग पद्धति को क्वान्टाइज़ेशन टाइप माना जाता है। क्वान्टाइज़ेशन वॉटरमार्क कम मज़बूत होते हैं, लेकिन पोषक हस्तक्षेप की अस्वीकृति के कारण इनमें उच्च सूचना क्षमता होती है। वॉटरमार्किंग पद्धति को एम्प्लीट्यूड मॉड्यूलेशन के रूप में संदर्भित किया जाता है यदि चिह्नित सिग्नल को योगात्मक संशोधन द्वारा अंतःस्थापित किया जाए, जो स्प्रेड स्पेक्ट्रम पद्धति के समान ही है लेकिन यह विशेष रूप से स्थानिक डोमेन में अंतःस्थापित होता है। मूल्यांकन/निर्देश मानक डिजिटल वॉटरमार्किंग योजनाएं एक वॉटरमार्क डिज़ाइनर या अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए विस्तृत जानकारी प्रदान कर सकते हैं। इसलिए, विभिन्न मूल्यांकन रणनीतियां मौजूद हैं। अक्सर एक वॉटरमार्क डिज़ाइनर द्वारा प्रदर्शनार्थ एकल गुणों का मूल्यांकन प्रयुक्त होता है, उदाहरण के लिए, सुधार. अंतिम उपयोगकर्ता ज़्यादातर विस्तृत जानकारी में दिलचस्पी नहीं रखते हैं। वे जानना चाहते हैं कि क्या डिजिटल वॉटरमार्किंग एल्गोरिदम का उपयोग उनके अनुप्रयोग परिदृश्य में किया जा सकता है और यदि हां, तो कौन-से पैरामीटर सेट सबसे अच्छे लगते हैं। सुरक्षित डिजिटल कैमरा 2003 में मोहंती और अन्य द्वारा एक सुरक्षित डिजिटल कैमरा (SDC) प्रस्तावित किया गया, जो जनवरी 2004 में प्रकाशित किया गया। ब्लिथ और फ़्रिडरिच ने एक ऐसे डिजिटल कैमरा के लिए 2004 में SDC पर भी काम किया जो क्रिप्टोग्राफ़िक हैश के साथ एक बॉयोमीट्रिक पहचानकर्ता को अंतःस्थापित करने के लिए हानिरहित वॉटरमार्किंग का इस्तेमाल करे. पूर्वगामी कैमरा Epson और Kodak ने Epson PhotoPC 3000Z और Kodak DC-290290 जैसी सुरक्षा सुविधाओं के साथ कैमरा बनाए हैं। दोनों कैमरों ने छवि में न हटाए जा सकने वाली सुविधाओं को जोड़ा है जो मूल छवि को विकृत करते हैं, जिसने उसे अदालत में न्यायिक साक्ष्य जैसे कुछ अनुप्रयोगों के लिए अस्वीकार्य बना दिया है। ब्लिथ और फ़्रिडरिच के अनुसार,"दोनों कैमरा मूल छवि या उसके निर्माता का अविवादित सबूत उपलब्ध [नहीं] करा सकते हैं". प्रतिवर्ती डेटा छिपाना प्रतिवर्ती डेटा छुपाना एक ऐसी तकनीक है जो छवियों को प्रमाणीकृत करने और फिर वॉटरमार्क हटाते हुए उसके मूल स्वरूप को बहाल करने तथा ऊपर-लिखित छवि डेटा को प्रतिस्थापित करने में सक्षम बनाता है। यह क़ानूनी प्रयोजनों के लिए छवियों को स्वीकार्य बनाता है। अमेरिकी सेना भी टोही छवियों के प्रमाणीकरण के लिए इस तकनीक में रुचि रखती है। इन्हें भी देखें ऑडियो वॉटरमार्क पहचान नकल पर हमला वॉटरमार्क (डेटा फ़ाइल) वॉटरमार्क पहचान पैटर्न पहचान (उपन्यास), प्रसिद्ध संतांत्रिकी कथा-साहित्य लेखक विलियम गिब्सन द्वारा लिखित डिजिटल वॉटरमार्किंग प्रसंग पर आधारित काल्पनिक वैज्ञानिक थ्रिलर यूरियन समूह - बैंक के नोटों पर प्रयुक्त कोडित पाइरसी-विरोधी - फ़िल्मों को ट्रैक करने के लिए प्रयुक्त स्टेगनोग्राफ़ी बाहरी कड़ियाँ Digital Watermarking Alliance – Furthering the Adoption of Digital Watermarking Digital Watermarking & Data Hiding research papers at Forensics.nl Directory of Books, Journals & Conferences on Digital Watermarking and Digital Watermarking Assessment Tools Information hiding homepage by Fabien Petitcolas Comparison of watermarking methods Robust Mesh Watermarking PhotoWaterMark technology: Holographic approach Open Platform for testing digital watermarking systems सन्दर्भ ECRYPT report: Audio Benchmarking Tools and Steganalysis ECRYPT report: Watermarking Benchmarking जीना डिट्टमैन, डेविड मेगियास, एंड्रीस लैंग, जोर्डी हेरेरा-जोआनकोमार्टी; थिएरेटिकल फ़्रेमवर्क फॉर ए प्रैक्टिकल इवाल्यूएशन एंड कंपारिज़न ऑफ़ ऑडियो वाटरमार्किंग स्कीम्स इन द ट्रयांगल ऑफ़ रोबस्टनेस, ट्रांस्परेंसी एंड कैपासिटी, इन: ट्रांसैक्शन ऑन डेटा हाइडिंग एंड मल्टीमीडिया सेक्यूरिटी I; स्प्रिंगर LNCS 4300; संपादक युन क्यू. शी; पृ. 1-40; ISBN 978-3-540-49071-5,2006 PDF एमवी स्मरनोव. होलोग्राफिक अप्रोच टु एम्बेडिंग हिडन वाटरमार्क्स इन ए फोटोग्राफिक इमेज// जर्नल ऑफ़ ऑप्टिकल टेक्नॉलोजी, खंड 72, अंक 6, पृ. 464-468. प्रमाणीकरण तरीके वॉटरमार्किंग डिजिटल फ़ोटोग्राफ़ी गूगल परियोजना
खुन खान राष्ट्रीय उद्यान () थाईलैंड के चियांग माई प्रान्त में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान है। खुन खान राष्ट्रीय उद्यान चियांग माई प्रांत के सामोएंग और माए चेम जिलों में चियांग माई शहर के पश्चिम में लगभग की दूरी पर स्थित है। उद्यान का क्षेत्रफल लगभग है। उद्यान थानोन थोंग चाई पर्वत श्रृंखला में स्थित है। ऊँचाई से लेकर उद्यान के उच्चतम बिंदु दोई पुंग किआ तक है। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Concise Khun Khan National Park information from the Tourism Authority of Thailand थाईलैंड के राष्ट्रीय उद्यान
विछनै, कोश्याँकुटोली तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत कुमाऊँ मण्डल के नैनीताल जिले का एक गाँव है। इन्हें भी देखें उत्तराखण्ड के जिले उत्तराखण्ड के नगर कुमाऊँ मण्डल गढ़वाल मण्डल बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) उत्तरा कृषि प्रभा विछनै, कोश्याँकुटोली तहसील विछनै, कोश्याँकुटोली तहसील
शंकर गढ़ कोइल, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ अलीगढ़ जिला के गाँव
कात्रज महाराष्ट्र राज्य के पूना ज़िले का एक उपनगर है। इस उपनगर की स्थापना गिरिश ने की थी। यह पुणे महानगर पालिका का क्षेत्र है। कात्रज कात्रज घाट के लिए प्रसिद्ध है। कात्रज अपने पेशवा-युग (18 वीं शताब्दी) झील के लिए प्रसिद्ध है जिन्होंने उस अवधि के दौरान शहर के लिए पानी की आपूर्ति की थी। यह गांव कात्रज घाट या पहाड़ी पास के मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग 4 पर स्थित है। हाल के दशकों में झील के आस-पास के क्षेत्र और कात्रज गांव पुणे शहर के हिस्स बन गए है। पूर्व ग्रामीण क्षेत्र अब आवासीय परिसरों से घिरा हुआ है। यहाँ पर राजीव गांधी जूलॉजिकल पार्क है तो एक भारती विद्यापीठ नामक विश्वविद्यालय भी है। चित्र गैलरी घाट सन्दर्भ महाराष्ट्र पुणे के उपनगर
हिंदू सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य चार वर्णों में विभाजित है ब्राह्मण , क्षत्रिय, व्यस्य, शूद्र पौराणिक इतिहास के अनुसार रोड एक क्षत्रिय योद्धा जाति में आती है । जिसका संबंध सिंध प्रांत से है जो इस समय पाकिस्तान में है। सम्राट धज राजा रोड ने रोड राजवंश की स्थापना की थी , जिसने 450 ईसवी से सिंध पर अगले 1000 वर्षों तक शासन किया। सिंध प्रांत में अरोर के हिंदू राजा दाहिर क्षत्रिय रोड राजा बताए जाते हैं रोड राजा दाहिर का जन्म 665 ईस्वी में हुआ था। वह 679 ईस्वी में सिंध के राजा बने। कुछ इतिहासकार रोड शब्द को गौङ समझ कर राजा दाहिर का संबंध ब्राह्मणों से लगाते हैं जो गलत है। पाकिस्तान के अरोर शहर ( वर्तमान में शहर का नाम रोहरी शहर) में रोड का किला आज भी मौजूद है । रोड जाती केवल एक ऐसी हिंदू क्षत्रिय जाति है, जिसका मुगल धर्म परिवर्तन नहीं करा सके। रोड क्षत्रिय जाति मुख्य रूप से हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड , महाराष्ट्र में मिलती है। हरियाणा के प्रसिद्ध खिलाड़ी नीरज चोपड़ा क्षत्रिय रोड जाति से आते हैं। जिन्होंने ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर भारत वह अपने रोड समाज का नाम पूरे विश्व में विख्यात कर दिया। लिखे गए संपादन में अगर कोई त्रुटि रह गई हो उसे पूरा किया जाएगा कृपया अपने कमेंट वह सुझाव हमें दें।
95 रेखांश पूर्व (95rd meridian east) पृथ्वी की प्रधान मध्याह्न रेखा से पूर्व में 95 रेखांश पर स्थित उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक चलने वाली रेखांश है। यह काल्पनिक रेखा आर्कटिक महासागर, एशिया, हिन्द महासागर, दक्षिणी महासागर और अंटार्कटिका से गुज़रती है, जिसमें भारत के असम, नागालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश भी सम्मिलित है। यह 85 रेखांश पश्चिम से मिलकर एक महावृत्त बनाती है। इन्हें भी देखें रेखांश 96 रेखांश पूर्व 85 रेखांश पश्चिम 94 रेखांश पूर्व महावृत्त सन्दर्भ पूर्
असौटी, थराली तहसील में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत गढ़वाल मण्डल के चमोली जिले का एक गाँव है। बाहरी कड़ियाँ उत्तराखण्ड - भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उत्तराखण्ड सरकार का आधिकारिक जालपृष्ठ उत्तराखण्ड (उत्तराखण्ड के बारे में विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी) असौटी, थराली तहसील असौटी, थराली तहसील असौटी, थराली तहसील
बरतारा २ रायगढ-चौक, लखीसराय, बिहार स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ लखीसराय जिला के गाँव
कोइरेंग भाषा भारत की संकटग्रस्त भाषाओं में से एक है। यह अत्यधिक गंभीर रूप से खतरे में है। आईएसओ कोड: nkd भौगोलिक वर्गीकरण नामकरण क्षेत्रविस्तार बोलियाँ भाषा साहित्य इन्हें भी देखें भारत में संकटग्रस्त भाषाओं की सूची भारत की भाषाएँ भारत में स्थानीय वक्ताओं की संख्यानुसार भाषाओं की सूची सन्दर्भ भारत की संकटग्रस्त भाषाएँ
जमुई (Jamui) भारत के बिहार राज्य के जमुई ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है। विवरण जमुई जैनों के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। प्राचीन समय में इस जगह को जूम्भिकग्राम और जमबुबानी के नाम से जाना जाता था। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण रहा है। माना जाता है कि 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने उज्जिहवलिया नदी के तट पर स्थित जूम्भिकग्राम में दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था। इस जिले की स्थापना गुप्त, पाल और चन्देल शासकों ने की थी। जमुई का संबंध प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत से भी जोड़ा जाता है... यहाँ माँ कलिका मंदिर, मलयपुर, जमुई, जिला मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर एवं जमुई रेलवे स्टेशन से सटा हुआ है जो आस पास के इलाके में बहुत ही भव्य एवं प्रसिद्ध है...दूर दूर से सैलानी इस मंदिर में श्रद्धा करने आते हैं... मुख्य आकर्षण बाबा कोकिलचंद धाम मंदिर गंगरा (गिद्धौर ) जय बाबा कोकिलचंद बाबा कोकिलचंद धाम गंगरा में आपका स्वागत है !! बाबा कोकिलचंद  आपकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करें ! जमुई  जनपद के जिस स्थल पर आपका पदार्पण हुआ है  वह मध्य युग के  महामानव , त्रिकाल दर्शी, काल-जयी पुरुष बाबा कोकिल चंद  की स्मृति में स्थापित  पिंड स्वरूप है जिसे राज्य एवम राज्येतर   समस्त श्रद्धालुओं ने  भक्तिपूर्वक समग्र सहयोग प्रदान कर धार्मिक धरोहर के रूप में  भव्यता प्रदान करने का भागीरथ प्रयत्न किया है। बाबा की यह पिंडी गंगरा ग्राम के उसी हिस्से पर अवस्थित है जिसे गिद्धौर के चन्देलवंशी शासक ने किसी रहस्यमयी अलौकिक उपकार के बदले में  ग्राम वासियों को प्रतिदान में बाबा की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए दिया था।इस प्रकार यह स्थल चन्देलवंशों के इतिहास से जुड़ने के कारण ऐतिहासिक महत्व का है। बाबा कोकिलचंद मूल रूप से कृषक थे। तत्कालीन मध्य युग के समाज के बीच आपद धर्म का सन्देश स्थापित करने के लिए एवम अपनी आत्म रक्षा के लिए जो सुकृत्य किया ,उसकी रोमांचक कथा उनके इस स्थल को धर्म- धाम बनाती है ।  जंगल से लकड़ी लाने के क्रम में उनका सामना एक बाघ से हुआ ।बाबा ने उसे मार गिराया । जब मृत बाघ की सहगामिनी बाघिन क्रोध में सामने आई तो बाबा को साक्षात शक्ति स्वरूपा माँ के दर्शन हुए । आपद धर्म का  तत्क्षण निर्वाह करते हुए बाबा ने स्वयं को माँ के समक्ष आत्मार्पण कर नश्वर काया से मुक्ति पा ली । इसके उपरांत अपनी आलौकिक शक्ति से वैद्यनाथ धाम (देवघर ) स्थित शिव मंदिर का त्रिशूल झुकाकर  मंदिर प्रांगण में शिव पार्षद के रुप में स्थान पाया ,    यह धर्म-  धाम ही पिंडी के स्वरूप में विद्यमान है। मध्य युगीन भारत में स्त्रियों पर  तरह- तरह के अत्याचार होते रहते थे । मदिरा , और मैथुन ही उस युग की जीवन चर्या थी । बाबा कोकिल चंद जीवन पर्यंत  इन सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध रहे । कृषकों के द्वारा उत्पादित अन्न की सतत रक्षा करने को कहा करते थे। अन्न की बर्बादी को रोकने के लिए विगत सात सौ वर्षों से  प्रत्येक वर्ष  नवान्न पूजा(नेमान पर्व)  7तथा आसाढ में आसाढी पूजा गंगरा गाँव की एक प्राचीन परंपरा है, जो   इस मंच का आवश्यक अनुष्ठान है । बाबा कोकिलचंद  का त्रिसूत्रीय संदेश आज भी प्रासंगिक है जो इस प्रकार है : 1* शराब से दूर रहना 2* अन्न की रक्षा करना 3* नारी का सम्मान करना  । बाबा कोकिलचंद  विचारमंच ट्रस्ट का उद्देश्य - 1. बाबा के अनुशासन  त्रिसूत्र को क्रियान्वित करना , 2. रामनवमी 24/3/2010 से   शुभारंभ  बाबा कोकिलचंद  का भव्य मंदिर निर्माणकार्य पूरा करना , 3. बाबा दरबार में 2009  से शुभारंभ सामूहिक सोमवारी आरती पूजन अनवरत जारी रखना , 4. 2015 से संचालित सामूहिक दीपावली मनाना ,   5. बागवानी , पुस्तकालय , सौंदर्यीकरण, 6. बाबा दरबार में आदर्श विधिव्यवस्था स्थापित करना तथा परिसर की घेराबंदी करना , 7. समाजिक एवं उत्कृष्ट कार्य करनेवाले लोगों को  प्रोत्साहित एवं सम्मानित करना , 8. राज्य सरकार से धार्मिक पर्यटन के रुप में विकसित करने की माँग पूरी करना 9.कोकिलचंद धाम को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विकसित करना। 10. गंगरा ग्राम को पूर्ण शराबमुक्त ऐतिहासिक ग्राम के रूप में पहचान दिलाना। श्रद्धालुओं की साहसिक स्वीकार्यता के आधार पर अब यह विचार मंच न्यास ( ट्रस्ट) के रूप में  बिहार सरकार के  जिला निबन्धन कार्यालय जमुई द्वारा निबन्धित है जिसकी निबन्धन संख्या 4201/2022 है । गुरूद्वारा पक्की संगत जमुई जिले के मोगहार स्थित गुरूद्वारा पक्की संगत प्राचीन गुरूद्वारों में से है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां सिक्खों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर कुछ समय के लिए ठहरें थे। गुरुद्वारे में एक कमरा है। माना जाता है कि इस कमरे में रखे हुए तकिया और कोट को गुरु जी ने प्रयोग किया था। गुरुद्वारे के समीप पर ही एक पुराना किला भी है। मिन्टो टॉवर जमुई जिला मुख्यालय के पूर्व से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गिद्धौर में मिन्टो टॉवर है। यह टॉवर बिहार के प्रमुख पयर्टन स्थलों में से है। मिन्टो टॉवर का निर्माण महाराजा रामेश्‍वर प्रसाद सिंह ने करवाया था। यह टॉवर लॉर्ड मिन्टो, भारत के गर्वनर जर्नल और वाइसराय की याद में बनवाया गया था, जो 10 फ़रवरी 1960 ई॰ में यहां घूमने के लिए आए थे। काफी संख्या में पर्यटक यहां आना पसंद करते है। मिन्टो टॉवर के समीप ही एक मंदिर भी है। गिद्धौर में बना मिंटो टावर का निर्माण चंदेल वंश के अंतिम राजा प्रताप सिंह के पिता महाराजा चन्द्रचूड़ सिंह ने अंग्रेज शासक लार्ड मिंटो के सम्मान में करवाई थी। वर्ष 1907 में लार्ड मिंटो गिद्धौर आए थे। उस समय राजा ने गिद्धौर स्टेशन से मिंटो टावर तक लगभग दो कि॰मी॰ कालीन बिछवाई थी। शाही बग्गी पर सवार होकर राजा प्रताप सिंह अपने पिता महाराजा चन्द्रचूड़ सिंह के साथ लार्ड मिंटो की अगुवाई की और टावर तक आए थे। उसी दिन महराजा ने सवारी हेतु फोर्ड की नई कार मंगवाई थी। जिस पर सवार होकर टावर से राजमहल तक महाराज और लार्ड मिंटो आए थे। गिद्धौर दुर्गा मंदिर गिद्धौर ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से दो ही पहचान है। एक यहां की पुरानी रियासत तथा दूसरा दुर्गापूजा और दोनों की एक लंबी परम्परा रही है। शैलवालाओं और झरनों से भरे वन प्रांतर के मध्य बसी थी गिद्धौर नगरी। जहां चार शताब्दी से भी अधिक वर्ष पूर्व तत्कालीन राजा ने अलीगढ़ से स्थापत्य से जुड़े राज मिस्त्री को बुलाकर गिद्धौर स्थित दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया था। तब से जैनागमों में चर्चित पवित्र नदी उच्चवालिया (उलाय नाम से प्रसिद्ध) तथा नागिन नदी के संगम पर बने इस मंदिर में दुर्गा पूजा अर्चना होती आ रही है। गंगा और यमुना सरीखी इन दो पवित्र नदियों में सरस्वती स्वरुपनी दुधियाजोर मिश्रित होती है जिसे आज झाझा रेलवे के पूर्व सिग्नल के पास देखा जा सकता है। इस संगम में स्नान करने के उपरांत हरिवंश पुरान का श्रवण करने से निस्संतान दंपती को गुणवान पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के प्रारंभ होते ही सुदूर अंचल से ब्रह्मा मुहूर्त में इसी पवित्र नदी में स्नान कर नर-नारी दंडवत करते हुए इस मंदिर के द्वार पहुंचकर पूजा-अर्चना करते रहे हैं। चंदेल राजाओं के गिद्धौर राज की इस राजधानी को परसंडा के नाम से भी जाना जाता है। बिहार प्रांत के पूर्वांचल जैनागमों में आए वर्णन के अनुसार यह दुर्गा पूजा के लिए सर्व प्रतिष्ठित स्थल है। दशहरा के अवसर पर यहां के राज्याश्रद्ध मेला में कभी मल्ल युद्ध का अभ्यास, तीरंदाजी, कवि सम्मेलन, नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन हुआ करता था। मीना बाजार लगाए जाते थे। हाल के वर्षो में इसकी जगह सर्कस, थियेटर ने ले लिया है। राज्याश्रद्ध इस मेले को चंदेल वंश के उत्तराधिकारी प्रताप सिंह ने जनाश्रत घोषित कर दिया है। दशहरा के पुनीत अवसर पर अतीत को पुर्नजागृत करने के लिए गिद्धौरवासी व पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह ने गिद्धौर संस्थान गठित कर गिद्धौर सांस्कृतिक महोत्सव की रचना की थी। लेकिन उनके आकस्मिक निधन के बाद पुन: गिद्धौर सांस्कृतिक महोत्सव की परम्परा थम सी गई है। इस इलाके के हजारों लोग स्वस्थ सांस्कृतिक मनोरंजन से वंचित हो गए हैं। जैन मंदिर धर्मशाला जमुई के पश्चिम से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिंकदरा में जैन मंदिर और एक धर्मशाला स्थित है। इस धर्मशाला में कुल 65 कमरें है। मंदिर स्थित यह धर्मशाला जैन भक्तों को रहने की सुविधा उपलब्ध कराती है। यह धर्मशाला मंदिर के भीतर स्थित है। जैन मंदिर भगवान महावीर को समर्पित है। काफी संख्या में लोग मंदिर में आते हैं। इसके अलावा यह स्थान भगवान महावीर के जन्म स्थान के रूप में भी जाना जाता है। चन्द्रशेखर संग्रहालय चन्द्रशेखर संग्रहालय बहुउद्देशीय संग्रहालय है। इसकी स्थापना 1985 ई॰ में हुई थी। जमुई स्थित चन्द्रशेखर संग्रहालय की स्थापना श्री भुब्वनेशवरनाथ वर्मा की थी। पुरातात्विक वस्तुएं, टेरीकोटा सील और प्राचीन चट्टान आदि इस संग्रहालय में देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त, संग्रहालय में भगवान विष्णु, भगवान सूर्या, देवी उमा और दुर्गा की अनेक प्रतिमाएं देखी जा सकती है। यह संग्रहालय चन्द्रशेखर सिंह संग्रहालय के नाम से प्रसिद्ध है। यह संग्रहालय प्रत्येक दिन खुला रहता है। केवल सोमवार को अवकाश रहता है। खुलने का समय: सुबह 10 बजे से शाम 4.30 बजे तक काकन काकन जुमई के उत्तर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह धार्मिक केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि जैनों के नौवें तीर्थंकर सुविधिनाथ का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में भक्त यहां आते हैं। इसके अलावा यहां लोगों के लिए रहने की सुविधा भी प्रदान की गई है। प्रसिद्ध जैन मंदिर कुमार ग्राम प्राचीन देवी मंदिर के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि इंदापी जिसे इंद्रप्रस्थ के नाम से भी जाना जाता है, वह भी यहां घूमने के लिए आए थे। काली मंदिर काली मंदिर जुमई, जमुई रेलवे स्टेशन के सामने (मलयपुर) में स्थित है। यह मंदिर देवी काली को समर्पित है। प्रत्येक वर्ष दीपावली से छठ तक इस जगह पर बहुत ही प्रसिद्ध मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले को काली मेला के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर निर्माण का श्रेय मलयपुर निवासी अशोक सिंह को जाता है। उन्हीं के कठिन परिश्रम से जमुई काली मंदिर की सुन्दरता और रख-रखाव बरक़रार है। जमुई काली मंदिर जमुई ज़िले का गौरव है। धनेश्वर नाथ (महादेव सिमरिया) जिला मुख्यालय के सिकन्दरा-जमुई मुख्य मार्ग पथ पर बाबा धनेश्वर नाथ (महादेव सिमरिया) मंदिर स्थित है। बाबा धनेश्वर नाथ शिव मंदिर स्वयंभू शिवलिंग है। इसे बाबा वैद्यनाथ के उपलिंग के रूप में जाना जाता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार यह शिव मंदिर 400 दशक से भी अधिक पुराना है। जहां बिहार ही नहीं बरन दूसरे राज्य जैसे झारखंड, पश्चिम बंगाल आदि से श्रद्धालु नर-नारी पहुंचते हैं। पूरे वर्ष इस मंदिर में पूजन दर्शन, उपनयन, मुंडन आदि अनुष्ठान करने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। विशेषताएं-इस मंदिर के चारों और शिवगंगा बनी हुई है। मंदिर का मुख्य द्वार पूरब दिशा की ओर है। मंदिर परिसर में सात मंदिर है जिसमें भगवान शंकर का मंदिर गर्भगृह में अवस्थित है। ऐसी मान्यता है कि गिद्धौर वंश के तत्कालीन महाराजा पूरनमल सिंह को स्वप्न आया कि महादेव सिमरिया स्थित शिवडीह में शिवलिंग प्रकट हुआ है। जिसकी चर्चा दूर-दूर तक फैल रही है। तब महाराजा ने अपने दल-बल के साथ उक्त स्थान पर आकर विधिवत तरीके से पूजा-अर्चना कर शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। उस के बाद से यह शिवमंदिर बाबा धनेश्वर नाथ के नाम से जाना जाने लगा और पुजारियों के आजीविका के लिए महाराजा द्वारा जमीन उपलब्ध कराए गए। गिद्धेश्वर स्थान जिला मुख्यालय से लगभग १५ किलो मीटर दूर खैरा प्रखंड में गिद्धेश्वर स्थान है। कहा जाता है कि राम व रावण की लड़ाई में जब रावण-सीता का अपहरण कर लंका जा रहा था तो यही वह स्थान है जब गिद्धराज जटायु ने रावण से युद्ध किया था। आज भी यह स्थान क्षेत्र के लोगों के लिए दर्शनीय केन्द्र है। यहाँ गिद्धेश्वर महादेव मंदिर भी है जो यहाँ के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है। प्रचलित कथा के अनुसार यहां के पर्वत पर ही जटायु ने रावण से उस वक्त युद्ध किया था जब माता सीता का अपहरण कर ले जा रहा था। गुस्से में रावण ने जटायु का पंख काट डाला था और यहीं पर गिरकर मौक्ष की प्राप्ति किया था। चुकि जटायू गिद्ध था इसलिए इस स्थान का नाम गिद्धेश्वर और यहां निर्मित मंदिर का नाम गिद्धेश्वर मंदिर पड़ा। गिद्धेश्वर मंदिर का निर्माण खैरा स्टेट के तत्कालीन तहसीलदार लाला हरिनंदन प्रसाद द्वारा लगभग 100 वर्ष पूर्व किया गया है। प्रकृति के खुबसूरत वादियों में बसे गिद्धेश्वर स्थान और इसके आसपास विशाल भू-भाग को आदर्श पिकनिक स्थल के रूप में विकसित है। यहां हरे-भरे पेड़-पौधों से अच्छादित पर्वत, बीच में भव्य मंदिर, आगे शिवगंग (तालाब) तथा किउल नदी की कलकल-छलछल करती जलधारा बरबस ही श्रद्धालुओं के साथ-साथ सैलानियों को भी आकर्षित करता है। पत्नेश्वर स्थान किउल नदी तट पर पत्‍‌नेश्वर पहाड़ पर अवस्थित पत्‍‌नेश्वर नाथ मंदिर राजकाल से ही लोगों की आस्था का केन्द्र रहा है। धर्मावलंबी जनों की मानें तो यहां की पूजा करने से असाध्य रोग दूर हो जाता है। इस मंदिर के पुजारी बताते हैं कि उक्त स्थल पर स्वयं शिवलिंग अवतरित हुआ है। शिवलिंग के आसपास मंदिर का निर्माण किया गया जहां जमुई के लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। पुजारियों ने बताया कि बनैली राज स्टेट द्वारा उक्त मंदिर और आसपास का परिसर ब्राह्माणों को पूजन के लिए दिया गया। शुरुआती दौर में यहां आबादी नहीं के बराबर थी तब यहां एक साधु महात्मा आए थे। उड़ीया बाबा के नाम से मशहूर उक्त महात्मा काफी दिनों तक पत्‍‌नेश्वर पहाड़ पर रहे। उन्होंने बताया कि उन्हें गलित कुष्ठ था और देवघर बाबाधाम मंदिर में पूजा के दौरान उन्हें पत्‍‌नेश्वर में पूजा करने का स्वप्न हुआ। वे स्वयं पत्‍‌नेश्वर में पूजा के बाद स्वस्थ हुए और यहीं के होकर रह गए। उन्होंने जंगल पहाड़ के स्थल पर किउल नदी में हर रोज स्नान कर पूजा से कुष्ठ जैसे असाध्य रोगों से मुक्ति का मार्ग बताया था। बदलते वक्त के साथ यहां अब भव्य मंदिर बन गया है। हर साल सावन माह में यहां भक्त ही भगवान की परीक्षा लेते हैं। इस विशेष पूजन में छोटे से शिवलिंग को चारो ओर से घेरकर कई मन दूध तथा गंगा जल से अभिषेक कराया जाता है। इस पूजन में लगातार अभिषेक के बावजूद शिवलिंग को पूरी तरह से दूध अथवा जल में डुबाना मुश्किल होता है। इस आयोजन के दौरान भारी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। बदलते वक्त के साथ अब जमुई शहर में प्रवेश के साथ ही पत्‍‌नेश्वर पहाड़, किउल नदी के बीच पत्‍‌नेश्वर धाम में मंदिर का मनोहारी दृश्य लोगों को बरबस ही आकर्षित कर रहा है। पूरे साल यहां सैकड़ों की संख्या में शादियां और पूजा-पाठ का कार्यक्रम चलता रहता है। माँ नेतुला मंदिर जमुई मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर सिकंदरा प्रखंड के कुमार गाँव के समीप श्मशान भूमि स्थित माँ नेतुला मंदिर प्राचीन काल से ही हिंदू धर्मावलंबियों के लिए आस्था का केंद्र रहा है। हजारों वर्षो पूर्व से ही यहां नेत्र व पुत्र प्रदाता देवी के रूप में माँ नेतुला की पूजा होती आ रही है। माँ नेतुला मंदिर का इतिहास: जैन धर्म की पुस्तक कल्पसूत्र के अनुसार जैन धर्म के 24 वें र्तीथकर भगवान महावीर ने ज्ञान की प्राप्ति के लिए घर का त्याग किया था तो कुण्डलपुर से निकल कर उन्होंने पहला रात्रि विश्रम कुमार गाँव में ही माँ नेतुना मंदिर के समीप एक वट वृक्ष के नीचे किया था। लगभग 26 सौ वर्ष पूर्व घटी इस घटना और कल्पसूत्र में वर्णित माँ नेतुला की पूजा व बली प्रथा का वर्णन इस मंदिर के पौराणिक काल के होने की पुष्टि करती है। इस प्रकार हजारों वर्षो की गौरव गाथा को अपने में समेटे माँ नुतुला आज भी भक्तों की मनोकामना पूरी कर रही है। खैरा का दुर्गा खैरा का दुर्गा मंदिर न केवल ऐतिहासिक है बल्कि इसकी पौराणिक महत्ता भी है। यहां के दुर्गा मंदिर और दुर्गा पूजा से खैरा प्रखंड के अलावा जिले व अन्य जिलों के लाखों लोगों की धार्मिक आस्था और मान्यता जुड़ी है। यही कारण है कि दुर्गा पूजा के अवसर पर लाखों लोग यहां आकर दंडवत देते हैं और भक्तिभाव से पूजा अर्चना करते हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां तीन दिवसीय मेला भी लगता है। खैरा का दुर्गा मंदिर 200 वर्षो से अधिक पुराना है। इसका निर्माण स्व. राजा रावणेश्वर प्रसाद सिंह के पुत्र स्व॰ गुरुप्रसाद सिंह द्वारा कराया गया था। दुर्गा पूजा के अवसर पर हजारों लोग मध्य रात्रि से ही रानी तालाब में स्नान कर माँ दुर्गा को दंडवत देते हैं। यहाँ मन्नतें पूरी होती है खैरा के दुर्गा मंदिर के प्रति आस्था रखने वाले और भक्तिभाव से पूजन करने वालों की मन्नतें पूरी होती हैं। यही कारण है कि लाखों लोग यहां पूजा करने आते हैं। यहां अष्टमी में मध्यरात्रि से बलि प्रथा की प्रचलन है जहां हजारों की संख्याओं में पशुओं की बलि दी जाती है। यहां के मूर्तिकार और पुजारी परंपरागत हैं। आवागमन वायु मार्ग यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, पटना है। पटना से जमुई 161 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी है। गया से जमुई 136 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रेल मार्ग जमुई रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से पहुँचा जा सकता है। दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेल पथ पर स्थित जमुई स्टेशन झाझा और किउल स्टेशन के मध्य स्थित है। रेलमार्ग द्वारा जमुई पहुंचने के लिए दो दर्जन से भी अधिक गाड़ियां प्रतिदिन उपलब्ध हैं। जमुई रेलवे स्टेशन उतरकर वहां से सड़क मार्ग द्वारा जमुई शहर पहुंचा जा सकता है। इसके लिए जमुई स्टेशन से ऑटो तथा अन्य वाहनों का इस्तेमाल करना उचित रहेगा। सड़क मार्ग भारत के कई प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग द्वारा जमुई आसानी से पहुंचा जा सकता है। इन्हें भी देखें जमुई ज़िला सन्दर्भ जमुई जिला बिहार के शहर जमुई ज़िले के नगर
वाल्मीकि रामायण : क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञश्च पुत्रिकाः। क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमया‌विष्टितं जगत्॥ अर्थ: क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है। क्षमा यश है, क्षमा ही धर्म है, वास्तव में यह जगत् पूर्णतः क्षमा से ही घिरा हुआ है।। मनुस्मृति मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं: धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९२) अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही धर्म के दस लक्षण है। याज्ञवल्क्य याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं: अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।। (याज्ञवल्क्य स्मृति १.१२२) (अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति) श्रीमद्भागवत श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में सनातन धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं : सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:। अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्।। संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:। नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।। अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:। तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव।। श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:। सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।। नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:। त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।। (७-११-८ से १२ ) महात्मा विदुर महाभारत के महान यशस्वी पात्र विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं - इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ। उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान बन जाता है। महाकवि तुलसीदास जी द्वारा वर्णित धर्मरथ सुनहु सखा, कह कृपानिधाना, जेहिं जय होई सो स्यन्दन आना। सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका। बल बिबेक दम पर-हित घोरे, छमा कृपा समता रजु जोरे। ईस भजनु सारथी सुजाना, बिरति चर्म संतोष कृपाना। दान परसु बुधि सक्ति प्रचण्डा, बर बिग्यान कठिन कोदंडा। अमल अचल मन त्रोन सामना, सम जम नियम सिलीमुख नाना। कवच अभेद बिप्र-गुरुपूजा, एहि सम बिजय उपाय न दूजा। सखा धर्ममय अस रथ जाकें, जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताकें। महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होई दृढ़, सुनहु सखा मति-धीर।। (लंकाकांड) पद्मपुराण ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते। दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ।। अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते। एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत।। (अर्थात ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति और अस्तेय इन दस अंगों से युक्त होने पर ही धर्म की वृद्धि होती है।) धर्मसर्वस्वम् जिस नैतिक नियम को आजकल 'गोल्डेन रूल' या 'एथिक ऑफ रेसिप्रोसिटी' कहते हैं उसे भारत में प्राचीन काल से मान्यता है। सनातन धर्म में इसे 'धर्मसर्वस्वम्" (=धर्म का सब कुछ) कहा गया है: श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। (पद्मपुराण, शृष्टि 19/357-358) (अर्थ: धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये।) इन्हें भी देखें दशलक्षण धर्म जैन धर्म के दिगम्बर अनुयायियों द्वारा आदर्श अवस्था में अपनाये जाने वाले गुणों को दश लक्षण धर्म कहा जाता है। इसके अनुसार जीवन में सुख-शांति के लिए उत्तम क्षर्मा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य आदि दशलक्षण धर्मों का पालन हर मनुष्य को करना चाहिए जैन ग्रन्थ, तत्त्वार्थ सूत्र में १० धर्मों का वर्णन है। यह १० धर्म है: ·        उत्तम क्षमा ·        उत्तम मार्दव ·        उत्तम आर्जव ·        उत्तम शौच ·        उत्तम सत्य ·        उत्तम संयम ·        उत्तम तप ·        उत्तम त्याग ·        उत्तम आकिंचन्य ·        उत्तम ब्रह्मचर्य दसलक्षण पर्व पर इन दस धर्मों को धारण किया जाता है।जैन धर्म में इन दस धर्मों की पूजा उपासना की जाती है और नियम रूप से मन दिन के हिसाब से माना भी जाता है जो क्रमशः इस प्रकार मनाये जाते है| (आशीष जैन) उत्तम क्षमा ·        (क) हम उनसे क्षमा मांगते हैं, जिनके साथ हमने बुरा व्यवहार किया हो और उन्हें क्षमा करते हैं, जिन्होंने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया हो॥ सिर्फ इन्सानों  के लिए ही  नहीं,  बल्कि हर एक- इन्द्रिय से पांच- इन्द्रिय जीवों के प्रति,   भी ऐसा  ही क्षमा-भाव रखते हैं ॥ ·        (ख) उत्तम क्षमा धर्म हमारी आत्मा को सही राह खोजने में और क्षमा को जीवन और व्यवहार में लाना सिखाता है! जिससे सम्यक दर्शन प्राप्त होता है ॥ सम्यक दर्शन वो चीज है, जो आत्मा को कठोर तप त्याग की कुछ समय की यातना सहन करके परम आनंद मोक्ष को पाने का प्रथम मार्ग है ॥ इस दिन बोला जाता है- सबको क्षमा :: सबसे क्षमा ॥ उत्तम मार्दव भाद्रमाह के सुद छठ को दिगंबर जैन समाज के पर्वाधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का दूसरा दिन होता है! ·        (क) अकसर धन, दौलत, शान और शौकत इन्सान को अहंकारी और अभिमानी बना देता है, ऐसा व्यक्ति दूसरों को छोटा और अपने आप को सर्वोच्च मानता है॥ ये सभी चीजें नाशवान हैं! ये सभी चीजें एक दिन आप को छोड देंगी या फिर आपको एक दिन मजबूरन इन चीजों को छोडना ही पडेगा ॥ नाशवंत चीजों के पीछे भागने से बेहतर है कि अभिमान और परिग्रह (सभी बुरे कर्मों में बढोतरी करते हैं ) को छोडा जाये और सभी से विनम्र भाव से पेश आएँ! सभी जीवों के प्रति मैत्री-भाव रखें, क्योंकि सभी जीवों को अपना जीवन जीने का अधिकार है ॥ ·        (ख) मार्दव धर्म हमें अपने आप की सही वृत्ति को समझने का जरिया है! सभी को एक न एक दिन जाना ही है, तो फिर यह सब परिग्रहों का त्याग करें और बेहतर है कि खुद को पहचानों और परिग्रहों का नाश करने के लिए खुद को तप, त्याग के साथ साधना रूपी भट्टी में झोंक दो, क्योंकि इनसे बचने का और परमशांति व मोक्ष को पाने का साधना ही एकमात्र विकल्प है ॥ उत्तम आर्जव भाद्रमाह के सुद सप्तमी को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का तीसरा दिन होता है! ·        (क) हम सब को सरल स्वभाव रखना चाहिए, बने उतना कपट को त्याग करना चाहिए॥ ·        (ख) कपट के भ्रम में जीना दुखी होने का मूल कारण है॥ आत्मा ज्ञान, खुशी, प्रयास, विश्वास जैसे असंख्य गूणों से सिंचित है! उस में इतनी ताकत है कि *कैवल्य- ज्ञान* को प्राप्त कर सके॥ उत्तम आजॅव धर्म हमें सिखाता है कि मोह-माया, बुरे  कमॅ सब छोड -छाड कर सरल स्वभाव के साथ परम आनंद मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं ॥ उत्तम शौच भाद्रमाह के सुद अष्टमी को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का चौथा दिन होता है! ·        (क) किसी चीज़ की इच्छा होना इस बात का प्रतीक है कि हमारे पास वह चीज नहीं है! तो बेहतर है कि हम अपने पास जो कुछ है, उसके लिए परमात्मा का शुक्रिया अदा करें और संतोषी बनकर उसी में काम चलायें ॥ ·        (ख) भौतिक संसाधनों और धन- दौलत में खुशी खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है। उत्तम शौच धमॅ हमें यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है, उसी में खुश रहो! परमात्मा का हमेशा शुक्रिया मानों और अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है ॥ उत्तम सत्य भाद्रमाह के सुद नवमी को दिगंबर जैन समाज के पर्वाधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का पाँचवाँ दिन होता है ·        (क) झूठ बोलना बुरे कर्म में बढोतरी करता है ॥ ·        (ख) सत्य जो 'सत' शब्द से आया है जिसका मतलब है वास्तविक होना॥ उत्तम सत्य धर्म हमें यही सिखाता है कि आत्मा की प्रकृति जानने के लिए सत्य आवश्यक है और इसके आधार पर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है ॥ अपने मन आत्मा को सरल और शुद्ध बना लें तो सत्य अपने आप ही आ जाएगा ॥ उत्तम संयम भाद्रमाह के सुद दशमी को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का छठा दिन होता है! इस दिन को धूप दशमी के रूप में मनाया जाता है! लोग इस दिन बैंड बाजों के साथ घर से धूप लेकर जाते हैं और मंदिर में भगवान के दर्शन के साथ धूप चढा कर खूशबू फैलाते हैं और कामना करते हैं कि इस धूप की तरह ही हमारा जीवन भी हमेशा महकता रहे॥ पसंद नापसंद ग़ुस्से का त्याग करना। इन सब से छुटकारा तब ही मुमकिन है जब अपनी आत्मा को इन सब प्रलोभनों से मुक्त करें और स्थिर मन के साथ संयम रखें ॥ इसी राह पर चलते परम आनंद मोक्ष की प्राप्ति मुमकिन है ॥ उत्तम तप भाद्रमाह के सुद ग्यारस को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का सातवाँ दिन होता है! ·        (क) तप का मतलब सिर्फ उपवास में भोजन नहीं करना, सिफॅ इतना ही नहीं, बल्कि तप का असली मतलब है कि इन सभी क्रिया-कलापों के साथ अपनी इच्छाओं और ख्वाहिशों को वश में रखना! ऐसा तप अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है ॥ ·        (ख) साधना इच्छाओं की वृद्धि नहीं करने का एकमात्र मागॅ है ॥ पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने करीब छह महीनों तक ऐसी तप-साधना (बिना खाए बिना पिए) की थी और परम आनंद मोक्ष को प्राप्त किया था ॥ हमारे तीर्थंकरों जैसी तप-साधना करना इस जमाने में शायद मुमकिन नहीं है, पर हम भी ऐसी ही भावना रखते हैं और पर्यूषण पवॅ के 10 दिनों के दौरान उपवास (बिना खाए बिना पिए), एकाशन (एकबार खाना-पानी) करतें हैं और परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करने की राह पर चलने का प्रयत्न करते हैं ॥ उत्तम त्याग भाद्रमाह के सुद बारस को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का आठवाँ दिन होता है! ·        (क) 'त्याग' शब्द से ही पता लग जाता है कि इसका मतलब छोडना है और जीवन को संतुष्ट बना कर अपनी इच्छाओं को वश में करना है! यह न सिर्फ अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है, बल्कि बुरे  कर्मों का नाश भी करता है ॥ छोडने की भावना जैन धर्म में सबसे अधिक है, क्योंकि जैन-संत सिफॅ अपना घर-बार ही नहीं, बल्कि (यहां तक कि) :अपने कपडे भी त्याग देता है और पूरा जीवन दिगंबर मुद्रा धारण करके व्यतीत करता है ॥ इन्सान की शक्ति इससे नहीं परखी जाती है कि उसके पास कितनी धन -दौलत है, बल्कि इससे परखी जाती है कि उसने कितना छोडा है, कितना त्याग किया है ! ·        (ख) उत्तम त्याग धर्म हमें यही सिखाता है कि मन को संतोषी बनाकर के ही इच्छाओं और भावनाओं का त्याग करना मुमकिन है ॥ त्याग की भावना भीतरी आत्मा को शुद्ध बनाने पर ही होती है ॥ उत्तम आकिंचन्य भाद्रमाह के सुद तेरस को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का नौवाँ दिन होता है ·        (क) आँकिंचन हमें मोह को त्याग करना सिखाता है ॥ दस शक्यता है, जिनके हम बाहरी रूप में मालिक हो सकते है; जमीन, घर, चाँदी, सोना, धन, अन्न, महिला नौकर, पुरुष नौकर, कपडे और संसाधन इन सब का मोह न रखकर ना सिफॅ इच्छाओं पर काबू रख सकते हैं बल्कि इससे गुणवान कर्मों मे वृद्धि भी होती है ॥ ·        (ख) आत्मा के भीतरी मोह जैसे गलत मान्यता, गुस्सा, घमंड, कपट, लालच, मजाक, पसंद-नापसंद, डर, शोक, और वासना इन सब मोह का त्याग करके ही आत्मा को शुद्ध बनाया जा सकता है ॥ सभी मोह, प्रलोभनों और परिग्रहों को छोडकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है ॥ उत्तम ब्रह्मचर्य भाद्रमाह के सुद चौदस को दिगंबर जैन समाज के पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का दसवाँ दिन होता है! इस दिन को अनंत चतुर्दशी कहते हैं!  इस  दिन को लोग परमात्मा के समक्ष अखंड दिया लगाते हैं! ·        (क) ब्रह्मचर्य हमें सिखाता है कि उन परिग्रहों का त्याग करना, जो हमारे भौतिक संपर्क से जुडी हुई हैं! जैसे जमीन पर सोना न कि गद्दे तकियों पर, जरुरत से ज्यादा किसी वस्तु का उपयोग न करना, व्यय, मोह, वासना ना रखते हुए सादगी से जीवन व्यतीत करना ॥ कई सन्त इसका पालन करते हैं और विशेषकर जैन-संत शरीर, जुबान और दिमाग से सबसे ज्यादा इसका ही पालन करते हैं ॥ ·        (ख) 'ब्रह्म' जिसका मतलब आत्मा, और 'चर्या' का मतलब "रखना", इसको मिलाकर ब्रह्मचर्य शब्द बना है, ब्रह्मचर्य का मतलब अपनी आत्मा में रहना है ॥ ब्रह्मचर्य का पालन करने से आपको पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान और शक्ति प्राप्त होगी और ऐसा न करने पर, आप सिर्फ अपनी इच्छाओं और कामनाओं के गुलाम ही रहेंगे॥ मिच्छामी दूक्कडम अनंत चतुर्दशी के दूसरे दिन मंदिर में सभी लोग, भक्त-जन एक साथ प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल मे किये गए पाप और कटु वचन से किसी के दिल को जाने-अनजाने ठेस पहुंची हो, तो उसके लिए एक-दूसरे को क्षमा करते हैं और एक-दूसरे से क्षमा माँगते है और हाथ जोड कर गले मिलकर मिच्छामी दूक्कडम कहते हैं। जो लोग उपस्थित नहीं होते, उनसे दूसरे दिन क्षमा-याचना करते हैं। बाहरी कड़ियाँ सनातन मानव-धर्म पूर्णता देता है धर्म (दैनिक जागरण) धर्म हिन्दू धर्म
2017-18 ज़ोनल टी-20 लीग भारत में एक आगामी ट्वेंटी 20 क्रिकेट प्रतियोगिता है यह 7 से 16 जनवरी 2018 तक खेला जाने वाला है। जनवरी और फरवरी 2017 में आयोजित 2016-17 इंटर स्टेट ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट के बाद यह टूर्नामेंट का दूसरा संस्करण होगा। फिक्स्चर मध्य ज़ोन पूर्वी ज़ोन उत्तर ज़ोन दक्षिण ज़ोन पश्चिम ज़ोन सन्दर्भ घरेलू क्रिकेट प्रतियोगितायें २०१८ में क्रिकेट
नाखून मनुष्यों के हाथ तथा पांव की अंगुलियों के आख़िरी हिस्से के ऊपरी भाग में एक ठोस कवचनुमा आवरण होता है। यह वानरों और कुछ अन्य स्तनपाइयों में भी विद्यमान होता है। अनेक जीवों में नाखून पंजों के समान होता है। यह एक कठोर प्रोटीन कॅराटिन से बना होता है पशुओं के सींग भी इसी पदार्थ के होते हैं। रोग पैर की उंगलियों। पंजे के आकार को बदल सकता है कि एक बीमारी। के काटने पर लोगों के लिए: दोहराया। या राहत खांचे (लकीरें) आ सकते हैं। लोगों के लिए छोटे झरोखों। तुम नाखून का रंग बदल सकते हैं। जो बीमारियों को पकड़ने की संभावना पर आधारित है। नाखून धीरे धीरे बढ़ने के बाद से, किसी भी बीमारी के बाद से, इससे पहले हम देखते कि पता लगा सकते हैं कितनी देर .. उस पर लग रहा है। आनुवंशिक विश्लेषण करने के लिए आसान नाखून का एक टुकड़ा, परीक्षण करके चयापचय विकारों की पहचान। नाखूनों पर कलाकारी महिलाएँ नाखूनों पर रंग लगाकर उसे सुदंर बनाने व दिखाने का काम करती हैं। विभिन्न मानव समाजों में शताब्दियों से रंगों की सहायता से विभिन्न प्रकार के चित्र व संरचनाएँ उकेर कर नाखूनों को चमकीला व सुंदर बनाया जाता है। नाखूनों को रंगना शरीर के सजावट का एक हिस्सा है। मानव शरीर अंग
कोटर (Kotar) भारत के मध्य प्रदेश राज्य के सतना ज़िले में स्थित एक नगर है। इन्हें भी देखें सतना ज़िला सन्दर्भ मध्य प्रदेश के शहर सतना ज़िला सतना ज़िले के नगर
लामडिंग (Lumding) भारत के असम राज्य के होजाई ज़िले में स्थित एक शहर है। इन्हें भी देखें होजाई ज़िला सन्दर्भ असम के नगर होजाई ज़िला होजाई ज़िले के नगर
पाटण (Patan) भारत के गुजरात राज्य के पाटण ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है। विवरण पाटण एक प्राचीन नगर है जिसकी स्थापना ७५६ ई में वनराज चावडा ने की थी। राजा ने इसका नाम 'अन्हिलपुर पाटण' या 'अन्हिलवाड़ पाटन' रखा था। यह मध्यकाल में गुजरात की राजधानी हुआ करता था। इस नगर में बहुत से ऐतिहास स्थल हैं जिनमें हिन्दू एवं जैन मन्दिर, रानी की वाव आदि प्रसिद्ध हैं। पाटण का प्राचीन नाम 'अण्हीलपुर ' है। प्राचीन समय में पाटण भील प्रदेश के रूप में जाना जाता था और वे अण्हीलपुर के शासक थे। जब पचासर के चावड़ा गुर्जर अपना राज्य कल्याण कटक के चालुक्य भुहड़ से हार गए तब उनकी पत्नी अपने नन्हे बच्चे को लेकर भील प्रदेश में शरण लेने आयी , जहां भीलों ने उनकी सहायता करी और उस बच्चे को वनराज नाम दिया क्योंकि वह जंगल में भीलों के साथ बड़ा हुआ था , आगे चलकर वहीं वनराज चावड़ा , राजा अण्हील भील के बाद अण्हीलपुर का शासक बना। प्राचीन काल में इसे मुसलमानों ने खंडहर बना दिया था, उन्हीं खंडहरों पर पुन: नवीन पाटन ने प्रगति की है। महाराज भीम की रानी उद्यामती का बनवाया भवन खंडहर अवस्था में अब भी विद्यमान है। नगर के दक्षिण में एक प्रसिद्ध खान सरोवर है। एक जैन मंदिर में वनराजा की मूर्ति भी दर्शनीय है। नवीन पाटन मराठा लोगों के प्रयास का फल है। यह सरस्वती नदी से डेढ किमी की दूरी पर है। जैन मंदिरों की संख्या यहाँ एक सौ से भी अधिक है, पर ये विशेष कलात्मक नहीं हैं। खादी के व्यवसाय में इधर काफी उन्नति हुई है। इन्हें भी देखें रानी की वाव हेमचन्द्राचार्य उत्तर गुजरात विश्वविद्यालय पाटण ज़िला पाटन, मध्य प्रदेश बाहरी कड़ियाँ पाटण के ऐतिहासिक स्थलों ने मन मोह लिया यूनेस्को ने गुजरात के पाटण में स्थित ११ शताब्दी की रानी की वव (बावली) को विश्व धरोहर माना सन्दर्भ गुजरात के शहर पाटण ज़िला पाटण ज़िले के नगर
अनिरुद्ध वृष्णिवंशीय कृष्ण के पोता और प्रद्युम्न के पुत्र। इनके रूप पर मोहित होकर असुरों की राजकुमारी उषा, जो बाण की कन्या थी, इन्हें अपनी राजधानी शेणितपुर उठा ले गए। कृष्ण ओर बलराम बाण को युद्ध में परास्त कर अनिरुद्ध को उषा सहित द्वारका ले लाए। महाभारत के पात्र
गुलाम रसूल सन्तोष (१९२९-१९९७) कश्मीर के चर्चित चित्रकार थे जिनकी रचनाओं में शैव दर्शन का प्रभाव था। कश्मीर के लोग श्रीनगर के लोग ◆ रसूल संतोष का जन्म 1929 को श्री नगर कश्मीर में हुआ. शिक्षा.1954 में ललित कला की शिक्षा बड़ौदा से प्राप्त की विषय. कश्मीर के शैवधर्म से प्रेरित रही अध्ययन. तांत्रिक कला (रहस्मय कला) चित्रों की विशेषता..कामुकता की जीवंतता,आध्यात्मिकता की ऊर्जा दिखाई देती है ★ G R संतोष कश्मीर में प्रोग्रेसिव आर्ट्स एसोशिएशन में शामिल हो गए पुरस्कार. 1973 में ललित कला अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया 2. 1977 में पदम्श्री पुरस्कार मिला 3.1984 कलाकार का वर्ष पुरस्कार मिला ● प्रमुख पेंटिंग.. श्रीयंत्र,कश्मीर,तत्व आदि
सिहांदा गाँव बालेसर से लगभग १२ किलोमीटर दूर हैं | यह जोधपुर जिले के शेरगढ़ तहसील के अंतर्गत आता हैं | इसकी जनसंख्या करीब ४००० हैं | यह मान्यता हैं की यहाँ पहले शिया जाती के मुसलमान रहते थे इसलिए इस गाँव का नाम सिहांदा पड़ा | जाटी भांडु, तिबना, खिरजां, तेना,हनुवंत नगर, सोइन्त्रा आदि इसके पड़ोसी गाँव हैं |यहाँ का पिन कोड ३४२०२८ हैं | यहाँ पर भगवान विश्वकर्मा, करणी माता, व सती माताजी जी का प्रसिद्ध मंदिर हैं | इसके अलावा यहाँ एक प्राथमिक चिकित्सालय , आँगनवाड़ी केंद्र, तथा एक उच्च माध्यमिक विद्यालय हैं | जोधपुर ज़िले के गाँव
नहरौला खैर, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। भूगोल जनसांख्यिकी यातायात आदर्श स्थल शिक्षा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ अलीगढ़ जिला के गाँव
सिट्रिक अम्ल (Citric acid) एक दुर्बल कार्बनिक अम्ल है। नींबू, संतरे और अनेक खट्टे फलों में सिट्रिक अम्ल और इसके लवण पाए जाते हैं। जांतव पदार्थों में भी बड़ी अल्प मात्रा में यह पाया जाता है। नींबू के रस से यह तैयार होता है। नींबू के रस में ६ से ७ प्रतिशत तक सिट्रिक अम्ल रहता है। नींबू के रस को चूने के दूध से उपचारित करने से कैल्सियम सिट्रेट का अवक्षेप प्राप्त होता है। अवक्षेप को हल्के सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ उपचारित करने से सिट्रिक अम्ल उन्मुक्त होता है। विलयन के उद्वाष्पन से अम्ल के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं जिनमें जल का एक अणु रहता है। शर्करा के किण्वन से भी सिट्रिक अम्ल प्राप्त होता है। रसायनशाला में सिट्रिक अम्ल का संश्लेषण भी हुआ है। यह वस्तुत: २-हाइड्रोक्सि-प्रोपेन १: २: ३ ट्राइकार्बोसिलिक अम्ल है। गुणधर्म सिट्रिक अम्ल बड़े-बड़े समचतुर्भुजीय प्रिज्म का क्रिस्टल बनाता है। यह जल और ऐल्कोहॉल में घुल जाता है पर ईथर में बहुत कम घुलता है। क्रिस्टल में क्रिस्टल जल रहता है। गरम करने से १३०° सें. पर यह अजल हो जाता है और तब १५३° सें. पर पिघलता है। इससे ऊँचे ताप पर यह विघटित होना शुरू करता है। सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल से सावधानी से तपाने पर भी विघटित होता है। यह त्रिक्षारक अम्ल है और तीन श्रेणियों का लवण बनाता है। कुछ लवण जल में विलेय, कुछ अल्प विलेय और कुछ अविलेय होते हैं। सिट्रिक अम्ल का उपयोग रंगबंधक के रूप में, रंगसाजी में, लेमोनेड सदृश पेयों को बनाने में और खाद्यों में होता है। इसका अणुसूत्र और संरचना सूत्र यह है: उपयोग सिट्रिक अम्ल प्राकृतिक संरक्षक (natural preservative) है। यह भोजन एवं मृदु पेयों में खट्टापन लाने के लिये डाला जाता है। जैवरसायन में इसका महत्व इसलिये हैं कि यह सभी सभी जीवों के उपापचय चक्र पैदा होता है। यह पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाये सफाई का काम करने के लिये उपयुक्त है। जल को मृदु करने के लिये बाहरी कड़ियाँ The European Citric Acid Manufacturers Association NextBio Citric Acid Entry Citric acid analysis - free spreadsheet for titration of acids and pH calculation Applications of Citric Acid MSDS sheet for Citric Acid घरेलू रसायन हाइड्रॉक्सी अम्ल
वल्कनीकरण (Vulcanization या vulcanisation) एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें गंधक या इसी प्रकार का कोई दूसरा पदार्थ मिला देने से रबर या संबंधित बहुलकों को अपेक्षाकृत अधिक टिकाऊ पदार्थ में बदल दिया जाता है। इन पदार्थों के मिलाने से रबर में मौजूद बहुलक शृंखलाएं परस्पर 'क्रॉसलिंकित' (क्रॉसलिंक्ड) हो जाती हैं। वल्कित पदार्थ कम चिपचिपा होता है एवं इसके यांत्रिक गुण अधिक श्रेष्ठ होते हैं। टायर, जूतों के 'सोल', होज पाइप, हॉकी पक एवं अनेकों सामान वल्कित रबर के ही बनते हैं। 'वल्कन' नाम रोम के 'आग के देवता' का नाम है। रबर का वल्कनीकरण महत्व का प्रक्रम है। इससे शुद्ध रबर के अनेक दोषों का निराकरण हो जाता है, जिससे रबर को उपयोगिता बढ़ जाती है। वल्कनीकरण के लिए कच्चे रबर को गंधक के साथ लगभग १४०° सें. पर तीन से चार घंटे तक गरम करते हैं। गंधक के साथ त्वरक को मिला देने से वल्कनीकरण शीघ्र संपन्न हो जाता और रबर में कुछ अधिक उपयोगी गुण भी आ जाते हैं। त्वरक की अत्यंत अल्प मात्रा लगती है। कुछ त्वरकों से तो सामान्य ताप पर ही वल्कनीकरण हो जाता है। वल्कनीकरण से भौतिक गुणों के साथ साथ रबर के रासायनिक गुणों में भी परिवर्तन हो जाता है। वल्कनीकरण में ०.१५ प्रतिशत से ३२ प्रतिशत गंधक इस्तेमाल हो सकता है। वल्कनीकृत रबर का गुण वल्कनीकरण के ढंग पर बहुत कुछ निर्भर करता है। वल्कनीकृत रबर पर पानी का कोई असर नहीं होता। यह चिपचिपा नहीं होता। वितानक्षमता और दैर्ध्य बढ़ जाता है। विलायकों, ऊष्मा, विदरण और अपघर्षण के प्रति प्रतिरोध बढ़ जाता है। वैद्युत गुण बहुत कुछ बदल जाता है। वल्कनीकरण प्रेस में, या भाप की उपस्थिति में, या शुष्क ताप पर संपन्न हाता है। वल्कनीकरण में गंधक, रबर के साथ रसायनत: संयुक्त होता है। इतिहास उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर में अनेक वैज्ञानिक ऐसी रबर तैयार करने की कोशिश में लगे थे, जिसे लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके और जो मौसम या तापमान से ज्यादा प्रभावित न हो। अमेरिकी विज्ञानी चार्ल्स गुडइयर भी इन्हीं वैज्ञानिकों में से एक थे, जो सालों से इस दिशा में प्रयोग कर रहे थे। वर्ष 1839 में रबर व सल्फर के मिश्रण के साथ ऐसे ही एक प्रयोग के दौरान उनका यह मिश्रण गर्म स्टोव पर गिर गया, लेकिन यह देखकर उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा कि स्टोव की गर्मी से पिघलने के बजाय मिश्रण चमड़े जैसा सख्त हो गया और इसका लचीलापन भी बरकरार था। बाद के प्रयोगों से साबित हो गया कि रबर के इस नए पॉलीमर को भीषण ठंड में रखा जाए, तब भी इसका लचीलापन नहीं जाता। इस तरह यह वल्कित रबर (वल्कनाइज्ड रबर) अस्तित्व में आई, जिसका टायर-ट्यूब, रबर बैंड, वाटरप्रूफ कोट व फुटवियर तथा गुब्बारे इत्यादि बनाने में व्यापक इस्तेमाल होता है। रासायनिक प्रक्रिया रबर
उत्तर प्रदेश (भारत )का गाँव हैं।जो सन्त कबीर नगर जिले के मेंहदावल तहसील में हैं। इस गाँव की जनसंख्या २३१३ हैं। उत्तर प्रदेश के गाँव
भीमुनिपट्टनम (Bheemunipatnam) या भीमिली (Bheemili) भारत के आन्ध्र प्रदेश राज्य के विशाखपटनम ज़िले में स्थित एक नगर है। यह विशाखपटनम से पूर्वोत्तर में बंगाल की खाड़ी से तटस्थ है और यहाँ गोस्तनी नदी का सागर से नदीमुख है। चित्रदीर्घा इन्हें भी देखें विशाखपटनम गोस्तनी नदी विशाखपटनम ज़िला सन्दर्भ आन्ध्र प्रदेश के नगर विशाखपटनम ज़िला विशाखपटनम ज़िले के नगर
उत्तर प्रदेश राज्य राजमार्ग १ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक राज्य राजमार्ग है। १५४.१३ किलोमीटर लम्बा यह राजमार्ग सोनौली नगर को बलिया से जोड़ता है। इसे सोनौली-नौतनवा-गोरखपुर-देवरिया-बलिया मार्ग भी कहा जाता है। यह महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया और बलिया जिलों से होकर गुजरता है। मार्ग राज्य राजमार्ग १ नेपाल सीमा से सटे सोनौली नगर से शुरू होता है और नौतनवा होते हुए कोल्हुई तक दक्षिण-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ता है। कोल्हुई से यह दक्षिण-पूर्व की और मुड़ता है, और आनंद नगर पहुंचता है, जहां राज्य राजमार्ग १ए और राज्य राजमार्ग ८६ इसे काटते हैं। आनंद नगर से थोड़ा आगे ही राष्ट्रीय राजमार्ग ७३० इसे काटता है। दक्षिण-पूर्व में आगे बढ़ते-बढ़ते यह गोरखपुर और देवरिया पहुंचता है। देवरिया से थोड़ा आगे यह घाघरा नदी को पार करता है, और फिर बलिया में राष्ट्रीय राजमार्ग ३१ के चौराहे पर समाप्त हो जाता है। महत्वपूर्ण स्थल रामघर ताल, गोरखपुर इन्हें भी देखें राज्य राजमार्ग उत्तर प्रदेश के राज्य राजमार्गों की सूची बाहरी कड़ियाँ उत्तर प्रदेश राज्य राजमार्ग प्राधिकरण का मानचित्र सन्दर्भ उत्तर प्रदेश के राज्य राजमार्ग
अमीरा बिंत एडन बिन नायेफ अल-तवील अल-ओतैबी (जन्म 6 नवंबर 1983) सऊदी अरब की परोपकारी और पूर्व राजकुमारी, उनकी वर्तमान शाही सऊद वंश से कोई संबद्धता नहीं वो ओतैबी जनजाति में जन्मी थी उसकी शादी राजकुमार अल वलीद बिन तलाल अल सऊद से हुई थी जिस कारण अंग्रेजी भाषा के प्रेस में उन्हें राजकुमारी अमीरा अल-तवील के नाम से भी जाना जाता है। अमीरा सिलाटेक बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ की सदस्य हैं और वर्तमान में उन्होंने अमीराती अरबपति खलीफा बिन बत्ती अल मुहाई से शादी की है। उसने सऊदी अरब में महिलाओं के अधिकार की वकालत की है। जीवन रियाद, सऊदी अरब अल-तवी में पैदा हुआ थी। उसके पिता एडन बिन नायेफ अल-तवील अल-ओतैबी हैं। उनकी परवरिश उनकी तलाकशुदा मां और उनके दादा-दादी ने रियाद में की थी। 18 साल की उम्र में वह राजकुमार अलवलीद बिन तलाल से मिली, जो आदमी उससे 28 साल बड़ा है, जबकि एक स्कूल पेपर के लिए एक साक्षात्कार आयोजित करता है। आखिरकार, उन्होंने 2008 में शादी कर ली और बाद में नवंबर 2013 में तलाक हो गया। प्रिंस अलवलीद बिन तलाल अल सऊद के तलाक के बाद से, वह अब एक राजकुमारी नहीं है और अपने पूर्व पति के शाही घराने से भी संबंधित नहीं है। न्होंने कंपैरिटिव रिलिजन की पढ़ाई की है. अमीरा कहती हैं कि उन्होंने हिंदू, यहूदी, ईसाई धर्म के बारे में भी एजुकेशन हासिल की है। संदर्भ बाहरी कड़ियाँ अलवलीद बिन तलाल फाउंडेशन वेबसाइट चार्ली रोज के साथ राजकुमारी अमीराह अल-तवेल साक्षात्कार अलवलीद फाउंडेशन की वेबसाइट पर राजकुमारी अमीरा की प्रोफाइल [अमीरा अल-तवील ट्विटर पर] 1987 में जन्मे लोग जीवित लोग अरब के लोग
बिग बॉस हल्ला बोल बिग बॉस के 8वें संस्करण के समाप्त होने के बाद उसे और बढ़ाने के लिए बनाया गया था। यह कलर्स पर उसी समय रात 9 बजे से 10 बजे तक देता था। इस धारावाहिक में गौतम गुलाटी ने इस धारावाहिक में जीत गए और करिश्मा तन्ना व प्रीतम सिंह क्रमश: बिना निस्कासन के रहे। जिसमें 50 लाख के विजेता गौतम गुलाटी और 25 लाख प्रीतम सिंह ने जीता। फराह खान ने शो के नए प्रारूप की मेजबानी की, क्योंकि सलमान ने बजरंगी भाईजान के फिल्मांकन शेड्यूल के कारण शो को अलविदा कह दिया। निर्माण बिग बॉस का 8वां संस्करण जनवरी में समाप्त हो चुका था। लेकिन कलर्स में जो नया धारावाहिक आने वाला था उसके बनने में देरी होने के कारण इस धारावाहिक को 1 महीने के लिए बढ़ा दिया गया। जिसका नाम बिग बॉस हल्ला बोल रखा गया। इसके अलावा बिग बॉस के घर में केवल 5 लोग ही बचे थे। इस कारण उस घर में अन्य संस्करण के 5 लोगों को लाया गया। इसके पश्चात उन्हे कार्य के अनूसार जगह मिलता और साथ ही तबादला का भी एक कार्य जोड़ा गया जिसमें घर के लोग किसी एक को विजेता से दावेदार में बदल सकते थे। इस धारावाहिक में सलमान खान ही प्रस्तुत करने वाले थे लेकिन जब इस धारावाहिक को एक महीने और बढ़ा दिया गया तो उनके पास का समय जो किसी और कार्य का था। इस कारण वह अपने कार्य में चले गए और इस धारावाहिक को फराह खान के द्वारा प्रस्तुत किया गया। घर के सदस्य घर चैंपियंस करिश्मा तन्ना गौतम गुलाटी प्रीतम सिंह आरजे अली कुली मिर्जा डिंपी गांगुली चैलेंजर्स पांच चैलेंजर पिछले सीज़न से खिताब के लिए दिग्गजों के रूप में लौटे। जबकि दो हाउसमेट्स सीजन 2 से और एक सीजन 5,6 और 7 प्रत्येक से चुने गए थे। सीजन 1,3 और 4 से कोई समावेशन नहीं किया गया था। एजाज खान महक चहल राहुल महाजन संभावना सेठ सना खान सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ बिगबॉस की आधिकारिक वेबसाइट कलर्स चैनल के कार्यक्रम बिग बॉस भारतीय वास्तविकता टेलीविजन श्रृंखला बिग बॉस हिंदी
जितिया एक व्रत है जिसमें निर्जला (बिना पानी के) उपवास पूरे दिन किया जाता है और माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र,कल्याण के लिए मनाया जाता है। बिक्रम संवत के आश्विन माह में कृष्ण-पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन-दिवसीय त्योहार मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से नेपाल के मिथिला और थरुहट, भारतीय राज्यों बिहार , झाड़खंड , उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के नेपाली लोगों द्वारा मनाया जाता है। इसके अलावा, यह व्यापक रूप से पूर्वी थारू और सुदूर-पूर्वी मधेसी लोगों द्वारा मानाया जाता है। नियम :- व्रत के दिन सोया नहीं जाता है और कुछ खाया नहीं जाता है। विवरण हिंदू विक्रम संवत के अश्विन माह में कृष्ण पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन दिन तक चलने वाला त्योहार मनाया जाता है। जिवितपुत्रिका के पहले दिन को नहाई-खाई के नाम से जाना जाता है। उस दिन माताएं स्नान करने के बाद ही भोजन ग्रहण करती हैं। जिवितपुत्रिका दिवस पर, एक सख्त उपवास, जिसे खुर जितिया कहा जाता है, पानी के बिना मनाया जाता है। तीसरे दिन व्रत का समापन पारन के साथ होता है, जो दिन का पहला भोजन होता है। मिथिला , थरुहट , पूर्वोत्तर बिहार और पूर्वी नेपाल के क्षेत्र में, विभिन्न प्रकार के भोजन और एक विशेष त्योहार विनम्रता भोर (करी और सफेद चावल), नोनी का साग और मडुआ की रोटी तैयार की जाती है। पश्चिमी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और नेपाल के भोजपुरी क्षेत्र में, नोनी का साग (गर्मियों के पुसलाने ) , मारुवा की रोटी और तोरी की सब्जी के साथ पारन किया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से नेपाल और बिहार , झाड़खंड और भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी और मैथिली भाषी क्षेत्रों में मनाया जाता है । कथा जिवितपुत्रिका व्रत कथा यह माना जाता है कि एक बार, एक गरुड़ और एक मादा लोमड़ी नर्मदा नदी के पास एक हिमालय के जंगल में रहते थे। दोनों ने कुछ महिलाओं को पूजा करते और उपवास करते देखा, और खुद भी इसे देखने की कामना की। उनके उपवास के दौरान, लोमड़ी भूख के कारण बेहोश हो गई और चुपके से भोजन किया। दूसरी ओर, चील ने पूरे समर्पण के साथ व्रत का पालन किया और उसे पूरा किया। परिणामस्वरूप, लोमड़ी से पैदा हुए सभी बच्चे जन्म के कुछ दिन बाद ही खत्म हो गए और चील की संतान लंबी आयु के लिए धन्य हो गई। जीमूतवाहन इस कहानी के अनुसार जीमूतवाहन गंधर्व के बुद्धिमान और राजा थे। जीमूतवाहन शासक से संतुष्ट नहीं थे और परिणामस्वरूप उन्होंने अपने भाइयों को अपने राज्य की सभी जिम्मेदारियाँ दीं और अपने पिता की सेवा के लिए जंगल चले गए। एक दिन जंगल में भटकते हुए उसे एक बुढ़िया विलाप करती हुई मिलती है। उसने बुढ़िया से रोने का कारण पूछा, जिस पर उसने उसे बताया कि वह सांप (नागवंशी) के परिवार से है और उसका एक ही बेटा है। एक शपथ के रूप में, हर दिन, एक सांप को भोजन के रूप में पक्षीराज गरुड़ को चढ़ाया जाता है और उस दिन उसके बेटे को अपना भोजन बनने का मौका मिला। उसकी समस्या सुनने के बाद, जिमुतवाहन ने उसे सांत्वना दी और वादा किया कि वह अपने बेटे को जीवित वापस ले आएगा और गरुड़ से उसकी रक्षा करेगा। वह खुद को चारा के लिए गरुड़ को भेंट की जाने वाली चट्टानों के बिस्तर पर लेटने का फैसला करता है। गरुड़ आता है और अपनी अंगुलियों से लाल कपड़े से ढंके जिमुतवाहन को पकड़कर चट्टान पर चढ़ जाता है। गरुड़ को आश्चर्य होता है जब वह जिस व्यक्ति को फंसाता है वह प्रतिक्रिया नहीं देता है। वह जिमुतवाहन से उसकी पहचान पूछता है जिस पर वह गरुड़ को पूरे दृश्य का वर्णन करता है। गरुड़, जीमूतवाहन की वीरता और परोपकार से प्रसन्न होकर, सांपों से कोई और बलिदान नहीं लेने का वादा करता है। जिमुतवाहन की बहादुरी और उदारता के कारण, सांपों की दौड़ बच गई और तब से, बच्चों के कल्याण और लंबे जीवन के लिए उपवास मनाया जाता है। सन्दर्भ
अर्जुन सिंह बामणिया एक भारतीय राजनीतिज्ञ तथा वर्तमान राजस्थान सरकार में जनजाति क्षेत्रीय विकास (स्वतंत्र प्रभार) और उद्योग राजकीय उपक्रम मंत्री हैं। वे राजस्थान विधानसभा में बांसवाड़ा से विधायक हैं। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनेता हैं। सन्दर्भ जीवित लोग 1963 में जन्मे लोग राजस्थान के विधायक
अर्धपारगम्य झिल्ली (semipermeable membrane) एक प्रकार की जैविक झिल्ली है जो कुछ अणुओं या ऑयनों को अपने से होकर पार होने देती है जबकि अन्य को नही। यह कृत्रिम झिल्ली भी होती है जिसे जल शुद्धीकरण हेतु प्रयोग किया जाता है। इन्हें भी देखें परासरण विसरण छनित्र झिल्ली जीवविज्ञान झिल्ली प्रौद्योगिकी
नाकोड़ा (अंग्रेजी :Nakoda) भारत के राजस्थान राज्य के बालोतरा ज़िले का एक प्रसिद्ध गांव है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार गांव का नाम मेवानगर है। गांव नगारा के नाम से भी जाना जाता है इनके अलावा इतिहास में यह विभिन्न नामों से जैसे विरमपुरा ,मेहवा के नाम से भी जाना जाता था। नाकोड़ा में एक प्रसिद्ध पार्श्व जैन मन्दिर भी है। जो कि जैन धर्म का एक तीर्थ स्थल कहलाता है। बाहरी कड़ियां Details about Nakoda Jain Temple and History of Nakoda parsvanath Temple and provides online aarti of Nakoda Bherunath ji सन्दर्भ राजस्थान के गाँव बाड़मेर बाड़मेर के दर्शनीय स्थल
भारत गणराज्य में अब तक कुल 50 (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सहित) न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की है। न्यायमूर्ति श्री एच जे कनिया भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश थे तथा वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री धनञ्जय यशवंत चंद्रचूड़ हैं। सूची भारत के मुख्य न्यायाधीशों की सूची इस प्रकार है :- ‡ - मृत्यु की तिथि ‡‡ - इस्तीफे की तिथि सन्दर्भ इन्हें भी देखें मुख्य न्यायधीश (भारत) बाहरी कड़ियाँ आधिकारिक जालस्थल अ दालत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश
अजनबी 2001 में बनी हिन्दी भाषा की थ्रिलर फिल्म है। इसका निर्देशन अब्बास-मस्तान ने किया और इसमें अक्षय कुमार, बॉबी देओल, करीना कपूर और पदार्पण कर रही बिपाशा बसु प्रमुख भूमिकाओं में हैं। जॉनी लीवर, दिलीप ताहिल, नरेन्द्र बेदी और शरत सक्सेना ने सहायक भूमिका निभाई। संक्षेप राज (बॉबी देओल) और प्रिया (करीना कपूर) दोनों किस्मत से मिलते हैं और दोनों में प्यार हो जाता है। दोनों स्विट्ज़रलैंड में शादी कर लेते हैं और वहीं उनकी मुलाक़ात एक अन्य भारतीय जोड़े, विक्रम (अक्षय कुमार) और सोनिया (बिपाशा बसु) से होता है। उन लोग बहुत जल्दी ही अच्छे दोस्त बन जाते हैं। विक्रम के जन्मदिन के मौके पर राज और विक्रम काफी शराब पी लेते हैं। अगले दिन राज को पिछले रात का कुछ भी याद नहीं रहता है। उसके कुछ समय बाद ही उसे पता चलता है कि सोनिया की मौत हो चुकी है। उसकी हत्या एक टूटे हुए शराब के बोतल से हुई होती है, जिसमें पुलिस को राज के उंगलियों के निशान मिलते हैं। अपने आप को बेकसूर साबित करने के लिए राज पुलिस के गिरफ्त से भाग जाता है। वो प्रिया से मिलता है और सारी बात समझाता है। जिसके बाद वो उसे बेकसूर मान कर साथ देने लगती है। राज जेनेवा में एक बीमा अफसर से मिलता है। वहाँ उसे पता चलता है कि वो अपनी बीवी के बीमा में मिलने वाले $100 मिलियन डॉलर के लिए हत्या की होगी। वो उस अफसर की मदद से विक्रम का पता लगा लेता है। विक्रम एक क्रुज़ जहाज में रहता है। जब राज उस जहाज में जाता है तो वो विक्रम को एक लड़की के साथ नाचते हुए देखता है। वो कोई और नहीं, बल्कि सोनिया होती है। सोनिया को जिंदा देख कर राज हैरान रह जाता है। जब वो विक्रम से इस बारे में पूछता है तो वो अपने शैतानी योजना के बारे में उसे बताने लगता है। वो बताता है कि असल में वो जिसे सोनिया बजाज सोच रहा है, वो उसकी प्रेमिका, नीता (बिपाशा बसु) है, और असल सोनिया बजाज (मिंक बरार) की उसने बीमा में मिलने वाले सौ मिलियन डॉलर के लिए मार डाला और नीता के साथ मिल कर उस हत्या का आरोप राज पर डाल दिया। राज उसे कम्प्युटर के सामने ले जाता है और उसे उसका खाली बैंक खाता दिखाता है। वो कहता है कि उसने उसके पासवर्ड को अंदाजे से डाला था। पासवर्ड वही शब्द था, जो वो बार बार बोलते रहता था। वो ये भी बताता है कि बीमा कंपनी से मिलने वाले सारे पैसे वो बीमा कंपनी के खाते में डाल चुका है। राज उसे ये भी बताता है कि उसकी सारी बातें रिकॉर्ड हो चुकी हैं। इसके बाद राज और विक्रम के बीच लड़ाई शुरू हो जाती है। लड़ाई के दौरान नीता की मौत हो जाती है। गुस्से में वो बीमा अफसर को मार देता है और राज को भी लगभग मार ही देता है। जब वो प्रिया को मारने जाता है, तब राज आ कर उसे बचा लेता है। इसी बीच उस जहाज के लंगर से विक्रम की मौत हो जाती है। अंत में राज बेकसूर साबित हो जाता है और वे दोनों भारत लौट जाते हैं। मुख्य कलाकार अक्षय कुमार - विक्रम बजाज (विकी) बॉबी द्योल - राज मल्होत्रा करीना कपूर - प्रिया मल्होत्रा बिपाशा बसु - सोनिया/नीता जॉनी लीवर - भानु प्रधान मिंक ब्रार - सोनिया बजाज अमिता नाँगिया - चम्पा देवी शरत सक्सेना - बीमा कम्पनी का जासूस दिलीप ताहिल - प्रिया के पिता नरेन्द्र बेदी - लखन पाल संगीत नामांकन और पुरस्कार |- | rowspan="4"| 2002 | बिपाशा बसु | फ़िल्मफ़ेयर महिला प्रथम अभिनय पुरस्कार | |- | अक्षय कुमार | फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार | |- | जॉनी लीवर | फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार | |- | अदनान सामी ("महबूबा महबूबा") | फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक पुरस्कार | |} बाहरी कड़ियाँ 2001 में बनी हिन्दी फ़िल्म अनु मलिक द्वारा संगीतबद्ध फिल्में