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भारतीय प्रवासन पैटर्न के परिणामस्वरूप अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण किया गया है। लंदन के नेसडेन में बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था मंदिर यूरोप में निर्मित होने वाला पहला पारंपरिक हिंदू मंदिर था। संगठन के पास उत्तरी अमेरिका में ह्यूस्टन, शिकागो, अटलांटा, ...
हिन्दू
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200
== बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था चैरिटीज == बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था चैरिटी एक वैश्विक गैर-धार्मिक, धर्मार्थ संगठन है जो बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था (बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था) से उत्पन्न हुआ है, जो समाज की सेवा पर ध्यान केंद्रित करता है...
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237
मुद्रित स्रोत Clarke, Matthew (2011). Development and Religion: Theology and Practice. Northampton, Massachusetts: Edward Elgar Publishing. पपृ॰ 40–49. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781848445840. Dave, H.T (1974). Life and Philosophy of Shree Swaminarayan 1781–1830. London: George Allen & Unwin. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-04-294082-6. Gadhia, Smi...
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323
== बाहरी संबंध == बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था वेबसाइट
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182,603
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10
बोडो ब्राह्म धर्म २०वीं शताब्दी के आरम्भ में गुरुदेव कालीचरन ब्रह्म द्वारा शुरु किया गया एक नया धार्मिक आन्दोलन था। यह मुख्यतः असम के धुबरी जिले में बोडो लोगों के बीच आरम्भ हुआ।
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33
मतुआ महासंघ एक धर्मसुधार आन्दोलन है जो १८६० ई के आसपास अविभाजित भारत के बंगाल में शुरू हुआ था। वर्तमान में इसके अनुयायी भारत और बांग्लादेश दोनों में हैं। मतुआ समुदाय हिन्दुओं का एक एक समुदाय है।
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182,605
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37
इस आन्दोलन का आरम्भ हरिचन्द ठाकुर के अनुयायियों ने आरम्भ किया था। हरिचन्द ने बहुत कम आयु में आत्मदर्शन किया था और अपने सिद्धान्तों को वे १२ सूत्रों के रूप में अपने शिष्यों को बताते थे। मतुआ महासंघ 'स्वयं-दिक्षिति' में विश्वास करता है। १९४७ में भारत के विभाजन के बाद भारी संख्या में मतुआ लोग भारत के पश्चिमी बंगाल राज्य म...
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182,606
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155
महानुभाव पंथ हिन्दुओं का एक सम्प्रदाय है जिसका प्रवर्तन १२६७ ई. में चक्रधर स्वामी ने किया था। वे एक बड़े समाज सुधारक थे। महानुभाव पंथ के अनुयायी कड़क शाकाहारी होते हैं। वे शराब आदि से सख्त परहेज करते हैं। वह मराठी भाषा के जन्मदाता माने जाते हैं। मराठी भाषा की पहली कवयित्री महदंबा उनकी शिष्या थीं। मराठी के आद्यग्रंथ लील...
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182,607
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67
== बाहरी कड़ियाँ == "महानुभाव पंथ" अर्थात "जय कृष्णी पंथ" Archived 2017-02-11 at the वेबैक मशीन
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182,608
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16
राधावल्लभ संप्रदाय, (Radha Vallabha Sampradaya) हितहरिवंश महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित एक प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय है। जो 1535 में आचार्य श्री हित हरिवंश महाप्रभु (1502-1552) ने वृन्दावन में शुरू किया था। लघुभाग साढ़े 400 साल पूर्व वृन्दावन में जिन युगल उपासक वैष्णव सम्प्रदाय का उदय हुआ था उनमें चैतन्य सम्प्रदाय में श्रीकृ...
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147
हित हरिवंश महाप्रभु कृष्ण के शाश्वत वंशी के अवतार हैं और प्रियाप्रियतम की सहचरी या सखी भाव प्रदान करने और बरसाने के लिए अवतरित हुए हैं। हित "शुद्ध प्रेम" का प्रतीक है जो राधावल्लभ संप्रदाय की भक्ति सेवा की आधारशिला है। हरिवंश का अर्थ और सरल किया गया है:
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182,610
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49
H (ह) – हरि का प्रतीक है R (र) - राधा रानी का प्रतीक है V (व) - वृन्दावन और को दर्शाता है S (श) - का मतलब सहचरी है
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182,611
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30
== प्रमुख रसिक == गोस्वामी हितहरिवंश सेवक (दामोदरदास) हरिराम व्यास ध्रुवदास नेही नागरीदास श्री प्रेमानंद महाराज
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182,612
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16
रामानंदी सम्प्रदाय, बैरागियों के चार सम्प्रदायों में अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय को बैरागी सम्प्रदाय, रामावत सम्प्रदाय और श्री सम्प्रदाय भी कहते हैं। इस सम्प्रदाय का सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत कहलाता है। काशी में स्थित पंचगंगा घाट पर रामानंदी सम्प्रदाय का प्राचीन मठ बताया जाता है। अयोध्या में जो नया राम मन्...
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182,613
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62
== इतिहास == तीर्थ यात्रा करने के बाद रामानन्द जब घर आए और गुरुमठ पहुँचे तो उनके गुरुभाइयों ने उनके साथ भोजन करने में आपत्ति की। उनका अनुमान था कि रामानन्द ने तीर्थाटन में अवश्य ही खानपान संबंधी छुआछूत का कोई विचार नहीं किया होगा। रामानन्द जी ने अपने शिष्यों का यह आग्रह देकर एक नया संप्रदाय चलाने की सलाह दे दी। यहीं से...
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182,614
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128
१. द्विभुज श्रीराम परमोपास्य हैं। २. ओम् रामाय नमः सांप्रदायिक मंत्र है। ३. इस संप्रदाय का नाम श्री संप्रदाय या रामानंद संप्रदाय या 'वैरागी संप्रदाय है। ४. इस संप्रदाय में आचार पर अधिक बल नहीं दिया जाता। कर्मकांड का महत्व यहाँ बहुत कम है। ५. इस संप्रदाय में शुक्लश्री, बिंदुश्री, रक्तश्री, लस्करी आदि अनेक प्रकार के तिलक...
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182,615
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296
== रामानन्द सम्प्रदाय के दार्शनिक सिद्धान्त == रामानन्द सम्प्रदाय को जो श्री संप्रदाय कहा जाता है उसमें 'श्री' शब्द का अर्थ लक्ष्मी के स्थान पर 'सीता' किया जाता है। इस संप्रदाय का दार्शनिक मत विशिष्टाद्वैत ही माना जाता है, जैसा ऊपर उल्लिखित हो चुका है। विशिष्टाद्वैत शब्द का अर्थ इस प्रकार किया गया है - विशिष्टं चा विशि...
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182,616
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101
=== परब्रह्म राम === स्वामी जी का परब्रह्म राम विश्व की उत्पत्ति, रक्षा और इसका लय करता है। उसके प्रकाश से सूर्य और चंद्रमा संसार को प्रकाशित करते हैं। जो वायु को चलायमान करता है, जो पृथ्वी को स्थिर रखता है, वह ज्ञानस्वरूप, साक्षी, अनेक शुभ गुणों से युक्त, अविनाशी एवं विश्वभर्ता ईश्वर ही परब्रह्म है। यह परब्रह्म नित्य ...
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182,617
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298
=== जीव === रामानंद ने जीव की साधारण ढंग से इस प्रकार व्याख्या की है - जो सदैव एक स्वरूप में स्थित है, जो ईश्वर की अपेक्षा अज्ञ, चेतन, सर्वदा पराधीन (भगवदधीन), सूक्ष्म से सूक्ष्म, बद्धादि भेदों से भिन्न भिन्न शरीरों में भिन्न भिन्न प्रकार का होकर भिन्न है। भगवान् से परिव्याप्त शरीर में जो रहता है, स्वकर्मानुसार फल भोगन...
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182,618
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171
=== बद्ध जीव === अनादि कर्मों की राशि से अनेक प्रकार के शरीर का अभिमानी जीवबद्ध कहा गया है। बद्ध जीव दो प्रकार के हैं - १. मुमुक्षु, २. बुभुक्षु। भगवान् की निर्हेतुक कृपा से अविद्यादि दुष्ट कर्मों की वासना की रुचि की प्रवृत्ति के संबंध से छूटने का प्रयत्न करनेवाले जीवों को मुमुक्षु कहते हैं। इसके विरुद्ध सांसारिक भोग क...
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182,619
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283
=== मुक्त जीव === ये जीव दो प्रकार के हैं १. नित्य, २. कादाचित्क। नित्य जीव गर्भ जन्मादि दु:खों के अनुभव करनेवाले कहलाते हैं, जैसे - हनुमान। नित्य जीव भी दो प्रकार के हैं - १. परिजन, २. परिच्छद। हनुमान परिजन और किरीट आदि परिच्छेद की परिभाषा में आते हैं। इसी प्रकार कादाचित्क जीव के भी दो भेद किए गए हैं - १. भागवत, २. के...
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115
=== प्रकृति === रामानंद के मत के अनुसार प्रकृति के संबंध में उनकी वही धारणा है जो सांख्य में वर्णित है। तत्वविद्, विकाररहित, संपूर्ण विश्व का कारण, एक होकर भी अनेक प्रकार से शोभित, शुक्लादि भेद से अनेक वर्णोवाली, सत्व, रज, तम आदि गुणों को प्रश्रय देनेवाली, अव्यक्त प्रधान आदि शब्दों से अभिहित, स्वतंत्र व्यापारहीन, ईश्वर...
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182,621
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86
=== मोक्ष === रामानंद के मत से भगवान् की कृपा से सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर साकेत लोक को प्राप्त करके परब्रह्म से सायुज्य की प्राप्ति करना ही मोक्ष कहलाता है। रामानंद संप्रदाय में भक्त, श्री राम की कृपा से सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है और उनके साथ नित्य क्रीड़ा करता है।
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182,622
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52
=== साकेत === रामानंद के मत से जीव सुषुम्ना, अर्चिमार्ग, अर्हमार्ग, उत्तरायण, संवत्सर, सूर्य, चंद्र, और विद्युत् आदि मार्गों से होता हुआ दिव्य लोक साकेत में पहुँचकर विश्राम करता है। यही भगवान् राम का लोक है, जहाँ करोड़ों सूर्य के प्रकाश से युक्त हेम का सिंहासन है, जहाँ स भक्त फिर इस संसार में नहीं लौटता। इस साकेत लोक क...
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182,623
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72
=== सन्दर्भ ग्रन्थ === हजारीप्रसाद द्विवेदी : कबीर ; डा. रामकुमार वर्मा : संक्षिप्त संत कवीर;
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182,624
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16
हिंदू धर्म में, रुद्र सम्प्रदाय चार वैष्णव संप्रदायों में से एक है। संन्यासी विष्णुस्वामी ने इस सम्प्रदाय की स्थापना की थी। वैसे तो वैष्णव सम्प्रदाय विष्णु के कृष्ण अवतार और अन्य अवतारों को भगवान के रूप में पूजता है, किन्तु रुद्र सम्प्रदाय के लोग अपनी उत्पत्ति रुद्र से मानते हैं।
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182,625
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50
वीरशैव धर्म, हिन्दुओं के लिंगायत सम्प्रदाय का एक उपसम्प्रदाय है। यह एक शैव परम्परा है जो शैवागमों पर आधारित है। यह दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई है। ये भारत का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है पर इसके अधिकांश उपासक कर्नाटक में हैं॥ इसके अलावा भारत का दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, केरल ओर तमिलनाडु मे वीरशैव उपा...
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182,626
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87
== इतिहास == भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र ) की सिन्धु घाटी सभ्यता में वीरशैव धर्म के कई निशान मिलते हैं । इनमें एक मां पार्वति मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे शिवलिंग की मुद्राएँ / मूर्तियां , शिवलिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के मुतबिक सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं व...
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182,627
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159
== मुख्य सिद्धान्त == वीरशैव धर्म में शिवाद्वैत अथवा षटस्थल सिद्धान्त है जिसे सभी वीरशैव को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक अध्यात्म साधन का मार्ग है। वीरशैव का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है और न ही कोई "पोप"। इसकी अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी...
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155
१) बसवादि शरण साम्प्रदाय ह, २) आचार्य साम्प्रदाय ३ नायनार साम्प्रदाय (तमिळ शैव साम्प्रदाय) ४) कश्मीरि शैव साम्प्रदाय (जो सबि शिव को परमेश्वर मानते हैं), देवी को परमेश्वरि मानते हैं।
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182,629
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30
=== शिव === वीरशैव धर्मग्रन्थ शैवाग्मो (सिद्धांत शिखामणि) के अनुसार शिव ही परम तत्व है वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है। उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है। शिव एक और सिर्फ़ एक ही है। वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी। वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान ...
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182,630
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165
=== अष्टावर्ण === १ गुरु : वीरशैव धर्म में गुरु को शिव का प्रति रूप माना जाता है। शिष्य कि उद्धरण के लिये गुरु मु़ख्य है ओर शिष्य को धर्म मार्ग पर चलाते है। २ लिंगः शिव प्रति रूप यनि विश्वात्मका साकार रूप हि लिंग है। लिंगमे त्रि प्रकार है १) इष्टलिंग २) चरलिंग ३) स्थावरलिंग। इष्टलिंग को धर्म उपासकोने कंठ मे धारण क‍रते ...
हिन्दू
182,631
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141
=== षटस्थल === १ भक्तस्थल २ महेशस्थल ३ प्राणस्थल ४ लिंगस्थल ५ ऐक्यस्थल ६ शरणस्थल
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182,632
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15
=== पञ्च आचार === १ भर्त्याचार, २लिंगाचार, ३सदाचार, ४गणचार, ५ शिवाचार
हिन्दू
182,633
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11
== धर्मग्रन्थ == श्रुति वीरशैव धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं। इसके अन्तर्गत अठाविस शैवागम (२८) आते हैं : वातुलागम, परमेश्वरागम श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि वीरशैव का मानना है कि इन शैवागम को परमात्मा शिव ने रेणुकाचार्यादि पंचाचार्य को सुनाया था, जब वे गहरे ध्यान में थे। शैवागम को श्रवण परम्परा के अनुसार गुरू द्वारा...
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182,634
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201
== तीर्थ एवं तीर्थयात्रा == भारत देश बड़ा विशाल देश है, लेकिन उसकी विशालता और महानता को हम तब तक नहीं जान सकते, जबतक कि उसे देखें नहीं। इस और वैसे अनेक महापुरूषों का ध्यान गया, लेकिन आज से बारह सौ वर्ष पहले जगदगुरु रेणुकाचार्य ने इसके लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होनें चारों दिशाओं में भारत के छोरों पर, पाच...
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182,635
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156
शैवसिद्धान्त, आगम शैव सम्प्रदाय तथा वैदिक शैव सम्प्रदाय का सम्मिलित सिद्धान्त है। यह द्वैत सिद्धान्त है। शैवसिद्धान्त का लक्ष्य शिव की कृपा की प्राप्ति द्वारा ज्ञानी बनना है।
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182,636
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28
सत वैष्णव(संस्कृत: सदवैष्णव), (लोकप्रिय रूप से माधव संप्रदाय,माधव वैष्णव और ब्रह्म संप्रदाय के रूप में जाना जाता है), हिंदू धर्म की वैष्णव-भागवत परंपरा के भीतर एक संप्रदाय है। सत वैष्णव की स्थापना तेरहवीं शताब्दी के दार्शनिक-संत माधवाचार्य ने की थी, जिन्होंने हिंदू दर्शन के तत्त्ववाद (द्वैत) ("यथार्थवादी दृष्टिकोण से त...
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182,637
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55
== अग्रिम पाठान == Helmuth von Glasenapp (1992). Madhva's Philosophy of the Viṣṇu Faith. Dvaita Vedanta Studies and Research Foundation. Deepak Sarma (29 September 2017). An Introduction to Madhva Vedanta. Routledge. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781351958738. अभिगमन तिथि 29 September 2017. Okita, Kiyokazu (2012). "Chapter 15. Who are...
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182,638
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126
== बाहरी कड़ियाँ == Dvaita.org Archived 2023-06-13 at the वेबैक मशीन तत्त्ववाद
हिन्दू
182,639
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12
स्मार्त सम्प्रदाय, स्मृति साहित्य का अनुसरण करता है। यह माना जाता है कि वेदमन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने जिन वेदमन्त्रों का साक्षात्कार सृष्टि के आदिकाल में किया था, उन्हीं ने उनके अर्थों को भी सही रूप में समझा था , अतः वेदों के अर्थ को विस्तार रूप से प्रतिपादन करने वाले उन ऋषियों के प्रतिपादित अर्थस्मारक ग्रन्थविशेषों को स्...
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182,640
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115
कुछ लोगों के मतानुसार इस धार्मिक-सामाजिक समूह का प्रचार प्रसार करने वाले, ईसा पूर्व पांचवी सदी के दार्शनिक व अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक शंकर थे। कर्नाटक का शृंगेरी में उनके द्वारा स्थापित मठ तथा इसी प्रकार अन्य दिशाओं में भी उनके मठ स्मार्त सम्प्रदाय का केन्द्र बने हुए हैं तथा इस मठ के प्रमुख जगद्गुरु, दक्षिण भारत , ग...
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182,641
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314
जयचमराजा वोडेयार बहादुर (18 जुलाई 1919 - 23 सितंबर 1974) मैसूर की शाही रियासत के 25वें और अंतिम महाराजा थे, जो 1940 से 1950 तक पदासीन रहे। वे एक प्रख्यात दार्शनिक, संगीत प्रेमी, राजनीतिक विचारक और परोपकारी थे। विश्व हिंदू परिषद के प्रथम अध्यक्ष रहे है
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182,642
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46
== जीवनी == वे युवराज कान्तीरावा नरसिंहराजा वडियार और युवरानी केम्पु चेलुवाजा अम्मानी के एकमात्र पुत्र थे। उन्होंने महाराजा कॉलेज, मैसूर से 1938 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, उन्हें पांच पुरस्कार और स्वर्ण पदक प्राप्त हुए. उसी वर्ष रविवार, 15 मई 1938 को उनका विवाह हुआ। 1939 में उन्होंने यूरोप का दौरा किया, लंदन में क...
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182,643
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183
=== खेल === वे एक अच्छे घुड़सवार और टेनिस खिलाड़ी थे, जिहोने रामानाथन कृष्णन को विम्बलडन में भाग लेने के सिलसिले में मदद की. अपनी निशानेबाजी के लिए वे विख्यात थे और उनके आसपास के इलाकों में कोई पागल हाथी या आदमखोर बाघ उत्पात मचाया करता तो उन्हें बुलावा भेजा जाता था। राजमहल के संग्रहालय में उन्हें प्राप्त वन्य जीवन से स...
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182,644
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92
=== संगीत === वे पश्चिमी और कर्नाटकी (दक्षिण भारतीय शास्त्रीय) संगीत के जानकार थे और भारतीय दर्शन शास्त्र के मान्य विद्वान थे। उन्होंने एक अल्प-ख्यात रुसी संगीतकार निकोलाई कार्लोविच मेद्तनर (1880-1951) के संगीत को पश्चिमी दुनिया में ख्याति दिलाने में मदद की, उन्होंने उनके अनेक संगीतों की रिकॉर्डिंग के लिए धन दिया और 19...
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182,645
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832
द क्वेस्ट फॉर पीस: ऐन इंडियन एप्रोच, मिनेसोटा विश्वविद्यालय, मिनेपोलिस 1959. दत्तात्रेय: द वे एंड द गोल, एलन एंड अनविन, लंदन 1957. गीता एंड इंडियन कल्चर, ओरिएंट लाँगमैन्स, बंबई, 1963. रिलिजन एंड मैन, ओरिएंट लाँगमैन्स, बंबई, 1965. 1961 में कर्नाटक विश्वविद्यालय में स्थापित प्रो॰ रानाडे श्रृंखला व्याख्यान के आधार पर. अवध...
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182,646
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337
ॠग्वेद - 35 भागों में शंकराचार्य स्तोत्र - 2 भागों में मुखपंचशती कामकल्पा तरुस्ताव त्रिपुरासुन्दरी मानसिका पूजा गुरुगीता शिवगीता महामस्ता पुरश्चरण विधिः षोडशी पूजा कल्प पूजा भुवनेश्वरी कल्प रुद्र महान्यासा प्रयोग सुक्तागालू पुराणागालू
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182,647
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33
5 भागों में देवी भागवत: एदातोरे काम्द्रशेकराशास्त्री (वर्ष 1942-1943) द्वारा अनुदित शिव पुराण शिव रहस्य स्कंद महापुराण कालिका पुराण - 2 भागों में: हसनदा पंडित वेंकटराव द्वारा (28-5-44) वराह पुराण भविष्य पुराण गणेश पुराण वामन पुराण कामकी महात्म्य विष्णु धर्मोत्तर पुराण ब्रह्मम्दा पुराण नारदीय पुराण रामा मंत्र महिमे, (अग...
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182,648
null
75
हलास्य माहात्म्ये गार्ग्य संहिता ब्रह्म व्यैवर्त पुराण ब्रह्म पुराण शंकर संहिते पद्मपुराण तीन भागों में विष्णु पुराण: पंडित गंजम तिमण्णय्या द्वारा अनुदित, वर्ष 1948, कुल पृष्ठ (463+492+460) मंत्रशास्त्र - सहस्रनाम - उपनिषद्
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182,649
null
32
परिवास्य रहस्य त्रिपुरातापिन्युपनिषद'' ललितात्रिशती भाष्य त्रिपुरा रहस्य'' श्रीकामदा सारार्थ बोधिनी सुता संहिते वनदुर्गोपनिषद शारदा सहस्रनाम गणेश सहस्रनाम दक्षिणामूर्ति सहस्रनाम शिव पूजा पद्धति (उपरोक्त लिखित ग्रंथों का अंग्रेजी लिप्यंतरण करते समय नियमानुसार लोकप्रिय मुफ्त सॉफ्टवेयर https://web.archive.org/web/20180913...
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182,650
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39
== उपाधियां == 1919-11 मार्च 1940: महाराजकुमार श्री जयचमराजेंद्र वोडेयर 11 मार्च-3 जुलाई 1940: महाराज युवराज श्री जयचमराजेंद्र वोडेयार बहादुर, मैसूर के युवराज 3 जुलाई 1940-1945: महाराज महाराजा श्री जयचमराजेंद्र वोडेयार बहादुर, मैसूर के महाराजा 1945-1946: महाराज महाराजा श्री सर जयचमराजेंद्र वोडेयार बहादुर, मैसूर के महार...
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182,651
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78
== सम्मान == 1945 में जीसीएसआई (GCSI) और 1946 में जीसीबी (GCB) के साथ ब्रिटिश सरकार ने सम्मानित किया। क्वींसलैंड के विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया से डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर [3] [4] अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिल नाडू से डॉक्टर ऑफ लिटरेचर . बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ लॉ मैसूर विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ लॉज़, औनोरिस...
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182,652
null
76
राजकुमारी विजया लक्ष्मी अम्मानी, बाद में कोटडा संगनी की रानी विजया देवी. राजकुमारी सुजय कंथा अम्मानी, बाद में साणंद की ठकुरानी साहिबा. राजकुमारी जया चामुंडा अम्मानी अवरु, बाद में एच.एच. महारानी श्री जया चामुंडा अम्मानी अवरु साहिबा, भरतपुर की महारानी. पत्नियां: चरखारी की एच.एच. महारानी सत्या प्रेम कुमारी. शादी 15 मई 193...
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182,653
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108
राजकुमारी गायत्री देवी अवरु, (1946-1974), जो अपने पिता के पहले मर गई। राजकुमारी मीनाक्षी देवी अवरु, बी.1951. एच.एच. महाराजा श्री श्रीकांत दत्ता नरसिम्हाराजा वोडेयर (बी. 1953). राजकुमारी कामाक्षी देवी अवरु, बी.1954. राजकुमारी देवी इन्द्राक्षी अवरु, बी.1956. राजकुमारी विशलाक्षी देवी अवरु, बी.1962.
हिन्दू
182,654
null
41
== बाहरी कड़ियाँ == इसके प्रयाग कांग्रेस में वी.एच.पी पता एक गुप्त संस्था का सदस्य के रूप में भाषण एच.एच. जयचमराजा वोडेयार पर फ्रंटलाइन पत्रिका में अनुच्छेद मैसूर के शाही परिवार के वेबसाइट कुछ समाचार जय चमराजा, अंतिम महाराजा रिचर्ड स्ट्रास का एपिटाफ वगियाकारा I वगियाकारा II / डॉ॰ आया इकेगेम द्वारा 1799 से वर्तमान तक मै...
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182,655
null
61
संगम राजवंश में जन्मे बुक्क (ಬುಕ್ಕ ; 1357-1377 ई.) विजयनगर साम्राज्य के सम्राट थे। इन्हें बुक्क राय प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। बुक्क ने तेलुगू कवि नाचन सोमा को संरक्षण दिया। १४वीं सदी के पूर्वार्ध में दक्षिण भारत में तुंगभद्रा नदी के किनारे विजयनगर राज्य की स्थापना हुई थी जिसके संस्थापक बुक्क तथा उसके ज्येष्ठ भ्र...
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182,656
null
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बुक्क और उनके भाई हक्क (जिन्हें हरिहर प्रथम के नाम से भी जाना जाता है) के प्रारंभिक जीवन लगभग अज्ञात है और उनके प्रारंभिक जीवन का अधिकांश वर्णन विभिन्न मतों पर आधारित है (इनके अधिक विस्तृत वर्णन के लिए लेख विजयनगर साम्राज्य देखें)। मुहम्मद बिन तुग़लक के हाथों वारंगल के राजा की पराजय के बाद, बुक्क और उनके भाई को बंदी बन...
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== सन्दर्भ == डॉ॰ सूर्यकांत यू. कामत, कंसाइस हिस्ट्री ऑफ़ कर्नाटका, एमसीसी, बैंगलोर, 2001 (पुनः प्रकाशित 2002) चोपड़ा पी.एन., टी.के. रविंद्रन और एन. सुब्रमण्यम हिस्ट्री ऑफ़ साउथ इण्डिया एस. चंद, 2003. ISBN 81-219-0153-7 Dr. Suryanath U. Kamat, Concise history of Karnataka, MCC, Bangalore, 2001 (Reprinted 2002) Chopra, ...
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