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कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्तुत शोध प्रबंध मेरे प्राय 4 वर्षों के प्रखण्ड स्वाध्याय का प्रतिफल है । इस विषय पर काय करने की प्रेरणा मुझे सवप्रथम प्राचाय हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के 'सूरमाहित्य के प्रथम निवन्ध को उन पक्तियों से मिली जिहै इस प्रबंध की 'अवतरणिका' मे उद्धृत किया गया है । वही मत्र बीज मेरे मन मे विस्मयजनत जिज्ञामा के अनगिन प्रतानो के साथ सर्वार्द्धत होकर इस विस्तृत प्रथम प्रतिफलित हुआ है। इस बीच प्राचाय प्रवर वे साथ हुई वार्ताओं में जो कई सूक्ष्म सवेत मिले, उनके लिए में उनका चिर अनुगृहीत हूँ । में सूर साहित्य के ममज्ञ विद्वान् डॉ० वजे वर वर्मा, निदेशव, हिन्दी शोध संस्थान, आगरा का भी परम आभारी हूँ जिन्होने प्रबन्ध की प्रतिज्ञा के स्थिरीकरण और व्याव हारिक सतुलन सम्बनी यथेष्ट महायता प्रदान की। इसी प्रमग मे डॉ० श्रीकृष्ण लाल (स्वर्गीय) रोडर हिन्दी विभाग, नाशी विश्वविद्यालय को अत्यत श्रद्धापूर करता हूँ जिहोंने मेरे वाशी-वास के दिनों में अपना बहुत समय देकर अनेकानेव शबाश्रो का समाधान किया। उनके साथ बई सलापों मे लेखक को जो स्नेह-मिश्रित सुझाव मिले, उस धनुग्रह को भुलाया नहीं जा सकता। काशी-वास के पुण्य अवसर पर विद्यावतार प० गोपीनाथ कविराज जी के दशन और विमश भी अविस्मरणीय है। अपनी रुग्णावस्था मे भो उ हाने जो सकेत दिये, वह उनकी विद्याव्यसनिता ही नहीं, सवसुलभता का प्रमाण है। इसी सिलमिले म मैं भगध विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष प० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, प्रयाग विश्वविद्यालय के तब प्रध्यक्ष डॉ० रामकुमार वर्मा भौर विहार राष्ट्रभाषा परिषद् के तत्कालीन सचालन डॉ० भुवनेश्वर मिश्र 'माधव जी का भी समवेत रूप से मनुगृहीत हूँ जिन्होने समय समय पर अपने अमुल्य ममय दक्र लेखक वो मूल्यवान सुझाव दिय । अपनी शोर यात्रा के कम म तय पुस्तकालय पटना के श्रीकृष्ण चतन्य जो तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, गीता प्रेम गोरखपुर और राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता के पुस्तकाध्यक्ष का भो में धाभार मानता हूँ निहोंने अपने संग्रहालयों को पात सामग्रियों की उपलब्धि परा पर मुझे यथेष्ट महायता दी। कि तु में सर्वाधिव वृतन हूँ अपने प्राचाय निर्देशन भोर मध्यन डॉ० श्री वोरै द श्रीवास्तव जो वा, जि होने श्रादि से म त तक इस गहन विषय मे तल्लीन होकर मनुम पान वरने की सतत प्रेरण दी। उनके पण्डित्यपूर्ण निर्देशो और परामर्शो के बिना यह काय पूरा होना कदाचित् असभव था । उ होने लेखन से प्रकाशन तक इस काम को अपना हो जान वर जो अमूल्य सुझाव व प्राक्कथन के मूल्यवान् शमुझे प्रदान किये, इनके लिए में उनका श्राजीवन ऋणी रहूँगा । लेखक प्रो० श्री विजयन्द्र स्नातक ( दिल्ली विश्वविद्यालय ) व प्रो० विनय मोहन गर्मा जी ( कुरक्षेत्र विश्विद्यानय ) जैसे यशस्वी विद्वानों का आभारी हूँ जिन्होंने अपनी सम्मति देवर इस प्रबंध की सवद्धना की है। अन्त म, अपने अग्रज तुल्य डॉ० श्री त्रिभुवन सिंह ( काशी विश्वविद्यालय ) तथा श्रीकृष्ण चन्द्र बेरी जी ( व्यवस्थापक, हिन्दी प्रचारक संस्थान पाशी ) के प्रति प्रामार प्रकट करना में अपना कत्तय समझता हूँ जिनकी प्रेरणा व सहयोग के बिना इस ग्राथ का मालोक्ति होग वठिन था । भस्तु भागलपुर शरपूर्णिमा २०२७ opo } तपेश्वरनाथ प्रसाद [ डॉ० वीरेन्द्र श्रीपास्टर एम० ए० ( द्वय ), डि० लिटू० ] प्रोफेसर एव अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग भागलपुर विश्वविद्यालय हिन्दी साहित्य के इतिहास में कृष्णाश्रित काव्यधारा निरन्तर प्रवाहित होती रही । विद्यापति को पदावली से लेकर घमवीर को कनुप्रिया तक वह भविच्छि न धारा जनमानस के भनेक घरातलो को प्राप्लावित करती रही है । वृष्ण के जीवन चरित मे स्वत हो भनेव उपादानो का क्रमिक समावेश होता गया है। वैदिक साहित्य के वासुदेव कृष्ण महाभारत के कमयोगी कृष्ण और भागवत के गोपीवल्लभ कृष्ण ने एक प्रपूव व्यक्तित्व का निर्माण किया था। भाभीरों के बाल गोपाल ने इस 'गोपवेष विष्णु' के व्यक्तित्व मे अपना भी योगदान दिया। हिन्दी साहित्य के प्रारम्भ होने से पूर्व ही कृष्ण के व्यक्तित्व का यह सम वयात्मक रूप सस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश मापानी के वाङमय के माध्यम से पूणता को प्राप्त करवा था हि दी साहित्य के श्रादिकाल, मध्यकाल और माधुनिक काल ने अपने परिवेश के अनुकूल वृष्ण के उस रूप का वाध्य मे नियोजन किया । विद्यापति ने साम तो दरबार के अनुरूप कृष्ण को शृङ्गारदेव वनावर चित्रित किया । उ होने कीर्तिपताका मे अर्जुन राय को शृङ्गारकेलि को 'हरिकेलि' बताया व लिखत हैससाररत्न मृगशावकाक्षी, रत्न च शृगाररसो रसानाम् । तच्चानुभूया चिचरमर्जुनेन्द्र पुरानुभूत मधुसूदनेन ।। उनको दृष्टि मे राम ने कृष्ण का अवतार हो इसलिए लिया था कि वे सीता के वियोगदु ख को क्षतिपूर्ति कर सकें । उन्होने कोत्तिपताका मे विविध रमणियों (नायिकाओं) के समागम के ग्रामोद प्रमोद पूरण प्रसग वा हृदयग्राही अन किया है। पदावली मे वही शृङ्गारभूमि कृष्ण के चरित्र का भाघार है। कालान्तर मे विद्यापति के इमरदेव का पूरा पल्लवन रोतिकाल में हुआ । सूर, तुलसी, मीराबाई, रसखान इत्यादि कवियों ने विभिन्न भाचार्यो की छत्रछाया मे कृष्ण को भत्तिदव बनाकर अपने रमस्निग्ध पदों की रचना को 1 कृष्णु वारमल्य, सख्य, दास्य, माधुय और शान्त भक्ति के पालम्वन बने । रीतिकाल म पूर्वनिर्देशा नुसार कृष्ण शृङ्गारदेव हो रहे । श्राधुनिक काल में समाज को परिवत्तित विचारसरणि से प्रभावित होकर कृष्ण ने कुछ बौद्धिकता का प्राश्रय अवश्य लिया जसा कि हरिभोध के प्रियप्रवास मे है परंतु प्रधानत वे भावदेव ही बने रहे और अनुप्रिया उसकी चरम परिणति है । इस प्रकार लीलापुरुषोत्तम कृष्ण रति के प्रेम के सभी रूपो के उ मुक्त भालम्बन हिन्दी साहित्य में बनते रहे हैं । हिंदी वाव्य म कृष्णचरित के इस सम्पूर्ण विकास के गम्भीर विश्ने पणात्मक प्रध्ययन की आवश्यकता थी। डॉ० तपेश्वरनाथ प्रसाद ने उस श्रावश्यक्ता की पूर्ति 'हिन्दी काव्य में कृष्णचरित का भावात्मक स्वरूप शोषक अपने शोधप्रब घ मे की है। इसमें उनकी भावयित्री प्रतिभा का अच्छा निदशन है । उन्होने कृष्ण सम्बन्धी उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री का अच्छी तरह समाकलन किया है भौर ऐतिहासिक विवेतन के साथ तकसगत पद्धति मे अपने विषय का प्रतिपादन किया है । हिन्दी काव्य में अति कृष्ण के स्वरूप को समप्रता से मात्मसात् करने के लिए यह प्रबन्ध अभी तक सर्वोसृष्ट साधन है यह निर्विवाद कहा जा सकता है। आशा है हिंदी के पाठक इस प्रबध का खुले दिल से स्वागत करेंगे । भारतीय संस्कृति के उजायका मे राम और कृष्ण के नाम सर्वाधिक प्रज्ज्वल इन्होंने अपने गरिमामय एवं उदात्त चरित्र द्वारा भारतीय जन गण के भावो और विचारों को हिलकोर कर उसे एक नयी दिशा, नयी भास्था प्रदान की । परम्परा से विश्वासशील जनता ने हजारो वर्षों से का महिमाशालो प्रवपुरुषो का मुक्त कठ से यशोगान किया है । अपने प्रतापी पूजा के श्रादश कृत्यों का कोसन हो इस आस्थाशील परम्परा को नैसर्गिक शृङ्खला ही रही, जिसने उत्तरोत्तर नौविक वृत्त के स्थान पर अलोकिक चरित को प्रास्फूत किया । पलत मानवत्व म देवत्व को उद्बुद्धि हुई। भोर, लोवचित्त ने अपनी कल्पना और पूज्यबुद्धि षे भतिरेव से राम-कृष्ण के नाम रूपात्मक प्रस्तित्व का ईश्वरीय ऐश्वर्य और मानन्द म रूपातरित कर लिया। क्षीरमिधु में निवास करने वाले देवाधिदेव विष्णु भारतीय मनीषा की वैभवशालिनी चरित-चरपना के ही पुजीभूत प्रतीक है। हमारी श्रद्धा और कल्पना की इसी पीठिका पर राम-कृष्ण के ध्रुवतरण की साथकता को समझा जा सकता है । इसके अनुसार, राम त्रेतायुग की धम-वेदना की उत्पत्ति है । जि होने भक्तिस्वरूपा कौशल्या की वादना से अपने चतुर्भुज स्वरूप को तज पर मानवीय लीलाओ में अपना स्वरूप प्राकट्य किया । उमी प्रकार कृष्ण भी द्वापर युग के भक्तों की प्रेम-वेदना से वशीभूत हो कमलागृह तज कर मथुरा के कारागृह में प्रक्ट हुए और अपनी लीला का व्यापक प्रसार कर ब्रजमण्डल, मथुरा, द्वारका सभी को एक अद्भुत मानद लोक मे परिणत कर दिया । वैष्णवो का गोलाक इसी कल्पना का सुमधुर रूप है। सामासिक संस्कृति के इस देश म, जहाँ को जनता करोड़ों देवी देवतामो को जानती और मानती थी, उन समस्त प्राचीन देवताओं के स्थान पर विष्णु के उक्त दो अवतार - राम और कृष्ण लोक में प्रतिष्ठित और प्राराध्य बन गये। राम यदि मर्यादापुरुषोत्तम हैं तो कृष्ण लीलापुरुषोत्तम । अपनी लीला रजनकारिणो वृत्ति के हो वारण श्रीकृष्ण सर्वाधिक जनप्रिय और लोक भावना के मनिकट हैं। श्रीकृष्णचत्र को पूर्णावतार कहा गया है। उनमें समस्त कलाप्रो का स्पे विकास हुआ है। उनका वचपन गोष-जीवन म असाधारण प्रेम, उमग और उल्लास का स्मारव है तो उनका यौवन गोपीकृष्ण शृङ्गार लीलामो वा मरम सन्निधान । उसी प्रचार उनको प्रौढावस्या मादव बुल मे अलौकिक शक्ति, कुशाग्र बुद्धि और नेतृत्व क्षमता का दृष्टात है । यदि लोव चातुय से उन्होने सकटापन्न पाण्डवी का माग निर्देश किया तो भलो विक प्रतिभा से भजुन को रण-स्थत म हो गीता का तेजस्वी मम दिया। यदि वह द्वारकाधीश रूप में मनात एश्वर्यो के भोक्ता और असख्य रानियों के पतिदेव रहे तो साथ ही स्थितमन योगी भी। इस प्रकार, वृष्ण प्रेमी शोर चोर बानक है, कला-नोविद और शस्त्रासविद् युवक हैं। योद्धा मोर जेता सामन्त हैं, राजनीतिक भौर दार्शनिय यागी हैसब एक साथ हैं और सब म महान हैं । यही कारण है कि उनके सम्बंध में सर्वाधिक विवाद भी उठ सरे हुए हैं। प्रथि काश हिदुओ को पास्पा मे मनुसार वृष्ण भगवान् विष्णु म भाग्य - पूरा भार हैं। किन्तु, विद्वान् इस तथ्य को विषय तय ज्ञान को इयता नहीं मानो। इस सम्बध मे मने परिडत ( जिनम प्रो० मिटरनिल, भरडारवर मादि प्रमुख हैं ) रारमाध्यम से ऐतिहासिय कृष्ण के सम्बन्ध में विचिविला मरत हुए हम है कि वस्तुत कृष्ण नाम के तीन विभिन्न महापुरुष हुए ( १ ) वैदिन ऋषि वृष्ण ( २ ) गीतानाचक कृष्ण और, (३) गोपीजनवल्लभ वृष्ण बुछ बुद्धिवादी ( श्री टी० पी० सिंह- हिदू पासिंह बयामा के भौतिय अर्थ मे लेखक ) कृष्ण के ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर स देह तु कृष्ण लीला व भोतिष पर्यापर भाग्रह रखते हैं। और बुछ ऐसे भी विद्वान् है जिन्होने कृष्ण के ऐतिहासिम व्यक्तित्व का और पौराणिक चरित्र को शृङ्खलाबद्ध गवेपणा में अपनी प्रतिभा मोर थम वा प्रथिवांश समर्पित किया है। श्री एस० एन० ताडपत्रीवर को गवेषणात्मक पुस्तप 'द कृष्ण प्रव लेम' इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। बुद्ध विद्वान को दव पुष्प कुछ ईदनर और मनुष्य के बीच भी कोई शक्ति और कुछ इ है भद्ध ऐतिहागिय मद्धपौराणिक रहस्यमय पात्र मानते हैं जो श्रव तक् पूणत बोधगम्म नही हो सके । इस मत के समयको में हू इच वृण' के लेखष प्रो० श्री क्षेत्रलाल साहा पाते हैं। और अधिकांश व्यक्ति उन्हें एक ऐसे मन मोजो निष्काम पुरुष के रूप में देखते हैं जिसका जीवनोद्देश्य इस जगत को एक विशाल फीडा भूमि के रूप मे अगीकार करता है । ऐतिहासिक व्यक्तित्व के अतिरिक्त बाल और किशोर का एक पौराणिक स्वरूप भी है जो अपने पल्पनाप्रवण रूप मे काण्यत्व के सनक्ट है। इस पौराणिक स्वरूप के एक पक्ष बाल कृष्ण के सम्मघ मे वेबर प्रियसन केनेडी, भएडारकर मादि विद्वानो को यह मान्यता रही कि यह ईसामसीह को क्या का भारतीय रूपांतरण है। प्राचाय हजारी प्रमाद द्विवेदी जी ने इस धारणा का उचित निरारा अपने सूर साहित्य के प्रति गवेषणात्मक प्रथम निर्बंध में बहुत पहले कर दिया था। उपयुक्त विवरण से यह सिद्ध है कि इतिहास पुराण भादि के विभिन्न स्रोतो मे विकीण कृष्ण चरित से सम्बद्ध श्राख्यान इतने बहुवणीं हैं कि इस विषय के नवीन अनु स धाताओ को एक बार पुन गम्भीरतापूर्वक सोच विचार करने को प्रेरित कर देते । वस्तुत भारतीय वाङमय के प्राचीन और प्रतिविस्तृत पट पर चाहे वह वैदिक हो या भौपनिषदिक, पौराणिक हो या लौकिक-कृष्ण की तरह गतिशील, बहुवर्णी, रगीन और माध्यात्मिक्ता सम्पन्न चरित्र कोई दूसरा नहीं दिखाई देता कृष्ण के व्यक्तित्व में अखिल ब्रह्माण्ड की संचालिका शक्ति है तो पूर्ण निस्सगता भी। क्रियाशीलता है तो शान्त निवि
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Во время Второй мировой войны промышленность нацистской Германии создала большое количество оригинальных и необычных проектов вооружения и техники. Пытаясь выполнить требования заказчика, конструкторы прибегали к нестандартным идеям и решением, результатом чего становилось оружие, способное удивлять даже сейчас. Одним из самых ярких примеров подобного подхода к созданию оружия является противопехотная мина Kugeltreibmine. Этот боеприпас имел оригинальную конструкцию и необычный способ применения. Kugeltreibmine उत्पाद (K. -Tr. Mi. ) मोबाइल खानों के एक अत्यंत दुर्लभ वर्ग के थे। यह माना गया था कि वेहरमाच सेनानी इन हथियारों को ढलान से रोल करेंगे और इस तरह दुश्मन की बढ़त का मुकाबला करेंगे। इस प्रकार, इस हथियार को शब्द के पूर्ण अर्थ में एक खदान नहीं माना जा सकता है। संभवतः इस कारण से, कुछ स्रोतों में के. टी. आर. एम. आई. बम (रोलबॉम्ब) कहा जाता है। इसी समय, इस तरह के एक असामान्य हथियार को अधिकतम आकार और वजन के साथ एक तरह का हैंड ग्रेनेड माना जा सकता है। एक तरह से या दूसरे, आधिकारिक दस्तावेजों में, कुगेल्ट्रेइम्बाइन उत्पाद को गेंद मोबाइल की खान के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। खदान के विकास के समय की सटीक जानकारी K. Tr. Mi. अनुपस्थित हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, यह हथियार 1942-43 वर्षों में बनाया गया था। इसी समय, एक्सएनयूएमएक्स वर्ष में, पूर्ण पैमाने पर उत्पादन पहले से ही चल रहा था, हालांकि समय के साथ, उत्पादन में कमी आई। एक्सएनयूएमएक्स में उत्पादन में कमी की जानकारी से पता चलता है कि पहला उत्पादन के. टी. आर. टी. आई. 1944 या उससे भी पहले सैनिकों के पास गया। पहले से ही 1942 में, जर्मन उद्योग कई महत्वपूर्ण संसाधनों की कमी से पीड़ित होने लगा। विशेष रूप से, धातुओं और मिश्र धातुओं के मौजूदा उत्पादन ने सभी उत्पादन के लिए कच्चे माल प्रदान करना संभव नहीं किया। विभिन्न खानों का उत्पादन पहले कम होने में से एक था, जिसके कारण लकड़ी, कंक्रीट, कांच और यहां तक कि कार्डबोर्ड मामलों में गोला-बारूद की उपस्थिति हुई। के। Tr. Mi के मामले में। कंक्रीट के मामले को बनाने का निर्णय लिया गया। उत्पाद के. टी. आर. एम. आई. दो हिस्सों से बना एक गोलाकार शरीर प्राप्त किया। कंक्रीट से गोला बारूद के निर्माण में, एक गुहा के साथ दो गोलार्ध डाले गए थे। हेमिस्फोरस को बोल्ट या स्टड का उपयोग करके जोड़ा गया था। स्वीकार्य विनाशकारी क्षमता प्रदान करने के लिए, विभिन्न विनाशकारी तत्वों को कंक्रीट में रखा गया था। उत्पादन को सरल बनाने की आवश्यकता के कारण, विभिन्न धातु की वस्तुओं का उपयोग तैयार किए गए टुकड़ों के रूप में किया जा सकता है, बियरिंग के लिए दोषपूर्ण गोलियों या गेंदों से लेकर कटा हुआ तार और छोटे नाखून तक। उत्पादन को सरल बनाने के उद्देश्य से खान परियोजना का विकास किया गया था, इसलिए निर्माता को "घटकों" का चयन करते समय कार्रवाई की बहुत स्वतंत्रता थी। गोलाकार शरीर के अंदर एक गुहा था जिसमें एक विस्फोटक चार्ज और एक फ्यूज लगाने का प्रस्ताव था। Sprengkörper 28 वजनी 232 g या मेल्टिनल के समान चार्ज के पांच ट्राइटिल ब्लॉक असेंबली के दौरान इस कैविटी में ढेर हो गए थे। आवरण में एक आयताकार चैनल प्रदान किया गया था, जो आंतरिक गुहा को बाहरी सतह से जोड़ता है। छेद के माध्यम से एक गोल के साथ एक लकड़ी के ब्लॉक को इस चैनल में डाला गया था। फ्यूज की स्थापना के लिए बार का इरादा था, और इसके अलावा, टीएनटी ब्लॉकों को स्थानांतरित करने की अनुमति नहीं दी थी। गोलाकार कंक्रीट की खान खोल में 25 सेमी का व्यास था। गोला बारूद का वजन 18-20 किलो तक पहुंच गया। उत्पादन प्रक्रिया की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, उत्पाद के आयाम और वजन कुछ सीमाओं के भीतर उतार-चढ़ाव कर सकते हैं। कई हिस्सों से इकट्ठे हुए फ्यूज को बार के छेद में रखा गया था। Kugeltreibmine खदान एक Zundschuranzünder 29 फ्यूज, एक Zeitzündschnur 30 लौ-कॉर्डेंट कॉर्ड के बारे में 10-12 लंबे समय से सुसज्जित था, और एक विशेष कुंडली में एक नंबर 8 स्प्रेंगकैपल डेटोनेटर कैप्सूल से लैस नहीं था। डेटोनेटर को एक चेकर के घोंसले में रखा गया था और आग प्रतिरोधी कॉर्ड का उपयोग करके फ्यूज के साथ जोड़ा गया था। बाद वाले को खदान की सतह पर बांध दिया गया था। खदान के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किए गए फ्यूज में सबसे सरल निर्माण संभव था, और इग्नाइटर रिंग को हटाने के कुछ समय बाद प्रभारी के विस्फोट के लिए भी प्रदान किया गया था। अतः के. टी. आर. एम. आई. हैंड ग्रेनेड के फ़्यूज़ की याद ताजा करती है। ऐसा कोई भी साधन जो हानिरहित प्रस्तुत करने के लिए कठिन या असंभव बना था, अनुपस्थित था। विशिष्ट आवेदन प्रक्रिया के कारण स्व-परिसमापक प्रदान नहीं किया गया था। अन्य विरोधी कर्मियों खानों के विपरीत, उत्पाद K. Tr. Mi. जमीन में स्थापना के लिए इरादा नहीं है। इस हथियार का उपयोग करने की प्रक्रिया अलग थी और अद्वितीय थी। उपयोग की तैयारी में, खदान एक फ्यूज से सुसज्जित थी और एक पैरापेट पर रखी गई थी। मूल आवेदन विधि के कारण, बॉल खानों का उपयोग केवल ढलान के ऊपर या पहाड़ों में स्थित इकाइयों द्वारा किया जा सकता था। एक अलग व्यवस्था के साथ, ऐसे हथियारों के उपयोग को दुश्मन को गोला बारूद की असंभवता के कारण बाहर रखा गया था। दुश्मन के हमले के दौरान, लड़ाकू-खनिक को विस्तार कॉर्ड को हटाते हुए फ्यूज कवर और अंगूठी पर खींचना पड़ा। इसके लिए, 0,5-0,6 किलो से अधिक नहीं के प्रयास की आवश्यकता थी। इसके बाद खदान को दुश्मन की दिशा में पैरापेट से खदेड़ा जा सकता था। अपने स्वयं के वजन के तहत, गोला बारूद पहाड़ी के नीचे लुढ़क गया और कुछ सेकंड के बाद विस्फोट हो गया। निष्कर्षण के दौरान, निकास कॉर्ड को एक विशेष रचना के एक खंड के खिलाफ रगड़ा जाता है जो घर्षण के दौरान ज्वलनशील होता है। एक ज्वलनशील अभिकर्मक ने आग की हड्डी को प्रज्वलित किया, जो बदले में, 10-12 सेकंड में डेटोनेटर कैप्सूल को जला दिया और प्रज्वलित कर दिया। उसके बाद एक विस्फोट हुआ। Kugeltreibmine खदान का उपयोग करने का मुख्य तरीका ढलान को मैन्युअल रूप से रोल करना था। एक अन्य तकनीक को "खिंचाव" के रूप में गोला-बारूद के उपयोग से भी जाना जाता है। इस मामले में, गेंद की खान को अस्थिर स्थिति में ढलान पर रखा गया था, और तनाव कॉर्ड के सिरों में से एक फ्यूज रिंग से बंधा हुआ था। टेंशन कॉर्ड के संपर्क में आने पर, खदान को स्टॉप से स्लाइड करना पड़ता है और ढलान नीचे गिरती है। उसी समय, फ्यूज कॉर्ड को हटा दिया गया था। यह विश्वास करने का कारण है कि गेंद की खान के. टी. आर. एम. आई. काफी बड़ी शक्ति थी। टीएनटी का एक 1160 चार्ज या पिघला हुआ, तैयार किए गए हड़ताली तत्वों के साथ मिलकर एक ठोस मामले में डाला गया, जिससे 10 मीटर के दायरे में दुश्मन की जनशक्ति हिट हो सकती है। इसके अलावा, एक ढलान से 20-किलोग्राम किलोग्राम रोलिंग भी अपनी गतिज ऊर्जा के कारण एक निश्चित खतरा पैदा कर सकता है। । हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि अग्रिम दुश्मन समय में खदान की "शुरुआत" को नोटिस कर सकता है और आवश्यक उपाय कर सकता है - सुरक्षित दूरी पर इससे दूर जाने के लिए। फ्यूज के डिजाइन और एक निश्चित सीमा तक खानों का उपयोग करने की विधि ने सैपर के काम को सुविधाजनक बनाया। सभी घटकों के मानक संचालन के साथ, खदान में विस्फोट हुआ। अस्पष्टीकृत आयुध पृथ्वी की सतह पर पड़ा रहा, जिससे उनकी खोज बेहद आसान हो गई। खानों की निकासी के लिए के. टी. आर. एम. आई. फ्यूज के साथ लकड़ी के ब्लॉक को हटाने और डेटोनेटर को हटाने के लिए आवश्यक था। हालांकि, यह हमेशा संभव नहीं था। यदि डेटोनेटर को निकालना असंभव था, तो ओवरहेड चार्ज का उपयोग करके खदान को नष्ट करने की सिफारिश की गई थी। Kugeltreibmine उत्पादों का उत्पादन वर्ष 1943 के आसपास शुरू हुआ। इन हथियारों का उत्पादन मात्रा छोटा था। जबकि अन्य खानों का उत्पादन हजारों के बैचों में किया गया था, के. टी. आर. एम. आई. एक महीने में कई सौ से अधिक नहीं हुआ। इसके अलावा, 1944 वर्ष में, ऐसे हथियारों का उत्पादन गंभीरता से कम हो गया थाः 800 से 250 इकाइयों के लिए प्रति माह। इस कारण से, सेना में मूल बॉल मोबाइल की खदानें व्यापक नहीं हैं। ऐसे हथियारों का उपयोग एपिसोडिक था और केवल पश्चिमी यूरोप में लड़ाई के लिए लागू होता है। के- Tr. Mi के उपयोग पर जानकारी। पूर्वी मोर्चे पर अनुपस्थित है। Kugeltreibmine मोबाइल बॉल को नाजी जर्मनी के सबसे दिलचस्प और असामान्य प्रकार के हथियारों में से एक के रूप में पहचाना जा सकता है। इसी समय, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह खदान सबसे असफल और बेकार घटनाओं में से एक थी। इस तरह के हथियारों में बेहद सीमित गुंजाइश थी, साथ ही साथ संदिग्ध युद्ध प्रभावशीलता भी थी। कुछ मामलों में, खानों के बजाय एक अलग उत्पादन के संगठन की आवश्यकता होती है, मौजूदा हैंड ग्रेनेड का उपयोग करना संभव था। खानों की मुख्य समस्या के. टी. आर. एम. आई. आवेदन की प्रस्तावित विधि में शामिल है। एक अग्रिम दुश्मन पर अपेक्षाकृत बड़े विस्फोटक चार्ज के साथ भारी गोला बारूद को रोल करने का विचार दिलचस्प लगता है। हालांकि, व्यवहार में, वह कई गंभीर समस्याओं का सामना करती है। सबसे पहले, यह परिदृश्य है। हमेशा नहीं जर्मन सैनिकों को ऊंचाई में एक फायदा था और एक ढलान पर आगे बढ़ने वाले दुश्मन से खुद की रक्षा करने की क्षमता थी। अन्य मामलों में, एक नियमित तरीके से खानों का उपयोग असंभव था। इसके अलावा, जिस ढलान पर खानों को रोल करने की योजना बनाई गई थी, उसमें ऐसा कोई भी धमाका नहीं होना चाहिए जो गोला-बारूद को रोक सके। खाइयों से थोड़ी दूरी पर स्थित धक्कों के कारण, बचाव बलों को अपनी खानों से कुछ नुकसान हो सकता है। ठोस मामले और विभिन्न धातु की वस्तुओं के रूप में हड़ताली तत्वों ने हथियारों के उत्पादन को सुविधाजनक और सस्ता किया, लेकिन उनके उपयोग को मुश्किल बना दिया। गेंद की खान काफी भारी हो गई, जो कुछ हद तक उपयोग और वास्तविक उपयोग के लिए इसकी तैयारी को जटिल बनाती है। संचालक के साथ फ्यूज के इस्तेमाल से ऑपरेशन में भी बाधा आ रही थी। जिस सेनानी ने K. Tr. Mi. का उपयोग किया था, उसे खानों के मार्ग की सही गणना करने के लिए आवश्यक था, साथ ही ढलान पर गिरावट के सटीक क्षण का भी निर्धारण करना था। पैरापेट के साथ असामयिक टक्कर के मामले में, खदान आगे की टुकड़ियों तक नहीं पहुंच सकती थी या दुश्मन के युद्ध संरचनाओं के पीछे विस्फोट कर सकती थी। इसके अलावा, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुश्मन के पास सुरक्षित दूरी पर रिटायर होने और लेटने का समय हो सकता है। खानों का उपयोग करने की डिजाइन और विधि के. टी. आर. एम. आई. वे कहते हैं कि युद्ध की प्रभावशीलता के संदर्भ में इस तरह के हथियार न केवल धक्का कार्रवाई की खानों के लिए, बल्कि हथगोले को भी खो देते हैं। पूर्व ने दुश्मन से पर्याप्त रूप से बड़े क्षेत्र की रक्षा करना संभव बना दिया, और उत्तरार्द्ध, रक्षकों के नियत कौशल के साथ, दुश्मन के लड़ाकों को आगे बढ़ा सकते थे, प्रतिक्रिया के लिए लगभग कोई समय नहीं छोड़ा। इसके अलावा, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लड़ाई के दौरान खदानों और हथगोले रक्षकों के सहायक हथियार हैं और केवल छोटे हथियारों के पूरक हैं। जर्मन कमांड ने शायद समझा कि कुगेल्ट्रेइम्बाइन खदान में अस्पष्ट या यहां तक कि संदिग्ध संभावनाएं थीं, जिसके कारण इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन बहुत तेज नहीं था। समय के साथ, इस तरह के हथियारों का उत्पादन अन्य प्रणालियों के निर्माण के पक्ष में और कम हो गया। लगभग सभी बॉल मोबाइल की खदानों का इस्तेमाल या तो लड़ाई के दौरान किया गया था, या हिटलर विरोधी गठबंधन की विरोधी ताकतों को ट्राफियां के रूप में दिया गया था। इनमें से कई गोला-बारूद आज तक बच गए हैं। अब वे संग्रहालय प्रदर्शनी हैं। साइटों की सामग्री परः
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16 Jun 2023विश्व हिंदू परिषद (VHP) कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने के सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के फैसले पर हिंदू संगठनों में जबरदस्त नाराजगी दिख रही है। कर्नाटक में पिछले भाजपा सरकार द्वारा लाए गए गोहत्या विरोधी कानून पर सियासत गरमाई हुई है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री एमबी पाटिल ने सोमवार को ट्वीट कर 'शांतिपूर्ण कर्नाटक' नाम से एक हेल्पलाइन शुरू करने का प्रस्ताव रखा। कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार का आज मंत्रिमंडल विस्तार हुआ, जिसमें 24 विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार की मुफ्त घोषणाओं की आलोचना करना एक सरकारी स्कूल के शिक्षक को भारी पड़ गया। उनको सेवा से निलंबित कर दिया गया है। कर्नाटक में नवगठित सरकार की शनिवार को पहली कैबिनेट बैठक हुई। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में शनिवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया और कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने क्रमशः मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। कर्नाटक चुनाव के नतीजे शनिवार को घोषित हुए, जिसमें कांग्रेस ने 135 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि भाजपा ने 66 सीटें जीती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय के आरक्षण को लेकर दिये जा रहे राजनीतिक बयानों पर कड़ी आपत्ति जताई। मंगलवार को कर्नाटक सरकार के राज्य में 4 फीसदी मुस्लिम आरक्षण को खत्म करने के मामले में अहम घटनाक्रम हुआ। कर्नाटक में हाई कोर्ट ने एक नहर के काम के लिए सरकारी कार्यकारी अभियंता द्वारा 5 करोड़ रुपये भुगतान की मंजूरी पर हैरानी जताई। इस नहर का काम 3 दिन में पूरा हो गया था। चुनाव आयोग ने कर्नाटक में चुनावी तारीखों का ऐलान कर दिया है। राज्य की सभी सीटों पर 10 मई को एक ही चरण में मतदान होगा और 13 मई को नतीजे जारी किए जाएंगे। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता बीएस येदियुरप्पा के घर पर सोमवार को हमला हो गया। कर्नाटक में जल्द ही विधानसभा चुनावों का ऐलान हो सकता है। इससे पहले लिंगायत समुदाय से जुड़ी दो बड़ी खबरें आई हैं। कर्नाटक में दूध की भारी किल्लत सामने आ रही है। इसके देखते हुए कर्नाटक सरकार ने दूध के दाम न बढ़ाकर अलग रास्ता अपनाया है और दूध की मात्रा कम कर दी। टीपू सुल्तान के एक वंशज ने राजनीतिक पार्टियों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे टीपू के नाम का इस्तेमाल राजनीति के लिए न करें। कर्नाटक में दो वरिष्ठ महिला अधिकारियों के बीच व्यक्तिगत विवाद सामने आया है। भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी डी रूपा और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी रोहिणी सिंधुरी ने एक-दूसरे पर जमकर निशाना साधा है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुधवार को आदियोगी मूर्ति के अनावरण और बेंगलुरू के नंदी पहाड़ियों की तलहटी पर बने ईशा योग केंद्र के उद्घाटन पर रोक लगा दी। महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच चल रहे सीमा विवाद में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कर्नाटक के मंत्री जे मधु स्वामी की टिप्पणी पर खरा जवाब दिया है। कर्नाटक में जनता दल (सेक्यूलर) (JDS) की विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी की पत्नी अनिथा कुमारास्वामी ने एक जनसभा में किसानों से कहा कि जितना चाहिए उतना लोन लो, उनकी सरकार आने पर सब माफ कर देंगे। चीन में कोरोना के कहर को देखते हुए केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारें भी अपनी ओर से आदेश जारी कर रही हैं। कर्नाटक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सतीश लक्ष्मणराव जारकीहोली ने सोमवार को हिंदू शब्द पर कई तरह के सवाल खड़े करते हुए नए विवाद को जन्म दे दिया है। देशभर में आज दिवाली का त्योहार मनाया जा रहा है। लोग एक-दूसरे को उपहार देकर खुशियां मना रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में पर्यटन मंत्री आनंद सिंह की ओर से दिए गए उपहार ने विवाद खड़ा कर दिया है। कर्नाटक सरकार में मंत्री वी सोमन्ना एक महिला को थप्पड़ मारकर विवादों में घिर गए हैं। कांग्रेस ने जहां मंत्री को पद से हटाने की मांग की है, वहीं मुख्यमंत्री बसवराज बोम्ममई ने उनसे सफाई मांगी है। चरमपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) चौतरफा मुसीबतों में घिर गया है और कर्नाटक सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगाने की कार्रवाई शुरू कर दी है। कर्नाटक के मंत्री उमेश कट्टी की मंगलवार रात हार्ट अटैक से मौत हो गई। वह 61 साल के थे और राज्य सरकार में वन, खाद्य, सिविल सप्लाई और ग्राहकों से संबंधित मामलों के मंत्री थे। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में रविवार रात आई बारिश के बाद शहर के हालत बिगड़े हुए हैं। कर्नाटक में दो धड़ों में बंटी कांग्रेस को एकजुट करने पहुंच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को चित्रदुर्ग में स्थित लिंगायत समुदाय के मुरुगराजेंद्र मठ का भी दौरा किया। कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत ने मंगलवार को राज्य सरकार की ओर से गत दिनों पारित किए गए धर्मांतरण विरोधी विधेयक से संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी। देश में लाउडस्पीकर पर अजान के खिलाफ विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की मांग उठाने के बाद अब कर्नाटक में भी इसकी आग पहुंच गई है। टोयोटा (Toyota) ने कर्नाटक सरकार के साथ किये अपने एक समझोते (MoU) की घोषणा की है। कर्नाटक में भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल के 2,500 करोड़ रुपये में मुख्यमंत्री बनाने का ऑफर मिलने के दावे ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। कर्नाटक में एक ठेकेदार की मौत के मामले में राज्य के मंत्री केएस ईश्वरप्पा का नाम आने के बाद विवाद बढ़ गया। कर्नाटक में स्कूल और कॉलेजों में हिजाब पहनने को चल रहे विवाद के बीच कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों वाली पूर्ण पीठ ने शुक्रवार को सभी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर ली है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी का सपना देखने वाले उम्मीदवारों के लिए अच्छी खबर है। कर्नाटक के शिवमोगा शहर में बजरंग दल के कार्यकर्ता की हत्या के बाद से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। कर्नाटक के शिवमोगा शहर में बजरंग दल के कार्यकर्ता की हत्या के बाद तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। संगठन के सदस्यों ने आज शहर में कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन किया और कुछ जगहों पर पथराव भी किया गया। भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस के आंसू गैस के गोले छोड़ने की खबर भी है। कर्नाटक में चल रहे हिजाब विवाद मामले में सरकार और पुलिस की ओर से लगातार समझाइश करने के बाद भी विरोध-प्रदर्शन थम नहीं रहा है। कर्नाटक में चल रहे हिजाब विवाद को लेकर हाई कोर्ट की तीन जजों वाली बड़ी बेंच में लगातार सुनवाई चल रही है। कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों वाली बड़ी बेंच ने राज्य में चल रहे हिजाब विवाद मामले को लेकर गुरुवार को अहम सुनवाई की। कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनकर कॉलेज आने पर विवाद के बीच बेंगलुरू में स्कूल और कॉलेजों के आसपास सभा या प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ये प्रतिबंध दो हफ्ते तक लागू रहेगा। कर्नाटक में हिजाब पहनने को लेकर शुरु हुआ विवाद मंगलवार को उबाल पर आ गया। कर्नाटक में कक्षाओं में हिजाब पहनने को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य सरकार ने ड्रेस कोड लागू कर दिया है। कर्नाटक में हिजाब पहनने को लेकर शुरु हुआ विवाद अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। उडुपी के सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ यह विवाद अब अन्य कॉलेजों तक पहुंच गया है। कोरोना वायरस के ओमिक्रॉन वेरिएंट के प्रभाव के कारण देश में संक्रमण के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री के सुधाकर ने महिलाओं पर विवादत बयान दिया है। आज हुए एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक भारतीय महिलाएं अविवाहित रहना चाहती हैं और यदि शादी हो भी जाए तो बच्चे नहीं पैदा करना चाहती हैं, सरोगेसी से बच्चा चाहती हैं। कर्नाटक सरकार ने ट्रांसजेंडरों के प्रति भेदभाव को मिटाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। देश में कोरोना से ठीक हुए लोगों पर म्यूकरमायकोसिस यानी ब्लैक फंगस का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। ऐपल के लिए अनुबंध पर आईफोन का विनिर्माण करने वाली कंपनी विस्ट्रॉन के कर्नाटक के कोलार स्थित नरसापुरा प्लांट पर पिछले दिनों हुई हिंसा के मामले में कंपनी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। कर्नाटक में कोरोना वायरस के संक्रमण की स्थिति को जांचने के लिए कराए गए सीरोलॉजिकल सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। देश में लगातार बढ़ते कोरोना वायरस के संक्रमण ने अब चिकित्सा व्यवस्था पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार ने 25 मार्च से लागू लॉकडाउन में सभी धार्मिक स्थलों को भी बंद कर दिया था। कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन के बीच सोमवार से घरेलू विमान सेवाएं फिर से शुरू हो गई हैं। PM केयर्स फंड के खिलाफ कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए कुछ ट्वीट्स के संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक में एक मामला दर्ज किया गया है। कांग्रेस-JDS गठबंधन सरकार की दीवार को गिराकर फिर से सत्ता पर काबिज होने वाले मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को इसी माह अपने मंत्रीमंडल का विस्तार करना है, लेकिन उससे पहले उनके सामने परेशानियां खड़ी होना शुरू हो गई हैं। केंद्र सरकार के नए मोटर वाहन अधिनियम पर बहस के बीच कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री ने सड़क दुर्घटनाओं को लेकर अजीबोगरीब बयान दिया है। कांग्रेस 17 विधायकों की सदस्यता रद्द होने से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव की तैयारियों में जुट गई है और इसे जनता दल (सेक्युलर) के साथ उसके गठबंधन के अंत के तौर पर देखा जा रहा है। कर्नाटक में सफलता के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार पर निशाना साधे बैठी भारतीय जनता पार्टी को तब बड़ा झटका लगा जब उसके 2 विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर सरकार के एक बिल के समर्थन में वोट कर दिया। रोज लंबे होते इंतजार के बीच आज आखिरकार कर्नाटक विधानसभा में विश्वास मत पर वोटिंग हो गई, जिसमें एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई। कर्नाटक में चल रहा सियासी नाटक थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार को सदन को 22 जुलाई तक स्थगित कर दिया गया है। कर्नाटक में राज्यपाल वजुभाई वाला द्वारा मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी को दी गई शाम 6 बजे की दूसरी डेडलाइन भी खत्म हो गई है। विधायकों के इस्तीफे के कारण संकट से गुजर रही कर्नाटक सरकार गुरुवार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेगी। मुंबई के होटल में ठहरे कर्नाटक के 14 बागी विधायकों ने फिर से मुंबई पुलिस को पत्र लिखकर कांग्रेस नेताओं ने गंभीर खतरा बताया है और सुरक्षा की मांग की है। शनिवार को कर्नाटक सरकार के 5 और बागी विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और कहा कि विधानसभा स्पीकर उनके इस्तीफे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। कर्नाटक में सियासी नाटक के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सिद्धारमैया ने बागी कांग्रेस विधायकों को चेतावनी दी है। कर्नाटक की कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन सरकार की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) प्रमुख एचडी देवगौड़ा ने कर्नाटक में मध्यावधि चुनाव होने की भविष्यवाणी की है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने भारतीय जनता पार्टी पर विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया है। कर्नाटक की सत्ता पर काबिज कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन में मतभेद एक बार फिर से तब उजागर हुए, जब बुधवार को मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि वह हर दिन दर्द से गुजर रहे हैं। कर्नाटक के भाजपा नेता केएस ईश्वरप्पा ने विवादित बयान दिया है। कांग्रेस नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की एक हरकत की वजह से पार्टी की मुसाबतें फिर से बढ़ सकती हैं। कर्नाटक में चल रहे सियासी नाटक में एक ऐसी घटना सामने आई है जो कांग्रेस की सिरदर्दी बढ़ा सकती है।
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चौंरीखाल से चलें तो तकरीबन 5 किमी. आगे पैठाणी से आने वाली सड़क हमारी सड़क से जुड़ गयी है. ललित बताते हैं कि पैठाणी वाली सड़क भी बिट्रिश कालीन ऐतिहासिक मार्ग पौड़ी-रामनगर का ही हिस्सा है. कैन्यूर बैंड पर नीचे की ओर दिख रहे थलीसैंण के लिए एक सड़क मुड रही है. थलीसैंण यहां से 10 किमी है. (Chandra Singh Garhwali Village Travelogue) कैन्यूर बैंड के पास वाला कैन्यूर गांव कत्यूरी राजाओं का प्राचीन गांव माना जाता है. भरा-पूरा और जीवन्त गांव. इस इलाके की सम्पन्नता और खुशहाली इसी बात से दृष्टिगौचर होती है कि पौड़ी से चलते-चलते करीबन 100 किमी. हो गए हैं और हमें न तो कोई टूटा/खंडहर घर/इमारत मिली और न ही कहीं बंजर जमीन या छूटे हुए खेत. पुरुष हों या स्त्रियां अपने-अपने काम-धन्धों में है. सड़क के किनारे मिट्टीतेल के ड्रम के ऊपर कैरम खेलते युवा और चाय की दुकान के पिछवाड़े ताश खेलते सयाने यहां सिरे से नदारत हैं. इस पूरे परिदृश्य पर 'ये तो पहाड़ी पहचान के बिल्कुल विपरीत बात हो गयी' सीताराम बहुगुणा का जुमला था. जंगलों में लगी आग के निशान जरूर जगह-जगह पर हैं. पर उस भयावहता में नहीं है जैसा अन्य पहाड़ी इलाकों में देखने को मिलते हैं. ललित का कहना है कि 'जंगल और लोगों के रिश्ते यहां अभी उतने दूर नहीं हुए हैं जितना कि शहरी इलाकों के आस-पास हो गए हैं. जंगलों की भरपूरता ने यहां के लोगों के पुश्तैनी कार्यों को कमजोर नहीं होने दिया है. जगलों में जंगली जानवरों का आधिपत्य है तो खेत-खलिहानों में मानवों का. दोनों अपनी-अपनी जगह अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ बेफिक्र हैं. जंगली जानवरों को अपनी जरूरतों का भोजन जंगल में आसानी से मिल जाता है. फिर क्यों वो मानव आबादी में आने का जोखिम उठायेंगे. दूसरी तरफ सभी गांव लोगों से आबाद हैं तो जंगली जानवरों के कभी-कभार के हमलों पर नियंत्रण रखना उनके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होता है. चौंरीखाल में दुकानदार का यह कहना कि बाघ हमारा दोस्त है इसी बात की पुष्टि करता है, क्योंकि बाघ और स्थानीय आदमी के रास्ते तथा जरूरतों में टकराहट की गुजांइश दूधातोली इलाके में बहुत कम है'. कैन्यूर बैंड से 20 किमी. चलकर हम पीठसैंण पहुंचे हैं. पीठसैंण (समुद्रतल से 2250 मीटर ऊंचाई) एक ऊंची धार पर एकदम पसरा है, ग्वाले की तरह. जैसे कोई ग्वाला ऊंचे टीले पर अधलेटा आराम फरमाते हुए नीचे घाटी में चरते अपने जानवरों पर भी नजर रख रहा हो. (Chandra Singh Garhwali Village Travelogue) 'पहाड़ी भाषा में 'सैंण' का मतलब 'मैदान' होता है और 'सैंण' में 'ई' की मात्रा लगा दो तो पहाड़ी में 'सैंणी' 'महिला' को कहते हैं'. अब तक बिल्कुल चुप रहने वाले अजय ने अपनी चुप्पी इस ज्ञानी बात को कहकर तोड़ी है. सपकपाया अजय कहता है पीठसैंण नाम पर उसे यह याद आया. अजय की इस बात पर केवल मुस्कराया ही जा सकता है. पीठसैंण की वर्तमान पहचान उत्तराखंड के जननायक स्वर्गीय वीर चंन्द्रसिंह 'गढ़वाली' जी से है. (ज्ञातव्य है कि चन्द्रसिंह 'गढ़वाली', सेना में 2/18 रायल गढ़वाल में हवलदार थे और 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में देश की स्वाधीनता के लिए शान्तिपूर्वक प्रर्दशन कर रहे निहत्थे पठानों पर कम्पनी कमाण्डर के 'गढ़वाली तीन राउण्ड गोली चलाओ' के आदेश को उन्होने 'गढ़वाली गोली मत चलाओ' कह कर मानने से मना कर दिया था. तब यह घटना विश्व चर्चा का विषय बनी और इसको भारतीय सेना का विद्रोह माना गया था. चन्द्रसिंह और उनके साथियों को तकरीबन 11 साल कालापानी की सजा हुई. सजा से छूटने के बाद चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' एक कम्यूनिष्ट नेता के रूप विख्यात हुए). सड़क के एक किनारे पर टीन शैड़ से ढ़के चबूतरे पर चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' जी की मूर्ति खड़ी है. पास ही उनके साथियों के नाम और पेशावर घटना के विवरण का शिलापट्ट है. गढ़वाली जी की मूर्ति देखकर एक तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का उसमें कहीं साम्य नजर नहीं आता, फिर लोगों के कुसंस्कारों ने जिस तरह से उसे जगह-जगह पर खंरोचा है, उससे तो अच्छा था कि यहां पर यह मूर्ति लगती ही नहीं. ये मूर्तियों का प्रचलन भी अजीब है. जीवन में अब तक हजारों मूर्तियां देख ली होगीं पर उनको देखकर उन जैसा बनने की कभी प्रेरणा मिली हो मुझे ऐसा तो याद नहीं आता है. पास ही एक जेसीबी पहाड़ी टीले को उधाड़ने में लगा है. पता चला कि एक भव्य स्मारक बनाने के लिए इस मैदान को और लम्बा-चौड़ा किया जा रहा है. मन में आया कि चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' जी के जीते-जी तो कभी कद्र की नहीं की न समाज ने और न ही तत्कालीन सरकार ने अब उनके नाम पर जो कर लो, उनकी बला से. पीठसैंण की उत्तर दिशा में 30 किमी. पर प्रसिद्ध तीर्थ 'विनसर महादेव, समुद्रतल से 2480 मीटर ऊंचाई) है. ऐसी मान्यता है कि मन्दिर के पास एक प्राचीन नगर भूमिगत है. पीठसैंण से 'विनसर महादेव' होते हुए गैरसैण जाने का पैदल मार्ग है. पीठसैंण से उडियार खरक 6 किमी. वहां से कोदियाबगड़ 6 किमी. और वहां से 15 किमी. गैरसैंण है. (Chandra Singh Garhwali Village Travelogue) सज्जन सिंह बताते हैं कि वो बर्फीली चोटी मूसाकोठ (समुद्रतल से 10,217 फिट ऊंचाई) और वो कोदियाबगड़ (समुद्रतल से 10,183 फीट ऊंचाई) का क्षेत्र है. कोदियाबगड़ में चन्द्रसिंह जी की छः फीट की समाधि सरकार ने बनाई है. ललित ने पूछा 'इधर कोई नेता लोग भी आते हैं'. 'हां साब, आते ही रहते हैं. पर हमारी चाय तो आप जैसे लोगों से बिकती है. नेता मंत्री आते हैं और बड़-बड़ करके चले जाते हैं. पर साब, 23 अप्रैल, 2005 को मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी आये थे यहां. भौत, बड़ा कार्यक्रम हुआ था तब. गजब का किस्सा हुआ साहब, उस दिन. स्कूल के बच्चों ने उस समारोह में नाचना-गाना किया. नाटक करते हुए एक बच्चे पर चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' पहाड़ी देवता के रूप में अवतरित हो गया. फिर तो नाचते-नाचते देवता बनकर बोलते हुए उसने सरकार की जो पोल खोली उसको देखकर नेता तो भुनभुना रहे थे पर पब्लिक खूब मजे ले-ले कर हंस कर लोट-पोट हो रही थी. नाटक में उस देवता ने धै (जोर की आवाज) लगा कर सबसे पूछा 'क्यों नहीं बनाई उत्तराखंड की राजधानी 'गैरसैंण' में, शराब और खनन से बरबाद कर रहे हो पहाड़ को, बच्चे बेरोजगार हैं, उनका रोजगार कहां गया, लोग बीमार हैं और तुम मजे कर रहे हो, शर्म नहीं आती तुम सबको और भी साब भौत भौंकुछ (कुछभी) बोला उस देवता ने. साब, उस दौरान सारा सरकारी अमला हकड़क (स्तब्ध) हो गया. क्या जो करें, उस समय तो वो बच्चा देवता हुआ, उसे रोक भी नहीं सकते थे. बड़ी मुश्किल से धूप-पिठाई देकर उस देवता को शांत किया गया'. 'बाद में मुख्यमंत्री तिवाड़ी जी ने क्या कहा'? अजय ने पूछा. 'अरे साब, नारायण दत्त तिवारी जी हुए वो बहुत होशियार, पूरे टैम उस देवता की ओर नतमस्तक रहे और कहते रहे 'सब्ब है जलि, सब्ब है जलि, (सब हो जायेगा, सब हो जायेगा). पीठसैंण से अब सड़क ढ़लान पर हो गयी है. पूर्वी नयार के इस पार (किनारे) वाले क्षेत्र के 80 गांव चौथान पट्टी में शामिल हैं. चार गाड़ों (छोटी नदी) का सम्मलित भू-भाग चौथान कहलाया. ये गाड़ हैं मासों गाड़, अंगगाड़, बसौली गाड़ और डड़ौली गाड़. चौथान क्षेत्र जड़ीबूटी और चारागाहों के लिए प्रसिद्ध है. जड़ीबूटी संग्रहण और दूध उत्पादन में यह इलाका अग्रणी है. चन्द्रसिंह 'गढवाली' जी के पुस्तैनी गांव मासों पीठसैंण से 10 किमी. पर है. चौथान पट्टी के रौणींसेरा मासों गांव में जाथली सिंह भण्डारी के घर 25 दिसम्बर, 1891 को चन्द्रसिंह का जन्म हुआ था. वे नजदीकी स्कूल बूगींधार से प्राइमरी में पढ़ने के बाद घर से भागकर गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे. अब उनके परिवार का तो कोई गांव में रहता नहीं है. लिहाजा, पास के ही गांव की दिक्खा देवी जो भागवत कथा सुनने की जल्दी में है से चलते-चलते बात होती है. वे बताती हैं कि मासों भण्डारियों का गांव है. खेती सिंचित और ऊपजाऊ है इसीलिए चारों ओर आबाद खेत नजर आते हैं. गांव के ऊपरी छोर पर बांज-बुरांस का घना जंगल है. आलू बहुत होता है. गढ़वाली जी के पैतृक घर के पास ही गुलबहार का मोटा ताजा पेड है जिसे गढ़वाली जी कोटद्वार से लाकर लगाया था. बताया गया कि उत्तराखंड में चकबंदी के शुरुवाती प्रयास मासों ग्राम में भी हुए थे. आज तो उत्तराखंड में चकबंदी का चक्रचाल बस बातों में ही सांसे ले रहा है. (Chandra Singh Garhwali Village Travelogue) मासों से जगतपुरी है 8 किलोमीटर यहां से हमें मेन सड़क छोड़कर देघाट वाली सड़क की ओर जाना है. मेरा मानना है कि जहां पर दो सड़कें जुड़ रही हो वहां पर अपनी मंजिल वाली सड़क की पुख्ता जानकारी लेने में ही अक्लमंदी होती है. और जब अक्ल का इस्तेमाल करोगे तो परेशानी होगी ही. परेशानी यह है कि थोड़ा आगे आने के बाद मैंने कहा चलो किसी से पूछ लेते हैं कि हम सही सड़क पर चल रहे हैं की नहीं. तुरंत ललित ने कहा कि गाड़ी से उतर कर ये नेक काम आप ही कर लीजिए क्योंकि बताने वाले तो दुकानों के अन्दर हैं. 'चल खुसरो, पूछ आते हैं' के भाव से एक सज्जन से पूछा तो उसने छूटते ही कहा- आप सामने के बोर्ड में देघाट का ऐरो नहीं देख रहे हैं क्या? ओह, सचमुच, खिसयाया सा मैं अब अपनी गाड़ी में थोड़ी देर में जाना चाहता था. सोचा और क्या जो पूंछू इनसे, मुहं से निकला 'वाह ! भाई सहाब, जगतपुरी के सारे घर नये और चमचमाते हैं. बड़ा खूबसूरत गांव है यह. हां भाई सहाब 'नई बसावत वाला गांव है यह. हमारे दादा जी का नाम था 'जगत सिंह' उन्होने सबसे पहले यहां पर घर बनाया और रास्ते में बड़ा सा लिख दिया 'जगतपुरी'. बस, पहले लोगों ने मजाक में इस जगह को 'जगतपुरी' कहा अब नाम ही पड़ गया 'जगतपुरी'. (Chandra Singh Garhwali Village Travelogue) मैने कहा 'भाई अगर उनका नाम जगन्नाथ होता तो जगन्नाथपुरी हो जाती ये जगह'. उस पर क्या प्रतिक्रिया हुई ये देखे बगैर मैं तेजी से अपनी गाड़ी में बैठते ही बोला, चलो हम ठीक रास्ते पर हैं. 'जगतपुरी से आगे 5 किमी. के बाद देघाट के लिए एक शार्टकट है, उसमें 2 किमी. की सड़क कच्ची है लेकिन उसके बाद तो सड़क पर गाड़ी सायं-सायं करती आगे बढ़ती है, ऐसा पीठसैंण में किसी मार्गदर्शक ने बताया था. यात्रा में शार्टकट का लालच तो होता ही है. 'उसी सड़क से चलो चलते हैं' की राय के बाद चलती गाड़ी में हिचकोले खाना जो शुरू हुआ वो पाठक बन्धुओं 10 किमी. तक जारी रहा. मुश्किल ये कि पीछे भी नहीं जा सकते. सड़क के ऊपर की ओर चट्टान जैसे बड़े-बड़े पत्थर ऐसे लगते कि बस, सड़क पर जैसे लुड़कने के समय के लिए हमारे आने का ही इंतजार कर रहे हों. सीताराम बहुगुणा का ये विचार कि सरकार को नदी किनारे खनन कार्य कराने के बजाय सड़क के आस-पास के चट्टानी पत्थरों को तोड़ने की इजाजत दी जानी चाहिए. इन पत्थरों का कहीं कोई उपयोग तो होता नजर आता नहीं. विचार तो विचारणीय है पर फिलहाल समस्या यह है कि इन चट्टानी पत्थरों के आस-पास तक कोई गांव तो क्या आदमी भी नजर नहीं आ रहा है. हां, पहली बार इस ओर बंदरों के उछलते-कूदते झुंड जरूर हैं. मुसीबत में जब आदमी होता है तो उसको दूसरे सभी उस पर हंसते हुए नजर आते हैं. चाहे वो जानवर ही क्यों न हो. ऐसी हालात में बंदरों को भी मैं इसी नजर से खुश देख रहा हूं. संयोग यह कि गाड़ी मित्र सीताराम चला रहे हैं और मैं किसी अनहोनी से बचने और माहौल को हल्का करने के लिए सीताराम-सीताराम जपने लगा हूं. अजय सबसे छोटा है लिहाजा बार-बार सड़क के पत्थरों को हटाने का जिम्मा उसी का है. ललित ने कहा कि ये बात समझ में नहीं आती कि लोग अक्सर अच्छी खासी लम्बी दूरी को भी यहीं पर बस एक लतड़ाग (कदम) क्यों जो कहते होंगे? यही तो आनंद है जीवन का, वरना फिर नपी-तुली जिन्दगी तो केवल चलने वाली हुयी जीवंत जीने वाली ज़िन्दगी तो ऐसी ही ऊबड़-खाबड़ होती है. मैने जो ये कहा- तो फिर जाओ गाड़ी के आगे की सड़क के पत्थर उठाओ, जीवंत जिदंगी जीने के लिए. ललित ने मुस्कराते हुए आदेश दिया है. (Chandra Singh Garhwali Village Travelogue) वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी अरुण कुकसाल का यह लेख उनकी अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है. लेखक के कुछ अन्य लेख भी पढ़ें :
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चम्पका लु- चम्पा "सतो गच्छत राजेन्द्र चम्पकारण्य मुत्तमम् । सवोष्य बजनीमेकां गोमहसफल लभेत् ।" (मशरम वन ८४५० इसका वर्तमान नाम चम्पारण्य है । चम्पकालु ( मं० पु० ) चम्पकेन पनमावयव विशेषेण अलति . चम्पक अल. उग । पनम, कटहल । चम्पकावतो (सं० स्त्री० ) चम्पक अस्त्यर्थे मतुप्, मस्य वः संज्ञायां दोघं : । चम्पापुरो । चम्पादेखो। चम्पकुन्द ( सं० पु० ) चम्पइव कुन्दते कुदि-अच् । मस्यविशेष, एक तरहको मछली । इसका गुण - गुरु, शुक्र वर्द्धक, मधुर और वातपित्तनाशक है । चम्पकोल ( सं० पु० ) पनसवृक्ष, कटहलका पेड़ । चम्पकोष (मं० पु०) चम्पञ्चम्पक इव कोषो वस्य, बहुव्री० । पनम, कटहलका पेड़ । चम्पतराय -- एक विख्यात बुन्देला मर्दार, छत्रसालके पिता । १७वीं शताब्दी में इन्होंने सैन्य दलको साथ ले मुसलमानोंको परास्त कर वेत्रवती नदीतीरवर्ती समु दाय भूभाग अधिकार किया था । लाल कविके बनाये हुए छत्रप्रकाश नामक हिन्दी ग्रन्थ में इनका यथेष्ट परिचय है । करुसाल देखो। चम्पा (हिं० स्त्री० ) चम्पक देख । चम्पा ( मं० स्त्रो० ) चम्पा नदी अस्ति अस्याम्, चम्पा अर्श आदित्वात् अच् । अथवा चम्पन रात्र हरिश्चन्द्रस्य प्रपो त्रेण निर्मिता या पुरी । १ गङ्गातीरस्थ अङ्ग राज्यको राज धानो। महाभारत और पुराणमें चम्पा, चम्पापुरी प्रभृति नामोंसे उसका उल्लेख है । हेमचन्द्रने सालिनी, लोमपादपू श्रोर कापू आदि चम्पाके कई एक पर्याय लिखे हैं। वर्तमान भागलपुरके निकट ही वह नगर रहा। विख्यात चीनपर्यटक युएनचुयाङ्ग चम्पाका ऐसा विवरण लिख गये हैं - चम्पा एक विस्तृत प्रदेश है। इसको राजधानो चम्पानगर उत्तरभाग में गङ्गाके तौर अवस्थित है । यह प्रदेश समतल तथा उर्वर है और सुचारुरूपसे कर्षित हुआ करता है। वायु मृदु और ईषदुष्ण है। अधिवासी सरल और सत्यवादो हैं। यहाँ बहुतसे जीर्ण सङ्घाराम हैं। इन सब मठों में प्रायः २०० बौद्ध यति रहते हैं। यह होनयान मतावलम्बी हैं। इसमें कोई २० देवमन्दिर हैं। राजधानीका चतुर्दिकस्य प्राचीर इष्टक निर्मित, अत्यच्च और शत्रुगणको दुराक्रम्य है। कहते हैं, उसी कल्पके आरम्भ में जब मनुष्य प्रभृतिको प्रथम सृष्टि हुई, एक अप्सरा किमो अपराधसे स्वर्गच्युत हो मय में आ करके बमो थी। फिर किसी देवर्क और और इसी अमराके गभसे ४ पुत्र हुए। इन्हीं पुत्रोंने जम्बुद्दीपको चार में बांट लिया और प्रत्यकने अपने अपने अंश में राज्य स्थापन किया। उन्होंमें एक चम्पानगरके स्थापयिता थे । इस नगरसे पूर्व थोड़ी दूरको गङ्गाके दक्षिण तोर पर एक पहाड़ और तदुपरि एक देवमन्दिर है। इस मन्दिर के देवता प्रत्यक्ष हैं और अनेक अलौकिक घटना प्रदर्शन करते हैं । पहाड़को काट करके मन्दिर आदि निर्मित हुए हैं । इस पहाड़ और उसके गुहा प्रभृति देखनेको बहुतमे ज्ञानी आया करते हैं। इस प्रदेश के दक्षिणांश में अरण्य है। बोच बीच हाथो और अन्यान्य वन्य जन्तु दलके दल घूमते हैं । ( Si-yu-ki ) भागवतादिके मतमें हरितपुत्र चम्पने अपने नाम पर चम्पानगरी बनायो । चम्प देखो । २ पूर्व उपद्दीपका एक अति प्राचीन राज्य । वर्तमान आनाम और कम्बोडिया अर्थात् कम्बोजके दक्षिणांश में यह राज्य अवस्थित था । अद्यापि उस स्थान के घोड़े अंशको चम्पा कहते हैं । इस देश के अधिवामी चम् ( चम्प् ) नामसे ख्यात हैं। प्रवाद है - कम्बोजोंके आने से पहले यह किसो समय श्याम उपसागरसे समस्त उपद्दो पर्मे व्यास हो करके वास करते थे । पहले वह मब हिन्दू धर्मावलम्बी थे। अनुमान होता है कि गातोरवर्ती चम्पानगर के अनुकरण पर उसका नामकरण हुआ होगा। सृष्टीय म शताब्दको पार्थक्य दिखलाने के लिये इसको महाचम्पा कहते थे । चोना पर्यटक युएनचुयाङ्गने कम्बोडियाको चम्पाको महाचम्पा और गङ्गतोरवर्ती चम्पानगरको चम्पा जैसा ही ( चेन्पो ) लिखा है । आनामवासियोंके आक्रमण करने से पहले यह राज्य प्रबल पराक्रान्त हिन्दू राजा कर्तृक शामित होता था । उस समय इसको सोम श्याम ओर आनाम में बहुत दूर तक विस्तृत थो । आगामी भाषामें चम्पा के लोगोंको लुई कहते हैं। यह बराबर हिन्दू मतावलम्बी रहे । इनको उपासना प्रभृति बोड़ों और जैनों जैसी है। यहां भी हर, पार्वती आदिको पूजा होती है। कितने ही वर्ष पहले वहां कई एक प्राचीन शिलालिपि और अनुशासन प्रभृति मिले थे। इनका अधिकांश संस्कृत किंवा चम् भाषामें लिखित है । सबको पढ़नेसे समझ पड़ता है कि वहां पहले पराक्रान्त हिन्दू राजा राजत्व करते थे। उन्होंने स्व व नामानुसार इस प्रदेशमें जयहरिलिङ्गेश्वर, श्रीजयहरिवर्मलिङ्गेश्वर, श्रोइन्द्रवर्मशिवलिङ्गेश्वर प्रभृति शिवलिङ्गोको प्रतिष्ठा की थी। इनमें संस्कृतभाषाको लिखी लिपिडां अति प्राचीन हैं । चम्पा - काश्मोरका सीमान्त प्रदेश । इसको राजधानीको ब्रह्मपुर कहते हैं । १०२८ से १०३१ ई० के बीच काश्मीरराज अनन्तदेवने उक्त राज्यको आक्रमण किया था । शालदेव नामक चम्पाराज इनके हाथों निहत हुए । फिर उनके पुत्रम चम्पावती नामक एक नगर स्थापन किया। वही चम्पा आजकल चम्बा नामसे प्रसिद्ध है। राबी वा इरावती नदी द्वारा वह नगर दो भागोंमें बंटा हुआ है । चम्बा देखो चम्पा--मध्यप्रदेशके विलासपुर जिलेकी एक जमीन्दारो । इसका परिमाण १२० वर्गमील है । यहाँ कोई ६५ ग्राम और ६३७७ घर होंगे। चंपाके जमीन्दारको कुमार कहते हैं। मदरका नाम भी चम्पा ही है । इस शहर में बहुत से जुलाहे रहते हैं। उनके बनाये हुए वस्त्रादि पास हो वामनोडिहोके बाजार में बिकते हैं। चम्पा (मं० स्त्री०) १ नदीविशेष । आजकल इसको चम्पई कहते हैं । २ पनसका कोई अवयव । चम्पाकली (हिं ० स्त्री० ) स्त्रियोंका एक गहना जो गलेमें पहना जाता है। इसमें चम्पाको कलोके आकार के सोनेके दाने रशमके तागेमें गुंथे रहते हैं । चम्पाधिप ( सं० पु० ) चम्पाया अधिपः, ६-तत् । कर्ण । का देखो। चम्पानगर - भागलपुरके पश्चिम भागका एक ग्राम । यहां बहुतमे मुसलमान संन्यासियोंकी कब्र हैं। यहां भागलपुरके ओसवाल जैनियोंके पुरोहित रहते हैं। यहां तसर, रेशम, सन आदि कपड़ोंकी आढ़त है। चम्पापुरी देखो । चम्पानेर - बम्बई प्रदेशस्थ पञ्चमहल जिलेके कालोल ताल्लुकका एक प्राचीन ध्वस्त नगर । यह अक्षा० २२२६ उ० और देश॰ ७३॰ ३२ पू० में बड़ोदामे २५ मील उत्तर अवस्थित है। यहां बड़ोदा-गोदरा रेलवेका ष्टेशन बना है । १४८३ ई० की जब महमूद बेगर पावागढ़ घेरे थे, वहाँ पहली मुसलमानो इमारत खडी को गयो। उन्होंने एक उम्दा ममजिदको नींव भी डालो । १४८४ ई० को दुर्ग मुसलमानों के हाथ लगा और राजपूतोंने छोटे उदयपुर और देवगढ़ वारियाको पलायन किया। महमूद बेगरने पहाड़के नीचे एक भव्य नगर खड़ा कर दिया और अहमदाबाद से अपने मन्त्रियों और सभासटोंकोला इसको राजधानी बना लिया। उन्होंने नगरका नाम महमूदा बाद चम्पानेर रखा था। यह बहुत जल्द बढ़ा और खूब रोजगार चला । चम्पानेरका रेशमी कपड़ा और तलवारें मशहूर थीं । लगे हुए पहाड़ों में लोहा मिलता था। किन्तु १५३५ ई० को हमाय ने उसे ल ट लिया और सुलतान बहादुर शाहके मरने पर राजधानो और अदालत अह मदाबाद चली गयी । ई० १७वीं शताब्दी के आरम्भसे इसकी इमारतें गिरने लगीं और जङ्गल बढ़ने लगा। १८०३ ई० को जब अंगरेजांका वहाँ अधिकार हुषा, केवल ५०० अधिवासो मिले थे । चम्पानेरका किला प्रायः १४२० गज लम्बा और ६६० गज चौड़ा है। यह दो भागों में बंटा हुआ है । एक भाग अत्य च है जिसमें प्रसिद्ध कालिका देवोका मन्दिर है । अपरार्ध अपेक्षाकृत अवनत होते भी दुराक्रम्य है। यहां अति प्राचीन कालके हिन्दू देवदेवीमन्दिर दृष्ट होते हैं। दुर्ग के दक्षिण-पूर्व पहाड़से घिरा हुआ एक बड़ा गहरा होज है जिसमें चारों ओर पत्थरको सिड्डियां लगी हैं । चम्पापुरी - जैनोंका एक तीर्थ स्थान । यह भागलपुर जिलेके अन्तर्गत नाथनगरके पास अवस्थित है। यहांसे जैनोंके बारहवें तीर्थ वर वासुपूज्य भगवान् मोक्ष गये हैं। यहां एक दिगम्बरोंका तथा ४ श्वेताम्बरियोंके मन्दिर हैं । पहिले ये मन्दिर दिगम्बर और वं ताम्बर दोनोंके कक्ष में थे. पर कुछ दिनोंसे वे ब ताम्बरीके काबूमें हैं। यहां एक छोटासा पहाड़ भी है, उसके ऊपर अनेक प्राचीन प्रतिमायुक्त दिगम्बर जैन मन्दिर है, जिसको लोग मन्दार गिरि कहते हैं । चम्पारण्य - प्राचीनकालका एक जंगल । शायद पहले यह वहां हो, जिसे आजकल चम्पारन कहते हैं । चम्पारन - विहार प्रान्तका एक जिला । यह अता० २६' १६' तथा २७° ३१ उ० और देशा० ८३.५० एवं ८५ १८ पू० के मध्य अवस्थित है। इसका क्षेत्रफल ३५३१ वर्गमौल है। यह गण्डक नदीके वाम तट पर १०० मोल तक विस्तृत है। इसके उत्तर नेपाल, पश्चिम गण्डक और पूर्व तथा दक्षिणको मुजफफरपुर है । सोमेश्वर पर्वत जङ्गलसे हरा भरा रहता है। पूर्व सोमा पर कुदी नदी प्रवेश करती जिसमें नेपाल में देवघाटको राह निकलती है। इस सङ्गट मार्ग से १८१५ ई० को अंगरेज फौज नेपाल पर चढ़ी थो। जूरीपानो नदी पर सोमेश्वर पर्वतका दृश्य अत्यन्त मनोहर है। उत्तरको जङ्गल लगा है। इसमें अच्छी से अच्छी लकड़ी होती है। हरे भरे मैदानों में बहुत से मवेशी चरा करते हैं। उत्तरको भूमि कड़ी और शीतकाल में उत्पन्न होनेवाले चावलके लायक है। दक्षिण की ओर हलकी जमीन है। उसमें ज्वार बाजरा, दाल, अनाज और तेलहन होता है । गण्डक, बूढ़ी गण्डक, बाघमती आदि इसकी नदियाँ हैं । ४३ झोल जिलेके बीचसे निकले हैं। पहले यहाँ गण्डक और बाघमतीकी बड़ी बाढ़ आती थी । परन्तु अब मर कारने उन पर बांध बंधा दिये हैं । प्राचीन समयको चम्पारन जिलेमें बड़ा जङ्गल रहा । ब्राह्मण वहां प्रारण्यक पदा करते थे । कहते हैं कि सुप्रसिद्ध वाल्मोकि ऋषि संग्रामपुर के पास रहते थे । राम और लवकुश में युद्ध होने के कारण हो उस स्थानका यह नाम पड़ा। यह जिला मिथिला राज्यका अन्तभुक्त रहा । लोरिया-नन्दनगढ़ ग्रामके निकट ३ प्रकाण्ड सूच्यग्र प्रस्तर श्रेणियां विद्यमान हैं । जैनग्ल कनिङ्ग हमके अनुमानमें वह ई०से १००० वर्ष पूर्वको राजाओं के समाधिस्थान जैसे बनाये गये थे। यहां अलेकसन्दरके भारत आने से पहले की एक रौप्यमुद्रा और गुप्त राजाओंके समयका अक्षराङ्गित मृत्तिकानिर्मित द्रव्य मिला है इसो स्थानके निकट अशोकप्रतिष्ठित ३३ फुट ऊंचा एक अखण्ड प्रस्तरस्तम्भ है। उसमें बुद्धको आदेशावली लिखी हुई है। अरराज ग्राम में अपेक्षाकृत क्षुद्र एक स्तम्भ है । Vol. VII. 53 केसरिया नामक स्थानमें भी इष्टकनिर्मित एक प्रकाण्ड चतुष्कोण वेटो पर ६२ फुट ऊंचा और ६८ फुट व्यासका एक पक्का खम्भा है। पुराविद कनिङ्गहाम अनुमान करते हैं, वह बुद्धदेवके किसी कार्यका स्मृतिचित्र जैसा प्रतिष्ठित हुआ होगा। इसीके पास बुडदेवकी मूर्तिका भग्नावशेष मिलता है। बौद्धधर्मका ह्रास होने पर किसी पराकान्त हिन्दू राजवंशने मम्भवतः १०८७ से १३२२ ई० तक नेपालके मिमरोनमें राजत्व किया । वहां आज भी इसका बहुतमा ध्व मावशेष विद्यमान है। नान्यदेवने उस को प्रतिष्ठित किया था। फिर इनके वंशकं ६ राजा हुए। अन्तिम राजाको हरिसिंह देवने जोता था, जिन्हें अवधसे मुसलमानोंने निकाल दिया। १९८७ ई० को मुहम्मद बखतियार खिलजीने चम्पारन अधिकार किया। परन्तु मुसलमानक समय चम्पारन सरकार वर्तमान चम्पारन जिले से बहुत लोटी थी । अकबरके राजस्व सचिव टोडरमलने लिखा है कि १५८२ ई० को वह तीन परगनोंमें बांटा था । इसका क्षेत्रफल ८५१११ बौघा था । १७६५ ई० को जब यह इष्ट इण्डिया कम्पनीके अधिकारभुक्ता हुआ, तब यहांका राजस्व २ लाख रुपये कायम किया गया, किन्तु उसके बाद धीरे धीरे घटता गया। कई वर्षकं बाद अर्थात् ई० १७६३ में इस जिलेका राजस्व ३९८६ लाख रुपये सदा के लिये नियत कर दिया गया और १८६६ ई० तक सारन जिले में लगता रहा। १८५७ ई० को प्रधान घटना मगौलो किलको फौजका विद्रोह था । इस जिले में पुलिस स्टेशन और १४ आउट पोस्ट (Out-post) हैं, जिनमें जिला सुपरिंटेण्ड एट २ इन्स पेकर, ३५ मब इन्सपेकर, २४ हेड कोन्सटेबल, ३२३ कोन्सटेबल और ४८ शहरके चौकीदार रहते हैं । जिलेका कारागार मोतीहारीमें है, जिसमें ३५६ कैदी रखे जाते हैं और वहां एक कोतघर भी है। इसके सिवा यहां ७ अस्पताल हैं, जिनमें वार्षिक व्यय २४०००) रु० और आाथ ३१०००) रु० की है। आय ७००) ८० सरकारमे ४०००, रु० म्युनिसिपलटोसे और ) रु० चन्दासे संग्रह किया जाता है । अधि. यहांको जनसंख्या प्रायः १७१०४६३ है। वासियों में अधिकांश अहोर और चमार हैं, जिनको
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घरेलू iconostasis वफादार रूढ़िवादी ईसाई के लिए एक छोटे से चर्च का एक प्रकार प्रतिनिधित्व करते हैं। घर में वे एक विशेष जगह है जहाँ आप चुपचाप छवियों से पहले प्रार्थना कर सकते हैं करने के लिए आवंटित किया जाना चाहिए। घरेलू iconostasis प्राचीन रूस में दिखाई दिया। उनके लिए यह एक कोने, लाल बुलाया (अर्थात सुंदर) आवंटित किया गया था। इस जगह में, आइकन को रखा गया था मोमबत्ती और लैंप जलाया। सुबह और, साथ ही घरेलू घड़ियों की विशेष आध्यात्मिक आवश्यकताओं में शाम यहां उनकी प्रार्थना कहा। छोटे पर्दे कि संतों की और पक्षों पर उद्धारकर्ता की छवियों बंद कर देता है - समय की iconostasis एक बहु-स्तरीय शेल्फ जिस पर bozhnik लटका दिया था। एक विशेष कपड़ा है कि केवल प्रार्थना के दौरान खींचती है - माउस blagovestkoy के नीचे छिपा कर रहे थे। इस परंपरा संयोग से रूस में दिखाई दिया। यह ज्ञात है कि उद्धारकर्ता की पहली छवि, उसे द्वारा बनाई किया जाएगा भगवान की उनकी इच्छा से यीशु पानी से चेहरा छिड़का और कैनवास पर अपने ubrus (कपड़ा) का सफाया करने के बाद उसके मुंह था। यह चित्र वह दर्द राज्यपाल भेजा एशिया माइनर के - Abgar, तो वह चंगा। उसके बाद, राजकुमार शहर के पवित्र द्वारों के ऊपर बोर्ड कील करने का आदेश दिया। बाद पवित्र छवि के 900 साल कांस्टेंटिनोपल में स्थानांतरित किया गया। अब, हर साल अगस्त 29 रूढ़िवादी पर उद्धारकर्ता की छवि के अधिग्रहण, और पवित्रा हाथ बुना कपड़ा मनाते हैं। छवियों के लिए शेल्फ पर निपटान क्या है? उस समय की घरेलू iconostasis भी पवित्र जल और पवित्र रोटी पकड़ करने का इरादा कर रहे थे। परिवारों bozhnikom सुसमाचार और pomyannik (विशेष किताबें, जो सभी मृत के नाम और रूढ़िवादी के परिवार के रहने वाले रखा) के पीछे छिपे रहते हैं। विशेष रूप से निपुण needlewoman हाथ में माल की (पवित्र आत्मा के प्रतीक के रूप) कबूतरों बनाया है और iconostasis करने के लिए उन्हें काट दिया। लाल कोने में यह लैंप और मोमबत्ती है कि एक घर सेवा के दौरान जलाया गया की उपस्थिति रहा होगा। इस तरह के एक छोटा सा मंदिर 1917 की क्रांति तक हर रूढ़िवादी घर में था। बोल्शेविक के सत्ता में आने के बाद, लोगों को प्रार्थना करने के लिए जारी रखा, लेकिन गुप्त रूप से वैसा ही किया। इसलिए, अलंकृत घर iconostasis से केवल कुछ ही छवियों है कि लोगों को ध्यान से आँखों prying से छिपा हुआ, उत्पीड़न के डर से थे। के रूप में इसके निर्माण की परंपराओं के कई बस भूल गया है आधुनिक लाल कोने में, हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई एक से थोड़ा अलग है। क्या घर iconostasis हो जाएगा, यह केवल घर के मालिकों पर निर्भर करता है। हालांकि, निम्नलिखित नियमों का पालन करने के लिए मत भूलनाः - दुनिया की बातें, बेहतर से दूर - पवित्र छवियों उपकरण (टीवी, कंप्यूटर, आदि) से दूर रखा जाना चाहिए। - भक्तों को इससे पहले कि माउस के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए तंग महसूस नहीं किया था। और जब चर्च किताबें प्रार्थना (प्रार्थना पुस्तकों इंजील) सोफे ज्ञानतीठ (स्टैंड) पर बिछाने के लिए बेहतर है। - तुम्हें पता है, अलमारियों पर एक के बाद प्रतीक एक, अलमारियाँ में व्यवस्था नहीं करना चाहिए, जबकि इन छवियों अन्य सांसारिक बातें कर रही हैः स्मृति चिन्ह, चित्र, आदि यह सख्ती से मना किया है, क्योंकि इस तरह हम परमेश्वर के लिए अनादर। सब के बाद, किसी कारण से, तस्वीरें लोगों और हमारे प्रियजनों, खासकर जो लोग इस दुनिया को छोड़ दिया है, कई, सबसे प्रमुख जगह पर हैं उन्हें अनावश्यक वस्तुओं के साथ अव्यवस्थित किए बिना प्यार करता था। यह आवश्यक है के रूप में पवित्र छवियों के लिए प्यार और सम्मान दिखा माउस के साथ कार्य करने के लिए। यदि आप एक घर है, तो चित्रों कि बाइबिल कहानियों को प्रतिबिंबित की प्रतिकृतियां हैं, वे iconostasis पर नहीं रखा जाना चाहिए। पवित्र छवि और पेंटिंग के बीच मुख्य अंतर - कि प्रतीक के माध्यम से पहले मामले में हम परमेश्वर के साथ संवाद है। और iconostasis के रूप में - एक पवित्र प्रार्थना में एकांत के लिए समर्पित जगह, प्रतिकृतियां के शामिल किए जाने के लिए बस उस में जगह से बाहर है। प्रतीक हस्तियों के पोस्टर के बगल में दीवार पर लटका दिया नहीं जा सकता है - कि हम पवित्र छवियों विरोध करे, तो सांसारिक मूर्तियों के साथ एक सममूल्य पर उन्हें रखा जाता है। घरेलू iconostasis बेहतर घर के पूर्वी भाग में रखा जाता है, के रूप में दुनिया के इस हिस्से कट्टरपंथियों में विशेष महत्व का है। उदाहरण के लिए, यह पुराने नियम से जाना जाता है, भगवान ईडन के पूर्व में लोगों के लिए स्वर्ग बनाया। और इंजील में कहा गया है कि के रूप में बिजली पूर्व से पश्चिम तक आता है, और भगवान स्वर्ग से आ रहा है। चर्च वेदी भी पूर्वी भाग में स्थित है। अगर, हालांकि, खुले विंडो, घर iconostasis, एक तस्वीर जिसमें से आप इस लेख में मिलेगा के इस तरफ उसके लिए किसी अन्य उपयुक्त जगह पर सेट कर रहे हैं। शेल्फ खरीद क्या है? आप अपने हाथ, लकड़ी के बने या पूरी तरह से आप पर निर्भर उन्हें एक फर्नीचर की दुकान या एक चर्च बेंच में अधिग्रहण के साथ एक घर iconostasis पैदा करेगा। आप शेल्फ खरीदना चाहते हैं, विशेष दुकानों रूढ़िवादी में करते हैं। वहाँ उपलब्ध शास्त्र की एक व्यापक रेंज है, और विक्रेताओं हमेशा शीघ्र कर रहे हैं और चयन के साथ मदद करते हैं। सामग्री बरामद की लकड़ी और प्लाईवुड चिह्नों के लिए अलमारियों। वे एकल चरण और बहु-स्तरीय, सीधे और कोणीय हो सकता है। यहां तक कि पूरे iconostasis, जो पहले से ही पवित्र छवियों है। लेकिन इस तरह के अलमारियों मुख्य रूप से केवल क्रम में किया जाता है। यह समझने के लिए कि कैसे एक घर इस लेख में प्रस्तुत iconostasis तस्वीरें लग रहा है। आप एक असली लाल कोने बनाने का निर्णय लेते हैं, तो खड़ी अलमारियों का चयन करें। वे इस तरह के मंदिरों में स्थापित उन लोगों के रूप संतों की छवियों, साथ राजसी दीवारों से बनाना बहुत आसान हो जाएगा। जहां यह (दीवार पर या कमरे के एक कोने में) रखा जाएगा पर निर्भर करता है एक कोने या एक सीधी रेखा - क्या अपने घर iconostasis हो जाएगा। क्या माउस की जरूरत है? सबसे पहले, हर घर उद्धारकर्ता, परमेश्वर की माँ और Nikolaya Chudotvortsa की छवियों होना चाहिए। प्रार्थना के लिए हमारे प्रभु के सभी प्रतीक के घर पर सर्वशक्तिमान की सबसे पसंदीदा कमर छवि है। इस पर iisus hristos के आइकन अपने बाएं हाथ एक खुली किताब में रखती है, जिसमें लिखा है, "एक नई आज्ञा मैं तुम्हें देः एक-दूसरे से प्यार है। " भगवान दाहिने हाथ प्रार्थना बप्तिस्मा देता है। इस तरह के "कोमलता" और "Hodegetria" (Putevoditelnitsa) के रूप में रूसी लोग चिह्न का विशेष रूप से शौकीन ऑफ आवर लेडी की छवियों से। वर्जिन मैरी की पहली छवि उसकी बाहों, जो नम्रता से उसकी गर्दन को गले लगाती है और उसके गाल के खिलाफ लगाए में एक बच्चे को पकड़े हैं। इस प्रकार के सबसे प्रसिद्ध आइकन व्लादिमीर ऑफ आवर लेडी की छवि माना जाता है। एक सुस्पष्ट विशेषता तथ्य यह है कि बाईं एड़ी बच्चे पूरी तरह से निकला है। भगवान Hodegetria की माँ की छवि पर शिशु, जो उसके दाहिने हाथ में एक बंडल रखती है और बाईं सभी भक्तों हावी रहती है साथ दिखाया गया है पार की। इस छवि का एक अद्भुत उदाहरण कज़ान आइकन "Skoroposlushnitsa" कर रहे हैं "Sporuchnitsa Greshnykh"। घर के iconostasis पर इन बुनियादी माउस के अलावा संतों, जो अपने परिवार के सदस्यों के सम्मान में नामित कर रहे हैं की छवियों को डाल करने के लिए आवश्यक है। मानसिक और शारीरिक बीमारियों के आरोग्य - यह भी एक आइकन आरोग्य Panteleimon प्राप्त करने के लिए वांछनीय है। अन्य छवियों का चयन घर की जरूरतों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, आप पीटर और Fevronia, जो परिवार भलाई के लिए प्रार्थना की छवि खरीद सकते हैं। इससे पहले कि Sergiya Radonezhskogo के आइकन सीखने और अच्छा उपक्रमों में मदद के लिए पूछ। अविवाहित महिलाओं पीटर्सबर्ग के Xenia, जो परमेश्वर की इच्छा शादी के कारोबार में लोगों की एक सहायक बन गया है की छवि से पहले प्रार्थना कर सकते हैं। हाल के वर्षों में कई घरों केंद्रीय आइकन में से एक धन्य वर्ष महिलाओं मास्को की Matrona की छवि बन गई। यहां तक कि अपने सांसारिक मृत्यु के बाद, यह उन सभी जो Pokrovsky मंदिर या कब्र Danilovsky कब्रिस्तान में उसे करने के लिए आ में मदद करता है, या बस प्रार्थना कर घर पर मैट्रन को दर्शाता है। पहले से ही कई लोगों को उसकी चिकित्सा और मदद से प्राप्त हुआ है। कोई आश्चर्य नहीं कि उसने कहाः "मेरे पास आओ और मुझे बताओ कि जीने के लिए। " इस मैट्रन के तहत वह सूचित किया कि उसकी धरती पर मौत आध्यात्मिक के निधन मतलब यह नहीं हैः वह अभी भी हमारे साथ है। बहुत महत्वपूर्ण उनके लिए आवंटित स्थान पर छवियों का उचित स्थान है। एक सूली पर चढ़ाया की iconostasis पर। यह चर्च की दुकान में खरीदा या लकड़ी के अपने खुद के बाहर बना जा सकता है। अगले स्तर पर सुविधाओं होली ट्रिनिटी का एक प्रतीक। नीचे शेल्फ पर उद्धारकर्ता, परमेश्वर की माँ और Nikolaya Chudotvortsa की छवियों रखा जाना चाहिए। भगवान की छवि, बीच में होना चाहिए दाहिने हाथ (दाएं) पर - वर्जिन मेरी और oshuyu (बाएं) - निकोलाई Ugodnik। बस पवित्र परिवार श्रद्धेय डाल आइकन के ठीक नीचे। आखिरी मंजिल पर आप पवित्र जल, मोमबत्तियाँ, और सुसमाचार की एक बोतल रख सकते हैं। एक घर को सजाने के iconostasis यरूशलेम में प्रभु के प्रवेश - यह ताजा फूल, महान दावत के बाद विलो की टहनियाँ हो सकता है। और Pentecost परमेश्वर की शक्ति की कृपा के प्रतीक के रूप सन्टी टहनियाँ फ्रेम छवियों के साथ अलमारियों के दिन। माउस के लिए शेल्फ पर, आप भी छवियों के प्रजनन सेट कर सकते हैं। इससे पहले वे पवित्रता की जरूरत है, और फिर घर iconostasis को जोड़ा गया। मोती उन्हें क्योटो (एक फ्रेम) के लिए कढ़ाई, और फिर वे अन्य माउस के साथ सौहार्दपूर्ण दिखेगा। आप छवियों के लिए एक स्टैंड, या मॉडल है कि आप मिले हैं के सभी खरीदने में असमर्थ हैं, तो आप पसंद करते हैं या उपयुक्त नहीं हैं (उदाहरण के लिए, स्तर की एक छोटी संख्या, सीमित स्थान, आदि . . ), अपने स्वयं के हाथों से iconostasis घर हैं, जिनमें से एक तस्वीर लेख में प्रस्तुत कर रहे हैं नहीं है आप अपनी खुद की कर सकते हैं। एक मानक तीन तलों वाला iconostasis के लिए, आप लकड़ी के तख्ते को, ड्रिल और शिकंजा की आवश्यकता होगी। आदेश में यह इकट्ठा करने के लिए के लिए, आप चित्र घर iconostasis बनाना होगा। उन पर आप आसानी से लकड़ी के पैनल है, जो iconostasis पर उपलब्ध आइकन की संख्या पर निर्भर करेगा के आयामों की गणना कर सकते हैं। पवित्र छवियों के लिए सबसे बुनियादी स्टैंड प्लाईवुड के बनाया जा सकता है। पहले यह आकाशीय पदानुक्रम के अनुसार शिकंजा के साथ आइकन संलग्न करने के लिए आवश्यक है। एक विशेष वेतन, जो छवियों फंसाया है - उसके बाद आप माउस के लिए एक बागे बनाना चाहिए। यह कशीदाकारी कपड़े या माला और मोती से बनाया जा सकता। इस दे देंगे के प्रतीक के लिए शेल्फ उत्सव और पवित्र। यही कारण है कि कैसे आप अपने हाथों के साथ iconostasis घर बना सकते हैं। इस लेख में इसी तरह काम करता है की तस्वीरें इसकी सजावट में मदद मिलेगी। इस प्रकार, एक छोटे से चर्च घर के निर्माण - न केवल अपने आध्यात्मिक आवेग और इच्छा के रूप में रूढ़िवादी ईसाई के जीवन का एक शर्त है। सब के बाद, लोगों का मानना है और भगवान से प्यार है, हमेशा प्रार्थना में और मरने के बाद में उसे चालू करने के लिए, और घर के कार्यालय में चाहता है। यह कोई फर्क नहीं पड़ता अपने iconostasis महंगा सामग्री के बने कि क्या कर रहा है और सोने का पानी चढ़ा छवियों के साथ कतार में खड़े हैं, या आप मैन्युअल रूप से इसे बनाया जाता है, पवित्र छवियों का संग्रह। मुख्य मूल्य - आपका विश्वास और आध्यात्मिक पूर्णता के लिए प्रतिबद्धता है।
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सत्य और सत् कोनों को ही पूर्णता का अंततोगत्वा एक ही स्वरूप है । उसमें सुनिश्चित स्वाश्रित व्यष्टित्व होता है । सत्य में आन्तरिक समन्वय अवथा व्याप्ति और सर्वसमावेश के लक्षल अवश्य ही प्रकट होने चाहिए, और ये दोनो विशेषताएं एक ही सिद्धांत के दो भिन्न-भिन्न पक्ष हैं । प्रथम जो स्वयं विरोधी है वह खटकता है क्योंकि उसके भीतर निहित परिपूर्णता अपने अंगों के बीच संघर्ष उत्पन्न कर देती है और इन संघर्ष को आमंत्रित करने वाले अपने संदर्भों से वियुक्त तत्वों के बीच समन्वय स्थापित करने का उपाय यह है कि इन असंगतियों को एक विस्तृत व्यवस्था में पुनः फैला दिया जाय । परन्तु दूसरी ओर समन्वय, नियंत्रण और सोमितता में मेल नहीं खाता, क्योंकि जो वस्तु सर्वव्यापी नहीं है उसमें तत्वतः आन्तरिक असंगति होगी। सत्ता को प्राप्त करने के प्रयास में तत्व वृद्धि के द्वारा एक ऐसा स्थायी व्यष्टित्व में रूपांतरित हो जाता है कि उसमें उसका अपना निजी स्वभाव समाहित हो जाता है, वह अन्य शब्दों में एक ऐसी पूर्ण इकाई में परिणत हो जाता है जिसमें संपूर्ण वसंगतियों का अन्त हो जाता है और एक व्यवस्था (system) स्थापित हो जाती है । व्रडले के शब्दों में "इस प्रकार प्रसार और समन्वय के दो पक्ष सिद्धान्ततः एक ही हो जाते हैं, यद्यपि हमारे काम के लिये टे कुछ अंश तक पृथक्-पृथक् हो जाते हैं, और अभी हमें उनको अलग-अलग समझने में ही संतोष करना चाहिये १२ 1: "Truth must exhibit the mark of internal harmony, or again, the mark of expansion and all inclusiveness. And these two characteristics are diverse aspects of a single principle. That which contradicts itself in the first place, jars, because the whole, immanent within it drives its parts into collision, And the way to find harmony, as we have seen, is to redistribute these discrepancies in a wider arrangement. But in the second place, harmony is incom patible with restriction and finitude." - Appearance and Reality, pp.. 321-22. 2. "The two aspects of extension and harmony, are thus in principle one, though ( ) for our practice they in some degree fall apart. And we must be content, for the present, to use them independently." -- Ibid., Page 322. सत्य और सत् को मात्राएं पुनः अपने विचारों को इस प्रश्न पर एक अन्य कोण से विकसित करते हुये वे कहते हैं : न्यूनाधिक मात्रा में सत्य एवं वास्तविक होने का अर्थ है किसी छोटे अथवा बड़े अंतराल के द्वारा सर्वसमष्टि अथवा स्वयं सिद्धि की अवस्था से पृथक् होना । उदाहरणार्थ डले कहते हैं : दो प्रस्तुत भाभासों में .एक जो अधिक विस्तृत अथवा समन्वयशील है, वह अधिक वास्तविक है ।" इन आभासों की अपूर्णताओं की समाप्ति एवं परिपूर्ण सत् में उनके रूपांतरण एवं अवस्थिति हेतु परिवर्तन अपेक्षित है । जिस अनुपात में इन आभासों में कम अथवा अधिक परिवर्तन की अपेक्षा होगी उस अनुपात में हो वह आभासों की श्रेणी में उच्च होगा। इसीको दूसरे प्रकार से प्रस्तुत करते हुये कहा जा सकता है कि सत्य में सत् की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें परिवर्तन के बाद कितना अपना अंश शेष रह जाता है या जो कुछ भी अपरिवर्तित रह जाता है, वही उसमें पूर्ण सत् है । अपने आशय को पुनः स्पष्ट करते हुये व्रडले कहते है कि सत्य की मात्राओं से हमारा तात्पर्य यही है कि जो सत्य, अथवा तथ्य परम सत् में रूपान्तरित होने के लिए पुनर्व्यवस्था एवं वृद्धि की जितनी कम अपेक्षा रखता है, वह उतना ही अधिक वास्तविक और सत्य है । असत्य आमास की सत्य में परिणति : पूर्व कथनों के अतिरिक्त व्रडले के अनुसार यह भी सम्भव है कि पूर्णता एवं पुनर्व्यवस्था द्वारा असत्य आभास भी सत्य में रूपान्तरित हो जाय तभी उन्होंने पूर्ण मूल और पूर्ण त्रुटि के प्रत्यय का भी खण्डन किया है । व्यावहारिक दृष्टि से ये प्रत्यय महत्वपूर्ण हो सकते हैं परन्तु तात्विक दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं है। पूर्ण त्रुटि अथवा किसी ऐसे तथ्य की, जिसमें सम्पूर्ण सत् में परिवर्तित होकर समाहित होने की सामर्थ्य हो, कल्पना नहीं की जा सकती । ऐसा कोई भी तथ्य नहीं जिसमें परम सत् में रूपान्तरित होने को क्षमता हो न हो । उसमें कम से कम न्यूनतम सत् अवश्य हो होगा, जो विकसित होकर परिपूर्ण सत् में परिणत हो सके। इस सम्बन्ध में ब्रेडले कहते हैं । "कोई त्रुटि केवल उसी अर्थ में पूर्ण हो सकती है, जबकि सत्य 1. "Of two given appearanccs the one more wide, or more harmonious it more real - Ibid., PP. 322-23. रूप में परिणत होने पर उसका विशेष रूप पूर्णतः बिलुप्त हो जाय और उसको वास्तविक सत्ता नष्ट हो जाय ।" १ परन्तु यह कथन सत्य के निम्नतर प्रकारों पर भी लागू होना चाहिए क्योंकि तत्वमीमांसीय दृष्टि से सत्य और असत्य के बीच कोई निश्चित भेदभाव नहीं हो सकता । सभी आभासों के बारे में यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि आन्तरिक सत् में उनकी परिणति स्वीकार कर लेने पर उनमें शेष क्या रह जायगा ? व्रडले का उत्तर है कि प्रत्येक अवस्था में अवशेष की मात्रा से ही सत्य की मात्रा और सत् का निर्धारण होता है । मात्राओं के आधार पर आभासों का क्रम निर्देशन : मात्राओं के आधार पर जगत के सभी नाभासों को एक श्रेणी के तारतम्य में क्रमबद्ध किया जा सकता है। यद्यपि ब्रेडले के अनुसार यह कार्य साधारण नहीं तथापि तत्व शास्त्र को आभासों में मात्राओं के आधार पर क्रम निर्देशन करना चाहिये । अतः व्रडले ने क्रम निर्देशन हेतु कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है, जो निम्नलिखित है : जो भाभास अनुभव का क्षेत्र सत्य है । अधिक घेरते हैं, वे अधिक अपेक्षाकृत अधिक स्थायी है अथवा उनमें अधिक काल तक परिवर्तन नहीं होता या कम परिवर्तन होता है, वे अधिक सत्य हैं । दो वस्तुओं अथवा लाभासों में वह माभास अपेक्षाकृत अधिक सत्य है, जिसमें सामंजस्य अधिक है ? निष्कर्ष : इस प्रकार यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ब्रेडसे का परम सत् मात्राओं के प्रत्यय से प्रभावित नहीं है । निश्चय ही मात्रा का यह सिद्धांत 1. "An error can be total only in this sense that when it is turned into truth, its particular nature will have vanished, and its actual self be destroyed." - Ibid., p. 823. सत्य तथा सत् की मात्राएं आभासों से ही सम्बन्धित है । मात्राएं चाहें सत्य में हों अथवा असत्य में उनका सम्बन्ध आभास से ही है । सत् एक सम्पूर्ण सर्वग्राही सत्ता है जिसमें सभी अनुभूतियां तथा आभास विकसित एवं रूपान्तरित होकर अवस्थित रहते हैं । ऐसे सम्पूर्ण सत् में मात्राएं नहीं हैं । मात्राओं का प्रश्न माभासों के ही सम्बन्ध में सार्थक होगा। प्रत्येक सत्य अथवा आभास में यह सामर्थ्य है कि वह वृद्धि एवं परिर्वतन द्वारा सत् से एकीकृत हो सके। परन्तु ऐसा करने पर उन्हें अपने वर्तमान स्वरूप का समर्पण करना होगा, उसे सम्पूर्ण सत् में समाहित होने के लिये अपनी विशिष्टताओं को किस मात्रा में खोना होगा यह तथ्य ही इस बात का प्रमाण है कि किसी आभास में सत् की कितनी मात्रा है तथा वह किस अंश तक यथार्थ है । संक्षेप में ब्रडले के सिद्धान्त पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने पर विदित होता है कि एक सत्य और एक सत्, पुनः सत्य की मात्राएं और सत्ये दोनों ही कल्पनायें उनके सिद्धान्त में विशेष सार्थकता के साथ उपस्थित है और उनका प्रतिपादन उन्होंने अत्यन्त सशक्त ढंग से किया है तथा यह स्थापित कर दिया है कि "सत्य के लक्ष्य को पूर्ण प्राप्ति उस सत् में होती है, जो बुद्धि को आत्मसात करके उनका अतिक्रमण करता है । " १ 1. "The complete attainment of truth's end is reached only in that reality, which includes and transcends intelligence" -Essays on Truth and Reality, P. 331: ६ शिवत्व' नैतिकता अथवा धर्म के अन्तिम सत्य के रूप में स्वीकार करने के सम्बन्ध में जो सामान्य पूर्वाग्रह है, मुख्यतः उसी से प्रेरित होकर और उसी का विरोध करने के आशय से डले ने शिवत्व की कल्पना पर यहां विचार किया है । सामान्यतः शिवत्व की कल्पना नैतिकता अथवा धर्म में केन्द्रीय समझी जाती है । परब्रडले के अनुसार परम तत्व सब प्रकार से संगतिपूर्ण और सत् है, अतएव उसे शिवत्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती है । वे इसी सदर्भ में शिवत्व की सापेक्षता का उल्लेख करते हैं । उनके अनुसार अशिवस्व और शिवत्व भ्रांतियां नहीं हैं क्योंकि उनकी तथ्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । इसीलिए उन्हें आभास कहा गया है । वे जीवन के एकांगी पक्ष है, जिनमें से प्रत्येक पूरक तत्व की मध्यस्थता से अपने से व्यापक एक परिपूर्ण इकाई में अतिक्रान्त और रूपान्तरित होता है। य शिवश्व का विश्लेषण करते हुए डले कई ऐसे अर्थों को प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें शिव के ही रूप में प्रस्तुत किया जाता है यथा - इच्छा-सतुष्टि या सुख-प्रत्यय, आत्म-साक्षात्कार, नैतिकता, धर्म और ईश्वर । इन रूपों में शिवत्व की सामान्यतः कल्पना की जाती है। ब्रेडले ने इनका विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया है कि इन सभी रूपों में वह आंतरिक विसंगतियों से युक्त है । अतः इन्हें इस रूप में अंतिमता नहीं प्रदान की जा सकती है। इस कारण अन्तिम सत् केवल परम तत्व है और ये सब मात्र उसके आभास हैं । अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि शिवत्व की ये विभिन्न अभिव्यंजनायें उपरोक्त अर्थ में आभास है, सत् नहीं । पुनः ब्रडले यह भी कहते हैं कि पूर्णत्व में जो सत् का ही पर्याय है, विभिन्न अनुपात में ये शुभ की सभी अभिव्यंजनायें "Evil and good are not illusions, but they are most certainly appearances; they are out-sided aspects; each overruled and transmuted in the whole." अनिवार्यतः सम्मिलित है। पुनः इस कथन के औचित्य को प्रस्तुत करते हुए ब्रडले कहते हैं ऐसा इसलिए कि एक अन्तर्व्यापी पूर्णत्व की सक्रियता से हो इनका निर्माण होता है और वही इन भेदों का औचित्य भी प्रस्तुत करता हैं । शिवत्व के विभिन्न अर्थ : सामान्यतः शिवत्व को हम एक ऐसा तत्व मान सकते हैं, जो हमारी इच्छा को पूर्ण करे यानी वह जिसका हम अनुमोदन करते हैं, और जिसमें हमें संतोष की प्रतीति होती है । इसे एक और प्रकार से प्रस्तुत करते हुए हम यह कह सकते हैं कि वह हमारे समक्ष 'मूल्य' के रूप में आता है। व्रडले शिवत्व के स्वरूप की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उसके अन्तर्गत वस्तुतः वे ही तत्व मौजूद हैं जो सत्य में विद्यमान रहते हैं। दोनों में हो ' प्रत्यय' तथा 'अस्तित्व' के बीच एक प्रकार की अनुरूपता या भिन्न प्रकार से प्रस्तुत करते हुए कह सकते हैं कि एक तादात्म्यता रहती है पर दोनों के प्रारम्भ बिन्दु एक दूसरे के विपरीत हैं । सत्य में हम 'अस्तित्व' से प्रारम्भ करते हुए प्रत्ययों के माध्यम से उस संपूर्णता को व्यंजित करते हैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है और शुभ में ठीक इसके विपरीत हम एक 'प्रत्यय' से प्रारम्भ करते हैं जो पूर्णता का प्रतिनिधित्व करता है और उस पूर्णत्व को हम किसी अस्तित्व में निर्मित करते हैं अथवा उसमें ढूंढ़ निकालते हैं। पुनः पूर्णत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले इस प्रत्यय को हम वांछित भी मानते हैं । शिवत्व सम्बन्धी इस निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हुए मैं डले कहते हैं कि एक विचार रूप में इच्छित अन्तविषय का अस्तित्व में मूर्त होना ही शिवत्व है और इस प्रकार वह किसी मनोनीत प्रत्यय के आधार पर किसी तथ्य को मापने की कल्पना को अपने में निहित रखता है । वे कहते हैं कि शिवत्व एवं सत्य दोनों में ही प्रत्यय एवं अस्तित्व दोनों तत्वों के बीच एक अपूरित अंतर है और इस अंतर को पूरित करने का सम्बन्ध ]. "The Absolute is perfact in all its detail, it is equally true and good throughout. But, upon the other side, each distinction of better and more true, every degree and each comparative stage of reality is essential, they are made and justified by all-pervasive action of one immanent perfection. A & R, P. 355,
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"।। इस ग्रंथ छपवानेमें, प्रथम आश्रयदात(...TRUNCATED)
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"इस घटना में है कि जिसमें पैसे के सभी प्(...TRUNCATED)
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"आमराज - नागभट्ट द्वितीय\nविक्रम की नौव(...TRUNCATED)
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