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266cdb1c67a30a08f07b590a8e4598b30869d6563abb3a9c93026ac32a4214e0 | pdf | कृतज्ञता ज्ञापन
प्रस्तुत शोध प्रबंध मेरे प्राय 4 वर्षों के प्रखण्ड स्वाध्याय का प्रतिफल है । इस विषय पर काय करने की प्रेरणा मुझे सवप्रथम प्राचाय हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के 'सूरमाहित्य के प्रथम निवन्ध को उन पक्तियों से मिली जिहै इस प्रबंध की 'अवतरणिका' मे उद्धृत किया गया है । वही मत्र बीज मेरे मन मे विस्मयजनत जिज्ञामा के अनगिन प्रतानो के साथ सर्वार्द्धत होकर इस विस्तृत प्रथम प्रतिफलित हुआ है। इस बीच प्राचाय प्रवर वे साथ हुई वार्ताओं में जो कई सूक्ष्म सवेत मिले, उनके लिए में उनका चिर अनुगृहीत हूँ ।
में सूर साहित्य के ममज्ञ विद्वान् डॉ० वजे वर वर्मा, निदेशव, हिन्दी शोध संस्थान, आगरा का भी परम आभारी हूँ जिन्होने प्रबन्ध की प्रतिज्ञा के स्थिरीकरण और व्याव हारिक सतुलन सम्बनी यथेष्ट महायता प्रदान की। इसी प्रमग मे डॉ० श्रीकृष्ण लाल (स्वर्गीय) रोडर हिन्दी विभाग, नाशी विश्वविद्यालय को अत्यत श्रद्धापूर करता हूँ जिहोंने मेरे वाशी-वास के दिनों में अपना बहुत समय देकर अनेकानेव शबाश्रो का समाधान किया। उनके साथ बई सलापों मे लेखक को जो स्नेह-मिश्रित सुझाव मिले, उस धनुग्रह को भुलाया नहीं जा सकता। काशी-वास के पुण्य अवसर पर विद्यावतार प० गोपीनाथ कविराज जी के दशन और विमश भी अविस्मरणीय है। अपनी रुग्णावस्था मे भो उ हाने जो सकेत दिये, वह उनकी विद्याव्यसनिता ही नहीं, सवसुलभता का प्रमाण है।
इसी सिलमिले म मैं भगध विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष प० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, प्रयाग विश्वविद्यालय के तब प्रध्यक्ष डॉ० रामकुमार वर्मा भौर विहार राष्ट्रभाषा परिषद् के तत्कालीन सचालन डॉ० भुवनेश्वर मिश्र 'माधव जी का भी समवेत रूप से मनुगृहीत हूँ जिन्होने समय समय पर अपने अमुल्य ममय दक्र लेखक वो मूल्यवान सुझाव दिय ।
अपनी शोर यात्रा के कम म तय पुस्तकालय पटना के श्रीकृष्ण चतन्य जो तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, गीता प्रेम गोरखपुर और राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता के पुस्तकाध्यक्ष का भो में धाभार मानता हूँ निहोंने अपने संग्रहालयों को पात सामग्रियों की उपलब्धि परा पर मुझे यथेष्ट महायता दी।
कि तु में सर्वाधिव वृतन हूँ अपने प्राचाय निर्देशन भोर मध्यन डॉ० श्री वोरै द श्रीवास्तव जो वा, जि होने श्रादि से म त तक इस गहन विषय मे तल्लीन होकर मनुम पान वरने की सतत प्रेरण दी। उनके पण्डित्यपूर्ण निर्देशो और परामर्शो के बिना यह काय पूरा होना कदाचित् असभव था । उ होने लेखन से प्रकाशन तक इस काम को अपना हो जान वर जो अमूल्य सुझाव व प्राक्कथन के मूल्यवान् शमुझे प्रदान किये, इनके लिए में उनका श्राजीवन ऋणी रहूँगा ।
लेखक प्रो० श्री विजयन्द्र स्नातक ( दिल्ली विश्वविद्यालय ) व प्रो० विनय मोहन गर्मा जी ( कुरक्षेत्र विश्विद्यानय ) जैसे यशस्वी विद्वानों का आभारी हूँ जिन्होंने अपनी सम्मति देवर इस प्रबंध की सवद्धना की है।
अन्त म, अपने अग्रज तुल्य डॉ० श्री त्रिभुवन सिंह ( काशी विश्वविद्यालय ) तथा श्रीकृष्ण चन्द्र बेरी जी ( व्यवस्थापक, हिन्दी प्रचारक संस्थान पाशी ) के प्रति प्रामार प्रकट करना में अपना कत्तय समझता हूँ जिनकी प्रेरणा व सहयोग के बिना इस ग्राथ का मालोक्ति होग वठिन था । भस्तु
भागलपुर शरपूर्णिमा २०२७ opo }
तपेश्वरनाथ प्रसाद
[ डॉ० वीरेन्द्र श्रीपास्टर एम० ए० ( द्वय ), डि० लिटू० ] प्रोफेसर एव अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग भागलपुर विश्वविद्यालय
हिन्दी साहित्य के इतिहास में कृष्णाश्रित काव्यधारा निरन्तर प्रवाहित होती रही । विद्यापति को पदावली से लेकर घमवीर को कनुप्रिया तक वह भविच्छि न धारा जनमानस के भनेक घरातलो को प्राप्लावित करती रही है । वृष्ण के जीवन चरित मे स्वत हो भनेव उपादानो का क्रमिक समावेश होता गया है। वैदिक साहित्य के वासुदेव कृष्ण महाभारत के कमयोगी कृष्ण और भागवत के गोपीवल्लभ कृष्ण ने एक प्रपूव व्यक्तित्व का निर्माण किया था। भाभीरों के बाल गोपाल ने इस 'गोपवेष विष्णु' के व्यक्तित्व मे अपना भी योगदान दिया। हिन्दी साहित्य के प्रारम्भ होने से पूर्व ही कृष्ण के व्यक्तित्व का यह सम वयात्मक रूप सस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश मापानी के वाङमय के माध्यम से पूणता को प्राप्त करवा था हि दी साहित्य के श्रादिकाल, मध्यकाल और माधुनिक काल ने अपने परिवेश के अनुकूल वृष्ण के उस रूप का वाध्य मे नियोजन किया । विद्यापति ने साम तो दरबार के अनुरूप कृष्ण को शृङ्गारदेव वनावर चित्रित किया । उ होने कीर्तिपताका मे अर्जुन राय को शृङ्गारकेलि को 'हरिकेलि' बताया व लिखत हैससाररत्न मृगशावकाक्षी, रत्न च शृगाररसो रसानाम् । तच्चानुभूया चिचरमर्जुनेन्द्र पुरानुभूत मधुसूदनेन ।।
उनको दृष्टि मे राम ने कृष्ण का अवतार हो इसलिए लिया था कि वे सीता के वियोगदु ख को क्षतिपूर्ति कर सकें । उन्होने कोत्तिपताका मे विविध रमणियों (नायिकाओं) के समागम के ग्रामोद प्रमोद पूरण प्रसग वा हृदयग्राही अन किया है। पदावली मे वही शृङ्गारभूमि कृष्ण के चरित्र का भाघार है। कालान्तर मे विद्यापति के इमरदेव का पूरा पल्लवन रोतिकाल में हुआ । सूर, तुलसी, मीराबाई, रसखान इत्यादि कवियों ने विभिन्न भाचार्यो की छत्रछाया मे कृष्ण को भत्तिदव बनाकर अपने रमस्निग्ध पदों की रचना को 1 कृष्णु वारमल्य, सख्य, दास्य, माधुय और शान्त भक्ति के पालम्वन बने । रीतिकाल म पूर्वनिर्देशा नुसार कृष्ण शृङ्गारदेव हो रहे । श्राधुनिक काल में समाज को परिवत्तित विचारसरणि से प्रभावित होकर कृष्ण ने कुछ बौद्धिकता का प्राश्रय अवश्य लिया जसा कि हरिभोध
के प्रियप्रवास मे है परंतु प्रधानत वे भावदेव ही बने रहे और अनुप्रिया उसकी चरम परिणति है । इस प्रकार लीलापुरुषोत्तम कृष्ण रति के प्रेम के सभी रूपो के उ मुक्त भालम्बन हिन्दी साहित्य में बनते रहे हैं ।
हिंदी वाव्य म कृष्णचरित के इस सम्पूर्ण विकास के गम्भीर विश्ने पणात्मक प्रध्ययन की आवश्यकता थी। डॉ० तपेश्वरनाथ प्रसाद ने उस श्रावश्यक्ता की पूर्ति 'हिन्दी काव्य में कृष्णचरित का भावात्मक स्वरूप शोषक अपने शोधप्रब घ मे की है। इसमें उनकी भावयित्री प्रतिभा का अच्छा निदशन है । उन्होने कृष्ण सम्बन्धी उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री का अच्छी तरह समाकलन किया है भौर ऐतिहासिक विवेतन के साथ तकसगत पद्धति मे अपने विषय का प्रतिपादन किया है । हिन्दी काव्य में अति कृष्ण के स्वरूप को समप्रता से मात्मसात् करने के लिए यह प्रबन्ध अभी तक सर्वोसृष्ट साधन है यह निर्विवाद कहा जा सकता है। आशा है हिंदी के पाठक इस प्रबध का खुले दिल से स्वागत करेंगे ।
भारतीय संस्कृति के उजायका मे राम और कृष्ण के नाम सर्वाधिक प्रज्ज्वल इन्होंने अपने गरिमामय एवं उदात्त चरित्र द्वारा भारतीय जन गण के भावो और विचारों को हिलकोर कर उसे एक नयी दिशा, नयी भास्था प्रदान की । परम्परा से विश्वासशील जनता ने हजारो वर्षों से का महिमाशालो प्रवपुरुषो का मुक्त कठ से यशोगान किया है । अपने प्रतापी पूजा के श्रादश कृत्यों का कोसन हो इस आस्थाशील परम्परा को नैसर्गिक शृङ्खला ही रही, जिसने उत्तरोत्तर नौविक वृत्त के स्थान पर अलोकिक चरित को प्रास्फूत किया । पलत मानवत्व म देवत्व को उद्बुद्धि हुई। भोर, लोवचित्त ने अपनी कल्पना और पूज्यबुद्धि षे भतिरेव से राम-कृष्ण के नाम रूपात्मक प्रस्तित्व का ईश्वरीय ऐश्वर्य और मानन्द म रूपातरित कर लिया। क्षीरमिधु में निवास करने वाले देवाधिदेव विष्णु भारतीय मनीषा की वैभवशालिनी चरित-चरपना के ही पुजीभूत प्रतीक है। हमारी श्रद्धा और कल्पना की इसी पीठिका पर राम-कृष्ण के ध्रुवतरण की साथकता को समझा जा सकता है ।
इसके अनुसार, राम त्रेतायुग की धम-वेदना की उत्पत्ति है । जि होने भक्तिस्वरूपा कौशल्या की वादना से अपने चतुर्भुज स्वरूप को तज पर मानवीय लीलाओ में अपना स्वरूप प्राकट्य किया । उमी प्रकार कृष्ण भी द्वापर युग के भक्तों की प्रेम-वेदना से वशीभूत हो कमलागृह तज कर मथुरा के कारागृह में प्रक्ट हुए और अपनी लीला का व्यापक प्रसार कर ब्रजमण्डल, मथुरा, द्वारका सभी को एक अद्भुत मानद लोक मे परिणत कर दिया । वैष्णवो का गोलाक इसी कल्पना का सुमधुर रूप है।
सामासिक संस्कृति के इस देश म, जहाँ को जनता करोड़ों देवी देवतामो को जानती और मानती थी, उन समस्त प्राचीन देवताओं के स्थान पर विष्णु के उक्त दो अवतार - राम और कृष्ण लोक में प्रतिष्ठित और प्राराध्य बन गये। राम यदि मर्यादापुरुषोत्तम हैं तो कृष्ण लीलापुरुषोत्तम । अपनी लीला रजनकारिणो वृत्ति के हो वारण श्रीकृष्ण सर्वाधिक जनप्रिय और लोक भावना के मनिकट हैं।
श्रीकृष्णचत्र को पूर्णावतार कहा गया है। उनमें समस्त कलाप्रो का स्पे विकास हुआ है। उनका वचपन गोष-जीवन म असाधारण प्रेम, उमग और उल्लास का स्मारव है तो उनका यौवन गोपीकृष्ण शृङ्गार लीलामो वा मरम सन्निधान । उसी प्रचार उनको प्रौढावस्या मादव बुल मे अलौकिक शक्ति, कुशाग्र बुद्धि और नेतृत्व क्षमता का दृष्टात है । यदि लोव चातुय से उन्होने सकटापन्न पाण्डवी का माग निर्देश किया तो भलो विक प्रतिभा से भजुन को रण-स्थत म हो गीता का तेजस्वी मम दिया। यदि वह द्वारकाधीश रूप में मनात एश्वर्यो के भोक्ता और असख्य रानियों के पतिदेव रहे तो साथ ही स्थितमन योगी भी। इस प्रकार, वृष्ण प्रेमी शोर चोर बानक है, कला-नोविद और
शस्त्रासविद् युवक हैं। योद्धा मोर जेता सामन्त हैं, राजनीतिक भौर दार्शनिय यागी हैसब एक साथ हैं और सब म महान हैं ।
यही कारण है कि उनके सम्बंध में सर्वाधिक विवाद भी उठ सरे हुए हैं। प्रथि काश हिदुओ को पास्पा मे मनुसार वृष्ण भगवान् विष्णु म भाग्य - पूरा भार हैं। किन्तु, विद्वान् इस तथ्य को विषय तय ज्ञान को इयता नहीं मानो। इस सम्बध मे मने परिडत ( जिनम प्रो० मिटरनिल, भरडारवर मादि प्रमुख हैं ) रारमाध्यम से ऐतिहासिय कृष्ण के सम्बन्ध में विचिविला मरत हुए हम है कि वस्तुत कृष्ण नाम के तीन विभिन्न महापुरुष हुए
( १ ) वैदिन ऋषि वृष्ण
( २ ) गीतानाचक कृष्ण और, (३) गोपीजनवल्लभ वृष्ण
बुछ बुद्धिवादी ( श्री टी० पी० सिंह- हिदू पासिंह बयामा के भौतिय अर्थ मे लेखक ) कृष्ण के ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर स देह तु कृष्ण लीला व भोतिष पर्यापर भाग्रह रखते हैं। और बुछ ऐसे भी विद्वान् है जिन्होने कृष्ण के ऐतिहासिम व्यक्तित्व का और पौराणिक चरित्र को शृङ्खलाबद्ध गवेपणा में अपनी प्रतिभा मोर थम वा प्रथिवांश समर्पित किया है। श्री एस० एन० ताडपत्रीवर को गवेषणात्मक पुस्तप 'द कृष्ण प्रव लेम' इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। बुद्ध विद्वान को दव पुष्प कुछ ईदनर और मनुष्य के बीच भी कोई शक्ति और कुछ इ है भद्ध ऐतिहागिय मद्धपौराणिक रहस्यमय पात्र मानते हैं जो श्रव तक् पूणत बोधगम्म नही हो सके । इस मत के समयको में हू इच वृण' के लेखष प्रो० श्री क्षेत्रलाल साहा पाते हैं। और अधिकांश व्यक्ति उन्हें एक ऐसे मन मोजो निष्काम पुरुष के रूप में देखते हैं जिसका जीवनोद्देश्य इस जगत को एक विशाल फीडा भूमि के रूप मे अगीकार करता है ।
ऐतिहासिक व्यक्तित्व के अतिरिक्त बाल और किशोर का एक पौराणिक स्वरूप भी है जो अपने पल्पनाप्रवण रूप मे काण्यत्व के सनक्ट है। इस पौराणिक स्वरूप के एक पक्ष बाल कृष्ण के सम्मघ मे वेबर प्रियसन केनेडी, भएडारकर मादि विद्वानो को यह मान्यता रही कि यह ईसामसीह को क्या का भारतीय रूपांतरण है। प्राचाय हजारी प्रमाद द्विवेदी जी ने इस धारणा का उचित निरारा अपने सूर साहित्य के प्रति गवेषणात्मक प्रथम निर्बंध में बहुत पहले कर दिया था।
उपयुक्त विवरण से यह सिद्ध है कि इतिहास पुराण भादि के विभिन्न स्रोतो मे विकीण कृष्ण चरित से सम्बद्ध श्राख्यान इतने बहुवणीं हैं कि इस विषय के नवीन अनु स धाताओ को एक बार पुन गम्भीरतापूर्वक सोच विचार करने को प्रेरित कर देते ।
वस्तुत भारतीय वाङमय के प्राचीन और प्रतिविस्तृत पट पर चाहे वह वैदिक हो या भौपनिषदिक, पौराणिक हो या लौकिक-कृष्ण की तरह गतिशील, बहुवर्णी, रगीन और माध्यात्मिक्ता सम्पन्न चरित्र कोई दूसरा नहीं दिखाई देता कृष्ण के व्यक्तित्व में अखिल ब्रह्माण्ड की संचालिका शक्ति है तो पूर्ण निस्सगता भी। क्रियाशीलता है तो शान्त निवि |
2c1bed22af64506af5c28040f933b2befee129e1 | web | Во время Второй мировой войны промышленность нацистской Германии создала большое количество оригинальных и необычных проектов вооружения и техники. Пытаясь выполнить требования заказчика, конструкторы прибегали к нестандартным идеям и решением, результатом чего становилось оружие, способное удивлять даже сейчас. Одним из самых ярких примеров подобного подхода к созданию оружия является противопехотная мина Kugeltreibmine. Этот боеприпас имел оригинальную конструкцию и необычный способ применения.
Kugeltreibmine उत्पाद (K. -Tr. Mi. ) मोबाइल खानों के एक अत्यंत दुर्लभ वर्ग के थे। यह माना गया था कि वेहरमाच सेनानी इन हथियारों को ढलान से रोल करेंगे और इस तरह दुश्मन की बढ़त का मुकाबला करेंगे। इस प्रकार, इस हथियार को शब्द के पूर्ण अर्थ में एक खदान नहीं माना जा सकता है। संभवतः इस कारण से, कुछ स्रोतों में के. टी. आर. एम. आई. बम (रोलबॉम्ब) कहा जाता है। इसी समय, इस तरह के एक असामान्य हथियार को अधिकतम आकार और वजन के साथ एक तरह का हैंड ग्रेनेड माना जा सकता है। एक तरह से या दूसरे, आधिकारिक दस्तावेजों में, कुगेल्ट्रेइम्बाइन उत्पाद को गेंद मोबाइल की खान के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।
खदान के विकास के समय की सटीक जानकारी K. Tr. Mi. अनुपस्थित हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, यह हथियार 1942-43 वर्षों में बनाया गया था। इसी समय, एक्सएनयूएमएक्स वर्ष में, पूर्ण पैमाने पर उत्पादन पहले से ही चल रहा था, हालांकि समय के साथ, उत्पादन में कमी आई। एक्सएनयूएमएक्स में उत्पादन में कमी की जानकारी से पता चलता है कि पहला उत्पादन के. टी. आर. टी. आई. 1944 या उससे भी पहले सैनिकों के पास गया।
पहले से ही 1942 में, जर्मन उद्योग कई महत्वपूर्ण संसाधनों की कमी से पीड़ित होने लगा। विशेष रूप से, धातुओं और मिश्र धातुओं के मौजूदा उत्पादन ने सभी उत्पादन के लिए कच्चे माल प्रदान करना संभव नहीं किया। विभिन्न खानों का उत्पादन पहले कम होने में से एक था, जिसके कारण लकड़ी, कंक्रीट, कांच और यहां तक कि कार्डबोर्ड मामलों में गोला-बारूद की उपस्थिति हुई। के। Tr. Mi के मामले में। कंक्रीट के मामले को बनाने का निर्णय लिया गया।
उत्पाद के. टी. आर. एम. आई. दो हिस्सों से बना एक गोलाकार शरीर प्राप्त किया। कंक्रीट से गोला बारूद के निर्माण में, एक गुहा के साथ दो गोलार्ध डाले गए थे। हेमिस्फोरस को बोल्ट या स्टड का उपयोग करके जोड़ा गया था। स्वीकार्य विनाशकारी क्षमता प्रदान करने के लिए, विभिन्न विनाशकारी तत्वों को कंक्रीट में रखा गया था। उत्पादन को सरल बनाने की आवश्यकता के कारण, विभिन्न धातु की वस्तुओं का उपयोग तैयार किए गए टुकड़ों के रूप में किया जा सकता है, बियरिंग के लिए दोषपूर्ण गोलियों या गेंदों से लेकर कटा हुआ तार और छोटे नाखून तक। उत्पादन को सरल बनाने के उद्देश्य से खान परियोजना का विकास किया गया था, इसलिए निर्माता को "घटकों" का चयन करते समय कार्रवाई की बहुत स्वतंत्रता थी।
गोलाकार शरीर के अंदर एक गुहा था जिसमें एक विस्फोटक चार्ज और एक फ्यूज लगाने का प्रस्ताव था। Sprengkörper 28 वजनी 232 g या मेल्टिनल के समान चार्ज के पांच ट्राइटिल ब्लॉक असेंबली के दौरान इस कैविटी में ढेर हो गए थे। आवरण में एक आयताकार चैनल प्रदान किया गया था, जो आंतरिक गुहा को बाहरी सतह से जोड़ता है। छेद के माध्यम से एक गोल के साथ एक लकड़ी के ब्लॉक को इस चैनल में डाला गया था। फ्यूज की स्थापना के लिए बार का इरादा था, और इसके अलावा, टीएनटी ब्लॉकों को स्थानांतरित करने की अनुमति नहीं दी थी।
गोलाकार कंक्रीट की खान खोल में 25 सेमी का व्यास था। गोला बारूद का वजन 18-20 किलो तक पहुंच गया। उत्पादन प्रक्रिया की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, उत्पाद के आयाम और वजन कुछ सीमाओं के भीतर उतार-चढ़ाव कर सकते हैं।
कई हिस्सों से इकट्ठे हुए फ्यूज को बार के छेद में रखा गया था। Kugeltreibmine खदान एक Zundschuranzünder 29 फ्यूज, एक Zeitzündschnur 30 लौ-कॉर्डेंट कॉर्ड के बारे में 10-12 लंबे समय से सुसज्जित था, और एक विशेष कुंडली में एक नंबर 8 स्प्रेंगकैपल डेटोनेटर कैप्सूल से लैस नहीं था। डेटोनेटर को एक चेकर के घोंसले में रखा गया था और आग प्रतिरोधी कॉर्ड का उपयोग करके फ्यूज के साथ जोड़ा गया था। बाद वाले को खदान की सतह पर बांध दिया गया था। खदान के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किए गए फ्यूज में सबसे सरल निर्माण संभव था, और इग्नाइटर रिंग को हटाने के कुछ समय बाद प्रभारी के विस्फोट के लिए भी प्रदान किया गया था। अतः के. टी. आर. एम. आई. हैंड ग्रेनेड के फ़्यूज़ की याद ताजा करती है। ऐसा कोई भी साधन जो हानिरहित प्रस्तुत करने के लिए कठिन या असंभव बना था, अनुपस्थित था। विशिष्ट आवेदन प्रक्रिया के कारण स्व-परिसमापक प्रदान नहीं किया गया था।
अन्य विरोधी कर्मियों खानों के विपरीत, उत्पाद K. Tr. Mi. जमीन में स्थापना के लिए इरादा नहीं है। इस हथियार का उपयोग करने की प्रक्रिया अलग थी और अद्वितीय थी। उपयोग की तैयारी में, खदान एक फ्यूज से सुसज्जित थी और एक पैरापेट पर रखी गई थी। मूल आवेदन विधि के कारण, बॉल खानों का उपयोग केवल ढलान के ऊपर या पहाड़ों में स्थित इकाइयों द्वारा किया जा सकता था। एक अलग व्यवस्था के साथ, ऐसे हथियारों के उपयोग को दुश्मन को गोला बारूद की असंभवता के कारण बाहर रखा गया था।
दुश्मन के हमले के दौरान, लड़ाकू-खनिक को विस्तार कॉर्ड को हटाते हुए फ्यूज कवर और अंगूठी पर खींचना पड़ा। इसके लिए, 0,5-0,6 किलो से अधिक नहीं के प्रयास की आवश्यकता थी। इसके बाद खदान को दुश्मन की दिशा में पैरापेट से खदेड़ा जा सकता था। अपने स्वयं के वजन के तहत, गोला बारूद पहाड़ी के नीचे लुढ़क गया और कुछ सेकंड के बाद विस्फोट हो गया। निष्कर्षण के दौरान, निकास कॉर्ड को एक विशेष रचना के एक खंड के खिलाफ रगड़ा जाता है जो घर्षण के दौरान ज्वलनशील होता है। एक ज्वलनशील अभिकर्मक ने आग की हड्डी को प्रज्वलित किया, जो बदले में, 10-12 सेकंड में डेटोनेटर कैप्सूल को जला दिया और प्रज्वलित कर दिया। उसके बाद एक विस्फोट हुआ।
Kugeltreibmine खदान का उपयोग करने का मुख्य तरीका ढलान को मैन्युअल रूप से रोल करना था। एक अन्य तकनीक को "खिंचाव" के रूप में गोला-बारूद के उपयोग से भी जाना जाता है। इस मामले में, गेंद की खान को अस्थिर स्थिति में ढलान पर रखा गया था, और तनाव कॉर्ड के सिरों में से एक फ्यूज रिंग से बंधा हुआ था। टेंशन कॉर्ड के संपर्क में आने पर, खदान को स्टॉप से स्लाइड करना पड़ता है और ढलान नीचे गिरती है। उसी समय, फ्यूज कॉर्ड को हटा दिया गया था।
यह विश्वास करने का कारण है कि गेंद की खान के. टी. आर. एम. आई. काफी बड़ी शक्ति थी। टीएनटी का एक 1160 चार्ज या पिघला हुआ, तैयार किए गए हड़ताली तत्वों के साथ मिलकर एक ठोस मामले में डाला गया, जिससे 10 मीटर के दायरे में दुश्मन की जनशक्ति हिट हो सकती है। इसके अलावा, एक ढलान से 20-किलोग्राम किलोग्राम रोलिंग भी अपनी गतिज ऊर्जा के कारण एक निश्चित खतरा पैदा कर सकता है। । हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि अग्रिम दुश्मन समय में खदान की "शुरुआत" को नोटिस कर सकता है और आवश्यक उपाय कर सकता है - सुरक्षित दूरी पर इससे दूर जाने के लिए।
फ्यूज के डिजाइन और एक निश्चित सीमा तक खानों का उपयोग करने की विधि ने सैपर के काम को सुविधाजनक बनाया। सभी घटकों के मानक संचालन के साथ, खदान में विस्फोट हुआ। अस्पष्टीकृत आयुध पृथ्वी की सतह पर पड़ा रहा, जिससे उनकी खोज बेहद आसान हो गई। खानों की निकासी के लिए के. टी. आर. एम. आई. फ्यूज के साथ लकड़ी के ब्लॉक को हटाने और डेटोनेटर को हटाने के लिए आवश्यक था। हालांकि, यह हमेशा संभव नहीं था। यदि डेटोनेटर को निकालना असंभव था, तो ओवरहेड चार्ज का उपयोग करके खदान को नष्ट करने की सिफारिश की गई थी।
Kugeltreibmine उत्पादों का उत्पादन वर्ष 1943 के आसपास शुरू हुआ। इन हथियारों का उत्पादन मात्रा छोटा था। जबकि अन्य खानों का उत्पादन हजारों के बैचों में किया गया था, के. टी. आर. एम. आई. एक महीने में कई सौ से अधिक नहीं हुआ। इसके अलावा, 1944 वर्ष में, ऐसे हथियारों का उत्पादन गंभीरता से कम हो गया थाः 800 से 250 इकाइयों के लिए प्रति माह। इस कारण से, सेना में मूल बॉल मोबाइल की खदानें व्यापक नहीं हैं। ऐसे हथियारों का उपयोग एपिसोडिक था और केवल पश्चिमी यूरोप में लड़ाई के लिए लागू होता है। के- Tr. Mi के उपयोग पर जानकारी। पूर्वी मोर्चे पर अनुपस्थित है।
Kugeltreibmine मोबाइल बॉल को नाजी जर्मनी के सबसे दिलचस्प और असामान्य प्रकार के हथियारों में से एक के रूप में पहचाना जा सकता है। इसी समय, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह खदान सबसे असफल और बेकार घटनाओं में से एक थी। इस तरह के हथियारों में बेहद सीमित गुंजाइश थी, साथ ही साथ संदिग्ध युद्ध प्रभावशीलता भी थी। कुछ मामलों में, खानों के बजाय एक अलग उत्पादन के संगठन की आवश्यकता होती है, मौजूदा हैंड ग्रेनेड का उपयोग करना संभव था।
खानों की मुख्य समस्या के. टी. आर. एम. आई. आवेदन की प्रस्तावित विधि में शामिल है। एक अग्रिम दुश्मन पर अपेक्षाकृत बड़े विस्फोटक चार्ज के साथ भारी गोला बारूद को रोल करने का विचार दिलचस्प लगता है। हालांकि, व्यवहार में, वह कई गंभीर समस्याओं का सामना करती है। सबसे पहले, यह परिदृश्य है। हमेशा नहीं जर्मन सैनिकों को ऊंचाई में एक फायदा था और एक ढलान पर आगे बढ़ने वाले दुश्मन से खुद की रक्षा करने की क्षमता थी। अन्य मामलों में, एक नियमित तरीके से खानों का उपयोग असंभव था। इसके अलावा, जिस ढलान पर खानों को रोल करने की योजना बनाई गई थी, उसमें ऐसा कोई भी धमाका नहीं होना चाहिए जो गोला-बारूद को रोक सके। खाइयों से थोड़ी दूरी पर स्थित धक्कों के कारण, बचाव बलों को अपनी खानों से कुछ नुकसान हो सकता है।
ठोस मामले और विभिन्न धातु की वस्तुओं के रूप में हड़ताली तत्वों ने हथियारों के उत्पादन को सुविधाजनक और सस्ता किया, लेकिन उनके उपयोग को मुश्किल बना दिया। गेंद की खान काफी भारी हो गई, जो कुछ हद तक उपयोग और वास्तविक उपयोग के लिए इसकी तैयारी को जटिल बनाती है। संचालक के साथ फ्यूज के इस्तेमाल से ऑपरेशन में भी बाधा आ रही थी। जिस सेनानी ने K. Tr. Mi. का उपयोग किया था, उसे खानों के मार्ग की सही गणना करने के लिए आवश्यक था, साथ ही ढलान पर गिरावट के सटीक क्षण का भी निर्धारण करना था। पैरापेट के साथ असामयिक टक्कर के मामले में, खदान आगे की टुकड़ियों तक नहीं पहुंच सकती थी या दुश्मन के युद्ध संरचनाओं के पीछे विस्फोट कर सकती थी। इसके अलावा, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुश्मन के पास सुरक्षित दूरी पर रिटायर होने और लेटने का समय हो सकता है।
खानों का उपयोग करने की डिजाइन और विधि के. टी. आर. एम. आई. वे कहते हैं कि युद्ध की प्रभावशीलता के संदर्भ में इस तरह के हथियार न केवल धक्का कार्रवाई की खानों के लिए, बल्कि हथगोले को भी खो देते हैं। पूर्व ने दुश्मन से पर्याप्त रूप से बड़े क्षेत्र की रक्षा करना संभव बना दिया, और उत्तरार्द्ध, रक्षकों के नियत कौशल के साथ, दुश्मन के लड़ाकों को आगे बढ़ा सकते थे, प्रतिक्रिया के लिए लगभग कोई समय नहीं छोड़ा। इसके अलावा, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लड़ाई के दौरान खदानों और हथगोले रक्षकों के सहायक हथियार हैं और केवल छोटे हथियारों के पूरक हैं।
जर्मन कमांड ने शायद समझा कि कुगेल्ट्रेइम्बाइन खदान में अस्पष्ट या यहां तक कि संदिग्ध संभावनाएं थीं, जिसके कारण इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन बहुत तेज नहीं था। समय के साथ, इस तरह के हथियारों का उत्पादन अन्य प्रणालियों के निर्माण के पक्ष में और कम हो गया। लगभग सभी बॉल मोबाइल की खदानों का इस्तेमाल या तो लड़ाई के दौरान किया गया था, या हिटलर विरोधी गठबंधन की विरोधी ताकतों को ट्राफियां के रूप में दिया गया था। इनमें से कई गोला-बारूद आज तक बच गए हैं। अब वे संग्रहालय प्रदर्शनी हैं।
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c25e6f6282cb131756f3aea4070f0c1892b31163 | web | 16 Jun 2023विश्व हिंदू परिषद (VHP)
कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने के सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के फैसले पर हिंदू संगठनों में जबरदस्त नाराजगी दिख रही है।
कर्नाटक में पिछले भाजपा सरकार द्वारा लाए गए गोहत्या विरोधी कानून पर सियासत गरमाई हुई है।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री एमबी पाटिल ने सोमवार को ट्वीट कर 'शांतिपूर्ण कर्नाटक' नाम से एक हेल्पलाइन शुरू करने का प्रस्ताव रखा।
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार का आज मंत्रिमंडल विस्तार हुआ, जिसमें 24 विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार की मुफ्त घोषणाओं की आलोचना करना एक सरकारी स्कूल के शिक्षक को भारी पड़ गया। उनको सेवा से निलंबित कर दिया गया है।
कर्नाटक में नवगठित सरकार की शनिवार को पहली कैबिनेट बैठक हुई।
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में शनिवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया और कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने क्रमशः मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
कर्नाटक चुनाव के नतीजे शनिवार को घोषित हुए, जिसमें कांग्रेस ने 135 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि भाजपा ने 66 सीटें जीती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय के आरक्षण को लेकर दिये जा रहे राजनीतिक बयानों पर कड़ी आपत्ति जताई।
मंगलवार को कर्नाटक सरकार के राज्य में 4 फीसदी मुस्लिम आरक्षण को खत्म करने के मामले में अहम घटनाक्रम हुआ।
कर्नाटक में हाई कोर्ट ने एक नहर के काम के लिए सरकारी कार्यकारी अभियंता द्वारा 5 करोड़ रुपये भुगतान की मंजूरी पर हैरानी जताई। इस नहर का काम 3 दिन में पूरा हो गया था।
चुनाव आयोग ने कर्नाटक में चुनावी तारीखों का ऐलान कर दिया है। राज्य की सभी सीटों पर 10 मई को एक ही चरण में मतदान होगा और 13 मई को नतीजे जारी किए जाएंगे।
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता बीएस येदियुरप्पा के घर पर सोमवार को हमला हो गया।
कर्नाटक में जल्द ही विधानसभा चुनावों का ऐलान हो सकता है। इससे पहले लिंगायत समुदाय से जुड़ी दो बड़ी खबरें आई हैं।
कर्नाटक में दूध की भारी किल्लत सामने आ रही है। इसके देखते हुए कर्नाटक सरकार ने दूध के दाम न बढ़ाकर अलग रास्ता अपनाया है और दूध की मात्रा कम कर दी।
टीपू सुल्तान के एक वंशज ने राजनीतिक पार्टियों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे टीपू के नाम का इस्तेमाल राजनीति के लिए न करें।
कर्नाटक में दो वरिष्ठ महिला अधिकारियों के बीच व्यक्तिगत विवाद सामने आया है। भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी डी रूपा और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी रोहिणी सिंधुरी ने एक-दूसरे पर जमकर निशाना साधा है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुधवार को आदियोगी मूर्ति के अनावरण और बेंगलुरू के नंदी पहाड़ियों की तलहटी पर बने ईशा योग केंद्र के उद्घाटन पर रोक लगा दी।
महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच चल रहे सीमा विवाद में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कर्नाटक के मंत्री जे मधु स्वामी की टिप्पणी पर खरा जवाब दिया है।
कर्नाटक में जनता दल (सेक्यूलर) (JDS) की विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी की पत्नी अनिथा कुमारास्वामी ने एक जनसभा में किसानों से कहा कि जितना चाहिए उतना लोन लो, उनकी सरकार आने पर सब माफ कर देंगे।
चीन में कोरोना के कहर को देखते हुए केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारें भी अपनी ओर से आदेश जारी कर रही हैं।
कर्नाटक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सतीश लक्ष्मणराव जारकीहोली ने सोमवार को हिंदू शब्द पर कई तरह के सवाल खड़े करते हुए नए विवाद को जन्म दे दिया है।
देशभर में आज दिवाली का त्योहार मनाया जा रहा है। लोग एक-दूसरे को उपहार देकर खुशियां मना रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में पर्यटन मंत्री आनंद सिंह की ओर से दिए गए उपहार ने विवाद खड़ा कर दिया है।
कर्नाटक सरकार में मंत्री वी सोमन्ना एक महिला को थप्पड़ मारकर विवादों में घिर गए हैं। कांग्रेस ने जहां मंत्री को पद से हटाने की मांग की है, वहीं मुख्यमंत्री बसवराज बोम्ममई ने उनसे सफाई मांगी है।
चरमपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) चौतरफा मुसीबतों में घिर गया है और कर्नाटक सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगाने की कार्रवाई शुरू कर दी है।
कर्नाटक के मंत्री उमेश कट्टी की मंगलवार रात हार्ट अटैक से मौत हो गई। वह 61 साल के थे और राज्य सरकार में वन, खाद्य, सिविल सप्लाई और ग्राहकों से संबंधित मामलों के मंत्री थे।
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में रविवार रात आई बारिश के बाद शहर के हालत बिगड़े हुए हैं।
कर्नाटक में दो धड़ों में बंटी कांग्रेस को एकजुट करने पहुंच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को चित्रदुर्ग में स्थित लिंगायत समुदाय के मुरुगराजेंद्र मठ का भी दौरा किया।
कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत ने मंगलवार को राज्य सरकार की ओर से गत दिनों पारित किए गए धर्मांतरण विरोधी विधेयक से संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी।
देश में लाउडस्पीकर पर अजान के खिलाफ विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की मांग उठाने के बाद अब कर्नाटक में भी इसकी आग पहुंच गई है।
टोयोटा (Toyota) ने कर्नाटक सरकार के साथ किये अपने एक समझोते (MoU) की घोषणा की है।
कर्नाटक में भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल के 2,500 करोड़ रुपये में मुख्यमंत्री बनाने का ऑफर मिलने के दावे ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
कर्नाटक में एक ठेकेदार की मौत के मामले में राज्य के मंत्री केएस ईश्वरप्पा का नाम आने के बाद विवाद बढ़ गया।
कर्नाटक में स्कूल और कॉलेजों में हिजाब पहनने को चल रहे विवाद के बीच कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों वाली पूर्ण पीठ ने शुक्रवार को सभी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर ली है।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी का सपना देखने वाले उम्मीदवारों के लिए अच्छी खबर है।
कर्नाटक के शिवमोगा शहर में बजरंग दल के कार्यकर्ता की हत्या के बाद से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं।
कर्नाटक के शिवमोगा शहर में बजरंग दल के कार्यकर्ता की हत्या के बाद तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। संगठन के सदस्यों ने आज शहर में कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन किया और कुछ जगहों पर पथराव भी किया गया। भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस के आंसू गैस के गोले छोड़ने की खबर भी है।
कर्नाटक में चल रहे हिजाब विवाद मामले में सरकार और पुलिस की ओर से लगातार समझाइश करने के बाद भी विरोध-प्रदर्शन थम नहीं रहा है।
कर्नाटक में चल रहे हिजाब विवाद को लेकर हाई कोर्ट की तीन जजों वाली बड़ी बेंच में लगातार सुनवाई चल रही है।
कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों वाली बड़ी बेंच ने राज्य में चल रहे हिजाब विवाद मामले को लेकर गुरुवार को अहम सुनवाई की।
कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनकर कॉलेज आने पर विवाद के बीच बेंगलुरू में स्कूल और कॉलेजों के आसपास सभा या प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ये प्रतिबंध दो हफ्ते तक लागू रहेगा।
कर्नाटक में हिजाब पहनने को लेकर शुरु हुआ विवाद मंगलवार को उबाल पर आ गया।
कर्नाटक में कक्षाओं में हिजाब पहनने को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य सरकार ने ड्रेस कोड लागू कर दिया है।
कर्नाटक में हिजाब पहनने को लेकर शुरु हुआ विवाद अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। उडुपी के सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ यह विवाद अब अन्य कॉलेजों तक पहुंच गया है।
कोरोना वायरस के ओमिक्रॉन वेरिएंट के प्रभाव के कारण देश में संक्रमण के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है।
कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री के सुधाकर ने महिलाओं पर विवादत बयान दिया है। आज हुए एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक भारतीय महिलाएं अविवाहित रहना चाहती हैं और यदि शादी हो भी जाए तो बच्चे नहीं पैदा करना चाहती हैं, सरोगेसी से बच्चा चाहती हैं।
कर्नाटक सरकार ने ट्रांसजेंडरों के प्रति भेदभाव को मिटाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
देश में कोरोना से ठीक हुए लोगों पर म्यूकरमायकोसिस यानी ब्लैक फंगस का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।
ऐपल के लिए अनुबंध पर आईफोन का विनिर्माण करने वाली कंपनी विस्ट्रॉन के कर्नाटक के कोलार स्थित नरसापुरा प्लांट पर पिछले दिनों हुई हिंसा के मामले में कंपनी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है।
कर्नाटक में कोरोना वायरस के संक्रमण की स्थिति को जांचने के लिए कराए गए सीरोलॉजिकल सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
देश में लगातार बढ़ते कोरोना वायरस के संक्रमण ने अब चिकित्सा व्यवस्था पर भी असर डालना शुरू कर दिया है।
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार ने 25 मार्च से लागू लॉकडाउन में सभी धार्मिक स्थलों को भी बंद कर दिया था।
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन के बीच सोमवार से घरेलू विमान सेवाएं फिर से शुरू हो गई हैं।
PM केयर्स फंड के खिलाफ कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए कुछ ट्वीट्स के संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक में एक मामला दर्ज किया गया है।
कांग्रेस-JDS गठबंधन सरकार की दीवार को गिराकर फिर से सत्ता पर काबिज होने वाले मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को इसी माह अपने मंत्रीमंडल का विस्तार करना है, लेकिन उससे पहले उनके सामने परेशानियां खड़ी होना शुरू हो गई हैं।
केंद्र सरकार के नए मोटर वाहन अधिनियम पर बहस के बीच कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री ने सड़क दुर्घटनाओं को लेकर अजीबोगरीब बयान दिया है।
कांग्रेस 17 विधायकों की सदस्यता रद्द होने से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव की तैयारियों में जुट गई है और इसे जनता दल (सेक्युलर) के साथ उसके गठबंधन के अंत के तौर पर देखा जा रहा है।
कर्नाटक में सफलता के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार पर निशाना साधे बैठी भारतीय जनता पार्टी को तब बड़ा झटका लगा जब उसके 2 विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर सरकार के एक बिल के समर्थन में वोट कर दिया।
रोज लंबे होते इंतजार के बीच आज आखिरकार कर्नाटक विधानसभा में विश्वास मत पर वोटिंग हो गई, जिसमें एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई।
कर्नाटक में चल रहा सियासी नाटक थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार को सदन को 22 जुलाई तक स्थगित कर दिया गया है।
कर्नाटक में राज्यपाल वजुभाई वाला द्वारा मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी को दी गई शाम 6 बजे की दूसरी डेडलाइन भी खत्म हो गई है।
विधायकों के इस्तीफे के कारण संकट से गुजर रही कर्नाटक सरकार गुरुवार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेगी।
मुंबई के होटल में ठहरे कर्नाटक के 14 बागी विधायकों ने फिर से मुंबई पुलिस को पत्र लिखकर कांग्रेस नेताओं ने गंभीर खतरा बताया है और सुरक्षा की मांग की है।
शनिवार को कर्नाटक सरकार के 5 और बागी विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और कहा कि विधानसभा स्पीकर उनके इस्तीफे स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
कर्नाटक में सियासी नाटक के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सिद्धारमैया ने बागी कांग्रेस विधायकों को चेतावनी दी है।
कर्नाटक की कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन सरकार की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) प्रमुख एचडी देवगौड़ा ने कर्नाटक में मध्यावधि चुनाव होने की भविष्यवाणी की है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने भारतीय जनता पार्टी पर विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया है।
कर्नाटक की सत्ता पर काबिज कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन में मतभेद एक बार फिर से तब उजागर हुए, जब बुधवार को मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि वह हर दिन दर्द से गुजर रहे हैं।
कर्नाटक के भाजपा नेता केएस ईश्वरप्पा ने विवादित बयान दिया है।
कांग्रेस नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की एक हरकत की वजह से पार्टी की मुसाबतें फिर से बढ़ सकती हैं।
कर्नाटक में चल रहे सियासी नाटक में एक ऐसी घटना सामने आई है जो कांग्रेस की सिरदर्दी बढ़ा सकती है।
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3d8e8c25b0ccdf3b0f3537428771e4a0053cf6e8 | web | चौंरीखाल से चलें तो तकरीबन 5 किमी. आगे पैठाणी से आने वाली सड़क हमारी सड़क से जुड़ गयी है. ललित बताते हैं कि पैठाणी वाली सड़क भी बिट्रिश कालीन ऐतिहासिक मार्ग पौड़ी-रामनगर का ही हिस्सा है. कैन्यूर बैंड पर नीचे की ओर दिख रहे थलीसैंण के लिए एक सड़क मुड रही है. थलीसैंण यहां से 10 किमी है.
(Chandra Singh Garhwali Village Travelogue)
कैन्यूर बैंड के पास वाला कैन्यूर गांव कत्यूरी राजाओं का प्राचीन गांव माना जाता है. भरा-पूरा और जीवन्त गांव. इस इलाके की सम्पन्नता और खुशहाली इसी बात से दृष्टिगौचर होती है कि पौड़ी से चलते-चलते करीबन 100 किमी. हो गए हैं और हमें न तो कोई टूटा/खंडहर घर/इमारत मिली और न ही कहीं बंजर जमीन या छूटे हुए खेत. पुरुष हों या स्त्रियां अपने-अपने काम-धन्धों में है. सड़क के किनारे मिट्टीतेल के ड्रम के ऊपर कैरम खेलते युवा और चाय की दुकान के पिछवाड़े ताश खेलते सयाने यहां सिरे से नदारत हैं. इस पूरे परिदृश्य पर 'ये तो पहाड़ी पहचान के बिल्कुल विपरीत बात हो गयी' सीताराम बहुगुणा का जुमला था.
जंगलों में लगी आग के निशान जरूर जगह-जगह पर हैं. पर उस भयावहता में नहीं है जैसा अन्य पहाड़ी इलाकों में देखने को मिलते हैं. ललित का कहना है कि 'जंगल और लोगों के रिश्ते यहां अभी उतने दूर नहीं हुए हैं जितना कि शहरी इलाकों के आस-पास हो गए हैं. जंगलों की भरपूरता ने यहां के लोगों के पुश्तैनी कार्यों को कमजोर नहीं होने दिया है. जगलों में जंगली जानवरों का आधिपत्य है तो खेत-खलिहानों में मानवों का. दोनों अपनी-अपनी जगह अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ बेफिक्र हैं. जंगली जानवरों को अपनी जरूरतों का भोजन जंगल में आसानी से मिल जाता है. फिर क्यों वो मानव आबादी में आने का जोखिम उठायेंगे. दूसरी तरफ सभी गांव लोगों से आबाद हैं तो जंगली जानवरों के कभी-कभार के हमलों पर नियंत्रण रखना उनके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होता है. चौंरीखाल में दुकानदार का यह कहना कि बाघ हमारा दोस्त है इसी बात की पुष्टि करता है, क्योंकि बाघ और स्थानीय आदमी के रास्ते तथा जरूरतों में टकराहट की गुजांइश दूधातोली इलाके में बहुत कम है'.
कैन्यूर बैंड से 20 किमी. चलकर हम पीठसैंण पहुंचे हैं. पीठसैंण (समुद्रतल से 2250 मीटर ऊंचाई) एक ऊंची धार पर एकदम पसरा है, ग्वाले की तरह. जैसे कोई ग्वाला ऊंचे टीले पर अधलेटा आराम फरमाते हुए नीचे घाटी में चरते अपने जानवरों पर भी नजर रख रहा हो.
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'पहाड़ी भाषा में 'सैंण' का मतलब 'मैदान' होता है और 'सैंण' में 'ई' की मात्रा लगा दो तो पहाड़ी में 'सैंणी' 'महिला' को कहते हैं'. अब तक बिल्कुल चुप रहने वाले अजय ने अपनी चुप्पी इस ज्ञानी बात को कहकर तोड़ी है. सपकपाया अजय कहता है पीठसैंण नाम पर उसे यह याद आया. अजय की इस बात पर केवल मुस्कराया ही जा सकता है.
पीठसैंण की वर्तमान पहचान उत्तराखंड के जननायक स्वर्गीय वीर चंन्द्रसिंह 'गढ़वाली' जी से है. (ज्ञातव्य है कि चन्द्रसिंह 'गढ़वाली', सेना में 2/18 रायल गढ़वाल में हवलदार थे और 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में देश की स्वाधीनता के लिए शान्तिपूर्वक प्रर्दशन कर रहे निहत्थे पठानों पर कम्पनी कमाण्डर के 'गढ़वाली तीन राउण्ड गोली चलाओ' के आदेश को उन्होने 'गढ़वाली गोली मत चलाओ' कह कर मानने से मना कर दिया था. तब यह घटना विश्व चर्चा का विषय बनी और इसको भारतीय सेना का विद्रोह माना गया था. चन्द्रसिंह और उनके साथियों को तकरीबन 11 साल कालापानी की सजा हुई. सजा से छूटने के बाद चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' एक कम्यूनिष्ट नेता के रूप विख्यात हुए).
सड़क के एक किनारे पर टीन शैड़ से ढ़के चबूतरे पर चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' जी की मूर्ति खड़ी है. पास ही उनके साथियों के नाम और पेशावर घटना के विवरण का शिलापट्ट है. गढ़वाली जी की मूर्ति देखकर एक तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का उसमें कहीं साम्य नजर नहीं आता, फिर लोगों के कुसंस्कारों ने जिस तरह से उसे जगह-जगह पर खंरोचा है, उससे तो अच्छा था कि यहां पर यह मूर्ति लगती ही नहीं. ये मूर्तियों का प्रचलन भी अजीब है.
जीवन में अब तक हजारों मूर्तियां देख ली होगीं पर उनको देखकर उन जैसा बनने की कभी प्रेरणा मिली हो मुझे ऐसा तो याद नहीं आता है. पास ही एक जेसीबी पहाड़ी टीले को उधाड़ने में लगा है. पता चला कि एक भव्य स्मारक बनाने के लिए इस मैदान को और लम्बा-चौड़ा किया जा रहा है. मन में आया कि चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' जी के जीते-जी तो कभी कद्र की नहीं की न समाज ने और न ही तत्कालीन सरकार ने अब उनके नाम पर जो कर लो, उनकी बला से.
पीठसैंण की उत्तर दिशा में 30 किमी. पर प्रसिद्ध तीर्थ 'विनसर महादेव, समुद्रतल से 2480 मीटर ऊंचाई) है. ऐसी मान्यता है कि मन्दिर के पास एक प्राचीन नगर भूमिगत है. पीठसैंण से 'विनसर महादेव' होते हुए गैरसैण जाने का पैदल मार्ग है. पीठसैंण से उडियार खरक 6 किमी. वहां से कोदियाबगड़ 6 किमी. और वहां से 15 किमी. गैरसैंण है.
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सज्जन सिंह बताते हैं कि वो बर्फीली चोटी मूसाकोठ (समुद्रतल से 10,217 फिट ऊंचाई) और वो कोदियाबगड़ (समुद्रतल से 10,183 फीट ऊंचाई) का क्षेत्र है. कोदियाबगड़ में चन्द्रसिंह जी की छः फीट की समाधि सरकार ने बनाई है. ललित ने पूछा 'इधर कोई नेता लोग भी आते हैं'.
'हां साब, आते ही रहते हैं. पर हमारी चाय तो आप जैसे लोगों से बिकती है. नेता मंत्री आते हैं और बड़-बड़ करके चले जाते हैं. पर साब, 23 अप्रैल, 2005 को मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी आये थे यहां. भौत, बड़ा कार्यक्रम हुआ था तब. गजब का किस्सा हुआ साहब, उस दिन. स्कूल के बच्चों ने उस समारोह में नाचना-गाना किया. नाटक करते हुए एक बच्चे पर चन्द्रसिंह 'गढ़वाली' पहाड़ी देवता के रूप में अवतरित हो गया. फिर तो नाचते-नाचते देवता बनकर बोलते हुए उसने सरकार की जो पोल खोली उसको देखकर नेता तो भुनभुना रहे थे पर पब्लिक खूब मजे ले-ले कर हंस कर लोट-पोट हो रही थी.
नाटक में उस देवता ने धै (जोर की आवाज) लगा कर सबसे पूछा 'क्यों नहीं बनाई उत्तराखंड की राजधानी 'गैरसैंण' में, शराब और खनन से बरबाद कर रहे हो पहाड़ को, बच्चे बेरोजगार हैं, उनका रोजगार कहां गया, लोग बीमार हैं और तुम मजे कर रहे हो, शर्म नहीं आती तुम सबको और भी साब भौत भौंकुछ (कुछभी) बोला उस देवता ने.
साब, उस दौरान सारा सरकारी अमला हकड़क (स्तब्ध) हो गया. क्या जो करें, उस समय तो वो बच्चा देवता हुआ, उसे रोक भी नहीं सकते थे. बड़ी मुश्किल से धूप-पिठाई देकर उस देवता को शांत किया गया'.
'बाद में मुख्यमंत्री तिवाड़ी जी ने क्या कहा'? अजय ने पूछा.
'अरे साब, नारायण दत्त तिवारी जी हुए वो बहुत होशियार, पूरे टैम उस देवता की ओर नतमस्तक रहे और कहते रहे 'सब्ब है जलि, सब्ब है जलि, (सब हो जायेगा, सब हो जायेगा).
पीठसैंण से अब सड़क ढ़लान पर हो गयी है. पूर्वी नयार के इस पार (किनारे) वाले क्षेत्र के 80 गांव चौथान पट्टी में शामिल हैं. चार गाड़ों (छोटी नदी) का सम्मलित भू-भाग चौथान कहलाया. ये गाड़ हैं मासों गाड़, अंगगाड़, बसौली गाड़ और डड़ौली गाड़. चौथान क्षेत्र जड़ीबूटी और चारागाहों के लिए प्रसिद्ध है. जड़ीबूटी संग्रहण और दूध उत्पादन में यह इलाका अग्रणी है.
चन्द्रसिंह 'गढवाली' जी के पुस्तैनी गांव मासों पीठसैंण से 10 किमी. पर है. चौथान पट्टी के रौणींसेरा मासों गांव में जाथली सिंह भण्डारी के घर 25 दिसम्बर, 1891 को चन्द्रसिंह का जन्म हुआ था. वे नजदीकी स्कूल बूगींधार से प्राइमरी में पढ़ने के बाद घर से भागकर गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे. अब उनके परिवार का तो कोई गांव में रहता नहीं है.
लिहाजा, पास के ही गांव की दिक्खा देवी जो भागवत कथा सुनने की जल्दी में है से चलते-चलते बात होती है. वे बताती हैं कि मासों भण्डारियों का गांव है. खेती सिंचित और ऊपजाऊ है इसीलिए चारों ओर आबाद खेत नजर आते हैं. गांव के ऊपरी छोर पर बांज-बुरांस का घना जंगल है. आलू बहुत होता है. गढ़वाली जी के पैतृक घर के पास ही गुलबहार का मोटा ताजा पेड है जिसे गढ़वाली जी कोटद्वार से लाकर लगाया था. बताया गया कि उत्तराखंड में चकबंदी के शुरुवाती प्रयास मासों ग्राम में भी हुए थे. आज तो उत्तराखंड में चकबंदी का चक्रचाल बस बातों में ही सांसे ले रहा है.
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मासों से जगतपुरी है 8 किलोमीटर यहां से हमें मेन सड़क छोड़कर देघाट वाली सड़क की ओर जाना है. मेरा मानना है कि जहां पर दो सड़कें जुड़ रही हो वहां पर अपनी मंजिल वाली सड़क की पुख्ता जानकारी लेने में ही अक्लमंदी होती है. और जब अक्ल का इस्तेमाल करोगे तो परेशानी होगी ही. परेशानी यह है कि थोड़ा आगे आने के बाद मैंने कहा चलो किसी से पूछ लेते हैं कि हम सही सड़क पर चल रहे हैं की नहीं. तुरंत ललित ने कहा कि गाड़ी से उतर कर ये नेक काम आप ही कर लीजिए क्योंकि बताने वाले तो दुकानों के अन्दर हैं. 'चल खुसरो, पूछ आते हैं' के भाव से एक सज्जन से पूछा तो उसने छूटते ही कहा- आप सामने के बोर्ड में देघाट का ऐरो नहीं देख रहे हैं क्या?
ओह, सचमुच, खिसयाया सा मैं अब अपनी गाड़ी में थोड़ी देर में जाना चाहता था. सोचा और क्या जो पूंछू इनसे, मुहं से निकला 'वाह ! भाई सहाब, जगतपुरी के सारे घर नये और चमचमाते हैं. बड़ा खूबसूरत गांव है यह.
हां भाई सहाब 'नई बसावत वाला गांव है यह. हमारे दादा जी का नाम था 'जगत सिंह' उन्होने सबसे पहले यहां पर घर बनाया और रास्ते में बड़ा सा लिख दिया 'जगतपुरी'. बस, पहले लोगों ने मजाक में इस जगह को 'जगतपुरी' कहा अब नाम ही पड़ गया 'जगतपुरी'.
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मैने कहा 'भाई अगर उनका नाम जगन्नाथ होता तो जगन्नाथपुरी हो जाती ये जगह'. उस पर क्या प्रतिक्रिया हुई ये देखे बगैर मैं तेजी से अपनी गाड़ी में बैठते ही बोला, चलो हम ठीक रास्ते पर हैं.
'जगतपुरी से आगे 5 किमी. के बाद देघाट के लिए एक शार्टकट है, उसमें 2 किमी. की सड़क कच्ची है लेकिन उसके बाद तो सड़क पर गाड़ी सायं-सायं करती आगे बढ़ती है, ऐसा पीठसैंण में किसी मार्गदर्शक ने बताया था.
यात्रा में शार्टकट का लालच तो होता ही है. 'उसी सड़क से चलो चलते हैं' की राय के बाद चलती गाड़ी में हिचकोले खाना जो शुरू हुआ वो पाठक बन्धुओं 10 किमी. तक जारी रहा. मुश्किल ये कि पीछे भी नहीं जा सकते. सड़क के ऊपर की ओर चट्टान जैसे बड़े-बड़े पत्थर ऐसे लगते कि बस, सड़क पर जैसे लुड़कने के समय के लिए हमारे आने का ही इंतजार कर रहे हों.
सीताराम बहुगुणा का ये विचार कि सरकार को नदी किनारे खनन कार्य कराने के बजाय सड़क के आस-पास के चट्टानी पत्थरों को तोड़ने की इजाजत दी जानी चाहिए. इन पत्थरों का कहीं कोई उपयोग तो होता नजर आता नहीं. विचार तो विचारणीय है पर फिलहाल समस्या यह है कि इन चट्टानी पत्थरों के आस-पास तक कोई गांव तो क्या आदमी भी नजर नहीं आ रहा है. हां, पहली बार इस ओर बंदरों के उछलते-कूदते झुंड जरूर हैं. मुसीबत में जब आदमी होता है तो उसको दूसरे सभी उस पर हंसते हुए नजर आते हैं. चाहे वो जानवर ही क्यों न हो. ऐसी हालात में बंदरों को भी मैं इसी नजर से खुश देख रहा हूं.
संयोग यह कि गाड़ी मित्र सीताराम चला रहे हैं और मैं किसी अनहोनी से बचने और माहौल को हल्का करने के लिए सीताराम-सीताराम जपने लगा हूं. अजय सबसे छोटा है लिहाजा बार-बार सड़क के पत्थरों को हटाने का जिम्मा उसी का है. ललित ने कहा कि ये बात समझ में नहीं आती कि लोग अक्सर अच्छी खासी लम्बी दूरी को भी यहीं पर बस एक लतड़ाग (कदम) क्यों जो कहते होंगे?
यही तो आनंद है जीवन का, वरना फिर नपी-तुली जिन्दगी तो केवल चलने वाली हुयी जीवंत जीने वाली ज़िन्दगी तो ऐसी ही ऊबड़-खाबड़ होती है. मैने जो ये कहा- तो फिर जाओ गाड़ी के आगे की सड़क के पत्थर उठाओ, जीवंत जिदंगी जीने के लिए. ललित ने मुस्कराते हुए आदेश दिया है.
(Chandra Singh Garhwali Village Travelogue)
वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी अरुण कुकसाल का यह लेख उनकी अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.
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e5c1ed6b46885980fbbe66513c1ff92308d26fbc7293d135d912c79c69812b30 | pdf | चम्पका लु- चम्पा
"सतो गच्छत राजेन्द्र चम्पकारण्य मुत्तमम् । सवोष्य बजनीमेकां गोमहसफल लभेत् ।" (मशरम वन ८४५० इसका वर्तमान नाम चम्पारण्य है । चम्पकालु ( मं० पु० ) चम्पकेन पनमावयव विशेषेण अलति . चम्पक अल. उग । पनम, कटहल ।
चम्पकावतो (सं० स्त्री० ) चम्पक अस्त्यर्थे मतुप्, मस्य वः संज्ञायां दोघं : । चम्पापुरो । चम्पादेखो।
चम्पकुन्द ( सं० पु० ) चम्पइव कुन्दते कुदि-अच् । मस्यविशेष, एक तरहको मछली । इसका गुण - गुरु, शुक्र वर्द्धक, मधुर और वातपित्तनाशक है ।
चम्पकोल ( सं० पु० ) पनसवृक्ष, कटहलका पेड़ । चम्पकोष (मं० पु०) चम्पञ्चम्पक इव कोषो वस्य, बहुव्री० । पनम, कटहलका पेड़ ।
चम्पतराय -- एक विख्यात बुन्देला मर्दार, छत्रसालके पिता । १७वीं शताब्दी में इन्होंने सैन्य दलको साथ ले मुसलमानोंको परास्त कर वेत्रवती नदीतीरवर्ती समु दाय भूभाग अधिकार किया था ।
लाल कविके बनाये हुए छत्रप्रकाश नामक हिन्दी ग्रन्थ में इनका यथेष्ट परिचय है । करुसाल देखो। चम्पा (हिं० स्त्री० ) चम्पक देख ।
चम्पा ( मं० स्त्रो० ) चम्पा नदी अस्ति अस्याम्, चम्पा अर्श आदित्वात् अच् । अथवा चम्पन रात्र हरिश्चन्द्रस्य प्रपो त्रेण निर्मिता या पुरी । १ गङ्गातीरस्थ अङ्ग राज्यको राज धानो। महाभारत और पुराणमें चम्पा, चम्पापुरी प्रभृति नामोंसे उसका उल्लेख है । हेमचन्द्रने सालिनी, लोमपादपू श्रोर कापू आदि चम्पाके कई एक पर्याय लिखे हैं। वर्तमान भागलपुरके निकट ही वह नगर रहा। विख्यात चीनपर्यटक युएनचुयाङ्ग चम्पाका ऐसा विवरण लिख गये हैं - चम्पा एक विस्तृत प्रदेश है। इसको राजधानो चम्पानगर उत्तरभाग में गङ्गाके तौर अवस्थित है । यह प्रदेश समतल तथा उर्वर है और सुचारुरूपसे कर्षित हुआ करता है। वायु मृदु और ईषदुष्ण है। अधिवासी सरल और सत्यवादो हैं। यहाँ बहुतसे जीर्ण सङ्घाराम हैं। इन सब मठों में प्रायः २०० बौद्ध यति रहते हैं। यह होनयान मतावलम्बी हैं। इसमें कोई २० देवमन्दिर हैं। राजधानीका चतुर्दिकस्य प्राचीर इष्टक
निर्मित, अत्यच्च और शत्रुगणको दुराक्रम्य है। कहते हैं, उसी कल्पके आरम्भ में जब मनुष्य प्रभृतिको प्रथम सृष्टि हुई, एक अप्सरा किमो अपराधसे स्वर्गच्युत हो मय में आ करके बमो थी। फिर किसी देवर्क और और इसी अमराके गभसे ४ पुत्र हुए। इन्हीं पुत्रोंने जम्बुद्दीपको चार में बांट लिया और प्रत्यकने अपने अपने अंश में राज्य स्थापन किया। उन्होंमें एक चम्पानगरके स्थापयिता थे । इस नगरसे पूर्व थोड़ी दूरको गङ्गाके दक्षिण तोर पर एक पहाड़ और तदुपरि एक देवमन्दिर है। इस मन्दिर के देवता प्रत्यक्ष हैं और अनेक अलौकिक घटना प्रदर्शन करते हैं । पहाड़को काट करके मन्दिर आदि निर्मित हुए हैं । इस पहाड़ और उसके गुहा प्रभृति देखनेको बहुतमे ज्ञानी आया करते हैं। इस प्रदेश के दक्षिणांश में अरण्य है। बोच बीच हाथो और अन्यान्य वन्य जन्तु दलके दल घूमते हैं । ( Si-yu-ki )
भागवतादिके मतमें हरितपुत्र चम्पने अपने नाम पर चम्पानगरी बनायो । चम्प देखो ।
२ पूर्व उपद्दीपका एक अति प्राचीन राज्य । वर्तमान आनाम और कम्बोडिया अर्थात् कम्बोजके दक्षिणांश में यह राज्य अवस्थित था । अद्यापि उस स्थान के घोड़े अंशको चम्पा कहते हैं । इस देश के अधिवामी चम् ( चम्प् ) नामसे ख्यात हैं। प्रवाद है - कम्बोजोंके आने से पहले यह किसो समय श्याम उपसागरसे समस्त उपद्दो पर्मे व्यास हो करके वास करते थे । पहले वह मब हिन्दू धर्मावलम्बी थे। अनुमान होता है कि गातोरवर्ती चम्पानगर के अनुकरण पर उसका नामकरण हुआ होगा। सृष्टीय म शताब्दको पार्थक्य दिखलाने के लिये इसको महाचम्पा कहते थे । चोना पर्यटक युएनचुयाङ्गने कम्बोडियाको चम्पाको महाचम्पा और गङ्गतोरवर्ती चम्पानगरको चम्पा जैसा ही ( चेन्पो ) लिखा है ।
आनामवासियोंके आक्रमण करने से पहले यह राज्य प्रबल पराक्रान्त हिन्दू राजा कर्तृक शामित होता था । उस समय इसको सोम श्याम ओर आनाम में बहुत दूर तक विस्तृत थो ।
आगामी भाषामें चम्पा के लोगोंको लुई कहते हैं। यह बराबर हिन्दू मतावलम्बी रहे । इनको उपासना
प्रभृति बोड़ों और जैनों जैसी है। यहां भी हर, पार्वती आदिको पूजा होती है। कितने ही वर्ष पहले वहां कई एक प्राचीन शिलालिपि और अनुशासन प्रभृति मिले थे। इनका अधिकांश संस्कृत किंवा चम् भाषामें लिखित है । सबको पढ़नेसे समझ पड़ता है कि वहां पहले पराक्रान्त हिन्दू राजा राजत्व करते थे। उन्होंने स्व व नामानुसार इस प्रदेशमें जयहरिलिङ्गेश्वर, श्रीजयहरिवर्मलिङ्गेश्वर, श्रोइन्द्रवर्मशिवलिङ्गेश्वर प्रभृति शिवलिङ्गोको प्रतिष्ठा की थी। इनमें संस्कृतभाषाको लिखी लिपिडां अति प्राचीन हैं ।
चम्पा - काश्मोरका सीमान्त प्रदेश । इसको राजधानीको ब्रह्मपुर कहते हैं । १०२८ से १०३१ ई० के बीच काश्मीरराज अनन्तदेवने उक्त राज्यको आक्रमण किया था । शालदेव नामक चम्पाराज इनके हाथों निहत हुए । फिर उनके पुत्रम चम्पावती नामक एक नगर स्थापन किया। वही चम्पा आजकल चम्बा नामसे प्रसिद्ध है। राबी वा इरावती नदी द्वारा वह नगर दो भागोंमें बंटा हुआ है । चम्बा देखो
चम्पा--मध्यप्रदेशके विलासपुर जिलेकी एक जमीन्दारो । इसका परिमाण १२० वर्गमील है । यहाँ कोई ६५ ग्राम और ६३७७ घर होंगे। चंपाके जमीन्दारको कुमार कहते हैं। मदरका नाम भी चम्पा ही है । इस शहर में बहुत से जुलाहे रहते हैं। उनके बनाये हुए वस्त्रादि पास हो वामनोडिहोके बाजार में बिकते हैं।
चम्पा (मं० स्त्री०) १ नदीविशेष । आजकल इसको चम्पई कहते हैं । २ पनसका कोई अवयव । चम्पाकली (हिं ० स्त्री० ) स्त्रियोंका एक गहना जो गलेमें पहना जाता है। इसमें चम्पाको कलोके आकार के सोनेके दाने रशमके तागेमें गुंथे रहते हैं । चम्पाधिप ( सं० पु० ) चम्पाया अधिपः, ६-तत् । कर्ण । का देखो। चम्पानगर - भागलपुरके पश्चिम भागका एक ग्राम । यहां बहुतमे मुसलमान संन्यासियोंकी कब्र हैं। यहां भागलपुरके ओसवाल जैनियोंके पुरोहित रहते हैं। यहां तसर, रेशम, सन आदि कपड़ोंकी आढ़त है। चम्पापुरी देखो । चम्पानेर - बम्बई प्रदेशस्थ पञ्चमहल जिलेके कालोल
ताल्लुकका एक प्राचीन ध्वस्त नगर । यह अक्षा० २२२६ उ० और देश॰ ७३॰ ३२ पू० में बड़ोदामे २५ मील उत्तर अवस्थित है। यहां बड़ोदा-गोदरा रेलवेका ष्टेशन बना है । १४८३ ई० की जब महमूद बेगर पावागढ़ घेरे थे, वहाँ पहली मुसलमानो इमारत खडी को गयो। उन्होंने एक उम्दा ममजिदको नींव भी डालो । १४८४ ई० को दुर्ग मुसलमानों के हाथ लगा और राजपूतोंने छोटे उदयपुर और देवगढ़ वारियाको पलायन किया। महमूद बेगरने पहाड़के नीचे एक भव्य नगर खड़ा कर दिया और अहमदाबाद से अपने मन्त्रियों और सभासटोंकोला इसको राजधानी बना लिया। उन्होंने नगरका नाम महमूदा बाद चम्पानेर रखा था। यह बहुत जल्द बढ़ा और खूब रोजगार चला । चम्पानेरका रेशमी कपड़ा और तलवारें मशहूर थीं । लगे हुए पहाड़ों में लोहा मिलता था। किन्तु १५३५ ई० को हमाय ने उसे ल ट लिया और सुलतान बहादुर शाहके मरने पर राजधानो और अदालत अह मदाबाद चली गयी । ई० १७वीं शताब्दी के आरम्भसे इसकी इमारतें गिरने लगीं और जङ्गल बढ़ने लगा। १८०३ ई० को जब अंगरेजांका वहाँ अधिकार हुषा, केवल ५०० अधिवासो मिले थे ।
चम्पानेरका किला प्रायः १४२० गज लम्बा और ६६० गज चौड़ा है। यह दो भागों में बंटा हुआ है । एक भाग अत्य च है जिसमें प्रसिद्ध कालिका देवोका मन्दिर है । अपरार्ध अपेक्षाकृत अवनत होते भी दुराक्रम्य है। यहां अति प्राचीन कालके हिन्दू देवदेवीमन्दिर दृष्ट होते हैं। दुर्ग के दक्षिण-पूर्व पहाड़से घिरा हुआ एक बड़ा गहरा होज है जिसमें चारों ओर पत्थरको सिड्डियां लगी हैं । चम्पापुरी - जैनोंका एक तीर्थ स्थान । यह भागलपुर जिलेके अन्तर्गत नाथनगरके पास अवस्थित है। यहांसे जैनोंके बारहवें तीर्थ वर वासुपूज्य भगवान् मोक्ष गये हैं। यहां एक दिगम्बरोंका तथा ४ श्वेताम्बरियोंके मन्दिर हैं । पहिले ये मन्दिर दिगम्बर और वं ताम्बर दोनोंके कक्ष में थे. पर कुछ दिनोंसे वे ब ताम्बरीके काबूमें हैं। यहां एक छोटासा पहाड़ भी है, उसके ऊपर अनेक प्राचीन प्रतिमायुक्त दिगम्बर जैन मन्दिर है, जिसको लोग मन्दार गिरि कहते हैं ।
चम्पारण्य - प्राचीनकालका एक जंगल ।
शायद पहले
यह वहां हो, जिसे आजकल चम्पारन कहते हैं । चम्पारन - विहार प्रान्तका एक जिला । यह अता० २६' १६' तथा २७° ३१ उ० और देशा० ८३.५० एवं ८५ १८ पू० के मध्य अवस्थित है। इसका क्षेत्रफल ३५३१ वर्गमौल है। यह गण्डक नदीके वाम तट पर १०० मोल तक विस्तृत है। इसके उत्तर नेपाल, पश्चिम गण्डक और पूर्व तथा दक्षिणको मुजफफरपुर है । सोमेश्वर पर्वत जङ्गलसे हरा भरा रहता है। पूर्व सोमा पर कुदी नदी प्रवेश करती जिसमें नेपाल में देवघाटको राह निकलती है। इस सङ्गट मार्ग से १८१५ ई० को अंगरेज फौज नेपाल पर चढ़ी थो। जूरीपानो नदी पर सोमेश्वर पर्वतका दृश्य अत्यन्त मनोहर है। उत्तरको जङ्गल लगा है। इसमें अच्छी से अच्छी लकड़ी होती है। हरे भरे मैदानों में बहुत से मवेशी चरा करते हैं। उत्तरको भूमि कड़ी और शीतकाल में उत्पन्न होनेवाले चावलके लायक है। दक्षिण की ओर हलकी जमीन है। उसमें ज्वार बाजरा, दाल, अनाज और तेलहन होता है । गण्डक, बूढ़ी गण्डक, बाघमती आदि इसकी नदियाँ हैं । ४३ झोल जिलेके बीचसे निकले हैं। पहले यहाँ गण्डक और बाघमतीकी बड़ी बाढ़ आती थी । परन्तु अब मर कारने उन पर बांध बंधा दिये हैं ।
प्राचीन समयको चम्पारन जिलेमें बड़ा जङ्गल रहा । ब्राह्मण वहां प्रारण्यक पदा करते थे । कहते हैं कि सुप्रसिद्ध वाल्मोकि ऋषि संग्रामपुर के पास रहते थे । राम और लवकुश में युद्ध होने के कारण हो उस स्थानका यह नाम पड़ा। यह जिला मिथिला राज्यका अन्तभुक्त रहा । लोरिया-नन्दनगढ़ ग्रामके निकट ३ प्रकाण्ड सूच्यग्र प्रस्तर श्रेणियां विद्यमान हैं । जैनग्ल कनिङ्ग हमके अनुमानमें वह ई०से १००० वर्ष पूर्वको राजाओं के समाधिस्थान जैसे बनाये गये थे। यहां अलेकसन्दरके भारत आने से पहले की एक रौप्यमुद्रा और गुप्त राजाओंके समयका अक्षराङ्गित मृत्तिकानिर्मित द्रव्य मिला है इसो स्थानके निकट अशोकप्रतिष्ठित ३३ फुट ऊंचा एक अखण्ड प्रस्तरस्तम्भ है। उसमें बुद्धको आदेशावली लिखी हुई है। अरराज ग्राम में अपेक्षाकृत क्षुद्र एक स्तम्भ है । Vol. VII. 53
केसरिया नामक स्थानमें भी इष्टकनिर्मित एक प्रकाण्ड चतुष्कोण वेटो पर ६२ फुट ऊंचा और ६८ फुट व्यासका एक पक्का खम्भा है। पुराविद कनिङ्गहाम अनुमान करते हैं, वह बुद्धदेवके किसी कार्यका स्मृतिचित्र जैसा प्रतिष्ठित हुआ होगा। इसीके पास बुडदेवकी मूर्तिका भग्नावशेष मिलता है। बौद्धधर्मका ह्रास होने पर किसी पराकान्त हिन्दू राजवंशने मम्भवतः १०८७ से १३२२ ई० तक नेपालके मिमरोनमें राजत्व किया । वहां आज भी इसका बहुतमा ध्व मावशेष विद्यमान है। नान्यदेवने उस को प्रतिष्ठित किया था। फिर इनके वंशकं ६ राजा हुए। अन्तिम राजाको हरिसिंह देवने जोता था, जिन्हें अवधसे मुसलमानोंने निकाल दिया। १९८७ ई० को मुहम्मद बखतियार खिलजीने चम्पारन अधिकार किया। परन्तु मुसलमानक समय चम्पारन सरकार वर्तमान चम्पारन जिले से बहुत लोटी थी । अकबरके राजस्व सचिव टोडरमलने लिखा है कि १५८२ ई० को वह तीन परगनोंमें बांटा था । इसका क्षेत्रफल ८५१११ बौघा था । १७६५ ई० को जब यह इष्ट इण्डिया कम्पनीके अधिकारभुक्ता हुआ, तब यहांका राजस्व २ लाख रुपये कायम किया गया, किन्तु उसके बाद धीरे धीरे घटता गया। कई वर्षकं बाद अर्थात् ई० १७६३ में इस जिलेका राजस्व ३९८६ लाख रुपये सदा के लिये नियत कर दिया गया और १८६६ ई० तक सारन जिले में लगता रहा। १८५७ ई० को प्रधान घटना मगौलो किलको फौजका विद्रोह था । इस जिले में पुलिस स्टेशन और १४ आउट पोस्ट (Out-post) हैं, जिनमें जिला सुपरिंटेण्ड एट २ इन्स पेकर, ३५ मब इन्सपेकर, २४ हेड कोन्सटेबल, ३२३ कोन्सटेबल और ४८ शहरके चौकीदार रहते हैं । जिलेका कारागार मोतीहारीमें है, जिसमें ३५६ कैदी रखे जाते हैं और वहां एक कोतघर भी है। इसके सिवा यहां ७ अस्पताल हैं, जिनमें वार्षिक व्यय २४०००) रु० और आाथ ३१०००) रु० की है। आय ७००) ८० सरकारमे ४०००, रु० म्युनिसिपलटोसे और ) रु० चन्दासे संग्रह किया जाता है ।
अधि. यहांको जनसंख्या प्रायः १७१०४६३ है। वासियों में अधिकांश अहोर और चमार हैं, जिनको |
40799ee04ad9c47821245e4d5b8a2244adbba2c9 | web | घरेलू iconostasis वफादार रूढ़िवादी ईसाई के लिए एक छोटे से चर्च का एक प्रकार प्रतिनिधित्व करते हैं। घर में वे एक विशेष जगह है जहाँ आप चुपचाप छवियों से पहले प्रार्थना कर सकते हैं करने के लिए आवंटित किया जाना चाहिए।
घरेलू iconostasis प्राचीन रूस में दिखाई दिया। उनके लिए यह एक कोने, लाल बुलाया (अर्थात सुंदर) आवंटित किया गया था। इस जगह में, आइकन को रखा गया था मोमबत्ती और लैंप जलाया। सुबह और, साथ ही घरेलू घड़ियों की विशेष आध्यात्मिक आवश्यकताओं में शाम यहां उनकी प्रार्थना कहा।
छोटे पर्दे कि संतों की और पक्षों पर उद्धारकर्ता की छवियों बंद कर देता है - समय की iconostasis एक बहु-स्तरीय शेल्फ जिस पर bozhnik लटका दिया था। एक विशेष कपड़ा है कि केवल प्रार्थना के दौरान खींचती है - माउस blagovestkoy के नीचे छिपा कर रहे थे। इस परंपरा संयोग से रूस में दिखाई दिया। यह ज्ञात है कि उद्धारकर्ता की पहली छवि, उसे द्वारा बनाई किया जाएगा भगवान की उनकी इच्छा से यीशु पानी से चेहरा छिड़का और कैनवास पर अपने ubrus (कपड़ा) का सफाया करने के बाद उसके मुंह था। यह चित्र वह दर्द राज्यपाल भेजा एशिया माइनर के - Abgar, तो वह चंगा। उसके बाद, राजकुमार शहर के पवित्र द्वारों के ऊपर बोर्ड कील करने का आदेश दिया। बाद पवित्र छवि के 900 साल कांस्टेंटिनोपल में स्थानांतरित किया गया। अब, हर साल अगस्त 29 रूढ़िवादी पर उद्धारकर्ता की छवि के अधिग्रहण, और पवित्रा हाथ बुना कपड़ा मनाते हैं।
छवियों के लिए शेल्फ पर निपटान क्या है?
उस समय की घरेलू iconostasis भी पवित्र जल और पवित्र रोटी पकड़ करने का इरादा कर रहे थे। परिवारों bozhnikom सुसमाचार और pomyannik (विशेष किताबें, जो सभी मृत के नाम और रूढ़िवादी के परिवार के रहने वाले रखा) के पीछे छिपे रहते हैं। विशेष रूप से निपुण needlewoman हाथ में माल की (पवित्र आत्मा के प्रतीक के रूप) कबूतरों बनाया है और iconostasis करने के लिए उन्हें काट दिया। लाल कोने में यह लैंप और मोमबत्ती है कि एक घर सेवा के दौरान जलाया गया की उपस्थिति रहा होगा।
इस तरह के एक छोटा सा मंदिर 1917 की क्रांति तक हर रूढ़िवादी घर में था। बोल्शेविक के सत्ता में आने के बाद, लोगों को प्रार्थना करने के लिए जारी रखा, लेकिन गुप्त रूप से वैसा ही किया। इसलिए, अलंकृत घर iconostasis से केवल कुछ ही छवियों है कि लोगों को ध्यान से आँखों prying से छिपा हुआ, उत्पीड़न के डर से थे। के रूप में इसके निर्माण की परंपराओं के कई बस भूल गया है आधुनिक लाल कोने में, हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई एक से थोड़ा अलग है।
क्या घर iconostasis हो जाएगा, यह केवल घर के मालिकों पर निर्भर करता है। हालांकि, निम्नलिखित नियमों का पालन करने के लिए मत भूलनाः
- दुनिया की बातें, बेहतर से दूर - पवित्र छवियों उपकरण (टीवी, कंप्यूटर, आदि) से दूर रखा जाना चाहिए।
- भक्तों को इससे पहले कि माउस के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए तंग महसूस नहीं किया था। और जब चर्च किताबें प्रार्थना (प्रार्थना पुस्तकों इंजील) सोफे ज्ञानतीठ (स्टैंड) पर बिछाने के लिए बेहतर है।
- तुम्हें पता है, अलमारियों पर एक के बाद प्रतीक एक, अलमारियाँ में व्यवस्था नहीं करना चाहिए, जबकि इन छवियों अन्य सांसारिक बातें कर रही हैः स्मृति चिन्ह, चित्र, आदि यह सख्ती से मना किया है, क्योंकि इस तरह हम परमेश्वर के लिए अनादर। सब के बाद, किसी कारण से, तस्वीरें लोगों और हमारे प्रियजनों, खासकर जो लोग इस दुनिया को छोड़ दिया है, कई, सबसे प्रमुख जगह पर हैं उन्हें अनावश्यक वस्तुओं के साथ अव्यवस्थित किए बिना प्यार करता था। यह आवश्यक है के रूप में पवित्र छवियों के लिए प्यार और सम्मान दिखा माउस के साथ कार्य करने के लिए।
यदि आप एक घर है, तो चित्रों कि बाइबिल कहानियों को प्रतिबिंबित की प्रतिकृतियां हैं, वे iconostasis पर नहीं रखा जाना चाहिए।
पवित्र छवि और पेंटिंग के बीच मुख्य अंतर - कि प्रतीक के माध्यम से पहले मामले में हम परमेश्वर के साथ संवाद है। और iconostasis के रूप में - एक पवित्र प्रार्थना में एकांत के लिए समर्पित जगह, प्रतिकृतियां के शामिल किए जाने के लिए बस उस में जगह से बाहर है।
प्रतीक हस्तियों के पोस्टर के बगल में दीवार पर लटका दिया नहीं जा सकता है - कि हम पवित्र छवियों विरोध करे, तो सांसारिक मूर्तियों के साथ एक सममूल्य पर उन्हें रखा जाता है।
घरेलू iconostasis बेहतर घर के पूर्वी भाग में रखा जाता है, के रूप में दुनिया के इस हिस्से कट्टरपंथियों में विशेष महत्व का है।
उदाहरण के लिए, यह पुराने नियम से जाना जाता है, भगवान ईडन के पूर्व में लोगों के लिए स्वर्ग बनाया। और इंजील में कहा गया है कि के रूप में बिजली पूर्व से पश्चिम तक आता है, और भगवान स्वर्ग से आ रहा है। चर्च वेदी भी पूर्वी भाग में स्थित है। अगर, हालांकि, खुले विंडो, घर iconostasis, एक तस्वीर जिसमें से आप इस लेख में मिलेगा के इस तरफ उसके लिए किसी अन्य उपयुक्त जगह पर सेट कर रहे हैं।
शेल्फ खरीद क्या है?
आप अपने हाथ, लकड़ी के बने या पूरी तरह से आप पर निर्भर उन्हें एक फर्नीचर की दुकान या एक चर्च बेंच में अधिग्रहण के साथ एक घर iconostasis पैदा करेगा। आप शेल्फ खरीदना चाहते हैं, विशेष दुकानों रूढ़िवादी में करते हैं। वहाँ उपलब्ध शास्त्र की एक व्यापक रेंज है, और विक्रेताओं हमेशा शीघ्र कर रहे हैं और चयन के साथ मदद करते हैं। सामग्री बरामद की लकड़ी और प्लाईवुड चिह्नों के लिए अलमारियों। वे एकल चरण और बहु-स्तरीय, सीधे और कोणीय हो सकता है। यहां तक कि पूरे iconostasis, जो पहले से ही पवित्र छवियों है। लेकिन इस तरह के अलमारियों मुख्य रूप से केवल क्रम में किया जाता है। यह समझने के लिए कि कैसे एक घर इस लेख में प्रस्तुत iconostasis तस्वीरें लग रहा है।
आप एक असली लाल कोने बनाने का निर्णय लेते हैं, तो खड़ी अलमारियों का चयन करें। वे इस तरह के मंदिरों में स्थापित उन लोगों के रूप संतों की छवियों, साथ राजसी दीवारों से बनाना बहुत आसान हो जाएगा। जहां यह (दीवार पर या कमरे के एक कोने में) रखा जाएगा पर निर्भर करता है एक कोने या एक सीधी रेखा - क्या अपने घर iconostasis हो जाएगा।
क्या माउस की जरूरत है?
सबसे पहले, हर घर उद्धारकर्ता, परमेश्वर की माँ और Nikolaya Chudotvortsa की छवियों होना चाहिए। प्रार्थना के लिए हमारे प्रभु के सभी प्रतीक के घर पर सर्वशक्तिमान की सबसे पसंदीदा कमर छवि है। इस पर iisus hristos के आइकन अपने बाएं हाथ एक खुली किताब में रखती है, जिसमें लिखा है, "एक नई आज्ञा मैं तुम्हें देः एक-दूसरे से प्यार है। " भगवान दाहिने हाथ प्रार्थना बप्तिस्मा देता है।
इस तरह के "कोमलता" और "Hodegetria" (Putevoditelnitsa) के रूप में रूसी लोग चिह्न का विशेष रूप से शौकीन ऑफ आवर लेडी की छवियों से। वर्जिन मैरी की पहली छवि उसकी बाहों, जो नम्रता से उसकी गर्दन को गले लगाती है और उसके गाल के खिलाफ लगाए में एक बच्चे को पकड़े हैं। इस प्रकार के सबसे प्रसिद्ध आइकन व्लादिमीर ऑफ आवर लेडी की छवि माना जाता है। एक सुस्पष्ट विशेषता तथ्य यह है कि बाईं एड़ी बच्चे पूरी तरह से निकला है। भगवान Hodegetria की माँ की छवि पर शिशु, जो उसके दाहिने हाथ में एक बंडल रखती है और बाईं सभी भक्तों हावी रहती है साथ दिखाया गया है पार की। इस छवि का एक अद्भुत उदाहरण कज़ान आइकन "Skoroposlushnitsa" कर रहे हैं "Sporuchnitsa Greshnykh"।
घर के iconostasis पर इन बुनियादी माउस के अलावा संतों, जो अपने परिवार के सदस्यों के सम्मान में नामित कर रहे हैं की छवियों को डाल करने के लिए आवश्यक है। मानसिक और शारीरिक बीमारियों के आरोग्य - यह भी एक आइकन आरोग्य Panteleimon प्राप्त करने के लिए वांछनीय है। अन्य छवियों का चयन घर की जरूरतों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, आप पीटर और Fevronia, जो परिवार भलाई के लिए प्रार्थना की छवि खरीद सकते हैं। इससे पहले कि Sergiya Radonezhskogo के आइकन सीखने और अच्छा उपक्रमों में मदद के लिए पूछ। अविवाहित महिलाओं पीटर्सबर्ग के Xenia, जो परमेश्वर की इच्छा शादी के कारोबार में लोगों की एक सहायक बन गया है की छवि से पहले प्रार्थना कर सकते हैं।
हाल के वर्षों में कई घरों केंद्रीय आइकन में से एक धन्य वर्ष महिलाओं मास्को की Matrona की छवि बन गई। यहां तक कि अपने सांसारिक मृत्यु के बाद, यह उन सभी जो Pokrovsky मंदिर या कब्र Danilovsky कब्रिस्तान में उसे करने के लिए आ में मदद करता है, या बस प्रार्थना कर घर पर मैट्रन को दर्शाता है। पहले से ही कई लोगों को उसकी चिकित्सा और मदद से प्राप्त हुआ है। कोई आश्चर्य नहीं कि उसने कहाः "मेरे पास आओ और मुझे बताओ कि जीने के लिए। " इस मैट्रन के तहत वह सूचित किया कि उसकी धरती पर मौत आध्यात्मिक के निधन मतलब यह नहीं हैः वह अभी भी हमारे साथ है।
बहुत महत्वपूर्ण उनके लिए आवंटित स्थान पर छवियों का उचित स्थान है। एक सूली पर चढ़ाया की iconostasis पर। यह चर्च की दुकान में खरीदा या लकड़ी के अपने खुद के बाहर बना जा सकता है। अगले स्तर पर सुविधाओं होली ट्रिनिटी का एक प्रतीक। नीचे शेल्फ पर उद्धारकर्ता, परमेश्वर की माँ और Nikolaya Chudotvortsa की छवियों रखा जाना चाहिए। भगवान की छवि, बीच में होना चाहिए दाहिने हाथ (दाएं) पर - वर्जिन मेरी और oshuyu (बाएं) - निकोलाई Ugodnik।
बस पवित्र परिवार श्रद्धेय डाल आइकन के ठीक नीचे। आखिरी मंजिल पर आप पवित्र जल, मोमबत्तियाँ, और सुसमाचार की एक बोतल रख सकते हैं।
एक घर को सजाने के iconostasis यरूशलेम में प्रभु के प्रवेश - यह ताजा फूल, महान दावत के बाद विलो की टहनियाँ हो सकता है। और Pentecost परमेश्वर की शक्ति की कृपा के प्रतीक के रूप सन्टी टहनियाँ फ्रेम छवियों के साथ अलमारियों के दिन।
माउस के लिए शेल्फ पर, आप भी छवियों के प्रजनन सेट कर सकते हैं। इससे पहले वे पवित्रता की जरूरत है, और फिर घर iconostasis को जोड़ा गया। मोती उन्हें क्योटो (एक फ्रेम) के लिए कढ़ाई, और फिर वे अन्य माउस के साथ सौहार्दपूर्ण दिखेगा।
आप छवियों के लिए एक स्टैंड, या मॉडल है कि आप मिले हैं के सभी खरीदने में असमर्थ हैं, तो आप पसंद करते हैं या उपयुक्त नहीं हैं (उदाहरण के लिए, स्तर की एक छोटी संख्या, सीमित स्थान, आदि . . ), अपने स्वयं के हाथों से iconostasis घर हैं, जिनमें से एक तस्वीर लेख में प्रस्तुत कर रहे हैं नहीं है आप अपनी खुद की कर सकते हैं। एक मानक तीन तलों वाला iconostasis के लिए, आप लकड़ी के तख्ते को, ड्रिल और शिकंजा की आवश्यकता होगी। आदेश में यह इकट्ठा करने के लिए के लिए, आप चित्र घर iconostasis बनाना होगा। उन पर आप आसानी से लकड़ी के पैनल है, जो iconostasis पर उपलब्ध आइकन की संख्या पर निर्भर करेगा के आयामों की गणना कर सकते हैं।
पवित्र छवियों के लिए सबसे बुनियादी स्टैंड प्लाईवुड के बनाया जा सकता है। पहले यह आकाशीय पदानुक्रम के अनुसार शिकंजा के साथ आइकन संलग्न करने के लिए आवश्यक है। एक विशेष वेतन, जो छवियों फंसाया है - उसके बाद आप माउस के लिए एक बागे बनाना चाहिए। यह कशीदाकारी कपड़े या माला और मोती से बनाया जा सकता। इस दे देंगे के प्रतीक के लिए शेल्फ उत्सव और पवित्र। यही कारण है कि कैसे आप अपने हाथों के साथ iconostasis घर बना सकते हैं। इस लेख में इसी तरह काम करता है की तस्वीरें इसकी सजावट में मदद मिलेगी।
इस प्रकार, एक छोटे से चर्च घर के निर्माण - न केवल अपने आध्यात्मिक आवेग और इच्छा के रूप में रूढ़िवादी ईसाई के जीवन का एक शर्त है। सब के बाद, लोगों का मानना है और भगवान से प्यार है, हमेशा प्रार्थना में और मरने के बाद में उसे चालू करने के लिए, और घर के कार्यालय में चाहता है। यह कोई फर्क नहीं पड़ता अपने iconostasis महंगा सामग्री के बने कि क्या कर रहा है और सोने का पानी चढ़ा छवियों के साथ कतार में खड़े हैं, या आप मैन्युअल रूप से इसे बनाया जाता है, पवित्र छवियों का संग्रह। मुख्य मूल्य - आपका विश्वास और आध्यात्मिक पूर्णता के लिए प्रतिबद्धता है।
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57f4a739c820d237c5429af45dd00b1653a535205c4d685d7b9bf0109e04fd2d | pdf | सत्य और सत् कोनों को ही पूर्णता का अंततोगत्वा एक ही स्वरूप है । उसमें सुनिश्चित स्वाश्रित व्यष्टित्व होता है । सत्य में आन्तरिक समन्वय अवथा व्याप्ति और सर्वसमावेश के लक्षल अवश्य ही प्रकट होने चाहिए, और ये दोनो विशेषताएं एक ही सिद्धांत के दो भिन्न-भिन्न पक्ष हैं । प्रथम जो स्वयं विरोधी है वह खटकता है क्योंकि उसके भीतर निहित परिपूर्णता अपने अंगों के बीच संघर्ष उत्पन्न कर देती है और इन संघर्ष को आमंत्रित करने वाले अपने संदर्भों से वियुक्त तत्वों के बीच समन्वय स्थापित करने का उपाय यह है कि इन असंगतियों को एक विस्तृत व्यवस्था में पुनः फैला दिया जाय । परन्तु दूसरी ओर समन्वय, नियंत्रण और सोमितता में मेल नहीं खाता, क्योंकि जो वस्तु सर्वव्यापी नहीं है उसमें तत्वतः आन्तरिक असंगति होगी।
सत्ता को प्राप्त करने के प्रयास में तत्व वृद्धि के द्वारा एक ऐसा स्थायी व्यष्टित्व में रूपांतरित हो जाता है कि उसमें उसका अपना निजी स्वभाव समाहित हो जाता है, वह अन्य शब्दों में एक ऐसी पूर्ण इकाई में परिणत हो जाता है जिसमें संपूर्ण वसंगतियों का अन्त हो जाता है और एक व्यवस्था (system) स्थापित हो जाती है । व्रडले के शब्दों में
"इस प्रकार प्रसार और समन्वय के दो पक्ष सिद्धान्ततः एक ही हो जाते हैं, यद्यपि हमारे काम के लिये टे कुछ अंश तक पृथक्-पृथक् हो जाते हैं, और अभी हमें उनको अलग-अलग समझने में ही संतोष करना चाहिये १२
1: "Truth must exhibit the mark of internal harmony, or again, the mark of expansion and all inclusiveness. And these two characteristics are diverse aspects of a single principle. That which contradicts itself in the first place, jars, because the whole, immanent within it drives its parts into collision, And the way to find harmony, as we have seen, is to redistribute these discrepancies in a wider arrangement. But in the second place, harmony is incom patible with restriction and finitude."
- Appearance and Reality, pp.. 321-22. 2. "The two aspects of extension and harmony, are thus in principle one, though ( ) for our practice they in some degree fall apart. And we must be content, for the present, to use them independently." -- Ibid., Page 322.
सत्य और सत् को मात्राएं
पुनः अपने विचारों को इस प्रश्न पर एक अन्य कोण से विकसित करते हुये वे कहते हैं : न्यूनाधिक मात्रा में सत्य एवं वास्तविक होने का अर्थ है किसी छोटे अथवा बड़े अंतराल के द्वारा सर्वसमष्टि अथवा स्वयं सिद्धि की अवस्था से पृथक् होना । उदाहरणार्थ डले कहते हैं : दो प्रस्तुत भाभासों में .एक जो अधिक विस्तृत अथवा समन्वयशील है, वह अधिक वास्तविक है ।"
इन आभासों की अपूर्णताओं की समाप्ति एवं परिपूर्ण सत् में उनके रूपांतरण एवं अवस्थिति हेतु परिवर्तन अपेक्षित है । जिस अनुपात में इन आभासों में कम अथवा अधिक परिवर्तन की अपेक्षा होगी उस अनुपात में हो वह आभासों की श्रेणी में उच्च होगा। इसीको दूसरे प्रकार से प्रस्तुत करते हुये कहा जा सकता है कि सत्य में सत् की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें परिवर्तन के बाद कितना अपना अंश शेष रह जाता है या जो कुछ भी अपरिवर्तित रह जाता है, वही उसमें पूर्ण सत् है । अपने आशय को पुनः स्पष्ट करते हुये व्रडले कहते है कि सत्य की मात्राओं से हमारा तात्पर्य यही है कि जो सत्य, अथवा तथ्य परम सत् में रूपान्तरित होने के लिए पुनर्व्यवस्था एवं वृद्धि की जितनी कम अपेक्षा रखता है, वह उतना ही अधिक वास्तविक और सत्य है ।
असत्य आमास की सत्य में परिणति :
पूर्व कथनों के अतिरिक्त व्रडले के अनुसार यह भी सम्भव है कि पूर्णता एवं पुनर्व्यवस्था द्वारा असत्य आभास भी सत्य में रूपान्तरित हो जाय तभी उन्होंने पूर्ण मूल और पूर्ण त्रुटि के प्रत्यय का भी खण्डन किया है । व्यावहारिक दृष्टि से ये प्रत्यय महत्वपूर्ण हो सकते हैं परन्तु तात्विक दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं है। पूर्ण त्रुटि अथवा किसी ऐसे तथ्य की, जिसमें सम्पूर्ण सत् में परिवर्तित होकर समाहित होने की सामर्थ्य हो, कल्पना नहीं की जा सकती । ऐसा कोई भी तथ्य नहीं जिसमें परम सत् में रूपान्तरित होने को क्षमता हो न हो । उसमें कम से कम न्यूनतम सत् अवश्य हो होगा, जो विकसित होकर परिपूर्ण सत् में परिणत हो सके। इस सम्बन्ध में ब्रेडले कहते हैं । "कोई त्रुटि केवल उसी अर्थ में पूर्ण हो सकती है, जबकि सत्य
1. "Of two given appearanccs the one more wide, or more harmonious it more real - Ibid., PP. 322-23.
रूप में परिणत होने पर उसका विशेष रूप पूर्णतः बिलुप्त हो जाय और उसको वास्तविक सत्ता नष्ट हो जाय ।" १
परन्तु यह कथन सत्य के निम्नतर प्रकारों पर भी लागू होना चाहिए क्योंकि तत्वमीमांसीय दृष्टि से सत्य और असत्य के बीच कोई निश्चित भेदभाव नहीं हो सकता । सभी आभासों के बारे में यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि आन्तरिक सत् में उनकी परिणति स्वीकार कर लेने पर उनमें शेष क्या रह जायगा ? व्रडले का उत्तर है कि प्रत्येक अवस्था में अवशेष की मात्रा से ही सत्य की मात्रा और सत् का निर्धारण होता है ।
मात्राओं के आधार पर आभासों का क्रम निर्देशन :
मात्राओं के आधार पर जगत के सभी नाभासों को एक श्रेणी के तारतम्य में क्रमबद्ध किया जा सकता है। यद्यपि ब्रेडले के अनुसार यह कार्य साधारण नहीं तथापि तत्व शास्त्र को आभासों में मात्राओं के आधार पर क्रम निर्देशन करना चाहिये । अतः व्रडले ने क्रम निर्देशन हेतु कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है, जो निम्नलिखित है :
जो भाभास अनुभव का क्षेत्र सत्य है ।
अधिक घेरते हैं, वे अधिक
अपेक्षाकृत अधिक स्थायी है अथवा उनमें अधिक काल तक परिवर्तन नहीं होता या कम परिवर्तन होता है, वे अधिक सत्य हैं ।
दो वस्तुओं अथवा लाभासों में वह माभास अपेक्षाकृत अधिक सत्य है, जिसमें सामंजस्य अधिक है ?
निष्कर्ष :
इस प्रकार यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ब्रेडसे का परम सत् मात्राओं के प्रत्यय से प्रभावित नहीं है । निश्चय ही मात्रा का यह सिद्धांत
1. "An error can be total only in this sense that when it is turned into truth, its particular nature will have vanished, and its actual self be destroyed." - Ibid., p. 823.
सत्य तथा सत् की मात्राएं
आभासों से ही सम्बन्धित है । मात्राएं चाहें सत्य में हों अथवा असत्य में उनका सम्बन्ध आभास से ही है । सत् एक सम्पूर्ण सर्वग्राही सत्ता है जिसमें सभी अनुभूतियां तथा आभास विकसित एवं रूपान्तरित होकर अवस्थित रहते हैं । ऐसे सम्पूर्ण सत् में मात्राएं नहीं हैं । मात्राओं का प्रश्न माभासों के ही सम्बन्ध में सार्थक होगा। प्रत्येक सत्य अथवा आभास में यह सामर्थ्य है कि वह वृद्धि एवं परिर्वतन द्वारा सत् से एकीकृत हो सके। परन्तु ऐसा करने पर उन्हें अपने वर्तमान स्वरूप का समर्पण करना होगा, उसे सम्पूर्ण सत् में समाहित होने के लिये अपनी विशिष्टताओं को किस मात्रा में खोना होगा यह तथ्य ही इस बात का प्रमाण है कि किसी आभास में सत् की कितनी मात्रा है तथा वह किस अंश तक यथार्थ है ।
संक्षेप में ब्रडले के सिद्धान्त पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने पर विदित होता है कि एक सत्य और एक सत्, पुनः सत्य की मात्राएं और सत्ये दोनों ही कल्पनायें उनके सिद्धान्त में विशेष सार्थकता के साथ उपस्थित है और उनका प्रतिपादन उन्होंने अत्यन्त सशक्त ढंग से किया है तथा यह स्थापित कर दिया है कि "सत्य के लक्ष्य को पूर्ण प्राप्ति उस सत् में होती है, जो बुद्धि को आत्मसात करके उनका अतिक्रमण करता है । " १
1. "The complete attainment of truth's end is reached only in that reality, which includes and transcends intelligence" -Essays on Truth and Reality, P. 331:
६ शिवत्व'
नैतिकता अथवा धर्म के अन्तिम सत्य के रूप में स्वीकार करने के सम्बन्ध में जो सामान्य पूर्वाग्रह है, मुख्यतः उसी से प्रेरित होकर और उसी का विरोध करने के आशय से डले ने शिवत्व की कल्पना पर यहां विचार किया है । सामान्यतः शिवत्व की कल्पना नैतिकता अथवा धर्म में केन्द्रीय समझी जाती है । परब्रडले के अनुसार परम तत्व सब प्रकार से संगतिपूर्ण और सत् है, अतएव उसे शिवत्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती है । वे इसी सदर्भ में शिवत्व की सापेक्षता का उल्लेख करते हैं । उनके अनुसार अशिवस्व और शिवत्व भ्रांतियां नहीं हैं क्योंकि उनकी तथ्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । इसीलिए उन्हें आभास कहा गया है । वे जीवन के एकांगी पक्ष है, जिनमें से प्रत्येक पूरक तत्व की मध्यस्थता से अपने से व्यापक एक परिपूर्ण इकाई में अतिक्रान्त और रूपान्तरित होता है। य
शिवश्व का विश्लेषण करते हुए डले कई ऐसे अर्थों को प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें शिव के ही रूप में प्रस्तुत किया जाता है यथा - इच्छा-सतुष्टि या सुख-प्रत्यय, आत्म-साक्षात्कार, नैतिकता, धर्म और ईश्वर । इन रूपों में शिवत्व की सामान्यतः कल्पना की जाती है। ब्रेडले ने इनका विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया है कि इन सभी रूपों में वह आंतरिक विसंगतियों से युक्त है । अतः इन्हें इस रूप में अंतिमता नहीं प्रदान की जा सकती है। इस कारण अन्तिम सत् केवल परम तत्व है और ये सब मात्र उसके आभास हैं । अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि शिवत्व की ये विभिन्न अभिव्यंजनायें उपरोक्त अर्थ में आभास है, सत् नहीं । पुनः ब्रडले यह भी कहते हैं कि पूर्णत्व में जो सत् का ही पर्याय है, विभिन्न अनुपात में ये शुभ की सभी अभिव्यंजनायें
"Evil and good are not illusions, but they are most certainly appearances; they are out-sided aspects; each overruled and transmuted in the whole."
अनिवार्यतः सम्मिलित है। पुनः इस कथन के औचित्य को प्रस्तुत करते हुए ब्रडले कहते हैं ऐसा इसलिए कि एक अन्तर्व्यापी पूर्णत्व की सक्रियता से हो इनका निर्माण होता है और वही इन भेदों का औचित्य भी प्रस्तुत करता हैं ।
शिवत्व के विभिन्न अर्थ :
सामान्यतः शिवत्व को हम एक ऐसा तत्व मान सकते हैं, जो हमारी इच्छा को पूर्ण करे यानी वह जिसका हम अनुमोदन करते हैं, और जिसमें हमें संतोष की प्रतीति होती है । इसे एक और प्रकार से प्रस्तुत करते हुए हम यह कह सकते हैं कि वह हमारे समक्ष 'मूल्य' के रूप में आता है। व्रडले शिवत्व के स्वरूप की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उसके अन्तर्गत वस्तुतः वे ही तत्व मौजूद हैं जो सत्य में विद्यमान रहते हैं। दोनों में हो ' प्रत्यय' तथा 'अस्तित्व' के बीच एक प्रकार की अनुरूपता या भिन्न प्रकार से प्रस्तुत करते हुए कह सकते हैं कि एक तादात्म्यता रहती है पर दोनों के प्रारम्भ बिन्दु एक दूसरे के विपरीत हैं । सत्य में हम 'अस्तित्व' से प्रारम्भ करते हुए प्रत्ययों के माध्यम से उस संपूर्णता को व्यंजित करते हैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है और शुभ में ठीक इसके विपरीत हम एक 'प्रत्यय' से प्रारम्भ करते हैं जो पूर्णता का प्रतिनिधित्व करता है और उस पूर्णत्व को हम किसी अस्तित्व में निर्मित करते हैं अथवा उसमें ढूंढ़ निकालते हैं। पुनः पूर्णत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले इस प्रत्यय को हम वांछित भी मानते हैं । शिवत्व सम्बन्धी इस निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हुए मैं डले कहते हैं कि एक विचार रूप में इच्छित अन्तविषय का अस्तित्व में मूर्त होना ही शिवत्व है और इस प्रकार वह किसी मनोनीत प्रत्यय के आधार पर किसी तथ्य को मापने की कल्पना को अपने में निहित रखता है । वे कहते हैं कि शिवत्व एवं सत्य दोनों में ही प्रत्यय एवं अस्तित्व दोनों तत्वों के बीच एक अपूरित अंतर है और इस अंतर को पूरित करने का सम्बन्ध
]. "The Absolute is perfact in all its detail, it is equally true and good throughout. But, upon the other side, each distinction of better and more true, every degree and each comparative stage of reality is essential, they are made and justified by all-pervasive action of one immanent perfection. A & R, P. 355, |
84e49c7e7dac2e4225e5e1f54129a82cb316dbdb30e4257bcb74d3fb00703024 | pdf | ।। इस ग्रंथ छपवानेमें, प्रथम आश्रयदाता ।। (खानदेश ) आमलनेरा निवासी, धर्मात्मा सा वधूसा दगडुसाकी भार्या पानाबाई, की तरफमें रूपैया चारसोंका, उत्तम आश्रय मिलनेस, ते बाईका पोषक सा. रतनचंद्र, दगडसा के नामसे छपवा नेका प्रबंध किया गयाथा ।
परंतु अनेक कारणके योगसे, दूसरे मेसमें पुनः छपवानेका प्रबंध करना पड़ा । और आगे ग्रंथका भी विस्तार हो जानेसें, दुपट खरचका बोजा उठाना पड़ा । इसी कारण से दूसरे भी सद्गृहस्थाका आश्रय लेनेको विशेष आवश्यकता हुई। ते सद्गृहस्थोंकी, और गाहकोकी भी, यादि पिछले भागमें हमने दिवाई है । और कितनेक संस्था के नामकी भी यादि, मथमसे छपवाई दीई है । जिसमें लोकोंको लेने की भी सुगमता हो जावें ॥ इत्यलं ।।
।। लि. ग्रंथ कर्त्ता ।।
।। इस पुस्तकको छपवानेका अधिकार किसीकोभी नहिं हैं ।।
॥ ॐॐ नमो जिनमूर्त्तये ॥ ।। प्रस्तावना ।।
।। सज्जन पुरुषो ! यह ढूंढनी पार्वतीजीने, प्रथम- ज्ञानदीपिका, नामकी पुस्तक प्रगट करवाई थी, परंतु थोडेही दिनोंमें, मुनिराज श्रीवल्लभ विजयकी तरफसे- गप्प दीपिका समीरके, ज पाटमें सर्वथा मकार बृजगईथी, और वह कठोर पवनको, हटानेको समर्थ नहीं होती हुई, इन दूढनीजीने, पुनः सत्यर्थ चंद्रोदय जैन, नामका पुस्तकको प्रगट करवाया, परंतु यह विचार न किया कि एक तो रात्रिका समय, दूसरा दृष्टिविकारका भारी दोष, तोपिछेएक चंद्रका उदय मात्र है सो, वस्तु तत्त्वका बोध-यथावत्, किस मकार करा सकेगा ? । चंद्रका उदय तो क्या, लेकिन सूर्य नारायणका उदय होने परभी, दृष्टि दोषके विकारवाले पुरुषों को, कुछभी उपकार नहीं हो सकता है । इस वास्ते प्रथम दृष्टि दोष दूर करनेकी ही आवश्यकता है । जब दृष्टि दोष दूर होजायगा, तब उनके पिछे. सें, क्षयोपशमानुसार सें - चंद्रके उदयमॅभी ओर सूर्यके उदय मेंभी वस्तु तत्त्रका, यथावत् भान होजायगा । हमारे दृढकभाइयांका जिनमतिमाके विषय में दृष्टि दोष दूर होनके वास्ते, हमनेभी यह अंज नरूपग्रथ, तैयार किया है । कदाच अंजन करती वखते, दृष्टि दोषका कारणसे किंचित् - कर्कशता, मालूम पडेगी, परंतु जो शिरको ठीकाने रखके, अंजन करते रहोंगे तो, दृष्टि दोषका विकार तो न रह सकेगा । और तो क्या लेकिन कोई भूत प्रेतादिककाभी दोष, हुवा होगा सोभी गायें न रह सकेगा ! हमारा अंजनको हमको ऐमी खात्री है। परंतु विपरीत भवितव्यतावालो
को, कदाच हमारा अंजन, फागदाकारक-न हुवा तो, कुछ अंजनकी दाष, न गीना जायगा ? ।।
जबर्से यह गुरु विनाक! पंथ गगट हुवा है, तबसे आजतक, इनके कितनेक पल्लव ग्राही ढूंढ़कोने, अपना मनःकल्पित मतको ध. कानेके लिये, अन्य मतके, और जैनमतकेभी सर्व शास्त्रों से सम्मत, और जिनकी साक्षी यह धरती माताभी हजारों कोशों तकर्म, हजारो वर्षोस, गवाही दे रही है, वैसी श्रीवीतराग देवकी अलोकिक मूर्त्तिका, और जैन मतके अनेक धुरंधर आचार्य महाराजाओंकाभी, अनादर करके, हमतो गणधर भाषित सुत्रही मानेंगे, वैसा कहकर, मात्र. [ ३२ ] वत्रीश ही सूत्रको आगे धरके, अपना ढूंढ़क पंथको धकाये जातेथे और अपनी सिद्धाइ प्रगट करनेको, सर्व महापुरुषों की निंद्याके साथ, अगडवगडं लिख भी मारतेथे, जैसें प्रथम ढूंढक जेठमलजीनेसमकित सार, लिख माराथा, और पिछे किसीने छपबाके प्रसिद्ध करवायाथा, परंतु जब गुरुवर्य श्रीमद्विजयानंद सूरीश्वरजी ( प्रसिद्ध नाम आत्मारामजी ) की तरफसें, उनका उत्तर रूप-सम्यक्त्व शल्योहार, मगट हुवा, तब उनका उत्तर देनेकी शुद्धि न रहनेसें, थोडेदिन चुपके होके बैठ गयेथे । फिर इस ढूंढ़नीजीने- ज्ञानदीपिकाका, धतंग खडा किया, उनका भी उ त्तर हो जानेसे चुचके हो गयेथे, ऐसे वारंवार जूटे जूट लिखनेको उग्रत होते है ।
परंतु मूर्ति पूजकोंकी तरफस, सत्य स्वरूप प्रगट होने से, दूंढकोंको, कोई भी प्रकारसे उत्तर देनेकी जाग्या न रहने से, पुनः इस ढ़नी पार्वतीजीने, मनः कल्पित जूठे जूठ चार निक्षेपका लक्षण लिखके, जो गणधर ग्रंथिन, श्री अनुयोगद्वार नामका महागंभीर,
सर्व सूत्रोंका मूल सूत्र है, उनको भी धक्का पुहचानेका इरादा उठया है । और - स्थापना निक्षेपको, उठाने के लिये, कितनेक मूर्ख ढूंढकोंने, जो जो कुतर्कों किइथी, उनका ही पुन जीवन करके, और वर्त्तमान में प्रचलित कुतकोंसें, अपनी थोथी पोथी भरदेके, जैन मतके शत्रुभूत, आर्यसामाजिष्टके, दो चार पंडितों की प्रशंशा पत्रिका, किसीभी प्रकारसे डलवायके, अजान वर्गको भ्रमित करनेका उपाय किया है ?
ते पंडितोंकी सम्पति, नीचे मुजब(१) वसता लवपुर मध्ये, छात्रान् शास्त्रं प्रवेशयता । संमतिरत्र सुविहिता, दुर्गादत्तेन सुविलोक्य ॥ १ ॥ पं० दुर्गादत्त शास्त्री० अध्यापक० आ० का० लाहौर ।।
( २ ) मिथ्या तिमिर नाशक मेतत् - उपक्रमोप संहार पूर्वकं, सर्वे मयावलोकिनम् । इति प्रमाणीकरोति । लाहौर डी० ए० वी० कालेज प्रोफेसर, पंडित राधामसाद शर्मा शास्त्री ।।
( ३ ) दयानंदने एवं लिखाथा, सत्यार्थ प्रकाशे ठीक । मूर्तिपूजाके आरंभक है जैनी, या जगमें नीक । पर अवलोकन कर यह पुस्तक, संशय सकल भये अव छीन तातें धन्यवाद तुहि देवी, तूं पार्वती यथार्थ चीन । ३ । साधारण अवलामें ऐसी, होइ न कब हूं उत्तम बुद्ध । तांते यह अवतार पछीनो, कह शिवनाथ हृदय कर शुद्ध । चार २ हम ईश्वरसे अब, यह मांगे है वर करजोर । चिरंजीवि रह पर्वत तनया, रचे ग्रंथ सिद्धांत निचोर ।।४।। इत्यादि ।।
॥ दोहा ॥
पंडित योगीनाथ शिव, लिखीसम्मति । लवपुर मांहि निवास जिह, शंकरके प्रताप ॥ १ ॥
(४) पार्वती रचितो ग्रंथो, जैनमत प्रदर्शकः । प्रीतयेऽस्तुसतां नित्यं, सत्यार्थ चंद्र सूचकः ॥ १ ॥
गोस्वामि रामरंग शास्त्री, मुख्य संस्कृताध्यापक, राजकीय पाठशाला, लाहौर ।।
( ५ ) सत्यार्थ चंद्रोदय जैन- इस पुस्तक में, यह दिखलाया है कि, मृत्तिपूजा जैन सिद्धांत के विरुद्ध हैं । युक्तियें सबकी समजमें आने वाली हैं। और उत्तम है, दृष्टांनोसें जगह २ समजाया गया है । और फिर जैनधर्मर्क सूत्रोंसे भी इस सिद्धांतको पुष्ट किया है । जैनधर्म वालोंके लिये यह ग्रंथ अवश्य उपकारी है ।
लाहौर - राजाराम पंडित० संपादक आर्य ग्रंथावली ।।
( ६ ) अंग्रेजी में - पी० तुलसीराम. वी० ए० लाहौर ।। ( ७ ) गुरुमुखी अक्षरोंम* इनसातों पंडितोको, न जाने किस कारणसे फसाये होंगे ।
* कितनेक पंडितोंने तो बडी २ उपमाओ ढेके, ढूंढ़नीजी की, वडी ही जूठी प्रशंसा कोई है । सो सत्यार्थम, अर्थके साथ विचार लेना ।।
क्योंकि जैन धर्मका जंडाको लेके फिरने वाली, ढूंढनी पार्वतीजीको ही, जैन धर्मके त्योंकी समज नहीं हैं, तो पिछे जैन धर्मक तत्रोंकी दिशा मात्रसें भी अज्ञ, ते पंडितोंका हम क्या दूषण निकालें ? ।। इसमें तो कोई एकाद प्रकारकी चालाकी मात्र ही दीखती है । ते सिवाय नतो पंडितोंने किंचित् मात्रका भी विचार किया है । और नतो ढूंढनी पार्वतीजी भी जैन धर्मका तत्त्रको समजी है । मात्र भव्य माणियांको जैन धर्मसें सर्वथा प्रकार भ्रष्ट करनेको मतमान हुई है ।।
केवल इतना ही मात्र नहीं, परंतु अपनी स्त्री जातिकी तुछता कोभी प्रगट करके, जाति स्वभाव भी जग जगेपर दिखाया है, और परमप्रिय वीतराग देवकी शांत मूर्तिको पथ्थर, पहाड, आदि निंद्य वचन लिखके तीक्ष्ण वाण वर्षाये है ? । और इनके पूजने वाले श्रावकोंको, और उनके उपदेशक, गणधर महाराजादिक सर्व. आचार्यों को, अनंत संसारी ही ठहरानेका प्रयत्न किया है ? । और अपने आप पर्वत तनयाका स्वरूपके। धारण करती हुई, और गणधर गूंधित सिद्धांतको भी तुळपणे मानती हुई, और जूठे जूठ लिखती हुइ भी, जर्गे जगे पर तीक्ष्ण वचनके ही बाण छोडती हुई चली गई है ? ।।
परंतु हगने यह जमानाका विचार करके, और स्त्री जातिकी तुछताकी उपेक्षा करके, सर्वथा प्रकार से प्रिय शब्दों में ही लिखनेका विचार किया है, परंतु इस ढूंढनीजीका तीक्ष्ण वचनके आगे, हमारी. बुद्धि ऐसी अटक जातिथीकि, छेवटमें किसी किसी जर्गेपर ढूंढनीजीका ही अनुकरण मात्र करादेतीथी, तो भी हमने हमारी तरफसे, नर्म स्वरूपसे ही लिखने का प्रयत्न किया है. ।
इंदनीजीके कितनेक, अपूर्ववाक्य.
परंतु जिसने, ढूंढनजीका तटन जूडका पुंज, और केवल कपोल कल्पित, और अति तीक्ष्ण, वचनका लेख, नहीं वांचा होगा, उनको हमारा लेख किंचित् तीक्ष्ण स्वरूपसे मालूम होनेका संभव रहता है, इस वास्ते प्रथम ढूंढ़नीजीने- सत्यार्थ चंद्रोदय में, जे जूठ, और निंद्य, और कटुक, शब्दो लिखे हैं, उसमेंस किंचित् नमुना दाखल लिख दिखाता हुं, जिससे पाठक गणका ध्यान रहे । और विचार करणेमें मसगुल बने रहें ।।
।। देखो ढूंढनी पार्वतीजीकी चत्रराइपणेका लेख ।।
( १ ) प्रस्तावनाका टष्ट. १ लेमें - ढूंढक सिवाय, सर्व पूर्वाचार्यों को, सावधाचार्य ठहरायके, हिंसा धर्मके ही कथन करनेवाले ठरहाये है ॥ १ ॥
विचार करोकि, जैन मार्ग में जो पूर्वधर आचार्यों हो गये हैं, सो क्या हिंसा में धर्म कह गये है ? अहो क्या ढूंढनीके लेखम सत्यता है ? ॥ और मंदिर, मूर्त्तिका, लेख है सो तो, गणधर गूंधित सूही है ? । तो क्या यह ढूंदनी गणधर महाराजाओंकों, हिंसा धर्मी ठहराती है ? ।।
( २ ) आगे पृ. २१ में चार निक्षेपका स्वरूपको समजे विना, ढूंढनीजी तो बन बैठी पंडितानी, और सर्व पूर्वाचार्यों को कहती है कि हटवादीयोकी मंडलीमें, तत्वका विचार कहाँ । इत्यादि ।। २ ।।
पूर्वाचायकी महा गंभीर बुद्धिको पुचना तुमहम सर्वको महा कठीन हैं, परंतु हमारा किंचित् मात्रका लेखसे ही, विचार करन कि ढूंढ़नीजीको, निक्षेपके विषयका, कितना ज्ञान है, सो पाटक गणको मालूम हो जायगा ।
ढूंढनीजीके कितनेक, अपूर्ववाक्यः
( ३ ) टट. ३६ में वीतराग देवकी, अलोकिक शांत मूर्त्ति को, जैनके मूल सिद्धांतों में वर्णन करके वंदना, नपस्कार, करानेवाले, गणधर महाराजा, सो तो सर्व भव्यात्माको मत [ मदिरा ] पीलानेवाले ।।
और वंदनां, नमस्कार करनेवालेको मूर्ख ठहराये । और अ पना थोथा पोथामें जगें जगेंपर जूठे जूठ लिखनेवाली, और अ भीतक ढूंढनेवाली ढूंढनीजी, सो तो वन बैठी पंडितानी ? ।। ३ ।। [४] दृष्ट. ४३ में - वीतरागकी शांतमूर्त्तिको, वंदनादिक, करनेवाले, बाल अज्ञानी ॥ ४ ॥
ढूंढनीजीने, वीतरागकी मूर्ति के वैरीको तो, बना दिये ज्ञानी, क्या ? अपूर्व चातुरी मगट किई है ? ।।
[ ५ ] पृष्ट ५२ में सिद्धांतके अक्षरोंकी स्थापना सें, ज्ञान नहीं होता है, ऐसा झूठा आक्षेप करके भी, कहती है कि तुम्हारी मति तो ' मिथ्यात्वने ' विगाड रखी है, इत्यादि ॥ ५ ॥
।। इसका निर्णय, हमारा लेखसें, मालूम हो जायगा ।।
[ ६ ] ८. ५७ में बालककी लाठीकीतरां, अज्ञानीने, पापा. णादिकका - बिंब, बनाके, भगवान् कल्प रख्खा है ।। इत्यादि ।।६।।
।। इस लेखमें गणधरादिक सर्व जैनधर्मीयोंको, अज्ञानी ठहरायके, अवीतकभी ढूंढकरनेवाली ढूंढ़नी ही ज्ञानिनी वन बैठी है ? ।।
[ ७ ] पृष्ट ६३ में मूर्तिपूजक, कभी ज्ञानी न होंगे इत्यादि ढूंढनीजीने लिखा है ।। ७ ।।
[ ८ ] टए. ६४ में मूर्तिपूजना, गुडीयांका खेल ।। इत्यादि ८
दृढ़नीजीके कितनेक, अपूर्ववाक्य.
।। ढूंढकों, जो कुछ क्रिया करके दिखलाते है, सोभी तो गुडीयांका ही खेल हो जागया क्योंकि ढूंढक लोको भावको ही मुख्य पणे वतलाते है, तो पिछे दूसरी क्रियाओ करके, वतलानेकी भी क्या जरुरी है ? ।
[ ९ ] एट. ६ ७ में पथ्थरकी मात धरके, श्रुति भी लगानी नहीं चाहीये । इत्यादि ॥ ९ ॥
वीतरागी भव्य मूर्ति, ध्यानका मुख्य ढनोजीको, कितना द्वेप प्रज्वलित हुवा है ? ।
आलंबन है, परंतु हूं[ १० ] पृष्ट. ६८ में मूर्तिपूजक तो, सर्व सावद्याचार्यके, धोपेमें आये हुये है । इत्यादि ।। १० ।।
।। गुरु विनाका तत्व विमुख लोकाशा वणीयेका, मनः कल्पित मार्गको पकडके चलनेवाले, सो तो, धोपेमें आये हुये नहीं ? वाहरे ढूंढ़नीजी वाह ? ।।
[ ११ ] ८८. ६९ में जिन मूर्तिका सूत्र पार्टीको, जूठा ठहरानेके लिये, पूर्वके महान् महान् सर्व आचायको, कथाकार कहकर, गपौडे लिखनेवाले ठहराय दिये है ।। इत्यादि ।। ११ ।।
।। इस हूंढ़नीने आचार्यों का नाम देके, सूत्रकार गणधर महाराजाओंको ही, गपौंडे लिखनेवाले ठहराये है ?
और स्वाधीं दो चार पंडितोंकी पाससें, स्तुति करवायके ढूंढनीजी अपने आप साक्षात् ईश्वरकी पार्वतीका, स्वरूपको धारण करके, और जैन सिद्धांतों से तद्न विपरीतपणे लेखको लिखके, ढूंढकोका, उद्धार करनेका, मनमें कल्पना कर बैठी हैं ? क्या अपूर्व न्याय दिखाया है ? ।॥
( १२ ) ९. ७६ में - ढूंढनीजी शाश्वती जिन प्रतिमाओं |
ecdcdc0c64904279c765567224b4cc8e25a58cdc611978e7f7d5ae2a1b8f0b19 | pdf | इस घटना में है कि जिसमें पैसे के सभी प्रकार के अन्यायों और अत्याचारों का खूब खुल कर खेल हुआ है-दस ही वर्ष के अन्दर ही अच्छी तरह प्रस्फुटित होती हुई देखते हैं।
नाटक इस प्रकार आरम्भ होता है - अमेरिकन सरवार फिजी द्वीप के लोगों को अपने अधीन करने के लिये धन्दूकों से भरे हुए जहाज भेजती है । बहाना है रुपया घसूल करने का पर है यह करुणा प्रसङ्ग आरम्भ इस प्रकार होता है कि फिजी के समस्त, अधिवासियों के ऊपर खोपें लगायी जाती है और इनमें स्त्री, यूढ़े और जवान सभी तरह के लोग हैं और प्रायः सभी निर्दोष । 'रुपया दो या जिन्दगी से हाथ घोओ -- ४५ हजार डालर और फिर ९० हजार अथवा फल आम । परन्तु ९० हजार डालर उन्हें मिलते नहीं और यहीं से आरम्भ होता है दृश्य नम्बर दो । इसमें उस भयकर खूनी और क्षण स्थायी पद्धति के स्थान पर एक नवीन यातना का आविष्कार होता है जो इतनी स्पष्ट तो दिखाई नहीं पड़ती पर उसका असर सय लोगों तक पहुँचता है और निवासी नरहत्या के स्थान पर देर तक रहता है। फिजी के मूल रुपये की गुलामी स्वीकार करते हैं। रुपया सघार लेवे ही वह पद्धति शिक्षित सेना की तरह अपना काम आरम्भ कर देती है । पाँच वर्ष के अन्दर काम पूर्ण हो जाता है - मनुष्यों ने अपनी जमीन और जायदाद के उपयोग करने का अधिकार ही नहीं सो दिया धल्कि अपनी स्वतंत्रता भी खो बैठे-वस एक दम गुलाम बन गये ।
यह ही अथ तृतीय दृश्य प्रारम्भ होता है। स्थिति दुःख है। इन अभागों को सलाह दी जाती है कि वह मालिक
बदल कर दूसरे के गुलाम हो जावें । रुपये द्वारा गुलामी से मुक्त होने का उनके दिमाग में खयाल तक नहीं । यह लोग एक दूसरे मालिक को बुलाते हैं और उससे अपनी स्थिति को सुधारने की प्रार्थना करके अपने को उसके हाथों में सौंप देते हैं। अङ्ग्रेज लोग प्याकर देखते हैं कि इन लोगों पर शासनाधिकार मिल जाने से वह अपनी जाति के आवश्यकता से अधिक बढ़े हुए निकम्मे जीवों के भरण पोषण का प्रबन्ध कर सकेंगे और इसलिये वह इन द्वीपों और उनके अधिवासियों को अपने अधिकार में ले लेते हैं ।
किन्तु इंग्लैण्ड इन्हें गुलामों के रुप में नहीं लेता, उनकी जमीन को भी वह अपने कर्मचारियों में वॉट नहीं देता। इन पुरानी पद्धतियों की अब जरूरत नहीं, व्यय केवल एक बात की ज़रूरत है टैक्स लगने चाहिये और ऐसे परियाप्त परिमाण में कि एक ओर तो वह किसानों को व्यावहारिक दासता के पाश से मुक्त न होने दें और दूसरी ओर बहुत से निकम्मे जीवों के लिये मजे से जीवन व्यतीत करने का प्रबन्ध किया जा सके। फ़िजी निवासियों को प्रति वर्ष सत्तर हज़ार पौंड अदा करने चाहिये - यह खास शर्त है जिस पर इंग्लैण्ड फिजी निवासियों को अमेरिकन अत्याचार से बचाने के लिये राजी होता है और फिजी के लोगों को पूर्ण रुप से दासता के पाश में भाबद्ध करने के लिये बस एक इसी बात की कमी रह गई थी। किंतु स्थिति कुछ ऐसी है कि फिजी द्वीप वाले यह सत्तर हजार पौंड किसी हालत में नहीं दे सकते, उनके लिये यह मॉग बहुत बड़ी है।
अंगरेज कुछ काल के लिये अपनी माँग पर जोर न देकर
प्राकृतिक उपज का ही कुछ अंश लेकर चुप रहते हैं ताकि जब रुपये का चलन हो जाय तो वह पूरी रफ़म वसूल कर सकें। वह पहिली फम्पनी की तरह व्यवहार नहीं करते उस फम्पनी के व्यवहार को किसी देश में जंगली आक्रमण कारियों के प्रथम आगमन के समान कहा जा सकता है जब उनका मतलब सिर्फ इतना होता है कि जो कुछ मिले वह लूट कर चलते धनें । परंतु इंग्लैंड का व्यवहार दूरदर्शी गुलाम बनाने वाजे आदमो का सा होता है, वह सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को एक मार ही मार नहीं डालता बल्कि वह उसे पालता है ताकि वह भराचर अण्डे देती रहे। इंग्लैण्ड पहिले अपने मवलय को ढीला छोड़ देता है ताकि वह घरावर अण्डे देतो रहे। इंग्लैण्ड पहिले अपने से मतलम को ढीला छोड़ देता है ताकि बाद को इन लोगों से खूब फस कर काम निकाल ले। इस प्रकार बेचारे फिजी के लोगों को उसकी गुलामी के उस फन्दे में ला फँसाया कि जिसमें समस्त योरोपियन जाति इस समय फँसी हुई है और जिसमें से उनके निकलने की कोई सूरत भी नहीं दिखाई देती ।
यही यात अमेरिका, चीन और मध्य एशिया में होती है और सभी विजिव जातियों के इतिहास में ऐसी ही घटना पाई आती है। रुपया विनिमय का एक निर्दोष साधन है किन्तु उसी हालत में कि जय उसे वसूल करने के लिए निरोह निःशस्त्र लोगों के ऊपर तोपें नहीं लगाई जाती । किन्तु ज्योंही रुपया इकट्ठा करने के लिये घोपों और मन्दूकों का प्रयोग किया आयगा वो जो कुछ फिल्मो में हुआ वह अनिवार्य रूप से होकर रहेगा और ऐसा दी है।
जो लोग यह समझते हैं कि दूसरों के श्रम का उपभोग करना उनका उचित अधिकार है यह बलपूर्वक रुपया माँग फर अपना मतलब बनायेंगे और रुपये की इस साँग के द्वारा ही अत्याचारी लोग बिचारे दीन लोगों को गुलाम बनने के लिये मजबूर करते हैं। इसके अलावा आततायी लोग जितना रुपया जमा हो सकता है उससे सदा ही अधिक माँगेंगे जैसा कि इंग्लैण्ड और फिजी के सम्बन्ध में हुआ और यह अधिक रुपया इस लिये माँगा जाता है जिससे गुलाम बनाने की क्रिया जली ही पूरी हो जाय । रुपये की माँग को उस समय तक अवश्य सीमा के अन्दर रक्खा जाता है जब तक कि उनके पास पर्याप्त धन और नैतिक भाव रहता है, जब इस नैतिक भाव का ह्रास हो जायेगा अथवा रुपयों को जरूरत होगी तो फिर इस सीमाको पर्वाह न की जायेगी रही गवन्मेंन्टों की बाव, तो यह तो सदा हो सीमा मे अधिक माँग करती है क्योंकि एक तो गवन्मेन्टों के लिये न्याय अन्याय जैसी कोई नैतिक भावना ही नहीं होती, और दूसरे जैसा कि सभी जानते हैं युद्ध के कारण तथा मित्रों को देने के लिये उन्हें रुपयों की सदा ही जरूरत रहती है। सभी सरकारें दीवालिया होती हैं और अठारवीं शताब्दी के एक रूसी राजनीतिज्ञ की इस कथन के अनुसार हो व्यवहार करती है-"किसान की ऊन को काट हो लेना चाहिये ताकि कहीं वह बहुत ज्यादा २ नबढ़ जाय ।" सभी हुकूमतें छुरी तरह फर्जदार होती हैं और प्रायः कर्ज को यह रफ्तार भयंकर गति से बढ़ रही है। इसी तरह बजट अर्थात् व्ययसूची भी बढ़ जाती है और इसका परिणाम यह होता है कि दूसरे आतताइयों से झगड़ने और अपने भाववाइयों को पारितोषिक देने
की विशेष आवश्यकता होती है और इसके कारण जमीन के लगान में वृद्धि होती है।
मजदूरी में वृद्धि नहीं होती है और वह लगान के फ़ानून कारण नहीं घल्कि जबरदस्ती वसूल किये जाने वाले करों के कारण जिनका अस्तित्व ही फेवल इसलिये होता है कि मनुष्यों
के पास कुछ रहने न पावे ताकि मालिकों को सन्तुष्ट करने के
लिये वह अपने को मेहनत करने के लिये बेंच डालने पर मजबूर :
हों - टैक्सों के लगाने का उद्देश्य यह होता है कि मजदूरों की मजदूरी का उपयोग किया जा सके ।
मजदूरों की मजदूरी का उपयोग उसी हालत में किया जा सकता है कि साधारणतः जो कर लगाये जायें वह इतने बड़े होने चाहिये कि मजदूर ध्यपनी अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद उन्हें प्रदान कर पायें । यदि मजदूरी में वृद्धि हो मजदूर के आगे चल कर दास बन जाने की सम्भावना हो. नहीं रहती, इसलिये जय तक जबरदस्ती का दौर दौरा रहेगा तब तक मजदूरी में वृद्धि कमी हो ही नहीं सकती। कुछ लोग जो दूसरे लोगों के साथ स्पष्ट खुले, देंग से जो, अन्याय करते हैं उसे. अर्थशास्त्रज्ञ जोहे के नियम के नाम से पुकारते हैं तथा जिस औजार के द्वारा अन्याय किया जाता है उसे यह लोग विनिमय साधन कहते हैं और यह निर्दोष विनिमय साधन जो मनुष्यों के पारस्परिक व्यापार के लिये आवश्यक है और कुछ नहीं रुपया दी है ।
व फिर ऐसा क्यों है कि जहाँ ज़बरदस्ती लगान रुपयों में
वपूल नहीं किया जाता वहाँ रुपया अपने वास्तविक अर्थ में कमी
होता ही नहीं और न कभी हो ही सकता है बल्कि या तो भेड़, अनाज, खाल आदि पदार्थों का परस्पर विनिमय होता है या सीप,. घोंघे जैसे किसी भी चीज को समयानुसार मूल्य निर्णायक मान. लेते हैं जैसा कि फिजी निवासियों में, फिनीशियनों में, फिरधियों में होता है और जैसा कि प्रायः उन लोगों में होता है कि जो अफ्रीकनों की तरह टैक्स ही नहीं देते।
जहाँ कहीं भी किसी निश्चित प्रकार का सिका प्रचलित होता है तो वह विनिमय का साधन नहीं रहता पल्कि ज़बरदस्ती से पिंड छुड़ाने का उपाय बन जाता है और उस सिर्फ का प्रचार लोगों में तभी होता है जब कि सभी से किसी नियमित परिमाण में वह वसूल किया जाता है। तभी सब लोग एक साँ उसको प्राप्त करने के लिये उत्सुक होते हैं और तभी उसकी कोई कदर और कीमत होती है ।
एक बात यह भी है कि विनिमय के लिये जो सरल और उपयोगी चीज़ है उसो को विनिमय को शक्ति अथवा मूल्य प्राप्त नहीं हो जाता बल्कि विनिमय का साधन वही पदार्थ बनता है और उसी को विनिमय शक्ति प्राप्त होती है कि जिसे गवर्नमेंट चाहती है। यदि सोने की माँग होती है तो सोना कीमती होता है और यदि घुटने की हड्डिये माँगी जाने लगें तो वह मूल्यवान बन जायें । यदि यह बात नहीं है तो विनिमय के साधनों को सरकार सदा अपनी ही ओर से जारी रखने का अधिकार क्यों रखती है ? उदाहरणार्थ फिंजो निवासियों ने अपना एक निज का विनिमय साधन निश्चित कर लिया है, वह जिस तरह चाहते हैं उस तरह विनिमय करने की स्वतंत्रतां उन्हें मिलनी चाहिये और
तुम लोग जो घल या अत्याचार करने के साधन रखते हो उनके विनिमय में हस्तक्षेप न करो । किन्तु इसके बजाय तुम खुद सिके बनाते हो, किसी दूसरे को ऐसा करने नहीं देते या जैसा कि हम लोगों के यहाँ है, तुम लोग केवल कुछ नोट छापते हो उस पर ज्जार का सर बना कर एक विशिष्ट प्रकार का हस्ताक्षर कर देते हो और चमकी देते हो कि यदि कोई जाली नोट बनायेगा तो सख्त सजा पायेगा। इसके बाद अपने कर्मचारियों में तुम उन्हें वितरित कर देते हो और यह चाहते हो कि प्रत्येक आइमी लगान और मालगुजारी आदि के रूप में तुम्हें इस प्रकार के सिक्के अथवा नोट दे जिस पर एक विशिष्ट प्रकार के हस्ताक्षर हों और वह इतनी संख्या में दिये जायें कि इन सिक्कों अथवा नोटों को प्राप्त करने के लिये वह अपनी सारी मेहनत और मजदूरी को बेचने पर मजबूर हो जाये और यह सच करने के बाद तुम हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हो कि रुपया विनिमय साधन में हमारे लिये आवश्यक है ।.
समाज के सब लोग सुखी और स्वतंत्र है, कोई किसी को न सताता और न किसी को गुलामी में रखता है। किन्तु समाज में रुपये का आविर्भाव होता है और तुरन्त ही लोहे का सा फड़ा नियम बनता है जिसके परिणाम स्वरूप लगान की वृद्धि होती है और मजदूरी यथा सम्भव कम हो जाती है। रूप के चाघे बरिक आधे से अधिक किसान तरह तरह के कर अदा करने के 'लिये स्वेच्छापूर्वक अपने को जमीन्दारों अथवा कारखाने वालों के हाथ न डालेते हैं क्योंकि मनुष्य का तथा अन्य प्रकार के करों को चुकाने के लिये उन्हें मजबूर होकर उन लोगों के पास
जाना पड़ता है कि जिनके पास रुपया है और नुसार उन्हें उनकी गुलामी करनी पड़ती है। का खेल है ।
उनकी आज्ञा-यही इस रुपये
जब गुलामी की प्रथा पन्दू नहीं हुई थी तो मैं आइवन को कोई भी काम करने के लिये मजबूर कर सकता था और उसके इन्कार करने पर उसे पुलिस के हवाले कर देता जहाँ वह मार कर ठीक कर दिया जाता किन्तु यदि मैं आइवन से शक्ति से काम कराता और उसे वस्त्र या भोजन न देता तो यह मामला अधिकारियों के पास जाता और मुझे उसके लिये, जवाब देना पड़ता ।
किन्तु अब जब कि गुलामो उठ गई है मैं आइयन, पीटर वा साइडर से कोई भी काम करा सकता हूं और यदि वह इन्कार करें तो मैं लगान अदा करने के लिये उन्हें रुपया नहीं देता और तब उन पर फोड़े पड़ते हैं । इस प्रकार वह मेरी बात मानने को वाध्य होते हैं। इसके अतिरिक्त में जर्मन, फ्रान्सीसी, चीनी तथा. हिन्दुस्तानी को भी इसी साधन के द्वारा अपना काम करने के लिये मजबूर कर सकता हूँ, यदि वह राजी नहीं होते तो में जमीन किराये पर लेने के लिये या भोजन खरीदने के लिये उन्हें रुपया नहीं दूँमा और चूँकि उनके पास जमीन और भोजन फुल भी नहीं है उन्हें मजबूर होकर मेरे पास आना पड़ेगा ! और यदि मैं उनसे शक्ति से अधिक काम कराऊँ यहाँ तक कि अधिक काम ले ले कर मैं उन्हें मार भी डालूँ तब भी कोई मुझसे एक शब्द भी नहीं कह सकता और जो कहीं मैंने पोलिटिकल अर्थ शाख की किताबें पढ़ली है तब तो फिर मुझे पूर्ण विश्वास हो |
bd9c1700f770c76b3e4e1d24c11d3f08de612d1268722935e7152e4e61d3fad0 | pdf | आमराज - नागभट्ट द्वितीय
विक्रम की नौवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में आचार्य बप्पभट्टी का समकालीन एवं परम भक्त श्रम नामक प्रतिहारवंशीय राजा कन्नौज पर शासन करता था । मराज अपने समय का महान् योद्धा और जैन धर्म के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा रखने वाला राजा था । इसने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार एवं अभ्युदय के लिये जोजो कार्य किये उनका संक्षेप में आचार्य बप्पभट्टी के परिचय में उल्लेख किया जा चुका है । नागभट्ट (द्वितीय) और नागावलोक, इसी मराज के अपर नाम थे ।
श्रामराज ( नागभट्ट ) के पिता का नाम यशोवर्मन था । यशोवर्मन गुजरात के लाट प्रदेश का बड़ा शक्तिशाली राजा था । मराज का बाल्यकाल बड़ी ही संकटापन्न स्थिति में व्यतीत हुआ । इसका कारण यह था कि यशोवर्मन की एक रानी से जब आमराज का जन्म हुआ तो उसकी दूसरी रानी ने सौतिया डाह से प्रेरित हो यशोवर्मन को आमराज की माता के विरुद्ध भड़का कर उसे लाट राज्य से निकलवा दिया। आमराज की माता निराश्रय हो अपने शिशु को लिये वन्य जीवन व्यतीत करने लगी । बप्पभट्टी के गुरु आचार्य सिद्धसेन ने जब उसे जंगल में निराश्रित देखा तो मोढ़ेरा ग्राम के जैन संघ को कहकर मराज और उनकी माता के भरण-पोषण की व्यवस्था करवाई। कुछ ही समय पश्चात् श्रामराज की सौतेली माता की मृत्यु हो जाने पर यशोवर्मन ने अपनी रानी और पुत्र की खोज करवा उन्हें पुनः अपने राजप्रासाद में बुलवा लिया ।
विक्रम सं० ८६० के आस-पास राष्ट्रकूट वंश के दशवें राजा गोविन्द तृतीय ( जगत्तुंग ) ने यशोवर्मन पर आक्रमण कर उससे लाट प्रदेश छोनकर अपने गुजरात राज्य में मिला लिया और अपने लघु भ्राता इन्द्र को गुजरात का राज्यपाल नियुक्त कर दिया ।
गोविन्द तृतीय से पराजित होने और लाट प्रदेश के अपने राज्य के हाथ से निकल जाने पर यशोवर्मन कन्नौज की ओर बढ़ा और वहां के चक्रायुध नामक राजा को मारकर स्वयं कन्नौज के राज-सिंहासन पर बैठ गया। स्वाभिमानी श्रामराज की अपने पिता से किसी बात पर अनवन हो गई और वह कर्मा से प्रछन रूप में निकल कर मोढेरा चला आया । मोढेरा ग्राम के बाहर एक मन्दिर में गुनि बप्पमट्टी से उसकी भेंट हुई । बप्पभट्टी उसे अपने गुरु के पास ले गये और गुरु ने नाम धादि
लाट विजय के सम्बन्ध में देखिये इसी ग्रन्थ कापू० २०१
घोरो धैर्यधनो विपक्षवनितावक्त्राम्बुजश्रीहरो, हेला - स्वीकृत - गौड़ - राज्य - कमलान् चान्तः प्रविश्याचिराद्, उन्मार्गे मरु मध्यम- प्रतिबलैर्यो वत्सराजं बलैः । '
अर्थात् - राष्ट्रकूटवंशीय राजा कृष्ण प्रथम के ( गोविन्द द्वितीय से छोटे ) पुत्र घोर - अपर नाम ध्रुव ने गौड़ राज्य पर अधिकार करने के पश्चात् मालवा पर आक्रमण किया और वत्सराज को युद्ध में पराजित कर मरुभूमि की ओर भाग जाने
के लिये बाध्य कर दिया ।
उद्योतनसूरि द्वारा रचित कुवलयमाला की प्रशस्ति के अनुसार शक संवत् ६९६ में वत्सराज का जाबालिपुर पर शासन था । हरिवंश पुराण की प्रशस्ति में जिनसेन के उल्लेखानुसार शक सं० ७०५ में अवन्ति ( मालव) राज्य पर वत्सराज का शासन था । इन दोनों ऐतिहासिक महत्व के उल्लेखों से यहं प्रमाणित होता है कि शक सं० ७०५ अर्थात् ई० सन् ७८३ तक बत्सराज का मालवा और जालौर इन दोनों ही राज्यों पर और ध्रुव के बड़े भाई गोविन्द द्वितीय अपर नाम वल्लभ का प्रायः सम्पूर्ण दक्षिणापथ पर अधिकार था । दूसरे शब्दों में कहा जाय तो ध्रुव राष्ट्रकूट वंश राजसिंहासन पर आरूढ़ नहीं हुआ था। इससे अनुमान किया जाता है कि ई० सन् ७८५ के आस-पास ध्रुव ने अपने बड़े भाई गोविन्द द्वितीय को भीषण युद्ध में हरा राज्य - च्युत और सोरब के छोटे से राज्य का स्वामी बनाकर राष्ट्रकूट राज्य पर अधिकार किया । राज्य की बागडोर सम्हालते ही ध्रुव ने अपने बड़े भाई को युद्ध में सहायता करने वाले शिवमार को बन्दी बनाया और पल्लवमल्ल से कर के रूप में अनेक हाथी मंगवा कर एक प्रकार से दण्डित किया । तत्पश्चात् युद्ध में ध्र व ने अपना विजय अभियान प्रारम्भ किया । सर्वप्रथम उसने गौड़ों को पराजित कर उन्हें अपना वशवर्ती बनाया । तत्पश्चात् विन्द्य पर्वत को पार कर मालवा के राजा वत्सराज पर आक्रमण किया । इन सब कार्यों को सम्पन्न करने में ध्रुव को वर्ष - डेढ़ वर्ष का समय तो कम से कम अवश्य ही लगा होगा । इन सव तथ्यों पर विचार करने पर अनुमान किया जाता है कि ध्रुव ने ई० सन् ७८७ के आस-पास वत्सराज को मालवा से जालोर की ओर पलायन करने के लिये बाध्य किया ।
मालवा में अपनी पराजय के पश्चात् वत्सराज अपने जीवन के अन्त समय तक जालोर में ही रहा । जैन संघ के साथ वत्सराज के बड़े मधुर सम्बन्ध थे ।
१ जैन शिलालेख संग्रह, भाग २, लेख संख्या १२३, पृ. १२५
आमराज- नागभट्ट द्वितीय
विक्रम की नौवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में आचार्य बप्पभट्टी का समकालीन एवं परम भक्त श्राम नामक प्रतिहारवंशीय राजा कन्नौज पर शासन करता था । आमराज अपने समय का महान् योद्धा और जैन धर्म के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा रखने वाला राजा था । इसने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार एवं अभ्युदय के लिये जोजो कार्य किये उनका संक्षेप में आचार्य बप्पभट्टी के परिचय में उल्लेख किया जा चुका है । नागभट्ट (द्वितीय) और नागावलोक, इसी आमराज के अपर नाम थे ।
मराज ( नागभट्ट) के पिता का नाम यशोवर्मन था । यशोवर्मन गुजरात के लाट प्रदेश का बड़ा शक्तिशाली राजा था । मराज का वाल्यकाल बड़ी ही संकटापन्न स्थिति में व्यतीत हुआ । इसका कारण यह था कि यशोवर्मन की एक रानी से जब श्रमराज का जन्म हुआ तो उसकी दूसरी रानी ने सौतिया डाह से प्रेरित हो यशोवर्मन को आमराज की माता के विरुद्ध भड़का कर उसे लाट राज्य से निकलवा दिया । आमराज की माता निराश्रय हो अपने शिशु को लिये वन्य जीवन व्यतीत करने लगी । बप्पभट्टी के गुरु आचार्य सिद्धसेन ने जब उसे जंगल में निराश्रित देखा तो मोढ़ेरा ग्राम के जैन संघ को कहकर आमराज और उनकी माता के भरण-पोषण की व्यवस्था करवाई। कुछ ही समय पश्चात् मराज की सौतेली माता की मृत्यु हो जाने पर यशोवर्मन ने अपनी रानी और पुत्र की खोज करवा उन्हें पुनः अपने राजप्रासाद में बुलवा लिया ।
विक्रम सं० ८६० के आस-पास राष्ट्रकूट वंश के दशवें राजा गोविन्द तृतीय ( जगत्तुंग ) ने यशोवर्मन पर आक्रमण कर उससे लाट प्रदेश छीनकर अपने गुजरात राज्य में मिला लिया और अपने लघु भ्राता इन्द्र को गुजरात का राज्यपाल नियुक्त कर दिया ।
गोविन्द तृतीय से पराजित होने और लाट प्रदेश के अपने राज्य के हाथ में निकल जाने पर यशोवर्मन कन्नौज की ओर बढ़ा और वहां के चकाधनामक राजा को मारकर स्वयं कन्नौज के राज-सिंहासन पर बैठ गया। स्वाभिमानी श्रामगड को अपने पिता से किसी बात पर अनबन हो गई और वह कमीज से प्रधान रूप से निकल कर मोढेरा चला आया । मोढेरा ग्राम के बाहर एक मन्दिर में मुनि पट्टी से उसकी भेंट हुई । बप्पभट्टी उसे अपने गुरु के पास ले गये गुरु के नाम धादि पॉर
लाट विजय के सम्बन्ध में देखिये इसी अन्य क ०२६९
जैन धर्म का मौलिक इतिहास -- भाग ३
का परिचय पाते ही राजकुमार श्रमराज को पहचान लिया । आचार्यश्री ने मराज से कहा कि वह उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में मोढेरा में ही रहकर उनके पास और बप्पभट्टी के पास विद्याध्ययन करे ।
सिद्धन के निर्देशानुसार राजकुमार आमराज उनके पास रहकर विद्याध्ययन करने लगा । इस प्रकार आचार्यश्री के सान्निध्य में बप्पभट्टी के संसर्ग में रहते हुए राजकुमार मराज के अन्तर्मन में बप्पभट्टी के प्रति प्रगाढ़ अनुराग हो गया । आगराज ने आचार्यश्री और बप्पभट्टी की सेवा में रहते हुए बड़ी निष्ठा के साथ अध्ययन किया ।
अनुमान किया जाता है कि श्रमराज का पिता यशोवर्मन एक साहसी योद्धा होने के साथ-साथ सरस्वती का भी उपासक और अच्छा लेखक था। उसने "रामाभ्युदय" नामक एक नाटक की भी रचना की थी । यह नाटक 'वर्तमान में उपलब्ध नहीं है किन्तु " ध्वन्यालोक", साहित्य दर्पण आदि में यशोवर्मन के इस नाटक का उल्लेख है । ' अस्तु ।
कालान्तर में यशोवर्मन की मृत्यु होते ही कन्नौज के मन्त्रियों ने राजकुमार मराज को मोढेरा से कन्नौज ले जाकर उसका कन्नौज के राज-सिंहासन पर राज्याभिषेक किया।
मराज पर नाम नागावलोक एक शक्तिशाली राजा सिद्ध हुआ । इसने कन्नौज राज्य की चहुंमुखी समृद्धयभिवृद्धि के लिए उल्लेखनीय कार्य किया । संभवतः मराज के पूर्व नागभट्ट (द्वितीय) एवं "अवनिजनाश्रय" तथा "दक्षिणभट" अर्थात् दक्षिणापथ का सुदृढ़ आधारस्तम्भ आदि उपाधियों से विभूषित पुलकेशिन ( चालु - क्यराज विक्रमादित्य द्वितीय के द्वारा नियुक्त दक्षिण गुजरात के राज्यपाल ) जैसे देशभक्त योद्धाओं ने भारत पर किये गये अरबों के आक्रमण को पूर्णतः असफल कर में र आक्रान्तों की शक्ति को अन्तिम रूप से नष्ट कर दिया। इस सम्बन्ध आर. सी. मजूमदार आदि विद्वान् इतिहासज्ञों द्वारा संपादित - 'दि क्लासिकल एज' का निम्नलिखित उल्लेख गौरवानुभूति के साथ पठनीय एवं मननीय है :
. These Arab expeditions took place between A. D. 724 and 738. But the success of the Arabs was short-lived, and they were defeated by the Pratihara king Nagabhatta and the Chalukya ruler of Lata (S. Gujarat) named Avanijanasruya Pulkeshiraj. The latter's heroic stand earned him the titles 'solid pillar of Dakshinapatha, and the repeller of the unrepellable.' The Gurjara king Jayabhatta IV of Nandipuri also claims to have defeated
क्लासिकल एज, पृ० ३१०
the Arabs. Apart from these claims, authenticated by contemporary records, we have traditions about several Indian rulers as having defeated the Mlechchhas, and some of them at any rate refer probably to the Arab invaders of this period. It is also admitted in the Arab chronicles that under Junaid's successor Tamin, the Muslims lost the newly conquered territories and fell back upon Sindh. Even here their position became insecure. According to Arab chronicles, 'a place of refuge to which the Muslims might flee was not to be found,' and so the governor of Sindh built a city on the further side of the lake, on which later the City of Mansurah stood, as a place of refuge for them. It is thus clear that the period of Confusion in the Caliphate during the last years of the Umayyads also witnessed the decline of Islamic power in India.1
ईसा की आठवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चार दशकों के इतिहास के पर्यालोचन से यह तथ्य प्रकाश में आता है कि जो अरव शक्ति टर्की, ईराक, ईरान, अफगानिस्तान आदि देशों में प्रचण्ड ग्रांधी की तरह बड़े वेग से इन राष्ट्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित करती हुई बढ़ती ही गई, वह चालुक्य वंशी कन्नोज राज यशोवर्मन, काश्मीर के राजा ललितादित्य, प्रतिहार वंशीय राजा नागभट्ट (द्वितीय) दक्षिण गुजरात के राज्यपाल चालुक्यवंशीय पुलकेशिन आदि-आदि भारतीय वीरों की फौलादी दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गई ।
मराज के जीवन की प्रमुख घटनाओं और उसके धार्मिक कार्य कलापों का बप्पभट्टीसूरि के इतिवृत्त में परिचय दे दिया गया है। अपनी आयु के केवल ६ मास अवशिष्ट रहने पर आमराज ने बप्पभट्टी के साथ तीर्थयात्रा प्रारम्भ की। अनेक तीर्थों की यात्रा करने के पश्चात् मागध तीर्थ की, नाव में बैठ कर यात्रा करते समय मगटोड़ा नामक ग्राम के पास ग्रामराज ने जिनेन्द्रप्रभु की शरण ग्रहण कर वप्पभट्टी से पंच परमेष्टि नमस्कार मन्त्र का श्रवण करते हुए गंगा की धारा के प्रवाह के मध्य भाग में नौका में ही वि० सं० ८९० को भाद्रपद शुक्ला ५ के दिन अपनी इहलीला समाप्त की। मगटोड़ा ग्राम में ही आमराज की घोप्देही क्रियाएं सम्पन्न की गईं ।
मराज के पश्चात् उसका पौत्र मिहिरभोज कान्यकुब्ज के राजसिंहासन पर ( वि० सं० ८६० में) बैठा । मिहिरभोज भी परम श्रद्धानिष्ठ जैन राजा था । इसने अपने जीवन काल में जैन धर्म के प्रचार-प्रसार और अभ्युदयस्थान के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किये । मिहिरभोज ने बप्पभुट्टी के दो उपरों में से एक पट्टधर प्राचार्य गोविन्दसूरि को अपनी राजसभा में राजगुरु के रूप में रखा। |
7970625e20f16d87b83c15c57afacc0eb2dca7cd | web | गजानन त्र्यंबक माडखोलकर (28 दिसम्बर, 1900 - 27 नवम्बर, 1976)), मराठी उपन्यासकार, आलोचक तथा पत्रकार थे। .
9 संबंधोंः पत्रकार, मराठी भाषा, मुम्बई, रस (काव्य शास्त्र), हिन्दी, गुजराती भाषा, आलोचना, काव्यशास्त्र, उपन्यास।
पत्रकार उस व्यक्ति को कहते हैं जो समसामयिक घटनाओं, लोगों, एवं मुद्दों आदि पर सूचना एकत्र करता है एवं जनता में उसे विभिन्न माध्यमों की मदद से फैलाता है। इस व्यवसाय या कार्य को पत्रकारिता कहते हैं। संवाददाता एक प्रकार के पत्रकार हैं। स्तम्भकार (कॉलमिस्ट) भी पत्रकार हैं। इसके अलावा विभिन्न प्रकार के सम्पादक, फोटोग्राफर एवं पृष्ठ डिजाइनर आदि भी पत्रकार ही हैं। .
मराठी भारत के महाराष्ट्र प्रांत में बोली जानेवाली सबसे मुख्य भाषा है। भाषाई परिवार के स्तर पर यह एक आर्य भाषा है जिसका विकास संस्कृत से अपभ्रंश तक का सफर पूरा होने के बाद आरंभ हुआ। मराठी भारत की प्रमुख भाषओं में से एक है। यह महाराष्ट्र और गोवा में राजभाषा है तथा पश्चिम भारत की सह-राजभाषा हैं। मातृभाषियों कि संख्या के आधार पर मराठी विश्व में पंद्रहवें और भारत में चौथे स्थान पर है। इसे बोलने वालों की कुल संख्या लगभग ९ करोड़ है। यह भाषा 900 ईसवी से प्रचलन में है और यह भी हिन्दी के समान संस्कृत आधारित भाषा है। .
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित मुंंबई (पूर्व नाम बम्बई), भारतीय राज्य महाराष्ट्र की राजधानी है। इसकी अनुमानित जनसंख्या ३ करोड़ २९ लाख है जो देश की पहली सर्वाधिक आबादी वाली नगरी है। इसका गठन लावा निर्मित सात छोटे-छोटे द्वीपों द्वारा हुआ है एवं यह पुल द्वारा प्रमुख भू-खंड के साथ जुड़ा हुआ है। मुम्बई बन्दरगाह भारतवर्ष का सर्वश्रेष्ठ सामुद्रिक बन्दरगाह है। मुम्बई का तट कटा-फटा है जिसके कारण इसका पोताश्रय प्राकृतिक एवं सुरक्षित है। यूरोप, अमेरिका, अफ़्रीका आदि पश्चिमी देशों से जलमार्ग या वायुमार्ग से आनेवाले जहाज यात्री एवं पर्यटक सर्वप्रथम मुम्बई ही आते हैं इसलिए मुम्बई को भारत का प्रवेशद्वार कहा जाता है। मुम्बई भारत का सर्ववृहत्तम वाणिज्यिक केन्द्र है। जिसकी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 5% की भागीदारी है। यह सम्पूर्ण भारत के औद्योगिक उत्पाद का 25%, नौवहन व्यापार का 40%, एवं भारतीय अर्थ व्यवस्था के पूंजी लेनदेन का 70% भागीदार है। मुंबई विश्व के सर्वोच्च दस वाणिज्यिक केन्द्रों में से एक है। भारत के अधिकांश बैंक एवं सौदागरी कार्यालयों के प्रमुख कार्यालय एवं कई महत्वपूर्ण आर्थिक संस्थान जैसे भारतीय रिज़र्व बैंक, बम्बई स्टॉक एक्स्चेंज, नेशनल स्टऑक एक्स्चेंज एवं अनेक भारतीय कम्पनियों के निगमित मुख्यालय तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियां मुम्बई में अवस्थित हैं। इसलिए इसे भारत की आर्थिक राजधानी भी कहते हैं। नगर में भारत का हिन्दी चलचित्र एवं दूरदर्शन उद्योग भी है, जो बॉलीवुड नाम से प्रसिद्ध है। मुंबई की व्यवसायिक अपॊर्ट्युनिटी, व उच्च जीवन स्तर पूरे भारतवर्ष भर के लोगों को आकर्षित करती है, जिसके कारण यह नगर विभिन्न समाजों व संस्कृतियों का मिश्रण बन गया है। मुंबई पत्तन भारत के लगभग आधे समुद्री माल की आवाजाही करता है। .
रस (काव्य शास्त्र)
श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस से जिस भाव की अनुभूति होती है वह रस का स्थायी भाव होता है। रस, छंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं। रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है। रस अन्तःकरण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। अकेले एक शिखर पर पहुँचा देता है। रस का यह अपूर्व रूप अप्रमेय और अनिर्वचनीय है। .
हिन्दी या भारतीय विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। केंद्रीय स्तर पर दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। यह हिन्दुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्द का प्रयोग अधिक हैं और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हालांकि, हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत का संविधान में कोई भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी और इसकी बोलियाँ सम्पूर्ण भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। भारत और अन्य देशों में भी लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की और नेपाल की जनता भी हिन्दी बोलती है।http://www.ethnologue.com/language/hin 2001 की भारतीय जनगणना में भारत में ४२ करोड़ २० लाख लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा बताया। भारत के बाहर, हिन्दी बोलने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में 648,983; मॉरीशस में ६,८५,१७०; दक्षिण अफ्रीका में ८,९०,२९२; यमन में २,३२,७६०; युगांडा में १,४७,०००; सिंगापुर में ५,०००; नेपाल में ८ लाख; जर्मनी में ३०,००० हैं। न्यूजीलैंड में हिन्दी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसके अलावा भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में १४ करोड़ १० लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, मौखिक रूप से हिन्दी के काफी सामान है। लोगों का एक विशाल बहुमत हिन्दी और उर्दू दोनों को ही समझता है। भारत में हिन्दी, विभिन्न भारतीय राज्यों की १४ आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग १ अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है। हिंदी हिंदी बेल्ट का लिंगुआ फ़्रैंका है, और कुछ हद तक पूरे भारत (आमतौर पर एक सरल या पिज्जाइज्ड किस्म जैसे बाजार हिंदुस्तान या हाफ्लोंग हिंदी में)। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी उनमें हिन्दी भी प्रमुख होगी। 'देशी', 'भाखा' (भाषा), 'देशना वचन' (विद्यापति), 'हिन्दवी', 'दक्खिनी', 'रेखता', 'आर्यभाषा' (स्वामी दयानन्द सरस्वती), 'हिन्दुस्तानी', 'खड़ी बोली', 'भारती' आदि हिन्दी के अन्य नाम हैं जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखण्डों में एवं विभिन्न सन्दर्भों में प्रयुक्त हुए हैं। .
गुजराती भारत की एक भाषा है जो गुजरात राज्य, दीव और मुंबई में बोली जाती है। गुजराती साहित्य भारतीय भाषाओं के सबसे अधिक समृद्ध साहित्य में से है। भारत की दूसरी भाषाओं की तरह गुजराती भाषा का जन्म संस्कृत भाषा से हुआ है। वहीं इसके कई शब्द ब्रजभाषा के हैं ऐसा भी माना जाता है की इसका जन्म ब्रजभाषा में से भी हुआ अर्थात संस्कृत और ब्रजभाषा के मिले जुले शब्दों से गुजरातीे भाषा का जन्म हुआ। दूसरे राज्य एवं विदेशों में भी गुजराती बोलने वाले लोग निवास करते हैं। जिन में पाकिस्तान, अमेरिका, यु.के., केन्या, सिंगापुर, अफ्रिका, ऑस्ट्रेलीया मुख्य है। भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की मातृभाषा गुजराती थी। गुजराती बोलने वाले भारत के दूसरे महानुभावों में पाकिस्तान के राष्ट्रपिता मुहम्मद अली जिन्ना, महर्षि दयानंद सरस्वती, मोरारजी देसाई, नरेन्द्र मोदी, धीरु भाई अंबानी भी सम्मिलित है। .
आलोचना या समालोचना (Criticism) किसी वस्तु/विषय की, उसके लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, उसके गुण-दोषों एवं उपयुक्ततता का विवेचन करने वालि साहित्यिक विधा है। हिंदी आलोचना की शुरुआत १९वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतेन्दु युग से ही मानी जाती है। 'समालोचना' का शाब्दिक अर्थ है - 'अच्छी तरह देखना'। 'आलोचना' शब्द 'लुच' धातु से बना है। 'लुच' का अर्थ है 'देखना'। समीक्षा और समालोचना शब्दों का भी यही अर्थ है। अंग्रेजी के 'क्रिटिसिज्म' शब्द के समानार्थी रूप में 'आलोचना' का व्यवहार होता है। संस्कृत में प्रचलित 'टीका-व्याख्या' और 'काव्य-सिद्धान्तनिरूपण' के लिए भी आलोचना शब्द का प्रयोग कर लिया जाता है किन्तु आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का स्पष्ट मत है कि आधुनिक आलोचना, संस्कृत के काव्य-सिद्धान्तनिरूपण से स्वतंत्र चीज़ है। आलोचना का कार्य है किसी साहित्यक रचना की अच्छी तरह परीक्षा करके उसके रूप, गणु और अर्थव्यस्था का निर्धारण करना। डॉक्टर श्यामसुन्दर दास ने आलोचना की परिभाषा इन शब्दों में दी हैः अर्थात् आलोचना का कर्तव्य साहित्यक कृति की विश्लेषण परक व्याख्या है। साहित्यकार जीवन और अनभुव के जिन तत्वों के संश्लेषण से साहित्य रचना करता है, आलोचना उन्हीं तत्वों का विश्लेषण करती है। साहित्य में जहाँ रागतत्व प्रधान है वहाँ आलोचना में बुद्धि तत्व। आलोचना ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों और शिस्तयों का भी आकलन करती है और साहित्य पर उनके पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना करती है। व्यक्तिगत रुचि के आधार पर किसी कृति की निन्दा या प्रशंसा करना आलोचना का धर्म नहीं है। कृति की व्याख्या और विश्लेषण के लिए आलोचना में पद्धति और प्रणाली का महत्त्व होता है। आलोचना करते समय आलोचक अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष, रुचि-अरुचि से तभी बच सकता है जब पद्धति का अनुसरण करे, वह तभी वस्तुनिष्ठ होकर साहित्य के प्रति न्याय कर सकता है। इस दृष्टि से हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को सर्वश्रेष्ठ आलोचक माना जाता है। .
काव्यशास्त्र काव्य और साहित्य का दर्शन तथा विज्ञान है। यह काव्यकृतियों के विश्लेषण के आधार पर समय-समय पर उद्भावित सिद्धांतों की ज्ञानराशि है। युगानुरूप परिस्थितियों के अनुसार काव्य और साहित्य का कथ्य और शिल्प बदलता रहता है; फलतः काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों में भी निरंतर परिवर्तन होता रहा है। भारत में भरत के सिद्धांतों से लेकर आज तक और पश्चिम में सुकरात और उसके शिष्य प्लेटो से लेकर अद्यतन "नवआलोचना' (नियो-क्रिटिसिज्म़) तक के सिद्धांतों के ऐतिहासिक अनुशीलन से यह बात साफ हो जाती है। भारत में काव्य नाटकादि कृतियों को 'लक्ष्य ग्रंथ' तथा सैद्धांतिक ग्रंथों को 'लक्षण ग्रंथ' कहा जाता है। ये लक्षण ग्रंथ सदा लक्ष्य ग्रंथ के पश्चाद्भावनी तथा अनुगामी है और महान् कवि इनकी लीक को चुनौती देते देखे जाते हैं। काव्यशास्त्र के लिए पुराने नाम 'साहित्यशास्त्र' तथा 'अलंकारशास्त्र' हैं और साहित्य के व्यापक रचनात्मक वाङमय को समेटने पर इसे 'समीक्षाशास्त्र' भी कहा जाने लगा। मूलतः काव्यशास्त्रीय चिंतन शब्दकाव्य (महाकाव्य एवं मुक्तक) तथा दृश्यकाव्य (नाटक) के ही सम्बंध में सिद्धांत स्थिर करता देखा जाता है। अरस्तू के "पोयटिक्स" में कामेडी, ट्रैजेडी, तथा एपिक की समीक्षात्मक कसौटी का आकलन है और भरत का नाट्यशास्त्र केवल रूपक या दृश्यकाव्य की ही समीक्षा के सिद्धांत प्रस्तुत करता है। भारत और पश्चिम में यह चिंतन ई.पू.
उपन्यास गद्य लेखन की एक विधा है। .
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c72b3330e180a2d5e84bf129ef28da94a9d96801 | web | भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने असिस्टेंट डायरेक्टर, डिप्टी मैनेजर, फ़ूड एनालिस्ट, टेक्निकल ऑफिसर, सेंट्रल फ़ूड सेफ्टी ऑफिसर (CFSO), असिस्टेंट मैनेजर, हिंदी ट्रांसलेटर, आईटी असिस्टेंट और जूनियर असिस्टेंट जैसे विभिन्न पदों पर सीधी भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। गुजरात मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (जीएमआरसी) ने असिस्टेंट मैनेजर, जॉइंट जनरल मैनेजर, डिप्टी जनरल मैनेजर, मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर, सीनियर सेक्शन इंजीनियर, सेक्शन इंजीनियर, असिस्टेंट सेक्शन इंजीनियर, जूनियर इंजीनियरऔर मेंटेनर सहित एग्जीक्यूटिव और नॉन-एग्जीक्यूटिव पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। उम्मीदवार 12 नवंबर 2021 तक आवेदन कर सकते हैं। उत्तराखंड सबोर्डिनेट सर्विस सेलेक्शन कमीशन (UKSSSC) ने विभिन्न विभागों में भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। सभी इच्छुक उम्मीदवार UKSSSC Recruitment 2021 के लिए आधिकारिक वेबसाइट sssc. uk. gov. in पर 25 नवंबर 2021 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
पंजाब सबोर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड (PSSSB) ने डेयरी डेवलपमेंट इंस्पेक्टर पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। सभी इच्छुक और योग्य उम्मीदवार PSSSB Dairy Development Inspector Recruitment 2021 के लिए आधिकारिक वेबसाइट sssb. punjab. gov. in पर 31 अक्टूबर तक या उससे पहले ऑनलाइन मोड के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने ट्रेनी इंजीनियर और प्रोजेक्ट इंजीनियर पदों पर भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन मांगे हैं। सभी इच्छुक उम्मीदवार BEL Recruitment 2021 के लिए आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से 27 अक्टूबर तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
असिस्टेंट मैनेजर (रोलिंग स्टॉक) - उम्मीदवार को मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय / संस्थान से बी. ई/बी. टेक (इलेक्ट्रिकल / इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स / एप्लाइड इलेक्ट्रॉनिक्स / औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स / पावर इलेक्ट्रॉनिक्स / इंस्ट्रुमेंटेशन / मैकेनिकल या समकक्ष) इंजीनियरिंग ग्रेजुएट.
सेक्शन इंजीनियर (सिविल/ट्रैक (ओ एंड एम)) - उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय / संस्थान से सिविल इंजीनियरिंग में बी. ई/बी. टेक/डिप्लोमा होना चाहिए.
असिस्टेंट सेक्शन इंजीनियर (सिविल / ट्रैक (ओ एंड एम)) - उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय / संस्थान से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा होना चाहिए.
जूनियर इंजीनियर (सिविल/ट्रैक (ओ एंड एम)) - उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय / संस्थान से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा होना चाहिए.
गुजरात मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (जीएमआरसी) ने असिस्टेंट मैनेजर, जॉइंट जनरल मैनेजर, डिप्टी जनरल मैनेजर, मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर, सीनियर सेक्शन इंजीनियर, सेक्शन इंजीनियर, असिस्टेंट सेक्शन इंजीनियर, जूनियर इंजीनियरऔर मेंटेनर सहित एग्जीक्यूटिव और नॉन-एग्जीक्यूटिव पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना जारी किया है. इच्छुक उम्मीदवार 12 नवंबर 2021 तक या उससे पहले निर्धारित प्रारूप के माध्यम से पदों पर आवेदन कर सकते हैं।
उम्मीदवार FSSAI की वेबसाइट -fssai. gov. in पर '[email protected] (करियर)' सेक्शन में जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. FSSAI ऑनलाइन आवेदन लिंक 13 अक्टूबर 2021 को एक्टिव हो जाएगा जो 12 नवंबर 2021 तक उपलब्ध रहेगा.
टेक्निकल ऑफिसर - सीबीटी (स्टेज -1) + सीबीटी (स्टेज -2)
सेंट्रल फ़ूड सेफ्टी ऑफिसर - सीबीटी (स्टेज -1) + सीबीटी (स्टेज -2)
असिस्टेंट मैनेजर (आईटी) - सीबीटी (स्टेज -1) + सीबीटी (स्टेज -2)
असिस्टेंट मैनेजर - सीबीटी (स्टेज -1) + सीबीटी (स्टेज -2)
पर्सनल असिस्टेंट - सीबीटी + शॉर्टहैंड और टाइपिंग में स्किल.
असिस्टेंट डायरेक्टर और डिप्टी डायरेक्टर - सीबीटी (स्टेज -1) + सीबीटी (स्टेज -2) + इंटरव्यू.
शैक्षिक योग्यता और अनुभवः
डिप्टी मैनेजर - किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से पत्रकारिता या जनसंचार या जनसंपर्क में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री या डिप्लोमा (पूर्णकालिक पाठ्यक्रम) या मार्केटिंग में स्पेशलिटी के साथ एमबीए. प्रासंगिक क्षेत्र में छह साल का अनुभव.
सेंट्रल फ़ूड सेफ्टी ऑफिसर - खाद्य प्रौद्योगिकी या डेयरी प्रौद्योगिकी या जैव प्रौद्योगिकी या तेल प्रौद्योगिकी या कृषि विज्ञान या पशु चिकित्सा विज्ञान या जैव-रसायन विज्ञान या सूक्ष्म जीव विज्ञान में डिग्री या रसायन विज्ञान में मास्टर डिग्री या किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से चिकित्सा में डिग्री या कोई अन्य समकक्ष या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित मान्यता प्राप्त योग्यता.
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) आपको सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा अवसर दे रहा है. FSSAI द्वारा निकाली गयी 200 से अधिक रिक्तियों के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू हो गयी है. उल्लेखनीय है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने असिस्टेंट डायरेक्टर, डिप्टी मैनेजर, फ़ूड एनालिस्ट, टेक्निकल ऑफिसर, सेंट्रल फ़ूड सेफ्टी ऑफिसर (CFSO), असिस्टेंट मैनेजर, हिंदी ट्रांसलेटर, आईटी असिस्टेंट और जूनियर असिस्टेंट जैसे विभिन्न पदों पर सीधी भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है।
उम्मीदवार निम्न चरणों का पालन करके 29 अक्टूबर से 02 नवंबर 2021 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैंः
1. आधिकारिक वेबसाइट - joinindiannavy. gov. in पर जाएं.
2. यदि पहले से पंजीकृत नहीं है, तो अपनी ईमेल आईडी के साथ स्वयं को पंजीकृत करें.
3. अब, पंजीकृत ईमेल से लॉग-इन करें और 'वर्तमान अवसर' पर क्लिक करें.
4. 'अप्लाई करें' बटन पर क्लिक करें.
5. फॉर्म को पूरी तरह से भरें.
6. 'सबमिट' बटन पर क्लिक करने से पहले सुनिश्चित करें कि सभी विवरण सही हैं, सभी आवश्यक दस्तावेजों को मूल रूप में स्कैन करके अपलोड किया गया है.
7. अपना आवेदन जमा करें.
चयन निम्न आधार पर किया जाएगाः1. लिखित परीक्षा2. शारीरिक स्वास्थ्य परीक्षण (पीएफटी)भारतीय नौसेना एमआर परीक्षा पैटर्न 2021:1. वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न 2 खंडों में विभाजित होंगे अर्थात विज्ञान और गणित और सामान्य ज्ञान. 2. प्रश्न पत्र द्विभाषी होगा (हिंदी और अंग्रेजी)3. प्रश्न पत्र का स्तर 10वीं लेवल का होगा और परीक्षा का पाठ्यक्रम वेबसाइट http://www. joinindiannavy. gov. in पर उपलब्ध है. 4. लिखित परीक्षा में बैठने वाले सभी उम्मीदवारों का उसी दिन पीएफटी किया जाएगा. भारतीय नौसेना एमआर पीएफटी 2021:1. चयन के लिए फिजिकल फिटनेस टेस्ट (पीएफटी) में अर्हता प्राप्त करना अनिवार्य है। 2. पीएफटी में 7 मिनट में 1. 6 किलोमीटर की दौड़, 20 स्क्वाट (उथक बैठक) और 10 पुश-अप शामिल होंगे। पीएफटी से गुजरने वाले उम्मीदवार अपने जोखिम पर ऐसा करेंगे.
शिक्षा मंत्रालय, सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूल शिक्षा बोर्ड से 10 वीं उत्तीर्ण। भारत की।
भारतीय नौसेना एमआर आयु सीमाः
उम्मीदवारों का जन्म 01 अप्रैल 2002 से 30 सितंबर 2005 के बीच होना चाहिए (दोनों तिथियां सम्मिलित)
प्रारंभिक प्रशिक्षण अवधि के दौरान 14,600/- रूपये प्रतिमाह देय होगा.
प्रारंभिक प्रशिक्षण के सफल समापन पर, उन्हें रक्षा वेतन मैट्रिक्स (21,700 रुपये- 69,100 रुपये) के स्तर 3 में रखा जाएगा.
भारतीय नौसेना एमआर के लिए ऑनलाइन आवेदन 29 अक्टूबर 2021 से शुरू होगा. उम्मीदवार महत्वपूर्ण तिथियों, रिक्ति, वेतन, शैक्षिक योग्यता, आयु सीमा और अन्य डिटेल्स चेक कर सकते हैं।
इंडियन नेवी नें अविवाहित पुरुष उम्मीदवारों से सेलर के रूप में मैट्रिक रिक्रूट (MR) के लिए आवेदन आमंत्रित किये हैं. इसके तहत उम्मीदवारों का चयन अप्रैल 22 बैच के लिए किया जाएगा. इच्छुक एवं योग्य उम्मीदवार 2 नवंबर 2021 तक joinindiannavy. gov. in पर आवेदन कर सकते हैं.
इंडिया पोस्ट जम्मू और कश्मीर पोस्टल के रिक्त पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों के पास मान्यता प्राप्त संस्थान से 10वीं पास ( गणित, स्थानीय भाषा और अंग्रेजी (अनिवार्य या वैकल्पिक विषयों के रूप में अध्ययन किया गया) पास होना चाहिए। साथ ही कैंडिडेट्स ने कम से कम 10 वीं कक्षा तक स्थानीय भाषा का अध्ययन किया होना चाहिए। शैक्षिक योग्यता की पूर्ण जानकारी के लिए उम्मीदवार ऑफिशियल नोटिफिकेशन देखें।
भारतीय डाक ने इंडिया पोस्ट जम्मू और कश्मीर पोस्टल के लिए ग्रामीण डाक सेवक के पदों के लिए इच्छुक एवं योग्य उम्मीदवारों से आवेदन मांगे हैं। इन पदों पर आवेदन करने की अंतिम तिथि 29 अक्टूबर 2021 तक किये जा सकते हैं। इस भर्ती अभियान के जरिए ग्रामीण डाक सेवक (GDS) के कुल 266 पदों पर भर्ती की जाएगी। उम्मीदवार ऑफिशियल वेबसाइट appost. in के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।
सभी इच्छुक और योग्य उम्मीदवार FCI Watchman Recruitment 2021 के लिए आधिकारिक वेबसाइट fci-punjab-watch-ward. in पर 10 नवंबर तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को 250 आवेदन शुल्क जमा करना होगा। अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक वेबसाइट चेक करें।
उम्मीदवार किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से कक्षा 8वीं पास होना चाहिए। आयु सीमा की बात करें तो इन पदों पर भर्ती के लिए उम्मीदवार की आयु 18 साल से 25 साल के बीच होनी चाहिए। हालांकि, सरकारी नियमों के अनुसार आरक्षित कैटेगरी के उम्मीदवारों को अधिकतम आयु सीमा में छूट दी जाएगी। शैक्षिक योग्यता और आयु सीमा की विस्तृत जानकारी के लिए उम्मीदवार आधिकारिक नोटिफिकेशन चेक कर सकते हैं।
इस प्रक्रिया के माध्यम से कुल 860 पदों पर भर्ती की जाएगी। जिसमें, जनरल कैटेगरी के लिए 345 पद, एससी कैटेगरी के लिए 249 पद, ओबीसी कैटेगरी के लिए 180 पद और ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के लिए 86 पद शामिल हैं। इन पदों पर चयनित उम्मीदवारों को 23000 रुपए से 64000 रुपए महीने तक का वेतन दिया जाएगा।
फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) ने पंजाब राज्य में अपने डीपो और कार्यालयों में वॉचमैन के पदों पर भर्ती के लिए एक नोटिफिकेशन जारी किया है। सभी इच्छुक और योग्य उम्मीदवार इन पदों पर भर्ती के लिए आधिकारिक वेबसाइट fci-punjab-watch-ward. in पर 10 नवंबर तक या उससे पहले ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
इन पदों पर भर्ती के लिए उम्मीदवारों का चयन GATE 2021 में प्राप्त अंकों, शैक्षिक योग्यता और इंटरव्यू के आधार पर किया जाएगा। सभी इच्छुक और योग्य उम्मीदवार ONGC Graduate Apprentice Recruitment 2021 के लिए आधिकारिक वेबसाइट ongcindia. com पर 1 नवंबर 2021 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
आवेदन करने के लिए जनरल / ईडब्ल्यूएस / ओबीसी कैटेगरी के उम्मीदवारों को 300 रुपए आवेदन शुल्क भी जमा करना होगा। अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक वेबसाइट चेक कर सकते हैं।
इस प्रक्रिया के माध्यम से कुल 309 पदों पर भर्ती की जाएगी। जिसमें, AEE के कुल 220 पद, केमिस्ट के 14 पद, जियोलॉजिस्ट के 19 पद, जियोफिजिसिस्ट के 35 पद, मैटेरियल मैनेजमेंट ऑफिसर के 13 पद और ट्रांसपोर्ट ऑफिसर के 8 पद हैं। बता दें कि ग्रैजुएट ट्रेनी के कुल रिक्त पदों में जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 145 पद, ओबीसी कैटेगरी के लिए 62 पद, एससी कैटेगरी के लिए 40 पद, एसटी कैटेगरी के लिए 32 पद और ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के लिए 30 पद शामिल हैं।
ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ONGC) ने इंजीनियरिंग और जियो साइंस डिसिप्लिन में ग्रैजुएट ट्रेनी पदों पर भर्ती के लिए एक नोटिफिकेशन जारी किया है। सभी इच्छुक उम्मीदवार इन पदों पर भर्ती के लिए आधिकारिक वेबसाइट ongcindia. com के माध्यम से 1 नवंबर 2021 तक आवेदन कर सकते हैं।
इस पदों पर कैंडिडेट की नियुक्ति के बाद 70,000 से 80,000 रुपए महीने तक सैलरी मिलेगी। इस पद पर भर्ती के आयु सीमा की बात करें तो अधिकतम आयु सीमा 35 साल रखी गई है। इस पद पर नियुक्ति एक विधिवत गठित चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी। इच्छुक उम्मीदवार ugc. ac. in/jobs पर ऑनलाइन मोड में संबंधित दस्तावेजों के साथ आवेदन कर सकते हैं। आवेदन प्राप्त करने की आखिर तारीख 31 अक्टूबर 2021 है।
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81e3f0414f3a6f69a8b441f1f64ef85d934e6f38 | web | बारात में जाना कई कारण से टालता हूँ । मंगल कार्यों में हम जैसी चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है। महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिये। किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गये थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है। उनका यह शोध है कि महाभारत का युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती। और अगर कृष्णमेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता।
सारे युद्ध प्रौढ़ कुंवारों के अहं की तुष्टि के लिए होते हैं। 1948 में तेलंगाना में किसानों का सशस्त्र विद्रोह देश के वरिष्ठ कुंवारे विनोवस भावे के अहं की तुष्टि के लिए हुआ था। उनका अहं भूदान के रूप में तुष्ट हुआ।
अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न मायराम के मन में उस दिन नागपुर में बड़ा मौलिक विचार जागा था। कहने लगे, " बस, अब तुमलोगों की बारात में जाने की इच्छा है। " हम लोगों ने कहा - ' अब किशोरों जैसी बारात तो होगी नही। अब तो ऐसी बारात ऐसी होगी- किसी को भगा कर लाने के कारण हथकड़ी पहने हम होंगे और पीछे चलोगे तुम जमानत देने वाले। ऐसी बारात होगी। चाहो तो बैण्ड भी बजवा सकते हो।"
विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है। विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है। लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने मे जा रही है। पाव ताकत छिपाने मे जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में ... बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, - तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।
छात्र थोड़े चौंके। कुछ ही-ही करते भी पाये गये। मगर कुछ नहीं।
एक तरुण के साथ सालों मेहनत करके मैंने उसके खयालात संवारे थे। वह शादी के मंडप में बैठा तो ससुर से बच्चे की तरह मचलकर बोला, "बाबूजी, हम तो वेस्पा लेंगे, वेस्पा के बिना कौर नहीं उठायेंगे।" लड़की के बाप का चेहरा फक। जी हुआ, जूता उतारकर पांच इस लड़के को मारूं और पच्चीस खुद अपने को। समस्या यों सुलझी कि लड़की के बाप ने साल भर में वेस्पा देने का वादा किया, नेग के लिए बाजार से वेस्पा का खिलौना मंगाकर थाली में रखा, फिर सबा रुपया रखा और दामाद को भेंट किया। सबा रुपया तो मरते वक्त गोदान के निमित्त दिया जाता है न। हां, मेरे उस तरुण दोस्त की प्रगतिशीलता का गोदान हो रहा था।
बारात यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ , खासकर लौटते वक्त जब बाराती बेकार बोझ हो जाता है । अगर जी भर दहेज न मिले, तो वर का बाप बरातियों को दुश्मन समझता है। मैं सावधानी बरतता हूँ कि बारात की विदा के पहले ही कुछ बहाना करके किराया लेकर लौट पड़ता हूँ।
एक बारात की वापसी मुझे याद है।
हम पांच मित्रों ने तय किया कि शाम ४ बजे की बस से वापस चलें। पन्ना से इसी कम्पनी की बस सतना के लिये घण्टे-भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुंच जायेंगे। हममें से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था, इसलिये वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं बस डाकिन है।
बस को देखा तो श्रद्धा उभर पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदीयों के अनुभव के निशान लिये हुए थी। लोग इसलिए सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!
बस-कम्पनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमनें उनसे पूछा-यह बस चलती है? वह बोले-चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी। हमनें कहा-वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने-आप चलती है यह? उन्होंने कहा-हां जी और कैसे चलेगी?
गज़ब हो गया। ऐसी बस अपने-आप चलती है!
हम आगा-पीछा करने लगे। पर डाक्टर मित्र ने कहा-डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नई-नवेली बसों से ज़्यादा विशवनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी। हम बैठ गये। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे, जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आखें कह रही थी - आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है सो जायेगा - राजा, रंक, फ़कीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।
इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा लगा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। कांच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फौरन खिड़की से दूर सरक गये। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था हमारी सीट के नीचे इंजन है।
बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि गांधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दुसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता, सीट बॉडी को छोड़ कर आगे निकल गयी। कभी लगता कि सीट को छोड़ कर बॉडी आगे भागे जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेद-भाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हमपर बैठी है।
एकाएक बस रूक गयी। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस कम्पनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएंगे, जैसे मां बच्चे के मुंह में दूध की शीशी लगाती है।
बस की रफ्तार अब पन्द्रह-बीस मील हो गयी थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फेल हो सकता है, स्टीयरींग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ हरे-हरे पेड़ थे, जिन पर पंछी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इन्तज़ार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।
एकाएक फिर बस रूकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं, पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया था। कम्पनी के हिस्सेदार कह रहे थे - बस तो फर्स्ट क्लास है जी! ये तो इत्तफाक की बात है। क्षीण चांदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गयी हो। हमें ग्लानी हो रही थी कि इस बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अन्त्येष्टी करनी पड़ेगी।
हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गयी थी।
धीरे-धीरे वृद्धा की आखों की ज्योति जाने लगी। चांदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती - निकल जाओ बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।
एक पुलिया के उपर पहुंचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। बस बहुत ज़ोर से हिलकर थम गयी। अगर स्पीड में होती तो उछल कर नाले में गिर जाती। मैंने उस कम्पनी के हिस्सेदार की तरफ श्रद्धा भाव से देखा। वह टायरों क हाल जानते हैं, फिर भी जान हथेली पर ले कर इसी बस से सफर करते हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान-भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते, तो देवता बांहें पसारे उसका इन्तज़ार करते। कहते - वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।
दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी - पन्ना, क्या, कहीं भी, कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ज़िन्दगी इसी बस में गुज़ारनी है और इससे सीधे उस लोक की ओर प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गये। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गये। चिन्ता जाती रही। हंसी मज़ाक चालू हो गया।
ठण्ड बढ़ रही थी । खिड़कियाँ खुली ही थीं। डाक्टर ने कहा - ' गलती हो गयी। 'कुछ' पीने को ले आता तो ठीक रहता । ' एक गाँव पर बस रुकी तो डाक्टर फौरन उतरा । ड्राइवर से बोला - 'जरा रोकना ! नारियल ले आऊँ । आगे मढ़िया पर फोड़ना है । डाक्टर झोपड़ियों के पीछे गया और देशी शराब की बोतल ले आया । छागलों मे भर कर हम लोगों ने पीना शुरु किया ।
इसके बाद किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। पन्ना से पहले ही सारे मुसाफिर उतर चुके थे । बस कम्पनी के हिस्सेदार शहर के बाहर ही अपने घर पर उतर गये। बस शहर मे अपने ठिकाने पर रुकी। कम्पनी के दो मालिक रजाइयों मे दुबके बैठे थे। रात का एक बजा था। हम पाँचों उतरे। मैं सड़क के किनारे खड़ा रहा। डाक्टर भी मेरे पास खड़ा हो कर बोतल से अंतिम घूँट लेने लगा। बाकि तीन मित्र बस-मालिकों पर झपटे। उनकी गर्म डाँट हम सुन रहे थे। पर वे निराश लौटे। बस-मालिकों ने कह दिया था, सतना की बस तो चार- पाँच घण्टे पहले जा चुकी थी। अब लौटती होगी। अब तो बस सवेरे ही मिलेगी।
आसपास देखा, सारी दुकानें, होटल बन्द। ठण्ड कड़ाके की। भूख भी खूब लग रही थी। तभी डाक्टर बस-मालिकों के पास गया। पाँचेक मिनट मे उनके साथ लौटा तो बदला हुआ था। बड़े अदब से मुझसे कहने लगा," सर, नाराज़ मत होइए। सरदार जी कुछ इंतजाम करेंगे। सर,सर उन्हें अफ़सोस है कि आपको तक़लीफ़ हुई। "
अभी डाक्टर बेतकुल्लफी से बात कर रहा था और अब मुझे 'सर' कह रहा है। बात क्या है? कही ठर्रा ज्यादा असर तो नहीं कर गया। मैने कहा, "यह तुमने क्या 'सर-सर' लगा रखी है ? "
उसने वैसे ही झुक कर कहा, " सर, नाराज़ मत होइए ! सर, कुछ इंतजाम हुआ जाता है। "
मुझे तब भी कुछ समझ में नही आया। डाक्टर भी परेशान था कि मैं कुछ समझ क्यों नही रहा हूँ। वह मुझे अलग ले गया और समझाया, " मैने इन लोगों से कहा है कि तुम संसद सदस्य हो। इधर जांच करने आए हो।मैं एक क्लर्क हूँ, जिसे साहब ने एम. पी. को सतना पहुँचाने के लिए भेजा है। मैने इनसे कहा कि सरदारजी, मुझ गरीब की तो गर्दन कटेगी ही, आपकी भी लेवा-देई हो जायेगी। वह स्पेशल बस से सतना भेजने का इंतजाम कर देगा। ज़रा थोड़ा एम. पी. पन तो दिखाओ। उल्लू की तरह क्यों पेश आ रहे हो। "
मैं समझ गया कि मेरी काली शेरवानी काम आ गयी है। यह काली शेरवानी और ये बड़े बाल मुझे कोई रुप दे देते हैं। नेता भी दिखता हूँ, शायर भी और अगर बाल सूखे -बिखरे हों तो जुम्मन शहनाईवाले का भी धोखा हो जाता है।
मैने मिथ्याचार का आत्मबल बटोरा और लौटा तो ठीक संसद सदस्य की तरह। आते ही सरदारजी से रोब से पूछा, " सरदारजी, आर. टी. ओ. से कब तक इस बस को चलाने का सौदा हो गया है? "
सरदारजी घबरा उठे। डाक्टर खुश कि मैने फर्स्ट क्लास रोल किया है।
रोबदार संसद सदस्य का एक वाक्य काफ़ी है, यह सोंचकर मैं दूर खड़े होकर सिगरेट पीने लगा। सरदारजी ने वहीं मेरे लिये कुर्सी डलवा दी। वह डरे हुए थे और डरा हुआ मैं भी था। मेरा डर यह था कि कहीं पूछताछ होने लगी कि मैं कौन संसद सदस्य हूँ तो क्या कहूँगा। याद आया कि अपने मित्र महेशदत्त मिश्र का नाम धारण कर लूँगा। गाँधीवादी होने के नाते, वह थोड़ा झूठ बोलकर मुझे बचा ही लेंगे।
मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। झूठ यदि जम जाये तो सत्य से ज्यादा अभय देता है। मैं वहीं बैठे-बैठे डाक्टर से चीखकर बोला, " बाबू , यहाँ क्या कयामत तक बैठे रहना पड़ेगा? इधर कहीं फोन हो तो जरा कलेक्टर को इत्तिला कर दो। वह ग़ाड़ी का इंतजाम कर देंगे। "
डाक्टर वहीं से बोला, " सर, बस एक मिनट! जस्ट ए मिनट सर !" थोड़ी देर बाद सरदारजी ने एक नयी बस निकलवायी। मुझे सादर बैठाया गया। साथियों को बैठाया। बस चल पड़ी।
मुझे एम. पी. पन काफी भाड़ी पड़ रहा था। मैं दोस्तों के बीच अजनबी की तरह अकड़ा बैठा था। डाक्टर बार बार 'सर' कहता था और बस का मालिक 'हुज़ूर'।
सतना में जब रेलवे के मुसाफिरखाने मे पहुँचे तब डाक्टर ने कहा, " अब तीन घण्टे लगातार तुम मुझे 'सर' कहो। मेरी बहुत तौहीन हो चुकी है।"
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9497c9bec465d1d883602d520548b2b9ef354b5cd129cba075ef2cc60428440a | pdf | ७) 'अथर्वसंहिता' में चारों वेदों के अतन्तर पुराणों की उत्पत्ति का निर्देश किया गया है, जिससे पुराण-विषय के प्राचीनतम अस्तित्व का पता चलता है । कदाचित् 'अथर्व-संहिता' का लक्ष्य प्राचीनतम पुराण-संहिता से था; किन्तु इससे भी इतना तो प्रमाण मिलता ही है कि पुराण-विषय भी वैदिक युग की ही उपज थी ।
इस प्रकार लगभग १२वीं शताब्दी ई० से लेकर मौर्यवंश ( ३७४-१९० ई० पू० ), आन्ध्रवंश ( २१२ ई० पू० से ३३८ ई० ), गुप्तवंश ( २७५-५१० ई० ), 'महाभारत' ( ५०० ई० पू० ), अर्थशास्त्र (३०० ई० पू०), 'कल्पसूत्र' ( ७०० ई० पू० ), उपनिषद् ( १००० ई० पू० ) और वैदिक संहिताओं ( २५०० ई० पू० ) तक पुराणों के प्राचीनतम और आधुनिक स्वरूपों की समर्थ चर्चाएँ विद्यमान होने के कारण उनकी पूर्व सीमा वैदिक युग और उत्तरसीमा गुप्त साम्राज्य तक निर्धारित की जा सकती है ।
पुराणों के सम्बन्ध में पार्जिटर साहब ने एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम है 'ऐंशियेण्ट इंडियन हिस्टॉरिकल ट्रेडिशन्स' । ट्रेडिशन्स' । यह पुस्तक उनके पुराण-साहित्य और भारतीय परंपराओं के प्रति गम्भीर ज्ञान का परिचय देती है। इसमें उन्होंने पुराणों के सम्बन्ध में प्रचलित भ्रान्त धारणाओं का निराकरण करने के साथ-साथ पुराणों की महत्ता पर भी प्रकाश डाला है । उन्होंने वेदों को भी पुराणों की भाँति विरुदावली कहा है। जिस प्रकार राजवंशों की विरुदावली पुराणों में वर्णित है, उसी प्रकार ऋषिवंशों की विरुदावली के परिचायक ग्रंथ 'वेद' हैं ।
अपने सन्तुलित एवं गम्भीर अध्ययन के आधार पर पार्जिंटर साहब का कथन है कि पुराण मूल रूप में ईस्वी सन् की प्रारंभिक शताब्दियों के बाद के नहीं हो सकते हैं। पुराणों में 'अग्निपुराण' सब से प्राचीन है । 'अग्निपुराण' का समय इतिहासकारों ने चौथी शताब्दी या इससे पहले का बताया है। पुराण-ग्रन्थों की रचना के सम्बन्ध में लोकमान्य तिलक का मत है कि उनका समय ईस्वी सन् के दूसरे शतक से बाद का कदाचित् नहीं हो सकता है।
'अग्निपुराण' की रचना के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं । श्रीयुत सुशीलकुमार दे के मतानुसार 'अग्निपुराण' के अलंकार प्रकरण, दण्डी और भामह के पश्चात् और 'ध्वन्यालोक' के कृतिकार श्री आनन्दवर्धन से पहले ईसा की नवम शताब्दी के लगभग रचा गया। श्री काणे साहब 'अग्निपुराण' को ७०० ई० के बाद और उसके काव्य-शास्त्र विषयक अंश की रचना ९०० ई० के बाद की स्वीकार करते हैं। इन दोनों विद्वानों की स्थापनाओं का विधिवत् खण्डन करके श्री कन्हैयालाल पोद्दार ने अपना सप्रमाण मंतव्य दिया है कि 'अग्निपुराण' के काव्य प्रकरण का ध्यान देकर अध्ययन करने से यह निर्विवाद विदित हो सकता है कि वह वर्णन भामह, दण्डी, उद्भट और ध्वनिकार आदि सभी प्राचीन साहित्याचार्यों से विलक्षण है और वह काव्य के विकास क्रम के आधार पर 'नाट्यशास्त्र' के पश्चात् और भामहादि के पूर्व का मध्यकालीन रूप है ।
डॉ० हजारा ने पुराण- साहित्य पर खोजपूर्ण कार्य किया है और उनके ऐतिहासिक स्तर पर गम्भीर प्रकाश डाला है। उन्होंने कालक्रम से प्राचीनतम महापुराणों में 'मार्कण्डेय', 'ब्रह्माण्ड', 'विष्णु', 'मत्स्य', 'भागवत' एवं 'कूर्म' की गणना की है ।
पहले दो पुराणों को उन्होंने 'विष्णुपुराण' से पहले का रचा माना है । शेष पुराणों में 'विष्णु' ४०० ई० 'वायु' ५०० ई० 'भागवत' ६००-७०० ई० और 'कूर्म' ७०० ई० में रचे गए। उन्होंने 'हरिवंश' का रचनाकाल भी ४०० ई० सिद्ध किया है। उनके मतानुसार 'अग्निपुराण' की रचना यद्यपि ८०० ई० में हुई, किन्तु उसकी कुछ सामग्री इससे पहले की और कुछ इससे बाद की है । यद्यपि मूल 'नारदीय पुराण', संप्रति अप्राप्य है, तथापि प्रचलित 'नारदीय पुराण' की रचना दसवीं शताब्दी में हो चुकी थी और बाद में उसका कलेवर प्रक्षेपों से बढ़ता गया । इसी प्रकार 'ब्रह्मपुराण' की कुछ सामग्री बहुत बाद की होते हुए भी उसकी रचना दसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । 'स्कन्द पुराण' की कुछ सामग्री आठवीं शताब्दी में और अधिकांश उसके बाद निर्मित हुई । 'गरुडपुराण' की रचना दसवीं शताब्दी में हुई। इसी प्रकार 'पद्मपुराण' की रचना १२०० - १५०० ई० के
बीच हुई । 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' की रचना यद्यपि ७०० ई० पू० हो चुकी थी तथापि उसका वर्तमान रूप सोलहवीं शताब्दी ई० का है ।
पुराणग्रन्थों के संबंध में इधर कुछ नई सामग्री प्रकाश में आई है। यह स्फुट लेखों में है; किन्तु है बड़े महत्त्व की । आज से लगभग २०-२२ वर्ष पूर्व पत्र-पत्रिकाओं में एक विवाद उठाया गया था कि 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' की रचना किसी कवि ने १६वीं शताब्दी में की है, एवं उस पर गीतगोविन्दकार जयदेव का प्रभाव है। साथ ही इस संबंध में यह भी प्रचारित किया गया था कि इस पुराणग्रंथ पर १६वीं शताब्दी की सामाजिक अवनति तथा तत्सामयिक दुर्नीति-परायण वातावरण की छाप है; बल्कि यह भी कहा गया कि उस युग की सामाजिक चरित्रहीनता का दिग्दर्शन भी 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में निहित है। इसी प्रसंग में यह भी उड़ाया गया कि 'भागवत' का अंतिम संस्करण १०वीं शताब्दी में हुआ ।
इस मत के विपक्ष में भी कम नहीं लिखा गया। इस संबंध में कुछ विद्वानों ने तो यहाँ तक कहा कि 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' की रचना की बात १६वीं शताब्दी तो अलग रही, उसकी रचना कालिदास से भी पहिले हो चुकी थी ।
ये दोनों प्रकार की बातें अतिरंजनापूर्ण हैं । समीक्षा का यह एकांगी दृष्टिकोण है, जिससे सचाई का पता नहीं लगाया जा सकता है ।
'ब्रह्मपुराण' की रचना के संबंध में भी कहा जाता है कि ११वीं सदी में भवदेव भट्ट ने उड़ीसा के भुवनेश्वर क्षेत्र में अनंत वासुदेव का एक मंदिर बनवाया था । 'ब्रह्मपुराण' में अनंत वासुदेव का माहात्म्य तो वर्णित है; किन्तु इस मंदिर का कहीं भी उल्लेख नहीं है। यदि 'ब्रह्मपुराण' की रचना उक्त मन्दिर के निर्माणानन्तर हुई होती तो उसमें मंदिर का उल्लेख अवश्य हुआ होता । इसके अतिरिक्त 'महाभारत' में 'ब्रह्मपुराण के अनेक श्लोक उद्धृत हैं। इसके विपरीत 'ब्रह्मपुराण' में 'महाभारत' का कोई भी श्लोक उद्धृत हुआ नहीं मिलता है। इसलिए निश्चित ही 'ब्रह्मपुराण' की रचना 'महाभारत' से पहिले हुई होगी ।
'विष्णुधर्मोत्तर पुराण' का संभावित काल बूलर ने सातवीं शताब्दी
बताया है, जो कि काश्मीर में रचा गया। इसी प्रकार 'नृसिंहपुराण' की रचना ४००-५०० ई० के बीच हुई । 'ब्रह्मपुराण' की एक हस्तलिखित प्रति १६४६ वि० की उपलब्ध है । इस दृष्टि से इसका रचनाकाल कम से कम १४वीं १५वीं शताब्दी में होना चाहिए । 'सौरपुराण' की रचना विद्वानों ने ९५० - १०५० ई० के बीच बताई है ।
पुराण-ग्रन्थों की रचना के सम्बन्ध में इतनी ही सूचनाएँ उपलब्ध हैं। अन्यत्र भी पुराणों के ऐतिहासिक स्तर पर कुछ विचार सामग्री देखने को मिलती है; किन्तु उनमें कल्पना की प्रचुरता है। मेरी दृष्टि में पार्जिटर साहव और डॉ० हजारा की एतत्सम्बन्धी स्थापनाएँ ही अधिक युक्तिसंगत एवं विश्वसनीय प्रतीत हुई हैं ।
यद्यपि महापुराणों की संख्या अष्टादश है; किन्तु 'वायुपुराण' और 'देवीभागवत' को जोड़कर वे बीस तक पहुँच जाते हैं। इसी प्रकार उपपुराणों की संख्या भी लगभग ३० तक पहुँच जाती है । बहुत से लोगों का कथन है कि इन उपपुराणों की रचना महापुराणों के बाद हुई; किन्तु मौलिकता और प्राचीनता की दृष्टि से महापुराणों से किसी भी प्रकार उप-पुराणों का महत्व कम नहीं है । ये ३० उपपुराण हैंः
१ सनत्कुमार, २ नरसिंह ३ बृहन्नारदीय ४ शिवधर्म, ५ दुर्वासस् ६ कपिल ७ मानव ८ उशनस् ९ वारुण १० कालिका ११ साम्ब १२ नंदकेश्वर १३ सौर १४ पाराशर १५ आदित्य १६ ब्रह्माण्ड १७ माहेश्वर १८ भागवत १९ वाशिष्ट २० कौर्म २१ भार्गव २२ आदि २३ मुद्गल २४ कल्कि २५ देवी २६ महाभागवत २७ बृहद्धर्म २८ परानंद २९ पशुपति और ३० हरिवंश ।
'महाभारत' के खिल- पर्व का ही दूसरा नाम 'हरिवंशपुराण' है। इसी की लोकसंख्या मिलाकर 'महाभारत' के श्लोक एक लाख तक पहुँचते हैं। बहुत संभव है, जैसा कि अनेक विद्वानों का मत भी है, यह अंश पीछे से 'महाभारत' में जोड़ दिया गया हो ।
जैन और बौद्ध पुराण
वेद, वैदिक-साहित्य वेदांग और पुराणों की भाँति जैन धर्मावलंबियों के वेद, वेदांग और पुराण आदि हैं, जो अपना स्वतंत्र महत्व रखते हैं। भारतीय दर्शनशास्त्र के इतिहास में मध्ययुगीन न्याय के जन्मदाता जैन-बौद्ध ही थे । वेद - अविश्वासी होने के कारण जैन-बौद्ध दर्शन को नास्तिक संज्ञा दी गई है । पड़ आस्तिक दर्शनों की भाँति नास्तिक दर्शनों की संख्या भी छह है । पहिला नास्तिक दर्शन चार्वाक प्रणीत, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ बौद्धाचार्यों द्वारा प्रवर्तित और छठा जैन-दर्शन है। आस्तिक- दर्शन के पट्-संप्रदायों ने नास्तिक दर्शनों के ऐतिहासिक महत्व को बराबर स्वीकार किया है ।
जैन और बौद्ध एक ही बृहद् हिन्दू जाति के अंग हैं। आज जिस प्रकार अपनी मूलभूमि भारत में उनकी जातीय परंपरा कुछ क्षीण-सी हो गई है, उसी भाँति उनका बहुत सारा साहित्य भी आज विलुप्त हो चुका है। इस प्रसंग में हम केवल उनके पुराण-ग्रंथों की ही चर्चा करेंगे ।
ब्राह्मणधर्म के नाम से जिस प्रकार अष्टादश महापुराणों तथा अनेक उपपुराणों का उल्लेख हुआ है, उसी प्रकार जैनधर्म के भी अपने चतुर्विंशति पुराण है । इन चतुर्विंशति पुराण ग्रंथों में उनके चौबीस तीर्थंकर महात्माओं का माहात्म्य वर्णित है । जैनियों के पुराण ब्राह्मण पुराणों की भाँति पंचलणी
न होकर :
'पुरातनं पुराणं स्यात्तन्मइन्महदाश्रयात्'
अपने महापुरुषों की पुरातन कथा के प्रतिपादक ग्रंथ हैं । जैनियों के २४ पुराणों में क्रमशः उनके २४ तीर्थंकर महात्माओं की कथायें वर्णित हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैंः १ आदि पुराण, २ अजितनाथ पुराण, ३ संभवनाथ पुराण, ४ अभिनन्द पुराण, ५ सुमतिनाथ पुराण, ६ पद्मप्रभ पुराण, ७ सुपार्श्व पुराण, ८ चंद्रप्रभ पुराण, ९ पुण्यदंत पुराण, १० शीतलनाथ पुराण, ११ श्रेयांश पुराण, १२ वासुपूज्य पुराण, १३ विमलनाथ पुराण, १४ अनंतजीत पुराण; १५ धर्मनाथ पुराण, १६ शांतिनाथ पुराण, १७ कुन्थुनाथ पुराण, १८ अरमाथ पुराण, १९ मल्लिनाथ पुराण, २० मुनिसुव्रत पुराण, २१ नेमिनाथ पुराण, २२ नेमिनाथ पुराण, २३ पार्श्वनाथ पुराण, और २४ सम्मति पुराण ।
इन २४ जैन-पुराणों में भी सुप्रसिद्ध पुराणों के नाम हैं : आदि पुराण, पद्मप्रभ पुराण, अरिष्टनेमि पुराण (जिसे हरिवंश पुराण भी कहते हैं ) और उत्तर पुराण । इनमें भी 'आदि पुराण' और 'उत्तर पुराण' का विशेष महत्व है।
आदि पुराण
इसमें जैनों के प्रथम तीर्थंकर महात्मा ऋषभदेव की कथायें वर्णित हैं। ऋषभदेवजी के संबंध में जैन परम्परा है कि उनका जन्म सर्वार्थसिद्धि योग, उत्तराषाढ़ नक्षत्र, धन राशि, चैत्र मास की कृष्णाष्टमी को इक्ष्वाकुवंशीय राजा नाभि और रानी मरुदेवी के गर्भ से विनीता नामक नगरी में हुआ था। यह भी परंपरागत विश्वास है कि वे चतुर्युगी अर्थात् चौरासी लाख वर्ष जीवित रहकर मोक्ष को प्राप्त हुए । 'भागवत' में इनकी महिमा का बड़ा बखान है । 'भागवत' में भी इनके माता-पिता के उक्त नाम ही बताये गये हैं और इन्हें भगवद्-गुणसंपन्न कहा गया है। इनकी पत्नी का नाम इंद्रकन्या जयन्ती बताया गया है, जिससे कि इनके धर्मात्मा, वेदज्ञ और भागवतधर्मानुयायी भरत, कुशावर्त आदि सौ पुत्र हुए । 'भागवत' में प्रोक्त, बाईस अवतारों में इन्हें आठवाँ अवतार बताया गया है ।
इस पुराण में ४७ पर्व हैं। इसके रचयिता जिनसेन हुए। जिनसेन ने ग्रंथारंभ करते हुए नयकेशरी, सिद्धसेन, वादिचूड़ामणि, समंतभद्र, श्रीदत्त, यशोभद्र, चंद्रोदयकर, प्रभाचंद्र, मुनीश्वर, शिवकोटि, जटाचार्य ( सिंहनंदी), कथालंकारकार काणभिक्षु ( देवमुनि), कवितीर्थ, भट्टारक, वीरसेन और वागर्थ-संग्रहकार जयसेन प्रभृति गुरुजनों का नाम स्मरण किया है, जिससे ग्रंथ के रचनाकाल में पर्याप्त सहायता मिलती है।
इस पुराण - ग्रंथ में सृष्टि-तत्व के संबंध में जो विचार किया गया है, इसको देखकर ऐसा विदित होता है कि जैसे उन्होंने अपने उत्तरभावी आचार्य शंकर के अद्वैत ब्रह्म-संबंधी विचारों का खंडन कर दिया है।
उत्तर पुराण
यह 'आदि पुराण' का उत्तरार्द्ध भाग है। आचार्य जिनसेन 'आदि पुराण के ४४ सर्ग लिखने के बाद ही निर्वाण को प्राप्त हुए। तदनन्तर ४५ सर्ग से |
35bb64a20f18d783c7c640368a83bd41325be41d4064e5e49511fad646be35ae | pdf | सीही से चार कोस पर स्थित एक गांव के पेड़ के नीचे तालाव के किनारे जाकर रहने लगे। वहां वे ज्योतिषी बनकर शकुन बताने लगे जो ठीक निकलते थे । इससे वे प्रतिष्ठित हुए और 'स्वामी' कहलाये । फलतः सूर की अपनी हीनताग्रंथि का कुछ शमन हुआ । साथ ही वे विरह के पदों में अपनी हीनताग्रस्त चेतना को भूल जाते थे । किन्तु कुछ ही दिनों में सूर ज्योतिषी की मिथ्या प्रतिष्ठा के जाल को छोड़कर निरन्तर साहित्यक-साधना के लिए ब्रज की ओर चल पड़े और गौ-घाट पर आकर स्थायी रूप से रहने लगे ।
2. वल्लभाचार्य जी से भेंट : सूर के व्यक्तित्व में मोड़
गऊघाट पर वल्लभाचार्य जी के आने की सूचना पाकर सूर ने उनसे भेंट की । आचार्य जी ने पहले ही सूर के गायन की वात सुन ली थी। इसलिए उन्होंने सूर से भगवद्यशवर्णन करने के लिए कहा । सूर ने विनयभाव से गायाहरि, हो सब पतितनि को नायक ।
को करि सकै बरावरि मेरी, और नहीं कोउ लायक ॥
आचार्य जी को उसमें सूर का घिधियाना पसन्द नहीं आया और उन्होंने सूर को धैर्य देते हुए भगवद्लीला वर्णन करने को कहा । सूर ने पहले की ही भांति अपने दैन्य और प्रभु के महत्त्व को लक्ष्य करते हुए गाया और पुरुषोत्तम की लीलाओं की अनभिज्ञता व्यक्त की। तब आचार्य जी ने उन्हें पुरुषोत्तम की लीलाओं का मर्मबोध कराने का आश्वासन दिया ।
चार्य जी की बातों से आनन्दित सूर उनकी शरण में आये । आचार्य जी ने उनके कानों में अष्टाक्षर मंत्र सुनाकर उनकी समर्परण-दीक्षा पूरी की। फिर उन्होंने दशमस्कंध की अनुक्रमणिका, भागवत की स्वरचित टीका 'सुबोधिनी और पुरुषोत्तम सहस्रनाम सुनाया । इससे सूर को हुए लाभ ये हैं1. सूर के हृदय में प्रोम-लक्षरगा- भक्ति स्थापित हुई । 2. उन्हें सम्पूर्ण भागवत स्पष्ट हो गई ।
3. उन्होंने लीला- रहस्य जान लिया ।
4. वे गेय की सीमाओं से परिचित हुए ।
5. उनकी पलायनवादी वृत्ति को स्थिरता मिली ।
6. उनके अनिश्चित व्यक्तित्व को एक निश्चित भावदिशा मिली ।
7. उन्हें अपनी हीनता ग्रस्त चेतना को गौरवमय बनाने में सहायता मिली ।
3. शरणागती के पश्चात् के निर्माता तत्त्व
क. गोकुल : वल्लभाचार्य जी के प्रति शरणागत होने के बाद सूर उनके साथ गोकुल आये । वहां उन्होंने श्रीकृष्ण की वाल लीलाओं के स्थल देखकर उनसे भावात्मक तादात्म्य स्थापित किया । तव उनके समक्ष आचार्यजी द्वारा बतायी गई पुरुषोत्तम की लीलायें स्फुरित हुई और उन्होने 'सोभित कर नवनीत लिए' वाला पद गाया जो नवनीतप्रिय जी का कीर्तन तथा गोकुल की बाललीला का वर्णन है । इस प्रकार गोकुल ने सूर को वाललीला साहित्य की प्रथम प्रेरणा स्फूर्ति प्रदान की ।
ख. श्रीनाथ जी का मंदिर : सूर वल्लभाचार्य सहित गोकुल से पारसौली आए । पारसौली के गिरिराज पर श्रीनाथ जी का मंदिर था । श्रीनाथजी वल्लभ संप्रदाय के सेव्य थे । सूर नित्य श्रीनाथ जी के दर्शन करते थे । श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए भगवान् का साक्षात्कार ही था । श्रीनाथ जी धीरे-धीरे सूर के भ्रमित व्यक्तित्व के आकर्षण केन्द्र बने । उनका साक्षात्कार कर सूर जिस भावावेश में गा उठते थे, उसमें समस्त रस- कोश उमड़ पड़ता था । सूर के समस्त काव्य का स्रोत श्रीनाथ जी का मंदिर ही रहा । अतः श्रीनाथ जी का मंदिर सूर की प्रातिभ साधना का केन्द्र माना जा सकता है ।
ग. गोस्वामी विट्ठलनाथ : गोस्वामी विट्ठलनाथ वल्लभाचार्य के पुत्र थे । उनके समय तक सम्प्रदाय में माधुर्य भाव का प्रवेश हो गया था । सूर भी उनके संपर्क में ग्राने के बाद राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं का गान करने लगे। इस प्रकार गोस्वामी विठ्ठलनाथ जी से सूर को माधुर्य - साहित्य-रचना की प्रेरणा प्राप्त हुई ।
आ) व्यक्तित्व की विशेषतायें
सूर के व्यक्तित्व की पहली विशेषता उनकी रागात्मक वृत्ति से समन्वित भक्तिभावना है। वे श्रीनाथ जी के मन्दिर मे रहते समय कृष्ण-सखा के रूप मे सख्य भावाश्रित समाधि में लीन रहते थे। उनकी सस्य भावना इतनी घनी और अनन्य थी कि वे अपने वीच श्रीनाथ जी की भावना की उपस्थिति का अनुभव करते थे ।
शेप समय में वे 'सखी भावापन्न' रहते थे। उन्होंने भावना को सजीव रखने के लिए उसका विस्तार भी कर दिया था ।
सूर के व्यक्तित्व की दूसरी विशेषता है भगवान के प्रति अनन्यता से युक्त स्वाभिमान । इसीलिए वे व्यक्ति विशेष की प्रशंसा करनेवाले नहीं थे । एक वार अकबर ने सूर से भेंट की थी और उन्होंने उनसे यशोगान के लिए प्रार्थना की थी । किन्तु सूर ने गाया कि उनके हृदय में नंदनंदन के अतिरिक्त किसी दूसरे व्यक्ति को स्थान नहीं है -
नाहिन रह्यो मन में ठौर । नन्दनन्दन अछत कैसे
उर और ?
इससे सूर की भगवान के प्रति अनन्यता और अकबर जैसे सम्राट के प्रति निर्भीकता व्यक्त होती है ।
(इ) सांप्रदायिक महत्त्व
सूर का सम्प्रदाय में विशेष महत्त्व रहा है । वल्लभाचार्य जी सूर को सदा रखते थे और संप्रदाय की निगूढ़-सी-निगूढ़ बातें भी उन्हें बताते थे । वे सूर को 'सूर सागर' कहा करते थे । उनका आशय यह था कि जैसे सागराध है, वैसे सूरदास जी का हृदय अगाध है; और जैसे समुद्र में समस्त पदार्थ होते हैं, वैसे ही सूर ने जो पद गाये है । उनमें ज्ञान, वैराग्य, भक्ति-भेद तथा अनेक भागवत अवतार और उन सबकी लीलाओं का वर्णन है ।
गोस्वामी विट्ठलनाथ सूर को 'पुष्टिमार्ग का जहाज' कहते थे । जिस प्रकार जहाज अनेक वस्तुओं से भरी रहती है, उसी प्रकार सूरदास जी के हृदय में लौकिक वस्तु नाना प्रकार की भरी हुई थी । गोस्वामी ने सूर की मृत्यु के समय जो बात कही है, उससे भी सूर का सांप्रदायिक महत्त्व स्पष्ट होता है - "पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, सो जाकों कछू लैनौ होय, सो लेउ और उहां जायकै सूरदास जी कों देखो ।"
सूरदास जी श्रीनाथ जी के कीर्तन संस्थान के पहले नियमित कीर्तनियां थे । विट्ठलनाथ जी उनकी अनेक सांप्रदायिक वातों के सम्बन्ध में सलाह लेते थे । इससे भी सूरदास जी का साम्प्रदायिक महत्त्व मालूम होता है ।
सूर और उनका साहित्य : एक परिचय 3. सूर की सृजन-साधना
प्रामाणिक रचनायें
वार्त्ता साहित्य में सूरदास जी की रचनाओं पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया है । केवल उनके पदों की संख्या का संकेत कहीं-कहीं मिलता है। प्रभुदयाल मीतल से संपादित गोस्वामी हरिरायजी कृत 'मूरदास की वार्ता' में दो स्थानों पर सूर के पदों की संख्या का संकेत मिलता है । एक जगह उनके पदों की संख्या 'सहस्रावधि'1 बतायी गई है तो दूसरी जगह 'सवा लाख 2 ।
काशी नागरी प्रचारिणी सभा तथा अन्य संस्थाओं के द्वारा कराई गई खोजों में उनकी 25 रचनायें मिली हैं जिनका अकारादि-क्रम इस प्रकार है-1. एकादशी माहात्म्य 2. गोवर्द्धन लीला 3. दशम स्कंव भाषा 4. दानलं 5. दृष्टिकूट के पद 6. नलदमयन्ती 7. नागलीला 8. प्राण प्यारी 9. व्याहलो 10. भँवरगीत 11. भागवत भाषा 12. मान लीला 13. रावारसकेलि कौतूहल 14. राम जन्म 15. विनय के पद 16. साहित्य लहरी 17. सूर पचीसी 18. सूर रामायरण 19. सूर शतक 20. सूर सागर 21. सूरसागर सार 22. सूर साठी 23. सूर सारावली 24. सेवाफल और 25. हरिवंश की टीका ।
डॉ० दीनदयाल गुप्त इनमें से एकादशी माहात्म्य, नल दमयन्ती, रामजन्म और हरिवंश की टीका को अप्रामाणिक मानते हैं । गोवर्द्धन लीला, दशमस्कंध भाषा, दानलीला, दृष्टिकूट पढ, नागलीला, प्राणप्यारी, व्याहलो, भँवरगीत, भागवत भाषा, मानलीला, राधा रसकेलि कौतूहल, मूर रामायण, सूर शतक और नूर सागर सार तो सूर सागर के ही यंग संस्करण हैं । विनय के पद, सूर पचीसी रसूर साठी में तो स्फुट पद हैं । श्रव रह जाती हैं - साहित्यलहरी, सूर सागर और सूर सारावली । ये तीनों सूरदाम की प्रमुख रचनाएँ मानी जाती है । सूर सारावली तथा साहित्य लहरी की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में विभिन्न मत है, उन पर विचार करना हमारे अध्ययन के बाहर का विषय है। सूर की सृजन-साधना का मुख्य रत्न सूरसागर ही है । अतः यहां सूर् को साहित्य - सावना सम्बन्धी अध्ययन को सूरसागर तक ही सीमित रखा गया है ।
सूरदास की वार्ता, न प्रभृदयाल मीतल, प्रसंग 3, पृ० 27 2 वही, प्रसग 10, पृ० 54
3. अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय, प्रथम भाग, पृ० 263
सूर सागर का चयन
सूरसागर सूरदास की सर्वमान्य प्रामाणिक रचना है। इसकी अनेक हस्तलिखित प्रतियां मिलती है । सूरसागर की मुद्रित प्रतियों के दो सस्करण - नवल किशोर प्रेस, लखनऊ और वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई के मिलते है । बम्बई वाले संस्करण के आधार पर डॉ. वेनी प्रसाद, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा तथा डॉ. रामकुमार वर्मा ने संक्षिप्त संस्करण निकाले है । श्री वियोगी हरि द्वारा सम्पादित एक संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित है । नागरी प्रचारणी सभा, काशी ने पंडित नन्ददुलारे वाजपेयी द्वारा सम्पादित 'सूरसागर' को दो भागों में प्रकाशित किया ।
प्रस्तुत अध्ययन के लिए नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'सूरसागर' को ही आधार बनाया गया है । इससे पूर्व प्रकाशित 'सूरसागर' अधिक वैज्ञानिक रूप से सम्पादित नही है । इस अवस्था में नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करण को चुनना ही उचित समझा गया है। 1
4. सूरसागर का वर्ण्य विषय
सूरसागर के सृजन में सूर ने श्रीमद्भागवत का ही अधिक अनुसरण किया है यद्यपि उन्होने कही-कही उसमें कुछ हेर-फेर किया है या कुछ अपनी नई उद्भावनाएँ जोड़ी है अथवा कुछ बाते अन्य स्रोतों से ग्रहण की है । इसलिए सूरसागर मे 12 स्कंध है ।
सूरसागर के प्रतीकों पर विवेचन कर लेने के पूर्व उसके वर्ण्य - विषय को यहां समझ लेना समीचीन है, क्योंकि प्रत्येक प्रतीक को समझने के लिए उससे संबंधित वर्ण्य - विषय का ज्ञान आवश्यक है।
प्रथम स्कंध दो शीर्षको के अन्तर्गत विभाजित है - 1. विनय और 2. श्री भागवत प्रसंग । विनय के पदों में सगुरगोपासना का प्रयोजन, भक्ति की प्रधानता, मायामय संसार आदि पर अच्छे पद है। श्री भागवत प्रसग के अंतर्गत कवि के जो भक्ति विषयक पद है वे उनकी अनुभूति के विषय है ।
द्वितीय स्कध मे भी कोई विशेष कथा नही है । भक्ति सम्बन्धी पदों की है। तृतीय स्कंध से लेकर अष्टम स्कध तक विष्णु के अवतारों तथा अन्य
1 अब पण्डित जवाहर लाल चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित बृहत् सूरसागर प्रकाशित हुआ है ।
पौराणिक कथाओं का निरूपण है। नवम स्कंध में रामावतार की कथा है जो 'वाल्मीकि रामायरण से प्रभावित है ।
दशम स्कंध सूरसागर का बहुत बड़ा तथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्कंध है । इसमें 4309 पद हैं । इसके दो विभाग किये गये हैं - - 1. पूर्वार्द्ध और 2. उत्तरार्द्ध । पूवार्द्ध में 4161 और उत्तरार्द्ध में 148 पद हैं । इस स्कंध में कृष्ण की कथा अधिक विस्तार से वरिंगत है । पूर्वार्द्ध में गोकुल और ब्रज में विहार करनेवाले श्री कृष्ण का चरित्र है और उत्तरार्द्ध में द्वारिका गमन से मृत्यु तक श्री कृष्ण की - जीवनी । पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध के पदों की संख्या की विषमता को देखने से पता चलता है कि सूर ने राजनैतिक कृष्ण की अपेक्षा बालकृष्ण की जीवनी पर ही अधिक प्रकाश डाला है जो उनके आराध्य थे ।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सूरसागर के दशमस्कंध में कृष्ण की कथा अधिक विस्तार से वरिंगत है; प्रथम नौ स्कंध उस कथा की भूमिका का काम कर रहे हैं और अंतिम दो स्कंध उस कथा के उपसंहार रूप में लिखे गये प्रकार सूरसागर में दशावतार वर्णन की परम्परा देखने को मिलती है । सूर और शुद्धाद्वैत दर्शन
एकादश स्कंध में नारायण तथा हंस के अवतार वणित हैं । द्वादश स्कंध में बुद्ध अवतार वर्णन, कल्कि अवतार वर्णन, राजा परीक्षित - हरि-पद-प्राप्ति और जनमेजय कथा संक्षेप में वरिणत है ।
वल्लभ सम्प्रदाय दार्शनिक दृष्टि से शुद्धाद्वैतवाद और सांप्रदायिक दृष्टि से पुष्टिमार्गीय है। सूरदास भी शुद्धाद्ध तवाद के अनुयायी और पुष्टिमार्गीय थे । इतिहास के उल्लेख और साहित्य के अंतःसाक्ष्य के प्रमाण इस मान्यता के पक्ष में हैं । सूरसागर में प्राप्त सामग्री के आधार पर सूर के दार्शनिक विचारों को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है -
1. ब्रह्म माया से नितांत अलिप्त होने के कारण शुद्ध है ।
निरंजन निराकार, कोउ हुतौ न दूसर । ( 379 )
2. ब्रह्म निर्गुरण भी है और सगुरण भी ।
वेद उपनिषद जासु कौं, निरगुनहिं बतावै । सोइ सगुरग ह्व नंद की दाँवरी बँधावै । (4) |
66f5b3d8db293761f5e4a8f0325e0aa42c5fde5931d577a8948bba2dd0a319a4 | pdf | विक्षेपके अभावका नाम योग है । इस प्रकारका संन्यास तथा योग दोनों इस निष्काम पुरुषविषे विद्यमान हैं अर्थात् यह निष्कामपुरुष फलके त्यागवाला होणेंतैं संन्यासी है तथा फलको तृष्णारूप विक्षेपके अभाववाला होतैं योगी है । इहां सकामपुरुषों की अपेक्षाकरिकै तिस निष्काम पुरुषविषे श्रेष्ठता कथन करणेवासतै श्रीभगवान् संन्यासशब्दकी गौणीवृत्तिकूं अङ्गीकार करिकै ता संन्यास शब्दकरिकै कर्मके फलका त्याग कथन कन्या है तथा योगशब्दकी गौणी वृत्तिकूं अङ्गीकार करिकै ता योगशब्दकरिकै फलकी तृष्णाका त्याग कथन कया है । और ता. संन्यासशब्दका फल सहित सर्वकर्मों का त्यागरूप जो मुख्य अर्थ है तथा ता योगशब्दका सर्व चित्तवृत्तियोंका निरोधरूप जो मुरुप अर्थ है ते दोनों ता निष्कामपुरुषकं आगे अवश्यकरिकै उत्पन्न होणेहारे हैं । यातैं सो निष्काम कर्मोंकू करणेहारा पुरुष यद्यपि अनितैं रहित नहीं है अर्थात अग्निकरिकै सिद्ध होणेहारे अग्रिहोत्रादिक श्रौतकर्मोके त्यागवाला नहीं है तथा सो कमीं पुरुष क्रियात रहितभी नहीं है अर्थात् ता अनिकी अपेक्षा रहित स्मातकियाके त्यागवालाभी नहीं है तथापि सो निष्काम कर्मोकू करणेहारा कर्मी पुरुष संन्यासी जानणा तथा योगीही जानणा । अथवा स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः या वचनका यह अर्थ करणा-श्रौतआ रहित पुरुष कोई संन्यासी कह्या जावै नहीं । तथा क्रियात रहित पुरुष कोई योगी कहा जावै नहीं । किंतु ता श्रौतअग्निवाला तथा ता क्रियावाला जो निष्काम कर्मोंके करणेहारा पुरुष है सो कर्मी पुरुषही संन्यासी जानणा तथा योगी जानणा । इस प्रकार सो निष्काम कर्मी पुरुष स्तुति कन्याजावै इति । इहां यद्यपि अक्रिय या शब्द करिकैही सर्व कर्मों के संन्यासी की प्रतीति हो इसकै है या निरभिः यह पद व्यर्थ है तथापि अग्निशब्दतै सर्वकर्मों का ग्रहण करिकै निरग्निः या शब्दकारकै संन्यासीका कथन कप्पाहै । तथा क्रियाशब्दतैं सर्व चित्तके वृत्तियोंका ग्रहण करिके अक्रियः या शब्दकरिकै निरुद्धचित्तवृत्तिवाले योगीका कथन कन्या है ।
श्रीमद्भगवद्गीता[ अध्याययातें यह अर्थ सिद्ध होते है सो निरशिपुरुष संन्यासी कहपाजावै नहीं तथा अक्रियपुरुष योगी कह्याजावै नहीं किंतु सो निष्काम कर्मोंके करणेहारा कर्मीपुरुषही संन्यासी तथा योगी कह्याजावै है ॥ १ ॥
तहां जैसे - सिंहो देवदत्तः इस वचनविषे पशुरूप सिंह भिन्न मनुष्य - रूप देवदत्तविषे ता सिंहके सदृश शूरता क्रूरता आदिक गुणोंकूं ग्रहणकरिकै सो सिंहशब्द प्रवृत्त होवैहै । तैसे असंन्यासविषे संन्यासशब्दकी प्रवृत्तिका तथा अयोगविंषे योगशब्दके प्रवृत्तिका निमित्तरूप जो समान गुण है ता गुणकूं श्रीभगवान् कथन करें हैंयं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
( पदच्छेदः ) यम् । संन्यासम् । इति । प्राहुः । योगंम् । तम् । विद्धिं । पाण्डेव । न । हिं' । असंन्यस्तसङ्कल्पः । योगी" । भ॑वति । कश्चनं ॥ २॥
( पदार्थः ) हे अंर्जुन ! जिसकूं श्रुतियां संन्यास इस नामकारकै कथंन करें हैं तिसकूही तूं योगरूप जान जिसकारणत संकल्पके त्याग रहित कोईभी पुरुष 'योगी नहीं होते है ॥ २ ॥
भां० टी० - न्यास एवातिरेचयत् । ब्राह्मणाः पुत्रैषणा याश्च वित्तैपणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्ये चरन्ति इत्यादिक अनेक श्रुतियां जिस फलसहित सर्वकर्मोक त्यागकूं संन्यास या नामकरिकै कथन करें हैं तिस संन्यासकूँही तूं अर्जुन योगरूप जान । इहां फलकी इच्छाका तथा कर्तृत्व अभिमानका परित्याग करिकै जो शास्त्रविहित शुभकमका अनुष्ठान है ताका नाम योग है अर्थात् ता संन्यासकूं तूं निष्काम कर्मयोग - रूप जान । शंका - हे भगवन् ! जैसे अब्रह्मदत्तकूं यह ब्रह्मदत है या प्रकार जो कोई कहै है ता कहेणे करिके यह जान्या जावे यह ब्रह्मदत्तके सदृश है । 2. किसी अन्यवस्तुका वाचक जो शब्दहै ता शब्दका जबी किसी अन्य
वस्तुके जनावणेवासतै उच्चारण होवैहै तबी सो शब्द गौणीवृत्तिकरिकै अथवा तनावके आरोपकरिके तिस अन्यवस्तुविषे स्ववाच्यार्थ के सादृश्यताकूंही बोधन करै है । सो इहां प्रसंगविषे कौन सादृश्यधर्म है ? ऐसी अर्जुनकी शंकांके हुए श्रीभगवान् ता सादृश्यधर्मकूं कथन करैं हैं-न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन इति । जिस कारणतैं फल संकल्पके त्यागतैं रहित कोईभी पुरुष योगी होवै नहीं किंतु सर्व योगीजन फल संकल्पके त्यागवालेही होवैं हैं, तिस कारणतैं फलका त्यागरूप समानधर्मत तथा तृष्णारूप चित्तवृत्तिके निरोधकसमानता गौणीवृत्ति करिकै सो कर्मी पुरुष ही है संन्यासी है तथा योगी है । तात्पर्य यह - संन्यासी शब्दका मुख्य अर्थ जो फलसहित सर्वकर्मोंका त्यागी है ताके विषे जैसे स्वर्गादिकफलोंका त्याग रहेहै तैसे निष्कामकर्मी पुरुषविषेभी सो स्वर्गादिक फलोंका त्याग रहे है। यातें सो संन्यासी शब्द गौणीवृत्तिकरिक ता कर्मी पुरुषविषे प्रवृत्त होते है तथा योगीशब्दका मुख्य अर्थ जो जो सर्वचित्तवृत्तियों के निरोधवाला है, ताकेविषे जैसे फलकी तृष्णारूप चित्तवृत्तिका निरोध रहे तैसे निष्काम कर्मी विषेभी सो फलकी तृष्णारूप चित्तवृत्तिका निरोध रहै है - यात सो योगीशब्दभी गौणीवृत्तिकरिकै ता कमपुरुषविषे प्रवृत्त होते है इति । अब इसी अर्थक योगसूत्रों करिके स्पष्ट करें हैं । तहां सूत्र - योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः । प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः इति । अर्थ यह चित्त की सर्ववृत्ति - - 1 योंका जो निरोध है ताका नाम योग है इति । ते चित्तकी वृत्तियां प्रमाण १ विपर्यय २, विकल्प ३, निद्रा ४, स्मृति ५ यह पंचप्रकारकी होवैं हैं । तहां प्रमाका जो कारण होवै ताकूं प्रमाण कहैं हैं । सो प्रमाणभी प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि यह षट्कारका हो है । या प्रकारका वैदिक पुरुष अंगीकार करें हैं और प्रत्यक्ष अनुमान, आगम यह तीन प्रकारका प्रमाण होवै है या प्रकार योगशासवाले अंगीकार करें हैं । तहां किसी प्रमाणका किसी प्रमाणविषे अंतर्भाव होते है । और किसी प्रमाणका किसी प्रमाणत बहिर्भाव होवै है । इस प्रकार तिन प्रमाणोंका परस्पर
[ अध्यायअंतर्भाव तथा बहिर्भाव अंगीकार करिके किसी शास्त्र विषे तिन प्रमाणका संकोच कया है । और किसी शास्त्रविषे तिन प्रमाणोंका विस्तार कन्या है, जैसे नैयायिकों के मतविषे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द यह च्यारिही प्रमाण होवें हैं । तहां नैयायिकोंन अर्थापत्तिप्रमाणका केवल व्यतिरेकी अनुमानविषेही अंतर्भाव कप्पा है और अनुपलब्धिप्रमाणका प्रत्यक्ष प्रमाणविषही अंतर्भाव कया है । इस प्रकार अन्यमतोंविषेभी तिन प्रमांगोंकी न्यून अधिकता जानिलेणी । यद्यपि नैयायिकादिकोंके मतविषे प्रत्यक्षादिक प्रमाके कारण होतें इंद्रियादिकही प्रत्यक्षादि प्रमाणरूप हैं तथापि योगशास्त्र के मतविषे इंद्रियादिकरिकै उत्पन्न हुई जे चित्तकी वृत्तियां हैं ते वृत्तियांही प्रत्यक्षादिप्रमाणरूप हैं। और तिन वृत्तियोंविषे जो चेतनका प्रतिबिंब है सो प्रतिबिंब प्रत्यक्षादिप्रमारूप है । यात प्रत्यक्षादिक प्रमाणोंकू चित्तकी वृत्तिरूप कथन कन्या है । और मिथ्याज्ञानका नाम विपर्यय है । सो विपर्ययभी अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश इस भेदकारके पंचप्रकारका होवै है। तिन अविद्यादिक पंचक्लेशों का स्वरूप पूर्व पंचम अध्याय विषे विस्तारत निरूपण करि आये हैं २ । और शब्द श्रवणत अतन्तर उत्पन्न होणेहारी तथा अर्थरूप वस्तु रहित ऐसी जा चित्तकी वृत्तिविशेष है ताका नाम विकल्प है । जैसे-वन्ध्यापुत्रोऽस्ति नरोऽस्ति इत्यादिक शब्दों के श्रवणते अनंतर ता श्रोतापुरुषकी वंध्यापुत्रविषयक तथा नरशृङ्गविषयक चित्तकी वृत्ति अवश्यकरिकै उत्पन्न होवै है और ता वृत्तिका विषयरूप वंध्यापुत्र तथा नरशृङ्ग अत्यन्त असत् हैं । यातैं असत् अर्थ - विषयक ते वृत्तियां विकल्परूप कही जावैं हैं । सो यह विकल्प विषयरूप वस्तुतै रहित होणते प्रमारूपभी कह्या जावै नहीं तथा यह विकल्प बाधज्ञानके विद्यमान हुएमी अवश्यकरिकै उत्पत्तिवाला होणेंतैं तथा व्यवहारका हेतु होणेंतैं विपर्ययरूपभी नहीं है । जैसे चैतन्यही पुरुष होवे है या प्रकारत चैतन्यपुरुष दोनोंके अभेदके निश्चय हुएभी पुरुषका चैतन्य है या प्रकार के शब्दश्रवणत अनन्तर चैतन्यपुरुषके भेदकू विषय करणेहारा विकल्प -
माषांटीकासहिता ।
ज्ञान होवे है । यातैं सो विकल्पज्ञान विपर्ययरूपभी नहीं है। बाधज्ञानके विद्यमान हुए सो विपर्ययज्ञान उत्पन्न होता नहीं किंतु सो विकल्पज्ञान प्रमाज्ञानतैं तथा भ्रमज्ञान विलक्षणही होवै है । यहही विकल्पका स्वरूप शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः । इस सूत्रविषे पतञ्जलिभगवानून कथन कया है ३ । और प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, स्मृति या च्यारि प्रकारकी वृत्तियोंके अभावका कारणरूप जो तमोगुण है तिस तमोगुणकूं विषय करणेहारी जा वृत्तिविशेष है ताका नाम निद्रा है । इतने कहणे करिकै ज्ञानादिकोंके अभावमात्रका नाम निद्रा है या मतकाभी खण्डन कथा । यहही निद्राका स्वरूप अभावप्रत्यया लम्बनावृत्तिर्निद्रा । इस सूत्रविषे पतञ्जलि भगवान्नै कथन कन्या है ४ । और पूर्व अनुभवजन्य संस्कारमा जो ज्ञान उत्पन्न होते है ताका नाम स्मृति है । सा स्मृति सर्ववृत्तियोंकरिकै जन्य होवै है । यति पतंजलि भगवान् ता स्मृतिकं सर्ववृत्तियोंके अन्तविषे कथन कप्पा है ५ । यद्यपि लज्जादिक अनेकप्रकारक वृत्तियां होवें हैं तथापि तिन लज्जादिक सर्ववृत्तियोंका इन प्रमाणादिक पंचवृत्तियविषेही अन्तर्भाव है। इस प्रकारको सर्वचित्तवृत्तियोंका जो निरोध है सो निरोधही योग कह्याजावै है तथा समाधि कह्याजावै है और कर्मोंके फलका जो संकल्प सो संकल्पभी पंचप्रकारके विपर्यय विषे रागनामा तीसरा विपर्ययविशेष है । तिस रागरूप फलसंकल्पके निरोधमात्रकूंही इहां गौणीवृत्ति करिकै योग नामकरिकै तथा संन्यास नामकरिकै कथन कन्या है । या किंचित्मात्री इहां विरोध होवै नहीं ॥ २ ॥
हे भगवन् ! पूर्व आपने कर्मयोगकी श्रेष्ठता कथन करी, यातैं यह जान्या जावे है - श्रेष्ठ होणें तैं सो कर्मयोगही इस अधिकारी पुरुष जीवितकाल - पर्यंत करणे योग्य है और यावज्जीवमग्रिहोत्रं जुहोति यह श्रुतिभी जीवित कालपर्यंत अग्रिहोत्रादिक कर्मोकी कर्त्तव्यताकूही कथन करै है। ऐसी अर्जुनकी शंकाके हुए श्रीभगवान् ता कर्मयोगकी अवधिकं कथन करैं हैंश्रीमद्भगवद्गीता ।
[ अध्यायआरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ॥ योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
( पदच्छेदः) औरुरुक्षोः । मुँनेः । योगम् । कर्म । कारणम् । उच्यते । योगांरूढस्य । तस्य । एवं । शर्मः । कारणम् । उच्चैते ॥३॥
( पदार्थः ) हे अर्जुन ! योगविषे आरूढ होणेंकी इच्छावान् मुनिकू ता योगकी प्राप्तिविषे नित्यकर्मही समाधानरूपही कैथन करया है तथा ता योगविषे आरूढहुए तिसीही पुरुषको ज्ञाननिष्ठाकी प्राप्तिवास संन्यास ' ही सौधनरूप कैंथन कन्या है ॥ ३ ॥
भा० टी० - अंतःकरणकी शुद्धिपूर्वक जो सर्वविषयसुख तीववैराग्य है ताका नाम योग है । ऐसे योगविषे आरूढ होणेकी इच्छावाला जो पुरुष है ताका नाम आरुरुक्षु है और सो आरुरुक्षु पुरुष अंतःकरणकी शुद्धित अनंतर आगे सर्व कर्मोंके त्यागरूप संन्यासवाला होणा है । यातैं अबी ताकूं मुनि कह्या है । अथवा अबीही फलकी तृष्णा रहित हैं। या ताकू सुनि कह्या है। ऐसे आरुरुक्षु मुनिके प्रति ता योगविषे आरूढ होणेवास्ते अर्थाव वा योगकी प्राप्तिवास्ते वेदविहित निष्काम अग्निहोत्रादिक नित्यनैमित्तिक कर्मही साधनरूपकरिकै हमने तथा वेदभगवान्न विधान करया है। और सोईही कर्मीपुरुष जबी तिन निष्काम कर्मोकारकै अंतःकरणकी शुद्धिरूप योगकूं प्राप्त होवै है तबी सो पुरुष योगारूढ कह्या जावै है ऐसे योगारूढ पुरुषकू पुनः ते कर्म कर्त्तव्य नहीं हैं । किंतु ता योगारूढ पुरुषकं ज्ञाननिष्ठा की प्राप्तिवास्ते सर्वकर्मोंका संन्यासरूप शमही साधनरूपकरिकै विधान कया है । तात्पर्य यह --जितने कालपर्यंत इस अधिकारी पुरुषकू अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक वैराग्य की प्राप्ति नहीं भई तितने कालपर्यंत यह अधि कारी पुरुष ता वैराग्यकी प्राप्तिवास्ते फलकी इच्छा रहित होइकै शास्त्र - विहित नित्यनैमित्तिक कर्मोकंही करे। और जिसकालविषे यह अधिकारी पुरूष तिन निष्कामकमौकरिके अंतःकरणकी शुद्धिपूर्वक ता वैराग्य प्राप्त |
cbb4e6b94ab71318b1f801ac91ab1642a258bd07 | web | मंजर इमाम की गिरफ्तारी हुई। होनी चाहिए, अगर हैदराबाद बम ब्लास्ट या अन्य घटनाओं में उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत जांच एजेंसियों के पास हैं। उसे जांच पड़ताल के लिए दक्षिण के उन राज्यों में ले जाया गया है जहां वह आतंकी घटनाएं हुई। बच गए हैं तो उसके परिवार के लोग। पांच युवा भाई, तीन बहनें और गंभीर बीमारी से ग्रस्त बूढ़ी मां। वे मानने को तैयार नहीं कि मंजर किसी भी गैरकानूनी घटना में शामिल हो सकता है। उर्दू में गोल्ड मेडलिस्ट मंजर तो क्रिकेटर बनना चाहता था। क्या से क्या हो गया! . . यही बात मंजर के मुहल्ले, बस्ती (बरियातु, रांची) के लोग भी मानते हैं। दीगर यह कि वे खुलकर बोलने से कतरा रहे हैं। हर बार की तरह. . किसी परिवार के एक सदस्य पर ऐसी घटनाओं में संलिप्ततता के चर्चे भी हो जाएं तो उसे अपने ही समाज से काट दिया जाता है। यह अलग बात है कि मंजर पर अभी संदेह भर है। लेकिन, शायद हमारा समाज अभी इतना बुलंद हौसला नहीं रखता कि जांच के अंतिम नतीजे आने तक पीड़ित परिवार के साथ खड़ा दिखाई दे। बस यहीं आकर हमारी पीढ़ियों पुरानी सामाजिक संरचना, ताने बाने कमजोर पड़ जाते हैं। . . एक तरह से देखा जाए तो यह अपराधों के खिलाफ सामाजिक मुहिम का फॉरमूला है। लेकिन, इन सबके बीच क्या मानवीयता का पहलू भी दरकिनार कर दिया जाना चाहिए! . . खासकर, जब हम विवेकवान समाज होने के दावे करते हैं। मंजर इमाम की रांची में गिरफ्तारी से स्थानीय व देशी विदेशी प्रेस मीडिया खबरों से पट गये। जांच पहलुओं की अवधारणा मात्र पर क्रिमिनलॉजी के क्लिष्ट शब्दावली से खबरें सुर्खियां बनने लगीं। न्यूज विंग ने एक कोशिश की है उस पीड़ित परिवार की भावनाओं को समझने की। अभी अभी दो 'आतंकियों' कसाब और अफजल गुरू को फांसी दी गई। मंजर के परिजन आहत हैं, व्याकुल भी। बचपने से साथ जवां हुए भाइयों में क्षोभ है, गुस्सा भी। न्यूज विंग संवाददाता रणजीत वर्मा ने आहत परिवार से मिलकर उसे जानने समझने की कोशिश की है । लेकिन, इतना भर काफी नहीं। आखिर ऐसी परिस्थिति में समाज, सरकार, संस्थाओं की भी कोई जिम्मेवारी होनी चाहिए। मंजर पर तो जांच चल रही है, लेकिन उसके परिजन! . . कौन मरहम लगायेगा उनकी क्षत विक्षत संवेदना पर। इसी प्रसंग पर न्यूज विंग ने राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन डा शाहिद अख्तर से लंबी बातचीत की। कुछ आश्वासन भी मिले। रणजीत वर्मा, रांची झारखंड का रांची शहर क्रिकेट की वजह से चर्चा में रहा है पर इन दिनों देशभर में हुए आतंकी धमाकों के तार जुड़ जाने से खास सुर्खियों में है। चार मार्च (2013) को इंडियन मुजाहिद्दीन (आईएम) के संदिग्ध सदस्य मंजर इमाम की गिरफ्तारी के बाद उसकी बस्ती (बरियातु इलाके) के लोग कशमकश में हैं। स्कूल, कालेज, दफ्तर, बाजार हर तरफ एक ही चर्चा, मंजर इमाम! परिवार के सदस्य गुस्से में कहते हैं बेकसूर है मंजर! मंजर हैदराबाद ब्लास्ट वाली जगह पर देखा गया ...। देखा गया तो फिर आप उसको दो साल से खोज रहे हैं। पकड़े क्यों नहीं? पहचान है तो पकड़वाते ना! उर्दू में गोल्ड मेडलिस्ट मंजर इमाम की तलाश राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को साल 2011 से है। पांच भाइयों और तीन बहनों वाले परिवार में मंजर भाइयों में चौथे नंबर पर है। परिवार वालों के मुताबिक 2011 में एजेंसी मंजर से औपचारिक पूछताछ कर चुकी है। पर पिछले दो सालों में हुए आतंकी धमाकों के बाद इमाम की भूमिका संदिग्ध के रूप में देखी गयी। खास तौर पर हैदराबाद के दिलसुखनगर में हुए दो धमाकों के बाद। तुरंत एजेंसी की सक्रियता झारखंड में बढी और रांची में कांके थाना क्षेत्र से मंजर गिरफ्तार हुआ। अदालत में पेशी के बाद ट्रांजिट रिमांड पर वह केरल में है। वहीं एक विशेष अदालत में सुनवाई के बाद मंजर 18 मार्च तक न्यायिक हिरासत में रहेगा। इस बीच उसे कई बार रिमांड पर लिया जायेगा। जिससे कुछ नये खुलासे हो सकते हैं। न्यूज विंग ने जब मंजर इमाम के रिश्तेदारों से इस संबंध में जानना चाहा तो बड़े भाई बदर इमाम ने मंजर की किसी भी तरह की आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता से इनकार किया। उसने कहा, 13 अप्रैल 2011 को आईबी, एनआईए, सीआईडी की कमेटी ने उससे पूछताछ किया था। शाम आठ बजे से सवा नौ बजे तक। मंजर से पूछा गया, क्या करते हो? क्या पढते हो? वगैरह वगैरह्। जवाब सुनने के बाद अफसरों का कहना था एमए किये हो नौकरी क्यों नहीं करते? तो मंजर ने जवाब दिया, बीएड के लिये तीन लाख मांगा गया अब्बू ने नहीं दिया। पुराने जमाने के हैं ना। बदर ने आगे कहा कि जिस दिन वो लोग आये थे उस दिन मंजर बहुत खुश हुआ कि चलो अब हमको कुछ नहीं होगा। दुकान खोलेंगे, ऐसे बनाओ, वैसे बनाओ कई प्रोग्राम बना रहा था। पर अल्लाह की क्या मर्जी देखिये ...! इन सब घटनाक्रम के बीच परिवार वालों को लगता है उनके साथ न्याय नहीं हुआ। यह पूछने पर, क्यों? जवाब में वो कहते हैं, केन्द्रीय गृह मंत्रालय से लेकर झारखंड के आला अफसरों और विभागों के पास फैक्स के जरिये चिट्ठी भेजी। सब का कटिंग है उनके पास। हर जगह जवाब मिला कि मंजर के नाम से एक भी केस दर्ज नहीं है। गृह विभाग के पास आवेदन से पूछा गया कि मंजर इमाम पर कितनी प्राथमिकी दर्ज है? कौन से केस में शामिल है? कहीं कोई एफआइआर दर्ज नहीं है। तब कैसे हो गया अपराधी? आई एम के संदिग्ध सदस्य के रूप में मंजर को प्रोजेक्ट किये जाने से परिजन मीडिया के रवैये से ज्यादा आहत हैं। न्यूज विंग से पहले तो उन्होंने बात करने से मना किया, पर बाद में राजी हुए। परिवार के सदस्य कहते हैं कि एनआईए और एटीएस ने मंजर को कभी भी आतंकवादी नहीं माना है। सब सस्पेक्ट (संदिग्ध) मानते हैं। पर मीडिया तो आतंकवादी बोल रही है ...। सभी यही लिख और बोल रहे हैं हैदराबाद में रेयाज भटकल के साथ काला कुर्ता में देखा गया था। देखा तो पकड़ा क्यों नहीं? बरियातू में राजेन्द्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) से 700 मीटर की दूरी पर मंजर के घर पर परिवार के एक सदस्य ने न्यूज विंग से कहा, दुनिया की बात छोड़ दीजिये। इस बस्ती में चौदह हजार आदमी है। एक आदमी भी उसके खिलाफ बोल दे ...। चौदह हजार से ज्यादा आबादी है बस्ती की. . कोई पन्द्रह सोलह हजार आबादी है। ये तो यहां बस्ती का बता रहे हैं। मेन रोड छोड़ दीजिये। इस बस्ती का। आइडियल है पूरा बस्ती के लोगों में। पूरा समय पढाई और क्रिकेट। एक नंबर का क्रिकेटर था। आतंकी धमाकों में संलिप्तता के संबंध में परिवार वालों ने कहा कि मंजर कालेज का रेग्यूलर स्टूडेंट था। सूरत (गुजरात) ब्लास्ट के संबंध में उनका कहना है कि ब्लास्ट 27 को हुआ था। जबकि 26 को घर में फंक्शन था ... बडे भाई की बेटी का बर्थडे। पांच सौ आदमी का रिकार्ड के साथ दस्तावेज है। पूरा टाइमटेबल था। मंजर यहीं था। गुस्से में परिवार वाले तो यहां तक कह गये कि एक प्रूफ भी लाकर दीजिये पांच लाख से दस करोड़ रुपया हमलोग देंगे। उससे ज्यादा हमलोग क्या कर सकते हैं! कुछ ने कहा कि हक को दबाइयेगा वह और बढेगा! . . ये मत सोचियेगा ... सब का पीछे मरसी है। वो जानता है ना खेलना कूदना! . . फिलहाल पूरा परिवार जाहीदा खातून (मंजर की मां) की इलाज में व्यस्त हैं। पांच भाई हैं हमलोग ... रास्ता निकालेंगे, बैठे थोड़े रहेंगे : नजर इमाम भाईयों में सबसे छोटे नजर इमाम पढाई कर रहे है। पर मंजर की गिरफ्तारी के बाद से परेशान है। उसने कहा, हमारा भाई को उठा कर ले गया है। हमलोग तो बैठे नही रहेंगे। कानून का सहारा लेंगे। नहीं होगा तो अपना कुछ न कुछ तो ढ़ूंढ़ेंगे रास्ता। रास्ता है ना. . और भी है रास्ता। पांच भाई हैं हमलोग ... रास्ता निकालेंगे। बैठे थोड़े रहेंगे। नजर आगे कहते हैं, कसाबे को देखिये ना केतना करोड़ रुपया उसको खिलाने में खर्च किया। तब जाके फांसी हुआ। देना था तो पहले ही दे दिया होता! वो तो सबूत के साथ पकड़ाया था तो फिर उसको रखने की क्या जरूरत थी? अगर इ कसूर किया है तो एक महीना में फैसला सुनाईये। आरोपी था, गोल्ड मेडल ले रहा है तो गिरफ्तार क्यों नहीं कर लिये? अब जैसे अभी इसको पकड़ लिया है. . अब देखिये, पकड़ा गया. . अब इसका नाम आना बंद हो जायेगा। हमलोग केरल में अच्छे से अच्छा वकील भेजेंगे। हन्ड्रेड परसेंट पता है कि वो बेकसूर है। आटोमेटिक दिल में नफरत पैदा होने लगता है इंसान से : आलम इमाम मंजर इमाम के रिश्तेदार आलम इमाम कहते हैं कि कोई इंजीनियर हुआ, कोई डाक्टर हुआ, कोई पढने में ब्रिलियंट हुआ। सबसे पहले क्या करता है कि उसको इतना दिन बंद करके जेल में रखा जाता है कि उसका सर्विस लाइफ खतम हो जाये। कसूर नहीं निकलता। लाइफ बर्बाद। इ सिर्फ जानते हैं आटोमेटिक दिल में नफरत पैदा होने लगता है इंसान के प्रति। दस साल के बाद चार्जशीट दाखिल होगा तो क्या बचेगा उसका करियर। मंजर कालेज कभी नागा नहीं करता था। पढाई लिखाई में लगा रहता था। खेल में था। कम्प्यूटर हल्का फुल्का किया। गाडी का ट्रेनिंग लिया। जाब का टाइम आया। तो ...। जॉब कभी बाहर नहीं किया। वो करने के बाद घर के बाहर ही किताब दुकान लगाने लगा। नहीं चला, तो उसको छोड़ दिया। थोड़ा आगे तालाब के बगल में रिश्तेदार का राशन दुकान है। वहां बैठने लगा। तब ना. . उसको आदमी लोग कह रहा था कि वो तो ऐसा कर ही नहीं सकता। बेगुनाही का सबूत नहीं होता तो फाइट थोड़े ही ना करते : बदर इमाम मंजर के रिश्तेदार बदर इमाम ने न्यूज विंग से कहा कि सबूत नहीं रहता तो फाइट थोड़े ही ना करते! हम लड़ेंगे अच्छे से अच्छा वकील रखेंगे। . . झारखंड से बाहर रहता तो मान सकते थे। बैठ जाते। अगर बाहर रहता तो हमलोग आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं करते। बदर ने आगे कहा कि गिरफ्तारी की खबर मिलते ही आधा घंटा के अंदर चार पांच सौ आदमी वहां पहुंच गये थे। अगर पूरा होता तो घेर लेते। ऐसे ही पहुंच गया था टेररिस्ट था तो ...। हाई प्रोफाइल के पीछे। इतनी भीड़ थी की लाठी चार्ज करना पड़ा। एक डेढ घंटा और रहता ना तो हजार दस हजार और आदमी घेर लेता। बस्ती में 15 हजार से ज्यादा आदमी हैं। कोई भी उसके खिलाफ बोल दे! हैदराबाद. . हिन्दुस्तान में आईएम ही एक संगठन है क्या? और भी है. . बोडो है, उल्फा है. . युगा है। बहुत सारा है। आप एक मॉडल के पीछे काम कीजियेगा। दूसरा मॉडल सक्रिय होकर काम करने लगेगा। काम कर रहा है अपना। बहुत सारी चीज है। बोडो कम बड़ा टेररिस्ट आर्गनाइजेशन है। मंजर को तो एबडोमेनल (पेट से संबंधित) प्रोबलम शुरू से रहता था। खाना नहीं पचता था उसे। दिमागी प्रोबलम है, दांत का प्रोबलम है। एक प्रोबलम है? हमलोग तो अच्छा से अच्छा इलाज करवा रहे थे। उसे प्रोबलम था गर्दन में। आतंकवादी होने पर लोग परिवार वालों के पास से भागते हैं। पर हमारे घर तो हर दिन चार चार किलो चायपत्ती और आठ आठ किलो चीनी की जरूरत पड़ रही है। चेन सिस्टम है सात संदिग्ध के नाम : भाई इस सवाल पर कि रांची में सात और लोगों के आईएम से जुड़े होने की खबर आ रही है मंजर के भाई का जवाब था, अभी सात लोगों का नाम जोडा जा रहा है। वो पकड़े जायेंगे तो सात और का नाम जुड़ेगा। इसी तरह बढ़ता जायेगा। चेन सिस्टम की तरह। किसी के मोबाइल से किसी का भी नंबर मिलेगा और कह देगा कि वो भी आतंकवादी है। वहीं इस सवाल पर कि विस्फोट में घायल संदिग्ध आतंकवादी का इलाज रांची में किया गया जवाब मिला कि विस्फोट करने वाला घायल कैसे हो गया? और इतनी दूर रांची में इलाज करवाने चला आया? ! . . हल्ला किया जा रहा है कि हैदराबाद ब्लास्ट की जानकारी थी. . मंजर हैदारबाद में पढाई किया। पर मंजर हैदराबाद कभी गया ही नहीं। उसकी पूरी पढाई इसी शहर में हुई है। दो भाई जुड़वा जैसे नहीं मंजर के छोटे भाई नजर इमाम से यह पूछने पर कि क्या वो दोनों जुड़वा जैसे हैं? नजर ने कहा दोनों जुड़वा बिल्कुल नहीं लगते। ऐसी कोई समानता है ही नहीं। न हाइट में न वजन में। नजर ने कहा कि मंजर का चेहरा साफ है जबकि नजर सांवला। नजर के मुताबिक मंजर का नजर बनकर घर आने की बात बेबुनियाद है। उसने कहा कि उसका बावन किलो है जबकि मंजर 45 केजी के आसपास है। नजर ने कहा कि मंजर के कुछ और नाम भी बताये जा रहे हैं। पर पूरे बस्ती से पूछ लीजिये इसका एक ही नाम है। मंजर, मंजर और मंजर। दूसरा कोई नाम नहीं।
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2ae0b07c1e2cc83b918b2c2d6c5d1bb1aba4f46d1cfbaa9c2ba1fb8c3ffa93a7 | web | प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आज नई दिल्ली में मुख्य सचिवों के पहले वार्षिक सम्मेलन को संबोधित किया। इस अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने देश के तीव्र विकास के लिए राज्यों और केन्द्रों के बीच बेहतर प्रशासनिक समन्वय की मांग की। इस अवसर पर प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ निम्नलिखित है :
मैं राज्यों के मुख्य सचिवों के पहले वार्षिक सम्मेलन के उद्धाटन के लिए आज यहां आकर बहुत प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। मैं आप सभी का बधाई के साथ स्वागत करता हूँ। मुझे आशा है कि आने वाले समय में यह वार्षिक सम्मेलन केंद्र और राज्यों के बीच विचारों के उपयोगी और उत्पादक आदान-प्रदान के लिए एक मंच बन जाएगा। मैं इस सम्मेलन के लिए प्रस्ताव की पहल करने के लिए कैबिनेट सचिव को बधाई देता हूँ।
हम लोग एक नई दशक की शुरुआत में मिल रहे हैं। पिछले बीस वर्षों में किए गए आर्थिक सुधारों ने हमें दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनने में सक्षम बनाया है। इतना ही नहीं, हमारे पास संकट की चुनौतियों का सामना करने और उनसे निपटने के लिए लचीलापन भी है, जो हाल में आए आर्थिक मंदी में हमारी प्रतिक्रिया से पता चलता है। हम अब लगातार गरीबी, भूख और बीमारी से लड़ने में और अपने लोगों को बेहतर जीवन प्रदान करने में पहले से ज्यादा समर्थ हैं। अब हम एक वैश्विक वातावरण में भी रहते हैं जहां भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत हो रही है और भारतीय प्रतिभा और उद्यम को विश्व भर में मान्यता मिल रही है।
हालांकि जहां भविष्य की अपनी संभावनाओं के बारे में देश में अभूतपूर्व उत्साह है, वहीं नई चुनौतियों का हम प्रशासकों के रूप में सामना कर रहे हैं। प्रशासन आज एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया बन गया है। हम जिस गति से परिणाम दे सकते हैं, उस गति पर लोगों की बढ़ती अपेक्षाएँ उन्हें अधीर बना रही हैं। लोग आज सरकार के किसी स्तर पर किसी भी रूप में उदासीनता, सुस्ती और भ्रष्टाचार का पहले से ज्यादा विरोध करते हैं। विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया- सभी हलकों से जवाबदेही की मांग है। अधिक से अधिक संपर्क और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में राज्यों के ज्यादा एकीकरण का मतलब है कि एक राज्य की घटना का दूसरे राज्यों पर प्रभाव पड़ना। ऐसी समस्याएँ हैं जिनके लिए एक ऐसी प्रतिक्रिया की आवश्यकता है जो न सिर्फ प्रभावित राज्यों के बीच समन्वित हो बल्कि केन्द्र और राज्यों के बीच भी समन्वित हो।
इसके लिए आवश्यकता है कि समस्याओं और संकटों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया पहले से ज्यादा रचनात्मक और कल्पनाशील हो। यह भी जरूरी है कि प्रशासनिक प्रणाली में सभी अच्छे जानकार, सुप्रशिक्षित और समर्थ हों ताकि न सिर्फ आज हमारे सामने प्रकट होने वाली समस्याओं बल्कि आने वाले वर्षों में सामने आने वाली संभावित चुनौतियों से भी निपट सकें। यह तभी हो सकता है जब प्रशासनिक तंत्र खोजी, लचीला और तेज हो जो हमारे समय की जांच में पास हो सकता है।
इस पृष्ठभूमि में यह है कि यह सम्मेलन बहुत ही महत्वपूर्ण है। आप राज्य प्रशासन में एक महत्वपूर्ण पद पर हैं। प्रशासनिक तंत्र को इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए इसे सुनिश्चित तौर पर समर्थ बनाना आप लोगों कार् कत्ताव्य है। मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन के विचार-विमर्श आपको उस पृष्ठभूमि की बेहतर समझ देंगे जिसमें केंद्र सरकार नीतिगत निर्णय लेती है। मुझे यह भी उम्मीद है कि ये उन समस्याओं को समन्वित तरीके से सुलझाने के तरीके खोजने में भी आपकी मदद करेंगे जो समस्याएँ एक से अधिक राज्यों को प्रभावित करती है। परिणामस्वरूप इससे आप अपनी सरकार को एक अधिक सूक्ष्म और सुविचारित सलाह देने में सक्षम हो जाएँगे। जैसा कि आप सभी अच्छी तरह जानते हैं कि समग्र विकास हमारी विकास प्रक्रिया का केन्द्रीय विषय है। तीव्र आर्थिक विकास का कोई मतलब नहीं है अगर यह गरीबों, वंचितों, हमारे किसानों, मजदूरों, बच्चों, छात्रों और महिलाओं का कल्याण नहीं करता है। अगर हम सही अर्थों में प्रगति करना चाहते हैं और एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र बनना चाहते हैं तो विकास प्रक्रिया के लाभों को अपने देश के हर हिस्से तक पहुँचाना होगा। केन्द्र सरकार ने हमारे विकास को समग्र बनाने को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। लेकिन भारत तो राज्यों में बसता है। इसलिए जब तक राज्यों को आगे बढ़ने और सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त गति प्राप्त नहीं होती है, हम समग्र विकास प्राप्त करने का दावा नहीं कर सकते हैं। हम जिस समग्र विकास की बात करते हैं वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन, अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए 15 सूत्री नया कार्यक्रम और भारत निर्माण जैसी स्कीमों की शुरुआत से परिलक्षित होता है। ये स्कीमें ग्रामीण, सामाजिक और बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ताा में सुधार लाने के लिए तैयार की गई हैं। इन सभी कार्यक्रमों में राज्य सरकारों की सक्रिय भागीदारी और प्रतिबध्दता की जरूरत है। इन कार्यक्रमों को जिस उद्देश्य के लिए शुरू किया गया है उसे प्राप्त करने के लिए सही अर्थों में इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आप लोगों पर है ताकि मार्ग में आने वाले अवरोधों को शीघ्रता से और प्रतिबध्दता के साथ हटाया जा सके और खामियों को दूर किया जा सके और लोगों को वह सब कुछ तीव्रतम और सबसे कुशल तरीके से प्राप्त हो सके जो उनके लिए भेजा गया है। समावेशी विकास के लिए एक कारगर विकेन्द्रीकृत योजना प्रणाली के साधन के रूप में पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। यह सब एक बड़ा काम है जिसके लिए समर्पण, प्रतिबध्दता और दृढ़ता की आवश्यकता है। मैं यहां यह जरूर कहना चाहूँगा कि केन्द्र सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि इन स्कीमों और कार्यक्रमों में हमेशा सुधार की गुंजाइश है। नीचे से योजना बनाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना इस देश की आवश्यकताओं पर एक रूप में अभिन्नता से विचार करना। केन्द्र सरकार द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों के डिजाइन और क्रियान्वयन से संबंधित आपके हर सुझाव का हम स्वागत करते हैं।
कानून के शासन को सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में से एक है। इसके अलावा तीव्र आर्थिक विकास के लिए शांति और साम्प्रदायिक सद्भाव का माहौल आवश्यक है। कानून एवं व्यवस्था तंत्र को उन महत्वपूर्ण सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बारे में जागरूक बनाना है जो हमें प्रभावित करती हैं। आतंकवाद, उग्रवाद और अतिवाद से सख्ती से लेकिन कारगर और संवेदनशील तरीके से निपटने की आवश्यकता है। आपको न केवल स्थानीय और क्षेत्रीय घटनाओं के प्रति जागरूक रहना होगा बल्कि संपूर्ण भारत और सीमा पार की गतिविधियों पर भी नजर रखनी होगी। मुझे आशा है कि इस सम्मेलन से इन मुद्दों में से कुछ पर आपको बेहतर समझ प्राप्त होगी।
पिछले दो वर्षों के हमारे अनुभव ने खाद्य सुरक्षा के महत्व और मूल्य वृध्दि पर नियंत्रण की आवश्यकता को सामने खड़ा कर दिया है। पिछले कुछ समय के लिए अगर मैं कहूँ कि यह मानना कि भोजन की उपलब्धता चिंता का विषय नहीं रह गया है तो यह खाद्य सुरक्षा के संबंध में गलत भावना पालना था। इसी तरह बहुत लोगों को लगा कि हमने कीमतों पर नियंत्रय कर लिया है। लेकिन हमने जान लिया है कि हमारी बढ़ती जनसंख्या और जीवन-यापन के उच्च स्तर हमारे खाद्य पदार्थों की आपूर्ति को बढ़ाने के लिए विवश कर देते हैं। इस संदर्भ में मैं राज्य सरकारों से अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी ऊर्जा कृषि उत्पादकता बढ़ाने के क्षेत्रों में लगाएँ। हमारी कृषि उत्पादकता अभी भी विश्व में सर्वोच्च पायदान से काफी नीचे है। हमारे प्रमुख फसलों की उत्पादकता में सुधार के लिए अभी काफी गुंजाइश है और मुझे उम्मीद है कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और प्रयास किए जाएँगे। मैं यह भी सलाह देना चाहूँगा कि हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व को देखते हुए राज्यों को अपने सर्वश्रेष्ठ और प्रतिबध्द अधिकारियों में से कुछ को कृषि उत्पादन आयुक्तों के रूप में नियुक्त करना चाहिए। मैंने देखा कि हाल के वर्षों में इस कार्य ने अपना आकर्षण खो दिया और राज्यों में कृषि उत्पादन आयुक्तों के पद पर बेहतरीन अधिकारियों को नहीं नियुक्त किया जा रहा है। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि एक भूमंडलीकृत विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मांग और आपूर्ति की खींच-तान से अपने आप को अलग करना कभी संभव नहीं होगा। राज्य सरकारों को खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए और आवश्यक आपूर्तियों की कमी से निपटने के लिए उपयुक्त रणनीतियां बनानी चाहिए। गरीब और आम आदमी को उचित कीमत पर जरूरी चीजों को उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत और कारगर बनाने के महत्व पर ज्यादा बोलने की आवश्यकता नहीं है। आपके नियंत्रण में कई उपकरण हैं और आशा है कि आप उनके समुचित उपयोग में कमी नहीं करेंगे। केंद्र सरकार की तरफ से मैं इन सब प्रयासों और अन्य क्षेत्रों में राज्य सरकारों को हर संभव मदद देने की प्रतिबध्दता को दोहराता हूँ।
हमारी तेजी से हो रही प्रगति की राह में खराब बुनियादी सुविधाएँ अभी भी अवरोधक का काम कर रही हैं। बिजली की कमी, खराब सड़कें, भीड़-भाड़ वाले बंदरगाह, उड़ानों में देरी ये सब हमारी आर्थिक क्षमता को नुकसान पहुँचाते हैं और हमारी अंतर्राष्ट्रीय छवि को भी चोट पहुँचाते हैं। जिन राज्यों में तुलनात्मक रूप से बेहतर बुनियादी सुविधाएँ हैं, वे राज्य तो निवेश को आकर्षित कर लेते हैं लेकिन अन्य राज्य पीछे छूट जाते हैं। यह एक सबक है जो सभी राज्यों को सीखना होगा। जो राज्य पीछे छूट गए हैं उन्हें अपनी बुनियादी सुविधाओं को तेजी से विकसित करने के लिए ज्यादा प्रयास करना होगा। इस संदर्भ में मैं संकट से निपटने के लिए आवश्यक प्रशासनिक संरचना खड़ा करने की आवश्यकता के बारे में भी बोलना चाहूँगा जिसे आपदा प्रबंधन के नाम से जाना जाता है। हमें आपदाओं से बचाव करना है लेकिन हमें यह मानना होगा कि आपदाओं की भी अपनी एक प्रक्रिया है और हम उसे रोक नहीं सकते और इसीलिए हमें उन चुनौतियों का सामना करने के लिए विश्वसनीय तरीके में कारगर आपदा प्रबंधन से अपने आपको लैस करना होगा।
जलवायु परिवर्तन के लिए श्री पृथ्वी राज चौहान को कहा गया और यह न केवल हमारे लिए बल्कि हमारी भावी पीढ़ी के लिए भी खतरा बना हुआ है। हमने जलवायु परिवर्तन पर एक राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की है। इस कार्य योजना में आठ राष्ट्रीय मिशनों को शामिल किया गया है। हमने अपने लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं वो वाकई में महत्वाकांक्षी हैं। राष्ट्रीय मिशन के संबंध में ज्यादातर काम राज्यों को करना होगा। कौन सी चीज कारगर होगी, इसका पता लगाने के लिए और क्रियान्वयन की प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों को शामिल करने के लिए स्थानीय अनुकूलन की आवश्यकता होगी। इन अत्यंत महत्वपूर्ण आठ मिशनों के क्रियान्वयन को आवश्यक नेतृत्व और प्रोत्साहन प्रदान करने की जिम्मेदारी आप लोगों पर है।
इस सम्मेलन के एजेंडे में अन्य मुद्दे भी शामिल हैं जिनकी मैंने चर्चा नहीं की, लेकिन वो मुद्दे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। मुझे उम्मीद है कि उनपर समुचित ध्यान दिया जाएगा।
मुझे आशा है कि यह सम्मेलन आप सभीं को विचारों के मुक्त और स्पष्ट आदान-प्रदान के लिए और एक-दूसरे की समस्याओं की बेहतर समझ के लिए एक अवसर प्रदान करेगा। मुझे उम्मीद है कि यहां मौजूद सभी लोगों के लिए यह एक अच्छा अनुभव होगा। किसी देश का विकास मुख्यतया इस बात पर निर्भर करता है कि वहां के शीर्ष प्रशासनिक पदों पर आसीन लोग तीव्र और समरूप विकास की चुनौतियों के प्रति कितने प्रतिबध्द हैं। इसलिए आपके कंधों पर बड़ी भारी जिम्मेदारी है और वह है अपने देश को उस गति से आगे बढ़ाने की, जिस गति की हमें इस प्राचीन देश से गरीबी, अज्ञानता और बीमारियों को खत्म करने के लिए आवश्यकता है । इन शब्दों के साथ मैं आप सभी को आपके विचारों और प्रयासों की सफलता की शुभकामना देता हूँ।
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5fcf646ab94ad3527dbf7cb22f242e648178ef91 | web | टीम को मुश्किलों से निकालने वाला महान ऑलराउंडर कैसे हो गया पाई-पाई को मोहताज ?
न्यूजीलैंड का महान ऑलराउंडर कैसे हो गया ख़ाक छानने को है मजबूर ?
इंसान का भाग्य का सिक्का कब पलट जाए कोई नहीं जानता और ये बात भी सच है कि इस दुनिया में कोई किसी का सगा नहीं होता. मतलब इंसान को इंसान और यही मतलब इंसान को हैवान बना देता है. फिर बात चाहे आम लोगों की हो या फिर बड़े लोगों की, सबपर यह लागू होता है. क्रिकेट की दुनिया भी बड़ी जालिम होती है दोस्तों. मैदान पर अपने देश के लिए जी जान लगाकर मुश्किलों से निकालने वाले को जब असल जिंदगी में मदद की जरुरत पड़ी तो सबने हाथ खड़े कर दिए.
इस लेख में हम बात करेंगे एक ऐसे महान खिलाड़ी की, जिसने अपने देश के लिए कई बार शानदार प्रदर्शन कर टीम को मुश्किलों से निकाला, मुकाबले जितवाए लेकिन आज यही खिलाड़ी गरीबी और गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर है. एक वक्त करोड़ों लोग जिस खिलाड़ी के चौकों-छक्कों पर ताली बजाते थे, आज कोई इनके पास नहीं है. आज यह खिलाड़ी जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहा है. आज बात होगी महान क्रिकेटर क्रिस केरन्स की. इस लेख में हम न्यूजीलैंड के पूर्व दिग्गज ऑलराउंडर क्रिस केरन्स के जीवन से जुड़ी कुछ जानी-अनजानी और अनकही बातों को जानने की कोशिश करेंगे.
दोस्तों, क्रिस केरन्स का जन्म 13 जून, 1970 को न्यूजीलैंड के पीक्टन शहर में हुआ था. क्रिस केरन्स के पिता लांस केरन्स भी न्यूजीलैंड के लिए खेल चुके हैं और देश के जाने-माने क्रिकेटर रह चुके हैं. लांस न्यूजीलैंड के लिए 43 टेस्ट और 78 वनडे खेल चुके हैं. क्रिस की मां स्यू क्रेन्स एक हाउसवाइफ थी. क्रिस केरन्स ने अपनी स्कूलिंग क्राइस्टचर्च बॉयज हाईस्कूल से पूरी की थी.
एक क्रिकेटर के घर पैदा होने के कारण क्रिस को बचपन से ही खेल के प्रति आकर्षण था. क्रिस के पिता उन्हें क्रिकेटर बनाना चाहते थे लेकिन उनकी दिलचस्पी रग्बी में अधिक थी. ये रग्बी के लिए उनका प्यार ही था कि हाईस्कूल के बाद वो न्यूजीलैंड की अंडर-17 रग्बी टीम में आ गए लेकिन फिर पिता की बात मानते हुए उन्होंने रग्बी छोड़ दिया और अपने पिता के सपने को सच करने में जुट गए. क्रिस केरन्स ने अपने देश के महानतम क्रिकेटर रिचर्ड हेडली को देखकर क्रिकेट खेलना और सीखना शुरू किया था और उन्हीं की तरह एक तेज गेंदबाज बनना चाहते थे. क्रिस की मेहनत रंग लाइ और 1988 यूथ क्रिकेट वर्ल्ड कप जिसे अब अंडर-19 वर्ल्ड कप के नाम से जाना जाता है इसके लिए न्यूजीलैंड की टीम में चुन लिया गया. इस वर्ल्ड कप के दौरान क्रिस जिस कमरे में थे उसमें शेन थोमसन, ली जर्मन और एंडी कैडिक भी उनके साथ थे, यही नहीं टूर्नामेंट में ब्रायन लारा, इंजमाम उल हक और नासिर हुसैन जैसे धुरंधर भी खेल रहे थे. इसी साल यानी 1988 में क्रिस केरन्स ने इंग्लैंड की डोमेस्टिक टीम नॉटिंघमशायर की तरफ से खेलते हुए अपने फर्स्ट क्लास करियर की भी शुरुआत की थी. इसके एक साल बाद क्रिस को अपने देश की तरफ से भी फर्स्ट क्लास खेलने का मौका मिला जहां उन्होंने डोमेस्टिक टीम नदर्न डिस्ट्रिक्ट टीम का प्रतिनिधित्व किया. क्रिस ने इस दौरान अपने बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन से टीम को कई मुकाबले जितवाए. 19 वर्षीय क्रिस ने इस दौरान अपने फर्स्ट क्लास करियर का पहला शतक भी लगाया. शानदार फर्स्ट क्लास परफॉरमेंस के बाद क्रिस के लिए न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय टीम के भी दरवाजे भी खुल गए और उन्हें ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज के लिए टीम में शामिल किया गया.
24 नवंबर, 1989 ये वो दिन था जब क्रिस केरन्स ने अपना पहला टेस्ट अंतराष्ट्रीय मुकाबला खेला था. लेकिन अपने डेब्यू मैच में क्रिस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. क्रिस अपने डेब्यू मैच की पहली पारी में 1 और दूसरी पारी में सिर्फ 28 रन बनाकर आउट हुए और वो एक विकेट भी लेने में सफल नहीं हो पाए थे. इसके अलावा अपने डेब्यू मैच में ही क्रिस को पीठ की इंजरी हो गई, जिसने पूरे क्रिकेट करियर में उनका दामन नहीं छोड़ा.
इसके बाद लगभग 1 साल तक वो क्रिकेट से दूर रहे, 1991 में क्रिस ने मैदान पर वापसी की और उन्हें पहली बार न्यूजीलैंड की वनडे टीम से खेलने का मौका मिला.
13 फरवरी, 1991 को इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज के दूसरे मैच में क्रिस केरन्स ने अपना वनडे अंतराष्ट्रीय डेब्यू किया था. अपने पहले वनडे मैच में क्रिस बल्ले से तो कुछ खास कमाल नहीं कर पाए थे लेकिन गेंद से उम्दा प्रदर्शन करते हुए उन्होंने 2 विकेट चटकाए थे. क्रिस की सधी हुई गेंदबाजी के चलते कीवी टीम ने 196 रनों को डिफेंड करते हुए 9 रन से मैच जीता था. इसके बाद करियर के अपने दूसरे वनडे मुकाबले में क्रिस ने 4 विकेट झटके और न्यूजीलैंड को सीरीज जिताने में अहम भूमिका निभाई थी. क्रिस को उनके शानदार प्रदर्शन के लिए अपने दूसरे वनडे में ही 'प्लेयर ऑफ द मैच' अवार्ड से सम्मानित किया गया था.
वनडे क्रिकेट में जबरदस्त प्रदर्शन को देखते हुए क्रिस को श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज के चौथे मैच में खेलने का मौका मिला, जहां क्रिस केरन्स ने टेस्ट क्रिकेट में शानदार वापसी करते हुए कुल 9 विकेट चटकाए थे. क्रिस का करियर अब अपने परवान पर था लेकिन तभी उनके जिंदगी में एक हादसा हो गया, जिससे वह बुरी तरह टूट गए. दरअसल, 1993 में रोलेस्टोन नाम के कसबे में एक रेल हादसे हुआ, जिसमें उनकी बहन का निधन हो गया था. क्रिस केरन्स इस घटना के बाद पूरी तरह बिखर गए थे लेकिन साल 1996 में जिम्बाब्वे के खिलाफ खेलते हुए उन्होंने 10 चौकों और 9 छक्कों की मदद से अपने टेस्ट करियर का पहला शतक जड़ दिया. क्रिस केरन्स न्यूजीलैंड की टीम के जरुरत बन गए थे, जहां वो अपनी टीम को एक के बाद एक मैच जितवा रहे थे.
1999 में वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट सीरीज के दौरान एक मुकाबले में क्रिस केरन्स ने अपने ऑलराउंड प्रदर्शन की अमिट छाप छोड़ी थी, जब उन्होंने बल्ले से 72 रन बनाए थे और 27 रन देकर 7 बल्लेबाजों को आउट किया था. यह क्रिस के अबतक के टेस्ट करियर का सबसे बेस्ट परफॉरमेंस था. क्रिस केरन्स ताबरतोड़ बल्लेबाजी में यकीन रखते थे और उनकी यही शैली किसी भी परिस्थिति से उबरकर अपनी टीम को जीत दिलाने में सक्षम बनाती थी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिला था साल 2000 में हुई ICC नॉकआउट ट्रॉफी में, जहां न्यूजीलैंड की टीम का सामना सौरव गांगुली समेत कई महान खिलाड़ियों से सजी भारतीय टीम से हो रहा था. भारत द्वारा दिए गए 265 रनों के लक्ष्य के जवाब में न्यूजीलैंड की टीम का स्कोर एक समय 132 रन पर 5 विकेट था. तब क्रीज पर उतरे क्रिस केरन्स ने नाबाद 102 रनों की पारी खेलकर करोड़ों भारतीय फैंस का दिल तोड़ दिया था. क्रिस की इस करिश्माई पारी की बदौलत न्यूजीलैंड की टीम पहली बार किसी ICC इवेंट का विजेता बनी थी. वो मैन ऑफ द मैच तो बने ही थे साथ ही इस प्रदर्शन के लिए उनको 'विजडन क्रिकेटर ऑफ द इयर' चुना गया था.
क्रिस केरन्स का नाता विवादों से भी रहा. सबसे पहला विवाद साल 1996 में वेस्टइंडीज के खिलाफ होने वाली सीरीज से पहले हुआ था, जब उन्होंने न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड से चल रहे अपने मतभेदों के चलते वेस्टइंडीज जाने से मना कर दिया था. इसके अलावा मैच फिक्सिंग मामले में भी उनका नाम आया लेकिन वो हम आपको आगे बताएंगे.
साल 2004 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट सीरीज के दूसरे मैच में क्रिस केरन्स ने 158 रनों की पारी खेली थी, जो उनके टेस्ट करियर का सर्वाधिक स्कोर है. जैसा हमने आपको पहले बताया था कि क्रिस केरन्स को अपने टेस्ट डेब्यू मैच में ही पीठ की इंजरी का शिकार होना पड़ा था, जिसने पूरे करियर में उनको सताया. 15 सालों के करियर में कुल 55 टेस्ट मैचों में अपनी चोटों के कारण उन्हें बाहर होना पड़ा था.
10 जनवरी, 2005 को अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुनामी के लिए रूपए जुटाने हेतु मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर एक मैच खेला गया था, जिसमें खेलते हुए क्रिस ने 47 गेंदों में 69 रन की पारी खेली थी.
जैसा हमने आपको बताया था कि रेल हादसे में क्रिस केरन्स की बहन का निधन हो गया था, जिससे वो बुरी तरह टूट गए थे. क्रिस ने अपनी बहन के याद में सितंबर, 2008 में एक हजार किलोमीटर का पैदल मार्च करते हुए रेल सेफ्टी का संदेश दिया था.
22 जनवरी, 2006 को एक प्रेस कॉनफ्रेंस में क्रिस केरन्स ने क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा कर दी थी. 16 फरवरी, 2006 को अपने पहले और आखिरी टी20 अंतराष्ट्रीय में क्रिस केरन्स आखिरी बार न्यूजीलैंड की तरफ से खेले थे, दरअसल ये उनका फेयरवेल मैच था. अपने आखिरी मैच में भी क्रिस केरन्स को कोई विकेट नहीं मिला था उन्होंने 4 ओवर गेंदबाजी की थी, जिसमें वो एक भी विकेट चटकाने में सफल नहीं हो पाए थे. गेंद के अलावा बल्ले से भी वो फ्लॉप रहे थे, 9 गेंद खेलकर बिना कोई रन बनाए वो आउट हो गए थे.
क्रिस केरन्स ने न्यूजीलैंड के लिए कुल 62 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 3320 रन और 218 विकेट चटकाए. इसके अलावा 215 वनडे मैचों में उन्होंने 4950 रन और 201 विकेट झटके. टेस्ट क्रिकेट से रिटायरमेंट लेते वक्त इस फॉर्मेट में सबसे ज्यादा 87 छक्कों का रिकॉर्ड क्रिस के ही नाम था जिसे आगे चलकर एडम गिलक्रिस्ट ने तोड़ा था. इसके अलावा न्यूजीलैंड के लिए सबसे तेज शतक लगाने का रिकॉर्ड भी कई सालों तक क्रिस के ही नाम रहा था. टेस्ट क्रिकेट में 200 विकेट और 3000 रन बनाने वाले क्रिस तीसरे सबसे तेज ऑलराउंडर हैं.
क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद कुछ समय तक क्रिस एक कमेंटेटर के रूप में क्रिकेट से जुड़े रहे थे, इसके बाद उन्होंने अपना हीरों का बिजनेस शुरू किया था. दिसंबर, 2013 में ICC द्वारा जारी किए गए एक रिपोर्ट में क्रिस केरन्स को 2008 में इंडियन क्रिकेट लीग के एक मैच में फिक्सिंग का दोषी पाया गया था. यहां आपको बता दें कि क्रिस केरन्स इंडियन क्रिकेट लीग में चंडीगढ़ लायंस की कप्तानी भी कर चुके हैं.
क्रिस पर यह आरोप लगने के बाद न्यूजीलैंड के तत्कालीन कप्तान ब्रेंडन मैकुल्लम ने भी ICC की anti-corruption and security unit को क्रिस के खिलाफ बयान दिया था. लेकिन क्रिस ने हमेशा खुद पर लगे आरोपों को गलत और बेबुनियाद बताया.
खुद को न्याय दिलाने के लिए क्रिस ने 2012 में ललित मोदी के खिलाफ केस दर्ज करवाया था क्योंकि 2010 में ललित मोदी ने अपने एक ट्वीट के जरिए क्रिस को 2008 में होने वाली मैच फिक्सिंग में लिप्त बताया था. क्रिस केरन्स केस तो जीत गए लेकिन अपने ऊपर आई मुसीबत से खुद को निजात नहीं दिला पाए.
30 नवंबर, 2015 को क्रिस झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने और कानून को भ्रमित करने के मामले में आरोपी पाए गए थे. इन्हीं कानूनी कार्यवाई और केस लड़ते-लड़ते क्रिस का बिजनेस पूरी तरह से चौपट हो गया, जिसके चलते उनके सामने आर्थिक तंगी का संकट भी खड़ा हो गया था. आर्थिक तंगी का आलम ये था कि हाल में उन्हें बसों और ट्रकों को साफ करते हुए देखा गया था.
क्रिस के एक साथ खिलाड़ी ने न्यूजीलैंड हैराल्ड अखबार को बताया था कि क्रिस अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए बसों और ट्रकों की सफाई करते हैं. साल 2010 में क्रिस का विवाह ऑस्ट्रेलियाई मूल की महिला मेलानी क्रोसर से हुआ था, यह उनकी तीसरी शादी थी.
10 अगस्त, 2021 को उनके हार्ट अटैक की खबर सामने आई, ऑस्ट्रेलिया में ही उनका इलाज चला और 20 अगस्त, 2021 को खबर आई कि अब वो खतरे से बाहर हैं और ICU से उनको बाहर निकाला जा चुका है.
5 फरवरी 2022 को, उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर खुलासा किया कि एक दिन पहले नियमित जांच के बाद उन्हें आंत्र कैंसर का पता चला था.
क्या कोई सोच सकता था कि न्यूजीलैंड का यह महान खिलाड़ी आज ख़ाक छानने पर मजबूर हो जाएगा. लेकिन ऐसा पहला मामला भी नहीं है जहां क्रिकेटर ने अमीरी से गरीबी का सफर तय किया हो, क्रिस के अलावा भी कई क्रिकेटर हुए जो अर्श से फर्स तक पहुंच गए.
चक दे क्रिकेट की पूरी टीम क्रिस केरन्स के स्वस्थ जीवन और उज्जवल भविष्य की कामना करती है. क्या आपको न्यूजीलैंड के इस महान खिलाड़ी के बारे में जानकारी थी ? कमेंट में हमें जरुर बताएं.
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77bfb3e6cd06aacdf579193d52e2f73182313c49 | web | शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ।
महाराजा रणजीत सिंह (पंजाबीः ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ) (१७८०-१८३९) सिख साम्राज्य के राजा थे। वे शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हैं। जाट सिक्ख महाराजा रणजीत एक ऐसी व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा, बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं भटकने दिया। रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) जाट सिक्ख महाराजा महां सिंह के घर हुआ था। उन दिनों पंजाब पर सिखों और अफगानों का राज चलता था जिन्होंने पूरे इलाके को कई मिसलों में बांट रखा था। रणजीत के पिता महा सिंह सुकरचकिया मिसल के कमांडर थे। पश्चिमी पंजाब में स्थित इस इलाके का मुख्यालय गुजरांवाला में था। छोटी सी उम्र में चेचक की वजह से महाराजा रणजीत सिंह की एक आंख की रोशनी जाती रही। महज 12 वर्ष के थे जब पिता चल बसे और राजपाट का सारा बोझ इन्हीं के कंधों पर आ गया। 12 अप्रैल 1801 को रणजीत ने महाराजा की उपाधि ग्रहण की। गुरु नानक के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और सन 1802 में अमृतसर की ओर रूख किया। महाराजा रणजीत ने अफगानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया। अब पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर उन्हीं का अधिकार हो गया। यह पहला मौका था जब पश्तूनों पर किसी गैर मुस्लिम ने राज किया। उसके बाद उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर पर भी अधिकार कर लिया। पहली आधुनिक भारतीय सेना - "सिख खालसा सेना" गठित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उनकी सरपरस्ती में पंजाब अब बहुत शक्तिशाली सूबा था। इसी ताकतवर सेना ने लंबे अर्से तक ब्रिटेन को पंजाब हड़पने से रोके रखा। एक ऐसा मौका भी आया जब पंजाब ही एकमात्र ऐसा सूबा था, जिस पर अंग्रेजों का कब्जा नहीं था। ब्रिटिश इतिहासकार जे टी व्हीलर के मुताबिक, अगर वह एक पीढ़ी पुराने होते, तो पूरे हिंदूस्तान को ही फतह कर लेते। महाराजा रणजीत खुद अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को बहुत प्रोत्साहन दिया। उन्होंने पंजाब में कानून एवं व्यवस्था कायम की और कभी भी किसी को मृत्युदण्ड नहीं दी। उनका सूबा धर्मनिरपेक्ष था उन्होंने हिंदुओं और सिखों से वसूले जाने वाले जजिया पर भी रोक लगाई। कभी भी किसी को सिख धर्म अपनाने के लिए विवश नहीं किया। उन्होंने अमृतसर के हरिमन्दिर साहिब गुरूद्वारे में संगमरमर लगवाया और सोना मढ़वाया, तभी से उसे स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा। बेशकीमती हीरा कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के खजाने की रौनक था। सन 1839 में महाराजा रणजीत का निधन हो गया। उनकी समाधि लाहौर में बनवाई गई, जो आज भी वहां कायम है। उनकी मौत के साथ ही अंग्रेजों का पंजाब पर शिकंजा कसना शुरू हो गया। अंग्रेज-सिख युद्ध के बाद 30 मार्च 1849 में पंजाब ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया गया और कोहिनूर महारानी विक्टोरिया के हुजूर में पेश कर दिया गया। . सरदार हरि सिंह (1791 - 1837), सिक्ख महाराजा रणजीत सिंह के सेनाध्यक्ष थे जिन्होने पठानों से साथ कई युद्धों का नेतृत्व किया। रणनीति और रणकौशल की दृष्टि से हरि सिंह नलवा की तुलना भारत के श्रेष्ठ सेनानायकों से की जा सकती है। हरि सिंह नलवा ने कश्मीर पर विजय प्राप्त कर अपना लोहा मनवाया। यही नहीं, काबुल पर भी सेना चढ़ाकर जीत दर्ज की। खैबर दर्रे से होने वाले अफगान आक्रमणों से देश को मुक्त किया। इतिहास में पहली बार हुआ था कि पेशावरी पश्तून, पंजाबियों द्वारा शासित थे। महाराजा रणजीत सिंह के निर्देश के अनुसार हरि सिंह नलवा ने सिख साम्राज्य की भौगोलिक सीमाओं को पंजाब से लेकर काबुल बादशाहत के बीचोंबीच तक विस्तार किया था। महाराजा रणजीत सिंह के सिख शासन के दौरान 1807 ई. से लेकर 1837 ई. तक हरि सिंह नलवा लगातार अफगानों के खिलाफ लड़े। अफगानों के खिलाफ जटिल लड़ाई जीतकर नलवा ने कसूर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर में सिख शासन की व्यवस्था की थी। सर हेनरी ग्रिफिन ने हरि सिंह को "खालसाजी का चैंपियन" कहा है। ब्रिटिश शासकों ने हरि सिंह नलवा की तुलना नेपोलियन से भी की है। .
महाराजा रणजीत सिंह और सरदार हरि सिंह नलवा आम में 8 बातें हैं (यूनियनपीडिया में): नेपोलियन बोनापार्ट, पंजाब क्षेत्र, पेशावर, लाहौर, सिन्धु नदी, सिख, सिख साम्राज्य, गुजरांवाला।
नेपोलियन बोनापार्ट (15 अगस्त 1769 - 5 मई 1821) (जन्म नाम नेपोलियोनि दि बोनापार्टे) फ्रान्स की क्रान्ति में सेनापति, 11 नवम्बर 1799 से 18 मई 1804 तक प्रथम कांसल के रूप में शासक और 18 मई 1804 से 6 अप्रैल 1814 तक नेपोलियन I के नाम से सम्राट रहा। वह पुनः 20 मार्च से 22 जून 1815 में सम्राट बना। वह यूरोप के अन्य कई क्षेत्रों का भी शासक था। इतिहास में नेपोलियन विश्व के सबसे महान सेनापतियों में गिना जाता है। उसने एक फ्रांस में एक नयी विधि संहिता लागू की जिसे नेपोलियन की संहिता कहा जाता है। वह इतिहास के सबसे महान विजेताओं में से एक था। उसके सामने कोई रुक नहीं पा रहा था। जब तक कि उसने 1812 में रूस पर आक्रमण नहीं किया, जहां सर्दी और वातावरण से उसकी सेना को बहुत क्षति पहुँची। 18 जून 1815 वॉटरलू के युद्ध में पराजय के पश्चात अंग्रज़ों ने उसे अन्ध महासागर के दूर द्वीप सेंट हेलेना में बन्दी बना दिया। छः वर्षों के अन्त में वहाँ उसकी मृत्यु हो गई। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेज़ों ने उसे संखिया (आर्सीनिक) का विष देकर मार डाला। .
पंजाब दक्षिण एशिया का क्षेत्र है जिसका फ़ारसी में मतलब पांच नदियों का क्षेत्र है। पंजाब ने भारतीय इतिहास को कई मोड़ दिये हैं। अतीत में शकों, हूणों, पठानों व मुगलों ने इसी पंजाब के रास्ते भारत में प्रवेश किया था। आर्यो का आगमन भी हिन्दुकुश पार कर इसी पंजाब के रास्ते ही हुआ था। पंजाब की सिन्धु नदी की घाटी में आर्यो की सभ्यता का विकास हुआ। उस समय इस भूख़ड का नाम सप्त सिन्धु अर्थात सात सागरों का देश था। समय के साथ सरस्वती जलस्रोत सूख् गया। अब रह गयीं पाँच नदियाँ-झेलम, चेनाब, राबी, व्यास और सतलज इन्हीं पाँच नदियों का प्रांत पंजाब हुआ। पंजाब का नामाकरण फारसी के दो शब्दों से हुआ है। पंज का अर्थ है पाँच और आब का अर्थ होता है जल। .
पेशावर पाकिस्तान का एक शहर है। यह ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रान्त की राजधानी है। पेशावर उल्लेख पुराने पुस्तकों में "पुरुषपुर" के नाम से मिलता है। इस उपमहाद्वीप के प्राचीन शहरों में से एक है। पेशावर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत और कबायली इलाकों के वाणिज्यिक केंद्र है। पेशावर में पश्तो भाषा बोली जाती है लेकिन जब उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है इसलिए उर्दू भी माना जाता है। .
लाहौर (لہور / ਲਹੌਰ, لاہور) पाकिस्तान के प्रांत पंजाब की राजधानी है एवं कराची के बाद पाकिस्तान में दूसरा सबसे बडा आबादी वाला शहर है। इसे पाकिस्तान का दिल नाम से भी संबोधित किया जाता है क्योंकि इस शहर का पाकिस्तानी इतिहास, संस्कृति एवं शिक्षा में अत्यंत विशिष्ट योगदान रहा है। इसे अक्सर पाकिस्तान बागों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। लाहौर शहर रावी एवं वाघा नदी के तट पर भारत पाकिस्तान सीमा पर स्थित है। लाहौर का ज्यादातर स्थापत्य मुगल कालीन एवं औपनिवेशिक ब्रिटिश काल का है जिसका अधिकांश आज भी सुरक्षित है। आज भी बादशाही मस्जिद, अली हुजविरी शालीमार बाग एवं नूरजहां तथा जहांगीर के मकबरे मुगलकालीन स्थापत्य की उपस्थिती एवं उसकी अहमियत का आभास करवाता है। महत्वपूर्ण ब्रिटिश कालीन भवनों में लाहौर उच्च न्यायलय जनरल पोस्ट ऑफिस, इत्यादि मुगल एवं ब्रिटिश स्थापत्य का मिलाजुला नमूना बनकर लाहौर में शान से उपस्थित है एवं ये सभी महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल के रूप में लोकप्रिय हैं। मुख्य तौर पर लाहौर में पंजाबी को मातृ भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है हलाकि उर्दू एवं अंग्रेजी भाषा भी यहां काफी प्रचलन में है एवं नौजवानों में काफी लोकप्रिय है। लाहौर की पंजाबी शैली को लाहौरी पंजाबी के नाम से भी जाना जाता है जिसमे पंजाबी एवं उर्दू का काफी सुंदर मिश्रण होता है। १९९८ की जनगणना के अनुसार शहर की आबादी लगभग ७ लाख आंकी गयी थी जिसके जून २००६ में १० लाख होने की उम्मीद जतायी गयी थी। इस अनुमान के मुताबिक लाहौर दक्षिण एशिया में पांचवी सबसे बडी आबादी वाला एवं दुनिया में २३वीं सबसे बडी आबादी वाला शहर है।.
पाकिस्तान में बहती सिन्घु सिन्धु नदी (Indus River) एशिया की सबसे लंबी नदियों में से एक है। यह पाकिस्तान, भारत (जम्मू और कश्मीर) और चीन (पश्चिमी तिब्बत) के माध्यम से बहती है। सिन्धु नदी का उद्गम स्थल, तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा माना जाता है। इस नदी की लंबाई प्रायः 2880 किलोमीटर है। यहां से यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती है। नंगा पर्वत के उत्तरी भाग से घूम कर यह दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीच से गुजरती है और फिर जाकर अरब सागर में मिलती है। इस नदी का ज्यादातर अंश पाकिस्तान में प्रवाहित होता है। यह पाकिस्तान की सबसे लंबी नदी और राष्ट्रीय नदी है। सिंधु की पांच उपनदियां हैं। इनके नाम हैंः वितस्ता, चन्द्रभागा, ईरावती, विपासा एंव शतद्रु.
भारतीय सेना के सिख रेजिमेन्ट के सैनिक सिख धर्म के अनुयायियों को सिख कहते हैं। इसे कभी-कभी सिक्ख भी लिखा जाता है। इनके पहले गुरू गुरु नानक जी हैं। गुरु ग्रंथ साहिब सिखों का पवित्र ग्रन्थ है। इनके प्रार्थना स्थल को गुरुद्वारा कहते हैं। हिन्दू धर्म की रक्षा में तथा भारत की आजादी की लड़ाई में और भारत की आर्थिक प्रगति में सिखों का बहुत बड़ा योगदान है। .
महाराजा रणजीत सिंह सिख साम्राज्य(ਸਿੱਖ ਸਲਤਨਤ; साधारण नाम खाल्सा राज) का उदय, उन्नीसवीं सदी की पहली अर्धशताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर में एक ताकतवर महाशक्ती के रूप में हुआ था। महाराज रणजीत सिंह के नेत्रित्व में उसने, स्वयं को पश्चिमोत्तर के सर्वश्रेष्ठ रणनायक के रूप में स्थापित किया था, जन्होंने खाल्सा के सिद्धांतों पर एक मज़बूत, धर्मनिर्पेक्ष हुक़ूमत की स्थापना की थी जिस की आधारभूमि पंजाब थी। सिख साम्राज्य की नींव, सन् १७९९ में रणजीत सिंह द्वारा, लाहौर-विजय पर पड़ी थी। उन्होंने छोटे सिख मिस्लों को एकत्रित कर एक ऐसे विशाल साम्राज्य के रूप में गठित किया था जो अपने चर्मोत्कर्ष पर पश्चिम में ख़ैबर दर्रे से लेकर पूर्व में पश्चिमी तिब्बत तक, तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में मिथान कोट तक फैला हुआ था। यह १७९९ से १८४९ तक अस्तित्व में रहा था। .
गुजराँवाला रेलवे स्टेशन गुजराँवाला पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त का एक जिला, तहसील तथा औद्योगिक नगर है। यह उत्तर-पश्चिम रेलमार्ग पर लाहौर से ७० किमी उत्तर में है। यह पाकिस्तान का सातवाँ सबसे बडा शहर है। इस नगर की स्थापना गूजर जाति द्वारा हुई बताई जाती है। नगर की स्थापना मध्ययुगीन है। नगर की प्रसिद्धि तथा महत्व में महाराजा रणजीतसिंह के परिवार का अधिक हाथ रहा। सन् १७८० में यहीं पर महाराजा रणजीतसिंह का जन्म हुआ था। रणजीतसिंह के पिता महाराजा महानसिंह की समाधि तथा महाराजा रणजीतसिंह का भस्मावशेष भी यहीं सुरक्षित है। एक बार अमृतसर से आए हुए जाटों ने इस नगर का नाम खानपुर रख दिया था किंतु इसका प्राचीन नाम ही प्रचलित रहा। नगर के प्रशासन के लिए नगरनिगम की स्थापना सन् १८६७ में हुई। यहाँ गल्ले की प्रसिद्ध मंडी है। कपास के बिनौले अलग करना, तेल पेरना, काँसे और मिट्टी के बर्तन बनाना, चूड़ियाँ, जिनमें हाथी दाँत की चूड़ियाँ मुख्य हैं और सूती कपड़े बुनना यहाँ के प्रमुख उद्योग धंधे हैं। सरकारी अस्पताल और महाविद्यालय स्तर की शिक्षा संस्थाएँ भी यहाँ हैं। श्रेणीःपाकिस्तान के शहर.
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7430c31273163432a0694a484b1d1931852d5ef6 | web | वियतनाम - रोचक और आकर्षक देश है, जो लंबे आराम के लिए एक जगह के रूप में हमारे हमवतन बीच लोकप्रिय हो गया। इस कारण से, हम होटल Michelia बुलाया अच्छा होटल में से एक के बारे में बताना चाहते हैं न्हा ट्रांग 4 *।
Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 * बीसवीं सदी की शुरुआत में बनाया गया था और समय "ला Fregate" पर बुलाया गया था। काम के वर्षों के बाद वह कई मरम्मत आया है और 1972 में आरामदायक और सुंदर से एक बन गया न्हा ट्रांग होटल। होटल के मेहमान फ्रांस के अधिकारियों, व्यापारियों और विदेशी निवेशकों के प्रतिनिधि थे। Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 * यूरोपीय शैली में वास्तुकला की दृष्टि से किया गया है, और अब अधिक जटिल है और एक यूरोपीय स्तर पर सेवाएं प्रदान करता है। यह न्हा ट्रांग के दिल (न्हा ट्रांग) में स्थित है, सार्वजनिक समुद्र तट और रेलवे स्टेशन के एक पांच मिनट की ड्राइव से दूर नहीं। इसलिए, पर्यटकों जो यहाँ आया था आराम, नहीं तक पहुँचने के लिए मुश्किल हो जाए।
इसके अलावा सुविधाजनक स्थान, Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 *, जो एक बहु मंजिला इमारत है, 199 कमरे हैं। सभी अपार्टमेंट में इस तरह के कपड़े, वातानुकूलन, डेस्क, टेलीविजन जैसी सुविधाएँ की है। होटल विभिन्न श्रेणियों के कमरे की एक विस्तृत पसंद हैः
- प्रेसिडेंशियल सुइट (115 वर्ग मीटर का एक क्षेत्र के साथ)। समुद्र के दृश्यों के साथ विशाल अपार्टमेंट रसोई क्षेत्र, राजा आकार बिस्तर राजा आकार के साथ बेडरूम के साथ एक अलग बैठक है। अन्य लाभों के अलावा, कमरे में एक केतली, सुरक्षित, डीवीडी प्लेयर है।
- सुपीरियर (25 वर्ग मीटर का एक क्षेत्र)। कमरे पूल या शहर के दृश्य है। अपार्टमेंट दो सिंगल बेड, बाथरूम से सुसज्जित हैं। वे दो मेहमानों के लिए रह सकते हैं।
- सुपीरियर प्रीमियर (32 वर्ग मीटर)। कमरे नदी और शहर के दृश्य है। अपार्टमेंट दो जुड़वा या राजा आकार बिस्तर, शहर दृश्यों, बाथरूम के साथ एक बालकनी है। वे तीन मेहमानों को समायोजित कर सकते हैं। ये संख्या सन्निहित के रूप में सुरक्षित किया जा सकता है।
- डीलक्स (32 वर्ग मीटर)। इन कमरों में समुद्र और शहर के दृश्य है। वे दो एकल या एक बड़े बिस्तर से लैस हैं। इन दोनों लोगों को आराम समायोजित कर सकते हैं में, इसके अलावा में, वहाँ एक अतिरिक्त सीट है।
- डीलक्स प्रीमियर (45 वर्ग मीटर का एक क्षेत्र)। अपार्टमेंट शहर और समुद्र के दृश्यों यह एक लाउंज क्षेत्र और एक बालकनी है है,। यह दो लोगों को समायोजित कर सकते हैं, वहाँ एक अतिरिक्त सीट है।
- प्रीमियर सुइट (55 वर्ग मीटर)। समुद्र या शहर के परिदृश्य के साथ कमरे। इन अपार्टमेंट में एक निजी कमरे में रहने वाले, राजा आकार के साथ बेडरूम है। कमरे में तीन मेहमानों की एक अधिकतम ले जाने में सक्षम है।
- कार्यकारी सुइट (65 वर्ग मीटर)। शहर और समुद्र विचारों के साथ अपार्टमेंट और एक राजा आकार बिस्तर और अलग रहने वाले कमरे के साथ एक बेडरूम शामिल हैं। कमरे दो मेहमानों के लिए तैयार कर रहे हैं, यह एक अतिरिक्त बेड पर एक और व्यक्ति को समायोजित करने के लिए संभव है।
सभी कमरों में वाई-फाई के साथ आते हैं सौंदर्य प्रसाधन, सुरक्षित, मिनी बार, समाचार पत्र नहीं है।
Michelia न्हा ट्रांग होटल 4 * (वियतनाम) अपने क्षेत्र में एक रेस्तरां, जो एशियाई व्यंजनों, साथ ही यूरोपीय भोजन, एक ला कार्टे रेस्तरां, लाउंज और कॉफी की दुकान के साथ एक रेस्तरां में कार्य करता है पर है।
होटल में एक बुफे कार्य करता है। यह बहुत ही उच्च गुणवत्ता भोजन है। रेस्टोरेंट सही आगंतुकों बारबेक्यू समुद्री भोजन के सामने, बहुत अलग व्यंजन की एक बड़ी संख्या में कार्य करता है। बहुत स्वादिष्ट सूप और एक स्थानीय प्रदर्शन पर गर्म व्यंजन। व्यक्तिगत प्रशंसा स्वादिष्ट फल के योग्य।
Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 * (वियतनाम, न्हा ट्रांग) एक अच्छा बुनियादी सुविधाओं है। गहराई जिनमें से एक से डेढ़ मीटर तक की हो सकती एक 25 मीटर स्विमिंग पूल, स्थित एक इमारत की पहली मंजिल पर। इसके अलावा साइट मुद्रा विनिमय, उपहार की दुकान, कपड़े धोने और कार किराए पर लेने पर उपलब्ध है। व्यापार की घटनाओं के सभी प्रकार के लिए, होटल में एक सम्मेलन कक्ष है।
Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 * (लेख में दी गई तस्वीर) एक फिटनेस सेंटर, स्पा (मालिश, सौना, जकूज़ी), एक डिस्को, साथ ही खेलने टेनिस, मछली पकड़ने, डाइविंग प्रदान करता है। बच्चों के लिए, होटल एक दाई की व्यवस्था कर सकते हैं।
होटल दूर समुद्र तट से, यह तट सड़क से अलग है नहीं है। पैर पर आप कोई पाँच मिनट से अधिक, धीरा गति में वहां पहुंच सकते हैं। किनारे पर छाते, डेक कुर्सियों रहे हैं। समुद्र तट तौलिया हर बार जब आप समुद्र की यात्रा जारी किए जाते हैं।
फायदे Michelia Nhatrang होटल 4 * क्या हैं? न्हा ट्रांग - एक रिसॉर्ट शहर है, या बल्कि, देश के समुद्र तट राजधानी। होटल बहुत आसानी से, केंद्र के पास स्थित है एक दस मिनट की पैदल दूरी पर। यह भी बहुत सुविधाजनक है कि समुद्र तट के बहुत करीब है।
शहर में ही बहुत हंसमुख और शोर है। पर्यटकों के हजारों हर साल यहाँ आओ आराम करने के लिए। कुछ बर्फ से सफेद समुद्र तटों और नीला समुद्र के लिए रिसॉर्ट, हरी पहाड़ियों और खाड़ी में उष्णकटिबंधीय द्वीप की सुंदरता की सराहना करते हैं। अन्य शहर की तरह एक रात का जीवन। शांत छुट्टियां मनाने रिसॉर्ट स्पा और कीचड़ स्नान की प्रशंसा में रहते हैं। कम नहीं पर्यटकों को प्राचीन के लिए दिलचस्प चाम टावरों, जो शहर के केंद्र में स्थित हैं।
न्हा ट्रांग (न्हा ट्रांग) - हनोई से 1,300 किलोमीटर की दूरी पर है (वियतनाम की राजधानी)। शहर की आबादी छोटे, केवल 200 हजार लोगों को है। स्थानीय लोगों,, मछली पकड़ने में लगे हुए हैं यह प्रसंस्करण, और जाहिर है पर्यटकों को सेवा।
शहर का नाम वियतनाम के जातीय समूहों में से एक की भाषा से अनुवाद किया है का मतलब है "नदी ईख" या "सदाबहार"। एक बार जब ट्रांग सिर्फ एक मछली पकड़ने के गांव था। के रूप में एक रिसॉर्ट शहर दिनों में वापस विकसित करना शुरू किया जब देश एक फ्रांसीसी उपनिवेश था। 2000 की शुरुआत में, न्हा ट्रांग, छोटे भवनों का पूरा, और हाल के वर्षों में था शहर बहुमंजिला में तेजी से निर्माण और एक सुंदर घर के लिए धन्यवाद। यहाँ नियमित रूप से सौंदर्य प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है, और भी 2008 में आयोजित है, यह एक बहुत ही प्रतिष्ठित प्रतियोगिता "मिस यूनिवर्स" है।
क्यों छुट्टियां मनाने Michelia Nhatrang होटल 4 * (वियतनाम) के लिए आते हैं? न्हा ट्रांग न केवल अपने समुद्र तटीय के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन यह भी बहुत उपचार कीचड़ और स्प्रिंग्स। इसलिए, होटल में आराम कर रही है, आप केवल समुद्र तटों पर आराम नहीं कर सकते हैं, लेकिन यह भी स्थानीय कीचड़ के लाभदायक प्रभाव महसूस करने के लिए। नीलगिरी के वृक्ष गंध के साथ हवा का अच्छा व्यापक उपचार - यह सब कमजोर प्रतिरक्षा और श्वसन रोगों के साथ लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
एक दिलचस्प तथ्य यह तापमान हमेशा कम से कम 26 डिग्री है, कि शहर में समुद्र बहुत गर्म है। यह केवल फरवरी और जनवरी में किया गया था, थर्मामीटर +24। गर्मी के दिनों में गर्मी यहां मनाया जाता है (+ 33-34 डिग्री), सर्दियों में तापमान बहुत मुश्किल से ही 15 डिग्री तक कम किया जा सकता है। गर्मियों और सर्दियों के महीनों के बीच बड़ा अंतर नहीं देखा है, औसतन - है 22-28 डिग्री कम है।
क्या अच्छा Michelia Nhatrang होटल 4 *? समीक्षा जटिल व्यवस्था का अच्छा स्थान का कहना है। केंद्र पास पैदल दूरी के भीतर स्थानीय आकर्षण के लिए स्थित है, और इसलिए कर रहा है। इसके अलावा, समुद्र की निकटता प्रसन्न। आम तौर पर, शहर बहुत अच्छी तरह से डाइविंग विकसित की है। मार्च और अगस्त की शुरुआत से - खेल के इस प्रकार के लिए सबसे अच्छा समय है। Semikilometrovy प्रसिद्ध न्हा ट्रांग समुद्र तट सबसे अच्छा और वियतनाम के दक्षिण में सबसे सुंदर माना जाता है। बड़े नारियल हथेलियों मजबूत धूप से रक्षा की, न केवल समुद्र में पर्यटकों और स्नान करने वालों घूमना। खाड़ी समुद्र, द्वीपों और पहाड़ों कि तूफान और हवाओं से लोगों को बचाने से शहर से आच्छादित है। समुद्री जल अत्यंत स्पष्ट और साफ है, और इनपुट पानी नहीं बल्कि तेज, दो या तीन मीटर गहराई बड़ा मानव विकास हो जाता है। इसलिए, विशेष रूप से सावधान रहना करने के लिए यहाँ बच्चों के साथ की जरूरत है।
मुख्य आकर्षण है कि देखने लायक हैं के अलावा, गढ़ सत्रहवीं सदी में बनाया गया राजवंश चिंग Denkhan है, शिवालय Longshon (मोनास्टिर, भिक्षुओं का निवास), फ्रेंच गोथिक शैली में न्हा ट्रांग के कैथेड्रल, विला बाओ दाव, चाम टावरों (वे देश में ऊंचा दर्जा पाने रहते थे) , सातवीं और बारहवीं सदी के बीच डेटिंग।
होटल के बारे में बात करते हुए मैं समीक्षा पर चर्चा करना चाहते हैं, इस परिसर में आराम करने के लिए समय नहीं था। यह * ध्यान Michelia न्हा ट्रांग होटल 4 के योग्य है? हॉलिडे समीक्षा यह होटल बहुत ही सकारात्मक है। उन्हें विस्तार से जांच करते हैं। होटल का लाभ उसके स्थान है। एक तरफ, यह लगभग केंद्र में है, और अन्य पर - समुद्र तट के पास। न्हा ट्रांग - एक छोटे से शहर आपको लगता है कि केंद्र के भीतर स्थित हैं स्थानीय आकर्षणों से पैदल बनाने के लिए अनुमति देता है। लेकिन एक ही समय में यह पूरी तरह, परिवहन चलता है, ताकि आप इच्छित स्थान पर प्राप्त कर सकते हैं। अनुभवी यात्रियों पैसे के साथ सावधान रहना है और उन्हें अपने तक ही रखना सलाह दी जाती है। देश इतना समृद्ध नहीं है, और इसलिए चोरी विकसित की है, उदाहरण के लिए, बैग आंसू।
होटल अच्छा विशाल कमरे हैं। सभी गुणवत्ता सामान, बहुत ही आरामदायक और बड़े बेड से सुसज्जित हैं। नई लिनेन, सुंदर। टूथब्रश, साबुन, जैल और शैंपू से और तौलिये और चप्पल के लिएः अपार्टमेंट सब कुछ आप की जरूरत है। कुछ कमरों में बालकनी है, और कुछ नहीं है। यह बुकिंग के समय ध्यान देना आवश्यक है। यदि आप पूरी तरह इसकी जरूरत है, तो एक पेस्ट उस पल निर्धारित।
खाद्य होटल बहुत अच्छी है। पर्यटकों की एक विशेष खुशी शाम (ऑक्टोपस, झींगे, मछली) में समुद्री भोजन ग्रील्ड कारण। टेबल पर हमेशा सलाद, सब्जियां, फल और मांस का एक बड़ा चयन है। स्थानीय रसोइयों स्वादिष्ट तैयार करते हैं।
क्या अन्य लाभ करता है Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 *? होटल के विवरण सफाई के उल्लेख के बिना अधूरा होगा। किसी कारण से यह सवाल अक्सर पर्यटकों के साथ संबंध है। कमरे दैनिक और गुणवत्ता पर्याप्त साफ किया जाता है, और, बहुत महत्वपूर्ण, हर दिन परिवर्तन तौलिए। इसके अतिरिक्त, समुद्र तट तौलिया हैं। यह बहुत सुविधाजनक है। वे आप समुद्र तट पर बाहर जाना हर बार जारी किए जाते हैं।
समुद्र तट से जाने के लिए दूर नहीं है। यह बहुत बड़ी नहीं है, यह गद्दे और छतरियों के साथ धूप कुर्सियों है, लेकिन वे हमेशा पर्याप्त नहीं हैं। यह जगह लेने के लिए या तो सात घंटे के लिए आवश्यक है, या तुम सिर्फ रेत में रह सकते हैं। क्योंकि यह बहुत गर्म है ग्यारह घंटे के बाद किनारे पर स्थित है, समस्याग्रस्त है। खाने से, एक नियम के रूप में, हवा ऊपर उठाता है और समुद्र - लहर।
होटल के कर्मचारियों का सवाल है, यह काफी दोस्ताना और चौकस है। समस्याओं के निपटारे के साथ उत्पन्न होती हैं। होटल के प्रबंधक जन्मदिन का केक और नववरवधू पेश करेंगे। सामान्य तौर पर, पर्यटकों Michelia Hotel न्हा ट्रांग 4 * में छुट्टी पर सबसे सुखद अनुभव कर रहे हैं। पर्यटकों की प्रतिक्रियाएँ - सेवा और रहने की स्थिति की गुणवत्ता का मुख्य सूचक है, जो निश्चित रूप से करने के लिए ध्यान देना चाहिए।
पूर्वगामी के आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि Michelia Hotel HhaTrang 4 * यात्रियों के लिए सिफारिश की जा सकती रूप में पर्यटकों का कहना है कि होटल पूरी तरह से अपने चार सितारा श्रेणी से मिलता है। और सेवा, भोजन और आवास की गुणवत्ता ऊंचाई पर है। बहुत आरामदायक एक जगह में आराम करने के लिए।
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0b3ac9be4277abdc42c1517e3bcb1ebcb8ff1787a2540f64a33e05c75e69ee64 | pdf | स्वस्थ जीवन का आधारभूत तत्व ह 'सम्यक् दृष्टिकाण । जीवन जाना और सम्यक् दशन के साथ जीना - इन दोनो स्थितियों में बहुत अन्तर है। जीते ता सभी ह किन्तु सही दृष्टि, सही लभ्य, मही दिशा आर सही गति के साथ जीना उपलब्धिया के साथ जीना है । दृष्टि सही नहीं होगी ता सहा लक्ष्य का निधारण कैसे होगा? लक्ष्य निधारित किए बिना सही दिशा म प्रस्थान की संभावना ही क्षीण हा जाएगी। लभ्य स्पष्ट हा गया, किन्तु दिशा उलटी हो गई तो लक्ष्य की दूरी केसी सिमटेगी दिशा सही है, पर चरण गतिशील नहीं ह ता घाणी के वल' की तरह किसी एक ही केन्द्रविन्दु की परिक्रमा हाती रहगी।
मनुष्य बहुत समझदार प्राणी है । वह वत का काल्हू म जातता ह ना उसकी आखा पर पट्टी बाध दता है। क्या? उसे यह अहसास न हा कि वह निरन्तर एक ही स्थान पर चक्कर लगा रहा ह । पशुविज्ञानिया का अभिमत है कि यदि वन का उक्त तथ्य ज्ञात हो जाए तो वह उसी समय गश खाकर गिर पडे। मनुष्य की भी यही स्थिति है। वह निरंतर गतिशील रहकर भी लक्ष्य की दूरी का एक इच भी कम नहीं कर पाएगा यदि उसका दृष्टिकाण सम्यक् नही है। इसलिए जरूरी ह जीवन म सम्यक् दशन । माथ का आरक्षण इसी तत्त्व के सहारे से सभव है ।
सम्यक् दशन क्या ह जीवन के प्रति सम्यक् दृष्टिकोण का निकास कस हा सकता है? जीवन का लक्ष्य क्या है? निधारित लक्ष्य को प्राप्त करने के उपाय क्या हरनन्य प्राप्ति की दिशा में प्रस्थित होने पर भी गत्यवराव क्यो होता है? क्या अवराव का तोड़ा जा सकता है / इत्यादि अनेक प्रश्न ह जा जिनासु लागा क मस्तिष्क म काधते रहते है।
१०० दीव म दीया जन
हर चिन्तनशील व्यक्ति आगे बढ़ने के लिए अपने सामने एक आदश का प्रस्थापित करना चाहता है। आदश, पथदशक आर पथ की सभ्यक अवधारणा ही सम्यक् दशन हे । दूसरे शब्दों में विधायक दृष्टिकाण का नाम सम्यक् दशन हे । जीवन के प्रति दृष्टिकाण को सम्यक् बनान के लिए एक जीवनशैली के निधारण ओर प्रशिक्षण की अपेक्षा हे । सामान्यत हर व्यक्ति स्वस्थ आर शक्तिसपन्न जीवन जीना चाहता है । इस चाह की पूर्ति क लिए सम्यक् दर्शन की नितान्त आवश्यकता है। सम्यक् दशन की पहचान करान के लिए पाच पेमाने निधारित किए गए ह
क्रोध, अभिमान छलना, लोभ आदि आनेगा का उपशमन । • लक्ष्य की दिशा म गतिशील रहने का रुथान ।
• जीवन को अभिशप्त वनान वाली मनोवृत्तिया स वराग्य । • मन मे सवेदनशीलता ओर व्यवहार में करुणा ।
• सबके अस्तित्व मे आस्था ।
मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व को मापने वाले ये पमाने सम्यक् दृष्टिकाण की कसोटिया ह तो जीवनशैली का वदलन वाल महत्वपूर्ण घटक है। आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण ओर आत्मनियनण के आधार पर लक्ष्य की दिशा में होन वाले गत्यनरोध को ताडा जा सकता है ।
मनुष्य अपनी दो आखा से जगत् के स्थूल पदार्थो को दखता है। आये कभी उस धोखा दे सकती है। आखा दखा सच भी कभी-कभी झूठ प्रमाणित हो सकता है। किन्तु सम्यक दृष्टिकाण ऐसा तत्त्व ह जा अन्तर्दृष्टि क धुधलपन को दूर करता है। आइना साफ होता ह ता प्रतिबिम्व भी साफ आता है । इसी प्रकार दृष्टिकोण सम्यक् ह ता जीवन का क्रम भी सम्यक आर व्यवस्थित हो सकता है ।
साफ आइना साफ प्रतिबिम्ब १०१
स्वस्थ जीवन का आधारभूत तत्व ह 'सम्यक दृष्टिकोण । जीवन जीना आर सम्यक् दशन के साथ जीना - इन दाना स्थिनिया में बहुत अन्तर है। जीते तो सभी ह किन्तु सही दृष्टि, सही लक्ष्य, सही दिशा आर सी गति के साथ जीना उपलब्धिया के साथ जीना है। दृष्टि सही नहीं होगी ता सहा लक्ष्य का निधारण कसे होगा लक्ष्य निधारित किए बिना सही दिशा म प्रस्थान की संभावना ही क्षीण हो जाएगी। लक्ष्य स्पष्ट हा गया, किन्तु दिशा उलटी हा गई तो लक्ष्य की दूरी कसी सिमटंगी? दिशा सही है, पर चरण गतिशील नहीं है तो 'घाणी क वल' की तरह किसी एक ही केन्द्रविन्दु परिक्रमा हाती रहगी ।
मनुष्य बहुत समझदार प्राणी है। वह बल का कोल्हू म जातता ह ता उसकी आखा पर पट्टी बाध दता है। क्या ? उम यह अहसास न हो कि वह निरन्तर एक ही स्थान पर चक्कर लगा रहा है। पशुविज्ञानिया का अभिमत है कि यदि वन का उक्त तथ्य ज्ञात हो जाए तो वह उसी समय गश खाकर गिर पडे । मनुष्य की भी यही स्थिति है। यह निरतर गनिशील रहकर भी लक्ष्य की दूरी का एक इच भी कम नहीं कर पाएगा यदि उसका दृष्टिकाण सम्य नहीं है। इसलिए जरूरी है जीवन म सम्यक् दशन । माक्ष का आरक्षण इसी तत्त्व के सहार से सभव हे ।
सम्यक् दशन क्या ह जीवन के पति सभ्य दष्टिकाण का विकास केसे हा सकता है? जीवन का लक्ष्य क्या है? निधारित लक्ष्य का प्राप्त करन के उपाय क्या ह? नक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रस्थित हान पर भी गत्यवराध क्यो हाता है क्या जवरोध को तोड़ा जा सकता है। इत्यादि अनक प्रश्न ह जो जिज्ञासु लागा क मस्तिष्क में काधत रहते है।
१०० टीम स दीया जले
हर चिन्तनशील व्यक्ति आगे बढ़ने के लिए अपन सामने एक आदश को प्रस्थापित करना चाहता है। आदश, पथदशक आर पथ की मम्यक् अवधारणा ही सम्यक् दशन है। दूसरे शब्द मे विधायक दृष्टिकाण का नाम सम्यक् दशन है। जीवन के प्रति दृष्टिकाण को सम्यक् बनाने के लिए एक जीवनशली के निधारण ओर प्रशिक्षण की अपना हे । सामान्यत हर व्यक्ति स्वस्थ ओर शक्तिसपन्न जीवन जीना चाहता है । इस चाह की वृति के लिए सम्यक् दर्शन की नितान्त आवश्यकता है । सम्यक् दशन की पहचान करान के लिए पाच पेमाने निधारित किए गए ह
क्रोध, अभिमान, छलना, लोभ आदि आगोका उपशमन । • लक्ष्य की दिशा में गतिशील रहन का रुझान ।
• जीवन को अभिशप्त बनान वाली मनोवृत्तिया से वराग्य । • मन मे सवेदनशीलना ओर व्यवहार में करुणा ।
• सबके अस्तित्व में आस्था ।
मनुष्य क आन्तरिक व्यक्तित्व को मापने वाले ये पमाने सम्यक् दृष्टिकाण की कसाटिया ह तो जीवनशैली का बदतन वाले महत्वपूर्ण घटक है। आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण और आत्मनियंत्रण के आधार पर लक्ष्य की दिशा में होने वाले गत्यवराध को ताडा जा सकता है।
मनुष्य अपनी दा आखो स जगत् के स्थूल पदार्थो का दखता है। आख कभी उस धाखा द सकती है । आखो देखा सच भी कभी कभी झूठ प्रमाणित हा सकता है। किन्तु सम्यक दृष्टिकोण एसा तत्त्व ह, जा अन्तर्दृष्टि के धुधलेपन को दूर करता है । आइना साफ होता है ता प्रतिविम्व भी साफ आता है। इसी प्रकार दृष्टिकोण सम्यक् हे तो जीवन का क्रम भी सम्पर्क आर व्यनस्थित हो सकता है।
साफ आइना साफ प्रतिविम्व १०१
४८ सन्यास परम्परा ओर ज्ञान की धारा
भारतीय संस्कृति म मन्याम की परम्परा बहुत गरिमापूर्ण रही है। इसे जीवन के उदात्तीकरण की प्रक्रिया माना गया है। साधारण से साधारण आर महान् स महान् सभी व्यक्तियों के लिए सन्याम का राम्ना मुक्त रखा गया ह। आश्रम व्यवस्था के अनुसार इस जीवन का एक अपरिहाय हिस्सा माना गया है। जेन परपरा मे सन्यास के लिए जीवन के सान्ध्यकाल तक प्रतीना करन का विधान नहीं है। उपनिषद कहत ह कि जिस दिन विरक्ति हा, सी दिन पनज्या के पथ पर अग्रसर हो जाना चाहिए। बाद्धधम मानता ह कि कुछ समय के लिए ही सही जीवन में एक बार सन्यास लना आवश्यक है ।
नन्धम म सन्यास की कल्पना अन्य परम्पराआ म बहुत भिन्न हे । व्यक्ति मसार म रहे, पर समार उसके मन म न रहे, यह सन्याम की एक परिभाषा ह। घर, परिवार आर परिग्रह का त्याग कर एक अकिचन मुनि का जीवन जीना भी सन्यास है। इस परिभाषा के अनुसार मुनि अन्यन्न मीमित साधना से जीवनयापन करता है आम जपना पूरा जीवन चम, अध्यात्म या मानवता की सेवा मे समर्पित करक रहता है। ऐसे व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र क गारव हात ह आर सब प्रकार से निश्चिन्त हाकर विकास की नई खिड़किया खानत है ।
ससार म जितने विशिष्ट व्यक्ति हुए ह, उनम सन्यासियों की एक लम्बी सूची है। ज्ञान के अपूत्र सात सालन वाल सन्यासी ही हुए हैं। पदव्याम हा चाह उमास्वाति जिनभद्र हा या हरिभद्र। इस श्रेणी से जनक व्यक्तित्व जुड़ हुए ह । उनऊ द्वारा बहाइ गइ ज्ञानधारा में हम आप मी अभिण्यात हा रह है। ज्ञान आर चरित्र की उज्ज्वल आभा का टख इस दिशा में आऊपण हाना स्वाभाविक है । किन्तु ऐसा लगता है कि प्रजाह उलटा वह रहा है। युवा
१०० दीय स दीया जल
पीटा क लागा की अध्यात्म वा सन्चास क क्षेत्र म रुचि कम हा रही ह या समाप्त हो रही है। उन्ह अथ ही अध दिखाई द रहा है। अथ जीवनयापन का साधन ह यह काई र वान नहीं है। मनुष्य अथ के बिना भी जी सकता है, अच्छ टग स जीवनयापन कर सकता है। यह विलक्षण अवधारणा ह । इसक द्वारा सयम त्याग वा सन्चास के पथ पर गति होती है । इस आर से आख मूद लेना दश क हिन म कस हागा
मनुष्य अथ के अनन जर सगह की म्पधा म खड़ा है। इस स्पधा म का भी खड़ा हा सकता है। पर परिगह के की स्पधा म कान खड़ा हो सकता है एक सठ न अभूतपूर दान दन का निर्णय लिया। उसन मान की चाकी बनाई। उस पर ही मानी सजाए। एक ब्राह्मण का आमनित कर सट वाला - ब्राह्मण दरना । यह चाकी म आपका दता हू । एसा दान कही देखा है आपन / यह बात सुन ब्राह्मण का स्वाभिमान जागा । अपनी जय सदा रुपए निकाल । उस चाक पर रख आर कहा- 'म इस चाकी का निसजन करता ह, त्याग करना हू । सठ साहन । आपन एसा त्याग कही देखा है ? सठ का सिर तज्जा से झुक गया। एस प्रसग म आयारा' का सूक्न आखा के सामन आ जाना ह-अन्धि सत्य परण पर, पत्थि असन्थ परण पर-हिसा म परपरा चलनी ह । अहिंसा म काइ परपरा नहीं है। हिमा हा या परिग्रह उसम हाड चल सकती है। अपरिग्रह म हाड नही चलती । अपरिग्रह का माग ही सन्यास का माग ह ।
सन्यास न पलायन ह आर न रूढ़ि है। यह एक साहसिक अभियान ह। इस अभियान के लिए घर का न्याग कर चलने वाले कुठा तनाव, हीनभावना, असतोप आदि युगीन वीमारिया स मुक्त रहत है । उनके सामन य समस्याएं क्या नहीं रहती है। अनुसंधान किया जाए ता कुछ कारण स्पष्ट असतोप आदि का कारण ह- इच्छाआ का विस्तार एपणाआ का निम्तार आर सगह की धुन । सन्यास का पथ अनिच्छा, अनेपणा आर असग्रह की आरला पाला है। इस पथ पर बटन वाल युगीन बीमारिया स
आक्रान्त क्या हाग ?
अध्याम भारतीय संस्कृति का आधार है। इसे सुरक्षित रखने के लिए पयन्नपूनक सन्यास की परपरा का सुरक्षित रखन का अपक्षा है।
सन्चास परम्परा और ज्ञान की धारा १०३
सन्यास की परंपरा का लोप दश के दुभाग्य का सूचक है। शास्त्र में बताया ह कि मुनि सार मसार का अभय दन वाना होता है। एक मुनि की हत्या अनन्न नीना की हत्या के बराबर है। वह दश माभाग्यशाली हाना है, जहा अहिमा, अपरिग्रह जादि महारता का पालन करनन्यासी साधना करन है । मन्यास-परपरा की महता का ध्यान में रखकर इसकी सुरक्षा ए अभिवृद्धि के लिए सलग्न अभिकम किया जाए ना भाजी खतरा स वचा जा
सकता है।
१०४ दीय स दीवा तल
४६ सापेक्षता है सजीवनी
भगवान् महावीर ने ढाई हजार वर्ष पहले सापेक्षता का सिद्धान्त दिया । उन्होंने कहा- 'वस्तु म अनन्त धम होते है । वे सब धर्म सापेक्ष रहकर ही अपनी उपयोगिता प्रमाणित कर सकत ह । व्यक्ति भी अनन्त धर्मो का समजाय है । उसमे विरोधी युगला की सत्ता ह । वह सापेक्षता के सिद्धान्त को समझ ले तो उसके जीवन मे कही कोई उलयन नही आ सकती। सामूहिक जीवन म तो सापेक्षता के बिना एक कदम उठाना भी कठिन हे ।' भगगन् महावीर का यह सिद्धान्त उस समय प्रासगिक था। आज उसकी प्रासंगिकता बहुगुणित होती जा रही है ।
परिवार, पार्टी, सघ, संस्थान कोइ भी समूह हो, उसके सदस्य जितने सापेक्ष रहगे, सगठन उतना ही मजबूत होगा। आज चारो ओर बिखराव की स्थिति है। परिवार बिखर रहे है। दल टूट रहे ह । धर्मसघो मे एकरूपता नही है, सस्थाना में व्यवस्थाए ठीक नहीं है। कारण क्या है? अनेक कारण हो सकते है । निरपेक्षता सबसे बड़ा कारण हे । हम पीया, हमारा वल पीया, अव चाहे कुआ ढह पडे - सामूहिक चेतना मे यह कसी मनोवृत्ति ? यदि हमारा पडोसी दुखी है तो क्या उसका प्रभाव हम पर नहीं होगा ? व्यक्ति की स्वाथ-चेतना को जव तक पराथ या परमाथ की दिशा नहीं मिलेगी, वह सापेक्ष होकर नही जी पाएगा।
एक ईप्यालु व्यक्ति अपने पास-पडोस म किसी का विकास देखना नही चाहता था। उसकी यह आकाक्षा थी कि उसका कोई भी पडोसी किसी भी क्षेत्र मे उससे आगे न बढे । एक वार उसने किसी देवी की आराधना की । दवी प्रसन्न हुइ । पर उसने एक शत रखी कि वह अपने लिए जो कुछ चाहगा उसके पडोसी का उससे दुगुना मिलगा। एक मकान एक खत, एक
सापेक्षता हे सजीवनी १०५ |
a628b6fcdfb6aff2d7d41fe2f40540fb304e4ddb | web | भारत में हुई शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (एससीओ) की बैठक से लौटे पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने शुक्रवार को कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर 'दोनों मुल्कों को मिलकर बात करनी चाहिए. '
वहीं उनके इस बयान के कुछ घंटे पहले भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाक विदेश मंत्री को 'आतंक की इंडस्ट्री का प्रवक्ता और उसे बढ़ावा देने वाला कहा' और कहा कि पाकिस्तान से 'बातचीत जैसी कोई स्थिति नहीं बन रही है. '
भारत और पाकिस्तान के बीच बीते कुछ सालों से रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं और 2016 के बाद ये पहला मौक़ा था जब पाकिस्तान की तरफ से कोई मंत्री भारत आए.
ये उम्मीद जताई जा रही थी कि बिलावल भुट्टो के भारत दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्ते बेहतर हो सकते हैं. लेकिन दोनों मुल्कों के विदेश मंत्रियों के तीखे बयान सामने आने के बाद अब ऐसा लग रहा है कि दोनों के बीच रिश्तों में जारी तनाव अभी तक कम नहीं हुआ है और हालात बेहतर होने की सूरत को लेकर भी संहेद जाहिर किया जा रहा है.
इस बारे में पाकिस्तान में मौजूद बीबीसी संवाददाता शुमाइला जाफ़री कहती हैं कि पाकिस्तान के नज़रिए से देखा जाए तो काफी सोच-विचार के बाद बिलावल भुट्टो एससीओ की बैठक में शिरकत करने पहुंचे थे लेकिन 'दुर्भाग्य से जो माहौल रहा है उसके बाद कहा जा सकता है कि रिश्ते जल्द सुधरने के आसार नहीं दिखते. '
वहीं भारत में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर भी मानते हैं कि कम से कम आने वाले एक-डेढ़ साल तक 'दोनों देशों के संबंधों में तनाव कम होने की संभावना नहीं दिखती. '
'पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण पहल की थी, लेकिन. . . . '
शुमाइला जाफ़री कहती हैं कि पाकिस्तान के भीतर बिलावल भुट्टो के भारत दौरे को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया आ रही थी, लेकिन उनके लौटने के बाद अब देश के भीतर स्थिति थोड़ी बदल गई है.
शुमाइला कहती हैं, "विपक्षी पार्टी तहरीक़े इंसाफ़ का कहना था कि उन्हें भारत नहीं जाना चाहिए था. हालांकि इसे लेकर पार्टी के भीतर ही एक राय नहीं थी और कुछ लोगों का मानना था कि एससीओ पाकिस्तान के लिए अहम है इसलिए बिलावल को जाना चाहिए. लेकिन भारतीय विदेश मंत्री के बयान के बाद बिलावल भुट्टो को पाकिस्तान में काफी समर्थन मिल रहा है. ये कहा जा रहा है कि उन्होंने भारत में पाकिस्तान का रुख़ सामने रखा और बेहद संतुलित बयान दिया. "
शुमाइला जाफ़री कहती हैं, "बीते साल दिसंबर में बिलावल भुट्टो ने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रधानमंत्री के बारे में विवादित बयान दिया था जिसके बाद उनकी काफी आलोचना हुई थी. इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से काफी सोच-विचार के बाद बिलावल भुट्टो को एससीओ की बैठक के लिए भारत भेजने का फ़ैसला लिया गया था. ये अपने आप में अहम पहल थी. "
वो कहती हैं, "वहां प्रोटोकॉल के अनुसार दोनों नेताओं ने हाथ नहीं मिलाया, जिस दौरान बिलावल बोल रहे थे उस दौरान बैकग्राउंड में मीडिया की कमेंट्री होती रही. भारत से वापस आने के बाद बिलावल भुट्टो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि दोनों देशों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो बातचीत करें. लेकिन जो हालात बने हैं उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते सुधर सकते हैं. "
'भारत की सरकार अभी बात नहीं करना चाहेगी'
वहीं शेखर अय्यर कहते हैं, "पहली बात तो ये है कि घाटी में आतंकवादी घटनाओं में कमी नहीं आई है और भारत मांग करता रहा है कि इस तरह की घटनाओं में कमी आने के बाद ही बातचीत की संभावना बन सकती है. "
"दूसरी बात ये है कि पाकिस्तान का कहना है कि भारत सरकार को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का फ़ैसला पलटना चाहिए. भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि ये उसका आंतरिक मामला है. ऐसे में दोनों के बीच आगे किसी तरह की बातचीत की संभावना बेहद कम नज़र आती. "
अगस्त 2019 में भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने का फ़ैसला किया. अब सरकार वहां जल्द चुनाव करवाने की तैयारी में है.
वो कहते हैं, "भारत सरकार इसी साल के आख़िर में जम्मू कश्मीर में चुनाव करवा सकती है और वो ये दिखाना चाहेगी कि वहां पर राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो रही है. "
शेखर अय्यर कहते हैं, "बीजेपी सरकार की बात को अगर आप छोड़ भी दें तो 370 एक ऐसा मसला है कि जिससे जुड़े फ़ैसले को वो पलटना नहीं चाहेंगे. कांग्रेस इससे जुड़े कुछ क़ानूनों को हटा सकती है, लेकिन इसे पूरी तरह बदलने जैसा कुछ वो भी नहीं करेगी. "
- 370 हटने से कश्मीर में क्या बदलेगा, अभी क्या स्थिति है?
शेखर अय्यर कहते हैं कि दोनों ही मुल्कों के राजनीतिक हालात कुछ ऐसे हैं कि दोनों अभी एकदूसरे से न तो बातचीत करना चाहेंगे और न ही उलझना चाहेंगे.
वो कहते हैं, "भारत में एक के बाद एक कई विधानसभा चुनाव होने हैं. मई में कर्नाटक, उसके बाद तेलंगाना, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं. इसके बाद अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं. वहीं पाकिस्तान आर्थिक परेशानी से तो जूझ ही रहा है, उसके सामने राजनीतिक संकट भी है. फिर पाकिस्तान की मौजूदा सरकार का कार्यकाल इस साल अगस्त तक ख़त्म होना है. "
"भारत का पक्ष स्पष्ट है कि एससीओ में पाकिस्तान सदस्य देश है और उसे इसमें शिरकत करनी चाहिए लेकिन बातचीत को लेकर साफ़ है कि जब तक आतंक की घटनाएं कम नहीं होती तब तक बातचीत नहीं हो सकती. "
भारत 2004 में हुए इस्लामाबाद डिक्लेरेशन पर कायम है, जिसके अनुसार दोनों पक्ष आतंकवाद के लिए अपनी सरज़मीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगे. ये घोषणा अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में हुई थी.
बीजेपी सरकार के ही कार्यकाल के दौरान दोनों मुल्कों के बीच बस सेवा भी शुरू हुई थी और तब के पाक पीएम से मिलने तत्कालीन भारतीय पीएम लाहौर पहुंचे थे. ऐसे में बीजेपी सरकार हमेशा ही ये कह सकती है कि उन्होंने रिश्ते बेहतर करने की दिशा में सभी कदम उठाए हैं.
शेखर अय्यर कहते हैं, "मौजूदा हालात को देखते हुए ये असंभव लगता है कि बीजेपी सरकार पाकिस्तान से साथ किसी मामले में अभी बातचीत करेगी, कम से कम आने वाले एक-डेढ़ साल तक इसकी सूरत बनती नहीं दिखती. "
- 2016 के बाद पहली बार इस साल पाकिस्तान के किसी मंत्री ने भारत का दौरा किया है.
- इससे पहले पाकिस्तान के पीएम रहे नवाज़ शरीफ़ 2014 में भारतीय पीएम मोदी के शपथग्रहण समारोह में भारत आए थे.
- उनके दौरे के बाद दिसंबर 2015 में मोदी अचानक उनसे मुलाक़ात करने लाहौर पहुंचे थे. इसके बाद से दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते लगातार बिगड़ते गए.
- अगस्त 2016 में जम्मू कश्मीर के उरी में एक आर्मी कैंप में हमला हुआ. उसी साल सितंबर में भारत ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया.
- सितंबर 2018 में इमरान ख़ान पाकिस्तान के पीएम बने, मोदी ने उनसे बात की और बधाई दी. दोनों नेताओं के बीच मुलाक़ात को लेकर चर्चा चल रही थी लेकिन इस बीच जम्मू कश्मीर में आतंक की घटनाओं में इज़ाफ़ा हुआ.
- फरवरी 2019 में पुलवामा में सेना के काफिले पर हमला हुआ. जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए.
- अगस्त 2019 में भारत ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने का ऐलान किया. पाकिस्तान इसका कड़ा विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र में भी इस पर बयान दिया.
- इसके बाद इस साल अप्रैल में भारत ने जी20 देशों की एक बैठक श्रीनगर में करने का एलान किया था, जिस पर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई थी.
पाक विदेश मंत्री ने क्या कहा?
भारत के गोवा में चार-पांच मई को हुई एससीओ देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक से वापस लौट कर बिलावल भुट्टो ने शुक्रवार को एक प्रेंस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने कहा कि भारत में उन्होंने पाकिस्तान के रुख़ की बात की और लोगों को बताया कि 'हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता. '
उन्होंने कहा, "हमारा मकसद था कि हम पाकिस्तान का रुख़ सदस्य देशों के सामने रख सकें. उस लिहाज़ से ये दौरा कामयाब रहा. हम पर पाबंदी है कि हम द्विपक्षीय मुद्दों को उस तरीके से नहीं उठा सकते हैं लेकिन कूटनीतिक दायरे में रहते हुए ऐसा कर सकते हैं. हमने बैठक में ज़रूरी मुद्दे उठाए. "
उन्होंने जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की तरफ इशारा करते हुए इसे 'एकतरफा कदम' बताया.
बिलावल भुट्टो ने कहा, "ये अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के रिज़ोल्युशन का उल्लघंन है. ये एससीओ के उद्देश्यों और दोनों के बीच द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन है. "
बिलावल भुट्टो ने कहा, "मुझे लगता है कि ये ज़िम्मेदारी भारत की है कि वो ऐसा माहौल बनाए जिसमें बातचीत हो सके, नहीं तो दोनों मुल्क आतंक का शिकार होते रहे हैं. "
उन्होंने कहा, "भारत का पक्ष एक मज़ाक है. वो कहते हैं कि आप खुद को आतंक का शिकार कहते हैं और आतंक फैलाने वालों के साथ बैठते हैं. आप मुझे बताएं क्या मैं कभी ग़लती से भी किसी दहशतगर्द के साथ बैठा हूं. लेकिन नफरत इतनी बढ़ चुकी है कि उन्हें हर मुसलमान दहशतगर्द नज़र आता है. जब तक हम आतंकवाद के मुद्दे का राजनीतिकरण करते रहेंगे, इस पर बंटे हुए रहेंगे तब तक हम इसका शिकार होते रहेंगे. हमें एक होकर इसका मुक़ाबला करना होगा. "
बिलावल भुट्टो ने कहा, "भारत में बीजेपी और आरएसएस की कोशिश रही है कि वो दुनियाभर के मुसलमानों को दहशतगर्द करार देते हैं, भले ही वो भारत में रहते हों या फिर पाकिस्तानी हों. ये एक प्रोपोगैंडा चलाया जा रहा है, हमने उस मिथक को तोड़ने की कोशिश की. "
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान में प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के टिकट पर लड़ने वाले हिंदू पाकिस्तानी उम्मीदवार चुनाव लड़कर जीतते हैं और नेता, मंत्री बनते हैं. लेकिन मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ कि भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी है, लेकिन बीजेपी की तरफ से न तो लोकसभा में और न ही राज्यसभा में एक भी मुसलमान मंत्री है. "
भारतीय विदेश मंत्री ने क्या कहा?
बिलावल भुट्टो के पाकिस्तान लौटने से कुछ देर पहले पहले भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक प्रेस वार्ता में उन पर आरोप लगाया कि वो "आंतक की इंडस्ट्री के प्रवक्ता हैं, इसको बढ़ावा देने और इसे सही ठहराने वाले हैं. "
उन्होंने कश्मीर का ज़िक्र करते हुए कहा, "370 अब इतिहास बन चुका है, लोग ये बात जितनी जल्दी समझ जाएं उतना ही बेहतर होगा. "
एससीओ की बैठक ख़त्म होने के बाद हुई प्रेस वार्ता में एस जयशंकर ने कहा, "पाक विदेश मंत्री ने जो मुद्दे उठाए उनका उत्तर दिया गया है. तथाकथित चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के बारे में बैठक में ये स्पष्ट किया गया है कि विकास के लिए कनेक्टिविटी अच्छी बात है लेकिन ये किसी की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. यही भारत का पक्ष रहा है और इस पर किसी को संशय नहीं होना चाहिए. "
एस. जयशंकर ने कहा, "जी20 देशों की बैठक को लेकर चर्चा का कोई मामला नहीं है, कम से कम इस बारे में किसी ऐसे मुल्क से बात नहीं हो सकती जो इसका हिस्सा नहीं हैं. जम्मू कश्मीर हमेशा से भारत का हिस्सा था, है और रहेगा. इसकी बैठकें भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में होंगी, ये नैचुरल है. "
साथ बैठकर बातचीत करने वाली पाकिस्तान की बात पर एस. जयशंकर ने कहा, "आप खुद को आतंक का शिकार कहते हैं और आतंक फैलाने वालों के साथ बैठते हैं, ऐसा नहीं हो सकता. आतंक के शिकार इसका मुक़ाबला करते हैं और अपना बचाव करते हैं. ऐसा कह कर वो हिपोक्रेसी दिखा रहे हैं और ये जता रहे हैं कि हम लोग एक ही नाव पर सवार हैं. "
एस जयशंकर ने कहा, "ये बात स्पष्ट है कि आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान की क्रेडिबिलिटी उसके विदेशी मुद्रा भंडार से भी ज़्यादा तेज़ी से ख़त्म हो रही है. वो एससीओ के सदस्य के तौर पर यहां आए थे, इसमें इससे अधिक कोई बात नहीं है. "
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fe29c99877c59cb18e75be1ad4b1cb9ebe4e6b7e | web | नई दिल्ली/भोपाल : कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज (बुधवार) बीजेपी में शामिल हो गए। उन्होंने हाल ही में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की मौजूदगी में दिल्ली बीजेपी मुख्यालय पर पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। सूत्रों के मुताबकि उनके समर्थन में कांग्रेस के 22 विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया है। इससे साफ हो गया है कि 230 सीटों वाले राज्य विधानसभा में कमलनाथ की सरकार अल्पमत में आ गई है। हालांकि कमलनाथ ने दावा किया है कि उनकी सरकार अपना बहुमत साबित कर देगी। दूसरी ओर बीजेपी के सभी 107 विधायक दिल्ली पहुंच गए हैं, उन्हें मनेसर के होटल में शिफ्ट किया गया। कांग्रेस ने भी अपने विधायकों को जयपुर के लिए रवाना कर दिया है।
मध्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य़ सिंधिया को उनकी पार्टी राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार बनाएगी। सिंधिया बुधवार को दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में पार्टी की सदस्यता ली। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सिंधिया को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण कराई।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी से सीनियर नेता शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आज बीजेपीऔर मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से एक खुशी का दिन है। आज मैं राजमाता सिंधिया जी को याद कर रहा हूं। ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी परिवार के सदस्य बन गए हैं। पूरा परिवार बीजेपी के साथ है। उनकी एक परंपरा है जहां राजनीति लोगों की सेवा करने का एक माध्यम है।
बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि मैं सर्वप्रथम आदरणीय नड्डा जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी और गृह मंत्री श्री अमित शाह जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि आपने मुझे अपने परिवार में आमंत्रित किया और एक स्थान दिया। उन्होंने कहा कि मेरे जीवन में दो तारीखें बहुत महत्वपूर्ण रहीं, एक 30 सितंबर 2001 जब मैंने अपने पूज्य पिताजी को खोया। दूसरा दिन 10 मार्च, 2020, जो उनकी 75वीं वर्षगांठ थी जहां जीवन में एक नई परिकल्पना, एक नए मोड़ का सामना करके एक निर्णय मैंने लिया। सिंधिया ने कहा कि मध्य प्रदेश में एक सपना हमने पिरोया था, जब वहां सरकार बनी। लेकिन 18 महीने में वो सारे सपने बिखर गए, चाहे वो किसानों के कर्ज माफ करने की बात हो, पिछले फसल का बोनस न मिलना हो, ओलावृष्टि से नष्ट फसल आदि का भी मुआवजा अब तक नहीं मिल पाया है।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि मैं इनको (ज्योतिरादित्य सिंधिया) ये विश्वास दिलाता हूं कि इनको बीजेपी में मुख्यधारा में काम करने का पूरा मौका मिलेगा। आज हम सबके लिए बहुत खुशी का विषय है और आज मैं हमारी वरिष्ठतम नेता स्वर्गीय राजमाता सिंधिया जी को याद कर रहा हूं। भारतीय जनसंघ और बीजेपी दोनों पार्टी की स्थापना और स्थापना से लेकर विचारधारा को बढ़ाने में एक बहुत बड़ा योगदान रहा है। ज्योतिरादित्य जी आज अपने परिवार में शामिल हो रहे हैं, मैं इनका स्वागत करता हूं और हार्दिक अभिनन्दन भी करता हूं। हमारे लिए राजमाता जी आदर्श और हम सब के लिए वो एक दृष्टि और दिशा देने वाली नेता रही हैं। उन्होंने पार्टी को शैशव काल से उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम किया। मैं अपनी ओर से और सभी कार्यकर्ताओं की तरफ से उनका हार्दिक अभिनंदन करता हूं, स्वागत करता हूं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने कहा कि ऐसे अवसरवादियों को पार्टी छोड़नी चाहिए थी। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 18 साल दिए। मौका आने पर मौकापरस्ती दिखाई है। लोग उसे सबक सिखाएंगे। हर कोई देख सकता है कि लोकतंत्र की हत्या कैसे हो रही है। विधायक जयपुर आ रहे हैं, आप देख सकते हैं कि वहां (एमपी में) किस तरह के हॉर्स-ट्रेडिंग के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसा नंगा नाच कभी नहीं देखा गया है, जो सत्ता में बैठे हुए लोगे कर उठे हैं। हम एक साथ खड़े हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया के पोस्टर मध्य प्रदेश के भिंड में लगाए गए। उधर भोपाल में कांग्रेस कार्यालय से ज्योतिरादित्य सिंधिया की नेमप्लेट कल हटा दी गई थी।
मध्य प्रदेश में सियासी हलचल के बीच महाराष्ट्र सरकार को लेकर कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने कहा कि महाराष्ट्र की सरकार स्थिर सरकार नहीं है, तीन दलों की सरकार है और मैं इसके बारे में हमेशा कहता हूं कि ये उधार का सिंदूर लेकर सुहागन बनने वाली बात हैं, ऐसे सुहाग टिकते नहीं है। कांग्रेस को ऐसे पार्टी का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।
'कांग्रेस के अंदर ये कोई पहला मौका नहीं है'
मध्यप्रदेश के राजनीतिक हालात पर बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि ये कांग्रेस के अंदर एक सामान्य प्रवृत्ति है, ये कोई पहला मौका नहीं है। जब-जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर होती है तब-तब ऐसा ही होता है।
'सिंधिया ने हमें धोखे में रखा'
मध्यप्रदेश कांग्रेस नेता सज्जन सिंह वर्मा ने कहा कोई सिंधिया जी के साथ जाने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी रगों में कांग्रेस का खून है। महाराज खुद बनने के लिए दूसरे लोगों की बलि चढ़ाएं ये कैसे संभव है ये वो विधायक समझ गए। हमें कोई डर नहीं है। बीजेपी के 7 से 8 विधायक हमारे संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया से चर्चा में बोला विधायकों से हो गई है बात सभी सिंधिया के एक्शन से नाराज हैं सब की घर वापसी शीघ्र होगी। अभी मैं मुख्यमंत्री के निर्देश पर विधायकों को लेकर जयपुर जा रहा हूं 2 दिन बाद लौट कर बात करेंगे।
कांग्रेस सांसद नकुल नाथ (मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ के बेटे) ने कहा कि मुझे पूरी उम्मीद है कि मध्यप्रदेश सरकार सुरक्षित है और कर्नाटक गए विधायक जल्द ही कांग्रेस में वापस आएंगे।
राजस्थानः मध्यप्रदेश के कांग्रेस विधायक जयपुर के ब्यूना विस्ता रिजॉर्ट में रूक सकते हैं। कुछ ही देर में कांग्रेस विधायक भोपाल से जयपुर के लिए रवाना होंगे।
मध्य प्रदेश के राजनीतिक हालात पर राहुल गांधी का ट्वीट,'जब आप एक निर्वाचित कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने में व्यस्त थे,तब आप वैश्विक तेल की कीमतों में 35%की गिरावट पर ध्यान देने से चूक गए। क्या आप पेट्रोल की कीमतों को 60 रुपए प्रति लीटर से कम करके भारतीयों को लाभ पहुंचा सकते हैं? सुस्त अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करेगा।
निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा बोले. .
मध्यप्रदेश निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने कहा कि मेरी लीडरशिप में हम लोग जयपुर जाने वाले हैं। फ्लोर टेस्ट में कांग्रेस जीतेगी, चारों विधायक मेरे साथ हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के सवाल पर जवाब देने से इनकार किया।
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि सिंधिया जी इतने दिन हमारी पार्टी के नेता थे, इस तरह अचानक से चले जाएंगे तो थोड़ा झटका तो लगेगा। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम इससे उभर नहीं पाएंगे। सिंधिया को सोनिया गांधी अपने बेटे समान मानतीं थीं उनका इस तरह अचानक पार्टी छोड़ जाना मेरे लिए काफी दुखद है।
मध्य प्रदेश में जारी राजनीतिक उठा पटक के बीच कांग्रेस विधायकों के बुधवार दोपहर जयपुर पहुंच रहे हैं। कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने बताया कि ये विधायक 11 बजे के आसपास विशेष विमान से जयपुर। सूत्रों के अनुसार पार्टी के 80 से अधिक विधायक पहुंच रहे हैं। उन्हें यहां शहर के बाहर एक रिजोर्ट में ठहराया जाना है।
मध्यप्रदेश के राजनीति हालातों पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कुछ तो मजबूरियां रही होंगी वरना कोई यूं ही बेवफा थोड़ी होता है। कांग्रेस से जाने वाले लोग हमेशा हमने देखा है कि वो गुर्राते हुए जाते हैं और दुम दबाकर आते हैं और ऐसे अनेक उदाहरण हैं।
मध्यप्रदेश कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह ने कहा कि इस प्रकार से उनका (ज्योतिरादित्य सिंधिया) पार्टी को छोड़ना मैं मानता हूं सही बात नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने उनको बहुत कुछ दिया था। अफसोस की बात है कि वो पार्टी छोड़ चुके हैं। जो उन्होंने किया वो सही नहीं किया।
कांग्रेस की शोभा ओझा ने दावा कि हम बहुमत साबित करेंगे। हमारे पास पर गिनती है जो हम विधानसभा के पटल पर साबित कर देंगे, नंबर की कोई कमी नहीं है। बेंगलुरु वाले विधायक हमारे साथ हैं, वो कांग्रेस के साथ हैं। विधानसभा में हम अपना बहुमत सिद्ध करेंगे। बीजेपी के विधायक भी हमारे टच में हैं। शोभा ओझा ने दावा किया कुल 4 निर्दलीय विधायक हैं, चारों हमारे साथ हैं। विधायक सभी हमारे साथ हैं जो सिंधिया जी के साथ गए हैं वो भी हमारे साथ हैं क्योंकि वो समझ रहे हैं कि एक व्यक्ति की महत्वकांक्षा के चलते उन सबके भविष्य दांव पर हैं।
मध्य प्रदेश कांग्रेस विधायक अर्जुन सिंह काकोड़िया ने कहा कि कांग्रेस की सरकार रहेगी, कमलनाथ की सरकार रहेगी। 16 तारीख को देखिएगा जितने नंबर थे उतने ही रहेंगे। सब वापस आएंगे। जाने दीजिए उन्हें (सिंधिया),पुराना इतिहास है,जनसंघ उन्हीं के घर से पैदा हुआ था। अकेले जाने से कुछ नहीं होता,अब राजा-महाराजा के दिन गए।
मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में दो सीटें खाली हैं। ऐसे में 228 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास मामूली बहुमत है। अगर 22 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए जाते हैं तो विधानसभा में सदस्यों की प्रभावी संख्या महज 206 रह जाएगी। उस स्थिति में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा सिर्फ 104 का रह जाएगा। ऐसे में, कांग्रेस के पास सिर्फ 92 विधायक रह जाएंगे, जबकि बीजेपी के 107 विधायक हैं। कांग्रेस को चार निर्दलीयों, बीएसपी के दो और एसपी के एक विधायक का समर्थन हासिल है। उनके समर्थन के बावजूद कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से दूर हो जाएगी। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि निर्दलीय और बीएसपी तथा एसपी के विधायक कांग्रेस का समर्थन जारी रखेंगे या वे भी बीजेपी से हाथ मिला लेंगे।
कांग्रेस छोड़ने वाले 49 वर्षीय ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। उनकी दादी दिवंगत विजय राजे सिंधिया इसी पार्टी में थीं। ऐसी अटकले हैं कि सिंधिया को राज्यसभा का टिकट दिया जा सकता है और उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया जा सकता है। कांग्रेस ने पार्टी विरोधी गतिविधि के कारण पार्टी के महासचिव एवं पूर्ववर्ती ग्वालियर राजघराने के वंशज ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
मंगलवार सुबह जब पूरा देश होली का जश्न मना रहा था, तभी सिंधिया ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने पीएम मोदी से उनके 7, लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास पर मुलाकात की। बैठक में क्या बातचीत हुई, इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। हालांकि, बीजेपी सूत्रों ने कहा कि सिंधिया से लंबी बातचीत करने का भगवा पार्टी के दोनों शीर्ष नेताओं का फैसला इस बात को दर्शाता है कि वे उन्हें (सिंधिया को) कितना महत्व देते हैं जिन्हें राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता है।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को 9 मार्च को लिखे इस्तीफा पत्र में सिंधिया ने कहा कि उनके लिए आगे बढ़ने का समय आ गया है क्योंकि इस पार्टी में रहते हुए अब वह देश के लोगों की सेवा करने में अक्षम हैं। कांग्रेस पार्टी ने कहा कि उनका पत्र सोनिया गांधी के आवास पर मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर मिला। इस दिन उनके पिता और कांग्रेस नेता माधव राव सिंधिया का 75 वां जन्मदिन है।
सिंधिया की बुआ एवं मध्य प्रदेश से बीजेपी विधायक यशोधरा राजे ने कांग्रेस छोड़ने के उनके कदम का स्वागत किया है। सिंधिया की एक अन्य बुआ वसुंधरा राजे बीजेपी नेता हैं और वह राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। सिंधिया के पिता माधव राव सिंधिया ने भी अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1971 में जनसंघ के सांसद के रूप में की थी और बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गे थे।
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59f461b528c360568d5807b2cf30cda6bdb8d99a9fcfb199c783a1ec972b5b1d | pdf | सडको पर उत्साह की लहर थी । किसानो की भीडे महल के सामने जय बोल रही थी और जार के बाहर निकलते ही उसकी गाडी के पीछे लोग भागने लगे । हर्जन ने दो वर्ष बाद, जब अलैक्जैण्डर पोलैण्ड की क्रान्ति का भयकर दमन कर रहा था, ठीक ही कहा था, "अलैक्जैण्डर तुम्हारी मृत्यु उसी दिन क्यो नही हो गई ? तव तो इतिहास मे तुम्हारी गणना महान पुरुषो मे हुई होती । "
और विद्रोह ? जिनका पुराने सरदारो को इतना भय था । इस घोषणा पत्र की भाषा इतनी अस्पष्ट और गोलमोल थी कि केवल उसीके कारण विद्रोह हो सकते थे । इससे अधिक अनिश्चित वातावरण तैयार किया नहीं जा सकता था । लेकिन फिर भी सिवा दो छुटपुट विद्रोहो के सम्पूर्ण रूस मे शान्ति रही । रूसी जनता ने अपनी स्वाभाविक सहज बुद्धि से समझ लिया कि गुलामी सदैव के लिए चली गई, "स्वतंत्रता आ गई" और यद्यपि शर्ते बहुत कडी थी, फिर भी उन्होंने उन्हें स्वीकार कर लिया ।
मैं अगस्त १८६१ ओर १८६२ मे निकोलसकाई गया और मुझे किसानो को परिवर्तित दशा को देखकर आश्चर्य हुआ । वे भली भाति जानते थे कि मुक्ति कर चुकाना बहुत मुश्किल है, लेकिन वे गुलामी के दुष्ट परिणामों को इतनी अच्छी तरह जानते थे कि उन्हें यह भयकर कर देना मजूर था। पहले कुछ महीनो तो उन्होंने सप्ताह में दो छुट्टिया ली, शुक्रवार की भी काम नहीं करते थे, लेकिन बाद को वे पहले से भी ज्यादा जोश से काम करने लगे ।
मैंने गुलामी उठ जाने के सवा साल वाद निकोलसकाई के किसानो को देगा । वैसा ही सरल और कोमल उनका स्वभाव था और वे अपने मालिको से बिलकुल समानता से बातचीत करते थे, मानो वे कभी उनके गुलाम न रहे हो ।
'घरों के नारों की व्ररी हालत हुई। उन्हें जमीन नहीं मिली थी यदि मिली भी होती तो भी वे कुछ न कर पाते। उन्हें वेवल स्वा६६
था उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना ! लेकिन मेरे लिए इसका महत्व इस लिए था कि मैं स्कूल की घिसघिस से मुक्त हो गया और मुझे अपने अध्ययन के लिए एक अलग कमरा मिल गया।
सबसे ऊची कक्षा के विद्यार्थियों को अक्सर उत्सवो, भोजो, नृत्यो आदि के अवसरों पर दरबार मे ड्यूटी देनी पडती थी । बडे दिन, ईस्टर आदि त्योहारो के दिनो मे तो हम लोग दिन में दो बार महलो मे बुलाए जाते थे और सार्जेन्ट के पद पर होने के कारण मुझे प्रत्येक रविवार को परेड के समय सम्राट को सूचित करना पडता था कि "पार्षद सकुशल है", चाहे स्कूल के एक-तिहाई लडके बीमार हो ! मैने ऐसे एक मौके पर कर्नल से पूछा, "क्या मै आज कह दू कि सब अच्छी तरह नही है ?" "ईश्वर ऐसा न करे", उसने उत्तर दिया, "तुम्हे ऐसा तभी कहना चाहिए जब कोई विद्रोह हो जाय । "
दरबारी जीवन शानदार और रग-बिरगा होता है । वहा का सुसस्कृत व्यवहार, व्यवस्थित शिष्टाचार और शानदार वायुमडल अत्यन्त प्रभावशाली होते है । उस समय मै सम्राट को बहुत ही श्रद्धा की दृष्टि से देखता था । वह दरबारी व्यवस्थाओं को कोई महत्व नही देते थे और अत्यधिक परिश्रम करते थे । इस समय दरबार के एक प्रतिक्रियावादी गुट के विरोध मे होते हुए भी वे कुछ सुधार करने के प्रयत्न मे थे । गुलामी प्रथा का उठाना उनका पहला सुधार ही था ।
लेकिन धीरे-धीरे जब मुझे इस तडक भडक की जिन्दगी को अधिक देसने का अवसर मिला और उस सबके पीछे जो कुछ हो रहा था उससे जब मै परिचित हुआ, तो मेरा विश्वास हो गया कि यह सब व्यर्थ ढोग ही नही है, बल्कि इन छोटी-छोटी चीजो मे ये लोग इतने फसे रहते है कि महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर वे ध्यान ही नही दे पाते ! इस नाटकीय अभिनय मे वे वास्तविकता ही भूल गये है ! और फिर सम्राट का जो रूप मेरी कल्पना मे था, उसकी चमक भी वर्ष के अन्त तक चली गई । इस तरह यदि प्रारम्भ मे मेरे मस्तिष्क मे उस प्रकार की कोई कल्पना रही भी होगी कि राजमहल मे कोई लाभप्रद कार्य हो सकता है तो वह वर्ष समाप्त होते-होते दूर हो गई ।
सम्राट और सम्राजी के जन्मदिनो और महत्वपूर्ण त्योहारो पर महल मे एक आयोजन होता था । हजारो फौजी अफसर, शासन के ऊचेऊचे पदाधिकारी महल के कक्षो मे पक्तिबद्ध खडे हो जाते थे । जब सम्राट और उनका कुटुम्ब महल मे से निकलकर गिरजाघर जाते, तो उन्हें सब झुककर प्रणाम करते । जब सम्राट निकलते, मैं देखता कि वडे-बडे फौजी अफसर और राज्याधिकारी झुककर प्रणाम करने के पहले सम्राट की ओर देखते रहते और यदि सम्राट ने उनकी तरफ देखकर मुस्करा दिया अथवा एक - दो शब्द कह दिये, तो वे वडा गौरव अनुभव करते और अपने इधरउघर पास वडे गर्व से देखते । गिरजाघर से जव सम्राट लीटते, तब फिर इसी प्रकार अफसर खडे होते ।
जाडो मे दो-तीन वडे नृत्यो का आयोजन होता था और उनमे सहस्रो ही आदमी निमंत्रित होते । वहा हजारो युवतिया, एक झुड बनाए खडी रहती- - इस आशा मे कि शायद उनके ऊपर सम्राट के किसी सम्वन्धी की दृष्टि पड जाय और वह अपने साथ नृत्य करने के लिए बुला ले । सेण्ट पीटर्सवर्ग की जनता पर दरवार का इतना प्रभाव था कि यदि किसी लडकी पर सम्राट के सम्वन्धी की दृष्टि पड जाय, तो उसके माता-पिता भरसक इसी बात का प्रयत्न करते कि वह लडकी उस राजकुमार से प्रेम करने लगे, यद्यपि सब लोग इस वात को जानते थे कि सम्राट का कोई सम्बन्धी प्रजा मे शादी नहीं कर सकता !
जन कभी हमे महल जाना पडता, हमारा भोजन वही होता । उस समय वहा के नौकर राजमहल की प्रेम और प्रणय की घटनाए हमसे आ आकर कहते । महलो मे जो कुछ होता था, उन्हे ज्ञात था । वास्तव मे, जिस साल मैं महल मे रहा, वहा घटनाए ज्यादा नहीं हुई । जार के भाइयो की गादी अभी ही हुई थी और उनके लड़के अभी कम उम्र क थे। लेकिन एक लड़की से, (जिसका तुर्गनेव ने अपने उपन्यास 'स्मोक' मे वडा सुन्दर वर्णन किया है), जार के सम्बन्धों की चर्चा नौकर बहुत करते थे। एक दिन जैसे ही हम लोग बमरे में घुसे, हमे मालूम हुआ कि इस लड़की को जार ने निकाल दिया। लगभग आव घंटे बाद उस स्त्री को हमने बाहर प्रार्थना
के लिए निकलते देखा। उसकी आखे रोने के कारण सूजी हुई थी। प्रार्थना के समय किसी तरह वह अपने आसू रोके रही, वाकी स्त्रिया उसे तिरस्कृत कर उससे दूर खडी थी । नहलो के नौकरो को यह मालूम हो गया था और वे इसके ऊपर मनमानी टीका कर रहे थे । यह सब देखकर मुझे बडी ग्लानि हुई। कुछ ही समय पहले ये लोग उस स्त्री के चरण चूमते थे । सम्राट की हर चीज वडी वारीकी से देखी जाती । शायद ही जार का कोई कार्य गुप्त रह पाता हो । नौकरो तथा वहा की स्त्रियो द्वारा हर वात वडे-बडे अफसरो तक पहुच जाती । प्रत्येक गवर्नर जनरल, मंत्री आदि सम्राट के कमरे मे प्रवेश करने के पहले सम्राट के निजी परिचारको से बातचीत करते और उनकी उस समय की मनोवृत्ति जानने की कोशिश करते और उसके अनुसार अपने काग़जो की पेशी करते ।
प्रारम्भ मे मेरे हृदय मे ज़ार के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी और मेरी मनोवृति उस समय ऐसी थी कि यदि कोई आदमी मेरी उपस्थिति मे जार पर आक्रमण करता तो मैं अपना जीवन खतरे मे डालकर उनकी रक्षा करता ।
लेकिन छोटी-छोटी घटनाओ और सम्राट की प्रतिक्रियावादी नीति के कारण इसमे परिवर्तन होता गया । ६ जनवरी को हर साल रूस मे नदियो को पवित्र करने के लिए एक उत्सव होता था। इस दिन सम्राट, उनके सव सम्बवी और पादरी नदी किनारे खडे होते थे, प्रार्थना होती थी और फिर सलीव को नदी मे डुवाया जाता था । हजारो आदमी इस उत्सव मे भाग लेते। वे सव नगे सिर रहते । मूल से एक आदमी के सिर पर टोपी का एक हिस्सा रखा रह गया । दस इसीको देख-देखकर प्रार्थना के समय भी सम्राट के सभी सम्बन्धी और स्वय सम्राट भी हँसते रहे । लेकिन इस उत्सव के समाप्त होने पर जब सम्राट महल लौट रहे थे तो एक बूढा किसान सिपाहियो की पक्तियों को किसी तरह पार करता हुआ सम्राट, के चरणो पर गिरा और अपना प्रार्थना पत्र रखते हुए गिड़गिडाया, "सम्राट हमारी रक्षा कीजिये ।" युगो से जो दमन रूसी किसानो पर हो रहा था वह इस किसान की आह मे स्पष्ट था । लेकिन जार ने, जो अवतक अत्यन्त तुच्छ वात पर प्रार्थना के समय भी दूरी तरह हँस रहा था, इस ओर कुछ भी ध्यान नहीं दिया, अपने पैरो पर पडे इस मनुष्य की ओर देखा भी नही ।
मैंने चारो ओर देखा -- सम्राट के सम्बन्धियो में से भी किसीने इस किसान की ओर कोई ध्यान नही दिया । फिर उस प्रार्थना पत्र को मैंने उठा लिया । मैं जानता था कि मुझे इसके लिए फटकार मिल सकती है, लेकिन मैने सोचा कि इस किसान को सिपाहियो और फौजो की कतारो को पार करके यहां तक आने में कितना कप्ट हुआ होगा। अब तो उसे अनिश्चित काल के लिए कैद मे डाल दिया जाना था । जार के सामने प्रार्थनापत्र पेश करने पर यही सजा दी जाती थी ।
जिस समय गुलामी की प्रथा उठाई गई थी, सेण्ट पीटर्सबर्ग की जनता के बीच सम्राट अत्यन्त लोकप्रिय थे। लेकिन १८६२ के बाद की घटनाओ ने दिखला दिया कि मौका आने पर वह अपने पिता के युग के निकृष्टतम काम कर सकते है । सब लोग जानते थे कि सम्राट न्याय और फौज विभागो मे कई सुधार करना चाहते है । मारपीट की सजाए शीघ्र ही बन्द हो जाने वाली थी और स्वायत्त शासन और किसी प्रकार का विधान भी स्वीकार होने की सम्भावना थी । लेकिन हल्के से उपद्रव को भी भयकर रूप से दवाया जाता था - प्रत्येक आन्दोलन को वह अपने व्यक्तिगत विरोध का रूप देते थे और इसलिए किसी भी क्षण वह पाशविक दमन की आज्ञा दे देते। सेण्ट पीटर्सबर्ग, मास्को तथा कजान के विश्वविद्यालयो मे १८६१ मे जो उपद्रव हुए, उनका अत्यन्त निर्दयतापूर्वक दमन किया गया । सेण्ट पीटर्सवर्ग का विश्वविद्यालय बन्द कर दिया गया और उसके बाद अध्यापको ने निःशुल्क शिक्षा का अलग से जो प्रबन्ध किया था, उसे भी बन्द कर दिया गया। गुलामी की प्रथा उठने के पश्चात रविवार-स्कूलो का एक वडा आन्दोलन चला था । स्वयं जनता ने इन स्कूलो की स्थापना की थी। किसान, मजदूर उनसे खूद फायदा उठाने लगे थे । अफसर और विद्यार्थी इनमे अध्यापक का काम करते और अध्यापन का ढंग इतना अच्छा था कि नौ-दस पाठो मे ही हम लोग किसानो को पढ़ना सिखा देते थे। लेकिन यकायक सब रविवार स्कूल, जिनके द्वारा कुछ ही वर्षो मे अधिकाश जनता, राज्य के विना एक भी पैसा खर्च किये, शिक्षित हो सकती थी, वन्द कर दिये गए । पोलैण्ड मे स्वतंत्रता सम्वन्धी कुछ लक्षण दीखने लगे, पर तुरन्त ही वहा दमन करने के लिए कज्जाक फोजे भेज दी गई । वारसा
मे सडको पर आदमियो को गोली मारी गई और जनता को बुरी तरह कुचला गया ।
आगे चलकर १८७०-८१ तक अलेक्जैण्डर का जो रूप दीखा, उसके लक्षण १८६१ मे ही दीखने लगे थे ।
सम्पूर्ण राजकुटुम्ब मे सबसे अधिक सुसंस्कृत सम्राज्ञी थी । वह अत्यन्त सरल स्वभाव की थी। जिस अकृत्रिम ढंग से उसने मुझे एक छोटे से कार्य के लिए धन्यवाद दिया, उससे मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ था। गुलामी की प्रथा के उठाने में उसने अच्छा प्रभाव डाला था । लडकियो के लिए अच्छे हाई स्कूलो के खुलवाने का तो अधिकाश श्रेय उसीको है। सुप्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री उशिस्की, उसके साथ अच्छे सम्बन्ध होने के कारण ही, निर्वासन की सजा से वच गये ।
उनके भाई अलैक्जैण्डर का, जो १८६५ मे युवराज हो गया, स्वभाव अत्यन्त खराब था। उसने पढने से कतई इकार कर दिया । कहते है, अपने जीवन के अन्त मे उसका स्वभाव कुछ अच्छा हो गया था, लेकिन १८७० और उसके बाद तक तो वह वैसा ही था । मुझे मालूम है कि सेण्ट पीटर्सबर्ग मे एक ऊचे फौजी अफसर थे, जो अमरीका बन्दूके खरीदने भेजे गये थे । वहा से लौटने पर वह युवराज अलैक्जैण्डर के पास अपने कार्य की रिपोर्ट पेश करने गए। बातचीत के दौरान मे ही युवराज ने अपने स्वभावानुसार क्रोधित होकर उन अफसर को गाली देकर उनका अपमान करना शुरू कर दिया । अफसर अत्यन्त स्वाभिमानी और राजभक्त था । वह उठकर चला आया और उसने तुरन्त युवराज को एक पत्र लिखा कि यदि वह चौबीस घंटे मे अपने इस दुर्व्यवहार के लिए क्षमा नही मागते तो मै आत्महत्या कर लूगा । युवराज ने क्षमा नही मागी और उस अफसर ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली। मैने उक्त अफसर को अपने एक मित्र के यहा युवराज के पत्र की प्रत्येक क्षण प्रतीक्षा करते हुए देखा था । दूसरे दिन उसने आत्महत्या कर ली। जार को जब यह मालूम हुआ तो वह युवराज से रुष्ट हुआ और उसे उस अफसर की शव यात्रा मे शामिल होने की आज्ञा दी। लेकिन इस भयकर घटना से भी उसकी वर्वरता और उद्धतपन मे कमी नहीं आई। |
0eb66e2d524e3719824303bab5d93cd25ae7048b6bb299a8be327a035f236c2e | pdf | मेरी जीवन-यात्रा / १४६
व्याख्यान देने का जहाँ तक मुझे उक्त अनुभव है वहाँ एक कटु अनुभव भी है। लाहौर की बच्चों वाली आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर मुझे प्रायः निमन्त्रित किया जाता था। उन दिनों लाउडस्पीकर नहीं चले थे, चिल्लाकर बड़ी ऊँची आवाज में वक्ता बोलता था। एक उत्सव में मैं व्याख्यान दे चुका था कि इतने में स्वामी वेदानन्द जी आ विराजे । उन्होंने मेरा व्याख्यान तो नहीं सुना था, आगे-आगे ऊंचे स्वर मे निकलती आवाज़ सुनी थी। आकर मेरे पास बैठ गये, पूछने लगे कौन व्याख्यान दे रहा था। पास बैठे एक सज्जन ने कहाये बैठे हैं, पं० सत्यव्रत जी सिद्धान्तालंकार जो व्याख्यान देकर अभी बैठे हैं। स्वामी वेदानन्द जी बोल उठे'थोथा चना बाजे घना' । स्वामी जी को इस टीका को सुनकर मैंने कहा- शायद स्वामी जी अपनी भुगती हुई बात कह रहे हों।
गुरुकुल का एक स्नातक होने के नाते हमारी अलग से एक बिरादरी है। इस बिरादरी में बैठकर हममे से न कोई बड़ा, न कोई छोटा-सब एक कुल-माता के एक समान पुत्र । फिर भी, क्योंकि मैं सब जीवित स्नातकों में आयु की दृष्टि से सबसे बड़ा हूँ, इसलिए एक बिरादरी के होते हुए भी सब स्नातक मेरा आदरसत्कार करते हैं ।
इसी एक बिरादरी का होने के कारण मेरा एक स्नातक के साथ आने-जाने और मिलने-जुलने का विशेष सबंध हो गया। हमारे परिवारों का भी एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध बन गया । उस स्नातक का नाम था - मनुदेव जिसका कई साल हुए देहान्त हो गया है। मैने जीवन में किसी को मित्र नहीं माना, परन्तु उनके विषय में मैं कह सकता हूँ कि उन्हें मैं अपना मित्र मानता था। अपनी समस्याओं के संबंध में वे मुझसे, सलाह-मशविरा करते थे, मैं उनसे । हमारा यह घनिष्ठता का संबंध हमारे भाइयो तक था । वे परिवार सहित हमारे और हम परिवार सहित उनके पारिवारिक कार्यक्रमो मे भाग लेते थे।
वे व्यापारिक तबीयत के थे, व्यापारिक परिवार के थे। व्यापार के सब पापड़ बेलने के बाद, जीवन के संध्याकाल में उन्होंने एक कम्पनी का निर्माण किया जिसका नाम था - 'ब्रोन्ड पाउडर प्राइवेट लिमिटेड' वे इस कम्पनी को सुचारू रूप से चलाने के लिए अमरीका गये, सरकार से कई एकड़ की इस फैक्टरी के लिए जमीन ली, और इस कम्पनी के डायरेक्टर बने और मुझे भी इस कम्पनी के शेयर लेने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रबल आग्रह और विश्वास दिलाने पर कि इस काम मे बहुत लाभ होगा मैने अपनी सारी जमापूँजी, जो उस समय २५ हजार थी, इस कम्पनी मे झोक दी और अपने कुछ स्नातक साथियों को भी इस कम्पनी के शेयर खरीदने के लिए प्रेरित किया। साल पर साल बीतते गये, परन्तु कम्पनी सिरे न चढ़ी । इस बीच कई अन्य कारण भी हो गये जिनके कारण मेरा तथा उनका आपसी प्यार जाता रहा और हम अधिकांश हिस्सेदारो ने उन पर दावा दायर कर दिया। अब हम लोग जो एक-दूसरे के साथ मित्रता के संबंध मे जुड़े थे, कचहरी मे एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो गये । इन सब घटनाओ को याद कर मुझे दुःख होता है ।
जीवन के ऐसे कटु अनुभव प्रायः सभी को मिलते हैं। भाई-भाई एक साथ, एक घर में पलते हैं, परन्तु वे कालान्तर मे एक-दूसरे के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं। जमाना ऐसा आ गया है कि भाई भाई का नही रहा, भाई बहन का नही रहा, चाचा-ताया सब नाम के रह गये हैं। स्थिति यहाँ तक आ गई है कि जिस दामाद को अपना बेटा बनाकर गाने-बजाने के साथ हम घर लाते हैं, वही कालान्तर मे हम पर इतना हावी हो जाता है कि हम जान बचाकर उससे पीछा छुडाना चाहते हैं। स्मृतिकारी ने ठीक कहा है ~ 'जामाता दशमो ग्रहः' । आज कितनी ही लड़कियाँ डावरी के कारण परलोक सिधार रही हैं। घनिष्ठ सबंधियों की यह दुर्दशा देखकर किसी कवि ने कहा था :
भूयं वयं वयं पूयं इत्यास्मीन्मतिरावयो, कि जानं प्रधुना मिच यूयं यूयं वयं वयम् ।
१५० / वैदिक साहित्य, संस्कृति और समाजदर्शन
अरे भाई, कोई जमाना था जब तुम हम और हम तुम थे, अब क्या हो गया कि तुम तुम और हम हम हो गये ।
मैं १९०५ में गुरुकुल कांगड़ी ( हरिद्वार ) में भर्ती हुआ था, १९१४ में स्नातक बना । जिस युग में मेरा जन्म हुआ वह सामन्तवाद तथा जन-जागरण का युग था। देश मे राज-रजवाड़े थे, परन्तु अंग्रेजी राज ने उनकी जड़ खोखली कर दी थी। अंग्रेज योरोपीय सभ्यता तथा विचारों को लेकर आये थे । वहाँ भी कहने को सामन्तीय युग चल रहा था, परन्तु विचार स्वातत्य हर देश में उभर रहा था। योरोप मे विचारों के क्षेत्र में जो कुछ हो रहा था, उसका कुछ-कुछ अंश अग्रेजी राज्य के द्वारा भारत मे भी रहा था । इस काल को सामन्तवाद तथा जन-साधारण सामन्तवादी संस्था जन-जागरण के कारण कुछ-कुछ हिल रही थी। हिल रही थी का यह अर्थ नहीं है कि नष्ट हो गई थी, इसका इतना ही अर्थ है कि जनता में इसके विरुद्ध धीमा-धीमा असन्तोष उभरने लगा था । वही असन्तोष अत्यन्त धीमे रूप में भारत में भी आ रहा था, परन्तु प्रधानता अभी सामन्तवाद की ही थी।
प्रधानता सामन्तवाद की ही थी- इससे मेरा क्या अभिप्राय है ? मेरा अभिप्राय यह है कि इस मंक्रान्तिकाल से राजा के मर जाने पर जनता का राज उस रिक्त स्थान में नहीं आ जाता जो अन्त मे आ गया, उस रिक्त स्थान मे राजा का ही बेटा उस स्थान पर बैठता था। जो परंपरा सैकड़ो सालो से चली आ रही थी वही चलती रही यद्यपि उसके पति सर्व साधारण तथा शिक्षित वर्ग मे असन्तोष भी उभरने लगा। इस युग मे विचारों को इन दो भिन्न-भिन्न धाराओं ने जन्म लिया। एक विचारधारा यह थी कि जो कुछ युगो से चलता आ रहा है वही चलते रहना चाहिए, राजा का बेटा ही बाप के मरने के बाद राज करे, क्योंकि वह ऐसे वातावरण मे रहा है जिससे वह उस कार्य मे कुशल हो गया है। दूसरी विचारधारा यह थी कि प्रत्येक व्यक्ति को वे सब अधिकार होने चाहिए जो राजा के बेटे को होते हैं क्योंकि हर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों से जूझता हुआ एक-दूसरे से आगे बढ़ सकता है। संक्षेप में कहा जाय तो कह सकते हैं कि जीवन मे व्यक्ति का मार्ग जन्मजात होना चाहिए या कर्मजात होना चाहिए । जन्म और कर्म का यह झगड़ा संक्रान्ति काल के इस युग का सबसे बड़ा प्रश्न था । राजनीति में समाज के व्यवहार मे, शिक्षा में - हर क्षेत्र में ये दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ प्रकट हो रही थी। राजा का बेटा राज करेगा, पंडित का बेटा पंडित बनेगा, यहाँ तक कि जीवन के काम-धंधों में भी यही सूत्र चल रहा था। जिसका परिणाम यह था कि जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही प्रत्येक व्यक्ति का काम-धधा निश्चित था। किसी को इस बात की चिंता नहीं थी कि पढ़-लिखकर, या बिना पढे भी वह जीवन में क्या प्रोफेशन करेगा। जीवन की परंपरा पर आश्रित सामन्तवाद के युग मे किसी को यह सोचना नहीं पड़ता था कि युवा होकर वह क्या करेगा। यह निश्चित था कि युवा होकर वह वही कुछ करेगा जो उसके माता-पिता करते आये हैं, या जो कुछ उसके परिवार में होता आया है। जिस संक्राति काल में मैंने जीवन में प्रवेश किया उसमें जन-जागरण के विचारों के कारण वातावरण बदल रहा था, और प्रत्येक व्यक्ति अपने घरेलू काम-धंधे से ही सन्तुष्ट न होकर हर किसी काम-धंधे के लिए प्रयास कर रहा था। इस नवीन वातावरण के कारण जीवन संघर्ष उग्र हो गया था और पहले जो बेकारी नही थी, वह दिनोदिन बढ़ रही थी। जहां तक मेरे जीवन का संबध या, मेरे लिये परिवार के धंधे का प्रश्न ही नहीं था क्योकि मेरे पिता तो रेलवे में नौकर थे जिसके लिये मुझे कोई चान्स नहीं था क्योंकि उस समय तक उनका देहान्त हो चुका था, और मेरी शिक्षा भी अत्यन्त भिन्न प्रकार की हुई थी। मैं सामन्तवाद तथा जन-जागरण के इस संक्रांति-काल की उपज था इसलिये मुझे जीवन का रास्ता बनाने के लिये अनेक संघर्षों से गुजरना पड़ा जिनका उल्लेख पाठक आगे पढ़ेंगे ।
इसमें शक नहीं कि वर्तमान शिक्षाविज्ञ फिर से सोचने लगे हैं कि शिक्षा समाप्त होने से पहले ही युवक के सामने कोई ऐसा लक्ष्य होना चाहिये जिसको साधने के लिये वह पहले से तैयारी करें और शिक्षा
मेरी जीवन-यात्रा / १५१
समाप्त करने पर उसे दर-दर न भटकना पड़े, प्रारंभ से ही युवक की शिक्षा को ऐसी दिशा दी जाय जिधर उसकी प्रवृत्ति हो और उसे शिक्षा समाप्त करने पर बेकारी का जीवन न बिनाना पडे। इसी को जीवनयापनोन्मुख ( Profession Oriented Education ) कहा जाता है जिसकी तरफ वर्तमान शिक्षाविज्ञों का ध्यान बढ़ता जा रहा है।
गुरुकुल में वेदों के उद्भद विद्वान् पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर अध्यापक थे । वह उच्चकोटि के विचारक तथा क्रान्तिकारी विचारों के धनी थे ।
श्री सातवलेकर जी के संबंध में लिखते हुए स्मरण हो आता है कि जिस युग में मैं इस संस्था में पढ़ता था, इसे शिक्षा संस्था के स्थान में राजनीतिक संस्था समझा जाता था। जनसाधारण तो इसे आर्य समाज के उपदेशक तथा प्रचारक उत्पन्न करने की संस्था मानते थे, परन्तु अंग्रेजी सरकार इसे क्रांतिकारी युवक तैयार करने की संस्था समझते तथा मानते थे। इस दृष्टि से गुरुकुल को सरकार बडे सन्देह की दृष्टि से देखती थी। सरकार का यह दृष्टिकोण इस बात से भी पुष्ट होता था कि कई बार सरकार की तरफ़ से महात्मा मुशीराम को सन्देश भेजा गया कि वे इस संस्था को चलाने के लिये सरकारी अनुदान स्वीकार करे, परन्तु जिसे महात्मा जी ने सदा अस्वीकार कर दिया। गुरुकुल के संचालको का क्या दृष्टिकोण है - इसे जानने के लिए उत्तर प्रदेश के गर्वनर सर जेम्स मेस्टन यहाँ आये । उस समय किसी गवर्नर का किसी संस्था मे आना अभूतपूर्व घटना थो । सर जेम्स मेस्टन के सन्देह तो दूर हो गये, परन्तु केन्द्रीय सरकार मे यह सन्देह तब भी बना रहा। अन्ततोगत्वा सरकार ने यह निश्चय किया कि वायसराय को गुरुकुल भेजा जाय ताकि उनके प्रभाव से गुरुकुल के संचालक अपनी सन्देहास्पद गतिविधि को छोड़ दें । उस समय लार्ड विलिंगडन वायसराय थे । वे सरकारी दल-बल के साथ गुरुकुल पधारे । उनका जुलूस हाथियो पर आया था । लाट साहब को सारा गुरुकुल दिखाया गया । पुस्तकालय मे भी वे पधारे। केन्द्र मे वाचनालय के अनेक समाचार-पत्त पड़े हुए थे। एक पत्र था बाम्बे कानिकल Bombay Chronicle । इस पत्र का Bamb शब्द दीख रहा था, बाकी का हिस्सा किसी अन्य पत्र से ढका हुआ था। दो मिनट तक लाट साहब 'बाम्ब' शब्द को देखते रहे । महात्मा जी ने जब देखा कि लाट साहब एक जगह खडे होकर मेज पर पडे एक पत्र को ध्यान से देख रहे है, तो वे सब बात समझ गये और उन्होंने Bomb के आगे के भाग को ढकने वाले कागज़ को परे हटा दिया, और शायद लाट साहब की उलझन दूर हो गई। उन दिनों हम लोग भी क्रांतिकारी बातें किया करते थे । हिन्दी की पुस्तको मे लिखा होता था कि अंग्रेजों के भारत आने पर देश को अनेक लाभ हुए । यहाँ रेले चली, टेलीफोन लगे, सडके बनीं, मोटरें आयो। हम लोग पाठ्य पुस्तकों के इन भागों पर लकीर फेर देते थे और हाशिये मे लिख देते थे कि यदि अंग्रेज़ इस देश मे न आते तब भी स्वतंत्र भारत मे यह सब कुछ होता । जब पता चला कि लाट साहब आने वाले हैं तब हम बच्चों ने अपनी पाठ्य पुस्तको के गंगा के किनारे पडे पत्थरो के नीचे दबा दिया ताकि हमारे लिखे इन वाक्यों को कोई न देख ले। हमारा यह समझना कि लाट साहब हमारी पुस्तको को छानबीन करेंगे - यह हमारी बचपन की बातें थी परन्तु उस समय हम लोगों की मानसिक वृत्ति पर इस घटना से प्रकाश पड़ता है । विदेशी सरकार को यह समझ नही पड़ता था कि यह संस्था शहरों से दूर जंगल में क्यों बनाई गई है ? अगर वहाँ कोई गुप्त कार्य नहीं हो रहा और यह सिर्फ शिक्षा संस्था है, तो इसे शहर में क्यों नही बनाया गया । इस समय जो विद्यार्थी गुरुकुल मे पढते थे उनमे से अनेक विद्यार्थियों ने सशस्त्र क्रांति मे भाग लिया। उदाहरणार्थ श्री यशपाल मेरे साथ गुरुकल मे पढते थे, वे सशस्त्र क्रांतिकारियों में मुख्य स्थान रखते थे। इसका यह अभिप्राय नहीं कि गुरुकुल की स्थापना ही क्रांतिकारी युवक उत्पन्न करने के लिये थी; गुरुकुल की स्थापना जिस जागरण के काल में हुई थी उसमे युवकों का क्रांतिकारी बन जाना स्वाभाविक था । सरकार की गुरुकुल की गतिविधियों को जानने की उत्सुकता यहाँ तक बढी हुई थी कि एक बार इंगलैंड की लेबर पार्टी के नेता रैमजे मैग्डानाल्ड, जो आगे चलकर इंगलैंड के प्रधानमंत्री बने, गुरुकुल पधारे। महात्मा जी |
0243a2ebd5a96cb5e97dd1cd6c674b5b6b7a7734 | web | निर्माता से आधुनिक वाशिंग मशीन के लिए"बॉश" एक विशेषता है जो आपको धोने के दौरान खराब और खराब होने के दौरान त्रुटियों को प्रदर्शित करने की अनुमति देती है। यह Maxx और Logixx श्रृंखला उपकरणों पर लागू होता है कुछ मामलों में, जब मालिक समझता है कि त्रुटि कोड क्या है, तो वह सेवा का उपयोग किए बिना खराबी की मरम्मत कर सकता है।
जर्मन निर्मित बॉश मशीन का उपयोग करते समय, एनालॉग्स की तुलना में अप्रियता कम होती है।
हालांकि, निर्माता ने अभी भी अपने मॉडल की आपूर्ति की हैसर्विस टेस्ट, जो कि एक आत्म निदान मोड है। इसके साथ, उपयोगकर्ता कपड़े धोने की मशीन की "बॉश डी 07" में स्वास्थ्य प्रणाली कार्यों निर्धारित कर सकते हैं, त्रुटि कोड के बारे में आप नीचे पढ़ सकते हैं।
एक सेवा परीक्षण बहुत उपयोगी माना जा सकता है अगरकई घटक विफल रहे। शासक के आधार पर निदान चलाना अलग-अलग तरीकों से किया जाता है। उदाहरण के लिए, परीक्षण शुरू होने के प्रारंभिक चरण में मैक्सएक्स 4 मशीन के लिए, डिवाइस को बंद करना और इसके साथ-साथ अतिरिक्त फ़ंक्शन बटन दबाकर आवश्यक है। इस के साथ, मोड हैंडल 30 डिग्री सेल्सियस कपास का घूमता है। एक सफल प्रक्षेपण के रूप में, आप परीक्षण के चयन के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
एक निश्चित प्रोग्राम स्थापित करने के बाद, आपके पास एक इलेक्ट्रिक मोटर या नाली पंप का चेक उपयोग करने का अवसर होगा।
इन दो मामलों में, मोड सेट हैकपास 60 डिग्री सेल्सियस और कपास 60 डिग्री सेल्सियस अर्थव्यवस्था वाशिंग मशीन "बॉश लॉगिक्स 8" की त्रुटि कोड बाहर नहीं आते हैं, तो आपको हीटर और मुख्य वाल्व के संचालन को जांचना होगा। पहले मामले में, मोड कपास 90 डिग्री पर सेट किया जाना चाहिए, जबकि दूसरे मोड में यह स्पिन स्थिति के अनुरूप होगा।
पहले से, वाल्व की जांच की जा सकती है अगरआप मशीन को सिंक पर सेट करते हैं। प्रोग्राम शुरू करने के लिए, आपको "स्टार्ट" बटन का उपयोग करना होगा। यदि कोई गलती होती है, तो एल ई डी प्रकाश डाल देगा। पुरानी कक्षा के मॉडल को खरीदकर, आप एक सरल ऑपरेशन प्रदान करते हैं, क्योंकि इस मामले में त्रुटि कोड डिस्प्ले पर दिखाई देगा।
वाशिंग मशीन "बॉश" के लिए त्रुटि कोड तब प्रकट होते हैं जब सिस्टम के तत्वों में से एक टूट जाता है।
एक घर मास्टर होने के नाते, आप बचा सकते हैंधन और समय, यदि आप कोड का उपयोग करके त्रुटि की पहचान कर सकते हैं। उपकरण ब्रांड मैक्स 4, बॉश क्लासिकिक्स 5 और मैक्स 6 कुछ निश्चित वर्णों के गलत संचालन को संकेत देंगे।
यदि आप प्रदर्शन पर ध्यान देते हैं तो त्रुटि F16, तो यहइंगित करता है कि कार्यक्रम की शुरुआत के दौरान कपड़े धोने का लोड खोलना खोला गया था। लेकिन यदि डिस्प्ले त्रुटि F17 दिखाता है, तो आप सुनिश्चित कर सकते हैं कि पानी का सेवन का समय पार हो गया है। इस मामले में एक फिल्टर के रूप में, फिल्टर और वाल्व के clogs। कभी-कभी ऐसा होता है कि पानी की आपूर्ति वाल्व बंद है।
जब आप मशीन के प्रदर्शन को F18 देखते हैं, तो यहकहेंगे कि नाली का समय समाप्त हो गया है। इस मामले में, आप यह धारणा कर सकते हैं कि नाली वाल्व छिड़क दिया गया है या पानी का स्तर सेंसर क्रम से बाहर है। कभी-कभी यह भी होता है कि सामान्य हीटिंग समय समाप्त हो जाता है, इस मामले में आपको त्रुटि कोड F19 दिखाई देगा। कारण नेटवर्क में अपर्याप्त वोल्टेज हो सकता है, साथ ही थर्मोस्टेट या टेन के साथ दक्षता का नुकसान भी हो सकता है।
जब पानी गर्म नहीं होता है, तो मशीनउपभोक्ता को समस्या कोड F20 इंगित करता है। आप मान सकते हैं कि हीटर या थर्मोस्टेट आदेश से बाहर है। लेकिन जब ड्रम के साथ समस्याएं होती हैं, तो मशीन पद F21 प्रदर्शित करती है। यह एक टूटे टैकोमीटर, रिवर्स या रिले के कारण हो सकता है। एनटीसी सेंसर भी तोड़ सकता है, कभी-कभी इसके संचालन में बाधाएं होती हैं, जिन्हें आप कोड एफ 22 द्वारा सीखेंगे। यह शॉर्ट सर्किट या वायरिंग के खराब होने के कारण हो सकता है, बाद के मामले में सर्किट में एक ब्रेक होता है।
वाशिंग मशीनों के त्रुटि कोड को ध्यान में रखते हुए "बॉश"आपको निश्चित रूप से उस पर ध्यान देना चाहिए जो एक्वास्टॉप सिस्टम के सक्रियण को इंगित करता है। इस मामले में हम एफ 23 के बारे में बात कर रहे हैं। विद्युत श्रृंखला में, ट्रे में तरल होने पर एक ब्रेक होगा, यदि आप उपरोक्त कोड नहीं चाहते हैं तो इसे विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
टर्बिडिटी सेंसर के दौरान सक्रिय होना चाहिएडिवाइस पूरी तरह से काम करता है, लेकिन अगर इसके कामकाज में कोई त्रुटि हुई है, तो आप कोड F25 द्वारा इसके बारे में पता लगा सकते हैं। एनालॉग सेंसर ऑपरेशन भी विफल रहता है, जैसा कि पदनाम F26 द्वारा दर्शाया गया है। कभी-कभी प्रवाह संकेतक समस्याओं का सामना करते हैं, आप उनके बारे में F27 द्वारा सीख सकते हैं।
तरल दबाव सेंसर विफलता और गलतमोटर ऑपरेशन को क्रमशः एफ 28 और एफ 2 9 के रूप में दर्शाया गया है। जब इंजन घूर्णन बंद हो जाता है, तो आप इसके बारे में F30 द्वारा सीखेंगे। मशीन के संचालन के लिए विद्युत उपकरणों का सिंक्रनाइज़ेशन बहुत महत्वपूर्ण है। यदि कोई खराबी होती है, तो प्रदर्शन F40 दिखाएगा। इस मामले में एक कारण के रूप में, विद्युत नेटवर्क प्रदर्शन का विसंगति डिवाइस की तकनीकी विशेषताओं के कारण है।
जब प्रवाह दर बहुत अधिक या कम होती है,मशीन F50 प्रदर्शित करता है। दरवाजा त्रुटि F51 है, जबकि कार्यात्मक सुरक्षा भी असफल हो सकती है, आप इसके बारे में F53 कोड से सीखेंगे। कभी-कभी नियंत्रण मॉड्यूल विफल रहता है, जैसा कि F54 द्वारा इंगित किया गया है। नियंत्रण मॉड्यूल की त्रुटि F63 है।
यह देखने के बाद या वह त्रुटि कोडवॉशिंग मशीन बॉश, आपको समस्या निवारण शुरू करना होगा। जितनी जल्दी हो सके इसकी सिफारिश की जाती है। यह न केवल उपकरण का जीवन बढ़ाएगा, बल्कि डिवाइस को अधिक कुशलता से काम करेगा।
उदाहरण के लिए, यदि वाशिंग मशीन चालू नहीं होती है,तो इसकी जांच की जानी चाहिए कि क्या यह तारों में एक ख़राब है। हो सकता है कि व्यक्तिगत नोड्स क्रम से बाहर हों या कारण डिवाइस में ही व्यक्त किया गया हो। विशेषज्ञ नेटवर्क में वोल्टेज की जांच करने की सलाह देते हैं। यदि यह मौजूद है, तो अगला कदम आपूर्ति केबल्स, स्वचालित उपकरणों और सॉकेट की अखंडता सुनिश्चित करना है।
कभी-कभी वॉशिंग मशीन के त्रुटि कोडों में से एक"बॉश" तब होता है जब पावर बटन विफल हो जाता है। यदि आप देखते हैं कि यह स्थानांतरित या डुबकी नहीं है, तो आपको इसे प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता है। चिप की विफलता इतनी लोकप्रिय वजह नहीं है। कुछ मामलों में, नियंत्रण मॉड्यूल का टूटना है। ड्रम और इलेक्ट्रिक मोटर को भी कम तोड़ते हैं। यदि आपने मशीन की मरम्मत के हर प्रयास किए हैं, लेकिन स्टार्ट-अप और वर्कफ़्लो के स्थिरीकरण को सुनिश्चित नहीं किया है, तो आपको एक विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
वॉशिंग मशीन के त्रुटि कोड को ध्यान में रखते हुए "बॉशक्लासिक 5 ", आप देख सकते हैं कि उनमें से एक दरवाजे के खराब होने का संकेत देता है। इस पर चर्चा की गई थी। समस्या को ठीक करने के लिए, आपको लोच को प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता हो सकती है।
लेकिन जब सीलिंग टूट गई थी यारबड़ की चोटी की अखंडता, इसे स्वयं या किसी विशेष सेवा से संपर्क करके एक नए में बदल दिया जाता है। सामान्य ऑपरेशन में, जब आप उपकरण को पुनरारंभ करते हैं तो त्रुटि कोड हटाया जा सकता है।
वाशिंग मशीन के त्रुटियों में से एक कोड "बॉशक्लासिक 5 "वह है जो एक समस्या को इंगित करता है, जो पानी की आपूर्ति और निर्वहन के साथ व्यक्त किया जाता है। यदि आपके उपकरण को इस तरह के खराब होने का अनुभव हुआ है, तो आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि क्रेन सामान्य स्थिति में स्थापित हों। उन्हें खोला जाना चाहिए। यदि डिस्प्ले पर त्रुटि अभी भी दिखाई देती है, तो आपको फ़िल्टर को साफ करना चाहिए या इसे पूरी तरह से बदलना चाहिए। कम सिस्टम दबाव पर, कनेक्शन जांचें और उन्हें साफ़ करें। कभी-कभी पानी की आपूर्ति के साथ समस्याओं के मामले में, पानी के स्तर सेंसर को प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।
त्रुटि कोड धोने के कारणों को ध्यान में रखते हुएमशीन "बॉश", आपको एक समस्या का ध्यान देना होगा - एक लंबी नाली। यदि ऐसा होता है, तो पानी के स्तर सेंसर को बदलकर गलती का उपचार किया जा सकता है। मुख्य पंप साफ किया जाना चाहिए।
जब कोई गलत हीटिंग होता है, जोअनावश्यक रूप से लंबा हो सकता है, आपको थर्मोस्टेट, तापमान सेंसर की जांच करनी चाहिए और हीटर को प्रतिस्थापित करना चाहिए। त्रुटियों में से एक ड्रम का टूटना है। आप निर्माता द्वारा अनुशंसित कपड़े धोने की मात्रा को लोड करके इसे हटा सकते हैं। यदि आप लोडिंग के लिए सिफारिशों की उपेक्षा करते हैं, तो इससे बेल्ट पहनने का कारण बन जाएगा। भविष्य में, इकाई और पूरी तरह से असफल हो सकता है।
यदि उपयोगकर्ता को एक त्रुटि आई हैखराबी को खत्म करने के लिए वाशिंग-अप तरल पदार्थ की बाड़ में अक्सर व्यक्त किया जाता है, जिससे कंटेनर को साफ करना संभव हो जाता है। एक समान समस्या को भी रोका जा सकता है। ऐसा करने के लिए, बहुत अधिक पाउडर डाउनलोड करने लायक नहीं है, और आप इसे लंबे समय तक मशीन के अंदर नहीं छोड़ सकते हैं। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है अगर उपकरण एक आर्द्र कमरे में संचालित होता है।
वॉशिंग मशीनों में से एक त्रुटियों में से एक "बॉश मैक्स5 "एक समस्या है जो शोर की उपस्थिति को इंगित करती है। इस मामले में, डिवाइस का अधिक से अधिक निदान किया जाना चाहिए। यदि बाहरी शोर समय-समय पर प्रकट होता है और गायब हो जाता है, तो कारण नालीदार ट्यूबों में विदेशी वस्तुओं की उपस्थिति हो सकती है। हस्तक्षेप करने वाले हिस्सों को हटा दिया जाना चाहिए ताकि वे सिस्टम में प्रवेश न करें, और कोई शॉर्ट सर्किट नहीं है।
यदि यह नहीं किया जाता है, तो व्यक्तिगत तत्वनिराशाजनक हो सकता है। वाशिंग मशीन "बॉश मैक्स" के त्रुटि कोड को ध्यान में रखते हुए, आप देख सकते हैं कि निर्माता शोर के बारे में बोलने वाले पदनाम को इंगित करता है। यदि आप धातु की चपेट में देखते हैं, तो बीयरिंग दोषपूर्ण हो सकती है। उन्हें जितनी जल्दी हो सके बदला जाना चाहिए, ताकि जेनरेटर पूरी तरह विफल न हो।
अगर लोडिंग दरवाजा का दरवाजा नहीं थाबंद, तो यह त्रुटि F01 इंगित करेगा। उपयोगकर्ता को यह जांचना चाहिए कि दरवाजा बंद कितना कसकर बंद है। आप फिर से कपड़े धो सकते हैं, ताकि दरवाजे पर कोई वस्तु न हो। बॉश वॉशिंग मशीनों के लिए त्रुटि कोड पर विचार करते समय, आपको एक निर्णय लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि पानी नहीं है, तो आप प्रदर्शन पर F02 देखेंगे।
कारण एक बंद फ़ीड नल हो सकता हैपानी टैप करें। कभी-कभी यह भी होता है कि दबाव बहुत कम है या पानी बंद हो गया है। जब कोई पानी नहीं दिया जाता है, तो आप इस तथ्य के बारे में भी सोच सकते हैं कि आपूर्ति नली में जाल छिड़क गया है। जब पानी नहीं निकलता है, तो प्रदर्शन पर F03 दिखाई दे सकता है। इस मामले में, त्रुटि तब होती है जब मशीन ने 10 मिनट में टैंक से पानी निकाला नहीं है।
फ़िल्टर की समस्या निवारण के लिए, आपको अवश्य ही करना होगासाफ करें, और फिर सुनिश्चित करें कि नलिका और hoses में कोई clogs हैं। जब वाशिंग मशीन "बॉश क्लासिक एक्सएक्स 5" का उपरोक्त त्रुटि कोड उत्पन्न हुआ, तो आप जांच सकते हैं कि नाली पंप सही तरीके से काम करता है या नहीं। यदि आपको पानी की रिसाव मिलती है, तो मशीन F04 जारी करेगी। समस्या को हल करने के लिए, स्रोत ढूंढना और कनेक्शन की मजबूती सुनिश्चित करना आवश्यक है।
प्रदर्शन के बिना वाशिंग मशीन "बॉश" के त्रुटि कोडवे एलईडी सिग्नल के संयोजन से निर्धारित होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि "जी" एलईडी जलाया जाता है, तो यह इंगित करता है कि दरवाजा बंद नहीं है। जब "पी" एलईडी रोशनी हो जाती है, तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि जल निकासी व्यवस्था दोषपूर्ण थी। लेकिन जब एलईडी "ओ" आता है, तो मशीन पानी को निकालने के खराब होने के साथ टक्कर लगी है।
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001e60ad40d649e376ae917481dd72ff6a52123b | web | Filmy4Wap 2021 : अगर आप बालीवुड, हॉलीवुड और वेब सीरिज या नई-पुरानी फिल्में दिखने के शौकिन है तो यह खबर आपके लिए है। यहां हम आपको उस वेबसाइट के बारे में बताने जा रहे है जहां से आप अपनी मनपसंद फिल्मों को फ्री में डाउनलोड कर देख सकते है। जी हां हम आपको इस खबर के माध्यम से Filmy4Wap वेबसाइट के बारे में जानकारी देने वाले है।
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बॉलीवुड और हॉलीवुड ने अगर कोई फिल्म बनाई है तो यह उनका एक रचनात्मक प्रयास है। अभिनेता, निर्देशक, संपादक और रचनात्मक पेशेवर किसी एक बॉलीवुड मूवी, हॉलीवुड मूवी, थ्रिलर और एक्शन, कॉमेडी और ड्रामा, रोमांस ड्रामा, वेब सीरिज बनाने के लिए बहुत समय, पैसा और ऊर्जा खर्च करते हैं। बॉक्स ऑफिस कलेक्शन, टीआरपी, व्यूअरशिप और अवार्ड नॉमिनेशन के जरिए ही किसी फिल्म को सराहना मिलती है।
इतना कुछ होने के बाद ही कोई फिल्म बनती है। Filmy4Wap जैसी कई वेबसाइट हैं जो एक पायरेसी वेबसाइट है। जो इंटरनेट पर फ्री मूवी डाउनलोड की सुविधा देती है। ऐसे वेबसाइट फिल्मों को ऑनलाइन लीक भी करती है। जिससे फिल्म इंडस्ट्री को नुकसान होता है। और इस वजह से कई फिल्म प्रोफेशनल्स के करियर पर भी इसका अच्छा खासा असर पड़ता है।
इस वजह से मीडिया और प्रोडक्शन हाउस को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। ये वेबसाइट पायरेसी को बढ़ावा देती है। इसीलिए आज इस पोस्ट के माध्यम से बताने जा रहे है कि ऐसी पायरेसी वेबसाइटों से मूवी डाउनलोड करना और देखना आपको परेशानी में डाल सकता है। इसीलिए newspost. in द्वारा सलाह दी जाती है कि अगर आप कोई फिल्म देखना या डाउनलोड करना चाहते हैं, तो हमेशा एक अधिकृत वेबसाइट से ही करें। हां इसके लिए आपको कुछ पैसे जरूर चुकाने पड़ेंगे।
ऐसे में इंटरनेट पर कई गैर कानूनी साइट्स हैं, जो फिल्मों को इस तरह फ्री में मुहैया कराती हैं, लेकिन इससे फिल्म इंडस्ट्री को ज्यादा नुकसान हुआ है। यह न केवल फिल्म इंडस्ट्री बल्कि डिजिटल मनोरंजन एप, सिनेमा हॉल, टीवी चैनल और भी बहुत कुछ प्रभावित कर रहा है। क्योंकि लोगों को कोई भी मूवी फ्री में डाउनलोड करने को मिल जाती है तो वह व्यक्ति सिनेमा हॉल में फिल्म देखने नहीं जाता और इससे सिनेमा हॉल में दर्शकों की संख्या काफी कम हो गई है।
Filmy4Wap जैसी साइट्स लोगों को फ्री में मूवी उपलब्ध करा रही हैं। क्योंकि यहां से बहुत से लोग बॉलीवुड, हॉलीवुड, टॉलीवुड, बॉलीवुड और अन्य भाषा की फिल्में इंटरनेट के माध्यम से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं। ये लीक हुई फिल्में उनकी साइट पर उपलब्ध हैं। Filmy4Wap वेबसाइट के बारे में बहुत से लोग जानते हैं जो उन लोगों को फिल्में उपलब्ध कराती है, जो कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण हॉल में जाकर फिल्में नहीं देख सकते। कई बार ऐसा होता है कि कोई फिल्म रिलीज होने से पहले ही ऐसी साइटों पर फिल्म लीक हो जाती है। और इस तरह लोग फिल्म को फ्री में देखते हैं। इससे फिल्म की कमाई पर सीधा असर पड़ता है। कई बार तो फिल्म निर्माण में लगने वाली लागत भी नहीं निकल पाती है।
Filmy4Wap वेबसाइट लोगों की पसंदीदा वेबसाइट बन गई है। लेकिन आपको बता देना चाहता हूं कि एक वेबसाइट जो बिना किसी परमिशन के लोगों को मूवी फ्री में उपलब्ध कराती है। तो ऐसी वेबसाइट को एक अवैध वेबसाइट माना जाता है। Filmy4Wap वेबसाइट को भी एक पायरेसी वेबसाइट माना गया है। क्योंकि यह वेबसाइट बिना किसी परमिशन के लोगों को फ्री में मूवी उपलब्ध कराती है। आज इस पोस्ट के माध्यम से आपको ऐसी पायरेसी वेबसाइटों के बारे में जानकारी मिलेगी।
दुनियाभर में अधिकांश लोग मनोरंजन के आदी हो चुके हैं। जिस वजह से हर कोई मूवी देखना पसंद करता है। Filmy4Wap वेबसाइट एक ऐसी वेबसाइट है जो लोगों को फ्री में मूवी उपलब्ध कराती है। यह वेबसाइट हर बार अपने वेब पेज को बदलती रहती है, जैसे डोमेन बदलना और मूवी की एचडी क्वालिटी में बदलाव आदि।
यह सभी लोग जानते हैं कि इस वेबसाइट से 400MB से अधिक में मूवी डाउनलोड होती है। इसके जरिए बॉलीवुड और हॉलीवुड, वेब सीरीज, हिंदी डब, तमिल, तेलुगु, पंजाबी और कई अन्य फिल्में लीक हुई हैं। ऐसा होने के बाद लोग ऐसी फिल्में आसानी से डाउनलोड कर लेते हैं। लोगों द्वारा ऐसी वेबसाइट को बहुत पसंद किया जाता हैं क्योंकि हर व्यक्ति फ्री में फिल्में अपने मोबाइल से ही डाउनलोड कर सकता है। इस वेबसाइट पर मराठी और बंगाली फिल्में भी उपलब्ध हैं जो लोगों को काफी पसंद आती हैं।
Filmy4Wap का व्यापक कैटलॉग न केवल बॉलीवुड, हॉलीवुड, टॉलीवुड, कॉलीवुड और अन्य उद्योगों की कॉपीराइट वाली फिल्में प्रदान करता है। इस वेबसाइट पर लोगों को कई टीवी शो भी फ्री में उपलब्ध करवाए जाते हैं। इसलिए यह वेबसाइट लोगों के लिए सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली वेबसाइट बन गई है।
लेकिन ऐसी वेबसाइट को भारत सरकार द्वारा अवैध वेबसाइट माना जाता है, जो बिना किसी अनुमति के लोगों को कोई भी फिल्म मुफ्त में उपलब्ध कराती है। इसलिए ऐसी वेबसाइट को पायरेसी वेबसाइट कहा जाता है।
newspost. in आपको ऐसी पायरेसी वेबसाइटों से दूर रहने की सलाह देता है और आपके लिए अच्छा है आप हमेशा लोकप्रिय अधिकृत साइटों से ही मूवी देखें और डाउनलोड करें।
Filmy4Wap वेबसाइट लोगों को फ्री में नई फिल्में उपलब्ध कराती है। Filmy4Wap वेबसाइट को लोग अपने मोबाइल और अपने कंप्यूटर में आसानी से खोल लेते हैं। वेबसाइट ओपन करने के बाद उसमें कई मूवी के पोस्टर दिखाई देते हैं और इस तरह इस वेबसाइट को खोलना और चलाना बहुत ही आसान है।
Filmy4Wap मुख्य रूप से मुफ्त अंग्रेजी, हिंदी और दक्षिण फिल्मों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इसमें पंजाबी और अन्य हिंदी डब फिल्में भी हैं। Filmy4Wap वेबसाइट यूजर्स की पसंदीदा वेबसाइट बन गई है क्योंकि यहां कई तरह की फिल्में लीक होती हैं। लोग उन फिल्मों को आसानी से डाउनलोड कर लेते हैं। इसीलिए इस वेबसाइट को भी फ्री मूवी डाउनलोड वेबसाइट में से एक माना जाता है।
News Post आपको पायरेसी वेबसाइटों से दूर रहने की सलाह देता है। और आपके लिए लोकप्रिय कानूनी वेबसाइट से ही मूवी डाउनलोड करना और देखना हमेशा सुरक्षित रहेगा।
भारत के अलावा और भी कई देशों में एक ऐसी वेबसाइट है जो आने वाली नई फिल्मों, बॉलीवुड और हॉलीवुड के नए शोज को पायरेट कर रही है। ऐसी ही एक वेबसाइट Filmy4Wap भी है। बॉलीवुड और हॉलीवुड की लगभग हर ब्लॉकबस्टर फिल्म, जिसमें कई अंतरराष्ट्रीय सितारे हैं, Filmy4Wap द्वारा लीक कर दी गई है।
यह वेबसाइट बॉलीवुड, हॉलीवुड, टीवी शो, वेब सीरीज और भी बहुत कुछ नई फिल्में लीक करती है। इन लीक हुई सुपरहिट बॉलीवुड फिल्में भी शामिल है। इसके अलावा आने वाली नई फिल्मों के लीक होने का भी आरोप लगाया गया है। इसलिए भारत सरकार द्वारा ऐसी कई वेबसाइट को बंद कर दिया गया है।
इंटरनेट पर कुछ अवैध वेबसाइटें भी हैं जो मुफ्त में फिल्में उपलब्ध कराती हैं। फिल्मों के अलावा यह ऑनलाइन पायरेसी दिग्गज नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम, हुलु, हुक, उल्लू और अन्य मनोरंजन साइटों को मुफ्त में ऑनलाइन सामग्री उपलब्ध कराने के लिए भी बनाती है। इसलिए भारत के अलावा और भी कई देशों में ऐसी कई वेबसाइट को बंद कर दिया गया है। क्योंकि यह कृत्य अवैध है।
NewsPost आपको ऐसी अवैध वेबसाइट से दूर रहने की सलाह देता है और मूवी देखने और डाउनलोड करने के लिए लोकप्रिय कानूनी वेबसाइट का उपयोग करना आपके लिए हमेशा सुरक्षित है।
भारत और अमेरिका के अलावा कई अन्य देशों में मूवी पायरेसी को अवैध माना जाता है। भारत सरकार द्वारा कई ऐसी वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जो बॉलीवुड और हॉलीवुड की ऐसी कई फिल्में लोगों को हिंदी में उपलब्ध कराती थीं। भारत सरकार द्वारा Filmy4Wap, 123movies, Tamilrockers और Movierulz जैसी साइटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। क्योंकि कुछ ऐसी वेबसाइटें लोगों को शरीर में बड़ी मात्रा में फिल्में उपलब्ध कराती थीं।
लेकिन कई लोगों द्वारा यह भी कहा गया है कि आज भी इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइट हैं जो आज भी लोगों को मुफ्त में फिल्में उपलब्ध करा रही हैं, जो कि अवैध है। लेकिन बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते हैं कि कई वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, फिर भी वेबसाइट अभी भी इंटरनेट पर दिखाई देती है। इसका सबसे बड़ा कारण ये जो वेबसाइट प्रदान करते हैं उसका डोमेन नाम बदलते रहते हैं। जिसके कारण ऐसी वेबसाइट आज भी कई बार इंटरनेट पर दिखाई देती है।
But sometimes such website stops working for downloading the movie.
NewsPost आपको ऐसी अवैध वेबसाइटों से दूर रहने की सलाह देता है और मूवी देखने या डाउनलोड करने के लिए हमेशा लोकप्रिय Sony Liv, Netflix, Amazon Prime, Hotstar जैसी कानूनी साइटों का ही उपयोग करें।
बॉलीवुड और हॉलीवुड में काफी मेहनत के बाद कोई फिल्म बनती है। इसके बाद ही वह फिल्में सिनेमा हॉल में बड़े पैमाने पर रिलीज होती हैं, लेकिन कुछ अवैध वेबसाइटें जो इन फिल्मों को जनता को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं, जो कि अवैध है। इसके बाद जो फिल्म निर्माता को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। भारत सरकार द्वारा यह नियम बनाया गया कि कोई भी वेबसाइट बिना अनुमति के लोगों को मुफ्त में फिल्में नहीं दे सकता है। भारत सरकार ने पायरेसी को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए हैं। 2019 में स्वीकृत सिनेमैटोग्राफ एक्ट के अनुसार, निर्माता की लिखित सहमति के बिना फिल्म रिकॉर्ड करने वाले किसी भी व्यक्ति को 3 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। इसके साथ ही दोषियों पर 10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
जो लोग अवैध टोरेंट वेबसाइटों पर पायरेटेड प्रतियां प्रसारित करते हैं, उन्हें भी जेल की सजा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए हम आपको लगातार सलाह देते हैं कि जब भी आप कोई फिल्म देखना चाहते हैं, तो आपको इसे हमेशा लोकप्रिय कानूनी नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम, हॉटस्टार वेबसाइट से देखना चाहिए। क्योंकि अगर आप किसी भी अवैध साइट से मूवी डाउनलोड करते हैं तो यह आपको मुश्किल में डाल सकती है।
भारत में पाइरेसी कानून के नियम के अनुसार अगर कोई व्यक्ति ऐसी अवैध साइट चलाता है तो उसे कोर्ट में ले जाया जा सकता है। या किसी और की मदद करें और Filmy4Wap फ्री मूवीज से कॉपीराइट मूवी ऑनलाइन डाउनलोड करें। तो यह व्यक्ति को बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। इसलिए यदि आप किसी भी मूवी को डाउनलोड या स्ट्रीम करना चाहते हैं, तो हमेशा लोकप्रिय कानूनी वेबसाइट पर ही भरोसा करें। यहां कुछ लोकप्रिय कानूनी साइटें दी गई हैं। इन साइट्स से आप हॉलीवुड, बॉलीवुड, टीवी सीरियल्स देख और डाउनलोड कर सकते हैं। लेकिन इनमें से कुछ कानूनी साइटों को फिल्में डाउनलोड करने और स्ट्रीमिंग करने के लिए सदस्यता की आवश्यकता होती है। हमने आपको हमेशा सलाह दी है कि इसका उपयोग मूवी डाउनलोड करने और स्ट्रीमिंग के लिए करें।
News Post वेबसाइट के माध्यम से आपको सूचित किया जाता है कि इस पोस्ट के माध्यम से केवल इस फिल्म का रिव्यू दिया जा रहा है। आप इस वेबसाइट के माध्यम से फिल्में डाउनलोड नहीं कर सकते हैं। यह मूवी डाउनलोड करने वाली वेबसाइट नहीं है।
भारतीय कानून के तहत पाइरेसी अपराध है। इस खबर का मकसद आपको गैर-कानूनी गतिविधियों के बारे में सूचित कर जागरूक करना है ताकि आप इस तरह की साइट्स से दूर रहें। आपसे अपील की जाती है कि इन साइट्स के माध्यम से फिल्में डाउनलोड न करें।
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42c01e36b06949bed4768b0f2fe3f952fec6326d | web | ब्रिटेन से एक अजीब खबर आ रही है. यहां एक महिला सेक्स के दौरान तेज तेज आवाज निकालने पर जेल भेज दी गई. ब्रिटेन के बर्मिंघम में अदालत ने सेक्स के दौरान 'तेज़ आवाज़' ना करने के लिए एक महिला को आदेश दिया हुआ था. लेकिन महिला ने यह आदेश नहीं माना. आदेश का उल्लंघन किए जाने की शिकायत फिर से कोर्ट में पड़ोसियों द्वारा की गई. इस सेक्स के दौरान तेज तेज आवाज निकालने वाली महिला को जेल भेज दिया गया.
Heat stroke is the state in which the temperature of the human body start rising. The mechanism of human body is that the the heat withdraws from the body in the form of sweat. But during heat stroke the body loses its ability to cool itself. when the temperature of human body rises it is usually called fever of heat whereas in heat stroke the temprature of the body rises rapidly but it is very difficult to maintain it again to normal.
एक मार्ग पर एक सांसद के नामकरण को रद्द कर दूसरे सांसद के नाम का पटृ लगाने का प्रयास भारत में पहली बार सुनने में आया। दोनों सांसद मेरठ जनपद से सम्बन्ध रखते थे। श्री अमर पाल सिंह के नाम से ऊपर श्री कैलाश प्रकाश का नाम लगाया जाता, आपत्ति तब भी थी। एक सड़क का नाम उपरोक्त दोनों सांसद सदस्यों के नाम के आगे छोटी बात है। दोनों के नाम से मेरठ या अन्यत्र स्थानों पर बड़े संस्थान व योजनाएं होनी चाहिए थी। फिर भी, किसी अनाम या बेतुके नाम के स्थान को नई पहचान देनी थी तब नामकरण उचित प्रतीत होता।
UP IPS officer Amitabh Thakur has requested Home Minister Rajnath Singh and UP Chief Minister Akhilesh Yadav to ensure 08 hours workday and minimum one-day weekly off for policemen. Basing on the study, 'National Requirement of Manpower for 8-hour Shift in Police Stations' by Bureau of Police Research and Development (BPRD), which says that 90% of police officers work for more than eight hours a day and 73% don't get a weekly off even once a month, Sri Thakur requested Sri Singh to issue appropriate guidelines to all the State governments to ensure the compliance of the important conclusions of this report. He requested Akhilesh Yadav to ensure similar provisions in Uttar Pradesh.
Labour Laws finished! Company Changed! Courage translated into exploitation!
Labour Laws finished! Company Changed! Courage translated into exploitation! Hell losing at work places. Just before leaving office, Last night we witnessed the imported glass on the central table of the conference room created mega Blast twice which could have sent splinters to kill us if the walls could not stop it. Yet another scam in purchase which is abundant during continuous shifting of the working place and name change of the company to deprive us.
Satya Narayan : वैसे तो ज़्यादातर कारख़ानों में साप्ताहिक अवकाश का कोई प्रावधान नहीं है, तथा सातों दिन का काम अब आम बात हो गयी है। परन्तु जब भी हमें ख़ाली वक़्त मिलता है तो हममें से अधिकतर लोग सलमान ख़ान, आमिर ख़ान, शाहरुख ख़ान या बॉलीवुड सितारों की फ़िल्में देखना पसन्द करते हैं। इन तमाम फ़िल्मों को देखने के बाद हम कुछ देर के लिए अपनी कठिन ज़िन्दगी को भूल जाते हैं, परन्तु इससे हमारे वास्तविक जीवन में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। सुबह होते ही हमें एक बार फिर कोल्हू के बैल की तरह 16-17 घण्टे खटते हुए मालिक की तिजोरियाँ भरने के लिए अपनी-अपनी फ़ैक्टरी के लिए रवाना होना पड़ता है।
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन द्वारा आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (AIPMT) के पर्चे लीक एवं परीक्षा मे नकल होने के संदर्भ मे एक न्यायपूर्ण एवं पुनः परीक्षा की मांग हेतु प्रतिभाशाली युवाओं के भविष्य हेतु माननीय उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. इसी विषय पर आगामी 3 जून को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी. विगत कई सालों से देखा गया है समाज के अराजक वर्गो (कथित शिक्षा माफिया) ने मिलकर देश मे एक शिक्षा तकनीक चिकित्सा के क्षेत्र मे बेहद कुत्सित माहौल पैदा कर दिया है. हर जगह मुन्ना भाइयो का ज़ोर चल रहा है. शिक्षण संस्थानों में उभरती प्रतिभावों का हनन हो रह है. प्री सेटिंग के माध्यम से बिना मेरिट वालो अयोग्य लोगों को सेवा के क्षेत्रों में प्रवेश दिया जा रहा है. इस तरह की स्थिति समाज में किसी तरह के उत्पादन हनन का कारण बनेगा. सेवा क्षेत्र में अयोग्य लोगों का प्रवेश देश के स्वास्थ्य, शिक्षा को निम्न स्तर पर ले जाएगा.
I, Amitabh Thakur, an IIT Kanpur alumnus and UP IPS officer, have sent an email today to IIT Madras authorities requesting them to lift the ban on Ambedkar Periyar Student Circle. In the mail I have said that the ban is improper and unwarranted because it seems to come only due to a particular thought-process and ideology. I said that from my 4-year stay at IIT Kanpur, I can vouch for a definite presumed superiority in non-SC students vis-à-vis SC students and banning the group will only help inflame such feelings. About the alleged misuse of IIT name and symbols, I have said that IIT brand is so strong that every IIT student and group openly and shamelessly use these them and singling out a particular group is prima-facie discriminatory. Based on these facts, I have requested to lift the ban and set an exemplary example of tolerance.
एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि युवतियां दिन में कम से कम 48 मिनट से लेकर सप्ताह में पांच घंटे और 36 मिनट तक का समय महज सेल्फी लेने में गुजारती हैं। एक वेबसाइट मिरर के मुताबिक, अच्छी सेल्फी लेने में इतना समय मेकअप, सही रोशनी, सही एंगल के कारण लगता है। सर्वे में हर 10 में से एक लड़की बाथरूम, कार या अपने ऑफिस में ली गई कम से कम 150 तस्वीरें अपने कंप्यूटर, स्मार्टफोन में संजोए पाई गईं। सर्वे में 16 से 25 साल की उम्र की 2000 युवतियों को शामिल किया गया। इनमें से 28 फीसदी युवतियों ने बताया कि वे सप्ताह में कम से कम एक बार अपनी तस्वीरें खींचती हैं।
कई चुनौतियों से जूझते हुए पांचवी बार तमिलनाडु में सत्ता की बागडोर संभालने वाली अन्नाद्रमुक नेता जे जयललिता ने यह साबित कर दिया है कि राज्य की राजनीति में वह एक करिश्मा है, जिसका उनके विरोधी भी लोहा मानते हैं। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने और कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद उनके विरोधी यह मानकर चल रहे थे कि जयललिता का राजनीतिक जीवन अब पूरी तरह खत्म हो चुका है पर उनकी जीवटता और संघर्ष करने के हौसले ने उन्हें इस संकट से भी बाहर निकाल दिया और आखिरकार वह कर्नाटक उच्च न्यायालय से बरी कर दी गयीं और आज पांचवी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गयीं।
प्रसिद्ध गायक कैलाश खेर को बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। वे हाल ही में न्यूयॉर्क से लौटे हैं। कैलाश खेर (41) ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बीमारी के कारण गुजरात का उनका कार्यक्रम रद्द करना पड़ा।
: www. mlareportcard. com के सर्वे की रिपोर्ट : आम आदमी पार्टी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर www. mlareportcard. com का सर्वे । दिल्ली में इस वक्त मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच अधिकारों को लेकर जंग चल रही है । आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। 70 में से 67 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार 24 मई को 100 दिन पूरे कर रही है । सौ दिन के अनुभव के आधार पर क्या दिल्ली के लोग अपने विधायकों से खुश हैं । क्या दिल्ली सरकार और उनके विधायक लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर रहे है । विकास कार्यों के आधार पर दिल्ली के सबसे लोकप्रिय विधायक कौन से हैं ? ऐसे ही 7 सवालों पर www. mlareportcard. com ने 15 अप्रेल से 10 मई तक ऑनलाइन सर्वे किया । सर्वे का मकसद ये जानना था कि क्या जनता अपने अपने विधायकों के विकास कार्यों से खुश है ? सर्वे के नतीजों के मुताबिक यदि दिल्ली में आज चुनाव हों तो आम आदमी पार्टी भारी बहुमत से सरकार बनाएगी । दिल्ली के लोग बतौर विधायक केजरीवाल और उनके ज्यादातर विधायकों से खुश हैं हालांकि बतौर विधायक केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने 5 में से 5 नंबर नहीं दिए और वो अपने ही विधायकों से लोकप्रियता की रेस में पिछड़ गए ।
Sheetal P Singh : हे Umesh Sehgal IAS जी! आप विभिन्न चैनलों पर दिल्ली राज्य में दो संवैधानिक पदाधिकारियों के अधिकारों (एल जी बनाम मंत्रिपरिषद) के बाबत और फिर यहाँ काम कर रहे केन्द्रीय सेवा के अधिकारियों के अधिकारों के लिये अपना नैतिक समर्थन व्यक्त करते मिले। आपको याद होगा वर्ष २००३-४ के दौरान आप Hind Agro ltd, ओखला ग्रुप की एक कंपनी के निदेशक/ executive के रूप में संबंधित व्यावसायिक लोगों से मिलते रहे थे।
जिले के एक समारोह में लालकृष्ण आडवाणी को आमंत्रित नहीं किए जाने को लेकर उठे विवादों के बीच आयोजकों ने कहा है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी इस कार्यक्रम से जुड़ी समिति के कभी सदस्य नहीं रहे हैं, इसलिए उन्हें निमंत्रण नहीं दिया गया।
वाराणसी, 23 मई । दुनिया की व्यस्क आबादी का 25 प्रतिशत यानि करीब एक अरब लोग उच्च रक्तचाप यानि हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं। `वर्ल्ड हाईपरटेंशन लीग के अनुसार हर साल करीब 75 लाख लोगों की मौत स्ट्रोक, दिल के दौरे, हार्ट फेल्यर, एन्युरिज्म आदि जैसी कॉर्डियोवैस्कुलर बीमारी से होती है, जिनका मूल कारण उच्च रक्त चाप ही होता है। भारत में 25 वर्ष या इससे अधिक उम्र के 23. 1 प्रतिशत पुरुष और 22. 6 प्रतिशत महिलाएं इसकी चपेट में हैं। यह जानकारी शहर के जाने माने चिकित्सक और जमुना सेवा सदन एंड हर्ट केयर सेंटर के निदेशक डॉ. ए. के. टंडन ने दी ।
चेन्नई से मैच हारने के बाद विराट कोहली बेहद निराश दिखे। उनकी आंखों से निकल रहे आंसू साफ बता रहे थे कि अगर आरसीबी 20 रन ज्यादा बना लेती, तो मैच जीत सकती थी। मैच के बाद विराट कोहली ने कहा कि चेन्नई के खिलाफ यह बहुत ही छोटा लक्ष्य था। 139 रन का टारगेट डिफेंड करना मुश्किल था। उन्होंने कहा, सेमीफाइनल में पहुंचना हमारे लिए बहुत अच्छा रहा। हमने जैसा खेला इसके लिए टीम के प्लेयर्स की सराहना की जानी चाहिए। गौरतलब है कि आशीष नेहरा की अगुवाई में गेंदबाजों के दमदार प्रदर्शन के बाद सलामी बल्लेबाज माइक हसी के जुझारू अर्धशतक से चेन्नई सुपकिंग्स ने इंडियन प्रीमियर लीग के दूसरे क्वालीफायर में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को रोमांचक मुकाबले में तीन विकेट से हराकर छठी बार फाइनल में जगह बनाई। आईपीएल के इतिहास में चेन्नई सबसे कामयाब टीम रही है, जिसने 2010 और 2011 में खिताब जीते और अब तक पांच बार फाइनल में पहुंच चुकी है। आईपीएल आठ में आरसीबी पर सुपरकिंग्स की यह तीन मैचों में तीसरी जीत है।
अक्षय कुमार जल्द ही एक ऑनलाइन होम शॉपिंग टीवी चैनल पर अपनी परिधान संग्रह श्रृंखला शुरू करेंगे। इस टीवी चैनल में वह राज कुंद्रा के साथ सहमालिक हैं। अक्षय ने सोशल नेटवर्किंग साइटों फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर अपने प्रशंसकों के बीच इस खबर को साझा किया।
The century has witnessed that era too when the revolutionaries competed to get martyred. The revolutionaries gave everything to their country, including their life. The atrocities of the foreign colonizers were answered bravely and very strongly. The revolutionaries were fighting the foreigners with the strength of equality and a strong organization. What else could be the reason that in spite of the difficult times socialism was the essence.
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97d7932e66a7463e756e25c97e3dd1a60c25e80b920fe478780111ff925b6efe | pdf | यहाँ हमें सातवाहनत के बाद के इतिहास से मतलब नहीं है, पर ऐसा पता लगता है कि श्री यज्ञ सातकरिण के बाद सातवाहन साम्राज्य बँट गया। तीसरी सदी के मध्य तक तो उसका अन्त हो गया तथा उसी से माइसोर के कदब, महाराष्ट्र के आमीर और आन्ध्रदेश के इचवानुकुत निकले।
गुरहूर जिले के पालनाङ तालुक में कृष्णा नदी के दाहिने किनारे पर नागाजुनी कोण्ड की पहाड़ियों पर बहुत से प्राचीन अवशेष पाये गये हैं जिनसे पूर्ण समुद्रतट पर यात के दूसरी तीसरी सदी के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। श्रभाग्यवश वहाँ से मिले अभिलेख तीन राजाओं यानी माढरिपुत सिरि-विरपुरिसदात, उनके पिता वासिठिपुत बातमूल और वीरपुरिसदाम के पुत्र पहुवुत्त चातमूल के ही हैं। पर यहाँ एक बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि अयोध्या के इचवाकुमों से सम्बन्ध जोड़ता हुआ एक राजवंश अपने स्थान से इतनी दूर आकर राज्य करता था। ऐसा पता चलता है कि प्रदेश के इन इचत्राकुराजाओं की कुत्र हस्ती थी क्योंकि उनके विवाह-सम्बन्ध उत्तर कनारा के बनवास- राजकुन और उज्जयिनी के छत्रप-कुल में हुए थे। ये राजे सहिष्णु थे, क्योंकि उनके स्वयं ब्राह्मण वर्म के अनुयायी होते हुए भी उनके घरों की स्त्रियाँ बौद्ध थीं।
भावरिपुत के चौदहवें वर्ष' के एक लेख में सिंहलद्वीप के बौद्ध भिक्षुओं को एक चैत्य भेंट करने का उल्लेख है। लेख में यह भी कहा गया है कि सिंहल के इन बौद्ध भिक्षुओं ने कश्मीर, गंधार, चीन, चिलात ( किरात ), तोसजि, अवरन्त ( अपरान्त ), वंग, धनवासी, यवन, दमिल, (प) लुर और तम्बपणि को बौद्धधर्म का अनुमायी बनाया। इनमें से कुछ देश, जैसे कश्मीर, गन्धार, बनवासी, अपरान्तक और योन तो तीसरी बौद्ध संगीति के बाद ही धौद्ध हो चुके थे। देशों की उपयुक्त तालिका की तुलना हम मिलिन्दप्रश्न की वैसी ही दो तालिकाओं से कर सकते हैं।
अभिलेख के चिलात~~ जिनका उल्लेख पेरिप्लस के लेखक और टाल्मी ने किया -पेरिप्लस के अनुसार, उत्तर के वासी थे। टाल्मी उन्हें बंगाल की खाड़ी पर घताना है। महाभारत के अनुसार ( म० भा० २१४६१५ ), उनका स्थान हिमालय की ढाल- समुद्र पर स्थित धारिष (घारीसाल) और ब्रह्मपुत्र - बतलाया गया है। इसके यह मानी हुए कि महाभारत में किरातों से तिब्बती-धरमी जाति से मतलब है। वे खाल पहनते थे तथा कन्द और फल पर गुजारा करते थे। युधिष्ठिर को उन्होंने उपायन में चमड़े, सोना, रल, चन्दन, अगर और दूसरे गन्धद्रव्य भेट में दिये ।
तोसलि कलिंग यानी चड़ीसा में था और हाथीदाँत के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। अपरान्त से कोंकण का, वॅग से बंगाल का, बनवासी से उत्तर कनारा का, यवन से सिकन्दरिया का, (प) लुर से कलिंग की राजधानी दन्तपुर का और दमिल से तामिलनाढ का मतलब है ।
१ एपि०] [इंडि०, २०, ५० ६ १ सिनिन्दभरन, पृ० ३२० और ३३७
संगठिन नहीं कर पाते थे और आपस में वरावर ला करते। कनिष्क के समय, इस प्रदेश पर दो शक्तियाँ आँख गाये हुई थीं - पश्चिम में कुषण और पुरव में चीन । उस समय चीन कमजोर पड़ रहा था और उसकी कमजोरी का लाभ उठाकर, कुषाण सेना पूरब में पामीर के दरों पर आ पहुंची। उस युग में कनिष्क ने वहाँ भारतीय उपनिवेश प्साये और इस तरह, भारत के मालिक की हैसियत से, घे दोनों कौशेयपयों पर कब्जा कर बैठे।
अन यहाँ उस उत्तर प्रदेश की खोज करनी चाहिए जिसके लेने के लिए कनिष्क को बहुत-सी लडाइयों लड़नी पड़ीं। श्री गिर्श पान की राय में यह प्रदेश सुग्ध है जिसमें मध्यकाल तक कुत्राणों की याद बच गई थी। काशगर से चलनेवाले उत्तरी कौशेयमार्ग पर सुग्ध तक कुत्राणों ने बहुत से वैसे ही उपनिवेश बनाये जैसे उन्होंने दक्खिनी रास्ते पर बनाये थे। सुग्ध में से चौद्ध वर्म भी शायद कनिष्क के पहले ही पहुँच चुका था और उसका प्रचार मन्दी धर्म के साथ ही साथ बेखटके हो रहा था । सुग्ध लोगों की सहनशीजा का परिचय हमें इसी बात से मिलता कि उनके प्रदेश में व्यापार करनेवालों में सभी धर्म के माननेवाले थे, जैसे जर्थुस्त्री, वौद्ध, मनीखी, ईवाई इत्यादि । मज्दवर्मं के पालन करनेवालों की इस सहनशीलता से उसमें बौद्धधर्म का भी समावेश हो गया ।
सुग्ध में बौद्धधर्म के प्रवेश होने पर वहाँ की कला पर भी भारतीय कला का बड़ा असर पड़ा। तिरमिज के पास रूसियों द्वारा खुराई करने से कई बौद्ध विहारों का पता लगा है-जिनमें से कुछ के पर मथुरा की कला का स्पष्ट प्रभाव देव पड़ता है। वहाँ खरोष्ठी लिपि का भी काफी प्रचार था । ऐसा माजूम पड़ता है कि बहुत कोशिशों के बाद कनिष्क ने इस प्रदेश को भी जीत लिया और एक ऐसे साम्राज्य का मालिक बन बैठा जो उत्तर में पेशावर से लेकर बुखारा, समरकन्द और ताशकन्द तक फैला हुआ था । मर्व से सोतान और सारनाथ तक उसकी सीमा थी तथा वह सीर दरिया से ओमान के समुद्र तक फैला हुआ था। इतना बडा साम्राज्य प्राचीन काल में फिर देखने को नहीं मिला
उस युग में कुपाणो और रोमन साम्राज्य का सम्बन्ध काफी दृढ़ हुआ । कुषाणों के अधिकृत राजमार्गों से चलते हुए चीनी वर्तन, चीन के घने रेशमी कपडे, हाथीदॉन, कीनती रत्न, मसाले तथा सूती कपड़े रोम को जाने लगे और रोमन साम्राज्य का सोना कुषाण साम्राज्य में आने लगा। कनिष्क के समय, भारत के धन का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कनिष्क से अधिक और किसी के सोने के सिक्के आज दिन भी भारत में नहीं मिलते।
ऐसा लगता है कि कनिष्क की शौकीन प्रजा रोनन माज्ञ की भी शोकीन थी। बेग्राम में हैक की खुदाई से यह पता लगता है कि रोम से भी कुछ माल भारत और चीन को जाता था। कुषाण अधिकृत सड़कों से रोम को जानेवाले माल का इतना अधिक दाम या कि रोम ने चीन से सीवा सम्बन्ध करने का प्रयत्न किया। चीनी लोगों से ऐसा पता लगता है कि रोम के वाइशाह मारकस औरेलियस ने दूसरी सदी के अन्त में समुद्री मार्ग से एक दूत को चीन भेजा। हम आगे चलकर देखेंगे कि भारत ओर रोम का व्यापार इस कुषाण युग में कितना उन्नत हो चुका था ।
कुषाणों का संचलन बहुत तरतीव से होता था। अपनी चढाइयों में वे विजितों से उपायन लेकर भी उन्हें छोड़ देते थे। गुन्दुफर के राज्य के वे स्वामी बने, पर ऐसा पता लगता है कि विजित राज्य के छत्रपों और महाक्षत्रपों को उन्होंने ज्यों-का-त्यों रहने दिया, केवल राजा
यहाँ हमें सातवाहनकुल के बाद के इतिहास से मतलब नहीं है, पर ऐसा पता लगता कि श्रीयश सातकर्णि के बाद सातवाहन साम्राज्य बैंठ गया। तीसरी सदी के मध्य तक तो उसका अन्त हो गया तथा उसी से माइसोर के कदंच, महाराष्ट्र के आभीर और धान्ध्रदेश के इचल निकले।
गुष्टुर जिले के पालनाड तालुक में कृष्णा नदी के दाहिने किनारे पर नागार्जुनी कोण्ड की पहाड़ियों पर बहुत-से प्राचीन अवशेष पाये गये हैं जिनसे पूर्णे समुदतट पर इचवाल के दूसरी-तीसरी सदी के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। अभाग्यवश वहाँ से मिले अभिलेख तीन राजाओं यानी माढरिपुत सिरि-विरपुरिदात, उनके पिता वासिठिपुन चातमूल और योरपुरिसदान के पुत्र एहुवुल चातमूल के ही हैं। पर यहाँ एक बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि अयोग्या के इक्ष्वाकुओं से सम्बन्ध जोन्ता हुआ एक राजवंश अपने स्थान से इतनी दूर आकर राज्य करता था। ऐसा पता चलता है कि श्रन्ध्रदेश के इन उदाउराजाओं की फुत्र हस्ती थी, क्योंकि उनके विवाह सम्बन्ध उत्तर कनारा के बनवास-राजकुश और उज्जयिनी के क्षेत्रप-कुज में हुए थे।" ये राजे सहिष्णु थे, क्योंकि उनके स्वयं ब्राह्मण वर्म के अनुयायी होते हुए भी उनके घरों की स्त्रियाँ बौद्ध थीं ।
माढरिपुत के चौदहवें वर्ष के एक लेख में सिंहलद्वीप के बौद्ध भिक्षुओं को एक चैत्य भेंट करने का उल्लेख है। लेख में यह भी कहा गया है कि सिंहल के इन बौद्ध भिक्षुओं ने कश्मीर, गंधार, चीन, चिलात ( किरात ), तोसति, अवरन्त ( अपरान्त ), वंग, बनवासी, यवन, दमिल, (प)लुर और तम्बपथि को बौद्धधर्म का अनुयायी धनाया। इनमें से कुछ देश, जैसे कश्मीर, गन्वार, धनवासी, अपरान्तक और योन तो तीसरी बौद्ध संगीति के बाद ही बौद्ध हो चुके थे। देशों की उपयुक्त तालिका की तुलना हम मिलिन्दशश्न की वैसी ही दो तालिकाओं से कर सकते हैं।
अभिलेख के चिलात- जिनका उल्लेख पेरिप्लस के लेखक और टाल्मी ने किया है- पेरिप्लस के अनुसार, उत्तर के वासी थे। टाल्मी उन्हें बंगाल की खाड़ी पर बताता है। महाभारत के अनुसार ( म० भा० २१४६१८ ), उनका स्थान हिमालय की ढाल - समुद्र पर स्थित धारिष (बारीसाल) और ब्रह्मपुत्र - बतलाया गया है। इसके यह मानी हुए कि महाभारत में किरातों से तिब्बती-वरमी जाति से मतलव है। वे खाल पहनते थे तथा कन्द और फल पर गुजारा करते थे। युधिष्ठिर को उन्होंने उपायन में चमड़े, सोना, रत्न, चन्दन, अगर और दूसरे गन्धद्रव्य भेंट में दिये।
तोसलि कलिंग यानी उड़ीसा में था और हाथीदाँत के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था । अपरान्त से कोंकण का, बंग से बंगाल का, बनवासी से उत्तर कनारा का, यवन से सिकन्दरिया का, (प)लुर से कलिंग की राजधानी दन्तपुर का और दमिल से तामिलनाड का मतलब है 1
१ एपि०] [इंडि०, २०, पृ० ६ २ मिलिन्दुमरन, पु० ३२० और ३३७
उपयुक्त अभिलेस में ही, कराटकसेन के महाचैत्य के पूर्वो द्वार पर स्थित एक लेख का वर्णन है। निश्चयपूर्वक यह फस्ट रुसेल और टाल्मी का कण्डिफोस्कुल (Kantikossula ) ( ७ । १ ।१५ ) जिसका उल्लेख कृष्ण के मुहाने के ठीक बाद आता है, एक थे । ठा० वोगे ने इस कण्डवेश को नागार्जुनी कोएड में रखा था; पर पूर्व समुद्रतट पर कृष्णा जिले के घण्टासाल नामक गाँव से प्राप्त करीब ३००६० के पाँच प्राकृत ले कराटकसेल की स्थिति पर अच्छा प्रकाश डालते हैं। एक लेख में महानाविक विवक का उल्लेख होने से यह बात साफ हो जाती है ईसा की प्रारम्भिक सदियों में घण्टावाल एक बन्दरगाह था। दूसरे लेग में तो घण्टासाल का प्राचीन नाम करटकमोन दिया हुआ है। उपर्युक पातों से कोई सन्देह नहीं रह जाता कि ईसा की आरम्भिक सदियों में कराटोन कृष्ण नदी के दायें किनारे पर एक वड़ा बन्दरगाढ या जिसका लंका के बन्दरों तथा दूसरे बन्दरों से व्यापारिक सम्बन्ध था।
टाल्मी के अनुसार ( ७ । १ । १६ ) पलुर एक एफेटेरियम ( समुद्र- प्रस्थान ) था जहाँ से सुवर्णद्वीप के लिए किनारा छोड़कर जहाजवाते समुद्र में चले जाते थे। पलुर की स्थिति की पहचान चिकाकोन और कलिंगपटनम् के पदोस में की जाती है।
इसमें गन्देह नहीं कि पूर्वी समुद्रतट पर वाद्धधर्म के ऐश्वर्य का कारण व्यापार था। बौद्ध धर्म के अनुयायी अधिकनर व्यापारी थे और उन्हों की मदद से अमरावती, नागार्जु भी कोण्ड, और जगन्यपेट के विशाल स्तूप राई हो सके। कृष्णा के निचले भाग में बौद्धधर्म के ह्रास का कारण देश में सत्र जगह बौद्ध नर्म को अरनति तो था ही, साथ-ही-साथ, रोम के साथ व्यापार की कमी भी था, जिससे इस देश में सोना आना बन्द हो गया और बौद्ध व्यापारी दरिद्र हो गये।
जिस समय दक्षिण में सातवाहन वंश अपनी शक्ति मजबूत कर रहा था उसी युग में गुजरात और काठियावाद पर छत्रपों का राज्य था। ये क्षत्रप पहले शाहानुशाही के प्रादेशिक थे। शायद उनकी नस्ल शक अथवा पहूलय थी, पर बाद में तो ये पुरे हिन्दू हो चुके थे। छाव यह प्रायः निश्चित हो चुका है कि काठियावाद के छत्रप कनिष्क और उसके वंश के प्रति वफादार थे। पर गुजरात, काठियावाड़ और मालवा पर शासन करनेवाले चनपों के दो फुल थे। तहरात-कुल में भूमक हुए जिनके सिक्के गुजरात के समुद्रीतट, काठियावाड़ और मालवा तक मिलते हैं। नहपान ने जिनकी सातवाहन पुन्त से हमेशा प्रतिस्पर्धा रहती थी और जिनका उल्लेख जैन-साहित्य में हुआ है, शायद ११६-११४६० तक राज किया, गोंकि उनके समय पर ऐतिहासिकों में काफी बहस है। शायद नहपान के अधिकार में गुजरात, काठियानाद, उत्तर- कोंकण, नासिक और पूना के जिले, मालचा तथा राजस्थान के कुछ भाग थे। जैसा हम कह आये हैं, गौतमीपुत्र ने इन प्रदेशों में से कुछ पर कब्जा कर लिया था ।
चष्टन उस राजकुल का संस्थापक था जिसने ३०४६० तक राज्य किया। चप्टन और चहरात-वंशों के रिश्ते पर अनेक मत है । ऐसा पता चलता है कि गौतमीपुत्र सातकणि द्वारा चहरातों के उम्भुलन के बाद, शक-शक्ति की ओर से, चप्टन को बचे-खुचे सूत्रों का क्षत्रप नियुक्त
एरॉट इंडिया, नं० ५ ( जनवरी, १६४६ ), पृ० १३ २. मागची, मीधायन एड प्रोड्वीडियन, देखो पल्लर एण्ड इंतपुर |
f4c41aac89c01acd7e507ac00b40fc2a8709cae450167e9c32208b0dfa1a0f01 | pdf | तृतीय से तीसवाँ उद्देशक - अन्तर्द्वीप ( सूत्र १ - ३)
उपोद्घात ४३०, एकोक आदि अन्तर्द्वीपक मनुष्य ४३०, पर वहाँ के निवासी मनुष्य ४३१, जीवाभिगमसूत्र का प्रतिदेश ४३१, अन्तद्वपिक मनुष्यों का आहार-विहार आदि ४३१, वेद्वीप कहाँ ? ४३२, छप्पन अन्तर्द्वीप ४३२ ।
इकतीसवाँ उद्देशक - प्रश्रुत्वाकेवली ( सूत्र १ - ४४)
उपोद्घात ४३३, केवली यावत् केवली- पाक्षिक उपासिका से धर्मश्रवणलाभालाभ ४३३, केवली इत्यादि शब्दों का भावार्थ ४३४, असोच्चा धम्मं लभेज्जा सवणयाए तथा नाणावरणिज्जाणं ....खग्रोवसमे का अर्थ ४३४, केवली आदि से शुद्धवोधि का लाभालाभ ४३४, केवली आदि से शुद्ध गरिता का ग्रहण ग्रहण ४३५, केवली आदि से ब्रह्मचर्य-वास का धारण धारण ४३६, केवली आदि से शुद्ध संयम का ग्रहण ग्रहण ४३७, केवली आदि से शुद्ध संवर का आचरण अनाचरण ४३८, केवली आदि से अभिनिवोधिक श्रादि ज्ञान - उपार्जन अनुपार्जन ४३८, केवली आदि से ग्यारह वोलों की प्राप्ति र अप्राप्ति ४४०, केवली आदि से विना सुने केवलज्ञानप्राप्ति वाले को विभंगज्ञान एवं क्रमशः अवधिज्ञान प्राप्त होने की प्रक्रिया ४४२, 'तस्स छटु छुट्टणं' : आशय ४४३, समुत्पन्न विभंगज्ञान की शक्ति ४४३, विभंगज्ञान अवधिज्ञान में परिणत होने की प्रक्रिया ४४३, पूर्वोक्त अवधिज्ञानी में लेश्या, ज्ञान आदि का निरूपण ४४४, साकारोपयोग एवं अनाकारोपयोगका अर्थ ४४७, वज्रऋषभनाराच संहनन ही क्यों ? ४४७, सवेदी आदि का तात्पर्य ४४७, प्रशस्त अध्यवसायस्थान ही क्यों ? ४४७, उक्त अवधिज्ञानी को केवलज्ञान प्राप्ति का क्रम ४४७, चारित्रात्मा अवधिज्ञानी के प्रशस्त अध्यवसायों का प्रभाव ४४८, मोहनीयकर्म का नाश, शेष घाति कर्मनाश का कारण ४४५, केवलज्ञान के विशेषणों का भावार्थ ४४८, असोचा केवली द्वारा उपदेश-प्रव्रज्यासिद्धि आदि के सम्बन्ध में ४४६, प्रसोच्चा केवली का प्रचार-विचार, उपलब्धि एवं स्थान ४५०, सोच्चा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तर ४५१, 'असोच्चा' का अतिदेश ४५१, केवली आदि से सुन कर अवधिज्ञान की उपलब्धि ४५२, केवली आदि से सुन कर सम्यग्दर्शनादि प्राप्त जीव को अवधिज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया ४५२, तथारूप अवधिज्ञानी में लेश्या, योग, देह आदि ४५२, सोच्चा केवली द्वारा उपदेश, प्रव्रज्या, सिद्धि आदि के सम्बन्ध में ४५४, सोच्चा अवधिज्ञानी के लेश्या आदि का निरूपण ४५६, असोच्चा से सोच्चा ग्रवधिज्ञानी की कई वातों में अन्तर ४५६ ।
बत्तीसवाँ उद्देशक-गांगेय (सूत्र १ ५६ )
उपोद्घात ४५८, चौवीस दण्डकों में सान्तर निरन्तर उपपात- उद्वर्तन-प्ररूपणा ४५८, उपपातउद्वर्तन : परिभाषा ४६०, सान्तर और निरन्तर ४६०, एकेन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति और मृत्यु ४६०, प्रवेशनक : चार प्रकार ४६०, नैरयिक - प्रवेशनक निरूपण ८६१, नैरयिक - प्रवेशनक सात ही क्यों ? ४६१, एक नैरयिक के प्रवेशनक-भंग ४६१, एक नैरयिक के संयोगी सात प्रवेशनक-भंग ४६१, दो नैरयिकों के प्रवेशनक-भंग ४६१, तीन नैरयिकों के प्रवेशनक-भंग ४६३, चार नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४६६, चार नैरयिकों के त्रिकसंयोगी भंग ४७१, पंच नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४७१. पंच नैरयिकों के द्विकसंयोगी भंग ४७४, पांच नैरयिकों के त्रिकसंयोगी भंग ४७४, पांच नैरयिक के चतुःसंयोगी भंग ४७५, पंच नैरयिकों के पंचसंयोगी भंग ४७६, पांच नैरयिकों के समस्त भंग ४७७, छह
नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४७७, एक संयोगी ७ भंग ४७६, द्विकसंयोगी १०५ भंग ४७६, त्रिकसंयोगौ ३५० भंग ४७६, चतुःसंयोगी ३५० भंग ४७६, पंचसंयोगी १०५ भंग ४७६, षड्योगी ७ भंग ४८०, सात नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४८०, सात नैरयिकों के अयोगी ७ भंग ४८१, द्विकसंयोगी १२६ भंग ४८१, त्रिकसंयोगी ५२५ भंग ४८१, चतुःसंयोगी ७०० भंग ४८१, पंचसंयोगी ३१५ भंग ४८१, षट्संयोगी ४२ भंग ४८१, सप्तसंयोगी एक भंग ४८१, आठ नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४८१, योगी भंग ४८२, द्विकसंयोगी १४७ भंग ४५२, त्रिकसंयोगी ७३५ भंग ४५२, चतुःसंयोगी १२२५ भंग ४८२, पंचसंयोगी ७३५ भंग ४८३, षट्संयोगी १४७ भंग ४८३, सप्तसंयोगी ७ भंग ४८३, नौ नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४८३, नौ नैरयिकों के असंयोगी भंग ४८३, द्विकसंयोगी १६८ भंग ४८३, त्रिकसंयोगी ९८० भंग ४८४, चतुष्कसंयोगी १९६० भंग ४८४, पंचसंयोगी १४७० भंग ४८४, षट्संयोगी ३६२ भंग ४८४, सप्तसंयोगी २८ भंग ४८४, दस नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४८४, दस नैरयिकों के असंयोगी भंग ४८५, विकसंयोगी १८६ भंग ४८५, त्रिकसंयोगी १२६० भंग ४८५, चतुष्कसंयोगी २६४० भंग ४८५, पंचसंयोगी २६४६ भंग ४८५, पसंयोगी ८८२ भंग ४८५, सप्तसंयोगी ८४ भंग ४८५, संख्यात नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४८६, संख्यात का स्वरूप ४८८, असंयोगी ७ भंग ४८८, द्विकसंयोगी २३१, भंग ४८८, त्रिकसंयोगी ७३५ भंग ४८८, चतुः संयोगी १०८५ भंग ४८६, पंचसंयोगी ८६१ भंग ४८६, षट्सयोगी ३५७ भंग ४८६, सप्तसंयोगी ६१ भंग ४८६, असंख्यात नैरयिकों के प्रवेशनकभंग ४८६, उत्कृष्ट नैरयिक - प्रवेशनक प्ररूपणा ४९०, रत्नप्रभादि नैरयिक प्रवेशनकों का अल्पवहुत्व ४९२, तिर्यञ्चयोनिक- प्रवेशनकः प्रकार और भंग ४६३, उत्कृष्ट तिर्यञ्चयोनिक प्रवेशनक प्ररूपणा ४९४, एकेन्द्रियादि तिर्यञ्चप्रवेशनकों का अल्पबहुत्व ४९५, मनुष्य प्रवेशनक प्रकार और भंग ४९५, उत्कृष्ट रूप से मनुष्य प्रवेशनक- प्ररूपणा ४६७, मनुष्य - प्रवेशनकों का अल्पबहुत्व ४९७, देव-प्रवेशनकः प्रकार और भंग ४९८, उत्कृष्ट रूप से देव- प्रवेशनक- प्ररूपणा ४९६, भवनवासी आदि देवों के प्रवेशनकों का अल्पवहुत्व ४९६, नारकतिर्यञ्च - मनुष्य- देव प्रवेशनकों का अल्पवहुत्व ५००, चौवीस दण्डकों में सान्तर निरन्तर उपपाद - उद्वर्तनप्ररूपणा ५००, प्रकारान्तर से चौवीस दण्डकों में उत्पाद - उद्वर्तना- प्ररूपणा ५०१, सत् ही उत्पन्न होने आदि का रहस्य ५०३, सत् में ही उत्पन्न होने आदि का रहस्य ५०३, गांगेय सम्मतसिद्धान्त के द्वारा स्वकथन की पुष्टि ५०३, केवलज्ञानी आत्मप्रत्यक्ष से सब जानते हैं ५०३, केवलज्ञानी द्वारा समस्त स्व-प्रत्यक्ष ५०४, नैरयिक आदि की स्वयं उत्पत्तिः रहस्य और कारण ५०४-५०५, भगवान् के सर्वज्ञत्व पर श्रद्धा और पंचमहाव्रत धर्म स्वीकार ५०७ ।
तेतीसवाँ उद्देशक-कुण्डग्राम (सूत्र १ - ११२ )
ऋषभदत्त और देवानन्दा : संक्षिप्त परिचय ५०८, ऋषभदत्त ब्राह्मणधर्मानुयायी था या श्रमणधर्मानुयायी ? ५०६, भगवान् की सेवा में वन्दना - पर्युपासनादि के लिए जाने का निश्चय ५०६, ब्राह्मणदम्पती की दर्शनवन्दनार्थ जाने की तैयारी ५१०, पांच अभिगम क्या और क्यों ? ५१३, देवानन्दा की मातृवत्सलता और गौतम का समाधान ५१३, ऋषभदत्त द्वारा प्रव्रज्याग्रहण एवं निर्वाणप्राप्ति ५१५, देवानन्दा द्वारा साध्वी दीक्षा और मुक्ति प्राप्ति ५१६, ( जमालि चरित) जमालि और उसका भोग-वैभवमय जीवन ५१८, भगवान् का पदार्पण सुनकर दर्शन-वन्दनादि के लिये गमन ५१६, जमालि द्वारा प्रवचन-श्रवण और श्रद्धा तथा प्रव्रज्या की अभिव्यक्ति ५२२, माता-पिता से दीक्षा की
नुज्ञा का अनुरोध ५२३, प्रव्रज्या का संकल्प सुनते ही माता शोकमग्न ५२५, माता-पिता के साथ विरक्त जमालि का संलाप ५२६, जमालि को प्रव्रज्याग्रहण की अनुमति दी ५३६, जमालि के प्रव्रज्याग्रहण का विस्तृत वर्णन ५३७ ५५३, भगवान् की विना आज्ञा के जमालि का पृथक् विहार ५५४, जमालि अनगार का श्रावस्ती में और भगवान् का चंपा में विहरण ५५५, जमालि अनगार के शरीर में रोगातंक की उत्पत्ति ५५६, रुग्ण जमालि को शय्यासंस्तारक के निमित्त से सिद्धान्त विरुद्ध स्फुरणा और प्ररूपणा ५५७, कुछ श्रमणों द्वारा जमालि के सिद्धान्त का स्वीकार, कुछ के द्वारा अस्वीकार ५५५, जमालि द्वारा सर्वज्ञता का मिथ्या दावा ५५६, गौतम के दो प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ जमालि का भगवान् द्वारा सैद्धान्तिक समाधान ५६०, मिथ्यात्वग्रस्त जमालि की विराधकता का फल ५६२, किल्विषिक देवों में उत्पत्ति का भगवत्समाधान ५६३, किल्विपिक देवों के भेद, स्थान एवं उत्पत्तिः कारण ५६४, किल्विपिक देवों में जमालि की उत्पत्ति का कारण ५६६, स्वादजयी गार किल्विषिक देव क्यों ? ५६७, जमालि का भविष्य ५६७ ।
चौतीसवाँ उद्देशक-पुरुष (सूत्र १ २५ )
पुरुष और नोपुरुप का घातक, उपोद्घात, पुरुष के द्वारा अश्वादिघात सम्बन्धी प्रश्नोत्तर ५६६, प्राणिघात के सम्बन्ध में सापेक्ष सिद्धान्त ५७१, घातक व्यक्ति को वैरस्पर्श की प्ररूपणा ५७१, एकेन्द्रिय जीवों की परस्पर श्वासोच्छ्वाससम्बन्धी प्ररूपणा ५७२, पृथ्वीकायिकादि द्वारा पृथ्वीकायिकादि को श्वासोच्छ्वास करते समय क्रिया-प्ररूपणा ५७३, वायुकाय को वृक्षमूलादि कंपाने-गिराने संबंधी क्रिया ५७५ ।
दशम शतक
दशम शतकगत चौतीस उद्देशकों के विषयों का संक्षिप्त परिचय दशम शतक के चौतीस उद्देशकों की संग्रहगाथा
द्वितीय उद्देशक-संवृत अनगार ( सूत्र १ - १ ) १-६)
प्रथम उद्देशक- दिशाओं का स्वरूप (सूत्र २-१६)
दिशाओं का स्वरूप ५७६, दिशाएँ : जीव-अजीव रूप क्यों ? ५७६, दिशाओं के दस भेद ५८०, दिशाओं के ये दस नामान्तर क्यों ? ५८१, दश दिशाओं की जीव-जीव सम्बन्धी वक्तव्यता ५८१, दिशा - विदिशाओं का आकार एवं व्यापकत्व ५८२, आग्नेयी विदिशा का स्वरूप ५८३, जीवदेश सम्वन्धी भंगजाल ५८३, शेष दिशा - विदिशाओं की जीव-अजीव प्ररूपणा ५८४, शरीर के भेद-प्रभेद तथा सम्वन्धित निरूपण ५८४ ।
वीचिपचिपथ स्थित संवृत अनगार को लगने वाली क्रिया ५८६, ऐर्यापथिकी और साम्परायिकी क्रिया के अधिकारी ५८७, वीयीपंथे : चार रूपः चार अर्थ ५८७, अवीयीपंथे : चार रूपः चार अर्थ ५८७, योनियों के भेद-प्रभेद, प्रकार एवं स्वरूप ५८७, योनि का
निर्वचनार्थ ५८८, योनि के सामान्यतया तीन प्रकार ५८८, प्रकारान्तर से योनि के तीन भेद ५८६, अन्य प्रकार से योनि के तीन भेद ५८६, उत्कृष्टता-निकृष्टता की दृष्टि से योनि के तीन प्रकार ५८६, चौरासी लाख जीवयोनियाँ ५८६, विविध वेदना प्रकार एवं स्वरूप ५८६, प्रकारान्तर से त्रिविध वेदना ५६०, वेदना के पुनः तीन भेद हैं ५६०, वेदना के दो भेद ५९०, वेदना के दो भेद : प्रकारान्तर से ५९०, मासिक भिक्षुप्रतिमा की वास्तविक आराधना ५६१, भिक्षुप्रतिमा : स्वरूप और प्रकार ५६१, अकृत्यसेवी भिक्षु : कब अाराधक कब आराधक ? ५६२, आराधकविराधक भिक्षु की छह कोटियां ५६३ ।
तृतीय उद्देशक- आत्मऋद्धि ( सूत्र १ -१६ )
देवों की देवावासों की उल्लंघनशक्ति अपनी और दूसरी ५६४, देवों का मध्य में से होकर गमनसामर्थ्य ५६५, विमोहित करने का तात्पर्य ५९७, देव-देवियों का एक दूसरे के मध्य में से होकर गमनसामर्थ्य ५९७, दौड़ते हुए अश्व के 'खु खु' शब्द का कारण ५६६, प्रज्ञापनीभाषा : मृषा नहीं ५६६, बारह प्रकार की भाषाओं का लक्षण ६०० ।
चतुर्थ उद्देशक-श्यामहस्ती ( सूत्र १-१४ )
श्यामहस्ती अनगार : परिचय एवं प्रश्न का उत्थान ६०२, चमरेन्द्र के त्रायस्त्रिशक देव : अस्तित्व, कारण एवं सदैव स्थायित्व ६०३, त्रायस्त्रिश देवों का लक्षण ६०५, वलीन्द्र के त्रायस्त्रिशक देवों की नित्यता का प्रतिपादन ६०६, धरणेन्द्र से महाघोषेन्द्र- पर्यन्त के त्रायस्त्रिशक देवों की नित्यता का निरूपण ६०७, शकेन्द्र से अच्युतेन्द्र तक के त्रायस्त्रिशकः कौन और कैसे ? ६०७, त्रायस्त्रिशक देव : किन देवनिकायों में ? ६०६ ।
पंचम उद्देशक अग्रमहिषी वर्णन ( सूत्र १ - ३५)
उपोद्घात : स्थविरों द्वारा पृच्छा ६१०, अपनी सुधर्मा सभा में चमरेन्द्र की मैथुननिमित्तक भोग की असमर्थता ६११, चमरेन्द्र के सोमादि लोकपालों का देवी - परिवार ६१२, बलीन्द्र एवं उसके लोकपालों का देवी-परिवार ६१४, धरणेन्द्र और उसके लोकपालों का देवी - परिवार ६१५, भूतानन्दादि भवनवासी इन्द्रों तथा उनके लोकपालों का देवी परिवार ६१६, व्यन्तरजातीय देवेन्द्रों के देवीपरिवार आदि का निरूपण ६१७, व्यंतरजातीय देवों के ८ प्रकार ६१९, इन आठों के प्रत्येक समूह के दो-दो इन्द्रों के नाम ६२०, चन्द्र सूर्य ग्रहों के देवी परिवार आदि का निरूपण ६२०, शकेन्द्र और उसके लोकपालों का देवी - परिवार ६२१, ईशानेन्द्र तथा उसके लोकपालों का देवी परिवार ६२२ ।
छठा उद्देशक - सभा ( सूत्र १-२ )
सूर्याभ के अतिदेशपूर्वक शकेन्द्र तथा उसकी सुधर्मा सभा आदि का वर्णन ६२४ । सात - चौतीस उद्देशक उत्तरवर्ती अन्तद्वप (सूत्र १)
उत्तरंदिशावर्ती अट्ठाईस अन्तर्द्वीप ( जीवाभिगमसूत्र के अनुसार ) ६२६ । ।। समाप्तिसूचक ।। |
61c6e2a88e3e71913d508883be2126905959f6ba | web | 1851 में अपनी बहन को लिखी चिट्ठी में उपन्यासकार जॉर्ज इलियट ने मलमल के कपड़ों पर अपनी राय जाहिर की थी.
उन्होंने लिखा था, "छींटदार कपड़े सबसे अच्छे हैं, लेकिन उसका असर चिंट्ज़ी होता है. " यह 'चिंट्ज़ी' शब्द का सबसे पहला इस्तेमाल था.
रॉयल ऑन्टोरियो म्यूजियम में चिंट्ज़ पर होने वाली प्रदर्शनी की क्यूरेटर सारा फ़ी को लगता है कि इलियट ने असली चिंट्ज़ की जगह इसके सस्ती नकल के बारे में लिखा था.
असली कपड़ा तो इतना शानदार था कि उसकी व्याख्या "आधुनिक विज्ञान भी नहीं कर सकता. "
"उस समय तक ब्रिटेन की कपड़ा मिलों ने दुनिया के बाजारों को चिंट्ज़ की सस्ती नकल से भर दिया था. विलासिता की पहचान रहे कपड़ों की सस्ती औद्योगिक नकल आम लोगों के लिए की गई थी. "
चिंट्ज़ कपड़े एक समय न सिर्फ़ बेशकीमती थे बल्कि उन्होंने फ़ैशन और डिजाइन में क्रांति लाने में भी मदद की थी. कई मामलों में उन्होंने इतिहास का रुख भी बदल दिया.
हार्वर्ड के इतिहासकार डॉक्टर स्वेन बेकर्ट के मुताबिक चिंट्ज़ की कहानी बहुत बड़ी और दुखद है. "यह सशस्त्र व्यापार, उपनिवेशवाद, गुलामी और देसी लोगों को बेदखल करने की कहानी है. "
बेकर्ट जिस कहानी का जिक्र करते हैं वह 15वीं सदी में शुरू हुई थी, लेकिन चिंट्ज़ का इतिहास उससे पहले का है.
अंग्रेजी का 'चिंट्ज़' शब्द हिंदी के 'छींट' शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है चित्तीदार. फ़ी ने अपनी किताब 'क्लॉथ दैट चेंज्ड द वर्ल्ड' में लिखा है- "हजारों साल पहले यह कपड़ा आधुनिक भारत और पाकिस्तान के इलाकों में बनाया गया. "
चिंट्ज़ के बारे में अधिकतर लोग जैसा सोचते हैं उसके उलट ज़रूरी नहीं कि यह चमकीला या फूल-पत्तेदार प्रिंट वाला कपड़ा हो.
सीधे शब्दों में कहें तो चिंट्ज़ सूती कपड़ा होता है, जिस पर रंगबंधकों (मोर्डेंट और रेसिस्ट) का इस्तेमाल किया जाता है ताकि कपड़े का रंग पक्का रहे.
समय के साथ, चिंट्ज़ का इस्तेमाल कई तरह के कपड़ों के लिए किया जाने लगा.
18वीं सदी में अंग्रेजी बोलने वाले लोग इसका इस्तेमाल मिलों में तैयार होने वाले प्रिंटेड सूती कपड़ों के लिए करने लगे.
19वीं सदी में फूल-पत्तेदार डिजाइन और चमक वाले कपड़ों को चिंट्ज़ कहा जाने लगा.
रॉयल ऑन्टोरियो म्यूजियम की एक और क्यूरेटर अलेंक्जांड्रा पामर का कहना है कि "महंगे भारतीय चिंट्ज़ चमकदार होते थे, उनमें एक कड़क अहसास होता था. "
चमक हो या न हो, मूल रूप से चिंट्ज़ कपड़े मोर्डेंट, रेसिस्ट और रंजकों के इस्तेमाल से तैयार होते थे.
छपाई के जटिल पैटर्न दो तरीकों से तैयार किए जाते थे. ये दोनों हाथ से किए जाते थे. एक तरीका था लकड़ी के ब्लॉक से छपाई और दूसरा कलमकारी.
भारत सदियों से चिंट्ज़ का उत्पादन और निर्यात करता था.
लेकिन 1498 में जब पुर्तगाली समुद्रयात्री वास्को डि गामा भारत के कालीकट पहुंचे तब भारतीय चिंट्ज़ ने दुनिया में हलचल मचानी शुरू कर दी.
वास्को डि गामा से पहले क्रिस्टोफर कोलंबस ने कई साल तक भारत खोजने की नाकाम कोशिश की थी.
बेकर्ट कहते हैं, "वास्को डि गामा पुर्तगाल लौटे तो अपने साथ न सिर्फ़ बेशकीमती मसाले लेकर पहुंचे बल्कि उनके पास भारत के कुछ शानदार सूती कपड़े भी थे. "
"यह उस व्यापार की शुरुआत थी जो बाद में हिंसक हो गई और जिस पर अधिकार के लिए 100 साल बाद यूरोपीय देशों में ईस्ट इंडिया कंपनियों का गठन हुआ. "
वास्को डि गामा के पुर्तगाल लौटने के बाद यूरोपीय व्यापारियों ने हिंद महासागर क्षेत्र में कपड़ों का निर्यात शुरू किया.
लेकिन उनको ज़ल्द ही पता चल गया कि उनके ऊन और लिनेन कपड़ों की यहां पूछ नहीं है. फिर उन्होंने भारतीय चिंट्ज़ कपड़ों की ओर रुख किया.
उन्होंने पहले भारतीय चिंट्ज़ का व्यापार इसी क्षेत्र में करना शुरू किया, फिर उन्होंने यूरोपीय बाजारों पर भी नज़र गड़ाई.
उनको लगा कि मुनाफा घर में भी कमाया जा सकता है. कपड़े के व्यापार में पहले वे अरब और तुर्की व्यापारियों पर निर्भर थे.
मगर ज़ल्द ही वे उन बिचौलियों से उकताने लगे और समुद्र के रास्ते सीधे भारत से कारोबार करने का रास्ता तलाश लिया.
उनकी कोशिश कामयाब रही. 15वीं सदी में शुरू किया गया उनका चिंट्ज़ का कारोबार 'कैलिको क्रेज' में बदल गया तो 17वीं सदी में चरम तक पहुंच गया.
भारत से इंग्लैंड जानेवाले सूती कपड़ों को कालीकट के नाम पर 'कैलिको' कहा गया. बाद में साधारण बुनावट के सफ़ेद सूती कपड़ों को भी कैलिको कहा जाने लगा.
फ़ैशन जगत में पहुंचने से पहले चिंट्ज़ का इस्तेमाल आंतरिक सज्जा में होता था.
फ़ी के मुताबिक यूरोप में भारतीय चिंट्ज़ अभिजात वर्ग के घरों में इस्तेमाल होते थे, ख़ासकर छोटी बैठक और रंगीन कालीनों वाले बेडरूम में.
इनसे दीवारों और बिस्तरों को कवर किया जाता था.
विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम की सीनियर क्यूरेटर डॉ. रोजमेरी क्रिल के मुताबिक चिंट्ज़ को मुख्य तौर पर "महिलाओं का और अनौपचारिक" कपड़ा माना जाता था.
1625 तक यूरोप में जो चिंट्ज़ लाए जाते रहे वे मोहक डिजाइन वाले होते थे.
उन पर छपे चित्रों में फूल वाले पौधों की प्रमुखता होती थी जिनके बारे में क्रिल ने लिखा है कि वे "यूरोप में भारतीय कपड़ा व्यापार के प्रतीक" थे.
भारत और आसपास के इलाकों में खपत के लिए बनाए जाने वाले चिंट्ज़ रंगीन पृष्ठभूमि वाले होते थे, जबकि यूरोप भेजे जाने वाले कपड़े ज़्यादातर सफ़ेद होते थे.
उस दौर मे चीन के चीनी मिट्टी के बर्तन भी लोकप्रिय थे.
क्रिल लिखती हैं कि सफ़ेद रंग स्वास्थ्य, स्वच्छता और पवित्रता के बारे में नये सामाजिक-सांस्कृतिक नज़रिये को भी दिखाता था- ये सभी विलासिता का संकेत देते थे.
17वीं सदी के मध्य से चिंट्ज़ का इस्तेमाल पहनने के कपड़े बनाने में होने लगा.
1625 से यूरोपीय व्यापारियों ने भारतीय कलाकारों को यूरोपीय सौंदर्यबोध के हिसाब से डिजाइन बनाने के निर्देश देने शुरू कर दिए.
चिंट्ज़ को ड्रेस फैब्रिक के रूप में सभी देशों में एक तरह से नहीं अपनाया गया. फ्रांस में सबसे पहले अभिजात वर्ग ने इसकी मांग की.
लेकिन इंग्लैंड और स्पेन में कुलीन वर्ग ने 1670 के दशक के बाद इसे पहनना शुरू किया. फ़ी कहती हैं, "कामकाजी महिलाओं ने कई दशक पहले इसे अपना लिया था. "
पूरे यूरोप में सभी वर्गों के लोग- पुरुष और महिलाएं दोनों- इसे पहन सकते थे इसलिए भारतीय चिंट्ज़ को मास फ़ैशन का पहला कपड़ा माना जाता है.
"आम लोगों के लिए रेशम पहनने के नियम थे, लेकिन सूती के बारे में कोई नियम नहीं थे. "
कैलिको क्रेज से यूरोप के चिंट्ज़ आयातकों को भारी मुनाफा हो रहा था, लेकिन यूरोप के स्थानीय कपड़ा व्यापारी इससे ख़ुश नहीं थे.
फ़ी लिखती हैं, "सिल्क, लिनेन, जूट और ऊन के जमे-जमाए उत्पादकों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया और 'गैर-ईसाइयों' के हाथों से बने 'भद्दे और चितकबरे' सूती कपड़ों के ख़िलाफ़ दंगे भी किए. "
घरेलू व्यापार की रक्षा के लिए फ्रांस में 1686 से 1759 के बीच चिंट्ज़ को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया.
ब्रिटेन में 1700 से 1774 के बीच इस पर आंशिक पाबंदी लगाई गई थी.
स्पेन, वेनिस, प्रशिया और ऑटोमन साम्राज्य में भी चिंट्ज़ और अन्य एशियाई कपड़ों के आयात और इस्तेमाल के बारे में कई आदेश निकाले गए.
लेकिन देश-निकाला का ख़तरा उठाकर भी व्यापारियों ने यूरोप में चिंट्ज़ की तस्करी जारी रखी और लोग बड़े पैमाने पर इसे पहनते रहे.
1700 के दशक में यूरोपीय उत्पादकों ने घरेलू स्तर पर चिंट्ज़ की नकल करना शुरू किया. इससे तकनीकी तौर पर कई सुधारों की शुरुआत हुई.
ब्रिटेन यूरोप में कपड़ों का मुख्य प्रिंटर बन गया. लेकिन उस समय तक ब्रिटेन सूती कपड़ों की आपूर्ति के लिए काफी हद तक भारतीय उत्पादकों पर निर्भर था.
ब्रिटिश व्यापारी नहीं चाहते थे कि उनके मुनाफे को कोई और ले जाए. बदकिस्मती से उन्होंने समस्या का जो हल निकाला उसके विनाशकारी नतीजे हुए.
अमरीका ने कपास की ऐसी किस्में विकसित की थी जो ठंड सह सकती थी और मशीनों के उपयुक्त थी.
वहां इसकी दोहरी त्रासदी हुई- दासता और स्वदेशी अमरीकियों का विस्थापन.
इस कपास की खेती के लिए ब्रिटिश (और अन्य यूरोपीय) उत्पादकों ने पश्चिमी अफ्रीका के गुलामों को काम पर लगाया.
जिसे उन्होंने यूरोपीय और भारतीय सूती के बदले में खरीदा था. फ़ी के मुताबिक यह देशी अमरीकी आबादी का राज्य-प्रायोजित निष्कासन के साथ हो रहा था.
इन अनैतिक तरीकों के साथ-साथ ब्रिटिश व्यापारियों ने 1770 से 1830 के बीच नई तकनीक को भी अपनाया.
फ़ी के शब्दों में अंग्रेज व्यापारियों ने दुनिया की पहली बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगाईं और मिल शहर बसाए.
बेकर्ट ने अपनी किताब 'एम्पायर ऑफ़ कॉटन' में लिखा है कि यह "बड़ी औद्योगिक क्रांति का लॉन्च पैड" बना.
1776 में अमरीका में आज़ादी की घोषणा के बाद पश्चिम में चिंट्ज़ की किस्मत ढलने लगी. ब्रिटेन ने अपने मशीनी चिंट्ज़ के लिए अमरीका का बाजार खो दिया.
19वीं सदी में यूरोपीय फ़ैशन के आदर्श भी बदले और रंग-बिरंगे कपड़े स्टाइल से बाहर हो गए.
इसके अलावा, 1800 के दशक के मध्य में ब्रिटेन के कला और शिल्प आंदोलन ने औद्योगिक उत्पादों को नकारने और हस्तशिल्प और पूर्वी (भारतीय सहित) डिजाइनों को अपनाने पर जोर दिया.
लेकिन आंतरिक साज-सज्जा में चिंट्ज़ की मांग बनी रही, ब्रिटेन में भी और ब्रिटेन के पूर्वी उपनिवेशों में भी.
ईरान जैसे देशों में इसकी मांग बढ़ रही थी, जो भारत के प्रमुख बाजारों में से एक था.
पश्चिमी फ़ैशन से चिंट्ज़ 19वीं सदी में ही बाहर निकल गया था, लेकिन तब से उसने कई बार वापसी की है. इनमें सबसे प्रमुख है 1960 के दशक का हिप्पी फ़ैशन.
1980 के दशक में दिवंगत मारियो बुएटा (प्रिंस ऑफ़ चिंट्ज़) जैसे आंतरिक सज्जाकारों और लॉरा एश्ले जैसे ब्रांड ने इसका खूब प्रयोग किया और इसे लोकप्रिय बना दिया.
मगर आइकिया ने 1996 के अपने प्रभावशाली 'चक आउट योर चिंट्ज़' अभियान से इसे पीछे धकेल दिया.
असली चिंट्ज़ की सस्ती ब्रिटिश नकल के लिए जॉर्ज इलियट ने 'चिंट्जी' शब्द दिया तो फूल-पत्तेदार डिजाइन की सभी चीज़ों के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा.
फ़ी का कहना है कि इसमें "दादी मां के पर्दे" जैसा अहसास था, हालांकि कई लोग इससे अलग राय रखते हैं.
विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम की क्यूरेटर दिव्या पटेल के मुताबिक भारत में समकालीन डिजाइनर जैसे सूफियान खत्री और राजेश प्रताप सिंह चिंट्ज़ और अन्य देसी कपड़ों का प्रयोग करते हैं.
इसी तरह नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी की एलुनेड एडवर्ड्स का कहना है कि इंडिया फ़ैशन वीक के कैटवॉक में, खुदरा दुकानों और शहरों के मॉल में भारतीय चिंट्ज़ की किस्में, जैसे अजरख, दिखती हैं.
उन चमकते सितारों की कहानी जिन्हें दुनिया अभी और देखना और सुनना चाहती थी.
चिंट्ज़ को अपने मूल स्थान पर ही नहीं सराहा जा रहा, 2010 से पश्चिमी डिजाइनर जैसे एलेक्जेंडर मैकक्वीन, सारा बर्टन, रिचर्ड क्विन, एर्डेम मोरालिओलू और मलबरी के जॉनी कोका भी चिंट्ज़ का इस्तेमाल कर रहे हैं.
केथ किडस्टन और बेट्सी जॉनसन जैसी डिजाइनर दशकों से चिंट्ज़ का इस्तेमाल कर रही हैं और उससे प्रेरित हैं.
किडस्टन कहती हैं, "मैं चिंट्ज़ से हमेशा प्रभावित रही हूं. छपाई और चित्रकारी के मामले में ये अद्भुत कपड़े हैं. इनमें विविधता बहुत है. "
इसी तरह जॉनसन कहती हैं, "चिंट्ज़ पैटर्न और चिंट्ज़ का पूरा लुक पिछले 35 साल से मेरे काम का मुख्य आधार है. मैं हमेशा उस बगिया में होने का अहसास पसंद करती हूं जो चिंट्ज़ आपको देते हैं. "
2010 के दशक में वोग सहित कई प्रकाशनों ने चिंट्ज़ की वापसी के बारे में लिखा. 2018 में वोग ने लिखा कि "प्रिंट बड़े पैमाने पर वापस आया है. "
इसका सच होना अभी बाकी है. लेकिन इतिहास को देखकर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि चिंट्ज़ फ़ैशन से ख़त्म नहीं होने जा रहा.
बेट्सी जॉनसन कहती हैं, "घर की साज-सज्जा में और फ़ैशन में यह हमेशा आता-जाता रहेगा क्योंकि यह बहुत बढ़िया है. "
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016b9b22c591c4048499100ef7324b0b9fbc75824e99fecb69f386d3641431c5 | pdf | चौविसवाँ अध्याय जिले का शासन
"जिलाधीश जिले के शासन का केन्द्रविन्दु है; वह जनता और सरकार के बीच की कड़ी है ।"
नितान्त केन्द्रगत शासन का सबसे बड़ा दुगु रंग यह होता है कि सरकार जो काम करना चाहती है और उसके लिए जिन उपायों का वह अवलम्वन करना चाहती है, उन्हें जब दूर-दूर के गांवों में कार्यान्वित किया जाता है, तब काम की शक्ल योजना तथा अभीष्ट से बिलकुल हो भिन्न हो जाती है ।
- मा० द्वारका प्रसाद मिश्र राज्य के भाग - पिछले अध्यायों में राज्यों की शासन पद्धति का वर्णन किया गया है। ये राज्य बहुत बडे-बडे हैं । किसी-किसीका तो क्षेत्रफल एक एक लाख वर्ग मील से अधिक और जनसख्या कई-कई करोड है । इनके अधिकारी लोक-जीवन से दूर रहते हैं, उन्हें लोगों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूरी जानकारी नहीं होती । वे नीति सम्बन्धी बातों का ही विचार कर सकते हैं। उस नीति पर अमल कराने के लिए यह आवश्यक है कि राज्यो को छोटे-छोटे भागों में विभाजित किया जाय । ऐसा किये बिना उनका शासन अच्छी तरह नहीं हो सकता । वैसे भी विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह भावना फैल रही है कि देश की छोटी-छोटी इकाइयों को अधिक से अधिक उत्तरदायित्व सौंपा जाय । ग्रस्तु, भारत में खासकर शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक राज्य कई-कई हिस्सों में वंटा है ।
कमिश्नरियाँ -यहाँ मद्रास राज्य को छोड़कर प्रत्येक बढे राज्य में चार छः कमिश्नरियाँ हैं। कमिश्नरी के अफसर को कमिश्नर कहते हैं । वह शासन सम्बन्धी कोई कार्य स्वयं नहीं करता, केवल जिला अफसरों के काम की जॉच-पड़ताल करता है । जिलों से जो रिपोर्ट या पत्रादि राज्यसरकार के पास जाते हैं, वे सब कमिश्नरों के हाथ से गुजरते हैं । कमिश्नरों को म्युनिसपेलटियो का काम देखने-भालने के भी कुछ अधिकार हैं; परन्तु इनका विशेष सम्बन्ध मालगुजारी से रहता है, ये मालगुजारी के के बन्दोबस्त में परामर्श देते हैं, और विशेष दशा में उसे वसूल करने के कार्य हैं । ये माल के मुकदमों की अपील भी सुनते हैं ।
कमिश्नरिया विशेष उपयोगी नहीं समझी जातीं । इन्हें तोडने का विचार बहुत समय से है; अब इस दिशा में विशेष प्रयत्न होने की आशा है ।
जिले उनका क्षेत्रफल और जनसंख्या - प्रत्येक कमिश्नरी मे एक या अधिक जिले हैं । इस प्रकार किसी राज्य मे, खासकर 'ग' वर्ग के राज्यों मे एक-दो ही जिले हैं और किसी मे बहुत अधिक । उत्तर प्रदेश में तो जिलों की संख्या पचास से ऊपर है । यह संख्या समयसमय पर घटती चढ़ती रहती है। कभी मितव्ययिता के विचार से जिलो की सख्या घटाना आवश्यक समझा जाता है तो कभी कोई जिला शासन की दृष्टि से बहुत बडा मालूम होने पर उसका कुछ भाग अलग करके दूसरे जिले में मिला दिया जाता है, अथवा एक नया ही जिला बना दिया जाता है । पहले बताया जा चुका है कि पिछले दिनों में देशी रियासतों की स्थिति बदलने से राज्यो का पुनस्सगठन हुआ है; इस लिए कुछ स्थानों मे आवश्यकतानुसार जिलों की भी पुनर्रचना हो रही है ।
प्रत्येक जिले का औसत क्षेत्रफल चार हजार वर्गमील, तथा उसकी औसत मनुष्य संख्या नौ लाख है; कोई जिला छोटा होता है, कोई
बडा । इसी प्रकार किसी को चादी कम है, किसी की बहुत अधिक । जिलों की सीमा निश्चित करने मे प्रायः यह विचार रखा जाता है कि प्रत्येक जिले के शासक को मालगुजारी तथा प्रचन्धादि का काम बहुतकुछ समान ही करना पड़े ।
शासन-व्यवस्था में जिले का स्थान - राज्यों में शासन की इकाई जिला की है। शासन की कल जैसी एक जिले में चलती दिखलाई पड़ती है, वैसी ही प्रायः अन्य जिलों में भी है । जैसे अफसर एक जिले में काम करते हैं, वैसे ही दूसरों मे भी । जनता के कामकाज का मुख्य स्थान और लोक व्यवहार का केन्द्र जिला है । जो मनुष्य अन्य जिलों या राज्यो से कुछ सम्बन्ध नहीं रखते, उन्हें भी बहुधा अपने जिले के भिन्न-भिन्न स्थानो मे, शासन या न्याय सम्बन्धी कुछ न कुछ काम पढ जाता है। यहाँ के प्रबन्ध को देखकर जनसाधारण समस्त देश के राजप्रबन्ध का अनुमान किया करते हैं ।
जिलाधीश का महत्व - प्रत्येक जिला एक जिलाधीश के - - होता है। जिलाधीश जिले का 'कलेक्टर' भी होता है। कलेक्टर का अर्थ है, वसूल करनेवाला । उसका एक मुख्य कार्य मालगुजारी वसूल करना होने के कारण उसे साधारण बोलचाल में 'कलेक्टर' कहते हैं । ( पूर्वी पंजाब, वध और मध्यप्रदेश में वह डिप्टी कमिश्नर कहलाता है । )
जिले के लोगो के लिए जिलाधीश ही सरकार का प्रतिनिधि है । उच्च कर्मचारियों को वे भले ही न जानें, जिलाधीश से तो उन्हें काम पडता ही रहता है। इसी की योग्यता पर सरकार के नियमों से प्रजा का यथेष्ट लाभ होना अथवा न होना, निर्भर है; और, जैसा इसका बर्ताव रहता है, उसी से अधिकांश जन-समाज सरकार की नीति का अन्दाज
लगाते हैं । यह जो कार्य करता है, उसे सरकार का कार्य कहा जाता है;
इसकी कही हुई बात सरकार की कही हुई बात समझी जाती है। सरकार को बहुत-सी बातों का ज्ञान उतना या वैसा ही होता है, जैसा वह कराता है । इससे यह कहा जा सकता है कि वह सरकार का हाथ-मुह ही नहीं, खान भी है । यह तो स्पष्ट ही है कि वह जनता और सरकार के बीच की कड़ी है, वह एक की बात दूसरे के सामने रखता रहता है ।
जिलाधीश के अधिकार - जिले में, उसका वेतन तो विशेष ऊँचा नहीं होता, पर अधिकारों के विचार वही सब से बडा माना जाता है। पहले इस पद पर प्रायः आई० सी० एस० ( इंडयन सिविल सर्विस ) का सदस्य नियुक्त होता था, जिसके लिए इंगलैंड में शिक्षा दी जाती थी; कुछ दशा में प्रान्तीय सिविल सर्विस के अनुभवी व्यक्तियों को भी यह पद दिया जाता था । अब आई० ए० एस० ( इंडयन एडमिनिस्टूटिव सर्विस) के आदमी इस पद पर नियुक्त किए जाते हैं । इस विषय में विशेष आगे, सरकारी नौकरियों के प्रसंग में, लिखा जायगा । यहाँ यही कहना है कि उसका जिले में होनेवाले विविध प्रकार के कार्यों से सम्बन्ध होता है, और इस लिए उसे कई प्रकार के अधिकार होते हैं ।
राजस्व या माल सम्बन्धी अधिकार - जिलाधीश का एक मुख्य कार्य जिले का राजस्व एकत्र करना है। इस कार्य के प्रसंग मे उसका सम्बन्ध जिले के गांव-गांव की जनता से होता है; यहां तक कि वे उसे 'कलेक्टर... नाम से ही अधिक जानते है । 'कलेक्टर' का अर्थ है, एकत्र या वसूल करनेवाला । वह मालगुजारी घटा चढ़ा नहीं सकता; हॉ अकाल, महामारी आदि संकट के समय वह राज्य की सरकार से उसे घटाने का अनुरोध कर सकता है ।
मालगुजारी वसूल करने में कलेक्टर का सम्बन्ध किसानों से तथा उन सब लोगों से हो जाता है, जो किसी प्रकार खेती से सम्बन्धित हों । भारतवर्ष मे गांवो का और खेती का विस्तार ध्यान में लाने से कलेक्टर के इस
अधिकार क्षेत्र का सहज ही अनुमान हो सकता है। किसानों को तकावी देने का काम उसी के द्वारा किया जाता है। वह माल ( मालगुजारी) के बड़ेचड़े मामलों का फैसला करता है, और छोटे मामलों की अपील सुनता है ।
न्याय और शान्ति सम्बन्धी अधिकार - जिलाधीश की संयुक्त उपाधि 'कलेक्टर मजिस्ट्रेट उसके डनल कार्य की बोधक है। कलेक्टर की हैसियत से किए जानेवाले कार्यों का उल्लेख ऊपर किया गया है । जिला मजिस्ट्रेट की हैसियत से वह जिले भर की छोटी अदालतों का निरीक्षण करता है । उसे दर्जे की मजिस्ट्रेट के अधिकार होते हैं, जिनसे वह एक अपराध पर साधारणतः दो साल तक की कैद और एक हजार रुपए तक का जुर्माना कर सकता है। जिले की सब प्रकार की सुख-शान्ति का वही उत्तरदाता है । वह स्थानीय पुलिस का निरीक्षण भी करता है । पुलिस उसकी · श्राज्ञा मानती है। जलूसों की व्यवस्था और दंगो का दमन करने में वह पुलिस सुपरिटेन्डेन्ट की सलाह से काम करता है, और समय-समय पर आवश्यक आदेश जारी करता रहता है । वही पेट्रोल या बन्दूक ग्रादि का लाइसेन्स देता है ।
अन्य अधिकार - जैसा पहले कहा गया है, जिले में शासन सम्बन्धी कोई विभाग ऐसा नहीं है, जिसका जिलाधीश से सम्बन्ध न हो । चह सब का ही निरीक्षण या नियंत्रण करता है। उदाहरण के लिए स्था नीय श्रावकारी, स्टाम्प ड्यूटी, जिला-कोप आदि भी उसी के अधीन हैं। यद्यपि जिले में राज्य शासन के भिन्न-भिन्न विभागों के बडे-बड़े पदाधिकारी, अपने-अपने विभागों की देख-रेख के लिए रहते हैं - - जैसे पुलिस-सुपरिंटेन्डेन्ट, जेलों का सुपरिन्टेण्डेण्ट, स्कूल इन्स्पेक्टर, इन्जीनियर, सिविल सर्जन, जंगलों के चीफ कन्जरवेटर इत्यादि - तो भी इन सब विभागों की सुव्यवस्था का उत्तरदायित्व जिलाधीश पर है । प्रत्येक विभाग का प्रधान अपने कार्यों के लिए स्वतन्त्र होते हुए भी अपने ग्राप को उस से नीचे समझता है । जिलाधीश स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का भी निरीक्षण
जिले का साशन
करता है। जिला चोर्ड तथा म्युनिस्पेलटियां साधारणतया उसकी निगरानी में काम करती हैं। इस बात का निश्चय करने मे, कि कहाँ पुल, सड़क इत्यादि बनने चाहिए, कहाँ सफाई का प्रवन्ध होना चाहिए, तथा जिले के किन-किन भागों को स्थानीय स्वराज्य का अधिकार मिलना चाहिए, उसी की सम्मति प्रमाणिक मानी जाती है। जिले में जो भी प्रबन्ध ठीक न हो, उसका सुधार करना, औौर हरेक बात की रिपोर्ट उच्च कर्मचारियों के पास भेजना, उसी का कर्तव्य है। जिले की आन्तरिक दशा जानने तथा उसे सुधारने के विचार से उसे देहातों में दौरा करना होता है ।
इस प्रकार इतने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य उसके सुपुर्द हैं कि उसके लिए उन सब को स्वयं भली प्रकार चलाना दुस्तर है। इसलिए बहुत से काम उसके अधीन कर्मचारी ही कर डालते हैं, और वह उनके कागजों पर हस्ताक्षर कर देता है। हॉ, इससे उसकी जिम्मेवारी कम नहीं होती; जिले के शासन सम्बन्धी सत्र कार्य का उत्तरदाता वही होता है। आजकल सरकारी काम में कागजी कार्रवाई बहुत बढ़ गई है, इससे जिलाधीश को जनता की वास्तविक दशा जानने के लिए, उससे सीधे सम्पर्क में आने का अवकाश बहुत कम मिलता है । वह प्रायः अपने अधीन कर्मचारियों की रिपोर्ट या कुछ खास-खास लोगों की बातों के आधार पर ही अपनी राय कायम कर लेता है ।
जिलाधीश का प्रभाव - जिलाधीश को शासन-प्रबन्ध के
☼ आज कल खाने-पीने की चीजों का कंट्रोल ( नियंत्रण) और राशनिंग होने से, रोजमर्रा के काम की अनेक वस्तुओं का मूल्य निर्धारण तथा मकानों का नियंत्रण होने से सरकारी काम बहुत बढ़ा हुआ है; इसका स्वाभाविक परिणाम यह है कि जिलाधीश का अधिकार क्षेत्र बहुत बढ़ा हुआ है।
सम्बन्ध में कुछ स्वतंत्र अधिकार नहीं है, वह प्रान्तीय सरकार के आदेश - नुसार कार्य करनेवाला कर्मचारी है, तथापि जिले भर में उसका प्रभाव बहुत अधिक होता है । वह सत्र बड़े-वडे धनी प्रतिष्ठित व्यक्तियों के सीधे सम्पर्क में आता है; सेट, साहूकार, जमीदार या महन्त सत्र उसको प्रसन्न रखना चाहते हैं। बहुत से श्रादमी उसके नाम पर कुछ सार्वजनिक कार्य करने के इच्छुक रहते हैं। यदि उसमे लोक सेवा की अभिलाषा हो और उसका व्यक्तित्व ऊँचा हो तो वह उन्हें विविध हितकर योजनाओं के लिए प्रोत्साहन दे सकता है, और जिले के निवासियों की सामूहिक उन्नति करने में बहुत सफलता प्राप्त कर सकता है । इसके विपरीत, यदि उसे जनता पर दया आतंक जमाने की ही चिन्ता हो तो उसका प्रबन्धकाल जिले के लिए एक अभिशाप ही होगा ।
शासन और न्याय का पृथक्करण - पहले बताया जा चुका है कि जिलाधीश को शासन सम्बन्धी अधिकार भी हैं, और न्याय सम्बन्धी भी । वह अपने जिले की शान्ति का उत्तरदाता है, इसलिए पुलिस पर उसका नियंत्रण रहता है। पुलिस उसे इस बात की सूचना देती रहती है कि जिले में किस-किस व्यक्ति का व्यवहार या आचरण उसकी दृष्टि से है। जिस व्यक्ति को पुलिस अपराधी ख्याल करती है, उसकी गिरफ्तारी के लिए वह जिलाधीश की अनुमति ले सकती है, अथवा जिलाधीश चाहे तो वह भी किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करा सकता है । जब जिलाधीश ऐसे मुकदमो का फैसला करता है तो मानो वादी स्वयं ही न्यायाधीश बन जाता है। ऐसी दशा मे न्याय कार्य स्वतंत्रता पूर्वक न होना, पुलिस की बात रखने का प्रयत्न होनाभियुक्त के साथ अन्याय होना स्वाभाविक ही है। इसलिए यह आवश्यक है कि शासन और न्याय कार्य पृथक-पृथक हो, जिलाधीश या उसके सहायक या अधीन पदाधिकारियो को मजिस्ट्रेट के अधिकार न रहें । फौजदारी मुकदमों का फैसला ( दीवानी मुकदमो की तरह ) मुन्सफी की अदालतों |
b96ba186b9ecebeb7a6c4b51c539e5928b722968 | web | चुनाव आयोग द्वारा मध्य प्रदेश सहित चार अन्य राज्यों के लिए चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा कर दी गई है. मध्य प्रदेश की सभी 230 सीटों के लिए एक ही चरण में चुनाव होंगे. इसके लिए नामांकन दाखिल करने का आखिरी दिन 9 नवंबर है, 28 नवंबर को मतदान होगा और 11 दिसंबर को चुनाव के परिणाम घोषित किए जाएंगे.
चुनाव आयोग की घोषणा के बाद प्रदेश में आचार संहिता लग गई है और इसके साथ ही चुनावी सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं, लेकिन इन सबके बीच प्रदेश की सियासत में दो ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे राजनीतिक दल नए सिरे से अपनी रणनीति बनाने को मजबूर हुए हैं. एक तरफ जहां सवर्ण आंदोलन के दौरान उभरे संगठन सपाक्स ने राजनीति में उतरने का फैसला करते हुए सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, तो वहीं बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर पूरी तरह से विराम लगाते हुए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.
बसपा की इस घोषणा के साथ ही मध्य प्रदेश में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं. अभी तक जो परिदृश्य बन रहा है, उसके हिसाब से कांग्रेस और भाजपा के अलावा बसपा, आप, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और सपाक्स प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही हैं. आदिवासी संगठन जयस ने भी 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है.
अब यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि क्या सपाक्स और बसपा के ये फैसले मध्य प्रदेश में नए समीकरणों को जन्म देते हैं या फिर प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवीय ही बनी रहेगी. सपाक्स के चुनाव में उतरने से किसको ज्यादा नुकसान होगा और क्या बसपा के साथ गठबंधन न होने से कांग्रेस को सिर्फ नुकसान ही होगा?
बसपा की दग़ाबाज़ी या कांग्रेस ही पीछे हटी है?
मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद से कमलनाथ लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि प्रदेश में भाजपा को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों को एक साथ मिलकर चुनाव लड़ना होगा, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद ऐसा संभव नहीं हो पाया है. बीएसपी सुप्रीमो मायावती ऐलान कर चुकी हैं कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसपा का कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा और यहां वो अकेले ही चुनाव लड़ेगी. मायावती ने प्रदेश में कांग्रेस से समझौता न होने के लिए उसके वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया है.
उनका आरोप था कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो गठबंधन चाहते हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे नेता नहीं चाहते कि बीएसपी-कांग्रेस का गठबंधन होने पाए, क्योंकि वे भाजपा-आरएसएस के एजेंट हैं और वे केंद्र सरकार की सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों से डरते हैं. लेकिन दिग्विजय सिंह तो इस पूरे सीन में ही नहीं थे. बसपा के साथ गठबंधन की बात तो खुद कमलनाथ कर रहे थे और मायावती इससे पहले ही छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ समझौते के ऐलान के दौरान मध्य प्रदेश की 22 सीटों के लिए बसपा उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर चुकी थीं.
दरअसल, मायावती द्वारा कांग्रेस के साथ गठबंधन न होने की घोषणा दिग्विजय सिंह द्वारा दिए गए उस इंटरव्यू के बाद की गई थी, जिसमें उन्होंने संभावना जताते हुए कहा था कि मायावती केंद्र सरकार, सीबीआई और ईडी के दबाव में हैं, इसी वजह से गठबंधन नहीं हो पा रहा है. तो क्या कांग्रेस दिग्विजय सिंह के बयान के जरिए मायावती को वो मौका देना चाहती थी, जिससे उन्हें गठबंधन की सभी संभावनाओं पर एकतरफा विराम लगाने का मौका मिल सके?
जाहिर है दिग्विजय सिंह ने अपने इंटरव्यू के दौरान मायावती पर दबाव की बात कही थी, उसमें उनकी पार्टी की भी सहमति रही ही होगी. अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस पार्टी दिग्विजय सिंह के इस बयान से अपने आप को अलग भी कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, उल्टे दिग्विजय सिंह की तरफ से कहा गया कि राहुल गांधी हमारे नेता हैं और हम उनके निर्देश के अनुसार ही काम करते हैं.
दरअसल, मायावती और दिग्विजय सिंह की अदावत पुरानी है, ये दिग्विजय सिंह ही हैं, जिन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने दूसरे कार्यकाल में बसपा के कई विधायकों को तोड़ लिया था. बाद में जब वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रभारी बनाए गए तो वहां मायावती की सरकार थी. ऐसे में उनके निशाने पर मायावती और उनकी सरकार ही रहती थी, वे मायावती के खिलाफ खुलकर हमलावार रहते थे. ताज कॉरिडोर मामले को दिग्विजय सिंह ने बहुत जोर-शोर से उठाया था.
2009 के लोकसभा चुनाव में जब वे उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे, उस समय कांग्रेस वहां 21 सीटें हासिल कर दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि 20 सीटों के साथ बसपा तीसरे नंबर पर आ गई थी. ऐसे में कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह ही वो चेहरा थे, जिसे कांग्रेस सामने लाकर मायावती की तरफ से गठबंधन की संभावनाओं पर विराम लगा सकती थी और हुआ भी यही. मध्य प्रदेश में कांग्रेस का बसपा के साथ गठबंधन नहीं हो रहा है और इसके लिए मायावती जिम्मेदार ठहराई जा रही हैं. दिग्विजय ने मायावती द्वारा अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए इसका ठीकरा उनके ही सर पर डाल दिया है.
मायावती द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को खारिज करते हुए दिग्विजय ने कहा है कि मैं नरेंद्र मोदी, अमित शाह, बीजेपी और संघ का सबसे बड़ा आलोचक रहा हूं. मैं कांग्रेस और बीएसपी के बीच गठबंधन का समर्थक हूं. मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन उन्होंने पहले ही 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित करते हुए ऐलान कर दिया था कि उनकी पार्टी मध्य प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. ऐसे में कांग्रेस बीएसपी का गठबंधन न होने के लिए मैं जिम्मेदार कैसे हूं?
मायावती ने कांग्रेस के साथ गठबंधन न हो पाने का ठीकरा भले ही दिग्विजय सिंह पर फोड़ा हो या फिर इसके पीछे केंद्रीय एजेंसियों के दबाव की बात कही जा रही हो, लेकिन ऐसा लगता है कि मायावती खुद चाहती थीं कि विधानसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन न हो सके. दरअसल, उनकी नजर लोकसभा चुनाव पर है और इसी हिसाब से वे अपनी चाल चल रही हैं. अगर तीनों राज्यों में कांग्रेस मजबूत होकर उभरती है तो उनके लिए लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के साथ अपनी शर्तों पर मोलभाव करना आसान नहीं होगा, इसलिए वे चाहती हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत होकर उभर न सके. इसके बदले भले ही उनकी पार्टी को नुकसान उठाना पड़े.
ऐसे में उनके लिए राज्यों में कांग्रेस के बिना चुनाव लड़ना ज्यादा फायदे का सौदा लग रहा है. दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले वे कांग्रेस को जताना चाहती हैं कि अगर कांग्रेस ने उनसे तालमेल नहीं किया तो वो भाजपा को नहीं हरा पाएगी और यह तालमेल उनकी शर्तों पर ही होगा. यह सही भी है, अगर राज्यों के चुनाव में कांग्रेस पिछड़ी तो फिर उसे बसपा और अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ झुक कर उनकी शर्तों पर समझौता करना पड़ेगा.
दूसरा कारण, प्रदेश में दलित और सवर्ण आंदोलन के प्रभाव और इस दौरान उभरे सपाक्स के बाद परिस्थितियां बदली हैं, जिसमें मायावती को लग रहा है कि मध्य प्रदेश में बसपा के लिए स्थायी रूप से तीसरी ताकत के रूप में उभरने का सही मौका है. इसीलिए पिछले चुनाव में 2 सीटें जीतने के बाद भी वे कांग्रेस से 50 सीटों की मांग कर रही थीं. दरअसल, सूबे में जातीय राजनीति के उभार के बाद बसपा को लग रहा है कि उसकी एक दर्जन से अधिक सीटों पर संभावना मजबूत हुई है.
मध्य प्रदेश में बसपा का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है, अलग-अलग चुनावों के दौरान उसे 3. 5 से लेकर 8. 97 प्रतिशत मत मिलते रहे हैं. मध्य प्रदेश में वो कभी दलितों की पार्टी के तौर पर भी नहीं उभर पाई. 2013 के चुनाव में उसे 6. 29 प्रतिशत मत मिले थे और उसने जो चार सीटें जीती थीं, उनमें से अनुसूचित जाति वर्ग की केवल एक सीट थी. जबकि मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 35 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से 27 सीट भाजपा के खाते में गई थीं.
मायावती ने जिस तरह से दिग्विजय सिंह के सिर पर ठीकरा फोड़कर मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, उससे ऊपरी तौर पर यह कांग्रेस के लिए चिंता बढ़ाने वाला कदम लग सकता है. लेकिन कांग्रेस के पीछे हटने का प्रमुख कारण कांग्रेस का एक आंतरिक सर्वे भी बताया जा रहा है, जिसमें निकल कर आया था कि महागठबंधन के लिए कांग्रेस को दूसरे दलों के लिए करीब नब्बे सीटें छोड़नी पड़ती, अगर कांग्रेस ऐसा करती तो इसका कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश की राजनीति में दूरगामी असर पड़ता.
इससे मध्य प्रदेश में उसके पैर उखड़ जाते. गठबंधन के दौरान कांग्रेस पार्टी सहयोगी दलों के लिए अगर इतनी बड़ी संख्या में सीटें छोड़ती, तो इसका गलत संदेश तो जाता ही, साथ ही इन सीटों पर उसके कार्यकर्ता हमेशा के लिए भाजपा या अन्य दलों में जा सकते थे. तात्कालिक रूप से उसे कुछ फायदा जरूर हो जाता, लेकिन लॉन्ग टर्म में उसे जमीन खिसक जाने का खतरा था. इसीलिए कांग्रेस महागठबंधन से पीछे हट गई.
दरअसल, इससे पहले कांग्रेस उत्तर प्रदेश में ऐसी ही गलती दोहरा चुकी है, जिसके बाद से कांग्रेस वहां हाशिए पर पहुंच गई है. शायद इसीलिए कांग्रेस के रणनीतिकारों को एहसास हो चुका था कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस बसपा को वो सीटें दे देती, जहां उसे छह प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते हैं, तो फिर उन सीटों पर कांग्रेस अपने वोटरों को हमेशा के लिए खो सकती थी. कांग्रेस को एहसास हो चुका था कि महागठबंधन की कीमत पर इतनी बड़ी संख्या में दूसरी पार्टियों के लिए सीटें छोड़ने का सौदा उसके लिए आत्मघाती साबित होगा.
इसके बाद से कांग्रेस का जोर इस बात को लेकर था कि किसी भी तरह से महागठबंधन को खत्म करने का दोष बीएसपी पर मढ़ दिया जाए. मायावती के मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान पर कमलनाथ ने पलटवार करते हुए कहा कि गठबंधन न होने से कांग्रेस को कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि बसपा ने जो 50 सीटें मांगी थी, उनमें से 11 सीटों पर ही बसपा का प्रभाव है, जबकि उनमें से 14 सीटों पर कांग्रेस और 25 सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार जीतते आए हैं.
ऐसी सीटें अगर बसपा को दी जातीं, तो इसका फायदा बीजेपी को ही होता. गठबंधन न हो पाने के लिए मायावती द्वारा दिग्विजय सिंह को दोषी ठहराने को लेकर भी कमलनाथ का कहना था कि मायावती को कुछ न कुछ कहना था, लेकिन दिग्विजय पर आरोप लगाना सही नहीं है.
कांग्रेस के पीछे हटने का एक और कारण सवर्ण का भाजपा के खिलाफ गुस्सा भी है. प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 35 सीटों में से 28 पर भाजपा का कब्जा है. इस परिस्थिति में कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि बसपा के साथ गठबंधन न होने की दशा में सवर्ण मतदाता कांग्रेस के पक्ष में आ सकता है.
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए सेमीफाइनल की तरह हैं. इन तीनों राज्यों में देश की दोनों प्रमुख पार्टियां सीधे तौर पर आमने-सामने हैं. राजस्थान में हर पांच साल बाद सत्ता बदलने का चलन रहा है. लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा पिछले पंद्रह सालों से सत्ता में है.
इन तीनों राज्यों के चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए बहुत अहमियत रखते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने इन तीनों राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीटों में से 62 सीटों पर चुनाव जीता था. कांग्रेस के लिए तो यह एक तरह से अस्तित्व से जुड़ा हुआ मसला है और अगर वो इन तीनों राज्यों में से दो राज्य भी जीत लेती है, तो यह जीत उसके लिए लाइफ लाइन की तरह होगी, जिसके सहारे वो 2019 के आम चुनाव में नए जोश और तेवर के साथ उतरेगी.
इससे राहुल गांधी के विपक्ष में चेहरे के तौर पर स्वीकार्यता भी बढ़ेगी. लेकिन अगर कांग्रेस तीनों राज्य हार जाती है, तो फिर उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाएगा और उसे दूसरी पार्टियों के साथ झुक कर समझौता करने को मजबूर होना पड़ेगा. ऐसे में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की एकला चलो नीति बहुत सोच-समझ कर उठाया गया कदम है. हालांकि यह एक जोखिम भरा फैसला है, लेकिन इसका विकल्प ज्यादा घातक हो सकता था.
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faa38750b6d67f1b45be0e873e83421e2b2a9ecb | web | कभी-कभी जब गोला-बारूद की चर्चा होती है, विशेष रूप से, कारतूस, तो यह दावा किया जा सकता है कि कैप्सूल में इस्तेमाल किया जाने वाला लेड एज़ाइड, पारा फुलमिनेट की तुलना में अधिक शक्तिशाली और आधुनिक आरंभ करने वाला विस्फोटक है, आमतौर पर विस्फोटक पारा के रूप में। आमतौर पर इसे संदेह से परे सच्चाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
हालांकि, जब दोनों प्रकार के विस्फोटकों के गुणों की तुलना की जाती है, तो यह देखा जाता है कि एज़ाइड के लिए संकेतक विस्फोटक पारा की तुलना में कुछ कम हैं। लेड एज़ाइड के लिए, विस्फोट की गर्मी 1,6 एमजे / किग्रा है, विस्फोटक पारा के लिए - 1,8 एमजे / किग्रा, लीड एज़ाइड के लिए गैस की मात्रा 308 लीटर / किग्रा, विस्फोटक पारा के लिए - 315 लीटर / किग्रा, लीड एज़ाइड के लिए निरोध वेग घनत्व के आधार पर, विस्फोटक पारा के लिए 4630 से 5180 मी / से भिन्न होता है - 5400 मीटर / से। विस्फोटक पारा सदमे के लिए अधिक संवेदनशील है, और विस्फोटक समान है। सामान्य तौर पर, विस्फोटक पारे में कुछ लाभ के साथ, पदार्थ एक दूसरे से तुलनीय होते हैं।
इसके अलावा, सीसा azide, सुई की तरह क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया है, पाउडर विस्फोटक पारा की तुलना में बहुत कम प्रवाह क्षमता और संपीड़ितता है, और यह कैप्सूल चार्ज के लिए मिश्रण की सटीक संरचना के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, टीएनटी को हटाने के लिए 0,36 ग्राम पारा की आवश्यकता होती है, और लीड एजेड के लिए 0,09 ग्राम की आवश्यकता होती है। इन पदार्थों के अपने फायदे और नुकसान हैं।
प्रतिस्थापन का कारण स्पष्ट रूप से अलग था और सैन्य-आर्थिक विचारों में निहित था। पारा प्राप्त करना मुश्किल है, और यह हर जगह प्राप्त नहीं किया जा सकता है, जबकि सीसा हजारों की मात्रा में निकाला जाता है और यहां तक कि हजारों टन भी। लीड एज़ाइड बनाना आसान है।
लीड azide, जैसा कि आप अनुमान लगा सकते हैं, जर्मनी में दिखाई दिया। यह पहली बार 1891 में जर्मन रसायनज्ञ थियोडोर कर्टियस द्वारा प्राप्त किया गया था। सेना ने जल्दी से इस खोज पर ध्यान आकर्षित किया, और पहले से ही 1907 में जर्मनी में लीड एज़ाइड के साथ पहला आरंभ करने का आरोप लगाया गया था। 1910 में, विस्फोटक के राइन-वेस्टफेलियन ज्वाइंट-स्टॉक कंपनी ने डेटोनेटर कैप के लिए लेड एज़ाइड, नाइट्रोजन सल्फाइड और डायज़ोलबेनज़ीन नाइट्रेट के मिश्रण का पेटेंट कराया।
फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और अन्य देशों में भी लीड एज़ाइड पर काम किया गया है। वैसे, रूस में, लीड एजेड का अध्ययन किया गया था, लेकिन यह व्यापक उपयोग में नहीं गया, क्योंकि रूस में बहुत अधिक पारा था। ट्रांसबाइकलिया में XVIII सदी में इसका उत्पादन शुरू हुआ। 1879 में, यूक्रेन में निकितोस्कोवाय जमा की खोज की गई थी, 1887 में धातु पारा का उत्पादन शुरू हुआ। 1887 से 1913 तक, लगभग 6762 टन पारा निकाला गया था, जिसमें से 5145 टन निर्यात किया गया था, जो औसत वार्षिक उत्पादन 260 टन और 197 टन का निर्यात करता है। इसके अलावा, सिनेबार और पारा का आयात भी हुआ, 1913 में 56 टन सिनबर और 168 टन पारा। यह आयात और निर्यात का एक जिज्ञासु खेत था, सबसे अधिक संभावना है, विदेशों में प्राथमिक पारा परिष्कृत किया गया था। सामान्य तौर पर, विस्फोटक पारा के उत्पादन के लिए पर्याप्त कच्चा माल था, और लीड एजेड के लिए कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी।
जर्मनी में पारे के नुकसान की संभावना के कारण, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भी लीड एज़ाइड का उत्पादन किया गया था और इसका उपयोग किया गया था। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि हर जगह और हर जगह लीड एज़ाइड के साथ विस्फोटक पारा का प्रतिस्थापन अच्छा था। उदाहरण के लिए, एंटी-एयरक्राफ्ट गन के लिए गोले में, एज़ाइड के कारण बैरल में बार-बार विस्फोट होते हैं। मार्च 1918 में, पश्चिमी मोर्चे पर, बैरल में शेल विस्फोटों से 43% एंटी-एयरक्राफ्ट गन को निष्क्रिय कर दिया गया था। कारण यह था कि लीड एज़ाइड निर्माण तकनीक को बदल दिया गया था, और यह झटके के लिए इतना संवेदनशील हो गया कि इसे निकाल दिया गया। जर्मनों को एंटी-एयरक्राफ्ट गन के लिए गोले के पूरे स्टॉक को बदलने के लिए मजबूर किया गया था।
युद्ध समाप्त होने के बाद, जब दुनिया का पारा बाजार गिर गया, तो 2100 में उत्पादन घटकर 1923 टन हो गया (1913 में 4000 टन था), सीसा ऑक्साइड का उत्पादन शुरू हुआ। कोयला खदानों को अब डेटोनेटर की जरूरत थी, और खनन के लिए सस्ता। राइन-वेस्टफेलियन सोसायटी ने इस पदार्थ का एक बहुत बड़ा उत्पादन स्थापित किया। 1932 तक ट्राइसॉर्फ की एक फैक्ट्री ने 750 टन लेड एज़ाइड का उत्पादन किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जर्मनी ने एजाइड का नेतृत्व करने के लिए ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि युद्ध की शुरुआत तक जर्मनी में सबसे अधिक पारा उत्पादक थेः स्पेन और इटली। विशेष रूप से इटली, जिसे जर्मन उपकरण और जर्मन कोयले की सख्त जरूरत थी। 1938 में, इटली ने 3300 टन पारा का उत्पादन किया, जो सभी कल्पनाशील जरूरतों के लिए पर्याप्त होगा। वैसे, पूर्व ऑस्ट्रियाई पारा खदान इतालवी लोगों के कब्जे वाले स्लोवेनियाई क्षेत्र में समाप्त हो गया और इटली के वेनिस-जूलिया क्षेत्र में शामिल हो गया।
जहाँ तक एक न्यायाधीश कर सकता है, नाजी जर्मनी के युद्ध में लीड एजाइड ने थोड़ी अलग भूमिका निभाई। इसका उपयोग, विशेष रूप से लेड ट्रिनिट्रोरसोरिनेट के साथ मिश्रण में, फ़्यूज़ के उत्पादन पर दुर्लभ तांबे की खपत को बचाने के लिए अनुमति दी गई है। कॉपर के साथ लीड एज़ाइड एक बहुत अस्थिर बनाता है और तांबा एज़ाइड के सहज विस्फोट की संभावना है, इसलिए फ़्यूज़ एल्यूमीनियम से बने थे। दूसरी ओर, रैटलस्नेक को तांबे की ट्यूब की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह एल्यूमीनियम के साथ एक मिश्रण बनाती है। दसियों के उत्पादन पैमाने पर और सैकड़ों-लाखों की संख्या में गोला-बारूद, एल्यूमीनियम के साथ तांबे की जगह बहुत ठोस बचत हुई।
पारे को खोने का क्या मतलब है?
29 अक्टूबर, 1941 को एक तबाही हुई - जर्मन ने यूक्रेन में गोरलोवका पर कब्जा कर लिया। इसके आगे निकितोवका था, जहां यूएसएसआर में एकमात्र पारा खनन और गलाने का संयंत्र था। 1940 में, इसने 361 टन पारा का उत्पादन किया, और जनवरी-सितंबर 1941 में - 372 टन। संयंत्र तकनीकी रूप से उन्नत था (यहां तक कि जर्मनों ने उल्लेख किया), बहुत कम पारा सामग्री के साथ संसाधित अयस्क। सच है, उन्होंने पारा के लिए देश की सभी जरूरतों को कवर नहीं किया, जो 750-800 टन तक पहुंच गया, और युद्ध से पहले यूएसएसआर ने विदेशों में पारा खरीदा, मुख्य रूप से इटली में।
अब सभी स्रोत गायब हो गए हैं। इस बीच, यूएसएसआर के गैर-लौह धातुकर्म के पीपुल्स कमिश्रिएट के ग्लेव्रेडमेट के अनुसार, सैन्य कमिशारियों के लिए 4 की चौथी तिमाही में खपत 1941 टन (गोला-बारूद के कमिशिएट सहित) - 70 टन थी और नागरिक कमिसारियों के लिए - 30 टन (आरजीएई, एफ 69)। 7794, डी। 5, एल। 230)। अकेले गोला बारूद के उत्पादन में वार्षिक अनुमानित खपत 36 टन थी; प्रति वर्ष कुल सैन्य खपत - 120 टन, कुल - 280 टन।
बेशक, सभी संभव पारा सैन्य उद्योग के लिए भेजा गया था, प्रयोगशालाओं और नागरिक उद्यमों में पारा की जब्ती तक। उन्हें पारा स्विच के लिए और समामेलन द्वारा सोने के खनन के लिए चुना गया था।
निकितोव्स्की मर्करी प्लांट के उपकरण और श्रमिकों को जल्दबाजी में किर्गिस्तान के लिए स्थानांतरित कर दिया गया था, जिसे खदीरकान खनन क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया था, जो 1930 के दशक में शुरू हुआ था। यह पारा और सुरमा के साथ मिश्रित फ्लोरस्पार का एक बड़ा भंडार है। वहां, नए पारा संयंत्र को पहले से मौजूद पायलट उत्पादन के आधार पर त्वरित गति से बनाया गया था। १ ९ ४१ में, खदीरकान ने ११. ६ टन पारा दिया, और १ ९ ४२ की योजना ३०० टन की निर्धारित की गई। इतना, निश्चित रूप से, नया संयंत्र पिघला नहीं। यहां तक कि 1941 में पारे के गलाने की मात्रा 11,6 टन थी। लेकिन फिर भी, 1942-300 में, सबसे कठिन अवधि के दौरान, खदिरकान का पारा जीवित रहने की अनुमति दी। और वहां सहयोगी पहले से ही मदद कर रहे हैं (1945 जनवरी, 193,7 से पहले लेंड-लीज ने 1942 टन पारा पहुंचाया), और 1943 सितंबर, 1 को गोरलोवका को मुक्त कर दिया गया था, और नॉन-फेरस धातुकर्म के यूएसएसआर पीपुल्स कमिश्रिएट के विशेषज्ञों ने निकितोव्का को रवाना किया।
पारा उत्पादन पर डेटा एक बहुत ही दिलचस्प अभिलेखीय खोज था, जो हमें यह कहने की अनुमति देता है कि गोला बारूद की तीव्र कमी, विशेष रूप से तोपखाने के गोले, जो 1941 के अंत से और लगभग 1943 के वसंत में नोट किया गया था, न केवल जुड़ा हुआ था और न ही उद्योग के स्थानांतरण के साथ इतना तीव्र था। विस्फोटक पारे के उत्पादन के लिए कच्चे माल की कमी।
इन शर्तों के तहत, एज़ाइड का, ज़ाहिर है, विस्फोटक पारे के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाना था। इस बारे में केवल जानकारी के बारे में जानकारी प्राप्त करने वाले कोलिमा में सोने की तरह प्राप्त करना होता है। उदाहरण के लिए, इस बात का सबूत है कि कारखाने का नाम 5 है। द्वितीय लेनिनग्राद में लेप्स (जिसे ओक्टा शिपयार्ड के रूप में भी जाना जाता है) में समुद्री तोपखाने के लिए शेल उत्पादन होता था, और इसके साथ एक लीड एज़ाइड उत्पादन कार्यशाला थी। क्योंकि यह कार्यशाला एक अलग संयंत्र में शेल उत्पादन के आवंटन के संबंध में बंद थी। सितंबर 1941 में, संयंत्र का हिस्सा खाली कर दिया गया था, लेकिन लेनिनग्राद में हथियारों और गोला-बारूद के उत्पादन के विस्तार के संबंध में, पूर्व कार्यशाला को याद किया गया और बहाल किया गया।
जाहिर है, सोवियत नेतृत्व ने निकितोव्स्की पारा संयंत्र के नुकसान के महाकाव्य से सबक सीखा और युद्ध के बाद पारा उद्योग पर सबसे गंभीर ध्यान दियाः यह वृद्धि पर चला गया। 1980 के दशक के प्रारंभ में यूएसएसआर में प्राथमिक पारे की निकासी प्रति वर्ष लगभग 1900-2200 टन थी, और 1966 में एक विशेष डिक्री जारी की गई थी जो सभी पारा युक्त कचरे को प्रसंस्करण के लिए निकितोस्कॉवन कॉम्बिनेशन में भेजने के लिए बाध्य करती थी। संयंत्र को प्रति वर्ष लगभग 400 टन का द्वितीयक पारा मिला। 1980 के दशक में घरेलू पारा की खपत 1000 से 1250 टन प्रति वर्ष (यहां तक कि 1985 में 1307 टन) थी, निर्यात प्रति वर्ष 300-450 टन तक था, और शेष का भंडार था।
घरेलू खपत का लगभग 20% सैन्य जरूरतों के लिए गया, जिसमें विस्फोटक पारा का उत्पादन शामिल है, यानी प्रति वर्ष 200 से 250 टन। और लगभग 500-600 टन पारा प्रति वर्ष रिजर्व में संग्रहीत किया गया था, जाहिरा तौर पर एक प्रमुख युद्ध के मामले में, सैन्य जरूरतों के लिए भी। सिद्धांत रूप में, एक गोदाम में 1000-1500 टन पारा दो या तीन साल के युद्ध के लिए गोला-बारूद के उत्पादन की आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है।
लीड azide इसके अभाव में विस्फोटक पारा का एक विकल्प है। लेड एजिड का मौजूदा प्रचलन इस तथ्य के कारण है कि पारा उत्पादन में तेजी से गिरावट आई है। 1970 के दशक में, वैश्विक प्राथमिक पारा बाजार लगभग 10 हजार टन प्रति वर्ष था, अब उत्पादन लगभग 3 हजार टन प्रति वर्ष हो गया है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि पारे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपरिवर्तनीय रूप से खपत होता है। उसी समय, बुध पर मिनमाता कन्वेंशन पर अक्टूबर 2013 में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसका उद्देश्य पारा के उपयोग को कम करना और 2020 से पारा स्विच, लैंप, थर्मामीटर और दबाव मापने वाले उपकरणों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाना है।
गिरते पारे के उत्पादन के बीच, स्टॉकपिल्स की बिक्री (रूस ने भी 1990 के दशक में अपने पारा स्टॉक की बिक्री की) और पारा उत्पादन में और भी अधिक गिरावट की संभावना है, निश्चित रूप से, लीड एजेड का प्रसार आश्चर्यजनक नहीं है। यदि संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक पारा उद्योग का गला घोंटने का फैसला किया है, तो लोकतंत्र के लिए या इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी जानी चाहिए, और विस्फोटक पारा लीड एज़ाइड की जगह लेगा।
- लेखकः
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b5e5bbeebb55df25885c2aa4e731afec7d536f19 | web | appendix in Hindi अपेंडिक्स (appendix) को एक अवशेष या अनुपयोगी अंग के रूप में जाना जाता है। कुछ अवधारणाओं के अनुसार इस अंग का मानव शरीर में कोई विशेष कार्य नहीं होता है। तथा इसे सर्जरी के दौरान हटाया जा सकता है। परन्तु कुछ विशेषज्ञ का मानना है कि अपेंडिक्स कुछ अच्छे बैक्टीरिया को स्टोर करने का कार्य करता है, तथा प्रतिरक्षा प्रणाली को स्वस्थ्य रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चूँकि यह अंग जठरांत्र-नली (gastrointestinal tract) का भाग है। यह मानव शरीर में कुछ विशेष कार्य नहीं करता, परन्तु यह विभिन्न समास्याओं का उत्पन्न कर सकता है।
अतः अपेंडिक्स में उत्पन्न समस्याएँ जैसे- अपेंडिसाइटिस (appendicitis), गंभीर पेट दर्द के साथ जीवन के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती हैं। अपेंडिक्स रोग का इलाज करने के लिए इसकी उपचार प्रक्रिया में सर्जरी और शल्य चिकित्सा को शामिल किया जा सकता है। इस अंग को उपचार के दौरान हटाया भी जा सकता है। अतः आज के लेख में आप जानेंगे कि अपेंडिक्स (appendix) क्या है, इसके कार्य क्या हैं, बीमारी, निदान, उपचार और रोकथाम उपाय के बारे में।
अपेंडिक्स (appendix) मनुष्यों के निचले पेट के दाएं तरफ में पाई जाने वली एक पतली ट्यूब होती है। यह छोटी आंत और बड़ी आंत के मिलने वाले स्थान (जंक्शन) के पास स्थिति होती है। यह लगभग 4 इंच लम्बी ट्यूब है। इस ट्यूब का एक छोर बंद और दूसरी छोर बड़ी आंत से जुड़ा होता है,
चूँकि अपेंडिक्स (appendix) का कार्य अज्ञात है। परन्तु यह माना जाता है कि अपेंडिक्स (appendix) अच्छे बैक्टीरिया के लिए एक भंडारगृह के रूप में कार्य करता है, दस्त की बीमारियों के बाद पाचन तंत्र को "रिबूट" (reboot) करता है। अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अपेंडिक्स (appendix) विकासवादी काल से सिर्फ एक अवशेष या अनुपयोगी अंग है। अपेंडिक्स के शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की मदद से हटाने पर किसी भी प्रकार की कोई स्वास्थ्य समस्या प्रगट नहीं होती है।
बड़ी अंत से जुड़े होने के कारण इसमें विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे- संक्रमण, सूजन, कैंसर आदि। विशेषज्ञ अपेंडिक्स के संक्रमण का इलाज करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं तथा बहुत कम जोखिम दायक तरीकों की खोज में लगे हुए हैं।
अपेंडिक्स (appendix) बड़ी आंत से जुडी, 4 इंच लंबी ट्यूब होती है। इस अंग का सटीक कार्य अस्पष्ट है। कुछ लोग मानते हैं, यह अंग मानव स्वास्थ्य को कोई लाभ प्रदान नहीं करता है। लेकिन यह आंत प्रतिरक्षा (gut immunity) में कुछ भूमिका अदा कर सकती है। अध्ययनों के आधार पर ज्ञात होता है किः
- अपेंडिक्स भ्रूण (fetus) और युवा वयस्कों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अपेंडिक्स को वयस्कों में मुख्य रूप से प्रतिरक्षा कार्यों में योगदान देने के रूप में जाना जाता है।
- कुछ चिकित्सको का मानना है कि यह अंग शरीर में उपयोगी बैक्टीरिया के लिए एक भंडारगृह के रूप में कार्य करता है। ये उपयोगी बैक्टीरिया अच्छे पाचन को बढ़ावा देने, आंतों को स्वस्थ रखने और प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाये रखने में मदद कर सकते हैं।
- यह माना जाता है कि अपेंडिक्स, बी लिम्फोसाइट्स (B lymphocytes) (सफेद रक्त कोशिका की एक किस्म) और इम्यूनोग्लोबुलिन ए (immunoglobulin A (IgA)) एंटीबॉडी के उत्पादन में भी सहायता करती है।
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अपेंडिक्स (appendix) मानव अंग है जिसके कारण मनुष्य को इससे सम्बंधित निम्न समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे :
जब अपेंडिक्स (appendix) में सूजन आ जाती है, तो इस स्थिति को अपेंडिसाइटिस (appendicitis) कहा जाता है। यह स्थिति आमतौर पर जीवाणु संक्रमण के कारण उत्पन्न होती है। संक्रमण पेट से शुरू होकर अपेंडिक्स (appendix) तक पहुँच सकता है। यह संक्रमण आंतों में कठोर मल के कारण भी उत्पन्न हो सकता है।
अपेंडिसाइटिस (appendicitis) के लक्षण विभिन्न हो सकते हैं। इनमें शामिल हैंः
- पेट के निचले दाहिने हिस्से में दर्द होना,
- कभी कभी अपेंडिसाइटिस में चिकित्सकीय आपातकाल की स्थिति विकसित हो सकती हैं।
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अपेंडिक्स फोड़ा (appendix Abscess) - अपेंडिक्स (appendix) में एक फोड़ा (collection of pus) उत्पन्न हो सकता है, जिसे अपेंडिक्स फोड़ा (appendix Abscess) कहते हैं। यह समस्या अक्सर अपेंडिक्स में सूजन से सम्बंधित है, लेकिन अपेंडिसाइटिस (appendicitis) के इलाज से पहले इसका इलाज करना आवश्यक होता है।
अपेंडिक्स कैंसर (appendix cancer) - अपेंडिक्स (appendix) में गंभीर दर्द का कारण ट्यूमर हो सकता है। अपितु अपेंडिक्स कैंसर या ट्यूमर एक दुर्लभ समस्या है, जो बहुत कम लोगो को प्रभावित करती है। अपेंडिक्स कैंसर सामान्य अवस्था में किसी भी प्रकार के गंभीर लक्षणों का कारण नहीं बनता है। जब यह कैंसर गंभीर होता है, तो इसके दुर्लभ लक्षण देखे जा सकते हैं। इसके लक्षणों में गंभीर दर्द, दस्त आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त :
- गंभीर ऐंठन (Severe cramps)
- गैस के साथ कब्ज या दस्त की समस्या आदि को भी शामिल किया जा सकता है।
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अपेंडिक्स (appendix) के मुख्य लक्षण के रूप में पेट के निचले दाहिने हिस्से में दर्द को शामिल किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसके सामान्य लक्षणों में निम्न को शामिल किया जा सकता है, जैसेः
- भूख न लगना,
- जी मिचलाना,
- उल्टी होना,
- कब्ज या दस्त की समस्या उत्पन्न होना,
- गैस पास करने में असमर्थता,
- बुखार आना,
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अपेंडिक्स (appendix) से सम्बंधित पेट दर्द और बुखार जैसे लक्षणों का निदान करने के लिये एक चिकित्सक विभिन्न प्रकार के परीक्षण अपना सकता है। मुख्य रूप से कई अलग-अलग परीक्षणों का उपयोग अपेंडिसाइटिस (appendicitis) या संक्रमण का निर्धारन करने के लिए किया जा सकता है। अतः अपेंडिक्स समस्याओं का निदान करने के लिए डॉक्टर द्वारा निम्न टेस्ट या परीक्षणों को अपनाया जा सकता हैः
शारीरिक परीक्षण (Physical test) - अपेंडिक्स (appendix) समस्याओं जैसे- अपेंडिसाइटिस (appendicitis) का निदान करने में शारीरिक परीक्षण महत्वपूर्ण होता है। कुछ मामलों में, शारीरिक परीक्षण के आधार पर अपेंडिक्स (appendix) को हटाने के लिए सर्जरी करने का निर्णय लिया जा सकता है, और इसके लिए इमेजिंग परीक्षण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। शारीरिक परीक्षण के अंतर्गत निचले दाएं पेट को दबाने पर दर्द, पेट में सूजन तथा अन्य लक्षणों का अवलोकन किया जा सकता है।
पूर्ण रक्त गणना (Complete blood count (CBC)) - ऐसा कोई भी रक्त परीक्षण नहीं है, जो अपेंडिसाइटिस (appendicitis) की उपस्थिति को स्पष्ट रूप से दिखा सके। हालांकि, संक्रमण की स्थिति में शरीर में सफेद रक्त कोशिकाओं (white blood cells) की संख्या बढ़ती हैं, अतः पूर्ण रक्त परीक्षण में प्राप्त सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या में हुई वृद्धि - संक्रमण और सूजन की ओर संकेत कर सकती है।
सीटी स्कैन (CT scan (computed tomography)) - सीटी स्कैनर शरीर की विस्तृत तथा स्पष्ट छवियों को बनाने के लिए एक्स-रे और कंप्यूटर का उपयोग करने वाला एक यंत्र होता है। अपेंडिसाइटिस (appendicitis) के केस में सीटी स्कैन की मदद से अपेंडिक्स में सूजन को देखा जा सकता है और अपेंडिक्स कैंसर तथा इसके टूटने की स्थिति का भी पता लगाया जा सकता है।
अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) - शरीर के अंदर की संरचनाओं को देखने के लिए अल्ट्रासाउंड ध्वनि तरंगों का उपयोग करता है, इस इमेजिंग परीक्षण में विकिरण का उपयोग नहीं किया जाता है। अतः विकरण के प्रभाव से बचने के बच्चों या गर्भवती महिलाओं में इमेजिंग परीक्षण के लिए अल्ट्रासाउंड प्रयोग में लाया जाता है। अल्ट्रासाउंड के दौरान, छवियों लेने के लिए पेट पर ट्रांसड्यूसर (transducer) नामक एक उपकरण को चलाया जाता है। यदि अपेंडिक्स में सूजन है, तो यह इस परीक्षण से पता लगाया जा सकता है।
अन्य इमेजिंग परीक्षण (Other imaging tests) - जब अपेंडिक्स में कैंसर होने का संदेह होता है, तो इमेजिंग निम्न इमेजिंग परीक्षण काफी उपयोगी हो जाते हैं, जैसे - चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (MRI), पॉजिट्रॉन उत्सर्जन टोमोग्राफी (positron emission tomography (PET)) आदि।
इसके अतिरिक्त मूत्र पथ संक्रमण की जानकारी के लिए मूत्र परीक्षण (Urine test) तथा गुदा का परीक्षण (Rectal exam) भी किये जा सकते है।
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अपेंडिक्स का इलाज डॉक्टर द्वारा मुख्य रूप से दो प्रकार से किया जा सकता हैः
अपेंडिक्स को हटाने के लिए सर्जरी अपेंडेक्टॉमी (Appendectomy) - अपेंडिक्स को हटाने के लिए सर्जरी, जिसे अपेंडेक्टोमी (Appendectomy) कहा जाता है, यह अपेंडिसाइटिस (appendicitis) के लगभग सभी मामलों के लिए उपचार के दौरान शामिल की जा सकती है। अतः अपेंडिसाइटिस रोग को रोकने और इलाज के लिए अपेंडेक्टोमी (Appendectomy) का व्यापक उपयोग किया जाता है। अपेंडेक्टोमी (Appendectomy) के तहत डॉक्टर पारंपरिक तकनीक (एक बड़ा कट लगाकर) या लेप्रोस्कोपी (laparoscopy) (पेट में कई छोटे छेद कर अन्दर देखने के लिए कैमरे का उपयोग) का उपयोग कर सकते हैं। सर्जरी से पहले एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर अपेंडिक्स (appendix) टूट जाता है, और पेट की गुहा (abdominal cavity) में सामग्री फैलती है, तो यह पेरिटोनिटिस (peritonitis) नामक स्थिति कहलाती है, जो जीवन के लिए खतरनाक होती है।
यदि अपेंडिक्स फोड़ा (appendix abscess) का निदान किया जाता है, तो चिकित्सक इसका इलाज करने के लिए त्वचा के नीचे एक ट्यूब डालकर निकाल सकता है।
अपेंडिसाइटिस का इलाज एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) - कुछ मामलों में, अपेंडिसाइटिस (appendicitis) का इलाज एंटीबायोटिक्स के द्वारा किया जा सकता है। कुछ अध्ययनों पाया गया है कि कुछ रोगियों में एंटीबायोटिक दवाओं के दौरान एपेंडिसाइटिस की स्थिति में काफी सुधार आया है। परन्तु केवल एंटीबायोटिक्स, अपेंडिसाइटिस का प्रभावी ढंग से इलाज करने के लिए उपयोगी नहीं हैं।
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अपेंडिसाइटिस (appendicitis) को रोकने तथा अपेंडिक्स को स्वस्थ्य और रोग मुक्त रखने का कोई उचित तरीका नहीं है। हालांकि, उन लोगों में अपेंडिसाइटिस (appendicitis) जैसे अपेंडिक्स से सम्बंधित रोग, कम देखने को मिलते हैं, जो ताजा फल और सब्जियों जैसे फाइबर में उच्च भोजन का सेवन करते हैं।
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एक स्वस्थ आहार अपेंडिक्स समस्या (Appendix problem) के इलाज और उसके जोखिमों को कम करने में काफी मदद कर सकता है। जो व्यक्ति अपेंडिसाइटिस (appendicitis), से पीड़ित हैं, उन्हें कुछ विशेष खाद्य पदार्थ को खाने की सलाह दी जाती है। तथा कुछ कुछ ऐसे भी खाद्य पदार्थ है, जिनका सेवन अपेंडिक्स समस्याओं को गंभीर बना सकता है। अतः कुछ अपेंडिक्स आहार इस तरह से हैंः
शल्य चिकित्सा के दौरान इन खाद्य पदार्थों का सेवन मानव शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता हैं, जो संक्रमण को रोकने और उपचार प्रक्रिया को तेजी प्रदान करने के लिए उपयोगी हैं। प्रोटीन, विटामिन सी और फाइबर में समृद्ध खाद्य पदार्थों का नियमित रूप से सेवन किया जाना चाहिए।
- उच्च वसा वाले भोजन का सेवन न करें। उच्च वसा वाले भोजन में मांस, अंडा, पनीर (cheese), दूध, चॉकलेट, आइसक्रीम, तला हुआ भोजन और मक्खन तथा तेल युक्त भोजन आदि शामिल हैं।
- उच्च शर्करा युक्त सामग्री जैसे - मिठाई, केक, मफिन (muffins), स्वीटनर (sweeteners), आइसक्रीम आदि।
- डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ और जूस,
- वाष्पित पेय (Aerated drinks)
- पेय (Beverages)
- बेकरी की चीज़ें (Bakery items) आदि।
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712c89c2c87426b4b71ee914ec48b4b0a56149c9568b4240d2965b3e356b6471 | pdf | और खेल के साथी की तरह समझ लिया था।
आगे मैंने पाया कि बहुत से बच्चों के हाथ-पैरों पर फोड़े-फुंसियों के कारण ज़ख्म थे। और विटामिनों की कमी से उनके मुंह के अन्दर भी ज़ख्म थे। मैंने देखा कि उन्हें इधर-उधर थूकने की गंदी आदत थी और वे अपनी गंदी नाक को अपने नंगे हाथ या अपने कपड़ों के सिरों से पोंछ लेते थे। मैंने जांच की, उनके नाखून काटे, उनके फटे हुए कपड़ों की सिलाई की। कमीज़, फ्रॉक आदि के टूटे हुए बटन टांके, घर में लेप बनाकर उनके फोड़े-फुंसियों पर लगाया और बच्चों को बिना पैसे लिए विटामिन की गोलियां बांटीं।
जल्दी ही बच्चों की माताएं भी मुझसे आकर मिलीं और चुटकियों में मैंने बच्चों को साफ-सुथरा और अच्छी स्वस्थ आदतों वाला बना दिया। वे साधारण कपड़े पहनते थे, लेकिन वे साफ, धुले हुए होते थे।
अक्सर माताएं मुझसे मिलने आतीं और बच्चों की किसी समस्या के लिए सलाह लेतीं या बच्चों को बुखार आदि कोई बीमारी होती तो मुझे अपने घर बुलातीं । कक्षा शिक्षण
मैंने भाषा, इतिहास, गणित और भूगोल की औपचारिक पढ़ाई शुरू नहीं कराई। लेकिन कहानी सुनाना और कहानी की किताबें जैसे अबनिन्द्र नाथ ठाकुर की या रूसी प्रकाशन की या सुकुमार रॉय, उपेन्द्र किशोर रॉय या जोगेन्द्र नाथ सरकार की कविताएं पढ़ाना शुरू
इन शुरुआती कोशिशों से बच्चे मेरी कक्षा की ओर आकर्षित हुए और इन सब में रुचि लेने लगे। यह रुचि जल्दी ही अनुपस्थित रहने वाले बच्चों में भी फैलने लगी। धीरे-धीरे वे भी वापस स्कूल आने लगे।
तीन-चार महीनों में ही मेरी कक्षा दाखिल हुए विद्यार्थियों से पूरी भर गई । स्कूल नहीं आने वाले बच्चों की संख्या मुश्किल से एक या दो प्रतिदिन रह गई।
यह निरंतरता कैसे बनी रहे
अब मेरे सामने सवाल था कि इस रुचि को लम्बे समय तक कैसे कायम रखा जाए, इसके लिए मैंने नई-नई गतिविधियां करवाने की योजना बनाई। मैंने सोचा कि किसी भी काम के दो पहलू होने चाहिए। एक तो इसमें सीखने-सिखाने से सम्बन्धित कुछ होना चाहिए, जैसे विद्यार्थी के विकास के एक - दो पक्ष भी सम्मिलित हों, वह चाहे भाषा सीखने के क्षेत्र में हो या गणित, इतिहास आदि के। दूसरे, विद्यार्थियों की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कुछ होना चाहिए। जैसे
कोई आर्थिक मसला, या आम जनता के जानने योग्य बात, या मां की रसोईघर की कोई आवश्यक वस्तु, या उसकी स्वयं की खेलने की कोई चीज़ वगैरह, कुछ भी बात हो सकती है।
विविध गतिविधियांः
संबंधियों को पत्र लिखना और डाक में डालना
शुरू में मैंने अभिभावकों से पोस्टकार्ड लेकर बच्चों को दिए, जिन पर ठीक पता लिखा हुआ था।
मैंने ब्लैकबोर्ड पर पत्र लिखा, उन्होंने उसकी नकल की और मैंने वे सब पोस्टकार्ड डाक में डाल दिए। एक महीने में अधिकतर बच्चों ने बताया कि वे बहुत खुश थे क्योंकि उनके नाना, चाचा आदि को खत मिल गए थे और उन्होंने किसी संदेशवाहक के ज़रिए जवाब भेजा था। बच्चों के लिए यह एक महान अनुभव था, कि वे अपने दूर रहने वाले सम्बन्धियों को सन्देश भेज सकते थे।
बाद में मैं उन्हें भ्रमण के लिए डाकखाने ले जाती थी, जो एक किलोमीटर दूर था । हम प्रकृति का आनन्द लेते हुए, बड़े-बड़े धान के खेतों के पास से होकर जाते। रास्ते में मुझे उनसे कुछ अनजान पौधों, टिड्डे, ड्रैगनफ्लाई आदि के बारे में बात करने का अवसर मिल जाता था।
डाकखाने पहुंचने पर मैंने बच्चों से पोस्टकार्ड खरीदने को कहा, फिर मैं उन्हें एक पेड़ के नीचे ले गई। वहां बैठकर उन्होंने पत्र लिखे और फिर डाक में डाले। मुझे याद है, मुझे उन्हें समझाना पड़ा था कि पत्र, किस प्रकार उनकी नानी, चाचा आदि तक पहुंचता है जबकि गंजा पोस्टमास्टर उन्हें जानता तक नहीं है। इस छोटे से भ्रमण के बाद हम वापस स्कूल आ गए। बच्चों को इसमें बहुत आनन्द आया।
यहां मेरे विद्यार्थियों को भाषा के द्वारा परिवार की वास्तविक ज़रूरत पूरा करने का मौका मिला। उसके बाद उनमें से कुछ विद्यार्थियों ने अच्छे सुलेख की ओर खास ध्यान दिया। पत्र लिखने के अभ्यास से भाषा की कक्षा में उनकी रुचि बढ़ी, पाठ पढ़ने और लिखने में भी।
यहां मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि मेरे एक पोलियोग्रस्त विद्यार्थी द्वारा लिखे गए पत्र ने, शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का ध्यान आकर्षित किया । और वह अधिकारी अब उस विद्यार्थी को इलाज और स्वास्थ्य लाभ के लिए कलकत्ता भेजने का प्रयत्न कर रहा है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि मेरे इस छोटे से प्रोजेक्ट के लिए यह एक बड़ा पुरस्कार है।
प्रकृति का अध्ययन और स्वास्थ्य
अभिभावकों तथा अन्य लोगों की मदद से मैंने विद्यार्थियों से स्थानीय जड़ी-बूटियां, पत्ते, बीज, फूल आदि इकट्ठे कराए और उनकी पहचान करना सिखाया। उनमें से कुछ हैं - कालमेघ, थानकुनि, जंडिस, वरंडा, कुलखड़ा, तुलसी, तेजपाता, हिंचे, नीम, बाशक, भृंगराज, शेफाली, पेंपे, गंधोबादल, ब्राह्मीशाक, पुदिना ।
विद्यार्थियों ने पत्तियों तथा बीजों को अपनी अभ्यास पुस्तिका पर चिपकाया और उनका छोटा-छोटा विवरण लिखा तथा इनका उपयोग भी बताया। बाद में मुझे खबर मिली कि कुछ बच्चों ने कुछ खास बीजपत्तियां आदि इकट्ठा करके अपनी मां से दवाई बनवाई और उसे खाकर सर्दी-जुकाम, मलेरिया आदि ठीक किया।
साहित्य सभा
शान्ति निकेतन के विश्वभारती स्कूल का अनुकरण करते हुए, मैंने नियमित साप्ताहिक साहित्य सभा शुरू करने का प्रबन्ध किया। विद्यार्थी इस सभा का आयोजन करते थे। वे इसका संचालन करते, कहानी या कविताएं पढ़ते, समाचार पत्रों, रेडियो, टी.वी. के ताज़ा समाचार सुनाते, क्रिकेट के खेल के समाचार भी सुनाते। वे गीत और गज़लें गाते तथा नाटक भी करते थे।
ध्यान का अभ्यास करना
स्कूल प्रार्थना के सामान्य सत्र के तुरन्त बाद, हमारी कक्षा की शुरुआत में मैंने मौन ध्यान का अभ्यास शुरू कराया; जिसमें सारी कक्षा मेरे साथ किसी पेड़ के नीचे या खुले बरामदे मे बैठकर तीन से पांच मिनट तक, प्रतिदिन, ध्यान का अभ्यास करती थी। यह ध्यान लगाना बच्चों के व्यवहार के लिए आश्चर्यजनक काम करता है। कहानी सुनाने की कक्षा
स्कूल के कार्यक्रम में एक घंटा कहानी सुनाने का होता है। मैं बच्चों को बहुत सी देशी-विदेशी पुस्तकों में से कहानियां पढ़कर सुनाती। कुछ कक्षाओं में बच्चों से भी कहानी सुनाने को कहा जाता।
बच्चे अपनी स्वयं की या मुझसे या किसी और से सुनी हुई कहानियां सुनाते । कहने की आवश्यकता नहीं है कि बच्चे इसका भरपूर आनंद लेते थे। साथ ही वे जनसमूह के सामने निडरता से तथा स्पष्ट बोलने की योग्यता भी प्राप्त करते थे।
कविता पाठ करना
कहानी सुनाने की तरह, कविता की कक्षा भी होती थी, जिनका हम दिल से आनन्द लेते थे। कभी मैं पढ़ती थी, कभी बच्चे। हम सब सुन्दर तुकबन्दी और कविताओं के पाठ, लय व सुन्दरता का आनंद लेते थे। इस आनन्द के द्वारा हम भाषा और साहित्य में रुचि बढ़ाने का प्रयत्न करते ।
दीवार पत्रिका की तैयारी
साहित्य सेवा में पढ़ी गई विद्यार्थियों की रचनाओं में से मैंने दीवार पत्रिका के लिए रुचिकर कहानियां, कविताएं तथा अन्य चीजें चुनीं । चित्रकला की कक्षा से मैंने चित्रों को इस पत्रिका के लिए छांटा। फिर उन्हें बच्चों से आर्ट-पेपर पर साफ-साफ लिखने और इन तस्वीरों से सजाने को कहा गया। बच्चों ने इसे दीवार पर टांग दिया, जिससे सारा स्कूल इसे पढ़ सके। यह पाठ्येत्तर गतिविधि बच्चों के लिए बहुत रुचिकर होती थी।
वार्षिक कैलेंडर की तैयारी
विद्यार्थियों को प्रति वर्ष एक बड़ा-सा वार्षिक कैलेंडर आर्ट पेपर पर बनाना सिखाया जाता था। बच्चे इसे तस्वीरों से सजाते थे, तथा इसमें महीने, हफ्ते, दिनांक तथा दिनों का विस्तृत ब्यौरा देते थे । हम इसे अपनी कक्षा में टांगते थे और आवश्यकता होने पर काम में लेते थे। दैनिक डायरी लिखना
विद्यार्थियों को प्रतिदिन डायरी लिखने के लिए प्रेरित किया जाता है। वे इसे प्रसन्नता से करते हैं। वे इसे घर के काम की तरह हर रोज़ मुझे दिखाते हैं। उनकी डायरियों से मुझे बहुत सी मज़ेदार खबरें मिलती हैं, जैसे घोंसले में से एक बार अंडे निकालने के बाद वापस उसमें रखना, ज़हरीले सांप को मारना आदि। हम अक्सर मनोरंजक डायरी, सारी कक्षा को पढ़कर सुनाते। इस काम में मैंने पाया कि बच्चों को अपने को व्यक्त करने की योग्यता और रुचि विकसित करने का अवसर मिलता है।
कातुम- कुतुम (दस्तकारी)
सुविख्यात कलाकार अबनिन्द्रनाथ ठाकुर ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया और इसे यह नाम दिया। यह एक प्रकार से कला और दस्तकारी की प्रक्रिया है। इसमें बेकार चीज़ों जैसे खाली माचिस, कागज़,
कपड़ा और रिबन के टुकड़े, दीमक खाई क लकड़ी आदि चीज़ों से कोई खिलौने आदि
बनाना होता है। इन चीज़ों को अगर ठीक से छांटकर जमाया जाए, तो एक सुनहरी पगड़ी पहने हारमोनियम बजाता हुआ आदमी बन सकता है। इस विचार को लेकर मेरे बच्चों ने उड़ती हुई चिड़िया, रेंगता हुआ सांप कूदता खरगोश, दौड़ता हिरन, फुदकता कगारू, नाचती लड़किया आदि बहुत-सी चीजें बनाईं। बच्चों को इस काम में बहुत मज़ा आया। इस तरह के क्राफ्ट के काम में कोई भी खर्चा नहीं होता, लेकिन इससे बच्चों की रचनात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। निरीक्षण करने की शक्ति का विकास होता है, सौन्दर्यबोध आता है, और औज़ारों को काम में लाने की योग्यता का विकास होता है।
अल्पना बनाना
को सजाने के लिए मैं अक्सर यह प्रोजेक्ट कराती हूं। हम स्कूल के बरामदे में बिल्डिंग के सामने या किसी पेड़ के इर्द-गिर्द कोई उपयुक्त स्थान पसन्द करके वहां सफाई करते हैं और वर्षों पुरानी कला 'अल्पना' बनाते हैं। सरस्वती पूजा, स्वतन्त्रता दिवस आदि के अवसर पर हम - अल्पना से सजाने के लिए विभिन्न रंगों, फूलों, बीजों यहां तक कि कोयले के चूरे, रेत, ईंटों के चूरे आदि का प्रयोग करते हैं। यह एक दूसरा क्षेत्र है जहां विद्यार्थियों ने खुद को स्वतंत्रता से अभिव्यक्त किया और अपनी कला की लोगों द्वारा प्रशंसा होते देखी।
रसोईघर उद्यान
मेरी कक्षा ने बैंगन, टमाटर, हरी मिर्च, पपीता और फूल आदि उगाकर एक छोटासा रसोईघर उद्यान बनाया। बच्चों को फावड़े से मिट्टी खोदने, खाद डालने, पौधे लगाने और पानी देने में बहुत अच्छा लगता है। इसके बाद मैंने देखा कि बच्चे पेड़-पौधों को पहले से ज़्यादा प्यार करने लगे हैं। वे पेड़-पौधों को पशुओं तथा दूसरों से बचाने के लिए उनकी रखवाली करते। बच्चों ने फालतू में फूल-पत्ते तोड़ना और पौधों को नष्ट करने की
अपनी पुरानी आदत, अपने आप ही बदल दी। अपने छोटे से बाग से उन्हें बैंगन, मिर्च आदि जो थोड़ी-सी उपज मिलती उसे वे अपने स्कूल के पीछे रहने वाले गरीब पड़ोसियों में बांट देते हैं।
चिड़ियों के पंख एकत्र करना
बच्चे सब स्थानीय चिड़ियों के पंख इकट्ठाकर अपनी अभ्यासपुस्तिका में लगाते और साथ में उसकी पहचान, प्राप्ति का स्थान, चिड़िया का वर्णन, उसकी खाने, घोंसला बनाने, अंडे देने आदि आदतों के विषय में लिखते। इस काम से चिड़ियों की दुनिया में रुचि और प्रकृति के प्रति प्रेम बढ़ता है।
तितलियों के लार्वा इकट्ठे करना और उन्हें पालना
विद्यार्थी उस जगह मिलनेवाले कीटों और तितलियों के लार्वा इकट्ठा करते हैं, और उन्हें कांच के हवादार बर्तन में रखते हैं। हर रोज़ वे बर्तन को साफ करते और लार्वा को खाने के लिए खास पत्तियां देते। वे कांच के बर्तन का प्रतिदिन बाहर से निरीक्षण करते, उनकी बढ़त, लार्वा से प्यूपा बनना और अन्त में सुन्दर-सी तितली बनना देखते । वे इनके उचित विकास के लिए हर तरह की सावधानी रखते और अन्त में उसे उड़ जाने देते। यह काम हमेशा ही बच्चों को मनोरंजक और रुचिकर लगता। यह उनके दिल की गहराइयों में प्रकृति प्रेम उत्पन्न करता । चित्रकला और मॉडल बनाना
मैंने मुक्त हस्तचित्र बनाने, उनमें रंग भरने और साथ ही मिट्टी से मॉडल बनाने, सिखाने शुरू कराए। कहने की आवश्यकता नहीं है कि स्कूल के पास इस उद्देश्य के लिए सामान मंगाने के लिए पैसा नहीं था। आर्ट पेपर, रंग, पेंसिल आदि का खर्च शिक्षक को स्वयं ही करना होता । खेलकूद
अपनी कक्षा के दैनिक कार्यक्रम में मैंने खेलों का अभ्यास शुरू कराया, जिससे बच्चों का मनोरंजन हो और उनका स्वास्थ्य भी ठीक रहे। मैंने उन्हें ऊंची कूद, लम्बी कूद, साधारण |
6cc56fbe9550664ef6aa3b8c8847f3c3d9a8d4c150fcbe50110f00b087e1ef14 | pdf | वह कथा इस प्रकार है। इस भरत क्षेत्र में सुरम्य देश है। उसमें पोदनपुर नामक नगर है। वहाँ राजा त्रर्णापिगल का पुत्र मधुपिंगल था । वह चारणयुगल नगर के राजा सुयोधन की पुत्री मुलसा के स्वयंवर में आया था । और वहां इस प्रकार राजा सगर भी आया था । सगर के मंत्री ने मधुपिंगल को कपट से सामुद्रिक शास्त्र का अवलम्बन लेकर धोका दिया कि इनके नेत्र पिंगल हैं वह बिल्ली के समान है इसलिये जो इन्हें कन्या देगा वह मरण को प्राप्त होगा । तब कन्या ने सगर के गले में माला डाल दी । मधुपिंगल के गले में नहीं डाली । तब मधुपिगल ने विरक्त होकर दीक्षा लेली। बाद में उसने कारण पाकर सगर के मंत्री के कपट को जानकर क्रोध किया और अन्त में निदान किया कि मेरे तप का यह फल हो कि जन्मांतर में सगर के कुल का नाश करूं । इस तरह से मन में निदानबंध करके मधुपिंगल मरकर महाकालासुर नाम का असुर हो गया । तब सगर को मंत्री सहित मारने का उपाय सोचा तब क्षीरकदम्ब ब्राह्मण का पुत्र पर्वत उसको मिला। तब पशु की हिंसा रूपी यज्ञ का सहायी होकर कहा कि सगर राजा को यज्ञ का उपदेश देकर यज्ञ कराम्रो । तेरे यज्ञ का सहायी मैं होऊंगा । तब पर्वत ने सगर के पास जाकर यज्ञ कराया और उसमें अनेक पशु होम दिये। उस पाप से सगर सातवें नरक में गया और कालासुर उसका सहायक वन गया । अर्थात् वह यज्ञ के कारण स्वर्ग में गया ऐमा बताया। इस प्रकार मधुपिंगल मुति निदान बंध करके आगे जाकर पाप को भोगने वाला हो गया । इसलिये आचार्य कहते हैं कि हे योगी ! भाव बिगड़ने से आत्मसिद्धि को प्राप्त नहीं होता है । इसलिये भाव सहित तप कर्म की निर्जरा का कारण होता है उससे विशुद्ध मोक्ष पद की प्राप्ति होती है ।
जो पद की आकांक्षा करते हों उन्हें चाहिये कि, ज्ञान की आराधना करें । क्योंकि, ज्ञान जीत्र का मूल स्वभाव है। किसी भी वस्तु की चिरकाल तक कामना या आराधना करने से उसकी प्राप्ति एक दिन अवश्य होती है ।
ज्ञान भावना का फलज्ञानमेव फलं ज्ञाने ननु श्लाघ्यमनश्वरम् । अहो मोहस्य माहात्म्यमन्यदप्यन्त्र मन्यते ।।
ज्ञान की आराधना करने का या ज्ञान में मग्न होने का असली व उपयोगी फल यही है कि परोक्ष व अल्प श्रुतज्ञान हटकर सकलप्रत्यक्ष केवल ज्ञान का लाभ हो । यह फल अविनश्वर है व आत्मा को पवित्र तथा सुखी बनाने का कारण होने से स्तुत्य है । तपश्चरण करना, धर्माचरण करना, ज्ञानाभ्यासादि करना, यह सब इसलिए कि अणिमा महिमा आदि ऋद्धि, सिद्धि व सम्पत्ति आदि की प्राप्ति हो, ऐसा मानना मोह का माहात्म्य है । जिन जीवों का मोह शांत होकर आत्मतत्व
की परीक्षा प्राप्त नहीं हुई है वे इन पराधीन क्षणनश्वर दुःखमय संसारविषयों की अभिलाषा करते हैं। घर द्वार छोड़कर तपस्वी बनने पर भी उनकी यह अभिलाषा नष्ट नहीं हो पाती । इस मोह की महिमा का क्या ठिकाना है ? परन्तु यह खूब समझ लो कि चाहने से कुछ नहीं मिलता है ।
शास्त्राग्नौ मणिवद्भव्यो विशुद्धो भाति निर्वृतः । अंगारवत् खलो दीप्तो झली वा भस्मी वा भवेत् ॥
शास्त्रों का ज्ञान होने से वस्तुओं पर सच्चा प्रकाश पड़ता है और कर्म कलंक जल जाते हैं । इसलिए शास्त्र ज्ञान एक प्रकार की है। में पड़ने से रत्न जैसे शुद्ध होकर चमकने लगता है वैसे ही निर्मोह हुए भव्य जीव शास्त्र ज्ञान में मग्न होकर कर्म कालिमा को जला डालते हैं और निर्मल होकर अथवा कर्मो से छूटकर प्रकाशमान होने लगते हैं। जिनकी विषय वासना नहीं छूटी है ऐसे मोही जीव शास्त्र ज्ञान में प्रविष्ट होकर भी आधे जले हुए अंगार की तरह चमकते तो हैं परन्तु मलिन ही वने रहते हैं । अन्त में जव पूरे जल चुकते हैं तो भस्म की तरह प्रकाश से भी गून्य निस्सार हो जाते हैं । ठीक ही है, मोही जीव यदि ज्ञान का सम्पादन भी करें तो भी अन्त में विषयासक्त होकर अज्ञानी ही रह जाते हैं । नीच कर्म करने से वे मलिन दीखने लगते हैं व विवेकशून्य हो जाने से में भस्म की भांति निस्सार दीख पड़ते हैं। परंतु ज्ञानी उसी शास्त्रज्ञान के द्वारा पवित्राचरण रखता हुआ चमकता है व अंत में शुद्ध वन जाता है ।
इसलिये हे योगी ! द्रव्यलिंग को छोड़कर भावलिंगी होकर और वाह्य पर वस्तु को त्याग करने में ही लीन होकर अपना ही ध्यान करो । सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र युक्त तू ही है । तब अपनी आत्मा से भिन्न बाह्य वस्तु आप ही आप अपने शरीर से भिन्न हो जाती है । जब तक बाह्य वस्तु अपनी आत्मा के साथ रहती है और जब तक आत्मा उसमें रागी होकर परिभ्रमण करती है तब तक रागी कहलाती है इसलिये रागद्वेष को अपनी आत्मा से भिन्न मानकर जब आप अपने अन्दर देखेगा तव सव कुछ अपने अन्दर ही मालूम होगा ।
हे योगी ! यदि हमेशा भगवान जिनेश्वर के चरण कमलों में भक्ति पूर्वक लीनता, इन्द्रियों के विषयों आदि से विरक्ति, तपस्या के भाव को सम्हालने के लिये अनुकूल शक्ति, शरीर को ज्ञान के द्वारा आत्मा से अच्छी तरह भिन्न करके आत्म स्वरूप को पूर्ण रूप से देखने की युक्ति और गुणों में प्रीति तुम्हारे अन्दर उत्पन्न हो जाये तो शीघ्र ही मोक्ष की प्राप्ति होगी और यदि ये गुण तुम्हारे अन्दर व्याप्त नहीं होंगे तो मनुष्य जन्म लेने से क्या फायदा । इसलिए
हे जीव ! तू सम्पूर्ण भाव विषय वासना, पर पदार्थ से विमुख होकर आत्म सन्मुख होजा, तव तुझे शुद्धात्म की प्रतीति होगी और मोक्ष की प्राप्ति होगी।
पल्लु बायारूत्तिर लेल्ला ओदुगकनोदि तन्नय गुणदोळ् ।। निल्लुदव नोटुगिळियो दल्लदे पेरतल्ल बेंबमुनि मुनिवृषभं ॥३५॥
अर्थ --- दांत और मुंह द्वारा बहुत से ग्रंथ पढ़े अर्थात् तर्क, व्याकरण छंद, अलंकार, नाटक, भरतशास्त्र, गणित, वेद, ज्योतिष, आगम न्याय शास्त्रादि अनेक शास्त्र रातदिन पढ़े परन्तु यह शास्त्र अध्ययन एक अज्ञानी तोते के रटने के समान है। क्योंकि, तोते को जितना सिखाया जाता है उतना ही वह रटता है परन्तु पढ़ लेने पर भी जीव ने ज्ञान नहीं प्राप्त किया। इससे सम्यग्दर्शन पूर्वक आत्मा का अनुभव नहीं हुआ और साधन नही हुआ । जो योगी मुनि अपने आत्मानुभव में रमने वाले हैं वही मुनि मुनिवृषभ हैं अर्थात् मुनियों में श्रेष्ठ है ।। ३५ ।।
विवेचन - ग्रंथकार ने इस श्लोक में बतलाया है कि बहिरात्मा ज्ञानी - ने बहुत से शास्त्र पढ़े किन्तु उनका पढ़ना केवल तोते के समान ही है ऐसा समझना चाहिये । क्योंकि इतने शास्त्र पढ़ने पर भी उसके हृदय में सम्यग्ज्ञान नही हुआ और आत्मा को पहिचान न सका तब शास्त्र कंठस्थ करने से क्या लाभ ? केवल उनका पढ़ना शुष्क भेरी की आवाज के समान ही समझना चाहिये । कहा भी है किःगिरिय सुक्तिदरेनु हवचुजोदिदरेनु पिरिपु लांछन तोटेट्रेनु । अरियदे निज परमात्मनध्यानव नरिकगि बललि सन्तते ॥
पहाड़ की प्रदक्षिणा करने से क्या ? अनेक प्रकार के लाखों शास्त्रों का अध्ययन करने से क्या पंडित बन गया ? अगर निज परमात्म को ध्यान के द्वारा नहीं जानता है तो उसका ज्ञान वैसा ही है जैसा कि एक सियारनी अपने बच्चे के साथ किसी किसान के गन्ने के खेत में पहुंच जाती है और खूब गन्ना चूसकर पेट भरती है तब एकदम चिल्लाती है परन्तु यह नहीं समझती कि अगर मैं चिल्लाऊंगी तो मेरे बच्चे किसान के हाथ में पड़ जायेगे और मारे जायेगे । जब वह चिल्लाती है तो किसान भागा आता है और वह सियारनी भाग जाती है और वच्चा उसके हाथ में फंस जाता है। इसी तरह इस संसारी आत्मा ने दुनिया के सारे पर पदार्थों को जानकर, उनका अनुभव कर ज्ञान प्राप्तकर सभी कुछ किया, चारों गतियों में भ्रमण किया, अनेक प्रकार के कला कौशल आदि में निष्णात हुआ तो भी अपनी आत्मा के स्वभाव को नहीं जाना । इससे जो बाह्य तप, संयम आदि पालन किया,
कठिन से कठिन तप किया इससे कर्म की निर्जरा आज तक तो न हो पायी । इसलिये हे योगी ! मनुष्य पर्याय धारण करके व अनेक बार संयम धारण करके पीछी कमंडल धारण किया । यदि वे सभी इकट्ठे किये जायें तो मेरु पर्वत से भी अधिक हो जाएँगे । इसलिये हे निर्बुद्धि जीव ! स्वरूप को पहचान । यदि तू संसार से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता है तो बाह्य इन्द्रिय जन्य विषय भोग के मोह को त्याग कर यदि अपने अन्दर आप ही रत होकर अपने को देखेगा तो तू ही परमात्मा बन जायगा । तू ही मोक्ष रूप है और अन्य कोई मोक्ष रूप नहीं है। इसलिए भावलिंगी बनकर आत्म स्वरूप का चिन्तन कर ऐसा श्री गुरु का उपदेश है ।
नेट्टने निजशुद्धात्मनं निटियिसत्मोक्ष मक्कुमंदरियरिदवं ।। निटे यिनुरे माळप तपं पोट्टबडिदल्लियाक्कियरपंतकुं ।।३६।।
अर्थ - ठीक एकांत में बैठकर संपूर्ण पर वस्तु को अपनी आत्मा से दूर हटाकर शुद्धोपयोग के द्वारा शुद्धात्म रत होकर जो अपने आपको देखता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है इस बात को निश्चय और श्रद्धान पूर्वक अर्थात् निष्ठा पूर्वक न जानने वाला मूर्ख अज्ञानी जीव जो कठिन तप करता है वह व्यर्थ तप करता है । उस तप को ऐसा समझना चाहिये जैसे कि धान को कूटकर, चावल निकालकर फैंके हुए छिलके या भूसा को कूटकर उसके प्रदर चावल को ढूंढ़ने वाले मूर्ख शिरोमणि हों । अर्थात् अध्यात्म रहित जिनका तप है वह तप निष्फल है ऐसा समझना चाहिये ।
विवेचन--ग्रंथकार ने इस श्लोक में यह बतलाया है कि जो योगी सम्यक्त्व सहित श्रद्धानपूर्वक एकांत स्थान में बैठकर संपूर्ण आत्मा से परवस्तु को भिन्न मानकर और में रत होकर वीतराग सहजानंद समरसी वन गया और निविकल्प समाधिरूप अपने अहं में रत होकर शुद्धोपयोग पूर्वक ध्यान करता है वही जानी जीव मोक्ष की प्राप्ति कर सकता
। इस बात को न जानने वाले बहिरात्मा, अध्यात्म शून्य, अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव, भूसे के ढेर को कूटकर चावल देखने वाले मूर्ख के समान है । जो मूर्ख अध्यात्म से शून्य होकर केवल कठिन से कठिन बाह्य तप करने वाले द्रव्यलिंगी हैं उन्हें मोक्ष की सिद्धि कभी नहीं हो सकती है ।
आत्म ज्ञान रहित तप करने वाले योगियों को उनकी पाँचों इंद्रियां पंचाग्नि के समान हैं और अध्यात्म सहित होकर तप करने वाले आत्म ज्ञानी की पांचों
इन्द्रियाँ पंचरत्न के समान हैं ऐसा समझना चाहिये । इसलिये हे योगी ! आत्मज्ञान सहित तन करो । श्रात्मज्ञान रहित तप सदा दीर्घ संसार और दुःख का कारण बनता है । इमसे तुभे संसार में अनेक दुःख सहन करना पड़ेगा ।
प्रश्न - आत्मा का परिचय कैसे हो ?
समाधानज्ञानस्वभावः स्यादात्मा स्वभावावाप्तिरच्युतिः । तस्मादच्युतिमाकांक्षन् भावयेज्ज्ञानभावनाम् ।।
उत्पत्ति, स्थिति, नाश इन तीनों धर्मों का सतत रहना वस्तुओं का सामान्य लक्षण कहलाता है । इन्हीं सर्व वस्तुओं के अंतर्गत जीव भी एक द्रव्य या तत्व है। उसका भी सामान्य स्वभाव वही है जो बाकी सर्व वस्तुओं का है । परन्तु जीवों का जो निजी तत्व है उसी के कल्याण के लिये सारा घटाटोप है । शास्त्रों का उपदेश व व्रत, तप, दान, धर्म, ये सब कर्म केवल जीव के कल्याणार्थ ही कहे व किये जाते हैं । इसलिये जीव की निराली पहचान होना बहुत ही आवश्यक कार्य है । उसके कल्याण मार्ग उसके जानने पर ही जाने जा सकते है । तब ?
जीव का स्वभाव जान है । जीवों को जितने दुःख, प्रशांति, उद्वेग, क्षोभ, होने दिखाई देते हैं वे सब रागद्वेष के वश होने से व अज्ञानी रहने से । इसी प्रकार जहाँ जहाँ पर रागद्वेष की कमी व ज्ञान की वृद्धि दीख पड़ती है वहीं वहीं सुख शांति व अनुद्र देखने में आता है। वस्तु में उद्योग व अशांति न में ग रहना यही उस वस्तु का मूल स्वभाव समझना चा हये । क्षोभ व अशांति अथवा उथल पुथल होना विजातीय संयोग का कार्य है । इसीलिये क्षोभ रहित शांत होकर ठहरना वस्तु का मूल स्वभाव समझा जाता है। रागद्वेष रहित शुद्ध ज्ञान उत्पन्न होने पर आत्मा की क्षोभ - प्रशांति मिटती है और शांति प्राप्त होती है । रागद्वेष की अवस्था जैसे जैसे मंद होती है वैसे वैसे तत्वज्ञान की वृद्धि होती है और वैसी हीं वैसी जीवों को शांति प्राप्त होती प्रतीत होती है । इसलिये रागद्वेष का पूर्ण अभाव, ज्ञान की पूर्णता होना निज स्वभाव व पूर्ण सुख-शांति प्राप्त होने का कारण मानलेना, अनुभव के विरुद्ध न होगा ।
वस्तु के स्वभाव की प्राप्ति होना ही अविनाशी अवस्था की प्राप्ति है । वह अवस्था फिर कभी नही छूटती है ।
श्रोदुवुदु तन्न नरियद कोदुवुदिह परके हितमनाचरिपडे तानोदुवुदल्लदोड दुगिकि योदिदिवोलोदिनवके पंडितनक्कु ॥३७॥ |
08f309a8e0be4e4ed38573f7c91f6a43bc34a4f4f3d631a41f3952540b4193d4 | pdf | की भक्ति करता है, वह यदि निष्काम भाव से केवल भगवान की प्रसन्नता के लिये ही ऐसा करता हो तब तो ठीक है, परन्तु यदि वह स्वयं इन पदार्थों को भगवान की प्रसादी समझते हुए उन वस्तुओं की ओर आकृष्ट हो जाता है और भगवान को छोड़कर उनसे आसक्ति रखने लगता है तो उन पदार्थों को भोगते हुए विषयासक्त होने के कारण भ्रष्ट हो जाता है. उसमें यही बाधा आती है. अतएव, त्यागी भक्त को तो भगवान को ही सर्वकर्ता समझकर तप द्वारा ही परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहिये तथा राधिकाजी और लक्ष्मीजी की तरह प्रेमलक्षणा भक्ति द्वारा भगवान का भजन करना चाहिये. यह हमारा सिद्धान्त है.'
ब्रह्मानन्द स्वामी ने पूछा कि 'हे महाराज ! आप हमें वह उपाय बताइये, जिससे इस लोक तथा परलोक में हमारा कल्याण हो जाय. श्रीजीमहाराज बोले कि २' यह जो हमारा सिद्धान्त है, वही इस लोक तथा परलोक में परमसुख का हेतु होता है.
गोपालानन्द स्वामी ने पूछा कि 'हे महाराज ! त्याग तथा तप करने की मन में चाह तो रहे, किन्तु त्याग या तप करते समय बीच में ही कोई विघ्न आ पड़े, तो उसके लिये क्या करना चाहिये ?'
श्रीजीमहाराज बोले, 'जिसे जिस बात की सच्ची चाह रहती है, उसके सामने यदि बीच में ही हज़ारों विघ्न उपस्थित हो जायँ, तो भी यदि वह इनके रोकने से न रुके, तब उसकी चाह को सच्ची समझ लेना चाहिये. देखिये, हम इक्कीस वर्षों से श्रीरामानन्द स्वामी के सान्निध्य में आये हैं. यहाँ नाना प्रकार के वस्त्रों, अलंकारों और खानपान आदि द्वारा सेवा करनेवाले असंख्य भक्त मिले हैं, परन्तु हमें किसी भी पदार्थ की लिप्सा नहीं रही, क्योंकि हमें त्यागवृत्ति रखने की चाह ही बनी हुई है.
इस संसार में कितनी ही विधवा स्त्रियाँ हैं, जो अपने पतियों की मृत्यु पर उनके लिये छाती फूट-फूट कर रूदन ही करती रहती हैं. कितनी ही ऐसी स्त्रियाँ भी हैं, जो अपने विवाहित पति का भी त्याग करके भगवान
१. यद्यपि आत्यन्तिक कल्याण के हेतुरूप उन्होंने अपना सिद्धान्त बताया है, तथापि कल्याण के लिये उससे भी अधिक कोई बात सुविधाजनक हो जाय, वैसा उपाय कहेंगे, इस अभिप्राय से पूछते हैं.
२. पूर्वोक्त.
का भजन करती रहती हैं. कितने ही मूर्ख पुरुष हैं. वे अपनी स्त्रियों के मर जाने पर उनके लिये रोते रहते हैं और दूसरी स्त्रियों को पाने के लिये दौड़धूप किया करते हैं. कितने ही वैराग्यवान पुरुष ऐसे भी हैं, जो विवाहिता स्त्रियों का अपने घरों में ही परित्याग करके परमेश्वर का भी भजन करते रहते हैं. इस प्रकार, सबकी चाह भिन्न-भिन्न प्रकार की है. हमारी तो यही चाह और यही सिद्धान्त भी है कि तप द्वारा भगवान को प्रसन्न करना चाहिये, भगवान को ही सबका कर्ता हर्ता जानकर स्वामीसेवक भाव से उन परमेश्वर की भक्ति करनी चाहिये तथा भगवान की उपासना को खंडित नहीं होने देना चाहिये. इसलिए, आप सब भी हमारे इस वचन को परम सिद्धांत के रूप में मानियेगा.' ॥ इति वचनामृतम् ।।१०।। ।।१०६।।
वचनामृत ११ : प्रीति लक्षण
संवत् १८७७ में कार्तिक शुक्ल एकादशी को श्रीजीमहाराज श्रीकारियाणी ग्राम स्थित वस्ताखाचर के राजभवन में पूर्वी द्वार के कमरे के बरामदे में रात्रि के समय विराजमान थे. उन्होंने श्वेत दुपट्टा धारण किया था, सफेद छींटकी बगलबंडी पहनी थी, श्वेत पाग बाँधी थी और गुलदावदी के पीले तथा लाल पुष्पों के हार पहने थे. पाग में पीले पुष्पों के तुर्रे लटक रहे थे. उनकी दोनों तरफ दो नाई मशालें लेकर खड़े थे. उनके मुखारविन्द के समक्ष मुनियों तथा देश-देशान्तर के हरिभक्तों की सभा हो रही थी.
श्रीजीमहाराज से सच्चिदानन्द स्वामी ने प्रश्न पूछा कि 'जो पुरुष भगवान से प्रीति करता है, उसके कैसे लक्षण होते हैं ? '
श्रीजीमहाराज बोले कि 'जिसे अपने प्रियतम भगवान से प्रीति होती है, वह उनकी इच्छा के विपरीत कोई भी काम नहीं करता. प्रीति का यही लक्षण है. गोपियों को श्रीकृष्ण भगवान से प्रेम था. जब श्रीकृष्ण भगवान मथुरा जाने के लिये तैयार हुए, तब समस्त गोपियों ने मिलजुलकर यह विचार किया कि 'हम कुटुम्ब तथा संसार की लज्जा का परित्याग करके भगवान को जबरन रोक रखेंगे.' परन्तु, श्रीकृष्ण भगवान के प्रस्थान के समय गोपियों ने जब उनके नेत्रों को देखा, तब उन्हें भगवान के रहने की
* शुक्रवार, १६ नवम्बर, १८२०.
इच्छा नहीं दिखायी पड़ी. इस कारण वे डरके मारे दूर ही खड़ी रहीं और उनके अन्तःकरण में यह भय समा गया कि 'यदि हमने भगवान की इच्छा का पालन नहीं किया, तो भगवान को हमसे प्रीति नहीं रहेगी.' ऐसा विचार करके वे कुछ भी नहीं कह सकीं. भगवान मथुरा पधारे और वे केवल तीन कोस की दूरी पर ही थे, फिर भी गोपियाँ भगवान की इच्छा के विपरीत किसी भी दिन उनके दर्शनों के लिये नहीं गयीं और गोपियाँ यह समझकर चुप रहीं कि 'भगवान की मरजी के विरुद्ध यदि हम मथुरा जायेंगी, तो हमसे भगवान की प्रीति नहीं रहेगी.' प्रीति का यही स्वरूप है, जिसे जिसके साथ स्नेह होता है तो वह उसकी मरजी के अनुसार ही रहता है, ऐसा भक्त अपने प्रियतम की प्रसन्नता के लिये उनकी आज्ञा से पास में या दूर रहता है, फिर भी प्रसन्न रहता है, परन्तु किसी भी प्रकार से अपने प्रियतम की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता. प्रेम का यही लक्षण है. गोपियों को भगवान के साथ सच्चा प्रेम था. इसी कारण वे आज्ञा का उल्लंघन करके भगवान के दर्शन करने नहीं गयीं, भगवान ने जब उन्हें कुरुक्षेत्र में बुलाया, तब उन्होंने वहाँ भगवान के दर्शन किये, किन्तु उनके वचनों का उल्लंघन नहीं किया. जिसे भगवान से प्रेम होता है, वह भगवान की इच्छा के प्रतिकूल कभी भी नहीं चलता. भगवान की इच्छा के अनुसार रहना ही प्रीति का लक्षण है.'
श्रीजीमहाराज बोले कि 'अच्छा, हम एक प्रश्न पूछते हैं.'
मुनियों ने कहा कि 'हे महाराज ! पूछिये.'
श्रीजीमहाराज बोले कि 'जो भगवान का भक्त होता है, वह भगवान की मूर्ति के सम्बन्ध से रहित अन्य सम्बन्धी पंचविषयों को तुच्छ मानता है और पाँच प्रकार से एकमात्र भगवान के साथ ही सम्बन्ध रखता है. ऐसे भक्त को भगवान यह आज्ञा देते हैं कि 'तुम हमसे दूर रहो.' तब वह यदि भगवान के दर्शनों का लोभ रखता है, तो उससे आज्ञा का उल्लंघन होता है. यदि उसने भगवान की आशा का पालन नहीं किया तो उस भक्त के साथ भगवान का स्नेह नहीं रहता. इसलिए उस भक्त ने जिस प्रकार मायिक शब्दादि पंचविषयों का त्याग कर दिया है, वैसे ही क्या वह भगवान सम्बन्धी शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध का भी परित्याग कर देता है या नहीं ? '
समस्त मुनियों ने मिलकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दिया. परन्तु इस प्रश्न का समाधान नहीं हुआ. तब उन्होंने श्रीजीमहाराज से निवेदन किया कि 'हे महाराज ! इसका उत्तर आप ही दीजिये. '
श्रीजीमहाराज बोले कि 'जिसे भगवान से दृढ़ प्रीति बनी हुई है और जिसने भगवान के अखंड सम्बन्ध से रहित मायिक पंचविषयों को तुच्छ समझा है तथा जो शब्दादि पंचविषयों द्वारा भगवान के प्रति अपना ध्यान दृढ़ता से लगाये हुए है, वह भक्त भगवान की आज्ञा के अनुसार जहाँ जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ भगवान की मूर्ति भी उस भक्त के साथ ही जाती है. जैसे वह भक्त भगवान के बिना नहीं रहता, वैसे ही भगवान भी उस भक्त को छोड़कर नहीं रहते. वे भक्त के हृदय से निमिषमात्र भी दूर नहीं रहते. इस प्रकार भगवान के साथ उस भक्त का पाँचों प्रकार से अखंड सम्बन्ध बना रहता है, क्योंकि जिन शब्दादि पंचविषयों के बिना जीवमात्र से नहीं रहा जाता, उन्हें उसने तुच्छ मान लिया है तथा पाँचों प्रकार से भगवान में ही तन्मय बना हुआ है. इसलिए भगवान के साथ उस भक्त का अखंड सम्बन्ध बना रहता है. ' ॥ इति वचनामृतम् ।।११।। ।।१०७॥
वचनामृत १२ : स्थूल सूक्ष्म एवं कारण शरीर
संवत् १८७७ में कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीकारियाणी ग्राम स्थित वस्ताखाचर के राजभवन में पूर्वी द्वार के कमरे के बरामदे में पलंग पर विराजमान थे. उन्होंने सफेद दुपट्टा धारण किया था, श्वेत छींट की बगलबंडी पहनी थी और सफेद फेंटा बाँधा था और मुँह लपेटकर आकंठ दुपट्टा बाँधा था. उनके मुखारविन्द के समक्ष परमहंसों तथा देश-देशान्तर के हरिभक्तों की सभा हो रही थी.
श्रीजीमहाराज बोले कि 'प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम प्रारम्भ करिये.' मुनियों परस्पर पर्याप्त समय तक प्रश्न पूछे और उनके उत्तर दिये. इस अवसर पर स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण नामक शरीरों और विराट, सूत्रात्मा तथा अव्याकृत नामक देहों पर विचार किया गया.
श्रीजीमहाराज बोले कि 'कारण शरीर है यह जीव की माया है. वही
* मंगलवार, २० नवम्बर, १८२०.
कारण शरीर स्थूल सूक्ष्मरूप होता है. अतएव, जीव की स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण नामक तीन प्रकार की माया है. उसी तरह विराट, सूत्रात्मा और अव्याकृत ईश्वर की माया है. जीव की कारणशरीररूपी माया, जो वज्रसदृश है, किसी भी प्रकार से जीव से अलग नहीं होती. जब उस जीव को सन्त का समागम प्राप्त होता है तथा सन्त के वचनों से अलग नहीं परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान होता है, उसके आधार पर ईश्वर के स्वरूप का ध्यान करता है तथा परमेश्वर के वचनों को हृदय में धारण करता है, तब कारणरूपी शरीर जलकर खोखला सा हो जाता है, जैसे इमली के बीज का छिलका बीज के साथ बड़ी मजबूती के साथ चिपक गया हो और उसे आग में सेका जाय तब वह छिलका जल जाने से खोखला सा हो जाता है और हाथ में लेकर मसलने पर अलग हो जाता है, वैसे ही भगवान के ध्यान तथा वचनों द्वारा कारणशरीर दग्ध होकर इमली के छिलके की तरह अलग हो जाता है. उसके बिना अन्य कोटि उपाय करने पर भी कारणशरीररूपी अज्ञान का नाश नहीं होता. ' श्रीजीमहाराज ने इस प्रकार वार्ता कही.
श्रीजीमहाराज ने मुनियों से प्रश्न पूछा कि 'जाग्रत अवस्था में सात्त्विक गुण रहता है और समस्त पदार्थों का यथार्थ ज्ञान होता है, तो भी जाग्रत अवस्था में सुनी गयी बात का जब सूक्ष्म देह में मनन किया जाय तब सुनी हुई बात पक्की हो जाती है. सूक्ष्म देह में तो रजोगुण रहता है, उसमें अयथार्थ ज्ञान रहा है, फिर भी जाग्रत अवस्था में सुनी गयी बात का सूक्ष्म देह में मनन करने पर यथार्थ ज्ञान होता है, इसका क्या कारण है ?
सब मुनियों ने मिलजुलकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दिया, परन्तु श्रीजीमहाराज के प्रश्न का समाधान नहीं हुआ. तब समस्त मुनि हाथ जोड़कर बोले कि 'हे महाराज ! इस प्रश्न का उत्तर आप दीजिये. '
श्रीजीमहाराज बोले कि 'इस प्रश्न का उत्तर तो यह है कि हृदय में क्षेत्रज्ञ जीव का निवास है. वह क्षेत्रज्ञ जीव चौदह इन्द्रियों का प्रेरक है. उनमें अन्तःकरण क्षेत्रज्ञ के समीप रहता है. इसलिए, अन्तःकरण में मनन करने पर यह दृढ़ हो जाता है, क्योंकि क्षेत्रज्ञ समस्त इन्द्रियों और अन्तःकरण की अपेक्षा अधिक समर्थ रहता है, इसलिए क्षेत्रज्ञ द्वारा प्रमाणित की हुई बात अत्यन्त दृढ़ हो जाती है. इस प्रकार, इस प्रश्न का उत्तर दिया. समस्त
मुनियों ने कहा कि 'हे महाराज ! आपने यह यथार्थ उत्तर दिया है. ऐसा उत्तर कोई भी नहीं दे सकता था.
श्रीजीमहाराज बोले कि 'चाहे कैसा ही कामी, क्रोधी, लोभी और लम्पट जीव हो, वह यदि इस प्रकार की बात में विश्वास रखकर इसे प्रीतिपूर्वक सुनता है, तो उसके सभी विकार मिट जाते हैं. जैसे किसी पुरुष के दाँत पहले तो इतने मजबूत होते हैं कि वह कच्चे चने चबा जाता है, वह यदि कच्चा आम अच्छी तरह खा ले, तो भात भी चबाकर नहीं खा सकेगा, वैसे ही कामादि में आसक्त कैसा ही पुरुष क्यों न हो, वह यदि आस्तिक होकर इस वार्ता को श्रद्धापूर्वक सुनता है, तो ऐसा पुरुष विषयों के सुख को भोगने में समर्थ नहीं होता. यदि वह तप्तकृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रत द्वारा अपनी देह को कृश बना डाले, तो भी उसका मन वैसा निर्विषयी नहीं हो पाता, जैसा कि ऐसी भगवद्वार्ता सुननेवाले मनुष्य का मन निर्विषयी हो जाया करता है. जैसे ऐसी बात सुनने के बाद आप सबका मन जिस प्रकार निर्विकल्प हो जाता होगा, वैसा ध्यान करने और माला फेरते रहने से नहीं होता होगा. इसीलिए, विश्वासपूर्वक प्रीति रखकर भगवान पुरुषोत्तमनारायण की वार्ता सुनने से बढ़कर मन को स्थिर रखने और मन को निर्विषयी बनाने का अन्य कोई बड़ा साधन नहीं हो सकता.
॥ श्रीकारियाणी- प्रकरणं समाप्तम् ॥ |
bb5fe609ce27730c6f0127469f3db54ea350eaa4 | web | दक्षिण कोरियाई मोबाइल कंपनी सैमसंग बहुत जल्द भारत में सैमसंग गैलेक्सी S21 लॉन्च करने वाली है।
भारतीय बाजार में जल्द ही लोगों को नोकिया के लैपटॉप मिलेंगे। हाल ही में कंपनी के लैपटॉप्स को भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की वेबसाइट पर स्पॉट किया गया था।
बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन को किसी पहचान की जरुरत नहीं है। उन्हें एंग्री यंग मैन के रूप में जाना जाता है।
लड़का हो या लड़की, आज के समय में जींस हर किसी के वार्डरोब का अहम हिस्सा है। लेकिन बहुत से लोग जींस से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में नहीं जानते हैं, जिस कारण वे जींस पहनते समय अंजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनसे उनका लुक बिगड़ सकता है।
कोरोना वायरस महामारी से जूझ रही दुनिया को राहत पहुंचाने के लिए कई कंपनियां वैक्सीन इजाद करने में जुटी है।
बीते साल चीन से शुरू हुई कोरोना वायरस महामारी से बचाव के लिए वैक्सीन ही एकमात्र उपाय नजर आ रहा है।
ऑस्ट्रेलिया के ओपनर बल्लेबाज डेविड वॉर्नर चोटिल होकर तीसरे वनडे और टी-20 सीरीज से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह डार्सी शॉर्ट को टी-20 टीम में शामिल किया गया है।
ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म फ्लिपकार्ट ने 'फ्लिपस्टार्ट डेज' सेल की घोषणा कर दी है।
नए कृषि कानूनों को पंजाब और हरियाणा के किसान जमकर विरोध कर रहे हैं और सिंघु बॉर्डर (दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर) पर ही डटे हुए हैं।
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी में खेले गए पहले वनडे में भारतीय टीम ने तय समय से ज्यादा वक्त लिया, जिसके चलते मैच रेफरी डेविड बून ने टीम पर मैच फीस का 20 प्रतिशत जुर्माना लगाया था। हालांकि, इसके बावजूद दूसरे वनडे में भी भारतीय टीम ने स्लो ओवर रेट से गेंदबाजी की।
बदलते मौसम की वजह से क्या आप यह सोच नहीं पा रहे हैं कि ऐसा क्या बनाया जाए जो हेल्दी होने के साथ-साथ टेस्टी भी हो तो घर पर बनाएं स्टफ्ड मसाला इडली।
पिछले सप्ताह पुदुचेरी और तमिलनाडु में तबाही मचाने वाले साइक्लोन 'निवार' के बाद अब दूसरे साइक्लोन का खतरा पैदा हो गया है।
दीवाली के बाद से देश के उत्तरी और मध्य राज्यों में कोरोना संक्रमण के मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसको देखते हुए राज्यों ने सख्ती भी बरतना शुरू कर दिया है।
सर्दियों का मौसम जब आता है तो त्वचा को रूखेपन और बेजान जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) ने पिछले साल विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की शुरुआत की थी।
गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर खड़ी सरदार वल्लभ भाई पटेल की गगनचुंबी मूर्ति 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' ने केवडिया गांव के भाग्य खोल दिए हैं।
मोटोरोला ने सोमवार को भारत में अपना नया मिड रेंज स्मार्टफोन मोटो G लॉन्च कर दिया है। यह 5G नेटवर्क को सपोर्ट करता है।
बीते रविवार को सिडनी में खेले गए दूसरे वनडे मुकाबले में भारत को 51 रनों से शिकस्त झेलनी पड़ी। इसके साथ ही विराट कोहली की अगुवाई में भारतीय टीम ने टी-20 सीरीज गंवा दी।
ट्रायल के नतीजों का ऐलान होने के साथ ही अलग-अलग कंपनियों ने कोरोना वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तेजी से बढ़ते कोरोना वायरस के संक्रमण पर लगाम कसने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। विशेषज्ञों ने कोरोना संक्रमण से बचने के लिए टेस्टिंग की अहम भूमिका बताई है।
रविवार को भारत के खिलाफ दूसरे वनडे मैच में स्टीव स्मिथ का प्रदर्शन शानदार रहा था।
पैरों की देख-रेख करना उतना ही जरूरी है, जितनी आप चेहरे की करते हैं।
इन दिनों देश में किसानों के प्रदर्शन का मुद्दा सुर्खियों में छाया हुआ है।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ने रविवार को 2007 की हिट फिल्म 'अपने' के सीक्वल की घोषणा की।
साल 2020 खत्म होने जा रहा है और साल के अंत में भी कई ऑटोमोबाइल कंपनियां भारतीय बाजार में अपनी दमदार इंजन वाली कारें उतारकर धमाल मचाने के लिए तैयार हैं।
नए कृषि कानूनों को वापस लेने सहित अन्य मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों द्वारा रविवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बुराड़ी जाकर आंदोलन करने के प्रस्वात को ठुकराने के बाद गृह मंत्री ने देर रात प्रमुख मंत्रियों के साथ अहम बैठक की।
शरीर को पोषण प्रदान करने में पानी अहम भूमिका निभाता है, लेकिन आजकल बहुत से लोग व्यस्त दिनचर्या के कारण पर्याप्त मात्रा में पानी के सेवन पर ध्यान ही नहीं दे पाते हैं, जिसके कारण वे कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की चपेट में आ सकते हैं।
पिछले साल क्रिकेट विश्व कप के दौरान रविंद्र जडेजा पर किए गए कमेंट के बाद से संजय मांजरेकर बुरी तरह फंसे थे।
बिहार में रामविलास पासवान के निधन के बाद खाली हुई राज्यसभा सीट पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने अपना उम्मीदवार उतारने का मन बना लिया है।
ऑस्ट्रेलिया के ओपनर बल्लेबाज डेविड वॉर्नर चोटिल होकर तीसरे वनडे और टी-20 सीरीज से बाहर हो गए हैं। डार्सी शॉर्ट को टी-20 टीम में शामिल किया गया है, जिन्होंने अपना आखिरी मैच फरवरी 2019 में बेंगलुरु में भारत के खिलाफ था।
पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने चेन्नई के रहने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ 100 करोड़ रुपये की मानहानि का दावा किया है।
भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 94 लाख से पार हो गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को देश में कोरोना वैक्सीन पर काम कर रहीं तीन कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करेंगे।
बॉलीवुड में बिना मेक-अप आर्टिस्ट के टिक पाना लगभग नामुमकिन है। मेक-अप आर्टिस्ट ही हैं, जो किसी भी अभिनेत्री को ग्लैमरस लुक देते हैं।
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को आज किसी पहचान की जरुरत नहीं है। देश का बच्चा-बच्चा कोहली और उनके टैलेंट से परिचित है।
आज की तेज दौड़ती जिंदगी में ब्रेड हमारे खाने का एक जरूरी हिस्सा बन गए हैं क्योंकि ब्रेड दुनियाभर में बहुत ही आराम से मिलने वाली सामग्री है।
लंबे वक्त तक इंतजार के बाद अब 93वें ऑस्कर अवॉर्ड्स 2021 के लिए उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। किसी भी फिल्म को ऑस्कर से नवाजा जाना अपने-आप में सम्मान की बात है। ऐसे में सभी मेकर्स को हर साल इन अवॉर्ड्स का इंतजार रहता है।
बोलैंड पार्क में खेले गए दूसरे टी-20 मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को चार विकेट से हराकर इंग्लैंड ने टी-20 सीरीज में 2-0 की अजेय बढ़त बना ली है।
कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर चल रहे पंजाब और हरियाणा के किसानों के प्रदर्शन के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के बीच जुबानी जंग तेजी से बढ़ती जा रही है।
उत्तराखंड की राजधारी देहरादून में तेजी से बढ़ते कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए पुलिस ने सख्त कदम उठाया है।
कॉमेडी क्वीन भारती सिंह इन दिनों विवादों में फंसी दिख रही हैं। हाल ही में उन्हें और उनके निर्माता पति हर्ष लिंबाचिया के घर से गांजा बरामद होने पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने गिरफ्तार किया था।
ऑस्ट्रेलिया के ओपनिंग बल्लेबाज डेविड वॉर्नर दूसरे वनडे मैच के दौरान फील्डिंग करते हुए चोटिल हो गए।
नए कृषि कानूनों को वापस लेने तथा अपनी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बुराड़ी जाकर आंदोलन करने के प्रस्वात को ठुकरा दिया है।
बॉलीवुड अभिनेता राहुल रॉय को लेकर बड़ी खबर आई है। दरअसल, अभिनेता को ब्रेन स्ट्रोक की वजह से अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। राहुल पिछले कुछ समय अपनी आगामी फिल्म 'LAC: लाइव द बैटल' की शूटिंग में व्यस्त चल रहे थे।
बॉलीवुड से राजनीति में कदम रखने वाली अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर कर नई राजनीतिक पारी का आगाज करने जा रही है। इसके लिए वह सोमवार को महाराष्ट्र में सत्तारुढ़ शिवसेना का दामन थामेंगी।
हल्की धूप और सुहाना मौसम सर्दियों में अपने साथ ऐसी ही कई बहारें लेकर आता है, इसलिए कई लोग इस मौसम का इंतजार बेसबरी से करते हैं।
ऑस्ट्रेलिया ने दूसरे वनडे में भारत को 51 रनो से हराते हुए वनडे सीरीज में 2-0 की अजेय बढ़त हासिल कर ली है।
छोटे पर्दे का सबसे विवादित रियलिटी शो 'बिग बॉस 14' में हर दिन हैरान करने वाले ट्वीस्ट देखने को मिल रहे हैं। इसी के साथ दर्शकों की उत्सुकता भी काफी बढ़ती जा रही है।
पर्यावरण को मजबूत बनाने की मुहिम में सहयोग करने के लिए भारतीय रेलवे ने बड़ा फैसला किया है।
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले वनडे में 375 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत को 66 रन से हार झेलनी पड़ी थी।
अफगानिस्तान में आतंकी हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। आतंकी आए दिन यहां धार्मिक स्थलों सहित सुरक्षा बलों पर हमले कर रहे हैं।
कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में इन कानूनों के फायदे बताकर किसानों को मनाने की कोशिश की।
यह साल हर किसी के लिए जैसे काल बनकर आया है। फिल्मी हस्तियों को भी 2020 में कई बुरी चीजें देखने को मिली है। अब खबर आई है कि अभिनेत्री दिव्या भटनागर भी इस समय गंभीर स्थिति में हैं।
उत्तर प्रदेश में जबरन धर्म परिवर्तन के मामले में कार्रवाई शुरू हो गई है। सरकार की ओर से गत दिनों पास किए गए 'विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020' को शरिवार को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद बरेली पुलिस ने इस सबंध में पहला मामला दर्ज कर लिया है।
स्टीव स्मिथ टेस्ट में वर्तमान समय में दुनिया के बेस्ट बल्लेबाजों में से एक हैं।
हैदराबाद नगर निगम के चुनाव इस बार राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं और इसकी एक वजह भाजपा का इन चुनावों में पूरी ताकत झोंक देना है। देश की सत्ता पर काबिज भाजपा ने नगर निगम स्तर के इस चुनाव में गृह मंत्री अमित शाह से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक अपने तमाम स्टार प्रचारकों को उतार दिया है।
बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार वाजिद खान ने इसी साल जून में हमेशा के लिए अपनी आंखे मूंद ली। अब उनके निधन के पांच महीने बाद उनकी पत्नी कमालरुख खान ने वाजिद के परिवार पर कुछ गंभीर आरोप लगाते हुए सभी को हैरान कर दिया है।
भारत के खिलाफ दूसरे वनडे में स्टीव स्मिथ ने लगातार दूसरा शतक लगाया है।
न्यूजीलैंड दौरे पर गए पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान बाबर आजम मुश्किलों में फंस संकते हैं।
शनिवार रात छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों द्वारा किए गए IED बम विस्फोट में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक अधिकारी शहीद हो गए, वहीं नौ अन्य जवान घायल हुए हैं।
बे ओवल में खेले गए दूसरे टी-20 मुकाबले में न्यूजीलैंड ने वेस्टइंडीज को 72 रनों से हरा दिया है।
कोरोना वायरस महामारी की शुरूआत से पहले खुला घूमने के आदी लोगों को अब फेस मास्क लगाकर घूमना पड़ रहा है और वे इससे निजात पाने के लिए जल्द से जल्द वैक्सीन आने का इंतजार कर रहे हैं।
भारत में बीते दिन कोरोना वायरस से संक्रमण के 41,810 नए मामले सामने आए और 496 मरीजों ने इसकी वजह से दम तोड़ा।
गृह मंत्री अमित शाह ने कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों के सामने सशर्त बातचीत का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा है कि अगर किसान सरकार द्वारा प्रदान किए गए बुराड़ी के निरंकारी समागम मैदान में शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने को तैयार हो जाते हैं तो सरकार अगले ही दिन उनसे बातचीत कर लेगी।
29 नवंबर को दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच दूसरा टी-20 मैच खेला जाएगा।
बॉलीवुड की कुछ फिल्मों में मुख्य कैरेक्टर सामान्य होते हैं, तो कुछ फिल्मों के पात्र दिव्यांग होते हैं।
कार निर्माता कंपनी स्कोडा इंडिया के निदेशक जैक हॉलिस ने घोषणा कर बताया कि साल 2021 की दूसरी तिमाही में कंपनी भारत में अपनी सेडान कार ऑक्टेविया फेसलिफ्ट लॉन्च करने वाली है।
सर्दियों में सिर्फ खुद को ठंड से बचाने के लिए बहुत सी महिलाएं कई तरह की टिप्स और हैक्स को अपनाती हैं।
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3166096a7bc1bed44ea71467d5d379b6628881f421faa3e7c4b82366a721ba90 | pdf | ४. फोसणाणुगमो
फोसणाणुगमेण दुविहो णिसो ओघेण आदेसेण य ॥ १ ॥
स्पर्शनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-- ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश ॥ १ ॥ नामम्पर्शन, स्थापनास्पर्शन, द्रव्यस्पर्शन, क्षेत्रस्पर्शन, कालम्पर्शन और भावस्पर्शनके भेदसे स्पर्शन छह प्रकारका है। उनमें 'स्पर्शन' यह शब्द नामस्पर्शन निक्षेप है । 'यह वह है ' इस प्रकारकी बुद्धिसे एक द्रव्यके साथ अन्य द्रव्यका एकत्व स्थापित करना स्थापनास्पर्शन निक्षेप है। जैसे- घट, पिठर ( पात्रविशेष ) आदिकमें 'यह ऋषभ है, यह अजित है, यह अभिनन्दन है, इत्यादि । द्रव्यस्पर्शन निक्षेप दो प्रकारका है- आगमद्रव्यस्पर्शन निक्षेप और नोआगमद्रव्यस्पर्शन निक्षेप । उनमें स्पर्शनविषयक प्राभृतका जानकार होकर वर्तमानमें तद्विषयक उपयोगसे रहित जीव आगमद्रव्यस्पर्शन निक्षेप है। नोआगमद्रव्यस्पर्शन निक्षेप ज्ञायकशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्तके भेदसे तीन प्रकारका है। उनमें ज्ञायकशरीर नोआगमद्रव्यस्पर्शन भावी, वर्तमान और समुज्झितके भेदसे तीन प्रकारका है । जो जीव भविष्य में स्पर्शनप्राभृतका जानकार होनेवाला है उसे भावी नोआगमद्रव्यम्पर्शन कहते हैं । तद्द्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यम्पर्शन सचित्त, अचित्त और मिश्रके भेदसे तीन प्रकारका है । सचित्त द्रव्योंका जो परस्पर संयोग होता है वह सचित्त द्रव्यस्पर्शन कहलाता है । अचित्त द्रव्योंका जो परस्परमें संयोग होता है वह अचित्त द्रव्यस्पर्शन कहलाता है। चेतन अचेतनस्वरूप छहों द्रव्योंके संयोगसे निष्पन्न होनेवाला मिश्र द्रव्यस्पर्शन उनसठ (५९) भेदोंमें विभक्त है ।
शेष द्रव्योंका आकाश द्रव्यके साथ जो संयोग होता है वह क्षेत्रस्पर्शन कहा जाता है । काल द्रव्यका अन्य द्रव्योंके साथ जो संयोग है उसका नाम कालस्पर्शन है। भावस्पर्शन आगम और नोआगमके भेदसे दो प्रकारका है । स्पर्शनप्राभृतका जानकार होकर जो जीव वर्तमानमें तद्विषयक उपयोगसे सहित है उसको आगमभावस्पर्शन कहते हैं। स्पर्शगुणसे परिणत पुद्गल द्रव्यको नोआगमभावस्पर्शन कहते हैं ।
उपर्युक्त छह प्रकारके स्पर्शनोंमेंसे यहांपर जीवद्रव्य सम्बन्धी क्षेत्रस्पर्शनसे प्रयोजन है। जो भूत कालमें स्पर्श किया गया है और वर्तमानमें स्पर्श किया जा रहा है उसका नाम स्पर्शन है। स्पर्शनके अनुगमको स्पर्शनानुगम कहते हैं । निर्देश, कथन और व्याख्यान ये तीनों समानार्थक शब्द हैं। स्पर्शनानुगमकी अपेक्षा वह निर्देश ओधनिर्देश और आदेशके भेदसे दो प्रकारका है ।
ओघेण मिच्छादिड्डीहि केवडियं खेतं फोसिदं १ सन्त्रलोगो ॥ २ ॥
ओघसे मिथ्यादृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? सर्व लोक स्पर्श किया है ॥ २ ॥
इससे पूर्व क्षेत्रानुयोगद्वारमें समस्त मार्गणास्थानोंका अवलम्बन लेकर सब ही गुणस्थानों सम्बन्धी वर्तमान कालविशिष्ट क्षेत्रकी प्ररूपणा की जा चुकी है। अब इस अनुयोगद्वार में पूर्वोक्त वर्तमान कालविशिष्ट क्षेत्रका स्मरण कराते हुए उन्हीं चौदह मार्गणाओंका अवलम्बन लेकर सब गुणस्थानों सम्बन्धी अतीत कालविशिष्ट क्षेत्रकी प्ररूपणा की जाती है। यथा सामान्य से सभी मिथ्यादृष्टि जीवोंने अतीत कालमें सर्व लोकका स्पर्श किया है। विशेषकी अपेक्षा स्वस्थानस्वस्थान, वेदना, कषाय व मारणान्तिक समुद्घातगत और उपपादपदगत मिथ्यादृष्टि जीवोंने अतीत और वर्तमान कालमें सर्व लोक स्पर्श किया है। बिहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिकसमुद्वातगत मिथ्यादृष्टि जीवोंने वर्तमान काल में सामान्य लोक आदि तीन लोकोंका असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोकका संख्यातवां भाग और अढ़ाईद्वीपसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। अतीत कालकी अपेक्षा उन्होंने कुछ कम आठ बटे चौदह ( ₹४ ) राजु क्षेत्र स्पर्श किया है । वह इस प्रकारसे लोकनालीके चौदह खण्ड करके मेरु पर्वतके मूल भागसे नीचेके दो खंडोको और ऊपरके छह खंडोंको एकत्रित करनेपर आठ बटे चौदह भाग हो जाते हैं। ये चूंकि तीसरी पृथिवीके नीचेके एक हजार योजनोंसे हीन होते हैं, इसीलिये कुछ कम कहा है ।
सासणसम्मादिठ्ठीहि केवडियं खत्तं फोसिदं ? लोगस्म असंखेज्जदिभागो ॥ ३ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ ३ ॥
स्वस्थान स्वस्थान, विहारत्रत्वस्थान, वेदना, कषाय, वैकियिक और मारणान्तिक समुद्वातगत तथा उपपादपदगत मासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने वर्तमान कालमें सामान्य लोक आदि चार लोकोंका असंख्यातवां भाग तथा मनुष्यलोकसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है ।
अट्ठ बारह चोहसभागा वा देखणा ।। ४ ।।
सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग ( ४ ) तथा कुछ कम बारह बटे चौदह भाग ( १ ) प्रमाण क्षेत्र स्पर्श किया है ॥ ४ ॥
स्वस्थानस्वस्थान पदगत सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने अतीत कालमें सामान्य लोक आदि तीन लोकोंका असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोकका संख्यातवां भाग और मनुष्यलोकसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। बिहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैकियिक समुद्धातगत सासाइनसम्यग्दृष्टियोंने कुछ कम बारह भाग ( १३ ) प्रमाण क्षेत्रको स्पर्श किया है। वह इस प्रकार - सुमेरुके मूल भागसे लेकर ऊपर ईपत्प्राग्भार पृथिवी तक सात राजु और उसके नीचे छठी पृथिवी तक पांच राजु होते हैं । इन दोनोंको मिला देनेपर सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंक मारणान्तिक क्षेत्रकी लम्बाई हो जाती है। उपपादगत सासाइनसम्यग्दृष्टियोंने कुछ कम ग्यारह बटे चौदह ( ३४ ) भाग स्पर्श किये हैं। वह इस प्रकारसे- मेरुतलसे छठी पृथिवी तक पांच राजु और उसके ऊपर आरण-अच्युत कल्प
फोसणाणुगमे ओघणिदेसो
तक छह राजु इस प्रकार लोकनालीके चौदह भागोंमेंसे ग्यारह भाग प्रमाण उनका उपपादक्षेत्र हो जाता है।
सम्मामिच्छाइडि- असंजदसम्माइठ्ठीहि केवडियं खेतं फोसिदं १ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ५ ॥
सम्यग्मिय्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ ५ ॥
स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्धात और वैक्रियिक समुद्धातगत सम्यग्मिय्यादृष्टि जीवोंने वर्तमान कालमें सामान्य लोक आदि चार लोकोंका असंख्यातवां भाग और मनुष्यक्षेत्रसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, बेदनासमुद्धात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्धात मारणान्तिकसमुद्धात और उपपादको प्राप्त असंयतसम्यग्दृष्टि जीत्रोंका स्पर्शन क्षेत्रप्ररूपणाके समान जानना चाहिये ।
अट्ठ चोहसभागा वा देणा ।। ६ ।।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंगतसम्यग्दृष्टि जीवोंने अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ॥ ६ ॥
स्वस्थानगत सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंने सामान्य लोक आदि तीन लोकोंका असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोकका संख्यतवां भाग और मनुष्यलोकसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। बिहारवत्स्वस्थान, बेदना, कषाय और वैकियिक समुद्घातगत सम्यग्मिध्यादृष्टियोंने कुछ कम आठ बटे चौदह भाग ( ) स्पर्श किये हैं। स्वस्थानगत असंयतसम्यग्दृष्टियोंने सामान्य लोक आदि तीन लोकोंका असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोकका संख्यातवां भाग और मनुष्यलोकसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कपाय, वैकियिक और मारणान्तिक समुद्धातगत उन्हीं असंयतसम्यग्दृष्टियोंने कुछ कम आठ बटे चौदह भाग (४) भाग (मेरुके ऊपर छह राजु और नीचे दो राजु ) स्पर्श किये हैं । उपपाश्गत उक्त जीवोंने कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं। इसका कारण यह है कि असंगतसम्यग्दृष्टि जीवोंका उपपाद क्षेत्र उसके नीचे नहीं पाया जाता है।
संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ७ ॥ संयतासंयत जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ ७ ॥
छ चोदसभागा वा देखणा ॥ ८ ॥
संयतासंयत जीवोंने अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ।
स्वस्थानखस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैऋियिक समुद्घातगत संयतासंयतोंने सामान्य लोक आदि तीन लोकोंका असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोकका संख्यातवां भाग और मनुष्यक्षेत्रसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। मारणान्तिकसमुद्घातगत संयतासंयतोंने कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ।
पमतसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ९ ॥
प्रमत्तसंपत गुणस्थानसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ ९ ॥
स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात कपायसमुद्घात, वैक्रियिक समुद्घात, तैजससमुद्घात और आहारकसमुद्घातगत प्रमत्तसंयतादि गुणस्थानवर्ती जीवोंने सामान्य लोक आदि चार लोकोंका असंख्यातवां भाग और मनुष्यलोकका संख्यातवां भाग स्पर्श किया है । तथा मारणान्तिकसमुद्घातगत प्रमत्तसंयतादि जीवोंने सामान्य लोक आदि चार लोकोंका असंख्यातवां भाग और मनुष्यलोकसे असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है ।
सजोगिकेवलीहि केवडियं खेतं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जा वा भागा सव्वलोगो वा ॥ १० ॥
सयोगिकेवली जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है : लोकका असंख्यातवां भाग असंख्यात बहुभाग और सर्व लोक स्पर्श किया है ॥ १० ॥
आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ११ ॥
आदेशकी अपेक्षा गतिमार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है। लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ ११ ॥
छ चोद्दसभागा वा देखणा ॥ १२ ॥
नारकी मिथ्यादृष्टि जीवोंने अतीत कालकी अपेक्षा कुछ ( देशोन ३००० यो. ) कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ॥ १२ ॥
यह स्पर्शनका प्रमाण मारणान्तिकसमुवातगत और उपपादगत नारक मिथ्यादृष्टि जीवोंका समझना चाहिये ।
सासणसम्मादिठ्ठीहि केवडियं खेतं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १३ ॥ सासादन सम्यग्दृष्टि नारकियोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ १३ ॥
फोगाणुगमे मंदिमम्गणा
पंच चोदसभागा वा देखणा ॥ १४ ॥
उन्हीं सासादनसम्यग्दृष्टि नारकियोंने अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम पांच बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ॥ १४ ॥
सम्मामिच्छादिङि- असंजदसम्मादिड्डीहि केवडियं खेतं फोसिदं १ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १५ ॥
सम्यग्मिध्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ १५ ॥
पढमाए पुढवीए णेरइएसु मिच्छाइट्टिप्पहुडि जाब असंजदसम्मादिड्डीहि केवडियं खेतं फोसिदं १ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ।। १६ ।।
प्रथम पृथिवीस्थ नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक नारकी जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ १६ ॥ बिदियादि जाव छडीए पुढवीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिठ्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १७ ॥
द्वितीय पृथिवीसे लेकर छठी पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवीके नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है। एग वे तिष्णि चत्तारि पंच चोहसभागा वा देसूणा ॥ १८ ॥
मारणान्तिकसमुद्धात और उपपादगत उक्त नारकी जीवोंने अतीत कालकी अपेक्षा यथाक्रमसे चौदह भागोमेंसे कुछ कम एक, दो, तीन, चार और पांच भाग स्पर्श किये हैं ॥ १८ ॥ सम्मामिच्छादि ट्ठि-असंजदसम्मादिठ्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? असंखेज्जदिभागो ॥ १९ ॥
द्वितीय पृथिवीसे लेकर छठी पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवीक सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है । सत्तमीए पुढवीए णेरइएस मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ २० ॥
सातवीं पृथिवीस्थ नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ २० ॥
छ चोदसभागा वा देखणा ।। २१ ।।
सातवीं पृथिवीके मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादगत मिथ्यादृष्टि नारकियोंने अतीत |
23933a91f84d73bfcb5d5a3779a87af8661ed494 | web | स्वतंत्रता पर, अफ्रीकी देशों को यह तय करना पड़ा कि किस प्रकार की स्थिति स्थापित की जानी चाहिए, और 1 9 50 और 1 9 80 के दशक के मध्य के दौरान, अफ्रीका के पांच देशों ने कुछ समय पर समाजवाद अपनाया था। 1 इन देशों के नेताओं का मानना था कि समाजवाद ने इन नए राज्यों को स्वतंत्रता पर सामना करने वाली कई बाधाओं को दूर करने का अपना सर्वश्रेष्ठ मौका दिया था। प्रारंभ में, अफ्रीकी नेताओं ने समाजवाद के नए, संकर संस्करण बनाए, जिन्हें अफ्रीकी समाजवाद के रूप में जाना जाता था, लेकिन 1 9 70 के दशक तक, कई राज्य समाजवाद की अधिक रूढ़िवादी धारणा को बदल गए, जिसे वैज्ञानिक समाजवाद के रूप में जाना जाता है।
अफ्रीका में समाजवाद की अपील क्या थी, और अफ्रीकी समाजवाद ने वैज्ञानिक समाजवाद से क्या अलग किया?
समाजवाद विरोधी शाही था। समाजवाद की विचारधारा स्पष्ट रूप से विरोधी शाही है। जबकि यूएसएसआर (जो 1 9 50 के दशक में समाजवाद का चेहरा था) तर्कसंगत रूप से एक साम्राज्य था, इसके प्रमुख संस्थापक, व्लादिमीर लेनिन ने 20 वीं शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध साम्राज्य ग्रंथों में से एक लिखाः साम्राज्यवादः पूंजीवाद का सर्वोच्च चरण । इस काम में, लेनिन ने न केवल उपनिवेशवाद की आलोचना की बल्कि तर्क दिया कि साम्राज्यवाद से लाभ यूरोप के औद्योगिक श्रमिकों को 'खरीद' देगा। मजदूरों की क्रांति, उन्होंने निष्कर्ष निकाला, उन्हें दुनिया के गैर-औद्योगिकीकृत, अविकसित देशों से आना होगा। साम्राज्यवाद के लिए समाजवाद का विरोध और अविकसित देशों में क्रांति के वादे ने 20 वीं शताब्दी में दुनिया भर में औपनिवेशिक राष्ट्रवादियों के लिए अपील की।
समाजवाद ने पश्चिमी बाजारों के साथ तोड़ने का एक तरीका पेश किया। वास्तव में स्वतंत्र होने के लिए, अफ्रीकी राज्यों को न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की आवश्यकता थी। लेकिन अधिकांश उपनिवेशवाद के तहत स्थापित व्यापार संबंधों में फंस गए थे। यूरोपीय साम्राज्यों ने प्राकृतिक संसाधनों के लिए अफ्रीकी उपनिवेशों का उपयोग किया था, इसलिए, जब उन राज्यों ने आजादी हासिल की तो उन्हें उद्योगों की कमी थी। अफ्रीका में प्रमुख कंपनियां, जैसे कि खनन निगम संघ मिनीरेर डु हौट-कटंगा, यूरोपीय-आधारित और यूरोपीय स्वामित्व वाली थीं। समाजवादी सिद्धांतों को गले लगाकर और समाजवादी व्यापार भागीदारों के साथ काम करके, अफ्रीकी नेताओं ने औपनिवेशिक बाजारों से बचने की उम्मीद की थी कि उपनिवेशवाद ने उन्हें छोड़ दिया था।
1 9 50 के दशक में, समाजवाद स्पष्ट रूप से एक सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड था। जब रूसी क्रांति के दौरान 1 9 17 में यूएसएसआर का गठन हुआ, तो यह छोटे उद्योग के साथ एक कृषि राज्य था। इसे पिछड़े देश के रूप में जाना जाता था, लेकिन 30 साल से भी कम समय में, यूएसएसआर दुनिया में दो महाशक्तियों में से एक बन गया था। निर्भरता के अपने चक्र से बचने के लिए, अफ्रीकी राज्यों को अपने बुनियादी ढांचे को औद्योगिकीकृत और आधुनिकीकरण करने की आवश्यकता थी, और अफ्रीकी नेताओं ने आशा व्यक्त की कि समाजवाद का उपयोग करके अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं की योजना बनाने और उन्हें नियंत्रित करके वे कुछ दशकों के भीतर आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी, आधुनिक राज्य बना सकते हैं।
समाजवाद पश्चिम की व्यक्तिगत पूंजीवाद की तुलना में अफ्रीकी सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंडों के साथ अधिक प्राकृतिक फिट की तरह लग रहा था। कई अफ्रीकी समाज पारस्परिकता और समुदाय पर बहुत अधिक जोर देते हैं। उबंटू का दर्शन, जो लोगों की जुड़ी प्रकृति पर जोर देता है और आतिथ्य या देने को प्रोत्साहित करता है, अक्सर पश्चिम के व्यक्तित्व से अलग होता है, और कई अफ्रीकी नेताओं ने तर्क दिया कि इन मूल्यों ने समाजवाद को पूंजीवाद की तुलना में अफ्रीकी समाजों के लिए बेहतर फिट बनाया है।
एक पार्टी के समाजवादी राज्यों ने एकता का वादा किया। आजादी पर, कई अफ्रीकी राज्य विभिन्न समूहों (चाहे धार्मिक, जातीय, पारिवारिक, या क्षेत्रीय) के बीच राष्ट्रवाद की भावना स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, जो उनकी आबादी बनाते थे। समाजवाद ने राजनीतिक विपक्ष को सीमित करने के लिए एक तर्क दिया, जो नेताओं - यहां तक कि पहले उदारवादी - राष्ट्रीय एकता और प्रगति के लिए एक खतरे के रूप में देखने के लिए आए थे।
Decolonization से पहले दशकों में, स्वतंत्रता से पहले दशकों में लियोपोल्ड सेनोर जैसे कुछ अफ्रीकी बुद्धिजीवियों को समाजवाद के लिए आकर्षित किया गया था। सेनगर ने कई प्रतिष्ठित समाजवादी कार्यों को पढ़ा लेकिन पहले से ही समाजवाद का एक अफ्रीकी संस्करण प्रस्तावित कर रहा था, जो 1 9 50 के दशक की शुरुआत में अफ्रीकी समाजवाद के रूप में जाना जाने लगा।
कई अन्य राष्ट्रवादी, जैसे भविष्य के राष्ट्रपति गिनी, अहमद सेको टूर , ट्रेड यूनियनों में भारी शामिल थे और श्रमिकों के अधिकारों की मांग करते थे। इन राष्ट्रवादियों को अक्सर सेनघोर जैसे पुरुषों की तुलना में बहुत कम शिक्षित किया गया था, और कुछ लोगों ने समाजवादी सिद्धांत को पढ़ने, लिखने और बहस करने का अवकाश लिया था। मजदूरी के लिए उनके संघर्ष और नियोक्ताओं से बुनियादी सुरक्षा ने उन्हें सामाजिकता को आकर्षक बना दिया, विशेष रूप से संशोधित समाजवाद के प्रकार जो सेनघोर जैसे पुरुषों ने प्रस्तावित किया।
यद्यपि अफ्रीकी समाजवाद यूरोपीय, या मार्क्सवादी, समाजवाद से कई मामलों में अलग था, फिर भी यह उत्पादन के साधनों को नियंत्रित करके सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को हल करने की कोशिश करने के बारे में अनिवार्य रूप से था। समाजवाद ने बाजार और वितरण के राज्य नियंत्रण के माध्यम से अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए औचित्य और रणनीति दोनों प्रदान की।
राष्ट्रपतियों, जिन्होंने वर्षों से संघर्ष किया था और कभी-कभी दशकों के पश्चिम में प्रभुत्व से बचने के लिए कोई दिलचस्पी नहीं थी, हालांकि, यूएसएसआर के अधीन होने में वे विदेशी राजनीतिक या सांस्कृतिक विचारों को भी नहीं लेना चाहते थे; वे अफ्रीकी सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं को प्रोत्साहित करना और बढ़ावा देना चाहते थे। इसलिए, नेताओं ने आजादी के कुछ ही समय बाद समाजवादी शासन शुरू किए - जैसे सेनेगल और तंजानिया में - मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों को पुनः पेश नहीं किया। इसके बजाए, उन्होंने समाजवाद के नए, अफ्रीकी संस्करणों को विकसित किया, जिन्होंने कुछ पारंपरिक संरचनाओं का समर्थन किया, जबकि यह घोषणा करते हुए कि उनके समाज थे - और हमेशा वर्गीकृत थे।
समाजवाद के अफ्रीकी रूपों ने भी धर्म की कहीं अधिक स्वतंत्रता की अनुमति दी। कार्ल मार्क्स ने धर्म को "लोगों का अफीम" कहा, समाजवाद के 2 और अधिक रूढ़िवादी संस्करण अफ्रीकी समाजवादी देशों की तुलना में कहीं अधिक धर्म का विरोध करते थे। अधिकांश अफ्रीकी लोगों के लिए धर्म या आध्यात्मिकता बहुत महत्वपूर्ण थी और अफ्रीकी समाजवादियों ने धर्म के अभ्यास को सीमित नहीं किया था।
अफ्रीकी समाजवाद का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण जूलियस न्येरेरे की उज्मामा या विद्रोह की कट्टरपंथी नीति थी , जिसमें उन्होंने प्रोत्साहित किया, और बाद में लोगों को मॉडल गांवों में जाने के लिए मजबूर कर दिया ताकि वे सामूहिक कृषि में भाग ले सकें।
वह नीति, उसने महसूस किया, कई समस्याओं को एक साथ हल करेगा। इससे तंजानिया की ग्रामीण आबादी को इकट्ठा करने में मदद मिलेगी ताकि वे शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसे राज्य सेवाओं से लाभ उठा सकें। उनका यह भी मानना था कि यह आदिवासीवाद को दूर करने में मदद करेगा जो कई औपनिवेशिक राज्यों को बेदखल कर देता है, और वास्तव में, तंजानिया ने उस विशेष समस्या से काफी हद तक बच निकला था।
हालांकि, उजामा का कार्यान्वयन दोषपूर्ण था। राज्य द्वारा आगे बढ़ने के लिए मजबूर किए गए कुछ लोगों ने इसकी सराहना की, और कुछ को समय पर आगे बढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसका मतलब था कि उन्हें उस वर्ष की फसल के साथ पहले से बोए गए खेतों को छोड़ना पड़ा था। खाद्य उत्पादन गिर गया, और देश की अर्थव्यवस्था का सामना करना पड़ा। सार्वजनिक शिक्षा के मामले में प्रगति हुई थी, लेकिन तंजानिया तेजी से अफ्रीका के गरीब देशों में से एक बन गया था, जो विदेशी सहायता से दूर था। यह केवल 1 9 85 में था, हालांकि न्येरेरे सत्ता से नीचे उतर गए और तंजानिया ने अफ्रीकी समाजवाद के साथ अपने प्रयोग को त्याग दिया।
उस बिंदु तक, अफ्रीकी समाजवाद लंबे समय से प्रचलित था। वास्तव में, 1 9 60 के दशक के मध्य में अफ्रीकी समाजवाद के पूर्व समर्थक इस विचार के खिलाफ पहले ही शुरू हो रहे थे। 1 9 67 में एक भाषण में, क्वाम नेक्रुमा ने तर्क दिया कि "अफ्रीकी समाजवाद" शब्द उपयोगी होने के लिए बहुत अस्पष्ट हो गया था। प्रत्येक देश का अपना संस्करण था और अफ्रीकी समाजवाद क्या था इस पर कोई सहमति नहीं थी।
अंकुरा ने यह भी तर्क दिया कि पूर्व औपनिवेशिक युग के बारे में मिथकों को बढ़ावा देने के लिए अफ्रीकी समाजवाद की धारणा का उपयोग किया जा रहा था। उन्होंने सही तर्क दिया कि अफ्रीकी समाज वर्गीकृत यूटोपिया नहीं थे, बल्कि उन्हें विभिन्न प्रकार के सामाजिक पदानुक्रमों द्वारा चिह्नित किया गया था, और उन्होंने अपने दर्शकों को याद दिलाया कि अफ्रीकी व्यापारियों ने स्वेच्छा से दास व्यापार में भाग लिया था ।
पूर्व औपनिवेशिक मूल्यों पर थोक वापसी, उन्होंने कहा, अफ्रीकी की जरूरत नहीं थी।
नक्कुमा ने तर्क दिया कि अफ्रीकी राज्यों को जो करना है वह अधिक रूढ़िवादी मार्क्सवादी-लेनिनवादी समाजवादी आदर्शों या वैज्ञानिक समाजवाद में लौट आया था, और 1 9 70 के दशक में इथियोपिया और मोजाम्बिक जैसे कई अफ्रीकी राज्यों ने यही किया था। अभ्यास में, हालांकि, अफ्रीकी और वैज्ञानिक समाजवाद के बीच कई अंतर नहीं थे।
वैज्ञानिक समाजवाद ने अफ्रीकी परंपराओं और समुदाय की परंपरागत धारणाओं के उदारता से विवाद किया, और रोमांटिक शर्तों के बजाय मार्क्सवादी में इतिहास की बात की। अफ्रीकी समाजवाद की तरह, हालांकि, अफ्रीका में वैज्ञानिक समाजवाद धर्म का अधिक सहनशील था, और अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के कृषि आधार का अर्थ था कि वैज्ञानिक समाजवादियों की नीतियां अफ्रीकी समाजवादी की तुलना में अलग नहीं हो सकतीं। अभ्यास से विचार और संदेश में यह एक और बदलाव था।
आम तौर पर, अफ्रीका में समाजवाद ने 1 9 8 9 में यूएसएसआर के पतन को पार नहीं किया। यूएसएसआर के रूप में एक वित्तीय समर्थक और सहयोगी का नुकसान निश्चित रूप से इसका एक हिस्सा था, लेकिन कई अफ्रीकी राज्यों को ऋण के लिए भी आवश्यकता थी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से। 1 9 80 के दशक तक, इन संस्थानों को राज्यों को उत्पादन और वितरण पर राज्य एकाधिकार जारी करने और ऋण से सहमत होने से पहले उद्योग को निजीकृत करने की आवश्यकता थी।
समाजवाद का उदारता भी पक्ष से बाहर हो रहा था, और बहु-पार्टी राज्यों के लिए आबादी आ गई। बदले में बंधे हुए, अधिकांश अफ्रीकी राज्य जिन्होंने समाजवाद को एक रूप में गले लगा लिया था या दूसरे ने 1 99 0 के दशक में अफ्रीका भर में बहु-पार्टी लोकतंत्र की लहर को गले लगा लिया था। विकास अब राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्थाओं के बजाय विदेशी व्यापार और निवेश के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन कई लोग सामाजिक शिक्षा, वित्त पोषित स्वास्थ्य देखभाल और विकसित परिवहन प्रणालियों जैसे सामाजिक आधारभूत संरचनाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, दोनों समाजवाद और विकास ने वादा किया था।
1. पिचर, एम। ऐनी, और केली एम Askew। "अफ्रीकी समाजवाद और postocialisms। " अफ्रीका 76. 1 (2006) अकादमिक वन फ़ाइल।
2. कार्ल मार्क्स, हेगेल के फिलॉसफी ऑफ राइट , (1843) की आलोचना में योगदान के लिए परिचय, मार्क्सवादी इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है ।
अतिरिक्त स्रोतः
Nkrumah, Kwame। मार्कीवादी इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध डोमिनिक ट्वीडेई (1 9 67) द्वारा लिखित अफ्रीका सेमिनार, काहिरा में दिए गए भाषण "अफ्रीकी समाजवाद पुनर्वितरण" ।
थॉमसन, एलेक्स। अफ्रीकी राजनीति का परिचय । लंदन, जीबीआरः रूटलेज, 2000।
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827992ab2038f588bb092dd64848278a9dcbaf1d | web | - कारणः तीव्र गुर्दे की विफलता क्यों है?
- तीव्र गुर्दे की विफलता को रोकने के लिए क्या संभव है?
फिल्टर और उत्सर्जक उपकरण का कार्य कुछ घंटों के भीतर तेजी से खराब हो सकता है या पूरी तरह विफल हो सकता है। यह कैसे है और क्या किया जाना है? इस आलेख में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं!
- सावधानीः कुछ दवाओं ने गुर्दे पर भारी तनाव डाला।
तीव्र गुर्दे की विफलता घंटों के दिनों में होने वाले गुर्दे की क्रिया का मुख्य रूप से उलटा गिरावट है, जो मृत्यु दर में वृद्धि के साथ जुड़ा हुआ है। तत्काल उपचार आवश्यक है।
तीव्र गुर्दे की विफलता शब्द (तीव्र गुर्दे की कमी) एक क्षणिक, अचानक अपर्याप्त या पूरी तरह असफल गुर्दे समारोह को संदर्भित करता है। नतीजतन, शरीर में कोई अधिक उत्सर्जित विषाक्त पदार्थ जमा नहीं होते हैं। मूत्र उत्पादन सामान्य या कम या यहां तक कि पूरा हो सकता है।
विसर्जन की अनुपस्थिति में शरीर में महत्वपूर्ण जल प्रतिधारण हो सकता है। तीव्र गुर्दे की विफलता पुरानी गुर्दे की विफलता का कारण बन सकती है। 100,000 निवासियों में से 18 से 30 तीव्र गुर्दे की विफलता से पीड़ित हैं।
तीव्र गुर्दे की विफलता में, उत्सर्जित मूत्र की मात्रा रोग की प्रगति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है। तीव्र गुर्दे की विफलता के सबसे आम रूप में, मंच के आधार पर, मूत्र की मात्रा प्रति दिन 1.5 लीटर (एन) की सामान्य मात्रा से काफी भिन्न हो सकती है।
- चरण I: एक अंतर्निहित बीमारी गुर्दे को नुकसान पहुंचाती है। पेशाब की मात्रा प्रति दिन लगभग 500 मिलीलीटर है।
- चरण II: नौ से ग्यारह दिनों के बाद, मूत्र की मात्रा 500 मिलीलीटर प्रति दिन से कम है। मूत्र परीक्षण मूत्र में प्रोटीन और रक्त पैदा करते हैं। यह हृदय संबंधी एराइथेमिया, तीव्र अतिसंवेदनशीलता और मांसपेशी कमजोरियों का कारण बन सकता है।
- चरण III: दो से तीन सप्ताह के भीतर, मूत्र विसर्जन दैनिक दो लीटर से अधिक हो जाता है।
- चरण IV: रेनल फ़ंक्शन यथासंभव सामान्यीकृत करता है। लेकिन यह सीमित किया जा सकता है। मूत्र की मात्रा प्रतिदिन 1.5 लीटर (एन) प्रतिदिन होती है।
तीव्र गुर्दे की अपर्याप्तता के रूप, जो मूत्र की कम मात्रा के लक्षण से जुड़े नहीं होते हैं, कम बार होते हैं और अक्सर अधिक अनुकूल निदान होता है, इसलिए शायद ही कभी गुर्दे की विफलता हो जाती है।
2004 से, तीव्र गुर्दे की विफलता (तीव्र गुर्दे की कमी), तथाकथित आरआईएफएल वर्गीकरण के चरणों के लिए एक मानक वर्गीकरण है। आरआईएफईएल एक संक्षिप्त शब्द है और जोखिम चोट विफलता हानि ईएसआरडी (एंड स्टेज रेनल रोग) के लिए खड़ा है। यह निम्नलिखित चरणों में अनुवाद करता हैः जोखिम - चोट - गुर्दे की विफलता - गुर्दे की क्रिया का नुकसान - टर्मिनल गुर्दे की विफलता।
गुर्दे की असफलता के परिणामस्वरूप, उदाहरण के लिए, बहिर्वाह बाधा से, यूरियामिया (यूरियामिया) का खतरा होता है। मूत्रवर्धक पदार्थ जीव में जमा होते हैं और अब उत्सर्जित नहीं किए जा सकते हैं। गुर्दे के क्षेत्र में रक्तचाप बढ़ता है, सिरदर्द, धुंधली दृष्टि, थकान, बुखार, दर्द और खुजली हो सकती है और आंखों और पैरों का जल प्रतिधारण बन सकता है। तीव्र गुर्दे की कमी के इन लक्षणों के साथ आपको तुरंत चिकित्सक के पास जाना चाहिए।
कारणः तीव्र गुर्दे की विफलता क्यों है?
किडनी समारोह में तेजी से गिरावट के कई कारण हैं। वे मूत्र पथ बाधा, गंभीर संक्रामक बीमारियों, जलने के लिए बाद की जटिलताओं से लेकर हैं। मरीजों के लगभग आधा में, सेप्सिस तीव्र गुर्दे की विफलता (तीव्र गुर्दे की कमी) का कारण है और लगभग 30 प्रतिशत रोगियों में गुर्दे की क्रिया गंभीर गुर्दे की विफलता से पहले ही खराब थी। कारणों को उनके स्थान के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है - प्रीरेनल, इंट्रारेनल या पोस्टरेनल।
प्रीरेनल कारण (कारण गुर्दे के सामने स्थित है): गुर्दे के सामने झूठ बोलने के कारण गुर्दे में कम गुर्दे परफ्यूजन और ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है।की कमी हुई वृक्कीय रक्त प्रवाह में बड़ी सर्जरी (पश्चात गुर्दे की विफलता) या दुर्घटनाओं के कारण रक्त और तरल पदार्थ नुकसान का परिणाम हो सकता है। इसके अलावा संचार विफलता, फुफ्फुसीय अन्तः शल्यता, हृदय रोग और इस तरह के एनएसएआईडी (nonsteroidal विरोधी भड़काऊ दवाओं) के रूप में कुछ दवाओं और ऐस inhibitors गंभीर रूप से गुर्दे छिड़काव कम कर सकते हैं के साथ जलता है, गंभीर सूजन।
इंट्रा गुर्दे का कारण बनता है इस तरह के वाहिकाशोथ या स्तवकवृक्कशोथ और बैक्टीरिया के संक्रमण (pyelonephritis) और वायरल संक्रमण (बीचवाला नेफ्रैटिस) के रूप में गुर्दे ऊतक की सूजन के रूप में जहाजों की सूजन (गुर्दे में गुर्दे की विफलता के लिए कारण) गुर्दे को नुकसान पहुंचा। इसके अलावा (जैसे एंटीबायोटिक दवाओं, cytostatics, इसके विपरीत एजेंटों, सॉल्वैंट्स, इथाइलीन ग्लाइकॉल और निश्चेतक के रूप में) गुर्दे के हानिकारक दवाओं और प्रतिरक्षा प्रणाली के सामान्य विकारों तीव्र गुर्दे की विफलता (तीव्र गुर्दे की विफलता) का कारण हो सकता है। इसके अलावा, इस तरह के मायोग्लोबिन और गुर्दे की नलिकाओं में हीमोग्लोबिन के रूप में जमा अंतर्जात पदार्थ हानिकारक हो और गुर्दे की विफलता के लिए नेतृत्व कर सकते हैं।
पोस्ट गुर्दे का कारण बनता है (गुर्दे की विफलता के लिए कारण Harnleitersystem को नष्ट में है): मूत्र पथ जो वृक्कीय पेडू, मूत्रनली, मूत्राशय और मूत्रमार्ग शामिल साथ एक जन्मजात या अर्जित रुकावट नहीं है। विकलांग मूत्र प्रवाह गुर्दे, मूत्र या मूत्राशय की पथरी, ट्यूमर (प्रोस्टेट, मूत्राशय, गर्भाशय ग्रीवा का ट्यूमर), प्रोस्टेट बढ़ने या संकुचित मूत्रमार्ग के कारण हो सकता है। इसके अलावा, मूत्रमार्ग दीवार का एक सूजन, एक कैथेटर के बिछाने की वजह से मूत्र प्रवाह मजबूत नहीं हो पाती। मूत्र नहीं रह प्रवाह और गुर्दे तक का बैकअप बनाता है सकते हैं। गुर्दे ऊतक क्षतिग्रस्त है और इस तरह से काम करने की क्षमता खो देता है।
वहाँ विभिन्न मापदंडों के तीव्र गुर्दे की विफलता के निदान के लिए किया जाता है। वहाँ एक चरणबद्ध दृष्टिकोण हैः
इतिहासः यह स्पष्ट है कि क्या इस तरह के मधुमेह या उससे पहले प्रलेखित गुर्दे हानि के रूप में हद तक पुरानी अंतर्निहित की स्थिति, मौजूद हैं। गुर्दे विषैले दवाओं ले जाया गया?
शारीरिक परीक्षाः रक्तचाप, मूत्राशय भरने, गुर्दे टक्कर दर्द स्पष्ट किया। फेफड़े भीड़ या पेरीकार्डियम (पेरिकार्डियल बहाव) से पहले के क्षेत्र में द्रव संचय कर रहे हैं? संबंधित व्यक्ति पूरी तरह से होश है? त्वचा रंजकता, क्या है व्यक्ति सूजन है, या वह निर्जलीकरण से ग्रस्त है?
रक्त परीक्षणः यह यूरिक एसिड इलेक्ट्रोलाइट्स, अम्ल-क्षार स्थिति, ग्लूकोज और एल्बुमिन (जैसे सोडियम, पोटेशियम, फॉस्फेट और कैल्शियम के रूप में) के मूल्यों उदाहरण के लिए, की जांच की। आगे की जांच संभव हो रहे हैं।
मूत्र परीक्षण, के बारे में प्रोटीनमेह (मूत्र में वृद्धि हुई प्रोटीन की हानि), क्रिएटिनिन, यूरिया, यूरिक एसिड, पीएच, leucocyturia, हीमोग्लोबिन और मायोग्लोबिन। बढ़ी हुई creatinine और यूरिया गुर्दे की क्षति के संभावित लक्षण हैं।
मूत्र और मूत्र तलछट की मात्राः मूत्र उत्पादन गंभीरता और तीव्र गुर्दे की विफलता के पाठ्यक्रम के बारे में बयान अनुमति देता है।
ईसीजीः यह उदाहरण के लिए स्पष्ट किया जाता है, है, चाहे हाइपरकलेमिया (सीरम में उच्च पोटेशियम के स्तर) की निशानी के रूप अतालता, मौजूद हैं के बाद से गुर्दे के माध्यम से एक कम पोटाशियम के उत्सर्जन वृक्क असफलता की विशेषता है। हाइपरकलेमिया के अन्य संभावित लक्षण पक्षाघात, मुंह और भ्रम की स्थिति में धात्विक स्वाद कर रहे हैं।
इमेजिंग परीक्षणः वहाँ गुर्दे की अल्ट्रासाउंड परीक्षा है। विशेष रूप से ध्यान गुर्दे आकार, स्थान, आकार, बनावट, वृक्कीय रक्त प्रवाह, मूत्राशय की पथरी के लिए भुगतान किया है, और hydronephrosis का कोई लक्षण के बारे में है। इसके अलावा, छाती गुहा के एक एक्स-रे किया जाता है। इसके अलावा गुर्दे तेज से पेट के निचले हिस्से या उदर गुहा के एक चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (एमआरआई), वैकल्पिक रूप से गुर्दे की एमआरआई एंजियोग्राफी के साथ किए की गणना टोमोग्राफी (सीटी) खाली कर सकते हैं। एक संदिग्ध गुर्दे धमनी रोड़ा, यह भी एक सिन्टीग्राफी, एक परमाणु चिकित्सा इमेजिंग तकनीक का उपयोग करता है अल्पकालिक रेडियोधर्मी पदार्थ इस्तेमाल कर रहे हैं हो सकता है। हृदय निदान, इकोकार्डियोग्राफी का एक अल्ट्रासोनिक मशीनिंग विधि, अगर दिल की समस्याओं के शक कर रहे हैं प्रयोग किया जाता है।
गुर्दे बायोप्सीः ऊतक हटाने बदल गुर्दे ऊतक पर प्रकाश डाला सकता है।
तीव्र गुर्दे की विफलता के उपचार मुख्य रूप से चलाता को खत्म करने और लक्षणों को कम किया जा सके।
गुर्दे की विफलता के लिए एक विशिष्ट दवा चिकित्सा, वहाँ इस स्तर पर अभी तक नहीं कर रहे हैं। चिकित्सा ट्रिगर कारणों को समाप्त और एक ही समय के लक्षण या गुर्दे हानि की जटिलताओं को कम करने में करने के लिए नहीं बल्कि यह हैः अंतर्निहित बीमारी व्यवहार किया जाता है या अंतर्निहित रोगजनक कारण बंद (एक तरल पदार्थ घाटा या एक दवा के विच्छेदन संतुलन के बारे में), और वृक्कीय रक्त प्रवाह में सामान्यीकृत है,
गुर्दे की विफलता की संभावित जटिलताओं जहां भी संभव हो रोका जाना चाहिए।जब तक अपर्याप्तता हो, तब तक तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन (विशेष रूप से सोडियम और पोटेशियम) को संतुलित करने और मूत्र संबंधी पदार्थों (यूरिकिक नशा) के संचय जैसे जटिलताओं को रोकने के लिए आवश्यक है। सभी उपायों का लक्ष्य गुर्दे के प्राकृतिक फ़िल्टरिंग फ़ंक्शन को पुनर्स्थापित करना है।
तीव्र गुर्दे की विफलता में स्थलीय कारण हो सकते हैं, यानी एक अक्षम मूत्र बहिर्वाह के कारण हो, तो मूत्र पथ को जल्दी से छुटकारा पाना आवश्यक है। अगर गुर्दे की विफलता पहले ही हो चुकी है, तो रक्त को detoxify करने के लिए डायलिसिस आवश्यक है। यदि बैक्टीरिया संक्रमण होता है, तो उपयुक्त एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाना चाहिए। तीव्र उपचार के बावजूद, तीव्र गुर्दे की विफलता एक गंभीर बीमारी है। उदाहरण के लिए, यदि यह बहु-अंग विफलता के हिस्से के रूप में होता है, तो यह आज भी उच्च मृत्यु दर से जुड़ा हुआ है।
तीव्र गुर्दे की विफलता का आगे कोर्स बीमारी के लिए जिम्मेदार अंतर्निहित बीमारी से निकटता से जुड़ा हुआ है।
पूर्व और स्थलीय तीव्र गुर्दे की कमी में, यदि समय में असुविधा के कारण समाप्त हो जाते हैं, तो गुर्दे का कार्य आमतौर पर पूरी तरह से पुनर्प्राप्त करने योग्य होता है। इंट्रारेनल तीव्र गुर्दे की विफलता के मामले में, पूर्वानुमान खराब होता है, खासकर यदि उपचार शुरू होने से पहले गुर्दे की ऊतक पहले से ही क्षतिग्रस्त हो चुकी है। यदि ऐसा है, तो तीव्र लक्षणों से क्रोनिक गुर्दे की विफलता में संक्रमण का खतरा होता है।
तीव्र गुर्दे की विफलता को रोकने के लिए क्या संभव है?
तीव्र गुर्दे की कमी केवल अच्छे समय में ट्रिगरिंग अंतर्निहित बीमारियों के इलाज से रोका जा सकता है।
यह ज्ञात है कि एक खराब या अपर्याप्त रूप से समायोजित मधुमेह मधुमेह नेफ्रोपैथी के विकास का पक्ष लेता है। इस प्रकार, तीव्र गुर्दे की विफलता (तीव्र गुर्दे की कमी) का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए, यह आवश्यक है कि रक्त शर्करा और रक्तचाप समायोजन अनुकूलित किया जाए। यदि उनके पास संक्रमण या सेप्सिस है तो सर्जन और आईसीयू रोगियों में भी गुर्दे की विफलता का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए, इससे बचने के लिए सब कुछ पहले किया जाना चाहिए।
कोई भी जिसने गुर्दे की कार्यक्षमता को खराब कर दिया है और इसलिए इसे उच्च जोखिम वाले मरीज़ माना जाता है, उसे एनएसएआईडी समूह और ब्लड प्रेशर-एसीई अवरोधक को कम करने वाले दर्दनाशकों से बचाना चाहिए। वे गुर्दे के लिए गंभीर रूप से हानिकारक हो सकते हैं और अतिरिक्त गुर्दे की विफलता के जोखिम में वृद्धि, इसके अलावा किसी भी गुर्दे की समस्या को बढ़ा सकते हैं।
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325dd5f4c549beab3b6e84c72992e024e297a492 | pdf | प्रसारण प्रात915 बजे से
अवधि पंद्रह मिनट एक प्रदेश में अठारह से चौवालीस वर्ष के व्यक्तियों को आज से लगाया जायेगा कोरोना से बचाव का टीका
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्कूल और कॉलेजों में टीकाकरण के लिए कैम्प लगाने का दिया निर्देश
दो तीन पिछले चौबीस घंटों में राज्य में लगभग तेरह हजार नये संक्रमितों की हुई पहचान
अब तक तीन हजार दो सौ पन्द्रह लोगों को कोरोना के कारण जान गंवानी पड़ी
चार एक और केन्द्र सरकार ने अस्पताल में दाखिले से संबंधित नीति में किया बदलाव
अब अस्पताल में भर्ती के लिए पॉजिटिव रिपोर्ट जरूरी नहीं
कोविड के मामलों की संख्या बढ़ रही है
इसलिए श्रोताओं से अपील है कि कोई भी कोताही न बरतें
सुरक्षा के सभी उपायों का पालन करें
अठारह वर्ष से अधिक आयु के सभी लोग निःसंकोच टीका लगवाएं
तीन आसान उपायों का पालन करें और सुरक्षित रहें
मास्क पहनें दो गज दूरी है जरूरी सुरक्षित दूरी बनाये रखें हाथ और मुंह साफ रखें प्रदेश में आज से अठारह वर्ष से ऊपर के लोगों का कोविड टीकाकरण शुरु होगा
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा है कि केन्द्र से साढ़े तीन लाख टीके की डोज प्राप्त हो गयी है
उन्होंने कहा कि ये टीके अठारह से चौवालीस वर्ष आयु वर्ग के उन लोगों को दिये जायेंगे जो पहले से टीके के लिए पंजीकरण करा चुके हैं
बाईट श्री पांडेय ने कहा कि पंजीकरण कराने वाले लोगों को उनके नजदीकी केंद्रों या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर टीके दिये जायेंगे
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्कूल और कॉलेज परिसरों में कोविड से बचाव के लिए टीकाकरण कैम्प लगाने के निर्देश दिये हैं
यह निर्देश अस्पतालों में जांच के लिए लोगों की बढ़ती भीड़ के मद्देनजर दिया गया है
पटना में टीकाकरण अभियान की समीक्षा के दौरान उन्होंने कहा कि लॉकडाउन में टीका लेने के लिए लोगों को आवागमन में किसी प्रकार की असुविधा न हो इसका भी प्रशासन पूरा ख्याल रखे
श्री कुमार ने कहा कि टीका स्थलों पर नागरिक सुविधाओं का भी इंतजाम किया जाये साथ ही कोविड प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करवाया जाये
प्रदेश में अब तक उनासी लाख सत्ताईस हजार दो सौ छिहत्तर लोगों को कोविड से बचाव के टीके दिये जा चुके हैं
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार कल छियासठ हजार छह सौ छियासी लोगों का टीकाकरण किया गया
इनमें से सत्ताईस हजार पांच सौ सैंतालीस लोगों को टीके की पहली डोज जबकि उनतालीस हजार एक सौ उनतालीस लोगों को दूसरी डोज दी गयी
इधर देश भर में अब तक सोलह करोड़ बानवे लाख से अधिक लोगों का टीकाकरण किया जा चुका है
वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर सूर्यकांत ने कहा है कि कोविड होने के बावजूद लोगों को बचाव के लिए टीका लेना चाहिए
बाईट एक प्रदेश में कोविड उन्नीस के मामलों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है
पिछले चौबीस घंटों में बारह हजार नौ सौ अड़तालीस नये मामलों की पुष्टि हुई है
स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले चौबीस घंटों में एक लाख आठ हजार से अधिक कोविड नमूनों की जांच की गयी
सबसे अधिक दो हजार चार सौ अंठानवे नये मामले पटना जिले में दर्ज किये गये
वहीं नालंदा में सात सौ चालीस बेगूसराय में पांच सौ छियासी पश्चिमी चम्पारण में पांच सौ अठहत्तर समस्तीपुर में पांच सौ साठ मुजफ्फरपुर में चार सौ अस्सी और कटिहार में चार सौ अंठावन नये मामलों की पुष्टि हुई है
इधर एक दिन में चौदह हजार नौ सौ बासठ मरीजों को उपचार के बाद छुट्टी दी गयी
स्वस्थ होने की दर में सुधार हुआ है और अब यह उनासी दशमलव नौ सात प्रतिशत हो गयी है
वहीं इसी अवधि में कोविड से छिहत्तर लोगों की मौत के साथ ही अब तक इस महामारी से मरने वालों की संख्या बढ़कर तीन हजार दो सौ पन्द्रह हो गयी है
राज्य में फिलहाल सक्रिय मरीजों की संख्या एक लाख बारह हजार नौ सौ छिहत्तर है
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठनडीआरडीओ ने कोरोना संक्रमित लोगों के लिए दवाई बनाई है
भारतीय औषध महानियंत्रक ने मध्यम से गंभीर कोविड रोगियों के उपचार के लिए इस टूडीऑक्सीडीग्लुकोज दवाई के आपात उपयोग की अनुमति दे दी है
यह दवाई पाउडर के रूप में उपलब्ध है जिसे पानी में घोलकर लेना होगा
पेट में जाकर यह दवाई संक्रमित कोशिकाओं के साथ मिल जाती है और वायरस को बढ़ने से रोकती है तथा प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाती है
इस संबंध में आकाशवाणी से बातचीत में डीआरडीओ में जीवन विज्ञान विभाग के महानिदेशक डॉक्टर अजय कुमार सिंह ने कहा है कि टूडिओक्सीडीग्लूकोज दवाई का इस्तेमाल करने के बाद कोविड मरीजों की ऑक्सीजन पर निर्भरता घटी है और अस्पताल में रहने की अवधि कम हुई है
बाईटटू डी जीक्या करता है जब हम इसको एक कोरोना केमरीज को दे देते हैं
तो ये टू डी जी उस कोशिका में जो की वायरस से ग्रस्त है
उसमें एक तो ये ज्यादा मात्रा में उसके अंदर चलाजाता है और दूसरा जब ये ज्यादा अंदर चला जाता है
मगर ये ग्लूकोज कावेरिएंट है ये चला तो जाता है पर ये एनर्जी नहीं दे पाता तो जब ये एनर्जी नहीं दे पातातो वो सेल जो है एक तरह से एनर्जी के लिए भूखा हो जाता है उसको एनर्जी की जरूरत होतीहै पर टू डी जी उसमें तो एनर्जी नहीं दे पाता
तो डबल मार होती है कि उसने ज्यादा भी ले लिया सेल ने और वो उसमें एनर्जी नहीं दे पा रहा तो उससे क्या होता है कि जो वायरस है वो उसमें मल्टीप्लाई नहीं कर पाता
जब वायरस ज्यादा मल्टीप्लाई नहीं कर पाता तो अल्टीमेटलीजो वायरल लोड है वो बॉडी में कम हो जाता है और एक तरह से ये उस वायरस को मारने मेंया उसकी ग्रोथ को बहुत ज्यादा कंट्रोल करने में कारगर साबितहोता है
कुमार रवि पटना के बिहटा स्थित ईएसआईसी अस्पताल में कोविड मरीजों के लिए एक सौ बेड वाला अस्पताल काम करने लगा है
राज्य सरकार के समन्वय अधिकारी ने बताया कि अलगे तीन से चार दिनों में आईसीयू भी शुरू हो जायेगा
उन्होंने बताया कि सेना के पचासी डॉक्टरों की एक और टीम पटना पहुंच गयी है
इस अस्पताल में अभी पचास मरीज भर्ती हैं
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए विभिन्न श्रेणी के अस्पतालों में रोगियों को भर्ती करने के लिए राष्ट्रीय नीति में बदलाव किया है
इसका उद्देश्य कोविडउन्नीस से प्रभावित मरीजों को तुरंत प्रभावी और समग्र इलाज उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना है
सभी राज्यों को जारी किए गए निर्देशों में कहा गया है कि कोविड अस्पाताल में भर्ती के लिए रोगी की कोविडउन्नीस जांच पॉजिटिव होना अनिवार्य नहीं है
किसी भी रोगी का इलाज करने से इंकार नहीं किया जाएगा
इसमें दवाई ऑक्सीजन और अन्य आवश्यक इलाज भी शामिल हैं
दिशानिर्देश के अनुसार किसी भी रोगी को वैध पहचान पत्र के अभाव में भर्ती करने से इंकार नहीं किया जाएगा और ना ही इस आधार पर मना किया जाएगा कि वह अन्य शहर का निवासी है
अस्पताल में भर्ती पूरी तरह से आवश्यकता पर आधारित होगी
उच्चतम न्यायालय ने देशभर में चिकित्सा ऑक्सीजन के वैज्ञानिक तर्कसंगत और समान वितरण तथा उपलब्धता के आकलन के लिए बारह सदस्यों के एक कार्यबल का गठन किया
यह कार्यबल कोविडउन्नीस के इलाज में आवश्यक दवाईयों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उपाय भी बताएगा
न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर कार्यबल गठित करने से कोरोना महामारी के संबंध में जनस्वास्थ्य के लिए वैज्ञानिक और विशेष जानकारी उपलब्ध होगी
यह कार्यबल राज्यों को ऑक्सीजन आपूर्ति करने का वैज्ञानिक और व्यवहारिक फार्मूला भी तैयार करेगा
इस कार्यबल में देशभर के प्रमुख विशेषज्ञों को सदस्यों के तौर पर शामिल किया गया है
देश भर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर तरल चिकित्सा ऑक्सीजन की ढुलाई करने वाले सभी टैंकरों और कन्टेनरों का आवागमन टोलफ्री कर दिया गया है
कोविड महामारी को देखते हुए पूरे देश में चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है
अगले दो महीने या अगले आदेश तक ऑक्सीजन ले जा रहे कंटेनरों को एम्बुलेंस जैसे आपातकालीन वाहनों की श्रेणी में रखा जाएगा
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरणएनएचएआई ने कहा है कि फास्टैग लागू होने के बाद टोल प्लाजा पर प्रतीक्षा का समय लगभग शून्य हो गया है
इसके अलावा ऑक्सीजन के वाहनों को प्राथमिकता दी जाएगी
प्राधिकरण ने इस संबंध में निर्देश जारी कर दिये हैं
केंद्र सरकार कोविडउन्नीस महामारी से निपटने में ड्रोन के इस्तेमाल को सशर्त छूट देरही है
इसके जरिये वैक्सीन की आपूर्ति की जाएगी
नागरिक उड्डयन मंत्रालय और नागर विमानन महानिदेशालय ने वैक्सीन की आपूर्ति के लिए ड्रोन के इस्तेमाल की सशर्त अनुमति दी है
मंत्रालय ने कहा है कि इसका प्रायोगिक परीक्षण इस महीने के अंत तक शुरू हो जाएगा
राज्य सरकार ने विधायकों और विधान पार्षदों को मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास निधि से मिलने वाली राशि को कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए इस्तेमाल करने का निर्णय लिया है
सरकार के फैसले के बाद वित्त विभाग ने इस मद की राशि की निकासी संबंधित नियमों को शिथिल कर दिया है
प्राप्त जानकारी के अनुसार योजना और विकास विभाग इस मद की राशि को बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के खाते में जमा करेगी
इस राशि का इस्तेमाल राज्य के किसी भी हिस्से में कोरोना की रोकथाम के लिए किया जा सकेगा
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में मई महीने में होने वाली परीक्षाओं को रद्द कर दिया है
विश्वविद्यालय को भेजे निर्देश में यूजीसी ने कहा है कि परीक्षाओं का संचालन कोरोना की स्थिति में सुधार के बाद ही किया जायेगा
पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी ने गांव में नालीगली पेयजल और कुआं उड़ाही की योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने का निर्देश दिया है उन्होंने मजदूरों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार उपलब्ध कराने को कहा है
| किशनगंज जिले के अर्रवाड़ी पुलिस आउट पोस्ट क्षेत्र में अपराधियों ने हथियार का भय दिखाकर बैंक ग्राहक सेवा केन्द्र के संचालक से एक लाख सत्तर हजार रूपये लूट लिये
पुलिस मामले की छानबीन कर रही है
| प्रदेश में मौसम के मिजाज में बदलाव जारी है
मौसम विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार एक चक्रवाती परिसंचरण का क्षेत्र बिहार के ऊपर से होकर गुजर रहा है जिसके चलते मौसम तेजी से बदलने की सम्भावना है
मौसम विभाग ने बारह मई तक राज्य के अधिकांश हिस्सों में तेज आंधी के साथ बारिश का अलर्ट जारी किया है
इस दौरान तीस से चालीस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवा चलने और मेघ गर्जन का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है
कुछ स्थानों पर वज्रपात की भी चेतावनी जारी की गयी है
अब पटना से प्रकाशित प्रमुख समाचार पत्रों की सुर्खियां आज के सभी समाचार पत्रों ने प्रदेश में अठारव वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों के टीकाकरण की शुरूआत को अपनी प्रमुख सुर्सी बनाई है
हिन्दुस्तान ने इस खबर का शीर्षक लगाया है बिहार में अठारह पार के लोगों को टीका आज से
दैनिक जागरण की सुर्थी है डॉक्टरों पारा मेडिकल स्टॉफ की कल से होगी नियुक्ति
दैनिक भास्कर ने कोरोना संक्रमण से जुड़ी खबर का शीर्षक लगाया हैएनटीपीसी बाढ़ में एक सौ पचास इंजीनियर तथा कर्मी पॉजिटिव अस्पताल फुल कैम्पस लॉक
प्रभात खबर ने विशेषज्ञों की राय के हवाले से प्रकाशित खबर का शीर्षक लगाया है कोरोना से उभरे लोगों में जान जाने का खतरा कम
दैनिक आज की सुर्थी है कोरोना पॉजिटिव रेल कर्मियों को तीस दिनों की विशेष छुट्टी
राष्ट्रीय सहारा लिखता है ऑक्सीजन पर सुप्रीम टास्क फोर्स
और अब अंत में मुख्य समाचार एक दो प्रदेश में अठारह से चौवालीस वर्ष के व्यक्तियों को आज से लगाया जायेगा कोरोना से बचाव का टीका
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्कूल और कॉलेजों में टीकाकरण के लिए कैम्प लगाने का दिया निर्देश
पिछले चौबीस घंटों में राज्य में लगभग तेरह हजार नये संक्रमितों की हुई पहचान
अब तक तीन हजार दो सौ पन्द्रह लोगों को कोरोना के कारण जान गंवानी पड़ी
तीन चार एक और केन्द्र सरकार ने अस्पताल में दाखिले से संबंधित नीति में किया बदलाव
अब अस्पताल में भर्ती के लिए पॉजिटिव रिपोर्ट जरूरी नहीं
इसके साथ ही आकाशवाणी पटना से प्रसारित प्रादेशिक समाचार का ये अंक समाप्त हुआ |
eebc384fffc64048207305b3e6ad3ff5f506b6c0 | web | रेनल धमनी स्टेनोसिस धमनी की संकुचन है जो कि ऑक्सीजन युक्त रक्त के साथ गुर्दे की आपूर्ति करती है। इस तरह की एक स्टेनोसिस केवल लक्षणों से ध्यान देने योग्य है जब पोत की चौड़ाई 75 प्रतिशत से कम हो जाती है। मुख्य विशेषता उच्च रक्तचाप है, जिसे समायोजित करना मुश्किल है।
- एक गुर्दे धमनी कसना में, रोगी उच्च रक्तचाप से पीड़ित होता है।
एक वृक्क धमनी स्टेनोसिस (वृक्क धमनी स्टेनोसिस) धमनी कि ऑक्सीजन युक्त रक्त के साथ गुर्दे की आपूर्ति में संकुचित है। केवल स्टेनोस (संकीर्ण), जो पोत के आकार को 75 प्रतिशत से भी कम कर देता है, धमनी उच्च रक्तचाप का कारण बनता है। एक तब एक रेनलेन हाइपरटोनस, एक उच्च रक्तचाप के बारे में बोलता है, जिसके कारण गुर्दे के रक्त परिसंचरण में इसका कारण होता है।
कम ग्रेड गुर्दे धमनी स्टेनोसिस, जो पोत को 70 प्रतिशत से भी कम करता है, बीमारी के कोई संकेत से जुड़ा हुआ है। पोत की बढ़ती कसना के साथ, प्रभावित रोगी धमनी उच्च रक्तचाप विकसित करता है, जिसे आमतौर पर समायोजित करना मुश्किल होता है।
एक गुर्दे धमनी कसना का संदेह बहुत करीब है, भले ही धमनी उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करना मुश्किल हो। इसके अलावा, 30 वर्ष से पहले धमनी उच्च रक्तचाप की अचानक शुरुआत गुर्दे धमनी स्टेनोसिस का संकेत हो सकती है।
गुर्दे की धमनी के 70% से अधिक कसना का कारण गुर्दे के ऊतकों के डाउनस्ट्रीम संवहनी प्रवाह मार्ग में कम छिड़काव होता है। गुर्दे के ऊतक में कोशिकाएं होती हैं जिनमें रक्तचाप सेंसर का कार्य होता है और रक्तचाप में गिरावट दर्ज करता है। रक्तचाप में गिरावट के मामले में, ये कोशिकाएं अनियमितता के अर्थ में हार्मोन (रेनिन) बनाती हैं, जो रक्त प्रवाह में जारी होती है। रेनिन रक्त गति में हार्मोन घूम में रूपांतरण प्रतिक्रिया है, अंत उत्पाद हार्मोन एंजियोटेनसिन द्वितीय, जो शरीर के छोटे धमनियों की कसना कारण बनता है। इन तथाकथित प्रतिरोध धमनियों के कब्ज का नतीजा यह है कि प्रणालीगत परिसंचरण का धमनियों का रक्तचाप उठाया जाता है। कुल मिलाकर, गुर्दे के ऊतक में गुर्दे बनाने वाली कोशिकाएं प्रभावित गुर्दे के क्षेत्र में ध्यान देने योग्य हाइपोटेंशन का सामना करने की कोशिश करती हैं।
अगर गुर्दे धमनी कसना गंभीर है, तो यह गुर्दे की क्रिया में गिरावट का कारण बनता है, जिसे प्रयोगशाला परीक्षा द्वारा पता लगाया जा सकता है। तब गुर्दा रक्त को फ़िल्टर करने का अपना काम पूरा नहीं करता है। पदार्थ जो वास्तव में पेशाब से समाप्त हो जाना चाहिए, रक्त में बढ़ी हुई मात्रा में मौजूद हैं। इसे गुर्दे की कमी कहा जाता है।
गुर्दे धमनी स्टेनोसिस के कारण या तो धमनीविरोधी प्रक्रियाएं या व्यक्तिगत संवहनी दीवार परतों के विकास होते हैं।
गुर्दे धमनी stenoses के दो अलग-अलग कारण हैं। 75 प्रतिशत मामलों की दर से, गुर्दे धमनी स्टेनोसिस का कारण धमनीजन्य है। गुर्दे की धमनी एक प्रकार का रोग की वजह से मामलों की लगभग 24 प्रतिशत में एक तथाकथित fibromuscular डिसप्लासिया, जो अलग-अलग धमनी दीवार परतों के एक स्थानीय रूप से वृद्धि हुई वृद्धि है। सभी गुर्दे धमनी stenoses का एक प्रतिशत जन्मजात हैं।
एथेरोस्क्लेरोसिस की सामान्य धमनी संकुचन निम्न चरणों में होती हैः
वह इस तरह के उच्च रक्तचाप के रूप में पतली रक्त वाहिका आंतरिक त्वचा (अन्तःचूचुक) की एक चोट, उदाहरण के लिए, एक यांत्रिक अति प्रयोग, से चला जाता है। मोनोसाइट्स, विशेष सफेद रक्त कोशिकाएं, पोत की भीतरी अस्तर के नीचे प्रवेश करती हैं।
चोट की जगह पर, मरम्मत प्रक्रियाएं होती हैं, प्लेटलेट जमा किए जाते हैं। ऑक्सीकरणयुक्त वसा अणुओं (एलडीएल कोलेस्ट्रॉल) को अधिमानतः जमा किया जाता है और फागोसाइट्स (मैक्रोफेज) द्वारा नष्ट किया जाता है।
प्रतिक्रिया पोत की दीवार में सूजन की ओर ले जाती है, जिसके बाद निशान और जमा होती है, जिसे फैटी अपघटन कहा जाता है। पोत पार अनुभाग आगे संकुचित है, यांत्रिक लोड बढ़ जाती है, तो यह प्रक्रिया, बढ़ती धमनीकाठिन्य (बुलाया atherosclerosis सहित) हमेशा प्रगति करता है।
गुर्दे धमनी stenoses के बहुत दुर्लभ कारण (एक प्रतिशत से नीचे) हैंः
विभिन्न परीक्षाओं के माध्यम से, जो रोगी के लिए अलग-अलग तनाव होते हैं, दोनों गुर्दे धमनी को संकुचित करते हैं और अक्सर उनके कारण का निर्धारण करते हैं।
रोगी के चिकित्सा इतिहास का सर्वेक्षण गुर्दे धमनी स्टेनोसिस के मामले में आमतौर पर कोई खुलासा जानकारी प्रदान करता है। डॉक्टर की यात्रा और निम्नलिखित परीक्षाओं का कारण उच्च रक्तचाप है, जो चिकित्सकीय रूप से समायोजित करना मुश्किल या असंभव है।
सबसे पहले, रोगी के रक्तचाप को दोनों हाथों पर मापा जाना चाहिए। इसके अलावा, 24 घंटे से अधिक रक्तचाप का माप किया जाता है। एक वृक्क धमनी स्टेनोसिस मौजूद न हो, दिन के दौरान रक्तचाप में रोग चिह्नित उतार चढ़ाव के प्रारंभिक चरण में अक्सर पहचानने योग्य होते हैं। यदि बीमारी लंबे समय तक चलती है, तो रक्तचाप स्थायी रूप से बढ़ जाता है और रात में भी कम नहीं होता है।
कम गुर्दे के रक्त प्रवाह से गुर्दे की क्रिया का प्रतिबंध हो सकता है। प्रयोगशाला परीक्षणों कि गुर्दे की धमनियों समारोह के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं सीरम क्रिएटिनिन का निर्धारण कर रहे हैं (सामान्य श्रेणी है कम से कम 1 मिग्रा / डीएल) और सीरम यूरिया (सामान्य श्रेणी के दस से 50 मिग्रा / डीएल)। दोनों पदार्थ जो मूत्र के माध्यम से उत्सर्जित हो रहे हैं, वे रक्त से पहले में एक उच्च एकाग्रता में झूठ हैं, तो यह एक गुर्दे समारोह इंगित करता है।
द्वैध सोनोग्राफ़ी दो आयामी अल्ट्रासाउंड विधि (धमनी की इमेजिंग के लिए) और डॉपलर प्रौद्योगिकी (रक्त प्रवाह विश्लेषण के लिए)। इस तरह, एक हाथ पर एक भी परीक्षा की प्रक्रिया में धमनी की और दूसरी ओर रक्त के प्रवाह के माप प्रतिनिधित्व का प्रबंधन करता है का एक संयोजन का प्रतिनिधित्व करता है। रंग डुप्लेक्स उपकरणों के साथ, रक्त प्रवाह को जहाज में रंग संकेत के रूप में प्रदर्शित किया जा सकता है।
रंग डुप्लेक्स सोनोग्राफी गुर्दे धमनी और उसके रक्त प्रवाह को ultrasonographically visualized करने की अनुमति देता है। यह परीक्षा रोगी के लिए बहुत तनावपूर्ण और हानिकारक नहीं है और इसकी लगभग 98 प्रतिशत की शुद्धता है।
सभी मामलों में से लगभग 20 प्रतिशत में, ऊपर वर्णित उपायों गुर्दे धमनी स्टेनोसिस से इंकार नहीं कर सकते हैं। एक्स-रे कंट्रास्ट इमेजिंग उच्च श्रेणी के गुर्दे धमनी स्टेनोसिस को देखना आसान बनाता है। हालांकि, इस उद्देश्य के लिए एक एक्स-रे विपरीत एजेंट कैथेटर की अर्थ यह है कि बार से अधिक उन्नत है द्वारा धमनी में प्रशासित किया जाना चाहिए। यह प्रक्रिया रोगी के लिए कुछ तनाव से जुड़ी है।
गुर्दे धमनियों की एक्स-रे दोनों जहाजों के सटीक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ एक कसना के कारण के बारे में एक बयान की अनुमति देता है। यदि धमनीविरोधी संवहनी कसना मौजूद है, एक्स-रे पेटी महाधमनी की व्यक्तिगत संकुचन दिखाती है। एक (व्यक्तिगत पोत दीवार परतों के स्थानीय विकास) fibromuscular dysplasia द्वारा कसना से वृक्क धमनी के मध्य बैरल खंड में ठेठ मोतियों के संकुचन पाता है।
परमाणु स्पिन एंजियोग्राफी (एमआरआई एंजियोग्राफी)
इमेजिंग गुर्दे धमनी stenoses इमेजिंग की एक नई विधि एमआरआई है। यह प्रक्रिया रोगी के लिए बहुत तनावपूर्ण नहीं है। एक्स-किरणों के बजाय, पोत को देखने के लिए चुंबकीय धाराओं का उपयोग किया जाता है। चूंकि यह प्रक्रिया बिल्कुल नया है, इस विधि के साथ व्यापक अनुभव अभी भी प्राप्त करने की आवश्यकता है।
उच्च श्रेणी के गुर्दे धमनी स्टेनोस के लिए पसंद का उपचार एक समर्थन ग्रिड (स्टेंट) के साथ या बिना संवहनी फैलाव है। यह उन मरीजों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है जिनके फाइब्रोमस्कुलर डिस्प्लेसिया कसना का कारण है।
सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, एनारोस्क्लेरोसिस को गुर्दे धमनी स्टेनोसिस के कारण के रूप में बढ़ाने वाले जोखिम कारकों को कम करना महत्वपूर्ण है। इन जोखिम कारकों को कम कर दिया गया हैः
धमनी उच्च रक्तचाप एंटीहाइपेर्टेन्सिव दवाओं के साथ दवा द्वारा समायोजित किया जाता है। गुर्दे धमनी स्टेनोसिस में उच्च रक्तचाप का इलाज करने के लिए दवाओं के निम्नलिखित समूहों का उपयोग किया जाता हैः
- दवाओं को निकालना (मूत्रवर्धक)
Percutaneous transluminal angioplasty (पीटीए)
Percutaneous मतलब है "त्वचा के माध्यम से", अनुवादक का मतलब है "जहाज के अंदर", एंजियोप्लास्टी संवहनी फैलाव है। धमनियों की अल्ट्रासाउंड या इसके विपरीत अध्ययन संकुचन द्वारा पता लगाया कैथेटर के माध्यम है जिस पर एक गुब्बारा स्थित है द्वारा विस्तारित किया जा सकता। इस उपचार विधि के लिए सभी vasoconstrictions या बंद नहीं हैं। संवहनी विशेषज्ञ इस उद्देश्य जरूरी परामर्श के लिए विचार किया जाना चाहिए।
सबसे पहले, एक और्विक धमनी छिद्रित तथा गुर्दे धमनी के संकुचन में प्रवेशनी के माध्यम से प्रस्तुत एक पतली, गाइड वायर तथाकथित है। कैथेटर, इसके सिरे पर, एक गुब्बारा स्थित है तो प्रतिदीप्तिदर्शन के तहत इस तार पर उन्नत किया गया है। बाद गुब्बारा कसना या बंद करने की के क्षेत्र में रखा गया था, यह एक नमकीन पानी के माध्यम से विस्तार होता है।सीधे फैलाव पैंतरेबाज़ी का पालन करते हुए, परिणाम को जहाज और एक्स-रे में विपरीत एजेंट पेश करके नियंत्रित किया जाता है।
गुर्दे धमनी को फिर से संकीर्ण करने से रोकने के लिए, एक ट्यूबलर समर्थन ग्रिड (स्टेंट) को प्रसव के बाद गुर्दे धमनी में डाला जा सकता है।
फाइब्रोमस्क्यूलर डिस्प्लेसिया वाले मरीजों में, वासोडिलेशन 50 प्रतिशत मामलों में रक्तचाप में सुधार करता है, और गुर्दे का कार्य 86 प्रतिशत मामलों में सुधार करता है। यदि धमनियों के धमनीविरोधी स्टेनोसिस मौजूद हैं, तो 10% मामलों में धमनियों का उच्च रक्तचाप ठीक हो सकता है। रेनल फ़ंक्शन अधिकतम 30 प्रतिशत रोगियों में सुधार करता है।
रेनल धमनी स्टेनोसिस को शायद ही कभी खुली संवहनी शल्य चिकित्सा प्रक्रिया में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक है जब पीटीए का कार्यान्वयन असंभव हो या जटिलताओं के साथ किया गया हो।
धमनी धमनी स्टेनोसिस के प्रमुख जोखिम कारकों को कम करके धमनीविरोधक के कारण गुर्दे धमनी को रोक दिया जा सकता है।
चूंकि गुर्दे धमनी स्टेनोसिस के कारण के रूप में फाइब्रोमस्कुलर डिस्प्लेसिया के विकास के लिए किसी भी कारण को ज्ञात नहीं किया जाता है, इसलिए इससे कोई निवारक उपाय नहीं किया जा सकता है। दूसरे प्रमुख कारण के रूप में धमनीविरोधक की रोकथाम संभव है।
निकोटिन एक मजबूत संवहनी प्रदूषक है। यह जहाजों की संकुचन का कारण बनता है और इस प्रकार उच्च रक्तचाप के समान प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, तंबाकू के अवयव चयापचय को खराब करते हैं, इसलिए धूम्रपान करने वालों में एलडीएल स्तर में काफी वृद्धि हुई है, जो रक्त वाहिकाओं में नींबू और फैटी पदार्थों के जमाव की ओर जाता है।
विशेष रूप से, एलडीएल कोलेस्ट्रॉल अपने ऑक्सीकरण (रैंकिड) रूप में खतरनाक है क्योंकि यह प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को लक्षित करता है। नतीजतन, कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाएं, तथाकथित फागोसाइट्स, एलडीएल-सी लेते हैं, लेकिन खुद को उन्मूलन से गुजरते हैं, जिससे फैटी फोम कोशिकाएं बनती हैं जो नींबू (इसलिए संवहनी कैलिफ़िकेशन) स्टोर कर सकती हैं।
मधुमेह (मधुमेह मेलिटस) धमनीविरोधी के खतरे के संबंध में चयापचय को प्रतिकूल रूप से बदल देती है, रक्त में कुछ वसा के स्तर अक्सर मधुमेह में बढ़ते हैं। मधुमेह के रोगियों में अक्सर उच्च रक्तचाप होता है, जो एथेरोस्क्लेरोसिस के जोखिम को और बढ़ा देता है।
उच्च रक्तचाप धमनियों के यांत्रिक भार को बढ़ाता है, ताकि पोत की दीवार की चोटें तेजी से हो जाएं। त्वचा की मरम्मत प्रक्रियाओं की आंतरिक अस्तर की ऐसी मामूली चोटों में, कैल्सरस जमा के जमाव को बढ़ावा देने और गुर्दे धमनी स्टेनोसिस (गुर्दे धमनी स्टेनोसिस) को अधिक संभावना बनाने में मदद मिलती है।
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824a5e6ee794d837b365e170e8be93bfd129f5bf88e18c6798c409540b82f3f4 | pdf | इस गतिसे हम लोग जागतिक व्यापार में तीन घटना समाश्रित देखते हैं।
विषुवरेखाका प्रत्येक विन्दु जितना ही हटता है। उतना ही पृथिवीका मेरु चक्राकार- -पथसे घूम जाता है । पृथिवीका मेरु जिस चक्राकार पथ होकर घूमना है, उसका केन्द्र है पृथिवीकक्षका मेरु । सुतरां २५८६८ वर्षों में उस केन्द्र के चारों ओर पृथिवीका मेरु एक एक वृत्त अङ्कित करता है। इस गति द्वारा मेरुवर्ती नक्षत्रराशिका सुदीर्घकाल में स्थानपरिवर्त्तन मालूम पड़ता है।
विषुवरेखाका एक एक विन्दु हट कर जितना हो उसके पूर्वस्थित विन्दुक पर आ जाता है, उतना ही नक्षत्रराशि में सूर्यका उदयकालप्रभेद और ऋतुवैषय लक्षित होता है। एक नक्षतसे उस नक्षत्र में लौट आने में पृथिवीका जो समय लगता है, उसे नाक्षत्र वत्सर (Sid..real year ) कहते हैं । कृत्तिकानक्षत्रके उदग्रस्थानसे सूर्यके पुनः कृत्तिका में लौट आनेसे एक वर्ष पूरा होता है।
सौर वर्षकी समयाल्पता हो ऋतु- परिवर्तनका मूल और वर्तमान वैषम्यका प्रधान कारण है । यदि प्रतिवर्ष ऋतूत्पादक सौरवर्ग नाक्षतवर्गसे २० मि० २० से० पहले उपस्थित हो, तो उसी परिमाणमें प्रत्येक ऋतु भी नाक्षत्रवर्ग के पहले सम्पादित होगी । इस प्रकार पुनः २५८६८ वर्गके बाद नाक्षत्र और सौर नूतन वर्ष ठीक एक ही समयमें आरब्ध हुआ करता है अर्थात् आज नाक्षव वर्गके जिस मासमें जिस दिनमें समान दिनरात हुई है, २५८६८ वर्ष बाद ठीक उसी दिन उसी समयमें समान दिनरात होगी।
हिन्दू लोग नाक्षतको और अङ्गरेज लोग सौरवर्णकी गणना किया करते हैं। यूरोपीय गणनासे जिस मासमें जो ऋतु पड़ती है, वह प्रायः एक ही रहती है। परन्तु आर्य लोगोंकी नाक्षत्र-गणनासे प्रतिवर्ष समान दिनरात २० मि० २० से० पहले हो जानेके कारण अनेक वर्ग पोछे क्रमशः ऋतुकालका परिवर्तन हुआ है। पहले जिस समय ऋतुराज वसन्तका आविर्भाव होता था, अभी उस समय निदारुण ग्रीष्मके समय वर्षा आई है । इस प्रकार पृथिवीके दोनों भागमें ऋतुकालका विशेष बैलक्षण्य दिखाई देता है ।
Vol. XIV. 82
पहले जब बैशाखमासके प्रथम दिन में वासन्तिक सम रात्रिदिन होता था, उस समय उसी दिनसे भारतवासियोंने नूतनवर्षकी गणना आरम्भ की है। परन्तु अभी १० चैतको समान रात दिन आरम्भ हुआ है, अतः पुनः वैशाखमासके प्रथम दिनमें समान रात दिन होनेमें प्रायः २५००० वर्ष लगेंगे । पहले वासन्तिक समान रात दिन में सूर्य मेष राशिमें उदय होते थे, अभी उस दिन मीनराशि अतिक्रम करनेमें १० अंश बाकी रह जाता है । इस प्रकार सूर्य क्रमशः पीछे उगते उगते २५८६८ वर्षके वाद पुनः उसी एक नक्षत्रमें उदय होंगे।
कान्तिपात के सचल होने के कारण पृथिवी की इससे जो मृदुगति होती है, उससे अयनमंडल धीरे धीरे परिवर्तित होता जाता है। इस कक्षपरिवर्त्तनगति द्वारा पृथिवीके एक और वर्ग उत्पन्न होता है जिसे अङ्गरेजीमें Anomalistic वा सौर-व्यवधान वर्ग कहते हैं। पृथिवी कक्षका जो विन्दु सूर्य से सर्वापेक्षा निकट है, उस विन्दुसे आरम्भ करके पुन, सर्वापेक्षा निकटस्थ विन्दुमें लौट आनेसे एक वर्ग पूरा होता है । कक्ष अपरिवर्तित रह कर यदि वह विन्दु अचल रहता, तो सौर-व्यवधान और नाक्षत्रवर्गका परिमाण समान होता । परन्तु पृथिवो ऐसी मृदुगतिसे अपने अयनमण्डलको परिवर्त्तन करती है, कि एक अवस्थासे उस अवस्थामें लौट आने में पृथिवीको १०८००० वर्ग लगता है।
कक्षके ऐसे परिवर्त्तन के कारण एक वर्ग पहले कक्षके जिस विन्दु पर आनेसे पृथिवी सूर्य से सर्वापेक्षा निकटवर्त्ती रहती उस विन्दुके दूसरे वर्ग और भी १२ सेकेण्ड अग्रसर होनेसे वह फिर पहलेके जैसा सर्वापेक्षा सूर्य के निकटवर्ती होती है। सुतरां उस स्थान पर आने में पृथिवीको और भी १२ सेकेण्ड समय लगता है। इस कारण सौर-व्यवधान-वर्षका परिमाण नाक्षत्रवर्षसे प्रायः ४ मिनट ३६ सेकेण्ड अधिक है अर्थात् सूर्यसम्पर्क में पृथिवीका व्यवधान समान होनेमें प्रति वर्ष ४ मिनट ३६ सेकेण्ड अधिक समयकी आवश्यकता होती है। (१४)
: १४) पृ वीकी कक्ष रित्तिनगतिसे अनेक नैसर्गिक व्यापार साधित होते हैं। पुराणमें युगयुगको जिस महाप्रलय की
सूर्य की दूरोके सम्पर्कमें पृथिवोकक्षकी एक अवस्थासे पुनः उस अवस्था में आने १०८००० वर्ग, किन्तु ऋतु सम्पर्क में सूर्यका दूरत्व परिमाण समान होने में प्रायः २० हजार वर्ष लगते हैं ।
सौरवर्ष और सौरव्यवधान-वर्षके परऋतूत्पादक स्पर वृत्ताभासका व्यवधान ६१ ६ सेकेण्ड है। इन दो बत्सरोंको एक अवस्था में आने में भी २० हजार वर्ष लगते हैं और इसीके ऊपर ऋतुसम्पर्क में सूर्यका दूरत्व परिवर्तन निर्भर करता है।
पृथिवोकी मेरुलक्ष्य परिवर्तनगति प्रधानतः चन्द्रमाके आकर्षणसे होती है। परन्तु ग्रहोंके समवेत आकर्षण द्वारा इसकी ह्रास वृद्धि हुआ करती है। पृथिवीके दोनों मेरु यद्यपि उत्तर दक्षिण में लक्ष्यवद्ध हैं, तौभो चन्द्रमाके आकर्षणसं उत्तरमेरुकी उत्तरकाश में और दक्षिणमेरुकी दक्षिणाकाश में ऊर्ध्वाधः गति होती है। पृथिवीमेरुकी इस चक्राकार मन्दगतिके साथ साथ दोनों मेरु पर ही पूर्वोक्त प्रकारकी एक और गति हो जाती है। इसलिये दोनों ही मेरु आकाश में लट्टू की तरह विसरणशील चिह्न अङ्कित करते हैं। इस गतिसे १६ वर्ष के बाद चन्द्रसूर्य और पृथिवीकी एक अवस्था होती है। इस कारण ऐसा एक एक चिह्न अङ्कित करने में अर्थात् एक मेरुके नीचेसे ऊपर उठ कर फिर उस नीचे स्थान पर आने में १६ वर्ष लगते हैं ।
कथा लिखी है, सम्भवतः पृथिवी की यह विभिन्न गति ही उन समस्त दुर्घटनाओंका मूल है। भूतत्त्वकी आलोचना से मालूम होता है, कि जगत् में एक एक समय प्रलय उपस्थित हुआ बा। यूरोपखण्ड में पोष्टप्लओसिन युगमें अनन्त तुषारसे भावृत वैसे ही जगदूव सका एक निदर्शन पाया गया है । वैज्ञानिक एडहीमरने इसका ज्योतिषिक कारण निर्देश करते हुए कहा है कि कान्तिपातकी वक्रगति द्वारा १० हजार वर्ष में पृथिवी के अर्द्ध सूर्य सम्पर्क से अपनी अवस्थिति परिवर्त्तन करते है। इसी नियमसे उत्तराई आज अपनमडलके अति निकट प्रान्त में रहने पर भी बह १० हजार वर्षके दाद दूर प्रांत में चला जाता है। इसी कारण तुषारशैकके दवाबसे उत्तरयूरोपके सभी जीव नष्ट हो जाते हैं।
घनत्व ।
पृथिवोका परिमाण और गतिनिर्णय करनेमें ज्योति विद्गण जिस प्रकार बद्धपरिकर हुए थे, इसका घनत्व ( Density ) और गुरुत्व ( weight ) मालूम करने में वे उसी प्रकार यत्नशील थे। किसी एक परिमेय क्षुद्रवस्तुकी आकृटिशक्ति के साथ पृथिवीको आकर्षणशक्तिकी तुलना करनेसे इस विषयका स्पष्ट आभास पाया जाता है। एक पर्वतस्तूपके मस्तकोवस्थानसे उसके ओलन को विच्युति Deflection of the plammet from the vertical position )-का अनुसरण करके ब्रूगेन, मास्केलिन आदि ज्योतिर्विद पृथिवोका गुरुत्व निरीक्षण करने में समर्थ हुए थे। उन्होंने अपने अपने निर्दिष्ट पर्वतकी ओलनविच्युति 8 से ५ तक लक्ष्य करके तथा उस उस पर्वतका घनत्व वा गुरुत्व निरूपण करके यह स्थिर किया, कि पृथिवीपिण्डका गुरुत्व जलको अपेक्षा ५ गुणा अधिक है। किन्तु पर्वतका यथायथ गुरुत्व निरूपित नहीं होने के कारण इसका यथार्य अवधारित नहीं होता । इसके बाद काभेडिस परीक्षा द्वारा मि० फ्रान्सिस बेली ( Mr Francis Baily ) सोसकके गुरुत्व और पृथिवीकी आकृष्टिशक्तिकी तुलना में जलकी अपेक्षा पृथिवीका गुरुत्व ५६ ७ स्थिर कर गये हैं। तृतीयतः राजज्योतिवि॑िद् परी ( Mr. Airy, Astronomer Royal ) १८५४ ई० में टाइन नदी के किनारे और हर्टन कोयलेके गड्ढे से १२६० फुट निम्नतम प्रदेशमें घड़ीके दोलक यन्त्रकी गतिविच्युतिको लक्ष्य करके जिस सिद्धान्त पर पहुंचे थे, वह पृथिवीकका गुरुत्व निर्णय करने में बड़ा हो उपयोगी है। उन्होंने भूपृष्ठ जौर गड्ढे के निम्नस्थ दोलकका दैनिक व्यवधान २१ सेकेण्ड निरीक्षण करके यह स्थिर किया है, कि भूपृष्ठसे उस निम्नस्थान में आकर्षण १८१८० संख्यक अंश अधिक है। इस अकफलसे उन्होंने पृथिवीका गुरुत्व जलकी अपेक्षा ६से ७ गुणा अधिक निर्णय किया।
ताप ।
पृथिवीके बाहर और भीतर उत्ताप है। उत्ताप जीवजगत्का प्राणदायी है। अनन्ताकाशका तेज, सूर्यका ताप दान और वायुके निष्पीड़नसे जगत्में एक उत्ताप विकीर्ण होता है। हम लोग सूर्यकिरणसे जो उत्ताप पाते हैं उसीपृथिवी
ही पृथिवीके भ्रमण और सूर्यसे स्थानविशेष में पृथिवीके स्थानभेदसे शीतप्रीष्मादि हुआ करता है । किन्तु पृथिवीका आभ्यन्तरिक उत्ताप इससे स्वतन्त्र है। भूपृष्ठसे हम लोग जितना ही नीचे जाते हैं, दैनिक उत्तापका व्यतिक्रम उतना ही कम मालूम पड़ता है, यहां तक, कि खूब नीचे जाने पर एक ऐसा स्थान मिलेगा, जहां वाधिक ताप बिलकुल अनुभूत नहीं होता। ऋतुके परिवर्त्तनसे उस स्थानके उत्तापका परिवर्तन दिखाई देता है। इस स्थानसे और भी निम्नतम प्रदेश में जाने से पुनः थोड़ा थोड़ा उत्ताप मालूम पड़ता है। प्रति ४० १५० फुट में १ फारेनहीट उत्तापकी वृद्धि होती है अथवा ६ मोल नीचे जानेसे प्रायः १०० उत्ताप पराया जाता है । इम हिसाबसे नीचेका ताप भी लेनेसे ५० मील और भो अभ्यन्तर भाग में ५००० ताप प्रभाव देखा जाता है। इस प्रकार उत्तापको कल्पनासे जग में उत्पत्तिके प्रारम्भ में सार्वजनोन तेजका आविर्भाव समझा जाता है। इससे यही अनुमान किया जाता है, कि ऐसे प्रचण्ड तापसे कोई भी धातु गाढ़ा हो कर नहीं रह सकता, अवश्य हो उसे गल कर द्रव होना पड़ता है। आग आग्नेय गिरिनिःसृत धावत तरल पदार्थादि इसका निदर्शन है। इसो धारणासे वैज्ञानिकों ने पृथिवीका आदि तरलत्व स्वीकार किया है । अभो देखा जाता है, कि पृथिवोका अभ्यन्तरभाग तापयुक्त तरल पदार्थसे परिपूर्ण है और यह भूपृष्ठ (Crest ) दुग्धसरको तरह स्निग्ध हो कर उत्पन्न हुआ है। केन्द्रगत ताप ( Central heat ) को स्वीकार करके फ़रियर, हम्बोष्ट आदि भूतत्वविद्गण अभिनव तत्त्वाविष्कार में सफलमनोरथ हुए हैं। पर्वतादिकी उत्पत्ति और भूमिकम्प इसो तापका निदान है ।
ताप शब्द में विस्तृत विवरण देख अनन्तकोडाविष्ट वापराशि धनोभूत हो कर क्रमशः तरल हो जाता है। वही उत्तप्त तरल जलराशि शीतल होने के समय दृढ़ आवरणसे आच्छादित रहती है। धीरे धीरे उसके ऊपर स्तर पर स्तर पड़ कर भूपपअर पत्थरके जैसा कठिन हो जाता है। ऊपरमें जो मट्टो देखने में आती है, क्रमशः वह पत्थर हो कर कुछ समय बाद श्लेटादि घन प्रन्धियुक्त पत्थरमें परिणत हो जायगो । महो
और पर्वतादिके नीचेसे नीचे स्थान में द्रवमय पत्थर वा धातवादिका हद या जलस्त्रोत देखने में आता है। भूतत्व और पर्वत शब्द देखो। भूपृष्ठके नीचे विभिन्न स्तरोंमें जो सब निहित प्रस्तरास्थिका निदर्शन मिलता है, उससे एक एक प्रलयकी कल्पना की जाती है ।
पृथिवीका उत्पत्ति काळ ।
क्या वर्तमान वैज्ञानिक युगमें, क्या पूर्वतन आय हिन्दुओंके मध्य, पृथ्वीका वयस निर्णय करने में विशेष आन्दोलन चला आ रहा है ? वैज्ञानिक वा ज्योतिर्विद् गण अपने अपने मतावलम्बनसे जिस प्रकार पृथिवीका उत्पत्तिकाल निर्णय करने में समर्थ हुए हैं, पूर्वतन हिन्दूशास्त्रकारोंने भी उन सब विषयोंको योगवलसे प्रगट किया है।
प्राचीन हिन्दुशास्त्रादिमें जगत्का अनन्त कालव्यामित्य स्वीकृत हुआ है। भगवान् मनुने "आसीदिदं तमोभतं" प्रभृति वचनों द्वारा उसका समर्थन किया है। क्रमशः सूर्यके विकाश और तेजोविकिरणसे जो वाष्प वा निहारिका बनती है, उसीसे पञ्चभूतमय इस गोलाकार पिण्डकी उत्पत्ति है। परन्तु बहुत दिन हुए, यह उत्पत्ति संसाधित हुई है, कोई भी इसे निश्चय रूपसे कहनेमें समर्थ नहीं हैं।
पुराणसे तथा वैज्ञानिक अनुसन्धानसे आविष्कृत हुआ है, कि पृथिवी भिन्न भिन्न समयमें प्रलय-प्लावित हो फिरसे सृष्ट हुई है। एकहत्तर युगके बाद प्रलय और एक एक मन्वन्तर अर्थात् नूतन मनुफा अवस्थितिकाल कल्पित हुआ है। मन्वन्तरकालको सन्धिका परिमाण सत्ययुगके बराबर है। उस सन्धिके समयमं पृथिवी जलप्लावित होती है। चाक्षुष मन्वन्तरके महाप्रलयके बाद यह सप्तद्वोपवती पृथिवी विराजित हुई है। अभी पञ्जिका देखनेसे ७म वैवस्वत मनुका आविर्भावकाल और श्वेतवराह कल्पाब्द ४३२००००००० मालूम होता है । इनमेंसे १६७२४६६००१ अब्द बीत चुके और १६५५८८५००१ अब्द हुए, भ-सृष्टि हुई है।
वर्तमान विख्यात ज्योतिर्विद् न्युकोम्ब और इलडेनकृत ज्योतिर्विद्या विषयक पुस्तकमें लिखा है, कि नोहारिकासे (Nebular hypothosis) वैज्ञानिक आलोचना |
eeb23fd01d30b2b999548b386d6548483c763c9f7023d30f8dd5c642d4ff14ce | pdf | से भेंट हुई थी, आपकी नमस्ते उन तक पहुंचा दी थी।
आजकल में उत्तर-पश्चिम में समुद्र तल से 6700 फीट (2000 मीटर) की ऊंचाई पर पर्वतीय स्थल पर हु। कुछ दिन यहीं रहने का विचार है, सामान्य क्रिया-कलापों को शुरू करने से पूर्व पहले की तरह स्वस्थ होना चाहता हूँ।
यह सुनकर प्रसन्नता हुई कि आप यूनिवर्सिटी के दर्शन विभाग के डीन चुने गए हैं। इस अवसर पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
श्रीमती लेनी व आपको शुभकामनाएं। इधर की ओर कब आ रहे हैं? आशा है आप पूर्ण स्वस्थ हैं। कृपया सलग्न पत्र श्री नाबियार तक पहुंचा दे।
प्रो डा. लेस्बी
प्रिय सीता
तुम्हारा पत्र पाकर प्रसन्नता हुई विशेष रूप से तुमने मुझे जो संबोधन किया। दोदी से विचार-विमर्श कर रहा था कि क्या 'मामा' जो अस्पष्ट था- बयाली भाषा है या पजाबी भाषा है ? अत निर्णय नहीं हो पाया। शायद तुम अस्पष्ट कुछ रोशनी डाल
शायद तुम्हें सैंडी की वास्तविक कहानी का पता नहीं। दीदी को वह टोकरी उठाए चलते देखने में बहुत आनंद आ रहा था जिसमें से बार-बार बिल्ली सिर उचकाकर झाकती थी। शिष्टतावश मैंने टोकरी उठाने का आग्रह तो किया, किंतु वह संभव नहीं था, क्योंकि दीदी स्वयं ही अपनी पालतू बिल्ली को बड़ी कठिनता से संभाल पा रही थी। एक महिला बोझ उठाए चले और मैं साथ-साथ खाली हाथ चलूं, यह प्रदर्शन करने की अपेक्षा मैंन दीदी को लीला के सरक्षण में छोड़ अपने डिब्बे में जाना बेहतर समझा। उस समय लग रहा था कि एक बार सुरक्षित डिब्बे में पहुंचने के पश्चात सभी तकलीफों का अंत हो जाएगा। यह नहीं पता था कि मुश्किले तो अब शुरू होंगी। जैसे हो गाड़ी चली, उसके शोर से बिल्ली बुरी तरह घबरा गई और उछलने लगी। यदि उसे अकेला छोड़ दिया होता तो वह निश्चित रूप से डिब्बे के बाहर कूद जाती। किंतु ऐसा नहीं था (पता नहीं उस समय मैं दुखी होता या नहीं) हमें तो कोई कठिनाई नहीं हुई मुझे और डाक्टर को, क्योंकि हम तो खूब डटकर सोए। किंतु दीदी को सारी रात बिल्ली को पकड़े रहना पड़ा। जब किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकती तो बिल्ली शात होती। पठानकोट पहुचने तक
बिल्ली ने उनकी साड़ी व बदन पर अपने कई निशान छोड दिए थे। उनकी साड़ी का तो पता नहीं, किंतु उनकी बाहों पर खरोंचों के निशान मिले जो हमने यहां पहुंच कर देखे, किंतु हम कुछ भी करने में असमर्थ थे। बहरहाल इस किस्से को यही रोकता हू और कुछ अन्य बार्ती पर आता हूँ।
आशा है तुम पूर्णरूप से सुरक्षित हो जैसा कि तुमने संकेत भी किया है। प्रसिद्ध हस्ती होने के कारण, अन्य लोगों को ही आकलन करना चाहिए।
मुझे डलहौजी बहुत पसद आया और इससे मुझे लाभ भी होगा। पहले से बेहतर महसूस करने लगा हूँ।
दिलीप के जो चित्र तुम्हे भेजे वे पाडिचेरी मे खीचे थे।
तुम्हे आवश्यकता नही... अस्पताल चलाने की।
अस्पतालों में लंबे समय तक रहने के कारण यह समझ चुका हू कि हाउस सर्जन अथवा हाउस फिजिशियन ही अस्पताल का कार्य सभालते हैं।
आज यही समाप्त करता हू क्योंकि डाकिया बाहर डाक लिए इंतज़ार कर रहा है, वह लेने जा रहा है। प्रेम सहित ।
तुम्हारा अपना सुभाष
द्वारा डा एन आर धर्मवीर डलहौजी पंजाब
मेरी धृष्टता है कि मैंने बहुत दिन से आपको लंबा पत्र नहीं लिखा जबकि आप मुझे कई बार लिख चुकी हैं। सच्चाई यह है कि रिहाई के बाद से मैं मित्रों को मिलने में अत्यधिक व्यस्त रहा। बहुत से पत्रो का ढेर लग गया है और कभी-कभी जल्दबाजी में कुछ मित्रों को कुछ पंक्तिया लिख देता हूं। शीघ्र ही सब व्यवस्थित होने की आशा है, तभी पत्रों का उत्तर ठीक प्रकार दे पाऊगा।
जैसा कि आप जानती ही है कि 17 मार्च को मैं रिहा हो गया था। यूरोप में किसी मित्र को केबल से सूचना नहीं दी, क्योंकि समाचार एजेंसी विदेशी समाचार पत्रों को खबर देगी और एन अच्छा मित्र होने के नाते विएना के सभी मित्रों को सूचित कर देगा। उन्होंने यही किया और आपको समाचार की विश्वसनीयता पर शक करने की आवश्यकता नहीं। कलकत्ता म्यूनिसिपल गजुट द्वारा यह समाचार आपको एक माह बाद
मिल पाता।
कलकत्ता में एक माह से अधिक रहा, एक तो आराम करने की दृष्टि से और दूसरे अपने रिश्तेदारों व मित्रों के संपर्क में रहने की दृष्टि से। फिर अप्रैल के मध्य में इलाहाबाद के लिए रवाना हुआ जहां महात्मा गांधी से मिला और पार्टी की बैठक में भाग लिया। कुछ दिन बाद लाहौर (उत्तर-पश्चिम) चला गया, जहा लगभग 10 दिन रहा। फिर 12 मई को यहां पहुंचा हूं। डलहौज़ी लाहौर के उत्तर में, हिमालय पर्वत श्रृंखला पर, 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां कुछ दिन मित्रों के साथ रहना चाहता हू जब तक पूर्णत; ठीक नहीं हो जाता।
17 मार्च के पत्र में आपने जो लिखा, पढ़कर अच्छा लगा, विशेष रूप से आपको आशा थी कि मैं शीघ्र ही रिहा कर दिया जाऊगा जब आप यह पत्र लिख रही थी तब आपको मालूम भी नहीं था कि ठीक उसी दिन मैं रिहा हो जाऊंगा । भेरी रिहाई अप्रत्याशित थी, क्योंकि मैं और मेरे लोग रिहाई की आशा से थक चुके थे। किंतु मैंने अपनी माताजी को बता दिया था कि या तो मार्च में रिहा हो जाऊंगा वरना फिर कम से कम छः माह और लगेंगे।
इससे पहले कि मैं भूल जाऊ, आपको बता दू कि डा बी.सी रॉय, जो मेरे मित्र भी हैं और कलकत्ता के भूतपूर्व मेयर रह चुके हैं, कलकत्ता के सुप्रसिद्ध चिकित्सक हैं, जून (अगले माह) में किसी समय विएना आने वाले हैं। मैं उन्हें आपके बारे में तथा डा. वैटर के बारे में बताना भूल गया। किंतु मैं चाहता हूं कि वे आपसे अवश्य मिलें, बशर्ते कि आप उन दिनों शहर से बाहर न हों। क्या आप उन्हें गैरोला के पते पर लिख देंगी कि वे आपसे सपर्क करें। गैरोला का पता है- के. एन. गैरोला, होटल डी फ्रांस । मैं चाहता हूँ कि डा. रॉप विएना की वास्तविकता को देखें और इसके लिए सही लोगों के संपर्क में आना आवश्यक है। संदेह है कि यहूदी डाक्टर उनको गुमराह न करें, क्योंकि उन्हें पहले सचेत नहीं कर पाया।
श्रीमती अस्कासी के समाचार पाने को उत्सुक हूँ। क्या वे वाकई सयुक्त राज्य जाने की इच्छुक हैं। तब उनके पति के व्यापार का क्या होगा? उनके क्लब का क्या होगा? क्या उनकी अनुपस्थिति में भी वह चल रहा है? यदि वे विएना पहुंच चुकी हैं तो आपको बहुत-सी दिलचस्प बातें सुनने को मिलेंगी।
हाल ही में मैंने ब्रीफाल्ट का यूरोप का अमरीकी ( या शायद अंग्रेजी) संस्करण पढ़ा है। मुझे बहुत पसद आया। अब समझ मे आया कि डा. वैटर क्यों उसका अनुवाद कर रहे थे। कुछ पैसेज को, प्राचीन काल की भाति विवादास्पद मानकर रेखांकित किया जा सकता है, किंतु मेरे विचार में समय और रुचि में तेज़ी से परिवर्तन आ रहा है। कुछ दिन पूर्व एल्डास हक्सले का उपन्यास 'आईलेस इन गाज़ा' भी पढ़ा। उसमें भी कुछ विवादास्पद पैरे है, किंतु इंग्लैंड में उसकी अप्रत्याशित बिक्री को देखकर लगता है कि अंग्रेज समाज भी अब उतना रूढ़िवादी और लज्जाशील नहीं रहा है जितना पहले था।
पिछले कई दिन से श्रीमती हाम्रो का कोई समाचार नहीं मिला है, मेरे विचार से अतिम पत्र मेरी ओर से ही लिखा गया था। क्या आप उन्हें मेरी याद दिला देंगी और
उनके स्वास्थ की सूचना मुझे देंगी। शायद वे ध्यानयोग में लीन रहती हैं।
सीएम.जी. को लिखा आपका पत्र मुख्य रूप से छापा गया, आपने देख हो लिया होगा। जब भी आपके पास समय हो, आप किसी भी विषय पर जो म्यूनिसिपल या लोकहित मे हो, लेख लिखकर समाचार पत्रों को भेज सकती हैं। वे उसे प्रसन्नतापूर्वक छापेगे।
मेरी रिहाई के बाद भी मेरा स्वास्थ्य बहुत संतोषजनक नहीं है, किंतु आशा है शीघ्र ही प्रगति होगी। पर्वतों के मध्य यह एक शांत और सुंदर स्थान है। मकान के आगन दूर-दूर फैले समतल स्थान व नदिया दिखाई देती हैं। दूसरी ओर पर्वत श्रृंखला, जगह-जगह बर्फ से आच्छादित दिखाई देती है। यद्यपि यहा मुझ पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। फिर भी मेरी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और मेरी डाक भी चुपचाप खोलकर देखी जा रही है। जब उन्हें कहता हूं तो वे मना कर देते हैं, किंतु हम सभी इसे जानते हैं। प्रायः निरीक्षण के पश्चात सभी चीज़े मुझे सौंप दी जाती है।
जब भी आप अंग्रेज़ी में भारतीय समाचार पत्रों में कुछ प्रकाशित करवाना चाहे, मुझे बताए मैं पूरी व्यवस्था कर दूंगा।
यह पत्र एयरमेल द्वारा प्रेषित करना चाहता हूं ताकि पत्र का उत्तर देने में हुए विलब की प्रतिपूर्ति कर सकूं। अलग से लाहौर से प्रकाशित समाचार पत्र की कटिंग भेज रहा हू तथा दो चित्र जो 12 मई को डलहौज़ी पहुंचने के पश्चात खीचे गए हैं। पता नही आप मुझे बगाली वेशभूषा में पहचान पाएगी अथवा नहीं। पहले की अपेक्षा कुछ दुबला भी हो गया हूं।
पत्र समाप्त करने से पूर्व आपकी भावनाओं का, जो पत्रों में व्यक्त हुई हैं, धन्यवाद करना चाहता हू। धन्यवाद करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मेरा धन्यवाद स्वीकार करे और डा. वैटर को शुभकामनाए दें।
आप आजकल अपना समय कैसे व्यतीत करती है? क्या आपको कोई और भारतीय साप्ताहिक अखबार या पत्रिका भिजवाऊ'
सदैव आपका शुभाकाक्षी सुभाष चंद्र बोस
डलहौजी, फ्जाब
तीन-चार दिन पूर्व आपका 18 अप्रैल का पत्र मिला। 12 तारीख को मैं यहा पहुचा हू और कुछ माह यही रहना चाहता हू। देखते हैं यहा स्वास्थ्य कैसा रहता है। प्रारंभ में यहा पहुचकर बहुत अच्छा लगा, कुछ समय बाद गले की परेशानी उभर आई और
वापिस लौटने की इच्छा होने लगी। मेरी रिहाई से पूर्व धर्मवीर मुझे यहां आने का आमंत्रण दे रहे थे, फिर अचानक रिहाई के पश्चात तो इन्होंने बहुत बल दिया। सब सोच-विचार कर मैंने आमंत्रण स्वीकार किया। वे मेरी पूरी देखभाल कर रहे हैं। इनसे मेरा पुराना परिचय है, तथा श्रीमती धर्मवीर को मैं अपनी बहन मानता हूं।
मेरे स्वास्थ्य की दृष्टि से यूरोप यात्रा ठीक रहती। किंतु कई कारणों से वह सभव नही। पहली बात विदेश जाना बहुत खर्चीला है, दूसरे घर से इतने दिन दूर रहा हू कि स्वतंत्र व्यक्ति के तौर पर अपनी इच्छा से अपने देश व लोगों से दूर नहीं जाना चाहता। देश में रहकर सबसे सपर्क बनाए रखना सरल है। बेगस्टीन में स्नान के दो उपचारों से मुझे बहुत लाभ पहुंचा था, अतः मुझे विश्वास है कि यदि मैं लगातार एक माह वह उपचार और करवा पाता तो मेरा स्वास्थ्य अवश्य सुधर गया होता। पहले मैं सोचता था कि स्नानोपचार महज प्रचार मात्र है, किंतु बैगस्टीन में स्वय उपचार कराने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुचा हूं कि वे बहुत लाभदायक हू। रेडियोएक्टिव स्नान करने पर ऐसा अनुभव होता है जैसे कोई 'टॉनिक' ले रहा है। खैर, अब इस विषय मे कुछ भी सोचने का कोई लाभ नही।
विएना समाज की उन्नति की कोई बड़ी आशा नहीं है। गैरोला समाज को अपने नियंत्रण में रखेगा। जहा भले लोगों का स्थाई अस्तित्व नहीं वहां नया कुछ सभव नही है।
आपके शोधग्रंथ की सूचना से बहुत प्रसन्नता हुई। आप भारत के प्रसिद्ध फिजीसियन के पास उसे भेज सकते हैं (दो प्रतिया पत्रिकाओं के लिए) विशेषरूप से उन क्षेत्रों में जहा आप प्रैक्टिस करना चाहते हैं।
मैनचेस्टर गार्जियन को लिखा पत्र मिला। यदि समय-समय पर आप ऐसे लेख या क्लिपिंग्स भेज सकें तो प्रसन्नता होगी।
विएना में और सब कैसा है? कुमारी शैकल से समय-समय पर समाचार मिलते से रहते हैं। 'मास्टर' का कुछ अता-पता नहीं शायद वह बर्लिन में हों। गैरोला प्रायः पत्र लिखते रहते हैं और श्रीमती मूलर हाल ही में भारत आई थी। विशेष आज्ञा प्राप्त कर वे मुझसे कलकत्ता अस्पताल मिलने आई। श्रीमती वैटर ने मुझे पिछले सप्ताह लिखा था कि आजकल यहूदियों में बहुत बेचैनी है। विएना में रह रहे हमारे कुछ यदूदी मित्र अमेरिका जाना चाह रहे हैं। सुश्री विस का क्या इरादा है? उन्होंने पैलेस्टीन जाने के विषय में मेरी राय जाननी चाही थी। उसके बाद से वहा कौन सी विध्वंसक घटनाए घटी। मेरे विचार से वर्तमान समय में और निकट भविष्य में भी, मध्य यूरोप में, यहूदियों की स्थिति बहुत अच्छी रहने वाली नहीं है।
आजकल आप इंग्लैंड में हैं अतः उपाधि लेने से पूर्व लौटने का विचार न करें। व्यक्तिगत रूप से मैं उपाधि के पीछे भागने के खिलाफ रहा हूं। किंतु क्योंकि आपका दिल्ली में रहने का विचार है और आजकल इंग्लैंड में है इसलिए आपको एडनबर्ग या लदन से डिग्री की आवश्यकता है ही। यह बात अपना स्थान बनाने की दृष्टि से है, |
763a35e84e2f496f04ce970d387ae4f7a1c1658659dc806bd6eda544f7522249 | pdf | उसी प्रकार भिन्न-भिन्न व्यक्ति एक प्रकार की कल्पना कर सकते हैं, किन्तु फिर भी उनकी कल्पनाएँ एक दूसरी से निराली ही होंगी ।
शुक्ल जी का मत है कि 'कल्पना की सारी रूप-सामग्री बाह्य जगत की ही होती है । कल्पना उसकी केवल तरह-तरह की योजना किया करती है + ++ यदि कोई मनुष्य जन्म से ही एक घर में बन्द रखा जाय, तो उसकी कल्पना में दीवारों और खम्भों के सिवा और कुछ नहीं आ सकता । ७११६ अतः उनकी दृष्टि में बाह्य गोचर जगत् ही कल्पना का स्रोत ठहरता है ।
कवि कल्पना के सम्बन्ध में शुक्ल जी ने लिखा है कि किसी भावोद्रेक द्वारा परिचालित अन्तवृत्ति जब उस भाव के पोषक स्वरूप गढ़कर या काट-छाँट कर सामने रखने लगती है तब हम उसे सच्ची कवि-कल्पना कह सकते हैं । यों ही सिरपच्ची करकेः- बिना किसी भाव में मग्न हुए कुछ अनोखे रूप खड़े करना या कुछ को कुछ कहने लगना या तो बावलापन है या दिमाग़ी कसरत, सच्चे कवि की कल्पना नहीं ।। ११७ स्पष्ट है कि शुक्ल जी सच्ची कवि-कल्पना के लिए भावोद्रेक से उसका सम्बन्ध अनिवार्य मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि 'भावोद्रेक और कल्पना में इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि एक काव्यमीमांसक ११८ ने दोनों को एक ही कहना ठीक समझ कर कह दिया है 'कल्पना आनन्द है ।। ११९
शुक्ल जी की दृष्टि में भावानुरूपता ही कल्पना की कसौटी है । साधारण व्यव हार में भी लोग जोश में आकर कल्पना का जो व्यवहार करते हैं वह भी भावानुरूप होने पर ही उचित कहला सकता है । 'किसी निष्ठुर कर्म करने वाले को यदि कोई 'हत्यारा' कह देता है, तो यह सच्ची कल्पना का उपयोग करता है, क्योंकि विरक्ति या घृणा के अतिरेक से प्रेरित होकर ही उसकी अन्तवृत्ति हत्यारे का रूप सामने करती है, जिससे भाव की मात्रा के अनुरूप आलम्बन खड़ा हो जाता है । 'हत्यारा' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग ही विरक्ति की अधिकता का व्यंजक है । उसके स्थान पर यदि कोई उसे 'बकरा' कहे तो या तो किसी भाव की व्यंजना न होगी या किसी ऐसे भाव की होगी जो प्रस्तृत विषय के मेल में नहीं ।।१२० काव्य के सम्बन्ध में भी उनका मत है कि 'वास्तव के अतिरिक्त या वास्तव के स्थान पर जो रूप सामने लाये गये हैं उनके सम्बन्ध में यह देखना चाहिए कि वे किसी भाव की उमंग में उस भाव को संभालने वाले या बढ़ाने वाले होकर आ खड़े हुए हैं या यों ही तमाशा दिखाने के लिए कुतूहल उत्पन्न करने के लिए जबर्दस्ती पकड़कर लाये गये हैं। यदि ऐसे रूपों की तह में उनके प्रवर्तक या प्रेषक भाव का पता लग जाय तो समझिये कि कवि के हृदय का पता लग गया और वे रूप हृदय प्रेरित हुए । १२१
शुक्ल जी की दृष्टि में 'जिसे निर्माण करने वाली सृष्टि खड़ी करने वाली कल्पना कहते हैं - उसकी पूर्णता किसी एक प्रस्तुत वस्तु के लिए कोई अप्रस्तुत वस्तु जो कि प्रायः कवि-परम्परा से प्रसिद्ध हुआ करती है -रख देने में उतनी नहीं दिखाई पड़ती जितनी किसी एक पूर्ण प्रसंग के मेल का कोई दूसरा प्रसंग - जिसमें अनेक प्राकृतिक
वस्तुओं और व्यापारों की नवीन योजना रहती है ----रखने में देखी जाती है । १२२
शुक्ल जी की दृष्टि में पौराणिक रूढ़ियाँ काव्यगत अत्युक्ति या कल्पना की उड़ान के अन्तर्गत नहीं आतीं। उन्होंने लिखा है कि इस प्रकार की ( अतिरंजित ) कुछ रूप योजनाएँ प्राचीन आख्यानों में रूद होकर पौराणिक ( माइथालॉजिकल हो गई हैं जैसे शुगेरु पर्वत, सूर्यचन्द्र के पहिए वाला रथ, समुद्र मन्थन, समुद्रलंघन, सिर पर पहाड़ नाद कर आकाश मार्ग से उड़ना इत्यादि । इन्हें काव्यगत अत्युक्ति या कल्पना की उड़ान के अन्तर्गत हम नहीं लेंगे । १२७ कल्पना का प्रयोग
शुक्ल जी के मतानुसार काव्य वस्तु का सारा रूप-विधान इसी की क्रिया से होता है । १२४ सारा रूप-विधान कल्पना ही करती है अतः अनुभाव कहे जाने वाले व्यापारों और चेष्टाओं द्वारा आश्रय को जो रूप दिया जाता है, वह भी कल्पना द्वारा १२५ वचनों द्वारा भाव व्यंजना के क्षेत्र में भी कल्पना को पूरी स्वच्छन्दता रहती है । १२६ मात्र प्रस्तुत की योजना में नहीं, अप्रस्तुत की योजना भी कल्पना ही द्वारा होती है । १२७ इस प्रकार कल्पना का प्रयोग क्षेत्र अत्यन्त व्यापक ठहरता है। प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों ही रूप-विधानों में कल्पना का प्रयोग होता है। उन्होंने लिखा है --- 'जिस प्रकार विभाव, अनुभाव आदि में हम कल्पना का प्रयोग पाते हैं, उसी प्रकार उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों में भी ।।१२८ किन्तु काव्य में रस के प्राधान्य के कारण उनका मत है कि उसके संयोजकों में कल्पना का जो प्रयोग होता है वही आवश्यक और प्रधान होता है । १२९ निष्कर्ष यह कि प्रस्तुत रूप विधान ही कल्पना के प्रयोग का प्रमुख क्षेत्र होता है, अप्रस्तुत रूप-विधान गौण । प्रस्तुत रूप विधान के अन्तर्गत कल्पना का सबसे बड़ा प्रधान कार्य क्षेत्र विभावन व्यापार होता है, क्योंकि विभावन व्यापार द्वारा ही रस का आधार खड़ा होता है । १४०
विभावन-व्यापार के क्षेत्र में भी कल्पना बिना पर के उड़ान नहीं भरती, वरन् अनुभूति या रागात्मिका वृत्ति के आदेश पर चलती है । वह ऐसे स्वरूप खड़े करती है जिनके द्वारा रति, हास, शोक, क्रोध इत्यादि का स्वयं अनुभव करने के कारण कवि जानता है कि श्रोता या पाठक भी उनका वैसा ही अनुभव करेंगे । 139 शुक्ल जी कल्पना द्वारा भावों के प्रकृत आधार या विषय का पूर्ण और यथा तथ्य प्रत्यक्षीकरण कराना ही कवि का प्रथम और सर्वाधिक आवश्यक कार्य मानते हैं । १३२ यद्यपि शुक्ल जी अप्रस्तुत रूप-विधान को भी कल्पना के प्रयोग का क्षेत्र मानते हैं, किन्तु वे इस धारणा का खण्डन करते हैं कि कल्पना का प्रयोग मात्र अप्रस्तुत रूप विधान की सामग्री एकत्र करने में ही होना चाहिए । उन्होंने इस धारणा को भी असंगत सिद्ध किया है । जिसके अनुसार काव्य में प्रतिभा या कल्पना का काम केवल ढूंढ-ढूंढ़ कर, या अपनी अन्तरात्मा में से निकाल निकाल कर, तरह-तरह के अप्रस्तुत रूपों का विधान करना ही है । १४४ प्रस्तुत के मार्मिक रूप-विधान का त्याग और केवल प्रचुर अप्रस्तुत रूपविधान में ही कल्पना का प्रयोग उन्हें मान्य नहीं । १३४ क्योंकि यह तो अलंकारवाद
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ही हो जायगा, जिसका नाम और रूप थोड़ा बदला हुआ होगा। फिर भी अलंकार विधान में उपयुक्त उपमान लाने में कल्पना काम करती है । 'जहाँ वस्तु गुण या क्रिया के पृथक्-पृथक् साम्य पर ही कवि की दृष्टि रहती है वहाँ वह उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि का सहारा लेता है और जहाँ व्यापार समष्टि या पूर्ण प्रसंग का साम्य अपेक्षित होता है वहीं दृष्टान्त, अर्थान्तर त्यास और अन्योक्ति का ।।१३५ उनका स्पष्ट मत है कि अप्रस्तुत की योजना 'यदि भाव के संकेत पर होगी, सौंदर्य, माधुर्य, भीषणता, कांति, दीप्ति इत्यादि की भावना में वृद्धि करने वाली होगी, तब तो वह काव्य के प्रयोजन की होगी, यदि केवल रंग, आकृति, छोटाई आदि का ही हिसाब-किताब बैठाकर की जायगी तो निष्फल ही नहीं, बाधक भी होगी ।।१३६
शुक्ल जी के कथनानुसार 'आधुनिक पाश्चात्य समीक्षा क्षेत्र में 'कल्पना' शब्द से अधिकतर अप्रस्तुत विधायिनी कल्पना ही समझी जाती है । 1939 कहने की आवश्यकता नहीं कि उनकी दृष्टि में यह मत एकांगी और अनुचित है ।
भावानुभूति के लिए विषय-बोध अनिवार्य होता है। काव्य में विषय-विधान कल्पना द्वारा सम्पन्न होता है, अतः कल्पना साधन-स्वरूपा है, साध्य नहीं । शुक्ल जी ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि 'यह ( कल्पना ) काव्य का अनिवार्य साधन है, पर है साधन ही, साध्य नहीं ।।१३८ उन्होंने लिखा है कि 'जिस प्रकार भक्ति के लिए उपासना या ध्यान की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार और भावों के प्रवर्तन के लिए भी भावना या कल्पना अपेक्षित होती है ।।933 अतः शुक्ल जी की दृष्टि में कल्पना के बिना भाव प्रवर्तन सम्भव ही नहीं। यहाँ उन्होंने 'भावना' और कल्पना को पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया है। उनका स्पष्ट मत है कि साहित्य में जिस क्रिया या शक्ति को 'भावना' शब्द से अभिहित किया जाता है, उसी को आजकल के लोग कल्पना कहते हैं । १४
उन्होंने कल्पना को उपासना के समकक्ष बतलाया है । १४१ उनका कथन है कि 'जो वस्तु हमसे अलग है, हमसे दूर प्रतीत होती है, उसकी मूर्ति मन में लाकर उसके सामीप्य का अनुभव करना ही उपासना है ।।१४२ कल्पना को उपासना के समकक्ष मानना कवि और पाठक दोनों की ही दृष्टियों से युक्तियुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि कवि भी कल्पना के माध्यम से अपने आलम्बन का रूप खड़ा कर इसके सामीप्य का अनुभव करता है और सहृदय या पाठक भी कल्पना के द्वारा अपनी सत्ता को कवि की सत्ता के पास ले आता है या यह कह सकते हैं कि पाठक कवि-जगत् के अति समीप आ जाता है । अतः डॉ० जयचन्द्र राय का यह मत कि 'उसे ( कल्पना को ) भावना या उपासना के समकक्ष रखना ठीक नहीं जान पड़ता ।।१४३ स्वयं ठीक नहीं जान पड़ता ।
शुक्ल जी ने कल्पना को काव्य का क्रियात्मक बोधपक्ष कहा है, जिसका विधान भारतीय काव्य- विचारणा में रसवादियों ने भाव के योग में ही अन्तर्भूत माना है । १४४ उन्होंने लिखा है कि 'किसी प्रसंग के अन्तर्गत कैसा ही विचित्र मूर्ति विधान हो ( कल्पना के द्वारा लाया हुआ) पर यदि उसमें उपयुक्त भाव को क्षमता नहीं है तो वह काव्य के
अन्तर्गत न होगा ।।१४५ अतः सब प्रकार की कल्पना काव्य की प्रक्रिया नहीं कही जा सकती। उनके मतानुसार 'काव्य में हृदय की अनुभूति अंगी है, मूर्त रूप अंग - भाव प्रधान है, कल्पना सहयोगिनी १४६
शुक्ल जी के मतानुसार कल्पना दो प्रकार की होती है - विधायक और ग्राहक । कवि में विधायक कल्पना अपेक्षित होती है और श्रोता या पाठक में अधिकतर ग्राहक । अन्यत्र उन्होंने 'स्मृत्याभास' नाम की एक अन्य कल्पना का उल्लेख किया है जो अतीत की कल्पना होती है, जिसका आधार आत शब्द ( इतिहास ) होता है अथवा शुद्ध अनुमान । उनका कथन है कि 'अतीत की कल्पना भावुकों में स्मृति की सी सजीबता प्राप्त करती है और कभी-कभी अतीत का कोई बचा हुआ चिह्न पाकर प्रत्यभिज्ञान का-सा रूप ग्रहण करती है ।१४८ उनकी दृष्टि में ऐसी कल्पना सत्य का आधार लेकर खड़ी होती है । अतः अत्यधिक मार्मिक होती है । १४९
भारत के साहित्य - चिन्तकों ने 'कल्पना' पर पृथक् एवं स्वतंत्र विचार नहीं किया है । पश्चिम के ही विद्वानों ने कल्पना पर स्वतंत्र रूप से विस्तारपूर्वक विचार किया है । कल्पना का विशद् विवेचन करने वालों में प्रमुख हैं कालरिज और रिचर्डस । अतः इन्हीं के कल्पना- विवेचन की सापेक्षता में शुक्ल जी के कल्पना- विवेचन की समीक्षा की जा सकती है ।
कालरिज ने लिखा है - 'इस समन्वय और जादू की शक्ति के लिए मैंने कल्पना याब्द का प्रयोग किया है। इसका धर्म है विरोधी या असम्बद्ध गुणों का एक दूसरे के साथ संतुलन अथवा समन्वय करना अर्थात् एकरूपता का अनेकरूपता के साथ, साधारण का विशेष के साथ, भाव का चित्र के साथ, व्यष्टि का समष्टि के साथ, नवीन का प्राचीन के साथ, असाधारण भावावेश का असीम संयम अथवा अनुक्रम के साथ अथवा चिर-जागृत विवेक एवं स्वस्थ आत्म संयम का दुर्दम तथा गंभीर भावुकता के साथ 1.... इसी के बल पर कवि अनेकता में एकता ढूंढ़ निकालता है और विभिन्न विचारों एवं भावों को एक विशेष विचार अथवा भाव से अन्वित कर देता है ।।१५० कालरिज के मतानुसार दृश्य जगत् और कवि की अपनी इकाई का समन्वय, जिसे आचार्य शुक्ल ने हृदय की मुक्तावस्था या रसदशा कहा है, कल्पना द्वारा ही सम्भव होता है। उनका कहना है कि 'कल्पना समष्टि मानस की प्रतिनिधि है। व्यष्टि मानस अर्थात् कवि का अन्तःकरण इसी समष्टि मानस को अपने भीतर समेटता है। इस प्रकार कवि की कल्पना में विषय अर्थात् बाह्य जगत् और विषयी अर्थात् कवि का समाहार हो जाता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि आचार्य शुक्ल का मत भी शब्दों के हेर-फेर के बावजूद तत्त्वतः यही है। उनका 'कल्पना' को 'उपासना' कहने का वास्तविक तात्पर्य यही है। उपासना द्वारा ही भेद में अभेद, अनेकता में एकता, दूरी में समीपता की स्थापना होती है, साथ ही भक्त और आराध्प अथवा कवि हृदय और बाह्य विषय का एकीकरण अथवा समाहार सम्भव होता है। कालरिज के उक्त विवेचन के अनुसार 'कल्पना' दृश्य जगत् के नाना रूपों का उद्घाटन करने वाली तथा व्यष्टि मानरा में |
49a50815f80e73522bbadf27338494112e8971e0 | web | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिसार की रैली में कहा, यह मोदी है जो ठान लेता है करके छोड़ता है। पाकिस्तान जा रहा पानी रोक कर रहेंगे। जल्द ही यह काम पूरा होगा। उन्होंने विपक्ष खासकर कांग्रेस पर जमकर हमले किए। उन्होंने कहा, हम काम करते हैं और वे कारनामा करते हैं।
हमारा काम करने में विश्वास है और कांग्रेस का कारनामा करने में यकीन है। मेरा पिछला कार्यकाल सफाई और गड्ढ़े भरने में गया। अब गति से काम करना है और नई इबारत लिखनी है। जम्मू-कश्मीर से 370 हटाकर अपने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पानी के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि हरियाणा के किसानों को पानी नहीं मिलता था और पहले की सरकारें चुप रहीं व देखती रहीं। उन्होंने कहा कि अब भारत और हरियाणा के लोगों के हक का पानी अब पाकिस्तान नहीं जाएगा। इसके लिए कदम उठाने की तैयारी हो रही है। उन्होंने कहा, यह मोदी है जो ठान लेता है पूरा करके रहता है। पाकिस्तान बहकर जा रहा पानी जल्द ही रोकेंगे।
उन्होंने कहा, हम अगले 5 वर्षों में 3. 5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रहे हैं ताकि हमारी माताओं और बहनों और किसानों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े। हमारा प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को केवल मौसम पर निर्भर न रहना पड़े और उनके खेतों को पर्याप्त पानी मिले।
उन्होंने कहा कि भाजपा जो कहती है वह करती है। यही कारण है कि लोग भाजपा के घोषणा पत्र में कही गई बातों पर भरोसा करते हैं। हम अपने दूसरे कार्यकाल में बहुत कुछ करने वाले हैं। मेरी सरकार पांच साल के लिए है और अभी तो पांच माह ही हुए हैं।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाकर हमने आतंकवाद से लड़ते हुए शहादत देने वाले हमारे वीर जवानों को श्रद्धांजलि है। मुझे यह कार्य करने संतोष मिला है कि इससे शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दे सका।
मोदी ने हरियाणा और हिसार की धरती को सर झुका कर नमन किया। उन्होंने कहा कि हरियाणा के लोगों ने भाजपा और मुझ पर आशीर्वाद बरसाया है। ये प्यार दिल्ली के एयर कंडीशन के कमरों में बैठ कर नहीं महसूस किया जा सकता। पूरा हरियाणा फिर एक बार भाजपा सरकार के पक्ष में खड़ा है।
पिछले एक हफ्ते में जहां- जहां जाने का मौका मिला और अनुभव हुआ उसपर कह रहा हूं। उन्होंने कहा, आज कांग्रेस की स्थिति बुरी है। कांग्रेसी भी कहते हैं 10 - 15 सीट ले पाए तो बहुत है। वे हार चुके हैं और थैके हुए हैं। जेजेपी का दायरा छोटा है। इन दोनों को हरियाणा ने ठुकरा दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने आयुष्मान योजना का जिक्र किया। उन्हाेंने कहा कि आयुष्मान योजना ने गरीबों को स्वास्थ्य और इलाज की सुविधा मिली। लोग अपना पैसे की कमी के कारण ठीक से इलाज नहीं करा पाते थे, लेकिन आयुष्मान योजना से उनको यह मिल रहा है। उन्होंने शौचालय, कौशल और घरेलू गैस सिलेंडर योजनाओं की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि हरियाणा को भाजपा ने विकास दिया है। विकास यहां की सड़कों पर दिखता है।
अपना संबोधन हरियाणवी में शुरू किया। उन्होंने कहा कि हरियाणा के लोगों ने लोकसभा चुनाव में जो प्यार दिया उसके लिए आभारी है। लोगों का प्यार मजबूत करता है। हरियाणा का विधानसभा चुनाव सारे समीकरण बदल देगा और सारे रिकार्ड तोड़ देगा। उन्होंने कांग्रेस और हरियाणा के कांग्रेस नेताओं पर हमला किया।
उन्होंने कहा कि हरियाणा मेरा दूसरा घर है। यहां काफी काम किया है और हरियाणा के बारे में मुझे किसी की सलाह की जरूरत है। वह साेनीपत के मोहाना में रैली को संबोधित करने के बाद हिसार पहुंचे हैं। हिसार रैली में पहुंचने पर उनको मोदी-मोदी के नारे से स्वागत हुआ।
रैली स्थल के पास पीएम का हेलीकॉप्टर पहुंचा तो लोग काफी उत्साहित हो गए और मोदी-मोदी के नारे लगाने लगे। रैली के मंच पर पहुंचने पर भाजपा नेताओं ने उनका भव्य स्वागत किया। रैली में पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह ने कहा की मोदी देश ही नहीं दुनिया के नेता हैं। मोदी की लीडरशिप में दो बार स्पष्ट बहुमत मिला। मैंने 47 साल के सियासी करियर में 2019 जैसा लोकसभा चुनाव नहीं देखा। पहली बार चुनाव जात पात और धर्म से ऊपर था।
हिसार रैली में अभी मंच पर स्थानीय नेता और हिसार और आसपास के जिलों के विधानसभा क्षेत्रों के प्रत्याशी मौजूद हैं। रैली के मंच पर राज्यसभा डीपी वत्स, हिसार के सांसद बृजेंद्र सिंह और हिसार के मेयर गौतम सरदाना मौजूद हैं। रैली स्थल को भाजपा के झंडों व पोस्टरों से सजाया गया है। रैली स्थल पर कड़ी सुरक्षा की गई है।
इससे पहले मोहाना रैली में उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेताओं ने जम्मू-कश्मीर के बारे में ऐसे बयान दिए कि इसका फायदा पाकिस्तान ने उठाया। वह इन बयानों के आधार पर दुनिया में अपना केस मजबूत करने में जुटा है। यह कांग्रेस और पाकिस्तान के बीच कैसी केमेस्ट्री है। यह दर्द और हमदर्द का रिश्ता लगता है। रैली में प्रधानमंत्री ने जय किसान, जय जवान और जय पहलवान का नारा दिया। मोहाना रैली के बाद पीएम मोदी हिसार के लिए रवाना हुए।
इससे पहले सोनीपत के माेहाना रैली में मोदी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की चर्चा करते हुए लोगों से पूछा कि बताएं मुझे देशहित में फैसले लेने चाहिए की नहीं। उन्होंने कहा कि इससे कांग्रेस को परेशानी होती है और उसके नेताओं के पेट में दर्द होने लगता है।
उन्होंने कहा कि 5 अगस्त को क्या हुआ था पता है ना। 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर में भारत का पूरा संविधान लागू हुआ। 70 साल से जम्मू कश्मीर के विकास में जो रुकावट थी, वो हमने हटा दी। मगर तभी से कांग्रेस व उसके मिलीभगत वालों के पेट में ऐसा दर्द उठा है कि कोई दवा काम ही नहीं कर पा रही।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेताओं ने जो झूठे दावे मोदी को घेरने के लिए किए थे, उन्हीं दावों को पकड़कर उन्ही बयानों को पकड़कर, आज पाकिस्तान पूरी दुनिया में अपना केस मजबूत बनाने के लिए बयानों का उपयोग कर रही है। कांग्रेस से कहना चाहता हूं कि मोदी को घेरने के लिए जितने आरोप लगाओ चाहे जितने झूठ बोलो, मगर कम से कम मां भारती की तो इज्जत करो। भारत माता का तो गौरव करो। सीमाएं ऐसे तो मत लांघों की देश का नुकसान कर दे।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को उन दलितों, उन पिछड़ाें की भी चिंता नहीं, जिन्हें जम्मू कश्मीर में अधिकार से वंचित रखा गया। देश आजाद होने के बाद जब पूरा पंजाब एक था, तब इस इलाके के दलितों काे जम्मू कश्मीर के लोगों की सेवा के लिए ले जाया गया। 70 साल हो गए, चार पीढियां बीत गई। इन दलितों ने कश्मीर की सेवा की। अब उनके बच्चे पढ़कर आगे आने शुरू हुए मगर 370 धारा के तहत इन दलितों एक भी अधिकार नहीं दिया गया। 70 साल तक कांग्रेस सोती रही।
मोदी ने कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर ने जो दलित व पीड़ितों के लिए किया था, उनका सपना जम्मू कश्मीर में कुचल दिया जाए, यह कब तक चलेगा। कांग्रेस को ना दलितों की चिंता नहीं, ना बाबा साहेब की। ऐसे लोगों की चिंता हरियाणा कर सकता है क्या। लोगों से पूछा कि ऐसे लोगों की सजा दी जाए कि नहीं। ऐसे लोगों काे घर भेज दीजिए। कांग्रेस के शासन में न जवान सुरक्षित था, न किसान और न ही खिलाड़ियों का हित।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस राज में खिलाड़ियों की स्थिति क्या था, आप इससे परिचित है। 2014 से पहले खेल में घोटाले व घपलों की खबरें आती थीं। खेल की चर्चा नहीं होती थी बल्कि घोटालों की चर्चा होती थी। कॉमनवेल्थ घोटालों के कारण बदनामी का कारण बना था। आज उनमें हमने बेहतर प्रदर्शन किया।
उन्हाेंने कहा कि अखाड़ा चाहे कुश्ती का हो या युद्ध का मैदान हो, तिरंगा की शान बुलंद करने में हरियाणा का नौजवान सबसे आगे रहा है। मोदी ने कहा, मैं आपसे पूछता हूं कि क्या मुझे हरियाणा की इस भावना को बुलंद करना चाहिए कि नहीं। क्या मुझे देशहित में फैसले लेने चाहिए कि नहीं। क्या देशहित राजनीति से ऊपर होना चाहिए कि नहीं। हरियाणा की जो भावना है, वह कांग्रेस और उसके जैसे दलों के कान में नहीं पड़ रही है।
मोदी ने कहा, यह कांग्रेस की बीमारी बन गया है। हम स्वच्छ भारत की बात करते हैं तो कांग्रेस के पेट में दर्द होने लगता है। हम सर्जिकल स्ट्राइक की बात करते हैं तो दर्द इतना बढ़ जाता है कि पूछो मत। हम बालाकोट का नाम लेते हैं तो कांग्रेस दर्द से उछलने लगती है। अब तो लोगाें को भी पता चलता है कि कांग्रेस का यह दर्द क्यों है।
पीएम मोदी ने कहा कि इन पांच सालों में खिलाड़ी भी वही, प्रतिभा भी वहीं संस्थाएं भी वहीं, फिर इतना बड़ा बदलाव कैसे आया। बदलाव ऐसे आया कि भाजपा सरकार ने स्थितियां बदली हैं। खिलाड़ी तो वही है। हमने प्रतिभा की पहचान पर बल दिया है। भाई-भतीजावाद दूर कर दिया। राजनीति नहीं घुसने दी। उसी का परिणाम है कि देश का खिलाड़ी देश के भरोसे पर चार चांद लगा देता है।
उन्होंने कहा कि अपने खिलाड़ियों को हम राजनीति और राष्ट्रनीति में अहम जगह दे रहे हैं। यहां जो पहलवान हमने दंगल में उतारे हैं, वह उसी सोच का परिणाम है। प्रधानमंत्री ने किसानों के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का जिक्र किया। पीएम किसान सम्मान निधि से लाखों परिवारों को सीधी आर्थिक मदद बैंक खाते में पहुंच रही है। कोई दलाल नहीं, कोई बिचौलिया नहीं। छोटे किसानों के लिए मासिक पेंशन योजना शुरू हो चुकी है। सिंचाई से लेकर कमाई तक, मौसमी आपदा से भरपाई तक मजबूत व्यवस्था तैयार की है।
उन्होंने कहा कि स्वरोजगार में हरियाणा ने अच्छा काम किया है। खर्ची और पर्ची का कांग्रेसी कल्चर हरियाणा से विदा हो चुका है। यही सुशासन है। यही लोकतंत्र है। युवाओं को बिना सिफारिश व जी हजूरी के अवसर मिले, यही हमारी नीति है।
सोनीपत उद्यमियों का हब बनता जा रहा है। उद्यम का तेजी से विकास हो रहा है। सूरत सोनीपत व भिवानी के लोगों से भरा हुआ है। उन्होंने गन्नौर में बनने वाली रेल फैक्ट्री का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत विदेशेां को भी ट्रेन कोच निर्यात कर रहा है। यह फैक्ट्री युवाओं को रोजगार देगी।
उन्होंने कहा कि हरियाणा में आज अगर उद्योगों का दायरा बढ़ रहा है, इसका कारण है इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार हो रहा है। आठ हाईवे का निर्माण हुआ है, पिछले पांच सालों में। मेट्रो का विस्तार सोनीपत में हो, इसके लिए काम चल रहा है। यह इलाका दिल्ली से रैपिड रेल से भी जुड़ने वाला है।
इससे पहले उनका रैली के मंच पर पहुंचने के बाद भव्य स्वागत किया। लोगों ने मोदी-माेदी के नारे लगाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हेलीकॉप्टर सभास्थल के पास उतरा और वहां से मंच पर पहुंचे। उन्होंने अपना संबोधन हरियाणावी में शुरू किया।
इससे पहले रैली को अभी स्थानीय नेताओं ने संबोधित किया। रैली स्थल को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया है। रैली में कड़ी सुरक्षा की गई है। रैली के मंच पर अभी स्थानीय नेता मौजूद हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री हिसार में रैली को संबोधित करेंगे।
रैली में कैबिनेट मंत्री कविता जैन, कृष्णलाल पंवार भी मौजूद हैं। रोहतक की गढ़ी किलोई सांपला से चुनाव लड़ रहे सतीश नांदल, महम से शमसेर खरकड़ा, गोहाना से चुनाव लड़ रहे तीर्थ राणा, बरोदा से योगेश्वर दत्त, गन्नौर से निर्मल चौधरी, राई से मोहनलाल बडौली जींद से विधायक कृष्णलाल मिढा मंच पर मौजूद हैं।
रैली में सुबह से ही लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। पूरे रैली स्थल को भाजपा के झंडों और पोस्टरों से सजाया गया है। प्रधानमंत्री मोदी के पोस्टर भी चारों ओर दिख रहे हैं। काफी संख्या में लोग पीएम मोदी का मुखौटा लगाकर आए हैं। पूरे रैली स्थल पर सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम हैं। लोगों को कड़ी चेकिंग के बाद ही रैली के पंडाल में जाने दिया गया है। प्रधानमंत्री विधानसभा चुनाव के अंतिम दिन 19 अक्टूबर को भी हरियाणा में दो रैलियों को संबोधित करेंगे।
प्रधानमंत्री ने 16 अक्टूबर को हरियााणा में दादरी और कुरुक्षेत्र में रैलियों को संबोधित किया था। वह 19 अक्टूबर को सिरसा व रेवाड़ी में रैली करेंगे। मोहाना में सुबह से रैली को लेकर गहमागहमी रही और रैलीस्थल व आसपास के क्षेत्र मे कड़ी सुरक्षा की गई ।
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9e1793234f7ad5515fa4c766410a0f01fc508d55e9d6b62aa22eb96f112d581a | pdf | बाद (दक्षिण ) की प्रायः नव्वे प्रति सैकड़ा जनता हिंदू है । उसमें तेलगू, तामिल, कनारी और मराठी बोलने वाले हैं। उनके लिए अरबी-फारसी के शब्दों का शुद्धोच्चारण करन भी कठिन है। परंतु निज़ाम साहब ने वहाँ की राज-भाषा उर्दू बना कर और उस्मानिया - विश्व - विद्यालय स्थापित कर वहाँ की भाषा ही बदल दी है। जो उर्दू हैदराबाद के हिंदुओं के पूर्वजों के लिए चीनी या लातीनी के समान अपरिचित थी, वही अब राज्य के प्रचार से उनकी मातृ-भाषा-सी बनती जा रही हैं । सो यह तो यह और प्रचार की बात हैं । इंग्लैंड में 'येकरे' आदि के समय में जनता 'फ्रेंच' और लातीनी शब्दों और वाक्यों का लिखना और बोलना एक बड़ी मान प्रतिष्ठा का काम समझती थी ! परंतु तत्पश्चात् स्वदेश प्रेमी अँग्रेज़ लेखकों ने उन सब शब्दों और वाक्यों को दूध में से मक्खी की भाँति निकाल कर बाहर फेंक दिया । V
जिस वस्तु को मनुष्य अपने लिए उपयोगी समझ कर स्वेच्छा पूर्वक खाता है, वह पच कर उसके शरीर का अंग बन जाती है, और उससे उसकी देह पुष्ट होती है। इसके विपरीत जो वस्तु बलात् अनिच्छापूर्वक उसके भीतर हँसी जाती है, वह विजातीय द्रव्य उसे हानि करता है । नीरोग शरीर पर जब रोग के विजातीय कीड़े आक्रमण करते हैं, तब शरीर उनको मार कर भगा देता है, वे उस पर अधिकार नहीं पा सकते । परंतु जब शरीर निर्बल हो जाता है, तब
वे कीड़े उसमें घर बना लेते हैं और उसकी नाक, मुँह आदि के मार्ग से वैसे के वैसे निकलने लगते हैं। यही दशा किसी जाति की है। बलवान् जाति तो विदेशी भाषाओं में से नए और उपयोगी शब्द लेकर आत्मसात् कर लेती है। फिर उनका ऐसा रूपांतर होता है कि पता ही नहीं लगता कि वे शब्द किसी विदेशी भाषा के हैं या स्वदेशी भाषा के । परंतु पराधीन निर्बल जाति पर जब कोई सबल जाति प्रभुत्व जमाती है, तब वह अपनी भाषा, अपना रहन-सहन और अपना धर्म उसके गले में हँसने का यक्ष करती है। निर्बल जाति कुछ काल तक तो विजेता के उस सांस्कृतिक और भाषा-संबंधी आक्रमण का प्रतिवाद करती है, परंतु जब उसमें जीवट नहीं रह जाती तब चुपचाप हार मान कर उन उदासता के चिह्नों को आभूषण समझ कर धारण कर लेती है।
1 AAL AAPPA
यू० पी० में मुसलमानों का स्थिर राज्य देर तक रहा है। आगरा, लखनऊ, दिल्ली इस्लाम के केंद्र रहे हैं। इसलिए यू० पी० ही उर्दू का गढ़ है। वहाँ हिंदू परिवारों की स्त्रियाँ भी 'नमस्ते' के स्थान में 'दुआ-सलाम' कहती हैं । यू० पी० की अदालत की भाषा भी उर्दू है । यद्यपि हिंदी को भी अदालतों में स्थान दिया गया है, तथापि क्वचित् ही कोई ऐसा नगर होगा, जहाँ अदालत की भाषा हिंदी हो । काशी तक में सारा अदालती काम उर्दू में होता है। श्री मालवीय जी
जैसे हिंदी प्रेमियों के रहते भी अभी.. यू० पी० उर्दू-आक्रांत, ही है। उसी यू० पी० की भाषा को हिंदी, हिंदी हिंदुस्तानी और राष्ट्र-भाषा कह कर दूसरे प्रांतों पर लादा जा रहा है। फिर आश्चर्य की बात यह है कि जिस मार्ग पर हिंदी स्वाभाविक रूप से चल रही है उसे उधर से हटा कर, दलदल में फँसाया जा रहा है । पुस्तकों और पत्रिकाओं की, हिंदी तो कदाचित् यू० पी० में कहीं भी नहीं बोली जाती ।। वहाँ की भाषा तो अभी मुसलमानों की दासता से निकलनेः का यत्न कर रही थी कि यह राष्ट्र-भाषा-प्रचारक मंडली 'जज़वात और वाक्यात' के गोले उस पर फेंकने लगी । मैं नही कह सकता, गोंडा, वस्ती एवं गोरखपुर के गाँवों में लोग 'जज़वात और वाकुयात' जैसे शब्द समझते होंगे । फिर यह भाषा नगर और गाँव की कैसे हुई ? साहित्यिक भाषा बोल-चाल की भाषा से सदा अलग रहेगी। इतिहास, और विज्ञान के लिए आपको नए-नए शब्द गढ़ने ही पड़ेंगे। यदि आप उनको संस्कृत से न गढ़ कर अरबी-फारसी से, गढ़ेंगे तो 'घर से वैर अवर से नाता' की लोकोक्ति को : चरितार्थ करते हुए आप भारत की भाषा संबंधी एकता साधित न करके अधिक पृथक्त्व का ही कारण बनेंगे । अँग्रेज़ । विदेशी भाषा है । उसे सीखने में बरसों लग जाते हैं। परंतु कितनी भी कठिन पुस्तक हो, कभी कोई भारतीय उसकी अंग्रेजी के कठिन या दुर्बोध होने की शिकायत नहीं
करता । इसके विपरीत संस्कृत का कोई छोटा-सा भी शब्द.. आ जाय तो भाषा की क्लिष्टता की शिकायत होने लगती है। इसका कारण कदाचित् यह है कि अंग्रेज़ी से अनभिज्ञता प्रकट करना अपने को सभ्य समाज की दृष्टि में गिराना समझा जाता है। परंतु हिंदी की क्लिष्टता की शिकायत. करना बड़प्पन और भाषा तत्त्व का विशेषज्ञ होने का लक्षण ' है । यदि फ़ारसी-अरबी के अनावश्यक और गला घोंटू शब्दों का रखना अतीव आवश्यक है, तो अँग्रेज़ी ने ऐसा कौन अपराध किया है ? उसे अपनाने से तो सारे संसार के साथ संबंध स्थापित हो जाता है । अरब और फारस से अंग्रेज़ सभ्य और शक्तिशाली भी अधिक है।
बात वास्तव में यह है कि केवल कोरी युक्ति और तर्क.. के घोड़े दौड़ाने से कुछ नहीं बनता। संगठित असत्य भी असंगठित सत्य को दबा लेता है। संसार में कर्म-योगी की ही जीत है । दर्शनशास्त्र के पुजारी हिंदुओं की सौ. 'समतियाँ हैं । कोई कहता है, बँगला राष्ट्र-भाषा होनी चाहिए, कोई अँग्रजी के गुण गा रहा है, कोई हिंदी के साथ व्यभिचार करके ऐसी भाषा तैयार करने की चेष्टा कर रहा है जो आधा तीतर और आधा बटेर है। कोई "मेरा फ़ादर, इन-ला मेरी वाइफ को बहुत बुरी तरह ट्रीट करता है" ऐसी भाषा का ही प्रेमी बन रहा है। सारांश यह कि हिंदुओं के
जितने मुँह उतनी ही बातें हैं। वाग्वीरता बहुत है, कर्मण्यता कुछ भी नहीं । उधर मुसलमान काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक स्वर से उर्दू के लिए पुकार कर रहे हैं, जिसका कारण यह है कि उन्हें सफलता प्राप्त हो रही है। विहार जैसे प्रांतों में भी उर्दू अदालत की भाषा हो गई है।
काका कालेलकर कहते हैं कि "हम राष्ट्र-भाषा में से संस्कृत और अरबी-फारसी शब्दों के निकाल डालने के पक्ष में नहीं हैं।" मेरा निवेदन है कि अरबी-फारसी शब्द तो आप निकाल ही नहीं सकते। आपके ऐसी कोई चेष्टा करते ही देश का राजनीतिक वायु-मंडल विगड़ जायगा; मुसलमान रूठ जायेंगे । परंतु संस्कृत के शब्दों का वहिष्कार तो आप न जानते हुए भी कर रहे हैं। 'समूल नाश' की जगह 'नेस्तोनाबूद'; 'फूट' की जगह 'नाइत्तिफाकी' और 'भयावह' की जगह 'ख़तरनाक' लिखना संस्कृत के शब्दों का वहिष्कार नहीं तो और क्या है ? यदि आप कहें कि समझाने के लिए लिखा है तो 'अनीहिलेशन', 'डिस - यूनियन' और 'डेंजरस' भी तो कहीं लिखा होता : मुसलमान से डरना और अँग्रेज़ के सामने अकड़ना, यह कहाँ का न्याय है ? आप मुसलमानी संस्कृति को तो गले लगाते हैं, परंतु "पश्चिमी संस्कृति की प्रभुता को मज़बूत" नहीं बनने देना चाहते। क्यों ? इस्लामिक संस्कृति में ऐसे क्या सद्गुण जो पश्चिमी संस्कृति में नहीं ?
जो अरब और ईरानी भारत में आकर बस गए हैं अथवा जिन भारतीयों ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया है, न्याय और देश प्रेम चाहता है कि वे अरबी-फ़ारसी को छोड़ कर इस देश की भाषा ही को अपनाएँ। हमने आज तक इंग्लैंड या जापान में बसने वाले किसी अरब या ईरानी को अंग्रेज़ों या जापानियों को अरबी-फ़ारसी शब्द अपनी भाषा में घुसेड़ने को विवश करते नहीं सुना । फिर भारत का ही बाबा आदम क्यों निराला है ? राष्ट्र-भाषा के नाम पर जिस प्रकार की गँदली भाषा उपर्युक्त मंडली लिखने लगी है, वैसी उर्दू या जिसे श्री काका कालेलकर जी फ़ारसी रस्म-ख़त में हिंदी कहते हैं, लिखते मैंने एक भी मुसलमान को नहीं देखा। जिस प्रकार कांग्रेस ने मुसलमानों की अनुचित माँगों के सामने सिर झुका कर और ख़िलाफ़त जैसा आंदोलन खड़ा करके राष्ट्रीय दृष्टि से बड़ी भूल की थी और जिसका कटु फल देश को अब चखना पड़ रहा है, मैं समझता हूँ, उपर्युक्त राष्ट्र-भाषा-प्रचारक मंडली की चेष्टाएँ भी वैसे ही दुष्परिणाम उत्पन्न करेंगी। मुसलमान तो संस्कृत के शब्दों को अपनाएँगे नहीं, हाँ, तर्क-जीवी हिंदू संस्कृत का परित्याग अवश्य कर देंगे।
एक राष्ट्र-लिपि बनाने का विचार बड़ा शुभ है। परंतु उसमें भी सब को प्रसन्न करने की नीति हानिकारक सिद्ध होगी। पंजाब में उर्दू, गुरुमुखी और हिंदी ये तीन लिपियाँ
प्रचलित हैं। सिख और मुसलमान तो गुरुमुखी और उर्दू को छोड़ने को तैयार नहीं; हाँ, नपुंसक हिंदुओं में किसी बात पर दृढ़ रहने की शक्ति नही, उनको हिंदी से हटा कर चाहे किसी ओर लगा दीजिए ! नागरी लिपि की काट-छाँट में जितना समय और श्रम व्यय किया जा रहा है, यदि उतना हिंदुओं में नागरी के प्रति प्रेम को दृढ़ करने में लगाया जाय तो अधिक उपकार की आशा है। हमारी नागरी लिपि जापान की लिपि से तो अधिक दोष पूर्ण नहीं । क्या जापान उसी लिपि को रखते हुए स्वतंत्र और एकता के सूत्र में आवद्ध नही ? मैंने सुना है, जापानी-लिपि वर्ण-माला नहीं,
वरन उसका एक-एक अक्षर एक-एक शब्द या वाक्य का
द्योतक है । उस अक्षर का उच्चारण जापान और चीन के भिन्न-भिन्न भागों में चाहे भिन्न-भिन्न हो, परंतु लिखा जाने पर उसका अर्थ सर्वत्र एक ही समझा जायगा । रूसी सोविएटों ने अपनी एकता को दृढ़ करने के लिए किसी नई लिपि का निर्माण नहीं किया, वरन् एक पुरानी वर्णमाला का ही जीर्णोद्धार करके उसका प्रचार किया है। भारत की राष्ट्र-भाषा हिंदी और राष्ट्र-लिपि नागरी होने से ही देश का कल्याण है, इस बात को स्वीकार करके हमें इनके प्रचार एवं उद्धार में दृढ़ता पूर्वक लग जाना चाहिये । आपकी सफलता और शक्ति को देख कर दूसरे लोग, यदि उनमें देश-प्रेम की भावना है, तो स्वयमेव आपके साथ आ मिलेंगे।
इस प्रकार मिन्नतें और चापलूसियाँ करने से कुछ लाभ न होगा । इससे हिंदी प्रेमियों का भी संगठन न रहेगा और दूसरे लोग भी आपसे न मिलेंगे ।
WNINIA WAJIAMA
श्रीयुत हरिभाऊ उपाध्याय 'मेरी कहानी' की भाषा के संबंध में कहते हैं कि यह अनुवाद बहुत कुछ श्री जवाहर लाल जी की भाषा में हुआ है अर्थात् यदि मूल लेखक स्वयं हिंदी में लिखते तो वह हिंदी ऐसी हो होती। मेरी राय में ऐसी अटपटी भाषा लिखने के लिए यह कोई पर्याप्त कारण नहीं । श्री जवाहरलाल जी राजनीतिक विषयों में नेता और प्रमाण हो सकते हैं, परंतु इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं कि वे प्रत्येक बात में नेता और प्रमाण हैं। विलायत से नवागत कोई अँग्रेज़ अथवा श्री अणे, अथवा श्री सत्यमूर्ति या श्री रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी हिंदी बोलते हैं, क्या आप उसी ऊट-पटाँग हिंदी में उनकी पुस्तकें लिखेंगे और उसका नाम 'राष्ट्र-भाषा' यानी 'हिंदी-हिंदुस्तानी' रख कर सारे राष्ट्र को उसका अनुकरण करने का उपदेश देंगे ? मेरा विचार है कि आप कभी भी वैसा दुस्साहस नहीं कर सकते । आज तक किसी जर्मन देश-भक्त ने अपनी 'आत्म-कथा' अंग्रेज़ी में, किसी अँग्रेज़ ने 'फ्रेंच' में या किसी इटालियन ने 'फ़ारसी' नही लिखी है। श्री जवाहरलाल जी ने खुद हिंदी में न लिख कर उस विदेशी भाषा में लिखा है। स्पष्ट है कि वे अपनी हिंदी को साहित्यिक या अनुकरणीय नहीं समझते। पंडित
महावीर प्रसाद जी द्विवेदी और बाबू श्यामसुंदरदास जी आदि सज्जन हिंदी के प्रामाणिक लेखक माने जाते हैं और साहित्यिक हिंदी के लिए उनकी ही शैली का अनुकरण करना परम आवश्यक है । कल्पना कीजिए कि यदि श्री जवाहरलाल जी अपनी मूल अँग्रेज़ी पुस्तक आपकी हिंदी जैसी 'विकासशील' अंग्रेज़ी में लिखते और उसमें चीनी, जापानी और हब्शी भाषाओं के बहुत से शब्द हँस देते क्योंकि इंग्लैंड में बहुत से हब्शी भी बस गये हैं, तो उसकी कैसी मिट्टी ख़राब होती। महात्मा गाँधी जी के अंग्रेजी लेखों और जवाहरलाल जी की 'मेरी कहानी' की अंग्रेजों में कुद्र होने का एक बड़ा कारण यह है कि वह परिमार्जित अँग्रेज़ी में लिखी गई है। शुद्ध अँग्रेज़ी के रोब से दब कर ही लोग उनके सामने सिर झुका देते हैं ।
श्री हरिभाऊ जी कहते हैं- "यदि हमें सचमुच ही हिंदी को राष्ट्र-भाषा के योग्य बनाना है तो उसमें हिंदुस्तान में प्रचलित तमाम धर्मों और प्रांतों की भाषाओं के सुप्रचलित शब्दों का समावेश अवश्य करना होगा ।" और कि "३५ करोड़ हिंदुस्तानियों की भाषा वही हो सकती है जिसे सब लोग आसानी से समझ सकें और बोल सकें ।" अब देखना यह है कि 'मेरी कहानी में तेलगू, तामिल, मलयालम, कनाड़ी, पंजाबी, सिंधी, मुलतानी और झंगी आदि भारतीय भाषाओं के कितने शब्द हैं। मैं समझता हूँ, शायद ही कोई |
1f83a1abe994a017ca44abdf477c3e16efe3e5f73bc3e58eaae3615539c36bce | pdf | १. नृत्यमें भावोंका अनुकरण प्रधान होता है।
२. इसमें आगिक अभिनय पर बल दिया जाता है। ३. इसमें पदार्थका अभिनय होता है ।
४ नृत्य भावाभिनयमें सहायक होता है तथा भावों पर हो अवलम्बित रहता
आदि पुराण में भारत
५. नृत्य सार्वभौमिक होता है एवं इसमे अभिनयकी प्रधानता रहती है। आदिपुराणमे नृत्यका चित्रण अनेक रूपोंमे आया है। नृत्य करती हुई अंगनाएँ नाट्यशास्त्र में निश्चित किये हुए स्थानोंपर हाथ फैलाती हुई विभिन्न प्रकारकी भावमुद्राओंका प्रदर्शन करती है । चञ्चल अंगोंको तीव्र गतिसे घुमानेके कारण नर्तकियोंके अंगप्रत्यंगका सौन्दर्य स्पष्ट रूपमे प्रदर्शित होता है। आदिपुराण के आधार पर नृत्यको निम्नलिखित मुद्राएँ प्रतिपादित की जा सकती हैं - १. भौंहको खीचकर बारबार कटाक्ष करते हुए नृत्य करना । 3
२ मुस्कराते हुए मधुरगानपूर्वक नृत्य करना ।४
३. कटाक्षपूर्वक हावभाव और विलासपूर्वक नृत्य करना। ५
४. नाना प्रकारकी गतियों द्वारा नृत्य करना ।
५. विभिन्न प्रकारके गायनोकी तालध्वनिके आधारपर नृत्य करना ७
६ विचित्र रूप में शारीरिक चेष्टाओका प्रदर्शन करते हुए फिरकी लेना । ७. पुष्पघट, मृत्तिकाघट अथवा स्वर्णघट सिर पर रखकर विभिन्न प्रकारकी भावावलियोका प्रदर्शन करना ।
८. रसान्वित नृत्य करना - अर्थात् अंगोके सौन्दर्यका विभिन्न भावावलि द्वारा प्रदर्शन करते हुए नृत्य करना" ।
९. छत्रबन्ध आदिका प्रदर्शन करते हुए विभिन्न रूपोमें नृत्य करना । ।" आदिपुराण में कई प्रकारके नृत्योंका उल्लेख आया है। वस्तुतः नृत्य दो प्रकार का होता है- -मधुर और उद्धत । मधुर नृत्यको लास्य नृत्य कहते है और उद्धतको ताण्डव । आदिपुराण मे इन दोनों ही प्रकारके नृत्योंका विस्तारपूर्वक वर्णन आया है।
ताण्डव नृत्य
ताण्डवनृत्य उद्धृत नृत्य है। इसमें विविध रेचकों, अंगहारों तथा पिण्डी बन्चो सहित यह नृत्य किया जाता है। कहा जाता है कि तण्डुमुनिने इस नृत्यमें
गान एवं वाद्य मन्त्रोंका प्रयोगकर इसे सरस बताया है। ताण्डवनृत्य की प्रयोगविधियोंका विवेचन करते हुए बताया गया है कि इसमें वर्षमानक तालका समावेश रहता है, जो कि कलाओं, वर्णों और लयों पर आधारित होता है।
आदिपुराणमें ताण्डव नृत्यका विवेचन करते हुए लिखा गया है कि पाद, कटि, कष्ठ और हाथोंको अनेक प्रकारसे घुमाकर उत्तम रस दिखलाना ताण्डव नृत्य' है । ताण्डव नृत्यकी कई विधियाँ प्रचलित थीं। पुष्पाञ्जलि क्षेपण करते हुए नृत्य करना, पुष्पाञ्जलि प्रकीर्णक नामक ताण्डव नृत्य है। इसी प्रकार विभिन्न रूपोंमें सुगन्धित जलकी वर्षा करते हुए नृत्य करना जलसेचन नामक ताण्डवनृत्य है ।
अलात चक्रनृत्य'
अलातचक्रनृत्यमे शोघ्रतापूर्वक फिरकी लेते हुए विभिन्न मुद्राओं द्वारा शरीरका अंगमंचार किया जाता था। शीघ्रतासे नृत्य क्रिया करने कारण ही इसे अलातचक्र कहा गया है ।
इस नृत्यमे क्षणभरके लिए व्याप्त हो जाना, क्षणभरमें छोटा बन जाना, क्षणभरमे निकट दिखलाई पडना, क्षणभरमं दूर पहुँच जाना, क्षणभरमें आकाशमे दिखलाई पडना, इन्द्रजाल नामका नृत्य है। इस नृत्यमे नाना प्रकारको लास्य क्रोडाएँ भी सम्मिलित रहती है। नृत्यकी गतिविधि अत्यन्त शीघ्रतासे प्रदर्शित को जाती है, जिससे नर्तक या नर्तकी का स्वरूप हो दृष्टिगोचर नही होता।
इस नृत्यमें नर्तकियोंको फिरकियाँ इस प्रकारमे घटित होती है जिससे केवल शिर या सेहरा अंश हो घूमता है। मुकुटका सेहरा घूमने के कारण हो इसे चक्र संज्ञा प्राप्त है। निष्क्रमणनृत्य'
निष्क्रमण नृत्यमें प्रवेश और निर्गमन ये दोनों हो क्रियाएँ साथ-साथ चलती । फिरकी लगाने वाली नर्तकियाँ कभी दो तीन हाथ आगेकी ओर बढ़ती है और कभी दो तीन हाथ पोछेकी ओर हटती हैं। फिरकी लगानेकी यह प्रक्रिया हो निष्क्रमण नामसे अभिहित की जाती है ।
१. चित्रैच रेचकैः पावकटिकण्ठ करावितैः । ननाट ताण्डवं शको रसमूजितम् दर्शयन् । आदि० १४/१२१ । २. वही, १४११४ ३. वही, १४११२८१४. वही, १४८१३०-१३१ । ५. वही, १४११३६ ६. वही १४१३४ ।
आदिपुराणमें भारतं
हुए नर्तकियाँ जब सिमटकर सूचोके रूपमें परिणित हो जाती है तब उसे सूची कहते है। आदिपुराण में किसी पुरुषके हाथकी उंगलियों पर लीलापूर्वक नृत्य करना सूचीनृत्य है ।
स्त्रियाँ अपने कटालोंका विशेषण करती हुई किसी पुरुषको बाहुओं पर स्थित हो जो नृत्य करती है, उसे कटाक्ष नृत्य कहा जाता है। सूची नृत्यमें पुरुषकी उंगलियों पर खडी होकर लड़कियाँ नृत्य करती हैं तो कटाक्ष नृत्यमें बाहुनों पर खडी होकर ।
भावोंको सुकुमार अभिव्यञ्जनाको लास्य कहते है । श्रावण आदि महीनों में दोलाक्रीडाके अवसर पर किये जाने वाले कामिनियोके मधुर तथा सुकुमार नृत्य लास्य कहलाते है। मयूरका कोमल नर्तन लास्यके अन्तर्गत आता है। लास्य नृत्य बहुत ही लोकप्रिय एवं रसोत्पादक है।
बहुरूपिणी विद्या वह कहलाती है जिसमे व्यक्ति अपनो अनेक आकृतियाँ बना ले । कामिनियाँ निर्मल मुक्तामणि जटित हारोको पहनकर उस प्रकार नृत्य करें जिससे उनको आकृतियाँ उस हारके मणियोमे प्रतिबिम्बित हो । अनेक प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण ही इस नृत्यको बहुरुपिणी नृत्य कहा जाता है। आदिपुराण में वास्तविक नृत्य उसोको माना गया है, जिसमें अंगोंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ सम्पन्न हो और नृत्य करने वाला अनेक रूपोंमें अपनी रसभाव मयी मुद्राओंका प्रदर्शन करे। "
स्पष्ट है कि रसभाव, अनुभाव और चेष्टाएँ नृत्यके लिए आवश्यक हैं। नृत्य, शृंगार, शान्त और वीररसके भावोंके प्रदर्शनके लिए सम्पन्न किया जाता था। नृत्य नाट्यशालाओंमें सम्पन्न होता था आदितीर्थंकरको नृत्य करती हुई नोलाजनाके विलयन के कारण हो विरक्ति उत्पन्न हुई थो । आदिपुराण के भारतमें ललित कलाओंमें नृत्यका महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनोरञ्जनके लिए सामन्त, सम्राट, प्ररोहित सभी नृत्यशालाओंमें बैठकर नृत्य देखते थे ।
अध्याय :
आर्थिक और राजनैतिक विचार प्रथम परिच्छेद
आर्थिक विचार और आर्थिक समृद्धि
आदिपुराणमें बताया गया है कि आदितीर्थकरने अपने पुत्र भरतको अर्थशास्त्रकी शिक्षा दी थी। पर इस अर्थशास्त्रका स्वरूप क्या था, इसकी जानकारी आदिपुराणके उक्त सन्दर्भसे नहीं होती । हाँ, समस्त आदिपुराणके अध्ययनसे इतना अवश्य अवगत होता है कि कल्याण सम्बन्धी समस्त बातोंका समावेश अर्थशास्त्र में किया गया है। इस सिद्धान्तके अनुसार अर्थशास्त्रका विषय मनुष्य है। मनुष्य किस प्रकार आय प्राप्त करता है और उसे व्यय करके अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस विषिके अनुसार करता हुआ सुख और कल्याण प्राप्त करता है, यह अर्थशास्त्रका अध्ययनीय विषय है। अर्थशास्त्रके विशेषज्ञ विद्वान् प्रो० उदयप्रकाश श्रीवास्तवने लिखा है- "अर्थशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है जिसमें मनुष्यको आर्थिक क्रियाओं - उत्पादन, उपभोग, विनिमय और वितरणका अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह मानवकल्याणके केवल उस भागका अध्ययन करता है, जिसे मुद्रारूपी मापदण्डसे मापा जा सके; बर्थात् अर्थशास्त्र में भौतिक कल्याणका अध्ययन किया जाता है। २....
आदिपुराणमें आर्थिक विचारोंके अन्तर्गत "अर्थसम्मार्जनं, रक्षणं, वर्द्धनं, पात्रे व विनियोजनम् " -- अर्थात् धन कमाना, अर्जित घनका रक्षण करना, पुनः उसका संवर्धन करना और योग्य पात्रोंको दान देना आदि बातोंको माना गया है।
१. बबिपुराण १६/११९ २. प्रारम्भिक अर्थशास्त्र - प्रो० उदयप्रकाश श्रीवास्तव, लाइट हाउस, आर्यकुमार रोड, पटना ४ से प्रकाशित, मथम संस्करण १९६८, १० २६६ । ३. आदिपुराण ४२ । १३ ।
आशय यह है कि मनुष्य के आर्थिक आचरणका अध्ययन करना आर्थिक विचारोंका अध्ययन है। मनुष्यको दुर्लभता और अभावका निरन्तर सामना करना पड़ता है । अर्जनके साधन भी सीमित हैं, अतएव अनिवार्यता के आधारपर आवश्य कताओकी प्राथमिकता एवं उनकी पूर्ति के लिए सीमित साधनोंका सन्तुलित रूपमें प्रयोग करना आर्थिक सिद्धान्त है। साधनोंकी निर्दोषता एवं सदोषतासे ही साध्य भी निर्दोष एवं सदोष होता है। अतएव आजीविका सम्पन्न करने के लिए प्राप्त साधनोंका निर्दोष रूपमें व्यवहार करना आदिपुराणके भारत में श्रेयस्कर समझा गया है। बताया है - "वृत्तिर्न्यायः " तथा "न्यानोपार्जितवित्त..." अर्थात् न्यायपूर्वब धनार्जन करना हो जीवनको सुखी और सन्तुष्ट बनानेका हेतु है। मनुष्यको समस्त क्रियाओका, जो समाजके बीच घटित होती है उसके आर्थिक जीवनके साथ सम्बन्ध है ।
आदिपुराणमे जीवनका लक्ष्य त्रिगौरवको प्राप्त करना है। इस त्रिगौरवमे रसगौरव, शब्दगौरव और ऋद्धिगौरव सम्मिलित है। आर्थिक दृष्टिसे ऋद्धिगौरवके अन्तर्गत वस्तुओकी विशेषताएं, उसको आन्तरिक दशाएँ, अर्जन एवं संवर्द्धन सम्मिलित है। आदिपुराणमे उपयोगिताको सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। आवश्यकताको पूर्ति तभी तुष्टिका कारण बन सकती है, जब उसकी उपयोगिता किसी दृष्टिसे हो । आवश्यकताओकी उत्पत्तिके कारणोंमें भौगोलिक, शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, स्वाभाविक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आदि प्रमुख है। मनुष्यकी प्रधान आवश्यकताओमे क्षुषा, तृषा, विश्राम, शोतातपसे सरक्षण, वस्त्र, आवास एवं आत्मरक्षा सम्बन्धी है। मनुष्य इन आवश्यकताओकी पूर्ति अपने विवेक द्वारा सम्पन्न करता है। आदिपुराणमं विवेकको विशेष महत्त्व दिया है ।
उपयोगितावादको स्पष्ट करते हुए बताया है - "रत्नानि ननु ताम्मेव यानि यान्त्युपयोगिताम् " । दर्शनके सिद्धान्तानुसार मनुष्य न तो नयो वस्तुका निर्माण करता है और न किसी पुरानी वस्तुका विनाश करता है, केवल उपयोगिताका सृजन करता है। उपयोगिताके सृजनका हो नाम उत्पादन या उपभोग है। वस्तुओकी जैसी जैसी उपयोगिता बढ़ती जाती है, उनका मूल्य भी वृद्धिगत होता जाता है। मूल्यनिर्धारण उपयोगिता के आधार पर ही किया जाता है। जहाँ वस्तुओकी अधिकता रहती है, वही उपयोगिता भी घटती जाती है। आदिपुराणकारने रत्नोका उदाहरण देकर उपयोगितावादका बहुत सुन्दर स्पष्टीकरण किया है। रत्न तभी रत्नसंज्ञाको प्राप्त होते हैं, जब खानसे निकलनेके अनन्तर
आर्थिक विचार और आर्थिक समृद्धि : ६-१
उन्हें सुसंस्कृत कर उपयोगी बना दिया जाता है। यदि रत्नोंमें संस्कार न किया जाय-उपयोगिताका सृजन न किया जाय, तो रत्न रस्न न होकर पाषाण कहलायेंगे। अतएव आर्थिक क्रियाओंका प्रारम्भ उपभोग या उपयोगितासे होता है और उनकी समाप्ति भी उन्हीं दोनोंसे होती है। मूलतः आर्थिक क्रियाओंका जन्म मनुष्यकी आवश्यकताओंसे होता है, जिनकी पूर्ति अत्यन्त आवश्यक है। आवदयकताएँ शारीरिक और मानसिक वेदना उत्पन्न करती हैं, जिससे बेचैनी होती है और बेचैनीके कारण मनुष्यका जीवन विश्वृंखलित हो जाता है। इसी कारण आदिपुराणमें उपयोगिताको महत्व दिया है। यह उपयोगिता, उपभोग या उत्पादनकी समानार्थक है । जब उपयोगिता पूर्ण हो जाती है, तो परम सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य के दुःखका कारण भौतिकताके प्रति मानसिक वृत्तिका अत्यधिक राग अथवा द्वेषयुक्त हो जाना है। ये राग और द्वेष जब सन्तुलनको स्थितिको प्राप्त होते है तभी व्यक्तिको परम सन्तोष उपलब्ध होता है और परम शान्ति मिलती है ।
आदिपुराणमें धनार्जनके साथ विवेकको महत्व देते हुए लिखा है- "लक्ष्मीवाग्बनिसाम मागम सुखस्यैकाधिपत्यं दधत् '..." अर्थात् सरस्वती और लक्ष्मो का समान रूपसे सन्तुलन हो सुखका कारण है। जो व्यक्ति घनार्जन, धनरक्षण और धनसंवर्द्धन करते समय विवेकको खो देता है, वह व्यक्ति संसारमें सुखी नहीं हो सकता । इसी सिद्धान्तको विस्तृत करते हुए आदिपुराणमे बताया है - "न्यायोपार्जित वित्तकामघटना २" अर्थात् न्यायपूर्वक चयन किये हुए घनसे हो इच्छाओंको पूर्ति करनी चाहिये । इच्छाएं अनन्त है और पूर्तिके साधन अत्यल्प । अतएव समस्त इच्छाओकी पूर्ति तो असम्भव है। ऐसी स्थिति में अधिक तीव्र आवश्यकताओंकी पूर्ति ही न्यायोपात्त बनसे करनी चाहिये। अर्थशास्त्रका नियम है कि सोमित साधनोंको विभिन्न आवश्यकताओं पर इस प्रकार व्यय करना चाहिये, जिससे अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त हो सके । आवश्यकताओं को तोव्रता हो उनकी प्राथमिकताको निर्णायक है। सामान्यतः आवश्यकताओंको पाँच वर्गामे बांटा जा सकता है-१. जीवन रक्षक आवश्यकताएँ । २. निपुणता रक्षक आवश्यकताएँ । ३. प्रतिष्ठा रक्षक आवश्यकताएं । ४. आराम सम्बन्धी आवश्यकताएँ । ५. विलासिता सम्बन्धी आवश्यकताएँ । |
3fc87d31a50b69a954415363f46d80651a14ebfd | web | क्या तुम्हे पता है राधिका इस समय हम कहां है ? नहीं! और मै जानना भी नहीं चाहती मोहन, क्योंकि मै इतना जानती हूं कि जहां तुम हो वहां मै हूं, तो इससे मुझे कोई मतलब नहीं है कि हम कहां है और कहां नहीं। राधिका क्या तुम मेरे साथ हर पल हर जगह मौजूद रह सकती हो ? मै तुम्हारे साथ हर पल, हर घड़ी और धरती के हर उस कण - कण में बस सकती हूं मोहन, जहां तुम्हारा निवास हो। तुम मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा हो मोहन मै तुम्हारे साथ नहीं तो मै अधूरी हूं मोहन इसलिए मैंने तुम्हे अपने मन मंदिर में बसा लिया है, जहां केवल तुम हो और तुम पर मात्र मेरा अधिकार है।
अधिकार की बात मत किया करो राधिका मै इस अधिकार तले दबना नहीं चाहता क्योंकि संसार का यह नियम है कि हर व्यक्ति किसी ना किसी के अंदर रहकर ही जीवनयापन करता है। तुम कहना क्या चाहते हो मोहन ? स्पष्ट कहो मै समझ नहीं पाई।
मेरे कहने का अर्थ यह है राधिका की मै एक पुत्र हूं तो पहला अधिकार माता - पिता का है भाई - बहन का है, गुरु का है, मित्र का है तत्पश्चात तुम्हारा अधिकार है। मतलब ? तुम्हारे जीवन पर मेरा कोई अधिकार नहीं ? तुम्हारे हृदय में मेरे लिए कोई स्थान नहीं ? ऐसा बात नहीं है राधिका मेरे जीवन पर माता - पिता के बाद सबसे अधिक - अधिकार तुम्हारा ही होगा। पता है क्यों - क्योंकि तुम सबसे अंत में मेरे जीवन में आई हो और जो अंत में आता है वह शेष भाग के साथ संपूर्ण हो जाता है। तुम्हारी बातें तुम्हीं जानो, मै तो बस इसी तरह हर रोज इसी पीपल के नीचे ठंडी छांव में नदी के तट पर तुम्हारे साथ शाम कर देना चाहती हूं। और सूरज की लालिमा में खुद को सराबोर करके एक नये रंग का अनुभव प्राप्त करना चाहती हूं। क्या तुम मेरे साथ प्रतिदिन यहां आओगे मोहन ? इस एकांत वातावरण में जहां केवल मै और तुम और पक्षियों की मनमुग्ध आवाज और कोई नहीं। राधिका तुम इतने समय एक साथ व्यतीत करके भी ऐसे प्रश्न कर रही हो जबकि मै प्रतिदिन तुमसे पहले यहां आकर तुम्हारे आने की राह देखा करता हूं। मै जानती हूं मोहन तुम मुझसे बहुत प्रेम करते हो किन्तु एक स्त्री को सदैव अपने मन की इच्छा को दूसरे से सुनकर एक सुंदर अहसास मिलता है। राधिका इस संध्या का अवलोकन अंतर्मन से करके देखो जिस लालिमा की बात कर रही थी तुम उससे अधिक मिठास तुम्हें इस झिलमिल नदी में मिलेगा। उस तरफ देखो राधिका बिल्कुल तुम्हारे आंखों के जैसी चमक और अधरों पर बसी लालिमा एक साथ होकर नवीन रंग दर्शाते हुए नजर आ रही हैं। रवि की किरणें एक सिंदूरी रंग से ओत - प्रोत मानो इस नदी में सम्लित होकर खुद को समर्पित कर देना चाहती हों। मोहन इन्हीं किरणों की भांति मेरा मन भी यही कहता है कि मै तन - मन और जीवन को तुम्हे समर्पण कर तुममें है मिल जाऊं। राधिका आज तुम्हें जीवन का एक सुंदर रहस्य बता रहा हूं इसपर विचार करना क्या जीवन इससे अलग और कुछ हो सकता है। जिस तरह सूरज का उदय होता है और वह एक तेज के साथ सारे संसार को दिन भर के लिए प्रकाशित करता है किन्तु जैसे - जैसे उसका तेज कम होता है वह संध्या को अपना पल समर्पित कर देता है और फिर पूरी तरह उसी में विलीन हो जाता है। किन्तु अगले दिन फिर वह एक नई दिशा और नये प्रकाश के साथ उदय होता है, ठीक उसी प्रकार मै तुमसे मिलकर एक नई शुरुआत करूंगा और इसी संध्या के साथ तुम और मै एक दूसरे को समर्पण कर प्रेम में संलग्न हो जाएंगे। किन्तु अभी हमे अपने घरों को लौटना चाहिए वहां सब हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। हां मोहन तुम ठीक कह रहे हो चलो अब घर जाना अतिआवश्यक हो गया है।
राधिका की मां - मिल आई उस मोहन से जिसे घर का एक काम तक नहीं होता वह तुम्हारे लिए क्या करेगा बिटिया तुम जानती हो कि वह जिम्मेदार नहीं है वह तुम्हे कोई सुख नहीं दे सकता।
राधिका - मां मुझे मोहन से कोई अपेक्षा नहीं है मुझे उससे और कुछ नहीं चाहिए शिवाय प्रेम के। और जहां प्रेम - स्नेह मिले वहां किसी और चीज की इच्छा करना मेरी सोच से परे है मां।
मां - ठीक है यदि तुझे और कोई सुख नहीं चाहिए तो मै तेरा विवाह उस मोहन से जरूर करा दूंगी। द्वापर में राधिका मोहन से नहीं मिल पाई थी फिर भी वह प्रेम का प्रतीक बन अमर है। और इस युग में राधिका - मोहन से मिलकर कितना सुखी और संपूर्ण हो पाती है। जीवित रही तो अवश्य देखूंगी।
राधिका - हां मां तुम ही नहीं पूरी दुनिया द्वापर कि राधिका को देवी मानती है क्योंकि वह राधिका भी एक सच्चे प्रेम में खुद का समर्पण कर चुकी थी और आज यह राधिका भी विश्वास दिलाती है कि यह मोहन सिर्फ मेरा है और मेरे प्राण भी उसी दिन निकलेंगे जिस दिन मोहन इस दुनिया से जाने के लिए कह देगा।
मां - हां हां बहुत हो गया तेरा प्रेम प्रसंग अब रात हो रही है खाना बनाना बाकी है। तू खाना बना मै सुबह के लिए चावल निकाल लेती हूं।
राधिका - ठीक है मां जरा रेडियो चालू कर देना आज शनिवार है विविध भारती पर " जयमाला आने वाला है देशभक्ति गीत सुनुंगी।
मां - अरे वाह दिन भर प्रेमभक्ति और अब देशभक्ति पूजा - भक्ति भी किया कर भाग्य उदय होगा तेरा भी और उस मोहन का भी। ( जयमाला कार्यक्रम का पहला गीत बजा - जिंदगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर ले हो... ओ प्यार करले घड़ी दो घड़ी।) राधिका भी साथ में गुनगुनाने लगी।
उधर मोहन घर पहुंचा तो बड़ी भाभी पूछ बैठी - कहां थे अब तक राधिका के मोहन ? मोहन भी इशारों - इशारों में बोल दिया - भाभी राधिका का है मोहन तो राधिका के पास ही रहेगा न और कहां जाएगा। अब ये बताओ पिता जी कहां है ? उन्होंने कुछ पूछा तो नहीं ना मेरे बारे में ?
भाभी - नहीं कुछ पूछे तो नहीं पर उन्हें अब तुम्हारे विवाह की चेष्टा होने लगी है बस इसी विषय पर कल चर्चा होने वाली है। और बहुत ही जल्द वह शुभ घड़ी भी आने वाली है जब तुम्हारे सिर पर भी पगड़ी बंधेगी। और हां मुझे ही नहीं अब तो बाबू जी को भी सबकुछ पता चल गया है, कल राधिका की मां आने वाली हैं विवाह की तिथि तय करने अब तुम्हे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।
अगले दिन सुबह हुई और मोहन सबसे पहले उठकर घर का सारा काम अकेले ही निबटा लिया और नदी में स्नान करने चला गया। मोहन को बड़ी बेसब्री से दोपहर का और राधिका से मिलने का इंतजार था। दोपहर को प्रतिदिन की तरह आज भी मोहन पहले ही पहुंच चुका था। राधिका के आते ही वह एक गीत गुनगुनाने लगा - बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है, मेरा मेहबूब आया है। राधिका हस्ते हुए बोली क्या बात है आज बड़े खुश लग रहे हो कुछ मिल गया है क्या ?
हां राधिका आज मुझे एक ऐसी चीज मिली है, एक ऐसा तोहफा मिला है जिसके लिए मै वर्षों से तड़प रहा था जो मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। ऐसी भी क्या चीज है मोहन जो तुमने मुझे आजतक नहीं बताया। ( राधिका के हंथों को पकड़ते हुए) हां राधिका माइंड तुम्हे आजतक इसलिए नहीं बताया क्योंकि मुझे दर था कि तुम जानोगी तो कहीं तुम्हारा प्यार दो भागों में बट ना जाये। राधिका मै तुम्हे बेहद प्रेम करता हूं और अब हम दोनों बहुत ही जल्द एक पवित्र बंधन में बंधने वाले हैं। हां मोहन आज सुबह मां ने मुझे सबकुछ बताया और मै आज बहुत खुश हूं। बहुत ही भाग्यशाली होते हैं वो लोग जिन्हें अपना प्रेम करने वाला साथी उम्र भर के लिए मिल जाता है। राधिका दो प्रेम करने वाले यदि उम्र भर के लिए मिल जाते हैं तो बहुत ही प्रसन्नता की बात है क्योंकि वह दोनों एक नए परिवार और गृहस्थ का संचार करते हैं और फिर प्रेम संक्षिप्त मात्र भर रह जाता है। किन्तु दो प्रेम करने वाले जब अलग - अलग रहते हैं तो दोनों के मन में एक - दूसरे के प्रति सदैव प्रेम बना रहता है और वह अंततः अमर हो जाता है। हां मोहन! लेकिन हमारा प्रेम एक होकर भी दुनिया के लिए उदाहरण का प्रतीक माना जाएगा। और फिर मै हर जन्म में ईश्वर से प्रार्थना करके तुम्हे ही पाना चाहूंगी। राधिका जिस दिन हमारा विवाह होगा हम संध्या के समय यहां जरूर आएंगे और फिर मै तुमसे एक वचन मांगूंगा। तुम पूरा करोगी न ? मोहन यदि तुम मेरे प्राण भी मांगोगे तो मै तुम्हे मना नहीं करूंगी। राधिका कभी - कभी इंसान को मरने से ज्यादा जीना कठिन हो जाता है और तब मनुष्य हार जाता है और अपने प्राण त्याग देता है जो किसी भी मनुष्य के लिए कायरता सिद्ध कराती है। ठीक है राधिका जिस दिन हम यहां आएंगे उस संध्या को हमारे बीच कुछ बात होगी।
समय और तिथि तय होने के साथ - साथ आखिर वह दिन भी आ गया जब दोनों का विवाह बड़े धूम - धाम से संपन्न हुआ। और फिर दोनों अपने कहनेनुसार संध्या को उसी पीपल के नीचे नदी के तट पर पहुंचते हैं। कुछ बातें हुई ही थी कि एक सर्प मोहन के पैरों में डंस कर चला गया। मोहन जमीन पर गिर पड़ा और राधिका जोर - जोर से चिल्लाने लगती हैं आवाज सुनकर लोग इकट्ठा होते हैं और फिर वैद्य को बुलाते हैं लेकिन मोहन कि हालत गंभीर होती चली जाती है। राधिका रोते हुए कहती है - क्या वचन था तुम्हारा मोहन ? क्या इसीलिए यहां ले आए थे ? आज के दिन ही तुम इस तरह का विश्वासघात मेरे साथ कैसे कर सकते हो मोहन ? बिन तुम्हारे इस दुनिया में राधिका का क्या काम है, मै भी अपने प्राण त्याग इस नदी में डूब जाऊंगी। नहीं राधिका (अपने अंतिम क्षणों में मोहन) तुम ऐसा नहीं कर सकती तुम्हे जीना होगा राधिका अपने लिए ना सही हमारे प्रेम के लिए तुम्हे जीना होगा। मैंने उस दिन एक वचन कि बात कही थी आज मुझे वचन दो की तुम आत्महत्या या फिर जानबूझ कर मरने कि कोशिश नहीं करोगी। वचन दो राधिका मेरे पास वक्त बहुत कम है किन्तु ईश्वर ने चाहा तो मै इस नदी से जीवित होकर लौटूंगा। मोहन मै तुम्हे वचन देती हूं की मैं सदियों तक तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी और सिर्फ तुम्हारी होकर तुम्हारे नाम में अपने आपको समर्पित करती हूं। राधिका किसी के लिए मरना बहुत सरल होता है लेकिन जीवित रहना अत्यंत कठिन हो जाता है। धैर्य मत खोना राधिका अपने मोहन पर विश्वास रखना। इतना कहते ही मोहन की सांसे थम सी गई और धड़कन कि गति भी धीरे - धीरे रुक गई। राधिका की आंखे रो - रो कर पत्थर हो चुकी थी। अब तो बस पीपल की छांव और खामोशी से बहता हुआ पानी मानो राधिका का सुख - चैन ही छीन ले गए हों और वह उनके पास अपने खुशियों को वापस पाने की गुहार लगाती बैठी रहती। ना खाने का समय ना प्यास की चिंता केवल नदी को निहारते ही रहती मानों मोहन इस नदी से अभी तैरता हुआ बाहर आने वाला ही हो।
राधिका की मां और मोहन के पिता ने राधिका को बहुत समझाया कि अब कई वर्ष बीत चुके हैं मोहन अब उसका अतीत है उसे भूल कर एक नई दुनिया में कदम रखे। किन्तु राधिका साफ इंकार कर कहती "राधिका का जीवन मोहन को समर्पण हो चुका है" अब तो वह ही मात्र उसके जीवन का आधार है और उसे अपने प्रेम पर पूरा विश्वास है कि वह जीवित है। क्या हुआ यदि हम एक नहीं हो पाए तो हमारा प्रेम सदियों तक अमर रहेगा। लगभग बीस वर्षों तक राधिका प्रतिदिन सुबह से शाम उसी पीपल की छांव में बैठकर नदी को निहारती रहती और चुपचाप आंखों से एक अश्रु रूपी नदी बहती रहती जिसे देखकर हर व्यक्ति के मन में ईश्वर को कोसने की भावना उत्पन्न हो जाती। एक दिन दोपहर के समय गांव कि और से हलचल भारी आवाज सुनाई देने लगी। गांव के कुछ बच्चे और बड़े लोग एक आदमी के पीछे चले आ रहे थे। वह व्यक्ति बड़ी - बड़ी दाढ़ी और मूंछ के साथ एक फटे- पुराने वस्त्र में चला आ रहा था। राधिका के मन में मानों आज कई वर्षों बाद किसी व्यक्ति को देखने की इच्छा जागृत हुई और वह पीछे मुड़कर देखने लगी। लोग उस व्यक्ति को नदी के तट पर आने से रोकना चाहते थे परन्तु वह दौड़ता हुआ चला आ रहा था। राधिका को देख अचानक वह रुक गया और आंखों से प्रेम की वर्षा होने लगी। किन्तु राधिका अब भी मोहन कि यादों के साथ सिमटी हुई थी।
तब उस व्यक्ति ने आ फिर से वही गीत गाना शुरू किया जो पहले कभी इसी वृक्ष के नीचे गाया था। " बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है, मेरा मेहबूब आया है। " अब राधिका को पूर्ण विश्वास हो गया कि उसका मोहन उसके समक्ष खड़ा है। दोनों एक दूसरे को इस तरह भेंटते हैं जैसे चंदन के पेड़ से लिपटा हुआ सर्प। दोनों का यह मिलन देख गांव के लोगों का भी मन भर आया और सकी आंखें नम हो गई।
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cc4bd8678c518d3c36ece6c74ba390f25136ea65 | web | तरीके से कार्य को संपन्न करके सफलता प्राप्त करेंगे। अध्यात्म तथा धार्मिक कार्यों में भी रुचि बढ़ेगी। ससुराल पक्ष से संबंध और अधिक मधुर होंगे।
नेगेटिव- बिना वजह के नोकझोंक और वाद-विवाद की स्थिति में ना पड़ें। तथा अपने पर्सनल कार्यों पर ध्यान दें। इस समय आमदनी के अनुपात में खर्चों की अधिकता रहेगी। इसलिए बजट बना कर चले। अपनी वाणी और अहम को नियंत्रित रखें।
व्यवसाय- व्यवसाय में आप अपने प्रयासों से नए अचीवमेंट हासिल करने में सक्षम रहेंगे। वर्किंग महिलाएं कार्यस्थल पर बेस्ट परफॉर्मेंस देंगी। नौकरी बदलने की कोशिश कर रहे हैं तो समय अनुकूल है। बॉस अधिकारियों के साथ उचित तालमेल बनाकर रखें।
लव- घर में सुख शांति और अनुशासन पूर्ण माहौल बना रहेगा। युवा वर्ग प्रेम संबंधों में समय व्यर्थ करने की बजाय अपने करियर पर ज्यादा ध्यान दें।
स्वास्थ्य- बदलते वातावरण की वजह से एलर्जी और खांसी जुकाम जैसी समस्या रह सकती हैं। अपना उचित बचाव करें।
वृष - पॉजिटिव- समय अनुकूल है। मित्रों तथा सहयोगियों से उचित सहयोग मिलने से आपकी कोई चिंता दूर होगी।
आपसी मेल मिलाप से अच्छी खबर मिल सकती है। स्टूडेंट्स को अच्छे और संतोषजनक नतीजे मिल सकते हैं।
नेगेटिव- दूसरों के समक्ष अपनी कमजोरी को जाहिर ना करें अन्यथा कोई इसका नाजायज फायदा उठा सकता है। दूसरों के कार्यभार को अपने ऊपर ना लादें। इस समय वाकपटुता तथा चतुराई से काम लेने की जरूरत है। मन में अजीब सी बेचौनी बनी रहेगी।
व्यवसाय- इस समय बिजनेस संबंधी कार्य प्रणाली के प्रति उचित मूल्यांकन करने की जरूरत है। कोशिशों से आप परिस्थितियों को अनुकूल बना लेंगे। कामकाजी महिलाओं के लिए समय ठीक नहीं रहेगा। नौकरीपेशा लोगों पर नई जिम्मेदारियां आ सकती हैं। आप उन्हें पूरा करने में सक्षम भी रहेंगे।
लव- घर में मेहमानों के आगमन से वातावरण खुशनुमा हो जाएगा और आप शांति और सुकून महसूस करेंगे। उपहारों का भी लेनदेन प्रसन्नता दायक रहेगा।
स्वास्थ्य- थकान और आलस हावी रहेगी। इस समय आपको शारीरिक और मानसिक रूप से आराम की भी जरूरत है।
संबंधी योजनाएं बनेंगी। कुछ समय अपनी रुचि पूर्ण कार्यों मैं भी अवश्य व्यतीत करें। राजकीय मामले सरलता व सुगमता से पूरे होंगे।
नेगेटिव- इस समय रिस्क प्रवर्ती जैसे कार्यों में भूलकर भी निवेश ना करें। क्रोध व आवेश पर नियंत्रण रखें। अन्यथा आपका कोई बना बनाया काम बिगड़ भी सकता है। तथा योजनाएं व प्लानिंग भी बीच में रह जाएंगी।
व्यवसाय- व्यवसायिक स्थल पर अनुभवी लोगों से संपर्क बनाना आपके लिए फायदेमंद रहेगा। कोई असंभव काम भी संभव होने की उम्मीद है। आर्थिक मामलों में दिन अच्छा है। निवेश में फायदा मिलने के योग हैं। किसी भी कागज अथवा दस्तावेज पर बिना पढ़े हस्ताक्षर ना करें।
लव- जीवनसाथी तथा पारिवारिक सदस्यों का आपको पूर्ण सहयोग रहेगा। प्रेम प्रसंगों में भी नज़दीकियां बढ़ेंगी।
स्वास्थ्य- अत्यधिक मेहनत तथा तनाव का असर आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा। कुछ समय योगा और ध्यान में भी अवश्य लगाएं।
कर्क - पॉजिटिव- पिछले समय से जो व्यक्तिगत चिंता चल रही थी, उसका समाधान मिलने के उचित संभावना है।
आपके आत्मविश्वास और मनोबल के समक्ष आपके विरोधी टिक नहीं पाएंगे। रुका हुआ या उधार दिया हुआ पैसा वापस मिलने की पूरी संभावना है, इसलिए प्रयासरत रहें।
नेगेटिव- इस समय आपको अपनी भावनाओं पर काबू रखना जरूरी है। क्योंकि वाद विवाद और लड़ाई झगड़े होने के आसार हैं। दूसरों के मामले में हस्तक्षेप ना करें। चल रहे विवादित मामले किसी की मध्यस्थता से हल करने का प्रयास करें।
व्यवसाय- किसी भी व्यवसाय संबंधी नए कार्य को शुरू करने के लिए आज समय अनुकूल नहीं है। इस समय व्यवसाय संबंधी कोई भी गतिविधि को सामान्य ही रखें। दूसरों के मामलों में ना उलझ कर अपने कार्यों पर ही ध्यान दें। कोई व्यवसायिक यात्रा संबंधी प्रोग्राम भी बन सकता है।
लव- परिवार के साथ किसी समारोह अथवा डिनर आदि पर जाने का अवसर बनेगा। तथा आपसी मेल मिलाप तथा साथ समय व्यतीत करना सबको खुशी देगा।
स्वास्थ्य- कोई पुरानी स्वास्थ्य संबंधी समस्या द्वारा उभर सकती हैं। परंतु लापरवाही करना बिल्कुल भी उचित नहीं है।
को सुलझाने का प्रयास करेंगे। अपने काम को पूरी गंभीरता व संजीदगी से अंजाम देने में सक्षम रहेंगे। तथा आपकी योग्यता और प्रतिभा भी खुलकर लोगों के सामने आएगी।
नेगेटिव- सावधान रहें आपके विरोधी सक्रिय हो सकते हैं। कोई अनचाही यात्रा करने की वजह से मन उदास रहेगा। जिसके परिणाम भी सकारात्मक नहीं मिलेंगे। किसी निकट संबंधी के साथ कोई अप्रिय घटना घटित होने की आशंका है।
व्यवसाय- कामकाज में लापरवाही बिल्कुल न करें। वरना मुश्किल में पड़ सकते हैं। नौकरी में काफी समय से कोई रुका हुआ इंक्रीमेंट अथवा प्रमोशन संबंधी शुभ समाचार मिल सकता है।
लव- घर में सुख शांति पूर्ण माहौल रहेगा। पति पत्नी के बीच आपसी तालमेल उचित बना रहेगा। प्रेम संबंधों के उजागर होने से परिवार में तनाव रह सकता है।
स्वास्थ्य- काम के साथ अपने स्वास्थ्य तथा आराम का भी ध्यान रखना जरूरी है। इस समय आप कुछ कमजोरी और थकान महसूस करेंगे।
मिलेंगी। आर्थिक पक्ष बेहतर होगा। आप अपनी कार्यकुशलता व कार्य क्षमता द्वारा सभी कार्यों को संपन्न करने में सक्षम भी रहेंगे।
नेगेटिव- अनावश्यक खर्चे बने रहेंगे, परंतु अनुचित अथवा दो नंबर के कार्यों से दूर ही रहे। अपनी वाणी तथा उत्तेजित व्यवहार पर संतुलन रखें। अन्यथा आप बिना मतलबी किसी से वेर ले बैठेंगे।
व्यवसाय- व्यवसायिक गतिविधियां बेहतरीन तरीके से व्यवस्थित होती जाएंगी। कोई महत्वपूर्ण काम आसानी से संपन्न होने से उत्साह व जोश रहेगा। जोखिमभरे कामों में दिलचस्पी न लें। ऑफिस में कुछ पॉलिटिक्स जैसा माहौल रह सकता है।
लव- पारिवारिक सदस्यों के बीच मतभेद दूर होंगे। तथा घर की व्यवस्था पुनः सुखद हो जाएगी। लव पार्टनर के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाने का प्लान करें।
स्वास्थ्य- स्वास्थ्य में सुधार होगा। तथा आप स्वयं को स्वस्थ और ऊर्जावान महसूस करेंगे।
होंगे। इस समय विरोधी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। युवाओं को विभागीय परीक्षा अथवा किसी इंटरव्यू में सफलता मिलने की पूरी संभावना है।
नेगेटिव- आपके प्रतिद्वंद्वी आपके विरुद्ध कोई योजना बना सकते हैं, इसलिए सचेत रहना जरूरी है। इस समय टैक्स अथवा गवर्नमेंट से संबंधित कार्यों को समय पर पूरा करने का प्रयास करें। बेहतर होगा कि समय रहते परिस्थितियों को नियंत्रित कर ले।
व्यवसाय- कामकाज में विस्तार की योजना जो काफी समय से लंबित चल रही थी, अब वह गति यह पकड़ेगी। इस समय किसी भी प्रकार का उधार संबंधी लेनदेन ना करें। नौकरी संबंधी कार्यों को गंभीरता से लें, अन्यथा लापरवाही के परिणाम घातक हो सकते हैं।
लव- घर परिवार का वातावरण खुशनुमा रहेगा। विवाह योग्य लोगों कि रिश्ते संबंधी बात में कोई व्यवधान आ सकता है। इसलिए थोड़ा ध्यान से बातचीत करें।
स्वास्थ्य- अपना इम्यून सिस्टम मजबूत रखना जरूरी है। व्यायाम, प्राणायाम आदि ऐसी बातों को अपनी दिनचर्या का अंग बना ले।
से आप सकारात्मक और ऊर्जावान महसूस करेंगे। बच्चों की किसी विशेष समस्या का निवारण होने से राहत मिलेगी। जितनी भी मेहनत लगे, परंतु आप अपने काम को पूरा करके ही दम लेंगे।
नेगेटिव- घर के वरिष्ठ सदस्यों के मान सम्मान में कोई भी कमी ना आने दे। पिता पुत्र के बीच कोई विचारिक मतभेद हो सकता है। घर के कोई इलेक्ट्रिक आइटम खराब होने से बड़ा खर्चा सामने आएगा। युवा वर्ग व्यर्थ की गतिविधियों में समय नष्ट ना करें।
व्यवसाय- कार्यक्षेत्र में बदलाव संबंधी काम पूरे होंगे। आपको मेहनत के मुताबिक नतीजे भी मिलेंगे। मनमाफिक माहौल भी बना रहेगा। युवाओं को प्रतियोगी परीक्षा में सफलता मिलने से नौकरी प्राप्ति की संभावना है।
लव- पति-पत्नी घर की किसी समस्या को आपसी सामंजस्य द्वारा समझाने का प्रयास करें। वाद-विवाद से वातावरण बिगड़ सकता है। प्रेम संबंधों में नज़दीकियां बढ़ेगी।
स्वास्थ्य- ब्लड प्रेशर संबंधी नियमित जांच अवश्य करवाएं। तथा ज्यादा गरिष्ठ भोजन के सेवन से परहेज करें।
कार्य में खर्च करके आपको प्रसन्नता होगी। किसी मित्र की सलाह आपके लिए उपयोगी साबित होगी। घर की व्यवस्था को बेहतर बनाने संबंधी कुछ योजनाएं भी बनेंगी।
नेगेटिव- किसी मांगलिक कार्य में जाते समय व्यर्थ के वाद विवाद में ना पड़ें। वरना इसका असर वातावरण को खराब करेगा। प्रॉपर्टी संबंधित मामलों में बाधा आ सकती है। बात को सही साबित करने के लिए बहुत जोर लगाना पड़ेगा।
व्यवसाय- कार्यक्षेत्र में आपको अपनी कार्यशैली में परिवर्तन लाने की जरूरत है। सोच समझकर किसी योजना में पूंजी निवेश करें। आकस्मिक लाभ की संभावना है। इसलिए अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे। अधिकारियों से संबंध खराब ना होने दें।
लव- पति-पत्नी के बीच खट्टी मीठी नोकझोंक रहेगी। तथा आपसी संबंधों में और अधिक मधुरता भी आएगी। प्रेम संबंधों में एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें।
स्वास्थ्य- आप अपनी दिनचर्या तथा खान-पान व्यवस्थित रखें। ऐसा करना आपको स्वस्थ और ऊर्जावान रखेगा। तथा सकारात्मक प्रवर्ती बनी रहेगी।
लिए सिफारिश लगाने के बजाय स्वयं ही उसके लिए प्रयास करें, तो ज्यादा बेहतर होगा। आज अपनी किसी नई योजना को लेकर उत्साहित रहेंगे।
नेगेटिव- बच्चों की कोई जिद आपको तनाव दे सकती है। घरेलू मामलों को अपने स्तर पर ही सुलझा लें, दूसरों की दखलंदाजी से काम बिगड़ सकता है। खर्चों की अधिकता की वजह से बजट भी गड़बड़ा जाएगा।
व्यवसाय- कार्यक्षेत्र में आपकी भूमिका सकारात्मक रहेगी। अपनी कड़ी मेहनत से उपलब्धि मिल सकती है। नौकरीपेशा लोग अपने काम को जोश और उत्साह से करें, जिससे अफसरों के बीच आपका विशेष प्रभाव बनेगा।
लव- पारिवारिक वातावरण सुखद रहेगा। दांपत्य संबंधों में भी मधुरता रहेगी। युवाओं को डेटिंग के अवसर सुलभ होंगे।
स्वास्थ्य- समय मन मुताबिक तरीके से व्यतीत होने से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा तथा स्फूर्ति बनी रहेगी। आप स्वस्थ महसूस करेंगे।
संभावना है। आपकी आशावादी तथा खुशमिजाज व्यक्तित्व आपकी तरक्की में सहायक होगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में और अधिक नजदीकियां आएंगी।
नेगेटिव- फोन पर कोई अशुभ समाचार मिलने से मन कुछ उदास रह सकता है। बच्चों की किसी नकारात्मक गतिविधि का पता चलने से आप तनाव और बेचैन भी रहेंगे। इस समय आपको मानसिक सुकून पाने के लिए कहीं एकांत अथवा आध्यात्मिक स्थल पर कुछ समय व्यतीत करना उचित रहेगा।
व्यवसाय- बिजनेस से जुड़ा लोन लेने के लिए समय अनुकूल नहीं है। किसी भी कागजी कार्यवाही को करते समय सावधानी बरतें। हालांकि आपके सभी कार्य निर्विघ्न पूरे भी होते जाएंगे। नौकरी में आपको किसी मामले में समझौता करना पड़ सकता है।
लव- पारिवारिक सदस्यों के बीच आपसी सामंजस्य उचित बना रहेगा तथा सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को आप बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से सुलझएंगे।
स्वास्थ्य- स्वास्थ्य ठीक रहेगा। परंतु जोखिम पूर्ण कार्यों को करने से बचें तथा वाहन सावधानी पूर्वक चलाएं।
योग बने हुए हैं। भौतिक सुख में वृद्धि होगी। स्त्री वर्ग घर तथा बाहर दोनों कार्यों को बेहतरीन तरीके से व्यवस्थित रखने में सफल रहेंगी।
नेगेटिव- इस समय अपना रुख नरम रखें तथा अनावश्यक नोकझोंक और वाद-विवाद से दूर रहें। रुपए पैसे के लेनदेन संबंधी मामले में सावधानी बरतें। कोर्ट केस अथवा किसी सामाजिक विवाद संबंधी मामले को समय पर सुलझाना जरूरी है।
व्यवसाय- किसी कर्मचारी की नकारात्मक गतिविधि की वजह से कुछ नुकसान होने की स्थिति बन रही है। इसलिए कार्यस्थल पर कड़ी नजर रखना जरूरी है। पार्टनरशिप संबंधी व्यवसाय मे मुनाफादायक स्थिति रहेगी। ऑफिस में अपनी फाइलें तथा डाक्यूमेंट्स को अच्छी तरह संभाल कर रखें।
लव- घर की व्यवस्था उचित बनी रहेगी। अविवाहित लोगों के लिए बेहतरीन रिश्ता भी आने की संभावना है।
स्वास्थ्य- असंतुलित दिनचर्या और खान-पान का असर आपकी स्वास्थ्य पर पड़ेगा। माइग्रेन, गैस आदि की समस्या परेशान करेगी।
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cb05b6ef2ea3d4555921b6a68b763170b999baa57416b3bc91d5545098524bcd | pdf | वह जीवन का पानी जो एक आरिफ़ ( ख़ुदा की पहचान रखने वाला) इस संसार में आध्यात्मिक रूप में पीता है उस में प्रकट रूप में विद्यमान है और वह रूहानी दूध जिस से दुधमूहें शिशु की प्रकार रूहानी रूप में संसार में उसका पालन पोषण होता है बहिश्त में प्रकट रूप में दिखाई देगा और वह ख़ुदा के प्रेम की शराब जिस से वह संसार में (आध्यात्मिकता के) रूहानी रूप में सदैव मस्त रहना था, अब स्वर्ग में प्रकट रूप में उसकी नहरें दिखाई देंगी और वह ईमान तथा विश्वास की मिठास का मधु जो संसार में रूहानी रूप में आरिफ़ के मुख में जाता था, वह स्वर्ग में व्यक्त रूप में स्पष्टतया नहरों की आकृति में दिखाई देगा । प्रत्येक स्वर्गीय अपनी नहरों और वाटिकाओं के साथ अपनी आध्यात्मिक अवस्था का निखरा हुआ स्पष्ट रूप दिखला देगा तथा ख़ुदा भी उस दिन स्वर्गीय लोगों के लिए पर्दे के बाहर आ जायेगा । सारांश यह कि आध्यात्मिक अवस्थायें गुप्त रूप में नहीं रहेंगी । अपितु स्थूल रूप में नज़र आएंगी ।
मअरिफ़त ( ख़ुदा की पहचान) का तीसरा सूत्र
मअरिफ़त का तीसरा रहस्यात्मक तत्व यह है कि परलोक में उन्नतियां असीमित होंगी । इस सम्बन्ध में अल्लाह तआला का कथन है
والذين امنوامعة نورهم تسعى بين ايديهم وبإيمانهم يقولون ربنا اتيت لنا نورنا واغفر لنا إنك على كل شئ قدير له
वल्लज़ीना आमनू मअहू नूरोहुम यसआ बैना ऐदीहिम् व बे ऐमानेहिम् यक़ूलूना रब्बना यक़ूलूना रब्बना अत्मिम लना नूरना वग़फ़र लना । इन्नका अला कुल्ले शैयिन क़दीर ।
अर्थात् जो व्यक्ति संसार में विश्वास और ईमान की ज्योति रखते हैं उनका नूर कयामत के दिन उनके आगे और उन की दायीं ओर दौड़ता होगा । वे लोग सदैव यही कहते रहेंगे कि हे ख़ुदा ! हमारे नूर को पूर्णत्व प्रदान कर तथा अपनी क्षमा की छाया के नीचे हमें ले ले । तू सर्वशक्तिमान है । इस
आयत में यह जो कहा गया है कि वह सदैव यही कहते रहेंगे कि हमारी ज्योति को पूर्णता प्रदान कर, यह अपरिसीम उन्नतियों की ओर संकेत है । अर्थात् उन्हें आत्मिक ज्योति का एक पूर्ण तत्व प्राप्त होगा । पुनः दूसरा पूर्ण तत्व उन्हें दिखाई देगा । उस को देख कर पहले पूर्णतत्व को कमतर समझेंगे । द्वितीय पूर्ण दक्षता की उपलब्धि की प्रार्थना करेंगे और जब वह प्राप्त होगा तो एक तीसरी श्रेणी कमाल (पूर्णता) की उन पर प्रकट होगी पुनः उसे देखकर पहली दक्षता और पूर्णत्वको निकृष्ट समझेंगे और उस की इच्छा करेंगे । यही उन्नतियों की चरमसीमा की परम इच्छा है जो "अत्मिम्" शब्द से समझी जाती है ।
अस्तु, इसी प्रकार असीमित उन्नतियों का क्रम चलता जायेगा । अवनति कभी नहीं होगी और न कभी स्वर्ग से निकाले जायेंगे । अपितु प्रतिदिन आगे बढ़ेंगे और पीछे न हटेंगे । और यह जो फ़रमाया कि वह सदैव अपनी क्षमा चाहेंगे । इस स्थान पर प्रश्न यह उठता है कि जब स्वर्ग में प्रविष्ट हो गये तो फिर क्षमा में कौन सी कौन सी न्यूनता शेष रह गई जब पाप और अपराध सब के सब क्षमा कर दिए गए तो फ़िर क्षमायाचना की क्या आवश्यकता ? इस का उत्तर यह है कि "मग़फिरत " ( क्षमा ) का वास्तविक अर्थ कठोर और त्रुटिपूर्ण स्थिति को नीचे दबाना और ढांकना है । अतः स्वर्गीय इस बात की इच्छा करेंगे कि उन्हें हर प्रकार की पूर्णता प्राप्त करें और वे ज्योति के स्रोत में लुप्त हो जाऐं वह दूसरी अवस्था को देख कर पहली अवस्था तुच्छ पाएंगे और वे इस बात की इच्छा करेंगे कि पहली अवस्था नीचे दबाई जाए । पुनः तृतीय श्रेणी को देख कर उन्हें इस बात की अभिलाषा होगी कि दूसरी श्रेणी की अपेक्षा मुक्तिदान तथा क्षमादान अधिक हो अर्थात् पहली तुच्छ अवस्था नीचे दबाई जाये और उसको छिपा दिया जाये । इस प्रकार अपरिसीम क्षमा के इच्छुक रहेंगे । यह क्षमा तथा क्षमायाचना का वही शब्द है जो कुछेक मूर्ख लोग आक्षेप के रूप में हमारे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लाहो अलैहि वसल्लम के विषय में पेश करते हैं ।
सो दर्शकों ने इस विवरण से भली प्रकार समझ लिया होगा कि यही क्षमा याचना की इच्छा मानव का गर्व है । जो व्यक्ति स्त्री के गर्भ से जन्मा
और फिर क्षमायाचना को अपनी आदत नहीं बनाता वह मनुष्य न होकर एक कीड़ा है, तथा नेत्रों वाला न होकर अन्धा है, एवं पवित्र न होकर अपवित्र और भ्रष्ट है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि पवित्र कुरान के अनुसार स्वर्ग और नरक दोनों वास्तव में मानव के जीवन का प्रतिबिम्ब और उस की प्रतिछाया है । कोई ऐसी नवीन भौतिक वस्तु नहीं हैं कि जो दूसरी जगह से आए यह सच है कि वह दोनों शारीरिक रूप से ज़ाहिर होंगे परन्तु वह वास्तविक रूहानी हालतों के प्रतिबिम्ब और प्रतिछाया होंगे । हम लोग ऐसे स्वर्ग पर आस्था नहीं रखते जिस में केवल स्थूल रूप में एक ज़मीन में पेड़ लगाये गये हों तथा न ही ऐसे नरक पर विश्वास रखते हैं जिस में सचमुच गन्धक के पत्थर हैं अपितु इस्लामी विश्वास और आस्था के अनुसार स्वर्ग और नरक उन्हीं कर्मों का प्रतिबिम्ब और प्रतिछाया हैं जो इस लोक में मनुष्य करता है ।
प्रश्न नं. 3
यह है कि संसार में जीवन के उद्देश्य क्या हैं ? और उनकी प्राप्ति किस तरह होती है ?
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि यद्यपि भिन्न-भिन्न स्वभाव के मनुष्य अपनी कम समझी या कम हिम्मती से नाना प्रकार के उद्देश्य अपनी ज़िन्दगी के लिए ठहराते हैं । और केवल सांसारिक उद्देश्यों और इच्छाओं तक चल कर आगे ठहर जाते हैं किन्तु वह परम लक्ष्य जो ख़ुदा तआला अपने पवित्र कलाम क़ुरान मजीद में बताता है वह यह है । अल्लाह तआला का कथन है :
وماخلقت الجن والانس إلا ليعبدون
लेयअबोदून ।
अर्थात् मैंने छोटे बड़े प्रत्येक मनुष्य को इस लिए पैदा किया है कि वह मुझे पहचाने और मेरी इबादत (उपासना) करे । अतः इस आयत के अनुसार मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा की पहचान और ख़ुदा के लिए हो जाना है ।
यह तो स्पष्ट है कि मनुष्य को यह पद प्राप्त नहीं है कि अपने जीवन का लक्ष्य अपने अधिकार से स्वयं ही निश्चित करे क्योंकि मनुष्य न अपनी इच्छा से आता है और न अपनी इच्छा से वापस जाएगा अपितु वह एक मख़लूक (सृष्टि) है और जिस ने उसे पैदा किया और समस्त जीव-धारियों की अपेक्षा अत्युत्तम और श्रेष्ठ शक्तियाँ प्रदान कीं, उसी ने उसके जीवन का एक लक्ष्य निश्चित कर रखा है । चाहे कोई मनुष्य इस लक्ष्य को समझे या न समझे, किन्तु मनुष्य के जन्म का लक्ष्य निस्सन्देह ख़ुदा की इबादत और उसकी मअरिफ़त (पहचान) एवं उसी में अपने को विलीन कर देना है । जैसा कि ख़ुदा तआला पवित्र क़ुरान में एक और स्थान पर फ़र्माता है :06: iral 135
मा ख़लक़्तुल
जिन्ना वल् इन्सा इल्ला
ان الدين عند الله الاسلام فطرت الله التي فطر ذلك الدين القيم له الناس عليها
इन्नद्दीना इन्दल्लाहिल् इस्लाम । फ़तरन्नासा अलैहा ज़ालिकद्दीनुलक़य्यमो
अर्थात् वह दीन जिसमें ख़ुदा की शुद्ध पहचान और उसकी इबादत सब से ज़्यादा अच्छे तौर पर है वह इस्लाम है । और इस्लाम मानव प्रकृति में रमा हुआ है । और ख़ुदा ने मनुष्य को इस्लाम पर पैदा किया है और हस्लाम के लिए पैदा किया है अर्थात् यह चाहा कि मनुष्य अपनी ताकतों और सम्पूर्ण शक्तियों के साथ उस की उपासना, और आज्ञा और प्रेम में संलग्न हो जाए । इसी लिए उस सर्वशक्तिमान और करीम ने मनुष्य को समस्त शक्तियाँ इस्लाम की याचनानुसार प्रदान की हैं । इन आयतों की व्याख्या अति विस्तृत है । हम इस विषय में कुछ हद तक प्रथम प्रश्न के तीसरे भाग में लिख भी चुके हैं किन्तु अब हम संक्षेप में यह बताना चाहते हैं कि मनुष्य को जो कुछ अन्तः और बाह्य अंग दिये गए हैं अथवा जो कुछ शक्तियाँ प्रदान हुई हैं उनका वास्तविक उद्देश्य उनका ख़ुदा की पहचान और ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा की मुहब्बत है इसी कारण मनुष्य संसार में हज़ारों कर्मों को अपना करके भी ख़ुदा के अतिरिक्त सच्ची खुशहाली किसी में नहीं पाता । बड़ा धनवान होकर, बड़ी पदवी पाकर, महान् व्यापारी बन कर, महान् साम्राज्य प्राप्त करके महान् दार्शनिक कहला कर भी अंत में सांसारिक कैदों से बड़े अफ़सोस के साथ जाता है और सदैव उस का हृदय संसार में डूबे रहने से उसको अपराधी ठहराता रहता है और उसके छलों, फ़रबों एवं अनुचित कर्मों में कभी उसका ज़मीर उस से सहमत नहीं होता ।
एक समझदार व्यक्ति इस समस्या को इस प्रकार भी समझ सकता है कि जिस वस्तु की शक्तियाँ अच्छे से अच्छे कर्म कर सकती हैं पुनः आगे जा कर ठहर जाती हैं, वही सर्वोत्तम कर्म उसकी उत्पत्ति का चरम लक्ष्य समझा जाता है । उदाहरणतया बैल का काम उत्तम विधि से हल चलाना अथवा
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सिंचाई करना या बोझ ढोना है । इस से अधिक उसकी शक्तियों में कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ । अतः बैल के जीवन का उद्देश्य यही तीन बातें हैं । इस से अधिक कोई शक्ति उसमें नहीं पाई जाती । किन्तु जब हम मनुष्य की शक्तियों का पर्थवेक्षण करते हैं कि उन में सर्वोत्तम कौन सी शक्ति है तो यही सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी ख़ुदा की उसमें खोज की जिज्ञासा विद्यमान है । यहाँ तक कि वह चाहता है कि ख़ुदा के प्रेम में विनम्र भाव से ऐसा लवलीन है हो जाए कि उसका अपना कुछ भी शेष न रहे, सब ख़ुदा का हो जाए । वह खाने और सोने इत्यादि स्वाभाविक क्रियाओं में अन्य जानवरों के बहुत हद तक बराबरी रखता है । कला कौशल और दस्तकारी में कुछ पशु मनुष्यों से बहुत बड़े हुए हैं । अपितु मधुर्माक्खयां भी हर एक पुष्प का सार निकाल कर उससे इतना उत्तम मधु तैयार करती हैं कि अब तक इस दस्तकारी में मनुष्य को सफलता नहीं मिली । अतः स्पष्ट है कि मनुष्य की सर्वोच्च विशेषता ख़ुदा तआला का मिलन है । अतः उसके जीवन का परम लक्ष्य यही है कि ख़ुदा की ओर उसके दिल की खिड़की खुले ।
इंसानी ज़िन्दगी की प्राप्ति के साधन
हाँ यदि यह प्रश्न हो कि यह उद्देश्य किस प्रकार प्राप्त हो सकता है और किन साधनों से मानव उसको पा सकता है ?
इसके लिए स्मरण रखना चाहिए कि सर्वोत्तम साधन जो इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शर्त है वह यह है ख़ुदा तआला को ठीक विधि से पहचाना जाए तथा सच्चे ख़ुदा पर ईमान लाया जाये क्योंकि यदि प्रथम पग ही अनुचित और अशुद्ध है उदाहरण के रूप में यदि कोई व्यक्ति किसी पक्षी या पशु अथवा जल, वायु अग्नि आदि भूतत्वों को अथवा मानव के बच्चे को ही ख़ुदा समझ बैठा है - तो फिर उसके दूसरे पगों में सीधे और सरल मार्ग पर चलने की क्या आशा है । सच्चा ख़ुदा उसके खोजने वालों को सहायता देता किन्तु एक मृतक दूसरे मृतक की क्या सहायता कर सकता है ? इस विषय में अल्लाह ज़ल्ला शानुहु ने जो रूपक बान्धा है वह यह है
له دعوة الحق والدين بن عون من دونه لايستينون لهم شئ الاكباسط كفيه إلى الماء ليبلغ قاه وتاهو بتاليه ومادعاء الكفر من الافضل له
लहू दावतुल हक़्क़े वल्लज़ीना यद्ऊना मिन् दूनेही ला यस्तजीबूना लहुम बेशैयिन इल्ला कबासेते कफ़्फ़ैहे इलल्माये लेयब्लोग़ग़ा फ़ाहो वमा होवा बेबालेगेही । वमा दुआउल् काफ़िरीन इल्ला फ़ी ज़लालिन ।
अर्थात् दुआ करने के योग्य वही सच्चा ख़ुदा है जो सर्व-शक्तिमान है । और जो लोग उसके अतिरिक्त औरों को पुकारते हैं वे कुछ भी उनको जवाब नहीं दे सकते । उनकी अवस्था ऐसी ही है जैसे कोई जल की ओर हाथ फैलाए और कहे कि हे जल ! तू मेरे मुख में आ जा ! तो क्या वह जल उसके मुख में आ सकता है ? कदापि नहीं । अतः जो व्यक्ति सच्चे ख़ुदा से अपरिचित और अनभिज्ञ हैं उसकी समस्त दुआयें व्यर्थ ।
दूसरा साधन :- दूसरा साधन ख़ुदा तआला के उस अलौकिक सौन्दर्य और उसके परम तत्व की जानकारी प्राप्त करना है जो सर्वाशितः उसमें विद्यमान है क्योंकि सौन्दर्य एक ऐसी वस्तु है जो स्वाभाविक रूप से हृदय उसकी ओर आकर्षित होता है और उसके देखने से स्वतः ही उससे प्रेम हो जाता है । अतः ख़ुदा तआला का सौन्दर्य उसकी वहदानियत (अद्वैत) और उसकी परम महानता, विराटता तथा अन्य अगणित विशेषताएं हैं जैसा कि क़ुरान करीम ने यह फ़र्माया है :
قل هو الله احد الله الصمد لم يلد لا ولم يولي وليكن له كفوا أحدا له
कुल हो वल्लाहो अहद् । अल्लाहुस्समद् । लम् यलिद् वलम यूलद् । वलम् यकुल्लहू कोफ़ोवन् अहद् ।
अर्थात् ख़ुदा अपनी सत्ता और अपनी विशेषता तथा अपनी चमत्कारिता
MON: call at 10:Jejlal 138 |
d3aed3c78586379717b452e6b21d430dc48d3407e7f008f66bcb5d4d624536ef | web | कभी कभी बिलकुल मेल खाता हुआ रूमानी साथी मिल पाना भाग्य की बात होती है। फिर भी जीवन साथी पाने की संभावना तब और बढ़ जाएगी जब आप स्वयं, प्रेम, डेटिंग तथा सम्बन्धों के प्रति अपने मनोभावों को सुधारने के लिए कार्य करेंगे। हमसफ़र की खोज को भाग्य पर छोड़ देने के लोभ का संवरण करिएः अपने प्रेमी को खोजने की संभावना को बढ़ाने के लिए स्वयं को, तथा अपनी डेटिंग नीतियों को सुधारिए।
1. अकेले रहने का आनंद लीजियेः
2. स्वयं में वांछित विशेषताएँ विकसित करिएः
अपने साथी में जो विशेषताएँ आपको अच्छी लगती हों उनकी एक सूची बनाइये। शायद आप उसके मज़ाकियापन से उसकी ओर आकृष्ट होते हों, या एक प्यारी सी मुस्कुराहट के कारण। शायद आपको कोई ऐसा पसंद हो जो खिलंदड़ा हो, तथा खेलों में भाग लेता हो, या आप किसी ऐसे की ओर आकृष्ट होते हों जो उपन्यास पढ़ने में आनंदित होता है। चाहे जो भी विलक्षणता हो, सोचिए कि अपने में आप उसे कैसे समाहित कर पाएंगे। यदि आप अपने पर इस तरह काम करेंगे, तो शायद आपको अंततः कोई ऐसा मिल ही जाएगा, जिसकी रुचियाँ और इच्छाएँ आपके समान हों। साथ ही, चाहे आप इस प्रकार से अपने हुमसफ़र से न भी मिल पाएँ, तब भी आप स्वयं को सुधार तो लेंगे ही और साथ ही नए कौशल भी सीख ही लेंगे।
3. दिमाग खुला रखिएः
अध्ययनों से पता चला है कि लोग अक्सर उन विशेषताओं का पूर्वानुमान नहीं कर पाते हैं, जो उन्हें आकर्षित करती हैं। यदि आप वांछनीय विशेषताओं की सूची बना लें, तब भी बहुत संभावना यह है कि आप वास्तविक जीवन में ऐसे व्यक्ति की ओर आकृष्ट होंगे जो बिलकुल भिन्न विशिष्टताओं का प्रदर्शन कर रहा हो। जब आप अपने आदर्श साथी की खोज कर रहे हों, तब कुछ सम्बन्धों के बीच में ही टूट जाने की चिंता मत करिएः तथापि, लाभ हानि का हिसाब लगाने के स्थान पर अपनी सहज प्रवृत्ति को ही निर्देश देने का अवसर दें। आप आश्चर्यचकित हो जाएँगे, कि आप कितने बढ़िया व्यक्ति से मिल पाते हैं।
विशेष क़िस्म के पक्षपात और पूर्वाग्रहों से बचना खासतौर से महत्त्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति का आकलन उसके रंग, धर्म, समूह, या आयु के आधार पर मत करिए। किसी भी व्यक्ति से संबंध बनाना उचित है अथवा नहीं, इसका निश्चय करने से पहले कुछ समय लीजिये।
4. जो लोग पहले से संबंध में हों, उनसे दूर ही रहिएः
यदि आप ऐसे किसी शानदार व्यक्ति से मिलते हैं, जो पहले ही से किसी के साथ संबंध में है, तब उससे रिश्ता बनाने की इच्छा को दबा लीजिये। वे संबंध जो बेवफ़ाई पर आधारित होते हैं, लंबे समय तक नहीं चलते हैं। वे किसी कमी पर आधारित होते हैं और उनसे आपको वह सब नहीं मिल सकता जो वास्तविक प्रेम में मिल सकता है। जबतक आपका आदर्श साथी कुछ समय तक अकेला न रह चुका हो, तब तक उसकी ओर बढ्ने के लिए प्रतीक्षा करिए ताकि आपके सम्बन्धों को बनने के लिए उचित अवसर मिल सकें।
5. अपना सामाजिक नेटवर्क विकसित करिएः
आपके जितने दिलचस्प मित्र होंगे, उनके ज़रिये, आप उतने ही दिलचस्प अनजाने लोगों से मिल पाएंगे। अपने डेटिंग पूल को बढ़ाने के लिए अपने सामाजिक नेटवर्क को बढ़ाइए। यदि आप डेट करने के लिए, नए अच्छे लोगों से मिलना चाहते हैं, तब मित्रता और क़रीबी जान पहचान को बढ़ाइए। अपनी तरह के लोगों से मिलने के कुछ बढ़िया तरीके ये हैंः
तत्कालीन मित्रताओं एवं जान पहचान को विकसित करिएः मित्रों को रात्रि भोज पर बुलाइये, कुछ पार्टियां दीजिये, या साथ मिल बैठने का समय निकालिए।
6. मित्रवत रहिएः
हंसने और मुस्कुराने से आपके नए परिचित आपके आस पास अधिक सहज महसूस करेंगे। यदि आप चाहते हैं कि किसी को दिल खोलने के लिए प्रोत्साहित करें, तब अपने हाव भाव खुले रखिए और मित्रवत व्यवहार करिए। जिसे आप चाहते हों उसके साथ हल्की फुलकी छेड़छाड़ कर के आप यह पता लगा सकते हैं कि क्या वह भी आपकी ओर आकृष्ट है।
7. अजनबियों से मुलाक़ात के लिए तैयार रहिएः
आपके मित्र जानते हैं कि आप कौन हैं और आपको क्या पसंद है। उनकी सहज बुद्धि को यह निर्णय लेने दीजिये कि क्या उनका कोई परिचित, आपके लिए उपयुक्त साथी हो सकता है। सभी अनजान लोगों से की गई डेट्स सफल नहीं होती हैं, परंतु, कुछ तो निश्चय ही होती ही हैं। नए दिलचस्प लोगों से मिलने के अवसर को हाथ से जाने मत दीजिये।
8. जानिए कि लोग छेड़ छाड़ कैसे करते हैंः
शारीरिक हाव भाव खुले रखना (खुली बाँहें, पैर, तथा हथेलियाँ)
9. अपनी ऑनलाइन डेटिंग प्रोफ़ाइल को ईमानदार परंतु रहस्यपूर्ण बनाए रखिएः
अनेक व्यक्तियों ने अपने हमसफ़र, ऑनलाइन डेटिंग के जरिये ही पाये हैं। हालांकि, यह एक कठिन कार्य हो सकता है। उपयोग करने वालों ने बताया है कि जब उन्होने अपनी डेटिंग प्रोफ़ाइल ईमानदार, परंतु संक्षिप्त रखी तो उन्हें अधिक सफलता मिली है। जब अन्य उपयोगकर्ता आपकी प्रोफ़ाइल पढ़ते हैं, तब थोड़ा रहस्य बना रहने दीजियेः सारे भेद तुरंत ही मत खोल दीजिये। डेट्स का उपयोग एक दूसरे को जानने में करिएः प्रोफ़ाइल को ही अपने लिए सारा काम न कर लेने दीजिये।
10. लोगों से दिल धड़का देने वाली जगहों पर मिलियेः
11. स्वयं को बताइये कि आपके लिए बस कोई एक ही व्यक्ति नहीं हैः
यदि किसी एक व्यक्ति के लिए प्रेम में पड़ने वाला केवल एक ही व्यक्ति होता, तब तो अपनी जीवन काल में 10,000 में से केवल एक ही व्यक्ति को सच्चा प्रेम मिल पाता। हम सब जानते हैं कि यह सच नहीं हैः लोगों को सदैव ही प्रेम होता रहा है और अच्छे संबंध बनते ही रहे हैं। अपने लिए केवल एक ही सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की खोज करने के प्रति आसक्ति मत रखिएः इसके स्थान पर निकट चलते रहने वाले, स्वस्थ और प्रेमपूर्ण संबंध विकसित करने को ही अपना लक्ष्य बना लीजिये। देखिये कि शायद आपका हमसफ़र अनायास ही एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व की तरह प्रकट होने के स्थान पर, आपके सम्मुख ही विकसित हो जाये। अनेक, अत्यंत संतोषजनक प्रकार के प्रेम संबंध लंबे समय में विकसित होते हैं, जिससे यह पता चलता है कि हमसफ़र तो एक दूसरे को जानने के अनेक वर्षों के उपरांत ही बना जा सकता है।
12. "हमसफ़र" शब्द पर संशय करिएः
हमसफ़र से अक्सर ऐसा लगता है कि दो व्यक्ति एक दूसरे के लिए ही बने थे और उनमें सदैव सम्पूर्ण सामञ्जस्य ही रहेगा। परंतु सभी मज़बूत, निकट, दीर्घकालीन सम्बन्धों में संघर्ष एवं असहमतियाँ शामिल होती हैं। अध्ययनों से पता चला है कि वे दंपत्तियाँ अपने साथियों से अधिक संतुष्ट होती हैं जब वे यह समझती हैं कि उनका प्रेम एक सफ़र या राह है। अपनी हमसफर की खोज, इन शर्तों पर आधारित करने का प्रयास करिएः आप किसी सम्पूर्ण, सुसंगत मेल की तलाश नहीं कर रहे हैं। इसके स्थान पर, आप एक ऐसे साथी की खोज में हैं, जिसके साथ आप जीवन का सफ़र ऊंच-नीच को सम्मिलित कर पूरा कर सकें। दूसरे शब्दों में आपको किसी ऐसे की खोज करनी है जिसके साथ आप विकसित हो सकें, न कि किसी ऐसे की जिससे मिलना आपके भाग्य में लिखा ही हो।
अपने प्रेम को सफ़र के स्थान पर भाग्य समझना संघर्ष या विवाद की स्थिति में विशेषकर हानिकारक हो सकता है। अच्छे दिनों में, बहुत अंतर नहीं पड़ता है।
13. अपनी सहज बुद्धि पर विश्वास करिएः
अध्ययनों से यह पता चला है कि किसी व्यक्ति के प्रति दी गई सहज प्रतिक्रिया किसी भी संबंध की सफलता के लिए महत्त्वपूर्ण इशारा होती है।किसी व्यक्ति के संबंध में सहज प्रवृत्ति से आए हुये पहले विचारों को अनदेखा करने का प्रयास मत करिए। यदि आपको उसके बारे में अच्छी भावनाएँ आती हैं, तब उस संबंध का अनुसरण करें। यदि आप किसी संबंध के प्रति असहज अथवा परेशान होते हैं - चाहे देखने में सबकुछ ठीक ठाक ही क्यों न लगता हो - तब शायद आप किसी और को खोजना चाहेंगे।
14. संपूर्णता को अच्छे की राह में मत आने दीजियेः
किसी प्रेमी में संपूर्णता प्रारम्भ में ही नहीं आ जाती हैः उसमें तो समय लगता ही है। यदि कोई ठीक ठाक लगता हो परंतु उसमें कुछ अपूर्णताएँ भी हों, तब उसको संपूर्णता में देखने का प्रयास करिए। दो अपूर्ण व्यक्तियों में सम्पूर्ण प्रेम हो सकता है।
यह सुझाव उन "अपूर्णताओं" के संबंध में नहीं है जो वास्तव में निंदनीय अथवा नियंत्रण संबंधी हैं। यदि आपका साथी आपको चोट पहुंचाने, अपमानित करने, या दूसरों से अलग करने का प्रयास करता है, तब यह संबंध तोड़ने का कारक है।
15. मज़बूत मैत्री संबंध बनाइयेः
जब आप एक संभावित साथी पा जाएँ, तब उसके साथ मज़बूत मित्रता निर्मित करने पर ध्यान केन्द्रित करें। साथ साथ मज़ेदार गतिविधियों में शामिल होइए, एक दूसरे से अपने जीवन के लक्ष्यों के संबंध में बातें करिए, एक दूसरे की रुचियों के संबंध में जानिए, तथा एक दूसरे को सहारा दीजिये। वे जोड़े जो एक दूसरे से मैत्री को महत्त्व देते हैं, दीर्घ-काल में अधिक सफल, रूमानी, तथा प्रेम करने वाले होते हैं। जो मैत्री संबंध बना लेते हैं वे पाते है कि वे एक दूसरे के साथ अधिक रूमानी रहते हैं (यहाँ तक कि शारीरिक संबंध भी बेहतर हो जाते हैं!)।
16. संबंध बनाने के लिए कुछ काम करिएः
दूसरे व्यक्तियों के साथ संबंध में पड़ने से बचना (यदि आप एक व्यक्ति से संबंध बनाए रखने का चयन करते हैं, तो)
17. दोहरी डेट पर जाइएः
किसी अन्य युगल के साथ दोहरी डेट पर जाने से आप अपने संबंध को भावुक एवं प्रेमपूर्ण बनाए रह सकते हैं। यह प्रभाव और भी मज़बूत तब हो जाता है जब आपका साथी निजी विषयों पर दूसरे युगल के साथ बातचीत करता है। रात्रि भोज के लिए दो घनिष्ठ मित्रों को आमंत्रित करिए अथवा दंपत्तियों के लिए संरचित मीट अप ग्रुप में सम्मिलित हो जाइए ताकि आप दूसरों को जान सकें। अपने साथी के साथ सच्चे हमसफ़र बनने के लिए अपने सामाजिक नेटवर्क को सहायता प्रदान करने दीजिये।
18. शारीरिक सम्बन्धों के उपरांत शारीरिक निकटता बनाए रखिएः
जब युगल शारीरिक संबंध बनाने के उपरांत, समय निकाल कर एक दूसरे के साथ शारीरिक रूप से प्रेम प्रदर्शित करते हैं, तब उनके संबंध अधिक प्रसन्न और संतोषजनक हो जाते हैं। यदि आपको लगता है कि आपको अपना हमसफ़र मिल गया है, तो सुनिश्चित करिए कि आप आलिंगन, निकटता, एवं कुछ मधुर बात चीत के लिए, शारीरिक सम्बन्धों के तुरंत बाद, समय निकाल सकें। इससे ऐसा सकारात्मक फ़ीडबैक लूप तैयार होगा जिससे आपका संबंध तेज़ी से विकसित हो सकेगा।
19. जीवन के लक्ष्यों का ध्यान रखिएः
मेरा कैरियर कितना महत्वपूर्ण है और क्या मेरा साथी मेरे कैरियर की देखभाल कर सकता है?
क्या कभी बच्चों की इच्छा होगी? क्या मेरे साथी की भी इच्छा होगी?
मैं स्वयं को 5 साल बाद कहाँ देखता हूँ? 10? 20? क्या मैं अपने साथी को भी अपने साथ देखता हूँ?
क्या मैं और मेरा साथी एक ही प्रकार के शहरों/ नगरों/ क्षेत्रों में रहने में प्रसन्न रह सकते हैं? यदि आपके साथी को तो शहर में रहना बिल्कुल ही नापसंद हो उसका वहाँ दम घुटता हो और आप महानगरों के अलावा कहीं रह ही नहीं सकते हों, तब तो आपको पुनर्विचार करना ही होगा।
20. संबंध चक्र बनाने से बचिएः
संबंध चक्र का अर्थ होता है नए नए साथियों के साथ संबंध बनाना और फिर उन्हें तोड़ना। ये संबंध बहुत ही मोहक हो सकते हैं, चूंकि उनमें अंतरंगता और उत्तेजना का मिश्रण होता है। परंतु यह उत्तेजना - हालांकि रोमांचकारी होती है - आम तौर पर नकारात्मक होती है। और अध्ययनों से पता चला है कि वे युगल जो संबंध बनाने और तोड़ने के चक्र में पड़े होते हैं दीर्घकाल में अच्छे नतीजे नहीं प्रदर्शित कर पाते हैं। याद रखिए कि संबंध चक्र न केवल मूल्यवान समय तथा भावनात्मक ऊर्जा का अपव्यय करता है बल्कि आपका किसी ऐसे से मिलन भी बाधित करता है, जो कि आपके लिए बेहतर संगति हो सकता है।
21. शांति और धैर्य की भावनाओं पर ध्यान दीजियेः
यदि आपको हमसफर मिल गया होगा तब आपको शांति मिलेगी, आप प्रसन्न होंगे तथा आपको विश्वास होगा कि आपका संबंध मज़बूत और स्वस्थ है। आपके हमसफ़र को आपका साथ देना चाहिए और आपको अपने हमसफ़र का। यदि संबंध बनाने के बाद आपको परेशानी, उद्विग्नता या व्याकुलता लगती हो तब तो शायद आपके लिए यह संबंध ठीक नहीं है। याद रखिए कि सुकून, सहजता, और संबंध का स्वास्थ्य, किसी भी प्रकार की नाटकीयता, हिम्मत या उत्तेजना से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
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5f0d92f97311604e22b9348e15ac032b2d98d38b | web | पाकिस्तान के गिलगिट-बाल्टीस्तान क्षेत्र में चीन की सीमा से सटे खुंजेरब दर्रे पर चीनी और पाकिस्तानी सीमा सुरक्षा के जवान।
भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर चल रहे तनाव को देखते हुए भारतीय विश्लेषकों के बीच उनकी सुरंग में झाँकने वाली दृष्टि उनकी बैचेनी को बढाने में ही सहायक सिद्ध हो रहा है।
आजकल यह देखने में आ रहा है कि अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ के वाचाल मुख से झर रहे प्रत्येक शब्द को ट्रम्प प्रशासन की ओर से भारत-चीन के बीच जारी तनाव में भारत के पूर्ण समर्थन की पुष्टि के तौर पर देखा जा रहा है। उदाहरण के लिए भारत द्वारा 59 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंधों को लगाए जाने पर जब पोम्पेओ ने तालियां बजाईं, तो इसे 'भारत समर्थक' बयान के तौर पर देख लिया गया।
लेकिन पोम्पेओ का यह अभियान चीन को बदनाम करने और दूसरे देशों को चीनी उच्च-तकनीक वाली दिग्गज कंपनी हुआवेई को अपनाने से रोकने के लिए अपनाया गया कदम है, जोकि वर्तमान में जारी लद्दाख सीमा पर मौजूदा तनाव से पूर्व से चल रहा है। हमारे रणनीतिक विश्लेषक इस बात से पूरी तरह से अंजान हैं कि हुआवेई के साथ अमेरिका की मुख्य समस्या पारस्परिक बाजार में पहुँच बनाने की कमी को लेकर है, जैसा कि जॉन एफ कैनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट के विलियम एच ओवरहोल्ट ने हाल ही में इस बारे में लिखा है।
इस पूरे मसले की जड़ को रेखांकित करते हुए ओवरहोल्ट लिखते हैं "जब तक हुआवेई की तीनों प्रमुख बाजारों - संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन तक पहुँच बनी रहने जा रही है, वहीँ दूसरी तरफ विदेशी तकनीकी कंपनियों को चीन के बाजार में पूरे तौर पर पहुँच बना पाने से रोका जा रहा हो, तो ऐसे में यह (हुआवेई) जल्द ही वैश्विक 5जी बाजार पर छा जाएगा। सभी बाजारों पर अपनी पहुँच होने की वजह से हुआवेई अपने प्रमुख प्रतिद्वंदियों एरिक्सन और नोकिया के कुलमिलाकर किये जाने वाले रिसर्च एवं विकास के बजट से भी अधिक खर्च करने की क्षमता रखता है। ऐसी स्थिति में वे हुआवेई की तकनीक के क्षेत्र में बेहतर प्रगति का मुकाबला नहीं कर सकते। निकट भविष्य में उनका सर्वनाश साफ़ नजर आ रहा है, जोकि पूरी तरह से अस्वीकार्य है...। ऐसे में हुआवेई की पहुँच से बाजार को दूर रखना जहाँ उचित रहेगा, वहीँ भविष्य में इसके समाधान के लिए दरवाजे खुले रहने होंगे।"
लेकिन यह साफ़ है कि हुआवेई के बारे में भारत ने अभी तक विवेकसम्मत निर्णय लिया है। यह किसी भी प्रकार से भावनाओं में बहकर या आज के हालात को देखते हुए धमनियों में उबाल खाते लहू के प्रवाह से निर्देशित है। निश्चित तौर पर बेहद ठन्डे दिमाग से सोच-विचार के साथ ही इस बारे में फैसला लिए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसका सीधा सम्बंध आधुनिक, नवोन्मेषी, प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के तौर पर देश के भविष्य के विकास से गहराई से जुड़ा हुआ है।
इसी तरह जापान के ओकिनावा में एक प्रान्त यदि अपने एक प्रशासनिक क्षेत्र का नाम बदलता है जिसमें ईस्ट चाइना सी में विवादित द्वीपों का एक समूह भी शामिल है (सेनकाकू द्वीप के बारे में बीजिंग इसे चीनी क्षेत्र के रूप में विवादित मानता है) को देखकर सभी भारतीय बेहद उत्साहित होने लगते हैं. उनकी नजर में टोक्यो चीन के खिलाफ एक 'दूसरा मोर्चा' खोल रहा है, जिससे कि बीजिंग का ध्यान भटक जाये और वह पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना पर दबाव कम करने के लिए मजबूर हो जाये।
यह पूरी समझ ही बेहद हास्यास्पद है, क्योंकि ओकिनावा प्रान्त के रिकॉर्ड में यह स्पष्ट है कि इसकी ओर से यह पहल इशिगाकी शहर के स्थानीय लोगों के बीच बने प्रशासनिक भ्रम को हल करने के उद्देश्य से लिया गया है, जो कि 'टोनोशिरो' (जापानी में) नाम सेनकाकू द्वीपों के साथ साझा करता है!बेहद मजेदार रहा यह देखना कि दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख दैनिक अख़बार में अगले दिन हेडलाइन फ्लैश होती है, भारत के साथ आमना-सामना होने के बाद, चीन जापान के साथ समुद्री विवाद में उलझा। हमारे अख़बारनवीसों को लगता है कि ये भी नहीं मालूम कि चीन सेनकाकू द्वीप समूह (बीजिंग इसे डियाओयू नाम से पुकारता है) के क्षेत्रीय जल में गश्त करता आ रहा है- जबकि टोक्यो इस हकीकत से वाकिफ है। अकेले जून माह में ही चीनी तट रक्षक जहाजों ने डियाओयू के आसपास के क्षेत्रीय जल में कुछ नहीं तो 8 या 9 गश्ती लगाईं होगी।
लेकिन इन सबसे अजीबोगरीब मामला तो तब देखने को मिला जब पिछले महीने प्रशांत सागर क्षेत्र में तीन विमानवाहक पोतों की अमेरिकी तैनाती को लेकर भारतीय विश्लेषकों के बीच में उत्साह का माहौल व्याप्त हो गया था। हमारे विश्लेषकों ने खुद को इस बात के लिए आश्वस्त कर लिया था कि इस तैनाती से पीएलए खतरे में पड़ चुका है, नतीजतन वह अपनी सुरक्षा के लिए फिक्रमंद होगा। एक समाचार एजेंसी ने तो अमेरिकी विमान वाहकों की मौजूदा तैनाती के बारे में दैनिक रिपोर्ट के साथ इस विषय पर विशेषज्ञता तक हासिल करनी शुरू कर दी!
जबकि चीनी विश्लेषकों के बीच में यह आम धारणा बनी हुई है कि पेंटागन ऐसा सिर्फ अपनी जरूरत के हिसाब से ही कर रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो पेंटागन का मुख्य दुश्मन आजकल कोरोनावायरस बना हुआ है। यदि वायरस अमेरिकी नौसेना की प्रमुख बेड़ों को अपनी चपेट में ले लेता है, तो यह अमेरिका की लड़ाकू मशीनरी को ही अपंग करने वाली बात होगी. कोरोनावायरस के ऐसे कुछ मामले, जिसमें अमेरिकी नोसेना के सुरक्षा चक्र को नष्ट पहले भी हो चुका है, देखने में आये थे, जिसमें मार्च महीने में विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट का प्रसिद्ध मामला भी शामिल है। असलियत में देखें तो कोरोनावायरस को चकमा देने की खातिर, अमेरिकी अमेरिकी नौसेना के जहाज आजकल समुद्र में बने रहने का रिकॉर्ड एक के बाद एक तोड़ रहे हैं।
हालांकि, उपरोक्त ख्याली पुलाव की तुलना में पूरी तरह से एक नई जोखिम भरी स्थिति नजर आ रही है। इसे शुक्रवार के दिन चीनी राज्य पार्षद और विदेश मंत्री वांग यी और पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के बीच की टेलीफोन पर हुई वार्ता से समझा जा सकता है, गौरतलब है कि ठीक उसी दिन पाकिस्तानी पक्ष के वार्ताकार कोविड-19 की जाँच में पॉजिटिव पाए गए थे।वांग और कुरैशी के बीच में हुई वार्ता में महामारी को लेकर काफी प्रमुखता से बात हुई। अपनी बातचीत में वांग ने कुरैशी से कहा है कि महामारी ने 'विश्व को और अधिक वैश्विक और क्षेत्रीय गतिशीलता के साथ बदल कर रख डाला है'। ऐसे में चीन और पाकिस्तान को 'संयुक्त रूप से चुनौतियों का सामना करने और साझा हितों और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाये रखने के लिए आपस में मिलकर काम करने की जरूरत है।'
चीन द्वारा जारी बयान के अनुसार इन दोनों शीर्ष राजनयिकों के बीच में व्यापक स्तर पर चर्चा हुई। इसमें शामिल मुद्दे विभिन्न प्रकृति के थे जिसमें क्षेत्रीय हालात, कश्मीर मुद्दा, अफगानिस्तान, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और कोरोनावायरस जैसे विषयों को शामिल किया गया था। यह सच है कि क्षेत्रीय हालातों में एक नई पेचीदगी आ चुकी है लेकिन चीनी-पाकिस्तानी प्लेट लबालब भरी हुई है।
भारत-चीन सीमा और नियंत्रण रेखा पर भारी तनाव बना हुआ है, अमेरिका की ओर से अफगान शांति प्रक्रिया को गति देकर इकतरफा दबाव बनाते जाने का सिलसिला जारी है, और इसके प्रमुख हितधारकों (रूस, चीन, ईरान) को इस पूरी प्रक्रिया से दरकिनार करने पर लगा हुआ है। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में भारी उथल-पुथल का दौर जारी है, वहीँ चीन 25 साल की टाइमलाइन के साथ पाकिस्तान के पड़ोसी ईरान को एक ऐतिहासिक साझेदारी वाले समझौते में शामिल करने जा रहा है, जो तेहरान को अलग-थलग करने वाली अमेरिकी नीतियों को ध्वस्त करने और क्षेत्रीय परिदृश्य को अभूतपूर्व तौर पर हमेशा के लिए बदलने जा रहा है। और निश्चित तौर पर यह महामारी वास्तविक तौर पर नई सच्चाइयों से रूबरू करा रही है।
क्या वांग-कुरैशी के बीच की यह वार्ता इस संवेदनशील मोड़ पर दोनों के द्वारा आपस में सर जोडकर भारत के खिलाफ 'दो-मोर्चों पर युद्ध' थोपने का कोई संकेत है? क्या इस क्षेत्र की जिओपॉलिटिक्स इतनी तेजी से बदल रही है कि सब कुछ पहचान से परे हो चला है? लेकिन इस सबके बावजूद कुछ भारतीय विश्लेषक इसे एक 'संभावना' के तौर पर देखते हैं और उन आंकड़ों के समूह को तैयार करने में व्यस्त हैं जो उनकी पहले से बनी-बनाई धरनों को पुष्ट करने का काम करती हैं।
जबकि हकीकत यह है कि पीएलए को भारत के साथ युद्ध में जाने के लिए किसी भी पाकिस्तानी मदद की जरूरत नहीं है, या यूँ कहें कि किसी भी अन्य की नहीं है तो यह कहना गलत नहीं होगा। सैन्य संतुलन निर्णायक तौर पर उसके पक्ष में काम कर रहा है। उल्टा यदि 'दो-मोर्चों वाली लड़ाई' छिड़ती है तो आयरन ब्रदर का जो तमगा मिला हुआ है वह सिर्फ पीएलए पर एक दबाव बन कर रह जाएगा, क्योंकि पाकिस्तान इस स्थिति में नहीं है कि वह भारत के साथ युद्ध छेड़ सके।
वहीँ पाकिस्तान अपने शब्दों और पहलकदमी को लेकर काफी एहतियात से काम ले रहा है। उसका पूरा फोकस इस समय अफगान शांति प्रक्रिया पर लगा हुआ है, जो एक विदेश नीति परियोजना की परिणति के तौर पर है जिसे 1970 के दशक में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के शासनकाल के दौरान काबुल में एक दोस्ताना सरकार स्थापित करने के तौर पर शुरू किया गया था। सौभाग्य की बात यह है कि इसी के जरिये अमेरिका के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से रिसेट करने का मौका भी मिल रहा है। ट्रम्प प्रशासन भी चाहेगा कि इसे इसी प्रकार से रखा जाए, जो कि पाकिस्तान को दिए गए निमंत्रण से स्पष्ट है, जिसमें उसे 3 बिलियन डॉलर की सहायता राशि मिलने जा रही है। यह सहायता पाकिस्तान को यूएस इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन द्वारा कोरोनावायरस के कारण आर्थिक संकट से निपटने के लिए वित्तीय सहायता के तौर पर दी जा रही है।
इसलिए अधिक से अधिक यह हो सकता है कि खुफिया जानकारी के साझाकरण के मामले को लेकर राजनयिक धरातल पर हमारे दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच कुछ 'टकराहट' हो सकती है। कई भारतीय विश्लेषकों की तुलना में पाकिस्तान शायद पीएम मोदी की मानसिक बुनावट को कहीं बेहतर तरीके से समझने लगा है। और उसने यह अंदाजा लगा लिया होगा कि गुरुवार के दिन लेह में मोदी ने जिस प्रकार से 'कठोर' भाषण दिया था, के चलते देश के भीतर इतना राजनीतिक स्थान बन चुका है कि , जिसका सहारा लेकर सही मौका देखकर चीन के साथ राजनयिक ट्रैक को एक बार फिर से दुरुस्त किया जा सकता है। (और इस बात की पूरी संभावना है कि वांग ने भी कुरैशी के दिमाग को पढ़ लिया हो।)
इस सबके बावजूद, इतना तो पूरी तरह से साफ़ है कि वांग लद्दाख के मसले को लेकर खुद को उलझाए हुए नहीं है, बल्कि इसकी बजाय कोविड-19 के कारण चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की प्रगति की जो रफ्तार धीमी पड़ चुकी है उसे कैसे गति प्रदान की जाये, इस बात पर ही पूरा ध्यान बना हुआ है। और वास्तव में इस मामले में बेहद चपलता से पाकिस्तानी प्रतिक्रिया तब देखने को मिली जब पीएम इमरान खान ने फौरन बीजिंग को आश्वस्त करते हुए कहा है कि इस्लामाबाद तेजी से अधूरे प्रोजेक्ट के कामों को पूरा करते हुए, जो वक्त इस बीच बर्बाद हो चुका है, उसकी भरपाई को सुनिश्चित करेगा। इमरान खान के शब्दों में "(सीपीइसी) गलियारा पाकिस्तान-चीन मित्रता का सूचक है और सरकार इसे किसी भी कीमत पर पूरा करके रखेगी... ।"
इसलिए जरुरी है कि किसी भ्रम में न रहकर हवा में लाठी भांजने का काम किया जाए, जिसमें यह नजर आने लगे कि चीन और पाकिस्तान मिलकर युद्ध छेड़ने की साजिश रच रहे हैं। उनके पास हाथ में इस समय इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रगतिशील एजेंडा है जो कि महामारी के बाद की आर्थिक सुधार की अनिवार्यताओं से जुडी है।
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339b097ec1a1b63592d8c3859d5aa5bc079a86ed | web | क्या तुम्हे पता है राधिका इस समय हम कहां है ? नहीं! और मै जानना भी नहीं चाहती मोहन, क्योंकि मै इतना जानती हूं कि जहां तुम हो वहां मै हूं, तो इससे मुझे कोई मतलब नहीं है कि हम कहां है और कहां नहीं। राधिका क्या तुम मेरे साथ हर पल हर जगह मौजूद रह सकती हो ? मै तुम्हारे साथ हर पल, हर घड़ी और धरती के हर उस कण - कण में बस सकती हूं मोहन, जहां तुम्हारा निवास हो। तुम मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा हो मोहन मै तुम्हारे साथ नहीं तो मै अधूरी हूं मोहन इसलिए मैंने तुम्हे अपने मन मंदिर में बसा लिया है, जहां केवल तुम हो और तुम पर मात्र मेरा अधिकार है।
अधिकार की बात मत किया करो राधिका मै इस अधिकार तले दबना नहीं चाहता क्योंकि संसार का यह नियम है कि हर व्यक्ति किसी ना किसी के अंदर रहकर ही जीवनयापन करता है। तुम कहना क्या चाहते हो मोहन ? स्पष्ट कहो मै समझ नहीं पाई।
मेरे कहने का अर्थ यह है राधिका की मै एक पुत्र हूं तो पहला अधिकार माता - पिता का है भाई - बहन का है, गुरु का है, मित्र का है तत्पश्चात तुम्हारा अधिकार है। मतलब ? तुम्हारे जीवन पर मेरा कोई अधिकार नहीं ? तुम्हारे हृदय में मेरे लिए कोई स्थान नहीं ? ऐसा बात नहीं है राधिका मेरे जीवन पर माता - पिता के बाद सबसे अधिक - अधिकार तुम्हारा ही होगा। पता है क्यों - क्योंकि तुम सबसे अंत में मेरे जीवन में आई हो और जो अंत में आता है वह शेष भाग के साथ संपूर्ण हो जाता है। तुम्हारी बातें तुम्हीं जानो, मै तो बस इसी तरह हर रोज इसी पीपल के नीचे ठंडी छांव में नदी के तट पर तुम्हारे साथ शाम कर देना चाहती हूं। और सूरज की लालिमा में खुद को सराबोर करके एक नये रंग का अनुभव प्राप्त करना चाहती हूं। क्या तुम मेरे साथ प्रतिदिन यहां आओगे मोहन ? इस एकांत वातावरण में जहां केवल मै और तुम और पक्षियों की मनमुग्ध आवाज और कोई नहीं। राधिका तुम इतने समय एक साथ व्यतीत करके भी ऐसे प्रश्न कर रही हो जबकि मै प्रतिदिन तुमसे पहले यहां आकर तुम्हारे आने की राह देखा करता हूं। मै जानती हूं मोहन तुम मुझसे बहुत प्रेम करते हो किन्तु एक स्त्री को सदैव अपने मन की इच्छा को दूसरे से सुनकर एक सुंदर अहसास मिलता है। राधिका इस संध्या का अवलोकन अंतर्मन से करके देखो जिस लालिमा की बात कर रही थी तुम उससे अधिक मिठास तुम्हें इस झिलमिल नदी में मिलेगा। उस तरफ देखो राधिका बिल्कुल तुम्हारे आंखों के जैसी चमक और अधरों पर बसी लालिमा एक साथ होकर नवीन रंग दर्शाते हुए नजर आ रही हैं। रवि की किरणें एक सिंदूरी रंग से ओत - प्रोत मानो इस नदी में सम्लित होकर खुद को समर्पित कर देना चाहती हों। मोहन इन्हीं किरणों की भांति मेरा मन भी यही कहता है कि मै तन - मन और जीवन को तुम्हे समर्पण कर तुममें है मिल जाऊं। राधिका आज तुम्हें जीवन का एक सुंदर रहस्य बता रहा हूं इसपर विचार करना क्या जीवन इससे अलग और कुछ हो सकता है। जिस तरह सूरज का उदय होता है और वह एक तेज के साथ सारे संसार को दिन भर के लिए प्रकाशित करता है किन्तु जैसे - जैसे उसका तेज कम होता है वह संध्या को अपना पल समर्पित कर देता है और फिर पूरी तरह उसी में विलीन हो जाता है। किन्तु अगले दिन फिर वह एक नई दिशा और नये प्रकाश के साथ उदय होता है, ठीक उसी प्रकार मै तुमसे मिलकर एक नई शुरुआत करूंगा और इसी संध्या के साथ तुम और मै एक दूसरे को समर्पण कर प्रेम में संलग्न हो जाएंगे। किन्तु अभी हमे अपने घरों को लौटना चाहिए वहां सब हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। हां मोहन तुम ठीक कह रहे हो चलो अब घर जाना अतिआवश्यक हो गया है।
राधिका की मां - मिल आई उस मोहन से जिसे घर का एक काम तक नहीं होता वह तुम्हारे लिए क्या करेगा बिटिया तुम जानती हो कि वह जिम्मेदार नहीं है वह तुम्हे कोई सुख नहीं दे सकता।
राधिका - मां मुझे मोहन से कोई अपेक्षा नहीं है मुझे उससे और कुछ नहीं चाहिए शिवाय प्रेम के। और जहां प्रेम - स्नेह मिले वहां किसी और चीज की इच्छा करना मेरी सोच से परे है मां।
मां - ठीक है यदि तुझे और कोई सुख नहीं चाहिए तो मै तेरा विवाह उस मोहन से जरूर करा दूंगी। द्वापर में राधिका मोहन से नहीं मिल पाई थी फिर भी वह प्रेम का प्रतीक बन अमर है। और इस युग में राधिका - मोहन से मिलकर कितना सुखी और संपूर्ण हो पाती है। जीवित रही तो अवश्य देखूंगी।
राधिका - हां मां तुम ही नहीं पूरी दुनिया द्वापर कि राधिका को देवी मानती है क्योंकि वह राधिका भी एक सच्चे प्रेम में खुद का समर्पण कर चुकी थी और आज यह राधिका भी विश्वास दिलाती है कि यह मोहन सिर्फ मेरा है और मेरे प्राण भी उसी दिन निकलेंगे जिस दिन मोहन इस दुनिया से जाने के लिए कह देगा।
मां - हां हां बहुत हो गया तेरा प्रेम प्रसंग अब रात हो रही है खाना बनाना बाकी है। तू खाना बना मै सुबह के लिए चावल निकाल लेती हूं।
राधिका - ठीक है मां जरा रेडियो चालू कर देना आज शनिवार है विविध भारती पर " जयमाला आने वाला है देशभक्ति गीत सुनुंगी।
मां - अरे वाह दिन भर प्रेमभक्ति और अब देशभक्ति पूजा - भक्ति भी किया कर भाग्य उदय होगा तेरा भी और उस मोहन का भी। ( जयमाला कार्यक्रम का पहला गीत बजा - जिंदगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर ले हो... ओ प्यार करले घड़ी दो घड़ी।) राधिका भी साथ में गुनगुनाने लगी।
उधर मोहन घर पहुंचा तो बड़ी भाभी पूछ बैठी - कहां थे अब तक राधिका के मोहन ? मोहन भी इशारों - इशारों में बोल दिया - भाभी राधिका का है मोहन तो राधिका के पास ही रहेगा न और कहां जाएगा। अब ये बताओ पिता जी कहां है ? उन्होंने कुछ पूछा तो नहीं ना मेरे बारे में ?
भाभी - नहीं कुछ पूछे तो नहीं पर उन्हें अब तुम्हारे विवाह की चेष्टा होने लगी है बस इसी विषय पर कल चर्चा होने वाली है। और बहुत ही जल्द वह शुभ घड़ी भी आने वाली है जब तुम्हारे सिर पर भी पगड़ी बंधेगी। और हां मुझे ही नहीं अब तो बाबू जी को भी सबकुछ पता चल गया है, कल राधिका की मां आने वाली हैं विवाह की तिथि तय करने अब तुम्हे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।
अगले दिन सुबह हुई और मोहन सबसे पहले उठकर घर का सारा काम अकेले ही निबटा लिया और नदी में स्नान करने चला गया। मोहन को बड़ी बेसब्री से दोपहर का और राधिका से मिलने का इंतजार था। दोपहर को प्रतिदिन की तरह आज भी मोहन पहले ही पहुंच चुका था। राधिका के आते ही वह एक गीत गुनगुनाने लगा - बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है, मेरा मेहबूब आया है। राधिका हस्ते हुए बोली क्या बात है आज बड़े खुश लग रहे हो कुछ मिल गया है क्या ?
हां राधिका आज मुझे एक ऐसी चीज मिली है, एक ऐसा तोहफा मिला है जिसके लिए मै वर्षों से तड़प रहा था जो मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। ऐसी भी क्या चीज है मोहन जो तुमने मुझे आजतक नहीं बताया। ( राधिका के हंथों को पकड़ते हुए) हां राधिका माइंड तुम्हे आजतक इसलिए नहीं बताया क्योंकि मुझे दर था कि तुम जानोगी तो कहीं तुम्हारा प्यार दो भागों में बट ना जाये। राधिका मै तुम्हे बेहद प्रेम करता हूं और अब हम दोनों बहुत ही जल्द एक पवित्र बंधन में बंधने वाले हैं। हां मोहन आज सुबह मां ने मुझे सबकुछ बताया और मै आज बहुत खुश हूं। बहुत ही भाग्यशाली होते हैं वो लोग जिन्हें अपना प्रेम करने वाला साथी उम्र भर के लिए मिल जाता है। राधिका दो प्रेम करने वाले यदि उम्र भर के लिए मिल जाते हैं तो बहुत ही प्रसन्नता की बात है क्योंकि वह दोनों एक नए परिवार और गृहस्थ का संचार करते हैं और फिर प्रेम संक्षिप्त मात्र भर रह जाता है। किन्तु दो प्रेम करने वाले जब अलग - अलग रहते हैं तो दोनों के मन में एक - दूसरे के प्रति सदैव प्रेम बना रहता है और वह अंततः अमर हो जाता है। हां मोहन! लेकिन हमारा प्रेम एक होकर भी दुनिया के लिए उदाहरण का प्रतीक माना जाएगा। और फिर मै हर जन्म में ईश्वर से प्रार्थना करके तुम्हे ही पाना चाहूंगी। राधिका जिस दिन हमारा विवाह होगा हम संध्या के समय यहां जरूर आएंगे और फिर मै तुमसे एक वचन मांगूंगा। तुम पूरा करोगी न ? मोहन यदि तुम मेरे प्राण भी मांगोगे तो मै तुम्हे मना नहीं करूंगी। राधिका कभी - कभी इंसान को मरने से ज्यादा जीना कठिन हो जाता है और तब मनुष्य हार जाता है और अपने प्राण त्याग देता है जो किसी भी मनुष्य के लिए कायरता सिद्ध कराती है। ठीक है राधिका जिस दिन हम यहां आएंगे उस संध्या को हमारे बीच कुछ बात होगी।
समय और तिथि तय होने के साथ - साथ आखिर वह दिन भी आ गया जब दोनों का विवाह बड़े धूम - धाम से संपन्न हुआ। और फिर दोनों अपने कहनेनुसार संध्या को उसी पीपल के नीचे नदी के तट पर पहुंचते हैं। कुछ बातें हुई ही थी कि एक सर्प मोहन के पैरों में डंस कर चला गया। मोहन जमीन पर गिर पड़ा और राधिका जोर - जोर से चिल्लाने लगती हैं आवाज सुनकर लोग इकट्ठा होते हैं और फिर वैद्य को बुलाते हैं लेकिन मोहन कि हालत गंभीर होती चली जाती है। राधिका रोते हुए कहती है - क्या वचन था तुम्हारा मोहन ? क्या इसीलिए यहां ले आए थे ? आज के दिन ही तुम इस तरह का विश्वासघात मेरे साथ कैसे कर सकते हो मोहन ? बिन तुम्हारे इस दुनिया में राधिका का क्या काम है, मै भी अपने प्राण त्याग इस नदी में डूब जाऊंगी। नहीं राधिका (अपने अंतिम क्षणों में मोहन) तुम ऐसा नहीं कर सकती तुम्हे जीना होगा राधिका अपने लिए ना सही हमारे प्रेम के लिए तुम्हे जीना होगा। मैंने उस दिन एक वचन कि बात कही थी आज मुझे वचन दो की तुम आत्महत्या या फिर जानबूझ कर मरने कि कोशिश नहीं करोगी। वचन दो राधिका मेरे पास वक्त बहुत कम है किन्तु ईश्वर ने चाहा तो मै इस नदी से जीवित होकर लौटूंगा। मोहन मै तुम्हे वचन देती हूं की मैं सदियों तक तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी और सिर्फ तुम्हारी होकर तुम्हारे नाम में अपने आपको समर्पित करती हूं। राधिका किसी के लिए मरना बहुत सरल होता है लेकिन जीवित रहना अत्यंत कठिन हो जाता है। धैर्य मत खोना राधिका अपने मोहन पर विश्वास रखना। इतना कहते ही मोहन की सांसे थम सी गई और धड़कन कि गति भी धीरे - धीरे रुक गई। राधिका की आंखे रो - रो कर पत्थर हो चुकी थी। अब तो बस पीपल की छांव और खामोशी से बहता हुआ पानी मानो राधिका का सुख - चैन ही छीन ले गए हों और वह उनके पास अपने खुशियों को वापस पाने की गुहार लगाती बैठी रहती। ना खाने का समय ना प्यास की चिंता केवल नदी को निहारते ही रहती मानों मोहन इस नदी से अभी तैरता हुआ बाहर आने वाला ही हो।
राधिका की मां और मोहन के पिता ने राधिका को बहुत समझाया कि अब कई वर्ष बीत चुके हैं मोहन अब उसका अतीत है उसे भूल कर एक नई दुनिया में कदम रखे। किन्तु राधिका साफ इंकार कर कहती "राधिका का जीवन मोहन को समर्पण हो चुका है" अब तो वह ही मात्र उसके जीवन का आधार है और उसे अपने प्रेम पर पूरा विश्वास है कि वह जीवित है। क्या हुआ यदि हम एक नहीं हो पाए तो हमारा प्रेम सदियों तक अमर रहेगा। लगभग बीस वर्षों तक राधिका प्रतिदिन सुबह से शाम उसी पीपल की छांव में बैठकर नदी को निहारती रहती और चुपचाप आंखों से एक अश्रु रूपी नदी बहती रहती जिसे देखकर हर व्यक्ति के मन में ईश्वर को कोसने की भावना उत्पन्न हो जाती। एक दिन दोपहर के समय गांव कि और से हलचल भारी आवाज सुनाई देने लगी। गांव के कुछ बच्चे और बड़े लोग एक आदमी के पीछे चले आ रहे थे। वह व्यक्ति बड़ी - बड़ी दाढ़ी और मूंछ के साथ एक फटे- पुराने वस्त्र में चला आ रहा था। राधिका के मन में मानों आज कई वर्षों बाद किसी व्यक्ति को देखने की इच्छा जागृत हुई और वह पीछे मुड़कर देखने लगी। लोग उस व्यक्ति को नदी के तट पर आने से रोकना चाहते थे परन्तु वह दौड़ता हुआ चला आ रहा था। राधिका को देख अचानक वह रुक गया और आंखों से प्रेम की वर्षा होने लगी। किन्तु राधिका अब भी मोहन कि यादों के साथ सिमटी हुई थी।
तब उस व्यक्ति ने आ फिर से वही गीत गाना शुरू किया जो पहले कभी इसी वृक्ष के नीचे गाया था। " बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है, मेरा मेहबूब आया है। " अब राधिका को पूर्ण विश्वास हो गया कि उसका मोहन उसके समक्ष खड़ा है। दोनों एक दूसरे को इस तरह भेंटते हैं जैसे चंदन के पेड़ से लिपटा हुआ सर्प। दोनों का यह मिलन देख गांव के लोगों का भी मन भर आया और सकी आंखें नम हो गई।
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5aa6f66823a84ff383b1662505ec7c902627232e | web | निर्माण सामग्री चुनते समय हम आगे बढ़ते हैंविभिन्न संकेतक, लेकिन मुख्य आवश्यकताओं उच्च गुणवत्ता, स्थायित्व और affordability रहते हैं। इन सभी आवश्यकताओं को आधुनिक इन्सुलेशन और वाटरप्रूफिंग पॉलीयूरेथेन फोम द्वारा पूरा किया जाता है, जिनकी विशेषताएं इसे विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग करने की अनुमति देती हैं। इसके अलावा, पीपीयू किस्मों का व्यापक रूप से गद्दे और फर्नीचर बनाने के लिए उपयोग किया जाता है, जो सामग्री की उच्च गुणवत्ता और सुरक्षा को इंगित करता है।
शुरू करने के लिए, हम ध्यान देते हैं कि यह सामग्रीइस तथ्य के कारण बड़ी मांग में है कि वे किसी भी परिसर की समाप्ति कर सकते हैं, जबकि आप आगे के खर्चों पर महत्वपूर्ण बचत कर पाएंगे। इस इन्सुलेशन की विशिष्ट विशेषताओं में शामिल हैंः
- पर्यावरण सुरक्षा और गैर-विषाक्तताः यह सामग्री के बार-बार परीक्षण द्वारा पुष्टि की जाती है।
- स्प्रेड पॉलीयूरेथेन फोम का उपयोग करना आसान और सस्ता है।
- थर्मल इन्सुलेशन गुणों में वृद्धि हुई, जो अतिरिक्त अंतरिक्ष हीटिंग की लागत को लगभग 40% कम कर देता है।
- ऑपरेशन की स्थायित्वः पीपीयू अपनी संपत्तियों में खोए बिना लगभग 30-40 साल तक रह सकता है।
- ऊर्जा दक्षता, जो जोड़ों, सीमों, थर्मल पुलों की अनुपस्थिति से सुनिश्चित होती है।
- चूंकि हीटर स्प्रेइंग द्वारा लागू किया जाता है, नहींफास्टनरों का उपयोग करने की आवश्यकता है। और इसका मतलब है कि ठंडे पुलों का निर्माण नहीं होगा, और इमारत लंबे समय तक अपनी ईमानदारी बनाए रखेगी।
- पु फोम आग प्रतिरोधी है, जो भी बहुत महत्वपूर्ण है।
- Polyurethane फोम गर्मी और ठंढ प्रतिरोधी है और तापमान सीमा में -70 से +130 डिग्री से संचालित किया जा सकता है।
- सामग्री रासायनिक मीडिया, गैसोलीन, तेल, बिटुमेन, पेंट्स के लिए प्रतिरोधी है।
सामग्री में polyurethane फोम विशेषताओं हैनिम्नलिखित सबसे पहले, polyurethane फोम अच्छी आसंजन द्वारा विशेषता है, यानी, विभिन्न सतहों के लिए चिपकने वाला। दूसरा, पॉलीयूरेथेन फोम का कोटिंग टिकाऊ है - आप सुरक्षित रूप से उस पर चल सकते हैं। तीसरा, कम वजन के कारण, भवन संरचनाओं पर भार में वृद्धि नहीं हुई है। चौथा, पॉलीयूरेथेन फोम सार्वभौमिक है, क्योंकि यह वाष्प बाधा और जलरोधक सामग्री के कार्यों को जोड़ता है। तो, इसका उपयोग करते समय, एक वायुरोधी परत बनती है जो पानी और हवा के प्रभाव से प्रतिरोधी होती है।
सामग्री पॉलीयूरेथेन फोम समय कम करने की अनुमति देता हैवार्मिंग कार्यों को पूरा करने पर, साथ ही कवर परत जोड़ों और अंतराल के बिना पूर्ण हो जाती है। और इसका मतलब है कि बाद में सतह विभिन्न प्रभावों के तहत पतन नहीं होगी।
यह कहां लागू किया जाता है?
पीपीयू व्यापक रूप से थर्मल इन्सुलेशन के लिए उपयोग किया जाता हैजल राफ्टिंग द्वारा आपूर्ति की गई लकड़ी की सुरक्षा और उछाल में सुधार के लिए होल्ड, प्रशीतन इकाइयों के ठंडे इन्सुलेशन के लिए आवास, ध्वनि और औद्योगिक, नागरिक संरचनाओं के थर्मल इन्सुलेशन इस प्रकार, पॉलीयुरेथेन फोम की विशेषताएं बहुत अलग हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में सामग्री का उपयोग करने की अनुमति मिलती है।
यह कहा जाना चाहिए कि सभी छिड़काव सामग्री के कई फायदे हैंः
- जंग के खिलाफ धातु संरक्षण के रूप में सेवा;
- एक अच्छा वॉटरप्रूफिंग एजेंट, इन्सुलेशन हैं;
- किसी भी सतह के साथ अच्छे युग्मन में अंतर;
- जल्दी से लागू।
पॉलीयुरेथेन, तकनीकी विशेषताओंजिसका इतना विविध, प्रशीतन के लिए लागू किया जाता है। इसका उद्देश्य संलग्न संरचनाओं, पाइपों को अलग करना है जो तरलीकृत नाइट्रोजन और अमोनिया की आपूर्ति करते हैं। कारों के लिए ढाला भागों का निर्माण करते समय, लोचदार, थर्मोफॉर्म, अर्ध-कठोर का उपयोग किया जाता है, और इसे ढाला भागों को बनाने की आवश्यकता होती है। फर्नीचर के लिए विभिन्न सजावटी तत्वों को बनाने के लिए सामग्री का उपयोग किया जाता है।
इस मामले में, गद्दे के लिए पॉलीयुरेथेन फोम बहुत लोकप्रिय है। इस मामले में सामग्री की विशेषताएं इस प्रकार हैंः
- व्यावहारिकता;
- कार्यक्षमता;
- स्थायित्व;
- आर्थोपेडिक गुण प्रदान करना;
- कई प्रकार के गद्दे के साथ - कई परतों में या संशोधित उत्पाद ज्यामिति के साथ।
पीपीयू पर आधारित प्रकाश उद्योग में लागू किया जाता हैकृत्रिम चमड़े के उत्पादन के लिए, नकली कपड़े। कार बिल्डिंग और एयरक्राफ्ट कंस्ट्रक्शन में मैटेरियल की जरूरत होती है, जब आग के प्रतिरोधी उच्च गुणवत्ता वाले ढाले हिस्से बनाते हैं।
सबसे व्यापक रूप से प्राप्त कियागद्दे के लिए पॉलीयुरेथेन फोम। इस सामग्री की विशेषताओं के साथ-साथ संभव है कि इन बेड के निर्माताओं की आवश्यकताओं को पूरा करें, क्योंकि, वे गुणवत्ता में प्राकृतिक सामग्री से किसी भी तरह से कम नहीं हैं, और कीमत के लिए यह चुनना अधिक लाभदायक है। गद्दे के निर्माण में पॉलीयूरेथेन फोम का उपयोग उचित है, क्योंकि यह अलग हैः
- शक्ति;
- स्थायित्व;
- लचीलापन;
- सुरक्षा;
- hypoallergenic।
सामग्री की ख़ासियत इसकी कोमलता में है, इसलिएगद्दे आरामदायक हैं और आरामदायक आराम प्रदान करते हैं। इसके अलावा, यह एलर्जी प्रतिक्रियाओं का कारण नहीं बनता है, क्रमशः, आप इस तरह के गद्दे को नर्सरी में, और एक बुजुर्ग व्यक्ति को कमरे में रख सकते हैं।
फर्नीचर के लिए पी.यू.एफ.
फर्नीचर निर्माण एक और क्षेत्र है जिसमेंइस सामग्री का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, और यहां लोचदार पॉलीयूरेथेन फोम मांग में है। पहली बार यह सामग्री जर्मनी में 30 के दशक में वापस बनाई गई थी, और आज यह इस सामग्री की किस्मों का उत्पादन करती है जो कि गद्दे और फर्नीचर के निर्माण में उपयोग की जाती हैं। पीपीयू की उच्च गुणवत्ता के कारण, इसका उपयोग असबाबवाला फर्नीचर के विभिन्न क्षेत्रों को सजाने के लिए किया जा सकता है जहां घनत्व और कठोरता की आवश्यकता होती है, जो उत्पाद को विरूपण से बचाता है। PPU व्यापक रूप से आर्मरेस्ट और हेड रिस्ट्रेन्ट, साथ ही सीटों को बनाने के लिए उपयोग किया जाता है, और कच्चे माल की गुणवत्ता जितनी अधिक होगी, सामग्री उतनी ही अधिक समय तक चलेगी।
इलास्टिक पॉलीयूरेथेन फोम की एक अलग डिग्री हैकठोरता, इसलिए इसे गंतव्य के आधार पर चुना जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, फर्नीचर में उच्च नरमता वाले फोम फोम की मांग है जहां कोई स्प्रिंग्स नहीं हैं। लोच भी एक बड़ी भूमिका निभाता है, क्योंकि फर्श का एक संयोजन, जैसे कि एक सीट, इस कारक पर निर्भर करता है। यह महत्वपूर्ण है कि पॉलीयुरेथेन फोम सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करता है, क्योंकि फर्नीचर का हर टुकड़ा सैनिटरी और हाइजेनिक अध्ययन के अधीन है। यदि जटिल आकार के नरम तत्वों के निर्माण की आवश्यकता होती है, तो एक विशेष ढाला पॉलीयूरेथेन फोम का उपयोग किया जाता है, जो उच्च परिशुद्धता रूपों में बनाया जाता है।
फर्नीचर के लिए, पॉलीयुरेथेन फोम, जिनकी विशेषताएं इतनी विविध हैं, एक सिंथेटिक आधार के साथ विभिन्न पॉलिमर को मिलाकर प्राप्त की जाती हैं। फर्नीचर के लिए इस भराव की ख़ासियतः
- परिवर्तन क्षमता;
- कठोरता की डिग्री बदलती;
- विश्वसनीयता;
- स्थायित्व।
पॉलीयुरेथेन, तकनीकी विशेषताओंजो विभिन्न क्षेत्रों में अपने आवेदन के लिए व्यापक संभावनाएं खोलता है, दो तरल घटकों - पॉलीओल और आइसोसाइनेट को मिलाकर बनता है। जब दीवार इन्सुलेशन सामग्री की स्थापना दो तरीकों से की जाती है - छिड़काव या डालना द्वारा। PPU के ताप-इन्सुलेट सामग्री के रूप में उपयोग के सकारात्मक पहलुओं में निम्नलिखित शामिल हैंः
- सामग्री पॉलीयूरेथेन फोम दीवारों, छतों, फर्श के लिए आदर्श है, और इसके साथ काम अंदर और बाहर दोनों किया जा सकता है।
- पीपीयू का उपयोग किसी भी सतह को खत्म करने के लिए किया जाता है।
- उत्कृष्ट ध्वनि इन्सुलेशन प्रदर्शन।
- विभिन्न रासायनिक यौगिकों के लिए उच्च प्रतिरोध - एसिड और क्षार।
- किसी भी तापमान की स्थिति में ऑपरेशन की संभावना।
- उच्च यांत्रिक शक्ति।
छिड़काव किया गया पॉलीयुरेथेन फोम अच्छी तरह से पालन करता हैकिसी भी सतह, चाहे वह कंक्रीट, ईंट या लकड़ी हो। सभी दरारें और दरारें भरना, सामग्री एक विश्वसनीय और अखंड कोटिंग बनाती है। फ़्रेम हाउस को खत्म करते समय छिड़काव का उपयोग करते समय, जंग के खिलाफ इसकी विश्वसनीय सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है, इसके अलावा, फोम को सड़ने, मोल्ड और सूक्ष्मजीवों के प्रतिरोध द्वारा प्रतिष्ठित किया जाता है।
व्यापक रूप से घरों के इन्सुलेशन में उपयोग किया जाता हैपॉलीयूरेथेन फोम। इसकी तकनीकी विशेषताएं अच्छी हैं, लेकिन कई बारीकियां भी हैं जिनका उपयोग करते समय विचार किया जाना चाहिए। मुख्य दोष काम की उच्च लागत है, खासकर यदि आप विशेषज्ञों को उपकरण के साथ आमंत्रित करते हैं। दूसरा बिंदु यह है कि यदि फोम जलाया जाता है, तो आग को बुझाया जा सकता है, लेकिन सामग्री खुद ही लंबे समय तक खराब हो जाएगी और हानिकारक पदार्थों का उत्सर्जन करेगी। तीसरा - बाहरी खत्म की सीमाएं, यदि पॉलीयुरेथेन फोम इन्सुलेशन का उपयोग किया जाता है। अभिलक्षण इसे किसी भी सतह पर उपयोग करने की अनुमति देते हैं, लेकिन आपको यह विचार करने की आवश्यकता है कि आगे परिष्करण के लिए किस सामग्री का उपयोग किया जाएगा।
पेशेवर क्या सलाह देते हैं?
- पॉलीयुरेथेन फोम का उपयोग करके दीवारों का वार्मिंग केवल बाहर ही किया जा सकता है।
- यदि फ्रेम की दीवारों का वार्मिंग बाहर किया जाता है, तो इंटीरियर को पूरी तरह से सील करना चाहिए ताकि परिष्करण सामग्री कमरे में हवा की अनुमति न दे।
यह सामग्री परिष्करण के लिए भी व्यापक रूप से उपयोग की जाती है।छत, और यहाँ इसके दो लोकप्रिय प्रकार हैं - लोचदार और कठोर। पहले में एक खुली झरझरा संरचना होती है जो अंदर से हवा या कार्बन डाइऑक्साइड से भरी होती है। यह सामग्री अच्छी है क्योंकि यह तापीय चालकता के कम गुणांक के साथ परिसर के उच्च ध्वनि इन्सुलेशन को प्राप्त करने की अनुमति देता है। कठोर पॉलीयूरेथेन फोम को एक बंद सेल संरचना की विशेषता है, जिसमें लगभग 3% ठोस पदार्थ होते हैं, जबकि शेष मात्रा एक सेल है। इसके उच्च घनत्व के कारण, इस सामग्री को व्यापक रूप से निर्माण में मांग की जाती है।
PPU क्यों ठीक है?
छत प्रणाली के इन्सुलेशन के लिए सामग्रीकई हैं, लेकिन तेजी से लोकप्रिय पॉलीयूरेथेन फोम। सामान्य खनिज ऊन के साथ तुलनात्मक विशेषताएं पहले सामग्री को चुनने के पक्ष में हैं, और निम्नलिखित पॉलीयुरेथेन फोम की छत के इन्सुलेशन की विशिष्ट विशेषताएं हैंः
- सामग्री हल्की है और लंबे समय तक उपयोग के दौरान ख़राब नहीं होती है।
- इसकी झरझरा संरचना के लिए धन्यवाद, यह नमी के खिलाफ एक उत्कृष्ट सुरक्षा है।
- पॉलीयूरेथेन फोम के साथ इन्सुलेट करते समय, आप गर्मी के नुकसान को काफी कम कर सकते हैं।
- ऑपरेशन के दौरान, सामग्री हानिकारक पदार्थों का उत्सर्जन नहीं करती है।
यह महत्वपूर्ण है कि पॉलीयुरेथेन फोम इन्सुलेशन के लिएसंरचना को पूरी तरह से अलग करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह आसानी से और बस किसी भी सतह पर लागू होता है। काम के लिए सतह को पूर्व-तैयार करने की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पीयूएफ स्वयं अपनी किसी भी अनियमितता का सफलतापूर्वक सामना करता है। आवेदन विशेष उपकरण के साथ किया जाता है, इसलिए खनिज ऊन के स्लैब को काटने के लिए आवश्यक नहीं है, और फिर उन्हें एक-दूसरे के साथ समायोजित करें।
इन्सुलेशन स्वयं दो तरीकों से किया जा सकता है।- डालने या छिड़कने से। पहला तरीका अच्छा है क्योंकि यह आपको किसी भी इलाके में और उसकी किसी भी स्थिति में काम करने की अनुमति देता है। तदनुसार, कोई भी सुरक्षित रूप से विभिन्न मेहराबों, पट्टियों, स्तंभों की योजना बना सकता है। बहाली के दौरान कठिन स्थानों पर काम करते समय यह विधि भी अच्छी है। इस मामले में थर्मल इन्सुलेशन उच्च गुणवत्ता, वायुरोधी होगा, क्योंकि सभी जोड़ों और सीमों को संसाधित किया जाएगा। पॉलीयुरेथेन फोम का छिड़काव विशेष उपकरण के साथ किया जाता है, और लागू परत का घनत्व भिन्न होता है।
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7d82176f9262eaeae2a7919a93be6b770faf41d7ffa4267b1a2a470a0e66ac4a | pdf | भी स्वीकार करना है। ब्रह्म के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए वे उनके देहादि का, उनके वैकुण्ठधाम, वस्त्राभूषण, पत्नियों, सेवकों आदि का पौराणिक पद्धति से चित्रण करते हैं। यह ब्रह्म पर मानवीय रूपों और सम्बन्धों का आरोपण है जो उनके दर्शन में पौराणिक विश्वासों का प्रवेश है। एक विशुद्ध दर्शन में धार्मिक भावना की आड़ में पौराणिक गाथाओं एवं मान्यताओं का यह मिश्रण है।
रामानुज के ग्रन्थों में हमें ब्रह्म के देह का दो प्रकार का वर्णन मिलता है। प्रथम तो वे पुराणों तथा टंक, द्रमिड़ आदि पूर्वाचार्यों के कथन को तार्किक समीक्षा के बगैर स्वीकार कर ब्रह्म के देह का और उनके आंगिक सौन्दर्य, सुकुमारत्व एवं लावण्य का मानवीय आधारों पर बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करते हैं जो कि उनके निम्नस्तरीय मानवीकरण का ही परिचायक है। परन्तु इसके अलावा हम ब्रह्म के देह के दूसरे प्रकार का भी वर्णन पाते हैं जो उनकी दार्शनिक भव्यता के अनुरूप है। इसके अनुसार समस्त चराचर जगत् ब्रह्म का देह है। आत्मभूत ब्रह्म के चिदचिद् शरीर हैं। शरीर वही है जिसे आत्मा धारण करता है, नियमन करता है और अपने प्रयोजन हेतु कार्य में प्रवृत्त करता है। ठीक इसी प्रकार ईश्वर चिदचिद् का धारण एवं नियमन करता है और उन्हें कार्य में प्रवृत्त करता है। जगत् ब्रह्म का शरीर है यह सिद्धान्त रामानुज ने बृहदारण्यक उपनिषद् के अन्तर्यामी ब्राह्मण अधिकरण से प्राप्त किया है जिसमें ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि जो पृथिवी में निवास करता है, जो पृथिवी का अन्तर्यामी है पर जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसकी पृथिवी शरीर है, जो पृथिवी का अन्दर से नियमन करता है, वही तुम्हारी भी आत्मा है, नियन्ता है, अमृत तत्त्व है, वही ब्रह्म है।
ब्रह्म और चिदचिद् विश्व के इस शरीर-शरीरी भाव को रामानुज काफी विस्तार से समझाते हैं। जीव और जगत् वस्तुतः नित्य तथा पृथक् पदार्थ हैं तथापि वे ब्रह्म के अधीन होकर रहते हैं। क्योंकि ब्रह्म भोक्ता (जीव) तथा भोग्य ( जड़ ) इन दोनों के भीतर अन्तर्यामी रूप से विद्यमान रहते हैं। श्वेताश्वतर का भोक्ता, भोग्य तथा प्रेरित यह त्रिविध ब्रह्म यहाँ क्रमशः चित्, अचित् तथा ब्रह्म के रूप में गृहीत किया गया है। रामानुज ब्रह्म में सजातीय और विजातीय भेद का निषेध करते हैं, परन्तु स्वगत भेद को स्वीकार करते हैं। ब्रह्म चित् और अचित् तत्त्वों का एक विशिष्ट है। उसको विशिष्ट करने वाले गुण नितान्त भिन्न हैं, यद्यपि उनका अस्तित्त्व अविभाज्य है। ऐसी दशा में ब्रह्म में स्वगतभेद विद्यमान रहता है। वे उस विराट् वृक्ष के सदृश हैं जिसकी असंख्य शाखायें और प्रशाखायें हैं। ब्रह्म ही जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कर्ता हैं। किन्तु इस प्रक्रिया में ब्रह्म निर्विकार ही रहते हैं। क्रियाशक्ति उनकी सत्ता या स्वरूप को बाधा नहीं पहुंचाती। प्रलय की अवस्था में चित् और अचित् अव्यक्त या बीजावस्था में ब्रह्म में रहते हैं। ब्रह्म को इस अवस्था में "कारणब्रह्म" कहते हैं। जब सृष्टि होती है तब ब्रह्म शरीरधारी जीवों तथा भौतिक पदार्थों में व्यक्त होते हैं। इस अवस्था में ब्रह्म को "कार्यब्रह्म" कहते हैं। ब्रह्म अपनी इन दोनों विशिष्ट अवस्थाओं
में अद्वैत रूप है। यही विशिष्टाद्वैत का तात्पर्य है। अभेद श्रुतियां कारणब्रह्म का सम्बोधन करती हैं और भेद श्रुतियां कार्यब्रह्म का ।
यदि चित् और अचित् को ब्रह्म का देह या अंश माना जाये तो एक आपत्ति उत्पन्न होती है। सृष्टि की अवस्था में चित् के दोषों और अचित् के विकारों से क्या ब्रह्म में भी दोष एवम् विकार उत्पन्न नहीं होते? यदि चिदचिद् ब्रह्म के वास्तविक अंश हैं तो अंशी ब्रह्म में भी ये दोष अवश्य ही आरोपित किये जा सकते हैं। इस विषम स्थिति से बचने के लिये रामानुज शरीर-शरीरी सम्बन्ध को अधिक स्पष्ट करते हैं। जिस तरह शारीरिक विकारों या त्रुटियों से आत्मा प्रभावित नहीं होता उसी तरह जगत् के विकारों या त्रुटियों से ब्रह्म प्रभावित नहीं होते हैं। कभी-कभी रामानुज इस विषय को समझाने के लिये राजा-प्रजा के संबंधों की भी सहायता लेते हैं। प्रजा के सुख-दुःखों से जिस तरह राजा प्रभावित नहीं होता उसी तरह जीवों के दुःखों से ब्रह्म प्रभावित नहीं होते। परन्तु यह विचारणीय है कि क्या इन व्याख्याओं से रामानुज मूल आपत्ति का निराकरण करने में समर्थ हो सके हैं? यदि जगत् को ब्रह्म का विशेषण, अंश या देह भी माना जाये तो जगत् के दोषों के आरोपण से ब्रह्म अछूते नहीं रह सकते। रामानुज स्वयं इस कठिनाई और विरोधाभास से अवगत थे। इस आपत्ति से बचने के लिये यदि यह मान लिया जाये कि ब्रह्म का चराचर जगत् से बाह्य सम्बन्ध ही है तो इससे उनके अपृथक्सिद्धि सम्बन्ध पर प्रभाव पड़ता है। रामानुज के सामने इस विरोधाभास से बचने का कोई मार्ग नहीं है और इसी से उनके मूल सिद्धान्त कुछ दुविधा आ जाती है।
रामानुज के ब्रह्म का निरूपण करते समय इस भ्रामक मान्यता का निरास आवश्यक है कि उन्होंने पाञ्चरात्र सम्प्रदाय से ब्रह्म के पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी तथा अर्चावतार इन पञ्चविध रूपों के सिद्धान्त को स्वीकार किया है और अपने दर्शन में उनका समावेश किया है। यथार्थ में इस सिद्धान्त का इसके पाञ्चरात्रीय रूप में रामानुज के ग्रन्थों में उल्लेख ही नहीं है और न उन्होंने इस सिद्धान्त का कहीं उपयोग ही किया है। वे केवल ब्रह्म के अवतारों का उल्लेख करते हैं जो भक्तों के ऊपर अनुग्रह किया करते हैं। अवतारवाद का यह सिद्धान्त यजुर्वेद की "अजायमानो बहुधा विजायते" नामक श्रुति से स्पष्ट प्रतिपादित है और गीता तथा विष्णुपुराण में हमें इसका व्यवस्थित रूप मिलता है। रामानुज की अवतारवाद की व्याख्या भी इन्हीं दो ग्रन्थों पर आधारित है।
संक्षेप में, रामानुज के अनुसार ब्रह्म पूर्ण एवम् परम पुरुष हैं जो समस्त शुभ गुणों के आकर हैं। वे जगत् के चरम लक्ष्य, आधार, नियन्ता, साक्षी, आवास, शरण्य, सखा आदि हैं। वे सर्वत्र विद्यमान समस्त पदार्थों के आदि एवं अंत हैं। जो सब निर्मित एवं विनष्ट किये जा सकते हैं, उन्हीं के स्वरूप हैं। वही सबके अक्षर कारण और सर्वस्व हैं।
रामानुज का विशिष्टाद्वैत वेदान्त ७. सृष्टि-निरूपण
सृष्टि के विषय में रामानुज उपनिषदों एवं गीता के सिद्धान्तों को ही यथावत् स्वीकार करते हैं। उनका मत है कि सर्वव्यापी ब्रह्म स्वेच्छा से ही अपने से मकड़ी के जाले की तरह इस नानात्मक विश्व का सृजन करते हैं। ब्रह्म में चित् और अचित् दो तत्त्व विद्यमान रहते हैं। इनमें चित् जीव का द्योतक है और अचित् जड़ प्रकृति का प्रकृति से ही समस्त भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति होती है। श्वेताश्वतर-उपनिषद् में इसी प्रकृति को अनादि, एक, तथा अपने समान ही बहुत सी प्रजाओं की सृष्टि करने वाली माना गया है। रामानुज इसे स्वीकार करते हैं। इतना तो सांख्यदर्शन में भी माना गया है, परन्तु सांख्यमत से रामानुज का यह भेद है कि रामानुज प्रकृति को ब्रह्म का अंश और ब्रह्म द्वारा परिचालित मानते हैं। प्रकृति स्वयं सृष्टि नहीं करती, प्रत्युत ब्रह्म की अध्यक्षता में ही वह सृष्टि का कार्य करती है। सर्वशक्तिमान् ब्रह्म की इच्छा से सूक्ष्म प्रकृति तीन प्रकार के तत्त्वों में तेज, जल तथा पृथिवी में विभाजित हो जाती है जिनमें क्रमशः सत्त्व, रज तथा तमोगुण पाये जाते हैं। इन्हीं तीनों तत्त्वों के नाना प्रकार के संयोग तथा मिश्रण के फल से जगत् के स्थूल पदार्थ उत्पन्न होते हैं और इसीलिये ये तीनों तत्त्व संसार के प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान रहते हैं। यह सम्मिश्रणक्रिया त्रिवृतकरण कहलाती है। इसका मूलतः संकेत छान्दोग्य उपनिषद् में पाया जाता है।
रामानुज जगत् के प्रति वास्तवलक्षी दृष्टिकोण अपनाते हैं। उनके मत में जगत् उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म स्वयम् जगत् मिथ्या है, इस अद्वैत के निष्कर्ष का वे प्रबलरूप से विरोध करते हैं। यथार्थ में उनकी सृष्टिमीमांसा शंकर के मायावाद के प्रत्यक्ष खण्डन के रूप में स्थापित हुई है। यद्यपि दोनों आचार्यों के आधारग्रन्थ एक ही हैं, दोनों की शास्त्र को अध्ययन करने की पद्धति भी एक-सी है फिर भी दोनों के निष्कर्ष भित्र ही नहीं, विरोधी भी हैं। दोनों ने अपने सृष्टिमीमांसा सम्बन्धी विचार अपनी ज्ञानमीमांसा और तत्त्व-मीमांसा से प्राप्त किये हैं। दोनों में मौलिक भेद सत्ता के प्रति दृष्टिकोण में है। दोनों यह मानते हैं कि सृष्टिप्रक्रिया का मूल कोई सृजन की चाह है और उस चाह को चरम सत्ता में स्थान मिलना चाहिए। परन्तु शंकर उस चाह को माया द्वारा ब्रह्म में आरोपित या मिथ्या मानते हैं। दोनों के अनुसार जगत् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, परन्तु शंकर के लिये यह अभिव्यक्ति आभास मात्र है, जबकि रामानुज इसे पूर्ण सत्य मानते हैं। शंकर के लिये यह विवर्त है जबकि रामानुज के लिये यह विकार है। विवर्त और विकार के बीच यह भेद सदानन्द ने वेदान्तसार में इस प्रकार समझाया हैसतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विकार इत्युदीरितः । अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदीरितः ।।
अर्थात् यदि कोई वस्तु यथार्थ में किसी अन्य वस्तु के रूप में अभिव्यक्त होती है तो उसे विकार कहते हैं और यदि वह अयथार्थतः किसी अन्य वस्तु के रूप में अभिव्यक्त होती है तो उसे विवर्त कहते हैं।
अद्वैत-दर्शन में सत्ता के प्रति जो दृष्टिकोण अपनाया गया है उससे एक प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि ब्रह्म एकमेव सत्ता है तो वैविध्यमय जगत् जिसका हम अनुभव करते हैं उसकी व्याख्या कैसे की जाये। इसका उत्तर माया के सिद्धान्त की सहायता से दिया अवश्य गया है, परन्तु माया स्वयं अपने आप में अनिर्वचनीय है, एक पहेली है, जो वास्तविक समाधान की अपेक्षा वैचारिक रहस्य है। यह एकत्व और नानात्व के विरोध को दूर करने के लिये प्रस्तुत की गई है, परन्तु इसमें स्वयं में सत् और असत् दोनों के निषेध का आत्मविरोध है। रामानुज सत्ता के प्रति सजीव दृष्टिकोण रखते हैं, अतः उनके लिये एकत्व और नानात्व के समाधान का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। वे इन दोनों को दो पृथक् तत्त्व न मानकर एक ही तत्त्व के दो पक्ष मान लेते हैं। इसमें एक चरम सत्ता अपने सविशेष स्वरूप में जगत् के नाना चराचर तत्त्वों का अंग के रूप में समावेश कर लेती है। तार्किक दृष्टि से यह आवश्यक भी है कि यदि ब्रह्म में अभिव्यक्ति को स्वीकार कर लिया जाये तो उन नाना रूपों को भी ब्रह्म में स्वीकार करना पड़ेगा जिनमें ब्रह्म की अभिव्यक्ति हुई है। अद्वैतवादी इस अभिव्यक्त नानात्व को माया के आधार पर मिथ्या घोषित करते हैं। रामानुज सात तर्कों के बल पर मायावाद का खण्डन करते हैं।
(१) आश्रयानुपपत्ति- जिस अविद्या या माया से संसार की उत्पत्ति होती है उसका आधार क्या है? यदि यह कहा जाये कि वह जीवाश्रित है (वाचस्पति का मत) तो यह शंका उत्पन्न होती है कि जीवत्व तो स्वयं अविद्या का कार्य है, फिर जो कारण है वह कार्य पर कैसे निर्भर रह सकता है? यदि यह कहा जाये कि अविद्या ब्रह्माश्रित है ( सर्वज्ञात्ममुनि का मत ) तो फिर ब्रह्म को शुद्ध ज्ञानस्वरूप कैसे कह सकते हैं? और न अविद्या को एक पृथक् स्वाश्रयी तत्त्व ही माना जा सकता है, क्योंकि इसमें अद्वैत के सिद्धान्त का खण्डन होता है।
(२) तिरोधानुपपत्ति-अद्वैतवाद के अनुसार अविद्या ब्रह्म को आच्छादित कर अध्यारोप द्वारा जगत् को व्यक्त करती है। परन्तु ब्रह्म जो स्वप्रकाश है अध्यारोप का विषय नहीं हो सकता, अन्यथा उसका तात्पर्य ब्रह्म के स्वरूप का विनाश या लोप होगा।
(३) स्वरूपानुपपत्ति- यदि हम अविद्या की सत्ता को स्वीकार करें तो प्रश्न उपस्थित होता है कि उसका स्वरूप क्या है? क्या वह सत् है या असत् है? अद्वैतवादी उसे सत् मानते ही नहीं। पर उसे असतू भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे अद्वैतवाद की हानि होगी। कारण कि चित् में स्थित अविद्या यदि स्वयं ही चिद्रूप है और असत् भी है तो दो प्रकार के चित् की कल्पना करनी होगीएक तो सत् चित् (ब्रह्म) और दूसरा असत् चित् (अविद्या )। इसके अलावा इस प्रस्थापना में अनवस्था दोष भी होगा, क्योंकि यदि असत् जगत् के कारण के रूप में अविद्या को माना जाये और यह अविद्या स्वयं भी असत् हो |
94fb6fd7c3942adeee53918f66a2d903c459c4a9e05f8bcf57214f9b77a641c7 | pdf | ११७. भाषण : बंगलोर खादी प्रदर्शनी के समापनके अवसरपर
पुरस्कार वितरणकी समाप्तिपर प्रभावोत्पादक मौनके बीच महात्माजीने निम्नलिखित भाषण दियाः
आपको इस सभाकी कार्रवाईमें दिलचस्पी है, इसे प्रदर्शित करनेका आपके लिए शायद सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि समारोहके समाप्त होते ही आप प्रदर्शनीके पण्डालमें जायें और सारी खादी खरीद डालें । राजगोपालाचारीने आपको पिछले छः दिनकी बिक्रीके आँकड़े पढ़कर सुनाये; उन्हे पढ़ते समय उनके मुखपर किसी हदतक सन्तोष और गर्वका भाव था । लेकिन में आपके सामने यह स्वीकार करूंगा कि जब मैं खुद आपकी क्षमताकी बात सोचता हूँ तब ८,००० रुपयोकी बिक्रीकी बात मुझे कोई सन्तोष नही देती। जब मै अपनी कल्पनाकी आँखोसे इतनी सारी दुकानो, बंगलोरमें कपड़ेकी दुकानोंको देखता हूँ और जब मै उन पोशाकोंको देखता हूँ जो बंगलोरकी अधिकांश स्त्रियाँ और पुरुष पहनते है तब मुझे यह आठ हजार रुपयेकी रकम बहुत थोड़ी जान पड़ती है। लेकिन खादी कार्यकर्ता अपनी कठिनाइयोंको जानते है । इस आन्दोलनकी प्रगतिके दौरान हर क्षण उन्हें इस बातका अनुभव होता रहता है कि यह कार्य कितना दुष्कर है और इसीलिए अन्य खादी प्रदर्शनियोकी तुलनामें जब वे यहाँ की विक्रीमें किंचित् वृद्धि पाते है तो उन्हें सन्तोष की अनुभूति होती है। राजगोपालाचारीको भी वास्तवमें इसी तरहके सन्तोषकी अनुभूति हुई है। लेकिन मैंने सोचा कि यदि मै इस सुन्दर प्रदेशमें रहनेवाले आप लोगोका ध्यान, बशर्तें आप करना चाहें तो जो कार्य आपके सम्मुख पड़ा हुआ है, उसकी ओर आकर्षित न करूं तो यह मेरी भूल होगी ।
हमारी सभ्यता शहरी सभ्यता नही है और यदि कल्पना- लोकमें विचरण करनेवाले कुछ लोग यह सोचते हों कि किसी-न-किसी दिन हम अपनी धरतीपर पश्चिमकी शहरी सभ्यताकी स्थापना कर सकेंगे तो मै, जो खुद भी एक तरहसे कल्पना- लोकमें ही विचरण करनेवाला आदमी हूँ, उन्हें आगाह करता हूँ कि वे कमसे कम वर्तमान पीढ़ीमें और आगे आनेवाली कुछ पीढ़ियों तक भी ऐसी कोई आशा न रखें । एक पलके लिए सोचिए कि हमारा देश कैसा है ? इस विशाल महाद्वीपमें, जो १,९०० मील लम्बा और १,५०० मील चौड़ा है, ७००,००० गाँव है; और ये गांव, पश्चिमके विद्वानोके मतानुसार भी, अत्यन्त प्राचीन कालसे चले आ रहे है । अमेरिका एक नया महाद्वीप है। उसमें लाखों एकड़ जमीन विना जोती-बोयी पड़ी है और आवादी भी कम और दूर-दूर वसी हुई है । जिस समय इंग्लंडसे लोग अमेरिका पहुँचे, जिस समय कोलम्बस अमेरिका पहुँचा, उस समय वहाँ गाँव नही थे । कमसे-कम जैसे गाँव आप यहाँ
देखते है, वैसे तो नही ही थे। इसलिए उन्होंने नई सभ्यताका निर्माण किया । हो सकता है कि यह सभ्यता उस भूमिके लिए सर्वथा उपयुक्त और पूर्ण हो, लेकिन जो चीज अमेरिकाकी गैर-आबाद धरतीके उपयुक्त हो, जरूरी नहीं कि वह चीज इस प्राचीन देशके लिए भी उपयुक्त हो, बल्कि वह उसके लिए उपयुक्त नहीं हो सकती और मेरे विचारसे वास्तवमें उपयुक्त नहीं है। क्योंकि इस देशको परिस्थितियाँ अमेरिकासे सर्वथा भिन्न है । यहाँ बड़ी-बड़ी नदियाँ बहती है, उच्चतम पर्वत शृंखलाएँ इसके प्रहरीका काम करती हैं, यहाँ ऐसे लोग रहते है जिन्हें अपने अतीतकी रक्षाका दुनियाकी सभी जातियों में सबसे अधिक मोह है, जिनकी अपनी परम्पराएं हैं, रीति-रिवाज है और इन सबको क्षण भरमें नष्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए में कहता हूँ कि यदि आप यह समझते है कि आप इस देशमें पश्चिमकी शहरो सभ्यताको ले आयेंगे और अपने गाँवोंको समूल नष्ट कर देंगे तो ऐसा आप केवल एक ही तरीकेसे कर सकते हैं, और वह है इतिहास प्रसिद्ध चंगेजखाँका तरीका में नहीं जानता कि चंगेजखाने क्या किया और क्या नहीं किया। लेकिन इतिहासमें जो वर्णन मिलता है, वह यदि सच है तो मैं इतना जानता हूँ कि इस देशमें अमेरिकी सभ्यताको प्रतिष्ठित करनेके लिए पहले आपको चंगेजखाँ जैसे सैकड़ों नृशंस व्यक्तियोंकी जरूरत पड़ेगी, जो निर्ममताके साथ ग्रामीणोंको मार डालेंगे और उनमें से ऐसे बलिष्ठ पुरुषों और स्त्रियोंको ढूंढ़ निकालेंगे, जिन्हें वे अपनी फौलादी एवं क्रूर इच्छाके आगे झुका सकते हो तथा इन मानव प्राणियोंका उपयोग इस ढंगसे कर सकें, मानो वे मनुष्य नहीं बल्कि पशु हों। इस स्वप्नको तब अवश्य ही साकार किया जा सकता है। लेकिन यदि आप अपने गाँवोंको सुरक्षित रखना चाहते है, यदि आप पश्चिमसे, हम जो सीख सकते है, उसकी अच्छी बातोंको आत्मसात् करना चाहते है तब तो बंगलोर, मैसूर और कर्नाटक तथा दक्षिणी प्रायद्वीपसे आये आप लोगोंके लिए और जो थोड़े-से लोग उत्तरसे आये उनके लिए भी यहाँ करनेको बहुत कुछ पड़ा हुआ है।
मैं नहीं जानता कि इन पुरस्कार पानेवाले लोगोंको देखकर मेरे ही समान आपका हृदय भी अभिभूत हुआ है अथवा नहीं। ये ब्राह्मण-अब्राह्मण, हिन्दू-मुसलमान, अमीर-गरीबका भेद नहीं जानते। इन सबमें एक समानता और भी है; वह यह कि ये इस देशकी गरीबीको अपनी गरीबी मानते हैं, इनमें से जो लोग धनी परिवारोंके है उन्होंने भी अपने भाग्यको हमारे सामने उपस्थित गरीब लोगोंके साथ जोड़ लिया है। आप घुड़दौड़में जितनी रुचि रखते हैं, आपको घुड़दौड़की भाषाका जितना ज्ञान है, उतनी ही रुचि इस काममें है या नहीं, उतना ही ज्ञान आपको इसकी भाषाका है अथवा नहीं, सो मैं नहीं जानता। भारतके दरिद्रतम लोगोंकी इस सभामें जैसे लोग उपस्थित हैं, उनके बदले यदि आपके सामने फुटवाल, घुड़दौड़ या क्रिकेटके मैदान में कमाल दिखाने के लिए पुरस्कार पानेवाले लोग होते तो मैं जानता हूँ कि आपमें से कुछ लोग कैसा महसूस करते, आपको उससे कितनी प्रसन्नता होती । लेकिन मुझे यह मालूम नहीं है कि आप कातनेवालों और चुननेवालोंकी भाषा समझते हैं अथवा नही। में नहीं जानता कि प्रदर्शनी देखनेके बावजूद आप इन प्रक्रियाओं में निहित अर्थको सचमुच
पत्र : मीरावहनको
समझते है अथवा नही। अगर आप समझते है तो मुझे विश्वास है कि इस समय, जब कि दुर्बल शरीरके बावजूद मुझे आपसे अपने मनकी सारी बातें कह डालनेकी एक अदम्य प्रेरणाका अनुभव हो रहा है, मेरे हृदयमें जो भावनाएँ उमड़ रही है, वही भावनाएं आपके हृदय में भी होगी ।
इतना बोलते-बोलते महात्माजी प्रत्यक्षतः विह्वल हो उठे और उनकी आँखों में आँसू भर आये । वे कुछ क्षणतक रुके रहे.
में भगवान्से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपको इस प्रदर्शनीको और उसमें जो कुछ दिखाया गया है, उसको समझनेकी शक्ति और बुद्धि दे ।
मुझे आपसे अब कुछ ज्यादा नहीं कहना है और यदि आपको अपना सन्देश देते हुए आपने मेरा गला अवरुद्ध होते देखा है तो मुझे आशा है उसके लिए आप क्षमा करेंगे। यह चीज मेरे मनपर इतनी छाई हुई है कि अपने आपको रोक पाना मेरे लिए कठिन हो जाता है, हालांकि मुझमें भी अपनी मनोगत भावनाओको छिपाकर बुद्धिकी सामान्य भाषामें आपसे अपनी बात कह सकनेकी सामर्थ्य है । लेकिन कभी-कभी में भावनासे अभिभूत हो उठता हूँ, और यही कामना करता हूँ कि काश ईश्वर मुझे, जिस शक्तिके लिए मै नित्य लालायित रहता हूँ, वह शक्ति दे जिससे मे अपना हृदय आपके सामने खोलकर रख दूं ताकि आप लोग जिह्वाकी भाषाको न समझकर हृदयसे बोली जानेवाली भाषाको पढ़ और समझ सकें। भगवान् आपका, तथा इन पुरस्कृत लोगोंका कल्याण करे और इस समारोहके उद्देश्यको सफल बनाये । में आप सबको सभामें आनेके लिए धन्यवाद देता हूँ ।
[ अंग्रेजीसे ] हिन्दू, ९-७-१९२७
११८. पत्रः मीराबहनको
तारके बाद तुम्हारा पत्र भी मिला । तुम्हारे नाम हर हफ्ते जो पत्र लिखा करता हूँ वह तो तुम्हें मिल ही गया होगा। वघकि पतेपर भी एक पोस्टकार्ड लिखा था, लेकिन वह सिर्फ यह बताने के लिए लिखा था कि मैने असली पत्र सावरमती भेज दिया है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि तुमने अभी कुछ दिन वहाँ रहकर डॉक्टरकी रिपोर्ट ले लेनेका निश्चय किया है। यदि हमें प्रकृतिके सारे नियमोंकी जानकारी होती अथवा यदि उनको जानकर मन, वचन और कर्मसे उनका पालन करनेकी शक्ति हममें होती तो हम खुद भगवान् ही बन जाते और हमें कुछ करनेकी जरूरत ही न रह जाती लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि हम उसके नियमोके वारेमें शायद ही कुछ जानते हों और उनका पालन करनेकी शक्ति हममें नही है। परिणामस्वरूप रोगादि होते है । इसलिए, हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है, हम यह समझ लें कि प्रत्येक बीमारी
प्रकृतिके किसी-न-किसी अज्ञात नियमका उल्लंघन करनेका परिणाम है और हम उसके नियमोंको जाननेका प्रयत्न करें तथा ईश्वरसे उनका पालन करनेकी शक्ति देनेकी प्रार्थना करें । अतएव जब हम बीमार होते है उस समय हृदयसे प्रार्थना करना, कर्म और ओषधि दोनोंका काम करता है ।
कल फिर मुझे बहुत काम करना पड़ा और सारा भार बहुत अच्छी तरह, पिछले रविवारसे भी अच्छी तरह, बर्दाश्त कर गया । मुझे तुमसे हिन्दी पत्र प्राप्त करनेकी कोई जल्दी नहीं है ।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२४७) से । सौजन्य : मीराबहन
१९९. पत्रः एन० आर० मलकानीको
प्रिय मलकानी,
तुम्हारा पत्र मिला । टूटी हुई बोतलको किसी तरह जोड़ा तो जा सकता है, किन्तु उसके मालिकने उसके विषयमें यह जो धारणा रखी थी कि वह अटूट है वह यश तो उसे वापिस नहीं मिल सकता । तुम्हारे पतनसे मुझे जो आघात पहुँचा है, उसे में अभीतक भुला नहीं पाया हूँ। तुम नहीं जानते कि मुझे तुमपर कितना विश्वास था । तुम मेरे उन चन्द सहयोगियों में से एक थे, जिनके बारेमें में सोचता हूँ कि वे कभी टूट नहीं सकते।
लेकिन मुझे बीती बातोंको भूल जाना चाहिए। मैं कोशिश करूंगा । तुम्हें महाविद्यालय में वापस आना चाहिए अथवा नहीं, सो मै नहीं जानता। इसका निर्णय कृपलानीपर ही छोड़ दो। यह आघात इतना तीव्र था कि में स्तम्भित रह गया और मैंने कृपलानी अथवा नानाभाईको कुछ भी लिखना उचित नहीं समझा, न उन्होंने ही मुझसे कुछ कहा ।
लेकिन यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि अब तुम्हें थडानीको काफी पहलेसे ही सूचना दिये बिना सिन्ध नहीं छोड़ना चाहिए । तुम्हारा पश्चात्ताप शुभ और उचित है । तथापि अभी जल्दीमें कुछ करनेकी जरूरत नहीं है। मेरे साथ सम्पर्क बनाये रहना । तुम अपने पश्चात्तापका अपनी पत्नी और साससे जिक्र करना । उन्हें भी महसूस करने दो कि वापसीका क्या मतलब है।
१ देखिए " पत्रः एन० आर० मलकानीको ", २६-६-१९२७ ।
२. नृसिंहप्रसाद ( नानाभाई) कालिदास भट्ट, जो उस समय गुजरात विद्यापीठके 'कुलनाषक' थे।
भाषण : एमेच्योर ड्रमैटिक एसोसिएशन, मैसूरमें
अभी कुछ दिन मै यही हूँ।
अंग्रेजी ( जी० एन० ८७६ ) की फोटो-नकलसे ।
१२०. भाषण : एमेच्योर ड्रमैटिक एसोसिएशन, मैसूरमें
इस सप्ताहका शुभारम्भ गांधीजीकी उपस्थितिमें पंडित तारानाथके एमेच्योर ड्रमँटिक एसोसिएशन द्वारा अभिनीत 'कबीर' नामक नाटकसे हुआ। इसका उद्देश्य हिन्दी और खादीको लोकप्रिय बनाना था। इसलिए गांधीजीने नाटककी अपनी समालोचनाका सार " आधुनिक रूपमें कबीर ", इन दो शब्दोंमें प्रस्तुत करते हुए सभी सम्बन्धित लोगोंकी योग्य प्रशंसा की। उन्होंने सभी लोगोंको इस बातके लिए धन्यवाद दिया कि उन सबने उन्हें तिहरा आनन्द पहुँचाया - एक आनन्द इस बातका कि • उन्होंने " अपने मनसे दरिद्रनारायणके प्रतिनिधि बने इस व्यक्तिको एक थैली भेंट की जिसका मूल्य उसमें रखी हुई राशिके आधारपर नहीं आँका जा सकता, दूसरा आनन्द यह कि गांधीजीको दक्षिण भारतमें "शुद्ध उच्चारण युक्त अच्छी हिन्दी सुननेको मिली और तीसरा यह कि उन्होंने सभी अभिनेताओंको खादीकी पोशाकें पहने देखा। उन्होंने आगे कहा :
१. महादेव देसाईके " साप्ताहिक पत्र" से । २. महादेव देसाईको डापरोके अनुसार ।
मे अब अपने किसी भी देशवासीको- फिर चाहे वह राजा हो अथवा किसान, वकील हो या डॉक्टर अथवा व्यापारी या कि वह स्त्री अथवा पुरुष समाजके उच्चतम अथवा निम्नतम वर्गका हो- खादी न पहने देखता हूँ, तब मुझे दुःख होता है। सब खादी पहन सकते है इसे अभिनेताओने इस नाटकमें मूर्त रूप देकर दिखाया है। मुझे उस दिनकी प्रतीक्षा है जब सब लोग हमारी मातृभूमिके इस सामान्य धर्मका पालन करेंगे और मुझे उम्मीद है कि अभिनेताओंोंने जिसका अभिनय किया है, उसे वे अपने जीवन में उतारेंगे और वह उनके तथा हमारे जीवनका स्थायी अंग बन जायेगा । सच मानिए, में अपने साथ कर्नाटकसे जिन सुखद स्मृतियोंको - अगर ईश्वरकी कृपासे में यहाँसे जीवित जा सका तो ले जाऊँगा उनमें इस शामकी स्मृति कोई कम सुखद न होगी। |
830b0ee5afffb92c9df498100a8e383cea6384c4968beec8eac33dd24d26f5f5 | pdf | ' में आकर लग गया। अस्त्र के तेज से नील के सब अङ्ग जलने लगे। वे ज़मीन पर गिर पड़े; परन्तु पिता अग्नि के माहात्य से और अपने तेजोबल से नील दोनों घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ने पर भी प्राणहीन नहीं हुए।
अब रावण इन कपि को मूर्च्छित देख, युद्ध की इच्छा से, रथ को गड़गड़ाता हुआ लक्ष्मण पर दौड़ा। वहाँ पहुँच कर और वानरों को हटा कर वह अपना धनुष सुधारने लगा। तब लक्ष्मण बोलेहे राक्षसराज, आओ, हम से लड़ो। बानरों से क्या मतलब है ? वगर्जनापूर्वक लक्ष्मण की बातें, तेज़ और प्रत्या की आवाज़, सुन कर क्रोधपूर्वक कहने लगा कि हे राघव ! अच्छा हुआ जो तुम मेरी नज़र पड़ गये। क्योंकि अब तुम्हारान्त पहुँचा । तुम्हारी बुद्धि विपरीत होगई है। अब इसी समय मेरे बायों से तुम यमलोक को जाते हो। इतना सुनकर लक्ष्मण ने कहाहे पापाधम ! अधिक प्रभाव रखनेवाले इस तरह गरजते नहीं, जैसे तू बक रहा है। तेरे वीर्य, बल, प्रताप और पराक्रम को मैं जानता हूँ । धनुष-चाण लिये मैं तेरे पास ही खड़ा हूँ । झूठ मूठ क्यों बक बक कर रहा है।
लक्ष्मण की बात सुनते ही रावण ने सात वाण चलाये पर लक्ष्मण ने उन बाणों को अपने वायों से काट गिराया। अपने बाण कटते देखकर रावण ने क्रोध में भर कर पैने बाण चलाना शुरू किया। उसने लक्ष्मण पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी । परन्तु लक्ष्मण तुर, अर्द्धचन्द्र, कर्णी और भन्न वाणों से उसके वाणों को काटते जाते थे । लक्ष्मण के अद्भुतं कर्म और शीघ्रता को
देख कर वह बड़ा चकित हुआ। वह फिर वाण चलाने लगा। अब लक्ष्मण ने भी धनुष चढ़ाकर पैने पैने वज्र के तुल्य भयङ्कर और के समान जलते हुए बाण, रावण के मारने के लिए, चलाये । किन्तु रावण ने इन सब बागों को काट डाला । फिर रावण ने एक बड़ा कालाग्नि के तुल्य बाय लक्ष्मण के माथे में मारा। यह बाण शिव का दिया हुआ था । उस बाण की चोट से लक्ष्मण कुछ हिल उठे । उनके हाथ का धनुष कुछ कुछ ढीला होगया। पर थोड़ी ही देर में सचेतं होकर उन्होंने रावण का धनुष काट डाला । धनुष काट कर लक्ष्मण ने तीन बाण रावय को ऐसे मारे जिनकी चोट से वह भी थोड़ी देर के लिए अचेत हो गया । फिर थोड़ी देर में वह सचेत तो हुआ पर खून से तर होगया । अब अपना धनुष कटा हुआ देखकर ब्रह्मा की दी हुई शक्ति उसने हाथ में ले ली। वह शक्ति धुएँ सहित आगं के समान थी और वानरों को डरानेवाली थी। उसने वह लक्ष्मण पर चला दी। लक्ष्मण ने चाहा कि उसे अस्त्रों से और अनेक बाणों से काट डालें; पर वह कट न सकी । लक्ष्मण की छाती में घुस ही गई । उसकी चोट से लक्ष्मण विह्वल होगये। उनको विहल और अचेत होते देखकर रावण झपटा । उसने अपनी दोनों भुजाओं से उनको थाम लिया और चाहा किइ नको उठा कर ले जाऊँ ।
सोचना चाहिए कि चाहे हिमवान्, मन्दर, मेरु अथवा देवताओं सहित त्रैलोक्य को कोई उठाले तो उठाले, पर श्रीलक्ष्मण को उठाने की शक्ति किस में है ? फिर ख़ास कर लड़ाई के मैदान में 18 यद्यपि उस समय उनकी छाती में ब्रह्म की दी हुई इस वचन से ऋषि ने लक्ष्मण का शेषावतार जतलाया है।
शक्ति से चोट लगी हुई थी तो भी वे विष्णु के अचिन्त्य भाग में अपने स्वरूप को याद कर, अपने स्वरूप को याद कर, ऐसे भारी होगये । मूर्च्छा आना तो उन्होंने मनुष्य के शरीर का धर्म दिखलाया था। जब रावण ने देखा कि उठाने से ये उठ नहीं सकते तब उसने दोनों हाथों से बल- पूर्वक उनको दवाकर छोड़ दिया । उस समय हनुमान की नज़र उधर जा पड़ी। उन्होंने वह सब हाल देख लिया। फिर तो वे क्रोध में भर कर रावण पर दौड़े और वज्र के तुल्य एक घूँसा उसकी छाती में मारा । उसकी चोट से रावण घुटनों के बल गिर पड़ा और सब रूप से लम्बा चौड़ा होगया । उसके मुँह, आँखों से खून बहने लगा। उसका शरीर घूमने लगा। वह चेष्टारहित होकर अपने रथपर दुलक गया । वह ऐसा मूर्च्छित और अचेत हो गया कि उसे कहीं गति न दिखाई देती थी । रावण को मूर्च्छित देख ऋषि, वानर और इन्द्र-सहित देवता हर्ष- नाद करने लगे । इधर हनुमान लक्ष्मण को दोनों भुजाओं से पकड़ कर रामचन्द्र के पास ले आये ।
यद्यपि लक्ष्मण शत्रु के हिलाये ज़रा भी न हिले थे, पर हनुमान की मैत्री और परम भक्ति के कारण वे हलके हो गये । इसके बाद वह शक्ति लक्ष्मण को छोड़ कर फिर, पहले की नाई, रावण के रथ पर जा बैठी। अव थोड़ी देर में सचेत होकर रावण भी अपना धनुष बाण सुधारने लगा। लक्ष्मण ने भी अपने को विष्णु का भाग समझ कर धीरज धरा । फिर उस घाव का दर्द जाता रहा । जब रामचन्द्र ने देखा कि दुष्ट निशाचर ने बहुत सी • सेना मार गिराई ,; अब इसको शिक्षा देनी ही चाहिए, तब वे सोच विचार कर रावण पर दौड़े।
उस समय रामचन्द्रजी को रावण की ओर जाते देख कर बीच में खड़े हुए हनुमान ने कहामहाराज ! मेरी पीठ पर सवार हो कर युद्ध के लिए चलिए, जिस तरह विष्णु भगवान् गरुड़ पर चढ़कर दैत्य से युद्ध करते हैं। वायुपुत्र की बात मान कर रामचन्द्रजी उनकी पीठ पर चढ़कर चलने लगे । वहाँ पहुँच कर उन्होंने रावा की रघ पर सवार देखा । उसे देखते ही वे उस पर ऐसे झपटे जैसे विष्णु प्रायुध तान कर वलि पर दौड़े थे। वह जाते ही उन्होंने पत्र के समान प्रत्यधा का कठोर शब्द किया। फिर गम्भीर वाणी से रावण से कहाअरे खड़ा रह, खड़ा रह । तू इस तरह मेरा अप्रिय काम करके कहाँ जाकर अपने को बचावेगा ? यदि तू इन्द्र, यम, सूर्य, शिव, अनि और प्रक्षा के भी शरण में जायगा या दशो दिशाओं में भी भागंगा तो भी मुझसे न छूटेगा । जिसको तूने अभी शक्ति द्वारा मारा है उसके दुःख की शान्त करने के लिए मैं तुझे सपुत्र पात्र को मृत्युरूप हूँ। मैंने ही बाणों से तेरें, जनस्थान में रहनेवालं अद्भुत रूपधारी, चौदह हज़ार राक्षसों को मार गिराया। राम की बातें सुनकर रावण बड़ा क्रुद्ध हुआ। उसने पहले वैर को याद करके हनुमान को बढ़ पैने पैने घाणों से मारा । ये रामचन्द्र की पीठ पर चढ़ाये हुए थे । यद्यपि रावण के वाणों को हनुमान को बड़ी चोट लगी तथापि स्वभाव से तेजस्वी होन के कारण उनका तेज और भी बढ़ा। इस
के बाद हनुमान के शरीर के घावों को देख कर रामचन्द्र बड़े क्रुद्ध हुए। उन्होंने मारे घायों के रावण के रथ का चक्र, घोड़ा, ध्वजा, छत्र, पताका, सारधि, वज्र, शूल और तलवार आदि सव सामान चकनालङ्काकाण्ड ।
'चूर कर दिया। फिर वज्र के तुल्य एक बाय उसकी छाती में ऐसा मारा मानों इन्द्र ने मेरु को वज्र भारा हो । जो रावण बड़े बड़े वनों की चोट खाकर कभी क्षुब्ध न होता था वही आज राम के वायों की चोट से बड़ा दुखी हो चेष्टारहित होगया; उसके हाघ से धनुष भी छूट पड़ा। महाराज ने उसे विहल होते देखकर बड़े जलते हुए अर्द्धचन्द्राकार चाय से उसके सिर के मुकुट को काट गिराया । उस समय रावण की ऐसी दशा घी जैसी विपरहित साँप की, ज्यालारहित अग्नि की और प्रकाशरहित सूर्य को होती है। अब श्रीहीन और मुकुट - रहित रावगा से रामचन्द्रजी बोले-देख, तू ने बड़ा भयङ्कर काम किया । तू ने मेरे प्रधान वीरों को मारा । भला जो किया सो किया, अब इस समय मैं तुझे बहुत का हुआ देख कर मारता नहीं । तू चला जा। मैं खूप जानता हूँ कि तू लड़ने के कारण बहुत थका हुआ है। लङ्का में जाकर स्वस्थचित्त से फिर अपने शस्त्र प्रस्न लंकर रथ पर चढ़कर मेरे पास श्राना । उस समय मेरा वल देखना । इस तरह दुतकारा हुआ रावण का में घुस गया। वह घोड़े और सारथि से रहित किया गया था । गर्व और वर्ष उसका छिन गया था। वह धापहीन, बाणों से पीड़ित और बिना मुकूट का था। उसके चले जाने पर राघव ने बानरों के और लक्ष्मण के घावों की पीड़ा दूर क्री ।
देखि हार सुर-शत्रु कर, सकल घराचर वृन्द । देव असुर आदिक भगं, तुष्ट परम आनन्द ।।
६०वाँ सर्ग ।
रावण का पश्चात्ताप करना और कुम्भकर्ण को जगाना ।
रावण लङ्का में चला तो गया पर वहाँ राम केवाणों को याद करके भय से दुखी हुआ । उसका गर्व जाता रहा और इन्द्रियाँ व्याकुल हो गई । जिस तरह सिंह से हाथी और गरुड़ से सौंप हार जाता है इसी तरह रामचन्द्र से रावण हार गया। राम के बाण ब्रह्मदण्ड के समान और बिजली की कड़क के तुल्य थे; उनकी याद करके वह बड़ा दुखी हो रहा था । सोने के बने हुए अपने आसन पर बैठ कर और राक्षसों की ओर देख कर वह कहने लगा कि देखा, जो मैंने तप किया था वह आज सब निष्फल हो गया। क्योंकि इन्द्र के तुल्य होने पर भी मुझे मनुष्य ने जीत लिया। ब्रह्मा की बात ठीक निकली । उन्होंने कहा था कि तुझे मनुष्य के द्वारा भय होगा । उस समय मैंने देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नागों से अभयदान चाहा था। मैंने यही कामना की थी कि इनसे मैं कभी न मारा जाऊँ । मैंने मनुष्यों से अभयदान नहीं चाहा था । इसलिए मैं दशरथ के इस पुत्र को वही मनुष्य समझता हूँ जिसके विषय में इक्ष्वाकु कुल के अनरण्य राजा ने मुझसे कहा था। उसने कहा था- 'हे राक्षसाधम, कुलाधम, हे दुर्बुद्धे ! देख, मेरेही कुल में एक मनुष्य ऐसा जन्म लेगा जो तेरे पुत्रं, मंत्री, सेना, घोड़े और सारथि - सहित तुझे संग्रामभूमि में मारेगा ।" इसके सिवा वेदवती ने भी मुझे शाप दिया था, क्योंकि उसका भी मैंने तिरस्कार किया था। मैं समझता हूँ कि उसी वेदवती ने जनकनन्दिनी
चाल्मीकीय रामायण ।
महाभागा सीता का अवतार लिया है। पार्वती, नन्दी, शिव, रम्भा और वरुण की कन्या - इन्होंने भी जो कुछ कहा था वह मुझे प्रत्यक्ष दिख रहा 'है । क्योंकि ऋषि की वात झूठ नहीं होती ।
अव यही करना चाहिए कि राजमार्गों और नगर के फाटकों पर राक्षस सावधानी से रक्षा करें। कुम्भकर्ण में वड़ी गम्भीरता है । वह देवों और दैत्यों का गर्व-मर्दन करनेवाला है तथा ब्रह्मा के शाप से सो रहा है, उसे जल्दी जगाओ। रावण ने अपनी हार और प्रहस्त का मारा जाना देख कर भयङ्कर राक्षसी सेना को श्राज्ञा दी कि नगर के फाटकों पर होशियार रहो और अारियों पर जा बैठो। कुम्भकर्ण के जगाने का भी उपाय करो। वह निश्चिन्त और निष्काम होकर सो रहा है। वह नौ, सात, दस, और आठ महीने तक भी सोता रहता है। आज नौ दिन हुए, वह हमारे साथ विचार करके सोया है । हे राक्षसो ! कुम्भकर्ण सब राक्षसों से अच्छा है । वह बानरों और राज - पुत्रों को बहुत जल्दी मार गिरावेगा। लड़ाई में वह एक झंडा है और सब राक्षसों का मुकुट है; परन्तु मूर्ख की तरह सदा सोया करता है। वह सोने हो को सुख मानता है जो असल में कुछ भी नहीं है । मैं भयंकर संग्राम में जो हार गया हूँ इसका, उसके जागने पर फिर, मुझे शोक न करना पड़ेगा। यद्यपि वह इन्द्र के समान बली है तथापि यदि वह इस तरह के घोर दुःख में सहायता न करेगा तो मैं उसे लेकर करूँगा ही क्या ?
• अब राक्षसराज की बातें सुन कर सब राक्षस घबराने लगे। वे जल्दी जल्दी कुम्भकर्ण के भवन की ओर चले । गन्ध, माला, और बहुत सी खाने
की चीज़ें उन्होंने साथ ले लीं। वे उसकी गुफा में घुस गये । गुफा का द्वार बड़ा भारी था। गुफा योजन भर लम्बी चौड़ी थो । उसमें से फूलों की सुगन्ध आ रही थी। परन्तु कुम्भकर्ण की साँस ऐसे ज़ोर से चल रही थी कि राक्षसों को भीतर धँसने भी न देती थी । तो भी वे सब बड़े कष्ट से उसमें घुस ही गये । गुफा के भीतर जाकर देखा तो उसका फर्श रत्न और सोने से पुख्ता बना हुआ था। वहीं से पर वह सो रहा था। राक्षसों ने उसे फैले हुए पर्वत की नाईं बुरी तरह सोते देखा। वे सब मिल कर उसे जगाने लगे ।
कुम्भकर्ण के सब रोयै खड़े हुए थे । वह भयंकर सौंप की नाई साँस छोड़ रहा था; वह अपनी साँसों से राक्षसों को घुमा देता था। उसकी नाक के दोनों छेद बड़े भयङ्कर थे । मुँह तो मानां पाताल ही सा दिखाई देता था । वोने पर सब शरीर को फैलाये हुए चर्बी और खून की बदबू छोड़ रहा था । उसकी दोनों भुजाएँ सोनं के विजायठों से भूपित थीं और वह अपने सिर पर बड़ा चमकीला सूर्यकान्तमणि का मुकुट रक्खे हुए था।
इस तरह कुम्भकर्ण की दशा देख कर राक्षसों ने पहले तो मृग, भैंसे, सुअर और अन्न आदि खानं की चीज़ों, का मेरु पर्वत के आकार के समान, ढेर भोजन के लिए उसके पास रख दिया। फिर खून से भरे हुए घड़े और अनेक तरह के मांस कुम्भकर्ण के आगे रक्खे गये 1 उत्तम सुगन्धित चन्दन से. उसका शरीर पोता गया । अच्छी अच्छी मालायें और सुगन्धित चीजें उसको सुँघाई गई। अनेक तरह की धूप जला कर वे सब उसकी स्तुति करने लगे। बादलों के गरजने के समान वड़े ज़ोर से वे सब |
559acd0f58c020e687a180039eebd6810d069a0673110ad94ea13d29d26daa11 | pdf | प्रकार की मूर्तियाँ प्राप्त हुई है जिनके कटि से नीचे का भाग नाग की पूँछ तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य का
। कनिघम२०७ महोदय को भी पश्चिमी पजाब से तीन अत्यन्त प्राचीन मुद्राये जिन पर सर्प टकित मिली थी जिन पर पुरानी ब्राह्मी लिपि मे 'काट्स' अकित है
कल्हण ने किन्नरपुर के समीप के सरोवर मे रहने वाले सुश्रवा नाग का उल्लेख किया है । विशाख नामक ब्राह्मण सुश्रवा नाग की कन्या इरावती च चन्द्रलेखा को तृणधान्य (तिन्नी) खाते देखकर मुग्ध हो गया तथा तक्षक नागोत्सव - जो ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादशी को होता था मे उनके पिता से मिलकर उनकी समस्या निवारण करके चन्द्रलेखा से विवाह कर लिया । उस ब्राह्मणी पर कश्मीर नरेश नर मुग्ध हो गया तथा उसका अपहरण करना चाहा, इस पर ब्राह्मण ने अपने श्वसुर की मदद से नरपुर नगर पर पत्थर बरसाकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। उस सुश्रवा नाग की बहन द्वारा एकत्र किये गये पत्थरो से निर्मित प्रदेश आज भी 'रमण्याटवी' कहलाता है। कहा जाता है कि आज भी अमरनाथ की यात्रा के समय सुश्रवा नाग का नया आवास सरोवर तथा उसके दामाद का जामातृ सरोवर दिखाई पडता
। इस प्रकार वह ब्राह्मण भी नागत्व को प्राप्त हुआ । "इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि नाग अनार्य जाति के थे जो पत्थर का काम करने मे दक्ष थे तथा प्राय ऐसे स्थलो पर आवास बनाते थे जहाँ जल सुलभ होता था । कश्मीर२०९ मे नागपूजन, नागयज्ञ, नागयात्रा उत्सव होने के साक्ष्य प्राप्त होते है । डॉ० रघुनाथसिह' के अनुसार मथुरा के यमुना तट पर रहने वाले शक्तिशाली नागवशीय कालिय नाग को मारकर श्रीकृष्ण ने यमुना उपत्यका को मुक्त कराया था ।"
कृष्ण गंगा के ऊर्ध्वभागीय उपत्यका के उत्तरी कश्मीर मे दरदो का स्थान था । ये पर्वतीय जाति
थी जिनका निवास उत्तरी-पश्चिमी सीमान्त पर था यदि इसमे अन्तर होता है तो वह ग्रंथो के रचनाकाल व तत्कालीन परिस्थितियों के कारण है। २११ महाभारत में इन्हे क्षत्रिय जाति का माना गया है ।
२०७ आक्यालॉजिकल सर्वे ऑव इण्डिया- भाग II पृष्ठ १० २०८ राजतरङ्गिणी - अनु० रामतेज शास्त्री I २०३-२६८ २०९ वही I १८५
२१० वही अनु० डॉ रघुनाथ सिंह - परिशिष्ट घ २११ वही - परि० ध, अनु० रामतेज शास्त्री - 1 ३१२ २१२ अनुशासनपर्व ३५ १७ १८
कल्हण ने एक अन्य स्थल पर इनका उल्लेख भौद्द तथा म्लेच्छ के साथ किया है जो अपवित्र कार्य करते थे । २१३ कृष्णा (कृष्णगगा) के ऊपरी क्षेत्र में दरद लोग रहते थे जो दरददेश के नाम से जाना जाता था।२१४ इनका मुख्य नगर दरदपुरी महापद्म (वूलर झील) के उत्तर से प्रारम्भ होकर सिन्धु क्षेत्र अस्तूर और बाल्टी तक जाने वाले मार्ग मे पड़ता है। २१५ राजा अनन्तदेव ने ब्रह्मराज को गजाधिपति बनाया था किन्तु रुद्रपाल से उसका झगडा हो गया अत वह म्लेच्छनरेशो, डामरसमुदाय तथा दरदो के राजा अचलमंगल के साथ कश्मीर पर आक्रमण किया, जिसमे दरदनरेश की मृत्यु हो गई २१६ अनन्तदेव के द्वारपति जनक ने दुर्गघात नामक दुर्ग के दुर्गरक्षक की हत्या कर दी थी। उसकी विधवा पत्नी ने राजा कलश को दुर्ग दे दिया था, किन्तु राजा द्वारा उधर कोई ध्यान न दिये जाने पर दरदराज ने आस-पास के गांवो सहित दुर्ग पर कब्जा कर लिया - इसे पुन. हस्तगत करने के लिए हर्ष ने सेनापति सहेल की मदद से अभियान चलाया किन्तु असफल रहा। २१७ दरदनरेश यशोधर की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर उसके दो मंत्रियो - विड्डसीह तथा पर्युक ने राजा के दो पुत्रो को अलग-अलग राजा बनाकर कश्मीर की अवहेलना करके दरददेश मे द्वैराज्य शासन स्थापित करा दिया। ,२१८ विड्डसीह तथा कश्मीर नरेश की ओर से भोज के मध्य लडाई हुई, किन्तु भोज को सफलता नही मिली और वह विभिन्न प्रकार के उपाय करने लगा जबकि दरदप्रमुख ने कश्मीरनरेश जयसिह से सन्धि की इच्छा व्यक्त की ।
मे पिशाचो का स्थान कश्मीर बताया गया है। २२० जिनका राजा निकुम्भ था। वर्तमान समय मे पिशाच का अर्थ-भूत, प्रेत, राक्षस से लगाया जाता है। कल्हण ने आश्वयु का उल्लेख
२१३ राजतरङ्गिणी- अनु० रामतेज शास्त्री - 1 ३१२
२१४ वही अनु० एम० ए० स्टेइन भाग एक I-९३-९४, ३१२, V-१५२, VII-११९, VIII-२०९ भाग दो पृष्ठ-४३५
२१५ वही भाग दो पृष्ठ- ४०६, अनु० रामतेजशास्त्री - VII.११७१
२१६ वही अनु० रामतेज शास्त्री - VII-१६६-१७६
२१९ वही VIII-२७०४, २७६१, २८४४-२८९६ २२० राजतरङ्गिणी - अनु० डॉ रघुनाथ सिह - परिशिष्ट ड
करते हुए लिखा है कि पूर्णमासी के दिन लोग एक दूसरे पर कीचड फेककर परिहासोत्सव मनाते थे जिससे पिशाच भय से भाग जाय। एक अन्य जगह कल्हण ने अश्वज गाली प्रथा का उल्लेख किया है। २२१ अलबेरूनी ने 'पुहपी' नामक प्रथा का जिक्र किया है जिसे स्टेइन महोदय ने 'पिशाच' का अपभ्रश माना है - इसमे लोग परस्पर परिहास करते व आपस मे तथा पशुओ से खेलते थे । डा० रघुनाथसिह के अनुसार ओल्डेनवर्ग, मेकडोनेल, कीथ, स्टेनकोनो ने पिशाच शब्द का अर्थ असुर, दैत्य, राक्षस लगाया है जबकि गियर्सन के अनुसार कालान्तर मे ये एक जाति थी जो उत्तर पश्चिम भारत मे निवास करते थे । अमरकोशकार २२३ ने पिशाच को 'देवयोनय.' कहा है। प्राचीन धर्मग्रंथो २२४ मे वर्णित आठ प्रकार के विवाहो मे पिशाच विवाह को सबसे निम्न माना गया है, जिसमें कन्या को चुराकर विवाह किया जाता था । कल्हण ने पिशाचपुर नामक स्थल का उल्लेख किया है जहाँ सभवत. पिशाचो की प्रचुर आबादी रही होगी । महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा मे 'वृहत्कथा' की रचना की थी जिसे बाद मे संस्कृत भाषा मे सोमदेव ने लिखा ।
संस्कृत साहित्य मे एक ऐसी जनजाति के सन्दर्भ मिलते है जिसे खश खस या खष अथवा खशीरा कहा जाता था। गियर्सन २२६ ने हिमालय क्षेत्र मे जहाँ अधिकाश लोग आर्य भाषी थे के पूर्व मे खश जातीय लोगो का आवास माना है। डॉ० रघुनाथ सिंह के अनुसार २२७ यह जाति पीर पाचाल पर्वतमाला के दक्षिण व पश्चिम मे रहती थी । हिन्दू खश जाति हिमालय के अन्य क्षेत्रो मे रहती है, कुमायूँ की पहाड़ियो मे कुछ लोग स्वय को 'खश' कहते है । महाभारत मे युधिष्ठिर को जिन राजाओ ने भेंट दिया था उनमे खश, पारद, कुलिन्द वे तण्गण सम्मिलित थे । एक अन्य उद्धरण से पता
२२१ राज० - अनु० रामतेज शास्त्री - IV-७१० २२२ वही - अनु० डॉ० रघुनाथ सिह - परि० ड
२२४ महाभारत आदि पर्व ७३ ९ १२
२२५ राजतरङ्गिणी - अनु० रामतेज शास्त्री V-४६९
२२६ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया- भाग IX, IV, पृष्ठ २ २२७ राजतरङ्गिणी - परिशिष्ट न अनु० रामतेज शास्त्री । ३१७ २२८ गियर्सन- पूर्वो०- पृष्ठ ३
चलता है कि कृष्ण ने शक, दरद, कम्बोज, पिशाच तथा उरसा निवासी कश्मीरियों के साथ खशो को भागवद् पुराण खश के साथ-साथ किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, अभीर, कक, और यवन को जाति के बाहर की जनजाति माना है। जिन्होने स्वय को विष्णु को समर्पित करके शुद्धता प्राप्त की थी। राजतरङ्गिणी के विभिन्न उद्धरणो से यह बात सकेतित होती है कि पीर पांचाल पर्वतमाला के दक्षिण और पश्चिम मे पडने वाले घाटी क्षेत्र तथा वितस्ता के लगभग आधे प्रवाह के पश्चिम व किश्तवाड के पूर्व का क्षेत्र खश या खशक था। २३१ ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि बिशलाटा जो चन्द्रभागा नदी के तथा बनिहाल के मध्य पड़ता है खशो से आबाद था । २३२ श्रीवर २३३ के मतानुसार खैशल उपत्यका जिसे केशर भी कहते है - खशालय है, जिसका पुराना नाम खशाली है ।
१२३४ मे खश को क्षत्रिय जाति का माना गया है। कल्हण ने२३५ लिखा है कि लोहर के खश सरदार सिहराज ने काबुल के शाही राजाओ से विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था। इसी सिहराज की कन्या दिद्दा ने कश्मीर पर शासन किया था जिसके शासनकाल मे पर्णोत्स प्रात के निवासी तुंग नामक चरवाहा मत्री बन गया था । भिक्षाचर ने खशराजा भागिक के दुर्ग में शरण लिया इसी प्रकार राजा जयसिह के मंत्री भोज ने दिन्नग्राम मे खशो के घर ठहरकर दरद प्रमुख विड्डसीह से युद्ध की योजना बनायी थी।२३७
२२९ आक्यालॉजिकल सर्वे - कनिघम - भाग XIV पृष्ठ १३१
२३० सभाग २ अध्याय IV, १८
२३२ राज० - रामतेज शास्त्री - VIII-१७७, १०७४
महाभारत मे लाट क्षत्रिय जाति मानी गयी है । लाट देश अवन्ति देश के पश्चिम तथा विदर्भ के उत्तर-पश्चिम पडता है - जिसका उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल-अभिलेख में हुआ है। डॉ० रघुनाथसिह ने कश्मीर नरेश मिहिरकुल द्वारा चोल, कर्णाट लाट देशो को विजित करने का उल्लेख किया है - यह यहाँ पर देश के रूप में प्रयुक्त हुआ है न कि लोगो के लिए, पुनश्च कश्मीर मे ऐसी कोई जाति थी ऐसा सन्दर्भ नही प्राप्त होता ।
राजतरङ्गिणी मे 'डामर' शब्दावली एक सामान्य घटना है जिनसे सबंधित लोगो ने कश्मीर के इतिहास-विशेष रूप से प्रथम एव द्वितीय लोहर राजवश मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्टेइन कहते हैं कि 'डामर' शब्द राजतरङ्गिणी व परिवर्ती ऐतिहासिक इतिवृत्तो मे जिस रूप में प्रयुक्त हुआ है वह कश्मीर से बाहर अब तक नही खोजा जा सका है। २४० सामान्य रूप मे इसका अर्थ 'विद्रोही', 'आतकवादी' या भ्रष्टाचार तथा समस्याओ के निरन्तर स्रोत वाले लोगो से है । इसका अर्थ बोजार या सामतवादी भू स्वामी या वैरून से लगाया जाता है। सेटपीटर्सवर्ग शब्दकोष में इन लोगो को मूलत स्थानीय जनजाति कहा गया है क्योकि ये पहाडी लोग बुद्ध व उपद्रवी प्रकृति के थे । अभिनवगुप्त ने२४२ चौसठ तत्रो मे डामरो की भी गणना की है। शिव के एक सहायक का भी नाम डामर था । स्टेइन १२४३ ने अभिसार, दरद दर्व, खश, किरात, कुलूट तथा कौण्डिन्य जैसी जनजातियों का उल्लेख किया है जो निसन्देह कश्मीर की पड़ोसी थी । इनमे से एक डामर भी थी - जो कश्मीर की आदिम जाति थी । २४४ कल्हण ने ललितादित्य की राज्यनीति का उल्लेख करते हुए सर्वप्रथम पहाडी लोगो २३८ अनुशासनपर्व - ३५ १७१२
२३९ राजतरङ्गिणी - परिशिष्ट 'थ' अनु० रामतेजशास्त्री । ३००
२४० राजतरङ्गिणी - भाग दो पृ० ३०४
२४१ वही पीटर्सवर्ग वार्टरवुच भाग III पृष्ठ ३०४
२४१ वही कृष्णा मोहन पूर्वो० पृ० ३३०-३३७ (परिशिष्ट) २४२ तत्रलोक - 1 ४२-४३ (के० सी० पाण्डे द्वारा उद्धृत ५०-८० )
२४३ राजतरङ्गिणी - भाग दो पृष्ठ ३६५
२४४ कश्मीर थ्रू द एजेज, जी० एल० कौल - पृष्ठ ३८
की चर्चा की है, उसके बाद ग्रामीण को एक वर्ष की आवश्यकता से अधिक अन्न न देने की बात कही है अन्यथा वे डामरो की तरह भयकर हो जायेगे । २४५ राजतरङ्गिणी मे डामर व लवण्य अलग लोगो के समूह या एक ही व्यक्ति के लिये प्रयुक्त हुआ है। २४६ कल्हण ने यद्यपि लवण्य का मूल अर्थ नही बताया किन्तु स्टेइन महोदय ने इसे कश्मीर की कृषक जनसंख्या के एक निश्चित भाग से उत्पन्न जनजाति माना है जो इस समय अपने अस्तिस्त के लिए क्रम मे लूनी नाम से सघर्ष कर रही है। बी० पी० मजूमदार २४८ ने डामरो को कोई विशिष्ट जनजाति नही माना है । ललितादित्य ने डामरो का उल्लेख सर्वप्रथम किया है जबकि लवण्यो का सर्वप्रथम उल्लेख हर्ष ने किया है जो ललितादित्य से
काफी बाद पड़ता है।२४९ मजूमदार ने ही लवण्यो का मूलस्थान लवण्य पर्वत माना है जिसकी वास्तविक पहचान नही हो सकी है, परन्तु जिस प्रकार कश्मीर मे ब्रह्मणो के गोत्र होते है, उसी प्रकार लवण्य जाति का उपविभाजन क्रम मे हुआ होगा जो जमीदार या जनजाति प्रमुख रहे होगे । २५० वोगल ने स्टेइन की बात का समर्थन करते हुये लवण्य को खेतिहर माना तथा अन्य पहाड़ी भागो के रण व ठक्कुर की तरह इनकी उपाधि डामर मानी जबकि वे समान सामाजिक स्तर के होते थे । परन्तु डामर लोग भूमि उपहार या दान मे नही प्राप्त करते थे बल्कि इसे ये अपनी शक्ति या वश-परम्परा के रूप में पाते थे तथा इसी से धन एकत्र करके धनवान बन जाते थे के अनुसार इस प्रकार डामर शुरू मे जनजाति रही होगी किन्तु बाद में यह एक सामाजिक स्तर माना जाने लगा । वर्तमान समय मे कश्मीर मे लोन (लवण्य) तथा डार ( डामर) दो पृथक जातियाँ प्राप्त होती है।
कल्हण को सन्दर्भित करते हुये एच० सी० रे ने म्लेच्छ का अर्थ सिन्धु नदी की उपत्यका (ऊपरी
राजतरङ्गिणी - अनु० रामतेज शास्त्री - IV ३४७-४८
२४७ राजतरङ्गिणी - अनु० एम० ए० स्टेइन भाग दो पृष्ठ ३०६
२४८ इण्डियन हिस्ट्री काग्रेस- १९४६, पृष्ठ १९४
२४९ राजतरङ्गिणी - अनु० स्टेइन - भाग एक IV-३४८
२५१ राजतरङ्गिणी - अनु० रामतेज शास्त्री VII-४९४
२५२ अर्ली मिडिवल हिस्ट्री ऑव कश्मीर-पृष्ठ ३३७, परिशिष्ट v |
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