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थायस ने स्वाधीन, लेकिन निर्धन और मूर्तिपूजक मातापिता के घर जन्म लिया था। जब वह बहुत छोटीसी लड़की थी तो उसका बाप एक सराय का भटियारा था। उस सराय में परायः मल्लाह बहुत आते थे। बाल्यकाल की अशृंखल, किन्तु सजीव स्मृतियां उसके मन में अब भी संचित थीं। उसे अपने बाप की याद आती थी जो पैर पर पैर रखे अंगीठी के सामने बैठा रहता था। ल... |
ने के बदले बैठा हुआ वह उसके लिए कागज के गुब्बारे और नौकाएं बनाया करता।
अहमद के साथ उसके स्वामियों ने घोर निर्दयता का बर्ताव किया था। एक कान कटा हुआ था और देह पर कोड़ों के दागही-दाग थे। किन्तु उसके मुख पर नित्य सुखमय शान्ति खेला करती थी और कोई उससे न पूछता था कि इस आत्मा की शान्ति और हृदय के सन्टोष का स्त्रोत कहां था। व... |
ं में ईसाई बिशपों और वरतधारिणी कुमारियों को कोड़े मारे गये हैं, सूली दी गयी हैं और जंगल के जानवरों के समान डाल दिया गया है। इस दारुण विपत्ति के समय जब ऐसा निश्चय हो रहा था कि ईसाइयों का नाम निशान भी न रहेगा; एन्थोनी ने अपने एकान्तवास से निकलकर मानो मुरझाये हुए धान में पानी डाल दिया। एन्थोनी मिस्त्रनिवासी ईसाइयों का नेत... |
पृथ्वी पर सबसे बलवान थे। वे दोनों ही मसीह से जलते थे, इसीलिए पुजारियों और न्यायाधीशों को हुक्म दिया कि परभु मसीह को मार डालो। उनकी आज्ञा से लोगों ने एक सलीब खड़ी की और परभु को सूली पर च़ा दिया। किन्तु परभु मसीह ने कबर के द्वार को तोड़ डाला और फिर अपने पिता ईश्वर के पास चले गये।
उसी समय से परभु मसीह के भक्त स्वर्ग को जा... |
लगाये हुए चला। थायस कुछ डरी, किन्तु उत्सुक भी थी। उसने सिर चोगे से बाहर निकाल लिया और अपने दोनों हाथ अहमद की मर्दन में डाल दिये। अहमद उसे लिये वेग से दौड़ा चला जाता था। वह एक तंग अंधेरी गली से होकर गुजरा; तब यहूदियों के मुहल्ले को पार किया, फिर एक कबिरस्तान के गिर्द में घूमते हुए एक खुले मैदान में पहुंचा जहां, ईसाई, धम... |
भनों के बाद अमर जीवन पराप्त करने वाली थी।
जब यह संस्कार समाप्त हो गया और सब लोग खोह के बाहर निकले तो अहमद ने बिशप से कहा-'पूज्य पिता, हमें आज आनन्द मनाना चाहिए; क्योंकि हमने एक आत्मा को परभु मसीह के चरणों पर समर्पित किया। आज्ञा हो तो हम आपके शुभस्थान पर चलें और शेष रात्रि उत्सव मनाने में काटें।'
बिशप ने परसन्नता से इस ... |
लगे थे। धर्मनिष्ठ अहमद इन सभाओं में सम्मिलित होने से कभी न चूकता। उसका धमोर्त्साह दिनोंदिन ब़ने लगा। कभीकभी वह बाजार में ईसाइयों को जमा करके उन्हें आने वाले सुखों की शुभ सूचना देता। उसकी सूरत देखते ही शहर के भिखारी, मजदूर, गुलाम, जिनका कोई आश्रय न था, जो रातों में सड़क पर सोते थे, एकत्र हो जाते और वह उनसे कहता-'गुलामों... |
खिलौने मोल लेती। पर उसकी लोभिनी माता चाहती थी कि वह जो कुछ पाये वह मुझे दे। थायस इसे न मानती थी। इसलिए उसकी माता उसे मारापीटा करती थी। माता की मार से बचने के लिए वह बहुधा घर से भाग जाती और शहरपनाह की दीवार की दरारों में वन्य जन्तुओं के साथ छिपी रहती।
एक दिन उसकी माता ने इतनी निर्दयता से उसे पीटा कि वह घर से भागी और शहर... |
े शहर के बाहर चली गयी।
बुयि का नाम मीरा था। उसके पास कई लड़केलड़कियों की एक मंडली थी। उन्हें उसने नाचना, गाना, नकलें करना सिखाया था। इस मंडली को लेकर वह नगरनगर घूमती थी, और अमीरों के जलसों में उनका नाचगाना कराके अच्छा पुरस्कार लिया करती थी।
उसकी चतुर आंखों ने देख लिया कि यह कोई साधारण लड़की नहीं है। उसका उठान कहे देता ... |
युवक ने फिर वही परेमाकांक्षा परकट की, लेकिन थायस ने फिर इनकार किया। उसके आतुर नेत्र, उसकी परेमयाचना बस निष्फल हुई, और जब उसने अधीर होकर उसे अपनी गोद में ले लिया और बलात खींच ले जाना चाहा तो उसने निष्ठुरता से उसे हटा दिया। तब वह उसके सामने बैठकर रोने लगा। पर उसके हृदय में एक नवीन, अज्ञात और अलक्षित चैतन्यता उदित हो गयी... |
बुल के फूल बटोरने चले जाते। उनकी थाली एक थी। प्याला एक था, मेज एक थी। लोलस उसके मुंह के अंगूर निकालकर अपने मुंह में खा जाता।
तब मीरा लोलस के पास आकर रोनेपीटने लगी कि मेरी थायस को छोड़ दो। वह मेरी बेटी है, मेरी आंखों की पुतली ! मैंने इसी उदर से उसे निकाल, इस गोद में उसका लालनपालन किया और अब तू उसे मेरी गोद से छीन लेना च... |
स्वीकार कर ली। और वह पहली बार रंगमंच पर आयी।
पहले दर्शकों ने उसका बहुत आशाजनक स्वागत न किया। एक तो वह इस काम में अभ्यस्त न थी, दूसरे उसकी परशंसा के पुल बांधकर जनता को पहले ही से उत्सुक न बनाया गया था। लेकिन कुछ दिनों तक गौण चरित्रों का पार्ट खेलने के बाद उसके यौवन ने वह हाथपांव निकाले कि सारा नगर लोटपोट हो गया। रंगशाला... |
रेमियों और विलासियों के मारे उसे सांस न मिलती, पर वह किसी को मुंह न लगाती। दूसरा, लोलस उसे जब न मिला तो उसने उसकी चिन्ता ही छोड़ दी। उस स्वर्गसुख की अब उसे आशा न थी।
उसके अन्य परेमियों में तत्त्वज्ञानी निसियास भी था जो विरक्त होने का दावा करने पर भी उसके परेम का इच्छुक था। वह धनवान था पर अन्य धनपतियों की भांति अभिमानी ... |
े याद आया, मैंने इसे पहले भी देखा है। कुछ लोग अन्दर गा रहे थे और दीवार की दरारों से उज्ज्वल परकाशरेखाएं बाहर झांक रही थीं। इसमें कोई नवीन बात न थी, क्योंकि इधर लगभग बीस वर्षों से ईसाईधर्म में को विघ्नबाधा न थी, ईसाई लोग निरापद रूप से अपने धमोर्त्सव करते थे। लेकिन इन भजनों में इतनी अनुरक्ति, करुण स्वर्गध्वनि थी, जो मर्म... |
्मित और चिन्तित होकर एक पादरी से पूछा-'पूज्य पिता, यह कैसा समारोह है ?'
पादरी ने उत्तर दिया-'क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हम आज सन्त थियोडोर की जयन्ती मना रहे हैं ? उनका जीवन पवित्र था। उन्होंने अपने को धर्म की बलिवेदी पर च़ा दिया, और इसीलिए हम श्वेत वस्त्र पहनकर उनकी समाधि पर लाल गुलाब के फूल च़ाने आये हैं।'
यह सुनते ही... |
ा सत्य है कि जब तक हम वही हैं जो हैं, तब तक हम दूसरों के विचारों में अपने ही विचारों की झलक देखते रहेंगे।'
वह अब भी इधर मुखातिब न हुई। उसकी आत्मा अभी तक हब्शी की कबर के सामने झुकी हुई थी। सहसा उसे आह भरते देखकर उसने उसकी गर्दन का चुम्बन कर लिया और बोला-'पिरये, संसार में सुख नहीं है जब तक हम संसार को भूल न जायें। आओ, हम... |
, विद्वानों और तत्त्वज्ञानियों को उसकी गति, अगंविन्यास और उस पराकृतिक माधुर्य की झलक नजर आती थी जो समस्त संसार में व्यापक है और उनके विचार में ऐसी अर्पूव शोभा स्वयं एक पवित्र वस्तु थी। दीन, दरिद्र, मूर्ख लोग उसे एक स्वगीर्य पदार्थ समझते थे। कोई किसी रूप में उसकी उपासना करता था, कोई किसी रूप में। कोई उसे भोग्य समझता था,... |
ा पसीना आ गया। तब उसने पुनः अपने को संभालकर आईने में देखा और उसे ज्ञात हुआ कि मैं अब भी परम सुन्दरी और परेयसी बनने के योग्य हूं। उसने पुलकित मन से मुस्कराकर मन में कहा-आज भी इस्कन्द्रिया में काई ऐसी रमणी नहीं है जो अंगों की चपलता और लचक में मुझसे टक्कर ले सके। मेरी बांहों की शोभा अब भी हृदय को खींच सकती है, यथार्थ में ... |
ी। उसके अभद्र और उद्दण्ड वेश ने उसे विस्मित कर दिया। उसे अब तक जितने मनुष्य मिले थे, यह उन सबों से निराला था। उसके मन में ऐसे अद्भुत पराणी के जीवनवृत्तान्त जानने की परबल उत्कंठा हुई। उसने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा-'महाशय, आप परेमपरदर्शन में बड़े कुशल मालूम होते हैं। होशियार रहियेगा कि मेरी चितबनें आपके हृदय के पार न हो ... |
जिस परेम का अनुभव हुआ है वह निंद्य और त्याज्य है।'
थायस ने गर्व से गर्दन उठाकर कहा-'मित्र, तुम मुंहफट जान पड़ते हो। तुम्हें गृहस्वामिनी के परति मुख से ऐसे शब्द निकालने में जरा भी संकोच नहीं होता ? मेरी ओर आंख उठाकर देखो और तब बताओ कि मेरा स्वरूप निन्दित और पतित पराणियों ही कासा है। नहीं, मैं अपने कृत्यों पर लज्जित नही... |
को परेरित करेगा जो तुम्हें मोम की भांति पिघला दें कि मेरी उंगलियां तुम्हें अपनी इच्छा के अनुसार रूप दे सकें ? ओ नारीरत्न ! यह कौनसी शक्ति है जो तुम्हें मेरे हाथों में सौंप देगी कि मेरे अन्तःकरण में निहित सद्परेरणा तुम्हारा पुनसरंस्कार करके तुम्हें ऐसा नया और परिष्कृत सौन्दर्य परदान करे कि तुम आनन्द से विह्वल हो पुकार उ... |
ा हूं। ईश्वर की आज्ञा से मैं एकान्तसेवन करता हूं। मैंने संसार से और संसार के पराणियों से मुंह मोड़ लिया था। इस पापमय संसार में निर्लिप्त रहना ही मेरा उद्दिष्ट मार्ग है। लेकिन तेरी मूर्ति मेरी शान्तिकुटीर में आकर मेरे सम्मुख खड़ी हुई और मैंने देखा कि तू पाप और वासना में लिप्त है, मृत्यु तुझे अपना गरास बनाने को खड़ी है। ... |
पत्थर तथा नमक की मूर्ति बन जाऊं। मुझे भयभीत न कीजिए। मेरे तो पहले ही से पराण सूखे हुए हैं। मुझे मौत का मुंह न दिखाइए, मुझे मौत से बहुत डर लगता है।'
पापनाशी ने उसे उठने का इशारा किया और बोला-'बच्चा, डर मत। तेरे परति अपमान या घृणा का शब्द भी मेरे मुंह से न निकलेगा। मैं उस महान पुरुष की ओर से आया हूं, जो पापियों को गले ल... |
न्द की भूखी स्त्री ! आ, और सच्चे आनन्द का आस्वादन कर। दरिद्रता का, विराग का, त्याग कर, ईश्वर के चरणों में आत्मसमर्पण कर ! आ, ओ स्त्री, जो आज परभु मसीह की द्रोहिणी है, लेकिन कल उसको परेयसी होगी। आ, उसका दर्शन कर, उसे देखते ही तू पुकार उठेगी-मुझे परेमधन मिल गया !'
थामस भविष्यचिन्तन में खोयी हुई थी। बोली-'महात्मा, अगर मैं... |
। मैं उस महान पुरुष की ओर से आया हूं, जो पापियों को गले लगाता था, वेश्याओं के घर भोजन करता था, हत्यारों से परेम करता था, पतितों को सान्त्वना देता था। मैं स्वयं पापमुक्त नहीं हूं कि दूसरों पर पत्थर फेंकूं। मैंने कितनी ही बार उस विभूति का दुरुपयोग किया है जो ईश्वर ने मुझे परदान की है। क्रोध ने मुझे यहां आने पर उत्साहित न... |
थामस भविष्यचिन्तन में खोयी हुई थी। बोली-'महात्मा, अगर मैं जीवन के सुखों को त्याग दूं और कठिन तपस्या करुं तो क्या यह सत्य है कि मैं फिर जन्म लूंगी और मेरे सौन्दर्य को आंच न आयेगी ?'
पापनाशी ने कहा-'थायस, मैं तेरे लिए अनन्तजीवन का सन्देश लाया हूं। विश्वास कर, मैं जो कुछ कहता हूं, सर्वथा सत्य है।'
थायस-'मुझे उसकी सत्यता प... |
मुंह से आपही-आप निकल पड़ेगा-यही मेरा आराध्य देव है। तूने अभी उसकी आलौकिक शक्ति देखी ! अगर उसने मेरी आंखों के सामने अपने दयालु हाथ न फैला दिये होते तो अब तक मैं तेरे साथ पापाचरण कर चुका होता; क्योंकि स्वतः मैं अत्यन्त दुर्बल और पापी हूं। लेकिन उसने हम दोनों की रक्षा की। वह जितना ही शक्तिशाली है उतना ही दयालु है और उसका ... |
। इसी बपतिस्माजल की महिमा थी जिसने मुझे ईश्वर के द्वार को छुड़ाकर मुझे खोजने के लिए इस विषाक्त वायु से भरे हुए संसार में आने पर बाध्य किया जहां मायामोह में फंसे हुए लोग अपना कलुषित जीवन व्यतीत करते हैं। उस पवित्र जल की एक बूंद-केवल एक ही बूंद मेरे मुख पर छिड़क दी गयी है जिसमें तूने स्नान किया था। आ, मेरी प्यारी बहिन, आ... |
यह अपने काम में बड़े परवीण और कुशल हैं। मैं उन्हें यथेष्ट पुरस्कार देती हूं। वह जो सोने की अंगूठियां पहने हैं और जिनके मोती केसे दांत चमक रहे हैं, उसे मैंने परधानमन्त्री की पत्नी से लिया है।'
पापनाशी की पहले तो यह इच्छा हुई कि थायस को इस भोज में सम्मिलित होने से यथाशक्ति रोके। पर पुनः विचार किया तो विदित हुआ कि यह उताव... |
गिरीश लाहौर का रहनेवाला है, विद्यार्थी है, युवा है और युवकों की साधारण भावुकता से भी सम्पन्न है। और इन सबके अतिरिक्त वह धनिक नहीं है। तो भी ऐसा है कि उसे कभी पहाड़ जाने के लिए खीस के बहाने घर से रुपये मँगा कर जोड़ने नहीं पड़ते, बिना बहाने ही मिल जाते हैं।
हाँ, तो गिरीश ने निश्चय किया है कि उसमें साहित्यिक प्रतिभा है और... |
ावुक बहिन का इच्छा-स्वप्न है?
काफ़ी देर तक ऐसी बातें सोच चुकने पर जब उसे एकाएक विचार आया कि वह पहाड़ी जीवन का पता लगाना चाहता है, न कि करुणा की प्रकृति पर विचार करना, तब वह खीझ कर उठ बैठा। फिर उसने निश्चय किया कि कल वह जाकर बाज़ार में बैठेगा और वहाँ पहाड़ी लोगों को देखेगा - नहीं, वहाँ क्यों, वह मोटर के अड्डे पर जाएगा, ... |
कि इस प्रकार अपने विभिन्न तात्कालिक धन्धों में निरत और व्यस्त जान पड़नेवाले इन व्यक्तियों की वास्तविक दृष्टि, वास्तविक प्रतीक्षा, किसी और ही ओर लगी हुई है। इन लोगों के सामान्य शारीरिक उद्योग से कुचले हुए शरीरों के भीतर छिपी हुई है भूखे भेड़िये की-सी प्रमादपूर्ण और अन्वेषण तत्परता, जो लारियों के आते ही फूट पड़ेगी।
इससे... |
सकी वेश-भूषा बिलकुल साधारण थी - सिर पर कस कर बाँधा हुआ बैंगनी रंग का रूमाल, कानों में चाँदी के झुमके, गले में एक लम्बा सफ़ेद कुरता (जो कभी सफेद था, अब नहीं है), जिसके ऊपर एक मनकों का हार, उसके नीचे मटियाले रंग की छींट का तंग पैजामा। किन्तु उसे देखकर ध्यान उस वेश की साधारणता की ओर नहीं, बल्कि उससे वेष्टित व्यक्तित्व की ... |
सेठ साहब की ओर ही। जब उसकी बात सुनकर उस पहाड़ी ने प्रश्न-भरी दृष्टि से मोटर-कम्पनी के दफ़्तर के भीतर देखा, तब उसने हाथ उठाकर सेठ साहब की ओर इशारा किया।
वह स्त्री घबराकर घूम गयी और उस पहाड़ी के साथ, जिससे उसने कुछ कहा था, जल्दी से भीड़ में से निकलकर अदृश्य हो गयी। गिरीश की स्मृति में उसका तो कुछ रहा नहीं, रहा केवल उसकी ... |
ा उत्तर न पा लिया जाए। और गिरीश समझता है कि वह ठीक पथ पर चल रहा है, उससे यह रहस्य छिपा नहीं करेगा, स्वयं भी खुलेगा और पहाड़ी जीवन की सत्यता भी दिखा जाएगा।
एक सप्ताह के-पहाड़ में आये हुए यात्रियों के-से जीवन के निरर्थक एक सप्ताह के बाद।
गिरीश डलहौज़ी से सैर करने निकलकर, चम्बे के रास्ते पर चल पड़ा था और लक्कड़मंडी में एक... |
िश्वास, इतनी श्रद्धा टपकती है।
गिरीश फिर एक बार उस अंश को पढ़ने लगा - "आपने पूछा है, मेरे जीवन में क्यों यह परिवर्तन आ गया है, क्यों मैं ऐसी अशान्त-सी रहती हूँ? आप पूछते हैं; पर मैं आपको न लिखूँगी, तो किसको लिखूँगी? यहाँ के लोगों को जिन्हें इतना भी पता नहीं कि शान्ति क्या होती है?
"मैं तो पूरा लिख भी नहीं सकती, थोड़ा-स... |
ह रहा है, "सलाम, साहब!" गिरीश को यह कुछ अच्छा-सा लगा। उसने कुछ मुस्करा कर उत्तर दिया, "सलाम।" तब बालक ने एक दीन स्वर में, जो सर्वथा स्वाभाविक नहीं था, बालकों की स्वाभाविक नक़ल करने की शक्ति से प्रेरित था, कहा "बक्शीश,साहब!" गिरीश को एकाएक ध्यान आया, यह सलाम उसे नहीं, उसके सिर पर के टोप को किया गया था और वह भी एक पैसे क... |
-एक दिखावटी दिलेरी से।
किन्तु आज शायद पहाड़ियों ने निश्चय किया था कि अपने जीवन की समस्त पहेलियाँ एक साथ उसके आगे बिखरा देंगे; उसे ललकारेंगे कि वह उन्हें सुलझा सकता हो तो सुलझाये। वह अभी इसी समस्या पर विचार कर रहा था कि उसने फिर सेठ साहब का स्वर सुना, अब की बार अपने बहुत निकट और धीमा, मानो कुछ गुपचुप बात कहने का यत्न कर... |
उसे मानो अपने सब प्रश्नों के उत्तर मिल गये थे; कितने कठोर उत्तर! सब समस्याओं का समाधान मिल गया था, कैसा उपहास-भरा समाधान!
वह कुछ ही दूर गया था कि सेठ साहब मिल गये; कुछ चौंके, कुछ झेंप-से गये। गिरीश को उस स्त्री के प्रति इतनी ग्लानि हो रही थी कि उसे यह ध्यान ही न आया कि सेठ साहब भी किसी सम्बन्ध में दोषी हो सकते हैं; वह ... |
विशृँखलता की ओर, जो उदारता की आड़ में फैल रही है। उसने अपनी ग़लती जानी कि जिस विषय की वह आलोचना कर रहा है उसका उद्भव उन भावनाओं से नहीं हुआ था, जो वह उन्हें दे रहा है, बल्कि केवल रुपये के लालच के लिए यानी रुपये के लिए इन पहाड़ियों का आचार और चरित्र बिकाऊ है।
पर यह धोखा है! ऐसे तर्क से केवल पतन ही पतन हो सकता है। उन्नत... |
अन्धा नहीं हो जाता। पहाड़ कुछ कहते नहीं, उनके जिह्वा है ही नहीं।
उनकी कहानी की सत्यता फिर भी न कही जाती, वैसी ही रह जाती, केवल पढ़ने की क्षमता रखनेवाले उसे पढ़ते और समझते और पर्वतों से प्रेम करते।
क्योंकि वह है ही अकथ्य, जैसे सभी गहरी बातें अकथ्य होती हैं - गहरा प्रेम, गहरी वेदना, गहरा सौन्दर्य, गहरा आह्लाद, गहरी भूख।... |
तिमत्ता को छोड़कर लौट जाता है अपने घिरे हुए, बँधे हुए, कलुषित, मारक, चूहेदान जैसे संसार में, तब वे उसे वापस भी नहीं बुलाते। वे उसी भव्य, विराट्, उपेक्षा-पूर्ण कठोर मुस्कराहट से निश्चल आकाश की ओर देखा करते हैं।
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नीति के उपदेश यही सिखाते हैं कि त्रिवर्ग की उन्नति करनी चाहिए, जिससे मोक्ष की प्राति सुकर हो जाय । त्रिवर्ग से तात्पर्य धर्म, अर्थ और काम तीनों से है। प्राचीन समय में भारत की सम्पत्ति सभी देशों के लिए स्पृहणीय थी । काम, अर्थात् व्यवहार तो भारत से ही और देशों ने सीखा है। सुखोपभोग की सामग्री भारत में कितनी विपुल थी, इसका... |
ि भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य पुनर्जन्मवाद है, तो भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत आनेवाले बौद्ध, जैन, सिक्ख, आर्यसमाज, ब्राह्मसमाज आदि जितने सम्प्रदाय हैं, वे सभी इस पुनर्जन्मवाद को अवश्य स्वीकार करते हैं। इस प्रकार, आचार और विचार ये, दो जो संस्कृति के पहलू हैं, उनमें विचारांश में भारतीयों का ऐक्य स्थापित हैं। शरीर के अति... |
है, इसका ज्ञान भारतीय संस्कृति में मुख्य माना गया था । यन्त्रों को जन्म देनेवाली कल्पना शक्ति के उद्भावक मन, बुद्धि और सब-के-सव चैतन्यप्रद आत्मा का विचार आध्यात्मिकवाद है । भारतीय संस्कृति के नेता यही कहते हैं कि जो अपने-आपका परिष्कार वा सुधार न कर सका, वह अन्य वस्तुओं का निर्माता होने पर महत्त्वशाली नहीं कहा जा सकता।... |
, तो अच्छा काम भी अधर्म ही ठहरेगा और उद्देश्य एवं परिणाम अनुचित न रहने से बुरे काम भी अच्छे हो जायेंगे । किसी भी कार्य में कर्त्ता की नीयत जाने विना धर्म का निर्णय नहीं हो सकता । इसके लिए भी आध्यात्मिकता की ओर आना होगा । यों धर्म और कर्त्तव्य के निर्णय में आध्यात्मिकता की ही कमी हुई, तब भारत की ओर ही सबकी दृष्टि केन्द्... |
हमें भी
मोक्ष को ही यह संस्कृति परम पुरुषार्थ कहती है। वह मोक्ष क्या है ? आत्मा को स्वतंत्र बना देना ही मोक्ष है । कर्त्तव्य का आचरण करते-करते मन, बुद्धि और शरीर पवित्र हो जाते हैं। इस प्रकार के पवित्र मन और बुद्धि में आत्मा की स्वतंत्र सत्ता प्रतीत होने लगती है। वह आत्मा हमें कहीं बाहर से लेने नहीं जाना पड़ेगा, वह तो ... |
प्त करना नहीं है, अपि तु अपना व्यापार चमकाना है। ज्यादा भीड़ बढ़ने पर लोग उसकी दूकान पर बैठकर खरीददारी भी करते हैं। अब यदि पाश्चात्य दृष्टि से कर्त्तव्याकर्त्तव्य का या धर्माधर्म का विचार करें, तो बनिया ही धर्मात्मा सिद्ध
भारतीय संस्कृति चच सकेगी। और, यह भी स्मरण रखना चाहिए कि कर्त्तव्य-निष्ठा वर्णाश्रम व्यवस्था के आधा... |
ौन सा कर्म नियत है - इसका उत्तर तो वर्ण-व्यवस्था ही दे सकती है। उसमें ही भिन्न-भिन्न वर्णों के अपने-अपने कर्म नियत हैं, उनका अनुष्ठान विना फल की इच्छा के ही करते रहना चाहिए । यदि विना वर्ण व्यवस्था माने भी कर्त्तव्य-निष्ठा का कोई यह समाधान करे कि जगत् के लाभदायक कर्म फल की इच्छा विना ही करते रहना चाहिए अथवा आत्मा की आज... |
क्या यह समझा जाय कि यदि वनों में भटकना हो, तो धर्म से ताल्लुक रखो और यदि उन्नति करना हो, तो छल-कपट, दम्म को अपनाओ । इसका बड़ा अच्छा उत्तर युधिष्ठिर ने दिया कि द्रौपदी ! तुमको यह किसने बहका दिया कि मैं फल की इच्छा से कर्म करता हूँ । यह सष्ट समझो कि मैं दान, यज्ञादि कर्म-फल की आकांक्षा से कभी नहीं करता । दान करना चाहिए,... |
ान में बैठती है। इसीलिए, प्रकृति ने शिर को सव अवयवों में ऊँचा स्थान दिया है । शिर सब अवयवों से सदा ऊँचा ही रहना चाहता है। यदि आप सब अंगों को एक सीध में लिटाना चाहें, तब भी एक तकिया लगाकर शिर को कुछ ऊँचा कर ही देना पड़ेगा । नहीं तो शरीर को चैन ही नहीं मिलेगा । यह ज्ञान शक्ति की ही महिमा है। इसी प्रकार प्रपंच में भी ज्ञा... |
सब अवनति की जड़ हुई। किन्तु, विचार करने पर यह आक्षेप निर्मूल ही सिद्ध होता है। वर्ण व्यवस्था कभी परस्पर विरोध वा आपस की फूट नहीं सिखाती । वेद-मन्त्रों से स्मृति पुराणादि तक जहाँ कहीं वर्ण-व्यवस्था का वर्णन है, वहाँ सर्वत्र सब वर्णों को एक शरीर का अंग माना गया है ।
ब्राह्मणोऽस्यमुखमासीद् वाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद... |
हैं और वहीं से विभक्त होकर सच अंगों का पोषण करते हैं । यहाँ तक कि मस्तक में वा पैर में भी पीड़ा हो, तो औषधि उदर में ही डाली जाती है। वही से वह शिर आदि में पहुँचकर पीड़ा शान्त करती है। चौथे भाग पाद में सेवा-शक्ति है । यह उक्त तीनों अंगों को अपने-अपने कार्य में सहायता देता है। देखने की इच्छा आँख को होती है। उसी को उत्तम ... |
से भिन्न-भिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न शिल्प बाँट दिये गये थे, जो आज भी चले आ रहे हैं। यह शिल्पबल शूद्र-बल है । शूद्रों के बुद्धि विकास से शिल्पों की उन्नति यहाँ पूर्ण मात्रा में हुई । ढाके की मलमल की बरावरी आज तक भी पाश्चात्य जगत् न कर सका । प्राचीन भारत के नेता ऋषि-महपियों का यह भी ध्यान था कि सब प्रकार के बलों की उ... |
यह नहीं है कि ख्वाब सिर्फ निद्रावस्था में ही दिखाई देते हों, अपितु जाग्रतावस्था में भी उतनी ही सरलता से ख्वाब देखे जा सकते हैं । फर्क सिर्फ इतना होता है कि जाग्रतावस्था में हम अपनी इच्छानुसार ख्वाब देख सकते हैं जबकि निद्रावस्था में देखे जाने वाले ख्वाबों पर हमारा या हमारे मन का कोई नियंत्रण नहीं होता है ।
अंगूठी - विवा... |
ेखने पर होगा ।
उबकाई लेना - बुरे कामों से घृणा हो । लोगों को सीधा मार्ग बताये ।
उस्तरा देखना - चिन्ता मुक्त हो, जेब कट जाए, बीमारी दूर हो ।
ऊबड़-खाबड़ रास्ता देखना - परेशानी उठाए लेकिन अन्त में सफलता पाये ।
ऊँचे वृक्ष देखना - उद्देश्य पूर्ति में देर लगेगी, इज्जत और मान प्राप्त हो ।
ऊन देखना - ऊन वाली भेड़ या ऊनी कपड़े ... |
लाभ हो । अच्छे कार्य करके नामवर हो जाए । हर प्रकार का सुख मिले ।
कमंद देखना - बड़ा काम पड़े किन्तु सहयोगी मिले । सफलता और ऊँचा स्थान प्राप्त होगा । किसी प्रकार का सुख मिले । शुभ समाचार आए ।
कमल देखना - साधुसन्तों से ज्ञान की प्राप्ति हो । विद्या धन मिले । उत्तीर्ण हो, पत्नी सुन्दर मिले । प्रेमिका सुन्दर और बुद्धिमान मि... |
ाली आयेगी । आशा के विपरीत धन मिले, विपत्तियां दूर हो शोहरत और इज्जत मिले, व्यापार में लाभ हो, सरकारी दरबार में जाने का अवसर मिले ।
गधा देखना - प्रेम और स्नेह का चिन्ह है यदि लदा हुआ पाये तो बहुत लाभ हो हर तरह का सुख मिले । व्यापार में लाभ हो ।
गधे की सवारी करना - सरकारी दरबार में स्थान मिले, व्यापार में लाभ हो संकट टल ... |
ेखना - पत्नी वफादार और सुशील मिले । कोई बुरा करने की भूल हो जाय जिसके परिणामस्वरूप लज्जित होना पड़े ।
चक्की देखना - जनता में सम्मान पाए, लोगों को अच्छी सलाह दे, यात्रा सामने आए, सकुशल वापसी हो ।
चींटियां देखना - वह घर उजड़ जाए । रहने वाले कम हो जायें, दुःख हो संकट आए ।
जाम देखना - हर काम में सफलता होगी, बुद्धि बढ़ेगी औ... |
है ।
ढाक का वृक्ष देखना - किसी साधु, सन्त, पीर, फकीर की संगत मिले, भोजन भरपूर मिले, मनोकामना सिद्ध होने का संकेत है ।
ढलता हुआ सूरज देखना - परेशानी और धन के विघटन की निशानी है, सूर्य अस्त होता देखे तो किसी की मौत का समाचार मिले ।
ताबूत देखना - अपना ताबूत, अर्थी या जनाजा देखने का फल यह है कि जिस काम को कर रहे है, उसमें... |
नेता या बड़े अधिकारी से दोस्ती का लाभ हो । धन बहुत हाथ आए, जिस व्यापार में हाथ लगाए घाटा न हो तो इरादा करे पूरा हो जाए, खुशी का समाचार मिले डूबता देखे तो हानि हो तैरना देखे तो सफलता पाए ।
दौलत देखना - पत्नी गर्भवती हो, किसी स्त्री से लाभ हो, सन्तान की प्राप्ति हो, व्यापार में लाभ हो, खुशी ही खुशी है ।
दलदल देखना - परेश... |
राहत मिले । फूल काले हो तो दुःख मिले । फूल के पास कंटीली झाड़ियां देखे तो मुसीबतों के बाद राहत मिले ।
फावड़ा देखना - कठिन परिश्रम के पश्चात् ही सुख मिलेगा । मेहनत की कमाई खायेगा और हर प्रकार की शान्ति रहेगी किन्तु धन की कमी रहेगी ।
फटे हुए कपड़े देखना - चिन्ताओं में घिर जाना पड़े । दुःख मिले, धन की हानि । यही हाल फटे प... |
े पश्चात् ।
भिखारी देखना - कोई अच्छा कार्य करे, राहत होगी ।
भैंस देखना - धन भोजन की प्राप्ति ।
मिठाई खाना - सुख पाए, दोस्ती बढ़े, प्रेम और स्नेह पाए, प्रेमिका से मिलन हो पत्नी मन पसन्द पाए, बिगड़े काम बन जायेंगे ।
मछली देखना - एक या दो देखे तो सुन्दर हसीना से विवाह हो, बड़ी हो तो खूब धन पाए और छोटी हो तो गरीबी और तंगी ... |
- कड़ी मेहनत करनी होगी तब अपार सुख मिलेगा शक्ति बढ़ेगी, शत्रु नीचा देखेंगे, तेज और ख्याति बढ़ेगी ।
लोमड़ी देखना - मक्कार निकटवर्ती लोगों से हानि हो, पत्नी मनपसन्द न मिले ।
लंगूर देखना - मुसीबतों का अन्त होने का समय आ गया है यदि लंगूर पेड़ पर है तो देर लगेगी, धरती पर है तो शीघ्र सारी उलझनों का अन्त होगा । कहीं से आशा के... |
सूर्य देखना - तेज बढ़े, ख्याति और धन की समृद्धि बढ़े, यशस्वी पुत्र प्राप्त हो । पत्नी का सुख मिले ।
सुलगती हुई आग देखना - दुःख बीमारी, दुश्मन से चिन्ता, शोक समाचार मिले ।
स्त्री की छाती से दूध टपकना - काम सुख मिले, पुत्र का जन्म हो, ससुराल से माल मिले ।
सीपी देखना - पानी में देखें तो हानि रेत पर पाये तो लाभ होगा ।
स्या... |
मियाँ शहसवार का दिल दुनिया से तो गिर गया था, मगर जोगिन की उठती जवानी देख कर धुन समाई कि इसको निकाह में लावें। उधर जोगिन ने ठान ली थी कि उम्र भर शादी न करूँगी। जिसके लिए जोगिन हुई, उसी की मुहब्बत का दम भरूँगी। एक दिन शहसवार ने जो सुना कि सिपहआरा कोठे पर से कूद पड़ी, तो दिल बेअख्तियार हो गया। चल खड़े हुए कि देखें, माजरा ... |
ाशे में बड़े ठाट से बैठी हुई है। ...Read Moreसब रुपए का खेल है।
सुरैया बेगम - क्यों महरी, रोशनी काहे की है? न लैंप, न झाड़, न कँवल और सारा खेमा जगमगा रहा है।
महरी - हुजूर, अक्ल काम नहीं करती, जादू का खेल है। बस, दो अंगारे जला दिए और दुनिया भर जगमगाने लगी।
हमारे मियाँ आजाद और इस मिरजा आजाद में नाम के सिवा और कोई बात नही... |
चा के पास जा कर बोली - बेगम साहब ने मुझे आपके पास भेजा है और कहा है कि रुपए की जरूरत हो तो हम हाजिर हैं। जितने रुपए कहिए, भेज दें।
आजाद अपनी फौज के साथ एक मैदान में पड़े हुए थे कि एक सवार ने फौज में आ कर कहा - अभी बिगुल दो। दुश्मन सिर पर आ पहुँचा। बिगुल की आवाज सुनते ही अफसर, प्यादे, सवार सब चौंक ...Read Moreसवार ऐंठते... |
उर्दू में बात करते थे, वह फ्रांसीसी में जवाब देता था।
बड़ी बेगम का बाग परीखाना बना हुआ है। चारों बहनें रविशों में अठखेलियाँ करती हैं। नाजो-अदा से तौल-तौल कर कदम धरती हैं। अब्बासी फूल तोड़-तोड़ कर झोलियाँ भर रही है। इतने में सिपहआरा ने शोखी के साथ गुलाब का ...Read Moreतोड़ कर गेतीआरा की तरफ फेंका। गेतीआरा ने उछाला तो सि... |
हवा उसको ऐसी पसंद आई कि कई दिन तक उसी पड़ाव पर शिकार खेलती रही। एक ...Read Moreमिस-कलरिसा ने सुबह को देखा कि उसके खेमे के सामने एक दूसरा बहुत बड़ा खेमा खड़ा हुआ है। हैरत हुई कि या खुदा, यह किसका सामान है। आधी रात तक सन्नाटा था, एकाएक खेमे कहाँ से आ गए! एक औरत को भेजा कि जा कर पता लगाए कि ये कौन लोग है। वह औरत जो खेमे म... |
आज दूल्हा भाई आने वाले हैं यह आपने रेशमी दुपट्टा क्या समझ के फड़काया!
सुरैया बेगम चोरी के बाद बहुत गमगीन रहने लगीं। एक दिन अब्बासी से बोलीं - अब्बासी, दिल को जरा तकसीन नहीं होती अब हम समझ गए कि जो बात हमारे दिल में है वह हासिल न होगी।
साकिया ले तेरी महफिल से चले भर पाया।
सारी खुदाई में हमारा कोई नहीं।
अब्बासी ने कहा - ... |
रतों ने रहना शुरू किया है। एक का नाम फिरोजा है, दूसरी का फारखुंदा। इस गाँव में कोई डेढ़ हजार घर आबाद होंगे, मगर उन सब में दो ठाकुरों ...Read Moreमकान आलीशान थे। फिरोजा का मकान छोटा था, मगर बहुत खुशनुमा। वह जवान औरत थी, कपड़ेलत्ते भी साफ-सुथरे पहनती थी, लेकिन उसकी बातचीत से उदासी पाई जाती थी। फरखुंदा इतनी हसीन तो न थी, ... |
ा आदमी है। उसकी शक्ल-सूरत और चाल-ढाल से ऐसा मालूम होता है कि अगर इसे जनाने कपड़े पहना दिए जायँ, तो बिलकुल औरत मालूम हो। पीछे-पीछे छह हाथी और आते थे। जंगल में पहुँच कर लोगों ने हाथी रोक लिए ताकि शेर का हाल दरियाफ्त कर लिया जाय कि कहाँ है।
जब रात को सब लो खा-पी कर लेटे, तो नवाब साहब ने दोनों बंगालियों को बुलाया और बोले -... |
री हैं। जानी बेगम ने पूछा - असगर मियाँ कौन हैं? कोई देहाती भाई हैं? इस पर हशमत बहू ने कहा, बहन वह कोई हों। अब तो हमारे मेहमान हैं। फीरीजा बेगम बोलीं - हाँ-हाँ तमीज से बात करो, मगर वह जो आई है, उनको नाम क्या है? महरी ने आहिस्ता से कहा - फैजन। इस पर दो-तीन बेगमों ने एक दूसरे की तरफ देखा।
आजाद पोलेंड की शाहजादी से रुखसत ह... |
ते-डरते समझाया भी तो वह और रोने लगती और कहती - क्या अब तुम्हारी यह मर्जी है कि मैं रोऊँ भी न, दिल ही में घुट-घुट कर मरूँ। दो-तीन दिन तक वह कब्र पर जा कर फूल चुनती रही, कभी कब्र को चूमती, कभी खुदा से दुआ माँगती कि ऐ खुदा, शाहजादे बहादुर की सूरत दिखा दे, कभी आप ही आप मुसकिराती, कभी कब्र की चट-चट बलाएँ लेती। एक आँख से हँस... |
आजाद पाशा को इस्कंदरिया में कई दिन रहना पड़ा। हैजे की वजह से जहाजों का आना-जाना बंद था। एक दिन उन्होंने खोजी से कहा - भाई, अब तो यहाँ से रिहाई पाना मुश्किल है।
खोजी - खुदा का शुक्र करो ...Read Moreबचके चले आए, इतनी जल्दी क्या है?
आजाद - मगर यार, तुमने वहाँ नाम न किया, अफसोस की बात है।
खोजी - क्या खूब, हमने नाम नहीं किय... |
गए। आजाद को देखते ही वह रईस चौंक कर खड़ा हो गया और उनकी तरफ देख कर बोला - वल्लाह, आपसे मिलने का बहुत शौक था। शुक्र है कि घर बैठे मुराद पूरी हुई। फर्माइए, आपकी क्या खिदमत करूँ ?
बहार बेगम - यह सब दिखाने की बातें हैं। किसी से दो हाथी माँगे, किसी से दो-चार घोड़े कहीं से सिपाही आए, कहीं से बरछी-बरदार! लो साहब, बरात आई है।... |
तीनों पात्रों के सिवा हमारे विचार में तो और कोई ऐसा पात्र नहीं है जिसके विषय में कुछ कहना बाकी रह गया हो। अच्छा सुनिए। मियाँ खोजी मरते दम तक आजाद के वफादार दोस्त बने रहे। अफीम की डिबिया और करौली की धुन ने कभी उनका साथ न छोड़ा। मिस मीडा औ मिस क्लारिसा ने उर्दू और हिंदी पढ़ी और दोनो थियासोफिस्ट हो गईं।
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जान-पहचान और संपर्क की घनिष्ठता बढ़ने पर यार-दोस्तों की मंडली जुड़ती गयी । विद्यालय की सीमा छोड़ने पर खत्ता-दड़ी, धुन्ना, अंटा, और लट्टू खेलने की ऐसी बान पड़ी कि दूसरी कोई भी बात अच्छी नही लगती थी । खाना खाते समय मन खत्ता-दड़ी के साथ गुड़कने लग जाता ; पढ़ते समय धुन्ना के डण्डों में सराबोर हो जाता । धुन्ने की जीत में को... |
मैं बरस गुजरने के पहले-पहले कोरी पाटी पर सन्नाट लिखने लग गया, छपी हुई पोथी फर्राट बांचने लगा । ऐसा महसूस होने लगा, जैसे उस पढ़ाई के बहाने मैं प्रकृति का अगम रहस्य खोल रहा हूं । पाटी पर अंकित
अक्षर आंखों के सामने नाचने लगते । आंखों की दृष्टि के द्वारा हृदय के भीतर प्रवेश करने वाले अक्षर अनहद घूमर की धमा-चौकड़ी मचाने लग... |
र के ही आनदीलालजी थे. विद्यार्थियों को दुख पहुंचाने में उनका कोई जवाब नही था । कान उमेठ कर मुझे बुरी तरह पीटा - लातों में, घूसों से और ठोलों से । पसली में किसी एक घूस की असह्य चोट से मै मूच्छित हो गया। विद्या मीखने के निमित्त मार जरूरी होते हुए भी मुझे वैसी बेजा मार का सपने में भी अनुमान नहीं था । होश आते ही गुस्सा तो ... |
तरह एक नथुने से काला धुआं और दूसरे नथुने से उबलती भाप ! एक नथुना सर पर और दूसरा पांव तले । मेरी आंखें चकन-बकन ! माथा आक-वाक ! गोरो की कारीगरी का कोई तूमार है भला ! सारी दुनिया पर राज्य करें तो भी कम है !
गांव की तमाम बस्ती समाये जितनी बडी गाड़ी । डिब्बे - ही - डिब्बे । न बैल जुते हुए और न घोड़े ! किस तरह चलेगी? यह गाड... |
रही थी ! थकावट मिटाने के बहाने वह तेजी से सांस खींच रही थी । दौड़ते-दौड़ते आखिर बेदम होकर हांफना पड़े तो इस में आश्चर्य की क्या बात ? सूरज से भी काफी देर बाद - घड़ी-डेढ़-घड़ी के उपरांत मेरी आंख खुली ।
अपरिचित स्टेशन । अजनबी मानुस । अजाना हाट-बाजार। अजानी राह । अजाने घर । अजाने गाछ-बिरछ । अजाने कुत्ते और अजाने ही कौए ।... |
ह बेंतों के उपरांत ही चुक गयी । हाकिम की मेहरबानी ! कैदी के नितंबों से खून झरने लगा। उस दिन की वह भयंकर छबि बरसों तक मुझे बेचैन करती रही । कैदी का वह हृदयविदारक चीत्कार, कंटीली बेंतों के प्रहार ! नितंबों से रिसता लहू ! हाथ-पांव बंधे हुए ! साथ-ही-साथ मुंह में डूंजा खसोल उसका मुह बांध देते तो बेहतर था । खाना खाते समय मुझ... |
ी आबादी फैल गयी है । जानवरों की उपमा देने पर मनुष्य बुरा मानेगे या जानवर ? तुम्हे क्या लगता है ? तुम्हारा प्रत्युत्तर बांचने से मुझे काफी राहत मिलेगी । हमेशा की तरह देरी से जवाब न देकर, जरा जल्दी देना ।
आज की बात अलहदा है । उस दिन की बात अलहदा थी । इसी एक नाम से कक्षा में हाजरी देता था और आज भी उसी नाम से मेरी पहचान है... |
ने पर नीद आती। नीद के सपनो में भी सब से ढंगी रहता । दौड़ते-दौड़ते लड़खड़ा कर गिर पड़ता । न जगने पर शांति और न नीद में चैन । नग आकर हिन्दी, संस्कृत व गणित से कुश्ती लडता । कद-काठी में सब से छोटा और दुबला होने के कारण लडकियो के साथ बैठने की इजाजत मिल जाती थी। लड़कियो के सामने हेटी न लगे, मन-ही-मन ऐसी तरकीबें सोचता। किसी ... |
दिन-ब-दिन परिचय का दायरा बढ़ने लगा । किसी दूसरे माध्यम से पार नहीं पड़ी तो कुबद और कुलंगों की ओर मेरा मन स्वतः ही खिंचने लगा । और कुछ ही दिनों में हिन्दी व संस्कृत की अपेक्षा बदमाशी के सीगे में मेरा नाम भीतर ही भीतर चमकने लगा । कभी-कभार हेड माट सा'ब यों ही अपनी रौ मे प्रार्थना के बाद पूछ बैठते कि स्कूल में सबसे ज्यादा... |
ठेक योद्धा मूलचंदजी मा'ट सा'ब के घर के पिछवाड़े अंग्रेजी बबूलों की ओट मे छिप गये। पहले से ही हाथों में अंग्रेजी । बबूल की कंटीली छड़ियां थाम रखी थी। जिस आशंका की अविकल प्रतीक्षा थी, उसकी अस्पष्ट-सी फुसफुसाहट सुनाई पडी- 'मा'ट सा'ब.. माट सा'ब... मै तो आपकी बेटी... ... के समान हूं । नही.. मा 'ट सा'व... नही ।' जैसे सारा आक... |
थपायी और शाबाशी दी। आज तुम्हें यह पत्र लिखते समय, वाकई ऐसा महसूस हो रहा है इरपिंदर कि हेड मा 'ट सा'ब का वह अदृष्ट हाथ अभी-अभी मेरी पीठ थपथपा रहा है और वे अदृष्ट अधखुले होंठ मुझे बार-बार शाबाशी दे रहे हैं ।
देवी ठेठ सीढ़ियों तक नीचे हमें छोड़ने आयी । ऐसा महसूस हुआ कि मैं नीचे उतरने की बजाय ऊपर-ही- ऊपर चढ़ रहा हूं। उस के... |
े कई मर्त्तवा अपनी चौपामनी स्कूल मे उनकी बदली के आदेश निकाले, मगर बाड़मेर की जनता ने उन्हें एक बार भी विदाई नही दी । सारा बाजार बंद । सारा कामकाज ठप्प । और उदार कॉक्स साहब ने भी जनता की मर्यादा को एक बार भी खंडित नही किया। तार-पर-तार खड़खडाने से उन्हें मन मार कर वापस तार से ही बदली रद्द करनी पड़ती । वह एक-से-एक आला चुन... |
त सरे आम उजागर नहीं करते तो आज मुझे लिखते समय दो बार सोचना पडता । किन्तु उस खांटी बन्दे ने बाप होकर जब बेटी के बुरे भले की रंचमात्र भी चिन्ता न करके निर्भय - निशंक सबके सामने सत्य पर पर्दा नही डाला तो आज किसे, कैसी जोखिम है ? जोखिम तो उस दिन थी । पर सत्य की टेक रखने वाले जवामर्द बिरले ही जन्म लेते है । सुना है कि धरती ... |
मवरी का लहू तो होठों लग चुका था । दूसरों की रटी हुई कविताओं की तुलना में मेरी अपनी कविताएं खराब लगती थीं । मगर बदमाशी मे मेरी होड करने वाला कोई नहीं था । नामवरी का उछाह इस राह धीरे-धीरे तुष्ट होने लगा । नादान देवी समझाने की चेष्टा करती; पर निरर्थक । आखिर समझ तो अपनी ही काम देती है, इरपिंदर । शाहजी की सीख फलसे तक । वह क... |
नहीं भरा । हेड मा ट सा'ब ने अत्यधिक खुशी में छक कर मुझे शाबाशी दी। देवी के आनंद का भी वारापार नहीं था । उस रात दमकते सितारों के बीच उसका मन भी दमका होगा, जरूर दमका होगा। मुझे स्वयं भी कुछ देर के लिए यह भ्रम हुआ कि इस अथाह यश-कीत्ति का दावेदार मैं ही हूं । पर उस रात के सघन अधियारे मे मेरी आंखों के सामने यह स्पष्ट हो गय... |
कले, उस से कुछ आशा रखना ही बेकार है। आज तो अधिकांश मित्रों के नाम सोचने पर भी याद नहीं आते, पर उस दिन वाकई वियोग की दाह का कोई पार नहीं था। वैसे घनिष्ठ अंतरंग मित्र पीछे रह गये और मैं अकेला जीवित मुर्दे की तरह आधे-अधूरे होश में गाड़ी रवाना होने के साथ जुदा हो गया । उस समय नृसिंह ने जाली के धागों से गुंथी एक थैली और एक ... |
पत्थर तैरते थे । शहर का चुनिंदा स्कूल था । वैसे ही नामजद गुरु और वैसे ही कुशल विद्यार्थी ! कुए के मेंढ़क ने जैसे विशाल सरोवर मे छलांग मारी हो । कई दिन तक तो घबराया-घबराया-सा रहा । मानो अपने ठिकाने पर स्वयं खो गया हूं । किसी तरह का कोई संपट ही नहीं जुड़ पाया । जगल की नीलगाय बस्ती मे आने पर जिस तरह होश भूल जाती है, ठीक म... |
तुम में से प्रत्येक व्यक्ति को नए सिरे से जाँच करनी चाहिए कि अपने पूरे जीवन में तुमने परमेश्वर पर किस तरह से विश्वास किया है, ताकि तुम यह देख सको कि परमेश्वर का अनुसरण करने की प्रक्रिया में तुम परमेश्वर को वास्तव में समझ, बूझ और जान पाए हो या नहीं, तुम वास्तव में जानते हो या नहीं कि विभिन्न प्रकार के मनुष्यों के प्रति ... |
मागम में प्रवेश नहीं किया है और परमेश्वर को कभी नहीं समझा है, या कम-से-कम यह कहा जा सकता है कि तुमने उसे कभी समझना नहीं चाहा है। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का अनुशासन और ताड़ना क्या हैं, तो निश्चित रूप से तुम नहीं जानते कि आज्ञाकारिता और परवाह क्या हैं, या कम से कम तुमने कभी वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन और उसकी... |
नहीं चल रहा है, परमेश्वर पर उसका विश्वास किसी वास्तविक तत्त्व से रहित है, उसका परमेश्वर का ज्ञान भी निश्चित ही शून्य है, और कहने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर के प्रति श्रद्धा क्या होती है, इसका उसे बिलकुल भी पता नहीं है।
परमेश्वर का स्वरूप और अस्तित्व, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव - यह सब मानवजाति को उसके वचनों... |
श्वर के विरुद्ध विद्रोह करेगा। इसके विपरीत, मनुष्य द्वारा परमेश्वर की परवाह और आज्ञाकारिता बढ़ेगी और परमेश्वर के प्रति उसका आदर अधिक वास्तविक और गहन होगा। ऐसे समागम के मध्य, मनुष्य न केवल सत्य का पोषण और जीवन का बपतिस्मा प्राप्त करेगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान भी प्राप्त करेगा। ऐसे समागम के मध्य न के... |
अंधविश्वासों और रोमानी रंगों से युक्त भक्ति के पारंपरिक रूपों की बुनियाद पर ही अटका हुआ है। मनुष्य के परमेश्वर संबंधी ज्ञान के प्रस्थान-बिंदु पर ही रुके होने का अर्थ व्यावहारिक रूप से उसका न होना है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर की स्थिति और पहचान की पुष्टि के अलावा परमेश्वर पर मनुष्य का विश्वास अभी भी अस्पष्ट अनिश्चतता की ... |
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