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15. अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के परिशीलन पर, यह प्रकट है कि अभिकथित घटना ग्राम - गौस नगर, पुलिस थाना सैदपुर, जिला सीतामढ़ी में अवस्थित खाता सं 906 से संबद्ध प्लॉट सं ० 4303 की एक एकड़ 35 डिसमिल क्षेत्रफल वाली जमीन पर घटित हुई थी ।
5 - आवेदक की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य पर विचार करने के पहले यह न्यायालय उल्लिखित करेगा कि पुत्रियों श्रीमती स्मृति सिंह एवं श्रीमती प्रीति सिंह की ओर से दाखिल दोनों शपथ - पत्रों में उन्होंने स्पष्टतः कथित किया है कि आवेदक उनका भाई है तथा वसीयतकर्ता उनका पिता था ।
यह वैसा मामला नहीं है जहाँ पुलिस के उच्च पदाधिकारीगण किसी भी तरह अपराध इत्यादि के कारित होने में संलिप्त हैं, जैसी कि पश्चिम बंगाल राज्य या रूबाबूद्दीन शेख या पंजाब राज्य के मामलों (ऊपर) में उच्चतम न्यायालय के समक्ष स्थिति थी ।
जब दोषमुक्ति का निर्णय होता है, तब इस उपधारणा में और बल होता है तथा पूर्वोक्त पृष्ठभूमि में, ऐसा सुसंगत न्यायिक निर्णय रहा है कि अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य से दो मत संभव होने की दशा में, अभियुक्त के पक्ष में जाने वाला मत स्वीकार किया जाना चाहिए ।
जहां तक विधि के विरचित तात्विक प्रश्न का सवाल है, यहां यह उल्लिखित किया जा सकता है कि मूल न्यायालय एवं अपीलीय न्यायालय के भी निर्णय से, मैं नहीं पाता हूँ कि प्रतिवादी के पक्ष में या वादी के पक्ष में कोई अभिधान घोषित किया गया है ।
20. सुनवाई के शुल्क का भुगतान विद्वान न्यायमित्र श्री जितेंद्र नारायण सिन्हा को पटना उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति द्वारा किया जाए जिन्होंने दांडिक अपील (SJ) सं ० 247 वर्ष 1995 में अपीलार्थीगण मुंशी प्रेम चंद सिंह एवं गोपाल सिंह की ओर से अपील में जिरह किया है ।
12 - हीरो विनोद (अवयस्क) बनाम सेसम्मल (2006) 5 scc 545 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया था कि किसी दस्तावेज के निबंधनों के वैधानिक प्रभाव या विधि के किसी सिद्धांत की प्रयोज्यता को अंतर्ग्रस्त करने वाले दस्तावेज का अर्थान्वयन विधि के तात्विक प्रश्न हैं ।
यह सही है कि आरोप के समय, एकमात्र आवश्यकता यह देखने की होती है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, परन्तु साथ ही अभिलेख पर मौजूद सामग्री के आधार पर न्यायालय को समाधान है कि अभियोजन दुर्भावना से प्रारम्भ किया गया है ।
9 - अभियोजन साक्षियों के साक्ष्य से यह भी स्पष्ट नहीं है कि 6. 4. 2009 से 20. 5. 2009 तक, जब्त निषिद्ध पदार्थ पुलिस थाना के माला खाना में रखा गया था की अवधि के दौरान जब्त गांजे के साथ किस प्रकार निपटा गया था ।
भिन्न शब्दों में कहने पर, सिविल न्यायालय अधिनियम के प्रावधान उपबंधित करते हैं तथा न्यायिक पदाधिकारी, जो जिला प्रत्यायोजी नहीं है, को विवादित मामलों में प्रोबेट या प्रशासन पत्र प्रदान करने की अधिकारिता प्रदान करते हैं जो उत्तराधिकार अधिनियम के अधीन संभवतः उसके पास अनुपस्थित हो सकती है ।
(i) नीलामी बोली/निविदा की राशि की किश्त या 7 वर्षों तक तय पायी गयी राशि के भुगतान के उपरांत, 13 वर्षों तक प्रत्येक वर्ष 5 हजार रुपये जमा किये जाने तक क्रशर के इस्तेमाल के लिए स्टोन स्टॉकिस्ट अनुज्ञप्ति का नवीकरण किया जाएगा ।
2 - यह विवादित नहीं है कि याची जब सेवा में था, तब उसे रेनल सेल कारसीनोमा बीमारी होने का पता चला था जिसके परिणामतः उसका सैन्य अस्पताल में इलाज किया गया था और फिर उसे पुणे के सैन्य अस्पताल भेज दिया गया था ।
इन्हीं विशेष परिस्थितियों में, जहां संहिता के आदेश 9, नियम 13 के प्रावधानों के अधीन एक उपचार उपबंधित है सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया था कि संहिता की धारा 151 के अधीन इस्तेमाल की गयी शक्ति विधि के अनुसार नहीं था क्योंकि सम्बद्ध पक्षकार को विनिर्दिष्ट उपचार उपलब्ध था ।
वर्तमान मामले में विश्वविद्यालय की ओर से तर्कपूर्ण रूप से समय - समय पर न्यायालय द्वारा दोहराये गये विधि के सुस्थापित सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं जिनके बावजूद सांविधिक प्राधिकार एवं निकाय उन्हीं अभ्यापत्तियों को उठाना जारी रखे हुए हैं जिन्हें अनगिनत बार न्यायालय द्वारा नकार दिया गया है ।
प्रत्यर्थीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह निवेदन किया गया है कि याची सहायक शाखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत प्रत्यर्थी बैंक का एक जिम्मेदार पदाधिकारी था तथा वित्तीय अनियमितता के संबंध में आरोपों के मदों को पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत सामग्रियों की परीक्षा पर जांच पदाधिकारी द्वारा सिद्ध पाया गया है ।
(iii) कि याचीगण निवेदन करते हैं कि मामले का लंबित रहना जीवन के अधिकार समेत याची के मौलिक अधिकारों के प्रति दुर्भावनापूर्ण तथा अहितकारी होने के अलावा न्यायालय की आदेशिका का एक दुरूपयोग है तथा पी ० सी ० अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन भी है । ' '
5. प्रस्तुत किये गये दस्तावेज साक्ष्य प्रदर्श A, जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रदर्श 2 से 2/5 बेड हेड टिकट पर अ ० सा 6 की लिखावट तथा हस्ताक्षर है, प्रदर्श 3 फर्दबयान है, प्रदर्श 4 औपचारिक प्रथम सूचना रिपोर्ट है ।
प्रतिपरीक्षा में, वह कथित करता है कि उसे छोड़कर पड़ोस से कोई भी घटना स्थल नहीं गया था, जो पुनः सबकुछ झुठला देता है क्योंकि प्राथमिकी में ही यह कथित किया गया है कि इस गवाह समेत कुछ पड़ोसी भी थे जो घटना स्थल तक गये थे ।
अतएव, मेरी राय में प्रतिवादीगण के इस अभिवाक् तथा स्वीकरण पर विचार करते हुए कि यह केवल 17 फुट एवं 12 फुट है, इस संबंध में विचार के लिए मामले को प्रतिप्रेषित करना वांछनीय नहीं है कि आंशिक निष्कासन द्वारा वादी की आवश्यकता पूरी होगी या नहीं ।
जहाँ तक अन्य निर्णय, अर्थात, AIR 1991 Patna 183 (मोस्मात साईमुसिसा बनाम मोहीउद्दीन) का सवाल है यह प्रतीत होता है कि उस मामले में दान विलेख मेहर ऋण के बदले में था, अतएव, यह अभिनिर्धारित किया जाता है कि दान विलेख नास्ति दस्तावेज है ।
वादी सं ० 2 मो ० रजा खान तथा अ ० सा ० 6 ने भी पैरा 34 में अपने अभिसाक्ष्य में स्वीकार किया है कि वाद भूमि अभिधान वाद सं ० 01/1890 में तथा माननीय कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय में उल्लिखित नहीं की गयी है ।
यह विवादिन नहीं है कि समझौते का पक्षकार परियोजना का महाप्रबंधक था जैसा कि परिशिष्ट 2 पर मौजूद पंचाट, परिशिष्ट 4 श्रृंखला पर मौजूद अधिनियम की धारा 34 के अधीन दाखिल विविध मामले तथा विविध मामले में पारित आक्षेपित आदेश से भी प्रकट है ।
14. खंडपीठ द्वारा अधिकथित विधि की इस स्थिति की दृष्टि में, मेरी राय में वाटिका तथा बांसवाड़ी भी बिहार जोत समेकन एवं खंडकरण निवारण अधिनियम, 1956 की धारा 2 (9) के अधीन यथा परिभाषित ' भूमि ' की परिभाषा में सम्मिलित हैं ।
विद्वान अधिवक्ता के निवेदन का मुख्य बल बाद वाले निर्णय के पैराओं 16, 19 एवं 21 पर था जो निम्नांकित निबंधनों में है: " 16. तथापि, परमादेश का विशेषाधिकार रिट सार्वजनिक दायित्व का निष्पादन करने में बाध्य करने के लिए केवल सार्वजनिक प्राधिकारों तक सीमित है ।
इस गवाह ने अपनी प्रतिपरीक्षा के पैराओं 9 एवं 10 में यह भी कथित किया है कि उसका पुत्र राम प्रवेश तीन - चार दिनों के अंतराल पर बिदांती के ससुराल के आवास जाया करता था तथा उसकी मृत्यु के एक दिन पहले राम प्रवेश उसके ससुराल गया था ।
मुख्य द्वार पर कोई फाटक नहीं था तथा घर के अंदर प्रवेश करने पर, प्रांगण था एवं प्रांगण के पूर्व में दो कमरे थे, उत्तरी कमरे में लकड़ीयों के टुकड़े थे तथा दक्षिणी कमरे में बांस का दरवाजा था जिसमें जगबन्धु अपनी पत्नी के साथ रहा करता था ।
यह भी निवेदन किया गया है कि अभियोजन के मामले पर मुख्यतः इस आधार पर अविश्वास किया गया है कि फर्दबयान में सुसंगत अंशों पर दोहरी लिखावट है जो इंगित करती है कि फर्दबयान के अभिलेखन के समय तथा घटना के समय में भी प्रक्षेप है ।
अधिकरण अभिलेखों के सतर्क परिशीलन पर तथा पक्षकारों की सुनवाई करने के उपरान्त प्रखंड विकास पदाधिकारी द्वारा लिये गये दृष्टिकोण से सहमत रहा था कि चयन समिति द्वारा अपनाई गयी पूर्णतः अनुचित तथा अवैधानिक प्रक्रिया के कारण प्रत्यर्थीगण द्वारा क्रियान्वित समूची चयन प्रक्रिया विधि में दूषित हो चुकी थी ।
विद्वान विचारण न्यायालय इस विनिर्दिष्ट निष्कर्ष पर पहुँचा था कि वादी वाद संपत्ति पर अपना कब्जा तथा अभिधान सिद्ध करने में विफल रहा था तथा इसके अलावा, प्रतिवादीगण द्वारा प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य भी वाद संपत्ति पर वादी के अभिधान एवं कब्जे के दावे को झुठलाते थे ।
20 - आक्षेपित विज्ञापन में वस्तुतः किसी वाहन को चलाने के अनुभव वाला खंड कमोवेश सरकारी नियमावली के अनुरूप है जबकि हल्के मोटर यान तथा भारी मोटर यान दोनों की ड्राइविंग लाईसेंस की आवश्यकता आई ० सी ० ए ० आर ० के मार्गनिर्देशों के अनुसार है ।
इन शिक्षकों को 30. 9. 2007 तक अवमुक्त करने के लिए केन्द्र सरकार का निर्णय गृह विशेष विभाग, बिहार सरकार द्वारा 22. 8. 2007 को प्रधान सचिव, स्वास्थ्य विभाग को संसूचित कर दिया गया था, अन्यथा उन्हें अवमुक्त समझा जायेगा ।
उनके ही कथनानुसार, जून, 2009 में उन्हें मालूम हुआ था कि समिति पहले ही अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी थी परन्तु सद्भावना में उन्होंने वर्तमान अवमान याचिका के साथ इस न्यायालय के पास आना समुचित समझने के पहले डेढ़ वर्ष तक उक्त रिपोर्ट के क्रियान्वयन की प्रतीक्षा किया था ।
उक्त शपथपत्र में, यह भी स्पष्टतः कथित किया गया है कि अधिक आयु के उम्मीदवारों को आयु के शिथिलीकरण से संबंधित दिनांक 8. 7. 2013 के सरकार के निर्णय के निबंधनों में, इसके सम्बन्ध में समुचित कदम इस न्यायालय के निर्णय के आलोक में उठाये जायेंगे ।
इस संबंध में, याचीगण ने जिला स्तर पर फार्मासिस्ट के पद पर नियुक्ति के संबंध में पिछली परिपाटी पर भरोसा किया है जहां मौखिक साक्षात्कार के लिए केवल 20 प्रतिशत अंक निर्धारित किये गये थे तथा शेष अंक उम्मीदवारों के शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर प्रदान किये गये थे ।
88. दूसरी ओर, प्रत्यर्थी, रिट याची के विद्वान अधिवक्ता श्री वर्मा ने निवेदन किया है कि इस न्यायालय द्वारा जिलाधिकारी में अधिकारिता निहित करने का कोई प्रश्न नहीं होगा, क्योंकि जिलाधिकारी के लिए इस न्यायालय द्वारा यथास्थापित विधि के अनुसार कार्य करना आवश्यक था ।
14. जहां तक दूसरी प्राथमिकी की पोषणीयता सवाल है, दांडिक विविध संख्या 13966 वर्ष 2012 में कार्यवाहियों, जिसकी एक प्रतिलिपि परिशिष्ट 1 पर रखी हुई है, के पिछले चक्र में इस न्यायालय द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता की दृष्टि में अभ्यापत्ति ही भ्रामक है ।
माननीय धरणीधर झा एवं अमरेश कुमार लाल, न्यायमूर्तिगण अशोक डोम (129 में) गणेश डोम एवं एक अन्य (155 में) बनाम बिहार राज्य (दोनों में) Criminal Appeal (DB) Nos. 129 with 155 of 1991. Decided on 17th July, 2014.
इसे उल्लिखित किया जाए कि याची के विद्वान अधिवक्ता श्री पी ० सी ० अग्रवाल जो प्रारूप इस न्यायालय के समक्ष लेकर आये हैं, उसे उन्हें लौटाया जाय ताकि वह न्यायालय की अनुमति के अध्याधीन अवर न्यायालय में विपक्षी संख्या 2 के अधिवक्ता को प्रारूप सौंप सकें ।
चूंकि अपराध किए जाने की तिथि और/अथवा दोषसिद्धि की तिथि पर लघु मात्रा और वाणिज्यिक मात्रा के बीच कोई सुभिन्नता नहीं थी, संशोधनकारी अधिनियम के प्रावधानों के कारण कम दंड दिए जाने का प्रश्न, हमारे सुविचारित मत में, उद्भूत नहीं होगा ।
विद्वान निरीक्षण न्यायाधीश ने कथित रूप से इसमें जांच का निर्देश दिया था एवं विशेष कार्य पदाधिकारी एवं रजिस्ट्रार (निगरानी) से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर, तत्कालीन माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा निर्गत निर्देश पर मामले को स्थायी समिति के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया था ।
आगे यह मामला है कि मुनेश्वर मऊआर की ऊन की टोपी घटना स्थल पर नीचे गिर गयी थी जब वह भाग रहा था जो अभी भी घटना स्थल पर थी तथा लालटेन एवं टार्च के प्रकाश में सूचनादाता ने अभियुक्त व्यक्तियों को पहचान लिया था ।
122. हम दोहराते हैं कि 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा, क्रीमी श्रेणी की संकल्पना तथा पिछड़ेपन, प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता तथा समग्र प्रशासनिक कार्यकुशलता जैसे अनिवार्य कारण संवैधानिक अपेक्षाएं हैं जिनके बिना अनुच्छेद 16 में समानता के अवसर का ढांचा ढह जायेगा ।
इसके परिणामतः उच्च न्यायालय में निहित अधीक्षण की शक्ति का विस्तार नहीं हुआ है, परन्तु यह सुनिश्चित करने का यह एक उपकरण उपलब्ध कराती है कि न्यायालय अपनी अधिकारिता के भीतर विधि की स्थापित प्रक्रिया के अनुसार कार्य करे ताकि लोगों का न्यायतंत्र में विश्वास हो सके ।
अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ में है, यह कहा जा सकता है कि ऐसा कार्य लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय कारित किया गया था एवं शिकायत किये गये कार्य तथा लोक सेवक के आधिकारिक कर्त्तव्य के बीच पूरा संबंध था ।
5 - इस तथ्य पर विचार करते हुए कि अपीलार्थी को स्वीकार्यतः पुनर्विलोकन चिकित्सा बोर्ड द्वारा अयोग्य पाया गया है, हमारी राय है कि वर्तमान मामले के तथ्यों तथा संलग्न परिस्थितियों में अपीलार्थी को भर्ती न करने का प्रत्यर्थीगण का निर्णय अवैधानिक या अनुचित नहीं कहा जा सकता है ।
7 - पक्षकारों की सुनवाई करके, यह न्यायालय आवेदन में आग्रह किये गये अनुतोष को अस्वीकार करते हुए याची को विधि में उपलब्ध तथा अधिकरण के आदेश (परिशिष्ट 4) के पैरा 12 में इंगित उपचार का अवलंब लेने की अनुमति देते हुए इसका निस्तारण करता है ।
तथापि, विद्वान अधिवक्ता इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि सभी चिकित्सकों का मुख्य साक्ष्य यह है कि प्रश्नाधीन उपहतियां रिवाल्वर के कुंदे से कारित की जा सकती थीं तथा एक तीक्ष्ण छोर वाले हथियार से कारित किये जाने के कारण यह एक छिन्न घाव जैसी दिखेंगी ।
इसके बाद डॉ ० काजिम हुसैन ने सायमा खातुन से विवाह किया था तथा पूर्वोक्त विवाह से, उन्हें पांच पुत्र तथा एक पुत्री भी उत्पन्न हुए थे जो सायमा हुसैन, कय्युम हुसैन, आबिद हुसैन, जाहिद हुसैन, नाजरा हुसैन, तस्लीम (सभी वादीगण) हैं ।
क्योंकि प्रथम सूचना रिपोर्ट के अनुसार घटना सूचनादाता के दुकान पर हुयी थी, परन्तु गवाह दावा करते हैं कि घटना डोमी सादा के प्रांगण के दक्षिण में हुयी थी, जो दुकान से उत्तर में लगभग 25 गज की दूरी पर है ।
अभियुक्त के दोष अथवा अन्यथा के संबंध में निष्कर्ष दर्ज करने के पहले परीक्षा का मानक और निर्णय जिसे अंततः लागू किया जाना है को बिल्कुल सटीक रूप से संहिता की धारा 227 अथवा धारा 228 के अधीन मामला विनिश्चित करने के चरण पर लागू नहीं किया जाना है ।
दूसरी ओर, इसमें पहले निर्दिष्ट अधिकांश मामले उन मामलों की विचित्र तथ्यों तथा परिस्थितियों के कारण उलट दिये गये थे या तो इस कारण कि प्राप्तकर्ता सेवानिवृत्त हो चुके थे या सेवानिवृत्ति के कगार पर थे या प्रशासनिक सोपान क्रम में निम्नतर पदों पर पदस्थापित थे ।
माननीय ईकबाल अहमद अंसारी एवं समरेन्द्र प्रताप सिंह, न्यायमूर्तिण राम अवतार राय एवं अन्य (दोनों में) बनाम बिहार राज्य (दोनों में) Criminal Appeal (DB) Nos. 451, 527 of 1993. Decided on 21st May, 2015.
संहिता की धाराओं 154, 155, 156, 157, 162, 169, 170 तथा 173 के उपबंधों की योजना के अनुसार, किसी संज्ञेय अपराध के कारित किये जाने के संबंध में केवल पूर्वतम या प्रथम सूचना संहिता की धारा 154 की अपेक्षाओं को पूरा करती है ।
निःसंदेह परिवादी का एक मामला है कि यह दुर्व्यवहार के लिए मृतक को पकड़े जाने तथा चुने जाने का एक मामला था तथा उसे अपीलार्थी एवं फुलबगान पुलिस थाना के थाना प्रभारी की निशानदेही पर तथा उनके कहने पर एक पुलिस कॉन्स्टेबल द्वारा मारा पीटा गया था ।
अपने उपरोक्त तर्क के समर्थन में, उन्होंने भगवान दास एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य [ (2010) 3 scC 545 ] के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (विशेषकर पैराओं 19, 28, 30 एवं 36) पर भरोसा किया है ।
ऐसी परिस्थितियों में, जब इस गवाह ने पूर्वतम अवसर पर पुलिस के समक्ष एक चक्षुदर्शी वर्णन प्रदान नहीं किया था तथा ऐसे अतिमहत्वपूर्ण बिन्दु पर अन्वेषण पदाधिकारी की अपरीक्षा ने अपीलार्थी को हानि कारित की है, हम इसे अभियोजन के विरूद्ध निर्णीत करेंगे ।
याची का मामला यह है कि अंतिम रिपोर्ट के प्रस्तुत किये जाने के उपरान्त विद्वान दंडाधिकारी ने पुलिस रिपोर्ट के साथ मतांतर रखते हुए भारतीय दंड संहिता की धाराओं 363, 366A/34 के अधीन अपराधों का संज्ञान लिया था तथा मामला सत्र न्यायालय भेज दिया गया था ।
89. 01. निवेदन यह है कि यद्यपि विधायिका द्वारा बनाए गए नियमों के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए विधायिका के पास दण्डों का प्रावधान करने का अधिकार है, प्रक्रिया तथा दण्ड उचित होने हैं एवं अति कठोर नहीं क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघनकारी होगा ।
इसके अलावा, जवाबी मामले का होना तथा पक्षकारों का एक दूसरे का गोत्रज होना भी पूर्वोक्त उद्धरण के अधीन यथा अधिकथित सिद्धांत की परिधि के भीतर नहीं आएगा क्योंकि ये बातें अखंडनीय दस्तावेज हैं इस तथ्य के साथ कि निष्कर्ष अभी आना शेष है ।
इन दोनों मुद्दों पर विचारण न्यायालय तथा अपीलीय न्यायालय ने सहवर्ती निष्कर्ष अभिलिखित किये हैं कि वादी वाद आवास की सद्भावी एवं युक्तियुक्त वैयक्तिक आवश्यकता एवं किये गये दावानुसार प्रतिवादी द्वारा किराये के भुगतान में व्यतिक्रम को भी सिद्ध करने में विफल रही है ।
वादी का मामला यह है कि उसके ससुर की मृत्यु के उपरान्त उनके वंशजों के बीच बंटवारा हुआ था एवं उक्त उक्त बंटवारे में वादी की सास को भवन का पश्चिमी हिस्सा आवंटित किया गया था तथा पूर्वी हिस्सा वादी के पति को आवंटित किया गया था ।
संरक्षण पदाधिकारी की रिपोर्ट भी इंगित करती है कि प्रश्नाधीन घर विपक्षी सं ० 2 के नाम अभिलिखित है तथा संरक्षण पदाधिकारी ने याची का बयान अभिलिखित करते समय अभिलिखित किया है कि याची सूचनादाता को उक्त घर में रहने देने की अनुमति देने का इच्छुक नहीं है ।
5. अपीलार्थी की ओर से उपस्थित होनेवाले विद्वान अधिवक्ता श्री मिश्रा ने निवेदन किया है कि विद्वान एकल न्यायाधीश को ग्राम पंचायत के मुखिया द्वारा दाखिल रिट आवेदन ग्रहण नहीं करना चाहिए था क्योंकि उसे विद्वान अधिकरण के आदेश से व्यथित पक्ष नहीं कहा जा सकता था ।
प्रतिपरीक्षा के दौरान, अन्य के अलावा पैरा 4 में अपीलार्थी ने घटना के ढंग पर इस गवाह की प्रतिपरीक्षा की थी जिसपर उसने विस्तार से बताया था कि घटना के समय वह बच्ची थी, अतएव, उसे एक एक विवरण स्मरण नहीं है परन्तु रक्तस्राव हो रहा था ।
2010 की नियमावली की भूमिका तथा उसमें अंतर्विष्ट उपबंधों से, यह प्रकट है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 309 के परंतुक के अधीन 2010 की नियमावली विरचित करने का एकमात्र उद्देश्य एक बार के उपाय के रूप में उक्त 34, 540 पदों को भरना था ।
इस प्रकार, प्रत्यर्थीगण द्वारा सत्यापन के अध्यधीन, उसपर कर की कोई और दायिता बाकी नहीं माननीय राकेश कुमार, न्यायमूर्ति शिवेश कुमार कर्ण बनाम बिहार राज्य एवं अन्य C. W. J. C. No. 452 of 2011. Decided on 11th January, 2016.
(a) कोई व्यक्ति एक असामाजिक तत्व है, तथा (b) (i) जिले या इसके किसी भाग में उसकी आवाजाही या कृत्य व्यक्तियों या संपत्ति को संत्रास, खतरा या नुकसान कारित कर रहे हैं या ऐसा करने के लिए निर्दिष्ट हैं; या ।
रिट याची, जो इसमें एकमात्र निजी प्रत्यर्थी है, की व्यथा यह भी कि उसने प्रवेशिका प्रमाण पत्र में यथा अभिलिखित अपनी जन्म तिथि की परिशुद्धि के लिए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (संक्षेप में समिति ') के यहां आवेदन किया था जिससे इनकार कर दिया गया है ।
(iv) जहाँ ऐसी असफलता या उल्लंघन के परिणामस्वरुप मृत्यु हो जाती है, वहाँ वह कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी जो दस लाख रुपये से कम नहीं होगा दंडनीय होगा ।
माननीय अंजना प्रकाश एवं राजेन्द्र कुमार मिश्रा, न्यायमूर्तिगण मलीदा देवी एवं अन्य (439 में) बिजय कुमार सिन्हा (436 में) बनाम बिहार राज्य (दोनों में) Criminal Appeal (DB) Nos. 439 with 436 of 2002. Decided on 4th July, 2016.
त्वचा के नीचे वातस्फीती हो सकती है, अगर फेफड़े के साथ पेराइटल प्लूरा भी फटा हो तथा चेहरे, गर्दन तथा छाती के उत्तकों पर वायु की विशिष्ट क्रेपिटस दर्शाता हो, तथा संक्रमित मिडियाटिनस के सहबद्ध श्वासनली के कटने या फटने में भी देखा जा सकता है ।
वाहन के मालिक के पिता एवं पति मोटर यान अधिनियम की धारा 147 के भीतर व्यक्ति पद की परिधि के भीतर नहीं आते हैं, बीमाकर्ता तीसरे पक्ष के सारे जोखिम को आच्छादित करने का दायी होगा तथा अन्य का नहीं जो अन्यथा उसकी परिधि के भीतर नहीं आएंगे ।
4 - अभिलेख से यथा प्रतीत होनेवाले तथ्य दर्शाते हैं कि समिति निबंधन अधिनियम, 1860 तथा उसके अधीन विरचित नियमावली के अधीन पर्व में याची संगठन को किसी समय वर्ष 1971 में सलभ 2017 (4) BLJ इंटरनेशनल समाज सेवा संगठन के तौर पर निबंधित किया गया था ।
7 - रीडर से प्रोफेसर के पद पर प्रोन्नति की विनिर्दिष्ट ढंग को उपबंधित करनेवाले प्रावधानों का पठन दर्शायेगा कि रीडर से प्रोफेसर के पद पर प्रोन्नति के मामले में क्रियान्वित कैरियर उन्नयन योजना ने पूर्ण रूप से कालबद्ध प्रोन्नति योजना की संकल्पना को अतिष्ठित कर दिया है ।
28 - प्रकटतः, विचारण न्यायालय का निर्णय मध्यवर्ती परिस्थितियों के कारण इस याची - अपीलार्थी के पक्ष में गया है जहां अपीलार्थी ने संभवतः गवाहों तथा पीड़ित के परिवार को प्रभावित किया होगा, जो सभी सहग्रामीण हैं, तथा जैसा कि सामान्यतः समय गुजरने के साथ होता है ।
इसके अतिरिक्त, मेरी राय में, उस व्यक्ति को धन वाद के एक पक्षकार के तौर पर जोड़े जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी जिसने विपक्षी संख्या 1 को कब्जाविहीन किया था क्योंकि विपक्षी सं ० 1 का दावा केवल प्रतिफल राशि की वसूली के लिये है ।
11 - प्रस्तुत मामले में परिवाद याचिका से ही, यह प्रकट है कि याची संख्या 2 के साथ सौदा तय करने के उपरान्त याची संख्या 1 के खाते में परिवादी द्वारा दस लाख रुपये अंतरित किये गये हैं, जो तथ्य याचीगण द्वारा भी स्वीकार किया गया है ।
17. हमारी राय है कि अधिनियम की धारा 14A (2) के निबंधनों में जमानत प्रदान करनेवाले या जमानत से इनकार करनेवाले विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय द्वारा 26. 1. 2016 के उपरान्त ही अभिलिखित किसी आदेश के विरूद्ध उच्च न्यायालय के समक्ष अपील होगी ।
माननीय राजेन्द्र मेनन, मुख्य न्यायाधीश एवं सुधीर सिंह, न्यायमूर्ति देशरत्न डॉ ० राजेन्द्र प्रसाद दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड एवं एक अन्य बनाम बिहार राज्य एवं अन्य LPA No. 386 of 2016 In CWJC No. 1028 of 2005. Decided on 20th March, 2017.
39. विधान सभा की और उसके सदस्यों और समितियों की तथा, यदि विधान परिषद् है तो, उस विधान परिषद् की और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ; राज्य के विधान-मंडल की समितियों के समक्ष साक्ष्य देने या दस्तावेज पेश करने के लिए व्यक्तियों को हाजिर कराना।
(3) सदन का कोई नामनिर्देशित सदस्य, सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा यदि वह, यथास्थिति, अनुच्छेद 99 या अनुच्छेद 188 की अपेक्षाओं का अनुपालन करने के पश्चात् अपना स्थान ग्रहण करने की तारीख से छह मास की समाप्ति के पश्चात् किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है।
परंतु जहाँ यह प्रश्न उठता है कि सदन का सभापति या अध्यक्ष निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं वहाँ वह प्रश्न सदन के ऐसे सदस्य के विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा जिसे वह सदन इस निमित्त निर्वाचित करे और उसका विनिश्चय अंतिम होगा।
(ख) भारत की प्रभुता तथा प्रादेशिक अखंडता को अनअंगीकृत, प्रश्नगत या विछिन्न करने, अथवा भारत राज्यक्षेत्र के किसी भाग का अध्यर्पण कराने अथवा भारत राज्यक्षेत्र के भाग को संघ से विलग कराने अथवा भारत के राष्ट्रीय ध्वज, भारतीय राष्ट्रगान और इस संविधान का अपमान करने वाले, क्रियाकलाप को रोकना,
(ii) किसी अन्य समुत्थान की दशा में, वह व्यक्ति अथवा वह व्यक्ति और उपधारा (3) में निर्दिष्ट अन्य व्यक्तियों में से एक या अधिक व्यक्ति परस्पर मिलकर, पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय ऐसे समुत्थान के लाभों के बीस प्रतिशत से अन्यून के फायदाप्रद रूप से हकदार हो या हों।
(iii) किसी सहकारी सोसाइटी, कंपनी या अन्य व्यक्ति-संगम का सदस्य जिसको, यथास्थिति उस सोसाइटी, कंपनी या संगम की गृह निर्माण स्कीम के अधीन कोर्इ भवन या उसका कोर्इ भाग आबंटित किया गया है या पट्टे पर दिया गया है, उस भवन का या उसके उस भाग का स्वामी समझा जाएगा;
परन्तु जहां ऐसा निर्धारिती कोर्इ फर्म या व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय है वहां इस धारा के अधीन कटौती, यथास्थिति किसी भागीदार या ऐसी फर्म, व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय, के किसी सदस्य की आय की संगणना करने में अनुज्ञात नहीं की जाएगी:
परन्तु इस उपधारा के उपबंध, ऐसे निर्धारिती की दशा में जो भारतीय कम्पनी है किसी ऐसी मशीनरी या संयंत्र की बाबत जो उसके द्वारा होटल के रूप में प्रयुक्त परिसर में लगाया गया है, वहां लागू नहीं होंगे जहां ऐसा होटल केन्द्रीय सरकार द्वारा तत्समय इस निमित्त अनुमोदित है।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, जहां निर्धारिती के विशेष खाते में या निक्षेप खाते में उसके नाम में जमा कोर्इ रकम किसी पूर्ववर्ष के दौरान राष्ट्रीय बैंक द्वारा जारी की जाती है या निक्षेप खाते से निर्धारिती द्वारा निकाली जाती है और ऐसी राशि–
33कखक.(1) जहां निर्धारिती भारत में पैट्रोलियम या प्राकृतिक गैस या दोनों की संभावना का पता लगाने, या निकालने या उत्पादन करने का कारबार चला रहा है और जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार ने ऐसे कारबार के लिए ऐसे निर्धारिती के साथ करार किया है, पूर्ववर्ष के अंत से पहले—
परन्तु यह कि खंड (ii)या खंड (iii) में निर्दिष्ट अनुसंधान संगम, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या अन्य संस्था, यथास्थिति, खंड (ii) या खंड (iii)के अधीन अनुदान के अनुमोदन या उसे जारी रखे जाने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार को विहित फार्म में और रीति से आवेदन करेगा:
परन्तु यह और कि यह धारा उस व्यक्ति को लागू नहीं होगी जिसे धारा 44ख या धारा 44खखक में निर्दिष्ट प्रकृति की आय, यथास्थिति, 1 अप्रैल, 1985 से ही या उस तारीख से ही जिसको सुसंगत धारा प्रवृत्त हुर्इ हो, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, प्राप्त होती है:
परंतु जहां 31 जनवरी, 2018 को ऐसे एक्सचेंज में उस आस्ति में कोर्इ व्यापार नहीं होता है, वहां 31 जनवरी, 2018 से तुरंत पूर्व ऐसी तारीख को, जब ऐसे एक्सचेंज में ऐसी आस्ति का व्यापार किया गया था, ऐसे एक्सचेंज में ऐसी आस्ति की अधिकतम कीमत उसका उचित बाजार मूल्य होगी;
परन्तु यदि किसी मामले में हुंडी पर उधार ली गर्इ रकम इस धारा के उपबंधों के अधीन किसी व्यक्ति की आय समझी गर्इ है तो ऐसा व्यक्ति ऐसी रकम के लौटाने पर इस धारा के उपबंधों के अधीन ऐसी रकम की बाबत पुन:निर्धारण किए जाने का दायी नहीं होगा।
(2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी निधि में निर्धारिती के नाम में जमा कोर्इ ऐसी रकम, जिसकी बाबत उपधारा (1) के अधीन कटौती अनुज्ञात की गर्इ है, निर्धारिती के खाते में प्रोद्भूत या जमा ब्याज अथवा बोनस के साथ निर्धारिती या उसके नामनिर्देशिती द्वारा,–
(i) निर्धारिती द्वारा विनिर्मित या प्रसंस्कृत माल या वाणिज्या के संबंध में वह रकम होगी जिसका कारबार के समायोजित लाभों से वही अनुपात है जो ऐसे माल के संबंध में समायोजित निर्यात-आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के समायोजित कुल आवर्त से है; और
परन्तु यह शर्त किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम की बाबत लागू नहीं होगी जो निर्धारिती द्वारा ऐसे किसी औद्योगिक उपक्रम के कारबार के, जो धारा 33ख में निर्दिष्ट है, उस धारा में, उल्लिखित परिस्थितियों में और अवधि के भीतर पुन:स्थापन, पुनर्गठन या पुन:चालन के परिणामस्वरूप बना है;
80त. (1) जहां किसी निर्धारिती की दशा में, जो सहकारी सोसाइटी है, उसकी सकल कुल आय में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कोर्इ आय सम्मिलित है, वहां निर्धारिती की कुल आय में संगणना करने में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट राशियों की कटौती इस धारा के उपबंधों के अनुसार और अध्यधीन की जाएगी।
(1) जहां इस आदेश के अधीन नियुक्त कमिश्नर के समक्ष कार्यवाहियों में साक्षी से पूछे गए किसी प्रश्न पर किसी पक्षकार या उसके प्लीडर द्वारा आक्षेप किया जाता है, वहां कमिश्नर प्रश्न, उत्तर, आक्षेपों को और इस प्रकार आक्षेप करने वाले, यथास्थिति, पक्षकार या प्लीडर का नाम लिखेगा:
(क) पारिस्थितिकी संवेदी जोन में जैव चिकित्सा अपशिष्ट का निपटान भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समय-समय पर यथा संशोधित अधिसूचना सं.सा.का.नि 343 (अ), तारीख 28 मार्च, 2016 के तहत प्रकाशित जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा।
जेट द्वारा यह निर्वचन की इसका प्रबंध पर नियंत्रण होगा, पूर्णतः त्रुटिपूर्ण है क्योंकि शुल्क इत्यादि के वर्धन समेत संस्थान के कार्यकलाप में निर्णय लेने के लिए प्रबंध एकमात्र प्राधिकार है और, अतएव, मेरे विचार में शुल्कों में बढ़ोत्तरी भी प्रबंध का एक अनन्य अधिकार क्षेत्र है ।