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महाराजा महेश्वर सिंह – 1850–1860 तक राजा रहलै। इनको मृत्यु के पश्चात् कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह के अवयस्क होला के कारण दरभंगा राज क॑ कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत लेलकै। जखनी कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह बालिग होलै तखनी अपनो पैतृक सिंहासन प॑ आसीन होलै।
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17.महाराजा महेश्वर सिंह
https://anp.wikipedia.org/wiki/17.%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%20%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%20%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9
अंकगणित गणित केरो सबसँ पुरानो शाखा मँ सँ एक छेकै । अंकगणित (Arithmetics) गणित केरो तीन बड़ौ शाखा मँ सँ एक छेकै। अंकों तथा संख्याओं की गणनाओं से सम्बंधित गणित की शाखा को अंकगणित कहा जाता हैं। यह गणित की मौलिक शाखा है तथा इसी से गणित की प्रारम्भिक शिक्षा का आरम्भ होता है। प्रत्येक मनुष्य अपने दैनिक जीवन में प्रायः अंकगणित का उपयोग करता है। अंकगणित के अन्तर्गत जोड़, घटाना, गुणा, भाग, भिन्न, दशमलव आदि प्रक्रियाएँ आती हैं। इतिहास मनुष्य आरम्भ से ही सामाजिक प्राणी रहा है तथा अपने प्रारम्भिक काल में कबीला बना कर रहा करता था। जब कबीले के सदस्यों में वृद्धि होने पर उनकी गिनती करने के लिये अंकों की आवश्यकता पड़ी। अंक बनाने के लिये मनुष्य की अंगुलियाँ आधार बनीं। अंको के इतिहास के विषय में बहुत कम जानकारियाँ उपलब्ध हैं। कहा जाता है कि ईसा पूर्व 1850 में बेबीलोन के निवासी गणित की प्रारम्भिक प्रक्रियाओं से अच्छी तरह से परिचित थे। भारत में अंकगणित का ज्ञान अत्यन्त प्राचीनकाल से रहा है तथा वेदों में गणितीय प्रक्रियाओं का उल्लेख है। शून्य भी भारत की ही देन है। अंक आरू संख्या शून्य (०) से लेकर नौ (९) को प्रदर्शित करने वाले संकेतों को अंक कहते हैं। अंक ही गणित का मूल है। दैनिक जीवन के अधिकांश कार्यों में अंकों का प्रयोग होता है। एक से अधिक अंकों को एक के पास एक रखने से संख्या बनती है। अंक केवल दस होते हैं, किन्तु संख्याएँ अनन्त हैं। उदाहरण के लिए ३४७२ (तीन हजार चार सौ बहत्तर) एक संख्या है जिसमें ३, ४, ७, और २ अंक प्रयुक्त हुए हैं। अंकगणित केरो मूल प्रक्रिया अंकगणित की मुख्य चार मूल प्रक्रियाएँ होती हैं जोड़ घटाना गुणा भाग जोड़ जब किसी संख्या या अंक में एक या एक से अधिक संख्या या अंक को मिलाया जाता है तो उसे जोड़ (:en:Addition) कहते हैं। जोड़ को + चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरणः 10 + 10 = 20 25 + 50 =75 घटाना जोड़ने की प्रक्रिया के विरुद्ध प्रक्रिया को घटाना (:en:Subtraction) कहा जाता है। जब किसी संख्या अथवा अंक से किसी दूसरी संख्या या अंक को कम किया जाता है तो उसे घटाना कहा जाता है। घटाने को - चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरणः 14 - 6 = 8 २४-१० = १४ गुणा जब किसी संख्या अथवा अंक में उसी संख्या अथवा अंक को एक या एक से अधिक बार जोड़ा जाता है तो उसे गुणा (:en:Multiplication) कहते हैं। संख्या अथवा अंक को जितनी बार जोड़ा जाता है वह उतनी ही बार गुणा होता है। गुणा को x चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरणः 2 x 4 = 8 4+4=8 1.माना कि किसी व्यक्ति की सैलरी 10,000 हैं और 3 साल बाद उसकी सैलरी 4 गुणा बढ़ जाती है ? सैलरी 10,000/- 3 साल बाद सैलरी 4 गुणा बढ जाती है ! 4 X 10,000 = 40,000/- या 10,000+10,000+10,000+10,000 = 40,000/- भाग गुणा करने की प्रक्रिया के विरुद्ध प्रक्रिया को भाग (:en:Division) कहा जाता है। जब किसी संख्या अथवा अंक में किसी संख्या अथवा अंक को एक से अधिक बार घटाया जाता है तो उसे भाग कहते हैं। संख्या अथवा अंक को जितनी बार विभाजित किया जाता है, उतनी ही बार भाग देना होता है। भाग को / चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरणः 4 / 2 = 2 ई भी देखौ बीजगणित ज्यामिति त्रिकोणमिति कैलकुलस बाहरी कड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये अंकगणित (गूगल पुस्तक; लेखक - आर एस अग्रवाल) वस्तुनिष्ट अंकगणित (गूगल पुस्तक ; लेखक -खट्टर) गणित अंकगणित
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अंकगणित
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A4
कच्चा या पकाय क खाबै लेली बीज सिनी स॑ छोटऽ-छोटऽ पौधा जन्माना अंकुरण कहलाबै छै। अंकुरण द्वारा किसी भी ऋतु में सलाद प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा अंकुरण घर पर या औद्योगिक रूप से किया जा सकता है। अंकुरित खाद्य पूर्वी एशियाई देशों में प्रमुखता से खाया जाता है। माल्ट बनाने के लिये जौ का बड़े पैमाने पर अंकुरण किया जाता है। उदाहरण अच्छी सोच एक अंकुर के समान है। गेहूँ और जौ के अंकुर जब धरती से फूटते हैं तब उन्हें सुई फूटना कहते हैं। खुले में रखे हुये प्याज और आलू में अंकुर फूटने लगते हैं। बन्जर भूमि में अंकुर नहीं फूटता। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की एक फिल्म का नाम अंकुर है। अन्य अर्थ उगना, अँखुआ, कली, नुकीला भाग, पोधे का आरंिभक रूप। संबंधित शब्द अंकुरित अंकुरण एकरो देखौ बाहरी कड़ी सुपर फूड जैसा है अंकुरित भोजन (प्रभासाक्षी) स्प्राउट फूड : सेहत भी, स्वाद भी (webaduniyaa) संदर्भ शब्दार्थ
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अंकुरण
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%A3
अंकोरवाट (खमेर भाषा : អង្គរវត្ត) कम्बोडिया मँ एगो मन्दिर परिसर आरू दुनिया क सबसँ बड़ा धार्मिक स्मारक छेकै, इ एगो हिन्दू मन्दिर छेकै। इ कम्बोडिया के अंकोर मँ छै जेकरौ पुराना नाँव 'यशोधरपुर' छेलै। एकरौ निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53 ई॰) के शासनकल मँ होलौ छेलै। विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मन्दिर परिसर तथा विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था। इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (१११२-५३ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था। मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है जो सैकड़ों वर्ग मील में फैला हुआ है। राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मंदिर को १९८३ से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में भी स्थान दिया गया है। यह मन्दिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। इसकी दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है। इन प्रसंगों में अप्सराएं बहुत सुंदर चित्रित की गई हैं, असुरों और देवताओं के बीच समुद्र मन्थन का दृश्य भी दिखाया गया है। विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ ही यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। पर्यटक यहाँ केवल वास्तुशास्त्र का अनुपम सौंदर्य देखने ही नहीं आते बल्कि यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं। सनातनी लोग इसे पवित्र तीर्थस्थान मानते हैं। परिचय अंग्कोरथोम और अंग्कोरवात प्राचीन कंबुज की राजधानी और उसके मंदिरों के भग्नावशेष का विस्तार। अंग्कोरथोम और अंग्कोरवात सुदूर पूर्व के हिंदचीन में प्राचीन भारतीय संस्कृति के अवशेष हैं। ईसवी सदियों के पहले से ही सुदूर पूर्व के देशों में प्रवासी भारतीयों के अनेक उपनिवेश बस चले थे। हिंदचीन, सुवर्ण द्वीप, वनद्वीप, मलाया आदि में भारतीयों ने कालांतर में अनेक राज्यों की स्थापना की। वर्तमान कंबोडिया के उत्तरी भाग में स्थित ‘कंबुज’ शब्द से व्यक्त होता है, कुछ विद्वान भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर बसने वाले कंबोजों का संबंध भी इस प्राचीन भारतीय उपनिवेश से बताते हैं। अनुश्रुति के अनुसार इस राज्य का संस्थापक कौंडिन्य ब्राह्मण था जिसका नाम वहाँ के एक संस्कृत अभिलेख में मिला है। नवीं शताब्दी ईसवी में जयवर्मा तृतीय कंबुज का राजा हुआ और उसी ने लगभग ८६० ईसवी में अंग्कोरथोम (थोम का अर्थ 'राजधानी' है) नामक अपनी राजधानी की नींव डाली। राजधानी प्राय: ४० वर्षों तक बनती रही और ९०० ई. के लगभग तैयार हुई। उसके निर्माण के संबंध में कंबुज के साहित्य में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित है। पश्चिम के सीमावर्ती थाई लोग पहले कंबुज के समेर साम्राज्य के अधीन थे परंतु १४वीं सदी के मध्य उन्होंने कंबुज पर आक्रमण करना आरंभ किया और अंग्कोरथोम को बारबार जीता और लूटा। तब लाचार होकर ख्मेरों को अपनी वह राजधानी छोड़ देनी पड़ी। फिर धीरे-धीरे बाँस के वनों की बाढ़ ने नगर को सभ्य जगत् से सर्वथा पृथक् कर दिया और उसकी सत्ता अंधकार में विलीन हो गई। नगर भी अधिकतर टूटकर खंडहर हो गया। १९वीं सदी के अंत में एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने पाँच दिनों की नौका यात्रा के बाद उस नगर और उसके खंडहरों का पुनरुद्धार किया। नगर तोन्ले सांप नामक महान सरोवर के किनारे उत्तर की ओर सदियों से सोया पड़ा था जहाँ पास ही, दूसरे तट पर, विशाल मंदिरों के भग्नावशेष खड़े थे। आज का अंग्कोरथोम एक विशाल नगर का खंडहर है। उसके चारों ओर ३३० फुट चौड़ी खाई है जो सदा जल से भरी रहती थी। नगर और खाई के बीच एक विशाल वर्गाकार प्राचीर नगर की रक्षा करती है। प्राचीर में अनेक भव्य और विशाल महाद्वार बने हैं। महाद्वारों के ऊँचे शिखरों को त्रिशीर्ष दिग्गज अपने मस्तक पर उठाए खड़े हैं। विभिन्न द्वारों से पाँच विभिन्न राजपथ नगर के मध्य तक पहुँचते हैं। विभिन्न आकृतियों वाले सरोवरों के खंडहर आज अपनी जीर्णावस्था में भी निर्माणकर्ता की प्रशस्ति गाते हैं। नगर के ठीक बीचोबीच शिव का एक विशाल मंदिर है जिसके तीन भाग हैं। प्रत्येक भाग में एक ऊँचा शिखर है। मध्य शिखर की ऊँचाई लगभग १५० फुट है। इस ऊँचे शिखरों के चारों ओर अनेक छोटे-छोटे शिखर बने हैं जो संख्या में लगभग ५० हैं। इन शिखरों के चारों ओर समाधिस्थ शिव की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर की विशालता और निर्माण कला आश्चर्यजनक है। उसकी दीवारों को पशु, पक्षी, पुष्प एवं नृत्यांगनाओं जैसी विभिन्न आकृतियों से अलंकृत किया गया है। यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से विश्व की एक आश्चर्यजनक वस्तु है और भारत के प्राचीन पौराणिक मंदिर के अवशेषों में तो एकाकी है। अंग्कोरथोम के मंदिर और भवन, उसके प्राचीन राजपथ और सरोवर सभी उस नगर की समृद्धि के सूचक हैं। १२वीं शताब्दी के लगभग सूर्यवर्मा द्वितीय ने अंग्कोरथोम में विष्णु का एक विशाल मंदिर बनवाया। इस मंदिर की रक्षा भी एक चतुर्दिक खाई करती है जिसकी चौड़ाई लगभग ७०० फुट है। दूर से यह खाई झील के समान दृष्टिगोचर होती है। मंदिर के पश्चिम की ओर इस खाई को पार करने के लिए एक पुल बना हुआ है। पुल के पार मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार निर्मित है जो लगभग १,००० फुट चौड़ा है। मंदिर बहुत विशाल है। इसकी दीवारों पर समस्त रामायण मूर्तियों में अंकित है। इस मंदिर को देखने से ज्ञात होता है कि विदेशों में जाकर भी प्रवासी कलाकारों ने भारतीय कला को जीवित रखा था। इनसे प्रकट है कि अंग्कोरथोम जिस कंबुज देश की राजधानी था उसमें विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश आदि देवताओं की पूजा प्रचलित थी। इन मंदिरों के निर्माण में जिस कला का अनुकरण हुआ है वह भारतीय गुप्त कला से प्रभावित जान पड़ती है। अंग्कोरवात के मंदिरों, तोरणद्वारों और शिखरों के अलंकरण में गुप्त कला प्रतिबिंबित है। इनमें भारतीय सांस्कतिक परंपरा जीवित गई थी। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि यशोधरपुर (अंग्कोरथोम का पूर्वनाम) का संस्थापक नरेश यशोवर्मा ‘अर्जुन और भीम जैसा वीर, सुश्रुत जैसा विद्वान् तथा शिल्प, भाषा, लिपि एवं नृत्य कला में पारंगत था’। उसने अंग्कोरथोम और अंग्कोरवात के अतिरिक्त कंबुज के अनेक राज्य स्थानों में भी आश्रम स्थापित किए जहाँ रामायण, महाभारत, पुराण तथा अन्य भारतीय ग्रंथों का अध्ययन अध्यापन होता था। अंग्कोरवात के हिंदू मंदिरों पर बाद में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा और कालांतर में उनमें बौद्ध भिक्षुओं ने निवास भी किया। अंगकोरथोम और अंग्कोरवात में २०वीं सदी के आरंभ में जो पुरातात्विक खुदाइयाँ हुई हैं उनसे ख्मेरो के धार्मिक विश्वासों, कलाकृतियों और भारतीय परंपराओं की प्रवासगत परिस्थितियों पर बहुत प्रकाश पड़ा है। कला की दृष्टि से अंग्कोरथोम और अंग्कोरवात अपने महलों और भवनों तथा मंदिरों और देवालयों के खंडहरों के कारण संसार के उस दिशा के शीर्षस्थ क्षेत्र बन गए हैं। जगत् के विविध भागों से हजारों पर्यटक उस प्राचीन हिंदू-बौद्ध-केंद्र के दर्शनों के लिए वहाँ प्रति वर्ष जाते हैं। स्थापत्य ख्मेर शास्त्रीय शैली से प्रभावित स्थापत्य वाले इस मंदिर का निर्माण कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ किया परन्तु वे इसे पूर्ण नहीं कर सके। मंदिर का कार्य उनके भानजे एवं उत्तराधिकारी धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में सम्पूर्ण हुआ। मिश्र एवं मेक्सिको के स्टेप पिरामिडों की तरह यह सीढ़ी पर उठता गया है। इसका मूल शिखर लगभग ६४ मीटर ऊँचा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी आठों शिखर ५४ मीटर उँचे हैं। मंदिर साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी पत्थर की दिवार से घिरा हुआ था, उसके बाहर ३० मीटर खुली भूमि और फिर बाहर १९० मीटर चौडी खाई है। विद्वानों के अनुसार यह चोल वंश के मन्दिरों से मिलता जुलता है। दक्षिण पश्चिम में स्थित ग्रन्थालय के साथ ही इस मंदिर में तीन वीथियाँ हैं जिसमें अन्दर वाली अधिक ऊंचाई पर हैं। निर्माण के कुछ ही वर्ष पश्चात चम्पा राज्य ने इस नगर को लूटा। उसके उपरान्त राजा जयवर्मन-७ ने नगर को कुछ किलोमीटर उत्तर में पुनर्स्थापित किया। १४वीं या १५वीं शताब्दी में थेरवाद बौद्ध लोगों ने इसे अपने नियन्त्रण में ले लिया। मंदिर के गलियारों में तत्कालीन सम्राट, बलि-वामन, स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा रामायण से संबद्ध अनेक शिलाचित्र हैं। यहाँ के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा बहुत संक्षिप्त है। इन शिलाचित्रों की शृंखला रावण वध हेतु देवताओं द्वारा की गयी आराधना से आरंभ होती है। उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है। बालकांड की इन दो प्रमुख घटनाओं की प्रस्तुति के बाद विराध एवं कबंध वध का चित्रण हुआ है। अगले शिलाचित्र में राम धनुष-बाण लिए स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसके उपरांत सुग्रीव से राम की मैत्री का दृश्य है। फिर, बाली और सुग्रीव के द्वंद्व युद्ध का चित्रण हुआ है। परवर्ती शिलाचित्रों में अशोक वाटिका में हनुमान की उपस्थिति, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं। अंकोरवाट के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा यद्यपि अत्यधिक विरल और संक्षिप्त है, तथापि यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी प्रस्तुति आदिकाव्य की कथा के अनुरूप हुई है। सन्दर्भ एकरो देखॉ संदर्भ बाहरी कड़ी बिहार में बनेगा भारत का अंकोरवाट टाइम ने ‘भारत के अंकोरवाट मंदिर’ को सराहा Roland Fletcher talks about Angkor कम्बोडिया कम्बोडिया में हिन्दू धर्म मन्दिर हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना परीक्षित लेख
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अंकोरवाट मंदिर
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9F%20%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0
अंखफोड़वा कांड आय स॑ करीब ४० साल पसीने १९७९-८० के दौरान बिहार के भागलपुर म॑ दिल दहलाने वाला घटना होलो छेलै। करीब एक दर्जन लोगो के रोशनी आंख म॑ तेजाब डाल्ला के वजह स॑ चल्ली गेलो छेलै। ई कांड "अंखफोड़वा कांड" के नाम स॑ जानलो जाय छै।ई कांड के पृष्ठभूमि प॑ बनलो प्रकाश झा के फिल्म गंगाजल छीकै। जेकरा म॑ अजय देवगन आरू ग्रेसी सिंह न॑ मुख्य भूमिका निभैने छै। एकरहो देखौ बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंखफोड़वा कांड
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%96%E0%A4%AB%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%B5%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A1
अंग मतलब हिस्सा । जेना हाथ आपनऽ देहऽ के एगो हिस्सा होलै । अंग एगो महाजनपद के भी नाम छेलै । भारत मं॑ १६ महाजनपद सौसे दुनिया मं॑ प्रसिद्ध छेलै, ओकरा मं॑ अंग केरऽ स्थान पहला छेलै । अंग देश मं॑ बोललऽ जाय वाला भासा क॑ अंगिका बोललऽ जाय छै । एकरो देखॉ संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंग
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97
अंग एगो प्राचीन भारतीय साम्राज्य छेलै जे पूरबी भारतीय उपमहाद्वीप मं विकसित होलॉ छेलै आरो सोलह महाजनपद सिनी ("बड़का राज्य") मं सं एक छेलै । इ अपनॉ पड़ोसी आरू प्रतिद्वंद्वी मगध के पूर्व मं स्थित छेलै, आरो बिहार राज्य मं आधुनिक भागलपुर आरू मुंगेर मं चंपा नदी सं अलग होय गेलॉ छेलै। अंग के राजधानी यही नदी के तट प स्थित छेलै आरू एकरॉ नाँव चंपा आरू मालिनीयो राखॉ गेलॉ छेलै। इ अपनॉ धन आरू वाणिज्य लेली प्रमुख छेलै। छठ्ठा शताब्दी ईसा पूर्व मं मगध द्वारा अंग प कब्जा करी लेलॉ गेलॉ छेलै। व्युप्ति महाभारत आरू पौराणिक साहित्य के अनुसार, अंग के नाम राज्य रॉ संस्थापक राजकुमार अंग आरू बाली के पुत्र रॉ नाम प राखलॉ गेलॉ छेलै, जे निसंतान छेलै। यहा लेली, हुनी ऋषि दीर्घतमस सं अनुरोध करलकै कि हुनी हुनकॉ पुत्र सिनी क आशीर्वाद दै। कहलॉ जाय छै कि ऋषि न अपनॉ पत्नी (रानी सुदेसना) के माध्यम सं पांचठो पुत्र क जन्म देलौ छेलै। राजकुमार सिनी के नौ अंग, वंग, कलिंग, सुम्हा आरू पुंड्रा छेलै। इतिहास सबसं पहलॉ उल्लेख अथर्ववेद मं मिलै छै जहां हुनका मगध, गांधारी आरू मुजावत सिनी के संग सूचीबद्ध करलॉ गेलॉ छै, जेना कि "ज्वार दूर करै लेली" दूर के स्थान सिनी के उदाहरण। पुराणिक ग्रंथ अंग, कलिंग, वंगा, पुंड्रा, विदर्भ आरू विंध्य-वासी के जनपद क पूरब-दक्षिण विभाग मं राखै छै। पुराण मं अंग के ढेरी सिनी प्रारंभिक राजा के सूची छै। महागोविंद सुत्तंत अंग के राजा धृतराष्ट्र क संदर्भित करै छै। जैन ग्रंथ मं अंग रॉ शासक के रूप मं दधिवाहन के उल्लेख छै। पुराण आरू हरिवंश हुनका राज्य के संस्थापक, अंगपुत्र आरू तत्काल उत्तराधिकारी के रूप मं दर्शाबै छै। जैन परंपरा हुनका छठ्ठा शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभ मं राखै छै। महाभारत के अनुसार दुर्योधन नं कर्ण क अंग के राजा घोषित करलॉ छेलै। वत्स आरू अंग के राज्य रॉ बीच मगध रहै छेलै। अंग आरू ओकरॉ पूरबी पड़ोसि के मध्य एगो महान संघर्ष चललै। विधुर पंडित जातक नं राजगृह (मगधन के राजधानी) क अंग शहर के रूप मं वर्णित करलॉ छै आरू महाभारत मं अंग के राजा द्वारा विष्णुपद (गया मं) पर्वत प करलॉ गेलॉ बलिदानो रॉ उल्लेख छै। इ इंगित करै छै कि अंग शुरू मं मगध प कब्जा करै मं सफल रहलॉ छेलै आरू इ प्रकार सं एकरॉ सीमा मत्स्य देश के राज्य तक फैललॉ छेलै। आय वहा पौराणिक साम्राज्य के भाषा अंगिका छेकै. एकरो देखौ अंग महाजनपद केरॉ भाषा "अंगिका" अंग के राजधानी भागलपुर संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंग महाजनपद
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%20%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%A6
अंग लिपि एगो प्राचीन लिपि छेकै। प्राचीन काल मँ अंगिका भासा लिखै लेली अंग लिपि केरौ उपयोग होय छेलै। बौद्ध ग्रंथ ललित विस्तर मँ एकरौ जिक्र करलौ गेलौ छै। पारिवारिक सम्बन्ध अंग लिपि भारत करो आरो सब्भे लिपि के तरह ही ब्राह्मी लिपि सँ निकललौ छै। व्युत्पत्ति आरू इतिहास अंग एगो एन्हौ क्षेत्र क संदर्भित करै छै जे अबय भारत केरो बिहार, झारखंड आरू बिहार राज्य मँ छै, जेकरौ लिपि अंग लिपि छेलै। अंग लिपि के उल्लेख एगो प्राचीन संस्कृत भाषा के बौद्ध पुस्तक "ललितविस्तर" मँ छै, जेकरा मँ बुद्ध क ज्ञात 64 लिपि के सूची मँ अंग लिपि के नाम प्रारंभ मँ उल्लिखित छै। आर्थर कोक बर्नेल न सोचलै छेलै कि "ललितविस्तर" मँ वर्णित चौंसठ लिपि मँ सँ कुछु क कल्पित मानलौ छेलै, लेकिन हुनी द्रविड़, अंग और बंग सहित कुछु क वास्तविक मानलौ छै। अभिलक्षण आरू तुलना अंग लिपि आरू बंगला लिपि कुछु क्षेत्रीय विशेषता सिनी के संग ब्राह्मी भाषा सँ विकसित होलौ लिपि छेकै। इ है विश्वास क समर्थन करै छै कि वर्णमाला मँ स्थानीय विशेषता के विकास प्राचीन समय सँ जारी छेलै। इ भारतीय वर्णमाला के स्थानीय रूप के प्रारंभिक विकास क दर्शाय छै। एकरो देखौ अंगिका बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंग लिपि
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%20%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%BF
अंगकोर थोम (खमेर भाषा: អង្គរធំ); शाब्दिक अर्थ "महान शहर") कम्बोडिया केरऽ एगो प्राचीन शहर छेकै जे खमेर साम्राज्य केरऽ अंतिम आरू सबसें लम्बा राजधानी छेलै। एकरऽ स्थापना 12वीं सदी म॑ जयवर्मन सातवाँ न॑ करलकै। एकरऽ क्षेत्रफल लगभग ९ वर्ग किलोमीटर छै, जेकरा म॑ जयवर्मन आरू पूर्व केरऽ शासकऽ द्वारा निर्मित बहुत सारा स्मारक स्थित छै। जयवर्मनक महल शहर क बीचोबीच छै। एकरो देखौ अंगकोरवाट मंदिर बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंगकोर थोम
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%20%E0%A4%A5%E0%A5%8B%E0%A4%AE
अंकोरवाट ([[खमेर भाषा]] : អង្គរវត្ត) [[कंबोडिया|कम्बोडिया]] मँ स्थित एगो मंदिर परिसर आरू दुनिया केरौ सबसँ बड़ौ धार्मिक स्मारक छेकै, 162.6 हेक्टेयर (1,626,000 वर्ग मीटर; 402 एकड़) क्षेत्रफल मँ फैललौ ई एगो हिन्दू मन्दिर छेकै। ई कम्बोडिया केरौ अंगकोर मँ छै जेकरो पुरानौ नाँव 'यशोधरपुर' छेलै। एकरो निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53 ई॰) के शासनकाल मँ होलो रहै । ई हिंदू मन्दिर छेकै। मीकांग नदी केरौ करगी स्थित सिमरिप शहर मँ बनलौ ई मंदिर आय भी संसार केरौ सबसँ बड़ौ मंदिर छेकै जे सैकड़ों वर्ग मील मँ फैललो छै । राष्ट्र लेली सम्मान के प्रतीक ई मन्दिर क कम्बोडिया केरौ राष्ट्रध्वज मँ भी स्थान देलो गेलो छै । ई मंदिर मेरु पर्वत केरौ भी प्रतीक छेकै। एकरो देवार प भारतीय हिन्दू धर्म ग्रन्थो के प्रसंगो के चित्रण छै। ई प्रसंगो मँ अप्सरा सिनी क बहुत सुन्नर ढंगौ सँ चित्रित करलो गेलो छै । सुर आरू आरू असुर के बीच समुद्र मंथन केरौ दृश्य भी देखैलो गेलो छै। विश्व केरौ सबसँ लोकप्रिय पर्यटन स्थलौ मँ सँ एक होला के अलावे ही ई मन्दिर यूनेस्को केरौ विश्व धरोहर स्थलो मँ सँ एक छेकै। पर्यटक यहाँ खाली वास्तुशास्त्र केरौ अनुपम सौंदर्य देखै ल ही नै आबै छै, भलुक यहाँकरौ सूर्योदय आरू सूर्यास्त देखै ल भी आबै छै। सनातनी लोग एकरा पवित्र तीर्थस्थान मानै छै। परिचय अंग्कोरथोम आरू अंग्कोरवात प्राचीन कंबुज केरौ राजधानी छेलै । अंग्कोरथोम आरू अंग्कोरवात सुदूर पूर्व के हिन्दचीन मँ प्राचीन भारतीय संस्कृति केरौ अंग महाजनपद केरौ अवशेष छेकै। ईसवी सदी के पहलै सँ ही सुदूर पूर्व केरौ देशौ मँ प्रवासी भारतीय केरौ अनेक उपनिवेश बसलो छेलै। हिंदचीन, सुवर्ण द्वीप, वनद्वीप, मलाया आरनि म भारत केरो अंग देश सँ गेलो लोगो सिनी नँ कालान्तर मँ बहुत्ते राज्य के स्थापना करलकै। वर्तमान कम्बोडिया के उत्तर भाग मँ स्थित 'कम्बुज’ शब्द सँ व्यक्त होय छै ।,अनुश्रुति के अनुसार ई राज्य के संस्थापक कौंडिन्य ब्राह्मण छेलै जेकरो नाँव वहाँकरौ एगो संस्कृत अभिलेख मँ मिलै छै। नवीं शताब्दी ईसवी मँ जयवर्मा तृतीय कम्बुज केरो राजा भेलै आरू हुनी लगभग 860 ईसवी मँ अंग्कोरथोम (थोम का अर्थ 'राजधानी' है) नामक अपनो राजधानी के नींव डाललकै। राजधानी लगभग 40 साल तलक बनतै रहलै आऱू 900 ई. के लगभग तैयार भेलै। एकरो निर्माण के सम्बन्ध मँ कम्बुज के साहित्य मँ अनेक किंवदन्ती सिनी प्रचलित छै। पश्चिम के सीमावर्ती थाई लोग पहलें कम्बुज के समेर साम्राज्य के अधीन छेलै लेकिन 14वीं सदी के मध्य हुनी सिनी कम्बुज प आक्रमण करना आरम्भ देलकै आरू अंग्कोरथोम क बार-बार जितलकै आरू लुटलकै । तब लाचार होकर ख्मेरों को अपनी वह राजधानी छोड़ देनी पड़ी। फिर धीरे-धीरे बाँस के वनों की बाढ़ ने नगर को सभ्य जगत् से सर्वथा पृथक कर दिया और उसकी सत्ता अन्धकार में विलीन हो गई। नगर भी अधिकतर टूटकर खण्डहर हो गया। 19वीं सदी के अन्त में एक फ़्रांसीसी वैज्ञानिक ने पाँच दिनों की नौका यात्रा के बाद उस नगर और उसके खण्डहरों का पुनरुद्धार किया। नगर तोन्ले साँप नामक महान सरोवर के किनारे उत्तर की ओर सदियों से सोया पड़ा था जहाँ पास ही, दूसरे तट पर, विशाल मन्दिरों के भग्नावशेष खड़े थे। आज का अंग्कोरथोम एक विशाल नगर का खण्डहर है। उसके चारों ओर 330 फुट चौड़ी खाई है जो सदा जल से भरी रहती थी। नगर और खाई के बीच एक विशाल वर्गाकार प्राचीर नगर की रक्षा करती है। प्राचीर में अनेक भव्य और विशाल महाद्वार बने हैं। महाद्वारों के ऊँचे शिखरों को त्रिशीर्ष दिग्गज अपने मस्तक पर उठाए खड़े हैं। विभिन्न द्वारों से पाँच विभिन्न राजपथ नगर के मध्य तक पहुँचते हैं। विभिन्न आकृतियों वाले सरोवरों के खण्डहर आज अपनी जीर्णावस्था में भी निर्माणकर्ता की प्रशस्ति गाते हैं। नगर के ठीक बीचोबीच शिव का एक विशाल मन्दिर है जिसके तीन भाग हैं। प्रत्येक भाग में एक ऊँचा शिखर है। मध्य शिखर की ऊँचाई लगभग 150 फुट है। इस ऊँचे शिखरों के चारों ओर अनेक छोटे-छोटे शिखर बने हैं जो संख्या में लगभग 50 हैं। इन शिखरों के चारों ओर समाधिस्थ शिव की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर की विशालता और निर्माण कला आश्चर्यजनक है। उसकी दीवारों को पशु, पक्षी, पुष्प एवं नृत्यांगनाओं जैसी विभिन्न आकृतियों से अलंकृत किया गया है। यह मन्दिर वास्तुकला की दृष्टि से विश्व की एक आश्चर्यजनक वस्तु है और भारत के प्राचीन पौराणिक मन्दिर के अवशेषों में तो एकाकी है। अंग्कोरथोम के मन्दिर और भवन, उसके प्राचीन राजपथ और सरोवर सभी उस नगर की समृद्धि के सूचक हैं। 12वीं शताब्दी के लगभग सूर्यवर्मा द्वितीय ने अंग्कोरथोम में विष्णु का एक विशाल मन्दिर बनवाया। इस मन्दिर की रक्षा भी एक चतुर्दिक खाई करती है जिसकी चौड़ाई लगभग 700 फुट है। दूर से यह खाई झील के समान दृष्टिगोचर होती है। मन्दिर के पश्चिम की ओर इस खाई को पार करने के लिए एक पुल बना हुआ है। पुल के पार मन्दिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार निर्मित है जो लगभग 1,000 फुट चौड़ा है। मन्दिर बहुत विशाल है। इसकी दीवारों पर समस्त रामायण मूर्तियों में अंकित है। इस मन्दिर को देखने से ज्ञात होता है कि विदेशों में जाकर भी प्रवासी कलाकारों ने भारतीय कला को जीवित रखा था। इनसे प्रकट है कि अंग्कोरथोम जिस कम्बुज देश की राजधानी था उसमें विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश आदि देवताओं की पूजा प्रचलित थी। इन मन्दिरों के निर्माण में जिस कला का अनुकरण हुआ है वह भारतीय गुप्त कला से प्रभावित जान पड़ती है। अंग्कोरवात के मन्दिरों, तोरणद्वारों और शिखरों के अलंकरण में गुप्त कला प्रतिबिम्बित है। इनमें भारतीय सांस्कतिक परम्परा जीवित गई थी। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि यशोधरपुर (अंग्कोरथोम का पूर्वनाम) का संस्थापक नरेश यशोवर्मा ‘अर्जुन और भीम जैसा वीर, सुश्रुत जैसा विद्वान् तथा शिल्प, भाषा, लिपि एवं नृत्य कला में पारंगत था’। उसने अंग्कोरथोम और अंग्कोरवात के अतिरिक्त कम्बुज के अनेक राज्य स्थानों में भी आश्रम स्थापित किए जहाँ रामायण, महाभारत, पुराण तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों का अध्ययन अध्यापन होता था। अंग्कोरवात के हिन्दू मन्दिरों पर बाद में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा और कालान्तर में उनमें बौद्ध भिक्षुओं ने निवास भी किया। अंगकोरथोम और अंग्कोरवात में 20वीं सदी के आरम्भ में जो पुरातात्विक खुदाइयाँ हुई हैं उनसे ख्मेरो के धार्मिक विश्वासों, कलाकृतियों और भारतीय परम्पराओं की प्रवासगत परिस्थितियों पर बहुत प्रकाश पड़ा है। कला की दृष्टि से अंग्कोरथोम और अंग्कोरवात अपने महलों और भवनों तथा मन्दिरों और देवालयों के खण्डहरों के कारण संसार के उस दिशा के शीर्षस्थ क्षेत्र बन गए हैं। जगत के विविध भागों से हजारों पर्यटक उस प्राचीन हिन्दू-बौद्ध-केन्द्र के दर्शनों के लिए वहाँ प्रति वर्ष जाते हैं। स्थापत्य ख्मेर शास्त्रीय शैली से प्रभावित स्थापत्य वाले इस मन्दिर का निर्माण कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ किया परन्तु वे इसे पूर्ण नहीं कर सके। मंदिर का कार्य उनके भानजे एवं उत्तराधिकारी धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में सम्पूर्ण हुआ। मिश्र एवं मेक्सिको के स्टेप पिरामिडों की तरह यह सीढ़ी पर उठता गया है। इसका मूल शिखर लगभग 64 मीटर ऊँचा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी आठों शिखर 54 मीटर उँचे हैं। मंदिर साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी पत्थर की दिवार से घिरा हुआ था, उसके बाहर 30 मीटर खुली भूमि और फिर बाहर 190 मीटर चौडी खाई है। विद्वानों के अनुसार यह चोल वंश के मन्दिरों से मिलता जुलता है। दक्षिण पश्चिम में स्थित ग्रन्थालय के साथ ही इस मंदिर में तीन वीथियाँ हैं जिसमें अन्दर वाली अधिक ऊँचाई पर हैं। निर्माण के कुछ ही वर्ष पश्चात चम्पा राज्य ने इस नगर को लूटा। उसके उपरान्त राजा जयवर्मन-7 ने नगर को कुछ किलोमीटर उत्तर में पुनर्स्थापित किया। 14वीं या 15वीं शताब्दी में थेरवाद बौद्ध लोगों ने इसे अपने नियन्त्रण में ले लिया। मन्दिर के गलियारों में तत्कालीन सम्राट, बलि-वामन, स्वर्ग-नरक, समुद्र मन्थन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा रामायण से संबद्ध अनेक शिलाचित्र हैं। यहाँ के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा बहुत संक्षिप्त है। इन शिलाचित्रों की शृंखला रावण वध हेतु देवताओं द्वारा की गयी आराधना से आरम्भ होती है। उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है। बालकांड की इन दो प्रमुख घटनाओं की प्रस्तुति के बाद विराध एवं कबन्ध वध का चित्रण हुआ है। अगले शिलाचित्र में राम धनुष-बाण लिए स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसके उपरान्त सुग्रीव से राम की मैत्री का दृश्य है। फिर, बाली और सुग्रीव के द्वन्द्व युद्ध का चित्रण हुआ है। परवर्ती शिलाचित्रों में अशोक वाटिका में हनुमान की उपस्थिति, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं। अंकोरवाट के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा यद्यपि अत्यधिक विरल और संक्षिप्त है, तथापि यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी प्रस्तुति आदिकाव्य की कथा के अनुरूप हुई है। एकरो देखौ तिरुपति सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ बिहार में बनेगा भारत का अंकोरवाट टाइम ने ‘भारत के अंकोरवाट मंदिर’ को सराहा Roland Fletcher talks about Angkor कम्बोडिया कम्बोडिया में हिन्दू धर्म मन्दिर हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना परीक्षित लेख W/
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अंगकोरवाट मंदिर
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कोनो जीवित या मृत व्यक्ति केरऽ शरीर के ऊतक या कोनो अंग दान करना अंगदान (Organ donation) कहलाबै छै। ई ऊतक या अंग कोनो दोसरऽ जीवित व्यक्ति के शरीर मं॑ प्रत्यारोपित (ट्रान्सप्लान्ट) करलऽ जाय छै। इस कार्य के लिये दाता के शरीर से दान किये हुए अंग को शल्यक्रिया द्वारा निकाला जाता है। भारत में अंगदान की स्थिति भारत में कार्निया दान की स्थिति काफी अच्छी है किन्तु 'मस्तिष्क मृत्यु' के बाद किये जाने वाले देह दान में बहुत धीमी गति से प्रगति हो रही है। स्रोत: Indian Transplant News Letter of MOHAN Foundation (Vol 2 Issue No. 37 of 2013) The year 2013 has been the best yet for deceased organ donation in India. A total of 845 organs were retrieved from 310 multi-organ donors resulting in a national organ donation rate of 0.26 per million population(Table 2). * ODR (pmp) – Organ Donation Rate (per million population) एकरो देखॉ सन्दर्भ बाहरी कड़ी देहदान: चिकित्सा और समाज की बड़ी जरूरत दधीचि देहदान समिति के माध्‍यम से मृत देह भी अमर हो रही है (प्रवक्ता) देहदान-परिजनों की आपत्ति पर सरकार सख्त (सरिता) शल्यक्रिया
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अंगदान
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इ भारत के सबस॑ दक्षिण म॑ स्थित राज्य केरल केरऽ एर्नाकुलम जिला म॑ स्थित एगो नगरपालिका छेकै। इ कोच्चि केरऽ उपनगर छेकै। उत्तरी प्रवेश द्वार वाणिज्यिक केरल की राजधानी है। शहर में निहित है मेन के चौराहे केन्द्रीय सड़क (एम. सी रोड) और राष्ट्रीय राजमार्ग 47. एम सी रोड, जो से शुरू तिरुअनंतपुरम अंगमाली पर के साथ समाप्त होता है राष्ट्रीय राजमार्ग 47 एक के रूप में शुरू मई 1952 में पंचायत अंगमाली उठाया गया। अप्रैल में एक नगर पालिका 1978 और भी है विधान सभा में निर्वाचन क्षेत्र एर्नाकुलम जिले. यह एक सबसे तेजी से है बढ़ रही शहरों में केरल, के लिए धन्यवाद की निकटता अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन और दो प्रमुख गुजर सड़कें के माध्यम से। अंगमाली एक प्रविष्टि के रूप में कार्य करता है विभिन्न स्थानों के लिए बिंदु मध्य में ब्याज की केरल, जिसमें शामिल कालटि, मलयाट्टूर, मञप्रा, कोतमंगलम, मूवाट्टुपुषा, मुन्नार और उत्तर परवूर, मुन्नार, इडुक्की आदि के साथ कई गांवों घिरा हुआ है, यह है एक प्रमुख हो व्यावसायिक केंद्र. महत्त्व अंगमाली अच्छी तरह से है हर तरह से जुड़ा परिवहन के. कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है के आसपास के क्षेत्र में अंगमाली. वास्तव में, के कुछ अंश अंगमाली नगर निगम क्षेत्र के लिए लिया गया है के विकास हवाई अड्डॉ॰ अंगमाली एक है रेलवे स्टेशन जहां सभी प्रमुख ट्रेनों बंद करो. वहाँ एक प्रस्तावित है रेलवे लाइन से अंगमाली सबरीमला जो कनेक्ट करेगा उच्च श्रेणियों के साथ कम भूमि, जो बारी में की अर्थव्यवस्था में सुधार संपूर्ण क्षेत्र. व्यवहार्यता अध्ययन खत्म हो गया है और रेल है के लिए आवंटित बजट भूमि का अधिग्रहण. प्रमुख अंतर्देशीय परिवहन मार्ग, 47 राष्ट्रीय राजमार्ग जो जोड़ता है सलेम को कन्याकुमारी के माध्यम से गुजरता अंगमाली. 17 राष्ट्रीय राजमार्ग जो कोचीन जोड़ता और मुंबई 20 है किलोमीटर दूर से अंगमाली. वन ऑफ प्रमुख जोड़ने वाली सड़क केरल, M.C. की राजधानी रोड से शुरू होता है इतिहास अंगमाली. माञाली नदी 'जो बहती के माध्यम से अंगमाली था एक प्रमुख जलमार्ग और निकट अन्गाटिक्कटव् पुराने चर्च एक था महत्त्वपूर्ण व्यापार केन्द्र पुराने दिनों में जहां मसाले, चावल, बांस और अन्य कृषि और पहाड़ी उत्पादों के लिए भेजा गया था मुस्सिरीस के पुराने बंदरगाह (कोटुंगल्लूर). माञाली नदी का हिस्सा है नई राष्ट्रीय जलमार्ग कार्यक्रम और हो रही है विकसित की है। अंगमालि समृद्ध है सांस्कृतिक और के साथ भक्ति केन्द्रों. वहाँ रहे हैं कई पुराने चर्चों जो कर रहे हैं अच्छी तरह के साथ पुरानी शताब्दियों परिभाषित frescoes और अन्य भित्ति चित्र है जो कर रहे हैं भी कुछ के लिए प्रसिद्ध ऐतिहासिक बैठकों और निर्णय है कि आकार आधुनिक ईसाइयत पूरे भारत में. नए कैथोलिक चर्च के दिल में बनाया शहर के रूप में माना जाता है में अपनी तरह का सबसे बड़ा भारत. तिरुनायतोट मंदिर, कृष्णास्वामी मंदिर, वेन्ङूर मंदिर, किटन्ङूर मंदिर, कोतकुलन्ङरा मंदिर, जैन मंदिर, एलवूर मंदिर, मूषिक्कुलम मंदिर सभी प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ केंद्र के पास अंगमाली. वहाँ रहे हैं प्रसिद्ध अस्पतालों और शैक्षिक संस्थानों जो करने के लिए गर्व कर रहे हैं स्थानीय आबादी. अंगमाली एक राज्य है स्वामित्व वाली औद्योगिक संपत्ति इसके दक्षिणी अंत में जो कई गया है प्रसिद्ध कारखानों. अंगमाली मँ पुलिस फायरिंग केरल राज्य बांस निगम लिमिटेड है पर मुख्यालय अंगमाली. वहाँ रहे हैं कई छोटे पैमाने पर पटाखा निर्माण आसपास में इकाइयों क्षेत्रों. कोटनाट, प्रसिद्ध के लिए अपनी हाथी प्रशिक्षण केंद्र 25 किलोमीटर है अंगमाली से. हाथी के रूप में अच्छी तरह से सवारी एक मिनी चिड़ियाघर उपलब्ध है यहाँ. मलयाट्टूर, महागोणि एषाट्टुमुखम, कालटी आदि शंकर स्तंभम,मंदिर और मगरमच्छ घाट के सभी स्थानों रहे हैं अंगमाली के पास ब्याज। एकरो देखौ केरल संदर्भ बाहरी कड़ी केरल केरऽ भूगोल
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अंगमालि
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BF
अंगामी एगो भासा के नाँव छेकै जे भारत मँ बोललौ जाय छै। इ भासा भारतीय संविधान के आठमां अनुसूची मँ शामिल नै छै, तत्काल इ भासा प्रस्तावित छै। इ चीनी-तिब्बती भासा परिवार सँ छै। नामोत्पत्ति भासाई उत्पत्ति आरो इतिहास शैली सिनी मानकीकरण बोली सिनी लिपि शब्दावली स्वरविज्ञान स्वर व्यंजन विदेशी ध्वनियाँ व्याकरण जनसांख्यिकी एकरो देखौ भारतीय संविधान मँ आठमां अनुसूची अंगिका भाषा बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंगामी भाषा
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अंगिका मुख्य रूप सं प्राचीन अंग यानि भारत केरॉ उत्तर-पूर्वी आरो बिहार, झारखंड, बंगाल, आसाम, उङीसा आरो नेपाल के तराई केरॉ क्षेत्र मं बोललॉ जाय वाला भासा छेकै । प्राचीन भासा कम्बोडिया, वियतनाम, मलेशिया आदि देशॉ मं भी प्राचीन समय सं बोललॉ जैतं रहलॉ छै। अंगिका भासा आर्य-भासा परिवार केरॉ सदस्य छेकै आरो भासाई तौर पऽ बांग्ला, असमिया, उड़िया आरो नेपाली, भासा सं ऐकरॉ बहुते निकट के संबंध छै। प्राचीन अंगिका के विकास के सुरूआती दौर कऽ प्राकृत आरो अपभ्रंश के विकास सं जोड़लॉ जाय छै । लगभग ५ सं ६ करोड़ लोग अंगिका कऽ मातृ-भासा के रुप मं प्रयोग करै छै । एकरॉ प्रयोगकर्ता भारत केरॉ विभिन्न हिस्सा सहित विश्व केरॉ ढेरी देसऽ मं फैललॉ छै। भारत केरॉ अंगिका क साहित्यिक भाषा के दर्जा प्राप्त छै। अंगिका साहित्य केरॉ आपनॉ समृद्ध इतिहास रहलॉ छै आरो आठमॉ शताब्दी के कवि सरह या सरहपा कऽ अंगिका साहित्य मं सबसं उंच्चॉ दर्जा प्राप्त छै। सरहपा कऽ हिन्दी आरू अंगिका के आदि कवि मानलॉ जाय छै। भारत सरकार द्वारा अंगिका के जल्द ही भारतीय संविधान केरॉ आठवीं अनुसूची मं भी शामिल करलॉ जैतै। प्राचीन समय मं अंगिका भाषा,अंग लिपि मं लिखलॉ जाय रहै। बादो-म कैथी लिपि-योम अंगिका लिखेलो जाय रहले, आजकल हेकरा लेली देवनागरी चले छे| नामोत्पत्ति भासाई उत्पत्ति आरो इतिहास शैली सिनी मानकीकरण बोली सिनी लिपि अंगिका लेली इतिहास मँ अंग लिपि इस्तेमाल होवै छेलै। फेर हेकरा लेली कैथी काम ऐले। आजकल हेकरा लेली देवनागरी चली रहलौ छै। शब्दावली स्वरविज्ञान स्वर व्यंजन विदेशी ध्वनियाँ व्याकरण जनसांख्यिकी एकरो देखौ भारतीय संविधान मँ आठमां अनुसूची मूल-भारोपीय भाषासमूह भारोपीय भाषासमूह हिंद-ईरानी भाषासमूह हिंद-आर्य भाषासमूह वैदिक संस्कृत भाषा संस्कृत भाषा मूल-हिंद-ईरानी भाषासमूह अवेस्तन भाषा ईरानी भाषासमूह नूरिस्तानी भाषासमूह दार्दी भाषासमूह रोमानी भाषा बाहरी कड़ी सन्दर्भ
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अंगिका भाषा
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अंगिका महोत्सव - २०१९ आगामी २ व ३ फरवरी क॑ भागलपुर म॑ आयोजित करलऽ गेलो छेलै । एकरो देखौ संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंगिका महोत्सव-२०१९
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अंगिका भाषा मॆ साहित्य रचना के इतिहास बहुत पुराना छै । लगभग चार हजार साल सं॑ अंगिका मं॑ रचना रचलऽ जाय रहलऽ छै । लिखित रूप मं॑ आठवीं सदी मं॑ लिखलऽ सरह के रचना उपलब्ध छै । एकरो देखौ संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंगिका साहित्य
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अंगिल्ला उत्तर अमेरिका महाद्वीप के केरिबियन क्षेत्र मँ एगो देस छेकै। है देस यूनाइटेड किंगडम के अंतर्गत आबै छै। शब्द-साधन इतिहास राजनीति कानून आरो आपराधिक न्याय विदेसी संबंध, रक्षा आरो सुरक्षा भूगोल अर्थव्यवस्था जनसांख्यिकी शिक्षा परिवहन मीडिया आरो दूरसंचार संस्कृति खेल एकरो देखौ विश्व केरौ सब्भे देस बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंगुइला
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अंगुत्तरनिकाय मँ 11 'निपात' (अध्याय) छै जेकरा मँ 1 सँ लै क 11 क संख्या के क्रम मँ भगवान बुद्ध क उपदेश संग्रहित करलौ गेलौ छै। प्रत्येक अंक क संख्या एक अध्याय या निपात छै, जे 'अंक'-वार विषय क प्रतिपादनकरै छै। प्रथम निपात क नाँव 'एककनिपात' छेकै जेकरा मँ धम्म (धर्म) क व्याख्या 'एक' प्रकार सँ करलौ गेलौ छै। द्वितीय निपात क नाँव 'दुकनिपात' छेकै आरू ओकरा मँ धर्म क व्याख्या 'दू' दृष्टि सँ करलौ गेलौ छै। इ रंगकी सँ क्रमशः एकादसक-निपात तक ग्यारह-ग्यारह प्रकार सँ धर्म क व्याख्या करलौ गेलौ छै। एकक-निपात सँ अंक मँ वृद्धि होतँ हुअ दुक-तिक-चतुक्क-पञ्चक-छक्क-सत्तक-अट्ठक-नव-दसक-एकादसक इ प्रकार क्रम सँ 'अंक मँ वृद्धि' (अंकोत्तर) चलै छै। अतः ‘अंगुत्तरनिकाय’ (अंकोत्तरनिकाय) इ नाम पूर्णतः सार्थक तथा समुच्चे प्रतीत होय छै। वस्तुतः अंगुत्तरनिकाय, एकोत्तर आगम क शैली मँ रचित ग्रन्थ छेकै जौँ शैली क अनेक सुत्तपिटक मँ अनुसरण मिलै छै। संरचना अंगुत्तरनिकाय मँ 11 निपात छै जेकरौ नाँव निम्नलिखित छै- एककनिपात दुकनिपात तिकनिपात चतुक्कनिपात पञ्चकनिपात छक्कनिपात सत्तकनिपात अट्ठकादिनिपात नवकनिपात दसकनिपात एकादसकनिपात एकरो देखौ संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंगुत्तर निकाय
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पाँच औंगली म॑ सबसं॑ छोटऽ आरू मोटऽ औंगली क॑ अंगूठा कहलऽ जाय छै ।। सम्मुख अँगूठा मानव प्रकार के कुछ प्राणि सिनी मँ हाथ क अँगूठा मोड़ी क अन्य उंगलि सिनी के ओर लै जाय सकै छै। इ सम्मुख अँगूठा (opposable thumb) वस्तु पकड़े आरू प्रयोग करै क क्षमता प्रदान करै छै, नरबानर गण के प्राणि के पनपै क आरू मानवीय सभ्यता क एगो मूल कारण समझाय छै। एकरो देखौ बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंगूठा
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अंगूठी एगो गहना छेकै जेकरा उंगली म॑ पहननलऽ जाबै सकै छै। अंगूठी एगो गहना छेकै आरू उंगली मँ पहनलौ जाय सकै छै। इ मुख्यता अनामिका मँ पहनलौ जाय छै| अंगूठी पुरुष और महिला, दोनों दुआरा पहनलौ जाय छै। अंगूठी धातु, प्लास्टिक, लकड़ी, हड्डी, कांच, रत्न आरू अन्य सामग्री क बनैलौ जाबै सकै छै। बाहरी कड़ी आभूषण केरौ नमूना अंगूठी कला संस्कृति फैशन
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अंगूठी
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अंगूर (संस्कृत/शुद्ध हिन्दी : द्राक्षा) एगो फल छेकै। अंगूर एगो बलवर्घक आरू सौन्दर्यवर्घक फल छेकै। अंगूर फल माय केरौ दूघ के समान पोसक होय छै। फलौ मँ अंगूर सर्वोत्तम मानलो जाय छै। ई निर्बल-सबल, स्वस्थ-अस्वस्थ आरनि सब्भे लेली समान उपयोगी होय छै। ई अंगूर के बेल पर बड़ौ-बड़ौ गुच्छा मँ उगै छै। अंगूर सोझे खैलो भी जाबै सकै छै, या फेर ओकरा सँ अंगूरी शराब भी बनैलो जाबै सकै छै, जेकरा अंग्रेज़ी मँ :en:wine कहलो जाय छै, जे कि अंगूर के रस केरो ख़मीरीकरण करी क बनैलो जाबै सकै छै। लाभ बहुत सँ ऐसनो रोग छै जेकरा मँ रोगी को कोय पदार्थ नै देलो जाय छै। उसमें भी अंगूर फल दिया जा सकता है। पका हुआ अंगूर तासीर में ठंडा, मीठा और दस्तावर होता है। यह स्पर को शुद्ध बनाता है तथा आँखों के लिए हितकर होता है। अंगूर वीर्यवर्घक, रक्त साफ करने वाला, रक्त बढाने वाला तथा तरावट देने वाला फल है। अंगूर में जल, शर्करा, सोडियम, पोटेशियम, साइट्रिक एसिड, फलोराइड, पोटेशियम सल्फेट, मैगनेशियम और लौह तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। अंगूर ह्वदय की दुर्बलता को दूर करने के लिए बहुत गुणकारी है। ह्वदय रोगी को नियमित अंगूर खाने चाहिएं। अंगूर के सेवन से फेफडों मे जमा कफ निकल जाता है, इससे खाँसी में भी आराम आता है। अंगूर जी मिचलाना, घबराहट, चक्कर आने वाली बीमारियों में भी लाभदायक है। श्वास रोग व वायु रोगों में भी अंगूर का प्रयोग हितकर है। नकसीर एवं पेशाब में होने वाली रूकावट में भी हितकर है। अंगूर का शरबत तो ""अमृत तुल्य"" है। शरीर के किसी भी भाग से रक्त स्राव होने पर अंगूर के एक गिलास ज्यूस में दो चम्मच शहद घोलकर पिलाने पर रक्त की कमी को पूरा किया जा सकता है जिसकी कि रक्तस्राव के समय क्षति हुई है। अंगूर का गूदा " ग्लूकोज व शर्करा युक्त " होता है। विटामिन "ए" पर्याप्त मात्रा में होने से अंगूर का सेवन " भूख " बढाता है, पाचन शक्ति ठीक रखता है, आँखों, बालों एवं त्वचा को चमकदार बनाता है। हार्ट-अटैक से बचने के लिए बैंगनी (काले) अंगूर का रस "एसप्रिन" की गोली के समान कारगर है। "एसप्रिन" खून के थक्के नहीं बनने देती है। बैंगनी (काले) अंगूर के रस में " फलोवोनाइडस " नामक तत्व होता है और यह भी यही कार्य करता है। पोटेशियम की कमी से बाल बहुत टूटते हैं। दाँत हिलने लगते हैं, त्वचा ढीली व निस्तेज हो जाती है, जोडों में दर्द व जकडन होने लगती है। इन सभी रोगों को अंगूर दूर रखता है। अंगूर फोडे-फुन्सियों एवं मुहासों को सुखाने में सहायता करता है। अंगूर के रस के गरारे करने से मुँह के घावों एवं छालों में राहत मिलती है। एनीमिया मँ अंगूर से बढकर कोई दवा नहीं है। उल्टी आने व जी मिचलाने पर अंगूर पर थोडा नमक व काली मिर्च डालकर सेवन करें। पेट की गर्मी शांत करने के लिए 20-25 अंगूर रात को पानी में भिगों दे तथा सुबह मसल कर निचोडें तथा इस रस में थोडी शक्कर मिलाकर पीना चाहिए। गठिया रोग में अंगूर का सेवन करना चाहिए। इसका सेवन बहुत लाभप्रद है क्योंकि यह शरीर में से उन तत्वों को बाहर निकालता है जिसके कारण गठिया होता है। अंगूर के सेवन से हडि्डयाँ मजबूत होती हैं। अंगूर के पत्तों का रस पानी में उबालकर काले नमक मिलाकर पीने से गुर्दो के दर्द में भी बहुत लाभ होता है। भोजन के आघा घंटे बाद अंगूर का रस पीने से खून बढता है और कुछ ही दिनों में पेट फूलना, बदहजमी आदि बीमारियों से छुटकारा मिलता है। अंगूर के रस की दो-तीन बूंद नाक में डालने से नकसीर बंद हो जाती है। इतिहास अंगूर की खेती का प्रारंभ अाज से ५०००-८००० साल पेहले पूर्वीय युरोप क्षेत्र से हुआ था। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ अंगूर फल
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अंगूर
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अंगोला एगो देस के नाँव छेकै। इ देस क अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त छै आरो संग संग संयुक्त राष्ट्र संघ मँ सदस्यता प्राप्त छै। शब्द-साधन इतिहास राजनीति कानून और आपराधिक न्याय विदेश संबंध, रक्षा और सुरक्षा भूगोल अर्थव्यवस्था जनसांख्यिकी शिक्षा स्कूलों अंडोरा विश्वविद्यालय परिवहन मीडिया और दूरसंचार संस्कृति खेल एकरो देखौ विश्व केरौ सब्भे देस बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंगोला
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अंग्रेज़ी गृहयुद्ध 1842 आरू 1851 के बीच लड़लौ गलौ युद्ध क एगो श्रृंखला क नाँव छेकै। इ युद्ध अंग्रेजी राजतंत्रवादि आरू संसदीय शासन के बीच आयोजित करलौ गलौ छेलै। सैन्य संघर्ष क मुख्य कारण इ छेलै कि इंग्लैंड मँ सरकार क व्यवस्था मँ राजशाही लगातार नै रहतै आरू सरकार क संसदीय प्रणाली क रूप लेतै। पहलौ युद्ध (1842-48) आरू दोसरौ युद्ध (1848-49) किंग चार्ल्स प्रथम आरू लॉन्ग पार्लियामेंट के बीच लड़लौ गलौ छेलै। तीसरौ युद्ध (1849-51) किंग चार्ल्स द्वितीय आरू रैम्प पार्लियामेंट के बीच लड़लौ गलौ छेलै। युद्ध 3 सितंबर 1851 क वॉर्सेस्टर के लड़ाई क साथ समाप्त होलै। युद्ध मँ राजतंत्रवादि सिनी क पराजय होलै।Quentin Outram. "The Demographic Impact of Early Modern Warfare." Social Science History, Summer, 2002, Vol. 26, No. 2 (Summer, 2002), p 256. परिणाम इ युद्ध क परिणाम तीन छेलै। राजा चार्ल्स प्रथम क मृत्युदंड, हुन्कौ पुत्र चार्ल्स द्वितीय क निर्वासन आरू ब्रिटिश राजतंत्र क परिवर्तन। इ युद्ध के परिणामस्वरूप, इ संवैधानिक घोषणा छेलै कि ब्रिटिश राज संसद के राय केरौ बिना राज्य प शासन नै करै पारतै। एकरो देखौ इंगलैंड अंग्रेजी भाषा बाहरी कड़ी Englishcivilwar.org अंग्रेजी गृहयुद्ध के बारै मँ समाचार, टिप्पणि आरू चर्चा इंग्लिश सिविल वॉर सोसाइटी केरौ आधिकारिक वेबसाइट क्रांति प क्रांति इ पन्ना मँ पूर्वी इंग्लैंड सँ संबंधित समकालीन प्रपत्र के कुछु प्रतिलेखन के लिंक छै एगो राष्ट्रीय गृहयुद्ध केरौ कालक्रम लिंकनशायर आरू हुन्कौ परिवेश लेली गृह युद्ध केरौ कालक्रम आरू कुछु जुड़लौ इतिहास संदर्भ
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अंग्रेज़ी गृहयुद्ध
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अंग्रेजी एगॊ पश्चिम जर्मेनिक भाषा छेकै जेकरॊ उत्पत्ति एंग्लो-सेक्सन इंग्लैंड मॆं होलॊ रहै । अंग्रेजी (english) इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के जर्मन शाखा केरौ पच्छिमी समूह क भासा छेकै। परिबार मँ अंग्रेजी क सबसँ निकटक भाषा फ़्रिसियाई छेकै। इ डच, फ्लेमिश (बेल्जियम केरौ डच क एगो उपभासा) आरू निच्चला जर्मन बोलीयो सँ संबंधित छै। अंग्रेजी क जन्म छठ्ठा शताब्दी ईस्वी मँ इंग्लैंड मँ होलौ छेलै जे उत्तरी अटलांटिक महासागर मँ ग्रेट ब्रिटेन के द्वीप केरौ दक्खिन मँ एगो देश छेकै। इ वर्तमान मँ यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आरू कैरिबियन आरू प्रशांत मँ ढेरी सिनी दुईप क मुख्य भासा छेकै। लगभग 370 मिलियन लोग क मातृभाषा अंग्रेजी छेकै। इ देसी वक्ता क संख्या के मामला मँ दुनिया मँ तीसरौ स्थान प छै। अंग्रेजी शब्दावली का अस्सी प्रतिशत विदेशी मूल का है। [3] शेष 30 प्रतिशत अंग्रेजी शब्द पुरानी अंग्रेजी, एंग्लो-सैक्सन और जर्मन मूल के हैं। एंग्लो-सैक्सन और जर्मन-व्युत्पन्न शब्दों को शुद्ध अंग्रेजी शब्द माना जाता है। बियोवुल्फ़, 8वीं और 11वीं शताब्दी के बीच कभी लिखा गया, अंग्रेजी भाषा के शुरुआती उदाहरणों में से एक माना जाता है। विलियम शेक्सपियर सर्वश्रेष्ठ अंग्रेजी लेखक हैं। 16वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी तक, जब अंग्रेजों ने दुनिया का उपनिवेश किया और संयुक्त राज्य अमेरिका महाशक्ति बन गया, तो 20वीं शताब्दी के मध्य तक अंग्रेजी दुनिया की भाषा बन गई। अंग्रेजी वर्तमान में दुनिया में दूसरी सबसे अधिक अध्ययन की जाने वाली भाषा है। दक्षिण अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, फिलीपींस, सिंगापुर जैसे पूर्व बहुभाषी अंग्रेजी उपनिवेशों ने स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजी को लिंगुआ फ़्रैंका या सह-आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया। कुल मिलाकर, 850 मिलियन गैर-देशी वक्ता एक विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेजी का उपयोग करते हैं।[4] आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक, दूरसंचार और कंप्यूटर प्रौद्योगिकी, विश्व व्यापार और कूटनीति की प्रमुख भाषा के रूप में, अंग्रेजी का आसपास के लोगों के दैनिक जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव है। दुनिया। एकरो देखॉ इंग्लैंड बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंग्रेजी भाषा
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लातिन क शब्दसूचि सिनी न आधुनिक कोश-रचना-पद्धति क जौन प्रकार विकास करलौ छै, अंग्रेज कोशों के विकास क्रम में उसे देखा जा सकता है। आरंभ में इन शब्दार्थसूचियों का प्रधान विधान था क्लिष्ट 'लातिन' शब्दों का सरल 'लातिन' भाषा में अर्थ सूचित करना। धीरे-धीरे सुविधा के लिये रोमन भूमि से दूरस्थ पाठक अपनी भाषा में भी उन शब्दों का अर्थ लिख देते थे। 'ग्लाँसरी' और 'वोकैब्युलेरि' के अंग्रेजी भाषी विद्वानों की प्रवृत्ति में भी यह नई भावना जगी। इस नवचेतना के परिणामस्वरूप 'लातिन' शब्दों का अंग्रेजी में अर्थनिर्देश करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। इस क्रम में लैटिन-अंगेजी कोश का आरंभिक रूप सामने आया। इतिहास दसवीं शताब्दी में ही 'आक्सफोर्ड' के निकटवर्ती स्थान के एक विद्वान धर्मपीठाधीश 'एफ्रिक' ने 'लैटिन' व्याकरण का एक ग्रंथ बनाया था। और उसी के साथ वर्गीकृत 'लातिन' शब्दों का एक 'लैटिन-इंग्लिश', लघुकोश भी जोड दिया था। संभवत: उक्त ढंग के कोशों में यह प्रथम था। १०६६ ई० से लेकर १४०० ई० के बीच की कोशोत्मक शब्दसूचियों को एकत्र करते हुए 'राइट ब्यूलर' ने ऐसी दो शब्दसूचिय़ाँ उपस्थित की है। इनमें भी एक १२ वीं शताब्दी की है। वह पूर्ववर्ती शब्दसूचियों की प्रतिलिपि मात्र हैं। दूसरी शब्दसूची में 'लातिन' तथा अन्य भाषाओं के शब्द हैं। इंग्लैड में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के उद्बुद्ध होने पर अंग्रेजी राजभाषा हुई। शिक्षा-संस्थाओं में फ्रांसीसी के स्थान पर अंग्रेजी का पठन-पाठन बढा। अंग्रेजी में लेखकों की संख्या भी अधिक होने लगी। फलत: अंग्रेजी के शब्दकोश की आवश्यकता भी बढ गई। १५वीं शती में 'राइट व्यूलर' ने छह महत्त्वपूर्ण पुरानी शब्दार्थसूचियों को मुद्रित किया। अधिकत: विषयगत वर्गों के आधार पर वे बनाई गई थीं। केवल एक शब्दसूची ऐसी थी जिसमें अकारादिक्रम से २५००० शब्दों का संकलन किया गया था। ऐम० ऐम० मैथ्यू ने अंग्रजी कोशों का सर्वेक्षण नामक अपनी रचना में १५वी शती के दो महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का उल्लेख किया़ है। प्रथम 'ओरट्स' का 'वोकाब्युलरियम्' था जो पूर्व 'मेड्डला' व्याकरण पर आधारित था। दूसरा था 'ग्लाफेड्स' या 'ज्याफरी' व्याकरण पर आधारित इंग्लिश—लैटिन कोश। इसका पिंसिन द्वारा १४४० ई० में प्रथम मुद्रित संस्करण प्रकाशित किया गया। उसका नाम था प्रोंपटोरियम परव्यूलोरमं सिनक्लोरिकोरं (अर्थात् बच्चों का भांडार या संग्रहालय)। इसका महत्व— ९—१० हजार शब्दों के संग्रह के कारण न होकर इसलिये था इसके द्वारा शब्दसूचि के रचनाविद्यान में नए प्रयोग का संकेत दिखाई पडा़। इसमें संज्ञा और क्रिया के मुख्यांश से व्यतिरिक्त अन्य प्रकार के शब्द (अन्य पार्टस् आँव स्पीच) भी संकलित है। यह 'मेड्डला ग्रामाटिसिज' कदाचित् प्रथम 'लातीन—अंग्रेजी' शब्दकोश था। लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है— उसकी बहुत सी उपलब्ध प्रतिलिपियो के कारण। १४८३ ईं में 'वेथोलिअम ऐंग्लिवन् ' नामक शब्दकोश संकलित हुआ था। परंतु महत्त्वपूर्ण कोश होकर भी पूर्वाक्त कोश के समान वह लोकप्रिय न हो सका। इसके पश्चात् १६वी शताब्दी में 'लैटिन-अँग्रँजी' और 'अंग्रेजी-लैटिन' की अनेक शब्दसूचियाँ निर्मित एवं प्रकाशित हुई। 'सर टामस ईलियट' की डिक्शनरी ऐसा सर्वप्रथम ग्रंथ है जिसमें 'डिक्शनरी' अभिधान का अंग्रेजी में प्रयोग मिलता है। मूल शब्द लातिन का 'डिक्शनरियम्' है जिसका अर्थ था कथन (सेइंग)। पर वैयाकरणों द्वारा 'कोश' शब्द के अर्थ में उसका प्रयोग होने लगा था। इससे पूर्व—आरं- भिक शब्दसूचियों और कोशों के लिये अनेक नाम प्रचलित थे, यथा— 'नामिनल', 'नेमबुक', मेडुला ग्रामेटिक्स, 'दी आर्टस् वोकाब्युलेरियम्' गार्डन आफ़ वडंस, दि प्रोम्पटारियम पोरवोरम, कैथोलिकं ऐग्लिकन्, मैनुअलस् वोकैब्युरम्, हैंडफुल आव वोकैब्युलरियस्, 'दि एबेसेडेरियम्, बिबलोथिका, एल्बारिया, लाइब्रेरी, दी टेबुल अल्फाबेटिकल, दी ट्रेजरी या ट्रेजरर्स ऑफ वर्डस् 'दि इंग्लिश एक्सपोजिटर', दि गाइड टु दि टंग्स्, दि ग्लासोग्राफिया, दि न्यू वल्डर्स, आव वर्डस् 'दि इटिमालाँजिकम्' दि फाइलाँलाँजिकम्' आदि। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अनुसार १२२४ ईं में कंठस्थ की जानेवाली 'लातिन' शब्दसूची के हस्तलेख के लिये जान गारलैंडिया ने इस (डिक्शनरी) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया था। परंतु लगभग तीन शताब्दी बाद सर टामस् ईलियट द्वारा प्रयुक्त यह शब्द क्यों और कैसे लोकप्रिय हो उठा यह कहना सरल नहीं है। १६वीं शती में पूर्वार्ध के व्यतीत होते होते यह विचार स्विकृत होने लगा कि शब्दकोश में शब्दार्थ देखने की पद्धति सुविधापूर्ण और सरल होनी चाहिए। इस दृष्टि से कोश के लिये वर्णमाला क्रम से शब्दानुक्रम की व्यवस्था उपयुक्ततर मानी गई। पश्चिम की इस पद्धति को महत्त्वपूर्ण उपलब्धि और कोशविद्या के नूतन विकास की नई मोड़ माना जा सकता है। एकाक्षर और विश्लेषणात्मक पदरचना वाली चीनी भाषा में एकाक्षर शब्द ही होते हैं। प्रत्येक 'सिलेबुल' स्वतंत्र, सार्थक ज्ञौर विश्लिष्ट होता है। वहाँ के पुराने कोश अर्थानुसार तथा उच्चारण- मूलक पद्धति पर बने हैं। वैसी भाषा के कोशों में उच्चारणानुसारी शब्दों का ढूँढना अत्यंत दुष्कर होता था। परंतु योरप की भाषाओं में अकारादि क्रमानुसारी एक नई दिशा की ओर शब्दकोशरचना का संकेत हुआ। पूर्वोक्त प्रोम्पटोरियम के अनंतर १५१९ में प्रकाशित विलियम हार्नन का शब्दकोश अंग्रेजी लैटिन कोशों में उल्लेख्य है। इसमें कहावतों और सूक्तियों का प्राचीन पद्धति पर संग्रह था। मुद्रित कोशों में इसका अपना स्थान था। १५७३ ई० में रिचार्ड हाउलेट का 'एबेसेडेरियम' और 'जाँन वारेट का लाइब्रेरिया—दो कोश प्रकाशित हुए। प्रथम में लैटिन पर्याय के साथ साथ अंग्रैजी में अर्थ कथन होने से अंग्रेजी कोशों में—विशेषत: प्राचीन काल के—इसे उत्तम और अपने ढंग का महत्वशाली कोश माना गया है। इससे भी पूर्व— ई० १५७० में 'पीटर लेविस' ने एक 'इंगलिश राइमिंग डिक्शनरी' बनाई थी जिसमें अंग्रेजी शब्दों के साथ लैटिन शब्द भी हैं और सभी खास शब्द तुकांत रूप में रखे गए थे। हेनरी अष्टम की बहन, मेरी ट्युडर, जब फ्रांस के १२वें लुई की पत्नी बनी तब उन्हें फ्रांसीसी भाषा पढा़ने के लिये जान पाल ग्रे ने एक ग्रंथ बनाया जिसमें फ्रांसीसी के साथ साथ अंग्रेजी शब्द भी थे। १४३० ई० में यह प्रकाशित हुआ। इस कोश को आधुनिक फ्रांसीसी और आधुनिक अंग्रेजी भाषाओं का प्राचीनतम कोश कहा जा सकता है। गाइल्स दु गेज़ ने लेडी मेरी को फ्रांसीसी पढा़ने के लिये १५२७ में व्याकरणरचना की जो पुस्तक प्रकाशित की थी उसमें भी चुने हुए अंग्रेजी और फ्रांसीसी शब्दों का संग्रह जोड़ दिया गया था। रिचर्ड हाउलेट का एबेसेडिरियम १५५२ ई० में प्रकाशित हुआ; जिसे सर्वप्रथम अंग्रेजी (+ लैटिन) 'डिक्शनरी' कह सकते हैं। जान वारेट का कोश (एल्बरिया) भी १५७३ ई० में प्रकाशित हुआ। रिचार्ड के कोश में अंग्रेजी भाषा द्वारा अर्थव्याख्या की गई है। अत: उसे प्रथम अंग्रेजी कोश— लैटिन अंग्रेजी डिक्शनरी कह सकते हैं। १६वीं शताब्दी में ही (१५९९ ई० में) रिचार्डस परसिवाल ने स्पेनिश अंग्रेजी—कोश मुद्रित कराया था। पलोरियो ने भी दि वर्ल्ड्स आव दि वर्डस् नाम से एक इताली—अग्रेजी—कोश बनाकर मुद्रित किया। उसका परिवर्धित संस्करण १६११ ई० में प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष रैंडल काटग्रेव का प्रसिद्ध फ्रेंच—अंग्रेजी—कोश भी प्रकाशित हुआ जिसके अति लोकप्रिय हो जाने के कारण बाद में अनेक संस्करण छपे। केवल अंग्रेजीकोश के अभाववश 'पलोरियो' और 'काटग्रेव' के अंग्रेजी शब्दसंग्रही का अत्यंत महत्व माना गया और 'शेक्सपियर' के युग की भाषा समझने—समझाने में वह बडा़ उपयोगी सिद्ध हुआ। इसी के आस-पास 'बाइबिल' का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाश में आया। १७वी० शताब्दी के प्रथम चरण (१६१० ई० में) में जाँन मिनश्यू ने 'दि गाइड इंटु इग्स ' नामक एक नानाभाषी कोश का निर्माण किया जिसमें अंग्रेजी के अतिरिक्त अन्य दस भाषाओं का (वेल्स लो डच्, हाई डच्, फ्रांसीसी, इताली, पूर्तगाली, स्पेनी लातिन, यूनानी और हिंब्रु शब्द दिए गए थे)। इन कोशों में अंग्रेजी कोश के लिये आवश्यक और उपयोगी सामग्री के रहने पर भी केवल अंग्रेजी के एकभाषी कोश की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। प्राचीन अध्ययन के प्रति पुनर्जागर्ति के कारण अंग्रेजी में लातिन, यूनानी, हिब्रू, अरबी आदि के सहस्रों शब्द और प्रयोग प्रचारित होने लगे थे। ये प्रयोग 'इंक हार्डस टमँस्' कहे जाते थे। वे परंपरया आगत नहीं थे। इन क्लिष्ट शब्दों की वर्तनी और कभी कभी अर्थ बतानेवाले ग्रंथों की तत्कालीन अनिवार्य आवश्यकता उठ खडी हुई थी। मुख्यतः इसी की पूर्ति के लिये— न कि अपनी भाषा के शब्दों और मुहावरों का परिचय कराने की भावना से— आरभिक अंग्रेजी- कोशों के निर्माण की कदाचित् मुख्य प्रेरणा मिली। सर्वप्रथम 'टेबुल अल्फावेटिकल आव हार्ड वर्डस' शीर्षक एक लघु पुस्तक राबर्ट काउड ने प्रकाशित की जो १२० पृष्ठों में रचित थी। इसमें तीन हजार शब्दों की शुद्ध वतंनी और अर्थों का निर्देश किया गया था। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि आठ वर्षों में इसके तीन संस्करण प्रकाशित करने पडे़। १६१६ ई० में 'ऐन इंगलिश एक्सपोजिटर' नामक — जान बुलाकर का — कोश प्रकाशित हुआ जिनके न जाने कितने संस्करण मुद्रित किए गए। १६२३ ई० में 'एच० सी० जेट' द्वारा रचित 'इंगलिश डिक्शनरी' के नाम से एक कोशग्रथ प्रकाशित हुआ जिसकी रचना से प्रसन्न होकर प्रशंसा में 'जाँन फो़ड' ने प्रमाणपत्र भेजा था। तीन भागों में विभक्त इस कोश की निर्माणपद्धति कुछ विचित्र सी लगती है। इसकी विभाजनपद्धति को देखकर 'यास्क' के निरुक्त में निर्दिष्ट नैगमकांड, नैघंटुककांड और दैबतकाडों में लक्षित वर्गानुसारी पद्धति की स्मृति हो आती है। प्रथम अंश से क्लिष्ट शब्द सामान्य भाषा में अर्थों के साथ दिए गए हैं। द्वितीय अंश में सामान्य शब्दों के अर्थों का क्लिष्ट पर्यायों द्वारा निर्देश हुआ है। देवी देवताओं, नरनारियो, लड़के लडकियों, दैत्वों—राक्षमों, पशु पक्षियों आदि की व्याख्या द्वारा तीसरे भाग के इस अंश में वर्णन किया गया। इसमें शास्त्रीय, ऐतिहासिक, पौराणिक तथा अलौकिक शक्तिसंपन्न व्यक्तियों आदि से संबद्ध कल्पनाआ का भी अच्छा सकलन है। २० साल परिश्रम करके 'ग्लासोग्राफया' नामक एक ऐसे कोश का 'टामस क्लाउंडर ने संग्रह किया था जिसमें यूनानी, लातिन, हिब्रू आदि के उन शब्दों की व्याख्या मिलती है जिनका प्रयोग उस समय की परिनिष्ठित अंग्रजी मे होने लगा था। एस० सी० काकरमैन का कोश भी बडा़ लोकप्रिय था और उसके जाने कितने संस्करण हुए। प्रसिद्ध कवि मिल्टन के भतीजे एडवर्ड फिलिप्स ने १५४५ ई० में दि न्यू वर्ल्ड आव इंगलिश बर्डस, या 'ए जेनरल डिकश्नरी' नामक लोकप्रिय कोश का निर्माण किया था। १६६० तक के प्रकाशित कोशों की निर्माण संबंधी आवश्यकताओं में कदाचित् तात्कालिक प्रयोजन का सर्वाधिक महत्व था विशिष्ट महिलाओं यो अध्ययनशील विदुषियों को सहायता देना। बाद में चलकर कोशनिर्माण का इस प्ररणा का निर्देश नहीं मिलता। १७०२ ई० से १७०७ तेक 'लासोग्राफिया' के अनेक संस्करण छपे। एडवर्ड फिलाप्स का काश भी बाद क संस्करणों में अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। एशिसाकोत्स और एडवर्ड पार्कर के कोश भी इसी समय के आसपास छपे जिनका पुनर्मुद्रण बीसवीं शती तक भी होता रहा। जाँन करेन्सी ने भी 'डिक्शनेरियम एंग्लोब्रिटेनिकन' या 'जनरल इंग्लिश डिक्शनरी' निर्मित की जिसमें पुराने (प्रयोगलुप्त) शब्दों की पर्याप्त संख्या थी। नैथन बेली सौ वर्षों तक अंग्रेजी की कोशरचना का उपर्युक्त क्रम चलता रहा जिनके शब्दसंकलन में विशिष्ट शब्दों की ही मुख्यता बनी रही। भाषा में प्रयुक्त समस्त सामान्य और विशिष्ट शब्दों का कोश बनाने में विद्वान् प्रवृत्त नहीं हुए थे। 'नैथन वेली' ने सर्वप्रथम ऐसे कोशके निर्माण की योजना बनाई जिसमें अंग्रेजी के समस्त शब्दों के समावेश का प्रयास किया गया। इसका नाम था युनिवर्सल इटिमाँलाजिकल इंगिलिश डिक्शनरी। इसमें अनेक विशेषताएँ थी। संकलित शब्दों के विकासक्रम का संकेत दिया गया था। साथ ही इसमें व्युत्पत्ति देने की भी चेष्टा की गई। १७२९ में इसका प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ। १७३९ में प्रकाशित दूसरे संस्करण में शब्दों के उच्चारणबोधक संकेत भी इ समें दिए गए। अंग्रेजी के कोशज्ञ विद्वानों द्वारा यह कोश अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग्रेजी डिक्शनरी माना जाता है। पहला कारण यह था कि डॉ॰ जानसन द्वारा निर्मित ऐतिहासिक महत्व के अंग्रेजी कोश की यह साधारशिला बनी। दूसरा कारण यह था कि इसमें समस्त अंग्रेजी शब्दों के वयाशक्ति संकलन का लक्ष्य पहली बार रखा गया। तीसरा कारण व्युत्पत्ति निर्देश करने और उच्चारणसंकेत देने की पद्धति के प्रवर्तन का प्रायास था। जाँनसन का अंग्रेजी कोश (१७४७ — १७५५ ई०) इठली और फांस एकेडमीशियनों द्वारा ऐसले प्रामाणिक कोशों की रचना का कार्यक्रम प्रवर्तित हो गया था जिनमें परिनिष्ठित भाषा के मान्यताप्राप्त प्रयोगरूपों का स्थिरीकरणऔर प्रमाणीकरण किया जा सके। जर्मन, स्पेनी, फ्रांसीसी और इताली भाषाओं में ऐसे कोशों की रचना का प्रयास चल रहा था। अंग्रेजी भाषा का साहित्यिक सवरूप पुष्ट, विकसित, मान्य एवं विरनिष्ठित होता चल रहा था। पद्य या छंदोबद्ध भाषा के अतिरिक्त वच की रचनाओं को साहित्यिक आदर प्राप्त होने लगा था। फलत अंग्रेजी भाषा का तत्कालीन स्वरूप परिनिष्ठित भाषा के स्तर पर ग्राह्य और मान्य हो गया था। अतः साहित्यकार, पुस्तक प्रकाशक और प्रचारक यह महसूस करने लगे थे कि परिनिष्ठित अंग्रेजी कोश का निर्माण अत्यंत आवश्यक हो गया है। अनेक पुस्तक प्रकाशकों और विक्रेताओं के उत्साह और सहयोग से पर्याप्त धनराशि व्यय करके जाँनसन द्वारा अनेक बर्षों के अथक प्रयास से अंग्रेजी की डिक्शनरी १७४७ से १७५५ ई० के बीच तैयार कर प्रकाशित की गई। इसी बीच'कन्साइज डिक्शनरी' भी १७५३ ई० में जान वेसली द्वारा प्रस्तुत होकर सामने आई। आजतक जानसन का उक्त कोश अपने आप में अत्यंत ऐतिहासिक महत्व का माना जाता है। इसमें मल शब्दों से अँग्रेजी के व्युत्पन्न शब्दों का विकासक्रम दिखाने के साथ साथ उनके विभिन्न अर्थप्रयोगों को भी उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है। अंग्रेजी के उक्तृष्ट लेखकों से उदाहरणों के उद्धरण लिए गए हैं। उनके इस कार्य का अंग्रेजी भाषी जनता ने बडे़ हर्ष और उल्लास के साथ स्वागत किया। इसमें शब्दों का अर्थ परिभाषा के रूप में भी दिया गाय है। नबकोशविद्या के इतिहास में यह उपलब्धि सर्ब- प्रथम और अत्यंत महत्वशाली कही गई। इसी समय चालीस विद्वान् व्कक्ति एक साथ मिलकर फ्रास में फ्रांसीसी भाषा का कोश बना रहे थे। उसकी चर्चा करतै हुए जेन्टिलमैन्स मैगजीन नामक पत्र ने कहा था कि फ्रांस के चालीस विद्वान् लगभग आधी शती में जो कार्ध न कर सके उसे अकेले जौनसन ने सात वर्षों में कर दिखाया। अंग्रेज जनता ने उस कोश को राष्ट्र और भाषा दोनों के उत्कर्ष की दृष्टि से अत्यंत महत्व का बताया। अंग्रेजी शब्दों के उच्चारण, भाषाशुद्धता की रक्षा और प्रयोग का स्थिरीकरण करने में इस कोश की बहुत बडी देन मानी जाती है। परंतु इसमें दिए गए साहित्यिक उद्धरण— ग्रंथों से संदर्भ निर्देशपूर्वक न लेकर— कोशकार ने अपनी स्मृति से दे दिए हैं। फलतः अनेक स्थलों में उद्धरणों की अशुद्धि इस कोश की एक त्रुटि बन गई। परंतु त्वरित गति से स्वल्प समय में कार्य समाप्त करने की आकांक्षा के कारण त्रुटि रह गई। पुस्तक एकत्र करना, उद्धरण प्रतिलिपि करना और उनका संयोजन करना, आदि कार्य इतना श्रम-समय-साध्य था जो सात बर्षों में एक व्यक्ति के द्वारा सर्वथा असंभव था। इसके बाद १८वीं शती के अंत तक अंग्रेजी में अनेक कोश बने। विलियम कर्निक, विलियम पैरी, टामस शेरिडन और जान वाकर ने उच्चारण आदि की समस्या को सुलझाने का प्रयत्न किया। इन कोशों को 'जोँनसन ' के कोश का संक्षिप्त या लघु संस्करण कहा गया है। उच्चारण का ठीक ठीक स्वरूप बताने का कार्य समस्यात्मक था। उसका पूर्णतः समाधान करने की चेष्टा 'जांनसन' या बाद के कोशकारों ने की। जौंन वाकर ने उक्त दिशा में विशेष प्रयत्न किया। इन कारणों से 'जोंनसन' के कोश की कुछ आलोचना भी होती रही। पर १९ वीं शती के पूर्वार्ध से उसका संमान बढ़ गया, उसकी महत्ता स्वीकृत हो गई। उसमें नए शब्दों, अर्थों, उद्धरणों आदि के परिवर्धन- कारी परिशिष्टों कों, अनेक विद्वानों की सहायता से जोड़कर उक्त कोश के संशोधित और संवर्धित संस्करण प्रकाशित होते रहे। १८९८ में ऐसी ही एक संस्करण प्रकाशित हुआ जो अब तक मान्य बना हुआ है। वेब्स्टर का अमरीकी अंग्रेजी का शब्दकोश इंग्लिस्तानियों के अंग्रेजी प्रयोगों से अमेरिकनों की अंग्रेजी को स्वतंत्र देखकर वेब्स्टर ने अमेरिकी अंग्रेजी का एक महत्त्वपूर्ण कोश बनाया। परंतु उनके कोश की बहुत सी व्युत्पत्तियाँ ऐतिहासिक प्रमाणो पर आधारित न होकर निज की स्वतंत्र कल्पना से आविष्कृत थीं। बाद के संस्करणों में भाषाविज्ञों ने उनका संशोधन कर दिया। आज भी वेब्स्टर के इस कोश का दो जिल्दों में 'इन्टरनैशनल' संस्करण प्रकाशित होता है और कुछ दृष्टियों से इसका आज भी महत्व बना हुआ है। रिचर्डसन का शब्दकोश इस युग का दूसरा कोशकार रिचर्डसन था। उसके कोश में उद्धरणों के द्वारा शब्दार्थबोध की युक्ति महत्त्वपूर्ण मानी गई और अर्थबोधक परिभाषाओं को हटाकर केवल उद्धरणों से अर्थ-प्रहत्यायन की पद्धति अपनाई गई। जांनसन से भी आगे बढ़कर - १३०० ईस्वी के पूर्ववर्ती चासर, गोवर आदि कलाकारों के लेखखंडों को उसने उदवृत किया। परंतु उद्धरणों की तिथि उन्होने नहीं दी। व्यावहारिक दृष्टि से श्रमसाध्य, अधिक व्यय-समय-साध्य यह पद्धति शब्दकोश से अर्थज्ञान की कामना करनेवाले पाठकों के लिये उपयोगी और सुविधाजनक न हुई। सामान्य पाठकों के लिये यह अति क्लिष्ट भी थी तथा अर्थ तक पहुँचने में समय भी बहुत लगता था। फिर भी कभी-कभी अनिश्चय रह ही जाता था। जनता में अधिक उपयोगी और लोकप्रिय न होने परह भी इस कोश से एक बडा भारी लाभ हुआ। प्राचीन और प्रसिद्ध लेखकों के अत्यधिक उद्धरणों का इसमें संकलन हो गवा और वले स्थायी रूप में सुरक्षित भी हो गए। आक्सफोर्ड डिक्शनरी: योजना और निर्माण विस्तृत लेख के लिये आक्सफोर्ड डिक्शनरी देखें। एकरो देखौ इंग्लैंड अंग्रेजी शब्दकोश शब्दकोशों का इतिहास बाहरी कड़ी संदर्भ शब्दकोश अंग्रेज़ी चित्र जोड़ें
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अंटार्कटिका अंतरिक्ष सँ अंटार्कटिका केरौ दृश्य। लाम्बर्ट अजिमुथाल प्रोजेक्शन प आधारित मानचित्र।दक्षिणी ध्रुव मध्य मँ छै। अंटार्कटिका (या अन्टार्टिका) पृथ्वी केरऽ दक्षिणतम महाद्वीप छेकै, जेकरा म॑ दक्षिणी ध्रुव अंतर्निहित छै । ई दक्षिणी गोलार्द्ध केरऽ अंटार्कटिक क्षेत्र आरू लगभग पूरा तरह सें अंटार्कटिक वृत केरऽ दक्षिण में स्थित छै । ई चारों ओर सें दक्षिणी महासागर सें घिरलऽ छै । अपनऽ १४० लाख वर्ग किलोमीटर (५४ लाख वर्ग मील) क्षेत्रफल के साथ ई, एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका आरू दक्षिणी अमेरिका के बाद, पृथ्वी केरऽ पाँचवां सबसें बड़ऽ महाद्वीप छेकै, अंटार्कटिका के ९८% भाग औसतन १.६ किलोमीटर मोटऽ बर्फ सें आच्छादित छै। औसत रूप सें अंटार्कटिका, विश्व केरऽ सबसें ठंडा, शुष्क आरू तेज हवा वाला महाद्वीप छेकै आरू सब्भे महाद्वीपऽ के तुलना में एकरऽ औसत उन्नयन सर्वाधिक छै । अंटार्कटिका क॑ एगो रेगिस्तान मानलऽ जाय छै, कैन्हेंकि यहाँकरऽ वार्षिक वर्षण केवल २०० मिमी (8 इंच) छै आरू ओकरा में भी जादातर तटीय क्षेत्रऽ में ही बारिश होय छै। यहाँकरऽ कोय स्थाई निवासी नै छै, लेकिन साल भर लगभग १००० सें ५००० लोग विभिन्न अनुसंधान केन्द्र सब, जे कि पूरे महाद्वीप पर फैललऽ छै , पर उपस्थित रहै छै । यहाँ सिर्फ शीतानुकूलित पौधा आरू जीव ही जीवित रह॑ सकै छै । जेकरा म॑ पेंगुइन, सील, निमेटोड, टार्डीग्रेड, पिस्सू, विभिन्न प्रकार के शैवाल आरू सूक्ष्मजीव के अलावा टुंड्रा वनस्पति भी शामिल छै । हालांकि पूरे यूरोप में टेरा ऑस्ट्रेलिस (दक्षिणी भूमि) के बारे में विभिन्न मिथक आरू अटकल सब सदियों स॑ प्रचलित छेलै पर ई भूमि सें पूरे विश्व केरऽ १८२० में परिचय कराबै के श्रेय रूसी अभियान कर्ता मिखाइल पेट्रोविच लाज़ारेव आरू फैबियन गॉटलिएब वॉन बेलिंगशौसेन क॑ जाय छै । ई महाद्वीप अपनऽ विषम जलवायु परिस्थिति, संसाधनऽ के कमी आरू मुख्य भूमि सें अलगाव के चलतें १९वाँ शताब्दी में कमोबेश उपेक्षित रहलै । महाद्वीप लेली अंटार्कटिका नाम केरऽ पहलऽ पहल औपचारिक प्रयोग १८९० में स्कॉटिश नक्शानवीस जॉन जॉर्ज बार्थोलोम्यू न॑ करन॑ छेलै । अंटार्कटिका नाम यूनानी यौगिक शब्द ανταρκτική एंटार्कटिके स॑ आबै छै, जे ανταρκτικός एंटार्कटिकोस केरऽ स्त्रीलिंग रूप छेकै आरू जेकरऽ अर्थ "उत्तर काे विपरीत" छै।" १९५९ ई. में बारह देश न॑ अंटार्कटिक संधि प॑ हस्ताक्षर करलकै, आज तलक छियालीस देशऽ न॑ ई संधि प॑ हस्ताक्षर करल॑ छै । संधि महाद्वीप प॑ सैन्य आरू खनिज खनन गतिविधि क॑ प्रतिबन्धित करै के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान के समर्थन करै छै आरू ई महाद्वीप केरऽ पारिस्थितिक क्षेत्र क॑ बचाबै लेली प्रतिबद्ध छै । विभिन्न अनुसंधान उद्देश्य के साथ वर्तमान में कईएक देशऽ के लगभग ४००० सें अधिक वैज्ञानिक विभिन्न प्रयोग करी रहलऽ छै । इतिहास टॉलेमी के समय (1 शताब्दी ईस्वी) से पूरे यूरोप में यह विश्वास फैला था कि दुनिया के विशाल महाद्वीपों एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका की भूमियों के संतुलन के लिए पृथ्वी के दक्षिणतम सिरे पर एक विशाल महाद्वीप अस्तित्व में है, जिसे वो टेरा ऑस्ट्रेलिस कह कर पुकारते थे। टॉलेमी के अनुसार विश्व की सभी ज्ञात भूमियों की सममिति के लिए एक विशाल महाद्वीप का दक्षिण में अस्तित्व अवश्यंभावी था। 16 वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में पृथ्वी के दक्षिण में एक विशाल महाद्वीप को दर्शाने वाले मानचित्र आम थे जैसे तुर्की का पीरी रीस नक्शा। यहां तक कि 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब खोजकर्ता यह जान चुके थे कि दक्षिणी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया कथित 'अंटार्कटिका " का भाग नहीं है, फिर भी वो यह मानते थे कि यह दक्षिणी महाद्वीप उनके अनुमानों से कहीं विशाल था। यूरोपीय नक्शों में इस काल्पनिक भूमि का दर्शाना लगातार तब तक जारी रहा जब तक कि, एचएमएस रिज़ोल्यूशन और एडवेंचर जैसे पोतों के कप्तान जेम्स कुक ने 17 जनवरी 1773, दिसम्बर 1773 और जनवरी 1774 में अंटार्कटिक वृत को पार नहीं किया। कुक को वास्तव में अंटार्कटिक तट से 121 किलोमीटर (75 मील) की दूरी से जमी हुई बर्फ के चलते वापस लौटना पड़ा था। अंटार्कटिका को सबसे पहले देखने वाले तीन पोतों के कर्मीदल थे जिनकी कप्तानी तीन अलग अलग व्यक्ति कर रहे थे। विभिन्न संगठनों जैसे कि के अनुसार नैशनल साइंस फाउंडेशन, नासा, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो (और अन्य स्रोत), के अनुसार 1820 में अंटार्कटिका को सबसे पहले तीन पोतों ने देखा था, जिनकी कप्तानी तीन अलग अलग व्यक्ति कर रहे थे जो थे, फैबियन गॉटलिएब वॉन बेलिंगशौसेन (रूसी शाही नौसेना का एक कप्तान), एडवर्ड ब्रांसफील्ड (ब्रिटिश शाही नौसेना का एक कप्तान) और नैथानियल पामर (स्टोनिंगटन, कनेक्टिकट का एक सील शिकारी)। फैबियन गॉटलिएब वॉन बेलिंगशौसेन ने अंटार्कटिका को 27 जनवरी 1820 को, एडवर्ड ब्रांसफील्ड से तीन दिन बाद और नैथानियल पामर से दस महीने (नवम्बर 1820) पहले देखा था। 27 जनवरी 1820 को वॉन बेलिंगशौसेन और मिखाइल पेट्रोविच लाज़ारेव जो एक दो-पोत अभियान की कप्तानी कर रहे थे, अंटार्कटिका की मुख्य भूमि के अन्दर 32 किलोमीटर तक गये थे और उन्होने वहाँ बर्फीले मैदान देखे थे। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार अंटार्कटिका की मुख्य भूमि पर पहली बार पश्चिम अंटार्कटिका में अमेरिकी सील शिकारी जॉन डेविस 7 फ़रवरी 1821 में आया था, हालांकि कुछ इतिहासकार इस दावे को सही नहीं मानते। दिसम्बर 1839 में, संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना द्वारा संचालित, संयुक्त राज्य अमेरिका अन्वेषण अभियान 1838-42 के एक भाग के तौर पर एक अभियान सिडनी, ऑस्ट्रेलिया से अंटार्कटिक महासागर (जैसा कि इसे उस समय जाना जाता था) के लिए रवाना हुआ था और इसने बलेनी द्वीपसमूह के पश्चिम में ‘अंटार्कटिक महाद्वीप’ की खोज का दावा किया था। अभियान ने अंटार्कटिका के इस भाग को विल्कीज़ भूमि नाम दिया गया जो नाम आज तक प्रयोग में आता है। 1841 में खोजकर्ता जेम्स क्लार्क रॉस उस स्थान से गुजरे जिसे अब रॉस सागर के नाम से जाना जाता है और रॉस द्वीप की खोज की (सागर और द्वीप दोनों को उनके नाम पर नामित किया गया है)। उन्होने बर्फ की एक बड़ी दीवार पार की जिसे रॉस आइस शेल्फ के नाम से जाना जाता है। एरेबेस पर्वत और टेरर पर्वत का नाम उनके अभियान में प्रयुक्त दो पोतों: एचएमएस एरेबेस और टेरर के नाम पर रखा गया है। मर्काटॉर कूपर 26 जनवरी 1853 को पूर्वी अंटार्कटिका पर पहुँचा था। निमरोद अभियान जिसका नेतृत्व अर्नेस्ट शैक्लटन कर रहे थे, के दौरान 1907 में टी. डब्ल्यू एजवर्थ डेविड के नेतृत्व वाले दल ने एरेबेस पर्वत पर चढ़ने और दक्षिण चुंबकीय ध्रुव तक पहँचने में सफलता प्राप्त की। डगलस मॉसन, जो दक्षिण चुंबकीय ध्रुव से मुश्किल वापसी के समय दल का नेतृत्व कर रहा थे, ने 1931 में अपने संन्यास लेने से पहले कई अभियानो का नेतृत्व किया। शैक्लटन और उसके तीन सहयोगी दिसंबर 1908 से फ़रवरी 1909 के बीच कई अभियानों का हिस्सा रहे और वे रॉस आइस शेल्फ, ट्रांसांटार्कटिक पर्वतमाला (बरास्ता बियर्डमोर हिमनद) को पार करने और वाले दक्षिण ध्रुवीय पठार पर पहुँचने वाले पहले मनुष्य बने। नॉर्वे के खोजी रोआल्ड एमुंडसेन जो फ्राम नामक पोत से एक अभियान का नेतृत्व कर रहे थे, 14 दिसम्बर 1911 को भौगोलिक दक्षिण ध्रुव पर पहँचने वाले पहले व्यक्ति बने। रोआल्ड एमुंडसेन ने इसके लिए व्हेल की खाड़ी और एक्सल हाइबर्ग हिमनद के रास्ते का प्रयोग किया। इसके एक महीने के बाद दुर्भाग्यशाली स्कॉट अभियान भी ध्रुव पर पहुंचने में सफल रहा। 1930 और 1940 के दशक में रिचर्ड एवलिन बायर्ड ने हवाई जहाज से अंटार्कटिक के लिए कई यात्राओं का नेतृत्व किया था। महाद्वीप पर यांत्रिक स्थल परिवहन की शुरुआत का श्रेय भी बायर्ड को ही जाता है, इसके अलावा वो महाद्वीप पर गहन भूवैज्ञानिक और जैविक अनुसंधानों से भी जुड़ा रहा था। 31 अक्टूबर 1956 के दिन रियर एडमिरल जॉर्ज जे डुफेक के नेतृत्व में एक अमेरिकी नौसेना दल ने सफलतापूर्वक एक विमान यहां उतरा था। अंटार्कटिका तक अकेला पहुँचने वाला पहला व्यक्ति न्यूजीलैंड का डेविड हेनरी लुईस था जिसने यहाँ पहुँचने के लिए 10 मीटर लम्बी इस्पात की छोटी नाव आइस बर्ड का प्रयोग किया था। भारत केरऽ अंटार्कटि‍क कार्यक्रम अंटार्कटि‍क में पहला भारतीय अभियान दल जनवरी 1982 में उतरा और तब से भारत ध्रुवीय विज्ञान में अग्रिम मोर्चे पर रहा है। दक्षिण गंगोत्री और मैत्री अनुसंधान केन्द्र स्थित भारतीय अनुसंधान केन्द्र में उपलब्ध मूलभूत आधार में वैज्ञानिकों को विभिन्न वि‍षयों यथा वातावरणीय विज्ञान, जैविक विज्ञान और पर्यावरणीय विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी अनुसंधान करने में सक्षम बनाया। इनमे से कई अनुसंधान कार्यक्रमों में अंटार्कटि‍क अनुसंधान संबंधी वैज्ञानिक समिति (एससीएआर) के तत्वावधान में सीधे वैश्विक परिक्षणों में योगदान किया है। अंटार्कटि‍क वातावरणीय विज्ञान कार्यक्रम में अनेक वैज्ञानिक संगठनों ने भाग लिया। इनमें उल्लेखनीय है भारतीय मौसम विज्ञान, राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला, भारतीय भू-चुम्बकत्व संस्था, कोलकाता विश्वविद्यालय, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला और बर्कततुल्ला विश्वविद्यालय आदि। इन वैज्ञानिक संगठनों में विशेष रूप से सार्वभौमिक भौतिकी (उपरी वातावरण और भू-चुम्बकत्व) मध्यवर्ती वातावरणीय अध्‍ययन और निम्न वातावरणीय अध्ययन (मौसम, जलवायु और सीमावर्ती परत)। कुल वैश्विक सौर विकीरण और वितरित सौर विकीरण को समझने के लिए विकीरण संतुलन अध्ययन किये जा रहे हैं। इस उपाय से ऊर्जा हस्तांतरण को समझने में सहायता मिलती है जिसके कारण वैश्विक वातावरणीय इंजन आंकड़े संग्रह का काम जारी रख पाता है। मैत्री में नियमित रूप से ओजोन के मापन का काम ओजोनसॉन्‍डे के इस्तेमाल से किया जाता है जो अंटार्कटि‍क पर ओजोन -छिद्र तथ्य और वैश्विक जलवायु परिवर्तन में ओजोन की कमी के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को गति प्रदान करता है। आयनमंडलीय अध्ययन ने एंटार्कटिक वैज्ञानिक प्रयोगों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। 2008-09 अभियान के दौरान कनाडाई अग्रिम अंकीय आयनोसॉन्‍डे (सीएडीआई) नामक अंकीय आयनोसॉन्‍डे स्थापित किया गया। यह हमें अंतरिक्ष की मौसम संबंधी घटनाओं का ब्यौरा देते हैं। मैत्री में वैश्विक आयनमंडलीय चमक और पूर्ण इलैक्ट्रोन अवयव अनुश्रवण प्रणाली (जीआईएसटीएम) स्थापित की गयी है जो पूर्ण इलैक्ट्रोन अवयव (आईटीसीई) और ध्रुवीय आयनमंडलीय चमक और उसकी अंतरिक्ष संबंधी घटनाओं पर निर्भरता के अभिलक्षणों की उपस्थिति की जानकारी देते हैं। जीआईएसटीएम के आंकड़े बृहत और मैसो स्तर के प्लाजामा ढांचे और उसकी गतिविधि को समझने में हमारी सहायता करते हैं। ध्रुवीय क्षेत्र और उसकी सुकमार पर्यावरणीय प्रणाली विभिन्न वैश्विक व्यवस्थाओं के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार की पर्यावरणीय व्यवस्थाएं आंतरिक रूप से स्थिर होती हैं। क्योंकि पर्यावरण में मामूली सा परिवर्तन उन्हें अत्यधिक क्षति पहुंचा सकता है। यह याद है कि ध्रुवीय रचनाओं की विकास दर धीमी है और उसे क्षति से उबरने में अच्छा खासा समय लगता है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अंटार्कटि‍क में जैविक अध्ययन समुद्री हिमानी सूक्ष्‍म रचनाओं, सजीव उपजातियों, ताजे पानी और पृथ्‍वी संबंधी पर्यावरणीय प्रणालियों जैव विविधता और अन्य संबद्ध तथ्यों पर विशेष ध्यान देते हैं। क्रायो-जैव विज्ञान अध्ययन क्रायो जैव विज्ञान प्रयोगशाला का 15 फ़रवरी 2010 को उद्घाटन किया गया था ताकि जैव विज्ञान और रसायन विज्ञान के क्षेत्र के उन अनुसंधानकर्ताओं को एक स्थान पर लाया जा सके। जिनकी निम्न तापमान वाली जैव- वैज्ञानिक प्रणालियों के क्षेत्र में एक सामान रूचि हो। इस प्रयोगशाला में इस समय ध्रुवीय निवासियों के जीवाणुओं का अध्ययन किया जा रहा है। जैव वैज्ञानिक कार्यक्रमों की कुछ उपलब्धियों में शीतल आबादियों से बैक्‍टरि‍या की कुछ नई उपजातियों का पता लगाया गया है। अंटार्कटि‍क में अब तक पता लगाई गयी 240 नई उपजातियों में से 30 भारत से हैं। 2008-11 के दौरान ध्रुवीय क्षेत्रों से बैक्‍टरि‍या की 12 नई प्रजातियों का पता चला है। दो जीन का भी पता लगा है जो निम्न तापमान पर बैक्‍टरि‍या को जीवित रखते हैं। जैव प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए कम उपयोगी तापमान पर सक्रिय कई लिपासे और प्रोटीज का भी पता लगाया है। अंटार्कटि‍क संबंधी पर्यावरणी संरक्षण समिति द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार मैत्री में पर्यावरणीय मापदंडों का अनुश्रवण किया जाता है। भारत ने अपने नये अनुसंधान केन्द्रित लार्जेमन्न पहाड़ियों पर पर्यावरणीय पहलुओं पर आधार रेखा आंकड़ें संग्रह संबंधी अध्ययन भी शुरू कर दिये हैं। इसकी प्रमुख उपलब्धियों में पर्यावरणीय मूल्यांकन संबंधी विस्तृत रिपोर्ट की तैयारी है। यह रिपोर्ट लार्जसन्न पर्वतीय क्षेत्र से पर्यावरणीय मानदंडों पर एकत्र किये गये आधार रेखा आंकड़े और पर्यावरणीय प्रयोगशालाओं में किये गये कार्य पर आधारित है। भारत एंटार्कटिक समझौता व्यवस्था की परिधि में दक्षिण गोदावरी हिमनदी के निकट संरक्षित क्षेत्र स्थापित करने में भी सफल रहा। जलवायु अंटार्कटिका पृथ्वी का सबसे ठंडा स्थान है | पृथ्वी पर सबसे ठंडा प्राकृतिक तापमान कभी २१ जुलाई १९८३ में अंटार्कटिका में रूसी वोस्तोक स्टेशन में -८९.२ डिग्री सेल्सियस (-१२८.६ °F) दर्ज था। अन्टार्कटिका विशाल वीरान बर्फीले रेगिस्तान है | जाड़ो में इसके आतंरिक भागों का कम से कम तापमान −८० °C (−११२ °F) और −९० °C (−१३० °F) के बीच तथा गर्मियों में इनके तटों का अधिकतम तापमान ५ °C (४१ °F) और १५ °C (५९ °F) के बीच होता है | बर्फीली सतह पर गिरने वाली पराबैंगनी प्रकाश की किरणें साधारणतया पूरी तरह से परावर्तित हो जाती है इस कारण अन्टार्कटिका में सनबर्न अक्सर एक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में है | अंटार्कटिका का पूर्वी भाग, पश्चिमी भाग की अपेक्षा अधिक उंचाई में स्थित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक ठंडा है | इस दूरस्थ महाद्वीप में मौसम शायद ही कभी प्रवेश करता है इसीलिए इसका केंद्रीय भाग हमेशा ठंडा और शुष्क रहता है | महाद्वीप के मध्य भाग में वर्षा की कमी के बावजूद वहाँ बर्फ बढ़ी हुई समय अवधि के लिए रहती है | महाद्वीप के तटीय भागों में भारी हिमपात सामान्य बात है जहां ४८ घंटे में १.२२ मीटर हिमपात दर्ज किया गया है | यह दक्षिण गोलार्ध में स्थिति बनाये हुए है। एकरो देखॉ पृथ्वी बाहरी कड़ी अंटार्कटिका-दुनिया का सबसे ठंडा महाद्वीप रहस्यों की गुत्थी है अंटार्कटिका में दबी पुरानी झील अंटार्कटिका के समुद्री जीवन को खतरा अंटार्कटिका महाद्वीप भारत कोश अन्टार्कटिका पर था डायनासौरों का राज अमर उजाला डेढ़ करोड़ साल पहले गर्म था अंटार्कटिका संदर्भ अंटार्कटिका महाद्वीप कॉमन्स पर निर्वाचित चित्र युक्त लेख महाद्वीप अंटार्कटिका
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अंटार्कटिका
https://anp.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE
अंडमान आरू निकोबार द्वीपसमूह (बंगाली भाषा मँ: আন্দামান ও নিকোবর দ্বীপপুঞ্জ) भारत क एगो केन्द्र शासित प्रदेश छेकै। इ बंगाल केरऽ खाड़ी के दक्षिण मँ हिन्द महासागर मँ स्थित छै। अण्डमान आरू निकोबार द्वीप समूह लगभग 572 छोटौ बड़ौ द्वीप सिनी सँ मिली क बनलौ छै जेकरा मँ सँ केवल कुछुए द्वीप प लोग रहै छै। एकरौ राजधानी पोर्ट ब्लेयर छेकै। एकरो देखौ संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंडमान आरू निकोबार द्वीपसमूह
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अंडमान सागर बंगाल केरऽ खाड़ी मं स्थित छै। अंडमान सागर बंगाल के खाड़ी केरौ दक्षिण पूर्व, म्यांमार केरौ दक्षिण, थाईलैंड केरौ पश्चिम आरो अंडमान आरू निकोबार द्वीपसमूह के पूर्व मँ स्थित एगो जल निकाय छेकै। ई हिन्द महासागर क एगो भाग छेकै। ई उत्तर सँ दक्षिण धरि लगभग १२०० किमी आरो पूर्व सँ पश्चिम धरि लगभग ६५० किमी विस्तारित छै आरो एकर कुल भौगोलिक क्षेत्रफल ७,९७,००० किमी छै। एकरौ औसत गहराई ८७० मीटर आरो अधिकतम गहराई ३,७७७ मीटर छै। एकरहो देखौ अंडमान आरू निकोबार द्वीपसमूह संदर्भ बाहरी कड़ी
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अंडमान सागर
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अंडोरा एगो देस के नाँव छेकै। इ देस क अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त छै आरो संग संग संयुक्त राष्ट्र संघ मँ सदस्यता प्राप्त छै। शब्द-साधन इतिहास राजनीति कानून और आपराधिक न्याय विदेश संबंध, रक्षा और सुरक्षा भूगोल अर्थव्यवस्था जनसांख्यिकी शिक्षा स्कूलों अंडोरा विश्वविद्यालय परिवहन मीडिया और दूरसंचार संस्कृति खेल एकरो देखौ विश्व केरौ सब्भे देस बाहरी कड़ी संदर्भ
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अंडोरा
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