Dataset Viewer
Auto-converted to Parquet Duplicate
audio
audioduration (s)
1.14
9.86
text
stringlengths
16
134
source
stringclasses
1 value
तो चलिए, इस सफर की शुरुआत करते हैं सुख की तलाश में.
0
हीडोनिज्म का इतिहास बहुत पुराना है और इसकी शुरुआत प्राचीन ग्रीस से मानी जाती है, जहां ये विचार पहली बार दर्शन की भाशा में सामने आया.
0
हीडोनिज्म शब्द, युनानी शब्द हीडोने से आया है, जिसका अर्थ है सुख या प्लेजर.
0
उनके अनुसार, अगर किसी काम से तुरंत आनंद मिलता है, तो वह काम सही है, और अगर दुख देता है तो गलत.
0
लेकिन इसी के जवाब में एक और स्कूल खड़ी हुई, जिसे हम एपिकूरियनिजम के नाम से जानते हैं.
0
इसकी स्थापना एपिकूरस ने की थी, जो हीडोनिजम को एक गहराई और संतुलन में देखने की कोशिश कर रहा था.
0
वह कहते हैं कि जो सुख सरल चीजों से मिल सकता है, उसके लिए हमें बड़ी चीजों के पीछे नहीं भागना चाहिए.
0
इस तरह, एपिक्यूरियनिजम ने हेडोनिजम को एक दार्शनिक और मानसिक डिसिप्लिन की तरह प्रस्तुत किया, ना कि केवल भौतिक भोग की तरह.
0
इसके बाद समय के साथ हेडोनिजम पश्चिमी दर्शन में आगे बढ़ा और यूटिलिटेरियनिजम का आधार बना.
0
जॉन स्टुवर्ट मिल ने बेंथम से थोड़ा अलग रुख अपनाया और कहा कि हर सुख समान नहीं होता.
0
कुछ प्लेजर्स हायर होते हैं जैसे कि साहित्य, कला और दर्शन से मिलने वाला सुख और कुछ लोवर होते हैं जैसे कि खाने -पीने या भौतिक सुख.
0
मिल के अनुसार एक हायर प्लेजर कम मात्रा में भी ज्यादा वैल्यूबल होता है.
0
इस तरह यूटिलिटेरियनिजम ने हेडोनिजम को इंडिविज्वल से उठा कर समाज के स्तर तक पहुँचा दिया.
0
अब अगर भारत की बात करें तो सीधे तोर पर हेडोनिजम जैसा दर्शन हमारे ग्रंथों में उस नाम से नहीं है.
0
लेकिन सुख की तलाश और उसकी सीमाओं पर बहुत चर्चा हुई है. चारवाग दर्शन को अकसर इंडियन हेडोनिजम का रूप माना जाता है.
0
चारवा पर इंडियन का एक मात्र सत्य, शरीर और इंडियों का सुख है.
0
चारवाग एक रैडिकल मेटीरियलिस्ट है जिन्नोंने किसी भी तरह के आध्यात्मिक सुख या धार्मिक सैयम को खारिज किया.
0
हालांकि उनका विचार मुख्यधारा में नहीं रहा, फिर भी भारतिय दर्� पर इंडियों के रूप में वो एक बोल्ड कॉंट्रास्ट के रूप में मौजूद है.
0
समय के साथ हेडोनिजम का विरोध भी हुआ.
0
स्टोिसिजम, क्रिस्टियानिटी और बुधिजम जैसी परंपराओं ने इसे सुपरफिशल और मिसलीडिंग माना.
0
स्टोिक्स ने कहा कि सच्चा सुख तो आत्म सैयम और वर्चू से आता है, ना कि प्लेजर से.
0
क्रिस्टियानिटी में प्लेजर को आफ्टन टेम्टेशन और पाप से जोड़ा गया, और जीवन को एक परीक्षा की तरह देखा गया.
0
वहीं बुधिजम ने यह सिखाया कि सुख की खोज ही दुख का कारण है और अटैच्मेंट से मुक्ती ही अल्टिमेट फ्रीडम है.
0
इन सब आलोचनाओं के बावजूद हेडोनिजम बार बार नए रूपों में लोटा.
0
इतिहास में हेडोनिजम का सफर एकदम सीधा नहीं रहा.
0
हेडोनिस्म कई प्रकार का होता है और हर प्रकार इस विचार को अलग नजरिये से देख्ता है, कि सुख क्या है और कीसे पाया जा सकता है?
0
यही वज़य है कि कई लोग जो हर चीज़ अफोर्ड कर सकते हैं, फिर भी दुखी रहते हैं.
0
तो सवाल यह उठता है, क्या हमें हेडोनिस्ट बनना चाहिए?
0
यानि क्या हमें अपने जीवन का उद्देश, सिर्फ सुख और आनंद की प्राप्ति मान लेना चाहिए? इसका जवाब सीधा नहीं है.
0
क्योंकि जीवन केवल प्लेजर से नहीं चलता, बलकि उसमें मीनिंग, स्ट्रगल, जिम्मेदारी और दूसरों के साथ जुडाव भी उतने ही जरूरी है.
0
इसलिए हमें हेडोनिस्ट तो बनना चाहिए, लेकिन एक ऐसा हेडोनिस्ट जो प्लेजर का गुलाम नहीं, बलकि उसका सजग उपयोग करता हो.
0
ऐसा इंसान जो जानत है कि कब रुकना है, कब त्याग करना है और कब पूरी तरह से किसी आनंद को जी लेना है.
0
हेडोनिजम को अगर हम एक टूल की तरह इस्तिमाल करें, ना कि अल्टिमेट गोल की तरह, तो ये जीवन को और भी रिच, वाइबरेंट और अर्थपूर्ण बना सकता है.
0
अगर आ फिर मिलते हैं अगले वीडियो में. धन्यवाद.
0
आज हम बात कर रहे हैं एक बहुत ही अनोखी और दिल्चस्प किताब की, Sophies World.
0
इस किताब को लिखा है जौस्टीन गार्डर ने, जो एक नॉर्वीजिन लेखक है.
0
वो पहले एक फिलोसफी टीचर थे, और उन्होंने ये किताब 1991 में लिखी थी.
0
सोचने वाली बात ये है कि ये किताब पूरी दुनिया में बच्चों और बड़ों, दोनों के बीच बहुत फेमस हो गई.
0
साठ से ज्यादा भाशाओं में ट्रांसलेट हुई, और मिलियन्स में कॉपीज बिकी. Sophies World एक सिंपल नॉवल नहीं है.
0
ये एक फिलोसोफिकल जर्नी है, जहां एक 14 साल की लड़की, Sophie, धीरे धीरे दुनिया और खुद को समझना शुरू करती है.
0
इस किताब का में थीम है, सोचना, सवाल पूछना, चीजों को समझना, और हर चीज के पीछे छुपे लॉजिक और मीनिंग को जानना.
0
ये किताब हमें याद दिलाती है, कि क्यूरियसिटी इनसान की सबसे बड़ी ताकत है. तो चलिए, शुरुआत करते हैं इस अमेजिंग जर्नी की.
0
सोफी की कहानी की शुरुआत होती है, एक बिलकुल आम दिन से, जब वो स्कूल से घर लोट रही होती है.
0
वो एक 14 साल की नॉर्मल लड़की है, नॉर्वे में रहती है, और एक क्वाइट और सोचने वाली नेचर की है.
0
वो जैसे ही अपने घर के गेट के पास पहुँचती है, उसे वहाँ एक अजीब सा लिफाफा मिलता है, बिना सेंडर के नाम के.
0
लिफाफे में एक छोटा सा नोट है, जिस पर लिखा होता है, Who are you? सोफी इस सवाल से चौंक जाती है.
0
पहले तो उसे लगता है कि कोई प्रैंक कर रहा है, लेकिन फिर ये सवाल उसके दिमाग में घर कर जाता है.
0
क्या ये कोई बजल है? या फिर कोई उसे कुछ सिखाना चाता है?
0
क्या वो इस जादू को महसूस नहीं कर पा रहे?
0
या सिर्फ imagination?
0
या फिर उसकी सोच?
0
क्या वह भी उसी की तरह एक पजल का हिस्सा है? क्या यह कैबिन सिर्फ एक जगए है या किसी और बड़े फिलोसॉफिकल मेसेज का हिस्सा?
0
या हमारी सोच और परसेप्शन ही सब कुछ तै करती है?
0
दुनिया कहां से आई? हम क्यों सोचते हैं? हमारा परपस क्या है?
0
आईडी जो सिर्फ प्लेजर चाहता है, इगो जो रियालिटी को समझता है और सूपर इगो जो मौरल वैलियूस की नजर से देखता है.
0
अगर � आप जानना चाहते हैं कि आपके मन के अंदर चल रही हर एक सटल लड़ाई कहां से शुरू होती है, तो ये किताब आपके लिए है.
0
ये सिर्फ साइकॉलजी की किताब नहीं, ये एक दरपन है जिसमें जहांक कर आप खुद से मिल सकते हैं.
0
जब हम अपने मन की बात करते हैं, तो ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि जो कुछ हम सोचते हैं, महसूस करते हैं और समझते हैं, वही सब कुछ है.
0
यानि कि हमारा कॉंशिस माइंड ही हमारा असली मन है. लेकिन सिग्मेंट फ्रायड ने इस बात को पूरी तरह से उल्टा क अनि कर दिया.
0
उन्होंने कहा कि हमारे मन का बहुत छोटा हिस्सा ही कॉंशिस होता है और हमारा असली और ज्यादा गहरा भाग अनकॉंशिस होता है.
0
फ्राइड ने इसे समझाने के लिए आइसबर्ग मॉडल जैसा उदारन दिया.
0
फ्राइड का मानना था कि ये जो अनकॉंशिस भाग है, वही हमारे थौट्स, बिहेवियर्स और इमोशन्स को ज्यादा कंट्रोल करता है.
0
फ्राइड के अनुसार, जब हम बच्पन में होते हैं, तब हमारे साथ बहुत सारी चीजें होती हैं.
0
कुछ प्लेजन्ट होती हैं, लेकिन कुछ पेइनफुल या सोशली अनक्सेप्टबल होती है.
0
ये रिप्रेशन ही उनकॉंशिस की शुरुवात होती है.
0
क्या एगो बेबस है? क्या इनसान पावरलेस है?
0
README.md exists but content is empty.
Downloads last month
5