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इस वीडियो में हम इन ही सवालों को एक्स्प्लोर करेंगे हीडोनिज्म के इतिहास, प्रकार, फायदे, नुकसान और उसकी रेलिवन्स आज के मॉडरन लाइफ में इन सब पर बात करेंगे और साथ ही ये भी समझ पर बात करेंगे ही जिवन का मकसद मानना सही है? तो चलिए, इस सफर की शुरुआत करते हैं सुख की तलाश में.
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हीडोनिज्म का इतिहास बहुत पुराना है और इसकी शुरुआत प्राचीन ग्रीस से मानी जाती है, जहां ये विचार पहली बार दर्शन की भाशा में सामने आया. हीडोनिज्म शब्द, युनानी शब्द हीडोने से आया है, जिसका अर्थ है सुख या प्लेजर. इस विचार धारा की सबसे पहली और मशहूर स्कूल्स में से एक थी सिरिनेक स्कूल, जिसकी स्थापना एरिस्टिपस ने की थी, जो की सौकरेटीस का शिष्ष्य था.
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एरिस्टिपस का मानना था कि जीवन का अंतिम लक्ष तुरंत मिलने वाला शारिरिक सुख है, यानि की मोमेंटरी और इंटेंस प्लेजर्स ही असली गुड है. उनके अनुसार, अगर किसी काम से तुरंत आनंद मिलता है, तो वह काम सही है, और अगर दुख देता है तो गलत. सीरिनेक्स का दृष्टिकोन बहुत ही सीधा और मेटिरियलिस्टिक था, उन्हें लॉंग टर्म कॉंसेक्वेंसिस की परवाह नहीं थी, बस इमीडियेट प्लेजर ही सबसे महत्वपूर्ण था.
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लेकिन इसी के जवाब में एक और स्कूल खड़ी हुई, जिसे हम एपिकूरियनिजम के नाम से जानते हैं. इसकी स्थापना एपिकूरस ने की थी, जो हीडोनिजम को एक गहराई और संतुलन में देखने की कोशिश कर रहा था. एपिकूरस ने कहा कि असली सुख केवल शारीरिक आनंद में नहीं है, बलकि पेन की अनुपस्थिती में हैं, यानि कि अगर हम चिंता, डर और दुख से मुक्त हैं, तो वही सबसे बड़ा सुख है.
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एपिकूरस के अनुसार, सिंप्लिसिटी, मानसिक शान्ती, यानि अटरेक्सिया और डिजायर्स को समझदारी से चुनना, ये सब मिलकर एक संतुलित सुखत जीवन की ओर ले जाते हैं. एपिकूरस ने डिजायर्स को तीन भागों में बाटा, नेचरल और नेसेसरी, जैसे महंगा खाना या लक्षरी, और अननेचरल और अननेसेसरी, जैसे फेम और पावर.
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वह कहते हैं कि जो सुख सरल चीजों से मिल सकता है, उसके लिए हमें बड़ी चीजों के पीछे नहीं भागना चाहिए. इस तरह, एपिक्यूरियनिजम ने हेडोनिजम को एक दार्शनिक और मानसिक डिसिप्लिन की तरह प्रस्तुत किया, ना कि केवल भौतिक भोग की तरह. इसके बाद समय के साथ हेडोनिजम पश्चिमी दर्शन में आगे बढ़ा और यूटिलिटेरियनिजम का आधार बना.
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18 -वी और 19 -वी शताबदी में जेरिमी बेंथम और जॉन स्टुवर्ट मिल जैसे थिंकर्स ने हीडोनिजम को सामाजिक स्तर पर लागू किया, और कहा कि नैतिक रूप से वही काम सही है, जो सबसे ज्यादा लोगों को सबसे ज्यादा सुख दे.
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बेंथम ने इसे सबसे बड़ा सुख सिध्धान्त कहा और प्लेजर को एक मापने योग्य इकाई की तरह समझाने की कोशिश की, जिसमें इंटेंसिटी, डूरेशन, सर्टेंटी और प्रॉक्सिमिटी जैसी चीजों से प्लेजर को आखा जाता था. जॉन स्टुवर्ट मिल ने बेंथम से थोड़ा अलग रुख अपनाया और कहा कि हर सुख समान नहीं होता.
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कुछ प्लेजर्स हायर होते हैं जैसे कि साहित्य, कला और दर्शन से मिलने वाला सुख और कुछ लोवर होते हैं जैसे कि खाने -पीने या भौतिक सुख. मिल के अनुसार एक हायर प्लेजर कम मात्रा में भी ज्यादा वैल्यूबल होता है. इस तरह यूटिलिटेरियनिजम ने हेडोनिजम को इंडिविज्वल से उठा कर समाज के स्तर तक पहुँचा दिया.
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अब अगर भारत की बात करें तो सीधे तोर पर हेडोनिजम जैसा दर्शन हमारे ग्रंथों में उस नाम से नहीं है. लेकिन सुख की तलाश और उसकी सीमाओं पर बहुत चर्चा हुई है. चारवाग दर्शन को अकसर इंडियन हेडोनिजम का रूप माना जाता है.
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चारवा पर इंडियन का एक मात्र सत्य, शरीर और इंडियों का सुख है. चारवाग एक रैडिकल मेटीरियलिस्ट है जिन्नोंने किसी भी तरह के आध्यात्मिक सुख या धार्मिक सैयम को खारिज किया. हालांकि उनका विचार मुख्यधारा में नहीं रहा, फिर भी भारतिय दर्� पर इंडियों के रूप में वो एक बोल्ड कॉंट्रास्ट के रूप में मौजूद है. समय के साथ हेडोनिजम का विरोध भी हुआ.
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स्टोिसिजम, क्रिस्टियानिटी और बुधिजम जैसी परंपराओं ने इसे सुपरफिशल और मिसलीडिंग माना. स्टोिक्स ने कहा कि सच्चा सुख तो आत्म सैयम और वर्चू से आता है, ना कि प्लेजर से. क्रिस्टियानिटी में प्लेजर को आफ्टन टेम्टेशन और पाप से जोड़ा गया, और जीवन को एक परीक्षा की तरह देखा गया.
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वहीं बुधिजम ने यह सिखाया कि सुख की खोज ही दुख का कारण है और अटैच्मेंट से मुक्ती ही अल्टिमेट फ्रीडम है. इन सब आलोचनाओं के बावजूद हेडोनिजम बार बार नए रूपों में लोटा.
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इतिहास में हेडोनिजम का सफर एकदम सीधा नहीं रहा. कभी एक् अच्छा महसूस हो और शायद इसी लिए हेडोनिजम सिर्फ एक दर्शन नहीं बलकि हर इनसान के जीवन में हर दिन चलने वाली एक चुप -चाप कॉन्वर्जेशन है अपने मन, शरीर और दुनिया से.
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हेडोनिस्म कई प्रकार का होता है और हर प्रकार इस विचार को अलग नजरिये से देख्ता है, कि सुख क्या है और कीसे पाया जा सकता है?
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आज के समय में बेहत जरूरी और गहरा है, क्योंकि आधुनिक जीवन शैली का बड़ा हिस्सा प्लेजर की लगातार खोच पर आधारित है, पर अगर हम ध्यान से देखें, तो हेडोनिजम अपने मूल रूप में सस्टेनेबल नहीं है, क्योंकि यह लगातार नए और इंटेंस सुख की तलाश करता है, जो न तो मानसिक रूप से और नहीं पर्यावरन या सामाजिक द्रिष्टी से लंबे समय तक टिकाव हो सकता है.
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एक व्यक्ति अगर हर दिन केवल स्वादिष्ट खाने, मनुरंजन, आराम और इंस प्लेजर के प्रती जल्दी अडैप्ट कर लेता है, और फिर पहले जितना आनंद भी नहीं मिलता. यही वज़य है कि कई लोग जो हर चीज़ अफोर्ड कर सकते हैं, फिर भी दुखी रहते हैं.
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इसके अलावा, अगर पूरी दुनिया केवल हेडोनिस्टिक लाइफस्टा� बना सकता है, जहां रिष्टे, त्याक और जिम्मेदारी जैसी चीज़ें कम होती जाती हैं.
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तो सवाल यह उठता है, क्या हमें हेडोनिस्ट बनना चाहिए? यानि क्या हमें अपने जीवन का उद्देश, सिर्फ सुख और आनंद की प्राप्ति मान लेना चाहिए? इसका जवाब सीधा नहीं है. क्योंकि जीवन केवल प्लेजर से नहीं चलता, बलकि उसमें मीनिंग, स्ट्रगल, जिम्मेदारी और दूसरों के साथ जुडाव भी उतने ही जरूरी है.
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अगर हम केवल सुख के पीछे भागते हैं, तो जल्दी ही वह सुख अपनी चमक हो देता है, और हम अंदर से खाली म आनंद, कला या ध्यान, तो हम हेडोनिजम को एक सुंदर और संतुलित जीवन शैली में बदल सकते हैं.
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इसलिए हमें हेडोनिस्ट तो बनना चाहिए, लेकिन एक ऐसा हेडोनिस्ट जो प्लेजर का गुलाम नहीं, बलकि उसका सजग उपयोग करता हो. ऐसा इंसान जो जानत है कि कब रुकना है, कब त्याग करना है और कब पूरी तरह से किसी आनंद को जी लेना है. हेडोनिजम को अगर हम एक टूल की तरह इस्तिमाल करें, ना कि अल्टिमेट गोल की तरह, तो ये जीवन को और भी रिच, वाइबरेंट और अर्थपूर्ण बना सकता है.
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अगर आ फिर मिलते हैं अगले वीडियो में. धन्यवाद.
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आज हम बात कर रहे हैं एक बहुत ही अनोखी और दिल्चस्प किताब की, Sophies World. इस किताब को लिखा है जौस्टीन गार्डर ने, जो एक नॉर्वीजिन लेखक है. वो पहले एक फिलोसफी टीचर थे, और उन्होंने ये किताब 1991 में लिखी थी. सोचने वाली बात ये है कि ये किताब पूरी दुनिया में बच्चों और बड़ों, दोनों के बीच बहुत फेमस हो गई.
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साठ से ज्यादा भाशाओं में ट्रांसलेट हुई, और मिलियन्स में कॉपीज बिकी. Sophies World एक सिंपल नॉवल नहीं है. ये एक फिलोसोफिकल जर्नी है, जहां एक 14 साल की लड़की, Sophie, धीरे धीरे दुनिया और खुद को समझना शुरू करती है.
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उसे कुछ अजीब लेटर्स मिलने लगते हैं, जिनमें सवाल होते हैं जैसे, इन सवालों के जवाब खोचते हुए, सोफी एक इन्विजिबल टीचर से मिलती है, अलबर्टो नॉक्स, जो उसे पूरी फिलोसोफी की हिस्टरी सिखाते हैं. इस किताब का में थीम है, सोचना, सवाल पूछना, चीजों को समझना, और हर चीज के पीछे छुपे लॉजिक और मीनिंग को जानना.
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ये किताब हमें याद दिलाती है, कि क्यूरियसिटी इनसान की सबसे बड़ी ताकत है. तो चलिए, शुरुआत करते हैं इस अमेजिंग जर्नी की. सोफी की कहानी की शुरुआत होती है, एक बिलकुल आम दिन से, जब वो स्कूल से घर लोट रही होती है. वो एक 14 साल की नॉर्मल लड़की है, नॉर्वे में रहती है, और एक क्वाइट और सोचने वाली नेचर की है.
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वो जैसे ही अपने घर के गेट के पास पहुँचती है, उसे वहाँ एक अजीब सा लिफाफा मिलता है, बिना सेंडर के नाम के. लिफाफे में एक छोटा सा नोट है, जिस पर लिखा होता है, Who are you? सोफी इस सवाल से चौंक जाती है. पहले तो उसे लगता है कि कोई प्रैंक कर रहा है, लेकिन फिर ये सवाल उसके दिमाग में घर कर जाता है.
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वो सोचने लगती है कि ऐसा बेसिक सवाल कितनी बड़ी बात है, वो खुद कौन है, क्या वो सिर्फ एक स्टूडेंट है, या कुछ और, वो इस थौट में इतना डूब जाती है, कि खुद को मिरर में देखती है, और सोचती है कि क्या ये बाड़ी ही उसकी आइडेंटिटी है?
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अगले दिन सोफी को एक और नोट मिलता है, अब वो पूरी तरह कन्फ्यूज़ड और क्यूरियस हो जाती है, ये सवाल भी उतना ही बड़ा होता है जितना पहला सवाल था, उसका दिमाग अब सवालों से भर गया है, क्या ये सब किसी ने सोचा समझा करके भेजा है? क्या ये कोई बजल है? या फिर कोई उसे कुछ सिखाना चाता है?
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क्या वो इस जादू को महसूस नहीं कर पा रहे?
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या सिर्फ imagination?
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या फिर उसकी सोच?
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क्या वह भी उसी की तरह एक पजल का हिस्सा है? क्या यह कैबिन सिर्फ एक जगए है या किसी और बड़े फिलोसॉफिकल मेसेज का हिस्सा?
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या हमारी सोच और परसेप्शन ही सब कुछ तै करती है?
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दुनिया कहां से आई? हम क्यों सोचते हैं? हमारा परपस क्या है?
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आईडी जो सिर्फ प्लेजर चाहता है, इगो जो रियालिटी को समझता है और सूपर इगो जो मौरल वैलियूस की नजर से देखता है. इन तीनों के बीच की खीचतान ही इनसान के दुख, चिंता और सो� अभी कभी हम खुद से ही क्यों लड़ते हैं.
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जो लोग ये सोचते हैं कि इनसान सिर्फ सोचने और समझने वाली मशीन है, उनके लिए ये किताब एक जटका है, क्योंकि फ्राइड ने दिखाया कि हम अपने ही अंदर के सबसे बड़े सीक्रिट से अनजान होते हैं.
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अगर � आप जानना चाहते हैं कि आपके मन के अंदर चल रही हर एक सटल लड़ाई कहां से शुरू होती है, तो ये किताब आपके लिए है. ये सिर्फ साइकॉलजी की किताब नहीं, ये एक दरपन है जिसमें जहांक कर आप खुद से मिल सकते हैं. जब हम अपने मन की बात करते हैं, तो ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि जो कुछ हम सोचते हैं, महसूस करते हैं और समझते हैं, वही सब कुछ है.
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यानि कि हमारा कॉंशिस माइंड ही हमारा असली मन है. लेकिन सिग्मेंट फ्रायड ने इस बात को पूरी तरह से उल्टा क अनि कर दिया. उन्होंने कहा कि हमारे मन का बहुत छोटा हिस्सा ही कॉंशिस होता है और हमारा असली और ज्यादा गहरा भाग अनकॉंशिस होता है.
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इस अनकॉंशिस माइंड में विसारी इच्छाएं, यादें, भावनाएं, डर, शर्म, गिल्ट और अनुभव छिपे रह जिनको हम या तो भूल चुके होते हैं, या हमने उन्हें जान बूज कर दबा दिया होता है. फ्राइड ने इसे समझाने के लिए आइसबर्ग मॉडल जैसा उदारन दिया.
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एक बर्फ की चट्टान का छोटा सा हिस्सा पानी के उपर दिखता है, जो कि कॉंशिस माइंड है लेकिन असली बड़ा भाग पानी के नीचे छुपा रहता है, जो कि अनकॉंशिस माइंड है. फ्राइड का मानना था कि ये जो अनकॉंशिस भाग है, वही हमारे थौट्स, बिहेवियर्स और इमोशन्स को ज्यादा कंट्रोल करता है.
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कॉंशिस माइंड तो बस एक छोटा स ऐसे. फ्राइड के अनुसार, जब हम बच्पन में होते हैं, तब हमारे साथ बहुत सारी चीजें होती हैं. कुछ प्लेजन्ट होती हैं, लेकिन कुछ पेइनफुल या सोशली अनक्सेप्टबल होती है.
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जब कोई एक्सपीरियंस हमारे लिए बहुत पेइनफुल होता है, � या जब कोई डिजायर ऐसा होता है, जो समाज या हमारे पेरेंट के हिसाब से गलत माना जाता है, तो हमारा माइनड उसे दबा देता है, यानि रिप्रेस कर देता है. ये रिप्रेशन ही उनकॉंशिस की शुरुवात होती है.
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रिप्रेस्ट थाइट्स को हम भूल जाते हैं लेकिन वे खत्म नहीं होते, वे हमारे अंदर दबे रहते हैं और किसी ना किसी फॉर्म में बाहर निकलने की कोशिश करते रहते हैं, जैसे कि dreams, slips of tongue, जिसे Freudian slip कहा जाता है, sudden emotional reactions या अजीब behavioral patterns.
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क्या एगो बेबस है? क्या इनसान पावरलेस है?
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