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नीचे इसे डॉगमेटिजम कहते हैं, यानि अंध विश्वास. वो मानते हैं कि ऐसे दार्शनिक सत्य को नहीं, बलकि अपने विश्वास को बचाने की कोशिश करते हैं. उनके लिए ये एक तरह की बेईमानी है. नीचे प्रीफिस में एक खास शब्द का जिकर करते हैं, फ्री स्पिरिट. ये वो लोग हैं जो पुराने नियमों और विश्वासों से आजात होते हैं. वो सवाल उठाते हैं, नई राह बनाते हैं और डरते नहीं हैं.
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नीचे कहते हैं कि उनकी किताब ऐसे ही फ्री स्पिरिट्स के लिए है. वो चाहते हैं कि रीडर्स उनकी बातों को सिर्फ पढ़ें नहीं, बलकि उन पर गहराई से सोचें. वो हमें चुनौती देते हैं कि हम अपनी सोच को परखें और देखें कि क्या हम सचमुच आजात हैं. एक और अहम बात जो नीचे यहां कहते हैं, वो है दर्शन की हालत. वो मानते हैं कि उनके समय में दर्शन कमजोर हो गया था.
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दर्शनिक लोग सच्चाई की बजाए छोटी छोटी बातों में उलच गए थे. नीचे इसे एक बीमारी की तरह देखते हैं. वो कहते हैं कि दर्शन को फिर से मजबूत करना होगा. इसके लिए हमें पुराने तरीकों को छोड़ना होगा और नए सवाल उठाने होगे. वो चाहते हैं कि दर्शन सिर्फ किताबों तक न रहे, बलकि जिन्दगी को बदलने की ताकत बने. प्रिफेस में नीचे धर्म पर भी बात करते हैं.
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वो कहते हैं कि धर्म ने इंसानों की सोच को बहुत प्रभावित किया हैं. लोग धर्म के नियमों को बिना सोचे मान लेते हैं. नीचे के लिए ये एक तरह की गुलामी है.
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उनके मुताबिक ज्यादातर दार्षनिक सत्य को नहीं, बलकि अपनी पुरानी मान्यताओं को बचाने की कोशिश करते हैं. वो इसे प्रेजुडिस कहते हैं, यानि पक्षपात. ये पक्षपात दार्षनिकों को सच्चाई से दूर रखता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई दार्षनिक पहले से मानता है कि दुनिया में एक खास तरह का नियम है, तो वो उसी नियम को सही साबित करने की कोशिश करता है. नीच्चे कहते हैं कि ये सत्य की खोज नहीं, बलकि अपने विश्वास को मजबूत करना है.
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इस चैप्टर में नीच्चे एक और अहम बात कहते हैं. दार्षनिक अकसर सवाल उठाने से डरते हैं. वो सोचते हैं कि कुछ सवाल उठाना गलत है. लेकि नीच्चे का मानना है कि सच्चाई तक पहुँचने के लिए हर चीज़ पर सवाल उठाना जरूरी है. वो कहते हैं कि दार्षनिकों को अपनी सोच को परखना चाहिए. अगर उनकी माननेताएं गलत साबित होती हैं तो उन्हें बदलने की हिम्मत दिखानी चाहिए.
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उनके लिए सच्च की खोज एक जंग की तरह है जिसमें डरने की कोई जगह नहीं. नीच्चे यहां टूथ के बारे में भी बात करते हैं. वो कहते हैं कि सत्य कोई ऐसी चीज नहीं जो हमेशा से मौजूद हो. लोग सोचते हैं कि सत्य एकदम साफ और स्थिर होता है. लेकिन नीच्चे इस से सहमत नहीं. वो मानते हैं कि सत्य इनसान की सोच पर निर्भर करता है.
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वो मानते हैं कि तर्क भी इनसान की बनाई हुई चीज है. कई बार ये तर्क हमें सच्चाई से दूर ले जाते हैं.
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वो मानते हैं कि धर्म की नातिकता अक्सर इंसान को दबाती है. उदारन के लिए कई धर्म कहते हैं कि अपनी इच्छाओं को दबाना अच्छा है.
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आखिर में, नीचे इस चैप्टर को एक गहरे सवाल के साथ खत्म करते हैं. वो पूछते हैं कि क्या हम धर्म की मनोदशा से बाहर निकल सकते हैं? वो मानते हैं कि धर्म ने इनसान को बहुत कुछ दिया, लेकिन इसने उसे जकड़ाबे. वो चाहते हैं कि हम धर्म को एक नए नजरिये से देखें. हमें उसकी अच्छी बातों को अपनाना चाहिए, लेकिन उसकी कमजोरियों को भी समझना चाहिए.
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ये चैप्टर हमें सिखाता है कि धर्म सिर्फ विश्वास नहीं, एंड, इंटर्लूड्स, बाकी चैप्टर से बिलकुल अलग है. यहां नीचे लंबी -लंबी बातों के बजाए छोटी -छोटी सुक्तियां, यानि एफ़ोरिजम्स लिखते हैं.
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ये सुक्तियां छोटे, तीखे और गहरे विचार हैं, जो दिमाग को जखशोर देते हैं. इस चैप्टर में 188 छोटे -छोटे हिस्से हैं, जो अलग -अलग विशेयों पर हैं, जैसे नैतिक्ता, इंसानी स्वभाव, समाज और सत्य. नीचे यहां अपने विचारों को सीधे और मज़िदार तरीके से पेश करते हैं. इस चैप्टर की खास बात ये है, कि हर सुक्ती अपने आप में पूरी है.
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ये एक दूसरे से जुड़ी नहीं है, बलकि अलग -अलग दिशाओं में सोचने को मजबूर करती हैं. नीचे का मकसद है कि रीडर्स हर सुक्ती पर रुके, उस पर गहराई से सोचे और उसे अपनी जिंदगी से जोड़े. उदाहरण के लिए एक सुक्ती में वो कहते हैं कि लोग सच को सुनना पसंद नहीं करते, क्योंकि सच अकसर कड़वा होता है. ये छोटा सा विचार हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच मुच सच सुनने को तयार हैं.
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नीचे इस चैप्टर में इनसानी स्वभाव पर बहुत बात करते हैं. वो कहते हैं कि इनसान अकसर अपनी कमजोरियों को छुपाने की कोशिश करता है. लोग बाहर से मजbूट दिखते हैं लेकिन अंदर से डर और शक से भरे होते हैं. एक सुक्ती में वो लिखते हैं कि इनसान का सबसे बड़ा डर अपने आपको जानने का होता है. उनके मताबिक हम अपनी गलतियों और कमजोरियों से भागते हैं.
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नीच्छे मानते हैं कि ये बदलाव समाज की जरूरतों पर निर्भर करता है. वो पूछते हैं कि क्या हम आज के गुणों को भी बदल सकते हैं? इस चैप्टर में नीच्छे, मोरालिटी यानी नैतिक्ता और गुणों के रिष्टे पर भी बात करते हैं. वो कहते हैं कि नैतिक्ता ने हमें कुछ गुण सिकھाए, लेकिन इन गुणों ने हमें जकड़ा भी.
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उदाहरण के लिए समाज सिखाता है कि गुस्सा बुरा है, लेकिन नीच्छे कहते हैं कि गुस्सा इंसान की ताकत का हिस्सा हो सकता है.
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वो मानते हैं कि उच्छता हर इंसान का सपना हो सकता है। आखिर में नीच्छे इस चैप्टर को एक प्रेरणा के साथ खत्म करते हैं.
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यात्री की तरह हमें भी अपने विचारों पर भरोसा करना चाहिए. नीच्छे इस कविता में होप यानि उम्मीद की बात भी करते हैं. यात्री पहाड पर खड़ा होकर भविश्य की सोचता है. उसे लगता है कि उसकी यात्रा दूसरों को भी प्रेरित करेगी. नीच्छे मानते हैं कि सत्य की खोच करने वाले लोग भविश्य के लिए रास्ता बनाते हैं. वो चाहते हैं कि हम भी उम्मीद रखें.
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उनके लिए उमीद वो ताकत है जो हमें आगे बढाती है. वो कहते हैं कि हमें अपने सपनों को जीना चाहिए. इस गीत में नीच्छे इंसानी स्वभाव पर भी विचार करते हैं. वो कहते हैं कि इंसान में ताकत और कमजोरी दोनों हैं.
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या फिर उसे समझना, स्विकार करना और सही दिशा देना ज्यादा बुद्धिमानी है?
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लेकिन इस अध्याय की बात यही है, कि अगर हम उस पल को, उस उर्जा को ध्यान पूरवक महसूस करें, तो वही पल एक नया अनुभव बन सकता है. एक ऐसा अनुभव, जिसमें समय रुख जाए, मन शान्त हो जाए, और केवल अभी का बोध रह जाए. यहां ये बहुत साफ बताया गया है, कि सेक्स का आनंद वास्तव में शरीर से नहीं आता, बलकि उस क्षण में पैदा होने वाली मौन, एकागरता और समर्पन से आता है.
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सेक्स के दौरान कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब सोच बंद हो जाती है, जब व्यक्ति पूरी तरह से वर्तमान में होता है, और यही ध्यान का पहला अनुभव है. फर्क बस इतना है कि ध्यान में यह स्थिती स्वेच्छा से जागरुक होकर आती है, जबकि सेक्स में यह अनजाने में होती है और बहुत ही क्षणिक होती है. इसी लिए सेक्स एक द्वार बन सकता है.
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लेकिन यह तब ही होगा जब तुम उस अनुभव को पकड़ सको, पहचान सको और उससे आगे जा सको. अगर तुम बस उसी क्षणिक आनंद में उलजे रह गए, तो यह द्वार बंधी रहेगा. लेकिन अगर तुम उस मौन को, उस उपस्थिती को ध्यान से देख सको, तो धीरे धीरे वह द्वार खुलने लगेगा, और फिर सेक्स ध्यान का रूप ले लेगा.
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यह बात बहुत क्रांतिकारी है, क्योंकि दुनिया में ज्यादातर धर्मों ने सेक्स को पाप बताया है, और ध्यान को पुन्य. लेकिन यहां यह बताया गया है कि दोनों एक ही उर्जा के दो रूप हैं, फर्क बस उप्योग का है. यह अध्याय एक नई समझ को जन्म देता है, कि सेक्स से भागने की जरूरत नहीं, नहीं उसमें डूबने की जरूरत है, बलकि जो जरूरत है, वह है सजकता की, होश की, और एक खास तरह के देखने की.
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यह अनुभव � सभी के भीतर संभव है. क्योंकि यह उर्जा सबके भीतर मौझूद है. फर्क बस इतना है कि कोई उसे दबाता है, कोई उसे भोगता है और कोई उसे देखता है. देखने वाला ही साधक है, वही उस दूआर तक पहुँच सकता है.
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लेकिन फिर भी समाज उन्हें दोशी समझता है, उन्हें गुनहगार मानता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे किसी शादी की मोहर के बिना साथ हैं.
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दूसरी त अध्याय बताता है कि जब इनसान अपने जीवन को किसी किताब, किसी धर्म गुरू या समाज के बनाए नियमों से चलाता है, तो वह एक रोबोट बन जाता है, वह सोचता नहीं, समझता नहीं, बस चलता रहता है.
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आज हम बात कर रहे हैं एक बहुत ही अनोखी और दिल्चस्प किताब की, Sophies World. इस किताब को लिखा है जौस्टीन गार्डर ने, जो एक नॉर्वीजिन लेखक है. वो पहले एक फिलोसफी टीचर थे, और उन्होंने ये किताब 1991 में लिखी थी. सोचने वाली बात ये है कि ये किताब पूरी दुनिया में बच्चों और बड़ों, दोनों के बीच बहुत फेमस हो गई.
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साठ से ज्यादा भाशाओं में ट्रांसलेट हुई, और मिलियन्स में कॉपीज बिकी. Sophies World एक सिंपल नॉवल नहीं है. ये एक फिलोसोफिकल जर्नी है, जहां एक 14 साल की लड़की, Sophie, धीरे धीरे दुनिया और खुद को समझना शुरू करती है.
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उसे कुछ अजीब लेटर्स मिलने लगते हैं, जिनमें सवाल होते हैं जैसे, इन सवालों के जवाब खोचते हुए, सोफी एक इन्विजिबल टीचर से मिलती है, अलबर्टो नॉक्स, जो उसे पूरी फिलोसोफी की हिस्टरी सिखाते हैं. इस किताब का में थीम है, सोचना, सवाल पूछना, चीजों को समझना, और हर चीज के पीछे छुपे लॉजिक और मीनिंग को जानना.
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ये किताब हमें याद दिलाती है, कि क्यूरियसिटी इनसान की सबसे बड़ी ताकत है. तो चलिए, शुरुआत करते हैं इस अमेजिंग जर्नी की. सोफी की कहानी की शुरुआत होती है, एक बिलकुल आम दिन से, जब वो स्कूल से घर लोट रही होती है. वो एक 14 साल की नॉर्मल लड़की है, नॉर्वे में रहती है, और एक क्वाइट और सोचने वाली नेचर की है.
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वो जैसे ही अपने घर के गेट के पास पहुँचती है, उसे वहाँ एक अजीब सा लिफाफा मिलता है, बिना सेंडर के नाम के. लिफाफे में एक छोटा सा नोट है, जिस पर लिखा होता है, Who are you? सोफी इस सवाल से चौंक जाती है. पहले तो उसे लगता है कि कोई प्रैंक कर रहा है, लेकिन फिर ये सवाल उसके दिमाग में घर कर जाता है.
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वो सोचने लगती है कि ऐसा बेसिक सवाल कितनी बड़ी बात है, वो खुद कौन है, क्या वो सिर्फ एक स्टूडेंट है, या कुछ और, वो इस थौट में इतना डूब जाती है, कि खुद को मिरर में देखती है, और सोचती है कि क्या ये बाड़ी ही उसकी आइडेंटिटी है?
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अगले दिन सोफी को एक और नोट मिलता है, अब वो पूरी तरह कन्फ्यूज़ड और क्यूरियस हो जाती है, ये सवाल भी उतना ही बड़ा होता है जितना पहला सवाल था, उसका दिमाग अब सवालों से घर गया है, क्या ये सब किसी ने सोचा समझा करके भेजा है? क्या ये कोई पजल है? या फिर कोई उसे कुछ सिखाना चाहता है?
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हवा क्यों चलती है? इनसान बोलना कैसे सीखता है?
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या सिर्फ इमैजिनेशन?
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या फिर उसकी सोच?
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क्या वह भी उसी की तरह एक पजल का हिस्सा है? क्या यह कैबिन सिर्फ एक जगए है या किसी और बड़े फिलोसॉफिकल मेसेज का हिस्सा?
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या हमारी सोच और परसेप्शन ही सब कुछ तै करती है?
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इसी दोरान हिल्डे अपने पिता को indirectly message देने लगती है कि अब वो control छोड़ दें और Sophie को free कर दें वो subtle hints भेजती है, कहानी में notes छोड़ती है और अपने mind से new ideas imagine करती है ये chapter बहुत meta हो जाता है क्योंकि अब reader भी सोचने लगता है कि वो खुद कौन है क्या वो भी सिर्फ किसी और की कहानी का reader है? या कोई अंदेखा लेखक उसकी जिंदगी को नियंतरन कर रहा है?
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दुनिया कहां से आई? हम क्यों सोचते हैं? हमारा परपस क्या है?
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रात की खामोशी में जब अंधेरा अपने साइं पहलाता है और बारिश की बूंदें खिड़की पर थिरकती हैं, उस वक्त हमारे भीतर एक सवाल गूंचता है, क्यों हम सफर करते हैं?
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या इसमें कोई सीख छुपी है? क्या सफरिंग हमें तोड़ता है या हमें बनाता है? इसी जटिलता के बीच एवोलूशन ने भी इस सफरिंग को छुपा रखा था क्यों प्रकृती ने सफरिंग को हमारे जीवन का हिस्सा बनाया? अगर सफरिंग इतना विनाशकारी है तो उसे हमारे एक्जिस्टेंस में क्यों रखा गया? क्या सफरिंग सिर्फ एक बायोलॉजिकल वार्निंग सिस्टम है जो हमें नुकसान से बचाने के लिए है?
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या कहीं यह कॉंशिसनेस की एक शैडो साइड है जो हमें एंटिसिपेटोरी दर्द में डालती है?
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क्या सफरिंग से मुक्ति संभव है?
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इन सभी में सफरिंग को एक चुनोती के रूप में लिया जाता है, जो आत्मा की शुद्ध और उन्नती के लिए आवश्यक है. मोक्ष का अनुभव ऐसा होता है जहां सफरिंग की सारी सीमाएं और बाधाएं समाप्त हो जाती है, और व्यक्ति शाश्वत आनंद और शान्ती की स्थिती में पहुँच जाता है.
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इस पूरे दर्शन में सफरिंग को न केवल एक बाधा या समस्या के रूप में देखा जाता है, बलकि एक आवश्यक कदम माना जाता है, जो हमें आत्म ज्यान की ओर ले जाता है. सफरिंग हमें हमारी सीमाओं का एहसास कराता है, हमारे अटैच्मेंट्स और इच्छाओं को दिखाता है, और हमें भीतर की वास्तविक्ता की ओर मोडता है.
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ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम अपने फॉल्स इगो और मटीरियल अटैच्मेंट्स को छोड़ते हुए हायर कॉंशिसनेस की ओर बढ़ते हैं. इसलिए हिंदू कॉजमिक वील की समझ हमें यह सिखाती है कि सफरिंग का कोई अंतिम नकारात्मक अर्थ नहीं है, बलकि वह जीवन की लीला का एक अनिवार यह हिस्सा है. यह सफरिंग हमें कर्मा के नियमों के तहट एक शिक्षा देता है और हमें मोक्ष के रास्ते पर ले जाता है.
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यह सवाल सदियों से मनुष्य के दिमाग में गूंचता आ रहा है और इसका कोई आसान जवाब नहीं है हम सोचते हैं अगर दुनिया में suffering ना हो तो कैसा होगा? क्या खुशी का अस्तित्व तब भी संभव होगा? एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जहां दर्द, दुख और संगर्ष बिलकुल न हो क्या वह दुनिया सच में पूरी तरह से खुशहाल होगी? या वह एक ऐसी जगह होगी जहां भावनाएं फीकी और असली नहीं होगी?
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अगर होगा तो क्या उनका भी कोई meaning होगा?
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कौन उसे सहन करेगा? और कौन उसे रहत देगा?
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क्या यह सिर्फ एक ऐसी पहेली है जिसका कोई अंतिम जवाब नहीं?
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नहीं, इसका मतलब ये है कि हमारी sense data ने हमें गलत signal दिया Russell इसी बात को generalize करते हैं कि हमारी senses हमें जो बताती हैं वो हमेशा reliable नहीं होती इसलिए हम appearance पर भरोसा नहीं कर सकते हमें reality तक पहुँचने के लिए reasoning और analysis की जरूरत होती है लेकिन फिर सवाल आता है कि अगर senses unreliable हैं तो हम reality को जानें कैसे?
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उसकी nature क्या है?
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उदारन के लिए जब हम कहते हैं आकाश नीला है और ये बात वास्तव में सही है, तो वह कथन सत्य है.
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हम क्या जान सकते हैं? और ग्यान की प्रक्रति क्या है?
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