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नीच्छे पूछते हैं कि क्या हम इन नियमों को हमेशा मानते रहेंगे या इन पर सवाल उठाएंगे। वो चाहते हैं कि हम नैतिकता को नए नजरिये से देखें और पूछें कि ये नियम हमें आजात करते हैं या बांधते हैं। प्रिफिस में नीच्छे अपनी किताब का मकसद भी साफ करते हैं। हो चाहते हैं कि ये किताब उन लोगों के लिए है जो पुराने विचारों से थक चुके हैं...
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वो अपनी किताब को एक तरह का हत्यार बताते हैं जो पुरानी सोच को तोड़ने के लिए है। वो चाहते हैं कि हम उनकी बातों से डरें नहीं बलकि उन्हें एक चुनौती की तरह लें। ुछ नीचे यहां एक कहानी का दिकर भी करते हैं, वो कहते हैं कि सत्य की खोज एक लंबा सफर है इस सफर में हमें कई बार गलत रास्तों पर जाना पड़ता हैं। लेकिन वो मानते हैं कि ...
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वो चाहते हैं कि हम इस सफर से डरें नहीं, बलकि हर कदम पर सीखें। उनके लिए सत्य कोई ऐसी चीज नहीं जो हमें आसानी से मिल जाए। हमें उसे खोजना पड़ता है और इस खोज में हमें अपने आपको भी समझना पड़ता है। प्रेफिस का आखिरी हिस्सा बहुत गहरा है। नीचे कहते हैं कि उनकी किताब एक नई शुरुआत है। वो चाहते हैं कि ये किताब दर्शन को फिर से ...
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वो अपने रीडर से कहते हैं कि वो उनकी बातों को सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि उन्हें अपनी जिंदगी में उतारें। वो चाहते हैं कि हम उनकी किताब को एक नक्षे की तरह देखें जो हमें नई मनजिलों तक ले जाएगा।
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उनके मुताबक धर्म का आधार अखसर डर और उम्मीद होता है। लोग डरते हैं कि अगर उन्होंने धर्म के नियम नहीं मानें, तो कुछ बुरा होगा।
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इससे पता चलता है कि नैतिकता कोई स्थिर चीज नहीं। इस चैप्टर में नीच्छे नैतिकता के पीछे की भावनाओं पर भी बात करते हैं। वो कहते हैं कि कई बार नैतिक नियम डर से बनते हैं। लोग डरते हैं कि अगर उन्होंने नियम तोड़े तो समाज उन्हें सजा देगा। इसके अलावा लोग दूसरों की तारीफ पाने के लिए भी नैतिक नियम मानते हैं। उदाहरण के लिए कोई...
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नीचे के लिए ये भावनाएं नैतिकता की जड़ में पूरते हैं। नीचे यहां पावर यानी ताकत की बात भी करते हैं। वो कहते हैं कि नैतिकता अकसर उन लोगों ने बनाई जो ताकत वर थैं। ताकत वर लोग अपने फायदे के लिए नियम बनाते हैं। उदाहरण के लिए पुराने जमाने में राजा और धर्म गुरु नियम बनाते थे ताकि लोग उनकी बात मानें।
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नीचे मानते हैं कि हमें ये समझना चाहिए कि नैतिक्ता हमेशा निश्पक्ष नहीं होती। कई बार ये ताकतवर लोगों के हित में होती है। इस चैपoter में नीचे ढर्म और नैतिक्ता के इसदे अग्ष ने जमाते हैं वो कहते हैं कि धर्म ने जमें जटक्ष आ एक में बहुत प्रभावेशा किया। कई धर्म सिखाते हैं कि कुछ काम करना पाप है और कुछ करना पुण्य।
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लेकिन नीच्छे के लिए ये सोच इनसान को कमजोर बनाती है। वो चाहते हैं कि हम free spirit की तरह सोचें और अपने नियम खुद बनाएं। उनके मुताबिक असली नैतिकता वही है जो इनसान अपनी समझ से बनाता है। इस चैप्टर में नीच्छे, वर्च्यू यानि गुण की भी बात करते हैं। वो कहते हैं कि समाज कुछ गुणों को बहुत उंचा मानता है, जैसे दया और इमानदारी...
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लेकिन नीच्छे पूछते हैं कि क्या ये गुण हमेशा अच्छे हैं। वो मानते हैं कि कई बार ये गुण इनसान को कमजोर बनाते हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई हमेशा दूसरों की मदद करता है, तो वो अपनी जरूरतों को भूल सकता है। नीच्छे चाहते हैं कि हम गुणों को नए नजरिये से देखें। नीच्छे इस हिस्से में नैतिकता और इनसान की प्रकृती पर भी विचार करते ह...
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नैतिकता ने इनसान को सिखाया कि वो अपनी बुराई को दबाए। लेकिन नीच्छे मानते हैं कि हमें अपनी पूरी परकृती को सुविकार करना चाहिए। वो चाहते हैं कि हम अपनी ताकत और कमजोरियों को समझें। उनके लिए असली नैतिकता वही है जो इनसान को मजबूत बनाए। आखिर में नीचे इस चैप्टर को एक बड़े सवाल के साथ खत्म करते हैं। वो पूछते हैं कि क्या हम ...
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वो मानते हैं कि पुरानी नैतिकता ने इनसान को बहुत कुछ सिखाया, लेकिन इसने उसे जखड़ा भी। वो चाहते हैं कि हम नैतिकता का नया इतिहास लिखे।
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उदाहरण के लिए कोई विद्वान किसी पुराने गरंथ के एक शब्द का मतलब निकालने में सालों बिता देता है। लेकिन वो कभी नहीं पूछता कि उस गरंथ का आज के समय में क्या मतलब है। नीच्षे के लिए ये समय की बरबादी है। वो चाहते हैं कि विद्वान बड़े और गहरे सवालों का सामना करें। इस चैप्टर में नीच्षे, फिलोजफी यानि दर्शन की हालत पर भी विचार क...
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वो कहते हैं कि उनके समय में दर्शन कमजोर हो गया था। विद्वान लोग दर्शन को सिर्फ किताबों तक सीमित कर चुके थे। नीच्षे मानते हैं कि दर्शन को जिंदगी से जोड़ा जाना चाहिए। वो चाहते हैं कि दर्शन सिर्फ विचारों का खेल न रहे, बलकि इनसान को बहतर बनाने में मदद करे। उनके लिए असली दार्शनिक वही है जो अपनी सोच से दुनिया को बदल दे। ...
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वो कहते हैं कि कई विद्वान सोचते हैं कि वो सबसे ज्यादा समझदार है। वो दूसरों की बात सुनना पसंद नहीं करते। नीचे के लिए यह अहंकार विद्वान की सबसे बड़ी कमजोरी है। वो मानते हैं कि असली विद्वान वही है जो हमेशा सीखने को तयार रहता है। वो चाहते हैं कि विद्वान अपनी गलतियों को स्विकार करें और नया सीखें।
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इस चैप्टर में नीच्षे, टूथ यानी सत्य की खोज पर भी बात करते हैं। वो कहते हैं कि सत्य कोई ऐसी चीज नहीं जो आसानी से मिल जाए। विद्वान अकसर सोचते हैं कि उनके पास सत्य है, लेकिन नीच्षे मानते हैं कि सत्य हमेशा बदलता रहता है। उदाहरण के लिए पहले लोग मानते थे कि प्रिथवी सूरज के चारों और नहीं घूमती, लेकिन बाद में ये सत्य बदल गय...
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नीच्षे इस हिस्से में आठ यानी कला की एहमियत की भी बात करते हैं। वो कहते हैं कि कला विद्वान को नई सोच दे सकती है। कला हमें वो दिखाती है जो किताबों में नहीं मिलता। उदाहरण के लिए एक कविता या चित्र हमें जिंदगी के गहरे सवालों के बारे में सोचने पर मजबूर कर सकता है। नीच्षे मानते हैं कि असली विद्वान वही है जो कला से सीखता ह...
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आखिर में नीच्षे इस चैप्टर को एक चुनौती के साथ खत्म करते हैं। वो कहते हैं कि विद्वानों को अपनी सोच को बदलना होगा। उन्हें पुरानी किताबों और नियमों से बाहर निकलना होगा। वो चाहते हैं कि विद्वान फ्री स्पिरिट की तरह सोचें और सत्य की खोज में डरे नहीं। ये चैप्टर हमें सिखाता है कि विद्वान होने का मतलब सिर्फ किताबें पढ़ना नह...
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एउन गुड और इवल का सात्वा चैप्टर आउर वर्चूस नीचे की नैतिकता और इंसानी गुणों पर गहरी सोच को दर्शाता है। यहां वो उन गुणों यानि वर्चूस की बात करते हैं जिने समाज अच्छा मानता है जैसे दया, इमानदारी और नम्रता। नीचे पूछते हैं कि क्या ये गुण वाकई हमेशा अच्छे हैं।
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वो इन गुणों की जड़ों तक जाते हैं और दिखाते हैं कि ये अकसर इनसान की कमजोरियों से पैदा होते हैं। इस चैप्टर में वो हमें अपने गुणों को नए नजरिये से देखने की चुनौती देते हैं। नीचे कहते हैं कि समाज कुछ गुणों को बहुत उच्छा मानता है। उदाहरण के लिए दया को हर जगह अच्छा कहा जाता है। लोग सोचते हैं कि दूसरों की मदध करना हमेशा स...
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वो मानते हैं कि कई बार दया कमजोर लोगों को और कमजोर बनाती है। अगर हम किसी की हमेशा मदद करते हैं, तो वो खुद मजबूत बनना सीखता ही नहीं। नीच्छे के लिए असली गुण वो है जो इनसान को मजबूत बनाए, न कि उसे कमजोर करे। इस चैप्टर में नीच्छे, आनिस्टी यानि इमानदारी पर भी बात करते हैं।
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समाज इमानदारी को बहुत बड़ा गुण मानता है, लेकिन नीच्छे कहते हैं कि कई बार इमानदारी इनसान को नुकसान पहुँचाती है। उदारन के लिए अगर कोई सच बोलकर अपनी जिन्दगी को मुश्किल में डाल देता है, तो क्या वो सच बोलना सही था। नीच्छे मानते हैं कि हमें हर गुण को परक्षना चाहिए। वो चाहते हैं कि हम सोचें कि क्या ये गुण हमारी जिन्दगी को ...
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नीच्छे यहां पिटी यानि करुणा की भी चर्चा करते हैं। वो कहते हैं कि करुणा को अच्छा माना जाता है, लेकिन इसके पीछे अक्सर इनसान का अहंकार होता है। जब हम किसी पर करुणा दिखाते हैं, तो हमें लगता है कि हम उससे बहतर हैं। नीच्छे के लिए ये एक तरह की कमजोरी है। वो चाहते हैं कि हम करुणा के बज़ाए दूसरों की ताकत को बढ़ावा दें। उनक...
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इस चैप्टर में नीच्छे सेलफलेस्नस यानी निस्वार्थता पर भी सवाल उठाते हैं। समाज सिखाता है कि दूसरों के लिए जीना अच्छा है। लेकिन नीच्छे पूछते हैं कि क्या ये हमेशा सही है। वो मानते हैं कि कई बार लोग निस्वार्थता का दिखावा करते हैं ताकि समाज उनकी तारीफ करे। उदाहरण के लिए कोई बड़ा दान देता है। लेकिन उसे सिर्फ नाम चाहिए।
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नीच्छे कहते हैं कि हमें अपनी इच्छाओं को स्विकार करना चाहिए। उनके लिए असली गुण वो है जो हमें अपनी ताकत दे। नीच्छे इस हिस्से में गुणों के इतिहास पर भी नज़र डालते हैं। वो कहते हैं कि गुण समय के साथ बदलते हैं।
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उदाहरण के लिए अगर कोई देश अपनी संस्कृती को सबसे अच्छा मानता है, तो वो दूसरी संस्कृतियों को समझने की कोशिश नहीं करता। नीच्षे के लिए अशली ताकत तब आती है, जब हम अपनी संस्कृती को दूसरों के साथ मिलाते हैं। वो चाहते हैं कि हम अपनी संस्कृती को खुली सोच से देखें। इस चैप्टर में नीच्षे, वार, यानि युद्ध पर भी टिपणी करते हैं। ...
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लोग अपने देश के लिए लड़ते हैं और दूसरों को दुश्मन मानते हैं। लेकिन नीच्शे मानते हैं कि युद्ध से ज्यादा जरूरी है एक दूसरे को समझना। वो चाहते हैं कि लोग युद्ध के बजाए विचारों और संस्कृती के आदान प्रदान में विश्वास करें। उनके लिए असली जीत तब होती है जब लोग एक दूसरे का सम्मान करते हैं। नीच्शे यहां फ्री स्पिरिट की बाद भ...
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वो अपने देश को प्यार करता है, लेकिन वो उसे आँख बंद करके सबसे अच्छा नहीं मानता।
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नीचे इस हिस्से में suffering यानी दुख की बात भी करते हैं। वो कहते हैं कि उच्च इनसान दुख से डरता नहीं। वो दुख को एक मौका मानता है जो उसे मजबूत बनाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई मुश्किल समय में हार नहीं मानता और आगे बढ़ता है तो वो उच्च है। नीचे मानते हैं कि दुख उच्च इनसान की ताकत को निखारता है। वो चाहते हैं कि हम दुख ...
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इस चैप्टर में नीचे, समाज और उच्च इनसान के रिष्टे पर भी विचार करते हैं। वो कहते हैं कि समाज अकसर उच्च इनसान को गलत समझता है। लोग उसकी अलग सोच से डरते हैं क्योंकि वो उनके नियमों को तोड़ता है। उदाहरण के लिए अगर कोई नई सोच लेकर आता है तो लोग उसे पागल कह सकते हैं। लेकि नीचे मानते हैं कि उच्च इनसान को इस डर से फर्क नहीं ...
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नीचे यहां क्रियेटिविटी यानी रचनात्मकता की भी बात करते हैं। वो कहते हैं कि उच्च इनसान रचनात्मक होता है। वो नई चीजें बनाता है चाहे वो कला हो, विचार हो या नई जिंदगी का तरीका। उदाहरन के लिए एक कलाकार जो अपनी अनोखी कला से दुनिया को नया नजरिया देता है, वो उच्च है। नीचे के लिए रचनात्मकता उच्चता का सबसे बड़ा लक्षन है।
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वो चाहते हैं कि हम अपनी रचनात्मकता को अपना है। इस चैप्टर में नीचे, लोनलीनेस यानी अकेलेपन की बात भी करते हैं। वो कहते हैं कि उच्च इनसान अकसर अकेला होता है। उसकी सोच उसे दूसरों से अलग करती है। लेकि नीचे मानते हैं कि ये अकेलापन उसकी ताकत है।
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उदारण के लिए अगर कोई अपनी सोच के लिए अकेला पढ़ जाता है, तो वो अपने विचारों को और मजबूत करता है। नीचे के लिए उच्च इनसान का अकेलापन उसकी महानता का सबूत है। नीचे इस हिससे में इन्सानी स्वभाव पर भी विचार करते हैं। वो कहते हैं कि हर इंसान में उच्च बनने की ताकत होती है। लेकिन बहुत कम लोग इसे पहचानते हैं।
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लोग समाज के नियमों में फंस जाते हैं और अपनी ताकत को भूल जाते हैं। नीच्छे चाहते हैं कि हम अपने अंदर की उस चिंगारी को खोजें, जो हमें उच्छ बनाएं. वो मानते हैं कि उच्छता हर इंसान का सपना हो सकता है।
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आखिर में नीच्छे इस चैप्टर को एक प्रेरणा के साथ खत्म करते हैं. वो कहते हैं कि उच्च इंसान भविश्य का प्रतीक है, वो दुनिया को नया रास्ता दिखाता है, वो चाहते हैं कि हम सब अपने अंदर के उच्च इंसान को जगाए। ये चैप्टर हमें सिखाता है कि उच्चता कोई ऐसी चीज नहीं जो सिर्फ कुछ लोगों के लिए हो, ये हर उस इंसान के लिए है जो अपनी ताकत,...
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बियॉंड गुड अड़ियूड का आफ्टर सॉंग किताब का आखिरी हिस्सा है, जो एक काव्यात्मक और गहरे अर्थ वाला गीत है। और इंसानी ताकत की खोज की बात करते हैं।
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ये हिस्सा किताब को एक emotional और inspirational अंत देता है। नीच्छे इस गीत को from high mountains यानी उंचे पहाडों से कहते हैं। ये कविता एक अकेले यात्री की कहानी है जो उंचे पहाडों पर खड़ा है। वो दुनिया को उपर से देखता है और अपनी यात्रा के बारे में सोचता है। नीच्छे इस यात्री के जरिये खुद को दर्शाते हैं। वो अपनी दा...
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इस चड़ाई में वो अकेले हैं लेकिन उन्हें इस अकेलेपन से ताकत मिलती है। कविता में नीच्छे सत्य की खोज की बात करते हैं। वो कहते हैं कि सत्य कोई आसान चीज नहीं। ये एक उंचा पहाड है जिस तक पहुँचने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। यात्री को रास्ते में कई मुश्किलें मिलती हैं जैसे डर, शक और ठकान लेकिन वो रुकता नहीं।
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नीच्छे मानते हैं कि सत्य की खोज में यही हिम्मत चाहिए। वो चाहते हैं कि हम भी इस यात्रा पर निकलें भले ही रास्ता मुश्किल हो। इस गीत में नीच्छे, लोनलिनेस यानि अकेलेपन की भी बात करते हैं। यात्री उंचे पहाड़ पर अकेला है, लोग उसे समझ नहीं पातें। लेकिन नीच्छे के लिए ये अकेलापन कोई कमजोरी नहीं। ये यात्री की ताकत है।
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वो अपने अकेलेपन में अपनी सोच को और गहरा करता है। नीच्छे मानते हैं कि जो लोग सत्य की खोज करते हैं, उन्हें अकसर अकेले चलना पड़ता है। वो हमें सिखाते हैं कि इस अकेलेपन से डरना नहीं चाहिए। नीच्छे इस कविता में फ्रीडम यानि आजादी की बात भी करते हैं। यात्री पहाड पर खड़ा होकर आजाद महसूस करता है।
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वो समाज के नियमों, धर्म और नैतिकता के बंधनों से मुक्त है। नीच्छे के लिए ये आजादी ही असली ताकत है। वो कहते हैं कि हमें अपनी सोच को आजात करना होगा। उदाहरण के लिए अगर समाज हमें कुछ मानने के लिए कहता है तो हमें पूछना चाहिए कि क्या ये सही है। यात्री की तरह हमें भी अपनी राह बनानी चाहिए।
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इस गीत में नीच्छे, ब्यूटी यानी सुन्दर्ता की भी बात करते हैं। यात्री पहाडों की सुन्दर्ता को देखता है। वो आसमान, बादल और चट्टानों में एक गहरी सुन्दर्ता पाता है। नीच्छे मानते हैं कि सुन्दर्ता सिर्फ बाहर की चीजों में नहीं, बलकि इन्सान की सोच में भी होती है। वो चाहते हैं कि हम जिन्दगी की सुन्दर्ता को देखें। उनके लिए सत...
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ये हमें जिन्दगी को गहराई से जीना सिखाती है। नीचे इस कविता में स्ट्रगल यानि संघर्ष की बात भी करते हैं। यात्री का रास्ता आसान नहीं, उसे ठंड, तूफान और मुश्किल चट्टानों का सामना करना पड़ता है। लेकिन नीचे कहते हैं कि यही संघर्ष यात्री को मजबूत बनाता है। वो मानते हैं कि जिन्दगी में संघर्ष के बिना हम कुछ नहीं सीखते।
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वो चाहते हैं कि हम अपने संघर्षों को एक मौका मानें। उदाहरण के लिए अगर हमें कोई मुश्किल आती है तो हमें उससे भागना नहीं, बलकि उसका सामना करना चाहिए। इस गीत में नीचे फ्री स्पिरिट की बात भी करते हैं। यात्री एक फ्री स्पिरिट है, वो किसी के नियमों से नहीं बनता, वो अपनी सोच और इच्छाओं को मानता है। नीचे मानते हैं कि फ्री स्प...
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वो कहते हैं कि हमें भी अपनी सोच को आजात करना चाहिए।
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यह किताब From Sex to Superconsciousness ओशो द्वारा दी गई पांच प्रवच्चनों का संकलन है जो उन्होंने 1960 के आसपास मुंबई में दिये थे। उस समय भारतिय समाज गहरी सेक्शुल रिप्रेशन की मानसिक्ता से ग्रस्त था। सेक्स पर खुल कर बात करना तो बहुत दूर उसे सोचने मातर से पाप समझा जाता था। यही नहीं धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था ने सेक्स ...
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ओशो ने इस चुप्पी को तोड़ते हुए सेक्स के बारे में बहुत ही खुल कर सीधा और गहराई से बोलने का साहस किया। उन्होंने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि सेक्स कोई पाप नहीं, बलकि जीवन का सबसे मौलिक आधार है। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य सेक्स को समझे बिना सिर्फ उसे दबाता रहेगा, तब तक न तो समाज स्वस्थ बन सकता है और नहीं व्यक्ति ...
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ओशों ने ये भी सपष्ट किया कि सेक्स केवल शरीर का मिलन नहीं है, बलकि वह एक गहरी ऊर्जा है, जो अगर सही दिशा में ले जाई जाए तो व्यक्ति को सूपर कॉंशिस अवस्था तक पहुँचा सकती है। ओशों के लिए सेक्स कोई अंत नहीं था, बलकि शुरुवात थी, शुरुवात एक यात्रा की, जो प्रेम, ध्यान और अंत में परम चेतना की ओर ले जाती है। ये किताब इसी यात्रा...
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इसमें ओशों ने बहुत ही सरल शब्दों में धीरे धीरे लोगों के मन से सेक्स के प्रतिफैली ब्रांतियों, भय और गिल्ट को हटाने की कोशिश किये। इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें कोई भी बात घुमा फिरा कर नहीं कही गई है। ओशों ने जो देखा, महसूस किया और जाना, वही सीधा, स्पष्ट और बिना किसी डर के कहा।
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उन्होंने यह किताब किसी सिध्धानत को साबित करने के लिए नहीं लिखी, बलकि लोगों को एक रिप्रेस्ट मानसिक्ता से बाहर निकालने के लिए प्रस्तुत की। यह किताब उस समय एक क्रांतिकारी दस्तावेज बन गई जब भारत में सेक्स एजुकेशन लगभग बरजित थी। समाज ने इस पर विवात खड़े किये, लोगों ने विरोध किया, लेकिन युवाओं और खोजी मनवालों ने इसे हातों ...
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ओशो को आलोचना की परवाह नहीं थी, वे सत्य के पक्ष में खड़े थे और उनके लिए सत्य यही था कि सेक्स से भागने की नहीं, उसे समझने की जरूरत है। यही समझ व्यक्ति को धीरे धीरे ध्यान और फिर सेल्फ नॉलेज की ओर ले जा सकती है।
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ओशो ने इस किताब में बार बार यही समझाने की कोशिश की कि सेक्स को दबाने से न तो धर्म मिलता है, नहीं शान्ती, बलकि समझ से एक नई उर्जा पैदा होती है, जो व्यक्ति को नई उँचाईयों तक ले जाती है। यह किताब सिर्फ सेक्स पर नहीं है, बलकि यह चेतना की यात्रा का पहला चरण है। यह उन लोगों के लिए है जो भीतर से इमानदार हैं, डरते नहीं हैं औ...
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तो चलिए इस किताब को एक्स्प्लोर करना शुरू करते हैं। हमारा समाज जिस विशय से सबसे ज्यादा डरता है, सबसे ज्यादा भागता है, सबसे ज्यादा चुप रहता है। वह है सेक्स। बचपन से ही हमें इसके बारे में या तो गलत जानकारी दी जाती है या बिलकुल भी जानकारी नहीं दी जाती।
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हम अपनी इच्छाओं को गहराई से नहीं समझ पाते, अपने संबंधों में सच्चाई नहीं ला पाते और धीरे धीरे नकली, बंटे हुए, उलजे हुए जीवन में जीने लगते हैं।
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इस पुस्तक की शुरुवात इसी बिंदू से होती है, कि अगर सेक्स जीवन की उर्जा है, तो फिर क्या उसे दबाना सही है? या फिर उसे समझना, स्विकार करना और सही दिशा देना ज्यादा बुद्धिमानी है? ये प्रस्तावना उस दर्वाजे की तरह है, जहां से यह पूरी खोज शुरू होती है।
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इस बात को बहुत स्पष्ट करती है कि सेक्स केवल शरीर की भूक नहीं है, ये एक संभावना है, एक सीड़ी है, जो अगर सही समझ के साथ चड़ी जाए, तो व्यक्ति को आत्मग्यान तक पहुँचा सकती है। लेकिन ये यात्रा तभी शुरू होती है जब इनसान इमान प्रस्टावना के अपनी वासनाओं को देखता है, उनका निरीक्षन करता है और बिना डर या ग्रिना के उन्हें स्विकार ...
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इनसान प्रेम चाहता है लेकिन नियंतरन करना नहीं छोड़ता। वह चाहता है कि सामने वाला उसकी हर जरूरत को समझे, हर समय उसे खुश रखे और बदल जाये जैसा वह चाहता है। लेकिन ऐसा प्रेम नहीं होता, वह स्वार्थ होता है और स्वार्थ कभी भी स्थाई सुख नहीं दे सकता। इस अध्याय में ये बात बहुत साफ होकर सामने आती है कि जब तक प्रेम के साथ स्वतंतरत...
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और जब तक हम ये उम्मीद करते हैं कि कोई दूसरा आकर हमारी अधूरी भावनाओं को पूरा कर देगा, तब तक हम सिर्फ दोख की तरफ बढ़ रहे होते हैं। प्रेम कोई चीज नहीं जो बाहर से मिलती है, वह तो हमारे भीतर की अवस्था है। जब कोई व्यक्ती स्वयम से प्रेम करता है, स्वयम को समझता है, तब ही वह किसी और से सच्चा प्रेम कर सकता है।
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लेकिन अधिकतर लोग स्वयम से भागते हैं, खुद से अंजान होते हैं, और उस खालीपन को भरने के लिए किसी और को पकड़ने की कोशिश करते हैं, यही पकड़ने की प्रवृत्ती रिष्टे को तोड़ देती है। जब प्रेम में पकड़ होती है, अधिकार होता है, तबुछ धीरे धीरे बोज बन जाता है। और जब प्रेम आजादी देता है, खुलापन देता है, तब वह एक खूलापन जेता है।
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लेकिन इस तरह का प्रेम बहुत कम लोक समझ पाते हैं, क्योंकि हमारे भीतर की काम उर्जा बहुत तेज होती है, और वो हमें बार बार बाहर की तरफ धखेलती है।
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लेकिन ये प्रेम कोई भावनात्मक ड्रामा नहीं होता, ये बहुत शांत, स्थिर और गहरा होता है। इसमें न शोर होता है न मांग, इसमें बस उपस्थिती होती है, मौन होता है और बहुत सारा अपनापन होता है। और ये प्रेम जब भीतर से बहने लगता है, तो व्यक्ति अपने आप सेक्स की सतही लालसाओं से उपर उठने लगता है। अब सेक्स जरूरत नहीं रह जाता, बस एक अभी...
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इस अध्याय का सार यही है कि प्रेम की खोज बाहर नहीं, भीतर होती है। जब व्यक्ति अपने भीतर की खाली जगहों को ध्यान, समझ और आत्म स्विकृती से भरता है, तब प्रेम अपने आप उसकी उपस्थिती में जलकने लगता है। तब प्रेम मांगता नहीं, बस बहता है। तब व्यक्ति दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं करता, बलकि उसे वैसा ही स्विकार करता है, जैसा वह है...
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जब दो लोग एक दूसरे को बिना शर्थ, बिना अपेक्षा और बिना डर के देख सकते हैं, तब प्रेम असली होता है।
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और जब यह प्रेम ध्यान के साथ जुड़ता है, तब वही प्रेम तुम्हें अपने भीतर की गहरा यही सच्चा संबंध है, जहां दो आत्माएं एक दूसरे को छूती हैं, बिना किसी जंजीर के, बिना किसी डर के और बिना किसी वासना के बोज के, यही प्रेम की खोज का अंतिम पड़ाव है, और यही से जीवन एक नई दिशा में बहने लगता है।
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हर इंसान के भीतर किसी न किसी चीज की ओर गहरा आकर्शन होता है, और सबसे पहला सबसे शक्तिशाली आकर्शन होता है नर और नारी के बीच। यह आकर्शन केवल एक शारीरिक आकर्शन नहीं है, बलकि यह एक बहुत गहरी और पुरानी जैविक, भावनात्मक और मानसिक आवश्चक्ता से जुड़ा होता है। यह वही आकर्शन है जो पूरी स्रिष्टी को आगे बढ़ाता है, जीवन को बनाए रखत...
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लेकिन अकसर हम इसे सिर्फ सेक्स तक सीमित करके देख लेते हैं। इस अध्याय में यह समझाया गया है कि यह जो आकर्शन है यह केवल शरीर का खेल नहीं है, बलकि यह हमारे अस्तित्व की सबसे मौलिक उर्जा है, जो हमें एक से दो और दो से एक होने की ओर ले जाती है। जब कोई पुरुष किसी स्त्री की ओर आकर्शित होता है या कोई स्त्री किसी पुरुष की ओर खेंच...
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उसके पीछे एक बहुत बड़ी उर्जा, एक बहुत गहरा कारण होता है, जो हमें एकता की तरफ ले जाना चाहता है। जब कि पुरुष के साथ मिलकर वह संपूर्णता पाएगी।
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ये खिंचाव प्राकृतिक है, मौलिक है और बहुत ही शक्तिशाली है। ये आकर्शन हमें बार -बार संबंधों की ओर ले जाता है, बार -बार खोच की ओर धकेलता है। हम किसी को पकड़ना चाहते हैं, अपनाना चाहते हैं और उसके जरिये अपने अंदर के अधूरेपन को भरना चाहते हैं। लेकिन अक्सर हम इस आकर्शन को गलत समझ बैठते हैं।
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हम सोचते हैं कि यह सिर्फ शारीरिक संबंद की प्यास है, जबकि हकीकत यह है कि यह एक्ता की खोज है, खोई हुई पूर्णता की याद है।
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हम इस उर्जा को ध्यान में, कला में, करुणा में और प्रेम में बदल सकते हैं। लेकिन उसके लिए पहले हमें ये स्विकार करना होगा, कि ये आकरशन है क्या। इसे दबाने से ये और गहराई में चला जाता है, और वहां से हमारे विचारों, सपनों और भावनाओं को चुप -चाप संचालित करता रहता है।
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लेकिन जब हम इसे प्रकाश में लाते हैं, इसे देखते हैं, इसे पहचानते हैं, तो यह उर्जा अब हमारे नियंतरण में आ जाती है, और तब हम इसे किसी भी दिशा में बहा सकते हैं। यह अध्याय हमें यह भी बताता है कि जो लोग इस मूल आकरशन को समझ नहीं पाते, वे या तो इसके गुलाम बन जाते हैं, या इसके खिलाफ हो जाते हैं। दोनों ही स्थिती में व्यक्ति सं...
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जो लोग इसकी गुलामी में जीते हैं, वे हमेशा किसी के पीछे भागते रहते हैं। एक चहरा, एक शरीर, एक रिश्टा और जो लोग इसके खिलाफ हो जाते हैं, वे इसे शत्रु समझ कर दबाने की कोशिश करते ह लेकिन भीतर से जलते रहते हैं, कुंठित हो जाते हैं, दोनों ही रास्ते दुख की ओर ले जाते हैं। लेकिन तीसरा रास्ता है समझ का, ध्यान का, स्वीकार का।
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जब हम आकर्शन को एक उर्जा की तरह देखें, न पाप समझें, न पुन्य, तब हम उसे भीतर खीच सकत इस अध्याय का सार यही है कि यह मूल आकर्शन इनसान के जीवन का आधार है कि लेकिन यह अंत नहीं है, शुरुआत हैं। यह उर्जा हमें बार बार बाहर की ओर धकेलती है ताकि हम अपने भीतर के खालीपन को भर सकें।
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इस अध्याय का सार यही है कि सेक्स केवल एक क्रिया नहीं है, यही एक संभावना है, एक पुल है, एक द्वार है। लेकिन वह द्वार तभी खुलता है जब हम सजग होते हैं, जब हम अनुभव को पूरी तरह जीते हैं और जब हम उसमें खोने के बजाए उसमें जाकते हैं। यही नया द्वार है और यही वह बिंदु है जहां से सेक्स से समाधी की यात्रा शुरू होती है। जब यह सम...
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अब वह सेक्स को न तो पाप समझता है न ही साधारन आनंद का साधन बलकि एक उचाई तक ले जाने वाला माध्यम समझने लगता है। यही सोच, यही द्रिष्टिकोन, यही जागरूकता नए जीवन की शुरूआत है और इस शुरूआत का पहला कदम है देखना, समझना और सजग होकर जीना यही है नया द्वार।
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अगर इंसान को बदलना है तो बदलाव केवल बाहर से नहीं आसकता, ना सरकारों से, ना समाज की नीतियों से, ना धर्म की व्यवस्ता से। असली बदलाव तो भीतर से आता है, एक -एक व्यक्ति के जागने से, उसके सोचने के तरीके के बदलने से और उसके जीवन जीने के ढंग में बदलाव से। यही बात इस अध्याय की मूल आत्मा है, कि एक नया मानव कैसे जन्म ले सकता है ...
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और क्या नहीं। लेकिन यह सब सिखाना व्यक्ति को नैतिक नहीं बनाता, यह उसे सिर्फ नकली बनाता है। दोहरे चेहरे वाला, भीतर कुछ और, बाहर कुछ और। और यही नकली पन हमारे समाज का सबसे बड़ा संकट है। इस अध्याय में यह गहराई से समझाया गया है कि अगर हमें एक नया मानव चाहिए, तो हमें सबसे पहले उसे स्वतंतरता देनी होगी। स्वतंतरता सोचने की,...
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हमें बच्चों को यह बताना बंद करना होगा कि सेक्स पाप है, शरीर गंदा है और प्रेम अपराध है। अगर हम बच्चपन से ही इन बातों को दबाएंगे, तो बच्चा अपराध बोध से भर जाएगा, और जब वह बड़ा होगा, तब वह न तो अपने संबंधों में सच्चा हो पाएगा, न अपने आप से। इसलिए एक नए मानव का जन्म तभी हो सकता है, जब हम उसे संपूर्णता में स्विकार करें।
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ये अध्याए एक और जरूरी बात की और इशारा करता है, कि अब तक का धर्म इनसान को तोड़ता रहा है। उसने शरीर को नीचा बताया, काम भावना को पाप बताया और आत्मा को पाने के लि� यह सिर्फ ब्रह्म है।
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नया मानव इस द्वंद्व को नहीं मानेगा, वह शरीर को भी स्विकार करेगा और आत्मा को भी, वह संसार में भी जिएगा और समाधी की ओर भी चलेगा।
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नया मानव इस समझ के साथ जिएगा कि जीवन के हर पहलू को रूपांतरित किया जा सकता है। कोई भी भावना शत्रू नहीं है, कोई भी इच्छा पाप नहीं है, अगर उसे सजकता से जिया जाए।
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दुनिया को बदलने के लिए किसी क्रांती की जरूरत नहीं है, सिर्फ ऐसे सजक व्यक्तियों की जरूरत है, जो अपने भीतर प्रेम, मौन और समझ को जीए। यही लोग असली क्रांती लाते हैं, जो ना नारों से होती है, ना तलवारों से, बल्कि छेतना से होती है।
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जब एक बच्चा, एक युवक, एक स्त्री या पुरुष ये समझने लगता है कि उसका शरीर पवित्र है, उसकी भावनाएं स्वाभाविक हैं और उसकी उर्जा कोई शत्रु नहीं बल्कि मित्र है, तभी नया मानव जन्म लेता है।
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यह अध्याय यह भी बताता है कि जो लोग सेक्स को दबाते हैं, वे कभी भी हीरा नहीं बन सकते। रिप्रेशन यानि दबाना सिर्फ और सिर्फ भीतर जर पैदा करता है। यह जर धीरे धीरे इनसान को या तो बीमार बना देता है या पाखंडी। और जो लोग बिना सोचे समझे बस भोगते हैं, वे अपनी उर्जा को बेकार बहा देते हैं, जैसे पानी को रेत पर डालना।
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लेकिन जो व्यक्ति सजग होता है, जो हर बार इस ओर्जा के उठने पर ध्यान पूर्वक उसे देखता है, वह धीरे धीरे उस ओर्जा को अपने भीतर खीचने लगता है। और यह खिंचना ही ध्यान में बदलता है। अब वह व्यक्ति इस उर्जा को आँखों में चमक, शब्दों में मिठास और मौन में शक्ति के रूप में जीने लगता है।
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तब वह केवल सेक्स करने वाला नहीं, बलकि प्रेम में जीने वाला, ध्यान में डूबने वाला और म� भरने वाला व्यक्ति बन जाता है। यही असली साधना है, जहां कुछ भी छोड़ा नहीं जाता, केवल रूपांतरित किया जाता है। इस अध्याय में यह भी बहुत सुन्दर तरीके से बताया गया है कि कोईले से हीरा बनना कोई एक दिन का काम नहीं है।
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यह एक धीमी म� बहुत से बाहर निकाल दो। लेकिन अगर व्यक्ति रुख सके, उसे देख सके, उसे महसूस कर सके, तो वह उर्जा भीतर ही भीतर आकार लेने लगती है। धीरे धीरे वह उर्जा शरीर से हटकर हृदय में आने लगती है।
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फिर वह हृदय से उठकर आग्या चक्र तक पह देन अग्युत्ति रुख पहाले जाती है। यही असली रूपांतरण है और यही इस अध्याय का मर्म है। इस रूपांतरण में सबसे जरूरी चीज है आत्म समवेदना।
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अगर तुम अपनी भावनाओं को, अपनी इच्छाओं को प्रेम से महसूस कर सको, तो वे तुम्हें कभी भी गुलाम नहीं बना सकती, वे तुम्हारे मित्र बन जाएंगी। और जब तुम अपनी उर्जा के साथ मित्रता कर लेते हो, तो वह उर्जा तुम्हें ऐसे रास्तों पर ले जाती है, जो अब तक छिपे हुए थे। तब जीवन केवल भोग नहीं रह जाता, वह एक ध्यान की यात्रा बन जाता है।
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तुम्हें सन्यासी बनने की जरूरत नहीं, नहीं किसी जंगल या प बदलने का। यही कोईले से हीरा बनने की असली प्रक्रिया है और यही एक सचमुच के आध्यात्मिक जीवन की शुरूआत है।
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जब यह शुरूआत होती है, तो तुम्हारा पूरा जीवन एक सुन्दर रचना बन जाता है, जिसमें प्रेम है, मौन है और गहराई है। यह जन्म से नहीं लाता, वह समाज द्वारा धीरे -धीरे डाला जाता है।
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समाज ने सेक्स को अपराद बना दिया है, शर्म की चीज़ बना दिया है और यही कारण है कि लोग इस पर खुल कर बात नहीं कर पाते, नहीं इसे समझ पाते हैं। हर बच्चा स्वाभाविक रूप से अपने शरीर और अपनी उर्जा के प्रती उत्सुक होता है। लेकिन माता -पिता, शिक्षक और धार्मिक संस्थाएं उसे तुरंत डाटते हैं, रोकते हैं और अपराद बोध में धकेल देते हैं...
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इस अध्याय का मुख्य संदेश यही है कि यौन उर्जा को दबाने से उसका अंत नह होता, बलकि वह अंदर ही अंदर गहरी हो जाती है, और व्यक्ति की सोच, भावनाओं और व्यवहार को चुप -चाप नियंतरित करने लगती है। इस दबाव से व्यक्ति का मन दो हिस्सों में बढ़ जाता है, एक जो सामाजिक मुखोटा है और दूसरा जो भीतर छिपी ह� वी सच्चाई है।
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यही दोहरापन इंसान को पाखंडी बना देता है, बाहर से वह सभ्य, नैतिक और धार्मिक दिखता है, लेकिन भीतर उसकी इच्छाएं, वासनाएं और कुंठाएं उसे खा रही होती हैं। यह मानसिक द्वंद्व व्यक्ति को कभी चैन नहीं लेने द वह जितना सेक्स को दबाता है, उतना ही उसके सपनों में, उसकी कलपनाओं में और अनजाने व्यवहार में वह और गहराई से प्रकट होता है।
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यही यौन संसकारों की बीमारी है, जो हर संस्कृती, हर समाज में फैली हुई है। और जब तक यह परतें नहीं तूटती, त कंडिशनिंग की गई है, वही असली बीमारी है।
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इस कंडिशनिंग ने हमारी सोच को इतना सीमित और डर से भरा बना दिया है, कि हम अपनी ही उर्जा से डरने लगे हैं। जब भी कोई काम भावना उठती है, तो व्यक्ति घबरा जाता है। उसे लगता है कि वह कुछ गल नहीं समझ में बदल सकती है।
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लेकिन क्योंकि समाज ने सेक्स को गंदा कहकर दबाया है, इसलिए यह भावना भीतर विकृत रूप ले लेती है। और यही कारण है कि दुनिया में बलातकार, यौन हिंसा और छिपे हुए शोशन की घटनाएं इतनी ज्यादा हैं। अगर स दबाने, छिपाने या हिंसक होने की जरूरत न पढ़ती।
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इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि यौन कंडिशनिंग केवल विचारों तक सीमित नहीं होती। वह शरीर की भाशा, चाल ढाल और हमारी समवेदन शीलता को भी प्रभावित करती है।
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यह अध्याय यही बताता है कि समाज ने सेक्स को लेकर जो नैतिकता तै की है वह इनसान को अपराधबोध और डर में डालती है। उसे दबा देती है। उसकी स्वाभाविकता को तोड़ देती है। सेक्स एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जैसे भूख लगना, प्यास लगना, वैसे ही यह भी शरीर की एक जरूरत है। लेकिन धर्मों और समाजों ने इसे अनैतिक बना दिया है, पाप कह दिया ...
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जब भी कोई य युवक या युवती सेक्स के बारे में सोचता है, तो उसे ऐसा लगता है कि वह कुछ गंदा सोच रहा है। यही भावना धीरे धीरे उसे या तो पाखंडी बना देती है, या फिर भीतर ही भीतर उसे तोड़ देती है। यह अध्याय यही सवाल उठाता है कि अगर कोई � चीज स्वाभाविक है, अगर वह जीवन की नीव में है, तो क्या उसे अनैतिक कहा जा सकता है। ओशो समझा...
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