audio audioduration (s) 7.9 19 | transcription stringlengths 32 145 | transcription_normalised stringlengths 32 145 | phonemes stringlengths 43 173 | gender stringclasses 1
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नईवतस्यकृतेनार्थोनाकृतेनेहकष्चनानचास्यसरवभूतेशुकष्चिदर्थव्यपाश्रयः | नईवतस्यकृतेनार्थोनाकृतेनेहकष्चनानचास्यसरवभूतेशुकष्चिदर्थव्यपाश्रयः | nəiʋətəsjəkɾɪteːnaːɾtʰoːnaːkɾɪteːneːhəkəʂcənaːncaːsjəsəɾəʋbʰuːteːʃʊkʂcɪdəɾtʰəʋjəpaːʃɾəjəh | Male | |
तेशामेवानुकंपार्थमहमद्न्यानजन्तमहानाशयाम्यात्मभावस्थोद्न्यानधीपेनभास्वता | तेशामेवानुकंपार्थमहमद्न्यानजन्तमहानाशयाम्यात्मभावस्थोद्न्यानधीपेनभास्वता | teːʃaːmeːʋaːnʊkmpaːɾtʰəməhəmdnjaːnəɟəntəmhaːnaːʃjaːmjaːtməbʰaːʋstʰoːdnjaːndʰipeːnbʰaːsʋətaː | Male | |
उद्धरेदात्मनात्मानन्नात्मानमवसादयेत् आत्मैवैहात्मनोबन्धुरात्मैवरिपुरात्मनाहा | उद्धरेदात्मनात्मानन्नात्मानमवसादयेत् आत्मैवैहात्मनोबन्धुरात्मैवरिपुरात्मनाहा | ʊdʰːɾeːdaːtmənaːtmaːnnnaːtmaːnəməʋsaːdjeːt aːtmɛːʋɛːhaːtmənoːbndʰʊɾaːtmɛːʋɾɪpʊɾaːtmənaːhaː | Male | |
श्री भगवानु भाच कालोस्मिलोकक्षयकृत्प्रवृत्धो लोकान्समाहरतुमिहप्रवृत्तः रुतेपित्वान्नभविष्यन्तिसरवे येवस्थिताः प्रत्यनीकेशुयोधाः | श्री भगवानु भाच कालोस्मिलोकक्षयकृत्प्रवृत्धो लोकान्समाहरतुमिहप्रवृत्तः रुतेपित्वान्नभविष्यन्तिसरवे येवस्थिताः प्रत्यनीकेशुयोधाः | ʃɾi bʰəɡʋaːnʊ bʰaːc kaːloːsmɪloːkəkʃəjkɾɪtpɾəʋɾɪtdʰoː loːkaːnsəmaːhəɾtʊmɪhəpɾəʋɾɪtːəh ɾʊteːpɪtʋaːnnəbʰʋɪʂjəntɪsəɾʋeː jeːʋstʰɪtaːh pɾətːjəniːkeːʃʊjoːdʰaːh | Male | |
सर्वभूतानिकोंतेय प्रकृतियान्तिमामिकाम् कलपक्षये पुनस्तानिकलपादविसुरुजाम्यहं। | सर्वभूतानिकोंतेय प्रकृतियान्तिमामिकाम् कलपक्षये पुनस्तानिकलपादविसुरुजाम्यहं। | sərʋəbʰuːtaːnɪkõteːj pɾəkɾɪtɪjaːntɪmaːmɪkaːm kələpʌkʃəjeː pʊnstaːnɪkəlpaːdʋɪsʊɾʊɟaːmjəhən | Male | |
यदहंकारमा शृत्यनयोच्य इतिमन्यसे मिठ्यईशव्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वान्नियोख्षती। | यदहंकारमा शृत्यनयोच्य इतिमन्यसे मिठ्यईशव्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वान्नियोख्षती। | jədəhəŋkaːɾmaː ʃɾɪtːjənjoːcːjə ɪtɪmʌnjəseː mɪʈʰjəiːʃəʋjəʋsaːjʌsteː pɾəkɾɪtɪstʋaːnnɪjoːkʰʂəti | Male | |
तद्विध्धि प्रणिपाते न परिप्रष्णे न सेवया। उपदेक्ष्यन्तिते द्न्यानन्द्न्यानिनस्तत्वदर्शिनहा। | तद्विध्धि प्रणिपाते न परिप्रष्णे न सेवया। उपदेक्ष्यन्तिते द्न्यानन्द्न्यानिनस्तत्वदर्शिनहा। | tədʋɪdʰdʰɪ pɾəɳɪpaːteː nə pəɾɪpɾʌʂɳeː nə seːʋjaː ʊpdeːkʃjəntɪteː dnjaːnndnjaːnɪnəstətʋədʌrʃɪnhaː | Male | |
मन्मनाभवमद्भक्तो मद्याजीमान्नमस्कुरू मामेवैश्यसियुक्त्वैवमात्मानंमत्परायनः | मन्मनाभवमद्भक्तो मद्याजीमान्नमस्कुरू मामेवैश्यसियुक्त्वैवमात्मानंमत्परायनः | mənmənaːbʰəʋəmədbʰʌktoː mədjaːɟimaːnnəmskʊɾuː maːmeːʋɛːʃjəsɪjʊktʋɛːʋmaːtmaːnəmmətpəɾaːjənəh | Male | |
संजय उवाच तन्तथा कुरुपयाविष्ट मश्रुपूर्णाकुलेक्षणं विशीदन्तमिदंवाक्यमुवाचमधुसूदनः | संजय उवाच तन्तथा कुरुपयाविष्ट मश्रुपूर्णाकुलेक्षणं विशीदन्तमिदंवाक्यमुवाचमधुसूदनः | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc tʌntətʰaː kʊɾʊpjaːʋɪʂʈ məʃɾʊpuːrɳaːkʊleːkʃəɳən ʋɪʃidəntəmɪdnʋaːkːjəmʊʋaːcəmdʰʊsuːdənəh | Male | |
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पित्रोनथपितामहान् आचार्यान् मातुलान् भ्रात्रोन् पुत्रान् पवुत्रान् सखीन्स्तथा। | तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पित्रोनथपितामहान् आचार्यान् मातुलान् भ्रात्रोन् पुत्रान् पवुत्रान् सखीन्स्तथा। | tətɾaːpəʃjətstʰɪtaːn paːɾtʰəh pɪtɾoːnətʰpɪtaːmhaːn aːcaːrjaːn maːtʊlaːn bʰɾaːtɾoːn pʊtɾaːn pəʋʊtɾaːn səkʰiːnstətʰaː | Male | |
अच्छेद्यो यमदाईयो यमकलेद्यो शोष्य एवच नित्यसरवगतस्थाणु रचलो यमसनातनाः | अच्छेद्यो यमदाईयो यमकलेद्यो शोष्य एवच नित्यसरवगतस्थाणु रचलो यमसनातनाः | ʌcʰcʰeːdjoː jəmdaːiːjoː jəməkleːdjoː ʃoːʂjə eːʋəc nɪtːjəsəɾəʋəɡətstʰaːɳʊ ɾʌcloː jəməsnaːtnaːh | Male | |
अमीचत्वान्धृतराष्ट्रस्यपुत्राः सरवेसहैवावनिपालसंघैः भीष्मोद्रोणसूतपुत्रस्तथासवु सहास्मदियैरपियोधमुख्यैः | अमीचत्वान्धृतराष्ट्रस्यपुत्राः सरवेसहैवावनिपालसंघैः भीष्मोद्रोणसूतपुत्रस्तथासवु सहास्मदियैरपियोधमुख्यैः | ʌmictʋaːndʰɾɪtɾaːʂʈɾəsjəpʊtɾaːh səɾʋeːshɛːʋaːʋnɪpaːləsŋɡʰɛːh bʰiʂmoːdɾoːɳsuːtpʊtɾəstətʰaːsʋʊ səhaːsmədɪjɛːɾpɪjoːdʰmʊkʰjɛːh | Male | |
इतिगुईयतमं शास्त्रमिदमुक्तम्मयानघ एतद्बुद्ध्वाबुद्धिमान्सियात्कृतकृत्यष्चभारत | इतिगुईयतमं शास्त्रमिदमुक्तम्मयानघ एतद्बुद्ध्वाबुद्धिमान्सियात्कृतकृत्यष्चभारत | ɪtɪɡʊiːjətəmən ʃaːstɾəmɪdmʊktəmməjaːnəɡʰ eːtdbʊdʰːʋaːbʊdʰːɪmaːnsɪjaːtkɾɪtkɾɪtːjəʂcəbʰaːɾət | Male | |
यद्न्यशिष्टामृ तभुजो यान्ति ब्रह्मसनातनं नायन्लोकोस्त्य यद्न्यस्य कुतोन्यखुर। | यद्न्यशिष्टामृ तभुजो यान्ति ब्रह्मसनातनं नायन्लोकोस्त्य यद्न्यस्य कुतोन्यखुर। | jədnjəʃɪʂʈaːmɾɪ tʌbʰʊɟoː jaːntɪ bɾəhməsnaːtənən naːjnloːkoːstːjə jədnjʌsjə kʊtoːnjəkʰʊɾ | Male | |
असव्मयाहतशत्रुर्हनिष्येचापरानपी ईश्वरोहमहंभोगीसिद्धोहंबलवानसुखी। | असव्मयाहतशत्रुर्हनिष्येचापरानपी ईश्वरोहमहंभोगीसिद्धोहंबलवानसुखी। | ʌsəʋməjaːhətəʃtɾʊrhənɪʂjeːcaːpɾaːnpi iːʃʋəɾoːhəməhəmbʰoːɡisɪdʰːoːhəmbəlʋaːnsʊkʰi | Male | |
सरवकरमाण्यपिसदा कुरुवाणो मद्व्यपाश्रयः मत्प्रसादादवाप्नोतिशाश्वतं पदमव्ययं | सरवकरमाण्यपिसदा कुरुवाणो मद्व्यपाश्रयः मत्प्रसादादवाप्नोतिशाश्वतं पदमव्ययं | səɾəʋəkəɾmaːɳjəpɪsdaː kʊɾʊʋaːɳoː mədʋjəpaːʃɾəjəh mətpɾəsaːdaːdʋaːpnoːtɪʃaːʃʋətən pədəmʌʋjəjən | Male | |
तत्रसत्वन्निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयं सुखसंगेनबद्नातिद्न्यानसंगेनचानग। | तत्रसत्वन्निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयं सुखसंगेनबद्नातिद्न्यानसंगेनचानग। | tətɾəsətʋənnɪrməltʋaːtpɾəkaːʃəkəmnaːməjən sʊkʰəsŋɡeːnəbdnaːtɪdnjaːnəsŋɡeːncaːnəɡ | Male | |
ये तु सरवाणि करमाणि मयिसन्यस्यमत्पराहा अनन्ये नईवयोगेन मान्ध्यायंत उपासते। | ये तु सरवाणि करमाणि मयिसन्यस्यमत्पराहा अनन्ये नईवयोगेन मान्ध्यायंत उपासते। | jeː tʊ səɾʋaːɳɪ kəɾmaːɳɪ məjɪsənjəsjəmətpəɾaːhaː ʌnʌnjeː nəiʋjoːɡeːn maːndʰjaːjənt ʊpaːsteː | Male | |
भूतग्रामस्सेवायं भूतवाभूतवाप्रलीयते रात्रियागमेवशः पार्थः प्रभवत्यहरागमे | भूतग्रामस्सेवायं भूतवाभूतवाप्रलीयते रात्रियागमेवशः पार्थः प्रभवत्यहरागमे | bʰuːtɡɾaːmsseːʋaːjən bʰuːtʋaːbʰuːtʋaːpɾəliːjteː ɾaːtɾɪjaːɡmeːʋəʃəh paːɾtʰəh pɾəbʰəʋətːjəhəɾaːɡmeː | Male | |
समोहं सर्वभुतेशु नमे द्वेश्योस्तिनप्रियहा ये भजन्तितुमां भक्तियामयितेतेशु चाप्यहं | समोहं सर्वभुतेशु नमे द्वेश्योस्तिनप्रियहा ये भजन्तितुमां भक्तियामयितेतेशु चाप्यहं | səmoːhən sərʋəbʰʊteːʃʊ nʌmeː dʋeːʃjoːstɪnpɾɪjhaː jeː bʰəɟʌntɪtʊmã bʰəktɪjaːmjɪteːteːʃʊ caːpːjəhən | Male | |
श्री भगवानु वाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रद्न्यावादाउँष्च भाषसे गतासून गतासूष्च नानुषोचन्ति पण्डिताः | श्री भगवानु वाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रद्न्यावादाउँष्च भाषसे गतासून गतासूष्च नानुषोचन्ति पण्डिताः | ʃɾi bʰəɡʋaːnʊ ʋaːc ʌʃoːcːjaːnənʋəʃoːcəstʋən pɾədnjaːʋaːdaːʊnʂc bʰaːʂseː ɡətaːsuːn ɡətaːsuːʂc naːnʊʂoːcʌntɪ pəɳɖɪtaːh | Male | |
करम ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवं तस्मात्सरवगतं ब्रह्मानित्यन्यद्नेप्रतिष्ठितं | करम ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवं तस्मात्सरवगतं ब्रह्मानित्यन्यद्नेप्रतिष्ठितं | kʌɾəm bɾəhmoːdbʰəʋən ʋɪdʰːɪ bɾəhmaːkʃəɾəsmʊdbʰəʋən təsmaːtsəɾəʋəɡətən bɾəhmaːnɪtːjənjədneːpɾətɪʂʈʰɪtən | Male | |
यत्सांख्यै प्राप्यते स्थानन्त अध्योगै रपिगम्यते एकं सांख्यंच योगंच यःपश्यति सपश्यति | यत्सांख्यै प्राप्यते स्थानन्त अध्योगै रपिगम्यते एकं सांख्यंच योगंच यःपश्यति सपश्यति | jətsãkʰjɛː pɾaːpːjəteː stʰaːnʌnt ʌdʰjoːɡɛː ɾəpɪɡʌmjəteː eːkən sãkʰjəɲc joːɡʌɲc jəhpʌʃjətɪ səpʌʃjətɪ | Male | |
अपर्याप्तन्तदस्माकं बलंभीष्माभिरक्षितं पर्याप्तन्त्विदमेतेशां बलंभीमाभिरक्षितं | अपर्याप्तन्तदस्माकं बलंभीष्माभिरक्षितं पर्याप्तन्त्विदमेतेशां बलंभीमाभिरक्षितं | ʌprjaːptəntədsmaːkən bəlmbʰiːʂmaːbʰɪɾkʃɪtən pərjaːptəntʋɪdmeːteːʃã bəlmbʰiːmaːbʰɪɾʌkʃɪtən | Male | |
असत्यम प्रतिष्ठन्ते जगदाहुरनीश्वरं अपरस्परसं भूतं किमन्यत्कामहै तुकं। | असत्यम प्रतिष्ठन्ते जगदाहुरनीश्वरं अपरस्परसं भूतं किमन्यत्कामहै तुकं। | ʌsʌtːjəm pɾətɪʂʈʰʌnteː ɟəɡdaːhʊɾniːʃʋəɾən ʌpəɾʌspəɾəsən bʰuːtən kɪmənjətkaːmhɛː tʊkən | Male | |
बुद्धेर भेदं धृतेष्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रणू प्रोच्यमानमशेषेण पुरुथक्तवेनधनन्जया। | बुद्धेर भेदं धृतेष्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रणू प्रोच्यमानमशेषेण पुरुथक्तवेनधनन्जया। | bʊdʰːeːɾ bʰeːdən dʰɾɪteːʂcɛːʋ ɡʊɳətʌstɾɪʋɪdʰən ʃɾʌɳuː pɾoːcːjəmaːnəmʃeːʂeːɳ pʊɾʊtʰəktəʋeːnədʰənʌnɟəjaː | Male | |
सन्जय उवाच इत्यर जुनम्वा सुदेवस्त थोक्तवा स्वकं रूपं दर्शयामा सभूयः आश्वासयामा सचभीतमेनं भूत्वा पुनस्सम्यवपुरु महात्मा | सन्जय उवाच इत्यर जुनम्वा सुदेवस्त थोक्तवा स्वकं रूपं दर्शयामा सभूयः आश्वासयामा सचभीतमेनं भूत्वा पुनस्सम्यवपुरु महात्मा | sʌnɟəɛj ʊʋaːc ɪtːjəɾ ɟʊnʌmʋaː sʊdeːʋʌst tʰoːktəʋaː sʋʌkən ɾuːpən dərʃəjaːmaː səbʰuːjəh aːʃʋaːsjaːmaː səcbʰiːtmeːnən bʰuːtʋaː pʊnəssʌmjəʋpʊɾʊ məhaːtmaː | Male | |
इदाउ उद्ञानमु पाश्रित्यममसाधर्म्यमागताः सरगेपिनोपजायन्तेप्रलयेनव्यधन्तिचौ। | इदाउ उद्ञानमु पाश्रित्यममसाधर्म्यमागताः सरगेपिनोपजायन्तेप्रलयेनव्यधन्तिचौ। | ɪdaːʊ ʊdɲaːnmʊ paːʃɾɪtːjəməmsaːdʰərmjəmaːɡtaːh səɾɡeːpɪnoːpɟaːjnteːpɾəljeːnəʋjədʰntɪcɔː | Male | |
योमाम जमनादिञ्च वेत्तिलोकमहेश्वरं असम्मूढः समर्तियेशु सरवपापैः प्रमुच्यते। | योमाम जमनादिञ्च वेत्तिलोकमहेश्वरं असम्मूढः समर्तियेशु सरवपापैः प्रमुच्यते। | joːmaːm ɟəmnaːdɪɲc ʋeːtːɪloːkəmheːʃʋəɾən ʌsmmuːɖʰəh səmrtɪjeːʃʊ səɾəʋpaːpɛːh pɾəmʊcːjəteː | Male | |
येत्वक्षरमनिर्देश्यं अव्यक्तं परियुपासते सरवत्रगमचिन्त्यंच कूटस्थमचलन्धुवं | येत्वक्षरमनिर्देश्यं अव्यक्तं परियुपासते सरवत्रगमचिन्त्यंच कूटस्थमचलन्धुवं | jeːtʋəkʃəɾəmnɪɾdeːʃjən ʌʋjʌktən pəɾɪjʊpaːsteː səɾəʋətɾəɡəmcɪntːjʌɲc kuːʈəstʰəməcəlʌndʰʊʋən | Male | |
यद्निये तपसिदाने चस्थितिस सदिति चोच्यते करमचैवत दरथीयं सदित्ये वापिधीयते। | यद्निये तपसिदाने चस्थितिस सदिति चोच्यते करमचैवत दरथीयं सदित्ये वापिधीयते। | jʌdnɪjeː təpsɪdaːneː cʌstʰɪtɪs sʌdɪtɪ coːcːjəteː kəɾəmcɛːʋət dəɾtʰiːjən sədɪtːjeː ʋaːpɪdʰiːjteː | Male | |
श्रेयान्स्वधरमो विकुणः परधरमात् स्वनुष्ठितात् स्वभावनियतं करम कुरुवन्नाप्नो तिकिलिविषम। | श्रेयान्स्वधरमो विकुणः परधरमात् स्वनुष्ठितात् स्वभावनियतं करम कुरुवन्नाप्नो तिकिलिविषम। | ʃɾeːjaːnsʋədʰəɾmoː ʋɪkʊɳəh pəɾədʰəɾmaːt sʋənʊʂʈʰɪtaːt sʋəbʰaːʋnɪjətən kʌɾəm kʊɾʊʋnnaːpnoː tɪkɪlɪʋɪʂəm | Male | |
सुखमात्यन्तिकैयत्तद्बुद्धिग्राय्यमतीन्द्रियं वेत्तियत्रनचैवायं स्थितश्चलतितत्वतः | सुखमात्यन्तिकैयत्तद्बुद्धिग्राय्यमतीन्द्रियं वेत्तियत्रनचैवायं स्थितश्चलतितत्वतः | sʊkʰmaːtːjəntɪkɛːjətːdbʊdʰːɪɡɾaːjjəmtiːndɾɪjən ʋeːtːɪjətɾəncɛːʋaːjən stʰɪtəʃcəltɪtʌtʋətəh | Male | |
यान्ति देवव्रतादेवान् पित्रुन्यान्ति पित्रुव्रताः भूतान्यान्ति भूतेज्यायान्ति मद्याजिनोपिमान् | यान्ति देवव्रतादेवान् पित्रुन्यान्ति पित्रुव्रताः भूतान्यान्ति भूतेज्यायान्ति मद्याजिनोपिमान् | jaːntɪ deːʋəʋɾətaːdeːʋaːn pɪtɾʊnjaːntɪ pɪtɾʊʋɾətaːh bʰuːtaːnjaːntɪ bʰuːteːɟjaːjaːntɪ mədjaːɟɪnoːpɪmaːn | Male | |
अहंकारं बलंदर पंकामं क्रोधं परिग्रहं विमुच्यनिर्ममश्यान्तो ब्रह्मभूयायकल्पते। | अहंकारं बलंदर पंकामं क्रोधं परिग्रहं विमुच्यनिर्ममश्यान्तो ब्रह्मभूयायकल्पते। | ɛhəŋkaːɾən bəlʌndəɾ pəŋkaːmən kɾoːdʰən pəɾɪɡɾəhən ʋɪmʊcːjənɪrməmʃjaːntoː bɾəhməbʰuːjaːjəkʌlpəteː | Male | |
न्यानन्ध्नेयं परिद्न्यातात् त्रिविधाकरमचोधनाक् करणंकरमकरतेतित् त्रिविधाकरमसंग्रहा | न्यानन्ध्नेयं परिद्न्यातात् त्रिविधाकरमचोधनाक् करणंकरमकरतेतित् त्रिविधाकरमसंग्रहा | njaːnndʰneːjən pəɾɪdnjaːtaːt tɾɪʋɪdʰaːkəɾəmcoːdʰnaːk kəɾəɳəŋkəɾəməkəɾteːtɪt tɾɪʋɪdʰaːkəɾəməsʌŋɡɾəhaː | Male | |
सैवायं मयातेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोसिमे सखाचेती रहस्यन्ये तदुत्तमं | सैवायं मयातेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोसिमे सखाचेती रहस्यन्ये तदुत्तमं | sɛːʋaːjən məjaːteːdjə joːɡəh pɾoːktəh pʊɾaːtənəh bʰəktoːsɪmeː səkʰaːceːti ɾəhəsjʌnjeː tədʊtːəmən | Male | |
सन्तुष्ट सततै योगी यतात्मा दुरुधनिष्चयहा मैयरपितमनो बुद्धिर योमद भक्तसमे प्रियहा | सन्तुष्ट सततै योगी यतात्मा दुरुधनिष्चयहा मैयरपितमनो बुद्धिर योमद भक्तसमे प्रियहा | səntʊʂʈ sʌttɛː joːɡi jətaːtmaː dʊɾʊdʰnɪʂcəjhaː mɛːjəɾpɪtəmnoː bʊdʰːɪɾ joːməd bʰʌktəsmeː pɾɪjhaː | Male | |
अधियत्न्यः कथंकोत्रदेहेस्मिन्मधुसूदनाः प्रयाणकालेचकथंध्योसिनियतात्मभिही। | अधियत्न्यः कथंकोत्रदेहेस्मिन्मधुसूदनाः प्रयाणकालेचकथंध्योसिनियतात्मभिही। | ʌdʰɪjʌtnjəh kətʰŋkoːtɾədeːheːsmɪnmədʰʊsuːdnaːh pɾəjaːɳkaːleːcəkətʰndʰjoːsɪnɪjtaːtməbʰɪhi | Male | |
भूमिरापोनलोवायुखम्मनोबुद्धिरेवच अहंकारितीयम्मेभिन्नाप्रकृतिरष्टधा। | भूमिरापोनलोवायुखम्मनोबुद्धिरेवच अहंकारितीयम्मेभिन्नाप्रकृतिरष्टधा। | bʰuːmɪɾaːpoːnloːʋaːjʊkʰəmmənoːbʊdʰːɪɾeːʋəc ɛhəŋkaːɾɪtiːjmmeːbʰɪnnaːpɾəkɾɪtɪɾəʂʈədʰaː | Male | |
चिन्ताम परिमेयान्च प्रलयान्तामु पाश्रिताहा कामो पभोग परामा एता वधिति निष्चिताहा। | चिन्ताम परिमेयान्च प्रलयान्तामु पाश्रिताहा कामो पभोग परामा एता वधिति निष्चिताहा। | cɪntaːm pəɾɪmeːjaːnc pɾəljaːntaːmʊ paːʃɾɪtaːhaː kaːmoː pəbʰoːɡ pəɾaːmaː eːtaː ʋʌdʰɪtɪ nɪʂcɪtaːhaː | Male | |
ततः पदंतत् परिमार्गितव्यं यस्मिन्गताननिवरतंतिभोयः तमेवचाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसुरुतापुराणी। | ततः पदंतत् परिमार्गितव्यं यस्मिन्गताननिवरतंतिभोयः तमेवचाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसुरुतापुराणी। | tʌtəh pədʌntət pəɾɪmaːɾɡɪtəʋjən jəsmɪnɡətaːnnɪʋəɾətntɪbʰoːjəh təmeːʋcaːdjən pʊɾʊʂən pɾəpʌdjeː jʌtəh pɾəʋɾɪtːɪh pɾəsʊɾʊtaːpʊɾaːɳi | Male | |
स्वभावचेन कौन्तेय निबध्धस्वेन करमणा करतुन्नेच्यसियन्मोहात करिष्यस्यवशोपितत। | स्वभावचेन कौन्तेय निबध्धस्वेन करमणा करतुन्नेच्यसियन्मोहात करिष्यस्यवशोपितत। | sʋəbʰaːʋceːn kɔːnteːj nɪbədʰdʰəsʋeːn kʌɾəmɳaː kəɾtʊnneːcːjəsɪjnmoːhaːt kəɾɪʂjəsjəʋʃoːpɪtət | Male | |
कुरुष्यः प्रकृतिस्थोहि भुंक्ते प्रकृति जान् गुणान् कारणं गुणसंगोस्य सदसद्यो निचन् मस्तुत। | कुरुष्यः प्रकृतिस्थोहि भुंक्ते प्रकृति जान् गुणान् कारणं गुणसंगोस्य सदसद्यो निचन् मस्तुत। | kʊɾʊʂjəh pɾəkɾɪtɪstʰoːhɪ bʰũkteː pɾʌkɾɪtɪ ɟaːn ɡʊɳaːn kaːɾəɳən ɡʊɳəsŋɡoːsjə sədəsʌdjoː nɪcən mʌstʊt | Male | |
यो मामेवम सम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमं ससर्वविद्भजतिमाम् सर्वभावेन भारत। | यो मामेवम सम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमं ससर्वविद्भजतिमाम् सर्वभावेन भारत। | joː maːmeːʋəm səmmuːɖʰoː ɟaːnaːtɪ pʊɾʊʂoːtːəmən səsərʋəʋɪdbʰəɟtɪmaːm sərʋəbʰaːʋeːn bʰaːɾət | Male | |
श्री भगवानु वाच अनाश्रितः करमफलंकार्यं करमकरोतियः ससन्यासीच योगीच ननिरग्दिर्णचाक्रियः | श्री भगवानु वाच अनाश्रितः करमफलंकार्यं करमकरोतियः ससन्यासीच योगीच ननिरग्दिर्णचाक्रियः | ʃɾi bʰəɡʋaːnʊ ʋaːc ʌnaːʃɾɪtəh kəɾəməpʰəlŋkaːrjən kəɾəməkɾoːtɪjəh səsnjaːsiːc joːɡiːc nənɪɾɡdɪrɳəcaːkɾɪjəh | Male | |
यदा संहरते चायंकूर्मों गानीव सरवशः इन्द्रियाणी इन्द्रियार्थे भ्यस्तस्य प्रद्न्याप्रतिष्ठिता | यदा संहरते चायंकूर्मों गानीव सरवशः इन्द्रियाणी इन्द्रियार्थे भ्यस्तस्य प्रद्न्याप्रतिष्ठिता | jʌdaː sʌnhəɾteː caːjŋkuːrmõ ɡaːniːʋ sʌɾəʋəʃəh ɪndɾɪjaːɳi ɪndɾɪjaːɾtʰeː bʰjəstʌsjə pɾədnjaːpɾətɪʂʈʰɪtaː | Male | |
नबुद्धिभेदं चनये दध्यानां करमसंगिनां जोशयेच सरवकरमाणी विद्वान्युक्तसमाचरण। | नबुद्धिभेदं चनये दध्यानां करमसंगिनां जोशयेच सरवकरमाणी विद्वान्युक्तसमाचरण। | nəbʊdʰːɪbʰeːdən cʌnjeː dədʰjaːnã kəɾəməsʌŋɡɪnã ɟoːʃjeːc səɾəʋəkəɾmaːɳi ʋɪdʋaːnjʊktəsmaːcəɾəɳ | Male | |
मानापमानयो स्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो सरवारंभ परित्यागी गुणातीतस उच्यते। | मानापमानयो स्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो सरवारंभ परित्यागी गुणातीतस उच्यते। | maːnaːpmaːnjoː stʊljəstʊljoː mɪtɾaːɾɪpʌkʃəjoː səɾʋaːɾʌmbʰ pəɾɪtːjaːɡi ɡʊɳaːtiːtəs ʊcːjəteː | Male | |
अनुबन्धंक्षयं हिम्सामनवेक्षयचपवुरुषम् मोहादारभ्यते करमयतत्तामसमुच्यते। | अनुबन्धंक्षयं हिम्सामनवेक्षयचपवुरुषम् मोहादारभ्यते करमयतत्तामसमुच्यते। | ʌnʊbəndʰʌŋkʃəjən hɪmsaːmənʋeːkʃəjəcəpʋʊɾʊʂəm moːhaːdaːɾʌbʰjəteː kəɾəməjəttːaːməsmʊcːjəteː | Male | |
किरीटिनंगदिनंचक्रिनंच तेजोराशिम् सर्वतोदीप्तिमंतं पश्यामित्वान्दुरुनिरीक्षंसमंतात् दीप्तानलारकद्यतिमक्प्रमेयं। | किरीटिनंगदिनंचक्रिनंच तेजोराशिम् सर्वतोदीप्तिमंतं पश्यामित्वान्दुरुनिरीक्षंसमंतात् दीप्तानलारकद्यतिमक्प्रमेयं। | kɪɾiʈɪnəŋɡədɪnəɲcəkɾɪnʌɲc teːɟoːɾaːʃɪm sərʋətoːdiːptɪməntən pəʃjaːmɪtʋaːndʊɾʊnɪɾiːkʃənsəmntaːt diːptaːnlaːɾəkədjətɪməkpɾəmeːjən | Male | |
ये यथामाम् प्रपद्यन्ते ताउंस्तथै वभजाम्यहं ममवर्त्मानु वरतन्ते मनुष्याः पार्थसरवशः | ये यथामाम् प्रपद्यन्ते ताउंस्तथै वभजाम्यहं ममवर्त्मानु वरतन्ते मनुष्याः पार्थसरवशः | jeː jətʰaːmaːm pɾəpədjʌnteː taːʊnstətʰɛː ʋəbʰɟaːmjəhən məməʋrtmaːnʊ ʋəɾətʌnteː mənʊʂjaːh paːɾtʰəsəɾəʋəʃəh | Male | |
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः परंभावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमं | अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः परंभावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमं | ʌʋjʌktən ʋjəktɪmaːpʌnnən mənjʌnteː maːmbʊdʰːəjəh pəɾmbʰaːʋəmɟaːnʌntoː məmaːʋjəjəmnʊtːəmən | Male | |
रागद्वेशवि उक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् आत्मवश्यैरु विधेयात्माप्रसादमधिगच्छती। | रागद्वेशवि उक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् आत्मवश्यैरु विधेयात्माप्रसादमधिगच्छती। | ɾaːɡdʋeːʃʋɪ ʊktɛːstʊ ʋɪʂjaːnɪndɾɪjɛːʃcəɾən aːtməʋʃjɛːɾʊ ʋɪdʰeːjaːtmaːpɾəsaːdəmdʰɪɡəcʰcʰti | Male | |
प्रसादे सर्वदुखानाम्भानिरस्योपचायते प्रसन्नचेतसोईहाशुबुद्धिः पर्यवतिष्ठते | प्रसादे सर्वदुखानाम्भानिरस्योपचायते प्रसन्नचेतसोईहाशुबुद्धिः पर्यवतिष्ठते | pɾəsaːdeː sərʋədʊkʰaːnaːmbʰaːnɪɾsjoːpcaːjteː pɾəsənnəceːtsoːiːhaːʃʊbʊdʰːɪh pərjəʋtɪʂʈʰəteː | Male | |
एताम् विभूतिं योगंच ममयो वेत्ति तत्वतः सोविकंपेन योगेन युज्यते नात्रसंशयः | एताम् विभूतिं योगंच ममयो वेत्ति तत्वतः सोविकंपेन योगेन युज्यते नात्रसंशयः | eːtaːm ʋɪbʰuːtĩ joːɡʌɲc mʌmjoː ʋeːtːɪ tʌtʋətəh soːʋɪkmpeːn joːɡeːn jʊɟjəteː naːtɾəsənʃəjəh | Male | |
अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिम् विद्धिमे पराम् जीवभूताम् महाबाहो ययेदन्धार्यते जगत् | अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिम् विद्धिमे पराम् जीवभूताम् महाबाहो ययेदन्धार्यते जगत् | ʌpɾeːjmɪtəstʋənjaːm pɾʌkɾɪtɪm ʋɪdʰːɪmeː pəɾaːm ɟiːʋbʰuːtaːm məhaːbaːhoː jəjeːdndʰaːrjəteː ɟʌɡət | Male | |
सदित्यनभिसंधाय फलै यद्न्यतपः क्रियाह धानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांशिभिह। | सदित्यनभिसंधाय फलै यद्न्यतपः क्रियाह धानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांशिभिह। | sədɪtːjənbʰɪsndʰaːj pʰʌlɛː jʌdnjətəpəh kɾɪjaːh dʰaːnkɾɪjaːʃc ʋɪʋɪdʰaːh kɾɪjʌnteː moːkʃəkãʃɪbʰɪh | Male | |
नास्ति बुद्धिर युक्तस्य नचा युक्तस्य भावना नचा भावयतस्यान्तिरशान्तस्यकुतसुखम। | नास्ति बुद्धिर युक्तस्य नचा युक्तस्य भावना नचा भावयतस्यान्तिरशान्तस्यकुतसुखम। | naːstɪ bʊdʰːɪɾ jʊktʌsjə nʌcaː jʊktʌsjə bʰaːʋnaː nʌcaː bʰaːʋəjətsjaːntɪɾʃaːntəsjəkʊtsʊkʰəm | Male | |
शनै शनै रुपरमेद बुद्ध्या धृतिकुरुहीतया आत्मसाउन्स्थम् मनः कृत्वानकिन्चिधपिचिन्तयेत। | शनै शनै रुपरमेद बुद्ध्या धृतिकुरुहीतया आत्मसाउन्स्थम् मनः कृत्वानकिन्चिधपिचिन्तयेत। | ʃʌnɛː ʃʌnɛː ɾʊpəɾmeːd bʊdʰːjaː dʰɾɪtɪkʊɾʊhiːtjaː aːtməsaːʊnstʰəm mʌnəh kɾɪtʋaːnkɪncɪdʰpɪcɪntəjeːt | Male | |
तत्रैकस्थन्जगत्कृष्णं प्रविभक्तमनेकधा अपश्यद्देवदेवस्यशरीरेपान्डवस्तदा। | तत्रैकस्थन्जगत्कृष्णं प्रविभक्तमनेकधा अपश्यद्देवदेवस्यशरीरेपान्डवस्तदा। | tətɾɛːkəstʰənɟəɡtkɾɪʂɳən pɾəʋɪbʰəktəmneːkdʰaː ʌpəʃjədːeːʋdeːʋəsjəʃɾiɾeːpaːnɖəʋəstədaː | Male | |
एतद्योनी निभूतानि सरवाणी त्यूपधारय अहंकृत्सनस्य जगताः प्रभवाः प्रलयस्तथा। | एतद्योनी निभूतानि सरवाणी त्यूपधारय अहंकृत्सनस्य जगताः प्रभवाः प्रलयस्तथा। | eːtdjoːni nɪbʰuːtaːnɪ səɾʋaːɳi tːjuːpdʰaːɾɛj ɛhəŋkɾɪtsənʌsjə ɟəɡtaːh pɾəbʰʋaːh pɾələjʌstətʰaː | Male | |
सततं कीर्तयन्तो मायतन्तश्यत्रधव्रताह नमस्यन्तश्यमाम् भक्तियानित्ययुक्ताउपासते | सततं कीर्तयन्तो मायतन्तश्यत्रधव्रताह नमस्यन्तश्यमाम् भक्तियानित्ययुक्ताउपासते | sʌtətən kiːɾtəjntoː maːjətəntəʃjətɾədʰəʋɾətaːh nəməsjəntəʃjəmaːm bʰəktɪjaːnɪtːjəjʊktaːʊpaːsteː | Male | |
श्री भगवानु वाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परंदर्शितमात्मयोगात् तेजो मयं विश्वमनं तमाध्यं यन्मेत्वदन्येन नद्रूष्टपूर्वं | श्री भगवानु वाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परंदर्शितमात्मयोगात् तेजो मयं विश्वमनं तमाध्यं यन्मेत्वदन्येन नद्रूष्टपूर्वं | ʃɾi bʰəɡʋaːnʊ ʋaːc mʌjaː pɾəsnneːn təʋaːɾɟʊneːdən ɾuːpən pəɾəndərʃɪtmaːtməjoːɡaːt teːɟoː mʌjən ʋɪʃʋəmənən təmaːdʰjən jənmeːtʋədnjeːn nədɾuːʂʈəpuːrʋən | Male | |
मन्यसे यदितच्छक्यम् मयाद्रष्टुमिति प्रभो योगेश्वरततो मेत्वन्दर्शयात्मानमव्ययं। | मन्यसे यदितच्छक्यम् मयाद्रष्टुमिति प्रभो योगेश्वरततो मेत्वन्दर्शयात्मानमव्ययं। | mʌnjəseː jədɪtəcʰcʰʌkːjəm məjaːdɾəʂʈʊmɪtɪ pɾʌbʰoː joːɡeːʃʋəɾəttoː meːtʋəndərʃəjaːtmaːnəməʋjəjən | Male | |
यद्न्यदानतपखकरमनत्याज्यंकार्यमेवतत् यद्न्योदानन्तपश्चैवपावनानिमनीशिणाम् | यद्न्यदानतपखकरमनत्याज्यंकार्यमेवतत् यद्न्योदानन्तपश्चैवपावनानिमनीशिणाम् | jədnjədaːnətəpəkʰəkəɾəməntːjaːɟjəŋkaːrjəmeːʋətət jədnjoːdaːnəntəpʃcɛːʋpaːʋnaːnɪmniʃɪɳaːm | Male | |
साधि भूता धिदैवं माम् साधि अध्यन्च ये विदुहो प्रयाण काले पिचमान् ते विदुर्युक्त चेत सहा। | साधि भूता धिदैवं माम् साधि अध्यन्च ये विदुहो प्रयाण काले पिचमान् ते विदुर्युक्त चेत सहा। | saːdʰɪ bʰuːtaː dʰɪdɛːʋən maːm saːdʰɪ ʌdʰjʌnc jeː ʋɪdʊhoː pɾəjaːɳ kaːleː pɪcmaːn teː ʋɪdʊrjʊkt ceːt sʌhaː | Male | |
दूरेणय वरंकरम बुद्धियोगाधनन्चया बुद्धवशरणमनविच्छकुरुपणाः फलहेतवः | दूरेणय वरंकरम बुद्धियोगाधनन्चया बुद्धवशरणमनविच्छकुरुपणाः फलहेतवः | duːɾeːɳɛj ʋəɾʌŋkəɾəm bʊdʰːɪjoːɡaːdʰənʌncəjaː bʊdʰːəʋəʃəɾəɳəmənʋɪcʰcʰkʊɾʊpɳaːh pʰəlheːtəʋəh | Male | |
रजस्तमस्चा भिभूय सत्वं भवति भारत रजस्त्वन्तमस्चैवतमस्त्वं रजस्तथा | रजस्तमस्चा भिभूय सत्वं भवति भारत रजस्त्वन्तमस्चैवतमस्त्वं रजस्तथा | ɾəɟəstəmʌscaː bʰɪbʰuːj sʌtʋən bʰʌʋtɪ bʰaːɾət ɾəɟəstʋəntəmscɛːʋətəmʌstʋən ɾəɟʌstətʰaː | Male | |
अहंक्रतुरहैयत्न्यस्वधाहमहमव्षधं मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहंहुतं | अहंक्रतुरहैयत्न्यस्वधाहमहमव्षधं मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहंहुतं | ɛhəŋkɾətʊɾhɛːjətnjəsʋədʰaːhəməhəmʌʋʂədʰən məntɾoːhəməhəmeːʋaːɟjəməhəmɡnɪɾəhənhʊtən | Male | |
देवद्विच गुरु प्राध्य पूषणं शव्चमार्षवं ब्रह्मचर्यमहिम्साच शारीरंतप उच्यते। | देवद्विच गुरु प्राध्य पूषणं शव्चमार्षवं ब्रह्मचर्यमहिम्साच शारीरंतप उच्यते। | deːʋʌdʋɪc ɡʊɾʊ pɾaːdʰjə puːʂəɳən ʃəʋcəmaːrʂəʋən bɾəhməcərjəmhɪmsaːc ʃaːɾiɾʌntəp ʊcːjəteː | Male | |
मत्करमक्रुन्मत्परमो मत्भक्तसंगवरशितः निरवैरस्सरवभूतेशु यस्समामेतिपान्डव | मत्करमक्रुन्मत्परमो मत्भक्तसंगवरशितः निरवैरस्सरवभूतेशु यस्समामेतिपान्डव | mətkəɾəmkɾʊnmʌtpəɾmoː mətbʰəktəsʌŋɡəʋəɾʃɪtəh nɪɾʋɛːɾəssəɾəʋbʰuːteːʃʊ jəssəmaːmeːtɪpaːnɖəʋ | Male | |
आहारस्त्वपिसरवस्यत्रिविधोभवतिप्रियह यद्न्यस्तपस्तथादानन्तेशाम्भेतमिवाँश्रणो | आहारस्त्वपिसरवस्यत्रिविधोभवतिप्रियह यद्न्यस्तपस्तथादानन्तेशाम्भेतमिवाँश्रणो | aːhaːɾəstʋəpɪsəɾəʋəsjətɾɪʋɪdʰoːbʰəʋtɪpɾɪjəh jədnjəstəpəstətʰaːdaːnnteːʃaːmbʰeːtmɪʋãnʃɾəɳoː | Male | |
अव्यक्ता अधिव्यक्त यसरवा प्रभवन्त्यह रागमे रात्रियागमे प्रलीयंते तत्रैवा अव्यक्त समुध्न्यके | अव्यक्ता अधिव्यक्त यसरवा प्रभवन्त्यह रागमे रात्रियागमे प्रलीयंते तत्रैवा अव्यक्त समुध्न्यके | ʌʋjʌktaː ʌdʰɪʋjʌkt jʌsəɾʋaː pɾəbʰəʋʌntːjəh ɾaːɡmeː ɾaːtɾɪjaːɡmeː pɾəlijʌnteː tətɾɛːʋaː ʌʋjʌkt səmʊdʰnjəkeː | Male | |
सुरुन्मित्रार्युदासीन मध्यस्थद्वेश्यबन्धुषु साधुष्वपिचपापेशु समबुध्धिर्विशिष्यते। | सुरुन्मित्रार्युदासीन मध्यस्थद्वेश्यबन्धुषु साधुष्वपिचपापेशु समबुध्धिर्विशिष्यते। | sʊɾʊnmɪtɾaːrjʊdaːsin mədʰjəstʰədʋeːʃjəbndʰʊʂʊ saːdʰʊʂʋəpɪcpaːpeːʃʊ səmbʊdʰdʰɪrʋɪʃɪʂjəteː | Male | |
काये नमनसा बुद्ध्या केवलै रिन्द्रियै रपी योगिनः करमकुरोवन्ती संगन्त्यक्तमात्मशुद्धये। | काये नमनसा बुद्ध्या केवलै रिन्द्रियै रपी योगिनः करमकुरोवन्ती संगन्त्यक्तमात्मशुद्धये। | kaːjeː nʌmənsaː bʊdʰːjaː keːʋlɛː ɾɪndɾɪjɛː ɾʌpi joːɡɪnəh kəɾəmkʊɾoːʋʌnti səŋɡəntːjəktəmaːtməʃʊdʰːjeː | Male | |
अरजुन उवाच योयन्योगस्त्वयाप्रोक्तसाम्येनमधुसूदन एतस्याहन्नपश्यामीचंचलत्वाच्सितिम्स्थिराम् | अरजुन उवाच योयन्योगस्त्वयाप्रोक्तसाम्येनमधुसूदन एतस्याहन्नपश्यामीचंचलत्वाच्सितिम्स्थिराम् | ʌɾɟʊn ʊʋaːc joːjnjoːɡəstʋəjaːpɾoːktəsaːmjeːnəmdʰʊsuːdən eːtsjaːhənnəpʃjaːmicəɲcəltʋaːcsɪtɪmstʰɪɾaːm | Male | |
श्वशुरान् सुर्धश्चैवसेनयो रुभयो रपी तान् समीक्षसकाऊन्तेयसरवान् बन्धूनवस्थितान् | श्वशुरान् सुर्धश्चैवसेनयो रुभयो रपी तान् समीक्षसकाऊन्तेयसरवान् बन्धूनवस्थितान् | ʃʋəʃʊɾaːn sʊɾdʰəʃcɛːʋseːnjoː ɾʊbʰjoː ɾʌpi taːn səmiːkʃəskaːunteːjəsəɾʋaːn bəndʰuːnəʋstʰɪtaːn | Male | |
इहै वतैर्जितसरगो येशामसाम्येस्थितम्बनः निर्दोषं हिसमं ब्रह्मतस्मात् ब्रह्मणितेस्थिताः | इहै वतैर्जितसरगो येशामसाम्येस्थितम्बनः निर्दोषं हिसमं ब्रह्मतस्मात् ब्रह्मणितेस्थिताः | ɪhɛː ʋətɛːɾɟɪtəsəɾɡoː jeːʃaːmsaːmjeːstʰɪtəmbənəh nɪɾdoːʂən hɪsəmən bɾəhmətsmaːt bɾəhməɳɪteːstʰɪtaːh | Male | |
यतो यतो निष्चरती मनश्चन्चलमस्थिरं ततस्ततो नियम्यै तदात्मन्ये ववशन्नये | यतो यतो निष्चरती मनश्चन्चलमस्थिरं ततस्ततो नियम्यै तदात्मन्ये ववशन्नये | jʌtoː jʌtoː nɪʂcəɾti mənəʃcəncələmʌstʰɪɾən tətʌstətoː nɪjʌmjɛː tədaːtmənjeː ʋəʋəʃʌnnəjeː | Male | |
सरवकरमाणि मनसासन्यस्यास्ते सुखंवशी नवद्वारे पुरेदेही नईवकुरुवन्नकारयन। | सरवकरमाणि मनसासन्यस्यास्ते सुखंवशी नवद्वारे पुरेदेही नईवकुरुवन्नकारयन। | səɾəʋəkəɾmaːɳɪ mənsaːsənjəsjaːsteː sʊkʰʌnʋəʃi nəʋdʋaːɾeː pʊɾeːdeːhi nəiʋkʊɾʊʋənnəkaːɾəjən | Male | |
दैवी संपद्वि मोक्षाय निबन्धाया सुरीमता माशुचस् संपदन् दैवी मभिजातो सिपान्डव। | दैवी संपद्वि मोक्षाय निबन्धाया सुरीमता माशुचस् संपदन् दैवी मभिजातो सिपान्डव। | dɛːʋi səmpʌdʋɪ moːkʃaːj nɪbndʰaːjaː sʊɾiːmtaː maːʃʊcəs sʌmpədən dɛːʋi məbʰɪɟaːtoː sɪpaːnɖəʋ | Male | |
करमण्य करम यः पश्येद करमणीच करम यः सबुद्धिमान मनुष्येशु सयुक्ता कृत्सन करमकृत। | करमण्य करम यः पश्येद करमणीच करम यः सबुद्धिमान मनुष्येशु सयुक्ता कृत्सन करमकृत। | kəɾəmʌɳjə kʌɾəm jʌh pəʃjeːd kəɾəmɳiːc kʌɾəm jʌh səbʊdʰːɪmaːn mənʊʂjeːʃʊ səjʊktaː kɾɪtsən kəɾəmʌkɾɪt | Male | |
ये चैवसात्विकाभावाराजसास्तामसाष्चये मत्तएवेतितान्विद्धीनत्वहन्तेशुतेमये। | ये चैवसात्विकाभावाराजसास्तामसाष्चये मत्तएवेतितान्विद्धीनत्वहन्तेशुतेमये। | jeː cɛːʋsaːtʋɪkaːbʰaːʋaːɾaːɟsaːstaːmsaːʂcəjeː mətːeːʋeːtɪtaːnʋɪdʰːiːnətʋəhənteːʃʊteːmjeː | Male | |
वेदेशुयद्नेशुतपस्सुचैव दानेशुयत्पुण्यफलं प्रदिष्टं अत्येतितत्सरवमिदं विदित्वा योगी परंस्थानमुपैतिचाध्यं। | वेदेशुयद्नेशुतपस्सुचैव दानेशुयत्पुण्यफलं प्रदिष्टं अत्येतितत्सरवमिदं विदित्वा योगी परंस्थानमुपैतिचाध्यं। | ʋeːdeːʃʊjdneːʃʊtəpssʊcɛːʋ daːneːʃʊjtpʊɳjəpʰələn pɾədɪʂʈən ʌtːjeːtɪtʌtsəɾəʋmɪdən ʋɪdɪtʋaː joːɡi pəɾnstʰaːnmʊpɛːtɪcaːdʰjən | Male | |
यो यो याँ याँ तनुम्भक्त श्रद्धयार्चितुमिच्छती तस्यतस्याचलाँ श्रद्धान्तामेववितधाम्यहं। | यो यो याँ याँ तनुम्भक्त श्रद्धयार्चितुमिच्छती तस्यतस्याचलाँ श्रद्धान्तामेववितधाम्यहं। | joː joː jã jã tənʊmbʰʌkt ʃɾədʰːjaːɾcɪtʊmɪcʰcʰti təsjətsjaːclã ʃɾədʰːaːntaːmeːʋʋɪtdʰaːmjəhən | Male | |
नतद्भासयते सूर्यो नशशांको नपावकः यद्गत्वाननिवरतंते तद्धामपरमम्मम। | नतद्भासयते सूर्यो नशशांको नपावकः यद्गत्वाननिवरतंते तद्धामपरमम्मम। | nətdbʰaːsəjteː suːrjoː nəʃʃãkoː nəpaːʋəkəh jədɡətʋaːnnɪʋəɾətʌnteː tədʰːaːməpəɾəmʌmməm | Male | |
भोगैश्वर्यप्रसक्तानान्तयापर्तचेतसाम् व्यवसायात्मिकाबुद्धिस्समाधवुनविधियते। | भोगैश्वर्यप्रसक्तानान्तयापर्तचेतसाम् व्यवसायात्मिकाबुद्धिस्समाधवुनविधियते। | bʰoːɡɛːʃʋərjəpɾəsktaːnaːntəjaːpəɾtəceːtsaːm ʋjəʋsaːjaːtmɪkaːbʊdʰːɪssəmaːdʰʋʊnʋɪdʰɪjteː | Male | |
करमणो यपि बोधव्यं बोधव्यं चवि करमणाहा अकरमणश्च बोधव्यं गहना करमणो गतिही। | करमणो यपि बोधव्यं बोधव्यं चवि करमणाहा अकरमणश्च बोधव्यं गहना करमणो गतिही। | kʌɾəmɳoː jʌpɪ boːdʰʌʋjən boːdʰʌʋjən cʌʋɪ kəɾəmɳaːhaː ʌkəɾəməɳʌʃc boːdʰʌʋjən ɡʌhənaː kʌɾəmɳoː ɡʌtɪhi | Male | |
अहोबतमहत्पापंकरतुम् व्यवसितावयं यद्राज्यसुखलोभेनाहन्तुम् स्वजनमुद्यताः | अहोबतमहत्पापंकरतुम् व्यवसितावयं यद्राज्यसुखलोभेनाहन्तुम् स्वजनमुद्यताः | ɛhoːbətəməhətpaːpʌŋkəɾtʊm ʋjəʋsɪtaːʋəjən jədɾaːɟjəsʊkʰloːbʰeːnaːhəntʊm sʋəɟənmʊdjətaːh | Male | |
तर्वमे तदुर्तम्मन्ये यन्माम् वदसिकेशव नहिते भगवन् व्यक्तिम् विदुर्धेवानदानवाहा | तर्वमे तदुर्तम्मन्ये यन्माम् वदसिकेशव नहिते भगवन् व्यक्तिम् विदुर्धेवानदानवाहा | tʌrʋəmeː tədʊɾtəmmʌnjeː jənmaːm ʋədsɪkeːʃəʋ nʌhɪteː bʰʌɡəʋən ʋjʌktɪm ʋɪdʊɾdʰeːʋaːndaːnʋaːhaː | Male | |
अनेकबाहु दरवक्त्रनेत्रं पश्यामित्वाम् सरवतोनन्तरूपं नान्तन्नमध्यन्नपुनस्तवादिम् पश्यामिविश्वेश्वरविश्वरूपं | अनेकबाहु दरवक्त्रनेत्रं पश्यामित्वाम् सरवतोनन्तरूपं नान्तन्नमध्यन्नपुनस्तवादिम् पश्यामिविश्वेश्वरविश्वरूपं | ʌneːkbaːhʊ dəɾəʋəktɾəneːtɾən pəʃjaːmɪtʋaːm səɾəʋtoːnəntəɾuːpən naːntənnəmədʰjənnəpʊnəstəʋaːdɪm pəʃjaːmɪʋɪʃʋeːʃʋəɾʋɪʃʋəɾuːpən | Male | |
देहिनोस्मिन्यथादेहेकव्मारैयवनन्जरातथादेहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्रनमुयते। | देहिनोस्मिन्यथादेहेकव्मारैयवनन्जरातथादेहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्रनमुयते। | deːhɪnoːsmɪnjətʰaːdeːheːkʋmaːɾɛːjəʋənənɟəɾaːttʰaːdeːhaːntəɾpɾaːptɪɾdʰiːɾəstətɾənmʊjteː | Male | |
संजय उवाच इत्यहंवा सुदेवस्य पार्थस्यच महात्मनः संवादमि ममश्रौष मद्धुतं रोमहर्षणम् | संजय उवाच इत्यहंवा सुदेवस्य पार्थस्यच महात्मनः संवादमि ममश्रौष मद्धुतं रोमहर्षणम् | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc ɪtːjəhʌnʋaː sʊdeːʋʌsjə paːɾtʰəsjəc məhaːtmənəh sənʋaːdmɪ məmʃɾɔːʂ mʌdʰːʊtən ɾoːməhʌrʂəɳəm | Male | |
निरमानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्याविनिवृत्तकामाहा द्वन्द्वैर् विमुक्तासुखदुखसंद्न्यैर् गच्छन्त्यमूढः पदमव्यन्तत् | निरमानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्याविनिवृत्तकामाहा द्वन्द्वैर् विमुक्तासुखदुखसंद्न्यैर् गच्छन्त्यमूढः पदमव्यन्तत् | nɪɾmaːnmoːhaː ɟɪtəsəŋɡədoːʂaː ʌdʰjaːtmənɪtːjaːʋɪnɪʋɾɪtːkaːmaːhaː dʋəndʋɛːɾ ʋɪmʊktaːsʊkʰdʊkʰəsndnjɛːɾ ɡəcʰcʰəntːjəmuːɖʰəh pədəməʋjʌntət | Male | |
सरवधरमान परित्यज्यमामे कंशरणं ब्रच अहन्तवा सरवपापे भ्यो मोक्ष यिश्यामि माशु चाहा। | सरवधरमान परित्यज्यमामे कंशरणं ब्रच अहन्तवा सरवपापे भ्यो मोक्ष यिश्यामि माशु चाहा। | səɾəʋədʰəɾmaːn pəɾɪtːjəɟjəmaːmeː kʌnʃəɾəɳən bɾʌc ɛhʌntəʋaː səɾəʋpaːpeː bʰjoː moːkʃ jɪʃjaːmɪ maːʃʊ caːhaː | Male | |
तस्मादो मित्युदार्हत्य यद्न्यदानतपख्रियाह प्रवरतंते विधानोक्तास सततं ब्रह्मवादिनाम। | तस्मादो मित्युदार्हत्य यद्न्यदानतपख्रियाह प्रवरतंते विधानोक्तास सततं ब्रह्मवादिनाम। | təsmaːdoː mɪtːjʊdaːrhətːjə jədnjədaːnətəpkʰɾɪjaːh pɾəʋəɾətʌnteː ʋɪdʰaːnoːktaːs sʌtətən bɾəhməʋaːdɪnaːm | Male | |
श्री भगवानु वाच परंभूय प्रवक्षामि द्ञानानान द्ञानमुत्तमं यज्ञातवामुनयसरवे परामसिद्धिमितोगताह। | श्री भगवानु वाच परंभूय प्रवक्षामि द्ञानानान द्ञानमुत्तमं यज्ञातवामुनयसरवे परामसिद्धिमितोगताह। | ʃɾi bʰəɡʋaːnʊ ʋaːc pəɾmbʰuːj pɾəʋkʃaːmɪ dɲaːnaːnaːn dɲaːnmʊtːəmən jəɡjaːtʋaːmʊnəjəsəɾʋeː pəɾaːmsɪdʰːɪmɪtoːɡtaːh | Male | |
दैवी शेषा गुणमै ममाया दुरत्यया मामे वये प्रपद्यन्ते माया मे तान्तरन्तिते। | दैवी शेषा गुणमै ममाया दुरत्यया मामे वये प्रपद्यन्ते माया मे तान्तरन्तिते। | dɛːʋi ʃeːʂaː ɡʊɳmɛː məmaːjaː dʊɾʌtːjəjaː maːmeː ʋʌjeː pɾəpədjʌnteː maːjaː meː taːntəɾntɪteː | Male | |
यस्त्विन्द्रियाणि मनसानियम्यारभतेर्जुना करमेंद्रियेः करमयोगमसक्तस्विशिष्यते। | यस्त्विन्द्रियाणि मनसानियम्यारभतेर्जुना करमेंद्रियेः करमयोगमसक्तस्विशिष्यते। | jəstʋɪndɾɪjaːɳɪ mənsaːnɪjmjaːɾəbʰteːɾɟʊnaː kəɾmẽːdɾɪjeːh kəɾəmjoːɡəməsəktəsʋɪʃɪʂjəteː | Male |
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