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hin_Deva | san_Deva | यास्क के निरुक्त में बारह निरुक्त कर्ताओं के नाम और उनके मत का निर्देश है। | यास्कस्य निरुक्ते द्वादशानां निरुक्तकर्तृणां नामानि मतानि च निर्दिष्टानि सन्ति। |
san_Deva | hin_Deva | वेदान्ततत्त्वस्य श्रवण-मनन-निदिध्यासनेन एव तत्त्वज्ञानं जायते। | वेदान्ततत्व के श्रवण मनन तथा निदिध्यासन के द्वारा ही तत्वज्ञान उत्पन्न होता है। |
hin_Deva | kan_Knda | इस सूत्र से “तत्पुरुष'' इस सूत्र से पहले तक जो सूत्र हैं उनसे विहित समास अव्ययीभावसंज्ञक होता है। | ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ "ತತ್ಪುರುಷ" ಈ ಸೂತ್ರಕ್ಕೆ ಮುಂಚೆ ಯಾವ ಸೂತ್ರವಿದೆಯೋ ಅವುಗಳಿಂದ ವಿಹಿತ ಸಮಾಸವು ಅವ್ಯಯೀಭಾವಸಂಜ್ಞಕವಾಗುತ್ತದೆ. |
san_Deva | hin_Deva | आरुः इत्यत्र आकारस्य 'उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः' इत्यनेन अनुदात्तस्वरः। | आरुः यहाँ पर आकार का ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः' इससे अनुदात्त स्वर है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಜೀವವೇ ಪಾಪಪುಣ್ಯಗಳನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತದೆ ಅದರ ಫಲವನ್ನೂ ಅನುಭವಿಸುತ್ತದೆ. | जीव ही पाप पुण्य आदि को उपार्जित करता है तथा उनके फलों को भोगता है। |
hin_Deva | san_Deva | विभाषा छन्दसि इस सूत्र में विभाषा इस पद का ग्रहण कैसे किया है? | विभाषा छन्दसि इति सूत्रे विभाषा इति पदग्रहणं कथम् ? |
san_Deva | kan_Knda | अयञ्च मोक्षः बद्धस्य जीवस्य स्वस्वरूपाज्ञाननाशाद् भवति। | ಈ ಮೋಕ್ಷವು ಬದ್ಧ ಜೀವದ ಸನ್ನ ಸ್ವರೂಪದ ಅಜ್ಞಾನ ನಾಶದಿಂದ ಆಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | समानाधिकरण तत्पुरुष का “तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः इससे कर्म संज्ञा प्रस्तुत को गई है। | समानाधिकरणस्य तत्पुरुषस्य " तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः " इत्यनेन कर्मधारयसंज्ञा प्रस्तुता। |
kan_Knda | san_Deva | ದೂರಂಗಮಂ ಜ್ಯೋತಿಷಾಮ್ ಏಕ ಜ್ಯೋತಿಃ ಮೇ ತತ್ ಮನಃ ಶಿವಸಂಕಲ್ಪಮಸ್ತು । | दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकःज्योतिः मे तत् मनः शिवसङ्कल्पमस्तु। |
hin_Deva | san_Deva | उसी वार्तिक का ही सज्जीकरण से पूर्व उक्त वार्तिक आया है। | तस्यैव वार्तिकस्य सज्जीकरणेन पूर्वोक्तं वार्तिकरूपम् आगतम् । |
san_Deva | kan_Knda | न वशे वर्तन्ते । | ಅವರ ವಶದಲ್ಲಿ ಇರುವುದಿಲ್ಲ. |
hin_Deva | kan_Knda | प्रवामि - प्रपूर्वक वा-धातु से लट उत्तमपुरुष एकवचन में प्रवामि यह रूप बना है। | ಪ್ರವಾಮಿ - ಪ್ರ ಪೂರ್ವಕ ವಾ ಧಾತುವಿನಿಂದ ಲಟ್ ಉತ್ತಮಪುರುಷ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ಪ್ರವಾಮಿ ಈ ರೂಪವು ಆಗುತ್ತದೆ. |
san_Deva | hin_Deva | अग्निष्टोमयागविषये संक्षेपेण आलोचयत। | अग्निष्टोम याग के विषय में संक्षेप से आलोचना करो? |
san_Deva | hin_Deva | तस्मात् एतान् सर्वान् विषयान् विचार्य एव केनचित् शब्दानाम् तात्पर्यम् अवगन्तव्यम् इति। | इसलिए इन सभी विषयों का विचार करके ही किन्हीं शब्दों के तात्पर्य को समझना चाहिए। |
hin_Deva | kan_Knda | अप्रातिलोम्ये इसका अनुकूलता गम्यमान हो यह अर्थ है। | ಅಪ್ರಾತಿಲೋಮ್ಯೆ ಇದರ ಅಭಿಮತವಾಗಿಸುವ ಎಂದರ್ಥ. |
kan_Knda | san_Deva | ಇಲ್ಲಿ ತೃಜಕಾಭ್ಯಾಮ್ ಎಂಬ ತೃತೀಯಾ ದ್ವಿವಚನಾಂತ ಪದ, ಕರ್ತರಿ ಎಂಬ ಸಪ್ತಮೀ ಏಕವಚನಾಂತ ಪದವು ಇದೆ. | अत्र तृजकाभ्यामिति तृतीयाद्विवचनान्तं कर्तरि इति सप्तम्येकवचनान्तं पदम्। |
hin_Deva | san_Deva | भले ही सभी कर्मों का त्याग ही मोक्ष होता है फिर भी चित्त शुद्धि के लिए तथा प्रतिबन्धक निवृत्ति के लिए नित्यादि कर्म करने चाहिए। | यद्यपि सर्वकर्मत्यागेनैव मोक्षः भवति तथापि चित्तशुद्धये प्रतिबन्धकनिवृत्तये च नित्यादिकर्माणि कर्तव्यानि। |
hin_Deva | san_Deva | आत्मीय देहादिसंघात में अहं प्रत्यय गौंण होता है। | आत्मीये देहादिसङ्काते अहंप्रत्ययः गौणः । |
hin_Deva | kan_Knda | अजाद्यतः यह पञ्चम्येकवचनान्त पद है। | ಅಜಾದ್ಯತಃ ಇದು ಪಂಚಮೀ ಏಕವಚನಾಂತ ಪದವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಪ್ರಿಯಂ ಶ್ರದ್ದೆ ದದತಃ... ಇತ್ಯಾದಿ ಮಂತ್ರಗಳನ್ನು ಪೂರ್ಣಗೊಳಿಸಿ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನವನ್ನು ಬರೆಯಿರಿ. | प्रियं श्रद्धे ददतः... इत्यादिमन्त्रं पूरयित्वा व्याख्यात। |
hin_Deva | san_Deva | पहला गद्यात्मक है और दूसण पद्यात्मक है। | प्रथमो गद्यात्मकः द्वितीयः पद्यात्मकः चेति। |
hin_Deva | kan_Knda | सूत्र की व्याख्या - पाणिनि के छ: प्रकार के सूत्रों में यह विधि सूत्र है। | ಸೂತ್ರದ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನ - ಪಾಣಿನೀಯ ಆರು ಪ್ರಕಾರವಾದ ಸೂತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಇದು ವಿಧಿ ಸೂತ್ರವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಅದೇ ರೀತಿಯಾಗಿ ಇಂದ್ರಬೃಹಸ್ಪತಿ ಇಲ್ಲಿಯೂ ಕೂಡ ಆಗುತ್ತದೆ. | एवं इन्द्रावृहस्पती इत्यपि। |
san_Deva | hin_Deva | "उपसर्जनं पूर्वम्" इत्यनेन च तस्य पूर्वनिपातः भवति। | “उपसर्जनं पूर्वम्” इससे उसका पूर्व निपात होता है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಹೇಗೆ ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಹತ್ತು ಜನರು ನದಿಯಲ್ಲಿ ಈಜುತ್ತಾ ಗ್ರಾಮಾಂತರವನ್ನು ತಲುಪಿದ ನಂತರ ನಾವು ಹತ್ತು ಜನರೇ ಇದ್ದೇವೆಯೋ ಅಥವಾ ಇಲ್ಲವೋ ಎಂದು ಸ್ವಯಂ ತನ್ನನು ತ್ಯಜಿಸಿ ಇತರರನ್ನು ಗಣನೆ ಮಾಡುತ್ತಾನೆಯೋ ಹಾಗೆಯೇ. | जैस लोक में दश लोग नदी को तैरकर पार करके ग्रामान्तर को प्राप्त करके हमलोग दस लोग हैं अथवा नहीं इस प्रकार से स्वयं को छोडकर गणना करते है और उस दसवें को ढूँढ॒ते हैं। |
hin_Deva | san_Deva | पुरोहित गणों के द्वारा चालित दो बैलों के द्वारा वाहित दो शकटों से सोम यज्ञ स्थल पर लाया जाता है। | पुरोहितगणैः चालिताभ्यां बलीवर्दद्वयेन वाहिताभ्यां द्वाभ्यां शकटाभ्यां सोमः यज्ञस्थले नीयते। |
kan_Knda | san_Deva | ಈ ಕಾರಣದಿಂದಾಗಿಯೇ ಅಕ್ಷೈರ್ಮಾ ದೀವ್ಯಃ ಈ ಉದಾಹರಣೆಯಲ್ಲಿ ಅಕ್ಷ ಶಬ್ದದ ಆದಿಯಲ್ಲಿರುವ ಅಕಾರದ ಉದಾತ್ತವಿರುವುದಿಲ್ಲ . | अस्मात् एव कारणात् अक्षैर्मा दीव्यः इत्युदाहरणे अक्षशब्दस्य आदेः स्वरस्य अकारस्य उदात्तत्वं नास्ति। |
kan_Knda | hin_Deva | ಇಲ್ಲಿ ಉಪಮಾಲಂಕಾರವಿದೆ ಮತ್ತು ಲುಪ್ತೋಪಮಾಲಂಕಾರವಿದೆ ಎಂದರ್ಥ. | यह इसका भावहे यहाँ उपमावाचक और लुप्तोपमालङ्कार। |
san_Deva | hin_Deva | मनुष्या मोहात् प्रमादं कुर्वन्ति। | मनुष्य मोह से प्रमाद करता है। |
hin_Deva | san_Deva | मनन के द्वारा शास्त्र के द्वारा निर्धारित अर्थ में दृढ मति होती है। | मननेन शास्त्रावधारिते अर्थे दृढा मतिर्भवति। |
san_Deva | hin_Deva | यः ध्यानयोगम् आरोढुम् इच्छति स आरुरुक्षुः। | तो ध्यान योग में आरूढ होने की इच्छा करता है वह आरुरुक्षु कहलाता है। |
san_Deva | kan_Knda | मूर्धनि इत्यस्य कोऽऽर्थः। | ಮೂರ್ಧನಿ ಇದರ ಅರ್ಥವೇನು? |
kan_Knda | hin_Deva | ಇಂತಹ ಸಮ್ಬಂಧದ ಜ್ಞಾನವು ಆದರೆ ವಿಷವನ್ನು ಜಿಜ್ಞಾಸು ಅದರ ಬೋಕದಲ್ಲಿ ಶಾಸ್ತ್ರದಲ್ಲಿ ಇರುತ್ತಾನೆ. | इस प्रकार से ही सम्बन्ध का ज्ञान होता है तो विषय जिज्ञासु के तथा उसके बोधक शास्त्र में प्रवर्तित होता है। |
hin_Deva | san_Deva | सम्बन्ध यहाँ पर दो प्रकार का है। | सम्बन्धः द्विष्ठो भवति। |
hin_Deva | san_Deva | अब कहते हैं की निदिध्यासन तथा समाधि में जो अभेद होता हैं तो इन दोनों का उपदेश विद्यारण्य स्वामी के द्वारा तथा शङ्कराचार्य के द्वारा एक ही साथ क्यों नहीं दिया गया है। | ननु निदिध्यासनसमाध्योः यदि अभेदः तर्हि कथं तयोः निदिध्यासनपदेनैव उपदेशः विद्यारण्यैः शङ्कराचार्यैः वा न विधीयते । |
kan_Knda | san_Deva | ನಞ್ ಎಂಬ ಸೂತ್ರದ ಅರ್ಥವೇನು? | " नञ् " इति सूत्रस्यार्थः कः ? |
kan_Knda | hin_Deva | ಹೀಗಾದ್ದರಿಂದ ಹೇಗೆ ಮುಂಚೆ ಅನುದಾತ್ತಸ್ವರ ಇತ್ತೋ ಹಾಗೇ ಉಳಿಯುತ್ತದೆ. | उससे जैसे पहले अनुदात्त स्वर था वैसे ही रहेगा। |
hin_Deva | kan_Knda | यहाँ यास्क और कात्यायन के मत में समन्वय प्रदर्शित किया है। | ಇಲ್ಲಿ ಯಾಸ್ಕ ಮತ್ತು ಕಾತ್ಯಾಯನರ ಮತಗಳ ಸಮನ್ವಯವನ್ನು ಪ್ರದರ್ಶಿಸಲಾಗುವುದು. |
hin_Deva | kan_Knda | अतिष्ठन्तीनाम् - स्थाधातु से शतृप्रत्यय करने पर ङीप् होकर तिष्ठन्ति यह रूप बनता है। | ಅತಿಷ್ಠಂತೀನಾಮ್ - ಸ್ಥಾ ಧಾತುವಿನಿಂದ ಶತೃ ಪ್ರತ್ಯಯವಾದಾಗ ಜ್ಞೀಪ್ ಆದಾಗ ತಿಷ್ಠಂತಿ ಈ ರೂಪವು ಆಗುತ್ತದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | तस्य द्वितीयैकवचने उर्वीम् इति रूपम्। | ಅದರ ದ್ವಿತೀಯಾ ವಿಭಕ್ತಿ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ಉರ್ವಿಮ್ ಎಂದು ರೂಪ. |
san_Deva | kan_Knda | व्याख्या- हे मित्रराजाना मित्रभूताः स्तोतारो राजानः स्वामिन ईश्वरा भवन्ति ययोरुपासनावशात् तौ मित्रराजानौ। | ವಿವರಣೆ - ಹೇ ಮಿತ್ರಾವರುಣರೇ ಮಿತ್ರಭೂತರು ಸ್ತೋತೃಗಳು ಸ್ವಾಮಿಗಳಾಗುತ್ತಾರೆ ಉಪಾಸನೆಯಿಂದ, ಅಂತಹವರು ಮಿತ್ರಾವರುಣರು |
kan_Knda | san_Deva | ಅಸಂಭಾವನೆಯ ನಿವೃತ್ತಿಯ ಮತ್ತು ವಿಪರೀತಭಾವನೆಯ ನಿವೃತ್ತಿಯ ಪ್ರತಿಬಂಧಕವು ಆಗಿದೆ. | असम्भावनानिवृत्तेः विपरीतभावनानिवृत्तेश्च प्रतिबन्धको भवति। |
san_Deva | hin_Deva | सुप् आमन्त्रिते पराङ्गवत् स्वरे इति सूत्रगतपदच्छेदः। | सुप् आमन्त्रिते पराङ्गवत् स्वरे ये सूत्र में आये पदच्छेद है। |
kan_Knda | san_Deva | ಅಂದರೆ ಪುರುಷನನ್ನು ತಿಳಿದುಕೊಂಡು ಮೃತ್ಯುವನ್ನು ಪಾರುಮಾಡಬಹುದು. | अर्थात् पुरुषं विदित्वा एव मृत्युम् अतिक्रामति। |
hin_Deva | kan_Knda | “कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः” इस प्रकार से श्रुतियों में कहा है। | "ಕರ್ಮಣಾ ಪಿತೃಲೋಕಃ ವಿದ್ಯಯಾ ದೇವಲೋಕಃ" ಎಂದು ಶೃತಿ ಹೇಳುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಪಾಪದಿಂದ ರಕ್ಷಿಸುವವರಾದ, ವರುಣ ಮಿತ್ರವರುಣರೇ,ನೀವು ಯಾವ ಯಜಮಾನನನ್ನು ಯಾಗಭೂಮಿಯಲ್ಲಿ ಯಜ್ಞದ ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ಕೊನೆಯಲ್ಲಿ ರಕ್ಷಿಸುವಿರೋ, ಅವನಿಗೆ ದಾನವಾಗಿ ಅವನ ಪಾಪದಿಂದ ರಕ್ಷಿಸಿ. | परस्पा परस्तात् पातारौ रक्षितारौ हे वरुणा मित्रावरुणौ युवां यं यजमानम् इळासु यागभूमिषु अन्तः मध्ये त्रासाथे रक्षथः तस्मै सुकृते अक्रविहस्ता परस्पा च भवथ इति सम्बन्धः। |
kan_Knda | san_Deva | ಈ ಸೂತ್ರದಲ್ಲಿ ಎರಡು ಪದಗಳಿವೆ. | सूत्रेऽस्मिन् पदद्वयम् अस्ति । |
san_Deva | kan_Knda | आहिताग्निशब्दस्य अर्थो हि येन गार्हपत्याग्निः प्रतिष्ठितो वर्तते। | ಆಹಿತಾಗ್ನಿ ಶಬ್ದದ ಅರ್ಥವೆಂದರೆ ಯಾರಿಂದ ಗಾರ್ಹಪತ್ಯಾಗ್ನಿಯು ಪ್ರತಿಷ್ಠಾಪಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆಯೋ ಅವನು. |
kan_Knda | hin_Deva | ಶಿಕ್ಷಾಶಾಸ್ತ್ರದ ಕೆಲವು ಗ್ರಂಥಗಳನ್ನು ನಿರ್ದೇಶಿಸಿ. | शिक्षा शास्त्र के कुछ ग्रन्थों का निर्देश कीजिए। |
hin_Deva | kan_Knda | हम इस प्रकार काव्ययुग की कल्पना भी नहीं कर सकते जहाँ उपमा आदि अलङ्कारों का प्रयोग नहीं किया। | ಉಪಮಾ ಇತ್ಯಾದಿ ಅಲಂಕಾರಗಳನ್ನು ಬಳಸದ ಕಾವ್ಯ ಯುಗವನ್ನು ನಾವು ಕಲ್ಪಿಸಿಕೊಳ್ಳಲೂ ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಸೂತ್ರಾರ್ಥದ ಸಮನ್ವಯ - ಈ ಉದಾಹರಣೆಯಲ್ಲಿ ಪಚತಿ ಇದು ತಿಙಂತ ಪದವಾಗಿದೆ. | सूत्र अर्थ का समन्वय- इस उदाहरण में पचति यह तिङन्त पद है। |
kan_Knda | san_Deva | ವೇದದಲ್ಲಿ ಧಾತು ಉಪಸರ್ಗದ ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ವ್ಯವಧಾನದ ಸಂಬಂಧವಿದೆ. | वेदे धातूपसर्गयोः मध्ये व्यवधानं सम्भवति। |
san_Deva | kan_Knda | उदाहरणम्- आहो उताहो वा भुङ्क्ते इति सूत्रस्य अस्य एकमुदाहरणम्। | ಉದಾಹರಣೆ - ಆಹೋ ಉತಾಹೋ ವಾ ಭುಂಕ್ತೇ ಈ ಸೂತ್ರದ ಒಂದು ಉದಾಹರಣೆಯಾಗಿದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | इष्टियागस्य आलोचनायाम् उक्तं यदिदं कर्म इडाभक्षणम् इति प्रसिद्धम्। | ಇಷ್ಟಿಯಾಗದ ಆಲೋಚನೆಯ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ಈ ಕರ್ಮವನ್ನು ಈಡಾಭಕ್ಷಣ ಎಂದು ಪ್ರಸಿದ್ಧವಾದದ್ದನ್ನು ಹೇಳಿರುತ್ತಾರೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | कर्मकाण्ड में नित्यनैमित्तिककाम्य भेद से तीन प्रकार के कर्मवेद में कहे गए है। | ಕರ್ಮಕಾಂಡದಲ್ಲಿ ನಿತ್ಯನೈಮಿತ್ತಿಕಕಾಮ್ಯ ಭೇದಗಳಿಂದ ಮೂರು ಪ್ರಕಾರವಾದ ಕರ್ಮವೇದದಲ್ಲಿ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ವಿಶೇಷ್ಯದ ಸ್ವರೂಪ ವಿಷಯಕ ಸಂಸ್ಕಾರ ಸಹಕೃತ ಪದಗಳ ಶ್ರವಣದಿಂದ ವಿಶೇಷ್ಯಸ್ವರೂಪದ ಉಪಸ್ಥಿತಿಯು ಆಗುತ್ತದೆ. | विशेष्यस्य स्वरूपविषयकसंस्कारसहकृतपदानां श्रवणात् एव विशेष्यस्वरूपस्य उपस्थितिः भवति। |
kan_Knda | hin_Deva | ತದ್ಧಿತಾರ್ಥ ಇಲ್ಲಿ ವೈಷಯಿಕ ಅಧಿಕರಣದಲ್ಲಿ ಸಪ್ತಮೀ ವಿಭಕ್ತಿಯು ಆಗುತ್ತದೆ. | तद्वितार्थ में यहाँ वैषयिक अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಈ ಕ್ರಮದಿಂದ ಕ್ರಮವಾಗಿ ಉದಾತ್ತಸ್ವರವಾಗುತ್ತದೆ . | इससे क्रम से उदात्त स्वर का विधान है। |
hin_Deva | san_Deva | बहुत स्थानों पर तो विषय दृढत्व सम्पादित करने के लिए श्रुति तथा स्मृतियों के वचनों का भी उपस्थापन किया जाएगा। | बहुत्र विषयस्य दृढत्वसम्पादनाय श्रुतिस्मृतिवचनानि उपस्थापयिष्यन्ते। |
kan_Knda | hin_Deva | ಆ ಉಪಾಯವು - ಪತಿಯು ತನ್ನ ಬೆರಳಿನಿಂದ ಆಕಾಶವನ್ನು ತೋರಿಸಿ ಪತ್ನಿಗೆ ಹೇಳುತ್ತಾನೆ. ಮೇಲೆ ಅತ್ಯಂತ ಬೆಳಕಿನಿಂದ ದೊಡ್ಡದಾಗಿ ಕಾಣುವ ನಕ್ಷತ್ರ ಇದೆಯಲ್ಲ ಎಂದು. | वह उपाय यह है कि | ध्यान देंः भर्ता अपनी अङ्गुली को दिखाकर के भार्या से कहता हैं कि ऊपर अत्यन्त प्रकाशमान स्थूलरूप में दिखाई दे रहा है क्या वह आपको दिख रहा है, क्या? |
san_Deva | hin_Deva | मलनिवृत्त्यर्थं निष्कामकर्म भूतयादि च मलं निवर्तयेत्। | मल की निवृत्ति के लिए निष्कामकर्मभूत यज्ञादि के द्वारा मल का निवारण करना चाहिए। |
hin_Deva | kan_Knda | (तै.उ.2.1-4) विश्व का व्यष्टि स्थूल शरीर ही अन्नमय कोश होता है। | (ತೆ. ಉ.೩.೧-೪) ವಿಷ್ವಸ್ಯ ವ್ಯಷ್ಟಿಸ್ಥೂಲಶರೀರಂ ಅನ್ನಮಯಕೋಶೋ ಭವತಿ. |
kan_Knda | san_Deva | ಋಗ್ವೇದ ಆದಿ ಮೂರು ವೇದ ಅಲ್ಪ ಫಲವನ್ನು ಕೊಡುವುದಾಗಿರುತ್ತದೆ. | ऋग्वेदादित्रयो वेदाः आमुष्मिकफलदातारः सन्ति। |
san_Deva | kan_Knda | भोगकरणाय ओषधीनाम् उत्पन्नं करोतु, तथा लोकात् प्रशंसां प्राप्नोतु । | ಭೋಗವನ್ನು ಮಾಡಲು ಔಷಧಿಗಳ ಉತ್ಪನ್ನವನ್ನು ಮಾಡಿ ಮತ್ತು ಲೋಕದಿಂದ ಪ್ರಶಂಸೆಯನ್ನು ಪಡೆಸುಕೊಌ. |
kan_Knda | san_Deva | ಈ ಉಪನಿಷತ್ ಶಾಂಖಾಯನವು ಆರಣ್ಯಕದ ಅಂಶವೇ ಆಗಿದೆ. | एषा उपनिषत् शाङ्खायनारण्यकस्य एव अंशो वर्तते। |
kan_Knda | san_Deva | ಇತ್ತೀಚಿನ ದಿನಗಳಲ್ಲಿ ಋಗ್ವೇದದಲ್ಲಿ ಪ್ರಚಲಿತವಾಗಿರುವ ಸಂಹಿತೆ ಶಾಕಲ ಶಾಖೆಯಾಗಿದೆ. | सम्प्रति ऋग्वेदस्य प्रचलिता संहिता शाकलशाखीया एवाऽस्ति। |
san_Deva | kan_Knda | चतुर्थदिवसः- गोष्टोमः। | ನಾಲ್ಕನೇ ದಿನ - ಗೋಷ್ಟೋಮ. |
hin_Deva | kan_Knda | और वे क्रमशः इठिमिका, माध्यमिका, ओरमिका, याज्यानुवाक्या, अश्वमेधाद्यनुवचन नामों से विख्यात है। | ಅವುಗಳು ಇಟಿಮಿಕಾ, ಮಾಧ್ಯಮಿಕಾ, ಓರಮಿಕಾ, ಯಾಜ್ಯಾನುವಾಕ್ಯಾ-ಅಶ್ವಮೇಧ ಎಂದು. |
kan_Knda | san_Deva | ಸೂತ್ರದ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನ - ಇದು ವಿಧಿಸೂತ್ರವಾಗಿರುತ್ತದೆ . | सूत्रव्याख्या- विधिसूत्रमेतत्। |
san_Deva | kan_Knda | सूत्रार्थसमन्वयः- कमु कान्तौ इति धातोः "कमेर्णिङ् इत्यनेन स्वार्थ णिङ्प्रत्ययेऽनुबन्धलोपे अत उपधायाः' इत्यनेन कम्-धातोः ककारोत्तरस्य अकारस्य वृद्धौ आकारे निष्पन्नस्य कामि इत्यस्य सनाद्यन्ता धतवः' इत्यनेन धातुसंज्ञा सिध्यति। | ಸೂತ್ರಾರ್ಥದ ಸಮನ್ವಯ - ಕಮು ಕಾಂತೌ ಎಂಬ ಧಾತುವಿನಿಂದ "ಕಮೇರ್ಣಿಙ್" ಇದರಿಂದ ಸ್ವಾರ್ಥದಲ್ಲಿ ಣಿಙ್ ಪ್ರತ್ಯಯ ಮತ್ತು ಅನುಬಂಧ ಲೋಪವನ್ನು ಮಾಡಿದಾಗ ಅತ ಉಪಧಾಯಾಃ ಇದರಿಂದ ಕಮ್ ಧಾತುವಿನ ಕಕಾರೋತ್ತರದಲ್ಲಿರುವ ಅ ಕಾರದ ಸ್ಥಾನದಲ್ಲಿ ವೃದ್ಧಿ ಮಾಡಿದಾಗ ಆಕಾರದಲ್ಲಿ ನಿಷ್ಪನ್ನಗೊಂಡ ಕಾಮಿ ಇದರ ' ಸನಾದ್ಯಂತಾ ಧಾತವಃ ' ಇದರಿಂದ ಧಾತುಸಂಜ್ಞಾ ಸಿದ್ಧಿಸುತ್ತದೆ . |
san_Deva | kan_Knda | उदात्तयणः इति पञ्चम्यन्तं पदम्, हल्पूर्वात् इत्यपि पञ्चम्यन्तं पदम्। | ಉದಾತ್ತಯಣಃ ಮತ್ತು ಹಲ್ಪೂರ್ವಾತ್ ಇವು ಪಂಚಮ್ಯಂತ ಪದಗಳಾಗಿವೆ. |
hin_Deva | san_Deva | पादाभ्याम् से अपादानपञ्चम्यन्त का समास होता है। | पादाभ्यामिति अपादानपञ्चम्यन्तस्य समासः। |
kan_Knda | hin_Deva | ಈ ಸೂತ್ರದಲ್ಲಿ ಎರಡು ಪದಗಳಿವೆ. | यह द्विपदात्मक सूत्र हैं। |
san_Deva | kan_Knda | निरुक्तादिग्रन्थेषु 'इति विज्ञायते' इति कथयित्वा ब्राह्मणग्रन्थानाम् एव प्रमाणरूपेण निर्देशः कृतः। | ನಿರುಕ್ತಾದಿ ಗ್ರಂಥಗಳು ಈ ಪ್ರಕಾರವಾಗಿ ತಿಳಿದುಬರುತ್ತದೆ ಹೀಗೆ ಹೇಳಿ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ಗ್ರಂಥಗಳ ಪ್ರಮಾಣ ರೂಪದಿಂದ ನಿರ್ದೇಶವನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಾರೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಜ್ಞಾನದಿಂದ ಕೈವಲ್ಯವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ ಎಂಬುದು ಪುರಾಣಸ್ಮೃತಿಯು. ಆರಂಭವಾಗದ ಫಲಗಳ ಪುಣ್ಯಗಳ ಕರ್ಮಗಳ ಕ್ಷಯಾನುಪಪತ್ತಿಗಳು. | इस प्रकार से 'ज्ञानात्कैवल्यप्राप्तिः' इत्यादि पुराणवचनों कौ, अनारब्ध पुण्यों को कर्मों की क्षय अनुपपप्ति भी होती हेै। |
san_Deva | hin_Deva | किन्तु अष्टोत्तरशतसंख्याकाः उपनिषदः एव प्राप्ताः। | किन्तु एक सौ आठ संख्या तक ही उपनिषद् प्राप्त होते है। |
hin_Deva | san_Deva | सूत्र अर्थ का समन्वय- तिसृ शब्द की अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् इस सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा होने पर, उसके बाद डऱयाप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः परश्च इनके अधिकार में वर्तमान स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङ्सोसांङयोस्सुप् इस सूत्र से खल कपोत न्याय से इक्कीस स्वादि प्रत्ययों की प्राप्ति में प्रथमा बहुवचन की विवक्षा में जस् प्रत्यय करने पर जस् प्रत्यय के आदि जकार की चुटू इस सूत्र से इत् संज्ञा करने पर तस्य लोप: इस सूत्र से उस इत् संज्ञक जकार के लोप होने पर तिसृ अस् इस स्थित्ति में अचि र ऋत: इस सूत्र से अच् परक होने से तिसृ शब्द के ऋकार के स्थान में रेफ आदेश होने पर तिसृस् इस स्थित्ति में उस शब्द के सुबन्त होने से उस सकार के स्थान में ससजुषोः रुः इससे सकार के स्थान में रु आदेश होने पर और रु के उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् इससे इत् संज्ञा करने पर और लोप करने पर तिस्रर् इस स्थित्ति में रेफ उच्चारण से परे वर्ण अभाव होने पर विरामोऽवसानम् इस सूत्र से अवसान संज्ञा करने पर उसके परे होने पर पूर्व रेफ के स्थान में खरवसानयोर्विसर्जनीयः इस सूत्र से रेफ के स्थान में विसर्ग करने पर तिस्रः यह सुबन्त रूप सिद्ध होता है। | सूत्रार्थसमन्वयः- तिसृशब्दस्य अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् इति सूत्रेण प्रातिपदिकसंज्ञायां ततः झ्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः परश्च चेत्यधिकृत्य प्रवर्तमानेन स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्डेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङ्सोसांङ्योस्सुप् इति सूत्रेण खले कपोतन्यायेन एकविंशतिषु स्वादिप्रत्ययेषु प्राप्तेषु प्रथमाबहुवचनविवक्षायां जस्प्रत्यये जस्प्रत्ययादेः जकारस्य चुटू इति सूत्रेण इत्संज्ञायां तस्य लोपः इति सूत्रेण च तस्य इत्संज्ञकस्य जकारस्य लोपे तिसृ अस् इति स्थिते अचि र ऋतः इति सूत्रेण अच्परकत्वात् तिसृशब्दस्य ऋकास्य स्थाने रेफादेशे तिस्रस् इति स्थिते तस्य शब्दस्य सुबन्तत्वात् तदन्तस्य सकारस्य स्थाने ससजुषोः रुः इति आदेशे रोः उकारस्य उपदेशेऽजनुनासिक इत् इति इत्संज्ञायां लोपे च कृते तिस्रर् इति स्थिते रेफोच्चारणात् परस्य वर्णाभावस्य विरामोऽवसानम् इति सूत्रेण अवसानसंज्ञायां तत्परकत्वात् पूर्वस्य रेफस्य स्थाने खरवसानयोर्विसर्जनीयः इति सूत्रेण रेफस्य स्थाने विसर्गे तिस्रः इति सुबन्तं रूपं सिद्ध्यति। |
hin_Deva | san_Deva | सरलार्थ-पादरहित और हाथ रहित वृत्र ने इन्द्र के प्रति युद्ध के लिए इच्छा की। | सरलार्थः - पादरहितः हस्तरहितश्च वृत्रः इन्द्रं प्रति युद्धाय ऐच्छत्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಬೃಹದ್ದೇವತಾದಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ಪುರಾಣಗಳಲ್ಲಿ ಶಾಕಪೂಣಿ ರಥೀತರಶಾಕಪೂಣಿ ಎಂಬ ಹೆಸರಿನಿಂದ ಪ್ರಸಿದ್ಧವಾಗಿದೆ. | बृहद्देवता में तथा पुराणों में शाकपूर्णी रथीतर शाकपूर्णि-नाम से जाने जाते हैं। |
hin_Deva | san_Deva | इस प्रकार इसको अनेक प्रकार से प्रशंसा करते हुए इस सूक्त का अत्यधिक रूप से प्रचार वैदिकवाङ्मय में विशेष रूप से किया गया है। | एवं बहु प्रस्थानप्रशस्तं प्रचुरप्रचारं सूक्तमिदं वैदिकवाङ्गये वैशिष्ट्येन विशिष्यते। |
hin_Deva | kan_Knda | प्रायश्चित्त विषय पर अथर्ववेद में जो कहा है उसे विस्तार से लिखिए। | ಪ್ರಾಯಶ್ಚಿತ ವಿಷಯದ ಮೇಲೆ ಅಥರ್ವವೇದದಲ್ಲಿ ಯಾವುದು ಹೇಳಿದೆಯೋ ಅದನ್ನು ವಿಸ್ತಾರವಾಗಿ ಬರೆಯಿರಿ. |
kan_Knda | hin_Deva | ೧೨. ಕಾಮ್ಯದ ಯಾವ ರೀತಿಯ ಆಚರಣೆಯಿಂದ ಚಿತ್ತಶುದ್ಧಿಕರವಾಗುತ್ತದೆ. | 12. काम्य की किस प्रकार के आचरण से चित्त की शुद्धि होती है? |
kan_Knda | san_Deva | 'ವೃಷಾದೀನಾಮ್' ಎಂದು ಷಷ್ಠೀ ಬಹುವಚನಾಂತಪದವು, 'ಚ' ಎಂದು ಅವ್ಯಯಪದವಾಗಿದೆ. | वृषादीनाम् इति षष्ठीबहुवचनान्तं, च इत्यव्ययपदम्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಪ್ರಥಮವಾಗಿ ಅನ್ನಮಯಕೋಶವಾಗುತ್ತದೆ, ಮತ್ತು ಅದರ ನಂತರ ಪ್ರಾಣಮಯಕೋಶವಾಗುತ್ತದೆ, ತದನಂತರ ಮನೋಮಯಕೋಶ ಆಗುತ್ತದೆ, ಮತ್ತು ಅದರ ನಂತರ ವಿಜ್ಞಾನಮಯಕೋಶವಾಗುತ್ತದೆ, ಆಮೇಲೆ ಆನಂದಮಯಕೋಶವಾಗುತ್ತದೆ. | सबसे पहले अन्नमयकोश होता है उसके बाद प्राणमयकोश होता है उसके बाद मनोमय कोश होता है उसके बाद विज्ञानमय कोश होता है तथा उसके बाद आनन्दमयकोश होता है। |
hin_Deva | kan_Knda | काम्य कर्मो को फल की भावना से करने पर वे अपने फल को देने को लिए फिर से देह धारण करवाते हैं। | ಕಾಮ್ಯಗಳ ಫಲದ ಆಸೆಯಿಂದ ಮಾಡಿದ್ದೇ ಆದರೆ ಅದರ ಜನಕಫಲಭೋಗಕ್ಕೆ ಮತ್ತೇ ದೇಹಧಾರಣೆಯನ್ನು ಪಡೆಯಬೇಕಾಗುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಸ್ತನಕೇಶವತೀ ಸ್ತ್ರೀ ಸ್ಥಾಲ್ಲೋಮಶಃ ಪುರುಷಃ ಸ್ಮೃತಃ. | स्तनकेशवती स्त्री स्थाल्लोमशः पुरुषः स्मृतः। |
san_Deva | kan_Knda | पुनः प्रत्येकं वस्तुनि तिष्ठन्ति। | ಮತ್ತೆ ಪ್ರತ್ಯೇಕ ವಸ್ತುವೇ ಆಗಿದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | क) तैत्तिरीयोपनिषद् में ख) कठोपनिषद् में ग) बृहदारण्योकोपनिषद् में घ) छान्दोग्योपनिषद् में किस उपनिषद में आकाश प्रमुख को सृष्टि प्रतिपादित की गई है? | क) तैत्तिरीयोपनिषदि ख) कठोपनिषदि ग) बृहदारण्यकोपनिषदि घ) छान्दोग्योपनिषदि कस्यामुपनिषदि आकाश प्रमुखा सृष्टिः प्रतिपाद्यते। |
hin_Deva | kan_Knda | तिल्विलम् क्या है? | ತಿಲ್ವಿಲಂ ಎಂದರೇನು? |
san_Deva | hin_Deva | केषाञ्चन देवानां नामानि द्वन्द्वसमासेन सर्वदा कीर्तितानि यथा - मित्रावरुणौ, इन्द्राग्नी, सूर्याचन्द्रमसौ, द्यावापृथिव्यौ, अग्नीषोमौ इत्यादयः। | कुछ देवता के नाम ढृन्द्व॒ समास में सर्वदा कीर्तित है यथा - मित्रावरुणौ, इन्द्राग्नी, सूर्याचन्द्रमसौ, द्यावापृथिव्यौ, अग्नीषोमौ इत्यादि। |
kan_Knda | hin_Deva | ಚಂದ್ರ, ಚತುರ್ಮುಖ, ಶಂಕರರಿಂದ ಕ್ರಮವಾಗಿ ನಿಯಂತ್ರಿಸಿದ ಮನೋಬುದ್ಧ್ಯಹಂಕಾರಚಿತ್ತಾದಿಗಳಿಂದ ನಾಲ್ಕು ಅಂತರಿಂದ್ರಿಯಗಳಿಂದ ಕ್ರಮವಾಗಿ ಸಂಕಲ್ಪಿಸಿದ ವಿಕಲ್ಪಗಳ ನಿಶ್ಚಯಗಳಿಂದ ಸ್ಥೂಲವಿಷಯಗಳನ್ನು ವೈಶ್ವಾನರನು ಅನುಭವಿಸುತ್ತಾನೆ. | चन्द्र, चतुर्मुख, शङ्कर,तथा अच्युत के द्वारा क्रम से नियन्त्रित मन बुद्धि अहङ्कार तथा चित्त के माध्यम से अन्तरिन्द्रियचतुष्कोण से क्रम से सङ्कल्प विकल्प निश्चय अहङ्कार तथा चित्त स्थूल विषयों का वैश्वानर अनुभव करता है। |
kan_Knda | san_Deva | ಇಲ್ಲಿ ಈ ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಸ್ವರ್ಗಲೋಕದಲ್ಲಿ ಯಾವುದು ಕರ್ಮಜನ್ಯವಾಗಿದೆ ಅದು ಫಲವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತದೆ ಅದರ ಭೋಗದಿಂದ ವಿರಕ್ತಿಯು, ಆಸಕ್ತಿಯ ಅಭಾವವೇ ಇಹಾಮುತ್ರಫಲಭೋಗವಿರಾಗವು. | इह अस्मिन् लोके अमुत्र स्वर्गलोके कर्मजन्यं यत् फलं प्राप्यते तस्य भोगात् विरक्तिः, आसक्त्याः अभावः एव इहामुत्रफलभोगविरागः। |
hin_Deva | kan_Knda | और पठति यह तिङन्त यहाँ उपसर्ग रहित अप्रतिषेध है। | ಪಠತಿ ಈ ತಿಙಂತವು ಇಲ್ಲಿ ಉಪಸರ್ಗ ರಹಿತ ಅಪ್ರತಿಷೇಧವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | 52. ಪಶ್ಚಾತ್ ಅರ್ಥದಲ್ಲಿ ಅವ್ಯಯೀಭಾವಸಮಾಸದ ಉದಾಹರಣೆ ಯಾವುದಾಗಿದೆ? | 52. पश्चात् अर्थ में अव्ययीभावसमास का उदाहरण क्या है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅದ್ವೈತ ವೇದಾಂತಿಗಳ ಪ್ರಕಾರ ಅಜ್ಞಾನದ ಸಮೀಪದ ಚೈತನ್ಯದಿಂದ ಆಕಾಶವು, ಆಕಾಶದಿಂದ ಗಾಳಿಯು, ಗಾಳಿಯಿಂದ ಅಗ್ನಿಯು, ಅಗ್ನಿಯಿಂದ ನೀರು, ನೀರಿನಿಂದ ಭೂಮಿಯು ಉತ್ಪತ್ತಿಯಾಯಿತು. | अद्वैत वेदान्त के मत में अज्ञानोपाहित चैतन्य से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल पृथ्वी उत्पन्न होती है। |
kan_Knda | san_Deva | ೨೦. ಸವಿಕಲ್ಪಕಸಮಾಧಿ ಎಂದರೇನು? | २०. सविकल्पकसमाधिः कः? |
hin_Deva | san_Deva | और ग्राम्य गौ अश्व आदि भी हुए। | तथा ये च ग्राम्याः गवाश्वादयः तानपि चक्रे। |
san_Deva | kan_Knda | वैदिकवाङ्गयविषये संक्षेपेण लिखत। | ವೈದಿಕ ವಾಙ್ಮಯದ ಬಗ್ಗೆ ಸಂಕ್ಷಿಪ್ತವಾಗಿ ಬರೆಯಿರಿ. |
kan_Knda | san_Deva | ಆದ್ದರಿಂದ ತಾತ್ಪರ್ಯ ಅವಧಾರಣೆಗಾಗಿ ಶ್ರವಣ ರೂಪವಾಗಿ ಮಾನಸಿಕ ಕ್ರಿಯೆಯಿಂದಲೇ ಶ್ರವಣವು ಇರುತ್ತದೆ. | इति तात्पर्यावधारणाय विहिता मानसक्रिया एव श्रवणम्। |
san_Deva | kan_Knda | अजायत-जन्-धातोः लङि प्रथमपुरुषैकवचने। | ಅಜಾಯತ - ಜನ್ - ಧಾತುವಿನಿಂದ ಲಂಗ್ ಲಕಾರದಲ್ಲಿ ಪ್ರಥಮಪುರುಷ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ಈ ರೂಪವು ಆಯಿತು. |
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