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डा. रामवरणयादवः गणतान्त्रिकस्य नेपालदेशस्य प्रथमः निर्वाचितः राष्ट्रपतिः अस्ति। सः नेपालदेशस्य जनकपुरक्षेत्रे कस्मिंश्चित् कृषकपरिवारे जातः। तस्य बाल्यकालः महिषाणां पालनेन तथा क्रीडादिभिः व्यतितोः भवति स्म। डा यादवः पठनकार्येषु अतीव मग्नः भवति स्म। तस्य प्रभावेन सः औषधिविज्ञानविषये विद्यावारिधिपदवीं प्राप्तवान्। सः वैद्यरूपेण रूपेण सेवाकर्म कुर्वाणः नेपाली कांग्रेसस्य नेत्रा श्रीगिरिजाप्रसादकोइरालाद्वारा प्रेरितः नेपाल-देशस्य लोकतान्त्रिक-आन्दोलनकार्येषु संलग्नः अभवत्।
अधुनातने नेपाले शाहवंशीयस्य राजकुलस्य पतनपश्चात् सङ्घीय प्रजातान्त्रिकदेशस्य प्रथमराष्ट्रपतिरूपेण स कार्यरतःअस्ति।
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भारतीय-प्रबन्धनसंस्था कोलकाता भारतदेशस्य बङ्गप्रदेशस्य कलोकातायां स्थित एका व्यावसायिकविद्यालयः। इयं संस्था भारतदेशस्य प्रप्रथमा व्यावसायिकीसंस्था। आइ आइ एम् संस्था कोलकातायां 1961 तमे वर्षे प्रतिष्ठिता। इयं सम्पूर्णरूपेण एका स्वशासितसंस्था वर्तते। अत्र एकाधिकाः स्नातोकत्तरः डक्टेरलशार्कुलर प्रचलिता वर्तते। 1961 तमे वर्षे आइ आइ एम् कोलकाटा प्रतिष्ठिता वर्तते। शिक्षा प्रदानेनन सह इयं अइ आइ एम् कोलकाता गवेषणा कनसाल्टसेमिनार एकाडेमिकसम्मेलनम् तथा गवेषणा प्रकाशनकार्ये अपि संलग्ना वर्तते। आइ आइ एम् कोलकाता संस्थायाः लक्ष्यम् भवति - " , " आइ आइ एम् कोलकतायाः ख्याति प्रधानतया तस्याः व्यावसायिकपाठ्यक्रमस्य कृते इयं संस्था भारतदेशस्य सर्वश्रेष्ठः वानिज्यिकी संस्था। वहु वर्षं यावत् इयं संस्था शिक्षा तथा शिल्पजगति सह सुसम्पर्कः स्थापयती वर्तते। अस्याः संस्थायाः कर्मसंस्थानमपि समीचीना वर्तते। 2009 तथा 2010 तमे वर्षे भारतीय एम् वि कर्मसूच्याम् आन्तर्देशीय तथा आन्तजर्तिककर्मसंस्थाने आइ आइ एम् कोलकातायाः मध्यमानं सर्वाधिकं तथा वेतनस्यापि मध्यमानं सर्वाधिकं वर्तते। 2009-10 तमे वर्षे भारतीय एम् वि कर्मसूच्याम् आइ आइ एम् कोलकाता संस्थायाः वेतनरूपेन उल्लेखितं सर्वाधिकपरिमितं धनम् आसीत् 350,000 डलार परिमितम्
आइ आइ एम् कोलकातायाः एम् वि कर्मसूच्यां प्रवेशः एडमिशन टेस्ट इत्यस्य फलानुसारेण भवित। इयं परिक्षा समग्रविश्वस्य सर्वाधिका क्लिष्ठा प्रवेशिकापरिक्षा इति मन्यते। एतत् विहाय साम्न्य क्यान्डिडेट प्रोफाइल तथा व्यैयक्तिकसाक्षात्कारः अपि स्वीक्रियते।
2009 तमे वर्षे किउ एस् ग्लोवाल 200 विजनेस स्कुल रिपोर्टानुसारेण एशियाप्यासिफिक अञ्चले आइ आइ एम् कोलकातायाः स्थानं दाद्वशी आसीत्।
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महाभारतस्य प्रमुखेषु पात्रेषु अन्यतमम् अस्ति नकुलस्य पात्रम् । नकुलः अपि पञ्चपाण्डवेषु अन्यतमः । पाण्डुमहाराजस्य पुत्रः । माद्री अस्य माता । अश्विनीदेवतयोः वरेण जन्म प्राप्नोत् नकुलः ।सहदेवः नकुलस्य अनुजः । युधिष्ठिरः, भीमः, अर्जुनः च नकुलस्य विमातुः कुन्त्याः पुत्राः ।
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अयं डा. डि. एन्. वाडिया भारतस्य प्रख्यातः भूगर्भशास्त्रज्ञः । सः "भारतस्य भूगर्भशास्त्रस्य पितामहः" इत्येव प्रसिद्धः । गुजरातराज्यस्य सूरतनगरे 1883तम संवत्सरस्य अक्टोबर् मासस्य 25 तमे दिनाङ्के अजायत। एतस्य कुटुम्बस्य जनाः नौकायाः निर्माणकार्यं कुर्वन्तिस्म। प्राथमिकशिक्षणं सूरतनगरे प्राप्तवान्। स्नातकोत्तरपदवीं जीवशास्त्रभूगर्भशास्त्रयोः वडोदरा कलाशालायां प्राप्तवान्। विशिष्य भूगर्भशास्त्रे नैरन्तर्यम् अध्ययनम् आसीत्। 1906तमे संवत्सरे, अस्य परिश्रमस्य फलं 20 तमे वयसि सः जम्मू नगरस्य महात्मा गान्धिः कलाशालायाम् आचार्यपदं प्राप्तवान्। अयं कलाशालायाः विरामेषु समयेषु हिमालयगर्भे विद्यमानं खनिजं, गर्भे विद्यमानवस्तूनि, शिलाञ्च आनीय संशोधनं करोतिस्म। छात्राणाम् अध्ययनार्थं 'भूगर्भशास्त्रविज्ञानम्’ इति ग्रन्थम् लिखितवान्। 1921 तमे संवत्सरे स्वपदत्यागाय त्यागपत्रं दत्तवान्। समनन्तरं भूगर्भशास्त्रविभागे उद्योगं प्राप्य संशोधनकार्ये सदा निरतः जातः। 55 तमे वयसि भूगर्भशास्त्रविभागीय पदम्प्रत्यपि त्यागपत्रं दत्तवान्। अस्मिन् समये भारते तथा श्रीलङ्कायाञ्च आङ्ग्लेयानां शासनमासीत्। अस्मै, आङ्ग्लसार्वकारेण श्रीलङ्कादेशस्य भूविज्ञानशास्त्रं तथा भूमापनविभागस्य मुख्यं स्थानं दत्तम्। तत्र इतोपि यशं प्राप्तवान्। तत्रत्य सहकर्मिणेभ्यः प्रशिक्षणं तथा स्वानुभवञ्च सर्वदा बोधयतिस्म। अनन्तरं भारतसार्वकारस्य भूमापकविभागस्य निदेशकः जातः। किञ्चित्कालानन्तरं खनिजं तथा लोहविभागस्य निदेशकोपि जातः। भारतस्य स्वातन्त्र्यानन्तरम् "डा.होमिबाबास्य" आध्यक्षे अणुशक्त्यायाः अध्ययनार्थं अस्मै अवकाशं कल्पितवन्तः। वाडिया खनिजविभागस्य मुख्यस्थः जातः। अयं 22 तम अन्ताराष्ट्रीय भूगर्भशास्त्रस्य उपकरणानां सम्मेलनम् भारते प्रप्रथमवारम् आयोजितवान्। एतस्य सम्मेलनस्य अध्यक्षः आसीत्। एष्याखण्डे विद्यमानेषु विभागेषु गत्वा महत्वपूर्णं संशोधनं कृतवान्। खनिजानाम् विस्तृतम् अध्ययनं कृत्वा वृत्तान्तं निवेदितवन्तः। विशिष्य मरुत्स्थलानां रचनाप्रकारविषये मण्डित विचारधाराः विश्वप्रख्याताः जाताः। "नङ्गाप्रभारतस्य भूगर्भः” एवं ”हिमालयस्य रचना” इत्यादि ग्रन्थान् रचयित्वा जनप्रियः सञ्जातः। 50 वयसि अपि अस्य ज्ञानशक्तिम् अवलोकयामश्चेत् युवानोऽपि लज्जामनुभवन्ति। काश्मीरतः कान्याकुमारीपर्यन्तम्, अस्सां तः कराची, बलुचिस्तान् तथा सरोवरसमुद्रादयः अस्य अध्ययनस्य केन्द्राणि भवन्ति। अनेन रचितेषु पुस्तकेषु भारतस्य तथा बर्मादेशस्य भूगर्भशास्त्रसंबन्धितशोधाः आश्चर्यकराः भवन्ति। अनेन लिखितः ग्रन्थः विश्वस्मिन् विश्वे सर्वेषु भूगर्भशास्त्रं तथा भूमापनविभागीयग्रन्थालयेषु लभ्यते। तं ग्रन्थम् आदरेण पश्यन्ति जनाः। 1957 तमे संवत्सरे लण्डन्देशस्य 'रायल्’ संस्थायाः संशोधकत्वेन परिगणितम्। प्रथमः भारतीयः भवति अस्मिन् क्षेत्रे इत्यतः महद्गौरवमस्य। भारतीय विज्ञानकाङ्ग्रेस् विभागस्य वारद्वयम् अध्यक्षस्थानम् अलङ्कृतवान्। राष्ट्रीय विज्ञानाकाडमि संस्थातः "मेगांद साहा” पुरस्कारभाजः जातः। कोलकता "असेटिक्” संस्थातः "भोस्” पुरस्कारभाजः जातः। 1958 तमे संवत्सरे भारतदेशस्य श्रष्ठं पद्मभूषणपुरस्कारम् अलभत्। स्व 85 तमे वयसि 1969 तमे संवत्सरे जून् मासे 15 दिनाङ्के पञ्चभूतेषु लीनः जातः।
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भारतदेशे किञ्चन राज्यम् अस्ति उत्तरप्रदेशराज्यम्। अस्य राज्यस्थं किञ्चन मण्डलम् अस्ति महाराजागञ्जमण्डलम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति महाराजागञ्जनगरम्।
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1120 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः अधिवर्षः आसीत्।
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नाट्यशास्त्रम् इति एकः प्राचीनग्रन्थः द्विसहस्रवर्षेभ्यः पूर्वमेव भरताचार्येण कृतः अस्ति । तस्मिन् ग्रन्थे सः नाट्यस्वरूपं नाटकलक्षणं च सम्यक् उक्तवान् । धनञ्जयः नामकः पण्डितः 'दशरूपकम्' इति ग्रन्थं विलिख्य रूपकाणां परिचयं कारितवान् ।
प्रथमं कविना गद्यपद्ययुक्तः, सम्भाषणात्मकः, अभिनययोग्यः कश्चन ग्रन्थः लिख्यते । तत्रत्या कथा रामायणादिषु प्रसिद्धा वा भवेत्, कविकल्पिता वा भवेत् । सः ग्रन्थः नटैः रङ्गे अभिनीयते । एषः अभिनयः, 'प्रयोगः' इति कथ्यते । सहृदयाः सामाजिकाः तं दृष्ट्वा आनन्दमनुभवन्ति । नाटके चतुर्विधाः अभिनयाः भवन्ति - आङ्गिकः, वाचिकः, आहार्यकः, सात्त्विकः चेति । हस्तपादनेत्रादिभिः यः अभिनयः क्रियते सः आङ्गिकः । भाषणं वाचिकः । वेषभूषणादिकम् आहार्यकः । गात्रकम्पनम्, स्वेदः इत्यादयः सात्त्विकाभिनयाः । एतादृशैः अभिनयैः नटाः प्रेक्षकेषु नव रसान् उत्पादयन्ति ।
संस्कृतनाटकेषु प्रथमम् एकं मङ्ग्लपद्यं भवति । 'नान्दी' इति तस्य नाम । तदनन्तरं सूत्रधारः प्रविशति । सः नाटके अभिनेष्यमाणायाः कथायाः सूचनां ददाति । तदनन्तरं नाटकस्य प्रारम्भः भवति । संस्कृतनाटके उत्तमजनाः संस्कृतेन, नीचजनाः स्त्रियः च प्राकृतेन भाषन्ते । रङ्गे जलपानं, भोजनं, अग्निः, युद्धम् इत्येतादृशाः विषयाः न दर्शनीयाः इति नियमः अस्ति । नाटकस्य अन्ते एकः श्लोकः भवति । प्रायः नायक एव इमं श्लोकं पठति । अस्मिन् श्लोके 'लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु' इत्येतादृशम् अर्थपूर्णं मङ्गलाशंसनं भवति । अस्य श्लोकस्य 'भरतवाक्यम्' इति नाम ।
भारतदेशस्य संस्कृतवाङ्मयस्य च कीर्तिसौधस्य आधारस्तम्भा इव चत्वारः भरतनामानः कीर्तिशेषाः श्रूयन्ते । तेषु प्रथमः दुष्यन्तपुत्रः भरतः । द्वितीयः बाहुबलिसोदरः भरतः । तृतीयः श्रीरामस्य अनुजः भरतः । चतुर्थस्तु नाट्यशास्त्रम् इत्येतद्ग्रन्थस्य कर्ता भरतमुनिः । एवं चतुर्णाम् एतेषां भरतानां जन्मभूमिः, कर्मभूमिः च योऽयं देशः वर्तते भारतम् इति यथार्थाभिधानम् भजते । तथैव भरतमुनिना प्रणीतं भारतीयं नाट्यशास्त्रम् भवति । नाट्यवेदः इति नाट्यशास्त्रस्य पुरातनं नाम बभूव, यथा-
तथा च नाट्यं वेदैरेव उपबृंहितमिति भरतः निरूपयति, यथा -
भारते प्रागैतिहासिके काले " नाट्यवेदः" द्वादशसहस्रश्लोकात्मकः बृहद्गात्रः प्रसिद्धिं गतः, उपलब्धश्च आसीदिति ज्ञायते । क्रिस्तात् पूर्वस्मिन् सहस्राब्दे भरतमुनिना पुरातननाट्यवेदात् सारमुद्धृत्य षट्सहस्रैः श्लोकैः,षट्त्रिंशदध्यायैः नाट्यशास्त्रं निबद्धम् । शास्त्रमिदं न केवलं रङ्गकर्मनिर्देशने प्रवृत्तम्, नृत्य-गीत-वाद्य-साहित्यादीनां कलामूलानां सर्वशास्त्राणामपि महोपकारकं वर्तते । सङीतादिशास्त्रग्रन्थाः एतच्छास्त्रम् अनूद्य एव प्रवृत्ताः इति न सन्देहः । अपि च भारतीयेषु अन्यान्यनाट्यप्रभेदेष्वपि भरतनाट्यशास्त्रे निरूपिताः नियमाः एव प्रवर्तन्ते ।
दृश्यकाव्यस्य अभिनेयमिति नामान्तरमिति पूर्वमुक्तम् । अभिनया रामादीनाम् अवस्थाया अनुकरणम् । स च तावत् चतुर्विधः, तथाहि - रामादौ गमनादिक्रिया वर्तते, वाक्यम्, वेषभूषणादिकं बाह्यस्वरूपम्, क्रोधहासादिः आन्तरो धर्मः । अनुकरणं च एतावतामेव नान्येषाम् । तत्र गमनादिक्रियाया अनुकरणं नटैः हस्तपादादिभिः अङ्गैः क्रियते । तस्मात् स अभिनयः ’आङ्गिकः’ । वाक्यस्य अनुकरणं वाचा क्रियते । तस्मात् स अभिनयः ’वाचिकः’ । बाह्यस्वरूपस्य अनुकरणं वेषभूषणादिना क्रियते । तस्मात् स अभिनयः ’आहार्यः’ । हासक्रोधादेः अनुकरणं मुखविकासादिना क्रियते । तस्माच्च स अभिनयः ’सात्त्विकः’ । तदेवमभिनयस्य चतुर्विधत्वम् । तत्र रामादिः अनुकार्यः, नटः अनुकर्ता, तेन च रामादेः अनुकरणमिति अंशत्रयं स्पष्ठम् ।
शृङ्गारादीनां रसानाम् अभिव्यञ्जनपराणां समेषां शास्त्रग्रन्थानाम् आधारभूतं प्रामाणिकं च शास्त्रं भारतमुनिकृतं 'नाट्यशास्त्रम्’ । अत्र आदौ पञ्चसु अध्यायेषु क्रमेण 1) नाट्योत्पत्तिः 2) मण्टपविधानम् 3) रङ्गदैवतपूजाविधानम् 4) ताण्डवलक्षणम् 5) पूर्वरङ्गविधानम् इति विषयान् सविस्तरं विविच्य भरतः षष्ठेऽध्याये रसान् अमूलाग्रं निरूपयति । अस्मिन्नध्याये नारदादयः भरतमुनिमुद्दिश्य रसभावसम्बद्धान् पञ्च प्रश्नान् पृच्छन्ति । ततः भरतः तान् प्रश्नान् उत्तरन् रसः, भावः, अभिनयः, धर्मी, वृत्तिः, प्रवृत्तिः, सिद्धिः, स्वरः, आतोद्यम्, गानम्, रङ्गं च व्यवृणोत् । ततः शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुतरसान् च अष्टौ रसान् नाट्योपयुक्तान् न्यरूपयत् । नाट्ये रसनिष्पत्तिहेतून् भावादीनभीधाय ततः वदति यत्-
एवं रससूत्रनिर्माणानन्तरं शास्त्रकारः "को द्ष्टान्तः?" इति स्वयमेव पृच्छामुद्घाट्य, अग्रे विवृणोति यथा -
इति । अस्यायमाशयः, अत्र द्ष्टान्ते विभावादीनां विवेचना प्रसिद्धैः गुडादिभिः निरूप्यते । अत्र गुडादयः षट् रसपदार्थाः विभावः, अनुभावः, सञ्चारिभावश्च इति ज्ञेयम् । जलं स्थायिभाव इति कल्पनीयम् । एवं च स्थायिभावेन विभावादीनां सम्मेलनं रसोत्पत्तिकारणम् । रसोत्पत्यनन्तरं भोक्तॄणामिव प्रेक्षकाणां सामाजिकानां आनन्दानुभूतिः, रसास्वादश्च भवति । अतो भरतोऽभिदधाति -
बुभुक्षितः जनः यथा मधुरादिभी रसैः मिश्रम् अन्नम् आस्वाद्य आनन्दम् अनुभवति, तथा सहृदयः नाट्येषु पात्राणाम् आङ्गिकैः, आहार्यैः, वाग्व्यापारैश्च सुखे दुःखे विस्मयादिषु च तादात्म्येन आनन्दमनुभवति । सामान्यतः श्रव्येषु काव्येषु स्वयम् अप्रवृत्तानां स्थायिभावरहितानाम् अरसिकानामपि हृद्येषु स्थायिभावस्य जागरणं नाट्येन कर्तुं शक्यते । अत्र नटः आख्यायिकापुरुषस्य स्वभावाभिनयेन गम्यः स्थायिभावः, चमत्कारेण रसत्वं प्राप्नोति । नटे स्थायिभावोऽस्त्येव इति प्रेक्षकः भावयति। एवम्द्वयोः समानतया उत्पन्नः स्थायिभाव एव रसनिष्पत्तिपर्यन्तम् निरन्तरः, अविच्छिन्नधारया स्यन्दमानः रसात्मतया परिणमति । इममेव विषयम् "अभिनवगुप्तः" अभिनवभारत्यां व्याख्यायां व्याचष्टे । यथा -
शृङ्गारादीनां नवानामपि रसानां प्रत्येकतया "स्थायिभावान्" निर्दिशति, यथा -
एवं शृङ्गाररसस्य स्थायिभावः रतिः, हास्यरसस्य हासः, वीरस्य उत्साहः, करुणरसस्य शोकः रौद्ररसस्य क्रोधः भयानकस्य भयम्,बीभत्सरसस्य जुगुप्सा अद्भुतरसस्य विस्मयः, शान्तरसस्य तु नाट्ये प्रसक्त्यभावे सत्यपि शान्तस्य शमः स्थायिभावः भवति इति वदति । ततः भावाः निरुच्यन्ते । भावलक्षणम्, यथा -
यद्यपि "भाव"शब्दस्य अनेके अर्थाः शास्त्रेषु दृश्यन्ते । तथापि अत्र भावनिरूपणे भावः नाम चित्तवृत्तिः इत्यर्थं स्वीकरोति । तथा "विभावः" नाम निमित्तम् इत्यर्थे भावयति । वस्तुतः भावस्य निष्पत्तिकारणम् भावाविर्भावहेतुः "विभावः" इति कथ्यते । यथा अभिज्ञानशाकुन्तले शकुन्तलायाः तपोवनविरुद्धस्य रतिस्थायिभावस्य उद्दीपनहेतुः दुष्यन्तः आलम्बनविभावः भवति । तथैव स्वचित्तगतविषयान् भ्रूविक्षेपादिभिः प्रटनम् एव अनुभावः । आहत्य अष्टविधान् अनुभावान् सङ्ख्यापयति भरतः, यथा -
तथा च प्रवर्तमाने स्थायिभावे आनुषङ्गिकतया मध्ये अन्यभावानाम् आगमनिर्गमौ सञ्चारिभावः अथवा व्यभिचरिभावः इति कथ्यते ।भरतः नाट्यानुगतान् 33 सञ्चारिभावान् उल्लिखति ।
महाभारतस्य विषये यदुक्तम्- यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् इति तथैव नाट्यशास्त्रविषयेऽपि भरतेन अभिहितम् यथा -
एवम् सर्वाः शिक्षाः, सर्वाणि शिल्पानि, लौकिकाः कलाः, विद्याः, सकलविधं च कर्म नाट्ये दृश्यरूपेण प्रदर्शयितुं शक्यते इति भावः । नाट्यम् आबालब्रह्मपर्यन्तम् रससरस्सन्निभम् लोकान् रञ्जयति इत्यर्थः । एतस्मात् ज्ञायते यत्, भरतमुनिकृतं नाट्यशास्त्रमिदम् सर्वजनपदकलाशास्त्राणां मूलाधारमिति नात्युक्तिः । भरतादपि पूर्वस्मिन् काले कोहलः दत्तिलः नाट्यशास्त्रग्रन्थान् रचयामासतुरिति श्रूयते । तत्र दत्तिलस्य ग्रन्थनाम "दत्तिलम्" इति । ततः श्रीमता आनन्दवर्धनेन ध्वन्यालोकः इति साहित्यशास्त्रस्य यः लक्षणग्रन्थः रचितः, तत्र 'ध्वनि’लक्षणं लक्षयति यथा- "अनुरणनं ध्वनिः" इति । 'अनुरणनं नाम नाट्यम् इत्यर्थः । आचार्यः मम्मटः स्वीये काव्यलक्षणग्रन्थे काव्यप्रकाशः नाम्नि भरतमुनिकृतात् नाट्यशास्त्रादेव कारिकाः समुद्धृत्य ग्रन्थम् आरचितवान् । तथा च दण्डी निजकृतौ "काव्यादर्शे"ऽपि भरतनाट्यशास्त्रीयान् श्लोकान् उपायुनक् । भरतकृतनाट्यशास्त्रे षाष्ठतमाध्यायगतां रसनिष्पत्तिप्रक्रियां विशदयितुं प्रयतितवत्सु व्याख्यानकर्तृषु अभिनवगुप्तः प्रमुखः । अभिनवगुप्तस्य व्याख्यानग्रन्थस्य नाम "अभिनवभारती" इति । भट्टतौतः नाम कश्चन लाक्षणिकः काव्यस्य रसास्वादविषये नाट्यशास्त्रम् आधारीकृत्य काव्यकौतुकम् नामकं ग्रन्थं रचितवान् । तथा च नाट्यशास्त्राधारितेषु ग्रन्थेषु 3यशतमाने ख्यातः नन्दितः नामा अभिनयदर्पणम् नाम ग्रन्थं व्यरचयत् । एवम् सोमनार्यः नाट्यचूडामणिम्, रामचन्द्रगुणाचार्यः नाट्यसर्पणम्, अशोकमल्लः नृत्याध्यायम्, जयसेनः नृत्यरत्नावलिम्, नान्यदेवः भरतभाष्यम्, अल्लराजः रसतत्वसमुच्चयम्, श्रीकण्ठकविः रसकौमुदीम्, अन्ये च अनेके नाट्येषु, नाट्यभेदेषु, देशीसङ्गीतेषु, राग-ताल-भावादिविषयेषु नाना कलाविषयेषु च भरतस्य "नाट्यशास्त्रात्" सामग्रीः सम्पाद्य एव लिलेखुः इत्यत्र नास्ति सन्देहलेशः । इदमपि ज्ञेयम् यत् पूर्वम् नाट्यस्य शिल्पम् इति नाम आसीत् । अतः शिल्पशास्त्रम् अथवा स्थापत्यशास्त्रम् अपि भारतनाट्यशास्त्रमनुकृत्य एव समैधत इति भाव्यम् । एवं च यथा काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम् इति लोकोक्तिः विद्यते तथैव नाट्यशास्त्रमिदं सर्वकलाशास्त्रोपकारकम् इत्युक्ते नातिभाषितं भवेत् ।
नाट्यशास्त्रस्य रचनाकालः कः इति रचिततया न विद्मः । किन्तु पाणिनेः अष्टाध्यायीग्रन्थे पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ।4/3/110 इति सूत्रे नटसूत्रत्वेन उपनिबद्धः कोऽपि सूत्रात्मकः प्राचीनः ग्रन्थ आसीदिति ऊहितुं शक्यते । तत्सूत्राणाम् आधारेणैव भरतमुनिना पाणिनेः अर्वाचीने काले "नाट्यशास्त्रम्" व्यरच्यतेति निश्चिनुमः । पाणिनेः कालस्तु क्रि.पू. 7मम् शतमानम् इति विदुषां मतम् । अतः भरतमुनेः कालः क्रि.पू.5मम् शतमानम् इत्यनुमीयते । परमत्र विपश्चिदपश्चिमानां मतं प्रमाणम् ।
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वैज़ाग्
17°41′18.16″ उत्तरदिक् 83°13′07.53″ पूर्वदिक् / 17.6883778°उत्तरदिक् 83.2187583°पूर्वदिक् / 17.6883778; 83.2187583
• सान्द्रता• महानगरम्
• 3,240 /किमी2 • 1
• औन्नत्यम्
• 5 मीटर
विशाखपट्टणमण्डलम् आन्ध्रप्रदेशस्य किञ्चनमण्डलं विद्यते। अस्य नगरस्य नाम कार्तिकेयात् आगतमस्ति । सुन्दरं सागरतीरं नौकानिस्थानं नौकानिर्माणकेन्द्रं च अत्र सन्ति । रामकृष्णसागरतीरम् अतीव सुन्दरम् अस्ति। दीपगृहम् इतः 64 कि.मी पर्यन्तं प्रकाशं प्रसरति। अस्य समीपे सिंहाचलप्रदेशे पर्वते श्री लक्ष्मीनरसिंहस्वामी देवालयः अस्ति। गन्तुं 500 सोपानानि सन्ति । 11 शतकीयः देवालयः एषः शिल्पकलायुक्तः अस्ति। ओरिस्साशैल्या भागवतः लीलाविनोदप्रसङ्गाः भित्तिषु चित्रिताः सन्ति।नौकानिर्माणकेन्द्रं परितः सुन्दरम् उद्यानम् अस्ति । विशाखपट्टणनगरे उत्तमवसति, भोजनव्यवास्था अस्ति ।
विश्वविख्यातसिंहाचलपुण्यक्षेत्रं विद्यते अस्मिन् मण्डले विशाखपट्टणम् । एतत् यावद्भारतदेशे बृहन्मण्डलम् आसीत् स्वातन्त्र्यात् पूर्वम् । मौर्याः, शातवाहनाः, विष्णुकुण्डिनः, चालुक्याः गजपतयः विजयनगराधीशाः, गोल्कोण्डसाम्राज्याधीशाः इत्यादीनां परिपालनानन्तरं ब्रिटिषाधिपत्यं गतम् । 1879 काले वीरय्यदोराध्वर्यवे रम्पाविप्लवम्, 1922 वर्षे गिरिजनैः सवरविप्लवं समजनि। ब्रिटिष्परिपालनविरोधिनः अल्लूरिसीतारामराजादीनां नायकत्वे नर्सीपट्टनं, रम्पचोडवरप्रान्तेषु वनवासिनः उद्यमं कृतवन्तः। किन्तु ब्रिटिष् सर्वकारः तान् उद्यमनायकान् पाशविकरीत्या मारितवान् । स्वातन्त्र्यानन्तरम् एतस्य मण्डलस्य द्विवारं विभजनं जातम् । ततः केचन प्रान्ताः श्रीकाकुले, केचन प्रान्ताः विजयनगरे च सम्मिलिताः । भौगोलिकम् अस्य सीमायां प्राग्दिशि बङ्गालाखातसमुद्रः, पश्चिमदिशि ओरिस्साराज्यम्, उत्तरदिशि विजयनगरमण्डलं, दक्षिणदिशि पूर्वगोदावरीमण्डलं च वर्तन्ते । अस्य मण्डलस्य भूभागे 42% अरण्यं वर्तते । 5 सङ्ख्याख्यः राजमार्गः अस्मिन् मण्डले 169 कि.मी. मिते दूरे विस्तृतः ।
पाञ्चालिकानां निर्माणे सुप्रसिद्धः एटिकोप्पाकग्रामः वर्तते । मण्डलेऽस्मिन् बाक्सैट् वेर्मिक्युलेट् च उपलभ्येते । वातावरणे आर्द्रता अधिकः अस्ति । झञ्झवातस्य आधिक्येन पीड्यते इदं मण्डलम् । 30% कृषिः क्रियते विद्यमानभूमौ । 40% भूमिं प्रति जलयोगः अस्ति । 1933 वर्षे नौकाकेन्द्रं निर्मितम् । विशाखपट्टणे केन्द्रराज्यसर्वकारयोः संस्थानि स्थापितानि । साहजिकं नौकाकेन्द्रं भारते अत्रैव विराजते । नौकाविमानरक्षणयन्त्रादिपरिकराणां निर्माणे, तेलस्वच्छता इत्यादिविभागेषु उपाधिः अधिकतया कल्प्यतेऽस्मिन् मण्डले ।
पर्यटकानाम् आकर्षकस्थानानि अनन्तगिरिः, चिन्तपल्लि, सीलेरु, अरकु, भीमिलि इत्यादीनि । सिंहाचलं श्रीवराहलक्ष्मीनरसिंहस्वामी देवालयः, डाल्विन्स् नोस्, रामकृष्णसागरः, काळिकादेवी आलयः, कैलासगिरि, रिषिकोण्डासागरः, इन्दिरागान्धिजन्तुप्रदर्शनशाला, बीमिली सागरः, सत्यनारायणस्वामी देवालयः, आन्ध्रविश्वविद्यालयः इत्यादीनि सन्ति।
चेन्नै- हौरामार्गे विशाखपट्टणनिस्थानम् अस्ति ।
आन्ध्रप्रदेशस्य महानगरेभ्यः सम्पर्कः अस्ति ।
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टिहरीगढवालमण्डलम् /ˈɪəɪɡəəɑːəəəə/) उत्तराखण्डराज्यस्य गढवालविभागे स्थितं किञ्चन मण्डलम् अस्ति । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति टिहरी इति नगरम् । टिहरीगढवालमण्डलं कृषि-जलपात-वन्यविविधता-शिक्षणादिभ्यः प्रख्यातमस्ति ।
टिहरीगढवालमण्डलस्य विस्तारः 4,080 च.कि.मी.-मितः अस्ति । उत्तराखण्डराज्यस्य उत्तरभागे इदं मण्डलमस्ति । अस्योत्तरदिशि उत्तरकाशीमण्डलं, दक्षिणदिशि पौरीगढवालमण्डलं, पूर्वदिशि रुद्रप्रयागमण्डलं, पश्चिमदिशि देहरादूनमण्डलम् अस्ति ।
टिहरीगढवालमण्डलस्य जनसङ्ख्या 6,18,931 अस्ति । अत्र 2,97,986 पुरुषाः, 3,20,945 स्त्रियः, 84,657 बालकाः सन्ति । अस्मिन् मण्डले प्रतिचतुरस्रकिलोमीटर्मिते 190 जनाः वसन्ति अर्थात् अस्य मण्डलस्य जनसङ्ख्यासान्द्रता प्रतिचतुरस्रकिलोमीटर् 170 जनाः । 2001-2011 दशके अस्मिन् मण्डले जनसङ्ख्यावृद्धिः 2.35% आसीत् । अत्र पुं-स्त्री अनुपातः 1000-1077 अस्ति । अत्र साक्षरता 87.36% अस्ति । अत्र लिङ्गानुगुणं साक्षरतानुपातः पुं – 89.76% स्त्री - 64.28% अस्ति ।
अस्मिन् मण्डले सप्त उपमण्डलानि सन्ति । तानि- टिहरी, धनौली, प्रतापनगर, घंसाली, जखनीधर, नरेन्द्रनगर, देवप्रयाग
अस्मिन् मण्डले बहूनि विक्षणीयस्थलानि सन्ति । यथा-
://../
://..////.
://.../
://.//-.
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अञ्जावजनपदम् अरुणाचलप्रदेशराज्ये स्थितं किञ्चन जनपदम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रं हवाइनगरम् ।
स्क्रिप्ट त्रुटि: " " ऐसा कोई मॉड्यूल नहीं है।
अञ्जावमण्डलस्य विस्तारः 6190 चतुरस्रकिलोमीटर्मितः अस्ति । अस्य मण्डलस्य उत्तरे चीना देशः अस्ति । अस्मिन् मण्डले लोहित नदी प्रवहति ।
2001 जनगणनानुगुणं अञ्जावमण्डलस्य जनसङ्ख्या 21089 अस्ति । अस्मिन् मण्डले प्रतिचतुरस्रकिलोमीटर्मिते 3 जनाः वसन्ति अर्थात् अस्य मण्डलस्य जनसङ्ख्यासान्द्रता प्रतिचतुरस्रकिलोमीटर् 3 जनाः । 2001-2011 दशके अस्मिन् मण्डले जनसङ्ख्यावृद्धिः 13.77% आसीत् । अत्र पुं-स्त्री अनुपातः 1000-805 अस्ति । अत्र साक्षरता 59.4 % अस्ति ।
अस्मिन् मण्डले सप्त उपमण्डलानि सन्ति । तानि-
1.हयूलियाञ्ग
2.हवाइ
3.मन्चल्
4.गोइलियान्ग्
5.वालोन्ग्
6.किबितू
7.चग्लोगम्
अञ्जाव् मण्डलम्, अधर दिबाङ् व्यालि मण्डलम्, अधर सुबन्सिरि मण्डलम्, ऊर्ध्व दिबाङ् व्यालि मण्डलम्, ऊर्ध्व सियाङ् मण्डलम्, ऊर्ध्व सुबन्सिरि मण्डलम्, कुरुङ् कुमेय् मण्डलम्, चङ्लङ् मण्डलम्, तवाङ्ग् मण्डलम्, तिरप् मण्डलम्, पश्चिम कामेङ् मण्डलम्, पश्चिम सियाङ् मण्डलम्, पापम् परे मण्डलम्, पूर्व कमेङ् मण्डलम्, पूर्व सियाङ् मण्डलम्, लोहित् मण्डलम्
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मत्स्यासनम् योगासनस्य एकम् आसनमस्ति ।
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भ्रष्टाचारः
भ्रष्टः चासौ आचारः भ्रष्टाचारः । यस्य आचारः भ्रष्टः सः भ्रष्टाचारी इति कथ्यते । इत्युक्ते यस्य जीवनपथः नष्टः अथवा व्यत्यस्तः सः भ्रष्टः इति भवति । समीचीनं मार्गं त्यक्त्वा असमीचीने मार्गे गमनम् एव भ्रष्टाचारः इति उक्तः । अस्य अर्थज्ञानं यावत् सुकरं तस्य परिणामज्ञानं तावदेव दुष्करम् । विश्वे सर्वत्र भ्रष्टाचारस्य व्याप्तिः अस्ति चेदपि अस्मिन् विषये प्रथमस्थानं तु भारतस्य एव । आङ्ग्लैः भारतं बहुकालं प्रशासितम् । अयं व्यवहारः अपि भ्रष्टचारः एव । तै पाठितः अयं भ्रष्टचारः अस्मिन् देशे इदानीं रूढमूला समस्या । अन्यासां समस्यानाम् आदिः अन्त्यः च कुतः कथं इति तु ज्ञायते एव । किन्तु अस्य भ्रष्टाचारस्य कुतो वा आरम्भः कियत्पर्यन्तम् अस्ति । अस्य कारणं किम् इति अवगन्तुं कष्टं भवति । बीजवृक्षन्यायः इव विवाहसमये वरदक्षिणायाः भ्रष्टचारे उत्कोचस्य च दानेन आरम्बः अभवत् उत स्वीकरणेन अभवत् इति वक्तुं सुकरं न ।
भ्रष्टाचारे द्वैविध्यम् अस्ति । राजकीयजनाः अधिकारिणः च स्वप्रभुत्वस्य प्रभावात् सर्वकारीयां सम्पत् आत्मसात् करणम् अथवा राजकरं वञ्चयित्वा आनैतिकेन वाममार्गेण वा अमितसम्पदः सङ्ग्रहणम् एकविधम् । अपरं तु सार्वजनिकसेवायां नियुक्ताः अधिकारिणः उत्कोचस्वीकरणम् । सर्वकारीयेषु कार्यालयेषु निम्नस्तरात् उच्चस्तरपर्यन्तं उत्कोचः उत्तरोत्तरं वर्धते । अथवा कस्यचित् ग्राहकस्य महाकार्यं पूरयितुं स्वाकृता धनराशिः स्तरानुगुणं वितीर्णा भवति । उन्नताधिकारिणः स्वापराधं गोपयितुं क्षालयितुं वा प्रभुत्वारुढराजकीयनायकेभ्यः कञ्चनांशं समर्पयन्ति । अनायासेन तस्मिन् नेतरि सम्पत्सङ्ग्रहः भवति अजान् एव भ्रष्टः अपि भवति ।
भ्रष्टाचरः विशेषतः सर्वकारीय कार्यालयेषु विरजते । यथा पिता स्वपुत्री पतिगृहे सुखेन जीवतु इति धिया धनककादीनि दत्त्वा तस्याः विवाहं समाचरति तथैव जनाः सर्वकारीयेषु कार्यालयेषु स्वकार्यं शीघ्रं सम्भवतु इति अधिकारिभ्यः आमिषरूपेण धनं दातुम् आरब्धवन्तः । अयम् अक्रमः एव कालान्तरेण भस्मासुरवत् बलिष्टः भूत्वा जनजीवनम् एव असह्यं कुर्वाणः अस्ति । परिचारकात् आरभ्य पर्माधिकारिणः पर्यन्तं सर्वेऽपि गिलने अजगराः सञ्जाताः । राजकीयनेतृभ्यः महाधिकारिभ्यः च उक्तोचं दत्त्वा उद्योगे नियुक्तः कश्चित् केवलं मासिकवेतनेन सन्तुष्टः भवति वा । न, दत्तोत्कोचस्य परिपूरयितुं सः अपि जनेभ्यः उत्कोचं चूषयति एव । न्यायालयेषु जयप्रप्तये, सर्वकारीयकार्ययोजनायाः आदेशप्रापणे, चिकित्सालयेषु योग्यचिकित्साप्राप्त्यर्थे, आरक्षकालये नष्टवस्तुनां शोधनार्थं, गृहनिर्माणस्य अनुमतिप्राप्तये, स्थिरसम्पत्तेः क्रयविक्रानुमतिप्राप्तये च इत्यादिषु अवसरेषु सर्वकारीयानाम् अधिकारिणाम् हस्तान् उष्णीकरणीयं भवति ।
यदि शिरः समीचीनं भवति तदा अन्याङ्गानि सम्यक् कार्यं कुर्वन्ति । तथैव यदि अधिकारूढः प्रभुः तस्य सचिवमण्डलं सदाचारिणः शुद्धहस्ताः भवन्ति तदा कार्याङ्गानि सक्षमानि भवन्ति । सामन्यजनाः भ्रष्टाचारं विरुध्य सङ्ग्रामसदृशानि अन्दोलनानि कुर्वन्तु । विना उत्कोचदानेन कार्यसमापनं निरीक्षताम् । भ्रष्टाचारसम्बद्धम् अपराधं ज्ञात्वा आरक्षणस्थाने आक्षेपं लेखयन्तु । सङ्घे शक्तिः कलौ युगे इति वचनानुगुणं सामूहिकः सङ्घटितप्रयत्नेन अस्य समाजकण्टकस्य भ्रष्टाचारस्य उन्मूलनं भवितुमर्हति ।
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गुजरातराज्ये किञ्चन मण्डलमस्ति आणन्दमण्डलम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रमस्ति आणन्द इत्येतन्नगरम् । आणन्दस्य प्राचीनं नाम आनन्दपुरम् आसीत्।
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केरलराज्ये मानवशिशुः चलनात् पूर्वं तरणं जानाति इति जनाः वदन्ति । यतः समग्रे राज्ये पश्चिमदिशि सगरपूर्वजलाशयाः सन्ति । केरलराज्ये अटनं नाम सम्पूर्णे वने अटनम् इव । सागरपूर्वजलसङ्ग्रहः सर्वत्र भवति । कोच्ची अलेप्पी इत्यादिक्षेत्रेषु नौकागृहाणि च सन्ति ।क्वचि एतत् जलं भागद्वये प्रवहति । तदा मध्ये विद्यमानः भूप्रदेशः महाद्वीपसहशः भवति । अलेप्पीतः अनेकविभागेषु सागरपूर्वजलाशयाः निर्मिताः सन्ति । तेषु गमनम् अतीव आनन्दायकं भवति ।अलेप्पीतः केट्टुवल्लं पर्यन्तं नौकागृहेण गन्तुं शक्यते । एतेषु नौकागृहेषु शयनगृहं स्नानगृहं पाकशाला इत्यादिसुव्यवस्थाः भवन्ति । उपरि आगत्य प्रकृतिवीक्षणं कर्तुं शक्यते । अत्र सीफूड् बहु प्रसिद्धम् । पक्वं मिष्टालुकम् अतीव उत्तमं भवति । पनसफलेन निर्मितं खाद्यमपि रुचिकरं भवति ।एवमेव कोच्चीप्रदेशतः कुडियतोड् त्रिघण्टात्मकप्रवासं कृत्वा गत्वा, कोच्चिप्रदेशः आगन्तुं शक्यते । एवं कोच्चीनगरतः एर्णाकुलतः पोर्टकोचिन्, पोर्टकोचिन् तः एर्णाकुलं प्रति अपि गमनागमनं कर्तुं शक्यते । एर्णाकुलतः मट्टञ्चेरी मट्टञ्चेरीतः एर्णाकुलं प्रति गमनागमनमपि साध्यमस्ति ।अलेप्पी-कोट्टायम्, कोल्लम्- अलेप्पी नैकायात्रा अपि अत्र कर्तुं शक्यते । एतदर्थं नवघण्टात्मकः कालः आवश्यकः भवति । केरलराज्ये प्रवासाय वर्षारहितेषु मासेषु केवलं व्यवस्था भवति । केरलप्रवासोद्यमनिगमः, तिरुवनन्तपुरम् इत्यस्मिन् कार्यालये पूर्वमेव यात्राविवरणम् आरक्षणं च कर्तुं शक्यते ।
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आन्तरिकापत्कालः अर्थात् संविधानविरोधीनि कार्याणि राज्ये चलन्ती सन्ति, शासकः संविधानानुसारं राज्ये शासनं कर्तुम् असमर्थः अस्ति वा । राष्ट्रपतिः एतादृषं यदि राज्यपालस्य सूचनेन, अन्यरीत्या वा जानाति, तर्हि तस्मिन् राज्ये राष्ट्रपतिः आपत्कालस्य घोषणां कर्तुं शक्नोति । एषः प्रादेशिकापत्काल एव राष्ट्रपतिशासनम् इति प्रसिद्धः । भारतीयसंविधानस्य षड्पञ्चाशदधिकत्रिशत्तमानुच्छेदानुसारं संसदः स्वीकृत्या सह षण्मासावधेः वर्षत्रयं यावत् राष्ट्रपतिशासनं भवितुमर्हति । राष्ट्रपतिशासनकाले राज्यस्य राज्यपाल एव राष्ट्रपतेः आदेशानुगुणं शासनं करोति । अस्य षड्पञ्चाशदधिकत्रिशत्तमस्य अनुच्छेदस्य बहुवारं दूरुपयोगः जातः अस्ति । अतः भारते बहुषु राज्येषु प्रादेशिकापत्कालस्य घोषणाः अभवन् । यस्य पक्षस्य सर्वकारः केन्द्रे शासनं करोति, सः पक्षः विपक्षस्य यस्मिन् राज्ये शासनम् अस्ति, तस्मिन् राज्ये शासकात् सत्ताम् अपकर्ष्य राष्ट्रपतिशासनस्य घोषणां कारयति । राज्ये कोपि पक्षः बहुमतं सिद्धं कर्तुम् असमर्थः भवति चेदपि राष्ट्रपतिशासनं भवति । परन्तु तत् आपत्कालत्वेन न परिगण्यते ।
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"source": "wikipedia"
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बैतूल इत्येतन्नगरं मध्यप्रदेशराज्यस्य नर्मदापुरविभागे अन्तर्गतस्य बैतूलमण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति ।
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"source": "wikipedia"
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1599 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः साधारण-वर्षः आसीत्।
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सः अयोध्याकुलस्य राजा आसीत्।
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ब्रिंदिज़ी इटली देशस्य एकः नगरं अस्ति । इटली यूरोप दक्षिणे एक: प्राचीन क्षेत्र अस्ति ।
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1729 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः साधारण-वर्षः आसीत्।
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अयं भगवद्गीतायाः प्रथमोध्यायस्य अर्जुनविषादयोगस्य नवदशः श्लोकः ।
सः, घोषः, धार्तराष्ट्राणाम्, हृदयानि, व्यदारयत् । नभः, च, पृथिवीम्, च, एव, तुमुलः, व्यनुनादयन् ॥
सः तुमुलः घोषः नभः पृथिवीं च व्यनुनादयन् धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
सर्वेऽपि महावीराः युगपदेव शङ्खान् ध्मातवन्तः इति तदा महान् घोरश्च शब्दः समुत्पन्नः । तेन आकाशे भूमौ च प्रतिध्वनिः जातः । तस्य घोषस्य श्रवणेन दुष्टानां कौरवाणां हृदयानि विभिन्नानि इव अभवन् ।
ततो युधिष्ठिरो वृकोदरादयश्च स्वकीयान्शङ्खान्पृथक्पृथक्प्रदध्मौ । स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषामेव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद । अदयैव नष्टं कुरूणां बलमिति धार्तराष्ट्रा मेनिरे । एवं तद्विजयाभिकङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयोऽकथयत॥1.151.19॥
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भारतीय लेखकः।
अनेन काश्मीरस्य इतिहास: लिखित: । एतस्य ऐतिहासिककाव्यस्य नामधेयं राजतरङ्गिणी इति ।
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निर्देशाङ्कः : 8°0′39.1″ उत्तरदिक् 80°30′45.6″ पूर्वदिक् / 8.010861°उत्तरदिक् 80.512667°पूर्वदिक् / 8.010861; 80.512667
अवुकाना-प्रतिमा /ˈəʊɑːɑː əɪɑː/) मध्यश्रीलङ्कायाः केकीरवा-विभागे स्थिता बुद्धस्य प्रतिमा अस्ति । सा प्रतिमा 40 फीटपरिमिता उन्नता अस्ति । विशालायां ग्रेनाट्-शिलायाम् उत्कीर्णा सा प्रतिमा पञ्चम्यां शताब्द्यां निर्मिता इति अनुमीयते । सा प्रतिमा अभयमुद्रायाः भिन्नं स्वरूपं दर्शयति । तस्यां प्रतिमायां सुक्ष्मोत्कीर्णनं जातम् अस्ति । मुख्यतया वस्त्रस्य सुष्ठु उत्कीरितुम् अधिकं कार्यं कृतम् इति दृश्यते । धातुसेननामकस्य राज्ञः समये उत्कीर्णा एषा प्रतिमा शिक्षकविद्यार्थिषु योजितायाः स्पर्धायाः फलम् अस्ति । सद्यः तत्स्थलं पर्यटनाय उत्तमस्थलं मन्यते ।
अवुकाना-प्रतिमा मध्यश्रीलङ्कायाः केकीरवा-विभागे स्थिते अवुकाना-ग्रामे विद्यते । तस्य ग्रामस्य अपरं नाम औकाना अपि प्रसिद्धम् । प्रतिमायाः सम्मुखं काला-वेवा इत्याख्यः सरोवरः अस्ति । बुद्धप्रतिमा सरोवराभिमुखी अस्ति । विशालायाः ग्रेनैट-शिलया निर्मिता सा प्रतिमा गिरिकायाः भिन्ना न कृता, अपि तु गिरिकायाः सम्मुखे स्थितस्य भागस्य उत्कीर्णनं कृत्वा अपरः भागः गिरिकया सह सँल्लग्नः एव स्थापितः । तेन प्रतिमायाः आधारे दृढे सति सा विशालप्रतिमा स्थविरा अभवत् । परन्तु प्रतिमायाः कमलाकारम् आसनं भिन्नतया उत्कीर्य प्रतिमायाः आधारः निर्मितः अस्ति । आसनं विना प्रतिमायाः औन्नत्यं 38 फीट् 10 इञ्च् अस्ति । आसनस्य औन्नत्यं परिगण्य यदि प्रतिमायाः आहत्यौन्नत्यं परिगणयामः, तर्हि प्रतिमायाः औन्नत्यं 42 फीटपरिमितं भवति । प्रतिमायाः अग्रे एकं मन्दिरम् अस्ति । पुरा तस्मिन् मन्दिरे एव एषा प्रतिमा आसीत् । अद्यापि तत्र अनेके अवशेषाः उपबद्धाः । तस्य मन्दिरस्य भित्तिः इष्टिकाभिः, प्रस्तरैश्च निर्मिता अस्ति । तस्य मन्दिरस्य लम्बता 74 फीट, विस्तारश्च 63 फीट अस्ति ।
श्रीलङ्कायाः प्राचीनबौद्धप्रतिमासु अवुकाना-प्रतिमायाः उल्लेखः भवति । एषा प्रतिमा गान्धार-अमरावत्योः शिल्पशैल्या निर्मिता इति स्पष्टतया ज्ञायते । बुद्धमूर्तेः शरीरे वस्त्राणि कुण्ठतया धृतानि इति प्रदर्शितम् । अतः बुद्धस्य शरीराकृतिः स्पष्टतया दृष्टुं शक्यते । श्रीलङ्कायाः बौद्धपरम्परानुगुणं बुद्धप्रतिमायाः दक्षिणस्कन्धः वस्त्रेण आच्छादितः अस्ति, परन्तु वामस्कन्धः अनावृतः अस्ति । सावधानस्थित्यां दर्शितस्य बुद्धशरीरस्य वामहस्तेन वस्त्रं धृतम् अस्ति इति आकृतेः स्वरूपम् अस्ति । दक्षिणहस्तः स्कन्धं यावत् उन्नतं कृत्वा करतलं वामतः वक्रीकृतम् अस्ति । यस्यां मुद्रायां बुद्धप्रतिमा अस्ति, सा मुद्रा आशीर्मुद्रा इति प्रसिद्धा । सा आशीर्मुद्रा अभयमुद्रायाः एव कश्चन प्रकारः ।
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राजारामण्णः कश्चन अणुविज्ञानी, श्रेष्ठः भौतशास्त्रज्ञः च । भारतीयाण्वस्त्रकार्यस्य आरम्भस्तरे संशोधननिर्देशनं यत् एतेन कृतं तत् महत्त्वपूर्णम् अस्ति । अस्मिन् कार्ये 1964 तमे वर्षे आत्मानं योजितवान् अयं होमिजहाङ्गीर्भभावर्यस्य मार्गदर्शने कार्यम् अकरोत् । ततः 1967 तमे वर्षे स्वयं निर्देशनम् अकरोत् । अण्वस्त्राणां वैज्ञानिकसंशोधनस्य अवलोकनं विस्तारः च अनेन कृतम् । 1974 तमे वर्षे 'स्मयमानः बुद्धः' इत्येतेन गूढनाम्ना विज्ञानिगणेन अण्वस्त्रपरीक्षाः याः क्रियन्ते स्म तस्य निर्देशाधिकारी आसीत् रामण्णः ।
रामण्णः दशकचतुष्टयं यावत् भारतीयाण्वस्त्रकार्यस्य निर्देशनम् अकरोत् । अपि च भारतीयसैन्यस्य कृते औद्योगिकरक्षणकार्याणां च आरम्भं कृतवान् । दशकचतुष्टयं यावत् भारतीयाण्वस्त्रकार्यस्य संवर्धनं निर्देशनं च तेन कृतम् इत्यतः सः भारतीयाण्वस्त्रकार्यस्य पिता इति निर्दिश्यते । अस्य कार्यार्थं तेन श्रेष्ठभारतीयपौरप्रशस्तिः प्राप्ता । रामण्णः 2004 तमे वर्षे 79 तमे वयसि मुम्बयीनगरे दिवङ्गतः । वैज्ञानिकत्वेन भौतविज्ञनित्वेन च सः भारते पाकिस्थाने च बहु प्रसिद्धः । अणु-भौतशास्त्रेस्य संवर्धने सः श्रेष्ठत्वेन परिगण्यते ।
भारतीयाण्वस्त्रकार्यं 1947 तमे वर्षे जवाहरलालनेहरूवर्येण आरब्धम् । होमी जे बाबा आदौ निर्देशकः आसीत् । भौतशास्त्रे विद्यावारिधेः प्राप्त्यनन्तरं 1954 तमे वर्षे भारतं प्रत्यागतः रामण्णः ज्येष्ठतान्त्रिकसहायकत्वेन भाभा-अणुसंशोधनकेन्द्रं प्राविशत् । तत्र सः होमिजहाङ्गीरभाभावर्यस्य मार्गदर्शने अण्वस्त्रपरियोजनायां कार्यम् अकरोत् ।
भाभावर्यः साक्षात् कार्यस्य विषये अवधानम् अयच्छत्, रामण्णः अण्वस्त्रप्रयोगाय योग्यस्य क्षेत्रस्य चयनाय सूचितः । सः पोख्रान्क्षेत्रे अस्य कार्यस्य आरम्भं कृतवान् ।होमिभाभावर्यस्य दुरन्तमरणस्य अनन्तरं झटिति रामण्णः तस्याः योजनायाः निर्देशनाधिकारित्वेन नियोजितः । सः प्रथमाण्वस्त्रस्य निर्माणे उद्युक्तः । आरम्भविन्यासः तदीये मार्गदर्शने समाप्तः । तन्निमित्तम् अपेक्षितस्य अण्वस्त्रस्फोटकवस्तुनः निर्माणं 1970 तमे वर्षे सम्पन्नम् । प्रथमम् अण्वस्त्रं यदा सिद्धं तदा रामण्णः तदानीन्तन-प्रधानमन्त्रिण्य्याः इन्दिरागान्धेः समीपम् अगच्छत् ।इन्दिरागान्धिवर्या मौखिकरूपेण अङ्गीकारम् असूचयत् । अनुपदं रामण्णः पोख्रानं प्रति अगच्छत् यत्र तेन अण्वस्त्रक्षेत्रं निर्मितम् आसीत् । अत्यन्तं रहस्येन जागरूकतया च सज्जताः कृताः । अण्वस्त्रं ट्राम्बेतः पोख्रानं प्रति आनीतम् । क्षेत्रे अण्वस्त्रं समायोजितम् इन्दिरागान्धेः आगमनात् प्राक् । 1974 तमस्य वर्षस्य मेमासस्य प्रातःकाले रामण्णः 'स्मयमानः बुद्धः' इति गूढनाम्ना युतस्य लघ्वण्वस्त्रस्य परीक्षाम् अकरोत् । परीक्षा सफला जाता । पत्रिकासु इन्दिरया स्थितौ रामण्ण-डा होमिसेथ्नयोः भावचित्राणि सर्वत्र प्रकाशितानि । इदं साधनं पुरस्कृत्य एव भारतीयश्रेष्ठपौरप्रशस्तिः सर्वकारेण प्रदत्ता । तेन अन्तराष्ट्रियप्रसिद्धिः प्राप्ता । भारतीय वैज्ञानिकः।
तदग्रिमेषु कालेषु अण्वस्त्रवर्धनस्य अवरोधकनियमाः तेन गभीरतया आरचिताः । पाकिस्थाने सम्पन्ने वार्षिक-अन्ताराष्ट्रियभौतशास्त्रसम्मेलने अयम् अणुभौतशास्त्रविषये, अणुशक्तिविषयेषु च भाषणम् अकरोत् । भारत-पाकिस्थानयोः शान्तिस्थापनाय, अण्वस्त्रप्रयोगस्य अवरोधाय च बहु प्रयत्नम् अकरोत् । 1980 - 1990 तमेषु वर्षेषु रामण्णः रक्षणसंशोधनसंवर्धनकेन्द्रस्य निर्देशकत्वेन कार्यम् अकरोत् । 2000 तमे वर्षे रक्षणमन्त्रिणः वैज्ञानिकमार्गदर्शकत्वेन दायित्वं निरवहत् । 1984 तमे वर्षे सः अन्ताराष्ट्रिय-अणुशक्ति-संस्थां प्राविशत् । तस्य 30 त्तमे सम्मेलने आध्यक्षं निरवहत् ।
1990 तमे वर्षे वि पि सिङ्गस्य शासनावधौ रामण्णः राज्यरक्षणसचिवत्वेन नियुक्तः । राजनैतिकजनैः प्रोत्साहितः सः निर्वाचने राज्यसभासदस्यः जातः । 2000 तमे वर्षे सः बेङ्गलूरुनगरे विद्यमानस्य न्याषनल् इन्स्टिट्यूट् फार् अड्वान्स्ड् स्टडीस् संस्थायाः प्रथमनिर्देशकः जातः ।
राजारामण्ण सेण्टर् फार् अड्वान्स्ड् स्टडीस्
रागे सङ्गीतविन्यासः पाश्चात्यव्यवस्था च
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अयं भगवद्गीतायाः दशमोऽध्यायस्य विभूतियोगस्य द्वात्रिंसशत्तमः श्लोकः ।
सर्गाणाम् आदिः अन्तः च मध्यम् च एव अहम् अर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानाम् वादः प्रवदताम् अहम्॥32॥
अर्जुन सर्गाणाम् आदिः मध्यं च अन्तः च एव अहम्, विद्यानाम् आध्यात्मविद्या, प्रवदतां वादः अहम्।
हे अर्जुन! अहमेव कृत्स्नानां सृष्टीणां मूलः स्थितिः लयः च अस्मि। अहं विद्यासु अध्यात्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानं अस्मि तथैव वक्तृद्वारा वादः जल्पः वितण्डा च इति प्रयुक्तानां एषां त्रिप्रकाराणां वदनभेदानां अर्थनिर्णयहेतुः वादः अस्मि अहम्।
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बुद्धस्वामिः एकः संस्कृतकथाकारः वर्तते । श्लोकसंग्रहनामायं ग्रन्थो बुध्दस्वामिना कृतः ।
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गोसम्बद्धं सर्वं गव्यम् इति उच्यते । गौः सर्वत्र पूज्या एव । तया वयं यत् यत् प्राप्नुमः तत् सर्वम् अमृतसमानम् एव । अतः एव सा "कामधेनुः" इति उक्तम् अस्ति ।
क्षीरं, दधि, घृतम्, गोमूत्रं, गोमयम् - इति एतेषु एकैकमपि गव्यं विशिष्टगुणयुक्तं भवति । यदि पञ्च अपि गव्यानि विधिवत् मन्त्रपूर्वकं योजयाम: तर्हि तद्भवति इतोऽपि विशिष्टं 'पञ्चगव्यम् ।’ भारतीयानां सुपरिचितमेव इदं शुद्धिकारकं पञ्चगव्यम् । आशौचान्ते पञ्चगव्यप्राशनं कृत्वा शुद्धा: भवन्ति जना: । पञ्चगव्यसेवनसमये उच्यमानोऽयं श्लोकं ज्ञापयति तदीयं महत्त्वम् -
पञ्चगव्यघृतम्’ इति विशिष्ट: योग: आयुर्वेदे प्रयुज्यते । तदुक्तम् -
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कमलम् किञ्चन पुष्पम् अस्ति। कमलं भारतस्य राष्ट्रियपुष्पम् अपि ।पङ्के जातम् अपि इदं पङ्कहीनं स्वच्छं भवति । इदं सौन्दर्यस्य, कोमलताया:, निर्मलताया: शान्ते: च द्योतकं वर्तते ।
कमसस्यानि जले भवन्ति चेदपि बाहिः आनयामः चेत् पत्रेषु जलं लिप्तं न भवति ।
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14°41′उत्तरदिक् 77°36′पूर्वदिक् / 14.68°उत्तरदिक् 77.6°पूर्वदिक् / 14.68; 77.6
• सान्द्रता
• 190 /किमी2
अनन्तपुरमण्डलम् आंध्रप्रदेशराज्ये स्थितम् एकं मण्डलम् ।
मौर्यैः, बाणैः, राष्ट्रकूटिभिः, चोलैः, चालुक्यैः, होयसल्-विजयनगरराजैः, असप्जाहीवंशजैः, आग्लेयैश्च परिपालितम् अनन्तपुरमण्डलम् । 1881 तमे वर्षे आविर्भूतमिदं मण्डलम् । अनन्तसागराख्यं किञ्चन सरः वर्तते इत्यतः अनन्तपुरम् इति नामाभिहितम् । आन्ध्रप्रदेशराज्यस्य प्रथममुख्यमन्त्री श्रीमान् नीलं सञ्जीवरेड्डिः, मर्कसिस्ट्-दलनायकः नीलं राजशेखररेड्डिः च अस्य मण्डलस्य वासिनौ ।
मण्डलस्य प्राच्यां कडपमण्डलं, पश्चिमदक्षिणयोः कर्णाटकराज्यम्, उत्तरेकर्नूलुमण्डलं च सीमायां विराजन्ते । मैसूरुपीठभूमेः उत्तर सीमायां समुद्रोपरितलात् 670 कि.मी उन्नतमस्ति इदं मण्डलम् । 10.2% भूभागः अरण्य एन विस्तृतः । वज्रकरुरप्रान्ते वज्रनिधिः पेन्ना, कुमदवल्ली, भैरवमनितिप्पा,तुङ्गभद्रा इत्यादिभ्यः जलं लभ्यते । मल्बरीवनानि, क्षुमानीडानि इत्यादयः जलजातीनाम् – उपाधिमार्गाः ।
कलायः आढकी, कार्पाशः, पलाण्डुः, फलानां च सस्यं विस्तृतं वर्तते । श्रीकृष्णदेवरायविश्वविद्यालयः, सत्यसायीविश्वविद्यालयः च वर्तेतेऽत्र ।
लेपाक्षीस्थितः नन्दीश्वरालयः, ताडिपत्रिस्थः चिन्तलरामस्वामिदेवालयः, कदिरिग्रामे श्रीलक्ष्मीनरसिंहस्वामिदेवालयः,पुट्टपर्ति सत्यशायिसन्निधिः, पेनुगोण्ड गगनमहलदुर्गं, पेन्ना-अहोबिले पेन्ना-जलपादं, तत्रापि लक्ष्मीनरसिंहस्वामिदेवालयः इत्यादीनि प्रमुखपर्याटककेन्द्राणि सन्ति ।
चित्रावती नदी सूर्यास्तमयः, पुट्टपर्त्तिः
शिवलिङ्गः, लेपाक्षी
गडियारस्तम्भः, अनन्तपूरम्
वीरभद्रदेवालयः, लेपाक्षी
इस्कान् देवालयः
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अयं भगवद्गीतायाः सप्तदशोध्यायस्य श्रद्धात्रयविभागयोगस्य षष्ठः श्लोकः ।
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम् अचेतसः मां च एव अन्तः शरीरस्थं तान् विद्धि आसुरनिश्चयान् ॥
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः अचेतसः शरीरस्थं भूतग्रामम् अन्तःशरीरस्थं मां च एव कर्शयन्तः ये जनाः अशास्त्रविहितं घोरं तपः तप्यन्ते तान् आसुरनिश्चयान् विद्धि ।
येषु पुनः धार्मिकतया आत्मनः ख्यापनम्, अहङ्कारः, विषयाभिलाषः, विषयाभिनिवेशः, आग्रहः इत्यादयः गुणाः सन्ति ते अविवेकिनः स्वशरीरे वर्तमानं पृथिव्यादिभूतसमूहं मां च कृशीकुर्वन्तः अशास्त्रीयं घोरं तपः कुर्वन्ति । तादृशाः उग्रकर्माणः इति ज्ञातव्यम् ।
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खजुराहो भारतस्य मध्यप्रदेशस्य छतरपुरमण्डले स्थितं नगरम् अस्ति यत् स्वस्य प्राचीनानां मध्यकालीनानां मन्दिरणां विषये विश्वविख्यातम् । एतत् स्थानं मध्ययुगे क्रिस्ताब्दे 950 तः 1650 पर्यन्तं बुन्देलखण्डे प्रशासनं कृतवतां चन्देलराजपुत्राणां राजधानी आसीत् । देवालयानां केन्द्रम् अपि आसीत् । अत्र आहत्य 85 देवालयाः आसन् इति चीनीप्रवासी ह्यू येन् त्स्याङ्ग् स्वपुस्तके लिखितवान् अस्ति । इदानीं विंशतिदेवालयाः सन्ति ।
सर्वधर्मसमन्वयकेन्द्रमेतत् । शैव-वैष्णव-जैन-बौद्धानां मन्दिराणि अत्र सन्ति । सर्वाणि मन्दिराणि अपूर्वाणि कलात्मकानि दर्शनीयानि च सन्ति । स्वयमपूर्णाः उत्तमवास्तुकलायुक्ताः देवालयाः इदानीमपि मनमोहकाः सन्ति ।
देवालयात् बहिः भित्तौ अलङ्करणं देवालयस्य सौन्दर्यवर्धकमस्ति । अत्र देवाः, प्राणिनः, सैनिकाः, सङ्गीतवादकाः, गायकाः, मिथुनशिल्पानि इण्डो-आर्यन्- शैल्या रचितानि सन्ति ।देवालयेषु लक्ष्मणदेवालयः, लक्ष्मीः-वराहः- महादेवः- जगदम्बादेवालयाः पश्चिमभागे सन्ति । चित्रगुप्तदेवालयः सूर्याय अर्पितः अस्ति । अत्र नर्तक्यः, मृगयादृश्यम् इत्यादीनि अपूर्वाणि शिल्पानि सन्ति । गर्भगृहे सप्ताश्वरथम् चलयतः सूर्यस्य शिल्पम् आकर्षकम् अस्ति ।
एकादशशिरस्कः श्रीहरिविग्रहः अत्र विशिष्टः अस्ति । मध्ये विद्यमानं शिरः विष्णोः अस्ति । इतराणि दशावतारस्य शीर्षाणि सन्ति । महादेवमन्दिरे त्रिपट्टिकास्तरेषु देवतामूर्तयः, सुन्दरस्रियः, सङ्गीतज्ञाः मिथुनशिल्पानि च चित्रितानि सन्ति । बृहन्नन्दी अपि आकर्षकः अस्ति । दशमे शतके अस्य निर्माणम् अभवत् । लक्ष्मणदेवालयस्य पार्श्वे मतङ्गेश्वरदेवालये अष्टपादोन्नतं शिवलिङ्गं द्रष्टुं शक्नुमः । देवालयसङ्कीर्णात् बहिः एषः देवालयः अस्ति ।
देवालयावरणे एव वस्तुसङ्ग्रहालयः अस्ति । तत्र नर्तनगणेश- हरिहर-भूवराह- शेषशायिविष्णुः-बुद्धः-अप्सर-सदाशिव-मौनीहरीत्यादयः विग्रहाः सन्ति । कन्दर्यमहादेवदेवालयः भारतीयशिल्पकलाद्योतकः अतीवसुन्दरःच अस्ति । गोपुर 11 मीटर मितोन्नत’ अत्र 872 विग्रहाः सन्ति । शिखरम् अतीव सुन्दरम् अस्ति । पूर्वभागे पार्श्वनाथ-आदिनाथ-शान्तिनाथानां मन्दिराणि सन्ति । पार्श्वनाथमन्दिरे स्थितानि शिल्पानि बेलूरुशिलाबालिकासदृशानि सन्ति । दक्षिणभागे चतुर्भुजदेवालयः अस्ति ।
प्राचीनकाले अस्य नगरस्य खर्जूरपुरम् अथवा खर्जूरवाहिका इति नाम आसीत् । अत्र अधिकसङ्ख्यया हैन्दवानां जैनानां च मन्दिराणि सन्ति । समग्रे विश्वे शिलानिर्मितमन्दिराणां विषये खुजुराहो नगरं प्रसिद्धम् । अत्रस्थम् अप्रतिमं प्रेमकलावैभवम् अनुभवितुं न केवलं भारतीयाः वैदेशिकाः पर्यटकाः अपि निरन्तरम् आगच्छन्तः भवन्ति । कुशलाः शिल्पिनः स्थपतयः मध्यकाले च सनातनसंस्कृतिं शिल्पकलामाध्यमेन अत्र शिलासु उदकारीन् । रतिक्रीडायाः विविधानि आसनानि अत्र शिल्पेषु चित्रितानि ।
खुजुराहो शिल्पवैभवस्य इतिहासः सहस्राधिकवर्षेभ्यः पूर्वतनः । एतन्नगरं चन्देलसाम्राज्यस्य प्रथमा राजधानी आसीत् । चन्देलवंशस्य खुजुराहोनगरस्य च संस्थापकः चन्द्रवर्मा राजा यः बुन्देलखण्डस्य प्रशासिता राजपुत्रवंशस्य राजा आसीत् । सः आत्मानं चन्द्रवंशीयराजः इति मन्यते स्म । एते राजानः दशमशतकात् एकादशशतकपर्यन्तं मध्यभारते प्रशासनम् अकुर्वन् । खुजुराहोमन्दिराणां निर्माणं क्रि.श. 950तः क्रि.श. 1050तमवर्षमध्ये चन्देलराजैः कृतम् । मन्दिरनिर्माणस्य पश्चात् चन्देलराजाः राजधानीं महोबानगरान्तरम् अकुर्वन् । तथापि खुजुराहो महत्त्वं रक्षितम् एव अभवत् । मध्यकालीनः आस्थानकविः चन्द्रवरदायी इत्याख्यः पृथ्वीराज रासो इति काव्ये चन्देलवंशस्य उत्पत्तेः कथावर्णनं कृतवान् । एषः तत्र लिखितवान् यत् वाराणस्याः राजपण्डितस्य पुत्री हेमवती अपूर्वसौन्दर्यस्य स्वामिनी आसीत् । कदाचित् ग्रीष्मकालस्य रात्रौ सा कमलपुष्पैः पूर्णे सरसि स्नानं कुर्वती आसीत् ।
तस्या अनुपमं सौन्दर्यं दृष्ट्वा भगवान् चन्द्रः तस्याम् अनुरक्तः अभवत् । सः मानवरूपेण अवतीर्य हिमवत्याः अपहरणम् अकरोत् । एकपुत्रवती सा हेमवती दौर्भाग्येन विधवा आसीत् । सा चन्द्रदेवस्य उपरि जीवनं मानं च नाशितवान् इति आक्षेपं कृतवती । स्वापराधात् पश्चात्तपम् अनुभवन् चन्द्रदेवः वीरपुत्रजननी भव इति हेमवत्यै वरमेकम् दत्त्वा एवम् अवदत् "तं पुत्रं खर्जूरपुरं नयतु । तत्र सः महान् राजा भविष्यति, राजा भूत्वा उद्यानैः सरोभिः परिवृतानानां मन्दिराणां निर्माणं करिष्यति । पश्चात् कस्यचित् महायज्ञस्य आयोजनं करिष्यति येन भवत्याः सर्वपापनि क्षयं गमिष्यन्ति" इति । चन्द्रस्य निदेशनम् अनुसरन्ती हेमवती गृहं त्यक्त्वा कुग्राममेकं गत्वा पुत्रं प्रसूतवती । हेमवत्याः पुत्रः चन्द्रवर्मा स्वपित्रा समं तेजस्वी शूरः शक्तिशाली अभवत् । सप्तदशे वयसि शस्त्रैः विना सिंहं व्याघ्रं च हन्तुं शक्नोति स्म । पुत्रस्य अप्रतिमं शौर्यं दृष्ट्वा हेमवती चन्द्रदेवस्य आराधनम् आरभत । भक्त्या प्रसन्नः चन्द्रदेवः चन्द्रवर्मणे उपहाररूपेण दत्त्वा खुजरहोनगरस्य राजानम् अकरोत् । चन्द्रवर्मा अनेकेषु युद्देषु निरन्तरं जयम् अवप्नोत् । एषः कालिन्दरप्रदेशे दीर्घं कोटं निर्मितवान् । मातुः आशयानुसारं खुजुराहोप्रदेशे सरोभिः उद्यानैः च परिवृतानि 85मन्द्रिराणि निर्मितवान् । कञ्चित् यज्ञम् अनुष्ठितवान् येन माता पापमुक्ता अभवत् । तस्य उत्तराधिकारिणः राजनः अपि तत्र मन्दिराणां निर्माणम् अकुर्वन् ।
यदा आङ्ग्लेयः अभियन्ता टि.एस्.बर्ट् इत्येषः खुजुराहोस्थाने मन्दिराणां विशालं समूहमेकम् अन्विष्टवान् तदारभ्य अस्य पश्चिममन्दिरसमूहः इति ख्यातिः प्राप्ता । एतत् खुजराहोप्रदेशस्य अत्याकर्षकस्थानेषु अन्यतमम् अस्ति । एतत् स्थानं युनेस्को संस्थया क्रि.श. 1986तमे वर्षे विश्वपरम्परास्थानम् इति उद्घुष्टम् । अस्य ताप्तर्यं यत् अस्य उद्धारस्य संरक्षणस्य दायित्वं समग्रविश्वस्य इति । शिवसागरनद्याः समीपे स्थितस्य अस्य स्थानस्य दर्शनेन एव पर्यटकानां यात्रा आरभ्यते । अत्र प्रवेशार्थं निश्चितशुल्कधनम् अर्पणीयं भवति । सैकल्यानेन सञ्चरन् खुजुराहोस्थानि मन्दिराणि दृष्टुं सौकर्यं भवति । अत्र प्रतिहोरा 20रूप्यकस्य भाटकेन सैकल्यानं लभ्यते । अस्मिन् परिसरे विशालमन्दिराणाम् अलङ्कारः अधिकः एव कृतः । इयं सज्जात अत्रत्यानां प्रशासकराजानां सामर्थ्यं प्रकटयति । एवम् अत्र तैः राजभिः सनातनदेवतानां विषये प्रकटितः भक्तिभावः इति इतिहासकाराणाम् अभिप्रायः । देवकुलस्य चित्रेषु विष्णुः अथवा शिवः प्रदर्शितः । अस्मिन् परिसरे स्थितं लक्ष्मणमन्दिरम् उन्नतस्तरस्य मन्दिरम् अस्ति । अत्र भगवान् विष्णुः वैकुण्ठे इव उपविष्टः अस्ति । षट्पादपरिमितोन्नतस्य विष्णुविग्रहस्य मुखत्रयम् अस्ति । तत्र एकं मनुष्यशिरः एकं सिंहशिरः, अपरं वराहशिरः । एषः विग्रहः काश्मीरस्य चम्बाकन्दरतः आनीतः इति लोकविश्वासः । अस्य विग्रहस्य दक्षिणपार्श्वे सामान्यजनजीवनस्य प्रतिदिनव्यवहारस्य गृहस्थजीवनस्य नर्तकानां च चित्राणि उत्कीर्णानि । मन्दिरस्य प्रधानवेदिकायाः चत्वाराः सहायकमञ्चाः सन्ति । एते क्रि.श. 954तमे वर्षस्य तान्त्रिकतायुत्तः देवलयाः । अस्य अग्रभागः द्विविधमूर्तिकलाभ्याम् अलङ्कृतः । मध्यभागः आलङ्गितमिथुनस्य शिल्पेन अलङ्कृतः । मन्दिरस्य पुरतः द्वे लघुवेदिके स्तः । एका देव्यै अपरा वराहाय च समर्पिता । बृहद्वाराहमूर्तिः एकयैव पीतशिलया निर्मिता अस्ति ।
लक्ष्मीमन्दिरम् वराहमन्दिरं च ।
वराहमन्दिरम् ।
वराहमन्दिरम् ।
वराहमन्दिरम् ।
वराहमन्दिरम् ।
वराहमन्दिरम् ।
वराहमन्दिरम् ।
वराहमन्दिरम् ।
लक्षमणदेवालयस्य विष्णुमूर्तिः
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
लक्ष्म्णमन्दिरस्य दर्शनम् ।
खुजुराहोपश्चिममन्दिरसमूहे विशलतमः देवालयः कन्दर्यमहादेवालयः । एतन्मन्दिरं स्वस्य भव्यातार्थं प्रसिद्धम् । राजा महाचन्देलः महम्मदगज़नीं विरुध्य सङ्ग्रामे जयं प्राप्य तस्य स्मरणार्थं क्रि.श. 1050तमे वर्षे अस्य देवालयस्य निर्माणं कृतवान् । तान्त्रिकसमुदायं प्रसन्नं कर्तुम् अस्य शैवमन्दिरस्य निर्माणं कृतम् । अस्य कन्दर्यमहादेवमन्दिरस्य औन्नत्यं सामान्यतः 107पादपरिमितम् अस्ति । मकरतोरणम् अस्य वैशिष्ट्यम् । मन्दिरस्य अमृतशिलालिङ्गे अत्यधिकोर्जायुतं मिथुनम् अस्ति । अलेग्साण्डर् कनिङ्घम् इति पर्यटकस्य अवलोकनानुसारम् अत्र अत्यधिकसङ्ख्यायां मिथुनशिल्पानि सन्ति । एषः मन्दिरात् बहिः 646मिथुनाकृतयः, मन्दिरस्य अन्तः 246 मिथुनाकृयः सन्तीति गणनाम् अवदत् ।
कन्दर्यमहादेवमन्दिरम् ।
कन्दर्यमहादेवमन्दिरम् ।
कन्दर्यमहादेवमन्दिरम् ।
कन्दर्यमहादेवमन्दिरम् ।
कन्दर्यमहादेवमन्दिरम् ।
कन्दर्यमहादेवमन्दिरम् ।
एतन्मन्दिरं कन्दर्यमहादेवस्य देव्याः मन्दिरस्य च मध्ये निर्मितम् अस्ति ।
पुरस्तात् सिंहमन्दिरम् ।
सिंहमन्दिरं पार्श्वदर्शनम् ।
कन्द्ररियामहादेवस्य मन्दिरवेदिकायाः उत्तरभागे देव्याः जगदम्बायाः मन्दिरम् अस्ति । अस्य मन्दिरस्य निर्माणं क्रि.श. 1000तः क्रि.श. 1025तमवर्षाणां मध्ये अभवत् । तदा एतत् विष्णुमन्दिरम् आसीत् । शताधिकवर्षाणां पश्चात् छतरपुरस्य महाराजः अस्यां देव्याः पार्वत्याः प्रतिमां प्रतिष्ठापितवान् । तदारभ्य एतत् देव्याः जगदम्बायाः मन्दिरम् इति प्रसिद्धम् । अत्रस्थेषु मिथुनशिल्पेषु गाढसंवेदनशीलता दृश्यते इति विशेषः । एतन्मन्दिरं शार्दूलानां काल्पनिकचित्रणार्थं प्रसिद्धम् अस्ति । अत्र शार्दूलः नाम शरीरं व्याघ्रस्य मुखं हस्तिनः अथवा वराहस्य भवति ।
जगदम्बामन्दिरस्य द्वारपालकशिल्पम्।
जगदम्बामन्दिरस्य मुखदर्शनम् ।
मन्दिरे जगदम्बामूर्तिः ।
मन्दिरस्य अन्तः।
मन्दिरस्य स्तम्भशिल्पः ।
खुजुराहोसूर्यमन्दिरस्य नाम चन्द्रगुप्तमन्दिरम् इति । अयं मन्दिरसमूहमञ्चे विद्यमानः चतुर्थः देवालयः । अस्य निर्माणं राज्ञः विद्याधरस्य काले अभवत् । अस्मिन् देवालये षट्पादपरिमितः सकवचः सूर्यविग्रहः अस्ति । अत्र सूर्यप्रतिमा सप्ताश्वरथे स्थापिता अस्ति । अत्र मन्दिरस्य शिल्पेषु मूर्तिकारः कश्चित् आसन्दे उपविष्टः इव चित्रितः अस्ति इति विशेषः । मन्दिरस्य दक्षिणपार्श्वस्य भित्तौ महाविष्णोः एकादशीर्षयुक्तः विग्रहः अस्ति । उद्यानस्य मार्गे पूर्वस्यां दिशि पार्वत्याः मन्दिरं तिष्ठति । अयं लघुदेवालयः पूर्वं विष्णोस्स्थानम् आसीत् । छतरपुरस्य महाराजः प्रतापसिंहः क्रि.श. 1843तः क्रि.श. 1847तमवर्षाणां मध्ये निर्मितवान् । अत्र गोधावाहनवत्याः पार्वत्याः प्रतिमा अस्ति । अस्य पार्वतीमन्दिरस्य दक्षिणदिशायां विश्वनाथमन्दिरम् अस्ति । एतत् खुजुराहोस्थानस्य अतिविशालं मन्दिरम् । अस्य मन्दिरस्य देवः भगवान् शङ्करः । क्रि.श. 999तमे वर्षे राजा धङ्गः निर्मितवान् । अस्मिन् मन्दिरे किञ्चित् शिवलिङ्गम्, पत्रं लिखन्तीनां सङ्गीतं कुर्वतीनाम् अप्सरसां चित्राणि सन्ति ।
सूर्यमन्दिरस्य पार्श्वदूरदर्शनम् ।
सूर्यमन्दिरस्य प्रवेशः ।
सूर्यमन्दिरस्य भित्तिशिल्पः ।
सूर्यमन्दिरस्य भित्तिशिल्पः ।
सूर्यमन्दिरस्य गोपुरशिल्पः ।
शैवमन्दिरेषु अत्यन्तं महत्वपूर्णं विश्वनाथमन्दिरम् । अस्य निर्माणः क्रि.श. 1002-1003वर्षयोः अभवत् । पश्चिमदेवालयसमूहेषु विद्यमानस्य अस्य मन्दिरस्य सौन्दर्यम् अनुपमम् अस्ति । मन्दिरस्य दैर्घ्यं 89पादपरिमितं, विस्तीर्णः 45वर्गपादपरिमितं चास्ति । पञ्चायतनशैल्या निर्मितः प्रासादः शिवभगवते समर्पितः अस्ति । गर्भगृहे शिवलिङ्गेन सह मध्यभागे नन्दीवाहनस्य शिवस्यापि मूर्तिः प्रतिष्ठापिता ।
विश्वनाथमन्दिरस्य दूरदर्शनम् ।
मन्दिरे शिवलिङ्गम् ।
मन्दिरस्य पाङ्गणे गजशिल्पः ।
मन्दिरपरिसरे अपरं शिवलिङ्गम् ।
विश्वनाथमन्दिरस्य पार्श्वे स्थितः नन्दिदेवालयः ।
नन्दिमन्दिरस्य दूरदर्शनम् ।
नन्दिप्रतिमायः पार्श्वदृश्यम् ।
नन्दिविग्रहस्य अपरपार्श्ववीक्षणम् ।
नन्दिविग्रहस्य पुरतः वीक्षणम् ।
पार्वतीमन्दिरस्य गर्भगृहगोपुरम् ।
पार्वतीमन्दिरस्य गोपुरदर्शनम् ।
पार्वतीमन्दिरस्य प्रवेशमहाद्वारम् ।
पार्वतीमन्दिरस्य दूरदर्शनम् ।
अस्मिन् मन्दिरपरिसरे सायम् अमिताभ बच्चन् द्वारा निर्मितः ध्वनिप्रकाशकार्यक्रमः प्रचलति । एतत् चित्रप्रदर्शनं खुजुराहोपूर्वेतिहासं जीवितं करोति । प्रवेशशुल्कं दत्त्वा पर्यटकः एतस्य कार्यक्रमस्य आनन्दम् अनुभवितुं शक्नोति । सेप्टम्बर् तः फेब्रवरीमासपर्यन्तम् सायं 7वदनतः 8वादनपर्यन्तम् अयं कार्यक्रमः आङ्ग्लभाषया भवति । पश्चात् प्रदर्शनं हिन्दीभाषया भवति । मार्चतः आगस्ट् पर्यन्तं प्रथमप्रदर्शनं हिन्दीभाषया भवति पश्चात् आङ्ग्लभाषया च ।
पूर्वसमूहः द्विधा असमसमूहेन विभक्तः । यस्य उपस्थितिः अद्यतनीयगान्धिवर्गतः आरप्स्यते । अस्याः श्रेण्याः प्रथमचत्वारि मन्दिराणि प्राचीनखुजुराहोग्रामस्य समीपे सन्ति । द्वितीये समूहे जैनमन्दिरम् अस्ति यत् ग्रामस्य शालायः पृष्ठभागे स्थितम् । ग्रामस्य अन्यस्मिन् अन्त्यभागे स्थितं मन्दिरं दृष्ट्वा परिभ्रमणस्य आरम्भः भवति । समीपे एव वामनस्य जायरीमन्दिरं च दर्शनीये स्तः । क्रि.श. 1050तः क्रि.श. 1075वर्षमध्ये महाविष्णोः अवतारेषु अन्यतमस्य वामनस्य मन्दिरनिर्माणः कृतः । समीपे एव जयरीमन्दिरम् अस्ति यस्य निर्माणं क्रि.श. 1075तः क्रि.श. 1100तमवर्षमध्ये अभवत् इति जनविश्वासः । एतन्मन्दिरम् अपि भगवतः विष्णोः अस्ति । एतयोः मन्दिरयोः समीपमेव भगवतः ब्रह्मणः मन्दिरम् अस्ति । अस्य निर्माणं क्रि.श. 925तमवर्षे अभवत् । अत्र चत्वारिमुखस्य लिङ्गम् अस्ति । अत्र ब्रह्मा शिवलिङ्गरूपेण स्थितः अस्ति ।
वामनमन्दिरस्य गोपुरदृश्यम्।
वामनमन्दिरस्य गोपुरशिल्पविन्यासः ।
वामनमन्दिरस्य शिल्पवैभवम् ।
वामनमन्दिरस्य मूर्तिशिल्पः
मन्दिरस्य चालस्य विन्यासः ।
जवरीमन्दिरस्य गोपुरम् ।
जवरीमन्दिरस्य मूर्तिशिल्पः ।
मन्दिरस्य तोरणम् ।
जवारीमन्दिरस्य चालशिल्पविन्यासः ।
एताणि जैनमन्दिराणि एकस्मिन् एव आवरणे अस्ति । जैनमतस्य दिगम्परपथस्य अनुयायिनः एतेषां मन्दिराणां समूहं निर्मितवन्तः । अयं सम्प्रदायः एव अस्य मन्दिरसमूहस्य निर्वहणं करोति । मन्दिरसमूहस्य बृहन्मन्दिरं तीर्थङ्कराय आदिनाथाय समर्पितम् । आदिनाथमन्दिरं पार्श्वनाथमन्दिरस्य उत्तरभागे निर्मितम् अस्ति । जैनमन्दिरसमूहस्य शान्तिनाथमन्दिरम् एकदशशतके निर्मितम् अस्ति ।
जैनमन्दिरमूर्तिशिल्पः ।
जैनमन्दिरगोपुरदर्शनम् ।
जिनमन्दिरगोपुरशिल्पः ।
जैनमन्दिरद्वारशिल्पम् ।
खजुराहो : पत्थरों पर छवियां जीवन की
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जबलपुरमण्डलम् /ˈʒəəəʊəəəə/) इत्येतत् भारतस्य मध्यभागे स्थितस्य मध्यप्रदेशराज्यस्य जबलपुरविभागे अन्तर्गतं किञ्चन मण्डलम् अस्ति । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति जबलपुरम् इति नगरम् ।
जबलपुरमण्डलस्य विस्तारः 5,211 चतुरस्रकिलोमीटर्मितः अस्ति । मध्यप्रदेशराज्यस्य मध्यभागे इदं मण्डलम् अस्ति । अस्य मण्डलस्य पूर्वे डिण्डोरीमण्डलं, पश्चिमे नरसिंहपुरमण्डलम्, उत्तरे कटनीमण्डलं, दक्षिणे मण्डलामण्डलम् अस्ति । अस्मिन् मण्डले नर्मदानदी प्रवहति ।
2011 जनगणनानुगुणं जबलपुरमण्डलस्य जनसङ्ख्या 24,63,289 अस्ति । अत्र 12,77,278 पुरुषाः, 11,86,011 महिलाः च सन्ति । अस्मिन् मण्डले प्रतिचतुरस्रकिलोमीटर्मिते 473 जनाः वसन्ति अर्थात् अस्य मण्डलस्य जनसङ्ख्यासान्द्रता प्रतिचतुरस्रकिलोमीटर् 473 जनाः। 2001-2011 दशके अस्मिन् मण्डले जनसङ्ख्यावृद्धिः 14.51% आसीत् । अत्र पुं-स्त्री अनुपातः 1000-929 अस्ति । अत्र साक्षरता 81.07% अस्ति ।
अस्मिन् मण्डले सप्त उपमण्डलानि सन्ति । तानि- जबलपुर, शाहपुरा, पाटन, पनागर, मझोती, सिहोरा, कुन्दम ।
बेडाघाट इत्यस्मिन् स्थले नर्मदानदी प्रवहति । नर्मदया पर्वतस्थाः शैलाः छिद्रिताः सन्ति । तत्र प्राकृतिकसौन्दर्यम् अस्ति । बहवः जनाः तत्र भ्रमणार्थं गच्छन्ति । तत्र एकः जलप्रपातः वर्तते । तज्जलप्रपातः धूम्रवान् जलप्रपातः कथ्यते ।
मदनमहल-दुर्गः जबलपुरमण्डलस्य गौरवम् अस्ति । अस्य दुर्गस्य निर्माणं राज्ञा मदन शाह इत्यनेन एकादशशताब्द्यां कारितम् । अयम् एकः सुन्दरः दुर्गः अस्ति ।
रानी दुर्गावती-सङ्ग्रहालयस्य निर्माणं राज्ञिदुर्गावत्याः स्मृतौ कृतम् अस्ति । अस्मिन् सङ्ग्रहालये अनेकानां मूर्तीनां, शिलालेखानाम्, ऐतिहासिकावशेषाणां सङ्ग्रहः अस्ति ।
://../ ://.2011..///318-. ://../////.
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इण्डियन् सुपर् लीग् इति फुट्बाल्-क्रीडायाः भारते विद्यमाना एका स्पर्धाशृङ्खला अस्ति । आधिकारिकरूपेण 2014 तमे वर्षे अस्याः स्पर्धाशृङ्खलायाः नाम हिरो इण्डियन् सुपर् लीग् अस्ति प्रायोजककारणतः। एषा फुट्बल्-स्पर्धाशृङ्खला भारते विद्यमानासु वृहत्तमा । ऐ लीग् इत्यनया नाम्ना ख्यातायाः फुट्बल्-स्पर्धाशृङ्खलायाः व्यापितं रूपमस्ति इण्डियन् सुपर् लीग् । अस्यां क्रीडाशृङ्खलायाम् दशम दलाः सन्ति ।अस्मिन वर्षे चेन्नई विजयतां अभवत। ते अंतिम मुक़ाबलयाम बैंग्लोरस्य दले पराज्यीतां।
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सामविधानब्राह्मणम् इदं सामवेदस्याऽस्ति। एतस्मिन् ब्राह्मणे सांरारिवस्तूनां प्राप्त्यै अपि विधानि दत्तानि इति महत्त्वमस्य। अत्र शत्रूणां नाशनाय, ऐश्वर्यप्राप्त्यै च अपि विधानानि सन्ति।
अस्य विषयः ब्राह्मणान्तरेषु उपलब्धेभ्यो विषयेभ्यः नितान्तं भिन्नमस्ति । ब्राह्मणेऽस्मिन् अभिचाराय, ग्रामान्निष्कासनाय, शत्रूणां विनाशाय, धनार्जनाय, नानाविधोपद्रवाणां शमनाय च सामगानेन सह कतिपयस्य विशिष्टानुष्ठानस्य विधानमस्ति । अस्य ब्राह्मणस्य वर्णनशैली न पुनरुक्तिप्रधानाऽस्ति न चाप्यत्यन्तसंक्षिप्ताऽस्ति । सप्तमशतकीयेन कुमारिलभट्टमहोदयेन सामवेदस्य अष्टानां ब्राह्मणानां नामनिर्देशोऽपि कृतः, येषु अन्यतमेदं ब्राह्मणमस्ति ।
ब्राह्मणेऽस्मिन् प्रकरणत्रयमस्ति । प्रथमप्रकरणे कृच्छ्रः, अतिकृच्छ्रादयः स्मृतिषु बहुशः वर्णितव्रतानां वर्णनं समुपलब्धो भवति । पुराणेषु वर्णितव्रतानां मूलमपि ब्राह्मणेऽस्मिन् समुपलब्धं भवति । यथा जले स्थित्वा कस्यापि विशिष्टमन्त्रस्य जपेन विशिष्टफलस्य प्राप्तिर्भवति । अस्मिन् ब्राह्मणे काम्यप्रयोगाणां तथा विविधप्रायश्चित्तानां विधानमपि वृद्धिं प्राप । एतेषां विषयाणामेव ग्रहणं धर्मसूत्रेषु तथा कालान्तरे धर्मशास्त्रेषु विशेषरूपेण उपलब्धं भवति । सामविधानमस्य एव वैशिष्ट्यस्य परिचायकमस्ति ।
सामविधाने कमपि शत्रुं ग्रामान्निष्कासनस्य, चतुष्पथि चिताभस्मानयनाय तथा शत्रुगृहेऽथवा शय्योपकरणे तत्प्रक्षेपणस्य वर्णनमस्ति । अनेन प्रकारेण सुवर्णप्राप्तिनिमित्ताय मांसबलिना तथा सामगायनेन सह मणिभद्रयक्षविशेषस्य पूजाविधानमस्ति। पुराणेषु प्रसिद्धः रुद्रानुचराणां शान्तये अप्यत्र सामविधानं कौतूहलवर्द्धकमस्ति । विनायकस्य, स्कन्दस्य च शान्तये सामद्वयेन, तथा रुद्रस्य विष्णोश्च शान्तये सामद्वयान्येन विधानं विहितमस्ति। शत्रोः मारणविधानस्य अप्यत्रोल्लेखो लभते। राजयक्ष्मा प्राणहन्ता व्याधिरासीद्, तदुपशमनस्यापि विधेर्वर्णनमुपलब्धं भवति।
तृतीयपरिच्छेदे ऐश्वर्याय, अभिनवगृहे प्रवेशाय, आयुष्यवर्धनाय च बहुविधानामनुष्ठानानां वर्णनं विभिन्नसामगायनेन सह कृतमस्ति । भूत-प्रेत-गन्धर्व-अप्सरा-देवतादिभ्यः साम्नां प्रयोगोऽपि अस्ति। यो हि पुरुषः कमपि मन्त्रं सकृदैव श्रुत्वा तस्य पाठं कर्तुं शक्नोति, सः ‘श्रुतिनिगादी' भवति । एतस्यै सिद्ध्यै अपि सामगानस्य विधानमस्ति । ब्राह्मणग्रन्थोऽयं धर्मसूत्राणां पूर्वपीठिकाऽस्ति । धर्मसूत्रेषु सविस्तरेण वर्णिताः दोषापराधप्रायश्चित्तादिविषयाः ब्राह्मणेऽस्मिन् मुख्यतया प्रतिपादिताः । तदा समाजोऽयं चतुर्षु वर्गेषु विभक्त अासीत् । शूद्रया सह विवाहः सर्वथा निषिद्ध अासीत् । येभ्यः पापाचरणेभ्यः प्रायश्चित्तस्य विधानमत्रास्ति तान् दृष्ट्वा तात्कालिकसमाजस्य स्थितेः परिचयः प्राप्तुं शक्यते ।
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941 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः साधारण-वर्षः आसीत्।
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प्रपञ्चमिथ्यात्वानुमानखण्डनस्य ग्रन्थस्य रचयिता मध्वाचार्यः भवति। मायावादखण्डनम्, उपाधिखण्डनम्, प्रपञ्चमिथ्यात्वानुमानखण्डनञ्च खण्डनत्रयम् इति नाम्ना प्रसिद्धानि भवन्ति। वादग्रन्थाः इत्यपि प्रसिद्धिरस्ति। त्रयोऽपि ग्रन्थाः अद्वैतमतस्य विमर्शार्थम् एव प्रवृत्ताः भवन्ति। अद्वैतमते ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या इति प्रतिपादयन्ति। दृश्यत्वात्, जडत्वात्, परिच्छिनत्वात् हेतुभिः जगन्मिथ्यात्वं साधयन्ति। प्रपञ्चमिथ्यात्वानुमाने असिद्धिः, विरोधः, आश्रयासिद्धिः, अप्रसिद्धविशेषणत्वम्, सिद्धसाधनता, अनेकान्तिकता, साधनवैकल्यम्, उपाधिदोशाः दर्शिताः सन्ति। यत् दृश्यते तत् मिथ्या इति यदा वदामः तर्हि ब्रह्मा अपि दृश्यते तर्हि सोऽपि मिथ्या स्यात्। ईदृश सूक्ष्म दोषान् अस्मिन् ग्रन्थे निरूपितवन्तः। समनन्तरं पक्ष, विपक्ष, दृष्टान्त, हेतु इत्यादीनां पारिभाषिकपदानां लक्षणानि निरूपितानि सन्ति। खण्डनत्रयेभ्यः ग्रन्थेभ्यः श्री जयतीर्थस्य, श्री श्रीनिवासस्य च टीका प्रसिद्धा भवति।
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शुक्लरास्या यूरोप- महाद्वीपे देश: अस्ति. राजधानी - मिन्स्क, भाषा - रूसी, बेलारूसीजनसंख्या - 11 मिलियन
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शिलचर-नगरम् काचार् मण्डलस्य केन्द्रः अस्ति।
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है हे नदी पूर्व एशिया महाद्वीपे चीन देशे एका नदी अस्ति.
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रविमार्गे दृश्यमानेषु 27 प्रमुखनक्षत्रसमूहेषु अन्यतमं वर्तते शतभिषानक्षत्रम् । प्रतिदिनं चन्द्रः यस्मिन् नक्षत्रे दृश्यते तत् नक्षत्रं दिननक्षत्रम् इति उच्यते । शिशोः जननावसरे चन्द्रः यत्र भवति तत् तस्य जन्मनक्षत्रम् इति कथ्यते । हिन्दुज्योतिष्शास्त्रस्य अनुगुणम् शतभिषानक्षत्रं भवति चतुर्विंशतितमं नक्षत्रम् । आकाशः 360 डिग्रियुक्तः इति भाव्यते चेत् सः सप्तविंशतिधा विभज्यते चेत् एकैकः भागः 13.20 डिग्रियुक्तः भवति । एकैकम् अपि क्षेत्रं चतुर्धा यदि विभज्येत तर्हि 108 भागाः भवन्ति । एकैकोपि भागः 3.20 डिग्रियुक्तः भवति । तन्नाम नक्षत्रस्य प्रत्येकभागः 3.20 डिग्रियुक्तः भवति । एकस्य नक्षत्रस्य 13.20 डिग्रिपरिमितभागः । एकस्य राशेः 30 डिग्रिभागः । 12 राशीनां 360 डिग्रिपरिमितः भागः भवति ।
शतभिषक्छतं ताराः - शतं ताराणां समूहः ।
गो सा सी सू - शतभिषानक्षत्रसम्बद्धानि अक्षराणि ।
तैत्तिरीयसंहितायां शतभिषङ्नक्षत्रमिन्द्रो देवताः इति उल्लिखितम् अस्ति । तन्नाम शतभिषानक्षत्रस्य स्वामी इन्द्रः । किन्तु तैत्तरीयब्राह्मणे शतभिषानक्षत्रस्य स्वामी वरुणः इति निर्दिष्टमस्ति । शतभिषनक्षत्रे शतं ताराः विद्यन्ते । अतः एव अस्य नक्षत्रस्य नाम सङ्ख्यायाः आधारेण निर्दिष्टमस्ति । तैत्तिरीयब्राह्मणे लिखितं यत् वरुणः क्षत्रियाणां राजा शतभिषा तस्य निवासस्थानम् इति । एतौ सज्जनेभ्यः दीर्घायुं प्रददाति ।
पाशिकाः । पाशा बन्धनरज्जवः । पाशैः प्राणिनो बध्नन्तीति पाशिकाः । मत्स्यबन्धो मत्स्यान् मीनान् बध्नाति यः । जलजानि जलोद्भवानि सर्वद्रव्याणि मुक्ताफलादीनि । जलचराजीवाः । जलचरैर्मत्स्यादिभिर्ये आजीवन्ति । सौकरिकाः । सूकरान् वराहान् ये बध्नन्ति । रजका वस्त्ररागकर्तारः । शौण्डिकाः पानसक्ताः । शाकुनिकाः शकुनीन् घ्नन्तीति शाकुनिकाः पक्षिघातिनः । एते सर्व एवास्मिन् वर्गे वरुणेशे शतभिषजि ।
शतभिषानक्षत्रे युद्धस्य आरम्भः, आभूषणम्, गजः, सेना, अश्वः, उष्ट्रः, शस्त्रम्, नौका, मौक्तिकम्, रजतम्, वास्तु इत्यादिसम्बद्धानि कार्याणि कर्तुं शक्यन्ते ।
श्रवणत्रयमादित्यानिले च चरकर्मणि हितानि ॥ श्रवणत्रयं धनिष्ठा शतभिषगिति । आदित्यं पुनर्वसुः । आनिलं स्वातिः । ते आदियानिले च । एतानि पञ्च नक्षत्राणि । तानि च चरकर्मण्यस्थिरे कर्मणि हितानि प्रशस्तानि ।
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श्रीहर्षदेवस्य जन्म सरस्वतीनद्यास्तटे कुरुक्षेत्रसमीपे ‘थाणेश्वरे 590 ईस्व्यां अभूत् । अस्य पिता महाराजः प्रभाकरवर्ध्दनः, माता च ‘यशोमती’ आसीत्। हर्षस्य अग्रजः राज्यवर्ध्दनः अनुजा च राज्यश्री । एतस्य 606 ईस्व्यां राजसिंहासनारोहणं जातम् । अयं एकछत्रसाम्राज्यस्य प्राप्त्यभिलाषया 620 ईस्व्यां दक्षिण भारते आक्रमणम् अकार्षीत्, किन्तु चालुक्यवंशी-पुलकेशिनद्वितीयेन पराजितो बभूव ।एतस्यैव प्रशासनकाले चीनदेशीयः पर्यटकः ह्वेनसांगः भारतम् आजगाम । तस्य राज्यं हिमालयादारभ्य नर्मदां यावत् मालवा-गुर्जर बङ्गादिषु प्रदेशेषु विस्तृतम् आसीत्। श्रीहर्षस्य 646 ईसवीयान्ते मृत्युरभवत् ।
सम्राटश्रीहर्षः उदारहृदयः, विद्वान्, कविश्चासीत् बाणभट्ट-मयूर मातङ्ग-दिवाकरादयः विद्वांसः अस्य सभापण्डिताः आसन् । महाकविबाणभट्टः हर्षचरितनामके ग्रन्थे हर्षस्य प्रतिभायाः वर्णनमकार्षीत् । धावकनामकः कविः स्वकाव्यप्रतिभया हर्षं प्रसाद्य तस्मात् विपुलं धनं प्राप्तवान् । हर्षदेवस्य प्रमुखतया तिस्रः रचनाः आसन् –
चतुर्णामङ्कानां निबध्दा रत्नावलीनाटिका श्रीहर्षवर्ध्दनेन विरचिता । अस्याः प्रधानो रसः श्रृङ्गारः नायको धीरललितो वत्सराजो उदयनः,नायिका मुग्धा नवीनानुरागवती सागरिका चास्ति । सिध्दपुरुषस्य भविष्यवाणीं श्रुत्वा कौशाम्बीनरेश- वत्सराज- उदयनस्य अमात्यः यौगन्धरायणः सिंहलेश्वरस्य विक्रमबाहोः दुहितां रत्नावलीं प्रच्छन्नरुपेण, सागरिका- नाम्ना दासीरुपेण अन्तः पुरे अप्रेषयत् । सागरिकायाः रुपलावण्येन शङ्किता राज्ञी वासवदत्ता सागरिकां सर्वदा उदयनात् दूरं गोपयति, किन्तु किराजा उदयनः चित्रफलकदर्शनेन सागरिकायाम् आसक्तो भवति । राज्ञी वासवदत्ता सागरिकां कारगारे निगडबध्दा करोति किन्तु् यदा वासवदत्ता जानाति यत् सागरिका तस्याः मातुलस्य पुत्री राजकुमारी च वर्तते, रत्नावल्याः पतिः चक्रवर्ती सम्राट् भविष्यति इति सिध्दपुरुषेण उक्तम् तदा सा राजानम् उदयनं तया सह विवाहं कर्तुं अनुमतिं प्रददाति । ततः 'निः शेषं यान्तु शान्तिं पिशुनजनगिरो दुर्जया वज्रलेपाः इति भरतवाक्येन नाटिका समाप्ता भवति ।
नाटिकायाः प्रमुखपात्राणि, राजा उदयनः, रत्नावली राज्ञी वासवदत्ता, अमात्यःयैगन्धरायणः, वसन्तकविदॄषकः बाभ्रव्यः, वसुभूतिःकञ्चनमाला, सिसंगता, ऐन्द्रजालिकाश्च सन्ति । अस्याः नाटिकायाः उपजीव्यं बृहत्कथा वर्तते । अस्यां नाटिकायां श्रीहर्षदेवः नाटकतत्त्वानाम् उपस्थापने पूर्णरुपेण सफलोऽस्ति । कथावस्तु –घटनागतिशीलता –अभिनेयतादिकानां दृष्ट्या इयं नाटिका संस्कृतसाहित्ये महत्त्वपूर्णस्थानं प्राप्नोति ।
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19 अप्रैल-दिनाङ्कः ग्रेगोरीयन-पञ्चाङ्गानुसारं वर्षस्य एकशताधिकनवमं दिनम् । लिप्-वर्षानुगुणम् एकशताधिकदशम दिनम् एतत् । एतस्मात् दिनात् वर्षान्ताय 256 दिनानि अवशिष्टानि ।
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इदम् अर्कसस्यं भारते सर्वत्र वर्धमानं किश्चन सस्यविशेषम् । इदं सस्यं सर्वेषु प्रदेशेषु अपि वर्धते । कम्बोडिया, इण्डोनेषिया, मलेष्या, फिलिफैन्स्, थाय्लेण्ड्, श्रीलङ्का, भारतम् इत्यादिषु देशेषु अधिकतया वर्धते । अस्मिन् अर्कसस्ये मदर् आल्बन्, अदर् प्लूविल्, ब्ल्याक् आसिड्, रेसिन्, एल्लो रेसिन् इत्यादयः अंशाः भवन्ति । इदं सस्य औषधत्वेन केवलम् उपयुज्यते न तु आहारत्वेन । अस्य अर्कसस्यस्य मूलं त्वक्, पुष्पं पर्णं चापि औषधत्वेन उपयुज्यते । रथसप्तम्याम् अस्य पर्णानि शिरसि संस्थाप्य स्नानं कुर्वन्ति । शनिवासरेषु, विशेषदिनेषु च अस्य पर्णैः निर्मितः हारः आञ्जनेयस्य श्रेष्ठः इति धार्मिकः विश्वासः अस्ति भारते । अस्य पुष्पाणि श्वेतवर्णीयानि, मन्दनीललोहितवर्णीयानि च भवन्ति । अस्य पर्णानि स्थूलानि, हरिद्वर्णीयानि च । पर्णानाम् उपरि श्वेतवर्णीयं किमपि चूर्णं स्थापितम् इव भवति । अस्य पर्णं वा काण्डं वा कर्तयामः चेत् श्वेतवर्णीयः द्रवपदार्थः ततः निस्सरति । अतः एव आङ्ग्लभाषया तस्य “मिल्क् वीड्” इत्यपि उच्यते । अस्य अर्कसस्यस्य वल्कलैः रज्जुः, मीनग्रहणजालं चापि निर्मातुं शक्यते । अस्य सस्यभागः अन्येषां सस्यानां गोभरत्वेन अपि उपयुज्यते । सावयवकृषौ उपयुज्यमानेषु सप्तवर्णकषायं तथा च दशवर्णकषायेषु अस्य अर्कस्य पर्णानि उपयुज्यन्ते । जैविकरससारेषु रञ्जकस्य अंशस्य वर्धनार्थम् अर्कपर्णानि एव अधिकतया उपयुज्यन्ते ।
इदम् अर्कसस्यम् आङ्ग्लभाषया“जेग्याण्टिक् स्वालोवर्” अथवा “क्रौन् फ्लवर्” इति उच्यते । सस्यकुले इदम् अर्कसस्यं इत्यस्मिन् कुले अन्तर्भवति । हिन्दीभाषया“मड्डर्” अथवा “अफेद् अरा” इति, तेलुगुभाषया “एक्क” अथवा “जिल्लेडि पूवु” इति, तमिळ्भाषायां “बडबडम्” अथवा “एरक्कु” इति, मलयाळभाषया “इरिक्क” इति, कन्नडभाषया “एक्के” इति च उच्यते ।
इदम् अर्कसस्यं यद्यपि किञ्चित् लघु सस्यं तथापि प्रयोजनस्य विषये महत् एव । अस्य अर्कवृक्षस्य रसः तिक्तः तथा कटुः च । 1. अस्य अर्कसस्यस्य त्वक् कफं निवारयति, वमनम् अपि कारयति ।2. अस्य अर्कस्य पुष्पं जीर्णकारकम् ।3. चर्मरोगेषु, “सिफिलिस्”क्षीणतायां, “सिफिलिस्”व्रणेषु, अतिसारे, आमवाते च अर्कस्य उपयोगः हितकरः ।4. अस्य अर्कसस्यस्य मूलं त्वक् च गजपादरोगे, चर्मरोगे, उदररोगे च उपयुज्येते ।5. अस्य अर्कस्य रसः शिरसि जातानां कीटानां निवारणे, गुदद्वारे जाते “फिस्टुला”रोगे, मूलव्याधौ च उपयुज्यते ।6. दन्ताः कीटविद्धाः इति कारणात् दन्तवेदना यदि जायते तर्हि अर्कस्य रसे कार्पासं निमज्ज्य तस्मिन् दन्ते स्थापनेन वेदना अपगच्छति ।7. “सिफिलिस्”रोगे अस्य अर्कस्य मूलस्य त्वचा धूमपानं कारयन्ति ।8. अस्य अर्कस्य पर्णानि शुष्कीकृत्य चूर्णीकृत्य व्रणेषु लेपनेन व्रणाः अपगच्छन्ति ।9. अर्कपर्णस्य चूर्णम् अपस्मारे, “हिस्टीरिया”रोगे, हनुग्रहे, विषजन्तूनां दशने च उपयोक्तुं शक्यते ।10. अस्य अर्कस्य पुष्पं कासे, श्वासावरोधे, अग्निमान्द्ये च उपयोक्तुं श्क्यते ।11. पादे कण्टकं लग्नं चेत् अस्य अर्कस्य पर्णस्य रसस्य स्थापनेन कण्टकं बहिः आगच्छति ।12. इदम् अर्कं “होमियोपति” औषधानां निर्माणे अपि उपयुज्यते ।13. धेनूनां नेत्रसमस्या अस्ति चेत् सूर्योदयस्य अवसरे लभ्यमानां तुषारयुक्तानाम् अर्कपर्णानां रसेन औषधं निर्मान्ति ।14. अर्कलवणं 125 ग्रां यावत् जलेन सह वा मधुना सह वा दिने द्विवारम् इव उपयोक्तव्यम् ।15. अस्य अर्कपर्णस्य मूलस्य च उपयोगः कल्कस्य निर्माणे, वटिकायाः निर्माणे च क्रियते ।
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अस्य कुटुम्बः फ्याबेसी इति । अस्य सस्यशास्त्रीयं नाम अकेसिया फ़र्नेसिआन वैल्ड । अरिमेडा, विटः इति अस्य वृक्षस्य नामान्तरम् अस्ति । अन्यभाषासु अस्य वृक्षस्य नामानि यथा...
आङ्ग्लम् - क्यासिया, स्पाञ्ज् ट्री । , .कन्नडम् - करिजालि, कस्तुरि जालि, सण्णजालि । ಕರಿಜಾಲಿ, ಕಸ್ತೂರಿಜಾಲಿ, ಸಣ್ಣಜಾಲಿ।हिन्दी - गुड् बबूल्, विलायति, कैकर ।तमिळु - कडिवेल्, वेदुमुल् । கடிவேல், வேதுமுல் ।तेलुगु - कस्तूरितुम्म, मुरिकितुम्म । కస్తూరితుమ్మ, మురికితుమ్మ।मराठि - गुबबुल, कंक्रि,येरिबबुल् ।मलयाळम् - पिवेलम् । പിവേലമ്।
मरुद्रुमः 10-20पादपरिमितम् औन्नत्यं प्राप्नोति । अस्य काण्डस्य वर्णः गाढपिङ्गलवर्णः । द्विदलयुक्तानि पत्राणि भवन्ति । पत्राणां दीर्घता 2.5-5सें.मी. पर्यन्तमपि भवति ।6-8मि.मी.व्यासास्य वर्तुलाकारस्य पुष्पानां गुच्छम् एव भवति । पीतवर्णस्य पुष्पाणां सुगन्धः अतीव तीक्ष्णः भवति । नवेम्बर् तः मार्च मासाभ्यान्तरं वृक्षाः कुसुमिताः भवन्ति । अस्य फलानि 5-9सें.मी.दीर्घाणि वक्राणि च भवन्ति । अस्य वृक्षस्य वंशाभिवृद्धिः बीजैः एव भवति ।
मरुद्रुमस्य वल्कलानि दन्तक्षयस्य रक्तसम्बद्धरोगाणां क्षतानां च उपशमनार्थं उपययोजयन्ति । किसलयाः गोनेरिया इति रोगोपशमनार्थं प्रयोजनकारिणः भवन्ति । अस्य वल्कलस्य कषायं कुष्टरोगस्य अन्यचर्मरोगाणां निवारणार्थं प्रयोजयन्ति । वल्कलचूर्णम् आस्तमारोगं नियन्त्रयति । पुष्पाणाम् उपयोगेन केसि इति सुगन्धरसम् उत्पादयन्ति । वृक्षनिर्यासः चर्मोद्यमेषु मधुराणि निर्मातुं च उपयुज्यते । किसलयस्य पाकशालासु उपयोगः भवति ।
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कुम्भः द्वादशसु राशिषु अन्यतमः । द्वादश राशयः मेषराशिः, वृषभराशिः, मिथुनराशिः, कर्कटराशिः, सिंहराशिः, कन्यारशिः, तुलाराशिः, वृश्चिकराशिः, धनूराशिः, मकरराशिः, कुम्भराशिः, मीनराशिः च सन्ति ।
कुम्भे किं विद्यते इत्येतत् न ज्ञायते । जलं यदि स्यात् कियत् विद्यते इति न ज्ञायते । अतः कुम्भे अज्ञाताः विषयाः भवन्ति । कदाचित् तस्मिन् किमपि न भवेदेव । रिक्ते कुम्भे नूतनं किमपि दृश्येत । कश्चन भावः परिपूर्णः अंशः कुम्भे विद्यते इति भावयितुं शक्यम् । कुम्भराशिवत्सु अपि किञ्चन वैशिष्ट्यम्, आकस्मिकरूपेण ते प्रमुखपात्रं वहेयुः । किन्तु कदा कस्मिन् विषये इत्येतत् भवति गोप्यम् । तेषां सामर्थ्यं शक्तिविशेषश्च निगूहितं भवति । सूक्ष्मतया अवलोकनेन मात्रं तेषाम् अन्तर्गतशक्तिः सर्वैः अवगम्यते ।
मकर-कुम्भराश्योः शनिः अधिपतिः । ग्रहराज्यव्यवस्थायाः अनुसारं शनिः सेवकः । सेवातत्परतायाः सङ्केतः शनिः । शान्तिदाता अपि शनिः । लोके सेवायाः अपेक्षया उत्तमः धर्मः अन्यः न विद्यते । सेवातत्त्वं समीचीनतया अवगत्य कष्टकाले ये सहकर्तुम् अग्रे आगच्छन्ति ते अस्मिन् राशौ अन्तर्भवन्ति । कुम्भराशौ सुखिनः सन्तः सेवाकार्ये आत्मानं योजितवन्तः भवन्ति । अहङ्काराभिमानैः मुक्ता सेवा अत्र भवेत् । रुग्णालयेषु सेवकाः हृदयपूर्वकं यदि कार्यं कुर्वन्ति तर्हि सा उत्तमसेवा इति उच्यते । तादृशानां सेवाकार्याणां शनिः कारकः भवति ।
कुम्भराशेः सहज-लाभभावः इति निर्दिश्यते । अत्र लाभसम्बद्धाः अंशाः द्रष्टव्याः ।
पुरुषजातिः, स्थिरसंज्ञकः, वायुतत्त्वं, विचित्रवर्णः, शीर्षोदयः, अर्धजलं, त्रिदोषप्रकृतिः, दिनबली, पश्चिमदिशः स्वामी, उष्णस्वभावः, शूद्रवर्णः, क्रूरस्तथा मध्यमसन्ततिः । अस्य प्राकृतिकस्वभावः विचारशीलः, शान्तचित्तः, धर्मवीरः,प्रतिभासम्पन्नश्च वर्तते । अनेन उदरस्य आभ्यन्तरीकभागस्य विचारः क्रियते । अस्य स्वामी शनिः । यथा चोक्तं –
कुम्भराशौ धनिष्ठायाः 3,4 पादौ शतभिषायाः 4 पादाः, पूर्वाभाद्रयाः 1,2,3 पादाः च भवन्ति इत्यतः गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा ... इत्येतानि अक्षराणि कुम्भराशिसम्बद्धानि इति वक्तुं शक्यते ।
येषां जन्मदिनं जनवरी-मासस्य 21 दिनाङ्कतः फेब्रवरी-मासस्य 10 दिनाङ्कतः पूर्वं भवति तेषां कुम्भराशिः ।
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एस्.आर्.बोम्मायीमहोदयस्य पूर्णं नाम सोमप्प रामप्प बोम्मायी इति । राजकीयतन्त्रस्य व्यत्यासात् रामकृष्णहेगडे महोदयस्य अधिकारत्यागस्य समनन्तरम् एस्.आर्.बोम्मायीमहोदयः कर्णाटकस्य मुख्यमन्त्री अभवत् । राजतन्त्रस्य ध्रुवनक्षत्रमिव भासमानः एषः क्रि.श.1924तमे वर्षे जून् मासे 6दिनाङ्के धारवाडमण्डलस्य शिग्गांविउपमण्डलस्य करडगिग्रामे अजायत । कृषकः रामचन्द्रप्पः पिता माता शिवम्मा । बोम्मायी इति अस्य कुलस्य नाम । अस्य प्राथमिकी शिक्षा स्वस्य कमडोळ्ळिग्रामे अभवत् । हुब्बळ्ळीपत्तने पदविशिक्षां समाप्य आधुनिकन्यायविद्यायां पदवीं बेळगावीपत्तने अवाप्नोत् ।
पठने क्रीडने च समानासक्तियुतः सोमप्पः सांस्कृतिकप्रक्रियासु अपि भागं वहति स्म । तासु अनेकानि पारितोषिकानि अपि प्राप्तवान् । विद्यार्थिजीवने चर्चास्पर्धासु स्पर्धार्थी भूत्वा तेन राजकीयप्रवेशाय प्रेरणा प्राप्ता। एषः छात्रजीवने इदाफ् कलाडिगे नामकाभ्यां शिक्षकाभ्यां प्रभावितः । हुब्बळ्ळीपत्तनस्य एम्.बि.हुरुळिकुप्पिमहोदयस्य पुत्र्या गङ्गम्मया सह अस्य विवाहः सम्पन्नः । फलरूपेण द्वौ पुत्रौ द्वे पुत्र्यौ अजायन्त । ज्येष्ठः पुत्रः मल्ल्लिकार्जुनः अभियन्तृविद्यामधीत्य उद्यमी अभवत् । द्वितीयः बसवराजः अपि अभियन्तृशिक्षां प्राप्य राजकीयं प्रविष्टवान् । सोमप्प बोम्मायीमहोदयः एषः क्रि.श.1998तमे वर्षे कर्णाटकविधानपरिषदि चितः। दशवर्षाणि यावत् न्यायवादिनः वृत्तिं निरवहत् । स्वातन्त्र्यान्दोलनसमये प्रवृत्ते ’क्विट् इण्डिया’ आन्दोलने प्रविश्य राजकीयजीवनम् आरब्धवान् । क्रि.श.1942तमे वर्षे रेडिकल् ह्यूमनिसम् इति पक्षं प्रविष्टवान् । क्रि.श. 1947पर्यन्तम् अपि तस्य सदस्यः आसीत् ।
पोर्चुगीसैः आक्रान्तस्य गोमान्तकप्रदेशस्य विमोचनार्थं बोम्मायीमहोदयः गोवास्वातन्त्र्यसभां संस्थाप्य तस्य कार्यदर्शी अभवत् । तस्य राज्यस्य स्वातत्र्यप्राप्तये आन्दोलनं कुर्वाणः बहुवारं कारागृहवासमनुभूतवान् । क्रि.श.1960तमे वर्षे कर्णाटकविश्वविद्यालयस्य सेनेट् सदस्यः अभवत् । ततः पञ्चवर्षेषु उत्तमं प्रशासनानुभवं प्राप्तवान् । धारवाडस्य कोताम्ब्रिन्यायमहाविद्यालयस्य अध्यक्षः अभवत् । 8 वर्षाणि हुब्बळ्ळीधारवाड सेण्ट्रल् को आपरेटिव् होल्सेल् स्टोर्स् संस्थायाः मुख्यः अभवत् । क्रि.श.1967तमे वर्षे सार्वजनिकसम्पर्ककार्यक्रमम् आरभ्य जनप्रियः राजतन्त्रज्ञः अभवत् । तस्मिन् एव वर्षे कर्णाटकविधासभायाः निर्वाचने लोकसेवकसङ्घस्य अभ्यर्थिरूपेण कुन्दगल्क्षेत्रतः स्पर्धितवान् । तत्र विजयम् अपि प्राप्तवान् । एवम् अस्य राजकीयजीवनस्य शुभारम्भः अभवत् । क्रि.श. 1969तमे वर्षे काङ्ग्रेसपक्षं प्रविष्टवान् ।क्रि.श.1972तमे वर्षे पञ्चायतिमतक्षेत्रात् विजयं प्राप्य विधानपरिषदं प्रविष्टवान् । क्रि.श.1976-77वषावधौ प्रतिपक्षनायकः भूत्वा प्रसिद्धः नायकः अभवत् । क्रि.श.1977तमे वर्षे यदा जनतापक्षः स्थापितः तदा तस्य अध्यक्षत्वेन नियुक्तः । क्रि.श.1983तमे वर्षे प्रवृत्ते निर्वाचने जनतापक्षस्य नेता बोम्मायीमहोदयः एव अभवत् । जनतापक्षेन कङ्ग्रेस् पक्षः प्रथमवारं पराजितः । तेन अधिकारसूत्रम् अपि गृहीतम् । बोम्मायीमहोदयस्य त्यागभावनया रामकृष्णहेगडेमहोदयः मुख्यमन्त्री अभवत् ।
क्रि.श.1984तमे वर्षे प्रचलिते लोकसभानिर्वाचने जनतापक्षः पराजितः । तदा रामकृष्णहेगडेमहोदयः त्यागपत्रं दत्त्वा विधानसभां विसर्जितवान् । कर्णाटके क्रि.श.1985तमे वर्षे प्रचलिते निर्वाचने जनतापक्षेन बहुमतः सम्पादितः । रामकृष्णहेगडेमहोदयः मुख्यमन्त्री अभवत् । क्रि.श.1988तमे वर्षे हेगडेमहोदयस्य सर्वकारः प्रजाभिः बहुविधैः आक्षिप्तः । दूरभाषाचौर्यश्रवणस्य महाक्षेपेन तस्य अधिकारः एव बाधितः अभवत् । तदा राजकीयज्येष्ठं बोम्मायीमहोदयं मुख्यमन्त्रिस्थाने प्रतिष्ठापितवन्तः । पक्षस्य अन्तःकलहात् सर्वकारसञ्चालनम् कष्टकरम् अभवत् । रामकृष्णहेगडेदेवेगौडयोः मध्ये विद्यमानेन मनस्तापकारणेन शासकाः द्विधा विभक्ताः तेन पक्षोऽपि विभाजितः । बोम्मायिमहोदयस्य नेतृत्वे जनतादलम् इति पक्षः उत्पन्नः । नूतनपक्षस्य केन्द्रीयः अध्यक्षः वी पी सिंहमहोदयः अभवत् । देवेगौडादयः मूलजनतापक्षे एव न्यवसन् । देवेगौडः प्रोत्साहं प्रतिस्वीकृतवान् इति सर्वकारः पतितः । केन्द्रे विश्वनाथ प्रताप सिंहः प्रधानी अभवत् । बोम्मायिमहोदयः पक्षस्य सङ्घटनार्थं राष्ट्रियः अध्यक्षः अभवत् । क्रि.श.1989तमे वर्षे बोम्मयिपक्षः देवगौडपक्षः च उभावपि पराजितौ । कालान्तरे अजितसिंहः, रामकृष्णहेगडे, एस्.आर्.बोम्मायि, देवेगौडा सर्वे एकस्मिन् एव पक्षे सम्मिलिताः । देवेगौडः जनतदलपक्षस्य राज्याध्यक्षः भूत्वा देशसञ्चारं कृतवान् । ओडिश्शासर्वकारेण बोम्मायिमहोदयः राज्यसभासदस्यरूपेण चितः । तदारभ्य बोम्मायिमहोदयः बहुवारं राज्यसभासदस्यः अभवत् ।
गिरिजनानाम् अभिवृद्धिं प्रोत्साहितवान् । बाब्रिमस्जीदभङ्गस्य अध्ययनं कर्तुं रचितसमितौ बोम्मायीमहोदयः अपि सदस्यः आसीत् । गोवाविमोचनान्दोलने सक्रियः भूत्वा विजयं सम्पादितवान् । हुब्बळ्ळीधारवाडयोः नैकान् महाविद्यालयान् स्थापयितुं प्रोत्साहं दत्तवान् । यदा अर्थविभागस्य जलानयनविभागस्य च मन्त्री आसीत् तदा कृषिक्षेत्रस्य अभिवृद्धये परिश्रमं कृतवान् । क्षामनिवारणार्थम् अनुष्ठिताः कार्यक्रमाः जनप्रियाः अभवन् । गुण्डूरावमहोदयस्य काले वज्रचूर्णावधारणं प्रकाशितवान् । अनेन राजकीयव्यवहारः पारदर्शकः भवेत् इति निदेशितवान् । पञ्चायतराज्ययोजनायाः सुरूपं दत्तवान् । मतदानारम्भस्य आयुः 18 इति निम्नीकृत्य युवकानां प्रियः अभवत् । हैदराबाद् कर्णाटकप्रान्तस्य अभिवृद्ध्यै मण्डलीं निर्माय कोटिद्वयरूप्यकाणाम् अनुदानं दत्तवान् । केन्द्रसर्वकारीयेषु उद्योगेषु कन्नडजानानां नियुक्तिः विरलतया भवति स्म । एतं पक्षपातं निवारयितुं परिश्रमं कृत्वा सफलः अभवत् । सर्वकारीये प्राशासने सर्वत्र कन्नडभाषायै अद्यतां दातुम् आदेशं सञ्चालितवान् । क्रि.श. 1989-90तमवर्षमध्ये शालाभवननिर्माणम्, अतिवृष्टिपरिहारः, विद्युदुत्पादनकेन्द्राणाम् आरम्भः, ग्रामेषु वनमहोत्सवपारितोषिकानि, विद्याप्रोत्साहधनवृद्धिः, उर्दुभाषाभिवृद्धये निदेशनालयस्थापनम् इत्यादीनि अभिवृद्धिपराणि कार्याणि बोम्मायिमहोदयस्य साधनानाम् आवलिः भवति । 'पठतु अर्जयतु’ इति योजनायां ग्रामीणनिरुद्योगिनां कृते प्रतिमासं 300 रूप्यकाणाम् अनुदानम्, रायचूरुप्रान्ते शाखोत्पन्नविद्युदागारस्य संस्थापनम्, कृष्यर्थम् आद्यता, नजीरनिवासयोजनया उपमण्डलेषु दीनानां गृहनिर्माणकार्याणि, दीनानां निवेशनदानम्, प्रतिग्रामम् आरोग्यकेन्द्रस्थापनम्, ग्रामेषु शौचालयानां निर्माणम्, इत्यादीनि लोकहितकार्याणि कुर्वन् एस्.आर्.बोम्मायिमहोदयः बहुजनप्रियः राजकीयः नेता अभवत् ।
क्रि.श. 1996तमे वर्षे लोकसभानिर्वाचने काङ्ग्रेस् पक्षः पराजयमवाप्नोत् । तावता महपक्षरूपेण प्रवृद्धः भारतीयजनतापक्षः जितवान् चेदपि संसदि प्राबल्यं प्रदर्शयितुमसमर्थः अभवत् । अनन्तरं केन्द्रे प्रवृत्तराजकीयक्रीडया बोम्मायीमहोदयः मानवसम्पन्मूलसंसाधनमन्त्री अभवत् । निष्ठावान् जनसेवकः,निष्कामकर्मकरः, अतः एव जनानां बहुप्रीतिपात्रम् अभवत् मान्यः एस्.आर्.बोम्मायिमहोदयः ।
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जुनो संयुक्त राज्य अमेरिका देशस्य नगरः अस्ति।
अलाबामा | अलास्का | आरिज़ोना | अर्कान्स | कालिफ़ोर्निया | कोलोराडो | कनेक्टिकट् | डेलावेर् | फ्लोरिडा | जार्जिया | हवाई | ऐडहो | इलिनाई | इन्डियाना | अयोवा | केन्सास | केन्टकी | लूइसियाना | मेन | मेरील्यान्ड् | मासचुसेट्स | मिशिगन | मिनेसोटा | मिसिसिपी | मिसूरी | मान्टाना | नेब्रास्का | नेवाडा | न्यू हेम्पशायर | न्यू जर्सी | न्यू मेक्सिको | न्यू यार्क् | नार्थ केरोलैना | नार्थ डेकोटा | ओहायो | ओक्लाहोमा | ओरेगन् | पेन्सिल्वेनिया | रोड ऐलैंड | साउथ केरोलैना | दक्षिण डकोटा | टेनेसी | टेक्सास् | यूटाह | वर्मांट | वर्जिनिया | वाशिङ्टन् | वेस्ट वर्जिनिया | विस्कान्सिन् | वायोमिङ् | वाशिङ्ग्टन् डि सि
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डॉ. आत्मारामः /ˈɑːɑːɑːəə/) वैज्ञानिकी-औद्योगिकी-अनुसन्धानपरिषदः महानिदेशकपदं 1966 तमस्य वर्षस्य अगस्त-मासस्य एकविंशे दिनाङ्के व्यभूषयत्। महानिदेशकः सन् सः भारतसर्वकारस्य शिक्षामन्त्रालयस्य वैज्ञानिकसचिवोऽपि आसीत्। डॉ. आत्मारामः कोलकाता-महानगरस्य काच-सिरेमिक-अनुसन्धासंस्थानस्य निदेशकत्वेन दायित्वम् अवहत्।
1908 तमस्य वर्षस्य अक्तूबर-मासस्य द्वादशे दिनाङ्के उत्तरप्रदेशराज्यस्य बिजनौरमण्डलस्य पिलाना-ग्रामे आत्मारामस्य जन्म अभवत्। तस्य पिता भगवानदास बन्सल लेखपालः आसीत्। भगवानदासस्य निर्धनतायाः विषये दुर्गाप्रसादः अलिखत्, "लेखपालस्य गृहे प्राप्तजन्मा आत्मारामः, स्वबाल्ये निर्धनतायाः वातावरणे विकसितः। तस्य पिता भगवानदासः स्ववृत्तिं प्रामाणिकतया करोति स्म" इति। भगवानदासः पिलाना-प्राथमिकशालायाः शिक्षकः आसीत्। तस्य परिश्रमेण ग्रामे बृहद्भवनस्य निर्माणम् अभवत्। अतः भगवानदासः समग्रे ग्रामे, ग्रामं परितः च "शिक्षणपिता" इति प्रसिद्धः। ततः भगवानदासः ग्रामे कञ्चन आपणं चालयति स्म। आत्मारामस्य मातुः निधनम् अल्पवयसि अभवत्। तयोः त्रयः पुत्राः आसन्। आत्मारामः भगवानदासस्य द्वितीयः पुत्रः आसीत्। आत्मारामस्य अग्रजायाः नाम जयादेवी आसीत्। आत्मारामस्य पत्न्याः नाम सीतादेवी आसीत्।
आत्मारामस्य प्राथमिकशिक्षणं पिलाना-ग्रामस्य सर्वकारीयशालायाम् अभवत्। प्राथमिकशालायाम् आत्मारामस्य द्वे मित्रे आस्ताम्। हरस्वरूपः, शिवदयाल-पाठकश्च। 1922 तमे वर्षे चन्दपुरस्य शालायाः त्रयोदशवर्षीयः आत्मारामः मातृभाषापरीक्षां विशेषयोग्यतया सह उदतरत्। परन्तु अग्रे पठितुम् आत्मारामस्य पार्श्वे अवसरः नासीत्। यतो हि त्रयोदशवर्षीयः बालकः सामान्यप्रशिक्षणपाठ्यक्रमस्य कृते अल्पवयस्कः आसीत्। तस्मै अभ्यासक्रमाय न्यूनातिन्यूनम् अष्टादशवर्षात्मिकं वयः अनिवार्यम् आसीत्। अतः भगवानदासः आत्मारामं माध्यमिकशिक्षणाय बिजनौर-नगरं प्रैषयत्।
माध्यमिकशिक्षणाय बिजनौर-नगरं प्राप्तः आत्मारामः जयादेव्याः गृहे निवसति स्म। जयादेवी आत्मारामस्य अग्रजा आसीत्। जयादेवी विधवा आसीत्, तथा च तस्याः सन्ततिः अपि नासीत्। अतः आत्मारामं भगवानदासः तत्र प्रैषयत् इत्यपि अपरं कारणम्। आत्मारामस्य भाग्योदयस्य आरम्भः बिजनौर-नगरं प्राप्य प्रप्रथमे दिने एव अभवत्। यस्मिन् दिने सः स्वाग्रजायाः गृहं प्राप्नोत्, तस्मिन् दिने एव गृहे कश्चन जनः उपस्थितः आसीत्। सः जनः अवदत्, समीपे कुत्रचित् कश्चन शिक्षकः अस्ति, यः स्वशालायां वर्षद्वयाभ्यान्तरे छात्रान् माध्यमिकपरीक्षायै प्रशिक्षितान् करोति इति।
तस्य जनस्य कथनानुसारं पितापुत्रौ तस्य शिक्षकस्य सम्पर्कं कर्तुं निर्गतवन्तौ। बिजनौर-नगरस्य बहिः एका धर्मशाला आसीत्। तस्याः धर्मशालायाः समीपे कश्चन भग्नावशेषः आसीत्। तत्र शालायाः अवशेषः अपि न दरीदृश्यते स्म। अनेकान् स्थानीयजनान् तौ शालायाः, शिक्षकस्य च विषये अपृच्छताम्। परन्तु न कोऽपि तस्याः शालायाः विषये उत तस्य शिक्षकस्य विषये जानाति स्म। निराशौ तौ यदा प्रतिगन्तुम् उद्युक्तौ, तदा तौ एकं जनम् अपश्यताम्। सः जनः एकस्मिन् जीर्णकुटङ्के स्थितः आसीत्। सः जनः एव शिक्षकः आसीत्। तौ द्वौ तेन सह अमिलताम्। भगवानदासः तम् अकथयत्, मम पुत्रः माध्यमिकपरीक्षायाम् उत्तीर्णः अस्ति। कश्चन जनः आवाम् अकथयत् यत्, भवान् उच्चतरमाध्यमिककक्षायै छात्रान् पाठयतीति। शिक्षकः प्रत्युदतरत्, एतावता एकोऽपि छात्रः तां परीक्षाम् उत्तरितुं क्षमः नाभूत्। परन्तु यदि भवान् चिन्तयति यत्, भवतः पुत्रः मेधावी अस्ति, तर्हि भवान् प्रयासं कर्तुं शक्नोति। शिक्षकस्य उत्तरेण भगवानदासः स्तब्धः अभवत्। कञ्चित् समयं यावत् न कोऽपि किमपि अवदत्। ततः सः शिक्षकः अवदत्, शाला सप्तवादने आरभ्यते। अहं द्वे रूप्यके पारिश्रमिकं नेष्यामि। यदि भवतः पुत्रः आगन्तुम् इच्छति, तर्हि तेन ' ' इत्याख्यं पुस्तकं नीत्वा प्रातःकाले आगन्तव्यम्। तेन सह सः श्वेतकर्गदस्य टिप्पणीपुस्तकम् अपि आनयेत् इति।
शिक्षकस्य वचनं श्रुतवन्तौ पितापुत्रौ गृहमागत्यापि शालाप्रवेशस्य विषये कामपि चर्चां नाकुरुताम्। परन्तु रात्रौ शय्यायां पितापुत्रौ शिक्षकस्य कथनविषये परस्परं परामृशताम्। ततः भगवानदासः आत्मारामम् अपृच्छत्, "शिक्षकः यत्किमपि उक्तवान्, तस्य विषये तव कः परामर्शः ?" इति। आत्मारामः उदतरत्, अहं कदाचित् वर्षद्वये उत्तीर्णः न भविष्यामि, किन्तु वर्षत्रये उत्तीर्णो भविष्यामि चेदपि मम द्वे वर्षे रक्षिते भविष्यतः इति। यतो हि तस्मिन् काले उच्चतरमाध्यमिकस्तरस्य परीक्षायै पञ्चवर्षाणि अपक्ष्यन्ते स्म। द्वितीये दिने यथासमयम् आत्मारामः द्वे रूप्यके, पुस्तकं, टिप्पणीपुस्तिकां च नीत्वा शालाम् अगच्छत्।
कानिचन दिनानि शालायां अतीतानि आत्मारामस्य। एकस्मिन् दिने यदा भाषाचयनस्य प्रिक्रिया आरब्धा, तदा आत्मारामः हिन्दीभाषाम् अचिनोत्। अपरौ द्वौ छात्रौ ऊर्दूभाषाम् अचिन्वताम्। एकस्यां कक्षायां छात्राणां चयनवैभिन्न्येन पाठनप्रक्रिया क्लिष्टा भविष्यतीति विचिन्त्य शिक्षकः आत्मारामम् ऊर्दूभाषायां किमपि लेखितुम् आदिशत्। यतो हि आत्मारामः प्राथमिककक्षायाम् ऊर्दूभाषाम् अधीतवान् आसीत्। आत्मारामः किञ्चित् लिखित्वा यदा शिक्षकं प्रादर्शयत्, तदा शिक्षकः आत्मारामम् ऊर्दूभाषां चेतुम् अवदत्। यतः आत्मारामेण ऊर्दूभाषया यल्लिखितम् आसीत्, तद् अति सुष्ठु आसीत्। परन्तु आत्मारामः संस्कृतं पठितुम् इच्छति स्म। अतः सः समीपस्थं संस्कृतपण्डितं पाठयितुं न्यवेदयत्। परन्तु सः पण्डितः आत्मारम् अवदत्, "स्वल्पे काले संस्कृतस्य व्याकरणं पठितुं न शक्यते। संस्कृतभाषायाः व्याकरणं क्लिष्टं भवती"ति। ततः आत्मारामः पर्शियन्-भाषाम्, ऊर्दूभाषां च पठितुं विवशः अभवत्।
आत्मारामस्य शालायां केलवं चत्वारः छात्राः आसन्। स्वयम् आत्मारामः, शिवदलायसिंहः, आनन्दस्वरूपः, मसूद अहमद् च। एकवर्षं यावत् आत्मारामः तस्यां शालायाम् ऊर्दूभाषाम् अपठत्। मध्यावकाशोत्तरं यदा आत्मारामः शालां प्रत्यगच्छत्, तदा तेन ज्ञातं यत्, अन्ये त्रयः छात्राः उच्चतरमाध्यमिकशालायां प्रवेशं प्रापन् इति। अतः शिक्षकस्य शालायां केलवम् आत्मारामः एकाकी छात्रः अवशिष्टः। एकस्य छात्रस्य कृते अधिकं समयं व्ययीकर्तुं शिक्षकः अक्षमः आसीत्। अतः सः आत्मारामम् उच्चतरमाध्यमिकशालां प्रेवेष्टुं परामर्शयत्। परन्तु आत्मारामः तथा कर्तुं निराकरोत्। अपरत्र शिक्षकः अपि पाठयितुम् असमर्थः आसीत्। परन्तु आत्मारामस्य निश्चयं दृष्ट्वा सः अवदत्, "आत्माराम ! तव कृते अहं प्रातः षड् वादने, सायं चतुर्वादने च समयं दातुं शक्नोमि" इति। तदा आत्मारामः एकाकी आसीत्, अतः हिन्दीभाषायाः अध्यापने शिक्षकः अपि तत्परः आसीत्। परन्तु सः हिन्दीभाषां पाठयितुम् अधिकपारिश्रमिकस्य याचनाम् अकरोत्। शिक्षकस्य प्रस्तावम् आत्मारामः सहर्षम् अङ्ग्यकरोत्। तेन स्वगृहव्ययात् शिक्षकाय पारिश्रमिकस्य व्यवस्था कृता। ततः सः प्रतिदिनं द्वे होरे हिन्दीभाषां पठति स्म। यतः आत्मारामः दिनस्य प्रथमे प्रहरे एव शालां गच्छति स्म। अतः शीतकाले मार्गं द्रष्टुं कन्दिलं नीत्वा गच्छति स्म। हिन्दीभाषायाः अध्ययने केचन मासाः एव व्यतीताः। ततः शालायां अन्ये त्रयः छात्राः प्रविष्टवन्तः। ते सर्वे यवनाः आसन्। तेषां सर्वेषां भाषा ऊर्दू उत पर्शियन् आसीत्। परन्तु दृढनिश्चयी आत्मारामः स्वभाषां द्वितीयवारं न पर्यवर्तयत्। ततः आत्मारामः, तस्य हुसैन इत्याख्यः सहपाठी च वाराणसीं परीक्षां दातुं गतवन्तौ। हुसैन इत्येषः पर्शियन्-भाषायाम् अनुत्तीर्णः अभवत्। तस्यां परीक्षायां द्वितीयश्रेण्या आत्मारामः उत्तीर्णः अभवत्।
एवं 1924 तमे वर्षे बनारसहिन्दुविश्वविद्यालयात् आत्मारामः मैट्रिक्युलेशन्-परीक्षायाम् उत्तीर्णः अभवत्। पञ्चदशवर्षीयः आत्मारामः स्वस्य जीवनस्य त्रीणि वर्षाणि अरक्षत्। यस्यां शालायाम् आत्मारामः पठति स्म, तस्याः शालायाः शिक्षकं यदा कश्चन हिन्दीसमाचारपत्रं पठित्वा अवदत्, "पिलाना-ग्रामस्य कश्चन बालकः मैट्रिक्युलेशन-परीक्षायाम् उत्तीर्णः अभवदि"ति, तदा सः शिक्षकः अत्युत्साही अभवत्। भग्नावशेषे पाठ्यमानः सः शिक्षकः नगरे चर्चायाः विषयः आसीत्। तस्य प्रसिद्धिः अवर्धत। समाचारपत्रेषु, भित्तिपत्रेषु च सर्वत्र आत्मारामस्य सफलतायाः वार्ताः आसन्।
आत्मारामः स्वसफलतायाः समाचारं यदा प्रापत्, तदा सः बिजनौर-नगरे आसीत्। स्वपितुः आशीर्वादं स्वीकर्तुम् आत्मारामः ब्राह्ममुहूर्ते उत्थाय पिलना-ग्रामं प्रति पद्भ्यां यात्राम् आरभत। 6 माइल् दूरे स्थितं पिलाना-ग्रामं मध्याह्नकाले प्राप्य आत्मारामः स्वसफलतायाः सूचनां स्वपित्रे अयच्छत्। भगवानदासः पुत्रस्य सफलतायाम् आनन्दितः आसीत्। सः पौनःपुन्येन आत्मारामस्य पृष्ठे हस्तं स्थापयित्वा तस्मिन् स्निह्यति स्म। स्वोच्चमाध्यमिकस्तरीयाभ्यासस्य साफल्यानन्तरम् आत्मारामः उच्चशिक्षणाय चिन्तनम् आरभत।
आत्मारामस्य सफलतायाः अनन्तरं यदा तस्य उच्चिशिक्षणस्य चर्चा आरब्धा, तदा भगवानदासः बनारसहिन्दुविश्वविद्यालयस्य नाम प्रास्तौत्। यतो हि बनारसविश्वविद्यालस्य ख्यातिः विश्वे विस्तृता। परन्तु आत्मारामस्य सम्मुखं धन-साधनानाम् अभावः आसीत्। अतः आत्मारामः पितुः प्रस्तावस्य विषये किमपि नावदत्। तस्मिन् काले बनारसविश्वविद्यालये पठनस्य व्ययः न्यूनातिन्यूनं त्रिंशत् उत पञ्चत्रिंशत् आसीत्। भगवानदासः अपि सत्यतायाः अवबोधने सति चिन्तितः अभवत्।
स्वपुत्रस्य बनारसविश्वविद्यालये प्रवेशं कारयितुं धनसङ्ग्रहस्य निर्णयं कुर्वन् भगवानदासः ग्रामेशम् उपागच्छत्। तस्मात् पुरा कदापि भगवानदासः धनयाचनायै न गतवान् आसीत्। परन्तु तस्य प्रप्रथमः याचनावसरः एव दुःखदः असिध्यत्। ग्रामेशः भगवानदासम् अवदत्, "अरे भगवानदास ! त्वं बालवद् किमर्थं भाषसे ? कदापि त्वया श्रुतम् अस्ति यत्, अश्वाय पादत्राणस्य निर्माणं जातम् ? चरणः तु मण्डुकस्यापि वर्धते" इति। एतादृशैः उपालम्भपूर्णवचनैः अपमानितः भगवानदासः गृहम् अगच्छत्। तस्मिन् काले सः खेदं, दुःखं चान्वभवत्। परन्तु तम् उपालम्भं सः प्रतिस्पन्दत्वेन स्व्यकरोत्। यदा सः गृहं प्रविष्य समनन्तरमेव स्वपुत्रेण सह समीपस्थेन केनचन बालकेन सह मेलितुम् अगच्छत्। सः बालकः भगवानदासस्य गृहात् पञ्च माईल् दूरे निवसति स्म। उभौ पितापुत्रौ तस्य गृहम् गतवन्तौ।
सः बालकः बनारसविश्वविद्यालये पठन् आसीत्। आत्मारामस्य साहाय्यं कर्तुम् उद्युक्तः सः छात्रावासस्य प्रकोष्ठे निवसितुम् आत्मारामाय अवसरम् अयच्छत्। ततः सः तस्य विश्वविद्यालयस्य इण्टर-अभ्यासं प्रारभत। तस्मिन् वर्षे सः विश्वविद्यालस्य छात्रावासे निवस्य एव अध्ययनम् अकरोत्। छात्रावासे सुविधानाम् अभावे सति आत्मारामः स्वयमेव भोजनं पचति स्म। विद्युदादीनाम् अभावेनापि तस्य अध्ययनम् अति कष्टपूर्णम् आसीत्। तस्मिन् काले अधिकाः छात्राः विज्ञानं मुख्यविषयत्वेन न चिन्वन्ति स्म। विज्ञानविषयस्य प्राध्यापकानां, शिक्षकानां च आवश्यकता आसीत्, परन्तु तेषाम् अभावः अपि आसीत्।
आत्मारामः स्वयं भाषायाः छात्रः आसीत्। परन्तु उच्चशिक्षणाय मुख्यविषयस्य चयने सः किङ्कर्तव्याकर्तव्यमूढः आसीत्। तस्य मित्रस्य परामर्शेण आत्मारामेण विज्ञानविषयः मुख्यविषयत्वेन स्वीकृतः। तस्य परामर्शकमित्रेषु नायकचन्द्रः, रामचन्द्रः च मुख्यौ। ततः आत्मारामस्य विज्ञानाध्ययनम् आरब्धम्। एतावता आत्मारामेण कदापि विज्ञानस्य अध्यनयनं न कृतम् आसीत्। अपरञ्च स्वपाकः, आङ्ग्लभाषायाः अभावः इत्यादयः अनेकाः समस्याः अपि आसन्। मेट्रिक्-मध्ये प्रथमे वर्षे आत्मारामः अनुत्तीर्णः अभवत्। रसायन-भौतिकी-विज्ञानयोः शिक्षकाः उच्चस्तरीयाङ्ग्लभाषया पाठयन्ति स्म। गणितविषये अपि तथैव आसीत्। तस्मिन् वर्षे आत्मारामः रसायनशास्त्रे 12%, भौतिकशास्त्रे 10%, गणितविषये 18% च अलभत। स्वपरिणामं दृष्ट्वा आत्मारामस्य भानम् अभवत् यत्, विज्ञानाध्ययनं पयोहिमः नास्ति, यः सहजतया प्राप्यते। विज्ञानं पठितुम् अधिकः प्रयासः, परिश्रमश्च अपेक्ष्यते इति। तस्मिन् काले विद्यार्थिनः मध्यसत्रे स्वविषयं परिवर्तयितुं शक्नुवन्ति स्म। अतः तेन विषयपरिवर्तनस्य विकल्पः अपि आकलितः। सः पुनः पर्शियन्-भाषां पठितुम् अपि अकाङ्क्षत।
अत्यधिकचिन्तनानन्तरम् अन्ततो गत्वा आत्मारामेण विषयपरिवर्तनस्य आवेदनपत्रं पूरितम्। तत्पत्रं नीत्वा सः रसायनशास्त्राध्यक्षस्य कार्यालयं प्रैषयत्। आत्मारामः येन केन प्रकारेण विषयपरिवर्तनम् इच्छति स्म। अतः तेन स्वावदेनपत्रेण सह स्वप्राप्ताङ्कपत्रम् अपि योजितम् आसीत्। तस्य आशयः आसीत् यत्, यदि अहम् अल्पगुणप्राप्तेः कारणं प्रदर्शयिष्यामि, तर्हि शीघ्रं, निर्विघ्नं च विषयपरिवर्तनस्य अनुमोदनं प्राप्स्यामि इति। परन्तु परिणामः भिन्नः एवाभवत्। आत्मारामस्य विषयपरिवर्तनस्य आवेदनं दृष्ट्वा समनन्तरं रसायनविभागाध्यक्षः एम् बी राणे-महोदयः आत्मारामम् आह्वयत्। आत्मारामः यदा विभागाध्यक्षस्य प्रकोष्टं प्रविष्टवान्, तदा राणे-महोदयः प्रश्नम् अपृच्छत्, "रसायन-भौतिकशास्त्रयोः अपेक्षया गणितशास्त्रे अधिकाङ्कप्राप्तेः पृष्ठभुवि किं कारणम् अस्ति ?" इति। विभागाध्यक्षेण आङ्ग्लभाषया प्रश्नः कृतः आसीत्, परन्तु आत्मारामः हिन्दीभाषया प्रत्युदतरत्। आत्मारामः अवदत्, कदाचित् अहं विज्ञानसम्बद्धान् विषयान् ज्ञातुं न शक्तवान् इति। प्रो. राणे-महोदयः आश्चर्यचकितः आसीत् यत्, कश्चन विद्यार्थी गणितविषये योग्यरीत्या पठितुं शक्नोति, स एव छात्रः विज्ञानविषयेषु अनुत्तीर्णः कथं भवितुम् अर्हति ? इति। क्षणं विचिन्त्य सः स्वसहकर्मिणं प्रो. फूलदेव सहाय वर्मा-महोदयम् आह्वयत्। प्रो. राणे-महोदयः फूलदेव-महोदयेन सह काञ्चित् मन्त्रणाम् अकरोत्। ततः सः आत्मारामं फूलदेव-महोदयेन सह गन्तुम् आदिष्टवान्।
फूलदेव-महोदयस्य पृष्ठे पृष्टे चलन् आत्मारामः अचिन्तयत्, एषः प्राध्यापकः मह्यं विज्ञानविषयं परिवर्तयितुम् अनुमतिं दास्यति इति। एवं चिन्तयन् फूलदेव-महोदयस्य प्रकोष्टं प्रविष्टः आत्मारामः तूष्णीं स्थितः। परन्तु आत्मारामस्य चिन्तनानुसारं किमपि नाभवत्। प्रो. फूलदेवः आत्मारामम् अवदत्, त्वं नियमिततया व्याख्याने उपस्थितः न आसीः, अपि च तव पार्श्वे आश्यकपुस्तकानि न सन्ति इति। यतो हि आत्मारामः आगामिवर्षे पठितवतां छात्राणां पुस्तकानि स्वीकृत्य अध्ययनं करोति स्म। फूलदेव-महोदयः स्वोत्पीठिकायां स्थापितं रसायनशास्त्रस्य किञ्चित् पुस्तकम् आत्मारामं प्रादर्शयत्। फूलदेव-महोदयस्य विश्लेषणेन आत्मारामः अवगतवान् यत्, मम विषयपरिवर्तनस्य याचिका निरस्ता अभवदिति। फूलदेव-महोदयस्य सहिष्णुतया अपि सः परिचितः अभवत्। अतः सः फूलदेव-महोदयात् तत्पुस्तकम् अयाचत। अनुक्षणं फूलदेव-महोदयः तत्पुस्तकम् आत्मारामस्य हस्ते अस्थापयत्। सः अवदत्, एतत् पुस्तकं पठित्वा मां कथय इति।
कानिचन दिनानि पुस्तकं पठित्वा आत्मारामः फूलदेव-महोदयस्य समीपं गतः। यः बालकः विज्ञानविषयं प्रति अरुचिं नीत्वा प्रकोष्ठात् निर्गतः आसीत्, सः यदा पुनः प्रकोष्टं प्रविष्टः, तदा न केवलं तस्य अभिरुचौ वृद्धिः अभवत्, अपि तु तस्य बालकस्य आत्मविश्वासः अपि अवर्धत। आत्मारामस्य प्रयासैः सोऽपि अति प्रसन्नः अभवत्। ततः फूलदेव-महोदयस्य संसर्गेण आत्मारामस्य विज्ञानविषयात् भीतिः व्यपगता। आत्मारामेण पूर्णबलेन विज्ञानस्य अध्ययनं प्रारब्धम्। तस्मिन् वर्षे विषेशयोग्यतया सह आत्मारामः रसायनशास्त्रे उत्तीर्णः अभवत्। सर्वेऽपि आत्मारामस्य परिणामेन विस्मिताः आसन्।
आत्मारामः कुत्रचित् स्वविज्ञानाध्ययनस्य अनुभवम् अलिखत्, "यदा कदापि विज्ञानप्राध्यापकाः ' ' इति वदन्ति स्म, तदा मम मनसि 'पानी के चने' इति बोधः समुद्भवति स्म। अतः प्रायोगिके अपि अहं किमपि विशेषं कर्तुं न शक्नोमि स्म। यतः अहं 'चणकम्' अन्विष्यामि स्म। प्रायोगिके किमपि अकृतः अहं प्रो. तिवारी-महोदयात् बहुधा भर्त्सनां प्राप्नवम्। ततः एकस्मिन् दिने यदा प्रो. प्रतुल घोष-महोदयः ऊष्माभारस्य विषये अध्यापयन् आसीत्, तदा मया ज्ञातं यत्, '' इति परिमाणविशेषसंज्ञा अस्ति। ततः अहं स्वमूढतायाः उपरि अट्टहास्यम् अकरवम्" इति।
1926 तमे वर्षे आत्मारामः इण्टर-परीक्षायाम् उत्तीर्णो भूत्वा तस्मिन्नेव वर्षे बी एस सी-अभ्यासम् आरभत । बी एस सी-अभ्यासं सः कानपुर-महानगरस्य डि ए वी-महाविद्यालयात् अकरोत्। तस्य महाविद्यालयस्य आचार्यः लाला दिवान चन्द इत्येषः आसीत्। तस्मिन् विद्यालये पठितुम् आत्मारामः द्वे छात्रवृत्ती अलभत। द्वयोः छात्रवृत्योः धनम् आहत्य पञ्चविंशतिरूप्यकाणि भवति स्म। बी एस् सी-मध्ये प्रप्रथमवर्षस्य परीक्षायाम् आत्मारामः सारल्येन उत्तीर्णः अभवत्। यतः सः विशेषवर्गे अपि पठितुं गच्छति स्म। प्रथमवर्षस्य सफलतायाः अनन्तरम् आत्मारामः द्वितीये वर्षे विशेषवर्गम् अत्यजत्। यतो हि सः अचिन्तयत्, विज्ञानाध्ययनं परिश्रमप्रतीकं वर्तते। अतः अहम् अपरे वर्षे विशेषवर्गम् अगत्वा स्वपरिश्रमेण अध्ययनं करिष्ये इति। ततः सः विषयमग्नः सन् चिरकालं पठति स्म। अनेकेषां होराणां दीर्घाध्ययनेन सः गभीरतया अस्वस्थः अभवत्। 1928 तमे वर्षे बी एस् सी-अभ्यासक्रमस्य अन्तिमसत्रे सः द्वितीयश्रेण्या उत्तीर्णः अभवत्। आत्मारामः स्वपरिणामेन यावान् उदासी आसीत्, तावानेव महाविद्यालयस्य प्राचार्यः लाला दिवान चन्द-महोदयः आसीत्।
प्रथमे सत्रे योग्याङ्कान् प्राप्तः आत्मारामः एम् एस् सि-अभ्यासक्रमाय अत्युत्साही आसीत्। परन्तु द्वितीयसत्रस्य परिणामेन आत्मारामस्य भविष्यम् अस्थिरम् अभवत्। यद्यपि तस्य पर्याप्ताङ्काः नासन्, तथापि सः एम एस सि-अभ्यासं कर्तुं सज्जः अभवत्। आत्मारामः यदा कानपुर-नगरात् इलाहाबाद-नगरं गच्छति स्म, तदा रेल-स्थानके तस्य सम्पर्कः जमनलाल शर्मा-महोदयेन सह अभवत्। सः एम एस् सी-पदव्यै पठितुम् इलाहाबाद-विश्वविद्यालयं गच्छन् आसीत्। आत्मारामः तेन सह तस्य प्रकोष्ठे स्वस्यूतादि अस्थापयत्।
बिजनौर-नगरात् निर्गतः आत्मारामः डि ए वी-महाविद्यालस्य प्राचार्यस्य लाला दिवान चन्द इत्येतस्य महोदयस्य आश्वासनं प्राप्य निर्गतः आसीत्। चन्द-महोदयस्य डॉ. मेघनादेन, डॉ. नीलरत्नेन च सह व्यक्तिगतसम्बन्धः आसीत्। अतः सः तौ इलाहाबाद-विश्वविद्यालयस्य प्राध्यापकौ प्रति आत्मारामस्य कृते अनुशंसापत्रं प्रैषयत्। यतो हि बी एस् सी-पदव्याः अन्तिमे सत्रे आत्मारामस्य प्राप्ताङ्काः पर्याप्ताः नासन्। परन्तु इलाहाबाद-विश्वविद्यालयस्य शुल्कग्रहणकार्यलयात् यदा आत्मारामः अजानत् यत्, तस्य नाम प्रवेशार्हछात्रेषु नास्ति, तदा आत्मारामः निराशः अभवत्।
यतो हि इलाहाबाद-विश्वविद्यालये आत्मारामः प्रवेशं नालभत, अतः सः इलाहाबाद-विश्वविद्यालयस्य प्राध्यापकस्य नीलरत्न-महोदस्य कक्षायाः बहिः स्थित्वा व्याख्यानम् अशृणोत्। नीलरत्न-महोदस्य व्याख्यानेन आत्मारामः अत्यन्तप्रभावितः आसीत्। तेन स्वजीवने एतावान् प्रतिभाशाली, वाक्पटुः, विद्यावान् प्राध्यापकः न दृष्टः आसीत्। तस्मिन् काले तेन अनुभूतं यत्, तस्य जीवनस्य अतिमहत्त्वपूर्णः अवसरः व्यपगतः इति। दुःखितमनसा सः इलाहाबाद-नगरात् प्रति गन्तुम् उद्युक्तः। परन्तु नीलरत्न-महोदायात् प्रभावितः आत्मारामः तेन सह मेलितुम् इच्छति स्म। अतः द्वितीये दिने रविवासरे आत्मारामः बेलि-मार्गस्थितं श्रीनीलरत्नस्य गृहम् अगच्छत्।
प्रातःकाले श्रीनीलरत्नस्य गृहं प्राप्य आत्मारामः द्वारशब्दम् अकरोत्। श्रीनीलरत्नस्य अनुजः द्वारम् उदघाटयत्। तदा आत्मारामः सम्मुखे स्थितं धौतवस्त्रधारिणं श्रीनीलरत्नम् अपश्यत्। ततः श्रीनीलरत्नः आत्मारामं समीपे स्थानं स्वीकर्तुम् अकथयत्। श्रीनीलरत्नः अवदत्, भोः ! अहं न जाने त्वं कः ? इति। इलाहाबाद-नगरस्य त्यागात् प्रागहं भवतः दर्शनं कृत्वा कृतज्ञतां पाठयितुम् इच्छामि स्म। अतः अत्र उपस्थितोऽस्म्यहम् इति आत्मारामः पत्युदतरत्। श्रीनीलरत्नः किमपि वदेत् तस्मात् प्रागेव आत्मारामः विनम्रतायुक्तेन स्वरेण अवदत्, भवतः ह्यस्तनं व्याख्यानं मह्यम् अतीव अरोचत इति।
आत्मारामः मां प्रभावितं कर्तुम् अनुशंसां कुर्वन् अस्ति इति विचिन्त्य श्रीनीलरत्नः आत्मारामम् अकथयत्, मम व्याख्याने तुभ्यं किम् अत्यधिकम् अरोचत ? इति कथय। प्राध्यपकस्य प्रश्नस्य उत्तरं यच्छन् आत्मारामः सम्पूर्णस्य व्याख्यानस्य सारं, मुख्यांशान् च विस्तारेण अवदत्। आत्मारामेण प्रभावितः श्रीनीलरत्नः अपृच्छत्, त्वं तु कक्षायां नासीत्, तर्हि त्वया मम व्याख्यानं कथं श्रुतम् ? इति। अहं प्रकोष्टस्य समीपे या सोपानशृङ्खला अस्ति, तत्र स्थित्वा अशृणवम् इति आत्मारामः अकथयत्। आत्मारामस्य उत्तरं श्रुत्वा स्तब्धः श्रीनीलरत्नः किञ्चित् गहनचिन्तने मग्नः अभवत्। त्वं श्वः गमनात् प्राक् प्रयोगशालाम् आगत्य मया सह मिलतु इत्युक्तवा सः स्वानुजम् आत्मारामाय अल्पाहारं दातुम् आदिष्टवान्।
रविवासरे जातस्य सम्पर्कस्यानन्तरम् आत्मारामः अचिन्तयत्, अनेन सम्पर्केण किमपि शुभं भविष्यतीति। यतः श्रीनीलरत्नः स्वगृहम् आगतेभ्यः सर्वेभ्यः तु मधुरं न यच्छेत्। ततः द्वितीयदिने सोमवासरे आत्मारामः प्रयोगशालां गत्वा श्रीनीलरत्नेन सह अमिलत्। तस्मिन् काले प्रयोगशालायां के पि चेटर्जी-महोदयः उपस्थितः आसीत्। सः इलाहाबाद-विश्वविद्यालये केतुबाबू इति प्रसिद्धः आसीत्। आत्मारामस्य विषये श्रीनीलरत्नः चेटर्जी-महोदयेन सह सम्भाषणम् अकरोत्। ततः चेटर्जी-महोदयः आत्मारामं शुभसमाचारम् अश्रावयत्, तव प्रवेशः निश्चितः अभवत् इति। तस्य महोदयस्य वचनं श्रुत्वा आत्मारामस्य आनन्दः सीमातीतः अभवत्। श्रीनीलरत्नमहोदयः आत्मारामाय किञ्चन पत्रं दत्त्वा कुलसचिवाय दातुम् अकथयत्। ईश्वरं प्रति कृतज्ञतां पाठयन् आत्मारामः एतस्य प्रसङ्गस्य सन्दर्भे गोस्वामितुलसीदासस्य चौपाई उदलिखत्,
आपु न आवै ताहिं पै ताहिं तहाँ लै जाय।। तुलसीदासः
अर्थात्, तुलसी कथयति, यदि कोऽपि ईश्वरस्य साहाय्ययोग्यः अस्ति, तथा च ईश्वरः स्वयं साहाय्यार्थम् आगन्तुं शक्नोति, तर्हि ईश्वरः तं जनं सहायकस्य पार्श्वे प्रेषयति इति।
इलाहाबाद-विश्वविद्यालये प्रवेशं प्राप्य आत्मारामः हिन्दुछात्रालये निवसति स्म। तत्रापि आत्मारामः स्वपाकी आसीत्। स्वार्थिकशक्तिं वर्धयितुं सः बालकेभ्यः विशेषवर्गान् यच्छति स्म। 1931 तमे वर्षे इलाहाबाद-विश्वविद्यालात् प्रथमश्रेण्या उत्तीर्णः आत्मारामः विश्वविद्यालये प्रप्रथमः आसीत्। आत्मारामस्य सफलतायाः समग्रे विश्वविद्यालये श्रीनीलरत्नस्य प्रशंसा भवति स्म। यतो हि तस्मिन् स्थिता विद्यार्थिनिरीक्षणक्षमता एव आत्मारामस्य विश्वविद्यालये प्रवेशं निश्चितम् अकरोत्। आत्मरामस्य विस्मयकारिणीं सिद्धिं दृष्ट्वा श्रीनीलरत्नः स्वयमपि गर्वितः आसीत्।
आत्मारामः स्वजीवन्यां छात्रावासे घटितं कञ्चन प्रसङ्गं न्यरूपयत्, "अहं हिन्दुछात्रालये निवसामि स्म। अहं स्वपाकी आसम्। एम एस् सी-मध्ये अन्तिमे वर्षे आसम् च। एकदा सायङ्काले प्रो. नीलरत्नः छात्रालयम् आगत्य मम प्रकोष्ठं प्रविष्टः। सः समयः अविस्मरणीयः, अविशिष्टश्च आसीत्। यतः उत्तमः, प्रसिद्धः वैज्ञानिकः प्रो. नीलरत्न धर-महोदयः कस्यचित् सामान्यबालकस्य प्रकोष्ठे आसीत्। अहं पचने व्यस्तः आसम्। प्रकोष्ठं प्रविष्य सः प्रेम्णा, अनुरागेण च अवदत्, इतःपरं त्वं स्वभोजनं न पक्ष्यसि इति। एवं वदन् सः सम्पूर्णे प्रकोष्ठे इतस्ततः अपश्यत्। ततः सहसा सः स्वकोषात् द्वयोः मासयोः भोजनालयस्य व्ययं मे दातुम् उद्युक्तः। एतादृशस्य महतः जनस्य कथनं निराकर्तुं मयि सामर्थ्यं नासीत्। अतः अहं सहर्षं तद्धनं स्व्यकरवम्। ततः श्रीनीलरत्नः प्रकोष्ठं, तत्र स्थितानि पुस्तकानि च अपश्यत्। तेन मम टिप्पणीपुस्तिका अपि पठिता। ततः सः आनन्दितः सन् छात्रालयात् निर्गतः। अहं तस्य अनितरसाधारणया सहानुभूत्या अभिभूतः अभवम्। तस्य प्रसङ्गस्यानन्तरम् अद्य पञ्च दशकानि व्यतीतानि, तथापि सः प्रसङ्गः सुस्पष्टतया, प्रत्यक्षतया च मे मनसि उत्कीर्णितः अस्ति" इति।
ततः रसायनविदः डॉ. श्रीनीलरत्नस्य साहाय्येन आत्मारामः अनुसन्धानछात्रावृत्तिं प्राप्नोत्। तस्मिन् अनुसन्धाने आत्मारामः चित्र-रसायनक्रियाणाम् अध्ययनम् अकरोत्। तस्य अनुसन्धासस्य परिसमाप्तौ आत्मारामः 1936 तमे वर्षे विद्यावाचस्पतिः अभवत्। प्रकाशरासायनिकप्रतिक्रियायाः सिद्धान्तस्य साफल्यात् आत्मारामः विद्यावाचस्पतिपदवीम् अलभत।
आत्मारामस्य विषये डॉ. नीलरत्न-महोदयः अलिखत्, "डी एस् सी-अध्ययनकाले आत्मारामः 100 रूप्यकाणि मासिकछात्रवृत्तिं प्राप्नोति स्म। तेषु रूप्यकेषु आत्मारामः केवलं सप्तरूप्यकाणि व्ययीकरोति स्म। शेषधनं सः स्वगृहं प्रेषयति स्म" इति।
तस्मिन् काले विवाहः किशोरावस्थायाम् एव भवति स्म। तथा आत्मारामस्यापि अभविष्यत्, परन्तु वरदक्षिणायाः विरोधी, आर्यसमाजानुयायी च भगवानदासः वारद्वयं विवाहप्रस्तावं निराकरोत्। यतो हि कन्यापक्षः वरदक्षिणां दातुं कटिबद्धः आसीत्। यदा आत्मारामः दशवर्षीयः आसीत्, तदा पिलाना-ग्रामस्य कश्चन जनः स्वपुत्र्यस्य कृते आत्मारामाय विवाहप्रस्तावं प्रैषयत्। ततः आत्मारामः यदा एम एस सी–मध्ये पठन् आसीत्, तदा कस्याश्चित् कन्यायाः विवाहप्रस्तावः आसीत्। ततः आत्मारामस्य कृते यदा तृतीयः विवाहप्रस्तावः सम्प्राप्तः, तदा तस्य विवाहः अभवत्।
आत्मारामस्य भगिनी देहल्यां निवसति स्म। एकदा काचित् कन्या मेट्रिक-परीक्षायै कानिचन दिनानि स्थातुं तस्याः गृहे निवसति स्म। तस्याः कन्यायाः माता स्वपुत्र्याः विवाहाय उत्सुका आसीत्। अतः सखिसम्मेलने सा स्वपुत्र्याः विवाहयोग्यतायाः विषयम् उपास्थापयत्। तस्मिन् काले प्रतिवेशिनी आत्मारामस्य भगिनीम् अवदत्, "एतस्याः कन्यायाः तव भ्रातुः आत्मारामस्य च विवाहं कारयतु" इति। आत्मारामः समये प्राप्ते स्वभगिन्याः गृहं गच्छति स्म। अतः प्रतिवेशिनः अपि आत्मारामस्य विषये जानन्ति स्म। परन्तु आत्मारामस्य भगिनी अवदत्, आत्मारामः विवाहाय सज्जः नास्ति इति। परन्तु ग्रीष्मकालीने अवकाशे एतादृशं विषयम् उपस्थापयितुं शक्नोम्यहम्। कन्यायाः माता अपि अवदत्, अहम् अपि ग्रीष्मकाले भवत्याः पितुः गृहम् आगत्य विवाहनिवेदनं कर्तुं तत्परा अस्मि इति। ततः ग्रीष्मकाले भगिनी, कन्यामाता च ग्रामं गत्वा भगवानदासेन सह मिलित्वा विवाहप्रस्तावम् उपास्थापयत्। परन्तु यदा भगवानदासः आत्मारामं विवाहविषये अकथयत्, तदा आत्मारामः निराकरोत्। तस्य तर्कः आसीत् यत्, मम पार्श्वे सद्यः वृत्तिः नास्ति। अहं यत् पठामि, तस्य कृते प्रतिमासं शतं रूप्यकाणि छात्रवृत्तिं प्राप्नोमि। तस्योपरि वैवाहिकव्ययं सोढुं न शक्नोम्यहम् इति।
ततः समये व्यतीते कन्यायाः भ्राता पुनः विवाहप्रस्तावं साक्षात् आत्मारामस्य सम्मुखम् उपास्थापयत्। आत्मारामः अवदत्, अहम् इतोऽपि पठन् अस्मि। मम पार्श्वे योग्यं गृहं नास्ति तथा च आजीविका अपि नास्ति। कन्यायाः भ्राता वाक्कीलः आसीत्। सः अवदत्, चिन्ता नास्ति। अधुना केवलं विवाहनिश्चितिं कुर्मः, ततः आजीवकायां सत्यां विवाहं करिष्यामः इति। तस्य तर्कस्य सम्मुखम् आत्मारामस्य पार्श्वे किमपि वक्तुं नासीत्। अतः सः अङ्ग्यकरोत्।
तस्मिन् काले विवाहात् प्राक् वरकन्ये परस्परं न पश्यतः स्म। परन्तु आत्मारामः आधुनिकविचारैः सम्पन्नः आसीत्। अतः तेन कन्यया सह चर्चायै प्रस्तावः कृतः। परन्तु कन्यापक्षात् सः प्रस्तावः निरस्तः अभवत्। आत्मारामः तेषां निर्णयस्य सम्माननं कृत्वा किमपि नावदत्। ततः आत्मारामः अजमेर-महाविद्यालये आजीविकाम् अलभत। परन्तु सा वृत्तिः मासचतुष्मिका एव आसीत्। तथापि कन्यापक्षस्य पौनःपुन्येन आग्रहे सति आत्मारामः 1934 तमस्य वर्षस्य दिसम्बर-मासस्य षड्विंशे दिनाङ्के सीतीदेव्या सह विवाहबन्धनेन बद्धः ।
1936 तमे वर्षे डॉ. आत्मारामः भारतीयौद्योगिकानुसन्धानसंस्थानम् अगच्छत्। तत्र तस्य परिचयः डॉ. मेघनादेन, डॉ. शान्तिस्वरूपेण च सह अभवत्। तादृशैः अनेकैः मूर्धन्यवैज्ञानिकैः सह कार्यं कृत्वा डॉ. आत्मारामस्य जीवनेऽपि अनेकानि प्रोत्साहकानि परिवर्तनानि अभूवन्। 1937 तमे वर्षे डॉ. मेघनादः सुभाष-आख्यं क्रान्तिकारिणं स्वसमितौ कार्यं कर्तुम् आह्वयत्। परन्तु सुभाषमहोदयेन उक्तम्, अधुना अहं केवलं स्वतन्त्रतायै चिन्तयामि। अतः अहम् एतादृशेषु कार्येषु सक्रियः भवितुं न शक्नोमि इति। ततः डॉ. मेघनादः आत्मारामं स्वप्रकोष्ठम् आवह्वयत्। डॉ. मेघनादः अति क्रुद्धः आसीत्। आत्मारामः यदा तस्य प्रकोष्ठं प्रविष्टः, तदा डॉ. मेघनादः क्रोधावेशेन अवदत्, अस्माकं देशस्य विद्यावन्तः जनाः "चरखा", "खद्दर" इत्येते अतिरिच्य किमपि न चिन्तयन्ति इति।
डॉ. बी एन् अडारकार-महोदयेन ' ' इत्याख्यं पुस्तकं लिखितम् आसीत्। तस्य पुस्तकस्य प्रस्तावना डॉ. मेघनादेन लिखिता। सा प्रस्तावना अति महत्त्वपूर्णा आसीत्। आत्मारामः अपि तत् पुस्तकं पठन् आसीत्, अतः यदा डॉ. मेघनादः आत्मारामेण सह चर्चयन् आसीत्, तदा आत्मारामः तस्मै परामर्शम् अयच्छत्। आत्मारामः अवदत्, महोदय ! भवता सः प्रष्टव्यः आसीत् यत्, ' ' इति। उक्तपरामर्शस्य पृष्ठे आत्मारामस्य आशयः आसीत् यत्, खादि-इत्यादिकम् अपि आवश्यकम् अस्ति। आत्मारामः स्वयमपि खादि-वस्त्रधारी आसीत्। आत्मारामस्य वचनं श्रुत्वा डॉ. मेघनादस्य क्रोधः शान्तः अभवत्। ततः द्वयोः दिनयोः मध्ये डॉ. मेघनादः आत्मारेण सह सुभाषमहोदयेन सह मेलितुम् अगच्छत्। तस्मिन् दिने डॉ. मेघनादः सुभाषमहोदयम् अपृच्छत्, यदि श्वः स्वतन्त्रतायाः उद्घोषणा भविष्यति, तर्हि भवान् किं करिष्यति ? इति। डॉ. मेघनादस्य प्रश्नं श्रुत्वा सुभाषमहोदयः प्रफुल्लितः अभवत्। ततः डॉ. मेघनादः तस्य सम्मुखम् अनेकान् प्रश्नान् अस्थापयत्। सः अपृच्छत्, यदि श्वः स्वतन्त्रतायाः घोषणा भवति, तर्हि
1. कति वस्त्राणि आवश्यकानि भविष्यन्ति ?
2. कियती भोज्यसामग्री अपेक्षिष्यते ?
3. कति गृहाणि अपेक्षिष्यन्ते ? इति।
ततः डॉ. मेघनादः ‘मम साहाय्यं करोतु’ इति पुनः सुभाषमहोदयं न्यवेदयत्। सुभाषमहोदयः प्रत्यपृच्छत्, तर्हि किं करणीयं भविष्यति ? इति। डॉ. मेघनादः उदतरत्, कॉङ्ग्रेस-पक्षः स्वतन्त्रतायाः प्राक् राज्यनीतेः परिकल्पनां चिन्तयेत् इति। डॉ. मेघनादस्य परामर्शेण सुभाषमहोदयः अत्यन्तं प्रभावितः अभवत्। सः राष्ट्रिययोजनासमितेः स्थापनायै सम्मतः अभवत्। परन्तु डॉ. मेघनादस्य कल्पनायाः प्रत्यक्षता 1945 तमे वर्षे अभवत्। तस्मिन् वर्षे इलाहाबाद-कारागारात् मुक्तः पण्डितः राष्ट्रिययोजनासमितिविषये चर्चां कर्तुं डॉ. मेघनादम् आह्वयत्। डॉ. मेघनादः आत्मारामेण सह पण्डितेन सह मेलितुम् अगच्छत्। भारतस्वातन्त्र्यात् पूर्वं कॉङ्ग्रेस-दलः राष्ट्रिययोजनासमितेः दायित्वं डॉ मेघनादाय अयच्छत्। तेषां गोष्ठ्याः पूर्वमेव आत्मारामः 'सेन्ट्रल् ग्लास् एड् सिरामिक रिसर्च् इन्स्टिट्यूट्' इत्यस्याः संस्थायाः अधिकारित्वेन नियुक्तः आसीत्। तस्मिन् काले आत्मारामस्य पण्डितेन सह प्रप्रथमवारं सम्पर्कः अभवत्।
भारतीयौद्योगिक्यनुसन्धानपरिषदः शासी-सभायाः अध्यक्षः डॉ. शान्तिस्वरूपः आसीत्। सः कोलकाता—महागरे काचस्य एवं मृत्तिकायाः अनुसंधानकेन्द्रं स्थापयितुम् इच्छति स्म। अतः डॉ. शान्तिस्वरूपः तस्य केन्द्रस्य दायित्वं डॉ. आत्मारामाय अच्छत्। 1944 तमे वर्षे केन्द्रियकाच-एवं-सिरामिक-अनुसन्धानकेन्द्रस्य स्थापनायै निर्णयः अभवत्। तस्य केन्द्रियकाच-एवं-सिरामिक-अनुसन्धानकेन्द्रस्य स्थापनायाः दायित्वं डॉ. आत्मारामस्य आसीत्। तस्मिन् काले द्वितीयं विश्वयुद्धं जायमानम् आसीत्। अतः तदा युद्धोपयोगिनां वस्तूनां संशोधनं बाहुल्येन भवति स्म। डॉ. आत्मारामेणापि अनेकेषां अग्निशामकपदार्थानां संशोधनं कृतम्।
1944 तमात् वर्षात् केन्द्रियकाच-एवं-सिरामिक-अनुसन्धानकेन्द्रस्य स्थापनायै आरब्धपरिश्रमा डॉ. आत्मारामः 1945 तमे वर्षे तस्य अनुसन्धानकेन्द्रस्य अधिकारित्वेन नियुक्तः अभवत्। अनुसन्धानकेन्द्रस्य निर्माणादिकार्यं तस्मिन् वर्षे पूर्णे सति 1945 तमस्य वर्षस्य दिसम्बर-मासस्य चतुर्विंशे दिनाङ्के केन्द्रियकाच-एवं-सिरामिक-अनुसन्धानकेन्द्रस्य स्थापना अभवत्। ‘आर्देशिर दलाल’ इत्याख्यः व्यापारी तस्य संस्थानस्य प्रप्रथमः निदेशकः अभवत्। ततः 1952 तमात् वर्षात् 1966 तमवर्षपर्यन्तं डॉ. आत्मारामः तस्य संस्थानस्य निदेशकत्वेन दायित्वम् अवहत्।
काच-पदार्थक्षेत्रे संशोधनस्य विचारं डॉ आत्मारामः यूरोप-देशे अकरोत्। आत्मारामः यूरोप-देशस्य यात्रायै गतः आसीत्, तदा कस्यचिद् अक्षिणि काचः अपतत्। आत्मारामः अत्यन्तं व्याकूलः अभवत्। काचः तस्य अक्षिणः निष्कासनानन्तरं सः अपृच्छत्, एतत् किमस्ति ? इति। तदारभ्य काचः तस्य संशोधनविषयः अभवत्।
डॉ. आत्मारामः एस-सी, एफ जी टी, एफ आई सी, एफ एन आई इत्यादिभिः सम्मानितः प्राप्तान्ताराष्ट्रियख्यातिः वैज्ञानिकः। काचोद्योगे तस्य अनेकानि महत्त्वपूर्णानि संशोधनानि सन्ति। काचस्य अनेकेषां प्रकाराणां निर्माणे तस्य महद्योगदानं वर्तते। काचस्य रङ्गयुक्तस्य, फेनिल-युक्तस्य, सिलेनियम-मुक्तस्य रक्तकाचस्य च आविष्कारः डॉ आत्मारामस्य मुख्ययोगदानेषु अन्तर्भवति।
1961 तमस्य वर्षस्य जनवरी-मासे भारतीयविज्ञानपरिषदः अष्टचत्वारिंशत्तमे अधिवेशने डॉ. आत्मारामः हिन्दीभाषया एकं शोधलेखम् अपठत्। 'भारत में ऑप्टीकल काच का उत्पादन' इति तस्य शोधलेखस्य विषयः आसीत्। तत्र सः अवदत्, काचेन निर्मितेन दूरदर्शकेनैव विश्वेन ज्ञातं यत्, पृथ्वी सूर्यं परितः परिक्रामति, न तु सूर्यः पृथ्वीं परितः। काचः अनेकेषां महत्त्वपूर्णयन्त्राणां मुख्याङ्गभूतः वर्तते। सूक्ष्मतमात् दीर्घतमं द्रष्टुं काचः मुख्यसाधनत्वेन परिगण्यते। आधुनिकसैनिकाः लक्ष्यं साधयितुं काचस्य उपयोगं कुर्वन्ति। पूर्वं एतादृशः महत्त्वपूर्णः काचः सम्पूर्णे जम्बूद्वीपे केवलं जपान्-देशे एव निर्मीयते स्म। तस्य काचस्य प्रप्रथमनिर्माणस्य श्रेयः जर्मनी-देशाय गच्छति इति।
डॉ. आत्मारामस्य मार्गदर्शने भारते काचोद्योगः विकसितः। स्वल्पे काले केन्द्रिय-काच-एवं-सिरामिक-अनुसन्धानकेन्द्रम् अखिलभारतस्य काचस्य आवश्यकतायाः आपूर्त्यै क्षमम् अभवत्। काचस्य संरचनायाः, ताम्रवर्णीयस्य काचस्य च निर्माणाय अपि डॉ. आत्मारामस्य योगदानं महत्तरं मन्यते। डॉ. आत्मारामस्य व्यवस्थितं, सफलं च कार्यं दृष्ट्वा विश्वस्य अनेके देशाः तं 'फैलो' इत्यनेन अघोषयन्। 'सोसाइटी ऑफ् ग्लास् टैक्नोलॉजी' इत्याख्या ब्रिटेन्-देशस्य काचोद्योगस्य संस्था 1966 तमे वर्षे डॉ. आत्मारामं 'फैलो' इति घोषयित्वा तस्य सम्माननम् अकरोत्। ततः सः भारतीयराष्ट्रियविज्ञानसंस्थानस्य, 'इन्स्टिट्यूशन् ऑफ् केमिस्ट्स् इण्डिया' इत्येतयोः संस्थयोः सदस्यः अभवत्।
स्वतन्त्रे भारते 1948 तमे वर्षे काचायोगस्य, अन्ताराष्ट्रियमृत्तिका-अकादमी-स्थायाः च सदस्यः डॉ. आत्मारामः अभवत्। सः अन्ताराष्ट्रियसङ्घद्वारा सञ्चालिते उच्चतापस्य रासायनिकायोगे भारतस्य प्रतिनिधित्वम् आचरत्। 1962-66 वर्षेषु भारतीयविज्ञानपरिषदः महामन्त्रित्वेन कार्यभारम् अङ्ग्यकरोत्। 1966 तमे वर्षे भारतीयविज्ञानकॉङ्ग्रेस-वाराणस्याः अधिवेशाध्यक्षपदं व्यभूषयत्। 1966 तः 1971 पर्यन्तं भारतीयवैज्ञानिकौद्योगिकानुसन्धानपरिषदः महानिदेशपदे आरूढः।
1967 तमे वर्षे भारतीयविज्ञानपरिषदः पञ्चपञ्चाशत्तमे अधिवेशने वाराणस्यां अध्यक्षपदारूढः डॉ आत्मारामः हिन्दीभाषया अनेकान् महत्त्वपूर्णान् विषयान् उपास्थापयत्।
1. विज्ञाने बौद्धिकैकाधिपत्यस्य किमपि स्थानं नास्ति। यदि कुत्रचित् अस्ति, तर्हि यथाशीघ्रं तद् अपाकरणीयम्।
2. प्रयोगशालायां स्वतन्त्रतायाः अर्थः अन्यान् प्रति स्वकर्तव्यस्य अभावः इति न सिद्ध्यति।
3. भारतम् औद्योगिकक्रान्तेः द्वारे स्थितम् अस्ति। अस्माकम् औद्योगकविकासः तदैव सम्भविष्यति, यदा अस्माकं प्रयोगशालासु कृतानि अनुसंशोधनानि कार्यशालापर्यन्तं गमिष्यन्ति।
4. आधुनिक्यः समस्याः न केवलं राजनीतिज्ञानां दायित्वम् अस्ति, अपि तु सर्वेषां देशवासिनां दायित्वम् अस्ति। वैज्ञानिकाः केवलं परामर्शदातारः न भवेयुः, अपि तु देशविकासप्रक्रियायां पूर्णरीत्या सक्रियाः भवेयुः।
हिन्दीसमर्थकेषु अग्रगण्यविज्ञानिकेषु डॉ. आत्मारामः अन्यतमः। अतः सः हिन्दीभाषया वैज्ञानिकसाहित्यम् असृजत्। डॉ. आत्मारामेण हिन्दीभाषया लिखिताः शताधिकाः शोधलेखाः भारतस्य कृते महत्त्वपूर्णाः। तेषु लेखेषु भौतिकरसायनं, प्रकाशरसायनं, काचः, सिरेमिक् इत्येतेषां विषयाणां संशोधनात्मकम् अध्ययनम् अन्तर्भवति। विंशतिः पद्धतयः डॉ आत्मारामेण संशोधिताः, यासां 'पेटेन्ट' अपि अभवत्। हिन्दीभाषया डॉ आत्मारामेण यानि पुस्तकानि लिखितानि, तेषु 'रसायनशास्त्र की कहानी' इत्येतत् पुस्तकं सर्वाधिकप्रसिद्धम् अस्ति।
1. शान्तिस्वरूप भटनागर-पुरस्कारः – 1959
2. पद्मश्रीः – 1959
3. ऑल् इण्डिया ग्लास् मेन्युफेक्चर् फेडरेशन् – 1964
4. डॉक्टरेट् लेनिन् सेल्विट् टेकनोलॉजि इन्स्टिट्यूट्, लेनिन्गराद – 1959
5. उत्तरप्रदेशवैज्ञानिकानुसन्धानसमितिपदकम्
6. के जी नायक-स्वर्णपदकं, बडौदा-विश्वविद्यालयः
7. अणुव्रतपुरस्कारः, तुलसी फाण्डेशन्
1983 तमस्य वर्षस्य फरवरी-मासस्य षष्ठे दिनाङ्के मध्याह्ने सार्धैकवादने देहली-नगरस्य रुग्णालये डॉ. आत्मारामः दिवङ्गतः। सः अस्थमा-रोगेण पीडितः आसीत्। यतो हि अस्थमा-रोगः शीतकाले अत्युग्रः भवति, अतः जनवरी-मासादेव सः अस्वस्थः आसीत्। ततः फरवरी-मासे अन्तिमाघातेन सः पञ्चतत्त्वे विलीनः।
आत्मारामः आर्यसमाजी आसीत्। बाल्यकालेऽपि आत्मारामः उत्पाती उत उत्छृङ्खलबालकः नासीत्। सः स्वभावेन एव शान्तः आसीत्। आत्मारामः आत्मावलोकने निमग्नः भवति स्म। भारतस्य मुख्यवैज्ञानिकेषु अन्यतमः सः सरलजीवनं यापयति स्म। आत्मारामस्य ईश्वरे अनन्या श्रद्धा आसीत्। सर्वेषु मित्रेषु आत्मारामः नेतृवत् आसीत्। सः सत्याचरणं, धर्माचरणं, प्रामाणिकतां च प्रति अन्यमित्राणि प्रेरयति स्म। सः 'खादि'-वस्त्रं धरते स्म।
एकदा आत्मारामः कस्यचित् कार्यशालायाः निरीक्षणाय अगच्छत्। यदा सः कार्यशालायाः प्राङ्गणं प्राप्तः, तदा कार्यशालायाः अधिकारिणः डॉ आत्मारामं ज्ञात्वा तस्य सहकर्मिणः पुष्पमालिकया स्वागतम् अकुर्वन्। परन्तु यदा तैः सत्यं ज्ञातं, तदा ते लज्जिताः सन्तः क्षमयाचनाम् अकुर्वन्। परन्तु डॉ आत्मारामस्य मनसि किञ्चिदपि अपमाननस्य भावः नासीत्।
डॉ. आत्मारामः कस्यचित् साक्षात्कारस्य कृते अगच्छत्। आङ्ग्लसाम्राज्ये साक्षात्कारकाले 'सूट्-पेन्ट्-टाई'वस्त्रं धृत्वा एव गन्तव्यम् इति आचारः आसीत्। तस्मिन् काले तेन 'टाई' इत्याख्यं वस्त्रं कथं ध्रियते ? इति शिक्षितम्। परन्तु आङ्ग्ल-परिपाट्या बद्धः भविष्यामि इति मत्वा तेन ततः परं कदापि तद्वस्त्रं न धृतम्। हिन्दीभाषाप्रियः, स्वदेशिप्रियः सः यावज्जीवं विज्ञानस्य, भारतस्य च सेवाम् अकरोत्।
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मुम्बई महाराष्ट्रराज्यस्य राजधानी अस्ति । एतन्नगरं भारतदेशस्य विशालं, प्रगतं च नगरम् । भारते लोकसङ्ख्यादृष्ट्या प्रथमस्थाने, पृथिव्यां द्वितीयस्थाने च वर्तते एतन्नगरम् । भारतस्य पश्चिमे, समुद्रतटे एतद् नगरं स्थितम् । अरबी-समुद्रतटे यानि नौकास्थानानि सन्ति तेषु अन्यतमं सर्वोत्कृष्टमिदम् । इदं मुम्बई महानगरं गगनस्पर्शिभवनैः आभारतम् एव अद्वितीयम् अस्ति । विश्वे 25 बृहन्नगरेषु अन्यतममिदम् । भारतदेशे वर्तमानेषु नगरेषु द्वितीयं बृहन्नगरम् । 'बोलिवुड्' नाम्ना प्रसिद्धः हिन्दी-चलच्चित्रोद्यमः इतः एव प्रवर्तते । मुम्बादेव्याः देवालयः अत्र अस्ति । अतः नगरस्य 'मुम्बापुरी' इति नाम आसीत् इति कथ्यते । आङ्गलानां प्रशासनकाले 'बॉम्बे' नाम्ना प्रख्यातम् अभवत् । लघु-’धाकटा’ कुलाबा, बृहत्-'मोठा' कुलाबा, मुम्बई, माझगाव, परळ, वरळी, माहीम इत्येतानां द्वीपानां एकत्रीकरणेन मुम्बईनगरं निर्मापितम् । इदानीं मुम्बई इति अधिकृततया नाम दत्तम् अस्ति ।
मुम्बई नगरस्य जनसङ्ख्या 1,84,14,288 अस्ति । अत्र 98,94,088 पुरुषा:, 8,520,200 महिला: च सन्ति । अत्र पुं-स्त्री अनुपातः 1000-861 अस्ति । अत्र साक्षरता 90.78% अस्ति । मुम्बई नगरस्य जनसङ्ख्या तु इदानीं जनानां चिन्ताविषय: । अस्याः समास्यायाः निवारणार्थं कार्यरतमस्ति बृहन्मुम्बईनगरप्रशासनम् ।
टोलेमि इत्यस्य प्रवासवर्णने ‘हेप्टानेशिया’ इति यः उल्लेख: दृश्यते स: मुम्बईसम्बद्ध: इति मन्यते । अत्यन्तपुरातनानि पाषाणसाधनानि, पुरातनाः अवशेषाश्च उपलभ्यन्ते । अस्मिन् विभागे पञ्चमशतकात् आरभ्य क्रमश: आभीर-त्रैकूटक-मौर्य-चालुक्य-राष्ट्रकूट-शिलाहार-यादवराजानां च आधिपत्यमासीत् । शिलाहारराजानाम् आधिपत्ये वाळकेश्वरमन्दिरस्य स्थापना जाता इति जना: मन्यन्ते । यादवानां समनन्तरं 25 वर्षेभ्य: एव मुम्बईपरिसरे हिन्दुसाम्राज्यस्यान्त: जात: । कोळी इति अत्रस्था: मूलजना: आसन् । मच्छगाव इदानीन्तन माझगाव, कोळघाट इदानीन्तन कुलाबा, माण्डवी, माहीम, शीव इत्येतेषु स्थानेषु ’कोळीवाडे’ मत्स्यव्यवसायिकानां निवासस्थानानि आसन् । कोळीजनै: सह आगरी, भण्डारी, माध्यन्दिनी-ब्राह्मणजना: अत्रस्था: पुरातनजना: । यादवानां कालखण्डे अत्र मत्स्यव्यवसाय:, कृषि:, लवणोत्पादनं च प्रचलत् आसीत् । पञ्चदशे शतके अत्र गुजरात-सुलतान इत्यस्य आधिपत्यमासीत् । साष्टी द्वीपे अभवत् युद्धम् इतिहासे प्रसिद्धम् । तस्मिन् युद्धे पुर्तगालप्रशासका: अपि भागम् ऊढवन्त: । तदा षोडश-शतके मुम्बई, वसई च पुर्तगाल-आधिपत्ये निर्गते । अस्मिन् काले क्रैस्तधर्मप्रसार:, चर्च इत्येतानां वास्तूनां निर्माणं जातम् । सप्तदशशतकस्य प्रारम्भे आङ्ग्लजनानाम् आगमनमत्राभवत्, डचप्रशासकानां साहाय्येन आङ्ग्ला: मुम्बईप्रदेशं जेतुं इच्छां धृतवन्त: । एकवारं मुम्बईप्रदेशं लुण्ठितवन्त: अपि । अन्ते आङ्ग्लराजा द्वितीय चार्ल्स इत्येतस्य पुर्तगाल-राजकन्यया केथरिन इत्यनया सह विवाह: जात: । तस्मिन् प्रसङ्गे उपहारत्वेन मुम्बईनगरं आङ्ग्लराजाय दत्तवन्त: पुर्तगाल प्रशासका: । जेराल्ड आञ्जिअर इत्यनेन अत्र बहु सुधारणाकार्यं कृतम् । जेराल्ड इत्यनेनैव सप्तद्वीपानां योजनेन एकसन्धपरिसरः निर्मापितः । द्वीपेषु गोलनजी हिल्स, शिव इत्यत्र कोट:, कान्हेरी लयनानि इत्येतेषां स्तरा: दृश्यन्ते । आङ्ग्लप्रशासनेऽपि बहुवारं हस्तान्तरणम् अभवत् । अष्टादशशतके मराठाप्रशासनाधिपत्ये मुम्बई स्थैर्यम् अलभत् । परं 1818 तमे वर्षे पेशवे-सत्ताधीशानां पराभवं कृत्वा आङ्ग्लप्रशासनेन आधिपत्यं संस्थापितम् । तदा 'बोम्बे प्रेसिडेन्सि' इति राज्यस्य स्थापना कृता । 1857 तमे वर्षे आभारतं चलत्-स्वातन्त्र्य-सङ्ग्रामस्य प्रभाव: मुम्बईनगरे किञ्चिदिव आसीत् । 1857 तमे वर्षे मुम्बई विद्यापीठस्य स्थापना जाता तत: शैक्षणिककेन्द्रत्वेन नगरस्य विकास: प्रारब्ध: । 1865 तमे वर्षे मुम्बई-नगरपालिकाया: स्थापना कृता । अस्मिन्नेव कालखण्डे जलनिर्गमयोजना, व्यापारकेन्द्रं, रञ्जनकेन्द्रं, रक्षकदलः, न्यायव्यवस्था इत्येतेषां पुनारचना कृता । वस्त्रोद्यमा:, धूमशकटमार्गाश्च आरब्धा: । बहूनां प्रसिद्धानां वास्तूनां निर्माणकार्यमपि तदानीमेव जातम्, यथा - जे.जे.स्कूल औफ़् आर्ट्स्, पुरातन-सचिवालय:, मुम्बई-विद्यापीठ-वास्तु इत्यादय: । 1947 तमे वर्षे स्वतन्त्र-भारतदेशे 'बोम्बे प्रेसिडेन्सि' इति राज्यस्य विलीनिकरणं जातम् । 1960 तमे वर्षे महाराष्ट्रराज्ये मुम्बई-नगरस्य समावेश: जात: । एवं बहुपुरातन: समृद्धश्च इतिहास: मुम्बईनगरस्य ।
मुम्बई नगरस्य विस्तार: 603 कि.मी. मित: अस्ति । नगरस्य पश्चिम-दक्षिण-आग्नेय-भागेषु सागरतट: अस्ति, ईशान्यदिशि ठाणेमण्डलमस्ति । इदानीमपि द्वीप-योजनस्य चिह्नानि दृश्यन्ते । मुम्बईनगरं सागरतटे अस्ति अत: साधारणतया उष्णम्, आर्द्रं च वातावरणम् अत्र भवति । जून मासत: सप्टेम्बर-मासाभ्यान्तरं नैऋत्य-मान्सून-वायुना वृष्टिपात: भवति । 180 से.मी. वार्षिकवृष्टिपातः भवति ।नगरेऽस्मिन् नारिकेल:-‘ताड’-आम्रफलं-तिन्त्रिणी-वट-वृक्षा: अधिका: सन्ति ।
1990 तमे वर्षे प्रशासनसौकर्यार्थं मुम्बईनगरस्य मण्डलद्वये विभाजनं जातम् । मुम्बईमण्डलं, मुम्बई-उपनगर-मण्डलं च इत्येतौ विभागौ स्त: । तथापि सामान्यत: मुम्बई नगरस्य केचन विभागा: भवन्ति । ते यथा - 'फोर्ट', बाजार इति क्रयविक्रयणकेन्द्रं, परळ-भायखळाविभागे धनिकानां निवासस्थानानि, 'बन्दर' नौकास्थानकविभाग:, मध्यमवर्गीयजनानां निवासस्थलं, उपनगराणि च ।
आधुनिकभारतनिर्माणे मुम्बई नगरस्य सहभाग: महत्वपूर्ण: । नैकानां राजकीय-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिकान्दोलनानाम् आरम्भस्थलमिदम् । 'रॉयल एशियाटिक सोसायटी', 'स्ट्यूडन्ट्स लिटररी एण्ड सायण्टिफिक सोसायटी', 'सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट', 'प्रार्थना समाज:', 'आर्य समाज:', 'थिऑसॉफिकल सोसायटी', 'भारतीय राष्ट्रीय काङ्ग्रेस' इत्यस्य प्रथमम् अधिवेशनं, 'कामगार चळवळ'- कर्मकराणाम् आन्दोलनम्, 'भारत छोडो आन्दोलनम्' इत्येतासां घटनानां प्रमुखस्थानमासीत् मुम्बई नगरम् । मुम्बई नगरे नैके राजकीय नेतारः, उद्योगपतयः, सामाजिक कार्यकर्तार:, विद्वज्जना: संशोधका:, लेखका:, कलावन्त: च आसन्, सन्त्यपि । तेषां जन्म वा कार्यस्थलमस्ति नगरमिदम् ।सांस्कृतिकदृष्ट्याऽपि वैविध्यपूर्णमिदं नगरम् । भाषा-धर्म-सम्प्रदाय-आर्थिकस्तरे भिन्नता अस्ति चेदपि व्यवसायकारणात् जना: अत्र आगच्छन्ति निवसन्ति च । मुम्बई नगरे तासां सर्वासां संस्कृतीनां समाहार: दृश्यते । मराठी, हिन्दी, गुजराती, आङ्ग्ल, सिन्धी, उर्दू इत्येतासु भाषासु जनाः वदन्ति । मराठी रङ्गभूमि-हिन्दीचलच्चित्रनिर्माणव्यवसाययोः जनाः विशेषत्वेन कार्यरताः दृश्यन्ते ।
नैकानां विभूतिनां जन्मस्थलं, कार्यस्थलं वा नगरमिदम् । यथा राजा भीमदेव, पुर्तगालप्रशासक: फ्रान्सिस् अल्मेडा, जेराल्ड आञ्जियर्, डा हाफकिन्, रुदियार्ड् किप्लिङ्ग, फिरोजशहा मेहता, दादाभाई नौरोजी, महादेव रानडे, डेविड् ससून, जगन्नाथ शङ्कर शेठ, जमशेठजी टाटा, होमी भाभा, मादाम कामा च ।
भारतस्य प्रवेशद्वारत्वात् अस्य नाम 'गेटवे ऑफ इण्डिया' इति । पूर्वं विदेशेभ्यः जनाः नौकायानेन अत्रैव आगच्छन्ति स्म । विशेषतः आङ्ग्लाः मुम्बईनगरम् आगत्य भारतदेशे कार्यप्रवृत्ताः भवन्ति स्म । अतः एव एतत् स्मारकम् अतीव विशिष्टं सञ्जातम् इति मन्यते ।पीतवर्णयुक्तैः 'बेसाल्ट्' शिलाभिः एतत् महाद्वारम् 'अपोलो' नौकास्थानकसमीपे निर्मापितम् अस्ति । द्वारं परितः विशालप्राङ्गणम् अस्ति । सागरतीरसमीपे अस्मिन् स्थले प्रातः सायं च विहाराय बहवः जनाः आगच्छन्ति ।
अयं सङ्ग्रहालयः पूर्वम् 'प्रिन्सवेल्स् म्यूजियम्' इति नाम्ना प्रसिद्ध: आसीत् । मुम्बईनगरे कोलाबाप्रदेशे एषः वस्तुसङ्ग्रहालयः अस्ति । क्रिस्ताब्दे 1905 तमे वर्षे पञ्चमः जोर्ज भारतम् आगतवान् । एतत्स्मरणार्थम् 'इण्डो-सार्सेनिक' शैल्या विशिष्टं भवनं निर्मापितम् आसीत् । अत्र एलिफण्टा गुहागतवास्तुकृतयः प्राच्यवस्तूनि च सङ्गृहीतानि सन्ति ।गौतमबुद्धस्य अपूर्वः विग्रहः अत्र अस्ति । अत्र आवरणे ’जहाङ्गीर आर्ट ग्यालरि' नामकः कलासङ्ग्रहालयः अस्ति । अत्र कलाप्रदर्शनानि वर्तन्ते ।
हुतात्मा चतुष्पथः इत्यपि अस्य अपरनाम । मुम्बईनगरस्य एकं जनभरितं वाणिज्यकेन्द्रस्थानम् एतत् । क्रिस्ताब्दे 1862 तः 1867 पर्यन्तं बॉम्बे प्रान्तस्य अधिकारी सर् बार्टल् फ्रियर अस्य प्रशासकः आसीत् । तस्य स्मरणार्थम् अस्य निर्माणम् कृतम् । फ्लोरामूर्तेः वैभवः दर्शनीयः अस्ति ।
एषः कश्चन मत्स्यागारः । मुम्बईनगरे मरीन ड्राइव इति सागरतीरसमीपे एषः विशिष्टः मत्स्यागारः अस्ति । अत्र विविधजातीयाः वर्णमयाः मत्स्याः सङ्गृहीताः सन्ति । अत्र मीनाः उत्तमतया संरक्षिताः सन्ति ।
मलबारहिल्स् पर्वतप्रदेशः मुम्बईनगरसमीपे अस्ति । शीतलः अयं प्रदेशः मुम्बईनगरवासिनां विहारस्थलमस्ति । वाळकेश्वर-महालक्ष्मीदेवालयौ अपि अत्रैव स्तः । मलबारपर्वताग्रे ‘हेङ्गिङ्ग गार्डन्’ क्रिस्ताब्दे 1881 तमे वर्षे निर्मापितम् । वाळकेश्वरमन्दिरस्य स्थापना श्रीरामेण एव कृतम् इति जनानाम् अभिप्रायः ।जलाशयस्य अग्रतः उद्यानं निर्मितम् अस्ति । अस्य फिरोजशाह मेहता उद्यानम् इत्यपि नाम । अत्र उद्यानवने सस्यानि प्राणिनाम् आकारैः कर्तितानि सन्ति । अधः कमलानेहरु उद्यानमपि अस्ति । एतदुद्यानं क्रिस्ताब्दे 1952 तमे वर्षे निर्मितम् । रात्रौ मलबारहिलतः नगरदर्शनम् अतीव सुन्दरं भवति ।
मुम्बईमहानगरे स्थितं विक्टोरिया गार्डन् वीरमाता जीजाबाई उद्यानवनम् इत्यपि प्रसिद्धम् अस्ति । अत्र सुन्दरः मृगालयः, आल्बर्ट ’म्यूसियम्’ च आकर्षणं अस्ति । वस्तुसङ्ग्रहालयस्य बाह्यप्रदेशे एलिफेण्टाद्वीपात् आनीतः बृहत्शिलागजः स्थापितः अस्ति । डा एनिबेसेन्टमार्गसमीपे नेहरू 'प्लानेटेरियम्'-ताराङ्गणम् आकर्षकम् अस्ति ।
मुम्बईनगरं पश्चिमसागरतीरे अस्ति । सागरतीरेषु सामान्यतः वालुकाः सन्ति ।जनाः विहाराय अत्र आगच्छन्ति । राष्ट्रियनायकानां महापुरुषाणां भाषणकार्यक्रमाः अत्र भवन्ति ।’चौपाटी’ सागरतीरं वक्राकारकम् अतीवाकर्षकम् अस्ति । सायङ्काले बहुजनाः रम्यदृश्यस्य वी़क्षणार्थम् अत्र आगच्छन्ति । जुहू ’चौपाटी’ अतिप्रसिद्धम् अस्ति । ’धक्का’ प्रदेशे नौकास्थानकम् अस्ति ।
मुम्बई न केवलं महाराष्ट्रराज्यस्य राजधानी, अपि तु भारतदेशस्य वित्तराजधानी, मनोरञ्जनराजधानी च वर्तते । 'भारतीय रिजर्व बैङ्क', मुम्बई ’शेअर बाजार’, राष्ट्रीय शेअर बाजार इत्येतादृश्यः नैकाः महत्वपूर्णाः संस्थाः अत्र सन्ति । मुम्बईनगरं हिन्दीभाषायां-चलच्चित्रनिर्माणस्यापि केन्द्रम् । सञ्जय गान्धी राष्ट्रियोद्यानं, लवणक्षेत्राणि इत्यादीनि प्राकृतिकस्थलानि नगरसमीपे सन्ति । एवं समृद्धमिदम् नगरम् ।
1. विमानमार्गा: - छत्रपति-शिवाजी-राष्ट्रिय,अन्ताराष्ट्रियविमानस्थानकम् अस्ति । सर्वेभ्य: प्रमुखविमानस्थानकेभ्य: मुम्बईनगरं प्रति विमानव्यवस्था: सन्ति । सर्वा: विमानसेवा: मुम्बईनगरं प्रति गमनार्थं सेवां यच्छन्ति । 2. धूमशकटमार्गा: - छत्रपति-शिवाजी-’टर्मिनस्’, ’बोम्बे सेण्ट्रल्’, दादर, कल्याण इत्येनानि प्रमुखरेलस्थानकानि सन्ति । मध्य-पूर्व-पश्चिम-दक्षिणरेलयानानां स्थानकानि सन्ति । अत: कुतश्चिदपि अत्र प्राप्तुं शक्यते ।
3. भूमार्गा: - सर्वेभ्य: प्रमुखस्थलेभ्य: मुम्बई नगरं गन्तुं बसयानानि प्राप्यन्ते ।
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140 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः अधिवर्षः आसीत्।
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नीजे अफ्रीका- महाद्वीपे देश: अस्ति. राजधानी - नियामे, भाषा - फ्रेंच, हौसाजनसंख्या - 11 मिलियन
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247 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः साधारण-वर्षः आसीत्।
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एरण्डबीजैः निर्मितं तैलम् एव एरण्डतैलम् । एरण्डबीजैः तैलं निर्मीयते । एषः एरण्डः आङ्ग्लभाषायां इति उच्यते । अस्य तैलं इति उच्यते । एतत् एरण्डतैलम् अधिकतया औषधत्वेन एव उपयुज्यते । कदाचित् सौन्दर्यवर्धकत्वेन अपि उपयुज्यते । आहारत्वेन अस्य एरण्डतैलस्य उपयोगः अतीव न्यूनः एव । एतत् एरण्डतैलम् अत्यन्तं लेखनम् । तत्रापि एरण्डबीजानि पक्वं कृत्वा निर्मितं तैलम् अत्यन्तं लेखनम् । प्रातः ब्राह्मीमुहूर्ते एव चुल्लीं प्रज्वाल्य पक्वकरणस्य प्रक्रिया आरप्स्यते । मध्याह्नपर्यन्तम् एषा प्रक्रिया प्रवर्तते ।
==बाह्यसम्पर्कतन्तुः==
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16 अगस्त-दिनाङ्कः ग्रेगोरीयन-पञ्चाङ्गानुसारं वर्षस्य द्विशताधिकाष्टाविंशतितमं दिनम् । लिप्-वर्षानुगुणम् द्विशताधिकनवविंशतितमं दिनम् एतत् । एतस्मात् दिनात् वर्षान्ताय 137 दिनानि अवशिष्टानि ।
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भारतीय दिग्दर्शकः।
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चार्ल्सटन् संयुक्त राज्य अमेरिका देशस्य नगरः अस्ति।
अलाबामा | अलास्का | आरिज़ोना | अर्कान्स | कालिफ़ोर्निया | कोलोराडो | कनेक्टिकट् | डेलावेर् | फ्लोरिडा | जार्जिया | हवाई | ऐडहो | इलिनाई | इन्डियाना | अयोवा | केन्सास | केन्टकी | लूइसियाना | मेन | मेरील्यान्ड् | मासचुसेट्स | मिशिगन | मिनेसोटा | मिसिसिपी | मिसूरी | मान्टाना | नेब्रास्का | नेवाडा | न्यू हेम्पशायर | न्यू जर्सी | न्यू मेक्सिको | न्यू यार्क् | नार्थ केरोलैना | नार्थ डेकोटा | ओहायो | ओक्लाहोमा | ओरेगन् | पेन्सिल्वेनिया | रोड ऐलैंड | साउथ केरोलैना | दक्षिण डकोटा | टेनेसी | टेक्सास् | यूटाह | वर्मांट | वर्जिनिया | वाशिङ्टन् | वेस्ट वर्जिनिया | विस्कान्सिन् | वायोमिङ् | वाशिङ्ग्टन् डि सि
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भिक्षुः आचार्यः /ˈɪʃʊʊ ɑːɑːəə/) तेरापन्थ-सम्प्रदायस्य संस्थापकः प्रवर्तकश्च आसीत् । सः 'श्रमण'-परम्परायाः महान् संवाहकः आसीत् । तेन एव तेरापन्थ-सम्प्रदायाय सम्पूर्णे भारते प्रचारः कृतः । तदनन्तरं तस्मिन् सम्प्रदाये बहवः आचार्याः अभवन् । सर्वे तेरापन्थ-सम्प्रदायस्य अनुयायिनः भिक्षु-आचार्यस्य पूजां कुर्वन्ति । तथा च सम्पूर्णे भारते अयं भिखणजी इति नाम्ना अपि प्रसिद्धः जातः । अयं जैनसम्प्रदायस्य महान् आचार्यः आसीत् । जन्मना एव अयं साधुविचारकः आसीत् । स्थानकवासी-सम्प्रदायस्य आचार्यरघुनाथस्य निर्देशानुसारं तेन स्थानकवासी-सम्प्रदायस्य साधुत्वम् अङ्गीकृतम् ।
आचार्यभिक्षोः जन्म ई. स. 1726 तमे वर्षे जुलाई-मासस्य प्रथमे दिनाङ्के, 1783 तमे विक्रमसंवत्सरे आषाढ-मासस्य शुक्लपक्षस्य त्रयोदश्यां तिथौ अभवत् । राजस्थान-राज्यस्य मारवाड-क्षेत्रस्य कण्टालिया-नामके ग्रामे तस्य जन्म अभवत् । तस्य पितुः नाम शाह बल्लुजी इति, तथा च मातुः नाम दीपाबाई इति आसीत् । अयम् ओसवाल-ज्ञातीयः, सकलेचा-वंशीयः च आसीत् । भिक्षोः पूर्वाश्रमस्य नाम भीखण इति आसीत् ।
प्रारम्भादेव तस्य व्यक्तित्वं साधारणम् एव आसीत् । तत्कालीनायाः परम्परयाः अनुसारं लघुवयसि एव तस्य विवाहः जातः । वैवाहिके जीवने सति अपि सः वैराग्यमयं जीवनं जीवितुम् इच्छति स्म । धर्मं प्रति सः सदैव तत्परः आसीत् । तस्य पत्निः अपि धार्मिका आसीत् । तौ द्वौ दीक्षां प्राप्तुम् इच्छतः स्म । किन्तु किञ्चित् समयान्तरे तस्य पत्न्याः देहावसानम् अभवत् । तदनन्तरं सः स्वयमेव दीक्षां प्राप्तुं जागतिकः अभवत् । परन्तु दीक्षायै तस्य मातुः आज्ञा नासीत् । तत्कालीनस्य स्थानकवासी-सम्प्रदायस्य आचार्यस्य रघुनाथस्य कथनानुसारं भिक्षुणा मातुः आज्ञा प्राप्ता । माता रघुनाथाचार्यम् उक्तवती यत् – “अहं कथं दीक्षायै आज्ञां दातुं शक्नोमि ? यदा भिक्षुः मम गर्भे आसीत्, तदैव अहं सिंहस्य स्वप्नं दृष्टवती आसम् । तस्य स्वप्नस्य अनुसारम् अयं कस्यचित् देशस्य राजा भविष्यति । सिंहः इव पराक्रमी अपि भविष्यति” इति । तदा आचार्येण उक्तं यत् – “ राजा एकस्मिन् देशे एव पूज्यते । किन्तु तव पुत्रस्य साधुत्वे सति सम्पूर्णे जगति तस्य पूजा भविष्यति” इति । अतः अन्ते भिक्षोः माता रघुनाथाचार्यस्य कथनानुसारं दीक्षायै अनुमतिम् अददात् ।
ई. स. 1751 तमे वर्षे, 1808 तमे विक्रमसंवत्सरे मार्गशीर्ष-मासस्य कृष्णपक्षस्य द्वादश्यां तिथौ भिक्षुः आचार्यरघुनाथात् दीक्षां प्रापत् । आचार्यभिक्षोः दृष्टिः, मेधा च सूक्ष्मतमा आसीत् । तत्वस्य गहनतायाः प्राप्तिः तस्य स्वभावः एव आसीत् । किञ्चित् वर्षान्तरे सः जैनशास्त्रज्ञः अभवत् ।
ई. स. 1758 तमे वर्षे 1815 तमे विक्रमसंवत्सरे तस्य मनसि साधुवर्गस्य आचारविचारयोः प्रति क्रान्तेः भावना जागतिका । तेन स्वस्य क्रान्तिपूर्णाः विचाराः आचार्यरघुनाथस्य समक्षं स्थापिताः । वर्षद्वयं यावत् विचारविमर्शः अभवत् । विचारभेदेन निर्णयस्याभावे सति आचार्यभिक्षुः कैश्चित् साधुभिः सह ई. स. 1760 तमे वर्षे 1817 तमे विक्रमसंवत्सरे चैत्र-मासस्य शुक्लपक्षस्य नवम्यां तिथौ मारवाड-क्षेत्रस्य बगडी-ग्रामे पृथगभूत् । आचार्यभिक्षोः धर्मक्रान्तेः विरोधः अभवत् । कारणं तस्मिन् काले आचार्यरघुनाथस्य प्रभावः प्रबलः आसीत् । अतः जनैः भिक्षोः सहयोगः न कृतः । ग्राम्यजनैः तेभ्यः साधुभ्यः निवासार्थं स्थानम् अपि न प्रदत्तम् । अतः आचार्यभिक्षुः, अन्ये साधवश्च अन्यत्र विहाराय अगच्छन् । किन्तु चक्रवातेन तेषां मार्गः अवरूद्धः । तदा तैः श्मशाने एव निवासः कृतः आसीत् । यत्र ते साधवः निवासं कृतवन्तः, तत्र जैतसिंह नामाख्यस्य स्मारकम् आसीत् । साम्प्रतम् अपि तत् स्मारकं विद्यमानम् अस्ति ।
सङ्घस्य बहिष्कारेण कोऽपि आचार्यभिक्षोः साहाय्यं न करोति स्म । सर्वे जनाः तस्य विरोधम् एव कुर्वन्ति स्म । किन्तु सः लौहपुरुषः आसीत् । अतः सः तटस्थतया स्वस्य कार्यं करोति स्म । सः सत्यस्य महानुपासकः अपि आसीत् । सः सत्याय स्वस्य प्राणस्य अपि त्यागं कर्तुं शक्नोति स्म । ई. स. 1760 तमे वर्षे आषाढ-मासस्य शुक्लपक्षस्य पौर्णिमायां तिथौ मेवाड-क्षेत्रस्य केलवा-ग्रामे द्वादशसाधुभिः सह आचार्यभिक्षुणा शास्त्राधारिता दीक्षा प्राप्ता । तस्मिन् दिने एव तेरापन्थ सम्प्रदायस्य स्थापना अभवत् । तस्मिन् दिने एव आचार्यभिक्षोः नेतृत्वे एकस्य सुसङ्घटितस्य सङ्घस्य निर्माणं जातम् । सः सङ्घः तेरापन्थ इति नाम्ना प्रख्यातः अभवत् ।
ई. स. 1760 तमवर्षतः ई. सं 1774 तमं वर्षं यावत् आचार्यभिक्षोः महासङ्घस्य पञ्चदशवर्षीयं जीवनं सङ्घर्षमयम् आसीत् । पञ्चवर्षपर्यन्तम् आहारमपि न प्राप्नोति स्म । कदाचित् आहारः प्राप्नोति स्म कदाचिन्न प्राप्नोति स्म । तस्यां सङ्घर्षमयस्थितौ आचार्यभिक्षुः कठोरतपश्चर्यां, साधनां, शास्त्राणां च गहनाध्ययनं चकार । तेन सङ्घस्य भविष्यत्कालस्य अपि चिन्तनं कृतम् आसीत् ।
भारमलजी इत्ययम् आचार्यभिक्षोः प्रमुखः शिष्यः आसीत् । अतः ई. स. 1775 तमे वर्षे आचार्यभिक्षुणा स्वस्य प्रमुखशिष्यः भारमलजी इत्ययम् उत्तराधिकारीत्वेन उद्घोषितः । तस्मिन् समये एव सः सङ्घस्य मर्यादानां निर्माणम् अपि अकरोत् । तस्मिन् वर्षे एव तेन मार्गशीर्षमासस्य कृष्णपक्षस्य सप्तम्यां तिथौ प्रथमं मर्यादापत्रं लिखितम् आसीत् । तदनन्तरं नूतनमर्यादानां निर्माणं कृतम् । तेन कारणेन सङ्घः सुदृढः जातः ।
ई. स. 1802 तमस्य वर्षस्य माघ-मासस्य शुक्लपक्षस्य सप्तम्यां तिथौ आचार्यः भिक्षुः अन्तिमं मर्यादापत्रं लिखितवान् आसीत् । सङ्घे एकः एव आचार्यः स्यात् इति नियमेन सङ्घस्य शक्तिः वर्धिता जाता । तेन सङ्घटनं सुदृढं जातम् । सम्प्रदाये सर्वेषां साधूनां पृथक्-पृथक् शिष्याः भवन्ति स्म । किन्तु अन्तिमे मर्यादापत्रे सर्वेषां शिष्याणाम् एकः एव आचार्यः स्यात् इति लिखितम् आसीत् । अतः स्वशिष्यपरम्परायाः विच्छेदः जातः । भविष्यत्कालस्य आचार्यस्य निर्वाचनस्य अधिकारः अपि वर्तमानाचार्याय एव प्रदत्तम् आसीत् ।
साम्प्रते काले तेरापन्थ-सम्प्रदायसङ्घः अनुशासितः, मर्यादितः, व्यवस्थितः च धर्मसङ्घः अस्ति । अस्य श्रेष्ठकार्यस्य सम्पूर्णः श्रेयः आचार्यभिक्षवे एव अस्ति ।
आचार्यभिक्षोः मौलिकानि चिन्तनानि समाजाय शुभचिन्तकानि भवन्ति स्म । सः हिंसा, दया, दान इत्यादिषु विषयेषु निरन्तरं चिन्तनं करोति स्म । तेषां विषयाणां सः व्याख्यां कृतवान् । तस्य व्याख्याः वैज्ञानिकाः भवन्ति स्म ।
आचार्यभिक्षुः अहिंसायाः उपासकः आसीत् । सः कदापि हिंसां नेच्छति स्म । पञ्चेन्द्रियजीवेभ्यः एकेन्द्रियप्राणिनां हननं कर्तव्यम् इति आचार्यभिक्षोः दृष्ट्या अनुचितम् आसीत् । आगमेषु अस्य विरोधः अपि कृतः अस्ति ।
अध्यात्मने, व्यवहाराय च तस्य विचारः अपि भिन्नः एव आसीत् । दयादानयोः विषये लौकिकः, लोकोत्तरश्च भेदः प्रस्तुत्य आचार्यभिक्षुणा जैनसमाजे प्रचलितानां मान्यतानां समक्षं नूतनं चिन्तनं प्रस्थापितम् । तस्मिन् समये समाजस्य मापदण्डः दयादानयोः आधारितः आसीत् । दयादानाभ्याम् एव सर्वोपलब्धिः पुण्योपलब्धिः वा भविष्यति इति मान्यता आसीत् । आचार्यभिक्षुणा लौकिकदयादानयोः व्यवस्थायाः सम्बन्धः कर्तव्यसहयोगाभ्यां सह कारितः । अनया प्रक्रिया मौलिकस्य सत्यस्य आच्छादनं निरस्तीकृतम् । साध्यसाधनयोः विषये अपि तस्य दृष्टिकोणः स्पष्टः एव आसीत् । सुखसाधनाभ्याम् एव सुखसाध्ययोः प्राप्तिः शक्या इति तस्य मतम् आसीत् । तेन उक्तं यत् – यानि वस्त्राणि रक्तेन सह संसर्गीभूतानि सन्ति तानि वस्त्राणि कदापि शुद्धिं न प्राप्नुवन्ति । तथैव यस्य मनुष्यस्य प्रवृत्तिः हिंसा प्रधाना वर्तते, तस्मै पवित्रलक्ष्यस्य प्राप्तिर्न भवति ।
आचार्यभिक्षुः एकः कविः, साहित्यकारश्चापि आसीत् । सः राजस्थानी-भाषायां 38000 पद्यानां रचनाम अपि कृतवान् । तया रचनया जैनसाहित्यं समर्थम् अकरोत् । आचारस्य प्रतिपादनं, तत्वदर्शनस्य विश्लेषणं, धर्मसङ्घस्य मौलिकमर्यादानां निरूपणम् इत्यादयः तस्य साहित्यरचनायाः प्रमुखाः विषयाः आसन् । तस्य रचनासु प्राचीनवैराग्यस्य आख्यानम् इति निहितम् अस्ति ।
आचार्यभिक्षुः कविः नासीत्, न भवितुम् ऐच्छत् । यद्यपि तेन भाषाशास्त्रस्य, छन्दशास्त्रस्य, अलङ्कारशास्त्रस्य, रसशास्त्रस्य च प्रशिक्षणम् अपि न प्राप्तम् आसीत्, तथापि तेन बह्व्यः उत्तमाः रचनाः कृताः । तासु रचनासु सः रसानाम्, अनुप्रासानाम्, अलङ्काराणां च प्रयोगं कृतवान् । पाठकाः तस्य काव्यरसेन सर्वदा मुग्धाः भवन्ति ।
आचार्यभिक्षोः जीवनं ज्योतिर्मयम् आसीत् । तस्य जीवनस्य प्रतिक्षणं पुरुषार्थाय, समाजकल्याणाय एव आसीत् । तस्य शासनकाले 49 साधवः, 56 साध्व्यश्च आसन् । जैनधर्मस्य आचार्येषु तस्य नाम विख्यातम् अभवत् । ई. स. 1803 तमस्य वर्षस्य भाद्रपदमासस्य शुक्लपक्षस्य त्रयोदश्यां तिथौ राजस्थान-राज्यस्य मारवाड-क्षेत्रस्य सिरियारी-ग्रामे सप्तसप्ततितमे वयसि आचार्यभिक्षुः समाधिं स्व्यकरोत् ।
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बालाघाट इत्येतन्नगरं मध्यप्रदेशराज्यस्य जबलपुरविभागे अन्तर्गतस्य बालाघाटमण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति ।
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प्रभञ्जन: इति काचित् विपत्ति: अस्ति।
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अधिवर्षम् प्रत्येकं चतुर्थस्य वर्षस्य नाम अस्ति ।
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मधुकर्कटीफलस्य रसः एव मधुकर्कटीफलरसः । एषा मधुकर्कटी आङ्ग्लभाषायां इति उच्यते । अस्य रसः इति उच्यते । मधुकर्कटीफलरसः आरोग्यार्थम् अपि बहु उत्तमम् । अस्य फलरसस्य निर्माणं कृत्वा कूपीषु, करण्डकेषु वा पूरयित्वा संरक्ष्यते । तादृशः फलरसः बहुकालं यावत् न नश्यति । यदा आवश्यकं तदा गृहे एव निर्माय पातुम् अपि शक्यते । आपणेषु उपहारमन्दिरेषु चापि अस्य मधुकर्कटीफलरसस्य विक्रयणं क्रियते । कुत्रचित् मार्गपार्श्वे अपि मधुकर्कटीफलरसं निर्माय विक्रयणं कुर्वन्ति अपि । भारते तु अयं मधुकर्कटीफलरसः अत्यन्तं प्रसिद्धं पेयम् अस्ति । मधुकर्कट्याः वर्णस्य रूचेः अनुगुणं फलरसस्य वर्णः रुचिः च परिवर्तते ।
अस्य मधुकर्कटीफलरसस्य निर्माणम् अपि अत्यन्तं सुलभम् । प्रथमम् मधुकर्कटीफलं प्रक्षाल्य त्वक् निष्कास्य बीजं पृथक् करणीयम् । अनन्तरं लघु लघु खण्डाः करणीयाः । तदनन्तरं फलखण्डेषु शर्करां योजयित्वा सम्यक् पेषणं करणीयम् । तदनन्तरं तत्र जलं वा दुग्धं वा योजनीयम् । अपेक्षितं चेत् तत्र एलायाः चूर्णम् अपि योजयितुं शक्यते ।
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भारतस्य बिहारराज्ये स्थितं किञ्चन मण्डलम् अस्ति शिवहरमण्डलम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति शिवहरनगरम्।
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इदं नारिकेलम् अपि भारते वर्धमानः सस्यजन्यः आहारपदार्थः । आङ्ग्लभाषायाम् एतत् नारिकेलं इति उच्यते । अस्य वैज्ञानिकं नाम इति । नारिकेलस्य फलं, तैलं, पुष्पं च उपयोगाय योग्यं भवति । नारिकेलस्य उपयोगः दक्षिणभारते अधिकतया क्रियते । तत्रापि कर्णाटकसदृशेषु राज्येषु नारिकेलं विना दिनं न चलति एव । सामान्यतया अत्र प्रतिदिनम् सेव्यमाने क्वथिते, सारे, उपसेचने, व्यञ्जने, ताक्रे, दाधिके वा नारिकेलम् उपयुज्यते । तद्विना अपि विशेषरूपेण नारिकेलेन एव मधुरभक्ष्यम् अपि निर्मीयते ।
नारिकेलं बहु उपयोगयोग्यः आहारपदार्थः अस्ति । अयम् आहारपदार्थः गुरुस्निग्धगुणप्रधानः । मधुररसयुक्तः, पित्तशामकः च ।
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अयं भगवद्गीतायाः पञ्चमोध्यायस्य कर्मसंन्यासयोगस्य द्वादशः श्लोकः ।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिम् आप्नोति नैष्ठिकीम् अयुक्तः कामकारेण फले सक्तः निबध्यते ॥ 12 ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्वा नैष्ठिकीं शान्तिम् आप्नोति । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तः निबध्यते ।
ईश्वराय कर्माणि करोमि, न फलाय' इति भावयन् समाहितः कर्मफलानि त्यक्त्वा मोक्षं प्राप्नोति । यस्तु फलाकाङ्क्षी कर्मसु प्रवर्तते सः बद्धो भवति ।
यस्माच्च-युक्त ईश्वराय कर्माणि करोमि न मम फलायेत्येवं समाहितः सन्कर्मफलं त्यक्त्वा परित्यज्य शान्तिं मोक्षाख्यामाप्नोति नैष्ठिकिं निष्ठायां भवा सत्त्वशुद्धुज्ञानप्राप्तिसर्वकर्मसंन्यासज्ञाननिष्ठाक्रमेणेतिवाक्यशेषः। यस्तु पुनरयुक्तेऽसमाहितः कामकारेण करणं कारः कामस्य कारः कामकारस्तेन कामकारेण। कामप्रेरिततयेत्यर्थः। मम फलायेदं करोमि कर्मेत्येवं फले सक्तोनिबध्यतेऽतस्त्वं युक्तो भवेत्यर्थः ।।12।।
1) संन्यासं कर्मणां कृष्ण...2) संन्यासः कर्मयोगश्च...3) ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी...4) साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः...5) यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं...6) संन्यासस्तु महाबाहो...7) योगयुक्तो विशुद्धात्मा...8) नैव किञ्चित्करोमीति...9) प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्...10) ब्रह्मण्याधाय कर्माणि...11) कायेन मनसा बुद्ध्या...12) युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा...13) सर्वकर्माणि मनसा...14) न कर्तृत्वं न कर्माणि...15) नादत्ते कस्यचित्पापं...16) ज्ञानेन तु तदज्ञानं... 17) तद्बुद्धयस्तदात्मानः18) विद्याविनयसम्पन्ने...19) इहैव तैर्जितः सर्गो...20) न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य...21) बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा...22) ये हि संस्पर्शजा भोगाः...23) शक्नोतीहैव यः सोढुं...24) योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः...25) लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम्...26) कामक्रोधवियुक्तानां...27) स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्...28) यतेन्द्रियमनोबुद्धिः...29) भोक्तारं यज्ञतपसां...
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भवभूतिः संस्कृतनाटककर्तृषु कविषु अन्यतमः। बहूनां संस्कृतकवीनां यथा तथैव भवभूतेरपि जीवनचरितम् नातीव ज्ञायते । अयम् महावीरचरिते नाटके स्वस्य विषये किञ्चिदिव विवृणोति; यथा- तत्र केचित् तैत्तरीयिणः काश्यपाश्चरणगुरवः पङ्तिपावनाः पञ्चाग्नयो धृतव्रताः सोमपीथिन उदुम्बरनामानो ब्रह्मवादिनः इति । तत्र स्वपरिचयं वदता भवभूतिना भट्टगोपालस्य पौत्रः पवित्रकीर्तेः नीलकण्ठस्य आत्मसम्भवः श्रीकण्ठपदलाञ्छनो जातुकर्णीपुत्रः इति अभिहितम् । भवभूतेः प्रथमं नाम "श्रीकण्ठः" इति श्री एम्.आर्.तेलङ्गमहाशयः स्वग्रन्थे मालतीमाधवस्य संस्कृतभाषाकथानुवादे लिखितवान् । अयं भवभूतिनामा कविः वेदान्तशास्त्रे, न्यायशास्त्रे, व्याकरणशास्त्रे ब्रह्मविद्यायां च निष्णातः आसीत् इति अस्य कवेः कृतिभिः ज्ञायते । एष काश्यपगोत्रजः । आपस्तम्बसूत्रस्य उदुम्बरब्राह्मणशाखायाम् जनिम् अलभत । अस्य माता जातुकर्णी । पिता नीलकण्ठः । पितामहः भट्टगोपालः । ज्ञाननिधिः भवभूतेः गुरुः । एष दाक्षिणात्यः । विदर्भदेशे विद्यमानं पद्मपुरम् अस्य जन्मभूमिः इतिमात्रम् ज्ञातुं शक्यते । विद्वांसः श्रीतेलङ्गमहोदयाः वदन्ति यत्-" अस्ति दक्षिणापथे विद्र्भेषु पद्मपुरम् नाम नगरम् । तत्र केचित्तैत्तरीयाः काश्यपा उदुम्बरोपाभिधाना ब्रह्मवादिनो द्विजा वसन्ति स्म । तेषां वंशे महाकविर्नाम कश्चिद्वाजपेययाजी विप्रो बभूव । अस्मात् पञ्चमः पुरुषो भवभूतिः । अधीतवानयं तर्क-व्याकरण-पूर्वोत्तरमीमांसादीनि शास्त्राणि । अस्य पितृकृतं नाम श्रीकण्ठ इति ।" अपि च सः भवभूतिरिति नाम्नः कारणं निरूपयति यथा-
तथा च
भवभूतिः कुमारिलभट्टस्य शिष्य इति पण्डिताः त्रिपाठीमहोदयाः स्वस्य " कविताकौमुदी" इति पुस्तके व्यलिखन् । कुमारिल भट्टाश्च क्रि.श.8मे शतमाने आसन् । अतः भवभूतेः कालः अष्टमशतकम् । तथा च कन्याकुब्जे श्रीहर्षवर्धनात् अनन्तरम् राजसु मुख्यः "यशोवर्मा" एषः क्रि.श.693 तः 729 पर्यन्तम् राज्यभारम् अकरोत् । यशोवर्मा क्रि.श.730 तमे वर्षे चीनदेशं प्रति राजप्रतिनिधिं प्रेषितवान् आसीत् । ततः दशवर्षानन्तरम् काश्मीरराजात् ललितादित्यमुक्तापीडात् पराजितः । अयं यशोवर्मा एव भवभूतेः आश्रयदाता आसीत् । इममेव विषयं "राजतरङ्गिण्याः" एतेन श्लोकेन अवगन्तुम् शक्यते । यथा-
यशोवर्मणः पराजयानन्तरं "भवभूतिः" काश्मीरराजम् ललितादित्यम् आश्रितवान् । एतैः कारणैः भवभूतेः कालः अष्टमशतमानस्य पूर्वार्धम् इति निश्चेतुं सुलभम् ।
संस्कृतसाहित्ये बहवः सन्ति नाटकरचयितारः। तेषु दिगन्तव्याप्तैः यशोभिः विलिसितौ कविवरौ द्वौ स्तः - कालिदासः भवभूतिश्च । "कनिष्ठिका ऽधिष्ठितकालिदासा" "उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते" इति वचने इममेवाभिप्रायं समर्थयतः । अत्र महाकवेः भवभूतेः जीवितविशेषान् कांश्चन संस्मरामः । महानाटककारेण भवभूतिना उत्तररामचरितम् इति करुणरसपूर्णम् एकं रूपक रचितम् । स एव मालतीमाधवं महावीरचरितं च अलिखत्। तस्य जन्म अष्टमशतके विदर्भे पद्मपुरे अभवत्। पद्मपुरस्य पद्मवटी, पाटलिपुत्रम् इति नामद्वयं च भवति । सः श्रीकान्तनीलकण्ठः इति उदाहृतः। तस्य पिता नीलकण्ठः माता जातुकर्णी गुरुः ज्ञाननिधिः च आसन्। सः कल्प्यां वसन् नाटकानि अलिखत्। सः कन्याकुब्जस्य राज्ञः यशोवर्मणः सभायाम् आसीत् । भवभूतिरिति नाम तस्य शिवभक्तिं सूचयति । अस्य ‘उम्बेकः’ इति नामान्तरमप्यस्ति । अस्य पोषकः यशोवर्मा यद काश्मीरराजेन ललितादित्येन पराजितोऽभूत्, तदारभ्य असौ महाकविः बहूनि कष्टान्यनुभूतवान्। महाकवेरस्य नाटककलायां विशेषासक्तिरासीत् । सैव अस्य नाटकरचनायां प्रधानं कारणमित्यूह्यते । कविवरेणानेन त्रीणि रुपकाणि विरचितानि -महावीरचरितम्, मालतीमाधवम्, उत्तररामचरितं चेति। तेषु क्रमशः वीरश्रृङ्गारकरुणरसाः प्राधान्यं वहन्ति।
वश्यवाक्यं कवेर्वाक्यम् इति महावीरचरिते अनेनैव उक्तत्वात् "वश्यवाक्’ कविरिति अस्य बिरुदम् भवति । व्याकरणन्यायमीमांसादिषु शास्त्रेषु परिणतः इति हेतोः "पदवाक्यप्रमाणज्ञ" इति चतुश्शास्त्राभिज्ञत्वात् "भट्ट" इति नामभिः भवभूतिम् आह्वयन्ति । महाव्याख्यानकर्ता "जगद्धरः" श्रीकण्ठ इति भवभूतेः पाण्डित्येन प्राप्तम् बिरुदम् इति स्पष्टतया वदति ।
चतुशशास्त्रपारङ्गतस्य भवभूतेः मनसि स्त्रीषु महानादरः । तेषु दिवसेष्वेव अयं महाकविः स्त्रीशिक्षां प्रोत्सहते स्म । अयं विषयः तस्य रचनासु दृश्यते ।यथा-
अस्य करुणरसपप्रधानम् उत्तररामचरितनाटकं न केवलं भारते देशे किन्तु प्रपञ्चेऽस्मिन् विशिष्टं स्थानमलभत । शाकुन्तलनाटकेन कालिदास इव उत्तररामचरितनाटकेन भवभूतिः जगत्प्रसिद्धः अभवत् । अत एवोक्तम् ।उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते इति ।
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उपेन्द्रः , कन्नडचचित्रक्षेत्रस्य एकः नायक, निर्देशकः, निर्मापकः च वर्तते । एषः मध्यमस्तरस्य ब्राह्मणकुटुम्बे जन्म प्राप्तवान् । ज्न्मस्थलं कुन्दापुरस्य समीपे कोटेश्वरः इत्य्स्मिन् ग्रामः । न केवलम् एषः अभिनेता गीतरचयिता अपि ।1992 तमे वर्षे सम्पादितचित्रेण कन्नडचचित्रक्षेत्रं प्रविष्टवान् ।एतस्मात् प्राक् सहायकनिर्देशकरूपेण कार्यं कृतवान् । नायकः भूत्वा एतस्य प्रथमचित्रम् ए।1998 तमे वर्षे चित्रमिदं सम्पादितम् । एतस्य पत्नी प्रियान्का त्रिवेदी। एतस्य पुत्रद्वयं स्तः ।
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भारतस्य केन्द्रशासितप्रदेशः अस्ति अण्डमाननिकोबारद्वीपसमूहः । बङ्गालोपसागरे विद्यमाने अस्मिन् द्वीपसमूहे त्रीणि मण्डलानि सन्ति । तेषु त्रिषु मण्डलेषु अन्यतमम् अस्ति निकोबारमण्डलम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति कार् निकोबार् नगरम् ।
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103 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः साधारण-वर्षः आसीत्।
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गुजरातराज्ये किञ्चन मण्डलम् अस्ति पाटणमण्डलम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति पाटण इति नगरम् ।
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गुल्मः इन्द्रियम् अस्ति।
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गोडचिनमल्किजलपातः गोकाक नगरतः प्रायशः 19 कि.मी. दूरे अस्ति । गोकाक नगरतः 7 कि.मी. दूरे स्थितं गोकाकजलपातं दृष्ट्वा ततः 9 कि.मी. दूरे गोडचिनमल्कि ग्रामः लभते । एषः ग्रामतः वाहने इतोपि 2 कि.मी. अग्रे गच्छति चेत् गोडचिनमल्किजलपातः लभति |
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विख्यात पुरुषः।
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अयं भगवद्गीतायाः त्रयोदशोध्यायस्य क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगस्य द्वात्रिंशत्तमः श्लोकः ।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यात् आकाशं न उपलिप्यते सर्वत्र अवस्थितः देहे तथा आत्मा न उपलिप्यते ॥ 32 ॥
यथा सर्वगतम् आकाशं सौक्ष्म्यात् न उपलिप्यते तथा सर्वत्र देहे अवस्थितः आत्मा न उपलिप्यते ।
यथा आकाशः पादिषु पुष्पादिषु च वर्तमानः असत्वात् न तद्गतेन दोषेण गुणेन वा सम्बध्यते तथा आत्मा अपि प्रकृष्टे निकृष्टे वा शरीरे वर्तमानः न तद्गतेन दोषेण गुणेन वा सम्बध्यते ।
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अल्बर्ट ऐन्स्टायिन् जर्मनीदेशस्य विश्वविख्यातः वैज्ञानिकः आसीत् । भौतविज्ञानस्य लोके स्वसंशोधनैः प्रसिद्धः । भौतशास्त्रस्य जनकः इति प्रसिद्धिः अस्य । द्युतिविद्युत्परिणामस्य नियमं निरूपितवान् । एषः सुप्रसिद्धः नियमः भवति । 'बनेश् हाफ्’ अस्य शिष्यः अस्य जीवनस्य साधनस्य च विषये 'दि स्ट्रेञ्ज् स्टोरि आफ् दि क्वाण्टम्' इत्यस्मिन् पुस्तके विस्तृततया लिखितवान् अस्ति ।
ऐन्स्टायिन् मार्चमासस्य 14 दिनाङ्के 1879 तमे संवत्सरे जर्मनीदेशस्य वुर्टेन् बर्गप्रान्तस्य उल्म्-नगरे अजायत । अस्य पिता 'हर्मन्' । मता 'पौलीन्' । हर्मन् एकस्य आपणस्य स्वामी आसीत् । पौलीन् सङ्गीतप्रिया आसीत् । बाल्ये अध्ययने अभिरुचिः न आसीत् । शालां गन्तुं मनः न आसीत् ।
अस्य पिता कालान्तरे म्यूनिक् नगरे यन्त्रागारं स्थापितवान् । अस्मिन् समये पुत्रं क्याथोलिक् शालायाम् अध्ययनार्थं प्रेशितवान् । अत्रत्यनां कठिणनियमपालने अनासक्तः। अतः शालां गन्तुम् इच्छा एव न भवति स्म । पुत्राय विद्यायाः महत्त्वम् एवं अस्याः आवश्यकताञ्च बोधितवान् । पितृव्यस्य प्रोत्साहः अस्य अध्ययने बहुमुख्यम् आसीत् । एतेन अध्ययने अभिरुचिरागतः । अस्य माता 'पिटिलु’ वाद्यं पाठितवती । शालासु भाषाविषयेषु अनासक्तः, विज्ञाने, गणीते च आसक्तिः आसीत् । तत्रापि यूक्लिडस्य रेखागणीते अतीवासक्तिः आसीत् । अस्य प्रश्नाः शालासु अध्यापकान् पीडयन्ति स्म । अतीव सूक्ष्माः कठिणाश्च प्रश्नाः भवन्ति स्म । अस्मै अत्रत्य पाठनव्यवस्था न रोचते स्म । अतः स्विट्झर्ल्याण्ड्देशस्य आकानगरस्य प्रसिद्धां शालां प्रविष्टवान् । अत्रत्या पाठनशैली आकर्शिता । उत्तमशिक्षणं प्राप्य, जूरिच्नगरस्य पालिटेक्निक् कलाशालां प्रविष्टवान् । अस्मिन् समये भौतविज्ञानस्यैव अध्ययनं कर्तव्यमिति निर्धारं स्वीकृतवान् । अपेक्षितान् गणीतशास्त्रनियमान् अधीतवान् । अध्ययनानन्तरं उद्योगावकाशाः न प्राप्ताः । एषु दिनेषु बालेभ्यः पाठयति स्म । जूरच् विश्वविद्यालयस्य डाक्टरेट् पदवीं प्राप्तवान् । अस्मिन्नेव विश्वविद्यालये एव 1909 तमे संवत्सरे प्राध्यापकपदवीं प्राप्तवान् । 1912 तमे संवत्सरे जूरिच् पालिटेक्निक् विद्यालये सहप्राध्यापकत्वेन कार्यं कृतवान् । 1913 तमे संवत्सरे बर्लिन् विश्वविद्यालये प्राध्यापकत्वेन कार्यं कृतवान् । कैसर् विल् हेल्म् इन्स्टिट्यूट संस्थायाः विंशतिवर्षाणि यावत् निदेशकः आसीत् ।
अस्य बहुसरलजीवनम् आसीत् । यहूदिसम्प्रदायस्थः आसीत् । 1903 तमे संवत्सरे विद्याभ्यासस्य कालीनां मिलेवा मारिस् सखीं परिणीतवान् । 1904 तमे संवत्सरे "ह्यान्स् अल्बर्ट्” नाम प्रथमः पुत्रः अजायत् । द्वितीयस्य पुत्रस्य नाम एड्वर्ड इति । 1914 तमे संवत्सरे परिवारेण सह बर्लिन्-प्रदेशम् आगतवान् । अत्र नूतन उद्योगं प्राप्तवान् । किञ्चित् कालानन्तरं दाम्पत्ये क्लेशाः उत्पन्नाः। 1919 तमे संवत्सरे विच्छेदनम् अपि प्राप्तवान् । पुत्राभ्यां गृहात् निर्गता मिलेवा । अनेन दुःखितः ऋग्णश्च सञ्जातः । अस्मिन् समये अस्य पालनम् 'एल्सा’ कृतवती । एनाम् एव अल्बर्ट परिणीतवान् । अस्य प्रसिद्धौ एषा अपि कारणीभूता । उपन्यासेन युरोपदेशेषु, अमेरिकादेशेषु च प्रसिद्धिः आसीत् । 1933 तमे संवत्सरे अडाल्फ् हिट्लर स्वशासनकाले अस्य गृहादिकं स्वायत्तीकृतवान् । अस्य पौरत्वमपि स्वीकृतवान् । अतः एषः अमेरिकादेशे एव वासं कृतवान् । स्वान्त्यकालपर्यन्तं न्यूजेर्सिया प्रिन्स्-टन् विश्वविद्यालये कार्यं कृतवान् ।
अस्य सापेक्षतासिद्धान्तः सुप्रसिद्धः भवति । एन्स्टैन् प्लाङ्कनस्य शकलसिद्धान्तस्य सारं स्वीकृत्य प्रकाशस्य गुणधर्मान् ज्ञातुं संशोधनं कृतवान् । अनेन स्वसिद्धान्तं निरूपितवान् । "यन्यू डेफिनिशन् आफ् मालिक्टूलर् डैमेन्षन्" इति प्रबन्धमेकं रचितवान् । एन्स्टैन् प्रकाशस्य सञ्चारस्य, वेगस्य च विषये स्व नूतनं सिद्धान्तं निरूपितवान् । "प्रकाशस्य सञ्चाराय माध्यमम् अनपेक्षितम्, सः प्रकाशः निर्वाते सञ्चारसामर्थ्यसहितः शक्तिरूपः भवति । प्रकाशस्य वेगस्य समानः वेगः कस्यापि न भवति। प्रकाशः स्वमूलात् बहिरागत्य समानवेगे प्रसरति ।" इति अस्य निरूपणं भवति। प्रकाशस्य वेगः गरिष्ठः भवति । अतः स्थिरवेगं '" इति आङ्ग्लाक्षरेण सूचितवान् । एन्स्टैन् निरूपितं समीकरणम् = 2 इति । जडवस्तु त्रिषु रूपेषु घन, द्रव, अनिलादि भेदेन विद्यते । वस्तुने द्रव्यराशिः अस्ति । द्रव्यराशिं इति सङ्केतेन निरूपितवान् अस्ति । प्रकाशम्, उष्णञ्च भारपरिमाणेन मापयितुं न शक्यते । ईदृशां शक्तीं इति सङ्केतितवान् । वैज्ञानिकाः शक्तिराशी पृथक् इति चिन्तयन्तः आसन् । उभयोर्मध्ये एन्स्टैन् सम्बन्धं कल्पयित्वा, उभयोः समत्वं च कल्पयित्वा =2 इति सरलं समीकरणं निरूपितवान् । अनेन समीकरणेन परमाणुगोलस्य तत्वं निरूपितम् ।
एन्स्टैन् न केवलं वैज्ञानिकः, किन्तु प्रसिद्धः लेखकोऽपि । अनेन बहवः ग्रन्थाः रचिताः । अस्य कृतयः जर्मनीभाषायां विद्यन्ते । कालन्तरे आङ्ग्लभाषायाम् अपि प्रकटिताः। "दि यवुल्यूषन् आफ् फिसिक्स्” इति लीफाल्ड् इन्फेल्डवर्येण सह लिखितः प्रसिद्धकृतिः ।
एन्स्टैन् प्रिन्सटन् वैद्यालये एप्रिल्मासस्य 18 तम दिनाङ्कस्य 1955 तमे वर्षे मृतवान् । एन्स्टैनवर्यस्य मरणानन्तरम् अस्य मस्तिष्कं प्रिन्स्-टन् वैद्यालये स्थापितवन्तः । अस्य प्रतिभायाः रहस्यं ज्ञातुं अत्रत्य वैज्ञानिकाः कुतूहलीनः आसन् । एवम् अस्योपरि अध्ययनम् अपि कृतवन्तः
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कर्णाटकस्य अष्टाविंशतिलोकसभाक्षेत्रेषु अन्यतमम् अस्ति रायचूरुलोकसभाक्षेत्रम्। अत्र अष्टविधानसभाक्षेत्राणि अन्तर्भवन्ति । तेषु अन्यतमम् अस्ति शाहपुरविधानसभाक्षेत्रम्। कर्णाटके विधानसभाक्षेत्रेषु अस्य सङ्ख्या 37। शाहपुरविधानसभाक्षेत्रं मण्डलदृष्ट्या यादगिरिमण्डले अन्तर्भवति । निर्वाचनक्षेत्रदृष्ट्या रायचूरुलोकसभाक्षेत्रे अन्तर्भवति । शाहपुरविषये अधिकविवरणार्थम् शाहपुरम् इति पृष्टम् पश्यन्तु ।
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परिणामालङ्कारः अलङ्कारस्य तावत् बहुधा उपयोगः काव्येषु भवति । उपमायाः लक्षणं तावत् कुवलयानन्दे अप्पय्यदीक्षितः एवं प्रकथयति –
यत्र आरोप्यमाणो विषयी किञ्चित् कार्योपयोगित्वेन निबध्यमानः स्वतस्तस्य तदुपयोगित्वासंभवात् प्रकृतात्मना परिणतिमपेक्षते तत्र परिणामालङ्कारः । अत्रोदाहरणम् प्रसन्नेति । अत्र हि अब्जस्य वीक्षणोपयोगित्वं निबध्ये न तु दृशः । मयूरव्यंसकादिसमासेनोत्तरपदार्थप्राधान्यात् । नचोपमितसमासाश्रयणेन दृगब्जमिवेति पूर्वप्राधान्यमस्तीति वाच्यम् । प्रसन्नेति सामान्यधर्मप्रयोगात् । "उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे” इति तदप्रयोग एवोपमितसमासानुशासनात् । अब्जस्य वीक्षणोपयोगित्वं न स्वात्मना सम्भवति । अतस्तस्य प्रकृतदृगात्मना परिणत्यपेक्षणात् परिणामालङ्कारः ।यथा वा –
अत्रारोप्यमाण आतरः सौमित्रिमैत्रिरूपतापत्या गुहोपकारलक्षणकार्योपयोगी न स्वात्मना, गुहस्य रघुनाथप्रसादैकार्थिकत्वेन वेतनार्थित्वाभावात् ॥ परिणामोऽनयोर्यस्मिन्नभेदः पर्यवस्यति । कान्तेन पृष्टा रहसि मौनमेवोत्तरं ददौ ॥
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रायल् चालेञ्जर्स् गणः बेङ्गळूरुनगरं प्रतिनिधत्ते । एषोऽपि गणः भारतीय-प्रीमियर् लीग् मध्ये अन्यतमः । एतस्य गणस्य स्वामी विजयमल्यः वर्तते । गणस्यास्य नेता डेनियल् वेटोरि विद्यते । क्रिस् गेय्ल् अस्य गणस्य प्रमुखक्रीडालुः विद्यते ।
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अयं भगवद्गीतायाः अष्टादशोऽध्यायस्य मोक्षसंन्यासयोगस्य षोडशः श्लोकः ।
तत्र एवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः पश्यति अकृतबुद्धित्वात् न सः पश्यति दुर्मतिः ॥
देहभृता अशेषतः कर्माणि त्यक्तुं नहि शक्यम् । यः तु कर्मफलत्यागी सः त्यागी इति अभिधीयते ।
एवं सर्वकर्मसिद्धौ पञ्च कारणानि इति स्थितौ यः पुरुषः सर्वेषां कर्मणां कर्ता अहम् इति चिन्तयति तस्य शास्त्रोपदेशेन बुद्धिरेव न संस्कृता इति निर्णयः । ततश्च सः जानन्नपि न जानाति इत्येव बोद्धव्यम् ।
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1223 तमः वर्षः ग्रेगोरी-कालगणनायाम् एकः साधारण-वर्षः आसीत्।
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17°21′58″उत्तरदिक् 78°28′34″पूर्वदिक् / 17.366°उत्तरदिक् 78.476°पूर्वदिक् / 17.366; 78.476
• महानगरम्
• 7
• औन्नत्यम्• तीरप्रदेशः
• 536 मीटर • 0 किलोमीटर
• तलस्पर्षीतापमानम्• ग्रीष्मकालः• शीतकालः
• 603 मिमी • 26.0 °से • 35.9 °से • 2 °से
हैदराबादनगरमण्डलम् आन्ध्रप्रदेशराज्ये स्थितं किञ्चनमण्डलम् । अस्य मण्डलस्य केन्द्रम् अस्ति हैदराबाद् नगरम् ।
1591 तमे वर्षे कुलीकुतुब् षा इत्याख्येन राज्ञा स्वसख्याः भागमत्याः स्मृत्यर्थं हैदराबाद् नाम नगरं निर्मितवान् । शातवाहनैः,चालुक्यैः, काकतीयैः, बहमनीसुल्तानजनैः च पालितमिदं मण्डलम् ।औरङ्गजेबः इदं प्रान्तं 1687 तमे वर्षे अजयत् । असब्जाहीवंशजाः 1724 वर्षतः पर्यपालयन् इदं हैदराबादनगरम् । 1803 तमे वर्षे सिकिन्दर्जा इत्यस्य पालने सिकिन्द्राबाद् नगरं निर्मितम् । निजांनवाब् जनाः 1948 तमवर्षपर्यन्तं प्रान्तमिदम् अपालयन् । 1948 तमे वर्षे इदं भारतदेशे विलीनं जातम् । 1956 तमे वर्षे सीमान्ध्रप्रान्तैः संयोज्य आन्ध्रप्रदेशराज्यं च आविष्कृत्य तस्य राजधानीत्वेन भाग्यनगरम् उद्घोषितम् ।
अस्य प्राच्यांनल्गोण्डमण्डलं, पश्चिमे कर्णाटकराज्यम्, उत्तरे मेदक् मण्डलम्, दक्षिणे च महबूब् नगरमण्डलं वर्तन्ते । अत्र जनानाम् उपाधिः व्यवसायेतरक्षेत्रेषु लभ्यते ।
भाग्यनगरपरिसरेषु केन्द्रराज्यसर्वकारीयाणां स्वायत्तीयसंस्थानां कर्मागाराणि स्थापितानि । मादापूर् समीपे &, मैक्रोसाफट्, ऎ. बी. एम्, गूगुल् इत्यादयः स्वीयसङ्गणकान्तर्गतकेन्द्राणि प्रास्थापयन् । मण्डलेस्मिन् उस्मानिया विश्वविद्यालयः, केन्द्रीयविश्वविद्यालयः, पोट्टिश्रीरामुलुतेलुगुविश्वविद्यालयः,अम्बेडकर् दूरविद्या विश्वविद्यालयश्च वर्तन्ते । मूसी, मञ्जीरा, होल्दिया इत्याद्युपनदीनां द्वारा पेयजलम् उपलभ्यम् ।
चार्मिनार्, सालार् जङ्ग् वस्तुसङ्ग्रहालयः, शासनसभा, हुस्सेन् सागरस्थः बुद्धविग्रहः, इन्दिरा उद्यानानि, गोल्कोण्डदुर्गं, सार्वजनिक उद्यानानि, नेह्रुमृगालयः, बिर्लामन्दिरम्, अन्तरिक्षशाला, रवीन्द्रभारती, रामोजी फिल्म् सिटी इत्यादीनि दर्शनीयस्थलानि बहूनि विद्यन्ते । विभिन्नमतानां, संस्कृतीनां च सङ्गमक्षेत्रमिदं मण्डलं भारतदेशे तथा विश्वस्तरे च विशिष्टस्थानं प्राप्नोति ।
हैदराबाद् आन्ध्रप्रदेशराज्यस्य राजधानी अस्ति । अत्र नेह्रुमृगालयः अपूर्वः अस्ति । 120 हेक्टर् प्रदेशे व्याप्ते मृगालये विविधा वन्यमृगाः सन्ति । सिंहाः, गजाः, व्याघ्राः, पक्षिणः इत्यादीनी सन्ति । लघुवाहनेनापि मृगालयदर्शनव्यवस्था अत्र अस्ति । सोमवासरे विरामः अस्ति ।
हैदराबाद् समीपे बिर्लामन्दिरम् अथवा बालाजीमन्दिरम् अपूर्वं दर्शनीयमस्ति । उन्नतप्रदेशे स्थितात् मन्दिरात् नगरदर्शनम् अतीव आनन्दं जनयति ।
हैदराबादनगरे चारमीनार् इति स्थलं केन्द्रस्थाने अस्ति । हिन्दूनर्तक्याः बागमत्याः स्मरणार्थं निर्मितमेतत् चतुर्गोपुरात्मकम् । क्रिस्ताब्दे 1513 तमे वर्षे सुल्तान् महम्मद् बुली कुतुब् शाही एतं निर्मितवान् । विपणिमध्ये एव एतत् विराजते । हैदराबादनगरस्य हृदयभागे विपणिमध्ये अस्ति एतत् चारमीनार् वीक्षकगोपुरस्थानम् । हैदराबाद् नगरस्य प्रमुखम् आकर्षण स्थानम् अस्ति एतत् । क्रिस्ताब्दे 1593 तमे वर्षे प्लेग् रोगात् मुक्तिः प्राप्ता इत्यस्य स्मरणार्थं नर्तकयाः भागमत्याः स्मरणार्थं च एतं विशेषशिल्पं महम्मद् कुलीषा निर्मितवान् । अत्र चत्वारि गोपुराणि सन्ति । गोपुराणि 50 मीटर् उन्नतानि 30 मीटर् विस्तृतानि च सन्ति । चतुर्षु र्भागेषु तोरणानि सन्ति । एतेषां पार्श्वभागे पाटलपुष्पाणां सुन्दरचित्रानि, अरेबिक् भाषया शासनानि च चित्रितानि सन्ति । उपरि गन्तुं सोपानानि सन्ति । गोपुरशिखरेभ्यः नगरदर्शनम् अतीवानन्दाय भवति । चार्मीनार् प्रदेशं परितः आपणाः सन्ति । अत्र आभरणानां विपणिः काचकङ्कणानां मौक्तिकानां च वाणिज्यं च सदा प्रसिद्धम् अस्ति । प्रवेशकालः प्रातः 9 वादनतः सायं 4 वादन पर्यन्तं यावत् भवति। सायङ्काले 7 वादनतः 9 वादन पर्यन्तं दीपोत्सवः भवति । गोपुराणि प्रकाशे अति सुन्दराणि भवन्ति ।
हैदराबाद् नगरे स्थितं मेक्कामस्जिद् इति प्रार्थनास्थलम् अतीव बृहदस्ति । अत्र दशसहस्रजनाः उपवेष्टुम् अर्हन्ति । निजामानां मरणोत्तरस्मारकाणि अत्र आवरणे सन्ति ।
एषः वस्तुसङ्ग्रहालयः विश्वे एव प्रसिद्धः अस्ति । भारते तृतीयः बृहत् सङ्ग्रहालयः एषः । एकेन सङ्गृहीतानि वस्तूनि अत्र सन्ति । सः एव सालारजङ्ग्-3 एषः पितुः सकाशात् पितामहस्य सकाशात् च कतिचनवस्तूनि प्राप्तवान् । अनेकानि वस्तूनि स्वयं सङ्गृहीतवान् । कलात्मकानि वस्तूनि अत्र सन्ति । लेखनानां सङ्ग्रहः अपि अत्र अस्ति । 40 वर्षाणां परिश्रमस्य प्रयत्नेन एषः वस्तुसङ्ग्रहालयः सुव्यवस्थितः अभवत् ।
ऐतिहासिकं दुर्गमेतत् पूर्वं वरङ्गलस्य काकतीयैः राजभिः निर्मितम् आसीत् । गोपालकानां प्रदेशः इत्यतः गोल्कोण्ड इति नाम अभवत् । राज्ञा प्रतापेन निर्मितम् एतत् इति केषाञ्चन मतम् । टर्कीदेशस्य सुल्तान् क्वालि कुतुब् षाहे क्रिस्ताब्दे 1512 तमे वर्षे एतस्य दुर्गस्य नवीकरणं कारितवान् । क्रिस्ताब्दस्य 1590 तमे वर्ष पर्यन्तम् एतत् बहमनिसाम्राज्यस्य राजधानी आसीत् । अनन्तरम् एष एव दिल्ली सुल्तानसैन्यं विरुद्ध्य युद्धं कृतवान् ।
हैदराबादनगरात् पश्चिमभागे 400 पादमितोन्नते स्थले ग्रान्नैट् शिलाभिः निर्मितं दुर्गं 7 कि.मीटर् परीधियुक्तम् अस्ति । तत्र स्फोटकशतघ्न्यः स्थापिताः आसन् । अत्र तारामती मस्जिद्, जनानां रक्षकगोपुरं स्फोटकवस्तुनिर्माणागारः च आसन् ।
नगीनबाग् प्रदेशे राजवंशीयानां स्नानगृहाणि विहारस्थानानि वाटिकाः च आसन् । दुर्गे पर्वतप्रदेशे जलवितरण्व्यवस्था आसीत् । दुर्गस्य चत्वारि द्वाराणि आसन् । तेषु फतेमेक्का बञ्जारबालाहिसारमुख्यानि । प्रवेशद्वारेषु तीक्ष्णानि शूलानि स्थापितानि आसन् ।
प्रवेशद्वारे करताडनपूर्वकं शब्दं कुर्वन्ति चेत् राजसभायां शब्दश्रवणं कर्तुं शक्यते । एतादिशी अद्भुता व्यवस्था दुर्गे अस्ति । प्रवेशद्वारे वर्तुलाघाटकः अस्ति । 120 मीटर् उपरिप्रदेशे शब्दश्रवणं स्पष्टतया भवति । उपरिगन्तुं 360 सोपानानि सन्ति ।
इतिहासानुसारं भद्राचलरामदासस्वामिनः बन्धनम् अत्रैव अभवत् । अनन्तरं रामदासमहोदयस्य बन्धविमोचनम् अभवत् । अत्र दुर्गे वज्रवाणिज्यं भवति स्म । नाम्पल्लिमार्गतः 14 कि.मी दूरे एतत् दुर्गम् अस्ति । नवम्बर्-मासतः फेब्रवरी-मासाभ्यान्तरं यावत् अत्र प्रवेशशुल्कं दत्त्वा प्रतिदिनं राजवैभवं द्रष्टुं शक्नुवन्ति । सायं ध्वनिदीपव्यवस्थापि अस्ति । अत्र अगन्तुं हैदराबादतः नगरवाहनसौकर्यम् अस्ति ।
हैदराबादनगरसमीपे स्थितम् आधुनिकं आकर्षकविहारस्थलं चलनच्चित्रनिर्माणकेन्द्रम् एतत् । 1800 हेक्टर् प्रदेशे व्याप्तं मनोरञ्जना स्थानमिदम् । पर्ल् सिटि, सिलिकान् सिटि इति च प्रसिद्धम् अस्ति । एतं ’प्याराडैस् आन् अर्थ’ इति च कथयन्ति । अत्रत्यं थ्रिल्लर् रैडर्, क्रिपालुगृहा, सीपिपिलैन् स्टण्टशो स्थानानि अतीव कर्षकाणि सन्ति ।प्रकृतिमध्ये मनुष्यनिर्मितम् अद्भुतदर्शनम् अत्र भवति । सम्पूर्णतया सुन्दरदृश्याणि निर्मितानि सन्ति । ‘युरेका’ शिल्पं सर्वान् यात्रि जनान् कदाचित् प्राचीनस्य मौर्यसाम्राज्यस्य, कदाचित् अमेरिका देशे रचितस्य वैल्ड् वेस्ट् नगरस्य, पुनः कदाचित् देहलीबादशाहसभायाः वैभवं दर्शयति ।युरेका पञ्चतारोपहारवसति गृहेषु अनेकविधाहारसेवनं साध्यमस्ति । अलम्पना, चाणक्यः, हनिमेक् फास्टफुड्, गङ्गाजमुना इत्यादीनि अनेकानि उपाहारगृहाणि अत्र सन्ति । अनेकविधक्रीडास्थानानि सन्ति । अत्र बालानाम् अतीव सन्तोषः भवति । क्रीडासु स्पर्धासु बालाः मग्नाः भवन्ति । हैदराबाद् नगरतः 35 कि.मी दूरे एतत् स्थलमस्ति । अत्र प्रतिदिनं विविधभाषा चलनच्चित्राणां चित्रीकरणं चलत् भवति । नगरतः जम्बोवाहनानि सम्पर्कयोग्यानि सन्ति । दूरवाणीं कृत्वापि वण्डरल्याण्ड जम्बोवाहनैः गन्तुं शक्यते । दूरवाणी सङ्ख्या 62,23,370 अस्ति ।फिल्मसिटि मध्ये लघुवाहनानि सन्ति । हैदराबाद् नगरतः नगरवाहनानि सन्ति । वसत्याः कृते काचिगुडा समीपे वसति गृहाणि सन्ति । कोठी वाहननिस्थानतः 205 सङ्ख्याकं वाहनं चलनच्चित्रनगरं गच्छति ।रामोजी फिल्मसिटि दर्शनार्थं प्रवेशधनं निर्दिष्टं अस्ति । बालानाम् अर्धव्ययः भवति । एकदिनं यावत् प्रायशः 500 सप्यकाणि भवन्ति । प्रवेशसमयः प्रातः काले 9 वादनतः सायङ्काले 6 वादनम् । रायल् प्याकेज् टूर् व्यवस्था अस्ति ।
बेङ्गळूरु तः 574 कि.मी । चेन्नैतः 794 कि.मी । तिरुपतितः 741 कि.मी । विजयवाडातः 260 कि.मी । मुम्बयी तः 739 कि.मी । अन्यराज्यैः अपि वाहनसम्पर्कः अस्ति । समीपवाहननिस्थानानि जूबिलि, कोठि हाम्लिबिन् । धूमशकटवाहननिस्थानं काचिगुड्प्रदेशे अस्ति ।
हैदराबाद् नगरम् आगन्तुं बेङ्गळूरु, चेन्नै, विशाखपट्टणम्, देहली, मुम्बयी, तिरुपतिः इत्यादि स्थानेभ्यः बेगम्पेट् विमानस्थानकं प्रति सम्पर्कविमानानि सन्ति ।
सिकन्दराबाद्, काचिगुडा, नाम्पल्ली स्थलेषु सन्ति ।
बेङ्गळूरु तः 500 कि.मी । चेन्नै तः 704 कि.मी। विजयवाडतः 273 कि.मी अस्ति।
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डॉ. किरण बेदी /ˈɪəə ɛː/) आई. पी. एस्. इत्यस्याम् उच्चाधिकारिरूपेण प्रथमा महिला आसीत् । सा आई. पी. एस्. इत्यस्यां विभिन्नानि पदानि अलङ्कृत्य जनसेवाम् अकरोत् । ’संयुक्त आयुक्त पुलिस् प्रशिक्षण’, ’पुलिस् स्पेशल् आयुक्त’ इत्यनयोः संस्थयोः तया कार्यं कृतम् आसीत् । वर्तमाने सा ’संयुक्त राष्ट्र संघ’ इत्यस्य सङ्घटनस्य ’शान्ति स्थापना ऑपरेशन्’-विभागे ’नागरिक पुलिस मार्गदर्शक’ इतीदं पदम् अलङ्कृत्य कार्यरता अस्ति । 2002 तमे वर्षे सा ’भारत की प्रशंसित महिला’ इत्युपाधिना सम्मानिता ।
डॉ. बेदी इत्यस्याः जन्म 1949 तमस्य वर्षस्य जून-मासस्य नवमे दिनाङ्के पञ्जाबराज्यस्य अमृतसर-नगरे अभवत् । तस्याः पितुः नाम प्रकाश लाल, मातुः नाम प्रेमलता अस्ति । तस्याः तिस्रः भगिन्यः सन्ति ।
अमृतसर-नगरस्य सेक्रेड् हार्ट् कॉन्वेन्ट् स्कूल् इत्यस्मिन् विद्यालये किरण 1955 तः 1964 पर्यन्तम् अधीतवती । तत्र सा नॅशनल् केडेट् कॉर्प्स् प्रविष्टवती । 1964 तः 1968 पर्यन्तं तया अमृतसर-नगरस्य गवर्न्मेण्ट् कॉलेज् फॉर् विमेन् इत्यस्मिन् महाविद्यालये आङ्ग्लभाषायाः विषये स्नातकस्य अध्ययनं कृतम् । महाविद्यालये सा नॅशनल् केडेट् कॉर्प्स् इत्यस्य सर्वश्रेष्ठ केडेट् इति पुरस्कृता । 1970 तमे वर्षे सा पञ्जाबविश्वविद्यालयात् राजनीतिविज्ञान-विषये स्नातकोत्तरपदवीं प्राप्तवती । 1988 तमे वर्षे सा दिल्ली विश्वविद्यालयात् न्यायविषये स्नातकपदवीं प्राप्तवती । 1993 तमे वर्षे किरण बेदी नवदेहली-नगरस्य ’राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान’ इत्यस्याः संस्थायाः ’सामाजिक विज्ञान में नशाखोरी तथा घरेलु हिंसा’ इति विषयम् अधिकृत्य पी. एच्. डी. पदवीं प्राप्तवती ।
बाल्ये टेनिस्-क्रीडायां तस्याः अभिरुचिः आसीत् । सा टेनिस्-क्रीडायाः श्रेष्ठक्रीडालुः आसीत् । अस्यां क्रीडायां तया बहवः पुरस्काराः अपि जिताः । ऑल इण्डिया टेनिस् चॅम्पियन्शिप्, ऑल एशियन् टेनिस् चॅम्पियन्शिप् इत्येतयोः अपि सा विजयित्री आसीत् । किन्तु समयान्तरे तस्याः रुचिः सामाजिकक्षेत्रे परिवर्तिता जाता । तस्याः जीवनं स्वस्याः कर्तव्यपालने एव गतम् । किरण बेदी इत्यस्याः जीवनस्य दृष्टिकोणः भिन्नः एव अस्ति । बाल्यावस्थायाः एव तस्याः मनसि उच्चविचाराः आसन् । तेन कारणेन तया देशाय समाजाय च निष्ठापूर्वकं कार्यं कृतम् अस्ति क्रियमाणम् अस्ति च ।
1972 तमे वर्षे ब्रज बेदी इत्याख्येन सह किरण बेदी इत्यस्याः विवाहः अभवत् । वर्षत्रयानन्तरं तयोः साइना नामिका एका पुत्री जाता । विवाहात् परम् अपि किरण बेदी इत्यस्याम् अध्ययनस्य उत्साहः आसीत् । अतः सा अध्ययनस्य प्रवर्तनम् अकरोत् ।
किरण बेदी आई. पी. एस्. इत्यस्यां प्रथमा महिला अधिकारी आसीत् । सा भारतीय पुलिस् सेवायां प्रप्रथमं पुलिस् महानिदेशकत्वेन स्वस्याः दायित्वम् अवहत् । 1972 तमे वर्षे आई. पी. एस्. प्रशिक्षणं प्राप्य सा तत्पदम् अलङ्कृतवती । तदनन्तरं स्वस्याः कार्याणां प्रभावेन पदोन्नतिं प्राप्य तया बहूनि पदानि अलङ्कृतानि । यथा –
दिल्ली-नगरस्थे तिहाड-नामके भारतस्य बृहत्तमे कारागारे यदा किरण महानिरीक्षिका आसीत् तदा तया कारागारस्य कारावासिनां हृदयपरिवर्तनाय एकम् अभियानं चालितम् आसीत् । कारावासिभ्यः योगस्य, ध्यानस्य, संस्काराणां च शिक्षणस्य व्यवस्था तया कृता । यद्यपि इदं कार्यं बहुकठिनम् आसीत् तथापि दृढनिश्चया किरण बेदी तिहाड-कारागारम् आश्रमवत् परिवर्तितवती । अनेन प्रसङ्गेन अपि सम्पूर्णे भारते किरण बेदी इत्यस्याः ख्यातिः वर्धिता ।
किरण बेदी यदा नवदेहली-नगरस्य ट्रॅफिक् कमिशनर् आसीत् तदा एकस्मिन् दिवसे तत्कालीनेन प्रधानमन्त्रिणा इन्दिरा गान्धी इत्याख्यया यातायातनियमस्य भङ्गः कृतः आसीत् । कर्तव्यपराधीना किरण बेदी इन्दिरा गान्धी इत्यस्याः वाहनं क्रेन्-यन्त्रेण नीतवती आसीत् । तत्कालादेव किरण बेदी ’क्रेन् बेदी’ इति प्रसिद्धा अभवत् । अस्य प्रसङ्गस्य प्रभावेन इन्दिरा गान्धी उक्तवती यत् – “अस्माकं भारतदेशे किरण बेदी सदृशानाम् अधिकारिणाम् आवश्यकता वर्तते” इति ।
किरण बेदी इत्याख्यायाः दृष्टिकोणः मानवीयः निर्भयश्च आसीत् । तया तेन दृष्टिकोणेन एव पुलिस् कार्यप्रणाल्यै नैकानि महत्वपूर्णानि योगदानानि दत्तानि सन्ति । निःस्वार्थकर्तव्यपरायणतायाः कारणेन सा शौर्य-पुरस्कारं प्राप्तवती । तया प्राप्ताः अन्ये विशिष्टाः पुरस्काराः –
सर्वे पुरस्काराः किरण बेदी इत्याख्यायाः वीरतायाः प्रतीकाः सन्ति । तया यत्किमपि कृतं तत् समाजसेवायै एव कृतम् अस्ति, न तु पुरस्कारेभ्यः ।
किरण बेदी भारतस्य प्रथमा महिला आई. पी. एस्. अधिकारी अस्ति । इदं तस्याः जीवनस्य गौरवं वर्तते । ऑस्ट्रेलिया-देशस्य निर्मात्रा मेगन् डनमैन् इत्याख्यया किरण बेदी इत्यस्याः जीवनाधारितं ’यस् मैडम्, सर्’ नामकम् एकं चलच्चित्रं निर्मितम् अस्ति । इदं चलच्चित्रं सैण्टा बारबरा अन्ताराष्ट्रिये चलच्चित्रसमारोहे द्वाभ्यां पुरस्काराभ्यां सम्मानितम् अभवत् । तया निर्मितं चलच्चित्रं सर्वश्रेष्ठजीवनाधारितेन चलच्चित्ररूपेण सम्मानितम् अभवत् । तस्य चलच्चित्रस्य निर्माणे षड्वर्षाणि व्यतीतानि । तस्य चलच्चित्रस्य निर्माणकाले बह्व्यः आर्थिकसमस्याः अपि आगताः । किन्तु अन्ते नैजनिवेशकानां साहाय्येन इदं चलच्चित्रं सम्पूर्णम् अभवत् । मेगन् डनमैन् कथयति यत् – “इयं केवलं भारतीया कथा नास्ति किन्तु अनेन चलच्चित्रेण वर्तमानकालस्य जनव्याधीनां निवारणाय जनेषु आशाः जागरिताः भवन्ति” । अस्मिन् वृत्तिचित्रे किरण बेदी इत्यस्याः जीवनचरित्रस्य, कार्यपद्धत्याः, तिहाड-कारागारस्य कारावासिनां जीवने परिवर्तनस्य घटनायाः च वर्णनं कृतम् अस्ति । ततः परं किरण बेदी इत्यस्याः व्यक्तित्वाधारितानि, जीवनाधारितानि अनेकानि चलच्चित्राणि निर्मितानि सन्ति ।
किरण इत्याख्यायाः समाजसेवायाम् अपि अभिरुचिः वर्तते । स्वस्याः वृत्त्याः कार्यकाले किरण बेदी इत्यनया समाजसेवायै द्वयोः स्वयंसेविसङ्घटनयोः स्थापना कृता आसीत् । 1987 तमे वर्षे तया नवज्योति, 1994 तमे वर्षे इण्डिया विजन् फाउण्डेशन् इत्येतयोः संस्थयोः प्रारम्भः कृतः । तयोः संस्थयोः साहाय्येन जनानां व्यसनमुक्त्यर्थं, निर्बलजनानां साहाय्यार्थं च बहूनि कार्याणि कृतानि सन्ति । निर्धनानाम्, अशक्तानां, बालकानां, स्त्रीणां च उज्ज्वलभविष्यस्य निर्माणार्थं, प्राथमिकशिक्षणप्रदानाय, प्रौढशिक्षणप्रदानाय एते संस्थे कार्यं कुरुतः । ’नवज्योति-संस्था’ व्यसनमुक्तिकार्येण सह ग्रामीणक्षेत्रेषु जनेभ्यः, कारावासिस्त्रीभ्यः च व्यावसायिकं प्रशिक्षणं परामर्शं च ददाति । व्यसनमुक्त्यर्त्थं ’युनाइटेड् नेशन्स्’ इत्यनया संस्थया ’सर्ज् सॉइटीरॉफ् मेमोरियल् अवार्ड्’ इत्यनेन पुरस्कारेण इमे संस्थे सम्मानिते ।
किरण बेदी वृत्तिजीवने बहूनि वर्षाणि देशसेवायै कार्याणि कृतवती । अन्ये जनाः पदोन्नत्यै कार्याणि कुर्वन्ति । किन्तु किरण बेदी स्वाभिमानेन स्वस्याः कार्याणि करोति । किरण बेदी इत्यस्याः कार्यं दृष्ट्वा एकदा दिल्ली-राज्यस्य उपराज्यपालेन किरण बेदी इत्यस्याः समक्षं दिल्ली-नगरस्य पुलिस् कमिशनर् पदस्य प्रस्तावः उपस्थापितः । किन्तु गृहमन्त्रालयः तत् न ऐच्छत् । गृहमन्त्रालयः किरण बेदी इत्यस्याः स्थाने वाई. एस्. डडवाल इत्याख्याय तत्पदं दातुम् ऐच्छत् । 1974 तमे वर्षे वाई. एस्. डडवाल इत्याख्याय पुलिस् कमिशनर् पदं दत्तम् । तेन कारणेन खिन्ना किरण बेदी स्वाभिमानेन 2007 तमस्य वर्षस्य दिसम्बर-मासस्य 26 तमे दिनाङ्के स्वेच्छया सेवायाः निवृत्ता अभवत् । तस्मिन् काले सा ’भारतीय पुलिस् अनुसंधान एवं विकास ब्युरो’ इत्यस्य महानिदेशकपदे कार्यरता आसीत् ।
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कल्पवृक्षः भारतीयभाषासु कथ्यमानः अयं वृक्षः बहुवर्षीयं सस्यम् अस्ति । नारिकेलः कल्पवृक्षः इति अस्य नामान्तरम् । अस्य सर्वेऽपि अङ्गानि उपयोगाय भवन्ति इति अपि च अयं वृक्षः बहुकालं स्वपालकाय आहारं ददाति । उक्तं च ....
प्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं स्मरन्तः । शिरसिनिहितभारा नारिकेला नराणाम् ।ददाति जलमतल्पास्वादमाजीवितान्तंन हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति ॥
नारिकेरवृक्षे शाखाविशाखाः न भावन्ति स्य पत्रवली दीर्घा भवति । दीर्घे दण्डे कृषाणि पत्राणि समान्तरेण संलग्नानि भवन्ति । अयं वृक्षः समुद्रतीरेषु अथवा लावण्यक्शेत्रेषु सम्यक् प्ररोहति । अस्य फलं भारतीयानां पवित्रतमं भवति । सर्वेषु धार्मिकविधिषु पूर्णफलरूपेण एतत् एव उपयोजयन्ति । नारिकेलवृक्षः भारते अधिकतया संरोहति । केरलराज्ये, पश्चिमबङ्गालराज्ये, ओडिशाराज्ये, अपि च महाराष्ट्रराज्ये, गोवाराज्ये नारिकेलस्य उपचयः अधिकः अस्ति ।
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सः विख्यातः वैज्ञानिकः।
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इन्दोनेशिया देशस्य सञ्जय राजवंशस्य शासकः।
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हिन्दुधर्मः • इतिहासः
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ब्रह्म · ॐ · ईश्वरःआत्मा · मायाकर्म · संस्काराःपु्रुार्थाःधर्मः · अर्थः · कामः · मोक्षः
आस्तिकवादाः साङ्ख्यम् · योगः न्यायः · वैशेषिकम् पूर्वमीमांसाउत्तरमीमांसा /वेदान्तः
नास्तिकवादाःचार्वाकवादः बौद्धवादः जैनवादः
ऋग्वेदः • यजुर्वेदः सामवेदः • अथर्ववेदः विभागाःसंहिता, ब्राह्मणः,आरण्यकः, उपनिषत्
आयुर्वेदः • धनुर्वेदः गान्धर्वेदः • स्थापत्यवेदः
शिक्षा · छ्न्दः · व्याकरणम्निरुक्तः · कल्पः · जौतिषम्
ऋग्वेदीयःऐतरेयायुजुर्वेदीयाःबृहदारण्यकः · ईशवास्यःतैत्तरीयः · कठः · श्वेताश्वतरः सामवेदीयाः छान्दोग्यः · केनःअथर्ववेदीयाःमुण्डकः · माण्डूक्यः · प्रश्नः
ब्रह्मसम्बद्धानिब्रह्मपुराणम् · ब्रह्माण्डपुराणानिब्रह्मवैवर्तपुराणम्मारकाण्डेयपुराणम् · भविष्यपुराणम्विष्णुसम्बद्धानिविष्णुपुराणम् · भागवतपुराणम्नारदपुराणम् · गरुडपुराणम् · पद्मपुराणम्शिवसम्बद्धानिशिवपुराणम् · लिङ्गपुराणम्स्कन्दपुराणम् · अग्निपुराणम् · वायुपुराणम्
रामायणम् · महाभारतम्
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आधुनिकाःश्री अरविन्दः · दयनन्दसरस्वती · महात्मागान्धी · कृश्णानन्दः · नारायणगुरुः · प्रभुपादः · श्रीरामकृष्णपरमहंसः · रमणमहर्षिः · सर्वपल्ली राधाकृष्णन् · स्वामी शिवानन्दसरस्वती · विवेकानन्दः · योगानन्दः
राष्ट्रानुगुणं सनातनधर्मःसनातनधार्मिकता • सनातनपञ्चाङ्गम्हैन्दवनियमाः • सनातनमूर्तिशिल्पः • हिन्दुत्वम्सनातनतीर्थस्थानानि सनातनधर्मस्य समस्याः • सनातनटीकासनातनः निघण्टुः
प्रवेशद्वारम्:सनातनधर्मःप्रवेशद्वारम्:सनातनाध्यत्मिकप्रवेशः
भाद्रपदमासे शुक्लपक्षे तृतीयायां तिथौ एतत् पर्व आचर्यते । व्यवहारे “गौरीपर्व” इति उच्यते चेदपि एतस्य पर्वणः शास्त्रीयं नाम “स्वर्णगौरीव्रतम्” इति । गौरीम् अधिकृत्य “मङ्गलगौरी”, “सम्पद्गौरी”, “सौभाग्यगौरी”, “लावण्यगौरी”, “त्रिलोचनगौरी”, “गजगौरी” इत्यादीनि व्रतानि सन्ति । एतदपि पर्व प्रायः सर्वत्र महिलाभिरेव आचर्यते । “गौरी” इत्येतत् पार्वत्याः एव पर्यायनाम । सा शिवस्य अर्धाङ्गिनी । संहारावसरे सा कृष्णवर्णीया काली, विद्याप्रदानावसरे श्यामलवर्णीया श्यमलाम्बिका । सौभाग्यप्रदानावसरे चम्पकपुष्पवर्णीया अथवा शुभ्रहिमवर्णीया । “गौरी” इत्यस्य पदस्य अर्थः एव “गौरवर्णीया” इति । गौरः वर्णः अस्ति अस्याः इति गौरी ।
ललिता, उमा, एकपर्णा, अपर्णा, शाकम्भरी, राजराजेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी इत्येतानि सर्वाणि अपि तस्याः एव नामानि । “विद्याकामस्तु गिरिशं दाम्पत्यर्थे उमां सतीम् ।“ इति । अनुरूपस्य पत्युः प्राप्त्यर्थं, शाश्वतं पतिप्रेमप्राप्त्यर्थं, सौमङ्गल्यसिध्यर्थं च गौर्याः पूजां कुर्वन्ति । रुक्मिण्या, गोपिकास्त्रीभिः च पतिरूपेण कृष्णस्य प्राप्त्यर्थं कृता गौरीपूजा पुराणप्रसिद्धा एव । इदानीम् अपि कुत्रचित् विवाहमङ्गलकार्यक्रमे सौभाग्यर्थं गौरीपूजां कारयन्ति ।
भाद्रपदमासे शुक्लपक्षे तृतीयायां तिथौ एतत् व्रतम् आचर्यते । गौरीं स्वर्णविग्रहे, हरिद्रालिप्तकलशे, नद्याः सरोवरतः वा सङ्गृहीतायां मृत्तिकायां वा आवाह्य व्रतम् आचरन्ति । रजतविग्रहः अत्र न अनुमन्यते । स्वर्णधरणेन शरीरे यः प्रभावः सञ्जायते सः एव प्रभावः हरिद्राधरणेनापि सञ्जायते । अतः स्वर्णाभावे हरिद्राविग्रहः योग्यः इति उच्यते । गौरी अपि स्वर्णवर्णा नतु रजतवर्णा । मृत्तिकायां ताम् आवाह्य पूजकाः प्रातः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा नदीं सरोवरं वा गत्वा गङ्गापूजां कुर्वन्ति । अनन्तरं तत्रत्यां मृत्तिकां हरिद्रायुक्ते वस्त्रे बध्वा तामेव ग्रन्थिं गौरीं मत्वा षोडशोपचारपूजां कृत्वा मङ्गलवाद्यसहितं गृहम् आनयन्ति । मण्डपे संस्थाप्य प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा विसर्जनपर्यन्तं त्रिकालेषु विधिपूर्वकं पूजयन्ति । घण्टानादेन पूजाम् आरभ्य आचमनं, सङ्कल्पं, कलशपूजां, महागणपतिपूजां, स्वर्णगौरीपूजां, देवताप्रतिष्ठापनं च कुर्वन्ति । पुष्पाक्षतैः ताम् आवाह्य रत्नसिंहासनं समर्पयन्ति । नूतनं सूत्रं पूजार्थं स्थापयन्ति । अर्घ्य-पाद्य-मधुपर्क-पञ्चामृतस्नान-शुद्धोदकस्नान-वस्त्राभरण-यज्ञोपवीत-गन्धाक्षताः-कुङ्क्मादीनि मङ्गलद्रव्याणि जगन्मात्रे समर्पयन्ति । देवीम् अङ्गपूजा-पुष्पपूजा-पत्रपूजा-नामपूजादिभिः सम्पूज्य सूत्रस्य 16 ग्रन्थीन् अपि स्वर्णगौरी, महागौरी, कात्यायनी, कौवरी, भद्रा, विष्णुसोदरी, मङ्गलदेवता, राकेन्दुवदना, चन्द्रशेखरप्रिया, विश्वेश्वरपत्नी, दाक्षायणी, कृष्णवेणी, भवानी, लोलेक्षणा, मेनकात्मजा, स्वर्णगौरी इति क्रमेण पूजयन्ति । नैवेद्यार्थं विशेषतया हरिद्रान्नं, मुद्गान्नं च समर्पयन्ति । पूजानन्तरं प्रसादरूपेण तत् सूत्रं धरन्ति । पूजानन्तरं व्रतकथाश्रवणम् अपि कुर्वन्ति ।
उद्यापनकर्तारः गृहस्य पूर्वभागं शुद्धीकृत्य अलङ्कृत्य तत्र मण्डपं निर्माय धान्यादिकं प्रसार्य कलशं स्थापयन्ति । कलशोपरि 16 दलयुक्तकमलचित्रयुक्तं ताम्रपात्रं संस्थाप्य तस्मिन् पार्वतीपरमेश्वरयोः स्वर्णविग्रहौ संस्थाप्य अभिषेकं कृत्वा षोडशोपचारपूजां कुर्वन्ति । रात्रिपूर्णं जागरणं कुर्वन्ति । अपरस्मिन् दिने प्रातः तिल-यव-आज्यैः सङ्कर्षणमन्त्र-गौरीमन्त्रैः हवनं कृत्वा गोदानादिकं कुर्वन्ति । 16 द्विजान्, सुमङ्गलीः च भोजयित्वा आशीर्वादं प्राप्नुवन्ति ।
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तिन्सुकिया मण्डलः अस्साम् राज्ये स्थितः एकः मण्डलः। अस्य मण्डलस्य केन्द्रः तिन्सुकिया नगरः।
उदाल्गुरि मण्डलम् करीम्गंज् मण्डलम् काचार् मण्डलम् कामरूप् मण्डलम् कामरूप् महानगरीय मण्डलम् कार्बि आङ्लाङ् मण्डलम् कोक्राझार् मण्डलम् गावल्पारा मण्डलम् गोलाघाट् मण्डलम् चिरांग् मण्डलम् जोर्हाट् मण्डलम् तिन्सुकिया मण्डलम् दर्रांग् मण्डलम् दिब्रुगर् मण्डलम् दिमा हसाउ मण्डलम् धमाजि मण्डलम् धुब्रि मण्डलम् नगाव् मण्डलम् नल्बारि मण्डलम् बक्सा मण्डलम् बार्पेट मण्डलम् बोगाइगाव् मण्डलम् मरिगाव् मण्डलम् लखिम्पुर् मण्डलम् शिब्सागर् मण्डलम् सोनित्पुर् मण्डलम् हैलाकन्डि मण्डलम्
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2 जनवरी-दिनाङ्कः ग्रेगोरीयन-पञ्चाङ्गानुसारं वर्षस्य द्वितीयं दिनम् । एतस्मात् दिनात् वर्षान्ताय 363 दिनानि अवशिष्टानि ।
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नेमिनाथः /ˈɛɪɑːθəə/) जैनधर्मस्य चतुर्विंशतितीर्थङ्करेषु द्वाविंशतितमः तीर्थङ्करः अस्ति । भगवतः नेमिनाथस्य वर्णः श्यामः आसीत् । जैनधर्मानुसारं भगवतः चिह्नं शङ्खः अस्ति ।
कौमारावस्थायां नेमिनाथस्य शरीरस्य औन्नत्यं दशः धनुर्मात्रात्मकम् आसीत् । भगवतः धार्मिकपरिवारे “गोमेध” इत्याख्यः यक्षः, “अम्बिका” इत्याख्या यक्षिणी च आसीत् । भगवान् नेमिनाथः हरिवंशवंशीयः, गौतमगोत्रीयश्चासीत् ।
देवायुष्यं पूर्णं कृत्वा भरतखण्डस्य शौरीपुर-नगरे भगवान् नेमिनाथः अवातरत् । श्रावण-मासस्य शुक्लपक्षस्य पञ्चम्यां तिथौ चित्रा-नक्षत्रे मध्यरात्रौ शौरीपुर-नगरस्य समुद्रविजय-नामकस्य राज्ञः गृहे भगवतः नेमिनाथस्य जन्म अभवत् ।
नेमिनाथस्य पिता समुद्रविजयः, माता च शिवादेवी आसीत् । समुद्रविजयः शौरीपुर-नगरस्य श्रेष्ठः राजा आसीत् । कार्त्तिक-मासस्य कृष्णपक्षस्य द्वादश्यां तिथौ चित्रा-नक्षत्रे रात्रौ शिवादेवी तीर्थङ्करत्वसूचकान् चतुर्दश स्वप्नान् दृष्टवती । रात्रौ एव शिवादेवी राज्ञे समुद्रविजयाय चतुर्दशस्वप्नान् श्रावितवती । तस्यां रात्रौ एव भगवतः नेमिनाथस्य जीवः शिवादेव्याः गर्भं प्राविशत् ।
आगामि-दिने राज्ञा स्वप्नशास्त्रिणः आहूताः । स्वप्नानां फलादेशाय स्वप्नशास्त्रमावश्यकं वर्तते । स्वप्नशास्त्रिणां पूजनं कृत्वा शिवादेवी चतुर्दशः स्वप्नान् श्रावितवती । स्वप्नशास्त्रिणः स्वप्नानां फलादेशम् अकुर्वन् यत् – “शिवादेव्याः गर्भे कश्चन श्रेष्ठः बालको विद्यते । सः बालकः तीर्थङ्करत्वं प्राप्स्यति ।
गर्भकालस्य समाप्त्यनन्तरं भगवतः नेमिनाथस्य पीडारहितं जन्म अभवत् । भगवतः जन्मनः सन्देशं प्राप्य राजा समुद्रविजयः प्रसन्नः जातः । राजा समुद्रविजयः तत्कालमेव सम्पूर्णे राज्ये पुत्रोत्सवस्य घोषणां चकार । ये बन्धिनः आसन्, तेभ्यः राजा मुक्तिम् अददात् । राज्ञा पुत्रप्राप्त्याः प्रसन्नतायां सर्वेभ्यः दानमपि अक्रियत । नगरजनाः अपि प्रसन्नाः आसन् । एकादशदिनानि यावत् भगवतः नेमिनाथस्य जन्मोत्सवः आचरितः ।
चतुर्विंशतितीर्थङ्करेषु एकविंशतिः तीर्थङ्कराः प्रागैतिहासिककाले अभवन् । त्रयोविंशतितमः, चतुर्विंशतितमः च तीर्थङ्करः ऐतिहासिककाले अभवताम् । द्वाविंशतितमः तीथङ्करः नेमिनाथात् पूर्वं प्रागैतिहासिकं मन्यते स्म । किन्तु साम्प्रते काले बहूनां विदुषां मतानुसारेण नेमिनाथः ऐतिहासिकः तीर्थङ्करः आसीत् । नेमिनाथस्य पूर्वजन्मनः विवरणमपि प्राप्यते ।
जम्बूद्वीपस्य भरतक्षेत्रे अचलपुरनामकं किञ्चन नगरम् आसीत् । तस्य नगरस्य राजा विक्रमधनः आसीत् । तस्य पत्नी धारिणी आसीत् । धारिणी एकं पुत्रम् अजीजनत् । तस्य नाम धनकुमारः इति । धनकुमारस्य विवाहः कुसुमपुरस्य राज्ञः सिंहस्य पुत्र्या धनवत्या सह अभवत् ।
एकदा धनकुमारः, धनवती च इत्येतौ जलक्रिडायै गतवन्तौ आस्ताम् । तत्र ताभ्यां कश्चन रोगी मुनिः दृष्टः । तत्र ताभ्यां तस्य मुनेः सेवा कृता । यदा सः मुनिः अचलपुर-नगरम् प्राप्तवान्, तदा ताभ्यां मुनेः भक्तिः कृता आसीत् । मुनेः उपदेशात् तौ दम्पती श्रावकत्वं स्वीकृतवन्तौ ।
विक्रमधनः दीक्षाम् अङ्गीकर्तुम् ऐच्छत् । अतः तेन धनकुमारस्य राज्याभिषेकं कृत्वा तस्मै राज्यस्य दायित्वं प्रदत्तम् आसीत् । अनन्तरं धनकुमारेण अपि स्वस्य पुत्रस्य जयन्तस्य राज्याभिषेकं कृत्वा तस्मै राज्यं प्रदत्तम् । धनकुमारः, धवनती च एतौ द्वौ दीक्षाम् अङ्गीकृतवन्तौ । अन्ते सौधर्मनामकं प्रथमं देवलोकं प्राप्तवन्तौ । तत्र महर्धिकदेवौ अभवताम् ।
भरतक्षेत्रस्य वैताढ्यपर्वतश्रेण्यां सूरतेज-नामकं नगरं स्थितमासीत् । विद्याधरसूरः नामकः तस्य नगरस्य राजा आसीत् । विद्युन्मती-नामिका तस्य पत्नी आसीत् । धनकुमारस्य जीवः तृतीये भवे विद्युन्मत्याः गर्भं प्रविष्टः । गर्भकालस्य समाप्त्यनन्तरं पुत्रस्य जन्म अभवत् । तस्य नाम चित्रगतिः इति कृतम् ।
वैताढ्यपर्वतस्य दक्षिणश्रेण्यां शिवमन्दिर-नगरम् आसीत् । तस्य नगरस्य राजा अनन्तसिंहः आसीत् । शशीप्रभा-नामिका तस्य पत्नी आसीत् । धनवत्याः जीवः तृतीये भवे अनन्तसिंहस्य रत्नवती-नामिकायाः पुत्रीस्वरूपेण अवतीर्णः । समयान्तरे तस्याः विवाहः चित्रगतिना सह अभवत् । चित्रगतिः स्वस्य पुरन्दर-नामकस्य पुत्रस्य राज्याभिषेकं कृतवान् । तेन पुरन्दराय राज्यस्य दायित्वम् अपि प्रदत्तम् आसीत् ।
अन्ते चित्रगतिना स्वस्य पत्नीभिः, अनुजभातृभ्यां च सह दमधरमुनेः दीक्षा प्राप्ता । बहुवर्षाणि यावत् चित्रगतिः तपस्यां चकार । सः माहेन्द्र-नामके चतुर्थे देवलोके महर्धिकदेवः अभवत् । तस्य पत्नी, भ्रातरौ चापि तस्मिन्नेव लोके देवाः अभवन् ।
पूर्वमहाविदेहस्य पद्मविजये सिंहपुर-नगरम् आसीत् । हरिनन्दी-नामकः सिंहपुरस्य राजा आसीत् । प्रियदर्शना-नामिका तस्याः पत्नी आसीत् । चित्रगतेः जीवः देवायुष्यं समाप्य प्रियदर्शनायाः पुत्रस्वरूपेण अजायत । तस्य नाम अपराजितः इति कृतम् ।
जनानन्दपुरस्य राजा जितशत्रुः आसीत् । तस्याः पत्नी धारिणी आसीत् । रत्नवत्याः जीवः धारिण्याः पुत्रीस्वरूपेण अवतीर्णः । प्रीतिमतिः इति तस्याः नामकरणं कृतम् । स्वस्य पुत्र्यां यौवने प्राप्ते सति जितशत्रुणा तस्याः विवाहः स्वयंवरपद्धत्या कारितः । अपराजितः राजा अपि स्वयंवरविवाहाय गतवान् आसीत् । प्रीतिमत्या स्वयंवरे अपराजितस्य वरणं कृतम् । मनोगतेः, चपलगतेः च जीवः अपि माहेन्द्रदेवलोकस्य आयुष्यं समाप्य अस्मिन् जन्मनि सूर, सोम च स्वरूपेण अभवत् ।
अपराजितेन श्रेष्ठतया राज्यस्य सञ्चालनं कृतम् आसीत् । प्रजाजनाः सुखिनः आसन् । तस्य पुत्रः पद्मनाभः आसीत् । समयान्तरे अपराजितेन पद्मनाभस्य राज्याभिषेकं कृत्वा तस्मै राज्यस्य दायित्वं प्रदत्तं च । तेन पत्न्या, अनुजाभ्यां च सह दीक्षा अङ्गीकृता । दीक्षानन्तरं तैः महत्साधना कृता । अन्ते सर्वे मोक्षं सम्प्राप्य आरण-नामके एकादशे देवलोके देवाः अभवन् ।
भरतक्षेत्रस्य हस्तिनापुर-नगर्यां श्रीषेणनामकः राजा आसीत् । तस्य पत्न्याः नाम श्रीमती इति । अपराजितस्य जीवः देवलोकस्य सम्पूर्णायुष्यं समाप्य श्रीमत्याः गर्भं प्राविशत् । नवमासानन्तरं सा एकं पुत्रम् अजीजनत् । तस्य नाम शङ्खः इति कृतम् । प्रीतिमत्याः जीवः अङ्गदेशास्य चम्पानगर्याः राज्ञः जितारिणः गृहे पुत्रीस्वरूपेण अवतीर्णः । तस्याः नाम यशोमती इति कृतम् आसीत् । पूर्वजन्मनः अपराजितस्य अनुजौ अस्मिन् जन्मनि यशोधरः, गुणधरः इत्येतौ श्रीषेणस्य पुत्रौ अभवताम् ।
एकदा समीपस्थस्य सीमाडा-नगरस्य जनाः साहाय्यं याचितुं हस्तिनापुर-नगरं समागताः । पल्लिनगरस्य समरकेतु-नामकः कश्चन राजा आसीत् । समरकेतुः सीमाडा-नगरस्य, नगरजनानां च धनं, सम्पत्तिं च अपहृतवान् । नगरजनानां याचनां श्रुत्वा श्रीषेणेन युद्धाय सेना प्रेषिता । श्रीषेणः स्वयमपि गन्तुं सज्जः अभवत् । किन्तु यदा शङ्खः युद्धस्य समाचारं प्राप्तवान्, तदा श्रीषेणस्य स्थाने शङ्खः स्वयमेव युद्धं कर्तुं गतः । तदनन्तरं भयङ्करं युद्धम् अभवत् । अन्ते समरकेतोः सैन्यं नष्टं जातम् । समरकेतुना शङ्खाय समर्पणं कृतम् । समरकेतुना लुण्ठिता सम्पत्तिः जनेभ्यः प्रतिदत्ता ।
समरकेतुं बद्ध्वा शङ्खः हस्तिनापुर-नगरं प्रत्यागच्छन् आसीत्, तदा मार्गे राजा मणिशेखरः अमिलत् । मणिशेखरः शङ्खं दृष्ट्वा पलायितुम् ऐच्छत् । मणिशेखरः बलात् एव यशोमत्या सह विवाहं कर्तुम् इच्छति स्म । अतः यशोमती अवसरं प्राप्य स्वस्य व्यथां शङ्खाय उक्तवती । शङ्खेन मणिशेखरः अवबोधितः । किन्तु तथापि मणिशेखरः न अवगतः । अन्ते शङ्खेन मणिशेखरेण सह युद्धं कृतम् । मणिशेखरः युद्धे पराजितो जातः । मृत्युभयात् मणिशेखरः पलायितवान् । शङ्खस्य शौर्यं दृष्ट्वा यशोमती शङ्खात् आकृष्टा अभवत् । यशोमत्याः पिता चम्पानरेशः जितारिः अपि युद्धस्थलं प्राप्तवान् आसीत् । यशोमती शङ्खेन सह विवाहं कर्तुम् ऐच्छत् । अतः पुत्र्याः मनसः इच्छां ज्ञात्वा जितारिणा वने एव यशोमत्याः शङ्खेन सह विवाहः कारितः ।
राजा श्रीषेणः पुत्रस्य विजयस्य, प्रत्यागमनस्य च सन्देशं प्राप्तवान् । श्रीषेणेन शङ्खस्य उत्साहपूर्वकं स्वागतं कृतम् । शङ्खस्य शौर्यगाथां श्रुत्वा श्रीषेणः प्रसन्नः जातः । श्रीषेणेन राज्ये उत्सवस्य घोषणा कृता । तस्मिन् उत्सवे एव श्रीषेणेन शङ्खस्य राज्याभिषेकः कृतः । अनन्तरं शङ्खाय राज्यस्य दायित्वं प्रदत्तम् । श्रीषेणः स्वयं वैराग्यं प्रापत् । सः साधनां कर्तुं राज्यं त्यक्तवान् । बहुवर्षानन्तरं तेन कैवल्यज्ञानं प्राप्तम् ।
राजा शङ्खः नीतिपूर्वकं राज्यस्य सञ्चालनं कुर्वन् आसीत् । एकदा राजा शङ्खः पत्न्या सह अटितुमुपवनं गतवान् । तस्य मित्राणि, अनुचराः अपि सहैव गतवन्तः आसन् । उद्याने एव भोजनस्य व्यवस्था आसीत् । सर्वे तत्र वार्तालापं कुर्वन्तः आसन् । तदैव एकः मुनिः तत्र आगतः । मुनिं दृष्ट्वा शङ्खः नमस्कृतवान् । यशोमती अपि मुनिं दृष्ट्वा चकिता अभवत् । मुनिः जलार्थं हस्तसङ्केतं कृतवान् । शङ्खः मुनेः सङ्केतम् अवगतवान् आसीत् किन्तु तत्क्षणमेव जलं कुतः आनेयिष्यामि ? इति व्यचारयत् । तदा यशोमती भोजनालयं गत्वा जलम् आनीतवती । शुद्धजलं प्राप्य मुनिः जलम् अपिबत् । अस्मिन् प्रसङ्गे राज्ञा शङ्खेन तीर्थङ्करगोत्रस्य बन्धनं कृतम् । राज्ञी यशोमती अपि एकभवतारी अभवत् । अग्रिमे जन्मनि सा महासत्याः राजीमत्याः स्वरूपेण जन्म प्राप्तवती ।
एकदा मुनिः श्रीषेणः हस्तिनापुर-नगरीं प्राप्तवान् आसीत् । राजा शङ्खः द्वाभ्यां भ्रातृभ्यां, यशोमत्या, सकलपरिवारेण च सह श्रीषेणमुनेः दर्शनं कर्तुं गतवान् । सर्वे श्रीषेणमुनेः प्रवचनं श्रुतवन्तः । प्रवचनानन्तरं शङ्खेन श्रीषेणमुनिं प्रति प्रश्नः पृष्टः यत् – “यशोमत्याः मयि एतावान् स्नेहः प्रेम वा कथम् अस्ति ? अस्य किं कारणम् अस्ति ? मह्यं कथयतु” इति ।
तदा श्रीषेणेन शङ्खः उक्तः यत् – “यदा भवान् पूर्वजन्मनि प्रथमे भवे धनकुमारः आसीत्, तदा सः धनवतीस्वरूपेण भवतः पत्नी आसीत् । अनन्तरं द्वितीये भवे सौधर्मनामके देवलोके सा भवतः सखी आसीत् । पुनः तृतीये भवे मृत्युलोके भवतोः जन्म अभवत् । तस्मिन् जन्मनि भवान् चित्रगतिः आसीत् । सा रत्नवतीस्वरूपेण तव पत्नी आसीत् । पुनः चतुर्थे भवे भवन्तौ माहेन्द्रनामकं देवलोकं गतवन्तौ आस्ताम् । तत्रापि सा भवतः सखी आसीत् । अनन्तरं पञ्चमे भवे पुनः भवन्तौ मृत्युलोकम् आगतौ । तदा तस्मिन् जन्मनि भवान् अपराजितः आसीत् । सा प्रीतिमतीस्वरूपेण भवतः धर्मपत्नी आसीत् । अनन्तरं पुनः षष्ठे भवे भवन्तौ आरणनामकं देवलोकं प्राप्तवन्तौ । तस्मिन् देवलोके अपि सा भवतः सखी एव आसीत् । इत्थं यशोमत्या सह भवतः सप्तजन्मनां सम्बन्धः वर्तते । इदं भवतोः सप्तमभवः वर्तते । अग्रिमे अष्टमे भवे भवन्तौ अनुत्तरविमाने देवौ भविष्यतः । देवलोकस्य आयुष्यं समाप्य भवान् नवमे भवे भरतक्षेत्रस्य “अरिष्टनेमी” “नेमिनाथः” वा इति नामकः द्वाविंशतितमः तीर्थङ्करः भविष्यति । तदा यशोमत्याः नाम राजीमती इति भविष्यति । भवतोः विवाहः निश्चितः भविष्यति, किन्तु अविवाहितावस्थायाम् एव राजीमती दीक्षाम् अङ्गीकरिष्यति मोक्षं प्राप्स्यति च” ।
स्वस्य पूर्वभवानां वर्णनं श्रुत्वा शङ्खस्य मनसि वैराग्यः समुद्भूतः । राज्ञा शङ्खेन अनुजाभ्यां, यशोमत्या, बहुभिः मित्रैश्च सह दीक्षा स्वीकृता । अन्ते सः साधनां कृत्वा मोक्षं प्रापत् । अनन्तरम् अनुत्तर-अपराजित-नामके देवलोके देवः अभवत् ।
भगवतः नेमिनाथस्य जन्मनः एकादशदिनानाम् अनन्तरं नामकरणसंस्कारस्य विधिः अभवत् । तस्मिन् दिने जनाः उत्सवम् अपि आचरितवन्तः । स्वर्गलोकात् बहवः देवाः भगवतः नेमिनाथस्य दर्शनार्थं समागताः । चतुष्षष्टिः इन्द्राः, लोकान्तिकाः देवाः च अपि उत्सवम् आचरितवन्तः । उत्सवे तेषां देवानाम् उपस्थितिः आवश्यकी वर्तते ।
राज्यस्य जनाः अपि प्रसन्नाः आसन् । नामकरणोत्सवे बालकस्य नामकरणं भवति । नामकरणदिवसे शिवादेवी श्यामकान्तियुतं शिशुं नीत्वा आयोजितं स्थलं प्राप्तवती । अतः राजा नामकरणाय देवतानां, जनानां च परामर्शं पृष्टवान् । अन्ते राज्ञा स्वस्य विचारः कथितः यत् – “यदा शिवादेवी गर्भवती आसीत्, तदा अस्माकं राज्यम् अनिष्टयुक्तम् आसीत् । अपरं च शिवादेवी गर्भकाले स्वप्ने एकम् अरिष्टरत्नमयं चक्रम् अपि दृष्टवती आसीत् । अतः अस्य बालकस्य नाम अरिष्टनेमी इति करणीयम् । सर्वैः जनैः, देवैः च समर्थनं प्रदत्तम् । ततः आरभ्य एव अरिष्टनेमिनाथः नेमिनाथः इति वा नाम प्रसिद्धम् अस्ति ।
अरिष्टनेमिनाथस्य पिता समुद्रविजयः हरिवंशीयः प्रतापी राजा आसीत् । विचित्रसंयोगेन हरिवंशस्योत्पत्तिः जाता ।
शीतलनाथः दशमः तीर्थङ्करः आसीत् । तस्य शासनकाले वत्सदेशस्य राजधानी कौशाम्बी-नगरी आसीत् । तस्यां नगर्यां सुमुह-नामकः कश्चन राजा आसीत् । कौशाम्बी-नगर्यां वीरक-नामकः कश्चन जनः आसीत् । सुमुहः राजा वीरकस्य पत्न्याः वनमालायाः आकृष्टः जातः । सुमुहः वनमालां बलात् राजप्रासादे आनीतवान् । समयान्तरे वनमाला सुमुहस्य परमप्रिया राज्ञी अभवत् । वीरकः पत्न्याः विरहेण अर्धविक्षिप्तावस्थायां जीवितः आसीत् । किञ्चित् समयान्तरे सः बालतपस्वी अभवत् ।
एकदा राजा सुमुहः वनमालया सह विहारार्थं वनं गतः । तत्र सः वीरकं दृष्टवान् । वीरकस्य स्थितिं दृष्ट्वा राजा सुमुहः मनसि पश्चात्तापं कुर्वन् आसीत् यत् – “मया अनुचितं कार्यं कृतम् आसीत् । मे दोषात् एव वीरकस्य एतादृशी स्थितिः जाता” । वनमाला अपि पश्चात्तापं कुर्वती आसीत् । अनेन कारणेन द्वयोः मनुष्यस्य आयुर्बन्धः अभवत् । तस्मिन् एव क्षणे तयोः उपरि विद्यत् आपतितः । तेन तयोः प्राणाः निर्गताः । तौ यौगलिकभूमौ हरिवासे युगलस्वरूपेण अजायताम् ।
वीरकेन आजीवनम् अज्ञानतपः कृतम् । अन्ते सः प्रथमे सौधर्मदेवलोके किल्विषी-नामकः देवः अभवत् । सः कालज्ञानी आसीत् । वीरकः राज्ञा सुमुहेन सह वनमालां भोगभूमौ अपश्यत् । तौ दृष्ट्वा वीरकः अत्यन्तः क्रुद्धः जातः ।
सः व्यचारयत् – अधुना एव सुमुहस्य हननं करोमि । किन्तु अस्य हननेन प्रयोजनस्य सिद्धिर्न भविष्यति । यत्र कर्मबन्धः भवेत् तत्रैव मया अयं सुमुहः प्रेषणीयः । अतः सः कस्यचित् राज्यस्य राजा भवितव्यः । यदि सः मांसमदिरयोः भोगं करिष्यति चेत् तस्य नरकगमनं भविष्यति । नरके तस्मै दुःखस्य प्राप्तिर्भविष्यति ।
चम्पा-नगर्याः राज्ञः तस्मिन् समये अवसानम् अभवत् । अतः तस्याः नगर्याः राजा कोऽपि नासीत् । यतः सः नरेशः सन्तानहीनः आसीत् । अतः देवेन चम्पानगर्याम् आकाशवाणी कृता यत् – "भवतां राजाविषयिकी या समस्या वर्तते, तस्याः समस्यायाः उपायः अहं ददामि । अहम् एकं युग्मं प्रेषयामि । तत् युग्मं भवतः राज्यस्य सञ्चालनं करिष्यति । भवद्भिः तस्मै युग्माय मद्यमांसाः, भोगसामग्र्यः च दात्तव्याः । अनन्तरं भवतां राज्यस्य समृद्धिः वर्धिष्यते” ।
देवेन द्वयोः औन्नत्यं न्यूनीकृतम् । तयोः आयुष्यम् अपि न्यूनं कृतम् । नगरजनैः तयोः राज्याभिषेकः कृतः । अनन्तरं तौ भोगासक्तौ अभवताम् । तेन तौ नरकं गतवन्तौ ।
इयमेका आश्चर्यमयी घटना आसीत् । यतः यौगलिकानां नरकगमनं न भवति स्म । अतः तयोः हरिवासयुग्मयोः एव हरिवंशस्य उत्पत्तिर्जाता । सः शीतलनाथश्रेयांसनाथयोः मध्यकालीनः समयः आसीत् । हरिवंशे बहवः प्रतापिनः, शक्तिशालिनः, धर्मात्मानः च राजानः अभवन् । तेषु राजसु पृथ्वीपतिः, महागिरिः, हिमगिरिः, वसुगिरिः, दक्षः, महेन्द्रदत्तः, शङ्खः, वसुश्चेत्यादयः राजानः आसन् ।
वसुः नामकः राजा आकाशे उच्चसिंहासने उपविशति इति शास्त्रेषु वर्णनं प्राप्यते । सः वसुः हरिवंशीयः एव आसीत् । ततः परं दीर्घबाहुः, वज्रबाहुः, सुभानुः च अभवत् । सुभानोः पुत्रः यदुः हरिवंशस्य पराक्रमी प्रभावशाली च राजा अभवत् । यदोः वंशे सौरीवीरनामानौ शक्तिशालिनौ राजानौ अभवताम् । राज्ञा सौरिणा सौरिपुरं, राज्ञा वीरेण सौवीर-नगरं च स्थापितम् ।
हरिवंशे यः सौरी-नामकः राजा आसीत्, तस्य अन्धकवृष्णिः, भोगवृष्णिः इत्येतौ द्वौ पुत्रौ अभवताम् । अन्धकवृष्णेः दशपुत्राः आसन् । ते – समुद्रविजयः, अक्षोभः, स्तिमितः, सागरः, हिमवान्, अचलः, धरणः, पूरणः, अभिचन्दः, वसुदेवः च । ते पुत्राः दशार्हः इति नाम्ना ख्याताः आसन् । तेष् पुत्रेषु समुद्रविजयः ज्येष्ठः, वसुदेवः कनिष्ठश्च आसन् ।
समुद्रविजयः अत्यन्तः न्यायशीलः, प्रजावत्सलः, उदारश्च आसीत् । वसुदेवः स्वस्य पराक्रमेण सर्वत्र कीर्तिः स्थापिता । समुद्रविजयस्य चत्वारः पुत्राः आसन् । ते – अरिष्टनेमी, रथनेमी, सत्यनेमी, दृढनेमी च । शिवादेवी तेषां माता आसीत् ।
वसुदेवस्य द्वौ पुत्रौ आस्ताम् । तौ - कृष्णः, बलरामश्च । तयोः मातारौ देवकी रोहिणी च । कृष्णः अरिष्टनेमिनाथस्य पितृव्यस्य पुत्रः आसीत् ।
यदा अरिष्टनेमी प्रायः चत्वारः वर्षदेशीयः आसीत् । तदा कृष्णेन कंसस्य हननं कृतम् आसीत् । कंसस्य पत्नी जीवयशा कृष्णात् खिन्ना अभवत् । अतः तया सम्पूर्णः वृत्तान्तः स्वस्य पित्रे प्रतिवासुदेवाय जरासन्धाय श्रावितः । जरासन्धेन यदुवंशस्य समूलं नाशं कर्तुं निश्चयः कृतः आसीत् । यतः जीवयशया प्रतिज्ञा कृता आसीत् यत् – “यदा अहं कृष्णबलरामाभ्यां सहित समग्रयदुवंशस्य विनाशं द्रक्ष्यामि तदैव शान्तिम् अनुभविष्यामि । अन्यथा अग्निं प्रवेक्ष्यामि” इति ।
कालकुमारः जरासन्धस्य पुत्रः, सेनापतिः च आसीत् । जरासन्धः युद्धाय कालकुमारं सेनया सह प्रेषितवान् । कुलदेव्याः कृपया सर्वे यादवाः समुद्रतटं प्राप्तवन्तः । तत्र देवसाहाय्येन जनाः समुद्रतटे सर्वसौकर्ययुतायाः द्वारिका-नगर्याः निर्माणम् अकुर्वन् । तस्यां नगर्यां सर्वे यादवाः सुखेन जीवन्ति स्म । कुलदेव्याः मायया कालकुमारः हतः ।
द्वारिका-नगर्यां कृष्णबलरामौ अपि निवसन्तौ आस्ताम् । तत्रैव ताभ्यां राज्यं विस्तारितम् । यादवानां समृद्धिविषयिकी, ऐश्वर्यविषयिकी च चर्चा विस्तृता जाता । यदा जरासन्धः इमं सन्देशं प्राप्तवान्, तदा सः क्रुद्धः जातः । जरासन्धेन पुत्रस्य कालकुमारस्य मृत्योः वैरोद्धाराय, पुत्र्याः जीवयशायाः प्रतिज्ञायै च स्वयं युद्धं कर्तुं निर्णयः कृतः ।
सर्वा सेना युद्धस्थलं प्राप्तवती । बहवः राजानः युद्धस्थलं प्राप्य समुद्रविजयम् अवबोधितवन्तः यत् – “अस्माकमुपरि वसुदेवस्य बहवः उपकाराः सन्ति । अतः अस्माभिः अपि वसुदेवस्य साहाय्यं कर्त्तव्यम् । जरासन्धस्य, यादवानां च मध्ये भयङ्कर्ं युद्धम् आरब्धम् । तस्मिन् युद्धे बहवः योद्धारः हताः । यादवैः जरासन्धस्य बहवः पुत्राः हताः । अतः जरासन्धः अपि यादवान् हन्तुं शराणां वर्षां कुर्वन् आसीत् । तेन यादवसेना बलहीना जाता ।
अरिष्टनेमी अपि युद्धे समुपस्थितः आसीत् । इन्द्रेण अरिष्टनेमिने युद्धं कर्तुम् एकः सुसज्जः रथः मातलि-नामकेन सारथिना सह प्रेषितः । अवसरं प्राप्य नेमिकुमारः युद्धस्य दायित्वम् अवहत् । नेमिकुमारः पुरन्दरशङ्खं ननाद । शङ्खनादेन शत्रवः कम्पमानाः जाताः । यादवेषु उत्साहवर्धनम् अभवत् । अन्ते श्रीकृष्णेन सुदर्शनचक्रेण हतः जरासन्धः । सः ऐतिहासिकः विजयः आसीत् । तावदेव कृष्णः नवमः वासुदेवः, बलरामः च नवमः बलदेवः अभवत् ।
एकदा नेमिकुमारः विचरन् कृष्णस्य शस्त्रागारं प्राप्तवान् । शस्त्रागारे नेमिकुमारेण पाञ्चजन्यः शङ्खः दृष्टः । नेमिकुमारः तच्छङ्खं ननाद । पाञ्चजन्यशङ्खस्य नादं श्रुत्वा बहवः जनाः मूर्च्छिताः अभवन् । कृष्णबलभद्रौ शस्त्रागारं प्रति धावितवन्तौ । तौ विचारितवन्तौ यत् – “अपरः कः वासुदेवः जातः, यः पाञ्चजन्यशङ्खम् अवादयत्" । यतः वासुदेवं विहाय कोऽपि पाञ्चजन्यशङ्खं वादयितुम् असमर्थः । यदा तौ शस्त्रागारं प्राप्तवन्तौ, तदा शस्त्रसंरक्षकेन ज्ञातं यत् – “नेमिकुमारः तच्छङ्खं ननाद" ।
कृष्णेन विचारितं यत् – “अस्य शङ्खस्य वादनम् अपि अद्भुतः पराक्रमः अस्ति । यतः केवलं वासुदेवः एव इमं शङ्खं वादयितुं शक्नोति । अग्रजः बलरामः अपि असमर्थः अस्ति” इति । कृष्णः चिन्ताग्रस्तः आसीत् यत् – “आवयोः को बलवान्? अहं वा अरिष्टनेमी” ? इति ।
अनया चिन्तया कृष्णेन कतिद्दिवसानन्तरं स्वस्य नेमिनः च बाहुबलस्पर्धा आयोजिता । मल्लशालायां सर्वे मिलितवन्तः । तत्र स्पर्धा आरब्धा । बाहुबलस्पर्धायां नेमिकुमारेण कृष्णः पराजितः । कृष्णेन द्वाभ्यां हस्ताभ्यां प्रयासः कृतः । तथापि कृष्णः किमपि कर्तुम् असमर्थः आसीत् । स्वल्पे समये एव नेमिकुमारः विजयं प्राप्तवान् । सर्वे जनाः अपि चकिताः अभवन् ।
सर्वत्र नेमिकुमारस्य बलस्य प्रशंसा जाता । अन्ते कृष्णः नेमिकुमारम् आलिङ्ग्य उक्तवान् यत् – “एतादृशः बलवान् मे अनुजः । इदानीम् कस्मात् अपि भयम् एव नास्ति । कोऽपि राजा अस्माकं राज्यं जेतुं न शक्ष्यति । अहं मे भ्रातरि गर्वम् अनुभवामि । अनेन ज्ञायते यत् – “नेमिकुमारस्य बलस्य काऽपि सीमा नासीत् । तस्य बलम् असीमितम् आसीत् ।
एकदा कृष्णस्य मनसि नेमिकुमारस्य विवाहस्य विचारः आगतः । “नेमिकुमारः निर्विकारः अस्ति । सः भोगमार्गे आकृष्टः भवेत् इति आवश्यकता अस्ति” इति विचिन्त्य कृष्णेन रुक्मिण्यै, सत्यभामायै च अस्य कार्यस्य दायित्वं प्रदत्तम् ।
रुक्मिणी, सत्यभामा च अस्मिन् कार्ये संलग्ना जाता । एकदा ताभ्यां नेमिकुमारः उक्तः यत् – “आवां त्वया सह जलक्रीडां कर्तुम् इच्छावः । नेमिकुमारः भ्रातृजाययोः आग्रहं निराकर्तुम् अक्षमः आसीत् । अतः सः तयोः सह सरोवरे बहुसमयं यावत् जलक्रीडां कुर्वन् आसीत् । तस्मिन्नैव समये रुक्मिणी, सत्यभामा च विवाहाय आग्रहं कृतवती यत् – “भवता विवाहः करणीयः । यादववंशीयः अस्ति तथापि अविवाहितः भवान् । एतन्नोचितम् । सर्वे यदुवंशीयाः लज्जाम् अनुभवन्ति । किं भवान् इमं प्रस्तावं स्वीकरोति खलु" ?
नेमिकुमारेण अवधिज्ञानेन भविष्यत्कालं ज्ञातं यत् – “विवाहस्य सज्जता एव मे दीक्षायाः निमित्तं भविष्यति” इति । अतः नेमिकुमारेण स्मितेन सह भ्रातृजाययोः आग्रहः स्वीकृतः । नेमिकुमारस्य स्वीकृतिं प्राप्य सर्वे विवाहस्य सज्जतां कुर्वन्तः आसन् । सर्वे प्रसन्नाः अभवन् ।
सर्वे राजकन्यानां विषये विचारं कुर्वन्तः आसन् । तदैव सत्यभामा उक्तवती यत् - “मम अनुजा नेमिकुमाराय योग्या वर्तते” । श्रीकृष्णः अपि सत्यभामायाः विचारं स्वीकृतवान् । तत्कालमेव कृष्णेन उग्रसेनेन साकं तत्पुत्र्याः विषये चर्चा कृता । तदा उग्रसेनेन उक्तं यत् – “इदं मम महत्सौभाग्यम् अस्ति । मम एका पुत्री पूर्वतः एव यदुवंशे निवसति । इदानीम् अपरा कन्या नेमिकुमारस्य पत्नी भविष्यति । अतः अहम् इमं प्रस्तावं स्वीकरोमि । किन्तु मम एका इच्छा अस्ति यत् – “भवद्भिः मम राज्यम् आगत्य एव विवाहं कृत्वा कन्या नेतव्या भविष्यति” ।
श्रीकृष्णेन उग्रसेनस्य प्रस्तावः स्वीकृतः । कृष्णः त्वरितमेव विवाहस्य व्यवस्थां कुर्वन् तत्परः अभवत् । कृष्णः चातुर्मासस्य श्रावण-मासस्य शुक्लपक्षस्य षष्ठीं तिथिं विवाहाय निश्चितवान् । तस्यां तिथौ सर्वैः बान्धवैः सह नेमिकुमारः सुसज्जितरथे उपविश्य विवाहाय गतवान् आसीत् ।
यदा ते उग्रसेनस्य राज्यं प्राप्तवन्तः, तदा नेमिकुमारेण मार्गे एकस्मिन् स्थले भयग्रस्ताः बहवः पशवः दृष्टाः । नेमिकुमारेण सारथिः पृष्टः यत् – “किमर्थम् एतावन्तः पशवः सन्ति” ? तदा सारथिना उक्तं यत् – “एते सर्वे पशवः भवतः विवाहप्रसङ्गाय आनीताः सन्ति । भोजनप्रसङ्गे एतेषां पशूनां मांसस्य परिवेषणं भविष्यति ।
तच्छ्रुत्वा नेमिकुमारस्य हृदयः परिवर्तनम् अभवत् । तेन नेमिकुमारेण तस्मिन्नैव समये विवाहं निरस्य सारथिने प्रतिगमनस्य आदेशः प्रदत्तः । कृष्णबलरामाभ्यां नेमिकुमारः आशंसितः यत् – “इत्थं मा कुरु” । किन्तु नेमिकुमारेण दृढतापूर्वकं तयोः विचाराः अस्वीकृताः । यतः तस्य मनसि वैराग्यस्य भावना उद्भूत । अतः सः विरक्तः जातः । सः पुनः द्वारका-नगरीं प्राप्तवान् आसीत् । सर्वे बान्धवाः अपि पुनः द्वारकानगरीं प्राप्तवन्तः । सः संसारसागरात् मुक्तिं प्राप्तुम् इच्छति स्म । अतः नेमिकुमारेण अविवाहितः भूत्वा एव दीक्षां स्वीकर्तुं निर्णयः कृतः आसीत् ।
ततः परं नेमिकुमारः वार्षिकीदानं कर्तुं सज्जः अभवत् । स्वर्गलोकात् लोकान्तिकदेवाः, चतुष्षष्टिः इन्द्राः च तत्र समागताः । ततः परं भगवता नेमिनाथेन वार्षिकीदानं कृतम् । एकवर्षं यावत् तेन वार्षिकीदानं कृतमासीत् । वार्षिकीदाने सुवर्णमुद्रिकाः दीयन्ते स्म । नगरजनाः वा अन्ये केचन अपि दानं स्वीकर्तुं शक्नुवन्ति स्म । दूरनगरात् अपि बहवः जनाः आगत्य दानं स्वीकुर्वन्ति स्म ।
राज्ञः दीक्षाप्रसङ्गेन जनाः विरक्ताः अभवन् । जनाः अपि दीक्षामङ्गीकर्तुं विचारितवन्तः । यतः राज्ञः स्वभावः शान्तः, प्रभावी च आसीत् । यदा वार्षिकीदानं पूर्णमभवत्, तदा श्रावण-मासस्य शुक्लपक्षस्य षष्ठ्यां तिथौ चित्रा-नक्षत्रे भगवान् नेमिनाथः सहस्रजनैः सह सौरिपुर-नगरस्य सहस्राम्रोद्यानं प्राप्तवान् ।
उद्याने देवाः, इन्द्राः चापि समुपस्थिताः आसन् । सर्वेषां समक्षं भगवता नेमिनाथेन दीक्षा अङ्गीकृता । दीक्षायाः दिवसे भगवान् अठ्ठमतपः कृतवान् । अपरे दिने भगवता नेमिनाथेन वरदत्त-नामकस्य ब्राह्मणस्य गृहे परमान्नं क्षीराहारः वा गृहीतः ।
दीक्षानन्तरं चतुर्पञ्चाशद्रात्रीः यावत् भगवान् नेमिनाथः रहसि आसीत् । भगवता नेमिनाथेन चतुर्पञ्चाशद्रात्रीः यावत् विविधाः तपस्याः, साधनाः च कृताः । सः पुनः सौरिपुरस्य सहस्राम्रोद्यानं प्राप्तवान् ।
सौरिपुरे आश्विन-मासस्य कृष्णपक्षस्य अमावास्यायां तिथौ चित्रा-नक्षत्रे तस्मै कैवल्यज्ञानम् अभवत् । तस्मिन् दिवसे लोकान्तिकदेवाः, चतुष्षष्टिः इन्द्राः, नगरजनाः च समुपस्थिताः आसन् । सर्वैः मिलित्वा कैवल्यमहोत्सवस्य आयोजनं कृतम् । देवाः, इन्द्राः, नगरजनाः च कैवल्यमहोत्सवम् आचरितवन्तः ।
ततः परं भगवता नेमिनाथेन प्रथमं प्रवचनं कृतम् । तस्मिन् प्रवचने बहवः श्रोतारः आसन् । भगवतः प्रवचनं श्रुत्वा बहवः जनाः विरक्ताः अभवन् । जनाः दीक्षां स्वीकर्तुन् ऐच्छन् । भगवतः नेमिनाथस्य प्रवचनस्य प्रभावः तादृशः आसीत्, येन जनाः मुग्धाः, लीनाः च अभवन् । बहवः जनाः धर्मस्य उपासनायाः नियमान् अङ्गीकृतवन्तः ।
यदा भगवान् नेमिनाथः चतुर्विधसङ्घस्य स्थापनां चकार, तदा नेमिनाथेन धार्मिकपरिवारस्य अपि रचना कृता।
अयं भगवतः धार्मिकः परिवारः वर्तते । तेषु परिवारजनेषु त्रिचत्वारिंशत् गणधरेषु “वरदत्तस्वामी” इत्याख्यः प्रथमः गणधरः आसीत् ।
राजीमती राज्ञः उग्रसेनस्य पुत्री, सत्यभामायाः अनुजा च आसीत् । राजीमती रूपवती, बुद्धिमती, लावण्यमयी, सुशीला, सर्वगुणयुता च आसीत् । अरिष्टनेमिना सह विवाहेन सा अतीव प्रसन्ना आसीत् । यदा अरिष्टनेमिना अन्तिमसमये विवाहः निराकृतः, तदा राजीमत्याः हृदये दुःखम् अभवत् । अशुभवार्त्तां श्रुत्वा राजीमती मूर्च्छिता जाता । यदा तया चैतन्यं प्राप्तं तदा अरिष्टनेमिनः अनुकरणं कर्तुं निर्णयः कृतः ।
अरिष्टनेमिनः अनुजः रथनेमी राजीमत्याः रूपलावण्यात् आकृष्टः अभवत् । सः राजीमत्या सह विवाहं कर्तुम् ऐच्छत् । अतः सः राजीमतीं मेलितुं वारं वारम् उग्रसेनस्य राजप्रासादं गच्छति स्म । एकस्मिन् दिवसे अवसरं प्राप्य रथनेमिना राजीमत्या सह विवाहस्य प्रस्तावः प्रस्थापितः । तदा राजीमत्या ज्ञातं यत् – “रथनेमी विवाहं कर्तुं मया मेलितुम् आगच्छति स्म" ।
राजीमत्या रथनेमिनः प्रस्तावः अस्वीकृतः । तथापि रथनेमी बहून् प्रयासान् कृतवान् । तेन त्रस्ता राजीमती एकां युक्तिं विचारितवती । राजीमती क्षीरं भुक्त्वा रथनेमिने एकं पात्रम् आनेतुम् उक्तवती । यदा रथनेमी पात्रम् आनीतवान्, तदा राजीमत्या तस्मिन् पात्रे वमनं कृतम् । अनन्तरं तद्वमनं तया रथनेमिने भोक्तुम् उक्तम् । रथनेमी क्रुद्धः जातः । रथनेमिना उक्तं यत् – “किमर्थं भवती विडम्बयति ? किं भवती न जानाति यत् – “वमितपदार्थः अभक्ष्यः” इति । किम् अहं श्वा दृश्ये” ?
तदा राजीमती उक्तवती यत् – “यदि भवान् जानाति यत् – “वमितपदार्थः अभक्ष्यः” वर्तते, तर्हि किमर्थं भवतः मनसि मया सह विवाहस्य इच्छा वर्तते । अहं भवतः ज्येष्ठस्य अरिष्टनेमिनः वमिता त्यक्ता वा अस्मि” । अतः पुनः अस्य विषयस्य चर्चा मास्तु” । रथनेमी किमपि वक्तुम् असर्मथः आसीत् अतः लज्जाम् अन्वभवत् । सः पुनः स्वराज्यं प्राप्तवान् । किञ्चित्समयान्तरे रथनेमी विरक्तः जातः । अनन्तरं तेन दीक्षा अङ्गीकृता । समयान्तरे राजीमत्या अपि शताधिकाभिः स्त्रीभिः सह दीक्षा अङ्गीकृता । दीक्षानन्तरं सा साधनां कर्तुं तत्परा अभवन् । श्रीकृष्णेन अपि राजीमत्यै आशीर्वादाः प्रदत्ताः ।
राजीमती अरिष्टनेमिनः दर्शनार्थम् अनेकाभिः साध्वीभिः सह रेवतगिरिपर्वताय प्रस्थितवती । यात्रायां प्राकृतिकिभिः आपद्भिः अवरोधः जातः । वातप्रकोपेण, वृष्टिप्रकोपेण च सर्वाः साध्व्यः विभक्ताः जाताः । वृष्ट्या राजीमत्याः वस्त्राणि आर्द्राणि जातानि आसन् । समीपे एकां गुहाम् अलभत । तत्र अन्धकारः आसीत्, अतः तया सर्वाणि वस्त्राणि शुष्कीकर्तुं निष्कासितानि ।
गुहायाम् अरिष्टनेमी उपविष्टः आसीत् । अशन्याः स्फुरणेन अनावृत्तां राजीमतीं दृष्ट्वा अरिष्टनेमिनः मनसि आसक्ति उद्भूता । सः राजीमत्यै सम्भोगाय उक्तवान् । किन्तु राजीमत्या पुनः वस्त्राणि धृत्वा अरिष्टनेमी अवबोधितः । अरिष्टनेमी पुनः विरक्तिम् अलभत । अनन्तरम् अरिष्टनेमिना प्रायश्चित्तं कृत्वा सिद्धत्वं प्राप्तम् । राजीमत्या अपि साधना आरब्धा । अन्ते सा मुक्तिं प्रापत् ।
भगवता नेमिनाथेन सर्वज्ञकाले बहूनां जनपदां यात्रा कृता । किन्तु तेन तेषु जनपदेषु द्वारिका-नगर्याः सर्वाधिकं भ्रमणं कृतम् आसीत् । एकदा नेमिनाथः द्वारिका-नगरीम् आगतः । तदा कृष्णस्य पारिवारिकजनाः, नागरिकाः च रेवतगिरिपर्वतं भगवतः नेमिनाथस्य प्रवचनं श्रोतुं गतवन्तः ।
प्रवचनं श्रुत्वा कृष्णेन पृष्टं यत् – “सर्वेषां वस्तूनां विनाशः निश्चितः एव । अतः द्वारिका-नगर्याः नाशः कदा भविष्यति” ? नेमिनाथेन उक्तं यत् – “द्वादशवर्षाणाम् अनन्तरं दीपायनर्षेः क्रोधेन द्वारिका-नगर्याः दहनं भविष्यति” । द्वारिकादहनस्य वार्तां श्रुत्वा जनाः चिन्ताग्रस्ताः जाताः । कृष्णेन पुनः पृष्टं यत् – “द्वारिकादहनस्य प्रयोजनं किं भविष्यति” ? भगवता उक्तं यत् – “मद्यपानेन उन्मत्ताः यादवकुमाराः दीपायनर्षिं त्रस्यन्ति । तेन खिन्नः ऋषिः द्वारिकादहनस्य निदानं करिष्यति । तस्य मृत्योः अनन्तरं देवः भविष्यति । पश्चात् सः द्वारिका-नगर्याः दहनं करिष्यति ।
अनन्तरं कृष्णेन पुनः एकः प्रश्नः पृष्टः यत् – “मम मृत्युः कदा भविष्यति” इति ? नेमिनाथः उक्तवान् यत् – “जराकुमारस्य बाणेन भवतः मृत्युः भविष्यति” । कृष्णनेमिनाथयोः सम्भाषणं श्रुत्वा जनाः स्तब्धाः अभवन् । बहवः जनाः विरक्ताः अभवन् । तैः सर्वैः दीक्षा अङ्गीकृता । दीपायनर्षिः, जराकुमारः च द्वारिकां त्यक्त्वा वनं गतवन्तौ ।
द्वारिका-नगर्यां सर्वत्र इयं चर्चा एव जायमाना आसीत् । अतः सर्वैः निर्णितं यत् – “द्वारिकादहनस्य कारणं यदि मदिरा एव अस्ति, तर्हि मदिरायाम् एव प्रतिबन्धनं कर्तव्यम्” इति । निर्णयं कृत्वा जनाः मदिरायाः प्रतिबन्धाय प्रयासान् कुर्वन्तः आसन् । द्वारिका-नगर्यां यावत् मद्यसङ्ग्रहः आसीत्, तत्सर्वः सङ्ग्रहः सुदूरेषु वनेषु क्षेपितः । द्वारिका-नगर्यां मदिरायाः निर्माणम् अपि अवरुद्धम् । इतः परं द्वारिका-नगर्यां मदिरायाः आनयनम् अपि प्रतिषिद्धम् आसीत् ।
कृष्णेन द्वारिका-नगर्याम् उद्घोषितं यत् – “यदि कोऽपि जनः दीक्षां स्वीकर्तुम् इच्छति, तर्हि शीघ्रं कुरु” । यस्य कस्यापि गृहविषयिकी काऽपि समस्या स्यात्, चेत् मां कथयतु । अहं सर्वेषां समस्याः निवारयिष्यामि । कस्यचित् पितरौ वृद्धौ स्याताम् चेत् अहं तेषां सेवां करिष्यामि । यदि कस्यचित् लघुबालकाः स्युः, तर्हि तेषां पालनम् अपि अहं करिष्यामि । अतः ये दीक्षां स्वीकर्तुम् इच्छन्ति तैः सर्वैः चिन्तया विना दीक्षा स्वीकर्त्तव्या । इदानीमहं गृहस्थोऽस्मि । सर्वेषां जनानां व्यावहारिकं दायित्त्वं वक्ष्यामि” ।
कृष्णस्य उद्घोषणां श्रुत्वा बहवः जनाः साधुपदं स्वीकृतवन्तः । किन्तु विधेः विधानं कोऽपि परिवर्तयितुं न शक्नोति । मदिरायाः सङ्ग्रहाः नाशिताः । वर्षर्तौ वर्षा जाता । तया वर्षया समीपस्थाः तडागाः सरोवराः आपूरिताः जाताः । शाम्बादयः यादवकुमाराः भ्रमणार्थं वनं गतवन्तः । ते तृषिताः आसन् । अतः तैः तडागस्य जलपानं कृतम् । तस्य तडागस्य जले मदिरायाः मिश्रणम् आसीत् । अतः मदिरया यावदकुमाराः उन्मत्ताः अभवन् । वने दीपायनर्षिः तपस्यां कुर्वन् आसीत् । उन्मत्तैः यादवकुमारैः दीपायनर्षिः त्रस्तो जातः । दीपायनर्षिः किञ्चित्समयं यावत् शान्तः आसीत् । किन्तु यातनाभिः त्रस्तः दीपायनर्षिः क्रुद्धः जातः । क्रोधे सति तेन उक्तं यत् – “निश्चितसमयावसरे अहं द्वारिका-नगरीं दाहयिष्यामि ।
मुनेः वचनं श्रुत्वा यादवकुमाराः स्तब्धाः अभवन् । सर्वे पश्चात्तापं कुर्वन्तः आसन् । कृष्णेन यादवकुमाराणाम् उद्दण्डता ज्ञाता । कृष्णबलरामाभ्यां दीपायनर्षेः प्रार्थना कृता । कृष्णबलरामयोः अत्यन्तविनयेन अपि दीपायनर्षेः क्रोधः शान्तः न जातः । एतावत् विनयेन मुनिः केवलं कृष्णबलरामाभ्याम् एव वैरोद्धारात् मुक्तिम् अददात् ।
नेमिनाथः पुनः द्वारिका-नगरीमागतः । खिन्नं कृष्णं दृष्ट्वा नेमिनाथः पृष्टवान् यत् – “कृष्ण ! का समस्या अस्ति” ? तदा कृष्णः उक्तवान् यत् – “बहवः जनाः साधुत्वं स्वीकुर्वन्तः सन्ति । मया अपि किं करणीयम् ? भगवता उक्तं यत् – “भवान् चिन्तां मा कुरु । अग्रिमायाम् उत्सर्पिण्यां भवान् ‘अमम’-नामकः द्वादशः तीर्थङ्करः भविष्यति” । सर्वे जनाः प्रसन्नाः अभवन् ।
नेमिनाथः विचरणं कृत्वा अन्यत्र गतवान् । जनाः धर्मोपासनायां लीनाः अभवन् । दीपायनर्षिः स्वस्य आयुष्यं पूर्णीकृत्य अग्निकुमार-नाम्ना देवस्वरूपेण देवलोके उद्भूतः । तेन अवधिज्ञानेन पूर्वजन्मनः वैरोद्धारः ज्ञातः । पुनः तस्य मनसि वैरोद्धारस्य भावना जागृता । तस्मिन् समये एव अग्निकुमारः द्वारिकां दग्धुं भूलोकम् आगतः । किन्तु प्रतिगृहम् उपासनां दृष्ट्वा सः द्वारिकां दग्धुम् असमर्थः । बहुवर्षाणि यावत् सः अवसरस्य प्रतीक्षां कुर्वन् आसीत् ।
एकादशवर्षाणि व्यतीतानि । अतः जनाः विचारितवन्तः यत् – “सङ्कटसमयः गतः” । इदानीं तपस्यायाः आवश्यकता नास्ति । सर्वैः जनैः तत्कालमेव तपस्या त्यक्ता । दीपायनर्षिः अवसरं प्राप्य अग्निवर्षां चकार । अग्निवर्षया द्वारिकानगरी भस्मीभूता । कृष्णबलरामाभ्यां सर्वान् रक्षितुं प्रयासाः कृताः । किन्तु तौ किमपि कर्तुम् असमर्थौ आस्ताम् । कृष्णस्य पिता वसुदेवः, माता रोहिणी, देवकी इत्येताः अपि दिवङ्गताः । अनेन प्रकारेण नेमिनाथतीर्थङ्करस्य भविष्यवाणी पूर्णा जाता ।
तीर्थङ्कराः त्रिकालज्ञानिनः भवन्ति । अतः पूर्वमेव तेभ्यः निर्वाणसमयस्य ज्ञानं भवति । यदा भगवता नेमिनाथः अपि स्वस्य निर्वाणकालं ज्ञातवान्, तदा सः षड्त्रिंशताधिकपञ्चशतेन साधुभिः सह सम्मेदशिखरं प्राप्तवान् । तत्र नेमिनाथेन एकमासं यावत् अनशनं कृतम् । सः एकमासं यावत् पुनः तपस्यां, साधनां च कृतवान् । अनन्तरं तेन सिद्धत्वं प्राप्तम् आसीत् ।
एकमासस्य अनशनान्ते आषाढ-मासस्य शुक्लपक्षस्य अष्टम्यां तिथौ चित्रा-नक्षत्रे रेवतगिरिनामके पर्वते भगवतः नेमिनाथस्य निर्वाणम् अभवत् । भगवता सह बहुभिः मुनिभिः अपि मोक्षः प्राप्तः आसीत् ।
नेमिनाथेन कौमारावस्थायां त्रिशतस्य वर्षाणां, दीक्षायां सप्तशतस्य वर्षाणां च आयुः भुक्तम् । अनेन प्रकारेण तेन सम्पूर्णजीवने एकसहस्रं वर्षाणि भुक्तानि आसन् ।
भगवतः अरिष्टनेमिनः शासनकाले ब्रह्मदत्त-नामकः अन्तिमः चक्रवर्ती राजा अभवत् । सः कम्पिलपुर-नगरस्य राज्ञः ब्रह्मपितुः पुत्रः आसीत् । तस्य मातुः नाम ’चूलनी’ इति आसीत् । ब्रह्मदत्तस्य बाल्यकाले बहवः समस्याः समुद्भूताः आसन् । तथापि अन्ते सः षड्खण्डानां चक्रवर्ती राजा अभवत् ।
नमिनाथस्य निर्वाणानन्तरं पञ्चलक्षवर्षानन्तरं नेमिनाथस्य मोक्षः अभवत् ।
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दण्डी कविः आलङ्कारिकश्च। दशकुमारचरितं, काव्यादर्शः, अवन्तिसुन्दरीकथा च अस्य प्रसिद्धाः ग्रन्थाः। आहत्य अस्य सप्त रचनाः सन्ति। एषः काञ्जीवासी आसीत्।
दण्डिनः स्थितिकालः सन्दिग्ध एव । अत्र समालोचकाः सुबन्धु-बाण-दण्डिनः, बाणदण्डिसुबन्धवः, सुबन्धु-दण्डि-बाणाश्चेति त्रिविधक्रमसमर्थका दृश्यन्ते । अधिकाः तु प्रथममेव पक्षमाश्रित्य प्रचलिताः दृश्यन्ते। एतावदेव ज्ञायते यत्स दाक्षिणात्यः । बाणभट्टः तं न स्मरतीति तस्य स्थितिकालस्य पूर्वसीमा, अभिनवगुप्तस्तं लोचने स्मरतीति तस्यापरसीमा।
अवन्तिसुन्दरीकथाऽनुसारेण दण्डी दामोदराऽऽख्यस्य प्रपौत्रः आसीत्। दामोदरस्य चतुर्षु सुतेषु कनिष्ठस्य वीरदत्तस्य सुत आसीद् दण्डी । तस्य माता गौरी । कथ्यते दामोदरः भारविरेव किंवा भारवेरन्तरङ्गसुहृदासीत् । सः विष्णुवर्धनाख्यस्य सिंहविष्णोः काञ्चीनरेशस्य सभापण्डित आसीत् । दामोदरस्य पुत्रो वीरेश्वरदत्तोऽपि सिंहविष्णुसुतस्य महेन्द्रवर्मणः सभापण्डित आसीत् । तथैव तत्सुतो दण्डी महेन्द्रवर्मणः सुतस्य नरसिंहवर्मणस्तत्सुतस्य राजवर्मणश्च सभाध्यक्ष आसीत् । नरसिंहवर्मणः स्थितिकालः 747-782 मितवैक्रमाब्दानभितः । एवमेव अवन्तिसुन्दरीकथायाम् -
भिन्नतीक्ष्णमुखेनाऽपि चित्रं बाणेन निर्व्यथः।
व्याहारेषु जहौ लीलां न मयूरः::::::::::।।
इति बाणो मयूरश्च कवी स्मृतौ दृश्येते । अनेन अवन्तिसुन्दरीकथायां वर्णितायाः कादम्बर्याः वर्णनस्य बाणवर्णितकादम्बरीवर्णनेन सह साजात्येनापि दण्डिनो बाणपरवर्तित्वं मन्यते। बाणः 715 मितवैक्रमाब्दे तनुं तत्याजेति मन्यते। तदनन्तरवर्तित्वेन दण्डिनः 730-800 मितवैक्रमाब्दकालः स्थितिकालत्वेन विद्वत्सु सम्मतिः।
दण्डिनः प्रासादिकगुणगुम्फितां सरलां भाषां विलोक्य केचित्तं बाणपूर्ववर्तिनमेव मन्यन्ते । तेषां मते सति तस्य बाणपरवर्तित्वे तस्य भाषयाऽपि बाणप्रवर्तितशैल्या प्रभावितया भाव्यं स्यान्न हि भाषयाऽपि तथा प्रतीयत इति। किन्तु नेदं युक्तियुक्तं प्रमाणं मन्यते यतो हि बाणपश्चाद्वर्तिनः सर्वे बाणमेवानुकुर्वन्तीति नैव राजाज्ञा कुत्रापि । कवेस्तु स्वकीयं वैशिष्ट्यं भवति । कमनीयपदावल्येव दण्डिनो वैशिष्टयम् । कल्पितेऽपि प्रमाणबाहुल्ये दण्डिनो यथार्थतः स्थितिकालस्तु 700-850 मितवैक्रमाब्दान्तरालः मन्यते। तेन 750 मितवैक्रमाब्दपश्चाद्वर्तिना तु न कदापि भाव्यं यतो हि 750 मितवैक्रमाब्दानभितः स्थितिमती विज्जका तं स्पष्टमेव स्मरति ।
नीलोत्पलदलश्यामां विज्जकां मामजानता।
वृथैव दण्डिना प्रोक्ता सर्वशुक्ला सरस्वती॥ इति ।
विज्जका द्वितीयपुलकेशिनः पुत्रस्य चन्द्रादित्यस्य पट्टराज्ञी विजयभट्टारिकैव नान्या।
दण्डी संस्कृतसाहित्ये मूर्तिमत् कविरेव। कथ्यते हि -
जाते जगति वाल्मीकौ कविरित्यभिधाऽभवत्।
कवी इति ततो व्यासे कवयस्त्वयि दण्डिनि।। इति ।
दण्डिनः कृतित्वेन सन्त्यनेके ग्रथाः प्रसिद्धाः । यथा -
1. दशकुमारचरितं - गद्यकाव्यं कथारूपम् ।
2. काव्यादर्शः - लक्षणग्रन्थः
3. अवन्तिसुन्दरीकथा - गद्यकाव्यम्
4. छन्दोविचितिः
5. कलापरिच्छेदः
6. द्विसन्धानकाव्यम्
7. वातमन्दिरम्
केचिदत्र मृच्छकटिकं गृह्णन्ति किन्तु वातमन्दिरमेव तत् । तेष्वपि त्रयो नितान्तं ख्याताः -दशकुमारचरितं, काव्यादर्शः, अवन्तिसुन्दरीकथा । कलापरिच्छेदः काव्यादर्शस्यैवाग्रिमो भागो न तु स्वतन्त्रग्रन्थः । एवमेव छन्दोविचितिरपि । यथोक्तं काव्यादर्शो -
'इत्थं कलाचतुःषष्ठिविरोधः साधु नीयताम्।
तस्याः कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति।।
'पद्यं चतुष्पदी तच्च वृत्तं जातिरिति द्विधा ।
छन्दोविचित्य सकलस्तत्प्रपञ्चो निदर्शितः ।।
दण्डिनो द्विसन्धानकाव्यमित्थं भोजराजेन शृङ्गारप्रकाशे स्मृतम् -
'द्वितीयस्य उदाहरणं यथा दण्डिनो धनञ्जयस्य द्विसन्धानप्रबन्धौ'
दशकुमारे यादृशी भौगोलिकी स्थितिवर्णिताऽस्ति तदनुसारेण तु दण्डी प्रभाकरवर्धनसमकालिको दृश्यते । तदनुसारेण तस्य बाणपूर्ववर्तित्वं सिध्यति अपि च गद्यकाव्यस्य प्रथमप्रयोक्तत्वञ्च । किन्तवेतन्न तथा प्रामाणिकं यतो हि कवयः श्रुतं वा कल्पितमप्यर्थं लीलया वर्णयन्ति यथा नैषधीयचरिते दमयन्तीस्वयंवरसभायां सप्तानामेव द्वीपानां राज्ञां विशेषतो जम्बूद्वीपस्य अवन्ति-गौड-मथुरा-काशी-अयोध्या-पाण्ड्य-महेन्द्र-काञ्ची-नेपाल-मलय-मिथिला-कामरूप-उत्कल-कीकटमहीपतीनामुपस्थितिवर्णनम् । अपरञ्च हर्षनिर्वाणानन्तरमपि भारतस्य दशा तथैव सञ्जाताऽऽसीद्या प्रभाकरवर्धनसमये आसीत् । काव्यादर्शे दण्डी कथयति यत् -
'इति साक्षात्कृते देवे राज्ञो यद्राजवर्मणः।
प्रीतिप्रकाशनं तच्च प्रेय इत्यवगम्यताम्॥' इति ।
राजवर्माणं स्वाश्रयदातृत्वेन स्मरति । ऐतिहासिकैः खलु राजवर्मा इति 747-782 मितवैक्रमाब्दान्तराले काञ्चीं शासत्पल्लवराजो नरसिंहूवर्मा गृह्यते । सति तथा, दण्डिनोऽपि तत्सभाकवित्वेन वा तत्समकालिकत्वेन 730-800 मितवैक्रमाब्दकालः स्थितिकालत्वेन मन्यते ।
दण्डी न केवलं विद्वान्, तस्य कल्पना उदात्ता बदुमुखी च । नास्य प्रबन्धः सुबन्धोरिव प्रत्यक्षरश्लेषमयो नापि च बाणस्येव रुचिरस्वरुवर्णपदानि । अस्य तु पदानि प्रसादमधुराणि ललितललितानि भावगभितानि च । समालोचकाः आमनन्ति यत्, स्पष्टता, भव्यभावसमभिव्यक्तिः कोमलकल्पनाकमनीयता, विचारवेशद्यञ्चास्य कृतिगतं वैशिष्ट्यम् । कविरसौ अनुप्रासमयपदविन्यासे एव रमते । तेनैवोक्तं भवेत् - 'दण्डिनः पदलालित्यम्' इति । अस्य पात्राणां सजीवता रोचिष्णुहास्यविलासः हृदयङ्गमा व्यङ्गभङ्गी च सर्वेषां कृते प्ररोचकाः । यथा हि -
'कुमारा माराभिरामा रामास्तपौरुषा रुषा भस्मीकृतारयो रयोपहसितसमीरणा रणाभियानेनाभ्युदयाशंसं राजानमकार्षः।'
निभाल्यतामस्य कवित्वकमनीयताऽत्र -
सुभग कुसुमसुकुमारं जगदनवद्यं विलोक्य ते रूपम्।
मम मानसमभिलषतित्वं वित्तं कुरु तथा मृदुलम्॥ इति ।
एवमेवास्य वर्णनकौशलस्योदाहरणं यथा -
'तत्र चकोरलोचनावचितपल्लवकुसुमनिकुरस्वं महीरुहसमूहं शरदिन्दमुख्या मन्मथसमाराधनस्थानञ्च नताङ्गीपदपङ्क्तिचिह्नितं शीतलसकततलञ्च सुदतीमुक्तमुक्तं माधवीलतामण्डपान्तरपल्लवतल्पं च विलोकयन् ललनातिलकविलोकनवेलाजनितशेषाणि स्मारं स्मारं मन्दमारुतकम्पितानि नवचतपल्लवानि मदनाग्निशिखा इव चकितो दर्शं दर्शं मनोजकर्णेजपानामिव कोकिलकोरमधुकराणां क्वणितानि श्रावं श्रावं मारविकारेण क्वचिदप्यवस्थातुमसहिष्णुः परिबभ्राम' इत्यादि ।
सत्यमेवोक्तमेकेन समालोचकेन यद्दण्डिनो दशकुमारचरिते नानाविधा, रोमाञ्चकारिघटनाः सन्ति । ग्रन्थस्यास्य मुख्यो रसस्तु वीर एव किन्तु प्राधान्यमद्भूतस्यापि ।
इति महाकविः राजशेखरः स्वस्य सुभाषितहारावलिग्रन्थे वदति । संस्कृतसाहित्ये गद्यकविषु दण्डी बहु प्रख्यातः अस्ति। गद्यकाव्येषु याद्र्शी कुतूहलता दण्डिना प्रदर्शिता ताद्र्शी कुतूहलता आसक्तिः च केनापि न प्रदर्शिता। दण्डिनः सप्त कृतयः समुपलभ्यते।
दशकुमारचरितं दण्डिनः प्रथितं गद्यकाव्यम् । अस्य पूर्वपीठिका, दशकुमारचरितं, उत्तरपीठिका चेति त्रयो भागाः । तत्रापि केचित्तु भाषागतभङ्गीमुद्दिश्य केवलं चरितभागमेव दण्डिप्रणीतं मन्यन्ते । तदनुसारेण यथा चरितभागस्य कमनीयपदा प्रसादगुणगुम्फिता मधुरमधुरा च भाषा न तथा पूर्वोत्तरपीठिकयोरिति । किन्तु कथनमतन्न युक्तियुक्तं सर्वेभ्यः। भाषाभङ्गी विषयानुबन्धिनी कवेस्तात्कालिकमनोवृत्यनुगा च । तेन एक एव कविरपि विविधभाषाभङ्गीमनुतिष्ठतीति नाश्चर्यं विषयाद्यनुसारेण ।
दशानां कुमाराणामतिपौरुषपराक्रमवर्णनमेवाऽस्य ग्रन्थस्य विषयः । मगधेशकुमारस्य राजवाहनस्य तन्मित्राणां नवानां देशविदेशाटनानुभवानां मनोहारि वर्णनमत्र दृश्यते।
दशकुमारचरितस्य सन्त्यनेके टीकाग्रन्थाः । अस्य पूर्वपीठिकायाः पददीपिकाऽभिधा टीका लभ्यते प्राचीना, नवीना च शेषराजशर्मणश्चन्द्रकलाऽऽख्या । मध्यभागस्य पदचन्द्रिका कवीन्द्राचार्यसरस्वतीकृता, शिवरामप्रणीता भूषणाऽऽख्या, लघुदीपिका च भानुचन्द्रकृता टीकाः । उत्तरपीठिकायाः न काऽपि टीका लभ्यते । पूर्वपीठिकायाः मध्यभागस्य च ताराचरणभट्टाचार्यप्रणीता बालविबोधिनी नाम्नी टीकाऽपि दृश्यते।
अवन्तिसुन्दरीकथा दण्डिनोऽपरा कृतिः। ग्रन्थोऽयमपि हर्षचरितमिव कतिपयैः पद्यैरारभ्यते । अत्रापि वाल्मीकि-व्यास-सुबन्धु-गुणाढ्य-शूद्रक-भास-प्रवरसेन-कालिदास-नारायण-बाण-मयूराख्यानां कवीनां नामग्रहणं कृतमस्ति । तत्र कतिपयपद्यानां मध्यभागः खण्डितोऽपि दृश्यते । ततश्च गद्येन ग्रन्थारम्भः कृतोऽस्ति । अत्र बाणस्य कादम्बरी पुनरुक्तेव दृश्यते भाषाभाववर्ण्यविषयादिदृष्ट्या। दण्डिना 'ओजःसमासभ्यस्त्वं गद्यस्य जीवितमिति' यदुक्तं तदवन्तिसुन्दरीकथायामेव चरितार्थं भवति न तु दशकुमारचरिते ।
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एकं भौतिकतत्त्वम् अस्ति।
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गुजरातराज्ये पाश्चिमे भागे रण् आफ् कच्छ प्रदेशे द्वीपसदृशे स्थले विशिष्टाः भारतीयगर्दभाः सन्ति । अत्र गर्दभाः यथेष्टं सञ्चरन्ति । एतादृशं स्थलम् अन्यत्र न दृश्यते ।गर्दभानां निमित्तम् संरक्षितम् अरण्यम् एतत् ।
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अयं भगवद्गीतायाः षष्ठोध्यायस्य आत्मसंयमयोगस्य सप्तमः श्लोकः ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः प्रशान्तस्य जितात्मनः परमात्मा समाहितः ।
यः जितमनस्कः भवति, रागद्वेषशून्यश्च भवति तस्य परमात्मा समाधेःविषयो भवति । सः शीतोष्णयोः सुखदुःखयोः, मानापमानयोश्च समानः भवति ।
जितात्मन इति। जितात्मनः कार्यकरणादिसंघात आत्मा जितो येन स जितात्मा तस्य जितात्मनः प्रशान्तस्य प्रसन्नान्तःकरणस्य सतः संन्यासिनः परमात्मा समाहितः । साक्षादात्मभावेनवर्तत इत्यर्थः । किंच शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानेऽपमाने च मानापमानयोः पूजापरिभवयोः ।।7।।
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अरनाथः /ˈəəɑːθəə/) जैनधर्मस्य चतुर्विंशतितीर्थङ्करेषु अष्टादशः तीर्थङ्करः अस्ति । भगवतः अरनाथस्य वर्णः सुवर्णः आसीत् । जैनधर्मानुसारं भगवतः चिह्नं मत्स्यः च अस्ति । भगवान् अरनाथः इक्ष्वाकुवंशीयः, काश्यपगोत्रीयश्चासीत् ।
कौमारावस्थायाम् अरनाथस्य शरीरस्य औन्नत्यं त्रिंशत् धनुर्मात्रात्मकम् आसीत् । भगवतः धार्मिकपरिवारे “यक्षेन्द्र” इत्याख्यः यक्षः, “धारिणी” इत्याख्या यक्षिणी च आसीत् । भगवान् अरनाथः आजीवनं सत्यस्य, अहिंसायाः च नियमानां पालनं कृतवान् । सः जनान् सत्यमार्गम् अनुसर्तुम् अवबोधयति स्म ।
देवायुष्यं समाप्य भगवान् अरनाथस्य जीवः पुनः मृत्युलोकम् आगच्छत् । हस्तिनापुर-नामिका नगरी आसीत् । तस्यां नगर्यां मार्गशीर्ष-मासस्य शुक्लपक्षस्य दशम्यां तिथौ रेवती-नक्षत्रस्य मध्यरात्रौ भगवतः अरनाथस्य जन्म अभवत् ।
सुदर्शन-नामकः हस्तिनापुरनगर्याः राजा आसीत् । सुदर्शनः अरनाथस्य पिता आसीत्, माता च महादेवी आसीत् । फाल्गुन-मासस्य शुक्लपक्षस्य तृतीयायां तिथौ रेवती-नक्षत्रे रात्रौ महादेवी तीर्थङ्करत्वसूचकान् चतुर्दश स्वप्नान् दृष्टवती । रात्रौ एव महादेवी राज्ञे सुदर्शनाय चतुर्दशस्वप्नान् श्रावितवती । तस्यां रात्रौ एव भगवतः अरनाथस्य जीवः महादेव्याः गर्भं प्राविशत् । इन्द्रादिभिः देवैः च्यवनकल्याणकमहोत्सवः आचरितः आसीत् ।
आगामि-दिने राजा स्वप्नशास्त्रिणः आहूतवान् । स्वप्नशास्त्रेण एव स्वप्नानां फलादेशः भवितुं शक्यते । स्वप्नशास्त्रिणां पूजनं कृत्वा महादेवी चतुर्दश स्वप्नान् श्रावितवती । स्वप्नशास्त्रिणः स्वप्नानां फलादेशं कृतवान् यत् – “महादेव्याः गर्भे एकः श्रेष्ठः, विशिष्टश्च बालकः अस्ति । सः तीर्थङ्करः भविष्यति” इति ।
सर्वे बालकस्य जन्मनः प्रतीक्षां कुर्वन्तः आसन् । गर्भकालस्य समाप्त्यनन्तरं भगवतः अरनाथस्य पीडारहितं जन्म अभवत् । भगवतः जन्मसमये सम्पूर्णे जगति शान्तवातावरणम् आसीत् । राजा सुदर्शनः सम्पूर्णे राज्ये पुत्रोत्सवस्य घोषणां चकार ।
ये बन्धिनः आसन्, तेभ्यः राजा मुक्तिम् अददात् । राज्ञा पुत्रप्राप्त्याः प्रसन्नतायां सर्वेभ्यः दानं कृतम् । नगरजनाः अपि प्रसन्नाः आसन् । एकादशदिनानि यावत् भगवतः अरनाथस्य जन्मोत्सवः आचरितः ।
जम्बूद्वीपस्य पूर्वविदेहक्षेत्रे सुसीमा-नामिका नगरी आसीत् । तस्याः नगर्याः राजा धनपतिः आसीत् । भगवान् अरनाथः पूर्वजन्मनि धनपतिः नामकः राजा आसीत् । धनपतिना तस्मिन् जन्मनि धर्मस्य साधना कृता । तेन बहुवर्षाणि यावत् राज्यसञ्चालनमपि कृतम् आसीत् ।
धनपतेः राज्ये जनाः नीतिमन्तः आसन् । अतः राज्ञा कदापि कस्मैचित् अपि दण्डः न प्रदत्तः । अन्ते राजा धनपतिः विरक्तः अभवत् । सः संवरमुनेः दीक्षां स्वीकृतवान् । अभिग्रहस्य, स्वाध्यायस्य, ध्यानस्य च विशिष्टा साधना धनपतिना कृता । सः आर्यजनपदि निरपेक्षभावेन विचरन् आसीत् ।
एकदा जिनदासस्य गृहे धनपतेः चातुर्मासीतपसः आहारस्या आयोजनम् आसीत् । तत्र देवैः दानकर्तुः, मुनेः च महिमा कथितः । तथापि मुनिः निरपेक्षः एव आसीत् । तस्य मनसि लेशमात्रम् अपि अहङ्कारः नासीत् । अनेन प्रकारेण धनपतिना घोरसाधनया तीर्थङ्करगोत्रस्य बन्धनं कृतम् । अन्ते आराधकपदं प्राप्य सः ग्रैवेयके महर्धिकदेवः जातः ।
भगवतः अरनाथस्य जन्मनः एकादशदिनोत्तरं नामकरणसंस्कारस्य विधिः अभवत् । तस्मिन् दिने जनाः उत्सवम् अपि आचरितवन्तः । स्वर्गलोकात् बहवः देवाः भगवतः अरनाथस्य दर्शनार्थं समागताः । चतुष्षष्टिः इन्द्राः, लोकान्तिकाः देवाः च अपि उत्सवम् आचरितवन्तः । उत्सवे तेषां देवानाम् उपस्थितिः आवश्यकी वर्तते ।
राज्यस्य जनाः अपि प्रसन्नाः आसन् । नामकरणोत्सवे बालकस्य नामकरणं भवति । अतः राजा नामकरणाय देवतानां, जनानां च परामर्शं पृष्टवान् । अन्ते राज्ञा स्वस्य विचारः कथितः यत् – “यदा महादेवी गर्भवती आसीत्, तदा महादेव्या रत्नमयम् एकम् अरचक्रं दृष्टम् आसीत् । अतः अस्य बालकस्य नाम अरकुमारः इति करणीयम् । सर्वैः जनैः, देवैः च समर्थनं प्रदत्तम् । तावत् एव अरनाथः इति नाम प्रसिद्धम् अस्ति ।
भगवतः अरनाथस्य बाल्यावस्था मनोरञ्जनेन व्यतीता । समयान्तरे सः तारुण्यावस्थायां प्राविशत् । भगवतः मनसि विरक्तेः भावः आसीत् । किन्तु राज्ञा सुदर्शनेन भगवतः अरनाथस्य अनेकाभिः राजकन्याभिः सह विवाहः कारितः । अरनाथस्य अरविन्द-नामकः पुत्रः अभवत् । अरनाथस्य विवाहानन्तरं राज्ञः सुदर्शनस्य मनसि राज्यात् निवृत्तेः विचारः आगतः । अतः सः अरनाथस्य राज्याभिषेकं कृतवान्, अरनाथाय राज्यस्य दायित्वं च प्रदत्तवान् । ततः परं सुदर्शनः स्थवीरमुनेः दीक्षां प्रापत् । दीक्षानन्तरं सः गृहं त्यक्त्वा साधनायां लीनः अभवत् ।
यदा अरनाथः राजा अभवत् तदा तेन राज्यस्य निष्ठापूर्वकं, विरक्तिपूर्वकं च पालनं कृतम् आसीत् । अरनाथस्य राज्ये अपराधिनः अपि न्यूनाः अभवन् । भगवान् अरनाथः सम्पूर्णे राज्ये जनेभ्यः सर्वाणि सौलभ्यानि यच्छति स्म । कस्यापि वस्तुनः अभावः एव नासीत्, अतः अपराधाः अपि न भवन्ति स्म । जनाः अपि आन्तरिकविवादान् विस्मृतवन्तः । जनाः परस्परम् एव विवादानां निवारणं कुर्वन्ति स्म । यथा कमले पङ्के उत्पन्ने सत्यपि, पङ्कात् मुक्तः भवति, तथैव भगवति अरनाथे अपि राज्यस्य सर्वभोगेषु सम्पृक्ते सति अपि मोहात् मुक्तः आसीत् । अतः तस्य जीवनं कमलम् इव आसीत् ।
राज्ञः अरनाथस्य मनसि अपि राज्यस्य सञ्चालनस्य सन्तोषः आसीत् । जनानाम् एकात्मतायाः कारणेन एव सम्पूर्णं राज्यं कुटुम्बम् इव प्रतिभाति स्म । राज्ये प्रजा सुखीनी आसीत् । यतः अरनाथः सदैव जनानां सौकर्येभ्यः जाग्रतः भवति स्म । जनाः पूर्ववर्तिनः राजानः विस्मृतवन्तः आसन् । जनेभ्यः अरनाथः एव सर्वस्वम् आसीत् ।
बहुवर्षाणि यावत् अरनाथः माण्डलिकः राजा आसीत् । तत्पश्चात् राज्ये चक्ररत्नं समुद्भूतम् । अतः चक्ररत्नेन तेन सम्पूर्णं भूमण्डलं जितम् । अतः अरनाथः चक्रवर्तिपदं प्राप्तवान् । द्वात्रिंशत् राजानः अरनाथस्य सेवायां रताः आसन् ।
भगवता अरनाथेन द्विचत्वारिंशत्सहस्रवर्षाणि यावत् चक्रवर्तित्वेन राज्यसञ्चालनं कृतम् आसीत् । तीर्थङ्कराः त्रिकालज्ञाः भवन्ति । अतः यदा तेन दीक्षायाः समयः ज्ञातः, तदा स्वस्य पुत्रस्य अरविन्दस्य राज्याभिषेकं कृत्वा अरविन्दाय राज्यस्य दायित्वं प्रदत्तम् । ततः परं सः वार्षिकीदानं कर्तुं सज्जः अभवत् । राज्ये अपि अरनाथेन वार्षिकीदानस्य घोषणा कृता । स्वर्गलोकात् बहवः देवाः, चतुष्षष्टिः इन्द्राः चापि तत्र समुपस्थिताः आसन् ।
ततः परं भगवान् अरनाथः वार्षिकीदानम् अकरोत् । एकवर्षं यावत् तेन वार्षिकीदानं कृतम् । वार्षिकीदाने सुवर्णमुद्रिकाः दीयन्ते स्म । नगरजनाः वा अन्ये केचन अपि दानं स्वीकर्तुं शक्नुवन्ति स्म । दूरनगरात् अपि बहवः जनाः आगत्य दानं स्वीकुर्वन्ति स्म ।
अरनाथः पराक्रमी, तेजस्वी च आसीत् । अतः राज्ञः दीक्षाप्रसङ्गेन जनाः विरक्ताः अभवन् । यदा वार्षिकीदानं समाप्तं जातं, तदा मार्गशीर्ष-मासस्य शुक्लपक्षस्य एकादश्यां तिथौ रेवती-नक्षत्रे भगवान् अरनाथः सहस्रजनैः सह हस्तिनापुरनगर्याः सहस्राम्रोद्यानं गतवान् । तत्र देवाः, इन्द्राः चापि समुपस्थिताः आसन् । तस्मिन् दिवसे एव सर्वेषां समक्षे भगवता अरनाथेन दीक्षा अङ्गीकृता । तेन सावद्ययोगानां सर्वथा प्रत्याख्यानं कृतम् आसीत् ।
दीक्षायाः दिवसे सः षष्ठीतपः कृतवान् । दीक्षायाः अपरे दिने भगवान् अरनाथः राजपुरस्य अपराजितनामकस्य राज्ञः गृहे प्रथमं क्षीरान्नं भुक्तवान् । देवैः जनेभ्यः दानस्य माहात्म्यम् अवबोधितम् आसीत् ।
दीक्षानन्तरं वर्षत्रयं यावत् भगवान् अरनाथः रहसि साधनां कुर्वन् आसीत् । भगवतः रहस्यविषये बहुनि मतानि सन्ति । केषुचित् ग्रन्थेषु वर्षत्रस्यस्य रहस्यकालविषयकः उल्लेखः प्राप्यते । केषुचित् ग्रन्थेषु केवलं त्रयाणाम् अहोरात्राणां रहस्यकालस्य उल्लेखः दृश्यते ।
भगवता अरनाथेन विविधाः तपस्याः, साधनाः च कृता । सः सर्वत्र विचरन् पुनः हस्तिनापुर-नगर्याः सहस्राम्रोद्यानं प्राप्तवान् । आम्रवृक्षस्याधः ध्यानारूढः सन् सः क्षपकश्रेणीमलभत ।
वर्षत्रयस्य साधनाकाले भगवान् अरनाथः साधनया घातकर्मणां नाशं कृतवान् आसीत् । हस्तिनापुर-नगर्यां कार्त्तिक-मासस्य शुक्लपक्षस्य द्वादश्यां तिथौ रेवती-नक्षत्रे तस्मै कैवल्यज्ञानम् अभवत् । तस्मिन् दिवसे लोकान्तिकदेवाः, चतुष्षष्टिः इन्द्राः, नगरजनाः च तत्र समुपस्थिताः आसन् । सर्वैः मिलित्वा कैवल्यमहोत्सवस्य आयोजनं कृतम्, उत्सवः आचरितः च ।
अनन्तरं भगवता अरनाथेन प्रथमं प्रवचनं कृतम् । तस्मिन् प्रवचने बहवः श्रोतारः आसन् । भगवतः अरनाथस्य प्रवचनस्य तादृशः प्रभावः आसीत्, येन जनाः मुग्धाः, तल्लीनाः च अभवन् । भगवतः प्रवचनं श्रुत्वा बहवः जनाः संसारसागरात् निवृत्तिं प्राप्तुम् ऐच्छन् । भगवतः अरनाथस्य प्रथमे प्रवचने एव तीर्थस्य स्थापना जाता । तदैव अरनाथः तीर्थङ्करः इति पदं प्रापत् ।
पुरा राजा अरनाथः चक्रवर्ती आसीत् । अतः जनेषु तस्य प्रभावः अत्यधिकः वर्तते स्म । भगवान् अरनाथः सर्वज्ञः आसीत् । अतः जनानां मनसि अरनाथाय महती आस्था आसीत् । जनानां जीवने अपि अरनाथस्य महान् प्रभावः अभवत् ।
यदा भगवान् अरनाथः चतुर्विधसङ्घस्य स्थापनां चकार, तदा अरनाथेन धार्मिकपरिवारस्य अपि रचना कृता।
अयं भगवतः धार्मिकः परिवारः वर्तते । तेषु परिवारजनेषु त्रयस्त्रिंशत् गणधरेषु “कुम्भस्वामी” इत्याख्यः प्रथमः गणधरः आसीत् ।
तीर्थङ्कराः पूर्वमेव सर्वं जानान्ति । तथैव यदा भगवता अरनाथेन अपि स्वस्य निर्वाणकालः ज्ञातः, तदा सः सप्तसहस्रसाधुभिः सह सम्मेदशिखरं गतवान् । तत्र सः एकमासं यावत् अनशनञ्चकार । तेन एकमासं यावत् पुनः तपस्या, साधना च कृता । एकमासानन्तरं सः शैलेशीपदं प्रापत् । शैलेशीपदस्य प्राप्त्या सर्वेषां कर्मणां नाशः अभवत् । अनन्तरं सः सिद्धपदं प्रापत् ।
एकमासस्य अनशनान्ते मार्गशीर्ष-मासस्य शुक्लपक्षस्य दशम्यां तिथौ रेवती-नक्षत्रे सम्मेदशिखरे भगवतः अरनाथस्य निर्वाणम् अभवत् । भगवतः अरनाथस्य जन्मनिर्वाणयोः मासपक्षतिथिनक्षत्राणि समानानि एव सन्ति । भगवता सह बहुभिः मुनिभिः अपि मोक्षः प्राप्तः आसीत् उद्धरणे दोषः : समाप्तिः शृङ्खला लुप्ता।
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न्यू जर्सी संयुक्त राज्य अमेरिका देशस्य प्रदेश: अस्ति । यस प्रदेशस्य राजधानी - ट्रेंटन अस्ति ।
अलाबामा | अलास्का | आरिज़ोना | अर्कान्स | कालिफ़ोर्निया | कोलोराडो | कनेक्टिकट् | डेलावेर् | फ्लोरिडा | जार्जिया | हवाई | ऐडहो | इलिनाई | इन्डियाना | अयोवा | केन्सास | केन्टकी | लूइसियाना | मेन | मेरील्यान्ड् | मासचुसेट्स | मिशिगन | मिनेसोटा | मिसिसिपी | मिसूरी | मान्टाना | नेब्रास्का | नेवाडा | न्यू हेम्पशायर | न्यू जर्सी | न्यू मेक्सिको | न्यू यार्क् | नार्थ केरोलैना | नार्थ डेकोटा | ओहायो | ओक्लाहोमा | ओरेगन् | पेन्सिल्वेनिया | रोड ऐलैंड | साउथ केरोलैना | दक्षिण डकोटा | टेनेसी | टेक्सास् | यूटाह | वर्मांट | वर्जिनिया | वाशिङ्टन् | वेस्ट वर्जिनिया | विस्कान्सिन् | वायोमिङ् | वाशिङ्ग्टन् डि सि
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छान्दोग्योपनिषत्, दशसु प्रमुखोपनिषत्सु अन्यतमा अस्ति । इयं हयग्रीवरूपीभगवतः मुखात् आविर्भूतानि पवित्रवाक्यानि । सर्वासाम् उपनिषदां मुख्याभिमानिनी लक्ष्मीदेवी स्वस्य पतिं श्रीहरिम् अत्र ओमित्यक्षरमुद्गीथमुपासीत इत्येवम्प्रकारेण स्तुतवती अस्ति इति आचार्याः उपोद्घाते उल्लिखितवन्तः सन्ति ।
इयम् उपनिषत् सामवेदस्य छान्दोग्यब्राह्मणस्य कश्चन भागः वर्तते । इयं गद्यरूपेण वर्तते इत्यतः अत्र छन्दः नास्ति । अस्याः उपनिषदः प्रथमद्रष्टा हयग्रीवभगवान् अस्याः प्रधानऋषिः । रमादेवी द्वितीया ऋषिः । अनन्तगुणपरिपूर्णः, शेषशायी रमापतिः अस्याः प्रतिपाद्यदेवता ।
दशसु प्रमुखोपनिषत्सु छान्दोग्योपनिषदः वैशिष्ट्यं वर्तते । अस्याः उपनिषदः भाष्यं श्रीशङ्कराचार्यैः श्रीमध्वाचारैश्च लिखितम् अस्ति ।
वागभिमानिनी सरस्वती मुख्यप्राणौ च दम्पती । ऋगभिमानिनी सरस्वती सामाभिमानी प्राणश्च नित्यदम्पती । एते ओङ्कारवाच्यं हृदयसन्निहितम् अक्षरनामकं भगवता सायुज्यं प्राप्नुवन्ति ।
यदा एतौ दम्पती भगवतः सायुज्यं प्राप्तवन्तौ तदा तैः अभीष्टं सर्वं प्राप्तम् ।
अस्याः उपनिषदः प्रथमतः पञ्चमोध्यायं यावत् उपासनापद्धतयः विवृताः सन्ति -
रैक्वेण उपदिष्टा संवर्गविद्या
एतेषु अध्यायेषु तत्त्वविचाराः उपदिष्टाः सन्ति । तत् त्वमसि इत्येतत् प्रसिद्धं वाक्यं षष्ठाध्याये निरूपितमस्ति । अस्मिन् प्रकरणे 9 दृष्टान्ताः प्रदत्ताः सन्ति -
सप्तमोध्याये भूमोपासनं विवृतम् । अस्मिन् सनत्कुमार-नारदयोः संवादः वर्तते । देवता-तारतम्यपरिमाणम् अत्र विस्तृतरूपेण प्रदत्तमस्ति ।अष्टमोध्याये दहरविद्या वर्णिता अस्ति । हृदये विद्यमानः दहराकाशः न परब्रह्म । दहराकाशे विद्यमानः महाकाशः एव परब्रह्म इति अत्र प्रतिपादितम् ।ब्रह्मचर्यस्य विषये मनोहारकं विवरणम् अस्य अध्यायस्य 5 खण्डे उपलभ्यते । ब्रह्मचर्यं नाम कायेन वाचा मनसा परमात्मनः प्राप्त्यै अनुष्ठानम् ।अस्मिन् अध्याये चतुर्मुखब्रह्मणा इन्द्र-विरोचनयोः कृते कृतः उपदेशः विद्यते । तत्त्वज्ञानस्य प्राप्त्यै समीपम् आगतवन्तौ तौ उभौ उद्दिश्य चतुर्मुखब्रह्मणा एकमेव वाक्यम् उपदिष्टम् - य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाच इति । उभौ अपि स्वयोग्यतानुसारम् अवगतवन्तौ । अष्टमाध्याये लभ्यमानानि उपनिष्द्वाक्यानि तत्त्वविचारस्य दृष्ट्या नितरां महत्त्वं प्राप्नोति । तेषु इदमेकं वाक्यम् - आत्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्याम् । न हवै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति । अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः । शरीराभिमानसहितः जीवः सुखदुःखयोः आक्रमणेन पीडितः भवति । देहाभिमानयुतेन जनेन सुखदुःखानि अनुभोक्तव्यानि एव । जीवेन सह परमात्मा शरीरे विद्यते चेदपि सः शरीराभिमानरहितः इत्यतः सः सुखदुःखाभ्यां दूरे तिष्ठति ।
तैत्तिरीयोपनिषत् • ऐतरेयोपनिषत् • छान्दोग्योपनिषत् •
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सः विख्यातः वैज्ञानिकः।
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