Kanda stringclasses 7
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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 104 | 2 | तवाहं पूर्वसद्भावे पुत्रः परपुरञ्जय । मायासम्भावितो वीर कालः सर्वसमाहरः ।। 7.104.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 3 | पितामहश्च भगवानाह लोकपतिः प्रभुः । समयस्ते कृतः सौम्य लोकान्सम्परिरक्षितुम् ।। 7.104.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 4 | सङ्क्षिप्य हि पुरा लोकान्मायया स्वयमेव हि । महार्णवे शयानो ऽप्सु मां त्वं पूर्वमजीजनः ।। 7.104.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 5 | भोगवन्तं ततो नागमनन्तमुदकेशयम् । मायया जनयित्वा त्वं द्वौ च सत्त्वौ महाबलौ ।। 7.104.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 6 | मधुं च कैटभं चैव ययोरस्थिचयैर्वृता । इयं पर्वतसम्बाधा मेदिनी चाभवन्मही ।। 7.104.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 7 | पद्मे दिव्ये ऽर्कसङ्काशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि । प्राजापत्यं त्वया कर्म मयि सर्वं निवेशितम् ।। 7.104.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 8 | सो ऽहं सन्न्यस्तभारो हि त्वामुपासे जगत्पतिम् । रक्षां विधत्स्व भूतेषु मम तेजस्करो भवान् ।। 7.104.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 9 | ततस्त्वमपि दुर्धर्षात्तस्माद्भावात्सनातनात् । रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ।। 7.104.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 10 | अदित्यां वीर्यवान्पुत्रो भ्रातऽणां वीर्यवर्धनः । समुत्पन्नेषु कृत्येषु तेषां साह्याय कल्पसे ।। 7.104.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 11 | स त्वं वित्रास्यमानासु प्रजासु जगतां वर । रावणस्य वधाकाङ्क्षी मानुषेषु मनो ऽदधाः ।। 7.104.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 12 | दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । कृत्वा वासस्य नियतिं स्वयमेवात्मना पुरा ।। 7.104.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 13 | स त्वं मनोमयः पुत्रः पूर्णायुर्मानुषेष्विह । कालो ऽयं ते नरश्रेष्ठ समीपमुपवर्तितुम् ।। 7.104.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 14 | यदि भूयो महाराज प्रजा इच्छस्युपासितुम् । वस वा वीर भद्रं त एवमाह पितामहः ।। 7.104.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 15 | अथ वा विजिगीषा ते सुरलोकाय राघव । सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ।। 7.104.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 16 | श्रुत्वा पितामहेनोक्तं वाक्यं कालसमीरितम् । राघवः प्रहसन्वाक्यं सर्वसंहारमब्रवीत् ।। 7.104.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 17 | श्रुत्वा मे देवदेवस्य वाक्यं परममद्भुतम् । प्रीतिर्हि महती जाता तवागमनसम्भवा ।। 7.104.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 18 | त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम सम्भवः । भद्रं ते ऽस्तु गमिष्यामि यत एवाहमागतः ।। 7.104.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 19 | हद्गतो ह्यसि सम्प्राप्तो न मे तत्र विचारणा । मया हि सर्वकृत्येषु देवानां वशवर्तिनाम् । स्थातव्यं सर्वसंहार यथा ह्याह पितामहः ।। 7.104.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 104 | 20 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे चतुरधिकशततमः सर्गः ।। 104 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 1 | तथा तयोः संवदतोर्दुर्वासा भगवानृषिः । रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राजद्वारमुपागमत् ।। 7.105.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 2 | सो ऽभिगम्य तु सौमित्रिमुवाच ऋषिसत्तमः । रामं दर्शय मे शीघ्रं पुरा मे ऽर्थो ऽतिवर्तते ।। 7.105.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 3 | मुनेस्तु भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा । अभिवाद्य महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.105.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 4 | किं कार्यं ब्रूहि भगवन्को वा ऽर्थः किं करोम्यहम् । व्यग्रो हि राघवो ब्रह्मन्मुहूर्तं प्रतिपाल्यताम् ।। 7.105.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 5 | तच्छ्रुत्वा ऋषिशार्दूलः क्रोधेन कलुषीकृतः । उवाच लक्ष्मणं वाक्यं निर्दहन्निव चक्षुषा ।। 7.105.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 6 | अस्मिन्क्षणे मां सौमित्रे रामाय प्रतिवेदय । अस्मिन्क्षणे मां सौमित्रे न निवेदयसे यदि ।। 7.105.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 7 | विषयं त्वां पुरं चैव शपिष्ये राघवं तथा । भरतं चैव सौमित्रे युष्माकं या च सन्ततिः ।। 7.105.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 8 | न हि शक्ष्याम्यहं भूयो मन्युं धारयितुं हृदि । तच्छ्रुत्वा घोरसङ्काशं वाक्यं तस्य महात्मनः । चिन्तयामास मनसा तस्य वाक्यस्य निश्चयम् ।। 7.105.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 9 | एकस्य मरणं मे ऽस्तु मा भूत्सर्वविनाशनम् । इति बुद्ध्या विनिश्चित्य राघवाय न्यवेदयत् ।। 7.105.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 10 | लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः कालं विसृज्य च । निस्सृत्य त्वरितं राजा अत्रेः पुत्रं ददर्श ह ।। 7.105.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 11 | सो ऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा । किं कार्यमिति काकुत्स्थः कृताञ्जलिरभाषत ।। 7.105.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 12 | तद्वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा मुनिवरः प्रभुम् । प्रत्याह रामं दुर्वासाः श्रूयतां धर्मवत्सल ।। 7.105.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 13 | अद्य वर्षसहस्रस्य समाप्तिस्तपसो मम । सो ऽहं भोजनमिच्छामि यथासिद्धं तवानघ ।। 7.105.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 14 | तच्छ्रुत्वा वचनं राजा राघवः प्रीतमानसः । भोजनं मुनिमुख्याय यथासिद्धमुपाहरत् ।। 7.105.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 15 | स तु भुक्त्वा मुनिश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । साधु रामेति सम्भाष्य स्वमाश्रममुपागमत् ।। 7.105.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 16 | तस्मिन् गते मुनिवरे स्वाश्रमं लक्ष्मणाग्रजः । संस्मृत्य कालवाक्यानि ततो दुःखमुपागमत् ।। 7.105.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 17 | दुःखेन च सुसन्तप्तः स्मृत्वा तद्घोरदर्शनम् । अवाङ्मुखो दीनमना व्याहर्तुं न शशाक ह ।। 7.105.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 18 | ततो बुद्ध्या विनिश्चित्य कालवाक्यानि राघवः । नैतदस्तीति निश्चित्य तूष्णीमासीन्महायशाः ।। 7.105.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 105 | 19 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे पञ्चोत्तरशततमः सर्गः ।। 105 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 1 | अवाङ्मुखमथो दीनं दृष्ट्वा सोममिवाप्लुतम् । राघवं लक्ष्मणो वाक्यं हृष्टो मधुरमब्रवीत् ।। 7.106.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 2 | न संतापं महाबाहो मदर्थं कर्तुमर्हसि । पूर्वनिर्माणबद्धा हि कालस्य गतिरीदृशी ।। 7.106.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 3 | जहि मां सौम्य विस्रब्धं प्रतिज्ञां परिपालय । हीनप्रतिज्ञाः काकुत्स्थ प्रयान्ति नरकं नराः ।। 7.106.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 4 | यदि प्रीतिर्महाराज यद्यनुग्राह्यता मयि । जहि मां निर्विशङ्कस्त्वं धर्मं वर्धय राघव ।। 7.106.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 5 | लक्ष्मणेन तथोक्तस्तु रामः प्रचलितेन्द्रियः । मन्त्रिणः समुपानीय तथैव च पुरोधसम् ।। 7.106.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 6 | अब्रवीच्च तदा वृत्तं तेषां मध्ये स राघवः । दुर्वासोभिगमं चैव प्रतिज्ञां तापसस्य च ।। 7.106.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 7 | तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणः सर्वे सोपाध्यायाः समासत । वसिष्ठस्तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.106.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 8 | दृष्टमेतन्महाबाहो क्षयं ते रोमहर्षणम् । लक्ष्मणेन वियोगश्च तव राम महायशः ।। 7.106.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 9 | त्यजैनं बलवान्कालो मा प्रतिज्ञां वृथा कृताः । विनष्टायां प्रतिज्ञायां धर्मो ऽपि च लयं व्रजेत् ।। 7.106.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 10 | ततो धर्मे विनष्टे तु त्रैलोक्यं सचराचरम् । सदेवर्षिगणं सर्वं विनश्येत्तु न संशयः ।। 7.106.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 11 | स त्वं पुरुषशार्दूल त्रैलोक्यस्याभिपालनात् । लक्ष्मणेन विना चाद्य जगत्स्वस्थं कुरुष्व ह ।। 7.106.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 12 | तेषां तत्समवेतानां वाक्यं धर्मार्थसंहितम् । श्रुत्वा परिषदो मध्ये रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।। 7.106.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 13 | विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद्धर्मविपर्ययः । त्यागो वधो वा विहितः साधूनां तूभयं समम् ।। 7.106.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 14 | रामेण भाषिते वाक्ये बाष्पव्याकुलितेन्द्रियः । लक्ष्मणस्त्वरितं प्रायात्स्वगृहं न विवेश ह ।। 7.106.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 15 | स गत्वा सरयूतीरमुपस्पृश्य कृताञ्जलिः । निगृह्य सर्वस्रोतांसि निःश्वासं न मुमोच ह ।। 7.106.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 16 | अनिःश्वसन्तं युक्तं तं सशक्राः साप्सरोगणाः । देवाः सर्षिगणाः सर्वे पुष्पैरभ्यकिरंस्तदा ।। 7.106.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 17 | अदृश्यं सर्वमनुजैः सशरीरं महाबलम् । प्रगृह्य लक्ष्मणं शक्रस्त्रिदिवं संविवेश ह ।। 7.106.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 18 | ततो विष्णोश्चतुर्भागमागतं सुरसत्तमाः । दृष्ट्वा प्रमुदिताः सर्वे ऽपूजयन् समहर्षयः ।। 7.106.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 106 | 19 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे षडुत्तरशततमः सर्गः ।। 106 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 1 | विसृज्य लक्ष्मणं रामो दुःखशोकसमन्वितः । पुरोधसं मन्त्रिणश्च नैगमांश्चेदमब्रवीत् ।। 7.107.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 2 | अद्य राज्ये ऽभिषेक्ष्यामि भरतं धर्मवत्सलम् । अयोध्यायाः पतिं वीरं ततो यास्याम्यहं वनम् ।। 7.107.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 3 | प्रवेशयत सम्भारान्माभूत्कालस्य पर्ययः । अद्यैवाहं गमिष्यामि लक्ष्मणेन गतां गतिम् ।। 7.107.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 4 | तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं सर्वाः प्रकृतयो भृशम् । मूर्धभिः प्रणता भूमौ गतसत्त्वा इवाभवन् ।। 7.107.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 5 | भरतश्च विसञ्ज्ञो ऽभूच्छ्रुत्वा रामस्य भाषितम् । राज्यं विगर्हयामास राघवं चेदमब्रवीत् ।। 7.107.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 6 | सत्येनाहं शपे राजन्स्वर्गलोके न चैव हि । न कामये यथा राज्यं त्वां विना रघुनन्दन ।। 7.107.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 7 | इमौ कुशलवौ राजन्नभिषिञ्च नराधिप । कोसलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् ।। 7.107.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 8 | शत्रुघ्नस्य तु गच्छन्तु दूतास्त्वरितविक्रमाः । इदं गमनमस्माकं स्वर्गायाख्यातु मा चिरम् ।। 7.107.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 9 | तच्छ्रुत्वा भरतेनोक्तं दृष्ट्वा चापि ह्यधोमुखान् । पौरान्दुःखेन सन्तप्तान्वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ।। 7.107.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 10 | वत्स राम इमाः पश्य धरणीं प्रकृतीर्गताः । ज्ञात्वैषामीप्सितं कार्यं मा चैषां विप्रियं कृथाः ।। 7.107.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 11 | वसिष्ठस्य तु वाक्येन उत्थाप्य प्रकृतीजनम् । किं करोमीति काकुत्स्थः सर्वा वचनमब्रवीत् ।। 7.107.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 12 | ततः सर्वाः प्रकृतयो रामं वचनमब्रुवन् । गच्छन्तमनुगच्छामो यत्र राम गमिष्यसि ।। 7.107.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 13 | पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो ह्यनुत्तमः । सपुत्रदाराः काकुत्स्थ समागच्छाम सत्पथम् ।। 7.107.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 14 | तपोवनं वा दुर्गं वा नदीमम्भोनिधिं तथा । वयं ते यदि न त्याज्याः सर्वान्नो नय ईश्वर ।। 7.107.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 15 | एषा नः परमा प्रीतिरेष नः परमो वरः । हृद्गता नः सदा प्रीतिस्तवानुगमने नृप ।। 7.107.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 16 | पौराणां दृढभक्तिं च बाढमित्येव सो ऽब्रवीत् । स्वकृतान्तं चान्ववेक्ष्य तस्मिन्नहनि राघवः ।। 7.107.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 17 | कोसलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् । अभिषिच्य महात्मानावुभौ रामः कुशीलवौ ।। 7.107.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 18 | अभिषिक्तौ सुतावङ्के प्रतिष्ठाप्य पुरे ततः । परिष्वज्य महाबाहुर्मूर्ध्न्युपाघ्राय चासकृत् ।। 7.107.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 19 | रथानां तु सहस्राणि नागानामयुतानि च । दशायुतानि चाश्वानामेकैकस्य धनं ददौ ।। 7.107.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 20 | बहुरत्नौ बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृतौ । स्वे पुरे प्रेषयामास भ्रातरौ तु कुशीलवौ ।। 7.107.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 21 | अभिषिच्य सुतौ वीरौ प्रतिष्ठाप्य पुरे तदा । दूतान्सम्प्रेषयामास शत्रुघ्नाय महात्मने ।। 7.107.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 107 | 22 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे सप्तोत्तरशततमः सर्गः ।। 107 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 1 | ते दूता रामवाक्येन चोदिता लघुविक्रमाः । प्रजग्मुर्मधुरां शीघ्रं चक्रुर्वासं न चाध्वनि ।। 7.108.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 2 | ते तु त्रिभिरहोरात्रैः सम्प्राप्य मधुरामथ । शत्रुघ्नाय यथातत्त्वमाचख्युः सर्वमेव तत् ।। 7.108.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 3 | लक्ष्मणस्य परित्यागं प्रतिज्ञां राघवस्य च । पुत्रयोरभिषेकं च पौरानुगमनं तथा ।। 7.108.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 4 | कुशस्य नगरी रम्या विन्ध्यपर्वतरोधसि । कुशावतीति नाम्ना सा कृता रामेण धीमता । श्रावस्तीति पुरी रम्या श्राविता च लवस्य ह ।। 7.108.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 5 | अयोध्यां विजनां कृत्वा राघवो भरतस्तथा । स्वर्गस्य गमनोद्योगं कृतवन्तौ महारथौ ।। 7.108.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 6 | एवं सर्वं निवेद्याशु शत्रुघ्नाय महात्मने । विरेमुस्ते ततो दूतास्त्वर राजेति चाब्रुवन् ।। 7.108.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 7 | तच्छ्रुत्वा घोरसङ्काशं कुलक्षयमुपस्थितम् । प्रकृतीस्तु समानीय काञ्चनं च पुरोधसम् ।। 7.108.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 8 | तेषां सर्वं यथावृत्तमब्रवीद्रघनन्दनः । आत्मनश्च विपर्यासं भविष्यं भ्रातृभिः सह ।। 7.108.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 9 | ततः पुत्रद्वयं वीरः सो ऽभ्यषिञ्चन्नराधिपः । सुबाहुर्मधुरां लेभे शत्रुघाती च वैदिशम् ।। 7.108.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 10 | द्विधा कृत्वा तु तां सेनां माधुरीं पुत्रयोर्द्वयोः । धनं च युक्तं कृत्वा वै स्थापयामास पार्थिवः ।। 7.108.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 11 | सुबाहुं मधुरायां च वैदेशे शत्रुघातिनम् । ययौ स्थाप्य तदा ऽयोध्यां रथेनैकेन राघवः ।। 7.108.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 12 | स ददर्श महात्मानं ज्वलन्तमिव पावकम् । सूक्ष्मक्षौमाम्बरधरं मुनिभिः सार्धमक्षयैः ।। 7.108.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 13 | सो ऽभिवाद्य ततो रामं प्राञ्जलिः प्रयतेन्द्रियः । उवाच वाक्यं धर्मज्ञं धर्ममेवानुचिन्तयन् ।। 7.108.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 14 | कृत्वाभिषेकं सुतयोर्द्वयो राघवनन्दन । तवानुगमने राजन्विद्धि मां कृतनिश्चयम् ।। 7.108.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 15 | न चान्यदपि वक्तव्यमतो वीर न शासनम् । विलोक्यमानमिच्छामि मद्विधेन विशेषतः ।। 7.108.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 16 | तस्य तां बुद्धिमक्लीबां विज्ञाय रघुनन्दनः । बाढमित्येव शत्रुघ्नं रामो वाक्यमुवाच ह ।। 7.108.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 17 | तस्य वाक्यस्य वाक्यान्ते वानराः कामरूपिणः । ऋक्षराक्षससङ्घाश्च समापेतुरनेकशः ।। 7.108.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 18 | सुग्रीवं ते पुरस्कृत्य सर्व एव समागताः । तं रामं द्रष्टुमनसः स्वर्गायाभिमुखं स्थितम् ।। 7.108.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 19 | देवपुत्रा ऋषिसुता गन्धर्वाणां सुतास्तथा । रामक्षयं विदित्वा ते सर्व एव समागताः ।। 7.108.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 20 | ते राममभिवाद्योचुः सर्वे वानरराक्षसाः । तवानुगमने राजन्सम्प्राप्ताः कृतनिश्चयाः ।। 7.108.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 108 | 21 | यदि राम विनास्माभिर्गच्छेस्त्वं पुरुषोत्तम । यमदण्डमिवोद्यम्य त्वया स्म विनिपातिताः ।। 7.108.21 ।। | null |
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