Kanda stringclasses 7
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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 95 | 3 | मद्वचो ब्रूत गच्छध्वमितो भगवतो ऽन्तिकम् ।। 7.95.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 4 | परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत् । यदि शुद्धसमाचारा यदि वा वीतकल्मषा । करोत्विहात्मनः शुद्धिमनुमान्य महामुनिम् ।। 7.95.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 5 | छन्दं मुनेश्च विज्ञाय सीतायाश्च मनोगतम् । प्रत्ययं दातुकामायास्ततः शंसत मे लघु ।। 7.95.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 6 | श्वः प्रभाते तु शपथं मैथिली जनकात्मजा । करोतु परिषन्मध्ये शोधनार्थं ममैव च ।। 7.95.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 7 | श्रुत्वा तु ऱागवस्यैतद्वचः परममद्भुतम् । दूताः सम्प्रययुर्बाटं यत्रास्ते मुनिपुङ्गवः ।। 7.95.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 8 | ते प्रणम्य महात्मानं ज्वलन्तममितप्रभम् । ऊचुस्ते रामवाक्यानि मृदूनि मधुराणि च ।। 7.95.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 9 | तेषां तद्व्याहृतं श्रुत्वा रामस्य च मनोगतम् । विज्ञाय सुमहातेजा मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ।। 7.95.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 10 | एवं भवतु भद्रं वो यथा वदति राघवः । तथा करिष्यते सीता दैवतं हि पतिः स्त्रियाः ।। 7.95.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 11 | तथोक्ता मुनिना सर्वे राजदूता महौजसम् । प्रत्येत्य राघवं क्षिप्रं मुनिवाक्यं बभाषिरे ।। 7.95.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 12 | ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थः श्रुत्वा वाक्यं महात्मनः । ऋषींस्तत्र समेतांश्च राज्ञश्चैवाभ्यभाषत ।। 7.95.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 13 | भगवन्तः सशिष्या वै सानुगाश्च नराधिपाः । पश्यन्तु सीताशपथं यश्चैवान्यो ऽपि काङ्क्षते ।। 7.95.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 14 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । सर्वेषामृषिमुख्यानां साधुवादो महानभूत् ।। 7.95.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 15 | राजानश्च महात्मानः प्रशंसन्ति स्म राघवम् । उपपन्नं नरश्रेष्ठ त्वय्येव भुवि नान्यतः ।। 7.95.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 16 | एवं विनिश्चयं कृत्वा श्वोभूत इति राघवः । विसर्जयामास तदा सर्वांस्ताञ्छत्रुसूदनः ।। 7.95.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 17 | इति सम्प्रविचार्य राजसिंहः श्वोभूते शपथस्य निश्चयं वै । विससर्ज मुनीन्नृपांश्च सर्वान्स महात्मा महतो महानुभावः ।। 7.95.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 95 | 18 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्ग ।। 95 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 1 | तस्यां रजन्यां व्युष्टायां यज्ञवाटगतो नृपः । ऋषीन्सर्वान्महातेजाः शब्दापयति राघवः ।। 7.96.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 2 | वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः । विश्वामित्रो दीर्घतपा दुर्वासाश्च महातपाः ।। 7.96.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 3 | पुलस्त्यो ऽपि तथा शक्तिर्भार्गवश्चैव वामनः । मार्कण्डेयश्च दीर्घायुर्मौद्गल्यश्च महायशाः ।। 7.96.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 4 | गर्गश्च च्यवनश्चैव शतानन्दश्च धर्मवित् । भरद्वाजश्च तेजस्वी ह्यग्निपुत्रश्च सुप्रभः ।। 7.96.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 5 | नारदः पर्वतश्चैव गौतमश्च महायशाः । कात्यायनः सुयज्ञश्च ह्यगस्त्यस्तपसां निधिः ।। 7.96.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 6 | एते चान्ये च बहवो मुनयः संशितव्रताः । कौतूहलसमाविष्टाः सर्व एव समागताः ।। 7.96.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 7 | राक्षसाश्च महावीर्या वानराश्च महाबलाः । सर्व एव समाजग्मुर्महात्मानः कुतूहलात् ।। 7.96.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 8 | क्षत्रिया ये च शूद्राश्च वैश्याश्चैव सहस्रशः । नानादेशगताश्चैव ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।। 7.96.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 9 | ज्ञाननिष्ठाः कर्मनिष्ठाः योगनिष्ठास्तथापरे । सीताशपथवीक्षार्थं सर्व एव समागताः ।। 7.96.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 10 | तदा समागतं सर्वमश्मभूतमिवाचलम् । श्रुत्वा मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ।। 7.96.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 11 | तमृषिं पृष्ठतः सीता त्वन्वगच्छदवाङ्मुखी । कृताञ्जलिर्बाष्पगला कृत्वा रामं मनोगतम् ।। 7.96.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 12 | दृष्ट्वा श्रुतिमिवायान्तीं ब्रह्माणमनुगामिनीम् । वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ।। 7.96.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 13 | ततो हलहलाशब्दः सर्वेषामेवमाबभौ । दुःखजन्मविशालेन शोकेनाकुलितात्मनाम् ।। 7.96.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 14 | साधु रामेति केचित्तु साधु सीतेति चापरे । उभावेव च तत्रान्ये प्रेक्षकाः सम्प्रचुक्रुशुः ।। 7.96.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 15 | ततो मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । सीतासहायो वाल्मीकिरिति होवाच राघवम् ।। 7.96.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 16 | इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी । अपवादैः परित्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ।। 7.96.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 17 | लोकापवादभीतस्य तव राम महाव्रत । प्रत्ययं दास्यते सीता तदनुज्ञातुमर्हसि ।। 7.96.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 18 | इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातकौ । सुतौ तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ।। 7.96.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 19 | प्रचेतसो ऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन । न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ ।। 7.96.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 20 | बहुवर्षसहस्राणि तपश्चर्या मया कृता । नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ।। 7.96.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 21 | मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम् । तस्याः फलमुपाश्नीयामपापा मैथिली यदि ।। 7.96.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 22 | अहं पञ्चसु भूतेषु मनष्षष्ठेषु राघव । विचिन्त्य सीतां शुद्धेति जग्राह वननिर्झरे ।। 7.96.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 23 | इयं शुद्धसमाचारा अपापा पतिदेवता । लोकापवादभीतस्य प्रत्ययं तव दास्यति ।। 7.96.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 24 | तस्मादियं नरवरात्मज शुद्धभावा दिव्येन दृष्टिविषयेण तदा प्रविष्टा । लोकापवादकलुषीकृतचेतसा या त्यक्ता त्वया प्रियतमा विदिता ऽपि शुद्धा ।। 7.96.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 96 | 25 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे षण्णवतितमः सर्गः ।। 96 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 1 | वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत । प्राञ्जलिर्जगतो मध्ये दृष्ट्वा तां वरवर्णिनीम् ।। 7.97.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 2 | एवमेतन्महाभाग यथा वदसि धर्मवित् । प्रत्ययस्तु मम ब्रह्मंस्तव वाक्यैरकल्मषैः ।। 7.97.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 3 | प्रत्ययस्तु पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसन्निधौ । शपथस्तु कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता । लोकापवादो बलवान्येन त्यक्ता हि मैथिली ।। 7.97.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 4 | सेयं लोकभयाद्ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता । परित्यक्ता मया सीता तद्भावन्क्षन्तुमर्हति ।। 7.97.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 5 | जानामि चेमौ पुत्रौ मे यमजातौ कुशीलवौ । शुद्धायां जगतो मध्ये मैथिल्यां प्रीतिरस्तु मे ।। 7.97.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 6 | अभिप्रायं तु विज्ञाय रामस्य सुरसत्तमाः । सीतायाः शपथे तस्मिन् महेन्द्राद्या महौजसः ।। 7.97.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 7 | पितामहं पुरस्कृत्य सर्व एव समागताः ।। 7.97.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 8 | आदित्या वसवो रुद्रा ह्यश्विनौ समरुद्गणाः । गन्धर्वाप्सरसश्चैव सर्व एव समागताः ।। 7.97.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 9 | साध्याश्च विश्वेदेवाश्च सर्वे च परमर्षयः । नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च ते सर्वे हृष्टमानसाः । सीताशपथसम्भ्रान्ताः सर्व एव समागताः ।। 7.97.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 10 | दृष्ट्वा देवानृषींश्चैव राघवः पुनरब्रवीत् । प्रत्ययो मे नरश्रेष्ठा ऋषिवाक्यैरकल्मषैः ।। 7.97.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 11 | शुद्धायां जगतो मध्ये वैदेह्यां प्रीतिरस्तु मे ।। 7.97.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 12 | ततो वायुः शुभः पुण्यो दिव्यगन्धो मनोरमः । तज्जनौघं सुरश्रेष्ठो ह्लादयामास सर्वतः ।। 7.97.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 13 | तदद्भुतमिवाचिन्त्यं निरैक्षन्त समागताः । मानवाः सर्वराष्ट्रेभ्यः पूर्वं कृतयुगे यथा ।। 7.97.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 14 | सर्वान्समागतान्दृष्ट्वा सीता काषायवासिनी । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यमधोदृष्टिरवाङ्मुखी ।। 7.97.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 15 | यथा ऽहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ।। 7.97.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 16 | मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ।। 7.97.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 17 | यथैतत्सत्यमुक्तं मे वेद्मि रामात्परं न च । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ।। 7.97.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 18 | तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत्तदद्भुतम् । भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ।। 7.97.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 19 | ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ।। 7.97.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 20 | तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ।। 7.97.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 21 | तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् । पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ।। 7.97.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 22 | साधुकारश्च सुमहान्देवानां सहसोत्थितः । साधु साध्विति वै सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ।। 7.97.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 23 | एवं बहुविधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः । व्याजह्रुर्हृष्टमनसो दृष्ट्वा सीताप्रवेशनम् ।। 7.97.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 24 | यज्ञवाटगताश्चापि मुनयः सर्व एव ते । राजानश्च नरव्याघ्रा विस्मयान्नोपरेमिरे ।। 7.97.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 25 | अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः । दानवाश्च महाकायाः पाताले पन्नगाधिपाः ।। 7.97.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 26 | केचिद्विनेदुः संहृष्टाः केचिद्ध्यानपरायणाः । केचिद्रामं निरीक्षन्ते केचित्सीतामचेतनाः ।। 7.97.26 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 27 | सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा तेषामासीत्समागमः । तन्मुहूर्तमिवात्यर्थं समं सम्मोहितं जगत् ।। 7.97.27 ।। | null |
Uttara Kanda | 97 | 28 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः ।। 97 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 1 | रसातलं प्रविष्टायां वैदेह्यां सर्ववानराः । चुक्रुशुः साधु साध्वीति मुनयो रामसन्निधौ ।। 7.98.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 2 | दण्डकाष्ठमवष्टभ्य बाष्पव्याकुलितेक्षणः । अवाक्छिरा दीनमना रामो ह्यासीत्सुदुःखितः ।। 7.98.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 3 | स रुदित्वा चिरं कालं बहुशो बाष्पमुत्सृजन् । क्रोधशोकसमाविष्टो रामो वचनमब्रवीत् ।। 7.98.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 4 | अभूतपूर्वं शोकं मे मनः स्प्रष्टुमिवेच्छति । पश्यतो मे यथा नष्टा सीता श्रीरिव रूपिणी ।। 7.98.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 5 | सा ऽदर्शनं पुरा सीता लङ्कापारे महोदधेः । ततश्चापि मयानीता किं पुनर्वसुधातलात् ।। 7.98.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 6 | वसुधे देवि भवति सीता निर्यात्यतां मम । दर्शयिष्यामि वा रोषं यथा मामवगच्छसि ।। 7.98.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 7 | कामं श्वश्रूर्ममैव त्वं त्वत्सकाशाद्धि मैथिली । कर्षता हलहस्तेन जनकेनोद्धृता पुरा ।। 7.98.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 8 | तस्मान्निर्यात्यतां सीता विवरं वा प्रयच्छ मे । पाताले नाकपृष्ठे वा वसेयं सहितस्तया ।। 7.98.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 9 | आनय त्वं हि तां सीतां मत्तो ऽहं मैथिलीकृते । न मे दास्यसि चेत्सीतां यथारूपां महीतले ।। 7.98.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 10 | सपर्वतवनां कृत्स्नां विधमिष्यामि ते स्थितम् । नाशयिष्याम्यहं भूमिं सर्वमापो भवत्विह ।। 7.98.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 11 | एवं ब्रुवाणे काकुत्स्थे क्रोधशोकसमन्विते । ब्रह्मा सुरगणैः सार्धमुवाच रघुनन्दनम् ।। 7.98.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 12 | राम राम न सन्तापं कर्तुमर्हसि सुव्रत । स्मर त्वं पूर्वकं भावं मन्त्रं चामित्रकर्शन ।। 7.98.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 13 | न खलु त्वां महाबाहो स्मारयेयमनुत्तमम् । इमं मुहूर्तं दुर्धर्ष स्मर त्वं जन्म वैष्णवम् ।। 7.98.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 14 | सीता हि विमला साध्वी तव पूर्वपरायणा । नागलोकं सुखं प्रायात्त्वदाश्रयतपोबलात् ।। 7.98.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 15 | स्वर्गे ते सङ्गमो भूयो भविष्यति न संशयः । अस्यास्तु परिषन्मध्ये यद्ब्रवीमि निबोध तत् ।। 7.98.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 16 | एतदेव हि काव्यं ते काव्यानामुत्तमं श्रुतम् । सर्वं विस्तरतो राम व्याख्यास्यति न संशयः ।। 7.98.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 17 | जन्मप्रभृति ते वीर सुखदुःखोपसेवनम् । भविष्यदुत्तरं चेह सर्वं वाल्मीकिना कृतम् ।। 7.98.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 18 | आदिकाव्यमिदं राम त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । नह्यन्यो ऽर्हति काव्यानां यशोभाग्राघवादृते ।। 7.98.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 19 | श्रुतं ते पूर्वमेतद्धि मया सर्वं सुरैः सह । दिव्यमद्भुतरूपं च सत्यवाक्यमनावृतम् ।। 7.98.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 20 | स त्वं पुरुषशार्दूल धर्मेण सुसमाहितः । शेषं भविष्यं काकुत्स्थ काव्यं रामायणं शृणु ।। 7.98.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 21 | उत्तरं नाम काव्यस्य शेषमत्र महायशः । तच्छृणुष्व महातेज ऋषिभिः सार्धमुत्तमम् ।। 7.98.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 22 | न खल्वन्येन काकुत्स्थ श्रोतव्यमिदमुत्तमम् । परमम् ऋषिणा वीर त्वयैव रघुनन्दन ।। 7.98.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 23 | एतावदुक्त्वा वचनं ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः । जगाम त्रिदिवं देवो देवैः सह सबान्धवैः ।। 7.98.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 24 | ये च तत्र महात्मान ऋषयो ब्राह्मलौकिकाः । ब्रह्मणा समनुज्ञाता न्यवर्तन्त महौजसः । उत्तरं श्रोतुमनसो भविष्यं यच्च राघवे ।। 7.98.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 25 | ततो रामः शुभां वाणीं देवदेवस्य भाषिताम् । श्रुत्वा परमतेजस्वी वाल्मीकिमिदमब्रवीत् ।। 7.98.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 26 | भगवन् श्रोतुमनस ऋषयो ब्राह्मलौकिकाः । भविष्यदुत्तरं यन्मे श्वोभूते सम्प्रवर्तताम् ।। 7.98.26 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 27 | एवं विनिश्चयं कृत्वा सम्प्रगृह्य कुशीलवौ । तं जनौघं विसृज्याथ पर्णशालामुपागमत् । तामेव शोचतः सीतां सा व्यतीयाय शर्वरी ।। 7.98.27 ।। | null |
Uttara Kanda | 98 | 28 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे ऽष्टनवतितमः सर्गः ।। 98 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 1 | रजन्यां तु प्रभातायां समानीय महामुनीन् । गीयतामविशङ्काभ्यां रामः पुत्रावुवाच ह ।। 7.99.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 2 | ततः समुपविष्टेषु ब्रह्मर्षिषु महात्मसु । भविष्यदुत्तरं काव्यं जगतुस्तौ कुशीलवौ ।। 7.99.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 99 | 3 | प्रविष्टायां तु सीतायां भूतलं सत्यसम्पदा । तस्यावसाने यज्ञस्य रामः परमदुर्मनाः ।। 7.99.3 ।। | null |
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