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|---|---|---|---|
1 | 1.44 | null | उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥ |
1 | 1.45 | null | अहो वत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयमं । यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥ |
1 | null | 257 | देवा अवधारी आणिक एक । एथ घडे महापातक । जै संगदोषें हा लौकिक । भ्रंशु पावे ॥ २५७ ॥ |
1 | null | 258 | जैसा घरीं आपुला । वानिवसे वन्ही लागला। तो आणिकांही प्रज्वळिला । जाळुनि घाली ॥ २५८ ॥ |
1 | null | 259 | तैसिया तया कुळसंगती । जे जे लोक वर्तती । तेही बाधु पावती । निमित्तें येणें ॥ २५९ ॥ |
1 | null | 260 | तैसें नाना दोषें सकळ । अर्जुन म्हणे तें कुळ । मग महाघोर केवळ । निरय भोगी ॥ २६० ॥ |
1 | null | 261 | पडिलिया तिये ठायीं । मग कल्पांतीही उगंडु नाही । येसणें पतन कुळक्षयीं । अर्जुन म्हणे ॥ २६१ ॥ |
1 | null | 262 | देवा हें विविध कानीं ऐकिजे । परि अझुनिवरी त्रासु नुपजे । हृदय वज्राचें हें काय कीजे । अवधारी पां ॥ २६२ ॥ |
1 | null | 263 | अपेक्षिजे राज्यसुख । जयालागीं तें तंव क्षणिक । ऐसे जाणतांही दोख । अव्हेरू ना ॥ २६३ ॥ |
1 | null | 264 | हे वडिल सकळ आपुले । वधावया दिठी सूदले । सांग पां काय थेकुलें । घडले आम्हा ॥ २६४ ॥ |
1 | 1.46 | null | यदि मामप्रतीकारमशस्त्रतं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तनं मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥ |
1 | null | 265 | आतां यावरी जें जियावें । तयापासूनि हें बरवे । जे शस्त्र सांडूनि साहावे । बाण त्यांचे ॥ २६५ ॥ |
1 | null | 266 | तयावरी होय जितुकें । तें मरणही वरी निकें । परी येणें कल्मषें । चाड नाहीं ॥ २६६ ॥ |
1 | null | 267 | ऐसें देखोनि सकळ । अर्जुनें आपुलें कुळ । मग म्हणे राज्य तें केवळ । निरयभोगु ॥ २६७ ॥ |
1 | 1.47 | null | संजय उवाचः एवमुक्तवार्जुन: संख्ये रथोपस्य उपाविशत् । |
1 | null | 268 | ऐसें तिये अवसरीं । अर्जुन बोलिला समरीं । संजयो म्हणे अवधारी । धृतराष्ट्रातें ॥ २६८ ॥ |
1 | null | 269 | मग अत्यंत उद्वेगला । न धरत गहिंवरू आला । तेथ उडी घातली खालां । रथौनियां ॥ २६९ ॥ |
1 | null | 270 | जैसा राजकुमरु पदच्युतु । सर्वथा होय उपहृतु । कां रवि राहुग्रस्तु । प्रभाहीनु ॥ २७० ॥ |
1 | null | 271 | ना तरी महासिद्धीसंभ्रमें । जिंतला त्रासु भ्रमे । मग आकळुनि कामें । दीनु कीजे ॥ २७१ ॥ |
1 | null | 272 | तैसा तो धनुर्धरु । अत्यंत दुःखें जर्जरु । दिसे जेथ रहंवरु । त्यजिला तेणें ॥ २७२ ॥ |
1 | null | 273 | मग धनुष्यबाण सांडिले । न धरत अश्रुपात आले । ऐसें ऐके राया तेथ वर्तलें । संजयो म्हणे ॥ २७३ ॥ |
1 | null | 274 | आता यावरी तो वैकुंठ्नाथु । देखोनि सखेद पार्थु । कवणेपरी परमार्थु । निरुपील ॥ २७४ ॥ |
1 | null | 275 | ते सविस्तर पुढारी कथा, अति सकौतुक ऐकतां।
ज्ञानदेव म्हणे आतां निवृत्तिदासु ॥ २७५ ॥ |
1 | null | null | ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ |
null | null | null | null |
2 | 2.01 | null | संजय उवाच : तं तथा कृपयाविष्टमश्रूपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १॥ |
2 | null | 1 | मग संजयो म्हणे रायातें, आइकें तो पार्थु तेथें। शोकाकुल रुदनातें, करितुसे ॥ १॥ |
2 | null | 2 | तें कुळ देखोनि समस्त, स्नेह उपनलें अद्भुत। तेणें द्रवले असे चित्त, कवणेपरी ॥ २ ॥ |
2 | null | 3 | जैसें लवण जळें झळंबलें, ना तरी अभ्र वातें हाले। तैसे सधीर परी विरमलें, हृदय तयाचें ॥ ३॥ |
2 | null | 4 | म्हणोनि कृपा आकळिला, दिसतसे अति कोमाइला। जैसा कर्दमीं रुपला, राजहंस ॥ ४ ॥ |
2 | null | 5 | तयापरी तो पांडुकुमरु, महामोहें अतिजर्जरु। देखोनि, शार्गङधरु, काय बोले ॥ ५ ॥ |
2 | 2.02 | null | श्रीभगवानुवाच : कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तीकरमर्जुन ॥ २ ॥ |
2 | null | 6 | म्हणे अर्जुना आदि पाहीं, हें उचित काय इये ठायीं। तूं कवण हें कायी, करीत आहासी ॥ ६ ॥ |
2 | null | 7 | तुज सांगे काय जाहलें, कवण उणें आलें। करितां काय ठेलें, खेदु कायिसा ॥ ७ ॥ |
2 | null | 8 | तूं अनुचिता चित्त नेदिसी, धीरु कंहीच न संडिसी। तुझेनि नामे अपयशीं, दिशा लंघिजे ॥ ८ ॥ |
2 | null | 9 | तू शूरवृत्तीचा ठावो, क्षत्रियांमाजीं रावो। तुझिया लाठेपणाचा आवो, तिहीं लोकीं ॥ ९ ॥ |
2 | null | 10 | तुवा संग्रामीं हरु जिंतिला, निवात्कवचांचा ठावो फेडिला। पवाडा तुवां केला, गंधर्वासी ॥ १० ॥ |
2 | null | 11 | हें पाहता तुझेनि पाडें, दिसे त्रैलोक्यही थोकडें। ऐसें पौरुष चोखडें, पार्था तुझे ॥ ११ ॥ |
2 | null | 12 | तो तूं कीं आजि एथें, सांडुनिया वीरवृत्तीतें। अधोमुख रुदनातें, करितु आहासी ॥ १२ ॥ |
2 | null | 13 | विचारीं तूं अर्जुनु, कीं कारुण्यें कीजसी दीनु। सांग पां अंधकारे, भानु ग्रासिला आथी ॥ १३ ॥ |
2 | null | 14 | ना तरी पवनु मेघासी बिहे, कीं अमृतासी मरण आहे। पाहे पा इंधनचि गिळोनि जाये, पावकातें ॥ १४ ॥ |
2 | null | 15 | की लवणेंचि जळ विरे, संसर्गें काळकूट मरे। सांग महाफणी दर्दुरें, गिळिजे कायी ॥ १५ ॥ |
2 | null | 16 | सिंहासी झोंबे कोल्हा, ऐसा अपाडु आथी कां जाहला। परी तो त्वां साच केला, आजि एथ ॥ १६ ॥ |
2 | null | 17 | म्हणोनि अझुनि अर्जुना, झणें चित्त देसी या हीना। वेगीं धीर करूनियां मना, सावधान होईं ॥ १७ ॥ |
2 | null | 18 | सांडी हे मूर्खपण, उठीं घे धनुष्यबाण, संग्रामीं हें कवण, कारुण्य तुझे ॥ १८ ॥ |
2 | null | 19 | हां गा तू जाणता, तरी न विचारीसी कां आता। सांगे झुंजावेळें सदयता, उचित कायी ॥ १९ ॥ |
2 | null | 20 | हे असतिये कीर्तीसी नाशु, आणि पारत्रिकासी अपभ्रंशु। म्हणे जगन्निवासु, अर्जुनातें ॥ २० ॥ |
2 | 2.03 | null | क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं ह्रदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ |
2 | null | 21 | म्हणोनि शोक न करीं, तूं पुरता धीरु धरीं। हे शोच्यता अव्हेरीं, पंडुकुमरा ॥ २१ ॥ |
2 | null | 22 | तुज नव्हे हें उचित, येणें नासेल जोडले बहुत। तूं अझुनिवरी हित, विचारी पां ॥ २२ ॥ |
2 | null | 23 | येणें संग्रामाचेनि अवसरें, एथ कृपाळुपण नुपकरे। हे आतांचि काय सोयरे, जाहले तुज ॥ २३ ॥ |
2 | null | 24 | तूं आधींचि काय नेणसी, कीं गोत्र नोळखसी। वायांचि काय करिसी, अतिशो आतां ॥ २४ ॥ |
2 | null | 25 | आजिंचे हें काय झुंज, काय जन्मा नवल तुज। हें परस्परें तुम्हां व्याज, सदाचि आथि ॥ २५ ॥ |
2 | null | 26 | तरी आतां काय जाहलें, कायि स्नेह उपनले। हें नेणिजे परि कुडे केले, अर्जुना तुवा ॥ २६ ॥ |
2 | null | 27 | मोह धरिलिया ऐसें होईल, जे असती प्रतिष्ठा जाईल। आणि परलोकही अंतरेल, ऐहिकेंसी ॥ २७ ॥ |
2 | null | 28 | हृदयाचे ढिलेपण, एथ निकयासी नव्हे कारण। हें संग्रामीं पतन जाण, क्षत्रीयांसी ॥ २८ ॥ |
2 | null | 29 | ऐसेनि तो कृपावंतु, नानापरी असे शिकवितु। हे ऐकोनि पंडुसुतु, काय बोले ॥ २९ ॥ |
2 | 2.04 | null | अर्जुन उवाचः कथं च भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४॥ |
2 | null | 30 | देवा हें येतुलेवरी, बोलावे नलगे अवधारीं। आधीं तूंचि चित्ती विचारीं, संग्रामु हा ॥ ३० ॥ |
2 | null | 31 | हें झुंज नव्हे प्रमादु, एथ प्रवर्तलिया दिसतसे बाधु। हा उघडा लिंगभेदु, वोढवला आम्हा ॥ ३१ ॥ |
2 | null | 32 | देखें मातापितरें अर्चिजती, सर्वस्वें तोष पावविजती, तियें पाठीं केवीं वधिजती, आपुला हातीं ॥ ३२ ॥ |
2 | null | 33 | देवा संतवृंदु नमस्कारिजे, कां घडे तरी पूजिजे। हें वांचूनि केवीं निंदिजे, स्वयें वाचा ॥ ३३ ॥ |
2 | null | 34 | तैसे गोत्रगुरु आमुचे, हे पूजनीय आम्हां नियमांचे। मज बहुत भीष्मद्रोणांचे, वर्ततसे ॥ ३४ ॥ |
2 | null | 35 | जयालागीं मनें विरु, आम्ही स्वप्नींही न शको धरूं। तया प्रत्यक्ष केवीं, घातु देवा ॥ ३५ ॥ |
2 | null | 36 | वर जळो हें जियालें, एथ आघवेयांसी हेंचि काय जाहले। जे यांचां वधीं अभ्यासिलें, मिरविजे आम्हीं ॥ ३६ ॥ |
2 | null | 37 | मी पार्थु द्रोणाचा केला, येणें धनुर्वेदु मज दिधला। तेणें उपकारें काय आभारैला, वधीं तयातें ॥ ३७ ॥ |
2 | null | 38 | जेथींचिया कृपा लाभिजे वरु, तेथेंचि मने व्यभिचारु। तरी काय मी भस्मासुरु, अर्जुन म्हणे ॥ ३८ ॥ |
2 | 2.05 | null | गुरूनहत्वा हि महानुभवान् श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥ |
2 | null | 39 | देवा समुद्र गंभीर आइकिजे, वर तोहि आहाच देखिजे। परी क्षोभु मनीं नेणिजे, द्रोणाचिये ॥ ३९ ॥ |
2 | null | 40 | हें अपार जें गगन, वर तयाही होईल मान। परि अगाध भलें गहन, हृदय यांचे ॥ ४० ॥ |
2 | null | 41 | वरी अमृतही विटे, कीं काळवशें वज्र फुटे। परि मनोधर्मु न लोटे, विकरविला हा ॥ ४१ ॥ |
2 | null | 42 | स्नेहालागीं माये, म्हणिपे तें कीरु होये। परि कृपा ते मूर्त आहे, द्रोणीं इये ॥ ४२ ॥ |
2 | null | 43 | हा कारुण्याची आदि, सकळ गुणांचा निधि। विद्यासिंधु निरवधि, अर्जुन म्हणे ॥ ४३ ॥ |
2 | null | 44 | हा येणें मानें महंतु, वरी आम्हांलागी कृपावंतु। आतां सांग पां येथ घातु, चिंतूं येईल ॥ ४४ ॥ |
2 | null | 45 | ऐसे हे रणीं वधावे, मग आपण राज्यसुख भोगावें। तें मना न ये आघवें, जीवितेंसीं ॥ ४५ ॥ |
2 | null | 46 | हें येणें मानें दुर्भर, जे याहीहुनि भोग सधर। ते असतु येथवर, भिक्षा मागतां भली ॥ ४६ ॥ |
2 | null | 47 | ना तरी देशत्यागें जाइजे, का गिरिकंदर सेविजे। परी शस्त्र आतां न धरिजे, इयांवरी ॥ ४७ ॥ |
2 | null | 48 | देवा नवनिशतीं शरीं, वावरोनि यांचां जिव्हारीं। भोग गिंवसावे रुधिरीं, बुडाले जे ॥ ४८ ॥ |
2 | null | 49 | ते काढूनि काय कीजती, लिप्त केवीं सेविजती। मज न ये हे उपपत्ति, याचिलागीं ॥ ४९ ॥ |
2 | null | 50 | ऐसे अर्जुन तिये अवससरीं, म्हणे श्रीकृष्णा अवधारीं। परि ते मना न येचि मुरारी, आइकोनियां ॥ ५० ॥ |
2 | null | 51 | हें जाणोनि पार्थु बिहाला, मग पुनरपि बोलों लागला, म्हणे देवो कां चित्त या बोलां, देतीचिना ॥ ५१ ॥ |
2 | 2.06 | null | न चैतद् विद्मः करतन् नो गरीयो यद् वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ |
2 | null | 52 | येर्ह वीं माझां चित्तीं जें होते, तें मी विचारूनि बोलिलों एथें। परि निकें काय यापरौते, तें तुम्ही जाणा ॥ ५२ ॥ |
2 | null | 53 | पै विरु जयांसी ऐकिजे, आणि या बोलाचि प्राणु सांडिजे। ते एथ संग्रामव्याजें, उभे आहाती ॥ ५३ ॥ |
2 | null | 54 | आतां ऐसेयांतें वधावे, कीं अव्हेरुनिया निघावें। या दोहोंमाजी काइ करावे, तें नेणों आम्ही ॥ ५४ ॥ |
2 | 2.07 | null | कार्पण्यदोषोपहत्स्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः। यत् श्रेयः स्यान् निश्चितं ब्रूहि तन् मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७॥ |
2 | null | 55 | आम्हां काय उचित, तें पाहतां न स्फुरे एथ। जे मोहें येणें चित्त, व्याकुळ माझे ॥ ५५ ॥ |
2 | null | 56 | तिमिरावरुद्ध जैसें, दृष्टीचे तेज भ्रंशे। मग पांसीच असतां न दिसे, वस्तुजात ॥ ५६ ॥ |
2 | null | 57 | देवा मज तैसे जाहले, जें मन भ्रांती ग्रासिलें। आतां काय हित आपुलें, तेंही नेणे ॥ ५७ ॥ |
2 | null | 58 | तरी श्रीकृष्णा तुवां जाणावें, निकें तें आम्हां सांगावें। जे सखा सर्वस्व आघवें, आम्हांसी तूं ॥ ५८ ॥ |
2 | null | 59 | तूं गुरु बंधु पिता, तूं आमची इष्ट देवता। तूंचि सदा रक्षिता, आपदीं आमुतें ॥ ५९ ॥ |
2 | null | 60 | जैसा शिष्यांते गुरु, सर्वथा नेणे अव्हेरु। कीं सरितांते सागरु, त्यजी केवीं ॥ ६०॥ |
2 | null | 61 | नातरी अपत्यातें माये, सांडुनि जरी जाये। तरी ते कैसेनिं जिये, ऐकें कृष्णा ॥ ६१ ॥ |
2 | null | 62 | तैसा सर्वांपरी आम्हांसी, देवा तूंचि एक आहासी। आणि बोलिलें जरी न मानिसी, मागील माझें ॥ ६२ ॥ |
2 | null | 63 | तरी उचित काय आम्हां, जे व्यभिचरेना धर्मा। तें झडकरी पुरुषोत्तमा, सांगें आतां ॥ ६३ ॥ |
2 | 2.08 | null | न हि प्रपश्यामि ममापुनुद्याद् यच्छोकमुछोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥ |
2 | null | 64 | हें सकळ कुळ देखोनि, जो शोकु उपजलासे मनीं। तो तुझिया वाक्यावांचुनि, न जाय आणिकें ॥ ६४ ॥ |
2 | null | 65 | एथ पृथ्वीतळ आपु होईल, हें महेंद्रपदही पाविजेल। परि मोह हा न फिटेल, मानसींचा ॥ ६५ ॥ |
2 | null | 66 | जैसीं बीजें सर्वथा आहाळलीं, तरी सुक्षेत्री जर्ही पेरिलीं। तरी न विरुढती सिंचलीं, आवडे तैसीं ॥ ६६ ॥ |
2 | null | 67 | ना तरी आयुष्य पुरलें आहे, तरी औषधें काही नोहे। एथ एकचि उपेगा जाये, परमामृत ॥ ६७ ॥ |
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