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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 59 | 13 | एवमुक्त्वा सुतं पूरुं ययातिर्नहुषात्मजः । देवयानीसुतं क्रुद्धो राजा वाक्यमुवाच ह ।। 7.59.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 14 | राक्षसस्त्वं मया जातः पुत्ररूपो दुरासदः । प्रतिहंसि ममाज्ञां यत् प्रजार्थे विफलो भव ।। 7.59.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 15 | पितरं गुरुभूतं मां यस्मात्त्वमवमन्यसे । राक्षसान्यातुधानांस्त्वं जनयिष्यसि दारुणान् ।। 7.59.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 16 | न तु सोमकुलोत्पन्ने वंशे स्थास्यति दुर्मतेः । वंशो ऽपि भवतस्तुल्यो दुर्विनीतो भविष्यति ।। 7.59.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 17 | तमेवमुक्त्वा राजर्षिः पूरुं राज्यविवर्धनम् । अभिषेकेण सम्पूज्य आश्रमं प्रविवेश ह ।। 7.59.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 18 | ततः कालेन महता दिष्टान्तमुपजग्मिवान् । त्रिदिवं सङ्गतो राजा ययातिर्नहुषात्मजः ।। 7.59.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 19 | पूरुश्चकार तद्राज्यं धर्मेण महता वृतः । प्रतिष्ठाने पुरवरे काशिराज्ये महायशाः ।। 7.59.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 20 | यदुस्तु जनयामास यातुधानान्सहस्रशः । पुरे क्रौञ्चवने दुर्गे राजवंशबहिष्कृतः ।। 7.59.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 21 | एष तूशनसा मुक्तः शापोत्सर्गो ययातिना । धारितः क्षत्रधर्मेण यन्निमिश्च न चक्षमे ।। 7.59.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 22 | एतत्ते सर्वमाख्यातं दर्शनं सर्वकारिणाम् । अनुवर्तामहे सौम्य दोषो न स्याद्यथा नृगे ।। 7.59.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 23 | इति कथयति रामे चन्द्रतुल्यानने च प्रविरलतरतारं व्योम जज्ञे तदानीम् । अरुणकिरणरक्ता दिग्बभौ चैव पूर्वा कुसुमरसविमुक्तं वस्त्रमाकुण्ठितेव ।। 7.59.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 59 | 24 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ।। 59 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 1 | तयोः संवदतोरेवं रामलक्ष्मणयोस्तदा । वासन्तिकी निशा प्राप्ता न शीता न च घर्मदा ।। 7.60.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 2 | ततः प्रभाते विमले कृतपौर्वाह्णिकक्रियः । अभिचक्राम काकुत्स्थो दर्शनं पौरकार्यवित् ।। 7.60.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 3 | ततः सुमन्त्रस्त्वागम्य राघवं वाक्यमब्रवीत् । एते प्रतिहता राजन्द्वारि तिष्ठन्ति तापसाः ।। 7.60.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 4 | भार्गवच्यवनं चैव पुरस्कृत्य महर्षयः । दर्शनं ते महाराज्ञश्चोदयन्ति कृतत्वराः । प्रीयमाणा नरव्याघ्र यमुनातीरवासिनः ।। 7.60.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 5 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः प्रोवाच धर्मवित् । प्रवेश्यन्तां महाभागा भार्गवप्रमुखा द्विजाः ।। 7.60.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 6 | राज्ञस्त्वाज्ञां पुरस्कृत्य द्वाःस्थो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः । प्रवेशयामास तदा तापसान्सुदुरासदान् ।। 7.60.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 7 | शतं समधिकं तत्र दीप्यमानं स्वतेजसा । प्रविष्टं राजभवनं तापसानां महात्मनाम् ।। 7.60.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 8 | ते द्विजाः पूर्णकलशैः सर्वतीर्थाम्बुसत्कृतैः । गृहीत्वा फलमूलं च रामस्याभ्याहरन्बहु ।। 7.60.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 9 | प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं रामः प्रीतिपुरस्कृतः । तीर्थोदकानि सर्वाणि फलानि विविधानि च ।। 7.60.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 10 | उवाच च महाबाहुः सर्वानेव महामुनीन् । इमान्यासनमुख्यानि यथार्हमुपविश्यताम् ।। 7.60.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 11 | रामस्य भाषितं श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः । बृसीषु रुचिराख्यासु निषेदुः काञ्चनीषु ते ।। 7.60.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 12 | उपविष्टानृषींस्तत्र दृष्ट्वा परपुरञ्जयः । प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ।। 7.60.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 13 | किमागमनकार्यं वः किं करोमि समाहितः । आज्ञाप्यो ऽहं महर्षीणां सर्वकामकरः सुखम् ।। 7.60.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 14 | इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् । सर्वमेतद्द्विदार्थं मे सत्यमेतद्ब्रवीमि वः ।। 7.60.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 15 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा साधुकारो महानभूत् । ऋषीणामुग्रतपसां यमुनातीरवासिनाम् ।। 7.60.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 16 | ऊचुश्च ते महात्मानो हर्षेण महता वृताः । उपपन्नं नरश्रेष्ठ तवैव भुवि नान्यतः ।। 7.60.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 17 | बहवः पार्थिवा राजन्नतिक्रान्ता महाबलाः । कार्यस्य गौरवं मत्वा प्रतिज्ञां नाभ्यरोचयन् ।। 7.60.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 18 | त्वया पुनर्ब्राह्मणगौरवादियं कृता प्रतिज्ञा ह्यनवेक्ष्य कारणम् । ततश्च कर्ता ह्यसि नात्र संशयो महाभयात्ऺत्रातुमृषींस्त्वमर्हसि ।। 7.60.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 60 | 19 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे षष्टितमः सर्गः ।। 60 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 1 | एवं ब्रुवद्भिर्ऋषिभिः काकुत्स्थो वाक्यमब्रवीत् । किं कार्यं ब्रूत मुनयो भयं तावदपैतु वः ।। 7.61.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 2 | तथा ब्रुवति काकुत्स्थे भार्गवो वाक्यमब्रवीत् । भयानां शृणु यन्मूलं देशस्य च नरेश्वर ।। 7.61.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 3 | पूर्वं कृतयुगे राजन्दैतेयः सुमहाबलः । लोलापुत्रो ऽभवज्ज्येष्ठो मधुर्नाम महासुरः ।। 7.61.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 4 | ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च बुद्ध्या च परिनिष्ठितः । सुरैश्च परमोदारैः प्रीतिस्तस्यातुला ऽभवत् ।। 7.61.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 5 | स मधुर्वीर्यसम्पन्नो धर्मे च सुसमाहितः । बहुवर्षसहस्राणि रुद्रप्रीत्या ऽकरोत्तपः ।। 7.61.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 6 | रुद्रः प्रीतो ऽभवत्तस्मै वरं दातुं ययौ च सः । बहुमानाच्च रुद्रेण दत्तस्तस्याद्भुतो वरः ।। 7.61.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 7 | शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य महावीर्यं महाप्रभम् । ददौ महात्मा सुप्रीतो वाक्यं चैतदुवाच ह ।। 7.61.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 8 | त्वयायमतुलो धर्मो मत्प्रसादकरः कृतः । प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यायुधमुत्तमम् ।। 7.61.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 9 | यावत्सुरैश्च विप्रैश्च न विरुध्येर्महासुर । तावच्छूलं तवेदं स्यादन्यथा नाशमेप्यति ।। 7.61.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 10 | यश्च त्वामभियुञ्जीत युद्धाय विगतज्वरः । तं शूलो भस्मसात्कृत्वा पुनरेष्यति ते करम् ।। 7.61.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 11 | एवं रुद्राद्वरं लब्ध्वा भूय एव महासुरः । प्रणिपत्य महादेवं वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.61.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 12 | भगवन्मम वंशस्य शूलमेतदनुत्तमम् । भवेत्तु सततं देव सुराणामीश्वरो ह्यसि ।। 7.61.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 13 | तं ब्रुवाणं मधुं देवः सर्वभूतपतिः शिवः । प्रत्युवाच महातेजा नैतदेवं भविष्यति ।। 7.61.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 14 | मा भूत्ते विफला वाणी मत्प्रसादकृता शुभा । भवतः पुत्रमेकं तु शूलमेतद्भजिष्यते ।। 7.61.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 15 | यावत्करस्थः शूलो ऽयं भविष्यति सुतस्य ते । अवध्यः सर्वभूतानां शूलहस्तो भविष्यति ।। 7.61.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 16 | एवं मधुर्वरं लब्ध्वा देवात्सुमहदद्भुतम् । भवनं सो ऽसुरश्रेष्ठः कारयामास सुप्रभम् ।। 7.61.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 17 | तस्य पत्नी महाभागा प्रिया कुम्भीनसीति या । विश्वावसोरपत्यं सा ह्यनलायां महाप्रभा ।। 7.61.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 18 | तस्याः पुत्रो महावीर्यो लवणो नाम दारुणः । बाल्यात्प्रभृति दुष्टात्मा पापान्येव समाचरत् ।। 7.61.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 19 | तं पुत्रं दुर्विनीतं तु दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः । मधुः स शोकमापेदे न चैनं किञ्चिदब्रवीत् ।। 7.61.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 20 | स विहाय त्विमं लोकं प्रविष्टो वरुणालयम् । शूलं निवेश्य लवणे वरं तस्मै न्यवेदयत् ।। 7.61.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 21 | स प्रभावेण शूलस्य दौरात्म्येनात्मनस्तथा । सन्तापयति लोकांस्त्रीन्विशेषेण च तापसान् ।। 7.61.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 22 | एवंप्रभावो लवणः शूलं चैव तथाविधम् । श्रुत्वा प्रमाणं काकुत्स्थ त्वं हि नः परमा गतिः ।। 7.61.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 23 | बहवः पार्थिवा राम भयार्तैर्ऋषिभिः पुरा । अभयं याचिता वीर त्रातारं न च विद्महे ।। 7.61.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 24 | ते वयं रावणं श्रुत्वा हतं सबलवाहनम् । त्रातारं विद्महे तात नान्यं भुवि नराधिपम् । तत्परित्रातुमिच्छामो लवणाद्भयपीडितान् ।। 7.61.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 25 | इति राम निवेदितं तु ते भयजं कारणमुत्थितं च यत् । विनिवारयितुं भवान्क्षमः कुरु तं काममहीनविक्रम ।। 7.61.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 61 | 26 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ।। 61 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 1 | तथोक्ते तानृषीन्रामः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः । किमाहारः किमाचारो लवणः क्व च वर्तते ।। 7.62.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 2 | राघवस्य वचः श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते । ततो निवेदयामासुर्लवणो ववृधे यथा ।। 7.62.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 3 | आहारः सर्वसत्त्वानि विशेषेण च तापसाः । आचारो रौद्रता नित्यं वासो मधुवने तथा ।। 7.62.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 4 | हत्वा बहुसहस्राणि सिंहव्याघ्रमृगद्विपान् । मानुषांश्चैव कुरुते नित्यमाहारमाह्निकम् ।। 7.62.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 5 | ततो ऽन्तराणि सत्त्वानि खादते स महाबलः । संहारे समनुप्राप्ते व्यादितास्य इवान्तकः ।। 7.62.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 6 | तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यमुवाच स महामुनीन् । घातयिष्यामि तद्रक्षो ह्यपगच्छतु वो भयम् ।। 7.62.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 7 | प्रतिज्ञाय तथा तेषां मुनीनामुग्रतेजसाम् । स भ्रातऽन्सहितान्सर्वानुवाच रघुनन्दनः ।। 7.62.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 8 | को हन्ता लवणं वीरः कस्यांशः स विधीयताम् । भरतस्य महाबाहोः शत्रुघ्नस्य च धीमतः ।। 7.62.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 9 | राघवेणैवमुक्तस्तु भरतो वाक्यमब्रवीत् । अहमेनं वधिष्यामि ममांशः स विधीयताम् ।। 7.62.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 10 | भरतस्य वचः श्रुत्वा धैर्यशौर्यसमन्वितम् । लक्ष्मणावरजस्तस्थौ हित्वा सौवर्णमासनम् ।। 7.62.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 11 | शत्रुघ्नस्त्वब्रवीद्वाक्यं प्रणिपत्य नराधिपम् । कृतकर्मा महाबाहुर्मध्यमो रघुनन्दनः ।। 7.62.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 12 | आर्येण हि पुरा शून्या त्वयोध्या परिपालिता । सन्तापं हृदये कृत्वा आर्यस्यागमनं प्रति ।। 7.62.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 13 | दुःखानि च बहूनीह ह्यनुभूतानि पार्थिव । शयानो दुःखशय्यासु नन्दिग्रामे ऽवसत्पुरा ।। 7.62.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 14 | फलमूलाशनो भूत्वा जटी चीरधरस्तथा । अनुभूयेदृशं दुःखमेष राघवनन्दनः । प्रेष्ये मयि स्थिते राजन्न भूयः क्लेशमाप्नुयात् ।। 7.62.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 15 | तथा ब्रुवति शत्रुघ्ने राघवः पुनरब्रवीत् । एवं भवतु काकुत्स्थ क्रियतां मम शासनम् ।। 7.62.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 16 | राज्ये त्वामभिषेक्ष्यामि मधोस्तु नगरे शुभे । निवेशय महाबाहो भरतं यद्यवेक्षसे ।। 7.62.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 17 | शूरस्त्वं कृतविद्यश्च समर्थश्च निवेशने ।। 7.62.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 18 | यो हि शत्रुं समुत्पाट्य पार्थिवस्य पुनः क्षये । न विधत्ते नृपं तत्र नरकं स हि गच्छति ।। 7.62.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 19 | स त्वं हत्वा मधुसुतं लवणं पापनिश्चयम् । राज्यं प्रशाधि धर्मेण वाक्यं मे यद्यवेक्षसे ।। 7.62.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 20 | उत्तरं च न वक्तव्यं शूर वाक्यान्तरे मम । बालेन पूर्वजस्याज्ञा कर्तव्या नात्र संशयः ।। 7.62.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 21 | अभिषेकं च काकुत्स्थ प्रतीच्छस्व मयोद्यतम् । वसिष्ठप्रमुखैर्विप्रैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ।। 7.62.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 62 | 22 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ।। 62।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 1 | एवमुक्तस्तु रामेण परां व्रीडामुपागमत् । शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो मन्दं मन्दमुवाच ह ।। 7.63.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 2 | अधर्मं विद्म काकुत्स्थ ह्यस्मिन्नर्थे नरेश्वर । कथं तिष्ठत्सु ज्येष्ठेषु कनीयानभिषिच्यते ।। 7.63.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 3 | अवश्यं करणीयं च शासनं पुरुषर्षभ । तव चैव महाभाग शासनं दुरतिक्रमम् ।। 7.63.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 4 | त्वत्तो मया श्रुतं वीर श्रुतिभ्यश्च मया श्रुतम् । नोत्तरं हि मया वाच्यं मध्यमे प्रतिजानति ।। 7.63.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 5 | व्याहृतं दुर्वचो घोरं हन्तास्मि लवणं मृधे । तस्यैवं मे दुरुक्तस्य दुर्गतिः पुरुषर्षभ ।। 7.63.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 6 | उत्तरं नहि वक्तव्यं ज्येष्ठेनाभिहिते पुनः । अधर्मसहितं चैव परलोकविवर्जितम् ।। 7.63.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 7 | सो ऽहं द्वितीयं काकुत्स्थ न वक्ष्यामि तवोत्तरम् । मा द्वितीयेन दण्डो वै निपतेन्मयि मानद ।। 7.63.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 8 | कामकारो ह्यहं राजंस्तवास्मि पुरुषर्षभ । अधर्मं जहि काकुत्स्थ मत्कृते रघुनन्दन ।। 7.63.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 9 | एवमुक्ते तु शूरेण शत्रुघ्नेन महात्मना । उवाच रामः संहृष्टो भरतं लक्ष्मणं तथा ।। 7.63.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 10 | सम्भारानभिषेकस्य आनयध्वं समाहिताः । अद्यैव पुरुषव्याघ्रमभिषेक्ष्यामि राघवम् ।। 7.63.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 11 | पुरोहितं च काकुत्स्थं नैगमानृत्विजस्तथा । मन्त्रिणश्चैव तान्सर्वानानयध्वं ममाज्ञया ।। 7.63.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 12 | राज्ञः शासनमाज्ञाय तथा ऽकुर्वन्महारथाः । अभिषेकसमारम्भं पुरस्कृत्य पुरोधसम् । प्रविष्टा राजभवनं राजानो ब्राह्मणास्तथा ।। 7.63.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 13 | तथो ऽभिषेको ववृधे शत्रुघ्नस्य महात्मनः । सम्प्रहर्षकरः श्रीमान्राघवस्य पुरस्य च ।। 7.63.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 14 | अभिषिक्तस्तु शत्रुघ्नो बभौ चादित्यसन्निभः । अभिषिक्तः पुरा स्कन्दः सेन्द्रैरिव मरुद्गणैः ।। 7.63.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 15 | अभिषिक्ते तु शत्रुघ्ने रामेणाक्लिष्टकर्मणा । पौराः प्रमुदिताश्चासन्ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः ।। 7.63.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 16 | कौसल्या च सुमित्रा च मङ्गलं केकयी तथा । चक्रुस्ता राजभवने याश्चान्या राजयोषितः ।। 7.63.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 17 | ऋषयश्च महात्मानो यमुनातीरवासिनः । हतं लवणमाशंसुः शत्रुघ्नस्याभिषेचनात् ।। 7.63.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 18 | ततो ऽभिषिक्तं शत्रुघ्नमङ्कमारोप्य राघवः । उवाच मधुरां वाणीं तेजस्तस्याभिपूरयन् ।। 7.63.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 19 | अयं शरस्त्वमोघस्ते दिव्यः परपुरञ्जयः । अनेन लवणं सौम्य हन्ता ऽसि रघुनन्दन ।। 7.63.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 20 | सृष्टः शरो ऽयं काकुत्स्थ यदा शेते महार्णवे ।। 7.63.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 63 | 21 | स्वयम्भूरजितो देवो यन्नापश्यन्सुरासुराः । अदृश्यः सर्वभूतानां तेनायं तु शरोत्तमः ।। 7.63.21 ।। | null |
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