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पंडितजी देखकर गद्गद हो गए।
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मकान में खिड़कियॉँ तक न थीं, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें।
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और क्या!” फिर दो-एक क्षण के बाद उसने पूछा, “खाने का क्या इन्तज़ाम किया है? ” “ अभी कुछ नहीं किया।
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क्या रूप-रंग बहुत खराब है?
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मैंने पूछा। लड़का ना हो, तो मुक्ती कैसे होवे?
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तुम पर भौंकना मेरा फर्ज़ है, मेरे मालिक का फरमान है।
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कुत्ते का बैरी कुत्ता होता है।
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तुम दोनों की छाती पर मूँग दलूँगी।
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पुरोहित जी के जिस्म पर आबले फूट जाने पर लक्षमण ने उन की बड़ी सेवा की थी।
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अब उनके सम्‍मान की सीमा न रही।
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साहब ने उन्हें फ़ौरन बंगले पर बुलाया था।
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हिरामन की जीभ न जाने कब से सूख कर लकड़ी-जैसी हो गई थी!' भैया, तुम्हारा नाम क्या है?' हू-ब-हू फेनूगिलास! ...हिरामन के रोम-रोम बज उठे। मुँह से बोली नहीं निकली।
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मुझे सरकार की नीति पर विश्वास था, और अपने घर में बैठा हुआ मैं अखबारी दुनिया का विश्वास कम करता था।
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लेकिन क़ुसूर और बे-क़ुसूरी की तो बात ही अलाहदा है क्यूँ कि ये कोई सुनने के लिए तैयार नहीं कि उस में होली का गुनाह क्या है, सब गुनाह होली का है।
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टैक्सी जला दी गई थी।
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मम्मी सलाम आलेकुम।' उसने आ कर स्कूल में मिली शिक्षा के अनुसार कहा।
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सोचा, एक सप्ताह की ख़ुराक एक ही साथ ले लूँ।
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फिर बच्चे को उठाये वह सडक़ की तरफ़ चल दिया।
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होली ने रहम जूयाना निगाहों से रसीले की तरफ़ देखा और बोली “जी, मुझसे अनाज की बोरी हिलाई जाती है कहीं?”
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बेचारे नौकरों के साथ खाते और बाहर झोपड़े में पड़े रहते थे।
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लेकिन वो जितनी भी बातें कहते और जितने भी शास्त्रों और पुराणों का हवाला देते, उतना ही अपने मक़सद के ख़िलाफ़ बातें करते और यूँ मैदान हाथ से जाते देख कर सुंदर लाल बाबू उठता, लेकिन वो दो फ़िरक़ों के अलावा कुछ भी न कह पाता।
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मैंने सोचा, ‘युधिष्ठिर की तरह सत्य की रक्षा करूँ तो असत्य-भाषण का पाप न लगेगा। ’
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जब कॉलिज में था तो कई लड़कियां उस पर जान छड़कतीं थीं
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हिरनी के मुख से निकला-“हे रामजी!” रानी साहिबा की नाक से खून की धारा बह चली।
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इस तोते का भी क्या नसीब है!'' सुनार को थैलियाँ भर-भरकर इनाम मिला।
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लोगों के फेंके हुए जूठे दोने, खाली नारियल और बहुत-सी मसली हुई थैलियाँ जहाँ-तहाँ पड़ी थीं।
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मामूँ जी के देस, हाँ हाँ, मामूँ जी के देस. घोड़े .... ” जूँ ही मैंने दहलीज़ में क़दम रखा।
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अभी स्कूल से वापस आते होंगे ......... .
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वालिद साहब अक्सर अपने हाथों से शक्कर का वजन करते हैं।
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पर खाली पेट देश-प्रेम नहीं हो सकता।
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जो वाहगुरु की पूजा करता है, वह और किसी की पूजा नहीं कर सकता।
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वो सी न सकती थी.. .
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लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक कर बोला--मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो!
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हाय! करमवा, होय करमवा .... गाड़ी की बल्ली पर उँगलियों से ताल दे कर गीत को काट दिया
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लाला मूसा के क़रीब लाशों से इतनी मकरूह सड़ादं निकलने लगी कि बल्लोची सिपाही उन्हें बाहर फेंकने पर मजबूर हो गए।
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यह कहकर वह एक कोने से दो छोटी-छोटी गाड़ियाँ निकाल लाया।
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"हां, यह आदमी" सुपरिन्‍टेंडेंट सोच में पड़ गया।
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या यह मेरी जान ले ले, या मैं इसकी जान ले लूँगा। ” और वह पकड़ से छूटने के लिए और भी संघर्ष करने लगा।
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भोजन करते समय मुझे टोका गया –
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कुछ चिड़ियों को खरीदकर उड़ा देती हूँ।
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वैसे ही लज़ीज़, बल्कि पहले से कुछ बढ़ चढ़ कर ही होंगे। ”
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माता कुछ को रूप ( बद-शक्ल ) नाराज़, दिखाई देती थीं।
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बहुत-बहुत पंचलैट देखा है।
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हर कन्या के पिता स्वीकार करेंगे कि मैं सत्पात्र हूं।
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ऐसे में कोई क्या गाड़ी हाँके! एक तो पीठ में गुदगुदी लग रही है।
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गाढ़े में काम न दे, वह मित्र नहीं, दुश्‍मन है।' सामने देखकर,' वह शास्‍त्री जी का ही मकान है, सामने।' था वह किराये का मकान।
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बदशक्ल भी कहे जा सकते थे, पर पुरुषों की भी कहीं सुंदरता देखी जाती है?
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करम सिंह की गोली बर्मा की लडाई में।
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चंपिया की माँ के आँगन में नाकवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह।
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चालीस फुट ऊपर चाली पर चढ़ा आह बूढ़ा केठानी, खड़ा काम कर रहा था।
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रसीले ने आहिस्ता से आँचल को छोड़ा।
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राकसनी ने। जवान हो गई, कहीं शादी-ब्याह की बात भी नहीं चलाई।
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और सब हो जाए लेकिन रांड की गाली उस की बर्दाश्त से बाहर थी।
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रग्घू ने तीनों लड़कों को दरवाजे पर खड़े देखा, पर कुछ बोला नहीं।
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उन्ही लोगों ने जो अभी मारने पे तुले थे, अपने नीचे से पीपल की गूलरें हटा दीं, और फिर से बैठते हुए बोल उठे।
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" सावित्री बोली-'' खान, तुम हमारे घर चले आए।
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फिर कहीं नेकी राम, मुहर्रिर चौकी कुछ कहने के लिए उठते।
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रसीला एक नया मरम्मत किया हुआ छाज हाथ में लिए अंदर दाख़िल हुआ।
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लेकिन आख़िर में मारे गए, बच्चे और मर्द हलाक हो गए तो औरतों की बारी आई और वहीं इसी खुले मैदान में जहां गेहूँ के खलियान लगाए जाते थे और सरसों के फूल मुस्कुराते थे और इफ़्फ़त मआब बीबियाँ अपने खाविंदों की निगाह-ए-शौक़ की ताब न ला कर कमज़ोर शाख़ों की तरह झुकी झुकी जाती थीं।
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उनका कलेजा बड़े वेग से धड़क उठा। उनका एक ही लड़का था।
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चटाई पर कथरी ओढ़ कर बैठती हुई चंपिया ने बिरजू को चुपचाप अपने पास बैठने का इशारा किया, मुफ्त में मार खाएगा बेचारा! बिरजू ने बहन की कथरी में हिस्सा बाँटते हुए चुक्की-मुक्की लगाई।
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आप जैसे उसके नौकर हैं।
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रोज़ रात को ढाई तीन हज़ार डालर मुझे यहां से मिलता है।
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मेरा प्रणाम मामूली प्रणाम नहीं, बडे़ भाग्य से मिलता है।
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बिरजू के बाप ने एक भद्दी गाली दी-' साला! लताड़ मार कर लँगड़ी बनाएगा पुतोहू को!' सभी ठठा कर हँस पड़े।
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अपने देश की कंपनी है।
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इसरानी ने घूँसा मार कर लड़की को नीचे गिरा दिया।
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यह सारी बदमाशी मथुरामोहन कंपनीवालों की है।
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कई लोग उस पेड़ के पास आ जमा हुए।
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सब लोग बाहर चले गए उस की बीवी और लड़की दोनों अंदर दाख़िल हुईं रो रो कर उन का बुरा हाल हो रहा था।
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मजदूरों के साथ रियायत करनी शुरू की। फिर क्या था?
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जैसा कि शाहिदा ने उस को बताया था कि उस का शौहर बहुत प्यार करने वाला है बहुत नेक ख़सलत है लेकिन इस से ये साबित तो नहीं होता कि वो शाहिदा के लिए लाज़िमी था।
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यह कहकर उसने नाम लिखे टिकटों को खोलकर प्लेटफार्म पर फेंक दिया।
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शब-ओ-रोज़ वो नंदू के घर का तवाफ़ करने लगा।
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आम तौर पर मुसाफ़िर वहाँ पहुँच कर शश्दर रह जाते।
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उसकी सौतेली माँ साच्छात राकसनी! बहुत बड़ी नजर-चालक।
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पंद्रह साल की है।
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मुझसे उसने कहा, ‘काका, ये निर्गुण-पद बडे़-बडे़ विद्वान् नहीं समझते। ’
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एक युवक दोनों पांवों को फैलाकर बांस की लग्गी से नाव खे रहा था।
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मां के ही हाथों मेरा लालन-पालन हुआ।
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तुम्हारे गाँव की सब औरतों को अपने दाम में गिरफ़्तार कर सकता हूँ।
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अनावृष्टि के दिनों में फूल की कली के समान जब लड़की एकदम मुर्झा गई तो पिता के प्राण और अधिक सहन न कर सके।
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राखी बंधवा कर वह अपनी बेवा बहन को यही यक़ीन दिलाता था कि अगर्चे उस का सुहाग लुट गया है मगर जब तक उस का भाई ज़िंदा है, उस की रक्षा, उस की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेता है।
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मगर फिर वो एक फ़ैसला-कुन लायहा-ए-अमल मुरत्तब करते हुए चारपाई पर आँखें बंद कर के लेट गया।
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हम दोनों मुस्कुरा दिए।
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मुझे देखते ही बसन्ते ने कहा, “ वह लो, आ गये भाई साहब!” “हम कितनी देर इन्तज़ार कर-करके अब खाना खाने बैठे हैं! ”
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सहरे बाँधे गए। वो और भी जवान हो गया था।
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उस ने चुनांचे कई मर्तबा अपने ख़ाविंद से कहा “दुकान पर तुम क्यों नहीं जाते? ”
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मान त्यागकर वे दौड़कर हमारे दरवाजे पर आए।
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कल नैनीताल जाओगी ?...
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उत्तर में उसने ऊपर से होठ को सिकोड़े और नीचे के अधर को कुछ बढ़ा कर आश्वासन की मुद्रा के साथ कहा-- ‘ई कउन बड़ी बात आय।
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वो जो कुछ कहता था।
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दो दुकानों के बीच से एक सँकरा गलियारा निकलता था।
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सिर पर हाथ रक्खा, बड़े जोर से धड़क रही थी।
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बहुत ख़ूबसूरत। ज़रा संवर जाओ।
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पकड़ लो.....
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हर जिले में कांग्रेस उम्‍मीदवार खड़े हुए।
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पागल !” “ अच्छा है जो पागल हो जाऊं क्या पागलों के लिए इस दुनिया में कोई जगह नहीं इतने सारे पागल हैं
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दूसरा युवक पत्रिका पढ़नेवाली लड़की के सामने, अपने घुटने पर कोहनी टेककर कोई मनमोहक ‘डायलॉग’ बोल रहा था।
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“ले, धो डाल। ” अब होली नहीं जानती बेचारी कि वो रोटियाँ पकाए या दुपट्टा धोए।
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