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जिस गांव हमें जाना था वह पक्की सड़क से बहुत दूर था। | 1 |
रात को माली ने दबे हुए आदमी को दाल-भात खिलाया। | 4 |
हे प्रभो! शरणागत-शरण! तुम्हीं हो- बाबा विश्वनाथ!' कहते हुए मित्र ने पलकें मूंद लीं। | 2 |
बच्चों की बोली जैसी महीन, फेनूगिलासी बोली! मथुरामोहन नौटंकी कंपनी में लैला बननेवाली हीराबाई का नाम किसने नहीं सुना होगा भला! लेकिन हिरामन की बात निराली है! उसने सात साल तक लगातार मेलों की लदनी लादी है, कभी नौटंकी-थियेटर या बायस्कोप सिनेमा नहीं देखा। | 2 |
...क़हाँ चला गया वह जमाना? | 1 |
अत: रहमत का अनुरोध वह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाती थी; | 1 |
गाड़ी पर बैठे-बैठे दोनों को जुड़वाँ बाँध दिया। | 4 |
लुहार की लुहसार बेहद फैल गयी और लुहारिन के अंगों पर सोने के गहनें शोभने लगे और कोतवाल की चतुराई देखकर राजा ने उसे सिरोपा अता किया। | 4 |
उसने होंठ गोल करके एक बार पारसी की तरफ़ देख लिया, फिर खेल देखने में व्यस्त हो गया। | 1 |
मुलिया— दाग-साग सब मिट जायगा। | 2 |
मामा का चेहरा लाल हो उठा, दरिद्र उनको ठगना चाहेगा, किंतु वे ठगे नहीं जाएंगे | 4 |
गेहुँआ रंग था, बड़ी-बड़ी नोकीली पलकें, कपोलों पर हल्की सुर्खी, आँखों में प्रबल आकर्षण। रग्घू उसे देखते ही मंत्र-मुग्ध हो गया। | 1 |
मैं अभी बैंक से अपनी गारंटी पर आपका चैक कैश किराए देता हूँ। | 2 |
भूटिये बाप और अल्सेशियन माँ के रूप-रंग ने उसे जो वर्णसंकरता दी थी, उसके कारण न वह अल्सेशियन था, न भूटिया। रोमों के भूरे, पीले और काले रंगों के सम्मिश्रण से जो रंग बना था, वह एक विशेष प्रकार का धूपछाँही हो गया था। | 1 |
खान को देखते ही सावित्री ने कहा-'' बहुत दिनों में आए खान! हींग तो कब की खत्म हो गई। | 2 |
मुनरी ने हसरत-भरी निगाह से गोधन की ओर देखा। | 4 |
नहाने-धोने कौन जाय, लेकिन इतना कहे देता हूँ कि चाहे चार की जगह छ: रोटियाँ खा जाऊँ, चाहे तू मुझे घी के मटके ही में डुबा दे, पर यह दाग मेरे दिल से न मिटेगा। | 2 |
जूंही फ़सल तैय्यार हुई मैं फ़ौरन ही आप की ख़िदमत में टोकरा लेकर हाज़िर हो जाऊंगा ....... . | 2 |
इलावा अज़ीं सिद्धू हलवाई के घर में उसका जिस्म तेज़ी से बढ़ रहा था और उसे रोटी की शदीद ज़रूरत रहती थी और हर वक़्त महसूस होती रहती थी। | 1 |
बिरजू की माँ को' मौसी' कहके पुकारा-' यह जमीन बाबू जी ने मेरे नाम से खरीदी थी। | 2 |
फिर खेत भी बँट गए थे। | 1 |
चाँदनी, कातिक की! ...खेतों से धान के झरते फूलों की गंध आती है। | 2 |
छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। | 1 |
' जी!'' चलते हुए उपन्यास की एक तस्वीर देखती हुई नम्रता से बोली। | 4 |
कुन्ती ने बच्चों से कहा, तो तुम दोनों भाई यहीं रह जायो, बाबू को जाने दो, है न ठीक? | 2 |
और फिर वही अम्मां .... कुंवार-पन और गरबा नाच! होली ने एक नज़र से शिबू की तरफ़ देखा। | 4 |
पानी के बढ़ने की यह रफ़्तार है तो पता नहीं पानी कितना बढ़े। | 0 |
स्त्री ने जैसे उस पर तरस खाकर कहा। “मेरे पास चम्मच नहीं है, ” | 4 |
...जी, संवाद तो कोई नहीं। मैं कल सिरसिया गांव आया था, तो सोचा कि एक बार चलकर आप लोगों का दर्शन कर लूं। | 2 |
मैके का नाम आते ही उस का तमाम जिस्म एक न मालूम जज़्बे से काँप उठता। | 1 |
सावित्री के बच्चों ने कहा-" हम भी काली का जुलूस देखने जाएंगे। | 2 |
भार मेरे ही ऊपर था, क्योंकि मामा इस बार भी हावड़ा पुल के पार नहीं हुए। | 1 |
आदि से अंत तक उसके लेख में प्राचीन पतिव्रत धर्म और नवीन छायावादी व्यभिचार प्रचारक के कंठ से बोल रहा था। | 1 |
घुस जाए तेरे पेट में माता काली ... | 2 |
महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है गुरू जी!' गला भर आया हीराबाई का। | 2 |
सब चले गए।' चंपिया को तिल-भर भी भरोसा नहीं। | 4 |
जैसा वो अंदर से था वैसा ही वो बाहर से भी नज़र आता था। | 1 |
पन्ना- चल, मैं बूढ़ी हुई। | 2 |
उस रेडिएशन का अनुमान उसके चेहरे की लकीरों से, उसके हाव-भाव से, या उसकी आँखों से नहीं होता। | 2 |
पूछा-'' कितने पैसे हुए खान?'' | 2 |
अल्लाह को जैसा मंजूर होगा। | 1 |
वह सुन्दर थी, अवस्था अभी कुछ ऐसी ज्यादा न थी। | 1 |
मैंने तशरीह करना मुनासिब ना समझा, सिर्फ इतना कहा कि मेरे लिए हांगकांग और कलकत्ता या बंबई के क़हबा ख़ानों में कोई फ़र्क़ नहीं। | 4 |
पृष्ठ एक सौ ग्यारह खोलकर वे हृदय के नए ऑपरेशन का ब्यौरा पढऩे लगे। | 4 |
सुपरिन्टेंडेंट दौड़ा दौड़ा बाहर लॉन में आया। | 4 |
यानी ढेर की ढेर पोथियों के ढेर के ढेर पन्ने फाड़-फाड़कर कलम की नोंक से तोते के मुँह में घुसेड़े जाते थे। | 1 |
मिनी की सगाई की बात पक्की हो गई। | 4 |
इस बात को विष्णु अत्तार जानता है ... . | 2 |
दामन फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी। | 1 |
बोझ से ढका होने के कारण उसका चेहरा नहीं दिखा। | 4 |
तुम्हें अनुभव नहीं होता कि आज वायु किस प्रकार क्रन्दन कर रही है? | 2 |
इसकी तलाशी ली, तो इसकी जेब से ताँबे का एक तावीज़-सा निकला। | 2 |
जैसे हर बिहार के बाद आती है। | 3 |
पं. रामखेलावन जी आश्चर्य और हर्ष से देख रहे थे। | 1 |
किंतु रसोई अच्छी बनी थी और सब-कुछ साफ-सुथरा। | 1 |
फिर वो अपनी कमज़र्फ़ी पर अपने आप ही को कोसता। | 1 |
वो नहीं आएगा माँ... | 2 |
बोला, “पहले मेरा टिक्का दो। | 2 |
हिरामन अब बेखटक हीराबाई की आँखों में आँखें डाल कर बात करता है। | 4 |
वे भी समझेंगे।' पं. रामखेलावन जी दिल से कसमसाए, पर चारा न था। | 1 |
और फिर ये भुट्टे जवान और तवाना हो गए और उनका रस पुख़्ता हो गया। | 4 |
कई विदेशी महिलाओं ने उसे “परफैक्ट जेन्टिलमैंन” की उपाधि दे डाली। | 1 |
सुन्दर संतान को कदाचित् उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। | 3 |
गौरी के स्वभाव से कुन्ती भली-भांति परिचित थी। | 1 |
किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? | 1 |
फिर झगड़ा बढ़ गया। | 4 |
‘‘मायजी, मुझे इसी गाड़ी से वापस जाना होगा। | 2 |
जिनके नाम पर फाका कर रहे हो, उन्होंने मजे से लड़कों को खिलाया और आप खाया, अब आराम से सो रही हैं। | 2 |
बालिका की आँखें सजल हो आईं। | 4 |
तीस और मारे गए। | 4 |
काइस्थों को तो बच्चे चाहिएँ। | 3 |
परन्तु जो हलचल उसकी आँखों में देखने से नहीं होती। | 2 |
गाड़ी पहुंची और तुरन्त भोंपे से आवाज़ अपने-आप निकलने लगी- थाना बिहपुर, खगड़िया और बरौनी जानेवाली यात्री तीन नम्बर प्लेटफार्म पर चले जाएं। | 4 |
सच तो ये है कि ईश्वर ने सब जीव जन्तों को नंगा कर के इस दुनिया भेज दिया है। | 3 |
बहुत दिन से नैहर नहीं गई, सो जाकर देख आवे, यही कहकर और पहना-उढ़ाकर सास ने उसे विदा कर दिया। | 4 |
हँस कर बात उड़ा दी सभी ने। | 4 |
कम-से-कम अभी तो रुक गया है। | 4 |
कौन सा वक़्त? | 2 |
जब मिलती है बड़े अख़लाक़ से पेश आती है ” | 2 |
पहले दाम्पत्य में पुरानी आदतों के कारण जो एक जड़ता-सी आ गई थी, विरह के आकर्षण से वह एकदम टूट गई, और अपने पति को मानो उसने पहले की अपेक्षा कहीं अधिक पूर्णता के साथ पा लिया। | 4 |
तहसील से एक कच्चा रास्ता कीकर और शीशम के तनावर दरख़्तों के दर्मियान साँप की तरह बल खाता हुआ चंद मील जा कर एक बड़े से बड़ के नीचे यक-दम रुक जाता। | 1 |
गधे तो बोझ महसूस ही नहीं करते थे। | 1 |
परंतु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। | 1 |
हिरामन टिकटी पर टिकी गाड़ी पर बैठ गया। | 4 |
मकान 414 की बेवा के अलावा मोहल्ला “मुल्ला शकूर” की बहुत सी औरतें सुंदरलाल बाबू सोशल वर्कर के घर आने से घबराती थीं। | 1 |
अगर्चे बाथू की भुजिया बड़ी ज़ाइक़ा-दार होती है। | 1 |
शास्त्रिणी जी भी जौनपुर से खड़ी होकर सफल हुईं। | 4 |
उसी से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है या झूठ। श्रीकंठ की ऑंखें लाल हो गयीं। | 2 |
क्या औरत इस के बग़ैर ज़िंदा नहीं रह सकती। | 0 |
मैंने भुट्टा एक जगह से खाया। | 4 |
हर गाँव के बच्चे तालियाँ बजा कर गा रहे हैं। | 4 |
जैसे मेरी बिटिया, रहमत को देखते ही, हँसती हुई पूछती," काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला, तुम्हारी झोली के भीतर क्या है? | 2 |
बाढ़ तो बचपन से ही देखता आया हूं, किन्तु पानी का इस तरह आना कभी नहीं देखा। | 4 |
" साहब ने पूछा-" तुम कहां जाओगी? | 2 |
काठ गोदाम के सब आदमियों ने गौरी के हुस्न की तारीफ़ तो सुनी थी, मगर लक्षमण के सिवाए उसे जी भर कर किसी ने न देखा था। | 1 |
उस आदमी की आँखें हठात लाल हो गई। | 4 |
बिरजू की माँ ने जंगी की पुतोहू को देखा, धीरे-धीरे गुनगुना रही है वह भी। कितनी प्यारी पुतोहू है! गौने की साड़ी से एक खास किस्म की गंध निकलती है। | 2 |
" एक क्लर्क ने हैरत से कहा।" पेड़ को हटा कर इसे निकाल लेना चाहिए।" | 2 |
अंत में आनंदी कमरे से निकली और उसका हाथ पकड़ लिया। | 4 |
सारे का सारा काठ गोदाम नंदू के घर पल पड़ा। | 4 |
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