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मैं ध्यान न देता, खास करके जब पाकिस्तान के प्रधान मंत्रीने भी कहा कि इल्जाम मूलमें सही है, तो मुसलमान उन इल्जामोंको वेद-वाक्य माननेवाले थे । मगर अब भले मुसलमानोंके मनमे उनकी सचाईके बारेमें शक है । मै चाहता हूं कि इसपरसे काठियावाड़के और दूसरे मित्र यह पाठ सीखे कि हम अपने घरमे तो किसी तरह की गडबड होने नहीं देंगे, टीकाका स्वागत करेगे, चाहे वह कड़वी टीका ही क्यों न हो; अधिक सच्चे बनेंगे और जब कभी भूल देखनेमे श्रावे उसे सुधारेगे । हम यह सोचनेकी गलती न करें कि हम कभी भूल कर ही नही सकते, कडवी से कड़वी टीका करनेवालेके पास हमारे विरुद्ध कोई-न-कोई सच्ची काल्पनिक शिकायत रहती है अगर हम उसके साथ धीरज रखें, जब कभी मौका आवे उसकी उसे बतावें, हमारी गलती हो तो उसे सुधारें, तो हम टीका करनेभूल वालेको भी सुधार सकते है । ऐसा करनेसे हम कभी रास्ता नहीं भूलेंगे । इसमें कोई शक नहीं कि क्षमता तो रखनी ही होगी । समझदारी और शिनाख्तकी हमेशा जरूरत रहती है । जान-बूझकर शरारतकी ही खातिर जो बयान दिए जाते है उनकी तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए । मैं मानता हूं कि लंबे अभ्यास मै शिनाख्त करना थोड़ा-बहुत सीख गया हूं । आज हवा विगडी हुई है, एक दूसरे पर इल्जाम-ही-इल्जाम लगाए जाते हैं। ऐसी हालत में यह सोचना कि हम गलती कर ही नहीं सकते, मूर्खता होगी । हम ऐसा दावा कर सके वह खुशकिस्मती आज कहां ! अगर मेहनत करके हम झगडेको फैलनेसे रोक सके और फिर उसे जडमूलसे उखाड़ फेके तो बहुत हुआ । यह हम तभी कर सकेंगे अगर हम अपने दोष देखने और सुननेके लिए अपनी और कान खुले रखें । कुदरतने हमें ऐसा बनाया है कि हम अपनी भूल नहीं देख सकते, वह तो दूसरे ही देख सकते है। इसलिए बुद्धिमानी यही है कि जो दूसरे देख सकते हैं उनसे हम फायदा उठावे । कल प्रार्थनामे जाते समय मुझे जो जूनागढ़ से लंबा तार मिला उसकी बात कला पूरी नहीं हो सकी । कल मैने उसपर सरसरी नजर ही डाली थी। प्राज उसे ध्यानपूर्वक पढ़ गया हूं । तार भेजनेवाले कहते हैं कि जिन इल्जामोंका मैंने पहले दिन जिक्र किया था वे सब सच्चे हैं । अगर यह सही है तो काठियावाड़ के लिए बहुत बुरी बात है। अगर जो इल्जाम साथियोंने स्वीकार किए हैं और मैंने छापे हैं उनको बढ़ानेकी कोशिश की गई है तो तार भेजनेवालोंने पाकिस्तानको नुक्सान पहुंचाया है । वे मुझे निमंत्रण देते है कि मैं खुद काठियावाड़ में जाऊं और अपनेआप सब चीजोंकी तहकीकात करूं । मैं समझता हूं कि वे जानते है कि मैं आज ऐसा कर नहीं सकता । वे एक तहकीकात कमीशन मांगते । मगर उससे पहले उन्हें केस तैयार करना चाहिए। मैं मान लेता हूं कि उनका हेतु जूनागढ़को या काठियावाड़को बदनाम करना नहीं है । वे सच निकालना चाहते हैं और अल्पमतकी जानमाल और इज्जतकी रक्षाका पूरा प्रबंध करना चाहते हैं । वे जानते है कि हरएक आदमी जानता है कि अखबारी प्रचार, खास करके जब वह पूरी-पूरी सचाईपर न हो, न जानकी रक्षा कर सकता है, न मालकी, न इज्जतकी। तीनों चीजोंकी रक्षा आज हो सकती है, उसके लिए तार भेजनेवालोंको सचाईपर कायम रहना चाहिए और हिंदू मित्रों के पास जाना चाहिए । वे जानते हैं कि हिंदुओं में उनके मित्र है । वे यह भी जानते हैं कि अगर मैं काठियावाड़से से बहुत दूर बैठा हूं, मगर यहासे भी उनका काम कर रहा हूं । मैंने जान-बूझकर यह बात कह दी और मै सब सच्ची खबरें इकट्ठी कर रहा हूं। मैं सरदार पटेलसे मिला हूं और वे कहते हैं कि जहांतक उनके हाथकी बात है, वे कौमी झगड़ा नहीं होने देंगे और कहीं कोई मुस्लिम भाई-बहनोंसे वदतमीजी करेगा उसे कड़ी सजा दी जायगी । काठियावाड़के कार्यकर्त्ता, जिनके मनमें कोई पक्षपात नहीं, सच ढूंढ़नेकी और काठियावाडके मुसलमानोंको जो तकलीफ पहुंची हो, उसको दूर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं । उन्हें मुसलमान उतने ही प्यारे है जितनी अपनी जान । क्या मुसलमान उनकी मदद करेंगे ? मैने तो आपको कही था कि आज मुझको पानीपत जाना है । इरादा ऐसा था कि ४ बजे वापस आ जाऊगा । लेकिन काम इतना निकल गया था कि बडी मुश्किलसे ५ बजकर ५ मिनट हो गई थी - ३ मिनट तो हो ही गई थी आया । तब प्रार्थनाकी आवाज सुनी । प्रार्थना तो शुरू हो ही जानी चाहिए थी, मै रहूं चाहे न रहूं । मैने तो कह दिया है कि प्रार्थना शुरू हो ही जानी चाहिए नियमके मुताबिक चलना ही चाहिए । पीछे मुह् धोने चला गया इसलिए देर लग गई । मै इसके लिए क्षमा चाहता हूं । मै क्यों पानीपत गया, इसका थोडा-सा तो इशारा कर दिया था । मेरी उम्मीद तो थी और अब भी उम्मीद नही छोड़ आया हूं कि किसी-न-किसी तरह पानीपतके मुसलमानोको रख सकें तो अच्छा है । हमारे लिए तो अच्छा है ही, सारे हिंदुस्तान के लिए भी अच्छा है और जो हिदुस्तान के लिए अच्छा है वह पाकिस्तान के लिए भी अच्छा है । वहां आज लोग मुसीबत मे पडे है । वहांसे जो दुःखी लोग आए हैंदुःखीको शरणार्थी कहते हैं - वे दुःखमें है और रहनेवाले है, जबतक अपने घर नही चले जाते है । वैसे ही मुसलमान मजबूर होकर जो पाकिस्तान गए है वे भी दुःखमे ही रहनेवाले है । इसमे आप कोई शक न रखें । मै धर्मका पालन करता हूं तो वहां चला गया, यह अच्छा हुआ । डाक्टर गोपीचद भार्गव भी आ गए थे, गृह मंत्री सरदार स्वर्णसिह भी आ गए थे। मुझको पता नहीं था कि डाक्टर गोपीचंद आनेवाले थे । सरदार स्वर्णसिहने तो कहला भेजा था कि मेरी दरकार हो तो मै आ सकता हूं। मैने कहा कि दरकार तो नही है; क्योकि जो कुछ करना है, वह करूंगा; लेकिन वे आ गए । पूर्वी पंजाब उनका इलाका है तो उनका तो वह हक है, इसलिए वह भी आ गए । देशबंधु गुप्ताने कहला भेजा था
मैं ध्यान न देता, खास करके जब पाकिस्तान के प्रधान मंत्रीने भी कहा कि इल्जाम मूलमें सही है, तो मुसलमान उन इल्जामोंको वेद-वाक्य माननेवाले थे । मगर अब भले मुसलमानोंके मनमे उनकी सचाईके बारेमें शक है । मै चाहता हूं कि इसपरसे काठियावाड़के और दूसरे मित्र यह पाठ सीखे कि हम अपने घरमे तो किसी तरह की गडबड होने नहीं देंगे, टीकाका स्वागत करेगे, चाहे वह कड़वी टीका ही क्यों न हो; अधिक सच्चे बनेंगे और जब कभी भूल देखनेमे श्रावे उसे सुधारेगे । हम यह सोचनेकी गलती न करें कि हम कभी भूल कर ही नही सकते, कडवी से कड़वी टीका करनेवालेके पास हमारे विरुद्ध कोई-न-कोई सच्ची काल्पनिक शिकायत रहती है अगर हम उसके साथ धीरज रखें, जब कभी मौका आवे उसकी उसे बतावें, हमारी गलती हो तो उसे सुधारें, तो हम टीका करनेभूल वालेको भी सुधार सकते है । ऐसा करनेसे हम कभी रास्ता नहीं भूलेंगे । इसमें कोई शक नहीं कि क्षमता तो रखनी ही होगी । समझदारी और शिनाख्तकी हमेशा जरूरत रहती है । जान-बूझकर शरारतकी ही खातिर जो बयान दिए जाते है उनकी तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए । मैं मानता हूं कि लंबे अभ्यास मै शिनाख्त करना थोड़ा-बहुत सीख गया हूं । आज हवा विगडी हुई है, एक दूसरे पर इल्जाम-ही-इल्जाम लगाए जाते हैं। ऐसी हालत में यह सोचना कि हम गलती कर ही नहीं सकते, मूर्खता होगी । हम ऐसा दावा कर सके वह खुशकिस्मती आज कहां ! अगर मेहनत करके हम झगडेको फैलनेसे रोक सके और फिर उसे जडमूलसे उखाड़ फेके तो बहुत हुआ । यह हम तभी कर सकेंगे अगर हम अपने दोष देखने और सुननेके लिए अपनी और कान खुले रखें । कुदरतने हमें ऐसा बनाया है कि हम अपनी भूल नहीं देख सकते, वह तो दूसरे ही देख सकते है। इसलिए बुद्धिमानी यही है कि जो दूसरे देख सकते हैं उनसे हम फायदा उठावे । कल प्रार्थनामे जाते समय मुझे जो जूनागढ़ से लंबा तार मिला उसकी बात कला पूरी नहीं हो सकी । कल मैने उसपर सरसरी नजर ही डाली थी। प्राज उसे ध्यानपूर्वक पढ़ गया हूं । तार भेजनेवाले कहते हैं कि जिन इल्जामोंका मैंने पहले दिन जिक्र किया था वे सब सच्चे हैं । अगर यह सही है तो काठियावाड़ के लिए बहुत बुरी बात है। अगर जो इल्जाम साथियोंने स्वीकार किए हैं और मैंने छापे हैं उनको बढ़ानेकी कोशिश की गई है तो तार भेजनेवालोंने पाकिस्तानको नुक्सान पहुंचाया है । वे मुझे निमंत्रण देते है कि मैं खुद काठियावाड़ में जाऊं और अपनेआप सब चीजोंकी तहकीकात करूं । मैं समझता हूं कि वे जानते है कि मैं आज ऐसा कर नहीं सकता । वे एक तहकीकात कमीशन मांगते । मगर उससे पहले उन्हें केस तैयार करना चाहिए। मैं मान लेता हूं कि उनका हेतु जूनागढ़को या काठियावाड़को बदनाम करना नहीं है । वे सच निकालना चाहते हैं और अल्पमतकी जानमाल और इज्जतकी रक्षाका पूरा प्रबंध करना चाहते हैं । वे जानते है कि हरएक आदमी जानता है कि अखबारी प्रचार, खास करके जब वह पूरी-पूरी सचाईपर न हो, न जानकी रक्षा कर सकता है, न मालकी, न इज्जतकी। तीनों चीजोंकी रक्षा आज हो सकती है, उसके लिए तार भेजनेवालोंको सचाईपर कायम रहना चाहिए और हिंदू मित्रों के पास जाना चाहिए । वे जानते हैं कि हिंदुओं में उनके मित्र है । वे यह भी जानते हैं कि अगर मैं काठियावाड़से से बहुत दूर बैठा हूं, मगर यहासे भी उनका काम कर रहा हूं । मैंने जान-बूझकर यह बात कह दी और मै सब सच्ची खबरें इकट्ठी कर रहा हूं। मैं सरदार पटेलसे मिला हूं और वे कहते हैं कि जहांतक उनके हाथकी बात है, वे कौमी झगड़ा नहीं होने देंगे और कहीं कोई मुस्लिम भाई-बहनोंसे वदतमीजी करेगा उसे कड़ी सजा दी जायगी । काठियावाड़के कार्यकर्त्ता, जिनके मनमें कोई पक्षपात नहीं, सच ढूंढ़नेकी और काठियावाडके मुसलमानोंको जो तकलीफ पहुंची हो, उसको दूर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं । उन्हें मुसलमान उतने ही प्यारे है जितनी अपनी जान । क्या मुसलमान उनकी मदद करेंगे ? मैने तो आपको कही था कि आज मुझको पानीपत जाना है । इरादा ऐसा था कि चार बजे वापस आ जाऊगा । लेकिन काम इतना निकल गया था कि बडी मुश्किलसे पाँच बजकर पाँच मिनट हो गई थी - तीन मिनट तो हो ही गई थी आया । तब प्रार्थनाकी आवाज सुनी । प्रार्थना तो शुरू हो ही जानी चाहिए थी, मै रहूं चाहे न रहूं । मैने तो कह दिया है कि प्रार्थना शुरू हो ही जानी चाहिए नियमके मुताबिक चलना ही चाहिए । पीछे मुह् धोने चला गया इसलिए देर लग गई । मै इसके लिए क्षमा चाहता हूं । मै क्यों पानीपत गया, इसका थोडा-सा तो इशारा कर दिया था । मेरी उम्मीद तो थी और अब भी उम्मीद नही छोड़ आया हूं कि किसी-न-किसी तरह पानीपतके मुसलमानोको रख सकें तो अच्छा है । हमारे लिए तो अच्छा है ही, सारे हिंदुस्तान के लिए भी अच्छा है और जो हिदुस्तान के लिए अच्छा है वह पाकिस्तान के लिए भी अच्छा है । वहां आज लोग मुसीबत मे पडे है । वहांसे जो दुःखी लोग आए हैंदुःखीको शरणार्थी कहते हैं - वे दुःखमें है और रहनेवाले है, जबतक अपने घर नही चले जाते है । वैसे ही मुसलमान मजबूर होकर जो पाकिस्तान गए है वे भी दुःखमे ही रहनेवाले है । इसमे आप कोई शक न रखें । मै धर्मका पालन करता हूं तो वहां चला गया, यह अच्छा हुआ । डाक्टर गोपीचद भार्गव भी आ गए थे, गृह मंत्री सरदार स्वर्णसिह भी आ गए थे। मुझको पता नहीं था कि डाक्टर गोपीचंद आनेवाले थे । सरदार स्वर्णसिहने तो कहला भेजा था कि मेरी दरकार हो तो मै आ सकता हूं। मैने कहा कि दरकार तो नही है; क्योकि जो कुछ करना है, वह करूंगा; लेकिन वे आ गए । पूर्वी पंजाब उनका इलाका है तो उनका तो वह हक है, इसलिए वह भी आ गए । देशबंधु गुप्ताने कहला भेजा था
परिग्रही जो व्यक्ति होगा, वह चीज़ सब संग्रह करता है। चाहे धन संग्रह करे, चाहे शब्द संग्रह करे, चाहे यश संग्रह करे, इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। एक परिग्रह की वृत्ति है मनुष्य के अन्दर कि इकट्ठा कर लो । लेकिन कुछ चीजें ऐसी है जिनके इकट्ठा करने में कुछ थोड़ा-बहुत अर्थ भी हो सकता हैजैसे कि कोई धन इकट्ठा करे। धन इकट्ठा करने में थोड़ा अर्थ हो सकता क्योकि धन_परिग्रह की वृत्ति से ही पैदा हुआ है और परिग्रही वृत्ति का ही वाहन है, परिग्रही वृत्ति वृत्ति की ही विनिमय मुद्रा है। यानी परिग्रही व्यक्ति का हो धन आविष्कार है । धन का कोई व्यक्ति संग्रह करे तो सार्थक भी है क्योंकि धन परिग्रह का ही माध्यम है और परिग्रह के लिए ही है लेकिन जिस अनुभव से महावीर गुजरे हैं वह अपरिग्रह में घटा है। और उनके शब्दों को जो इकट्ठा कर रहा है, वह परिग्रही वृत्ति का व्यक्ति है । महावीर को उत्सुकता नहीं है शब्द संग्रह की, न बुद्ध को है, न क्राइस्ट को है । वैसे तो महावीर भी किताब लिख सकते थे लेकिन महावीर ने किताब नहीं लिखी, कृष्ण ने भी किताब नहीं लिखी, बुद्ध ने भी किताब नहीं लिखी और जीसस ने भी किताब नहीं लिखी। सिर्फ लाओत्से ने, इन असाधारण लोगों में से, किंताब लिखी और वह भी जबरदस्ती में लिखी । लाओत्से ने अस्सी साल की उम्र तक किताब नहीं लिखी । लोग कहते कि कुछ लिखो । और वह कहता कि जो लिखूंगा वह झूठ हो जाएगा। जो लिखना है वह लिखा नहीं जाता, इसलिए इस उपद्रव में मैं नहीं पड़ता । अस्सी साल तक बचा रहा लेकिन सारे मुल्क में यह भाव पैदा हो गया कि अब बूढ़ा हुआ जाता है, अब मर जाएगा, जो जानता है वह खो जाएगा । अन्तिम उम्र में लाओत्से पर्वतों की तरफ चला गया, सब छोड़-छाड़कर, पता नहीं कि वह कब मरा । उसने कहा कि इससे पहले कि मृत्यु छीने, मुझे खुद ही चला जाना चाहिए । आखिर मृत्यु की प्रतीक्षा क्यों करें, इतना परवश भी क्यों हों ? जब वह चीन की रेखा सीमा छोड़ने लगा तो चीन के सम्राट् ने उसे रुकवा दिया अपनी चुंगी- चौकी पर और कहा कि टैक्स चुकाए बिना नहीं जाने देंगे । लाओत्से ने कहा कैसा टैक्स ? न हम कोई सामान ले जाते है बाहर, न कुछ लाते हैं, अकेले जाते हैं। खाली; सच तो यह है कि जिन्दगी भर से खाली हैं। कुछ सामान कभी गया नहीं जिस पर टैक्स देना पड़े। टैक्स कैसा ? सम्राट् ने बहुत मजाक किया और उससे कहा कि टैक्स तो बहुत-बहुत लिए जाते हैं। इतनी सम्पत्ति कभी कोई आदमी ले हो नहीं गया, सब कुछ न कुछ दे हो जाते हैं। तुम बोलते नहीं हो कि क्या तुम्हारे भीतर है । वह सब चुका दो, कम से कम टैक्स दे दो, सम्पत्ति मत दो; नहीं तो हम क्या कहेंगे, एक आदमी के पास था, वह बिल्कुल ले गया, बिल्कुल ले गया चुपचाप ? ऐसा नहीं हो सकता, इस चुंगो चौकी के बाहर नहीं जाने देंगे। जबरदस्ती लाओत्से को रोक लिया । वह भी हंसा । उसने कहा : बात तो शायद ठीक ही है। लिए तो जाता हूँ। लेकिन देने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए जाता हूँ और कुछ नहीं । देना में भी चाहता हूँ । तब उसने एक छोटी-सी किताब लिखी । उस तरह के असाधारण लोगों में लिखने वाला वह अकेला श्रादमी है । पर पहला ही वाक्य यह लिखा है "बड़ी भूल हुई जाती है, जो कहना है वह कहा नहीं जाता। और जो नहीं कहना है वही कहा जाएगा । सत्य बोला नहीं जा सकता । जो बोला जा सकता है वह सत्य हो नहीं सकता। बड़ी भूल हुई जाती है। और मैं इसको जानकर लिखने बैठा हूँ, इसलिए जो भी आगे पढ़ोगे, इसको जानकर पढ़ना कि सत्य तोला नहीं जा सकता, कहा नहीं जा सकता । और जो कहा जा सकता है, वह सत्य हो नहीं सकता । That which can be said is not the Toa.' इसे पहले समझ लेना फिर किताव पढ़ना ।" तो किसी ने किताब लिखी नहीं जिसने लिखो उसने प्रश्नचिह्न पहले लगा दिया। यानो सच तो यह है कि जो समझ जाएगा उसके आगे किताब पढ़ेगा ही नहीं। मामला यह है कि लाओत्से होशियार आदमी मालूम होता है। राजा समझा कि हम चुंगो ले रहे है । वह गल्ती में पड़ गया । जो समझेगा वह उसके आगे किताब पढ़ेगा नहीं ।" बात खत्म हो गई है । जो नहीं. समझेगा वह पढ़ डालेगा । उससे कोई मतलब नहीं । तो नासमझ किताबें पढ़ते हैं, समझदार रुक जाते हैं । बुद्ध महावीर जैसे लोगों ने किताब नहीं लिखी। कारण हैं बहुत । पक्का नहीं है कि जो कहना है वह कहा जा सकता है। फिर भी कहा । कहने का माध्यम उन्होंने चुना, लिखने का नहीं चुना । इसका भी कारण है। क्योंकि कहने का माध्यम प्रत्यक्ष है आमने-सामने और मैं गया, आप गए कि खो गया । लिखने का माध्यम स्थायी है, आमने-सामने नहीं है । परोक्ष है । न मैं रहूँगा, न आप रहेंगे, वह रहेगा, वह हम से स्वतन्त्र होकर जाएगा। कहने में भूल होती है लेकिन फिर भी सामने है आदमी । अगर मैं कुछ कह रहा है, तो आप मुझे देख रहे हैं; मेरी आँख को देख रहे हैं, मेरी तड़प, मेरी पीड़ा को भी देख रहे हैं : मेरो मुसीबत भी देख रहे हैं कि कुछ है जो नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि आप थोड़ा समझ जाएं । लेकिन, एक किताब हैं, न आँख है, न तड़प है, न पोड़ा है। सब साफ-सुथरा सोधा है। फिर, किताब बचती है । इसमें से किसी ने भी यह फिक्र नहीं की कि किताब बचे । इन सबकी फिक्र यह थी कि कह दें तो बात खत्म हो जाए। इससे ज्यादा उसको बचाना नहीं है । लेकिन, बचा ली गई । बचाने वाले लोग खड़े हो गए। उन्होंने कहा इसको बचाना होगा; बड़ी कीमतो चीज है; इसको बचा लो । उन्होंने बचाने की कोशिश की । फिर उनकी बचाई हुई किताब पर किताबें चलती आईं, टीकाएं होती रहीं । और वह बचाना भी महावीर के ठीक सामने नहीं हो सका । उसका कारण है कि शायद महावीर ने इन्कार किया होगा । बुद्ध ने इन्कार किया होगा कि यह सामने न हो । तुम लिखना मत । तो वह तीन-तीन सौ, चार-चार सौ, पांच-चांच सौ वर्ष बाद हुआ, यानी जो भी लिखा गया है सुनकर नहीं लिखा गया है । किसी ने सुना है फिर किसी ने किसी से कहा है । ऐसे दो चार पीढ़ी बीत गई हैं और कहते-कहते वह लिखा गया है । महावीर असमर्थ हैं कहने में। फिर उनको सुननेवाले ने किसी से कहा है, फिर उसने किसी से कहा है, फिर, दो, चार पांच पीढ़ियों के बाद वह लिखा गया है। फिर उस पर टीकाएं चलती रही हैं, विवाद चलते रहे हैं । वे हमारे पास शास्त्र हैं । अगर किसी को महावीर से चूकना हो तो उन शास्त्रों से सुगम उपाय नहीं । इन शास्त्रों में चला जाए तो वह महावीर तक कभी नहीं पहुंच सकेगा। तो मैं कोई शास्त्रों से महावीर तक पहुंचने की न तो सलाह देता हूँ और न मैं उस रास्ते से उन तक गया हूँ और न मानता हूँ कि कोई कभी जा सकता है। मैं बिल्कुल ही अशास्त्रीय व्यक्ति हूँ । अशास्त्रीय से कहना चाहिए एकदम शास्त्रविरोधी । शास्त्रीय रास्ता दिखाई पड़ता है तो इसलिए साधु-संन्यासी शास्त्र खोले हुए हैं, खोज रहे हैं महावीर को और क्या रास्ता है और क्या मार्ग है ? अगर सारे शास्त्र खो जाएं तो साधु, संयासियों और पंडितों के हिसाब से महावीर खो जाएंगे। क्या बचाव है इस में ? अगर सारे शास्त्र खो जाएं तो महावीर का क्या बचाव है ? महावीर खो जायेंगे। लेकिन क्या सत्य का अनुभव खो सकता है ? क्या यह सम्भव है कि, महावीर जैसी अनुभूति घटे और अस्तित्व के किसी कोने में सुरक्षित न रह जाए ? क्या यह संभव है कि कृष्ण जैसा आदमी पैदा हो और सिर्फ आदमी को लिखी किताबों में उसकी सुरक्षा हो और अगर किताबें खो जाएं तो कृष्ण खो जाएगा। अगर ऐसा है तो न कृष्ण का कोई मूल्य है, न महावीर का कोई मूल्य है । आदमी के रिकार्ड, पलकों के रिकार्ड, गणधरों के रिकार्ड हो अगर सब कुछ है, तो ठीक है किताबें खो जाएंगी और ये आदमी खो जाएंगे। मगर इतना सस्ता नहीं है यह मामला कि इतनी बड़ी घटनाएं घटें जिन्दगी में और वह खरबों वर्षों में और वहां, खरबों लोगों के बीच कभी कोई आदमी परम सत्य को उपलब्ध होता हो, उसके परम सत्य के उपलब्ध होने की घटना सिर्फ कमजोर आदमियों को कमजोर भाषा में सुरक्षित रहे और अस्तित्व में इसकी सुरक्षा का कोई उपाय न हो, ऐसा नहीं है । ऐसा हो भी नहीं सकता । इसलिए एक और उपाय है । मेरा कहना है कि जगत् में जो भी महत्त्वपूर्ण घटता है, महत्त्वपूर्ण तो बहुत दूर की बात है, साधारण, और अमहत्त्वपूर्ण घटता है, वह भी किसी तरह पर मुरक्षित होता है, महत्त्वपूर्ण तो सुरक्षित होता ही है, वह तो कभी नष्ट नहीं होता । इसलिए जो भी महत्त्वपूर्ण घटा है जगत् में कभी भी वह मनुष्य पर नहीं छोड़ दिया गया है कि आप उसे सुरक्षित करें। वह तो ऐसे ही होगा कि अन्धों के एक समाज में एक आदमी को आंख मिल जाए और उसे प्रकाश दिखाई पड़े, और अन्धों के ऊपर निर्भर हो कि तुम उसके अनुभव को सुरक्षित रखो, अन्धों को छूट हो इस बात की कि तुम्हारे बीच जो आंख वाला एक आदमी पैदा हुआ और उसे जो अनुभव हुआ, तुम उसे सुरक्षित रखना; तुम वेद. बनाना, तुम आगम रचना, तुम गीता रचना, तुम बाइबिल बनाना, इन्हें सुरक्षित रखना । और फिर अनुभव के अनुभव की टीकाएं होती चली जाएं । और हजार दो हजार साल बाद आंख वाले आदमी की देखी गई बात अन्धों द्वारा सुरक्षित की गई हो, अन्धों द्वारा व्याख्यायें की गई हों और फिर उनके द्वारा हम आंख वाले आदमी की बात को खोजने निकले तो हमसे ज्यादा मूढ़ कोई दूसरा नहीं होगा । तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि अस्तित्व में कुछ भी खोता नहीं। मच तो यह है कि अभी भी मैं जो बोल रहा हूँ वह कभी खोएगा नहीं । आप भी जो बोल रहे हैं, वह भी नहीं खोएगा । जो शब्द एक बार पैदा हो गया है, वह नहीं खोएंगा कभी। आज हम जानते हैं, लंदन में कोई बोल रहा है, रेडियों से हम यहां श्रीनगर में उसे सुनते हैं। आज से दो सौ वर्ष पहले नहीं २२ सुन सकते थे और आज से दो सौ वर्ष पहले कोई मान भी नहीं सकता था कि यह भी कभी सम्भव होगा कि लंदन में कोई बोलेगा और श्रीनगर में कोई सुनेगा । कोई नहीं मान सकता था। लेकिन क्या आप समझते हैं कि उस दिन लंदन में जो बोला जा रहा था, वह श्रीनगर में नहीं सुना जा रहा था ? यानी मेरा मतलब यह है कि उस दिन जो भी ध्वनि तरंगें लंदन में बोलने से पैदा हो रही थीं वे श्रीनगर की इस डल झील के पास से नहीं गुजर रही थीं ? अगर नहीं तो आज आप रेडियो में कैसे पकड़ लेते ? अभी भी यहां से गुजर रही हैं सब तरंगें । सारे जगत् में अभी जो बोला जा रहा है, वह भी आपके पास से गुजर रहा है। सिर्फ एक यांत्रिक तरकीब की जरूरत है जिससे वह पकड़ा जा सके। बस । यानी मेरा कहना है कि कृष्ण ने अगर कभी भी बोला है तो आज भी उसकी ध्वनि तरंगे, किन्हीं तारों के निकट से गुजर रहीं हैं । यह भी ध्यान रहे कि लंदन में जो बोला गया है ठीक आप उसी वक्त नहीं सुन लेते हैं उसे, क्योंकि ध्वनि तरंगों को आने में समय लगता है। तो जब लन्दन में बोला जा रहा है तब आप ठीक उसी वक्त नहीं सुनते हैं, थोड़ी देर बाद सुनते हैं। मतलब यह हुआ कि उतनी देर ध्वनि तरंगें आप तक यात्रा करती हैं। जो कभी भी बोला गया है उसकी ध्वनि तरंगें आज भी यात्रा करती हैं, किन्हीं तारों के पास से गुजर रही हैं । और अगर उन तारों के लोगों के पास व्यवस्था होगी यन्त्रों की तो वे उन्हें पकड़ लेते होंगे। यानी किसी तारे पर आज भी महावीर के वचन सुने जा रहे होंगे। इसका क्या मतलब हुआ ? इसका , मतलब यह हुआ कि इस अनन्त आकाश में, अनन्त है इसलिए कुछ नहीं खोता, जो भी पैदा होता है वह यात्रा करता रहता है । यह मैं ध्वनि की बात कर रहा हूँ । लेकिन और भी सूक्ष्म तरंगें हैं जहां अनुभूति की तरंगें शेष रहती हैं। जब हम बोलते हैं तब ध्वनि की तरंगें पैदा होती हैं। लेकिन जब हम अनुभव करते हैं तब भी एक घटना घटती है और तरंगें पैदा होती हैं जोकि और भी सूक्ष्म आकाश में यात्रा करती हैं। अगर रेडियो हो सके तो हम आकाश, स्थूल आकाश में घूमती हुई ध्वनि तरंगों को पकड़ लेते हैं। अगर कोई यांत्रिक व्यवस्था हो सके तो और सूक्ष्म आकाश में हुए अनुभवों की तरंगों को पुनः पकड़ा जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि जगत् में, जो भी सृष्टि में जितने गहरे अनुभव हुए हैं उतने गहरे आकाश के तल के रिकार्ड सदा सुरक्षित हैं। वे कभी नष्ट नहीं होते और यह आदमी पर नहीं छोड़ा गया है कि वह लिखकर उनको सुरक्षित करे । इसका मतलब यह हुआ कि अगर हम इन गहराइयों में अपने भीतर उतरें, यदि हम विशिष्ट ध्यान रखकर उतरें, तो उन विशिष्ट व्यक्तियों की अनुभूति से हम तत्काल प्रत्यक्ष सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। लेकिन अगर हम कोई विशिष्ट व्यक्ति का ध्यान न रखकर उतरें तो हम अपनी अन्तर अनुभूति में उत्तर जाते हैं । अपने भीतर गहरे में उतरने वाला व्यक्ति ऐसी व्यवस्था कर सकता है कि वह महावीर, बुद्ध, जीसस या कृष्ण से संयुक्त हो जाए । संयुक्त होने का मतलब यह नहीं कि कृष्ण कहीं बैठे हैं जिनसे संयोग हो जाएगा। वह दिया तो टूट गया और वह ज्योति भी खो गई। लेकिन उस ज्योति ने जो अनुभव किया था उस अनुभव की सूक्ष्म तरंगे अस्तित्व की गहराइयों में आज भी सुरक्षित हैं । और उतनी गहराइयों का विशिष्ट ध्यान लेकर, महावीर का पूर्ण ध्यान लेकर अगर आप उन गहराइयों पर उतरें तो आपके लिए वे द्वार खुल जाते हैं जहाँ महावीर के अन्तरंग की सूक्ष्म तरंगे आपको उपलब्ध हो जाएं और जब भी दुनिया में कभी इस तरह के अनुभवों से जुड़ा जाता है तो और कोई जोड़ने का रास्ता नहीं । उसमें सब आदमियों को किताबें खो जाएँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक द्वीप था - महाद्वीप अतलांतिस । लंबा समय हुआ वह डूब गया सागर में। अब वह पृथ्वी पर नहीं है, कभी था; और उसका कोई रिकार्ड नहीं रह गया क्योंकि रिकार्ड भी डूब गए उस द्वीप के साथ। जैसे कि एशिया डूब जाए, पूरा का पूरा एशिया । परिवर्तन हो, सागर हावी हो जाए और एशिया पूरा डूब जाए और एशिया के सारे रिकार्ड भी उसके साथ डूब जाएँ और आज तो यह है कि एशिया के कुछ रिकार्ड इंगलैंड में भी हैं, न्यूयार्क में भी हैं जो बच जाएँ - उस दिन तो यह भी सम्भव नहीं था, उस दिन तो हमें पता ही नहीं था दूसरे कुछ का । अतलांतिस महाद्वीप पूरा का पूरा डूब गया। कई करोड़ वर्ष पहले। लेकिन कुछ लोग जो गहराइयों में उतरते रहे वे निरन्तर इसकी खबर देते रहे कि एक महाद्वीप पूरा का पूरा डूब गया है और वे इसका रिकार्ड करते चले गये । इसके कोई रेकार्ड नहीं बचे । लेकिन इजिप्ट के कुछ फकीरों ने, तिब्बत के कुछ साधकों ने इस बात के रिकार्ड किये कि पूरा का पूरा महाद्वीप डूब गया है, और इसकी कुछ आन्तरिक खोज करने वाले लोग इसकी खोज में निरन्तर लगे रहे कि वह कैसा द्वीप था, कैसी उनकी व्यवस्था थी और आप जानकर हैरान होंगे कि कुछ लोगों ने निरन्तरं मेहनत करके सिर्फ आन्तरिक अनुभव से उस महाद्वीप के सारे के सारे नक्शे निर्मित किए। उस जाति के लोगों. के चेहरे, उस जाति का धर्म, उस जाति की मान्यताएं, विचार, अनुभूतियां - इनका सारा इन्तजाम किया। अगर एक व्यक्ति करे तो बड़ा मुश्किल है क्योंकि उसका पक्का कैसा माना जाए कि आदमी कल्पना नहीं कर रहा है । कल्पना कर सकता है। लेकिन अलग-अलग लोगों ने इसके प्रयोग किए और निकटतम सहमतियों पर पहुँच गए कि वह नक्शा ऐसा होगा । वैज्ञानिक तो पहले बिल्कुल इन्कार किए कि ये कभी हो ही नहीं सकता, इसका कोई रिकार्ड ही नहीं, ऐसा कोई द्वीप कभी रहा नहीं महाद्वीप पर, इसका कोई हिसाब ही नहीं कहीं । लेकिन ये लोग अपना काम करते चले गये और इन लोगों के दबाव से अन्ततः वैज्ञानिकों को भी चिन्तना करनी पड़ी कि कुछ हो सकता है। इसकी खोजबीन वैज्ञानिक ढंगों से की गई और पता चला कि ऐसा एक महाद्वीप निश्चित ही डूबा था और वह आज समुद्र के तल में पड़ा हुआ है। और जहाँ इन साघकों ( मिस्टिक्स ) ने कहा था कि वह है, वह करीब-करीब वहाँ है । उस पर बड़ी गहराई को पानी की परते हैं। और इनने जो कहा था कि उसमें इस तरह के पहाड़ होने चाहिए, इन-इन रेखाओं पर, वहाँ पहाड़ भी हैं । इसका भी वैज्ञानिक • अनुसन्धान चला और अतलांतिस पर बड़ी खोज चल रही है कि क्या वहाँ से कुछ उपलब्ध हो सकेगा ? लेकिन उसकी पहली खबर देने वाले वे लोग थे जिनको कोई मतलब न था। उसकी बात ही बिल्कुल झूठ समझी गई कि अतलांतिक महासागर के नीचे अतलांतिक डूबा हुआ है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मेरा रास्ता शास्त्र के मार्ग से बिल्कुल नहीं है । और मेरी यह भी समझ है कि उस मार्ग जैसा कोई मार्ग भी नहीं है । इसलिए जो भी उस मार्ग पर पड़ गए है सिर्फ भटकने वाले सिद्ध हुए हैं । वह कहीं ले जाने वाले सिद्ध नहीं हुए हैं। सरल वही है । किताब पढ़ने से ज्यादा सरल और क्या हो सकता है हालांकि कुछ लोगों के लिए वह भी कठिन है। किताब पढ़ने से ज्यादा सरल बात और क्या हो सकती है ? लेकिन आकाशिक रिकार्ड, जिनकी मैं बात कर रहा हूं कि अस्तित्व की गहराइयों में अनुभूतियाँ सुरक्षित रह जाती हैं, वहाँ से उन्हें वापिस पकड़ा जा सकता है और वहां से उनसे पुनः जोवन सम्बन्ध स्थापित किए जा सकते हैं। तो मैं भी जो चर्चा करूंगा इधर, उसकी शास्त्रानुसार ताल-मेल खोजने की कोशिश में मत पड़ना । उससे कोई सम्बन्ध ही नहीं। किसी और द्वार से ही में चेष्टा करता हूं और उस चैष्टा में जो कुछ मुझे दिखाई पड़ता है, वह में आपसे कहता चलूंगा। किन्तु जब तक कोई और लोग मेरे साथ उस प्रयोग को करने के लिए राजी न हों तब तक मेरी बात प्रामाणिक है या नहीं कुछ निर्णय नहीं हो सकता । उसका कोई निर्णय का उपाय ही नहीं है दूसरा जब तक कि कुछ लोग मेरे साथ प्रयोग करने को राजी न हो जाएं। और तब मैं लिखकर दूं कि तुम्हें यह अनुभव होगा और उन्हें हो जाए तो फिर कुछ बात बने । उसी आशा में यह सारी बात में करूंगा कि कुछ लोग निकल आएं शायद । विवाद का इसमें उपाय ही नहीं है कुछ । लेकिन विवाद किससे करना है। हो सकता है कुछ लोग इस प्रेरणा से भर जाएं और हिम्मत जुटाएं तो आविष्कार हो सकता है । और तभी कोई तोल हो सकती है कि जो में कह रहा हूं वह कहां तक, कितनी दूर तक, क्या अर्थ रखता है। अब इसमें उल्टे मामले आजाएंगे और आपके पास कोई उपाय नहीं होगा कि क्या करें । सारी ईसाइयत का इतिहास यह जूडास ने जीसस को तीस रुपये पर बेचा और जूडास जीसस का दुश्मन था । सीधी बात है जो आदमी मरवा दे वह दुश्मन है । उसका शिष्य नहीं था ? शिष्य तो था लेकिन दगाबाज ! धोखा किया, और जीसस को बिकवा दिया। जीसस को सूली इसी वजह से लगी । उसने पकड़वाया रात को आकर । जीसस रात में ठहरे कहीं और जूडास लाया दुश्मन के सिपाहियों को और जीसस को पकड़वा दिया। जूडास के नाम से गंदा नाम ईसाइयत के इतिहास में दूसरा नहीं । यानी किसी आदमी को गाली देनी हो तो जूडास कह दो । इससे बड़ी कोई गाली नहीं है । जीसस को फांसी लगवाने से और बुरा क्या हो सकता है ? लेकिन गुरजिएफ पहला आदमी हैं जिसने कहा कि यह बात सरासर झूठी है। जूडास दुश्मन नहीं है, जीसस का दोस्त है और पकड़वाने में जीसस का षडयंत्र है, जूडास का नहीं । जीसस चाहते हैं वे पकड़े जाएं और सूली पर लटकाए जाएं। जूडास उनका सेवक है इतना बड़ा सेवक कि जब जीसस उससे कहते हैं कि तुम मुझे पकड़वाते क्यों नहीं तो बाकी शिष्यों में किसी की हिम्मत नहीं है इस काम को करवाने की । लेकिन जूडास तो सेवक है । वह कहता है, "आपकी आज्ञा " । जूडास पकड़वा देता है। तो गुरजिएफ ने सबसे पहले यह कहा कि मैं उन गहराइयों में इस बात की खोज कर आपको खवर देता हूं कि जूडास दुश्मन नहीं। और जूडास जैसा मित्र पाना मुश्किल है कि जो मरवाने तक की आज्ञा को चुपचाप शिरोधार्य कर ले और चला जाए। इसीलिए सारी ईसाइयत कहती है कि जूडास के पैर पड़े ईसा पकड़े जाने के पहले। ईसाइयत कहती है कि कितना अद्भुत था जीसस कि जो पकड़ा रैहा था उसके पैर छुए, पैर धोए । गुरजिएफ कहता है कि पैर पड़ने योग्य था वह जूडास । ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है कि जिसने इतने पर भी इन्कार न किया जब जीसस ने कहा कि तुम मुझे पकड़वा दो, मेरी फांसी लगवानी जरूरी है। अगर फांसी नहीं लगती, जो मैं कह रहा. हूं वह खो जाएगा। मेरी फांसी लगती है तो सील मोहर हो जाएगी। मेरी फांसी हो अब मेरा काम कर सकती है और कोई उपाय नहीं है । तो तुम मुझे फांसी लगवा दो। फांसी से बचाने वाला मित्र खोजना आसान है। फांसी लगवाने वाला मित्र खोजना बड़ा मुश्किल है। इसलिए गुरजिएफ ने जब पहली दफा यह बात कही तो एक बड़ी मुश्किल का मामला हो गया। सारी ईसाइयत ने बड़ा विरोध किया कि यह बकवास है । यह कहता क्या है ? यह तो हमारा सारा हिसाब ही पलट गया । यह तो बात ही ठीक नहीं। लेकिन एक आदमी हिम्मत जुटाकर नहीं आया कि आकर कोशिश करता कि यह आदमी कहता कहां से है। लेकिन मैंने प्रयोग किया और मैं हैरान हुआ कि वह ठीक कहता है। जूडास दुश्मन नहीं है। जूडास दोस्त है । वह फ़क़ीर ठीक कहता है। वह गलत कहता ही नहीं बिल्कुल । मगर बड़ी मुश्किल से खोज पाया होगा। तो मेरा कहना है कि शास्त्र खोज का रास्ता है ही नहीं बल्कि सबसे बड़ी रुकावट है क्योंकि मन को ऐसी बातों से भर देता है जोकि हो सकता है नहीं भी हो। और तब उनसे नीचे उतरना, उनसे विपरीत जाना बिना जाने मुश्किल हो जाता है, एकदम मुश्किल हो जाता है । और महावीर के सम्बन्ध में तो बहुत ज्यादा हुई है यह बात, हृद बहुत ही हद की है । गुरजिएफ ने जो यह कहा तो उसको उसने नाम दिया - क्राइस्ट ड्रामा । उसने कहा कि यह सूली-बूली सब खेल है । यह सूली बिल्कुल । खेल है और नाटक है पूरा रचा हुआ । जीसस ने इस ख्याल पर अपने मित्र को राजी कर लिया है और अपने आसपास की हवा को कि जो मैं कह रहा हूं अगर तुम्हें बहुत दूर तक पहुंचाना हो उसकी खबर, तो मेरी फांसी लगवा देना जरूरी है। नहीं तो यह बात खो जाएगी। मेरी फांसी ही मूल्यवान् बनेगी ? इसलिए 'क्रास' मूल्यवान् बन गया। जीसस से ज्यादा मूल्यवान् 'क्रास' हो गया । यह जो इस तरह की बहुत सी बातें हुई बहुत ही मुश्किल में डालती हैं । लेकिन, उनके सम्बन्ध में विवाद करने का कोई उपाय नहीं है। उनके सम्बन्ध में प्रयोग करने का हो उपाय है। इधर, इन दिनों में बहुत ऐसी बात होगी जो शायद आपको पहली दफा हो ख्याल में आये, पहली वफा ही सुनें आप । लेकिन इस कारण न तो मैं कहता हूं कि मान लेना कि मैंने कही, और न कहता हूं कि इसलिए इन्कार कर देना कि पहली दफा किसी ने कही। अगर सच में ही प्रेम हो तो खोज पर निकलना १ १. इस खोज पर निकलने की प्रक्रिया अत्यन्त सुन्दर शब्दों में आचार्य जो ने दो है । यह प्रक्रिया उन्हीं के शब्दों में इसी ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्ट रूप में दो है। प्रवचन के सभी श्रोता इस प्रयोग से लाभान्त्रित हुए थे। पाठक भी परिशिष्ट से उस प्रयोग की विधि को जानकर लाभ उठायें ।
परिग्रही जो व्यक्ति होगा, वह चीज़ सब संग्रह करता है। चाहे धन संग्रह करे, चाहे शब्द संग्रह करे, चाहे यश संग्रह करे, इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। एक परिग्रह की वृत्ति है मनुष्य के अन्दर कि इकट्ठा कर लो । लेकिन कुछ चीजें ऐसी है जिनके इकट्ठा करने में कुछ थोड़ा-बहुत अर्थ भी हो सकता हैजैसे कि कोई धन इकट्ठा करे। धन इकट्ठा करने में थोड़ा अर्थ हो सकता क्योकि धन_परिग्रह की वृत्ति से ही पैदा हुआ है और परिग्रही वृत्ति का ही वाहन है, परिग्रही वृत्ति वृत्ति की ही विनिमय मुद्रा है। यानी परिग्रही व्यक्ति का हो धन आविष्कार है । धन का कोई व्यक्ति संग्रह करे तो सार्थक भी है क्योंकि धन परिग्रह का ही माध्यम है और परिग्रह के लिए ही है लेकिन जिस अनुभव से महावीर गुजरे हैं वह अपरिग्रह में घटा है। और उनके शब्दों को जो इकट्ठा कर रहा है, वह परिग्रही वृत्ति का व्यक्ति है । महावीर को उत्सुकता नहीं है शब्द संग्रह की, न बुद्ध को है, न क्राइस्ट को है । वैसे तो महावीर भी किताब लिख सकते थे लेकिन महावीर ने किताब नहीं लिखी, कृष्ण ने भी किताब नहीं लिखी, बुद्ध ने भी किताब नहीं लिखी और जीसस ने भी किताब नहीं लिखी। सिर्फ लाओत्से ने, इन असाधारण लोगों में से, किंताब लिखी और वह भी जबरदस्ती में लिखी । लाओत्से ने अस्सी साल की उम्र तक किताब नहीं लिखी । लोग कहते कि कुछ लिखो । और वह कहता कि जो लिखूंगा वह झूठ हो जाएगा। जो लिखना है वह लिखा नहीं जाता, इसलिए इस उपद्रव में मैं नहीं पड़ता । अस्सी साल तक बचा रहा लेकिन सारे मुल्क में यह भाव पैदा हो गया कि अब बूढ़ा हुआ जाता है, अब मर जाएगा, जो जानता है वह खो जाएगा । अन्तिम उम्र में लाओत्से पर्वतों की तरफ चला गया, सब छोड़-छाड़कर, पता नहीं कि वह कब मरा । उसने कहा कि इससे पहले कि मृत्यु छीने, मुझे खुद ही चला जाना चाहिए । आखिर मृत्यु की प्रतीक्षा क्यों करें, इतना परवश भी क्यों हों ? जब वह चीन की रेखा सीमा छोड़ने लगा तो चीन के सम्राट् ने उसे रुकवा दिया अपनी चुंगी- चौकी पर और कहा कि टैक्स चुकाए बिना नहीं जाने देंगे । लाओत्से ने कहा कैसा टैक्स ? न हम कोई सामान ले जाते है बाहर, न कुछ लाते हैं, अकेले जाते हैं। खाली; सच तो यह है कि जिन्दगी भर से खाली हैं। कुछ सामान कभी गया नहीं जिस पर टैक्स देना पड़े। टैक्स कैसा ? सम्राट् ने बहुत मजाक किया और उससे कहा कि टैक्स तो बहुत-बहुत लिए जाते हैं। इतनी सम्पत्ति कभी कोई आदमी ले हो नहीं गया, सब कुछ न कुछ दे हो जाते हैं। तुम बोलते नहीं हो कि क्या तुम्हारे भीतर है । वह सब चुका दो, कम से कम टैक्स दे दो, सम्पत्ति मत दो; नहीं तो हम क्या कहेंगे, एक आदमी के पास था, वह बिल्कुल ले गया, बिल्कुल ले गया चुपचाप ? ऐसा नहीं हो सकता, इस चुंगो चौकी के बाहर नहीं जाने देंगे। जबरदस्ती लाओत्से को रोक लिया । वह भी हंसा । उसने कहा : बात तो शायद ठीक ही है। लिए तो जाता हूँ। लेकिन देने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए जाता हूँ और कुछ नहीं । देना में भी चाहता हूँ । तब उसने एक छोटी-सी किताब लिखी । उस तरह के असाधारण लोगों में लिखने वाला वह अकेला श्रादमी है । पर पहला ही वाक्य यह लिखा है "बड़ी भूल हुई जाती है, जो कहना है वह कहा नहीं जाता। और जो नहीं कहना है वही कहा जाएगा । सत्य बोला नहीं जा सकता । जो बोला जा सकता है वह सत्य हो नहीं सकता। बड़ी भूल हुई जाती है। और मैं इसको जानकर लिखने बैठा हूँ, इसलिए जो भी आगे पढ़ोगे, इसको जानकर पढ़ना कि सत्य तोला नहीं जा सकता, कहा नहीं जा सकता । और जो कहा जा सकता है, वह सत्य हो नहीं सकता । That which can be said is not the Toa.' इसे पहले समझ लेना फिर किताव पढ़ना ।" तो किसी ने किताब लिखी नहीं जिसने लिखो उसने प्रश्नचिह्न पहले लगा दिया। यानो सच तो यह है कि जो समझ जाएगा उसके आगे किताब पढ़ेगा ही नहीं। मामला यह है कि लाओत्से होशियार आदमी मालूम होता है। राजा समझा कि हम चुंगो ले रहे है । वह गल्ती में पड़ गया । जो समझेगा वह उसके आगे किताब पढ़ेगा नहीं ।" बात खत्म हो गई है । जो नहीं. समझेगा वह पढ़ डालेगा । उससे कोई मतलब नहीं । तो नासमझ किताबें पढ़ते हैं, समझदार रुक जाते हैं । बुद्ध महावीर जैसे लोगों ने किताब नहीं लिखी। कारण हैं बहुत । पक्का नहीं है कि जो कहना है वह कहा जा सकता है। फिर भी कहा । कहने का माध्यम उन्होंने चुना, लिखने का नहीं चुना । इसका भी कारण है। क्योंकि कहने का माध्यम प्रत्यक्ष है आमने-सामने और मैं गया, आप गए कि खो गया । लिखने का माध्यम स्थायी है, आमने-सामने नहीं है । परोक्ष है । न मैं रहूँगा, न आप रहेंगे, वह रहेगा, वह हम से स्वतन्त्र होकर जाएगा। कहने में भूल होती है लेकिन फिर भी सामने है आदमी । अगर मैं कुछ कह रहा है, तो आप मुझे देख रहे हैं; मेरी आँख को देख रहे हैं, मेरी तड़प, मेरी पीड़ा को भी देख रहे हैं : मेरो मुसीबत भी देख रहे हैं कि कुछ है जो नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि आप थोड़ा समझ जाएं । लेकिन, एक किताब हैं, न आँख है, न तड़प है, न पोड़ा है। सब साफ-सुथरा सोधा है। फिर, किताब बचती है । इसमें से किसी ने भी यह फिक्र नहीं की कि किताब बचे । इन सबकी फिक्र यह थी कि कह दें तो बात खत्म हो जाए। इससे ज्यादा उसको बचाना नहीं है । लेकिन, बचा ली गई । बचाने वाले लोग खड़े हो गए। उन्होंने कहा इसको बचाना होगा; बड़ी कीमतो चीज है; इसको बचा लो । उन्होंने बचाने की कोशिश की । फिर उनकी बचाई हुई किताब पर किताबें चलती आईं, टीकाएं होती रहीं । और वह बचाना भी महावीर के ठीक सामने नहीं हो सका । उसका कारण है कि शायद महावीर ने इन्कार किया होगा । बुद्ध ने इन्कार किया होगा कि यह सामने न हो । तुम लिखना मत । तो वह तीन-तीन सौ, चार-चार सौ, पांच-चांच सौ वर्ष बाद हुआ, यानी जो भी लिखा गया है सुनकर नहीं लिखा गया है । किसी ने सुना है फिर किसी ने किसी से कहा है । ऐसे दो चार पीढ़ी बीत गई हैं और कहते-कहते वह लिखा गया है । महावीर असमर्थ हैं कहने में। फिर उनको सुननेवाले ने किसी से कहा है, फिर उसने किसी से कहा है, फिर, दो, चार पांच पीढ़ियों के बाद वह लिखा गया है। फिर उस पर टीकाएं चलती रही हैं, विवाद चलते रहे हैं । वे हमारे पास शास्त्र हैं । अगर किसी को महावीर से चूकना हो तो उन शास्त्रों से सुगम उपाय नहीं । इन शास्त्रों में चला जाए तो वह महावीर तक कभी नहीं पहुंच सकेगा। तो मैं कोई शास्त्रों से महावीर तक पहुंचने की न तो सलाह देता हूँ और न मैं उस रास्ते से उन तक गया हूँ और न मानता हूँ कि कोई कभी जा सकता है। मैं बिल्कुल ही अशास्त्रीय व्यक्ति हूँ । अशास्त्रीय से कहना चाहिए एकदम शास्त्रविरोधी । शास्त्रीय रास्ता दिखाई पड़ता है तो इसलिए साधु-संन्यासी शास्त्र खोले हुए हैं, खोज रहे हैं महावीर को और क्या रास्ता है और क्या मार्ग है ? अगर सारे शास्त्र खो जाएं तो साधु, संयासियों और पंडितों के हिसाब से महावीर खो जाएंगे। क्या बचाव है इस में ? अगर सारे शास्त्र खो जाएं तो महावीर का क्या बचाव है ? महावीर खो जायेंगे। लेकिन क्या सत्य का अनुभव खो सकता है ? क्या यह सम्भव है कि, महावीर जैसी अनुभूति घटे और अस्तित्व के किसी कोने में सुरक्षित न रह जाए ? क्या यह संभव है कि कृष्ण जैसा आदमी पैदा हो और सिर्फ आदमी को लिखी किताबों में उसकी सुरक्षा हो और अगर किताबें खो जाएं तो कृष्ण खो जाएगा। अगर ऐसा है तो न कृष्ण का कोई मूल्य है, न महावीर का कोई मूल्य है । आदमी के रिकार्ड, पलकों के रिकार्ड, गणधरों के रिकार्ड हो अगर सब कुछ है, तो ठीक है किताबें खो जाएंगी और ये आदमी खो जाएंगे। मगर इतना सस्ता नहीं है यह मामला कि इतनी बड़ी घटनाएं घटें जिन्दगी में और वह खरबों वर्षों में और वहां, खरबों लोगों के बीच कभी कोई आदमी परम सत्य को उपलब्ध होता हो, उसके परम सत्य के उपलब्ध होने की घटना सिर्फ कमजोर आदमियों को कमजोर भाषा में सुरक्षित रहे और अस्तित्व में इसकी सुरक्षा का कोई उपाय न हो, ऐसा नहीं है । ऐसा हो भी नहीं सकता । इसलिए एक और उपाय है । मेरा कहना है कि जगत् में जो भी महत्त्वपूर्ण घटता है, महत्त्वपूर्ण तो बहुत दूर की बात है, साधारण, और अमहत्त्वपूर्ण घटता है, वह भी किसी तरह पर मुरक्षित होता है, महत्त्वपूर्ण तो सुरक्षित होता ही है, वह तो कभी नष्ट नहीं होता । इसलिए जो भी महत्त्वपूर्ण घटा है जगत् में कभी भी वह मनुष्य पर नहीं छोड़ दिया गया है कि आप उसे सुरक्षित करें। वह तो ऐसे ही होगा कि अन्धों के एक समाज में एक आदमी को आंख मिल जाए और उसे प्रकाश दिखाई पड़े, और अन्धों के ऊपर निर्भर हो कि तुम उसके अनुभव को सुरक्षित रखो, अन्धों को छूट हो इस बात की कि तुम्हारे बीच जो आंख वाला एक आदमी पैदा हुआ और उसे जो अनुभव हुआ, तुम उसे सुरक्षित रखना; तुम वेद. बनाना, तुम आगम रचना, तुम गीता रचना, तुम बाइबिल बनाना, इन्हें सुरक्षित रखना । और फिर अनुभव के अनुभव की टीकाएं होती चली जाएं । और हजार दो हजार साल बाद आंख वाले आदमी की देखी गई बात अन्धों द्वारा सुरक्षित की गई हो, अन्धों द्वारा व्याख्यायें की गई हों और फिर उनके द्वारा हम आंख वाले आदमी की बात को खोजने निकले तो हमसे ज्यादा मूढ़ कोई दूसरा नहीं होगा । तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि अस्तित्व में कुछ भी खोता नहीं। मच तो यह है कि अभी भी मैं जो बोल रहा हूँ वह कभी खोएगा नहीं । आप भी जो बोल रहे हैं, वह भी नहीं खोएगा । जो शब्द एक बार पैदा हो गया है, वह नहीं खोएंगा कभी। आज हम जानते हैं, लंदन में कोई बोल रहा है, रेडियों से हम यहां श्रीनगर में उसे सुनते हैं। आज से दो सौ वर्ष पहले नहीं बाईस सुन सकते थे और आज से दो सौ वर्ष पहले कोई मान भी नहीं सकता था कि यह भी कभी सम्भव होगा कि लंदन में कोई बोलेगा और श्रीनगर में कोई सुनेगा । कोई नहीं मान सकता था। लेकिन क्या आप समझते हैं कि उस दिन लंदन में जो बोला जा रहा था, वह श्रीनगर में नहीं सुना जा रहा था ? यानी मेरा मतलब यह है कि उस दिन जो भी ध्वनि तरंगें लंदन में बोलने से पैदा हो रही थीं वे श्रीनगर की इस डल झील के पास से नहीं गुजर रही थीं ? अगर नहीं तो आज आप रेडियो में कैसे पकड़ लेते ? अभी भी यहां से गुजर रही हैं सब तरंगें । सारे जगत् में अभी जो बोला जा रहा है, वह भी आपके पास से गुजर रहा है। सिर्फ एक यांत्रिक तरकीब की जरूरत है जिससे वह पकड़ा जा सके। बस । यानी मेरा कहना है कि कृष्ण ने अगर कभी भी बोला है तो आज भी उसकी ध्वनि तरंगे, किन्हीं तारों के निकट से गुजर रहीं हैं । यह भी ध्यान रहे कि लंदन में जो बोला गया है ठीक आप उसी वक्त नहीं सुन लेते हैं उसे, क्योंकि ध्वनि तरंगों को आने में समय लगता है। तो जब लन्दन में बोला जा रहा है तब आप ठीक उसी वक्त नहीं सुनते हैं, थोड़ी देर बाद सुनते हैं। मतलब यह हुआ कि उतनी देर ध्वनि तरंगें आप तक यात्रा करती हैं। जो कभी भी बोला गया है उसकी ध्वनि तरंगें आज भी यात्रा करती हैं, किन्हीं तारों के पास से गुजर रही हैं । और अगर उन तारों के लोगों के पास व्यवस्था होगी यन्त्रों की तो वे उन्हें पकड़ लेते होंगे। यानी किसी तारे पर आज भी महावीर के वचन सुने जा रहे होंगे। इसका क्या मतलब हुआ ? इसका , मतलब यह हुआ कि इस अनन्त आकाश में, अनन्त है इसलिए कुछ नहीं खोता, जो भी पैदा होता है वह यात्रा करता रहता है । यह मैं ध्वनि की बात कर रहा हूँ । लेकिन और भी सूक्ष्म तरंगें हैं जहां अनुभूति की तरंगें शेष रहती हैं। जब हम बोलते हैं तब ध्वनि की तरंगें पैदा होती हैं। लेकिन जब हम अनुभव करते हैं तब भी एक घटना घटती है और तरंगें पैदा होती हैं जोकि और भी सूक्ष्म आकाश में यात्रा करती हैं। अगर रेडियो हो सके तो हम आकाश, स्थूल आकाश में घूमती हुई ध्वनि तरंगों को पकड़ लेते हैं। अगर कोई यांत्रिक व्यवस्था हो सके तो और सूक्ष्म आकाश में हुए अनुभवों की तरंगों को पुनः पकड़ा जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि जगत् में, जो भी सृष्टि में जितने गहरे अनुभव हुए हैं उतने गहरे आकाश के तल के रिकार्ड सदा सुरक्षित हैं। वे कभी नष्ट नहीं होते और यह आदमी पर नहीं छोड़ा गया है कि वह लिखकर उनको सुरक्षित करे । इसका मतलब यह हुआ कि अगर हम इन गहराइयों में अपने भीतर उतरें, यदि हम विशिष्ट ध्यान रखकर उतरें, तो उन विशिष्ट व्यक्तियों की अनुभूति से हम तत्काल प्रत्यक्ष सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। लेकिन अगर हम कोई विशिष्ट व्यक्ति का ध्यान न रखकर उतरें तो हम अपनी अन्तर अनुभूति में उत्तर जाते हैं । अपने भीतर गहरे में उतरने वाला व्यक्ति ऐसी व्यवस्था कर सकता है कि वह महावीर, बुद्ध, जीसस या कृष्ण से संयुक्त हो जाए । संयुक्त होने का मतलब यह नहीं कि कृष्ण कहीं बैठे हैं जिनसे संयोग हो जाएगा। वह दिया तो टूट गया और वह ज्योति भी खो गई। लेकिन उस ज्योति ने जो अनुभव किया था उस अनुभव की सूक्ष्म तरंगे अस्तित्व की गहराइयों में आज भी सुरक्षित हैं । और उतनी गहराइयों का विशिष्ट ध्यान लेकर, महावीर का पूर्ण ध्यान लेकर अगर आप उन गहराइयों पर उतरें तो आपके लिए वे द्वार खुल जाते हैं जहाँ महावीर के अन्तरंग की सूक्ष्म तरंगे आपको उपलब्ध हो जाएं और जब भी दुनिया में कभी इस तरह के अनुभवों से जुड़ा जाता है तो और कोई जोड़ने का रास्ता नहीं । उसमें सब आदमियों को किताबें खो जाएँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक द्वीप था - महाद्वीप अतलांतिस । लंबा समय हुआ वह डूब गया सागर में। अब वह पृथ्वी पर नहीं है, कभी था; और उसका कोई रिकार्ड नहीं रह गया क्योंकि रिकार्ड भी डूब गए उस द्वीप के साथ। जैसे कि एशिया डूब जाए, पूरा का पूरा एशिया । परिवर्तन हो, सागर हावी हो जाए और एशिया पूरा डूब जाए और एशिया के सारे रिकार्ड भी उसके साथ डूब जाएँ और आज तो यह है कि एशिया के कुछ रिकार्ड इंगलैंड में भी हैं, न्यूयार्क में भी हैं जो बच जाएँ - उस दिन तो यह भी सम्भव नहीं था, उस दिन तो हमें पता ही नहीं था दूसरे कुछ का । अतलांतिस महाद्वीप पूरा का पूरा डूब गया। कई करोड़ वर्ष पहले। लेकिन कुछ लोग जो गहराइयों में उतरते रहे वे निरन्तर इसकी खबर देते रहे कि एक महाद्वीप पूरा का पूरा डूब गया है और वे इसका रिकार्ड करते चले गये । इसके कोई रेकार्ड नहीं बचे । लेकिन इजिप्ट के कुछ फकीरों ने, तिब्बत के कुछ साधकों ने इस बात के रिकार्ड किये कि पूरा का पूरा महाद्वीप डूब गया है, और इसकी कुछ आन्तरिक खोज करने वाले लोग इसकी खोज में निरन्तर लगे रहे कि वह कैसा द्वीप था, कैसी उनकी व्यवस्था थी और आप जानकर हैरान होंगे कि कुछ लोगों ने निरन्तरं मेहनत करके सिर्फ आन्तरिक अनुभव से उस महाद्वीप के सारे के सारे नक्शे निर्मित किए। उस जाति के लोगों. के चेहरे, उस जाति का धर्म, उस जाति की मान्यताएं, विचार, अनुभूतियां - इनका सारा इन्तजाम किया। अगर एक व्यक्ति करे तो बड़ा मुश्किल है क्योंकि उसका पक्का कैसा माना जाए कि आदमी कल्पना नहीं कर रहा है । कल्पना कर सकता है। लेकिन अलग-अलग लोगों ने इसके प्रयोग किए और निकटतम सहमतियों पर पहुँच गए कि वह नक्शा ऐसा होगा । वैज्ञानिक तो पहले बिल्कुल इन्कार किए कि ये कभी हो ही नहीं सकता, इसका कोई रिकार्ड ही नहीं, ऐसा कोई द्वीप कभी रहा नहीं महाद्वीप पर, इसका कोई हिसाब ही नहीं कहीं । लेकिन ये लोग अपना काम करते चले गये और इन लोगों के दबाव से अन्ततः वैज्ञानिकों को भी चिन्तना करनी पड़ी कि कुछ हो सकता है। इसकी खोजबीन वैज्ञानिक ढंगों से की गई और पता चला कि ऐसा एक महाद्वीप निश्चित ही डूबा था और वह आज समुद्र के तल में पड़ा हुआ है। और जहाँ इन साघकों ने कहा था कि वह है, वह करीब-करीब वहाँ है । उस पर बड़ी गहराई को पानी की परते हैं। और इनने जो कहा था कि उसमें इस तरह के पहाड़ होने चाहिए, इन-इन रेखाओं पर, वहाँ पहाड़ भी हैं । इसका भी वैज्ञानिक • अनुसन्धान चला और अतलांतिस पर बड़ी खोज चल रही है कि क्या वहाँ से कुछ उपलब्ध हो सकेगा ? लेकिन उसकी पहली खबर देने वाले वे लोग थे जिनको कोई मतलब न था। उसकी बात ही बिल्कुल झूठ समझी गई कि अतलांतिक महासागर के नीचे अतलांतिक डूबा हुआ है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मेरा रास्ता शास्त्र के मार्ग से बिल्कुल नहीं है । और मेरी यह भी समझ है कि उस मार्ग जैसा कोई मार्ग भी नहीं है । इसलिए जो भी उस मार्ग पर पड़ गए है सिर्फ भटकने वाले सिद्ध हुए हैं । वह कहीं ले जाने वाले सिद्ध नहीं हुए हैं। सरल वही है । किताब पढ़ने से ज्यादा सरल और क्या हो सकता है हालांकि कुछ लोगों के लिए वह भी कठिन है। किताब पढ़ने से ज्यादा सरल बात और क्या हो सकती है ? लेकिन आकाशिक रिकार्ड, जिनकी मैं बात कर रहा हूं कि अस्तित्व की गहराइयों में अनुभूतियाँ सुरक्षित रह जाती हैं, वहाँ से उन्हें वापिस पकड़ा जा सकता है और वहां से उनसे पुनः जोवन सम्बन्ध स्थापित किए जा सकते हैं। तो मैं भी जो चर्चा करूंगा इधर, उसकी शास्त्रानुसार ताल-मेल खोजने की कोशिश में मत पड़ना । उससे कोई सम्बन्ध ही नहीं। किसी और द्वार से ही में चेष्टा करता हूं और उस चैष्टा में जो कुछ मुझे दिखाई पड़ता है, वह में आपसे कहता चलूंगा। किन्तु जब तक कोई और लोग मेरे साथ उस प्रयोग को करने के लिए राजी न हों तब तक मेरी बात प्रामाणिक है या नहीं कुछ निर्णय नहीं हो सकता । उसका कोई निर्णय का उपाय ही नहीं है दूसरा जब तक कि कुछ लोग मेरे साथ प्रयोग करने को राजी न हो जाएं। और तब मैं लिखकर दूं कि तुम्हें यह अनुभव होगा और उन्हें हो जाए तो फिर कुछ बात बने । उसी आशा में यह सारी बात में करूंगा कि कुछ लोग निकल आएं शायद । विवाद का इसमें उपाय ही नहीं है कुछ । लेकिन विवाद किससे करना है। हो सकता है कुछ लोग इस प्रेरणा से भर जाएं और हिम्मत जुटाएं तो आविष्कार हो सकता है । और तभी कोई तोल हो सकती है कि जो में कह रहा हूं वह कहां तक, कितनी दूर तक, क्या अर्थ रखता है। अब इसमें उल्टे मामले आजाएंगे और आपके पास कोई उपाय नहीं होगा कि क्या करें । सारी ईसाइयत का इतिहास यह जूडास ने जीसस को तीस रुपये पर बेचा और जूडास जीसस का दुश्मन था । सीधी बात है जो आदमी मरवा दे वह दुश्मन है । उसका शिष्य नहीं था ? शिष्य तो था लेकिन दगाबाज ! धोखा किया, और जीसस को बिकवा दिया। जीसस को सूली इसी वजह से लगी । उसने पकड़वाया रात को आकर । जीसस रात में ठहरे कहीं और जूडास लाया दुश्मन के सिपाहियों को और जीसस को पकड़वा दिया। जूडास के नाम से गंदा नाम ईसाइयत के इतिहास में दूसरा नहीं । यानी किसी आदमी को गाली देनी हो तो जूडास कह दो । इससे बड़ी कोई गाली नहीं है । जीसस को फांसी लगवाने से और बुरा क्या हो सकता है ? लेकिन गुरजिएफ पहला आदमी हैं जिसने कहा कि यह बात सरासर झूठी है। जूडास दुश्मन नहीं है, जीसस का दोस्त है और पकड़वाने में जीसस का षडयंत्र है, जूडास का नहीं । जीसस चाहते हैं वे पकड़े जाएं और सूली पर लटकाए जाएं। जूडास उनका सेवक है इतना बड़ा सेवक कि जब जीसस उससे कहते हैं कि तुम मुझे पकड़वाते क्यों नहीं तो बाकी शिष्यों में किसी की हिम्मत नहीं है इस काम को करवाने की । लेकिन जूडास तो सेवक है । वह कहता है, "आपकी आज्ञा " । जूडास पकड़वा देता है। तो गुरजिएफ ने सबसे पहले यह कहा कि मैं उन गहराइयों में इस बात की खोज कर आपको खवर देता हूं कि जूडास दुश्मन नहीं। और जूडास जैसा मित्र पाना मुश्किल है कि जो मरवाने तक की आज्ञा को चुपचाप शिरोधार्य कर ले और चला जाए। इसीलिए सारी ईसाइयत कहती है कि जूडास के पैर पड़े ईसा पकड़े जाने के पहले। ईसाइयत कहती है कि कितना अद्भुत था जीसस कि जो पकड़ा रैहा था उसके पैर छुए, पैर धोए । गुरजिएफ कहता है कि पैर पड़ने योग्य था वह जूडास । ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है कि जिसने इतने पर भी इन्कार न किया जब जीसस ने कहा कि तुम मुझे पकड़वा दो, मेरी फांसी लगवानी जरूरी है। अगर फांसी नहीं लगती, जो मैं कह रहा. हूं वह खो जाएगा। मेरी फांसी लगती है तो सील मोहर हो जाएगी। मेरी फांसी हो अब मेरा काम कर सकती है और कोई उपाय नहीं है । तो तुम मुझे फांसी लगवा दो। फांसी से बचाने वाला मित्र खोजना आसान है। फांसी लगवाने वाला मित्र खोजना बड़ा मुश्किल है। इसलिए गुरजिएफ ने जब पहली दफा यह बात कही तो एक बड़ी मुश्किल का मामला हो गया। सारी ईसाइयत ने बड़ा विरोध किया कि यह बकवास है । यह कहता क्या है ? यह तो हमारा सारा हिसाब ही पलट गया । यह तो बात ही ठीक नहीं। लेकिन एक आदमी हिम्मत जुटाकर नहीं आया कि आकर कोशिश करता कि यह आदमी कहता कहां से है। लेकिन मैंने प्रयोग किया और मैं हैरान हुआ कि वह ठीक कहता है। जूडास दुश्मन नहीं है। जूडास दोस्त है । वह फ़क़ीर ठीक कहता है। वह गलत कहता ही नहीं बिल्कुल । मगर बड़ी मुश्किल से खोज पाया होगा। तो मेरा कहना है कि शास्त्र खोज का रास्ता है ही नहीं बल्कि सबसे बड़ी रुकावट है क्योंकि मन को ऐसी बातों से भर देता है जोकि हो सकता है नहीं भी हो। और तब उनसे नीचे उतरना, उनसे विपरीत जाना बिना जाने मुश्किल हो जाता है, एकदम मुश्किल हो जाता है । और महावीर के सम्बन्ध में तो बहुत ज्यादा हुई है यह बात, हृद बहुत ही हद की है । गुरजिएफ ने जो यह कहा तो उसको उसने नाम दिया - क्राइस्ट ड्रामा । उसने कहा कि यह सूली-बूली सब खेल है । यह सूली बिल्कुल । खेल है और नाटक है पूरा रचा हुआ । जीसस ने इस ख्याल पर अपने मित्र को राजी कर लिया है और अपने आसपास की हवा को कि जो मैं कह रहा हूं अगर तुम्हें बहुत दूर तक पहुंचाना हो उसकी खबर, तो मेरी फांसी लगवा देना जरूरी है। नहीं तो यह बात खो जाएगी। मेरी फांसी ही मूल्यवान् बनेगी ? इसलिए 'क्रास' मूल्यवान् बन गया। जीसस से ज्यादा मूल्यवान् 'क्रास' हो गया । यह जो इस तरह की बहुत सी बातें हुई बहुत ही मुश्किल में डालती हैं । लेकिन, उनके सम्बन्ध में विवाद करने का कोई उपाय नहीं है। उनके सम्बन्ध में प्रयोग करने का हो उपाय है। इधर, इन दिनों में बहुत ऐसी बात होगी जो शायद आपको पहली दफा हो ख्याल में आये, पहली वफा ही सुनें आप । लेकिन इस कारण न तो मैं कहता हूं कि मान लेना कि मैंने कही, और न कहता हूं कि इसलिए इन्कार कर देना कि पहली दफा किसी ने कही। अगर सच में ही प्रेम हो तो खोज पर निकलना एक एक. इस खोज पर निकलने की प्रक्रिया अत्यन्त सुन्दर शब्दों में आचार्य जो ने दो है । यह प्रक्रिया उन्हीं के शब्दों में इसी ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्ट रूप में दो है। प्रवचन के सभी श्रोता इस प्रयोग से लाभान्त्रित हुए थे। पाठक भी परिशिष्ट से उस प्रयोग की विधि को जानकर लाभ उठायें ।
स्टाफ रिपोर्टर, एएनएम न्यूज : मयूर विहार भाजपा जिलामंत्री जितेंद्र चौधरी की हत्या पुरानी रंजिश और हाल के दिनों में हुए पार्किंग विवाद की वजह से की गई है। पुलिस ने पांच सौ सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगालकर हत्या में शामिल चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि व्यक्तिगत रंजिश की वजह से आरोपी ने साथियों के साथ मिलकर भाजपा नेता की हत्या की है। आरोपियों से लगातार पूछताछ किया जा रहा है और साथ ही हथियार बरामद करने का प्रयास कर रही है। गिरफ्तार दो आरोपियों पर पहले से हत्या के प्रयास के मामले चल रहे हैं। मयूर विहार फेज तीन के निवासी उज्जवल उर्फ गौरव (26), सौरव कटारिया (18), घड़ौली गांव निवासी राजा (22) और बिट्टू (29) के रूप में गिरफ्तार आरोपियों की पहचान हुई है।
स्टाफ रिपोर्टर, एएनएम न्यूज : मयूर विहार भाजपा जिलामंत्री जितेंद्र चौधरी की हत्या पुरानी रंजिश और हाल के दिनों में हुए पार्किंग विवाद की वजह से की गई है। पुलिस ने पांच सौ सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगालकर हत्या में शामिल चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि व्यक्तिगत रंजिश की वजह से आरोपी ने साथियों के साथ मिलकर भाजपा नेता की हत्या की है। आरोपियों से लगातार पूछताछ किया जा रहा है और साथ ही हथियार बरामद करने का प्रयास कर रही है। गिरफ्तार दो आरोपियों पर पहले से हत्या के प्रयास के मामले चल रहे हैं। मयूर विहार फेज तीन के निवासी उज्जवल उर्फ गौरव , सौरव कटारिया , घड़ौली गांव निवासी राजा और बिट्टू के रूप में गिरफ्तार आरोपियों की पहचान हुई है।
Patna:शुक्रवार की रात बिहार में वेंटिलेटर के सहारे सांसे गिन रही सरकारी चिकत्सा सेवा ने एक और महिला की जान ले ली. भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आईसीयू में भर्ती महिला की तडप-तड़प कर मौत हो गयी. सूबे के सबसे बडे अस्पतालों में से एक जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बिजली कटने से वेंटिलेटर बंद हो गया. नतीजतन वेंटिलेटर के सहारे सांस ले रही महिला तड़प कर मर गयी. इंतिहा देखिये कि इस वाकये के दौरान आईसीयू से डॉक्टर और नर्स दोनों गायब थे. दरअसल भागलपुर के बूढ़ानाथ निवासी चंद्रशेखर प्रसाद की 55 वर्षीय पत्नी निर्मला देवी को शुक्रवार की सुबह जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के इमरजेंसी में भर्ती कराया गया था. महिला की हालत गंभीर थी, लिहाजा डॉक्टरों ने मरीज को गायनी आईसीयू में शिफ्ट कर दिया. आईसीयू में तैनात एनेस्थिसिया के डॉक्टर ने मरीज को सी-पैप वेंटिलेटर पर डाल दिया. इसके बाद मरीज की सेहत में सुधार होने लगा. लेकिन शुक्रवार की रात करीब 8:55 बजे अचानक गायनी आईसीयू की बिजली कट गयी. बिजली कटने के दो से तीन मिनट बाद वेंटिलेटर ने भी काम करना बंद कर दिया. आईसीयू में जहां हर वक्त डॉक्टर और नर्स को तैनात रहना पड़ता है, वहां कोई डॉक्टर-नर्स नहीं था. महिला के परिजनों ने जब मरीज को छटपटाते देखा तो खुद उसे दूसरे बेड पर लगे वेंटिलेटर तक ले गये. जब तक वे मरीज को दूसरे वेंटिलेटर पर ले जाते, तब तक मरीज की मौत हो गयी. महिला मरीज की तड़प तड़प कर मौत होने के बाद आईसीयू को जेनरेटर के जरिये बिजली आपूर्ति की गयी. मौत के बाद जब वेटिंलेटर की जांच की गयी तो पता चला कि उसकी बैट्री भी खराब थी. दरअसल सारे वेंटिलेटर में बैट्री लगा होता है ताकि बिजली गुल हो तो भी वेंटिलेटर बंद नहीं हो. लेकिन भागलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में लगे वेंटिलेटर की बैट्री खराब थी और किसी को इसकी जानकारी तक नहीं थी. जाहिर है एक बार वेटिंलेटर की खरीद के बाद उसकी जांच करने की जहमत नहीं उठायी गयी थी. किसी भी अस्पताल के आईसीयू में 24 घंटे डॉक्टर और नर्स के तैनात रहने का प्रावधान होता है. लेकिन जब भागलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बिजली गुल हुई तो नर्स-डॉक्टर की कौन कहे बिजली आपूर्ति करने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसी का सुरक्षा गार्ड तक गायब था. महिला के परिजन गार्ड को ढ़ूढ़ते रह गये लेकिन वह नहीं मिलाय आईसीयू में भर्ती मरीजों की निगरानी की जिम्मेदारी वहां तैनात नर्स की थी लेकिन 10 मिनट तक बिजली कटी रही और ऑक्सीजन के अभाव में महिला मरीज तड़पती रही. इस दौरान आईसीयू में तैनात एक भी नर्स नहीं मिली. आईसीयू में 24 घंटे चिकित्सक की तैनाती की जाती है लेकिन कोई डॉक्टर भी वहां नहीं था. अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक डॉ कुमार गौरव ने कहा कि बिजली गुल होने पर भी वेटिंलेटर को बैटरी के सहारे चलना चाहिये थे. अस्पताल अधीक्षक ने कहा कि पहली नजर में उन्हें ये मामला बिजली आपूर्ति करने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसी, वहां तैनात गार्ड के साथ साथ साथ आईसीयू में ऑन ड्यूटी नर्स और डॉक्टर की लापरवाही का लग रहा है. इस मामले की जांच करायी जायेगी और दोषी पर कार्रवाई की जायेगी. लेकिन काश अस्पताल अधीक्षक ये भी बता पाते कि उनकी कड़ी कार्रवाई के दावे से क्या तड़प कर मर गयी महिला की जान वापस आ जायेगी.
Patna:शुक्रवार की रात बिहार में वेंटिलेटर के सहारे सांसे गिन रही सरकारी चिकत्सा सेवा ने एक और महिला की जान ले ली. भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आईसीयू में भर्ती महिला की तडप-तड़प कर मौत हो गयी. सूबे के सबसे बडे अस्पतालों में से एक जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बिजली कटने से वेंटिलेटर बंद हो गया. नतीजतन वेंटिलेटर के सहारे सांस ले रही महिला तड़प कर मर गयी. इंतिहा देखिये कि इस वाकये के दौरान आईसीयू से डॉक्टर और नर्स दोनों गायब थे. दरअसल भागलपुर के बूढ़ानाथ निवासी चंद्रशेखर प्रसाद की पचपन वर्षीय पत्नी निर्मला देवी को शुक्रवार की सुबह जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के इमरजेंसी में भर्ती कराया गया था. महिला की हालत गंभीर थी, लिहाजा डॉक्टरों ने मरीज को गायनी आईसीयू में शिफ्ट कर दिया. आईसीयू में तैनात एनेस्थिसिया के डॉक्टर ने मरीज को सी-पैप वेंटिलेटर पर डाल दिया. इसके बाद मरीज की सेहत में सुधार होने लगा. लेकिन शुक्रवार की रात करीब आठ:पचपन बजे अचानक गायनी आईसीयू की बिजली कट गयी. बिजली कटने के दो से तीन मिनट बाद वेंटिलेटर ने भी काम करना बंद कर दिया. आईसीयू में जहां हर वक्त डॉक्टर और नर्स को तैनात रहना पड़ता है, वहां कोई डॉक्टर-नर्स नहीं था. महिला के परिजनों ने जब मरीज को छटपटाते देखा तो खुद उसे दूसरे बेड पर लगे वेंटिलेटर तक ले गये. जब तक वे मरीज को दूसरे वेंटिलेटर पर ले जाते, तब तक मरीज की मौत हो गयी. महिला मरीज की तड़प तड़प कर मौत होने के बाद आईसीयू को जेनरेटर के जरिये बिजली आपूर्ति की गयी. मौत के बाद जब वेटिंलेटर की जांच की गयी तो पता चला कि उसकी बैट्री भी खराब थी. दरअसल सारे वेंटिलेटर में बैट्री लगा होता है ताकि बिजली गुल हो तो भी वेंटिलेटर बंद नहीं हो. लेकिन भागलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में लगे वेंटिलेटर की बैट्री खराब थी और किसी को इसकी जानकारी तक नहीं थी. जाहिर है एक बार वेटिंलेटर की खरीद के बाद उसकी जांच करने की जहमत नहीं उठायी गयी थी. किसी भी अस्पताल के आईसीयू में चौबीस घंटाटे डॉक्टर और नर्स के तैनात रहने का प्रावधान होता है. लेकिन जब भागलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बिजली गुल हुई तो नर्स-डॉक्टर की कौन कहे बिजली आपूर्ति करने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसी का सुरक्षा गार्ड तक गायब था. महिला के परिजन गार्ड को ढ़ूढ़ते रह गये लेकिन वह नहीं मिलाय आईसीयू में भर्ती मरीजों की निगरानी की जिम्मेदारी वहां तैनात नर्स की थी लेकिन दस मिनट तक बिजली कटी रही और ऑक्सीजन के अभाव में महिला मरीज तड़पती रही. इस दौरान आईसीयू में तैनात एक भी नर्स नहीं मिली. आईसीयू में चौबीस घंटाटे चिकित्सक की तैनाती की जाती है लेकिन कोई डॉक्टर भी वहां नहीं था. अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक डॉ कुमार गौरव ने कहा कि बिजली गुल होने पर भी वेटिंलेटर को बैटरी के सहारे चलना चाहिये थे. अस्पताल अधीक्षक ने कहा कि पहली नजर में उन्हें ये मामला बिजली आपूर्ति करने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसी, वहां तैनात गार्ड के साथ साथ साथ आईसीयू में ऑन ड्यूटी नर्स और डॉक्टर की लापरवाही का लग रहा है. इस मामले की जांच करायी जायेगी और दोषी पर कार्रवाई की जायेगी. लेकिन काश अस्पताल अधीक्षक ये भी बता पाते कि उनकी कड़ी कार्रवाई के दावे से क्या तड़प कर मर गयी महिला की जान वापस आ जायेगी.
जनकपुरी वेस्ट और कालकाजी मंदिर के बीच की 24. 82 किलोमीटर लंबी DMRC की मजेंटा लाइन सोमवार 28 मई से शुरू हो गई। इस लाइन के शुरू हो जाने से नोएडा और गुरुग्राम के बीच की यात्रा की अवधि में कम से कम 30 मिनट की कमी आएगी। दरअसल, गुरुग्राम जानेवाले यात्रियों को मजेंटा लाइन मेट्रो से हौज खास इंटरचेंज पर उतरना होगा और वहां से यलो लाइन मेट्रो पकड़कर वे हुडा सिटी सेंटर की ओर जा सकेंगे। DMRC के अधिकारियों के मुताबिक मजेंटा लाइन शुरू हो जाने से हूडा सिटी सेंटर (यलो लाइन गुरुग्राम की तरफ) से बॉटनिकल गार्डन (नोएडा में ब्लू लाइन पर) पहुंचने में करीब 50 मिनट का वक्त लगेगा। इस लाइन के शुरू होने से पहले राजीव चौक से इंटरचेंज करने के बाद गुरुग्राम से नोएडा पहुंचने में करीब डेढ़ घंटे का वक्त लगता था। DMRC के मजेंटा मेट्रो लाइन को सुपर लाइन भी कहा जा रहा है क्योंकि इससे यात्रियों के वक्त और पैसे दोनों की काफी बचत होगी। साथ ही पालम के इंदिरा गांधी डमेस्टिक एयरपोर्ट तक आने-जाने के लिए अब तक मेट्रो की कोई सीधी कनेक्टिविटी नहीं थी। अब मजेंटा मेट्रो यह कमी दूर कर देगी। बॉटनिकल गार्डन से मजेंटा मेट्रो में बैठकर लोग सीधे डमेस्टिक एयरपोर्ट तक पहुंच सकेंगे। इससे उन्हें कैब वालों की मनमानी से निजात मिलने के साथ ही जाम और प्रदूषण से भी राहत मिलेगी।
जनकपुरी वेस्ट और कालकाजी मंदिर के बीच की चौबीस. बयासी किलोग्राममीटर लंबी DMRC की मजेंटा लाइन सोमवार अट्ठाईस मई से शुरू हो गई। इस लाइन के शुरू हो जाने से नोएडा और गुरुग्राम के बीच की यात्रा की अवधि में कम से कम तीस मिनट की कमी आएगी। दरअसल, गुरुग्राम जानेवाले यात्रियों को मजेंटा लाइन मेट्रो से हौज खास इंटरचेंज पर उतरना होगा और वहां से यलो लाइन मेट्रो पकड़कर वे हुडा सिटी सेंटर की ओर जा सकेंगे। DMRC के अधिकारियों के मुताबिक मजेंटा लाइन शुरू हो जाने से हूडा सिटी सेंटर से बॉटनिकल गार्डन पहुंचने में करीब पचास मिनट का वक्त लगेगा। इस लाइन के शुरू होने से पहले राजीव चौक से इंटरचेंज करने के बाद गुरुग्राम से नोएडा पहुंचने में करीब डेढ़ घंटे का वक्त लगता था। DMRC के मजेंटा मेट्रो लाइन को सुपर लाइन भी कहा जा रहा है क्योंकि इससे यात्रियों के वक्त और पैसे दोनों की काफी बचत होगी। साथ ही पालम के इंदिरा गांधी डमेस्टिक एयरपोर्ट तक आने-जाने के लिए अब तक मेट्रो की कोई सीधी कनेक्टिविटी नहीं थी। अब मजेंटा मेट्रो यह कमी दूर कर देगी। बॉटनिकल गार्डन से मजेंटा मेट्रो में बैठकर लोग सीधे डमेस्टिक एयरपोर्ट तक पहुंच सकेंगे। इससे उन्हें कैब वालों की मनमानी से निजात मिलने के साथ ही जाम और प्रदूषण से भी राहत मिलेगी।
टीवी की मशहूर एक्ट्रेस रुबीना दिलैक (Rubina Dilaik) इन दिनों खतरों के खिलाड़ी में खतरों से खेलती नजर आ रही हैं। यही नहीं, उन्होंने पहले ही दिन स्टंट करके साबित कर दिया कि वो रियल लाइफ शेरनी हैं। रोहित शेट्टी के शो में अपनी ताकत का डंका बजाने वाली एक्ट्रेस ने अब ट्रोलर्स को करारा जवाब देना सीख लिया है। बिग बॉस 14 में रुबीना दिलैक ने अपनी शादीशुदा जिंदगी को लेकर बड़ा खुलासा किया था। रुबीना ने बताया था कि वो और अभिनव शुक्ला तलाक लेने की सोच रहे थे। इसलिये वो शो में अपनी शादी को एक अवसर देने आए हैं। रुबीना के खुलासे ने हर किसी को चौंका दिया था। वहीं कुछ लोगों ने उनके रिश्ते पर कई सवाल भी उठाये। वहीं अब रुबीना ने एक इंटरव्यू के चलते स्पष्ट कर दिया है कि वो अपने पति के खिलाफ कोई गलत चीज बर्दाशत नहीं करेंगी। रुबीना ने कहा है कि वो किसी भी कीमत पर अभिनव की बेइज्जती बर्दाशत नहीं करेंगीं। यदि किसी ने ऐसा करने का प्रयास किया, तो उसे रुबीना का क्रोध और रोष दोनों ही झेलना पड़ेगा। इंटरव्यू के चलते रुबीना ने कहा कि उन्हें पता था कि यदि वो नेशनल टीवी पर अपने रिलेशनशिप के बारे में बतायेंगी, तो लोग उन्हें भला-बुरा कहेंगे, क्योंकि हर कोई उनके रिश्ते को समझे जरूरी नहीं है। रुबीना ने कहा है कि उनके बिखरे की रिश्ते की सच्चाई जानने के पश्चात् कई लोगों ने उनके और अभिनव के बीच दरार डालने का प्रयास किया, मगर सफल नहीं हो पाये। लेकिन अब अगर अभिनव के बारे में किसी ने कुछ बोला, तो उसे रुबीना छोड़ने वाली नहीं हैं।
टीवी की मशहूर एक्ट्रेस रुबीना दिलैक इन दिनों खतरों के खिलाड़ी में खतरों से खेलती नजर आ रही हैं। यही नहीं, उन्होंने पहले ही दिन स्टंट करके साबित कर दिया कि वो रियल लाइफ शेरनी हैं। रोहित शेट्टी के शो में अपनी ताकत का डंका बजाने वाली एक्ट्रेस ने अब ट्रोलर्स को करारा जवाब देना सीख लिया है। बिग बॉस चौदह में रुबीना दिलैक ने अपनी शादीशुदा जिंदगी को लेकर बड़ा खुलासा किया था। रुबीना ने बताया था कि वो और अभिनव शुक्ला तलाक लेने की सोच रहे थे। इसलिये वो शो में अपनी शादी को एक अवसर देने आए हैं। रुबीना के खुलासे ने हर किसी को चौंका दिया था। वहीं कुछ लोगों ने उनके रिश्ते पर कई सवाल भी उठाये। वहीं अब रुबीना ने एक इंटरव्यू के चलते स्पष्ट कर दिया है कि वो अपने पति के खिलाफ कोई गलत चीज बर्दाशत नहीं करेंगी। रुबीना ने कहा है कि वो किसी भी कीमत पर अभिनव की बेइज्जती बर्दाशत नहीं करेंगीं। यदि किसी ने ऐसा करने का प्रयास किया, तो उसे रुबीना का क्रोध और रोष दोनों ही झेलना पड़ेगा। इंटरव्यू के चलते रुबीना ने कहा कि उन्हें पता था कि यदि वो नेशनल टीवी पर अपने रिलेशनशिप के बारे में बतायेंगी, तो लोग उन्हें भला-बुरा कहेंगे, क्योंकि हर कोई उनके रिश्ते को समझे जरूरी नहीं है। रुबीना ने कहा है कि उनके बिखरे की रिश्ते की सच्चाई जानने के पश्चात् कई लोगों ने उनके और अभिनव के बीच दरार डालने का प्रयास किया, मगर सफल नहीं हो पाये। लेकिन अब अगर अभिनव के बारे में किसी ने कुछ बोला, तो उसे रुबीना छोड़ने वाली नहीं हैं।
शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ। बाल्टिक सागर में जाने वाली रेगा नदी (Rega) और उसमें विलय होने वाली उपनदियाँ उपनदी या सहायक नदी ऐसे झरने या नदी को बोलते हैं जो जाकर किसी मुख्य नदी में विलय हो जाती है। उपनदियाँ सीधी किसी सागर या झील में जाकर नहीं मिलतीं। कोई भी मुख्य नदी और उसकी उपनदियाँ एक जलसम्भर क्षेत्र बनती हैं जहाँ का पानी उपनदियों के ज़रिये मुख्य नदी में एकत्रित होकर फिर सागर में विलय हो जाता है। इसका एक उदाहरण यमुना नदी है, जो गंगा नदी की एक उपनदी है। प्रयाग में विलय के बाद यमुना का पानी गंगा में मिल जाता है और उस से आगे सिर्फ मुख्य गंगा नदी ही चलती है।, John Oberlin Harris,... पाकिस्तान में बहती सिन्घु सिन्धु नदी (Indus River) एशिया की सबसे लंबी नदियों में से एक है। यह पाकिस्तान, भारत (जम्मू और कश्मीर) और चीन (पश्चिमी तिब्बत) के माध्यम से बहती है। सिन्धु नदी का उद्गम स्थल, तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा माना जाता है। इस नदी की लंबाई प्रायः 2880 किलोमीटर है। यहां से यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती है। नंगा पर्वत के उत्तरी भाग से घूम कर यह दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीच से गुजरती है और फिर जाकर अरब सागर में मिलती है। इस नदी का ज्यादातर अंश पाकिस्तान में प्रवाहित होता है। यह पाकिस्तान की सबसे लंबी नदी और राष्ट्रीय नदी है। सिंधु की पांच उपनदियां हैं। इनके नाम हैंः वितस्ता, चन्द्रभागा, ईरावती, विपासा एंव शतद्रु. उपनदी और सिन्धु नदी आम में 0 बातें हैं (यूनियनपीडिया में)। उपनदी 7 संबंध है और सिन्धु नदी 44 है। वे आम 0 में है, समानता सूचकांक 0.00% है = 0 / (7 + 44)। यह लेख उपनदी और सिन्धु नदी के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ। बाल्टिक सागर में जाने वाली रेगा नदी और उसमें विलय होने वाली उपनदियाँ उपनदी या सहायक नदी ऐसे झरने या नदी को बोलते हैं जो जाकर किसी मुख्य नदी में विलय हो जाती है। उपनदियाँ सीधी किसी सागर या झील में जाकर नहीं मिलतीं। कोई भी मुख्य नदी और उसकी उपनदियाँ एक जलसम्भर क्षेत्र बनती हैं जहाँ का पानी उपनदियों के ज़रिये मुख्य नदी में एकत्रित होकर फिर सागर में विलय हो जाता है। इसका एक उदाहरण यमुना नदी है, जो गंगा नदी की एक उपनदी है। प्रयाग में विलय के बाद यमुना का पानी गंगा में मिल जाता है और उस से आगे सिर्फ मुख्य गंगा नदी ही चलती है।, John Oberlin Harris,... पाकिस्तान में बहती सिन्घु सिन्धु नदी एशिया की सबसे लंबी नदियों में से एक है। यह पाकिस्तान, भारत और चीन के माध्यम से बहती है। सिन्धु नदी का उद्गम स्थल, तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा माना जाता है। इस नदी की लंबाई प्रायः दो हज़ार आठ सौ अस्सी किलोग्राममीटर है। यहां से यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती है। नंगा पर्वत के उत्तरी भाग से घूम कर यह दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीच से गुजरती है और फिर जाकर अरब सागर में मिलती है। इस नदी का ज्यादातर अंश पाकिस्तान में प्रवाहित होता है। यह पाकिस्तान की सबसे लंबी नदी और राष्ट्रीय नदी है। सिंधु की पांच उपनदियां हैं। इनके नाम हैंः वितस्ता, चन्द्रभागा, ईरावती, विपासा एंव शतद्रु. उपनदी और सिन्धु नदी आम में शून्य बातें हैं । उपनदी सात संबंध है और सिन्धु नदी चौंतालीस है। वे आम शून्य में है, समानता सूचकांक शून्य.शून्य% है = शून्य / । यह लेख उपनदी और सिन्धु नदी के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
मुंबई। शहर का एक सामाजिक संगठन एक पाकिस्तानी फिल्म चुनने के लिए एमएएमआई मामी मुंबई फिल्म महोत्सव के आयोजकों से नाराज है और उसने इसका विरोध करने की योजना बनाई है जिसके लिए उसने पुलिस की अनुमति मांगी है। संगठन 'संघर्ष' ने आयोजकों पर भारत की जनता की राष्ट्रवादी भावनाओं से ऐसे समय खेलने का आरोप लगाया जब उरी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ तनाव की स्थिति है । संगठन के प्रमुख पृथ्वी महास्के ने अंबोली पुलिस को यहां लिखे पत्र में कहा कि इस कार्यक्रम के आयोजक अपने फिल्म महोत्सव में इस पाकिस्तानी फिल्म को दिखाकर लोगों में आक्रोश बढा सकते हैं। यह स्वीकार्य नहीं होगा क्योंकि यह लोगों में तनाव और आक्रोश और बढाएगा। पत्र में कहा गया कि इसके अलावा 'आईएमपीएए' ने बालीवुड में काम करने वाले पाकिस्तानी कलाकारों को प्रतिबंधित करने का फैसला किया है और लगभग सभी एक पर्दे वाले सिनेमाघरों ने पाकिस्तानी कलाकारों की फिल्मों पर पाबंदी लगाने का फैसला किया। तो फिर मामी फिल्म महोत्सव के आयोजक पाकिस्तानी कलाकारों के प्रति इतना प्रेम क्यों दिखा रहे हैं। इस महोत्सव का 18वां सत्र 20 से 27 अक्तूबर तक आयोजित होगा जिसमें 54 देशों की 180 से अधिक फिल्में शहर के अलग अलग स्थानों पर दिखाई जाएंगी। महास्के ने कहा कि अगर आयोजक फिल्म प्रदर्शन नहीं रोकते हैं तो मेरे कार्यकर्ता फिल्म का प्रदर्शन रोकेंगे। संपर्क किए जाने पर अंबोली के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक भारत गायकवाड ने कहा कि हां, मुझे इस संबंध में एक आवेदन मिला है और मैंने आवेदन के गुणदोष पर गौर करने के लिए कल दोनों पक्षों को बुलाया है। 'जागो हुआ सवेरा' 1958 की एक पाकिस्तानी फिल्म है जिसका निर्देशन एजे करदार ने किया है।
मुंबई। शहर का एक सामाजिक संगठन एक पाकिस्तानी फिल्म चुनने के लिए एमएएमआई मामी मुंबई फिल्म महोत्सव के आयोजकों से नाराज है और उसने इसका विरोध करने की योजना बनाई है जिसके लिए उसने पुलिस की अनुमति मांगी है। संगठन 'संघर्ष' ने आयोजकों पर भारत की जनता की राष्ट्रवादी भावनाओं से ऐसे समय खेलने का आरोप लगाया जब उरी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ तनाव की स्थिति है । संगठन के प्रमुख पृथ्वी महास्के ने अंबोली पुलिस को यहां लिखे पत्र में कहा कि इस कार्यक्रम के आयोजक अपने फिल्म महोत्सव में इस पाकिस्तानी फिल्म को दिखाकर लोगों में आक्रोश बढा सकते हैं। यह स्वीकार्य नहीं होगा क्योंकि यह लोगों में तनाव और आक्रोश और बढाएगा। पत्र में कहा गया कि इसके अलावा 'आईएमपीएए' ने बालीवुड में काम करने वाले पाकिस्तानी कलाकारों को प्रतिबंधित करने का फैसला किया है और लगभग सभी एक पर्दे वाले सिनेमाघरों ने पाकिस्तानी कलाकारों की फिल्मों पर पाबंदी लगाने का फैसला किया। तो फिर मामी फिल्म महोत्सव के आयोजक पाकिस्तानी कलाकारों के प्रति इतना प्रेम क्यों दिखा रहे हैं। इस महोत्सव का अट्ठारहवां सत्र बीस से सत्ताईस अक्तूबर तक आयोजित होगा जिसमें चौवन देशों की एक सौ अस्सी से अधिक फिल्में शहर के अलग अलग स्थानों पर दिखाई जाएंगी। महास्के ने कहा कि अगर आयोजक फिल्म प्रदर्शन नहीं रोकते हैं तो मेरे कार्यकर्ता फिल्म का प्रदर्शन रोकेंगे। संपर्क किए जाने पर अंबोली के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक भारत गायकवाड ने कहा कि हां, मुझे इस संबंध में एक आवेदन मिला है और मैंने आवेदन के गुणदोष पर गौर करने के लिए कल दोनों पक्षों को बुलाया है। 'जागो हुआ सवेरा' एक हज़ार नौ सौ अट्ठावन की एक पाकिस्तानी फिल्म है जिसका निर्देशन एजे करदार ने किया है।
३७. दलबन्दी से वर्ग जडीभूत हो जाते हैं मालिक हमेशा मालिक बने रहते हैं, गुलाम हमेशा गुलाम बने रहते हैं । मालिक हमेशा मालिक बने रहते हैं, मजदूर हमेशा मजदूर बने रहते हैं । विशिष्ट अधिकारी हमेशा विशिष्ट अधिकारी ही रहते हैं और गुलाम हमेशा गुलाम ही रहते हैं । ३८. इसका मतलब हैं कि कुछ लोगों के लिये तो स्वतन्त्रता हो सकती है, किन्तु सभी के लिये नहीं । इसका मतलब हुआ कि चन्द लोगों के लिये समानता हो सकती है, किन्तु अधिकांश के लिए नहीं हो सकती । ३९. इसका इलाज क्या है? एक ही इलाज है कि भ्रातृ-भावना को सर्वमान्य और प्रभावशाली बनाया जाय । ४०. भ्रातृ-भाव क्या है? आदमी हर आदमी को अपना भाई समझे -- यही नैतिकता है । ४१. इसीलीये भगवान् बुद्ध ने कहा कि धम्म नैतिकता है और जिस प्रकार धम्म पवित्र है; उसी प्रकार नैतिकता भी पवित्र है ।
सैंतीस. दलबन्दी से वर्ग जडीभूत हो जाते हैं मालिक हमेशा मालिक बने रहते हैं, गुलाम हमेशा गुलाम बने रहते हैं । मालिक हमेशा मालिक बने रहते हैं, मजदूर हमेशा मजदूर बने रहते हैं । विशिष्ट अधिकारी हमेशा विशिष्ट अधिकारी ही रहते हैं और गुलाम हमेशा गुलाम ही रहते हैं । अड़तीस. इसका मतलब हैं कि कुछ लोगों के लिये तो स्वतन्त्रता हो सकती है, किन्तु सभी के लिये नहीं । इसका मतलब हुआ कि चन्द लोगों के लिये समानता हो सकती है, किन्तु अधिकांश के लिए नहीं हो सकती । उनतालीस. इसका इलाज क्या है? एक ही इलाज है कि भ्रातृ-भावना को सर्वमान्य और प्रभावशाली बनाया जाय । चालीस. भ्रातृ-भाव क्या है? आदमी हर आदमी को अपना भाई समझे -- यही नैतिकता है । इकतालीस. इसीलीये भगवान् बुद्ध ने कहा कि धम्म नैतिकता है और जिस प्रकार धम्म पवित्र है; उसी प्रकार नैतिकता भी पवित्र है ।
तेलंगाना राज्य के चौदह छात्रों ने TISS प्रवेश परीक्षा को मंजूरी दी जिसमें राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा और व्यक्तिगत साक्षात्कार शामिल हैं। परीक्षा का आयोजन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (TISS), मुंबई द्वारा किया गया था। इन छात्रों में से तेरह तेलंगाना सोशल वेलफेयर डिग्री कॉलेज फॉर वूमेन और एक ट्राइबल वेलफेयर डिग्री कॉलेज से हैं। परीक्षा को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले छात्र इस प्रकार हैंः जो छात्र चुने जाते हैं वे pursue महिला अध्ययन ', and प्राकृतिक संसाधन और शासन', Policy लोक नीति और शासन ',' शिक्षा ', Innovation सामाजिक नवाचार, उद्यमिता' और it दलित और आदिवासी अध्ययन 'में एमए करेंगे। ज्यादातर छात्र गरीब परिवारों के हैं। उनके माता-पिता दर्जी, मजदूर, किसान, बीड़ी बनाने वाले आदि हैं। छात्रों की सफलता के बाद, तेलंगाना सामाजिक और जनजातीय कल्याण आवासीय शैक्षिक संस्थानों के सचिव डॉ। आरएस प्रवीण कुमार ने राज्य सरकार के समाज कल्याण मंत्री कोप्पुला ईश्वर और आदिम जाति कल्याण मंत्री सत्यवती राठौड़ का समर्थन करने के लिए धन्यवाद दिया।
तेलंगाना राज्य के चौदह छात्रों ने TISS प्रवेश परीक्षा को मंजूरी दी जिसमें राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा और व्यक्तिगत साक्षात्कार शामिल हैं। परीक्षा का आयोजन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस , मुंबई द्वारा किया गया था। इन छात्रों में से तेरह तेलंगाना सोशल वेलफेयर डिग्री कॉलेज फॉर वूमेन और एक ट्राइबल वेलफेयर डिग्री कॉलेज से हैं। परीक्षा को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले छात्र इस प्रकार हैंः जो छात्र चुने जाते हैं वे pursue महिला अध्ययन ', and प्राकृतिक संसाधन और शासन', Policy लोक नीति और शासन ',' शिक्षा ', Innovation सामाजिक नवाचार, उद्यमिता' और it दलित और आदिवासी अध्ययन 'में एमए करेंगे। ज्यादातर छात्र गरीब परिवारों के हैं। उनके माता-पिता दर्जी, मजदूर, किसान, बीड़ी बनाने वाले आदि हैं। छात्रों की सफलता के बाद, तेलंगाना सामाजिक और जनजातीय कल्याण आवासीय शैक्षिक संस्थानों के सचिव डॉ। आरएस प्रवीण कुमार ने राज्य सरकार के समाज कल्याण मंत्री कोप्पुला ईश्वर और आदिम जाति कल्याण मंत्री सत्यवती राठौड़ का समर्थन करने के लिए धन्यवाद दिया।
विरोधिरसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपिताषु कामिनीषु वैराग्यकथाभिरनुनये । विरोधिरसानुभावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य कोपावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने । विभाव वर्णन करने में । विरोधी रस के भावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रिय के प्रति प्रणय कलह में कुपित कामिनियों के विषय में वैराग्य की बातचीत से अनुनय करने में। विरोधी रस के अनुभावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रणय कुपित तथा प्रसन्न न होनेवाली नायिका के विषय में कोपावेशविवश नायक के रौद्र रस के अनुभावों के वर्णन करने में । विरोधिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात् । व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव । अत एव सामान्येन भावग्रहणम् । वैराग्यकथाभिरिति बैराग्य - विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी उसका परिग्रह; विरोधी का जो स्थायी, स्थायी के रूप में उसका परिग्रह ही असम्भव है क्योंकि उसके उत्थान का प्रसङ्ग ही नहीं आता । व्यभिचारी के रूप में तो उसका परिग्रह हो ही जाता है । इसीलिये सामान्यतया भाव शब्द का उपादान किया गया है 'वैराग्य की बातों के द्वारा ' यहाँ वैराग्य शब्द से शान्त का जो स्थायी निर्वेद वह कहा तारावती नायक इत्यादि में नहीं होता। दूसरी बात यह है कि रस अद्वितीयानन्दमय होता है, उसमें विरोध असम्भव है। विरोध के विषय में रसगङ्गाधरकार का कहना है कि यदि प्रकृत रस के विरोधी रसांगों का निबन्धन किया जावेगा तो विरोधी प्रकृत रस का बाध कर लेगा अथवा दोनों उसी प्रकार नष्ट हो जावेंगे जैसे सुन्द और उपसुन्द परस्पर लड़कर दोनों नष्ट हो गये । ) रस के उपकरण तीन होते हैं विभाव, भाव, और अनुभाव । विरोधी रस से सम्बद्ध इन तीनों का उपादान नहीं करना चाहिये । उदाहरण के लिये यदि शान्त रस के विभावों का शान्तरस के विभावों के रूप में ही वर्णन किया गया हो और उसके तत्काल बाद शृंगार रस के विभावों का वर्णन प्रारम्भ कर दिया जावे तो विरोधी रस के विभाव परिग्रह का दोष होगा । ( पहले बतलाया जा चुका है कि हास्य और शृंगार, वीर और अद्भुत रौद्र और करुण, भयानक और बीभत्स इनके विभावों का विरोध नहीं होता । इन रसों का विरोध तभी होता है जब एक ही आलम्बन के प्रति दोनों भाव हो । यदि हास्य और शृंगार के पृथक् पृथक् आलम्बनों का एक साथ शब्देन निर्वेदः शान्तस्य यः स्थायी स उक्तः । यथा 'प्रसादे वर्तस्व प्रकटयमुद्रं सन्त्यज रुषम्' इत्याद्युपक्रम्यार्थान्तरन्यासो 'न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः' इति । मनागपि निर्वेदानुभवेशे सति रतेर्विच्छेदः । ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वाभिमानं कथं भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिकारजत तत्त्वस्तदुपादेयधियं भजते ऋते संवृतिमान्नात् । कथाभिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृतिमतिप्रभृतीन संगृह्णाति । गया है । जैसे - 'प्रसन्नता में वर्तमान होओ, आनन्द प्रकट करो और क्रोध छोड़ दो' यह उपक्रम करके --'हे मुग्धे ! वीता हुआ कालहरिण पुनः आने में समर्थ नहीं होता ।' यहाँ थोड़े भी निर्वेद के अनुप्रवेश में रति का विच्छेद हो जाता है । विषयों के वास्तविक तत्त्व को जाननेवाला व्यक्ति निस्सन्देह जीवितसर्वस्व के अभिमान को किस प्रकार प्राप्त होवे । शुक्ति और रजत के तत्त्व को जाननेवाला एकमात्र संवृति को छोड़कर उसके उपादान की बुद्धि को प्राप्त नहीं होता। 'कथाभिः' का बहुवचन शान्त रस के व्यभिचारी धृति, मति इत्यादि का संग्रह कर लेता है । तारावती वर्णन किया जावेगा तो दोष नहीं होगा। एक में रौद्र और दूसरे में करुण का होना तो स्वाभाविक ही है । ) इसीलिये यहाँ पर विभाव विरोध में शान्त और शृङ्गार का उदाहरण दिया गया है । शम और रति एक दूसरे के विरोधी होते हैं । शम का वर्णन करते करते यदि कोई कवि रति के विभावों का उपादान कर ले तो यह दोष ही होगा । यह तो हुई विरोधी रस के विभावों के उपादान की बात । अब विरोधी रस के उपादान को लीजिये - भाव शब्द का अर्थ है व्यभिचारी भाव और स्थायी भाव । यहाँ पर भाव शब्द से तात्पर्य व्यभिचारी भाव से ही है स्थायी भाव से नहीं। क्योंकि यदि विरोधी रस के स्थायी भाव का उपादान किया जावेगा और उसका परिपोष भी स्थायी भाव के ही रूप में किया जावेगा तो प्रकृत रस तो समाप्त ही हो जावेगा और उसके स्थान पर विरोधी रस सत्ता में आ जावेगा । अतः विरोधी रस के सञ्चारी भावों का उपादान दोष होता है । यदि स्थायी भावों का भी उपादान व्यभिचारी भावों के रूप में किया जावेगा तो उनका उपादान भी दोष होगा । इसीलिये सामान्यतया भावों के विरोधी होने की बात कह दी गई है । उदाहरण के लिये प्रणयकुपिता नायिकाओं को मनाने के लिये कोई वैराग्य की कथायें करने लगे । वैराग्य ( निर्वेद ) यद्यपि शान्त रस का जब मानिनी के अनुनय के प्रसंग में उसका उपादान किया जावेगा तब वह
विरोधिरसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपिताषु कामिनीषु वैराग्यकथाभिरनुनये । विरोधिरसानुभावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य कोपावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने । विभाव वर्णन करने में । विरोधी रस के भावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रिय के प्रति प्रणय कलह में कुपित कामिनियों के विषय में वैराग्य की बातचीत से अनुनय करने में। विरोधी रस के अनुभावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रणय कुपित तथा प्रसन्न न होनेवाली नायिका के विषय में कोपावेशविवश नायक के रौद्र रस के अनुभावों के वर्णन करने में । विरोधिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात् । व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव । अत एव सामान्येन भावग्रहणम् । वैराग्यकथाभिरिति बैराग्य - विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी उसका परिग्रह; विरोधी का जो स्थायी, स्थायी के रूप में उसका परिग्रह ही असम्भव है क्योंकि उसके उत्थान का प्रसङ्ग ही नहीं आता । व्यभिचारी के रूप में तो उसका परिग्रह हो ही जाता है । इसीलिये सामान्यतया भाव शब्द का उपादान किया गया है 'वैराग्य की बातों के द्वारा ' यहाँ वैराग्य शब्द से शान्त का जो स्थायी निर्वेद वह कहा तारावती नायक इत्यादि में नहीं होता। दूसरी बात यह है कि रस अद्वितीयानन्दमय होता है, उसमें विरोध असम्भव है। विरोध के विषय में रसगङ्गाधरकार का कहना है कि यदि प्रकृत रस के विरोधी रसांगों का निबन्धन किया जावेगा तो विरोधी प्रकृत रस का बाध कर लेगा अथवा दोनों उसी प्रकार नष्ट हो जावेंगे जैसे सुन्द और उपसुन्द परस्पर लड़कर दोनों नष्ट हो गये । ) रस के उपकरण तीन होते हैं विभाव, भाव, और अनुभाव । विरोधी रस से सम्बद्ध इन तीनों का उपादान नहीं करना चाहिये । उदाहरण के लिये यदि शान्त रस के विभावों का शान्तरस के विभावों के रूप में ही वर्णन किया गया हो और उसके तत्काल बाद शृंगार रस के विभावों का वर्णन प्रारम्भ कर दिया जावे तो विरोधी रस के विभाव परिग्रह का दोष होगा । इसीलिये यहाँ पर विभाव विरोध में शान्त और शृङ्गार का उदाहरण दिया गया है । शम और रति एक दूसरे के विरोधी होते हैं । शम का वर्णन करते करते यदि कोई कवि रति के विभावों का उपादान कर ले तो यह दोष ही होगा । यह तो हुई विरोधी रस के विभावों के उपादान की बात । अब विरोधी रस के उपादान को लीजिये - भाव शब्द का अर्थ है व्यभिचारी भाव और स्थायी भाव । यहाँ पर भाव शब्द से तात्पर्य व्यभिचारी भाव से ही है स्थायी भाव से नहीं। क्योंकि यदि विरोधी रस के स्थायी भाव का उपादान किया जावेगा और उसका परिपोष भी स्थायी भाव के ही रूप में किया जावेगा तो प्रकृत रस तो समाप्त ही हो जावेगा और उसके स्थान पर विरोधी रस सत्ता में आ जावेगा । अतः विरोधी रस के सञ्चारी भावों का उपादान दोष होता है । यदि स्थायी भावों का भी उपादान व्यभिचारी भावों के रूप में किया जावेगा तो उनका उपादान भी दोष होगा । इसीलिये सामान्यतया भावों के विरोधी होने की बात कह दी गई है । उदाहरण के लिये प्रणयकुपिता नायिकाओं को मनाने के लिये कोई वैराग्य की कथायें करने लगे । वैराग्य यद्यपि शान्त रस का जब मानिनी के अनुनय के प्रसंग में उसका उपादान किया जावेगा तब वह
Meerut. बेसिक शिक्षा परिषद बच्चों को कॉमिक्स बुक राइटिंग में हुनर दिखाने का मौका दे रहा है. इसके अलावा स्टोरी राइटिंग में भी बच्चे अपना हुनर दिखा सकते हैं. इसके लिए परिषद ने बकायदा स्टेट लेवल कॉम्पिटीशन का आयोजन भी किया है. इसके तहत राज्यभर के स्कूलों से बच्चे लेखन में अपना हुनर दिखा सकेंगे. बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से यह मौका बच्चों के टैलेंट को देखते हुए दिया गया है. परिषद के अधिकारियों के मुताबिक कई स्कूलों के बच्चे स्कूलों में ही वीडियो बनाकर व अन्य माध्यम से अपने राइटिंग स्किल को पंख देने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ स्टूडेंट्स ने हिंदी, इंग्लिश, साइंस जैसे सब्जेक्ट्स के विजुएल्स तैयार किए हैं, जिनकी कुछ कॉपियां परिषद को भी मिली हैं. बच्चों के इस टैलेंट को देखते हुए परिषद के अधिकारियों ने राइटिंग कॉम्पीटिशन कराने का जिम्मा उठाया है. बच्चों के साथ परिषद ने टीचर्स के लिए भी कॉम्पिटीशन का आयोजन किया है. इसके तहत टीचर्स काव्य और गायन प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं. इसके लिए टीचर्स को पहले 3 मिनट का वीडियो परिषद को भेजना होगा. जिसमें टीचर्स अपना नाम, पता, विकासखंड, स्कूल व जिले का नाम भी बताना होगा. परिषद का मानना है कि इस तरह की प्रतियोगिताओं के जरिए टीचर्स भी अपने छुपे हुए टैलेंट को बाहर ला सकते हैं. इसके लिए 30 अप्रैल से 10 मई तक आवेदन किए जा सकते हैं. स्टूडेंट्स और टीचर्स दोनों को ही इस तरह के कॉम्पिटीशन से अपनी पहचान बनाने का मौका मिलेगा.
Meerut. बेसिक शिक्षा परिषद बच्चों को कॉमिक्स बुक राइटिंग में हुनर दिखाने का मौका दे रहा है. इसके अलावा स्टोरी राइटिंग में भी बच्चे अपना हुनर दिखा सकते हैं. इसके लिए परिषद ने बकायदा स्टेट लेवल कॉम्पिटीशन का आयोजन भी किया है. इसके तहत राज्यभर के स्कूलों से बच्चे लेखन में अपना हुनर दिखा सकेंगे. बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से यह मौका बच्चों के टैलेंट को देखते हुए दिया गया है. परिषद के अधिकारियों के मुताबिक कई स्कूलों के बच्चे स्कूलों में ही वीडियो बनाकर व अन्य माध्यम से अपने राइटिंग स्किल को पंख देने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ स्टूडेंट्स ने हिंदी, इंग्लिश, साइंस जैसे सब्जेक्ट्स के विजुएल्स तैयार किए हैं, जिनकी कुछ कॉपियां परिषद को भी मिली हैं. बच्चों के इस टैलेंट को देखते हुए परिषद के अधिकारियों ने राइटिंग कॉम्पीटिशन कराने का जिम्मा उठाया है. बच्चों के साथ परिषद ने टीचर्स के लिए भी कॉम्पिटीशन का आयोजन किया है. इसके तहत टीचर्स काव्य और गायन प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं. इसके लिए टीचर्स को पहले तीन मिनट का वीडियो परिषद को भेजना होगा. जिसमें टीचर्स अपना नाम, पता, विकासखंड, स्कूल व जिले का नाम भी बताना होगा. परिषद का मानना है कि इस तरह की प्रतियोगिताओं के जरिए टीचर्स भी अपने छुपे हुए टैलेंट को बाहर ला सकते हैं. इसके लिए तीस अप्रैल से दस मई तक आवेदन किए जा सकते हैं. स्टूडेंट्स और टीचर्स दोनों को ही इस तरह के कॉम्पिटीशन से अपनी पहचान बनाने का मौका मिलेगा.
ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट के सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। नीलसन द्वारा कराए गए भारत 2. 0 इंटरनेट अध्ययन के अनुसार 2019 से भारत के ग्रामीण इलाकों में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में 45 फीसदी की वृद्घि हुई है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इंटरनेट का सक्रियता से उपयोग करने वालों में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या 2019 के बाद से 61 फीसदी बढ़ी है। अध्ययन में देश भर में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बीच इंटरनेट के उपयोग और उनके ब्राउजिंग रूझान का भी विवरण दिया गया है। रिपोर्ट से पता चलता है कि दिसंबर 2021 में देश भर में 2 साल से अधिक उम्र के सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 64. 6 करोड़ थी। सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में ग्रामीण भारत शहरी इलाकों से कहीं आगे है। ग्रामीण इलाकों में 35. 2 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं जिनकी संख्या शहरी भारत की तुलना में करीब 20 फीसदी अधिक है। अध्ययन से यह भी पता चला है कि करीब 60 फीसदी ग्रामीण आबादी अब भी इंटरनेट का सक्रिय उपयोग नहीं कर रही है, जिससे इस क्षेत्र में विस्तार की काफी संभावना है। इधर शहरी इलाकों में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 29. 4 करोड़ है। नीलसन इंडिया की प्रबंध निदेशक डॉली झा ने कहा कि सस्ते स्मार्टफोन और किफायती मोबाइल डेटा की उपलब्धता के साथ डिजिटल ढांचे को मजबूत बनाने के सरकार के प्रयास से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा है। देश में डेटा की कीमत दुनिया में सबसे कम है, जिसकी वजह से भी इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है। उन्होंने कहा, 'इन सब वजहों से देश में तेजी से इंटरनेट का प्रसार हुआ है। ' उन्होंने कहा कि इस साल 5जी शुरू होने की उम्मीद है जिससे कुछ क्षेत्रों में काफी तेजी देखी जा सकती है। सरकार डिजिटल एजेंडा पर काफी सक्रियता से काम कर रही है और काफी संख्या में ग्राम पंचायतों को इंटरनेट के दायरे में लाया जा रहा है। सरकार के इन प्रयासों का लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। अध्ययन के अनुसार 59. 2 करोड़ सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता 12 साल और उससे ऊपर के हैं। 2019 की तुलना में इस आयु वर्ग के सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की की संख्या करीब 37 फीसदी बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की वृद्घि दर 45 फीसदी रही जबकि शहरी इलाकों में यह वृद्घि 28 फीसदी दर्ज की गई। दिलचस्प है कि पिछले दो साल में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या 61 फीसदी बढ़ी जबकि पुरुष उपयोगकर्ताओं की संख्या 24 फीसदी बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट का उपयोग करने वाली हर 3 में 1 महिला सक्रिय उपयोगकर्ता हैं। अध्ययन के अनुसार करीब 90 फीसदी उपयोगकर्ता रोजाना इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। 50 साल और उससे ऊपर के उपयोगकर्ता भी सक्रियता से इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और इस आयु वर्ग में 81 फीसदी उपयोगकर्ता रोजाना इंटरनेट का उपयोग करते हैं। हालांकि सभी आयु वर्ग और क्षेत्रों मेंं इंटरनेट इस्तेमाल करने के साधन के रूप में मोबाइल फोन अव्वल है। 12 साल से ऊपर के उपयोगकर्ता इंटरनेट पर वीडियो देखना पसंद करते हैं। हालांकि सोशल नेटवर्किंग या चैटिंग अब भी देश भर में इंटरनेट उपयोग में शीर्ष पर बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट के सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। नीलसन द्वारा कराए गए भारत 2. 0 इंटरनेट अध्ययन के अनुसार 2019 से भारत के ग्रामीण इलाकों में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में 45 फीसदी की वृद्घि हुई है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इंटरनेट का सक्रियता से उपयोग करने वालों में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या 2019 के बाद से 61 फीसदी बढ़ी है।
ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट के सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। नीलसन द्वारा कराए गए भारत दो. शून्य इंटरनेट अध्ययन के अनुसार दो हज़ार उन्नीस से भारत के ग्रामीण इलाकों में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में पैंतालीस फीसदी की वृद्घि हुई है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इंटरनेट का सक्रियता से उपयोग करने वालों में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या दो हज़ार उन्नीस के बाद से इकसठ फीसदी बढ़ी है। अध्ययन में देश भर में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बीच इंटरनेट के उपयोग और उनके ब्राउजिंग रूझान का भी विवरण दिया गया है। रिपोर्ट से पता चलता है कि दिसंबर दो हज़ार इक्कीस में देश भर में दो साल से अधिक उम्र के सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या चौंसठ. छः करोड़ थी। सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में ग्रामीण भारत शहरी इलाकों से कहीं आगे है। ग्रामीण इलाकों में पैंतीस. दो करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं जिनकी संख्या शहरी भारत की तुलना में करीब बीस फीसदी अधिक है। अध्ययन से यह भी पता चला है कि करीब साठ फीसदी ग्रामीण आबादी अब भी इंटरनेट का सक्रिय उपयोग नहीं कर रही है, जिससे इस क्षेत्र में विस्तार की काफी संभावना है। इधर शहरी इलाकों में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या उनतीस. चार करोड़ है। नीलसन इंडिया की प्रबंध निदेशक डॉली झा ने कहा कि सस्ते स्मार्टफोन और किफायती मोबाइल डेटा की उपलब्धता के साथ डिजिटल ढांचे को मजबूत बनाने के सरकार के प्रयास से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा है। देश में डेटा की कीमत दुनिया में सबसे कम है, जिसकी वजह से भी इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है। उन्होंने कहा, 'इन सब वजहों से देश में तेजी से इंटरनेट का प्रसार हुआ है। ' उन्होंने कहा कि इस साल पाँचजी शुरू होने की उम्मीद है जिससे कुछ क्षेत्रों में काफी तेजी देखी जा सकती है। सरकार डिजिटल एजेंडा पर काफी सक्रियता से काम कर रही है और काफी संख्या में ग्राम पंचायतों को इंटरनेट के दायरे में लाया जा रहा है। सरकार के इन प्रयासों का लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। अध्ययन के अनुसार उनसठ. दो करोड़ सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता बारह साल और उससे ऊपर के हैं। दो हज़ार उन्नीस की तुलना में इस आयु वर्ग के सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की की संख्या करीब सैंतीस फीसदी बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की वृद्घि दर पैंतालीस फीसदी रही जबकि शहरी इलाकों में यह वृद्घि अट्ठाईस फीसदी दर्ज की गई। दिलचस्प है कि पिछले दो साल में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या इकसठ फीसदी बढ़ी जबकि पुरुष उपयोगकर्ताओं की संख्या चौबीस फीसदी बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट का उपयोग करने वाली हर तीन में एक महिला सक्रिय उपयोगकर्ता हैं। अध्ययन के अनुसार करीब नब्बे फीसदी उपयोगकर्ता रोजाना इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। पचास साल और उससे ऊपर के उपयोगकर्ता भी सक्रियता से इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और इस आयु वर्ग में इक्यासी फीसदी उपयोगकर्ता रोजाना इंटरनेट का उपयोग करते हैं। हालांकि सभी आयु वर्ग और क्षेत्रों मेंं इंटरनेट इस्तेमाल करने के साधन के रूप में मोबाइल फोन अव्वल है। बारह साल से ऊपर के उपयोगकर्ता इंटरनेट पर वीडियो देखना पसंद करते हैं। हालांकि सोशल नेटवर्किंग या चैटिंग अब भी देश भर में इंटरनेट उपयोग में शीर्ष पर बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट के सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। नीलसन द्वारा कराए गए भारत दो. शून्य इंटरनेट अध्ययन के अनुसार दो हज़ार उन्नीस से भारत के ग्रामीण इलाकों में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में पैंतालीस फीसदी की वृद्घि हुई है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इंटरनेट का सक्रियता से उपयोग करने वालों में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या दो हज़ार उन्नीस के बाद से इकसठ फीसदी बढ़ी है।
सोलन -पाइनग्रोव स्कूल धर्मपुर में 28वां वार्षिक समारोह का शुभारंभ बुधवार को हुआ। कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश के प्रधान सलाहकार (आरपीजी) विद्या चंद फारका ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत पाश्चात्य संगीत, पश्चिमी सिंफनी आर्केस्ट्रे के साथ की गई। जिसमें नन्हे संगीतकारों ने बीथोविन की स्वर लहरी को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया। मुख्यातिथि ने विद्यार्थी द्वारा बनाई हस्त शिल्प कला प्रदर्शनी का भी निरीक्षण किया। उन्होंने छात्रों की अद्भुत हस्त शिल्प की प्रशंसा करते हुए कहा कि स्कूली स्तर पर ऐसी कुशलता हैरान करने वाली है। विद्यार्थियों द्वारा भारतीय शास्त्रीय संगीत, राग यमन की प्रस्तुती दी गई। यह शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ हिंदी सिनेमा जगत में भी लोकप्रिय रहा है। शास्त्रीय संगीत के पश्चात दि सैलफिश जाइंट लघु नाटिका प्रस्तुत की गई। लघु नाटिका के बाद विद्यार्थियों द्वारा हिंदी नृत्य इंतकाम प्रस्तुत किया गया। विद्यार्थियों की नृत्य नाटिका को देखकर मुख्यातिथि का मन प्रफुलित हो उठा। इस अवसर पर विद्यार्थियों द्वारा गत वर्ष की उपलब्धियों, विभिन्न प्रतियोगिताओं के सफल आयोजन तथा शिक्षा व खेलों में सर्वोत्तम प्रदर्शन का वर्णन किया गया। इस अवसर पर चौथी व पांचवी कक्षा के नन्हें बच्चों द्वारा विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ी गई। सांयकालीन समारोह में हिमाचल प्रदेश के टीसीलपी और शहरी विकास सचिव, सी पालरासू मुख्यातिथि रहे। उसके पश्चात स्कूल के विद्यार्थियों ने रॉक बैंड, कराटे, लड़कियों द्वारा पाइप बैंड, जिमनास्टिक, एक लोकनृत्य ने दर्शकों का मन लुभाया और वाहवाही भी लूटी।
सोलन -पाइनग्रोव स्कूल धर्मपुर में अट्ठाईसवां वार्षिक समारोह का शुभारंभ बुधवार को हुआ। कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश के प्रधान सलाहकार विद्या चंद फारका ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत पाश्चात्य संगीत, पश्चिमी सिंफनी आर्केस्ट्रे के साथ की गई। जिसमें नन्हे संगीतकारों ने बीथोविन की स्वर लहरी को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया। मुख्यातिथि ने विद्यार्थी द्वारा बनाई हस्त शिल्प कला प्रदर्शनी का भी निरीक्षण किया। उन्होंने छात्रों की अद्भुत हस्त शिल्प की प्रशंसा करते हुए कहा कि स्कूली स्तर पर ऐसी कुशलता हैरान करने वाली है। विद्यार्थियों द्वारा भारतीय शास्त्रीय संगीत, राग यमन की प्रस्तुती दी गई। यह शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ हिंदी सिनेमा जगत में भी लोकप्रिय रहा है। शास्त्रीय संगीत के पश्चात दि सैलफिश जाइंट लघु नाटिका प्रस्तुत की गई। लघु नाटिका के बाद विद्यार्थियों द्वारा हिंदी नृत्य इंतकाम प्रस्तुत किया गया। विद्यार्थियों की नृत्य नाटिका को देखकर मुख्यातिथि का मन प्रफुलित हो उठा। इस अवसर पर विद्यार्थियों द्वारा गत वर्ष की उपलब्धियों, विभिन्न प्रतियोगिताओं के सफल आयोजन तथा शिक्षा व खेलों में सर्वोत्तम प्रदर्शन का वर्णन किया गया। इस अवसर पर चौथी व पांचवी कक्षा के नन्हें बच्चों द्वारा विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ी गई। सांयकालीन समारोह में हिमाचल प्रदेश के टीसीलपी और शहरी विकास सचिव, सी पालरासू मुख्यातिथि रहे। उसके पश्चात स्कूल के विद्यार्थियों ने रॉक बैंड, कराटे, लड़कियों द्वारा पाइप बैंड, जिमनास्टिक, एक लोकनृत्य ने दर्शकों का मन लुभाया और वाहवाही भी लूटी।
रायपुर। पूर्व सांसद व प्रदेश कांग्रेस कमेटी उपाध्यक्ष पीआर खुंटे ने छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में उम्मीदवारी की दावा ठोका है. इस संबंध में उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, पीएल पुनिया के अलावा बीके हरिप्रसाद, वेणुगोपाल, भूपेश बघेल, मोहन मरकाम को पत्र लिखा है. खुंटे ने अपने पत्र में कहा कि छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा व कांग्रेस से अनुसूचित जाति के राज्यसभा सदस्य बनकर सर्वोच्च सदन में जाते रहे हैं. कांग्रेस पार्टी अनुसूचित जाति से राज्यसभा सदस्य प्रत्याशी घोषित कर 55 लाख से अधिक अनुसूचित जाति के लोगों को नेतृत्व प्रदान करने का अधिकार कांग्रेस पार्टी देती है, उससे अनुसूचित जाति वर्ग में अदम्य उत्साह और कांग्रेस पार्टी के प्रति आभार झलकेगा. आगामी राज्यसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ से अनुसूचित जाति का राज्यसभा सदस्य बनाने पर कांग्रेस पार्टी के हित में होगा. कांग्रेस से छत्तीसगढ़ से जनजाति, पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग, महिला वर्ग से राज्यसभा में जा चुके हैं. अबकी बार राज्यसभा में जाने का हक अनुसूचित जाति का बनता है. इसलिए राज्यसभा में जाने प्रथम अधिकार मेरा बनता है. मुझे राज्यसभा में छत्तीसगढ़ की आवाज बुलंद करने उम्मीदवार घोषित करें. सर्वविदित है कि 13वीं लोकसभा के प्रश्नकाल की सूची में मेरा नाम देश में 5वां स्थान रहा है. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में प्रथम स्थान रहा है. उन्होंने विश्वास दिलाता हूं कि राज्यसभा में सेवा का अवसर मिला तो राज्यसभा में प्रथम स्थान लाने का प्रयास करूंगा, ताकि 2023-2024 के विधानसभा, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन सके. विगत 22 वर्षो से मैं कांग्रेस पार्टी के मुख्यधारा से जुड़कर पार्टी को सेवा देते आ रहा हूं. पार्टी ने मुझे संगठन में जो भी जिम्मेदारी दिया उसे ईमानदारी से पालन करते हुए पार्टी संगठन को मजबूत करने का प्रयास किया हूं. कांग्रेस पार्टी को मैंने सब कुछ न्यौछावर कर दिया है. यहां तक कि केंद्रीय मंत्री पद को ठुकरा कर कांग्रेस पार्टी की सरकार बनाने कांग्रेस पार्टी में शामिल हुआ. उन्होंने कहा कि स्व. नंद कुमार पटेल, डॉ. चरणदास महंत, भूपेश बघेल, मोहन मरकाम के नेतृत्व में प्रदेश उपाध्यक्ष चुनाव समिति, चुनाव हाई कमेटी, चुनाव अभियान समिति, स्टार प्रचारक, अनुशासन समिति व एआईसीसी सदस्य बिलासपुर, बेमेतरा जिला के संगठन प्रभारी के रूप में काम किया है. वर्तमान में रायगढ़ जिला संगठन प्रभारी के रूप में संगठन को मजबूत करने का काम कर रहा हूं. विगत 22 वर्षों से राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा की उम्मीदवारी का मांग करते आ रहा हूं, किन्तु आज तक मुझे पार्टी ने चुनाव लड़ने का अवसर नहीं दिया है. आशा है कि इस बार अवसर मिलेगा. राहुल गांधी, पीएल पुनिया, भूपेश बघेल के कुशल नेतृत्व में भारी मशक्कत के बाद छत्तीसगढ़ में स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनी है. मैं छत्तीसगढ़ का माटीपुत्र हूं, मेरा हर एक काम कांग्रेस के साथ मेरा हर एक मिशन सर्वहारा के साथ में जीवन के हर मोड़ पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, भूपेश बघेल के साथ हूं. खुंदे ने कहा कि मेरा वादा था कांग्रेस की सरकार बनाना, मेरा वादा था भाजपा को सत्ता से हटाना, मैं कल भी कांग्रेस के साथ था, मैं आज भी कांग्रेस के साथ हूं, और कल भी कांग्रेस के साथ रहूंगा. अतः मैं पुनः कांग्रेस की सरकार बनाने का वादा करता हूं। मैंने 22 वर्षों तक सब कुछ खोया है, कुछ नहीं पाया है, अबकी बार राज्यसभा में जाने का अवसर प्रदान करने की कृपा करें.
रायपुर। पूर्व सांसद व प्रदेश कांग्रेस कमेटी उपाध्यक्ष पीआर खुंटे ने छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में उम्मीदवारी की दावा ठोका है. इस संबंध में उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, पीएल पुनिया के अलावा बीके हरिप्रसाद, वेणुगोपाल, भूपेश बघेल, मोहन मरकाम को पत्र लिखा है. खुंटे ने अपने पत्र में कहा कि छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा व कांग्रेस से अनुसूचित जाति के राज्यसभा सदस्य बनकर सर्वोच्च सदन में जाते रहे हैं. कांग्रेस पार्टी अनुसूचित जाति से राज्यसभा सदस्य प्रत्याशी घोषित कर पचपन लाख से अधिक अनुसूचित जाति के लोगों को नेतृत्व प्रदान करने का अधिकार कांग्रेस पार्टी देती है, उससे अनुसूचित जाति वर्ग में अदम्य उत्साह और कांग्रेस पार्टी के प्रति आभार झलकेगा. आगामी राज्यसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ से अनुसूचित जाति का राज्यसभा सदस्य बनाने पर कांग्रेस पार्टी के हित में होगा. कांग्रेस से छत्तीसगढ़ से जनजाति, पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग, महिला वर्ग से राज्यसभा में जा चुके हैं. अबकी बार राज्यसभा में जाने का हक अनुसूचित जाति का बनता है. इसलिए राज्यसभा में जाने प्रथम अधिकार मेरा बनता है. मुझे राज्यसभा में छत्तीसगढ़ की आवाज बुलंद करने उम्मीदवार घोषित करें. सर्वविदित है कि तेरहवीं लोकसभा के प्रश्नकाल की सूची में मेरा नाम देश में पाँचवां स्थान रहा है. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में प्रथम स्थान रहा है. उन्होंने विश्वास दिलाता हूं कि राज्यसभा में सेवा का अवसर मिला तो राज्यसभा में प्रथम स्थान लाने का प्रयास करूंगा, ताकि दो हज़ार तेईस-दो हज़ार चौबीस के विधानसभा, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन सके. विगत बाईस वर्षो से मैं कांग्रेस पार्टी के मुख्यधारा से जुड़कर पार्टी को सेवा देते आ रहा हूं. पार्टी ने मुझे संगठन में जो भी जिम्मेदारी दिया उसे ईमानदारी से पालन करते हुए पार्टी संगठन को मजबूत करने का प्रयास किया हूं. कांग्रेस पार्टी को मैंने सब कुछ न्यौछावर कर दिया है. यहां तक कि केंद्रीय मंत्री पद को ठुकरा कर कांग्रेस पार्टी की सरकार बनाने कांग्रेस पार्टी में शामिल हुआ. उन्होंने कहा कि स्व. नंद कुमार पटेल, डॉ. चरणदास महंत, भूपेश बघेल, मोहन मरकाम के नेतृत्व में प्रदेश उपाध्यक्ष चुनाव समिति, चुनाव हाई कमेटी, चुनाव अभियान समिति, स्टार प्रचारक, अनुशासन समिति व एआईसीसी सदस्य बिलासपुर, बेमेतरा जिला के संगठन प्रभारी के रूप में काम किया है. वर्तमान में रायगढ़ जिला संगठन प्रभारी के रूप में संगठन को मजबूत करने का काम कर रहा हूं. विगत बाईस वर्षों से राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा की उम्मीदवारी का मांग करते आ रहा हूं, किन्तु आज तक मुझे पार्टी ने चुनाव लड़ने का अवसर नहीं दिया है. आशा है कि इस बार अवसर मिलेगा. राहुल गांधी, पीएल पुनिया, भूपेश बघेल के कुशल नेतृत्व में भारी मशक्कत के बाद छत्तीसगढ़ में स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनी है. मैं छत्तीसगढ़ का माटीपुत्र हूं, मेरा हर एक काम कांग्रेस के साथ मेरा हर एक मिशन सर्वहारा के साथ में जीवन के हर मोड़ पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, भूपेश बघेल के साथ हूं. खुंदे ने कहा कि मेरा वादा था कांग्रेस की सरकार बनाना, मेरा वादा था भाजपा को सत्ता से हटाना, मैं कल भी कांग्रेस के साथ था, मैं आज भी कांग्रेस के साथ हूं, और कल भी कांग्रेस के साथ रहूंगा. अतः मैं पुनः कांग्रेस की सरकार बनाने का वादा करता हूं। मैंने बाईस वर्षों तक सब कुछ खोया है, कुछ नहीं पाया है, अबकी बार राज्यसभा में जाने का अवसर प्रदान करने की कृपा करें.
राष्ट्रपति रूहानी ने ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी पाबंदियों को अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तावों का उल्लंघन कहा है। डॉक्टर हसन रूहानी ने कहा कि अमरीका यह जान ले कि वह पूरी दुनिया का थानेदार नहीं बल्कि अन्य देशों की तरह वह भी एक देश है। उन्होंने बल दिया कि अमरीकी पाबंदियां बहुत बड़ी राजनैतिक व आर्थिक ग़लती और अंतर्राष्ट्रीय नियम व प्रस्तावों का उल्लंघन है। ईरानी राष्ट्रपति ने मंगलवार को तेहरान में ऑस्ट्रेलिया की नई राजदूत श्रीमती लिन्डल जीन सैक्स का प्रत्यय पत्र लेते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच संबंध व सहयोग के विस्तार में अमरीका की ग़ैर क़ानूनी पाबंदियों को रुकावट बनने नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वाधीन देशों को अमरीका की ग़ैर क़ानूनी पाबंदियों के ख़िलाफ़ डटना चाहिए। डॉक्टर हसन रूहानी ने इस बात का उल्लेख करते हुए कि अमरीका पाबंदियां लगाकर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता कहा कि ईरानी राष्ट्र इतना महान राष्ट्र है कि इस तरह के दबावों से नहीं घबराता। उन्होंने परमाणु समझौते जेसीपीओए के टूटने को दुनिया के लिए नुक़सानदेह बताते हुए कहा कि इस समझौते से अमरीका के निकलने और योरोपीय देशों की वादाख़िलाफ़ी के बावजूद, ईरान अभी भी इस समझौते के तहत अपने वचन पर क़ायम है। तेहरान के लिए ऑस्ट्रेलिया की नई दूत लिन्डल जीन सैक्स ने अपना प्रत्यय पत्र राषट्रपति रूहानी को सौंपते हुए कहा कि ईरान-ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापारिक व आर्थिक संबंध में विस्तार से दोनों देशों के बीच संबंध व सहयोग में विस्तार का रास्ता साफ़ हो सकता है। लिन्डल सैक्स ने इसी तरह परमाणु समझौते जेसीपीओए के प्रति ऑस्ट्रेलिया की ओर से समर्थन का ज़िक्र किया और कहा कि सभी को इस परमाणु समझौते का पालन करना चाहिए। राष्ट्रपति रूहानी ने मंगलवार को ही ईरान के लिए यमन के नए राजदूत इब्राहीम मोहम्मद बिन मोहम्मद दैलमी का प्रत्यय पत्र लेते हुए, कहा कि ईरानी राष्ट्र हालिया बरसों में यमन की पीड़ित मुसलमान जनता की पीड़ा को अपना दर्द समझता है। उन्होंने कहा कि ईरान यमनी जनता और उसकी क्रान्ति को सही और हमलावरों के ख़िलाफ़ उसके प्रतिरोध को मूल्यवान समझता है। तेहरान में यमन के नए राजदूत इब्राहीम मोहम्मद बिन मोहम्मद दैलमी ने इस मुलाक़ात में अपना प्रत्यय पत्र राष्ट्रपति रूहानी को सौंपते हुए दोनों देशों के बीच संबंध व सहयोग के पहले से ज़्यादा बढ़ने पर आग्रह किया। (MAQ/N)
राष्ट्रपति रूहानी ने ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी पाबंदियों को अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तावों का उल्लंघन कहा है। डॉक्टर हसन रूहानी ने कहा कि अमरीका यह जान ले कि वह पूरी दुनिया का थानेदार नहीं बल्कि अन्य देशों की तरह वह भी एक देश है। उन्होंने बल दिया कि अमरीकी पाबंदियां बहुत बड़ी राजनैतिक व आर्थिक ग़लती और अंतर्राष्ट्रीय नियम व प्रस्तावों का उल्लंघन है। ईरानी राष्ट्रपति ने मंगलवार को तेहरान में ऑस्ट्रेलिया की नई राजदूत श्रीमती लिन्डल जीन सैक्स का प्रत्यय पत्र लेते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच संबंध व सहयोग के विस्तार में अमरीका की ग़ैर क़ानूनी पाबंदियों को रुकावट बनने नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वाधीन देशों को अमरीका की ग़ैर क़ानूनी पाबंदियों के ख़िलाफ़ डटना चाहिए। डॉक्टर हसन रूहानी ने इस बात का उल्लेख करते हुए कि अमरीका पाबंदियां लगाकर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता कहा कि ईरानी राष्ट्र इतना महान राष्ट्र है कि इस तरह के दबावों से नहीं घबराता। उन्होंने परमाणु समझौते जेसीपीओए के टूटने को दुनिया के लिए नुक़सानदेह बताते हुए कहा कि इस समझौते से अमरीका के निकलने और योरोपीय देशों की वादाख़िलाफ़ी के बावजूद, ईरान अभी भी इस समझौते के तहत अपने वचन पर क़ायम है। तेहरान के लिए ऑस्ट्रेलिया की नई दूत लिन्डल जीन सैक्स ने अपना प्रत्यय पत्र राषट्रपति रूहानी को सौंपते हुए कहा कि ईरान-ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापारिक व आर्थिक संबंध में विस्तार से दोनों देशों के बीच संबंध व सहयोग में विस्तार का रास्ता साफ़ हो सकता है। लिन्डल सैक्स ने इसी तरह परमाणु समझौते जेसीपीओए के प्रति ऑस्ट्रेलिया की ओर से समर्थन का ज़िक्र किया और कहा कि सभी को इस परमाणु समझौते का पालन करना चाहिए। राष्ट्रपति रूहानी ने मंगलवार को ही ईरान के लिए यमन के नए राजदूत इब्राहीम मोहम्मद बिन मोहम्मद दैलमी का प्रत्यय पत्र लेते हुए, कहा कि ईरानी राष्ट्र हालिया बरसों में यमन की पीड़ित मुसलमान जनता की पीड़ा को अपना दर्द समझता है। उन्होंने कहा कि ईरान यमनी जनता और उसकी क्रान्ति को सही और हमलावरों के ख़िलाफ़ उसके प्रतिरोध को मूल्यवान समझता है। तेहरान में यमन के नए राजदूत इब्राहीम मोहम्मद बिन मोहम्मद दैलमी ने इस मुलाक़ात में अपना प्रत्यय पत्र राष्ट्रपति रूहानी को सौंपते हुए दोनों देशों के बीच संबंध व सहयोग के पहले से ज़्यादा बढ़ने पर आग्रह किया।
संभावित प्रतिद्वंद्वियों पर कुछ लाभ हासिल करने की इच्छा रखते हुए, विकसित विदेशी राज्य अपने सैन्य अंतरिक्ष समूहों को अपडेट कर रहे हैं। कुछ कार्यों के साथ विभिन्न वर्गों के सिस्टम और कॉम्प्लेक्स विकसित किए जा रहे हैं। इनमें से कुछ विकास तीसरे देशों के लिए संभावित खतरा पैदा करते हैं। इसलिए, हाल ही में यह रूसी अंतरिक्ष समूह के लिए नए खतरों के बारे में ज्ञात हुआ। 16 फरवरी को, फेडरेशन काउंसिल ने "अमेरिकी सामरिक रक्षा पहल के 40 वर्ष" विषय पर एक गोल मेज की मेजबानी की। अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की तीव्र समस्याओं में से एक के रूप में बाहरी अंतरिक्ष का सैन्यीकरण। यह आयोजन फेडरेशन काउंसिल कमेटी ऑन इंटरनेशनल अफेयर्स और डिफेंस कमेटी द्वारा आयोजित किया गया था। चर्चा में सीनेटरों और रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की प्रासंगिक संरचनाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। राउंड टेबल के हिस्से के रूप में, सैन्य अंतरिक्ष अकादमी के प्रमुख द्वारा एक रिपोर्ट तैयार की गई थी। ए एफ। मोजाहिस्की मेजर जनरल अनातोली नेस्तेचुक। रिपोर्ट का मुख्य विषय बाहरी अंतरिक्ष में मौजूदा खतरों और चुनौतियों के साथ-साथ विदेशी राज्यों के प्रासंगिक विकास थे। इसके अलावा, जनरल ने बताया कि कैसे हमारे सशस्त्र बल मौजूदा और अपेक्षित खतरों का मुकाबला करने की योजना बनाते हैं। अकादमी के प्रमुख के अनुसार, अमेरिकी विज्ञान और उद्योग अब सक्रिय रूप से तथाकथित विषय में लगे हुए हैं। छोटे लड़ाकू अंतरिक्ष यान। इस वर्ग के विभिन्न उदाहरण बनाए गए हैं। कुछ परियोजनाओं का विकास पहले ही पूरा हो चुका है और तैयार उत्पादों का परीक्षण किया जा रहा है। ऐसे छोटे साधन गुप्त युद्धाभ्यास करने और अन्य अंतरिक्ष यान के पास जाने में सक्षम हैं। निकट आने के बाद, वे लक्ष्य को अक्षम कर सकते हैं। लड़ाकू अभियानों को किसी भी स्थिति में और किसी भी समय पूरा किया जा सकता है। छोटे लड़ाकू अंतरिक्ष वाहनों को विभिन्न रॉकेट और अंतरिक्ष प्रणालियों का उपयोग करके कक्षा में प्रक्षेपित किया जा सकता है। इसलिए, उन्हें मल्टी-सैटेलाइट लो-ऑर्बिट कम्युनिकेशन सिस्टम, जैसे स्टारलिंक या वनवेब के हिस्से के रूप में लॉन्च किया जा सकता है। इसके अलावा, पुनः प्रयोज्य जहाज X-37B अब सैन्य उपकरणों के वाहक के रूप में सक्रिय रूप से उपयोग किया जाता है। जनरल नेस्तेचुक ने कहा कि छोटे हथियारों के निर्माण और तैनाती से रूसी अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे के महत्वपूर्ण तत्वों पर हमले का खतरा पैदा होता है। विशेष रूप से, संचार उपकरणों के अक्षम होने से कमांड और नियंत्रण सहित के संरक्षण को खतरा है। रणनीतिक परमाणु बल। मिलिट्री स्पेस एकेडमी के प्रमुख ने यह भी कहा कि हमारे देश में प्रेक्षित और अपेक्षित खतरों से बचाव के उपाय किए जा रहे हैं। उनमें से एक नई बड़ी संरचना का निर्माण है जो मौजूदा और अपेक्षित खतरों को खोजने और पार करने के लिए जिम्मेदार होगा। तीसरे देशों की सैन्य अंतरिक्ष गतिविधियों की सूचना और विश्लेषणात्मक सहायता के लिए एक केंद्र बनाने का प्रस्ताव है। यह संगठन उन सभी स्रोतों से डेटा एकत्र करेगा जो बाहरी अंतरिक्ष और कक्षाओं की निगरानी करते हैं। उसे सूचनाओं को संसाधित करना, वर्तमान स्थिति की निगरानी करना और पूर्वानुमान लगाना है। विभिन्न उपभोक्ताओं को तैयार डेटा जारी किया जाएगा। ए। नेस्तेचुक के अनुसार, इस तरह के केंद्र के निर्माण से सशस्त्र बलों को नए अवसर और कुछ फायदे मिलेंगे। सबसे पहले, वे अंतरिक्ष समूह और पारंपरिक बलों दोनों के लिए समय पर खतरों की पहचान करने में सक्षम होंगे। इसके अलावा, नई संरचना देश के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को सही निर्णय लेने और उभरती परिस्थितियों का सही ढंग से जवाब देने में मदद करेगी। इस प्रकार, बाहरी अंतरिक्ष में स्थिति कठिन बनी हुई है, और इसके और अधिक बिगड़ने का जोखिम है। सभी प्रमुख देशों ने अपने स्वयं के सैन्य कक्षीय समूह बनाए हैं और उन्हें विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। उसी समय, संयुक्त राज्य अमेरिका, कई चेतावनियों और चेतावनियों के बावजूद, बाह्य अंतरिक्ष के पूर्ण सैन्यकरण में शामिल होने का इरादा रखता है। फेडरेशन काउंसिल में हाल ही में हुई एक बैठक के दौरान, अंतरिक्ष हथियारों के क्षेत्र में पेंटागन के कुछ आधुनिक विकासों का उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका के पास अपने निपटान में अन्य प्रणालियाँ हैं जो कक्षीय लक्ष्यों को मारने या संबंधित सैन्य कार्यों को हल करने में सक्षम हैं। साथ ही, मौजूदा प्रणालियों और परिसरों की पूरी क्षमता अभी भी अज्ञात है। ज्ञात आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी अंतरिक्ष उद्योग लंबे समय से इंस्पेक्टर उपग्रहों के विषय से निपट रहा है। इस वर्ग के विभिन्न नमूने विकसित किए गए, कक्षा में स्थापित किए गए और परीक्षण किए गए। नवीनतम के अनुसार समाचारइस क्षेत्र में विकास जारी है। नए अवसर प्राप्त करने के लिए, अन्य सभी विशेषताओं को बनाए रखते हुए आकार और वजन को कम करने के लिए एक कोर्स किया गया। आकार और वजन में कमी विकास और उत्पादन को जटिल बना सकती है, लेकिन परिचालन लाभ प्रदान करती है। इसलिए, उपग्रहों को कक्षाओं में बड़े पैमाने पर एक साथ लॉन्च करने की संभावना है - दोहरे उपयोग वाली परियोजनाओं में आवश्यक तकनीकों पर पहले ही काम किया जा चुका है। इंस्पेक्टर उपग्रहों या लड़ाकू वाहनों का बड़े पैमाने पर प्रक्षेपण विभिन्न कक्षाओं की एक साथ निगरानी को सरल करेगा। मिलिट्री स्पेस एकेडमी के प्रमुख के अनुसार, पेंटागन के पास छोटे भार को कक्षा में लॉन्च करने का एक और साधन है - X-37B पुनः प्रयोज्य अंतरिक्ष यान। इसकी क्षमता व्यवहार में पहले ही सिद्ध हो चुकी है। पिछले मिशनों में से एक के दौरान, इस तरह के जहाज को गणना की गई कक्षा में पहुँचाया गया और एक छोटे आकार के उपग्रह को गिराया गया। साथ ही, अंतरिक्ष यान का कार्गो डिब्बे आपको एकल वाहनों के रूप में और छोटे उपग्रहों के पूरे सेट दोनों के रूप में बड़े और भारी भार को परिवहन करने की अनुमति देता है। यह याद किया जाना चाहिए कि संयुक्त राज्य अमेरिका कम कक्षाओं में अंतरिक्ष यान का मुकाबला करने के लिए न केवल विशेष उपग्रहों का उपयोग कर सकता है। 2008 में एक एंटी-सैटेलाइट के रूप में हथियारों जहाज के विमान भेदी परिसर की SM-3 मिसाइल का परीक्षण किया। उसने लगभग की ऊँचाई पर एक कक्षीय लक्ष्य को सफलतापूर्वक मारा। 240 किमी। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस दिशा का विकास जारी है, और नए रॉकेट उच्च कक्षाओं तक पहुँचने में सक्षम हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका या अन्य देशों से अंतरिक्ष में संभावित खतरे रूसी सेना के लिए नए नहीं हैं। हमारी सेना के पास अंतरिक्ष में स्थिति की निगरानी करने के लिए कई तरह के साधन हैं, और प्रत्यक्ष हमलों तक एक अलग प्रकृति के जवाबी उपाय भी कर सकती है। यह उल्लेखनीय है कि रूसी सेना की ऐसी क्षमता के बारे में पूरी जानकारी अज्ञात बनी हुई है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। बाहरी अंतरिक्ष का अवलोकन और कक्षीय वस्तुओं की ट्रैकिंग विभिन्न परिसरों और प्रणालियों को सौंपी जाती है। ओक्नो ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक कॉम्प्लेक्स, जिसमें कई टेलीस्कोप शामिल हैं, व्यापक रूप से जाना जाता है। विभिन्न प्रकार के रडार और अन्य प्रणालियों का भी उपयोग किया जाता है। ऐसे सभी माध्यमों से जानकारी अंतरिक्ष की स्थिति की टोह लेने के लिए 821वें मुख्य केंद्र में प्रवेश करती है, जहां इसे संसाधित किया जाता है और उपभोक्ताओं को जारी किया जाता है। यह विभिन्न एंटी-सैटेलाइट/एंटी-स्पेस सिस्टम के अस्तित्व और संचालन के बारे में जाना जाता है। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, संभावित दुश्मन के कक्षीय समूहन का मुकाबला करने के लिए कार्रवाई के विभिन्न सिद्धांतों के साथ उपकरणों का एक पूरा सेट उपयोग किया जाता है। तो, लक्ष्यों के अस्थायी दमन के लिए, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक स्टेशनों और पेर्सवेट लेजर कॉम्प्लेक्स का उपयोग किया जा सकता है। कक्षीय लक्ष्यों का अवरोधन S-500 और Nudol वायु रक्षा / मिसाइल रक्षा प्रणालियों द्वारा किया जा सकता है। एक अंतरिक्ष ट्रेन भी है। विदेशी स्रोत नियमित रूप से रूसी निरीक्षक उपग्रहों के काम पर रिपोर्ट करते हैं। ऐसे उत्पाद बिना किसी चेतावनी के कक्षा बदलते हैं, तीसरे देशों के उपग्रहों का अध्ययन करते हैं - और चिंता का कारण बनते हैं। साथ ही, स्पष्ट कारणों से, उनके कार्यों और क्षमताओं की पूरी सूची अज्ञात है। इस प्रकार, रूसी सशस्त्र बलों के पास सभी आवश्यक क्षमताओं के साथ एक काफी बड़ा अंतरिक्ष समूह है। इसका विकास जारी है, और इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप सेना के लिए समग्र रूप से समूहीकरण का मूल्य बढ़ रहा है। साथ ही, शत्रु के प्रभाव से जुड़े जोखिम भी बढ़ जाते हैं। संभावित विरोधी, बदले में, हमारे समूह का मुकाबला करने के तरीके और साधन विकसित करता है। प्रोफाइल संरचनाएं और संगठन विदेशी सहयोगियों के काम की बारीकी से निगरानी करते हैं और उनकी योजनाओं और उपलब्धियों का अध्ययन करते हैं। यह विश्लेषण हमें मौजूदा जोखिमों को निर्धारित करने और हमारे सैन्य अंतरिक्ष उद्योग के आगे के विकास के लिए योजनाओं को स्पष्ट करने की अनुमति देता है। इस दृष्टिकोण का उपयोग लंबे समय से किया गया है और इसने खुद को अच्छी तरह साबित किया है। इसका अर्थ है कि नई चुनौतियाँ और खतरे, सहित। छोटे लड़ाकू अंतरिक्ष संपत्तियों के रूप में, आवश्यक प्रतिक्रिया प्राप्त होगी, और हमारे उपग्रह सुरक्षित रहेंगे। - लेखकः
संभावित प्रतिद्वंद्वियों पर कुछ लाभ हासिल करने की इच्छा रखते हुए, विकसित विदेशी राज्य अपने सैन्य अंतरिक्ष समूहों को अपडेट कर रहे हैं। कुछ कार्यों के साथ विभिन्न वर्गों के सिस्टम और कॉम्प्लेक्स विकसित किए जा रहे हैं। इनमें से कुछ विकास तीसरे देशों के लिए संभावित खतरा पैदा करते हैं। इसलिए, हाल ही में यह रूसी अंतरिक्ष समूह के लिए नए खतरों के बारे में ज्ञात हुआ। सोलह फरवरी को, फेडरेशन काउंसिल ने "अमेरिकी सामरिक रक्षा पहल के चालीस वर्ष" विषय पर एक गोल मेज की मेजबानी की। अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की तीव्र समस्याओं में से एक के रूप में बाहरी अंतरिक्ष का सैन्यीकरण। यह आयोजन फेडरेशन काउंसिल कमेटी ऑन इंटरनेशनल अफेयर्स और डिफेंस कमेटी द्वारा आयोजित किया गया था। चर्चा में सीनेटरों और रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की प्रासंगिक संरचनाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। राउंड टेबल के हिस्से के रूप में, सैन्य अंतरिक्ष अकादमी के प्रमुख द्वारा एक रिपोर्ट तैयार की गई थी। ए एफ। मोजाहिस्की मेजर जनरल अनातोली नेस्तेचुक। रिपोर्ट का मुख्य विषय बाहरी अंतरिक्ष में मौजूदा खतरों और चुनौतियों के साथ-साथ विदेशी राज्यों के प्रासंगिक विकास थे। इसके अलावा, जनरल ने बताया कि कैसे हमारे सशस्त्र बल मौजूदा और अपेक्षित खतरों का मुकाबला करने की योजना बनाते हैं। अकादमी के प्रमुख के अनुसार, अमेरिकी विज्ञान और उद्योग अब सक्रिय रूप से तथाकथित विषय में लगे हुए हैं। छोटे लड़ाकू अंतरिक्ष यान। इस वर्ग के विभिन्न उदाहरण बनाए गए हैं। कुछ परियोजनाओं का विकास पहले ही पूरा हो चुका है और तैयार उत्पादों का परीक्षण किया जा रहा है। ऐसे छोटे साधन गुप्त युद्धाभ्यास करने और अन्य अंतरिक्ष यान के पास जाने में सक्षम हैं। निकट आने के बाद, वे लक्ष्य को अक्षम कर सकते हैं। लड़ाकू अभियानों को किसी भी स्थिति में और किसी भी समय पूरा किया जा सकता है। छोटे लड़ाकू अंतरिक्ष वाहनों को विभिन्न रॉकेट और अंतरिक्ष प्रणालियों का उपयोग करके कक्षा में प्रक्षेपित किया जा सकता है। इसलिए, उन्हें मल्टी-सैटेलाइट लो-ऑर्बिट कम्युनिकेशन सिस्टम, जैसे स्टारलिंक या वनवेब के हिस्से के रूप में लॉन्च किया जा सकता है। इसके अलावा, पुनः प्रयोज्य जहाज X-सैंतीसB अब सैन्य उपकरणों के वाहक के रूप में सक्रिय रूप से उपयोग किया जाता है। जनरल नेस्तेचुक ने कहा कि छोटे हथियारों के निर्माण और तैनाती से रूसी अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे के महत्वपूर्ण तत्वों पर हमले का खतरा पैदा होता है। विशेष रूप से, संचार उपकरणों के अक्षम होने से कमांड और नियंत्रण सहित के संरक्षण को खतरा है। रणनीतिक परमाणु बल। मिलिट्री स्पेस एकेडमी के प्रमुख ने यह भी कहा कि हमारे देश में प्रेक्षित और अपेक्षित खतरों से बचाव के उपाय किए जा रहे हैं। उनमें से एक नई बड़ी संरचना का निर्माण है जो मौजूदा और अपेक्षित खतरों को खोजने और पार करने के लिए जिम्मेदार होगा। तीसरे देशों की सैन्य अंतरिक्ष गतिविधियों की सूचना और विश्लेषणात्मक सहायता के लिए एक केंद्र बनाने का प्रस्ताव है। यह संगठन उन सभी स्रोतों से डेटा एकत्र करेगा जो बाहरी अंतरिक्ष और कक्षाओं की निगरानी करते हैं। उसे सूचनाओं को संसाधित करना, वर्तमान स्थिति की निगरानी करना और पूर्वानुमान लगाना है। विभिन्न उपभोक्ताओं को तैयार डेटा जारी किया जाएगा। ए। नेस्तेचुक के अनुसार, इस तरह के केंद्र के निर्माण से सशस्त्र बलों को नए अवसर और कुछ फायदे मिलेंगे। सबसे पहले, वे अंतरिक्ष समूह और पारंपरिक बलों दोनों के लिए समय पर खतरों की पहचान करने में सक्षम होंगे। इसके अलावा, नई संरचना देश के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को सही निर्णय लेने और उभरती परिस्थितियों का सही ढंग से जवाब देने में मदद करेगी। इस प्रकार, बाहरी अंतरिक्ष में स्थिति कठिन बनी हुई है, और इसके और अधिक बिगड़ने का जोखिम है। सभी प्रमुख देशों ने अपने स्वयं के सैन्य कक्षीय समूह बनाए हैं और उन्हें विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। उसी समय, संयुक्त राज्य अमेरिका, कई चेतावनियों और चेतावनियों के बावजूद, बाह्य अंतरिक्ष के पूर्ण सैन्यकरण में शामिल होने का इरादा रखता है। फेडरेशन काउंसिल में हाल ही में हुई एक बैठक के दौरान, अंतरिक्ष हथियारों के क्षेत्र में पेंटागन के कुछ आधुनिक विकासों का उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका के पास अपने निपटान में अन्य प्रणालियाँ हैं जो कक्षीय लक्ष्यों को मारने या संबंधित सैन्य कार्यों को हल करने में सक्षम हैं। साथ ही, मौजूदा प्रणालियों और परिसरों की पूरी क्षमता अभी भी अज्ञात है। ज्ञात आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी अंतरिक्ष उद्योग लंबे समय से इंस्पेक्टर उपग्रहों के विषय से निपट रहा है। इस वर्ग के विभिन्न नमूने विकसित किए गए, कक्षा में स्थापित किए गए और परीक्षण किए गए। नवीनतम के अनुसार समाचारइस क्षेत्र में विकास जारी है। नए अवसर प्राप्त करने के लिए, अन्य सभी विशेषताओं को बनाए रखते हुए आकार और वजन को कम करने के लिए एक कोर्स किया गया। आकार और वजन में कमी विकास और उत्पादन को जटिल बना सकती है, लेकिन परिचालन लाभ प्रदान करती है। इसलिए, उपग्रहों को कक्षाओं में बड़े पैमाने पर एक साथ लॉन्च करने की संभावना है - दोहरे उपयोग वाली परियोजनाओं में आवश्यक तकनीकों पर पहले ही काम किया जा चुका है। इंस्पेक्टर उपग्रहों या लड़ाकू वाहनों का बड़े पैमाने पर प्रक्षेपण विभिन्न कक्षाओं की एक साथ निगरानी को सरल करेगा। मिलिट्री स्पेस एकेडमी के प्रमुख के अनुसार, पेंटागन के पास छोटे भार को कक्षा में लॉन्च करने का एक और साधन है - X-सैंतीसB पुनः प्रयोज्य अंतरिक्ष यान। इसकी क्षमता व्यवहार में पहले ही सिद्ध हो चुकी है। पिछले मिशनों में से एक के दौरान, इस तरह के जहाज को गणना की गई कक्षा में पहुँचाया गया और एक छोटे आकार के उपग्रह को गिराया गया। साथ ही, अंतरिक्ष यान का कार्गो डिब्बे आपको एकल वाहनों के रूप में और छोटे उपग्रहों के पूरे सेट दोनों के रूप में बड़े और भारी भार को परिवहन करने की अनुमति देता है। यह याद किया जाना चाहिए कि संयुक्त राज्य अमेरिका कम कक्षाओं में अंतरिक्ष यान का मुकाबला करने के लिए न केवल विशेष उपग्रहों का उपयोग कर सकता है। दो हज़ार आठ में एक एंटी-सैटेलाइट के रूप में हथियारों जहाज के विमान भेदी परिसर की SM-तीन मिसाइल का परीक्षण किया। उसने लगभग की ऊँचाई पर एक कक्षीय लक्ष्य को सफलतापूर्वक मारा। दो सौ चालीस किमी। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस दिशा का विकास जारी है, और नए रॉकेट उच्च कक्षाओं तक पहुँचने में सक्षम हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका या अन्य देशों से अंतरिक्ष में संभावित खतरे रूसी सेना के लिए नए नहीं हैं। हमारी सेना के पास अंतरिक्ष में स्थिति की निगरानी करने के लिए कई तरह के साधन हैं, और प्रत्यक्ष हमलों तक एक अलग प्रकृति के जवाबी उपाय भी कर सकती है। यह उल्लेखनीय है कि रूसी सेना की ऐसी क्षमता के बारे में पूरी जानकारी अज्ञात बनी हुई है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। बाहरी अंतरिक्ष का अवलोकन और कक्षीय वस्तुओं की ट्रैकिंग विभिन्न परिसरों और प्रणालियों को सौंपी जाती है। ओक्नो ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक कॉम्प्लेक्स, जिसमें कई टेलीस्कोप शामिल हैं, व्यापक रूप से जाना जाता है। विभिन्न प्रकार के रडार और अन्य प्रणालियों का भी उपयोग किया जाता है। ऐसे सभी माध्यमों से जानकारी अंतरिक्ष की स्थिति की टोह लेने के लिए आठ सौ इक्कीसवें मुख्य केंद्र में प्रवेश करती है, जहां इसे संसाधित किया जाता है और उपभोक्ताओं को जारी किया जाता है। यह विभिन्न एंटी-सैटेलाइट/एंटी-स्पेस सिस्टम के अस्तित्व और संचालन के बारे में जाना जाता है। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, संभावित दुश्मन के कक्षीय समूहन का मुकाबला करने के लिए कार्रवाई के विभिन्न सिद्धांतों के साथ उपकरणों का एक पूरा सेट उपयोग किया जाता है। तो, लक्ष्यों के अस्थायी दमन के लिए, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक स्टेशनों और पेर्सवेट लेजर कॉम्प्लेक्स का उपयोग किया जा सकता है। कक्षीय लक्ष्यों का अवरोधन S-पाँच सौ और Nudol वायु रक्षा / मिसाइल रक्षा प्रणालियों द्वारा किया जा सकता है। एक अंतरिक्ष ट्रेन भी है। विदेशी स्रोत नियमित रूप से रूसी निरीक्षक उपग्रहों के काम पर रिपोर्ट करते हैं। ऐसे उत्पाद बिना किसी चेतावनी के कक्षा बदलते हैं, तीसरे देशों के उपग्रहों का अध्ययन करते हैं - और चिंता का कारण बनते हैं। साथ ही, स्पष्ट कारणों से, उनके कार्यों और क्षमताओं की पूरी सूची अज्ञात है। इस प्रकार, रूसी सशस्त्र बलों के पास सभी आवश्यक क्षमताओं के साथ एक काफी बड़ा अंतरिक्ष समूह है। इसका विकास जारी है, और इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप सेना के लिए समग्र रूप से समूहीकरण का मूल्य बढ़ रहा है। साथ ही, शत्रु के प्रभाव से जुड़े जोखिम भी बढ़ जाते हैं। संभावित विरोधी, बदले में, हमारे समूह का मुकाबला करने के तरीके और साधन विकसित करता है। प्रोफाइल संरचनाएं और संगठन विदेशी सहयोगियों के काम की बारीकी से निगरानी करते हैं और उनकी योजनाओं और उपलब्धियों का अध्ययन करते हैं। यह विश्लेषण हमें मौजूदा जोखिमों को निर्धारित करने और हमारे सैन्य अंतरिक्ष उद्योग के आगे के विकास के लिए योजनाओं को स्पष्ट करने की अनुमति देता है। इस दृष्टिकोण का उपयोग लंबे समय से किया गया है और इसने खुद को अच्छी तरह साबित किया है। इसका अर्थ है कि नई चुनौतियाँ और खतरे, सहित। छोटे लड़ाकू अंतरिक्ष संपत्तियों के रूप में, आवश्यक प्रतिक्रिया प्राप्त होगी, और हमारे उपग्रह सुरक्षित रहेंगे। - लेखकः
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विष्णुपदी, पुण्यसलिला मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ,अतः यह दिन गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) या लोकभाषा में जेठ का दशहरा के नाम से जाना जाता है। इस बार दशमी तिथि 9 जून को प्रातः काल 8 बजकर 21 मिनट से प्रारंभ होकर 10 जून को सायंकाल 7 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर गंगा दशहरा 10 जून को मनाया जाएगा। साथ ही इस दिन हस्त नक्षत्र और व्यतिपात योग भी रहेगा, इस योग में स्नान और दान करना अति लाभदायक होता है। पुराण कहते हैं कि इस दिन गंगाजल के सेवन या गंगा स्नान करने से अनजाने में हुए पाप और कष्टों से मुक्ति मिल जाती है एवं दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। बिना दी हुई वस्तु को लेना,निषिद्ध हिंसा,परस्त्री संगम-यह तीन प्रकार का दैहिक पाप माना गया है। कठोर वचन मुंह से निकालना,झूट बोलना,सब ओर चुगली करना एवं वाणी द्वारा मन को दुखाना-ये वाणी से होने वाले चार प्रकार के पाप हैं। दूसरे के धन को लेने का विचार करना,मन से किसी का बुरा सोचना और असत्य वस्तुओं में आग्रह रखना-ये तीन प्रकार के मानसिक पाप कहे गए हैं। यानी कि दैहिक, वाणी द्वारा एवं मानसिक पाप,ये सभी गंगा दशहरा के दिन पतितपावनी गंगा स्नान से धुल जाते हैं। विष्णु पुराण में लिखा है कि गंगा का नाम लेने,सुनने,उसे देखने,उसका जल पीने,स्पर्श करने,उसमें स्नान करने तथा सौ योजन (कोस)से भी गंगा नाम का उच्चारण करने मात्र से मनुष्य के तीन जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। पदमपुराण की कथा के अनुसार आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से कहा-"हे देवी! तुम समस्त लोकों का आदिकारण बनो,मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि प्रारंभ करूँगा"। ब्रह्मा जी के कहने पर मूलप्रकृति-गायत्री सरस्वती,लक्ष्मी,उमादेवी,शक्तिबीजा,तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात स्वरूपों में प्रकट हुईं। इनमें से सातवीं 'पराप्रकृति धर्मद्रवा'को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित जानकार ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु में धारण कर लिया। राजा बलि के यज्ञ के समय वामन अवतार लिए जब भगवान विष्णु का एक पग आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुए,उस समय अपने कमण्डलु के जल से ब्रह्माजी ने श्रीविष्णु के चरण का पूजन किया। चरण धोते समय श्री विष्णु का चरणोदक हेमकूट पर्वत पर गिरा। वहां से भगवान शिव के पास पहुंचकर यह जल गंगा के रूप में उनकी जटाओं में समा गया। गंगा बहुत काल तक शिव की जटाओं में भ्रमण करती रहीं। तत्पश्चात सूर्यवंशी राजा भगीरथ ने अपने पूर्वज सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार करने हेतु गंगा को धरती पर लेन के लिए शिवजी की घोर तपस्या की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर गंगा को पृथ्वी पर उतार दिया। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, हस्त नक्षत्र में गंगाजी शिवजी की जटाओं से निकलकर धरती पर आई थी। उस समय गंगाजी तीन धाराओं में प्रकट होकर तीनों लोकों में चली गयीं और संसार में त्रिस्रोता के नाम से विख्यात हुईं। शिव,ब्रह्मा तथा विष्णु-तीनों देवताओं के संयोग से पवित्र होकर गंगा त्रिभुवन को पवन करती हैं।
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विष्णुपदी, पुण्यसलिला मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ,अतः यह दिन गंगा दशहरा या लोकभाषा में जेठ का दशहरा के नाम से जाना जाता है। इस बार दशमी तिथि नौ जून को प्रातः काल आठ बजकर इक्कीस मिनट से प्रारंभ होकर दस जून को सायंकाल सात बजकर पच्चीस मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर गंगा दशहरा दस जून को मनाया जाएगा। साथ ही इस दिन हस्त नक्षत्र और व्यतिपात योग भी रहेगा, इस योग में स्नान और दान करना अति लाभदायक होता है। पुराण कहते हैं कि इस दिन गंगाजल के सेवन या गंगा स्नान करने से अनजाने में हुए पाप और कष्टों से मुक्ति मिल जाती है एवं दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। बिना दी हुई वस्तु को लेना,निषिद्ध हिंसा,परस्त्री संगम-यह तीन प्रकार का दैहिक पाप माना गया है। कठोर वचन मुंह से निकालना,झूट बोलना,सब ओर चुगली करना एवं वाणी द्वारा मन को दुखाना-ये वाणी से होने वाले चार प्रकार के पाप हैं। दूसरे के धन को लेने का विचार करना,मन से किसी का बुरा सोचना और असत्य वस्तुओं में आग्रह रखना-ये तीन प्रकार के मानसिक पाप कहे गए हैं। यानी कि दैहिक, वाणी द्वारा एवं मानसिक पाप,ये सभी गंगा दशहरा के दिन पतितपावनी गंगा स्नान से धुल जाते हैं। विष्णु पुराण में लिखा है कि गंगा का नाम लेने,सुनने,उसे देखने,उसका जल पीने,स्पर्श करने,उसमें स्नान करने तथा सौ योजन से भी गंगा नाम का उच्चारण करने मात्र से मनुष्य के तीन जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। पदमपुराण की कथा के अनुसार आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से कहा-"हे देवी! तुम समस्त लोकों का आदिकारण बनो,मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि प्रारंभ करूँगा"। ब्रह्मा जी के कहने पर मूलप्रकृति-गायत्री सरस्वती,लक्ष्मी,उमादेवी,शक्तिबीजा,तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात स्वरूपों में प्रकट हुईं। इनमें से सातवीं 'पराप्रकृति धर्मद्रवा'को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित जानकार ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु में धारण कर लिया। राजा बलि के यज्ञ के समय वामन अवतार लिए जब भगवान विष्णु का एक पग आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुए,उस समय अपने कमण्डलु के जल से ब्रह्माजी ने श्रीविष्णु के चरण का पूजन किया। चरण धोते समय श्री विष्णु का चरणोदक हेमकूट पर्वत पर गिरा। वहां से भगवान शिव के पास पहुंचकर यह जल गंगा के रूप में उनकी जटाओं में समा गया। गंगा बहुत काल तक शिव की जटाओं में भ्रमण करती रहीं। तत्पश्चात सूर्यवंशी राजा भगीरथ ने अपने पूर्वज सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार करने हेतु गंगा को धरती पर लेन के लिए शिवजी की घोर तपस्या की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर गंगा को पृथ्वी पर उतार दिया। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, हस्त नक्षत्र में गंगाजी शिवजी की जटाओं से निकलकर धरती पर आई थी। उस समय गंगाजी तीन धाराओं में प्रकट होकर तीनों लोकों में चली गयीं और संसार में त्रिस्रोता के नाम से विख्यात हुईं। शिव,ब्रह्मा तथा विष्णु-तीनों देवताओं के संयोग से पवित्र होकर गंगा त्रिभुवन को पवन करती हैं।
चाहिये, क्योंकि मिथ्याज्ञानी तत्वोंके यथार्थ स्वरूप को ग्रहण नहीं कर सकता + है । इसी कारण उसको सच्चा सुख प्राप्त नहीं होता । हैं । और जहां पर अन्धकार रहने से दूर में स्थित पदार्थ 'स्थाणु वा पुरुष' ऐसा स्पष्ट ज्ञान होने से उन दोनों में रहने वाले 'ऊर्ध्वता सामान्य' का प्रत्यक्ष है। वक, कोटर, आदि स्थाणु ( टूठ ) के विशेष एवं शिर, हाथ, आदि पुरुष के विशेष अवयवों का प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु पहले उनका ज्ञान हो चुका है, इस लिये मन के द्वारा उनका स्मरण है । इस तरह से जहांपर सामान्य प्रत्यक्ष, विशेष प्रत्यक्ष और विशेष स्मरण है, वहीं पर संशय ज्ञान होने के कारण इन्द्रियों के आधीन इस की उत्पत्ति मानी गई है । परन्तु भवधिज्ञान में इन्द्रियों के व्यापार की कोई अपेक्षा नहीं, न मन के व्यापार की कोई अपेक्षा है, क्योंकि अवधिज्ञान को इन्द्रिय और मन से रहित माना है, किन्तु अवधिज्ञानावरण के क्षयोपशम की विशुद्धता रहने पर वह सामान्य विशेष रूप अपने विषयभूत पदार्थों को जानता है। इसलिये अवधिज्ञान में संशय नहीं हो सकता है। परन्तु हां, मिथ्यात्व कर्म के विपरीत श्रद्धान स्वरूप मिथ्या दर्शन के साथ श्रवधिज्ञान रहता है, इस लिये वह विपरीत स्वरूप अवश्य है। तथा जिस पदार्थ की और अवधिज्ञान का उपयोग लगा हुवा है, कारण वश उसका पूरा ज्ञान न होने के प्रथम ही, दूसरे किसी ज्ञान के विषयभूत दूसरे ही पदार्थ की ओर उपयोग लग जाय, उस समय मार्ग में जाते हुये पुरुषको 'तृण स्पर्श ज्ञानके समान' अनिश्चयात्मक अवधिज्ञान हो जाता है। श्रतएव अवधिज्ञान का विपरीत परिणमन अनध्यवसाय रूप भी होता है, किन्तु जिस समय जिस पदार्थं को अवधिज्ञान विषय कर रहा है, उस समय यदि वह उपयोग दृढ़ होगा, तो अवधिज्ञान का अनध्यवसाय रूप विपरीत परिणमन नहीं हो सकता है । ( देखो श्लोकवार्तिक पृष्ठ २५६ ) + मिच्छाइट्ठी जीवी उवइटुं यवयां ग सदहदि । सदहदि असम्भवं उवहं वा अणुवटुं ॥१८॥ गो. सा यदि कोई 'अग्नि' को शीतल समझकर स्पर्श करे तो अन्त में उस को दुख ही प्राप्त होगा। इसी प्रकार मिथ्या दृष्टि के ज्ञान का उपयोग पदार्थों के यथार्थ स्वरूप के जानने में नहीं होता। मिथ्याज्ञान और सम्यग्ज्ञानका भेद लौकिक ज्ञान की अपेक्षा से नहीं है, किन्तु मोक्ष मार्ग अथवा वस्तु के यथार्थ स्वरूप के जाननेकी दृष्टि से है । मिथ्या दृष्टि दो प्रकार के होते हैं, एक भव्य, दूसरे अभव्य । जो सिद्ध अवस्था को किसी भी समय प्राप्त कर सकते हैं, उन्हें 'भव्य' कहते हैं, और इनके विपरीत जो सिद्ध अवस्था को किसी भी काल में प्राप्त नहीं हो सकते हैं, उनको 'प्रभव्य' समझना चाहिये । ये दोनों ही प्रकार के मिथ्यांदृष्टि, सम्यग्दृष्टि के समान + ही घटपटादि पदार्थों एवं रूप रसादि को ग्रहण और निरूपण करते हैं, परन्तु जो तत्व मोक्ष मार्ग में सहायक हैं, उन का ज्ञान मिथ्यादृष्टि को विपरीत होता है । इसी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि के ज्ञान को 'मिथ्याज्ञान' + और सम्यग्दर्शन सहित जीव के ज्ञानको 'सम्यग्ज्ञान' कहा गया है । अब नीचे लिखे सूत्र द्वारा मिथ्याज्ञान का विशेष वर्णन करते ‡ तथा हि, सम्यग्दृष्टि र्यथा चक्षुरादिभिः रूपादीनु लभते, तथा मिथ्यादृष्टिरपि मत्यज्ञानेन, यथा सम्यग्दृष्टिःश्रु तेन रूपादीनि जानाति च निरूपय ति तथा मिथ्यादृष्टिरपि श्रुताज्ञानेन, यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टिः रूपिणी sथानवगच्छति, तथा मिथ्यादृष्टि विभंग ज्ञानेन इति । स० सि० + दर्शन मोह के उदय से आत्मा का मिथ्यादर्शन परिणाम और मतिज्ञानादि दोनों एक साथ और एक स्थान में ही आत्मा में रहते हैं । इसलिये मिथ्यादर्शन के सम्बन्ध से मतिज्ञान आदिको भी मिथ्याज्ञान कहते हैं। जैसे कडुवी तूम्बी में रक्खा हुवा दूध कटुक रज के संसर्ग से दूध भी कटुआ हो जाया करता है, यही बात मिथ्या ज्ञानों के विषय में हैं। सदसतोरविशेषाद्य दृच्छोपलब्धे रुन्मत्तवत् ॥ ३२ ॥ सूत्रार्थः- (सदसतोः) सत् और असत् रूप पदार्थों के ( अविशेषात) विशेष का अर्थात भेद का ज्ञान नहीं होने से (यहच्छोपलब्धेः) स्वेच्छा रूप यद्वा तद्वा जानने के कारण ( उन्मत्तवत् ) उन्मत्त के समान ये मिथ्याज्ञान भी होते हैं । अर्थात् मिथ्यादर्शन के उदय से सत और असत् पदार्थों का भेद नहीं समझते हुये, कुमति कुश्रुत और कुअवधिज्ञान वाले का यथार्थ जानना भी मिथ्याज्ञान ही समझना चाहिये । विशेषार्थः-~~- जिस प्रकार उन्मत्त (पागल) अथवा शराबी पुरुष भार्या (स्त्री) को माता, और माता को भार्या समझता है, यह उसका ज्ञान मिथ्याज्ञान है । परन्तु यदि वह किसी समय स्त्री को स्त्री और माता को माता भी कहदे, तो भी उसका यह कथन ( कहना ) या ज्ञानमिथ्याज्ञान ही कहा जायगा। क्योंकि उसको स्त्री और माताके भेद का यथार्थ (ठीक) ज्ञान नहीं है । उसी प्रकार दर्शन मोह के उदय से सत् और असत् पदार्थ का यथार्थ (ठीक) ज्ञान न होने के कारण कुमति, कुश्रुत, और कुअवधिज्ञान भी मिथ्याज्ञान समझना चाहिये यहां पर 'सत' का अर्थ प्रशस्त अथवा विद्यमान और असत् का तथा विद्यमान समझना चाहिये । वैसे यद्यपि नेत्रादिक इन्द्रियों से घटपटादि पदार्थों के रूपादि गुणों को सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि समानरूप से ग्रहण करता है परन्तु मिथ्यादृष्टि के कारण विपरीतता, स्वरूप विपरीतता और भेदाभेद विपरीतता, ये तीन प्रकारकी विपरोतता रहती है- अब इन तीनों का स्वरूप इस प्रकार है- घटपटादि पदार्थों के रूपादि गुणों को तो जैसे हैं वैसे ही जानता है, परन्तु उसके कारणोंको मिथ्यापहला अध्याय दृष्टि विपरीत कल्पित करता है। जैसे ब्रह्माद्व तवादी रूपादिकों का कारण एक अमूर्तिक नित्य ब्रह्म ही को मानते हैं और नैयायिक वैशेषिक, पृथ्वी से परमाणुओं में जाति भेद मानते हैं । उन में पृथ्वी में तो स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, चार गुण मानते हैं परन्तु वायु और जल में गन्ध को छोड़कर तीन ही गुण मानते हैं । अग्नि में स्पर्श और वर्णं दो ही गुण मानते हैं । वायु में एक स्पर्शगुण ही मानते हैं, शेष तीन गुण नहीं मानते हैं । इससे यह बात सिद्ध करते हैं, कि पृथिवी, जल, अग्नि और वायु ये चार अपनीर जाति के पृथक स्कन्धरूप कार्यों को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् इन चारों के परमाणु पृथक २ ही हैं । बौद्ध मत वाले पृथिवी आदि को चार भूत मान कर और स्पर्शादि गुण इन चारों के भौतिक कर्म हैं, ऐसा मानते हैं । पश्चात् इन आठों के समुदाय को 'परमाणु' कहते हैं । इस प्रकार घटपटादि पदार्थों के रूपादि गुणों के कारणों में विपरीतता मानते हैं, यह 'कारण विपरीतता' है । कोई इन समस्त पदार्थोंके स्वरूप में भी भेद मानते हैं, कितने ही तो रूप रसादिको निरंश निर्विकल्प मानते हैं, कोई कहते हैं कि रूपादि गुरण कोई ज्ञान से भिन्न वस्तु नहीं है, ज्ञान ही रूपादिकों के आकार परिणत होता है । कोई वस्तुको सर्वथा अनित्य ही मानते हैं । इसप्रकार मिथ्यात्व के उदय से वस्तुका स्वरूप बिपरीत मानते हैं, इसको 'स्वरूप विप - रोतता' समझना चाहिये । कोई कारण से कार्य को सर्वथा अभिन्न ही मानते हैं । तथा द्रव्य से गुण को और गुणों से द्रव्य को सर्वथा भिन्न ही मानते हैं । अथवा कारण कार्य को सर्वथा अभिन्न ही मानते हैं । एवं समस्त द्रव्यों को ब्रह्म से अभिन्न ही मानते हैं । इत्यादि प्रकार से भेदाभेद में सर्वथा एकान्त पक्षपात से भेदाभेद दोनों को विपरीत ही मानते हैं, यह 'भेदाभेद विपरीतता' है ।
चाहिये, क्योंकि मिथ्याज्ञानी तत्वोंके यथार्थ स्वरूप को ग्रहण नहीं कर सकता + है । इसी कारण उसको सच्चा सुख प्राप्त नहीं होता । हैं । और जहां पर अन्धकार रहने से दूर में स्थित पदार्थ 'स्थाणु वा पुरुष' ऐसा स्पष्ट ज्ञान होने से उन दोनों में रहने वाले 'ऊर्ध्वता सामान्य' का प्रत्यक्ष है। वक, कोटर, आदि स्थाणु के विशेष एवं शिर, हाथ, आदि पुरुष के विशेष अवयवों का प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु पहले उनका ज्ञान हो चुका है, इस लिये मन के द्वारा उनका स्मरण है । इस तरह से जहांपर सामान्य प्रत्यक्ष, विशेष प्रत्यक्ष और विशेष स्मरण है, वहीं पर संशय ज्ञान होने के कारण इन्द्रियों के आधीन इस की उत्पत्ति मानी गई है । परन्तु भवधिज्ञान में इन्द्रियों के व्यापार की कोई अपेक्षा नहीं, न मन के व्यापार की कोई अपेक्षा है, क्योंकि अवधिज्ञान को इन्द्रिय और मन से रहित माना है, किन्तु अवधिज्ञानावरण के क्षयोपशम की विशुद्धता रहने पर वह सामान्य विशेष रूप अपने विषयभूत पदार्थों को जानता है। इसलिये अवधिज्ञान में संशय नहीं हो सकता है। परन्तु हां, मिथ्यात्व कर्म के विपरीत श्रद्धान स्वरूप मिथ्या दर्शन के साथ श्रवधिज्ञान रहता है, इस लिये वह विपरीत स्वरूप अवश्य है। तथा जिस पदार्थ की और अवधिज्ञान का उपयोग लगा हुवा है, कारण वश उसका पूरा ज्ञान न होने के प्रथम ही, दूसरे किसी ज्ञान के विषयभूत दूसरे ही पदार्थ की ओर उपयोग लग जाय, उस समय मार्ग में जाते हुये पुरुषको 'तृण स्पर्श ज्ञानके समान' अनिश्चयात्मक अवधिज्ञान हो जाता है। श्रतएव अवधिज्ञान का विपरीत परिणमन अनध्यवसाय रूप भी होता है, किन्तु जिस समय जिस पदार्थं को अवधिज्ञान विषय कर रहा है, उस समय यदि वह उपयोग दृढ़ होगा, तो अवधिज्ञान का अनध्यवसाय रूप विपरीत परिणमन नहीं हो सकता है । + मिच्छाइट्ठी जीवी उवइटुं यवयां ग सदहदि । सदहदि असम्भवं उवहं वा अणुवटुं ॥अट्ठारह॥ गो. सा यदि कोई 'अग्नि' को शीतल समझकर स्पर्श करे तो अन्त में उस को दुख ही प्राप्त होगा। इसी प्रकार मिथ्या दृष्टि के ज्ञान का उपयोग पदार्थों के यथार्थ स्वरूप के जानने में नहीं होता। मिथ्याज्ञान और सम्यग्ज्ञानका भेद लौकिक ज्ञान की अपेक्षा से नहीं है, किन्तु मोक्ष मार्ग अथवा वस्तु के यथार्थ स्वरूप के जाननेकी दृष्टि से है । मिथ्या दृष्टि दो प्रकार के होते हैं, एक भव्य, दूसरे अभव्य । जो सिद्ध अवस्था को किसी भी समय प्राप्त कर सकते हैं, उन्हें 'भव्य' कहते हैं, और इनके विपरीत जो सिद्ध अवस्था को किसी भी काल में प्राप्त नहीं हो सकते हैं, उनको 'प्रभव्य' समझना चाहिये । ये दोनों ही प्रकार के मिथ्यांदृष्टि, सम्यग्दृष्टि के समान + ही घटपटादि पदार्थों एवं रूप रसादि को ग्रहण और निरूपण करते हैं, परन्तु जो तत्व मोक्ष मार्ग में सहायक हैं, उन का ज्ञान मिथ्यादृष्टि को विपरीत होता है । इसी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि के ज्ञान को 'मिथ्याज्ञान' + और सम्यग्दर्शन सहित जीव के ज्ञानको 'सम्यग्ज्ञान' कहा गया है । अब नीचे लिखे सूत्र द्वारा मिथ्याज्ञान का विशेष वर्णन करते ‡ तथा हि, सम्यग्दृष्टि र्यथा चक्षुरादिभिः रूपादीनु लभते, तथा मिथ्यादृष्टिरपि मत्यज्ञानेन, यथा सम्यग्दृष्टिःश्रु तेन रूपादीनि जानाति च निरूपय ति तथा मिथ्यादृष्टिरपि श्रुताज्ञानेन, यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टिः रूपिणी sथानवगच्छति, तथा मिथ्यादृष्टि विभंग ज्ञानेन इति । सशून्य सिशून्य + दर्शन मोह के उदय से आत्मा का मिथ्यादर्शन परिणाम और मतिज्ञानादि दोनों एक साथ और एक स्थान में ही आत्मा में रहते हैं । इसलिये मिथ्यादर्शन के सम्बन्ध से मतिज्ञान आदिको भी मिथ्याज्ञान कहते हैं। जैसे कडुवी तूम्बी में रक्खा हुवा दूध कटुक रज के संसर्ग से दूध भी कटुआ हो जाया करता है, यही बात मिथ्या ज्ञानों के विषय में हैं। सदसतोरविशेषाद्य दृच्छोपलब्धे रुन्मत्तवत् ॥ बत्तीस ॥ सूत्रार्थः- सत् और असत् रूप पदार्थों के विशेष का अर्थात भेद का ज्ञान नहीं होने से स्वेच्छा रूप यद्वा तद्वा जानने के कारण उन्मत्त के समान ये मिथ्याज्ञान भी होते हैं । अर्थात् मिथ्यादर्शन के उदय से सत और असत् पदार्थों का भेद नहीं समझते हुये, कुमति कुश्रुत और कुअवधिज्ञान वाले का यथार्थ जानना भी मिथ्याज्ञान ही समझना चाहिये । विशेषार्थः-~~- जिस प्रकार उन्मत्त अथवा शराबी पुरुष भार्या को माता, और माता को भार्या समझता है, यह उसका ज्ञान मिथ्याज्ञान है । परन्तु यदि वह किसी समय स्त्री को स्त्री और माता को माता भी कहदे, तो भी उसका यह कथन या ज्ञानमिथ्याज्ञान ही कहा जायगा। क्योंकि उसको स्त्री और माताके भेद का यथार्थ ज्ञान नहीं है । उसी प्रकार दर्शन मोह के उदय से सत् और असत् पदार्थ का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण कुमति, कुश्रुत, और कुअवधिज्ञान भी मिथ्याज्ञान समझना चाहिये यहां पर 'सत' का अर्थ प्रशस्त अथवा विद्यमान और असत् का तथा विद्यमान समझना चाहिये । वैसे यद्यपि नेत्रादिक इन्द्रियों से घटपटादि पदार्थों के रूपादि गुणों को सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि समानरूप से ग्रहण करता है परन्तु मिथ्यादृष्टि के कारण विपरीतता, स्वरूप विपरीतता और भेदाभेद विपरीतता, ये तीन प्रकारकी विपरोतता रहती है- अब इन तीनों का स्वरूप इस प्रकार है- घटपटादि पदार्थों के रूपादि गुणों को तो जैसे हैं वैसे ही जानता है, परन्तु उसके कारणोंको मिथ्यापहला अध्याय दृष्टि विपरीत कल्पित करता है। जैसे ब्रह्माद्व तवादी रूपादिकों का कारण एक अमूर्तिक नित्य ब्रह्म ही को मानते हैं और नैयायिक वैशेषिक, पृथ्वी से परमाणुओं में जाति भेद मानते हैं । उन में पृथ्वी में तो स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, चार गुण मानते हैं परन्तु वायु और जल में गन्ध को छोड़कर तीन ही गुण मानते हैं । अग्नि में स्पर्श और वर्णं दो ही गुण मानते हैं । वायु में एक स्पर्शगुण ही मानते हैं, शेष तीन गुण नहीं मानते हैं । इससे यह बात सिद्ध करते हैं, कि पृथिवी, जल, अग्नि और वायु ये चार अपनीर जाति के पृथक स्कन्धरूप कार्यों को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् इन चारों के परमाणु पृथक दो ही हैं । बौद्ध मत वाले पृथिवी आदि को चार भूत मान कर और स्पर्शादि गुण इन चारों के भौतिक कर्म हैं, ऐसा मानते हैं । पश्चात् इन आठों के समुदाय को 'परमाणु' कहते हैं । इस प्रकार घटपटादि पदार्थों के रूपादि गुणों के कारणों में विपरीतता मानते हैं, यह 'कारण विपरीतता' है । कोई इन समस्त पदार्थोंके स्वरूप में भी भेद मानते हैं, कितने ही तो रूप रसादिको निरंश निर्विकल्प मानते हैं, कोई कहते हैं कि रूपादि गुरण कोई ज्ञान से भिन्न वस्तु नहीं है, ज्ञान ही रूपादिकों के आकार परिणत होता है । कोई वस्तुको सर्वथा अनित्य ही मानते हैं । इसप्रकार मिथ्यात्व के उदय से वस्तुका स्वरूप बिपरीत मानते हैं, इसको 'स्वरूप विप - रोतता' समझना चाहिये । कोई कारण से कार्य को सर्वथा अभिन्न ही मानते हैं । तथा द्रव्य से गुण को और गुणों से द्रव्य को सर्वथा भिन्न ही मानते हैं । अथवा कारण कार्य को सर्वथा अभिन्न ही मानते हैं । एवं समस्त द्रव्यों को ब्रह्म से अभिन्न ही मानते हैं । इत्यादि प्रकार से भेदाभेद में सर्वथा एकान्त पक्षपात से भेदाभेद दोनों को विपरीत ही मानते हैं, यह 'भेदाभेद विपरीतता' है ।
भारत से चीन सीमा पर सड़क पहुंचाना बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) के लिए किसी जंग से कम नहीं था। आज रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए चीन सीमा के लिए बनी घट्टाबगढ़-लिपुलेख सड़क का ऑनलाइन उद्घाटन किया। लेकिन हम आपको बताते हैं कि किन कठिनाइयों के साथ मजदूरों ने इस जंग में मुकाम हासिल किया। चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख के लिए 1999 से सड़क का निर्माण किया जा रहा है। तवाघाट से लिपुलेख तक कुल 95 किमी सड़क की कटिंग का काम पूरा हो गया है। तवाघाट से गर्बाधार तक 2008 में ही सड़क का निर्माण पूरा कर लिया गया था। 2014 के बाद सड़क निर्माण में काफी तेजी आई। तवाघाट से गुंजी तक कठिन चट्टानें होने के कारण सड़क निर्माण में काफी कठिनाइयां आईं। लखनपुर और नजंग की पहाड़ियों को काटना बेहद कठिन था। काटने में पिछले दस सालों में ग्रिफ के एक जूनियर इंजीनियर, दो ऑपरेटरों और छह स्थानीय मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी। करोड़ों की मशीनें भी इन्हीं चट्टानों में दफन हो गईं थीं। ग्रिफ के अधिकारियों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान 65 लाख की लागत का डोजर, 2. 5 करोड़ रुपये की डीसी 400 ड्रिलिंग मशीन, 40 लाख रुपये की वैगन ड्रिल मशीन सहित कई मशीनें नष्ट हो गई थीं। चीन सीमा तक बनी घट्टाबगढ़-लिपुलेख सड़क पर करीब 408 करोड़ की राशि खर्च हो चुकी है। सड़क कटिंग का काम 2008 से पहले ग्रिफ की 65 आरसीसी ने किया। जून 2008 से 67 आरसीसी ग्रिफ सड़क का काम कर रही है। ग्रिफ के चीफ इंजीनियर विमल गोस्वामी ने बताया कि सड़क की कटिंग का काम पूरा हो गया है। अगले दो-तीन वर्षों में सड़क को पक्का कर लिया जाएगा।
भारत से चीन सीमा पर सड़क पहुंचाना बीआरओ के लिए किसी जंग से कम नहीं था। आज रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए चीन सीमा के लिए बनी घट्टाबगढ़-लिपुलेख सड़क का ऑनलाइन उद्घाटन किया। लेकिन हम आपको बताते हैं कि किन कठिनाइयों के साथ मजदूरों ने इस जंग में मुकाम हासिल किया। चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख के लिए एक हज़ार नौ सौ निन्यानवे से सड़क का निर्माण किया जा रहा है। तवाघाट से लिपुलेख तक कुल पचानवे किमी सड़क की कटिंग का काम पूरा हो गया है। तवाघाट से गर्बाधार तक दो हज़ार आठ में ही सड़क का निर्माण पूरा कर लिया गया था। दो हज़ार चौदह के बाद सड़क निर्माण में काफी तेजी आई। तवाघाट से गुंजी तक कठिन चट्टानें होने के कारण सड़क निर्माण में काफी कठिनाइयां आईं। लखनपुर और नजंग की पहाड़ियों को काटना बेहद कठिन था। काटने में पिछले दस सालों में ग्रिफ के एक जूनियर इंजीनियर, दो ऑपरेटरों और छह स्थानीय मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी। करोड़ों की मशीनें भी इन्हीं चट्टानों में दफन हो गईं थीं। ग्रिफ के अधिकारियों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान पैंसठ लाख की लागत का डोजर, दो. पाँच करोड़ रुपये की डीसी चार सौ ड्रिलिंग मशीन, चालीस लाख रुपये की वैगन ड्रिल मशीन सहित कई मशीनें नष्ट हो गई थीं। चीन सीमा तक बनी घट्टाबगढ़-लिपुलेख सड़क पर करीब चार सौ आठ करोड़ की राशि खर्च हो चुकी है। सड़क कटिंग का काम दो हज़ार आठ से पहले ग्रिफ की पैंसठ आरसीसी ने किया। जून दो हज़ार आठ से सरसठ आरसीसी ग्रिफ सड़क का काम कर रही है। ग्रिफ के चीफ इंजीनियर विमल गोस्वामी ने बताया कि सड़क की कटिंग का काम पूरा हो गया है। अगले दो-तीन वर्षों में सड़क को पक्का कर लिया जाएगा।
प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस ने अभी तक अपनी बेटी का नहीं किया है नामकरण, किस बात का है इंतजार? Priyanka Chopra did not decide daughter's name: प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस को पैरेंट्स बने हुए करीब 2 महीने से ज्यादा हो गए हैं लेकिन उन्होंन अभी तक अपनी बेटी का नाम नहीं तय किया है। इसके पीछे का कारण अब सामने आया है। प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस सरोगेसी के जरिए पैरेंट्स बने हैं। प्रियंका ने खुद जनवरी को सोशल मीडिया पर अपने बच्चे के बारे में बताया था। ये तो बात में पता चला कि उनकी संतान एक बेटी है। साथ में ये भी जानकारी आई कि उनकी बेटी प्रीमैच्योर है और उसे अस्पताल में ऑबर्जवेशन के लिए रखा गया है। प्रियंका और निक को पैरेंट्स बने हुए दो करीब दो महीने से ज्यादा हो गए हैं लेकिन दोनों ने अभी तक अपनी बेटी का नाम नहीं रखा है। वो बेटी का नाम काफी सोच समझकर रखना चाहते हैं। बॉलीवुड लाइफ को एक सोर्स ने बताया है, "प्रियंका और निक को अपनी बेटी के नाम के लिए उनके परिवार और दोस्तों से ढेर सारे सुझाव मिले हैं। हालांकि, उन्हें अभी तक कोई ऐसा नाम नहीं मिला है जो उनके दिलों को छू गया हो। प्रियंका और निक अपनी बच्ची का नाम रखने की जल्दी में नहीं हैं क्योंकि वे अपनी बेटी के लिए कुछ अनोखा और सार्थक नाम चाहते हैं।" सोर्स ने आगे कहा, "प्रियंका अपनी जड़ों से बहुत जुड़ी हुई हैं और अपने पति की संस्कृति का भी सम्मान करती हैं और प्यार करती हैं, अपनी बेटी का नाम रखना चाहती हैं जिसमें संस्कृतियों का मिश्रण हो। खैर, हमें राजकुमारी के नाम का इंतजार करना होगा क्योंकि माता-पिता को कोई जल्दी नहीं है और अपना समय ले रहे हैं।" प्रियंका चोपड़ा की मां मधु चोपड़ा ने अभी तक अपनी नातिन से मुलाकात नहीं की है। हाल ही में उन्होंने एक इंस्टाग्राम लाइव में बताया कि वो नानी बनकर बहुत ज्यादा खुश हैं लेकिन वो प्रियंका की बेटी से मिलने नहीं जा पाई हैं क्योंकि एक तरफ उनकी तबियत और दूसरा कोविड 19 का खतरा है जिससे वो फिलहाल बच रही हैं। लेकिन उन्होंने ये जरूर बताया कि वो फेसटाइम पर अकसर अपनी नातिन से बात करती रहती हैं। बॉलीवुड, हॉलीवुड, साउथ, भोजपुरी और टीवी जगत की ताजा खबरों के लिए यहां क्लिक करें...बॉलीवुड लाइफ हिन्दी के फेसबुक पेज, ट्विटर पेज, ताजा गॉसिप के लिए हमें Facebook Messenger पर फॉलो करें।
प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस ने अभी तक अपनी बेटी का नहीं किया है नामकरण, किस बात का है इंतजार? Priyanka Chopra did not decide daughter's name: प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस को पैरेंट्स बने हुए करीब दो महीने से ज्यादा हो गए हैं लेकिन उन्होंन अभी तक अपनी बेटी का नाम नहीं तय किया है। इसके पीछे का कारण अब सामने आया है। प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस सरोगेसी के जरिए पैरेंट्स बने हैं। प्रियंका ने खुद जनवरी को सोशल मीडिया पर अपने बच्चे के बारे में बताया था। ये तो बात में पता चला कि उनकी संतान एक बेटी है। साथ में ये भी जानकारी आई कि उनकी बेटी प्रीमैच्योर है और उसे अस्पताल में ऑबर्जवेशन के लिए रखा गया है। प्रियंका और निक को पैरेंट्स बने हुए दो करीब दो महीने से ज्यादा हो गए हैं लेकिन दोनों ने अभी तक अपनी बेटी का नाम नहीं रखा है। वो बेटी का नाम काफी सोच समझकर रखना चाहते हैं। बॉलीवुड लाइफ को एक सोर्स ने बताया है, "प्रियंका और निक को अपनी बेटी के नाम के लिए उनके परिवार और दोस्तों से ढेर सारे सुझाव मिले हैं। हालांकि, उन्हें अभी तक कोई ऐसा नाम नहीं मिला है जो उनके दिलों को छू गया हो। प्रियंका और निक अपनी बच्ची का नाम रखने की जल्दी में नहीं हैं क्योंकि वे अपनी बेटी के लिए कुछ अनोखा और सार्थक नाम चाहते हैं।" सोर्स ने आगे कहा, "प्रियंका अपनी जड़ों से बहुत जुड़ी हुई हैं और अपने पति की संस्कृति का भी सम्मान करती हैं और प्यार करती हैं, अपनी बेटी का नाम रखना चाहती हैं जिसमें संस्कृतियों का मिश्रण हो। खैर, हमें राजकुमारी के नाम का इंतजार करना होगा क्योंकि माता-पिता को कोई जल्दी नहीं है और अपना समय ले रहे हैं।" प्रियंका चोपड़ा की मां मधु चोपड़ा ने अभी तक अपनी नातिन से मुलाकात नहीं की है। हाल ही में उन्होंने एक इंस्टाग्राम लाइव में बताया कि वो नानी बनकर बहुत ज्यादा खुश हैं लेकिन वो प्रियंका की बेटी से मिलने नहीं जा पाई हैं क्योंकि एक तरफ उनकी तबियत और दूसरा कोविड उन्नीस का खतरा है जिससे वो फिलहाल बच रही हैं। लेकिन उन्होंने ये जरूर बताया कि वो फेसटाइम पर अकसर अपनी नातिन से बात करती रहती हैं। बॉलीवुड, हॉलीवुड, साउथ, भोजपुरी और टीवी जगत की ताजा खबरों के लिए यहां क्लिक करें...बॉलीवुड लाइफ हिन्दी के फेसबुक पेज, ट्विटर पेज, ताजा गॉसिप के लिए हमें Facebook Messenger पर फॉलो करें।
4 की उप-धारा 1 में निर्धारित 17 मदों (नियमावली) को प्रकाशित करना होगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में निम्नलिखित विभाग शामिल हैंः स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय चिकित्सा और जन स्वास्थ्य मामलों को देखता है जिसमें औषध नियंत्रण और खाद्य में मिलावट की रोकथाम शामिल है जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसंख्या स्थिरीकरण करना है। विभाग में विभिन्न स्तरों पर कार्य का संचालन, कार्य संचालन नियमों और समय-समय पर जारी अन्य सरकारी आदेशों / अनुदेशों के अनुसार किया जाता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की कार्यालय पद्धति निर्देशिका, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नियमों / विनियमों / अनुदेशों आदि का अनुपालन करता है। किसी व्यवस्था की विशिष्टियां, जो उसकी नीति की संरचना या उसके कार्यान्वयन के संबंध में जनता के सदस्यों से परामर्श के लिए या उनके द्वारा अभ्यावेदन के लिए विद्यमान हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में एक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद है जिसमें राज्य सरकारों / केन्द्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्री, सांसद, स्वास्थ्य संगठनों और सार्वजनिक निकायों का प्रतिनिधित्व करने वाले गैर-सरकारी अधिकारी और कुछ प्रख्यात व्यक्ति शामिल हैं। यह केन्द्र और राज्यों के लिए नीति की व्यापक रूपरेखा की सिफारिश करने के लिए अपने सभी पहलुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में शीर्ष नीति निर्माण निकाय है। - ऐसे बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों के, जिनमें दो या अधिक व्यक्ति हैं, जिनका उसके भाग के रूप में या इस बारे में सलाह देने के प्रयोजन के लिए गठन किया गया है और इस बारे में कि क्या उन बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों की बैठकें जनता के लिए खुली होंगी या ऐसी बैठकों के कार्यवृत्त तक जनता की पहुंच होगी। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण में अध्यक्ष के अलावा 22 सदस्य हैं। एफएसएसएआई के कार्यवृत्त को समय-समय पर वेबसाइट अर्थात् Fssai.gov.in पर अपलोड किया जाता है। - सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत नोडल अधिकारी का नामांकन (513.49 KB)
चार की उप-धारा एक में निर्धारित सत्रह मदों को प्रकाशित करना होगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में निम्नलिखित विभाग शामिल हैंः स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय चिकित्सा और जन स्वास्थ्य मामलों को देखता है जिसमें औषध नियंत्रण और खाद्य में मिलावट की रोकथाम शामिल है जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसंख्या स्थिरीकरण करना है। विभाग में विभिन्न स्तरों पर कार्य का संचालन, कार्य संचालन नियमों और समय-समय पर जारी अन्य सरकारी आदेशों / अनुदेशों के अनुसार किया जाता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की कार्यालय पद्धति निर्देशिका, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नियमों / विनियमों / अनुदेशों आदि का अनुपालन करता है। किसी व्यवस्था की विशिष्टियां, जो उसकी नीति की संरचना या उसके कार्यान्वयन के संबंध में जनता के सदस्यों से परामर्श के लिए या उनके द्वारा अभ्यावेदन के लिए विद्यमान हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में एक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद है जिसमें राज्य सरकारों / केन्द्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्री, सांसद, स्वास्थ्य संगठनों और सार्वजनिक निकायों का प्रतिनिधित्व करने वाले गैर-सरकारी अधिकारी और कुछ प्रख्यात व्यक्ति शामिल हैं। यह केन्द्र और राज्यों के लिए नीति की व्यापक रूपरेखा की सिफारिश करने के लिए अपने सभी पहलुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में शीर्ष नीति निर्माण निकाय है। - ऐसे बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों के, जिनमें दो या अधिक व्यक्ति हैं, जिनका उसके भाग के रूप में या इस बारे में सलाह देने के प्रयोजन के लिए गठन किया गया है और इस बारे में कि क्या उन बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों की बैठकें जनता के लिए खुली होंगी या ऐसी बैठकों के कार्यवृत्त तक जनता की पहुंच होगी। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण में अध्यक्ष के अलावा बाईस सदस्य हैं। एफएसएसएआई के कार्यवृत्त को समय-समय पर वेबसाइट अर्थात् Fssai.gov.in पर अपलोड किया जाता है। - सूचना का अधिकार अधिनियम दो हज़ार पाँच के तहत नोडल अधिकारी का नामांकन
सुगंधा मिश्रा और कॉमेडियन संकेत भोसले ने इंस्टाग्राम पर अपनी शादी की फोटोज को शेयर किया। तेलुगु स्टार अल्लू अर्जुन भी कोरोना से संक्रमित हो गये हैं। अभिनेता ने इंस्टाग्राम पर अपने स्वास्थ्य की जानकारी देते हुए खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है। अभिनेत्री सुगंधा मिश्रा और कॉमेडियन संकेत भोसले ने इंस्टाग्राम पर अपनी शादी की फोटोज को शेयर किया। दोनों की शादी 26 अप्रैल को जालंधर में हुई थी। फोटो में संचित सुगंधा को जयमाला पहना रहे है। पिंक लहंगे में सुगंधा बेहद खूबसूरत लग रही है, वहीं साकेत भी शेरवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहे है। संकेत को टीज करते हुए सुंगधा ने फोटो के साथ कैप्शन दिया, "इसी के साथ योर लाइफ, माई रूल्स" सुंगधा संकेत की पोस्ट पर उनके दोस्तों ने दोनों ढेर सारी बधाईयां दी। तेलुगु स्टार अल्लू अर्जुन भी कोरोना से संक्रमित हो गये हैं। अभिनेता ने इंस्टाग्राम पर अपने स्वास्थ्य की जानकारी देते हुए खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है। अर्जुन ने लिखा, "सभी को नमस्कार! मैं कोविड पॉजिटिव हो गया हूं। मैंने खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है और सभी प्रोटोकॉल का पालन कर रहा हूं। " उन्होंने उन लोगों से भी टेस्ट कराने का आग्रह किया जो उनके संपर्क में आये थे। उन्होंने कहा, "घर पर रहें, सुरक्षित रहें और मौका मिलने पर टीका लगवाएं। " अभिनेता ने साझा किया कि वह ठीक हो रहे हैं और उसके प्रशंसकों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। मंदिरा बेदी जल्द ही अपनी आने वाली मर्डर मिस्ट्री सीरीज में एक पुलिस अधिकारी के किरदार में नजर आएंगी। अपने किरदार के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं रूहाना धुलप का किरदार निभा रही हूं, जो एक तेज तर्रार और शानदार पुलिस अधिकारी है। इसकी कहानी एक युवा व्यवसायी की हत्या के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक काफी पेंचीदा मामला है। इसे सुलझाने के लिए वह अपना पूरा दम लगा देती है। " उन्होंने आगे कहा, "मैं इससे पहले भी पुलिस ऑफिसर के किरदार में काम कर चुकी हूं, लेकिन रुहाना का किरदार अलग है और मैंने इसे काफी एंज्वॉय भी किया है। उसका सवाल करने और केस को हल करने का अपना एक तरीका है। मैं इस सीरीज को लेकर काफी एक्साइटेड हूं। " भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार अरविन्द अकेला कल्लू अपने चाहने वालों के मनोरंजन के लिए बहुत ही इंटरटेनिंग वीडियो गाने लेकर आए हैं। कल्लू, ट्रेंडिंग गर्ल नीलम गिरी और पॉपुलर गायिका शिल्पी राज की तिकड़ी का धमाल वीडियो सांग 'बियाह बिना बिगरतारु' वर्ल्डवाइड रिकॉर्डस भोजपुरी के ऑफिसियल यूटयूब चैनल पर रिलीज किया गया है। इस गाने में कल्लू और नीलम गिरी की गजब केमिस्ट्री नजर आ रही है, जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं। गाने में कल्लू के मधुर सुर में गायिका शिल्पी राज ने भी सुर मिलाया है। अभिनेत्री सारा खान ने रमजान के महीने के दौरान अपने परिवार के साथ बिताने के लिए हाल ही में लंबे समय बाद अपने गृहनगर भोपाल की यात्रा की। सारा ने कहा कि वह अपने परिवार के साथ कुछ क्वालिटी टाइम (बेहतर समय) बिताने के लिए लगभग 10 साल बाद भोपाल आई। सारा ने कहा, "यह कोविड-19 महामारी बहुत कठिन समय है, लेकिन मैंने सभी आवश्यक सावधानी बरती और सुनिश्चित किया कि मैं रमजान के इस पवित्र महीने के दौरान अपने बड़ों और नानी का आशीर्वाद प्राप्त करूं। " सारा रसोई में इफ्तार और सेहरी की रेसिपी के साथ प्रयोग भी करती रही हैं। अभिनेत्री का कहना है कि जब आप अपने परिवार के सदस्यों से घिरे होते हैं तो उपवास करना कठिन नहीं होता है।
सुगंधा मिश्रा और कॉमेडियन संकेत भोसले ने इंस्टाग्राम पर अपनी शादी की फोटोज को शेयर किया। तेलुगु स्टार अल्लू अर्जुन भी कोरोना से संक्रमित हो गये हैं। अभिनेता ने इंस्टाग्राम पर अपने स्वास्थ्य की जानकारी देते हुए खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है। अभिनेत्री सुगंधा मिश्रा और कॉमेडियन संकेत भोसले ने इंस्टाग्राम पर अपनी शादी की फोटोज को शेयर किया। दोनों की शादी छब्बीस अप्रैल को जालंधर में हुई थी। फोटो में संचित सुगंधा को जयमाला पहना रहे है। पिंक लहंगे में सुगंधा बेहद खूबसूरत लग रही है, वहीं साकेत भी शेरवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहे है। संकेत को टीज करते हुए सुंगधा ने फोटो के साथ कैप्शन दिया, "इसी के साथ योर लाइफ, माई रूल्स" सुंगधा संकेत की पोस्ट पर उनके दोस्तों ने दोनों ढेर सारी बधाईयां दी। तेलुगु स्टार अल्लू अर्जुन भी कोरोना से संक्रमित हो गये हैं। अभिनेता ने इंस्टाग्राम पर अपने स्वास्थ्य की जानकारी देते हुए खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है। अर्जुन ने लिखा, "सभी को नमस्कार! मैं कोविड पॉजिटिव हो गया हूं। मैंने खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है और सभी प्रोटोकॉल का पालन कर रहा हूं। " उन्होंने उन लोगों से भी टेस्ट कराने का आग्रह किया जो उनके संपर्क में आये थे। उन्होंने कहा, "घर पर रहें, सुरक्षित रहें और मौका मिलने पर टीका लगवाएं। " अभिनेता ने साझा किया कि वह ठीक हो रहे हैं और उसके प्रशंसकों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। मंदिरा बेदी जल्द ही अपनी आने वाली मर्डर मिस्ट्री सीरीज में एक पुलिस अधिकारी के किरदार में नजर आएंगी। अपने किरदार के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं रूहाना धुलप का किरदार निभा रही हूं, जो एक तेज तर्रार और शानदार पुलिस अधिकारी है। इसकी कहानी एक युवा व्यवसायी की हत्या के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक काफी पेंचीदा मामला है। इसे सुलझाने के लिए वह अपना पूरा दम लगा देती है। " उन्होंने आगे कहा, "मैं इससे पहले भी पुलिस ऑफिसर के किरदार में काम कर चुकी हूं, लेकिन रुहाना का किरदार अलग है और मैंने इसे काफी एंज्वॉय भी किया है। उसका सवाल करने और केस को हल करने का अपना एक तरीका है। मैं इस सीरीज को लेकर काफी एक्साइटेड हूं। " भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार अरविन्द अकेला कल्लू अपने चाहने वालों के मनोरंजन के लिए बहुत ही इंटरटेनिंग वीडियो गाने लेकर आए हैं। कल्लू, ट्रेंडिंग गर्ल नीलम गिरी और पॉपुलर गायिका शिल्पी राज की तिकड़ी का धमाल वीडियो सांग 'बियाह बिना बिगरतारु' वर्ल्डवाइड रिकॉर्डस भोजपुरी के ऑफिसियल यूटयूब चैनल पर रिलीज किया गया है। इस गाने में कल्लू और नीलम गिरी की गजब केमिस्ट्री नजर आ रही है, जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं। गाने में कल्लू के मधुर सुर में गायिका शिल्पी राज ने भी सुर मिलाया है। अभिनेत्री सारा खान ने रमजान के महीने के दौरान अपने परिवार के साथ बिताने के लिए हाल ही में लंबे समय बाद अपने गृहनगर भोपाल की यात्रा की। सारा ने कहा कि वह अपने परिवार के साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिताने के लिए लगभग दस साल बाद भोपाल आई। सारा ने कहा, "यह कोविड-उन्नीस महामारी बहुत कठिन समय है, लेकिन मैंने सभी आवश्यक सावधानी बरती और सुनिश्चित किया कि मैं रमजान के इस पवित्र महीने के दौरान अपने बड़ों और नानी का आशीर्वाद प्राप्त करूं। " सारा रसोई में इफ्तार और सेहरी की रेसिपी के साथ प्रयोग भी करती रही हैं। अभिनेत्री का कहना है कि जब आप अपने परिवार के सदस्यों से घिरे होते हैं तो उपवास करना कठिन नहीं होता है।
भारत में होने वाली पहली मोटो जीपी रेस का सबसे सस्ता टिकट 800 रूपये का होगा जबकि सबसे महंगा टिकट डेढ लाख रूपये का रहेगा । प्रीमियर दुपहिया रेस प्रतियोगिता के भारतीय प्रमोटर फेयरस्ट्रीट स्पोटर्स ने 22 से 24 सितंबर तक ग्रेटर नोएडा के बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर होने वाली रेस के टिकटों की बिक्री जल्दी शुरू करने का ऐलान किया। भारत में फार्मूला वन ग्रां प्री के बाद यह सबसे बड़ा मोटरस्पोर्ट टूर्नामेंट होगा । भारत में 2011 में होने वाली पहली फार्मूला वन रेस से पहले सबसे सस्ता टिकट 1500 रूपये का था। रेस के टिकट साझेदार बुक माय शो ने गुरुवार को ऐलान किया कि टिकटों की बिक्री जल्दी ही शुरू की जायेगी ।
भारत में होने वाली पहली मोटो जीपी रेस का सबसे सस्ता टिकट आठ सौ रूपये का होगा जबकि सबसे महंगा टिकट डेढ लाख रूपये का रहेगा । प्रीमियर दुपहिया रेस प्रतियोगिता के भारतीय प्रमोटर फेयरस्ट्रीट स्पोटर्स ने बाईस से चौबीस सितंबर तक ग्रेटर नोएडा के बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर होने वाली रेस के टिकटों की बिक्री जल्दी शुरू करने का ऐलान किया। भारत में फार्मूला वन ग्रां प्री के बाद यह सबसे बड़ा मोटरस्पोर्ट टूर्नामेंट होगा । भारत में दो हज़ार ग्यारह में होने वाली पहली फार्मूला वन रेस से पहले सबसे सस्ता टिकट एक हज़ार पाँच सौ रूपये का था। रेस के टिकट साझेदार बुक माय शो ने गुरुवार को ऐलान किया कि टिकटों की बिक्री जल्दी ही शुरू की जायेगी ।
पहली बार मैंने उसे एक फिजियोथेरेपी क्लिनिक में देखा था, जो उपनगरों में सर्वश्रेष्ठ में से एक है (जो कि एकमात्र ऐसी जगह है जिसे मैं वास्तव में जानता हूं) बहु-प्रतिभाशाली डॉक्टर इंदु टंडन द्वारा संचालित, जो मदन प्रकाश की बेटी हैं, जो सबसे अधिक में से एक हैं। मैं उद्योग में विनम्र और सौम्य तकनीशियनों को जानता हूं, एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष हिंदी फिल्मों की दुनिया को दिए हैं। वह उन सभी लोगों के बीच एक आकर्षक और लगभग देवदूत दिखने वाली आकृति थी, जिनका विभिन्न प्रकार की बीमारियों और गंभीर दुर्घटनाओं, टूटी हड्डियों और परिणामी अवसाद के परिणामों के लिए इलाज चल रहा था, उनमें से अधिकांश युवा थे। उसकी पीठ में कुछ समस्या थी और यह आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि मुझे एहसास हुआ कि वह अब अपने शुरुआती अस्सी के दशक में थी। दर्द और अन्य प्रकार के दुखों के कारण वह जिस दर्द से गुजर रही थी, उसके बावजूद उसके चेहरे पर लगातार मुस्कान थी। उसके भूरे बाल शानदार लग रहे थे, उसके कार्यवाहक द्वारा पूर्णता के साथ कंघी की गई, जिसे कभी महाराष्ट्र के एक गाँव का मुखिया कहा जाता था और जो स्थानीय नृत्य और संगीत के विशेषज्ञ थे और मुझे अभी यह कहना होगा कि उसकी कुछ धुनें और मराठी गीतों ने कुछ बहुत लोकप्रिय गीतों का आधार भी बनाया है। वह ग्रे के शुक्रवार, शनिवार और रविवार की महिला की तरह थे और पूरे प्यार और सम्मान के साथ ग्रे महिला की देखभाल करती थी। मैं अपने टूटे पैर के लिए फिजियोथेरेपी के एक सत्र से गुजर रहा था और कुछ व्यायाम जो मुझे करने के लिए किए गए थे, वे बहुत दर्दनाक थे, लेकिन इस महिला में कुछ जादू था जिसने मुझे उसकी ओर देखा और अपना दर्द भूल गया।श्री मदन प्रकाश ने उनसे मेरा परिचय कराया और हमने एक त्वरित और सहज बातचीत शुरू की, जिससे एक बहुत ही मधुर संबंध बन गया जो डॉ. टंडन के क्लिनिक में अभ्यास के दिन के साथ ही मजबूत होता गया। वह 83 वर्ष की थीं और मुझे उनकी युवावस्था के सबसे अच्छे वर्षों को याद करने के दुख, अफसोस और दर्द के बारे में कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। मैंने उसे अपनी "गर्लफ्रेंड" कहने के बाद ही वो खुश दिखी और वो शायद नहीं जानती थी कि डॉ. टंडन के क्लिनिक में हम एक साथ कम समय में मुझे कितनी खुशी दे रहे थे। हर शाम, वह क्लिनिक में सभी के लिए गर्म चाय से भरे अपने फ्लास्क और कुछ स्नैक्स लेकर आती थी और जब उसे चाय के लिए मेरी कमजोरी का पता चला, तो उसने सुनिश्चित किया कि मेरे पास गर्म चाय के कम से कम दो बड़े मग हों। बहुत बाद में मुझे बताया गया कि वह लीला थी, संजय लीला भंसाली के नाम पर लीला, हमारे सबसे महान फिल्म निर्माताओं में से एक और जिसने उन्हें, उनकी मां को प्रेरणा के प्रमुख स्रोत के रूप में लिया था और यही कारण था कि क्यों उन्होंने अपने पिता का नाम अपने मध्य नाम के रूप में नहीं लिया था, बल्कि अपनी मां के नाम के रूप में लिया था और इसी तरह उन्हें अपना नाम संजय लीला भंसाली मिला, जो अब भारतीय सिनेमा में अच्छा, महान और गौरवशाली नाम का पर्याय बन गया है। वह 83 वर्ष की थी और 84 वर्ष की हो रही थी जब उसे लगा कि, मैं उसे अपनी "प्रेमिका" कहना बहुत तुच्छ है और उसने मुझे एक बड़ा आश्चर्य तब दिया जब उसने मुझे मदन प्रकाश के कमरे में आमंत्रित किया जो उसके स्वीकृत भाईयों में से एक था और अब उसने मुझसे अनुमति मांगी कि क्या वह मुझे अपना भाई बना सकती है, और क्या मैं खुश था!मेरी कभी कोई सगी बहन नहीं थी। मेरी कई "मुंहबोली" बहनें थीं जो रक्षाबंधन के दिन मेरे लगभग दोनों हाथों को राखी से भर देती थीं और उनमें से एक को भी नहीं पता था कि, एक ऐसे भाई की बहन होने के नाते जो वास्तव में उनका भाई नहीं था। मुझे इस बात का अफ़सोस था कि मेरी ऐसी बहनें थीं जो मुझे अपना भाई बनाने में केवल अपना स्वार्थ रखती थीं। भगवान ने मेरी हालत को एक ऐसे भाई के रूप में देखा होगा जो सचमुच बहनों द्वारा लूट लिया गया था, जो कि बहन कहलाने के लायक नहीं थे, असली या अन्यथा .... और यहाँ था सबसे अनमोल भगवान उपहार मेरी उम्र, एक बहन जिसका एक मुस्कान और एक उड़ान चुंबन और मेरे कंधे पर एक हाथ कई लाख करोड़ रुपए, असीमित प्यार और बिना शर्त प्यार के लायक हो सकता है पर मुझे देने के लिए योजना बनाई थी, वह थी। पिछले रक्षाबंधन दिवस के दौरान जब उसने मेरे लिए पूजा की और जब उसने चावल के कुछ दानों के स्पर्श से अपनी पुरानी लेकिन बहुत मजबूत उंगलियों के साथ मेरे माथे पर टीके के निशान को छुआ और मुझे बर्फी का एक टुकड़ा खिलाया, तो मैं अभिभूत हो गया, मैं उनके आशीर्वाद और प्रार्थनाओं को अपने पूरे अस्तित्व में रिश्ता हुआ महसूस कर सकता था। हमने पूजा के बाद बहुत देर तक बात की और मैंने उसे 83 साल की उम्र में पाया, जिसमें अभी भी एक 23 साल की लड़की की आत्मा थी और अपने तरीके से जो किसी भी चीज़ की तुलना में विनम्रता से अधिक थी, उसने मुझे कहानी सुनाई अपने संघर्ष के दिनों में और कैसे उन्होंने एक गायिका और नर्तकी के रूप में अपने जुनून को एक पेशे में अपना, अपने बेटे, संजय और अपनी बेटी, बेला के लिए एक अच्छा जीवनयापन करने के लिए अपनाया। और क्या मैं इस महिला से प्रभावित था, जो निश्चित रूप से कोई साधारण महिला नहीं थी और यहां तक कि एक असाधारण महिला भी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी महिला थी जो सीधे अच्छे भगवान की कृपा और छाया में थी ...उस रक्षाबंधन दिवस को एक साल बीत चुका था और यह एक और रक्षाबंधन दिवस था, मैंने अपने पागल और अस्पष्ट कारणों के लिए डॉ टंडन के क्लिनिक में जाना बंद कर दिया था, भूरे रंग की महिला भी रुक गई थी और बीच में हल्का दिल का दौरा पड़ा था, दुनिया में और विशेष रूप से उसकी दुनिया में बहुत कुछ बदल गया था। उनके बेटे ने कुछ बड़ी समस्याओं को दूर किया था और "पद्मावत" जैसी बड़ी हिट थी और उनकी बेटी शेरविन की बेटी ने "मलाल" में एक अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की थी और भले ही फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। जावेद जाफरी के बेटे शर्मिन और मीज़ान, जिन्होंने फिल्म में अपनी शुरुआत की थी, दोनों की सराहना की गई थी और सभी की सराहना की गई थी ... ग्रे रंग की महिला ने मुझे इस रक्षाबंधन दिवस से एक सप्ताह पहले (अपने दूसरे भाई मदन प्रकाश के माध्यम से) फोन किया और मुझे 15 अगस्त को मुक्त होने के लिए कहा था, रक्षाबंधन पूजा के लिए वह प्रदर्शन करना चाहती थी, मैं हिल गया और मैं अगस्त की प्रतीक्षा करता रहा 15 कई अन्य कारणों से होने वाला है, स्वतंत्रता दिवस उनमें से एक है, लेकिन किसी भी चीज़ से अधिक मैंने उस महिला को ग्रे रंग में देखने का इंतजार किया जिसे मैंने एक साल में देखा था। मैं अभी-अभी 84 की धूसर रंग की महिला द्वारा की गई पूजा के बाद लौटा हूं और उसके बालों में सफेदी और भी शानदार हो गई है और उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ कई अन्य कहानियाँ बताती हैं जो केवल वह जानती है, यह वही पूजा थी। टीके का निशान और चावल के दाने और वह लगभग चीख पड़ी जब चावल का सिर्फ एक दाना मेरे माथे से फिसल गया और उसने सुनिश्चित किया कि चावल का दाना मेरे माथे पर वापस आ गया है। मैंने किसी भी प्रकार के अनुष्ठानों में जाना लगभग बंद कर दिया है और किसी अन्य स्थान पर पूजा की है, मुझे तब तक नहीं है जब तक मेरे पास ऐसे लोग हैं जो मुझे शुभकामनाएं देते हैं और मुझे अपनी प्रार्थनाओं में रखते हैं जिसके साथ वे मुझे आशीर्वाद देते हैं और निश्चित रूप से जब तक मैं एक बड़ी बहन के रूप में भगवान का यह उपहार और मेरे साथ उनका आशीर्वाद है।वे कहते हैं कि, एक आदमी या औरत चीजों और घटनाओं को भूल जाते हैं, लेकिन लीला, बड़ी बहन कुछ भी नहीं भूलती है और अगर वह करती भी है, तो उसका एक कार्यवाहक होता है जो वह सब कुछ याद रखता है जिसे वह भूल सकती है। जब हम बात कर रहे थे, तब लीला, मेरी बड़ी बहन को भी कुछ जानकारी मिली जैसे "मलाल" का "आइची शपथ" गाना हिट हो गया और उसने मेरे शाश्वत आनंद के लिए मेरे लिए पहली कुछ पंक्तियाँ भी गाईं। वह एक रिपोर्टर की तरह थी जो मुझे अपने बेटे, संजय के बारे में जानकारी दे रही थी कि वह अपनी अगली फिल्म "इंशाअल्लाह" पर बहुत मेहनत कर रहे हैं, जिसमें उसने मुझे बताया कि सलमान खान, संजय के साथ "हम दिल दे चुके सनम" के बाद काम कर रहे थे (भले ही उन्होंने एक "सांवरिया" में अतिथि भूमिका)। मिठाई से भरा एक डिब्बा मेरा इंतजार कर रहा था और मैंने दो स्वादिष्ट टुकड़े करके इसे सबसे अच्छा बनाया, भले ही मुझे कुछ भी मीठा नहीं खाना चाहिए था। लीला भंसाली के साथ यह मेरा सबसे यादगार रक्षाबंधन अनुभव था, एक बहन जिसे मैं अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकता हूं कि जब तक मैं जीवित हूं, हमेशा मेरे लिए भगवान का अनमोल उपहार रहेगा।बहन, लीला तेरी लीला गजब की है और मैं कितना खुशनसीब हूं कि तेरी लीला मेरी जिंदगी का अमूल्य हिस्सा बन चुकी है और बनी रहेगी, जब तक है जान।
पहली बार मैंने उसे एक फिजियोथेरेपी क्लिनिक में देखा था, जो उपनगरों में सर्वश्रेष्ठ में से एक है बहु-प्रतिभाशाली डॉक्टर इंदु टंडन द्वारा संचालित, जो मदन प्रकाश की बेटी हैं, जो सबसे अधिक में से एक हैं। मैं उद्योग में विनम्र और सौम्य तकनीशियनों को जानता हूं, एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष हिंदी फिल्मों की दुनिया को दिए हैं। वह उन सभी लोगों के बीच एक आकर्षक और लगभग देवदूत दिखने वाली आकृति थी, जिनका विभिन्न प्रकार की बीमारियों और गंभीर दुर्घटनाओं, टूटी हड्डियों और परिणामी अवसाद के परिणामों के लिए इलाज चल रहा था, उनमें से अधिकांश युवा थे। उसकी पीठ में कुछ समस्या थी और यह आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि मुझे एहसास हुआ कि वह अब अपने शुरुआती अस्सी के दशक में थी। दर्द और अन्य प्रकार के दुखों के कारण वह जिस दर्द से गुजर रही थी, उसके बावजूद उसके चेहरे पर लगातार मुस्कान थी। उसके भूरे बाल शानदार लग रहे थे, उसके कार्यवाहक द्वारा पूर्णता के साथ कंघी की गई, जिसे कभी महाराष्ट्र के एक गाँव का मुखिया कहा जाता था और जो स्थानीय नृत्य और संगीत के विशेषज्ञ थे और मुझे अभी यह कहना होगा कि उसकी कुछ धुनें और मराठी गीतों ने कुछ बहुत लोकप्रिय गीतों का आधार भी बनाया है। वह ग्रे के शुक्रवार, शनिवार और रविवार की महिला की तरह थे और पूरे प्यार और सम्मान के साथ ग्रे महिला की देखभाल करती थी। मैं अपने टूटे पैर के लिए फिजियोथेरेपी के एक सत्र से गुजर रहा था और कुछ व्यायाम जो मुझे करने के लिए किए गए थे, वे बहुत दर्दनाक थे, लेकिन इस महिला में कुछ जादू था जिसने मुझे उसकी ओर देखा और अपना दर्द भूल गया।श्री मदन प्रकाश ने उनसे मेरा परिचय कराया और हमने एक त्वरित और सहज बातचीत शुरू की, जिससे एक बहुत ही मधुर संबंध बन गया जो डॉ. टंडन के क्लिनिक में अभ्यास के दिन के साथ ही मजबूत होता गया। वह तिरासी वर्ष की थीं और मुझे उनकी युवावस्था के सबसे अच्छे वर्षों को याद करने के दुख, अफसोस और दर्द के बारे में कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। मैंने उसे अपनी "गर्लफ्रेंड" कहने के बाद ही वो खुश दिखी और वो शायद नहीं जानती थी कि डॉ. टंडन के क्लिनिक में हम एक साथ कम समय में मुझे कितनी खुशी दे रहे थे। हर शाम, वह क्लिनिक में सभी के लिए गर्म चाय से भरे अपने फ्लास्क और कुछ स्नैक्स लेकर आती थी और जब उसे चाय के लिए मेरी कमजोरी का पता चला, तो उसने सुनिश्चित किया कि मेरे पास गर्म चाय के कम से कम दो बड़े मग हों। बहुत बाद में मुझे बताया गया कि वह लीला थी, संजय लीला भंसाली के नाम पर लीला, हमारे सबसे महान फिल्म निर्माताओं में से एक और जिसने उन्हें, उनकी मां को प्रेरणा के प्रमुख स्रोत के रूप में लिया था और यही कारण था कि क्यों उन्होंने अपने पिता का नाम अपने मध्य नाम के रूप में नहीं लिया था, बल्कि अपनी मां के नाम के रूप में लिया था और इसी तरह उन्हें अपना नाम संजय लीला भंसाली मिला, जो अब भारतीय सिनेमा में अच्छा, महान और गौरवशाली नाम का पर्याय बन गया है। वह तिरासी वर्ष की थी और चौरासी वर्ष की हो रही थी जब उसे लगा कि, मैं उसे अपनी "प्रेमिका" कहना बहुत तुच्छ है और उसने मुझे एक बड़ा आश्चर्य तब दिया जब उसने मुझे मदन प्रकाश के कमरे में आमंत्रित किया जो उसके स्वीकृत भाईयों में से एक था और अब उसने मुझसे अनुमति मांगी कि क्या वह मुझे अपना भाई बना सकती है, और क्या मैं खुश था!मेरी कभी कोई सगी बहन नहीं थी। मेरी कई "मुंहबोली" बहनें थीं जो रक्षाबंधन के दिन मेरे लगभग दोनों हाथों को राखी से भर देती थीं और उनमें से एक को भी नहीं पता था कि, एक ऐसे भाई की बहन होने के नाते जो वास्तव में उनका भाई नहीं था। मुझे इस बात का अफ़सोस था कि मेरी ऐसी बहनें थीं जो मुझे अपना भाई बनाने में केवल अपना स्वार्थ रखती थीं। भगवान ने मेरी हालत को एक ऐसे भाई के रूप में देखा होगा जो सचमुच बहनों द्वारा लूट लिया गया था, जो कि बहन कहलाने के लायक नहीं थे, असली या अन्यथा .... और यहाँ था सबसे अनमोल भगवान उपहार मेरी उम्र, एक बहन जिसका एक मुस्कान और एक उड़ान चुंबन और मेरे कंधे पर एक हाथ कई लाख करोड़ रुपए, असीमित प्यार और बिना शर्त प्यार के लायक हो सकता है पर मुझे देने के लिए योजना बनाई थी, वह थी। पिछले रक्षाबंधन दिवस के दौरान जब उसने मेरे लिए पूजा की और जब उसने चावल के कुछ दानों के स्पर्श से अपनी पुरानी लेकिन बहुत मजबूत उंगलियों के साथ मेरे माथे पर टीके के निशान को छुआ और मुझे बर्फी का एक टुकड़ा खिलाया, तो मैं अभिभूत हो गया, मैं उनके आशीर्वाद और प्रार्थनाओं को अपने पूरे अस्तित्व में रिश्ता हुआ महसूस कर सकता था। हमने पूजा के बाद बहुत देर तक बात की और मैंने उसे तिरासी साल की उम्र में पाया, जिसमें अभी भी एक तेईस साल की लड़की की आत्मा थी और अपने तरीके से जो किसी भी चीज़ की तुलना में विनम्रता से अधिक थी, उसने मुझे कहानी सुनाई अपने संघर्ष के दिनों में और कैसे उन्होंने एक गायिका और नर्तकी के रूप में अपने जुनून को एक पेशे में अपना, अपने बेटे, संजय और अपनी बेटी, बेला के लिए एक अच्छा जीवनयापन करने के लिए अपनाया। और क्या मैं इस महिला से प्रभावित था, जो निश्चित रूप से कोई साधारण महिला नहीं थी और यहां तक कि एक असाधारण महिला भी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी महिला थी जो सीधे अच्छे भगवान की कृपा और छाया में थी ...उस रक्षाबंधन दिवस को एक साल बीत चुका था और यह एक और रक्षाबंधन दिवस था, मैंने अपने पागल और अस्पष्ट कारणों के लिए डॉ टंडन के क्लिनिक में जाना बंद कर दिया था, भूरे रंग की महिला भी रुक गई थी और बीच में हल्का दिल का दौरा पड़ा था, दुनिया में और विशेष रूप से उसकी दुनिया में बहुत कुछ बदल गया था। उनके बेटे ने कुछ बड़ी समस्याओं को दूर किया था और "पद्मावत" जैसी बड़ी हिट थी और उनकी बेटी शेरविन की बेटी ने "मलाल" में एक अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की थी और भले ही फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। जावेद जाफरी के बेटे शर्मिन और मीज़ान, जिन्होंने फिल्म में अपनी शुरुआत की थी, दोनों की सराहना की गई थी और सभी की सराहना की गई थी ... ग्रे रंग की महिला ने मुझे इस रक्षाबंधन दिवस से एक सप्ताह पहले फोन किया और मुझे पंद्रह अगस्त को मुक्त होने के लिए कहा था, रक्षाबंधन पूजा के लिए वह प्रदर्शन करना चाहती थी, मैं हिल गया और मैं अगस्त की प्रतीक्षा करता रहा पंद्रह कई अन्य कारणों से होने वाला है, स्वतंत्रता दिवस उनमें से एक है, लेकिन किसी भी चीज़ से अधिक मैंने उस महिला को ग्रे रंग में देखने का इंतजार किया जिसे मैंने एक साल में देखा था। मैं अभी-अभी चौरासी की धूसर रंग की महिला द्वारा की गई पूजा के बाद लौटा हूं और उसके बालों में सफेदी और भी शानदार हो गई है और उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ कई अन्य कहानियाँ बताती हैं जो केवल वह जानती है, यह वही पूजा थी। टीके का निशान और चावल के दाने और वह लगभग चीख पड़ी जब चावल का सिर्फ एक दाना मेरे माथे से फिसल गया और उसने सुनिश्चित किया कि चावल का दाना मेरे माथे पर वापस आ गया है। मैंने किसी भी प्रकार के अनुष्ठानों में जाना लगभग बंद कर दिया है और किसी अन्य स्थान पर पूजा की है, मुझे तब तक नहीं है जब तक मेरे पास ऐसे लोग हैं जो मुझे शुभकामनाएं देते हैं और मुझे अपनी प्रार्थनाओं में रखते हैं जिसके साथ वे मुझे आशीर्वाद देते हैं और निश्चित रूप से जब तक मैं एक बड़ी बहन के रूप में भगवान का यह उपहार और मेरे साथ उनका आशीर्वाद है।वे कहते हैं कि, एक आदमी या औरत चीजों और घटनाओं को भूल जाते हैं, लेकिन लीला, बड़ी बहन कुछ भी नहीं भूलती है और अगर वह करती भी है, तो उसका एक कार्यवाहक होता है जो वह सब कुछ याद रखता है जिसे वह भूल सकती है। जब हम बात कर रहे थे, तब लीला, मेरी बड़ी बहन को भी कुछ जानकारी मिली जैसे "मलाल" का "आइची शपथ" गाना हिट हो गया और उसने मेरे शाश्वत आनंद के लिए मेरे लिए पहली कुछ पंक्तियाँ भी गाईं। वह एक रिपोर्टर की तरह थी जो मुझे अपने बेटे, संजय के बारे में जानकारी दे रही थी कि वह अपनी अगली फिल्म "इंशाअल्लाह" पर बहुत मेहनत कर रहे हैं, जिसमें उसने मुझे बताया कि सलमान खान, संजय के साथ "हम दिल दे चुके सनम" के बाद काम कर रहे थे । मिठाई से भरा एक डिब्बा मेरा इंतजार कर रहा था और मैंने दो स्वादिष्ट टुकड़े करके इसे सबसे अच्छा बनाया, भले ही मुझे कुछ भी मीठा नहीं खाना चाहिए था। लीला भंसाली के साथ यह मेरा सबसे यादगार रक्षाबंधन अनुभव था, एक बहन जिसे मैं अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकता हूं कि जब तक मैं जीवित हूं, हमेशा मेरे लिए भगवान का अनमोल उपहार रहेगा।बहन, लीला तेरी लीला गजब की है और मैं कितना खुशनसीब हूं कि तेरी लीला मेरी जिंदगी का अमूल्य हिस्सा बन चुकी है और बनी रहेगी, जब तक है जान।
संघीय मधेशी मोर्चा द्वारा कपिलवस्तु के तौलिहवा में १० गते को प्रधानमन्त्री तथा गृहमन्त्री का शव यात्रा सहित पुतला दहन किया गया है । खसबादी समुदाय द्वारा मधेशी हक अधिकार से वन्चित हैं इस नारा के साथ पुतला दहन किया गया है । मोर्चा में आवद्ध दल के नेता कार्यकर्ताओं ने प्रधानमन्त्री तथा गृहमन्त्री को मृत घोषित कर उनकी शबवयात्रा निकाली गई । तौलिहवा बाजार परिक्रमा करते हुए भगवानदास गुप्ता के शालिक के नजदीक पुतला दहन किया गया । शव यात्रा के बाद कोण सभ को सम्बोधित करते हुए लाई संघीय सद्भावना पार्टी के जिला अध्यक्ष तथा मोर्चा के अगुवा कलिपद शर्मा ( जनसन )ने कहा हम मधेशीयों के अधिकार को नेपाली काग्रेंस, नेकाप एमाले, एमाओबादीेयों ने कभी देना नहीं चाहा है । और मधेशी को सदा अवहेलत किया गया है । जिसके कारण उनका पुतला दहन किया जा रहा है । इस शव यात्रा कार्यक्रम में मधेशीयों की सहभागिता थी । मोर्चा ने कहा जब तक हमारी माँगों को सम्बोधित नहीं किया जाएगा या आन्दोलन जारी रहेगा ।
संघीय मधेशी मोर्चा द्वारा कपिलवस्तु के तौलिहवा में दस गते को प्रधानमन्त्री तथा गृहमन्त्री का शव यात्रा सहित पुतला दहन किया गया है । खसबादी समुदाय द्वारा मधेशी हक अधिकार से वन्चित हैं इस नारा के साथ पुतला दहन किया गया है । मोर्चा में आवद्ध दल के नेता कार्यकर्ताओं ने प्रधानमन्त्री तथा गृहमन्त्री को मृत घोषित कर उनकी शबवयात्रा निकाली गई । तौलिहवा बाजार परिक्रमा करते हुए भगवानदास गुप्ता के शालिक के नजदीक पुतला दहन किया गया । शव यात्रा के बाद कोण सभ को सम्बोधित करते हुए लाई संघीय सद्भावना पार्टी के जिला अध्यक्ष तथा मोर्चा के अगुवा कलिपद शर्मा ने कहा हम मधेशीयों के अधिकार को नेपाली काग्रेंस, नेकाप एमाले, एमाओबादीेयों ने कभी देना नहीं चाहा है । और मधेशी को सदा अवहेलत किया गया है । जिसके कारण उनका पुतला दहन किया जा रहा है । इस शव यात्रा कार्यक्रम में मधेशीयों की सहभागिता थी । मोर्चा ने कहा जब तक हमारी माँगों को सम्बोधित नहीं किया जाएगा या आन्दोलन जारी रहेगा ।
नई दिल्लीः पोषक तत्वों की कमी से शरीर का हार्मोनिक संतुलन बिगड़ जाता है। जिसके कारण बालों का झडना आम हो गया है। है। जो हर एक दूसरे व्यक्ति में पाई जाती है। बालों का झडना भी काफी गंभीर समस्या है जिसका मुख्य कारण पोषक तत्वों की कमी हो सकता है। पोषक तत्वो की कमी संतुलित आहार न खाने की वजह से होता है। अगर आप भी इस समस्या से परेशान है तो आपके लिए योगा काफी फायदेमंद हो सकता है। बाल झड़ने का मुख्य कारण हार्मोंस के असंतुलन होने के कारण होता है। जिसके कारण बाल अधिक मात्रा में गिरने लगते है। अगर आप भी हेयर फाल से परेशान है, तो हम आपको एक ऐसा आयुर्वेदिक तेल बता रहे है। जिससे सिर्फ 2 सप्ताह में हेयर फाल तो बंद हो ही जाएंगा। इसके साथ ही लंबे और घने बाल भी हो जाएंगे। जानिए इस घरेलू उपाय के बारें में। - सबसे पहले एक पैन लें और उसमें नारियल तेल डाल गर्म करें। इसके बाद इसमें करी पत्ता और प्याज डालकर कम से कम 5 मिनट पकाएं। - 5 मिनट बाद इसमें तिल, मेथी, प्याज के बीज डालें और 10 मिनट से ज्यादा पकने दें। बीच-बीच में मिलात रहें। - इसके बाद शइमें आंवला पाउडर और भृंगराज पाउडर अच्छी तरह मिलाएं और कम से कम 15 मिनट पकने दें। ये भी पढ़ेंः
नई दिल्लीः पोषक तत्वों की कमी से शरीर का हार्मोनिक संतुलन बिगड़ जाता है। जिसके कारण बालों का झडना आम हो गया है। है। जो हर एक दूसरे व्यक्ति में पाई जाती है। बालों का झडना भी काफी गंभीर समस्या है जिसका मुख्य कारण पोषक तत्वों की कमी हो सकता है। पोषक तत्वो की कमी संतुलित आहार न खाने की वजह से होता है। अगर आप भी इस समस्या से परेशान है तो आपके लिए योगा काफी फायदेमंद हो सकता है। बाल झड़ने का मुख्य कारण हार्मोंस के असंतुलन होने के कारण होता है। जिसके कारण बाल अधिक मात्रा में गिरने लगते है। अगर आप भी हेयर फाल से परेशान है, तो हम आपको एक ऐसा आयुर्वेदिक तेल बता रहे है। जिससे सिर्फ दो सप्ताह में हेयर फाल तो बंद हो ही जाएंगा। इसके साथ ही लंबे और घने बाल भी हो जाएंगे। जानिए इस घरेलू उपाय के बारें में। - सबसे पहले एक पैन लें और उसमें नारियल तेल डाल गर्म करें। इसके बाद इसमें करी पत्ता और प्याज डालकर कम से कम पाँच मिनट पकाएं। - पाँच मिनट बाद इसमें तिल, मेथी, प्याज के बीज डालें और दस मिनट से ज्यादा पकने दें। बीच-बीच में मिलात रहें। - इसके बाद शइमें आंवला पाउडर और भृंगराज पाउडर अच्छी तरह मिलाएं और कम से कम पंद्रह मिनट पकने दें। ये भी पढ़ेंः
परमदानव तारे वी॰वाए॰ कैनिस मेजौरिस का अर्धव्यास (रेडियस) क़रीब २००० \beginsmallmatrixR_\odot\endsmallmatrix है, यानि सूरज का दो हज़ार गुना - यह सब से बड़ा ज्ञात तारा है तारों की श्रेणियाँ दिखने वाला हर्ट्ज़स्प्रुंग-रसल चित्र परमदानव तारा एक अत्याधिक द्रव्यमान (मास) और चमक वाला तारा होता है जिस से लगातार गैस, प्लाज़्मा और अन्य द्रव्य बड़ी मात्राओं में अंतरिक्ष में उछलते रहते हैं। यर्कीज़ वर्णक्रम श्रेणीकरण में इसकी चमक की श्रेणी "0" है (यानि सारे तारों में सब से अधिक)। . 5 संबंधोंः तारों की श्रेणियाँ, दानव तारा, महादानव तारा, वी वाई महाश्वान, G श्रेणी का मुख्य-अनुक्रम तारा। अभिजीत (वेगा) एक A श्रेणी का तारा है जो सफ़ेद या सफ़ेद-नीले लगते हैं - उसके दाएँ पर हमारा सूरज है जो G श्रेणी का पीला या पीला-नारंगी लगने वाला तारा है खगोलशास्त्र में तारों की श्रेणियाँ उनसे आने वाली रोशनी के वर्णक्रम (स्पॅकट्रम) के आधार पर किया जाता है। इस वर्णक्रम से यह ज़ाहिर हो जाता है कि तारे का तापमान क्या है और उसके अन्दर कौन से रासायनिक तत्व मौजूद हैं। अधिकतर तारों कि वर्णक्रम पर आधारित श्रेणियों को अंग्रेज़ी के O, B, A, F, G, K और M अक्षर नाम के रूप में दिए गए हैं-. एक लाल दानव तारे और सूरज के अंदरूनी ढाँचे की तुलना खगोलशास्त्र में दानव तारा ऐसे तारे को बोलते हैं जिसका आकार और चमक दोनों उस से बढ़ के हो जो उसकी सतह के तापमान के आधार पर मुख्य अनुक्रम के किसी तारे के होते। ऐसे तारे आम तौर पर सूरज से १० से १०० गुना व्यास (डायामीटर) में बड़े होते हैं और चमक में १० से १००० गुना ज़्यादा रोशन होते हैं। अपने तापमान के हिसाब से ऐसे दानव तारे कई रंगों में मिलते हैं - लाल, नारंगी, नीले, सफ़ेद, वग़ैराह। महादानव तारे और परमदानव तारे इन दानव तारों से भी बड़े और अधिक रोशन होते हैं। . लाल महादानव तारे मू सिफ़ई के आगे सूरज नन्हा लगता है - मू सिफ़ई का अर्धव्यास (रेडियस) सूरज का १,६५० गुना है तारों की श्रेणियाँ दिखने वाला हर्ट्ज़स्प्रुंग-रसल चित्र महादानव तारा एक अत्याधिक द्रव्यमान (मास) और चमक वाला तारा होता है। यर्कीज़ वर्णक्रम श्रेणीकरण में इसकी चमक की श्रेणी "Ia" (बहुत चमकीले महादानव) और "Ib" (कम चमकीले महादानव) है। इनसे बड़े तारे ब्रह्माण्ड में मुट्ठी-भर ही हैं और वे परमदानव तारे कहलाते हैं। . वी वाई महाश्वान हमारे सूरज से लगभग दो हज़ार गुना बड़ा है वी वाई महाश्वान (बायर नामः VY CMa) महाश्वान तारामंडल में स्थित एक लाल परमदानव तारा जो पूरे पूरे ब्रह्माण्ड में अब तक सब से बड़ा मिला तारा है। इसका व्यास (डायामीटर) १८०० से २१०० सौर व्यास के बराबर है, यानी हमारे सूरज के व्यास से लगभग दो हज़ार गुना। वी वाई महाश्वान पृथ्वी से ४,९०० प्रकाश-वर्ष की दूरी पर है। यह तारा इतना बड़ा है के अगर पृथ्वी के सौर मंडल से सूरज हटाकर इसे रख दिया जाए तो शनि की कक्षा तक की जगह इसी तारे के अन्दर हो जाए। . श्रेणी का मुख्य अनुक्रम तारा है G श्रेणी का मुख्य-अनुक्रम तारा (G-type main-sequence star या G.V), जिसे पीला बौना या G बौना भी कहा जाता है, ऐसे मुख्य अनुक्रम तारे को बोलते हैं जिसकी वर्णक्रम श्रेणी G हो और जिसकी (तापमान और चमक पर आधारित) यर्कीज़ श्रेणी V हो। इन तारों का द्रव्यमान (मास) सूरज के द्रव्यमान का ०.८ से १.२ गुना और इनका सतही तापमान ५,३०० कैल्विन से ६,००० कैल्विन के बीच होता है।, G. M. H. J. Habets and J. R. W. Heintze, Astronomy and Astrophysics Supplement 46 (November 1981), pp.
परमदानव तारे वी॰वाए॰ कैनिस मेजौरिस का अर्धव्यास क़रीब दो हज़ार \beginsmallmatrixR_\odot\endsmallmatrix है, यानि सूरज का दो हज़ार गुना - यह सब से बड़ा ज्ञात तारा है तारों की श्रेणियाँ दिखने वाला हर्ट्ज़स्प्रुंग-रसल चित्र परमदानव तारा एक अत्याधिक द्रव्यमान और चमक वाला तारा होता है जिस से लगातार गैस, प्लाज़्मा और अन्य द्रव्य बड़ी मात्राओं में अंतरिक्ष में उछलते रहते हैं। यर्कीज़ वर्णक्रम श्रेणीकरण में इसकी चमक की श्रेणी "शून्य" है । . पाँच संबंधोंः तारों की श्रेणियाँ, दानव तारा, महादानव तारा, वी वाई महाश्वान, G श्रेणी का मुख्य-अनुक्रम तारा। अभिजीत एक A श्रेणी का तारा है जो सफ़ेद या सफ़ेद-नीले लगते हैं - उसके दाएँ पर हमारा सूरज है जो G श्रेणी का पीला या पीला-नारंगी लगने वाला तारा है खगोलशास्त्र में तारों की श्रेणियाँ उनसे आने वाली रोशनी के वर्णक्रम के आधार पर किया जाता है। इस वर्णक्रम से यह ज़ाहिर हो जाता है कि तारे का तापमान क्या है और उसके अन्दर कौन से रासायनिक तत्व मौजूद हैं। अधिकतर तारों कि वर्णक्रम पर आधारित श्रेणियों को अंग्रेज़ी के O, B, A, F, G, K और M अक्षर नाम के रूप में दिए गए हैं-. एक लाल दानव तारे और सूरज के अंदरूनी ढाँचे की तुलना खगोलशास्त्र में दानव तारा ऐसे तारे को बोलते हैं जिसका आकार और चमक दोनों उस से बढ़ के हो जो उसकी सतह के तापमान के आधार पर मुख्य अनुक्रम के किसी तारे के होते। ऐसे तारे आम तौर पर सूरज से दस से एक सौ गुना व्यास में बड़े होते हैं और चमक में दस से एक हज़ार गुना ज़्यादा रोशन होते हैं। अपने तापमान के हिसाब से ऐसे दानव तारे कई रंगों में मिलते हैं - लाल, नारंगी, नीले, सफ़ेद, वग़ैराह। महादानव तारे और परमदानव तारे इन दानव तारों से भी बड़े और अधिक रोशन होते हैं। . लाल महादानव तारे मू सिफ़ई के आगे सूरज नन्हा लगता है - मू सिफ़ई का अर्धव्यास सूरज का एक,छः सौ पचास गुना है तारों की श्रेणियाँ दिखने वाला हर्ट्ज़स्प्रुंग-रसल चित्र महादानव तारा एक अत्याधिक द्रव्यमान और चमक वाला तारा होता है। यर्कीज़ वर्णक्रम श्रेणीकरण में इसकी चमक की श्रेणी "Ia" और "Ib" है। इनसे बड़े तारे ब्रह्माण्ड में मुट्ठी-भर ही हैं और वे परमदानव तारे कहलाते हैं। . वी वाई महाश्वान हमारे सूरज से लगभग दो हज़ार गुना बड़ा है वी वाई महाश्वान महाश्वान तारामंडल में स्थित एक लाल परमदानव तारा जो पूरे पूरे ब्रह्माण्ड में अब तक सब से बड़ा मिला तारा है। इसका व्यास एक हज़ार आठ सौ से दो हज़ार एक सौ सौर व्यास के बराबर है, यानी हमारे सूरज के व्यास से लगभग दो हज़ार गुना। वी वाई महाश्वान पृथ्वी से चार,नौ सौ प्रकाश-वर्ष की दूरी पर है। यह तारा इतना बड़ा है के अगर पृथ्वी के सौर मंडल से सूरज हटाकर इसे रख दिया जाए तो शनि की कक्षा तक की जगह इसी तारे के अन्दर हो जाए। . श्रेणी का मुख्य अनुक्रम तारा है G श्रेणी का मुख्य-अनुक्रम तारा , जिसे पीला बौना या G बौना भी कहा जाता है, ऐसे मुख्य अनुक्रम तारे को बोलते हैं जिसकी वर्णक्रम श्रेणी G हो और जिसकी यर्कीज़ श्रेणी V हो। इन तारों का द्रव्यमान सूरज के द्रव्यमान का शून्य.आठ से एक.दो गुना और इनका सतही तापमान पाँच,तीन सौ कैल्विन से छः,शून्य कैल्विन के बीच होता है।, G. M. H. J. Habets and J. R. W. Heintze, Astronomy and Astrophysics Supplement छियालीस , pp.
झारखंड में पुरवैया चलने लगी है. मौसम में उतार-चढ़ाव जारी है. दो दिन में रांची का तापमान 6. 7 डिग्री तक घट गया. राजधानी का न्यूनतम और उच्चतम तापमान सामान्य से कम बना हुआ है. रांची का न्यूनतम तापमान गुरुवार को 11. 6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 1. 4 डिग्री कम है. वहीं अधिकतम तापमान 26. 3 डिग्री हो गया, जो सामान्य से 1. 1 डिग्री कम है. तेज हवाओं ने झारखंड में ठंड बढ़ा दी है. तीन जिलों का न्यूनतम तापमान 10 डिग्री से नीचे चला गया है. झारखंड में तेज हवाओं की वजह से ठंड बढ़ गयी है. राज्य के तीन जिलों में तापमान 10 डिग्री से नीचे पहुंच गया है. रांची का न्यूनतम तापमान 11. 6 डिग्री है. जमशेदपुर, डालटेनगंज, बोकारो, चाईबासा में भी न्यूनतम तापमान सामान्य से कम हो गया है. चाईबासा का न्यूनतम तापमान तो सामान्य से 4. 3 डिग्री तक घट गया है. यहां न्यूनतम तापमान 11. 6 डिग्री दर्ज किया गया, जबकि उच्चतम तापमान 31 डिग्री रहा, जो सामान्य से 1. 7 डिग्री अधिक है. जमशेदपुर के उच्चतम तापमान में 0. 4 डिग्री की वृद्धि दर्ज की गयी. इसके साथ ही यहां का अधिकतम तापमान 29. 2 डिग्री सेल्सियस हो गया, जो सामान्य से1. 2 डिग्री कम है. यहां का न्यूनतम तापमान 13. 4 डिग्री रहा, जो सामान्य से 0. 4 डिग्री कम है. पलामू के जिला मुख्यालय डाल्टेनगंज का अधिकतम तापमान आज 0. 4 डिग्री बढ़कर 28. 8 डिग्री सेंटीग्रेड हो गया, जो सामान्य से 0. 8 डिग्री सेल्सियस कम है. यहां का न्यूनतम तापमान 0. 6 डिग्री चढ़कर 10. 5 डिग्री हो गया, जो सामान्य से 1. 7 डिग्री सेंटीग्रेड कम है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के रांची स्थित मौसम केंद्र के प्रमुख अभिषेक आनंद ने बताया कि संताल परगना और कोल्हान में 17, 18 और 19 फरवरी को आसमान में बादल छाये रहेंगे. बाकी जिलों का मौसम शुष्क बने रहने का अनुमान है. साथ ही बताया कि अगले 4-5 दिनों में न्यूनतम तापमान में 4 से 5 डिग्री की वृद्धि दर्ज की जायेगी. राजधानी रांची में 18 फरवरी को न्यूनतम तापमान 16 डिग्री पहुंच जाने का अनुमान है, जबकि 19 और 20 फरवरी को अधिकतम तापमान 31 डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है. इस दौरान मौसम पूरी तरह से शुष्क रहेगा. बता दें कि 13 फरवरी को रांची का तमापन 4. 4 डिग्री गिर गया था, जबकि जमशेदपुर और डालटेनगंज के तापमान में क्रमशः 3. 4 डिग्री की गिरावट दर्ज की गयी थी. मंगलवार यानी 14 फरवरी को रांची का तापमान 2. 3 डिग्री गिर गया था. डालटेनगंज का तापमान 2. 5 डिग्री गिरा, जबकि लौहनगरी जमशेदपुर के तापमान में 0. 4 डिग्री की बढ़ोतरी हुई. पिछले 24 घंटे के दौरान देवघर, गिरिडीह, गढ़वा, रामगढ़ और सिमडेगा का अधिकतम तापमान क्रमशः 26. 6 डिग्री, 24. 6 डिग्री, 26. 5 डिग्री, 26. 1 डिग्री और 29 डिग्री दर्ज किया गया, जबकि इन जिलों का न्यूनतम तापमान क्रमशः 11. 3 डिग्री, 10. 5 डिग्री, 7. 9 डिग्री, 7. 7 डिग्री और 7. 5 डिग्री दर्ज किया गया.
झारखंड में पुरवैया चलने लगी है. मौसम में उतार-चढ़ाव जारी है. दो दिन में रांची का तापमान छः. सात डिग्री तक घट गया. राजधानी का न्यूनतम और उच्चतम तापमान सामान्य से कम बना हुआ है. रांची का न्यूनतम तापमान गुरुवार को ग्यारह. छः डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से एक. चार डिग्री कम है. वहीं अधिकतम तापमान छब्बीस. तीन डिग्री हो गया, जो सामान्य से एक. एक डिग्री कम है. तेज हवाओं ने झारखंड में ठंड बढ़ा दी है. तीन जिलों का न्यूनतम तापमान दस डिग्री से नीचे चला गया है. झारखंड में तेज हवाओं की वजह से ठंड बढ़ गयी है. राज्य के तीन जिलों में तापमान दस डिग्री से नीचे पहुंच गया है. रांची का न्यूनतम तापमान ग्यारह. छः डिग्री है. जमशेदपुर, डालटेनगंज, बोकारो, चाईबासा में भी न्यूनतम तापमान सामान्य से कम हो गया है. चाईबासा का न्यूनतम तापमान तो सामान्य से चार. तीन डिग्री तक घट गया है. यहां न्यूनतम तापमान ग्यारह. छः डिग्री दर्ज किया गया, जबकि उच्चतम तापमान इकतीस डिग्री रहा, जो सामान्य से एक. सात डिग्री अधिक है. जमशेदपुर के उच्चतम तापमान में शून्य. चार डिग्री की वृद्धि दर्ज की गयी. इसके साथ ही यहां का अधिकतम तापमान उनतीस. दो डिग्री सेल्सियस हो गया, जो सामान्य सेएक. दो डिग्री कम है. यहां का न्यूनतम तापमान तेरह. चार डिग्री रहा, जो सामान्य से शून्य. चार डिग्री कम है. पलामू के जिला मुख्यालय डाल्टेनगंज का अधिकतम तापमान आज शून्य. चार डिग्री बढ़कर अट्ठाईस. आठ डिग्री सेंटीग्रेड हो गया, जो सामान्य से शून्य. आठ डिग्री सेल्सियस कम है. यहां का न्यूनतम तापमान शून्य. छः डिग्री चढ़कर दस. पाँच डिग्री हो गया, जो सामान्य से एक. सात डिग्री सेंटीग्रेड कम है. भारत मौसम विज्ञान विभाग के रांची स्थित मौसम केंद्र के प्रमुख अभिषेक आनंद ने बताया कि संताल परगना और कोल्हान में सत्रह, अट्ठारह और उन्नीस फरवरी को आसमान में बादल छाये रहेंगे. बाकी जिलों का मौसम शुष्क बने रहने का अनुमान है. साथ ही बताया कि अगले चार-पाँच दिनों में न्यूनतम तापमान में चार से पाँच डिग्री की वृद्धि दर्ज की जायेगी. राजधानी रांची में अट्ठारह फरवरी को न्यूनतम तापमान सोलह डिग्री पहुंच जाने का अनुमान है, जबकि उन्नीस और बीस फरवरी को अधिकतम तापमान इकतीस डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है. इस दौरान मौसम पूरी तरह से शुष्क रहेगा. बता दें कि तेरह फरवरी को रांची का तमापन चार. चार डिग्री गिर गया था, जबकि जमशेदपुर और डालटेनगंज के तापमान में क्रमशः तीन. चार डिग्री की गिरावट दर्ज की गयी थी. मंगलवार यानी चौदह फरवरी को रांची का तापमान दो. तीन डिग्री गिर गया था. डालटेनगंज का तापमान दो. पाँच डिग्री गिरा, जबकि लौहनगरी जमशेदपुर के तापमान में शून्य. चार डिग्री की बढ़ोतरी हुई. पिछले चौबीस घंटाटे के दौरान देवघर, गिरिडीह, गढ़वा, रामगढ़ और सिमडेगा का अधिकतम तापमान क्रमशः छब्बीस. छः डिग्री, चौबीस. छः डिग्री, छब्बीस. पाँच डिग्री, छब्बीस. एक डिग्री और उनतीस डिग्री दर्ज किया गया, जबकि इन जिलों का न्यूनतम तापमान क्रमशः ग्यारह. तीन डिग्री, दस. पाँच डिग्री, सात. नौ डिग्री, सात. सात डिग्री और सात. पाँच डिग्री दर्ज किया गया.
स्वस्थ लोग कोरोना संक्रमित लोगों के संपर्क में न आएं, इसके लिए भारत सरकार की तरफ से भी कुछ तकनीकी स्तर पर इंतजाम किए जा गए हैं। सबसे पहले तो संक्रमित लोगों की तादाद जिन स्थान पर ज्यादा है, उन जगहों को सील किया जा रहा है और उन सभी संक्रमित लोगों की लोकेशन हिस्ट्री निकाल कर उनका भी चेकअप किया जा रहा है। लेकिन समस्या इस बात की भी है कि जिन लोगों की कोई ट्रैवल हिस्ट्री नहीं रही है और जो लोग संक्रमित लोगों के संपर्क में नहीं आए हैं, उनका पता कैसे लगाया जाए। इसलिए इस बात की जानकारी रखने के लिए और लोगों को सतर्क करने के लिए सरकार की ओर से आरोग्य सेतु ऐप बनाया गया है। सबसे पहली महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आरोग्य सेतु ऐप सभी लोगों की मदद करेगा। इसमें कई ऐसे फंक्शंस दिए हुए हैं, जिसके जरिए आपको पता चल सकता है कि आपके आसपास कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति तो नहीं है, क्योंकि इस ऐप में उन सभी लोगों का डाटा एकत्र किया जाता है, जो लोग कोरोना वायरस से पीड़ित हैं। इस ऐप को डाउनलोड करने के लिए प्ले स्टोर पर जाएं। इसके बाद इंस्टॉल करने पर यह ऐप्स खुल जाएगी तो इसमें सबसे पहले अपना मोबाइल नंबर डालकर रजिस्ट्रेशन कर ले। तमाम जानकारी देने के बाद आपको कोरोना वायरस के लक्षण के बारे में पूछा जाएगा। उसके बाद आपकी ट्रैवल हिस्ट्री के बारे में पूछा जाएगा और फिर यह आपके बारे में सही जानकारी बता देगा कि आप कोरोना पीड़ित हो सकते हैं या नहीं। साथ ही यह ऐप आपको यह भी बताएगी कि आप कोरोना पीड़ित व्यक्ति के आसपास हैं या नहीं। अधिकतर लोगों को यह पता नहीं होता है कि आसपास कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति है या नहीं। ऐसे में आरोग्य सेतु ऐप से जरिए यह आसानी से पता लगाया जा सकता है। कोरोना वायरस के संक्रमित व्यक्ति को कई बार शुरुआत में इसके लक्षण समझ ही नहीं आते हैं, जब 1 हफ्ते से ज्यादा हो जाता है तो धीरे-धीरे लक्षण सामने आने लगते हैं। ऐसे में समय-समय पर ऐप में दिए गए टिप्स के आधार पर खुद का अवलोकन भी करते रहना चाहिए, जिसकी जानकारी स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की टीम तो तुरंत मिलती रहती है। समय रहते वह टीम तत्काल मदद के लिए पहुंच जाती है।
स्वस्थ लोग कोरोना संक्रमित लोगों के संपर्क में न आएं, इसके लिए भारत सरकार की तरफ से भी कुछ तकनीकी स्तर पर इंतजाम किए जा गए हैं। सबसे पहले तो संक्रमित लोगों की तादाद जिन स्थान पर ज्यादा है, उन जगहों को सील किया जा रहा है और उन सभी संक्रमित लोगों की लोकेशन हिस्ट्री निकाल कर उनका भी चेकअप किया जा रहा है। लेकिन समस्या इस बात की भी है कि जिन लोगों की कोई ट्रैवल हिस्ट्री नहीं रही है और जो लोग संक्रमित लोगों के संपर्क में नहीं आए हैं, उनका पता कैसे लगाया जाए। इसलिए इस बात की जानकारी रखने के लिए और लोगों को सतर्क करने के लिए सरकार की ओर से आरोग्य सेतु ऐप बनाया गया है। सबसे पहली महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आरोग्य सेतु ऐप सभी लोगों की मदद करेगा। इसमें कई ऐसे फंक्शंस दिए हुए हैं, जिसके जरिए आपको पता चल सकता है कि आपके आसपास कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति तो नहीं है, क्योंकि इस ऐप में उन सभी लोगों का डाटा एकत्र किया जाता है, जो लोग कोरोना वायरस से पीड़ित हैं। इस ऐप को डाउनलोड करने के लिए प्ले स्टोर पर जाएं। इसके बाद इंस्टॉल करने पर यह ऐप्स खुल जाएगी तो इसमें सबसे पहले अपना मोबाइल नंबर डालकर रजिस्ट्रेशन कर ले। तमाम जानकारी देने के बाद आपको कोरोना वायरस के लक्षण के बारे में पूछा जाएगा। उसके बाद आपकी ट्रैवल हिस्ट्री के बारे में पूछा जाएगा और फिर यह आपके बारे में सही जानकारी बता देगा कि आप कोरोना पीड़ित हो सकते हैं या नहीं। साथ ही यह ऐप आपको यह भी बताएगी कि आप कोरोना पीड़ित व्यक्ति के आसपास हैं या नहीं। अधिकतर लोगों को यह पता नहीं होता है कि आसपास कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति है या नहीं। ऐसे में आरोग्य सेतु ऐप से जरिए यह आसानी से पता लगाया जा सकता है। कोरोना वायरस के संक्रमित व्यक्ति को कई बार शुरुआत में इसके लक्षण समझ ही नहीं आते हैं, जब एक हफ्ते से ज्यादा हो जाता है तो धीरे-धीरे लक्षण सामने आने लगते हैं। ऐसे में समय-समय पर ऐप में दिए गए टिप्स के आधार पर खुद का अवलोकन भी करते रहना चाहिए, जिसकी जानकारी स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की टीम तो तुरंत मिलती रहती है। समय रहते वह टीम तत्काल मदद के लिए पहुंच जाती है।
यह लारा देश उस नाम से कभी प्रसिद्ध रहा हो ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, श्रतएव वह नाम भी कल्पित ही है, क्योंकि राजस्थान या उसके प्राकृत ( लौकिक ) रूप रायथान का प्रयोग प्रत्येक राज्य के लिए हो सकता है । सारे राजपूताने के लिए पहले किसी एक नाम का प्रयोग होना नहीं पाया जाता । उसके कितने एक अंशों के तो प्राचीन काल में समय-समय पर भिन्न-भिन्न नाम थे और कुछ विभाग अन्यं बाहरी प्रदेशों के अन्तर्गत थे' । ( १ ) पहले सारा बीकानेर राज्य तथा जोधपुर राज्य का उत्तरी विभाग, जिसमें नागोर आदि परगने हैं, जांगल देश कहलाता था। उसकी राजधानी अहिच्छत्रपुर ( नागोर ) थी । वही देश चौहानों के राज्य-समय सपादलत नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसकी सीमा दूर-दूर तक फैली। सपादलक्ष की पहली राजधानी सांभर ( शाकंभरी ) और दूसरी जमेर रही । अलवर राज्य का उत्तरी विभाग कुरु देश के, दक्षिणी और पश्चिमी मत्स्य देश के थौर पूर्वी विभाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था । भरतपुर और धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश शूरसेन देश के अन्तर्गत थे । शूरसेन देश की राजधानी मथुरा थी और मथुरा के आसपास के प्रदेशों पर राज्य करनेवाले क्षत्रप राजाओं के समय शूरसेन देश को राजन्य देश भी कहते थे । जयपुर राज्य का उत्तरी विभाग मत्स्य देश के अन्तर्गत और दक्षिणी विभाग चौहानों के राज्य-समय सपादलक्ष में गिना जाता था । मत्स्य देश की राजधानी वैराट नगर ( जयपुर राज्य ) थी। उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम शिवि देश था, जिसकी राजधानी मध्यमिका नगरी. थी । उसके खंडहर इस समय नगरी नाम से प्रसिद्ध हैं और चित्तोड़ से ७ मील उत्तर में हैं। वहां पर मेव जाति का अधिकार होने से उक्त देश का नाम मैदपाट या मेवाड़, हुआ, जिसको प्राग्वाट देश भी कहते थे । मेवाड़ का पूर्वी हिस्सा चौहानों के राजत्वकाल में सपादलक्ष देश के अन्तर्गत था । हूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्यों का प्राचीन नाम बागढ़ ( चार्गट ) था और अब भी वे उसी नाम से प्रसिद्ध हैं। जोधपुर राज्य के सारे रेतीले प्रदेश का सामान्यतः मरु देश में समावेश होता था, परन्तु इस समय खास मरु ( मारवाड़ ) में उक्त राज्य के शिव, मालाणी और पचभद्रा के परगने ही माने जाते हैं। जैसलमेर राज्य से मिले हुए जोधपुर राज्य के दक्षिणी अथवा पश्चिमी ( ? ) विभाग का नाम वल देश था और मालाणी या उसके पास का एक प्रदेश कन्नौज के प्रतिहारों (पढ़िहारों) के समय नवणी कहलाता था । गुर्जरों (गूजरों) के अधीन का, जोधपुर राज्य की उत्तरी सीमा से लगाकर दक्षिणी सीमा तक का सारा मारवाड़ गुर्जरना या गुर्जर (गुजरात) के नाम से प्रसिद्ध था। सिरोही राज्य और उससे मिले हुए जोधपुर राज्य के एक विभाग की गणना अर्बुद ( श्रावू ) देश में होती थी। जैसलमेर राज्य का नाम माढ था और
यह लारा देश उस नाम से कभी प्रसिद्ध रहा हो ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, श्रतएव वह नाम भी कल्पित ही है, क्योंकि राजस्थान या उसके प्राकृत रूप रायथान का प्रयोग प्रत्येक राज्य के लिए हो सकता है । सारे राजपूताने के लिए पहले किसी एक नाम का प्रयोग होना नहीं पाया जाता । उसके कितने एक अंशों के तो प्राचीन काल में समय-समय पर भिन्न-भिन्न नाम थे और कुछ विभाग अन्यं बाहरी प्रदेशों के अन्तर्गत थे' । पहले सारा बीकानेर राज्य तथा जोधपुर राज्य का उत्तरी विभाग, जिसमें नागोर आदि परगने हैं, जांगल देश कहलाता था। उसकी राजधानी अहिच्छत्रपुर थी । वही देश चौहानों के राज्य-समय सपादलत नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसकी सीमा दूर-दूर तक फैली। सपादलक्ष की पहली राजधानी सांभर और दूसरी जमेर रही । अलवर राज्य का उत्तरी विभाग कुरु देश के, दक्षिणी और पश्चिमी मत्स्य देश के थौर पूर्वी विभाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था । भरतपुर और धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश शूरसेन देश के अन्तर्गत थे । शूरसेन देश की राजधानी मथुरा थी और मथुरा के आसपास के प्रदेशों पर राज्य करनेवाले क्षत्रप राजाओं के समय शूरसेन देश को राजन्य देश भी कहते थे । जयपुर राज्य का उत्तरी विभाग मत्स्य देश के अन्तर्गत और दक्षिणी विभाग चौहानों के राज्य-समय सपादलक्ष में गिना जाता था । मत्स्य देश की राजधानी वैराट नगर थी। उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम शिवि देश था, जिसकी राजधानी मध्यमिका नगरी. थी । उसके खंडहर इस समय नगरी नाम से प्रसिद्ध हैं और चित्तोड़ से सात मील उत्तर में हैं। वहां पर मेव जाति का अधिकार होने से उक्त देश का नाम मैदपाट या मेवाड़, हुआ, जिसको प्राग्वाट देश भी कहते थे । मेवाड़ का पूर्वी हिस्सा चौहानों के राजत्वकाल में सपादलक्ष देश के अन्तर्गत था । हूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्यों का प्राचीन नाम बागढ़ था और अब भी वे उसी नाम से प्रसिद्ध हैं। जोधपुर राज्य के सारे रेतीले प्रदेश का सामान्यतः मरु देश में समावेश होता था, परन्तु इस समय खास मरु में उक्त राज्य के शिव, मालाणी और पचभद्रा के परगने ही माने जाते हैं। जैसलमेर राज्य से मिले हुए जोधपुर राज्य के दक्षिणी अथवा पश्चिमी विभाग का नाम वल देश था और मालाणी या उसके पास का एक प्रदेश कन्नौज के प्रतिहारों के समय नवणी कहलाता था । गुर्जरों के अधीन का, जोधपुर राज्य की उत्तरी सीमा से लगाकर दक्षिणी सीमा तक का सारा मारवाड़ गुर्जरना या गुर्जर के नाम से प्रसिद्ध था। सिरोही राज्य और उससे मिले हुए जोधपुर राज्य के एक विभाग की गणना अर्बुद देश में होती थी। जैसलमेर राज्य का नाम माढ था और
बांग्लादेश के सिलहट में एक इफ्तार पार्टी में शामिल हुए हिन्दुओं को गोमांस खिलाने की खबर है। इस इफ्तारी में शामिल लोगों को बीफ के अलावा कोई दूसरी चॉइस भी नहीं दी गई। यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। मामला गुरुवार (28 अप्रैल 2022) का बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह इफ्तारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) द्वारा आयोजित की गई थी। इस पार्टी में हिन्दू धर्म के लगभग 20 लोग शामिल थे। इन सभी को बाकी खाने के साथ गोमांस भी परोसा गया। वही BNP के ही एक अन्य हिन्दू नेता कनक कांति दास ने इस इफ्तारी को तमाशा बताया है। उन्होंने लिखा, "आपने इफ्तारी के मज़े लिए और हम हिन्दू बस देखते रहे। " इफ्तारी में बीफ परोसने की घटना को BNP सिलहट ने भी स्वीकार किया लेकिन इसके लिए किसी भी प्रकार की माफ़ी नहीं माँगी। एक अन्य घटनाक्रम में बांग्लादेश के पत्रकार सौमिक ने चिकन बिरयानी में गोमांस परोसने वाले दुकानदार की गिरफ्तारी का ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने 'चटगाँव प्रतिदिन' नाम के अख़बार का स्क्रीनशॉट लगाया है। 28 अप्रैल 2022 की उस खबर में हेडलाइन है, "चटगाँव में हिंदू खरीदार को गोमांस खिलाने के बाद दुकानदार जेल गया। " ट्वीट में पकड़े गए आरोपित का फोटो भी है। रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश के चटगाँव में सुपन नाम का लड़का अपने जन्मदिन के मौके पर दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में चिकन बिरयानी खाने गया था। दुकान का नाम 'दुबई रेस्तरां और बिरानी हाउस' है। वहाँ उसे चिकन बिरयानी में गोमांस भी परोसा गया। इसकी जानकारी होते ही सुपन ने पुलिस को शिकायत दी। पुलिस ने होटल मैनेजर मंज़ूर अहमद को जेल भेज दिया है। इसी केस में अभी 2 आरोपित फरार बताए जा रहे हैं।
बांग्लादेश के सिलहट में एक इफ्तार पार्टी में शामिल हुए हिन्दुओं को गोमांस खिलाने की खबर है। इस इफ्तारी में शामिल लोगों को बीफ के अलावा कोई दूसरी चॉइस भी नहीं दी गई। यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। मामला गुरुवार का बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह इफ्तारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित की गई थी। इस पार्टी में हिन्दू धर्म के लगभग बीस लोग शामिल थे। इन सभी को बाकी खाने के साथ गोमांस भी परोसा गया। वही BNP के ही एक अन्य हिन्दू नेता कनक कांति दास ने इस इफ्तारी को तमाशा बताया है। उन्होंने लिखा, "आपने इफ्तारी के मज़े लिए और हम हिन्दू बस देखते रहे। " इफ्तारी में बीफ परोसने की घटना को BNP सिलहट ने भी स्वीकार किया लेकिन इसके लिए किसी भी प्रकार की माफ़ी नहीं माँगी। एक अन्य घटनाक्रम में बांग्लादेश के पत्रकार सौमिक ने चिकन बिरयानी में गोमांस परोसने वाले दुकानदार की गिरफ्तारी का ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने 'चटगाँव प्रतिदिन' नाम के अख़बार का स्क्रीनशॉट लगाया है। अट्ठाईस अप्रैल दो हज़ार बाईस की उस खबर में हेडलाइन है, "चटगाँव में हिंदू खरीदार को गोमांस खिलाने के बाद दुकानदार जेल गया। " ट्वीट में पकड़े गए आरोपित का फोटो भी है। रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश के चटगाँव में सुपन नाम का लड़का अपने जन्मदिन के मौके पर दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में चिकन बिरयानी खाने गया था। दुकान का नाम 'दुबई रेस्तरां और बिरानी हाउस' है। वहाँ उसे चिकन बिरयानी में गोमांस भी परोसा गया। इसकी जानकारी होते ही सुपन ने पुलिस को शिकायत दी। पुलिस ने होटल मैनेजर मंज़ूर अहमद को जेल भेज दिया है। इसी केस में अभी दो आरोपित फरार बताए जा रहे हैं।
दिल्ली से किराए की कार लेकर बाड़मेर पहुंचे एक महिला सहित तीन दोस्तों ने कार ड्राइवर के साथ मारपीट कर मोबाइल, एटीएम, कैश रुपए लूट कर भाग गए। घटना बाड़मेर जिले के पचपदरा थाने इलाके के पटाउ गांव की है। पुलिस ने 24 घंटे में बदमाशों को गिरफ्तार कर लूटी हुई कार को बरामद कर लिया। तीनों आरोपी जोधपुर जिले के आसपास के गांव के रहने वाले है। मौज मस्ती व घूमने-फिरने के आदि है। घूमने के दौरान रुपए की जरूरत होने पर वारदात करना कबूल किया। दरअसल, विजहरा गांव डेरापुरा कानुपर निवासी ड्राइवर आर्यन यादव ने पचपदरा थाने में 2 सितंबर को रिपोर्ट दी थी। कि को दिल्ली से एक महिला सहित तीन दोस्त किराए पर राजस्थान कार लेकर आए थे। रविवार दोपहर के समय में पचपदरा पटाउ के पहुंचे तब तीनों ने कच्चे रास्ते चलने के लिए कहा, मना करने पर कहां कि हमारा घर गांव में है। कच्चे रास्ते में गाड़ी रुकवाकर मेरे साथ मारपीट करके पर्स, मोबाइल, घड़ी, एटीएम, पेनकार्ड व आधार कार्ड और 1400 रुपए कैश व कार छीनकर ले गए। पुलिस ने रिपोर्ट पर मामला दर्ज कर बदमाशों की तलाश शुरू की। एसपी दीपक भार्गव के मुताबिक थाना स्तर से अलग-अलग टीम व थानाधिकारी कल्याणपुर मय जाब्ता की टीम बनाकर बदमाशों के बारे में जानकारी जुटाई। घटना स्थल के आसपास के सीसीटीवी, कैमरे, टोल नांका के फुटेज चैक किए गए। पहले के बदमाशों पर नजर रखी गई। पचपदरा थानाधिकारी राजेंद्रसिह मय टीम ने साइबर एक्सपर्ट की टीम की मदद से पटाऊ, कल्याणपुर, जोधपुर, बिलाड़ा, बर, ब्यावर, मांगलियावास, अजमेर बदमाशों की तलाश की गई। साइबर एक्सपर्ट की मदद से आरोपी दिनेश पुत्र वीरमाराम निवासी भाखरी लूणी जोधपुर, राजुराम पुत्र लक्ष्मणराम निवासी निंबली नाडी कडुंबा नाडा झंवर जोधपुर को गिरफ्तार किया गया। वहीं लूटी कार को बरामद कर लिया। घटना में शरीक महिला दोस्त किरण पत्नी विरेंद्रसिह निवासी हिरण मगरी जिला उदयपुर हाल रिलायश फ्रेश के पास रातानाडा व बाईजी का तालाब जालोरी गेट को घर से गिरफ्तार किया गया। टीम ने लूटा हुआ मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया। पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि महिला सहित तीनों आपस में दोस्त है। घूमने-फिरने एवं ऐश मौज करने के आदि है। घूमने-फिरने के दौरान पैसों की जरूरत होने पर घटना करना स्वीकार किया है। पुलिस अन्य वारदातों के संबंध में पूछताछ कर रही है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
दिल्ली से किराए की कार लेकर बाड़मेर पहुंचे एक महिला सहित तीन दोस्तों ने कार ड्राइवर के साथ मारपीट कर मोबाइल, एटीएम, कैश रुपए लूट कर भाग गए। घटना बाड़मेर जिले के पचपदरा थाने इलाके के पटाउ गांव की है। पुलिस ने चौबीस घंटाटे में बदमाशों को गिरफ्तार कर लूटी हुई कार को बरामद कर लिया। तीनों आरोपी जोधपुर जिले के आसपास के गांव के रहने वाले है। मौज मस्ती व घूमने-फिरने के आदि है। घूमने के दौरान रुपए की जरूरत होने पर वारदात करना कबूल किया। दरअसल, विजहरा गांव डेरापुरा कानुपर निवासी ड्राइवर आर्यन यादव ने पचपदरा थाने में दो सितंबर को रिपोर्ट दी थी। कि को दिल्ली से एक महिला सहित तीन दोस्त किराए पर राजस्थान कार लेकर आए थे। रविवार दोपहर के समय में पचपदरा पटाउ के पहुंचे तब तीनों ने कच्चे रास्ते चलने के लिए कहा, मना करने पर कहां कि हमारा घर गांव में है। कच्चे रास्ते में गाड़ी रुकवाकर मेरे साथ मारपीट करके पर्स, मोबाइल, घड़ी, एटीएम, पेनकार्ड व आधार कार्ड और एक हज़ार चार सौ रुपयापए कैश व कार छीनकर ले गए। पुलिस ने रिपोर्ट पर मामला दर्ज कर बदमाशों की तलाश शुरू की। एसपी दीपक भार्गव के मुताबिक थाना स्तर से अलग-अलग टीम व थानाधिकारी कल्याणपुर मय जाब्ता की टीम बनाकर बदमाशों के बारे में जानकारी जुटाई। घटना स्थल के आसपास के सीसीटीवी, कैमरे, टोल नांका के फुटेज चैक किए गए। पहले के बदमाशों पर नजर रखी गई। पचपदरा थानाधिकारी राजेंद्रसिह मय टीम ने साइबर एक्सपर्ट की टीम की मदद से पटाऊ, कल्याणपुर, जोधपुर, बिलाड़ा, बर, ब्यावर, मांगलियावास, अजमेर बदमाशों की तलाश की गई। साइबर एक्सपर्ट की मदद से आरोपी दिनेश पुत्र वीरमाराम निवासी भाखरी लूणी जोधपुर, राजुराम पुत्र लक्ष्मणराम निवासी निंबली नाडी कडुंबा नाडा झंवर जोधपुर को गिरफ्तार किया गया। वहीं लूटी कार को बरामद कर लिया। घटना में शरीक महिला दोस्त किरण पत्नी विरेंद्रसिह निवासी हिरण मगरी जिला उदयपुर हाल रिलायश फ्रेश के पास रातानाडा व बाईजी का तालाब जालोरी गेट को घर से गिरफ्तार किया गया। टीम ने लूटा हुआ मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया। पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि महिला सहित तीनों आपस में दोस्त है। घूमने-फिरने एवं ऐश मौज करने के आदि है। घूमने-फिरने के दौरान पैसों की जरूरत होने पर घटना करना स्वीकार किया है। पुलिस अन्य वारदातों के संबंध में पूछताछ कर रही है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
ग्रेट प्लेस टू वर्क इंस्टीट्यूट ने कंपनियों को मुफ्त कर्मचारी सर्वेक्षण सहायता प्रदान करना शुरू कर दिया है। कर्मचारियों पर COVID-19 प्रक्रिया के प्रभावों को कम करने के उद्देश्य से, संस्थान कर्मचारी स्वास्थ्य, लचीले काम और समन्वय में सहायता प्रदान करता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करने वाली कोविड-19 महामारी ने कर्मचारियों और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। कंपनियां कर्मचारियों के बीच वर्कफ़्लो और संचार में निरंतरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ चिंता को कम करने और विश्वास की भावना को उजागर करने के तरीकों की तलाश कर रही हैं। पाज़रलामास्योन प्राइम की कोविड19 रिपोर्ट के अनुसार, महामारी से व्यापार जगत के 68 प्रतिशत लोग "काफी" चिंतित हैं। 27 प्रतिशत लोग महामारी के प्रभावों को लेकर "कुछ हद तक चिंतित" हैं। रिपोर्ट में दुनिया में उठाए गए कदमों को असरदार मानने वालों की दर 9 फीसदी है, जबकि तुर्की में उठाए गए कदमों को असरदार मानने वालों की दर 2 फीसदी है. ग्रेट प्लेस टू वर्क® तुर्की के महाप्रबंधक आईयूप टोपराक ने कहा, "हम अनिश्चितताओं से भरे दौर से गुजर रहे हैं। आजकल, जब हम चिंता, असहायता और भय महसूस करते हैं, तो हमें विश्वास, प्रेरणा और निर्बाध संचार की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता होती है। हमें एक-दूसरे को समझना चाहिए और सामान्य ज्ञान वाला होना चाहिए। "हमारे मुफ़्त विश्लेषण हर क्षेत्र के लिए खुले होने के साथ, हमारा लक्ष्य इस संवेदनशील अवधि में कर्मचारियों और प्रबंधकों का समर्थन करना, वर्कफ़्लो में होने वाले जोखिम कारकों को रोकना और नए दृष्टिकोण प्रदान करना है।" उन्होंने एक बयान दिया.
ग्रेट प्लेस टू वर्क इंस्टीट्यूट ने कंपनियों को मुफ्त कर्मचारी सर्वेक्षण सहायता प्रदान करना शुरू कर दिया है। कर्मचारियों पर COVID-उन्नीस प्रक्रिया के प्रभावों को कम करने के उद्देश्य से, संस्थान कर्मचारी स्वास्थ्य, लचीले काम और समन्वय में सहायता प्रदान करता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करने वाली कोविड-उन्नीस महामारी ने कर्मचारियों और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। कंपनियां कर्मचारियों के बीच वर्कफ़्लो और संचार में निरंतरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ चिंता को कम करने और विश्वास की भावना को उजागर करने के तरीकों की तलाश कर रही हैं। पाज़रलामास्योन प्राइम की कोविडउन्नीस रिपोर्ट के अनुसार, महामारी से व्यापार जगत के अड़सठ प्रतिशत लोग "काफी" चिंतित हैं। सत्ताईस प्रतिशत लोग महामारी के प्रभावों को लेकर "कुछ हद तक चिंतित" हैं। रिपोर्ट में दुनिया में उठाए गए कदमों को असरदार मानने वालों की दर नौ फीसदी है, जबकि तुर्की में उठाए गए कदमों को असरदार मानने वालों की दर दो फीसदी है. ग्रेट प्लेस टू वर्क® तुर्की के महाप्रबंधक आईयूप टोपराक ने कहा, "हम अनिश्चितताओं से भरे दौर से गुजर रहे हैं। आजकल, जब हम चिंता, असहायता और भय महसूस करते हैं, तो हमें विश्वास, प्रेरणा और निर्बाध संचार की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता होती है। हमें एक-दूसरे को समझना चाहिए और सामान्य ज्ञान वाला होना चाहिए। "हमारे मुफ़्त विश्लेषण हर क्षेत्र के लिए खुले होने के साथ, हमारा लक्ष्य इस संवेदनशील अवधि में कर्मचारियों और प्रबंधकों का समर्थन करना, वर्कफ़्लो में होने वाले जोखिम कारकों को रोकना और नए दृष्टिकोण प्रदान करना है।" उन्होंने एक बयान दिया.
हेडलाइन टुडे टीवी चैनल का कहना है कि केजरीवाल का धरना खत्म कराने के लिए योगेन्द्र यादव की पर्दे के पीछे की राजनीति काम आई। केजरीवाल के लिए सबसे अपमानजनक क्षण यह था कि वे कल से धरना दे रहे थे लेकिन न तो पीएम ने बुलाया न गृहमंत्री ने बात करने के लिए बुलाया। इस तरह की सख्ती पहले कभी कांग्रेस ने नहीं दिखायी थी। कांग्रेस की सख्ती देखकर योगेन्द्र यादव दिल्ली के उपराज्यपाल के पास दौड़े गए और उनसे अनुरोध किया कि वे कुछ मदद करें जिससे केजरीवाल को सम्मानजनक ढ़ंग से धरने से उठाया जा सके। उप राज्यपाल ने साफ कर दिया कि उनकी किसी केन्द्रीय नेता से धरने पर बात नहीं हुई है अतःवे कोई मदद नहीं कर सकते। अंत में काफी कहने-सुनने के बाद उपराज्यपाल ने कहा केजरीवाल जिद्दी है वह नहीं मानता, अतःपहले यह सुनिश्चित करो कि यहां पर जो तय होगा उसे वह मानेगा। यादव ने भरोसा दिया और इसके बाद संबंधित 3पुलिसवालों को जांच होने तक छुट्टी पर जाने देने पर राज्यपाल राजी हो गए। बाद में केजरीवाल ने जो कुछ कहा उसे सब जानते हैं । यानी केजरीवाल की नाक बचाने के लिए उप राज्यपाल से अपील जारी करायी गयी। यह केजरीवाल की महान पराक्रमी इमेज में आया परिवर्तन है। पहलीबार वे धरने से बिना जिद किए उठे हैं । (स्रोत-एफबी)
हेडलाइन टुडे टीवी चैनल का कहना है कि केजरीवाल का धरना खत्म कराने के लिए योगेन्द्र यादव की पर्दे के पीछे की राजनीति काम आई। केजरीवाल के लिए सबसे अपमानजनक क्षण यह था कि वे कल से धरना दे रहे थे लेकिन न तो पीएम ने बुलाया न गृहमंत्री ने बात करने के लिए बुलाया। इस तरह की सख्ती पहले कभी कांग्रेस ने नहीं दिखायी थी। कांग्रेस की सख्ती देखकर योगेन्द्र यादव दिल्ली के उपराज्यपाल के पास दौड़े गए और उनसे अनुरोध किया कि वे कुछ मदद करें जिससे केजरीवाल को सम्मानजनक ढ़ंग से धरने से उठाया जा सके। उप राज्यपाल ने साफ कर दिया कि उनकी किसी केन्द्रीय नेता से धरने पर बात नहीं हुई है अतःवे कोई मदद नहीं कर सकते। अंत में काफी कहने-सुनने के बाद उपराज्यपाल ने कहा केजरीवाल जिद्दी है वह नहीं मानता, अतःपहले यह सुनिश्चित करो कि यहां पर जो तय होगा उसे वह मानेगा। यादव ने भरोसा दिया और इसके बाद संबंधित तीनपुलिसवालों को जांच होने तक छुट्टी पर जाने देने पर राज्यपाल राजी हो गए। बाद में केजरीवाल ने जो कुछ कहा उसे सब जानते हैं । यानी केजरीवाल की नाक बचाने के लिए उप राज्यपाल से अपील जारी करायी गयी। यह केजरीवाल की महान पराक्रमी इमेज में आया परिवर्तन है। पहलीबार वे धरने से बिना जिद किए उठे हैं ।
How to Please Shani Dev on Hanuman Janmotsav 2023: चैत्र पूर्णिमा का दिन पवनपुत्र हनुमान भक्तों के लिए खास होता है। इस दिन हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल हनुमान जन्मोत्सव 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को मनाया जाएगा। हनुमान जन्मोत्सव का दिन कर्क, वृश्चिक, कुंभ, मीन व मकर राशि के जातकों के लिए बेहद खास माना जा रहा है। इनमें से कुछ राशियों पर शनि की साढ़ेसाती व कुछ राशियों पर शनि ढैय्या का प्रभाव है। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जन्मोत्सव के दिन शनि ढैय्या व शनि की साढ़ेसासी से पीड़ित राशि के जातकों को बजंरगबली की पूजा करने से शनि के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है। दरअसल शनिदेव को बजरंगबली का भक्त माना गया है। कहते हैं कि शनिदेव बजरंगबली के भक्तों को परेशान नहीं करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि वर्तमान में अपनी स्वराशि कुंभ में विराजमान हैं। जिसके कारण कर्क व वृश्चिक राशि वालों पर शनि ढैय्या चल रही है। मकर राशि वालों पर साढ़ेसाती का अंतिम चरण, कुंभ राशि वालों पर दूसरा और मीन राशि वालों पर पहला चरण चल रहा है। 1. हनुमान जन्मोत्सव के दिन बजरंगबली की विधि-विधान से पूजा करें और बजरंगबाण का पाठ करें। मान्यता है कि ऐसा करने से हनुमान जी के साथ शनिदेव की कृपा होती है। 2. हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करें। मान्यता है कि ऐसा करने से शनि का अशुभ प्रभाव कम पड़ता है। 3. हनुमान जन्मोत्सव के दिन शमी के वृक्ष में जल चढ़ाने से शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या में लाभ होता है। 4. इस दिन सुंदरकांड या बजरंगबाण का पाठ करने से संकटों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। इसके साथ ही बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 5. हनुमान जन्मोत्सव के दिन अपनी सामर्थ्यनुसार किसी जरूरतमंद को दान देने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
How to Please Shani Dev on Hanuman Janmotsav दो हज़ार तेईस: चैत्र पूर्णिमा का दिन पवनपुत्र हनुमान भक्तों के लिए खास होता है। इस दिन हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल हनुमान जन्मोत्सव छः अप्रैल दो हज़ार तेईस, गुरुवार को मनाया जाएगा। हनुमान जन्मोत्सव का दिन कर्क, वृश्चिक, कुंभ, मीन व मकर राशि के जातकों के लिए बेहद खास माना जा रहा है। इनमें से कुछ राशियों पर शनि की साढ़ेसाती व कुछ राशियों पर शनि ढैय्या का प्रभाव है। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जन्मोत्सव के दिन शनि ढैय्या व शनि की साढ़ेसासी से पीड़ित राशि के जातकों को बजंरगबली की पूजा करने से शनि के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है। दरअसल शनिदेव को बजरंगबली का भक्त माना गया है। कहते हैं कि शनिदेव बजरंगबली के भक्तों को परेशान नहीं करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि वर्तमान में अपनी स्वराशि कुंभ में विराजमान हैं। जिसके कारण कर्क व वृश्चिक राशि वालों पर शनि ढैय्या चल रही है। मकर राशि वालों पर साढ़ेसाती का अंतिम चरण, कुंभ राशि वालों पर दूसरा और मीन राशि वालों पर पहला चरण चल रहा है। एक. हनुमान जन्मोत्सव के दिन बजरंगबली की विधि-विधान से पूजा करें और बजरंगबाण का पाठ करें। मान्यता है कि ऐसा करने से हनुमान जी के साथ शनिदेव की कृपा होती है। दो. हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करें। मान्यता है कि ऐसा करने से शनि का अशुभ प्रभाव कम पड़ता है। तीन. हनुमान जन्मोत्सव के दिन शमी के वृक्ष में जल चढ़ाने से शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या में लाभ होता है। चार. इस दिन सुंदरकांड या बजरंगबाण का पाठ करने से संकटों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। इसके साथ ही बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पाँच. हनुमान जन्मोत्सव के दिन अपनी सामर्थ्यनुसार किसी जरूरतमंद को दान देने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
नई दिल्ली. देश में कोरोना (Coronavirus Pandemic) की वजह से लॉकडाउन लगा हुआ है. इस लॉकडाउन की घोषणा अभी तक तो 4 मई के लिए की गयी थी अब देखना होगा की ये 4 मई से आगे जाता है या नहीं. लॉकडाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव गरीब, किसान और मजदूरों पर पड़ा है. इसी वजह से मोदी सरकार लगातार इन्हें मदद कर रही है. मोदी सरकार ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि 24 मार्च से अब तक सरकार PM Kisan में रजिस्टरड लाभार्थीयों को 17986 करोड़ रुपए बांट चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के करोड़ों किसानों के लिए कई फायदे वाली योजनाएं शुरू की है. इन योजनाओं में प्रधानमंत्री किसान निधि योजना काफी अहम है. इस योजना के तहत सरकार किसानों के बैंक खातों में हर साल 6000 रुपये जमा करती है. यह राशि तीन बराबर किस्तों में किसानों के खाते में डाली जाती है. ये भी पढ़ेंः ₹10 हजार गारंटीड आमदनी वाली स्कीम को सरकार फिर कर सकती है शुरू! 1. किसान स्थानीय पटवारी/ राजस्व अधिकारी/ राज्य सरकारों की ओर से पीएम किसान योजना के लिए नामांकित नोडल अधिकारी के जरिए इस योजना के लिए अपना पंजीकरण करा सकते हैं. 2. साझा सेवा केंद्रों (CSCs) को इस स्कीम के लिए किसानों के रजिस्ट्रेशन के लिए अधिकृत किया गया है. 3. किसान PM Kisan की वेबसाइट के जरिए खुद ही इस योजना के लिए पंजीकरण करा सकते हैं. >> वेबसाइट pmkisan. gov. in पर जाएं. >> होम पेज पर मेन्यू बार देखें और यहां 'फार्मर कार्नर' पर जाएं. >> यहां 'लाभार्थी सूची' के लिंक पर क्लिक करें. >> इसके बाद अपना राज्य, जिला, उप-जिला, ब्लॉक और गांव विवरण दर्ज करें. >> इतना भरने के बाद Get Report पर क्लिक करें और पाएं पूरी लिस्ट. .
नई दिल्ली. देश में कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगा हुआ है. इस लॉकडाउन की घोषणा अभी तक तो चार मई के लिए की गयी थी अब देखना होगा की ये चार मई से आगे जाता है या नहीं. लॉकडाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव गरीब, किसान और मजदूरों पर पड़ा है. इसी वजह से मोदी सरकार लगातार इन्हें मदद कर रही है. मोदी सरकार ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि चौबीस मार्च से अब तक सरकार PM Kisan में रजिस्टरड लाभार्थीयों को सत्रह हज़ार नौ सौ छियासी करोड़ रुपए बांट चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के करोड़ों किसानों के लिए कई फायदे वाली योजनाएं शुरू की है. इन योजनाओं में प्रधानमंत्री किसान निधि योजना काफी अहम है. इस योजना के तहत सरकार किसानों के बैंक खातों में हर साल छः हज़ार रुपयापये जमा करती है. यह राशि तीन बराबर किस्तों में किसानों के खाते में डाली जाती है. ये भी पढ़ेंः दस रुपया हजार गारंटीड आमदनी वाली स्कीम को सरकार फिर कर सकती है शुरू! एक. किसान स्थानीय पटवारी/ राजस्व अधिकारी/ राज्य सरकारों की ओर से पीएम किसान योजना के लिए नामांकित नोडल अधिकारी के जरिए इस योजना के लिए अपना पंजीकरण करा सकते हैं. दो. साझा सेवा केंद्रों को इस स्कीम के लिए किसानों के रजिस्ट्रेशन के लिए अधिकृत किया गया है. तीन. किसान PM Kisan की वेबसाइट के जरिए खुद ही इस योजना के लिए पंजीकरण करा सकते हैं. >> वेबसाइट pmkisan. gov. in पर जाएं. >> होम पेज पर मेन्यू बार देखें और यहां 'फार्मर कार्नर' पर जाएं. >> यहां 'लाभार्थी सूची' के लिंक पर क्लिक करें. >> इसके बाद अपना राज्य, जिला, उप-जिला, ब्लॉक और गांव विवरण दर्ज करें. >> इतना भरने के बाद Get Report पर क्लिक करें और पाएं पूरी लिस्ट. .
जरूरी सामग्रीः ताजा पालक - 1 कप ( उबली और बारीक कटी हुई) आधा कप - किनोआ (उबला हुआ) -एक पैन में ऑयल गर्म करें, उसमें लहसुन की कलियां डालकर गोल्डन ब्राउन होने तक भूनें। -एक बाउल में अंडे तोड़कर उन्हें हल्का बीट कर लें और पैन में डाल दें। -जब अंडे थोड़े पकने लगें, तो उनमें बारीक कटी पालक, चीज, किनोआ, नमक और काली मिर्च पाउडर डालकर अच्छे से मिक्स करें। -आप चाहें तो इसपर टमाटर, प्याज और अपनी मनपसंद सॉस भी डालकर खा सकते हैं।
जरूरी सामग्रीः ताजा पालक - एक कप आधा कप - किनोआ -एक पैन में ऑयल गर्म करें, उसमें लहसुन की कलियां डालकर गोल्डन ब्राउन होने तक भूनें। -एक बाउल में अंडे तोड़कर उन्हें हल्का बीट कर लें और पैन में डाल दें। -जब अंडे थोड़े पकने लगें, तो उनमें बारीक कटी पालक, चीज, किनोआ, नमक और काली मिर्च पाउडर डालकर अच्छे से मिक्स करें। -आप चाहें तो इसपर टमाटर, प्याज और अपनी मनपसंद सॉस भी डालकर खा सकते हैं।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान बुधवार को रूस दौरे पर रवाना होने वाले हैं। इसके पहले उन्होंने रूस के एक टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया। कहा- मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ टीवी पर बहस करना चाहता हूं। इससे दोनों देशों के रिश्तों पर अच्छी चर्चा हो सकेगी और हम बातचीत के जरिए कई मसलों का हल खोज सकेंगे। इससे भारत और पाकिस्तान के करोड़ों लोगों को फायदा होगा। इमरान का रूस दौरा ऐसे वक्त हो रहा है, जब रूस और यूक्रेन के बीच बिल्कुल जंग जैसा माहौल है। रूस ने यूक्रेन के दो प्रांतों (लुहांस्क-डोनेट्स्क) को अलग देश घोषित कर दिया है। अमेरिका और पश्चिमी देश रूस के खिलाफ सख्त कदम उठा रहे हैं। करीब 22 साल बाद पाकिस्तान का कोई प्रधानमंत्री रूस दौरे पर जा रहा है। इसके पहले पिछले महीने इमरान चीन भी गए थे। चीन और रूस के बीच अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देश इन दोनों देशों से नाराज हैं। बहरहाल, रूस दौरे से पहले एक रस्मी इंटरव्यू में खान ने भारत और प्रधानमंत्री मोदी का जिक्र भी कर दिया। एक सवाल के जवाब में कहा- मैं चाहूंगा कि प्रधानमंत्री मोदी मुझसे टीवी पर डिबेट करें। अगर हम बातचीत से मुद्दे हल कर पाए तो इससे उपमहाद्वीप और दोनों देशों के करोड़ों लोगों को फायदा होगा। खास बात यह है कि भारत सरकार और विदेश मंत्रालय ने अब तक इमरान के बयान पर किसी तरह का रिएक्शन नहीं दिया है। इमरान के मुताबिक, पाकिस्तान के पास कारोबार के लिहाज से साउथ एशिया में बहुत कम विकल्प हैं। वैसे, इमरान का यह बयान वक्त की मांग भी है। दरअसल, पाकिस्तान FATF की ग्रे लिस्ट में है। इसकी पेरिस में मीटिंग चल रही है। माना जा रहा है कि उसका ग्रे लिस्ट से निकलना मुश्किल है। FATF टेरर-फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग पर अंकुश लगाने में पाकिस्तान की प्रगति की समीक्षा कर रहा है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान की किस्मत का फैसला 24 फरवरी को आएगा। पेरिस स्थित इस वॉचडॉग ने एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के लिए धन जुटाने जैसे मुद्दों पर 2018 में पाकिस्तान को ग्रे-लिस्ट में रखा था। इमरान अब तक सियासी वजहों के चलते भारत से ट्रेड बहाल करने से बचते रहे हैं, लेकिन उनके दोस्त, मुल्क के बड़े कारोबारी और एडवाइजर अब्दुल रज्जाक दाऊद ने पिछले दिनों यह कहकर उन्हें मुश्किल में डाल दिया कि भारत के साथ कारोबार वक्त की जरूरत है और इसका सबसे ज्यादा फायदा पाकिस्तान को ही होगा। वैसे, दाऊद अकेले नहीं हैं। पिछले महीने पाकिस्तान के सबसे बड़े कारोबारी मियां मोहम्मद मंशा ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच बैकडोर डिप्लोमैसी चल रही है और जल्द ही दोनों के बीच ट्रेड रिलेशन बहाल होंगे। मंशा ने तो यहां तक कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले महीने पाकिस्तान की यात्रा पर आ सकते हैं। हालांकि, भारत का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। This website follows the DNPA Code of Ethics.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान बुधवार को रूस दौरे पर रवाना होने वाले हैं। इसके पहले उन्होंने रूस के एक टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया। कहा- मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ टीवी पर बहस करना चाहता हूं। इससे दोनों देशों के रिश्तों पर अच्छी चर्चा हो सकेगी और हम बातचीत के जरिए कई मसलों का हल खोज सकेंगे। इससे भारत और पाकिस्तान के करोड़ों लोगों को फायदा होगा। इमरान का रूस दौरा ऐसे वक्त हो रहा है, जब रूस और यूक्रेन के बीच बिल्कुल जंग जैसा माहौल है। रूस ने यूक्रेन के दो प्रांतों को अलग देश घोषित कर दिया है। अमेरिका और पश्चिमी देश रूस के खिलाफ सख्त कदम उठा रहे हैं। करीब बाईस साल बाद पाकिस्तान का कोई प्रधानमंत्री रूस दौरे पर जा रहा है। इसके पहले पिछले महीने इमरान चीन भी गए थे। चीन और रूस के बीच अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देश इन दोनों देशों से नाराज हैं। बहरहाल, रूस दौरे से पहले एक रस्मी इंटरव्यू में खान ने भारत और प्रधानमंत्री मोदी का जिक्र भी कर दिया। एक सवाल के जवाब में कहा- मैं चाहूंगा कि प्रधानमंत्री मोदी मुझसे टीवी पर डिबेट करें। अगर हम बातचीत से मुद्दे हल कर पाए तो इससे उपमहाद्वीप और दोनों देशों के करोड़ों लोगों को फायदा होगा। खास बात यह है कि भारत सरकार और विदेश मंत्रालय ने अब तक इमरान के बयान पर किसी तरह का रिएक्शन नहीं दिया है। इमरान के मुताबिक, पाकिस्तान के पास कारोबार के लिहाज से साउथ एशिया में बहुत कम विकल्प हैं। वैसे, इमरान का यह बयान वक्त की मांग भी है। दरअसल, पाकिस्तान FATF की ग्रे लिस्ट में है। इसकी पेरिस में मीटिंग चल रही है। माना जा रहा है कि उसका ग्रे लिस्ट से निकलना मुश्किल है। FATF टेरर-फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग पर अंकुश लगाने में पाकिस्तान की प्रगति की समीक्षा कर रहा है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान की किस्मत का फैसला चौबीस फरवरी को आएगा। पेरिस स्थित इस वॉचडॉग ने एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के लिए धन जुटाने जैसे मुद्दों पर दो हज़ार अट्ठारह में पाकिस्तान को ग्रे-लिस्ट में रखा था। इमरान अब तक सियासी वजहों के चलते भारत से ट्रेड बहाल करने से बचते रहे हैं, लेकिन उनके दोस्त, मुल्क के बड़े कारोबारी और एडवाइजर अब्दुल रज्जाक दाऊद ने पिछले दिनों यह कहकर उन्हें मुश्किल में डाल दिया कि भारत के साथ कारोबार वक्त की जरूरत है और इसका सबसे ज्यादा फायदा पाकिस्तान को ही होगा। वैसे, दाऊद अकेले नहीं हैं। पिछले महीने पाकिस्तान के सबसे बड़े कारोबारी मियां मोहम्मद मंशा ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच बैकडोर डिप्लोमैसी चल रही है और जल्द ही दोनों के बीच ट्रेड रिलेशन बहाल होंगे। मंशा ने तो यहां तक कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले महीने पाकिस्तान की यात्रा पर आ सकते हैं। हालांकि, भारत का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। This website follows the DNPA Code of Ethics.
जिम्मेदारों ने कार्यक्रम के दौरान शुद्ध जल के प्रयोग तथा स्वच्छता संबंधी जानकारी दी। सिद्धार्थगर : ब्लाक क्षेत्र के बहेरिया गांव में स्थित पानी टंकी स्थान पर बुधवार को जल जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर जल कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें जल निगम के जिम्मेदार व ग्राम प्रधान प्रतिनिधि दिलीप पाण्डेय उर्फ छोटे सहित भारी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। जिम्मेदारों ने कार्यक्रम के दौरान शुद्ध जल के प्रयोग तथा स्वच्छता संबंधी जानकारी दी। डा. लक्ष्मी कांत शुक्ला ने बताया कि जिन गांव में नीर निर्मल योजना अथवा जल निगम के जरिये पानी की टंकी का निर्माण कराया गया है, वहां के लोग इसी का शुद्ध जल प्रयोग करें। महेश धुरिया, पलटू राम, मधु गौड़, पुष्पा देवी, राजाराम, रमेश चंद्र, बैजनाथ, बजरंगी , प्रदीप पांडेय, रक्षा राम यादव, पांचू यादव, चुनमुन, उर्मिला, जुग्गी लाल आदि मौजूद रहे।
जिम्मेदारों ने कार्यक्रम के दौरान शुद्ध जल के प्रयोग तथा स्वच्छता संबंधी जानकारी दी। सिद्धार्थगर : ब्लाक क्षेत्र के बहेरिया गांव में स्थित पानी टंकी स्थान पर बुधवार को जल जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर जल कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें जल निगम के जिम्मेदार व ग्राम प्रधान प्रतिनिधि दिलीप पाण्डेय उर्फ छोटे सहित भारी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। जिम्मेदारों ने कार्यक्रम के दौरान शुद्ध जल के प्रयोग तथा स्वच्छता संबंधी जानकारी दी। डा. लक्ष्मी कांत शुक्ला ने बताया कि जिन गांव में नीर निर्मल योजना अथवा जल निगम के जरिये पानी की टंकी का निर्माण कराया गया है, वहां के लोग इसी का शुद्ध जल प्रयोग करें। महेश धुरिया, पलटू राम, मधु गौड़, पुष्पा देवी, राजाराम, रमेश चंद्र, बैजनाथ, बजरंगी , प्रदीप पांडेय, रक्षा राम यादव, पांचू यादव, चुनमुन, उर्मिला, जुग्गी लाल आदि मौजूद रहे।
मनोज शर्मा, पालीः राजस्थान में जहां एक ओर मंत्री पुत्र रोहित जोशी के रेप केस ( Rohit Joshi rape case) ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रखी है। वहीं पाली में एक और जनप्रतिनिधि पर भी अब दुष्कर्म का आरोप लग गया है। यहां जिले के रायपुर थाना क्षेत्र में स्थित बर ग्राम पंचायत के सरपंच महेन्द्र चौहान के खिलाफ एक विवाहिता ने घर में घुसकर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करवाया है। विवाहिता का आरोप है कि सरपंच (Mali Sarpanch rape case) ने उसके पति को पहले दो दोस्तों के साथ बाहर भेज दिया। इसके बाद उसके साथ घर में घुसकर दुष्कर्म किया। हालांकि पूरे मामले को लेकर सरपंच ने आरोपों का खंडन किया है। सरपंच ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा है कि पुलिस की जांच में सच सामने आ जाएगा। जानकारी के अनुसार पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। वहीं पीड़िता के भी बयान लेकर उसका मेडिकल भी करवाया गया है। पुलिस के अनुसार 26 वर्षीय विवाहिता का आरोप है कि बर ग्राम पंचायम के सरपंच महेन्द्र चौहान ने उसके घर में घुसकर उसके साथ गत रविवार को साथ दुष्कर्म किया। रविवार को वह और उसका पति बर बस स्टैंड पर खड़े थे, इस दौरान सरपंच महेंद्र चौहान और उनके साथ अशोक और राजू वहां पर खड़े थे। पीड़िता के अनुसार इस दौरान उसे और उसके पति को वे गाड़ी में बिठाकर वो ब्यावर की तरफ ले गए । वहां पर रात्रि साढ़े नौ बजे तक शॉपिंग की, उसके बाद एक होटल में खाना खिलाया। इसके बाद एक जगह पर उनको पान खिलाया, पान में नशीला पदार्थ मिलाया हुआ था। उनको बर बस स्टैंड पर छोड़ दिया, वहां से वे घर आ गए। बताया जा रहा है कि देर रात उसके पति को किसी बहाने आरोपियों ने घर से बुलाकर कहीं पर भेज दिया। पीछे से सरपंच महेंद्र चौहान जबरन उसके घर में घुस गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। सुबह पीड़िता ने अपने पति व परिजनों को इस घटना की जानकारी दी और पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाया। पीडिता का यह भी आरोप है कि चौहान ने इस घटना के बारे में किसी को बताने पर उसे जान से मारने की धमकी दी । वहीं दूसरी ओर सरपंच का यह कहना है कि आरोप लगाने वाली विवाहिता का पति उसके बचपन का मित्र है । रिश्ते में वो उसका साला भी है। विवाहिता का उस दिन जन्मदिन था, इसलिए उसे ब्यावर में खाना खिलाने बुलाया था। विवाहिता ने कुछ लोगों के प्रेशर में आकर उस पर झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है, पुलिस की जांच में सच्चाई सामने आ जाएगी। गौरतलब है कि आरोपी सरपंच चौहान अपने आप को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का करीबी बताता है और उसकी गहलोत के साथ कई फोटो भी हैं।
मनोज शर्मा, पालीः राजस्थान में जहां एक ओर मंत्री पुत्र रोहित जोशी के रेप केस ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रखी है। वहीं पाली में एक और जनप्रतिनिधि पर भी अब दुष्कर्म का आरोप लग गया है। यहां जिले के रायपुर थाना क्षेत्र में स्थित बर ग्राम पंचायत के सरपंच महेन्द्र चौहान के खिलाफ एक विवाहिता ने घर में घुसकर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करवाया है। विवाहिता का आरोप है कि सरपंच ने उसके पति को पहले दो दोस्तों के साथ बाहर भेज दिया। इसके बाद उसके साथ घर में घुसकर दुष्कर्म किया। हालांकि पूरे मामले को लेकर सरपंच ने आरोपों का खंडन किया है। सरपंच ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा है कि पुलिस की जांच में सच सामने आ जाएगा। जानकारी के अनुसार पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। वहीं पीड़िता के भी बयान लेकर उसका मेडिकल भी करवाया गया है। पुलिस के अनुसार छब्बीस वर्षीय विवाहिता का आरोप है कि बर ग्राम पंचायम के सरपंच महेन्द्र चौहान ने उसके घर में घुसकर उसके साथ गत रविवार को साथ दुष्कर्म किया। रविवार को वह और उसका पति बर बस स्टैंड पर खड़े थे, इस दौरान सरपंच महेंद्र चौहान और उनके साथ अशोक और राजू वहां पर खड़े थे। पीड़िता के अनुसार इस दौरान उसे और उसके पति को वे गाड़ी में बिठाकर वो ब्यावर की तरफ ले गए । वहां पर रात्रि साढ़े नौ बजे तक शॉपिंग की, उसके बाद एक होटल में खाना खिलाया। इसके बाद एक जगह पर उनको पान खिलाया, पान में नशीला पदार्थ मिलाया हुआ था। उनको बर बस स्टैंड पर छोड़ दिया, वहां से वे घर आ गए। बताया जा रहा है कि देर रात उसके पति को किसी बहाने आरोपियों ने घर से बुलाकर कहीं पर भेज दिया। पीछे से सरपंच महेंद्र चौहान जबरन उसके घर में घुस गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। सुबह पीड़िता ने अपने पति व परिजनों को इस घटना की जानकारी दी और पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाया। पीडिता का यह भी आरोप है कि चौहान ने इस घटना के बारे में किसी को बताने पर उसे जान से मारने की धमकी दी । वहीं दूसरी ओर सरपंच का यह कहना है कि आरोप लगाने वाली विवाहिता का पति उसके बचपन का मित्र है । रिश्ते में वो उसका साला भी है। विवाहिता का उस दिन जन्मदिन था, इसलिए उसे ब्यावर में खाना खिलाने बुलाया था। विवाहिता ने कुछ लोगों के प्रेशर में आकर उस पर झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है, पुलिस की जांच में सच्चाई सामने आ जाएगी। गौरतलब है कि आरोपी सरपंच चौहान अपने आप को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का करीबी बताता है और उसकी गहलोत के साथ कई फोटो भी हैं।
भारत से वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात जून महीने में 47 प्रतिशत बढ़कर 32. 46 अरब डॉलर हो गया। इंजीनियरिंग के सामान, पेट्रोलियम उत्पादों, रत्न एवं आभूषण की विदेशी बाजारों में मांग के कारण यह तेजी आई है। भारत ने अप्रैल-जून के दौरान अब तक का सर्वाधिक 95 अरब डॉलर निर्यात किया है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 85 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में हुए निर्यात की तुलना में 18 प्रतिशत ज्यादा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार चालू वित्त वर्ष के अंत तक 400 अरब डॉलर के सर्वाधिक निर्यात के एक और लक्ष्य पर काम कर रही है और मंत्रालय इस सिलसिले मेंं संबंधित साझेदारों के साथ मिलकर लक्ष्य हासिल करेगी। उन्होंने कहा, 'अप्रैल से जून 2021 के दौरान वाणिज्यिक वस्तुओं के एक तिमाही में 95 अरब डॉलर के सर्वाधिक निर्यात का लक्ष्य हासिल किया गया है। कोरोना की दूसरी लहर के बावजूद यह लक्ष्य हासिल हुआ है। सेक्टर आधारित हस्तक्षेपों, सभी हिस्सेदारों द्वारा मिलकर काम करने और सरकार के वित्तपोषण की वजह से यह वृद्धि हासिल करने में मदद मिली है। ' उन्होंने उम्मीद जताई कि सेवाओं का निर्यात अगले 5 साल में 500 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। वाणिज्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यन ने संवाददाताओं से कहा कि महत्त्वाकांक्षी 400 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके अलावा 2022-23 तक 500 अरब डॉलर और अगले 5 साल मेंं एक लाख करोड़ रुपये के वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात का लक्ष्य हासिल करने की कवायद होगी। भारत का निर्यात जून में 41. 86 अरब डॉलर था, जो पिछले साल के समान महीने से 96. 33 प्रतिशत और जून, 2019 की तुलना में 2. 03 प्रतिशत ज्यादा है। भारत से वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात जून महीने में 47 प्रतिशत बढ़कर 32. 46 अरब डॉलर हो गया। इंजीनियरिंग के सामान, पेट्रोलियम उत्पादों, रत्न एवं आभूषण की विदेशी बाजारों में मांग के कारण यह तेजी आई है। भारत ने अप्रैल-जून के दौरान अब तक का सर्वाधिक 95 अरब डॉलर निर्यात किया है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 85 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में हुए निर्यात की तुलना में 18 प्रतिशत ज्यादा है।
भारत से वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात जून महीने में सैंतालीस प्रतिशत बढ़कर बत्तीस. छियालीस अरब डॉलर हो गया। इंजीनियरिंग के सामान, पेट्रोलियम उत्पादों, रत्न एवं आभूषण की विदेशी बाजारों में मांग के कारण यह तेजी आई है। भारत ने अप्रैल-जून के दौरान अब तक का सर्वाधिक पचानवे अरब डॉलर निर्यात किया है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में पचासी प्रतिशत और वित्त वर्ष दो हज़ार उन्नीस-बीस की पहली तिमाही में हुए निर्यात की तुलना में अट्ठारह प्रतिशत ज्यादा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार चालू वित्त वर्ष के अंत तक चार सौ अरब डॉलर के सर्वाधिक निर्यात के एक और लक्ष्य पर काम कर रही है और मंत्रालय इस सिलसिले मेंं संबंधित साझेदारों के साथ मिलकर लक्ष्य हासिल करेगी। उन्होंने कहा, 'अप्रैल से जून दो हज़ार इक्कीस के दौरान वाणिज्यिक वस्तुओं के एक तिमाही में पचानवे अरब डॉलर के सर्वाधिक निर्यात का लक्ष्य हासिल किया गया है। कोरोना की दूसरी लहर के बावजूद यह लक्ष्य हासिल हुआ है। सेक्टर आधारित हस्तक्षेपों, सभी हिस्सेदारों द्वारा मिलकर काम करने और सरकार के वित्तपोषण की वजह से यह वृद्धि हासिल करने में मदद मिली है। ' उन्होंने उम्मीद जताई कि सेवाओं का निर्यात अगले पाँच साल में पाँच सौ अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। वाणिज्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यन ने संवाददाताओं से कहा कि महत्त्वाकांक्षी चार सौ अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके अलावा दो हज़ार बाईस-तेईस तक पाँच सौ अरब डॉलर और अगले पाँच साल मेंं एक लाख करोड़ रुपये के वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात का लक्ष्य हासिल करने की कवायद होगी। भारत का निर्यात जून में इकतालीस. छियासी अरब डॉलर था, जो पिछले साल के समान महीने से छियानवे. तैंतीस प्रतिशत और जून, दो हज़ार उन्नीस की तुलना में दो. तीन प्रतिशत ज्यादा है। भारत से वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात जून महीने में सैंतालीस प्रतिशत बढ़कर बत्तीस. छियालीस अरब डॉलर हो गया। इंजीनियरिंग के सामान, पेट्रोलियम उत्पादों, रत्न एवं आभूषण की विदेशी बाजारों में मांग के कारण यह तेजी आई है। भारत ने अप्रैल-जून के दौरान अब तक का सर्वाधिक पचानवे अरब डॉलर निर्यात किया है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में पचासी प्रतिशत और वित्त वर्ष दो हज़ार उन्नीस-बीस की पहली तिमाही में हुए निर्यात की तुलना में अट्ठारह प्रतिशत ज्यादा है।
महाराष्ट्र मे चल रही सियासी खींचतान पर अब जल्द ही विराम लगाने की तैयारी शुरु हो चुकी है. महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फ्लोर टेस्ट का ऐलान कर दिया है. ऐसे में बताया जा रहा है कि बीते एक सप्ताह से गुवाहाटी में रुके एकनाथ शिंदे गुट अब गोवा होते हुए मुंबई पहुंचने का प्लान है. गुवाहाटी। महाराष्ट्र मे चल रही सियासी खींचतान पर अब जल्द ही विराम लगाने की तैयारी शुरु हो चुकी है. महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फ्लोर टेस्ट का ऐलान कर दिया है. ऐसे में बताया जा रहा है कि बीते एक सप्ताह से गुवाहाटी में रुके एकनाथ शिंदे गुट अब गोवा होते हुए मुंबई पहुंचने का प्लान है. बता दें कि बीते दिन बागी नेता एकनाथ शिंदे ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनके पास 50 MLAs का समर्थन का है और वह बालासाहब के शिवसेना को आगे ले जाने का कार्य कर रहें हैं,साथ ही उन्होने कहा कि आगे कि रणनीति आपको सभी को बताई जाएगी हम जल्द मुंबई लौट रहें हैं। उधर,बीजेपी नेता व महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बीते दिन दिल्ली पहुंचकर बीजेपी के आलाकमान के साथ मुलाकात की. यह मुलाकात काफी अहम बताया जा रहा है. कहा जा है कि इस मुलाकात में भाजपा ने सरकार बनाने के समीकरणों पर चर्चा की है. फडणवीस कल ही मुलाकात के बाद मुंबई लौट आए और देर शाम राज्यपाल से भी मुलाकात की. जिसके बाद बताया जा रहा है कि राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट का ऐलान किया है।
महाराष्ट्र मे चल रही सियासी खींचतान पर अब जल्द ही विराम लगाने की तैयारी शुरु हो चुकी है. महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फ्लोर टेस्ट का ऐलान कर दिया है. ऐसे में बताया जा रहा है कि बीते एक सप्ताह से गुवाहाटी में रुके एकनाथ शिंदे गुट अब गोवा होते हुए मुंबई पहुंचने का प्लान है. गुवाहाटी। महाराष्ट्र मे चल रही सियासी खींचतान पर अब जल्द ही विराम लगाने की तैयारी शुरु हो चुकी है. महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फ्लोर टेस्ट का ऐलान कर दिया है. ऐसे में बताया जा रहा है कि बीते एक सप्ताह से गुवाहाटी में रुके एकनाथ शिंदे गुट अब गोवा होते हुए मुंबई पहुंचने का प्लान है. बता दें कि बीते दिन बागी नेता एकनाथ शिंदे ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनके पास पचास MLAs का समर्थन का है और वह बालासाहब के शिवसेना को आगे ले जाने का कार्य कर रहें हैं,साथ ही उन्होने कहा कि आगे कि रणनीति आपको सभी को बताई जाएगी हम जल्द मुंबई लौट रहें हैं। उधर,बीजेपी नेता व महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बीते दिन दिल्ली पहुंचकर बीजेपी के आलाकमान के साथ मुलाकात की. यह मुलाकात काफी अहम बताया जा रहा है. कहा जा है कि इस मुलाकात में भाजपा ने सरकार बनाने के समीकरणों पर चर्चा की है. फडणवीस कल ही मुलाकात के बाद मुंबई लौट आए और देर शाम राज्यपाल से भी मुलाकात की. जिसके बाद बताया जा रहा है कि राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट का ऐलान किया है।
Fashion : आजकल लड़कियों के बीच लिक्विड (Lipstick) लिपस्टिक काफी लोकप्रिय हो रही है और यह सबसे ज्यादा यूज होने वाले ब्यूटी प्रॉडक्ट्स में से एक बन गई है। जिन्हें भी मेकअप का शौक है उनके बैग में कम से कम एक लिक्विड (Lipstick) लिपस्टिक जरूर मिल जाएगी। अन्य (Lipstick) लिपस्टिक की अपेक्षा ये ज्यादा समय तक टिकती है और इसका कलर भी काफी इन्टेस होता है। इसका एक कोट ही आपके लिप्स को बेहद खूबसूरत कलर देता है। बाकि लिपस्टिक्स की तरह इसे झटपट नहीं लगाया जा सकता। लिक्विड (Lipstick) लिपस्टिक लगाते समय आपको धैर्य रखने की जरूरत होती है। इसे आप जल्दबाजी में कभी न लगाएं। इसे लगाते वक्त समय लें ताकि प्रॉपर आउटलाइन और फिनिशिंग दे सकें। लिक्विड (Lipstick) लिपस्टिक काफी पिगमेंटेड होती है इसलिए इसे लगाने के साथ-साथ मेकअप करना भी जरूरी हो जाता है। मेकअप बेस के तौर पर फाउंडेशन लगाएं और अच्छी तरह से मेकअप करें ताकि देखने में अजीब न लगे। आप लिपस्टिक की मैचिंग का ब्लश भी यूज कर सकती हैं। लिक्विड (Lipstick) लिपस्टिक का एक कोट काफी होता है। एक्सट्रा पिगमेंटेशन से बचने के लिए लिपस्टिक लगाने से पहले एकस्ट्रा लिपस्टिक स्टिक से हटा दें। इससे आपके लिप्स को टेक्सचर भी मिलेगा और एकस्ट्रा लिपस्टिक पर कंट्रोल भी रहेगा। ड्रमैटिक लुक के लिए आप लिपस्टिक की एक्सट्रा कोट्स लगा सकती हैं। अगर आप के होंठ अक्सर सूखे और फटे रहते हैं तो (Lipstick) लिपस्टिक लगाने से पहले होंठों को मॉइश्चराइज जरूर करें। इससे आपके होंठ हाइड्रेटेड रहेंगे। लिपस्टिक लगाने से पहले होंठों पर लिप बाम लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें। इसके बाद ही लिक्विड लिपस्टिक लगाएं। (Lipstick) लिपस्टिक लगाने का सबसे अहम रूल है कि लिपस्टिक सबसे पहले निचले होंठ पर लगाएं और फिर दोनों होंठों को एकसाथ प्रेस करें जिससे की लिरस्टिक आपस में मिल जाए। लिप ब्रश या लिप लाइनर से होंठों को अच्छी तरह से शेप दें। ये ध्यान रखें कि लिप लाइनर का कलर लिपस्टिक से एक शेड डार्क होना चाहिए।
Fashion : आजकल लड़कियों के बीच लिक्विड लिपस्टिक काफी लोकप्रिय हो रही है और यह सबसे ज्यादा यूज होने वाले ब्यूटी प्रॉडक्ट्स में से एक बन गई है। जिन्हें भी मेकअप का शौक है उनके बैग में कम से कम एक लिक्विड लिपस्टिक जरूर मिल जाएगी। अन्य लिपस्टिक की अपेक्षा ये ज्यादा समय तक टिकती है और इसका कलर भी काफी इन्टेस होता है। इसका एक कोट ही आपके लिप्स को बेहद खूबसूरत कलर देता है। बाकि लिपस्टिक्स की तरह इसे झटपट नहीं लगाया जा सकता। लिक्विड लिपस्टिक लगाते समय आपको धैर्य रखने की जरूरत होती है। इसे आप जल्दबाजी में कभी न लगाएं। इसे लगाते वक्त समय लें ताकि प्रॉपर आउटलाइन और फिनिशिंग दे सकें। लिक्विड लिपस्टिक काफी पिगमेंटेड होती है इसलिए इसे लगाने के साथ-साथ मेकअप करना भी जरूरी हो जाता है। मेकअप बेस के तौर पर फाउंडेशन लगाएं और अच्छी तरह से मेकअप करें ताकि देखने में अजीब न लगे। आप लिपस्टिक की मैचिंग का ब्लश भी यूज कर सकती हैं। लिक्विड लिपस्टिक का एक कोट काफी होता है। एक्सट्रा पिगमेंटेशन से बचने के लिए लिपस्टिक लगाने से पहले एकस्ट्रा लिपस्टिक स्टिक से हटा दें। इससे आपके लिप्स को टेक्सचर भी मिलेगा और एकस्ट्रा लिपस्टिक पर कंट्रोल भी रहेगा। ड्रमैटिक लुक के लिए आप लिपस्टिक की एक्सट्रा कोट्स लगा सकती हैं। अगर आप के होंठ अक्सर सूखे और फटे रहते हैं तो लिपस्टिक लगाने से पहले होंठों को मॉइश्चराइज जरूर करें। इससे आपके होंठ हाइड्रेटेड रहेंगे। लिपस्टिक लगाने से पहले होंठों पर लिप बाम लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें। इसके बाद ही लिक्विड लिपस्टिक लगाएं। लिपस्टिक लगाने का सबसे अहम रूल है कि लिपस्टिक सबसे पहले निचले होंठ पर लगाएं और फिर दोनों होंठों को एकसाथ प्रेस करें जिससे की लिरस्टिक आपस में मिल जाए। लिप ब्रश या लिप लाइनर से होंठों को अच्छी तरह से शेप दें। ये ध्यान रखें कि लिप लाइनर का कलर लिपस्टिक से एक शेड डार्क होना चाहिए।
CISCE Board ICSE 10th & ISC 12th Result 2021: इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन, ICSE, ISC रिजल्ट 2021 आज 23 जुलाई, 2021 को दोपहर 3 बजे कक्षा 10 और 12 दोनों के परिणाम घोषित कर दिए हैं। छात्र सीआईएससीई की आधिकारिक वेबसाइट cisce. org पर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे पहले, CISCE ने COVID 19 स्थिति के कारण भारत में विभिन्न अन्य राष्ट्रीय और राज्य बोर्डों के साथ कक्षा 10 और कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा रद्द कर दी थी। बोर्ड ने परिभाषित आंतरिक मूल्यांकन नीति के आधार पर आईसीएसई और आईएससी रिजल्ट 2021 तैयार करने का निर्णय लिया था। पहले जारी मूल्यांकन नीति के अनुसार, बोर्ड ने आईसीएसई रिजल्ट 2021 तैयार करने के लिए कक्षा 9 और कक्षा 10 की आंतरिक परीक्षाओं के नंबरों पर विचार किया है। दूसरी ओर, कक्षा 11 और कक्षा 12 की आंतरिक परीक्षाओं के नंबरों को आईएससी रिजल्ट तैयार करने के लिए माना जाएगा। सीआईएससीई ने मान्यता प्राप्त स्कूलों को सूचित किया है कि आईसीएसई और आईएससी के परिणाम परिषद की वेबसाइट पर और एसएमएस के माध्यम से उपलब्ध होंगे। स्कूलों के लिए टैबुलेशन रजिस्टर्स करियर पोर्टल से उपलब्ध कराए जाएंगे।
CISCE Board ICSE दसth & ISC बारहth Result दो हज़ार इक्कीस: इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन, ICSE, ISC रिजल्ट दो हज़ार इक्कीस आज तेईस जुलाई, दो हज़ार इक्कीस को दोपहर तीन बजे कक्षा दस और बारह दोनों के परिणाम घोषित कर दिए हैं। छात्र सीआईएससीई की आधिकारिक वेबसाइट cisce. org पर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे पहले, CISCE ने COVID उन्नीस स्थिति के कारण भारत में विभिन्न अन्य राष्ट्रीय और राज्य बोर्डों के साथ कक्षा दस और कक्षा बारह की बोर्ड परीक्षा रद्द कर दी थी। बोर्ड ने परिभाषित आंतरिक मूल्यांकन नीति के आधार पर आईसीएसई और आईएससी रिजल्ट दो हज़ार इक्कीस तैयार करने का निर्णय लिया था। पहले जारी मूल्यांकन नीति के अनुसार, बोर्ड ने आईसीएसई रिजल्ट दो हज़ार इक्कीस तैयार करने के लिए कक्षा नौ और कक्षा दस की आंतरिक परीक्षाओं के नंबरों पर विचार किया है। दूसरी ओर, कक्षा ग्यारह और कक्षा बारह की आंतरिक परीक्षाओं के नंबरों को आईएससी रिजल्ट तैयार करने के लिए माना जाएगा। सीआईएससीई ने मान्यता प्राप्त स्कूलों को सूचित किया है कि आईसीएसई और आईएससी के परिणाम परिषद की वेबसाइट पर और एसएमएस के माध्यम से उपलब्ध होंगे। स्कूलों के लिए टैबुलेशन रजिस्टर्स करियर पोर्टल से उपलब्ध कराए जाएंगे।
भारत में कोरोनावायरस का कहर थमने का नाम नही ले रहा है. वही, कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी है. देश में पिछले 24 घंटे में देश में कोरोना वायरस के 149 नए मामले सामने आए हैं. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देशभर में संक्रमितों की संख्या 800 को पार कर गई है. देश में कोरोना वायरस के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 873 हो गई है. स्वास्थ्य मंत्रालय के सुबह 9. 30 बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक देश में फिलहाल 775 सक्रिय मामले हैं. वहीं 78 लोग अस्पताल में इलाज के बाद ठीक हो गए हैं. देश में कोराना से मरने वालों का आंकड़ा फिलहाल 19 है. इस मामले को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार सुबह 9. 30 बजे तक 180 मामलों के साथ महाराष्ट्र में सबसे अधिक कोरोना वायरस रोगियों की संख्या है, वहीं केरल 173 मामलों की पुष्टि के साथ सूची में दूसरे स्थान पर है. हालांकि, महाराष्ट्र और केरल में क्रमशः 25 और 11 मरीज ठीक भी हुए हैं. वही, कोरोना वायरस का कहर देश के 27 राज्यों तक पहुंच चुका है. देश के 27 राज्यों में कुल 873 मरीज अब तक सामने आ चुके हैं. इनमें से 826 मरीज भारत के हैं तो 47 मरीज विदेशी हैं. वहीं 78 लोगों को अस्पताल से डिस्चार्ज किया जा चुका है. देश में कोरोना से अब तक 19 लोगों की मौत हो चुकी है. क्या भारत ने सबसे पहले बना लिया है कोरोना वायरस का टीका ? अगर आपको नही पता तो बता दे कि शुक्रवार को एक दिन में देश में कोरोना के संक्रमण के 125 नए मामले सामने आए हैं, जबकि चार लोगों की मौत हो गई है. देशभर में संक्रमितों की संख्या 800 को पार कर गई है. जिसमें 47 विदेशी नागरिक, वायरस के चलते जान गंवाने वाले 20 व्यक्ति और स्वस्थ हो चुके 67 लोग शामिल हैं. 27 मार्च तक केरल में 176 मामले सामने आए तो महाराष्ट्र में 153 मामले सामने आए हैं.
भारत में कोरोनावायरस का कहर थमने का नाम नही ले रहा है. वही, कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी है. देश में पिछले चौबीस घंटाटे में देश में कोरोना वायरस के एक सौ उनचास नए मामले सामने आए हैं. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देशभर में संक्रमितों की संख्या आठ सौ को पार कर गई है. देश में कोरोना वायरस के कुल मामलों की संख्या बढ़कर आठ सौ तिहत्तर हो गई है. स्वास्थ्य मंत्रालय के सुबह नौ. तीस बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक देश में फिलहाल सात सौ पचहत्तर सक्रिय मामले हैं. वहीं अठहत्तर लोग अस्पताल में इलाज के बाद ठीक हो गए हैं. देश में कोराना से मरने वालों का आंकड़ा फिलहाल उन्नीस है. इस मामले को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार सुबह नौ. तीस बजे तक एक सौ अस्सी मामलों के साथ महाराष्ट्र में सबसे अधिक कोरोना वायरस रोगियों की संख्या है, वहीं केरल एक सौ तिहत्तर मामलों की पुष्टि के साथ सूची में दूसरे स्थान पर है. हालांकि, महाराष्ट्र और केरल में क्रमशः पच्चीस और ग्यारह मरीज ठीक भी हुए हैं. वही, कोरोना वायरस का कहर देश के सत्ताईस राज्यों तक पहुंच चुका है. देश के सत्ताईस राज्यों में कुल आठ सौ तिहत्तर मरीज अब तक सामने आ चुके हैं. इनमें से आठ सौ छब्बीस मरीज भारत के हैं तो सैंतालीस मरीज विदेशी हैं. वहीं अठहत्तर लोगों को अस्पताल से डिस्चार्ज किया जा चुका है. देश में कोरोना से अब तक उन्नीस लोगों की मौत हो चुकी है. क्या भारत ने सबसे पहले बना लिया है कोरोना वायरस का टीका ? अगर आपको नही पता तो बता दे कि शुक्रवार को एक दिन में देश में कोरोना के संक्रमण के एक सौ पच्चीस नए मामले सामने आए हैं, जबकि चार लोगों की मौत हो गई है. देशभर में संक्रमितों की संख्या आठ सौ को पार कर गई है. जिसमें सैंतालीस विदेशी नागरिक, वायरस के चलते जान गंवाने वाले बीस व्यक्ति और स्वस्थ हो चुके सरसठ लोग शामिल हैं. सत्ताईस मार्च तक केरल में एक सौ छिहत्तर मामले सामने आए तो महाराष्ट्र में एक सौ तिरेपन मामले सामने आए हैं.
लखनऊ में समय से एंबुलेंस न मिलने के कारण मौत होने का मामला सामने आया हैं। शहरी क्षेत्र में एयरपोर्ट के नजदीक चिल्लावां गांव में बिजली का करंट लगने से गंभीर रुप से घायल मरीज को अस्पताल पहुंचने में टाइम लग गया। इस बीच रास्ते में ही मरीज की मौत हो गई। मृतक के परिजनों ने एम्बुलेंस न मिलने के कारण मौत होने के बात कही हैं। तीमारदारों ने बताया कि एम्बुलेंस को लगातार फोन करने के बाद और एक घंटा इंतजार करने के बाद भी एम्बुलेंस नही पहुंची। इस बीच मरीज की हालत बिगड़ती देख आस पड़ोस के लोगों ने मदद करते हुए खुद की गाड़ी से मरीज को लेकर नजदीकी CHC पहुंचे। पर वहां के डॉक्टरों ने 'ब्रॉट डेड' घोषित कर दिया। जानकारी के मुताबिक 30 साल के बबलू की 3 बेटियां हैं। सबसे छोटी बेटी की उम्र महज डेढ़ महीने हैं। रविवार को सुबह बिजली का झटका लगने से उसकी तबियत अचानक से बिगड़ गई। इस बीच परिवारीजनों ने एम्बुलेंस को फोन मिलाया पर समय से न पहुंची। पर मरीज की हालत बिगड़ चुकी थी। थोड़ी देर में मरीज की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई। मृतक रोलिंग मिल में कामगार था। सरोजनी नगर सीएससी प्रभारी डॉ. अंशुमान ने बताया सुबह करीब 10 बजे एयरपोर्ट के पास के चिल्लावां गांव के बबलू नाम का युवक को तीमारदारों द्वारा मृत अवस्था में CHC लाया गया हैं। उसी समय अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद डॉ. विवेक ने थाने को भी पंचनामा के लिए सूचना दी थी। पर मौत होने के पुष्टि होते ही पंचनामा होने से पहले ही तीमारदार मृतक को अपने साथ लेकर चले गए। ड्यूटी में मौजूद डॉक्टर से बिजली का झटका लगने की बात तीमारदारों द्वारा कही गई थी। एम्बुलेंस नही पहुंची इस बाबत जानकारी नही हैं। लखनऊ सीएमओ डॉ. मनोज अग्रवाल से इस बारे में जब सवाल किया गया तो उन्होंने सबसे पहले बिना पंचनामा किए शव ले जाने की बात कही। वही एम्बुलेंस न पंहुचने के सवाल पर उन्होंने कहां कि एजेंसी ने कोई कॉल न आने की बात कही हैं। इस बारें में एजेंसी से लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया हैं। This website follows the DNPA Code of Ethics.
लखनऊ में समय से एंबुलेंस न मिलने के कारण मौत होने का मामला सामने आया हैं। शहरी क्षेत्र में एयरपोर्ट के नजदीक चिल्लावां गांव में बिजली का करंट लगने से गंभीर रुप से घायल मरीज को अस्पताल पहुंचने में टाइम लग गया। इस बीच रास्ते में ही मरीज की मौत हो गई। मृतक के परिजनों ने एम्बुलेंस न मिलने के कारण मौत होने के बात कही हैं। तीमारदारों ने बताया कि एम्बुलेंस को लगातार फोन करने के बाद और एक घंटा इंतजार करने के बाद भी एम्बुलेंस नही पहुंची। इस बीच मरीज की हालत बिगड़ती देख आस पड़ोस के लोगों ने मदद करते हुए खुद की गाड़ी से मरीज को लेकर नजदीकी CHC पहुंचे। पर वहां के डॉक्टरों ने 'ब्रॉट डेड' घोषित कर दिया। जानकारी के मुताबिक तीस साल के बबलू की तीन बेटियां हैं। सबसे छोटी बेटी की उम्र महज डेढ़ महीने हैं। रविवार को सुबह बिजली का झटका लगने से उसकी तबियत अचानक से बिगड़ गई। इस बीच परिवारीजनों ने एम्बुलेंस को फोन मिलाया पर समय से न पहुंची। पर मरीज की हालत बिगड़ चुकी थी। थोड़ी देर में मरीज की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई। मृतक रोलिंग मिल में कामगार था। सरोजनी नगर सीएससी प्रभारी डॉ. अंशुमान ने बताया सुबह करीब दस बजे एयरपोर्ट के पास के चिल्लावां गांव के बबलू नाम का युवक को तीमारदारों द्वारा मृत अवस्था में CHC लाया गया हैं। उसी समय अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद डॉ. विवेक ने थाने को भी पंचनामा के लिए सूचना दी थी। पर मौत होने के पुष्टि होते ही पंचनामा होने से पहले ही तीमारदार मृतक को अपने साथ लेकर चले गए। ड्यूटी में मौजूद डॉक्टर से बिजली का झटका लगने की बात तीमारदारों द्वारा कही गई थी। एम्बुलेंस नही पहुंची इस बाबत जानकारी नही हैं। लखनऊ सीएमओ डॉ. मनोज अग्रवाल से इस बारे में जब सवाल किया गया तो उन्होंने सबसे पहले बिना पंचनामा किए शव ले जाने की बात कही। वही एम्बुलेंस न पंहुचने के सवाल पर उन्होंने कहां कि एजेंसी ने कोई कॉल न आने की बात कही हैं। इस बारें में एजेंसी से लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया हैं। This website follows the DNPA Code of Ethics.
ब्रिटेन में आम चुनावों के लिए हो रहा मतदान समाप्त हो गया है. शुरुआती नतीजे मध्यरात्री तक आने शुरू हो जाएंगे जबकि शुक्रवार दोपहर तक पूरे नतीजे आ जाएंगे. बीबीसी, आईटीवी और स्काई न्यूज़ के लिए किए गए एक्ज़िट पोल के मुताबिक कंज़रवेटिव पार्टी 316 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी होगी. ये बहुमत से कुछ कम हैं. वहीं लेबर पार्टी को 239 सीटें मिल सकती हैं. एक्ज़िट पोल्स के अनुसार लिबरल-डेमोक्रेटिक पार्टी को सिर्फ़ दस सीटें जबकि स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी) को 58, प्लेड केमरू यानी पार्टी ऑफ़ वेल्स को चार, यूनाइटेड किंगडम इंडीपेंडेट पार्टी (यूकिप) को दो और ग्रीन पार्टी को दो सीटें मिल सकती हैं. सरकार बनाने के लिए 326 सीटें ज़रूरी हैं. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं. )
ब्रिटेन में आम चुनावों के लिए हो रहा मतदान समाप्त हो गया है. शुरुआती नतीजे मध्यरात्री तक आने शुरू हो जाएंगे जबकि शुक्रवार दोपहर तक पूरे नतीजे आ जाएंगे. बीबीसी, आईटीवी और स्काई न्यूज़ के लिए किए गए एक्ज़िट पोल के मुताबिक कंज़रवेटिव पार्टी तीन सौ सोलह सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी होगी. ये बहुमत से कुछ कम हैं. वहीं लेबर पार्टी को दो सौ उनतालीस सीटें मिल सकती हैं. एक्ज़िट पोल्स के अनुसार लिबरल-डेमोक्रेटिक पार्टी को सिर्फ़ दस सीटें जबकि स्कॉटिश नेशनल पार्टी को अट्ठावन, प्लेड केमरू यानी पार्टी ऑफ़ वेल्स को चार, यूनाइटेड किंगडम इंडीपेंडेट पार्टी को दो और ग्रीन पार्टी को दो सीटें मिल सकती हैं. सरकार बनाने के लिए तीन सौ छब्बीस सीटें ज़रूरी हैं.
न्यामुद्दीन अली,अनूपपुर। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले (Anuppur district) में दर्दनाक सड़क हादसा हुआ है. जिले में दो अलग-अलग सड़क दुर्घटना में दो लोगों की मौत (2 people died) हो गई. जबकि घायलों का अस्पताल में इलाज चल रहा है. घटना के बाद घर में मातम पसरा हुआ है. फिलहाल पुलिस दोनों ही मामले की तफ्तीश कर रही है. जानकारी मुताबिक पहली घटना भालूमाड़ा थाना क्षेत्र के बदरा तिराहे की है, जहां बहन बहनोई को छोड़ने जा रहे बाइक सवार को तेज रफ्तार पिकअप ने टक्कर मार दी. इस हादसे में बाइक सवार युवक नर्मदा सिंह की मौत हो गई, जबकि बहन और बहनोई को गंभीर चोटें आई हैं. जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. वही दूसरी घटना कोतमा थाना क्षेत्र की है, जहां एक बोलेरो वाहन ने बाइक सवार को ठोकर कर दी. बाइक सवार मनीष गुप्ता की मौत हो गई. कोतमा से मनेन्द्रगढ़ जा रहे थे. कोतमा पुलिस ने शव का पंचनामा तैयार करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेजा है. पुलिस पूरे मामले की जांच पर जुट गई है.
न्यामुद्दीन अली,अनूपपुर। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में दर्दनाक सड़क हादसा हुआ है. जिले में दो अलग-अलग सड़क दुर्घटना में दो लोगों की मौत हो गई. जबकि घायलों का अस्पताल में इलाज चल रहा है. घटना के बाद घर में मातम पसरा हुआ है. फिलहाल पुलिस दोनों ही मामले की तफ्तीश कर रही है. जानकारी मुताबिक पहली घटना भालूमाड़ा थाना क्षेत्र के बदरा तिराहे की है, जहां बहन बहनोई को छोड़ने जा रहे बाइक सवार को तेज रफ्तार पिकअप ने टक्कर मार दी. इस हादसे में बाइक सवार युवक नर्मदा सिंह की मौत हो गई, जबकि बहन और बहनोई को गंभीर चोटें आई हैं. जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. वही दूसरी घटना कोतमा थाना क्षेत्र की है, जहां एक बोलेरो वाहन ने बाइक सवार को ठोकर कर दी. बाइक सवार मनीष गुप्ता की मौत हो गई. कोतमा से मनेन्द्रगढ़ जा रहे थे. कोतमा पुलिस ने शव का पंचनामा तैयार करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेजा है. पुलिस पूरे मामले की जांच पर जुट गई है.
WI vs IND: वेस्टइंडीज और भारत के बीच होने वाले टी20 मैच को लेकर बड़ी अपडेट सामने आ रही है। 5 मैचों की टी20 सीरीज के दूसरे मैच के लिए दोनों टीमों के बीच आज यानि सोमवार को सेंट किट्स के वॉर्नर पार्क में भिंडत होने वाली है। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार मुकाबले की शुरुआत पहले भारतीय समय के मुताबिक रात 8 बजे होने वाली थी। लेकिन अब इसको लेकर खबर सामने आई है कि मैच की शुरुआत होने में लगभग 2 घंटे की देरी हो होगी। जानकारी के अनुसार खिलाड़ियों का लगेज स्टेडियम तक पहुंचने में देरी हुई है, जिसके कारण वेस्टइंडीज बनाम भारत (WI vs IND) दूसरे टी20 मैच की टाइमिंग में बदलाव किया गया है। विंडीज दौरे के सभी टी20 मैच भारतीय समयानुसार रात 8 बजे शुरू होने वाले थे, लेकिन अब सोमवार को हुई परेशानी की वजह से सिर्फ दूसरे टी20 मुकाबले की टाइमिंग में बदलाव हुआ है। इसके साथ ही आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वेस्टइंडीज और भारत के बीच 5 मैचों की टी20 सीरीज के आखिरी दो मुकाबले अमेरिका के फ्लोरिडा में आयोजित करने का फैसला लिया गया था। , लेकिन अब इस पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है, क्योंकि मेजबान और टीम इंडिया के खिलाड़ियों के वीजा अभी भी अमेरिका का वीजा नहीं मिला है, ऐसे में अगर तय कार्यक्रम पर खिलाड़ियों को वीजा नहीं मिलता है तो आखिरी शेष मैच भी कैरिबियन में ही खेले जाएंगे। अंत में बात की जाए WI vs IND सीरीज की तो 5 मैचों की टी20 शृंखला के पहले मुकाबले में भारतीय टीम ने मेजबानों को 68 रनों से मात दी थी। विंडीज कप्तान निकोलस पूरन (Nicholas Pooran) ने टॉस जीतने के बाद रोहित शर्मा की अगुवाई वाली टीम को पहले बल्लेबाजी करने का न्योता दिया था। जिसे स्वीकार करते हुए भारत ने 190 रन बनाए। जिसके फलस्वरूप 191 के मिले लक्ष्य के जवाब में मेजबान टीम 8 विकेट के नुकसान पर सिर्फ 122 रन ही बना पाई।
WI vs IND: वेस्टइंडीज और भारत के बीच होने वाले टीबीस मैच को लेकर बड़ी अपडेट सामने आ रही है। पाँच मैचों की टीबीस सीरीज के दूसरे मैच के लिए दोनों टीमों के बीच आज यानि सोमवार को सेंट किट्स के वॉर्नर पार्क में भिंडत होने वाली है। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार मुकाबले की शुरुआत पहले भारतीय समय के मुताबिक रात आठ बजे होने वाली थी। लेकिन अब इसको लेकर खबर सामने आई है कि मैच की शुरुआत होने में लगभग दो घंटाटे की देरी हो होगी। जानकारी के अनुसार खिलाड़ियों का लगेज स्टेडियम तक पहुंचने में देरी हुई है, जिसके कारण वेस्टइंडीज बनाम भारत दूसरे टीबीस मैच की टाइमिंग में बदलाव किया गया है। विंडीज दौरे के सभी टीबीस मैच भारतीय समयानुसार रात आठ बजे शुरू होने वाले थे, लेकिन अब सोमवार को हुई परेशानी की वजह से सिर्फ दूसरे टीबीस मुकाबले की टाइमिंग में बदलाव हुआ है। इसके साथ ही आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वेस्टइंडीज और भारत के बीच पाँच मैचों की टीबीस सीरीज के आखिरी दो मुकाबले अमेरिका के फ्लोरिडा में आयोजित करने का फैसला लिया गया था। , लेकिन अब इस पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है, क्योंकि मेजबान और टीम इंडिया के खिलाड़ियों के वीजा अभी भी अमेरिका का वीजा नहीं मिला है, ऐसे में अगर तय कार्यक्रम पर खिलाड़ियों को वीजा नहीं मिलता है तो आखिरी शेष मैच भी कैरिबियन में ही खेले जाएंगे। अंत में बात की जाए WI vs IND सीरीज की तो पाँच मैचों की टीबीस शृंखला के पहले मुकाबले में भारतीय टीम ने मेजबानों को अड़सठ रनों से मात दी थी। विंडीज कप्तान निकोलस पूरन ने टॉस जीतने के बाद रोहित शर्मा की अगुवाई वाली टीम को पहले बल्लेबाजी करने का न्योता दिया था। जिसे स्वीकार करते हुए भारत ने एक सौ नब्बे रन बनाए। जिसके फलस्वरूप एक सौ इक्यानवे के मिले लक्ष्य के जवाब में मेजबान टीम आठ विकेट के नुकसान पर सिर्फ एक सौ बाईस रन ही बना पाई।
VARANASI : फूलपुर थाना एरिया के कठिरांव लठियां गांव में रविवार की रात विवाहिता उसकी दूधमुंही बच्ची और मासूम भतीजी की निर्ममता से हत्या कर दी गयी। घटना को कुछ और ही रंग देने के लिए विवाहिता को घर से दो किलोमीटर दूर पेड़ से लटका दिया गया। लेकिन लाश खुद हत्या का सूबूत चीख-चीखकर दे रही थी। साथ ही अपनों को इस क्रूर कृत्य के लिए जिम्मेदार बता रही है। घटनाक्रम इशारा कर रहा है कि समाज में सभ्यता का मुखौटा पहनने वाले अपनों ने ही इज्जत की खातिर यह खूनी खेल खेला है। कठिरांव लठियां निवासी कैलाश पटेल की विवाहित बेटी कान्ति पटेल (ख्ख् वर्ष) अपनी दो माह की पुत्री कृष्णा के साथ मायके में रह रही थी। परिवार का कहना है कि रविवार की शाम वह अपने भाई सुनील की बेटी खुशी (सात वर्ष) के साथ कमरे में सो रही थी। रात्रि साढे़ सात बजे जब परिवार के लोग उसे खाना खाने के लिए जगाने गये तो वह नहीं मिली। बेड़ पर पड़ी खुशी की ओर किसी ने ध्यान दिए बिना कान्ति की तलाश शुरू कर दी। लगभग आधे घंटे बाद खुशी की मां शीला देवी फिर कान्ति के कमरे में पहुंची। खुशी को जगाने की कोशिश की तो देखा उसकी सांसे थम चुकी है। इसके बाद घर में कोहराम मच गया। पूरी रात खोज के बाद भी कान्ति और उसकी बेटी का कहीं पता नहीं चला। सुबह ग्रामीण शौच के लिए सीवान की ओर गए तो महुआ के पेड़ से कपड़े के फंदे के सहारे लटकती विवाहिता की लाश नजर आयी। थोड़ी ही दूर पर एक कम्बल में लिपटी दूधमुंही की लाश पड़ी थी। यह बात जंगल में आग की तरफ फैल गयी। मौके पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। थोड़ी देर बाद कैलाश पटेल पहुंचे। उन्होंने मरने वाली की पहचान अपनी बेटी कान्ति और पास में पड़ी दूधमुंही की लाश कृष्णा के रूप में की। तीन मौत की जानकारी होने पर पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर भागे हुए पहुंचे। एसएसपीआर डॉ। एके पांडेय, सीओ, एसडीएम भी आ गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए फोरेंसिंक टीम को बुलाया गया। पुलिस और कान्ति का परिवार पूरे मामले को हत्या के बाद आत्महत्या का रंग देने में लगा रहा है। उनका कहना था कि कान्ति अपनी भतीजी खुशी की गला दबाकर हत्या करने के बाद बेटी को लेकर घर से निकल गयी। पेड़ के नीचे बेटी कृष्णा की भी गला दबाकर हत्या की। उसे वहीं छोड़कर खुद पेड़ पर जा चढ़ी। साथ लाए कपड़े के टुकड़े से फंदा बनाया। फांसी लगाकर जान दे दी। रात को घना कोहरा होने की वजह से घर वाले उसकी तलाश नहीं कर सके। पुलिस और परिजनों की यह बात किसी को पच नहीं रही थी। हालात कुछ और कहानी बयां कर रहे थे। जिस पेड़ की डाल से कान्ति की लाश लटक रही थी वह लगभग क्फ् फुट ऊंचा था। मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था। दोनों हाथ को भी मजबूती से कपड़े से बांधा गया था। उसकी साड़ी खुलकर जमीन से छू रही थी। जलालपुर (जौनपुर) के रहने वाले जर्नादन पटेल से हुई थी। वह मुम्बई में रहकर इलेक्ट्रिशियन का काम करता था। एक साल बाद कान्ति का गौना हुआ। दो महीने ससुराल में रहने के बाद पति उसे साथ लेकर मुम्बई चला गया। पांच-छह महीने बाद गर्भवती कान्ति को मायके पहुंच गया। मायके में ही दो महीने पहले बेटी कृष्णा का जन्म हुआ। जनार्दन को कान्ति के चरित्र पर शंका थी। वह बेटी को भी नाजायज औलाद कहते दोनों से कोई सम्बंध नहीं रखना चाहता था। एक सप्ताह पहले गांव का झुल्लन राजभर मुम्बई जा रहा था। कान्ति भी अपनी बेटी को लेकर उसके साथ मुम्बई पति के पास चली गयी। इस बात को लेकर जर्नादन बुरी तरह से नाराज हो गया। बात जब हद से आगे बढ़ गयी तो कान्ति ने पूना में रहने वाले अपने भाई सुनील को फोन करके बुलाया। उसने दोनों को समझाया और साथ रहने के लिए राजी किया। उसके जाने के बाद फिर पति-पत्नी के बीच फिर झगड़ा शुरू हो गया। जानकारी होने पर जनार्दन बहन और भांजी को लेकर अपने घर ले आया। ख्7 दिसम्बर को कान्ति के घर लौटने के बाद परिवार की एक बार फिर शांति छिन गयी। उस दिन के बाद से लगातार घर में किचकिच होती रही। कान्ति के पास एक मोबाइल था। इससे वह घंटों-घंटों किसी से बात करती थी। मौत के बाद से उसका मोबाइल गायब है। फूलुपर एसओ संजीव कुमार मिश्र के अनुसार मोबाइल पुलिस के हाथ नही लगी है। बरामदगी में पुलिस जुटी हुई है। मोबाइल कॉल डिटेल व पीएम रिपोर्ट आने के बाद घटना के बारे में स्थिति स्पष्ट हो पायेगी। पुलिस ने पिता कैलाश पटेल की तहरीर पर कान्ति के खिलाफ हत्या की रपट दर्ज करते हुए जांच शुरू कर दी है। -परिजनों और पुलिस की कहानी को सच मानें तो कान्ति ने इतनी बड़ी घटना को अंजाम क्यों दिया? -जिस खुशी को कान्ति बेहद प्यार करती थी उसे मारने की क्यों जरूरत पड़ी? -कान्ति ने अगर खुशी को कमरे में मारा तो अपनी बेटी और खुद को मारने के लिए घर से दो किलोमीटर दूर क्यों गयी? -फांसी लगाने वाली कान्ति के मुंह में कपड़ा किसने ठूंसा? -साढ़े पांच फुट की कान्ति क्फ् फुट ऊंचे डाल तक कैसे पहुंच गयी? -रात में भतीजी की हत्या और कान्ति के बेटी सहित गायब होने के बावजूद फैमिली ने पुलिस या गांव वालों को क्यों नहीं बताया? कौन है हत्यारा? फूलपुर थाना एरिया में ऑनर किलिंग का एक मामला अगस्त माह में सामने आया था। घमहापुर में एक परिवार ने झूठी शान में क्8 वर्षीय युवती की हत्या कर उसकी लाश को गांव से दूर नहर के किनारे गाड़ दिया। वह क्ख्वीं की स्टूडेंट थी। उसका दोष इतना था कि वह गांव के एक लड़के से प्रेम कर बैठी थी। परिवार के मना करने बाद भी उसने युवक से रिश्ता नहीं तोड़ा था। इस मामले में युवती के दादा और भाई को पुलिस ने ऑनर किलिंग के मामले में अरेस्ट करके जेल भेज दिया था।
VARANASI : फूलपुर थाना एरिया के कठिरांव लठियां गांव में रविवार की रात विवाहिता उसकी दूधमुंही बच्ची और मासूम भतीजी की निर्ममता से हत्या कर दी गयी। घटना को कुछ और ही रंग देने के लिए विवाहिता को घर से दो किलोमीटर दूर पेड़ से लटका दिया गया। लेकिन लाश खुद हत्या का सूबूत चीख-चीखकर दे रही थी। साथ ही अपनों को इस क्रूर कृत्य के लिए जिम्मेदार बता रही है। घटनाक्रम इशारा कर रहा है कि समाज में सभ्यता का मुखौटा पहनने वाले अपनों ने ही इज्जत की खातिर यह खूनी खेल खेला है। कठिरांव लठियां निवासी कैलाश पटेल की विवाहित बेटी कान्ति पटेल अपनी दो माह की पुत्री कृष्णा के साथ मायके में रह रही थी। परिवार का कहना है कि रविवार की शाम वह अपने भाई सुनील की बेटी खुशी के साथ कमरे में सो रही थी। रात्रि साढे़ सात बजे जब परिवार के लोग उसे खाना खाने के लिए जगाने गये तो वह नहीं मिली। बेड़ पर पड़ी खुशी की ओर किसी ने ध्यान दिए बिना कान्ति की तलाश शुरू कर दी। लगभग आधे घंटे बाद खुशी की मां शीला देवी फिर कान्ति के कमरे में पहुंची। खुशी को जगाने की कोशिश की तो देखा उसकी सांसे थम चुकी है। इसके बाद घर में कोहराम मच गया। पूरी रात खोज के बाद भी कान्ति और उसकी बेटी का कहीं पता नहीं चला। सुबह ग्रामीण शौच के लिए सीवान की ओर गए तो महुआ के पेड़ से कपड़े के फंदे के सहारे लटकती विवाहिता की लाश नजर आयी। थोड़ी ही दूर पर एक कम्बल में लिपटी दूधमुंही की लाश पड़ी थी। यह बात जंगल में आग की तरफ फैल गयी। मौके पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। थोड़ी देर बाद कैलाश पटेल पहुंचे। उन्होंने मरने वाली की पहचान अपनी बेटी कान्ति और पास में पड़ी दूधमुंही की लाश कृष्णा के रूप में की। तीन मौत की जानकारी होने पर पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर भागे हुए पहुंचे। एसएसपीआर डॉ। एके पांडेय, सीओ, एसडीएम भी आ गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए फोरेंसिंक टीम को बुलाया गया। पुलिस और कान्ति का परिवार पूरे मामले को हत्या के बाद आत्महत्या का रंग देने में लगा रहा है। उनका कहना था कि कान्ति अपनी भतीजी खुशी की गला दबाकर हत्या करने के बाद बेटी को लेकर घर से निकल गयी। पेड़ के नीचे बेटी कृष्णा की भी गला दबाकर हत्या की। उसे वहीं छोड़कर खुद पेड़ पर जा चढ़ी। साथ लाए कपड़े के टुकड़े से फंदा बनाया। फांसी लगाकर जान दे दी। रात को घना कोहरा होने की वजह से घर वाले उसकी तलाश नहीं कर सके। पुलिस और परिजनों की यह बात किसी को पच नहीं रही थी। हालात कुछ और कहानी बयां कर रहे थे। जिस पेड़ की डाल से कान्ति की लाश लटक रही थी वह लगभग क्फ् फुट ऊंचा था। मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था। दोनों हाथ को भी मजबूती से कपड़े से बांधा गया था। उसकी साड़ी खुलकर जमीन से छू रही थी। जलालपुर के रहने वाले जर्नादन पटेल से हुई थी। वह मुम्बई में रहकर इलेक्ट्रिशियन का काम करता था। एक साल बाद कान्ति का गौना हुआ। दो महीने ससुराल में रहने के बाद पति उसे साथ लेकर मुम्बई चला गया। पांच-छह महीने बाद गर्भवती कान्ति को मायके पहुंच गया। मायके में ही दो महीने पहले बेटी कृष्णा का जन्म हुआ। जनार्दन को कान्ति के चरित्र पर शंका थी। वह बेटी को भी नाजायज औलाद कहते दोनों से कोई सम्बंध नहीं रखना चाहता था। एक सप्ताह पहले गांव का झुल्लन राजभर मुम्बई जा रहा था। कान्ति भी अपनी बेटी को लेकर उसके साथ मुम्बई पति के पास चली गयी। इस बात को लेकर जर्नादन बुरी तरह से नाराज हो गया। बात जब हद से आगे बढ़ गयी तो कान्ति ने पूना में रहने वाले अपने भाई सुनील को फोन करके बुलाया। उसने दोनों को समझाया और साथ रहने के लिए राजी किया। उसके जाने के बाद फिर पति-पत्नी के बीच फिर झगड़ा शुरू हो गया। जानकारी होने पर जनार्दन बहन और भांजी को लेकर अपने घर ले आया। ख्सात दिसम्बर को कान्ति के घर लौटने के बाद परिवार की एक बार फिर शांति छिन गयी। उस दिन के बाद से लगातार घर में किचकिच होती रही। कान्ति के पास एक मोबाइल था। इससे वह घंटों-घंटों किसी से बात करती थी। मौत के बाद से उसका मोबाइल गायब है। फूलुपर एसओ संजीव कुमार मिश्र के अनुसार मोबाइल पुलिस के हाथ नही लगी है। बरामदगी में पुलिस जुटी हुई है। मोबाइल कॉल डिटेल व पीएम रिपोर्ट आने के बाद घटना के बारे में स्थिति स्पष्ट हो पायेगी। पुलिस ने पिता कैलाश पटेल की तहरीर पर कान्ति के खिलाफ हत्या की रपट दर्ज करते हुए जांच शुरू कर दी है। -परिजनों और पुलिस की कहानी को सच मानें तो कान्ति ने इतनी बड़ी घटना को अंजाम क्यों दिया? -जिस खुशी को कान्ति बेहद प्यार करती थी उसे मारने की क्यों जरूरत पड़ी? -कान्ति ने अगर खुशी को कमरे में मारा तो अपनी बेटी और खुद को मारने के लिए घर से दो किलोमीटर दूर क्यों गयी? -फांसी लगाने वाली कान्ति के मुंह में कपड़ा किसने ठूंसा? -साढ़े पांच फुट की कान्ति क्फ् फुट ऊंचे डाल तक कैसे पहुंच गयी? -रात में भतीजी की हत्या और कान्ति के बेटी सहित गायब होने के बावजूद फैमिली ने पुलिस या गांव वालों को क्यों नहीं बताया? कौन है हत्यारा? फूलपुर थाना एरिया में ऑनर किलिंग का एक मामला अगस्त माह में सामने आया था। घमहापुर में एक परिवार ने झूठी शान में क्आठ वर्षीय युवती की हत्या कर उसकी लाश को गांव से दूर नहर के किनारे गाड़ दिया। वह क्ख्वीं की स्टूडेंट थी। उसका दोष इतना था कि वह गांव के एक लड़के से प्रेम कर बैठी थी। परिवार के मना करने बाद भी उसने युवक से रिश्ता नहीं तोड़ा था। इस मामले में युवती के दादा और भाई को पुलिस ने ऑनर किलिंग के मामले में अरेस्ट करके जेल भेज दिया था।
है, जिसमें सभी किसानों को एक साथ श्रमिकों की आवश्यकता होती हैं कृषि में भूमि की जुताई, बुआई, पौध लगाने, सिंचाई, खर पतवार निकालने, उर्वरक और कीट नाशक दवाओं को छिड़कने, फसल की कटाई, पंवाई, ओसाई, सफाई, फसलों को बोरे में भरना एवं बैलगाड़ी पर लदाने के कार्य के लिए श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इन कार्यों में महिलाओं को मुख्यतया निराई, बुआई, पौध लगाने, कटाई, फसलों से भूसा निकालने के कार्य, दवाई, सफाई, फसल को बोरे में भरने और बैलगाड़ी में लदायी के कार्य में लगाया जाता है। इन कार्यों को किसी भी जाति के लोग कर सकते हैं । कृषि श्रमिक तीन तरीकों या प्रणाली के अनुसार कार्य करते हैं :दैनिक मजदूरी के आधार पर टुकड़े या किसी काम विशेष के लिए निर्धारित मजदूरी (पीस रेट्स) वार्षिक संविदा या ठेके के आधार पर महिलाओं को दैनिक मजूदरी या काम के टुकड़े के आधार पर निर्धारित मजदूरी की दरों के आधार पर काम में लगाया जाता है। जिन किसानों को मजदूरों की आवश्यकता होती है, उन्हें मजदूरों के घर जाकर किसी विशेष दिन उनके खेत पर जाकर काम करने के लिए कहना होता है। श्रमिक किसानों के घर काम करने के लिए कहने के लिए या काम मांगने के लिए श्रमिक नहीं जाते हैं, क्योंकि ऐसा करने से उनके मोल भाव करने की शक्ति कम हो जाती है। यदि किसान उनके घर जाते हैं तो वे मजदूरी के बारे में बात करने में समर्थ होते हैं और उन्हें एक उपयुक्त मजदूरी प्राप्त करने की आशा हो जाती है। जब श्रमिक किसी अन्य गांव या स्थान पर जाते हैं तो उन्हें काम खोजने और करने के लिए कहना और जाना होता है। यह एक निराशाजनक स्थिति होती है। जब किसानों द्वारा उनके पास जाकर काम करने के लिए कहा जाता है तो वे अपने गांव में कार्य करने के बजाय दूसरे गांवों में जाकर कार्य करना अधिक पसंद करते हैं जब कृषि श्रमिकों ( पुरूष और महिलाओ) को दैनिक मजदूरी या कार्य के टुकड़े की मजदूरी पदर पर लगाया जाता है तो ऐसी स्थिति में यह बिल्कुल स्पष्ट होता है कि वे किसी विशेष कृषक के साथ बंधे ( अटेच्ड) नहीं हैं। वे किसी के यहां कार्य करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। इस स्थिति को श्रमिक पसन्द भी करते हैं। केवल वे श्रमिक जो वार्षिक संविदा या ठेके के आधार पर लगाये जाते हैं वे एक विशेष समय के लिए बंधे होते हैं। इसके पश्चात में पुनः ठेका के लिए सौदा कर सकते हैं। यदि श्रकमक किसी किसान से ऋण लिए होते हैं तो ऐसी स्थिति में जब तक ऋण की रकम अदा नहीं हो जाती, तब तक के लिए व उस किसान से बंधे होते हैं । कृषि कार्य के लिए श्रमिक बड़े किसानों या ऐसे किसानों द्वारा लगाये जाते हैं, जो अपने परिवार वालों की सहायता से समय पर कार्य पूरा करने में समर्थ नहीं होते हैं । सरकार द्वारा घोषित 50 से 55 रूपये की सामान्य न्यूनतम मजदूरी की दर के बावजूद विभिन्न विकास खण्डों में या एक ही विकास खण्ड में दी जाने वाली मजदूरी की दरों में समानता का अभाव है। कृषि श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी सम्बन्धित किसान की आर्थिक सम्पन्नता, श्रमिकों की प्राप्ति, किसी विशेष गांव में भू स्वामियों के नियंत्रण शक्ति, बोयी जाने वाली फसल की पुकार तथा आस-पास के गांवों में प्रजलित मजदूरी की दर पर निर्भर है। दैनिक तथा कार्य के टुकड़े पर आधारित मजदूरी नकद, वस्तु रूप में और मिली जुली (आंशिक रूप से नकद और आंशिक रूप से वस्तु के रूप में) विधि से भुगतान की जाती है। बोआई, पौध रोपाई और निराई के कार्य के लिए मजदूरी नकद रूप में ही दी जाती है, क्योंकि उस समय किसान के पास फसल तैयार नहीं होती है। यदि फसल का पिछला स्टाक उसके पास होता है तो वह उपरोक्त कार्यों के लिए भुगतान वस्तु के रूप में कर दिया जाता है। फसल के कटाई, मड़ाई दवाई के समय में भुगतान वस्तु के रूप में किया जाता है, क्योंकि उस समय फसल तैयार होती है। कुछ गांवों में किसानों द्वारा एक सामान्य दर पर मजदूरी देने के लिए सहमति दी जाती है। इस कार्य के लिए कभी-कभी गांव के किसानों द्वारा श्रमिकों की सलाह से मीटिंग कर ली जाती है। किसी श्रमिक के दैनिक मजदूरी या काय्र के टुकड़े (पीस) मजदूरी के आधार पर लगाया जाता है, यह कार्य की आवश्यकता और श्रमिकां के कार्य को देखने के लिए प्राप्त मानव शक्ति पर निर्भर है। यदि श्रमिकों के कार्य को देखने के लिए परिवार में पर्याप्त लोग होते हैं और वे इस बात का निश्चय करने में समर्थ होते हैं कि एक दिन में श्रमिक द्वारा किया गया कार्य पर्याप्त है तो ऐसी स्थिति में श्रमिक को दैनिक मजदूरी के आधार पर लगाया जाता है। ऐसी स्थिति में श्रमिक जितना कार्य एक दिन में कर सकते हैं, उतना ही कार्य करते हैं और श्रमिकों में धीरे-धीरे काम कम करने की प्रवृत्ति होती है, क्योंकि उनके एक दिन का भुगतान पहले से ही निश्चित होता है। यदि श्रमिक द्वारा किये गये श्रम का उत्पादन या काम अधिक होता है तो कृषक को लाभ होता है, क्योंकि इसके लिए उसे अतिरिक्त भुगतान नहीं करना होता है। दूसरी और श्रमिकों को यह प्रयास होता है कि काम को अधिक से अधिक दिनों में पूरा किया जाय, क्योंकि उन्हें उसी कार्य के लिए अधिक दिनों तक कार्य करने पर अधिक मजदूरी या रकम प्राप्त होती है। इस स्थिति में किसान श्रमिकों के साथ कड़ाई से पेश आते हैं और वे हमेशा श्रमिकों के साथ खड़े होकर उन्हें कार्य करने के लिए कहते रहते हैं और उन्हें अधिक सुस्त नहीं होने देते हैं । जब किसानों के पास श्रमिकों के कार्य को देखन के लिए पर्याप्त लोग उसके परिवार में नहीं होते हैं या उन्हें अपने काम को एक निश्चित समय में पूरा करना या कराना होता है, (जैसा कि धान की रोपाई का कार्य), या जब काम अति आवश्यक होता है, ऐसी स्थिति में श्रमिकों को टुकड़े की मजदूरी या पीस दर पर लगाया जाता है। खेत में एक निश्चित क्षेत्र तक या निर्धारित कार्य के लिए एक निश्चित मात्रा की रकम मजदूरी के रूप में देने का सौदा कर लिया जाता है, या मजदूरी का भुगतान बोयी जाने वाली फसल के वजन के एक निश्चित प्रतििाश्त या अनुपात के रूप में किया जाता है। यह केवल बुआई के समय ही किया जाता है। ऐसी स्थिति में श्रमिक एक टीम में या समूह में साथ-साथ कार्य करते हैं और उनका प्रयास काम को कम से कम समय में समाप्त करने का रहता है, क्योंकि ऐसा करने से उनके पास दूसरा काम करने के लिए समय बच जाता है। साधरणतः वे अपने परिवार वालों की सहायता से कार्य को पूरा करते है, जिससे मजदूरी की सारी रकम परिवार वालों को ही प्राप्त हो सके। टीम के सदस्य मजदूरी की रकम को बराबर-बराबर हिस्से में आपस में बांट लेते हैं। यदि परिवार में सदस्यों की संख्या पर्याप्त नहीं होती तो आस-पास के लोगों को टीम में शामिल कर लिया जाता है। श्रमिक काम करने के यंत्र व औजार अपना स्वयं का अपने साथ लाते हैं । जनपद में मुख्यतया गेहूं, चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, लाछी सरसों, तिल, रेण्डी, मूंगफली, गन्ना, आलू आदि फसलों को उगाया जाता है। अध्ययन चयनित विकास खण्डों में फसलों का प्रारूप निम्न प्रकार है । मऊरानीपुर गन्ना, चावल, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, उर्द, मूंग, मसूर, चना, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, आलू । चिरगांव चावल, गेंहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, गन्ना, आलू। बंगरा चावल, गेंहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, गन्ना, आलू । बबीना चावल, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, गन्ना, आलू । किसानों द्वारा खाद्यान्न, दलहन, तिलहन के अतिरिक्त व्यापारिक फसलें जैसे गन्ना, आलू, सनई व हल्दी का उत्पादन थोड़ी मात्रा में किया जाता है । उपरोक्त सभी फसलों में श्रमिकों को उस समय लगाया जाता है जब कार्य इतना अधिक होता है कि परिवार के सदस्यों की क्षमता से बाहर होता है। गेहूं, धान, बाजरा, ज्वार, मक्का, सरसों आदि फसलों के उत्पादन में श्रम प्रधान तकनीक की प्रधानता के कारण एक बड़ी मात्रा में कृषि श्रमिकों को लगाया जाता है। इन कार्यों में श्रमिकों के भौतिक श्रम का प्रयोग किया जाता है। महिला श्रमिक असंगठित हुआ करती है। किसी भी विका खण्ड में कोई भी गैर सरकारी संगठन कार्यशील नहीं पाया गया जो इन महिला श्रमिकों को संगठित कर सके। कृषि श्रमिक संगठन में केवल पुरूष श्रमिक ही सदस्य पाये गये पर इसकी सदस्यता सभी गांवों और सभी श्रमिकों तक विस्तृत नहीं पायी गयी। धान के कृषि में पौध रोपड़, निराई व कटाई के समय श्रमिकों की आवश्यकता होती है। पोध रोपड़ के समय लगभग एक माह का कार्य इन्हें मिल जाता है। यह एक कठिन मेहनत वाला कार्य होता है। इसमें श्रमिकों के पैर में कीचड़ युक्त पानी में सूजन आ जाती है। इनके पैरों में जोंक लग जाती हैं, जिससे उनके पैरों से खून चूस लेती हैं। यदि वे दैनिक मजदूरी के आधार पर कार्य करते हैं तो उन्हें 50 से 60 रूपये प्रतिदिन प्राप्त होते हैं । इसी मजदूरी में उन्हें प्रातः 8 बजे से शाम 6 बजे तक कार्य करना होता है। कुछ विकास खण्डों में उन्हें 7 बजे प्रातः से ही कार्य करना होता है। कुछ विकास खण्डों में उन्हें वहांजाना होता है, जिसका अर्थ यह है कि उन्हें 6 बजे सुबह से 8 बजे रात्रि तक अपने पैरों पर ही चलना और खड़े रहना होता है । दोपहर में भोजन के लिए आधे घण्ओ से एक घण्टे का समय मिलता है, यह भी क्षेत्र पर निर्भर है। उन्हें अपना भोजन साथ लाना होता है। इस भोजन के साथ किसानों द्वारा दाल या सब्जी आदि दे दी जाती है, कहीं कहीं तो केवल प्याज या मिर्च दे दी जाती है। कुछ स्थानों पर उन्हें कुछ नहीं दिया जाता है । केवल चिरगांव विकास खण्ड में ऐसा पाया गाय कि उन्हें पूरा भोजन दिया जाता है, श्रमिकों को जो भोजन प्राप्त होता है, उसे वे ग्रहण करते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या इस भोजन से आप संतुष्ट हैं तो उन्होंने उत्तर में कहा कि इसके अलावा हम कर ही क्या सकते हैं, अपना पेट भरने के लिए खाना ही पड़ता है। यदि उन्हें टुकड़े की मजदूरी के आधार पर ( प्राइस रेट्स) तो उन्हें एक बीघा खेत में पौध रोपड़ के लिए 50 से 150 रूपये तक दिय जाता है (एक एकड़ में 1.75 बीघा होता है) इस कार्य को 5 से 6 व्यक्तियों द्वारा पूरे दिन कार्य करना होता है। यदि उन्हें धान रोपने के लिए बेहन भी निकालनी होती है और बेहन निकाल कर लगाना होता है तो मजदूरी निकली हुई बेहन को केवल लगाने को कार्य करने करने की तुलना में अधिक होती है। इस मजदूरी प्रणाली में वे एक दिन में जितना अधिक कार्य कर सकते हैं, उतना कार्य करते हैं। उन्हें इसके अन्तर्गत दोपहर में कोई भोजन नहीं दिया जाता है। साधारणतः मजदूरी नकद रूप में दी जाती है पर कभी-कभी उन्हें रोपण कार्य के लिए अनाज भी दिया जाता है। धान की खेती में अगला कार्य निराई का होता है। इस कार्य में उन्हें दैनिक मजदूरी के आधार पर रखा जाता है जो 20 रूपये से 30 रूपये के बीच होती है, यह कार्य लगभग 20 से 25 दिन का होता है। धान की कटाई के समय विभिन्न कार्यों में उन्हें पीस दर के अनुसार भुगतान किया जाता है। यदि फसल की कटाई के समय उनके द्वारा सभी कार्य किये जाते हैं तो उन्हें एक बीघे पर अधिकतम 5 मन अनाज ( एक मन = 30 किलोग्राम) या 250 रूपये दिये जाते हैं। सबसे अधिक प्रचलित प्रणाली एक मन की है, जो चिरगांव व बबीना विकास खण्डों में प्रचलित है। एक बीघे की कटाई में 5 से 8 व्यक्तियों को लगाया जाता है। यदि वे विभिन्न कार्यों का सम्पादन करते हैं तो उन्हें तीन से चार दिन लगता है। यदि उनके द्वारा कुछ ही कार्य किये जाते हैं तो मजदूरी का भुगतान नहीं होता है। सामान्यतया एक बीघ भूमि के फसल की कटाई, तौलाई, दवाई, ओसाई, तथा भराई, तथा लदाई के कार्यों के लिए एक मन अनाज मजदूरी में दिया जाता है। यह इस मजदूरी की दर पर श्रमिकों द्वारा कौन-कौन से कार्य किये जायेगें इसका निर्णय स्वंय श्रमिक को करना होता है। फसल की कटाई का कार्य भी अधिकतम एक माह तक चलता है। गेहूं की खेती में मजदूरी का भुगतान दैनिक आधार पर किया जाता है। श्रमिकों को 15 से 20 रूपये और दोपहर का भोजन प्रतिदिन दिया जाता है। बुआई व कटाई के लिए यही मजदूरी दी जाती है, फिर भी क्षेत्रीय अन्तर पाया जाता है। गेहूं की खेती में पीस रेट की मजदूरी की प्रथा नहीं प्रचलित है। इस कार्य में उन्हें एक माह का समय मिलता है। कुछ स्थानों पर ऐसा पाया गया कि गेहूं की कृषि में भी फसलों की कटाई में पीस रेट के अनुसार मजदूरी दी जाती है। उन्हें एक बीघ गेहूं का खेत काटने के लिए 16 से 20 सेर गेहूं ( 1 सेर = 1/2 किलो) दिया जाता है। इस कार्य के लिए एक दिन में कार्य पूरा करने के लिए दो व्यक्तियों को कार्य में लगाया जाता है। इसी प्रकार एक गेहूं के एक बीघा खेत की फसल काटने के लिए अधिकतम दो मन अनाज दिया जाता है। एक दिन में पूरा कार्य सम्पन्न कराने के लिए पांच या 6 व्यक्तियों को लगाया जाता है। मऊरानीपुर व चिरगांव विकास खण्डों के कुछ गांवों में गेहूं की फसल काटने के लिए सात से दस किलोग्राम गेहूं दैनिक मजदूरी के रूप में दिया जाता है। बंगरा व बबीना विकास खण्ड के कुछ गांवो में 15 रूपये तथा डेढ़ और दो सेर गेहूं दैनिक मजदूरी के रूप में दिया जाता है। चिरगांव विकास खण्ड के गांवों में 4 किलो गेहूं व दोपहर का भोजन दैनिक मजदूरी के रूप में दिया जाता है, या इसके बदले में 5 बुशल गेहूं दिया जाता है (जो 6 सेर गेहूं के बराबर होता है) गेहूं के बुआई व कटाई में भी धान की कृषि की भांति मेहनत करने की आवश्यकता होती है। कृषि में उन्हें 15 रूपये से 20 रूपये और भोजन प्रतिदिन के हिसाब से बोआई के समय दिया जाता है। इसकी कृषि मऊरानीपुर और बबीना विकास खण्डों में अधिक होती है। उन्हें 8 बजे प्रातः से 6 बजे शाम तक कार्य करना होता है। बीच में एक घण्टे का विश्राम दिया जाता है। फसल की कटाई के समय मजदूरी का भुगतान पीस रेट के अनुसार किया जाता है। एक बीघे बाजरे की कटाई के लिए उन्हें 4 से 8 सेर बाजरा दिया जाता है। बाजरे में उसके दाने को अलग करने का कार्य अतिरिक्त होता है, इसके लिए भी उन्हें बाजरे के रूप में भुगतान किया जाता है। इन दोनों कार्यों में उन्हें दोपहर का भोजन भी दिया जाता है। कहीं-कहीं बाजरे की बाली काटने के लिए 20 रूपये प्रतिदिन की मजदूरी दी जाती है। कुछ स्थानों पर उन्हें भोजन नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें चाय और बीड़ी दी जाती है तथा भोजन दोनों दिय जाता है। यदि मौसम सूखा होता है, तो वे अधिक कार्य करना सम्भव नहीं होता है। यदि परिवार बड़ा होता है तो वे एक दिन में अधिक बाजरा प्राप्त करने में सर्मा होते हैं। बाजरे की बुवाई से कटाई तथा उन्हें 15 से 20 दिनों का कार्य प्रत्येक स्तर पर प्राप्त हो जाता है। अन्य फसलों के उत्पादन जैसे मक्का, ज्वार आदि की कृषि में श्रमिकों को कुछ दिनों के लिए दैनिक मजदूरी के आधार पर कार्य मिल जाता है । यह समय एक सप्ताह से दस दिन तक का होता है। इन फसलों में उन्हें 15 रूपये से 20 रूपयों और भोजन मजदूरी के रूप में प्राप्त होता है। वस्तुओं के रूप में मजदूरी देते समय किसान न फसलों को बाजार के मूल्य पर विचार करके कम से कम या सस्ते दर पर नकद या वस्तु के रूप में दैनिक या पीस रेट मजदूरी का भुगतान करते हैं। श्रमिक अधिकतर पीस रेट की मजदूरी के आधार पर कार्य करना पसन्द करते हैं, क्योंकि इसके द्वारा इन्हें अधिक आय प्राप्त होती है। साथ ही उन्हें इस प्रकार की मजदूरी में एक निश्चित मात्रा में अनाज प्राप्त हो जाता है, जो उनके भोजन की आवश्यकता को पुरा करने में सहायक होता है। बहुत से किसान फसलों के बचे हुए पदार्थों को भी ले जाने की अनुमति दे देते हैं जो उनके द्वारा ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। अधिकांशतः कृषि श्रमिकों द्वारा इस बात का प्रयास किया जाता है कि परिवार का कम से कम एक व्यक्ति कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करता रहे, क्योंकि उसके द्वारा ईंधन और अनाज की आवश्यकता को पूरा करने में सहायता प्राप्त होती है। कृषि श्रमिकों यदि कृषक की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तो वे श्रमिकों को शीघ्र ही भुगतान कर देते हैं। कुछ लोग श्रमिकों के घर जा कर उन्हें भुगतान कर देते हैं पर कभी-कभी श्रमिकों को मजदूरी प्राप्त करने के लिए किसानों के घर उन्हें भुगतान के लिए याद कराने जाना पड़ता है। कुछ महिलाओं ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ लोग तो ऐसे हैं कि काम कराने के बाद मजदूरी प्राप्त करने जाने के लिए पैर दर्द करने लगते हैं। यदि श्रमिकों द्वारा मजदूरी के कम होने की शिकायत करने पर उन्हें अगले दिन काम पर आने से मना कर दिया जाता है। श्रमिक कार्य करते-करते थक जाते हैं पर वे इसकी शिकायत किससे करें, क्योंकि उनकी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं है। अपना पेट भरने के लिए मेहनत तो करनी ही है, यही मेरे भाग्य में लिखा है, यदि कार्य ने करें तो क्या खायेंगे। महिलाओं ने यह स्पष्ट किया कि चाहे उनके पीठ में दर्द हो या शरीर में दर्द हो उन्हें कार्य करने के लिए जाना होता है। महिलाओं ने इस बात को भी स्पष्ट किया कि उन्हें अधिक मजदूरी इसलिए भी नहीं दी जाती, क्योंकि उच्च जाति के किसान यह सोचते हैं कि यदि इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाती है तो हमारा काम कौन करेंगें, मजदूर मिलने में कठिनाई होगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे अपने शोषण से थक चुकी हैं पर इसके अलावा कोई और रास्ता ही नहीं है। उन्होंने अन्य कार्य करने की इच्छा की पर कठिनाईयों के कारण उसे करने का साहस नहीं पाती हैं । श्रमिकों व किसानों के बीच जो भी शर्तें तय होती हैं वह सब कुछ मौखिक होता है, किसी किसान के यहां कितने दिन काम किया है, केवल इतना ही श्रमिक याद रखते हैं और उन्हीं दिनों की मजदूरी प्राप्त करने के लिए जाते हैं। कभी-कभी उन्हें तुरन्त भुगतान नहीं प्राप्त होता, बल्कि कुछ दिनों के बाद आने के लिए कहा जाता है। यदि वे अपने मजदूरी लेना भूल जाते हैं तो वह कृषकों द्वारा हड़प लिया जाता है। जब किसानों द्वारा काम करने के बदले मजदूरी समय पर नहीं मिल पाती है तो वे ऋण लेने के लिए मजबूर होते हैं। जब किसानों द्वारा श्रमिकों की लेने के लिए मजबूर होते हैं । जब किसानों द्वारा श्रमिकों की मजदूरी की रकम नहीं दी जाती हैं तो उनके लिए ऋण लेना सरल हो जाता है, क्योंकि वे इस आधार पर ऋण लेते हं कि उन्हेंने जिस किसान के यहां कार्य है, उसके यहां से रकम प्राप्त होने पर ऋण की अदायगी कर दी जायेगी। इस आधार पर वे ऋणदाता से ऋण प्राप्त हो जाता है। किसान अपने अनाज की अच्छी कीमत प्राप्त करने के लिए अपने अनाज की बिक्री तुरन्त न करके कुछ दिन रोक लेता है और श्रमिको को दी जाने वाली रकम के भुगतान पड़ता है। ऐसी स्थिति में श्रमिक को ऋण वापस करने वाला नही समझा जाता। इसलिए उन्हें अपने गांव में ऋण मिलना कठिन होता है। उन्हें अपने गांव में ऋण उनके यहां काम करने का ठेका लेने का वायदा करने पर ही प्राप्त होता है। महिलाओं ने आपसी बातचीत में यह स्पष्ट किया कि अपने गांव में उन्हें या उनके पति को ऋण उसी समय प्राप्त हो सकता है, जब उधार देने वाले में यह विश्वास हो कि उसकी रकम वापस कर दी जायेगी और ऋण लेने के लिए पर्याप्त सम्पत्ति या गहने हैं। यदि खेत हो या जमीन हो या उस फसल खड़ी हो या घर में जानवर हो तो ऐसी स्थिति में गांव में ऋण मिल सकता है। हमारे पास ऐसी सम्पत्तियों के अभाव में कोई रूपया नहीं देना चाहता है। हम लोगों को जब रकम प्राप्त करना बहुत जरूरी होता है। तो हमें जो भी काम मिलता है, उसे करना होता है। अपने सम्बन्धों को किसानों से अच्छज्ञ बनाये रखने तथा भविष्य में काम मिलने की गारन्टी के लिए जब की उन्हें किसी किसान द्वारा काम करने के लिए बुलाया जाता है तो उन्हें जाना पड़ता है। मऊरानीपुर एवं बंगरा में ऐसा पाया गया कि काम करने के लिए आदिवासी महिलाओं व पुरूषों को आस-पास के क्षेत्रों से बुलाया जाता है, क्योंकि उन्हें कम मजदूरी देनी होती है और गांव के स्थानीय महिलाओं को काम पाने में कठिनाई होती है। दैनिक मजदूरी या पीस रेट मजदूरी दोनों के अन्तर्गत दुर्घटना होने पर किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति शिशु कल्याण या स्वसस्थ्य की सुविधाओं की व्यवस्था नही होती है। इसके उन्हें किसी प्रकार के लाभ जैसे भविष्य निधि बोनस और ग्रेच्यूटी आदि ही प्राप्त होता है । यद्यपि ग्रामीण क्षेत्र की महिला क्षमिक भी न्युनतम मजदूरी कानून के अन्तर्गत आती है। पर कानून को भली भांति लागू करना अभी भी बाकी हैं यह शिशु कल्याण कल्याण की सुविधाओं के अभाव में महिलाओं को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने बच्चों के साथ ले जाना होता है, जिसे वे एक कपड़े में सुलाकर वे किसी पेड़ की डाल में लटका देती है। कभी-कभी वे अपने साथ लकड़ी का खटोला ले जाती हैं और उसमं बच्चे को सुला देती है। बच्चे के रोने पर भी उन्हें कभी-कभी किसानों द्वारा काम से अलग कर दिया जाता है। काम के समय उन्हें बच्चों को देखने की अनुमति नहीं दी जाती है। ऐसे भी उदाहरण मिले हैं, जहां उन्हें अन्य महिलाओं की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है, क्योंकि वे अपने साथ बच्चे को ले जाती हैं। जब वे सड़क के किनारे काम करती हैं तो उनके बच्चों को कुत्ते नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभी तेज आंधी आने पर बच्चे को चोट लग जाती है। यदि वे अपने बच्चे की देख-रेख में लग जाती हैं तो उन्हें अगले दिन काम पर न आने के लिए कहा जाता है ऐसी स्थिति में बच्चों को कहीं भी किसी भी प्रकार के खतरे में छोड़कर काम पर जाना ही पड़ता है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें अपने साथ काम में मदद करने के लिए ले जाया जाता है। कृषि क्षेत्र में काम एक सीमित समय के लिए ही मिल पाता है। इसलिए श्रमिकों को शेष समय में आय के दूसरे साधन ढूंढने पड़ते हैं। बहुत से श्रमिकों द्वारा कृषि क्षेत्र में श्रम करने के अतिरिक्त घरेलू उत्पादन का कार्य किया जाता है। कुछ जाति के लोग ढोल बजाने का या अन्य बाजा बजाने का कार्य किया जाता है। कुछ लोगों द्वारा अन्य श्रम के कार्य, जैसे निर्माण कार्य में सहयोग देना, ईंटे बनाना, मिट्टी खोदने का कार्य किया जाता है। कुछ महिलायें आस-पास के नगरों के क्षेत्रों में काम करने के लिए जाती हैं। जिन महिलाओं के स्वास्थ्य नहीं ठीक होता या बूढ़ी महिलायें अन्य स्थानों पर काम करने नहीं जाती हैं। बूढ़ी महिलायें कृषि कार्य में भी नहीं जाती हैं, क्योंकि उन्हें कठिन मेहनत करनी होती है। यह केवल मजबूत व स्वस्थ महिलाओं द्वारा ही किया जा सकता है। बूढ़ी महिला एवं पुरूष घरों पर जानवरों को देखने के लिए रह जाते हैं और छोटे बच्चों को भी उन्हीं के पास घर पर छोड़ दिया जाता है। श्रमिकों को कृषि कार्य करने के लिए किसी विशेष कुशलता सीखने की आवश्यकता नहीं होती है, वे इस कार्य करने की दक्षता अपने परिवार में ही और खेतों में अन्य लोगों को काम करता देखकर सीख लेता या प्राप्त कर लेता है। बच्चे इसे आसानी से सीख जाते हैं, क्योंकि वे अपने माता-पिता के साथ खेतों पर उनकी मदद के लिए साथ जाया करते हैं। कृषि में जब मौसम के समय कार्य की अधिकता होती है तो स्कूल जाने वाले बच्चों को भी काम पर ले जाया जाता है। कृषि कार्य करने वाली महिलायें अक्सर अनपढ़ होती हैं, उनमें से ही ऐसे होती हैं जो थोड़ी रकम का जोड़ घटाना आदि कर सकती हैं और उन्हें कितनी मजदूरी प्राप्त होगी इसे ज्ञात कर लेती है। शेष महिलायें पढ़ी लिखी न होने के कारण दूसरों पर निर्भर होती हैं जो उन्हें जोड़ घटाकर उनकी मदद कर देते हैं और उन्हीं के सहारे वे जान पाती हैं कि उन्हें उचित रकम मिल रही है या नहीं। उनके काम कर लेने के बाद परिवार का कोई दूसरा व्यक्ति किसानों के पास उनकी रकम लेने जाता है। महिलायें अपनी रकम पुरूषों को दे देती हैं। जब कभी भी उन्हें परिवार के व्यय के लिए रूपयों की आवश्यकता होती है, वे पुरुषों से कहती हैं। महिलाओं व पुरूषों की आय में अन्तर बहुत कम किया जाता है । महलाओं द्वारा परिवार के खाने, कपड़े और परिवार के स्वास्थ्य पर रकम व्यय किाय जाता है और इस बात को हमेशा निश्चित करती रहती है कि परिवार के लोगों को खाने के लिए घर में पर्याप्त खाद्य सामग्री है। वे इस बात को जानती हैं कि परिवार में एक वर्ष में कितनी खाद्य सामग्री की आवश्यकता होती है, ऐसे में उने सामने इस खाद्य सामग्री को किस प्रकार प्राप्त किया जाये। जो भी काम मिल जाये उसे वे उस समय तक करती रहती हैं जब तक वे परिवार के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री एकत्र नहीं कर लेती हैं। सामान्यतया खाद्य सामग्री का स्टाक मौसम के आधार पर एकत्र किया जाता है। फसलों की कटाई के समय उन्हें पर्याप्त अनाज की प्राप्ति हो जाती है। इसी समय में कृषि श्रमिकों को छोटी रकम के ऋण लेने पड़ते हैं, दूसरे स्थानों पर काम के लिए जाना पड़ता है या घरेलू कार्यों को करने में लगाना होता है या फिर भूखे रहना पड़ता है। वर्षा के पहले उन्हें कुछ काम मिल जाता है और फसल की कटाई तक यह सिलसिला चलता रहता है। जिन क्षेत्रों में केवल एक फसल उगायी जाती है उनमें श्रमिकों को वर्ष के 30 या 40 दिनों तक ही कार्य मिल पाता है पर जहां सिंचाई की सुविधाओं का विकास हुआ है और दो या तीन फसलें उगायी जाती हैं उन क्षेत्रों में 100 से 150 दिनों तक कार्य मिल जाता है। कृषि क्षेत्र में कितने दिनों का कार्य मिल पाता है यह कृषि में प्रयोग किये जाने वाले बीजों और अन्य आगतों पर निर्भर हैं। यदि उत्तम बीजों और अधिक उपज देने वाली फसलों के बीज का प्रयोग किया जाता है। यह कार्य अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है और वे बेकार हो जाती हैं। उत्तम कोटि के बीजों के प्रयोग के कारण निराई काकार्य आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हो जाता है, उपज अधिक होती है, जिससे कुल उत्पादन भी अधिक होता है। निराई के कार्य के लिए महिला श्रमिकों की आवश्यकता नहीं रह जाती है और महिलाओं के कार्य के अवसरों में कमी होती है, लेकिन उन्हें कटाई के समय काम मिल जाता है । वैसे झांसी जनपद में अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग बहुत अधिक मात्रा में नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई की सुविधाओं के विकास के परिणाम स्वरूप कार्य के अवसरों में वृद्धि होती है, क्योंकि इससे एक से अधिक फसलें उगायी जाती हैं और वही कार्य प्रत्येक फसल के उत्पादन में करना होता है। महिलाओं से बातचीत करने के दौरान ऐसा अनभव किया गया कि वे इस बात को जानती हैं कि जितना कार्य वे करती हैं उसके बदले जो उन्हें अनाज मिलता है, या जो आय उन्हें प्राप्त होती है, वह उनके श्रम के मूल्य के बराबर नहीं होती है । वे केवल इतना ही जानती हैं कि किसान हम लोगों के श्रम के आधार पर ही अमीर बने हैं। एक महिला ने इस बात को बहुत ही संक्षिप्त शब्दों में कहा कि हम लोग किसानों के लिए सभी कार्य करते हैंखेत ठीक करने, फसल की कटाई, दवाई, सफाई भराई और उनके घरों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। केवल हम उनका भोजन बनाकर उनके मुंह में नहीं डालते हैं। शेष सभी कार्य हम करते हैं। ग्रामीण महिलाओं में आशावान पाया गाय उनके अनुसार भविष्य उत्तम होगा, उनमें से कुछ का कहना था कि क्या आ हमारी मजदूरी बढ़वा सकेगी ? आप हम लोगों के आर्थिक स्थिति को अच्छी बनाने में सहायता करें और सरकार को लिखकर हमारी मदद करें और हमारे गांव आप फिर आवें, हम लोगों के लिए कुछ अच्छा करें, भगवान आपको सकुशल रखे, चावल का टकर उस पर पालिश करने का कार्य हाथ से किाय जाता था, अब इन कार्यों को चावल मिलें तथा दाल मिलें में मशीनों द्वारा किाय जता है। महिलाओं के कार्य अवसरों में कमी हो रही है और काम के नये अवसर पुरूषों के पक्ष में विकसित हो रहे हैं। अब अधिकांशतः महिलाओं से कुशल कार्य कराये जाते हैं, जैसे पानी भरने का कार्य, भरे अनाजों के बोरे ढोने का कार्य, इन मिलों में कराये जाते हैं। बहुत से श्रमिक हाथ से किये जाने वाले कार्य भूल भी गये हैं। मिट्टी खोदने का कार्य मिट्टी खोदने का कार्य खुले में पुरूष एवं महिलओं दोनों द्वारा एक टीम में किया जाता है, जिसके अन्तर्गत जमीन या खेत को समतल बनाना, सड़क निर्माण, कुएं खोदने का कार्य निर्माण कार्य खेतों के चारों ओर मेड़ बनाना, आदि हैं। यह कार्य बहुत ही विस्तृत तथा बड़े क्षेत्र में फैला होता है। यह एक श्रम प्रधान कार्य है, जिसमें पुरुष यंत्रों की सहायता से मिट्टी खोदते हैं और महिलायें इसे सिर पर रखकर दूसरे स्थान पर रखने के लिए ले जाती या ट्रकों में लादती है, जिसे दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। इस प्रकार के कार्य के अवसर निजी व्यक्तियों द्वारा जैसे किसानों द्वारा जो अपने खेत को समतल बनाने या ठीक करने का कार्य कराते हैं या अपने खेतों के चारों और मिट्टी की दीवाल बनाकर खेत को सुरक्षित बनाने या मेड़ बनाने का काम करते हैं, कुएं खोदने या घर बनाने का कार्य कराते हैं। सरकार का सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग द्वारा भी इस प्रकार के कार्य के अवसर प्रदान किये जाते हैं। लोक निर्माण विभाग द्वारा सड़क, नहर, कुएं तथा बांध निर्माण के कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। लोक निर्माण के कार्य सामान्यतया ठेकेदारों द्वारा कराये जाते हैं। इन कार्यों में लगे श्रमिक परिवार बाहर कार्य करने के कारण अन्य कार्य करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। यह कार्य बहुत ही कठिन परिश्रम वाला होता है। किसी भी जाति के लोग इस कार्य को कर सकते हैं, बशर्ते कार्य मिल जाये । जब कभी व्यक्तियों द्वारा इस प्रकार के कार्य कराये जाते हैं तो वे अपने ही गांव के श्रमिकों को ही आकर काम करने के लिए कहते हैं। केवल कुछ ही श्रमिकों की आवश्यकता होती है और कार्य की मजदूरी दोनों के आपसी बातचीत से निश्चित कर ली जाती है। ऐसे कार्यों में कार्य करने का स्थान श्रमिकों के घर के पास ही होती है। कार्य करने के घंटे तय नहीं होते और न ही मजूरी का भुगतान प्राप्त करने के लिए कोई रजिस्टर नहीं होता, जिस पर हस्ताक्षर किया जाये। सभी लेन-देन मौखिक हुआ करता है। लोक निर्माण विभाग के कार्य जब ठेकेदारों द्वारा कराया जाता है तो वे भी कार्य स्थान के पास के गांवों से ही श्रमिकों को बुलाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें श्रमिकों को कोई अन्य सुविधा प्रदान नहीं करनी होती है। श्रमिक काम करने के पश्चात अपने गांव या घर को लौट जाते हैं। ठेकेदार गांवों के श्रमिकों के बारे में नहीं जानते होते इसलिए उन्हें कुछ लोगों की सहायता लेनी होती है, जिन्हें 'गैंग लीडर' कहा जाता है। गैंग लीडर वे व्यक्ति होते हैं जो ठेकेदारों के हमेशा सम्पर्क में होते हैं। जब कभी कोई प्रोजेक्ट ठेकेदारों को स्वीकृत हुआ करता है तो गैंग लीडर गांवों से श्रमिक उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं, जिनके ऊपर उनका नियंत्रण होता है। वे श्रमिकों को काम दिलाने का वादा करके उन पर नियंत्रण रखते हैं। कार्य के अवसरों के सीमित होने के कारण श्रमिक भी इस बात को जानकर खुश होते हैं कि कोई ऐसा भी है जो उन्हें प्राप्त कार्य की सूचना देकर उनकी उसे प्राप्त करने में उनकी सहायता करता है। गैंग लीडर ठेकेदारों के लिए सुरक्षा का कार्य करता है, क्योंकि वह काम कराने के लिए पर्याप्त मात्रा में श्रमिकों की उपलब्धि कराता है और गैंग लीडर श्रमिकों के लिए भी सुरक्षा का कार्य करता है। वह इस बात की निगरानी रखता है कि ठेकेदार उनसे काम कराकर उनकी मजदूरी की रकम बिना श्रमिकों को दिए हुए भाग न जाये। इसके लिए गैंग लीडर श्रमिकों से एक निश्चित मात्रा की फीस लेता है जो एक रूपये से तीन रूपये प्रतिदिन हुआ करती है या एक रूपया प्रत्येक इकाई कार्य, जो श्रमिकों द्वारा किया जाता है के अनुसार लेता है। यह रकम ठेकेदारों द्वारा उनके मजदूरी की रकम से काट ली जाती है तथा गैंग लीडरों को दे दी जाती है। बहुत से ऐसे भी श्रमिक होते हैं जो बिना गैंग लीडारों की मदद से ही काम ढूंढने के लिए निकलते हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के अन्तर्गत भी इस प्रकार के कार्य लोक निर्माण विभाग के समय पूरी होती है, जब किसी क्षेत्र से इस फिट लम्बाई व 10 फिट चौड़ाई एवं एक फुट गहराई तक की मिट्टी की खुदाई कर ली जाती है। काग्र की एक इकाई दो श्रमिकों ( पुरुष और महिलाओं) द्वारा एक दिन में पूरी कर ली जाती हैं वे उक्त मापक की मिट्टी प्रत्येक दिन में खोद सकते हैं इसलिए मजदूरी की दरों के सम्बन्ध में भ्रम हो जाता है कि यह एक दिन की मजदूरी है, जबकि वह पीस रेट के आधार पर दी गयी मजदूरी होती है। एक इकाई कार्य करने की न्यूनतम मजदूरी 50 रूपये है पर श्रमिकों को 35 रूपये से 40 रूपये ही दिया जाता है और उन्हें पूरी रकम पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाता है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के अन्तर्गत श्रमिकों को कार्य के अनुपात में भुगतान किया जाता है। यदि उनके द्वारा एक इकाई से अधिक का कार्य किया जाता है तो भी उन्हें एक इकाई की ही मजदूरी प्राप्त होती है। लोक निर्माण विभाग के कार्यों में यदि ठेकेदारों द्वारा समय से पहले या शीघ्र ही कार्य समाप्त कराना होता है तो अधिक कार्य के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है, ऐसी स्थिति में श्रमिकों को भुगतान कार्य की इकाईयों के अनुसार दिया जाता है। अधिक तेज कार्य करने वाली श्रमिकों की टीम द्वारा दो या तीन इकाईयों का कार्य एक दिन में पूरा कर लिया जाता है । श्रमिकों से बात के दौरान यह मालूम हुआ कि उन्हें 30 रूपये से 35 रूपये प्रति इकाई कार्य के अनुसार भुगतान किया जात है, पर यह बहुत कम क्षेत्रों में दिया जाता है। महिला श्रमिक अपने छोटे बच्चों को अपने साथ सहयोग से प्रदान किये जाते हैं पर यह इस कार्य को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के कार्यकर्ताओं द्वारा ठेकेदारों की सहायता से कराया जाता है। केवल ठेकेदार इस कार्य को नहीं कराते हैं। दोनों ही दशाओं में श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी है, क्योंकि ठेकेदारों को यह रजिस्टर लोक निर्माण विभाग के कार्यालय में निरीक्षण हेतु प्रस्तुत करना होता है। ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के कार्यकर्ता स्वयं आकर कार्यक्रम पर किये गये व्यय का भुगतान करते हैं। इसलिए रेकार्ड बनाये जाते हैं, शेष लेनदेन मौखिक हुआ करता है। व्यक्तियों द्वारा कराये जाने वाले कार्य में भुगतान प्रत्येक दिन किया जाता है या एक निश्चित मात्रा के कार्य को पूरा किाय जाने पर एक निश्चित रकम का भुगतान किया जाता है। इसके अन्तर्गत दी गयी मजदूरी की दरें कृषि श्रम के समान हुआ करती हैं, फिर भी इनमें मजदूरी की दरें प्रत्येक गांव में अलग-अलग होती हं जो 20 रूपये से 25 रूपये प्रतिदिन के बीच है। जब यह भुगतान एक मुश्त राशि में दिया जाता है तो श्रमिक इसे प्रतिदिन की मजदूरी से तुलना करते हैं। एक मुश्त राशि के भुगतान में जो राशि मिली होती है उस काय्र के लिए जितने श्रमिक लगाये जाते हैं और जितने दिन काम किया गया होता है, उससे भाग देकर राशि का अनुमान लगाया जाता है। लोक निर्माण विभाग तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के कार्यकर्ताओं को भुगतान कार्य की इकाई के अनुसार किया जाता है। कार्य की एक इकाई उससे ली जाती है और उन्हें कपड़े के पालने में रखकर छोड़ दिया जाता है। यदि परिवार में प्रौढ़ महिलायें होती है तो छोटे बच्चों को घर पर उन्हीं के पास छोड़ दिया जाता है। जब श्रमिक काम करने के लिए दूसरे गांवों या गांव से दूर साइट पर कार्य करने जाते हैं तो अपने दोपहर का भोजन साथ ले जाते हैं और अपनी पीने का पानी भी साथ ले जाते हैं, अगर कार्य करने की जगह गांव के पास होती है तो वे खाने के लिए घर वापस चले आते हैं । इन कार्यों में दी जाने वाली मौद्रिक मजदूरी कई बातों पर निर्भर हैं, यदि काम करने की जगह गांव से अधिक दूर है तो उन्हें कुछ अधिक रकम मजदूरी के रूप में दी जाती है। यदि ठेकेदार या गैंग लीडर उन्हें काम पर आने के लिए कहते हैं तो उन्हें कुछ अधिक रकम दी जाती है। जब वे अपने से काम पर आते हैं तो उन्हें कम मजदूरी दी जाती है। कार्य करने की जगह दूर होने पर श्रमिकों को रूकने की सुविधा ठेकेदार द्वारा प्रदान की जाती है, पर जब श्रमिक स्वयं काम ढूढते-ढूढते वहां पहुंचते हैं तो उन्हें रूकने की सुविधा नहीं प्रदान की जाती, भले ही उनके घर काम करने के स्थान से चाहे जितना अधिक दूर हो । इसी प्रकार मजदूरी के भुगतान में भी ठेकेदार केवल उन श्रमिकों की मजदूरी भुगतान में अधिक रूचि लेते हैं, जिन्हें वे कार्य पर बुलाते हैं और जो श्रमिक स्वयं काम पर आते हैं उनके भुगतान में वे अधिक रूचि नहीं लेते हैं। इसी प्रकार जब श्रमिकों द्वारा काम करने के लिए अपने यंत्र और औजार लोय जाते हैं तो उन्हें कुछ अधिक रकम का भुगतान किया जाता है, जो ठेकेदारों के यंत्र व औजारों का प्रयोग करने वाले श्रमिकों को नहीं प्राप्त होती है । कुछ कार्यों में पुरूष एवं महिलाओं को समान मजदूरी नहीं दी जाती है। महिलाओं को 20 रूपये तथा पुरुषों को 30 रूपये प्रतिदिन की मजदूरी दी जाती है और अधिकतर स्थानों पर समान मजदूरी दी जाती है । इसके लिए ठेकेदारों का यह कहना है कि काम के ठेका स्वीकृत कराने के लिए उन्हें बहुत से लोगों को पैसा देना होता है और उस पैसे को भी वसूल करना होता है। इसे वे श्रमिकों को स्वीकृत रकम से कम का भुगतान करके वसूल करते हैं, साथ ही में उन्हें अपने लाभ को भी सुनिश्चित करना होता है। साधारणतः महिलाओं को पूरे प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी नहीं होती, केवल वे इतना जानती हैं कि उन्हें एक निश्चित कार्य को करना है, कभी-कभी उन्हें कुल दिनों की संख्या ज्ञात होती है, जितने दिन उन्हें काम करना होता है, कभी-कभी वे उस समय तक काम करती रहती है, जब तक उन्हें काम करने के लिए कहा जाता है और वे इस बात को नहीं जानती कि काम कब समाप्त होगा। यदि महिलायें कार्य के स्थान पर बीमार हो जाती हैं तो ठेकेदार उनके ठीक होने की जिम्मेदारी नहीं लेता है। ऐसी स्थिति में या तो वे अपने घरों को लौट आती हैं या उसी जगह रूक जाती हैं। अपनी दवा वे वहीं पर उस समय खरीदती हैं, जब उनके पास पैसा होता है। दवा खरीदने के लिए जाने पर पहले वे दवा की कीमत पूंछती हैं। यदि उनके पास उतना पैसा होता है तो वे दवा खरीद लेती हैं, अथवा नहीं । मिट्टी खोदने के कार्य में उन्हें चोट भी लगती है उनके हाथ पेर में खरोंच आ जाती है और कभी-कभी खून निकलने लगता है, लेकिन फिर भी वे कार्य करती हैं। कभी कभी उनके पीठ और कमर में दर्द होता है या सीने में दर्द होता है पर वेपैसे के लिए कार्य करती हैं, जब उनके पास पैसा होता है वे खाती हैं अन्यथा वे भूखे ही रहकर काम करती हैं, उनका कहना है कि यही हमारा जीवन है यदि हम काम न करें तो हमें खाना कौन देगा। हम अपना पेट कैसे भरें ? हम लोगों को मिट्टी में रहना होता है तथा मिट्टी में ही खाना होता है। वे ठेकेदार से कभी भी बहस नहीं करती, भले ही वह उन्हें कम मजदूरी क्यों न दें, क्योंकि वे जानती है कि ऐसा करने पर उन्हें भविष्य में काम नहीं मिलेगा। कभी कभी जब प्रोजेक्ट के लिए फण्ड नहीं आता तो उन्हें अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए एक लम्बे समय तक इन्तजार करना होता है। वे असहाय स्थिति में होती हैं और इस शोषण के लिए वे कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं । कुछ महिलाओं का कहना था कि हम लोगों का जीवन आपकी तरह नहीं है, आप तो लिखकर चली जावेगी। हम लोगों को तो कठिन परिश्रम करना ही पड़ेगा, हम लोग पंखे की हवा के नीचे काम नहीं करते हैं । जब काम का समय छोआ होता है। 15 या 20 दिनों का होता है तो मजदूरी का भुगतान प्रतिदिन प्राप्त हो जाता है। जब काम अधिक समय तक ( तीन से चार माह का ) चलने वाला होता है तो मजदूरी का भुगतान सप्ताह में या पन्द्रह दिनों के बाद होता है। कभी-कभी उन्हें जितना मिलना चाहिए, उतनी धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है। यह केवल ठेकेदारों द्वारा इसलिए किया जाता है कि श्रमिक काम के बीच में छोड़कर चले न जाये। भुगतान का एक दूसरा तरीका प्रत्येक सप्ताह में एक निश्चित मात्रा की रकम अग्रिम के रूप में दी जाती है। यह प्रणाली 'खर्ची प्रथा' कहलाती है, जिसमें श्रमिकों का पूरा भुगतान कार्य के समाप्त होने पर किया जाता है पर श्रमिकों को प्रत्येक सप्ताह में एक धनराशि विभिन्न व्ययों को पूरा करने के लिए अग्रिम के रूप में दे दिया जाता है। श्रमिकों को अन्तिम के रूप में दी जाने वाली कम परिवार के आकार पर निर्भर है और पांच या छः सदस्यों वाले परिवार का एक सौ रूपये की राशि दी जाती है और शेष धनराशि कार्य के पूरे होने पर दी जाती है। यदि श्रमिकों को अतिरिक्त रकम की आवश्यकता होती है तो वे ठेकेदार से मांगते हैं । वास्तव में यह उनकी ही रकम होती है जो वे अपने श्रम द्वारा अर्जित करते हैं और वह ठेकेदारों के पास होती है । ठेकेदार द्वारा दी गयी अग्रिम धनराशि को रजिस्टर में लिखा जाता है और श्रमिक उस पर हस्ताक्षर करते हैं। अधिकांश श्रमिक अशिक्षित होते हैं । ठेकेदार द्वारा दी गयी रकम को याद करना होता है और काम समाप्त होने पर वे प्राप्त होने वाली रकम का हिसाब लगाते हैं। सामान्यतया किसी पढ़े लिख आदमी की सहायता ली जाती है और उसी की माध्यम यह जानने का प्रयास किया जाता है कि उन्हें पूरी रकम जो मिलनी चाहिए वह मिली है या नहीं। कभी कभी गैंग लीडर की भी सहायता ली जाती है । श्रमिकों का भुगतान पति व पत्नी दोनों की मजदूरी उसे दे दी जाती है; जो इसे प्राप्त करने के लिए जाता है । साधारणतः पुरूष ही मजदूरी प्राप्त करने जाता है। महिलायें उसी समय मजदूरी प्राप्त करने जाती हैं, जब उनके पति घर पर नहीं होते या जाने की स्थिति में नहीं होते हैं। ऐसे भी उदाहरण मिले हैं जहां मजदूरी का भुगतान केवल पुरूषों को ही किया जाता है, महिलाओं को भुगतान लेने जाने पर भी नहीं दिया जाता है। बहुत कम महिलायें पढ़ी होती है जो रूपया गिनने में समर्थ होती हैं। वे केवल रजिस्टर में अंगूठा निशान लगती हैं। उनका कहना है कि वे अनपढ़ होती हैं, हम कैसे जान सकते हैं कि हम किस पर हस्ताक्षर बना रहे हैं। वे विश्वास पर कार्य करती हैं, यदि वे इस बात को जानती हैं कि उन्हें जितना मिलना चाहिए, उससे कम दिया जा रहा है, फिर भी वे कुछ नहीं बोलती, क्योंकि वे असहाय होती हैं। वे इस बात को भी जानती हैं कि उनसे कटौती की गयी कम का एक भाग गैंग लीडर को दिया जाता है, कभी-कभी मजदूरी का रूपया मजदूरी प्राप्त होने पर उन्हीं के पास रहता है और कभी-कभी यह रूपया पुरूषों को दे दिया जाता है और आवश्यक पड़ने पर उनसे मांग लिया जाता है। लोक निर्माण विभाग तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में कार्य करने के घण्टे नौ बजे प्रातः 6 बजे सांय तक निश्चित होते हैं। बीच में एक घण्टे का अवकाश दिया जाता है। कहीं-कहीं पर काम 8 बजे प्रातः प्रारम्भ होता है तथा दो घण्टे का अवकाश दोपहर में दिया जाता है। कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें सात बजे प्रातः से सात बजे शाम तक काम करना होता है। कार्य करने के स्थान पर आठ बजे प्रातः पहुंचने के लिए उन्हें अपने घरों से बहुत सवेरे चलना होता है। व्यक्तियों के यहां कार्य करने के घण्टे नहीं निश्चित होते हैं यदि कार्य करने का स्थान दूर होता है तो महलिाओं को कार्य पर जाने व वापस आने के लिए बहुत लम्ब रास्ता चलना पड़ता है। उन्हें 3 से 5 किलोमीटर तक चलना होता है और आते समय वे ईंधन के लिए लकड़ी एकत्र करती आती हैं। किसी भी कार्य में बच्चों के देखरेख, स्वास्थ्य, दुर्घटना, क्षतिपूर्ति या अवकाश की सुविधायें नहीं प्रदान की जाती हैं। यद्यपि लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेकेदारों को इन मदों के लिए भी धनराशि स्वीकृत की जाती है। बहुम कम ऐसा सुना गया या नहीं सुना गया कि श्रमिकों के बीमार होने पर उन्हें कोई धनराशि दी जाती है। उन्हें कार्य स्थल पर रिपोर्ट करना होता है, चाहे वे उस दिन काम करें या न करें। यदि कार्य करने के दौरान उन्हें चोट लग जाती है या वे घायल हो जाते हैं तो बहुत कम ऐसे उदाहरण मिले हैं, जब उनके दवा आदि का व्यय ठेकेदारों द्वारा वहन किए जाते हैं। इन श्रमिकों के लिए भविष्य निधि, बोनस, ग्रेच्युटी आदि का प्रबंध इन श्रमिकों के लिए नहीं ऐसी भी महिलायें पायी गयी जो अपने अपने गांव के निकट कार्य स्थल पर कार्य करती हैं। वे दिन भर काम करने के पश्चात शाम को अपने घरवापस चली आती हैं कुछ ही ऐसी महिला श्रमिक मिली जो बस द्वारा जाकर भी काम करने को तैयार थी, ऐसे में उन्हें अतिरिक्त धनराशि व्यय करनी होती है या प्रत्येक दिन एक घण्टे पैदल ही जाना पड़ता है । ऐसी भी महिलायें मिलीं जो कहीं भी काम करने जाने के लिए तैयार थीं, वे ऐसी महिलायें थी जिनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी नहीं थी और वे अपनी जीविका इसी कार्य से अर्जित करती हैं। इस प्रकार की महिलायें गैंग लीडरों से हमेशा सम्पर्क बनाये रखती हैं, जो उन्हें कार्य के अवसरों के बारे में बताते रहते हैं। वे अवसर अधिक दिनों तक चलने वाले कार्यों की तलाश करती हैं और वे कार्यस्थल पर ही जाकर रहती हैं। इनके कार्यस्थल पर जाने का किराया ठेकेदारों द्वारा दिया जाता है। वापसी किराया श्रमिकों को देना पड़ता है। कार्यस्थल पर रहने के लिए टेन्ट लगाने के लिए पोलीथीन तथा बांस इत्यादि का प्रबंध ठेकेदारों द्वारा कर दिया जाता है, वापसी किराया श्रमिकों को देना पड़ता है। कार्यस्थल पर रहने के लिए पोलीथीन तथा बांस इत्यादि का प्रबंध श्रमिक परिवारों को ही करना होता है। कभी-कभी टेन्ट लगाने के लिए केवल बांस का प्रबंध कर दिया जाता है, उस पर छाजन, पोलीथीन या कपड़ा आदि का प्रबंध स्वयं श्रमिक को करना होता है। श्रमिक खुले मैदान में रहते हैं। उनका अन्य लोगों से बहुत कम सम्पर्क हो पाता है वे खर्ची प्राप्त होता है, उस दिन अवकाश कर दिया जाता है। यह हमेशा नहीं होता है। दवा इत्यादि के लिए उन्हें पास के कस्बे या नगर में जाना होता है। महिलाओं को पानी भी भरना होता है और सभी घरेलू कार्य करने होते हैं । मिट्टी खोदने का कार्य एक टीम या समूह के साथ किया जाता है। अकेली एक महिला अनजान व्यक्ति के साथ काम करने में कठिनाई का अनुनाव करती हैं। यदि उन्हें के गांव में उनका परिवार के पुरूष साथ में होते हैं तो वे कार्य करने चली जाती हैं, अन्यथा वे कार्य नहीं करती हैं। बंगरा व मऊरानीपुर विकास खण्ड के कुछ गांव की महिलाओं ने यह बताया कि वे एक टीम में जाकर कुछ महिलायें मिट्टी खोदने और कुछ उसे ढोने का कार्य करती हैं। पर यह बहुत कम पाया गया। सबसे सामान्य रूप यह होता है कि पुरूष मिट्टी खोदने तथा महिलायें उसे सिर पर रखकर ढोने का कार्य करती यह काग्र बरसात के मौसम के अतिरिक्त वर्षा भर चलता है पर वास्तव में कितने काम मिल सकेगा, यह किसी क्षेत्र के निर्माण कार्यक्रम पर निर्भर है। काम करने के दिन प्रत्येक वर्ष में अलग-अलग होते हैं। किसी वर्ष में काम नहीं भी होता है। यह उन महिलाओं के बारे में भी सही है जो ऐसे कार्यस्थलें पर कार्य करती हैं, जहां वे सरलता से पहुंच सकें। जो कुछ दूर यात्रा करके भी कार्य करने को तैयार हैं, उन्हें 50 से 60 दिनों तक कार्य मिल जाता है। वे महिलायें जो कहीं भी जाने को तैयार रहती हैं, उन्हें 6 से 8 महीनों तक काम मिला जाता है। ठेकेदारों से उन्हें ऋण प्राप्त होता है पर कुछ विशेष जाति के लोग जो ठेकेदार से भली भांति परिचित होते हैं और वे उसके नियंत्रण में होते हैं, वे थोड़ी रकम के ऋण भांति परिचित होते हैं और वे उसके नियंत्रण में होते हैं, वे थोड़ी रकम के ऋण प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। एक सौ श्रमिकों को नियंत्रित करने के लिए 40 हजार रूपयों की आवश्यकता होती है पर ऐसे परिवार केवल मिट्टी खोदने के धंधे से ही अपनी जीविका अर्जित करते हैं । इस प्रकार के श्रमिकों में आदिवासी परिवार पाये गये जो स्वस्थ एंव हुष्ट-पुष्ट पाये गये। गैंग लीडर उनके लिए बरसात के मौसम के लिए धनराशि की व्यवस्था करते हैं, जब उन्हें काम नहीं प्राप्त होता है। इस प्रकार के लोग ठेकेदारों के साथ उस स्थान पर जाया करते हैं, जहां उन्हें काम मिलता है । जब तक ऋण के रूप में ली गयी धनराशि अदा नहीं कर दी जाती वे किसी अन्य गैंग लीडर के साथ काम नहीं कर सकते हैं। श्रमिकों द्वारा लीडर से लिए ऋण पर ब्याज नहीं देते हैं, बल्कि कार्य के समय कार्य की एक इकाई पर एक रूपया काटने की स्वीकृति दे देते हैं। इसमें से लीडर ठेकेदारों को ब्याज दिया करते है, जो उन्हें धनराशि दिया करते हैं । आदिवासी परिवार के लोग एक दिन में निर्धारित कार्य की 6 या 7 इकाई का कार्य पूरा कर सकते हैं। काम के समाप्त होने पर उनके द्वारा ली गयी रकम को काटकर उनकी कुल मजदूरी की कुल रकम उन्हें दी दी जाती है। इन परिवारों द्वारा कुछ रकम बरसात के मौसम के लिए बचा ली जाती है, जिसे वे लेकर अपने घर लौट आते हैं, भले ही वह पूरे बरसात के मौसम के लिए पर्याप्त न हों, फिर भी वे बरसात के समय बिना किसी आय के अपने भोजन पानी आदि का प्रबंध करते हैं। यही कारण है कि वे अपना श्रम गैंग लीडर के पास अगले वर्ष उन्हीं के साथ काम करने के लिए बंधक रख देते हैं। इस सम्बन्ध में कोई लिखित समझौता नहीं हाता, बल्कि वे इस सम्बन्ध में ईमानदार होते हैं। मिट्टी खोदने के कार्य में कोई विशेष कुशलता की आवश्यकता नहीं होती है, फिर भी वे इस कार्य की कुशलता एक दूसरे के साथ काम करने के दौरान सीख लेते हैं। यह एक मेहनत का कार्य होता है, केवल स्वस्थ पुरुष और महिलायें ही इस कार्य को कर सकती हैं। वृद्ध, रोगी और शारीरिक दृष्टि से कमजोर महिलाओं को कोई दूसरा काम खोजना होता है। मिट्टी खोदने के कार्य में कोई विशेष कुशलता की आवश्यकता नहीं होती है, फिर भी वे इस कार्य की कुशलता एक दूसरे के साथ काम करने के दौरान सीख लेते हैं। यह एक मेहनत का कार्य होता है, केवल स्वस्थ पुरूष और महिलायें ही इस कार्य को कर सकती हैं। वृद्ध, रोगी और शारीरिक दृष्टि से कमजोर महलिाओं को कोई दूसरा काम खोजना होता है। कार्य करने की दशायें विशेषकर महिलाओं के लिए बहुत कठिन होती है। उनकी शक्ति इन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए लड़ने में ही खत्म हो जाती है। उन्हें अपनी आय बढ़ाने के लिए किसी अन्य कार्य करने का मौका ही नहीं मिला पाता है। इधर कार्य प्राप्त करने की कोई गारन्टी नहीं होती है। ऐसे परिवार जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर काम करने के लिए प्रवास करते हैं उनके बच्चे भी कार्य करने की कुशलता नहीं प्राप्त कर पाते हैं और वे भी शारीरिक श्रम के आधार पर जीविका अर्जित करने वाले बन जाते हैं। इन महिलाओं को श्रमिक तो माना जाता है पर उन्हें नियमित श्रमिक नहीं माना जाता है। उन्हें कार्य करने के दौरान होने वाली घटनाओं, कठिनाइयों और स्वास्थ्य सम्बन्ध क्षतियों से सुरक्षित रखने का कोई प्रबंध नहीं किया जाता है। महिलाओं की कोई प्रतिनिधि संस्था पायी गयी जो उनके हितों की रक्षा कर सके और उनकी स्थिति में सुधार कर सकें । निर्माण कार्य :- निर्माण कार्य के अन्तर्गत सड़क निर्माण, सीमेन्ट के टाइल्स बनाना, पत्थर काटना, नहर निर्माण, कोटा के पत्थरों से नहरों की लाइनें बनाना और अन्य इसी प्रकार के कार्य आते हैं। मिट्टी खोदने के कार्य की भांति निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों द्वारा ग्रामीणों को रोजगार के अवसर दिये जाते हैं। कभी-कभी मिट्टी खोदने तथा निर्माण कार्य दोनों साथ-साथ चलते हैं। निर्माण कार्य में अधिक कुशलता की आवश्यकता होती है जो कम कुशलता के श्रम के साथ पूरा किया जाता है। कम कुशलता वाले कार्यों में महिलाओं को अधिक श्रम वाले तथा सरल कार्यों में लगाया जाता है, जैसे सिर पर रखकर निर्माण सम्बन्धी सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना, पत्थर तोड़ना, एक स्थान से दूसरे स्थान को पानी ले जाना, सीमेन्ट के टाइल्स को पानी देना, सड़कों को साफ करना, गिट्टी एवं बालू दोनों का कार्य, सड़कों पर पानी छिड़कना आदि । कुशलता वाले कार्यों में जैसे निर्माण कार्य के लिए आवश्यक माल मसालों का मिलाना, पदार्थों का मापना, मशीन चलाना, प्लास्टर करना, पत्थर बिछाना, आदि कार्य पुरूषों द्वारा किया जाता है। निर्माण कार्य में महिलाओं की अहम भूमिका होती है, क्योंकि निर्माण कार्य के लिए आवश्यक सामान ढोने का कार्य महिलाओं द्वारा किाय जाता है, बिना उनके श्रम के पुरूषों द्वारा निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है। इस कार्य में पुरूषों एवं महलिाओं के कार्यों का बंटवारा स्पष्ट होता है, यह कार्य किसी भी जाति के श्रमिकों द्वारा किया जा सकता है, जो भी इस कार्य को करना चाहता है, वह जब तक काम है, तब तक अपनी जीविका प्राप्त कर सकता है। श्रमिकों को प्राप्त करने की प्रथा मिट्टी खोदने के कार्य की ही भांति है। व्यक्तिगत क्षेत्र के कार्यों के लिए अपने ही गांव के लोग ही मिल जाते हैं । ऐसे कार्यों में काम करने का स्थान गांव के पास में ही होता है। यह एक अकंशल कार्य है, इसे कोई भी कर सकता है, जो इसे करना चाहता है। इस कार्य में महिलाओं एवं पुरूषों की टीमें अलग-अलग कार्य करती है। अकेली महिला भी कार्य स्थान पर कार्य कर सकती है, इसमें किसी अन्य अजनबी व्यक्ति के साथ काम करने की आवश्यकता होती है। श्रमिक अपने साथ अपना भोजन अपने साथ अपना भोजन अपने साथ लेकर आते हैं, या अपने घर खाना खाने के लिए चले जाते हैं। इस कार्य में मजदूरी दैनिक आधार पर कृषि श्रमिकों की मजदूरी के सामान ही निश्चित की जाती है। कभी कभी एक निश्चित कार्य के लिए एक निश्चित धनराशि, निश्चित की जाती है, जिस कार्य को टीम द्वारा जितने दिन में चाहे कर सकते हैं। पर व्यक्तिगत क्षेत्र में निर्माण कार्य के अवसर बहुत कम होते हैं, अधिकांश कार्य सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत पूरे किये जाते हैं, क्योंकि यह कार्य अधिक खर्चीले होते हैं। मिट्टी खोदने के कार्य में व्यक्तिगत क्षेत्र में रोजगार के अवसर निर्माण कार्य की तुलना में अधिक होते हैं । सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य स्थल का निर्धारण किसी विशेष क्षेत्र के वर्ष विशेष की निर्माण योजना के आधार पर निश्चित किया जाता है। कार्य ठेकेदारों द्वारा पूरा कराया जाता है। ठेकेदार गैंग लीडरों के माध्यम से कार्य करते हैं जो श्रमिकों के सम्पर्क में हुआ करते हैं। इस कार्य में निर्माण कार्य स्थल के पास के गांवों से ही श्रमिक प्राप्त किये जाते हैं। पर जब स्थानीय क्षेत्रों से श्रमिक नहीं मिल पाते तो गैंग लीडरों की सहायता से कहीं से भी श्रमिक प्राप्त कर लिये जाते हैं। यदि यह कार्य पंचायत के माध्यम से करना होता है तो श्रमिकों को सरपंच द्वारा बुलाया जाता है। श्रमिक कार्य स्थल पर जाते हैं और दूर होने पर अपने साधनों द्वारा वहां जाते हैं। कभी-कभी श्रमिक आने जाने की सुविधा की मांग गैंग लीडर से सौदा करते हैं। यदि ठेकेदारों को श्रमिकों की आवश्यकता होती है तो वे परिवहन की सुविधा प्रदान की जाती है। वैसे ठेकेदार कम से कम सुविधायें देने को स्वीकार करते हैं । सार्वजनिक क्षेत्र के कार्य के घण्टे 9 बजे प्रातः से 6 बजे सायं तक होते हैं, बीच में एक घण्टे का अवकाश होता है। कार्य के लिए श्रमिकों को 6 बजे प्रातः ही अपना घर छोड़ना होता है। जब कभी भी कार्यस्थल पर महिलाओं से बात करने के लिए कार्यस्थल पर गये तो निरीक्षकों द्वारा उन्हें बात करने के लिए मना किया या जल्दी ही बात समाप्त करने को कहा गया। निर्माण कार्य में सरकार द्वारा न्यूनतम दैनिक मजदूरी 50 रूपये निश्चित की गयी है। महिलायें प्राय5 20 रूपये से 25 रूपये प्रतिदिन प्राप्त करती हैं । यह कार्य पर निर्भर है। जैसे- नहर निर्माण या सड़क निर्माण कार्य आदि कुशल व अकुशल दोनों प्रकार के श्रमिकों की दरें अलग-अलग होती हैं । महिलाओं को केवल अकुशलता वाले कार्य दिये जाते हैं, जिसके लिए उन्हें न्यूनतम दर पर मजदूरी दी जाती है। कुशलता पर आधारित कार्य पुरूषों द्वारा किये जाते हैं, जिसके लिए उन्हें 35 से 40 रूपये तक प्राप्त होते हैं, जबकि महिलाओं द्वारा अधिक परिश्रम के कार्य किये जाने के बदले में केवल 25 रूपयों तक ही प्राप्त होते हैं । विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग मजदूरी की दरें प्राप्त होती हैं । नहरों के किनारे पत्थर ले जाने के लिए 30 रूपये प्रतिदिन, पत्थरों को ट्रक पर लादने के लिए 60 रूपये प्रतिदिन जिसमें पत्थरों को तोड़ना, उसे ट्रक पर लादना शामिल है। पत्थर तोड़ने के लिए 60 पैसा प्रति पत्थर दिया जाता है। सिर पर पत्थर लादकर सड़कों के निर्माण के लिए ले जाने के लिए 40 रूपये प्रतिदिन दिये जाते हैं। इनमें कुछ कार्य के लिए महिला एवं पुरूषों को समान मजदूरी और अन्य कार्यों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी प्राप्त होती है। निर्माण कार्यों में भी श्रमिकों के प्रतिनिधि संगठनों का अभाव है, जिससे उनके हितों की रक्षा हो पाती है ओर उनके सौदा करने की शक्ति सीमित है। ईंटे बनाना :- ईंट बनाने कार्य उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां कि मिट्टी इसके लिए उपयुक्त होती है। यह कार्य अधिकांशतः मऊरानीपुर विकास खण्ड में किया जाता है। वैसे प्रत्येक विकास खण्ड में यह कार्य किसी न किसी पैमाने पर किया जाता है। अध्ययन में ईंट बनाने का कार्य 35 महिला परिवारों द्वारा किया जाता है। इनमें से अधिकांश महिलायें मऊरानीपुर विकास खण्ड में थी। पुरूष व महिलायें दोनों मिलकर इस कार्य को करते हैं। अधिकांशतः एक ही परिवार की महिलायें दोनों मिलकर इस कार्य को करते हैं। अधिकांशतः एक ही परिवार की महिलायें एवं पुरूष दोनों मिलकर इस कार्य को करते हैं । यह कार्य दो स्तरों में विभाजित किया जा सकता है। पहले स्तर पर मिट्टी से ईंटे तैयार करना और फिर उसे धूप में सुखाने का कार्य ओर दूसरे स्तर पर इन ईंटो को भट्ठे में लगाना व पकाने का कार्य किया जाता है। इनमें महिलाआं द्वारा दोनों स्तरों के कार्य किये जाते हैं और उनके कार्य पुरूषों के कार्य से अलग होते हैं। कार्य के प्रथम चरण में ईंट बनाने वाली टीम को कार्यस्थल पर रातों दिन रहना पड़ता है, क्योंकि यह कार्य लगातार किया जाता है। पुरूषों द्वारा खेतों में मिट्टी खोदने का किया जाता है और अधिक मात्रा में मिट्टी खोदी जाती हैं, जो लकड़ी के सांचे में डालकर ईंट का रूप देते हैं । बनी हुई ईंटो को महिलाओं द्वारा उठाकर दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है जहां पर उन्हें रखा जाता है और उन्हें उन्हें सूखने के लिए छोड दिया जाता है। मिट्टी खोदने का कार्य शाम को प्रारम्भ किया जाता है, मिट्टी में पानी मिलाकर रखा जाता है और काम रात में प्रारम्भ किया जाता है। यह कार्य उस समय तक किया जाता है, जब तक भट्ठे के लिए आवश्यक मात्रा में ईंटे तैयार नहीं हो जाते हैं। एक भट्ठे में 50 हजार से एक लाख ईंटे एक साथ पकायी जाती हैं। श्रमिकों द्वारा ईटो की गिनाई भी साथ-साथ की जाती है, जब आवश्यक मात्रा की ईंटे तैयार हो जाती हैं तो कार्य का दूसरा चरण प्रारम्भ होता है । कार्य के दूसरे स्तर में धूप में सूखी ईंटों को एक दूसरे के ऊपर चढ़ाकर चौकोर आकार में लगाना होता है, जिसके बीच में स्थान छोड़ना होता है, जिसके बीच कोयले के टुकड़े तथा रूई के गोले प्रत्येक पर्त में डाला जाता है साथ ही धान की भूसी भी फैलायी जाती है। भट्ठा में ईंटे इस प्रकार लगायी जाती है कि जैसे-जैसे ईंटे की ऊँचाई बढ़ती जाती है, उसके आकार कम होता जाता है। सबसे नीचे वाले भाग के पास में लकड़ी रखी जाती है । जब भट्ठे को पूरी तरह तैयार कर लिया जाता है तो लकड़ी रखी जाती है । धीरे धीरे कोयले में आग पकड़ लेती है। धूप में सूखी हुई उन्हें धीरे-धीरे पकती है और रंग बदल देती है। अन्त में लकड़ी वे कोयला पूरी तरह जल जाती है और भट्ठा शान्त हो जाता है और ईंटे बिक्री के लिए तैयार हो जाती है। काम के इस स्तर में भट्ठे में ईंटो के रखने की लम्बाई और चौड़ाई कोयले की मात्रा तथा अन्य ईंधन तथा ईंटो की पर्तों के लगाने के निर्णय का कार्य कुशल व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, उन्हें मिस्त्री कहा जाता है। इसके लिए केवल एक ही व्यक्ति की आवश्यकता होती है। महिलाओं को ईंटो के सूखने वाले स्थान से भट्ठे में रखने वाले स्थान पर ढोने के लिए दैनिक मजदूरी पर लगाया जाता है। इस कार्य के लिए पुरूषों को भी लगाया जाता है। सामान्यतया जो श्रमिक मिट्टी से ईंट बनाने का कार्य करते हैं यदि वे खाली रहते हैं तो दूसरे स्तर में भी कार्य करते हैं। ईंटों के बनाने का कार्य एक विशिष्ट कार्य हैं, इसके लिए ईंटे के भट्ट के पास रहना आवश्यक होता है। यह कार्य बरसात के मौसम को छोड़कर वर्ष भर किया जाता है। ईंट बनाने का मौसम दशहरे से होली तक होता है। दूसरा मौसम होली से जब तक बरसात नहीं होती तब तक का होता है। ईटों के भट्ठे प्रायः आबादी के बाहर हुआ करते हैं और प्रायः जनपद के विभिन्न भागों में फैले हुए हैं। श्रमिक विभिन्न भागों से इनमें कार्य करने आते हैं। पूरे मौसम में एक निश्चित मात्रा में ईंटों को बनाने के कार्य का समझौता हो जाता है और रमिक मौसम प्रारम्भ होते ही काम शुरू कर देते हैं। विभिन्न ईंटों के भट्ठे अलग-अलग करके घर वापस आ जाते हैं। और कुछ दूसरे मौसम में भी कार्य करते हैं। काम प्राप्त करने के लिए श्रमिक पहले पहल ईंट भट्ठों के पास जाते हैं। इस कार्य में वे अपने सम्बन्धी रिश्तेदारों व पड़ोसियों से मदद प्राप्त करते हैं। जब दोनों पार्टियों में समझौता हो जाता है और ईंट भट्ठों के मालिक जब श्रमिक के कार्य से संतुष्ट रहते हैं तो लम्बे समय तक श्रमिकों को कार्य मिला होता है। ईंट भट्ठों के मालिक कभी-कभी किसानों से उनके खेत किराये पर ले लेते हैं और भट्ठों के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए अपनी पूंजी लगाते हैं। भू-स्वामियों को वे एक निश्चित किराया देते हैं। यदि भट्ठे मालिक के पास पर्याप्त पूंजी नहीं होते तो वे साझेदार बना लेते हैं और लाभ का बंटवारा हिस्सेदारों में होता है। कभी-कभी भट्ठे मालिक के पास खुद की जमीन होती है। इस प्रकार की स्थिति में श्रमिकों को पीस रेट के आधार पर खा जाता है। दूसरी व्यवस्था में किसान अपने खेत को समान बनाने या खेत की सतह को नीचा कराते हैं, ऐसी स्थिति में वे स्वयं श्रमिकों से ईंटे बनाने का समझौता खेत से मिट्टी खोदकर करते हैं। इसकी लागत किसान तथा श्रमिक दोनों मिलकर वहन करते हैं। बनी हुई ईंट को बेचकर लाभ प्राप्त किया जाता है। यह कार्य छोटे खेतों पर एक या दो मौसम के लिए किया जाता है और जब खेत बराबर हो जाता है तो उसका उपयोग कृषि के लिए किया जाता है। श्रमिक किसी दूसरे किसान को ढूंढ़ लेते हैं, जिन्हें अपना खेत समतल बनाने या नीचा करने के लिए एक या दो मौसम में ईंट की पथाई करानी होती है। ईंट बनाने के कार्य में मजदूरी का भुगतान पीस रेट के अनुसार किया जाता है, जो 50 से 70 रूपये हजार ईंट हुआ करता है। श्रमिक एक निश्चित समय तक कार्य करने के लिए सहमत होते हैं। मजदूरी की दरें ईंट निर्माण संगठन द्वारा ईंट निर्माण श्रम यूनियन वैसे बात करके होली के समय प्रत्येक वर्ष घोषित कर दी जाती है। दिन भर में 1500 से 2000 ईंट बनाने के लिए तीन या चार श्रमिकों की एक टीम यदि वे अधिक परिश्रम करते हैं तो बना पाते हैं। यदि वे धीमी गति से कार्य करते हैं तो दिन भर में एक हजार ईंट बना लेते हैं। उनहें भुगतान रोज नहीं किया जाता है। प्रत्येक सप्ताह में श्रमिकों को एक निश्चित मात्रा में अग्रिम दिया जाता है, जिसे खर्ची प्रणाली कहा जाता है। सप्ताह में एक दिन निश्चित होता है जब श्रमिकों को एक निश्चित मात्रा में अग्रिम दिया जाता है, जिसे खर्ची प्रणाली कहा जाता है । सप्ताह में एक दिन निश्चित होता है जब श्रमिकों को एक निश्चित रकम दे दी जाती हैं सामान्यतया तीन या चार श्रमिकों के एक टीम को 100 रूपये की रकम दी जाती है। श्रमिक बनायी जानी वाली ईंटों का हिसाब रखते हैं तथा भट्ठा मालिक भी अपनी डायरी में बनायी गयी ईंटो की संख्या तथा श्रमिकों को अग्रिम के रूप में दी जाने वाली रकम लिखे रखते हैं। कभी-कभी मालिक श्रमिकों की हाजिरी भी मारते हैं। श्रमिक अधिकतर विश्वास पर कार्य करते हैं । मालिकों द्वारा रखे गये रिकार्ड पर श्रमिक विश्वास रखते हैं। बहुत कम पढ़े लिखे श्रमिक अपने कार्यों तथा लिये गये यपयों का स्वयं हिसाब रखते हैं। कभी कभी मालिक इन्हें हिसाब रखने के लिए डायरी दे देते हैं। मौसम के अन्त में उनके लेनदेन का हिसाब किया जाता है। वास्तव में श्रमिक द्वारा 1100 ईंटों के निर्माण के बाद भुगतान किया जाता है, क्योंकि एक हजार अच्छी ईंटों के निर्माण में 100 ईंटें टूट-फूट, बेकार के रूप में काट ली जाती हैं। श्रमिक अपना गुजारा प्राप्त अग्रिम से करते हैं, जिस दिन अग्रिम दिया जाता है, उस दिन छुट्टी होती है। ईंट के भट्ठे बाजार या बस्तियों से दूर होते हैं अतः श्रमिकों को अपने खाद्य सामग्री, ईंधन, दवा, और अन्य सामान खरीदने के लिए आस-पास के नगर में जाना होता है। उसी दिन वे अपने कपड़े साफ करते हैं तथा आराम करते हैं। खर्ची प्रथा कई कारणों से चालू रखी जाती है। पहला कारण तो श्रमिकों को काम पर रोके खने के लिए जिससे वे काम को बीच में छोड़कर न चलें जायें। दूसरा कारण यह है कि मजदूरी की सह दर मौसम के अन्त में स्पष्ट होती है। तीसरा कारण यह है कि ईटों का निर्माण एक बड़ी मात्रा में किया जाता है और बेचने से पहले उसे पकाया जाता है तथा उसमें लगी रकम को वसूल करना होता है। भट्ठे मालिक श्रमिकों को कम से कम रकम देना चाहते हैं। केवल उनके खाने भर को पर्याप्त रकम ही दिया करते हैं। अच्छे मौसम के समय में श्रमिक अपने खाने व खर्चे से बचाकर तीन हजार से चार हजार रूपये तक बचाकर लाते हैं और औसतन एक हजार से पन्द्रह सौ रूपये घर पा लाया करते हैं। यह बचाकर लायी गयी रकम बरसात में उनके परिवार के व्यय के काम आती हैं, जब उनके पास कार्य नहीं होता है। इन श्रमिकों द्वारा अधिक परिश्रम के कार्य किये जाते हैं। अतः वे बरसात में आराम करना पसन्द करते हैं और उनके पास जो रकम होती है, उसी में गुजारा कर लेते हैं। वे वास्तव में अपने लिए बहुत अधिक पूंजी का निर्माण करने में सफल नहीं होते हैं। यदि वे बरसात के मौसम में भी कार्य करें तो वे कुछ रकम बचा सकते हैं। उन्हें त्यौहारों, विवाहों तथा अन्य सामाजिक अवसरों पर व्यय करना होता है, कहीं-कहीं श्रमिकों को दो हजार से तीन हजार ईंटे बोनस के यप में दी जाती हैं । श्रमिकों को नकद प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य सुविधायें नहीं प्राप्त होती हैं। ईंटे बनाने में प्रयोग आने वाले यंत्र व औजार भट्ठा मालिक के ही होते हैं। ईंट भट्ठों के पास रहने के लिए श्रमिकों को बिना पकी हुई ईंटे रहने का स्थान बनाने के लिए दी जाती है, जिसके द्वारा वे अस्थानयी निवास का निर्माण कर लेते हैं। उन्हें इन ईंटों को घर जाते समय वापस करना होता है। पानी भट्ठे के आस-पास ही मिल जाता है, क्योंकि ईंट निर्माण में जल एक आवश्यक आगत होता है पर अन्य सामान जैसे ईंधन, खाना बनाना, शौच, बाल कल्याण, स्वास्थ्य और चोट इत्यादि लगने पर उसका इलाज स्वयं श्रमिकों को करना होता है। श्रमिक का पूरा परिवार उसके साथरहता हैं । कभी-कभी बुजुर्ग सदस्य भी इन्हीं के साथ जाते हैं और वे छोटे बच्चों की देखरेख किया करते हैं। ईंट के भट्ठे मुख्य सड़क व गांवों से दूर हुआ करते हैं। श्रमिक दूध के बकरियां अपने साथ ले आते हैं। उनके राशन कार्डो की उनके लिए उपयोगिता नहीं होती हैं। उन्हें खुले बाजार में अन्य लोगों की भांति उन्हीं मूल्यों पर सामान खरीदना होता है। बच्चों की शिक्षा भी नहीं हो पाती है। ऐसे भी उदाहरण मिले हैं, जहां बच्चों को दो स्कूलों में भेजा जाता है। जब वे ईंट भट्ठे पर काम कर रहे होते हैं तो भट्ठे के पास के स्कूल में भेजते हैं और जब वे गांव में होते हैं तो गांव के स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं अधिकांश श्रमिक अपने प्रवासी प्रवृतित के कारण बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं। वे अपने बच्चों को जहां वे जाते हैं अपने साथ ले जाया करते हैं। बच्चे जिस किसी भी कार्य में मदद करते हं जो वे कर सकते हैं। बच्चे वही कार्य करना सीख जाते हैं और उनके माता-पिता के प्रवासी प्रवृत्ति के कारण उनका भविष्य प्रमाणित होता है । इस प्रकार के श्रमिकों को गांव से कोई भी ऋण की सुविधा नहीं मिल पाती है, क्योंकि वे गांव में बहुत कम होते हैं ईंट भट्ठे के मालिक भी उन्हें ऋण नहीं देते हैं। कभी-कभी मौसम के प्रारम्भ में उन्हें थोड़ी रकम मिल जाती हैं पर मौसम के समाप्त होने पर कोई भी रकम उन्हें मालिक द्वारा नहीं प्राप्त होती है। मजदूरी का भुगतान परिवार के मुखिया को किया जाता है और महिलायें कोई रकम नहीं प्राप्त कर पाती है। बहुत सी महिलायें हिसाब-किताब रखना नहीं जानती। थोड़ी बहुत रकम वे अपने पास रखती हैं। रूपये अधिकांशतः पुरूषों द्वारा रखे जाते हैं। महिलायें अपनी आवश्यकतानुसार पुरूषों से अपने व्यय के लिए रूपये मांग लेती हैं। कुछ पुरूष श्रमिक ईंटों के निर्माण तथा उसमें लगने वाली पूंजी तथा आवश्यक वस्तुओं की लागत के बारे में ज्ञान रखते हैं। महिलायें इन सब बातों के बारे में जानकारी नहीं रखती है वे केवल उस कीमत के बारे में जानकारी रखती है, जिस पर ईंटें बिकती हैं। ईंटों की बिक्री भट्ठे पर ही होती है, जिसे ट्रकों द्वारा ले जाया जाता है। कुछ श्रमिक जाति के कुम्हार व मिट्टी के बर्तन बनाने वाले पाये गये जो मिट्टी के बरतन के काम को अधिक लाभदायक न होने के कारण ईंटे बनाने का काय्र करने लगे हैं। वे मिट्टी के कार्य में अधिक कुशल होते हैं और सरलता से ही ईंट बनाने का कार्य सीख लेते हैं। कुछ अन्य जाति के लोग भी ईंटे बनाने कार्य करते हैं। ईंट बनाने का धन्धा मिट्टी के बर्तन बनाने धंधे की भांति जाति पर आधारित नहीं है । महिलाओं को ईंट बनाने का कार्य करने के अतिरिक्त घरेलू कार्य भी करना होता है। वे रात में ईंट बनाने तथा दिन में भोजन बनाने, भोजन बनाने, कपड़ा धोने, पानी भरने बच्चों की देखरेख तथा मिट्टी खोदने का कार्य करती है, जिससे वे रात को ईंटे बनाने का कार्य के कारण थकी हुई होती हैं, उनके बदन में दर्द होता है, उनके हाथ की उंगलियों में कभी-कभी खून निकलता रहता है। उन्हें शीतकाल में भी कार्य करना होता है। उनके सिर के बाल भी गिरने लगते हैं। वे खुले में रहने की अभ्यस्त हो जाती है और अन्य कार्यों की तुलना में अधिक आय प्राप्त होने के कारण व ईंट भट्ठों में काम करती हैं। उन्हें जीवित रहने के लिए जो भी कार्य मिल जाता है, उसे करना होता है। महिलायें ईंट बनाने के कार्य में इसलिए लग जाती है, क्योंकि उन्हें अपने गांवों में अधिक काम नहीं मिल पाता है। यदि उन्हें भूमि तथा ऋण मिल जाये तो वे ईंट बनाने का कार्य स्वयं करने लगे जो दूसरों के भट्ठे पर जाकर पीस रेट के आधार पर काम करने की तुलना में अधिक लाभदायक है। ईंट भट्ठों के पास खुले में रहने के लिए उन्हें भयमुकत होना आवश्यक है अन्यथा वे अपनी जीविका ईंट निर्माण द्वारा अर्जित नहीं कर सकते हैं । महिलायें जो भट्ठों में लगाने के लिए ईंटे ढोने का कार्य करती हैं, उन्हें मजदूरी ईंटों की संख्या के आधार पर प्राप्त होती हैं। यहां पर 20 पेसे 25 पेसा प्रत्येक 21 ईंटों को ढोने के लिए प्राप्त होते हैं। इस प्रकार वे दिन में 20 से 25 रूपये तक अर्जित कर लेती हैं, यह उस क्षेत्र के मजदूरी दर पर निर्भर है। उन्हें किसी भट्ठे पर इस से पन्द्रह दिनों के लिए काम मिल पाता हैं यह एक कठिन परिश्रम का कार्य है, उनके पैरों में सारे दिन इधर-उधर आते-जाते दर्द होने लगता है। यदि भट्ठा अधिक दूर होता है तो वहीं पर रूक जाती हैं और अपने बच्चों के साथ ले जाया करती हैं तथा अपना खाना वहीं बनाया करती हैं । भट्ठा मालिक द्वारा कच्ची ईंटे रहने का स्थान बनाने के लिए दिया जाता है । ईंट भट्ठों में काम करने वाले श्रमिकों की ईंट श्रमिक संघ की स्थापना की गयी है जो श्रमिकों के हित के लिए क्रियाशील है, पर इसमें केवल पुरूष श्रमिको को ही सदस्य बनाया जाता है, यद्यपि महिलायें भी उतनी ही मेहनत से कार्य करती हैं, जितना पुरूष करते हैं। यूनियन द्वारा श्रमिकों के मजदूरी की दरें निश्चित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं प्रदान किया जाता है। महिला श्रमिकों को यूनियन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। बांस का कार्य :- बांस का कार्य एक विशेष जाति द्वारा किया जाता है, यह कार्य भंगी जाति के लोग करते हैं। यह एक परम्परागत जाति पर आधारित पेशा है। इस जाति के लोग गांव में दो या तीन परिवार रहते हैं। यह परिवार का पेशा है, जिसमें महिलायें विभिन्न प्रकार के कार्य करती हैं। केवल बाजार से कच्चे माल लाने के अतिरिक्त अन्य कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है । बांस, रैक्सीन, चमड़े की खाल, सूती धागे तथा मरे जानवरों की तांत आदि सामान सूप व टोकरियां बनाने के लिए बाजार से खरीदे जाते हैं। सूप फसलों के सफाई के समय अनाज को साफ करने के लिए सभी किसान परिवारों द्वारा प्रयोग किया जाता है और अन्य परिवारों द्वारा इसका प्रयोग घरेलू कार्य के लिए किया जाता है। यह शहरी क्षेत्रों में भी प्रयोग किया जाता है। कुछ दिनों के बाद इसे बदलने की आवश्यकता होती है। इसलिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। सूप का निर्माण घरों में ही किया जाता है और गांव के लोग या तो इसे इनके घरों से खरीदते हैं या अन्य गांवों में दरवाजे जाकर इसे बेचा जाता है और टोकरी का प्रयोग खाद्यान्न रखने के लिए, खाद्यान्न ढोने के लिए, मिट्टी, फल व सब्जी आदि लाने के लिए किया जाता है। इसका भी निम्मण बांस द्वारा घरों पर किया जाता है और सूप की ही भांति इसकी बिक्री की जाती है। बांस का काम करने वाले परिवारों द्वारा या तो सूप बनाने या टोकरी बनाने का काम किया जाता है। दोनों समान एक ही परिवार द्वारा बहुत कम मात्रा में बनाने हैं। यह व्यवसाय वर्ष भर किया जाता है पर कृषि के समय में इन परिवारों द्वारा पीन आय बढ़ाने के लिए कृषि श्रमिक के रूप में भी काग्र कर लिया जाता है। बांस का काम जजमानी प्रथा के अन्तर्गत किया जाता है, पर वर्तमान में यह नकद लेनदेन के आधार पर ही किया जाता है। बहुत कम ऐसा पाया गया कि लोग सूप लेने के लिए अनाज से बदला करते हैं । यह काम अपने ही घरों में परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता है और इस कार्य के लिए श्रमिकों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस कार्य में कच्चे माल प्राप्त करने का काग्र पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। बांस की खरीददारी कुछ स्थानों से की जाती है, सिरकी, प्लास्टिक, रैक्सीन, चमड़े, मरे जानवरों के धागे आदि शहर के बाजारों से प्राप्त किये जाते हैं। कच्चे माल की खरीददारी प्रत्येक समय में एक ही स्थान से की जाती है। बांस व सिरकी का प्रयोग सूप बनाने वालों द्वारा किया जाता है। रैक्सीन, प्लास्टिक या चमड़े का प्रयोग सूप के बनने में प्रयोग किया जाता है। सिरकी को बांधने के लिए मरे जानवरों के धागे या प्लास्टिक के धागे काप्रयोग सूप बांधने के लिए किया जाता है। सूप के निर्माण के कच्चे माल की खरीददारी सूप के प्रकार पर निर्भर है, साथ ही श्रमिकों के पास प्राप्त धनराशि और क्षेत्र में सूप की मांग पर निर्भर है। कच्चे माल खरीदने के लिए दो या तीन प्रणाली प्रचलित हैं- कुछ लोग आठ से दस दिन के कार्य करने के लिए थोड़ी मात्रा में कच्चे माल खरीदते हैं और कुछ लोगों द्वारा बड़ी मात्रा में, जो लगभग एक माह के उत्पादन कार्य के लिए पर्याप्त होता है, सामान का कच्चे माल खरीदा जाता है। वे प्रायः बस से कच्चे माल खरीदने जाते हैं। और सामान सिर पर लादकर वापिस आया करते हैं कभी-कभी उन्हें बांस लाने के लिए लगेज चाज्र देना होता है। बांस काफी मंहगा मिलता है, क्योंकि एक या दो बांस एक बार में खरीदा जाता है। यह 25 रूपसे से 50 रूपये का प्राप्त होता है। जो लोग एक माह के उत्पादन के लिए कच्चे माल खरीदा करते हैं उन्हें बांस कुछ सस्ता मिल जाता है। अन्य कच्चे माल प्रायः स्थिर मूल्यों पर प्राप्त होता है। रैक्सीन, रिक्शा, कारके सीट कवर से बचे हुए भाग से प्राप्त होता है, जिसका प्रयोग सूप के निर्माण में किया जाता है। चमड़े या तो मोची या चमड़े निकालने वाले लोगों से प्राप्त किया जाता है । मरे हुए जानवरों के तांत कसाई घरों ती धागे धागे बेचने वालों से प्राप्त किये जाते हैं और सिरकी शहर के बाजारों में प्राप्त हो जाती है। सभी कच्चे माल सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, का आकार दिये जाने का कार्य इस उत्पादन कार्य का सबसे अधिक कुशलता और दक्षता का कार्य है। पुरूष व महिलायें दोनों उत्पादन का कार्य करती हैं। बच्चे भी कभी-कभी उत्पादन कार्य में सहायता करते हैं, कुछ परिवार उत्पादन के सभी कार्य को एक ही बार में समाप्त कर देते हैं, जिससे प्रत्येक दिन उत्पादन तैयार कर लिया जाता है। कुछ परिवारों में काम विभिन्न स्तरों में तैयार किया जाता है, जिससे उत्पादन चार या पांच दिनों में तैयार किया जाता है । ओसतन दो कार्यकर्ता (पुरूष व स्त्री) एक दिन में दो सूपों का निर्माण कर सकते हैं। तेजी से काम करने वालों की टीम, जिसमें अधिक लोग काम करने वाले होते हैं, एक दिन में तीन या चार सूपों का निर्माण करते हैं। जो लोग एक सप्ताह या दस दिनों के उतपादन के लिए कच्चे माल लाते हैं, वे बीस से पच्चीस सूपों का निर्माण कर लेते हैं और उन्हें बेचते हैं। पन्द्रह दिनों के उत्पादन के लिए कच्चे माल खरीदने वाले लोगों द्वारा लगभग पच्चास सूपों का निर्माण किया जाता है और एक माह के उत्पादन का कच्चा माल खरीदने वालों द्वारा 200 से 250 सूपों का निर्माण किया जाता है । अपने ही गांव में लोग सूप की खरीददारी उनके घरों से करते हैं। वे सूप की बिक्री अपने गांव में जब कभी इसका निर्माण होता है कर दिया करते हैं। जब इन्हें अन्य गांवों में बेचने जाना होता है तो वे कई सूपों को एकत्र करके अपने सागि ले जाते हैं। सामान्यतया वे सप्ताह में इसकी बिक्री करते हैं और दो या तीन दिनों में वे कोशिश करते हैं कि उनके द्वारा गत सप्ताह में बनाये गये सभी सूपों की बिक्री हो सके। पुरूष एवं महिलायें दोनों सूप बेचने जाती है। महिलायें प्रायः अपने ही गांव में और पुरुष गांव के बाहर अन्य गांवों में सूप की बिक्री करने के लिए जाते हैं इसकी बिक्री इनके द्वारा नकद के आधार पर की जाती है। कोई भी व्यक्ति उन्हें इसके बदले में अनाज नहीं देता है, फिर भी कुछ महिलाओं ने यह बताया कि अभी भी महिलाओं द्वारा अपने गावं में बिक्री में एक सूप के बदले ढाई सेर अनाज मिल जाता है। सूपों की बिक्री व्यापारियों या दुकानदारों को नहीं की जाती है, क्योंकि इनके द्वारा इन्हें अच्छी कीमत नहीं प्राप्त होती है। केवल मजबूरी की सिति में ही इसकी बिक्री व्यापारियों के यहां करनी होती है । सूप बनाने की कुशलता परिवार में ही प्राप्त होती है। कुछ परिवारों में यह कार्य दर पुस्त दर या पीढ़ियों से चला आ रहा है। महिलायें यह कला या तो पअने माता-पिता या ससुराल में सीख लेती हैं। इसके निर्माण में विभिन्न आकारों के चाकू की आवश्यकता बांस काटने के लिए होती हैं तथा सिरकी सीने के लिए एक बड़ी सुई की तथा एक कुल्हाड़ी की आवश्यकता होती है । ये सब यंत्र परिवारों में होते हैं जो पीढ़ियों से परिवार में चलते हैं । 1 बांस के कार्य से प्राप्त होने वाली आय सूप को बेचने से प्राप्त कीमत पर निभ्रर हैं एक सूप की औसत कीमत 20 से 25 रूपये प्रति सूप के बीच होती हैं। पर कुछ परिवारों द्वारा 30 रूपये प्रति पीस प्राप्त कर ली जाती हैं। तांत से बने सूपों की कीमत कुछ अधिक होती है। सूप की कीमत उसमें लगे कच्चे माल की प्रकृति पर निर्भर है और बिक्री कीमत लाभ प्राप्ति को ध्यान में रखकर ऊँची रखी जाती है। साथ ही इसकी कीमत कच्चे माल के खरीद की मात्रा पर भी निर्भर है। जो एक माह के कच्चे माल की खरीददारी करते हैं उन्हें उन व्यक्तियों की तुलना में अधिक लग या आय प्राप्त होती हैं जो एक सप्ताह या दस दिनके उत्पादन के लिए कच्चे माल खरीद कर उत्पादन का कार्य करते हैं, कयोंकि इकट्ठा कच्चे माल खरीदने वालों की प्रति इकाई उत्पादन लागत कम होती हैं, जबकि कीमत समान होती है, इसलिए उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है, इसके अतिरिक्त कच्चे माल के प्रयोग पर भी उत्पादन लागत निर्भर है, वे लोग जो एक निश्चित कच्चे माल से अधिक उत्पादन की इकाइंया तैयार करते हैं तथा इसे बेकार होने से बचाते हैं उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है । एक सप्ताह या दस दिन के उत्पादन के लिए 60 से 100 रूपये तक का विनियोग करना होता है, जिससे 20 से 25 सूपों का निर्माण किया जाता है, जिससे उन्हें 150 से 200 रूपये की आय प्रत्येक सप्ताह या दस दिनों में होती है। 150 रूपये के विनियोग द्वारा 50 सूपों का निर्माण किया जाता है, जिससे 350 से 500 रूपये की आय प्रत्येक 15 दिनों होती है और उनका लाभ 200 रूपये आदि 350 रूपयों का होता है। इसी प्रकार 300 रूपये या 350 रूपये के विनियोग द्वारा 180 से 200 सूपों का निर्माण किया जाता है, जिससे 2000 रूपये से 2500 रूपये में प्राप्त होती है। यह आय दो या तीन व्यक्तियों की मेहनत द्वारा जो एक सप्ताह के उत्पादन के आधार पर या पांच या छः व्यक्तियों की आय होती है जो महीने या डेढ़ महीने के कच्चे माल की खरीददारी के आधार पर उत्पादन कार्य करते हैं। इसी आय से इन परिवारों द्वारा अपनी आधारभूत आवश्यकताओं तथा आकस्मिक इसलिए उन्हें कृषि श्रमिक के रूप में भी कार्य करना होता है या अन्य कार्य जो मिलता है, उसे करते हैं। इस कार्य में लगे श्रमिक जब तक उनके द्वारा बनाये गये उत्पाद बिक नहीं जाते, तब तक वे पुनः कच्चा माल लेने नहीं जाते हैं, क्योंकि उनके पास अधिक मात्रा में धनराशि विनियोजन के लिए नहीं होती है। जब कभी उनका उत्पाद बिक नहीं जाता वे अधिक कच्चे माल नहीं खरीद सकते हैं। ऐसी सििित में वे कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं, जिससे उन्हें नकद की प्राप्ति होती है, जिससे वे अपना भोजन व कुछ धनराशि से कच्चा माल खरीदते हैं। वे अपना सामान सस्ते में भी निकाल देते हैं, जब उसके खराब होने की सम्भावना होती है। सामान बेचने से जो रकम प्राप्त होती है, वे पूरी रकम व्यय नहीं करते, जिस रकम का कच्चा माल खरीदना होता है, उस धनराशि को निकाल कर यदि वे शेष धनराशि में से भी कुछ बचा लेते हैं, तो वे अगले उत्पादन के लिए कुछ अधिक मात्रा की रकम का विनियोजन करते हैं। यदि किसी उत्पादन के चक्र में उन्हें किसी आकस्मिक व्यय का सामना करना पड़ जाता है, तो उन्हें अपनी पूंजी का भी उपयोग करना पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में पूंजी एकत्र करने के लिए दूसरा काम करना पड़ जाता है या उधार लेकर उत्पादन का कार्य पुनः प्रारम्भ किया जाता है और जब पुंजी नहीं मिल जाती, उत्पादन बन्द रखा जाता है। जो लोग बांस की टोकरी बनाने का काम करते हैं वे चार बांसों से छः बड़ी या आठ छोटी टोकरियं बना लेते हैं। पुरुष तथा महिलायें दोनों टोकरी बनाने का कार्य करते है। बांस को बड़ी-बड़ी पटरियों में पहले काट लिया जाता है। इसके बाद टोकरियां बनायी जाती हैं। बड़ी टोकरी 45 रूपये की एक बेचते हैं, जिसमें 60 रूपये का विनियोग होता हैं। एक सप्ताह के उत्पादन कार्य के लिए चार बांस पर्याप्त होते हैं। दस दिनों में 300 रूपये की आय प्राप्त होती है, क्योंकि इसे बेचने में दो या तीन दिन लग जाते हैं। छोटी टोकरियां 20 रूपये में बिकती हैं और दस दिनों में कुल 200 रूपये की प्राप्ति And t होती है। वे पांच बांस खरीदते हैं, जिसके लिए उनहें 70 से 75 रूपये व्यय करने होते हैं प्रत्येक सप्ताह 100 से 150 रूपये की आय प्राप्त होती हैं। इसे बेचने के लिए पुरूष एवं महिलायें एक गांव के दूसरे गांव जाया करते हैं । टोकरियां बेचने से प्राप्त आय पुरूष एवं महिलाओं दोनों के हाथ में आया करती हैं। महिलायें इसे गिन नहीं सकती हैं, इसलिए परिवार का व्यय पुरूषों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। महिलायें अधिकांशतः अनपढ़ होती हैं । इनमें से कुछ गिन सकती हैं, सभी कार्य मौखिक हुआ करते हैं। इसलिए महिलाओं की निरक्षरता एक बाधा नहीं है। कभी-कभी महिलायें कच्चे माल की लागत व सूप और टोकरी की मांग को जनती हैं, पर उन्हें कच्चे माल की लागत व सूप और टोकरी की मांग को जानती हैं, पर उन्हें कच्चे माल खरीदने का स्थान ज्ञात नहीं होता है। इन श्रमिकों की कोई प्रतिनिधि संस्था नहीं होती है। यद्यपि वे कठिन परिश्रम करते हैं पर उन्हें इस कार्य से बहुत कम आय प्राप्त होती है। एक ही स्थिति में बैठे-बैठे उनकी कमर दर्द करने लगती है। उनकी आंखों पर भी भार पड़ता हैं वे अपने काम में अधिक रकम लगाना चाहते हैं, क्योंकि इससे उनकी आय में वृद्धि होगी। उनका कहना था कि हम लोगों के पास नोट छापने की मशीन नहीं है। कच्चे माल की खरीददारी जब हम लोगों के पास पैसा हाता है, तब की जाती है। कच्चे माल की गुणवत्ता हम लोगों के पास प्राप्त रकम की मात्रा पर निर्भर है। हम लोगों को अपना उत्पादन बेचने के लिए बहुत दूर-दूर जाना होता है, जब हम अपना उत्पादन बेचने में असमर्थ होते हैं, तो श्रमिक का कार्य करना होता है, बड़ी कठिनाईयों से हम अपना पेट भर पाते हैं, जब हमारे पास पैसा होता है तो हमारे बच्चे खिचड़ी खाकर रहते हैं। जब हम व्यापारियों को अपना माल बेचते हैं, तो हमें हानि उठानी पड़ती है। हम अपना माल हानि पर नहीं बेचना चाहते, क्योंकि इसको बनाने में हमें कठिन मेहनत करना होता है। जब हम लोग अपना माल नहीं बेच पाते तो मजबूर होकर व्यापारियों के हाथ हानि पर बेचना पड़ता है। इस प्रकार कठिन परिश्रम के बाद भी हमें अपने व्यापार से कुछ भी नहीं मिल पाता है। नरकट का कार्य :- नरकट एक प्रकार का जंगली पौधा है जो झांसी जनपद के अधिकांश क्षेत्रों में जंगलों या खेतों के चहारदिवारियों तथा ऊँची नीची भूमियों पर हुआ करता है। इसका प्रयोग बरतनों को रखने के लिए आधार बनाने और चारपायी के बांध या रस्सी बनाने के कान में लाया जाता है। हरिजन की एक विशेष जाति द्वारा इस कार्य को किया जाता है। यह कार्य विशेषकर महिलाओं द्वारा किया जाता है। पुरूषों द्वारा नरकट को खेतों तथा खुली जगहों से लाकर देने तथा इससे बने उत्पादों को बेचने के कार्य में मदद ली जाती है। इस कार्य में जहां कहीं से भी मिल जाता है, नरकट एकत्र करने का कार्य किया जाता है। महिलायें नरकअ से बरतन स्टैण्ड और अन्य सामान बनाती हैं और नकद या अनाज के बदले में बेचती हैं। नरकट प्रायः अक्टूबर से नवम्बर माह में प्राप्त होता है। महिलायें दो या तीन की समूह में अपने बच्चों तथा पुरूषों के साथ जाकर हसिया से नरकट काटने का कार्य करती हैं और प्रत्येक परिवार द्वारा अधिक से अधिक नरकट काटकर रख लिया जाता है, जिससे वर्ष भर उत्पादन का कार्य किया जा सके, क्योंकि नरकट एक विशेष समय पर ही प्राप्त होता है। इसलिए पूरे वर्ष के लिए नरकट का स्टाक रख लिया जाता है । नरकट का किसी परिवार द्वारा कितना स्टाक रखा जाता है, यह अपने गांव तथा आस-पास के क्षेत्रों में उसके द्वारा बने उत्पादों की मांग तथा परिवार में कितनी महिलायें इस कार्य को करती है। इस पर भी निर्भर हैं । नरकट को बण्डल में बांधकर रखा जाता है तथा 150 से 250 बण्डल तक एकत्र करके रखा जाता है। जहां पर इसकी मांग अधिक नहीं होती, जैसा कि बबीना विकास खण्ड में है, उन क्षेत्रों में 50 से 60 बण्डल तक एकत्र किये जाते हैं। नरकट को हंसिया से कटना एक कठिन कार्य और महिलायें अधिकतर घायल भी हो जाती हैं जंगलों में जाकर नरकट काटकर एकत्र करना भी एक कठिन कार्य है, उन्हें सात से दस किलोमीटर तक जाना पड़ता है, उन्हें जंगल में कांटों और झाड़ियों में घूमना पड़ता है, जिससे उन्हें चोट भी लग जाती है। कभी-कभी जिन किसानों के खेत के चारों और इस लगाया जाता है वे इसे काटने नहीं देते हैं। कभी-कभी उन्हें इसको काटने पर उन्हें मार खानी पड़ती है और उन्हें खेत से निकाल दिया जाता है। कुछ किसानों द्वारा इसे बेंच दिया जाता है। और उन्हें कुछ आय प्राप्त होती है। किसान सोचते हैं कि यह उनके लिए कच्चा माल है, जो उन्हें मुफ्त में क्यों दिया जाय इसलिए उन्हें कुछ कीमत प्राप्त करके दिया जाता है। महिलायें दो रूपये का एक बण्डल नरकट प्राप्त करती हैं। जब नरकट खरीदने से प्राप्त होता है तो उनके पास जितना पैसा होता है, उसी के अनुसार वे खरीददारी करती हैं। नरकट बेचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, पर अभी बड़ी मात्रा में नरकट खरीदने से ही नहीं प्राप्त होती है। महिलायें इसे अपने सिर पर लादकर घर पा लाती है। कभी-कभी पुरूषों द्वारा साइकिल का प्रयोग किया जाता है। जब नरकट की मात्रा अधिक होती है तो गाड़ी का प्रयोग किया जाता है। जब परिवार में पर्याप्त सदस्य नहीं होते हैं तो श्रमिक काम में लगाये जाते हैं और उन्हें 15 बण्डल के लिए 30 रूपये प्रतिदिन दिया जाता है। महिलायें ज्वार और धान के पौधे भी इन्हें बांधने के लिए एकत्र करती हैं। नरकट को पहले तालाब, या पानी के गढ्ढे में एक माह के लिए डाल दिया जाता है, बाद में इसे पानी में डालकर मुलायम तथा चिकना बनाया जाता है। एक माह के बाद उसे पानी से निकालकर धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद उसे छाया में किसी खम्बे या खूंटी में टांग दिया जाता है। ऐसे गांव जहां पानी नहीं मिलता है, वहां पर इसे पानी में भिगोने की समस्या होती है । जब इसकी सहायता से बरतनों के रखने का स्टैण्ड (पाट होल्डर) बनाना होता है तो थोड़ी मात्रा में सूखे नरकटों का प्रयोग किया जाता है। इसे छीलकर और भी पतला करके पुन5 पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद उसे लकड़ी के हथौड़े से पीटा जाता है, जब तक कि यह मुलायम और लचीला नहीं हो जाता है और इसी से बिनकर बर्तनों के स्टैण्ड आदि बनाये जाते हैं। ज्वार व धान के पौधे के सूखे पुआल का प्रयोग इसके अन्दर डालकर ऊपर से नरकट से बुनायी की जाती है, जिससे बरतनों का स्वरूप बन जाता है। इसे गोले के आकार में बदला जाता है, इसके चारों और नरकट से गट्ठी देकर बिनाई का कार्य किया जाता है, कभी-कभी इसके बीच में कपड़े के टुकड़ों का प्रयोग पुआल और नरकट के बीच किया जाता है। धान का पुआल महिलाओं को उन किसानों से प्राप्त हो जाता है, जहां वे कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करती हैं तथा कपड़े के टुकड़े गांव की दजी के पास से प्राप्त हो जाते हैं। कहीं-कहीं वे कपड़े के टुकड़े या कतरन वजन में तौलकर 5 रूपये किलो के हिसाब से प्राप्त करती हैं बनी हुई सामग्री गांव के घरों में बेची जाती है। वे दूसरे गांव में जाकर भी इसे बेचती हैं या नगर के किसी दुकानदार को इकट्ठा बेच दिया करती हैं। इस प्रकार बनी हुई टोकरी, बरतन स्टैण्ड आदि सामान 5 पैसे से 7 रुपये की बिकती है। कुछ गावों में इसे अनाज के बदले में बेचा जाता है। वर्ष भर लगातार इन सामानों को देने के लिए आधा मन अनाज दिया जाता है। पर ऐसे भी उदाहरण मिले हैं जहां एक से दो मन तक अनाज इसके लिए दिया जाता है। जिसके द्वारा परिवार में लगने वाले सभी सामनों की पूर्ति इनके द्वारा की जाती है। ये सामान अधिक दिनों तक नहीं चलते हैं । एक बण्डल नरकट से एक अच्छे कार्यकर्ता द्वारा दस से बारह इनडोनीच बना सकता है। कुछ महिलायें केवल उतने ही बण्डलों से उसका आधी संख्या में इन्डोनीच बना सकती है। इन्डोनीज के अतिरिक्त वे सुधीयास भी बनाती हैं। बड़े बरतनों की मांग बहुत अधिक होती है। पर बड़ी मांग के बर्तनों का निर्माण आदेशों के आधार पर किया जाता है, क्योंकि इनमें अधिक समय और अधिक कच्चे माल की आवश्यकता होती है। एक दिन में दो या तीन सुधीयास उसी नरकट के बण्डल से बनायी जा सकती है। इसी प्रकार एक बर्तन स्टैण्ड (पाट होल्डर) जिसे सीध (सीका ) कहते हैं। यह बर्तन के शक्ल का एक प्लेट होता है, जिसे बर्तन को बदलने में प्रयोग किया जाता है। इसे भी आदेश प्राप्त होने पर बनाया जाता है। एक सीका बनाने के लिए दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। सीका और सुधियास से इन्डोनीज की तुलना में अधिक दाम प्राप्त होता है। सुधियास लगभग दस रूपये की और सीका के लिए 10 से 15 रूपये प्राप्त हो जाते हैं। पर इन वस्तुओं की मांग बहुत कम होती है। एक माह में चार या पाचं सुधियास और दो सीका बनाया जाता है। जब इन्हें अनाज से बदला जाता है तो सुधियास के बदले दो से पांच सेर अनाज प्राप्त होता है। जब इसकी वार्षिक आधार पर आपूर्ति की जाती है तो इसके अन्तर्गत इन्डोनीज, सीका और सुधियास तीनों को शामिल किया जाता है। सामान्यतया आधा मन अनाज के बदले 10 से 15 इन्डोनीज दो सुधियास तथा दो सीका दिये जाते हैं। जब इन्डोनीज की बिक्री महिलाओं द्वारा अपने ही गांव में की जाती है तो परिवारों द्वारा इसकी आपूर्ति करने की सूचना समय-समय पर दी जाती है। जब महिलाओं को पैसे की या अनाज की आवश्यकता होती है तो वे गांव में घर-घर जाकर इन्डोनीज देने के लिए पूंछती हैं। जब इनहें अन्य गांवों में बेचा जाता है तो महिलायें दो या तीन टीम के समूह में घर-घर जाती हैं और इन्डोनीज बेचा करती हैं जब वे किसी दुकानदार को अपना माल दिया करती हैं तो उसे अधिक मात्रा में उसकी आपूर्ति करती हैं। दो या तीन दिनों में वे गांव के बाहर इन्डोनीज बेचने के लिए निकलती हैं। जहां पर इनकी आपूर्ति दुकानदारों को की जाती है, उन्हें 15 दिनों में माल दिया जाता है। पर कभी-कभी इन लोगों के पास बस का किराया तक नहीं होता है, जब वे इसे दुकानदार के पास बेचने के लिए जाया करती है । जब इन्डोनीज बेचेन के लिए महिलायें दूर के गांवों के इन्डोनीज बेचने जाती हैं तो वे उस समय तक अपने गांव वापस नहीं आती हैं, जब तक उनका पूरा माल नहीं बिक जाता है। आवश्यकता पड़ने वे उस गावं में रात को भी रूक जाती हैं और अगले दिन उसे बेचने का प्रयास करती हैं। यही कारण यही कारण है कि वे बेचने के कार्य लिए अकेले न जाकर एक समूह में जाया करती हैं। जब इन सामानों बिक्री वार्षिक खाद्यान्न के आधार पर की जाती है तो इनके परिवार निर्धारित होते हैं। एक नरकट का कार्य करने वाले परिवार द्वारा बारह से पन्द्रह परिवारों को इसकी आपूर्ति की जाती है। यदि किसवी गांव में केवल दो या तीन परिवार इस कार्य को करने वाले होते हैं तो परिवारों को विभाजन बराबर संख्या के आधार पर होता है। इन परिवारों द्वारा अपने गांव से वस्तु की आपूर्ति द्वारा कितनी आय प्राप्त होगी यह उनके गांव वालों के साथ सम्बन्ध पर निर्भर है। यदि इनके सम्बन्ध गांव वालों से अच्छे नहीं होते तो गांव के अमीर लोग इन्डोनीज की खरीददारी या तो दूसरे गांव से या नगरों से करते हैं और गांव वालों से इसकी खरीददारी नहीं करते हैं । यह केवल बदले की भावनावश किया जाता है, जिससे इन श्रमिकों की स्थिति और भी खराब हो जाती है । नरकट के कार्य से बहुत अधिक आय नहीं प्राप्त होती है, परयह कुछ परिवारों के आय का साधन हैं इन्हें प्राप्त होने वाला अनाज एक प्रकार से भूख के प्रति सुरक्षा का कार्य करता है, भले ही वह वर्ष के कुछ महीनों के लिए पर्याप्त होता है। जब इन श्रमिकों को धनराशि या नकद प्राप्त होता है, तो वे अपना खाद्यान्न खरीदते हैं। वे अपने माल की आपूर्ति के बदले खाद्यान्न लेगें या नकद यह उनके परिवार में प्राप्त खाद्यान्न की मात्रा पर निर्भर है। सभी परिवारों द्वारा अपने परिवार की आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अन्य कार्य करते हैं, वे कृषि कार्य, मिट्टी खोदने तथा अन्य श्रम प्रधान कार्य करते हैं जो भी उन्हें समय-समय पर प्राप्त होता है। पर ये कार्य मौसमी होते हैं और वे वर्ष के कुछ ही दिनों के लिए प्राप्त होता है। वे नरकट का कार्य इसलिए करते हैं, क्योंकि अन्य जाति के लोग इसे करने को तैयार नहीं होते हैं। इसलिए वे अपनी आय को बढ़ाने के लिए कोई भी दूसरा कार्य करते हैं और जैसे ही दूसरा कार्य समाप्त हो जाता है वे नरकट के कार्य पर वापस आ जाते हैं। वे अपने परिवार के खाद्यान्नों की आवश्यकता को जानते हैं । उनका पहला उद्देश्य परिवार के लिए वर्ष भर के लिए पर्याप्त अनाज की प्राप्ति करना होता है। उन्हें नकद की भी आवश्यकता होती है और नकद के लिए अधिमान उस समय होता है, जब परिवार के लिए पर्याप्त अनाज एकत्र कर लिया जाता है। जब कभी उनके पास खाद्यान्न पर्याप्त होता है और उनके लिए नकद की आवश्यकता बहुत अधिक होती है तो वे नकद प्राप्त करने के लिए अनाज को बेंच देते हैं और नकद प्राप्त करके इसकी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। यह उन गांवों में होता है जहां उन्हें पर्याप्त मात्रा में अनाज (प्रति परिवार दो या तीन मन अनाज प्राप्त होता है) प्राप्त होता है। उन्हें अनाज मिलता है, नकद नहीं। वे उधार भी लिया करते हैं जिसे वे बाद में वापस करे हैं। यह इसलिए आवश्यक होता है, कि वे अपना पूरा अनाज बेच नहीं सकते, क्योंकि भोजन की आवश्यकता होती है। यदि वे अनाज प्राप्त करते हैं तो अनाज को दुकानों पर बेचकर आवश्कयता की अन्य वस्तुएं खरीद ली जाती हैं । कुछ महिलायें नरकओं से रस्सियां भी बनाती हैं जो चारपाइयां बनने के काम आती हैं महिलायें रस्सियां बनाती हैं और पुरूष विभिन्न परिवारों में चारपायी के बुनाई का काम करने जाते हैं। एक चारपायी में दो या तीन बण्डल नरकट की आवश्यकता होती है। इस कार्य में उन्हें एक चारपायी की रस्सी के लिए 20 रूपये व बुनाई के कार्य के लिए भी 15 से 20 रूपये प्राप्त होते हैं। पुरूषों द्वारा बुनाई का कार्य अन्य गांवों में भी किया जाता है। कभी-कभी चारपायी बिनने के बजाय केवल रस्सी ही बेच दी जाती है। महिलायें नरकट के कार्य के साथ घरेलू कार्य भी करती हैं। घरेलू कार्य समाप्त करने के बाद वे इस कार्य को करती हैं। वे पांच से 6 घण्टे इस कार्य को करती हैं। बच्चों की देखरेख भी कार्य के साथ-साथ की जाती है } महिलायें इन्डोनीज बनाकर अपने दिन प्रतिदिन के व्ययों को पूरा करती हैं 1 जब वे नरकट प्राप्त करने के लिए जंगलों में जाती हैं तो वे इस कार्य को नहीं करती हैं, बल्कि वे पहले से कुछ इन्डोनीज बनाकर रख देती हैं, जिसे बेंचकर वे कुछ अनाज या पैसे प्राप्त करती रहती हैं। मौसम के समय वे एक दिन उत्पादन का कार्य तथा एक दिन नरकट एकत्र करने का कार्य करती हैं वे इतने अधिक मात्रा में नरकट एकत्र करती हैं कि वह अगले मौसम तक चल बरसात के समय में नरकट को सूखे रखना एक समस्या होती है। सूखे महीनों में नरकट झोपड़ियों के छत पर रख दी जाती है पर बरसात में इसे पार के अन्दर रखा जाता है। यदि नरकट भीग जाती है तो वह बेकार हो जाती है ओर उस समय अन्य माल नहीं मिल पाती है। इन लोगों को अपना कच्चा माल सावधानी से बचाकर रखना होता है । यद्यपि इनकी झोपड़ियां छोटी होती हैं पर वे कच्चे माल को उसी में बचाकर रखना होता है । यद्यपि इनकी झोपड़ियां छोटी होती हैं पर वे कच्चे माल को उसी में बचाकर रखते हैं। महिलायें अपनी गरीबी के बारे में बहुत ही जागरूक हैं उनका कहना था कि इस कार्य को करते हुए हम लोगों का जीवन बीत जाता है, हम लोग हो गयी हैं पर कोई परिवर्तन नहीं आया है। हम लोगों के हाथ में खरोंच पड़ गयी हैं पर कोई सुधार व विकास नहीं हुआ है। हम लोगों के हाथ थक गये हैं, हमारा शरीर एक ही स्थिति में बैठे-बैठे दर्द करने लगता है, यदि हम लोग अपने हाथों की खरोंच को देखें तो अपना पेट कैसे भरें। यदि हम लोग दूसरा काम करने जाते हैं तो प्रत्येक दिन खाना हम लोगों को नहीं मिलेगा। जब हम कृषि में कार्य करते हैं तो कुछ पैसा हाथ में दिखायी पड़ता है। जब कभी हमें नकद की आवश्यकता होती है घर के अनाज को बेचना पड़ता है। अन्य पेशों की भांति इन श्रमिकों की कोई प्रतिनिधि संस्था कार्य नहीं कर रही है, जो इनके आर्थिक व सामाजिक हितों की रक्षा कर सके । चमड़े का कार्य :- यह एक जाति प्रथा पर आधारित पेशा है, जिसे चमार जाति के लोग करते हैं। हरिजन जाति में चमार एक उपजाति है। बर्तन उद्योग की भांति यह भी एक परम्परागत उद्योग है पर इसे कार्य के कुछ स्तरों में तकनीकी परिवर्तन आये हैं। यह एक पारिवारिक कार्य है, जिसमें महिलायें कार्यों में मदद करती हैं। इस कार्य में कुछ काम घर के अन्दर तथा कुछ घर के बाहर पूरा किए जाते हैं । जब गांव में कोई जानवर मर जाता है तो चमारों को सूचना दी जाती है। मरे हुए जानवर को पहले गांव के बाहर उठाकर ले जाया जाता है। चमार की बस्तियों में जो भी व्यक्ति उस समय खाली होता है, इस कार्य के लिए जाता है। यह एक अधिक परिश्रमी कार्य है, महिलायें भी इसमें सहायता करती हैं, जब पुरुषों की संख्या पर्याप्त नहीं होती है। अधिकांश गांवों में जानवर को खींचकर बाहर ले जाया जाता है। महिलायें तथा पुरूष दोनों ही जानवरों को खींचते-खींचते थक जाते हैं, कभी-कभी उन्हें कंधे पर लादकर ले जाया जाता है। कुछ गांवों में अब चमारों द्वारा एक गाड़ी का प्रयोग जानवरों को ले जाने के लिए किया जाता है, जिससे उनका कार्य हल्का हो जाता है। गांव के बाहर जानवर ले जाकर चाकू, और कैचियों से उसके खाल निकालने का कार्य किया जाता है। हड्डियों को काटने के लिए कुल्हाड़ी का प्रयोग किया जाता है। पुरूष तथा महिलायें दोनों मिलकर इस कार्य को करती हैं चमड़े को सावधानी के साथ निकाला जाता है, जिससे उसे नुकसान कर रख लिया जाता है। जानवर के चमड़ने निकालने का कार्य में दो या तीन घण्टे लग जाते हैं। इस कार्य के लिए चमारों द्वारा अपने यंत्रों और औजारों का प्रयोग किया जाता है। कुछ गांवों में किसानों द्वारा अपनी बैलगाड़ी जानवर को फेंकने के लिए दी जाती हैं और कहीं-कहीं चमारों को इसके लिए दस से पच्चीस रूपये तक किराया देना होता है। चमड़ा निकालने के बाद इसे महिलाओं को दे दिया जाता है, जो नमक लगाकर इसके काटने का कार्य करती हं । एक बड़े जानवर के चमड़े को साफ करने में लगभग दस किलो नमक लग जाता है। महिलायें यह नमक दुकानदार से खरीदकर इसका तुरन्त उपयोग करती हैं। नमक लगा हुआ चमड़े को सूखने के लिए 48 से 60 घण्टे तक लगते हैं नमक द्वारा चमड़े की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कीट नाशक होता है और यह चमड़े में नमी बनाये रखने में सहायक होता है। चमड़े को छाया में सुखाना अच्छा माना जाता है। इसके बाद इसे मोड़कर रखा जाता है। चमड़े की कीमत उसके सूखने के गुण पर निर्भर है। जिसका अर्थ है कि चमड़े में काले धब्बे नहीं होना चाहिए, जो सूरज की रोशनी में चमड़ा सूखाने के कारण या सम धरातल के न होने पर होता है। एक समान सूखने के लिए चमड़े को कुछ घण्टों के बाद उलटना होता हैं । जाड़े में चमड़ा गर्मियों की अपेक्षा अच्छी तरह सूखता है। बरसात में इसका सूखना कठिन कार्य है। महिलाओं द्वारा इसे अपने घरों के भीतर चमड़े के सूखाने का कार्य करती हैं, जिसके कारण उन्हें विभिन्न कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है । चमड़े के सूखने के बाद चमड़े के उत्पादन योग्य बनाने की प्रक्रिया में तकनीकी परिवर्तन हुए हैं। परम्परागत तरीके द्वारा चमड़े की सफाई, घस व पेड़ के छालों द्वारा की जाती है, जिसके अन्तर्गत प्रकृति प्रदत्त रसायन कुंआ करते हैं। इस तरीके में महिलाओं को बहुत से काम करने होते हैं, जैसे घास और पेड़ों की छाल को एकत्र करना, उन्हें महीने लग जाता है, फिर भी उद्योगों के रसायन द्वारा साफ किये गये चमड़े की तुलना में अधिक कड़ा तथा मोटा होता है। चर्म शोधन की आधुनिक तकनीकों के विकास तथा चर्म शोधन उद्योगों की स्थापना के परिणाम स्वरूप अब उद्योगों के रसायन द्वारा साफ किये गये चमडत्रे तुलना में अधिक कड़ा तथा मोटा होता हैं चर्म शोधन की आधुनिक तकनीकों के विकास तथा चर्म शोधन की आधुनिक तकनीकों के विकास तथा चर्म शोधन उद्योगों की स्थापना के परिणाम स्परूप अब उद्योगों तकनीकों के विकास तग चर्म शोधन उद्योगों की स्थापना के पिरणाम स्परूप अब उद्योगों द्वारा शोधित चमड़े का प्रयोग बढ़ रहा है। अब परम्परागत तरीके से चर्म शोधन के बजाय उद्योगों द्वारा शोधन का कार्य किया जाने लगा है। इसके अतिरिक्त चमारों के पूंजी में ह्मस हुआ है और उनके पास चर्म शोधन के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है। चर्म शोधन की पुरानी विधि धीरे-धीरे समाप्त हो रही है और चमार अधिक तर आंशिक रूप से सूखे चमड़े को बेच देते हैं। इस प्रकार सूखे हुए चमड़े खरीदने के छोटे व्यापारियों का उदय हुआ है और उन चमारों में से ही कुछ लोग इस कार्य को करने लगे हैं। वे गांव-गांव घूमकर इस प्रकार प्राप्त चमड़े की खरीददारी करते हैं। चमार इन व्यापारियों का इन्तजार चमड़ा बेचने के लिए करते हैं, क्योंक उनसे कुछ अधिक कीमत चमड़े की प्राप्त हो जाती है। यदि चमारों द्वारा इन व्यापारियें से ऋण प्राप्त किया गया होता है तो चमड़े की उन्हें कुछ कम मूल्य प्राप्त होता है। चमारों को रूपये की अधिक आवश्यकता होने पर वे अपने चमड़े को बेचने के लिए जाया करते हैं। यह मजदूरी में बिक्री की स्थिति होती है। व्यापारी इन चमड़े को शोधक कारखानों में बेचते हैं और इसका शोधन के पश्चात पुनः चमारों को इनकी वस्तुएं बनाने के लिए प्राप्त हो जाता है। कुछ केन्द्रों पर अभी भी पुराने तरीके से चमड़े का शोधन किया जाता है, फिर भी चमार शोधित चमडत्रे व्यापारियों से ही खरीदते हैं। व्यापारीगण आस-पास के गांवों में जाकर सूखे चमड़े खरीदने का कार्य करते हैं पुरानी तथा आधुनिक दोनों तरीकों से चमड़े के शोधन में पर्याप्त मात्रा में चमड़े की प्राप्ति का होना आवश्यक है और इसके लिए दोनों प्रकार के तरीकों से शोधन करने वाले अधिक मात्रा में सूखे चमड़े खरीदते हैं । पुराने तरीके के शोधन विधि में बहुत सी महिलायें इसकी प्रक्रिया से परिचित हैं और वे स्वयं चर्म शोधन का कार्य भी करती हैं आधनिक तरीके में यह पूर्णतया पुरुषों का ही कार्य हो गया है। महिलाओं को श्रमिक के रूप में लगाया जाता है, जो शोधन कार्य में पानी भरने का कार्य करती हैं। आधुनिक तरीके में उद्योगों से बने रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इसमें रसायनों का अनुपात तथा समय दोनों ही अलग-अलग होता है और महिलायें इन तरीकों से परिचित नहीं है। आधुनिक तरीके से शोधित चमड़े को तैयार होने में लगभग एक माह का समय लग जाता हैं यह पुरानी विधि से शोधित चमड़े की तुलना में अधिक मुलायम होता है पर यह कम टिकाऊ होता है। में विभिन्न गांवों में सूखे चमड़े अलग-अलग स्थानों पर बेचे जाते हैं एक गाय का चमड़ा 75 से 100 रूपये, भैंस का चमड़ा, 100 रूपये से 125 रूपये तथा बैल का चमड़ा 75 से 100 रूपये तथा बकरी का चमड़ा 75 से 100 रूपये का बिकता है। वर्तमान में इस पेशे से चमारों को यदा कदा आय प्राप्त होती है, जो आंशिक रूप से शोधित चमड़े की बिक्री का कार्य करते हैं, क्योंकि इन्हें आय केवल उस समय प्राप्त हो सकती है, जब गांव में कोई जानवर भरता है। इस घटना के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। यदि किसी गांव में एक या दो चमारों के परिवार होते हैं, उन्हें वर्ष में सात या आठ चमड़े प्राप्त हो जाते हैं। जब चमारों के परिवारों की संख्या अधिक होती है तो उन्हें एक या दो चमड़े वर्ष में प्राप्त हो जाते हैं। जब जानवरों में कोई महामारी फैलती है तो उन्हें अधिक चमड़े प्राप्त हो जाते हैं। यदि जानवरों की अच्छी देखभाल की जाती है, उन्हें अच्छे भूसे और भोजन दिया जाता है तो वे स्वस्थ रहते हैं तथा अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। ऐसी स्थिति में उकने कम चमड़े प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार ऐसे गांव जहां लोग कम मात्रा में जनवर पालते हैं, वहां भी चमड़े अधिक मात्रा में नहीं प्राप्त होते हैं। यह उन लोगों का एक नियमित पेशा बन जाता है जो चमड़े के शाधन का कार्य करते हैं, क्योंकि यह एक लगातार चलने वाला कार्य होता है, जो लोग आंशिक रूप से शोधन का कार्य करते हैं, वे अपनी जीविका केवल इसी कार्य से नहीं अर्जित कर सकते हैं, ऐसी स्थिति में उनका मुख्य पेशा कृषि श्रमिक या श्रम प्रधान कोई भी कार्य होता है और चमड़े का कार्य उनका मुख्य पेशा कृषि श्रमिक या श्रम प्रधान कोई भी कार्य कोई अन्य नहीं करता है। वे लोग जो चमड़े का शोध्न पूरी तरह करते हैं और उससे चमड़े का सामान भी बनाते हैं वे इस कार्य से अपनी जीविका अर्जित करने के लिए एक युक्तिसंगत आय प्राप्त करते हैं। जिन गांवों में एक या दो चमारों के परिवार होते हैं, उनके लिए परिवार के सदस्यों की सहायता से जानवरों की खाल उतारना अधिक कठिन होता है, उन्हें अन्य जातियों के लोगों की सहायता लेनी होती है, और उसके लिए उन्हें मेहनताना देना होता है। जानवरों की हड्डियां, खुर तथा पूंछ के बाल गांव के सभी परिवारों द्वारा वर्ष भर एकत्र किये जाते हैं और वर्ष में एक बार व्यापारियों के हाथ 50 से 60 रूपये के बीच दाम लेकर बेंच दिए जाते हैं। बहुत से चमार परिवार इस प्रकार प्राप्त रकम का प्रयोग खुद नहीं करते हैं, बल्कि वे अपने पुरोहितों को दे देते हैं जो इधर उधर घूमकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं और अन्य लोग इसे एक फण्ड के रूप में रखते हैं और अपने जाति के लोगों को उनके आवश्यकता के समय दे दिया करते हैं। चमारों में एक ऐसी परम्परा है कि अपने जाति के लोगों में चमड़े के कार्य से प्राप्त होने वाली आय के लिए सभी परिवारों को समान अवसर दिया जाता है। इसके लिए एक क्रम बना दिया जाता है, जिसे सभी परिवार मानते हैं, यह विभिन्न जानवरों के लिए बनाया जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक गांव में दस परिवार हैं तो वे सभी परिवार के बैल का चमड़ा प्राप्त करने के लिए अवसर दिया जाता है। इसी प्रकार अन्य जानवरों जैसे भैंसा, गाय, ऊँट आदि जानवरों के चमड़े प्राप्त करने के लिए सभी का क्रम लगा दिया जाता है। अतः छोटे बड़े सभी जानवरों के लिए उन जानवरों के मृत्यु के अनुसार क्रम बांध दिया जाता है। पर किसी परिवार को कब मौका प्राप्त होगा, इसकी भविष्यवाणी करना कठिन है। यह प्रणाली बहुत ही उपायेगी है तथा इसके अनुसार परिवारों के बीच काम का बंटवारा समान रूप से हो जाता है। यदि किसी गांव में बहुत अधिक परिवार होते हैं तो एक परिवार को वर्ष में दो वर्ष में चमड़ा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है। कुछ गांवों में यह प्रणाली नहीं है, बल्कि चमारों के परिवार गांव के निश्चित परिवारों के साथ जुड़े होते हैं। वास्तव में यह पेशा जजमानी व्यवस्था के आधार पर चलता रहा है। किसानों द्वारा चमारों को अनाज दिया जाता है, जिसके बदले में चमारों द्वारा किसानों को बैलों के लिए चमड़े की लगाम, उन्हें तथा उनके परिवार वालों को चप्पल तथा जूते दिये जाते हैं। मरे जानवरों को ले जाने के बदले में उन्हें कच्चा माल (चमड़ा) दे दिया जाता है तथा शोधन के पश्चात चमड़ा उसी किसान को अनाज के बदले में दे दिया जाता है और दूसरे लोगों को नकद प्राप्त करके बेच दिया जाता है। वर्तमान में पूरी व्यवस्था का व्यापारीकरण हो चुका है और किसानों द्वारा अब कोई भी अनाज चमारों को नहीं दिया जाता है, बल्कि किसान मरे जानवरों के बदले उनसे कुछ पैसे भी प्राप्त करते हैं। मऊरानीपुर तथा बंगरा विकास खण्डों के कुछ गांवों में अभी भी जजमानी प्रथा चालू है जहां पर चमारों द्वारा चमड़ा शोधन तथा उससे सामान बनाने का कार्य किया जाता है। चमड़े का पुराने या आधुनिक तरीके से शोधन करने के लिए सूखे चमड़े को कुण्ड में रसायन लगाकर रखा जाता है और उसे कुछ दिनों के बाद तीन कुण्ड में रखा जाता है, जिनमें अलग-अलग रसायन पड़े होते हैं। पुरानी विधि के अन्तर्गत चमड़े को प्रतयेक कुण्ड में एक माह तक तथा आधुनिक विधि के अन्तर्गत दस दिनों तक रखा जाता है। पुरानी विधि में एक घास, जिसे जवासी कहते हैं, बबूल की गोंद, फिटकिरी, हल्दी तथा रेण्डी का तेल मिलाया जाता है। आधुनिक विधि के अन्तर्गत मैग्नेशियम सल्फाइड, बबूल की गोंद, हरदी और रेण्डी का तेल मिलाया जाता है। जिन चमारों द्वारा चर्म शोधन का कार्य स्वयं किया जाता है उन्हें कुण्ड बनवाने के लिए जल की सुविधा और रासायनिक पदार्थ खरीदने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त अन्य चमारों से चमड़ा खरीदने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है, जिससे यह कार्य हमेशा चलता रहे। इसी कारण से चर्म शाधन का कार्य केवल कुछ लोगों के हाथ में केन्द्रित हो गया है। कुण्ड बनवाने तथा जल की सुविधा के विकास के लिए लगभग पांच हजार रूपये की आवश्यकता होती है। यदि नये कुएं का निर्माण करना होता है तो इस हजार रूपये लगते हैं। उन गांवों में जहां चर्म शोधन का कार्य किया जाता है, ये सुविधायें बहुत दिनों से प्राप्त हैं। उन्हें नये शिरे से निर्माण नहीं किया जाता है। शोधन के लिए चमड़ा खरीदने का विनियोग उसके कार्य के अनुसार अलग-अलग है । जो चर्म शोधन अपने गांव के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं वे वर्ष में यह कार्य दो बार करते हैं वे एक साथ आठ या दस चमड़े का शोधन एक बार करते हैं। यदि चर्म शोधन के सभी रसायन खरीदना होता है तो दस चमड़े के शोधन में एक हजार रूपये की रकम लगती है, जो लोग शोधन का कार्य लगातार करते हैं वे दो हजार से तीन हजार रूपये का विनियोजलन करते हैं। शोधित चमड़ा 50 रूपये या 75 रूप्ये किलो के हिसाब से बिकता है। एक भैसें या बैल के चमड़े का वजन बीस किलोग्राम के आस-पास होता है। एक बार चमड़े को बेचकर अगले उत्पादन के लिए उसी राशि का विनियोग किया जाता है।
है, जिसमें सभी किसानों को एक साथ श्रमिकों की आवश्यकता होती हैं कृषि में भूमि की जुताई, बुआई, पौध लगाने, सिंचाई, खर पतवार निकालने, उर्वरक और कीट नाशक दवाओं को छिड़कने, फसल की कटाई, पंवाई, ओसाई, सफाई, फसलों को बोरे में भरना एवं बैलगाड़ी पर लदाने के कार्य के लिए श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इन कार्यों में महिलाओं को मुख्यतया निराई, बुआई, पौध लगाने, कटाई, फसलों से भूसा निकालने के कार्य, दवाई, सफाई, फसल को बोरे में भरने और बैलगाड़ी में लदायी के कार्य में लगाया जाता है। इन कार्यों को किसी भी जाति के लोग कर सकते हैं । कृषि श्रमिक तीन तरीकों या प्रणाली के अनुसार कार्य करते हैं :दैनिक मजदूरी के आधार पर टुकड़े या किसी काम विशेष के लिए निर्धारित मजदूरी वार्षिक संविदा या ठेके के आधार पर महिलाओं को दैनिक मजूदरी या काम के टुकड़े के आधार पर निर्धारित मजदूरी की दरों के आधार पर काम में लगाया जाता है। जिन किसानों को मजदूरों की आवश्यकता होती है, उन्हें मजदूरों के घर जाकर किसी विशेष दिन उनके खेत पर जाकर काम करने के लिए कहना होता है। श्रमिक किसानों के घर काम करने के लिए कहने के लिए या काम मांगने के लिए श्रमिक नहीं जाते हैं, क्योंकि ऐसा करने से उनके मोल भाव करने की शक्ति कम हो जाती है। यदि किसान उनके घर जाते हैं तो वे मजदूरी के बारे में बात करने में समर्थ होते हैं और उन्हें एक उपयुक्त मजदूरी प्राप्त करने की आशा हो जाती है। जब श्रमिक किसी अन्य गांव या स्थान पर जाते हैं तो उन्हें काम खोजने और करने के लिए कहना और जाना होता है। यह एक निराशाजनक स्थिति होती है। जब किसानों द्वारा उनके पास जाकर काम करने के लिए कहा जाता है तो वे अपने गांव में कार्य करने के बजाय दूसरे गांवों में जाकर कार्य करना अधिक पसंद करते हैं जब कृषि श्रमिकों को दैनिक मजदूरी या कार्य के टुकड़े की मजदूरी पदर पर लगाया जाता है तो ऐसी स्थिति में यह बिल्कुल स्पष्ट होता है कि वे किसी विशेष कृषक के साथ बंधे नहीं हैं। वे किसी के यहां कार्य करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। इस स्थिति को श्रमिक पसन्द भी करते हैं। केवल वे श्रमिक जो वार्षिक संविदा या ठेके के आधार पर लगाये जाते हैं वे एक विशेष समय के लिए बंधे होते हैं। इसके पश्चात में पुनः ठेका के लिए सौदा कर सकते हैं। यदि श्रकमक किसी किसान से ऋण लिए होते हैं तो ऐसी स्थिति में जब तक ऋण की रकम अदा नहीं हो जाती, तब तक के लिए व उस किसान से बंधे होते हैं । कृषि कार्य के लिए श्रमिक बड़े किसानों या ऐसे किसानों द्वारा लगाये जाते हैं, जो अपने परिवार वालों की सहायता से समय पर कार्य पूरा करने में समर्थ नहीं होते हैं । सरकार द्वारा घोषित पचास से पचपन रूपये की सामान्य न्यूनतम मजदूरी की दर के बावजूद विभिन्न विकास खण्डों में या एक ही विकास खण्ड में दी जाने वाली मजदूरी की दरों में समानता का अभाव है। कृषि श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी सम्बन्धित किसान की आर्थिक सम्पन्नता, श्रमिकों की प्राप्ति, किसी विशेष गांव में भू स्वामियों के नियंत्रण शक्ति, बोयी जाने वाली फसल की पुकार तथा आस-पास के गांवों में प्रजलित मजदूरी की दर पर निर्भर है। दैनिक तथा कार्य के टुकड़े पर आधारित मजदूरी नकद, वस्तु रूप में और मिली जुली विधि से भुगतान की जाती है। बोआई, पौध रोपाई और निराई के कार्य के लिए मजदूरी नकद रूप में ही दी जाती है, क्योंकि उस समय किसान के पास फसल तैयार नहीं होती है। यदि फसल का पिछला स्टाक उसके पास होता है तो वह उपरोक्त कार्यों के लिए भुगतान वस्तु के रूप में कर दिया जाता है। फसल के कटाई, मड़ाई दवाई के समय में भुगतान वस्तु के रूप में किया जाता है, क्योंकि उस समय फसल तैयार होती है। कुछ गांवों में किसानों द्वारा एक सामान्य दर पर मजदूरी देने के लिए सहमति दी जाती है। इस कार्य के लिए कभी-कभी गांव के किसानों द्वारा श्रमिकों की सलाह से मीटिंग कर ली जाती है। किसी श्रमिक के दैनिक मजदूरी या काय्र के टुकड़े मजदूरी के आधार पर लगाया जाता है, यह कार्य की आवश्यकता और श्रमिकां के कार्य को देखने के लिए प्राप्त मानव शक्ति पर निर्भर है। यदि श्रमिकों के कार्य को देखने के लिए परिवार में पर्याप्त लोग होते हैं और वे इस बात का निश्चय करने में समर्थ होते हैं कि एक दिन में श्रमिक द्वारा किया गया कार्य पर्याप्त है तो ऐसी स्थिति में श्रमिक को दैनिक मजदूरी के आधार पर लगाया जाता है। ऐसी स्थिति में श्रमिक जितना कार्य एक दिन में कर सकते हैं, उतना ही कार्य करते हैं और श्रमिकों में धीरे-धीरे काम कम करने की प्रवृत्ति होती है, क्योंकि उनके एक दिन का भुगतान पहले से ही निश्चित होता है। यदि श्रमिक द्वारा किये गये श्रम का उत्पादन या काम अधिक होता है तो कृषक को लाभ होता है, क्योंकि इसके लिए उसे अतिरिक्त भुगतान नहीं करना होता है। दूसरी और श्रमिकों को यह प्रयास होता है कि काम को अधिक से अधिक दिनों में पूरा किया जाय, क्योंकि उन्हें उसी कार्य के लिए अधिक दिनों तक कार्य करने पर अधिक मजदूरी या रकम प्राप्त होती है। इस स्थिति में किसान श्रमिकों के साथ कड़ाई से पेश आते हैं और वे हमेशा श्रमिकों के साथ खड़े होकर उन्हें कार्य करने के लिए कहते रहते हैं और उन्हें अधिक सुस्त नहीं होने देते हैं । जब किसानों के पास श्रमिकों के कार्य को देखन के लिए पर्याप्त लोग उसके परिवार में नहीं होते हैं या उन्हें अपने काम को एक निश्चित समय में पूरा करना या कराना होता है, , या जब काम अति आवश्यक होता है, ऐसी स्थिति में श्रमिकों को टुकड़े की मजदूरी या पीस दर पर लगाया जाता है। खेत में एक निश्चित क्षेत्र तक या निर्धारित कार्य के लिए एक निश्चित मात्रा की रकम मजदूरी के रूप में देने का सौदा कर लिया जाता है, या मजदूरी का भुगतान बोयी जाने वाली फसल के वजन के एक निश्चित प्रतििाश्त या अनुपात के रूप में किया जाता है। यह केवल बुआई के समय ही किया जाता है। ऐसी स्थिति में श्रमिक एक टीम में या समूह में साथ-साथ कार्य करते हैं और उनका प्रयास काम को कम से कम समय में समाप्त करने का रहता है, क्योंकि ऐसा करने से उनके पास दूसरा काम करने के लिए समय बच जाता है। साधरणतः वे अपने परिवार वालों की सहायता से कार्य को पूरा करते है, जिससे मजदूरी की सारी रकम परिवार वालों को ही प्राप्त हो सके। टीम के सदस्य मजदूरी की रकम को बराबर-बराबर हिस्से में आपस में बांट लेते हैं। यदि परिवार में सदस्यों की संख्या पर्याप्त नहीं होती तो आस-पास के लोगों को टीम में शामिल कर लिया जाता है। श्रमिक काम करने के यंत्र व औजार अपना स्वयं का अपने साथ लाते हैं । जनपद में मुख्यतया गेहूं, चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, लाछी सरसों, तिल, रेण्डी, मूंगफली, गन्ना, आलू आदि फसलों को उगाया जाता है। अध्ययन चयनित विकास खण्डों में फसलों का प्रारूप निम्न प्रकार है । मऊरानीपुर गन्ना, चावल, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, उर्द, मूंग, मसूर, चना, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, आलू । चिरगांव चावल, गेंहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, गन्ना, आलू। बंगरा चावल, गेंहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, गन्ना, आलू । बबीना चावल, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, उर्द, मूंग, मसूर, चना, मटर, अरहर, सरसों, तिल, मूंगफली, गन्ना, आलू । किसानों द्वारा खाद्यान्न, दलहन, तिलहन के अतिरिक्त व्यापारिक फसलें जैसे गन्ना, आलू, सनई व हल्दी का उत्पादन थोड़ी मात्रा में किया जाता है । उपरोक्त सभी फसलों में श्रमिकों को उस समय लगाया जाता है जब कार्य इतना अधिक होता है कि परिवार के सदस्यों की क्षमता से बाहर होता है। गेहूं, धान, बाजरा, ज्वार, मक्का, सरसों आदि फसलों के उत्पादन में श्रम प्रधान तकनीक की प्रधानता के कारण एक बड़ी मात्रा में कृषि श्रमिकों को लगाया जाता है। इन कार्यों में श्रमिकों के भौतिक श्रम का प्रयोग किया जाता है। महिला श्रमिक असंगठित हुआ करती है। किसी भी विका खण्ड में कोई भी गैर सरकारी संगठन कार्यशील नहीं पाया गया जो इन महिला श्रमिकों को संगठित कर सके। कृषि श्रमिक संगठन में केवल पुरूष श्रमिक ही सदस्य पाये गये पर इसकी सदस्यता सभी गांवों और सभी श्रमिकों तक विस्तृत नहीं पायी गयी। धान के कृषि में पौध रोपड़, निराई व कटाई के समय श्रमिकों की आवश्यकता होती है। पोध रोपड़ के समय लगभग एक माह का कार्य इन्हें मिल जाता है। यह एक कठिन मेहनत वाला कार्य होता है। इसमें श्रमिकों के पैर में कीचड़ युक्त पानी में सूजन आ जाती है। इनके पैरों में जोंक लग जाती हैं, जिससे उनके पैरों से खून चूस लेती हैं। यदि वे दैनिक मजदूरी के आधार पर कार्य करते हैं तो उन्हें पचास से साठ रूपये प्रतिदिन प्राप्त होते हैं । इसी मजदूरी में उन्हें प्रातः आठ बजे से शाम छः बजे तक कार्य करना होता है। कुछ विकास खण्डों में उन्हें सात बजे प्रातः से ही कार्य करना होता है। कुछ विकास खण्डों में उन्हें वहांजाना होता है, जिसका अर्थ यह है कि उन्हें छः बजे सुबह से आठ बजे रात्रि तक अपने पैरों पर ही चलना और खड़े रहना होता है । दोपहर में भोजन के लिए आधे घण्ओ से एक घण्टे का समय मिलता है, यह भी क्षेत्र पर निर्भर है। उन्हें अपना भोजन साथ लाना होता है। इस भोजन के साथ किसानों द्वारा दाल या सब्जी आदि दे दी जाती है, कहीं कहीं तो केवल प्याज या मिर्च दे दी जाती है। कुछ स्थानों पर उन्हें कुछ नहीं दिया जाता है । केवल चिरगांव विकास खण्ड में ऐसा पाया गाय कि उन्हें पूरा भोजन दिया जाता है, श्रमिकों को जो भोजन प्राप्त होता है, उसे वे ग्रहण करते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या इस भोजन से आप संतुष्ट हैं तो उन्होंने उत्तर में कहा कि इसके अलावा हम कर ही क्या सकते हैं, अपना पेट भरने के लिए खाना ही पड़ता है। यदि उन्हें टुकड़े की मजदूरी के आधार पर तो उन्हें एक बीघा खेत में पौध रोपड़ के लिए पचास से एक सौ पचास रूपये तक दिय जाता है इस कार्य को पाँच से छः व्यक्तियों द्वारा पूरे दिन कार्य करना होता है। यदि उन्हें धान रोपने के लिए बेहन भी निकालनी होती है और बेहन निकाल कर लगाना होता है तो मजदूरी निकली हुई बेहन को केवल लगाने को कार्य करने करने की तुलना में अधिक होती है। इस मजदूरी प्रणाली में वे एक दिन में जितना अधिक कार्य कर सकते हैं, उतना कार्य करते हैं। उन्हें इसके अन्तर्गत दोपहर में कोई भोजन नहीं दिया जाता है। साधारणतः मजदूरी नकद रूप में दी जाती है पर कभी-कभी उन्हें रोपण कार्य के लिए अनाज भी दिया जाता है। धान की खेती में अगला कार्य निराई का होता है। इस कार्य में उन्हें दैनिक मजदूरी के आधार पर रखा जाता है जो बीस रूपये से तीस रूपये के बीच होती है, यह कार्य लगभग बीस से पच्चीस दिन का होता है। धान की कटाई के समय विभिन्न कार्यों में उन्हें पीस दर के अनुसार भुगतान किया जाता है। यदि फसल की कटाई के समय उनके द्वारा सभी कार्य किये जाते हैं तो उन्हें एक बीघे पर अधिकतम पाँच मन अनाज या दो सौ पचास रूपये दिये जाते हैं। सबसे अधिक प्रचलित प्रणाली एक मन की है, जो चिरगांव व बबीना विकास खण्डों में प्रचलित है। एक बीघे की कटाई में पाँच से आठ व्यक्तियों को लगाया जाता है। यदि वे विभिन्न कार्यों का सम्पादन करते हैं तो उन्हें तीन से चार दिन लगता है। यदि उनके द्वारा कुछ ही कार्य किये जाते हैं तो मजदूरी का भुगतान नहीं होता है। सामान्यतया एक बीघ भूमि के फसल की कटाई, तौलाई, दवाई, ओसाई, तथा भराई, तथा लदाई के कार्यों के लिए एक मन अनाज मजदूरी में दिया जाता है। यह इस मजदूरी की दर पर श्रमिकों द्वारा कौन-कौन से कार्य किये जायेगें इसका निर्णय स्वंय श्रमिक को करना होता है। फसल की कटाई का कार्य भी अधिकतम एक माह तक चलता है। गेहूं की खेती में मजदूरी का भुगतान दैनिक आधार पर किया जाता है। श्रमिकों को पंद्रह से बीस रूपये और दोपहर का भोजन प्रतिदिन दिया जाता है। बुआई व कटाई के लिए यही मजदूरी दी जाती है, फिर भी क्षेत्रीय अन्तर पाया जाता है। गेहूं की खेती में पीस रेट की मजदूरी की प्रथा नहीं प्रचलित है। इस कार्य में उन्हें एक माह का समय मिलता है। कुछ स्थानों पर ऐसा पाया गया कि गेहूं की कृषि में भी फसलों की कटाई में पीस रेट के अनुसार मजदूरी दी जाती है। उन्हें एक बीघ गेहूं का खेत काटने के लिए सोलह से बीस सेर गेहूं दिया जाता है। इस कार्य के लिए एक दिन में कार्य पूरा करने के लिए दो व्यक्तियों को कार्य में लगाया जाता है। इसी प्रकार एक गेहूं के एक बीघा खेत की फसल काटने के लिए अधिकतम दो मन अनाज दिया जाता है। एक दिन में पूरा कार्य सम्पन्न कराने के लिए पांच या छः व्यक्तियों को लगाया जाता है। मऊरानीपुर व चिरगांव विकास खण्डों के कुछ गांवों में गेहूं की फसल काटने के लिए सात से दस किलोग्राम गेहूं दैनिक मजदूरी के रूप में दिया जाता है। बंगरा व बबीना विकास खण्ड के कुछ गांवो में पंद्रह रूपये तथा डेढ़ और दो सेर गेहूं दैनिक मजदूरी के रूप में दिया जाता है। चिरगांव विकास खण्ड के गांवों में चार किलो गेहूं व दोपहर का भोजन दैनिक मजदूरी के रूप में दिया जाता है, या इसके बदले में पाँच बुशल गेहूं दिया जाता है गेहूं के बुआई व कटाई में भी धान की कृषि की भांति मेहनत करने की आवश्यकता होती है। कृषि में उन्हें पंद्रह रूपये से बीस रूपये और भोजन प्रतिदिन के हिसाब से बोआई के समय दिया जाता है। इसकी कृषि मऊरानीपुर और बबीना विकास खण्डों में अधिक होती है। उन्हें आठ बजे प्रातः से छः बजे शाम तक कार्य करना होता है। बीच में एक घण्टे का विश्राम दिया जाता है। फसल की कटाई के समय मजदूरी का भुगतान पीस रेट के अनुसार किया जाता है। एक बीघे बाजरे की कटाई के लिए उन्हें चार से आठ सेर बाजरा दिया जाता है। बाजरे में उसके दाने को अलग करने का कार्य अतिरिक्त होता है, इसके लिए भी उन्हें बाजरे के रूप में भुगतान किया जाता है। इन दोनों कार्यों में उन्हें दोपहर का भोजन भी दिया जाता है। कहीं-कहीं बाजरे की बाली काटने के लिए बीस रूपये प्रतिदिन की मजदूरी दी जाती है। कुछ स्थानों पर उन्हें भोजन नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें चाय और बीड़ी दी जाती है तथा भोजन दोनों दिय जाता है। यदि मौसम सूखा होता है, तो वे अधिक कार्य करना सम्भव नहीं होता है। यदि परिवार बड़ा होता है तो वे एक दिन में अधिक बाजरा प्राप्त करने में सर्मा होते हैं। बाजरे की बुवाई से कटाई तथा उन्हें पंद्रह से बीस दिनों का कार्य प्रत्येक स्तर पर प्राप्त हो जाता है। अन्य फसलों के उत्पादन जैसे मक्का, ज्वार आदि की कृषि में श्रमिकों को कुछ दिनों के लिए दैनिक मजदूरी के आधार पर कार्य मिल जाता है । यह समय एक सप्ताह से दस दिन तक का होता है। इन फसलों में उन्हें पंद्रह रूपये से बीस रूपयों और भोजन मजदूरी के रूप में प्राप्त होता है। वस्तुओं के रूप में मजदूरी देते समय किसान न फसलों को बाजार के मूल्य पर विचार करके कम से कम या सस्ते दर पर नकद या वस्तु के रूप में दैनिक या पीस रेट मजदूरी का भुगतान करते हैं। श्रमिक अधिकतर पीस रेट की मजदूरी के आधार पर कार्य करना पसन्द करते हैं, क्योंकि इसके द्वारा इन्हें अधिक आय प्राप्त होती है। साथ ही उन्हें इस प्रकार की मजदूरी में एक निश्चित मात्रा में अनाज प्राप्त हो जाता है, जो उनके भोजन की आवश्यकता को पुरा करने में सहायक होता है। बहुत से किसान फसलों के बचे हुए पदार्थों को भी ले जाने की अनुमति दे देते हैं जो उनके द्वारा ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। अधिकांशतः कृषि श्रमिकों द्वारा इस बात का प्रयास किया जाता है कि परिवार का कम से कम एक व्यक्ति कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करता रहे, क्योंकि उसके द्वारा ईंधन और अनाज की आवश्यकता को पूरा करने में सहायता प्राप्त होती है। कृषि श्रमिकों यदि कृषक की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तो वे श्रमिकों को शीघ्र ही भुगतान कर देते हैं। कुछ लोग श्रमिकों के घर जा कर उन्हें भुगतान कर देते हैं पर कभी-कभी श्रमिकों को मजदूरी प्राप्त करने के लिए किसानों के घर उन्हें भुगतान के लिए याद कराने जाना पड़ता है। कुछ महिलाओं ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ लोग तो ऐसे हैं कि काम कराने के बाद मजदूरी प्राप्त करने जाने के लिए पैर दर्द करने लगते हैं। यदि श्रमिकों द्वारा मजदूरी के कम होने की शिकायत करने पर उन्हें अगले दिन काम पर आने से मना कर दिया जाता है। श्रमिक कार्य करते-करते थक जाते हैं पर वे इसकी शिकायत किससे करें, क्योंकि उनकी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं है। अपना पेट भरने के लिए मेहनत तो करनी ही है, यही मेरे भाग्य में लिखा है, यदि कार्य ने करें तो क्या खायेंगे। महिलाओं ने यह स्पष्ट किया कि चाहे उनके पीठ में दर्द हो या शरीर में दर्द हो उन्हें कार्य करने के लिए जाना होता है। महिलाओं ने इस बात को भी स्पष्ट किया कि उन्हें अधिक मजदूरी इसलिए भी नहीं दी जाती, क्योंकि उच्च जाति के किसान यह सोचते हैं कि यदि इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाती है तो हमारा काम कौन करेंगें, मजदूर मिलने में कठिनाई होगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे अपने शोषण से थक चुकी हैं पर इसके अलावा कोई और रास्ता ही नहीं है। उन्होंने अन्य कार्य करने की इच्छा की पर कठिनाईयों के कारण उसे करने का साहस नहीं पाती हैं । श्रमिकों व किसानों के बीच जो भी शर्तें तय होती हैं वह सब कुछ मौखिक होता है, किसी किसान के यहां कितने दिन काम किया है, केवल इतना ही श्रमिक याद रखते हैं और उन्हीं दिनों की मजदूरी प्राप्त करने के लिए जाते हैं। कभी-कभी उन्हें तुरन्त भुगतान नहीं प्राप्त होता, बल्कि कुछ दिनों के बाद आने के लिए कहा जाता है। यदि वे अपने मजदूरी लेना भूल जाते हैं तो वह कृषकों द्वारा हड़प लिया जाता है। जब किसानों द्वारा काम करने के बदले मजदूरी समय पर नहीं मिल पाती है तो वे ऋण लेने के लिए मजबूर होते हैं। जब किसानों द्वारा श्रमिकों की लेने के लिए मजबूर होते हैं । जब किसानों द्वारा श्रमिकों की मजदूरी की रकम नहीं दी जाती हैं तो उनके लिए ऋण लेना सरल हो जाता है, क्योंकि वे इस आधार पर ऋण लेते हं कि उन्हेंने जिस किसान के यहां कार्य है, उसके यहां से रकम प्राप्त होने पर ऋण की अदायगी कर दी जायेगी। इस आधार पर वे ऋणदाता से ऋण प्राप्त हो जाता है। किसान अपने अनाज की अच्छी कीमत प्राप्त करने के लिए अपने अनाज की बिक्री तुरन्त न करके कुछ दिन रोक लेता है और श्रमिको को दी जाने वाली रकम के भुगतान पड़ता है। ऐसी स्थिति में श्रमिक को ऋण वापस करने वाला नही समझा जाता। इसलिए उन्हें अपने गांव में ऋण मिलना कठिन होता है। उन्हें अपने गांव में ऋण उनके यहां काम करने का ठेका लेने का वायदा करने पर ही प्राप्त होता है। महिलाओं ने आपसी बातचीत में यह स्पष्ट किया कि अपने गांव में उन्हें या उनके पति को ऋण उसी समय प्राप्त हो सकता है, जब उधार देने वाले में यह विश्वास हो कि उसकी रकम वापस कर दी जायेगी और ऋण लेने के लिए पर्याप्त सम्पत्ति या गहने हैं। यदि खेत हो या जमीन हो या उस फसल खड़ी हो या घर में जानवर हो तो ऐसी स्थिति में गांव में ऋण मिल सकता है। हमारे पास ऐसी सम्पत्तियों के अभाव में कोई रूपया नहीं देना चाहता है। हम लोगों को जब रकम प्राप्त करना बहुत जरूरी होता है। तो हमें जो भी काम मिलता है, उसे करना होता है। अपने सम्बन्धों को किसानों से अच्छज्ञ बनाये रखने तथा भविष्य में काम मिलने की गारन्टी के लिए जब की उन्हें किसी किसान द्वारा काम करने के लिए बुलाया जाता है तो उन्हें जाना पड़ता है। मऊरानीपुर एवं बंगरा में ऐसा पाया गया कि काम करने के लिए आदिवासी महिलाओं व पुरूषों को आस-पास के क्षेत्रों से बुलाया जाता है, क्योंकि उन्हें कम मजदूरी देनी होती है और गांव के स्थानीय महिलाओं को काम पाने में कठिनाई होती है। दैनिक मजदूरी या पीस रेट मजदूरी दोनों के अन्तर्गत दुर्घटना होने पर किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति शिशु कल्याण या स्वसस्थ्य की सुविधाओं की व्यवस्था नही होती है। इसके उन्हें किसी प्रकार के लाभ जैसे भविष्य निधि बोनस और ग्रेच्यूटी आदि ही प्राप्त होता है । यद्यपि ग्रामीण क्षेत्र की महिला क्षमिक भी न्युनतम मजदूरी कानून के अन्तर्गत आती है। पर कानून को भली भांति लागू करना अभी भी बाकी हैं यह शिशु कल्याण कल्याण की सुविधाओं के अभाव में महिलाओं को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने बच्चों के साथ ले जाना होता है, जिसे वे एक कपड़े में सुलाकर वे किसी पेड़ की डाल में लटका देती है। कभी-कभी वे अपने साथ लकड़ी का खटोला ले जाती हैं और उसमं बच्चे को सुला देती है। बच्चे के रोने पर भी उन्हें कभी-कभी किसानों द्वारा काम से अलग कर दिया जाता है। काम के समय उन्हें बच्चों को देखने की अनुमति नहीं दी जाती है। ऐसे भी उदाहरण मिले हैं, जहां उन्हें अन्य महिलाओं की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है, क्योंकि वे अपने साथ बच्चे को ले जाती हैं। जब वे सड़क के किनारे काम करती हैं तो उनके बच्चों को कुत्ते नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभी तेज आंधी आने पर बच्चे को चोट लग जाती है। यदि वे अपने बच्चे की देख-रेख में लग जाती हैं तो उन्हें अगले दिन काम पर न आने के लिए कहा जाता है ऐसी स्थिति में बच्चों को कहीं भी किसी भी प्रकार के खतरे में छोड़कर काम पर जाना ही पड़ता है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें अपने साथ काम में मदद करने के लिए ले जाया जाता है। कृषि क्षेत्र में काम एक सीमित समय के लिए ही मिल पाता है। इसलिए श्रमिकों को शेष समय में आय के दूसरे साधन ढूंढने पड़ते हैं। बहुत से श्रमिकों द्वारा कृषि क्षेत्र में श्रम करने के अतिरिक्त घरेलू उत्पादन का कार्य किया जाता है। कुछ जाति के लोग ढोल बजाने का या अन्य बाजा बजाने का कार्य किया जाता है। कुछ लोगों द्वारा अन्य श्रम के कार्य, जैसे निर्माण कार्य में सहयोग देना, ईंटे बनाना, मिट्टी खोदने का कार्य किया जाता है। कुछ महिलायें आस-पास के नगरों के क्षेत्रों में काम करने के लिए जाती हैं। जिन महिलाओं के स्वास्थ्य नहीं ठीक होता या बूढ़ी महिलायें अन्य स्थानों पर काम करने नहीं जाती हैं। बूढ़ी महिलायें कृषि कार्य में भी नहीं जाती हैं, क्योंकि उन्हें कठिन मेहनत करनी होती है। यह केवल मजबूत व स्वस्थ महिलाओं द्वारा ही किया जा सकता है। बूढ़ी महिला एवं पुरूष घरों पर जानवरों को देखने के लिए रह जाते हैं और छोटे बच्चों को भी उन्हीं के पास घर पर छोड़ दिया जाता है। श्रमिकों को कृषि कार्य करने के लिए किसी विशेष कुशलता सीखने की आवश्यकता नहीं होती है, वे इस कार्य करने की दक्षता अपने परिवार में ही और खेतों में अन्य लोगों को काम करता देखकर सीख लेता या प्राप्त कर लेता है। बच्चे इसे आसानी से सीख जाते हैं, क्योंकि वे अपने माता-पिता के साथ खेतों पर उनकी मदद के लिए साथ जाया करते हैं। कृषि में जब मौसम के समय कार्य की अधिकता होती है तो स्कूल जाने वाले बच्चों को भी काम पर ले जाया जाता है। कृषि कार्य करने वाली महिलायें अक्सर अनपढ़ होती हैं, उनमें से ही ऐसे होती हैं जो थोड़ी रकम का जोड़ घटाना आदि कर सकती हैं और उन्हें कितनी मजदूरी प्राप्त होगी इसे ज्ञात कर लेती है। शेष महिलायें पढ़ी लिखी न होने के कारण दूसरों पर निर्भर होती हैं जो उन्हें जोड़ घटाकर उनकी मदद कर देते हैं और उन्हीं के सहारे वे जान पाती हैं कि उन्हें उचित रकम मिल रही है या नहीं। उनके काम कर लेने के बाद परिवार का कोई दूसरा व्यक्ति किसानों के पास उनकी रकम लेने जाता है। महिलायें अपनी रकम पुरूषों को दे देती हैं। जब कभी भी उन्हें परिवार के व्यय के लिए रूपयों की आवश्यकता होती है, वे पुरुषों से कहती हैं। महिलाओं व पुरूषों की आय में अन्तर बहुत कम किया जाता है । महलाओं द्वारा परिवार के खाने, कपड़े और परिवार के स्वास्थ्य पर रकम व्यय किाय जाता है और इस बात को हमेशा निश्चित करती रहती है कि परिवार के लोगों को खाने के लिए घर में पर्याप्त खाद्य सामग्री है। वे इस बात को जानती हैं कि परिवार में एक वर्ष में कितनी खाद्य सामग्री की आवश्यकता होती है, ऐसे में उने सामने इस खाद्य सामग्री को किस प्रकार प्राप्त किया जाये। जो भी काम मिल जाये उसे वे उस समय तक करती रहती हैं जब तक वे परिवार के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री एकत्र नहीं कर लेती हैं। सामान्यतया खाद्य सामग्री का स्टाक मौसम के आधार पर एकत्र किया जाता है। फसलों की कटाई के समय उन्हें पर्याप्त अनाज की प्राप्ति हो जाती है। इसी समय में कृषि श्रमिकों को छोटी रकम के ऋण लेने पड़ते हैं, दूसरे स्थानों पर काम के लिए जाना पड़ता है या घरेलू कार्यों को करने में लगाना होता है या फिर भूखे रहना पड़ता है। वर्षा के पहले उन्हें कुछ काम मिल जाता है और फसल की कटाई तक यह सिलसिला चलता रहता है। जिन क्षेत्रों में केवल एक फसल उगायी जाती है उनमें श्रमिकों को वर्ष के तीस या चालीस दिनों तक ही कार्य मिल पाता है पर जहां सिंचाई की सुविधाओं का विकास हुआ है और दो या तीन फसलें उगायी जाती हैं उन क्षेत्रों में एक सौ से एक सौ पचास दिनों तक कार्य मिल जाता है। कृषि क्षेत्र में कितने दिनों का कार्य मिल पाता है यह कृषि में प्रयोग किये जाने वाले बीजों और अन्य आगतों पर निर्भर हैं। यदि उत्तम बीजों और अधिक उपज देने वाली फसलों के बीज का प्रयोग किया जाता है। यह कार्य अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है और वे बेकार हो जाती हैं। उत्तम कोटि के बीजों के प्रयोग के कारण निराई काकार्य आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हो जाता है, उपज अधिक होती है, जिससे कुल उत्पादन भी अधिक होता है। निराई के कार्य के लिए महिला श्रमिकों की आवश्यकता नहीं रह जाती है और महिलाओं के कार्य के अवसरों में कमी होती है, लेकिन उन्हें कटाई के समय काम मिल जाता है । वैसे झांसी जनपद में अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग बहुत अधिक मात्रा में नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई की सुविधाओं के विकास के परिणाम स्वरूप कार्य के अवसरों में वृद्धि होती है, क्योंकि इससे एक से अधिक फसलें उगायी जाती हैं और वही कार्य प्रत्येक फसल के उत्पादन में करना होता है। महिलाओं से बातचीत करने के दौरान ऐसा अनभव किया गया कि वे इस बात को जानती हैं कि जितना कार्य वे करती हैं उसके बदले जो उन्हें अनाज मिलता है, या जो आय उन्हें प्राप्त होती है, वह उनके श्रम के मूल्य के बराबर नहीं होती है । वे केवल इतना ही जानती हैं कि किसान हम लोगों के श्रम के आधार पर ही अमीर बने हैं। एक महिला ने इस बात को बहुत ही संक्षिप्त शब्दों में कहा कि हम लोग किसानों के लिए सभी कार्य करते हैंखेत ठीक करने, फसल की कटाई, दवाई, सफाई भराई और उनके घरों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। केवल हम उनका भोजन बनाकर उनके मुंह में नहीं डालते हैं। शेष सभी कार्य हम करते हैं। ग्रामीण महिलाओं में आशावान पाया गाय उनके अनुसार भविष्य उत्तम होगा, उनमें से कुछ का कहना था कि क्या आ हमारी मजदूरी बढ़वा सकेगी ? आप हम लोगों के आर्थिक स्थिति को अच्छी बनाने में सहायता करें और सरकार को लिखकर हमारी मदद करें और हमारे गांव आप फिर आवें, हम लोगों के लिए कुछ अच्छा करें, भगवान आपको सकुशल रखे, चावल का टकर उस पर पालिश करने का कार्य हाथ से किाय जाता था, अब इन कार्यों को चावल मिलें तथा दाल मिलें में मशीनों द्वारा किाय जता है। महिलाओं के कार्य अवसरों में कमी हो रही है और काम के नये अवसर पुरूषों के पक्ष में विकसित हो रहे हैं। अब अधिकांशतः महिलाओं से कुशल कार्य कराये जाते हैं, जैसे पानी भरने का कार्य, भरे अनाजों के बोरे ढोने का कार्य, इन मिलों में कराये जाते हैं। बहुत से श्रमिक हाथ से किये जाने वाले कार्य भूल भी गये हैं। मिट्टी खोदने का कार्य मिट्टी खोदने का कार्य खुले में पुरूष एवं महिलओं दोनों द्वारा एक टीम में किया जाता है, जिसके अन्तर्गत जमीन या खेत को समतल बनाना, सड़क निर्माण, कुएं खोदने का कार्य निर्माण कार्य खेतों के चारों ओर मेड़ बनाना, आदि हैं। यह कार्य बहुत ही विस्तृत तथा बड़े क्षेत्र में फैला होता है। यह एक श्रम प्रधान कार्य है, जिसमें पुरुष यंत्रों की सहायता से मिट्टी खोदते हैं और महिलायें इसे सिर पर रखकर दूसरे स्थान पर रखने के लिए ले जाती या ट्रकों में लादती है, जिसे दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। इस प्रकार के कार्य के अवसर निजी व्यक्तियों द्वारा जैसे किसानों द्वारा जो अपने खेत को समतल बनाने या ठीक करने का कार्य कराते हैं या अपने खेतों के चारों और मिट्टी की दीवाल बनाकर खेत को सुरक्षित बनाने या मेड़ बनाने का काम करते हैं, कुएं खोदने या घर बनाने का कार्य कराते हैं। सरकार का सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग द्वारा भी इस प्रकार के कार्य के अवसर प्रदान किये जाते हैं। लोक निर्माण विभाग द्वारा सड़क, नहर, कुएं तथा बांध निर्माण के कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। लोक निर्माण के कार्य सामान्यतया ठेकेदारों द्वारा कराये जाते हैं। इन कार्यों में लगे श्रमिक परिवार बाहर कार्य करने के कारण अन्य कार्य करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। यह कार्य बहुत ही कठिन परिश्रम वाला होता है। किसी भी जाति के लोग इस कार्य को कर सकते हैं, बशर्ते कार्य मिल जाये । जब कभी व्यक्तियों द्वारा इस प्रकार के कार्य कराये जाते हैं तो वे अपने ही गांव के श्रमिकों को ही आकर काम करने के लिए कहते हैं। केवल कुछ ही श्रमिकों की आवश्यकता होती है और कार्य की मजदूरी दोनों के आपसी बातचीत से निश्चित कर ली जाती है। ऐसे कार्यों में कार्य करने का स्थान श्रमिकों के घर के पास ही होती है। कार्य करने के घंटे तय नहीं होते और न ही मजूरी का भुगतान प्राप्त करने के लिए कोई रजिस्टर नहीं होता, जिस पर हस्ताक्षर किया जाये। सभी लेन-देन मौखिक हुआ करता है। लोक निर्माण विभाग के कार्य जब ठेकेदारों द्वारा कराया जाता है तो वे भी कार्य स्थान के पास के गांवों से ही श्रमिकों को बुलाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें श्रमिकों को कोई अन्य सुविधा प्रदान नहीं करनी होती है। श्रमिक काम करने के पश्चात अपने गांव या घर को लौट जाते हैं। ठेकेदार गांवों के श्रमिकों के बारे में नहीं जानते होते इसलिए उन्हें कुछ लोगों की सहायता लेनी होती है, जिन्हें 'गैंग लीडर' कहा जाता है। गैंग लीडर वे व्यक्ति होते हैं जो ठेकेदारों के हमेशा सम्पर्क में होते हैं। जब कभी कोई प्रोजेक्ट ठेकेदारों को स्वीकृत हुआ करता है तो गैंग लीडर गांवों से श्रमिक उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं, जिनके ऊपर उनका नियंत्रण होता है। वे श्रमिकों को काम दिलाने का वादा करके उन पर नियंत्रण रखते हैं। कार्य के अवसरों के सीमित होने के कारण श्रमिक भी इस बात को जानकर खुश होते हैं कि कोई ऐसा भी है जो उन्हें प्राप्त कार्य की सूचना देकर उनकी उसे प्राप्त करने में उनकी सहायता करता है। गैंग लीडर ठेकेदारों के लिए सुरक्षा का कार्य करता है, क्योंकि वह काम कराने के लिए पर्याप्त मात्रा में श्रमिकों की उपलब्धि कराता है और गैंग लीडर श्रमिकों के लिए भी सुरक्षा का कार्य करता है। वह इस बात की निगरानी रखता है कि ठेकेदार उनसे काम कराकर उनकी मजदूरी की रकम बिना श्रमिकों को दिए हुए भाग न जाये। इसके लिए गैंग लीडर श्रमिकों से एक निश्चित मात्रा की फीस लेता है जो एक रूपये से तीन रूपये प्रतिदिन हुआ करती है या एक रूपया प्रत्येक इकाई कार्य, जो श्रमिकों द्वारा किया जाता है के अनुसार लेता है। यह रकम ठेकेदारों द्वारा उनके मजदूरी की रकम से काट ली जाती है तथा गैंग लीडरों को दे दी जाती है। बहुत से ऐसे भी श्रमिक होते हैं जो बिना गैंग लीडारों की मदद से ही काम ढूंढने के लिए निकलते हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के अन्तर्गत भी इस प्रकार के कार्य लोक निर्माण विभाग के समय पूरी होती है, जब किसी क्षेत्र से इस फिट लम्बाई व दस फिट चौड़ाई एवं एक फुट गहराई तक की मिट्टी की खुदाई कर ली जाती है। काग्र की एक इकाई दो श्रमिकों द्वारा एक दिन में पूरी कर ली जाती हैं वे उक्त मापक की मिट्टी प्रत्येक दिन में खोद सकते हैं इसलिए मजदूरी की दरों के सम्बन्ध में भ्रम हो जाता है कि यह एक दिन की मजदूरी है, जबकि वह पीस रेट के आधार पर दी गयी मजदूरी होती है। एक इकाई कार्य करने की न्यूनतम मजदूरी पचास रूपये है पर श्रमिकों को पैंतीस रूपये से चालीस रूपये ही दिया जाता है और उन्हें पूरी रकम पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाता है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के अन्तर्गत श्रमिकों को कार्य के अनुपात में भुगतान किया जाता है। यदि उनके द्वारा एक इकाई से अधिक का कार्य किया जाता है तो भी उन्हें एक इकाई की ही मजदूरी प्राप्त होती है। लोक निर्माण विभाग के कार्यों में यदि ठेकेदारों द्वारा समय से पहले या शीघ्र ही कार्य समाप्त कराना होता है तो अधिक कार्य के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है, ऐसी स्थिति में श्रमिकों को भुगतान कार्य की इकाईयों के अनुसार दिया जाता है। अधिक तेज कार्य करने वाली श्रमिकों की टीम द्वारा दो या तीन इकाईयों का कार्य एक दिन में पूरा कर लिया जाता है । श्रमिकों से बात के दौरान यह मालूम हुआ कि उन्हें तीस रूपये से पैंतीस रूपये प्रति इकाई कार्य के अनुसार भुगतान किया जात है, पर यह बहुत कम क्षेत्रों में दिया जाता है। महिला श्रमिक अपने छोटे बच्चों को अपने साथ सहयोग से प्रदान किये जाते हैं पर यह इस कार्य को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के कार्यकर्ताओं द्वारा ठेकेदारों की सहायता से कराया जाता है। केवल ठेकेदार इस कार्य को नहीं कराते हैं। दोनों ही दशाओं में श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी है, क्योंकि ठेकेदारों को यह रजिस्टर लोक निर्माण विभाग के कार्यालय में निरीक्षण हेतु प्रस्तुत करना होता है। ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के कार्यकर्ता स्वयं आकर कार्यक्रम पर किये गये व्यय का भुगतान करते हैं। इसलिए रेकार्ड बनाये जाते हैं, शेष लेनदेन मौखिक हुआ करता है। व्यक्तियों द्वारा कराये जाने वाले कार्य में भुगतान प्रत्येक दिन किया जाता है या एक निश्चित मात्रा के कार्य को पूरा किाय जाने पर एक निश्चित रकम का भुगतान किया जाता है। इसके अन्तर्गत दी गयी मजदूरी की दरें कृषि श्रम के समान हुआ करती हैं, फिर भी इनमें मजदूरी की दरें प्रत्येक गांव में अलग-अलग होती हं जो बीस रूपये से पच्चीस रूपये प्रतिदिन के बीच है। जब यह भुगतान एक मुश्त राशि में दिया जाता है तो श्रमिक इसे प्रतिदिन की मजदूरी से तुलना करते हैं। एक मुश्त राशि के भुगतान में जो राशि मिली होती है उस काय्र के लिए जितने श्रमिक लगाये जाते हैं और जितने दिन काम किया गया होता है, उससे भाग देकर राशि का अनुमान लगाया जाता है। लोक निर्माण विभाग तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के कार्यकर्ताओं को भुगतान कार्य की इकाई के अनुसार किया जाता है। कार्य की एक इकाई उससे ली जाती है और उन्हें कपड़े के पालने में रखकर छोड़ दिया जाता है। यदि परिवार में प्रौढ़ महिलायें होती है तो छोटे बच्चों को घर पर उन्हीं के पास छोड़ दिया जाता है। जब श्रमिक काम करने के लिए दूसरे गांवों या गांव से दूर साइट पर कार्य करने जाते हैं तो अपने दोपहर का भोजन साथ ले जाते हैं और अपनी पीने का पानी भी साथ ले जाते हैं, अगर कार्य करने की जगह गांव के पास होती है तो वे खाने के लिए घर वापस चले आते हैं । इन कार्यों में दी जाने वाली मौद्रिक मजदूरी कई बातों पर निर्भर हैं, यदि काम करने की जगह गांव से अधिक दूर है तो उन्हें कुछ अधिक रकम मजदूरी के रूप में दी जाती है। यदि ठेकेदार या गैंग लीडर उन्हें काम पर आने के लिए कहते हैं तो उन्हें कुछ अधिक रकम दी जाती है। जब वे अपने से काम पर आते हैं तो उन्हें कम मजदूरी दी जाती है। कार्य करने की जगह दूर होने पर श्रमिकों को रूकने की सुविधा ठेकेदार द्वारा प्रदान की जाती है, पर जब श्रमिक स्वयं काम ढूढते-ढूढते वहां पहुंचते हैं तो उन्हें रूकने की सुविधा नहीं प्रदान की जाती, भले ही उनके घर काम करने के स्थान से चाहे जितना अधिक दूर हो । इसी प्रकार मजदूरी के भुगतान में भी ठेकेदार केवल उन श्रमिकों की मजदूरी भुगतान में अधिक रूचि लेते हैं, जिन्हें वे कार्य पर बुलाते हैं और जो श्रमिक स्वयं काम पर आते हैं उनके भुगतान में वे अधिक रूचि नहीं लेते हैं। इसी प्रकार जब श्रमिकों द्वारा काम करने के लिए अपने यंत्र और औजार लोय जाते हैं तो उन्हें कुछ अधिक रकम का भुगतान किया जाता है, जो ठेकेदारों के यंत्र व औजारों का प्रयोग करने वाले श्रमिकों को नहीं प्राप्त होती है । कुछ कार्यों में पुरूष एवं महिलाओं को समान मजदूरी नहीं दी जाती है। महिलाओं को बीस रूपये तथा पुरुषों को तीस रूपये प्रतिदिन की मजदूरी दी जाती है और अधिकतर स्थानों पर समान मजदूरी दी जाती है । इसके लिए ठेकेदारों का यह कहना है कि काम के ठेका स्वीकृत कराने के लिए उन्हें बहुत से लोगों को पैसा देना होता है और उस पैसे को भी वसूल करना होता है। इसे वे श्रमिकों को स्वीकृत रकम से कम का भुगतान करके वसूल करते हैं, साथ ही में उन्हें अपने लाभ को भी सुनिश्चित करना होता है। साधारणतः महिलाओं को पूरे प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी नहीं होती, केवल वे इतना जानती हैं कि उन्हें एक निश्चित कार्य को करना है, कभी-कभी उन्हें कुल दिनों की संख्या ज्ञात होती है, जितने दिन उन्हें काम करना होता है, कभी-कभी वे उस समय तक काम करती रहती है, जब तक उन्हें काम करने के लिए कहा जाता है और वे इस बात को नहीं जानती कि काम कब समाप्त होगा। यदि महिलायें कार्य के स्थान पर बीमार हो जाती हैं तो ठेकेदार उनके ठीक होने की जिम्मेदारी नहीं लेता है। ऐसी स्थिति में या तो वे अपने घरों को लौट आती हैं या उसी जगह रूक जाती हैं। अपनी दवा वे वहीं पर उस समय खरीदती हैं, जब उनके पास पैसा होता है। दवा खरीदने के लिए जाने पर पहले वे दवा की कीमत पूंछती हैं। यदि उनके पास उतना पैसा होता है तो वे दवा खरीद लेती हैं, अथवा नहीं । मिट्टी खोदने के कार्य में उन्हें चोट भी लगती है उनके हाथ पेर में खरोंच आ जाती है और कभी-कभी खून निकलने लगता है, लेकिन फिर भी वे कार्य करती हैं। कभी कभी उनके पीठ और कमर में दर्द होता है या सीने में दर्द होता है पर वेपैसे के लिए कार्य करती हैं, जब उनके पास पैसा होता है वे खाती हैं अन्यथा वे भूखे ही रहकर काम करती हैं, उनका कहना है कि यही हमारा जीवन है यदि हम काम न करें तो हमें खाना कौन देगा। हम अपना पेट कैसे भरें ? हम लोगों को मिट्टी में रहना होता है तथा मिट्टी में ही खाना होता है। वे ठेकेदार से कभी भी बहस नहीं करती, भले ही वह उन्हें कम मजदूरी क्यों न दें, क्योंकि वे जानती है कि ऐसा करने पर उन्हें भविष्य में काम नहीं मिलेगा। कभी कभी जब प्रोजेक्ट के लिए फण्ड नहीं आता तो उन्हें अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए एक लम्बे समय तक इन्तजार करना होता है। वे असहाय स्थिति में होती हैं और इस शोषण के लिए वे कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं । कुछ महिलाओं का कहना था कि हम लोगों का जीवन आपकी तरह नहीं है, आप तो लिखकर चली जावेगी। हम लोगों को तो कठिन परिश्रम करना ही पड़ेगा, हम लोग पंखे की हवा के नीचे काम नहीं करते हैं । जब काम का समय छोआ होता है। पंद्रह या बीस दिनों का होता है तो मजदूरी का भुगतान प्रतिदिन प्राप्त हो जाता है। जब काम अधिक समय तक चलने वाला होता है तो मजदूरी का भुगतान सप्ताह में या पन्द्रह दिनों के बाद होता है। कभी-कभी उन्हें जितना मिलना चाहिए, उतनी धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है। यह केवल ठेकेदारों द्वारा इसलिए किया जाता है कि श्रमिक काम के बीच में छोड़कर चले न जाये। भुगतान का एक दूसरा तरीका प्रत्येक सप्ताह में एक निश्चित मात्रा की रकम अग्रिम के रूप में दी जाती है। यह प्रणाली 'खर्ची प्रथा' कहलाती है, जिसमें श्रमिकों का पूरा भुगतान कार्य के समाप्त होने पर किया जाता है पर श्रमिकों को प्रत्येक सप्ताह में एक धनराशि विभिन्न व्ययों को पूरा करने के लिए अग्रिम के रूप में दे दिया जाता है। श्रमिकों को अन्तिम के रूप में दी जाने वाली कम परिवार के आकार पर निर्भर है और पांच या छः सदस्यों वाले परिवार का एक सौ रूपये की राशि दी जाती है और शेष धनराशि कार्य के पूरे होने पर दी जाती है। यदि श्रमिकों को अतिरिक्त रकम की आवश्यकता होती है तो वे ठेकेदार से मांगते हैं । वास्तव में यह उनकी ही रकम होती है जो वे अपने श्रम द्वारा अर्जित करते हैं और वह ठेकेदारों के पास होती है । ठेकेदार द्वारा दी गयी अग्रिम धनराशि को रजिस्टर में लिखा जाता है और श्रमिक उस पर हस्ताक्षर करते हैं। अधिकांश श्रमिक अशिक्षित होते हैं । ठेकेदार द्वारा दी गयी रकम को याद करना होता है और काम समाप्त होने पर वे प्राप्त होने वाली रकम का हिसाब लगाते हैं। सामान्यतया किसी पढ़े लिख आदमी की सहायता ली जाती है और उसी की माध्यम यह जानने का प्रयास किया जाता है कि उन्हें पूरी रकम जो मिलनी चाहिए वह मिली है या नहीं। कभी कभी गैंग लीडर की भी सहायता ली जाती है । श्रमिकों का भुगतान पति व पत्नी दोनों की मजदूरी उसे दे दी जाती है; जो इसे प्राप्त करने के लिए जाता है । साधारणतः पुरूष ही मजदूरी प्राप्त करने जाता है। महिलायें उसी समय मजदूरी प्राप्त करने जाती हैं, जब उनके पति घर पर नहीं होते या जाने की स्थिति में नहीं होते हैं। ऐसे भी उदाहरण मिले हैं जहां मजदूरी का भुगतान केवल पुरूषों को ही किया जाता है, महिलाओं को भुगतान लेने जाने पर भी नहीं दिया जाता है। बहुत कम महिलायें पढ़ी होती है जो रूपया गिनने में समर्थ होती हैं। वे केवल रजिस्टर में अंगूठा निशान लगती हैं। उनका कहना है कि वे अनपढ़ होती हैं, हम कैसे जान सकते हैं कि हम किस पर हस्ताक्षर बना रहे हैं। वे विश्वास पर कार्य करती हैं, यदि वे इस बात को जानती हैं कि उन्हें जितना मिलना चाहिए, उससे कम दिया जा रहा है, फिर भी वे कुछ नहीं बोलती, क्योंकि वे असहाय होती हैं। वे इस बात को भी जानती हैं कि उनसे कटौती की गयी कम का एक भाग गैंग लीडर को दिया जाता है, कभी-कभी मजदूरी का रूपया मजदूरी प्राप्त होने पर उन्हीं के पास रहता है और कभी-कभी यह रूपया पुरूषों को दे दिया जाता है और आवश्यक पड़ने पर उनसे मांग लिया जाता है। लोक निर्माण विभाग तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में कार्य करने के घण्टे नौ बजे प्रातः छः बजे सांय तक निश्चित होते हैं। बीच में एक घण्टे का अवकाश दिया जाता है। कहीं-कहीं पर काम आठ बजे प्रातः प्रारम्भ होता है तथा दो घण्टे का अवकाश दोपहर में दिया जाता है। कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें सात बजे प्रातः से सात बजे शाम तक काम करना होता है। कार्य करने के स्थान पर आठ बजे प्रातः पहुंचने के लिए उन्हें अपने घरों से बहुत सवेरे चलना होता है। व्यक्तियों के यहां कार्य करने के घण्टे नहीं निश्चित होते हैं यदि कार्य करने का स्थान दूर होता है तो महलिाओं को कार्य पर जाने व वापस आने के लिए बहुत लम्ब रास्ता चलना पड़ता है। उन्हें तीन से पाँच किलोग्राममीटर तक चलना होता है और आते समय वे ईंधन के लिए लकड़ी एकत्र करती आती हैं। किसी भी कार्य में बच्चों के देखरेख, स्वास्थ्य, दुर्घटना, क्षतिपूर्ति या अवकाश की सुविधायें नहीं प्रदान की जाती हैं। यद्यपि लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेकेदारों को इन मदों के लिए भी धनराशि स्वीकृत की जाती है। बहुम कम ऐसा सुना गया या नहीं सुना गया कि श्रमिकों के बीमार होने पर उन्हें कोई धनराशि दी जाती है। उन्हें कार्य स्थल पर रिपोर्ट करना होता है, चाहे वे उस दिन काम करें या न करें। यदि कार्य करने के दौरान उन्हें चोट लग जाती है या वे घायल हो जाते हैं तो बहुत कम ऐसे उदाहरण मिले हैं, जब उनके दवा आदि का व्यय ठेकेदारों द्वारा वहन किए जाते हैं। इन श्रमिकों के लिए भविष्य निधि, बोनस, ग्रेच्युटी आदि का प्रबंध इन श्रमिकों के लिए नहीं ऐसी भी महिलायें पायी गयी जो अपने अपने गांव के निकट कार्य स्थल पर कार्य करती हैं। वे दिन भर काम करने के पश्चात शाम को अपने घरवापस चली आती हैं कुछ ही ऐसी महिला श्रमिक मिली जो बस द्वारा जाकर भी काम करने को तैयार थी, ऐसे में उन्हें अतिरिक्त धनराशि व्यय करनी होती है या प्रत्येक दिन एक घण्टे पैदल ही जाना पड़ता है । ऐसी भी महिलायें मिलीं जो कहीं भी काम करने जाने के लिए तैयार थीं, वे ऐसी महिलायें थी जिनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी नहीं थी और वे अपनी जीविका इसी कार्य से अर्जित करती हैं। इस प्रकार की महिलायें गैंग लीडरों से हमेशा सम्पर्क बनाये रखती हैं, जो उन्हें कार्य के अवसरों के बारे में बताते रहते हैं। वे अवसर अधिक दिनों तक चलने वाले कार्यों की तलाश करती हैं और वे कार्यस्थल पर ही जाकर रहती हैं। इनके कार्यस्थल पर जाने का किराया ठेकेदारों द्वारा दिया जाता है। वापसी किराया श्रमिकों को देना पड़ता है। कार्यस्थल पर रहने के लिए टेन्ट लगाने के लिए पोलीथीन तथा बांस इत्यादि का प्रबंध ठेकेदारों द्वारा कर दिया जाता है, वापसी किराया श्रमिकों को देना पड़ता है। कार्यस्थल पर रहने के लिए पोलीथीन तथा बांस इत्यादि का प्रबंध श्रमिक परिवारों को ही करना होता है। कभी-कभी टेन्ट लगाने के लिए केवल बांस का प्रबंध कर दिया जाता है, उस पर छाजन, पोलीथीन या कपड़ा आदि का प्रबंध स्वयं श्रमिक को करना होता है। श्रमिक खुले मैदान में रहते हैं। उनका अन्य लोगों से बहुत कम सम्पर्क हो पाता है वे खर्ची प्राप्त होता है, उस दिन अवकाश कर दिया जाता है। यह हमेशा नहीं होता है। दवा इत्यादि के लिए उन्हें पास के कस्बे या नगर में जाना होता है। महिलाओं को पानी भी भरना होता है और सभी घरेलू कार्य करने होते हैं । मिट्टी खोदने का कार्य एक टीम या समूह के साथ किया जाता है। अकेली एक महिला अनजान व्यक्ति के साथ काम करने में कठिनाई का अनुनाव करती हैं। यदि उन्हें के गांव में उनका परिवार के पुरूष साथ में होते हैं तो वे कार्य करने चली जाती हैं, अन्यथा वे कार्य नहीं करती हैं। बंगरा व मऊरानीपुर विकास खण्ड के कुछ गांव की महिलाओं ने यह बताया कि वे एक टीम में जाकर कुछ महिलायें मिट्टी खोदने और कुछ उसे ढोने का कार्य करती हैं। पर यह बहुत कम पाया गया। सबसे सामान्य रूप यह होता है कि पुरूष मिट्टी खोदने तथा महिलायें उसे सिर पर रखकर ढोने का कार्य करती यह काग्र बरसात के मौसम के अतिरिक्त वर्षा भर चलता है पर वास्तव में कितने काम मिल सकेगा, यह किसी क्षेत्र के निर्माण कार्यक्रम पर निर्भर है। काम करने के दिन प्रत्येक वर्ष में अलग-अलग होते हैं। किसी वर्ष में काम नहीं भी होता है। यह उन महिलाओं के बारे में भी सही है जो ऐसे कार्यस्थलें पर कार्य करती हैं, जहां वे सरलता से पहुंच सकें। जो कुछ दूर यात्रा करके भी कार्य करने को तैयार हैं, उन्हें पचास से साठ दिनों तक कार्य मिल जाता है। वे महिलायें जो कहीं भी जाने को तैयार रहती हैं, उन्हें छः से आठ महीनों तक काम मिला जाता है। ठेकेदारों से उन्हें ऋण प्राप्त होता है पर कुछ विशेष जाति के लोग जो ठेकेदार से भली भांति परिचित होते हैं और वे उसके नियंत्रण में होते हैं, वे थोड़ी रकम के ऋण भांति परिचित होते हैं और वे उसके नियंत्रण में होते हैं, वे थोड़ी रकम के ऋण प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। एक सौ श्रमिकों को नियंत्रित करने के लिए चालीस हजार रूपयों की आवश्यकता होती है पर ऐसे परिवार केवल मिट्टी खोदने के धंधे से ही अपनी जीविका अर्जित करते हैं । इस प्रकार के श्रमिकों में आदिवासी परिवार पाये गये जो स्वस्थ एंव हुष्ट-पुष्ट पाये गये। गैंग लीडर उनके लिए बरसात के मौसम के लिए धनराशि की व्यवस्था करते हैं, जब उन्हें काम नहीं प्राप्त होता है। इस प्रकार के लोग ठेकेदारों के साथ उस स्थान पर जाया करते हैं, जहां उन्हें काम मिलता है । जब तक ऋण के रूप में ली गयी धनराशि अदा नहीं कर दी जाती वे किसी अन्य गैंग लीडर के साथ काम नहीं कर सकते हैं। श्रमिकों द्वारा लीडर से लिए ऋण पर ब्याज नहीं देते हैं, बल्कि कार्य के समय कार्य की एक इकाई पर एक रूपया काटने की स्वीकृति दे देते हैं। इसमें से लीडर ठेकेदारों को ब्याज दिया करते है, जो उन्हें धनराशि दिया करते हैं । आदिवासी परिवार के लोग एक दिन में निर्धारित कार्य की छः या सात इकाई का कार्य पूरा कर सकते हैं। काम के समाप्त होने पर उनके द्वारा ली गयी रकम को काटकर उनकी कुल मजदूरी की कुल रकम उन्हें दी दी जाती है। इन परिवारों द्वारा कुछ रकम बरसात के मौसम के लिए बचा ली जाती है, जिसे वे लेकर अपने घर लौट आते हैं, भले ही वह पूरे बरसात के मौसम के लिए पर्याप्त न हों, फिर भी वे बरसात के समय बिना किसी आय के अपने भोजन पानी आदि का प्रबंध करते हैं। यही कारण है कि वे अपना श्रम गैंग लीडर के पास अगले वर्ष उन्हीं के साथ काम करने के लिए बंधक रख देते हैं। इस सम्बन्ध में कोई लिखित समझौता नहीं हाता, बल्कि वे इस सम्बन्ध में ईमानदार होते हैं। मिट्टी खोदने के कार्य में कोई विशेष कुशलता की आवश्यकता नहीं होती है, फिर भी वे इस कार्य की कुशलता एक दूसरे के साथ काम करने के दौरान सीख लेते हैं। यह एक मेहनत का कार्य होता है, केवल स्वस्थ पुरुष और महिलायें ही इस कार्य को कर सकती हैं। वृद्ध, रोगी और शारीरिक दृष्टि से कमजोर महिलाओं को कोई दूसरा काम खोजना होता है। मिट्टी खोदने के कार्य में कोई विशेष कुशलता की आवश्यकता नहीं होती है, फिर भी वे इस कार्य की कुशलता एक दूसरे के साथ काम करने के दौरान सीख लेते हैं। यह एक मेहनत का कार्य होता है, केवल स्वस्थ पुरूष और महिलायें ही इस कार्य को कर सकती हैं। वृद्ध, रोगी और शारीरिक दृष्टि से कमजोर महलिाओं को कोई दूसरा काम खोजना होता है। कार्य करने की दशायें विशेषकर महिलाओं के लिए बहुत कठिन होती है। उनकी शक्ति इन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए लड़ने में ही खत्म हो जाती है। उन्हें अपनी आय बढ़ाने के लिए किसी अन्य कार्य करने का मौका ही नहीं मिला पाता है। इधर कार्य प्राप्त करने की कोई गारन्टी नहीं होती है। ऐसे परिवार जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर काम करने के लिए प्रवास करते हैं उनके बच्चे भी कार्य करने की कुशलता नहीं प्राप्त कर पाते हैं और वे भी शारीरिक श्रम के आधार पर जीविका अर्जित करने वाले बन जाते हैं। इन महिलाओं को श्रमिक तो माना जाता है पर उन्हें नियमित श्रमिक नहीं माना जाता है। उन्हें कार्य करने के दौरान होने वाली घटनाओं, कठिनाइयों और स्वास्थ्य सम्बन्ध क्षतियों से सुरक्षित रखने का कोई प्रबंध नहीं किया जाता है। महिलाओं की कोई प्रतिनिधि संस्था पायी गयी जो उनके हितों की रक्षा कर सके और उनकी स्थिति में सुधार कर सकें । निर्माण कार्य :- निर्माण कार्य के अन्तर्गत सड़क निर्माण, सीमेन्ट के टाइल्स बनाना, पत्थर काटना, नहर निर्माण, कोटा के पत्थरों से नहरों की लाइनें बनाना और अन्य इसी प्रकार के कार्य आते हैं। मिट्टी खोदने के कार्य की भांति निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों द्वारा ग्रामीणों को रोजगार के अवसर दिये जाते हैं। कभी-कभी मिट्टी खोदने तथा निर्माण कार्य दोनों साथ-साथ चलते हैं। निर्माण कार्य में अधिक कुशलता की आवश्यकता होती है जो कम कुशलता के श्रम के साथ पूरा किया जाता है। कम कुशलता वाले कार्यों में महिलाओं को अधिक श्रम वाले तथा सरल कार्यों में लगाया जाता है, जैसे सिर पर रखकर निर्माण सम्बन्धी सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना, पत्थर तोड़ना, एक स्थान से दूसरे स्थान को पानी ले जाना, सीमेन्ट के टाइल्स को पानी देना, सड़कों को साफ करना, गिट्टी एवं बालू दोनों का कार्य, सड़कों पर पानी छिड़कना आदि । कुशलता वाले कार्यों में जैसे निर्माण कार्य के लिए आवश्यक माल मसालों का मिलाना, पदार्थों का मापना, मशीन चलाना, प्लास्टर करना, पत्थर बिछाना, आदि कार्य पुरूषों द्वारा किया जाता है। निर्माण कार्य में महिलाओं की अहम भूमिका होती है, क्योंकि निर्माण कार्य के लिए आवश्यक सामान ढोने का कार्य महिलाओं द्वारा किाय जाता है, बिना उनके श्रम के पुरूषों द्वारा निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है। इस कार्य में पुरूषों एवं महलिाओं के कार्यों का बंटवारा स्पष्ट होता है, यह कार्य किसी भी जाति के श्रमिकों द्वारा किया जा सकता है, जो भी इस कार्य को करना चाहता है, वह जब तक काम है, तब तक अपनी जीविका प्राप्त कर सकता है। श्रमिकों को प्राप्त करने की प्रथा मिट्टी खोदने के कार्य की ही भांति है। व्यक्तिगत क्षेत्र के कार्यों के लिए अपने ही गांव के लोग ही मिल जाते हैं । ऐसे कार्यों में काम करने का स्थान गांव के पास में ही होता है। यह एक अकंशल कार्य है, इसे कोई भी कर सकता है, जो इसे करना चाहता है। इस कार्य में महिलाओं एवं पुरूषों की टीमें अलग-अलग कार्य करती है। अकेली महिला भी कार्य स्थान पर कार्य कर सकती है, इसमें किसी अन्य अजनबी व्यक्ति के साथ काम करने की आवश्यकता होती है। श्रमिक अपने साथ अपना भोजन अपने साथ अपना भोजन अपने साथ लेकर आते हैं, या अपने घर खाना खाने के लिए चले जाते हैं। इस कार्य में मजदूरी दैनिक आधार पर कृषि श्रमिकों की मजदूरी के सामान ही निश्चित की जाती है। कभी कभी एक निश्चित कार्य के लिए एक निश्चित धनराशि, निश्चित की जाती है, जिस कार्य को टीम द्वारा जितने दिन में चाहे कर सकते हैं। पर व्यक्तिगत क्षेत्र में निर्माण कार्य के अवसर बहुत कम होते हैं, अधिकांश कार्य सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत पूरे किये जाते हैं, क्योंकि यह कार्य अधिक खर्चीले होते हैं। मिट्टी खोदने के कार्य में व्यक्तिगत क्षेत्र में रोजगार के अवसर निर्माण कार्य की तुलना में अधिक होते हैं । सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य स्थल का निर्धारण किसी विशेष क्षेत्र के वर्ष विशेष की निर्माण योजना के आधार पर निश्चित किया जाता है। कार्य ठेकेदारों द्वारा पूरा कराया जाता है। ठेकेदार गैंग लीडरों के माध्यम से कार्य करते हैं जो श्रमिकों के सम्पर्क में हुआ करते हैं। इस कार्य में निर्माण कार्य स्थल के पास के गांवों से ही श्रमिक प्राप्त किये जाते हैं। पर जब स्थानीय क्षेत्रों से श्रमिक नहीं मिल पाते तो गैंग लीडरों की सहायता से कहीं से भी श्रमिक प्राप्त कर लिये जाते हैं। यदि यह कार्य पंचायत के माध्यम से करना होता है तो श्रमिकों को सरपंच द्वारा बुलाया जाता है। श्रमिक कार्य स्थल पर जाते हैं और दूर होने पर अपने साधनों द्वारा वहां जाते हैं। कभी-कभी श्रमिक आने जाने की सुविधा की मांग गैंग लीडर से सौदा करते हैं। यदि ठेकेदारों को श्रमिकों की आवश्यकता होती है तो वे परिवहन की सुविधा प्रदान की जाती है। वैसे ठेकेदार कम से कम सुविधायें देने को स्वीकार करते हैं । सार्वजनिक क्षेत्र के कार्य के घण्टे नौ बजे प्रातः से छः बजे सायं तक होते हैं, बीच में एक घण्टे का अवकाश होता है। कार्य के लिए श्रमिकों को छः बजे प्रातः ही अपना घर छोड़ना होता है। जब कभी भी कार्यस्थल पर महिलाओं से बात करने के लिए कार्यस्थल पर गये तो निरीक्षकों द्वारा उन्हें बात करने के लिए मना किया या जल्दी ही बात समाप्त करने को कहा गया। निर्माण कार्य में सरकार द्वारा न्यूनतम दैनिक मजदूरी पचास रूपये निश्चित की गयी है। महिलायें प्रायपाँच बीस रूपये से पच्चीस रूपये प्रतिदिन प्राप्त करती हैं । यह कार्य पर निर्भर है। जैसे- नहर निर्माण या सड़क निर्माण कार्य आदि कुशल व अकुशल दोनों प्रकार के श्रमिकों की दरें अलग-अलग होती हैं । महिलाओं को केवल अकुशलता वाले कार्य दिये जाते हैं, जिसके लिए उन्हें न्यूनतम दर पर मजदूरी दी जाती है। कुशलता पर आधारित कार्य पुरूषों द्वारा किये जाते हैं, जिसके लिए उन्हें पैंतीस से चालीस रूपये तक प्राप्त होते हैं, जबकि महिलाओं द्वारा अधिक परिश्रम के कार्य किये जाने के बदले में केवल पच्चीस रूपयों तक ही प्राप्त होते हैं । विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग मजदूरी की दरें प्राप्त होती हैं । नहरों के किनारे पत्थर ले जाने के लिए तीस रूपये प्रतिदिन, पत्थरों को ट्रक पर लादने के लिए साठ रूपये प्रतिदिन जिसमें पत्थरों को तोड़ना, उसे ट्रक पर लादना शामिल है। पत्थर तोड़ने के लिए साठ पैसा प्रति पत्थर दिया जाता है। सिर पर पत्थर लादकर सड़कों के निर्माण के लिए ले जाने के लिए चालीस रूपये प्रतिदिन दिये जाते हैं। इनमें कुछ कार्य के लिए महिला एवं पुरूषों को समान मजदूरी और अन्य कार्यों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी प्राप्त होती है। निर्माण कार्यों में भी श्रमिकों के प्रतिनिधि संगठनों का अभाव है, जिससे उनके हितों की रक्षा हो पाती है ओर उनके सौदा करने की शक्ति सीमित है। ईंटे बनाना :- ईंट बनाने कार्य उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां कि मिट्टी इसके लिए उपयुक्त होती है। यह कार्य अधिकांशतः मऊरानीपुर विकास खण्ड में किया जाता है। वैसे प्रत्येक विकास खण्ड में यह कार्य किसी न किसी पैमाने पर किया जाता है। अध्ययन में ईंट बनाने का कार्य पैंतीस महिला परिवारों द्वारा किया जाता है। इनमें से अधिकांश महिलायें मऊरानीपुर विकास खण्ड में थी। पुरूष व महिलायें दोनों मिलकर इस कार्य को करते हैं। अधिकांशतः एक ही परिवार की महिलायें दोनों मिलकर इस कार्य को करते हैं। अधिकांशतः एक ही परिवार की महिलायें एवं पुरूष दोनों मिलकर इस कार्य को करते हैं । यह कार्य दो स्तरों में विभाजित किया जा सकता है। पहले स्तर पर मिट्टी से ईंटे तैयार करना और फिर उसे धूप में सुखाने का कार्य ओर दूसरे स्तर पर इन ईंटो को भट्ठे में लगाना व पकाने का कार्य किया जाता है। इनमें महिलाआं द्वारा दोनों स्तरों के कार्य किये जाते हैं और उनके कार्य पुरूषों के कार्य से अलग होते हैं। कार्य के प्रथम चरण में ईंट बनाने वाली टीम को कार्यस्थल पर रातों दिन रहना पड़ता है, क्योंकि यह कार्य लगातार किया जाता है। पुरूषों द्वारा खेतों में मिट्टी खोदने का किया जाता है और अधिक मात्रा में मिट्टी खोदी जाती हैं, जो लकड़ी के सांचे में डालकर ईंट का रूप देते हैं । बनी हुई ईंटो को महिलाओं द्वारा उठाकर दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है जहां पर उन्हें रखा जाता है और उन्हें उन्हें सूखने के लिए छोड दिया जाता है। मिट्टी खोदने का कार्य शाम को प्रारम्भ किया जाता है, मिट्टी में पानी मिलाकर रखा जाता है और काम रात में प्रारम्भ किया जाता है। यह कार्य उस समय तक किया जाता है, जब तक भट्ठे के लिए आवश्यक मात्रा में ईंटे तैयार नहीं हो जाते हैं। एक भट्ठे में पचास हजार से एक लाख ईंटे एक साथ पकायी जाती हैं। श्रमिकों द्वारा ईटो की गिनाई भी साथ-साथ की जाती है, जब आवश्यक मात्रा की ईंटे तैयार हो जाती हैं तो कार्य का दूसरा चरण प्रारम्भ होता है । कार्य के दूसरे स्तर में धूप में सूखी ईंटों को एक दूसरे के ऊपर चढ़ाकर चौकोर आकार में लगाना होता है, जिसके बीच में स्थान छोड़ना होता है, जिसके बीच कोयले के टुकड़े तथा रूई के गोले प्रत्येक पर्त में डाला जाता है साथ ही धान की भूसी भी फैलायी जाती है। भट्ठा में ईंटे इस प्रकार लगायी जाती है कि जैसे-जैसे ईंटे की ऊँचाई बढ़ती जाती है, उसके आकार कम होता जाता है। सबसे नीचे वाले भाग के पास में लकड़ी रखी जाती है । जब भट्ठे को पूरी तरह तैयार कर लिया जाता है तो लकड़ी रखी जाती है । धीरे धीरे कोयले में आग पकड़ लेती है। धूप में सूखी हुई उन्हें धीरे-धीरे पकती है और रंग बदल देती है। अन्त में लकड़ी वे कोयला पूरी तरह जल जाती है और भट्ठा शान्त हो जाता है और ईंटे बिक्री के लिए तैयार हो जाती है। काम के इस स्तर में भट्ठे में ईंटो के रखने की लम्बाई और चौड़ाई कोयले की मात्रा तथा अन्य ईंधन तथा ईंटो की पर्तों के लगाने के निर्णय का कार्य कुशल व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, उन्हें मिस्त्री कहा जाता है। इसके लिए केवल एक ही व्यक्ति की आवश्यकता होती है। महिलाओं को ईंटो के सूखने वाले स्थान से भट्ठे में रखने वाले स्थान पर ढोने के लिए दैनिक मजदूरी पर लगाया जाता है। इस कार्य के लिए पुरूषों को भी लगाया जाता है। सामान्यतया जो श्रमिक मिट्टी से ईंट बनाने का कार्य करते हैं यदि वे खाली रहते हैं तो दूसरे स्तर में भी कार्य करते हैं। ईंटों के बनाने का कार्य एक विशिष्ट कार्य हैं, इसके लिए ईंटे के भट्ट के पास रहना आवश्यक होता है। यह कार्य बरसात के मौसम को छोड़कर वर्ष भर किया जाता है। ईंट बनाने का मौसम दशहरे से होली तक होता है। दूसरा मौसम होली से जब तक बरसात नहीं होती तब तक का होता है। ईटों के भट्ठे प्रायः आबादी के बाहर हुआ करते हैं और प्रायः जनपद के विभिन्न भागों में फैले हुए हैं। श्रमिक विभिन्न भागों से इनमें कार्य करने आते हैं। पूरे मौसम में एक निश्चित मात्रा में ईंटों को बनाने के कार्य का समझौता हो जाता है और रमिक मौसम प्रारम्भ होते ही काम शुरू कर देते हैं। विभिन्न ईंटों के भट्ठे अलग-अलग करके घर वापस आ जाते हैं। और कुछ दूसरे मौसम में भी कार्य करते हैं। काम प्राप्त करने के लिए श्रमिक पहले पहल ईंट भट्ठों के पास जाते हैं। इस कार्य में वे अपने सम्बन्धी रिश्तेदारों व पड़ोसियों से मदद प्राप्त करते हैं। जब दोनों पार्टियों में समझौता हो जाता है और ईंट भट्ठों के मालिक जब श्रमिक के कार्य से संतुष्ट रहते हैं तो लम्बे समय तक श्रमिकों को कार्य मिला होता है। ईंट भट्ठों के मालिक कभी-कभी किसानों से उनके खेत किराये पर ले लेते हैं और भट्ठों के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए अपनी पूंजी लगाते हैं। भू-स्वामियों को वे एक निश्चित किराया देते हैं। यदि भट्ठे मालिक के पास पर्याप्त पूंजी नहीं होते तो वे साझेदार बना लेते हैं और लाभ का बंटवारा हिस्सेदारों में होता है। कभी-कभी भट्ठे मालिक के पास खुद की जमीन होती है। इस प्रकार की स्थिति में श्रमिकों को पीस रेट के आधार पर खा जाता है। दूसरी व्यवस्था में किसान अपने खेत को समान बनाने या खेत की सतह को नीचा कराते हैं, ऐसी स्थिति में वे स्वयं श्रमिकों से ईंटे बनाने का समझौता खेत से मिट्टी खोदकर करते हैं। इसकी लागत किसान तथा श्रमिक दोनों मिलकर वहन करते हैं। बनी हुई ईंट को बेचकर लाभ प्राप्त किया जाता है। यह कार्य छोटे खेतों पर एक या दो मौसम के लिए किया जाता है और जब खेत बराबर हो जाता है तो उसका उपयोग कृषि के लिए किया जाता है। श्रमिक किसी दूसरे किसान को ढूंढ़ लेते हैं, जिन्हें अपना खेत समतल बनाने या नीचा करने के लिए एक या दो मौसम में ईंट की पथाई करानी होती है। ईंट बनाने के कार्य में मजदूरी का भुगतान पीस रेट के अनुसार किया जाता है, जो पचास से सत्तर रूपये हजार ईंट हुआ करता है। श्रमिक एक निश्चित समय तक कार्य करने के लिए सहमत होते हैं। मजदूरी की दरें ईंट निर्माण संगठन द्वारा ईंट निर्माण श्रम यूनियन वैसे बात करके होली के समय प्रत्येक वर्ष घोषित कर दी जाती है। दिन भर में एक हज़ार पाँच सौ से दो हज़ार ईंट बनाने के लिए तीन या चार श्रमिकों की एक टीम यदि वे अधिक परिश्रम करते हैं तो बना पाते हैं। यदि वे धीमी गति से कार्य करते हैं तो दिन भर में एक हजार ईंट बना लेते हैं। उनहें भुगतान रोज नहीं किया जाता है। प्रत्येक सप्ताह में श्रमिकों को एक निश्चित मात्रा में अग्रिम दिया जाता है, जिसे खर्ची प्रणाली कहा जाता है। सप्ताह में एक दिन निश्चित होता है जब श्रमिकों को एक निश्चित मात्रा में अग्रिम दिया जाता है, जिसे खर्ची प्रणाली कहा जाता है । सप्ताह में एक दिन निश्चित होता है जब श्रमिकों को एक निश्चित रकम दे दी जाती हैं सामान्यतया तीन या चार श्रमिकों के एक टीम को एक सौ रूपये की रकम दी जाती है। श्रमिक बनायी जानी वाली ईंटों का हिसाब रखते हैं तथा भट्ठा मालिक भी अपनी डायरी में बनायी गयी ईंटो की संख्या तथा श्रमिकों को अग्रिम के रूप में दी जाने वाली रकम लिखे रखते हैं। कभी-कभी मालिक श्रमिकों की हाजिरी भी मारते हैं। श्रमिक अधिकतर विश्वास पर कार्य करते हैं । मालिकों द्वारा रखे गये रिकार्ड पर श्रमिक विश्वास रखते हैं। बहुत कम पढ़े लिखे श्रमिक अपने कार्यों तथा लिये गये यपयों का स्वयं हिसाब रखते हैं। कभी कभी मालिक इन्हें हिसाब रखने के लिए डायरी दे देते हैं। मौसम के अन्त में उनके लेनदेन का हिसाब किया जाता है। वास्तव में श्रमिक द्वारा एक हज़ार एक सौ ईंटों के निर्माण के बाद भुगतान किया जाता है, क्योंकि एक हजार अच्छी ईंटों के निर्माण में एक सौ ईंटें टूट-फूट, बेकार के रूप में काट ली जाती हैं। श्रमिक अपना गुजारा प्राप्त अग्रिम से करते हैं, जिस दिन अग्रिम दिया जाता है, उस दिन छुट्टी होती है। ईंट के भट्ठे बाजार या बस्तियों से दूर होते हैं अतः श्रमिकों को अपने खाद्य सामग्री, ईंधन, दवा, और अन्य सामान खरीदने के लिए आस-पास के नगर में जाना होता है। उसी दिन वे अपने कपड़े साफ करते हैं तथा आराम करते हैं। खर्ची प्रथा कई कारणों से चालू रखी जाती है। पहला कारण तो श्रमिकों को काम पर रोके खने के लिए जिससे वे काम को बीच में छोड़कर न चलें जायें। दूसरा कारण यह है कि मजदूरी की सह दर मौसम के अन्त में स्पष्ट होती है। तीसरा कारण यह है कि ईटों का निर्माण एक बड़ी मात्रा में किया जाता है और बेचने से पहले उसे पकाया जाता है तथा उसमें लगी रकम को वसूल करना होता है। भट्ठे मालिक श्रमिकों को कम से कम रकम देना चाहते हैं। केवल उनके खाने भर को पर्याप्त रकम ही दिया करते हैं। अच्छे मौसम के समय में श्रमिक अपने खाने व खर्चे से बचाकर तीन हजार से चार हजार रूपये तक बचाकर लाते हैं और औसतन एक हजार से पन्द्रह सौ रूपये घर पा लाया करते हैं। यह बचाकर लायी गयी रकम बरसात में उनके परिवार के व्यय के काम आती हैं, जब उनके पास कार्य नहीं होता है। इन श्रमिकों द्वारा अधिक परिश्रम के कार्य किये जाते हैं। अतः वे बरसात में आराम करना पसन्द करते हैं और उनके पास जो रकम होती है, उसी में गुजारा कर लेते हैं। वे वास्तव में अपने लिए बहुत अधिक पूंजी का निर्माण करने में सफल नहीं होते हैं। यदि वे बरसात के मौसम में भी कार्य करें तो वे कुछ रकम बचा सकते हैं। उन्हें त्यौहारों, विवाहों तथा अन्य सामाजिक अवसरों पर व्यय करना होता है, कहीं-कहीं श्रमिकों को दो हजार से तीन हजार ईंटे बोनस के यप में दी जाती हैं । श्रमिकों को नकद प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य सुविधायें नहीं प्राप्त होती हैं। ईंटे बनाने में प्रयोग आने वाले यंत्र व औजार भट्ठा मालिक के ही होते हैं। ईंट भट्ठों के पास रहने के लिए श्रमिकों को बिना पकी हुई ईंटे रहने का स्थान बनाने के लिए दी जाती है, जिसके द्वारा वे अस्थानयी निवास का निर्माण कर लेते हैं। उन्हें इन ईंटों को घर जाते समय वापस करना होता है। पानी भट्ठे के आस-पास ही मिल जाता है, क्योंकि ईंट निर्माण में जल एक आवश्यक आगत होता है पर अन्य सामान जैसे ईंधन, खाना बनाना, शौच, बाल कल्याण, स्वास्थ्य और चोट इत्यादि लगने पर उसका इलाज स्वयं श्रमिकों को करना होता है। श्रमिक का पूरा परिवार उसके साथरहता हैं । कभी-कभी बुजुर्ग सदस्य भी इन्हीं के साथ जाते हैं और वे छोटे बच्चों की देखरेख किया करते हैं। ईंट के भट्ठे मुख्य सड़क व गांवों से दूर हुआ करते हैं। श्रमिक दूध के बकरियां अपने साथ ले आते हैं। उनके राशन कार्डो की उनके लिए उपयोगिता नहीं होती हैं। उन्हें खुले बाजार में अन्य लोगों की भांति उन्हीं मूल्यों पर सामान खरीदना होता है। बच्चों की शिक्षा भी नहीं हो पाती है। ऐसे भी उदाहरण मिले हैं, जहां बच्चों को दो स्कूलों में भेजा जाता है। जब वे ईंट भट्ठे पर काम कर रहे होते हैं तो भट्ठे के पास के स्कूल में भेजते हैं और जब वे गांव में होते हैं तो गांव के स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं अधिकांश श्रमिक अपने प्रवासी प्रवृतित के कारण बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं। वे अपने बच्चों को जहां वे जाते हैं अपने साथ ले जाया करते हैं। बच्चे जिस किसी भी कार्य में मदद करते हं जो वे कर सकते हैं। बच्चे वही कार्य करना सीख जाते हैं और उनके माता-पिता के प्रवासी प्रवृत्ति के कारण उनका भविष्य प्रमाणित होता है । इस प्रकार के श्रमिकों को गांव से कोई भी ऋण की सुविधा नहीं मिल पाती है, क्योंकि वे गांव में बहुत कम होते हैं ईंट भट्ठे के मालिक भी उन्हें ऋण नहीं देते हैं। कभी-कभी मौसम के प्रारम्भ में उन्हें थोड़ी रकम मिल जाती हैं पर मौसम के समाप्त होने पर कोई भी रकम उन्हें मालिक द्वारा नहीं प्राप्त होती है। मजदूरी का भुगतान परिवार के मुखिया को किया जाता है और महिलायें कोई रकम नहीं प्राप्त कर पाती है। बहुत सी महिलायें हिसाब-किताब रखना नहीं जानती। थोड़ी बहुत रकम वे अपने पास रखती हैं। रूपये अधिकांशतः पुरूषों द्वारा रखे जाते हैं। महिलायें अपनी आवश्यकतानुसार पुरूषों से अपने व्यय के लिए रूपये मांग लेती हैं। कुछ पुरूष श्रमिक ईंटों के निर्माण तथा उसमें लगने वाली पूंजी तथा आवश्यक वस्तुओं की लागत के बारे में ज्ञान रखते हैं। महिलायें इन सब बातों के बारे में जानकारी नहीं रखती है वे केवल उस कीमत के बारे में जानकारी रखती है, जिस पर ईंटें बिकती हैं। ईंटों की बिक्री भट्ठे पर ही होती है, जिसे ट्रकों द्वारा ले जाया जाता है। कुछ श्रमिक जाति के कुम्हार व मिट्टी के बर्तन बनाने वाले पाये गये जो मिट्टी के बरतन के काम को अधिक लाभदायक न होने के कारण ईंटे बनाने का काय्र करने लगे हैं। वे मिट्टी के कार्य में अधिक कुशल होते हैं और सरलता से ही ईंट बनाने का कार्य सीख लेते हैं। कुछ अन्य जाति के लोग भी ईंटे बनाने कार्य करते हैं। ईंट बनाने का धन्धा मिट्टी के बर्तन बनाने धंधे की भांति जाति पर आधारित नहीं है । महिलाओं को ईंट बनाने का कार्य करने के अतिरिक्त घरेलू कार्य भी करना होता है। वे रात में ईंट बनाने तथा दिन में भोजन बनाने, भोजन बनाने, कपड़ा धोने, पानी भरने बच्चों की देखरेख तथा मिट्टी खोदने का कार्य करती है, जिससे वे रात को ईंटे बनाने का कार्य के कारण थकी हुई होती हैं, उनके बदन में दर्द होता है, उनके हाथ की उंगलियों में कभी-कभी खून निकलता रहता है। उन्हें शीतकाल में भी कार्य करना होता है। उनके सिर के बाल भी गिरने लगते हैं। वे खुले में रहने की अभ्यस्त हो जाती है और अन्य कार्यों की तुलना में अधिक आय प्राप्त होने के कारण व ईंट भट्ठों में काम करती हैं। उन्हें जीवित रहने के लिए जो भी कार्य मिल जाता है, उसे करना होता है। महिलायें ईंट बनाने के कार्य में इसलिए लग जाती है, क्योंकि उन्हें अपने गांवों में अधिक काम नहीं मिल पाता है। यदि उन्हें भूमि तथा ऋण मिल जाये तो वे ईंट बनाने का कार्य स्वयं करने लगे जो दूसरों के भट्ठे पर जाकर पीस रेट के आधार पर काम करने की तुलना में अधिक लाभदायक है। ईंट भट्ठों के पास खुले में रहने के लिए उन्हें भयमुकत होना आवश्यक है अन्यथा वे अपनी जीविका ईंट निर्माण द्वारा अर्जित नहीं कर सकते हैं । महिलायें जो भट्ठों में लगाने के लिए ईंटे ढोने का कार्य करती हैं, उन्हें मजदूरी ईंटों की संख्या के आधार पर प्राप्त होती हैं। यहां पर बीस पेसे पच्चीस पेसा प्रत्येक इक्कीस ईंटों को ढोने के लिए प्राप्त होते हैं। इस प्रकार वे दिन में बीस से पच्चीस रूपये तक अर्जित कर लेती हैं, यह उस क्षेत्र के मजदूरी दर पर निर्भर है। उन्हें किसी भट्ठे पर इस से पन्द्रह दिनों के लिए काम मिल पाता हैं यह एक कठिन परिश्रम का कार्य है, उनके पैरों में सारे दिन इधर-उधर आते-जाते दर्द होने लगता है। यदि भट्ठा अधिक दूर होता है तो वहीं पर रूक जाती हैं और अपने बच्चों के साथ ले जाया करती हैं तथा अपना खाना वहीं बनाया करती हैं । भट्ठा मालिक द्वारा कच्ची ईंटे रहने का स्थान बनाने के लिए दिया जाता है । ईंट भट्ठों में काम करने वाले श्रमिकों की ईंट श्रमिक संघ की स्थापना की गयी है जो श्रमिकों के हित के लिए क्रियाशील है, पर इसमें केवल पुरूष श्रमिको को ही सदस्य बनाया जाता है, यद्यपि महिलायें भी उतनी ही मेहनत से कार्य करती हैं, जितना पुरूष करते हैं। यूनियन द्वारा श्रमिकों के मजदूरी की दरें निश्चित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं प्रदान किया जाता है। महिला श्रमिकों को यूनियन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। बांस का कार्य :- बांस का कार्य एक विशेष जाति द्वारा किया जाता है, यह कार्य भंगी जाति के लोग करते हैं। यह एक परम्परागत जाति पर आधारित पेशा है। इस जाति के लोग गांव में दो या तीन परिवार रहते हैं। यह परिवार का पेशा है, जिसमें महिलायें विभिन्न प्रकार के कार्य करती हैं। केवल बाजार से कच्चे माल लाने के अतिरिक्त अन्य कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है । बांस, रैक्सीन, चमड़े की खाल, सूती धागे तथा मरे जानवरों की तांत आदि सामान सूप व टोकरियां बनाने के लिए बाजार से खरीदे जाते हैं। सूप फसलों के सफाई के समय अनाज को साफ करने के लिए सभी किसान परिवारों द्वारा प्रयोग किया जाता है और अन्य परिवारों द्वारा इसका प्रयोग घरेलू कार्य के लिए किया जाता है। यह शहरी क्षेत्रों में भी प्रयोग किया जाता है। कुछ दिनों के बाद इसे बदलने की आवश्यकता होती है। इसलिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। सूप का निर्माण घरों में ही किया जाता है और गांव के लोग या तो इसे इनके घरों से खरीदते हैं या अन्य गांवों में दरवाजे जाकर इसे बेचा जाता है और टोकरी का प्रयोग खाद्यान्न रखने के लिए, खाद्यान्न ढोने के लिए, मिट्टी, फल व सब्जी आदि लाने के लिए किया जाता है। इसका भी निम्मण बांस द्वारा घरों पर किया जाता है और सूप की ही भांति इसकी बिक्री की जाती है। बांस का काम करने वाले परिवारों द्वारा या तो सूप बनाने या टोकरी बनाने का काम किया जाता है। दोनों समान एक ही परिवार द्वारा बहुत कम मात्रा में बनाने हैं। यह व्यवसाय वर्ष भर किया जाता है पर कृषि के समय में इन परिवारों द्वारा पीन आय बढ़ाने के लिए कृषि श्रमिक के रूप में भी काग्र कर लिया जाता है। बांस का काम जजमानी प्रथा के अन्तर्गत किया जाता है, पर वर्तमान में यह नकद लेनदेन के आधार पर ही किया जाता है। बहुत कम ऐसा पाया गया कि लोग सूप लेने के लिए अनाज से बदला करते हैं । यह काम अपने ही घरों में परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता है और इस कार्य के लिए श्रमिकों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस कार्य में कच्चे माल प्राप्त करने का काग्र पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। बांस की खरीददारी कुछ स्थानों से की जाती है, सिरकी, प्लास्टिक, रैक्सीन, चमड़े, मरे जानवरों के धागे आदि शहर के बाजारों से प्राप्त किये जाते हैं। कच्चे माल की खरीददारी प्रत्येक समय में एक ही स्थान से की जाती है। बांस व सिरकी का प्रयोग सूप बनाने वालों द्वारा किया जाता है। रैक्सीन, प्लास्टिक या चमड़े का प्रयोग सूप के बनने में प्रयोग किया जाता है। सिरकी को बांधने के लिए मरे जानवरों के धागे या प्लास्टिक के धागे काप्रयोग सूप बांधने के लिए किया जाता है। सूप के निर्माण के कच्चे माल की खरीददारी सूप के प्रकार पर निर्भर है, साथ ही श्रमिकों के पास प्राप्त धनराशि और क्षेत्र में सूप की मांग पर निर्भर है। कच्चे माल खरीदने के लिए दो या तीन प्रणाली प्रचलित हैं- कुछ लोग आठ से दस दिन के कार्य करने के लिए थोड़ी मात्रा में कच्चे माल खरीदते हैं और कुछ लोगों द्वारा बड़ी मात्रा में, जो लगभग एक माह के उत्पादन कार्य के लिए पर्याप्त होता है, सामान का कच्चे माल खरीदा जाता है। वे प्रायः बस से कच्चे माल खरीदने जाते हैं। और सामान सिर पर लादकर वापिस आया करते हैं कभी-कभी उन्हें बांस लाने के लिए लगेज चाज्र देना होता है। बांस काफी मंहगा मिलता है, क्योंकि एक या दो बांस एक बार में खरीदा जाता है। यह पच्चीस रूपसे से पचास रूपये का प्राप्त होता है। जो लोग एक माह के उत्पादन के लिए कच्चे माल खरीदा करते हैं उन्हें बांस कुछ सस्ता मिल जाता है। अन्य कच्चे माल प्रायः स्थिर मूल्यों पर प्राप्त होता है। रैक्सीन, रिक्शा, कारके सीट कवर से बचे हुए भाग से प्राप्त होता है, जिसका प्रयोग सूप के निर्माण में किया जाता है। चमड़े या तो मोची या चमड़े निकालने वाले लोगों से प्राप्त किया जाता है । मरे हुए जानवरों के तांत कसाई घरों ती धागे धागे बेचने वालों से प्राप्त किये जाते हैं और सिरकी शहर के बाजारों में प्राप्त हो जाती है। सभी कच्चे माल सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, का आकार दिये जाने का कार्य इस उत्पादन कार्य का सबसे अधिक कुशलता और दक्षता का कार्य है। पुरूष व महिलायें दोनों उत्पादन का कार्य करती हैं। बच्चे भी कभी-कभी उत्पादन कार्य में सहायता करते हैं, कुछ परिवार उत्पादन के सभी कार्य को एक ही बार में समाप्त कर देते हैं, जिससे प्रत्येक दिन उत्पादन तैयार कर लिया जाता है। कुछ परिवारों में काम विभिन्न स्तरों में तैयार किया जाता है, जिससे उत्पादन चार या पांच दिनों में तैयार किया जाता है । ओसतन दो कार्यकर्ता एक दिन में दो सूपों का निर्माण कर सकते हैं। तेजी से काम करने वालों की टीम, जिसमें अधिक लोग काम करने वाले होते हैं, एक दिन में तीन या चार सूपों का निर्माण करते हैं। जो लोग एक सप्ताह या दस दिनों के उतपादन के लिए कच्चे माल लाते हैं, वे बीस से पच्चीस सूपों का निर्माण कर लेते हैं और उन्हें बेचते हैं। पन्द्रह दिनों के उत्पादन के लिए कच्चे माल खरीदने वाले लोगों द्वारा लगभग पच्चास सूपों का निर्माण किया जाता है और एक माह के उत्पादन का कच्चा माल खरीदने वालों द्वारा दो सौ से दो सौ पचास सूपों का निर्माण किया जाता है । अपने ही गांव में लोग सूप की खरीददारी उनके घरों से करते हैं। वे सूप की बिक्री अपने गांव में जब कभी इसका निर्माण होता है कर दिया करते हैं। जब इन्हें अन्य गांवों में बेचने जाना होता है तो वे कई सूपों को एकत्र करके अपने सागि ले जाते हैं। सामान्यतया वे सप्ताह में इसकी बिक्री करते हैं और दो या तीन दिनों में वे कोशिश करते हैं कि उनके द्वारा गत सप्ताह में बनाये गये सभी सूपों की बिक्री हो सके। पुरूष एवं महिलायें दोनों सूप बेचने जाती है। महिलायें प्रायः अपने ही गांव में और पुरुष गांव के बाहर अन्य गांवों में सूप की बिक्री करने के लिए जाते हैं इसकी बिक्री इनके द्वारा नकद के आधार पर की जाती है। कोई भी व्यक्ति उन्हें इसके बदले में अनाज नहीं देता है, फिर भी कुछ महिलाओं ने यह बताया कि अभी भी महिलाओं द्वारा अपने गावं में बिक्री में एक सूप के बदले ढाई सेर अनाज मिल जाता है। सूपों की बिक्री व्यापारियों या दुकानदारों को नहीं की जाती है, क्योंकि इनके द्वारा इन्हें अच्छी कीमत नहीं प्राप्त होती है। केवल मजबूरी की सिति में ही इसकी बिक्री व्यापारियों के यहां करनी होती है । सूप बनाने की कुशलता परिवार में ही प्राप्त होती है। कुछ परिवारों में यह कार्य दर पुस्त दर या पीढ़ियों से चला आ रहा है। महिलायें यह कला या तो पअने माता-पिता या ससुराल में सीख लेती हैं। इसके निर्माण में विभिन्न आकारों के चाकू की आवश्यकता बांस काटने के लिए होती हैं तथा सिरकी सीने के लिए एक बड़ी सुई की तथा एक कुल्हाड़ी की आवश्यकता होती है । ये सब यंत्र परिवारों में होते हैं जो पीढ़ियों से परिवार में चलते हैं । एक बांस के कार्य से प्राप्त होने वाली आय सूप को बेचने से प्राप्त कीमत पर निभ्रर हैं एक सूप की औसत कीमत बीस से पच्चीस रूपये प्रति सूप के बीच होती हैं। पर कुछ परिवारों द्वारा तीस रूपये प्रति पीस प्राप्त कर ली जाती हैं। तांत से बने सूपों की कीमत कुछ अधिक होती है। सूप की कीमत उसमें लगे कच्चे माल की प्रकृति पर निर्भर है और बिक्री कीमत लाभ प्राप्ति को ध्यान में रखकर ऊँची रखी जाती है। साथ ही इसकी कीमत कच्चे माल के खरीद की मात्रा पर भी निर्भर है। जो एक माह के कच्चे माल की खरीददारी करते हैं उन्हें उन व्यक्तियों की तुलना में अधिक लग या आय प्राप्त होती हैं जो एक सप्ताह या दस दिनके उत्पादन के लिए कच्चे माल खरीद कर उत्पादन का कार्य करते हैं, कयोंकि इकट्ठा कच्चे माल खरीदने वालों की प्रति इकाई उत्पादन लागत कम होती हैं, जबकि कीमत समान होती है, इसलिए उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है, इसके अतिरिक्त कच्चे माल के प्रयोग पर भी उत्पादन लागत निर्भर है, वे लोग जो एक निश्चित कच्चे माल से अधिक उत्पादन की इकाइंया तैयार करते हैं तथा इसे बेकार होने से बचाते हैं उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है । एक सप्ताह या दस दिन के उत्पादन के लिए साठ से एक सौ रूपये तक का विनियोग करना होता है, जिससे बीस से पच्चीस सूपों का निर्माण किया जाता है, जिससे उन्हें एक सौ पचास से दो सौ रूपये की आय प्रत्येक सप्ताह या दस दिनों में होती है। एक सौ पचास रूपये के विनियोग द्वारा पचास सूपों का निर्माण किया जाता है, जिससे तीन सौ पचास से पाँच सौ रूपये की आय प्रत्येक पंद्रह दिनों होती है और उनका लाभ दो सौ रूपये आदि तीन सौ पचास रूपयों का होता है। इसी प्रकार तीन सौ रूपये या तीन सौ पचास रूपये के विनियोग द्वारा एक सौ अस्सी से दो सौ सूपों का निर्माण किया जाता है, जिससे दो हज़ार रूपये से दो हज़ार पाँच सौ रूपये में प्राप्त होती है। यह आय दो या तीन व्यक्तियों की मेहनत द्वारा जो एक सप्ताह के उत्पादन के आधार पर या पांच या छः व्यक्तियों की आय होती है जो महीने या डेढ़ महीने के कच्चे माल की खरीददारी के आधार पर उत्पादन कार्य करते हैं। इसी आय से इन परिवारों द्वारा अपनी आधारभूत आवश्यकताओं तथा आकस्मिक इसलिए उन्हें कृषि श्रमिक के रूप में भी कार्य करना होता है या अन्य कार्य जो मिलता है, उसे करते हैं। इस कार्य में लगे श्रमिक जब तक उनके द्वारा बनाये गये उत्पाद बिक नहीं जाते, तब तक वे पुनः कच्चा माल लेने नहीं जाते हैं, क्योंकि उनके पास अधिक मात्रा में धनराशि विनियोजन के लिए नहीं होती है। जब कभी उनका उत्पाद बिक नहीं जाता वे अधिक कच्चे माल नहीं खरीद सकते हैं। ऐसी सििित में वे कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं, जिससे उन्हें नकद की प्राप्ति होती है, जिससे वे अपना भोजन व कुछ धनराशि से कच्चा माल खरीदते हैं। वे अपना सामान सस्ते में भी निकाल देते हैं, जब उसके खराब होने की सम्भावना होती है। सामान बेचने से जो रकम प्राप्त होती है, वे पूरी रकम व्यय नहीं करते, जिस रकम का कच्चा माल खरीदना होता है, उस धनराशि को निकाल कर यदि वे शेष धनराशि में से भी कुछ बचा लेते हैं, तो वे अगले उत्पादन के लिए कुछ अधिक मात्रा की रकम का विनियोजन करते हैं। यदि किसी उत्पादन के चक्र में उन्हें किसी आकस्मिक व्यय का सामना करना पड़ जाता है, तो उन्हें अपनी पूंजी का भी उपयोग करना पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में पूंजी एकत्र करने के लिए दूसरा काम करना पड़ जाता है या उधार लेकर उत्पादन का कार्य पुनः प्रारम्भ किया जाता है और जब पुंजी नहीं मिल जाती, उत्पादन बन्द रखा जाता है। जो लोग बांस की टोकरी बनाने का काम करते हैं वे चार बांसों से छः बड़ी या आठ छोटी टोकरियं बना लेते हैं। पुरुष तथा महिलायें दोनों टोकरी बनाने का कार्य करते है। बांस को बड़ी-बड़ी पटरियों में पहले काट लिया जाता है। इसके बाद टोकरियां बनायी जाती हैं। बड़ी टोकरी पैंतालीस रूपये की एक बेचते हैं, जिसमें साठ रूपये का विनियोग होता हैं। एक सप्ताह के उत्पादन कार्य के लिए चार बांस पर्याप्त होते हैं। दस दिनों में तीन सौ रूपये की आय प्राप्त होती है, क्योंकि इसे बेचने में दो या तीन दिन लग जाते हैं। छोटी टोकरियां बीस रूपये में बिकती हैं और दस दिनों में कुल दो सौ रूपये की प्राप्ति And t होती है। वे पांच बांस खरीदते हैं, जिसके लिए उनहें सत्तर से पचहत्तर रूपये व्यय करने होते हैं प्रत्येक सप्ताह एक सौ से एक सौ पचास रूपये की आय प्राप्त होती हैं। इसे बेचने के लिए पुरूष एवं महिलायें एक गांव के दूसरे गांव जाया करते हैं । टोकरियां बेचने से प्राप्त आय पुरूष एवं महिलाओं दोनों के हाथ में आया करती हैं। महिलायें इसे गिन नहीं सकती हैं, इसलिए परिवार का व्यय पुरूषों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। महिलायें अधिकांशतः अनपढ़ होती हैं । इनमें से कुछ गिन सकती हैं, सभी कार्य मौखिक हुआ करते हैं। इसलिए महिलाओं की निरक्षरता एक बाधा नहीं है। कभी-कभी महिलायें कच्चे माल की लागत व सूप और टोकरी की मांग को जनती हैं, पर उन्हें कच्चे माल की लागत व सूप और टोकरी की मांग को जानती हैं, पर उन्हें कच्चे माल खरीदने का स्थान ज्ञात नहीं होता है। इन श्रमिकों की कोई प्रतिनिधि संस्था नहीं होती है। यद्यपि वे कठिन परिश्रम करते हैं पर उन्हें इस कार्य से बहुत कम आय प्राप्त होती है। एक ही स्थिति में बैठे-बैठे उनकी कमर दर्द करने लगती है। उनकी आंखों पर भी भार पड़ता हैं वे अपने काम में अधिक रकम लगाना चाहते हैं, क्योंकि इससे उनकी आय में वृद्धि होगी। उनका कहना था कि हम लोगों के पास नोट छापने की मशीन नहीं है। कच्चे माल की खरीददारी जब हम लोगों के पास पैसा हाता है, तब की जाती है। कच्चे माल की गुणवत्ता हम लोगों के पास प्राप्त रकम की मात्रा पर निर्भर है। हम लोगों को अपना उत्पादन बेचने के लिए बहुत दूर-दूर जाना होता है, जब हम अपना उत्पादन बेचने में असमर्थ होते हैं, तो श्रमिक का कार्य करना होता है, बड़ी कठिनाईयों से हम अपना पेट भर पाते हैं, जब हमारे पास पैसा होता है तो हमारे बच्चे खिचड़ी खाकर रहते हैं। जब हम व्यापारियों को अपना माल बेचते हैं, तो हमें हानि उठानी पड़ती है। हम अपना माल हानि पर नहीं बेचना चाहते, क्योंकि इसको बनाने में हमें कठिन मेहनत करना होता है। जब हम लोग अपना माल नहीं बेच पाते तो मजबूर होकर व्यापारियों के हाथ हानि पर बेचना पड़ता है। इस प्रकार कठिन परिश्रम के बाद भी हमें अपने व्यापार से कुछ भी नहीं मिल पाता है। नरकट का कार्य :- नरकट एक प्रकार का जंगली पौधा है जो झांसी जनपद के अधिकांश क्षेत्रों में जंगलों या खेतों के चहारदिवारियों तथा ऊँची नीची भूमियों पर हुआ करता है। इसका प्रयोग बरतनों को रखने के लिए आधार बनाने और चारपायी के बांध या रस्सी बनाने के कान में लाया जाता है। हरिजन की एक विशेष जाति द्वारा इस कार्य को किया जाता है। यह कार्य विशेषकर महिलाओं द्वारा किया जाता है। पुरूषों द्वारा नरकट को खेतों तथा खुली जगहों से लाकर देने तथा इससे बने उत्पादों को बेचने के कार्य में मदद ली जाती है। इस कार्य में जहां कहीं से भी मिल जाता है, नरकट एकत्र करने का कार्य किया जाता है। महिलायें नरकअ से बरतन स्टैण्ड और अन्य सामान बनाती हैं और नकद या अनाज के बदले में बेचती हैं। नरकट प्रायः अक्टूबर से नवम्बर माह में प्राप्त होता है। महिलायें दो या तीन की समूह में अपने बच्चों तथा पुरूषों के साथ जाकर हसिया से नरकट काटने का कार्य करती हैं और प्रत्येक परिवार द्वारा अधिक से अधिक नरकट काटकर रख लिया जाता है, जिससे वर्ष भर उत्पादन का कार्य किया जा सके, क्योंकि नरकट एक विशेष समय पर ही प्राप्त होता है। इसलिए पूरे वर्ष के लिए नरकट का स्टाक रख लिया जाता है । नरकट का किसी परिवार द्वारा कितना स्टाक रखा जाता है, यह अपने गांव तथा आस-पास के क्षेत्रों में उसके द्वारा बने उत्पादों की मांग तथा परिवार में कितनी महिलायें इस कार्य को करती है। इस पर भी निर्भर हैं । नरकट को बण्डल में बांधकर रखा जाता है तथा एक सौ पचास से दो सौ पचास बण्डल तक एकत्र करके रखा जाता है। जहां पर इसकी मांग अधिक नहीं होती, जैसा कि बबीना विकास खण्ड में है, उन क्षेत्रों में पचास से साठ बण्डल तक एकत्र किये जाते हैं। नरकट को हंसिया से कटना एक कठिन कार्य और महिलायें अधिकतर घायल भी हो जाती हैं जंगलों में जाकर नरकट काटकर एकत्र करना भी एक कठिन कार्य है, उन्हें सात से दस किलोमीटर तक जाना पड़ता है, उन्हें जंगल में कांटों और झाड़ियों में घूमना पड़ता है, जिससे उन्हें चोट भी लग जाती है। कभी-कभी जिन किसानों के खेत के चारों और इस लगाया जाता है वे इसे काटने नहीं देते हैं। कभी-कभी उन्हें इसको काटने पर उन्हें मार खानी पड़ती है और उन्हें खेत से निकाल दिया जाता है। कुछ किसानों द्वारा इसे बेंच दिया जाता है। और उन्हें कुछ आय प्राप्त होती है। किसान सोचते हैं कि यह उनके लिए कच्चा माल है, जो उन्हें मुफ्त में क्यों दिया जाय इसलिए उन्हें कुछ कीमत प्राप्त करके दिया जाता है। महिलायें दो रूपये का एक बण्डल नरकट प्राप्त करती हैं। जब नरकट खरीदने से प्राप्त होता है तो उनके पास जितना पैसा होता है, उसी के अनुसार वे खरीददारी करती हैं। नरकट बेचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, पर अभी बड़ी मात्रा में नरकट खरीदने से ही नहीं प्राप्त होती है। महिलायें इसे अपने सिर पर लादकर घर पा लाती है। कभी-कभी पुरूषों द्वारा साइकिल का प्रयोग किया जाता है। जब नरकट की मात्रा अधिक होती है तो गाड़ी का प्रयोग किया जाता है। जब परिवार में पर्याप्त सदस्य नहीं होते हैं तो श्रमिक काम में लगाये जाते हैं और उन्हें पंद्रह बण्डल के लिए तीस रूपये प्रतिदिन दिया जाता है। महिलायें ज्वार और धान के पौधे भी इन्हें बांधने के लिए एकत्र करती हैं। नरकट को पहले तालाब, या पानी के गढ्ढे में एक माह के लिए डाल दिया जाता है, बाद में इसे पानी में डालकर मुलायम तथा चिकना बनाया जाता है। एक माह के बाद उसे पानी से निकालकर धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद उसे छाया में किसी खम्बे या खूंटी में टांग दिया जाता है। ऐसे गांव जहां पानी नहीं मिलता है, वहां पर इसे पानी में भिगोने की समस्या होती है । जब इसकी सहायता से बरतनों के रखने का स्टैण्ड बनाना होता है तो थोड़ी मात्रा में सूखे नरकटों का प्रयोग किया जाता है। इसे छीलकर और भी पतला करके पुनपाँच पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद उसे लकड़ी के हथौड़े से पीटा जाता है, जब तक कि यह मुलायम और लचीला नहीं हो जाता है और इसी से बिनकर बर्तनों के स्टैण्ड आदि बनाये जाते हैं। ज्वार व धान के पौधे के सूखे पुआल का प्रयोग इसके अन्दर डालकर ऊपर से नरकट से बुनायी की जाती है, जिससे बरतनों का स्वरूप बन जाता है। इसे गोले के आकार में बदला जाता है, इसके चारों और नरकट से गट्ठी देकर बिनाई का कार्य किया जाता है, कभी-कभी इसके बीच में कपड़े के टुकड़ों का प्रयोग पुआल और नरकट के बीच किया जाता है। धान का पुआल महिलाओं को उन किसानों से प्राप्त हो जाता है, जहां वे कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करती हैं तथा कपड़े के टुकड़े गांव की दजी के पास से प्राप्त हो जाते हैं। कहीं-कहीं वे कपड़े के टुकड़े या कतरन वजन में तौलकर पाँच रूपये किलो के हिसाब से प्राप्त करती हैं बनी हुई सामग्री गांव के घरों में बेची जाती है। वे दूसरे गांव में जाकर भी इसे बेचती हैं या नगर के किसी दुकानदार को इकट्ठा बेच दिया करती हैं। इस प्रकार बनी हुई टोकरी, बरतन स्टैण्ड आदि सामान पाँच पैसे से सात रुपयापये की बिकती है। कुछ गावों में इसे अनाज के बदले में बेचा जाता है। वर्ष भर लगातार इन सामानों को देने के लिए आधा मन अनाज दिया जाता है। पर ऐसे भी उदाहरण मिले हैं जहां एक से दो मन तक अनाज इसके लिए दिया जाता है। जिसके द्वारा परिवार में लगने वाले सभी सामनों की पूर्ति इनके द्वारा की जाती है। ये सामान अधिक दिनों तक नहीं चलते हैं । एक बण्डल नरकट से एक अच्छे कार्यकर्ता द्वारा दस से बारह इनडोनीच बना सकता है। कुछ महिलायें केवल उतने ही बण्डलों से उसका आधी संख्या में इन्डोनीच बना सकती है। इन्डोनीज के अतिरिक्त वे सुधीयास भी बनाती हैं। बड़े बरतनों की मांग बहुत अधिक होती है। पर बड़ी मांग के बर्तनों का निर्माण आदेशों के आधार पर किया जाता है, क्योंकि इनमें अधिक समय और अधिक कच्चे माल की आवश्यकता होती है। एक दिन में दो या तीन सुधीयास उसी नरकट के बण्डल से बनायी जा सकती है। इसी प्रकार एक बर्तन स्टैण्ड जिसे सीध कहते हैं। यह बर्तन के शक्ल का एक प्लेट होता है, जिसे बर्तन को बदलने में प्रयोग किया जाता है। इसे भी आदेश प्राप्त होने पर बनाया जाता है। एक सीका बनाने के लिए दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। सीका और सुधियास से इन्डोनीज की तुलना में अधिक दाम प्राप्त होता है। सुधियास लगभग दस रूपये की और सीका के लिए दस से पंद्रह रूपये प्राप्त हो जाते हैं। पर इन वस्तुओं की मांग बहुत कम होती है। एक माह में चार या पाचं सुधियास और दो सीका बनाया जाता है। जब इन्हें अनाज से बदला जाता है तो सुधियास के बदले दो से पांच सेर अनाज प्राप्त होता है। जब इसकी वार्षिक आधार पर आपूर्ति की जाती है तो इसके अन्तर्गत इन्डोनीज, सीका और सुधियास तीनों को शामिल किया जाता है। सामान्यतया आधा मन अनाज के बदले दस से पंद्रह इन्डोनीज दो सुधियास तथा दो सीका दिये जाते हैं। जब इन्डोनीज की बिक्री महिलाओं द्वारा अपने ही गांव में की जाती है तो परिवारों द्वारा इसकी आपूर्ति करने की सूचना समय-समय पर दी जाती है। जब महिलाओं को पैसे की या अनाज की आवश्यकता होती है तो वे गांव में घर-घर जाकर इन्डोनीज देने के लिए पूंछती हैं। जब इनहें अन्य गांवों में बेचा जाता है तो महिलायें दो या तीन टीम के समूह में घर-घर जाती हैं और इन्डोनीज बेचा करती हैं जब वे किसी दुकानदार को अपना माल दिया करती हैं तो उसे अधिक मात्रा में उसकी आपूर्ति करती हैं। दो या तीन दिनों में वे गांव के बाहर इन्डोनीज बेचने के लिए निकलती हैं। जहां पर इनकी आपूर्ति दुकानदारों को की जाती है, उन्हें पंद्रह दिनों में माल दिया जाता है। पर कभी-कभी इन लोगों के पास बस का किराया तक नहीं होता है, जब वे इसे दुकानदार के पास बेचने के लिए जाया करती है । जब इन्डोनीज बेचेन के लिए महिलायें दूर के गांवों के इन्डोनीज बेचने जाती हैं तो वे उस समय तक अपने गांव वापस नहीं आती हैं, जब तक उनका पूरा माल नहीं बिक जाता है। आवश्यकता पड़ने वे उस गावं में रात को भी रूक जाती हैं और अगले दिन उसे बेचने का प्रयास करती हैं। यही कारण यही कारण है कि वे बेचने के कार्य लिए अकेले न जाकर एक समूह में जाया करती हैं। जब इन सामानों बिक्री वार्षिक खाद्यान्न के आधार पर की जाती है तो इनके परिवार निर्धारित होते हैं। एक नरकट का कार्य करने वाले परिवार द्वारा बारह से पन्द्रह परिवारों को इसकी आपूर्ति की जाती है। यदि किसवी गांव में केवल दो या तीन परिवार इस कार्य को करने वाले होते हैं तो परिवारों को विभाजन बराबर संख्या के आधार पर होता है। इन परिवारों द्वारा अपने गांव से वस्तु की आपूर्ति द्वारा कितनी आय प्राप्त होगी यह उनके गांव वालों के साथ सम्बन्ध पर निर्भर है। यदि इनके सम्बन्ध गांव वालों से अच्छे नहीं होते तो गांव के अमीर लोग इन्डोनीज की खरीददारी या तो दूसरे गांव से या नगरों से करते हैं और गांव वालों से इसकी खरीददारी नहीं करते हैं । यह केवल बदले की भावनावश किया जाता है, जिससे इन श्रमिकों की स्थिति और भी खराब हो जाती है । नरकट के कार्य से बहुत अधिक आय नहीं प्राप्त होती है, परयह कुछ परिवारों के आय का साधन हैं इन्हें प्राप्त होने वाला अनाज एक प्रकार से भूख के प्रति सुरक्षा का कार्य करता है, भले ही वह वर्ष के कुछ महीनों के लिए पर्याप्त होता है। जब इन श्रमिकों को धनराशि या नकद प्राप्त होता है, तो वे अपना खाद्यान्न खरीदते हैं। वे अपने माल की आपूर्ति के बदले खाद्यान्न लेगें या नकद यह उनके परिवार में प्राप्त खाद्यान्न की मात्रा पर निर्भर है। सभी परिवारों द्वारा अपने परिवार की आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अन्य कार्य करते हैं, वे कृषि कार्य, मिट्टी खोदने तथा अन्य श्रम प्रधान कार्य करते हैं जो भी उन्हें समय-समय पर प्राप्त होता है। पर ये कार्य मौसमी होते हैं और वे वर्ष के कुछ ही दिनों के लिए प्राप्त होता है। वे नरकट का कार्य इसलिए करते हैं, क्योंकि अन्य जाति के लोग इसे करने को तैयार नहीं होते हैं। इसलिए वे अपनी आय को बढ़ाने के लिए कोई भी दूसरा कार्य करते हैं और जैसे ही दूसरा कार्य समाप्त हो जाता है वे नरकट के कार्य पर वापस आ जाते हैं। वे अपने परिवार के खाद्यान्नों की आवश्यकता को जानते हैं । उनका पहला उद्देश्य परिवार के लिए वर्ष भर के लिए पर्याप्त अनाज की प्राप्ति करना होता है। उन्हें नकद की भी आवश्यकता होती है और नकद के लिए अधिमान उस समय होता है, जब परिवार के लिए पर्याप्त अनाज एकत्र कर लिया जाता है। जब कभी उनके पास खाद्यान्न पर्याप्त होता है और उनके लिए नकद की आवश्यकता बहुत अधिक होती है तो वे नकद प्राप्त करने के लिए अनाज को बेंच देते हैं और नकद प्राप्त करके इसकी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। यह उन गांवों में होता है जहां उन्हें पर्याप्त मात्रा में अनाज प्राप्त होता है। उन्हें अनाज मिलता है, नकद नहीं। वे उधार भी लिया करते हैं जिसे वे बाद में वापस करे हैं। यह इसलिए आवश्यक होता है, कि वे अपना पूरा अनाज बेच नहीं सकते, क्योंकि भोजन की आवश्यकता होती है। यदि वे अनाज प्राप्त करते हैं तो अनाज को दुकानों पर बेचकर आवश्कयता की अन्य वस्तुएं खरीद ली जाती हैं । कुछ महिलायें नरकओं से रस्सियां भी बनाती हैं जो चारपाइयां बनने के काम आती हैं महिलायें रस्सियां बनाती हैं और पुरूष विभिन्न परिवारों में चारपायी के बुनाई का काम करने जाते हैं। एक चारपायी में दो या तीन बण्डल नरकट की आवश्यकता होती है। इस कार्य में उन्हें एक चारपायी की रस्सी के लिए बीस रूपये व बुनाई के कार्य के लिए भी पंद्रह से बीस रूपये प्राप्त होते हैं। पुरूषों द्वारा बुनाई का कार्य अन्य गांवों में भी किया जाता है। कभी-कभी चारपायी बिनने के बजाय केवल रस्सी ही बेच दी जाती है। महिलायें नरकट के कार्य के साथ घरेलू कार्य भी करती हैं। घरेलू कार्य समाप्त करने के बाद वे इस कार्य को करती हैं। वे पांच से छः घण्टे इस कार्य को करती हैं। बच्चों की देखरेख भी कार्य के साथ-साथ की जाती है } महिलायें इन्डोनीज बनाकर अपने दिन प्रतिदिन के व्ययों को पूरा करती हैं एक जब वे नरकट प्राप्त करने के लिए जंगलों में जाती हैं तो वे इस कार्य को नहीं करती हैं, बल्कि वे पहले से कुछ इन्डोनीज बनाकर रख देती हैं, जिसे बेंचकर वे कुछ अनाज या पैसे प्राप्त करती रहती हैं। मौसम के समय वे एक दिन उत्पादन का कार्य तथा एक दिन नरकट एकत्र करने का कार्य करती हैं वे इतने अधिक मात्रा में नरकट एकत्र करती हैं कि वह अगले मौसम तक चल बरसात के समय में नरकट को सूखे रखना एक समस्या होती है। सूखे महीनों में नरकट झोपड़ियों के छत पर रख दी जाती है पर बरसात में इसे पार के अन्दर रखा जाता है। यदि नरकट भीग जाती है तो वह बेकार हो जाती है ओर उस समय अन्य माल नहीं मिल पाती है। इन लोगों को अपना कच्चा माल सावधानी से बचाकर रखना होता है । यद्यपि इनकी झोपड़ियां छोटी होती हैं पर वे कच्चे माल को उसी में बचाकर रखना होता है । यद्यपि इनकी झोपड़ियां छोटी होती हैं पर वे कच्चे माल को उसी में बचाकर रखते हैं। महिलायें अपनी गरीबी के बारे में बहुत ही जागरूक हैं उनका कहना था कि इस कार्य को करते हुए हम लोगों का जीवन बीत जाता है, हम लोग हो गयी हैं पर कोई परिवर्तन नहीं आया है। हम लोगों के हाथ में खरोंच पड़ गयी हैं पर कोई सुधार व विकास नहीं हुआ है। हम लोगों के हाथ थक गये हैं, हमारा शरीर एक ही स्थिति में बैठे-बैठे दर्द करने लगता है, यदि हम लोग अपने हाथों की खरोंच को देखें तो अपना पेट कैसे भरें। यदि हम लोग दूसरा काम करने जाते हैं तो प्रत्येक दिन खाना हम लोगों को नहीं मिलेगा। जब हम कृषि में कार्य करते हैं तो कुछ पैसा हाथ में दिखायी पड़ता है। जब कभी हमें नकद की आवश्यकता होती है घर के अनाज को बेचना पड़ता है। अन्य पेशों की भांति इन श्रमिकों की कोई प्रतिनिधि संस्था कार्य नहीं कर रही है, जो इनके आर्थिक व सामाजिक हितों की रक्षा कर सके । चमड़े का कार्य :- यह एक जाति प्रथा पर आधारित पेशा है, जिसे चमार जाति के लोग करते हैं। हरिजन जाति में चमार एक उपजाति है। बर्तन उद्योग की भांति यह भी एक परम्परागत उद्योग है पर इसे कार्य के कुछ स्तरों में तकनीकी परिवर्तन आये हैं। यह एक पारिवारिक कार्य है, जिसमें महिलायें कार्यों में मदद करती हैं। इस कार्य में कुछ काम घर के अन्दर तथा कुछ घर के बाहर पूरा किए जाते हैं । जब गांव में कोई जानवर मर जाता है तो चमारों को सूचना दी जाती है। मरे हुए जानवर को पहले गांव के बाहर उठाकर ले जाया जाता है। चमार की बस्तियों में जो भी व्यक्ति उस समय खाली होता है, इस कार्य के लिए जाता है। यह एक अधिक परिश्रमी कार्य है, महिलायें भी इसमें सहायता करती हैं, जब पुरुषों की संख्या पर्याप्त नहीं होती है। अधिकांश गांवों में जानवर को खींचकर बाहर ले जाया जाता है। महिलायें तथा पुरूष दोनों ही जानवरों को खींचते-खींचते थक जाते हैं, कभी-कभी उन्हें कंधे पर लादकर ले जाया जाता है। कुछ गांवों में अब चमारों द्वारा एक गाड़ी का प्रयोग जानवरों को ले जाने के लिए किया जाता है, जिससे उनका कार्य हल्का हो जाता है। गांव के बाहर जानवर ले जाकर चाकू, और कैचियों से उसके खाल निकालने का कार्य किया जाता है। हड्डियों को काटने के लिए कुल्हाड़ी का प्रयोग किया जाता है। पुरूष तथा महिलायें दोनों मिलकर इस कार्य को करती हैं चमड़े को सावधानी के साथ निकाला जाता है, जिससे उसे नुकसान कर रख लिया जाता है। जानवर के चमड़ने निकालने का कार्य में दो या तीन घण्टे लग जाते हैं। इस कार्य के लिए चमारों द्वारा अपने यंत्रों और औजारों का प्रयोग किया जाता है। कुछ गांवों में किसानों द्वारा अपनी बैलगाड़ी जानवर को फेंकने के लिए दी जाती हैं और कहीं-कहीं चमारों को इसके लिए दस से पच्चीस रूपये तक किराया देना होता है। चमड़ा निकालने के बाद इसे महिलाओं को दे दिया जाता है, जो नमक लगाकर इसके काटने का कार्य करती हं । एक बड़े जानवर के चमड़े को साफ करने में लगभग दस किलो नमक लग जाता है। महिलायें यह नमक दुकानदार से खरीदकर इसका तुरन्त उपयोग करती हैं। नमक लगा हुआ चमड़े को सूखने के लिए अड़तालीस से साठ घण्टे तक लगते हैं नमक द्वारा चमड़े की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कीट नाशक होता है और यह चमड़े में नमी बनाये रखने में सहायक होता है। चमड़े को छाया में सुखाना अच्छा माना जाता है। इसके बाद इसे मोड़कर रखा जाता है। चमड़े की कीमत उसके सूखने के गुण पर निर्भर है। जिसका अर्थ है कि चमड़े में काले धब्बे नहीं होना चाहिए, जो सूरज की रोशनी में चमड़ा सूखाने के कारण या सम धरातल के न होने पर होता है। एक समान सूखने के लिए चमड़े को कुछ घण्टों के बाद उलटना होता हैं । जाड़े में चमड़ा गर्मियों की अपेक्षा अच्छी तरह सूखता है। बरसात में इसका सूखना कठिन कार्य है। महिलाओं द्वारा इसे अपने घरों के भीतर चमड़े के सूखाने का कार्य करती हैं, जिसके कारण उन्हें विभिन्न कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है । चमड़े के सूखने के बाद चमड़े के उत्पादन योग्य बनाने की प्रक्रिया में तकनीकी परिवर्तन हुए हैं। परम्परागत तरीके द्वारा चमड़े की सफाई, घस व पेड़ के छालों द्वारा की जाती है, जिसके अन्तर्गत प्रकृति प्रदत्त रसायन कुंआ करते हैं। इस तरीके में महिलाओं को बहुत से काम करने होते हैं, जैसे घास और पेड़ों की छाल को एकत्र करना, उन्हें महीने लग जाता है, फिर भी उद्योगों के रसायन द्वारा साफ किये गये चमड़े की तुलना में अधिक कड़ा तथा मोटा होता है। चर्म शोधन की आधुनिक तकनीकों के विकास तथा चर्म शोधन उद्योगों की स्थापना के परिणाम स्वरूप अब उद्योगों के रसायन द्वारा साफ किये गये चमडत्रे तुलना में अधिक कड़ा तथा मोटा होता हैं चर्म शोधन की आधुनिक तकनीकों के विकास तथा चर्म शोधन की आधुनिक तकनीकों के विकास तथा चर्म शोधन उद्योगों की स्थापना के परिणाम स्परूप अब उद्योगों तकनीकों के विकास तग चर्म शोधन उद्योगों की स्थापना के पिरणाम स्परूप अब उद्योगों द्वारा शोधित चमड़े का प्रयोग बढ़ रहा है। अब परम्परागत तरीके से चर्म शोधन के बजाय उद्योगों द्वारा शोधन का कार्य किया जाने लगा है। इसके अतिरिक्त चमारों के पूंजी में ह्मस हुआ है और उनके पास चर्म शोधन के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है। चर्म शोधन की पुरानी विधि धीरे-धीरे समाप्त हो रही है और चमार अधिक तर आंशिक रूप से सूखे चमड़े को बेच देते हैं। इस प्रकार सूखे हुए चमड़े खरीदने के छोटे व्यापारियों का उदय हुआ है और उन चमारों में से ही कुछ लोग इस कार्य को करने लगे हैं। वे गांव-गांव घूमकर इस प्रकार प्राप्त चमड़े की खरीददारी करते हैं। चमार इन व्यापारियों का इन्तजार चमड़ा बेचने के लिए करते हैं, क्योंक उनसे कुछ अधिक कीमत चमड़े की प्राप्त हो जाती है। यदि चमारों द्वारा इन व्यापारियें से ऋण प्राप्त किया गया होता है तो चमड़े की उन्हें कुछ कम मूल्य प्राप्त होता है। चमारों को रूपये की अधिक आवश्यकता होने पर वे अपने चमड़े को बेचने के लिए जाया करते हैं। यह मजदूरी में बिक्री की स्थिति होती है। व्यापारी इन चमड़े को शोधक कारखानों में बेचते हैं और इसका शोधन के पश्चात पुनः चमारों को इनकी वस्तुएं बनाने के लिए प्राप्त हो जाता है। कुछ केन्द्रों पर अभी भी पुराने तरीके से चमड़े का शोधन किया जाता है, फिर भी चमार शोधित चमडत्रे व्यापारियों से ही खरीदते हैं। व्यापारीगण आस-पास के गांवों में जाकर सूखे चमड़े खरीदने का कार्य करते हैं पुरानी तथा आधुनिक दोनों तरीकों से चमड़े के शोधन में पर्याप्त मात्रा में चमड़े की प्राप्ति का होना आवश्यक है और इसके लिए दोनों प्रकार के तरीकों से शोधन करने वाले अधिक मात्रा में सूखे चमड़े खरीदते हैं । पुराने तरीके के शोधन विधि में बहुत सी महिलायें इसकी प्रक्रिया से परिचित हैं और वे स्वयं चर्म शोधन का कार्य भी करती हैं आधनिक तरीके में यह पूर्णतया पुरुषों का ही कार्य हो गया है। महिलाओं को श्रमिक के रूप में लगाया जाता है, जो शोधन कार्य में पानी भरने का कार्य करती हैं। आधुनिक तरीके में उद्योगों से बने रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इसमें रसायनों का अनुपात तथा समय दोनों ही अलग-अलग होता है और महिलायें इन तरीकों से परिचित नहीं है। आधुनिक तरीके से शोधित चमड़े को तैयार होने में लगभग एक माह का समय लग जाता हैं यह पुरानी विधि से शोधित चमड़े की तुलना में अधिक मुलायम होता है पर यह कम टिकाऊ होता है। में विभिन्न गांवों में सूखे चमड़े अलग-अलग स्थानों पर बेचे जाते हैं एक गाय का चमड़ा पचहत्तर से एक सौ रूपये, भैंस का चमड़ा, एक सौ रूपये से एक सौ पच्चीस रूपये तथा बैल का चमड़ा पचहत्तर से एक सौ रूपये तथा बकरी का चमड़ा पचहत्तर से एक सौ रूपये का बिकता है। वर्तमान में इस पेशे से चमारों को यदा कदा आय प्राप्त होती है, जो आंशिक रूप से शोधित चमड़े की बिक्री का कार्य करते हैं, क्योंकि इन्हें आय केवल उस समय प्राप्त हो सकती है, जब गांव में कोई जानवर भरता है। इस घटना के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। यदि किसी गांव में एक या दो चमारों के परिवार होते हैं, उन्हें वर्ष में सात या आठ चमड़े प्राप्त हो जाते हैं। जब चमारों के परिवारों की संख्या अधिक होती है तो उन्हें एक या दो चमड़े वर्ष में प्राप्त हो जाते हैं। जब जानवरों में कोई महामारी फैलती है तो उन्हें अधिक चमड़े प्राप्त हो जाते हैं। यदि जानवरों की अच्छी देखभाल की जाती है, उन्हें अच्छे भूसे और भोजन दिया जाता है तो वे स्वस्थ रहते हैं तथा अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। ऐसी स्थिति में उकने कम चमड़े प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार ऐसे गांव जहां लोग कम मात्रा में जनवर पालते हैं, वहां भी चमड़े अधिक मात्रा में नहीं प्राप्त होते हैं। यह उन लोगों का एक नियमित पेशा बन जाता है जो चमड़े के शाधन का कार्य करते हैं, क्योंकि यह एक लगातार चलने वाला कार्य होता है, जो लोग आंशिक रूप से शोधन का कार्य करते हैं, वे अपनी जीविका केवल इसी कार्य से नहीं अर्जित कर सकते हैं, ऐसी स्थिति में उनका मुख्य पेशा कृषि श्रमिक या श्रम प्रधान कोई भी कार्य होता है और चमड़े का कार्य उनका मुख्य पेशा कृषि श्रमिक या श्रम प्रधान कोई भी कार्य कोई अन्य नहीं करता है। वे लोग जो चमड़े का शोध्न पूरी तरह करते हैं और उससे चमड़े का सामान भी बनाते हैं वे इस कार्य से अपनी जीविका अर्जित करने के लिए एक युक्तिसंगत आय प्राप्त करते हैं। जिन गांवों में एक या दो चमारों के परिवार होते हैं, उनके लिए परिवार के सदस्यों की सहायता से जानवरों की खाल उतारना अधिक कठिन होता है, उन्हें अन्य जातियों के लोगों की सहायता लेनी होती है, और उसके लिए उन्हें मेहनताना देना होता है। जानवरों की हड्डियां, खुर तथा पूंछ के बाल गांव के सभी परिवारों द्वारा वर्ष भर एकत्र किये जाते हैं और वर्ष में एक बार व्यापारियों के हाथ पचास से साठ रूपये के बीच दाम लेकर बेंच दिए जाते हैं। बहुत से चमार परिवार इस प्रकार प्राप्त रकम का प्रयोग खुद नहीं करते हैं, बल्कि वे अपने पुरोहितों को दे देते हैं जो इधर उधर घूमकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं और अन्य लोग इसे एक फण्ड के रूप में रखते हैं और अपने जाति के लोगों को उनके आवश्यकता के समय दे दिया करते हैं। चमारों में एक ऐसी परम्परा है कि अपने जाति के लोगों में चमड़े के कार्य से प्राप्त होने वाली आय के लिए सभी परिवारों को समान अवसर दिया जाता है। इसके लिए एक क्रम बना दिया जाता है, जिसे सभी परिवार मानते हैं, यह विभिन्न जानवरों के लिए बनाया जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक गांव में दस परिवार हैं तो वे सभी परिवार के बैल का चमड़ा प्राप्त करने के लिए अवसर दिया जाता है। इसी प्रकार अन्य जानवरों जैसे भैंसा, गाय, ऊँट आदि जानवरों के चमड़े प्राप्त करने के लिए सभी का क्रम लगा दिया जाता है। अतः छोटे बड़े सभी जानवरों के लिए उन जानवरों के मृत्यु के अनुसार क्रम बांध दिया जाता है। पर किसी परिवार को कब मौका प्राप्त होगा, इसकी भविष्यवाणी करना कठिन है। यह प्रणाली बहुत ही उपायेगी है तथा इसके अनुसार परिवारों के बीच काम का बंटवारा समान रूप से हो जाता है। यदि किसी गांव में बहुत अधिक परिवार होते हैं तो एक परिवार को वर्ष में दो वर्ष में चमड़ा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है। कुछ गांवों में यह प्रणाली नहीं है, बल्कि चमारों के परिवार गांव के निश्चित परिवारों के साथ जुड़े होते हैं। वास्तव में यह पेशा जजमानी व्यवस्था के आधार पर चलता रहा है। किसानों द्वारा चमारों को अनाज दिया जाता है, जिसके बदले में चमारों द्वारा किसानों को बैलों के लिए चमड़े की लगाम, उन्हें तथा उनके परिवार वालों को चप्पल तथा जूते दिये जाते हैं। मरे जानवरों को ले जाने के बदले में उन्हें कच्चा माल दे दिया जाता है तथा शोधन के पश्चात चमड़ा उसी किसान को अनाज के बदले में दे दिया जाता है और दूसरे लोगों को नकद प्राप्त करके बेच दिया जाता है। वर्तमान में पूरी व्यवस्था का व्यापारीकरण हो चुका है और किसानों द्वारा अब कोई भी अनाज चमारों को नहीं दिया जाता है, बल्कि किसान मरे जानवरों के बदले उनसे कुछ पैसे भी प्राप्त करते हैं। मऊरानीपुर तथा बंगरा विकास खण्डों के कुछ गांवों में अभी भी जजमानी प्रथा चालू है जहां पर चमारों द्वारा चमड़ा शोधन तथा उससे सामान बनाने का कार्य किया जाता है। चमड़े का पुराने या आधुनिक तरीके से शोधन करने के लिए सूखे चमड़े को कुण्ड में रसायन लगाकर रखा जाता है और उसे कुछ दिनों के बाद तीन कुण्ड में रखा जाता है, जिनमें अलग-अलग रसायन पड़े होते हैं। पुरानी विधि के अन्तर्गत चमड़े को प्रतयेक कुण्ड में एक माह तक तथा आधुनिक विधि के अन्तर्गत दस दिनों तक रखा जाता है। पुरानी विधि में एक घास, जिसे जवासी कहते हैं, बबूल की गोंद, फिटकिरी, हल्दी तथा रेण्डी का तेल मिलाया जाता है। आधुनिक विधि के अन्तर्गत मैग्नेशियम सल्फाइड, बबूल की गोंद, हरदी और रेण्डी का तेल मिलाया जाता है। जिन चमारों द्वारा चर्म शोधन का कार्य स्वयं किया जाता है उन्हें कुण्ड बनवाने के लिए जल की सुविधा और रासायनिक पदार्थ खरीदने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त अन्य चमारों से चमड़ा खरीदने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है, जिससे यह कार्य हमेशा चलता रहे। इसी कारण से चर्म शाधन का कार्य केवल कुछ लोगों के हाथ में केन्द्रित हो गया है। कुण्ड बनवाने तथा जल की सुविधा के विकास के लिए लगभग पांच हजार रूपये की आवश्यकता होती है। यदि नये कुएं का निर्माण करना होता है तो इस हजार रूपये लगते हैं। उन गांवों में जहां चर्म शोधन का कार्य किया जाता है, ये सुविधायें बहुत दिनों से प्राप्त हैं। उन्हें नये शिरे से निर्माण नहीं किया जाता है। शोधन के लिए चमड़ा खरीदने का विनियोग उसके कार्य के अनुसार अलग-अलग है । जो चर्म शोधन अपने गांव के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं वे वर्ष में यह कार्य दो बार करते हैं वे एक साथ आठ या दस चमड़े का शोधन एक बार करते हैं। यदि चर्म शोधन के सभी रसायन खरीदना होता है तो दस चमड़े के शोधन में एक हजार रूपये की रकम लगती है, जो लोग शोधन का कार्य लगातार करते हैं वे दो हजार से तीन हजार रूपये का विनियोजलन करते हैं। शोधित चमड़ा पचास रूपये या पचहत्तर रूप्ये किलो के हिसाब से बिकता है। एक भैसें या बैल के चमड़े का वजन बीस किलोग्राम के आस-पास होता है। एक बार चमड़े को बेचकर अगले उत्पादन के लिए उसी राशि का विनियोग किया जाता है।
केंद्र में मोदी सरकार को 8 साल पूरे हो गए हैं। जिस तरह की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली रही है, उससे उनके कामों की चर्चा हर समय होती रहती है। सरकार और उसके समर्थकों का दावा रहता है कि इन 8 सालों में हर क्षेत्र में देश ने प्रकृति की है। हालांकि विरोधी ऐसा नहीं मानते हैं। वो सरकार को कई मसलों पर घेरते हैं। यहां हम बात करेंगे कि आखिर इन 8 सालों में सरकार ने देश की सुरक्षा के मद्देनजर किस तरह कदम उठाए हैं। मोदी सरकार ने देश के सुरक्षा को लेकर कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे देश की तरफ आंख उठाने वालों को कड़ा संदेश गया है। 2016 में उरी हमले के बाद पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक की। इससे एक स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब आतंकियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई में पीछे नहीं रहेगा। जम्मू-कश्मीर में सेना को आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह से छूट दी गई। अनुच्छेद 370 को हटाने का फैसला किया। कश्मीर घाटी में पथराव की घटनाओं पर पूरी तरह से रोक लगाई गई। सरकार आतंकी घटनाओं और उनकी सहायता प्रणाली के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है। पूर्वी लद्दाख में चीन के द्वारा की गई घुसपैठ को लेकर मोदी सरकार को बार-बार सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता है, लेकिन भारतीय सेना द्वारा भी चीन को उसी की जुबान में जवाब दिया जा रहा है। भारत पूर्वी लद्दाख सेक्टर में वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ पैंगोंग झील और अन्य अग्रिम स्थानों के आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के लिए बहुत प्रयास कर रहा है। भारतीय बख्तरबंद रेजिमेंट भी लद्दाख सेक्टर में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। चीनी सेना द्वारा किसी भी दुस्साहस को रोकने के लिए लद्दाख सेक्टर में सैनिकों की संख्या भी काफी बढ़ा दी गई है। पूर्वोत्तर शांति सुनिश्चित करने पर भी मोदी सरकार का फोकस रहा है। 2021 में केंद्र ने कार्बी संगठनों के प्रतिनिधियों के एक समूह के साथ त्रिपक्षीय 'कार्बी आंगलोंग समझौते' पर हस्ताक्षर किए। कार्बी असम का एक प्रमुख जातीय समुदाय है। 2015 में सरकार द्वारा नागा विद्रोही समूह नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इसाक-मुइवा)-एनएससीएन (आईएम) के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पूर्वोत्तर में शांति सुनिश्चित करने में एक बड़ी सफलता हासिल हुई। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन के एक शीर्ष खुफिया अधिकारी ने हाल ही में कहा कि पाकिस्तान और चीन के खतरे के मद्देनजर देश की रक्षा के लिए भारत की मंशा जून 2022 तक एस-400 मिसाइल प्रणाली की तैनाती करने की है। भारत व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण में जुटा है जिसमें वायुसेना, थलसेना और नौसेना समेत रणनीतिक परमाणु बल शामिल हैं। भारत को पिछले वर्ष दिसंबर से रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली मिलने लगी है। भारत अपने हाइपरसोनिक, बैलेस्टिक, क्रूज प्रक्षेपास्त्रों का निर्माण कर रहा है और वह हवाई रक्षा मिसाइल क्षमताओं को विकसित कर रहा है, 2021 से लगातार अनेक परीक्षण कर रहा है। अंतरिक्ष में भारत के उपग्रहों की संख्या बढ़ रही है और वह अंतरिक्ष में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2019 के बाद से भारत के घरेलू रक्षा उद्योग को विस्तार देकर और विदेशी कंपनियों से रक्षा खरीद कम करने की नीति अपना कर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने को प्राथमिकता दी है। अमेरिका की रक्षा खुफिया एजेंसी के निदेशक लेंफ्टिनेंट जनरल स्कॉट बेरियर ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के बीच कभी कभार छोटी- मोटी झड़पें होती रहेंगी, लेकिन पाकिस्तान के आतंकवादियों द्वारा भारत में किसी बड़े आतंकवादी घटना को अंजाम देने की सूरत में भारत बड़ी सैन्य कार्रवाई कर सकता है।
केंद्र में मोदी सरकार को आठ साल पूरे हो गए हैं। जिस तरह की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली रही है, उससे उनके कामों की चर्चा हर समय होती रहती है। सरकार और उसके समर्थकों का दावा रहता है कि इन आठ सालों में हर क्षेत्र में देश ने प्रकृति की है। हालांकि विरोधी ऐसा नहीं मानते हैं। वो सरकार को कई मसलों पर घेरते हैं। यहां हम बात करेंगे कि आखिर इन आठ सालों में सरकार ने देश की सुरक्षा के मद्देनजर किस तरह कदम उठाए हैं। मोदी सरकार ने देश के सुरक्षा को लेकर कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे देश की तरफ आंख उठाने वालों को कड़ा संदेश गया है। दो हज़ार सोलह में उरी हमले के बाद पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक और दो हज़ार उन्नीस में पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक की। इससे एक स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब आतंकियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई में पीछे नहीं रहेगा। जम्मू-कश्मीर में सेना को आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह से छूट दी गई। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को हटाने का फैसला किया। कश्मीर घाटी में पथराव की घटनाओं पर पूरी तरह से रोक लगाई गई। सरकार आतंकी घटनाओं और उनकी सहायता प्रणाली के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है। पूर्वी लद्दाख में चीन के द्वारा की गई घुसपैठ को लेकर मोदी सरकार को बार-बार सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता है, लेकिन भारतीय सेना द्वारा भी चीन को उसी की जुबान में जवाब दिया जा रहा है। भारत पूर्वी लद्दाख सेक्टर में वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ पैंगोंग झील और अन्य अग्रिम स्थानों के आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के लिए बहुत प्रयास कर रहा है। भारतीय बख्तरबंद रेजिमेंट भी लद्दाख सेक्टर में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। चीनी सेना द्वारा किसी भी दुस्साहस को रोकने के लिए लद्दाख सेक्टर में सैनिकों की संख्या भी काफी बढ़ा दी गई है। पूर्वोत्तर शांति सुनिश्चित करने पर भी मोदी सरकार का फोकस रहा है। दो हज़ार इक्कीस में केंद्र ने कार्बी संगठनों के प्रतिनिधियों के एक समूह के साथ त्रिपक्षीय 'कार्बी आंगलोंग समझौते' पर हस्ताक्षर किए। कार्बी असम का एक प्रमुख जातीय समुदाय है। दो हज़ार पंद्रह में सरकार द्वारा नागा विद्रोही समूह नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड -एनएससीएन के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पूर्वोत्तर में शांति सुनिश्चित करने में एक बड़ी सफलता हासिल हुई। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन के एक शीर्ष खुफिया अधिकारी ने हाल ही में कहा कि पाकिस्तान और चीन के खतरे के मद्देनजर देश की रक्षा के लिए भारत की मंशा जून दो हज़ार बाईस तक एस-चार सौ मिसाइल प्रणाली की तैनाती करने की है। भारत व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण में जुटा है जिसमें वायुसेना, थलसेना और नौसेना समेत रणनीतिक परमाणु बल शामिल हैं। भारत को पिछले वर्ष दिसंबर से रूस से एस-चार सौ मिसाइल प्रणाली मिलने लगी है। भारत अपने हाइपरसोनिक, बैलेस्टिक, क्रूज प्रक्षेपास्त्रों का निर्माण कर रहा है और वह हवाई रक्षा मिसाइल क्षमताओं को विकसित कर रहा है, दो हज़ार इक्कीस से लगातार अनेक परीक्षण कर रहा है। अंतरिक्ष में भारत के उपग्रहों की संख्या बढ़ रही है और वह अंतरिक्ष में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष दो हज़ार उन्नीस के बाद से भारत के घरेलू रक्षा उद्योग को विस्तार देकर और विदेशी कंपनियों से रक्षा खरीद कम करने की नीति अपना कर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने को प्राथमिकता दी है। अमेरिका की रक्षा खुफिया एजेंसी के निदेशक लेंफ्टिनेंट जनरल स्कॉट बेरियर ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के बीच कभी कभार छोटी- मोटी झड़पें होती रहेंगी, लेकिन पाकिस्तान के आतंकवादियों द्वारा भारत में किसी बड़े आतंकवादी घटना को अंजाम देने की सूरत में भारत बड़ी सैन्य कार्रवाई कर सकता है।
Sidhi Collector ordered holiday in all schools till January 21 : सीधी। देश में कड़ाके की ठंड जारी है। हालांकि 20 जनवरी से इस ठंड में राहत मिलनी शुरू हो सकती है। एक पश्चिमी विक्षोभ के आज पश्चिमी हिमालय तक पहुंचने की संभावना है। वहीं एक अन्य पश्चिमी विक्षोभ 20 जनवरी को पश्चिमी हिमालय पहुंचेगा। जिसका असर मध्यप्रदेश सहित कई प्रदेशों में देखने को मिलेगा। इन दोनों पश्चिमी विक्षोभों के आने से मौसम का तापमान बढ़ना शुरू हो जाएगा, जिससे लोगों को गलन वाली ठंड से काफी राहत मिलेगी। Sidhi Collector ordered holiday in all schools till January 21 : इस शीतलहर के प्रकोप को देखते हुए एक बार फिर से स्कूलों में अवकाश को बढ़ा दिया गया है। इसके लिए कलेक्टर ने आदेश जारी कर दिए हैं। 21 जनवरी तक स्कूलों को बंद रखा जाएगा। मध्य प्रदेश के सीधी जिले में शीतलहर को देखते हुए कलेक्टर द्वारा 19 से 21 जनवरी तक प्राथमिक स्कूलों में छुट्टियों की घोषणा कर दी गई है। तापमान कम होने से छोटे बच्चों में ठंड का प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में 21 जनवरी तक छोटे बच्चों के सभी स्कूलों को बंद रखा जाएगा। read more : श्रेय की खींचतान. . धान पर फिर घमासान! क्या रिकॉर्ड धान खरीदी पर श्रेय लेने की राजनीति हो रही है? Sidhi Collector ordered holiday in all schools till January 21 : कलेक्टर द्वारा जारी आदेश के तहत नर्सरी से पांचवीं तक के स्कूलों में अवकाश घोषित किया गया है। यह अवकाश शासकीय, निजी, सीबीएसई स्कूलों में प्रभावी होगा। बता दें कि जिले में तापमान में लगातार गिरावट देखी जा रही है। जिले में 5 डिग्री तक तापमान पहुंचने से ठंड का प्रभाव बढ़ गया है। इस कारण से कलेक्टर द्वारा आदेश जारी किए गए हैं।
Sidhi Collector ordered holiday in all schools till January इक्कीस : सीधी। देश में कड़ाके की ठंड जारी है। हालांकि बीस जनवरी से इस ठंड में राहत मिलनी शुरू हो सकती है। एक पश्चिमी विक्षोभ के आज पश्चिमी हिमालय तक पहुंचने की संभावना है। वहीं एक अन्य पश्चिमी विक्षोभ बीस जनवरी को पश्चिमी हिमालय पहुंचेगा। जिसका असर मध्यप्रदेश सहित कई प्रदेशों में देखने को मिलेगा। इन दोनों पश्चिमी विक्षोभों के आने से मौसम का तापमान बढ़ना शुरू हो जाएगा, जिससे लोगों को गलन वाली ठंड से काफी राहत मिलेगी। Sidhi Collector ordered holiday in all schools till January इक्कीस : इस शीतलहर के प्रकोप को देखते हुए एक बार फिर से स्कूलों में अवकाश को बढ़ा दिया गया है। इसके लिए कलेक्टर ने आदेश जारी कर दिए हैं। इक्कीस जनवरी तक स्कूलों को बंद रखा जाएगा। मध्य प्रदेश के सीधी जिले में शीतलहर को देखते हुए कलेक्टर द्वारा उन्नीस से इक्कीस जनवरी तक प्राथमिक स्कूलों में छुट्टियों की घोषणा कर दी गई है। तापमान कम होने से छोटे बच्चों में ठंड का प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में इक्कीस जनवरी तक छोटे बच्चों के सभी स्कूलों को बंद रखा जाएगा। read more : श्रेय की खींचतान. . धान पर फिर घमासान! क्या रिकॉर्ड धान खरीदी पर श्रेय लेने की राजनीति हो रही है? Sidhi Collector ordered holiday in all schools till January इक्कीस : कलेक्टर द्वारा जारी आदेश के तहत नर्सरी से पांचवीं तक के स्कूलों में अवकाश घोषित किया गया है। यह अवकाश शासकीय, निजी, सीबीएसई स्कूलों में प्रभावी होगा। बता दें कि जिले में तापमान में लगातार गिरावट देखी जा रही है। जिले में पाँच डिग्री तक तापमान पहुंचने से ठंड का प्रभाव बढ़ गया है। इस कारण से कलेक्टर द्वारा आदेश जारी किए गए हैं।
उच्चतम न्यायालय गुजरात के पूर्व पुलिस प्रमुख (डीजीपी) आरबी श्रीकुमार, केरल के दो पूर्व पुलिस अधिकारियों - एस विजयन और थम्पी एस दुर्गा दत्त तथा सेवानिवृत्त खुफिया अधिकारी पी एस जयप्रकाश को जमानत देने के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की अपील पर सुनवाई कर रहा था। न्यायमूर्ति एम आर शाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "हम जो प्रस्ताव कर रहे हैं वह यह है. . . हम उच्च न्यायालय से कहेंगे कि किसी भी तरह की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना अग्रिम जमानत याचिकाओं पर नए सिरे से विचार करे। " श्रीकुमार उस समय खुफिया ब्यूरो के उप निदेशक थे। पीठ में न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार भी शामिल हैं। पीठ ने कहा कि इस बीच उन्हें गिरफ्तारी से मिली सुरक्षा जारी रहेगी। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कुछ गलतियां की हैं और उसने आरोपी द्वारा लगाए गए व्यक्तिगत आरोपों पर विचार नहीं किया। सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने तर्क दिया कि मामला गंभीर है और यह किसी "निजी अपराध" से संबंधित नहीं है बल्कि "राष्ट्र के खिलाफ अपराध" है और उच्च न्यायालय को आरोपियों को अग्रिम जमानत नहीं देना चाहिए था। तत्कालीन आईबी अधिकारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उच्च न्यायालय के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि प्राथमिकी में उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं था और जांच के लिए उनकी हिरासत मांगने का कोई आधार नहीं है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीबीआई की याचिका पर पिछले साल नवंबर में नोटिस जारी किया था।
उच्चतम न्यायालय गुजरात के पूर्व पुलिस प्रमुख आरबी श्रीकुमार, केरल के दो पूर्व पुलिस अधिकारियों - एस विजयन और थम्पी एस दुर्गा दत्त तथा सेवानिवृत्त खुफिया अधिकारी पी एस जयप्रकाश को जमानत देने के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की अपील पर सुनवाई कर रहा था। न्यायमूर्ति एम आर शाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "हम जो प्रस्ताव कर रहे हैं वह यह है. . . हम उच्च न्यायालय से कहेंगे कि किसी भी तरह की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना अग्रिम जमानत याचिकाओं पर नए सिरे से विचार करे। " श्रीकुमार उस समय खुफिया ब्यूरो के उप निदेशक थे। पीठ में न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार भी शामिल हैं। पीठ ने कहा कि इस बीच उन्हें गिरफ्तारी से मिली सुरक्षा जारी रहेगी। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कुछ गलतियां की हैं और उसने आरोपी द्वारा लगाए गए व्यक्तिगत आरोपों पर विचार नहीं किया। सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने तर्क दिया कि मामला गंभीर है और यह किसी "निजी अपराध" से संबंधित नहीं है बल्कि "राष्ट्र के खिलाफ अपराध" है और उच्च न्यायालय को आरोपियों को अग्रिम जमानत नहीं देना चाहिए था। तत्कालीन आईबी अधिकारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उच्च न्यायालय के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि प्राथमिकी में उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं था और जांच के लिए उनकी हिरासत मांगने का कोई आधार नहीं है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीबीआई की याचिका पर पिछले साल नवंबर में नोटिस जारी किया था।
लखनऊ : जिला एवं सत्र न्यायालय लखनऊ के प्रशासनिक जज जस्टिस एस एन शुक्ला ने शुक्रवार को अधिवक्ता कल्याण समिति के तत्वाधान आयेाजित एक कार्यक्रम में हाईकोर्ट की पुरानी बिल्डिंग जिला एवं सत्र अदालत को सौंपने के मसले पर कहा कि बहुत जल्द यह हो जाएगा। हालाकि जस्टिस शुक्ला ने किसी तारीख का ऐलान नहीं किया लेकिन समारोह में बैंठे वकीलों में इसे लेकर बेहद उत्सुकता थी। कार्यक्रम में दिवंगत अधिवक्ताओं के बच्चों को आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जस्टिस शुक्ला ने दिवंगत अधिवक्ताओं के छः बच्चों को चेक सौंपा व उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। जस्टिस शुक्ला ने इस मौके पर कहा कि यह बहुत ही पवित्र कार्य है। इस कार्य में वकीलों की दूसरी संस्थाओं को भी मदद के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने इस मौके पर सेंट्रल बार एसोसिएशन की उस मांग को मंजूरी दे दी, जिसके तहत अब वकालतनामे पर सेंट्रल बार का 100 रुपए का कूपन लगाया जाएगा। इस कूपन से जो भी धनराशि प्राप्त होगी, उससे दिवंगत वकीलों के परिवार को आर्थिक मदद दी जाएगी। सेंट्रल बार एसोसिएशन के राजेंद्र प्रसाद सभागार में आयोजित इस समारोह में जिला जज रामकृष्ण उपाध्याय व सीजेएम सन्ध्या श्रीवास्तव विशिष्ट अतिथि के रुप में मौजूद थे। इनके अलावा एडीजे उमाशंकर शर्मा, अविनाश सक्सेना, हरीश त्रिपाठी, अशोकेश्वर रवि, हरेंद्र बहादुर सिंह, सुनील कुमार यादव, डाॅ. लक्ष्मीकांत राठौर, अनिल कुमार शुक्ला, दिनेश सिंह व एसीजेएम आजाद सिंह, निर्भय प्रकाश, ज्ञान प्रकाश तिवारी के साथ ही बड़ी संख्या में वकील मौजूद थे। अधिवक्ता कल्याण समिति के अध्यक्ष उमेश तिवारी के मुताबिक आर्थिक सहयोग प्राप्त करने वालो छात्र-छात्राओं में वंशिका श्रीवास्तव, रिषभ श्रीवास्तव, गर्व शुक्ला, आदित्य सिंह, सिद्धांत शुक्ला व रितिका शुक्ला रहे। इससे पहले सेंट्रल बार एसोसिएशन की तरफ से सभी अतिथियांे को अंगवस्त्र व प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
लखनऊ : जिला एवं सत्र न्यायालय लखनऊ के प्रशासनिक जज जस्टिस एस एन शुक्ला ने शुक्रवार को अधिवक्ता कल्याण समिति के तत्वाधान आयेाजित एक कार्यक्रम में हाईकोर्ट की पुरानी बिल्डिंग जिला एवं सत्र अदालत को सौंपने के मसले पर कहा कि बहुत जल्द यह हो जाएगा। हालाकि जस्टिस शुक्ला ने किसी तारीख का ऐलान नहीं किया लेकिन समारोह में बैंठे वकीलों में इसे लेकर बेहद उत्सुकता थी। कार्यक्रम में दिवंगत अधिवक्ताओं के बच्चों को आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जस्टिस शुक्ला ने दिवंगत अधिवक्ताओं के छः बच्चों को चेक सौंपा व उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। जस्टिस शुक्ला ने इस मौके पर कहा कि यह बहुत ही पवित्र कार्य है। इस कार्य में वकीलों की दूसरी संस्थाओं को भी मदद के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने इस मौके पर सेंट्रल बार एसोसिएशन की उस मांग को मंजूरी दे दी, जिसके तहत अब वकालतनामे पर सेंट्रल बार का एक सौ रुपयापए का कूपन लगाया जाएगा। इस कूपन से जो भी धनराशि प्राप्त होगी, उससे दिवंगत वकीलों के परिवार को आर्थिक मदद दी जाएगी। सेंट्रल बार एसोसिएशन के राजेंद्र प्रसाद सभागार में आयोजित इस समारोह में जिला जज रामकृष्ण उपाध्याय व सीजेएम सन्ध्या श्रीवास्तव विशिष्ट अतिथि के रुप में मौजूद थे। इनके अलावा एडीजे उमाशंकर शर्मा, अविनाश सक्सेना, हरीश त्रिपाठी, अशोकेश्वर रवि, हरेंद्र बहादुर सिंह, सुनील कुमार यादव, डाॅ. लक्ष्मीकांत राठौर, अनिल कुमार शुक्ला, दिनेश सिंह व एसीजेएम आजाद सिंह, निर्भय प्रकाश, ज्ञान प्रकाश तिवारी के साथ ही बड़ी संख्या में वकील मौजूद थे। अधिवक्ता कल्याण समिति के अध्यक्ष उमेश तिवारी के मुताबिक आर्थिक सहयोग प्राप्त करने वालो छात्र-छात्राओं में वंशिका श्रीवास्तव, रिषभ श्रीवास्तव, गर्व शुक्ला, आदित्य सिंह, सिद्धांत शुक्ला व रितिका शुक्ला रहे। इससे पहले सेंट्रल बार एसोसिएशन की तरफ से सभी अतिथियांे को अंगवस्त्र व प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी पिछले काफी समय से अपनी निजी जिंदगी में चल रही उथल-पुछल के चलते सुर्खियों में बने हुए हैं। अभिनेता का अपनी पूर्व पत्नी आलिया के साथ विवाद किसी से छिपा नहीं है और इस सबके बीच उनकी अपने भाई शमास सिद्दीकी के साथ भी अनबन चल रही है। बीते दिनों शमास ने उन्हें अपनी बीमार मां से नहीं मिलने दिया था तो अब उनपर घर में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ मारपीट का आरोप लगाया है। शमास ने ट्विटर पर एक कॉल रिकॉर्डिंग साझा करके नवाज के अपने कर्मचारियों के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा, 'ये वीडियो होली के गिफ्ट के तौर पर मिला है। रूटीन के मुताबिक नवाजुद्दीन अपने स्टाफ को पीटते रहते हैं। उनका मैनेजर बता रहा है कि उन्होंने एक लड़के को दूसरी बार मारा है। यह एयरपोर्ट और ऑफिस में भी पीट चुका है। इसका वीडियो भी जारी किया जाएगा। महान व्यक्ति। ' इससे पहले ई टाइम्स के साथ बातचीत में भी शमास ने नवाज के खिलाफ बयान दिया था। शमास ने कहा था, "वो हमारा ख्याल रखते हैं, लेकिन किसी भाई के करियर को नहीं बनाया है। वह हमारे लिए संपत्तियां खरीदते हैं, लेकिन उनकी छवि वैसी नहीं है। वह लोगों को छोड़ देते हैं, आलिया और मैं इसके उदाहरण हैं। " इसके अलावा शमास ने अभिनेता पर उनकी फिल्म 'बोले चूड़ियां' के लिए उन्हें सपोर्ट नहीं करने का आरोप भी लगाया है। बीते दिन नवाज ने आलिया के घर से निकालने सहित सभी आरोपों पर चुप्पी तोड़ी थी। अभिनेता ने पोस्ट साझा कर कहा था कि 45 दिन से उनके बच्चों को बंधक बना रखा है और वह दुबई स्थित अपने स्कूल में नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आलिया पहले भी पैसों के लिए केस कर चुकी हैं और अभी भी ऐसा ही कर रही हैं। अभिनेता ने यह भी कहा कि वह अपने बच्चों की खातिर ही चुप थे। दरअसल, नवाज की मां ने जनवरी में आलिया के खिलाफ घर में जबरदस्ती घुसने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद आलिया ने घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना का मालमा दर्ज करा दिया। साथ ही आलिया और नवाज के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर भी विवाद चल रहा है। अब आलिया के बच्चों के साथ घर से बाहर निकाले जाने के आरोप का वीडियो इंस्टाग्राम पर साझा करने के बाद से दोनों के बीच का विवाद बढ़ गया है।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी पिछले काफी समय से अपनी निजी जिंदगी में चल रही उथल-पुछल के चलते सुर्खियों में बने हुए हैं। अभिनेता का अपनी पूर्व पत्नी आलिया के साथ विवाद किसी से छिपा नहीं है और इस सबके बीच उनकी अपने भाई शमास सिद्दीकी के साथ भी अनबन चल रही है। बीते दिनों शमास ने उन्हें अपनी बीमार मां से नहीं मिलने दिया था तो अब उनपर घर में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ मारपीट का आरोप लगाया है। शमास ने ट्विटर पर एक कॉल रिकॉर्डिंग साझा करके नवाज के अपने कर्मचारियों के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा, 'ये वीडियो होली के गिफ्ट के तौर पर मिला है। रूटीन के मुताबिक नवाजुद्दीन अपने स्टाफ को पीटते रहते हैं। उनका मैनेजर बता रहा है कि उन्होंने एक लड़के को दूसरी बार मारा है। यह एयरपोर्ट और ऑफिस में भी पीट चुका है। इसका वीडियो भी जारी किया जाएगा। महान व्यक्ति। ' इससे पहले ई टाइम्स के साथ बातचीत में भी शमास ने नवाज के खिलाफ बयान दिया था। शमास ने कहा था, "वो हमारा ख्याल रखते हैं, लेकिन किसी भाई के करियर को नहीं बनाया है। वह हमारे लिए संपत्तियां खरीदते हैं, लेकिन उनकी छवि वैसी नहीं है। वह लोगों को छोड़ देते हैं, आलिया और मैं इसके उदाहरण हैं। " इसके अलावा शमास ने अभिनेता पर उनकी फिल्म 'बोले चूड़ियां' के लिए उन्हें सपोर्ट नहीं करने का आरोप भी लगाया है। बीते दिन नवाज ने आलिया के घर से निकालने सहित सभी आरोपों पर चुप्पी तोड़ी थी। अभिनेता ने पोस्ट साझा कर कहा था कि पैंतालीस दिन से उनके बच्चों को बंधक बना रखा है और वह दुबई स्थित अपने स्कूल में नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आलिया पहले भी पैसों के लिए केस कर चुकी हैं और अभी भी ऐसा ही कर रही हैं। अभिनेता ने यह भी कहा कि वह अपने बच्चों की खातिर ही चुप थे। दरअसल, नवाज की मां ने जनवरी में आलिया के खिलाफ घर में जबरदस्ती घुसने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद आलिया ने घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना का मालमा दर्ज करा दिया। साथ ही आलिया और नवाज के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर भी विवाद चल रहा है। अब आलिया के बच्चों के साथ घर से बाहर निकाले जाने के आरोप का वीडियो इंस्टाग्राम पर साझा करने के बाद से दोनों के बीच का विवाद बढ़ गया है।
19 वींशताब्दी की तुलना में 20वीं शताब्दी में होने वाले किसान आंदोलनों की विशेषताओं और सामाजिक प्रभाव में एक प्रकार का मूलभूत परिवर्तन/पैराडाइम शिफ्ट देखने को मिलता है उदाहरण सहित समझाए। (250 शब्द) - किसान आंदोलनों के कारणों के लिये उत्तरदायी परिस्थितियों के बारे में बताएँ। - 19वीं शताब्दी के किसान आंदोलनों की विशेषताओं का वर्णन कीजिये। - 20वीं शताब्दी के किसान आंदोलनों की प्रकृति के विरोधाभास को दर्शाए। - उचित निष्कर्ष दीजिये। - 19वीं शताब्दी के दौरान भारत में ब्रिटिश साम्राज्य शोषणकारी आर्थिक और भूमि राजस्व नीतियों के माध्यम से अपने शासन को मज़बूत करने का प्रयास कर रहा था। - भारतीय कृषक समाज ब्रिटिश शासन से सर्वाधिक पीड़ित थे। हालांँकि, किसानों द्वारा शोषण का विरोध किया गया तथा नीतियों के खिलाफ सामूहिक विरोध और आंदोलनों का आयोजन किया गया। - तात्कालिक उद्देश्यः किसानों की अधीनता या शोषण व्यवस्था को समाप्त करना इन आंदोलनों का उद्देश्य नहीं था बल्कि इनकी मांँग पूरी तरह से आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित थी। - उपनिवेशवाद के प्रति समझ का अभावः किसानों के संघर्षों को विशिष्ट और सीमित उद्देश्यों एवं विशेष शिकायतों के निवारण के लिये निर्देशित किया गया। आंदोलनकारियों द्वारा विदेशी बागान, स्वदेशी ज़मींदारों और साहूकारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शित किया गया। उपनिवेशवाद इन आंदोलनों के लक्ष्य में निहित नहीं था। - नेतृत्वः नील विद्रोह (1859-60), 1860 के दशक में पबना कृषक लीग तथा 1870 के दशक में डेक्कन कृषक विद्रोह द्वारा किसान आंदोलनों में मुख्य भूमिका निभाई गई। - इनकी प्रादेशिक पहुंँच एक विशेष स्थानीय क्षेत्र तक ही सीमित थी। - संगठनः इन आंदोलनों के नेतृत्व के लिये कोई औपचारिक संगठन नहीं था जिस कारण ये आंदोलन छोटी अवधि के लिये ही हुए। संगठन के अभाव के चलते आंदोलनों ने दीर्घकालिक रणनीति और कार्यान्वयन को बाधित किया। - विचारधाराः अग्रगामी विचारधारा सामाजिक आंदोलनों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती है, हालांँकि किसान आंदोलन के इस चरण में भविष्य के बारे में किसी भी सुसंगत वैकल्पिक वैचारिक ढाँचे का अभाव था तथा ये आंदोलन शोषित किसान की सहज प्रतिक्रिया का परिणाम थे। - भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक भाग के रूप में किसान आंदोलनः भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में उपनिवेशवाद के खिलाफ व्यापक संघर्ष में महात्मा गांधी की उपस्थिति के साथ किसानों के चंपारण, खेड़ा और बाद में बारदोली आंदोलनों ने कृषकों के मध्य उपनिवेशवाद विरोधी चेतना जागृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। - वर्ग चेतना संगठनों का उद्भवः कॉन्ग्रेस द्वारा ज़मींदार एवं ज़मींदारों के हितों की रक्षा करने की नीति के कारण ग्रामीण भारत में स्वतंत्र किसान वर्ग संगठनों का उदय हुआ। किसान आंदोलनों के कट्टरपंथी तबके द्वारा महसूस किया कि कॉन्ग्रेस पूंजीपतियों की ज़मीन-जायदाद व उनके हितों के प्रति अधिक संवेदनशील है। वर्ष 1935 में लखनऊ में आयोजित पहली किसान कॉन्ग्रेस द्वारा अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किया गया। - सांप्रदायिक राजनीति का प्रभावः मोपला विद्रोह को मुस्लिम जोतदारों/पट्टेदारों द्वारा सरकार एवं ज़मींदारों के विरुद्ध शुरू किया गया, हालांँकि बाद में इस विद्रोह ने सांप्रदायिक रूप ग्रहण कर लिया। विद्रोह के सांप्रदायिकरण ने खिलाफत-असहयोग आंदोलन में मोपलाओं के मध्य चले आ रहे अलगाव को दूर करने का कार्य किया। - अखिल भारतीय आंदोलनः कॉन्ग्रेस के प्रांतीय शासन के दौरान वर्ष 1937-39 के मध्य की अवधि किसान आंदोलनों की गतिविधियों का उच्चतम स्तर था। किसान सम्मेलनों और बैठकों के माध्यम से किसानों को एकत्रित किया जाता था तथा उनकी मांँगों को पारित कर प्रसारित किया जाता था।साथ ही किसानों को गांँवों के स्तर पर एकजुट करने का कार्य किया गया। नेतृत्वः इस अवधि के दौरान किसान आंदोलनों का नेतृत्व कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा किया गया। तेलंगाना आंदोलन कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले गुरिल्लाओं द्वारा आयोजित किया गया। इसी प्रकार तेभागा आंदोलन का नेतृत्व बंगाल प्रांतीय किसान सभा द्वारा किया गया। - ब्रिटिश शासन के दौरान किसान आंदोलनों की प्रकृति में ब्रिटिश राज के पहले चरण एवं 20वीं शताब्दी में किसान आंदोलनों के मध्य हड़तालों के स्तर पर भिन्नता विद्यमान थी। - औपनिवेशिक उद्देश्यों की पूर्ति को लेकर बढ़ती जागरूकता, जन-आधारित राजनीतिक संगठन और मार्क्सवादी-कम्युनिस्ट विचारों के रूप में कॉन्ग्रेस के उद्भव के कारण इन मतभेदों का उत्पन्न होना स्वाभाविक था।
उन्नीस वींशताब्दी की तुलना में बीसवीं शताब्दी में होने वाले किसान आंदोलनों की विशेषताओं और सामाजिक प्रभाव में एक प्रकार का मूलभूत परिवर्तन/पैराडाइम शिफ्ट देखने को मिलता है उदाहरण सहित समझाए। - किसान आंदोलनों के कारणों के लिये उत्तरदायी परिस्थितियों के बारे में बताएँ। - उन्नीसवीं शताब्दी के किसान आंदोलनों की विशेषताओं का वर्णन कीजिये। - बीसवीं शताब्दी के किसान आंदोलनों की प्रकृति के विरोधाभास को दर्शाए। - उचित निष्कर्ष दीजिये। - उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान भारत में ब्रिटिश साम्राज्य शोषणकारी आर्थिक और भूमि राजस्व नीतियों के माध्यम से अपने शासन को मज़बूत करने का प्रयास कर रहा था। - भारतीय कृषक समाज ब्रिटिश शासन से सर्वाधिक पीड़ित थे। हालांँकि, किसानों द्वारा शोषण का विरोध किया गया तथा नीतियों के खिलाफ सामूहिक विरोध और आंदोलनों का आयोजन किया गया। - तात्कालिक उद्देश्यः किसानों की अधीनता या शोषण व्यवस्था को समाप्त करना इन आंदोलनों का उद्देश्य नहीं था बल्कि इनकी मांँग पूरी तरह से आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित थी। - उपनिवेशवाद के प्रति समझ का अभावः किसानों के संघर्षों को विशिष्ट और सीमित उद्देश्यों एवं विशेष शिकायतों के निवारण के लिये निर्देशित किया गया। आंदोलनकारियों द्वारा विदेशी बागान, स्वदेशी ज़मींदारों और साहूकारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शित किया गया। उपनिवेशवाद इन आंदोलनों के लक्ष्य में निहित नहीं था। - नेतृत्वः नील विद्रोह , एक हज़ार आठ सौ साठ के दशक में पबना कृषक लीग तथा एक हज़ार आठ सौ सत्तर के दशक में डेक्कन कृषक विद्रोह द्वारा किसान आंदोलनों में मुख्य भूमिका निभाई गई। - इनकी प्रादेशिक पहुंँच एक विशेष स्थानीय क्षेत्र तक ही सीमित थी। - संगठनः इन आंदोलनों के नेतृत्व के लिये कोई औपचारिक संगठन नहीं था जिस कारण ये आंदोलन छोटी अवधि के लिये ही हुए। संगठन के अभाव के चलते आंदोलनों ने दीर्घकालिक रणनीति और कार्यान्वयन को बाधित किया। - विचारधाराः अग्रगामी विचारधारा सामाजिक आंदोलनों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती है, हालांँकि किसान आंदोलन के इस चरण में भविष्य के बारे में किसी भी सुसंगत वैकल्पिक वैचारिक ढाँचे का अभाव था तथा ये आंदोलन शोषित किसान की सहज प्रतिक्रिया का परिणाम थे। - भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक भाग के रूप में किसान आंदोलनः भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में उपनिवेशवाद के खिलाफ व्यापक संघर्ष में महात्मा गांधी की उपस्थिति के साथ किसानों के चंपारण, खेड़ा और बाद में बारदोली आंदोलनों ने कृषकों के मध्य उपनिवेशवाद विरोधी चेतना जागृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। - वर्ग चेतना संगठनों का उद्भवः कॉन्ग्रेस द्वारा ज़मींदार एवं ज़मींदारों के हितों की रक्षा करने की नीति के कारण ग्रामीण भारत में स्वतंत्र किसान वर्ग संगठनों का उदय हुआ। किसान आंदोलनों के कट्टरपंथी तबके द्वारा महसूस किया कि कॉन्ग्रेस पूंजीपतियों की ज़मीन-जायदाद व उनके हितों के प्रति अधिक संवेदनशील है। वर्ष एक हज़ार नौ सौ पैंतीस में लखनऊ में आयोजित पहली किसान कॉन्ग्रेस द्वारा अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किया गया। - सांप्रदायिक राजनीति का प्रभावः मोपला विद्रोह को मुस्लिम जोतदारों/पट्टेदारों द्वारा सरकार एवं ज़मींदारों के विरुद्ध शुरू किया गया, हालांँकि बाद में इस विद्रोह ने सांप्रदायिक रूप ग्रहण कर लिया। विद्रोह के सांप्रदायिकरण ने खिलाफत-असहयोग आंदोलन में मोपलाओं के मध्य चले आ रहे अलगाव को दूर करने का कार्य किया। - अखिल भारतीय आंदोलनः कॉन्ग्रेस के प्रांतीय शासन के दौरान वर्ष एक हज़ार नौ सौ सैंतीस-उनतालीस के मध्य की अवधि किसान आंदोलनों की गतिविधियों का उच्चतम स्तर था। किसान सम्मेलनों और बैठकों के माध्यम से किसानों को एकत्रित किया जाता था तथा उनकी मांँगों को पारित कर प्रसारित किया जाता था।साथ ही किसानों को गांँवों के स्तर पर एकजुट करने का कार्य किया गया। नेतृत्वः इस अवधि के दौरान किसान आंदोलनों का नेतृत्व कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा किया गया। तेलंगाना आंदोलन कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले गुरिल्लाओं द्वारा आयोजित किया गया। इसी प्रकार तेभागा आंदोलन का नेतृत्व बंगाल प्रांतीय किसान सभा द्वारा किया गया। - ब्रिटिश शासन के दौरान किसान आंदोलनों की प्रकृति में ब्रिटिश राज के पहले चरण एवं बीसवीं शताब्दी में किसान आंदोलनों के मध्य हड़तालों के स्तर पर भिन्नता विद्यमान थी। - औपनिवेशिक उद्देश्यों की पूर्ति को लेकर बढ़ती जागरूकता, जन-आधारित राजनीतिक संगठन और मार्क्सवादी-कम्युनिस्ट विचारों के रूप में कॉन्ग्रेस के उद्भव के कारण इन मतभेदों का उत्पन्न होना स्वाभाविक था।
जनज्वार। वर्ष 2015 में अनुष्का शर्मा की एक फ़िल्म आई थी 'एन-एच 10' याद होगी! झूठी शान के लिए की गई हत्या पर फ़िल्म आधारित थी। फ़िल्म की कहानी ग्रामीण इलाके पर आधारित थी, जिसमें शहर से आया दम्पत्ति भी घटनाक्रमों में शामिल हो जाता है। 'जनज्वार' के फेसबुक पेज पर 15 मई, 2021 को शाम साढ़े सात बजे उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर स्थित घाटमपुर कोतवाली क्षेत्र बिराहीनपुर गांव में घर के अंदर अपनी नाबालिग बेटी और उसके प्रेमी को आपत्तिजनक स्थिति में देखने के बाद ट्रक ड्राइवर पिता द्वारा दोनों को कुल्हाड़ी से काट डालने की ख़बर पर वीडियो पोस्ट किया गया था। 1 जून तक 13 लाख से भी ज्यादा लोगों द्वारा देखे जा चुके इस वीडियो पर तेरह हज़ार से ज्यादा लोग अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुके हैं, एक हज़ार से ज़्यादा लोगों ने इस पर टिप्पणी दी और पांच हज़ार से ज्यादा लोगों ने इस वीडियो को साझा किया है। झूठी शान और नाक की खातिर की गई इस हत्या पर समाज क्या सोचता है, यह हमें इस वीडियो पर लोगों द्वारा की गई टिप्पणियों से पता चल सकता है। उमेश पाल की टिप्पणी पर 136 लोग प्रतिक्रियाएं देते हैं। उमेश पाल कहते हैं पिता ने अगर एक ही को मारा होता तो वह गलत था, आपत्तिजनक हालत में देखने पर दोनों को मारा तो सराहनीय कार्य और वह ऐसा हर बाप को करने के लिए भी कहते हैं, जिससे सबमें डर बना रहे। इस पर टिप्पणी करते हुए सोनी यादव लिखती हैं, हत्या करना अच्छा होता है तो तू भी अपनी बेटी को मार दे। उमेश के लिखे पर सोनी की इस टिप्पणी पर ही तीन-चार लोग सोनी नाम की महिला के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग और गाली - गलौज करते हैं, उससे हमारे समाज की महिलाओं के प्रति मानसिकता को समझने में भी मदद मिलती है। एडीवी मंजूर शेख तो यह निर्णय ही नहीं ले पा रहे कि वास्तव में लिखना क्या चाहिए, उनकी टिप्पणी है कि अपनी नाबालिग लड़की को ऐसे हालत में बालिग के साथ देखा होगा तो ज़ाहिर सी बात है गुस्से में मार दिया, हालांकि किसी को जान से मारना गलत है। सतीश यादव हिंदू धर्म के ठेकेदार जान पड़ते हैं और लिखते हैं बहुत सही किया, हर एक परिवार वालों को ऐसा ही करना चाहिए, ताकि हिन्दू संस्कृति खत्म होने से पहले बच सके और कोई दूसरा ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे। ओम प्रकाश वैष्णव ओम अपने नाम के मुताबिक विचार वाले लगते और न ही उनकी लिखी हिंग्लिश समझ आती है, इसलिए विनय कुमार की टिप्पणी ली, हिंग्लिश में लिखी यह टिप्पणी समझनी थोड़ा आसान है। वह लिखते हैं कि जब वार्निंग दी थी तो नही जाना चाहिए, सही किया। पिंकी वर्मा शालिनी वर्मा को उन बच्चों की मां से हमदर्दी थी और उन्होंने इस बात को गलत कहा। संदीप पटेल कहते हैं, यह उस तरह की लड़कियां हैं जो प्यार में पड़कर बाद में कहती हैं मुझे मेरा बाप मार डालेगा। इनको मार के इनकी दोनों लाशों को भी ठिकाने लगा देना चाहिए था, पुलिस से कहना था * फलाने के साथ भाग गई। अल सबर लिखते हैं, बहुत ही सराहनीय काम किया है भाई ने, बहुत परिश्रम से परवरिश होती है बच्चों की। जगबीर कुमार लिखते हैं, बाप ने बिल्कुल सही किया है और हर एक बाप का ये करना भी जरूरी है। दलजीत सिंह ने लिखा बहुत बढ़िया करे भाई, सत्यम सिंह भी सही किया लिखते हैं। आफ़ताब आलम भी अच्छा किया लिख हत्यारे पिता के पक्ष में हैं। यानी यहां एक बात समझ में आती है कि धर्म के ठेकेदार चाहे हिंदू हों या मुस्लिम वह इस तरह बाप द्वारा हत्या किये जाने का समर्थन करते नजर आते हैं। ख़ुर्शीद अहमद ने लिखा, सही किया, पागल हो गए हैं आशिक़ी के चक्कर में पूरा घर रुलाया। प्यार मध्यमवर्गीय के लिए नही, अमीरों की मज़े लेने की चीज़ है। भोगेन्द्र राज रॉय ने भी लिखा, बहुत सही किया। किशोर भाई लिखते हैं लाइफ़ में पहली बार किसी बाप ने अपना फ़र्ज़ निभाया। अब आंखें खोलो दुनिया वालों और इनका साथ दो। बसंत प्रजापति ने लिखा कि गुस्सा किसी तूफान से कम नहीं होता, लेकिन जो हुआ अफ़सोस की बात है। सेना के जवान की पेंटिंग को अपनी प्रोफाइल पिक्चर बनाए रियाज़ अहमद लिखते हैं कानून को अपने हाथ में नही लेना था पिता को बट सही किया!!! धर्मराज सिंह लिखते हैं कि वेरी गुड, बहुत सही किया है बाप ने। जसवीर ठाकुर ने लिखा बहुत अच्छा किया है। संतोष सिंह लिखते हैं ऐसे पिता को सैल्यूट बनता है। नीरज कुमार ने लिखा बहुत सही किया बाप ने। विनय जाटव भी पिता की तरफ़ रहते हुए लिखते हैं एकदम सही किया। अहमद खान किसी विद्यालय के मास्टर या किसी क्रिकेट टीम के कोच जान पड़ते हैं, वह लिखते हैं गुड जॉब अच्छा किया बाप ने। पाल अग्रवाल तो राजनीति और एक हिंदी फ़िल्म में अमरीश पुरी के निभाए किरदार मोगेम्बो से ज्यादा ही प्रेरित दिखाई लगते हैं, वह लिखते हैं योगी खुश हुआ, लड़की के बाप को बुलाइए इनाम मिलेगा। रमेन्द्र द्विवेदी लिखते हैं लड़की का पिता सही है अपनी जगह। आरती मिश्रा सवाल पूछना चाहती हैं या अपनी राय दे रही हैं यह समझ नही आता। वह लिखती हैं कि गलत क्या किया दोनों को मार दिया। एमडी शरीफ नाम के अनुसार बेहद शरीफ़ नज़र आते हैं और चुपके से टिप्पणी पर करेक्ट का स्टिकर चिपका देते हैं। संदीप पाल पहले ऐसे व्यक्ति नज़र आते हैं, जिन्हें प्यार करने वालों से हमदर्दी है वह लिखते हैं क्या प्यार करना गलत है भाई। वीडियो में की गयीं अधिकतर टिप्पणियां नफ़रत से भरी हुई थी, इतनी लिजलिजी कि इंसानियत शरमा जाये। मोटामोटी आंकड़ा निकाला जाये तो केवल चार प्रतिशत लोगों को मरने वालों से सहानुभूति थी, बाकि सबका यही कहना था कि पिता ने ऐसा कर ठीक ही किया। टिप्पणी करने वाली महिलाओं की बात करें तो लगभग साठ प्रतिशत महिलाओं को प्रेमी जोड़े से सहानुभूति थी और चालीस प्रतिशत ने पिता को ही सही बताया। सबसे बड़ी बात यह है कि नफ़रत भरी टिप्पणी करने वाले अधिकतर वह लोग हैं, जिन्हें न हिंदी अच्छे से लिखने आती है और न ही अंग्रेज़ी और इनका ज्यादातर ज्ञान वाट्सएप यूनिवर्सिटी से जुटाया गया लगता है। अगर इनके परिवार वालों को ही यह टिप्पणियां पढ़ा दी जाएं तो मारे शर्म के इनका मुंह लाल हो जाए। इस वीडियो के साथ की गयी टिप्पणियों में जिस अभद्र और अश्लील भाषा का प्रयोग किया गया है, उससे लगता है कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ऐसे ही लोगों की वज़ह से लगाया जाता है, जो ऐसे मौकों का फ़ायदा उठा हिंसा फैलाते हैं, इन लोगों की न कोई जाति होती है न धर्म। किसी मशहूर व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट पर यह लोग उसकी टांग खींचने या उसे मुफ्त का ज्ञान देने से पीछे नहीं रहते। जनज्वार ने यह प्रयोग पत्रकारिता में अब तक लगभग असंभव माने जाने वाले फीडबैक को प्राप्त करने के लिए किया गया है, जिससे यह पता चले कि समाचारों में दिखाई जा रही इन खबरों के प्रति समाज के लोगों का क्या नज़रिया है, क्या ऐसी खबरों को दिखाए जाने के बाद लोग ऐसे अपराध कम करते हैं , क्या अपने मन में इतनी नफ़रत पाले इन लोगों को पत्रकारिता के माध्यम से जागरूक कर सुधारा जा सकता है। भारतीय समाज आज चाहे कितना भी पश्चिम का आडम्बर ओढ़ ले, पर अपने समाज में उसे आज भी प्रेम सम्बन्धों से नफ़रत है। वह इसे अनैतिक मानता है, यह हमारी शिक्षा प्रणाली और संस्कारों की ही कमी है जो हम आज तक अपनी अगली पीढ़ी को प्रेम, महिलाओं के सम्मान के अर्थ नही समझा पाए। यह झूठी आन की वज़ह से ली जा रही मौतें जाने कब ख़त्म होगी।
जनज्वार। वर्ष दो हज़ार पंद्रह में अनुष्का शर्मा की एक फ़िल्म आई थी 'एन-एच दस' याद होगी! झूठी शान के लिए की गई हत्या पर फ़िल्म आधारित थी। फ़िल्म की कहानी ग्रामीण इलाके पर आधारित थी, जिसमें शहर से आया दम्पत्ति भी घटनाक्रमों में शामिल हो जाता है। 'जनज्वार' के फेसबुक पेज पर पंद्रह मई, दो हज़ार इक्कीस को शाम साढ़े सात बजे उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर स्थित घाटमपुर कोतवाली क्षेत्र बिराहीनपुर गांव में घर के अंदर अपनी नाबालिग बेटी और उसके प्रेमी को आपत्तिजनक स्थिति में देखने के बाद ट्रक ड्राइवर पिता द्वारा दोनों को कुल्हाड़ी से काट डालने की ख़बर पर वीडियो पोस्ट किया गया था। एक जून तक तेरह लाख से भी ज्यादा लोगों द्वारा देखे जा चुके इस वीडियो पर तेरह हज़ार से ज्यादा लोग अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुके हैं, एक हज़ार से ज़्यादा लोगों ने इस पर टिप्पणी दी और पांच हज़ार से ज्यादा लोगों ने इस वीडियो को साझा किया है। झूठी शान और नाक की खातिर की गई इस हत्या पर समाज क्या सोचता है, यह हमें इस वीडियो पर लोगों द्वारा की गई टिप्पणियों से पता चल सकता है। उमेश पाल की टिप्पणी पर एक सौ छत्तीस लोग प्रतिक्रियाएं देते हैं। उमेश पाल कहते हैं पिता ने अगर एक ही को मारा होता तो वह गलत था, आपत्तिजनक हालत में देखने पर दोनों को मारा तो सराहनीय कार्य और वह ऐसा हर बाप को करने के लिए भी कहते हैं, जिससे सबमें डर बना रहे। इस पर टिप्पणी करते हुए सोनी यादव लिखती हैं, हत्या करना अच्छा होता है तो तू भी अपनी बेटी को मार दे। उमेश के लिखे पर सोनी की इस टिप्पणी पर ही तीन-चार लोग सोनी नाम की महिला के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग और गाली - गलौज करते हैं, उससे हमारे समाज की महिलाओं के प्रति मानसिकता को समझने में भी मदद मिलती है। एडीवी मंजूर शेख तो यह निर्णय ही नहीं ले पा रहे कि वास्तव में लिखना क्या चाहिए, उनकी टिप्पणी है कि अपनी नाबालिग लड़की को ऐसे हालत में बालिग के साथ देखा होगा तो ज़ाहिर सी बात है गुस्से में मार दिया, हालांकि किसी को जान से मारना गलत है। सतीश यादव हिंदू धर्म के ठेकेदार जान पड़ते हैं और लिखते हैं बहुत सही किया, हर एक परिवार वालों को ऐसा ही करना चाहिए, ताकि हिन्दू संस्कृति खत्म होने से पहले बच सके और कोई दूसरा ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे। ओम प्रकाश वैष्णव ओम अपने नाम के मुताबिक विचार वाले लगते और न ही उनकी लिखी हिंग्लिश समझ आती है, इसलिए विनय कुमार की टिप्पणी ली, हिंग्लिश में लिखी यह टिप्पणी समझनी थोड़ा आसान है। वह लिखते हैं कि जब वार्निंग दी थी तो नही जाना चाहिए, सही किया। पिंकी वर्मा शालिनी वर्मा को उन बच्चों की मां से हमदर्दी थी और उन्होंने इस बात को गलत कहा। संदीप पटेल कहते हैं, यह उस तरह की लड़कियां हैं जो प्यार में पड़कर बाद में कहती हैं मुझे मेरा बाप मार डालेगा। इनको मार के इनकी दोनों लाशों को भी ठिकाने लगा देना चाहिए था, पुलिस से कहना था * फलाने के साथ भाग गई। अल सबर लिखते हैं, बहुत ही सराहनीय काम किया है भाई ने, बहुत परिश्रम से परवरिश होती है बच्चों की। जगबीर कुमार लिखते हैं, बाप ने बिल्कुल सही किया है और हर एक बाप का ये करना भी जरूरी है। दलजीत सिंह ने लिखा बहुत बढ़िया करे भाई, सत्यम सिंह भी सही किया लिखते हैं। आफ़ताब आलम भी अच्छा किया लिख हत्यारे पिता के पक्ष में हैं। यानी यहां एक बात समझ में आती है कि धर्म के ठेकेदार चाहे हिंदू हों या मुस्लिम वह इस तरह बाप द्वारा हत्या किये जाने का समर्थन करते नजर आते हैं। ख़ुर्शीद अहमद ने लिखा, सही किया, पागल हो गए हैं आशिक़ी के चक्कर में पूरा घर रुलाया। प्यार मध्यमवर्गीय के लिए नही, अमीरों की मज़े लेने की चीज़ है। भोगेन्द्र राज रॉय ने भी लिखा, बहुत सही किया। किशोर भाई लिखते हैं लाइफ़ में पहली बार किसी बाप ने अपना फ़र्ज़ निभाया। अब आंखें खोलो दुनिया वालों और इनका साथ दो। बसंत प्रजापति ने लिखा कि गुस्सा किसी तूफान से कम नहीं होता, लेकिन जो हुआ अफ़सोस की बात है। सेना के जवान की पेंटिंग को अपनी प्रोफाइल पिक्चर बनाए रियाज़ अहमद लिखते हैं कानून को अपने हाथ में नही लेना था पिता को बट सही किया!!! धर्मराज सिंह लिखते हैं कि वेरी गुड, बहुत सही किया है बाप ने। जसवीर ठाकुर ने लिखा बहुत अच्छा किया है। संतोष सिंह लिखते हैं ऐसे पिता को सैल्यूट बनता है। नीरज कुमार ने लिखा बहुत सही किया बाप ने। विनय जाटव भी पिता की तरफ़ रहते हुए लिखते हैं एकदम सही किया। अहमद खान किसी विद्यालय के मास्टर या किसी क्रिकेट टीम के कोच जान पड़ते हैं, वह लिखते हैं गुड जॉब अच्छा किया बाप ने। पाल अग्रवाल तो राजनीति और एक हिंदी फ़िल्म में अमरीश पुरी के निभाए किरदार मोगेम्बो से ज्यादा ही प्रेरित दिखाई लगते हैं, वह लिखते हैं योगी खुश हुआ, लड़की के बाप को बुलाइए इनाम मिलेगा। रमेन्द्र द्विवेदी लिखते हैं लड़की का पिता सही है अपनी जगह। आरती मिश्रा सवाल पूछना चाहती हैं या अपनी राय दे रही हैं यह समझ नही आता। वह लिखती हैं कि गलत क्या किया दोनों को मार दिया। एमडी शरीफ नाम के अनुसार बेहद शरीफ़ नज़र आते हैं और चुपके से टिप्पणी पर करेक्ट का स्टिकर चिपका देते हैं। संदीप पाल पहले ऐसे व्यक्ति नज़र आते हैं, जिन्हें प्यार करने वालों से हमदर्दी है वह लिखते हैं क्या प्यार करना गलत है भाई। वीडियो में की गयीं अधिकतर टिप्पणियां नफ़रत से भरी हुई थी, इतनी लिजलिजी कि इंसानियत शरमा जाये। मोटामोटी आंकड़ा निकाला जाये तो केवल चार प्रतिशत लोगों को मरने वालों से सहानुभूति थी, बाकि सबका यही कहना था कि पिता ने ऐसा कर ठीक ही किया। टिप्पणी करने वाली महिलाओं की बात करें तो लगभग साठ प्रतिशत महिलाओं को प्रेमी जोड़े से सहानुभूति थी और चालीस प्रतिशत ने पिता को ही सही बताया। सबसे बड़ी बात यह है कि नफ़रत भरी टिप्पणी करने वाले अधिकतर वह लोग हैं, जिन्हें न हिंदी अच्छे से लिखने आती है और न ही अंग्रेज़ी और इनका ज्यादातर ज्ञान वाट्सएप यूनिवर्सिटी से जुटाया गया लगता है। अगर इनके परिवार वालों को ही यह टिप्पणियां पढ़ा दी जाएं तो मारे शर्म के इनका मुंह लाल हो जाए। इस वीडियो के साथ की गयी टिप्पणियों में जिस अभद्र और अश्लील भाषा का प्रयोग किया गया है, उससे लगता है कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ऐसे ही लोगों की वज़ह से लगाया जाता है, जो ऐसे मौकों का फ़ायदा उठा हिंसा फैलाते हैं, इन लोगों की न कोई जाति होती है न धर्म। किसी मशहूर व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट पर यह लोग उसकी टांग खींचने या उसे मुफ्त का ज्ञान देने से पीछे नहीं रहते। जनज्वार ने यह प्रयोग पत्रकारिता में अब तक लगभग असंभव माने जाने वाले फीडबैक को प्राप्त करने के लिए किया गया है, जिससे यह पता चले कि समाचारों में दिखाई जा रही इन खबरों के प्रति समाज के लोगों का क्या नज़रिया है, क्या ऐसी खबरों को दिखाए जाने के बाद लोग ऐसे अपराध कम करते हैं , क्या अपने मन में इतनी नफ़रत पाले इन लोगों को पत्रकारिता के माध्यम से जागरूक कर सुधारा जा सकता है। भारतीय समाज आज चाहे कितना भी पश्चिम का आडम्बर ओढ़ ले, पर अपने समाज में उसे आज भी प्रेम सम्बन्धों से नफ़रत है। वह इसे अनैतिक मानता है, यह हमारी शिक्षा प्रणाली और संस्कारों की ही कमी है जो हम आज तक अपनी अगली पीढ़ी को प्रेम, महिलाओं के सम्मान के अर्थ नही समझा पाए। यह झूठी आन की वज़ह से ली जा रही मौतें जाने कब ख़त्म होगी।
एटा। शिक्षा विभाग की एक के बाद एक किरकिरी होती जा रही है। अभी अलीगंज ब्लॉक क्षेत्र के गांव बनी स्थित प्राथमिक विद्यालय का मामला ठंडा नहीं पड़ा। अब इसी क्षेत्र के गांव फरसौली स्थित विद्यालय में सात माह तक मध्यान भोजन न बनने का मामला सामने आया है। यहां दिसंबर में प्रधानाध्यापक को निलंबित किया गया था। इसके बाद किसी भी शिक्षक को चार्ज नहीं दिया गया और बच्चे भूखे ही रहे। उच्च प्राथमिक विद्यालय फरसौली में प्रभारी प्रधानाध्यापक उपेंद्र कुमार को 31 दिसंबर 2021 को विभागीय अनियमितताओं के आरोप में निलंबित किया गया था तत्कालीन खंड शिक्षाधिकारी आनंद कुमार ने किसी दूसरे शिक्षक को यह पदभार नहीं दिया। जिसकी वजह से जनवरी से जुलाई 2022 तक विद्यालय में मध्याहन भोजन नहीं बना। इस बात को खंड शिक्षाधिकारी आनंद कुमार द्विवेदी अपने उच्चाधिकारियों से छिपाए रहे और किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगने दी। शिक्षक उपेंद्र कुमार ने बताया कि मेरे निलंबन के समय तक विद्यालय में सात माह से मध्याहन भोजन नहीं बना। किसी भी शिक्षक को वित्तीय अधिकारी नहीं दिए गए, जिसकी वजह से एमडीएम नहीं बन सका। जबकि विद्यालय में 77 विद्यार्थी अध्यनरत है।
एटा। शिक्षा विभाग की एक के बाद एक किरकिरी होती जा रही है। अभी अलीगंज ब्लॉक क्षेत्र के गांव बनी स्थित प्राथमिक विद्यालय का मामला ठंडा नहीं पड़ा। अब इसी क्षेत्र के गांव फरसौली स्थित विद्यालय में सात माह तक मध्यान भोजन न बनने का मामला सामने आया है। यहां दिसंबर में प्रधानाध्यापक को निलंबित किया गया था। इसके बाद किसी भी शिक्षक को चार्ज नहीं दिया गया और बच्चे भूखे ही रहे। उच्च प्राथमिक विद्यालय फरसौली में प्रभारी प्रधानाध्यापक उपेंद्र कुमार को इकतीस दिसंबर दो हज़ार इक्कीस को विभागीय अनियमितताओं के आरोप में निलंबित किया गया था तत्कालीन खंड शिक्षाधिकारी आनंद कुमार ने किसी दूसरे शिक्षक को यह पदभार नहीं दिया। जिसकी वजह से जनवरी से जुलाई दो हज़ार बाईस तक विद्यालय में मध्याहन भोजन नहीं बना। इस बात को खंड शिक्षाधिकारी आनंद कुमार द्विवेदी अपने उच्चाधिकारियों से छिपाए रहे और किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगने दी। शिक्षक उपेंद्र कुमार ने बताया कि मेरे निलंबन के समय तक विद्यालय में सात माह से मध्याहन भोजन नहीं बना। किसी भी शिक्षक को वित्तीय अधिकारी नहीं दिए गए, जिसकी वजह से एमडीएम नहीं बन सका। जबकि विद्यालय में सतहत्तर विद्यार्थी अध्यनरत है।
मैंने दिल से कहा ढून्ढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी बेचारा कहाँ जानता था खलिश है यह क्या खला है शहर भर की ख़ुशी से यह दर्द मेरा भला है जश्न यह राज़ न आये मज़ा तोह बस ग़म में आया है मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही कभी है इश्क़ का उजाला कभी है मौत का अँधेरा बताओ कौन बेस होगा मैं जोगी बनू या लुटेरा कई चेहरे हैं इस दिल के नजाने कौनसा मेरा मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही हज़ारों ऐसे फासले थे जो तै करने चले थे रहे मगर चल पड़ी थी और पीछे हम रह गए थे कदम दो चार चल पाये किये फेरे तेरे मन्न के मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही
मैंने दिल से कहा ढून्ढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी बेचारा कहाँ जानता था खलिश है यह क्या खला है शहर भर की ख़ुशी से यह दर्द मेरा भला है जश्न यह राज़ न आये मज़ा तोह बस ग़म में आया है मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही कभी है इश्क़ का उजाला कभी है मौत का अँधेरा बताओ कौन बेस होगा मैं जोगी बनू या लुटेरा कई चेहरे हैं इस दिल के नजाने कौनसा मेरा मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही हज़ारों ऐसे फासले थे जो तै करने चले थे रहे मगर चल पड़ी थी और पीछे हम रह गए थे कदम दो चार चल पाये किये फेरे तेरे मन्न के मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी नासमझ लाया ग़म तो यह ग़म ही सही
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी सभी संस्थाओं को सार्वजनिक जीवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने से बचने को कहा है। संघ ने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसी संस्थाओं को प्रधानमंत्री द्वारा गौ-रक्षकों की निंदा वाले बयान से नाराजगी जाहिर करने से मना किया है। आगरा में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश (ब्रज और मेरठ क्षेत्र) के 236 कार्यवाहकों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर कुछ विहिप नेताओं द्वारा दिए गए बयानों से भाजपा को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे यह भी संदेश गया कि संघ के भीतर ही दरार पड़ गई है। बैठक में संघ और उससे सम्बद्ध विहिप, भाजपा, विद्या भारती, अखिल भारतीय मजदूर संघ, किसान संघ, सहकर भारती, क्रीडा भारती, पूर्व सैनिक सेवा परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, विज्ञान भारती और लघु उद्योग भारती समेत 33 इकाइयों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। खबर है कि बैठक में भागवत ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मेंं होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत में मदद के लिए रणनीतियों पर भी चर्चा की। ब्रज प्रांत के प्रचारक प्रदीप ने कहा, "सरसंघचालक मोहन भागवत ने हमसे एक होने को कहा है। यूं तो सभी संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य करती हें, राष्ट्र निर्माण आैर विकास के लिए उनके बीच अच्छा समन्वय होना बेहद जरूरी है। भागवत ने कहा कि सभी स्वयंसेवकों को निस्वार्थ भाव से काम करते हुए देश के लिए सबसे बेहतर योगदान करना चाहिए। " उत्तराखंड के एक आरएसएस पदाधिकारी ने कहा, "आने वाले चुनावों पर चर्चा हुई... कैसे जमीन से जुड़कर लोगों से मजबूत संपर्क बनाया जाए। मुख्य मुद्दों में विवादों में फंसने से बचने और अगले कुछ महीनों तक चुप रहने पर बात हुई। " भागवत ने इस मौके पर पिछले ढाई साल में संघ और उसकी संस्थाओं द्वारा किए गए कार्यों की विस्तृत रिपोर्ट भी देखी। READ ALSO: दिनेश त्रिवेदी का ब्लॉगः क्या करोड़ों रुपए लुटाने से ही होगा ओलंपिक पदक विजेताओं का असली सम्मान? बैठक में भागवत ने फिर से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को आजाद कराने की बात की। आगरा में चार दिन की बैठक बुधवार को खत्म हो गई। इसके बाद भागवत लखनऊ में कार्यकर्ताओं को दो दिन संबोधित करेंगे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सभी संस्थाओं को सार्वजनिक जीवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने से बचने को कहा है। संघ ने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसी संस्थाओं को प्रधानमंत्री द्वारा गौ-रक्षकों की निंदा वाले बयान से नाराजगी जाहिर करने से मना किया है। आगरा में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के दो सौ छत्तीस कार्यवाहकों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर कुछ विहिप नेताओं द्वारा दिए गए बयानों से भाजपा को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे यह भी संदेश गया कि संघ के भीतर ही दरार पड़ गई है। बैठक में संघ और उससे सम्बद्ध विहिप, भाजपा, विद्या भारती, अखिल भारतीय मजदूर संघ, किसान संघ, सहकर भारती, क्रीडा भारती, पूर्व सैनिक सेवा परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, विज्ञान भारती और लघु उद्योग भारती समेत तैंतीस इकाइयों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। खबर है कि बैठक में भागवत ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मेंं होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत में मदद के लिए रणनीतियों पर भी चर्चा की। ब्रज प्रांत के प्रचारक प्रदीप ने कहा, "सरसंघचालक मोहन भागवत ने हमसे एक होने को कहा है। यूं तो सभी संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य करती हें, राष्ट्र निर्माण आैर विकास के लिए उनके बीच अच्छा समन्वय होना बेहद जरूरी है। भागवत ने कहा कि सभी स्वयंसेवकों को निस्वार्थ भाव से काम करते हुए देश के लिए सबसे बेहतर योगदान करना चाहिए। " उत्तराखंड के एक आरएसएस पदाधिकारी ने कहा, "आने वाले चुनावों पर चर्चा हुई... कैसे जमीन से जुड़कर लोगों से मजबूत संपर्क बनाया जाए। मुख्य मुद्दों में विवादों में फंसने से बचने और अगले कुछ महीनों तक चुप रहने पर बात हुई। " भागवत ने इस मौके पर पिछले ढाई साल में संघ और उसकी संस्थाओं द्वारा किए गए कार्यों की विस्तृत रिपोर्ट भी देखी। READ ALSO: दिनेश त्रिवेदी का ब्लॉगः क्या करोड़ों रुपए लुटाने से ही होगा ओलंपिक पदक विजेताओं का असली सम्मान? बैठक में भागवत ने फिर से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को आजाद कराने की बात की। आगरा में चार दिन की बैठक बुधवार को खत्म हो गई। इसके बाद भागवत लखनऊ में कार्यकर्ताओं को दो दिन संबोधित करेंगे।
पुरी। पुरी में आज एक दर्दनाक हादसे में पश्चिम बंगाल के दो पर्यटक समुद्र में नहाने के दौरान डूब गए। यह घटना सेक्टर 12 और 13 बाथिंग जोन की बताई जा रही है। हालांकि खबर लिखे जाने तक मृतकों की पहचान नहीं हो पाई थी। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि वे हावड़ा के रहने वाले थे। ये दोनों तीन अन्य पर्यटकों के साथ मंगलवार रात पुरी पहुंचे थे और सुबह समुद्र में नहाने के लिए गए थे। हालांकि, नहाने के दौरान दोनों करंट की चपेट में आ गए, जबकि अन्य बाल-बाल बच गए। शुरू में सभी को बचा लिया गया और अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनमें से दो को मृत घोषित कर दिया। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि बाकी पीड़ितों का इलाज चल रहा है और उनकी हालत गंभीर है।
पुरी। पुरी में आज एक दर्दनाक हादसे में पश्चिम बंगाल के दो पर्यटक समुद्र में नहाने के दौरान डूब गए। यह घटना सेक्टर बारह और तेरह बाथिंग जोन की बताई जा रही है। हालांकि खबर लिखे जाने तक मृतकों की पहचान नहीं हो पाई थी। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि वे हावड़ा के रहने वाले थे। ये दोनों तीन अन्य पर्यटकों के साथ मंगलवार रात पुरी पहुंचे थे और सुबह समुद्र में नहाने के लिए गए थे। हालांकि, नहाने के दौरान दोनों करंट की चपेट में आ गए, जबकि अन्य बाल-बाल बच गए। शुरू में सभी को बचा लिया गया और अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनमें से दो को मृत घोषित कर दिया। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि बाकी पीड़ितों का इलाज चल रहा है और उनकी हालत गंभीर है।
नोयडा ( ओम रतूड़ी )। भावी पीढ़ी के लिये जलवायु जनक लक्ष्य प्राप्त करने हेतु समिट का आयोजन किया गया। इस समिट में परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष और ग्लोबल इण्टरफेथ वाश एलायंस के संस्थापक स्वामी चिदानन्द, मौलाना महमूद असअद मदनी दिल्ली एवं अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों ने सहभाग कर जलवायु जनक लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अपने सुझाव प्रस्तुत किये। यह कार्यक्रम तीन सत्र में सम्पन्न हुआ जिसमें अनेक विषयों पर चिंतन किया गया यथा जीवन के अनुभव और विकास के साथ बदलते परिवेश और कठिन परिस्थितियों को एक सुरक्षात्मक वातावरण में बदलना, प्रभावी समन्वय के लिये एक एकीकृत क्षेत्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता, भोजन, पानी और आजीविका, खाद्य सुरक्षा, लड़कियों और महिलाओं के पोषण की स्थिति में सुधार, मृदा और पादप, आर्द्रभूमि, जल निकायों और जंगल के घनत्व की गुणवत्ता जैसे अनेक विषयों पर चिंतन किया गया। इस अवसर पर जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती , यूनिसेफ की भारतीय प्रतिनिधि (इंडिया रिप्रेजेंटेटिव) यास्मीन अली हक, मराठवाड़ा से आयी महिला किसान, मध्यप्रदेश के वाटर हार्वेस्टर, साध्वी आदित्यनन्दा सरस्वती , गंगा एक्शन परिवार से गंगा नन्दिनी त्रिपाठी, विभिन्न धर्मो के धर्मगुरू, विशेषज्ञों, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के अनेेक विद्याथियों ने सहभाग किया। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भावी पीढ़ी के लिये जलवायु जनक लक्ष्य प्राप्त करने हेतु आयोजित समिट को सम्बोधित करते हुये कहा कि 'नेल्सन मंडेला' ने कहा था कि 'बचाव एवं सुरक्षा स्वतः ही संभव नहीं है, यह सामूहिक सर्वसम्मति और सार्वजनिक निवेश का परिणाम है। हमें अपने बच्चों को, जो कि समाज के सबसे कोमल और कमजोर नागरिक है, एक यातना और भय से मुक्त जीवन देना होगा।' वास्तव में आज हमें इस कथन पर गहराई से चिंतन करने की जरूरत है कि क्या हम अपनी भावी पीढ़ियों और हमारे इन छोटे-छोटे बच्चों को स्वच्छ जल, शुद्ध वायु और पर्याप्त और प्रदूषण रहित खाद्य सामग्री दे पा रहे हैं। स्वच्छ, स्वस्थ, मस्त, सुरक्षित और व्यवस्थित बचपन पर सभी बच्चों का अधिकार है। सुरक्षित और व्यवस्थित बचपन ऐसी नींव तैयार करता है जिस पर हमारे देश के भविष्य की इमारत बुलंद होती है इसलिये नीति निर्माताओं और धर्मगुरूओं की जिम्मेदारी है कि बच्चों को उनके हितों, अधिकारों, सुविधाओं और सुरक्षित माहौल से युक्त जीवन प्रदान करें जिससे उनका सम्पूर्ण विकास हो सके। अगर समाज और सरकार दोनों मिलकर इस ओर कार्य करें तो विलक्षण परिवर्तन हो सकता है। स्वामी ने कहा कि आज के दौर में हम इकोलाॅजिकल ओवरसूट से गुजर रहे हैं। इकोलाॅजिकल ओवरसूट अर्थात इकोलाॅजिकल फ्रूट प्रिंट का आबादी की जैव क्षमता से अधिक होना है। आईये इन दोनों महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करते हैं कि क्या है इकोलाॅजिकल ओवरसूट या अर्थ ओवरसूट अर्थात भविष्य में आने वाली मानव और अन्य प्राणियों, पीढ़ियों को जीवन यापन के लिये धरा पर जो भू-भाग, जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधनोेें की जरूरत पड़ेगी उसको हम कम कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपनी आय से अधिक रूपये खर्च कर रहे हैं। हमें जितने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना चाहिये हम उससे कहीं अधिक मात्रा में कर रहे हैं यही है अर्थ ओवरसूट। अर्थ ओवर सूट अर्थात पृथ्वी एक वर्ष में जितने संसाधन उत्पादित करती है उसे विश्व की आबादी वर्ष के पहले दिन ही खर्च कर देती है। वर्ष 2018 की बात करें तो पृथ्वी द्वारा उत्पादित संसाधन जो 365 दिनों के लिये थे उसे हमने 212 दिन मैं ही समाप्त कर दिया शेष बचे 153 दिन हमने पृथ्वी के संसाधनों का अति दोहन किया। अब हमारी स्थिति ऐसी है कि हमें जितने संसाधनों की जरूरत है उसके लिये हमें 1.7 पृथ्वी की जरूरत पड़़ेगी। इकोलाॅजिकल फ्रूट प्रिंट ( मानवीय मांग का एक मापक है जो मनुष्य के मांग की तुलना पृथ्वी की पारिस्थितिकी के पुनरूत्पादन करने की क्षमता से करता है। अर्थात जनसंख्या बढ़ रही है तो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भी अधिक हो रहा है साथ ही अपशिष्ट की भी भारी मात्रा में वृद्धि हो रही है। वर्तमान में जितनी प्राकृतिक संसाधनों की मांग है उतना धरा पर मौजूद नहीं है । इन मुद्दों पर चितंन करने की जरूरत है ताकि भावी पीढ़ियों को सुरक्षित जीवन प्रदान किया जा सके। यूनिसेफ इंडिया रिप्रेजेंटेटिव यास्मीन अली हक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन मानव गतिविधियों के कारण होता है। यह बच्चों के जीवन पर विशेष रूप से प्रभाव डाल रहा है। यथा कहीं पर बाढ़, सूखा, गर्मी की लहर से बड़ों की तुलना में बच्चों का जीवन अधिक प्रभावित हो रहा है। उन्होने बताया कि यूनिसेफ के अनुसार जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट के कारण ये छह क्षेत्र यथा स्वास्थ्य, पोषण, पानी, स्वच्छता, बाल संरक्षण, सामाजिक समावेश और शिक्षा प्रभावित हुये है। उन्होने कहा कि मेरा विश्वास है कि मानव प्राकृतिक संसाधनों के साथ जीना सीख जाये तो जलवायु परिवर्तन की गतिविधियों को कम किया जा सकता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से हम "पारिस्थितिक रणनीतियाँ" तैयार कर सकते है। उन्होने कहा कि हम मनुष्य और अन्य जीवित प्रणालियों के मध्य एक सहज बंधन है। हमारा पूरा जीवन पौधों, जानवरों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है फिर भी हम अपने आप को प्रकृति के अलग देख रहे हैै, जबकि हम प्रकृति को मानव डिजाइन करने वाला और विकास की प्रेरणा के रूप में देख सकते है और मानव के स्थायी जीवन के सह-निर्माता बन सकते हैं। यास्मीन अली हक ने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार ने 29 डार्क ब्लाॅक जो गंभीर भूजल स्तर से गुजर रहे है उस पर कार्य कर रही हैं। साथ ही देश के विभिन्न भागों से आये लोगों ने भी अपने अनुभवों को साझा किया। इस कार्यक्रम के तीसरे सत्र में विभिन्न धर्मो के धर्मगुरूओं ने हमारे ग्रह और हमारे बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिये नीति बनाने के उच्च सोपानों पर चर्चा की। सभी ने कहा कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील परिणामों के लिये मजबूत नेतृत्व तैयार होना चाहिये। इस हेतु यूनिसेफ उचित समय पर विभिन्न धर्मो के प्रमुख हितधारकों के बीच परिणाम और परिणाम उन्मुखीकरण का निर्माण करेंगे। धर्मगुरूओं की पावन उपस्थिति में सभी ने मिलकर एक स्वर में वैश्विक मानदंडों के अनुरूप जलवायु परिवर्तन, सूखा, पर्यावरणीय स्थिरता और सुरक्षा, पानी, भोजन, पोषण, आजीविका, मानव आवास और खाद्य सुरक्षा को सुचारू करने का संकल्प लिया।
नोयडा । भावी पीढ़ी के लिये जलवायु जनक लक्ष्य प्राप्त करने हेतु समिट का आयोजन किया गया। इस समिट में परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष और ग्लोबल इण्टरफेथ वाश एलायंस के संस्थापक स्वामी चिदानन्द, मौलाना महमूद असअद मदनी दिल्ली एवं अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों ने सहभाग कर जलवायु जनक लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अपने सुझाव प्रस्तुत किये। यह कार्यक्रम तीन सत्र में सम्पन्न हुआ जिसमें अनेक विषयों पर चिंतन किया गया यथा जीवन के अनुभव और विकास के साथ बदलते परिवेश और कठिन परिस्थितियों को एक सुरक्षात्मक वातावरण में बदलना, प्रभावी समन्वय के लिये एक एकीकृत क्षेत्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता, भोजन, पानी और आजीविका, खाद्य सुरक्षा, लड़कियों और महिलाओं के पोषण की स्थिति में सुधार, मृदा और पादप, आर्द्रभूमि, जल निकायों और जंगल के घनत्व की गुणवत्ता जैसे अनेक विषयों पर चिंतन किया गया। इस अवसर पर जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती , यूनिसेफ की भारतीय प्रतिनिधि यास्मीन अली हक, मराठवाड़ा से आयी महिला किसान, मध्यप्रदेश के वाटर हार्वेस्टर, साध्वी आदित्यनन्दा सरस्वती , गंगा एक्शन परिवार से गंगा नन्दिनी त्रिपाठी, विभिन्न धर्मो के धर्मगुरू, विशेषज्ञों, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के अनेेक विद्याथियों ने सहभाग किया। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भावी पीढ़ी के लिये जलवायु जनक लक्ष्य प्राप्त करने हेतु आयोजित समिट को सम्बोधित करते हुये कहा कि 'नेल्सन मंडेला' ने कहा था कि 'बचाव एवं सुरक्षा स्वतः ही संभव नहीं है, यह सामूहिक सर्वसम्मति और सार्वजनिक निवेश का परिणाम है। हमें अपने बच्चों को, जो कि समाज के सबसे कोमल और कमजोर नागरिक है, एक यातना और भय से मुक्त जीवन देना होगा।' वास्तव में आज हमें इस कथन पर गहराई से चिंतन करने की जरूरत है कि क्या हम अपनी भावी पीढ़ियों और हमारे इन छोटे-छोटे बच्चों को स्वच्छ जल, शुद्ध वायु और पर्याप्त और प्रदूषण रहित खाद्य सामग्री दे पा रहे हैं। स्वच्छ, स्वस्थ, मस्त, सुरक्षित और व्यवस्थित बचपन पर सभी बच्चों का अधिकार है। सुरक्षित और व्यवस्थित बचपन ऐसी नींव तैयार करता है जिस पर हमारे देश के भविष्य की इमारत बुलंद होती है इसलिये नीति निर्माताओं और धर्मगुरूओं की जिम्मेदारी है कि बच्चों को उनके हितों, अधिकारों, सुविधाओं और सुरक्षित माहौल से युक्त जीवन प्रदान करें जिससे उनका सम्पूर्ण विकास हो सके। अगर समाज और सरकार दोनों मिलकर इस ओर कार्य करें तो विलक्षण परिवर्तन हो सकता है। स्वामी ने कहा कि आज के दौर में हम इकोलाॅजिकल ओवरसूट से गुजर रहे हैं। इकोलाॅजिकल ओवरसूट अर्थात इकोलाॅजिकल फ्रूट प्रिंट का आबादी की जैव क्षमता से अधिक होना है। आईये इन दोनों महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करते हैं कि क्या है इकोलाॅजिकल ओवरसूट या अर्थ ओवरसूट अर्थात भविष्य में आने वाली मानव और अन्य प्राणियों, पीढ़ियों को जीवन यापन के लिये धरा पर जो भू-भाग, जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधनोेें की जरूरत पड़ेगी उसको हम कम कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपनी आय से अधिक रूपये खर्च कर रहे हैं। हमें जितने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना चाहिये हम उससे कहीं अधिक मात्रा में कर रहे हैं यही है अर्थ ओवरसूट। अर्थ ओवर सूट अर्थात पृथ्वी एक वर्ष में जितने संसाधन उत्पादित करती है उसे विश्व की आबादी वर्ष के पहले दिन ही खर्च कर देती है। वर्ष दो हज़ार अट्ठारह की बात करें तो पृथ्वी द्वारा उत्पादित संसाधन जो तीन सौ पैंसठ दिनों के लिये थे उसे हमने दो सौ बारह दिन मैं ही समाप्त कर दिया शेष बचे एक सौ तिरेपन दिन हमने पृथ्वी के संसाधनों का अति दोहन किया। अब हमारी स्थिति ऐसी है कि हमें जितने संसाधनों की जरूरत है उसके लिये हमें एक.सात पृथ्वी की जरूरत पड़़ेगी। इकोलाॅजिकल फ्रूट प्रिंट ( मानवीय मांग का एक मापक है जो मनुष्य के मांग की तुलना पृथ्वी की पारिस्थितिकी के पुनरूत्पादन करने की क्षमता से करता है। अर्थात जनसंख्या बढ़ रही है तो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भी अधिक हो रहा है साथ ही अपशिष्ट की भी भारी मात्रा में वृद्धि हो रही है। वर्तमान में जितनी प्राकृतिक संसाधनों की मांग है उतना धरा पर मौजूद नहीं है । इन मुद्दों पर चितंन करने की जरूरत है ताकि भावी पीढ़ियों को सुरक्षित जीवन प्रदान किया जा सके। यूनिसेफ इंडिया रिप्रेजेंटेटिव यास्मीन अली हक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन मानव गतिविधियों के कारण होता है। यह बच्चों के जीवन पर विशेष रूप से प्रभाव डाल रहा है। यथा कहीं पर बाढ़, सूखा, गर्मी की लहर से बड़ों की तुलना में बच्चों का जीवन अधिक प्रभावित हो रहा है। उन्होने बताया कि यूनिसेफ के अनुसार जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट के कारण ये छह क्षेत्र यथा स्वास्थ्य, पोषण, पानी, स्वच्छता, बाल संरक्षण, सामाजिक समावेश और शिक्षा प्रभावित हुये है। उन्होने कहा कि मेरा विश्वास है कि मानव प्राकृतिक संसाधनों के साथ जीना सीख जाये तो जलवायु परिवर्तन की गतिविधियों को कम किया जा सकता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से हम "पारिस्थितिक रणनीतियाँ" तैयार कर सकते है। उन्होने कहा कि हम मनुष्य और अन्य जीवित प्रणालियों के मध्य एक सहज बंधन है। हमारा पूरा जीवन पौधों, जानवरों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है फिर भी हम अपने आप को प्रकृति के अलग देख रहे हैै, जबकि हम प्रकृति को मानव डिजाइन करने वाला और विकास की प्रेरणा के रूप में देख सकते है और मानव के स्थायी जीवन के सह-निर्माता बन सकते हैं। यास्मीन अली हक ने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार ने उनतीस डार्क ब्लाॅक जो गंभीर भूजल स्तर से गुजर रहे है उस पर कार्य कर रही हैं। साथ ही देश के विभिन्न भागों से आये लोगों ने भी अपने अनुभवों को साझा किया। इस कार्यक्रम के तीसरे सत्र में विभिन्न धर्मो के धर्मगुरूओं ने हमारे ग्रह और हमारे बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिये नीति बनाने के उच्च सोपानों पर चर्चा की। सभी ने कहा कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील परिणामों के लिये मजबूत नेतृत्व तैयार होना चाहिये। इस हेतु यूनिसेफ उचित समय पर विभिन्न धर्मो के प्रमुख हितधारकों के बीच परिणाम और परिणाम उन्मुखीकरण का निर्माण करेंगे। धर्मगुरूओं की पावन उपस्थिति में सभी ने मिलकर एक स्वर में वैश्विक मानदंडों के अनुरूप जलवायु परिवर्तन, सूखा, पर्यावरणीय स्थिरता और सुरक्षा, पानी, भोजन, पोषण, आजीविका, मानव आवास और खाद्य सुरक्षा को सुचारू करने का संकल्प लिया।
मध्य प्रदेश के उज्जैन को काल गणना का केंद्र माना जाता है। अब यहां जंतर मंतर पर वैदिक घड़ी लगाई जाएगी। इससे कालगणना तो आसान होगी ही शुभ मुहूर्त, नक्षत्र, जयंती, व्रत, त्योहार की भी जानकारी मिलेगी। मध्यप्रदेश के उज्जैन को काल गणना का केंद्र माना जाता है। उज्जयिनी में दक्षिण की ओर मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के दाहिनी तरफ जयसिंहपुरा स्थान को प्रेक्षाग्रह जंतर मंतर महल के नाम से जाना जाता है। इसका जयपुर के महाराजा जयसिंह ने 1733 ईस्वी में आज से 300 साल पहले निर्माण कराया था। उज्जयिनी को वापस कालगणना की दृष्टि से पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से रविवार को जंतर मंतर पर वैदिक घड़ी का भूमि पूजन उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव के मुख्य आतिथ्य में हुआ। यहां लगने वाली वैदिक घड़ी की लागत करीब 1 करोड़ 62 लाख रुपये है। भारत के खगोलशास्त्री तथा भूगोलवेत्ता यह मानते आए हैं कि देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है। यहां के प्रेक्षाग्रह का भी विशेष महत्व रहा है। वैदिक घड़ी में वैदिक से संबंधित जानकारियां भी मिलेंगी जैसे सूर्य का उदय और अस्त होना, ज्योतिषी, पंचांग, विक्रम संवत आदि। उज्जैन मैं वैदिक घड़ी काल गणना के सिद्धांतों के आधार पर होगी। प्रतिदिन सूर्योदय में होने वाले परिवर्तन तथा देश और दुनिया के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समय पर होने वाला सूर्योदय भी सिंक्रोनाइज होगा। वैदिक घड़ी की एप्लिकेशन में विक्रम पंचांग भी समाहित रहेगा जो प्रतिदिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त, विक्रम संवत मास, ग्रह स्थिति, योग, भद्रा स्थिति, चंद्र स्थिति, पर्व, शुभाशुभ मुहूर्त, नक्षत्र, जयंती, व्रत, त्योहार, चोघड़िया, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, प्रमुख अवकाश, आकाशस्य ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि ज्योतिःस्वरूप पदार्थो का स्वरूप, संचार, परिभ्रमण, कालग्रहण आदि घटनाओं का निरूपण, तिथि वार, नक्षत्र, योग, करण, आदि की विस्तृत जानकारी अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएगा। वैदिक घड़ी एप्लिकेशन को मोबाइल, एलईडी, स्मार्ट टीवी, टैब, डिजिटल घड़ी आदि पर देखा जा सकेगा। वैदिक घड़ी के बैकग्राउंड ग्राफिक्स में सभी ज्योतिर्लिंग, नवग्रह, राशि चक्र, सूर्योदय, सूर्यास्त आदि रहेंगे। उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव के अनुसार वैदिक घड़ी को बनाने में 1 करोड़ 62 लाख के करीब खर्च आएगा। पहले इसे उज्जैन के बीच टावर पर लगाने का प्लान था लेकिन कालगणना की दृष्टि से इसे अब जंतर मंतर पर लगाया जाएगा। मंत्री ने बताया कि भारतीय गणना का महत्व उज्जैन से ही जाना जाता है। दशमलव और शून्य के आधार पर ही गणना की जाती है। 300 साल पहले खगोलीय ज्ञान के लिए यंत्र लगाए थे जिसमें उज्जैन का जंतर मंतर भी शामिल है। इस स्थान के अलावा जयपुर, मथुरा और बनारस में वेधशाला बनाई गई थी। ग्रीनविथ से 300 साल पहले स्टैंडर्ड टाइम की कल्पना करते थे वह फिर से शुरू हो इसके लिए शासन एक प्रयास कर रहा है। जंतर मंतर की इस भूमि पर एक स्तंभ बनेगा जिस पर वैदिक घड़ी लगाई जाएगी। वैदिक घड़ी मुहूर्त से लेकर ग्रहदशा तक बताएगी।
मध्य प्रदेश के उज्जैन को काल गणना का केंद्र माना जाता है। अब यहां जंतर मंतर पर वैदिक घड़ी लगाई जाएगी। इससे कालगणना तो आसान होगी ही शुभ मुहूर्त, नक्षत्र, जयंती, व्रत, त्योहार की भी जानकारी मिलेगी। मध्यप्रदेश के उज्जैन को काल गणना का केंद्र माना जाता है। उज्जयिनी में दक्षिण की ओर मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के दाहिनी तरफ जयसिंहपुरा स्थान को प्रेक्षाग्रह जंतर मंतर महल के नाम से जाना जाता है। इसका जयपुर के महाराजा जयसिंह ने एक हज़ार सात सौ तैंतीस ईस्वी में आज से तीन सौ साल पहले निर्माण कराया था। उज्जयिनी को वापस कालगणना की दृष्टि से पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से रविवार को जंतर मंतर पर वैदिक घड़ी का भूमि पूजन उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव के मुख्य आतिथ्य में हुआ। यहां लगने वाली वैदिक घड़ी की लागत करीब एक करोड़ बासठ लाख रुपये है। भारत के खगोलशास्त्री तथा भूगोलवेत्ता यह मानते आए हैं कि देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है। यहां के प्रेक्षाग्रह का भी विशेष महत्व रहा है। वैदिक घड़ी में वैदिक से संबंधित जानकारियां भी मिलेंगी जैसे सूर्य का उदय और अस्त होना, ज्योतिषी, पंचांग, विक्रम संवत आदि। उज्जैन मैं वैदिक घड़ी काल गणना के सिद्धांतों के आधार पर होगी। प्रतिदिन सूर्योदय में होने वाले परिवर्तन तथा देश और दुनिया के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समय पर होने वाला सूर्योदय भी सिंक्रोनाइज होगा। वैदिक घड़ी की एप्लिकेशन में विक्रम पंचांग भी समाहित रहेगा जो प्रतिदिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त, विक्रम संवत मास, ग्रह स्थिति, योग, भद्रा स्थिति, चंद्र स्थिति, पर्व, शुभाशुभ मुहूर्त, नक्षत्र, जयंती, व्रत, त्योहार, चोघड़िया, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, प्रमुख अवकाश, आकाशस्य ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि ज्योतिःस्वरूप पदार्थो का स्वरूप, संचार, परिभ्रमण, कालग्रहण आदि घटनाओं का निरूपण, तिथि वार, नक्षत्र, योग, करण, आदि की विस्तृत जानकारी अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएगा। वैदिक घड़ी एप्लिकेशन को मोबाइल, एलईडी, स्मार्ट टीवी, टैब, डिजिटल घड़ी आदि पर देखा जा सकेगा। वैदिक घड़ी के बैकग्राउंड ग्राफिक्स में सभी ज्योतिर्लिंग, नवग्रह, राशि चक्र, सूर्योदय, सूर्यास्त आदि रहेंगे। उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव के अनुसार वैदिक घड़ी को बनाने में एक करोड़ बासठ लाख के करीब खर्च आएगा। पहले इसे उज्जैन के बीच टावर पर लगाने का प्लान था लेकिन कालगणना की दृष्टि से इसे अब जंतर मंतर पर लगाया जाएगा। मंत्री ने बताया कि भारतीय गणना का महत्व उज्जैन से ही जाना जाता है। दशमलव और शून्य के आधार पर ही गणना की जाती है। तीन सौ साल पहले खगोलीय ज्ञान के लिए यंत्र लगाए थे जिसमें उज्जैन का जंतर मंतर भी शामिल है। इस स्थान के अलावा जयपुर, मथुरा और बनारस में वेधशाला बनाई गई थी। ग्रीनविथ से तीन सौ साल पहले स्टैंडर्ड टाइम की कल्पना करते थे वह फिर से शुरू हो इसके लिए शासन एक प्रयास कर रहा है। जंतर मंतर की इस भूमि पर एक स्तंभ बनेगा जिस पर वैदिक घड़ी लगाई जाएगी। वैदिक घड़ी मुहूर्त से लेकर ग्रहदशा तक बताएगी।
तीन साल में विपक्ष को कोई मुद्दा नहीं मिला। इसलिए अब भारतीय जनता पार्टी रीट परीक्षा को मुद्दा बनाकर केवल कांग्रेस सरकार को बदनाम करने में लगी हुई है। यह बात सीकर दौरे पर आए प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्य्क्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने कही। इसके साथ ही डोटासरा ने कहा कि भाजपा पार्टी का काम चुनाव आते ही केंद्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग कर विपक्ष के लोगों को डराना धमकाना है। जिसके लिए कांग्रेस पूरी तरह से तैयार है। डोटासरा ने रविवार को यहां भारतीय जनता पार्टी, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधा। प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा, राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गुड गवर्नेंस के साथ जनहित के अच्छे फैसले ले रही है। कोरोना काल में बेहतर मैनेजमेंट हुआ, अच्छा बजट प्रस्तुत हुआ, जन घोषणा पत्र के 70 परसेंट से ज्यादा 3 साल के अंदर-अंदर उसके वादे पूरे किए गए, लेकिन भारतीय जनता पार्टी राजस्थान में 3 साल में प्रतिपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाया। एक भी मुद्दे के ऊपर वह सरकार को घेरने में नाकाम रही। अब जब केंद्र ने उनकी खिंचाई की है बेवजह मुद्दा बनाकर के 2600000 बेरोजगारों के साथ कुठाराघात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी कहा है कि प्रश्नपत्रों में नकल की बातें, पेपर आउट होने की बातें, यह सारे देश के अंदर हर स्टेट के अंदर होती रही हैं। जब जो सरकार रही है उसने समय-समय पर ऊपर अपने हिसाब से कार्रवाई की। कानून के हिसाब से कार्रवाई की। केवल राजस्थान में रीट के मुद्दे को लेकर प्रतिपक्ष इसलिए सीबीआई जांच की मांग कर रहा है कि कोई भी ऐसा मुद्दा पिछले 3 सालों में मिला नहीं। सीबीआई और ईडी और इनकम टैक्स का दुरुपयोग और पेगसास के आधार पर जासूसी करना आमबात हो गई है। डोटसरा ने कहा कि पिछली भाजपा सरकार के शासन में रीट, जेल प्रहरी समेत कई परीक्षाओं में नकल जैसे मामले हुए। उस समय केंद्र में और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार थी। यदि सरकार चाहती तो पूरे मामले को खुलवा सकती थी, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। डोटासरा ने कहा, पहले तो परीक्षा में हुई नकल, पेपर आउट जैसे कई मामलों का विपक्ष और आमजन को पता ही नहीं चल पाया। जब सरकार को इस बात का पता चला तो उन्होंने इसकी जांच एसओजी को सौंपी जो अभी भी जारी है। जांच में पूरा दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा। लेकिन केवल इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई केंद्र में यह साबित करना चाहती है कि वह प्रतिपक्ष की भूमिका अच्छे से निभा रही है। डोटासरा ने कहा कि भाजपा चाहती है कि परीक्षा की जांच सीबीआई में चली जाए। यदि ऐसा होता है दो साल तक कोई कार्रवाई नहीं होगी। ऐसे में मौजूदा कांग्रेस सरकार के बचे हुए दो साल निकल जायेंगे जिसमें एक भी अभ्यर्थी को नियुक्ति नहीं मिलेगी। यही भाजपा का टारगेट है। डोटासरा ने कहा, सतीश पूनिया, गुलाबचंद कटारिया, किरोड़ी लाल केवल और केवल रीट को मुद्दा बनाकर आलाकमान अपने नंबर बढ़ाने में लगे हुए हैं। केंद्र ने एक सर्वे करवाया जिसमें यह सामने आया है कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार रिपीट हो रही है। ऐसे में अब भाजपा की यही कोशिश है कि कैसे सरकार को बदनाम किया जाए। पहले तो भारतीय जनता पार्टी के अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने प्रदेश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश की और जब इसमें नाकाम हुए तो अब दूसरा षड्यंत्र सीबीआई जांच का कर रहे हैं। पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि केंद्र में राजस्थान से 25 के 25 सांसद भाजपा के होने के बावजूद भी आज तक कोई भी फूटी कौड़ी नहीं लेकर आया है। भाजपा में 8 से 10 नेता मुख्यमंत्री के दावेदार बने हुए बैठे हैं। प्रतिपक्ष में होने के बावजूद भी पार्टी के नेता एक दूसरे से बात तक नहीं करते हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी अपनी इन कमियों को छिपाकर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहती है। भाजपा के विधायक दल की बैठक में कुर्सियां चलने तक की नौबत आ गई थी। ऐसे मैं जिस तरह का रवैया विपक्ष अपना रहा है। वह केवल प्रोपोगेंडा है। डोटासरा ने कहा, मैंने पहले भी बयान दिया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पाठशाला में झूठ, फरेब, बेईमानी सिखाई जाती है। अब यदि वही बात में रिपीट करता हूं तो इनके पेट में मरोड़े आने शुरू हो जाते हैं। भाजपा केवल और केवल मुझे केंद्रित कर अभियान चला रही है जिसका साफ संदेश यही है कि हमारी सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। सरकार आरएसएस के झूठे प्रोपेगेंडा को जनता में उजागर कर रही है। पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि राजस्थान के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई अधिकारी या कर्मचारी नकल या पेपर आउट जैसे मामलों में संलिप्त पाया जाता है तो उसे सर्विस से बर्खास्त किया जाएगा। जांच में एसओजी अंतिम छोर तक पहुंच रही है जबकि भाजपा सरकार के समय जो परीक्षा आउट हुई उनकी न तो सरकार ने स्टेट एजेंसी से सही जांच करवाई न ही सीबीआई को सौंपा। ऐसे में अब केवल गुड गवर्नेंस कांग्रेस सरकार को बदनाम करने के लिए सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। साथ ही जो भी नेता R. S. S. के खिलाफ बोले उस पर बयानबाजी और आरोप लगाना भाजपा का काम है। डोटासरा ने कहा, केंद्र सरकार का एक ही एजेंडा है कि जैसे ही किसी राज्य में चुनाव नजदीक आते हैं तो वे सीबीआई, ईडी आदि का उपयोग कर विपक्ष के लोगों को डराने धमकाने का काम करती है। जिसके लिए हम पूरी तरह से तैयार हैं। डोटासरा ने कहा, मैं स्वच्छ राजनीति करता हूं, लेकिन जब विपक्ष पूरी तरह से फेल हो गया तो उनके पेट में मरोड़े आने शुरू हो गए हैं। पिछले बजट का दिसंबर तक सरकार ने 80% उपयोग कर लिया जबकि 40 परसेंट से ऊपर उपयोग किसी भी शासन में नहीं हुआ। कोरोना काल में राज्य सरकार की इनकम घट गई, केंद्र से पैसे नहीं मिले, इसके बाद भी सरकार शानदार बजट लेकर आई। एक तरफ जहां भाजपा की केंद्र सरकार ने 15 महीनों तक किसानों की दुर्गति की। इसके बाद बजट में पानी के लिए पैकेज भी नहीं दे पाई। डोटासरा ने कहा, जनता सचाई जानती है। सब लोग जानते हैं यह केवल और केवल थोथी बदनामी करके केंद्र से वाहवाही लेना चाहती है जो इन्हें नहीं मिलने वाली है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
तीन साल में विपक्ष को कोई मुद्दा नहीं मिला। इसलिए अब भारतीय जनता पार्टी रीट परीक्षा को मुद्दा बनाकर केवल कांग्रेस सरकार को बदनाम करने में लगी हुई है। यह बात सीकर दौरे पर आए प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्य्क्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने कही। इसके साथ ही डोटासरा ने कहा कि भाजपा पार्टी का काम चुनाव आते ही केंद्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग कर विपक्ष के लोगों को डराना धमकाना है। जिसके लिए कांग्रेस पूरी तरह से तैयार है। डोटासरा ने रविवार को यहां भारतीय जनता पार्टी, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधा। प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा, राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गुड गवर्नेंस के साथ जनहित के अच्छे फैसले ले रही है। कोरोना काल में बेहतर मैनेजमेंट हुआ, अच्छा बजट प्रस्तुत हुआ, जन घोषणा पत्र के सत्तर परसेंट से ज्यादा तीन साल के अंदर-अंदर उसके वादे पूरे किए गए, लेकिन भारतीय जनता पार्टी राजस्थान में तीन साल में प्रतिपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाया। एक भी मुद्दे के ऊपर वह सरकार को घेरने में नाकाम रही। अब जब केंद्र ने उनकी खिंचाई की है बेवजह मुद्दा बनाकर के छब्बीस लाख बेरोजगारों के साथ कुठाराघात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी कहा है कि प्रश्नपत्रों में नकल की बातें, पेपर आउट होने की बातें, यह सारे देश के अंदर हर स्टेट के अंदर होती रही हैं। जब जो सरकार रही है उसने समय-समय पर ऊपर अपने हिसाब से कार्रवाई की। कानून के हिसाब से कार्रवाई की। केवल राजस्थान में रीट के मुद्दे को लेकर प्रतिपक्ष इसलिए सीबीआई जांच की मांग कर रहा है कि कोई भी ऐसा मुद्दा पिछले तीन सालों में मिला नहीं। सीबीआई और ईडी और इनकम टैक्स का दुरुपयोग और पेगसास के आधार पर जासूसी करना आमबात हो गई है। डोटसरा ने कहा कि पिछली भाजपा सरकार के शासन में रीट, जेल प्रहरी समेत कई परीक्षाओं में नकल जैसे मामले हुए। उस समय केंद्र में और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार थी। यदि सरकार चाहती तो पूरे मामले को खुलवा सकती थी, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। डोटासरा ने कहा, पहले तो परीक्षा में हुई नकल, पेपर आउट जैसे कई मामलों का विपक्ष और आमजन को पता ही नहीं चल पाया। जब सरकार को इस बात का पता चला तो उन्होंने इसकी जांच एसओजी को सौंपी जो अभी भी जारी है। जांच में पूरा दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा। लेकिन केवल इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई केंद्र में यह साबित करना चाहती है कि वह प्रतिपक्ष की भूमिका अच्छे से निभा रही है। डोटासरा ने कहा कि भाजपा चाहती है कि परीक्षा की जांच सीबीआई में चली जाए। यदि ऐसा होता है दो साल तक कोई कार्रवाई नहीं होगी। ऐसे में मौजूदा कांग्रेस सरकार के बचे हुए दो साल निकल जायेंगे जिसमें एक भी अभ्यर्थी को नियुक्ति नहीं मिलेगी। यही भाजपा का टारगेट है। डोटासरा ने कहा, सतीश पूनिया, गुलाबचंद कटारिया, किरोड़ी लाल केवल और केवल रीट को मुद्दा बनाकर आलाकमान अपने नंबर बढ़ाने में लगे हुए हैं। केंद्र ने एक सर्वे करवाया जिसमें यह सामने आया है कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार रिपीट हो रही है। ऐसे में अब भाजपा की यही कोशिश है कि कैसे सरकार को बदनाम किया जाए। पहले तो भारतीय जनता पार्टी के अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने प्रदेश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश की और जब इसमें नाकाम हुए तो अब दूसरा षड्यंत्र सीबीआई जांच का कर रहे हैं। पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि केंद्र में राजस्थान से पच्चीस के पच्चीस सांसद भाजपा के होने के बावजूद भी आज तक कोई भी फूटी कौड़ी नहीं लेकर आया है। भाजपा में आठ से दस नेता मुख्यमंत्री के दावेदार बने हुए बैठे हैं। प्रतिपक्ष में होने के बावजूद भी पार्टी के नेता एक दूसरे से बात तक नहीं करते हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी अपनी इन कमियों को छिपाकर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहती है। भाजपा के विधायक दल की बैठक में कुर्सियां चलने तक की नौबत आ गई थी। ऐसे मैं जिस तरह का रवैया विपक्ष अपना रहा है। वह केवल प्रोपोगेंडा है। डोटासरा ने कहा, मैंने पहले भी बयान दिया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पाठशाला में झूठ, फरेब, बेईमानी सिखाई जाती है। अब यदि वही बात में रिपीट करता हूं तो इनके पेट में मरोड़े आने शुरू हो जाते हैं। भाजपा केवल और केवल मुझे केंद्रित कर अभियान चला रही है जिसका साफ संदेश यही है कि हमारी सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। सरकार आरएसएस के झूठे प्रोपेगेंडा को जनता में उजागर कर रही है। पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि राजस्थान के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई अधिकारी या कर्मचारी नकल या पेपर आउट जैसे मामलों में संलिप्त पाया जाता है तो उसे सर्विस से बर्खास्त किया जाएगा। जांच में एसओजी अंतिम छोर तक पहुंच रही है जबकि भाजपा सरकार के समय जो परीक्षा आउट हुई उनकी न तो सरकार ने स्टेट एजेंसी से सही जांच करवाई न ही सीबीआई को सौंपा। ऐसे में अब केवल गुड गवर्नेंस कांग्रेस सरकार को बदनाम करने के लिए सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। साथ ही जो भी नेता R. S. S. के खिलाफ बोले उस पर बयानबाजी और आरोप लगाना भाजपा का काम है। डोटासरा ने कहा, केंद्र सरकार का एक ही एजेंडा है कि जैसे ही किसी राज्य में चुनाव नजदीक आते हैं तो वे सीबीआई, ईडी आदि का उपयोग कर विपक्ष के लोगों को डराने धमकाने का काम करती है। जिसके लिए हम पूरी तरह से तैयार हैं। डोटासरा ने कहा, मैं स्वच्छ राजनीति करता हूं, लेकिन जब विपक्ष पूरी तरह से फेल हो गया तो उनके पेट में मरोड़े आने शुरू हो गए हैं। पिछले बजट का दिसंबर तक सरकार ने अस्सी% उपयोग कर लिया जबकि चालीस परसेंट से ऊपर उपयोग किसी भी शासन में नहीं हुआ। कोरोना काल में राज्य सरकार की इनकम घट गई, केंद्र से पैसे नहीं मिले, इसके बाद भी सरकार शानदार बजट लेकर आई। एक तरफ जहां भाजपा की केंद्र सरकार ने पंद्रह महीनों तक किसानों की दुर्गति की। इसके बाद बजट में पानी के लिए पैकेज भी नहीं दे पाई। डोटासरा ने कहा, जनता सचाई जानती है। सब लोग जानते हैं यह केवल और केवल थोथी बदनामी करके केंद्र से वाहवाही लेना चाहती है जो इन्हें नहीं मिलने वाली है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी परचम लहराने वाली पार्टी सीपीआई (एम) ने टीएमसी, भाजपा और आरएसएस पर जोरदार हमला बोला है। सीपीआई(एम) नेता मोहम्मद सलीम ने आरएसएस को नंबर वन दुश्मन बताते हुए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को चुनावी मैदान में देख लेने की चुनौती दी है। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए साक्षात्कार में मोहम्मद सलीम ने आगे कहा कि राज्य में अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए भाजपा और टीएमसी की जनविरोधी नीति को जनता के बीच ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी शिक्षित युवा नेताओं का एक कैडर भी तैयार करेगी। Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी परचम लहराने वाली पार्टी सीपीआई ने टीएमसी, भाजपा और आरएसएस पर जोरदार हमला बोला है। सीपीआई नेता मोहम्मद सलीम ने आरएसएस को नंबर वन दुश्मन बताते हुए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को चुनावी मैदान में देख लेने की चुनौती दी है। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए साक्षात्कार में मोहम्मद सलीम ने आगे कहा कि राज्य में अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए भाजपा और टीएमसी की जनविरोधी नीति को जनता के बीच ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी शिक्षित युवा नेताओं का एक कैडर भी तैयार करेगी। Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
साल 2017 खत्म हो गया है और साल 2018 अपनी दस्तक दे चुका हैं। क्रिकेट के मैदान से भी साल 2017 में कई खास रिकॉर्ड बने और कई युवा खिलाड़ी निकलकर सामनें आए। ऐसे में पिछले साल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की लिस्ट अपनी-अपनी पसंद की बनती जा रही है। साल 2018 शुरू तो हो गया है लेकिन पिछले साल की सर्वश्रेष्ठ टीम बनाने का काम अभी भी जारी है और इस बार क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने पिछले साल की अपनी बेस्ट वनडे टीम चुनी है। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के द्वारा साल 2017 की बेस्ट वनडे टीम का तो चयन किया गया है इसमें खास बात ये रही कि ऑस्ट्रेलिया का एक भी खिलाड़ी इसमें अपनी जगह बनाने में नाकाम रहा। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने 2017 में खिलाड़ियों के रिकॉर्ड के आधार पर टीम का चयन किया, जिसमें भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को कप्तान नियुक्त किया गया है। विराट कोहली ने कप्तानी के साथ ही अपनी बल्लेबाजी से भी 2017 में खूब चमक बिखेरी है। वहीं क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के इस टीम में सलामी बल्लेबाज के रूप में भारत के सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा को शामिल करने के साथ ही दक्षिण अफ्रीका के युवा विकेटकीपर बल्लेबाज क्विंटन डी कॉक को सलामी बल्लेबाज के साथ ही विकेटकीपर की दोहरी भूमिका दी गई है। नंबर तीन तीन पर विराट कोहली को रखा गया है इसके बाद इस टीम में नंबर चार के बल्लेबाज के रूप में इंग्लैंड के टेस्ट कप्तान जो रूट को जगह दी है। दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज बल्लेबाज मिस्टर 360 डिग्री एबी डीविलियर्स पांचवे नंबर के बल्लेबाज हैं इसके साथ ही इंग्लैंड के स्टार ऑलराउंडर बेन स्टोक्स और भारत के उभरते ऑलराउंडर हार्दिक पंड्या के रूप में दो ऑलराउंर खिलाड़ी शामिल किए गए हैं जो बल्लेबाजी के साथ ही गेंदबाजी में भी गहरायी देते हैं। बल्लेबाजों के इस क्रम के साथ ही क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने गेंदबाजी आक्रमण में भी संतुलन को पूरी तरह से कामय रखा है। गेंदबाजी आक्रमण की जिम्मेदारी इंग्लैंड के तेज गेंदबाज लियाम प्लंकेट, पाकिस्तान के उभरते सितारें हसन अली और न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाज ट्रेंट बोल्ट को चुना है इसके साथ ही स्पिन गेंदबाजी की जिम्मेदारी 2017 की सनसनी अफगानिस्तान के राशिद खान को दी गई है।
साल दो हज़ार सत्रह खत्म हो गया है और साल दो हज़ार अट्ठारह अपनी दस्तक दे चुका हैं। क्रिकेट के मैदान से भी साल दो हज़ार सत्रह में कई खास रिकॉर्ड बने और कई युवा खिलाड़ी निकलकर सामनें आए। ऐसे में पिछले साल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की लिस्ट अपनी-अपनी पसंद की बनती जा रही है। साल दो हज़ार अट्ठारह शुरू तो हो गया है लेकिन पिछले साल की सर्वश्रेष्ठ टीम बनाने का काम अभी भी जारी है और इस बार क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने पिछले साल की अपनी बेस्ट वनडे टीम चुनी है। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के द्वारा साल दो हज़ार सत्रह की बेस्ट वनडे टीम का तो चयन किया गया है इसमें खास बात ये रही कि ऑस्ट्रेलिया का एक भी खिलाड़ी इसमें अपनी जगह बनाने में नाकाम रहा। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने दो हज़ार सत्रह में खिलाड़ियों के रिकॉर्ड के आधार पर टीम का चयन किया, जिसमें भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को कप्तान नियुक्त किया गया है। विराट कोहली ने कप्तानी के साथ ही अपनी बल्लेबाजी से भी दो हज़ार सत्रह में खूब चमक बिखेरी है। वहीं क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के इस टीम में सलामी बल्लेबाज के रूप में भारत के सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा को शामिल करने के साथ ही दक्षिण अफ्रीका के युवा विकेटकीपर बल्लेबाज क्विंटन डी कॉक को सलामी बल्लेबाज के साथ ही विकेटकीपर की दोहरी भूमिका दी गई है। नंबर तीन तीन पर विराट कोहली को रखा गया है इसके बाद इस टीम में नंबर चार के बल्लेबाज के रूप में इंग्लैंड के टेस्ट कप्तान जो रूट को जगह दी है। दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज बल्लेबाज मिस्टर तीन सौ साठ डिग्री एबी डीविलियर्स पांचवे नंबर के बल्लेबाज हैं इसके साथ ही इंग्लैंड के स्टार ऑलराउंडर बेन स्टोक्स और भारत के उभरते ऑलराउंडर हार्दिक पंड्या के रूप में दो ऑलराउंर खिलाड़ी शामिल किए गए हैं जो बल्लेबाजी के साथ ही गेंदबाजी में भी गहरायी देते हैं। बल्लेबाजों के इस क्रम के साथ ही क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने गेंदबाजी आक्रमण में भी संतुलन को पूरी तरह से कामय रखा है। गेंदबाजी आक्रमण की जिम्मेदारी इंग्लैंड के तेज गेंदबाज लियाम प्लंकेट, पाकिस्तान के उभरते सितारें हसन अली और न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाज ट्रेंट बोल्ट को चुना है इसके साथ ही स्पिन गेंदबाजी की जिम्मेदारी दो हज़ार सत्रह की सनसनी अफगानिस्तान के राशिद खान को दी गई है।
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और ब्रह्मचारी (1968 फ़िल्म) शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ। फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार vs. ब्रह्मचारी (1968 फ़िल्म) फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका द्वारा प्रति वर्ष दिया जाने वाला पुरस्कार है। . ब्रह्मचारी १९६८ में बनी हिन्दी भाषा की फ़िल्म है जिसका निर्देशन भप्पी सोनी ने किया है और जिसके निर्माता जी. फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और ब्रह्मचारी (1968 फ़िल्म) आम में 0 बातें हैं (यूनियनपीडिया में)। फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार 81 संबंध है और ब्रह्मचारी (1968 फ़िल्म) 21 है। वे आम 0 में है, समानता सूचकांक 0.00% है = 0 / (81 + 21)। यह लेख फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और ब्रह्मचारी (1968 फ़िल्म) के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और ब्रह्मचारी शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ। फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार vs. ब्रह्मचारी फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका द्वारा प्रति वर्ष दिया जाने वाला पुरस्कार है। . ब्रह्मचारी एक हज़ार नौ सौ अड़सठ में बनी हिन्दी भाषा की फ़िल्म है जिसका निर्देशन भप्पी सोनी ने किया है और जिसके निर्माता जी. फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और ब्रह्मचारी आम में शून्य बातें हैं । फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार इक्यासी संबंध है और ब्रह्मचारी इक्कीस है। वे आम शून्य में है, समानता सूचकांक शून्य.शून्य% है = शून्य / । यह लेख फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और ब्रह्मचारी के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
बठिंडा। अकाली भाजपा सरकार द्वारा हटाये गये सुविधा केन्द्र कर्मचारियों द्वारा भविष्य में किये जाने वाले संघर्ष की रूपरेखा तैयार करने के लिये बुधवार को चंडीगढ़ में बैठक रखी गई है। इस सम्बंध में पंजाब स्टेट सुविधा कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष रविन्द्र रवि फरीदकोट व महासचिव वरिन्द्र पाल सिंह लुधियाना ने कहा कि वह लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं परन्तु पहले अकाली सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी तथा अब सरकार बदलने के बाद भी कैप्टन सरकार उनसे और समय मांग रही है। उन्होंने कहाकि सात माह पहले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया तथा वह बेरोजगार बैठै हैं इसलिये उनके सब्र का प्याला भर गया है। इन नेताओं ने कहाकि चुनावों दौरान कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें बहुत विश्वास दिलवाया था कि उन्हें न्याय मिलेगा परन्तु अभी तक कोई न्याय नहीं मिला। उन्होंने मांग की कि शीघ्र ही मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह उन्हें मीटिंग का समय दें तथ उनकी मांगें पूरी करें।
बठिंडा। अकाली भाजपा सरकार द्वारा हटाये गये सुविधा केन्द्र कर्मचारियों द्वारा भविष्य में किये जाने वाले संघर्ष की रूपरेखा तैयार करने के लिये बुधवार को चंडीगढ़ में बैठक रखी गई है। इस सम्बंध में पंजाब स्टेट सुविधा कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष रविन्द्र रवि फरीदकोट व महासचिव वरिन्द्र पाल सिंह लुधियाना ने कहा कि वह लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं परन्तु पहले अकाली सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी तथा अब सरकार बदलने के बाद भी कैप्टन सरकार उनसे और समय मांग रही है। उन्होंने कहाकि सात माह पहले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया तथा वह बेरोजगार बैठै हैं इसलिये उनके सब्र का प्याला भर गया है। इन नेताओं ने कहाकि चुनावों दौरान कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें बहुत विश्वास दिलवाया था कि उन्हें न्याय मिलेगा परन्तु अभी तक कोई न्याय नहीं मिला। उन्होंने मांग की कि शीघ्र ही मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह उन्हें मीटिंग का समय दें तथ उनकी मांगें पूरी करें।
Posted On: राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में आज देश ने भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की 132वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। राष्ट्रपति ने आज सुबह संसद भवन परिसर में संसद भवन लॉन में बाबा साहेब की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने भी भारतीय संविधान के जनक डॉ. अम्बेडकर को पुष्पांजलि अर्पित की। केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार एवं अन्य केंद्रीय मंत्रियों, गणमान्य व्यक्तियों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस समारोह का आयोजन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा किया गया था।
Posted On: राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में आज देश ने भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की एक सौ बत्तीसवीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। राष्ट्रपति ने आज सुबह संसद भवन परिसर में संसद भवन लॉन में बाबा साहेब की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने भी भारतीय संविधान के जनक डॉ. अम्बेडकर को पुष्पांजलि अर्पित की। केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार एवं अन्य केंद्रीय मंत्रियों, गणमान्य व्यक्तियों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस समारोह का आयोजन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा किया गया था।
सतना। जिले के पुलिस अधीक्षक धर्मवीर सिंह वर्तमान में अपराध पर नकेल कसने की पूरी कोशिश में जुटे हैं। देखा जा रहा है कि जहां पुलिस टीम शहर में परेड लगा रही है तो दूसरी ओर निगरानीशुदा बदमाशों की परेड थाना में कराई जा रही है। यही कारण है कि रविवार की शाम 7 बजे के आसपास कोलगवां थाना के तकरीबन 50 पुलिस कर्मियों को एक साथ मारुति नगर एवं बर्दाडीह रेलवे फाटक के पास देखकर रहवासी सन्न रह गये। लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई है। आमजन अचानक बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों को देखकर चैक गये, कारण कि इससे पहले लोगों ने इतनी संख्या में पुलिस कर्मियों में देखा नहीं था जिससे आशंका होने लगी। आखिर पुलिस कर्मियों को ही बोलना पड़ा कि क्या हम लोग घूमने नहीं आ सकते। पुलिस कर्मी कुछ देर तक बर्दाडीह फाटक के पास रुकने के बाद चले गये। दरअसल एसपी धर्मवीर सिंह यादव की कांबिग गश्त की हिदायत के बाद संबंधित थानों की पुलिस पैदल ही मोहल्ले की सड़कें नाप रही है। एक साथ बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों को देख आवारा किस्म के लोग खिसक लिये। पुलिस की कांबिग गश्त को देखकर लोगों की जुबान में काफी समय तक चर्चा का विषय बना रहा। लोग यह कहते सुने गये यदि पुलिस इसी तरह गश्त हफ्ते में भी करती रहे तो आपराधिक गतिविधियों में लगाम लग सकती है। दूसरी ओर पुलिस अधीक्षक एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में सिटी कोतवाली थाना प्रभारी अर्चना द्विवेदी द्वारा निगरानीशुदा बदमाशोें को थाना में हाजिर होने के लिये निर्देशित किया। जहां मातहत कर्मियों ने बदमाशांे को थाना में उपस्थित कराया। जिनकी निगरानी परेड नगर पुलिस अधीक्षक सतना के समक्ष कराई गई। परेड के दौरान निगरानीशुदा बदमाशों की गतिविधियों की जानकारी एकत्रित की गई। वहीं बदमाशों को पुलिस द्वारा समझाइस दी गई। बताया गया है कि यह कार्यवाही लगातार जारी रहेगी।
सतना। जिले के पुलिस अधीक्षक धर्मवीर सिंह वर्तमान में अपराध पर नकेल कसने की पूरी कोशिश में जुटे हैं। देखा जा रहा है कि जहां पुलिस टीम शहर में परेड लगा रही है तो दूसरी ओर निगरानीशुदा बदमाशों की परेड थाना में कराई जा रही है। यही कारण है कि रविवार की शाम सात बजे के आसपास कोलगवां थाना के तकरीबन पचास पुलिस कर्मियों को एक साथ मारुति नगर एवं बर्दाडीह रेलवे फाटक के पास देखकर रहवासी सन्न रह गये। लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई है। आमजन अचानक बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों को देखकर चैक गये, कारण कि इससे पहले लोगों ने इतनी संख्या में पुलिस कर्मियों में देखा नहीं था जिससे आशंका होने लगी। आखिर पुलिस कर्मियों को ही बोलना पड़ा कि क्या हम लोग घूमने नहीं आ सकते। पुलिस कर्मी कुछ देर तक बर्दाडीह फाटक के पास रुकने के बाद चले गये। दरअसल एसपी धर्मवीर सिंह यादव की कांबिग गश्त की हिदायत के बाद संबंधित थानों की पुलिस पैदल ही मोहल्ले की सड़कें नाप रही है। एक साथ बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों को देख आवारा किस्म के लोग खिसक लिये। पुलिस की कांबिग गश्त को देखकर लोगों की जुबान में काफी समय तक चर्चा का विषय बना रहा। लोग यह कहते सुने गये यदि पुलिस इसी तरह गश्त हफ्ते में भी करती रहे तो आपराधिक गतिविधियों में लगाम लग सकती है। दूसरी ओर पुलिस अधीक्षक एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में सिटी कोतवाली थाना प्रभारी अर्चना द्विवेदी द्वारा निगरानीशुदा बदमाशोें को थाना में हाजिर होने के लिये निर्देशित किया। जहां मातहत कर्मियों ने बदमाशांे को थाना में उपस्थित कराया। जिनकी निगरानी परेड नगर पुलिस अधीक्षक सतना के समक्ष कराई गई। परेड के दौरान निगरानीशुदा बदमाशों की गतिविधियों की जानकारी एकत्रित की गई। वहीं बदमाशों को पुलिस द्वारा समझाइस दी गई। बताया गया है कि यह कार्यवाही लगातार जारी रहेगी।
Quick links: बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर अपने व्यस्त लाइफ में भी सोशल मीडिया अकाउंट को अपडेट रखती हैं। अक्सर उनकी नई-नई तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाया रहता है। हाल ही में एक्ट्रेस ने अपनी फैमिली के साथ एक प्यारी सी तस्वीर को शेयर किया है, जिसमें माता-पिता रणधीर कपूर और बबीता के साथ बड़ी बहन करिश्मा कपूर सभी हैप्पी मूड में नजर आ रहे हैं। इस पोस्ट को शेयर करते हुए एक्ट्रेस ने लिखा है 'मेरी दुनिया' । इस तस्वीर को करीना कपूर ने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है, जिसमें एक्ट्रेस की मां बबीता, पिता रणधीर कपूर और बहन करिश्मा कपूर के साथ बैठे हुए दिख रहे हैं। पोस्ट को शेयर करते हुए करीना ने लिखा है 'मेरी दुनिया' और साथ ही दिल का इमोजी बनाया है। बता दें इस तस्वीर में सभी खुश दिख रहे हैं। हर किसी ने कलरफूल ड्रेस पहना हुआ है। इसमे रणधीर कपूर और बबीता को सोफे के बीच में बैठे हुए नजर आएं हैं, जबकि उनके आस-पास करीना और करिश्मा कपूर बैठी हुई हैं। इस फैमिली फोटो को अब तक लाखों लोगों का प्यार मिल चुका है। अधिकतर लोगों ने हैप्पी फैमिली और लवली फैमिली लिख कर लव रिएक्ट दिया है। फैंस के अलावा कई बॉलीवुड हस्तियों ने भी इसे लाइक किया है। एक्ट्रेस करीना कपूर ने अपने बेटे तैमूर के साथ भी एक पोस्ट शेयर किया है, जिसमें वह अपने बेटे तैमूर के साथ बैठ मस्ती करती हुई नजर आईं। इस तस्वीर में व्हाइट कलर का टॉप पहनी हुई दिखीं। जिस पर "हार्ट ब्रेकर" लिखा हुआ है। वहीं तैमूर अपनी मॉम के गोद में बैठ मस्ती कर रहे हैं। इस पोस्ट को भी फैंस ने भरपूर प्यार दिया है। खास कर तैमूर की फोटो को देखते हुए अधिकतर लोगों ने क्यूट कहा है। बता दें करीना कपूर जल्द ही आमिर खान के साथ मोस्ट अवेटेड फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा' में नजर आएंगी। फैंस को इस फिल्म का इंतजार है।
Quick links: बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर अपने व्यस्त लाइफ में भी सोशल मीडिया अकाउंट को अपडेट रखती हैं। अक्सर उनकी नई-नई तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाया रहता है। हाल ही में एक्ट्रेस ने अपनी फैमिली के साथ एक प्यारी सी तस्वीर को शेयर किया है, जिसमें माता-पिता रणधीर कपूर और बबीता के साथ बड़ी बहन करिश्मा कपूर सभी हैप्पी मूड में नजर आ रहे हैं। इस पोस्ट को शेयर करते हुए एक्ट्रेस ने लिखा है 'मेरी दुनिया' । इस तस्वीर को करीना कपूर ने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है, जिसमें एक्ट्रेस की मां बबीता, पिता रणधीर कपूर और बहन करिश्मा कपूर के साथ बैठे हुए दिख रहे हैं। पोस्ट को शेयर करते हुए करीना ने लिखा है 'मेरी दुनिया' और साथ ही दिल का इमोजी बनाया है। बता दें इस तस्वीर में सभी खुश दिख रहे हैं। हर किसी ने कलरफूल ड्रेस पहना हुआ है। इसमे रणधीर कपूर और बबीता को सोफे के बीच में बैठे हुए नजर आएं हैं, जबकि उनके आस-पास करीना और करिश्मा कपूर बैठी हुई हैं। इस फैमिली फोटो को अब तक लाखों लोगों का प्यार मिल चुका है। अधिकतर लोगों ने हैप्पी फैमिली और लवली फैमिली लिख कर लव रिएक्ट दिया है। फैंस के अलावा कई बॉलीवुड हस्तियों ने भी इसे लाइक किया है। एक्ट्रेस करीना कपूर ने अपने बेटे तैमूर के साथ भी एक पोस्ट शेयर किया है, जिसमें वह अपने बेटे तैमूर के साथ बैठ मस्ती करती हुई नजर आईं। इस तस्वीर में व्हाइट कलर का टॉप पहनी हुई दिखीं। जिस पर "हार्ट ब्रेकर" लिखा हुआ है। वहीं तैमूर अपनी मॉम के गोद में बैठ मस्ती कर रहे हैं। इस पोस्ट को भी फैंस ने भरपूर प्यार दिया है। खास कर तैमूर की फोटो को देखते हुए अधिकतर लोगों ने क्यूट कहा है। बता दें करीना कपूर जल्द ही आमिर खान के साथ मोस्ट अवेटेड फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा' में नजर आएंगी। फैंस को इस फिल्म का इंतजार है।
Mathura , 06 जुलाई . थाना टाउनशिप-रिफाइनरी क्षेत्र स्थित शिव शक्ति एनक्लेव कॉलोनी में गेट पर सो रहे व्यक्ति की अज्ञात लोगों ने पीट-पीटकरMurder कर दी. Thursday सुबह जब मृतक के परिजन जगे तो उन्हेंMurder की जानकारी हुई. सूचना मिलते ही Police भी मौके पर पहुंच गई. शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है. वरिष्ठ Police अधीक्षक शैलेष कुमार पांडेय ने बताया रिफाइनरी नगर की बाउंड्री के पास बनी शिव शक्ति एनक्लेव कॉलोनी एवं मूल निवासी सराय थाना बलदेव के रहने वाले धर्मवीर(55) पुत्र मुन्नालाल अपने परिवार के साथ रहते थे. धर्मवीर रोजाना की तरह घर के सो रहे थे. रात को अज्ञात लोगों ने सरिया से पीट-पीटकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. Thursday सुबह जब मृतक की पत्नी मंजू देवी उन्हें जगाने के लिए गई तो पति का रक्त रंजित शव देख उसके पैरों तले जमीन खिसक गई. महिला ने शोर मचाया तो आसपास के लोग मौके पर पहुंच गए. सूचना मिलने पर इलाका Police भी मौके पर पहुंच गई. मौके पर पहुंचे एसएसपी शैलेश कुमार पांडे ने बताया कि मृतक कीMurder किन कारणों से हुई है, इसकी जांच की जाएगी. फिलहाल मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जा रहा है. साथ ही चार टीम का गठन कर खुलासे के निर्देश इलाका Police को दिए हैं, जल्द हीMurder कांड का खुलासा किया जाएगा.
Mathura , छः जुलाई . थाना टाउनशिप-रिफाइनरी क्षेत्र स्थित शिव शक्ति एनक्लेव कॉलोनी में गेट पर सो रहे व्यक्ति की अज्ञात लोगों ने पीट-पीटकरMurder कर दी. Thursday सुबह जब मृतक के परिजन जगे तो उन्हेंMurder की जानकारी हुई. सूचना मिलते ही Police भी मौके पर पहुंच गई. शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है. वरिष्ठ Police अधीक्षक शैलेष कुमार पांडेय ने बताया रिफाइनरी नगर की बाउंड्री के पास बनी शिव शक्ति एनक्लेव कॉलोनी एवं मूल निवासी सराय थाना बलदेव के रहने वाले धर्मवीर पुत्र मुन्नालाल अपने परिवार के साथ रहते थे. धर्मवीर रोजाना की तरह घर के सो रहे थे. रात को अज्ञात लोगों ने सरिया से पीट-पीटकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. Thursday सुबह जब मृतक की पत्नी मंजू देवी उन्हें जगाने के लिए गई तो पति का रक्त रंजित शव देख उसके पैरों तले जमीन खिसक गई. महिला ने शोर मचाया तो आसपास के लोग मौके पर पहुंच गए. सूचना मिलने पर इलाका Police भी मौके पर पहुंच गई. मौके पर पहुंचे एसएसपी शैलेश कुमार पांडे ने बताया कि मृतक कीMurder किन कारणों से हुई है, इसकी जांच की जाएगी. फिलहाल मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जा रहा है. साथ ही चार टीम का गठन कर खुलासे के निर्देश इलाका Police को दिए हैं, जल्द हीMurder कांड का खुलासा किया जाएगा.
बीना (नवदुनिया न्यूज)। ज्ञान सिंह यादव हत्या कांड के बाद चर्चा में आए दौलतपुर गांव के लोगों को एक बार फिर डराने का प्रयास किया गया है। गुरुवार की रात अज्ञात बदमाशों ने बलराम लोधी के घर के बाहर रखे करीब 200 पाइपों में आग लगाकर पेड़ पर चेतावनी भरी तख्ती लटका दी। इसमें लिखा है कि दौलतपुर में लोधी समाज का एक भी आदमी जिंदा नहीं बचेगा, अभी तो सिर्फ फिल्म का ट्रेलर है। आगे-आगे देखते जाओ क्या करेंगे, तीन दिन के अंदर गांव खाली चाहिए। इस चेतावनी से गांव के लोग दहशत में हैं और कुछ परिवार गांव छोड़ने की तैयारी करने लगे हैं। गांव में आगजनी और गांव खाली करने की चेतावनी लिखने के मामले में अभी तक किसी का नाम सामने नहीं आया है, लेकिन इसे ज्ञानसिंह हत्या कांड से जोड़कर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि 17 जनवरी की रात दौतलपुर गांव के करीब आधा दर्जन लोगों ने ज्ञानसिंह की हत्या कर दी थी। आरोपितों की गिरफ्तारी होने के कुछ दिन बाद मृतक ज्ञानसिंह के परिवार वालों ने गांव में घुसकर तोड़फोड़ कर आगजनी की थी। इसके कुछ समय बाद लोधी समाज के ब्लाक अध्यक्ष पर कंजिया गांव के पास ही ज्ञानसिंह के परिवार वालों ने जानलेवा हमला किया था। इसके चलते दौरतपुर गांव में चर्चा में रहा था। करीब तीन माह बाद गुरुवार रात अज्ञात बदमाशों ने ज्ञानसिंह की हत्या में शामिल आरोपित प्रेमसिंह लोधी के घर के बाहर रखे करीब सिंचाई के करीब 200 पाइपों में आग लगा दी। इसके अलावा पास में पेड़ पर एक गांव खाली करने की चेतावनी लिखकर तख्ती लटका दी। प्रेमसिंह लोधी के भाई प्रीतम लोधी का दावा है कि दरवाजे पर पेट्रोल डालकर आग लगाने का भी प्रयास किया गया है। आगजनी की इस घटना और चेतावनी से लोधी समाज के लोगों में दहशत हैं। प्रीतम लोधी का कहना है कि प्रशासन से किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है। ऐसा माहौल रहा तो जान बचाने के लिए गांव छोड़कर जाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि कुछ परिवार गांव खाली करने की तैयारी भी कर रहे हैं। गांव में आगजनी और चेतावनी भरी तख्ती टांगने की सूचना मिलने पर एएसपी ज्योति ठाकुर, एसडीओपी प्रशांत सिंह सुमन, बीना थाना प्रभारी कमल निकवाल और भागनढ़ थाना प्रभारी लखन डाबर पुलिस बल के साथ गांव पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने घटना का निरीक्षण कर ग्रामीणों को सुरक्षा का पूरा भरोसा दिलाया है। ग्रामीणों को आश्वासन दिया है कि पुलिस इस घटना की जांच कर रही है, दोषियों की तलाश कर जल्द उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। गांव में आगजनी की सूचना मिलने पर सुबह ही मौके पर पहुंच गया था। गांव में किसी ने भी तख्ती टांगने और आग लगाने वाले को नहीं देखा है। इसके चलते कमला बाई पति बलराम लोधी की शिकायत पर अज्ञात आरोपित के खिलाफ आगजनी का मामला दर्ज कर लिया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन में मामले की जांच चल रही है।
बीना । ज्ञान सिंह यादव हत्या कांड के बाद चर्चा में आए दौलतपुर गांव के लोगों को एक बार फिर डराने का प्रयास किया गया है। गुरुवार की रात अज्ञात बदमाशों ने बलराम लोधी के घर के बाहर रखे करीब दो सौ पाइपों में आग लगाकर पेड़ पर चेतावनी भरी तख्ती लटका दी। इसमें लिखा है कि दौलतपुर में लोधी समाज का एक भी आदमी जिंदा नहीं बचेगा, अभी तो सिर्फ फिल्म का ट्रेलर है। आगे-आगे देखते जाओ क्या करेंगे, तीन दिन के अंदर गांव खाली चाहिए। इस चेतावनी से गांव के लोग दहशत में हैं और कुछ परिवार गांव छोड़ने की तैयारी करने लगे हैं। गांव में आगजनी और गांव खाली करने की चेतावनी लिखने के मामले में अभी तक किसी का नाम सामने नहीं आया है, लेकिन इसे ज्ञानसिंह हत्या कांड से जोड़कर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि सत्रह जनवरी की रात दौतलपुर गांव के करीब आधा दर्जन लोगों ने ज्ञानसिंह की हत्या कर दी थी। आरोपितों की गिरफ्तारी होने के कुछ दिन बाद मृतक ज्ञानसिंह के परिवार वालों ने गांव में घुसकर तोड़फोड़ कर आगजनी की थी। इसके कुछ समय बाद लोधी समाज के ब्लाक अध्यक्ष पर कंजिया गांव के पास ही ज्ञानसिंह के परिवार वालों ने जानलेवा हमला किया था। इसके चलते दौरतपुर गांव में चर्चा में रहा था। करीब तीन माह बाद गुरुवार रात अज्ञात बदमाशों ने ज्ञानसिंह की हत्या में शामिल आरोपित प्रेमसिंह लोधी के घर के बाहर रखे करीब सिंचाई के करीब दो सौ पाइपों में आग लगा दी। इसके अलावा पास में पेड़ पर एक गांव खाली करने की चेतावनी लिखकर तख्ती लटका दी। प्रेमसिंह लोधी के भाई प्रीतम लोधी का दावा है कि दरवाजे पर पेट्रोल डालकर आग लगाने का भी प्रयास किया गया है। आगजनी की इस घटना और चेतावनी से लोधी समाज के लोगों में दहशत हैं। प्रीतम लोधी का कहना है कि प्रशासन से किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है। ऐसा माहौल रहा तो जान बचाने के लिए गांव छोड़कर जाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि कुछ परिवार गांव खाली करने की तैयारी भी कर रहे हैं। गांव में आगजनी और चेतावनी भरी तख्ती टांगने की सूचना मिलने पर एएसपी ज्योति ठाकुर, एसडीओपी प्रशांत सिंह सुमन, बीना थाना प्रभारी कमल निकवाल और भागनढ़ थाना प्रभारी लखन डाबर पुलिस बल के साथ गांव पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने घटना का निरीक्षण कर ग्रामीणों को सुरक्षा का पूरा भरोसा दिलाया है। ग्रामीणों को आश्वासन दिया है कि पुलिस इस घटना की जांच कर रही है, दोषियों की तलाश कर जल्द उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। गांव में आगजनी की सूचना मिलने पर सुबह ही मौके पर पहुंच गया था। गांव में किसी ने भी तख्ती टांगने और आग लगाने वाले को नहीं देखा है। इसके चलते कमला बाई पति बलराम लोधी की शिकायत पर अज्ञात आरोपित के खिलाफ आगजनी का मामला दर्ज कर लिया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन में मामले की जांच चल रही है।
: हंगामे के बीच हुआ औरैया प्रेस क्लब का चुनाव : औरैया में काफी गहमागहमी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच प्रेस क्लब का चुनाव हुआ. दो साल बाद हो रहे चुनाव में नई-पुरानी के नाम पर समानांतर दो कार्यकारिणी का गठन कर लिया गया. प्रेस क्लब दो फाड़ में बंट गया है. नई कार्यकारिणी के पदाधिकारियों का आरोप है कि पुरानी कमेटी ने प्रेस क्लब पर अवैध कब्जा कर रखा है, एक तरह से उन्होंने प्रेस क्लब का अपहरण कर लिया है. इधर, पुराने प्रेस क्लब के लोग संस्था का पंजीकरण कराकर शीघ्र कराकर प्रेस क्लब पर दावा करने की बात कह रहे हैं. 28 नवम्बर को हुए चुनाव में नई कार्यकारिणी में अभिषेक शर्मा अध्यक्ष और मनु शर्मा महामंत्री चुना गया हैं तो पुरानी कार्यकारिणी से अनुराग तिवारी अध्यक्ष एवं दिलीप गुप्ता महामंत्री बनाये गए हैं. जानकारी के अनुसार औरैया जिलें में पिछले दो साल से प्रेस क्लब का चुनाव नहीं हुआ था. 28 नवम्बर को गोपाल वाटिका में चुनाव कराने का निर्णय लिया गया. इसके लिए औरैया, बिधुना और इटावा से तीन दर्जन से ज्यादा नए सदस्य बनाए गए. पूर्व सूचना के आधार पर जब दो दर्जन से ज्यादा पत्रकार गोपाल वाटिका पहुंचे तो पता चला कि कुछ पत्रकार 27 नवम्बर को ही आपस में मिलकर पदों का बंटवारा कर लिया है. इसे लेकर हंगामा शुरू हो गया. इस पर वहां मौजूद पुरानी कार्यकारिणी के कुछ लोगों ने कहा कि प्रेस क्लब के पदों पर फाउंडर मेंबर ही रहेंगे तथा नए सदस्यों को मतदान करने का अधिकार नहीं मिलेगा. इस बात पर दूरदराज से आए पत्रकार आक्रोशित हो गए और सभी पुराने पदाधिकारियों को बुलाने का दबाव बनाया. परंतु कोई मौके पर नहीं आया. इससे आक्रोशित नए-पुराने सदस्यों ने पुरानी कार्यकारिणी और प्रेस क्लब पर कब्जा जमाए लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आनन-फानन में नई कार्यकारिणी बनाने की घोषणा कर दी गई. इसकी जानकारी होने पर पुरानी कार्यकारिणी के लोगों ने किसी और दिन चुनाव कराने का मौका मांगा, परन्तु दूरदराज से आए पत्रकारों ने 28 को ही चुनाव करने का दबाव बनाए रखा, लिहाजा किसी प्रकार का समझौता नहीं हो पाया. इसके बाद मौजूद पत्रकारों ने फौरन नई कार्यकारिणी का चुनाव कर लिया. जिसमें ईटीवी के अभिषेक शर्मा को अध्यक्ष, सहारा समय के गौरव त्रिवेदी तथा दैनिक आज के सुरेन्द्र मिश्रा को उपाध्यक्ष, न्यूज वन के मनु शर्मा को महामंत्री, सहारा उर्दू के मोहम्मद सत्तार को कोषाध्यक्ष तथा महेश पुरवार को मंत्री बनाया गया. प्रमोद तिवारी और आनंद कुशवाहा को संरक्षक बनाया गया. नए अध्यक्ष अभिषेक शर्मा ने आरोप लगाया कि प्रेस क्लब के पुराने पदाधिकारियों ने अपनी जवाबदेही से बचने के लिए ही प्रेस क्लब के अपहरण की साजिश रची. दूसरी ओर जिन पर प्रेस क्लब के अपहरण का आरोप लगा है उनका कहना है कि वो संस्था का पंजीकरण जल्द कराकर प्रेस क्लब पर कब्जे का दावा करने जा रहे हैं. दरअसल चुनाव के दौरान प्रेस क्लब में भ्रष्टाचार के 13 बिंदु रखे गए थे, जिसमें प्रेस क्लब भवन पर अवैध कब्जा भी शामिल था. इन सबका जवाब पुराने पदाधिकारियों से मांगा गया था. इन बिन्दुओं का पुराने पदाधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया. पुराने पदाधिकारियों पर यह भी आरोप लगाया गया कि ये लोग प्रेस क्लब कि आड़ में पत्रकारिता के अलावा बाकी सभी दूसरे काम करते हैं. नई कार्यकारिणी में शामिल पत्रकारों की सूची भी प्रकाशित कर दी गई है. जिसमें साबिर शेख, अरशद जमाल, गौरव त्रिवेदी, विपुल पांडेय, अभिषेक शर्मा, आनंद कुशवाहा, मोहम्मद सिराजुददीन, आयुष गुप्ता, घनश्याम कृष्ण, संतोष तिवारी, विनीत त्रिपाठी, पंकज अवस्थी, मुनीष त्रिपाठी, अरूण त्रिवेदी, राजेश चंदानी, अमित पाठक, प्रमोद तिवारी, अब्दुल सत्तार, गिरीश कुमार शुक्ला, सुरेंद्र मिश्रा, महेश पुरवार, मनोज शुक्ला, सूर्य प्रकाश शर्मा "मनु", नमो नारायण, राजेंद्र बाबू मिश्रा, राजेंद्र सक्सेना, प्रद्युम्न पोरवाल, आशीष सविता, नीरज शुक्ला, आशा पांडेय, प्रदीप बाजपेयी शामिल हैं.
: हंगामे के बीच हुआ औरैया प्रेस क्लब का चुनाव : औरैया में काफी गहमागहमी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच प्रेस क्लब का चुनाव हुआ. दो साल बाद हो रहे चुनाव में नई-पुरानी के नाम पर समानांतर दो कार्यकारिणी का गठन कर लिया गया. प्रेस क्लब दो फाड़ में बंट गया है. नई कार्यकारिणी के पदाधिकारियों का आरोप है कि पुरानी कमेटी ने प्रेस क्लब पर अवैध कब्जा कर रखा है, एक तरह से उन्होंने प्रेस क्लब का अपहरण कर लिया है. इधर, पुराने प्रेस क्लब के लोग संस्था का पंजीकरण कराकर शीघ्र कराकर प्रेस क्लब पर दावा करने की बात कह रहे हैं. अट्ठाईस नवम्बर को हुए चुनाव में नई कार्यकारिणी में अभिषेक शर्मा अध्यक्ष और मनु शर्मा महामंत्री चुना गया हैं तो पुरानी कार्यकारिणी से अनुराग तिवारी अध्यक्ष एवं दिलीप गुप्ता महामंत्री बनाये गए हैं. जानकारी के अनुसार औरैया जिलें में पिछले दो साल से प्रेस क्लब का चुनाव नहीं हुआ था. अट्ठाईस नवम्बर को गोपाल वाटिका में चुनाव कराने का निर्णय लिया गया. इसके लिए औरैया, बिधुना और इटावा से तीन दर्जन से ज्यादा नए सदस्य बनाए गए. पूर्व सूचना के आधार पर जब दो दर्जन से ज्यादा पत्रकार गोपाल वाटिका पहुंचे तो पता चला कि कुछ पत्रकार सत्ताईस नवम्बर को ही आपस में मिलकर पदों का बंटवारा कर लिया है. इसे लेकर हंगामा शुरू हो गया. इस पर वहां मौजूद पुरानी कार्यकारिणी के कुछ लोगों ने कहा कि प्रेस क्लब के पदों पर फाउंडर मेंबर ही रहेंगे तथा नए सदस्यों को मतदान करने का अधिकार नहीं मिलेगा. इस बात पर दूरदराज से आए पत्रकार आक्रोशित हो गए और सभी पुराने पदाधिकारियों को बुलाने का दबाव बनाया. परंतु कोई मौके पर नहीं आया. इससे आक्रोशित नए-पुराने सदस्यों ने पुरानी कार्यकारिणी और प्रेस क्लब पर कब्जा जमाए लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आनन-फानन में नई कार्यकारिणी बनाने की घोषणा कर दी गई. इसकी जानकारी होने पर पुरानी कार्यकारिणी के लोगों ने किसी और दिन चुनाव कराने का मौका मांगा, परन्तु दूरदराज से आए पत्रकारों ने अट्ठाईस को ही चुनाव करने का दबाव बनाए रखा, लिहाजा किसी प्रकार का समझौता नहीं हो पाया. इसके बाद मौजूद पत्रकारों ने फौरन नई कार्यकारिणी का चुनाव कर लिया. जिसमें ईटीवी के अभिषेक शर्मा को अध्यक्ष, सहारा समय के गौरव त्रिवेदी तथा दैनिक आज के सुरेन्द्र मिश्रा को उपाध्यक्ष, न्यूज वन के मनु शर्मा को महामंत्री, सहारा उर्दू के मोहम्मद सत्तार को कोषाध्यक्ष तथा महेश पुरवार को मंत्री बनाया गया. प्रमोद तिवारी और आनंद कुशवाहा को संरक्षक बनाया गया. नए अध्यक्ष अभिषेक शर्मा ने आरोप लगाया कि प्रेस क्लब के पुराने पदाधिकारियों ने अपनी जवाबदेही से बचने के लिए ही प्रेस क्लब के अपहरण की साजिश रची. दूसरी ओर जिन पर प्रेस क्लब के अपहरण का आरोप लगा है उनका कहना है कि वो संस्था का पंजीकरण जल्द कराकर प्रेस क्लब पर कब्जे का दावा करने जा रहे हैं. दरअसल चुनाव के दौरान प्रेस क्लब में भ्रष्टाचार के तेरह बिंदु रखे गए थे, जिसमें प्रेस क्लब भवन पर अवैध कब्जा भी शामिल था. इन सबका जवाब पुराने पदाधिकारियों से मांगा गया था. इन बिन्दुओं का पुराने पदाधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया. पुराने पदाधिकारियों पर यह भी आरोप लगाया गया कि ये लोग प्रेस क्लब कि आड़ में पत्रकारिता के अलावा बाकी सभी दूसरे काम करते हैं. नई कार्यकारिणी में शामिल पत्रकारों की सूची भी प्रकाशित कर दी गई है. जिसमें साबिर शेख, अरशद जमाल, गौरव त्रिवेदी, विपुल पांडेय, अभिषेक शर्मा, आनंद कुशवाहा, मोहम्मद सिराजुददीन, आयुष गुप्ता, घनश्याम कृष्ण, संतोष तिवारी, विनीत त्रिपाठी, पंकज अवस्थी, मुनीष त्रिपाठी, अरूण त्रिवेदी, राजेश चंदानी, अमित पाठक, प्रमोद तिवारी, अब्दुल सत्तार, गिरीश कुमार शुक्ला, सुरेंद्र मिश्रा, महेश पुरवार, मनोज शुक्ला, सूर्य प्रकाश शर्मा "मनु", नमो नारायण, राजेंद्र बाबू मिश्रा, राजेंद्र सक्सेना, प्रद्युम्न पोरवाल, आशीष सविता, नीरज शुक्ला, आशा पांडेय, प्रदीप बाजपेयी शामिल हैं.
वडिवणाए फोसणं ६३८२. चादरपुढविषज० अट्ठावीमं पयडीणं सगपदवि० लोग० असंखे० भागो सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि पुरिस० असंखे० भागवड - अवडि० लोग० असंख० मागो । एवं वादरआउ० तेउ० वाउ० बादरवणप्फ दिपत्तेयपञ्जनाणं । णवरि बादरवाउ०पज● लोग० संखे० भागो' सव्वलोगो वा । इत्थि- पुरिम० असंख० भागवड्ड अवडिदविह लोग० संखे० भागो' । इसलिए इनकी अपेक्षा म्पर्शन कुछकम आठवडे चांदह राजुप्रमाण कहा है। स्त्री और पुरुषवेद की तीन वृद्धियों और अवस्थितपद् स्वस्थानके समय, विहारादिके समय तथा वीं और नारकियोंके तिर्यों और मनुष्यों मे मारणान्तिक समुद्घातके समय भी सम्भव है, इसलिए इन प्रकृतियों के उक्त पढ़ोंकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और कुछ कम बारह बड़े चौदह राजुप्रमाण कहा है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चारवृद्धियाँ अवस्थित ओर अवक्तव्यपद स्वस्थानमे और विहारादिके समय ही सम्भव है, इमलिए इन दो प्रकृतियाके उक्त पढ़ोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण और कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। इन दो प्रकृतियोकी चार हानियोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण. कुछ कम आठ घंटे चांद्रह राजुप्रमाण और सब लोकप्रमाण है यह स्पष्ट ही है, क्योंकि ये चारों हानियाँ उर्दुलना में भी सम्भव होनसे उक्तप्रमाण म्पर्शन बन जाता है। यहाँ त्रस आदि अन्य जितनी मार्गणाएं गिनाई है उनमें यह व्यवस्था बन जाता है, इसलिए उनके कथनको पंचेन्द्रियद्विक के समान कहा है । ६३८२ बार पृथिवीकायिक पर्याप्तकों में अट्ठाईस प्रकृतियोंके सब पद स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी असंव्यातभागवृद्धि और अवस्थितका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग है। इसी प्रकार बादर जलकायिक पर्याप्त, बादर अग्निकायिक पर्याप्त, बादर वायुकायिक पर्याप्त और बादर वनम्पतिकायिक प्रत्येकडारीर पर्याप्त जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि बार वायुकायिक पर्याप्त जीवाने लोकका संख्यातवों भाग और सब लोकका स्पर्शन किया है तथा श्रीवेद और पुरुपवेदकी अमंग्यातभागवृद्धि और अवस्थितस्थितिविभक्तिवालाने लोकके संख्यातवे भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषाथ - बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण है । अतः यहा अट्टाईस प्रकृतियोंके जो पद सम्भव है उनका यह स्पर्शन बन जाता है, इसलिए वह उक्तप्रमाण कहा है। मात्र श्रीवेद और पुरुपवेदकी असंख्यातभागवृद्धि और अवस्थितपढ़ इसके अपवाद है। बात यह है कि जो उक्त जीव नपुंसकोंमें मारणान्निक समुद्रात करते है उनके ये पढ़ नहीं होते, इसलिए इन दो प्रकृतियों के उक्त दो पदोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण कहा है। यहाँ अन्य जितनी मार्गणाएं गिनाई है उनमें यह व्यवस्था बन जाती है इसलिए उनमे वादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीवोंके समान स्पर्शन कहा है । मात्र वादर वायुकायिक पर्याप्त जीवोका म्पर्शन लोकके संख्यातवे भागप्रमाण और मत्र लोकप्रमाण होने से इनमे सब प्रकृतियों के सम्भव पढ़ोकी अपेक्षा यह स्पर्शन जानना चाहिए । किन्तु स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी असंख्यातभागवृद्धि और अवस्थितपदकी अपेक्षा यह स्पर्शन लोकके संख्यातवें भागप्रमाण ही जानना चाहिए। कारण म्पष्ट ही है । १ ता० प्रतौ असंखे० भागो इति पाठ । २ ता० प्रती असं० भागो इति पाट; । ६३८३, ओरालियमिस्स० छब्बीसं पयडीणं असंखे० भागवड-हाणि-अवडि० के० १ सव्बलोगो । दोवड्डि दोहाणि० केव० १ लोग० असंखे० भागो सव्वलोगो वा । इत्थि- पुरिस० दोवडि० लो० असंखे० भागो । सम्मत्त-सम्मामि० चदुहं हाणीणमोघं । ६३८५. वेउव्विय० छब्बीसं पयडीणं असंखे० मागवडि-हाणि०-दोवडि-दोहाणि - अवद्वि० लो० असंखेजदिमागो अट्ठ- तेरहचो६० भागा वा देणा । णवरि इत्थि- पुरिस० तिण्णिवड्डि-अवडि० लोग० असंखे० भागो अट्ट- बारहचोद्द० देखणा । अणंताणु० चउक० असंखे० गुणहाणि० - अवत्तव्व० सम्मत्त-सम्मामि० चत्तारिखड्डि अवडि० अवत्तव्वं च अट्टचोद्दस० देसूणा । मम्मत्त-सम्मामि० सेसपदाणं लोग० असं०भागो अट्ठ-तेरह० देखणा । वेउव्वियमिम्स अट्ठावासं पयडीणं सच्चपदवि० लोग० असंखे० भागो । S३८३ औदारिकमिश्रकाययोगिया में छच्चीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यात भागहानि और अवस्थितम्थितिविभक्तिवाले जीवान कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सब लोकका म्पर्शन किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाल जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यातवं भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पर स्त्रीवेद और पुरुषवेद की दो वृद्धियोंका स्पर्शन लॉकका असंख्यातवो भाग है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार हानियांका स्पर्शन आंघके समान है । विशेष थ औदारिकमिश्रयोगी जीव सब लोकमे पाये जाते हैं, इसलिए इनमें छब्बीम प्रकृतियाँकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपद्का स्पर्शन सत्र लोकप्रमाण कहा है। इनमें दो वृद्धि और दो हानियोका वर्तमान स्पर्शन तो लोकके असंख्यातव भागप्रमाण ही है. परन्तु अतीत स्पर्शन सब लोकप्रमाण बन जाता है. इसलिए यह लोकके असंख्यातव भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण कहा है । मात्र स्त्री और पुरुषवेदकी दो वृद्धियों न तो एकेन्द्रियों में सम्भव है और न नपुंसकामे मारणान्तिक समुद्रात करनेवालोंम सम्भव है. अन्यत्र यथायोग्य होती है. अत इन दो प्रकृतियों के उक्त पदांका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । शेप कथन स्पष्ट ही हूँ । ३३८५. वैकियिककाययोगियों में छच्चीस प्रकृतियांकी असंख्यातभागवृद्धि असंख्यात भागहानि, दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थिनस्थिनिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और त्रस नालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी तीन वृद्धि और अवस्थितका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रसनालांके चौदह भागांमेसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भाग है । अनन्तानुबन्धा चतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यका तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्यका स्पर्शन त्रम नालांके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग है ता सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके शेप पदोका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रस नालीके चौदह भागोमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह भाग है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोमे अट्ठाईस प्रकृतियोंके सब पढ़ स्थितिविभक्तिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ - वैक्रियिककायोगियों में स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी तीन वृद्धियों और अवस्थित पद स्वस्थानमे, विहारादिक समय तथा नारकियों और देवोके निर्यचां और मनुष्यांमे मारणान्तिक वड्डिपरूवणाए पोसणं । ६३८५, कम्मइय० छब्बीसं पयडीणमसंखे० भागवडि-हाणि-अवट्टि० केव० १ सव्वलोगो । दोवड्डि-दोहाणि० केव० १ लो० असंखे०भागो सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि- पुरिस० दोवडि० लोग० असंखे • भागो बारहचोद्दस देसूणा । सम्मत्त-सम्मामि० ओघं । णवरि पदविसेसो णायव्वो । एत्रमणाहारीणं । ९३८६. आहार-आहार मिस्स• सव्वपयडीणं सव्वपदवि० लोग० असंखे० भागो । एवमवगद० - अकसा० - मणपज० - संजद०-सामाइय- छेदो०परिहार० सुहुमसांप० - जहाक्खादसंजदे चि । समुद्रात के समय सम्भव होनेसे इन प्रकृतियोंके उक्त पदोंकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और कुछ कम बारह बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है । अनन्तानुवन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपद तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धियों, अवस्थित और अवक्तव्यपद मारणान्तिक समुद्घात आदिके समय सम्भव नहीं है, इसलिए इनका स्पर्शन कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। सब प्रकृतियोंके शेप पदोंका स्पर्शन वैक्रियिककाययोगके समान ही है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, इसलिए इसमें सब प्रकृतियोंके सव पदोंका म्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है । ६३८५ कार्मणकाययोगियों में छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धियोंका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ भागप्रमाण और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम बारह भागप्रमाण है तथा सम्यक्त्व ओर सम्यग्मिथ्यात्वका स्पर्श ओघके समान है। किन्तु पद विशेष जानना चाहिये । इसी प्रकार अनाहारकोंके जानना चाहिए । विशेषार्थ - कार्मणकाययोगका स्पर्शन सब लोकप्रमाण है, इसलिए इसमें छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित पदका स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोंकी दो वृद्धि और दो हानिमेंसे यथासम्भव द्वीन्द्रियादिक जीवोंके वृद्धियाँ और काण्डक घातके साथ संज्ञियोंके एकेन्द्रियादिकमें उत्पन्न होनेपर हानियाँ होती हैं। ऐसे जीवोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सब लोकप्रमाण होने से यह उक्तप्रमाण कहा है । मात्र स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी दो वृद्धियाँ जो स्त्रीवेदी और पुरुषवेदियोंमे उत्पन्न होते हैं उन्हींके यथासम्भव होती है, अतः इनका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और कुछ कम बारह बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है । ६३८६ आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों में सब प्रकृतियोंके सब पदस्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसी प्रकार अपगतवेदी, अकषायी, मनःपर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसांपरायिकसंयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके जानना चाहिए । [ दिविती ३ ६ ३८७, इत्थिवेद० छब्बीसं पयडीणम संखे० भागवड्डि-हाणि० [ संखेजभागवड्डिहाणि - ] संखे० गुणवड्डि-हाणि अवडि० लोग० असंखे० भागो अट्टचोद्दम० देखणा सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि- पुरिस० तिण्णिवड्डि-अवडि० लोग० असंखे०भागो अट्ठचोद्द० भागा वा देखणा । सव्वकम्माणमसंखे० गुणहाणि • लो० असंखे • मागो । अणंताणु०० चउक० असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्व लो० असंखे० भागो अट्टचो६० देसूणा । सम्मत्त-सम्मामि० चत्तारिखड्डि-अवडि० अवत्तव्व० केव० १ लो० असंखे० भागो - अचोद० देसूणा । चत्तारिहाणि० लोग० असंखे० भागो अट्टचोद० सन्चलोगो वा । पुरिसवेदे इत्थिवेदभंगो । विशेषार्थ- आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, इसलिए इनमें सत्र प्रकृतियोंके सब पदोंका स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है । यहाँ अपगतवेदी आदि अन्य जितनी मार्गणाऐ गिनाई है उनमें इसीप्रकार स्पर्शन घटित होता है, इसलिए उनके कथनको आहारककाययोगी द्विकके समान जाननेकी सूचना की है। ६३८७ स्त्रीवेदियों में छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंन्यातभागहानि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग, त्रसनाली के चौदह भागोंमसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि कहीवेद और पुरुपवेदकी तीन वृद्धि और अवस्थितका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रसनालीके चौदह भागोमेसे कुछ कम आठ भाग है । तथा सत्र कर्माकी असंख्यातगुणहानिका म्पर्श लोकका असंख्यातवा भाग और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रसनालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ भाग है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वको चारवृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातवें भाग और चसनाली के चौदह भेदोमंसे कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । चार हानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भागप्रमाण, बसनालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। पुरुपवेदियों में स्त्रीवेदियांके समान भंग है । विशेषार्थ - स्त्रीवेदियोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और सब लोकप्रमाण है। इन सब स्पर्शनों के समय छब्बीस प्रकृतियांकी तीन वृद्धियाँ, तीन हानियों और अवस्थितपद सम्भव हैं, इसलिए यह स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है । मात्र स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी तान वृद्धियों और अवस्थित पदका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ओर अनोत स्पर्शन कुछ कम आठ वटे चौदह राजुप्रमाण है। यहाँ उपपाद पदकी विवक्षा नहीं होनसे अन्य स्पर्शन नहीं कहा है। अनन्तानुवन्धाचतुष्क के सिवा पूर्वोक्त बाईस प्रकृतियों की असंख्यातगुणहानि उनकी क्षपणा के समय होती है, इसलिए इसकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण कहा है। तथा अनन्तानुबन्धाचतुष्ककी असंख्यातगुणहान और अवक्तव्य पद की अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, क्योंकि चारों गनिके संज्ञी पञ्चेन्द्रिय सम्यग्दृष्टि जीव इसकी विसंयोजना करते है और ऐसे वढिपरूणाए पोसणं ६३८८, मदि- सुदअण्णाणी० छब्बीसं पयडीणमसंखे० भागवडि-हाणि अवट्टि० केब• पो० १ सव्वलोगो । दोवड्ड- दोहाणि० केव० पो० १ लो० असंखे० भागो अट्ठचोदस● सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि पुरिस० दोवडि० लोग० असंखे० भागो अट्ट-बारह चोद्द देसूण । सम्मत्त-सम्मामि० चत्तारिहाणि० लोग० असंखे० भागो अट्टचोद्दस• सव्वलोगो वा । ६ ३८९. विहंगणाणी• छब्बीसं पयडीणं तिण्णिवडि-तिण्णिहाणि अवडि० लोग० असंखे०भागो अट्टचो६० सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि पुरिस० तिण्णिवड्डि - अवट्टि • जीवोंने अतीत कालमें कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य पद सम्यग्दृष्टि होते समय होते है, अतः इनकी अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम आठ वटे चौदह राजुप्रमाण कहा है । तथा इन दोनों प्रकृतियोंकी चार हानियाँ एकेन्द्रियादि सबके सम्भव हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा म्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ घंटे चौदह राजप्रमाण और सब लोकप्रमाण कहा है। पुरुपवेदियोंमें स्त्रीवेदियोके समान स्पर्शन बन जाता है, अतः उनका भङ्ग स्त्रीवेदियोंके समान जाननेकी सूचना की है। ६३८८ मत्यज्ञानी और ताज्ञानी जीवाम छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातवें भाग, वसनालीक चौदह भागामेसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी दो वृद्धिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और चौदह भागोमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार हानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग, त्रसनालीके चौदह भागोमेसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशोषार्थ- मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंका सब लोकप्रमाण स्पर्शन होनसे इनमें छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा स्पर्शन सब लोकप्रमाण कहा है । तथा इनकी दो वृद्धियों और दो हानियांका प्रारम्भ क्रमसे द्वीन्द्रियादि और संज्ञी पश्चेन्द्रिय करते है और ऐसे जीवोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण, विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और मारणान्तिक व उपपाद पदकी अपेक्षा सब लोक प्रमाण होनेसे यह स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है। दो हानियाँ एकेन्द्रियों मे भी सम्भव है, इसलिए भी सब लोक प्रमाण स्पर्शन बन जाता है। नारकियोंके तिर्यवां और मनुष्यों में मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपदके समय तथा देवांके स्वस्थान विहारादिके समय स्त्रीवेद और पुरुषवेदका बन्ध सम्भव है और इनका यह सम्मिलित स्पर्शन कुछ कम बारहबढे चौदह राजु प्रमाण है, अतः स्त्रीवेद और पुरुषवेदका दो वृद्धियोंका स्पर्शन कुछ कम बारह बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है, क्योंकि उसका पहले अनेक बार स्पष्टीकरण कर आये हैं। ६३८९. विभंगज्ञानियोंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितस्थितिविभक्तिवाले जीवॉन लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ लोग० असंखे० भागो अट्ठ- बारहचोदस० देसूणा । सम्मत्त-सम्मामि० चत्तारिहाणि लोग० असंखे० भागो अट्टचो६० सव्वलोगो वा । ६३९० आभिणि० सुद० - ओहि ० छब्बीसं पयडीणं असंखे० भागहाणि-संखे०भागहाणि-संखे० गुणहाणि● लोग० असंखे० मागो अट्टचो६० देसूणा । असंखे ० गुणहा० लोग० असंखे० भागो । णवरि अनंताणु० चउक० असंखे० गुणहाणि० अट्ठचोद्दसभागा देखणा । सम्मत्त-सम्मामि० असंखे० भागहाणि-संखे० भागहाणि संखे० गुणहाणि० लोग ० असंखे० भागो अट्ठचोद० देखणा । असंखे० गुणहाणि● लोग० असंखे०भागो । एवमोहिदंस० सुकले० सम्मादिहि त्ति । णवरि सुकले० उचोद्दस० देखणा । सम्मत्त सम्मामि० अवट्टिद० खेत्तभंगो । चत्तारिवड्ढि अवत्तव्त्र० अणंताणु० चउक० अवत्तव्व० लोग० असंखे० भागो छचोहसभागा वा देखणा । भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेद्की तीन वृद्धि और अवस्थितविभक्तिवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों मेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार हानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग, त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशेषार्थ - विभङ्गज्ञानी जीव वर्तमानमें सब लोकमें नहीं पाये जाते, क्योंकि संज्ञी पञ्चेन्द्रियोंमें ही कुछके यह ज्ञान होता है, इसलिए इनमें छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम आठबटे चौदह राजु और सब लोकप्रमाण कहा है। शेष सब विचार मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंके समान कर लेना चाहिए । मात्र यहाँ सब लोकप्रमाण स्पर्शन मारणान्तिक समुद्धातके समय कहना चाहिए । ६३९०. अभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोमे छब्बीस प्रकृतियांकी असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि और संख्यातगुणहानिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवें भाग और बसनालीके चौदह भागोमेंसे कुछ कम आठ भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। असंख्यातगुणहा निवाले जीवोंने लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु विशेषता यह है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी असंख्यातगुणहा निवालोंका स्पर्श त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि और संख्यातगुणहानिवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमेसे कुछ कम आठ भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। असंख्यातगुणहानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार अवधिदर्शनवाले, शुक्ललेश्या वाले और सम्यग्दृष्टि जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि शुक्ललेश्यावालोंने त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम छह भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अवस्थितस्थितिविभक्तिका भंग क्षेत्रके समान है। चार वृद्धि और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोंने तथा अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनाली के चौदह भागों मे से कुछ कम छह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । वड्ढपरूवणाए पोसणं ६ ३९९, संजदासंजद • अट्ठावीसं पयडीणमसंखे० भागहाणि वि० लोग० असं०भागो छचोद्दस० देखणा । संखे० भागहाणि० लोग० असंखे० भागो । मिच्छत्त-सम्मत्तसम्मामि० अणंताणु० चउक्क० संखे० गुणहाणि असंखे० गुणहाणि० लोग० असंखे० भागो । ६ ३९२ किण्ण णील-काउ• छब्बीसं पयडीणमसंखे • मागवड-हाणि० अवट्टि ० के० १ सव्वलोगो । दोवडि-दोहाणिवि० केव० १ लो० असंखे० मागो सव्वलोगो वा । अणताणु ० चउक० असंखे ० गुणहाणि-अवत्तव्व० लो० असंखे० भागो । इत्थि पुरिस० दोवड्डि ० लोग० असंखे० भागो वे-चत्तारि-छचोहसमागा वा देसूणा । सम्सत्त-सम्मामि० चत्तारिविशेषार्थ - आभिनिबोधिकज्ञानी आदि तीन ज्ञानियों में अनन्तानुबन्धीचतुष्कके सिवा सब प्रकृतियों की असंख्यातगुणहानि क्षपणाके समय होती है, इसलिए इसकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। शेष सब स्पर्शन इन मार्गणाओं के स्पर्शनके समान घटित होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है। यहाँ अवधिदर्शनी, शुक्ललेश्यावाले और सम्यग्दृष्टि ये तीन मार्गणाएं गिनाई है उनमे यह प्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, इसलिए उनके कथनको आभिनिबोधिकज्ञानी आदिके समान कहा है । मात्र शुक्ललेश्याका अतीत स्पर्शन कुछ कम छह बटे चौदह राजु प्रमाण होनसे इसमें कुछ कम आठ बढे चौदह राजुप्रमाण स्पर्शनके स्थानमें यह स्पर्शन जानना चाहिए। साथ ही शुक्ललेश्या में अनन्तानुवन्धीचतुष्क, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके जो अतिरिक्त पद होते है जो कि पूर्वोक्त मार्गणाओंमें सम्भव नहीं उनका मूलमें कहे अनुसार स्पर्शन अलगसे घटित कर लेना चाहिए । कोई वक्तव्य न होनेसे यहाँ हमने उसका अलगसे स्पष्टीकरण नहीं किया है । ६३९१. संयतासंयतो अट्ठाईस प्रकृतियांकी असंख्यातभागहानिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमसे कुछ कम छह भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। संख्यातभागानिवाले जीवान लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्क की संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहा निवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ - संयतासंयतोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम छह बटे चौदह राजुप्रमाण है। अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानिकी स्पर्शन बन जाता है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है । पर इन प्रकृतियांकी यथासम्भव शेष हानियोंकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ही स्पर्शन प्राप्त होता है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है। कारण स्पष्ट है । ६३९२. कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंमे छब्बीस प्रकृतियांकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवालोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सब लोकका स्पर्शन किया है। दो वृद्धि और दो हानि स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यातव भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असख्यातगुणहानि और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग जयधवलास हिदे कसायपाहुडे वड्डि-अवडि ० अवत्तव्व० लोग० असंखे० मागो । चत्तारिहाणि० लोग० सव्वलोगो वा । [विदिविहत्ती ३ असंखे० भागो ६ ३६३. तेउ० छब्बीसं पयडीणमसंखे० भागवड्डि-हाणि-संखे ० भागवड-हाणि - संखेज्जगुणवड्ड-हाणि-अर्वाट्ट० लोग० असंखे० भागो अट्ट- णवचोद्दस० देरणा । णवरि इत्थि- पुरिस० तिष्णिवड अवडि० लोग० असंखे० भागो अट्टचोद्दसभागा वा देखूणा । अणंताणु० चउक० असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्य● लोग० असंखे० भागो अट्ठचोद्दस देसूणा । मिच्छत्त० असंखे० गुणहाणि वि० लोगस्स असंखे० भागो । सम्मत्त-सम्मामि० तथा त्रसनालीके चौदह भागांमसे क्रमसे कुछ कम दो, कुछ कम चार और कुछ कम छह भोग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवान लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा चार हानिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ -- कृष्णादि तीन लेग्याओं का वर्तमान स्पर्शन सर्वलोकप्रमाण है। यहाँ छन्चोस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अतः यह उक्त प्रमाण कहा है । मात्र इन प्रकृतियोकी दो वृद्धियों और दो हानियोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण होकर भी अतीत स्पर्शन सव लोकप्रमाण है, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपद संज्ञी पचन्द्रियांके ही होते है और ये पद मारणान्तिक समुद्रात आदिके समय नहीं होतं, अतः इनकी अपेक्षा लोकके असंख्यातव भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी दो वृद्धियाँ द्वीन्द्रियादिकके ही होती हैं जिनका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यात भागनमाण है तथा स्त्रीवेदी और पुरुपवेदियों मे कृष्णादि लेग्यावालोंका मारणान्तिक समुद्रात द्वारा स्पर्शन कुछ कम छह् बटे चौदह राजु, कुछ कम चार बटे चौदह राजु और कुछ कम दो बटे चौदह राजुप्रमाण है, अतः यह स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है । इन लेश्याओंगे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धियाँ अवस्थित और अवक्तव्यपद सम्यक्त्व के समय होते है और ऐसे जीवांका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है। तथा इनकी चारो हानियाँ किसीके भी सम्भव है, इसलिए इनकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण कहा है । ६ ३९३ पीतलेश्यावालों में छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम नौ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेद की तीन वृद्धि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवालांन लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोन लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणहानि स्थितिविभक्तिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। व ड्डिपरूवणाए पोसणं चत्तारिखड्डि-अवडि० ६० अवत्तव्व० लोग० असंखे० भागो अट्टचोदस दे० । चत्तारिहाणि ● लोग० असंखे० भागो अट्ट-पत्रचोदस० दे० ' एवं पम्म० । णवरि णवचोद्दसभागा पत्थि । ६ ३६४. अभवसिद्धि० छब्बीसं पयडीणं असंखे० भागवड - हाणि० - अवडि० सव्वलोगो । दोवडि-दोहाणि० केव० १ लोग० असंखे० भागो अट्टचोदस० सव्वलोगो वा । इत्थि- पुरस० दोवड्ड० लोग० असंखे० भागो अह-बारह० चोइसभागा वा देसूणा । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । तथा वार हानिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम नौ भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसी प्रकार पद्मलेश्यावाले जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनके त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम नौ भागप्रमाण पश नहीं है। विशेषार्थ - पीनलेश्याका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ घंटे चौदह राजमाण और मारणान्तिक समुद्रातकी अपेक्षा कुछ कम नौ बटे चौदह राजुप्रमाण है। यहाँ छवीन प्रकृतियांकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा यह् पर्जन बन जाना है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है । मात्र स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी तीन वृद्धि और अवस्थित पदकी अपेक्षा कुछ कम नौ बटे चौदह राजप्रमाण स्पर्शन नहीं बनता, क्योंकि एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्रात करनेवाले इन जीवाके इन दो प्रकृतियांका बन्ध न होनेसे वहाँ इनकी तीन वृद्धियाँ और अवस्थान सम्भव नहीं, इसलिए इन दो प्रकृतियाके उक्त पदोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण और कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है । इसीप्रकार अनन्तानुबन्धीचतुककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाग और कुछ कम आठ वटे चौदह राजुप्रमाण घटित कर लेना चाहिए । मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणहानि क्षपणाके समय ही होती है, इसलिए यहाँ इसकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण कहा है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्यपदकी अपेक्षा स्पर्शन जो मूलमें कहा है उसका स्पष्टीकरण अनन्तानुबन्धोकी असंख्यातगुणहानिके स्पर्शनके समान कर लेना चाहिए, क्योंकि दोनोंका स्पर्शन एक समान है। इन दो प्रकृतियाका चार हानियाँ एकेन्द्रियों में मारणान्तिक समुद्रातके समय भी होती हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और सच लोकप्रनाग कता है। पझलेश्यामे कुछ कम नौ बटे चौदह राजप्रमाण स्पर्शन नहीं है, क्योंकि वे एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्घात नहीं करते । शेप सब कथन पीतलेश्या के समान है । ६३९४. अव्यों की प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने सब लोकका स्पर्श किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनाली के चौदह भागोंमें से कुछ कम आठ भागप्रमाण और सर्वलोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम ६ ३९५. वेदगसम्मादिट्ठीसु अठ्ठावीसपयडीणम संखे • मागहाणि - संखे० भागहाणिसंखे० गुणहाणि० लोग० असंखे० भागो अट्ठ चोद० देखणा । मिच्छच-सम्मत्त-सम्मामि० असंखे० गुणहाणि० लोग० असंखे० भागो । अणंताणु० चउक० असंखे० गुणहाणि ● लोग० असंखे० मागो अट्ठचोइस० देखणा । ९ ३९६. खइयसम्माइडी० एकवीसपयडीणमसंखेज्जभागहाणि० लोग० असंखे ०भागो अट्ठचोद्द० देखणा । संखेज्जमागहाणि-संखेज्जगुणहाणि असंखेज्जगुणहाणि ● लोग० असंखेज्जदिभागो । आठ और कुछ कम बारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशेषार्थ- -अभव्योंका वर्तमान स्पर्शन सर्व लोक है, अतः इनमें छब्बीस प्रकृतियों की असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण कहा है। इनकी दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवाने वर्तमानमें लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और अन्य प्रकारसे सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है, इसलिए यह स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है । ६ ३९५ वेदकसम्यग्दृष्टियों में अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि और संख्यातगुणहानि स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणहानिवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुगहा निवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशेषार्थ - वेदकसम्यग्दृष्टियोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण स्पर्शन है। इनमें अट्टाईस प्रकृतियोंकी तीन हानियोंकी अपेक्षा और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानिकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अतः यह उक्त प्रमाण कहा है। पर इनमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वकी असंख्यातगुणहानि क्षपणाके समय होती है, अतः इसकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है । § ३९६ क्षायिकसम्यग्दृष्टियों में इक्कीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानि स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहा निवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ-- क्षायिकसम्यक्त्वका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण है। इनमें इक्कीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानिकी अपेक्षा यह स्पर्शन वन जाता है, अतः वह उक्त प्रमाण कहा है। इनमें इन प्रकृतियों की शेष हानियाँ क्षपणाके समय होती हैं, अतः उनकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। वड्डिपरूवणाए पोसणं ९३९७ उवसमसम्मा० अट्ठावीसं पयडीणमसंखेज्जभागहाणि-संखेज्जभागहाणि ● अणंताणु० चउक० संखेज्जगुणहाणि असंखेज्जगुणहाणि० लोग० असंखेज्जदिभागो अट्ठ चोद्दस० देसूणा । सम्मामि० अट्ठावीसं पयडीणमसंखेज्जभागहाणि-संखेज्जभागहाणिसंखेज्जगुणहाणि● लोग० असंखेज्जदिभागो चोद देणा । ६३९८ सासणसम्माइट्ठी० अट्ठावीसं पयडीणमसंखेज्जभागहाणि • लोग० असंखेज्जदिभागो अट्ट बारहचोद्द० देसूणा । छब्बीसं पयडीणमसंखेज्ज भागवडि-हाणि० अवट्टि० सव्वलोगो । 'दोवडि-दोहाणि० केव० १ लोग० असंखेज्जदिमागो अट्टचोद्दस० देखणा सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि- पुरिस० दोवडि० लोग० असंखेज्ज दिमागो अट्ठ-बारहचोद्द० १३९७. उपशमसम्यग्दृष्ट्रियामं अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानि और संख्यात भागहानिवाले जीवोन तथा अनन्तानुबन्धीचतुककी संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहानिवाले जीवोन लोकके असंख्यात भाग और त्रमनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सम्यग्मिध्यादृष्टियोमे अट्ठाईस प्रकृतियांकी असंख्यातभागहानि, संख्यात भागहानि और संख्यानगुणहानिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातत्रे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेपार्थ - उपशमसम्यग्दृष्टियों में वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण है। इनमें अट्ठाई प्रकृतियों के यथासम्भव पदोंकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अतः वह उक्त प्रमाण कहा है । इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यावृष्टियोंमे स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए । ३९८ सासादनसम्यग्दृष्ट्रियों में अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और बसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ - मासादनसम्यक्त्वमें अट्ठाईस प्रकृतियों की एक असंख्यातभागहानि होती है और वह सासादनसम्यष्टियोंकी सब अवस्थाओं में सम्भव है, अतः यहाँ इस पदकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और कुछ कम बारह घंटे चौदह राजप्रमाण म्पर्शन कहा है। ६ ३९९. मिथ्याष्ट्रियोंमे छन्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि; असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिकालीन सब लोकका स्पर्शन किया है। दो वृद्धि और दो हानिवालोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यातवे भाग, त्रसनाली के चौदह भागोंमेसे कुछ कम आठ भाग और सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धिवाले जीवान लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम चारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मि१ ता.श्रा.प्रत्यो· सव्वलोग वा । दोङ्ग इति पाट ।
वडिवणाए फोसणं छः हज़ार तीन सौ बयासी. चादरपुढविषजशून्य अट्ठावीमं पयडीणं सगपदविशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि पुरिसशून्य असंखेशून्य भागवड - अवडिशून्य लोगशून्य असंखशून्य मागो । एवं वादरआउशून्य तेउशून्य वाउशून्य बादरवणप्फ दिपत्तेयपञ्जनाणं । णवरि बादरवाउशून्यपज● लोगशून्य संखेशून्य भागो' सव्वलोगो वा । इत्थि- पुरिमशून्य असंखशून्य भागवड्ड अवडिदविह लोगशून्य संखेशून्य भागो' । इसलिए इनकी अपेक्षा म्पर्शन कुछकम आठवडे चांदह राजुप्रमाण कहा है। स्त्री और पुरुषवेद की तीन वृद्धियों और अवस्थितपद् स्वस्थानके समय, विहारादिके समय तथा वीं और नारकियोंके तिर्यों और मनुष्यों मे मारणान्तिक समुद्घातके समय भी सम्भव है, इसलिए इन प्रकृतियों के उक्त पढ़ोंकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और कुछ कम बारह बड़े चौदह राजुप्रमाण कहा है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चारवृद्धियाँ अवस्थित ओर अवक्तव्यपद स्वस्थानमे और विहारादिके समय ही सम्भव है, इमलिए इन दो प्रकृतियाके उक्त पढ़ोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण और कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। इन दो प्रकृतियोकी चार हानियोका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण. कुछ कम आठ घंटे चांद्रह राजुप्रमाण और सब लोकप्रमाण है यह स्पष्ट ही है, क्योंकि ये चारों हानियाँ उर्दुलना में भी सम्भव होनसे उक्तप्रमाण म्पर्शन बन जाता है। यहाँ त्रस आदि अन्य जितनी मार्गणाएं गिनाई है उनमें यह व्यवस्था बन जाता है, इसलिए उनके कथनको पंचेन्द्रियद्विक के समान कहा है । छः हज़ार तीन सौ बयासी बार पृथिवीकायिक पर्याप्तकों में अट्ठाईस प्रकृतियोंके सब पद स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी असंव्यातभागवृद्धि और अवस्थितका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग है। इसी प्रकार बादर जलकायिक पर्याप्त, बादर अग्निकायिक पर्याप्त, बादर वायुकायिक पर्याप्त और बादर वनम्पतिकायिक प्रत्येकडारीर पर्याप्त जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि बार वायुकायिक पर्याप्त जीवाने लोकका संख्यातवों भाग और सब लोकका स्पर्शन किया है तथा श्रीवेद और पुरुपवेदकी अमंग्यातभागवृद्धि और अवस्थितस्थितिविभक्तिवालाने लोकके संख्यातवे भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषाथ - बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण है । अतः यहा अट्टाईस प्रकृतियोंके जो पद सम्भव है उनका यह स्पर्शन बन जाता है, इसलिए वह उक्तप्रमाण कहा है। मात्र श्रीवेद और पुरुपवेदकी असंख्यातभागवृद्धि और अवस्थितपढ़ इसके अपवाद है। बात यह है कि जो उक्त जीव नपुंसकोंमें मारणान्निक समुद्रात करते है उनके ये पढ़ नहीं होते, इसलिए इन दो प्रकृतियों के उक्त दो पदोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण कहा है। यहाँ अन्य जितनी मार्गणाएं गिनाई है उनमें यह व्यवस्था बन जाती है इसलिए उनमे वादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीवोंके समान स्पर्शन कहा है । मात्र वादर वायुकायिक पर्याप्त जीवोका म्पर्शन लोकके संख्यातवे भागप्रमाण और मत्र लोकप्रमाण होने से इनमे सब प्रकृतियों के सम्भव पढ़ोकी अपेक्षा यह स्पर्शन जानना चाहिए । किन्तु स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी असंख्यातभागवृद्धि और अवस्थितपदकी अपेक्षा यह स्पर्शन लोकके संख्यातवें भागप्रमाण ही जानना चाहिए। कारण म्पष्ट ही है । एक ताशून्य प्रतौ असंखेशून्य भागो इति पाठ । दो ताशून्य प्रती असंशून्य भागो इति पाट; । छः हज़ार तीन सौ तिरासी, ओरालियमिस्सशून्य छब्बीसं पयडीणं असंखेशून्य भागवड-हाणि-अवडिशून्य केशून्य एक सव्बलोगो । दोवड्डि दोहाणिशून्य केवशून्य एक लोगशून्य असंखेशून्य भागो सव्वलोगो वा । इत्थि- पुरिसशून्य दोवडिशून्य लोशून्य असंखेशून्य भागो । सम्मत्त-सम्मामिशून्य चदुहं हाणीणमोघं । छः हज़ार तीन सौ पचासी. वेउव्वियशून्य छब्बीसं पयडीणं असंखेशून्य मागवडि-हाणिशून्य-दोवडि-दोहाणि - अवद्विशून्य लोशून्य असंखेजदिमागो अट्ठ- तेरहचोसाठ भागा वा देणा । णवरि इत्थि- पुरिसशून्य तिण्णिवड्डि-अवडिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ट- बारहचोद्दशून्य देखणा । अणंताणुशून्य चउकशून्य असंखेशून्य गुणहाणिशून्य - अवत्तव्वशून्य सम्मत्त-सम्मामिशून्य चत्तारिखड्डि अवडिशून्य अवत्तव्वं च अट्टचोद्दसशून्य देसूणा । मम्मत्त-सम्मामिशून्य सेसपदाणं लोगशून्य असंशून्यभागो अट्ठ-तेरहशून्य देखणा । वेउव्वियमिम्स अट्ठावासं पयडीणं सच्चपदविशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो । Sतीन सौ तिरासी औदारिकमिश्रकाययोगिया में छच्चीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यात भागहानि और अवस्थितम्थितिविभक्तिवाले जीवान कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सब लोकका म्पर्शन किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाल जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यातवं भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। पर स्त्रीवेद और पुरुषवेद की दो वृद्धियोंका स्पर्शन लॉकका असंख्यातवो भाग है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार हानियांका स्पर्शन आंघके समान है । विशेष थ औदारिकमिश्रयोगी जीव सब लोकमे पाये जाते हैं, इसलिए इनमें छब्बीम प्रकृतियाँकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपद्का स्पर्शन सत्र लोकप्रमाण कहा है। इनमें दो वृद्धि और दो हानियोका वर्तमान स्पर्शन तो लोकके असंख्यातव भागप्रमाण ही है. परन्तु अतीत स्पर्शन सब लोकप्रमाण बन जाता है. इसलिए यह लोकके असंख्यातव भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण कहा है । मात्र स्त्री और पुरुषवेदकी दो वृद्धियों न तो एकेन्द्रियों में सम्भव है और न नपुंसकामे मारणान्तिक समुद्रात करनेवालोंम सम्भव है. अन्यत्र यथायोग्य होती है. अत इन दो प्रकृतियों के उक्त पदांका स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण कहा है । शेप कथन स्पष्ट ही हूँ । तीन हज़ार तीन सौ पचासी. वैकियिककाययोगियों में छच्चीस प्रकृतियांकी असंख्यातभागवृद्धि असंख्यात भागहानि, दो वृद्धि, दो हानि और अवस्थिनस्थिनिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और त्रस नालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी तीन वृद्धि और अवस्थितका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रसनालांके चौदह भागांमेसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भाग है । अनन्तानुबन्धा चतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यका तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्यका स्पर्शन त्रम नालांके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग है ता सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके शेप पदोका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रस नालीके चौदह भागोमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह भाग है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोमे अट्ठाईस प्रकृतियोंके सब पढ़ स्थितिविभक्तिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ - वैक्रियिककायोगियों में स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी तीन वृद्धियों और अवस्थित पद स्वस्थानमे, विहारादिक समय तथा नारकियों और देवोके निर्यचां और मनुष्यांमे मारणान्तिक वड्डिपरूवणाए पोसणं । छः हज़ार तीन सौ पचासी, कम्मइयशून्य छब्बीसं पयडीणमसंखेशून्य भागवडि-हाणि-अवट्टिशून्य केवशून्य एक सव्वलोगो । दोवड्डि-दोहाणिशून्य केवशून्य एक लोशून्य असंखेशून्यभागो सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि- पुरिसशून्य दोवडिशून्य लोगशून्य असंखे • भागो बारहचोद्दस देसूणा । सम्मत्त-सम्मामिशून्य ओघं । णवरि पदविसेसो णायव्वो । एत्रमणाहारीणं । नौ हज़ार तीन सौ छियासी. आहार-आहार मिस्स• सव्वपयडीणं सव्वपदविशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो । एवमवगदशून्य - अकसाशून्य - मणपजशून्य - संजदशून्य-सामाइय- छेदोशून्यपरिहारशून्य सुहुमसांपशून्य - जहाक्खादसंजदे चि । समुद्रात के समय सम्भव होनेसे इन प्रकृतियोंके उक्त पदोंकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और कुछ कम बारह बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है । अनन्तानुवन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपद तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धियों, अवस्थित और अवक्तव्यपद मारणान्तिक समुद्घात आदिके समय सम्भव नहीं है, इसलिए इनका स्पर्शन कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। सब प्रकृतियोंके शेप पदोंका स्पर्शन वैक्रियिककाययोगके समान ही है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, इसलिए इसमें सब प्रकृतियोंके सव पदोंका म्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है । छः हज़ार तीन सौ पचासी कार्मणकाययोगियों में छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धियोंका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ भागप्रमाण और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम बारह भागप्रमाण है तथा सम्यक्त्व ओर सम्यग्मिथ्यात्वका स्पर्श ओघके समान है। किन्तु पद विशेष जानना चाहिये । इसी प्रकार अनाहारकोंके जानना चाहिए । विशेषार्थ - कार्मणकाययोगका स्पर्शन सब लोकप्रमाण है, इसलिए इसमें छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित पदका स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है। इन प्रकृतियोंकी दो वृद्धि और दो हानिमेंसे यथासम्भव द्वीन्द्रियादिक जीवोंके वृद्धियाँ और काण्डक घातके साथ संज्ञियोंके एकेन्द्रियादिकमें उत्पन्न होनेपर हानियाँ होती हैं। ऐसे जीवोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन सब लोकप्रमाण होने से यह उक्तप्रमाण कहा है । मात्र स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी दो वृद्धियाँ जो स्त्रीवेदी और पुरुषवेदियोंमे उत्पन्न होते हैं उन्हींके यथासम्भव होती है, अतः इनका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और कुछ कम बारह बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है । छः हज़ार तीन सौ छियासी आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों में सब प्रकृतियोंके सब पदस्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसी प्रकार अपगतवेदी, अकषायी, मनःपर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसांपरायिकसंयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके जानना चाहिए । [ दिविती तीन छः तीन सौ सत्तासी, इत्थिवेदशून्य छब्बीसं पयडीणम संखेशून्य भागवड्डि-हाणिशून्य [ संखेजभागवड्डिहाणि - ] संखेशून्य गुणवड्डि-हाणि अवडिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोद्दमशून्य देखणा सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि- पुरिसशून्य तिण्णिवड्डि-अवडिशून्य लोगशून्य असंखेशून्यभागो अट्ठचोद्दशून्य भागा वा देखणा । सव्वकम्माणमसंखेशून्य गुणहाणि • लोशून्य असंखे • मागो । अणंताणुशून्य चउकशून्य असंखेशून्य गुणहाणि-अवत्तव्व लोशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोसाठ देसूणा । सम्मत्त-सम्मामिशून्य चत्तारिखड्डि-अवडिशून्य अवत्तव्वशून्य केवशून्य एक लोशून्य असंखेशून्य भागो - अचोदशून्य देसूणा । चत्तारिहाणिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोदशून्य सन्चलोगो वा । पुरिसवेदे इत्थिवेदभंगो । विशेषार्थ- आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, इसलिए इनमें सत्र प्रकृतियोंके सब पदोंका स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है । यहाँ अपगतवेदी आदि अन्य जितनी मार्गणाऐ गिनाई है उनमें इसीप्रकार स्पर्शन घटित होता है, इसलिए उनके कथनको आहारककाययोगी द्विकके समान जाननेकी सूचना की है। छः हज़ार तीन सौ सत्तासी स्त्रीवेदियों में छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंन्यातभागहानि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग, त्रसनाली के चौदह भागोंमसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि कहीवेद और पुरुपवेदकी तीन वृद्धि और अवस्थितका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रसनालीके चौदह भागोमेसे कुछ कम आठ भाग है । तथा सत्र कर्माकी असंख्यातगुणहानिका म्पर्श लोकका असंख्यातवा भाग और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ भाग और त्रसनालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ भाग है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वको चारवृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातवें भाग और चसनाली के चौदह भेदोमंसे कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । चार हानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भागप्रमाण, बसनालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। पुरुपवेदियों में स्त्रीवेदियांके समान भंग है । विशेषार्थ - स्त्रीवेदियोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और सब लोकप्रमाण है। इन सब स्पर्शनों के समय छब्बीस प्रकृतियांकी तीन वृद्धियाँ, तीन हानियों और अवस्थितपद सम्भव हैं, इसलिए यह स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है । मात्र स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी तान वृद्धियों और अवस्थित पदका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ओर अनोत स्पर्शन कुछ कम आठ वटे चौदह राजुप्रमाण है। यहाँ उपपाद पदकी विवक्षा नहीं होनसे अन्य स्पर्शन नहीं कहा है। अनन्तानुवन्धाचतुष्क के सिवा पूर्वोक्त बाईस प्रकृतियों की असंख्यातगुणहानि उनकी क्षपणा के समय होती है, इसलिए इसकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण कहा है। तथा अनन्तानुबन्धाचतुष्ककी असंख्यातगुणहान और अवक्तव्य पद की अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण है, क्योंकि चारों गनिके संज्ञी पञ्चेन्द्रिय सम्यग्दृष्टि जीव इसकी विसंयोजना करते है और ऐसे वढिपरूणाए पोसणं छः हज़ार तीन सौ अठासी, मदि- सुदअण्णाणीशून्य छब्बीसं पयडीणमसंखेशून्य भागवडि-हाणि अवट्टिशून्य केब• पोशून्य एक सव्वलोगो । दोवड्ड- दोहाणिशून्य केवशून्य पोशून्य एक लोशून्य असंखेशून्य भागो अट्ठचोदस● सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि पुरिसशून्य दोवडिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ट-बारह चोद्द देसूण । सम्मत्त-सम्मामिशून्य चत्तारिहाणिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोद्दस• सव्वलोगो वा । छः तीन सौ नवासी. विहंगणाणी• छब्बीसं पयडीणं तिण्णिवडि-तिण्णिहाणि अवडिशून्य लोगशून्य असंखेशून्यभागो अट्टचोसाठ सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि पुरिसशून्य तिण्णिवड्डि - अवट्टि • जीवोंने अतीत कालमें कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य पद सम्यग्दृष्टि होते समय होते है, अतः इनकी अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम आठ वटे चौदह राजुप्रमाण कहा है । तथा इन दोनों प्रकृतियोंकी चार हानियाँ एकेन्द्रियादि सबके सम्भव हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा म्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ घंटे चौदह राजप्रमाण और सब लोकप्रमाण कहा है। पुरुपवेदियोंमें स्त्रीवेदियोके समान स्पर्शन बन जाता है, अतः उनका भङ्ग स्त्रीवेदियोंके समान जाननेकी सूचना की है। छः हज़ार तीन सौ अठासी मत्यज्ञानी और ताज्ञानी जीवाम छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातवें भाग, वसनालीक चौदह भागामेसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी दो वृद्धिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और चौदह भागोमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार हानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग, त्रसनालीके चौदह भागोमेसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशोषार्थ- मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंका सब लोकप्रमाण स्पर्शन होनसे इनमें छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा स्पर्शन सब लोकप्रमाण कहा है । तथा इनकी दो वृद्धियों और दो हानियांका प्रारम्भ क्रमसे द्वीन्द्रियादि और संज्ञी पश्चेन्द्रिय करते है और ऐसे जीवोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण, विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और मारणान्तिक व उपपाद पदकी अपेक्षा सब लोक प्रमाण होनेसे यह स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है। दो हानियाँ एकेन्द्रियों मे भी सम्भव है, इसलिए भी सब लोक प्रमाण स्पर्शन बन जाता है। नारकियोंके तिर्यवां और मनुष्यों में मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपदके समय तथा देवांके स्वस्थान विहारादिके समय स्त्रीवेद और पुरुषवेदका बन्ध सम्भव है और इनका यह सम्मिलित स्पर्शन कुछ कम बारहबढे चौदह राजु प्रमाण है, अतः स्त्रीवेद और पुरुषवेदका दो वृद्धियोंका स्पर्शन कुछ कम बारह बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है। शेष कथन सुगम है, क्योंकि उसका पहले अनेक बार स्पष्टीकरण कर आये हैं। छः हज़ार तीन सौ नवासी. विभंगज्ञानियोंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितस्थितिविभक्तिवाले जीवॉन लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनालीके चौदह भागांमसे कुछ कम आठ लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ठ- बारहचोदसशून्य देसूणा । सम्मत्त-सम्मामिशून्य चत्तारिहाणि लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोसाठ सव्वलोगो वा । छः हज़ार तीन सौ नब्बे आभिणिशून्य सुदशून्य - ओहि शून्य छब्बीसं पयडीणं असंखेशून्य भागहाणि-संखेशून्यभागहाणि-संखेशून्य गुणहाणि● लोगशून्य असंखेशून्य मागो अट्टचोसाठ देसूणा । असंखे शून्य गुणहाशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो । णवरि अनंताणुशून्य चउकशून्य असंखेशून्य गुणहाणिशून्य अट्ठचोद्दसभागा देखणा । सम्मत्त-सम्मामिशून्य असंखेशून्य भागहाणि-संखेशून्य भागहाणि संखेशून्य गुणहाणिशून्य लोग शून्य असंखेशून्य भागो अट्ठचोदशून्य देखणा । असंखेशून्य गुणहाणि● लोगशून्य असंखेशून्यभागो । एवमोहिदंसशून्य सुकलेशून्य सम्मादिहि त्ति । णवरि सुकलेशून्य उचोद्दसशून्य देखणा । सम्मत्त सम्मामिशून्य अवट्टिदशून्य खेत्तभंगो । चत्तारिवड्ढि अवत्तव्त्रशून्य अणंताणुशून्य चउकशून्य अवत्तव्वशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो छचोहसभागा वा देखणा । भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेद्की तीन वृद्धि और अवस्थितविभक्तिवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों मेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार हानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग, त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशेषार्थ - विभङ्गज्ञानी जीव वर्तमानमें सब लोकमें नहीं पाये जाते, क्योंकि संज्ञी पञ्चेन्द्रियोंमें ही कुछके यह ज्ञान होता है, इसलिए इनमें छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम आठबटे चौदह राजु और सब लोकप्रमाण कहा है। शेष सब विचार मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंके समान कर लेना चाहिए । मात्र यहाँ सब लोकप्रमाण स्पर्शन मारणान्तिक समुद्धातके समय कहना चाहिए । छः हज़ार तीन सौ नब्बे. अभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोमे छब्बीस प्रकृतियांकी असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि और संख्यातगुणहानिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवें भाग और बसनालीके चौदह भागोमेंसे कुछ कम आठ भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। असंख्यातगुणहा निवाले जीवोंने लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु विशेषता यह है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी असंख्यातगुणहा निवालोंका स्पर्श त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि और संख्यातगुणहानिवाले जीवोने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमेसे कुछ कम आठ भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। असंख्यातगुणहानिवाले जीवाने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार अवधिदर्शनवाले, शुक्ललेश्या वाले और सम्यग्दृष्टि जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि शुक्ललेश्यावालोंने त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम छह भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अवस्थितस्थितिविभक्तिका भंग क्षेत्रके समान है। चार वृद्धि और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोंने तथा अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनाली के चौदह भागों मे से कुछ कम छह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । वड्ढपरूवणाए पोसणं छः तीन सौ निन्यानवे, संजदासंजद • अट्ठावीसं पयडीणमसंखेशून्य भागहाणि विशून्य लोगशून्य असंशून्यभागो छचोद्दसशून्य देखणा । संखेशून्य भागहाणिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो । मिच्छत्त-सम्मत्तसम्मामिशून्य अणंताणुशून्य चउक्कशून्य संखेशून्य गुणहाणि असंखेशून्य गुणहाणिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो । छः तीन सौ बानवे किण्ण णील-काउ• छब्बीसं पयडीणमसंखे • मागवड-हाणिशून्य अवट्टि शून्य केशून्य एक सव्वलोगो । दोवडि-दोहाणिविशून्य केवशून्य एक लोशून्य असंखेशून्य मागो सव्वलोगो वा । अणताणु शून्य चउकशून्य असंखे शून्य गुणहाणि-अवत्तव्वशून्य लोशून्य असंखेशून्य भागो । इत्थि पुरिसशून्य दोवड्डि शून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो वे-चत्तारि-छचोहसमागा वा देसूणा । सम्सत्त-सम्मामिशून्य चत्तारिविशेषार्थ - आभिनिबोधिकज्ञानी आदि तीन ज्ञानियों में अनन्तानुबन्धीचतुष्कके सिवा सब प्रकृतियों की असंख्यातगुणहानि क्षपणाके समय होती है, इसलिए इसकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। शेष सब स्पर्शन इन मार्गणाओं के स्पर्शनके समान घटित होनेसे वह उक्तप्रमाण कहा है। यहाँ अवधिदर्शनी, शुक्ललेश्यावाले और सम्यग्दृष्टि ये तीन मार्गणाएं गिनाई है उनमे यह प्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, इसलिए उनके कथनको आभिनिबोधिकज्ञानी आदिके समान कहा है । मात्र शुक्ललेश्याका अतीत स्पर्शन कुछ कम छह बटे चौदह राजु प्रमाण होनसे इसमें कुछ कम आठ बढे चौदह राजुप्रमाण स्पर्शनके स्थानमें यह स्पर्शन जानना चाहिए। साथ ही शुक्ललेश्या में अनन्तानुवन्धीचतुष्क, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके जो अतिरिक्त पद होते है जो कि पूर्वोक्त मार्गणाओंमें सम्भव नहीं उनका मूलमें कहे अनुसार स्पर्शन अलगसे घटित कर लेना चाहिए । कोई वक्तव्य न होनेसे यहाँ हमने उसका अलगसे स्पष्टीकरण नहीं किया है । छः हज़ार तीन सौ इक्यानवे. संयतासंयतो अट्ठाईस प्रकृतियांकी असंख्यातभागहानिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमसे कुछ कम छह भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। संख्यातभागानिवाले जीवान लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्क की संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहा निवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ - संयतासंयतोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और अतीत स्पर्शन कुछ कम छह बटे चौदह राजुप्रमाण है। अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानिकी स्पर्शन बन जाता है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है । पर इन प्रकृतियांकी यथासम्भव शेष हानियोंकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ही स्पर्शन प्राप्त होता है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है। कारण स्पष्ट है । छः हज़ार तीन सौ बानवे. कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंमे छब्बीस प्रकृतियांकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवालोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सब लोकका स्पर्शन किया है। दो वृद्धि और दो हानि स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यातव भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असख्यातगुणहानि और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग जयधवलास हिदे कसायपाहुडे वड्डि-अवडि शून्य अवत्तव्वशून्य लोगशून्य असंखेशून्य मागो । चत्तारिहाणिशून्य लोगशून्य सव्वलोगो वा । [विदिविहत्ती तीन असंखेशून्य भागो छः तीन सौ तिरेसठ. तेउशून्य छब्बीसं पयडीणमसंखेशून्य भागवड्डि-हाणि-संखे शून्य भागवड-हाणि - संखेज्जगुणवड्ड-हाणि-अर्वाट्टशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ट- णवचोद्दसशून्य देरणा । णवरि इत्थि- पुरिसशून्य तिष्णिवड अवडिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोद्दसभागा वा देखूणा । अणंताणुशून्य चउकशून्य असंखेशून्य गुणहाणि-अवत्तव्य● लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ठचोद्दस देसूणा । मिच्छत्तशून्य असंखेशून्य गुणहाणि विशून्य लोगस्स असंखेशून्य भागो । सम्मत्त-सम्मामिशून्य तथा त्रसनालीके चौदह भागांमसे क्रमसे कुछ कम दो, कुछ कम चार और कुछ कम छह भोग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवान लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है। तथा चार हानिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ -- कृष्णादि तीन लेग्याओं का वर्तमान स्पर्शन सर्वलोकप्रमाण है। यहाँ छन्चोस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अतः यह उक्त प्रमाण कहा है । मात्र इन प्रकृतियोकी दो वृद्धियों और दो हानियोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातव भागप्रमाण होकर भी अतीत स्पर्शन सव लोकप्रमाण है, इसलिए यह उक्त प्रमाण कहा है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपद संज्ञी पचन्द्रियांके ही होते है और ये पद मारणान्तिक समुद्रात आदिके समय नहीं होतं, अतः इनकी अपेक्षा लोकके असंख्यातव भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी दो वृद्धियाँ द्वीन्द्रियादिकके ही होती हैं जिनका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यात भागनमाण है तथा स्त्रीवेदी और पुरुपवेदियों मे कृष्णादि लेग्यावालोंका मारणान्तिक समुद्रात द्वारा स्पर्शन कुछ कम छह् बटे चौदह राजु, कुछ कम चार बटे चौदह राजु और कुछ कम दो बटे चौदह राजुप्रमाण है, अतः यह स्पर्शन उक्तप्रमाण कहा है । इन लेश्याओंगे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धियाँ अवस्थित और अवक्तव्यपद सम्यक्त्व के समय होते है और ऐसे जीवांका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है। तथा इनकी चारो हानियाँ किसीके भी सम्भव है, इसलिए इनकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सब लोकप्रमाण कहा है । छः तीन सौ तिरानवे पीतलेश्यावालों में छब्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम नौ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेद की तीन वृद्धि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवालांन लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोन लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणहानि स्थितिविभक्तिवाले जीवाने लोकके असंख्यातव भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। व ड्डिपरूवणाए पोसणं चत्तारिखड्डि-अवडिशून्य साठ अवत्तव्वशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोदस देशून्य । चत्तारिहाणि ● लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ट-पत्रचोदसशून्य देशून्य ' एवं पम्मशून्य । णवरि णवचोद्दसभागा पत्थि । छः तीन सौ चौंसठ. अभवसिद्धिशून्य छब्बीसं पयडीणं असंखेशून्य भागवड - हाणिशून्य - अवडिशून्य सव्वलोगो । दोवडि-दोहाणिशून्य केवशून्य एक लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्टचोदसशून्य सव्वलोगो वा । इत्थि- पुरसशून्य दोवड्डशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अह-बारहशून्य चोइसभागा वा देसूणा । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । तथा वार हानिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम नौ भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसी प्रकार पद्मलेश्यावाले जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनके त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम नौ भागप्रमाण पश नहीं है। विशेषार्थ - पीनलेश्याका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ घंटे चौदह राजमाण और मारणान्तिक समुद्रातकी अपेक्षा कुछ कम नौ बटे चौदह राजुप्रमाण है। यहाँ छवीन प्रकृतियांकी तीन वृद्धि, तीन हानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा यह् पर्जन बन जाना है, अतः यह उक्तप्रमाण कहा है । मात्र स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी तीन वृद्धि और अवस्थित पदकी अपेक्षा कुछ कम नौ बटे चौदह राजप्रमाण स्पर्शन नहीं बनता, क्योंकि एकेन्द्रियोंमे मारणान्तिक समुद्रात करनेवाले इन जीवाके इन दो प्रकृतियांका बन्ध न होनेसे वहाँ इनकी तीन वृद्धियाँ और अवस्थान सम्भव नहीं, इसलिए इन दो प्रकृतियाके उक्त पदोकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण और कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण कहा है । इसीप्रकार अनन्तानुबन्धीचतुककी असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्यपदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवे भागप्रमाग और कुछ कम आठ वटे चौदह राजुप्रमाण घटित कर लेना चाहिए । मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणहानि क्षपणाके समय ही होती है, इसलिए यहाँ इसकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यात भागप्रमाण कहा है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी चार वृद्धि, अवस्थित और अवक्तव्यपदकी अपेक्षा स्पर्शन जो मूलमें कहा है उसका स्पष्टीकरण अनन्तानुबन्धोकी असंख्यातगुणहानिके स्पर्शनके समान कर लेना चाहिए, क्योंकि दोनोंका स्पर्शन एक समान है। इन दो प्रकृतियाका चार हानियाँ एकेन्द्रियों में मारणान्तिक समुद्रातके समय भी होती हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और सच लोकप्रनाग कता है। पझलेश्यामे कुछ कम नौ बटे चौदह राजप्रमाण स्पर्शन नहीं है, क्योंकि वे एकेन्द्रियामे मारणान्तिक समुद्घात नहीं करते । शेप सब कथन पीतलेश्या के समान है । छः हज़ार तीन सौ चौरानवे. अव्यों की प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने सब लोकका स्पर्श किया है। दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवाने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असंख्यातव भाग और त्रसनाली के चौदह भागोंमें से कुछ कम आठ भागप्रमाण और सर्वलोक क्षेत्रका स्पर्श किया है। स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धिवाले जीवोन लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम छः तीन सौ पचानवे. वेदगसम्मादिट्ठीसु अठ्ठावीसपयडीणम संखे • मागहाणि - संखेशून्य भागहाणिसंखेशून्य गुणहाणिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो अट्ठ चोदशून्य देखणा । मिच्छच-सम्मत्त-सम्मामिशून्य असंखेशून्य गुणहाणिशून्य लोगशून्य असंखेशून्य भागो । अणंताणुशून्य चउकशून्य असंखेशून्य गुणहाणि ● लोगशून्य असंखेशून्य मागो अट्ठचोइसशून्य देखणा । नौ तीन सौ छियानवे. खइयसम्माइडीशून्य एकवीसपयडीणमसंखेज्जभागहाणिशून्य लोगशून्य असंखे शून्यभागो अट्ठचोद्दशून्य देखणा । संखेज्जमागहाणि-संखेज्जगुणहाणि असंखेज्जगुणहाणि ● लोगशून्य असंखेज्जदिभागो । आठ और कुछ कम बारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशेषार्थ- -अभव्योंका वर्तमान स्पर्शन सर्व लोक है, अतः इनमें छब्बीस प्रकृतियों की असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवस्थितपदकी अपेक्षा स्पर्शन सर्व लोकप्रमाण कहा है। इनकी दो वृद्धि और दो हानिवाले जीवाने वर्तमानमें लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और अन्य प्रकारसे सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है, इसलिए यह स्पर्शन उक्त प्रमाण कहा है । छः तीन सौ पचानवे वेदकसम्यग्दृष्टियों में अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि और संख्यातगुणहानि स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणहानिवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुगहा निवालोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । विशेषार्थ - वेदकसम्यग्दृष्टियोंका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण स्पर्शन है। इनमें अट्टाईस प्रकृतियोंकी तीन हानियोंकी अपेक्षा और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी असंख्यातगुणहानिकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अतः यह उक्त प्रमाण कहा है। पर इनमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वकी असंख्यातगुणहानि क्षपणाके समय होती है, अतः इसकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है । § तीन सौ छियानवे क्षायिकसम्यग्दृष्टियों में इक्कीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानि स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहा निवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ-- क्षायिकसम्यक्त्वका वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण है। इनमें इक्कीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानिकी अपेक्षा यह स्पर्शन वन जाता है, अतः वह उक्त प्रमाण कहा है। इनमें इन प्रकृतियों की शेष हानियाँ क्षपणाके समय होती हैं, अतः उनकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। वड्डिपरूवणाए पोसणं नौ हज़ार तीन सौ सत्तानवे उवसमसम्माशून्य अट्ठावीसं पयडीणमसंखेज्जभागहाणि-संखेज्जभागहाणि ● अणंताणुशून्य चउकशून्य संखेज्जगुणहाणि असंखेज्जगुणहाणिशून्य लोगशून्य असंखेज्जदिभागो अट्ठ चोद्दसशून्य देसूणा । सम्मामिशून्य अट्ठावीसं पयडीणमसंखेज्जभागहाणि-संखेज्जभागहाणिसंखेज्जगुणहाणि● लोगशून्य असंखेज्जदिभागो चोद देणा । छः हज़ार तीन सौ अट्ठानवे सासणसम्माइट्ठीशून्य अट्ठावीसं पयडीणमसंखेज्जभागहाणि • लोगशून्य असंखेज्जदिभागो अट्ट बारहचोद्दशून्य देसूणा । छब्बीसं पयडीणमसंखेज्ज भागवडि-हाणिशून्य अवट्टिशून्य सव्वलोगो । 'दोवडि-दोहाणिशून्य केवशून्य एक लोगशून्य असंखेज्जदिमागो अट्टचोद्दसशून्य देखणा सव्वलोगो वा । णवरि इत्थि- पुरिसशून्य दोवडिशून्य लोगशून्य असंखेज्ज दिमागो अट्ठ-बारहचोद्दशून्य एक हज़ार तीन सौ सत्तानवे. उपशमसम्यग्दृष्ट्रियामं अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानि और संख्यात भागहानिवाले जीवोन तथा अनन्तानुबन्धीचतुककी संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहानिवाले जीवोन लोकके असंख्यात भाग और त्रमनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सम्यग्मिध्यादृष्टियोमे अट्ठाईस प्रकृतियांकी असंख्यातभागहानि, संख्यात भागहानि और संख्यानगुणहानिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातत्रे भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेपार्थ - उपशमसम्यग्दृष्टियों में वर्तमान स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और विहारादिकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण है। इनमें अट्ठाई प्रकृतियों के यथासम्भव पदोंकी अपेक्षा यह स्पर्शन बन जाता है, अतः वह उक्त प्रमाण कहा है । इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यावृष्टियोंमे स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए । तीन सौ अट्ठानवे सासादनसम्यग्दृष्ट्रियों में अट्ठाईस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागहानिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और बसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । विशेषार्थ - मासादनसम्यक्त्वमें अट्ठाईस प्रकृतियों की एक असंख्यातभागहानि होती है और वह सासादनसम्यष्टियोंकी सब अवस्थाओं में सम्भव है, अतः यहाँ इस पदकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवे भागप्रमाण, कुछ कम आठ बटे चौदह राजुप्रमाण और कुछ कम बारह घंटे चौदह राजप्रमाण म्पर्शन कहा है। छः तीन सौ निन्यानवे. मिथ्याष्ट्रियोंमे छन्बीस प्रकृतियोंकी असंख्यातभागवृद्धि; असंख्यातभागहानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिकालीन सब लोकका स्पर्शन किया है। दो वृद्धि और दो हानिवालोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? लोकके असंख्यातवे भाग, त्रसनाली के चौदह भागोंमेसे कुछ कम आठ भाग और सब लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। किन्तु इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी दो वृद्धिवाले जीवान लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम चारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिएक ता.श्रा.प्रत्यो· सव्वलोग वा । दोङ्ग इति पाट ।
MBBS में साइन करना होता है Bond, जानिए कितने लाख का? भारत में हर साल MBBS में एडमिशन लेने के लिए NEET UG परीक्षा आयोजित की जाती है। NEET UG परीक्षा के बाद कट-ऑफ लिस्ट जारी की जाती है और फिर उसी के अनुसार छात्रों को MBBS कॉलेज में सीट आवंटित की जाती है। लेकिन हम आपको याद दिलाना चाहते हैं की भारत के सभी कॉलेजों में MBBS में एडमिशन लेने के लिए एक बॉन्ड साइन किया जाता है। क्या आपने पहले कभी MBBS बॉन्ड के बारे में बारे में सुना है? यदि नहीं तो अपनी जेब टाइट कर लें। यह सूचना उन अभिवावकों के लिए है जो अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देख रहे हैं। बता दें कि MBBS में एडमिशन के दौरान काउंसलिंग के बाद एक बॉन्ड साइन किया जाता है। यह बॉन्ड मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा भारत के सभी MBBS और BDS के प्राइवेट व सरकारी कॉलेजों में साइन किया जाता है। अगर आप यह बॉन्ड तोड़ते हैं तो आपको इसके लिए भारी जुर्माना देना पड़ सकता है। Finally उसकी कीमत भी जान लीजिए, MBBS में एडमिशन के दौरान पूरे 10 लाख रुपए का बॉन्ड साइन करना होता है। अगर आपने बॉन्ड तोड़ा तो आपको बतौर जुर्माना 10 लाख रुपए भरने होंगे। क्या मैं BDS में प्रवेश लेकर MBBS के लिए NEET की तैयारी कर सकती हूं?
MBBS में साइन करना होता है Bond, जानिए कितने लाख का? भारत में हर साल MBBS में एडमिशन लेने के लिए NEET UG परीक्षा आयोजित की जाती है। NEET UG परीक्षा के बाद कट-ऑफ लिस्ट जारी की जाती है और फिर उसी के अनुसार छात्रों को MBBS कॉलेज में सीट आवंटित की जाती है। लेकिन हम आपको याद दिलाना चाहते हैं की भारत के सभी कॉलेजों में MBBS में एडमिशन लेने के लिए एक बॉन्ड साइन किया जाता है। क्या आपने पहले कभी MBBS बॉन्ड के बारे में बारे में सुना है? यदि नहीं तो अपनी जेब टाइट कर लें। यह सूचना उन अभिवावकों के लिए है जो अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देख रहे हैं। बता दें कि MBBS में एडमिशन के दौरान काउंसलिंग के बाद एक बॉन्ड साइन किया जाता है। यह बॉन्ड मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा भारत के सभी MBBS और BDS के प्राइवेट व सरकारी कॉलेजों में साइन किया जाता है। अगर आप यह बॉन्ड तोड़ते हैं तो आपको इसके लिए भारी जुर्माना देना पड़ सकता है। Finally उसकी कीमत भी जान लीजिए, MBBS में एडमिशन के दौरान पूरे दस लाख रुपए का बॉन्ड साइन करना होता है। अगर आपने बॉन्ड तोड़ा तो आपको बतौर जुर्माना दस लाख रुपए भरने होंगे। क्या मैं BDS में प्रवेश लेकर MBBS के लिए NEET की तैयारी कर सकती हूं?
पूर्व भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी (Mahendra Singh Dhoni) की कप्तानी वाली चेन्नई सुपर किंग्स (Chennai Super Kings) के दो बड़ी खबरें हैं एक अच्छी और एक बुरी। टीम के लिए अच्छी खबर ये है कि स्टार ओपनर ऋतुराज गायकवाड़ (Rituraj Gaikwad) चोट से उबरकर पूरी तरह से फिट हो चुके हैं। वहीं बुरी खबर ये है कि तेज गेंदबाज दीपक चाहर (Deepak Chahar) अभी तक अनफिट हैं जिसके चलते टीम मैनेजमेंट की चिंता बढ़ती ही जा रही है। स्पोर्ट्स डेस्कः पूर्व भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी (Mahendra Singh Dhoni) की कप्तानी वाली चेन्नई सुपर किंग्स (Chennai Super Kings) के दो बड़ी खबरें हैं एक अच्छी और एक बुरी। टीम के लिए अच्छी खबर ये है कि स्टार ओपनर ऋतुराज गायकवाड़ (Rituraj Gaikwad) चोट से उबरकर पूरी तरह से फिट हो चुके हैं। वहीं बुरी खबर ये है कि तेज गेंदबाज दीपक चाहर (Deepak Chahar) अभी तक अनफिट हैं जिसके चलते टीम मैनेजमेंट की चिंता बढ़ती ही जा रही है। तेज गेंदबाज दीपक की फिटनेस संबंधी समस्या लगातार सीएसके के लिए टेंशन बढ़ा रही है। 12-13 फरवरी को हुई आईपीएल नीलामी में फ्रेंचाइजी ने चाहर को 14 करोड़ रुपए खर्च कर टीम में वापसी कराई थी। चाहर नीलामी में बिके सबसे महंगे तेज गेंदबाज भी थे। हालांकि सीएसके को पता नहीं था कि उनका ये दांव उल्टा पड़ जाएगा। अब आलम ये है कि उनका सबसे भरोसेमंद और महंगा गेंदबाज खेलने के लिए सक्षम ही नहीं है। ताजा जानकारी के मुताबिक चाहर आईपीएल के शुरुआत चरण के मुकाबले नहीं खेल पाएंगे। सीएसके उनकी फिटनेस पर लगातार नजर बनाए हुए है। फिलहाल वे नेशनल क्रिकेट एकेडमी में फिटनेस रिकवर करने में जुटे हैं। बीसीसीआई की मेडिकल टीम की निगरानी में उनकी इलाज चल रहा है। हाल ही में हुए फिटनेस टेस्ट को वे पास नहीं कर पाए थे। आपको बता दें कि वेस्टइंडीज के खिलाफ टी20 सीरीज के दौरान चाहर को चोट लग गई थी। सीएसके के लिए संतोषजनक बात ये है कि उनका सबसे भरोसेमंद क्रिकेटर ऋतुराज गायकवाड़ अब पूरी तरह से फिट हो चुका है। ऋतुराज टीम के साथ आईपीएल कैंप से भी जुड़ चुके हैं और उन्होंने अभ्यास भी शुरू कर दिया है। ऐसी संभावना है कि वे पहले मैच में टीम की ओर से पारी की शुरुआत करेंगे। गायकवाड़ की उपस्थिति टीम के लिए इसलिए भी आवश्यक है कि वे पिछले सीजन में सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज थे। अपनी इसी फॉर्म को उन्होंने घरेलू टूर्नामेंट सैयद मुश्ताक और रणजी ट्रॉफी में भी जारी रखा था। ऋतुराज गायकवाड़ पिछले कुछ समय से बल्ले से तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन किस्मत उनका साथ नहीं दे रही है। उन्हें वेस्टइंडीज और श्रीलंका के खिलाफ टी20 सीरीज के लिए चुना गया था, लेकिन वे मैदान में नहीं उतर पाए। विंडीज के खिलाफ सीरीज से पहले वे कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। इसके बाद श्रीलंका के खिलाफ सीरीज से पहले वे चोटिल हो गए। इसके बाद उन्हें एनसीए भेजा गया था, जहां से अब वह पूरी तरह से फिट होकर लौट आए हैं। यह भी पढ़ेंः
पूर्व भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली चेन्नई सुपर किंग्स के दो बड़ी खबरें हैं एक अच्छी और एक बुरी। टीम के लिए अच्छी खबर ये है कि स्टार ओपनर ऋतुराज गायकवाड़ चोट से उबरकर पूरी तरह से फिट हो चुके हैं। वहीं बुरी खबर ये है कि तेज गेंदबाज दीपक चाहर अभी तक अनफिट हैं जिसके चलते टीम मैनेजमेंट की चिंता बढ़ती ही जा रही है। स्पोर्ट्स डेस्कः पूर्व भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली चेन्नई सुपर किंग्स के दो बड़ी खबरें हैं एक अच्छी और एक बुरी। टीम के लिए अच्छी खबर ये है कि स्टार ओपनर ऋतुराज गायकवाड़ चोट से उबरकर पूरी तरह से फिट हो चुके हैं। वहीं बुरी खबर ये है कि तेज गेंदबाज दीपक चाहर अभी तक अनफिट हैं जिसके चलते टीम मैनेजमेंट की चिंता बढ़ती ही जा रही है। तेज गेंदबाज दीपक की फिटनेस संबंधी समस्या लगातार सीएसके के लिए टेंशन बढ़ा रही है। बारह-तेरह फरवरी को हुई आईपीएल नीलामी में फ्रेंचाइजी ने चाहर को चौदह करोड़ रुपए खर्च कर टीम में वापसी कराई थी। चाहर नीलामी में बिके सबसे महंगे तेज गेंदबाज भी थे। हालांकि सीएसके को पता नहीं था कि उनका ये दांव उल्टा पड़ जाएगा। अब आलम ये है कि उनका सबसे भरोसेमंद और महंगा गेंदबाज खेलने के लिए सक्षम ही नहीं है। ताजा जानकारी के मुताबिक चाहर आईपीएल के शुरुआत चरण के मुकाबले नहीं खेल पाएंगे। सीएसके उनकी फिटनेस पर लगातार नजर बनाए हुए है। फिलहाल वे नेशनल क्रिकेट एकेडमी में फिटनेस रिकवर करने में जुटे हैं। बीसीसीआई की मेडिकल टीम की निगरानी में उनकी इलाज चल रहा है। हाल ही में हुए फिटनेस टेस्ट को वे पास नहीं कर पाए थे। आपको बता दें कि वेस्टइंडीज के खिलाफ टीबीस सीरीज के दौरान चाहर को चोट लग गई थी। सीएसके के लिए संतोषजनक बात ये है कि उनका सबसे भरोसेमंद क्रिकेटर ऋतुराज गायकवाड़ अब पूरी तरह से फिट हो चुका है। ऋतुराज टीम के साथ आईपीएल कैंप से भी जुड़ चुके हैं और उन्होंने अभ्यास भी शुरू कर दिया है। ऐसी संभावना है कि वे पहले मैच में टीम की ओर से पारी की शुरुआत करेंगे। गायकवाड़ की उपस्थिति टीम के लिए इसलिए भी आवश्यक है कि वे पिछले सीजन में सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज थे। अपनी इसी फॉर्म को उन्होंने घरेलू टूर्नामेंट सैयद मुश्ताक और रणजी ट्रॉफी में भी जारी रखा था। ऋतुराज गायकवाड़ पिछले कुछ समय से बल्ले से तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन किस्मत उनका साथ नहीं दे रही है। उन्हें वेस्टइंडीज और श्रीलंका के खिलाफ टीबीस सीरीज के लिए चुना गया था, लेकिन वे मैदान में नहीं उतर पाए। विंडीज के खिलाफ सीरीज से पहले वे कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। इसके बाद श्रीलंका के खिलाफ सीरीज से पहले वे चोटिल हो गए। इसके बाद उन्हें एनसीए भेजा गया था, जहां से अब वह पूरी तरह से फिट होकर लौट आए हैं। यह भी पढ़ेंः
Bokaro : त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दूसरे चरण में जरीडीह, कसमार और बेरमो प्रखंड क्षेत्रों में कल यानी 19 मई 2022 को मतदान होना है. दूसरे चरण में कुल 1650 प्रत्याशी चुनावी मैदान में है. जिसमें 860 महिला प्रत्याशी है. इसकी जानकारी जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह-उपायुक्त कुलदीप चौधरी ने दी है. दूसरे चरण के चुनाव से पहले मतदान कर्मियों को बोकारो इस्पात सीनियर सेकेंडरी स्कूल सेक्टर-3 से रवाना किया गया. जहां बोकारो उपायुक्त कुलदीप चौधरी और उप विकास आयुक्त कीर्तिश्री मौजूद रहीं. (बोकारो की अन्य खबरों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) कुलदीप चौधरी ने बताया कि जरीडीह, कसमार एवं बेरमो प्रखंडों में कुल 4 पदों (जिला परिषद सदस्य, पंचायत समिति सदस्य, मुखिया एवं वार्ड सदस्य पद) के लिए 1650 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं. वार्ड सदस्य पद के लिए 1025, मुखिया के लिए 350, पंचायत सदस्य समिति के लिए 242 और जिला परिषद सदस्य पद के लिए 33 प्रत्याशी चुनावी मैदान में है. साथ ही तीनों प्रखंडों में कुल 181 प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं. जिसमें वार्ड सदस्य पद के लिए 180 और जिला परिषद सदस्य के लिए 01 प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए हैं. उपायुक्त कुलदीप चौधरी ने बताया कि दूसरे चरण के चुनाव के लिए 315 भवनों में कुल 593 मतदान केंद्र बनाये गये हैं. जरीडीह प्रखंड के 73 भवनों में 210 मतदान केंद्र, कसमार के 141 भवनों में 182 मतदान केंद्र एवं बेरमो प्रखंड के 101 भवनों में 201 मतदान केंद्र बनाये गये हैं. मतदान को संचालित करने के लिए 21 कलस्टर केंद्र भी बनाया गया है. जरीडीह में 8, कसमार में 8 और बेरमो प्रखंड में 05 कलस्टर शामिल है. दूसरे चरण में होने वाली वोटिंग के लिए 135 अतिसंवेदनशील, 271 संवेदनशील और 187 सामान्य मतदान केंद्र हैं. सभी मतदान केंद्रों पर पर्याप्त संख्या में सुरक्षा बल तैनात किया गया है.
Bokaro : त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दूसरे चरण में जरीडीह, कसमार और बेरमो प्रखंड क्षेत्रों में कल यानी उन्नीस मई दो हज़ार बाईस को मतदान होना है. दूसरे चरण में कुल एक हज़ार छः सौ पचास प्रत्याशी चुनावी मैदान में है. जिसमें आठ सौ साठ महिला प्रत्याशी है. इसकी जानकारी जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह-उपायुक्त कुलदीप चौधरी ने दी है. दूसरे चरण के चुनाव से पहले मतदान कर्मियों को बोकारो इस्पात सीनियर सेकेंडरी स्कूल सेक्टर-तीन से रवाना किया गया. जहां बोकारो उपायुक्त कुलदीप चौधरी और उप विकास आयुक्त कीर्तिश्री मौजूद रहीं. कुलदीप चौधरी ने बताया कि जरीडीह, कसमार एवं बेरमो प्रखंडों में कुल चार पदों के लिए एक हज़ार छः सौ पचास प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं. वार्ड सदस्य पद के लिए एक हज़ार पच्चीस, मुखिया के लिए तीन सौ पचास, पंचायत सदस्य समिति के लिए दो सौ बयालीस और जिला परिषद सदस्य पद के लिए तैंतीस प्रत्याशी चुनावी मैदान में है. साथ ही तीनों प्रखंडों में कुल एक सौ इक्यासी प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं. जिसमें वार्ड सदस्य पद के लिए एक सौ अस्सी और जिला परिषद सदस्य के लिए एक प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए हैं. उपायुक्त कुलदीप चौधरी ने बताया कि दूसरे चरण के चुनाव के लिए तीन सौ पंद्रह भवनों में कुल पाँच सौ तिरानवे मतदान केंद्र बनाये गये हैं. जरीडीह प्रखंड के तिहत्तर भवनों में दो सौ दस मतदान केंद्र, कसमार के एक सौ इकतालीस भवनों में एक सौ बयासी मतदान केंद्र एवं बेरमो प्रखंड के एक सौ एक भवनों में दो सौ एक मतदान केंद्र बनाये गये हैं. मतदान को संचालित करने के लिए इक्कीस कलस्टर केंद्र भी बनाया गया है. जरीडीह में आठ, कसमार में आठ और बेरमो प्रखंड में पाँच कलस्टर शामिल है. दूसरे चरण में होने वाली वोटिंग के लिए एक सौ पैंतीस अतिसंवेदनशील, दो सौ इकहत्तर संवेदनशील और एक सौ सत्तासी सामान्य मतदान केंद्र हैं. सभी मतदान केंद्रों पर पर्याप्त संख्या में सुरक्षा बल तैनात किया गया है.
नई दिल्ली। सिंगापुर के प्रधानंत्री कोरोना संक्रमित हो गए हैं. हाल ही में इन्होंने दो उपमहाद्विपों का दौरा किया था. सिंगापुर के पीएम ली सीन लूंग अफ्रीका और एशिया के दौरे पर थे. लेकिन इसके बाद जब ये सिंगापुर लौटें तो ये कोरोना संक्रमित पाए गए. बता दें कि सिंगापुर के सीएम ली सीन लूंग 14 से 16 मई तक साउथ अफ्रीका और फिर इसके बाद 17 से 19 मई तक केन्या के आधिकारिक दौरे पर थे. स्वदेश लौटने के बाद पीएम ने सोमवार को ये जानकारी दी कि पहली बार वो कोरोना संक्रमित हुए हैं. ली सीन लूंग की उम्र इस समय 71 वर्ष है, उन्होंने बताया उम्र को देखते हुए पैक्सलोविड एंटीवायरल दवा लेने की सलाह दी गई है।
नई दिल्ली। सिंगापुर के प्रधानंत्री कोरोना संक्रमित हो गए हैं. हाल ही में इन्होंने दो उपमहाद्विपों का दौरा किया था. सिंगापुर के पीएम ली सीन लूंग अफ्रीका और एशिया के दौरे पर थे. लेकिन इसके बाद जब ये सिंगापुर लौटें तो ये कोरोना संक्रमित पाए गए. बता दें कि सिंगापुर के सीएम ली सीन लूंग चौदह से सोलह मई तक साउथ अफ्रीका और फिर इसके बाद सत्रह से उन्नीस मई तक केन्या के आधिकारिक दौरे पर थे. स्वदेश लौटने के बाद पीएम ने सोमवार को ये जानकारी दी कि पहली बार वो कोरोना संक्रमित हुए हैं. ली सीन लूंग की उम्र इस समय इकहत्तर वर्ष है, उन्होंने बताया उम्र को देखते हुए पैक्सलोविड एंटीवायरल दवा लेने की सलाह दी गई है।
- शिक्षा मंत्री कंवरपाल ने भाजपा कार्यकर्ताओं व आमजन को मुख्यमंत्री के 8 मार्च के जगाधरी होली कार्यक्रम के लिए दिया निमंत्रण। प्रभजीत सिंह लक्की, यमुनानगर : हरियाणा सरकार में शिक्षा, वन व पर्यटन मंत्री कंवरपाल ने बताया कि आगामी 8 मार्च को पूरे भारतवर्ष में होली का पावन पवित्र त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा। इसी कड़ी के अंतर्गत 8 मार्च दिन बुधवार को सुबह 9 बजे मुख्यमंत्री मनोहर लाल जगाधरी पहुंचेंगे व सरस्वती विद्या मंदिर जगाधरी में भाजपा कार्यकर्ताओं व आमजन के साथ फूलों की होली खेलेंगे व इसके पश्चात मुख्यमंत्री मनोहर लाल यमुनानगर में जोडिय़ो गुरुद्वारा साहिब में होला मोहल्ला समागम में भी शिरकत करेंगे। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल का इस क्षेत्र से विशेष लगाव रहा है इसीलिए वे थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद जगाधरी यमुनानगर आते रहते हैं व उनका आशीर्वाद जिला की समस्त जनता को मिलता रहता है। उन्होंने जगाधरी सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालय में पहुंचकर 8 मार्च को आयोजित होने वाले होली कार्यक्रम की तैयारियों का जायजा लिया। उन्होने कहा कि मुख्यमंत्री के जगाधरी पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया जाएगा। भाजपा कार्यकर्ताओं में मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर भारी उत्साह है, यह हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि होली जैसे पावन पवित्र पर्व पर हरियाणा के यशस्वी मुख्यमंत्री जगाधरी पहुंच रहे हैं। मुख्यमंत्री भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचकर फुलों की होली खेलेंगे, इस अवसर पर उन्होने भाजपा कार्यकर्ताओं व आमजन को निमंत्रण देते हुए कहा कि सभी लोग 8 मार्च को सुबह 9 बजे सरस्वती विद्या मंदिर जगाधरी पहुंचे व मुख्यमंत्री व अन्य गणमान्य लोगों के साथ फूलों की होली खेंलेंगे। इस दौरान यमुनानगर भाजपा विधायक घनश्यामदास अरोड़ा, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश सपरा, नगर निगम मेयर मदन चौहान, भाजयुमो जिला उपाध्यक्ष निश्चल चौधरी, भाजपा जिला मीडिया प्रमुख कपिल मनीष गर्ग साथ रहे।
- शिक्षा मंत्री कंवरपाल ने भाजपा कार्यकर्ताओं व आमजन को मुख्यमंत्री के आठ मार्च के जगाधरी होली कार्यक्रम के लिए दिया निमंत्रण। प्रभजीत सिंह लक्की, यमुनानगर : हरियाणा सरकार में शिक्षा, वन व पर्यटन मंत्री कंवरपाल ने बताया कि आगामी आठ मार्च को पूरे भारतवर्ष में होली का पावन पवित्र त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा। इसी कड़ी के अंतर्गत आठ मार्च दिन बुधवार को सुबह नौ बजे मुख्यमंत्री मनोहर लाल जगाधरी पहुंचेंगे व सरस्वती विद्या मंदिर जगाधरी में भाजपा कार्यकर्ताओं व आमजन के साथ फूलों की होली खेलेंगे व इसके पश्चात मुख्यमंत्री मनोहर लाल यमुनानगर में जोडिय़ो गुरुद्वारा साहिब में होला मोहल्ला समागम में भी शिरकत करेंगे। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल का इस क्षेत्र से विशेष लगाव रहा है इसीलिए वे थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद जगाधरी यमुनानगर आते रहते हैं व उनका आशीर्वाद जिला की समस्त जनता को मिलता रहता है। उन्होंने जगाधरी सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालय में पहुंचकर आठ मार्च को आयोजित होने वाले होली कार्यक्रम की तैयारियों का जायजा लिया। उन्होने कहा कि मुख्यमंत्री के जगाधरी पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया जाएगा। भाजपा कार्यकर्ताओं में मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर भारी उत्साह है, यह हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि होली जैसे पावन पवित्र पर्व पर हरियाणा के यशस्वी मुख्यमंत्री जगाधरी पहुंच रहे हैं। मुख्यमंत्री भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचकर फुलों की होली खेलेंगे, इस अवसर पर उन्होने भाजपा कार्यकर्ताओं व आमजन को निमंत्रण देते हुए कहा कि सभी लोग आठ मार्च को सुबह नौ बजे सरस्वती विद्या मंदिर जगाधरी पहुंचे व मुख्यमंत्री व अन्य गणमान्य लोगों के साथ फूलों की होली खेंलेंगे। इस दौरान यमुनानगर भाजपा विधायक घनश्यामदास अरोड़ा, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश सपरा, नगर निगम मेयर मदन चौहान, भाजयुमो जिला उपाध्यक्ष निश्चल चौधरी, भाजपा जिला मीडिया प्रमुख कपिल मनीष गर्ग साथ रहे।
भारतीय टीम को इंग्लैंड के हाथों पांच मैचों की टेस्ट सीरीज के बर्मिंघम टेस्ट में मिली हार के बाद अब महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने कप्तान विराट कोहली को एक सलाह दी है। भारत को पहले टेस्ट मैच में बल्लेबाजों की जबरदस्त नाकामी के कारण 31 रनों की हार का सामना करना पड़ा। पहले टेस्ट मैच में गेंदबाजों ने तो अपना पूरा काम किया, लेकिन बल्लेबाजों ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। बल्लेबाजों की नाकामी के बाद सुनील गावस्कर ने भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली को लॉर्ड्स में 9 अगस्त से शुरू होने वाले दूसरे टेस्ट मैच में एक अतिरिक्त बल्लेबाज को टीम में शामिल करने की मांग की। अगर आपको हमारा ये आर्टिकल पसंद आए तो प्लीज इसे लाइक और शेयर करें।
भारतीय टीम को इंग्लैंड के हाथों पांच मैचों की टेस्ट सीरीज के बर्मिंघम टेस्ट में मिली हार के बाद अब महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने कप्तान विराट कोहली को एक सलाह दी है। भारत को पहले टेस्ट मैच में बल्लेबाजों की जबरदस्त नाकामी के कारण इकतीस रनों की हार का सामना करना पड़ा। पहले टेस्ट मैच में गेंदबाजों ने तो अपना पूरा काम किया, लेकिन बल्लेबाजों ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। बल्लेबाजों की नाकामी के बाद सुनील गावस्कर ने भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली को लॉर्ड्स में नौ अगस्त से शुरू होने वाले दूसरे टेस्ट मैच में एक अतिरिक्त बल्लेबाज को टीम में शामिल करने की मांग की। अगर आपको हमारा ये आर्टिकल पसंद आए तो प्लीज इसे लाइक और शेयर करें।
NALANDA : रक्षाबंधन सहित अन्य त्योहारों के मौके पर महिलाएं महेंदी से अपने हाथों को सजाती है। मगर उन्हें क्या पता कि वे जिस ब्रांडेड कंपनी की मेहंदी लगा रही है वह नकली है। इसी तरह का खुलासा सिलाव थाना इलाके के बाजार में हुई है। जहाँ शृंगार की दुकान से पुलिस ने कावेरी मेहंदी कंपनी के नकली मेहंदी को बरामद किया गया है। कंपनी के अधिकारी तरुण घोसले ने बताया कि हमलोगों को सूचना मिल रही थी कि सिलाव के बाजार में कावेरी कंपनी के नाम पर नकली मेहंदी बेची जा रही है। इसी सूचना पर टीम के द्वारा कई शृंगार दुकान में जांच किया गया। जहां कंपनी के नाम पर नकली मेहंदी बेचे जाने की पुष्टि हुई। इसके बाद सिलाव थाना की मदद से रंजीत शृंगार नामक दुकान में छापेमारी किया गया। जहां से दर्जनों पैकेट नकली मेहंदी बरामद किया गया। हालांकि टीम को देखते ही दुकानदार मौके से फरार हो गया। थानाध्यक्ष पवन कुमार ने बताया कि कंपनी के अधिकारी द्वारा दुकानदार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है ।
NALANDA : रक्षाबंधन सहित अन्य त्योहारों के मौके पर महिलाएं महेंदी से अपने हाथों को सजाती है। मगर उन्हें क्या पता कि वे जिस ब्रांडेड कंपनी की मेहंदी लगा रही है वह नकली है। इसी तरह का खुलासा सिलाव थाना इलाके के बाजार में हुई है। जहाँ शृंगार की दुकान से पुलिस ने कावेरी मेहंदी कंपनी के नकली मेहंदी को बरामद किया गया है। कंपनी के अधिकारी तरुण घोसले ने बताया कि हमलोगों को सूचना मिल रही थी कि सिलाव के बाजार में कावेरी कंपनी के नाम पर नकली मेहंदी बेची जा रही है। इसी सूचना पर टीम के द्वारा कई शृंगार दुकान में जांच किया गया। जहां कंपनी के नाम पर नकली मेहंदी बेचे जाने की पुष्टि हुई। इसके बाद सिलाव थाना की मदद से रंजीत शृंगार नामक दुकान में छापेमारी किया गया। जहां से दर्जनों पैकेट नकली मेहंदी बरामद किया गया। हालांकि टीम को देखते ही दुकानदार मौके से फरार हो गया। थानाध्यक्ष पवन कुमार ने बताया कि कंपनी के अधिकारी द्वारा दुकानदार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है ।
मे गाजीउद्दीन को सफलता प्राप्त हुई और उसने शासन पर अधिकार कर लिया। वह अहमदशाहु का मन्त्री बना । उसने शीघ्र ही महमदशाह को सिंहासन से उतार कर जहादारशाह के द्वितीय के द्वितीय पुत्र भजीजउद्दीन को मालमगीर द्वितीय के नाम से १७५४ ई० मे राज्य सिंहासन पर भासीन किया । भालमगोर द्वितीय वह १७५४ ई० मे गद्दी पर बैठा। उसका अधिकाश समय कारागृह की चाहर दीवारी के मन्दर व्यतीत हुआ था। इस समय उसकी अवस्था ५५ वर्ष की थी । वह न योग्य शासक था और न योग्य सेनापति । वास्तव में कारागृह मे रहने के कारण उसको इनका तनिक भी मनुभव नहीं था। शासन की समस्त सत्ता पर गाजाउद्दीन का अधिकार था। कुछ समय उपरान्त उसने अपने प्रापको मन्त्री के हाथों से मुक्त करने के लिये षड्यन्त्र रचा, किन्तु अनुभवहीन होने के कारण उसको सफलता प्राप्त नहीं हुई । गाजीउद्दीन ने पंजाब पर प्राक्रमण कर उसको अपने अधिकार में किया। उसके इस कार्य से मफगानिस्तान के शासक महमदशाह अब्दाली ने भारत पर तृतीय प्राक्रमण सन् १७५७ ई० में किया। दिल्ली, मथुग धादि प्रदेशों को लूटता हुमा वह अफगानिस्तान वापिस चला गया। गाजीउद्दीन ने सन् १७५६ ई० मे सम्राट का बध कर उसके पुत्र शाहपालम को सम्राट घोषित किया : शाहमालम द्वितीय सन् १७५६ ई० में बढ़ राज्यसिहासन पर प्रासीन हुआ। घासन की सत्ता पर गाजीउद्दीन का प्रभुत्व था। गाजीउद्दीन की नीति के कारण दिन प्रतिदिन उसका उसका विरोध बढ़ने लगा जिससे भयभीत होकर उसने मरों की सहायता प्राप्त की। मरठ्ठों को साम्रज्य की नीति में हस्तक्षेप करने का सुवर्ण अवसर प्राप्त हुआ। उन्होने दिल्ली में प्रवेश किया और पंजाब पर भी अधिकार किया । मरहट्ठों के प्रभाव को बढ़ता देख मुसलमान ममीरों ने पहमदशाह पन्नाली को भारत भाक्रमण के लिए भामन्त्रित किया और उसको सहायता करने का वचन दिया। सन् १७६१ ६० मे उसने माक्रमण किया । भरठ्ठों ने बड़ी बीरता से पानीपत के प्रसिद्ध रणक्षेत्र में उसका सामना किया, किन्तु वे पराजित हुए। इस पराजय से मरों की शक्ति को बडा प्राघात पहुँचा। महमदशाह भन्दाली ने पाहमालम को दिल्ली का सम्राट स्वीकार किया। बगाल की पोर से मज मपनी शक्ति का विस्तार कर रहे थे । सन् १७६४ ई० मे वे बक्र के युद्ध के में विजयी हुए। मगले वर्ष सन् १७६४ ई० मे अग्रेजों को बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा से दीवानी दमूल करने का अधिकार मिला। अग्रेजों ने इलाहाबाद और बड़ा के जिले सम्राट को दिए और उससे २६ लाख रुपया वार्षिक पेंशन के रूप में देना पारम्भ किया जो सन् १७७१ ६० में बन्द कर दी गई क्योंकि सम्राट मरहठों को संरक्षिता तथा प्रभाव क्षेत्र मे मा गया था। सन् १७८० ई० में गुलाब कादिर ने दिल्ली पर अधिकार कर थाहपालम को गद्दी से उतार दिया। वह अग्रेजो के संरक्षण में भा गया । सन् १८०६६० मे उसकी मृत्यु हो गई।
मे गाजीउद्दीन को सफलता प्राप्त हुई और उसने शासन पर अधिकार कर लिया। वह अहमदशाहु का मन्त्री बना । उसने शीघ्र ही महमदशाह को सिंहासन से उतार कर जहादारशाह के द्वितीय के द्वितीय पुत्र भजीजउद्दीन को मालमगीर द्वितीय के नाम से एक हज़ार सात सौ चौवन ईशून्य मे राज्य सिंहासन पर भासीन किया । भालमगोर द्वितीय वह एक हज़ार सात सौ चौवन ईशून्य मे गद्दी पर बैठा। उसका अधिकाश समय कारागृह की चाहर दीवारी के मन्दर व्यतीत हुआ था। इस समय उसकी अवस्था पचपन वर्ष की थी । वह न योग्य शासक था और न योग्य सेनापति । वास्तव में कारागृह मे रहने के कारण उसको इनका तनिक भी मनुभव नहीं था। शासन की समस्त सत्ता पर गाजाउद्दीन का अधिकार था। कुछ समय उपरान्त उसने अपने प्रापको मन्त्री के हाथों से मुक्त करने के लिये षड्यन्त्र रचा, किन्तु अनुभवहीन होने के कारण उसको सफलता प्राप्त नहीं हुई । गाजीउद्दीन ने पंजाब पर प्राक्रमण कर उसको अपने अधिकार में किया। उसके इस कार्य से मफगानिस्तान के शासक महमदशाह अब्दाली ने भारत पर तृतीय प्राक्रमण सन् एक हज़ार सात सौ सत्तावन ईशून्य में किया। दिल्ली, मथुग धादि प्रदेशों को लूटता हुमा वह अफगानिस्तान वापिस चला गया। गाजीउद्दीन ने सन् एक हज़ार सात सौ छप्पन ईशून्य मे सम्राट का बध कर उसके पुत्र शाहपालम को सम्राट घोषित किया : शाहमालम द्वितीय सन् एक हज़ार सात सौ छप्पन ईशून्य में बढ़ राज्यसिहासन पर प्रासीन हुआ। घासन की सत्ता पर गाजीउद्दीन का प्रभुत्व था। गाजीउद्दीन की नीति के कारण दिन प्रतिदिन उसका उसका विरोध बढ़ने लगा जिससे भयभीत होकर उसने मरों की सहायता प्राप्त की। मरठ्ठों को साम्रज्य की नीति में हस्तक्षेप करने का सुवर्ण अवसर प्राप्त हुआ। उन्होने दिल्ली में प्रवेश किया और पंजाब पर भी अधिकार किया । मरहट्ठों के प्रभाव को बढ़ता देख मुसलमान ममीरों ने पहमदशाह पन्नाली को भारत भाक्रमण के लिए भामन्त्रित किया और उसको सहायता करने का वचन दिया। सन् एक हज़ार सात सौ इकसठ साठ मे उसने माक्रमण किया । भरठ्ठों ने बड़ी बीरता से पानीपत के प्रसिद्ध रणक्षेत्र में उसका सामना किया, किन्तु वे पराजित हुए। इस पराजय से मरों की शक्ति को बडा प्राघात पहुँचा। महमदशाह भन्दाली ने पाहमालम को दिल्ली का सम्राट स्वीकार किया। बगाल की पोर से मज मपनी शक्ति का विस्तार कर रहे थे । सन् एक हज़ार सात सौ चौंसठ ईशून्य मे वे बक्र के युद्ध के में विजयी हुए। मगले वर्ष सन् एक हज़ार सात सौ चौंसठ ईशून्य मे अग्रेजों को बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा से दीवानी दमूल करने का अधिकार मिला। अग्रेजों ने इलाहाबाद और बड़ा के जिले सम्राट को दिए और उससे छब्बीस लाख रुपया वार्षिक पेंशन के रूप में देना पारम्भ किया जो सन् एक हज़ार सात सौ इकहत्तर साठ में बन्द कर दी गई क्योंकि सम्राट मरहठों को संरक्षिता तथा प्रभाव क्षेत्र मे मा गया था। सन् एक हज़ार सात सौ अस्सी ईशून्य में गुलाब कादिर ने दिल्ली पर अधिकार कर थाहपालम को गद्दी से उतार दिया। वह अग्रेजो के संरक्षण में भा गया । सन् एक लाख अस्सी हज़ार छः सौ साठ मे उसकी मृत्यु हो गई।
महेश भट्ट हाल ही में अरबाज खान के चैट शो में पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े कई राज खोले. उन्होंने बताया कि उनका बचपन काफी मुश्किलों में गुजरा और उन्हें अक्सर "नाजायज बच्चे" कहकर चिढ़ाया जाता था. यहां बता दें कि महेश भट्ट की मुस्लिम मां मुस्लिम थीं, उनका नाम शिरीन मोहम्मद अली से हुआ था वहीं उनके पिता नानाभाई भट्ट हिंदू थे. महेश भट्ट ने बताया कि हिंदू इलाके में रहने की वजह से उनकी मां को अपना धर्म छिपाकर रहना पड़ा था. जिन्होंने अपनी पहचान छुपाई, क्योंकि वे एक हिंदू क्षेत्र में रहते थे. उसने कहा कि वह केवल इतना चाहती थी कि उसे महेश के पिता नानाभाई भट्ट स्वीकार करें, जो एक हिंदू व्यक्ति थे. महेश भट्ट ने याद करते हुए कहा कि जब 1998 में उनकी मां का देहांत हुआ, तो उनकी आखिरी इच्छा अपने विश्वास के अनुसार दफन करने की थी. जब उनके पिता नानाभाई भट्ट के पिता अंतिम संस्कार के लिए आए, तो उन्होंने पहली बार उनकी मांग में सिंदूर लगाया था. यह देखकर महेश भट्ट हैरान हो गए थे. उन्होंने कहा, "मुझे याद है कि जब वह मर गई, और मेरे पिता अपनी पत्नी के साथ आए, उस समय उन्होंने उसकी मांग में सिंदूर लगाया और मैंने कहा टू लिटिल टू लेट. अर्थ निर्देशक ने कहा कि उस समय उन्हें कोई गुस्सा नहीं आया, और उन्होंने अपने पिता से कहा, "मैंने कहा 'मैं तो बेटा हूं, मुझे तो जाना पड़ेगा जैसे उन्हें कहा है. वो राइट तो उपरवाला भी इनकार नहीं कर सकता मुझे. " महेश भट्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उनके पिता "अपनी परवरिश के कैदी" थे, लेकिन इस प्रकरण ने उन्हें जीवन भर के लिए डरा दिया. मेरी आंखों में अभी भी आंसू हैं. उन्होंने भावनात्मक रूप से साझा किया. भट्ट की 1998 की फिल्म ज़ख्म उनके बचपन पर आधारित थी.
महेश भट्ट हाल ही में अरबाज खान के चैट शो में पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े कई राज खोले. उन्होंने बताया कि उनका बचपन काफी मुश्किलों में गुजरा और उन्हें अक्सर "नाजायज बच्चे" कहकर चिढ़ाया जाता था. यहां बता दें कि महेश भट्ट की मुस्लिम मां मुस्लिम थीं, उनका नाम शिरीन मोहम्मद अली से हुआ था वहीं उनके पिता नानाभाई भट्ट हिंदू थे. महेश भट्ट ने बताया कि हिंदू इलाके में रहने की वजह से उनकी मां को अपना धर्म छिपाकर रहना पड़ा था. जिन्होंने अपनी पहचान छुपाई, क्योंकि वे एक हिंदू क्षेत्र में रहते थे. उसने कहा कि वह केवल इतना चाहती थी कि उसे महेश के पिता नानाभाई भट्ट स्वीकार करें, जो एक हिंदू व्यक्ति थे. महेश भट्ट ने याद करते हुए कहा कि जब एक हज़ार नौ सौ अट्ठानवे में उनकी मां का देहांत हुआ, तो उनकी आखिरी इच्छा अपने विश्वास के अनुसार दफन करने की थी. जब उनके पिता नानाभाई भट्ट के पिता अंतिम संस्कार के लिए आए, तो उन्होंने पहली बार उनकी मांग में सिंदूर लगाया था. यह देखकर महेश भट्ट हैरान हो गए थे. उन्होंने कहा, "मुझे याद है कि जब वह मर गई, और मेरे पिता अपनी पत्नी के साथ आए, उस समय उन्होंने उसकी मांग में सिंदूर लगाया और मैंने कहा टू लिटिल टू लेट. अर्थ निर्देशक ने कहा कि उस समय उन्हें कोई गुस्सा नहीं आया, और उन्होंने अपने पिता से कहा, "मैंने कहा 'मैं तो बेटा हूं, मुझे तो जाना पड़ेगा जैसे उन्हें कहा है. वो राइट तो उपरवाला भी इनकार नहीं कर सकता मुझे. " महेश भट्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उनके पिता "अपनी परवरिश के कैदी" थे, लेकिन इस प्रकरण ने उन्हें जीवन भर के लिए डरा दिया. मेरी आंखों में अभी भी आंसू हैं. उन्होंने भावनात्मक रूप से साझा किया. भट्ट की एक हज़ार नौ सौ अट्ठानवे की फिल्म ज़ख्म उनके बचपन पर आधारित थी.
Surya Grahan 21 June 2020 Aarti Timing : उज्जैन (नईदुनिया प्रतिनिधि)। आषाढ़ी अमावस्या पर रविवार को कंकण आकृति सूर्य ग्रहण होगा। धर्मधानी उज्जयिनी में ग्रहण काल के दौरान मंदिरों में आरती-पूजन का समय बदलेगा। महाकाल मंदिर में सुबह 10 बजे होने वाली भोग आरती दोपहर 2. 30 बजे होगी। शक्तिपीठ हरसिद्धि, कालभैरव व सांदीपनि आश्रम में भी ग्रहण काल के दौरान गर्भगृह के पट बंद रहेंगे। ग्रहण मोक्ष के बाद मंदिरों में शुद्धि होगी फिर भगवान का अभिषेक-पूजन होगा। कोरोना संक्रमण को देखते हुए प्रशासन ने मोक्षदायिनी शिप्रा में स्नान पर रोक लगा दी है। घाट पर पुलिस बल तैनात रहेगा। शनिवार को जिला व पुलिस प्रशासन के अधिकारियों ने घाट क्षेत्र का निरीक्षण कर व्यवस्था को अंतिम रूप दिया। ओंकारेश्वर (खंडवा)। सुबह 10 से दोपहर दो बजे तक ओंकारेश्वर व ममलेश्वर मंदिर के पट बंद रहेंगे। इस दौरान भोग आरती सहित अन्य धार्मिक गतिविधियां नहीं होंगी। प्रशासन द्वारा नर्मदा स्नान पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इसके चलते दर्शन के लिए पूर्व में पंजीकृत श्रद्धालुओं को ही ओंकारेश्वर में प्रवेश मिल सकेगा। मुख्य स्थानों के साथ ही नर्मदा के घाटों पर पुलिस और होमगार्ड जवानों की ड्यूटी लगाई गई है।
Surya Grahan इक्कीस जूनe दो हज़ार बीस Aarti Timing : उज्जैन । आषाढ़ी अमावस्या पर रविवार को कंकण आकृति सूर्य ग्रहण होगा। धर्मधानी उज्जयिनी में ग्रहण काल के दौरान मंदिरों में आरती-पूजन का समय बदलेगा। महाकाल मंदिर में सुबह दस बजे होने वाली भोग आरती दोपहर दो. तीस बजे होगी। शक्तिपीठ हरसिद्धि, कालभैरव व सांदीपनि आश्रम में भी ग्रहण काल के दौरान गर्भगृह के पट बंद रहेंगे। ग्रहण मोक्ष के बाद मंदिरों में शुद्धि होगी फिर भगवान का अभिषेक-पूजन होगा। कोरोना संक्रमण को देखते हुए प्रशासन ने मोक्षदायिनी शिप्रा में स्नान पर रोक लगा दी है। घाट पर पुलिस बल तैनात रहेगा। शनिवार को जिला व पुलिस प्रशासन के अधिकारियों ने घाट क्षेत्र का निरीक्षण कर व्यवस्था को अंतिम रूप दिया। ओंकारेश्वर । सुबह दस से दोपहर दो बजे तक ओंकारेश्वर व ममलेश्वर मंदिर के पट बंद रहेंगे। इस दौरान भोग आरती सहित अन्य धार्मिक गतिविधियां नहीं होंगी। प्रशासन द्वारा नर्मदा स्नान पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इसके चलते दर्शन के लिए पूर्व में पंजीकृत श्रद्धालुओं को ही ओंकारेश्वर में प्रवेश मिल सकेगा। मुख्य स्थानों के साथ ही नर्मदा के घाटों पर पुलिस और होमगार्ड जवानों की ड्यूटी लगाई गई है।
टीका - ओढना और पहिनना थोडे मे रखना चाहिये । उदासीन गरीववत सादगी स्वभाव ही सबको हितैषी तथा शान्तिप्रद है । साथ ही नर-नारियो के सम्बन्ध की कमी करना चाहिये । व्यावहारिक प्रपच से मन न हटाया जाय तो कभी मुक्ति हाथ नही आ सकती । सादगीपन और व्यवहार को कमी रखने से वासनाये निर्वल होकर कब्जे मे आ जाती है, बन्धन का बोझा नही पड़ता, प्रवृत्ति झगडे से लक्ष्य सिमिट कर परमार्थ साधन पुष्ट हो जाता है, राग-द्वेप सर्व कामनाओ की निवृत्ति होकर सहज ही स्थिति मिल जाती है । वातचीत मे हँसना, दूसरे को हँसाना, बारम्बार मुस्काना आदि सब राजस मय जडाध्यास चचल रूप होने से इनको त्यागते हुये साथ ही शोक-मोह, मानसिक कष्ट, निर्वाह रोग भोगादिक और दैहिक कष्टों का सदा विचार करते रहना कि ये सब दुखो का अन्त कैसे होगा ? फिर हँसने-हँसाने का मौका ही कहाँ है ? । १२८ ।। दो० - " पर मन रीझन हेतु लें, निज मन हर्ष हहाय । बहत बासना धार मे, ठट्ठा बड़ी वलाय ।। " चौ०० - द्रष्टा स्ववश राग से पारा । उदासीन मनवेग से न्यारा ॥ उदासीन उपराम सुभागी । हर्प शोक शम सोवत जागी ॥ हँसी वेग को लक्ष लखि, करै कठिन दुख यादि । दोनों को संग्राम करि, करै हॅसी भ्रम वादि ।। १२६ ।। टीका - हॅसीवेग आने पर तिसे रोकने का यह साधन है - हॅसी आते ही उसे वन्धनप्रद समझ के साथ ही शीघ्र किसी कठिन दुख का स्मरण करो । देहग्रन्थि मे सब प्रकार अपनी अवदशा सोचकर, प्रवल दुखमय विवशता के विचार की अन्त करण में कूक भर दो । फिर तो उधर राजसमय होकर दोनो वृत्तियों का संग्राम हो जायगा । अन्त मे अपने को कठोर दुख के वीच मे निश्चय होते ही एकदम हँसी रुक जायगी । यही साधना मान-बड़ाई आदि मे हर्ष आते ही पाठ ]] उसे त्याग करने में उपयोगी है। फिर तो स्वयं ये जीव स्वतन्त्र अभय विराजेगा । इस प्रकार उदासीन वृत्ति ही परम शान्त सुखमय समझ के इधर उधर दृष्टि चचलता हॅसी वृत्ति का नाश करके राजस वासना पर कब्जा कर लेना चाहिये । "हर्पं शोक तजि स्वस्थ रहीजै । सदस्वरूप शम निज मे भीजै" ॥ १२६ ॥ रसिक बचन बोलच तजै, गुप्त प्रगट लखि कीच । आसन करै एकान्त नहिं, ग्राम धाम के बीच ॥ १३० ॥ टीका-विषयोत्पादक प्रापचिक वाक्यों का बोलना छोड देवे, चाहे एकान्त में छिप के हो चाहे सबके सामने हो । अश्लील कामुक वार्ता, ममता, राग-द्वेष पक्ष वार्ता, पर दुर्गुण उभाड़ वार्ता ये सब बाते कीचड़ रूप अन्तःकरण को मलीन करने वाली ही है। ऐसी पारखदृष्टि रखके उनसे बचे । वैराग्यवान यह भी हिसाब रक्खे कि जब ग्राम मे किसी घरगृहस्थी के यहाँ रहना हो तो ऐसे एकान्त घर के अन्दर छिपे ठौर में भीतरी आसन न लगावे कि जहाँ पुरुषों के दिखावे के बाहर अर्थात अलग हो । भाव - जहाँ पुरुषों का सम्बन्ध न पड़े, स्त्रियों का अधिक सहवास पड़े ऐसे एकान्त में रहना विरक्त को खतरे से खाली नही है ॥ १३० ॥ इच्छा सेवा लेन की, दीजै सच ही त्याग । तब सुख लहै विराग को, सोह नींद से जाग ॥ १३१ ॥ टीका - कोई स्नान करवावे, वस्त्र साफ करे, प्रसाद बना के खवावे, आसन ले चले, आसन बिछावे, कोई बर्तन मॉजे, सवारी लावे, देह दाबे इत्यादि शरीर की सेवा करवाने की इच्छा वैराग्यवान को दिल से त्याग देना चाहिये । निजी कार्य स्वयं करता रहे । असमर्थ में अथवा कोई अपना धर्म भक्ति पुष्ट करने के लिये वह अपनी तीव्र श्रद्धाभाव से करे तो भले करे, किन्तु तहाँ भी वैराग्यवान
टीका - ओढना और पहिनना थोडे मे रखना चाहिये । उदासीन गरीववत सादगी स्वभाव ही सबको हितैषी तथा शान्तिप्रद है । साथ ही नर-नारियो के सम्बन्ध की कमी करना चाहिये । व्यावहारिक प्रपच से मन न हटाया जाय तो कभी मुक्ति हाथ नही आ सकती । सादगीपन और व्यवहार को कमी रखने से वासनाये निर्वल होकर कब्जे मे आ जाती है, बन्धन का बोझा नही पड़ता, प्रवृत्ति झगडे से लक्ष्य सिमिट कर परमार्थ साधन पुष्ट हो जाता है, राग-द्वेप सर्व कामनाओ की निवृत्ति होकर सहज ही स्थिति मिल जाती है । वातचीत मे हँसना, दूसरे को हँसाना, बारम्बार मुस्काना आदि सब राजस मय जडाध्यास चचल रूप होने से इनको त्यागते हुये साथ ही शोक-मोह, मानसिक कष्ट, निर्वाह रोग भोगादिक और दैहिक कष्टों का सदा विचार करते रहना कि ये सब दुखो का अन्त कैसे होगा ? फिर हँसने-हँसाने का मौका ही कहाँ है ? । एक सौ अट्ठाईस ।। दोशून्य - " पर मन रीझन हेतु लें, निज मन हर्ष हहाय । बहत बासना धार मे, ठट्ठा बड़ी वलाय ।। " चौशून्य - द्रष्टा स्ववश राग से पारा । उदासीन मनवेग से न्यारा ॥ उदासीन उपराम सुभागी । हर्प शोक शम सोवत जागी ॥ हँसी वेग को लक्ष लखि, करै कठिन दुख यादि । दोनों को संग्राम करि, करै हॅसी भ्रम वादि ।। एक सौ छब्बीस ।। टीका - हॅसीवेग आने पर तिसे रोकने का यह साधन है - हॅसी आते ही उसे वन्धनप्रद समझ के साथ ही शीघ्र किसी कठिन दुख का स्मरण करो । देहग्रन्थि मे सब प्रकार अपनी अवदशा सोचकर, प्रवल दुखमय विवशता के विचार की अन्त करण में कूक भर दो । फिर तो उधर राजसमय होकर दोनो वृत्तियों का संग्राम हो जायगा । अन्त मे अपने को कठोर दुख के वीच मे निश्चय होते ही एकदम हँसी रुक जायगी । यही साधना मान-बड़ाई आदि मे हर्ष आते ही पाठ ]] उसे त्याग करने में उपयोगी है। फिर तो स्वयं ये जीव स्वतन्त्र अभय विराजेगा । इस प्रकार उदासीन वृत्ति ही परम शान्त सुखमय समझ के इधर उधर दृष्टि चचलता हॅसी वृत्ति का नाश करके राजस वासना पर कब्जा कर लेना चाहिये । "हर्पं शोक तजि स्वस्थ रहीजै । सदस्वरूप शम निज मे भीजै" ॥ एक सौ छब्बीस ॥ रसिक बचन बोलच तजै, गुप्त प्रगट लखि कीच । आसन करै एकान्त नहिं, ग्राम धाम के बीच ॥ एक सौ तीस ॥ टीका-विषयोत्पादक प्रापचिक वाक्यों का बोलना छोड देवे, चाहे एकान्त में छिप के हो चाहे सबके सामने हो । अश्लील कामुक वार्ता, ममता, राग-द्वेष पक्ष वार्ता, पर दुर्गुण उभाड़ वार्ता ये सब बाते कीचड़ रूप अन्तःकरण को मलीन करने वाली ही है। ऐसी पारखदृष्टि रखके उनसे बचे । वैराग्यवान यह भी हिसाब रक्खे कि जब ग्राम मे किसी घरगृहस्थी के यहाँ रहना हो तो ऐसे एकान्त घर के अन्दर छिपे ठौर में भीतरी आसन न लगावे कि जहाँ पुरुषों के दिखावे के बाहर अर्थात अलग हो । भाव - जहाँ पुरुषों का सम्बन्ध न पड़े, स्त्रियों का अधिक सहवास पड़े ऐसे एकान्त में रहना विरक्त को खतरे से खाली नही है ॥ एक सौ तीस ॥ इच्छा सेवा लेन की, दीजै सच ही त्याग । तब सुख लहै विराग को, सोह नींद से जाग ॥ एक सौ इकतीस ॥ टीका - कोई स्नान करवावे, वस्त्र साफ करे, प्रसाद बना के खवावे, आसन ले चले, आसन बिछावे, कोई बर्तन मॉजे, सवारी लावे, देह दाबे इत्यादि शरीर की सेवा करवाने की इच्छा वैराग्यवान को दिल से त्याग देना चाहिये । निजी कार्य स्वयं करता रहे । असमर्थ में अथवा कोई अपना धर्म भक्ति पुष्ट करने के लिये वह अपनी तीव्र श्रद्धाभाव से करे तो भले करे, किन्तु तहाँ भी वैराग्यवान
आज के समय में वजन बढ़ना और तोंद आना एक सामान्य बात लगने लगी हैं। लेकिन इस तोंद की वजह से आपको कई परेशानियां भी होती हैं। ऐसे में जरूरी हैं कि समय रहते इससे छुटकारा पाया जाए। वजन घटाने के लिए सिर्फ एक्सर्साइज ही जरूरी नहीं बल्कि आपको अपने खानपान भी ध्यान रखने की जरूरत होती हैं। आज हम आपके लिए कुछ ऐसे आहार की जानकारी लेकर आए हैं जिनसे दूरी बनाना बहुत जरूरी हैं अन्यथा आपकी तोंद कम करने की ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाती हैं। तो आइये जानते हैं उन आहार के बारे में। कई लोग मानते हैं कि शराब पीने से वजन नहीं बढ़ता है, जबकि ऐसा नहीं है। शराब, खासकर बियर पीने से वजन तेजी से बढ़ता है और तोंद भी निकल आती है। पैक हुए फूड्स, बिस्किट और कुकीज भी वजन को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसके अलावा सोडा, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य स्वीट बेवरेज से दूरी बनाकर रखें। इनका सेवन सेहत को सिर्फ नुकसान ही नहीं पहुंचाता बल्कि बहुत तेजी से वजन भी बढ़ता है। सोयाबीन ऑइल भी वजन बढ़ा देता है। इस ऑइल को सैचुरेटेड फैट्स का एक बेहतर विकल्प माना जाता था। लेकिन साल 2016 में आई एक स्टडी के अनुसार, वजन को बढ़ाने के मामले में सोयाबीन ऑइल शुगर से भी अव्वल है। माना जाता है कि सोयाबीन ऑइल में ओमेगा-6 फैटी ऐसिड्स की मात्रा अधिक होती है। हालांकि इन ऐसिड्स की कुछ मात्रा सेहत के लिहाज से सही मानी जाती है। लेकिन ज्यादा मात्रा से वजन बढ़ सकता है। जो लोग वेट लॉस करना चाहते हैं उन्हें सफेद ब्रेड खाने से बचना चाहिए। यह रिफाइन्ड मैदा और शुगर की बनी होती है। इस ब्रेड के अत्यधिक सेवन से ब्लड में शुगर का स्तर तो बढ़ ही सकता है, साथ ही वजन भी बढ़ने लगता है। वैसे यहां भी 'किसी चीज की अति' वाला फॉर्म्युला लागू होता है। यानी सफेद ब्रेड को कभी-कभी खाने से कोई नुकसान नहीं है, लेकिन अगर डेली डायट में यह शामिल हो चुकी है तो फिर आपको अलर्ट होने की जरूरत है।
आज के समय में वजन बढ़ना और तोंद आना एक सामान्य बात लगने लगी हैं। लेकिन इस तोंद की वजह से आपको कई परेशानियां भी होती हैं। ऐसे में जरूरी हैं कि समय रहते इससे छुटकारा पाया जाए। वजन घटाने के लिए सिर्फ एक्सर्साइज ही जरूरी नहीं बल्कि आपको अपने खानपान भी ध्यान रखने की जरूरत होती हैं। आज हम आपके लिए कुछ ऐसे आहार की जानकारी लेकर आए हैं जिनसे दूरी बनाना बहुत जरूरी हैं अन्यथा आपकी तोंद कम करने की ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाती हैं। तो आइये जानते हैं उन आहार के बारे में। कई लोग मानते हैं कि शराब पीने से वजन नहीं बढ़ता है, जबकि ऐसा नहीं है। शराब, खासकर बियर पीने से वजन तेजी से बढ़ता है और तोंद भी निकल आती है। पैक हुए फूड्स, बिस्किट और कुकीज भी वजन को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसके अलावा सोडा, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य स्वीट बेवरेज से दूरी बनाकर रखें। इनका सेवन सेहत को सिर्फ नुकसान ही नहीं पहुंचाता बल्कि बहुत तेजी से वजन भी बढ़ता है। सोयाबीन ऑइल भी वजन बढ़ा देता है। इस ऑइल को सैचुरेटेड फैट्स का एक बेहतर विकल्प माना जाता था। लेकिन साल दो हज़ार सोलह में आई एक स्टडी के अनुसार, वजन को बढ़ाने के मामले में सोयाबीन ऑइल शुगर से भी अव्वल है। माना जाता है कि सोयाबीन ऑइल में ओमेगा-छः फैटी ऐसिड्स की मात्रा अधिक होती है। हालांकि इन ऐसिड्स की कुछ मात्रा सेहत के लिहाज से सही मानी जाती है। लेकिन ज्यादा मात्रा से वजन बढ़ सकता है। जो लोग वेट लॉस करना चाहते हैं उन्हें सफेद ब्रेड खाने से बचना चाहिए। यह रिफाइन्ड मैदा और शुगर की बनी होती है। इस ब्रेड के अत्यधिक सेवन से ब्लड में शुगर का स्तर तो बढ़ ही सकता है, साथ ही वजन भी बढ़ने लगता है। वैसे यहां भी 'किसी चीज की अति' वाला फॉर्म्युला लागू होता है। यानी सफेद ब्रेड को कभी-कभी खाने से कोई नुकसान नहीं है, लेकिन अगर डेली डायट में यह शामिल हो चुकी है तो फिर आपको अलर्ट होने की जरूरत है।
अलीगढ़ के पूर्व मेयर आशुतोष वार्ष्णेय ने नम आंखों से बताया कि पूर्व सीएम कल्याण सिंह उनके राजनीतिक गुरु ही नहीं पिता तुल्य भी थे। उन्होंने ही अलीगढ़ को महानगर का दर्जा देकर पहली बार नगर निगम का मेयर बनाने का गौरव हासिल कराया था। Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
अलीगढ़ के पूर्व मेयर आशुतोष वार्ष्णेय ने नम आंखों से बताया कि पूर्व सीएम कल्याण सिंह उनके राजनीतिक गुरु ही नहीं पिता तुल्य भी थे। उन्होंने ही अलीगढ़ को महानगर का दर्जा देकर पहली बार नगर निगम का मेयर बनाने का गौरव हासिल कराया था। Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
सहारनपुर। जनपद में लगातार बारिश हो रही है तो वही बम बम भोले के उद्घोष के साथ कावड़िए जनपद सहारनपुर के देहरादून रोड से होकर गुजर रहे हैं। हरियाणा पंजाब हिमाचल राजस्थान दूरदराज से आए कावड़िए हरिद्वार से जल लेकर अपने गंतव्य की ओर वापस लौट रहे हैं तो वही सुबह से हो रही बारिश में भी कावड़ियों का आवागमन जारी है। जैसे-जैसे शिवरात्रि नजदीक आ रही है वैसे वैसे कावड़ियों का आवागमन जनपद में तेज हो रहा है सुबह से हो रही बरसात से जहां मौसम सुहाना हो गया है तो वही कावड़िए भी पूरे जोश के साथ बारिश में भी अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं ।
सहारनपुर। जनपद में लगातार बारिश हो रही है तो वही बम बम भोले के उद्घोष के साथ कावड़िए जनपद सहारनपुर के देहरादून रोड से होकर गुजर रहे हैं। हरियाणा पंजाब हिमाचल राजस्थान दूरदराज से आए कावड़िए हरिद्वार से जल लेकर अपने गंतव्य की ओर वापस लौट रहे हैं तो वही सुबह से हो रही बारिश में भी कावड़ियों का आवागमन जारी है। जैसे-जैसे शिवरात्रि नजदीक आ रही है वैसे वैसे कावड़ियों का आवागमन जनपद में तेज हो रहा है सुबह से हो रही बरसात से जहां मौसम सुहाना हो गया है तो वही कावड़िए भी पूरे जोश के साथ बारिश में भी अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं ।
मधुबनी/(राजीव झा): भारी वाहन चालक प्रशिक्षित योजना के अंतर्गत चालक प्रशिक्षण-सह-यातायात शोध संस्थान,औरंगाबाद,बिहार में भारी वाहन चालकों के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। प्रशिक्षण अवधि 30 दिनों की होगी। इस अवधि में प्रशिक्षुओं के निःशुल्क भोजन एवं आवासन की व्यवस्था की गई है। इस प्रशिक्षण योजना पर होनेवाले व्यय का वहन बिहार सड़क सुरक्षा परिषद् द्वारा किया जाएगा। निःशुल्क प्रषिक्षण प्राप्त करने हेतु प्रशिक्षणार्थी को बिहार का स्थायी निवासी होना चाहिए। उनके पास हल्के व्यवसायिक वाहन चलाने का न्यूनतम 01 वर्ष का अनुभवन होना चाहिए तथा एल. एम. वी. का एक वर्ष पुराना लाईसेंस होना चाहिए। भारी व्यवसायिक वाहन चालक लर्नर लाइसेंस होना चाहिए। आवेदकों को अपने जिला परिवहन पदाधिकारी से भारी व्यवसायिक वाहन चालन का लर्निंग लाइसेंस लेना होगा। भरा हुआ आवेदन विहित प्रपत्र में अपने जिला परिवहन कार्यालय में हाथों-हाथ अथवा निबंधित डाक से जमा करना होगा,जिसके साथ एल0एम0वी0 के चालक लाईसेंस की स्वअभिप्रमाणित प्रति,भारी वाहन व्यवसायिक लर्नर लाईसेंस की छायाप्रति तथा आवेदक के आधार कार्ड,आवासीय प्रमाण-पत्र,जाति प्रमाण-पत्र आदि की छायाप्रति संलग्न करना होगा। प्रशिक्षण के प्रथम सत्र में दरभंगा प्रमंडल से तीनों जिला मिलाकर कुल 70 प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण में भाग लेंगे।
मधुबनी/: भारी वाहन चालक प्रशिक्षित योजना के अंतर्गत चालक प्रशिक्षण-सह-यातायात शोध संस्थान,औरंगाबाद,बिहार में भारी वाहन चालकों के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। प्रशिक्षण अवधि तीस दिनों की होगी। इस अवधि में प्रशिक्षुओं के निःशुल्क भोजन एवं आवासन की व्यवस्था की गई है। इस प्रशिक्षण योजना पर होनेवाले व्यय का वहन बिहार सड़क सुरक्षा परिषद् द्वारा किया जाएगा। निःशुल्क प्रषिक्षण प्राप्त करने हेतु प्रशिक्षणार्थी को बिहार का स्थायी निवासी होना चाहिए। उनके पास हल्के व्यवसायिक वाहन चलाने का न्यूनतम एक वर्ष का अनुभवन होना चाहिए तथा एल. एम. वी. का एक वर्ष पुराना लाईसेंस होना चाहिए। भारी व्यवसायिक वाहन चालक लर्नर लाइसेंस होना चाहिए। आवेदकों को अपने जिला परिवहन पदाधिकारी से भारी व्यवसायिक वाहन चालन का लर्निंग लाइसेंस लेना होगा। भरा हुआ आवेदन विहित प्रपत्र में अपने जिला परिवहन कार्यालय में हाथों-हाथ अथवा निबंधित डाक से जमा करना होगा,जिसके साथ एलशून्यएमशून्यवीशून्य के चालक लाईसेंस की स्वअभिप्रमाणित प्रति,भारी वाहन व्यवसायिक लर्नर लाईसेंस की छायाप्रति तथा आवेदक के आधार कार्ड,आवासीय प्रमाण-पत्र,जाति प्रमाण-पत्र आदि की छायाप्रति संलग्न करना होगा। प्रशिक्षण के प्रथम सत्र में दरभंगा प्रमंडल से तीनों जिला मिलाकर कुल सत्तर प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण में भाग लेंगे।
पाकिस्तान में कद्दू की कद्र ज्यादा है क्रिकेटरों की कम। ऐसा इसलिए है क्योंकि पाकिस्तान के एक जिले में जो क्रिकेट स्टेडियम बना है उस स्टेडियम में कद्दू और मिर्च उगाई जा रही हैं। इस बात का खुलासा खुद पाकिस्तान मीडिया ने किया है। नई दिल्ली, आनलाइन डेस्क। एक समय था जब पाकिस्तान क्रिकेट काफी मजबूत हुआ करता था, लेकिन मौजूदा समय में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड यानी पीसीबी का बुनियादा ढांचा पूरी तरह उखड़ा हुआ लगता है, क्योंकि टीम के पास उतने अच्छे खिलाड़ी नहीं है। इसके पीछे की वजह है घरेलू स्तर की क्रिकेट का सही तरीके से आयोजन न होना। ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है, क्योंकि स्टेडियम को जब एक सब्जी उगाने वाला फार्म की तरह प्रयोग किया जाएगा तो कद्दू की कद्र होगी, न कि क्रिकेटरों की। ऐसा ही कहना है कि पाकिस्तान मीडिया का। दरअसल, पाकिस्तान के एक मैदान पर जहां क्रिकेट खेली जानी थी, वहां सब्जियों को उगाया जा रह है। मिर्च और कद्दू की खेती उस जमीन पर हो रही है, जहां से क्रिकेटर निकलने थे। एआरवाई न्यूज के मुताबिक, पंजाब प्रांत के खानेवाल क्रिकेट स्टेडियम में घरेलू मैचों का आयोजन कराने के लिए बनाया गया था, ताकि पाकिस्तान में जमीनी स्तर पर खेल का विकास हो। इसी को ध्यान में रखते हुए स्टेडियम का निर्माण किया गया था, जिसमें अभ्यास क्षेत्र के अलावा पवेलियन सहित उच्च श्रेणी की सुविधाएं थीं, लेकिन मैदान को किसानों ने अपने कब्जे में ले लिया है। Where are authorities? ? ? ? अब इस स्टेडियम में कद्दू, मिर्च आदि जैसी सब्जियां उगाई जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, स्टेडियम खानेवाल जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसने मैदान बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए थे। पाकिस्तान के एक रिपोर्टर ने इसका खुलासा किया है और रिपोर्टिंग में बताया है कि यहां कद्दू की कद्र ज्यादा है, खिलाड़ियों की कम। ये मिर्ची उन खिलाड़ियों के जख्मों पर लग रही हैं, जो सोच रहे होंगे कि वे मेहनत करके आगे बढ़ सकते हैं।
पाकिस्तान में कद्दू की कद्र ज्यादा है क्रिकेटरों की कम। ऐसा इसलिए है क्योंकि पाकिस्तान के एक जिले में जो क्रिकेट स्टेडियम बना है उस स्टेडियम में कद्दू और मिर्च उगाई जा रही हैं। इस बात का खुलासा खुद पाकिस्तान मीडिया ने किया है। नई दिल्ली, आनलाइन डेस्क। एक समय था जब पाकिस्तान क्रिकेट काफी मजबूत हुआ करता था, लेकिन मौजूदा समय में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड यानी पीसीबी का बुनियादा ढांचा पूरी तरह उखड़ा हुआ लगता है, क्योंकि टीम के पास उतने अच्छे खिलाड़ी नहीं है। इसके पीछे की वजह है घरेलू स्तर की क्रिकेट का सही तरीके से आयोजन न होना। ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है, क्योंकि स्टेडियम को जब एक सब्जी उगाने वाला फार्म की तरह प्रयोग किया जाएगा तो कद्दू की कद्र होगी, न कि क्रिकेटरों की। ऐसा ही कहना है कि पाकिस्तान मीडिया का। दरअसल, पाकिस्तान के एक मैदान पर जहां क्रिकेट खेली जानी थी, वहां सब्जियों को उगाया जा रह है। मिर्च और कद्दू की खेती उस जमीन पर हो रही है, जहां से क्रिकेटर निकलने थे। एआरवाई न्यूज के मुताबिक, पंजाब प्रांत के खानेवाल क्रिकेट स्टेडियम में घरेलू मैचों का आयोजन कराने के लिए बनाया गया था, ताकि पाकिस्तान में जमीनी स्तर पर खेल का विकास हो। इसी को ध्यान में रखते हुए स्टेडियम का निर्माण किया गया था, जिसमें अभ्यास क्षेत्र के अलावा पवेलियन सहित उच्च श्रेणी की सुविधाएं थीं, लेकिन मैदान को किसानों ने अपने कब्जे में ले लिया है। Where are authorities? ? ? ? अब इस स्टेडियम में कद्दू, मिर्च आदि जैसी सब्जियां उगाई जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, स्टेडियम खानेवाल जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसने मैदान बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए थे। पाकिस्तान के एक रिपोर्टर ने इसका खुलासा किया है और रिपोर्टिंग में बताया है कि यहां कद्दू की कद्र ज्यादा है, खिलाड़ियों की कम। ये मिर्ची उन खिलाड़ियों के जख्मों पर लग रही हैं, जो सोच रहे होंगे कि वे मेहनत करके आगे बढ़ सकते हैं।
पिछले कुछ समय से रन बनाने के लिए जूझ रहे अनुभवी भारतीय सलामी बल्लेबाज शिखर धवन अगले साल स्वदेश में होने वाले वनडे विश्व कप की तैयारियों के तहत स्वीप शॉट और रिवर्स हिट पर काम कर रहे हैं. धवन पिछले नौ मैचों में केवल एक अर्धशतक बना पाये हैं और विश्व कप से पहले इस 37 वर्षीय बल्लेबाज का टीम में स्थान खतरे में लगता है. बांग्लादेश सीरीज के लिए टीम में शामिल नहीं किये गये शुभमन गिल को विश्वकप में कप्तान रोहित शर्मा के साथ पारी का आगाज करने के लिए प्रबल दावेदार माना जा रहा है. भारतीय टीम के मुख्य कोच राहुल द्रविड़ ने बांग्लादेश के खिलाफ बुधवार को होने वाले दूसरे वनडे से पहले धवन के साथ विशेष अभ्यास सत्र में हिस्सा लिया. धवन ने भारत के लिए करो या मरो जैसा बने इस मैच की पूर्व संध्या पर कहा कि अधिक अभ्यास करना अच्छा होता है. इन परिस्थितियों में इन शॉट (स्वीप शॉट और रिवर्स हिट) को खेलने से मदद मिलती है. यहां तक की विश्व कप भी भारत में होगा जहां स्पिनर अपना प्रभाव छोडेंगे, वहां भी ये शॉट मददगार होंगे. मुझे इस तरह के शॉट खेलने में मजा आता है. इन परिस्थितियों में अभ्यास करना अच्छा रहा. धवन के रन बनाने के लिए जूझने के कारण भारत को हाल मे पावर प्ले में नुकसान हुआ है. बांग्लादेश के खिलाफ पहले वनडे में धवन ने 17 गेंदों पर सात रन बनाये और भारतीय टीम 41. 2 ओवर में 186 रन पर आउट हो गयी. धवन ने कहा कि यह पहला अवसर नहीं है जबकि हमने सीरीज का पहला मैच गंवाया. यह सामान्य बात है. हम जानते हैं कि इन परिस्थितियों में वापसी कैसे करनी है. हम वापसी करने को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं. बांग्लादेश का स्कोर एक समय नौ विकेट पर 136 रन था लेकिन मेहंदी हसन और मुस्तफिजुर रहमान ने आखिरी विकेट के लिए 51 रन की अटूट साझेदारी करके अपनी टीम को लक्ष्य तक पहुंचाया. धवन ने कहा कि ऐसा अक्सर नहीं होता है लेकिन उन्होंने बहुत अच्छी बल्लेबाजी की. इसमें कोई शक नहीं कि बांग्लादेश ने अच्छी क्रिकेट खेली. हमने समीक्षा की है कि हमें किन क्षेत्रों में सुधार करने की जरूरत है. निश्चित तौर पर आगामी मैचों में हम अधिक प्रभाव छोड़ेंगे. हम बेहद सकारात्मक हैं और अगला मैच खेलने के लिए उत्सुक हैं. धवन ने स्पिन ऑलराउंडर वाशिंगटन सुंदर के बारे में कहा कि जब से उसने वापसी की है वह वास्तव में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. यहां तक कि न्यूजीलैंड में भी उसने एक शानदार पारी खेली थी और अच्छी गेंदबाजी की थी. वह बहुत अच्छा ऑलराउंडर है. प्रभाव छोड़ने वाला एक स्पिनर और निचले क्रम में बल्लेबाजी करने वाला उपयोगी बल्लेबाज. वह जितने अधिक मैच खेलेगा उतना उसके खेल में निखार आयेगा.
पिछले कुछ समय से रन बनाने के लिए जूझ रहे अनुभवी भारतीय सलामी बल्लेबाज शिखर धवन अगले साल स्वदेश में होने वाले वनडे विश्व कप की तैयारियों के तहत स्वीप शॉट और रिवर्स हिट पर काम कर रहे हैं. धवन पिछले नौ मैचों में केवल एक अर्धशतक बना पाये हैं और विश्व कप से पहले इस सैंतीस वर्षीय बल्लेबाज का टीम में स्थान खतरे में लगता है. बांग्लादेश सीरीज के लिए टीम में शामिल नहीं किये गये शुभमन गिल को विश्वकप में कप्तान रोहित शर्मा के साथ पारी का आगाज करने के लिए प्रबल दावेदार माना जा रहा है. भारतीय टीम के मुख्य कोच राहुल द्रविड़ ने बांग्लादेश के खिलाफ बुधवार को होने वाले दूसरे वनडे से पहले धवन के साथ विशेष अभ्यास सत्र में हिस्सा लिया. धवन ने भारत के लिए करो या मरो जैसा बने इस मैच की पूर्व संध्या पर कहा कि अधिक अभ्यास करना अच्छा होता है. इन परिस्थितियों में इन शॉट को खेलने से मदद मिलती है. यहां तक की विश्व कप भी भारत में होगा जहां स्पिनर अपना प्रभाव छोडेंगे, वहां भी ये शॉट मददगार होंगे. मुझे इस तरह के शॉट खेलने में मजा आता है. इन परिस्थितियों में अभ्यास करना अच्छा रहा. धवन के रन बनाने के लिए जूझने के कारण भारत को हाल मे पावर प्ले में नुकसान हुआ है. बांग्लादेश के खिलाफ पहले वनडे में धवन ने सत्रह गेंदों पर सात रन बनाये और भारतीय टीम इकतालीस. दो ओवर में एक सौ छियासी रन पर आउट हो गयी. धवन ने कहा कि यह पहला अवसर नहीं है जबकि हमने सीरीज का पहला मैच गंवाया. यह सामान्य बात है. हम जानते हैं कि इन परिस्थितियों में वापसी कैसे करनी है. हम वापसी करने को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं. बांग्लादेश का स्कोर एक समय नौ विकेट पर एक सौ छत्तीस रन था लेकिन मेहंदी हसन और मुस्तफिजुर रहमान ने आखिरी विकेट के लिए इक्यावन रन की अटूट साझेदारी करके अपनी टीम को लक्ष्य तक पहुंचाया. धवन ने कहा कि ऐसा अक्सर नहीं होता है लेकिन उन्होंने बहुत अच्छी बल्लेबाजी की. इसमें कोई शक नहीं कि बांग्लादेश ने अच्छी क्रिकेट खेली. हमने समीक्षा की है कि हमें किन क्षेत्रों में सुधार करने की जरूरत है. निश्चित तौर पर आगामी मैचों में हम अधिक प्रभाव छोड़ेंगे. हम बेहद सकारात्मक हैं और अगला मैच खेलने के लिए उत्सुक हैं. धवन ने स्पिन ऑलराउंडर वाशिंगटन सुंदर के बारे में कहा कि जब से उसने वापसी की है वह वास्तव में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. यहां तक कि न्यूजीलैंड में भी उसने एक शानदार पारी खेली थी और अच्छी गेंदबाजी की थी. वह बहुत अच्छा ऑलराउंडर है. प्रभाव छोड़ने वाला एक स्पिनर और निचले क्रम में बल्लेबाजी करने वाला उपयोगी बल्लेबाज. वह जितने अधिक मैच खेलेगा उतना उसके खेल में निखार आयेगा.
"लशुन गुज्जनञ्चैव पलाण्ड कवकानि च । अवक्ष्याणि द्विजातीनराममेध्यप्रभवाणि च ॥ १ ( मनु ५/५ ) तहसुल गाजर और प्यान आदि डिजातियों है। इस कोषको टोकाले जिया है, "हे नातीनाममणि द्विजातिवर्ण शुद्रपदावार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन्हों तोनों वर्षों के लिये पलाण्ड, अक्षय विशेष निषिद्ध है, किन्तु शूद्र के लिये नहीं है। समो धर्मशाखोंने डिजातियों को प्याज और लहसुन खाने से मना किया है । मजुमें दूसरी जगह लिखा है, कि दिन यदि जान बूझ कर पवाण्ड, भक्षण करे, तो वह प्रतित होता है । पलाण्ड - भनक पतित प्रायश्चित्त करके विशुद्ध हो सकता है "लडुन जग्ना पतेत् द्विजः । * ( मनुं ५/१९ ) यह तरकारी या मांसके मसालेके काम में माता है। यह बहुत अधिक पुष्ट माना जाता है । इसको गन्ध बहुत उग्र और अप्रिय होता है जिसके कारण इसका अधिक व्यवहार करनेवालाक मुद और कभी कभी शरीरया ने भो विकट दुगन्ध निकलती है एक दिन प्याज खाने से दूसरे दिन में भी उसको गन्ध पाई जाती है । फारक्रय और अकेलिन ( Fourcroy और yauquelin ) नामक दो डाकरांने प्याजवे एक प्रकारका तल. निर्यात निकला जो घोत्र हो उड़ गया । ऋिमित्रा विद्याको सहायता से उन्होंने उसका विश्लेषण करके देखा कि इसमें गन्धक, शुत्रपदार्थ ( Albumen), चीनी, गोंदको तरहका लतीला पदार्थ, फस्फरिक एसिड, साइ टआब-लाइम मोर लिगनिन् पदार्थ मिते हुए हैं। मदिराको तरह प्याज के रस में भी फेन आ जाता है। लहसुनके तेलके जैसा इसके तेलमें भी आलिलमल. फाइड ( Allyl-sulphide ) है और दोनों हो प्रायः समानयुग विशिष्ट है। प्याजके मूस ना कन्द कटु श्राखादयुक्त रोज निकबता है जो उत्तेजक वा माना गया है । यह मूत्रोत्पादक और श्लेमानिःसारक औषधरूप में भी व्यवहृत होता है । ज्वर, उदरी, श्लेषमा ( Catarrh ) और वाण्ठश्वास (Chronic Bronchitis ), वायुशूल और रक्तपित्तरोग अचाचर इसका प्रयोग किया जात हो तो यह वर्मप्रदाइक और जला कर रेमैथे जुरुटिषका काम करता है। कांवर जोमत यह और तिता है तथा उदरामान रोग में विशेष उप द्वारा है 1 इसको तो सपदि विषात सरीस्टव नजदोक या नहीं सकते । मतान्तर से इसका गुण कामोद्दोपक और वायुनाशक है। कच्चा प्याज खाने से र और मूल अधिक परिमाण में निकलता है। जहां बिच्छ पदिने काटा हो, वहाँ प्याजको रस लगा देने से ज्वाता निवृत हो जाती है। प्याजके भीतरका गूदा अग्नि में उत्तप्त करके कान के भोतर देनेवे कर्णशूल आरोग्य हो जाता है। कभी कभी प्याजको चर कर उनका गरम रस कान में डालने से वेदना जानी रहती हैं । कन्द शिवा इसके वीजसे एक प्रकारका निर्मल वर्ण होन तेल निक लता है जो नाना ओषत्रों में काम आता है। मूर्च्छागत और गुल्मवायुरोग ( Fainting anl hysterical fits ) में यह उग्रगन्ध 'स्मोलि सल्ट का काम करती है । इसने अन्त्रस्थ पेशियों को किया बलवान् रहता है और कभी भी उसका अवसाद नहीं होता । पाण्डु रोग, अर्थ, गुदभ्रश और अलक रोग ( Hy.lrophobia ) यह अधिक व्यवहुत होता है। इनका व्यवहार करनेने जड़ें या (जड़ो) दूर होती है और चय कायरोग में सर्दो होने नहीं पातो । सामान्य सनं प्याजके काढ़ और गलजतरोग में सिरके के साथ इसका प्रयोग करनेने उपकार दिखाई देता है प्याज के रस और सरसों के तेजको एक साथ मिला कर शरीर में लगाने से गेठियावातरोग आरोग्य होता है । नोआखालो प्रदेश में जब विसूचिकाोगका प्रकोप देखा जाता है, तब छोटे छोटे बच्चो के गजेमें प्याजको माला पहना देते हैं अथवा दरवाजे पर उसे लटका देते है । उनका विश्वास है कि प्याजमें ऐसा गुण है कि वह लेगको आने नहीं देता। यथार्थ में प्याज दुर्गारक है। वायुमें दुगन्धजनित भस्वास्थ्यकर गुण लोग आदि मक्रामक रोगको उत्पत्तिका कारण और शरीरका पलाराड-- पलाने हानिकारक है। एकमात्र ध्याज हो ऐसी दूषित वायुको विशुद्ध कर सकता है। प्याज खानेसे भूख बढ़ती है । सिरके के साथ पका कर इसे खाने से पाण्ड, सहा और प्रजो रोगमें विशेष उपकार होता है ! पागल कुत्ते के काटनेसे क्षतस्थान पर ताजे प्याजका रस लगा देना चाहिए । आाभ्यन्तरिक प्रयोगसे भो क्षतके प्रतिशोध आरोग्य हो जानेको सम्भावना है । डा० एल् केमिरण साइबने लिखा है, कि बङ्गालो लोग प्याज खाते हैं, इस कारण उनके शोताहरोग नहीं होता। प्याजका रस ४ से ८ औंस तक दो श्रौंस चीनी के साथ मिला कर रक्तक्षरणशील अगरोगोको खिलानेसे अति शीघ्र फायदा दिखाई देता है। सबेरे और शाम को एक एक प्याज करके कालो मिर्च के साथ खाने से मलेरियावटित ज्वर आरोग्य होता है। प्याजका मुंह काट कर उस पर जला हुआ चूना लगा कर वृश्चिकक्षत स्थान पर घिन देने से ज्वाला बहुत कुछ दब जाती है । डाकर वे रेणके मत से कच्चा प्याज नोंद लाता है। सूर्च्छारोग में इसका रस उत्कष्ट उत्तेजक औषध है। मूर्च्छा के समय वह रम रोगों को नाकमें लगाना होता है। किसी एक बरतन में यदि कुछ प्याजको बन्द करके जहां गोबर जमा किया जाता है वहां जमोनके नीचे चार मास तक गाड़ कर रख दे, तो प्याजको कामो दोपक शक्ति बढ़ती है । आमाश्य वा आमरक्तरोग में प्याजका अधिक प्रयोग होते देखा जाता है। एक ग्रेन अफोमको प्याज के भोतर भर कर उत्तन चारयुक्त अग्नि में बाधा सिद्ध करके रोगोको खिलाने से कठिन आमदतका उपथम होता है। तीन प्याजकन्दको मुट्ठी भर इमलो की पत्तियों के साथ रोगोको खिलाने से वह विरेचक औषधका काम करता है। प्याजको चूर कर उसका ताजा इस प्रर्काघात वा सरदी गरमोसे पोड़ित रोगोके शरीर में अच्छी तरह लगाने से भारो उपकार होता है। प्रायः देखा जाता है, कि उत्तर भारतवासी ग्रोष्मकालमें अपनो अपनो सन्तानको उत्तप्त वायु ( ल ह ) से बचाने के लिये गले प्याज बांध देते हैं, श्रामाशय में तेज वृद्धि करनेके लिये साधारणतः प्याज बालकोंको खिलाया जाता है । हिन्दूशास्त्र में प्याजको अशुद्ध बतलाया है, इस कारण धर्म प्राण हिन्दूमात्र हो प्याज स्पर्श नहीं करते । मुमलमान और यूरोपीयगण बिना प्याजके तरकारी आदि बनाते ही नहीं। निम्नश्रेणोके हिन्दूगय व्यव नादिकेत अथवा रोटोके साथ कच्चा प्याज खाते हैं । साइबोरियां राज्य में एक जातिका पताण्ड, उत्पन्न होता है जिसका नाम है Stone leek or rock onion -Allium fisteulosum । यूरोप में सभो समय प्याज नहीं मिलता, इस कारण व्यञ्जनादि में यही दिया जाता है । हिमालय पर्वतजात पलाण्ड (A leptophyllam) घर्मकारक और साधारण प्याज से भाल होता है । परू (A. Porum, अरबी-किराय) नामक पलाण्डु पूर्व राज्य से यूरोप खण्ड में लाया गया था 1 फरोयाके समय इजिष्ट्रवासिगण 'परु' वपन करते थे। लिनि लिखित ग्रन्थ पढ़नेसे जाना जाता है, कि सम्राट् नेरोने पहले पहल इस वोजका यूरोपजगत् में प्रचार किया । वेल्सवासिगण सौक्सनोंको पराजयके उपलक्ष में छठीं शताब्दीसे इस जातिके प्याजका चिह्न धारण करते रहे हैं। जंगली प्याज ( A. Rubellium ) उत्तरपश्चिम-हिमालयखण्ड पर लाहोर तक विस्तृत स्थानमें उत्पन्न होता है। इसको पत्तियोंका दल मोटा होता है। इसका कन्द कच्चा और सिझा कर खाया जाता है। स्थान विशेषसे इसके और भो दो नाम सुने जाते हैं, बरनो प्याज और चिरि प्याजोः मोजे सके समय इजिप्टमें प्याजकी खेतो होतो थो। हिरोदोतसने ४१३ ई० सन्के पहले जित शिलालिविका उल्लेख किया है उसमें लिखा है कि, 'इजिप्टके विरामिड निर्माण कार्य में जो सब मजदूर काम करते थे, उन्होंने ४२८८०० पोण्डका प्याज खाया था।' पलाद ( स० पुस्खो० ) पल मांस अत्तोति [अद-भक्षणे (कर्मण्यण । पा ३।२।१ ) इति । १ राक्षस । (लि० ) २ मांसभक्षक । पलादन (स० पु०स्त्रो०) पल' माम अत्तोति पल-भदुब्यु । १ राक्षस ( त्रि० ) २ सांसमजणगौल। पसान (५०) महो या चारजना जो जानवरों पीठ पर लादने या चढ़ने के लिये कमा जाता है। पैजानना ( हि● क्रि० ) १ घोड़ आदि पर पलान कसना, गही या चारजामा कसना या बांधना । २ चढ़ाई को तैयारी करना, धावा करने के लिये तैयार होना । पलानी (स्त्रिो० ) १ छप्पर । २ पानके आकार का एक गहना जिसे स्त्रियां पर पजे के ऊपर पहनती हैं । पचान ( स ० क्लो० ) पल' मांस तेन सह पक्कमन्त्र, मध्य पदलोपि कर्मधारयः । मांसादियुक्ता सिद्ध अन्न, चावल और मांस से मेल से बना हुआ भोजन, पुनाव । पाकराजेखर में इसको पाकप्रणाली इस प्रकार लिखी है. काम मांस १ शराव, घृत मांसका चौथाई भाग, दार चोनो ३ मांगा, लवङ्ग ३ माया, इलाय वो ३ सागा, तण्डु, १ शराव, मिर्च २ तोला, तेजपत्र १ तोला, क्रुङ्गम १ माशा, अदरक २ तोला, लव ए ६ तोला, धनिया २ तोला, द्राचा ( शरावका पादाई पहले कागमांतको सूक्ष्म रूप से चूर्ण करके शुष्क प्रवे पाक करने से बाद दूसरे बरतन में तेजपत्र बिछा दे और तब ऊपर से थोड़ा अखण्ड गवद्रथ डाल दे। चावलको जलमें अर्द्धसिद्ध करके उसका मांड पमा ले और उसमें थोड़ा गन्धद्रय मिला कर इस अईसिद्ध तण्डुलका मांस के ऊपर अच्छो तरह सजा कर रख दे । इस प्रकार दीवा तोन वार सजा कर रखना होता है। पोछे इसके ऊपर बचा हुआ घो छिड़क दे और दो दण्ड तक आंच देते रहे । ऐसा करने से वह भलीभांति सिद्ध हो जायगा । मांस यदि न दिया जाय, तो उसके बदले में मछलो, फतु मूलादि भो दे सकते हैं। इसमें गन्धद्रव्य तो दधि ते साथ मिला कर देना होता है । पलाप ( म ० ० ) पल' मांस प्राप्यते प्राप्यते वाहुत्यन अत्र, पाप घञ । १ कण्ठपायक । २ हस्तिकपोल, हाथोका कपोल, कनपटी आदि । पलाश ( स ० स्त्री॰ ) नेत्राञ्जन । पलामू-विहार और उड़ीसा के छोटानागपुर उपविभागका एक जिला। यह बता० २३ २० से २४ ३८ उ० और देशा० ८३' २० से ८४५८ मध्य अवस्थित है। भूपरिमाप ४८१४ वर्ममोल है। इसके उत्तर में शाहाबाद और गया; पूर्व में गया, हजारीबाग और रांची, दक्षिण में रांची और सुरगुजा राज्य तथा पश्चिम में युक्त प्रदेश के सरगुजा और मिरापुर जिता है। इस जिलेका अधिकांश पर्वतमालाने घिरा सोननदो जिलेके उत्तरांवमें बह गई है। यहां के जङ्गल में बाघ, चीता, सम्बर, जयसार, नोलगाय और जङ्गलो कुत्ते पाये जाते हैं । यहांका तापपरिमाण ७४° से ८४ और वार्षिक वृष्टिात ४८ इञ्च है । पलामू जिलेका इतिहास १६०३ ई०के पहले नहीं मिलता। उस समय चेरोव शने राक्सत राजपूत को भगा कर अपना आधिपत्य जमा लिया। प्रायः २०० वर्ष तक राज्य किया । इन मेदनीराय थे जिन्होंने १६५८ से १६७२ ६० तक शासन किया । इन्होंने अपना राज्य गया, हजारोबाग और सुरगुजा तक फैला लिया था। यहां जो दुर्ग हैं, उनमेंसे एक इन्होंका बनवाया हुआ है। दूसरे दुगक नोत्रे इन लड़के ने डालो थो, पर वे इसे पूरा करन सके । उम समय मुसलमानोंने कई बार पलामू पर चढ़ाई को और राजाको कर देने के लिये बाध्य किया । दूसरे वर्ष दाऊद खांने यहां दुर्ग पर अधिकार जमा हो लिया। १७२२ ई० में राज रजिरा मारे गये और उनके छोटे लड़के राजनिहामन पर प्रतिष्ठित हुए । तदनन्तर जयण राय उन्हें सिहासनयत कर आप गद्दी पर बैठ गये। कुछ वर्ष बाद जयजगणराय गोलो के आघात मे पञ्चत्वको प्राप्त हुए और उनके परिवारवर्ग प्रागा ले कर मेगरा भागे। यहां उन्होंने उद वन्तरराम नामक एक कानूनगोके यहां आश्रय लिया उदवन्त १००० ई० में मृ राजा पोते गोपालरायको गमेण्ट एजेण्ट कप्तान कामकके पास पटना ले गये और सारा हाल कह सुनाया। इस पर कलानने राजाको सेनाको अच्छी तरह परास्त कर पलामूके उचित उत्त राधिकारी गोपालरायको सिंहासन पर बिठाया । किन्तु दुर्भाग्यवश दो वर्ष पोछे गोपालरायने मानूनगोको हत्या में दुष्टोंका साथ दिया और इस अपराध में उन्हें कठिन कारावास की सजा हुई । १७८४ ई० को पटने में उनको मृत्यु हुई। इसी समय बसन्तराय भी जो उनके कारावास के समय गद्दी पर बैठे थे, कराल काल के गाल में पतित हुए । तदनन्तर १८१३ ईमें चुगमनराय राज सिहासन पर अधिरूढ़ हुए। इस समय पनाम जिले
"लशुन गुज्जनञ्चैव पलाण्ड कवकानि च । अवक्ष्याणि द्विजातीनराममेध्यप्रभवाणि च ॥ एक तहसुल गाजर और प्यान आदि डिजातियों है। इस कोषको टोकाले जिया है, "हे नातीनाममणि द्विजातिवर्ण शुद्रपदावार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन्हों तोनों वर्षों के लिये पलाण्ड, अक्षय विशेष निषिद्ध है, किन्तु शूद्र के लिये नहीं है। समो धर्मशाखोंने डिजातियों को प्याज और लहसुन खाने से मना किया है । मजुमें दूसरी जगह लिखा है, कि दिन यदि जान बूझ कर पवाण्ड, भक्षण करे, तो वह प्रतित होता है । पलाण्ड - भनक पतित प्रायश्चित्त करके विशुद्ध हो सकता है "लडुन जग्ना पतेत् द्विजः । * यह तरकारी या मांसके मसालेके काम में माता है। यह बहुत अधिक पुष्ट माना जाता है । इसको गन्ध बहुत उग्र और अप्रिय होता है जिसके कारण इसका अधिक व्यवहार करनेवालाक मुद और कभी कभी शरीरया ने भो विकट दुगन्ध निकलती है एक दिन प्याज खाने से दूसरे दिन में भी उसको गन्ध पाई जाती है । फारक्रय और अकेलिन नामक दो डाकरांने प्याजवे एक प्रकारका तल. निर्यात निकला जो घोत्र हो उड़ गया । ऋिमित्रा विद्याको सहायता से उन्होंने उसका विश्लेषण करके देखा कि इसमें गन्धक, शुत्रपदार्थ , चीनी, गोंदको तरहका लतीला पदार्थ, फस्फरिक एसिड, साइ टआब-लाइम मोर लिगनिन् पदार्थ मिते हुए हैं। मदिराको तरह प्याज के रस में भी फेन आ जाता है। लहसुनके तेलके जैसा इसके तेलमें भी आलिलमल. फाइड है और दोनों हो प्रायः समानयुग विशिष्ट है। प्याजके मूस ना कन्द कटु श्राखादयुक्त रोज निकबता है जो उत्तेजक वा माना गया है । यह मूत्रोत्पादक और श्लेमानिःसारक औषधरूप में भी व्यवहृत होता है । ज्वर, उदरी, श्लेषमा और वाण्ठश्वास , वायुशूल और रक्तपित्तरोग अचाचर इसका प्रयोग किया जात हो तो यह वर्मप्रदाइक और जला कर रेमैथे जुरुटिषका काम करता है। कांवर जोमत यह और तिता है तथा उदरामान रोग में विशेष उप द्वारा है एक इसको तो सपदि विषात सरीस्टव नजदोक या नहीं सकते । मतान्तर से इसका गुण कामोद्दोपक और वायुनाशक है। कच्चा प्याज खाने से र और मूल अधिक परिमाण में निकलता है। जहां बिच्छ पदिने काटा हो, वहाँ प्याजको रस लगा देने से ज्वाता निवृत हो जाती है। प्याजके भीतरका गूदा अग्नि में उत्तप्त करके कान के भोतर देनेवे कर्णशूल आरोग्य हो जाता है। कभी कभी प्याजको चर कर उनका गरम रस कान में डालने से वेदना जानी रहती हैं । कन्द शिवा इसके वीजसे एक प्रकारका निर्मल वर्ण होन तेल निक लता है जो नाना ओषत्रों में काम आता है। मूर्च्छागत और गुल्मवायुरोग में यह उग्रगन्ध 'स्मोलि सल्ट का काम करती है । इसने अन्त्रस्थ पेशियों को किया बलवान् रहता है और कभी भी उसका अवसाद नहीं होता । पाण्डु रोग, अर्थ, गुदभ्रश और अलक रोग यह अधिक व्यवहुत होता है। इनका व्यवहार करनेने जड़ें या दूर होती है और चय कायरोग में सर्दो होने नहीं पातो । सामान्य सनं प्याजके काढ़ और गलजतरोग में सिरके के साथ इसका प्रयोग करनेने उपकार दिखाई देता है प्याज के रस और सरसों के तेजको एक साथ मिला कर शरीर में लगाने से गेठियावातरोग आरोग्य होता है । नोआखालो प्रदेश में जब विसूचिकाोगका प्रकोप देखा जाता है, तब छोटे छोटे बच्चो के गजेमें प्याजको माला पहना देते हैं अथवा दरवाजे पर उसे लटका देते है । उनका विश्वास है कि प्याजमें ऐसा गुण है कि वह लेगको आने नहीं देता। यथार्थ में प्याज दुर्गारक है। वायुमें दुगन्धजनित भस्वास्थ्यकर गुण लोग आदि मक्रामक रोगको उत्पत्तिका कारण और शरीरका पलाराड-- पलाने हानिकारक है। एकमात्र ध्याज हो ऐसी दूषित वायुको विशुद्ध कर सकता है। प्याज खानेसे भूख बढ़ती है । सिरके के साथ पका कर इसे खाने से पाण्ड, सहा और प्रजो रोगमें विशेष उपकार होता है ! पागल कुत्ते के काटनेसे क्षतस्थान पर ताजे प्याजका रस लगा देना चाहिए । आाभ्यन्तरिक प्रयोगसे भो क्षतके प्रतिशोध आरोग्य हो जानेको सम्भावना है । डाशून्य एल् केमिरण साइबने लिखा है, कि बङ्गालो लोग प्याज खाते हैं, इस कारण उनके शोताहरोग नहीं होता। प्याजका रस चार से आठ औंस तक दो श्रौंस चीनी के साथ मिला कर रक्तक्षरणशील अगरोगोको खिलानेसे अति शीघ्र फायदा दिखाई देता है। सबेरे और शाम को एक एक प्याज करके कालो मिर्च के साथ खाने से मलेरियावटित ज्वर आरोग्य होता है। प्याजका मुंह काट कर उस पर जला हुआ चूना लगा कर वृश्चिकक्षत स्थान पर घिन देने से ज्वाला बहुत कुछ दब जाती है । डाकर वे रेणके मत से कच्चा प्याज नोंद लाता है। सूर्च्छारोग में इसका रस उत्कष्ट उत्तेजक औषध है। मूर्च्छा के समय वह रम रोगों को नाकमें लगाना होता है। किसी एक बरतन में यदि कुछ प्याजको बन्द करके जहां गोबर जमा किया जाता है वहां जमोनके नीचे चार मास तक गाड़ कर रख दे, तो प्याजको कामो दोपक शक्ति बढ़ती है । आमाश्य वा आमरक्तरोग में प्याजका अधिक प्रयोग होते देखा जाता है। एक ग्रेन अफोमको प्याज के भोतर भर कर उत्तन चारयुक्त अग्नि में बाधा सिद्ध करके रोगोको खिलाने से कठिन आमदतका उपथम होता है। तीन प्याजकन्दको मुट्ठी भर इमलो की पत्तियों के साथ रोगोको खिलाने से वह विरेचक औषधका काम करता है। प्याजको चूर कर उसका ताजा इस प्रर्काघात वा सरदी गरमोसे पोड़ित रोगोके शरीर में अच्छी तरह लगाने से भारो उपकार होता है। प्रायः देखा जाता है, कि उत्तर भारतवासी ग्रोष्मकालमें अपनो अपनो सन्तानको उत्तप्त वायु से बचाने के लिये गले प्याज बांध देते हैं, श्रामाशय में तेज वृद्धि करनेके लिये साधारणतः प्याज बालकोंको खिलाया जाता है । हिन्दूशास्त्र में प्याजको अशुद्ध बतलाया है, इस कारण धर्म प्राण हिन्दूमात्र हो प्याज स्पर्श नहीं करते । मुमलमान और यूरोपीयगण बिना प्याजके तरकारी आदि बनाते ही नहीं। निम्नश्रेणोके हिन्दूगय व्यव नादिकेत अथवा रोटोके साथ कच्चा प्याज खाते हैं । साइबोरियां राज्य में एक जातिका पताण्ड, उत्पन्न होता है जिसका नाम है Stone leek or rock onion -Allium fisteulosum । यूरोप में सभो समय प्याज नहीं मिलता, इस कारण व्यञ्जनादि में यही दिया जाता है । हिमालय पर्वतजात पलाण्ड घर्मकारक और साधारण प्याज से भाल होता है । परू नामक पलाण्डु पूर्व राज्य से यूरोप खण्ड में लाया गया था एक फरोयाके समय इजिष्ट्रवासिगण 'परु' वपन करते थे। लिनि लिखित ग्रन्थ पढ़नेसे जाना जाता है, कि सम्राट् नेरोने पहले पहल इस वोजका यूरोपजगत् में प्रचार किया । वेल्सवासिगण सौक्सनोंको पराजयके उपलक्ष में छठीं शताब्दीसे इस जातिके प्याजका चिह्न धारण करते रहे हैं। जंगली प्याज उत्तरपश्चिम-हिमालयखण्ड पर लाहोर तक विस्तृत स्थानमें उत्पन्न होता है। इसको पत्तियोंका दल मोटा होता है। इसका कन्द कच्चा और सिझा कर खाया जाता है। स्थान विशेषसे इसके और भो दो नाम सुने जाते हैं, बरनो प्याज और चिरि प्याजोः मोजे सके समय इजिप्टमें प्याजकी खेतो होतो थो। हिरोदोतसने चार सौ तेरह ईशून्य सन्के पहले जित शिलालिविका उल्लेख किया है उसमें लिखा है कि, 'इजिप्टके विरामिड निर्माण कार्य में जो सब मजदूर काम करते थे, उन्होंने चार लाख अट्ठाईस हज़ार आठ सौ पोण्डका प्याज खाया था।' पलाद पल मांस अत्तोति [अद-भक्षणे इति । एक राक्षस । दो मांसभक्षक । पलादन पल' माम अत्तोति पल-भदुब्यु । एक राक्षस दो सांसमजणगौल। पसान महो या चारजना जो जानवरों पीठ पर लादने या चढ़ने के लिये कमा जाता है। पैजानना एक घोड़ आदि पर पलान कसना, गही या चारजामा कसना या बांधना । दो चढ़ाई को तैयारी करना, धावा करने के लिये तैयार होना । पलानी एक छप्पर । दो पानके आकार का एक गहना जिसे स्त्रियां पर पजे के ऊपर पहनती हैं । पचान पल' मांस तेन सह पक्कमन्त्र, मध्य पदलोपि कर्मधारयः । मांसादियुक्ता सिद्ध अन्न, चावल और मांस से मेल से बना हुआ भोजन, पुनाव । पाकराजेखर में इसको पाकप्रणाली इस प्रकार लिखी है. काम मांस एक शराव, घृत मांसका चौथाई भाग, दार चोनो तीन मांगा, लवङ्ग तीन माया, इलाय वो तीन सागा, तण्डु, एक शराव, मिर्च दो तोला, तेजपत्र एक तोला, क्रुङ्गम एक माशा, अदरक दो तोला, लव ए छः तोला, धनिया दो तोला, द्राचा पल' मांस प्राप्यते प्राप्यते वाहुत्यन अत्र, पाप घञ । एक कण्ठपायक । दो हस्तिकपोल, हाथोका कपोल, कनपटी आदि । पलाश नेत्राञ्जन । पलामू-विहार और उड़ीसा के छोटानागपुर उपविभागका एक जिला। यह बताशून्य तेईस बीस से चौबीस अड़तीस उशून्य और देशाशून्य तिरासी' बीस से आठ हज़ार चार सौ अट्ठावन मध्य अवस्थित है। भूपरिमाप चार हज़ार आठ सौ चौदह वर्ममोल है। इसके उत्तर में शाहाबाद और गया; पूर्व में गया, हजारीबाग और रांची, दक्षिण में रांची और सुरगुजा राज्य तथा पश्चिम में युक्त प्रदेश के सरगुजा और मिरापुर जिता है। इस जिलेका अधिकांश पर्वतमालाने घिरा सोननदो जिलेके उत्तरांवमें बह गई है। यहां के जङ्गल में बाघ, चीता, सम्बर, जयसार, नोलगाय और जङ्गलो कुत्ते पाये जाते हैं । यहांका तापपरिमाण चौहत्तर° से चौरासी और वार्षिक वृष्टिात अड़तालीस इञ्च है । पलामू जिलेका इतिहास एक हज़ार छः सौ तीन ईशून्यके पहले नहीं मिलता। उस समय चेरोव शने राक्सत राजपूत को भगा कर अपना आधिपत्य जमा लिया। प्रायः दो सौ वर्ष तक राज्य किया । इन मेदनीराय थे जिन्होंने एक हज़ार छः सौ अट्ठावन से एक हज़ार छः सौ बहत्तर साठ तक शासन किया । इन्होंने अपना राज्य गया, हजारोबाग और सुरगुजा तक फैला लिया था। यहां जो दुर्ग हैं, उनमेंसे एक इन्होंका बनवाया हुआ है। दूसरे दुगक नोत्रे इन लड़के ने डालो थो, पर वे इसे पूरा करन सके । उम समय मुसलमानोंने कई बार पलामू पर चढ़ाई को और राजाको कर देने के लिये बाध्य किया । दूसरे वर्ष दाऊद खांने यहां दुर्ग पर अधिकार जमा हो लिया। एक हज़ार सात सौ बाईस ईशून्य में राज रजिरा मारे गये और उनके छोटे लड़के राजनिहामन पर प्रतिष्ठित हुए । तदनन्तर जयण राय उन्हें सिहासनयत कर आप गद्दी पर बैठ गये। कुछ वर्ष बाद जयजगणराय गोलो के आघात मे पञ्चत्वको प्राप्त हुए और उनके परिवारवर्ग प्रागा ले कर मेगरा भागे। यहां उन्होंने उद वन्तरराम नामक एक कानूनगोके यहां आश्रय लिया उदवन्त एक हज़ार ईशून्य में मृ राजा पोते गोपालरायको गमेण्ट एजेण्ट कप्तान कामकके पास पटना ले गये और सारा हाल कह सुनाया। इस पर कलानने राजाको सेनाको अच्छी तरह परास्त कर पलामूके उचित उत्त राधिकारी गोपालरायको सिंहासन पर बिठाया । किन्तु दुर्भाग्यवश दो वर्ष पोछे गोपालरायने मानूनगोको हत्या में दुष्टोंका साथ दिया और इस अपराध में उन्हें कठिन कारावास की सजा हुई । एक हज़ार सात सौ चौरासी ईशून्य को पटने में उनको मृत्यु हुई। इसी समय बसन्तराय भी जो उनके कारावास के समय गद्दी पर बैठे थे, कराल काल के गाल में पतित हुए । तदनन्तर एक हज़ार आठ सौ तेरह ईमें चुगमनराय राज सिहासन पर अधिरूढ़ हुए। इस समय पनाम जिले
पंजाब के फिरोजपुर में नाबालिग को अगवा करने के आरोप में थाना गुरुहरसहाय पुलिस ने महिला सहित 4 आरोपियों को नामजद किया है। आरोपी 13 वर्षीय नाबालिग को सोते समय घर से उठाकर ले गए। जिसके बाद पीड़ित पिता ने आरोपियों के खिलाफ शिकायत देकर केस दर्ज कराया है। पुलिस को दी शिकायत में नाबालिग के पिता ने बताया है कि उनकी बेटी की उम्र 13 साल 19 दिन है। सातवीं कक्षा की छात्रा है। लंबे समय से हरजिंदर सिंह बेटी का पीछा कर रहा था। 21 जून की रात उनका परिवार खाना खाकर सो गया। सुबह उठकर जब देखा तो बेटी गायब थी। उन्हें विश्वास है कि बेटी को हरजिंदर सिंह, हरू सिंह व उसकी पत्नी और भगवान सिंह निवासी कोठे दखाली चक छांगा राय उताड़ की मदद से उठाकर ले गया है। आरोपियों ने रात में लाइट कटने के दौरान घटना को अंजाम दिया। घटना के बाद पिता गांव के गणमान्य लोगों के साथ जब आरोपी के घर पहुंचा तो वहां ताला लगा मिला। शिकायत के आधार पर थाना गुरुहरसहाय पुलिस के ASI गुरदेव सिंह ने बताया कि आरोपियों पर मुकदमा दर्ज कर अगवा की हुई लड़की व आरोपियों की खोज की जा रही है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
पंजाब के फिरोजपुर में नाबालिग को अगवा करने के आरोप में थाना गुरुहरसहाय पुलिस ने महिला सहित चार आरोपियों को नामजद किया है। आरोपी तेरह वर्षीय नाबालिग को सोते समय घर से उठाकर ले गए। जिसके बाद पीड़ित पिता ने आरोपियों के खिलाफ शिकायत देकर केस दर्ज कराया है। पुलिस को दी शिकायत में नाबालिग के पिता ने बताया है कि उनकी बेटी की उम्र तेरह साल उन्नीस दिन है। सातवीं कक्षा की छात्रा है। लंबे समय से हरजिंदर सिंह बेटी का पीछा कर रहा था। इक्कीस जून की रात उनका परिवार खाना खाकर सो गया। सुबह उठकर जब देखा तो बेटी गायब थी। उन्हें विश्वास है कि बेटी को हरजिंदर सिंह, हरू सिंह व उसकी पत्नी और भगवान सिंह निवासी कोठे दखाली चक छांगा राय उताड़ की मदद से उठाकर ले गया है। आरोपियों ने रात में लाइट कटने के दौरान घटना को अंजाम दिया। घटना के बाद पिता गांव के गणमान्य लोगों के साथ जब आरोपी के घर पहुंचा तो वहां ताला लगा मिला। शिकायत के आधार पर थाना गुरुहरसहाय पुलिस के ASI गुरदेव सिंह ने बताया कि आरोपियों पर मुकदमा दर्ज कर अगवा की हुई लड़की व आरोपियों की खोज की जा रही है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
प्रिय टोबी, भगवान, मैं एक मोसकल हूँ! चलो ईमानदार हो - यह सब हमारे लिए तैयार किया जा रहा था। अब यह सब कीव में हो रहा है कि विभिन्न कारणों से यह मॉस्को में "पास नहीं हुआ"। यहाँ, सब के बाद - सब कुछ सरल है, और आपके पास बहुत अधिक कल्पना भी नहीं हैः मैदान के बजाय, मन्हेजना स्क्वायर होगा। जिस पर रुसलान और टाइगनिबोकोव के बजाय बड़े परदे से सुसज्जित मंच पर, कुछ नवलनी, अकुनीन्स और अखाडेझाकॉव लगातार प्रदर्शन करेंगे। ग्रेशेव्स्की के बजाय, आइए, लूज़नेत्सेका तटबंध कहें। बजाय खट्टाचाय पर "विरोध" "चेस्टनट - एक ही टावर्सकी या रोज्देस्टेवेन्स्की बुलेवार्ड के सायन नीबू को छीलकर" विरोध "करके चेस्टनट्स को काट दिया और बैरल में जला दिया। सोची में ओलंपिक अवकाश के बजाय - मॉस्को के केंद्र में टायर जलाना, प्राइमरी और कैलिनिनग्राद में प्रशासन भवनों की जब्ती, बीएएम और ट्रांसस्बेरियन प्रदर्शनकारियों द्वारा "कट"। कहो कि यह नहीं हो सकता है ? ! हां. नहीं कर सकते। अतीत में एक उदासीन मनोदशा नहीं होती है, और अब, हमारे वर्तमान दिनों की ऊंचाई से, हम समझते हैंः यह हमारे लिए एक बहुत ही सरल और आदिम कारण से नहीं हुआ - क्योंकि यह हमारे लिए नहीं हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि व्हाइट रिबन के आयोजक और उनके पीछे खड़े लोग ऐसा नहीं चाहते थे। वे, सिद्धांत रूप में, बुरा नहीं मानते। प्राइमरी, कैलिनिनग्राद, बैकल-अमूर मेनलाइन और ट्रांस-साइबेरियन रेलवे - जैसा कि मैं आपको समझता हूं, यह संयोग से नहीं है कि मैंने इसे नाम दिया है। ये वर्तमान "प्रतिवादी" सर्गेई उदलत्सोव के "आधिकारिक" लक्ष्य हैं, जो जॉर्जियाई "राजनीतिज्ञ" जिया तरगामदेज़ से सहमत थे। इसके अलावा, अगर मेरी स्मृति मुझे सही कार्य करती है, तो यह "अपराध" का समर्थन करने के बारे में थाः ठीक उसी तरह जैसा कि आधुनिक यूक्रेनी मैदान में होता है, जहां लगभग हर तीसरे बंदी, एक अजीब संयोग से, "पहले से दोषी" है। और यह ठीक से मन्हेजनाया और अन्य केंद्रीय चौकों पर था कि भविष्य में मई 6 के "निर्दोष कैदियों" ने पुलिस पर पत्थर फेंकने की कोशिश की। और यह कोई संयोग नहीं है कि हमारे सभी स्थानीय "प्रोटेस्टेंट" उपाख्यान चिरिकोवा से "रूसी राष्ट्रवादी" नवलनी, जिन्होंने हाल ही में "नागरिक फ्यूहरर" के लिए दावा किया था, पहले से ही "मैदान के नायकों" के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त कर चुके हैं। और यहां तक कि, वास्तव में, "यूक्रेनी क्रांति" "कचरा में मस्कोवाइट" का आधिकारिक नारा कभी भी उन्हें रोक नहीं सकता है। कीव, बहुत हाल ही में "वे बच्चे हैं" - अभी तक याद है? अब ये यूक्रेनी "बच्चे" पहले ही मारना सीख गए हैं। यह वास्तव में उतना मुश्किल नहीं है जितना लगता है, आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैंः इसे एक बार आज़माने के लिए पर्याप्त है - यह और आगे जाएगा। जाँच की गई, और एक से अधिक बार। यूक्रेन अब खुलकर रसातल के बहुत किनारे पर खड़ा है। वहाँ, कोई फर्क नहीं पड़ता कि "समझौतावादी" राजनेता हमें क्या बताते हैं, पहले से ही एक वास्तविक गृह युद्ध है जो अब बस "गर्म चरण" के कगार पर संतुलन बना रहा है। क्योंकि, कोई फर्क नहीं पड़ता कि "मैदान पर होने वाले कार्यक्रम" समाप्त हो गए हैं, सभी सबसे दिलचस्प, अफसोस, अभी शुरुआत है। न तो "फाइटिंग स्क्वॉड" और न ही - अब दिग्गज - "गोल्डन ईगल" और उनके समर्थक कहीं भी जा रहे हैं। और इस विशेष स्थिति में, मैं बिल्कुल यह नहीं जानना चाहता कि "ऐतिहासिक रूप से सही" कौन था - न तो राजधानी के "सफेद टेप" के समय के दौरान, न ही कीव के पोग्रोम्स की शुरुआत के वर्तमान घंटों में। यह सब, खेद, माध्यमिक है। और सबसे पहले - रूसी शहरों की सड़कों पर गंदगी और खून की कमी और एक बार हंसमुख और उत्सवपूर्ण यूक्रेन में किसी के लिए उनकी निस्संदेह उपस्थिति। संक्षेप मेंः डीकॉन टोबी, गॉड, आई एम अ मस्कोवाइट। लेकिन अभी भी थोड़ी खुशी है। क्योंकि, जो भी कह सकता है, हमारा देश और हमारे लोग भी हैं। जिसके लिए अब सबसे स्पष्ट, वीभत्स और अविवादित आक्रामकता हो रही है। और पिछले हज़ार साल के रूप में दुनिया के उसी तरफ से। ऐसी बातें।
प्रिय टोबी, भगवान, मैं एक मोसकल हूँ! चलो ईमानदार हो - यह सब हमारे लिए तैयार किया जा रहा था। अब यह सब कीव में हो रहा है कि विभिन्न कारणों से यह मॉस्को में "पास नहीं हुआ"। यहाँ, सब के बाद - सब कुछ सरल है, और आपके पास बहुत अधिक कल्पना भी नहीं हैः मैदान के बजाय, मन्हेजना स्क्वायर होगा। जिस पर रुसलान और टाइगनिबोकोव के बजाय बड़े परदे से सुसज्जित मंच पर, कुछ नवलनी, अकुनीन्स और अखाडेझाकॉव लगातार प्रदर्शन करेंगे। ग्रेशेव्स्की के बजाय, आइए, लूज़नेत्सेका तटबंध कहें। बजाय खट्टाचाय पर "विरोध" "चेस्टनट - एक ही टावर्सकी या रोज्देस्टेवेन्स्की बुलेवार्ड के सायन नीबू को छीलकर" विरोध "करके चेस्टनट्स को काट दिया और बैरल में जला दिया। सोची में ओलंपिक अवकाश के बजाय - मॉस्को के केंद्र में टायर जलाना, प्राइमरी और कैलिनिनग्राद में प्रशासन भवनों की जब्ती, बीएएम और ट्रांसस्बेरियन प्रदर्शनकारियों द्वारा "कट"। कहो कि यह नहीं हो सकता है ? ! हां. नहीं कर सकते। अतीत में एक उदासीन मनोदशा नहीं होती है, और अब, हमारे वर्तमान दिनों की ऊंचाई से, हम समझते हैंः यह हमारे लिए एक बहुत ही सरल और आदिम कारण से नहीं हुआ - क्योंकि यह हमारे लिए नहीं हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि व्हाइट रिबन के आयोजक और उनके पीछे खड़े लोग ऐसा नहीं चाहते थे। वे, सिद्धांत रूप में, बुरा नहीं मानते। प्राइमरी, कैलिनिनग्राद, बैकल-अमूर मेनलाइन और ट्रांस-साइबेरियन रेलवे - जैसा कि मैं आपको समझता हूं, यह संयोग से नहीं है कि मैंने इसे नाम दिया है। ये वर्तमान "प्रतिवादी" सर्गेई उदलत्सोव के "आधिकारिक" लक्ष्य हैं, जो जॉर्जियाई "राजनीतिज्ञ" जिया तरगामदेज़ से सहमत थे। इसके अलावा, अगर मेरी स्मृति मुझे सही कार्य करती है, तो यह "अपराध" का समर्थन करने के बारे में थाः ठीक उसी तरह जैसा कि आधुनिक यूक्रेनी मैदान में होता है, जहां लगभग हर तीसरे बंदी, एक अजीब संयोग से, "पहले से दोषी" है। और यह ठीक से मन्हेजनाया और अन्य केंद्रीय चौकों पर था कि भविष्य में मई छः के "निर्दोष कैदियों" ने पुलिस पर पत्थर फेंकने की कोशिश की। और यह कोई संयोग नहीं है कि हमारे सभी स्थानीय "प्रोटेस्टेंट" उपाख्यान चिरिकोवा से "रूसी राष्ट्रवादी" नवलनी, जिन्होंने हाल ही में "नागरिक फ्यूहरर" के लिए दावा किया था, पहले से ही "मैदान के नायकों" के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त कर चुके हैं। और यहां तक कि, वास्तव में, "यूक्रेनी क्रांति" "कचरा में मस्कोवाइट" का आधिकारिक नारा कभी भी उन्हें रोक नहीं सकता है। कीव, बहुत हाल ही में "वे बच्चे हैं" - अभी तक याद है? अब ये यूक्रेनी "बच्चे" पहले ही मारना सीख गए हैं। यह वास्तव में उतना मुश्किल नहीं है जितना लगता है, आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैंः इसे एक बार आज़माने के लिए पर्याप्त है - यह और आगे जाएगा। जाँच की गई, और एक से अधिक बार। यूक्रेन अब खुलकर रसातल के बहुत किनारे पर खड़ा है। वहाँ, कोई फर्क नहीं पड़ता कि "समझौतावादी" राजनेता हमें क्या बताते हैं, पहले से ही एक वास्तविक गृह युद्ध है जो अब बस "गर्म चरण" के कगार पर संतुलन बना रहा है। क्योंकि, कोई फर्क नहीं पड़ता कि "मैदान पर होने वाले कार्यक्रम" समाप्त हो गए हैं, सभी सबसे दिलचस्प, अफसोस, अभी शुरुआत है। न तो "फाइटिंग स्क्वॉड" और न ही - अब दिग्गज - "गोल्डन ईगल" और उनके समर्थक कहीं भी जा रहे हैं। और इस विशेष स्थिति में, मैं बिल्कुल यह नहीं जानना चाहता कि "ऐतिहासिक रूप से सही" कौन था - न तो राजधानी के "सफेद टेप" के समय के दौरान, न ही कीव के पोग्रोम्स की शुरुआत के वर्तमान घंटों में। यह सब, खेद, माध्यमिक है। और सबसे पहले - रूसी शहरों की सड़कों पर गंदगी और खून की कमी और एक बार हंसमुख और उत्सवपूर्ण यूक्रेन में किसी के लिए उनकी निस्संदेह उपस्थिति। संक्षेप मेंः डीकॉन टोबी, गॉड, आई एम अ मस्कोवाइट। लेकिन अभी भी थोड़ी खुशी है। क्योंकि, जो भी कह सकता है, हमारा देश और हमारे लोग भी हैं। जिसके लिए अब सबसे स्पष्ट, वीभत्स और अविवादित आक्रामकता हो रही है। और पिछले हज़ार साल के रूप में दुनिया के उसी तरफ से। ऐसी बातें।
भले ही यमला पगला दीवाना फिर से बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई हो, लेकिन सनी देओल के चाहने वाले अभी भी मौजूद हैं। उनके फैंस इस बात से खुश हैं कि उनकी दो अटकी हुई फिल्में आखिरकार रिलीज होने वाली हैं। सनी देओल के जन्मदिन 19 अक्टोबर को 'भैय्याजी सुपरहिट' रिलीज हो रही है। आखिरकार फिल्म का टीज़र भी रिलीज हो गया है और जल्दी ही ट्रेलर भी देखने को मिलेगा। इसमें सनी ने उसी तरह का रोल निभाया है जैसा कि उनके फैंस देखना पसंद करते हैं। इस फिल्म में सनी के साथ प्रीति जिंटा, अमीषा पटेल और अरशद वारसी हैं। सनी इसमें गैंगस्टर के रोल में हैं। सनी की एक और फिल्म बरसों से अटकी हुई है। नाम है 'मोहल्ला अस्सी'। इसे चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने निर्देशित किया है। फिल्म में सनी और साक्षी तंवर लीड रोल में हैं। इस फिल्म का टीज़र भी जारी हो गया है और यह फिल्म 16 नवंबर को प्रदर्शित होगी। दोनों फिल्में अलग मिजाज की हैं। देखना दिलचस्प होगा कि ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कैसा प्रदर्शन करती हैं।
भले ही यमला पगला दीवाना फिर से बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई हो, लेकिन सनी देओल के चाहने वाले अभी भी मौजूद हैं। उनके फैंस इस बात से खुश हैं कि उनकी दो अटकी हुई फिल्में आखिरकार रिलीज होने वाली हैं। सनी देओल के जन्मदिन उन्नीस अक्टोबर को 'भैय्याजी सुपरहिट' रिलीज हो रही है। आखिरकार फिल्म का टीज़र भी रिलीज हो गया है और जल्दी ही ट्रेलर भी देखने को मिलेगा। इसमें सनी ने उसी तरह का रोल निभाया है जैसा कि उनके फैंस देखना पसंद करते हैं। इस फिल्म में सनी के साथ प्रीति जिंटा, अमीषा पटेल और अरशद वारसी हैं। सनी इसमें गैंगस्टर के रोल में हैं। सनी की एक और फिल्म बरसों से अटकी हुई है। नाम है 'मोहल्ला अस्सी'। इसे चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने निर्देशित किया है। फिल्म में सनी और साक्षी तंवर लीड रोल में हैं। इस फिल्म का टीज़र भी जारी हो गया है और यह फिल्म सोलह नवंबर को प्रदर्शित होगी। दोनों फिल्में अलग मिजाज की हैं। देखना दिलचस्प होगा कि ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कैसा प्रदर्शन करती हैं।
टीवी रियलिटी शो बिग बॉस10 जो की फ़िलहाल देखा जाए तो भी के बीच में अब धीरे धीरे अपना रंग दिखाता हुआ नजर आ रहा है. बिग बॉस10 में हमे रोज कुछ न कुछ नए नए कारनामे सुनने व देखने को मिल ही जाते है. बिग बॉस शो के पहले ही हफ्ते में चर्चित प्रतिभागी प्रियंका जग्गा को भी उनकी बेशर्म हरकतों के कारण दर्शको ने उन्हें शो से बाहर भेज दिया था. अब एक बार फिर से घर के अंदर दो टीमो में बंटे प्रतिभागी जिसमे से एक है सेलेब्रिटी और इंडियावालों के बीच में फिर से संग्राम देखने को मिला है. इस दौरान हमे देखने को मिला कि, प्रतिभागी मनु पंजाबी सेलेब्रिटी कंटेस्टेट रोहन मेहरा के साथ फिजिकल हुए तो वही घर के अंदर चल रहे लॉन्ड्री टास्क के दौरान भी हमे लड़ाई झगडे देखने को मिले. शो में लॉन्ड्री टास्क के दौरान सेलेब्स और इंडियावाले रूल्स तोड़ते हुए हमे गुत्थमगुत्था होते हुए नजर आए. ऐसे में रोहन और मनु लड़ पड़े और मनु ने उनको थक्का दे दिया. फिर क्या था घर में दोनों ही टीमें एक दूसरे पर जोर-जोर से चिल्लाते हुए नजर आए. इस दौरान दोनों ही टीम के मेम्बर टास्क को छोड़कर एक दूसरे के काम को मटियामेल करते हुए हमे नजर आए. फिर अंत में यह जो टास्क था उसे इंडियावालो ने जीत लिया.
टीवी रियलिटी शो बिग बॉसदस जो की फ़िलहाल देखा जाए तो भी के बीच में अब धीरे धीरे अपना रंग दिखाता हुआ नजर आ रहा है. बिग बॉसदस में हमे रोज कुछ न कुछ नए नए कारनामे सुनने व देखने को मिल ही जाते है. बिग बॉस शो के पहले ही हफ्ते में चर्चित प्रतिभागी प्रियंका जग्गा को भी उनकी बेशर्म हरकतों के कारण दर्शको ने उन्हें शो से बाहर भेज दिया था. अब एक बार फिर से घर के अंदर दो टीमो में बंटे प्रतिभागी जिसमे से एक है सेलेब्रिटी और इंडियावालों के बीच में फिर से संग्राम देखने को मिला है. इस दौरान हमे देखने को मिला कि, प्रतिभागी मनु पंजाबी सेलेब्रिटी कंटेस्टेट रोहन मेहरा के साथ फिजिकल हुए तो वही घर के अंदर चल रहे लॉन्ड्री टास्क के दौरान भी हमे लड़ाई झगडे देखने को मिले. शो में लॉन्ड्री टास्क के दौरान सेलेब्स और इंडियावाले रूल्स तोड़ते हुए हमे गुत्थमगुत्था होते हुए नजर आए. ऐसे में रोहन और मनु लड़ पड़े और मनु ने उनको थक्का दे दिया. फिर क्या था घर में दोनों ही टीमें एक दूसरे पर जोर-जोर से चिल्लाते हुए नजर आए. इस दौरान दोनों ही टीम के मेम्बर टास्क को छोड़कर एक दूसरे के काम को मटियामेल करते हुए हमे नजर आए. फिर अंत में यह जो टास्क था उसे इंडियावालो ने जीत लिया.
पिछले चार दिनों से उत्तर भारत में जारी बारिश से हाहाकार मचा हुआ है. बारिश का सबसे ज्यादा असर दिल्ली और उतर प्रदेश के कई जिलों में में देखने को मिला है. भारी बारिश से दिल्ली में बाढ़ जैसे हालात बने हुए है. तो वही उतार प्रदेश में मानों आसमान से पानी नहीं मौत बरस रही हो. उत्तर प्रदेश में पिछले चार दिनों से जारी भारी बारिश और तूफ़ान की वजह से अबतक 60 लोगों की मौत हो गई है. इसमें कुछ लोगों की मौत बिजली गिरने से हुई है. उत्तर प्रदेश में बारिश की वजह से हुए हादसे में 5 मौतें महज 24 घंटे हुए हुई है. अमरोहा में 3 लोगों और मुजफ्फरनगर में 2 लोगों की मकान का हिस्सा गिरने से मौत हुई है. मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर क्षेत्र के गांव नरा में एक मकान की छत गिरने से एक परिवार के 6 लोग दब गए. मलबे में दबने वालों में पति-पत्नी और उनके 4 बच्चे शामिल थे. हादसे में मां और एक बेटे की मौत हो गई. जबकि पिता और 3 बच्चों की हालत गंभीर है. जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश के 31 जिलों में 26 जुलाई से 28 जुलाई के बीच भारी बारिश, आंधी और बिजली गिरने के कारण 60 लोगों की मौत हो चुकी है. सबसे ज्यादा 11 मौतें सहारनपुर में हुई है. वहीं अब तक 53 लोग घायल हो चुके हैं. दिल्ली से सटे मेरठ में 10 और आगरा में 6 लोगों की मौत हुई है. सरकार ने मृतकों के परिजनों को 4 लाख, घायलों को 59 हजार की राशि देने का ऐलान किया गया है. बता दें कि उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र और ओडिसा में अबतक बाढ़ और बारिश की वजह से 500 से अधिक लोगों की मौत हो गई है. As an independent media platform, we do not take advertisements from governments and corporate houses. It is you, our readers, who have supported us on our journey to do honest and unbiased journalism. Please contribute, so that we can continue to do the same in future.
पिछले चार दिनों से उत्तर भारत में जारी बारिश से हाहाकार मचा हुआ है. बारिश का सबसे ज्यादा असर दिल्ली और उतर प्रदेश के कई जिलों में में देखने को मिला है. भारी बारिश से दिल्ली में बाढ़ जैसे हालात बने हुए है. तो वही उतार प्रदेश में मानों आसमान से पानी नहीं मौत बरस रही हो. उत्तर प्रदेश में पिछले चार दिनों से जारी भारी बारिश और तूफ़ान की वजह से अबतक साठ लोगों की मौत हो गई है. इसमें कुछ लोगों की मौत बिजली गिरने से हुई है. उत्तर प्रदेश में बारिश की वजह से हुए हादसे में पाँच मौतें महज चौबीस घंटाटे हुए हुई है. अमरोहा में तीन लोगों और मुजफ्फरनगर में दो लोगों की मकान का हिस्सा गिरने से मौत हुई है. मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर क्षेत्र के गांव नरा में एक मकान की छत गिरने से एक परिवार के छः लोग दब गए. मलबे में दबने वालों में पति-पत्नी और उनके चार बच्चे शामिल थे. हादसे में मां और एक बेटे की मौत हो गई. जबकि पिता और तीन बच्चों की हालत गंभीर है. जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश के इकतीस जिलों में छब्बीस जुलाई से अट्ठाईस जुलाई के बीच भारी बारिश, आंधी और बिजली गिरने के कारण साठ लोगों की मौत हो चुकी है. सबसे ज्यादा ग्यारह मौतें सहारनपुर में हुई है. वहीं अब तक तिरेपन लोग घायल हो चुके हैं. दिल्ली से सटे मेरठ में दस और आगरा में छः लोगों की मौत हुई है. सरकार ने मृतकों के परिजनों को चार लाख, घायलों को उनसठ हजार की राशि देने का ऐलान किया गया है. बता दें कि उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र और ओडिसा में अबतक बाढ़ और बारिश की वजह से पाँच सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई है. As an independent media platform, we do not take advertisements from governments and corporate houses. It is you, our readers, who have supported us on our journey to do honest and unbiased journalism. Please contribute, so that we can continue to do the same in future.