Question
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Discuss the structural difference between rural and urban local governments in India. Briefly explain various types of urban local governments. (200 words/10 marks)
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Approach: · Brief introduction about rural and urban local government in India · Explain the difference between structures of rural and urban local governments · Explain various types of Urban local governments in India Answer: Local governments in India got constitutional status in 1992. The separate type of governments was envisaged for rural and urban areas under 73rd amendment act and 74th amendment act respectively. Under 73rd amendment act, the rural local government has a uniform three-tier structure of panchayats: · At Village level, there is Gram Panchayat (GP), · At Intermediate or block level there is Panchayat Samiti (PS) · At District level, there is Zilla Parishad (ZP). All the three tiers are hierarchical in nature and connected to each other. Whereas, under 74th amendment act, urban local governments are divided into 3 types · Municipal Corporation · Municipal Council · Nagar Panchayat But they are not hierarchical in nature. Rather they depend on the type of area. For example, nagar panchayat for transitional areas i.e. an area in transition from rural to urban, a municipality for a smaller urban area, and a municipal corporation for a larger urban area. There is no link between these three types of urban local government. Various types of urban local governments in India are: 1. Municipal Corporations – Created to look after the administrative needs of large cities. It consists of 3 bodies such as Wards, Council headed by Mayor and Executive wing headed by Municipal Commissioner 2. Municipalities – Created for the administration of smaller cities and towns. It also consists of 3 bodies such as Wards, Council headed by Mayor/President and Executive wing headed by Municipal Commissioner. 3. Nagar panchayat for areas in transition from rural to urban. 4. Cantonment Board – Created for municipal administration for the civilian population in the cantonment areas. 5. Townships – Created by the large public sector enterprises for its staff and workers near to the plant with all civic amenities. 6. Port trusts – Created in the port areas to manage and protect the ports, and to provide civic amenities.
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##Question:Discuss the structural difference between rural and urban local governments in India. Briefly explain various types of urban local governments. (200 words/10 marks)##Answer:Approach: · Brief introduction about rural and urban local government in India · Explain the difference between structures of rural and urban local governments · Explain various types of Urban local governments in India Answer: Local governments in India got constitutional status in 1992. The separate type of governments was envisaged for rural and urban areas under 73rd amendment act and 74th amendment act respectively. Under 73rd amendment act, the rural local government has a uniform three-tier structure of panchayats: · At Village level, there is Gram Panchayat (GP), · At Intermediate or block level there is Panchayat Samiti (PS) · At District level, there is Zilla Parishad (ZP). All the three tiers are hierarchical in nature and connected to each other. Whereas, under 74th amendment act, urban local governments are divided into 3 types · Municipal Corporation · Municipal Council · Nagar Panchayat But they are not hierarchical in nature. Rather they depend on the type of area. For example, nagar panchayat for transitional areas i.e. an area in transition from rural to urban, a municipality for a smaller urban area, and a municipal corporation for a larger urban area. There is no link between these three types of urban local government. Various types of urban local governments in India are: 1. Municipal Corporations – Created to look after the administrative needs of large cities. It consists of 3 bodies such as Wards, Council headed by Mayor and Executive wing headed by Municipal Commissioner 2. Municipalities – Created for the administration of smaller cities and towns. It also consists of 3 bodies such as Wards, Council headed by Mayor/President and Executive wing headed by Municipal Commissioner. 3. Nagar panchayat for areas in transition from rural to urban. 4. Cantonment Board – Created for municipal administration for the civilian population in the cantonment areas. 5. Townships – Created by the large public sector enterprises for its staff and workers near to the plant with all civic amenities. 6. Port trusts – Created in the port areas to manage and protect the ports, and to provide civic amenities.
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"भारत का विभाजन, साम्प्रदायिकता के विकास का चरमोत्कर्ष था|" टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) "The Partition of India was the climax of the development of communalism." Comment (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण- भूमिका में साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए इसके उदय के कारणों की संक्षेप में जानकारी दीजिये| प्रथम भाग में विभाजन तक साम्प्रदायिकता के विकास की जानकारी दीजिये दूसरे भाग में विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि दीजिये साम्प्रदायिकता के चरमोत्कर्ष के रूप में विभाजन की जानकारी के साथ निष्कर्ष लिखिए| तात्विक रूप में साम्प्रदायिकता धर्म का राजनीतिक व्यापार है| अर्थात धर्म का राजनीतिक रूप से उपयोग करना साम्प्रदायिकता होती है| साम्प्रदायिकता की विचारधारा में एक ही समूह या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों के हित समान होते हैं| साम्प्रदायिकता की विचारधारा का मानना है कि बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के हितों से भिन्न हैं| अपने चरम रूप में यह विचारधारा मानती है कि विभिन्न धर्मो या समुदायों के हित एक दूसरे से भिन्न होने के साथ ही साथ एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। अर्थात दो विभिन्न समुदाय एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के हित से टकराते हैं। औपनिवेशिक काल में भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ, उभरते मध्यवर्ग के बीच की प्रतिद्वंद्विता, विभाजक ब्रिटिश नीतियाँ, सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के पश्च प्रभाव आदि कारकों ने साम्प्रदायिकता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| विभिन्न कारकों ने साम्प्रदायिकता के विकास को सुनिश्चित किया जिसके चरमोत्कर्ष के रूप में भारत को विभाजन का सामना करना पड़ा| विभाजन तक साम्प्रदायिकता का विकास साम्प्रदायिकता का विकास 19वीं सदी अंतिम दशकों से शुरू होता है | इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक भूमिका निभायी| ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के विरुद्ध सक्रिय करने का प्रयास किया उदाहरणार्थ सर सैय्यद अहमद खान को कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित करना, 20वीं सदी के आरंभिक चरण में ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति को महत्व दिया| इस संदर्भ में बंगाल विभाजन, मुस्लिम लीग की स्थापना में ब्रिटिश सरकार की भूमिका को देख सकते हैं, 1909 के अधिनियम में पृथक निर्वाचन का प्रावधान कर ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान कर दी, 20 वीं सदी के दूसरे दशक से प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक संगठनों की स्थापना का क्रम शुरू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिकता के विकास को एक नवीन चरण में पहुचा दिया| इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा, अकाली दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिकाओं को देखा जा सकता है, 1916 का लखनऊ समझौता अनेक मायनों में प्रगतिशील था लेकिन इसने साम्प्रदायिक शक्तियों को मान्यता प्रदान कर दी|कांग्रेस ने इसके द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। समझौते में यह निहित था कि भारत विभिन्न समुदायों का देश है तथा हित भिन्न-भिन्न हैं। कालांतर में इसके हानिकारक नतीजे निकले, खिलाफत आन्दोलन का आधार साम्प्रदायिक था| इसी समय स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्यसमाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसका उद्देश्य इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाना था। मुसलमानों ने इनके विरोध में तंजीम और तबलीग आंदोलन चलाये।इससे साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी, 1928 में नेहरु रिपोर्ट के विरोध में जिन्ना के 14 सूत्री मांगों का प्रस्तुत किया जाना और इस अवसर पर मुस्लिम लीग से समझौता करने की कोशिश करते हुये कांग्रेस नेतृत्व से हुई अनेक गलतियों ने साम्प्रदायिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध उदार दृष्टिकोण जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य कांग्रेस के सदस्य हो सकते थे, साम्प्रदायिक नेताओं से वार्ता की रणनीति, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अभियान न चलानाआदि, 1935 तक साम्प्रदायिक संगठनों की अधिकाँश मांगें सरकार ने मान ली थी इस संदर्भ में जिन्ना की 14 सूत्री मांगों को स्वीकार करना उल्लेखनीय है, 1937 के चुनाओं में लीग के निराशाजनक प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस का जनाधार निरंतर व्यापक होता जा रहा है| इसके पश्चात मुस्लिम लीग ने साम्प्रदायिकता के मुद्दे को और तीव्र करने का निश्चय किया। उसने अब मुसलमानों की एक अल्पसंख्यक समुदाय की जगह एक पृथक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना प्रारंभ कर दिया। इसी समय सरकार के द्वारा सांप्रदायिक संगठनों को किसी न किसी रूप में खुला समर्थन देना शुरू किया जैसे अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मलेन आदि में देखा जा सकता है, 1937 तक साम्प्रदायिकता का नरमपंथी दौर जारी रहा, जो मुख्यतः बचाव तथा आरक्षण जैसे मुद्दों के आसपास केंद्रित रहा। किंतु इसके बाद वह तेजी से उग्रवादी रूप धारण करती गयी 1945 तक साम्प्रदायिक संगठनों के जनाधार का भी विस्तार हुआ और सम्प्रदायवाद एक संगठित जन-आंदोलन के रूप में प्रारंभ हो गया, जिसका मुख्य आधार समाज का मध्य एवं उच्च वर्ग था। अब लीग के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरी मजबूती के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा और भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी| 1945 से 1947 के मध्य पाकिस्तान की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में अंतरिम सरकार एवं प्रांतीय सरकारें विफल रही| ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई| इसके साथ ही रियासतों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग, अलग सिक्ख राज्य की मांग जैसी गतिविधियों के कारण परिस्थितियाँ अत्यंत ही गंभीर थीं| इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दो ही विकल्प थे; प्रथम साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखना, इसमें देश के अनेक टुकड़ों में विघटन का खतरा था; द्वितीय, पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता की आग से लोगों को बचाना तथा जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक एकता व अखंडता को बनाये रखना| दूसरा विकल्प यद्यपि दुखद अवश्य था लेकिन राष्ट्र हित में इसी विकल्प को महत्त्व दिया गया|इस तरह से साप्रदायिकता का चरमोत्कर्ष भारत के विभाजन के रूप में देखा जा सकता है|
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##Question:"भारत का विभाजन, साम्प्रदायिकता के विकास का चरमोत्कर्ष था|" टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) "The Partition of India was the climax of the development of communalism." Comment (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए इसके उदय के कारणों की संक्षेप में जानकारी दीजिये| प्रथम भाग में विभाजन तक साम्प्रदायिकता के विकास की जानकारी दीजिये दूसरे भाग में विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि दीजिये साम्प्रदायिकता के चरमोत्कर्ष के रूप में विभाजन की जानकारी के साथ निष्कर्ष लिखिए| तात्विक रूप में साम्प्रदायिकता धर्म का राजनीतिक व्यापार है| अर्थात धर्म का राजनीतिक रूप से उपयोग करना साम्प्रदायिकता होती है| साम्प्रदायिकता की विचारधारा में एक ही समूह या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों के हित समान होते हैं| साम्प्रदायिकता की विचारधारा का मानना है कि बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के हितों से भिन्न हैं| अपने चरम रूप में यह विचारधारा मानती है कि विभिन्न धर्मो या समुदायों के हित एक दूसरे से भिन्न होने के साथ ही साथ एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। अर्थात दो विभिन्न समुदाय एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के हित से टकराते हैं। औपनिवेशिक काल में भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ, उभरते मध्यवर्ग के बीच की प्रतिद्वंद्विता, विभाजक ब्रिटिश नीतियाँ, सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के पश्च प्रभाव आदि कारकों ने साम्प्रदायिकता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| विभिन्न कारकों ने साम्प्रदायिकता के विकास को सुनिश्चित किया जिसके चरमोत्कर्ष के रूप में भारत को विभाजन का सामना करना पड़ा| विभाजन तक साम्प्रदायिकता का विकास साम्प्रदायिकता का विकास 19वीं सदी अंतिम दशकों से शुरू होता है | इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक भूमिका निभायी| ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के विरुद्ध सक्रिय करने का प्रयास किया उदाहरणार्थ सर सैय्यद अहमद खान को कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित करना, 20वीं सदी के आरंभिक चरण में ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति को महत्व दिया| इस संदर्भ में बंगाल विभाजन, मुस्लिम लीग की स्थापना में ब्रिटिश सरकार की भूमिका को देख सकते हैं, 1909 के अधिनियम में पृथक निर्वाचन का प्रावधान कर ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान कर दी, 20 वीं सदी के दूसरे दशक से प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक संगठनों की स्थापना का क्रम शुरू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिकता के विकास को एक नवीन चरण में पहुचा दिया| इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा, अकाली दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिकाओं को देखा जा सकता है, 1916 का लखनऊ समझौता अनेक मायनों में प्रगतिशील था लेकिन इसने साम्प्रदायिक शक्तियों को मान्यता प्रदान कर दी|कांग्रेस ने इसके द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। समझौते में यह निहित था कि भारत विभिन्न समुदायों का देश है तथा हित भिन्न-भिन्न हैं। कालांतर में इसके हानिकारक नतीजे निकले, खिलाफत आन्दोलन का आधार साम्प्रदायिक था| इसी समय स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्यसमाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसका उद्देश्य इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाना था। मुसलमानों ने इनके विरोध में तंजीम और तबलीग आंदोलन चलाये।इससे साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी, 1928 में नेहरु रिपोर्ट के विरोध में जिन्ना के 14 सूत्री मांगों का प्रस्तुत किया जाना और इस अवसर पर मुस्लिम लीग से समझौता करने की कोशिश करते हुये कांग्रेस नेतृत्व से हुई अनेक गलतियों ने साम्प्रदायिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध उदार दृष्टिकोण जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य कांग्रेस के सदस्य हो सकते थे, साम्प्रदायिक नेताओं से वार्ता की रणनीति, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अभियान न चलानाआदि, 1935 तक साम्प्रदायिक संगठनों की अधिकाँश मांगें सरकार ने मान ली थी इस संदर्भ में जिन्ना की 14 सूत्री मांगों को स्वीकार करना उल्लेखनीय है, 1937 के चुनाओं में लीग के निराशाजनक प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस का जनाधार निरंतर व्यापक होता जा रहा है| इसके पश्चात मुस्लिम लीग ने साम्प्रदायिकता के मुद्दे को और तीव्र करने का निश्चय किया। उसने अब मुसलमानों की एक अल्पसंख्यक समुदाय की जगह एक पृथक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना प्रारंभ कर दिया। इसी समय सरकार के द्वारा सांप्रदायिक संगठनों को किसी न किसी रूप में खुला समर्थन देना शुरू किया जैसे अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मलेन आदि में देखा जा सकता है, 1937 तक साम्प्रदायिकता का नरमपंथी दौर जारी रहा, जो मुख्यतः बचाव तथा आरक्षण जैसे मुद्दों के आसपास केंद्रित रहा। किंतु इसके बाद वह तेजी से उग्रवादी रूप धारण करती गयी 1945 तक साम्प्रदायिक संगठनों के जनाधार का भी विस्तार हुआ और सम्प्रदायवाद एक संगठित जन-आंदोलन के रूप में प्रारंभ हो गया, जिसका मुख्य आधार समाज का मध्य एवं उच्च वर्ग था। अब लीग के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरी मजबूती के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा और भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी| 1945 से 1947 के मध्य पाकिस्तान की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में अंतरिम सरकार एवं प्रांतीय सरकारें विफल रही| ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई| इसके साथ ही रियासतों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग, अलग सिक्ख राज्य की मांग जैसी गतिविधियों के कारण परिस्थितियाँ अत्यंत ही गंभीर थीं| इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दो ही विकल्प थे; प्रथम साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखना, इसमें देश के अनेक टुकड़ों में विघटन का खतरा था; द्वितीय, पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता की आग से लोगों को बचाना तथा जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक एकता व अखंडता को बनाये रखना| दूसरा विकल्प यद्यपि दुखद अवश्य था लेकिन राष्ट्र हित में इसी विकल्प को महत्त्व दिया गया|इस तरह से साप्रदायिकता का चरमोत्कर्ष भारत के विभाजन के रूप में देखा जा सकता है|
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Discuss the intrusive and extrusive landforms associated with volcanic activity. (150 words/10 marks)
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Approach : Introduce an answer by defining intrusive and extrusive landforms associated with volcanoes. Explain the extrusive landforms associated with volcanic activity Explain the intrusive landforms associated with volcanic activity Answer : Volcanic landforms are divided into extrusive and intrusive landforms based on whether magma cools within the crust or above the crust. A] Extrusive landforms are formed from material thrown out during volcanic activity 1. Composite volcano They are conical or central type volcanic landforms.Along with andesitic lava, large quantities of pyroclastic material and ashes find their way to the ground.Andesitic lava along with pyroclastic material accumulates in the vicinity of the vent openings leading to the formation of layers, and this makes the mounts appear as composite volcanoes.The highest and most common volcanoes have composite cones.They are often calledstrato-volcanoes. Stromboli ‘Lighthouse of the Mediterranean’, Mt. Vesuvius, Mt. Fuji etc. are examples. 2. Shield volcano TheHawaiian volcanoesare the most famous examples.These volcanoes are mostly made up of basalt, a type of lava that is very fluid when erupted.These volcanoes are not steep.They become explosive if somehow water gets into the vent; otherwise, they are less explosive.Example: Mauna Loa (Hawaii). 3. Basalt plains Sometimes, a very thin magma escapes through cracks and fissures in the earth’s surface and flows after intervals for a long time, spreading over a vast area, finally producing a layered, undulating (wave-like), flat surface. Example:Deccan traps(Peninsular India),Snake Basin, U.S.A, Icelandic Shield, Canadian Shield etc.. 4. Caldera lakes After the eruption of magma has ceased, the crater frequently turns into a lake at a later time. This lake is called a ‘caldera’.E.g.Lake Toba, Indonesia, the largest volcanic crater lake in the world.Crater Lake in Oregon, USA 5. Cinder cones A cinder cone is a steep conical hill of loose pyroclastic fragments, such as volcanic clinkers, cinders, volcanic ash, or scoria that has been built around a volcanic vent. B] Intrusive landforms are formed when magma cools within the crust 1.Batholith These are large rock masses formed due to cooling down and the solidification of hot magma inside the earth. They appear on the surface only after the denudation processes remove the overlying materials. Batholiths form the core of huge mountains and may be exposed on the surface after erosion. These are granitic. 2. Phacolith A wavy mass of intrusive rocks, at times, is found at the base of synclines or at the top of the anticline in the folded igneous country.Such wavy materials have a definite conduit to source beneath in the form of magma chambers (subsequently developed as batholiths). These are called the Phytoliths. 3. Sills These are solidified horizontal lava layers inside the earth. The near horizontal bodies of the intrusive igneous rocks are called sill or sheets, depending on the thickness of the material. The thinner ones are called sheets while the thick horizontal deposits are called sills. 4. Dykes When the lava makes its way through cracks and the fissures developed in the land, it solidifies almost perpendicular to the ground. It gets cooled in the same position to develop a wall-like structure. Such structures are called dykes.These are the most commonly found intrusive forms in the western Maharashtra area. These are considered the feeders for the eruptions that led to the development of the Deccan Traps. 5.Laccoliths These are large dome-shaped intrusive bodies connected by a pipe-like conduit from below.These are basically intrusive counterparts of an exposed domelike batholith. The Karnataka plateau is spotted with dome hills of granite rocks. Most of these, now exfoliated, are examples of laccoliths or batholiths. 6.Lapolith As and when the lava moves upwards, a portion of the same may tend to move in ahorizontaldirection wherever it finds a weak plane. It may get rested in different forms. In case it develops into a saucer shape, concave to the sky body, it is called Lapolith. ( the students are expected to give brief details and give diagrams)
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##Question:Discuss the intrusive and extrusive landforms associated with volcanic activity. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by defining intrusive and extrusive landforms associated with volcanoes. Explain the extrusive landforms associated with volcanic activity Explain the intrusive landforms associated with volcanic activity Answer : Volcanic landforms are divided into extrusive and intrusive landforms based on whether magma cools within the crust or above the crust. A] Extrusive landforms are formed from material thrown out during volcanic activity 1. Composite volcano They are conical or central type volcanic landforms.Along with andesitic lava, large quantities of pyroclastic material and ashes find their way to the ground.Andesitic lava along with pyroclastic material accumulates in the vicinity of the vent openings leading to the formation of layers, and this makes the mounts appear as composite volcanoes.The highest and most common volcanoes have composite cones.They are often calledstrato-volcanoes. Stromboli ‘Lighthouse of the Mediterranean’, Mt. Vesuvius, Mt. Fuji etc. are examples. 2. Shield volcano TheHawaiian volcanoesare the most famous examples.These volcanoes are mostly made up of basalt, a type of lava that is very fluid when erupted.These volcanoes are not steep.They become explosive if somehow water gets into the vent; otherwise, they are less explosive.Example: Mauna Loa (Hawaii). 3. Basalt plains Sometimes, a very thin magma escapes through cracks and fissures in the earth’s surface and flows after intervals for a long time, spreading over a vast area, finally producing a layered, undulating (wave-like), flat surface. Example:Deccan traps(Peninsular India),Snake Basin, U.S.A, Icelandic Shield, Canadian Shield etc.. 4. Caldera lakes After the eruption of magma has ceased, the crater frequently turns into a lake at a later time. This lake is called a ‘caldera’.E.g.Lake Toba, Indonesia, the largest volcanic crater lake in the world.Crater Lake in Oregon, USA 5. Cinder cones A cinder cone is a steep conical hill of loose pyroclastic fragments, such as volcanic clinkers, cinders, volcanic ash, or scoria that has been built around a volcanic vent. B] Intrusive landforms are formed when magma cools within the crust 1.Batholith These are large rock masses formed due to cooling down and the solidification of hot magma inside the earth. They appear on the surface only after the denudation processes remove the overlying materials. Batholiths form the core of huge mountains and may be exposed on the surface after erosion. These are granitic. 2. Phacolith A wavy mass of intrusive rocks, at times, is found at the base of synclines or at the top of the anticline in the folded igneous country.Such wavy materials have a definite conduit to source beneath in the form of magma chambers (subsequently developed as batholiths). These are called the Phytoliths. 3. Sills These are solidified horizontal lava layers inside the earth. The near horizontal bodies of the intrusive igneous rocks are called sill or sheets, depending on the thickness of the material. The thinner ones are called sheets while the thick horizontal deposits are called sills. 4. Dykes When the lava makes its way through cracks and the fissures developed in the land, it solidifies almost perpendicular to the ground. It gets cooled in the same position to develop a wall-like structure. Such structures are called dykes.These are the most commonly found intrusive forms in the western Maharashtra area. These are considered the feeders for the eruptions that led to the development of the Deccan Traps. 5.Laccoliths These are large dome-shaped intrusive bodies connected by a pipe-like conduit from below.These are basically intrusive counterparts of an exposed domelike batholith. The Karnataka plateau is spotted with dome hills of granite rocks. Most of these, now exfoliated, are examples of laccoliths or batholiths. 6.Lapolith As and when the lava moves upwards, a portion of the same may tend to move in ahorizontaldirection wherever it finds a weak plane. It may get rested in different forms. In case it develops into a saucer shape, concave to the sky body, it is called Lapolith. ( the students are expected to give brief details and give diagrams)
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Explain the factors affecting the formation of soil. Briefly discuss types of soil and their spatial distribution in India. (150 words/10 marks)
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Brief Approach: 1. Write about the various actors that affect the process of soil formation. 2. Give examples of Indian soil types in explaining these factors. 3. A diagram showing soil classification of soil in India Answer: Pedogenesis or the process of formation of soil begins with the weathering of parent material. It is this weathered material which is the basic input for soil form. However many other factors such as the climate, topography, biological activities and time decide the formation and nature of soil. In fact soil forming factors act in union and affect the action of one another. Role of other factors: 1. Topography: i. The influence of topography is felt through the amount of exposure of a surface covered by parent materials to sunlight and the amount of surface and sub-surface drainage over and through the parent materials. ii. Soils will be thin on steep slopes and thick over flat upland areas. Over gentle slopes where erosion is slow and percolation of water is good, soil formation is very favourable. iii. Soils over flat areas develop a thick layer of clay. iv. In middle latitudes, the south facing slopes of Vindhyas and Satpuras, which are exposed to sunlight, have different conditions of vegetation and soils and the north facing slopes with cool, moist conditions have some other soils and vegetation. 2. Climate: i. The climatic elements involved in soil development are: moisture in terms of intensity, frequency and duration of precipitation - evaporation and humidity; temperature in terms of seasonal and diurnal variations. ii. In the regions of hot and wet Tropical rainy areas of Western Ghats, most of the minerals including Silica are leached. This results in the formation of Laterite soil. iii. In dry climates of Rajasthan, evaporation exceeds precipitation, which brings salts to surface by capillary action, resulting in Saline soils. iv. Increased temperature shows increased chemical activity, that’s why tropical soils with higher temperatures show deeper profiles and in the frozen tundra regions soils contains mechanically broken materials. 3. Biological activity: i. Organic acids, which form during humification, aid in decomposing the minerals of the soil parent materials. ii. The vegetative cover and organisms help in adding organic matter, moisture retention, nitrogen etc. Dead plants provide humus, the finely divided organic matter of the soil. iii. With undecomposed organic matter because of low bacterial activity, layers of peat develop in soils of Himalayas and high mountains of North East. iv. In humid Tropics, bacterial growth and action is intense and dead vegetation is rapidly oxidised leaving very low humus content in the soil. Example: Red and Yellow Soils of South India. v. The influence of large animals like ants, termites, earthworms, rodents etc., is mechanical, but important in soil formation as they rework the soil up and down. 4. Time: i. The length of time the soil forming processes operate, determines maturation of soils and profile development. Soils developing from recently deposited alluvium or glacial till are considered young and they exhibit no horizons or only poorly developed horizons. ii. Examples: In the Gangetic plains, Khadar is the newly deposited alluvium and Bhangar is the older alluvium
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##Question:Explain the factors affecting the formation of soil. Briefly discuss types of soil and their spatial distribution in India. (150 words/10 marks)##Answer: Brief Approach: 1. Write about the various actors that affect the process of soil formation. 2. Give examples of Indian soil types in explaining these factors. 3. A diagram showing soil classification of soil in India Answer: Pedogenesis or the process of formation of soil begins with the weathering of parent material. It is this weathered material which is the basic input for soil form. However many other factors such as the climate, topography, biological activities and time decide the formation and nature of soil. In fact soil forming factors act in union and affect the action of one another. Role of other factors: 1. Topography: i. The influence of topography is felt through the amount of exposure of a surface covered by parent materials to sunlight and the amount of surface and sub-surface drainage over and through the parent materials. ii. Soils will be thin on steep slopes and thick over flat upland areas. Over gentle slopes where erosion is slow and percolation of water is good, soil formation is very favourable. iii. Soils over flat areas develop a thick layer of clay. iv. In middle latitudes, the south facing slopes of Vindhyas and Satpuras, which are exposed to sunlight, have different conditions of vegetation and soils and the north facing slopes with cool, moist conditions have some other soils and vegetation. 2. Climate: i. The climatic elements involved in soil development are: moisture in terms of intensity, frequency and duration of precipitation - evaporation and humidity; temperature in terms of seasonal and diurnal variations. ii. In the regions of hot and wet Tropical rainy areas of Western Ghats, most of the minerals including Silica are leached. This results in the formation of Laterite soil. iii. In dry climates of Rajasthan, evaporation exceeds precipitation, which brings salts to surface by capillary action, resulting in Saline soils. iv. Increased temperature shows increased chemical activity, that’s why tropical soils with higher temperatures show deeper profiles and in the frozen tundra regions soils contains mechanically broken materials. 3. Biological activity: i. Organic acids, which form during humification, aid in decomposing the minerals of the soil parent materials. ii. The vegetative cover and organisms help in adding organic matter, moisture retention, nitrogen etc. Dead plants provide humus, the finely divided organic matter of the soil. iii. With undecomposed organic matter because of low bacterial activity, layers of peat develop in soils of Himalayas and high mountains of North East. iv. In humid Tropics, bacterial growth and action is intense and dead vegetation is rapidly oxidised leaving very low humus content in the soil. Example: Red and Yellow Soils of South India. v. The influence of large animals like ants, termites, earthworms, rodents etc., is mechanical, but important in soil formation as they rework the soil up and down. 4. Time: i. The length of time the soil forming processes operate, determines maturation of soils and profile development. Soils developing from recently deposited alluvium or glacial till are considered young and they exhibit no horizons or only poorly developed horizons. ii. Examples: In the Gangetic plains, Khadar is the newly deposited alluvium and Bhangar is the older alluvium
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भारत में लौह इस्पात उद्योगों की अवस्थिति और अवस्थिति के निर्धारक कारकों को बताएं| हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी जा रही है, स्पष्ट कीजिये | (200 शब्द)
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दृष्टिकोण भूमिका में उद्योग को परिभाषित करते हुए भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास की चर्चा कीजिये, भारत में लौह इस्पात उद्योग संकुलों की स्थिति स्पष्ट कीजिये साथ ही लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों को बताइये हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये संकुलों के विकेंद्रीकरण के लाभों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उद्योगसे आशय ऐसी उच्च आर्थिक क्रियाओं से है, जिनका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके संवर्द्धन से होता है। उद्योग, संसाधनों के मूल्य संवर्धन एवं श्रम की उत्पादकता में सुनिश्चित करते हैं| लौह इस्पात उद्योगको किसी देश के अर्थिक विकास की धुरी माना जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है|भारतमें इसका सबसे पहला बड़े पैमाने का कारख़ाना1907में झारखंडराज्य में में साकची नामक स्थान परजमशेदजी टाटाद्वारा स्थापित किया गया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इस पर काफ़ी ध्यान दिया गया | सामान्य तौर पर किसी भी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में कच्चा माल, जलापूर्ति, ऊर्जा, श्रम, परिवहन की उपलब्धता, सरकार की नीति, बाजार से निकटता आदि कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| भारत में लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति को अनेक कारकों ने सुनिश्चित किया है | इन्ही कारकों के आधार पर लौह इस्पात उद्योग का भारत के विभिन्न क्षेत्रों वितरण हुआ है| इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- भारत के छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग को शामिल करते हुए एक अर्धचन्द्राकार प्रदेश है जिसे छोटानागपुर के पठार के रूप में जाना जाता है| यहाँ लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक सभी कच्चे माल यथा लौह अयस्क, कोयला, छूना पत्थर, डोलोमाईट, मैंगनीज, आदि की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग संकुल का विकास हुआ है| इस क्षेत्र में बोकारो, दुर्गापुर, भिलाई और राउरकेला में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किये गये हैं| इसी तरह कर्नाटक में स्थापित विश्वेश्वरैया इस्पात उद्योग का आधार बाबा बुदन की पहाड़ी में स्थित कुद्रेमुख खान से निकलने वाला लौह अयस्क है| इसे जोग जलप्रपात से उर्जा और भद्रावती नदी से जल की आपूर्ति होती है| परिवहन की सहज उपलब्धता किसी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक होता है| टाटा इस्पात उद्योग मुंबई-कोलकाता रेलवे लाइन के समीप स्थित है| इसके अतिरिक्त सुवर्ण रेखा नदी से प्राप्त जल, निकटस्थ खानों से लौह अयस्क और कोयले की उपस्थिति ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| राउरकेला इस्पात संयंत्र उत्तरी उड़ीसा में स्थित है| इसे हीराकुंड परियोजना से ऊर्जा और कोइल नदी से जल की आपूर्ति होती है| यहाँ क्योझर से प्राप्त लौह अयस्क का उपयोग किया जाता है| भिलाई इस्पात संयंत्र की अवस्थिति को छोटा नागपुर पठार से प्राप्त कच्चा माल तथा कोरबा से ऊर्जा और विशाखापट्टनम बंदरगाह से निकटता ने निर्धारित किया है| छोटा नागपुर से प्राप्त कच्चेमाल ने बोकारो और दुर्गापुर में अवस्थिति को निर्धारित किया है| इन्हें दामोदर घाटी कार्पोरेशन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है| तमिलनाडू में स्थित सेलम इस्पात उद्योग की अवस्थिति को क्षेत्र में उपलब्ध लिग्नाईट कोयले ने निर्धारित किया है| इन कारकों के अतिरिक्त इनकी स्थिति एवं विकास में विदेशी सहयोग, स्थानीय क्षेत्रों से सस्ते श्रम की आपूर्ति, सार्वजनिक निवेश की उपलब्धता, सहज परिवहन की उपलब्धता और भारत के बड़े बाजार जैसे कारकों ने भी भूमिका निभायी है| लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग माना जाता है| परंपरागत रूप से इनकी स्थापना में उपरोक्त कारकों पर ही बल दिया जाता था| जिसके कारण इनका विकास कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही हुआ है| उदारीकरण के बाद के वर्षों में लौह-इस्पात उद्योग में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है| वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास, परम्परागत कारकों की अनुपलब्धता के बावजूद औद्योगिक केन्द्रों और बाजारों के समीप हो रहा है| इस विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारकों ने सुनिश्चित किया है- तकनीकी विकास से अब प्रति इकाई उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो गयी है अतः ऊर्जा संयंत्रों के निकट स्थापना की बाधा उत्पन्न नही होती है, इसके साथ ही उर्जा के वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता ने स्थापना को और सहज बनाया है| मशीनीकरण और ऑटोमेशन से बढ़ने से सस्ते श्रम की उपलब्धता भी आवश्यक कारक नहीं रह गया है| वर्तमान में प्रायः मिनी स्टील प्लांट किये जाते हैं, मिनी स्टील प्लांटों की स्थापना में कम पूँजी, कम निवेश, भूमिअधिग्रहण की कम आवश्यकताहोती है| इस कारण उद्योगपति इस ओर आकर्षित हुए हैं| मिनी स्टील प्लांटों में अधिकांशतः स्क्रैप आयरन का प्रयोग किया जाता है जिसकी उपलब्धता शहरों में अधिक होती है, स्क्रैप आयरन के प्रयोग से लौह प्रसंस्करण लागत में कमी, ऊर्जा अथवा कोयले की आवश्यकता कम होती है| अर्थात कुल लागत में कमी आती है जिससे लाभ बढ़ता है| इससे निवेशकों को प्रोत्साहनमिलता है| उपरोक्त कारकों ने लौह इस्पात उद्योग के विकेंद्रीकरण अथवा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| वितरण की यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय आर्थिक असमानता में कमी लाने में सहायक होगा तथा लौह-इस्पात क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी बाजार के निर्माण में सहायक होगा|
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##Question:भारत में लौह इस्पात उद्योगों की अवस्थिति और अवस्थिति के निर्धारक कारकों को बताएं| हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी जा रही है, स्पष्ट कीजिये | (200 शब्द)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में उद्योग को परिभाषित करते हुए भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास की चर्चा कीजिये, भारत में लौह इस्पात उद्योग संकुलों की स्थिति स्पष्ट कीजिये साथ ही लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों को बताइये हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये संकुलों के विकेंद्रीकरण के लाभों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उद्योगसे आशय ऐसी उच्च आर्थिक क्रियाओं से है, जिनका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके संवर्द्धन से होता है। उद्योग, संसाधनों के मूल्य संवर्धन एवं श्रम की उत्पादकता में सुनिश्चित करते हैं| लौह इस्पात उद्योगको किसी देश के अर्थिक विकास की धुरी माना जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है|भारतमें इसका सबसे पहला बड़े पैमाने का कारख़ाना1907में झारखंडराज्य में में साकची नामक स्थान परजमशेदजी टाटाद्वारा स्थापित किया गया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इस पर काफ़ी ध्यान दिया गया | सामान्य तौर पर किसी भी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में कच्चा माल, जलापूर्ति, ऊर्जा, श्रम, परिवहन की उपलब्धता, सरकार की नीति, बाजार से निकटता आदि कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| भारत में लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति को अनेक कारकों ने सुनिश्चित किया है | इन्ही कारकों के आधार पर लौह इस्पात उद्योग का भारत के विभिन्न क्षेत्रों वितरण हुआ है| इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- भारत के छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग को शामिल करते हुए एक अर्धचन्द्राकार प्रदेश है जिसे छोटानागपुर के पठार के रूप में जाना जाता है| यहाँ लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक सभी कच्चे माल यथा लौह अयस्क, कोयला, छूना पत्थर, डोलोमाईट, मैंगनीज, आदि की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग संकुल का विकास हुआ है| इस क्षेत्र में बोकारो, दुर्गापुर, भिलाई और राउरकेला में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किये गये हैं| इसी तरह कर्नाटक में स्थापित विश्वेश्वरैया इस्पात उद्योग का आधार बाबा बुदन की पहाड़ी में स्थित कुद्रेमुख खान से निकलने वाला लौह अयस्क है| इसे जोग जलप्रपात से उर्जा और भद्रावती नदी से जल की आपूर्ति होती है| परिवहन की सहज उपलब्धता किसी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक होता है| टाटा इस्पात उद्योग मुंबई-कोलकाता रेलवे लाइन के समीप स्थित है| इसके अतिरिक्त सुवर्ण रेखा नदी से प्राप्त जल, निकटस्थ खानों से लौह अयस्क और कोयले की उपस्थिति ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| राउरकेला इस्पात संयंत्र उत्तरी उड़ीसा में स्थित है| इसे हीराकुंड परियोजना से ऊर्जा और कोइल नदी से जल की आपूर्ति होती है| यहाँ क्योझर से प्राप्त लौह अयस्क का उपयोग किया जाता है| भिलाई इस्पात संयंत्र की अवस्थिति को छोटा नागपुर पठार से प्राप्त कच्चा माल तथा कोरबा से ऊर्जा और विशाखापट्टनम बंदरगाह से निकटता ने निर्धारित किया है| छोटा नागपुर से प्राप्त कच्चेमाल ने बोकारो और दुर्गापुर में अवस्थिति को निर्धारित किया है| इन्हें दामोदर घाटी कार्पोरेशन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है| तमिलनाडू में स्थित सेलम इस्पात उद्योग की अवस्थिति को क्षेत्र में उपलब्ध लिग्नाईट कोयले ने निर्धारित किया है| इन कारकों के अतिरिक्त इनकी स्थिति एवं विकास में विदेशी सहयोग, स्थानीय क्षेत्रों से सस्ते श्रम की आपूर्ति, सार्वजनिक निवेश की उपलब्धता, सहज परिवहन की उपलब्धता और भारत के बड़े बाजार जैसे कारकों ने भी भूमिका निभायी है| लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग माना जाता है| परंपरागत रूप से इनकी स्थापना में उपरोक्त कारकों पर ही बल दिया जाता था| जिसके कारण इनका विकास कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही हुआ है| उदारीकरण के बाद के वर्षों में लौह-इस्पात उद्योग में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है| वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास, परम्परागत कारकों की अनुपलब्धता के बावजूद औद्योगिक केन्द्रों और बाजारों के समीप हो रहा है| इस विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारकों ने सुनिश्चित किया है- तकनीकी विकास से अब प्रति इकाई उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो गयी है अतः ऊर्जा संयंत्रों के निकट स्थापना की बाधा उत्पन्न नही होती है, इसके साथ ही उर्जा के वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता ने स्थापना को और सहज बनाया है| मशीनीकरण और ऑटोमेशन से बढ़ने से सस्ते श्रम की उपलब्धता भी आवश्यक कारक नहीं रह गया है| वर्तमान में प्रायः मिनी स्टील प्लांट किये जाते हैं, मिनी स्टील प्लांटों की स्थापना में कम पूँजी, कम निवेश, भूमिअधिग्रहण की कम आवश्यकताहोती है| इस कारण उद्योगपति इस ओर आकर्षित हुए हैं| मिनी स्टील प्लांटों में अधिकांशतः स्क्रैप आयरन का प्रयोग किया जाता है जिसकी उपलब्धता शहरों में अधिक होती है, स्क्रैप आयरन के प्रयोग से लौह प्रसंस्करण लागत में कमी, ऊर्जा अथवा कोयले की आवश्यकता कम होती है| अर्थात कुल लागत में कमी आती है जिससे लाभ बढ़ता है| इससे निवेशकों को प्रोत्साहनमिलता है| उपरोक्त कारकों ने लौह इस्पात उद्योग के विकेंद्रीकरण अथवा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| वितरण की यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय आर्थिक असमानता में कमी लाने में सहायक होगा तथा लौह-इस्पात क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी बाजार के निर्माण में सहायक होगा|
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What do you mean by Conflict of interest? Discuss the concept with examples. Suggest few measures to address the issue of conflict of interest.(150 words/ 10 Marks)
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Approach:- Define/explain what is the meaning of Conflict of interest Elaborate on the concept with an example Suggest measures to address the issue Answer:- A conflict of interest is a situation in which an individual has competing interests or loyalties in different conditions. A conflict of interest occurs when a corporation or person becomes unreliable because of a clash between personal and professional affairs. It involves dual relationships where an individual is in a different position in one relationship and a different relationship in another situation. For instance- If a judge has a relationship with one of the parties which are involved in a case before that judge, it counts as a conflict of interest. On one hand, that judge must deliver justice by being unbiased and keeping in the mind that law is paramount. On the other hand, the judge has a personal relationship with one of the parties. Getting involved in the case may lead the favouritism in this case. In this situation, the judge must keep himself away from the case to avoid this situation of conflict of interest. Recent controversy :- Chairman of ICICI bank Chanda Kochar is involved in a controversy where she was a member of the committee which sanctioned the loans to someone who was a friend of her husband. Possible situations for creating a conflict of interest : Nepotism:- It is the practice of giving favours to relatives and close friends, often by hiring them. Self-dealing :- It is a situation in which someone in a position of responsibility in an organization has conflicting interests and acts in their own interest rather than the interest of the organization. Suggestions to address the issue:- Information should be shared in a transparent manner by involved parties so that it can be taken into account beforehand. In the above example, the judge should keep himself away from the case to avoid any conflict of interest. A Code of Ethics and Code of Conduct should be followed to maintain a high working scenario in a professional setting. Value education that leads to high moral standards is needed at an early stage. Corporations must ask employees to declare any potential conflicts between their or their family members’ employment and business interests conflict with each other. Media scrutiny can be other ways in cases of high-profile political aspects. Conflict of interest is an issue that should be dealt with with great precaution and it should be a work culture, not an outside effort. Minimization of it may lead to a better and more efficient work culture which will lead to overall growth.
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##Question:What do you mean by Conflict of interest? Discuss the concept with examples. Suggest few measures to address the issue of conflict of interest.(150 words/ 10 Marks)##Answer: Approach:- Define/explain what is the meaning of Conflict of interest Elaborate on the concept with an example Suggest measures to address the issue Answer:- A conflict of interest is a situation in which an individual has competing interests or loyalties in different conditions. A conflict of interest occurs when a corporation or person becomes unreliable because of a clash between personal and professional affairs. It involves dual relationships where an individual is in a different position in one relationship and a different relationship in another situation. For instance- If a judge has a relationship with one of the parties which are involved in a case before that judge, it counts as a conflict of interest. On one hand, that judge must deliver justice by being unbiased and keeping in the mind that law is paramount. On the other hand, the judge has a personal relationship with one of the parties. Getting involved in the case may lead the favouritism in this case. In this situation, the judge must keep himself away from the case to avoid this situation of conflict of interest. Recent controversy :- Chairman of ICICI bank Chanda Kochar is involved in a controversy where she was a member of the committee which sanctioned the loans to someone who was a friend of her husband. Possible situations for creating a conflict of interest : Nepotism:- It is the practice of giving favours to relatives and close friends, often by hiring them. Self-dealing :- It is a situation in which someone in a position of responsibility in an organization has conflicting interests and acts in their own interest rather than the interest of the organization. Suggestions to address the issue:- Information should be shared in a transparent manner by involved parties so that it can be taken into account beforehand. In the above example, the judge should keep himself away from the case to avoid any conflict of interest. A Code of Ethics and Code of Conduct should be followed to maintain a high working scenario in a professional setting. Value education that leads to high moral standards is needed at an early stage. Corporations must ask employees to declare any potential conflicts between their or their family members’ employment and business interests conflict with each other. Media scrutiny can be other ways in cases of high-profile political aspects. Conflict of interest is an issue that should be dealt with with great precaution and it should be a work culture, not an outside effort. Minimization of it may lead to a better and more efficient work culture which will lead to overall growth.
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What are the Particulate Matters ? Discuss the harmful impacts of PM and steps being taken to address these ill-impacts. ( 150 words)
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Approach:- Explain the Particulate Matters Bring out the harmful impact of PM. Mention the steps taken to address the harmful impacts of PM. Answer:- Particulate Matter is the sum total of all the solid and liquid particles which are suspended in the air many of which are hazardous. PM is aterm used for a mixture of solid particles and liquid droplets found in the air. This mixture includes both organic and inorganic particles, such as dust, pollen, smoke, and liquid droplets. These particles vary in size such as:- (a) PM10:- with diameters generally 10 micrometres and smaller (b) PM2.5:fine inhalable particles,with diameters that are generally 2.5 micrometres and smaller. Harmful impacts of PM:- Climatic impacts:- PMs are very fine in size and they can easily penetrate in the lungs. This can cause many health problems like asthma. Due to the suppression of levels of evaporation of water from the Indian Ocean, PMs have an effect on a regional scale and have been linked to the failure of the Indian Monsoon. Aerosol haze and particulates are believed to be pushing tropical rainfall southward, leading to a number of droughts across the world. Health Impacts:- Particulates pass through the mother and into the child at any point of the pregnancy and can lead to a wide range of birth defects Fine particles are also the main cause of reduced visibility (haze) in parts of the world. Fine particles that penetrate deep into the human respiratory system and attack the bronchi, affecting the health of the lungs and leading to cancerous growths Numerous different particulates have drastic effects on the heart and its functions, again caused by the fine particulates that easily pass into the human system unfiltered Particulates pass through the mother and into the child at any point of the pregnancy and can lead to a wide range of birth defects Stomatal openings are clogged, leading to failures during the photosynthesis process PMs are a crucial cause of health problems in cities like Delhi and many other major cities across. All stakeholders need to come on board to look into the matter with urgency so that climatic and health ill-impacts can be rectified.
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##Question:What are the Particulate Matters ? Discuss the harmful impacts of PM and steps being taken to address these ill-impacts. ( 150 words)##Answer:Approach:- Explain the Particulate Matters Bring out the harmful impact of PM. Mention the steps taken to address the harmful impacts of PM. Answer:- Particulate Matter is the sum total of all the solid and liquid particles which are suspended in the air many of which are hazardous. PM is aterm used for a mixture of solid particles and liquid droplets found in the air. This mixture includes both organic and inorganic particles, such as dust, pollen, smoke, and liquid droplets. These particles vary in size such as:- (a) PM10:- with diameters generally 10 micrometres and smaller (b) PM2.5:fine inhalable particles,with diameters that are generally 2.5 micrometres and smaller. Harmful impacts of PM:- Climatic impacts:- PMs are very fine in size and they can easily penetrate in the lungs. This can cause many health problems like asthma. Due to the suppression of levels of evaporation of water from the Indian Ocean, PMs have an effect on a regional scale and have been linked to the failure of the Indian Monsoon. Aerosol haze and particulates are believed to be pushing tropical rainfall southward, leading to a number of droughts across the world. Health Impacts:- Particulates pass through the mother and into the child at any point of the pregnancy and can lead to a wide range of birth defects Fine particles are also the main cause of reduced visibility (haze) in parts of the world. Fine particles that penetrate deep into the human respiratory system and attack the bronchi, affecting the health of the lungs and leading to cancerous growths Numerous different particulates have drastic effects on the heart and its functions, again caused by the fine particulates that easily pass into the human system unfiltered Particulates pass through the mother and into the child at any point of the pregnancy and can lead to a wide range of birth defects Stomatal openings are clogged, leading to failures during the photosynthesis process PMs are a crucial cause of health problems in cities like Delhi and many other major cities across. All stakeholders need to come on board to look into the matter with urgency so that climatic and health ill-impacts can be rectified.
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भारत में लौह इस्पात उद्योगों की अवस्थिति और निर्धारक कारकों को बताइये। हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी जा रही है, स्पष्ट कीजिये। ( 10 अंक ; 150-200 शब्द) State the determining factors and location of iron steel industries in India. In recent years, the trend of change in their location and their factors is being observed, clarify. (10 marks; 150–200 words)
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दृष्टिकोण भूमिका में उद्योग को परिभाषित करते हुए भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास की चर्चा कीजिये, भारत में लौह इस्पात उद्योग संकुलों की स्थिति स्पष्ट कीजिये साथ ही लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों को बताइये हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये संकुलों के विकेंद्रीकरण के लाभों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उद्योगसे आशय ऐसी उच्च आर्थिक क्रियाओं से है, जिनका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके संवर्द्धन से होता है। उद्योग, संसाधनों के मूल्य संवर्धन एवं श्रम की उत्पादकता में सुनिश्चित करते हैं| लौह इस्पात उद्योगको किसी देश के अर्थिक विकास की धुरी माना जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है|भारतमें इसका सबसे पहला बड़े पैमाने का कारख़ाना1907में झारखंडराज्य में में साकची नामक स्थान परजमशेदजी टाटाद्वारा स्थापित किया गया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इस पर काफ़ी ध्यान दिया गया | सामान्य तौर पर किसी भी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में कच्चा माल, जलापूर्ति, ऊर्जा, श्रम, परिवहन की उपलब्धता, सरकार की नीति, बाजार से निकटता आदि कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| भारत में लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति को अनेक कारकों ने सुनिश्चित किया है | इन्ही कारकों के आधार पर लौह इस्पात उद्योग का भारत के विभिन्न क्षेत्रों वितरण हुआ है| इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- भारत के छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग को शामिल करते हुए एक अर्धचन्द्राकार प्रदेश है जिसे छोटानागपुर के पठार के रूप में जाना जाता है| यहाँ लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक सभी कच्चे माल यथा लौह अयस्क, कोयला, छूना पत्थर, डोलोमाईट, मैंगनीज, आदि की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग संकुल का विकास हुआ है| इस क्षेत्र में बोकारो, दुर्गापुर, भिलाई और राउरकेला में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किये गये हैं| इसी तरह कर्नाटक में स्थापित विश्वेश्वरैया इस्पात उद्योग का आधार बाबा बुदन की पहाड़ी में स्थित कुद्रेमुख खान से निकलने वाला लौह अयस्क है| इसे जोग जलप्रपात से उर्जा और भद्रावती नदी से जल की आपूर्ति होती है| परिवहन की सहज उपलब्धता किसी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक होता है| टाटा इस्पात उद्योग मुंबई-कोलकाता रेलवे लाइन के समीप स्थित है| इसके अतिरिक्त सुवर्ण रेखा नदी से प्राप्त जल, निकटस्थ खानों से लौह अयस्क और कोयले की उपस्थिति ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| राउरकेला इस्पात संयंत्र उत्तरी उड़ीसा में स्थित है| इसे हीराकुंड परियोजना से ऊर्जा और कोइल नदी से जल की आपूर्ति होती है| यहाँ क्योझर से प्राप्त लौह अयस्क का उपयोग किया जाता है| भिलाई इस्पात संयंत्र की अवस्थिति को छोटा नागपुर पठार से प्राप्त कच्चा माल तथा कोरबा से ऊर्जा और विशाखापट्टनम बंदरगाह से निकटता ने निर्धारित किया है| छोटा नागपुर से प्राप्त कच्चेमाल ने बोकारो और दुर्गापुर में अवस्थिति को निर्धारित किया है| इन्हें दामोदर घाटी कार्पोरेशन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है| तमिलनाडु में स्थित सेलम इस्पात उद्योग की अवस्थिति को क्षेत्र में उपलब्ध लिग्नाईट कोयले ने निर्धारित किया है| इन कारकों के अतिरिक्त इनकी स्थिति एवं विकास में विदेशी सहयोग, स्थानीय क्षेत्रों से सस्ते श्रम की आपूर्ति, सार्वजनिक निवेश की उपलब्धता, सहज परिवहन की उपलब्धता और भारत के बड़े बाजार जैसे कारकों ने भी भूमिका निभायी है| लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग माना जाता है| परंपरागत रूप से इनकी स्थापना में उपरोक्त कारकों पर ही बल दिया जाता था| जिसके कारण इनका विकास कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही हुआ है| उदारीकरण के बाद के वर्षों में लौह-इस्पात उद्योग में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है| वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास, परम्परागत कारकों की अनुपलब्धता के बावजूद औद्योगिक केन्द्रों और बाजारों के समीप हो रहा है| इस विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारकों ने सुनिश्चित किया है- तकनीकी विकास से अब प्रति इकाई उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो गयी है अतः ऊर्जा संयंत्रों के निकट स्थापना की बाधा उत्पन्न नही होती है, इसके साथ ही उर्जा के वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता ने स्थापना को और सहज बनाया है| मशीनीकरण और ऑटोमेशन से बढ़ने से सस्ते श्रम की उपलब्धता भी आवश्यक कारक नहीं रह गया है| वर्तमान में प्रायः मिनी स्टील प्लांट किये जाते हैं, मिनी स्टील प्लांटों की स्थापना में कम पूँजी, कम निवेश, भूमिअधिग्रहण की कम आवश्यकताहोती है| इस कारण उद्योगपति इस ओर आकर्षित हुए हैं| मिनी स्टील प्लांटों में अधिकांशतः स्क्रैप आयरन का प्रयोग किया जाता है जिसकी उपलब्धता शहरों में अधिक होती है, स्क्रैप आयरन के प्रयोग से लौह प्रसंस्करण लागत में कमी, ऊर्जा अथवा कोयले की आवश्यकता कम होती है| अर्थात कुल लागत में कमी आती है जिससे लाभ बढ़ता है| इससे निवेशकों को प्रोत्साहनमिलता है| उपरोक्त कारकों ने लौह इस्पात उद्योग के विकेंद्रीकरण अथवा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| वितरण की यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय आर्थिक असमानता में कमी लाने में सहायक होगा तथा लौह-इस्पात क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी बाजार के निर्माण में सहायक होगा|
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##Question:भारत में लौह इस्पात उद्योगों की अवस्थिति और निर्धारक कारकों को बताइये। हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी जा रही है, स्पष्ट कीजिये। ( 10 अंक ; 150-200 शब्द) State the determining factors and location of iron steel industries in India. In recent years, the trend of change in their location and their factors is being observed, clarify. (10 marks; 150–200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में उद्योग को परिभाषित करते हुए भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास की चर्चा कीजिये, भारत में लौह इस्पात उद्योग संकुलों की स्थिति स्पष्ट कीजिये साथ ही लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों को बताइये हाल के वर्षों में इनकी अवस्थिति एवं उनके कारकों मे परिवर्तन की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये संकुलों के विकेंद्रीकरण के लाभों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उद्योगसे आशय ऐसी उच्च आर्थिक क्रियाओं से है, जिनका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके संवर्द्धन से होता है। उद्योग, संसाधनों के मूल्य संवर्धन एवं श्रम की उत्पादकता में सुनिश्चित करते हैं| लौह इस्पात उद्योगको किसी देश के अर्थिक विकास की धुरी माना जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है|भारतमें इसका सबसे पहला बड़े पैमाने का कारख़ाना1907में झारखंडराज्य में में साकची नामक स्थान परजमशेदजी टाटाद्वारा स्थापित किया गया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इस पर काफ़ी ध्यान दिया गया | सामान्य तौर पर किसी भी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में कच्चा माल, जलापूर्ति, ऊर्जा, श्रम, परिवहन की उपलब्धता, सरकार की नीति, बाजार से निकटता आदि कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| भारत में लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति को अनेक कारकों ने सुनिश्चित किया है | इन्ही कारकों के आधार पर लौह इस्पात उद्योग का भारत के विभिन्न क्षेत्रों वितरण हुआ है| इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- भारत के छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग को शामिल करते हुए एक अर्धचन्द्राकार प्रदेश है जिसे छोटानागपुर के पठार के रूप में जाना जाता है| यहाँ लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक सभी कच्चे माल यथा लौह अयस्क, कोयला, छूना पत्थर, डोलोमाईट, मैंगनीज, आदि की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग संकुल का विकास हुआ है| इस क्षेत्र में बोकारो, दुर्गापुर, भिलाई और राउरकेला में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किये गये हैं| इसी तरह कर्नाटक में स्थापित विश्वेश्वरैया इस्पात उद्योग का आधार बाबा बुदन की पहाड़ी में स्थित कुद्रेमुख खान से निकलने वाला लौह अयस्क है| इसे जोग जलप्रपात से उर्जा और भद्रावती नदी से जल की आपूर्ति होती है| परिवहन की सहज उपलब्धता किसी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक होता है| टाटा इस्पात उद्योग मुंबई-कोलकाता रेलवे लाइन के समीप स्थित है| इसके अतिरिक्त सुवर्ण रेखा नदी से प्राप्त जल, निकटस्थ खानों से लौह अयस्क और कोयले की उपस्थिति ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| राउरकेला इस्पात संयंत्र उत्तरी उड़ीसा में स्थित है| इसे हीराकुंड परियोजना से ऊर्जा और कोइल नदी से जल की आपूर्ति होती है| यहाँ क्योझर से प्राप्त लौह अयस्क का उपयोग किया जाता है| भिलाई इस्पात संयंत्र की अवस्थिति को छोटा नागपुर पठार से प्राप्त कच्चा माल तथा कोरबा से ऊर्जा और विशाखापट्टनम बंदरगाह से निकटता ने निर्धारित किया है| छोटा नागपुर से प्राप्त कच्चेमाल ने बोकारो और दुर्गापुर में अवस्थिति को निर्धारित किया है| इन्हें दामोदर घाटी कार्पोरेशन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है| तमिलनाडु में स्थित सेलम इस्पात उद्योग की अवस्थिति को क्षेत्र में उपलब्ध लिग्नाईट कोयले ने निर्धारित किया है| इन कारकों के अतिरिक्त इनकी स्थिति एवं विकास में विदेशी सहयोग, स्थानीय क्षेत्रों से सस्ते श्रम की आपूर्ति, सार्वजनिक निवेश की उपलब्धता, सहज परिवहन की उपलब्धता और भारत के बड़े बाजार जैसे कारकों ने भी भूमिका निभायी है| लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग माना जाता है| परंपरागत रूप से इनकी स्थापना में उपरोक्त कारकों पर ही बल दिया जाता था| जिसके कारण इनका विकास कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही हुआ है| उदारीकरण के बाद के वर्षों में लौह-इस्पात उद्योग में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है| वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास, परम्परागत कारकों की अनुपलब्धता के बावजूद औद्योगिक केन्द्रों और बाजारों के समीप हो रहा है| इस विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारकों ने सुनिश्चित किया है- तकनीकी विकास से अब प्रति इकाई उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो गयी है अतः ऊर्जा संयंत्रों के निकट स्थापना की बाधा उत्पन्न नही होती है, इसके साथ ही उर्जा के वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता ने स्थापना को और सहज बनाया है| मशीनीकरण और ऑटोमेशन से बढ़ने से सस्ते श्रम की उपलब्धता भी आवश्यक कारक नहीं रह गया है| वर्तमान में प्रायः मिनी स्टील प्लांट किये जाते हैं, मिनी स्टील प्लांटों की स्थापना में कम पूँजी, कम निवेश, भूमिअधिग्रहण की कम आवश्यकताहोती है| इस कारण उद्योगपति इस ओर आकर्षित हुए हैं| मिनी स्टील प्लांटों में अधिकांशतः स्क्रैप आयरन का प्रयोग किया जाता है जिसकी उपलब्धता शहरों में अधिक होती है, स्क्रैप आयरन के प्रयोग से लौह प्रसंस्करण लागत में कमी, ऊर्जा अथवा कोयले की आवश्यकता कम होती है| अर्थात कुल लागत में कमी आती है जिससे लाभ बढ़ता है| इससे निवेशकों को प्रोत्साहनमिलता है| उपरोक्त कारकों ने लौह इस्पात उद्योग के विकेंद्रीकरण अथवा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| वितरण की यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय आर्थिक असमानता में कमी लाने में सहायक होगा तथा लौह-इस्पात क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी बाजार के निर्माण में सहायक होगा|
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पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता की व्याख्या कीजिये| साथ ही पूर्ण परिवर्तनीयता के संभाव्य जोखिमों का आकलन करते हुए भारत में परिवर्तनीयता की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the full convertibility of the capital account. Also, clarify the current state of convertibility in India by assessing the potential risks of full convertibility. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में परिवर्तनीयता को परिभाषित कीजिये, साथ ही पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता को व्याख्यायित कीजिये, पूर्ण परिवर्तनीयता के संभाव्य जोखिमों की चर्चा कीजिये, भारत में परिवर्तनीयता की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट कीजिये, अंतिम में पूर्ण परिवर्तनीयता के संदर्भ में तारापोर समिति द्वारा सुझाई गयी पूर्व तैयारियों की पूर्ति की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये| मुद्रा की परिवर्तनीयता का तात्त्पर्य दूसरी मुद्रा के साथ पारस्परिक विनिमय की स्वतंत्रता से है | यह भुगतान संतुलन खाते के अंतर्गत चालू खाते और पूंजी खाते पर होने वाले सभी लेन-देनों को पूरा करने के लिए रुपये को किसी भी स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में परिवर्तित करने कि स्वतंत्रता से है। पूंजी खाते की परिवर्तनीयता का तात्पर्य बिना किसी बाधा के पूँजी का स्वतंत्र बहिर्प्रवाह-अंतर्प्रवाह, भारतीयों द्वारा भारत में संपत्ति के विक्रय से प्राप्त रुपये को देश के बाहर ले जाने पर या किसी विदेशी मुद्रा में अपना जमा रखने पर पूर्ण स्वतंत्रता । इस प्रकार पूंजी खाता की परिवर्तनीयता का अर्थ घरेलू वित्तीय संपत्तियों तथा विदेशी वित्तीय संपत्तियों को एक दूसरे से बाजार निर्धारित विदेशी विनिमय दर पर बदलने की स्वतंत्रता से है । पूंजी खाता की पूर्ण परिवर्तनीयता की स्थिति में रूपये का विदेशी मुद्रा में परिवर्तन बिना किसी प्रतिबन्ध के होगा| केवल वैध मुद्रा की शर्त के साथ यहाँ बिना किसी प्रपत्र के मुद्रा का परिवर्तन किया जाएगा| यहाँ उपयोग के संदर्भ में सवाल जवाब नहीं किये जायेंगे और यहाँ अंतिम उपयोग सम्बन्धी शर्तें नहीं आरोपित की जायेंगी| पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता से विदेशी निवेश तीव्रता से होगा इससे भारतीय रूपये की मांग बढ़ेगी और भारतीय मुद्रा मजबूत होगी| निवेश में वृद्धि से विकास दर धीरे धीरे बढने लगेगी, इसका गरीबी और बेरोजगारी की समस्या पर सकारात्मक प्रभाव पडेगा और गरीबी और बेरोजगारी में कमी आएगी, इससे अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी और रियल स्टेट जैसे क्षेत्रों में तेजी आएगी और ऋण प्रवाह बढेगा| इस तरह से पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होती है| किन्तु कमजोर एवं अस्थिर अर्थव्यवस्थाओं के लिए पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता अनेक संभाव्य जोखिम भी उत्पन्न करती है जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- विदेशी मुद्रा का अंतर्प्रवाह घरेलू मुद्रा की मांग को बढ़ाएगा जिससे घरेलू मुद्रा को मजबूती प्रदान करेगा, इससे आयात तो सस्ते होंगे किन्तु महंगे होने के कारण निर्यातों में गिरावट आ सकती है| इसका प्रभाव व्यापार संतुलन पर नकारात्मक रूप से पड़ सकता है, घरेलू प्राकृतिक संसाधनों पर विदेशी पूँजी का एकाधिकारहो सकता है, अर्थव्यवस्था बाह्य आर्थिक कारकों के लिए अधिक सुभेद्य हो सकती है, घरेलू पूंजी द्वारा विदेशी पूंजी को प्रतिस्पर्धा नही दे पाने की स्थिति में घरेलू बाजार पर विदेशी पूँजी का एकाधिकार स्थापित हो सकता है, संसाधनों और अर्थव्यवस्था की संभावनाओं के समापन पर और बाजार जनित लाभप्रदता समाप्त होने पर पूँजी का बहिर्प्रवाह शुरू हो सकता है, इससे मुद्रा के मूल्य में गिरावट आएगी और अर्थव्यवस्था से अचानक पूँजी के निकल जाने से वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकता है, निवेशों में कमी आने से औद्योगिक क्षेत्रक में मंदी आ सकती है जिससे रोजगार में कमी आएगी, आय में गिरावट के कारण ऋणों की वापसी अवरुद्ध हो सकती है जिससे बैंक डिफ़ॉल्ट जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं, बड़ी मात्रा में पूँजी के अचानक बहिर्प्रवाह के शुरू होने से केन्द्रीय बैंक को विनिमय दर और पूँजी खाते का संतुलन और मौद्रिक नीति को एक साथ प्रबंधित करना पड़ेगा, इसे असंभव त्रिमूर्ति की समस्या कहते हैं | उपरोक्त संभाव्य जोखिमों को देखते हुए भारत में रूपये की पूर्ण परिवर्तनीयता के संदर्भ में चरणबद्ध विकास देख सकते हैं| प्रथम चरण में विदेशी विनिमय विनियमन अधिनियम (FERA) 1973 के द्वारा मुद्रा की परिवर्तनीयता को पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया था| किन्तु उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था को बाजार आधारित बनाने के लिए इसमें सुधार की आवश्यकता महसूस की गयी जिससे विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) 1999 लाया गया| FEMA के माध्यम से चालू खाते पर कुछ प्रतिबंधों के साथ परिवर्तनीयता लायी गयी और पूँजी खाते के अंतर्गत कुछ विशिष्ट मामलों में परिवर्तनीयता के संदर्भ में कुछ छूटें प्रदान की गयी| FEMA के अंतर्गत अभी परिवर्तनीयता के लिए आवश्यक प्रपत्रों को प्रस्तुत करना पड़ता है, अंतिम उपयोग उससे सम्बन्धित प्रतिबंधों को ध्यान में रख कर परिवर्तनीयता की जाती है| बेहतर निगरानी के लिए अकाउंट से अकाउंट में ट्रान्सफर की प्रक्रिया अपनाई जाती है| भारत में परिवर्तनीयता के संदर्भ में वर्तमान में जहाँ चालू खाते की कुछ मदों पर प्रतिबन्ध लगाए गएँ हैं वहीँ पूँजी खाते के अंतर्गत कुछ मदों के अंतर्गत लेन देन को अनुमत किया गया है | चालू खाते की कुछ मदों पर प्रतिबंधित गेम शो, रेसिंग प्रतियोगिता, लाटरी, सट्टेबाजी के माध्यम से अर्जित धन के प्रेषण(रेमिटेंस) की अनुमति नहीं है विदेशों में भारतीय कलाकारों को विदेशी मुद्रा में हुआ भुगतान और भारत में विदेशी कलाकारों को भुगतान के संदर्भ में वित्त मंत्रालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी वर्तमान नीति के तहत प्रति वर्ष 5 लाख डॉलर की एक सामान्य सीमा चालू खाते केविभिन्न लेन-देन के लिए आरोपित है, इसमे निजी विदेश यात्रा, उपहार/दान, रोजगार के लिए विदेश जाने पर, उत्प्रवासन के मामले में, विदेश में करीबी रिश्तेदारों का रख-रखाव, व्यापार यात्रा, विदेश में चिकित्सा उपचार और विदेश में अध्ययन आदि शामिल हैं| पूँजी खाते में अनुमत लेन-देन रिज़र्व बैंक ने LIBOR दर पर कुछ मात्रा में ऋण लेने की अनुमति दी है, वर्तमान में बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECB) के लिए RBI के अनुमोदन की आवश्यकता होती है| इसके अंतर्गत होटल, अस्पताल और सॉफ्टवेर क्षेत्र तथा अन्य कुछ सेवाओं के क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रकों के लिए 750 डॉलर का उधार ले सकते हैंऔर होटल, अस्पताल,सॉफ्टवेर क्षेत्र और विविध सेवाओं के लिए कॉर्पोरेट घराने एक वित्तीय वर्ष में 200 मिलियन डॉलर तक ऋण ले सकते हैं, सम्पूर्ण नागरिक उड्डयन क्षेत्र में कुल ECB सीमा एक बिलियन डॉलर, और एक व्यक्तिगत उड्डयन कंपनी के लिए 300 मिलियन डॉलर की सीमा आरोपित की गयी है, FDI/FPI के लिए वाणिज्यिक एवं उद्योग मंत्रालय ने अलग अलग सीमाएं निर्धारित की हैं, भूटान एवं नेपाल में निवेश के लिए कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है परन्तु और देशों के लिए 75 हजार डॉलर प्रतिवर्ष की सीमा आरोपित की गयी है, यदि वित्तीय कार्यवाही टास्क फ़ोर्स (FATF) किसी भी देश को गैर-सहयोगी देश का दर्जा दे रहा है जैसे उत्तरी कोरिया,इरान आदि तो वहां पर कोई भी भारतीय कोई भी निजी निवेश नहीं कर सकता है, उदारीकृत प्रेषण (रेमिटेंस) योजना एक भारतीय निवासी एक साल में भारत से बाहर 2.5 डॉलर लेकर जा सकता है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| तारापोर समिति के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था अभी पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता को लागू करने की स्थिति में नहीं है| पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता के संभाव्य जोखिम रूपये की अन्य मुद्राओं के सापेक्ष कमजोर स्थिति के कारण होंगी| यदि घरेलू वित्तीय बाजार की ब्याज दर अंतर्राष्ट्रीय दरों के बराबर होगी तो यह पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता से समस्या नहीं होगी| अतः इस संदर्भ में तारापोर समिति की अनुशंसाओं यथा मजबूत राजस्व-राजकोषीय स्थिति, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण और मजबूत वित्तीय बाजार आदि की स्थापना के बाद पूँजी खाते में क्रमिक परिवर्तनीयता लायी जा सकती है|
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##Question:पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता की व्याख्या कीजिये| साथ ही पूर्ण परिवर्तनीयता के संभाव्य जोखिमों का आकलन करते हुए भारत में परिवर्तनीयता की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the full convertibility of the capital account. Also, clarify the current state of convertibility in India by assessing the potential risks of full convertibility. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में परिवर्तनीयता को परिभाषित कीजिये, साथ ही पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता को व्याख्यायित कीजिये, पूर्ण परिवर्तनीयता के संभाव्य जोखिमों की चर्चा कीजिये, भारत में परिवर्तनीयता की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट कीजिये, अंतिम में पूर्ण परिवर्तनीयता के संदर्भ में तारापोर समिति द्वारा सुझाई गयी पूर्व तैयारियों की पूर्ति की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये| मुद्रा की परिवर्तनीयता का तात्त्पर्य दूसरी मुद्रा के साथ पारस्परिक विनिमय की स्वतंत्रता से है | यह भुगतान संतुलन खाते के अंतर्गत चालू खाते और पूंजी खाते पर होने वाले सभी लेन-देनों को पूरा करने के लिए रुपये को किसी भी स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में परिवर्तित करने कि स्वतंत्रता से है। पूंजी खाते की परिवर्तनीयता का तात्पर्य बिना किसी बाधा के पूँजी का स्वतंत्र बहिर्प्रवाह-अंतर्प्रवाह, भारतीयों द्वारा भारत में संपत्ति के विक्रय से प्राप्त रुपये को देश के बाहर ले जाने पर या किसी विदेशी मुद्रा में अपना जमा रखने पर पूर्ण स्वतंत्रता । इस प्रकार पूंजी खाता की परिवर्तनीयता का अर्थ घरेलू वित्तीय संपत्तियों तथा विदेशी वित्तीय संपत्तियों को एक दूसरे से बाजार निर्धारित विदेशी विनिमय दर पर बदलने की स्वतंत्रता से है । पूंजी खाता की पूर्ण परिवर्तनीयता की स्थिति में रूपये का विदेशी मुद्रा में परिवर्तन बिना किसी प्रतिबन्ध के होगा| केवल वैध मुद्रा की शर्त के साथ यहाँ बिना किसी प्रपत्र के मुद्रा का परिवर्तन किया जाएगा| यहाँ उपयोग के संदर्भ में सवाल जवाब नहीं किये जायेंगे और यहाँ अंतिम उपयोग सम्बन्धी शर्तें नहीं आरोपित की जायेंगी| पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता से विदेशी निवेश तीव्रता से होगा इससे भारतीय रूपये की मांग बढ़ेगी और भारतीय मुद्रा मजबूत होगी| निवेश में वृद्धि से विकास दर धीरे धीरे बढने लगेगी, इसका गरीबी और बेरोजगारी की समस्या पर सकारात्मक प्रभाव पडेगा और गरीबी और बेरोजगारी में कमी आएगी, इससे अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी और रियल स्टेट जैसे क्षेत्रों में तेजी आएगी और ऋण प्रवाह बढेगा| इस तरह से पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होती है| किन्तु कमजोर एवं अस्थिर अर्थव्यवस्थाओं के लिए पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता अनेक संभाव्य जोखिम भी उत्पन्न करती है जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- विदेशी मुद्रा का अंतर्प्रवाह घरेलू मुद्रा की मांग को बढ़ाएगा जिससे घरेलू मुद्रा को मजबूती प्रदान करेगा, इससे आयात तो सस्ते होंगे किन्तु महंगे होने के कारण निर्यातों में गिरावट आ सकती है| इसका प्रभाव व्यापार संतुलन पर नकारात्मक रूप से पड़ सकता है, घरेलू प्राकृतिक संसाधनों पर विदेशी पूँजी का एकाधिकारहो सकता है, अर्थव्यवस्था बाह्य आर्थिक कारकों के लिए अधिक सुभेद्य हो सकती है, घरेलू पूंजी द्वारा विदेशी पूंजी को प्रतिस्पर्धा नही दे पाने की स्थिति में घरेलू बाजार पर विदेशी पूँजी का एकाधिकार स्थापित हो सकता है, संसाधनों और अर्थव्यवस्था की संभावनाओं के समापन पर और बाजार जनित लाभप्रदता समाप्त होने पर पूँजी का बहिर्प्रवाह शुरू हो सकता है, इससे मुद्रा के मूल्य में गिरावट आएगी और अर्थव्यवस्था से अचानक पूँजी के निकल जाने से वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकता है, निवेशों में कमी आने से औद्योगिक क्षेत्रक में मंदी आ सकती है जिससे रोजगार में कमी आएगी, आय में गिरावट के कारण ऋणों की वापसी अवरुद्ध हो सकती है जिससे बैंक डिफ़ॉल्ट जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं, बड़ी मात्रा में पूँजी के अचानक बहिर्प्रवाह के शुरू होने से केन्द्रीय बैंक को विनिमय दर और पूँजी खाते का संतुलन और मौद्रिक नीति को एक साथ प्रबंधित करना पड़ेगा, इसे असंभव त्रिमूर्ति की समस्या कहते हैं | उपरोक्त संभाव्य जोखिमों को देखते हुए भारत में रूपये की पूर्ण परिवर्तनीयता के संदर्भ में चरणबद्ध विकास देख सकते हैं| प्रथम चरण में विदेशी विनिमय विनियमन अधिनियम (FERA) 1973 के द्वारा मुद्रा की परिवर्तनीयता को पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया था| किन्तु उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था को बाजार आधारित बनाने के लिए इसमें सुधार की आवश्यकता महसूस की गयी जिससे विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) 1999 लाया गया| FEMA के माध्यम से चालू खाते पर कुछ प्रतिबंधों के साथ परिवर्तनीयता लायी गयी और पूँजी खाते के अंतर्गत कुछ विशिष्ट मामलों में परिवर्तनीयता के संदर्भ में कुछ छूटें प्रदान की गयी| FEMA के अंतर्गत अभी परिवर्तनीयता के लिए आवश्यक प्रपत्रों को प्रस्तुत करना पड़ता है, अंतिम उपयोग उससे सम्बन्धित प्रतिबंधों को ध्यान में रख कर परिवर्तनीयता की जाती है| बेहतर निगरानी के लिए अकाउंट से अकाउंट में ट्रान्सफर की प्रक्रिया अपनाई जाती है| भारत में परिवर्तनीयता के संदर्भ में वर्तमान में जहाँ चालू खाते की कुछ मदों पर प्रतिबन्ध लगाए गएँ हैं वहीँ पूँजी खाते के अंतर्गत कुछ मदों के अंतर्गत लेन देन को अनुमत किया गया है | चालू खाते की कुछ मदों पर प्रतिबंधित गेम शो, रेसिंग प्रतियोगिता, लाटरी, सट्टेबाजी के माध्यम से अर्जित धन के प्रेषण(रेमिटेंस) की अनुमति नहीं है विदेशों में भारतीय कलाकारों को विदेशी मुद्रा में हुआ भुगतान और भारत में विदेशी कलाकारों को भुगतान के संदर्भ में वित्त मंत्रालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी वर्तमान नीति के तहत प्रति वर्ष 5 लाख डॉलर की एक सामान्य सीमा चालू खाते केविभिन्न लेन-देन के लिए आरोपित है, इसमे निजी विदेश यात्रा, उपहार/दान, रोजगार के लिए विदेश जाने पर, उत्प्रवासन के मामले में, विदेश में करीबी रिश्तेदारों का रख-रखाव, व्यापार यात्रा, विदेश में चिकित्सा उपचार और विदेश में अध्ययन आदि शामिल हैं| पूँजी खाते में अनुमत लेन-देन रिज़र्व बैंक ने LIBOR दर पर कुछ मात्रा में ऋण लेने की अनुमति दी है, वर्तमान में बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECB) के लिए RBI के अनुमोदन की आवश्यकता होती है| इसके अंतर्गत होटल, अस्पताल और सॉफ्टवेर क्षेत्र तथा अन्य कुछ सेवाओं के क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रकों के लिए 750 डॉलर का उधार ले सकते हैंऔर होटल, अस्पताल,सॉफ्टवेर क्षेत्र और विविध सेवाओं के लिए कॉर्पोरेट घराने एक वित्तीय वर्ष में 200 मिलियन डॉलर तक ऋण ले सकते हैं, सम्पूर्ण नागरिक उड्डयन क्षेत्र में कुल ECB सीमा एक बिलियन डॉलर, और एक व्यक्तिगत उड्डयन कंपनी के लिए 300 मिलियन डॉलर की सीमा आरोपित की गयी है, FDI/FPI के लिए वाणिज्यिक एवं उद्योग मंत्रालय ने अलग अलग सीमाएं निर्धारित की हैं, भूटान एवं नेपाल में निवेश के लिए कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है परन्तु और देशों के लिए 75 हजार डॉलर प्रतिवर्ष की सीमा आरोपित की गयी है, यदि वित्तीय कार्यवाही टास्क फ़ोर्स (FATF) किसी भी देश को गैर-सहयोगी देश का दर्जा दे रहा है जैसे उत्तरी कोरिया,इरान आदि तो वहां पर कोई भी भारतीय कोई भी निजी निवेश नहीं कर सकता है, उदारीकृत प्रेषण (रेमिटेंस) योजना एक भारतीय निवासी एक साल में भारत से बाहर 2.5 डॉलर लेकर जा सकता है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| तारापोर समिति के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था अभी पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता को लागू करने की स्थिति में नहीं है| पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता के संभाव्य जोखिम रूपये की अन्य मुद्राओं के सापेक्ष कमजोर स्थिति के कारण होंगी| यदि घरेलू वित्तीय बाजार की ब्याज दर अंतर्राष्ट्रीय दरों के बराबर होगी तो यह पूँजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता से समस्या नहीं होगी| अतः इस संदर्भ में तारापोर समिति की अनुशंसाओं यथा मजबूत राजस्व-राजकोषीय स्थिति, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण और मजबूत वित्तीय बाजार आदि की स्थापना के बाद पूँजी खाते में क्रमिक परिवर्तनीयता लायी जा सकती है|
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What are the issues associated with coastal security in India? Discuss the merits and demerits of creating a Central Marine Police Force in addressing these issues. (150 words/10 marks)
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APPROACH In the introduction brief mention of the coastal expanse of India. Mention of issues pertaining to coastal security which needs attention Mention the rationale for the creation of CMPF Mention the issues with the creation of CMPF Suggest way forward ANSWER India has a coastline of more than 7,500 k.m, with a vast Exclusive Economic Zone surrounding the Indian peninsula. Its geostrategic location and strategic importance make coastal security a key concern. In the aftermath of the 26/11 attack, the national coastal defence apparatus was radically overhauled. However, many issues pertaining to coastal security need attention: Lack of a cooperative mechanism – Many agencies like the Navy, Coast Guard, Marine Police and other authorities are tasked with coastal security. Hence, intelligence gathering, information sharing and coordination are major problems. Setting up a structure such as National Apex Maritime Authority would help to coordinate policy and to ensure that there is no duplication of effort and iron out all the differences which do come up. The multiplicity of authority - Bureaucratic bickering has led to multiplicity of authorities from the union, the states as well as private actors. It leads to delay in decision making while security threats require quick decisions. Lack of effective surveillance mechanisms – The government has installed coastal radar systems, sensors and electronic surveillance systems to secure the coastal areas. Still, we are unable to use technology innovatively in coastal security. Unavailability of necessary infrastructure - The marine police stations are not functioning effectively due to a shortage of manpower and lack of interceptor boats. Lack of suitable training in counterterrorism – Though marine police are tasked with overall coastal security they are not trained for counterterrorism. Maintenance and operational mechanisms for existing naval assets are non-existent. Penetration by non-state actors and terror attacks on population centres along the coast, vital installations like atomic power plants, oil platforms, naval/ military/coast guard bases and industrial centres. Threats posed by organized gangs carrying out smuggling of narcotics, arms and explosives. Indirect, yet consequential threats; including the vulnerability of the Indian coast to the illegal inflow of migrants and refugees from Bangladesh and Sri Lanka, especially along the Odisha and Tamil Nadu coasts. Unsettled maritime boundaries: Also hinders offshore development work. India’s maritime boundaries with Pakistan and Bangladesh are not delineated due to overlapping claims. Central Marine Police Force (CMPF) Recently, the Union Home minister approved a proposal to set up a Central Marine Police Force to protect sea, coasts, ports and vital installations with the following rationale: The central marine police force can police water up to 12 nautical miles from the coast and investigate crimes committed in the coastal water. The equipment required for marine policing is completely different from that available in a regular police station (For ex-boats) as well as good coordination with the Coast Guard and Navy. The Coast Guard which is already tasked with the overall defence of India and also patrols the Exclusive economic zone cannot be burdened with normal policing functions. However, some of the states are reluctant of all this and believe that the marine police should be funded by the Centre. The business of state police versus coastal police is basically a question of funding and money. States find it difficult in allocating funds for the coastal police setups. The creation of CMPF also raises various issues such as: The plan to substitute the state-controlled marine police with a central maritime force ignores structural impediments, such as the lack of local intelligence and regional language skills that the new agency is likely to come up against. The creation of CMPF may result in creating the problems of a multiplicity of command and lack of coordination and turf wars between the State police and the CMPF. Creating a new organization would only add another agency to the already crowded coastal security architecture. Way forward The need of the hour is to strengthen the Indian Coast Guard (ICG). Following the 2008 terrorist attacks in Mumbai, the ICG has been given the additional responsibility of coastal security in territorial waters, including the areas patrolled by the marine police. Thus, the ICG not only has the required mandate but also the ability to shoulder the responsibility of coastal security. All it requires is further strengthening with required assets and manpower to patrol the coastal and shallow waters. The new Merchant Shipping (Amendment) Bill, 2015 has not been passed by the Parliament yet. There would be a convoy system for piracy and the Indian navy proved that India became piracy free near its coastal waters. There needs to be some sort of registration for every boat and Mumbai police even ordered some sort of colours on the boats to recognize this. Coastguards can be given the overall authority for coastal security. Coastal and fishing communities are the largest constituents of the coastal security framework and are amongst its core strengths. Effective involvement has the potential to significantly complement the efforts of the security agencies. There is a need for an effective National Maritime blueprint and a steady infusion of funds both material and human resources. This would ensure that the vision of SAGAR (Security and Growth for All in the Region) is achieved, with India emerging as a net security provider.
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##Question:What are the issues associated with coastal security in India? Discuss the merits and demerits of creating a Central Marine Police Force in addressing these issues. (150 words/10 marks)##Answer: APPROACH In the introduction brief mention of the coastal expanse of India. Mention of issues pertaining to coastal security which needs attention Mention the rationale for the creation of CMPF Mention the issues with the creation of CMPF Suggest way forward ANSWER India has a coastline of more than 7,500 k.m, with a vast Exclusive Economic Zone surrounding the Indian peninsula. Its geostrategic location and strategic importance make coastal security a key concern. In the aftermath of the 26/11 attack, the national coastal defence apparatus was radically overhauled. However, many issues pertaining to coastal security need attention: Lack of a cooperative mechanism – Many agencies like the Navy, Coast Guard, Marine Police and other authorities are tasked with coastal security. Hence, intelligence gathering, information sharing and coordination are major problems. Setting up a structure such as National Apex Maritime Authority would help to coordinate policy and to ensure that there is no duplication of effort and iron out all the differences which do come up. The multiplicity of authority - Bureaucratic bickering has led to multiplicity of authorities from the union, the states as well as private actors. It leads to delay in decision making while security threats require quick decisions. Lack of effective surveillance mechanisms – The government has installed coastal radar systems, sensors and electronic surveillance systems to secure the coastal areas. Still, we are unable to use technology innovatively in coastal security. Unavailability of necessary infrastructure - The marine police stations are not functioning effectively due to a shortage of manpower and lack of interceptor boats. Lack of suitable training in counterterrorism – Though marine police are tasked with overall coastal security they are not trained for counterterrorism. Maintenance and operational mechanisms for existing naval assets are non-existent. Penetration by non-state actors and terror attacks on population centres along the coast, vital installations like atomic power plants, oil platforms, naval/ military/coast guard bases and industrial centres. Threats posed by organized gangs carrying out smuggling of narcotics, arms and explosives. Indirect, yet consequential threats; including the vulnerability of the Indian coast to the illegal inflow of migrants and refugees from Bangladesh and Sri Lanka, especially along the Odisha and Tamil Nadu coasts. Unsettled maritime boundaries: Also hinders offshore development work. India’s maritime boundaries with Pakistan and Bangladesh are not delineated due to overlapping claims. Central Marine Police Force (CMPF) Recently, the Union Home minister approved a proposal to set up a Central Marine Police Force to protect sea, coasts, ports and vital installations with the following rationale: The central marine police force can police water up to 12 nautical miles from the coast and investigate crimes committed in the coastal water. The equipment required for marine policing is completely different from that available in a regular police station (For ex-boats) as well as good coordination with the Coast Guard and Navy. The Coast Guard which is already tasked with the overall defence of India and also patrols the Exclusive economic zone cannot be burdened with normal policing functions. However, some of the states are reluctant of all this and believe that the marine police should be funded by the Centre. The business of state police versus coastal police is basically a question of funding and money. States find it difficult in allocating funds for the coastal police setups. The creation of CMPF also raises various issues such as: The plan to substitute the state-controlled marine police with a central maritime force ignores structural impediments, such as the lack of local intelligence and regional language skills that the new agency is likely to come up against. The creation of CMPF may result in creating the problems of a multiplicity of command and lack of coordination and turf wars between the State police and the CMPF. Creating a new organization would only add another agency to the already crowded coastal security architecture. Way forward The need of the hour is to strengthen the Indian Coast Guard (ICG). Following the 2008 terrorist attacks in Mumbai, the ICG has been given the additional responsibility of coastal security in territorial waters, including the areas patrolled by the marine police. Thus, the ICG not only has the required mandate but also the ability to shoulder the responsibility of coastal security. All it requires is further strengthening with required assets and manpower to patrol the coastal and shallow waters. The new Merchant Shipping (Amendment) Bill, 2015 has not been passed by the Parliament yet. There would be a convoy system for piracy and the Indian navy proved that India became piracy free near its coastal waters. There needs to be some sort of registration for every boat and Mumbai police even ordered some sort of colours on the boats to recognize this. Coastguards can be given the overall authority for coastal security. Coastal and fishing communities are the largest constituents of the coastal security framework and are amongst its core strengths. Effective involvement has the potential to significantly complement the efforts of the security agencies. There is a need for an effective National Maritime blueprint and a steady infusion of funds both material and human resources. This would ensure that the vision of SAGAR (Security and Growth for All in the Region) is achieved, with India emerging as a net security provider.
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जनसांख्यिकी संक्रमण से आप क्या समझते हैं? भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सामाजिक-आर्थिक स्थिति में परिवर्तन के कारण जनसांख्यिकी संक्रमण विभिन्न अवस्थाओं से गुजरा है। इस कथन का विश्लेषण कीजिये। (200 शब्द)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: जनसांख्यिकी संक्रमण के बारे में परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिये। इसके बाद विभिन्न अवस्थाओं को लिखते हुए इस परिवर्तन के कारकों को स्पष्ट कीजिये। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर: जनसांख्यिकी संक्रमण मॉडल जनसंख्या वृद्धि दर में परिवर्तनों की प्रवृत्तियों पर आधारित है जैसे कि परंपरागत कृषि अर्थव्यवस्था से आधुनिक औद्योगिक और शहरी अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होता है। जन्म दर और मृत्यु दर एवं इनके कारण होने वाला जनसंख्या परिवर्तन जनसांख्यिकीय संक्रमण का मूल आधार है। प्रत्येक देश अविकसित अवस्था से विकसित अवस्था जनसांख्यिकीय संक्रमण की निम्नलिखित तीन अवस्थाओं से गुजरता है: प्रथम अवस्था में जन्म दर एवं मृत्यु दर उच्च होती है। दूसरी अवस्था में आरंभ में जन्म दर उच्च रहती रहती है किन्तु समय के साथ जन्म दर में कमी होती है। अंतिम अवस्था में जन्म दर, मृत्यु अवस्था से तेजी से कम हो जाती है। गौरतलब है कि स्वतन्त्रता: के पश्चात जनसांख्यिकी संक्रमण कई अवस्थाओं से गुजरा इसमें अनेक कारण विद्यमान थे, जिसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: तीव्र वृद्धि की अवधि (1951-81): इस अवधि के दौरान जनसंख्या कि औसत वृद्धि दर 2.2% थी। मृत्यु दर में तेजी से कमी आना तथा उच्च जन्म दर इस अवधि में हुई जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण था। निम्न मृत्यु दर एवं उच्च जन्म दर हेतु कई कारक थे जैसे: इस दौरान स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी सुविधाओं में व्यापक सुधार हुआ। प्रमुख रोगों का ईलाज संभव हो सका। स्वास्थ्य सेवाएँ गांवों तक पहुंची। आर्थिक विकास की तीव्र दर भी इसका एक प्रमुख कारण था। हरित क्रांति का व्यापक प्रभाव पड़ा। आय में वृद्धि से आत्मनिर्भरता आई। घटती वृद्धि की अवधि (1981-2011): यद्यपि इस अवधि में कुल जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई परंतु जनसंख्या वृद्धि दर निश्चित रूप से कमी हुई है। मृत्यु दर में भी कमी देखि गयी परंतु कमी की दर धीमी हो गई। जनसंख्या वृद्धि दर के मंद होने के निम्नलिखित कारक थे: जनसंख्या नियंत्रण के उपायों का सफल होना। परिवार नियोजन की विधियों का अपनाया जाना। पारिवारिक व्यवस्था में बदलाव। आर्थिक सुधारों का प्रभाव लोगों के रोजगार पर पड़ा एकल परिवार व्यवस्था रूप लेने लगा। इस दौरान विवाह की औसत आयु में वृद्धि हुई। इस प्रकार जनसांख्यिकी संक्रमण का उपयोग विभिन्न देशों की जनसांख्यिकी अवस्थाओं के पूर्वानुमान में किया जा सकता है। भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात जनसंख्या में पहले तो वृद्धि हुई उसके बाद एक सीमा तक नियंत्रण स्थापित हुआ। दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में मानव विकास से संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, साक्षरता, रोजगार और पर्यावरण से संबन्धित नीतिगत पहल जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावपूर्ण नियंत्रण के लिए आवश्यक है।
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##Question:जनसांख्यिकी संक्रमण से आप क्या समझते हैं? भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सामाजिक-आर्थिक स्थिति में परिवर्तन के कारण जनसांख्यिकी संक्रमण विभिन्न अवस्थाओं से गुजरा है। इस कथन का विश्लेषण कीजिये। (200 शब्द)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: जनसांख्यिकी संक्रमण के बारे में परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिये। इसके बाद विभिन्न अवस्थाओं को लिखते हुए इस परिवर्तन के कारकों को स्पष्ट कीजिये। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर: जनसांख्यिकी संक्रमण मॉडल जनसंख्या वृद्धि दर में परिवर्तनों की प्रवृत्तियों पर आधारित है जैसे कि परंपरागत कृषि अर्थव्यवस्था से आधुनिक औद्योगिक और शहरी अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होता है। जन्म दर और मृत्यु दर एवं इनके कारण होने वाला जनसंख्या परिवर्तन जनसांख्यिकीय संक्रमण का मूल आधार है। प्रत्येक देश अविकसित अवस्था से विकसित अवस्था जनसांख्यिकीय संक्रमण की निम्नलिखित तीन अवस्थाओं से गुजरता है: प्रथम अवस्था में जन्म दर एवं मृत्यु दर उच्च होती है। दूसरी अवस्था में आरंभ में जन्म दर उच्च रहती रहती है किन्तु समय के साथ जन्म दर में कमी होती है। अंतिम अवस्था में जन्म दर, मृत्यु अवस्था से तेजी से कम हो जाती है। गौरतलब है कि स्वतन्त्रता: के पश्चात जनसांख्यिकी संक्रमण कई अवस्थाओं से गुजरा इसमें अनेक कारण विद्यमान थे, जिसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: तीव्र वृद्धि की अवधि (1951-81): इस अवधि के दौरान जनसंख्या कि औसत वृद्धि दर 2.2% थी। मृत्यु दर में तेजी से कमी आना तथा उच्च जन्म दर इस अवधि में हुई जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण था। निम्न मृत्यु दर एवं उच्च जन्म दर हेतु कई कारक थे जैसे: इस दौरान स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी सुविधाओं में व्यापक सुधार हुआ। प्रमुख रोगों का ईलाज संभव हो सका। स्वास्थ्य सेवाएँ गांवों तक पहुंची। आर्थिक विकास की तीव्र दर भी इसका एक प्रमुख कारण था। हरित क्रांति का व्यापक प्रभाव पड़ा। आय में वृद्धि से आत्मनिर्भरता आई। घटती वृद्धि की अवधि (1981-2011): यद्यपि इस अवधि में कुल जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई परंतु जनसंख्या वृद्धि दर निश्चित रूप से कमी हुई है। मृत्यु दर में भी कमी देखि गयी परंतु कमी की दर धीमी हो गई। जनसंख्या वृद्धि दर के मंद होने के निम्नलिखित कारक थे: जनसंख्या नियंत्रण के उपायों का सफल होना। परिवार नियोजन की विधियों का अपनाया जाना। पारिवारिक व्यवस्था में बदलाव। आर्थिक सुधारों का प्रभाव लोगों के रोजगार पर पड़ा एकल परिवार व्यवस्था रूप लेने लगा। इस दौरान विवाह की औसत आयु में वृद्धि हुई। इस प्रकार जनसांख्यिकी संक्रमण का उपयोग विभिन्न देशों की जनसांख्यिकी अवस्थाओं के पूर्वानुमान में किया जा सकता है। भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात जनसंख्या में पहले तो वृद्धि हुई उसके बाद एक सीमा तक नियंत्रण स्थापित हुआ। दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में मानव विकास से संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, साक्षरता, रोजगार और पर्यावरण से संबन्धित नीतिगत पहल जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावपूर्ण नियंत्रण के लिए आवश्यक है।
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What do you mean by Ecological succession? Also briefly discuss stages of ecological succession. (150 words/ 10 marks)
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Approach: Introduction -try to define ecological succession. Body of the answer-First part write about primary and secondary succession in the second part try to write aboutstages in the community. Conclusion -Try to give a contextual conclusion. Answer: The gradual and fairly predictable change in the species composition of a given area is called ecological succession. Type of Ecological succession Primary succession Primary Succession is a process that starts where no living organismsare there – these could be areas where no living organisms ever existed, say bare rock; or in areas that somehow, lost all the living organisms that existed there. This is called Primary succession. It takes a lot of time spanning around 100"s of the year. Secondary Succession Secondary succession begins in areas where natural biotic communities have been destroyed such as in abandoned farmlands, burned or cut forests, and lands that have been flooded. Since some soil or sediment is present, succession is faster than primary succession. Stages of Community 1. Pioneer community : The pioneer community is the first to inhabit the inhabited area. They are generally lichen and mosses. They lay a foundation that helps other forms of communities. 2. Seral communities. During succession, some species colonize an area and their populations become more numerous, whereas populations of other species decline and even disappear. The entire sequence of communities that successively change in agiven area is called sere(s) . The individual transitional communities aretermed seral stages or seral communities. In the successive serial stages. 1. There is a change in the diversity of species of organisms, an increase in thenumber of species and organisms as well as an increase in the total biomass. The present-day communities in the world have come to be becauseof succession that has occurred over millions of years since life started on earth.Succession and evolution would have been parallelprocesses at that time. 2. The establishment of anew biotic community is generally slow. Before a biotic community ofdiverse organisms can become established, there must be soil. Depending mostly on the climate, it takes natural processes several hundred to severalthousand years to produce fertile soil on bare rock. Climax community An important characteristic of all communities is that theircomposition and structure constantly change in response to the changingenvironmental conditions. This change is orderly and sequential, parallel with the changes in the physical environment. These changes lead finallyto a community that is in near equilibrium with the environment andthat is called a climax community. Conclusion At any time during primary or secondary succession, natural or human-induced disturbances (fire, deforestation, etc.), can convert aparticular seral stage of succession to an earlier stage. Also,suchdisturbances create new conditions that encourage some species anddiscourage or eliminate other species.
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##Question:What do you mean by Ecological succession? Also briefly discuss stages of ecological succession. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach: Introduction -try to define ecological succession. Body of the answer-First part write about primary and secondary succession in the second part try to write aboutstages in the community. Conclusion -Try to give a contextual conclusion. Answer: The gradual and fairly predictable change in the species composition of a given area is called ecological succession. Type of Ecological succession Primary succession Primary Succession is a process that starts where no living organismsare there – these could be areas where no living organisms ever existed, say bare rock; or in areas that somehow, lost all the living organisms that existed there. This is called Primary succession. It takes a lot of time spanning around 100"s of the year. Secondary Succession Secondary succession begins in areas where natural biotic communities have been destroyed such as in abandoned farmlands, burned or cut forests, and lands that have been flooded. Since some soil or sediment is present, succession is faster than primary succession. Stages of Community 1. Pioneer community : The pioneer community is the first to inhabit the inhabited area. They are generally lichen and mosses. They lay a foundation that helps other forms of communities. 2. Seral communities. During succession, some species colonize an area and their populations become more numerous, whereas populations of other species decline and even disappear. The entire sequence of communities that successively change in agiven area is called sere(s) . The individual transitional communities aretermed seral stages or seral communities. In the successive serial stages. 1. There is a change in the diversity of species of organisms, an increase in thenumber of species and organisms as well as an increase in the total biomass. The present-day communities in the world have come to be becauseof succession that has occurred over millions of years since life started on earth.Succession and evolution would have been parallelprocesses at that time. 2. The establishment of anew biotic community is generally slow. Before a biotic community ofdiverse organisms can become established, there must be soil. Depending mostly on the climate, it takes natural processes several hundred to severalthousand years to produce fertile soil on bare rock. Climax community An important characteristic of all communities is that theircomposition and structure constantly change in response to the changingenvironmental conditions. This change is orderly and sequential, parallel with the changes in the physical environment. These changes lead finallyto a community that is in near equilibrium with the environment andthat is called a climax community. Conclusion At any time during primary or secondary succession, natural or human-induced disturbances (fire, deforestation, etc.), can convert aparticular seral stage of succession to an earlier stage. Also,suchdisturbances create new conditions that encourage some species anddiscourage or eliminate other species.
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सिंधु घाटी सभ्यता, वर्तमान भारतीय समाज के विकास के विविध आयामो के लिए प्रेरणा श्रोत है ,चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द )
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अप्रोच :- भूमिका में सिंधु घाटी सभ्यता को समझते हुए उसके महत्व को संक्षेप में बताइये । उत्तर के पहले भाग में सिंधु घाटी सभ्यता के उन्नतशील विकासात्मक पहलूओं को समझाइए । उत्तर के दूसरे भाग में वर्तमान भारतीय समाज किन पहलूयों से प्रेरणा ले सकता है उसको स्पष्ट कीजिये । अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये । उत्तर :- सिंधु नदी के किनारे ईसा पूर्व तीसरी सहस्त्राब्दी ( 3000 BC ), जो सभ्यता विकसित हुए उसे सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से जाना जाता है , जो मुख्यत नगरीकृत सभ्यता थी और इस सभ्यता में कई विशाल नगर शामिल थे ।जैसे हड़प्पा , मोहनजोडरों , धौलावीरा , कलिबंगा आदि ।विश्व में जब ज्यादा तर तत्कालीन सभ्यताएं ग्रामीण पृष्ठभूमि की थी ।उस समय भारत में उन्नतशील तकनीक के साथ नगर नियोजन , जिसमे प्रभावी जल प्रबंधन , खाद्य प्रबंधन , नगर विकास प्रबंधन , सड़क संरचना , पक्की ईटों से निर्मित भवन और उत्कृष्ट मृदभांड यहाँ की बेहतर इंजीन्यरिंग और रसायन शास्त्र के ज्ञान को प्रदर्शित करते हैं । सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त उन्नत शील तकनीक को हम निम्न बिन्दुओं से समझ सकते है – नगर नियाजन आयताकार ग्रिड पैटर्न पर आधारित था , सड़के पूर्व –पश्चिम और उत्तर दक्षिण दिशा में जाती थी और एक दूसरे को समकोण पर कटती थी । भवन निर्माण में मानकीकृत पक्की ईटों को प्रयोग । ईटों को जोड़ने के लिए जिप्सम का प्रयोग नगर दो भागो में विभाजित जिसमे गढ़ में प्रशानिक वर्ग और निचले नगर में आम जनता निवास करती थी । गढ़ में मौजूद अन्नागार उन्नत तकनीक ज्ञान के परिचायक जिसमे वायु संचार के प्रभावी व्यवस्था और उचें चबूतरे का निर्माण अन्न भंडारण के साथ साथ कीटो से उनकी सुरक्षा की दृष्टि से कारगर था मोहनजोडरों से प्राप्त वृहद स्नानागार कुशल अभियांत्रिकी का उदाहरण है , क्योकि उसमे आज तक किसी प्रकार की दरार का अभाव है । हड़प्पा नगर में बेहतर जल निकास प्रणाली जिसमे प्रत्येक घर से निकली छोटी नालियों का बड़ी नालियों से जुड़ाव , बड़ी नाली का मुख्य नाली से जुड़ाव जो मुख्य सड़क के किनारे समानान्तर रूप से चलती थी । नालियो को ढककर रखा जाता था और बीच बीच में उनकी सफाई के लिए मुख्य छिद्र बना हुआ था । नगर में व्यक्तिगत और सार्वजनिक दोनों प्रकार की स्वच्छता का ध्यान रखा जाता था । नगर के गढ़ वाले हिस्से से बहुमंज़िला मकानो के भी साक्ष्य मिले है । समाज में विभिन्न वर्ग के लोग रहते थे तथा समाज साहिश्रुन था । घातक हथियारों का अभाव इनकी शांति प्रियता को दिखाता है । बड़े पैमाने पर प्राप्त साक्ष्यों से इनके प्रकृति पूजक होने का पता चलता है । उपरोक्त बिन्दुओं का अगर सूक्ष्म अवलोकन करें तो यह जान पड़ता है कि सिंधु घाटी सभ्यता तात्कालिक अन्य सभ्यताओं से काफी उन्नतशील थी और वर्तमान समय में भी यह भारतीय समाज के विकास में एक प्रेरणा स्त्रोत की तरह कार्य करती है । जिससे निम्नलिखित क्षेत्रो में प्रेरणा ली जा सकती है – नगर नियोजन में , जहां आज भारत में अनियंत्रित शहरीकरण बढ़ रहा है , बेहतर और व्यवस्थित नगरो का अभाव है , बेहतर सड़क प्रणाली और उसकी ग्रिड पैटर्न संबंधी संरचना भारत में नियजित नगर निर्माण में अत्यंत सहायक हो सकती है । नगरो में बेहतर सिवेज का विकास , जो की सिंधु घाटी सभ्यता में अत्यंत उन्नत थी , उससे सीखा जा सकता है । देश में बढ़ी हुई विविधता के साथ , आपसी भाई चारे के साथ रहना भारतीय समाज का लक्षण है , इसके प्रमाण हमे सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलते है। वर्तमान में सांप्रदायिकता के बढ़ते खतरे से निपटने में अत्यंत कारगर उपाय । सिंधु घाटी सभ्यता के लोगो का प्रकृति पूजक समाज आज हमे प्रकृति और उसके संरक्षण की प्रेरणा देता है , जिससे हम अपने प्रकृति और उसके संसाधनो का संधारणीय उपयोग सुनिचित कर सके , जो हमारे संधरणीय विकास लक्ष्यो (SDG) के अनुकूल है । साथ ही बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के निवारण में सहायक हो सकता है । महिलायो की प्रभुता और उनके सशक्त भागीदारी के प्रमाण हमे भी उनही लक्ष्यो को प्राप्त करने को प्रेरित करते है । वर्तमान सरकार द्वारा चलाया गया स्वच्छता अभियान की पृष्ठभूमि हम सिंधु घाटी सभ्यता में भी देख सकते है , जहां सार्वजनिक के साथ साथ व्यक्तिगत स्वच्छता पर भी ज़ोर था और लोगो की उसमे जन भागीदारी थी । उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि भारत को वर्तमान में एक विश्व शक्ति बनने के क्रम में अपने आर्थिक विकास के साथ साथ अपने सामाजिक विकास पर भी ध्यान देना पड़ेगा और उसके बेहतर क्रियान्वयन में सिंधु घाटी सभ्यता एक प्रेरणा स्त्रोत का काम कर सकती है ।
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##Question:सिंधु घाटी सभ्यता, वर्तमान भारतीय समाज के विकास के विविध आयामो के लिए प्रेरणा श्रोत है ,चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द )##Answer:अप्रोच :- भूमिका में सिंधु घाटी सभ्यता को समझते हुए उसके महत्व को संक्षेप में बताइये । उत्तर के पहले भाग में सिंधु घाटी सभ्यता के उन्नतशील विकासात्मक पहलूओं को समझाइए । उत्तर के दूसरे भाग में वर्तमान भारतीय समाज किन पहलूयों से प्रेरणा ले सकता है उसको स्पष्ट कीजिये । अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये । उत्तर :- सिंधु नदी के किनारे ईसा पूर्व तीसरी सहस्त्राब्दी ( 3000 BC ), जो सभ्यता विकसित हुए उसे सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से जाना जाता है , जो मुख्यत नगरीकृत सभ्यता थी और इस सभ्यता में कई विशाल नगर शामिल थे ।जैसे हड़प्पा , मोहनजोडरों , धौलावीरा , कलिबंगा आदि ।विश्व में जब ज्यादा तर तत्कालीन सभ्यताएं ग्रामीण पृष्ठभूमि की थी ।उस समय भारत में उन्नतशील तकनीक के साथ नगर नियोजन , जिसमे प्रभावी जल प्रबंधन , खाद्य प्रबंधन , नगर विकास प्रबंधन , सड़क संरचना , पक्की ईटों से निर्मित भवन और उत्कृष्ट मृदभांड यहाँ की बेहतर इंजीन्यरिंग और रसायन शास्त्र के ज्ञान को प्रदर्शित करते हैं । सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त उन्नत शील तकनीक को हम निम्न बिन्दुओं से समझ सकते है – नगर नियाजन आयताकार ग्रिड पैटर्न पर आधारित था , सड़के पूर्व –पश्चिम और उत्तर दक्षिण दिशा में जाती थी और एक दूसरे को समकोण पर कटती थी । भवन निर्माण में मानकीकृत पक्की ईटों को प्रयोग । ईटों को जोड़ने के लिए जिप्सम का प्रयोग नगर दो भागो में विभाजित जिसमे गढ़ में प्रशानिक वर्ग और निचले नगर में आम जनता निवास करती थी । गढ़ में मौजूद अन्नागार उन्नत तकनीक ज्ञान के परिचायक जिसमे वायु संचार के प्रभावी व्यवस्था और उचें चबूतरे का निर्माण अन्न भंडारण के साथ साथ कीटो से उनकी सुरक्षा की दृष्टि से कारगर था मोहनजोडरों से प्राप्त वृहद स्नानागार कुशल अभियांत्रिकी का उदाहरण है , क्योकि उसमे आज तक किसी प्रकार की दरार का अभाव है । हड़प्पा नगर में बेहतर जल निकास प्रणाली जिसमे प्रत्येक घर से निकली छोटी नालियों का बड़ी नालियों से जुड़ाव , बड़ी नाली का मुख्य नाली से जुड़ाव जो मुख्य सड़क के किनारे समानान्तर रूप से चलती थी । नालियो को ढककर रखा जाता था और बीच बीच में उनकी सफाई के लिए मुख्य छिद्र बना हुआ था । नगर में व्यक्तिगत और सार्वजनिक दोनों प्रकार की स्वच्छता का ध्यान रखा जाता था । नगर के गढ़ वाले हिस्से से बहुमंज़िला मकानो के भी साक्ष्य मिले है । समाज में विभिन्न वर्ग के लोग रहते थे तथा समाज साहिश्रुन था । घातक हथियारों का अभाव इनकी शांति प्रियता को दिखाता है । बड़े पैमाने पर प्राप्त साक्ष्यों से इनके प्रकृति पूजक होने का पता चलता है । उपरोक्त बिन्दुओं का अगर सूक्ष्म अवलोकन करें तो यह जान पड़ता है कि सिंधु घाटी सभ्यता तात्कालिक अन्य सभ्यताओं से काफी उन्नतशील थी और वर्तमान समय में भी यह भारतीय समाज के विकास में एक प्रेरणा स्त्रोत की तरह कार्य करती है । जिससे निम्नलिखित क्षेत्रो में प्रेरणा ली जा सकती है – नगर नियोजन में , जहां आज भारत में अनियंत्रित शहरीकरण बढ़ रहा है , बेहतर और व्यवस्थित नगरो का अभाव है , बेहतर सड़क प्रणाली और उसकी ग्रिड पैटर्न संबंधी संरचना भारत में नियजित नगर निर्माण में अत्यंत सहायक हो सकती है । नगरो में बेहतर सिवेज का विकास , जो की सिंधु घाटी सभ्यता में अत्यंत उन्नत थी , उससे सीखा जा सकता है । देश में बढ़ी हुई विविधता के साथ , आपसी भाई चारे के साथ रहना भारतीय समाज का लक्षण है , इसके प्रमाण हमे सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलते है। वर्तमान में सांप्रदायिकता के बढ़ते खतरे से निपटने में अत्यंत कारगर उपाय । सिंधु घाटी सभ्यता के लोगो का प्रकृति पूजक समाज आज हमे प्रकृति और उसके संरक्षण की प्रेरणा देता है , जिससे हम अपने प्रकृति और उसके संसाधनो का संधारणीय उपयोग सुनिचित कर सके , जो हमारे संधरणीय विकास लक्ष्यो (SDG) के अनुकूल है । साथ ही बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के निवारण में सहायक हो सकता है । महिलायो की प्रभुता और उनके सशक्त भागीदारी के प्रमाण हमे भी उनही लक्ष्यो को प्राप्त करने को प्रेरित करते है । वर्तमान सरकार द्वारा चलाया गया स्वच्छता अभियान की पृष्ठभूमि हम सिंधु घाटी सभ्यता में भी देख सकते है , जहां सार्वजनिक के साथ साथ व्यक्तिगत स्वच्छता पर भी ज़ोर था और लोगो की उसमे जन भागीदारी थी । उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि भारत को वर्तमान में एक विश्व शक्ति बनने के क्रम में अपने आर्थिक विकास के साथ साथ अपने सामाजिक विकास पर भी ध्यान देना पड़ेगा और उसके बेहतर क्रियान्वयन में सिंधु घाटी सभ्यता एक प्रेरणा स्त्रोत का काम कर सकती है ।
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"18वीं सदी में भारतीय इतिहास एक शक्तिशाली तथा समृद्ध साम्राज्य के पतन का गवाह बना ।" कथन के संदर्भ में मुगल साम्राज्य के पतन के कारणों की चर्चा कीजिये । (150 से 200 शब्द, 10 अंक) "Indian history witnessed the decline of a powerful and prosperous empire in the 18th century." In the context of the statement, discuss the reasons for the decline of the Mughal Empire. (150 to 200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण : मुगल साम्राज्य की महत्वपूर्ण स्थिति का संक्षिप्त परिचय दीजिये । मुख्य भाग मे मुगल साम्राज्य के पतन के कारणों की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष मे पतन के प्रभावों का समग्रता मे उल्लेख कीजिये । उत्तर : बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव डाली लगभग 200 वर्षो तक भारतवर्ष में मुगलों का आधिपत्य रहा । हुमायूं के समय साम्राज्य में भयंकर संकट आया। अकबर के समय मुगल साम्राज्य का चरम विकास हुआ, उसने हिन्दू और मुसलमानों के मध्य सहयोग की भावना पैदा की । जहांगीर और शाहजहां के काल में धार्मिक तथा राजपूत नीति में परिवर्तन हुआ, जिससे राजपूत और सिक्ख रूष्ट हो गये। औरंगजेब की नीतियों ने मुगल साम्राज्य को पतन के कगार पर ला खड़ा कर दिया। मुगल साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी- औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुरशाह प्रथम से लेकर बहादुरशाह द्वितीय तक सभी मुग़ल शासक नामधारी शासक रह गये थे। उनमें योग्यता, दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता का अभाव था. बहादुरशाह प्रथम बुढ़ापे की अवस्था में गद्दी पर बैठा था। उसमें सफल शासक के सभी गुणों का अभाव था। व्यावहारिक ज्ञान, कूटनीति और युद्ध-कला की शिक्षा देने के बदले मुग़ल शाहजादा शाही दरबार में रहकर राग-रंग में लिप्त रहते थे। यही कारण था कि औरंगजेब के बाद मुग़ल वंश में कोई योग्य शासक नहीं हुआ जो विघटनकारी तत्त्वों पर नियंत्रण रखकर मुग़ल साम्राज्य को पतन से बचा सकता था। औरंगजेब की नीतियाँ - औरगंजेब की धार्मिक नीति अनुदार थी । उसने मन्दिरों को तोडकर तथा मूर्तियों को अपवित्र कर हिन्दुओं की धार्मिक भावना को चोट पहुचाई तथा जजिया और तीर्थयात्रा जैसे कर लगाये । हिन्दुओं को उसने उच्च पदों से भी वंचित कर अपमानित किया, राजपूतों से शत्रुता की । मुगल शासकों ने शिवाजी को अपमानित कर तथा शम्भाजी की हत्या की। इस गलती के कारण औरंगजेब लम्बे समय तक दक्षिण में युद्ध में व्यस्त रहा । इसी तरह गुरू तेगबहादुर तथा गुरू गोविन्द सिंह के पुत्र की हत्या की । मारवाड़ तथा मेवाड़ के पीछे भी उसने अपनी शक्ति का अपव्यय किया। राजपूत की विश्वनीय शक्ति का साम्राज्य के हित में उपयोग नहीं किया जा सका । मनसबदारी प्रथा मे बार-बार परिवर्तन- औरंगजेब ने मनसबदारों की संख्या दुगुनी कर दी,पर आय में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं की। इसके अलावा मनसबदारों के उपर पाबंदिया समाप्त कर दी गई।औरगजेब की मृत्यु के बाद मनसबदारों की ताकत बढ़ गई तथा वे सम्राट पर अपनेरिश्तेदारों को वजीर बनाने हेतु दबाव डालने लगे । मनसबदारी प्रथा में भ्रष्टाचार आ गया था, जिससे मुगल सेना दुर्बल हो गई थी । सेना की शक्ति मुगल साम्राज्य की धुरी थी। इससे अयोग्य सम्राट अपने साम्राज्य की रक्षा न कर सके । विदेशी आक्रमण - 1739 में नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल राज्य कोबड़ा आघात पहुँचाया, कोष रिक्त हो गया और सैनिक दुर्बलता स्पष्ट हो गई। अब छोटे राज्य भी मुगलसत्ता की खुलकर अवहेलना करने लगे। मराठा शक्ति का उदय -पेशवाओं ने मराठा शक्ति को समेकित किया और प्रादेशिक शक्तियों द्वारा मुगलों पर प्रहार किया। उन्होंने "हिन्दू पादशाही" का जो आदर्श सामने रखा वह मुस्लिम राज्य के क्षय द्वारा ही पूरा हो सकता था। दरबार मे गुटबंदी - उत्तरकालीन मुगल दरबार में चार दल तूरानी, अफगानी, ईरानी और हिन्दुस्तानी दल प्रमुख थे।ये दल आपस में छोटे-छोटे युद्ध भी लड़ते रहते थे। यहाँ तक कि ये दल विदेशी आक्रमण के समय भी एक नहीं होते थे तथा विदेशी आक्रमणकारियों से मिलकर षड्यंत्र रचते थे। इससे बादशाह और साम्राज्य की प्रतिष्ठा समाप्त हो गयी और अंततः दिल्ली में विदेशी शक्तियों का प्रभाव स्थापित हो गया। सैनिक दुर्बलता -मुगल सम्राटों के पास अपनी कोई सेना नहीं होती थी। वे सैनिक आवश्यकता के लिए मनसबदारों पर निर्भर रहते थे जो अवसर मिलने पर सम्राटों को धोखा देने में नहीं चूकते थे। सैनिकों को मनसबदार ही वेतन देते थे, उन्हें शाही राजकोष से सीधे वेतन नहीं मिलता था। अतः सैनिक मनसबदार के प्रति निष्ठा रखते थे। 18वीं शताब्दी में मुगल सेना की सबसे बड़ी दुर्बलता उसके गठन की। साम्राज्यकी विशालता- आरैगंजेब ने साम्राज्यवादी था उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा तक अपने साम्राज्य को विस्तृत कर लिया था। औरंगजेब के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों के लिए इतने बड़े साम्राज्य की सुरक्षा करना असम्भव ही सिद्ध हुआ । मुगल साम्राज्यका पतन और विघटन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा संगठनात्मक कारणों से हुआ। औरंगजेबऐसी नीतियों के पालन में भी असमर्थ रहा, जिनसे परस्पर विरोधी तत्वों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई जा सकती। इस प्रकार औरंगज़ेब न केवल परिस्थितियों का शिकार था, बल्कि उसने स्वयं ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करने में योग दिया जिनका वह स्वयं शिकार बना। इस समय तक यूरोपीय कंपनियां जैसे-डेन, डच, फ्रांसीसी आदि कम्पनियों का भारत में प्रवेश हो चुका था। अंततः अंग्रेजों ने भारत पर सर्वोच्चता स्थापित करते हुए मुगलसाम्राज्य के पतन को अन्तिम आहुति दी ।
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##Question:"18वीं सदी में भारतीय इतिहास एक शक्तिशाली तथा समृद्ध साम्राज्य के पतन का गवाह बना ।" कथन के संदर्भ में मुगल साम्राज्य के पतन के कारणों की चर्चा कीजिये । (150 से 200 शब्द, 10 अंक) "Indian history witnessed the decline of a powerful and prosperous empire in the 18th century." In the context of the statement, discuss the reasons for the decline of the Mughal Empire. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : मुगल साम्राज्य की महत्वपूर्ण स्थिति का संक्षिप्त परिचय दीजिये । मुख्य भाग मे मुगल साम्राज्य के पतन के कारणों की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष मे पतन के प्रभावों का समग्रता मे उल्लेख कीजिये । उत्तर : बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव डाली लगभग 200 वर्षो तक भारतवर्ष में मुगलों का आधिपत्य रहा । हुमायूं के समय साम्राज्य में भयंकर संकट आया। अकबर के समय मुगल साम्राज्य का चरम विकास हुआ, उसने हिन्दू और मुसलमानों के मध्य सहयोग की भावना पैदा की । जहांगीर और शाहजहां के काल में धार्मिक तथा राजपूत नीति में परिवर्तन हुआ, जिससे राजपूत और सिक्ख रूष्ट हो गये। औरंगजेब की नीतियों ने मुगल साम्राज्य को पतन के कगार पर ला खड़ा कर दिया। मुगल साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी- औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुरशाह प्रथम से लेकर बहादुरशाह द्वितीय तक सभी मुग़ल शासक नामधारी शासक रह गये थे। उनमें योग्यता, दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता का अभाव था. बहादुरशाह प्रथम बुढ़ापे की अवस्था में गद्दी पर बैठा था। उसमें सफल शासक के सभी गुणों का अभाव था। व्यावहारिक ज्ञान, कूटनीति और युद्ध-कला की शिक्षा देने के बदले मुग़ल शाहजादा शाही दरबार में रहकर राग-रंग में लिप्त रहते थे। यही कारण था कि औरंगजेब के बाद मुग़ल वंश में कोई योग्य शासक नहीं हुआ जो विघटनकारी तत्त्वों पर नियंत्रण रखकर मुग़ल साम्राज्य को पतन से बचा सकता था। औरंगजेब की नीतियाँ - औरगंजेब की धार्मिक नीति अनुदार थी । उसने मन्दिरों को तोडकर तथा मूर्तियों को अपवित्र कर हिन्दुओं की धार्मिक भावना को चोट पहुचाई तथा जजिया और तीर्थयात्रा जैसे कर लगाये । हिन्दुओं को उसने उच्च पदों से भी वंचित कर अपमानित किया, राजपूतों से शत्रुता की । मुगल शासकों ने शिवाजी को अपमानित कर तथा शम्भाजी की हत्या की। इस गलती के कारण औरंगजेब लम्बे समय तक दक्षिण में युद्ध में व्यस्त रहा । इसी तरह गुरू तेगबहादुर तथा गुरू गोविन्द सिंह के पुत्र की हत्या की । मारवाड़ तथा मेवाड़ के पीछे भी उसने अपनी शक्ति का अपव्यय किया। राजपूत की विश्वनीय शक्ति का साम्राज्य के हित में उपयोग नहीं किया जा सका । मनसबदारी प्रथा मे बार-बार परिवर्तन- औरंगजेब ने मनसबदारों की संख्या दुगुनी कर दी,पर आय में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं की। इसके अलावा मनसबदारों के उपर पाबंदिया समाप्त कर दी गई।औरगजेब की मृत्यु के बाद मनसबदारों की ताकत बढ़ गई तथा वे सम्राट पर अपनेरिश्तेदारों को वजीर बनाने हेतु दबाव डालने लगे । मनसबदारी प्रथा में भ्रष्टाचार आ गया था, जिससे मुगल सेना दुर्बल हो गई थी । सेना की शक्ति मुगल साम्राज्य की धुरी थी। इससे अयोग्य सम्राट अपने साम्राज्य की रक्षा न कर सके । विदेशी आक्रमण - 1739 में नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल राज्य कोबड़ा आघात पहुँचाया, कोष रिक्त हो गया और सैनिक दुर्बलता स्पष्ट हो गई। अब छोटे राज्य भी मुगलसत्ता की खुलकर अवहेलना करने लगे। मराठा शक्ति का उदय -पेशवाओं ने मराठा शक्ति को समेकित किया और प्रादेशिक शक्तियों द्वारा मुगलों पर प्रहार किया। उन्होंने "हिन्दू पादशाही" का जो आदर्श सामने रखा वह मुस्लिम राज्य के क्षय द्वारा ही पूरा हो सकता था। दरबार मे गुटबंदी - उत्तरकालीन मुगल दरबार में चार दल तूरानी, अफगानी, ईरानी और हिन्दुस्तानी दल प्रमुख थे।ये दल आपस में छोटे-छोटे युद्ध भी लड़ते रहते थे। यहाँ तक कि ये दल विदेशी आक्रमण के समय भी एक नहीं होते थे तथा विदेशी आक्रमणकारियों से मिलकर षड्यंत्र रचते थे। इससे बादशाह और साम्राज्य की प्रतिष्ठा समाप्त हो गयी और अंततः दिल्ली में विदेशी शक्तियों का प्रभाव स्थापित हो गया। सैनिक दुर्बलता -मुगल सम्राटों के पास अपनी कोई सेना नहीं होती थी। वे सैनिक आवश्यकता के लिए मनसबदारों पर निर्भर रहते थे जो अवसर मिलने पर सम्राटों को धोखा देने में नहीं चूकते थे। सैनिकों को मनसबदार ही वेतन देते थे, उन्हें शाही राजकोष से सीधे वेतन नहीं मिलता था। अतः सैनिक मनसबदार के प्रति निष्ठा रखते थे। 18वीं शताब्दी में मुगल सेना की सबसे बड़ी दुर्बलता उसके गठन की। साम्राज्यकी विशालता- आरैगंजेब ने साम्राज्यवादी था उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा तक अपने साम्राज्य को विस्तृत कर लिया था। औरंगजेब के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों के लिए इतने बड़े साम्राज्य की सुरक्षा करना असम्भव ही सिद्ध हुआ । मुगल साम्राज्यका पतन और विघटन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा संगठनात्मक कारणों से हुआ। औरंगजेबऐसी नीतियों के पालन में भी असमर्थ रहा, जिनसे परस्पर विरोधी तत्वों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई जा सकती। इस प्रकार औरंगज़ेब न केवल परिस्थितियों का शिकार था, बल्कि उसने स्वयं ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करने में योग दिया जिनका वह स्वयं शिकार बना। इस समय तक यूरोपीय कंपनियां जैसे-डेन, डच, फ्रांसीसी आदि कम्पनियों का भारत में प्रवेश हो चुका था। अंततः अंग्रेजों ने भारत पर सर्वोच्चता स्थापित करते हुए मुगलसाम्राज्य के पतन को अन्तिम आहुति दी ।
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सब्सिडी से आप क्या समझते हैं? पेट्रोलियम क्षेत्र में सब्सिडी को व्यावहारिक बनाने के लिए समय के साथ क्या-क्या बदलाव किए गए हैं? विस्तार से वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द ) What do you understand by subsidy? What changes have been made over time to make subsidies viable in the petroleum sector? Describe in detail. (150-200 words)
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प्रश्न- सब्सिडी/सहायिकी क्या है? पेट्रोलियम सब्सिडी नीति में भारत में हुए क्रमिक परिवर्तनों को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) दृष्टिकोण भूमिका में सब्सिडी को परिभाषित कीजिये, प्रथम खंड में पेट्रोलियम सब्सिडी की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये दूसरे खंड में पेट्रोलियम सब्सिडी नीति के विकास को विस्तार से स्पष्ट कीजिये अंतिम में नयी नीति के लाभ बताते हुए निष्कर्ष दीजिये जब सरकार अपने नागरिकों को रियायती मूल्य पर कोई भी वस्तु या सेवा प्रदान करती है, इसे सब्सिडी अथवा सहायिकी के रूप में परिभाषित कर सकते हैं| यह सब्सिडी/सहायिकी प्राप्त रियायती मूल्य या तो बाजार मूल्य से कम होता है या उसे लागत से कम दाम पर जनता को उपलब्ध कराया जाता है| इस प्रकार सब्सिडी एक प्रकार की वित्तीय सहायता है जो कि सरकार द्वारा किसानों, उद्योगों, उपभोक्ताओं (मुख्यतः गरीबों) को उपलब्ध करायी जाती है जिसके कारण जरुरतमंद लोगों के लिए जरूरी चीजों के दाम नीचे आ जाते हैं| यह कार्य सरकार द्वारा लोगों के कल्याण के लिए किया जाता है| पारदर्शिता का स्तर, लाभार्थियों की पहचान और उनको लक्षित करने में दक्षता तथा इनका सफलतापूर्वक क्रियान्वयन ही किसी सब्सिडी को औचित्यपूर्ण एवं धारणीय बनाता है| भारत सरकार द्वारा खाद्य सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है, इस प्रकार की सब्सिडी में सरकार गरीबों के लिए सस्ते दामों पर खाद्यान्न (चावल, गेहूं, चीनी) इत्यादि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से उपलब्ध कराती है| इसी तरह उर्वरक सब्सिडी, कैश सब्सिडी, ब्याज माफ़ी,इंधन एवं इसके विविध रूप, वाहन और अन्य उपकरण खरीदने के लिए भी सरकार द्वारा सब्सिडी प्रदान की जाती है l सरकार द्वारा इंधन और इसके विभिन्न रूपों पर भी सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है,इस सब्सिडी में रसोई गैस, डीजल और पेट्रोल के दामों में सरकार सब्सिडी उपलब्ध कराती है l इसके अलावा गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने वाले लोगों को सरकार सस्ते दामों पर मिट्टी का तेल भी उपलब्ध कराती है l इसके माध्यम से सरकार इंधन उपयोग में प्रवृत्तिगत परिवर्तन, सस्ता परिवहन, इंधन की उपलब्धता और इंधन तक पहुच, सस्ते परिवहन के माध्यम से आपूर्तिगत मुद्रास्फीति पर नियंत्रण आदि उद्देश्यों की पूर्ति करती है| साथ ही इसका उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को सुचारू बनाए रखना है| अभी हाल के वर्षों में भारत की पेट्रोलियम सब्सिडी नीति में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं| जिनका विवरण निम्नलिखित है- वर्ष 2002 से पूर्व की नीति 2002 से पहले आयल पूल खाते की व्यवस्था थी, इस आयल पूल मेंएविएशन टरबाइन फ्यूल(ATF), पेट्रोलियम, डीजल और द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG), केरोसिन और नाप्था को शामिल किया जाता था| इसे पूल खाते का रख रखाव तेल समन्वय समिति द्वारा किया जाता था| इस समय ATF, पेट्रोलियम, डीजल को महंगा बेच करLPG, केरोसिन और नाप्था पर सब्सिडी देने की योजना अपनाई गयी थीजबकि केवल एविएशन टरबाइन फ्यूल को छोड़ कर वास्तव मेंपेट्रोलियम, डीजल,LPG, केरोसिन और नाप्था पर सब्सिडी दी जा रही थी| इस दौर में पेट्रोलियम आयल का बाजार मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता था, कच्चे तेल के मूल्य के सापेक्ष बिक्री दरें कम रखी जाती थीं इस व्यवस्था के कारण सभी तेल विपणन कम्पनियाँ घाटे में थीं | रूपये की अनुपस्थिति में कंपनियों के घाटे को सरकार ने बांड के माध्यम से पूरा करती थी| इस नीति के कारण सरकार पर बांडों का बोझ बढ़ता गया था दूसरी ओर तेल विपणन कंपनियों के पास नकदी की समस्या होने लगी थी| वर्ष 2002 से बाद की नीति भारत सरकार ने सब्सिडी को और दक्ष बनाने के लिए तथा पूर्ववर्ती नीति की सीमाओं को देखते हुए वर्ष 2002 में आयल पूल खाता और समन्वय समिति की व्यवस्था को समाप्त कर दिया| इसके स्थान पर आयात समता मूल्य (IPP) की अवधारणा लायी गयी| आयात समता मूल्य नीति में आयातक द्वारा भुगतान किया गये कच्चे तेल का दाम, आयात शुल्क और समुद्री किराया जोड़ा जाता था| अर्थात अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल की कीमत और सम्बन्धित खर्चों को जोड़ कर क्रूड आयल की कीमत तय की जाने लगी| इसका लाभ कच्चे तेल का निष्कर्षण करने वाली अपस्ट्रीम कम्पनियों को मिला | तेल विपणन कम्पनियां अभी भी घाटे का सामना कर रही थीं| वर्ष 2006 में सी. रंगराजन कमेटी की संस्तुति पर पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण में व्यापार समता मूल्य (TPP) नीति को अपनाया गया| इसके अंतर्गत आयातित और घरेलू कच्चे तेल की कीमतों/लागतों के औसत के आधार पर कच्चे तेल की कीमतों का निर्धारण किया गया| इससे क्रूड आयल के दामों में कुछ कमी आने की संभावना थी| लागत और विक्री मूल्य के अंतराल को सरकार सब्सिडी द्वारा पूरा करती थी| इस अंतराल की पूर्ति सरकार आयल बांडों के माध्यम से करती थी| अतः राजकोषीय भार की समस्या पूर्ववत ही रही| वर्ष 2010 के बाद की नीति पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण की एक व्यवहार्य और स्थायी प्रणाली पर अनुशंसा करने के लिए गठित एक विशेषज्ञ समूह के सुझाव के पर जून 2010 से पेट्रोल पर से सब्सिडी समाप्त करके पेट्रोल की कीमतों को बाजार की शक्तियों के अधीन लाया गया| इसके बाद डीजल की सब्सिडी के निर्धारण की समस्या आयी, क्योंकि डीजल की सब्सिडी बंद करने से परिवहन लागत बढ़ने और मुद्रास्फीति बढने की संभावना थी अतः डीजल पर सब्सिडी जारी रखी गयी| जनवरी 2013 में प्रतिमाह 40 से 50 पैसे प्रति लीटर दाम बढाने की नीति अपनाई गयी, एक बार अंडर रिकवरी समाप्त होने के बाद डीजल के मूल्य को भी बाजार पर छोड़ दिया जाना था | ध्यातव्य है कि 18 महीने बाद2014 में डीजल का मूल्य बाजार मूल्य के बराबर आ गयाथा| वर्ष 2014 से डीजल और पेट्रोल के मूल्य सरकारी नियंत्रण से छूटकर सरकारी तेल कंपनियों के द्वारा तय होने लगे हैं और कच्चे तेल के 15 दिनों के औसत मूल्यों के आधार पर दोनों तेलों के दाम तय किये जाते थे| इसमें तेल कंपनियों को तेल के मूल्यों की समीक्षा करने के लिए 15 दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है इसलिए कभी कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्यों में बढ़ोत्तरी होने पर भी कंपनियों को भारत में मूल्य बढ़ाने के लिए 15 वें दिन तक इंतजार करना होता है और घाटा भी उठाना पड़ता था| अतः कंपनियों द्वारा दैनिक आधार पर मूल्य निर्धारण की मांग की गयी| वर्ष 2016 से दैनिक आधार पर तेल मूल्य के निर्धारण की नीति अपनाई गयी | नयी नीति के अंतर्गत कंपनिया दैनिक आधार पर तेल मूल्यों का निर्धारण करती हैं| इससे तेल खरीद में होने वाली हेजिंग को रोका जा सकता है, इससे ग्राहक मूल्य परिवर्तन का लाभ त्वरित रूप से प्राप्त कर सकेगा| दैनिक आधार पर निर्धारण से कम्पनियाँ कभी कीमतों में ना तो बड़ी बढ़ोत्तरी करेंगी और न ही एकदम से घटाएंगी l इससे बाजार जनित उतार चढ़ाव से उपभोक्ताओं की रक्षा की जा सकेगी| इसके अतिरिक्त सरकार का मानना है कि दैनिक आधार पर पेट्रोल-डीजल के मूल्य निर्धारण से डॉलर और कच्चे तेल के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव से समष्टिगत आर्थिक नुकसान कम होंगे| इस प्रकार अपनाई गयी नई नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी|
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##Question:सब्सिडी से आप क्या समझते हैं? पेट्रोलियम क्षेत्र में सब्सिडी को व्यावहारिक बनाने के लिए समय के साथ क्या-क्या बदलाव किए गए हैं? विस्तार से वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द ) What do you understand by subsidy? What changes have been made over time to make subsidies viable in the petroleum sector? Describe in detail. (150-200 words)##Answer:प्रश्न- सब्सिडी/सहायिकी क्या है? पेट्रोलियम सब्सिडी नीति में भारत में हुए क्रमिक परिवर्तनों को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) दृष्टिकोण भूमिका में सब्सिडी को परिभाषित कीजिये, प्रथम खंड में पेट्रोलियम सब्सिडी की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये दूसरे खंड में पेट्रोलियम सब्सिडी नीति के विकास को विस्तार से स्पष्ट कीजिये अंतिम में नयी नीति के लाभ बताते हुए निष्कर्ष दीजिये जब सरकार अपने नागरिकों को रियायती मूल्य पर कोई भी वस्तु या सेवा प्रदान करती है, इसे सब्सिडी अथवा सहायिकी के रूप में परिभाषित कर सकते हैं| यह सब्सिडी/सहायिकी प्राप्त रियायती मूल्य या तो बाजार मूल्य से कम होता है या उसे लागत से कम दाम पर जनता को उपलब्ध कराया जाता है| इस प्रकार सब्सिडी एक प्रकार की वित्तीय सहायता है जो कि सरकार द्वारा किसानों, उद्योगों, उपभोक्ताओं (मुख्यतः गरीबों) को उपलब्ध करायी जाती है जिसके कारण जरुरतमंद लोगों के लिए जरूरी चीजों के दाम नीचे आ जाते हैं| यह कार्य सरकार द्वारा लोगों के कल्याण के लिए किया जाता है| पारदर्शिता का स्तर, लाभार्थियों की पहचान और उनको लक्षित करने में दक्षता तथा इनका सफलतापूर्वक क्रियान्वयन ही किसी सब्सिडी को औचित्यपूर्ण एवं धारणीय बनाता है| भारत सरकार द्वारा खाद्य सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है, इस प्रकार की सब्सिडी में सरकार गरीबों के लिए सस्ते दामों पर खाद्यान्न (चावल, गेहूं, चीनी) इत्यादि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से उपलब्ध कराती है| इसी तरह उर्वरक सब्सिडी, कैश सब्सिडी, ब्याज माफ़ी,इंधन एवं इसके विविध रूप, वाहन और अन्य उपकरण खरीदने के लिए भी सरकार द्वारा सब्सिडी प्रदान की जाती है l सरकार द्वारा इंधन और इसके विभिन्न रूपों पर भी सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है,इस सब्सिडी में रसोई गैस, डीजल और पेट्रोल के दामों में सरकार सब्सिडी उपलब्ध कराती है l इसके अलावा गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने वाले लोगों को सरकार सस्ते दामों पर मिट्टी का तेल भी उपलब्ध कराती है l इसके माध्यम से सरकार इंधन उपयोग में प्रवृत्तिगत परिवर्तन, सस्ता परिवहन, इंधन की उपलब्धता और इंधन तक पहुच, सस्ते परिवहन के माध्यम से आपूर्तिगत मुद्रास्फीति पर नियंत्रण आदि उद्देश्यों की पूर्ति करती है| साथ ही इसका उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को सुचारू बनाए रखना है| अभी हाल के वर्षों में भारत की पेट्रोलियम सब्सिडी नीति में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं| जिनका विवरण निम्नलिखित है- वर्ष 2002 से पूर्व की नीति 2002 से पहले आयल पूल खाते की व्यवस्था थी, इस आयल पूल मेंएविएशन टरबाइन फ्यूल(ATF), पेट्रोलियम, डीजल और द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG), केरोसिन और नाप्था को शामिल किया जाता था| इसे पूल खाते का रख रखाव तेल समन्वय समिति द्वारा किया जाता था| इस समय ATF, पेट्रोलियम, डीजल को महंगा बेच करLPG, केरोसिन और नाप्था पर सब्सिडी देने की योजना अपनाई गयी थीजबकि केवल एविएशन टरबाइन फ्यूल को छोड़ कर वास्तव मेंपेट्रोलियम, डीजल,LPG, केरोसिन और नाप्था पर सब्सिडी दी जा रही थी| इस दौर में पेट्रोलियम आयल का बाजार मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता था, कच्चे तेल के मूल्य के सापेक्ष बिक्री दरें कम रखी जाती थीं इस व्यवस्था के कारण सभी तेल विपणन कम्पनियाँ घाटे में थीं | रूपये की अनुपस्थिति में कंपनियों के घाटे को सरकार ने बांड के माध्यम से पूरा करती थी| इस नीति के कारण सरकार पर बांडों का बोझ बढ़ता गया था दूसरी ओर तेल विपणन कंपनियों के पास नकदी की समस्या होने लगी थी| वर्ष 2002 से बाद की नीति भारत सरकार ने सब्सिडी को और दक्ष बनाने के लिए तथा पूर्ववर्ती नीति की सीमाओं को देखते हुए वर्ष 2002 में आयल पूल खाता और समन्वय समिति की व्यवस्था को समाप्त कर दिया| इसके स्थान पर आयात समता मूल्य (IPP) की अवधारणा लायी गयी| आयात समता मूल्य नीति में आयातक द्वारा भुगतान किया गये कच्चे तेल का दाम, आयात शुल्क और समुद्री किराया जोड़ा जाता था| अर्थात अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल की कीमत और सम्बन्धित खर्चों को जोड़ कर क्रूड आयल की कीमत तय की जाने लगी| इसका लाभ कच्चे तेल का निष्कर्षण करने वाली अपस्ट्रीम कम्पनियों को मिला | तेल विपणन कम्पनियां अभी भी घाटे का सामना कर रही थीं| वर्ष 2006 में सी. रंगराजन कमेटी की संस्तुति पर पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण में व्यापार समता मूल्य (TPP) नीति को अपनाया गया| इसके अंतर्गत आयातित और घरेलू कच्चे तेल की कीमतों/लागतों के औसत के आधार पर कच्चे तेल की कीमतों का निर्धारण किया गया| इससे क्रूड आयल के दामों में कुछ कमी आने की संभावना थी| लागत और विक्री मूल्य के अंतराल को सरकार सब्सिडी द्वारा पूरा करती थी| इस अंतराल की पूर्ति सरकार आयल बांडों के माध्यम से करती थी| अतः राजकोषीय भार की समस्या पूर्ववत ही रही| वर्ष 2010 के बाद की नीति पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण की एक व्यवहार्य और स्थायी प्रणाली पर अनुशंसा करने के लिए गठित एक विशेषज्ञ समूह के सुझाव के पर जून 2010 से पेट्रोल पर से सब्सिडी समाप्त करके पेट्रोल की कीमतों को बाजार की शक्तियों के अधीन लाया गया| इसके बाद डीजल की सब्सिडी के निर्धारण की समस्या आयी, क्योंकि डीजल की सब्सिडी बंद करने से परिवहन लागत बढ़ने और मुद्रास्फीति बढने की संभावना थी अतः डीजल पर सब्सिडी जारी रखी गयी| जनवरी 2013 में प्रतिमाह 40 से 50 पैसे प्रति लीटर दाम बढाने की नीति अपनाई गयी, एक बार अंडर रिकवरी समाप्त होने के बाद डीजल के मूल्य को भी बाजार पर छोड़ दिया जाना था | ध्यातव्य है कि 18 महीने बाद2014 में डीजल का मूल्य बाजार मूल्य के बराबर आ गयाथा| वर्ष 2014 से डीजल और पेट्रोल के मूल्य सरकारी नियंत्रण से छूटकर सरकारी तेल कंपनियों के द्वारा तय होने लगे हैं और कच्चे तेल के 15 दिनों के औसत मूल्यों के आधार पर दोनों तेलों के दाम तय किये जाते थे| इसमें तेल कंपनियों को तेल के मूल्यों की समीक्षा करने के लिए 15 दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है इसलिए कभी कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्यों में बढ़ोत्तरी होने पर भी कंपनियों को भारत में मूल्य बढ़ाने के लिए 15 वें दिन तक इंतजार करना होता है और घाटा भी उठाना पड़ता था| अतः कंपनियों द्वारा दैनिक आधार पर मूल्य निर्धारण की मांग की गयी| वर्ष 2016 से दैनिक आधार पर तेल मूल्य के निर्धारण की नीति अपनाई गयी | नयी नीति के अंतर्गत कंपनिया दैनिक आधार पर तेल मूल्यों का निर्धारण करती हैं| इससे तेल खरीद में होने वाली हेजिंग को रोका जा सकता है, इससे ग्राहक मूल्य परिवर्तन का लाभ त्वरित रूप से प्राप्त कर सकेगा| दैनिक आधार पर निर्धारण से कम्पनियाँ कभी कीमतों में ना तो बड़ी बढ़ोत्तरी करेंगी और न ही एकदम से घटाएंगी l इससे बाजार जनित उतार चढ़ाव से उपभोक्ताओं की रक्षा की जा सकेगी| इसके अतिरिक्त सरकार का मानना है कि दैनिक आधार पर पेट्रोल-डीजल के मूल्य निर्धारण से डॉलर और कच्चे तेल के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव से समष्टिगत आर्थिक नुकसान कम होंगे| इस प्रकार अपनाई गयी नई नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी|
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Answer the following in 100 words each (5 + 5 marks) a. How to eliminate caste prejudices in the society? b. How to ensure people’s cooperation towards Swachh Bharat?
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a) Approach Briefly explain the Caste Prejudices in the society Discuss the ways through which Caste prejudices can be eliminated. Answer Prejudices mean a preconceived notion or opinion, not based on logical reasoning. Its genesis lies in the sense of insecurity and hatred towards another group. Casteprejudices is an example of such prejudices where lower castes in Indian society face discrimination. It has defied reason and violated human dignity. Overcoming Caste Prejudices 1. Providing information so that preconceived notions vanish Sourcing Vedas and other ancient texts where the caste system had no relevance Providing data/citing examples regarding persons from lower castes who have attained heights, became good leaders and contributed towards the nation building Ex. Ambedkar, Jagjivan Ram, Ram Nath Kovind etc. 2. Promote close and open meeting between members of different groups to create sympathy, harmony between them. Promoting community dining Facilitating cultural exchanges promoting inter-caste marriages etc. 3. Deploy persuasive techniques to help people change their attitudes towards lower castes Involving famous personalities to ask about attitudinal changes regarding caste prejudices Top officials and local leaders can take proactive steps to persuade people to change their attitude(lead by example) Value education and awareness Constructive use of social media More focus on individual identity creation rather than group identity. Caste discrimination faced by lower castes in Indian society is beyond reasoning and should be dealt with proper attention to eradicate caste prejudice. b) Approach Briefly explain Swachh Bharat Abhiyan Enlist the ways through whichpeople’s cooperation towards Swachh Bharat can be ensured. Answer Swachh Bharat Abhiyan or Swachh Bharat Mission is a nation-wide campaign in India for the period 2014 to 2019 that aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India"s cities, towns, and rural areas.Swachh Bharat Mission was launched throughout the length and breadth of the country as a national movement. The campaign aims to achieve the vision of a ‘Clean India’ by 2nd October 2019. Ways through whichpeople’s cooperation towards Swachh Bharat can be ensured By overcoming semantic barriers Use of symbols which are receiver friendly. No discrepancy between the verbal and non-verbal aspect of the message. By making communication idea-centric rather than word-centric. Use of illustrations and relevant examples to support the message. (Students are encouraged to come up with innovative ideas to achieve the above) By overcoming Psychological Barriers To remove the barrier, a climate of trust and understanding needs to be established. By overcoming Physical Barriers It can be overcome by redesigning the physical environment. By Use of Social Power Reward Power - Rewarding people who confirm on their own to make an example Coercive Power – Use of force of law/rules and regulations Legitimate Power – Using people who enjoy legitimacy e.g. Government officials, Panchayat members, teachers etc. Expert Power – Bringing in experts to help explain the pros and cons of various practices. Conformity pressure – creating social pressure in various ways… Social boycott, shaming etc Liking –creating liking about the idea, by use of celebrities or people who are revered. Commitment and consistency – Creating commitment among people eg by making them take the pledge, mass oath, religious oath etc Reciprocity – by providing money to construct Toilets (eg government grants) Above are just a few examples of what can be done. Students may come up with various different ideas which should be appreciated and evaluated by the checker.
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##Question:Answer the following in 100 words each (5 + 5 marks) a. How to eliminate caste prejudices in the society? b. How to ensure people’s cooperation towards Swachh Bharat?##Answer:a) Approach Briefly explain the Caste Prejudices in the society Discuss the ways through which Caste prejudices can be eliminated. Answer Prejudices mean a preconceived notion or opinion, not based on logical reasoning. Its genesis lies in the sense of insecurity and hatred towards another group. Casteprejudices is an example of such prejudices where lower castes in Indian society face discrimination. It has defied reason and violated human dignity. Overcoming Caste Prejudices 1. Providing information so that preconceived notions vanish Sourcing Vedas and other ancient texts where the caste system had no relevance Providing data/citing examples regarding persons from lower castes who have attained heights, became good leaders and contributed towards the nation building Ex. Ambedkar, Jagjivan Ram, Ram Nath Kovind etc. 2. Promote close and open meeting between members of different groups to create sympathy, harmony between them. Promoting community dining Facilitating cultural exchanges promoting inter-caste marriages etc. 3. Deploy persuasive techniques to help people change their attitudes towards lower castes Involving famous personalities to ask about attitudinal changes regarding caste prejudices Top officials and local leaders can take proactive steps to persuade people to change their attitude(lead by example) Value education and awareness Constructive use of social media More focus on individual identity creation rather than group identity. Caste discrimination faced by lower castes in Indian society is beyond reasoning and should be dealt with proper attention to eradicate caste prejudice. b) Approach Briefly explain Swachh Bharat Abhiyan Enlist the ways through whichpeople’s cooperation towards Swachh Bharat can be ensured. Answer Swachh Bharat Abhiyan or Swachh Bharat Mission is a nation-wide campaign in India for the period 2014 to 2019 that aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India"s cities, towns, and rural areas.Swachh Bharat Mission was launched throughout the length and breadth of the country as a national movement. The campaign aims to achieve the vision of a ‘Clean India’ by 2nd October 2019. Ways through whichpeople’s cooperation towards Swachh Bharat can be ensured By overcoming semantic barriers Use of symbols which are receiver friendly. No discrepancy between the verbal and non-verbal aspect of the message. By making communication idea-centric rather than word-centric. Use of illustrations and relevant examples to support the message. (Students are encouraged to come up with innovative ideas to achieve the above) By overcoming Psychological Barriers To remove the barrier, a climate of trust and understanding needs to be established. By overcoming Physical Barriers It can be overcome by redesigning the physical environment. By Use of Social Power Reward Power - Rewarding people who confirm on their own to make an example Coercive Power – Use of force of law/rules and regulations Legitimate Power – Using people who enjoy legitimacy e.g. Government officials, Panchayat members, teachers etc. Expert Power – Bringing in experts to help explain the pros and cons of various practices. Conformity pressure – creating social pressure in various ways… Social boycott, shaming etc Liking –creating liking about the idea, by use of celebrities or people who are revered. Commitment and consistency – Creating commitment among people eg by making them take the pledge, mass oath, religious oath etc Reciprocity – by providing money to construct Toilets (eg government grants) Above are just a few examples of what can be done. Students may come up with various different ideas which should be appreciated and evaluated by the checker.
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When we review our past we find that there is higher scientific ferment in ancient times than medieval times. What are the reasons for the decline of Science & Technology in medieval times? Cite a few examples from medieval times to illustrate S&T developments and compare it with modern times. (150 Words/10 Marks)
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APPROACH • Introduce the answer by mentioning important developments in ancient India • State the reasons for S&T development in Ancient times • Highlight the reasons for the decline of S&T in Medieval times • Illustrate S&T developments through examples and compare them with modern times Ans: Ancient India was a land of sages and seers as well as a land of scholars and scientists. India was actively contributing to the field of science and technology centuries long before modern laboratories were set up. Many theories and techniques discovered by the ancient Indians have created and strengthened the fundamentals of modern science and technology like the invention of Zero, decimal system, numeral notations in the field of maths, the theory of the atom, solar and lunar eclipse, heliocentric theory in the field of physics and astronomy. We had remarkable feats in metallurgy like India was the first to smelt zinc by the distillation process, Wootz steel was known to ancient Indians. Sushruta was known for his surgeries like cataract surgery and plastic surgery way back in 6th century BCE. Reasons for S&T development in Ancient times • Open Society: People in ancient times were open to new ideas, secular in their approach and less conservative. Also, the trade was not much developed, so people had time to ponder over things like nature, human body, etc. This kind of open society led to inquisitiveness. • Patronage by Rulers: Scientists like Aryabhatt, Varahamihir was supported by contemporary rulers. Charak was a physician in Kanishka’s court. Hence support from rulers led to more development. • Exchange of Ideas: Between different societies and civilizations. Eg Arab Numerals was developed by Indian mathematicians around AD 500. From India, the system was adopted by Arabic mathematicians in Baghdad and passed on to the Arabs farther west. Also Varahamihir, the ancient, mathematician, and astronomer were aware of western astronomy. • Presence of big learning centres like universities of Vikramshila, Nalanda, Taxila etc. Cultural practices of debate and discussions, as cited by Amartya sen in his The Argumentative Indian, encouraged academic tradition and knowledge was valued. New heterodox sects encouraged the development of sciences, for example, Buddhism which believed in the alleviation of sufferings, encouraged the development of medical sciences. for decline of S&T in Medival Times • Continuous wars, annexations and foreign Invasions kept the society unstable. Survival was the priority. • Religion dominated the life of people. Eg the Bhakti and Sufi movement, people became more conservative and inward-looking. • Orthodoxy was there like Caste and sub-castes were developed, which restricted the entry of people in different professions as they were decided by birth. • Patronage was given by rulers to promote art and architecture but not too scientific developments. Also, the existing learning centres were destroyed and along with those books on science and technology were also destroyed. However, it cannot be said the medieval times was totally devoid of scientific achievements. Developments of S&T in Medival Times 1. Astronomical developments in the form of Jantar Mantar at various places in India. Also in 1500, Nilakantha Somayaji of the Kerala school of astronomy and mathematics, in his Tantrasangraha, revised Aryabhata"s elliptical model for the planets Mercury and Venus. His equation of the centre for these planets remained the most accurate until the time of Johannes Kepler in the 17th century. 2. Due to continuous warfare, developing artillery and cavalry was the need of time. One of the reasons for Babur success was the use of gun powder. 3. Geometrical advancement can be seen in the form of architectural developments which reached its peak during Shah Jahan’s reign. 4. The first seamless celestial globe was made in Kashmir by Ali Kashmiri ibn Luqman in the reign of the Emperor Akbar 5. Unani system of medicine brought by Muslim invaders was highly developed during that time 6. During medieval times, the diffusion of Indian and Persian irrigation technologies gave rise to an advanced irrigation system which bought about economic growth and also helped in the growth of the material culture. Comparison with Modern Times: 1. Due to the threat from Britishers, Hyder Ali, in Mysore, developed war rockets with an important change: the use of metal cylinders to contain the combustion powder. Tipu Sultan continued to develop and expand the use of rocket weapons, reportedly increasing the number of rocket troops from 1,200 to a corps of 5,000. In battles at Seringapatam in 1792 and 1799, these rockets were used with considerable effect against the British. 2. French astronomer, Pierre Janssen observed the Solar eclipse and discovered helium, from Guntur in Madras State, British India. 3. The vaidyas and the hakims from the ayurvedic and Unani systems of medicine complemented and borrowed from each other. The practitioners of these systems collaborated and learned from each other, and there is hardly any account of animosity between them. However, the interaction between the practitioners of indigenous and Western medicine was not smooth. Portuguese were the first to introduce western medicine in India. 4. In 1600, the medical officers who arrived along with the East India Company"s the first fleet of ships also brought Western medicine in India. In 1775, hospital boards which comprised the Surgeon General and Physician General were formed. 5. Though forts were also built in modern times, necessity was felt for creating the infrastructure for the use of public like roads, water tanks, railways, etc., for this a separate department was established in the form of PWD. Thus, it can be said that in scientific development never stopped totally in any era, however, its growth and nature changed according to the socio-economic need of the society.
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##Question:When we review our past we find that there is higher scientific ferment in ancient times than medieval times. What are the reasons for the decline of Science & Technology in medieval times? Cite a few examples from medieval times to illustrate S&T developments and compare it with modern times. (150 Words/10 Marks)##Answer:APPROACH • Introduce the answer by mentioning important developments in ancient India • State the reasons for S&T development in Ancient times • Highlight the reasons for the decline of S&T in Medieval times • Illustrate S&T developments through examples and compare them with modern times Ans: Ancient India was a land of sages and seers as well as a land of scholars and scientists. India was actively contributing to the field of science and technology centuries long before modern laboratories were set up. Many theories and techniques discovered by the ancient Indians have created and strengthened the fundamentals of modern science and technology like the invention of Zero, decimal system, numeral notations in the field of maths, the theory of the atom, solar and lunar eclipse, heliocentric theory in the field of physics and astronomy. We had remarkable feats in metallurgy like India was the first to smelt zinc by the distillation process, Wootz steel was known to ancient Indians. Sushruta was known for his surgeries like cataract surgery and plastic surgery way back in 6th century BCE. Reasons for S&T development in Ancient times • Open Society: People in ancient times were open to new ideas, secular in their approach and less conservative. Also, the trade was not much developed, so people had time to ponder over things like nature, human body, etc. This kind of open society led to inquisitiveness. • Patronage by Rulers: Scientists like Aryabhatt, Varahamihir was supported by contemporary rulers. Charak was a physician in Kanishka’s court. Hence support from rulers led to more development. • Exchange of Ideas: Between different societies and civilizations. Eg Arab Numerals was developed by Indian mathematicians around AD 500. From India, the system was adopted by Arabic mathematicians in Baghdad and passed on to the Arabs farther west. Also Varahamihir, the ancient, mathematician, and astronomer were aware of western astronomy. • Presence of big learning centres like universities of Vikramshila, Nalanda, Taxila etc. Cultural practices of debate and discussions, as cited by Amartya sen in his The Argumentative Indian, encouraged academic tradition and knowledge was valued. New heterodox sects encouraged the development of sciences, for example, Buddhism which believed in the alleviation of sufferings, encouraged the development of medical sciences. for decline of S&T in Medival Times • Continuous wars, annexations and foreign Invasions kept the society unstable. Survival was the priority. • Religion dominated the life of people. Eg the Bhakti and Sufi movement, people became more conservative and inward-looking. • Orthodoxy was there like Caste and sub-castes were developed, which restricted the entry of people in different professions as they were decided by birth. • Patronage was given by rulers to promote art and architecture but not too scientific developments. Also, the existing learning centres were destroyed and along with those books on science and technology were also destroyed. However, it cannot be said the medieval times was totally devoid of scientific achievements. Developments of S&T in Medival Times 1. Astronomical developments in the form of Jantar Mantar at various places in India. Also in 1500, Nilakantha Somayaji of the Kerala school of astronomy and mathematics, in his Tantrasangraha, revised Aryabhata"s elliptical model for the planets Mercury and Venus. His equation of the centre for these planets remained the most accurate until the time of Johannes Kepler in the 17th century. 2. Due to continuous warfare, developing artillery and cavalry was the need of time. One of the reasons for Babur success was the use of gun powder. 3. Geometrical advancement can be seen in the form of architectural developments which reached its peak during Shah Jahan’s reign. 4. The first seamless celestial globe was made in Kashmir by Ali Kashmiri ibn Luqman in the reign of the Emperor Akbar 5. Unani system of medicine brought by Muslim invaders was highly developed during that time 6. During medieval times, the diffusion of Indian and Persian irrigation technologies gave rise to an advanced irrigation system which bought about economic growth and also helped in the growth of the material culture. Comparison with Modern Times: 1. Due to the threat from Britishers, Hyder Ali, in Mysore, developed war rockets with an important change: the use of metal cylinders to contain the combustion powder. Tipu Sultan continued to develop and expand the use of rocket weapons, reportedly increasing the number of rocket troops from 1,200 to a corps of 5,000. In battles at Seringapatam in 1792 and 1799, these rockets were used with considerable effect against the British. 2. French astronomer, Pierre Janssen observed the Solar eclipse and discovered helium, from Guntur in Madras State, British India. 3. The vaidyas and the hakims from the ayurvedic and Unani systems of medicine complemented and borrowed from each other. The practitioners of these systems collaborated and learned from each other, and there is hardly any account of animosity between them. However, the interaction between the practitioners of indigenous and Western medicine was not smooth. Portuguese were the first to introduce western medicine in India. 4. In 1600, the medical officers who arrived along with the East India Company"s the first fleet of ships also brought Western medicine in India. In 1775, hospital boards which comprised the Surgeon General and Physician General were formed. 5. Though forts were also built in modern times, necessity was felt for creating the infrastructure for the use of public like roads, water tanks, railways, etc., for this a separate department was established in the form of PWD. Thus, it can be said that in scientific development never stopped totally in any era, however, its growth and nature changed according to the socio-economic need of the society.
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प्रवासन की अवधारणा स्पष्ट कीजिये। इसके प्रमुख कारणों का उल्लेख करते हुए, परिणामों पर विस्तार से चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of migration. While mentioning its main reasons, discuss the results in detail. (150-200 words/10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: प्रवासन की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए प्रवासन का संक्षिप्त परिचय दीजिए और प्रकारों का उल्लेख कीजिये। इसके पश्चात कारणों को लिखिए। प्रवासन के परिणामों को विविध आयामों में बांटकर वर्णन कीजिये। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। जनसंख्या परिवर्तन के कारकों में प्रवासन महत्वपूर्ण घटक है। यह एक भौगोलिक इकाई से दूसरी भौगोलिक इकाई के मध्य स्थानिक गतिशीलता का एक प्रकार है। सामान्य तौर पर इसमें एक पर्याप्त लंबी समयावधि के लिए उद्गम या प्रस्थान स्थल से गंतव्य अथवा आगमन स्थल के रूप में निवास स्थल का परिवर्तन शामिल है। इसके विभिन्न प्रकार हैं: आंतरिक अंतर्प्रवास: किसी विशेष क्षेत्र में बहिर्प्रवास: किसी विशेष क्षेत्र से बाह्य आप्रवास: किसी अन्य देश से देश में उत्प्रवास: देश से बाहर प्रवासन के कारण: आर्थिक एवं जनांकिकीय कारक: इसके अंतर्गत निम्न कृषिगत आय, कृषिगत बेरोजगारी और अल्प रोजगार वे प्रमुख कारक हैं, जो प्रवासियों को अधिक रोजगार अवसरों वाले क्षेत्रों की ओर धकेलते हैं। स्वास्थ्य,शिक्षा आदि आधारभूत सुविधाओं की कमी; प्राकृतिक आपदा आदि वे कारक हैं जो बेहतर अवसरों की तलाश में अपनामूलस्थान छोड़ने के लिए विवश करते हैं। इसे प्रतिकर्ष कारक कहते हैं। अपकर्ष कारक के अंतर्गत बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य आदि लोगों को आकर्षित करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक कारक: पारिवारिक संघर्ष परिवहन, रेडियो, टेलीविज़न, सिनेमा आदि आदि के विकास से जागरूकता। राज्य सरकारों द्वारा नौकरियों के संबंध में भूमिपुत्रों की नीति। जैसे- महाराष्ट्र में शिवसेना का उदय। प्रवासन के परिणाम: प्रवासन के परिणाम स्वरूप उद्गम(जहां से प्रवास किया) तथा गंतव्य( जहां पर प्रवास किया) दोनों स्थानों पर कुछ लाभ एवं समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: आर्थिक परिणाम: प्रवास उत्प्रवासित क्षेत्र को नकारात्मक रूप से जबकि आप्रवासित क्षेत्र को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। क्योंकि दक्ष व्यक्तियों का अपेक्षाकृत अल्प विकसित क्षेत्र से अधिक विकसित क्षेत्र की ओर पलायन होता है। यदि उत्प्रवासित क्षेत्रों में वैकल्पिक अवसरों की कमी है तो समुदाय के अधिक उद्यमी सदस्यों के पलायन के रूप में नहीं देखा जा सकता है। उद्गम क्षेत्र के लिए प्रवासियों द्वारा भेजा गया एक बड़ा लाभ है। जनांकिकीय परिणाम: ग्रामीण क्षेत्र से आयु और कौशल संबंधी चयनात्मक प्रवास ग्रामीण जनांकिकीय संरचना को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। उद्गम और गंतव्य स्थान पर लैंगिक अनुपात में असंतुलन भी होता है। सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिणाम: इसके माध्यम से नई प्रद्योगिकियों, परिवार नियोजन, बालिकाओं की शिक्षा इत्यादि से संबन्धित नए विचारों का नगर से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसार हुआ है। प्रवास विविध संस्कृतियों के लोगों के मध्य अंतःमिश्रण की प्रक्रिया को संभव बनाता है। प्रवासन के कारण पारिवारिक संरचना मे बदलाव दिखाई देता है। पर्यावरणीय परिणाम: नगरिया बस्तियों का अनियोजित विकास और झुग्गी-झोपड़ियों व मलिन बस्तियों का उद्भव हुआ है। शहरों में प्रकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से भूमिगत जल की कमी, ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन की समस्या। राजनीतिक परिणाम: प्रवासन जनता को पर्याप्त आवास, शिक्षा और परिवहन सेवाओं को उपलब्ध कराने की राज्य की क्षमता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है तथा आप्रवासियों के विरुद्ध रोषपूर्ण प्रतिक्रिया की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार प्रवासन जनसंख्या में बदलाव का एक प्रमुख कारक है जिसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक कारण हो सकते है। इसका उद्गम व गंतव्य दोनों स्थानों पर आर्थिक, जननकिकीय, पर्यावरणीय आदि प्रभाव पड़ते हैं जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकते हैं।
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##Question:प्रवासन की अवधारणा स्पष्ट कीजिये। इसके प्रमुख कारणों का उल्लेख करते हुए, परिणामों पर विस्तार से चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of migration. While mentioning its main reasons, discuss the results in detail. (150-200 words/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: प्रवासन की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए प्रवासन का संक्षिप्त परिचय दीजिए और प्रकारों का उल्लेख कीजिये। इसके पश्चात कारणों को लिखिए। प्रवासन के परिणामों को विविध आयामों में बांटकर वर्णन कीजिये। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। जनसंख्या परिवर्तन के कारकों में प्रवासन महत्वपूर्ण घटक है। यह एक भौगोलिक इकाई से दूसरी भौगोलिक इकाई के मध्य स्थानिक गतिशीलता का एक प्रकार है। सामान्य तौर पर इसमें एक पर्याप्त लंबी समयावधि के लिए उद्गम या प्रस्थान स्थल से गंतव्य अथवा आगमन स्थल के रूप में निवास स्थल का परिवर्तन शामिल है। इसके विभिन्न प्रकार हैं: आंतरिक अंतर्प्रवास: किसी विशेष क्षेत्र में बहिर्प्रवास: किसी विशेष क्षेत्र से बाह्य आप्रवास: किसी अन्य देश से देश में उत्प्रवास: देश से बाहर प्रवासन के कारण: आर्थिक एवं जनांकिकीय कारक: इसके अंतर्गत निम्न कृषिगत आय, कृषिगत बेरोजगारी और अल्प रोजगार वे प्रमुख कारक हैं, जो प्रवासियों को अधिक रोजगार अवसरों वाले क्षेत्रों की ओर धकेलते हैं। स्वास्थ्य,शिक्षा आदि आधारभूत सुविधाओं की कमी; प्राकृतिक आपदा आदि वे कारक हैं जो बेहतर अवसरों की तलाश में अपनामूलस्थान छोड़ने के लिए विवश करते हैं। इसे प्रतिकर्ष कारक कहते हैं। अपकर्ष कारक के अंतर्गत बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य आदि लोगों को आकर्षित करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक कारक: पारिवारिक संघर्ष परिवहन, रेडियो, टेलीविज़न, सिनेमा आदि आदि के विकास से जागरूकता। राज्य सरकारों द्वारा नौकरियों के संबंध में भूमिपुत्रों की नीति। जैसे- महाराष्ट्र में शिवसेना का उदय। प्रवासन के परिणाम: प्रवासन के परिणाम स्वरूप उद्गम(जहां से प्रवास किया) तथा गंतव्य( जहां पर प्रवास किया) दोनों स्थानों पर कुछ लाभ एवं समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: आर्थिक परिणाम: प्रवास उत्प्रवासित क्षेत्र को नकारात्मक रूप से जबकि आप्रवासित क्षेत्र को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। क्योंकि दक्ष व्यक्तियों का अपेक्षाकृत अल्प विकसित क्षेत्र से अधिक विकसित क्षेत्र की ओर पलायन होता है। यदि उत्प्रवासित क्षेत्रों में वैकल्पिक अवसरों की कमी है तो समुदाय के अधिक उद्यमी सदस्यों के पलायन के रूप में नहीं देखा जा सकता है। उद्गम क्षेत्र के लिए प्रवासियों द्वारा भेजा गया एक बड़ा लाभ है। जनांकिकीय परिणाम: ग्रामीण क्षेत्र से आयु और कौशल संबंधी चयनात्मक प्रवास ग्रामीण जनांकिकीय संरचना को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। उद्गम और गंतव्य स्थान पर लैंगिक अनुपात में असंतुलन भी होता है। सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिणाम: इसके माध्यम से नई प्रद्योगिकियों, परिवार नियोजन, बालिकाओं की शिक्षा इत्यादि से संबन्धित नए विचारों का नगर से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसार हुआ है। प्रवास विविध संस्कृतियों के लोगों के मध्य अंतःमिश्रण की प्रक्रिया को संभव बनाता है। प्रवासन के कारण पारिवारिक संरचना मे बदलाव दिखाई देता है। पर्यावरणीय परिणाम: नगरिया बस्तियों का अनियोजित विकास और झुग्गी-झोपड़ियों व मलिन बस्तियों का उद्भव हुआ है। शहरों में प्रकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से भूमिगत जल की कमी, ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन की समस्या। राजनीतिक परिणाम: प्रवासन जनता को पर्याप्त आवास, शिक्षा और परिवहन सेवाओं को उपलब्ध कराने की राज्य की क्षमता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है तथा आप्रवासियों के विरुद्ध रोषपूर्ण प्रतिक्रिया की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार प्रवासन जनसंख्या में बदलाव का एक प्रमुख कारक है जिसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक कारण हो सकते है। इसका उद्गम व गंतव्य दोनों स्थानों पर आर्थिक, जननकिकीय, पर्यावरणीय आदि प्रभाव पड़ते हैं जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकते हैं।
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सैन्धव युगीन नगरीकरण को आर्थिक कारकों ने सुनिश्चित किया था| कथन के संदर्भ में हड़प्पा कालीन अर्थव्यवस्था के स्वरुप की चर्चा कीजिए| (200 शब्द )
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अप्रोच :- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता का नगरीकरणको स्पष्ट कीजिये । उत्तर के पहले भाग में आर्थिक प्रगति का स्पष्टीकरण को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में सैन्धव युगीन अर्थव्यवस्था की विशेषताएं एवं स्वरुप को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के अंत में कथन के अनुरूप निष्कर्ष दीजिये । हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में से एक थी |हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण को भारत की प्रथम नगरीय क्रान्ति के रूप में जाना जाता है| हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक प्रगति ने सैन्धव नगरों के विकास को सुनिश्चित किया था| प्रायः ये सभी नगर महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्रों, व्यापार-वाणिज्य के केन्द्रों,औद्योगिक बस्तियों अथवा व्यापारिक मार्गों के साथ विकसित हुए थे | सैन्धव सभ्यता के पुरातत्विक अवशेष सभ्यता की आर्थिक प्रगति की सूचना देते हैं| प्रभावी नगर नियोजन से स्पष्ट होता है की सैन्धव लोग पर्याप्त संसाधन संपन्न थे| भवनों का निर्माण,आवासीय भवनों की सुविधाओं से भी स्पष्ट होता है कि अधिकांश लोगों का जीवन सामान्य रूप से समृद्ध था| इस आर्थिक प्रगति का आधार हड़प्पा सभ्यता की गतिशील अर्थव्यवस्था थी| सैन्धवयुगीन अर्थव्यवस्था के स्वरूप का अनुमान निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है- हड़प्पा सभ्यता में कृषि-पशुपालन के साक्ष्य विभिन्न नगरों से गेहूं,जौ,चावल आदि फसलों का साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, कालीबंगा से वैज्ञानिक आधार पर जुते हुए खेत का प्रमाण मिला है, धौलावीरा से विकसित जल प्रबंधन का साक्ष्य मिलता है| यह प्रबंध सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था| अर्थात पर्याप्त रूप से विकसित कृषि होती थी, कृषि के विकसित प्रारूप से प्राप्त उत्पादन अधिशेष ने ही हड़प्पा सभ्यता के विकास को सुनिश्चित किया था | इसके अतिरिक्त, मुहरों पर पशुओं के अंकन से पशुपालन के संकेत मिलते हैं| शिल्पों का विकास कृषि के उत्पादन अधिशेष ने दैनिक आवश्यकताओं में गुणात्मक परिवर्तन किया, दैनिक आवश्यकताओं के आधार पर ही शिल्पकला का विकास हुआ, कांसे की प्रतिमा, सेलखड़ी की मुहरें,हाथीदांत की वस्तुएं, चाक पर बने हुए मृदभांड तथा सोने और चांदी के आभूषण ये स्पष्ट करते हैं कि शिल्पकारी पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी, कपास उत्पादन एवं कपड़ों का निर्माण भी किये जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | व्यापार-वाणिज्य सैन्धव सभ्यता से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, पश्चिम एशिया क्षेत्र में पाए जाने वाले पत्थर हड़प्पा सभ्यता के नगरों से प्राप्त हुए हैं जो सैन्धव वासियों के बाह्य संपर्क की सूचना देते हैं, मेसोपोटामिया, मिस्र एवं फारस की खाड़ी के साथ सैन्धववासियों के सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध थे, खेतड़ी से विभिन्न नगरों को तांबे के निर्यात के साक्ष्य मिले हैं, लोथल से मिटटी की नाव एवं गोदीबाड़ा, सुत्कांगेंडोर, लोथल आदितटीय नगरों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि स्थल के अतिरिक्त जल मार्ग का प्रयोग का प्रयोग भी होता था, हड़प्पा सभ्यता से सिक्कों के साक्ष्य नहीं मिलते संभवतः यहाँ वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी| उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है की हड़प्पा सभ्यता कृषि से प्राप्त अधिशेष उत्पादन तथा विकसित व्यापार वाणिज्य के आधार पर विकसित अर्थव्यवस्था थी| इसके आधार पर ही हड़प्पा सभ्यता भारत के प्रथम नगरीकरण के रूप में स्थापित हो पायी थी |
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##Question:सैन्धव युगीन नगरीकरण को आर्थिक कारकों ने सुनिश्चित किया था| कथन के संदर्भ में हड़प्पा कालीन अर्थव्यवस्था के स्वरुप की चर्चा कीजिए| (200 शब्द )##Answer:अप्रोच :- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता का नगरीकरणको स्पष्ट कीजिये । उत्तर के पहले भाग में आर्थिक प्रगति का स्पष्टीकरण को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में सैन्धव युगीन अर्थव्यवस्था की विशेषताएं एवं स्वरुप को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के अंत में कथन के अनुरूप निष्कर्ष दीजिये । हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में से एक थी |हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण को भारत की प्रथम नगरीय क्रान्ति के रूप में जाना जाता है| हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक प्रगति ने सैन्धव नगरों के विकास को सुनिश्चित किया था| प्रायः ये सभी नगर महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्रों, व्यापार-वाणिज्य के केन्द्रों,औद्योगिक बस्तियों अथवा व्यापारिक मार्गों के साथ विकसित हुए थे | सैन्धव सभ्यता के पुरातत्विक अवशेष सभ्यता की आर्थिक प्रगति की सूचना देते हैं| प्रभावी नगर नियोजन से स्पष्ट होता है की सैन्धव लोग पर्याप्त संसाधन संपन्न थे| भवनों का निर्माण,आवासीय भवनों की सुविधाओं से भी स्पष्ट होता है कि अधिकांश लोगों का जीवन सामान्य रूप से समृद्ध था| इस आर्थिक प्रगति का आधार हड़प्पा सभ्यता की गतिशील अर्थव्यवस्था थी| सैन्धवयुगीन अर्थव्यवस्था के स्वरूप का अनुमान निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है- हड़प्पा सभ्यता में कृषि-पशुपालन के साक्ष्य विभिन्न नगरों से गेहूं,जौ,चावल आदि फसलों का साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, कालीबंगा से वैज्ञानिक आधार पर जुते हुए खेत का प्रमाण मिला है, धौलावीरा से विकसित जल प्रबंधन का साक्ष्य मिलता है| यह प्रबंध सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था| अर्थात पर्याप्त रूप से विकसित कृषि होती थी, कृषि के विकसित प्रारूप से प्राप्त उत्पादन अधिशेष ने ही हड़प्पा सभ्यता के विकास को सुनिश्चित किया था | इसके अतिरिक्त, मुहरों पर पशुओं के अंकन से पशुपालन के संकेत मिलते हैं| शिल्पों का विकास कृषि के उत्पादन अधिशेष ने दैनिक आवश्यकताओं में गुणात्मक परिवर्तन किया, दैनिक आवश्यकताओं के आधार पर ही शिल्पकला का विकास हुआ, कांसे की प्रतिमा, सेलखड़ी की मुहरें,हाथीदांत की वस्तुएं, चाक पर बने हुए मृदभांड तथा सोने और चांदी के आभूषण ये स्पष्ट करते हैं कि शिल्पकारी पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी, कपास उत्पादन एवं कपड़ों का निर्माण भी किये जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | व्यापार-वाणिज्य सैन्धव सभ्यता से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, पश्चिम एशिया क्षेत्र में पाए जाने वाले पत्थर हड़प्पा सभ्यता के नगरों से प्राप्त हुए हैं जो सैन्धव वासियों के बाह्य संपर्क की सूचना देते हैं, मेसोपोटामिया, मिस्र एवं फारस की खाड़ी के साथ सैन्धववासियों के सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध थे, खेतड़ी से विभिन्न नगरों को तांबे के निर्यात के साक्ष्य मिले हैं, लोथल से मिटटी की नाव एवं गोदीबाड़ा, सुत्कांगेंडोर, लोथल आदितटीय नगरों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि स्थल के अतिरिक्त जल मार्ग का प्रयोग का प्रयोग भी होता था, हड़प्पा सभ्यता से सिक्कों के साक्ष्य नहीं मिलते संभवतः यहाँ वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी| उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है की हड़प्पा सभ्यता कृषि से प्राप्त अधिशेष उत्पादन तथा विकसित व्यापार वाणिज्य के आधार पर विकसित अर्थव्यवस्था थी| इसके आधार पर ही हड़प्पा सभ्यता भारत के प्रथम नगरीकरण के रूप में स्थापित हो पायी थी |
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पूर्ववर्ती कालों की अपेक्षा मौर्योत्तर काल का इतिहास जटिल प्रतीत होता है इस संदर्भ में मौर्योत्तर कालीन अर्थव्यवस्था और समाज की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द)
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Question: पूर्ववर्ती कालों की अपेक्षा मौर्योत्तर काल का इतिहास जटिल प्रतीत होता है इस संदर्भ में मौर्योत्तर कालीन अर्थव्यवस्था और समाज की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Explanation: दृष्टिकोण भूमिका में मौर्योत्तर काल का स्पष्टीकरण कीजिये प्रथम भाग में अर्थव्यवस्था की विशेषताएं बताइये दूसरे भाग में समाज की विशेषताएं स्पष्ट कीजिये अंतिम में जटिलता के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| मौर्य साम्राज्य के अवसान के बाद सम्पूर्ण भारत में अनेक राज्यों का उदय हुआ| मौर्योत्तर काल में अधिकतर छोटे-छोटे राज्य थे। मौर्योत्तर युग में भारत में अनेक देशी-विदेशी राज्यों की स्थापना हुई| मौर्य साम्राज्य के अवशेषों पर शुंगों ने शासन किया उनके बाद कणव वंश का शासन स्थापित हुआ| इसी समय मिनांडर जैसे इंडो-ग्रीक, रुद्रदामां जैसे शक आदि प्रसिद्ध विदेशी शासक हुए| कुषाणों और सातवाहनों के अतिरक्त मौर्योत्तर काल में आभीर, वाकाटक एवं सुदूर दक्षिण में चेर, चोल एवं पांड्य राज्य स्थापित हुए |उत्तर में कुषाणों एवं दक्षिण में सातवाहनों ने काफी विस्तृत प्रदेशों पर राज किया किन्तु न तो सातवाहन और न तो कुषाणों के राजनीतिक संगठन में वह केन्द्रीयकरण था जो मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषता थी।सातवाहन शासकों के कई अधीनस्थ शासक थे, जैसे-इक्ष्वाकु आदि, जिन्होंने सातवाहन शासकों के पतन होने पर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिये।विदेशी जातियों के आगमन, कुषाणों द्वारा मध्य एशिया तक विस्तृत राज्य की स्थापना, व्यापार के अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण से इस काल के समाज और अर्थव्यवस्था में जटिलता दिखती है| इसे तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था की विशेषताओं के माध्यम से समझ सकते हैं| मौर्योत्तर कालीन अर्थव्यवस्था की विशेषताएं मौर्ययुगीन प्रशासनिक केन्द्रीकरण अब समाप्त हो चुका था और छोटे-छोटे राज्यों का उदय हो गया था इन राज्यों के पास मौर्यों की तरह विशाल अधिकारी वर्ग नहीं था। प्रायः ये राज्य आपस में संघर्षरत थे| इन परिवर्तनों के बावजूद भी मौर्योत्तर काल नगरीकरण के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। इस काल में बड़ी संख्या में नगरों का उदय हुआ जिसकी बुनियाद बौद्ध युग में पड़ गयी थी।साहित्यिक स्रोतों से इस समय 40 बड़े नगरों की सूचना मिलती है| इस काल में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि इस समय आर्थिक गतिविधियों में राजकीय हस्तक्षेप कम हो गया। मौर्यों की तरह कृषि इस काल में राजकीय उद्यम नहीं रहा लेकिन भूमि पर राजकीय स्वामित्व की अवधारणा अब भी मौजूद थी। रूद्रदामां के जूनागढ़ अभिलेख से राज्य के द्वारा सिंचाई का समुचित प्रबंध करने के भी प्रमाण मिलते हैं| कुषाण एवं सातवाहन शासकों ने भी सिंचाई के लिए तालाबों का निर्माण करवाया था। कुषाणों के समय भू-राजस्व के स्थायी दान (अक्षयनीवि) की परम्परा की शुरूआत हुई जो गुप्तकाल में जाकर और विस्तृत हुई। राजा के द्वारा भूमि दान दिये जाने का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य सातवाहन काल में दिखायी पड़ता है लेकिन भूमिदान के बावजूद राज्य सामान्यतः राजस्व पर से अपना दावा नहीं छोड़ता था। इस समय कृषि का विकास हुआ जिससे उत्पन्न उत्पादन अधिशेष ने शेष आर्थिक गतिविधियों को आधार प्रदान किया| प्राचीन भारतीय इतिहास में शिल्पों का सर्वाधिक विकास मौर्योत्तर काल में हुआ। यह काल भारतीय इतिहास में शिल्पों में विविधता के लिए जाना जाता है। शिल्पों के विकास से व्यापार-वाणिज्य गतिविधियों में तेजी देखने को मिलती है| कुछ नगरों ने औद्योगिक विशिष्टता प्राप्त कर ली| इस समय प्रत्येक व्यावसायिक संघ की अलग-अलग श्रेणी होती थी जिसका प्रधान श्रेष्ठिन कहा जाता था। श्रेणी के कार्यालय को निगम सभा कहते थे। श्रेणियों के अपने व्यापारिक नियम होते थे जिन्हें श्रेणी धर्म कहा जाता था। मानसून के ज्ञान, कुषाणों द्वारा रेशम मार्ग पर नियंत्रण एवं राजनीतिक स्थिरता ने व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहित किया| मध्य एशियाई लोगों के आने से मध्य एशिया और भारत के मध्य व्यापारिक संपर्क स्थापित हुए। इस समय रोम के साथ भारत के बेहतर व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए| ध्यातव्य है कि प्लिनी ने अपने विवरणों में भारत-रोम व्यापार को भारत के पक्ष में बताया है| व्यापार के विकास के साथ ही मुद्रा व्यवस्था के विकास पर प्रकाश पड़ा। उत्तर में हिन्द-यवन शासकों ने सोने के सिक्के चलाए। कुषाण शासकों ने भी बहुत बड़ी मात्रा में सोने के सिक्के चलाये।इसी तरह व्यापारिक मार्गों और व्यापार योग्य बंदरगाहों का बृहत स्तर पर विकास देखने को मिलता है| मौर्योत्तर युगीन समाज की विशेषताएं मौर्योत्तर काल में वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा, दास प्रथा, छुआ-छूत की उपस्थिति और महिलाओं की निम्न दशा की जानकारी मिलती है| सातवाहन शासकों के नाम में माता का नाम जुड़े होने के कारण उच्च वर्गीय महिलाओं की बेहतर स्थिति का भी आभास मिलता है| विदेशी जातियों के आगमन से समाज में तनाव उपस्थित था| इस काल के समाज की प्रमुख विशेषता शकों तथा यवनों का भारतीय संस्कृति में समाहित होना था क्योंकि अनेक शकों के नाम भारतीय नामों की तरह थे, जैसे धर्मदेव, ऋषभदत्त, अग्निवर्मन आदि। इस तरह व्यवस्थाकारों द्वारा विदेशियों को अधम क्षत्रिय/द्वितीय श्रेणी का क्षत्रिय स्वीकार किया गया| सातवाहनकालीन समाज वर्णाश्रम धर्म पर आधारित था। इस काल में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था क्योंकि सातवाहन नरेश स्वयं ब्राह्मण थे| यद्यपि सातवाहन शासकों ने वर्ण संकरता को रोकने का प्रयास किया था किन्तु इस समय अन्तर्जातीय विवाह होते थे। सुदूर दक्षिण में वर्ण व्यवस्था पूर्णतः स्थापित नहीं हुई थी, हालांकि समाज में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च थी| धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो एक तरफ शुंग एवं सातवाहनों द्वारा ब्राहमण धर्म को संरक्षण प्रदान किया वहीँ दूसरी तरफ बौद्ध-जैन धर्मों का प्रसार हुआ| सातवाहन शासक ब्राह्मण होते हुए भी धर्म सहिष्णु थे। उन्होंने अपने शासनकाल में बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया था सातवाहनकालीन दक्कन की सभी गुफायें बौद्ध धर्म से ही सम्बन्धित हैं।इस समय वैदिक एवं बौद्ध धर्म का प्रभावशाली विकास देखने को मिलता है| कनिष्क के संरक्षण में बौद्ध धर्म का बहुत विकास हुआ| पहनावा पारंपरिक था, शकों-कुषाणों के सम्पर्क में उत्तर पश्चिम भारत में कुछ बदलाव दिखाई पड़ते हैं जैसे कुर्ता पाजामा, बड़ा कोट एवं चमड़े के जूते आदि| अंतिम संस्कार के रूप में समाज में दाह संस्कार प्रचलित था, संगम काल में दफनाने की प्रथा भी प्रचलित थी| उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि न केवल समाज के क्षेत्र में बल्कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में मौर्योत्तर युगीन इतिहास की प्रकृति जटिल थी| वर्ण संकर की अवधारणा, सुदूर क्षेत्रों तक व्यापार विस्तार, विदेशियों का आगमन, सुदूर क्षेत्रों तक सम्पर्क, जातीय संरचना में परिवर्तन आदि बिंदु इस काल के इतिहास को जटिलता प्रदान करते हैं|
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##Question:पूर्ववर्ती कालों की अपेक्षा मौर्योत्तर काल का इतिहास जटिल प्रतीत होता है इस संदर्भ में मौर्योत्तर कालीन अर्थव्यवस्था और समाज की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द)##Answer:Question: पूर्ववर्ती कालों की अपेक्षा मौर्योत्तर काल का इतिहास जटिल प्रतीत होता है इस संदर्भ में मौर्योत्तर कालीन अर्थव्यवस्था और समाज की प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Explanation: दृष्टिकोण भूमिका में मौर्योत्तर काल का स्पष्टीकरण कीजिये प्रथम भाग में अर्थव्यवस्था की विशेषताएं बताइये दूसरे भाग में समाज की विशेषताएं स्पष्ट कीजिये अंतिम में जटिलता के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| मौर्य साम्राज्य के अवसान के बाद सम्पूर्ण भारत में अनेक राज्यों का उदय हुआ| मौर्योत्तर काल में अधिकतर छोटे-छोटे राज्य थे। मौर्योत्तर युग में भारत में अनेक देशी-विदेशी राज्यों की स्थापना हुई| मौर्य साम्राज्य के अवशेषों पर शुंगों ने शासन किया उनके बाद कणव वंश का शासन स्थापित हुआ| इसी समय मिनांडर जैसे इंडो-ग्रीक, रुद्रदामां जैसे शक आदि प्रसिद्ध विदेशी शासक हुए| कुषाणों और सातवाहनों के अतिरक्त मौर्योत्तर काल में आभीर, वाकाटक एवं सुदूर दक्षिण में चेर, चोल एवं पांड्य राज्य स्थापित हुए |उत्तर में कुषाणों एवं दक्षिण में सातवाहनों ने काफी विस्तृत प्रदेशों पर राज किया किन्तु न तो सातवाहन और न तो कुषाणों के राजनीतिक संगठन में वह केन्द्रीयकरण था जो मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषता थी।सातवाहन शासकों के कई अधीनस्थ शासक थे, जैसे-इक्ष्वाकु आदि, जिन्होंने सातवाहन शासकों के पतन होने पर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिये।विदेशी जातियों के आगमन, कुषाणों द्वारा मध्य एशिया तक विस्तृत राज्य की स्थापना, व्यापार के अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण से इस काल के समाज और अर्थव्यवस्था में जटिलता दिखती है| इसे तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था की विशेषताओं के माध्यम से समझ सकते हैं| मौर्योत्तर कालीन अर्थव्यवस्था की विशेषताएं मौर्ययुगीन प्रशासनिक केन्द्रीकरण अब समाप्त हो चुका था और छोटे-छोटे राज्यों का उदय हो गया था इन राज्यों के पास मौर्यों की तरह विशाल अधिकारी वर्ग नहीं था। प्रायः ये राज्य आपस में संघर्षरत थे| इन परिवर्तनों के बावजूद भी मौर्योत्तर काल नगरीकरण के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। इस काल में बड़ी संख्या में नगरों का उदय हुआ जिसकी बुनियाद बौद्ध युग में पड़ गयी थी।साहित्यिक स्रोतों से इस समय 40 बड़े नगरों की सूचना मिलती है| इस काल में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि इस समय आर्थिक गतिविधियों में राजकीय हस्तक्षेप कम हो गया। मौर्यों की तरह कृषि इस काल में राजकीय उद्यम नहीं रहा लेकिन भूमि पर राजकीय स्वामित्व की अवधारणा अब भी मौजूद थी। रूद्रदामां के जूनागढ़ अभिलेख से राज्य के द्वारा सिंचाई का समुचित प्रबंध करने के भी प्रमाण मिलते हैं| कुषाण एवं सातवाहन शासकों ने भी सिंचाई के लिए तालाबों का निर्माण करवाया था। कुषाणों के समय भू-राजस्व के स्थायी दान (अक्षयनीवि) की परम्परा की शुरूआत हुई जो गुप्तकाल में जाकर और विस्तृत हुई। राजा के द्वारा भूमि दान दिये जाने का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य सातवाहन काल में दिखायी पड़ता है लेकिन भूमिदान के बावजूद राज्य सामान्यतः राजस्व पर से अपना दावा नहीं छोड़ता था। इस समय कृषि का विकास हुआ जिससे उत्पन्न उत्पादन अधिशेष ने शेष आर्थिक गतिविधियों को आधार प्रदान किया| प्राचीन भारतीय इतिहास में शिल्पों का सर्वाधिक विकास मौर्योत्तर काल में हुआ। यह काल भारतीय इतिहास में शिल्पों में विविधता के लिए जाना जाता है। शिल्पों के विकास से व्यापार-वाणिज्य गतिविधियों में तेजी देखने को मिलती है| कुछ नगरों ने औद्योगिक विशिष्टता प्राप्त कर ली| इस समय प्रत्येक व्यावसायिक संघ की अलग-अलग श्रेणी होती थी जिसका प्रधान श्रेष्ठिन कहा जाता था। श्रेणी के कार्यालय को निगम सभा कहते थे। श्रेणियों के अपने व्यापारिक नियम होते थे जिन्हें श्रेणी धर्म कहा जाता था। मानसून के ज्ञान, कुषाणों द्वारा रेशम मार्ग पर नियंत्रण एवं राजनीतिक स्थिरता ने व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहित किया| मध्य एशियाई लोगों के आने से मध्य एशिया और भारत के मध्य व्यापारिक संपर्क स्थापित हुए। इस समय रोम के साथ भारत के बेहतर व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए| ध्यातव्य है कि प्लिनी ने अपने विवरणों में भारत-रोम व्यापार को भारत के पक्ष में बताया है| व्यापार के विकास के साथ ही मुद्रा व्यवस्था के विकास पर प्रकाश पड़ा। उत्तर में हिन्द-यवन शासकों ने सोने के सिक्के चलाए। कुषाण शासकों ने भी बहुत बड़ी मात्रा में सोने के सिक्के चलाये।इसी तरह व्यापारिक मार्गों और व्यापार योग्य बंदरगाहों का बृहत स्तर पर विकास देखने को मिलता है| मौर्योत्तर युगीन समाज की विशेषताएं मौर्योत्तर काल में वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा, दास प्रथा, छुआ-छूत की उपस्थिति और महिलाओं की निम्न दशा की जानकारी मिलती है| सातवाहन शासकों के नाम में माता का नाम जुड़े होने के कारण उच्च वर्गीय महिलाओं की बेहतर स्थिति का भी आभास मिलता है| विदेशी जातियों के आगमन से समाज में तनाव उपस्थित था| इस काल के समाज की प्रमुख विशेषता शकों तथा यवनों का भारतीय संस्कृति में समाहित होना था क्योंकि अनेक शकों के नाम भारतीय नामों की तरह थे, जैसे धर्मदेव, ऋषभदत्त, अग्निवर्मन आदि। इस तरह व्यवस्थाकारों द्वारा विदेशियों को अधम क्षत्रिय/द्वितीय श्रेणी का क्षत्रिय स्वीकार किया गया| सातवाहनकालीन समाज वर्णाश्रम धर्म पर आधारित था। इस काल में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था क्योंकि सातवाहन नरेश स्वयं ब्राह्मण थे| यद्यपि सातवाहन शासकों ने वर्ण संकरता को रोकने का प्रयास किया था किन्तु इस समय अन्तर्जातीय विवाह होते थे। सुदूर दक्षिण में वर्ण व्यवस्था पूर्णतः स्थापित नहीं हुई थी, हालांकि समाज में ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च थी| धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो एक तरफ शुंग एवं सातवाहनों द्वारा ब्राहमण धर्म को संरक्षण प्रदान किया वहीँ दूसरी तरफ बौद्ध-जैन धर्मों का प्रसार हुआ| सातवाहन शासक ब्राह्मण होते हुए भी धर्म सहिष्णु थे। उन्होंने अपने शासनकाल में बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया था सातवाहनकालीन दक्कन की सभी गुफायें बौद्ध धर्म से ही सम्बन्धित हैं।इस समय वैदिक एवं बौद्ध धर्म का प्रभावशाली विकास देखने को मिलता है| कनिष्क के संरक्षण में बौद्ध धर्म का बहुत विकास हुआ| पहनावा पारंपरिक था, शकों-कुषाणों के सम्पर्क में उत्तर पश्चिम भारत में कुछ बदलाव दिखाई पड़ते हैं जैसे कुर्ता पाजामा, बड़ा कोट एवं चमड़े के जूते आदि| अंतिम संस्कार के रूप में समाज में दाह संस्कार प्रचलित था, संगम काल में दफनाने की प्रथा भी प्रचलित थी| उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि न केवल समाज के क्षेत्र में बल्कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में मौर्योत्तर युगीन इतिहास की प्रकृति जटिल थी| वर्ण संकर की अवधारणा, सुदूर क्षेत्रों तक व्यापार विस्तार, विदेशियों का आगमन, सुदूर क्षेत्रों तक सम्पर्क, जातीय संरचना में परिवर्तन आदि बिंदु इस काल के इतिहास को जटिलता प्रदान करते हैं|
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दस्तक के अधिकार से आप क्या समझते हैं । इसकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए मुगल राजस्व व्यवस्था को कमजोर करने मे इसकी भूमिका की चर्चा कीजिये । (200 शब्द )
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दृष्टिकोण : दस्तक के अधिकार का परिचय दीजिये । प्रथम भाग मे दस्तक की विशेषताओं की चर्चा कीजिये । दूसरे भाग मे मुगल राजस्व व्यवस्था को कमजोर करने मे इसकी भूमिका की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष मे समग्रता मे दस्तक के प्रभावों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर: दस्तक मुग़ल सम्राटद्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी कोस्वीकृत किया गया व्यापार परमिट था। 1717 मे फर्रूखशियर के फरमान के नियमो व शर्तों के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी सामान्य सीमा शुल्क का भुगतान किये बिना बंगाल मे व्यापार करने की हकदार थी। शाही फरमानसे प्राप्त अधिकार के आधार पर कंपनी बंगाल के प्रांत के भीतर सीमा शुल्क मुक्त व्यापार करने के लिए अपने एजेंटों को अधिकृत करने के लिए दस्तक जारी करती थी। दस्तक के अधिकार की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं - दस्तक द्वारा कवर मुक्त व्यापार का यह अधिकार केवल कंपनी तक ही सीमित था। यह अधिकार, कंपनी के निजी व्यापारियों द्वारा प्रयोग नहीं किया जाना था। इसके द्वारा कंपनी को बंगाल, बंबई और मद्रास में सीमा शुल्क से मुक्त व्यापार करने की अनुमति थी। कंपनी को कर का भुगतान किए बिना बंगाल में अपने माल का निर्यात करने और आयात करने की स्वतंत्रता दी। दस्तक के प्रयोग से अधिक उसका दुरुपयोग देखा गया । राजस्व व्यवस्था पर इसके द्वारा पड़े प्रभाव निम्नलिखित हैं - व्यवहार में कंपनी के निजी व्यापारियों ने आम तौर पर सरकार के चौकियों को दस्तक का उत्पादन करके मुक्त व्यापार अधिकार का दुरुपयोग किया। कंपनी ने न केवल यूरोपीय निजी व्यापारियों को बल्कि देशी व्यापारियों को भी उच्च मूल्य पर दस्तक बेचे।जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही थी। देशी व्यापारी, कंपनी और निजी व्यापारियों के साथ असमान प्रतिस्पर्धा के कारण अपना व्यवसाय खो रहे थे। दस्तक का दुरुपयोग, वास्तव में, नवाब और कंपनी के बीच संघर्ष के प्रमुख मुद्दों में से एक था। सिराजुद्दौला के शासन के दौरान यह समस्या एक संकट में बदल गई। दस्तक के दुरुपयोग के खिलाफ उनकी नीति कंपनी के साथ उनके संघर्ष के महत्वपूर्ण कारणों में से एक थी। दुर्व्यवहार के संबंध में व्यवहार करने के लिए कंपनी को मनाने में असमर्थ होने के कारण, स्थानीय व्यापारियों को बर्बाद होने से बचाने के लिए नवाब मीर क़ासिम ने सभी के लिए पूरी चुंगी माफ कर दिया। नवाब के इस निर्णय के कारण बक्सर युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।अन्त में गवर्नर-जनरल लार्ड कार्नवालिस के काल में यह बुराई पूरी तरह से समाप्त हो सकी।
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##Question:दस्तक के अधिकार से आप क्या समझते हैं । इसकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए मुगल राजस्व व्यवस्था को कमजोर करने मे इसकी भूमिका की चर्चा कीजिये । (200 शब्द )##Answer:दृष्टिकोण : दस्तक के अधिकार का परिचय दीजिये । प्रथम भाग मे दस्तक की विशेषताओं की चर्चा कीजिये । दूसरे भाग मे मुगल राजस्व व्यवस्था को कमजोर करने मे इसकी भूमिका की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष मे समग्रता मे दस्तक के प्रभावों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर: दस्तक मुग़ल सम्राटद्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी कोस्वीकृत किया गया व्यापार परमिट था। 1717 मे फर्रूखशियर के फरमान के नियमो व शर्तों के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी सामान्य सीमा शुल्क का भुगतान किये बिना बंगाल मे व्यापार करने की हकदार थी। शाही फरमानसे प्राप्त अधिकार के आधार पर कंपनी बंगाल के प्रांत के भीतर सीमा शुल्क मुक्त व्यापार करने के लिए अपने एजेंटों को अधिकृत करने के लिए दस्तक जारी करती थी। दस्तक के अधिकार की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं - दस्तक द्वारा कवर मुक्त व्यापार का यह अधिकार केवल कंपनी तक ही सीमित था। यह अधिकार, कंपनी के निजी व्यापारियों द्वारा प्रयोग नहीं किया जाना था। इसके द्वारा कंपनी को बंगाल, बंबई और मद्रास में सीमा शुल्क से मुक्त व्यापार करने की अनुमति थी। कंपनी को कर का भुगतान किए बिना बंगाल में अपने माल का निर्यात करने और आयात करने की स्वतंत्रता दी। दस्तक के प्रयोग से अधिक उसका दुरुपयोग देखा गया । राजस्व व्यवस्था पर इसके द्वारा पड़े प्रभाव निम्नलिखित हैं - व्यवहार में कंपनी के निजी व्यापारियों ने आम तौर पर सरकार के चौकियों को दस्तक का उत्पादन करके मुक्त व्यापार अधिकार का दुरुपयोग किया। कंपनी ने न केवल यूरोपीय निजी व्यापारियों को बल्कि देशी व्यापारियों को भी उच्च मूल्य पर दस्तक बेचे।जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही थी। देशी व्यापारी, कंपनी और निजी व्यापारियों के साथ असमान प्रतिस्पर्धा के कारण अपना व्यवसाय खो रहे थे। दस्तक का दुरुपयोग, वास्तव में, नवाब और कंपनी के बीच संघर्ष के प्रमुख मुद्दों में से एक था। सिराजुद्दौला के शासन के दौरान यह समस्या एक संकट में बदल गई। दस्तक के दुरुपयोग के खिलाफ उनकी नीति कंपनी के साथ उनके संघर्ष के महत्वपूर्ण कारणों में से एक थी। दुर्व्यवहार के संबंध में व्यवहार करने के लिए कंपनी को मनाने में असमर्थ होने के कारण, स्थानीय व्यापारियों को बर्बाद होने से बचाने के लिए नवाब मीर क़ासिम ने सभी के लिए पूरी चुंगी माफ कर दिया। नवाब के इस निर्णय के कारण बक्सर युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।अन्त में गवर्नर-जनरल लार्ड कार्नवालिस के काल में यह बुराई पूरी तरह से समाप्त हो सकी।
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In the context of diversity of India, can it be said that the regions form cultural units rather than the States? Give reasons with examples for your viewpoint. (150 words)
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APPROACH - In introduction brief explanation of religion and culture - Explanation about intra-state and supra-state regionalism with examples - Brief conclusion ANSWER A region is a homogeneous area which is culturally distinct from others and the region is independent of the state.For example within State, there can be multiple regions, and certainly, there can be a certain region which might extend to two and more states, for example, north-eastern states. As far as culture is concerned it is the totality of human experience acquired during transmission of heritage from one generation to another and to learn the ways of learning, eating, drinking, behaving, walking, dressing, and working is the culture of man. Intra-state regionalism i.e. different Cultural units in the different region within states One state can have many different regions which are culturally different from other in respect of having a common language, common festival or common religion etc. For example, Holi is celebrated differently in different Northern parts of India, for example, phoolo ki Holi, Lathmar Holi. Another example can be taken as language; in eastern UP, Awadhi and Bhojpuri are spoken while in western part Brij bhasha and Khadi Boli are spoken. In a similar way, in Karnataka state, North Karnataka majorly speaks Kannada while South Karnataka majorly speaks in Tulu language. If we talk about food pattern which is a very important part of a culture, in the eastern part of UP, people use rice as staple food while in western part wheat is used as staple food. Similarly, in north Karnataka, people use Millets as a staple food and in south Karnataka rice as a staple food Another example, culture in the Darjeeling region is different from the culture in the West Bengal region in the form of language. Also implementation of Bengali language raised the Law and Order problem in this region, though Darjeeling is part of West Bengal state. Supra state regionalism i.e. different states and some common culture units Though different states such as UP, Punjab, Gujarat and Tamil Nadu are distinct in culture in the form of food, festival and language, but some states have some commonalities. For example- The celebration of Dushehra and Diwali are common to all northern states and the celebration of Eid and Pongal in Sothern states is in different forms. Also, Bihu is celebrated not only in Assam but different other parts of the North-eastern states. Martial dance form of Punjab, Kerala, Tamil Nadu, West Bengal and Manipur has some commonalities. Thus one can advocate that different regions in the form of cultural units form states and there could be some regions which have some common culture which are discussed above.
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##Question:In the context of diversity of India, can it be said that the regions form cultural units rather than the States? Give reasons with examples for your viewpoint. (150 words)##Answer:APPROACH - In introduction brief explanation of religion and culture - Explanation about intra-state and supra-state regionalism with examples - Brief conclusion ANSWER A region is a homogeneous area which is culturally distinct from others and the region is independent of the state.For example within State, there can be multiple regions, and certainly, there can be a certain region which might extend to two and more states, for example, north-eastern states. As far as culture is concerned it is the totality of human experience acquired during transmission of heritage from one generation to another and to learn the ways of learning, eating, drinking, behaving, walking, dressing, and working is the culture of man. Intra-state regionalism i.e. different Cultural units in the different region within states One state can have many different regions which are culturally different from other in respect of having a common language, common festival or common religion etc. For example, Holi is celebrated differently in different Northern parts of India, for example, phoolo ki Holi, Lathmar Holi. Another example can be taken as language; in eastern UP, Awadhi and Bhojpuri are spoken while in western part Brij bhasha and Khadi Boli are spoken. In a similar way, in Karnataka state, North Karnataka majorly speaks Kannada while South Karnataka majorly speaks in Tulu language. If we talk about food pattern which is a very important part of a culture, in the eastern part of UP, people use rice as staple food while in western part wheat is used as staple food. Similarly, in north Karnataka, people use Millets as a staple food and in south Karnataka rice as a staple food Another example, culture in the Darjeeling region is different from the culture in the West Bengal region in the form of language. Also implementation of Bengali language raised the Law and Order problem in this region, though Darjeeling is part of West Bengal state. Supra state regionalism i.e. different states and some common culture units Though different states such as UP, Punjab, Gujarat and Tamil Nadu are distinct in culture in the form of food, festival and language, but some states have some commonalities. For example- The celebration of Dushehra and Diwali are common to all northern states and the celebration of Eid and Pongal in Sothern states is in different forms. Also, Bihu is celebrated not only in Assam but different other parts of the North-eastern states. Martial dance form of Punjab, Kerala, Tamil Nadu, West Bengal and Manipur has some commonalities. Thus one can advocate that different regions in the form of cultural units form states and there could be some regions which have some common culture which are discussed above.
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उत्तर वैदिक युगीन संस्कृति अनेक अर्थों में ऋग्वैदिक कालीन संस्कृति से भिन्न थी | इस संदर्भ में दोनों कालों की सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिये| (200 शब्द)
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अप्रोच :- भूमिका में वैदिक युग की चर्चा & ऋग्वैदिक तथा उत्तरवैदिक युग का स्पष्टीकरण उत्तर के बॉडी भाग में दोनों कालों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विशेषताएं स्वरुप में परिवर्तन के संदर्भ में निष्कर्ष हड़प्पा सभ्यता के बाद की अवस्था में एक नयी संस्कृति का अविर्भाव हुआ था| चूँकि इस संस्कृति के संदर्भ में समस्त जानकारियाँ वेदों से प्राप्त हुई हैं। अतः इस सभ्यता को वैदिक संस्कृति के नाम से जाना जाता है| वैदिक सभ्यता का अध्ययन दो चरणों में किया जाता है| प्रथम चरण की जानकारी का स्रोत ऋग्वेद है , अतः इसको ऋग्वैदिक काल कहा जाता है| सामान्यतः 1500 से 1000 ईसा पूर्व के मध्य के काल को ऋग्वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है| इसके बाद 1000 से 600 ईसा पूर्व के मध्य के काल को उत्तरवैदिक काल के रूप में जाना जाता है| उत्तरवैदिक काल के बारे में जानकारी के स्रोत ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वैदिक ग्रन्थ हैं| वैदिक काल के उपरोक्त विभाजन का कारण दोनों कालों की स्थितियों में परिवर्तन है| उत्तरवैदिक काल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विशेषताएं ऋग्वैदिक कालीन विशेषताओं से भिन्न थी| दोनों कालों की विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है- ऋग्वैदिक समाज पुरुषसूक्त में वर्णों का उल्लेख मिलता है लेकिन समाज में व्यवसाय आधारित विभाजन नहीं था| समाज में आर्य-अनार्य विभाजन उपस्थित था, यहाँ दास प्रथा की उपस्थिति भी दिखती है किन्तु इन दासों का प्रयोग घरेलू कार्यों में किया जाता था| प्रायः परिवार संयुक्त तथा पित्रसत्तात्मक व्यवस्था से संचालित होते थे| राजनीतिक संस्थाओं यथा सभा-समिति एवं विदाथ में महिलाओं की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है, इसी प्रकार अपाला घोष, लोपामुद्रा आदि विदुषी महिलाओं की उपस्थिति से स्पष्ट होता है की महिलाओं की दशा अपेक्षाकृत बेहतर थी| ऋग्वेद में इंद्र, अग्नि, वरुण, अदिति, अरण्यानी आदि देवी-देवताओं के के नाम मिलते हैं किन्तु मंदिर एवं मूर्तिपूजा के साक्ष्य नहीं मिलते | आराधना का उद्देश्य अधिकतम भौतिक सुखों की प्राप्ति था| उत्तर वैदिक कालीन समाज वर्णव्यवस्था पूर्ण रूप से प्रचलन में आ गयी थी, समाज में चार वर्णों यथा ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की उपस्थिति थी, अर्थात सामजिक भेदभाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी| उत्तर वैदिक काल में ही व्यवसाय आधारित सामजिक विभाजन प्रारम्भ होता है| दास प्रथा अस्तित्व में थी,अब दासों को कृषि कार्यों में लगाया जाने लगा था । उत्तरवैदिक काल से ही लैंगिक भेदभाव प्रारम्भ होता है, सभा में महिला प्रवेश वर्जित कर दिया गया था अनुलोम/प्रतिलोम विवाह,आश्रम व्यवस्था, पुरुषार्थ, संस्कार तथा गोत्रप्रथा का आदि का प्रचलन था| उत्तरवैदिक काल में देवताओं की स्थिति में परिवर्तन आया तथा अब देवियों को कम महत्त्व दिया गया था| यज्ञ और कर्मकांडों को अधिक महत्त्व मिलने लगा| ऋग्वैदिक पशुपालक अर्थव्यवस्था ऋग्वेद में कृषि से सम्बन्धित सम्पूर्ण प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है लेकिन कृषि को कम महत्त्व दिया जाता था| ऋग्वेद में गाय का महत्त्व अधिक दिया गया है इससे इनके पशुपालक होने की सूचना मिलती है| समाज मेंशिल्पों एवं शिल्पकारों की उपस्थिति थी। किन्तु , अभी ये विकास के प्रारम्भिक सोपान पर थे | इस प्रकार यहस्वरूपतः एक निर्वाह अर्थव्यवस्थाथी| सिक्को आदि के प्रचलन का अभाव , जिससे पता चलता है कि व्यापार आदि का विकास नही हुआ था और वस्तु विनिमय की प्रणाली ही विकसित रही होगी । उत्तरवैदिककालीन कृषक अर्थव्यवस्था इस काल में आर्यों दोआब क्षेत्र में प्रसार होने से उपजाऊ भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित हुई| इसी काल में आर्यों को लोहे की जानकारी मिली| आर्यों में लोहे का प्रयोग कृषि कार्यों में किया,जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई| कृषि में अधिशेष उत्पादन ने शिल्पों में के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| उत्तरवैदिक काल में सीमित व्यापार के साक्ष्य मिलने लगते हैं इसे के साथ आद्यनगरों के विकास की सूचना भी मिलती है| ऋग्वैदिक कालीन राजनीति कबीले पर प्रशासन की सर्वोच्च इकाई "जन" थी । राजा को प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए सभा-समिति एवं विदथ नामक संस्थाओं की सूचना मिलती है वंशानुगत राजतंत्र की व्यवस्था प्रचलन में थी| राजा का प्रमुख दायित्व कबीले की सुरक्षा करना था। भाग/बलि आदि के रूप में स्वैक्षिक कर प्रणाली का प्रचलन था| उत्तरवैदिक कालीन राजनीति कृषि निर्भर अर्थव्यवस्था के कारण प्रादेशिक शासन की शुरुआत हो गयी थी । उत्तरवैदिक कालीन साहित्य में कुरु- पांचाल आदि जनपदों तथा जनक, प्रवाहण, जाबालि जैसे कुछ शासकों का उल्लेख मिलता है| अब अधिकारियों की संख्या में वृद्धि हो गयी थी । राजकीय खर्चों की पूर्ति के लिए "बलि" अब एक नियमित उपहार बन गया था , जिसकी वसूली के लिए संग्रहित्री नामक अधिकारी की सूचना मिलती है| राजा की शक्ति में वृद्धि के साथ ही विदथ का महत्त्व कम हो गया था क्योंकि साहित्य में विदथ का उल्लेख कम मिलता है| साथ ही, सभा में महिलाओं के प्रवेश का उल्लेख नही मिलता| इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि उत्तरवैदिक संस्कृति, ऋग्वैदिक संस्कृति से अनेकों अर्थों में भिन्न थी| उत्तरवैदिक कालीन विशेषताएं राज्य समाज एवं अर्थव्यवस्था के परिवर्तित रूप को प्रदर्शित करती हैं|
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##Question:उत्तर वैदिक युगीन संस्कृति अनेक अर्थों में ऋग्वैदिक कालीन संस्कृति से भिन्न थी | इस संदर्भ में दोनों कालों की सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिये| (200 शब्द)##Answer:अप्रोच :- भूमिका में वैदिक युग की चर्चा & ऋग्वैदिक तथा उत्तरवैदिक युग का स्पष्टीकरण उत्तर के बॉडी भाग में दोनों कालों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विशेषताएं स्वरुप में परिवर्तन के संदर्भ में निष्कर्ष हड़प्पा सभ्यता के बाद की अवस्था में एक नयी संस्कृति का अविर्भाव हुआ था| चूँकि इस संस्कृति के संदर्भ में समस्त जानकारियाँ वेदों से प्राप्त हुई हैं। अतः इस सभ्यता को वैदिक संस्कृति के नाम से जाना जाता है| वैदिक सभ्यता का अध्ययन दो चरणों में किया जाता है| प्रथम चरण की जानकारी का स्रोत ऋग्वेद है , अतः इसको ऋग्वैदिक काल कहा जाता है| सामान्यतः 1500 से 1000 ईसा पूर्व के मध्य के काल को ऋग्वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है| इसके बाद 1000 से 600 ईसा पूर्व के मध्य के काल को उत्तरवैदिक काल के रूप में जाना जाता है| उत्तरवैदिक काल के बारे में जानकारी के स्रोत ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वैदिक ग्रन्थ हैं| वैदिक काल के उपरोक्त विभाजन का कारण दोनों कालों की स्थितियों में परिवर्तन है| उत्तरवैदिक काल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विशेषताएं ऋग्वैदिक कालीन विशेषताओं से भिन्न थी| दोनों कालों की विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है- ऋग्वैदिक समाज पुरुषसूक्त में वर्णों का उल्लेख मिलता है लेकिन समाज में व्यवसाय आधारित विभाजन नहीं था| समाज में आर्य-अनार्य विभाजन उपस्थित था, यहाँ दास प्रथा की उपस्थिति भी दिखती है किन्तु इन दासों का प्रयोग घरेलू कार्यों में किया जाता था| प्रायः परिवार संयुक्त तथा पित्रसत्तात्मक व्यवस्था से संचालित होते थे| राजनीतिक संस्थाओं यथा सभा-समिति एवं विदाथ में महिलाओं की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है, इसी प्रकार अपाला घोष, लोपामुद्रा आदि विदुषी महिलाओं की उपस्थिति से स्पष्ट होता है की महिलाओं की दशा अपेक्षाकृत बेहतर थी| ऋग्वेद में इंद्र, अग्नि, वरुण, अदिति, अरण्यानी आदि देवी-देवताओं के के नाम मिलते हैं किन्तु मंदिर एवं मूर्तिपूजा के साक्ष्य नहीं मिलते | आराधना का उद्देश्य अधिकतम भौतिक सुखों की प्राप्ति था| उत्तर वैदिक कालीन समाज वर्णव्यवस्था पूर्ण रूप से प्रचलन में आ गयी थी, समाज में चार वर्णों यथा ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की उपस्थिति थी, अर्थात सामजिक भेदभाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी| उत्तर वैदिक काल में ही व्यवसाय आधारित सामजिक विभाजन प्रारम्भ होता है| दास प्रथा अस्तित्व में थी,अब दासों को कृषि कार्यों में लगाया जाने लगा था । उत्तरवैदिक काल से ही लैंगिक भेदभाव प्रारम्भ होता है, सभा में महिला प्रवेश वर्जित कर दिया गया था अनुलोम/प्रतिलोम विवाह,आश्रम व्यवस्था, पुरुषार्थ, संस्कार तथा गोत्रप्रथा का आदि का प्रचलन था| उत्तरवैदिक काल में देवताओं की स्थिति में परिवर्तन आया तथा अब देवियों को कम महत्त्व दिया गया था| यज्ञ और कर्मकांडों को अधिक महत्त्व मिलने लगा| ऋग्वैदिक पशुपालक अर्थव्यवस्था ऋग्वेद में कृषि से सम्बन्धित सम्पूर्ण प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है लेकिन कृषि को कम महत्त्व दिया जाता था| ऋग्वेद में गाय का महत्त्व अधिक दिया गया है इससे इनके पशुपालक होने की सूचना मिलती है| समाज मेंशिल्पों एवं शिल्पकारों की उपस्थिति थी। किन्तु , अभी ये विकास के प्रारम्भिक सोपान पर थे | इस प्रकार यहस्वरूपतः एक निर्वाह अर्थव्यवस्थाथी| सिक्को आदि के प्रचलन का अभाव , जिससे पता चलता है कि व्यापार आदि का विकास नही हुआ था और वस्तु विनिमय की प्रणाली ही विकसित रही होगी । उत्तरवैदिककालीन कृषक अर्थव्यवस्था इस काल में आर्यों दोआब क्षेत्र में प्रसार होने से उपजाऊ भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित हुई| इसी काल में आर्यों को लोहे की जानकारी मिली| आर्यों में लोहे का प्रयोग कृषि कार्यों में किया,जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई| कृषि में अधिशेष उत्पादन ने शिल्पों में के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| उत्तरवैदिक काल में सीमित व्यापार के साक्ष्य मिलने लगते हैं इसे के साथ आद्यनगरों के विकास की सूचना भी मिलती है| ऋग्वैदिक कालीन राजनीति कबीले पर प्रशासन की सर्वोच्च इकाई "जन" थी । राजा को प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए सभा-समिति एवं विदथ नामक संस्थाओं की सूचना मिलती है वंशानुगत राजतंत्र की व्यवस्था प्रचलन में थी| राजा का प्रमुख दायित्व कबीले की सुरक्षा करना था। भाग/बलि आदि के रूप में स्वैक्षिक कर प्रणाली का प्रचलन था| उत्तरवैदिक कालीन राजनीति कृषि निर्भर अर्थव्यवस्था के कारण प्रादेशिक शासन की शुरुआत हो गयी थी । उत्तरवैदिक कालीन साहित्य में कुरु- पांचाल आदि जनपदों तथा जनक, प्रवाहण, जाबालि जैसे कुछ शासकों का उल्लेख मिलता है| अब अधिकारियों की संख्या में वृद्धि हो गयी थी । राजकीय खर्चों की पूर्ति के लिए "बलि" अब एक नियमित उपहार बन गया था , जिसकी वसूली के लिए संग्रहित्री नामक अधिकारी की सूचना मिलती है| राजा की शक्ति में वृद्धि के साथ ही विदथ का महत्त्व कम हो गया था क्योंकि साहित्य में विदथ का उल्लेख कम मिलता है| साथ ही, सभा में महिलाओं के प्रवेश का उल्लेख नही मिलता| इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि उत्तरवैदिक संस्कृति, ऋग्वैदिक संस्कृति से अनेकों अर्थों में भिन्न थी| उत्तरवैदिक कालीन विशेषताएं राज्य समाज एवं अर्थव्यवस्था के परिवर्तित रूप को प्रदर्शित करती हैं|
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गुप्तकाल को प्राचीन भारत का स्वर्ण काल कहा गया जो तत्कालीन साहित्य और कला के क्षेत्र में हुए विकास से सम्बंधित था| उक्त कथन को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये |(200 शब्द )
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दृष्टिकोण : परिचय में गुप्त काल की स्वर्ण युग की संकलपना की चर्चा कीजिये गुप्तकालीन कला के मुख्य पक्ष- स्थापत्य,मूर्तिकला , चित्रकला आदि इन पक्षों की मुख्य विशेषताएं एवं उनके कुछ मुख्य उदहारण गुप्तकालीन समाज में कला का महत्वपूर्ण भूमिका (अन्य पक्ष में अपेक्षित विकास नहीं) स्वर्ण युग या क्लासिकल ऐज जैसे शब्दों का प्रयोग किसी काल में जीवन के विभिन्न हिस्से में उच्चतर विकास के सन्दर्भ में किया जाता है |इन्हीं अर्थों में विशेषकर सांस्कृतिक अर्थों में गुप्तकाल को कुछ विद्वानों ने स्वर्ण युग की संज्ञा दी है जिसके प्रमाणों को तत्कालीन स्थापत्य ,चित्रकला ,मूर्तिकला के विकास के सन्दर्भ में देख सकते हैं| स्थापत्य स्तूप स्तूप स्थापत्य के साक्ष्य सारनाथ -धमेख स्तूप राजगृह -जरासंध की बैठक पक्के इंटों का प्रयोग चबूतरे पर स्तूपों का निर्माण नहीं गुप्त शासकों के पश्चात स्तूपों के साक्ष्य नहीं मिलते हैं विहार गुफा विहार - उदयगिरी विहार (विदिशा);अजन्ता की पहाड़ियों संरचनात्मक विहार -नालंदा महाविहार -शिक्षा का केंद्र मंदिर स्थापत्य मंदिर की शुरुआत मर्योत्तर काल में हो गयी थी परन्तु गुप्तों का महत्वपूर्ण योगदान शिखर शैली का विकास पूर्व मध्य काल में - नागर (उत्तर भारत ), द्रविड़(कृष्णा नदी के दक्षिण) और वेसर(महाराष्ट्र ,कर्णाटक ) प्रमुख मंदिर तिग्वा- विष्णु मंदिर एरण- विष्णु मंदिर झांसी -दशाअवतार उदयगिरी - वराह नचनाकुठार -पार्वती सिरपुर -लक्ष्मण भूमरा-शिव चित्रकला गुप्तकालीन चित्रकला के साक्ष्य अजंता अवं बाघ की गुफाओं से प्राप्त होते हैं हालाँकि अजंता की पहाड़ियों से प्राप्त चित्रों का सम्बन्ध अलग-अलग कालों से हैं (2 b.c से 7 ad तक) अजंता से चैत्य ,विहार एवं चित्रकला के साक्ष्य मिलते हैं बड़ी संख्या में गुप्तकालीन चित्रों के भी साक्ष्य मिलते हैं जिनके सम्बन्ध बोधिसत्व एवं जातक कथाओं से है मुख्य चित्र,eg.- महाभिनिष्क्रमण ,मरणासन्न राजकुमारी ,माता एवं शिशु का चित्र ,पदम् पानी अवलोकितेश्वर का चित्र,मार विजय मूर्तिकला ब्राह्मण धर्म से सम्बंधित मूर्तियों में वैष्णव एवं शैव परिवारों के साक्ष्य मिलते हैं जैसे-शिव,विष्णु,एनी देवियाँ गुप्तकालीन मूर्तियों में आभा मंडल को महत्त्व दिया गया है हालाँकि गुप्तकालीन कला पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिखता है जिसमे मंदिर वास्तुकला के साथ-साथ बौद्धों के चैत्यों और विहारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही |
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##Question:गुप्तकाल को प्राचीन भारत का स्वर्ण काल कहा गया जो तत्कालीन साहित्य और कला के क्षेत्र में हुए विकास से सम्बंधित था| उक्त कथन को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये |(200 शब्द )##Answer: दृष्टिकोण : परिचय में गुप्त काल की स्वर्ण युग की संकलपना की चर्चा कीजिये गुप्तकालीन कला के मुख्य पक्ष- स्थापत्य,मूर्तिकला , चित्रकला आदि इन पक्षों की मुख्य विशेषताएं एवं उनके कुछ मुख्य उदहारण गुप्तकालीन समाज में कला का महत्वपूर्ण भूमिका (अन्य पक्ष में अपेक्षित विकास नहीं) स्वर्ण युग या क्लासिकल ऐज जैसे शब्दों का प्रयोग किसी काल में जीवन के विभिन्न हिस्से में उच्चतर विकास के सन्दर्भ में किया जाता है |इन्हीं अर्थों में विशेषकर सांस्कृतिक अर्थों में गुप्तकाल को कुछ विद्वानों ने स्वर्ण युग की संज्ञा दी है जिसके प्रमाणों को तत्कालीन स्थापत्य ,चित्रकला ,मूर्तिकला के विकास के सन्दर्भ में देख सकते हैं| स्थापत्य स्तूप स्तूप स्थापत्य के साक्ष्य सारनाथ -धमेख स्तूप राजगृह -जरासंध की बैठक पक्के इंटों का प्रयोग चबूतरे पर स्तूपों का निर्माण नहीं गुप्त शासकों के पश्चात स्तूपों के साक्ष्य नहीं मिलते हैं विहार गुफा विहार - उदयगिरी विहार (विदिशा);अजन्ता की पहाड़ियों संरचनात्मक विहार -नालंदा महाविहार -शिक्षा का केंद्र मंदिर स्थापत्य मंदिर की शुरुआत मर्योत्तर काल में हो गयी थी परन्तु गुप्तों का महत्वपूर्ण योगदान शिखर शैली का विकास पूर्व मध्य काल में - नागर (उत्तर भारत ), द्रविड़(कृष्णा नदी के दक्षिण) और वेसर(महाराष्ट्र ,कर्णाटक ) प्रमुख मंदिर तिग्वा- विष्णु मंदिर एरण- विष्णु मंदिर झांसी -दशाअवतार उदयगिरी - वराह नचनाकुठार -पार्वती सिरपुर -लक्ष्मण भूमरा-शिव चित्रकला गुप्तकालीन चित्रकला के साक्ष्य अजंता अवं बाघ की गुफाओं से प्राप्त होते हैं हालाँकि अजंता की पहाड़ियों से प्राप्त चित्रों का सम्बन्ध अलग-अलग कालों से हैं (2 b.c से 7 ad तक) अजंता से चैत्य ,विहार एवं चित्रकला के साक्ष्य मिलते हैं बड़ी संख्या में गुप्तकालीन चित्रों के भी साक्ष्य मिलते हैं जिनके सम्बन्ध बोधिसत्व एवं जातक कथाओं से है मुख्य चित्र,eg.- महाभिनिष्क्रमण ,मरणासन्न राजकुमारी ,माता एवं शिशु का चित्र ,पदम् पानी अवलोकितेश्वर का चित्र,मार विजय मूर्तिकला ब्राह्मण धर्म से सम्बंधित मूर्तियों में वैष्णव एवं शैव परिवारों के साक्ष्य मिलते हैं जैसे-शिव,विष्णु,एनी देवियाँ गुप्तकालीन मूर्तियों में आभा मंडल को महत्त्व दिया गया है हालाँकि गुप्तकालीन कला पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिखता है जिसमे मंदिर वास्तुकला के साथ-साथ बौद्धों के चैत्यों और विहारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही |
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Unlike Rajya Sabha, Legislative Council is not the second house but a secondary house. In this context discuss the relevance of legislative councils. (150 words)(10 marks)
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Brief Approach Give reasons forthe need of SLC Mention the issues with SLC Comparison of SLC and RS Answer: Most states in India have a unicameral legislature however, few states (6 in number) have opted for a bicamerial legislature. Since its inception, there is a debate on whether SLC should be called Second chamber or Secondary chamber of the house, Following arguments, are given for the reasoning- It is considered as second House of the legislature for the following reasons: one, to act as a check on hasty actions by the popularly elected House and, two, for the accommodation of eminent individuals from different fields of life who are not able to win elections. Thus providing the much-needed diversity to the lawmaking body and government. three , to reduces the burden of the lower house by initiating many legislations in the upper house four ,As a mature and seasoned chamber which is generally away from the political controversies, it provides a platform for healthy and productive discussions on various important issues Issues with State legislative council Rather than fulfilling the objective of getting intellectuals into the legislature, the forum is likely to be used to accommodate party functionaries who fail to get elected. It is also an unnecessary drain on the exchequer. legislatures draw their talent both from the grassroots level and the higher echelons of learning. There are enough numbers of doctors, teachers and other professionals in most political parties today hence argument to elect intellectuals seems a bit flawed. Graduates are no longer a rare breed. Also, with dipping educational standards, graduate degree is no guarantee of any intellectual calibre. If a majority of the members in the upper house belong to the same party which holds the majority in the lower house, the upper house will become a mere ditto chamber. The powers of the Legislative Councils are limited to the extent that they can hardly impose any effective check on the Assemblies. Whether a Bill is liked by the Council or not, it is apt to be passed maximum after four months’ delay if the Assembly so decides. Also, the legislative council does not function as a secondary house as Rajya Sabha because of the following reasons: Power ofSLC with respect to RS is much lower in case of passage and discussion over a bill. SLC can at max delay a bill for 4 months. In the case of Money bill powers are even lower. The budget can only be discussed in SLC but cannot be voted upon. Council does not participate in the election of President, unlike RS. The existenceof SLC itself depends on the Legislative Assembly, Unlike RS which have its independent existence. Way forward- Implementation of the second ARC where it recommended that only local bodies be responsible for the election of SLC members. A regular report on working, productivity and efficiency of SLC.
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##Question:Unlike Rajya Sabha, Legislative Council is not the second house but a secondary house. In this context discuss the relevance of legislative councils. (150 words)(10 marks)##Answer:Brief Approach Give reasons forthe need of SLC Mention the issues with SLC Comparison of SLC and RS Answer: Most states in India have a unicameral legislature however, few states (6 in number) have opted for a bicamerial legislature. Since its inception, there is a debate on whether SLC should be called Second chamber or Secondary chamber of the house, Following arguments, are given for the reasoning- It is considered as second House of the legislature for the following reasons: one, to act as a check on hasty actions by the popularly elected House and, two, for the accommodation of eminent individuals from different fields of life who are not able to win elections. Thus providing the much-needed diversity to the lawmaking body and government. three , to reduces the burden of the lower house by initiating many legislations in the upper house four ,As a mature and seasoned chamber which is generally away from the political controversies, it provides a platform for healthy and productive discussions on various important issues Issues with State legislative council Rather than fulfilling the objective of getting intellectuals into the legislature, the forum is likely to be used to accommodate party functionaries who fail to get elected. It is also an unnecessary drain on the exchequer. legislatures draw their talent both from the grassroots level and the higher echelons of learning. There are enough numbers of doctors, teachers and other professionals in most political parties today hence argument to elect intellectuals seems a bit flawed. Graduates are no longer a rare breed. Also, with dipping educational standards, graduate degree is no guarantee of any intellectual calibre. If a majority of the members in the upper house belong to the same party which holds the majority in the lower house, the upper house will become a mere ditto chamber. The powers of the Legislative Councils are limited to the extent that they can hardly impose any effective check on the Assemblies. Whether a Bill is liked by the Council or not, it is apt to be passed maximum after four months’ delay if the Assembly so decides. Also, the legislative council does not function as a secondary house as Rajya Sabha because of the following reasons: Power ofSLC with respect to RS is much lower in case of passage and discussion over a bill. SLC can at max delay a bill for 4 months. In the case of Money bill powers are even lower. The budget can only be discussed in SLC but cannot be voted upon. Council does not participate in the election of President, unlike RS. The existenceof SLC itself depends on the Legislative Assembly, Unlike RS which have its independent existence. Way forward- Implementation of the second ARC where it recommended that only local bodies be responsible for the election of SLC members. A regular report on working, productivity and efficiency of SLC.
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साख सृजन को परिभाषित करते हुए बैंकों द्वारा साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये| (200 शब्द)
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प्रश्न- साख सृजन को परिभाषित करते हुए बैंकों द्वारा साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये| (200 शब्द) दृष्टिकोण भूमिका में साख सृजन को परिभाषित कीजिये, प्रथम भाग में साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये साख को किये गये भुगतान को वापस भुगतान के रूप में प्राप्त करने के दावे के रूप में परिभाषित किया जाता है| अपनी जमाओं में से जब एक बैंक अपने ग्राहकों को ऋण देता है तो भविष्य में उस ग्राहक से ऋण वसूल करने का प्रबंध करता है अर्थात बैंक भविष्य में ऋणी से ऋण के रूप में दी गयी राशि के वापस भुगतान का दावा कर सकता है| अपनी इसी क्षमता के कारण कोई बैंक ब्याज लाभ प्राप्त करता है और अपनी जमाओं को बढाने के योग्य हो पाता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को बैंक द्वारा किया गया साख सृजन कहते हैं| साख सृजन किसी व्यापारिक बैंक द्वारा किये जाने वाले प्रमुख क्रियाकलापों में से एक है| इसी के आधार पर बैंक अपने बैंकिंग कार्यों को करने में सक्षम हो पाता है| बैंक अपने सामान्य अनुभव से यह जानता है कि कि उसके ग्राहक अपनी सम्पूर्ण जमा को एक बार में बैंक से नहीं निकालेंगे, इस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुचता है कि कोई ग्राहक कब उस बैंक से अपनी जमा का कितना भाग निकाल सकता है| अर्थात उसके ग्राहक अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपनी जमा का कुछ भाग निकाल सकते हैं और शेष भाग बैंक के पास ही जमा रखेंगे| बैंक अपने ग्राहकों की मांग पर भुगतान के लिए अपनी कुल जमा के कुछ अंश को अपने पास नकद के रूप में रखता है| कुल जमा के शेष भाग से बैंक साख सृजन करता है| साख सृजन की प्रक्रिया निम्नलिखित है किसी व्यक्ति (माना A )द्वारा बैंक में बचत खाता खोलने के लिए उस बैंक में 100 रूपये जमा करने पर बैंक की कुल जमा में 100 रूपये की वृद्धि हो जाती है, इस जमा को प्राथमिक जमा कहते हैं| जमा राशि का इंट्री उस ग्राहक की पासबुक में कर दी जाती है, बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाता धारक एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 10 रुपये रखेगा और शेष 90 रुपये उसके पास साख सृजन के लिए उपलब्ध होते हैं| अगले चरण में उपरोक्त 90 रूपये को ऋण के रूप में लेने के लिए किसी ग्राहक (माना B) के आने पर बैंक उस ग्राहक के नाम एक खाता खोल कर उसे 90 रूपये का ऋण दे देता है और 90 रूपये की इंट्री उसकी पासबुक में कर देता है| इस तरह बैंक दूसरी जमा का सृजन करता है यहाँ भी बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाताधारक (B) एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 9 रुपये कैश रिजर्व के रूप में रखेगा और प्राथमिक जमा का शेष 81 रुपये को अपने पास साख सृजन के लिए रख लेता है| यह प्रक्रिया प्राथमिक जमा के शून्य होने तक जारी रहती है| इस तरह छोटी छोटी जमाओं के माध्यम से बैंक विशाल मात्रा में साख सृजन करते हैं और ब्याज लाभ प्राप्त करते हैं| बड़ी मात्रा में साख सृजन से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती है| अधिक साख सृजन मुद्रा गुणांक में वृद्धि करता है| साख सृजन के स्तर के निर्धारण में अनेक कारकों की भूमिका होती है| इनमे से प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं- जनता की बैंकिंग प्रवृत्ति का बैंकों की साख सृजन क्षमता पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, साख सृजन का आधार प्राथमिक जमा होता है| प्राथमिक जमा की अनुपस्थिति में बैंक साख सृजन नहीं कर पायेंगे| इसी तरह जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के अधिक होने से बैंक के पास प्राथमिक जमा आधिक होगी, और बैंक अधिक साख सृजन करने में सक्षम होंगे| साख सृजन के आकार के निर्धारण में केन्द्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| केन्द्रीय बैंक द्वारा नकद अरक्षित अनुपात और वैधानिक तरलता अनुपात को बढाने पर बैंक की प्राथमिक जमा का बड़ा भाग इनकी व्यवस्था में लग जाता है इससे बैंक के पास साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद में कमी आती है| इसी प्रकार केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज दरें भी साख सृजन को प्रभावित करती हैं| जिन देशों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार अधिक हुआ है वहां साख सृजन अधिक होता है, सेवाओं का कम विस्तार साख सृजन में कमी लाता है| इसके अतिरिक्त साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद की मात्रा, ऋण के बदले ली जाने वाली प्रतिभूतियों की गुणवत्ता, जारी चेकों के क्लियरेंस की तीव्रता आदि कारक भी साख सृजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने वाले कारक हैं| चूँकि साख सृजन का सीधा प्रभाव मुद्रा आपूर्ति पर पड़ता है जिससे अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है अतः एक वांछित स्तर तक साख सृजन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होता है| अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीतिक दबाव की स्थिति के अतिरिक्त केन्द्रीय बैंक साख सृजन को सुचारू बनाए रखने का प्रयास करता है| जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के विकास के लिए वित्तीय समावेशन, JAM ट्रिनिटी का प्रयोग, निजी बैंकों को लाइसेंस, ऑनलाइन सुविधाओं का निरंतर विस्तार, रोजगार सृजन आदि कारक साख सृजन में सहायक होंगे|
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##Question:साख सृजन को परिभाषित करते हुए बैंकों द्वारा साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार से स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये| (200 शब्द)##Answer:प्रश्न- साख सृजन को परिभाषित करते हुए बैंकों द्वारा साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये| (200 शब्द) दृष्टिकोण भूमिका में साख सृजन को परिभाषित कीजिये, प्रथम भाग में साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये साख को किये गये भुगतान को वापस भुगतान के रूप में प्राप्त करने के दावे के रूप में परिभाषित किया जाता है| अपनी जमाओं में से जब एक बैंक अपने ग्राहकों को ऋण देता है तो भविष्य में उस ग्राहक से ऋण वसूल करने का प्रबंध करता है अर्थात बैंक भविष्य में ऋणी से ऋण के रूप में दी गयी राशि के वापस भुगतान का दावा कर सकता है| अपनी इसी क्षमता के कारण कोई बैंक ब्याज लाभ प्राप्त करता है और अपनी जमाओं को बढाने के योग्य हो पाता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को बैंक द्वारा किया गया साख सृजन कहते हैं| साख सृजन किसी व्यापारिक बैंक द्वारा किये जाने वाले प्रमुख क्रियाकलापों में से एक है| इसी के आधार पर बैंक अपने बैंकिंग कार्यों को करने में सक्षम हो पाता है| बैंक अपने सामान्य अनुभव से यह जानता है कि कि उसके ग्राहक अपनी सम्पूर्ण जमा को एक बार में बैंक से नहीं निकालेंगे, इस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुचता है कि कोई ग्राहक कब उस बैंक से अपनी जमा का कितना भाग निकाल सकता है| अर्थात उसके ग्राहक अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपनी जमा का कुछ भाग निकाल सकते हैं और शेष भाग बैंक के पास ही जमा रखेंगे| बैंक अपने ग्राहकों की मांग पर भुगतान के लिए अपनी कुल जमा के कुछ अंश को अपने पास नकद के रूप में रखता है| कुल जमा के शेष भाग से बैंक साख सृजन करता है| साख सृजन की प्रक्रिया निम्नलिखित है किसी व्यक्ति (माना A )द्वारा बैंक में बचत खाता खोलने के लिए उस बैंक में 100 रूपये जमा करने पर बैंक की कुल जमा में 100 रूपये की वृद्धि हो जाती है, इस जमा को प्राथमिक जमा कहते हैं| जमा राशि का इंट्री उस ग्राहक की पासबुक में कर दी जाती है, बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाता धारक एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 10 रुपये रखेगा और शेष 90 रुपये उसके पास साख सृजन के लिए उपलब्ध होते हैं| अगले चरण में उपरोक्त 90 रूपये को ऋण के रूप में लेने के लिए किसी ग्राहक (माना B) के आने पर बैंक उस ग्राहक के नाम एक खाता खोल कर उसे 90 रूपये का ऋण दे देता है और 90 रूपये की इंट्री उसकी पासबुक में कर देता है| इस तरह बैंक दूसरी जमा का सृजन करता है यहाँ भी बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाताधारक (B) एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 9 रुपये कैश रिजर्व के रूप में रखेगा और प्राथमिक जमा का शेष 81 रुपये को अपने पास साख सृजन के लिए रख लेता है| यह प्रक्रिया प्राथमिक जमा के शून्य होने तक जारी रहती है| इस तरह छोटी छोटी जमाओं के माध्यम से बैंक विशाल मात्रा में साख सृजन करते हैं और ब्याज लाभ प्राप्त करते हैं| बड़ी मात्रा में साख सृजन से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती है| अधिक साख सृजन मुद्रा गुणांक में वृद्धि करता है| साख सृजन के स्तर के निर्धारण में अनेक कारकों की भूमिका होती है| इनमे से प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं- जनता की बैंकिंग प्रवृत्ति का बैंकों की साख सृजन क्षमता पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, साख सृजन का आधार प्राथमिक जमा होता है| प्राथमिक जमा की अनुपस्थिति में बैंक साख सृजन नहीं कर पायेंगे| इसी तरह जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के अधिक होने से बैंक के पास प्राथमिक जमा आधिक होगी, और बैंक अधिक साख सृजन करने में सक्षम होंगे| साख सृजन के आकार के निर्धारण में केन्द्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| केन्द्रीय बैंक द्वारा नकद अरक्षित अनुपात और वैधानिक तरलता अनुपात को बढाने पर बैंक की प्राथमिक जमा का बड़ा भाग इनकी व्यवस्था में लग जाता है इससे बैंक के पास साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद में कमी आती है| इसी प्रकार केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज दरें भी साख सृजन को प्रभावित करती हैं| जिन देशों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार अधिक हुआ है वहां साख सृजन अधिक होता है, सेवाओं का कम विस्तार साख सृजन में कमी लाता है| इसके अतिरिक्त साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद की मात्रा, ऋण के बदले ली जाने वाली प्रतिभूतियों की गुणवत्ता, जारी चेकों के क्लियरेंस की तीव्रता आदि कारक भी साख सृजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने वाले कारक हैं| चूँकि साख सृजन का सीधा प्रभाव मुद्रा आपूर्ति पर पड़ता है जिससे अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है अतः एक वांछित स्तर तक साख सृजन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होता है| अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीतिक दबाव की स्थिति के अतिरिक्त केन्द्रीय बैंक साख सृजन को सुचारू बनाए रखने का प्रयास करता है| जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के विकास के लिए वित्तीय समावेशन, JAM ट्रिनिटी का प्रयोग, निजी बैंकों को लाइसेंस, ऑनलाइन सुविधाओं का निरंतर विस्तार, रोजगार सृजन आदि कारक साख सृजन में सहायक होंगे|
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Do you think that there is need for regulating the Credit Rating agencies in India? Discuss. (200 words)
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Need for regulaitng Credit Rating Agencies: 1. They provide credit rating agency without assessing the real situation 2. Sometimes the credit rating agencies are given by providing the money 3. Conflict of Interest:CRAs are mainly paid by the companies whose securities they rate. These companies benefit from favourable (high) ratings on them or their securities.
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##Question:Do you think that there is need for regulating the Credit Rating agencies in India? Discuss. (200 words)##Answer:Need for regulaitng Credit Rating Agencies: 1. They provide credit rating agency without assessing the real situation 2. Sometimes the credit rating agencies are given by providing the money 3. Conflict of Interest:CRAs are mainly paid by the companies whose securities they rate. These companies benefit from favourable (high) ratings on them or their securities.
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यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन का मुद्दा (brexit ) एक नया गतिरोध बन रहा है , इस गतिरोध को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये | साथ ही भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिये | (200 शब्द )
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प्रश्न - यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन का मुद्दा (brexit ) एक नया गतिरोध बन रहा है , इस गतिरोध को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये | साथ ही भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर - दृष्टिकोण (brexit ) ब्रेक्षित को संक्षेप मे बताइये | Brexit के संदर्भ मे नवीन गतिरोध की संक्षिप्त चर्चा | गतिरोध को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये | भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिये | ब्रेक्ज़िट (Brexit) दो शब्दों- Britain+Exit से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ब्रिटेन का बाहर निकलना। यूरोपीय संघ में रहने या न रहने के सवाल पर यूनाइटेड किंगडम में 23 जून 2016 को जनमत संग्रह कराया गया था, जिसमें लगभग 52 फीसदी वोट यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्ष में पड़े थे। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे का यूरोपीय संघ से अलग होने संबंधीब्रेक्ज़िट (Brexit)समझौता संसद में पारित नहीं हो सका। ‘अब प्रधानमंत्री को जल्दी ही संसद में Plan-B पेश करना होगा। बेशक यह आधुनिक इतिहास में ब्रिटेन की संसद में किसी भी प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी हार थी, लेकिन इसके अगले ही दिन टेरेसा मे ने संसद में विश्वास मत जीत लिया। इस वज़ह से यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की ब्रिटेन की राह और मुश्किल हो गई है। ब्रेक्ज़िट के लिये जनमत संग्रह हुआ था UK में - जनमत संग्रह में केवल एक प्रश्न पूछा गया था- क्या यूनाइटेड किंगडम को यूरोपीय संघ का सदस्य बने रहना चाहिये या इसे छोड़ देना चाहिये? इसके पीछे ब्रिटेन की संप्रभुता, संस्कृति और पहचान बनाए रखने का तर्क देते हुए इसे Brexit नाम दिया गया। ब्रेक्ज़िट तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन का चुनावी वादा था, इसीलिये यह जनमत संग्रह हुआ। इसके बाद प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि वह यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्षधर थे। क्या हो सकती हैं संभावनाएँ...कैसे दूर हो सकता है गतिरोध? यूनाइटेड किंगडम एक बेहतर डील के लिये प्रयास कर सकता है। लेकिन यूरोपीय संघ किसी अन्य डील पर विचार करने से लगातार इनकार करता रहा है। यूनाइटेड किंगडम बिना किसी डील के 29 मार्च को यूरोपीय संघ से बाहर आ जाए। लेकिन इससे यूनाइटेड किंगडम के कारोबार पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे आयरलैंड की सीमा प्रभावित हो सकती है, जोगुड फ्राइडे एग्रीमेंट(Good Friday Agreement) में तय शर्तों के विपरीत होगा। ब्रेक्ज़िट की प्रक्रिया विलंबित कर दी जाए अर्थात यूनाइटेड किंगडम 29 मार्च को यूरोपीय संघ से बाहर न आए। इसकी संभावना सबसे अधिक है। लेकिन समय-सीमा जून 2019 से आगे नहीं खिसकाई जा सकती, क्योंकि तब नई यूरोपियन पार्लियामेंट कार्यभार संभालेगी जिसमें ब्रिटिश शामिल नहीं होंगे। ब्रिटेन में आम चुनाव करवाए जाएं और नई सरकार नए सिरे से यूरोपीय संघ के साथ बातचीत कर इस समस्या का हल निकालने का प्रयास करे। ब्रेक्ज़िट के मुद्दे पर यूनाइटेड किंगडम में एक बार फिर से जनमत संग्रह कराया जाए, लेकिन वर्तमान में इस विचार का अधिकांश सांसद विरोध कर रहे हैं। भारत पर क्या होगा असर? ब्रेक्ज़िट से भारतीय कारोबार पर भी असर पड़ने की बात कही जा रही है। यह तय है कि यदि ब्रेक्ज़िट को अमलीजामा पहनाया जाता है तो इसका असर वैश्विक बाज़ार पर भी पड़ सकता है। ब्रिटेन और भारत के द्विपक्षीय कारोबार के भी इसे प्रभावित होने की संभावनाएँ जताई जा रही हैं। इसके पीछे वजह यह है कि किन शर्तों पर ब्रिटेन अलग होता है और अलग होने के बाद यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच निवेश व कारोबार को लेकर किस तरह के समझौते होते हैं? ब्रेक्ज़िट की वजह से ही न तो भारत व ब्रिटेन के बीच नए कारोबारी समझौते की शुरुआत हो पाई है और न ही भारत व यूरोपीय संघ के बीच होने वाले FTA पर बातचीत आगे बढ़ पाई है। इस अनिश्चितता का असर ब्रिटेन में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों पर भी पड़ेगा। नैसकॉम के अनुसार, देश की IT कंपनियों के कुल कारोबार में ब्रिटेन की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी है। ब्रिटेन में आर्थिक मंदी होने का असर वहां से भारत आने वाली रेमिटेंस की राशि पर भी पड़ सकता है। अभी भारत में कुल जितनी राशि प्रवासी भारतीय भेजते हैं, उसका पाँच फीसदी ब्रिटेन से आता है। ब्रेक्ज़िट के पक्षधर और ब्रेक्ज़िट के विरोधी यूरोपीय संघ से नाता तोड़ लेने के समर्थक ब्रिटिश लोगों की दलील है कि ब्रिटेन की पहचान, आज़ादी और संस्कृति को बनाए एवं बचाए रखने के लिये ऐसा करना ज़रूरी हो गया है। ये लोग ब्रिटेन में भारी संख्या में आने वाले प्रवासियों पर भी सवाल उठा रहे हैं। इनका यह भी कहना है कि ब्रिटेन को हर साल अरबों पाउंड यूरोपीय संघ को देने पड़ते हैं और यह ब्रिटेन पर अपने "अलोकतांत्रिक" कानून थोपता है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ में बने रहने के समर्थकों का कहना है कि यूरोपीय संघ में बने रहना ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के लिये ज़्यादा अच्छा रहेगा। इनके विचार में यूरोप ही ब्रिटेन का सबसे अहम बाज़ार है और विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत भी। ऐसे में ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से बाहर निकलना उसकी अर्थव्यवस्था के लिये घातक हो सकता है। अब सारी दुनिया साँस रोककर बैठी देख रही है कि ब्रेक्ज़िट का ऊँट किस करवट बैठता है।
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##Question:यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन का मुद्दा (brexit ) एक नया गतिरोध बन रहा है , इस गतिरोध को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये | साथ ही भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिये | (200 शब्द ) ##Answer:प्रश्न - यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन का मुद्दा (brexit ) एक नया गतिरोध बन रहा है , इस गतिरोध को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये | साथ ही भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर - दृष्टिकोण (brexit ) ब्रेक्षित को संक्षेप मे बताइये | Brexit के संदर्भ मे नवीन गतिरोध की संक्षिप्त चर्चा | गतिरोध को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये | भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विश्लेषण कीजिये | ब्रेक्ज़िट (Brexit) दो शब्दों- Britain+Exit से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ब्रिटेन का बाहर निकलना। यूरोपीय संघ में रहने या न रहने के सवाल पर यूनाइटेड किंगडम में 23 जून 2016 को जनमत संग्रह कराया गया था, जिसमें लगभग 52 फीसदी वोट यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्ष में पड़े थे। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे का यूरोपीय संघ से अलग होने संबंधीब्रेक्ज़िट (Brexit)समझौता संसद में पारित नहीं हो सका। ‘अब प्रधानमंत्री को जल्दी ही संसद में Plan-B पेश करना होगा। बेशक यह आधुनिक इतिहास में ब्रिटेन की संसद में किसी भी प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी हार थी, लेकिन इसके अगले ही दिन टेरेसा मे ने संसद में विश्वास मत जीत लिया। इस वज़ह से यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की ब्रिटेन की राह और मुश्किल हो गई है। ब्रेक्ज़िट के लिये जनमत संग्रह हुआ था UK में - जनमत संग्रह में केवल एक प्रश्न पूछा गया था- क्या यूनाइटेड किंगडम को यूरोपीय संघ का सदस्य बने रहना चाहिये या इसे छोड़ देना चाहिये? इसके पीछे ब्रिटेन की संप्रभुता, संस्कृति और पहचान बनाए रखने का तर्क देते हुए इसे Brexit नाम दिया गया। ब्रेक्ज़िट तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन का चुनावी वादा था, इसीलिये यह जनमत संग्रह हुआ। इसके बाद प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि वह यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्षधर थे। क्या हो सकती हैं संभावनाएँ...कैसे दूर हो सकता है गतिरोध? यूनाइटेड किंगडम एक बेहतर डील के लिये प्रयास कर सकता है। लेकिन यूरोपीय संघ किसी अन्य डील पर विचार करने से लगातार इनकार करता रहा है। यूनाइटेड किंगडम बिना किसी डील के 29 मार्च को यूरोपीय संघ से बाहर आ जाए। लेकिन इससे यूनाइटेड किंगडम के कारोबार पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे आयरलैंड की सीमा प्रभावित हो सकती है, जोगुड फ्राइडे एग्रीमेंट(Good Friday Agreement) में तय शर्तों के विपरीत होगा। ब्रेक्ज़िट की प्रक्रिया विलंबित कर दी जाए अर्थात यूनाइटेड किंगडम 29 मार्च को यूरोपीय संघ से बाहर न आए। इसकी संभावना सबसे अधिक है। लेकिन समय-सीमा जून 2019 से आगे नहीं खिसकाई जा सकती, क्योंकि तब नई यूरोपियन पार्लियामेंट कार्यभार संभालेगी जिसमें ब्रिटिश शामिल नहीं होंगे। ब्रिटेन में आम चुनाव करवाए जाएं और नई सरकार नए सिरे से यूरोपीय संघ के साथ बातचीत कर इस समस्या का हल निकालने का प्रयास करे। ब्रेक्ज़िट के मुद्दे पर यूनाइटेड किंगडम में एक बार फिर से जनमत संग्रह कराया जाए, लेकिन वर्तमान में इस विचार का अधिकांश सांसद विरोध कर रहे हैं। भारत पर क्या होगा असर? ब्रेक्ज़िट से भारतीय कारोबार पर भी असर पड़ने की बात कही जा रही है। यह तय है कि यदि ब्रेक्ज़िट को अमलीजामा पहनाया जाता है तो इसका असर वैश्विक बाज़ार पर भी पड़ सकता है। ब्रिटेन और भारत के द्विपक्षीय कारोबार के भी इसे प्रभावित होने की संभावनाएँ जताई जा रही हैं। इसके पीछे वजह यह है कि किन शर्तों पर ब्रिटेन अलग होता है और अलग होने के बाद यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच निवेश व कारोबार को लेकर किस तरह के समझौते होते हैं? ब्रेक्ज़िट की वजह से ही न तो भारत व ब्रिटेन के बीच नए कारोबारी समझौते की शुरुआत हो पाई है और न ही भारत व यूरोपीय संघ के बीच होने वाले FTA पर बातचीत आगे बढ़ पाई है। इस अनिश्चितता का असर ब्रिटेन में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों पर भी पड़ेगा। नैसकॉम के अनुसार, देश की IT कंपनियों के कुल कारोबार में ब्रिटेन की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी है। ब्रिटेन में आर्थिक मंदी होने का असर वहां से भारत आने वाली रेमिटेंस की राशि पर भी पड़ सकता है। अभी भारत में कुल जितनी राशि प्रवासी भारतीय भेजते हैं, उसका पाँच फीसदी ब्रिटेन से आता है। ब्रेक्ज़िट के पक्षधर और ब्रेक्ज़िट के विरोधी यूरोपीय संघ से नाता तोड़ लेने के समर्थक ब्रिटिश लोगों की दलील है कि ब्रिटेन की पहचान, आज़ादी और संस्कृति को बनाए एवं बचाए रखने के लिये ऐसा करना ज़रूरी हो गया है। ये लोग ब्रिटेन में भारी संख्या में आने वाले प्रवासियों पर भी सवाल उठा रहे हैं। इनका यह भी कहना है कि ब्रिटेन को हर साल अरबों पाउंड यूरोपीय संघ को देने पड़ते हैं और यह ब्रिटेन पर अपने "अलोकतांत्रिक" कानून थोपता है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ में बने रहने के समर्थकों का कहना है कि यूरोपीय संघ में बने रहना ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के लिये ज़्यादा अच्छा रहेगा। इनके विचार में यूरोप ही ब्रिटेन का सबसे अहम बाज़ार है और विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत भी। ऐसे में ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से बाहर निकलना उसकी अर्थव्यवस्था के लिये घातक हो सकता है। अब सारी दुनिया साँस रोककर बैठी देख रही है कि ब्रेक्ज़िट का ऊँट किस करवट बैठता है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का विस्तार से उल्लेख कीजिये| (200 शब्द )
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अप्रोच :- भूमिका में अर्थव्यवस्था को परिभाषित कीजिए। उत्तर के मुख्य भाग में भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओ को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निष्कर्ष लिखिए। किसी राष्ट्र द्वारा अपने नागरिकों के कल्याण स्तर को उच्च करने तथा उच्च स्तर पर बनाये रखने के उद्देश्य से उपलब्ध संसाधनों का नियोजन करते हुए, मुद्रा को केंद्र में रख कर जिस व्यवस्था का निर्माण किया जाता है उसे अर्थव्यवस्था कहते हैं| अर्थव्यवस्था का अभिप्राय किसी क्षेत्र विशेष में प्रचलित आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप, प्रकृति एवं उनके स्तर से होता है|भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जिसकी विशेषताओ को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पर्याप्त रूप से बड़ा है लेकिन बड़ी जनसँख्या धारण करने के कारण औसत प्रतिव्यक्ति आय वास्तव में कम है। इसके कारणअधिकाँश जनसंख्या का निम्न जीवन स्तर दिखाई देता है| औपनिवेशिक कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था का पूँजी आधार कमजोर है और पूँजी की कमी के कारण आधारभूत ढांचेके विकास में निवेश की कमी रह जाती है ।जिससे आधारभूत ढांचा कमजोर रह जाता है| कमजोर आधारभूत ढांचा अर्थव्यवस्था के विकास को बाधित करता है| पूँजी की कमी के कारण रोजगार सर्जक क्षेत्रों में निवेश की कमी भी रहती है परिणामस्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था बृहद स्तर पर बेरोजगारी की समस्या का सामना करती है| लगातार बेरोजगारी की समस्या व्यापक गरीबी का रूप धारण कर लेती है |जनसंख्या का एक बड़ा भाग गरीबी रेखा से नीचे निर्वाह करता है| संसाधनों की कमी और अर्थव्यवस्था के असंतुलित विकास के कारण भारतीय अर्थयवस्था व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत/ क्षेत्रीय असमानताओं से युक्त है| भारतीय अर्थव्यवस्था जनसँख्या की उच्च वृद्धि दर की प्रवृत्ति का सामना कर रही है| यह संसाधनों पर दबाव को निरंतर बढाने के लिए जिम्मेदार है| भारत की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि में नियोजित है। कितुं नियोजित जनसंख्या के अनुपात में कृषि का कुल राष्ट्रीय आय में योगदान कम हैसिंचाई के लिये जल का प्रमुख स्त्रोत है मानसून है। अधिकांश क्षेत्रों में पुरानी तकनीक से कृषि की जाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति - मिश्रित अर्थव्यवस्था भारतीय अर्थव्यवस्था स्वरूपतः मिश्रित प्रणाली से संचालित होती है| आर्थिक गतिविधियों में निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रक संलग्न हैं| सार्वजनिक क्षेत्रक जनकल्याण के स्तर को उच्च रखने के लिए प्रयासरत है| कल्याण स्तर को उच्च रखने के लिए भारत सरकार संसाधनों के प्रबंधन के लिए नियोजन करती है| इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था एक नियोजित अर्थव्यवस्था है| यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था स्वरूपतः मिश्रित प्रकार की है लेकिन 1991 में हुए उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का स्वरुप धारण करती जा रही है| प्रगतिशील अर्थव्यस्था भारतीय अर्थव्यवस्था PPP के आधार पर तीसरी और विनिमय दर के आधार पर 6वीं बड़ी अर्थव्यवस्थाहै| वैश्विक व्यापार में भारत की भागीदारी में निरंतर वृद्धि हो रही है, इसी तरह भारत के विदेशी विनिमय कोष में बृद्धि जारी है , इसी के अनुरूप IMF में भारत की भागीदारी बढ़ती जा रही है| इसी प्रकार विश्व व्यापार संगठन, G- 20 तथा ब्रिक्स आदि वैश्विक आर्थिक संगठनों में भारतीय अर्थव्यवस्था का बढ़ता महत्त्व अर्थव्यवस्था की प्रगतिशीलता की सूचना देता है| उपरोक्त सभी बिंदु भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप एवं स्तर को स्पष्ट करते हैं| उच्च आर्थिक संवृद्धि, कौशल विकास, वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान एवं भागीदारी को देखते हुए निकट भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था में बदल जाने की क्षमता से युक्त है|
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##Question:भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का विस्तार से उल्लेख कीजिये| (200 शब्द )##Answer:अप्रोच :- भूमिका में अर्थव्यवस्था को परिभाषित कीजिए। उत्तर के मुख्य भाग में भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओ को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निष्कर्ष लिखिए। किसी राष्ट्र द्वारा अपने नागरिकों के कल्याण स्तर को उच्च करने तथा उच्च स्तर पर बनाये रखने के उद्देश्य से उपलब्ध संसाधनों का नियोजन करते हुए, मुद्रा को केंद्र में रख कर जिस व्यवस्था का निर्माण किया जाता है उसे अर्थव्यवस्था कहते हैं| अर्थव्यवस्था का अभिप्राय किसी क्षेत्र विशेष में प्रचलित आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप, प्रकृति एवं उनके स्तर से होता है|भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जिसकी विशेषताओ को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पर्याप्त रूप से बड़ा है लेकिन बड़ी जनसँख्या धारण करने के कारण औसत प्रतिव्यक्ति आय वास्तव में कम है। इसके कारणअधिकाँश जनसंख्या का निम्न जीवन स्तर दिखाई देता है| औपनिवेशिक कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था का पूँजी आधार कमजोर है और पूँजी की कमी के कारण आधारभूत ढांचेके विकास में निवेश की कमी रह जाती है ।जिससे आधारभूत ढांचा कमजोर रह जाता है| कमजोर आधारभूत ढांचा अर्थव्यवस्था के विकास को बाधित करता है| पूँजी की कमी के कारण रोजगार सर्जक क्षेत्रों में निवेश की कमी भी रहती है परिणामस्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था बृहद स्तर पर बेरोजगारी की समस्या का सामना करती है| लगातार बेरोजगारी की समस्या व्यापक गरीबी का रूप धारण कर लेती है |जनसंख्या का एक बड़ा भाग गरीबी रेखा से नीचे निर्वाह करता है| संसाधनों की कमी और अर्थव्यवस्था के असंतुलित विकास के कारण भारतीय अर्थयवस्था व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत/ क्षेत्रीय असमानताओं से युक्त है| भारतीय अर्थव्यवस्था जनसँख्या की उच्च वृद्धि दर की प्रवृत्ति का सामना कर रही है| यह संसाधनों पर दबाव को निरंतर बढाने के लिए जिम्मेदार है| भारत की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि में नियोजित है। कितुं नियोजित जनसंख्या के अनुपात में कृषि का कुल राष्ट्रीय आय में योगदान कम हैसिंचाई के लिये जल का प्रमुख स्त्रोत है मानसून है। अधिकांश क्षेत्रों में पुरानी तकनीक से कृषि की जाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति - मिश्रित अर्थव्यवस्था भारतीय अर्थव्यवस्था स्वरूपतः मिश्रित प्रणाली से संचालित होती है| आर्थिक गतिविधियों में निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रक संलग्न हैं| सार्वजनिक क्षेत्रक जनकल्याण के स्तर को उच्च रखने के लिए प्रयासरत है| कल्याण स्तर को उच्च रखने के लिए भारत सरकार संसाधनों के प्रबंधन के लिए नियोजन करती है| इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था एक नियोजित अर्थव्यवस्था है| यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था स्वरूपतः मिश्रित प्रकार की है लेकिन 1991 में हुए उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का स्वरुप धारण करती जा रही है| प्रगतिशील अर्थव्यस्था भारतीय अर्थव्यवस्था PPP के आधार पर तीसरी और विनिमय दर के आधार पर 6वीं बड़ी अर्थव्यवस्थाहै| वैश्विक व्यापार में भारत की भागीदारी में निरंतर वृद्धि हो रही है, इसी तरह भारत के विदेशी विनिमय कोष में बृद्धि जारी है , इसी के अनुरूप IMF में भारत की भागीदारी बढ़ती जा रही है| इसी प्रकार विश्व व्यापार संगठन, G- 20 तथा ब्रिक्स आदि वैश्विक आर्थिक संगठनों में भारतीय अर्थव्यवस्था का बढ़ता महत्त्व अर्थव्यवस्था की प्रगतिशीलता की सूचना देता है| उपरोक्त सभी बिंदु भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप एवं स्तर को स्पष्ट करते हैं| उच्च आर्थिक संवृद्धि, कौशल विकास, वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान एवं भागीदारी को देखते हुए निकट भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था में बदल जाने की क्षमता से युक्त है|
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Discuss the need to enact the Biological Diversity Act 2002. Highlight its various provisions which help in the conservation of biodiversity. (150 words/ 10 marks)
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Approach: Define Biological Diversity Act 2002. Provisions like NBA, Biodiversity Fund, reports, etc. should be mentioned. Role of the NBA, in IPR protection, etc. can be mentioned. Conclusion can be mentioned highlighting the conservation efforts, the role of the Biodiversity Act, etc. Answer: Biological Diversity Act 2002: In order to help in realizing the objectives of CBD, India has enacted umbrella legislation called the biological Diversity Act 2002 aimed at the conservation of biological resources and associated knowledge as well as facilitating access to them in a sustainable manner and through a just process. The Act helps in a conversation of biodiversity by following provisions: National Biodiversity Authority: · Biodiversity Act of 2002 allows the establishment of the National Biodiversity Authority, State Biodiversity Authority, and local-level biodiversity · All foreign nationals require approval from the NBA for obtaining Biological Resources from India. · No person shall apply for any intellectual property right, by whatever name called, in or outside India for any invention based on any research or information on a biological resource obtained from India without obtaining the previous approval of the National Biodiversity Authority. · The National Biodiversity Authority may, while granting the approval under this section, impose a benefit-sharing fee or royalty or both or impose conditions including the sharing of financial benefits arising out of the commercial utilization of such rights. · No person, who is a citizen of India or a body corporate, association or organization which is registered in India, shall obtain any biological resource for commercial utilization, or bio-survey and bio-utilization for commercial utilization except after giving prior intimation to the State Biodiversity Board concerned: · National Biodiversity Authority may, on behalf of the Central Government, take any measures necessary to oppose the grant of intellectual property rights in any country outside India. Constitution of National Biodiversity Fund · The Fund shall be applied for– · (a) channeling benefits to the benefit claimers; · (b) conservation and promotion of biological resources and development of areas from where such biological resources or knowledge associated thereto has been accessed; · (c) socio-economic development of areas referred to consultation with the local bodies concerned. Annual report of National Biodiversity Authority: · The National Biodiversity Authority shall prepare, in such form and at such time each financial year as may be prescribed, its annual report. · It is done by giving a full account of its activities during the previous financial year and furnishing, to the Central Government, before such date as may be prescribed, its audited copy of accounts together with auditors’ report thereon. · Biodiversity heritage sites- the State Government may, from time to time in consultation with the local bodies, notify in the Official Gazette, of areas of biodiversity importance as biodiversity heritage sites under this Act. Hence, we can say that the Biological Diversity Act, of 2002 was a result of India’s attempt to realize the objectives enshrined in the UN CBD 1992, and helps in the conservation of biological resources, managing its sustainable use, and enabling fair and equitable sharing benefits.
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##Question:Discuss the need to enact the Biological Diversity Act 2002. Highlight its various provisions which help in the conservation of biodiversity. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach: Define Biological Diversity Act 2002. Provisions like NBA, Biodiversity Fund, reports, etc. should be mentioned. Role of the NBA, in IPR protection, etc. can be mentioned. Conclusion can be mentioned highlighting the conservation efforts, the role of the Biodiversity Act, etc. Answer: Biological Diversity Act 2002: In order to help in realizing the objectives of CBD, India has enacted umbrella legislation called the biological Diversity Act 2002 aimed at the conservation of biological resources and associated knowledge as well as facilitating access to them in a sustainable manner and through a just process. The Act helps in a conversation of biodiversity by following provisions: National Biodiversity Authority: · Biodiversity Act of 2002 allows the establishment of the National Biodiversity Authority, State Biodiversity Authority, and local-level biodiversity · All foreign nationals require approval from the NBA for obtaining Biological Resources from India. · No person shall apply for any intellectual property right, by whatever name called, in or outside India for any invention based on any research or information on a biological resource obtained from India without obtaining the previous approval of the National Biodiversity Authority. · The National Biodiversity Authority may, while granting the approval under this section, impose a benefit-sharing fee or royalty or both or impose conditions including the sharing of financial benefits arising out of the commercial utilization of such rights. · No person, who is a citizen of India or a body corporate, association or organization which is registered in India, shall obtain any biological resource for commercial utilization, or bio-survey and bio-utilization for commercial utilization except after giving prior intimation to the State Biodiversity Board concerned: · National Biodiversity Authority may, on behalf of the Central Government, take any measures necessary to oppose the grant of intellectual property rights in any country outside India. Constitution of National Biodiversity Fund · The Fund shall be applied for– · (a) channeling benefits to the benefit claimers; · (b) conservation and promotion of biological resources and development of areas from where such biological resources or knowledge associated thereto has been accessed; · (c) socio-economic development of areas referred to consultation with the local bodies concerned. Annual report of National Biodiversity Authority: · The National Biodiversity Authority shall prepare, in such form and at such time each financial year as may be prescribed, its annual report. · It is done by giving a full account of its activities during the previous financial year and furnishing, to the Central Government, before such date as may be prescribed, its audited copy of accounts together with auditors’ report thereon. · Biodiversity heritage sites- the State Government may, from time to time in consultation with the local bodies, notify in the Official Gazette, of areas of biodiversity importance as biodiversity heritage sites under this Act. Hence, we can say that the Biological Diversity Act, of 2002 was a result of India’s attempt to realize the objectives enshrined in the UN CBD 1992, and helps in the conservation of biological resources, managing its sustainable use, and enabling fair and equitable sharing benefits.
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"प्लासी का लड़ाई एक सामान्य लड़ाई न होकर षड्यंत्र का प्रतिफल था।" चर्चा कीजिये ।(200 शब्द)
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दृष्टिकोण : प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त परिचय दीजिये। प्लासी युद्ध के कारणों की चर्चा करते हुए स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार यह षड्यंत्र का प्रतिफल था। उत्तर : 18 वीं सदी मे बंगाल मे ईस्ट इंडिया कंपनी अपना व्यापारिक प्रभाव बढ़ाना चाहती थी। कंपनी को 1717 मे मिले दस्तक का प्रयोग करके बंगाल मे अवैध व्यापार कर रही थी, जिससे बंगाल को राजस्व का काफी नुकसान हो रहा था । नवाब 1756 कि संधि से मुक्त होना चाहता था।सिराजुद्दौला के शुरु से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ संघर्ष प्रारम्भ हो गया। 23 जून 1757 को दोनों के बीच युद्ध छिड़ा जिसे प्लासी युद्ध के नाम से जाना जाता है। प्लासी के युद्ध के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - अंग्रेजों ने कलकत्ता पर आक्रमण कर दिया जिसमे अंग्रेजों की विजय हुई कलकत्ता नवाब के चंगुल से मुक्त हो गया। 9 फरवरी 1757 को दोनों के बीच अली नगर की संधि हुई और अंग्रेजों को फिर से सभी तरह के व्यवहारिक अधिकार उपलब्ध हो गया। अंग्रेजों ने फ्रांसीसीयों की बस्ती चन्दनगर पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने अधीन कर लिया। फ्रांसिसी नवाब के मित्र थे इसलिए नवाब इस घटना से काफी क्षुब्ध थे। इस समय यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध छिड़ने की आशंका थी। जिसमें इंगलैण्ड और फ्रांस ने एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध की आशंका से अपनी अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए किलेबन्दी करना शुरु किया जिसे नवाब बर्दास्त नहीं कर सका। इस युद्ध मे बंगाल के नवाब के पास बड़ी सेना के बावजूद उसकी हार हुई जिसका सर्वप्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा नवाब के विरुद्ध षड्यंत्र था।प्रारंभ से ही अंग्रेज बंगाल पर पूर्णतः अधिकार चाहते थे क्योंकि बंगाल एक उपजाऊ और धनी प्रांत था। अगर बंगाल पर कम्पनी का अधिकार हो जाता तो उसे अधिक से अधिक धन कमाने की आशा थी। इतना ही नहीं वे हिन्दु व्यापारियों को अपनी ओर मिलाकर उन्हें नवाब के विरुद्ध भड़काना शुरु किया। अंग्रेजों ने नवाब को पदच्युत करने के लिए षडयंत्र रचा जिसमे नवाब के भी कई लोग शामिल थे जैसे- रायदुर्लभ प्रधान सेनापति मीरजाफर आदि। अंग्रेजों ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का प्रलोभन दिया और इसके साथ गुप्त संधि की इस संधि के पश्चात नवाब पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होने अलीनगर की संधि का उल्लघंन किया है और उसी का बहाना बनाकर अंग्रेज ने नवाब पर आक्रमण कर दिया। प्लासी युद्ध के मैदान में युद्ध प्रारंभ हुआ, मीरजाफर अंग्रेजों से संधि कर चुका था फलत: नवाब की पराजय हुई तथा मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया। प्लासी युद्ध के द्वारा बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली गई। प्लासी का युद्ध वास्तव में कोई युद्ध नहीं था यह एक षडयंत्र और विश्वासघाति का प्रदर्शन था। इसे विश्व के निर्णायक युद्धों में स्थान उपलब्ध है।
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##Question:"प्लासी का लड़ाई एक सामान्य लड़ाई न होकर षड्यंत्र का प्रतिफल था।" चर्चा कीजिये ।(200 शब्द)##Answer:दृष्टिकोण : प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त परिचय दीजिये। प्लासी युद्ध के कारणों की चर्चा करते हुए स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार यह षड्यंत्र का प्रतिफल था। उत्तर : 18 वीं सदी मे बंगाल मे ईस्ट इंडिया कंपनी अपना व्यापारिक प्रभाव बढ़ाना चाहती थी। कंपनी को 1717 मे मिले दस्तक का प्रयोग करके बंगाल मे अवैध व्यापार कर रही थी, जिससे बंगाल को राजस्व का काफी नुकसान हो रहा था । नवाब 1756 कि संधि से मुक्त होना चाहता था।सिराजुद्दौला के शुरु से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ संघर्ष प्रारम्भ हो गया। 23 जून 1757 को दोनों के बीच युद्ध छिड़ा जिसे प्लासी युद्ध के नाम से जाना जाता है। प्लासी के युद्ध के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - अंग्रेजों ने कलकत्ता पर आक्रमण कर दिया जिसमे अंग्रेजों की विजय हुई कलकत्ता नवाब के चंगुल से मुक्त हो गया। 9 फरवरी 1757 को दोनों के बीच अली नगर की संधि हुई और अंग्रेजों को फिर से सभी तरह के व्यवहारिक अधिकार उपलब्ध हो गया। अंग्रेजों ने फ्रांसीसीयों की बस्ती चन्दनगर पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने अधीन कर लिया। फ्रांसिसी नवाब के मित्र थे इसलिए नवाब इस घटना से काफी क्षुब्ध थे। इस समय यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध छिड़ने की आशंका थी। जिसमें इंगलैण्ड और फ्रांस ने एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध की आशंका से अपनी अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए किलेबन्दी करना शुरु किया जिसे नवाब बर्दास्त नहीं कर सका। इस युद्ध मे बंगाल के नवाब के पास बड़ी सेना के बावजूद उसकी हार हुई जिसका सर्वप्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा नवाब के विरुद्ध षड्यंत्र था।प्रारंभ से ही अंग्रेज बंगाल पर पूर्णतः अधिकार चाहते थे क्योंकि बंगाल एक उपजाऊ और धनी प्रांत था। अगर बंगाल पर कम्पनी का अधिकार हो जाता तो उसे अधिक से अधिक धन कमाने की आशा थी। इतना ही नहीं वे हिन्दु व्यापारियों को अपनी ओर मिलाकर उन्हें नवाब के विरुद्ध भड़काना शुरु किया। अंग्रेजों ने नवाब को पदच्युत करने के लिए षडयंत्र रचा जिसमे नवाब के भी कई लोग शामिल थे जैसे- रायदुर्लभ प्रधान सेनापति मीरजाफर आदि। अंग्रेजों ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का प्रलोभन दिया और इसके साथ गुप्त संधि की इस संधि के पश्चात नवाब पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होने अलीनगर की संधि का उल्लघंन किया है और उसी का बहाना बनाकर अंग्रेज ने नवाब पर आक्रमण कर दिया। प्लासी युद्ध के मैदान में युद्ध प्रारंभ हुआ, मीरजाफर अंग्रेजों से संधि कर चुका था फलत: नवाब की पराजय हुई तथा मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया। प्लासी युद्ध के द्वारा बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली गई। प्लासी का युद्ध वास्तव में कोई युद्ध नहीं था यह एक षडयंत्र और विश्वासघाति का प्रदर्शन था। इसे विश्व के निर्णायक युद्धों में स्थान उपलब्ध है।
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The role of the Governor has been often criticized for favoring the Central Government. Give reasons why the Governor is unable to fulfill his duty impartially? Also, suggest measures that can be taken to avoid such instances. (150 words/10 marks)
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Approach: Introduction: Introduce the office of governor. Central body: (a) Reasons why the governor is unable to fulfil its duty impartially (b) Measures that can be taken 3. Conclusion: Conclude with The governor is the chief executive head of the state. But, like the president, he is a nominal executive head (titular or constitutional head). The governor also acts as a representative of the central government. Therefore, the office of governor has a dual role. Reasons why the governor is unable to fulfil his duty impartially- 1) appointed by the centre, no role of the state in the appointment, 2) no fixed tenure, can be removed by President any time, 3) Arbitrary use of Article 356 4) use of discretionary power wrt appointment of CM when no party has a clear majority 5) sometimes are seen as Post-retirement post 6) appointment of political personality, conflict of ideologies 7) wrt reservation of bill for president ascent Measures that can be taken- 1) fixed tenure 2) taking views of CM into consideration 3) proper scrutiny before the use of Article 356 4) Follow Sarkaria commission recommendation 5) not appointing political personalities 6) should be from outside state 7) making him illegible for a further appointment The office of the governor must uphold its dignity before it becomes irrelevant. The central government shall bring in reforms in order to revive and revitalise and uphold the trust in the office of governor.
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##Question:The role of the Governor has been often criticized for favoring the Central Government. Give reasons why the Governor is unable to fulfill his duty impartially? Also, suggest measures that can be taken to avoid such instances. (150 words/10 marks)##Answer: Approach: Introduction: Introduce the office of governor. Central body: (a) Reasons why the governor is unable to fulfil its duty impartially (b) Measures that can be taken 3. Conclusion: Conclude with The governor is the chief executive head of the state. But, like the president, he is a nominal executive head (titular or constitutional head). The governor also acts as a representative of the central government. Therefore, the office of governor has a dual role. Reasons why the governor is unable to fulfil his duty impartially- 1) appointed by the centre, no role of the state in the appointment, 2) no fixed tenure, can be removed by President any time, 3) Arbitrary use of Article 356 4) use of discretionary power wrt appointment of CM when no party has a clear majority 5) sometimes are seen as Post-retirement post 6) appointment of political personality, conflict of ideologies 7) wrt reservation of bill for president ascent Measures that can be taken- 1) fixed tenure 2) taking views of CM into consideration 3) proper scrutiny before the use of Article 356 4) Follow Sarkaria commission recommendation 5) not appointing political personalities 6) should be from outside state 7) making him illegible for a further appointment The office of the governor must uphold its dignity before it becomes irrelevant. The central government shall bring in reforms in order to revive and revitalise and uphold the trust in the office of governor.
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"भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में रिजर्व बैंक( RBI) की महत्वपूर्ण भूमिका है", कथन के विशेष संदर्भ में रिजर्व बैंक के कार्यों की विस्तृत समीक्षा कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) "The Reserve Bank (RBI) has an important role in ensuring economic stability in the Indian economy", in detail, review the functions of the Reserve Bank with special reference to the statement. (150-200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में आर्थिक स्थिरता को स्पष्ट कीजिये प्रथम भाग में केन्द्रीय बैंक के रूप में रिजर्व बैंक का परिचय दीजिये दूसरे भाग में RBI के कार्यों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में निष्कर्ष के रूप में RBI के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| किसी अवांछित आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता होने को किसी अर्थव्यवस्था की स्थिरता के रूप में समझ सकते हैं| किसी अर्थव्यवस्था में नियंत्रित मुद्रास्फीति, मूल्य स्थिरता, निरंतर होती आर्थिक वृद्धि, सुदृढ़ मौद्रिक प्रणाली, विनमय दर को स्थिर बनाए रखना, पूर्ण रोजगार की स्थिति और न्यूनतम गरीबी आदि कारक उस अर्थव्यवस्था की स्थिरता को सुनिश्चित करते हैं| इन कारकों की पूर्ति का कार्य उस अर्थव्यवस्था में उस देश का केन्द्रीय बैंक करता है| भारत में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने का कार्य भारतीय रिजर्व बैंक करता है| भारतीय रिजर्व बैंक देश का केन्द्रीय बैंक है अर्थात मौद्रिक प्रणाली का शीर्ष संस्थान है| हिल्टन यंग समिति की संस्तुति पर RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को RBI अधिनियम 1934 के अंतर्गत की गयी थी| इसकी स्थापना 5 करोड़ रूपये की अंश पूँजी के साथ निजी क्षेत्र में की गयी थी| 1 जनवरी 1949 को RBI का राष्ट्रीयकरण किया गया था| इसकी स्थापना कलकत्ता में हुई थी लेकिन बाद में इसका मुख्यालय मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया| रिजर्व बैंक भारत की मौद्रिक नीति का संचालक है| मौद्रिक नीति, देश की आर्थिक नीति का वह घटक है जिसके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (मुद्रा एवं साख) का नियमन करता है| यह वह नीति है जिसके माध्यम से RBI अपने अधीनस्थ उपकरणों(CRR, SLR आदि) का प्रयोग कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मुद्रा एवं साख की उपलब्धता, उसका अंतिम प्रयोग, मुद्रा एवं साख की लागत(ब्याजदर)का नियमन करता है| रिजर्व बैंक निम्नलिखित गतिविधियों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करता है| RBI के कार्य मुद्रा का निर्गमन RBI अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रा का निर्गमन करना है, मुद्रा अफ्र्थव्यव्स्था में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का आधार होती है| RBI 2 रूपये तक के सिक्के/नोट जारी करता है, इन पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते है जबकि 1 रूपये के नोट/सिक्के पर वित्त मंत्रालय के वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं क्योंकि इन्हें भारत सरकार निर्गमित करती है सरकार का बैंक RBI सरकार का बैंक है, केंद्र एवं राज्य सरकारों को RBI के पास खाता रखना होता है, केंद्र एवं राज्य सरकारों के सभी वित्तीय लेन-देन RBI के माध्यम से होते हैं, RBI, सरकार को वित्तीय मामलों में परामर्श भी देता है यह सरकारों(केंद्र-राज्य) को ऋण प्रदान करता है RBI सरकारी प्रतिभूतियों/बांडो के क्रय-विक्रय के माध्यम सेसार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करता है अभी इसके लिए सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी का प्रावधान किया जा रहा है बैंकों का बैंक यह सभी बैंकों का नियमन करना है तथा अन्य सुविधाएं भी देता है| बैंकों को RBI के पास खाता एवं आरक्षित कोष रखना होता है RBI बैंकों को परामर्श भी देता है तथा बैंकों के पारस्परिक लेन-देनों का समाशोधन (clearance) कराता है यह आर्थिक संकट के समय में भी ऋण प्रदान करता है इसलिए RBI को अंतिम ऋणदाता भी कहा जाता है RBI बैंकों एवं कुछ NBFCs का पर्यवेक्षण और नियमन भी करता है भुगतान प्रणाली का पर्यवेक्षक देश एवं विदेश से कोष स्थानान्तरण मानदंडों का नियमन करता है चेक,DD,पोस्टल आर्डर, मनी आर्डर, NEFT, RTGS, IMPS(त्वरित भुगतान प्रणाली), कार्ड पेमेंट सिस्टम(ATM) आदि कोष स्थानान्तरण के माध्यम हैं| अभी इस कार्य को अलग करने की बात की जा रही है| भुगतान प्रणाली के पर्यवेक्षक के रूप में भुगतान विनियामक बोर्ड की संकल्पना की गयी है| विदेशी पूँजी भण्डार का संरक्षक भारत में केवल RBI एवं उसके अधिकृत एजेंट ही विदेशी पूँजी/मुद्रा में लेन-देन कर सकते हैं अधिकाँश बड़े बैंक ही RBI के अधिकृत एजेंट होते हैं, इनके पास उपलब्ध विदेशी पूँजी पर RBI की निगरानी में होते हैं, ये केवल एक सीमा तक ही विदेशी पूँजी रख सकते हैं| विदेशी मुद्रा विनिमय का नियंत्रण RBI रूपये को विदेशी मुद्राओं में एवं विदेशी मुद्राओं को रूपये में परिवर्तित करने सम्बन्धी मानदंड(परिवर्तनीयता) निर्धारित करता है, इनका निर्धारण FEMA अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित होते हैं RBI रूपये के विनिमय दर का स्थिरीकरण भी करता है और मुद्रा के मूल्य को वांछित स्तर पर बनाए रखता है ताकि बाह्य अस्थिरताओं से भारतीय अर्थव्यवस्था की रक्षा की जा सके| मौद्रिक आंकड़ों का प्रकाशन RBI प्रत्येक 6 महीने पर मौद्रिक नीति रिपोर्ट जारी करता है इसके अतिरिक्त RBI करेंसी और फाइनेंस रिपोर्ट, वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट और मासिक पत्रिका के रूप में RBI बुलेटिन जारी करता है इनके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था की मौद्रिक स्थिति को स्पष्ट करता है मुद्रा एवं साख का नियंत्रण RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति का नियमन करता है इसके लिए CRR, SLR आदि उपायों का प्रयोग करता है विकासात्मक कार्य वित्तीय समावेशन का प्रोत्साहन, वित्तीय संस्थानों में स्थिरता बनाये रखना, मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना आदि उपायों के माध्यम से RBI भारत मेंआर्थिक विकास का प्रोत्साहन करता है| उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक को व्यापक अधिदेश प्राप्त है| इसी अधिदेश के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है| आर्थिक स्थिरता ही भविष्य में आर्थिक विकास की संभावना का निर्माण करती है| इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक न केवल आर्थिक स्थिरता बल्कि आर्थिक विकास की परिस्थितियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
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##Question:"भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में रिजर्व बैंक( RBI) की महत्वपूर्ण भूमिका है", कथन के विशेष संदर्भ में रिजर्व बैंक के कार्यों की विस्तृत समीक्षा कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) "The Reserve Bank (RBI) has an important role in ensuring economic stability in the Indian economy", in detail, review the functions of the Reserve Bank with special reference to the statement. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में आर्थिक स्थिरता को स्पष्ट कीजिये प्रथम भाग में केन्द्रीय बैंक के रूप में रिजर्व बैंक का परिचय दीजिये दूसरे भाग में RBI के कार्यों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में निष्कर्ष के रूप में RBI के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| किसी अवांछित आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता होने को किसी अर्थव्यवस्था की स्थिरता के रूप में समझ सकते हैं| किसी अर्थव्यवस्था में नियंत्रित मुद्रास्फीति, मूल्य स्थिरता, निरंतर होती आर्थिक वृद्धि, सुदृढ़ मौद्रिक प्रणाली, विनमय दर को स्थिर बनाए रखना, पूर्ण रोजगार की स्थिति और न्यूनतम गरीबी आदि कारक उस अर्थव्यवस्था की स्थिरता को सुनिश्चित करते हैं| इन कारकों की पूर्ति का कार्य उस अर्थव्यवस्था में उस देश का केन्द्रीय बैंक करता है| भारत में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने का कार्य भारतीय रिजर्व बैंक करता है| भारतीय रिजर्व बैंक देश का केन्द्रीय बैंक है अर्थात मौद्रिक प्रणाली का शीर्ष संस्थान है| हिल्टन यंग समिति की संस्तुति पर RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को RBI अधिनियम 1934 के अंतर्गत की गयी थी| इसकी स्थापना 5 करोड़ रूपये की अंश पूँजी के साथ निजी क्षेत्र में की गयी थी| 1 जनवरी 1949 को RBI का राष्ट्रीयकरण किया गया था| इसकी स्थापना कलकत्ता में हुई थी लेकिन बाद में इसका मुख्यालय मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया| रिजर्व बैंक भारत की मौद्रिक नीति का संचालक है| मौद्रिक नीति, देश की आर्थिक नीति का वह घटक है जिसके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (मुद्रा एवं साख) का नियमन करता है| यह वह नीति है जिसके माध्यम से RBI अपने अधीनस्थ उपकरणों(CRR, SLR आदि) का प्रयोग कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मुद्रा एवं साख की उपलब्धता, उसका अंतिम प्रयोग, मुद्रा एवं साख की लागत(ब्याजदर)का नियमन करता है| रिजर्व बैंक निम्नलिखित गतिविधियों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करता है| RBI के कार्य मुद्रा का निर्गमन RBI अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रा का निर्गमन करना है, मुद्रा अफ्र्थव्यव्स्था में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का आधार होती है| RBI 2 रूपये तक के सिक्के/नोट जारी करता है, इन पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते है जबकि 1 रूपये के नोट/सिक्के पर वित्त मंत्रालय के वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं क्योंकि इन्हें भारत सरकार निर्गमित करती है सरकार का बैंक RBI सरकार का बैंक है, केंद्र एवं राज्य सरकारों को RBI के पास खाता रखना होता है, केंद्र एवं राज्य सरकारों के सभी वित्तीय लेन-देन RBI के माध्यम से होते हैं, RBI, सरकार को वित्तीय मामलों में परामर्श भी देता है यह सरकारों(केंद्र-राज्य) को ऋण प्रदान करता है RBI सरकारी प्रतिभूतियों/बांडो के क्रय-विक्रय के माध्यम सेसार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करता है अभी इसके लिए सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी का प्रावधान किया जा रहा है बैंकों का बैंक यह सभी बैंकों का नियमन करना है तथा अन्य सुविधाएं भी देता है| बैंकों को RBI के पास खाता एवं आरक्षित कोष रखना होता है RBI बैंकों को परामर्श भी देता है तथा बैंकों के पारस्परिक लेन-देनों का समाशोधन (clearance) कराता है यह आर्थिक संकट के समय में भी ऋण प्रदान करता है इसलिए RBI को अंतिम ऋणदाता भी कहा जाता है RBI बैंकों एवं कुछ NBFCs का पर्यवेक्षण और नियमन भी करता है भुगतान प्रणाली का पर्यवेक्षक देश एवं विदेश से कोष स्थानान्तरण मानदंडों का नियमन करता है चेक,DD,पोस्टल आर्डर, मनी आर्डर, NEFT, RTGS, IMPS(त्वरित भुगतान प्रणाली), कार्ड पेमेंट सिस्टम(ATM) आदि कोष स्थानान्तरण के माध्यम हैं| अभी इस कार्य को अलग करने की बात की जा रही है| भुगतान प्रणाली के पर्यवेक्षक के रूप में भुगतान विनियामक बोर्ड की संकल्पना की गयी है| विदेशी पूँजी भण्डार का संरक्षक भारत में केवल RBI एवं उसके अधिकृत एजेंट ही विदेशी पूँजी/मुद्रा में लेन-देन कर सकते हैं अधिकाँश बड़े बैंक ही RBI के अधिकृत एजेंट होते हैं, इनके पास उपलब्ध विदेशी पूँजी पर RBI की निगरानी में होते हैं, ये केवल एक सीमा तक ही विदेशी पूँजी रख सकते हैं| विदेशी मुद्रा विनिमय का नियंत्रण RBI रूपये को विदेशी मुद्राओं में एवं विदेशी मुद्राओं को रूपये में परिवर्तित करने सम्बन्धी मानदंड(परिवर्तनीयता) निर्धारित करता है, इनका निर्धारण FEMA अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित होते हैं RBI रूपये के विनिमय दर का स्थिरीकरण भी करता है और मुद्रा के मूल्य को वांछित स्तर पर बनाए रखता है ताकि बाह्य अस्थिरताओं से भारतीय अर्थव्यवस्था की रक्षा की जा सके| मौद्रिक आंकड़ों का प्रकाशन RBI प्रत्येक 6 महीने पर मौद्रिक नीति रिपोर्ट जारी करता है इसके अतिरिक्त RBI करेंसी और फाइनेंस रिपोर्ट, वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट और मासिक पत्रिका के रूप में RBI बुलेटिन जारी करता है इनके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था की मौद्रिक स्थिति को स्पष्ट करता है मुद्रा एवं साख का नियंत्रण RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति का नियमन करता है इसके लिए CRR, SLR आदि उपायों का प्रयोग करता है विकासात्मक कार्य वित्तीय समावेशन का प्रोत्साहन, वित्तीय संस्थानों में स्थिरता बनाये रखना, मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना आदि उपायों के माध्यम से RBI भारत मेंआर्थिक विकास का प्रोत्साहन करता है| उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक को व्यापक अधिदेश प्राप्त है| इसी अधिदेश के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है| आर्थिक स्थिरता ही भविष्य में आर्थिक विकास की संभावना का निर्माण करती है| इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक न केवल आर्थिक स्थिरता बल्कि आर्थिक विकास की परिस्थितियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
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India is consistently facing a current account deficit in case of the foreign trade. Discuss. (150 words|10 marks)
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Approach : Introduce an answer by defining the current account deficit. Produce the data about the current account deficit in the case of India Highlight the reasons for persistent current account deficit. Suggest measures to overcome this issue. Answer : Current Account Deficit is one of the key indicators of an economy’s health. The current account deficit is a measurement of a country’s trade where the value of the goods and services it imports exceeds the value of the products it exports. In the case of India, since independence, India is facing a current account deficit primarily because of the developing nation.India’s current account deficit (CAD) widened to $57.2 billion, or 2.1% of GDP, in FY19 from 1.8% a year ago, the Reserve Bank of India (RBI) said in its report. There are two major components to measure the current account. One is a mercantile trade that measures the import and export of goods. Second is trade in services. In the case of India. The reasons for persistent current account deficit 1. Inelastic demand Petroleum products, Engineering goods, heavy technology, precious metals, etc form the major chunk of India"s import. Demand for these products is inelastic. So increasing prices of these products automatically increase the CAD for India. 2. The decline in competitiveness/export sector There has been a decline in the exporting manufacturing sector because India has struggled to compete in the international market. The cost of manufacturing of goods is greater in India. This has led to a persistent deficit in the balance of trade. 3. Higher inflation Inflation rises faster than our main competitors then it will make exports less competitive and imports more competitive. This will lead to deterioration in the current account. India has witnessed persistence in inflation over the period. However, inflation may also lead to a depreciation in the currency to offset this decline in competitiveness. 4. Economic growth When economic growth slows down, the overall production of the exporting goods gets declined. Indian economy barring few years struggled to achieve high economic growth.Research at the Indira Gandhi Institute of Development Research shows that Indian CAD is countercyclical. That is, it rises when output falls and not when demand rises. 5. Failure of Govt policies Schemes like the Exclusive Economic Zone, Manufacturing Hubs, etc did not bring the expected growth in the export of goods. For a developing country like India, CAD is not a major issue if it remains in a controllable limit. However, India needs to take more concentrated efforts to tackle the issue of CAD. Focus on the growth of export of services can be done. Attracting more FDI can also provide an additional cushion against the CAD.
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##Question:India is consistently facing a current account deficit in case of the foreign trade. Discuss. (150 words|10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by defining the current account deficit. Produce the data about the current account deficit in the case of India Highlight the reasons for persistent current account deficit. Suggest measures to overcome this issue. Answer : Current Account Deficit is one of the key indicators of an economy’s health. The current account deficit is a measurement of a country’s trade where the value of the goods and services it imports exceeds the value of the products it exports. In the case of India, since independence, India is facing a current account deficit primarily because of the developing nation.India’s current account deficit (CAD) widened to $57.2 billion, or 2.1% of GDP, in FY19 from 1.8% a year ago, the Reserve Bank of India (RBI) said in its report. There are two major components to measure the current account. One is a mercantile trade that measures the import and export of goods. Second is trade in services. In the case of India. The reasons for persistent current account deficit 1. Inelastic demand Petroleum products, Engineering goods, heavy technology, precious metals, etc form the major chunk of India"s import. Demand for these products is inelastic. So increasing prices of these products automatically increase the CAD for India. 2. The decline in competitiveness/export sector There has been a decline in the exporting manufacturing sector because India has struggled to compete in the international market. The cost of manufacturing of goods is greater in India. This has led to a persistent deficit in the balance of trade. 3. Higher inflation Inflation rises faster than our main competitors then it will make exports less competitive and imports more competitive. This will lead to deterioration in the current account. India has witnessed persistence in inflation over the period. However, inflation may also lead to a depreciation in the currency to offset this decline in competitiveness. 4. Economic growth When economic growth slows down, the overall production of the exporting goods gets declined. Indian economy barring few years struggled to achieve high economic growth.Research at the Indira Gandhi Institute of Development Research shows that Indian CAD is countercyclical. That is, it rises when output falls and not when demand rises. 5. Failure of Govt policies Schemes like the Exclusive Economic Zone, Manufacturing Hubs, etc did not bring the expected growth in the export of goods. For a developing country like India, CAD is not a major issue if it remains in a controllable limit. However, India needs to take more concentrated efforts to tackle the issue of CAD. Focus on the growth of export of services can be done. Attracting more FDI can also provide an additional cushion against the CAD.
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पूर्व मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य में नागर एवं द्रविड़ शैली एक दूसरे से कैसे भिन्न थे? उक्त सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए पल्लव शैली की विशेषताओं की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द , अंक-10 ) How did Nagara and Dravidian styles differ from each other in early medieval temple architecture? Keeping the above context in mind, discuss the features of the Pallava style. (150-200 words, Issue-10)
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दृष्टिकोण : परिचय पूर्व मध्यकाल का संक्षेप चर्चा दोनों शैलीयों में अंतर द्रविड़ शैली की की मुख्य उप शैलियाँ इन उपशैलियाँ की मुख्य विशेषता नागर एवं द्रविड़ शैली का मुख्य प्रभाव पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य की तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ जो नागर शैली , बेसर शैली एवं द्रविड़ शैली के रूप में जानी जाती हैं | इसमें उत्तर भारत में नागर एवं कृष्णा नदी के दक्षिण में द्रविड़ शैली विकसित हुई जो भारत के मंदिर स्थापत्य के लिए एक महान विरासत को जन्म दिया | नागर शैली एवं द्रविड़ शैली में मुख्य अंतर नागर शैली का क्षेत्र - उत्तर भारत में ओडिशा से लेकर गुजरात तक था जबकि द्रविड़ शैली का विस्तार क्षेत्र- सुदूर दक्षिण में ,कृष्णा नदी के दक्षिण तक था नागर शैली के संरक्षक - चालुक्य ,चौहान ,गंग,प्रतिहार इत्यादि वंश थे जबकि द्रविड़ शैली का संरक्षक - पल्लव ,चोल,पाण्डेय,विजयनगर थे मुख्य अंतर नागर शैली में मंदिरों का निर्माण वर्गाकार आधार पर किया गया जबकि द्रविड़ शैली में निर्मित मंदिर का निर्माण आयताकार आधार पर किया गया है| नागर शैली में शिखर की संरचना पर्वत के सामान है जबकि द्रविड़ शैली में शिखर पिरामिड के सामान है| नागर शैली में शिखर के ऊपर रैखिक आकार के आमलक है और उसके ऊपर कलश अवस्थित होते हैं जबकि द्रविड़ शैली में कलश के स्थान पर बेलनाकार संरचना उपस्थित है| नागर शैली में गर्भ गृह के सामने मंडप एवं अर्द्ध मंडप अवस्थित होते हैं जबकि द्रविड़ शैली में यह संरचना आवश्यक नहीं है| नागर शैली में द्वार के रूप में सामान्य तोरण की व्यवस्था है जबकि द्रविड़ शैली में द्वार के स्थान पर गोपुरम अवस्थित होते हैं| नागर शैली में मंदिर का सामान्य परिसर होता है जबकि द्रविड़ शैली में विशाल प्रांगन उपस्थित होते हैं| नागर शैली में मंदिरों की ऊँचाई सामान्यतः द्रविड़ शैली की तुलना में कम होती है | द्रविड़ शैली पल्लव कालीन मंदिर स्थापत्य शैलियाँ - महेंद्र्वैर्मन , नरसिंह , राजसिंह शैली महेन्द्रवर्मन शैली 610 से 640 पहाड़ों को काटकर इन मंदिरों को मंडप कहा गया है पञ्च पांडव मंडप मामल शैली /नरसिंह वेर्मन इस काल में मंडप के साथ-साथ एकाश्मक पत्थर से मंदिर का निर्माण इन मंदिरों को रथ कहा गया है जैसे- महाबली पुरम ,सप्त पैगोडा रथ राजसिंह शैली द्रविड़ स्थापत्य से सम्बंधित सभी विशेषताओं के साक्ष्य मिल्न लगते हैं इसी चरण में संरचनात्मक मंदिरों का भी निर्माण मिलने लगता है जैसे- शोर मंदिर (महाबलीपुरम) , कैलाश नाथ मंदिर (कांची ) नंदी वेर्मन शैली ( 800 से लेकर 900) उपरोक्त सभी विशेषताएं मुक्तेश्वर मंदिर चोल कालीन स्थापत्य विशालता एवं अलंकरण का विशेष ध्यान रखा गया है नागर एवं द्रविड़ शैली अपनी अंतरों के साथ-साथ पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया जिसे हिन्दू मंदिरों के विशाल उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है| भविष्य में चलकर इन दोनों शैलियों की विशेषताओं को लेकर एक नयी शैली का विकास हुआ जिसे बेसर शैली कहा गया |
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##Question:पूर्व मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य में नागर एवं द्रविड़ शैली एक दूसरे से कैसे भिन्न थे? उक्त सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए पल्लव शैली की विशेषताओं की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द , अंक-10 ) How did Nagara and Dravidian styles differ from each other in early medieval temple architecture? Keeping the above context in mind, discuss the features of the Pallava style. (150-200 words, Issue-10)##Answer:दृष्टिकोण : परिचय पूर्व मध्यकाल का संक्षेप चर्चा दोनों शैलीयों में अंतर द्रविड़ शैली की की मुख्य उप शैलियाँ इन उपशैलियाँ की मुख्य विशेषता नागर एवं द्रविड़ शैली का मुख्य प्रभाव पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य की तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ जो नागर शैली , बेसर शैली एवं द्रविड़ शैली के रूप में जानी जाती हैं | इसमें उत्तर भारत में नागर एवं कृष्णा नदी के दक्षिण में द्रविड़ शैली विकसित हुई जो भारत के मंदिर स्थापत्य के लिए एक महान विरासत को जन्म दिया | नागर शैली एवं द्रविड़ शैली में मुख्य अंतर नागर शैली का क्षेत्र - उत्तर भारत में ओडिशा से लेकर गुजरात तक था जबकि द्रविड़ शैली का विस्तार क्षेत्र- सुदूर दक्षिण में ,कृष्णा नदी के दक्षिण तक था नागर शैली के संरक्षक - चालुक्य ,चौहान ,गंग,प्रतिहार इत्यादि वंश थे जबकि द्रविड़ शैली का संरक्षक - पल्लव ,चोल,पाण्डेय,विजयनगर थे मुख्य अंतर नागर शैली में मंदिरों का निर्माण वर्गाकार आधार पर किया गया जबकि द्रविड़ शैली में निर्मित मंदिर का निर्माण आयताकार आधार पर किया गया है| नागर शैली में शिखर की संरचना पर्वत के सामान है जबकि द्रविड़ शैली में शिखर पिरामिड के सामान है| नागर शैली में शिखर के ऊपर रैखिक आकार के आमलक है और उसके ऊपर कलश अवस्थित होते हैं जबकि द्रविड़ शैली में कलश के स्थान पर बेलनाकार संरचना उपस्थित है| नागर शैली में गर्भ गृह के सामने मंडप एवं अर्द्ध मंडप अवस्थित होते हैं जबकि द्रविड़ शैली में यह संरचना आवश्यक नहीं है| नागर शैली में द्वार के रूप में सामान्य तोरण की व्यवस्था है जबकि द्रविड़ शैली में द्वार के स्थान पर गोपुरम अवस्थित होते हैं| नागर शैली में मंदिर का सामान्य परिसर होता है जबकि द्रविड़ शैली में विशाल प्रांगन उपस्थित होते हैं| नागर शैली में मंदिरों की ऊँचाई सामान्यतः द्रविड़ शैली की तुलना में कम होती है | द्रविड़ शैली पल्लव कालीन मंदिर स्थापत्य शैलियाँ - महेंद्र्वैर्मन , नरसिंह , राजसिंह शैली महेन्द्रवर्मन शैली 610 से 640 पहाड़ों को काटकर इन मंदिरों को मंडप कहा गया है पञ्च पांडव मंडप मामल शैली /नरसिंह वेर्मन इस काल में मंडप के साथ-साथ एकाश्मक पत्थर से मंदिर का निर्माण इन मंदिरों को रथ कहा गया है जैसे- महाबली पुरम ,सप्त पैगोडा रथ राजसिंह शैली द्रविड़ स्थापत्य से सम्बंधित सभी विशेषताओं के साक्ष्य मिल्न लगते हैं इसी चरण में संरचनात्मक मंदिरों का भी निर्माण मिलने लगता है जैसे- शोर मंदिर (महाबलीपुरम) , कैलाश नाथ मंदिर (कांची ) नंदी वेर्मन शैली ( 800 से लेकर 900) उपरोक्त सभी विशेषताएं मुक्तेश्वर मंदिर चोल कालीन स्थापत्य विशालता एवं अलंकरण का विशेष ध्यान रखा गया है नागर एवं द्रविड़ शैली अपनी अंतरों के साथ-साथ पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया जिसे हिन्दू मंदिरों के विशाल उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है| भविष्य में चलकर इन दोनों शैलियों की विशेषताओं को लेकर एक नयी शैली का विकास हुआ जिसे बेसर शैली कहा गया |
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सहायक संधि क्या है? इसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और भारत में ब्रिटिश शासन के विस्तार में इसके महत्व की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) What is Subsidiary alliance? Mention its features and explain its significance in expansion of British rule in India. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण : भूमिका में सहायक संधि प्रणाली का परिचय दीजिये । उत्तर के प्रथम भाग में इस प्रणाली की विशेषताओं की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में तत्कालीन भारत पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में समग्रता में इसके प्रभाव को बताइए उत्तर :- भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल के समय लॉर्ड वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अँग्रेजी राजनीतिक परिधि के अंतर्गत लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया । इसकी सहायता से भारत मे अँग्रेजी सत्ता की श्रेष्ठता स्थापित करने मे सहायता मिली। इसके अंतर्गत भारत के कई राज्य आ गए जैसे - हैदराबाद , मैसूर , तंजौर, अवधा, पेशवा इत्यादि । सहायक संधि की विशेषताएँ - सहायक संधि अपनाने वाले राज्यों को अपनी राजधानी मेब्रिटिश रेजीडेंट (British Resident) रखना होता था। भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कम्पनी के अधीन होंगे. वे कोई युद्ध नहीं करेंगें तथा अन्य राज्यों से बातचीत भी कंपनी के द्वारा ही होगी। बड़े राज्यों को अपने यहां एक ऐसी सेना रखनी होती थी जिसकी कमान कंपनी के हाथों में होती थी. इसका उद्देश्य सार्वजनिक शान्ति (Public peace) बनाए रखना था। इसके लिए उन्हें पूर्ण प्रभुसत्तायुक्त प्रदेश कंपनी को देना था तथा छोटे राज्यों को कंपनी को नकद धन देना था। राज्य कंपनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं रख सकते थे। कंपनी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करेगी तथाकंपनी राज्यों की प्रत्येक प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करेगी। सहायक संधि की विभिन्न शर्तों के कारण देशी राज्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़े , जो निम्नलिखित हैं - देशी रियासतें कंपनी की सर्वोच्चता स्वीकार कर अपनी संप्रभुता खो बैठे। संधि स्वीकार करने के बाद राज्य के सभी आंतरिक कार्यों मे कंपनी का नियंत्रण हो गया तथा कंपनी पर आश्रित हो गए । अँग्रेजी रेजीडेंटों ने राज्यों के प्रशासन मे अत्यधिक हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया था। सहायक संधि प्रणाली को अपनाने वाले राज्य शीघ्र ही दिवालिया हो गए। कंपनी द्वारा राज्य की आय का प्राय: 1/3 भाग आर्थिक सहायता के रूप में लिया जाता था, यह राशि इतनी अधिक होती थी कि लगभग सभी राज्यों पर बकाया रह जाता था। सहायक संधि ने प्रत्येक निर्बल तथा उत्पीड़क राजा की रक्षा की और इस प्रकार वहां की जनता की स्थिति प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई, चूँकि राजा को अब अपनी जनता की स्थिति के विषय में सोचना नहीं था, इसलिए अब जनता के हित उपेक्षित होने लगे। सहायक संधि प्रणाली का व्यापक असर हुआ। इससे अनेक देशी राज्य सहायक संधि के जाल में फँसते चले गए और अन्तत: इन सारे प्रदेशों का विलय अँग्रेजी राज्य में हो गया। यद्यपि कुछ राज्य अभी भी स्वतंत्र थे जिन्हें आने वाले समय में युद्ध की नीति एवं लार्ड डलहौजी की "विलय की नीति के तहत् ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
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##Question:सहायक संधि क्या है? इसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और भारत में ब्रिटिश शासन के विस्तार में इसके महत्व की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) What is Subsidiary alliance? Mention its features and explain its significance in expansion of British rule in India. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में सहायक संधि प्रणाली का परिचय दीजिये । उत्तर के प्रथम भाग में इस प्रणाली की विशेषताओं की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में तत्कालीन भारत पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में समग्रता में इसके प्रभाव को बताइए उत्तर :- भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल के समय लॉर्ड वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अँग्रेजी राजनीतिक परिधि के अंतर्गत लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया । इसकी सहायता से भारत मे अँग्रेजी सत्ता की श्रेष्ठता स्थापित करने मे सहायता मिली। इसके अंतर्गत भारत के कई राज्य आ गए जैसे - हैदराबाद , मैसूर , तंजौर, अवधा, पेशवा इत्यादि । सहायक संधि की विशेषताएँ - सहायक संधि अपनाने वाले राज्यों को अपनी राजधानी मेब्रिटिश रेजीडेंट (British Resident) रखना होता था। भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कम्पनी के अधीन होंगे. वे कोई युद्ध नहीं करेंगें तथा अन्य राज्यों से बातचीत भी कंपनी के द्वारा ही होगी। बड़े राज्यों को अपने यहां एक ऐसी सेना रखनी होती थी जिसकी कमान कंपनी के हाथों में होती थी. इसका उद्देश्य सार्वजनिक शान्ति (Public peace) बनाए रखना था। इसके लिए उन्हें पूर्ण प्रभुसत्तायुक्त प्रदेश कंपनी को देना था तथा छोटे राज्यों को कंपनी को नकद धन देना था। राज्य कंपनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं रख सकते थे। कंपनी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करेगी तथाकंपनी राज्यों की प्रत्येक प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करेगी। सहायक संधि की विभिन्न शर्तों के कारण देशी राज्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़े , जो निम्नलिखित हैं - देशी रियासतें कंपनी की सर्वोच्चता स्वीकार कर अपनी संप्रभुता खो बैठे। संधि स्वीकार करने के बाद राज्य के सभी आंतरिक कार्यों मे कंपनी का नियंत्रण हो गया तथा कंपनी पर आश्रित हो गए । अँग्रेजी रेजीडेंटों ने राज्यों के प्रशासन मे अत्यधिक हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया था। सहायक संधि प्रणाली को अपनाने वाले राज्य शीघ्र ही दिवालिया हो गए। कंपनी द्वारा राज्य की आय का प्राय: 1/3 भाग आर्थिक सहायता के रूप में लिया जाता था, यह राशि इतनी अधिक होती थी कि लगभग सभी राज्यों पर बकाया रह जाता था। सहायक संधि ने प्रत्येक निर्बल तथा उत्पीड़क राजा की रक्षा की और इस प्रकार वहां की जनता की स्थिति प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई, चूँकि राजा को अब अपनी जनता की स्थिति के विषय में सोचना नहीं था, इसलिए अब जनता के हित उपेक्षित होने लगे। सहायक संधि प्रणाली का व्यापक असर हुआ। इससे अनेक देशी राज्य सहायक संधि के जाल में फँसते चले गए और अन्तत: इन सारे प्रदेशों का विलय अँग्रेजी राज्य में हो गया। यद्यपि कुछ राज्य अभी भी स्वतंत्र थे जिन्हें आने वाले समय में युद्ध की नीति एवं लार्ड डलहौजी की "विलय की नीति के तहत् ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
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जर्मनी के एकीकरण मे बिस्मार्क की भूमिका का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द )
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प्रश्न - जर्मनी के एकीकरण मे बिस्मार्क की भूमिका का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर - दृष्टिकोण - प्रश्न की संक्षेप मे भूमिका लिखिए | बिस्मार्क की गृह युद्ध नीति के विभिन्न पहलू बिस्मार्क कीव्यवस्थापिका सभा का प्रारूप | बिस्मार्क की आर्थिक नीति के पहलू | बिस्मार्क और समाजवाद के विविध तत्व | बिस्मार्क की विदेश नीति को बताइये | जर्मनी के एकीकरण की पृष्टभूमि जर्मन विचारकों ने भी सांस्कृतिक ,वैचारिक भूमिका मे योगदान दिया बिस्मार्क की आर्थिक और विदेश नीति का प्रभाव बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण मे लौह एवं रक्त के नीतियों का आधार बनाया | बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए नयी नीति अपनाई थी, जिसके चलते उन्हेंman of blood and iron भी कहा जाता है. बिस्मार्क जनतंत्र का विरोधी और निरंकुश शासन का समर्थक वह राजतंत्र पर किसी प्रकार का संवैधानिक प्रतिबंध नहीं लगाना चाहता था | उसे संसद, संविधान और लोकतंत्र के आदर्शों से घृणा थी. उसका विश्वास था कि जर्मनी के भाग्य का निर्माण राजा ही कर सकता है. उसने क्रांतिकारियों और उदारवादियों की कटु आलोचना की | उसका उद्देश्य ऑस्ट्रिया को जर्मन परिसंघ बाहर निकालना था, क्योंकिएकीकरण के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक ऑस्ट्रिया था.साथ ही वह जर्मनी को यूरोप में प्रमुख शक्ति बनाना चाहता था. उसने प्रशा की सेना का संगठन कर उसे यूरोप का शक्तिशाली राष्ट्र बना दिया. उसने कूटनीतिक माध्यम से ऑस्ट्रिया को कमजोर बनाने का प्रयास किया. बिस्मार्क ऑस्ट्रिया के विरुद्ध रूस से मित्रता चाहता था. बिस्मार्क की गृह नीति नवीन संविधान का निर्माण जर्मनी के एकीकरण के पश्चात जर्मन साम्राज्य के लिए एक संविधान का निर्माण किया गया। इस संविधान को संघात्मक संविधान की संज्ञा प्रदान की जा सकती है। यह 25 छोटे-बड़े राज्यों तथा इम्पीरियल प्रदेश आल्सास व लॉरेन का सम्मिलित संघ राज्य था। इस नवीन संविधान के अनुसार - साम्राज्य- साम्राज्य का प्रमुख सदैव के लिए प्रशा का सम्राट होगा। वह इस संघ का अध्यक्ष रहेगा। शासन की समस्त सत्ता राज्यों की समष्टि में निहित थी जो उसका पय्र ागे विधान-सभा के द्वितीय सदन (साम्राज्य-परिषद्) में अपने प्रतिनिधियों द्वारा करते थे। उसके अधिकार निम्न श्रेणियों में विभक्त किये जाते हैं- (1) साम्राज्य का प्रतिनिधि-वह विदेशी राज्यों तथा संघ में सम्मिलित राज्यों के साम्राज्य का प्रतिनिधि था।बिस्मार्क कीव्यवस्थापिका सभा - (2) साम्राज्य परिषद-राजा को एक समिति की सलाह से कार्य करना था जिसे साम्राज्य-परिषद् कहते हैं। इस समिति की सहायता से विदेशी संबंधों की स्थापना करना, राजदूतों का स्वागत करने, उसकी नियुक्त करने, युद्ध तथा संधि करने के अधिकार प्राप्त थे। परन्तु उसको आक्रमणात्मक युद्धों के लिये साम्राज्य-परिषद् की अनुमति अवश्य प्राप्त करनी होती है। (3) व्यवस्थापिका-संबंधी अधिकार-उसको विधान-सभा के अधिवेशन आमंत्रित करने, उसको स्थापित करने तथा साम्राज्य-परिषद् की अनुमति से प्रथम भवन को भंग करने का अधिकार प्राप्त था। (4) कार्यपालिका संबंधी अधिकार-उसको विधान के अनुसार कार्य न करने वाले राज्य को दण्ड देने तथा साम्राज्य की विधियों की घोषणा करने तथा उसको कार्यान्वित करने का अधिकार था। चांसलर - इस संविधान में जर्मन साम्राज्य के लिये एक चांसलर की व्यवस्था थी। वह केवल सम्राट के प्रति उत्तरदायी था, न कि जर्मन साम्राज्य की व्यवस्थापिका सभा के। इस प्रकार उसकी नियुक्ति का अधिकार तथा पदच्युत करने का अधिकार जर्मन साम्राज्य के सम्राट में ही निहित था। उसकी सहायता के लिए सचिव थे। वह साम्राज्य-परिषद् का सभापति होता था। जर्मन साम्राज्य के चांसलर पद को बिस्मार्क ने लगभग 20 वर्षों तक सुशोभित किया। केन्द्रीय शक्ति को प्रधान बनाना - बिस्मार्क ने निम्न उपायों द्वारा केन्द्रीय शासन की शक्ति को प्रधानता स्थापित की- इम्पीरियल संस्थाओं की स्थापना - बिस्मार्क ने जमर्न -साम्राज्य में सम्मिलित समस्त राज्यों की पृथक संस्थाओं का अंत करके उनके स्थान पर इम्पीरियल संस्थाओं का निर्माण करना आरंभ किया। समान विधियों को कार्यान्वित करना - जर्मनी के विभिन्न राज्यों में विभिन्न प्रकार की विधियां कार्यान्वित थीं। बिस्मार्क ने समस्त जर्मन साम्राज्य के लियेएक फौजदारी विधि का निर्माण किया। राष्ट्रीय न्यायालयों की स्थापना - बिस्मार्क ने सम्पूर्ण जमर्न साम्राज्य के लिये राष्ट्रीय न्यायालयों की स्थापना की। समान मुद्रा-पद्धति की स्थापना - बिस्मार्क ने 1873 ई. में एक विधि द्वारा समस्त जमर्न साम्राज्य में एक समान मुद्रा पद्धति को लागू किया। उसने मार्क का प्रचलन किया। नए मार्क के सिक्के पर जर्मन सम्राट विलियम प्रथम की तस्वीर अंकित की गई। इम्पीरियल बैंक की स्थापना - 1876 ई. में उसने एक इम्पीरियल बैंक की स्थापना की और साम्राज्य के अंतर्गत बैंकों का उसने संबंध स्थापित किया। रेल, तार और टेलीफोन पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण - रेल, तार और टेलीफोन केन्द्रीय सरकार के अंतर्गत कर दिए। चर्च के प्रति बिस्मार्क की नीति (कुल्चुरकैम्फ) - एक ओर तो सरकार की ओर से कठोर दमनकारी विधियां पास की गई और दूसरी ओर कैथोलिकों का आंदोलन तीव्र होता चला गया। पोप ने समस्त अधिनियमों को अवैध घोषित किया और पादरियों को उनका उल्लंघन करने का आदेश दिया। जितना दमन किया गया उतना ही आन्दोलन ने उग्र रूप धारण किया। 1877 के निर्वाचन में 92 कैथोलिक लोक सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इनका दल सबसे अधिक संख्या में था। अत: कुछ गैर-कैथोलिकों ने भी सरकार की दमन नीति की आलोचना करना आरंभ किया। बिस्मार्क एक उच्च कोटि का राजनीतिज्ञ था। परिस्थितियों से वह समझ गया कि कैथोलिकों का दमन करना सरल कार्य नहीं है। इसके साथ-साथ साम्यवादी विचारधारा का प्रवाह तेजी से हो रहा था जिसका सामना बिस्मार्क को करना था और वह दोनों का एक साथ सामना करने में अवश्य असफल हो जाता। वास्तव में वह साम्यवाद के दमन करने में कैथोलिकों की सहायता प्राप्त करना चाहता था जिसके कारण उसने कैथोलिकों के संघर्ष का अंत करने का निश्चय किया और 1878 ई. में वह पापे से संधि करने में सफल हुआ। किन्तु बिस्मार्क को कैनोसा जाना पड़ा और समझौता करना पड़ा। इतिहास कारों ने इसे बिस्मार्क की पराजय कहा है। बिस्मार्क की आर्थिक नीति बिस्मार्क ने जर्मनी की आर्थिक दशा को उन्नत करने का विशेष प्रयत्न किया जिसके कारण राज्य की आय में वृद्धि हुई और सरकार दृढ़ तथा सुसंगठित सेना रखने में सफल हुई। उसने मुक्त व्यापार की नीति के स्थान पर संरक्षण की नीति को अपनाया। मुक्त व्यापार की नीति इंगलैंड में पर्याप्त सफलता प्राप्त कर चुकी थी। बिस्मार्क स्वयं भी पहले इसी नीति का अनुयायी था। किन्तु कुछ विशेष कारण्ज्ञों के उत्पन्न होने पर उसने संरक्षण नीति को जर्मन के लिये अधिक श्रेयस्कर तथा हितकर समझा। उसके प्रमुख कारण थे- कृषि की शोचनीय अवस्था आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करना उपरोक्त उद्देश्यों कर प्राप्ति हेतु बिस्मार्क ने करों में वृद्धि करने के लिए एक प्रस्ताव प्रस्तावित किया। जिस पर कई माह तक पर्याप्त वाद-विवाद चलता रहा, किन्तु जुलाई 1876 ई. में प्रस्ताव ने अधिनियम का रूप धारण किया और उसको शीघ्र ही कार्यान्वित किया गया। बिस्मार्क और समाजवाद 1878 ई. के उपरांत बिस्मार्क का ध्यान समाजवादियों की ओर आकर्षित हुआ जो व्यावसायिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप मजदूरों को अपनी और आकर्षित कर अपना दृढ़ संगठन कर रहे थे | जर्मनी में समाजवाद का जन्मदाता कार्ल माक्र्स था, किन्तु जर्मनी में आधुनिक समाजवाद तथा धार्मिक आन्दोलन का नेता फर्डिनेन्ड लासाल था। कार्ल माक्र्स और लासाल में सिद्धांत के प्रति पर्याप्त विभिन्नतायें विद्यमान थीं जिसके कारण आरंभ में जर्मनी में समाजवाद को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु 1875 ई. में दोनों में पारस्परिक समझातै के फलस्वरूप समाजवाद को बड़ा पा्र त्े साहन प्राप्त हुआ। उन्होंने सामाजिक प्रजातान्त्रिक दल की स्थापना की। 1878 ई. से पूर्व ही बिस्मार्क उनके सिद्धांत तथा नीति का कट्टर विरोधी था? क्योंकि वे उन सिद्धांतो का प्रतिपादन करते थे जो उसके अपने सिद्धांत से पूर्णतया विरूद्ध थे। वे प्रजातंत्र के समर्थक और सैनिकवाद के विरोधी थे, परन्तु बिस्मार्क प्रजातंत्र का शत्रु और सैनिकवाद का पुजारी था, अत: दोनों में संघर्ष होना अनिवार्य था। बिस्मार्क के समाजवाद के अन्त करने के उपाय - बिस्मार्क ने समाजवाद का जर्मनी से अंत करने के लिये दो उपाय किये (क) समाजवादियों का कठारे तापूर्वक दमन तथा (ख) श्रमिकों की दशा को उन्नत करना। किन्तु समाजवादियों का दमन कोई आसान कार्य नहीं था इसीलिए इस दिशा में बिस्मार्क को आंशिक सफलता ही प्राप्त हो सकी। बिस्मार्ककी विदेश नीति बिस्मार्क की गणना उस महान् राजनीतिज्ञों तथा कूटनीतिज्ञों में की जाती है जिन्होंने अपने युग को अपने विचारों तथा कार्यों द्वारा प्रभावित किया, उसका राजनीतिक प्रभाव उसकी विदेश नीति से स्पष्ट होता है। 1871 से पूर्व उसकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य यूरोप में ंजर्मन राज्य का एकीकरण प्रशा के नेतृत्व में करना था और इस उद्देश्य की पूर्ति उसने दो महान युद्धों द्वारा प्राप्त की। किन्तु 1871 ई. के उपरांत उसका उद्देश्य जर्मन शक्ति को स्थायित्व रूप देना तथा यूरोप में शान्ति की स्थापना करना था। 1871 ई. से 1890 ई. तक, वह जर्मन साम्राज्य के चान्सलर के पद पर आसीन था, तब उसने यूरोपीय राजनीति को बड़ा प्रभावित किया।
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##Question:जर्मनी के एकीकरण मे बिस्मार्क की भूमिका का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द )##Answer: प्रश्न - जर्मनी के एकीकरण मे बिस्मार्क की भूमिका का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर - दृष्टिकोण - प्रश्न की संक्षेप मे भूमिका लिखिए | बिस्मार्क की गृह युद्ध नीति के विभिन्न पहलू बिस्मार्क कीव्यवस्थापिका सभा का प्रारूप | बिस्मार्क की आर्थिक नीति के पहलू | बिस्मार्क और समाजवाद के विविध तत्व | बिस्मार्क की विदेश नीति को बताइये | जर्मनी के एकीकरण की पृष्टभूमि जर्मन विचारकों ने भी सांस्कृतिक ,वैचारिक भूमिका मे योगदान दिया बिस्मार्क की आर्थिक और विदेश नीति का प्रभाव बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण मे लौह एवं रक्त के नीतियों का आधार बनाया | बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए नयी नीति अपनाई थी, जिसके चलते उन्हेंman of blood and iron भी कहा जाता है. बिस्मार्क जनतंत्र का विरोधी और निरंकुश शासन का समर्थक वह राजतंत्र पर किसी प्रकार का संवैधानिक प्रतिबंध नहीं लगाना चाहता था | उसे संसद, संविधान और लोकतंत्र के आदर्शों से घृणा थी. उसका विश्वास था कि जर्मनी के भाग्य का निर्माण राजा ही कर सकता है. उसने क्रांतिकारियों और उदारवादियों की कटु आलोचना की | उसका उद्देश्य ऑस्ट्रिया को जर्मन परिसंघ बाहर निकालना था, क्योंकिएकीकरण के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक ऑस्ट्रिया था.साथ ही वह जर्मनी को यूरोप में प्रमुख शक्ति बनाना चाहता था. उसने प्रशा की सेना का संगठन कर उसे यूरोप का शक्तिशाली राष्ट्र बना दिया. उसने कूटनीतिक माध्यम से ऑस्ट्रिया को कमजोर बनाने का प्रयास किया. बिस्मार्क ऑस्ट्रिया के विरुद्ध रूस से मित्रता चाहता था. बिस्मार्क की गृह नीति नवीन संविधान का निर्माण जर्मनी के एकीकरण के पश्चात जर्मन साम्राज्य के लिए एक संविधान का निर्माण किया गया। इस संविधान को संघात्मक संविधान की संज्ञा प्रदान की जा सकती है। यह 25 छोटे-बड़े राज्यों तथा इम्पीरियल प्रदेश आल्सास व लॉरेन का सम्मिलित संघ राज्य था। इस नवीन संविधान के अनुसार - साम्राज्य- साम्राज्य का प्रमुख सदैव के लिए प्रशा का सम्राट होगा। वह इस संघ का अध्यक्ष रहेगा। शासन की समस्त सत्ता राज्यों की समष्टि में निहित थी जो उसका पय्र ागे विधान-सभा के द्वितीय सदन (साम्राज्य-परिषद्) में अपने प्रतिनिधियों द्वारा करते थे। उसके अधिकार निम्न श्रेणियों में विभक्त किये जाते हैं- (1) साम्राज्य का प्रतिनिधि-वह विदेशी राज्यों तथा संघ में सम्मिलित राज्यों के साम्राज्य का प्रतिनिधि था।बिस्मार्क कीव्यवस्थापिका सभा - (2) साम्राज्य परिषद-राजा को एक समिति की सलाह से कार्य करना था जिसे साम्राज्य-परिषद् कहते हैं। इस समिति की सहायता से विदेशी संबंधों की स्थापना करना, राजदूतों का स्वागत करने, उसकी नियुक्त करने, युद्ध तथा संधि करने के अधिकार प्राप्त थे। परन्तु उसको आक्रमणात्मक युद्धों के लिये साम्राज्य-परिषद् की अनुमति अवश्य प्राप्त करनी होती है। (3) व्यवस्थापिका-संबंधी अधिकार-उसको विधान-सभा के अधिवेशन आमंत्रित करने, उसको स्थापित करने तथा साम्राज्य-परिषद् की अनुमति से प्रथम भवन को भंग करने का अधिकार प्राप्त था। (4) कार्यपालिका संबंधी अधिकार-उसको विधान के अनुसार कार्य न करने वाले राज्य को दण्ड देने तथा साम्राज्य की विधियों की घोषणा करने तथा उसको कार्यान्वित करने का अधिकार था। चांसलर - इस संविधान में जर्मन साम्राज्य के लिये एक चांसलर की व्यवस्था थी। वह केवल सम्राट के प्रति उत्तरदायी था, न कि जर्मन साम्राज्य की व्यवस्थापिका सभा के। इस प्रकार उसकी नियुक्ति का अधिकार तथा पदच्युत करने का अधिकार जर्मन साम्राज्य के सम्राट में ही निहित था। उसकी सहायता के लिए सचिव थे। वह साम्राज्य-परिषद् का सभापति होता था। जर्मन साम्राज्य के चांसलर पद को बिस्मार्क ने लगभग 20 वर्षों तक सुशोभित किया। केन्द्रीय शक्ति को प्रधान बनाना - बिस्मार्क ने निम्न उपायों द्वारा केन्द्रीय शासन की शक्ति को प्रधानता स्थापित की- इम्पीरियल संस्थाओं की स्थापना - बिस्मार्क ने जमर्न -साम्राज्य में सम्मिलित समस्त राज्यों की पृथक संस्थाओं का अंत करके उनके स्थान पर इम्पीरियल संस्थाओं का निर्माण करना आरंभ किया। समान विधियों को कार्यान्वित करना - जर्मनी के विभिन्न राज्यों में विभिन्न प्रकार की विधियां कार्यान्वित थीं। बिस्मार्क ने समस्त जर्मन साम्राज्य के लियेएक फौजदारी विधि का निर्माण किया। राष्ट्रीय न्यायालयों की स्थापना - बिस्मार्क ने सम्पूर्ण जमर्न साम्राज्य के लिये राष्ट्रीय न्यायालयों की स्थापना की। समान मुद्रा-पद्धति की स्थापना - बिस्मार्क ने 1873 ई. में एक विधि द्वारा समस्त जमर्न साम्राज्य में एक समान मुद्रा पद्धति को लागू किया। उसने मार्क का प्रचलन किया। नए मार्क के सिक्के पर जर्मन सम्राट विलियम प्रथम की तस्वीर अंकित की गई। इम्पीरियल बैंक की स्थापना - 1876 ई. में उसने एक इम्पीरियल बैंक की स्थापना की और साम्राज्य के अंतर्गत बैंकों का उसने संबंध स्थापित किया। रेल, तार और टेलीफोन पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण - रेल, तार और टेलीफोन केन्द्रीय सरकार के अंतर्गत कर दिए। चर्च के प्रति बिस्मार्क की नीति (कुल्चुरकैम्फ) - एक ओर तो सरकार की ओर से कठोर दमनकारी विधियां पास की गई और दूसरी ओर कैथोलिकों का आंदोलन तीव्र होता चला गया। पोप ने समस्त अधिनियमों को अवैध घोषित किया और पादरियों को उनका उल्लंघन करने का आदेश दिया। जितना दमन किया गया उतना ही आन्दोलन ने उग्र रूप धारण किया। 1877 के निर्वाचन में 92 कैथोलिक लोक सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इनका दल सबसे अधिक संख्या में था। अत: कुछ गैर-कैथोलिकों ने भी सरकार की दमन नीति की आलोचना करना आरंभ किया। बिस्मार्क एक उच्च कोटि का राजनीतिज्ञ था। परिस्थितियों से वह समझ गया कि कैथोलिकों का दमन करना सरल कार्य नहीं है। इसके साथ-साथ साम्यवादी विचारधारा का प्रवाह तेजी से हो रहा था जिसका सामना बिस्मार्क को करना था और वह दोनों का एक साथ सामना करने में अवश्य असफल हो जाता। वास्तव में वह साम्यवाद के दमन करने में कैथोलिकों की सहायता प्राप्त करना चाहता था जिसके कारण उसने कैथोलिकों के संघर्ष का अंत करने का निश्चय किया और 1878 ई. में वह पापे से संधि करने में सफल हुआ। किन्तु बिस्मार्क को कैनोसा जाना पड़ा और समझौता करना पड़ा। इतिहास कारों ने इसे बिस्मार्क की पराजय कहा है। बिस्मार्क की आर्थिक नीति बिस्मार्क ने जर्मनी की आर्थिक दशा को उन्नत करने का विशेष प्रयत्न किया जिसके कारण राज्य की आय में वृद्धि हुई और सरकार दृढ़ तथा सुसंगठित सेना रखने में सफल हुई। उसने मुक्त व्यापार की नीति के स्थान पर संरक्षण की नीति को अपनाया। मुक्त व्यापार की नीति इंगलैंड में पर्याप्त सफलता प्राप्त कर चुकी थी। बिस्मार्क स्वयं भी पहले इसी नीति का अनुयायी था। किन्तु कुछ विशेष कारण्ज्ञों के उत्पन्न होने पर उसने संरक्षण नीति को जर्मन के लिये अधिक श्रेयस्कर तथा हितकर समझा। उसके प्रमुख कारण थे- कृषि की शोचनीय अवस्था आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करना उपरोक्त उद्देश्यों कर प्राप्ति हेतु बिस्मार्क ने करों में वृद्धि करने के लिए एक प्रस्ताव प्रस्तावित किया। जिस पर कई माह तक पर्याप्त वाद-विवाद चलता रहा, किन्तु जुलाई 1876 ई. में प्रस्ताव ने अधिनियम का रूप धारण किया और उसको शीघ्र ही कार्यान्वित किया गया। बिस्मार्क और समाजवाद 1878 ई. के उपरांत बिस्मार्क का ध्यान समाजवादियों की ओर आकर्षित हुआ जो व्यावसायिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप मजदूरों को अपनी और आकर्षित कर अपना दृढ़ संगठन कर रहे थे | जर्मनी में समाजवाद का जन्मदाता कार्ल माक्र्स था, किन्तु जर्मनी में आधुनिक समाजवाद तथा धार्मिक आन्दोलन का नेता फर्डिनेन्ड लासाल था। कार्ल माक्र्स और लासाल में सिद्धांत के प्रति पर्याप्त विभिन्नतायें विद्यमान थीं जिसके कारण आरंभ में जर्मनी में समाजवाद को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु 1875 ई. में दोनों में पारस्परिक समझातै के फलस्वरूप समाजवाद को बड़ा पा्र त्े साहन प्राप्त हुआ। उन्होंने सामाजिक प्रजातान्त्रिक दल की स्थापना की। 1878 ई. से पूर्व ही बिस्मार्क उनके सिद्धांत तथा नीति का कट्टर विरोधी था? क्योंकि वे उन सिद्धांतो का प्रतिपादन करते थे जो उसके अपने सिद्धांत से पूर्णतया विरूद्ध थे। वे प्रजातंत्र के समर्थक और सैनिकवाद के विरोधी थे, परन्तु बिस्मार्क प्रजातंत्र का शत्रु और सैनिकवाद का पुजारी था, अत: दोनों में संघर्ष होना अनिवार्य था। बिस्मार्क के समाजवाद के अन्त करने के उपाय - बिस्मार्क ने समाजवाद का जर्मनी से अंत करने के लिये दो उपाय किये (क) समाजवादियों का कठारे तापूर्वक दमन तथा (ख) श्रमिकों की दशा को उन्नत करना। किन्तु समाजवादियों का दमन कोई आसान कार्य नहीं था इसीलिए इस दिशा में बिस्मार्क को आंशिक सफलता ही प्राप्त हो सकी। बिस्मार्ककी विदेश नीति बिस्मार्क की गणना उस महान् राजनीतिज्ञों तथा कूटनीतिज्ञों में की जाती है जिन्होंने अपने युग को अपने विचारों तथा कार्यों द्वारा प्रभावित किया, उसका राजनीतिक प्रभाव उसकी विदेश नीति से स्पष्ट होता है। 1871 से पूर्व उसकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य यूरोप में ंजर्मन राज्य का एकीकरण प्रशा के नेतृत्व में करना था और इस उद्देश्य की पूर्ति उसने दो महान युद्धों द्वारा प्राप्त की। किन्तु 1871 ई. के उपरांत उसका उद्देश्य जर्मन शक्ति को स्थायित्व रूप देना तथा यूरोप में शान्ति की स्थापना करना था। 1871 ई. से 1890 ई. तक, वह जर्मन साम्राज्य के चान्सलर के पद पर आसीन था, तब उसने यूरोपीय राजनीति को बड़ा प्रभावित किया।
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आर्थिक असमानता को परिभाषित करते हुए इसके जिम्मेदार कारकों की विस्तार से व्याख्या कीजिये | आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये (200 शब्द)
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अप्रोच भूमिका में आर्थिक असमानता की परिभाषा और भारत की स्थिति की चर्चा कीजिए। प्रथम भाग में आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी कारकों को बताइए। उत्तर के दूसरे भाग में इसको कम करने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में अपेक्षित उपायों को सूचीबद्ध कीजिए। आर्थिक असमानता धारित संपत्ति, प्राप्त आय अथवा किये गए व्ययों में अंतर के रूप में परिभाषित की जाती है| इन्ही चरों के आधार पर आर्थिक असमानता को प्रदर्शित भी किया जाता है| ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में आर्थिक असमानता पिछले तीन दशकों से बढ़ रही है| रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग देश की एक प्रतिशत जनसंख्या के खाते में गया है| इसी सर्वे में यह भी बताया गया है कि 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है| इन आंकड़ों से भारत में व्यापक आर्थिक असमानता की स्थिति का पता चलता है| भारत में व्यापक आर्थिक असमानता के लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं जो निम्नलिखित हैं- भारत में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व में व्यापक असमानता देखने को मिलती है| स्वामित्व में असमानता के कारण लोगों की आय और व्यय में व्यापक अंतर देखने को मिलता है| इसके कारण आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है| आय अंतराल लोगों की शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक पहुँच को भी प्रभावित करता है| अधिक आय वर्ग के लोगों की उचित एवं आवश्यक शिक्षा तक आसानी से पहुँच होती है जबकि निम्न आय वर्ग के लोग अपेक्षित शिक्षा & प्रशिक्षण को नहीं प्राप्त कर पाते| इसका प्रभाव उनके द्वारा अवसरों तक पहुँच पर पड़ता है| अवसरों तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता का रूप धारण कर लेती है| भारत में पूँजी संसाधन की कमी का प्रभाव भारत की अवसंरचना पर पड़ता है जो अंतत विकास प्रक्रिया को बाधित करता है| कुछ क्षेत्रों में बेहतर अवसंरचना का विकास जबकि कुछ क्षेत्रों में अवसंरचना का विकास लोगों की आय में अंतर को उत्पन्न करता है जिससे आर्थिक असमानता बढ़ने लगती है| भारत की अधिकाँश जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है| कृषि उत्पादन में अन्तर, भूमि की उत्पादकता में अंतर, आगतों की उपलब्धता आदि कारणों से कृषि आय में अंतर आता है| इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेकों क्षेत्रों में अभी तकनीकी पिछड़ेपन को देखा जा सकता है| तकनीकी पिछडापन उत्पादन में कमी के लिए उत्तरदायी है| इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है| तकनीकी प्रयोग में अंतर भी आर्थिक असमानता के प्रमुख कारणों में से एक है| भारत में विभिन्न आय वर्ग हैं| इन वर्गों की क्षमताएं इनकी आय के अनुरूप हैं| क्षमताओं में अंतर आर्थिक असमानता की वृद्धि में सहायक है| विकासात्मक व्ययों में रिसाव की समस्या, समावेशी विकास को बाधित करती है| सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है। भारत में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या भी व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं| स्वतंत्रता के बाद से ही भारत सरकार आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है| इस दिशा में भारत सरकार ने निम्नलिखित प्रयास किये हैं- भूमि सुधार कार्यक्रम के माध्यम से संपत्ति एवं भूमि पर स्वामित्व की असमानता को कम करने का प्रयास किया गया है| कल्याणकारी स्वरुप के अंतर्गत भारत सरकार ने कल्याण के दृष्टिकोण से सार्वजनिक क्षेत्रक की स्थापना की है| यह आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सहायक है| संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए तथा गरीबों की सहज वित्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है| सामाजिक-आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार ने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई है और इसके अंतर्गत वंचित अथवा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है| भारत एक कल्याणकारी राज्य है| कल्याण कार्यों के सुचारू संचालन के लिए राजस्व की आवश्यकता होती है| राजस्व प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने प्रगतिशील कराधान की प्रणाली अपनाई है| सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में अधिकतम रोजगार सृजन की क्षमता होती है| अधिकतम रोजगार सृजन लोगों के आय स्तर में वृद्धि करने में सहायक होगा| इसी उद्देश्य से भारत सरकार MSME का संरक्षण और प्रोत्साहन कर रही है| इनके अतिरिक्त भारत सरकार विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रम,वित्तीय समावेशन, कृषि विकास, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम,कौशल विकास कार्यक्रम तथा निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रमों का संचालन कर रही है| उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारत में व्यापक आर्थिक असमानता देखने को मिलती है| इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार को और प्रभावी प्रयास करने की आवश्यकता है|इस दिशा में कौशल विकास, क्षमता संवर्धन, सशक्तिकरण आदि उपाय प्रभावी हो सकते हैं|
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##Question:आर्थिक असमानता को परिभाषित करते हुए इसके जिम्मेदार कारकों की विस्तार से व्याख्या कीजिये | आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये (200 शब्द)##Answer:अप्रोच भूमिका में आर्थिक असमानता की परिभाषा और भारत की स्थिति की चर्चा कीजिए। प्रथम भाग में आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी कारकों को बताइए। उत्तर के दूसरे भाग में इसको कम करने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में अपेक्षित उपायों को सूचीबद्ध कीजिए। आर्थिक असमानता धारित संपत्ति, प्राप्त आय अथवा किये गए व्ययों में अंतर के रूप में परिभाषित की जाती है| इन्ही चरों के आधार पर आर्थिक असमानता को प्रदर्शित भी किया जाता है| ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में आर्थिक असमानता पिछले तीन दशकों से बढ़ रही है| रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग देश की एक प्रतिशत जनसंख्या के खाते में गया है| इसी सर्वे में यह भी बताया गया है कि 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है| इन आंकड़ों से भारत में व्यापक आर्थिक असमानता की स्थिति का पता चलता है| भारत में व्यापक आर्थिक असमानता के लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं जो निम्नलिखित हैं- भारत में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व में व्यापक असमानता देखने को मिलती है| स्वामित्व में असमानता के कारण लोगों की आय और व्यय में व्यापक अंतर देखने को मिलता है| इसके कारण आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है| आय अंतराल लोगों की शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक पहुँच को भी प्रभावित करता है| अधिक आय वर्ग के लोगों की उचित एवं आवश्यक शिक्षा तक आसानी से पहुँच होती है जबकि निम्न आय वर्ग के लोग अपेक्षित शिक्षा & प्रशिक्षण को नहीं प्राप्त कर पाते| इसका प्रभाव उनके द्वारा अवसरों तक पहुँच पर पड़ता है| अवसरों तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता का रूप धारण कर लेती है| भारत में पूँजी संसाधन की कमी का प्रभाव भारत की अवसंरचना पर पड़ता है जो अंतत विकास प्रक्रिया को बाधित करता है| कुछ क्षेत्रों में बेहतर अवसंरचना का विकास जबकि कुछ क्षेत्रों में अवसंरचना का विकास लोगों की आय में अंतर को उत्पन्न करता है जिससे आर्थिक असमानता बढ़ने लगती है| भारत की अधिकाँश जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है| कृषि उत्पादन में अन्तर, भूमि की उत्पादकता में अंतर, आगतों की उपलब्धता आदि कारणों से कृषि आय में अंतर आता है| इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेकों क्षेत्रों में अभी तकनीकी पिछड़ेपन को देखा जा सकता है| तकनीकी पिछडापन उत्पादन में कमी के लिए उत्तरदायी है| इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है| तकनीकी प्रयोग में अंतर भी आर्थिक असमानता के प्रमुख कारणों में से एक है| भारत में विभिन्न आय वर्ग हैं| इन वर्गों की क्षमताएं इनकी आय के अनुरूप हैं| क्षमताओं में अंतर आर्थिक असमानता की वृद्धि में सहायक है| विकासात्मक व्ययों में रिसाव की समस्या, समावेशी विकास को बाधित करती है| सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है। भारत में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या भी व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं| स्वतंत्रता के बाद से ही भारत सरकार आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है| इस दिशा में भारत सरकार ने निम्नलिखित प्रयास किये हैं- भूमि सुधार कार्यक्रम के माध्यम से संपत्ति एवं भूमि पर स्वामित्व की असमानता को कम करने का प्रयास किया गया है| कल्याणकारी स्वरुप के अंतर्गत भारत सरकार ने कल्याण के दृष्टिकोण से सार्वजनिक क्षेत्रक की स्थापना की है| यह आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सहायक है| संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए तथा गरीबों की सहज वित्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है| सामाजिक-आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार ने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई है और इसके अंतर्गत वंचित अथवा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है| भारत एक कल्याणकारी राज्य है| कल्याण कार्यों के सुचारू संचालन के लिए राजस्व की आवश्यकता होती है| राजस्व प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने प्रगतिशील कराधान की प्रणाली अपनाई है| सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में अधिकतम रोजगार सृजन की क्षमता होती है| अधिकतम रोजगार सृजन लोगों के आय स्तर में वृद्धि करने में सहायक होगा| इसी उद्देश्य से भारत सरकार MSME का संरक्षण और प्रोत्साहन कर रही है| इनके अतिरिक्त भारत सरकार विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रम,वित्तीय समावेशन, कृषि विकास, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम,कौशल विकास कार्यक्रम तथा निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रमों का संचालन कर रही है| उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारत में व्यापक आर्थिक असमानता देखने को मिलती है| इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार को और प्रभावी प्रयास करने की आवश्यकता है|इस दिशा में कौशल विकास, क्षमता संवर्धन, सशक्तिकरण आदि उपाय प्रभावी हो सकते हैं|
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What are fluvial processes? Explain the landforms formed in its various stages? (200 words/10 Marks)
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Approach- The answer will start with explaining the fluvial processes. Then landforms of the three stages- youth, mature and old have to be explained separately. The students are expected to draw small simple diagrams to explain the landforms. Answer- Fluvial processes are associated with the movement of rivers and erosional and depositional activity involved with it. The land forms created as a result of degradational action (erosion) or aggradational work (deposition) of running water are called fluvial land forms. They occur in different stages of the course of the river. Youthful stage - maximum speed of the river are seen in this region. The river is known to cause vertical erosion in this phase. V-shaped valleys - They are deep river valleys with steep sides that look like a letter V when a cross section of them is taken. They’re found in the upper course because this is where the river has the greatest gravitational potential energy and so the greatest potential to erode vertically. Waterfall - When the rock type of the river’s channel changes from a resistant rock to a less resistant one, the river erodes the less resistant rock faster producing a sudden drop in the gradient of the river creating a greater height difference between the two rock types, producing the waterfall. Rapids - They are sections of a river where the gradient of the river bed is relatively steep resulting in an increase in the river’s turbulence and velocity. They form where the gradient of the river is steep and the bed is composed mainly of hard rocks. Gorges and canyons - They are deep clefts between cliffs resulting from weathering and the erosive activity of a river over a period of time. Mature stage- The speed reduces in this stage, thus it shows both erosional and depositional activity. · Meanders- They are sweeping loops or bends in the middle and lower course of the river. It is formed due to differential erosion and deposition on different sides of the river channel. · Ox-box lakes - They are an evolution of meanders that undergo extensive deposition and erosion. The meander is cut off from the main channel and the lake formed is an ox-bow lake. · Natural levees - They are natural embankments produced when a river floods, it deposits its load over the flood plain due to a dramatic drop in the river’s velocity as friction increases greatly. Old stage - This is the final stage of the course of the river which will have the minimum speed and greatest depositional activity. · Braided streams- It is a type of channel that is divided into smaller sub-channels by small, temporary islands call. Braided channels develop in rivers with a lot of sedimentary loads, a steep gradient and where the discharge of the river changes regularly. . Floodplains- They are large, flat expanses of land that form on either side of a river. The load is deposited across the floodplain as alluvium. The alluvium is very fertile so floodplains are often used as farmland. . Deltas - They are depositional landforms found at the mouth of a river where the river meets a body of water with a lower velocity than the river usually the sea or ocean into which the river will ultimately form.
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##Question:What are fluvial processes? Explain the landforms formed in its various stages? (200 words/10 Marks)##Answer:Approach- The answer will start with explaining the fluvial processes. Then landforms of the three stages- youth, mature and old have to be explained separately. The students are expected to draw small simple diagrams to explain the landforms. Answer- Fluvial processes are associated with the movement of rivers and erosional and depositional activity involved with it. The land forms created as a result of degradational action (erosion) or aggradational work (deposition) of running water are called fluvial land forms. They occur in different stages of the course of the river. Youthful stage - maximum speed of the river are seen in this region. The river is known to cause vertical erosion in this phase. V-shaped valleys - They are deep river valleys with steep sides that look like a letter V when a cross section of them is taken. They’re found in the upper course because this is where the river has the greatest gravitational potential energy and so the greatest potential to erode vertically. Waterfall - When the rock type of the river’s channel changes from a resistant rock to a less resistant one, the river erodes the less resistant rock faster producing a sudden drop in the gradient of the river creating a greater height difference between the two rock types, producing the waterfall. Rapids - They are sections of a river where the gradient of the river bed is relatively steep resulting in an increase in the river’s turbulence and velocity. They form where the gradient of the river is steep and the bed is composed mainly of hard rocks. Gorges and canyons - They are deep clefts between cliffs resulting from weathering and the erosive activity of a river over a period of time. Mature stage- The speed reduces in this stage, thus it shows both erosional and depositional activity. · Meanders- They are sweeping loops or bends in the middle and lower course of the river. It is formed due to differential erosion and deposition on different sides of the river channel. · Ox-box lakes - They are an evolution of meanders that undergo extensive deposition and erosion. The meander is cut off from the main channel and the lake formed is an ox-bow lake. · Natural levees - They are natural embankments produced when a river floods, it deposits its load over the flood plain due to a dramatic drop in the river’s velocity as friction increases greatly. Old stage - This is the final stage of the course of the river which will have the minimum speed and greatest depositional activity. · Braided streams- It is a type of channel that is divided into smaller sub-channels by small, temporary islands call. Braided channels develop in rivers with a lot of sedimentary loads, a steep gradient and where the discharge of the river changes regularly. . Floodplains- They are large, flat expanses of land that form on either side of a river. The load is deposited across the floodplain as alluvium. The alluvium is very fertile so floodplains are often used as farmland. . Deltas - They are depositional landforms found at the mouth of a river where the river meets a body of water with a lower velocity than the river usually the sea or ocean into which the river will ultimately form.
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पूर्व मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य कला में विकसित होने वाली बेसर शैली मूलतः नागर और द्रविड़ शैलियों का ही एक मिश्रित रूप थी| उक्त सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए वेसर शैली के विकास की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) The Vesar style that developed in early medieval temple architecture was basically a mixed form of Nagara and Dravida styles.
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दृष्टिकोण : परिचय में बेसर शैली की उत्पत्ति के सन्दर्भ की चर्चा कीजिये बेसर शैली के क्षेत्र को बताइए बेसर शैली की मुख्य विशेषताएं बेसर शैली की प्रमुख उपशैलियों की चर्चा कीजिये इन उपशैलियों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये निष्कर्ष में बेसर शैली के विकास क्रम को संक्षेप रूप में लिखिए पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य की तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ जो नागर शैली , बेसर शैली एवं द्रविड़ शैली के रूप में जानी जाती हैं | इनमे बेसर शैली का विकास मुख्यतः नागर एवं द्रविड़ शैलियों के मिश्रित रूप में हुआ | चुकी बेसर शैली में मुख्य नियोजन तथा प्रारूप द्रविड़ शैली का होता है परन्तु अलंकरण ,निरूपण तथा प्रतीकों की संरचना नागर शैली से प्रभावित होती है| बेसर शैली क्षेत्र- विन्ध्य पर्वत से कृष्णा नदी के मध्य संरक्षक - वातापी के चालुक्य ,मन्य्खेत के राष्ट्रकूट ,होयसल शासकों के द्वारा नागर और द्रविड़ शैली की विशेषताओं का मिश्रण जैसे-विमान ,गोपुरम ,रथ (द्रविड़ शैली की विशेषताओं ) चबूतरे पर मंदिरों का निर्माण ,कलश आदि बेसर शैली की मुख्य विशेषताएँ मंदिरों का आकार – आधार से शिखर तक गोलाकार,अर्द्ध गोलाकार उदहारण – हेलबिड का होयालेश्वर मंदिर ,वृन्दावन का वैष्णव मंदिर इनमे प्रायः गोपुरम का निर्माण किया जाता है| बेसर शैली का विकास /उपशैलियों चालुक्य - एहोल-दुर्गा मंदिर ,जैन मंदिर वातापी- पत्थरों को काटकर मंदिरों का निर्माण ), पदतकल -10 मंदिरों का साक्ष्य,जैसे- विश्वनाथ मंदिर(नागर) एवं विरूपाक्ष (द्रविड़ शैली) राष्ट्रकूट - एलोरा मंदिर ,विहार,चैत्य ,मूर्तियाँ एवं चित्रकला के साक्ष्य मिलते हैं एकाश्मक पत्थर से निर्मित कैलाश नाथ मंदिर (कृष्ण प्रथम के काल में निर्मित ) दशावतार मंदिर एवं रावण की खाई होयसल -हलेबिड , कर्नाटक होयसलेश्वर मंदिर इस प्रकार बेसर शैली का विकास चालुक्य काल में द्रविड़ शैली के मध्य समन्व्यय के परिणामस्वरूप हुआ जिसका चरमोत्कर्ष बादामी और पदतकल में देखने को मिलता है| इसीलिए कभी-कभी इसे चालुक्य शैली के नाम से भी जाना जाता है|
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##Question:पूर्व मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य कला में विकसित होने वाली बेसर शैली मूलतः नागर और द्रविड़ शैलियों का ही एक मिश्रित रूप थी| उक्त सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए वेसर शैली के विकास की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) The Vesar style that developed in early medieval temple architecture was basically a mixed form of Nagara and Dravida styles.##Answer:दृष्टिकोण : परिचय में बेसर शैली की उत्पत्ति के सन्दर्भ की चर्चा कीजिये बेसर शैली के क्षेत्र को बताइए बेसर शैली की मुख्य विशेषताएं बेसर शैली की प्रमुख उपशैलियों की चर्चा कीजिये इन उपशैलियों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये निष्कर्ष में बेसर शैली के विकास क्रम को संक्षेप रूप में लिखिए पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य की तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ जो नागर शैली , बेसर शैली एवं द्रविड़ शैली के रूप में जानी जाती हैं | इनमे बेसर शैली का विकास मुख्यतः नागर एवं द्रविड़ शैलियों के मिश्रित रूप में हुआ | चुकी बेसर शैली में मुख्य नियोजन तथा प्रारूप द्रविड़ शैली का होता है परन्तु अलंकरण ,निरूपण तथा प्रतीकों की संरचना नागर शैली से प्रभावित होती है| बेसर शैली क्षेत्र- विन्ध्य पर्वत से कृष्णा नदी के मध्य संरक्षक - वातापी के चालुक्य ,मन्य्खेत के राष्ट्रकूट ,होयसल शासकों के द्वारा नागर और द्रविड़ शैली की विशेषताओं का मिश्रण जैसे-विमान ,गोपुरम ,रथ (द्रविड़ शैली की विशेषताओं ) चबूतरे पर मंदिरों का निर्माण ,कलश आदि बेसर शैली की मुख्य विशेषताएँ मंदिरों का आकार – आधार से शिखर तक गोलाकार,अर्द्ध गोलाकार उदहारण – हेलबिड का होयालेश्वर मंदिर ,वृन्दावन का वैष्णव मंदिर इनमे प्रायः गोपुरम का निर्माण किया जाता है| बेसर शैली का विकास /उपशैलियों चालुक्य - एहोल-दुर्गा मंदिर ,जैन मंदिर वातापी- पत्थरों को काटकर मंदिरों का निर्माण ), पदतकल -10 मंदिरों का साक्ष्य,जैसे- विश्वनाथ मंदिर(नागर) एवं विरूपाक्ष (द्रविड़ शैली) राष्ट्रकूट - एलोरा मंदिर ,विहार,चैत्य ,मूर्तियाँ एवं चित्रकला के साक्ष्य मिलते हैं एकाश्मक पत्थर से निर्मित कैलाश नाथ मंदिर (कृष्ण प्रथम के काल में निर्मित ) दशावतार मंदिर एवं रावण की खाई होयसल -हलेबिड , कर्नाटक होयसलेश्वर मंदिर इस प्रकार बेसर शैली का विकास चालुक्य काल में द्रविड़ शैली के मध्य समन्व्यय के परिणामस्वरूप हुआ जिसका चरमोत्कर्ष बादामी और पदतकल में देखने को मिलता है| इसीलिए कभी-कभी इसे चालुक्य शैली के नाम से भी जाना जाता है|
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मौद्रिक नीति से आप क्या समझते है? मौद्रिक नीति के प्रकारों को बताते हुए हाल ही में मौद्रिक नीति संरचना में सुधार के संदर्भ में भारत सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Monetary Policy? Explaining the types of monetary policy, discuss the recent steps taken by the Government of India in the context of reforming the monetary policy structure. (150- 200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में मौद्रिक नीति को व्याख्यायित कीजिये, प्रथम भाग में मौद्रिक नीति के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में मौद्रिक नीति संरचना में सुधार के संदर्भ में सरकार द्वारा उठाये क़दमों की जानकारी दीजिये अंतिम में प्रयासों का महत्व स्पष्ट करते हुए निष्कर्ष दीजिये मौद्रिक नीति, आर्थिक नीति का वह घटक है जिसके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (मुद्रा एवं साख) का नियमन करता है| दूसरे शब्दों में मौद्रिक नीति वह नीति है जिसके माध्यम से RBI अपने अधीनस्थ उपकरणों(CRR, SLR आदि) का प्रयोग कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मुद्रा एवं साख की उपलब्धता, उसका अंतिम प्रयोग, मुद्रा एवं साख की लागत(ब्याज दर)का नियमन करता है|अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए मुद्रास्फीति का नियंत्रण, आर्थिक वृद्धि में निरन्तरता सुनिश्चित करना, अर्थव्यवस्था में मौद्रिक प्रणाली को सुदृढ़ बनाए रखना, रूपये की विनिमय दर को स्थिर बनाए रखना और इस तरह से बाह्य प्रभावों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित बनाए रखना, रोजगार गहन क्षेत्रकों को ऋण उपलब्ध कर अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन करना और गरीबी उन्मूलन आदि मौद्रिक नीति के उद्देश्य होते हैं| मौद्रिक नीति के उपरोक्त उद्देश्यों को केन्द्रीय बैंक साख नियंत्रण के मात्रात्मक/सामान्य एवं गुणात्मक/चयनात्मक उपकरणों के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करता है| साख नियंत्रण के मात्रात्मक/सामान्य उपकरण अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा को प्रभावित करते हैं अर्थात ये अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति की मात्रा को घटाते या बढाते हैं| इसके लिए केन्द्रीय बैंक CRR,SLR,MSF, OMO आदिउपकरणों का प्रयोग करता है| दूसरी ओर गुणात्मक/चयनात्मक उपकरण अर्थव्यवस्था के किसी क्षेत्र विशेष में मुद्रा आपूर्ति को प्रभावित करते हैं, अर्थात ये एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में कोष के स्थानान्तरण से मुद्रा के प्रवाह की दिशा को निर्धारित करते हैं| मौद्रिक नीति के प्रकार संकुचनकारी/कठोर मौद्रिक नीति कठोर मौद्रिक नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक द्वारा नकद आरक्षित अनुपात(CRR) वैधानिक तरलता अनुपात(SLR) बैंक दर, सीमान्त स्थायी सुविधा (MSF), रेपो दर, रिवर्स रेपो आदि दरों को बढ़ाता है तथा खुले बाजार की क्रिया (OMO) में सरकारी प्रतिभूतियों का विक्रय करता है| इसके माध्यम से अर्थव्यवस्था के अंतर्गत मुद्रा आपूर्ति की मात्रा को घटाया जाता है | इससे मुद्रा आपूर्ति में कमी आती है अतः इसे कठोर मौद्रिक नीति कहते हैं| कठोर मौद्रिक का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना या मुद्रा के मूल्यह्रास को नियंत्रित करना होता है| इस नीति से अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति में गिरावट आती है जिससे मांग में कमी आती है और मूल्य स्तरों में गिरावट आती और इस प्रकार मुद्रास्फीति पर नियन्त्रण स्थापना में आसानी होती है मुद्रा आपूर्ति की कमी होने से विदेशी मुद्रा की मांग में कमी आएगी जिससे विदेशी मुद्रा का मूल्य कम होगा इससे रूपये के मूल्यह्रास पर भी नियन्त्रण किया जा सकेगा इससे ब्याज दर बढ़ते हैं अतः उधार लेना महंगा पड़ने लगता है इसी कारण इसे महंगी मुद्रा नीति भी कहते है विस्तारवादी मौद्रिक नीति कठोर मौद्रिक नीति के विपरीत विस्तारवादी अथवा लचीली मौद्रिक नीति में मुद्रा आपूर्ति को बढाया जाता है, इसीलिए इसे विस्तारवादी मौद्रिक नीति कहते हैं| विस्तारवादी मौद्रिक नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक दवारा नकद आरक्षित अनुपात(CRR) वैधानिक तरलता अनुपात(SLR) बैंक दर, सीमान्त स्थायी सुविधा (MSF), रेपो दर, रिवर्स रेपो आदि दरों को घटाता है तथा खुले बाजार की क्रिया (OMO) में सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय करता है| इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ती है| विस्तारवादी मौद्रिक नीति का उद्देश्य आर्थिक वृद्धि को बढ़ाना और अर्थव्यवस्था से आर्थिक मंदी का समापन करना होता है| विस्तारवादी मौद्रिक नीति से ब्याज दरों में गिरावट आती है अतः इसे सस्ती मुद्रा नीति, उदार मौद्रिक नीति भी कहते हैं| जब RBI आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए मुद्रा आपूर्ति को बढाता है तो आर्थिक वृद्धि तो होती है किन्तु मुद्रास्फीति बढ़ने लगती है| इसी तरह मुद्रास्फीति पर के नियंत्रण के प्रयासों का प्रभाव आर्थिक वृद्धि पर पड़ता है अर्थात मौद्रिक प्रणाली के दो प्रमुख उद्देश्यों के मध्य दुविधा है| इससे कार्यवाही निर्धारण में RBI को समस्या होती है| इसके अतिरिक्त मौद्रिक नीति की अन्य सीमाओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा मौद्रिक नीति संरचना की समीक्षा एवं मौद्रिक नीतिगत मजबूती के लिए उर्जित पटेल समिति गठित की गयी थी| उर्जित पटेल समिति की रिपोर्ट वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई इसमें समिति द्वारा मौद्रिक नीति सम्बन्धी विभिन्न संस्तुतियां की गयीं जिनमे से अधिकाँश संस्तुतियों को भारत सरकार द्वारा स्वीकार किया गया है| भारत सरकार द्वारा स्वीकृत संस्तुतियों और इनके अनुरूप प्रयासों को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते है- मौद्रिक नीति संरचना के निर्धारण हेतु मुद्रास्फीति आकलन को थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के स्थान पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित होना चाहिए क्योंकि WPI जनता पर मुद्रास्फीति के प्रभाव को नहीं दर्शाता है और चूँकि सेवाओं का कोई थोक बाजार नहीं होता इसलिए WPI में सेवाओं का मूल्य भी सम्मिलित नहीं किया जाता है| इसे सरकार ने स्वीकार कर लिया है| मुद्रास्फीति दर(CPI आधारित) को वर्तमान 10 % से घटा कर अगले 2 वर्षों में 6 % तक कम करना चाहिए(जनवरी 2016 तक) उसके बाद मुद्रास्फीति दर 4% +/- 2 % (न्यूनतम 2 और अधिकतम 6%)तक रखनी चाहिए| RBI को लचीली मुद्रास्फीतिक लक्ष्यीकरण(FIT) नीति अपनानी चाहिए, इसे सरकार द्वारा 2015 से शुरू कर दिया गया है| रेपो को 14 दिन के अतिरिक्त कुछ अन्य अल्पकालिक अवधियों के रेपो भी लागू करने चाहिए, लेकिन पालिसी दर के रूप में 14 दिन के रेपो रेट का ही प्रयोग करना चाहिए| मौद्रिक नीति की संरचना का निर्धारण एक 5 सदस्यों वाली द्वारा किया जाना चाहिए| भारत सरकार द्वारा मौद्रिक नीति समिति को 2016 में गठित किया गया है| मौद्रिक नीति की समीक्षा तीन महीनों के स्थान पर 2 महीने के विलम्ब से की जानी चाहिए | सरकार द्वारा अब द्विमाही समीक्षा की जाती है| निर्णय निर्माण में विकेंद्रीकरण, दीर्घकालिक आंकड़ों से बचाव, विकल्पों में वृद्धि आदि के दृष्टिकोण से सरकार द्वारा किये गये उपरोक्त प्रयास सकारात्मक दिशा में हैं| उर्जित पटेल समिति ने मौद्रिक नीति के संचालन में लचीलापन रखने हेतु सरकार को अपना राजकोषीय घाटा GDP के 3 % तक कम करने की संस्तुति भी की है अतः सरकार को इस दिशा में प्रयास करने की भी आवश्यकता है ताकि मौद्रिक नीति को लचीला बनाए रखने में सहायता प्राप्त हो|
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##Question:मौद्रिक नीति से आप क्या समझते है? मौद्रिक नीति के प्रकारों को बताते हुए हाल ही में मौद्रिक नीति संरचना में सुधार के संदर्भ में भारत सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Monetary Policy? Explaining the types of monetary policy, discuss the recent steps taken by the Government of India in the context of reforming the monetary policy structure. (150- 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में मौद्रिक नीति को व्याख्यायित कीजिये, प्रथम भाग में मौद्रिक नीति के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में मौद्रिक नीति संरचना में सुधार के संदर्भ में सरकार द्वारा उठाये क़दमों की जानकारी दीजिये अंतिम में प्रयासों का महत्व स्पष्ट करते हुए निष्कर्ष दीजिये मौद्रिक नीति, आर्थिक नीति का वह घटक है जिसके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (मुद्रा एवं साख) का नियमन करता है| दूसरे शब्दों में मौद्रिक नीति वह नीति है जिसके माध्यम से RBI अपने अधीनस्थ उपकरणों(CRR, SLR आदि) का प्रयोग कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मुद्रा एवं साख की उपलब्धता, उसका अंतिम प्रयोग, मुद्रा एवं साख की लागत(ब्याज दर)का नियमन करता है|अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए मुद्रास्फीति का नियंत्रण, आर्थिक वृद्धि में निरन्तरता सुनिश्चित करना, अर्थव्यवस्था में मौद्रिक प्रणाली को सुदृढ़ बनाए रखना, रूपये की विनिमय दर को स्थिर बनाए रखना और इस तरह से बाह्य प्रभावों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित बनाए रखना, रोजगार गहन क्षेत्रकों को ऋण उपलब्ध कर अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन करना और गरीबी उन्मूलन आदि मौद्रिक नीति के उद्देश्य होते हैं| मौद्रिक नीति के उपरोक्त उद्देश्यों को केन्द्रीय बैंक साख नियंत्रण के मात्रात्मक/सामान्य एवं गुणात्मक/चयनात्मक उपकरणों के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करता है| साख नियंत्रण के मात्रात्मक/सामान्य उपकरण अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा को प्रभावित करते हैं अर्थात ये अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति की मात्रा को घटाते या बढाते हैं| इसके लिए केन्द्रीय बैंक CRR,SLR,MSF, OMO आदिउपकरणों का प्रयोग करता है| दूसरी ओर गुणात्मक/चयनात्मक उपकरण अर्थव्यवस्था के किसी क्षेत्र विशेष में मुद्रा आपूर्ति को प्रभावित करते हैं, अर्थात ये एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में कोष के स्थानान्तरण से मुद्रा के प्रवाह की दिशा को निर्धारित करते हैं| मौद्रिक नीति के प्रकार संकुचनकारी/कठोर मौद्रिक नीति कठोर मौद्रिक नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक द्वारा नकद आरक्षित अनुपात(CRR) वैधानिक तरलता अनुपात(SLR) बैंक दर, सीमान्त स्थायी सुविधा (MSF), रेपो दर, रिवर्स रेपो आदि दरों को बढ़ाता है तथा खुले बाजार की क्रिया (OMO) में सरकारी प्रतिभूतियों का विक्रय करता है| इसके माध्यम से अर्थव्यवस्था के अंतर्गत मुद्रा आपूर्ति की मात्रा को घटाया जाता है | इससे मुद्रा आपूर्ति में कमी आती है अतः इसे कठोर मौद्रिक नीति कहते हैं| कठोर मौद्रिक का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना या मुद्रा के मूल्यह्रास को नियंत्रित करना होता है| इस नीति से अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति में गिरावट आती है जिससे मांग में कमी आती है और मूल्य स्तरों में गिरावट आती और इस प्रकार मुद्रास्फीति पर नियन्त्रण स्थापना में आसानी होती है मुद्रा आपूर्ति की कमी होने से विदेशी मुद्रा की मांग में कमी आएगी जिससे विदेशी मुद्रा का मूल्य कम होगा इससे रूपये के मूल्यह्रास पर भी नियन्त्रण किया जा सकेगा इससे ब्याज दर बढ़ते हैं अतः उधार लेना महंगा पड़ने लगता है इसी कारण इसे महंगी मुद्रा नीति भी कहते है विस्तारवादी मौद्रिक नीति कठोर मौद्रिक नीति के विपरीत विस्तारवादी अथवा लचीली मौद्रिक नीति में मुद्रा आपूर्ति को बढाया जाता है, इसीलिए इसे विस्तारवादी मौद्रिक नीति कहते हैं| विस्तारवादी मौद्रिक नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक दवारा नकद आरक्षित अनुपात(CRR) वैधानिक तरलता अनुपात(SLR) बैंक दर, सीमान्त स्थायी सुविधा (MSF), रेपो दर, रिवर्स रेपो आदि दरों को घटाता है तथा खुले बाजार की क्रिया (OMO) में सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय करता है| इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ती है| विस्तारवादी मौद्रिक नीति का उद्देश्य आर्थिक वृद्धि को बढ़ाना और अर्थव्यवस्था से आर्थिक मंदी का समापन करना होता है| विस्तारवादी मौद्रिक नीति से ब्याज दरों में गिरावट आती है अतः इसे सस्ती मुद्रा नीति, उदार मौद्रिक नीति भी कहते हैं| जब RBI आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए मुद्रा आपूर्ति को बढाता है तो आर्थिक वृद्धि तो होती है किन्तु मुद्रास्फीति बढ़ने लगती है| इसी तरह मुद्रास्फीति पर के नियंत्रण के प्रयासों का प्रभाव आर्थिक वृद्धि पर पड़ता है अर्थात मौद्रिक प्रणाली के दो प्रमुख उद्देश्यों के मध्य दुविधा है| इससे कार्यवाही निर्धारण में RBI को समस्या होती है| इसके अतिरिक्त मौद्रिक नीति की अन्य सीमाओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा मौद्रिक नीति संरचना की समीक्षा एवं मौद्रिक नीतिगत मजबूती के लिए उर्जित पटेल समिति गठित की गयी थी| उर्जित पटेल समिति की रिपोर्ट वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई इसमें समिति द्वारा मौद्रिक नीति सम्बन्धी विभिन्न संस्तुतियां की गयीं जिनमे से अधिकाँश संस्तुतियों को भारत सरकार द्वारा स्वीकार किया गया है| भारत सरकार द्वारा स्वीकृत संस्तुतियों और इनके अनुरूप प्रयासों को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते है- मौद्रिक नीति संरचना के निर्धारण हेतु मुद्रास्फीति आकलन को थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के स्थान पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित होना चाहिए क्योंकि WPI जनता पर मुद्रास्फीति के प्रभाव को नहीं दर्शाता है और चूँकि सेवाओं का कोई थोक बाजार नहीं होता इसलिए WPI में सेवाओं का मूल्य भी सम्मिलित नहीं किया जाता है| इसे सरकार ने स्वीकार कर लिया है| मुद्रास्फीति दर(CPI आधारित) को वर्तमान 10 % से घटा कर अगले 2 वर्षों में 6 % तक कम करना चाहिए(जनवरी 2016 तक) उसके बाद मुद्रास्फीति दर 4% +/- 2 % (न्यूनतम 2 और अधिकतम 6%)तक रखनी चाहिए| RBI को लचीली मुद्रास्फीतिक लक्ष्यीकरण(FIT) नीति अपनानी चाहिए, इसे सरकार द्वारा 2015 से शुरू कर दिया गया है| रेपो को 14 दिन के अतिरिक्त कुछ अन्य अल्पकालिक अवधियों के रेपो भी लागू करने चाहिए, लेकिन पालिसी दर के रूप में 14 दिन के रेपो रेट का ही प्रयोग करना चाहिए| मौद्रिक नीति की संरचना का निर्धारण एक 5 सदस्यों वाली द्वारा किया जाना चाहिए| भारत सरकार द्वारा मौद्रिक नीति समिति को 2016 में गठित किया गया है| मौद्रिक नीति की समीक्षा तीन महीनों के स्थान पर 2 महीने के विलम्ब से की जानी चाहिए | सरकार द्वारा अब द्विमाही समीक्षा की जाती है| निर्णय निर्माण में विकेंद्रीकरण, दीर्घकालिक आंकड़ों से बचाव, विकल्पों में वृद्धि आदि के दृष्टिकोण से सरकार द्वारा किये गये उपरोक्त प्रयास सकारात्मक दिशा में हैं| उर्जित पटेल समिति ने मौद्रिक नीति के संचालन में लचीलापन रखने हेतु सरकार को अपना राजकोषीय घाटा GDP के 3 % तक कम करने की संस्तुति भी की है अतः सरकार को इस दिशा में प्रयास करने की भी आवश्यकता है ताकि मौद्रिक नीति को लचीला बनाए रखने में सहायता प्राप्त हो|
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भारत में अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ प्रमुख भू-राजस्व नीतियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। साथ ही, इन नीतियों के निहितार्थों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Briefly introduce major land revenue policies initiated by the British in India. Also, discuss the implications of these policies in detail. (200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में नीतियों की पृष्ठभूमि लिखिए। मुख्य भाग के प्रथम खंड में जमींदारी, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व्यवस्था के बारे में बताइये। इसके बाद इन प्रमुख नीतियों के निहितार्थों को लिखिए। निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। उत्तर: ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया।कंपनी ने करों के निर्धारण और वसूली के लिए कई नए प्रकार के भू-राजस्व बंदोबस्त प्रारम्भ किए। इनमें से कुछ प्रमुख नीतियाँ इस प्रकार हैं: स्थायी या जमींदारी व्यवस्था: 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा स्थायी रूप से लागू। इसके अतिरिक्त चार्ल्स ग्रांट, जॉन शोर नामक व्यक्तियों का प्रमुख योगदान। इसके अंतर्गत जमींदार को भूमि का स्थायी मालिक बनाकर भूमि पर अधिकार को पैतृक बना दिया गया। यह अधिकार हस्तांतरणीय था अर्थात् वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी उत्तराधिकारी को दे सकते थे। किसानों से वसूल किए गए कुल रकम का 10/11 भाग कंपनी को देना तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था। रैयतवाड़ी व्यवस्था: थॉमस मुनरो द्वारा प्रारम्भ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बंबई एवं असम के कुछ भागों में लागू किया गया। इस व्यवस्था में किसानों के साथ सीधा बंदोबस्त किया गया। भू- राजस्व का निर्धारण भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था। महालवाड़ी व्यवस्था: यह व्यवस्था मध्य प्रांत, पंजाब, उत्तर प्रदेश के आगरा में लागू की गयी। लॉर्ड हेस्टिंग्स, थॉमसन, मार्टिन बर्ड प्रमुख व्यक्ति भू-राजस्व नीतियों के निहितार्थ: कृषि का पूंजीवादी रूपांतरण इन नीतियों का प्रभाव यह हुआ कि कृषि के परंपरागत ढांचे का ह्रास होने लगा। अंग्रेजों ने इसे अपने व्यापारिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया। राजस्व वसूली के नियमों में अनिश्चितता के कारण शोषण की प्रवृत्ति पायी गयी। नीलामी जैसी व्यवस्था ने किसानों में सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। किसानों तथा ग्रामीण समुदाय के परंपरा आधारित अधिकारों की अनदेखी की गयी। इसके कारण वे केवल खेतिहर मजदूर बन गए। पुलिस, न्यायालय का हस्तक्षेप बढ़ा क्योंकि राजस्व भुगतान न कर पाने पर अंग्रेजों ने दंडात्मक व्यवस्था अपनाई। इस व्यवस्था से ग्रामीण समाज की समूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया। किसान दिनों-दिन निर्धन होते गए। बड़े पैमाने पर भूमि का हस्तांतरण हुआ। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में जमींदारी, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी आदि प्रमुख भू-राजस्व नीतियों को अपनाया गया था। इन सभी नीतियों का प्रमुख उद्देश्य अत्यधिक आर्थिक लाभ था जिसका परिणाम आर्थिक शोषण, किसानों की दयनीय स्थिति तथा अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में प्रतिलक्षित होता है।
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##Question:भारत में अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ प्रमुख भू-राजस्व नीतियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। साथ ही, इन नीतियों के निहितार्थों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Briefly introduce major land revenue policies initiated by the British in India. Also, discuss the implications of these policies in detail. (200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में नीतियों की पृष्ठभूमि लिखिए। मुख्य भाग के प्रथम खंड में जमींदारी, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व्यवस्था के बारे में बताइये। इसके बाद इन प्रमुख नीतियों के निहितार्थों को लिखिए। निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। उत्तर: ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया।कंपनी ने करों के निर्धारण और वसूली के लिए कई नए प्रकार के भू-राजस्व बंदोबस्त प्रारम्भ किए। इनमें से कुछ प्रमुख नीतियाँ इस प्रकार हैं: स्थायी या जमींदारी व्यवस्था: 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा स्थायी रूप से लागू। इसके अतिरिक्त चार्ल्स ग्रांट, जॉन शोर नामक व्यक्तियों का प्रमुख योगदान। इसके अंतर्गत जमींदार को भूमि का स्थायी मालिक बनाकर भूमि पर अधिकार को पैतृक बना दिया गया। यह अधिकार हस्तांतरणीय था अर्थात् वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी उत्तराधिकारी को दे सकते थे। किसानों से वसूल किए गए कुल रकम का 10/11 भाग कंपनी को देना तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था। रैयतवाड़ी व्यवस्था: थॉमस मुनरो द्वारा प्रारम्भ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बंबई एवं असम के कुछ भागों में लागू किया गया। इस व्यवस्था में किसानों के साथ सीधा बंदोबस्त किया गया। भू- राजस्व का निर्धारण भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था। महालवाड़ी व्यवस्था: यह व्यवस्था मध्य प्रांत, पंजाब, उत्तर प्रदेश के आगरा में लागू की गयी। लॉर्ड हेस्टिंग्स, थॉमसन, मार्टिन बर्ड प्रमुख व्यक्ति भू-राजस्व नीतियों के निहितार्थ: कृषि का पूंजीवादी रूपांतरण इन नीतियों का प्रभाव यह हुआ कि कृषि के परंपरागत ढांचे का ह्रास होने लगा। अंग्रेजों ने इसे अपने व्यापारिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया। राजस्व वसूली के नियमों में अनिश्चितता के कारण शोषण की प्रवृत्ति पायी गयी। नीलामी जैसी व्यवस्था ने किसानों में सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। किसानों तथा ग्रामीण समुदाय के परंपरा आधारित अधिकारों की अनदेखी की गयी। इसके कारण वे केवल खेतिहर मजदूर बन गए। पुलिस, न्यायालय का हस्तक्षेप बढ़ा क्योंकि राजस्व भुगतान न कर पाने पर अंग्रेजों ने दंडात्मक व्यवस्था अपनाई। इस व्यवस्था से ग्रामीण समाज की समूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया। किसान दिनों-दिन निर्धन होते गए। बड़े पैमाने पर भूमि का हस्तांतरण हुआ। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में जमींदारी, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी आदि प्रमुख भू-राजस्व नीतियों को अपनाया गया था। इन सभी नीतियों का प्रमुख उद्देश्य अत्यधिक आर्थिक लाभ था जिसका परिणाम आर्थिक शोषण, किसानों की दयनीय स्थिति तथा अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में प्रतिलक्षित होता है।
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पूर्व मध्यकाल के संदर्भ में, सामंतवाद से आप क्या समझते हैं?सामंतवाद के उदय के कारणों की चर्चा करते हुए, तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द) In the context of the Pre-Medieval era, What do you understand by Feudalism? Explain the reasons for the rise of feudalism and its effects on the society and economy of that time. (10 marks / 150-200 words)
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दृष्टिकोण- भूमिका में सामंतवाद को परिभाषित करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किजिये, प्रथम चरण में सामंतवाद के उदय के कारणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये, तत्कालीन अर्थव्यवस्था पर सामंतवाद के प्रभावों की जानकारी दीजिये, तत्कालीन समाज पर सामंतवाद के प्रभावों की जानकारी दीजिये, अंतिम में समाज और राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| पूर्व मध्यकालीन राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता सामंतवादी व्यवस्था का प्रचलन थी| सीमित अर्थों में सामंतवादवह शासन व्यवस्था है जिसमें राज्य की भूमि बड़े बड़े जमींदारों के अधिकार में रहती है|व्यापक अर्थों में इसमें सम्पूर्ण समाज एवं अर्थव्यवस्था को भी शामिल किया जाता है| सामंतवाद एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ भूमि पर नियंत्रण के आधार पर सामंतों या जमींदारों की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति निर्धारित होती है| यह केन्द्रीय सत्ता द्वारा अधिकारों के हस्तांतरण से उत्पन्न व्यवस्था थी| हर्षवर्धन के पश्चात भारतीय राजनीतिक इतिहास में केन्द्रीय सत्ता निरंतर कमजोर होती गयी एवं छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई जो परस्पर संघर्षरत थे| इन सभी राज्यों की राजनीतिक व्यवस्था सामंती प्रणाली से संचालित थी| सामंतवाद के विकास के कारण धार्मिक, प्रशासनिक एवं अन्य कारणों से होने वाले भूमि अनुदान ने भूराजस्व के स्थानीय दावेदारों की क्रमानुगत श्रेणी का विकास किया जिसने सामंतवाद के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी व्यापार में गिरावट और सिक्कों के प्रचालन में आई कमी के कारण प्रशासनिक और वैतनिक उद्दश्यों से भूमिदान दिया गया था किन्तु बाद में यह एक व्यवस्था के रूप में ढल गयी| सर्वप्रथम सातवाहनों ने भूमि दान की प्रथा की शुरुआत की केन्द्रीय राज्य के पास आय की कमी से सेना में कमी, केन्द्रीय सत्ता की सैन्य निर्भरता के कारण भी सामंतवाद का विकास हुआ| किन्तु इससे सैन्य एकरूपता में कमी आई और सेना में उनके सामंत प्रति निष्ठा अधिक होती थी करदाता अधीनस्थ राज्यों की उपस्थिति के कारण भी सामंती व्यवस्था का विकास हुआ, केन्द्रीय सत्ता द्वारा सर्वप्रथम भू-राजस्व पर अधिकार दिया गया इसके बाद इन जमींदारों को खनन एवं वन संपदा का अधिकार तथा प्रशासनिक अधिकार दिए गये और पूर्व मध्यकाल तक सामंतों को दंड देने का भी अधिकार मिल गया जिससे ये स्थानीय राजा के रूप में विकसित हुए और ये राज्य के भीतर विभिन्न राज्यों के विकास से सामंतवाद का विकास हुआ, व्यापार एवं शिल्पों के पतन से भी सामंवादी व्यवस्था मजबूत हुई यद्यपि केन्द्रीय शासन ने इसे प्रशासनिक सुविधा के लिए आरम्भ किया था किन्तु धीरे-धीरे सामंतवादी प्रणाली वंशानुगत व्यवस्था के रूप में बदलती चली गयी| अर्थव्यवस्था पर सामंतवाद का प्रभाव भूमिदान प्रथा या सामंतवाद के कारण शिल्प एवं व्यापार में गिरावट देखने को मिलती है, शिल्पियों को सामंती क्षेत्रों में रहने के लिए बाध्य किया जाता था, स्थानीय सामंतों द्वारा ली जाने वाली चुंगियों की अधिकता ने व्यापार-वाणिज्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया| शिल्प एवं व्यापार के गिरावट तथा सामंतवादी प्रथा का प्रभाव सिक्कों के प्रचलन पर भी पडा| इस समय आम लेन-देन में कौड़ियों का प्रचलन था या फिर वस्तु-विनिमय प्रणालीको अपनाया जाता था, यद्यपि कलचुरियों एवं कुछ अन्य शासकों के सिक्के मिलते तो हैं किन्तु इन सिक्कों में मिलावट की अधिकता के कारण इनकी आर्थिक उपयोगिता अधिक नही रही होगी, शिल्पों तथा व्यापार में गिरावट ने नगरीकरण की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया| ध्यातव्य है कि चीनी यात्री हुएनसांग तत्कालीन भारत में नगरों के पतन की जानकारी देता है, इस समय कृषि का प्रसार हुआ, सामंतवादी व्यवस्था के अंतर्गत होने वाले भूमिदानइसका एक महत्वपूर्ण कारण था| खम्भात, ताम्रलिप्ति आदि बंदरगाहों के माध्यम से पश्चिमी एवं पूर्वी तट पर व्यापार वाणिज्य के प्रचलन के साक्ष्य मिलते हैं, लेकिन उत्तर भारत में व्यापार-वाणिज्य की स्थिति दक्षिण भारत की तुलना में कमजोर थी| इसका कारण सामंतवाद और दक्षिण में शक्तिशाली राज्यों की उपस्थिति था| समाज पर सामंतवाद का प्रभाव तत्कालीन समाज में वर्ण व्यवस्था का प्रचलन था हालांकि व्यापार वाणिज्य में गिरावट तथा कृषि के प्रसार ने वैश्य एवं शूद्र दोनों ही वर्णों की स्थिति को प्रभावित किया था| हुएनसांग एवं अलबरूनी ने वैश्यों को भी कृषक के रूप में चित्रित किया है, तत्कालीन साहित्य से शूद्रों के द्वारा भी कृषि कार्य करने के उल्लेख मिलते हैं, इस समय के समाज में जातियों की संख्या में वृद्धि देखने को मिलती है, इसका प्रमुख कारण सामंतवाद के कारण विकसित हुई क्षेत्रीयता की भावना थी, भूमिदान की प्रथा के विकास के कारण भूमि प्रपत्रों के निर्माण, संग्रहण के कार्य का विस्तार हुआ इनके संदर्भ में पूर्वमध्य कालीन साहित्य से कायस्थ नामक जाति का अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है, इन्होने शिक्षा पर ब्राहमणों के एकाधिकार को तोड़ा था, महिलाओं की दशा पूर्ववर्ती काल की तरह दयनीय थी, उस समय जौहर प्रथा एवं मंदिरों में देवदासी प्रथा इत्यादि के साक्ष्य मिलते हैं, इसमें भी सामंतवादी अधीनता का बोध होता है, इस समय के साहित्य में वीरता के तत्व अधिक दिखाई देते हैं| इसके साथ ही इस समय क्षेत्रीय भाषाओं का विकास देखने को मिलता है| तमिल,कन्नड़, मलयाली, राजस्थानी और हिंदी आदि भाषाओं में आदि में अनेक रचनाएँ की गयीं, यद्यपि अधिकांशतः चारण साहित्य का सृजन देखने को मिलता है, धार्मिक भूमिदानों के कारण आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों में मंदिरों की भूमिका महत्वपूर्ण होने लगी, मंदिर सामान्य जन-जीवन की अधिकाँश गतिविधियों का केंद्र हो गये, इनके द्वारा कर संग्रहण, बैंकर के कार्य, सांस्कृतिक आयोजन आदिकार्य किये जाने लगे, धार्मिक संस्थाओं द्वारा राज्य के कार्यों के संचालन के कारण इस काल विशेष के संदर्भ मेंमंदिर अर्थव्यवस्था शब्द प्रयोग किया जाता है इसी काल में चौहान, चालुक्य, प्रतिहार एवं परमार राजपूतों की उत्पत्ति का अग्निकुंड सिद्धांत प्रचलित हुआ, इसके माध्यम से राजत्व सिद्धांत में देवत्व का समावेश किया गया, यह भी एक सामंती प्रभाव था| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भूराजस्व पर अधिकार हस्तांतरित करने की प्रक्रिया से शुरू होने वाले सामंतवाद ने पूर्व मध्यकालीन भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला| इस व्यवस्था का दूरगामी प्रभाव स्वामी-दास की मनोवृत्ति के रूप में दिखाई देता है| राजनीतिक रूप यह व्यवस्था तुर्कों द्वारा केंद्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली व्यवस्था की स्थापना तक जारी रही|
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##Question:पूर्व मध्यकाल के संदर्भ में, सामंतवाद से आप क्या समझते हैं?सामंतवाद के उदय के कारणों की चर्चा करते हुए, तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द) In the context of the Pre-Medieval era, What do you understand by Feudalism? Explain the reasons for the rise of feudalism and its effects on the society and economy of that time. (10 marks / 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में सामंतवाद को परिभाषित करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किजिये, प्रथम चरण में सामंतवाद के उदय के कारणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये, तत्कालीन अर्थव्यवस्था पर सामंतवाद के प्रभावों की जानकारी दीजिये, तत्कालीन समाज पर सामंतवाद के प्रभावों की जानकारी दीजिये, अंतिम में समाज और राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| पूर्व मध्यकालीन राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता सामंतवादी व्यवस्था का प्रचलन थी| सीमित अर्थों में सामंतवादवह शासन व्यवस्था है जिसमें राज्य की भूमि बड़े बड़े जमींदारों के अधिकार में रहती है|व्यापक अर्थों में इसमें सम्पूर्ण समाज एवं अर्थव्यवस्था को भी शामिल किया जाता है| सामंतवाद एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ भूमि पर नियंत्रण के आधार पर सामंतों या जमींदारों की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति निर्धारित होती है| यह केन्द्रीय सत्ता द्वारा अधिकारों के हस्तांतरण से उत्पन्न व्यवस्था थी| हर्षवर्धन के पश्चात भारतीय राजनीतिक इतिहास में केन्द्रीय सत्ता निरंतर कमजोर होती गयी एवं छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई जो परस्पर संघर्षरत थे| इन सभी राज्यों की राजनीतिक व्यवस्था सामंती प्रणाली से संचालित थी| सामंतवाद के विकास के कारण धार्मिक, प्रशासनिक एवं अन्य कारणों से होने वाले भूमि अनुदान ने भूराजस्व के स्थानीय दावेदारों की क्रमानुगत श्रेणी का विकास किया जिसने सामंतवाद के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी व्यापार में गिरावट और सिक्कों के प्रचालन में आई कमी के कारण प्रशासनिक और वैतनिक उद्दश्यों से भूमिदान दिया गया था किन्तु बाद में यह एक व्यवस्था के रूप में ढल गयी| सर्वप्रथम सातवाहनों ने भूमि दान की प्रथा की शुरुआत की केन्द्रीय राज्य के पास आय की कमी से सेना में कमी, केन्द्रीय सत्ता की सैन्य निर्भरता के कारण भी सामंतवाद का विकास हुआ| किन्तु इससे सैन्य एकरूपता में कमी आई और सेना में उनके सामंत प्रति निष्ठा अधिक होती थी करदाता अधीनस्थ राज्यों की उपस्थिति के कारण भी सामंती व्यवस्था का विकास हुआ, केन्द्रीय सत्ता द्वारा सर्वप्रथम भू-राजस्व पर अधिकार दिया गया इसके बाद इन जमींदारों को खनन एवं वन संपदा का अधिकार तथा प्रशासनिक अधिकार दिए गये और पूर्व मध्यकाल तक सामंतों को दंड देने का भी अधिकार मिल गया जिससे ये स्थानीय राजा के रूप में विकसित हुए और ये राज्य के भीतर विभिन्न राज्यों के विकास से सामंतवाद का विकास हुआ, व्यापार एवं शिल्पों के पतन से भी सामंवादी व्यवस्था मजबूत हुई यद्यपि केन्द्रीय शासन ने इसे प्रशासनिक सुविधा के लिए आरम्भ किया था किन्तु धीरे-धीरे सामंतवादी प्रणाली वंशानुगत व्यवस्था के रूप में बदलती चली गयी| अर्थव्यवस्था पर सामंतवाद का प्रभाव भूमिदान प्रथा या सामंतवाद के कारण शिल्प एवं व्यापार में गिरावट देखने को मिलती है, शिल्पियों को सामंती क्षेत्रों में रहने के लिए बाध्य किया जाता था, स्थानीय सामंतों द्वारा ली जाने वाली चुंगियों की अधिकता ने व्यापार-वाणिज्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया| शिल्प एवं व्यापार के गिरावट तथा सामंतवादी प्रथा का प्रभाव सिक्कों के प्रचलन पर भी पडा| इस समय आम लेन-देन में कौड़ियों का प्रचलन था या फिर वस्तु-विनिमय प्रणालीको अपनाया जाता था, यद्यपि कलचुरियों एवं कुछ अन्य शासकों के सिक्के मिलते तो हैं किन्तु इन सिक्कों में मिलावट की अधिकता के कारण इनकी आर्थिक उपयोगिता अधिक नही रही होगी, शिल्पों तथा व्यापार में गिरावट ने नगरीकरण की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया| ध्यातव्य है कि चीनी यात्री हुएनसांग तत्कालीन भारत में नगरों के पतन की जानकारी देता है, इस समय कृषि का प्रसार हुआ, सामंतवादी व्यवस्था के अंतर्गत होने वाले भूमिदानइसका एक महत्वपूर्ण कारण था| खम्भात, ताम्रलिप्ति आदि बंदरगाहों के माध्यम से पश्चिमी एवं पूर्वी तट पर व्यापार वाणिज्य के प्रचलन के साक्ष्य मिलते हैं, लेकिन उत्तर भारत में व्यापार-वाणिज्य की स्थिति दक्षिण भारत की तुलना में कमजोर थी| इसका कारण सामंतवाद और दक्षिण में शक्तिशाली राज्यों की उपस्थिति था| समाज पर सामंतवाद का प्रभाव तत्कालीन समाज में वर्ण व्यवस्था का प्रचलन था हालांकि व्यापार वाणिज्य में गिरावट तथा कृषि के प्रसार ने वैश्य एवं शूद्र दोनों ही वर्णों की स्थिति को प्रभावित किया था| हुएनसांग एवं अलबरूनी ने वैश्यों को भी कृषक के रूप में चित्रित किया है, तत्कालीन साहित्य से शूद्रों के द्वारा भी कृषि कार्य करने के उल्लेख मिलते हैं, इस समय के समाज में जातियों की संख्या में वृद्धि देखने को मिलती है, इसका प्रमुख कारण सामंतवाद के कारण विकसित हुई क्षेत्रीयता की भावना थी, भूमिदान की प्रथा के विकास के कारण भूमि प्रपत्रों के निर्माण, संग्रहण के कार्य का विस्तार हुआ इनके संदर्भ में पूर्वमध्य कालीन साहित्य से कायस्थ नामक जाति का अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है, इन्होने शिक्षा पर ब्राहमणों के एकाधिकार को तोड़ा था, महिलाओं की दशा पूर्ववर्ती काल की तरह दयनीय थी, उस समय जौहर प्रथा एवं मंदिरों में देवदासी प्रथा इत्यादि के साक्ष्य मिलते हैं, इसमें भी सामंतवादी अधीनता का बोध होता है, इस समय के साहित्य में वीरता के तत्व अधिक दिखाई देते हैं| इसके साथ ही इस समय क्षेत्रीय भाषाओं का विकास देखने को मिलता है| तमिल,कन्नड़, मलयाली, राजस्थानी और हिंदी आदि भाषाओं में आदि में अनेक रचनाएँ की गयीं, यद्यपि अधिकांशतः चारण साहित्य का सृजन देखने को मिलता है, धार्मिक भूमिदानों के कारण आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों में मंदिरों की भूमिका महत्वपूर्ण होने लगी, मंदिर सामान्य जन-जीवन की अधिकाँश गतिविधियों का केंद्र हो गये, इनके द्वारा कर संग्रहण, बैंकर के कार्य, सांस्कृतिक आयोजन आदिकार्य किये जाने लगे, धार्मिक संस्थाओं द्वारा राज्य के कार्यों के संचालन के कारण इस काल विशेष के संदर्भ मेंमंदिर अर्थव्यवस्था शब्द प्रयोग किया जाता है इसी काल में चौहान, चालुक्य, प्रतिहार एवं परमार राजपूतों की उत्पत्ति का अग्निकुंड सिद्धांत प्रचलित हुआ, इसके माध्यम से राजत्व सिद्धांत में देवत्व का समावेश किया गया, यह भी एक सामंती प्रभाव था| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भूराजस्व पर अधिकार हस्तांतरित करने की प्रक्रिया से शुरू होने वाले सामंतवाद ने पूर्व मध्यकालीन भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला| इस व्यवस्था का दूरगामी प्रभाव स्वामी-दास की मनोवृत्ति के रूप में दिखाई देता है| राजनीतिक रूप यह व्यवस्था तुर्कों द्वारा केंद्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली व्यवस्था की स्थापना तक जारी रही|
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उर्वरक सब्सिडी से कृषकों को और लाभान्वित करने हेतु सरकार के द्वारा प्रत्यक्ष लाभ हस्तानान्तरण (DBT) की प्रणाली का प्रारंभ किया गया है। इस कथन के सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के प्रमुख लाभों और चुनौतियों की चर्चा कीजिये।(150- 200 शब्द ) In order to further benefit the farmers from fertilizer subsidy, the system of Direct Benefit Transfer (DBT) has been introduced by the government. With reference to this statement, discuss the major benefits and challenges of direct benefit transfer. (150 - 200 words)
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दृष्टिकोण : भारत में उर्वरक नीति के मुख्य उद्येश्यों की चर्चा कीजिये उर्वरक सब्सिडी के लिए DBT की प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय दीजिये इसके मुख्य लाभों की चर्चा कीजिये इस प्रणाली के समक्ष उपस्थित मुख्य चुनौतियों का उल्लेख कीजिये अंततः उर्वरक सब्सिडी को कृषकों की आय में वृद्धि से सम्बद्ध करके चर्चा कीजिये उर्वरक कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता को प्रभावित करने वाला एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण कृषि इनपुट है| कृषि के निरंतर विकास और संतुलित पोषक तत्व अनुप्रयोग को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है कि किसानों को उर्वरक वहनीय मूल्य पर उपलब्ध करवाएं जाएँ| उर्वरक सब्सिडी उर्वरक सब्सिडी ,कृषि आगत सब्सिडी का एक मुख्य प्रकार है जो किसानों द्वारा किये गए निवेश लागत को पूर्ण करने के लिए उन्हें प्रदान किया जाता है| ये सब्सिडी सामान्यतः लघु एवं सीमांत किसानों तथा अनुसूचितजाति एवं जनजाति के किसानों को प्रदान किये जाते हैं | इसी उद्देश्य से एकमात्र नियंत्रित उर्वरक यूरिया को सांविधिक अधिसूचित एकसमान बिक्री मूल्य पर बेचा जा रहा है, और नियंत्रणमुक्त फॉस्फेटयुक्त और पोटाशयुक्त उर्वरकों को एक सांकेतिक अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर बेचा जा रहा है| खेत पर पहुंचाए गए उर्वरक के मूल्य और किसान द्वारा भुगतान किए गए अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच का अन्तर सरकार द्वारा उर्वरक निर्माता/आयातक को दी जाने वाली सब्सिडी के रूप में दिया जाता है| डीबीटी फ्रेमवर्क के तहत सब्सिडी भुगतान प्रणाली प्रस्तावित डीबीटी सिस्टम में लाभार्थी को खुदरा विक्रेता द्वारा वास्तविक बिक्री के आधार पर उर्वरक निर्माण कंपनियों को सब्सिडी का 100% भुगतान शामिल है; किसान या खरीदार की पहचान बॉयोमीट्रिक, आधार आधारित, विशिष्ट पहचान संख्या या मतदाता पहचान पत्र या किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से प्रमाणित किये जाने का प्रावधान है; आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को प्राथमिकता दी जाएगी क्योंकि यह भूमि अभिलेख और किसान के मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड से जुड़ा हुआ है; यह लाभार्थी द्वारा आयोजित कृषि भूमि की मृदा स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल के अनुकूल संगत उर्वरकों के उचित मिश्रण के उपयोग के लिए प्रेरित करेगा या सिफारिश करेगा ; हालांकि, लाभार्थी के लिए यह सिफारिश बाध्यकारी नहीं है लाभार्थी को किये जाने वाली बिक्री खुदरा विक्रेता के द्वारा अंत में प्रयोग किये जाने वाले प्वाइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों के माध्यम से आंकलित की जाएगी|इस प्रकार सभी उर्वरक बिक्री व लेनदेन सम्बंधित आंकड़ों को वास्तविक समय पर आधारित एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (आईएफएमएस) में ऑनलाइन आंकलित कर लिए जायेंगे ; इस आधार पर किये जाने वाले दावों को साप्ताहिक आधार पर संसाधित किया जाएगा और सब्सिडी की राशि को इलेक्ट्रॉनिक मोड के माध्यम से कंपनी के बैंक खाते में प्रेषित कर दिया जायेगा | DBT के लाभ प्रस्तावित डीबीटी ढांचा के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर लाभार्थी संचालित सब्सिडी भुगतान तंत्र का निर्माण किया जायेगा ; इससे लाभार्थियों के आधार कार्ड के द्वारा एक डेटाबेस का भी निर्माण करेगा जो खरीदारों के स्तर पर किये गए लेनदेन सम्बंधित आंकड़ों का प्रदर्शन करता है; वास्तविक बिक्री को सब्सिडी भुगतान से जोड़कर, इससे मूल्य श्रृंखला के साथ-साथ निर्माताओं से लेकर लाभार्थियों के लिए धन की अधिक पारदर्शी प्रणाली का निर्माण होगा और तेज़ी से ट्रैकिंग की सुविधा प्रदान की जा सकेगी ; उर्वरकों के विचलन(Deviation) को कम करने की उम्मीद है DBT की चुनौतियाँ / चिंताएं कनेक्टिविटी – भारत में आईटी सेवाओं जैसे इन्टरनेट कनेक्टिविटी डिजिटल ज्ञान में उपस्थित कमियों के कारण यह संभव है कि यह प्रणाली अपेक्षित रूप में प्रभावी न हो और यह संभव है कि रियल टाइम डाटा प्राप्त न किये जा सके | डीलर्स और विक्रेता – यह संभव है की विक्रेता के द्वारा अपेक्षित रुचि में कमी आये क्योंकि उनके लाभ और मार्जिन में होने वाली कमी उन्हें अपेक्षित उर्वरकों की बिक्री से उन्हें दूर कर सकता है| लाभार्थी की पहचान – भारत में अभी भी आधार प्रमाणीकरण व्यवस्था दोष से मुक्त नहीं है ,इससे लाभार्थियों की सही पहचान करना एक बहुत बड़ी चुनौती है| pos मशीन का प्रयोग – भारत में अभी भी उपभोक्ता एवं विक्रेता दोनों के द्वारा pos मशीन के सही उपयोग को बढ़ावा नहीं दिया जा सका है| विभिन्न इनपुट – उर्वरक सब्सिडी के अंतर्गत यूरिया के साथ-साथ फास्फोरिक और पोटाश आधारित उर्वरकों पर भी सब्सिडी दी जाती है| साथ ही इन सभी पर अलग-अलग सब्सिडी निर्धारित है| इस स्थिति में किसानों के लिए इसकी चुनौती बनी रहेगी कि आवश्यकता के अनुसार वो सभी उर्वरकों का क्रय कर पाए| इस प्रकार तमाम चुनौतियों के बावजूद उर्वरक सब्सिडी में DBT प्रणाली एक उल्लेखनीय पहल है जिससे नवीन लाभार्थियों की पहचान करना एवं वहनीय राशि पर उर्वरकों को उपलब्द्ध करवाना संभव है | इसका प्रत्यक्ष प्रभाव किसानों को उनकी लागत को कम करने के रूप में देखा जा सकता है जो उनकी आय में वृद्धि करने में मुख्य भूमिका निभा सकता है |
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##Question:उर्वरक सब्सिडी से कृषकों को और लाभान्वित करने हेतु सरकार के द्वारा प्रत्यक्ष लाभ हस्तानान्तरण (DBT) की प्रणाली का प्रारंभ किया गया है। इस कथन के सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के प्रमुख लाभों और चुनौतियों की चर्चा कीजिये।(150- 200 शब्द ) In order to further benefit the farmers from fertilizer subsidy, the system of Direct Benefit Transfer (DBT) has been introduced by the government. With reference to this statement, discuss the major benefits and challenges of direct benefit transfer. (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण : भारत में उर्वरक नीति के मुख्य उद्येश्यों की चर्चा कीजिये उर्वरक सब्सिडी के लिए DBT की प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय दीजिये इसके मुख्य लाभों की चर्चा कीजिये इस प्रणाली के समक्ष उपस्थित मुख्य चुनौतियों का उल्लेख कीजिये अंततः उर्वरक सब्सिडी को कृषकों की आय में वृद्धि से सम्बद्ध करके चर्चा कीजिये उर्वरक कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता को प्रभावित करने वाला एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण कृषि इनपुट है| कृषि के निरंतर विकास और संतुलित पोषक तत्व अनुप्रयोग को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है कि किसानों को उर्वरक वहनीय मूल्य पर उपलब्ध करवाएं जाएँ| उर्वरक सब्सिडी उर्वरक सब्सिडी ,कृषि आगत सब्सिडी का एक मुख्य प्रकार है जो किसानों द्वारा किये गए निवेश लागत को पूर्ण करने के लिए उन्हें प्रदान किया जाता है| ये सब्सिडी सामान्यतः लघु एवं सीमांत किसानों तथा अनुसूचितजाति एवं जनजाति के किसानों को प्रदान किये जाते हैं | इसी उद्देश्य से एकमात्र नियंत्रित उर्वरक यूरिया को सांविधिक अधिसूचित एकसमान बिक्री मूल्य पर बेचा जा रहा है, और नियंत्रणमुक्त फॉस्फेटयुक्त और पोटाशयुक्त उर्वरकों को एक सांकेतिक अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर बेचा जा रहा है| खेत पर पहुंचाए गए उर्वरक के मूल्य और किसान द्वारा भुगतान किए गए अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच का अन्तर सरकार द्वारा उर्वरक निर्माता/आयातक को दी जाने वाली सब्सिडी के रूप में दिया जाता है| डीबीटी फ्रेमवर्क के तहत सब्सिडी भुगतान प्रणाली प्रस्तावित डीबीटी सिस्टम में लाभार्थी को खुदरा विक्रेता द्वारा वास्तविक बिक्री के आधार पर उर्वरक निर्माण कंपनियों को सब्सिडी का 100% भुगतान शामिल है; किसान या खरीदार की पहचान बॉयोमीट्रिक, आधार आधारित, विशिष्ट पहचान संख्या या मतदाता पहचान पत्र या किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से प्रमाणित किये जाने का प्रावधान है; आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को प्राथमिकता दी जाएगी क्योंकि यह भूमि अभिलेख और किसान के मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड से जुड़ा हुआ है; यह लाभार्थी द्वारा आयोजित कृषि भूमि की मृदा स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल के अनुकूल संगत उर्वरकों के उचित मिश्रण के उपयोग के लिए प्रेरित करेगा या सिफारिश करेगा ; हालांकि, लाभार्थी के लिए यह सिफारिश बाध्यकारी नहीं है लाभार्थी को किये जाने वाली बिक्री खुदरा विक्रेता के द्वारा अंत में प्रयोग किये जाने वाले प्वाइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों के माध्यम से आंकलित की जाएगी|इस प्रकार सभी उर्वरक बिक्री व लेनदेन सम्बंधित आंकड़ों को वास्तविक समय पर आधारित एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (आईएफएमएस) में ऑनलाइन आंकलित कर लिए जायेंगे ; इस आधार पर किये जाने वाले दावों को साप्ताहिक आधार पर संसाधित किया जाएगा और सब्सिडी की राशि को इलेक्ट्रॉनिक मोड के माध्यम से कंपनी के बैंक खाते में प्रेषित कर दिया जायेगा | DBT के लाभ प्रस्तावित डीबीटी ढांचा के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर लाभार्थी संचालित सब्सिडी भुगतान तंत्र का निर्माण किया जायेगा ; इससे लाभार्थियों के आधार कार्ड के द्वारा एक डेटाबेस का भी निर्माण करेगा जो खरीदारों के स्तर पर किये गए लेनदेन सम्बंधित आंकड़ों का प्रदर्शन करता है; वास्तविक बिक्री को सब्सिडी भुगतान से जोड़कर, इससे मूल्य श्रृंखला के साथ-साथ निर्माताओं से लेकर लाभार्थियों के लिए धन की अधिक पारदर्शी प्रणाली का निर्माण होगा और तेज़ी से ट्रैकिंग की सुविधा प्रदान की जा सकेगी ; उर्वरकों के विचलन(Deviation) को कम करने की उम्मीद है DBT की चुनौतियाँ / चिंताएं कनेक्टिविटी – भारत में आईटी सेवाओं जैसे इन्टरनेट कनेक्टिविटी डिजिटल ज्ञान में उपस्थित कमियों के कारण यह संभव है कि यह प्रणाली अपेक्षित रूप में प्रभावी न हो और यह संभव है कि रियल टाइम डाटा प्राप्त न किये जा सके | डीलर्स और विक्रेता – यह संभव है की विक्रेता के द्वारा अपेक्षित रुचि में कमी आये क्योंकि उनके लाभ और मार्जिन में होने वाली कमी उन्हें अपेक्षित उर्वरकों की बिक्री से उन्हें दूर कर सकता है| लाभार्थी की पहचान – भारत में अभी भी आधार प्रमाणीकरण व्यवस्था दोष से मुक्त नहीं है ,इससे लाभार्थियों की सही पहचान करना एक बहुत बड़ी चुनौती है| pos मशीन का प्रयोग – भारत में अभी भी उपभोक्ता एवं विक्रेता दोनों के द्वारा pos मशीन के सही उपयोग को बढ़ावा नहीं दिया जा सका है| विभिन्न इनपुट – उर्वरक सब्सिडी के अंतर्गत यूरिया के साथ-साथ फास्फोरिक और पोटाश आधारित उर्वरकों पर भी सब्सिडी दी जाती है| साथ ही इन सभी पर अलग-अलग सब्सिडी निर्धारित है| इस स्थिति में किसानों के लिए इसकी चुनौती बनी रहेगी कि आवश्यकता के अनुसार वो सभी उर्वरकों का क्रय कर पाए| इस प्रकार तमाम चुनौतियों के बावजूद उर्वरक सब्सिडी में DBT प्रणाली एक उल्लेखनीय पहल है जिससे नवीन लाभार्थियों की पहचान करना एवं वहनीय राशि पर उर्वरकों को उपलब्द्ध करवाना संभव है | इसका प्रत्यक्ष प्रभाव किसानों को उनकी लागत को कम करने के रूप में देखा जा सकता है जो उनकी आय में वृद्धि करने में मुख्य भूमिका निभा सकता है |
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अमेरिकी क्रांति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये | साथ ही यह भी बताइये की अमेरिकी क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति को किस प्रकार प्रभावित किया ? (200 शब्द )
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दृष्टिकोण – अमेरिकी क्रांति की संक्षेप मे चर्चा कीजिये | अमेरिकी क्रांति के विभिन्न चरण के संक्षित विश्लेषण | सरकार की प्रतिकियाकी मुख्य तत्व | फ्राँसिसी क्रांति पर प्रभाव के विविध आयामों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये | 18 वी शताब्दी मे विश्व इतिहास के सबसे चर्चित घटनाओं मे अमेरिकी क्रांति को स्वर्णिम अक्षरों मे लिखा जाता है |हालांकि अमेरिकी क्रांति अन्य देशो के अपेक्षा अलग थी तथा इसने विश्व के उपनिवेश देशों को एक नयी दिशा प्रदान की | जिसके कारण तथा महत्व निम्न थे | अमेरिकी क्रांति के कारण असंतोष का कारण – 16 वी से 18 वी शादी के मध्य यूरोप मे वाणिज्यवादी विचारधारा का प्रभाव का होना ,इसके अंतर्गत अनूकूल व्यापार संतुलन पर बल दिया जाता था |इसी चरण मे ब्रिटेन ने अमेरिका मे 13 उपनिवेश बनाए ,और वाणिज्यवादी नीतियों को आधार बना कर अमेरिका का शोषण किया | जैसे -नौपरिवहन कानून (1651) के द्वारा समस्त आयात -निर्यात को नियंत्रित किया गया | कुछ उत्पाद जैसे की तंबाकू ,कपास चीनी इत्यादि का निर्यात अमेरिका से केवल ब्रिटेन को होता था |अमेरिका से होने वाले सभी निर्यात तथा आयात पर सीमा शुल्क आरोपित किए जाते थे |18 वी सदी के पूर्वार्ध मे ब्रिटेन के लौह एवं कपड़ा उद्योगो को प्रतिबंधित किया गया |उपरोक्त नीतियों के कारण असंतोस का होना स्वाभाविक था लेकिन इन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू न किए जाने के कारण असंतोषका स्वर उग्र नहीं था | राजनीतिक कारण – राजनीतिक दृष्टिकोण से अमेरिका अपेक्षाकृत एक विकसित उपनिवेश था |सभी बस्तियों मे विधायिका की स्थापना हो चुकी थी और इसमे स्थानीय लोगों की भागीदारी थी | विधान मंडलों को कर लगाने का अधिकार था लेकिन गवर्नरों को विशेष अधिकार थे और उनकी नियुक्ति ब्रिटेन के द्वारा की जाती थी | सामाजिक कारण – समय के साथ अमेरिकी समाज मे उन वर्गों का विकास जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे -व्यापारी वर्ग ,भूमि माफियायों का वर्ग ,शिक्षित वर्ग ,तस्करो का वर्ग इत्यादि | यूरोपियन तर्ज पर अमेरिका मे भी आधुनिक शिक्षण -संस्थानों की स्थापना जैसे -हार्वड ,येल इत्यादि शिक्षण संस्थाएं | शिक्षा के साथ ही आधुनिक विचार का प्रसार हुआ और इन विचारों ने ब्रिटिश विरोध नीतियों का समर्थन किया | वैचारिक कारण – 18 वी सदी के उतरार्ध मे बड़ी संख्या मे बुद्धिजीवियों की उपस्थिती , जो लोगो को जागरूक कर रहे थे | जैसे- बेंजामिन फ्रेंकलिन ,जेफरसन ,एडम्स ,वाशिंगटन ,जॉन लॉक ,रूसो ,वलटेयर इत्यादि विचारकों का भी अमेरिकी समाज या बुद्धिजीवियों पर प्रभाव देख सकते है |इन विचारकों ने असन्तुष्ट लोगो मे क्रांतिकारी विकजर का प्रसार किया ,तथा ब्रिटिश नियंत्रण का तार्किक आधार पर विरोध ही किया | इनके विचारों को लोगो तक पहुचाने मे अखबारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी | जैसे -न्यूयार्क गज़ट,बोस्टन न्यूज़ लेटर इत्यादि | अमेरिका –वासियों की प्रतिक्रिया- अमेरिकवासियों ने इस कानून का विरोध किया | विभिन्न बस्तियों मे स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से राजनीतिक गतिशीलता हुयी | ब्रिटिश वस्तुओं का विरोध किया जाने लगा और मेसाच्युसेटस मे एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमे इन करों को वापस लेने को कहा गया तथा यह नारा दिया गया -प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं | अमेरिकी क्रांति के महत्व और प्रभाव - उपनिवेश का प्रथम संघर्ष | इस ने विश्व मे उपनिवेश को एक शिक्षा दी | दक्षिण अमेरिका के राष्ट्रीय आंदोलनों पर इसका प्रभाव देखा गया | 1823 तक अधिकांशतः दक्षिण अमेरिकी राष्ट्र स्पेन एवं पुर्तगाल के नियंत्रण से स्वतंत्र हो चुके थे | अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम से फ़्रांस ,इटली एवं जर्मनी के राष्ट्रवादियों ने प्रेरणा ग्रहण की इत्यादि | आधुनिक राजनीति के विकास मे भी अमेरिकी क्रांति का महत्वपूर्ण योगदान है | जैसे -अमेरिका मे संविधान के द्वारा कानून के शासन की मांग राखी गयी | संप्रभुता जनता मे निहित है ,यह अवधारणा भी लोकप्रिय हुयी | आधुनिक लोकतन्त्र के क्षेत्र मे भी कई नए प्रयोग किए गए है है | जैसे लोकतन्त्र के संदर्भ मे ,संघात्मक सरकार ,संविधान संशोंधन की कठोर प्रतिक्रिया ,मूल अधिकारों का प्रावधान इत्यादि | समय के साथ विश्व के अधिकांशतः संविधानों पर किसी न किसी रूप मे अमेरिकी संविधानों का प्रभाव देखा गया | अमेरिकी क्रांति की सीमाएं - अमेरिकी संविधान मे महिलाओं एवं रेड -इंडियन को मत देने का अधिकार नहीं दिया गया तथा दासों को नागरिक नहीं माना गया | 1861 से 1864 के मध्य अमेरिका मे दासता के मुद्दे पर गृहयुद्ध हुआ और गृहयुद्ध के पश्चात दास प्रथा को समाप्त किया गया | 19 वी शताब्दी के अंत तक रेड इंडियन को तथा प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात महिलाओं को मत देने का अधिकार मिला | आजादी के पश्चात से ही रंग एवं नस्ल के आधार पर अमेरिकी समाज मे तनाव देखा गया | द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नागरिक अधिकार आंदोलन चलाया | फ्राँसिसी क्रांति पर प्रभाव - अमेरिकी क्रांति ने फ्रांस के सेनाओं के लिए एक प्रेरणा का कार्य किया |जैसे –स्वतन्त्रता और समानता को अपना लक्ष्य बनाया | फ्रांस के सैनिकों ने अमेरिकी क्रांति मे बढ़ –चढ़कर हिस्सा लिया | इसी से प्रेरित होकर वे फ्रांस मे अमेरिका के तरह समानता स्वतन्त्रता चाहते थे | फ्रांसीसी जनरल लफायते ने अमेरिकी क्रांति को नेतृत्व प्रदान किया था | अमेरिकी क्रांति विश्व पटल पर एक अहम छाप छोडती है जिसे पहले फ्रांस तथा बाद के वर्षों मे विश्व के अन्य देशों ने भी अपनाया |
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##Question:अमेरिकी क्रांति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये | साथ ही यह भी बताइये की अमेरिकी क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति को किस प्रकार प्रभावित किया ? (200 शब्द )##Answer:दृष्टिकोण – अमेरिकी क्रांति की संक्षेप मे चर्चा कीजिये | अमेरिकी क्रांति के विभिन्न चरण के संक्षित विश्लेषण | सरकार की प्रतिकियाकी मुख्य तत्व | फ्राँसिसी क्रांति पर प्रभाव के विविध आयामों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये | 18 वी शताब्दी मे विश्व इतिहास के सबसे चर्चित घटनाओं मे अमेरिकी क्रांति को स्वर्णिम अक्षरों मे लिखा जाता है |हालांकि अमेरिकी क्रांति अन्य देशो के अपेक्षा अलग थी तथा इसने विश्व के उपनिवेश देशों को एक नयी दिशा प्रदान की | जिसके कारण तथा महत्व निम्न थे | अमेरिकी क्रांति के कारण असंतोष का कारण – 16 वी से 18 वी शादी के मध्य यूरोप मे वाणिज्यवादी विचारधारा का प्रभाव का होना ,इसके अंतर्गत अनूकूल व्यापार संतुलन पर बल दिया जाता था |इसी चरण मे ब्रिटेन ने अमेरिका मे 13 उपनिवेश बनाए ,और वाणिज्यवादी नीतियों को आधार बना कर अमेरिका का शोषण किया | जैसे -नौपरिवहन कानून (1651) के द्वारा समस्त आयात -निर्यात को नियंत्रित किया गया | कुछ उत्पाद जैसे की तंबाकू ,कपास चीनी इत्यादि का निर्यात अमेरिका से केवल ब्रिटेन को होता था |अमेरिका से होने वाले सभी निर्यात तथा आयात पर सीमा शुल्क आरोपित किए जाते थे |18 वी सदी के पूर्वार्ध मे ब्रिटेन के लौह एवं कपड़ा उद्योगो को प्रतिबंधित किया गया |उपरोक्त नीतियों के कारण असंतोस का होना स्वाभाविक था लेकिन इन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू न किए जाने के कारण असंतोषका स्वर उग्र नहीं था | राजनीतिक कारण – राजनीतिक दृष्टिकोण से अमेरिका अपेक्षाकृत एक विकसित उपनिवेश था |सभी बस्तियों मे विधायिका की स्थापना हो चुकी थी और इसमे स्थानीय लोगों की भागीदारी थी | विधान मंडलों को कर लगाने का अधिकार था लेकिन गवर्नरों को विशेष अधिकार थे और उनकी नियुक्ति ब्रिटेन के द्वारा की जाती थी | सामाजिक कारण – समय के साथ अमेरिकी समाज मे उन वर्गों का विकास जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे -व्यापारी वर्ग ,भूमि माफियायों का वर्ग ,शिक्षित वर्ग ,तस्करो का वर्ग इत्यादि | यूरोपियन तर्ज पर अमेरिका मे भी आधुनिक शिक्षण -संस्थानों की स्थापना जैसे -हार्वड ,येल इत्यादि शिक्षण संस्थाएं | शिक्षा के साथ ही आधुनिक विचार का प्रसार हुआ और इन विचारों ने ब्रिटिश विरोध नीतियों का समर्थन किया | वैचारिक कारण – 18 वी सदी के उतरार्ध मे बड़ी संख्या मे बुद्धिजीवियों की उपस्थिती , जो लोगो को जागरूक कर रहे थे | जैसे- बेंजामिन फ्रेंकलिन ,जेफरसन ,एडम्स ,वाशिंगटन ,जॉन लॉक ,रूसो ,वलटेयर इत्यादि विचारकों का भी अमेरिकी समाज या बुद्धिजीवियों पर प्रभाव देख सकते है |इन विचारकों ने असन्तुष्ट लोगो मे क्रांतिकारी विकजर का प्रसार किया ,तथा ब्रिटिश नियंत्रण का तार्किक आधार पर विरोध ही किया | इनके विचारों को लोगो तक पहुचाने मे अखबारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी | जैसे -न्यूयार्क गज़ट,बोस्टन न्यूज़ लेटर इत्यादि | अमेरिका –वासियों की प्रतिक्रिया- अमेरिकवासियों ने इस कानून का विरोध किया | विभिन्न बस्तियों मे स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से राजनीतिक गतिशीलता हुयी | ब्रिटिश वस्तुओं का विरोध किया जाने लगा और मेसाच्युसेटस मे एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमे इन करों को वापस लेने को कहा गया तथा यह नारा दिया गया -प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं | अमेरिकी क्रांति के महत्व और प्रभाव - उपनिवेश का प्रथम संघर्ष | इस ने विश्व मे उपनिवेश को एक शिक्षा दी | दक्षिण अमेरिका के राष्ट्रीय आंदोलनों पर इसका प्रभाव देखा गया | 1823 तक अधिकांशतः दक्षिण अमेरिकी राष्ट्र स्पेन एवं पुर्तगाल के नियंत्रण से स्वतंत्र हो चुके थे | अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम से फ़्रांस ,इटली एवं जर्मनी के राष्ट्रवादियों ने प्रेरणा ग्रहण की इत्यादि | आधुनिक राजनीति के विकास मे भी अमेरिकी क्रांति का महत्वपूर्ण योगदान है | जैसे -अमेरिका मे संविधान के द्वारा कानून के शासन की मांग राखी गयी | संप्रभुता जनता मे निहित है ,यह अवधारणा भी लोकप्रिय हुयी | आधुनिक लोकतन्त्र के क्षेत्र मे भी कई नए प्रयोग किए गए है है | जैसे लोकतन्त्र के संदर्भ मे ,संघात्मक सरकार ,संविधान संशोंधन की कठोर प्रतिक्रिया ,मूल अधिकारों का प्रावधान इत्यादि | समय के साथ विश्व के अधिकांशतः संविधानों पर किसी न किसी रूप मे अमेरिकी संविधानों का प्रभाव देखा गया | अमेरिकी क्रांति की सीमाएं - अमेरिकी संविधान मे महिलाओं एवं रेड -इंडियन को मत देने का अधिकार नहीं दिया गया तथा दासों को नागरिक नहीं माना गया | 1861 से 1864 के मध्य अमेरिका मे दासता के मुद्दे पर गृहयुद्ध हुआ और गृहयुद्ध के पश्चात दास प्रथा को समाप्त किया गया | 19 वी शताब्दी के अंत तक रेड इंडियन को तथा प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात महिलाओं को मत देने का अधिकार मिला | आजादी के पश्चात से ही रंग एवं नस्ल के आधार पर अमेरिकी समाज मे तनाव देखा गया | द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नागरिक अधिकार आंदोलन चलाया | फ्राँसिसी क्रांति पर प्रभाव - अमेरिकी क्रांति ने फ्रांस के सेनाओं के लिए एक प्रेरणा का कार्य किया |जैसे –स्वतन्त्रता और समानता को अपना लक्ष्य बनाया | फ्रांस के सैनिकों ने अमेरिकी क्रांति मे बढ़ –चढ़कर हिस्सा लिया | इसी से प्रेरित होकर वे फ्रांस मे अमेरिका के तरह समानता स्वतन्त्रता चाहते थे | फ्रांसीसी जनरल लफायते ने अमेरिकी क्रांति को नेतृत्व प्रदान किया था | अमेरिकी क्रांति विश्व पटल पर एक अहम छाप छोडती है जिसे पहले फ्रांस तथा बाद के वर्षों मे विश्व के अन्य देशों ने भी अपनाया |
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श्रमबल भागीदारी/सहभागिता दर क्या है? वे कौन से कारण है जो श्रमबल में महिला भागीदारी दर में कमी के लिए जिम्मेदार हैं?(200 शब्द )
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अप्रोच :- भूमिका में श्रमबल सहभागिता दर की परिभाषा और इसी संदर्भ में भारत की स्थिति को बताइये । उत्तर के पहले भाग में महिला श्रम बल भागीदारी के बारे में चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में महिला श्रम भागीदारी में कमी के लिए उत्तरदायी कारणों को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये । श्रम, उत्पादन का एक अनिवार्य, महत्त्वपूर्ण एवं सक्रिय साधन है| श्रम शक्ति से आशय उन समस्त व्यक्तियों के समूह से है जो कार्य करते हैं या कार्य करने की इच्छा और योग्यता रखते हैं किन्तु उन्हें कार्य करने का अवसर नहीं मिलता यद्यपि इसके लिए वे सदा प्रयत्नशील रहते हैं|सम्पूर्ण जनसँख्या का वह भाग जो श्रमशक्ति में एक अनुपात या दर के रूप में व्यक्त किया जाता है उसे श्रमशक्ति सहभागिता दर कहते हैं| दुसरे शब्दों में, कार्यशील जनसंख्या के अनुपात को श्रम सहभागिता दर कहते हैं| अर्थात यह कुल जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या का अनुपात है| इसे रोजगारयुक्त अथवा बेरोजगार किन्तु कार्य की तलाश में लगे लोगों की संख्या को कुल श्रमबल से भाग दे कर निकाला जाता है| अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के आधार पर विश्व बैंक ने वर्ष 2017 में भारत में 54 % श्रमबल सहभागिता दर होने का आकलन किया है|श्रमबल सहभागिता दर का वैश्विक औसत लगभग 62 % है अर्थात यह विकसित देशों के सापेक्ष बहुत कम है|अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में महिला श्रमबल सहभागिता दर वर्ष 2013 में 27 % थी| जबकि इसी वर्ष चीन में यह अनुपात लगभग 64 % था और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में यह भारत से दुगना था| अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने महिला श्रम सहभागिता दर के संदर्भ में भारत को 130 देशों में 121वीं रैंकिंग प्रदान की थी| भारत में महिला श्रम की निम्न ( कम ) सहभागिता होने के अनेक कारण हैं जो निम्नवत हैं- सामान्य तौर पर परम्परागत परिवारों में महिलायें प्रायः घरेलु कार्यों में ही संलग्न रहती हैं इसके कारण ये महिलायें श्रमबल में सहभागिता नहीं कर पाती हैं| समाज में महिलाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो रोजगार के दौरान उत्पन्न चुनौतियों अथवा सुरक्षा के भय से श्रमबल में सहभागिता नहीं कर पाती हैं| इसके साथ ही कार्य के दौरान महिलाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति और अपेक्षित सुविधाओं की उपलब्धता उनकी श्रम भागीदारी को प्रभावित करती है| इसके अतिरिक्त महिलाओं की शिक्षा और प्रशिक्षण तक अपर्याप्त पहुच उन्हें पर्याप्त योग्यता और कौशल प्राप्त करने से बाधित करता है| इससे महिला श्रम भागीदारी में कमी आती है| परम्परागत समाजों में कामकाजी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह होता है अथवा प्रायः परिवार महिलाओं को काम पर भेजने के प्रति अनिच्छुक होते हैं जिससे महिला श्रम सहभागिता दर में कमी आती है| उदारीकरण के बाद आर्थिक विकास ने प्रति व्यक्ति आय में पर्याप्त वृद्धि सुनिश्चित की है| इस वृद्धि के कारण प्रायः महिलाओं को रोजगार में न भेजने की प्रवृत्ति देखी जाती है अथवा आवश्यकता नहीं समझी जाती| इसके अतिरिक्त महिलाओं के नियोजन और वेतन में भेदभाव की समस्या भी महिला श्रम सहभागिता दर में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| महिलायें देश की आधी आबादी हैं| भारत को अपनी क्षमताओं के पूर्ण दोहन के लिए महिलाओं को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाना आवश्यक है| महिलायें भी आर्थिक गतिविधियों में अपना अपेक्षित योगदान दे सकें, इसके लिए भारत को महिला श्रम सहभागिता दर बढाने के प्रयास करने चाहिए| कौशल विकास, शिक्षा के अवसर, सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन , सुविधा एवं सुरक्षा आदि की दिशा में प्रयास महिला श्रम भागीदारी को बढाने में सहायक होंगे|
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##Question:श्रमबल भागीदारी/सहभागिता दर क्या है? वे कौन से कारण है जो श्रमबल में महिला भागीदारी दर में कमी के लिए जिम्मेदार हैं?(200 शब्द )##Answer:अप्रोच :- भूमिका में श्रमबल सहभागिता दर की परिभाषा और इसी संदर्भ में भारत की स्थिति को बताइये । उत्तर के पहले भाग में महिला श्रम बल भागीदारी के बारे में चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में महिला श्रम भागीदारी में कमी के लिए उत्तरदायी कारणों को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये । श्रम, उत्पादन का एक अनिवार्य, महत्त्वपूर्ण एवं सक्रिय साधन है| श्रम शक्ति से आशय उन समस्त व्यक्तियों के समूह से है जो कार्य करते हैं या कार्य करने की इच्छा और योग्यता रखते हैं किन्तु उन्हें कार्य करने का अवसर नहीं मिलता यद्यपि इसके लिए वे सदा प्रयत्नशील रहते हैं|सम्पूर्ण जनसँख्या का वह भाग जो श्रमशक्ति में एक अनुपात या दर के रूप में व्यक्त किया जाता है उसे श्रमशक्ति सहभागिता दर कहते हैं| दुसरे शब्दों में, कार्यशील जनसंख्या के अनुपात को श्रम सहभागिता दर कहते हैं| अर्थात यह कुल जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या का अनुपात है| इसे रोजगारयुक्त अथवा बेरोजगार किन्तु कार्य की तलाश में लगे लोगों की संख्या को कुल श्रमबल से भाग दे कर निकाला जाता है| अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के आधार पर विश्व बैंक ने वर्ष 2017 में भारत में 54 % श्रमबल सहभागिता दर होने का आकलन किया है|श्रमबल सहभागिता दर का वैश्विक औसत लगभग 62 % है अर्थात यह विकसित देशों के सापेक्ष बहुत कम है|अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में महिला श्रमबल सहभागिता दर वर्ष 2013 में 27 % थी| जबकि इसी वर्ष चीन में यह अनुपात लगभग 64 % था और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में यह भारत से दुगना था| अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने महिला श्रम सहभागिता दर के संदर्भ में भारत को 130 देशों में 121वीं रैंकिंग प्रदान की थी| भारत में महिला श्रम की निम्न ( कम ) सहभागिता होने के अनेक कारण हैं जो निम्नवत हैं- सामान्य तौर पर परम्परागत परिवारों में महिलायें प्रायः घरेलु कार्यों में ही संलग्न रहती हैं इसके कारण ये महिलायें श्रमबल में सहभागिता नहीं कर पाती हैं| समाज में महिलाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो रोजगार के दौरान उत्पन्न चुनौतियों अथवा सुरक्षा के भय से श्रमबल में सहभागिता नहीं कर पाती हैं| इसके साथ ही कार्य के दौरान महिलाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति और अपेक्षित सुविधाओं की उपलब्धता उनकी श्रम भागीदारी को प्रभावित करती है| इसके अतिरिक्त महिलाओं की शिक्षा और प्रशिक्षण तक अपर्याप्त पहुच उन्हें पर्याप्त योग्यता और कौशल प्राप्त करने से बाधित करता है| इससे महिला श्रम भागीदारी में कमी आती है| परम्परागत समाजों में कामकाजी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह होता है अथवा प्रायः परिवार महिलाओं को काम पर भेजने के प्रति अनिच्छुक होते हैं जिससे महिला श्रम सहभागिता दर में कमी आती है| उदारीकरण के बाद आर्थिक विकास ने प्रति व्यक्ति आय में पर्याप्त वृद्धि सुनिश्चित की है| इस वृद्धि के कारण प्रायः महिलाओं को रोजगार में न भेजने की प्रवृत्ति देखी जाती है अथवा आवश्यकता नहीं समझी जाती| इसके अतिरिक्त महिलाओं के नियोजन और वेतन में भेदभाव की समस्या भी महिला श्रम सहभागिता दर में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| महिलायें देश की आधी आबादी हैं| भारत को अपनी क्षमताओं के पूर्ण दोहन के लिए महिलाओं को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाना आवश्यक है| महिलायें भी आर्थिक गतिविधियों में अपना अपेक्षित योगदान दे सकें, इसके लिए भारत को महिला श्रम सहभागिता दर बढाने के प्रयास करने चाहिए| कौशल विकास, शिक्षा के अवसर, सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन , सुविधा एवं सुरक्षा आदि की दिशा में प्रयास महिला श्रम भागीदारी को बढाने में सहायक होंगे|
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“भारत मेंभूख से मुक्ति वपोषण सुरक्षा को प्राप्त करने के सन्दर्भ में खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 ,नीतिगत स्तर पर किये गए एक व्यापक बदलाव का द्योतक है|” उक्त कथन को ध्यान में रखते हुए खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये| (200 शब्द )
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दृष्टिकोण : भूमिका में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के मुख्य उद्येश्य और रूपरेखा की चर्चा कीजिये खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिये खाद्य सुरक्षा अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु उपस्थित मुख्य चुनौतियाँ व चिंताओं की चर्चा कीजिये भूख से सुरक्षा हेतु सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए कुछ सकारात्मक पहलों की चर्चा कीजिये निष्कर्ष में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के सकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये स्वतंत्रता काल से ही भारत में सरकार के द्वारा सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य रहा है| उक्त सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 का प्रारूप तैयार किया गया जो सबके लिए पर्याप्त मात्रा में वहनीय मूल्य पर खाद्य आपूर्ति एवं पोषण की सुरक्षा को सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है| खाद्य सुरक्षा नीति 2013 के मुख्य उद्येश्य कल्याण आधारित दृष्टिकोण के स्थान पर अधिकार आधारित दृष्टिकोण को वैधानिक स्वरुप प्रदान करना वहनीय मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्द्ध करवाने का मुख्य उद्येश्य खाद्य सुरक्षा नीति की मुख्य विशेषताएं 75% ग्रामीण एवं 50% जनसँख्या को कवर किया जायेगा (80 करोड़ लोग या 67% जनसख्या ) TPDS के अंतर्गत सब्सिडी वाले अनाज को प्रदान करने का अधिकार व्यक्तिगत पात्रता का प्रावधान किया गया -प्रत्येक व्यक्ति को 5 kg. गेहूं , चावल या मोटा अनाज क्रमशः 3 रु., 2 रु. एवं 1 रु. प्रति kg. की दर से प्रदान किया जायेगा अन्त्योदय अन्न योजना के अंतर्गत 35 kg.खाद्यान्न प्रति परिवार पहले की भांति 2.43 करोड़ लोगों को दिया जाता रहेगा राज्य सरकारों को जिम्मेदारी दी गयी है कि वे इस अधिनियम के पारित होने के 365 दिनों के भीतर ऐसे परिवारों की पहचान करें 6 माह से 6 वर्ष के शिशुओं के लिए आंगनबाड़ी केन्द्रों के द्वारा आयु के अनुसार निःशुल्क भोजन प्रदान किया जायेगा 6 -14 वर्ष तक के बच्चों के लिए (8वीं कक्षा तक) के लिए सार्वजनिक मध्याहन योजना प्रदान किया जायेगा प्रत्येक गर्भवती और स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को आंगनबाड़ी केंद्र में निःशुल्क भोजन प्रदान करने के प्रावधान के साथ-साथ 6000 रु. के मातृत्व लाभ प्रदान किये जाने का भी प्रावधान है| इसके अतिरिक्त प्रत्येक राज्यों में एक खाद्य सुरक्षा आयोग के स्थापना का भी प्रावधान हैं अंततः यदि कोई राज्य सरकार अनाज प्रदान करने की दशा में नहीं हो तो लाभार्थी लोगों को खाद्य सुरक्षा भत्ता देने के भी प्रावधान हैं खाद्य सुरक्षा नीति का मूल्यांकन वित्तीय दवाब – खाद्य सुरक्षा नीति को लागू करने हेतु सरकारी बजट पर लगभग 1 लाख 30 हजार करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय लागत आएगी जो अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है | लाभार्थियों की पहचान - चुकी विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में 400 मिलियन जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है जिसके लिए खाद्यान्न आपूर्ति करना इस अधिनियम की मुख्य चुनौती है| इसलिए लाभार्थियों की पहचान करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी क्योंकि भ्रष्टाचार, जन जागरूकता की कमी और फर्जी लाभार्थियों की समस्या के कारण एक बहुत बड़ा जनसँख्या समूह लाभ प्राप्त करने से बाहर रह जाती है| हालाँकि सरकार के द्वारा सामाजिक-आर्थिक जनगणना (2011) संपन्न किये गए हैं जिसके आधार पर गरीबी रेखा से नीचे की जनसँख्या की पहचान की जा सकती है| अन्य सुविधाएँ – मातृत्व लाभ ,परिवहन लागत,मिड डे मिल सुधार सम्बंधित अन्य चुनौतियाँ भी उपस्थित हैं जिसे दूर किये बगैर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा नीति को प्रभावी बनाना एक बहुत बड़ा चुनौती है| रिसाव/लीकेज की समस्या – सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राष्ट्र स्तर पर काफ़ी भ्रष्टाचार व्याप्त है| खाद्यान्नों की खरीद – खाद्यान्न आपूर्ति हेतु बड़े पैमाने पर खाद्यान्नों की खरीद की आवश्यकता होगी| इसके साथ ही उसका भण्डारण और आपूर्ति से सम्बंधित अन्य समस्याएं इस दिशा में एक बहुत बड़ी चुनौती है| सकारात्मक पहल DBT – सरकार के द्वारा खाद्यान्न आपूर्ति नहीं करने की स्थिति में प्रत्यक्ष लाभ को हस्तानान्तरण करने की नीति अपनाई गयी है जो खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक पहल है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार /छत्तीसगढ़ मॉडल – राष्ट्र स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार हेतु शांता कुमार समिति का गठन किया गया है जिसका मुख्य ध्येय लीकेज की समस्या का समाधान करना है| इसके साथ ही देश में छत्तीसगढ़ एवं दिल्ली में किये गए PDS सुधारों के अनुभवों को राष्ट्र स्तर पर लागू कर समस्या का समाधान संभव है| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा नीति राष्ट्र स्तर पर खाद्यान्न की आपूर्ति के साथ –साथ पोषणीय सुरक्षा प्रदान करेगा जो भारत की व्यापक जनसँख्या को गरीबी से बाहर करने में सहायक होगा |
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##Question:“भारत मेंभूख से मुक्ति वपोषण सुरक्षा को प्राप्त करने के सन्दर्भ में खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 ,नीतिगत स्तर पर किये गए एक व्यापक बदलाव का द्योतक है|” उक्त कथन को ध्यान में रखते हुए खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये| (200 शब्द )##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के मुख्य उद्येश्य और रूपरेखा की चर्चा कीजिये खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिये खाद्य सुरक्षा अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु उपस्थित मुख्य चुनौतियाँ व चिंताओं की चर्चा कीजिये भूख से सुरक्षा हेतु सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए कुछ सकारात्मक पहलों की चर्चा कीजिये निष्कर्ष में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के सकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये स्वतंत्रता काल से ही भारत में सरकार के द्वारा सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य रहा है| उक्त सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 का प्रारूप तैयार किया गया जो सबके लिए पर्याप्त मात्रा में वहनीय मूल्य पर खाद्य आपूर्ति एवं पोषण की सुरक्षा को सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है| खाद्य सुरक्षा नीति 2013 के मुख्य उद्येश्य कल्याण आधारित दृष्टिकोण के स्थान पर अधिकार आधारित दृष्टिकोण को वैधानिक स्वरुप प्रदान करना वहनीय मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्द्ध करवाने का मुख्य उद्येश्य खाद्य सुरक्षा नीति की मुख्य विशेषताएं 75% ग्रामीण एवं 50% जनसँख्या को कवर किया जायेगा (80 करोड़ लोग या 67% जनसख्या ) TPDS के अंतर्गत सब्सिडी वाले अनाज को प्रदान करने का अधिकार व्यक्तिगत पात्रता का प्रावधान किया गया -प्रत्येक व्यक्ति को 5 kg. गेहूं , चावल या मोटा अनाज क्रमशः 3 रु., 2 रु. एवं 1 रु. प्रति kg. की दर से प्रदान किया जायेगा अन्त्योदय अन्न योजना के अंतर्गत 35 kg.खाद्यान्न प्रति परिवार पहले की भांति 2.43 करोड़ लोगों को दिया जाता रहेगा राज्य सरकारों को जिम्मेदारी दी गयी है कि वे इस अधिनियम के पारित होने के 365 दिनों के भीतर ऐसे परिवारों की पहचान करें 6 माह से 6 वर्ष के शिशुओं के लिए आंगनबाड़ी केन्द्रों के द्वारा आयु के अनुसार निःशुल्क भोजन प्रदान किया जायेगा 6 -14 वर्ष तक के बच्चों के लिए (8वीं कक्षा तक) के लिए सार्वजनिक मध्याहन योजना प्रदान किया जायेगा प्रत्येक गर्भवती और स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को आंगनबाड़ी केंद्र में निःशुल्क भोजन प्रदान करने के प्रावधान के साथ-साथ 6000 रु. के मातृत्व लाभ प्रदान किये जाने का भी प्रावधान है| इसके अतिरिक्त प्रत्येक राज्यों में एक खाद्य सुरक्षा आयोग के स्थापना का भी प्रावधान हैं अंततः यदि कोई राज्य सरकार अनाज प्रदान करने की दशा में नहीं हो तो लाभार्थी लोगों को खाद्य सुरक्षा भत्ता देने के भी प्रावधान हैं खाद्य सुरक्षा नीति का मूल्यांकन वित्तीय दवाब – खाद्य सुरक्षा नीति को लागू करने हेतु सरकारी बजट पर लगभग 1 लाख 30 हजार करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय लागत आएगी जो अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है | लाभार्थियों की पहचान - चुकी विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में 400 मिलियन जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है जिसके लिए खाद्यान्न आपूर्ति करना इस अधिनियम की मुख्य चुनौती है| इसलिए लाभार्थियों की पहचान करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी क्योंकि भ्रष्टाचार, जन जागरूकता की कमी और फर्जी लाभार्थियों की समस्या के कारण एक बहुत बड़ा जनसँख्या समूह लाभ प्राप्त करने से बाहर रह जाती है| हालाँकि सरकार के द्वारा सामाजिक-आर्थिक जनगणना (2011) संपन्न किये गए हैं जिसके आधार पर गरीबी रेखा से नीचे की जनसँख्या की पहचान की जा सकती है| अन्य सुविधाएँ – मातृत्व लाभ ,परिवहन लागत,मिड डे मिल सुधार सम्बंधित अन्य चुनौतियाँ भी उपस्थित हैं जिसे दूर किये बगैर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा नीति को प्रभावी बनाना एक बहुत बड़ा चुनौती है| रिसाव/लीकेज की समस्या – सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राष्ट्र स्तर पर काफ़ी भ्रष्टाचार व्याप्त है| खाद्यान्नों की खरीद – खाद्यान्न आपूर्ति हेतु बड़े पैमाने पर खाद्यान्नों की खरीद की आवश्यकता होगी| इसके साथ ही उसका भण्डारण और आपूर्ति से सम्बंधित अन्य समस्याएं इस दिशा में एक बहुत बड़ी चुनौती है| सकारात्मक पहल DBT – सरकार के द्वारा खाद्यान्न आपूर्ति नहीं करने की स्थिति में प्रत्यक्ष लाभ को हस्तानान्तरण करने की नीति अपनाई गयी है जो खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक पहल है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार /छत्तीसगढ़ मॉडल – राष्ट्र स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार हेतु शांता कुमार समिति का गठन किया गया है जिसका मुख्य ध्येय लीकेज की समस्या का समाधान करना है| इसके साथ ही देश में छत्तीसगढ़ एवं दिल्ली में किये गए PDS सुधारों के अनुभवों को राष्ट्र स्तर पर लागू कर समस्या का समाधान संभव है| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा नीति राष्ट्र स्तर पर खाद्यान्न की आपूर्ति के साथ –साथ पोषणीय सुरक्षा प्रदान करेगा जो भारत की व्यापक जनसँख्या को गरीबी से बाहर करने में सहायक होगा |
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द्रविड़ मंदिर निर्माण शैली का विकास पल्लवों के काल से शुरू हो कर हुए मदुरा के नायकों के समय तक हुआ यद्यपि प्रत्येक चरण की अपनी कुछ विशिष्टताएँ हैं| कथन के संदर्भ में द्रविड़ मंदिर निर्माण शैली के विकास को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) The development of the Dravidian temple style began from the period of the Pallavas to the time of the Nayaks of Madura, although each phase has its own characteristics. Explain the development of Dravidian temple building style in the context of the statement. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण- भूमिका में भारत में मंदिर निर्माण की तीनों शैलियों के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये प्रथम भाग में द्रविड़ शैली के बारे में बताते हुए इसकी सामान्य विशेषताएं बताइये, दूसरे भाग में विशेषताओं के साथ द्रविड़ शैली के विकास की चरणबद्ध जानकारी दीजिये अंतिम में द्रविड़ शैली के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पूर्व मध्यकालीन भारत में मंदिर निर्माण कला की तीन बड़ी शैलियों का विकास देखने को मिलता है यथा नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली| नागर शैली का प्रचलन हिमालय और विन्ध्य पर्वत के मध्य के भाग में पाया जाता है जबकि वेसर शैली विन्ध्य पर्वत के दक्षिण और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश में विकसित हुई| द्रविड़ शैली का विकास मुख्यतः कृष्णा और कावेरी नदियों के मध्य के क्षेत्र में देखने को मिलता है| द्रविड़ शैली, हिन्दू मंदिर स्थापत्य कला की तीन में से एक शैली है। यह शैली दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है। तमिलनाडु व निकटवर्ती क्षेत्रों के अधिकांश मंदिर इसी श्रेणी के होते हैं। इस शैली की कुछ सामान्य विशेषताएं इसे मंदिर निर्माण की अन्य शैलियों के समक्ष विशिष्टता प्रदान करती हैं, इन्हें हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- द्रविड शैली के मंदिरों की सामान्य विशेषताएं नागर शैली से अलग द्रविड़ शैली में चारदीवारी के भीतर समूहों में मंदिरों का निर्माण किया जाता है, यहाँ चारदीवारी में गोपुरम (प्रवेश द्वार) का निर्माण किया जाता था, ये प्रवेश द्वार(गोपुरम) पिरामिड की तरह होते थे, नागर शैली के विपरीत द्रविड़ शैली के मंदिरों के निर्माण में अधिष्ठान/जगती के साक्ष्य अपवाद स्वरुप ही मिलते हैं, नागर शैली में गर्भ गृह के ऊपर के भाग में जहाँ शिखर का निर्माण किया जाता था वहीं द्रविड़ मंदिरों में गर्भ गृह के ऊपर के भाग को विमान कहते हैं यह भी पिरामिड नुमा होता है, मंदिर परिसर में विभिन्न देवताओं के मंदिरों के साथ अलग-अलग उद्देश्यों से मंदिरों का भी निर्माण किया जाता है द्रविड़ शैली में मंदिर परिसर में ही जलाशय बनाये जाते हैं द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास पल्लव शासकों के काल में शुरू हुआ; इसके बाद चोलों,पांड्यों, विजयनगर तथा मदुरा के नायकों के संरक्षण में द्रविड़ शैली का विकास जारी रहा| द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली के विकास को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से देखा जा सकता है- पल्लव काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य का प्रारंभिक विकास सातवीं से दसवीं सदी के मध्य पल्लवों के शासनकाल में हुआ| पल्लव शासक कला के माहान संरक्षक एवं उत्साही निर्माता थे| पल्लव काल में विभिन्न शासकों के समय विकासात्मक शैलियों का उद्भव हुआ| सर्वप्रथम महेंद्रवर्मन शैली (610 से 640 ईस्वी)का विकास हुआ, इसमें पहाड़ों को काट कर मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें मंडप कहा जाता है उदाहरणार्थ- पंचपांडव मंदिर, महेंद्रवर्मन शैली के बाद विकसित महामल्ल शैली/नरसिंहवर्मन शैली (640 से 674 ईस्वी ) में एकाश्मक पत्थर से मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें रथ कहा जाता है जैसे महाबलीपुरम में सप्त पैगोडा रथ, पंच पांडव रथ आदि राजसिंह शैली (674 से 800 ईस्वी)के चरण में पल्लव मंदिरों से द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित सभी विशेषताओं के साक्ष्य मिलने लगते हैं|यहाँ से संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण भी प्रारम्भ हो जाता है जैसे कांची का कैलाश मंदिर एवं महाबलीपुरम का शोर/तटीय मंदिर नन्दिवर्मन शैली (800-900 ईस्वी ) के अंतर्गत भी द्रविड़ विशेषताओं के साथ संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण जारी रहा, जैसे कांची का मुक्तेश्वर मंदिर आदि चोल काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास यद्यपि द्रविड़ स्थापत्य से सम्बंधित सभी विशेषताओं का विकास चोल काल में भी जारी रहा,तथापि विशाल संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण निर्माण चोल काल की प्रमुख विशेषता है, इस दौर में गोपुरम एवं विमानों के निर्माण में विशालता एवं अलंकरण को अत्याधिक महत्त्व दिया गया, इस काल में निर्मित शैव मंदिरों में नदी मंडप का निर्माण एवं एकाश्मक पत्थर से निर्मित नंदी के साक्ष्य भी मिलते हैं, मंदिरों में तक्षण कार्यों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, तक्षण के माध्यम से पौराणिक कहानियों का चित्रांकन किया जाता था इसके साथ ही मंदिरों की दीवारों पर रामायण, महाभारत आदि से सम्बन्धित विषयों का चित्रण किया जाता था, तंजौर में चोल शासक राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर तथा राजेन्द्र प्रथम द्वारा निर्मित गंगइकोंडचोलपुरम मंदिर चोल काल निर्मित में प्रमुख मंदिर हैं| विजयनगर एवं मदुरा के नायकों के समय विकास ( 14वीं से 17वीं सदी) विजयनगर शैली में द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित और अब तक विकसित सभी विशेषताएं उपस्थित थीं, विजयनगर शैली में अलंकरण पर प्रमुख बल देखने को मिलता है, नवीनता के तौर पर यहाँ चारों दिशाओं में गोपुरम के निर्माण को देख सकते हैं, विजयनगर शैली में मंदिर समूहों में दो नये मंडपों का निर्माण किया जाने लगा, अब देवताओं के विवाह के लिए कल्याण मंडप और उपदेवताओं के लिए अम्मान मंडप का भी निर्माण किया जाने लगा था, विजयनगर शैली में बने द्रविड़ मंदिरों के सर्वाधिक साक्ष्य कर्नाटक के हम्पी से मिलते हैं जैसे विरूपाक्ष मंदिर, हजारा मंदिर, विट्ठल स्वामी मंदिर आदि विजयनगर के पश्चात मदुरा के नायकों के समय में भी द्रविड़ शैली में मंदिर स्थापत्य की परम्परा जारी रही इस समय मंदिरों के प्रांगण में विभिन्न आवासीय भवन एवं बाजारों का भी निर्माण किया जाने लगा जैसे मदुरा का मीनाक्षी मंदिर आदि| मदुरा के नायकों के समय तक द्रविड़ मंदिर स्थापत्य अपने विशुद्ध रूप से विकसित क्लासिकल स्वरुप को प्राप्त कर चुका था| इस प्रकार हम देख सकते हैं कि द्रविड़ मंदिर स्थापत्य कला का विकास सातवीं सदी से शुरू होकर 17वीं सदी तक किसी न किसी रूप में होता रहा| द्रविड़ स्थापत्य, भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है| यह पूरे दक्षिण भारत और पड़ोसी द्वीपों में प्रचलित है| इनके महत्त्व को देखते हुए वर्ष 1987 में यूनेस्को ने चोल कालीन मंदिरों विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था|
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##Question:द्रविड़ मंदिर निर्माण शैली का विकास पल्लवों के काल से शुरू हो कर हुए मदुरा के नायकों के समय तक हुआ यद्यपि प्रत्येक चरण की अपनी कुछ विशिष्टताएँ हैं| कथन के संदर्भ में द्रविड़ मंदिर निर्माण शैली के विकास को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) The development of the Dravidian temple style began from the period of the Pallavas to the time of the Nayaks of Madura, although each phase has its own characteristics. Explain the development of Dravidian temple building style in the context of the statement. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में भारत में मंदिर निर्माण की तीनों शैलियों के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये प्रथम भाग में द्रविड़ शैली के बारे में बताते हुए इसकी सामान्य विशेषताएं बताइये, दूसरे भाग में विशेषताओं के साथ द्रविड़ शैली के विकास की चरणबद्ध जानकारी दीजिये अंतिम में द्रविड़ शैली के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पूर्व मध्यकालीन भारत में मंदिर निर्माण कला की तीन बड़ी शैलियों का विकास देखने को मिलता है यथा नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली| नागर शैली का प्रचलन हिमालय और विन्ध्य पर्वत के मध्य के भाग में पाया जाता है जबकि वेसर शैली विन्ध्य पर्वत के दक्षिण और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश में विकसित हुई| द्रविड़ शैली का विकास मुख्यतः कृष्णा और कावेरी नदियों के मध्य के क्षेत्र में देखने को मिलता है| द्रविड़ शैली, हिन्दू मंदिर स्थापत्य कला की तीन में से एक शैली है। यह शैली दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है। तमिलनाडु व निकटवर्ती क्षेत्रों के अधिकांश मंदिर इसी श्रेणी के होते हैं। इस शैली की कुछ सामान्य विशेषताएं इसे मंदिर निर्माण की अन्य शैलियों के समक्ष विशिष्टता प्रदान करती हैं, इन्हें हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- द्रविड शैली के मंदिरों की सामान्य विशेषताएं नागर शैली से अलग द्रविड़ शैली में चारदीवारी के भीतर समूहों में मंदिरों का निर्माण किया जाता है, यहाँ चारदीवारी में गोपुरम (प्रवेश द्वार) का निर्माण किया जाता था, ये प्रवेश द्वार(गोपुरम) पिरामिड की तरह होते थे, नागर शैली के विपरीत द्रविड़ शैली के मंदिरों के निर्माण में अधिष्ठान/जगती के साक्ष्य अपवाद स्वरुप ही मिलते हैं, नागर शैली में गर्भ गृह के ऊपर के भाग में जहाँ शिखर का निर्माण किया जाता था वहीं द्रविड़ मंदिरों में गर्भ गृह के ऊपर के भाग को विमान कहते हैं यह भी पिरामिड नुमा होता है, मंदिर परिसर में विभिन्न देवताओं के मंदिरों के साथ अलग-अलग उद्देश्यों से मंदिरों का भी निर्माण किया जाता है द्रविड़ शैली में मंदिर परिसर में ही जलाशय बनाये जाते हैं द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास पल्लव शासकों के काल में शुरू हुआ; इसके बाद चोलों,पांड्यों, विजयनगर तथा मदुरा के नायकों के संरक्षण में द्रविड़ शैली का विकास जारी रहा| द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली के विकास को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से देखा जा सकता है- पल्लव काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य का प्रारंभिक विकास सातवीं से दसवीं सदी के मध्य पल्लवों के शासनकाल में हुआ| पल्लव शासक कला के माहान संरक्षक एवं उत्साही निर्माता थे| पल्लव काल में विभिन्न शासकों के समय विकासात्मक शैलियों का उद्भव हुआ| सर्वप्रथम महेंद्रवर्मन शैली (610 से 640 ईस्वी)का विकास हुआ, इसमें पहाड़ों को काट कर मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें मंडप कहा जाता है उदाहरणार्थ- पंचपांडव मंदिर, महेंद्रवर्मन शैली के बाद विकसित महामल्ल शैली/नरसिंहवर्मन शैली (640 से 674 ईस्वी ) में एकाश्मक पत्थर से मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें रथ कहा जाता है जैसे महाबलीपुरम में सप्त पैगोडा रथ, पंच पांडव रथ आदि राजसिंह शैली (674 से 800 ईस्वी)के चरण में पल्लव मंदिरों से द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित सभी विशेषताओं के साक्ष्य मिलने लगते हैं|यहाँ से संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण भी प्रारम्भ हो जाता है जैसे कांची का कैलाश मंदिर एवं महाबलीपुरम का शोर/तटीय मंदिर नन्दिवर्मन शैली (800-900 ईस्वी ) के अंतर्गत भी द्रविड़ विशेषताओं के साथ संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण जारी रहा, जैसे कांची का मुक्तेश्वर मंदिर आदि चोल काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास यद्यपि द्रविड़ स्थापत्य से सम्बंधित सभी विशेषताओं का विकास चोल काल में भी जारी रहा,तथापि विशाल संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण निर्माण चोल काल की प्रमुख विशेषता है, इस दौर में गोपुरम एवं विमानों के निर्माण में विशालता एवं अलंकरण को अत्याधिक महत्त्व दिया गया, इस काल में निर्मित शैव मंदिरों में नदी मंडप का निर्माण एवं एकाश्मक पत्थर से निर्मित नंदी के साक्ष्य भी मिलते हैं, मंदिरों में तक्षण कार्यों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, तक्षण के माध्यम से पौराणिक कहानियों का चित्रांकन किया जाता था इसके साथ ही मंदिरों की दीवारों पर रामायण, महाभारत आदि से सम्बन्धित विषयों का चित्रण किया जाता था, तंजौर में चोल शासक राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर तथा राजेन्द्र प्रथम द्वारा निर्मित गंगइकोंडचोलपुरम मंदिर चोल काल निर्मित में प्रमुख मंदिर हैं| विजयनगर एवं मदुरा के नायकों के समय विकास ( 14वीं से 17वीं सदी) विजयनगर शैली में द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित और अब तक विकसित सभी विशेषताएं उपस्थित थीं, विजयनगर शैली में अलंकरण पर प्रमुख बल देखने को मिलता है, नवीनता के तौर पर यहाँ चारों दिशाओं में गोपुरम के निर्माण को देख सकते हैं, विजयनगर शैली में मंदिर समूहों में दो नये मंडपों का निर्माण किया जाने लगा, अब देवताओं के विवाह के लिए कल्याण मंडप और उपदेवताओं के लिए अम्मान मंडप का भी निर्माण किया जाने लगा था, विजयनगर शैली में बने द्रविड़ मंदिरों के सर्वाधिक साक्ष्य कर्नाटक के हम्पी से मिलते हैं जैसे विरूपाक्ष मंदिर, हजारा मंदिर, विट्ठल स्वामी मंदिर आदि विजयनगर के पश्चात मदुरा के नायकों के समय में भी द्रविड़ शैली में मंदिर स्थापत्य की परम्परा जारी रही इस समय मंदिरों के प्रांगण में विभिन्न आवासीय भवन एवं बाजारों का भी निर्माण किया जाने लगा जैसे मदुरा का मीनाक्षी मंदिर आदि| मदुरा के नायकों के समय तक द्रविड़ मंदिर स्थापत्य अपने विशुद्ध रूप से विकसित क्लासिकल स्वरुप को प्राप्त कर चुका था| इस प्रकार हम देख सकते हैं कि द्रविड़ मंदिर स्थापत्य कला का विकास सातवीं सदी से शुरू होकर 17वीं सदी तक किसी न किसी रूप में होता रहा| द्रविड़ स्थापत्य, भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है| यह पूरे दक्षिण भारत और पड़ोसी द्वीपों में प्रचलित है| इनके महत्त्व को देखते हुए वर्ष 1987 में यूनेस्को ने चोल कालीन मंदिरों विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था|
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What is communalism? Explain the reasons for the shortcomings in the approach to dealing with the communal conflict in India. (150 words/10 marks)
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Brief Approach A brief introduction with the help of defining communalism Enlist the shortcomings to tackle the problem of communal conflict Suggest way forwards Answer Communalism is a situation when a particular community tries to promote its own interest at the cost of other communities. Communalism in the case of India is also the result of History (for example due to Britisher’s policy). In India there has been a rise in communal conflict as more than 800 incidents were recorded last year (as per Ministry of Home Affairs data). These events are also due to shortcomings in the approach to deal with communal conflict. These shortcomings can be enlisted: Administrative issues such as they fail to read the signs of communal discontent Appointment of insensitive/incapable officers in conflict-ridden areas. Police and administration at times act in partition manner. We have adopted A top-down approach to deal with communal conflicts, where field functionaries wait for the order from superiors. Rehabilitation of riot victims is often neglected, breeding contempt and anger. Officers are not held accountable for their failures, thereby perpetuating slackness and incompetence. Ineffective conflicts resolution method( Interstate councils, National integrated councils etc. are not working properly) Solutions to these problems Draw a hotspot of the communally sensitive area Posting should be done in a communally sensitive area as per merit Minimal force should be used. Ex.-use of tear gas, pellet guns etc. A single chain of Command Operational autonomy at the level of Inspector and above Identification of community leaders and promoting dialogue among them to diffuse tension Apart from these solutions, Punchi Commission came up with few suggestions such as Take proactive steps such asethics and guidelines for Media Reactive steps such as the speedy, non-partition response of local police and administration must be ensured to prevent the vested interest from converting petty local issues into divisive national ones Accountability should be there in case of any act of delays Model laws should be enacted on the subject of organized conversion Communalism threatens the secular fabric, unity, integrity and internal security of India. It should be eliminated as the constitution of India via its Article 355 says that it shall be the duty of the Union to protect every State against external aggression and internal disturbance.
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##Question:What is communalism? Explain the reasons for the shortcomings in the approach to dealing with the communal conflict in India. (150 words/10 marks)##Answer:Brief Approach A brief introduction with the help of defining communalism Enlist the shortcomings to tackle the problem of communal conflict Suggest way forwards Answer Communalism is a situation when a particular community tries to promote its own interest at the cost of other communities. Communalism in the case of India is also the result of History (for example due to Britisher’s policy). In India there has been a rise in communal conflict as more than 800 incidents were recorded last year (as per Ministry of Home Affairs data). These events are also due to shortcomings in the approach to deal with communal conflict. These shortcomings can be enlisted: Administrative issues such as they fail to read the signs of communal discontent Appointment of insensitive/incapable officers in conflict-ridden areas. Police and administration at times act in partition manner. We have adopted A top-down approach to deal with communal conflicts, where field functionaries wait for the order from superiors. Rehabilitation of riot victims is often neglected, breeding contempt and anger. Officers are not held accountable for their failures, thereby perpetuating slackness and incompetence. Ineffective conflicts resolution method( Interstate councils, National integrated councils etc. are not working properly) Solutions to these problems Draw a hotspot of the communally sensitive area Posting should be done in a communally sensitive area as per merit Minimal force should be used. Ex.-use of tear gas, pellet guns etc. A single chain of Command Operational autonomy at the level of Inspector and above Identification of community leaders and promoting dialogue among them to diffuse tension Apart from these solutions, Punchi Commission came up with few suggestions such as Take proactive steps such asethics and guidelines for Media Reactive steps such as the speedy, non-partition response of local police and administration must be ensured to prevent the vested interest from converting petty local issues into divisive national ones Accountability should be there in case of any act of delays Model laws should be enacted on the subject of organized conversion Communalism threatens the secular fabric, unity, integrity and internal security of India. It should be eliminated as the constitution of India via its Article 355 says that it shall be the duty of the Union to protect every State against external aggression and internal disturbance.
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Differentiate between Weather and Climate. ( 200 words)
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Approach:- A small introduction about Weather and Climate Mention the points describing the difference between weather and Climate Answer:- Weather consists of the short-term (minutes to months) changes in the atmosphere while the average atmospheric conditions of an area over a considerable period ( 30-35 years) is called climate. Difference:- Weather Climate Weather is what conditions of the atmosphere are over a short period of time the climate is how the atmosphere "behaves" over relatively long periods of time. Weather is the way the atmosphere is behaving, mainly with respect to its effects upon life and human activities. Climate is the way the atmosphere is behaving on a large time scale. weather can change from minute-to-minute, hour-to-hour, day-to-day, and season-to-season Climate, however, is the average of weather over time and space Weather is what you get, like a hot day with pop-up thunderstorms. the climate is what we expect, like a very hot summer Weather includes sunshine, rain, cloud cover, winds, hail, snow, sleet, freezing rain, flooding, blizzards, ice storms, thunderstorms etc. Climate includes the averages of precipitation, temperature, humidity, sunshine, wind velocity, phenomena such as fog, frost, and hail storms, and other measures of the weather that occur over a long period in a particular place. The reason behind studying the weather is comparatively narrower like- warning of thunderstorm, frost, cyclones, cloud bursts etc.. The reason behind studying the climate are broader like-Rising global temperatures and raise sea levels, alter forests, crop yields, and water supplies etc Study of weather is called Meteorology Study of Climate is called Climatology
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##Question:Differentiate between Weather and Climate. ( 200 words)##Answer:Approach:- A small introduction about Weather and Climate Mention the points describing the difference between weather and Climate Answer:- Weather consists of the short-term (minutes to months) changes in the atmosphere while the average atmospheric conditions of an area over a considerable period ( 30-35 years) is called climate. Difference:- Weather Climate Weather is what conditions of the atmosphere are over a short period of time the climate is how the atmosphere "behaves" over relatively long periods of time. Weather is the way the atmosphere is behaving, mainly with respect to its effects upon life and human activities. Climate is the way the atmosphere is behaving on a large time scale. weather can change from minute-to-minute, hour-to-hour, day-to-day, and season-to-season Climate, however, is the average of weather over time and space Weather is what you get, like a hot day with pop-up thunderstorms. the climate is what we expect, like a very hot summer Weather includes sunshine, rain, cloud cover, winds, hail, snow, sleet, freezing rain, flooding, blizzards, ice storms, thunderstorms etc. Climate includes the averages of precipitation, temperature, humidity, sunshine, wind velocity, phenomena such as fog, frost, and hail storms, and other measures of the weather that occur over a long period in a particular place. The reason behind studying the weather is comparatively narrower like- warning of thunderstorm, frost, cyclones, cloud bursts etc.. The reason behind studying the climate are broader like-Rising global temperatures and raise sea levels, alter forests, crop yields, and water supplies etc Study of weather is called Meteorology Study of Climate is called Climatology
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Discuss oceanic currents and the general pattern of oceanic currents. Also, briefly explain various factors responsible for the origin of ocean currents. (10 Marks/150 words)
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APPROACH: Define Ocean Currents, movement of ocean water, etc. A general pattern of ocean currents, and warm and cold currents need to be discussed. Map of World Ocean Currents can be drawn indicating warm and cold currents. Factors responsible for Ocean Currents like salinity, winds, etc. can be mentioned. Brief conclusion about the utility of Ocean Currents can be given. ANSWER: An ocean current is a continuous, directed movement of seawater generated by a number of forces acting upon the ocean. Ocean currents are like river flow in oceans. They represent a regular volume of water in a definite path and direction. The general pattern of ocean currents: Prevailing winds, Coriolis force, and other factors result in a specific pattern of Ocean Currents around the globe. · Pattern due to effect of wind: Wind blowing on the surface of the ocean pushes the water to move. Friction between the wind and the water surface affects the movement and decides the pattern of ocean currents. E.g., Effect of SW Monsoon on currents. · Movement due to expansion (heating): Water near the equator is heated more and expands, this causes a pattern in which the ocean currents move away from the equator towards higher latitudes. E.g., East Australian current. · Movement due to salinity: Water with high salinity is denser than water with low salinity and in the same way cold water is denser than warm water. For example, currents like the Labrador current have low salinity and move from colder to warmer latitudes. · Effect of gravity: Gravity causes the denser water to fall, pushing away the less dense water. Some of the main ocean currents and their patterns are: · Equatorial Ocean Currents: In this North and South equatorial currents flow in a pattern of east to west. · Equatorial Counter Currents: A pattern of currents that flows in opposition to North and South equatorial currents, that is, from west to east. · Humboldt Current: In a pattern of flow from the southernmost tip of Chile to northern Peru, along the west coast of South America. · Labrador Current: It flows from the Arctic Ocean towards the south and meets the warm northward moving Gulf Stream. · Benguela Current: Branch of West Wind Drift of the Southern Hemisphere. · Canary Current: Low salinity current extending between Fram Strait and Cape Farewell. · Kuroshio Current: This west boundary current is also known as Japan current. · Oyashio Current: It originates in the Arctic Ocean and flows south via the Bering Sea in the western North Pacific Ocean. · Antarctic Circumpolar Current: It is an ocean current that flows clockwise from west to east around Antarctica. Factors responsible for the origin of ocean currents are- Primary forces that initiate the movement of water are as follows: 1. The influence of insolation-Heating by solar energy causes the water to expand. That is why near the equator the ocean water is about 8 cm higher in level than in the middle latitudes. This causes a very slight gradient and water tends to flow down the slope. The flow is normally from east to west. 2. Influence of wind (atmospheric circulation)- Winds are responsible for both magnitude and direction [Coriolis force also affects the direction] of the ocean currents. Example: Monsoon winds are responsible for the seasonal reversal of ocean currents in the Indian ocean. 3. Influence of pressure belts and atmospheric circulations: The oceanic circulation pattern roughly corresponds to the atmospheric circulation over the oceans in the middle latitudes, which is mainly anticyclonic [Sub-tropical High-Pressure Belt] (more pronounced in the southern hemisphere than in the northern hemisphere due to differences in the extent of landmass). The oceanic circulation pattern also corresponds to the same. At higher latitudes, where the wind flow is mostly cyclonic [Sub-polar Low-Pressure Belt], the oceanic circulation follows this pattern. In regions of pronounced monsoonal flow [Northern Indian Ocean], the monsoon winds influence the current movements which change directions according to seasons. 4. The influence of gravity-Gravity tends to pull the water down to the pile and create gradient variation. 5. Influence of Coriolis force-The Coriolis force intervenes and causes the water to move to the right in the northern hemisphere and to the left in the southern hemisphere. 6. The temperature difference and salinity difference are the secondary forces. Differences in water density affect the vertical mobility of ocean currents (vertical currents). Denser water tends to sink, while relatively lighter water tends to rise. Cold-water ocean currents occur when the cold water at the poles sinks and slowly moves towards the equator. Warm-water currents travel out from the equator along the surface, flowing towards the poles to replace the sinking cold water. Conclusion: Ocean currents act much like a conveyer belt, transporting warm water and precipitation from the equator toward the poles and cold water from the poles back to the tropics. Thus, currents regulate the global climate, helping to counteract the uneven distribution of solar radiation reaching the Earth’s surface. Without currents, regional temperatures would be more extreme—super hot at the equator and frigid toward the poles—and much less of Earth’s land would be habitable.
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##Question:Discuss oceanic currents and the general pattern of oceanic currents. Also, briefly explain various factors responsible for the origin of ocean currents. (10 Marks/150 words)##Answer:APPROACH: Define Ocean Currents, movement of ocean water, etc. A general pattern of ocean currents, and warm and cold currents need to be discussed. Map of World Ocean Currents can be drawn indicating warm and cold currents. Factors responsible for Ocean Currents like salinity, winds, etc. can be mentioned. Brief conclusion about the utility of Ocean Currents can be given. ANSWER: An ocean current is a continuous, directed movement of seawater generated by a number of forces acting upon the ocean. Ocean currents are like river flow in oceans. They represent a regular volume of water in a definite path and direction. The general pattern of ocean currents: Prevailing winds, Coriolis force, and other factors result in a specific pattern of Ocean Currents around the globe. · Pattern due to effect of wind: Wind blowing on the surface of the ocean pushes the water to move. Friction between the wind and the water surface affects the movement and decides the pattern of ocean currents. E.g., Effect of SW Monsoon on currents. · Movement due to expansion (heating): Water near the equator is heated more and expands, this causes a pattern in which the ocean currents move away from the equator towards higher latitudes. E.g., East Australian current. · Movement due to salinity: Water with high salinity is denser than water with low salinity and in the same way cold water is denser than warm water. For example, currents like the Labrador current have low salinity and move from colder to warmer latitudes. · Effect of gravity: Gravity causes the denser water to fall, pushing away the less dense water. Some of the main ocean currents and their patterns are: · Equatorial Ocean Currents: In this North and South equatorial currents flow in a pattern of east to west. · Equatorial Counter Currents: A pattern of currents that flows in opposition to North and South equatorial currents, that is, from west to east. · Humboldt Current: In a pattern of flow from the southernmost tip of Chile to northern Peru, along the west coast of South America. · Labrador Current: It flows from the Arctic Ocean towards the south and meets the warm northward moving Gulf Stream. · Benguela Current: Branch of West Wind Drift of the Southern Hemisphere. · Canary Current: Low salinity current extending between Fram Strait and Cape Farewell. · Kuroshio Current: This west boundary current is also known as Japan current. · Oyashio Current: It originates in the Arctic Ocean and flows south via the Bering Sea in the western North Pacific Ocean. · Antarctic Circumpolar Current: It is an ocean current that flows clockwise from west to east around Antarctica. Factors responsible for the origin of ocean currents are- Primary forces that initiate the movement of water are as follows: 1. The influence of insolation-Heating by solar energy causes the water to expand. That is why near the equator the ocean water is about 8 cm higher in level than in the middle latitudes. This causes a very slight gradient and water tends to flow down the slope. The flow is normally from east to west. 2. Influence of wind (atmospheric circulation)- Winds are responsible for both magnitude and direction [Coriolis force also affects the direction] of the ocean currents. Example: Monsoon winds are responsible for the seasonal reversal of ocean currents in the Indian ocean. 3. Influence of pressure belts and atmospheric circulations: The oceanic circulation pattern roughly corresponds to the atmospheric circulation over the oceans in the middle latitudes, which is mainly anticyclonic [Sub-tropical High-Pressure Belt] (more pronounced in the southern hemisphere than in the northern hemisphere due to differences in the extent of landmass). The oceanic circulation pattern also corresponds to the same. At higher latitudes, where the wind flow is mostly cyclonic [Sub-polar Low-Pressure Belt], the oceanic circulation follows this pattern. In regions of pronounced monsoonal flow [Northern Indian Ocean], the monsoon winds influence the current movements which change directions according to seasons. 4. The influence of gravity-Gravity tends to pull the water down to the pile and create gradient variation. 5. Influence of Coriolis force-The Coriolis force intervenes and causes the water to move to the right in the northern hemisphere and to the left in the southern hemisphere. 6. The temperature difference and salinity difference are the secondary forces. Differences in water density affect the vertical mobility of ocean currents (vertical currents). Denser water tends to sink, while relatively lighter water tends to rise. Cold-water ocean currents occur when the cold water at the poles sinks and slowly moves towards the equator. Warm-water currents travel out from the equator along the surface, flowing towards the poles to replace the sinking cold water. Conclusion: Ocean currents act much like a conveyer belt, transporting warm water and precipitation from the equator toward the poles and cold water from the poles back to the tropics. Thus, currents regulate the global climate, helping to counteract the uneven distribution of solar radiation reaching the Earth’s surface. Without currents, regional temperatures would be more extreme—super hot at the equator and frigid toward the poles—and much less of Earth’s land would be habitable.
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निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये तथा गरीबी रेखा के निर्धारण के सबंध में बनी विभिन्न समितियों की सिफारिशों का क्रम से वर्णन कीजिये| (200 शब्द)
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अप्रोच :- भूमिका में निर्धनता तथा निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये| मुख्य भाग में गरीबी रेखा के संदर्भ में विभिन्न समितियों की सिफारिशों को क्रमबद्धता के साथ बताएं| अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष लिखिए । निर्धनता वह स्थिति है जिसमे व्यक्ति अपने जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम होता है| अर्थात निर्धनता का तात्पर्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के न्यूनतम संसाधनों को न जुटा पाने से है| निर्धनता की अवधारणा आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति आय, क्रयशक्ति एवं जनसंख्या से सम्बन्धित है| निर्धनता के 2 प्रकार होते हैं| प्रथम, निरपेक्ष निर्धनता एवं द्वितीय, सापेक्ष निर्धनता| राष्ट्रीय विकास के स्तर का आकलन, विकासात्मक योजनाओं के निर्माण तथा उनके निष्पादन के आकलन और योग्य लाभार्थियों की पहचान आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निर्धनता का मापन किया जाता है| निरपेक्ष निर्धनता के मापन के संदर्भ में निर्धनता रेखा की अवधारणा प्रस्तुत की जाती है| निर्धनता रेखा उस आय स्तर को कहते हैं जिससे कम आय होने पर व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है| निर्धनता रेखा अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग होती है| भारत में निर्धनता रेखा का आकलन मासिक उपभोग व्यय के संदर्भ में NSSO के आंकड़ों के आधार पर नीति आयोग द्वारा किया जाता है| यह निर्धारण विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाए गए मानदंडों के आधार पर किया जाता है| भारत में गरीबी रेखा के निर्धारक मानदंडों की संस्तुति के लिए योजना आयोग/ नीति आयोग द्वारा अब तक विभिन्न विशेषज्ञ समितियां गठित की जा चुकी हैं| इन विशेषज्ञ समितियों और इनके द्वारा की गयी संस्तुतियों का क्रमबद्ध विवरण निम्नलिखित है- गरीबी रेखा तय करने की शुरुआत योजना आयोग ने 1962 में एक कार्यकारी समूह बनाकर की थी।इसने प्रचलित मूल्यों के आधार पर प्रति व्यक्ति 20 रुपये मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा माना था। वाई के अलघ समिति - इस समिति का गठन योजना आयोग 1979 में किया गया था| अलघ समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के आधार पर निर्धनता रेखा के निर्धारण की सिफारिश की थी| समिति ने ICMR द्वारा सुझाए गए नगरीय & ग्रामीण पोषण स्तरों को आधार बना कर नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग अलग पोषण मानक सुझाए| अलघ समिति की सिफारिशों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी तथा नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले को BPL माना था| कैलोरी उपभोग के आधार पर निर्धारित गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 49 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 56.64 रूपये मासिक थी । लकडावाला समिति - 1989 में योजना आयोग द्वारा डी टी लकडावाला की अध्यक्षता में पुनः एक कार्यदल का गठन किया गया| लकड़ावाला समिति ने भी वाई के अलघ समिति के अनुरूप न्यूनतम पोषण आवश्यकता को गरीबी रेखा के निर्धारण का मानदंड माना| इस कार्यदल ने प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग निर्धनता रेखा निर्धारित की| लकडावाला समिति ने मूल्य निर्धारण के लिए मूल्य सूचकांकों को आधार बनाया| कैलोरी मानकों को समान रखा गया ।किन्तु , मूल्यों में परिवर्तन किया गया| अब गरीबी रेखा नगरीय क्षेत्रों के लिए 281 तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 205 रूपये निर्धारित की गयी थी| तेंदुलकर समिति - योजना आयोग द्वारा गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के संदर्भ में सुझाव देने के लिए वर्ष 2005 में प्रो.सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया| तेंदुलकर समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के मानक को अस्वीकार कर आवश्यक वस्तुओं पर व्यय के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया| तेंदुलकर समिति द्वारा गरीबी बास्केट की अवधारणा प्रस्तुत की गयी| समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम व्यय 27 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन को गरीबी रेखा माना, जबकि नगरीय क्षेत्रों के लिए यह 33 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन था| रंगराजन समिति - तेंदुलकर समीति द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा विभिन्न कारणों से विवादित रही| अतः गरीबी आकलन पद्धतियों की समीक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन किया गया|| समिति ने चयनित आवश्यक वस्तुओं पर किये गए न्यूनतम व्यय को ही आधार माना किन्तु तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए मूल्यों को बढ़ा कर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 32 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 47 रूपये कर दिया| इसी के आधार पर वर्ष 2011-12 में भारत में 30% जनसंख्या को गरीब माना गया| अन्य समितियों की तरह ही रंगराजन फार्मूला भी विवादित रहा| अतः वास्तविक गरीबी रेखा के आकलन के वर्ष 2015 में अरविन्द पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक 14 सदस्यीय टास्कफ़ोर्स का गठन किया गया|किन्तु यह दल गरीबी रेखा के निर्धारण के संदर्भ में अनिर्णीत रहा| तथापि टास्कफ़ोर्स ने नई निर्धनता रेखा के निर्धारण तक नीति आयोग/सरकार द्वारा तेंदुलकर समिति द्वारा प्रदत्त निर्धनता रेखा मानदंडों को अपनाने की सलाह दी है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि चूँकि गरीबी रेखा निर्धारण मामले के व्यापक राजनीतिक एवं राजकोषीय निहितार्थ हैं| अतः गरीबी रेखा निर्धारण का मामला भारत में लगातार विवादित रहा है|साथ ही गरीबी रेखा के संदर्भ में सर्वसम्मति का अभाव है| अतः वास्तविक गरीबी रेखा की पहचान के लिए भारत सरकार को विश्व के अन्य देशों में अपनाई जा रही विधियों का अध्ययन एवं शोध पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए|
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##Question:निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये तथा गरीबी रेखा के निर्धारण के सबंध में बनी विभिन्न समितियों की सिफारिशों का क्रम से वर्णन कीजिये| (200 शब्द)##Answer:अप्रोच :- भूमिका में निर्धनता तथा निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये| मुख्य भाग में गरीबी रेखा के संदर्भ में विभिन्न समितियों की सिफारिशों को क्रमबद्धता के साथ बताएं| अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष लिखिए । निर्धनता वह स्थिति है जिसमे व्यक्ति अपने जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम होता है| अर्थात निर्धनता का तात्पर्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के न्यूनतम संसाधनों को न जुटा पाने से है| निर्धनता की अवधारणा आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति आय, क्रयशक्ति एवं जनसंख्या से सम्बन्धित है| निर्धनता के 2 प्रकार होते हैं| प्रथम, निरपेक्ष निर्धनता एवं द्वितीय, सापेक्ष निर्धनता| राष्ट्रीय विकास के स्तर का आकलन, विकासात्मक योजनाओं के निर्माण तथा उनके निष्पादन के आकलन और योग्य लाभार्थियों की पहचान आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निर्धनता का मापन किया जाता है| निरपेक्ष निर्धनता के मापन के संदर्भ में निर्धनता रेखा की अवधारणा प्रस्तुत की जाती है| निर्धनता रेखा उस आय स्तर को कहते हैं जिससे कम आय होने पर व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है| निर्धनता रेखा अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग होती है| भारत में निर्धनता रेखा का आकलन मासिक उपभोग व्यय के संदर्भ में NSSO के आंकड़ों के आधार पर नीति आयोग द्वारा किया जाता है| यह निर्धारण विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाए गए मानदंडों के आधार पर किया जाता है| भारत में गरीबी रेखा के निर्धारक मानदंडों की संस्तुति के लिए योजना आयोग/ नीति आयोग द्वारा अब तक विभिन्न विशेषज्ञ समितियां गठित की जा चुकी हैं| इन विशेषज्ञ समितियों और इनके द्वारा की गयी संस्तुतियों का क्रमबद्ध विवरण निम्नलिखित है- गरीबी रेखा तय करने की शुरुआत योजना आयोग ने 1962 में एक कार्यकारी समूह बनाकर की थी।इसने प्रचलित मूल्यों के आधार पर प्रति व्यक्ति 20 रुपये मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा माना था। वाई के अलघ समिति - इस समिति का गठन योजना आयोग 1979 में किया गया था| अलघ समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के आधार पर निर्धनता रेखा के निर्धारण की सिफारिश की थी| समिति ने ICMR द्वारा सुझाए गए नगरीय & ग्रामीण पोषण स्तरों को आधार बना कर नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग अलग पोषण मानक सुझाए| अलघ समिति की सिफारिशों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी तथा नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले को BPL माना था| कैलोरी उपभोग के आधार पर निर्धारित गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 49 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 56.64 रूपये मासिक थी । लकडावाला समिति - 1989 में योजना आयोग द्वारा डी टी लकडावाला की अध्यक्षता में पुनः एक कार्यदल का गठन किया गया| लकड़ावाला समिति ने भी वाई के अलघ समिति के अनुरूप न्यूनतम पोषण आवश्यकता को गरीबी रेखा के निर्धारण का मानदंड माना| इस कार्यदल ने प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग निर्धनता रेखा निर्धारित की| लकडावाला समिति ने मूल्य निर्धारण के लिए मूल्य सूचकांकों को आधार बनाया| कैलोरी मानकों को समान रखा गया ।किन्तु , मूल्यों में परिवर्तन किया गया| अब गरीबी रेखा नगरीय क्षेत्रों के लिए 281 तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 205 रूपये निर्धारित की गयी थी| तेंदुलकर समिति - योजना आयोग द्वारा गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के संदर्भ में सुझाव देने के लिए वर्ष 2005 में प्रो.सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया| तेंदुलकर समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के मानक को अस्वीकार कर आवश्यक वस्तुओं पर व्यय के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया| तेंदुलकर समिति द्वारा गरीबी बास्केट की अवधारणा प्रस्तुत की गयी| समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम व्यय 27 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन को गरीबी रेखा माना, जबकि नगरीय क्षेत्रों के लिए यह 33 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन था| रंगराजन समिति - तेंदुलकर समीति द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा विभिन्न कारणों से विवादित रही| अतः गरीबी आकलन पद्धतियों की समीक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन किया गया|| समिति ने चयनित आवश्यक वस्तुओं पर किये गए न्यूनतम व्यय को ही आधार माना किन्तु तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए मूल्यों को बढ़ा कर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 32 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 47 रूपये कर दिया| इसी के आधार पर वर्ष 2011-12 में भारत में 30% जनसंख्या को गरीब माना गया| अन्य समितियों की तरह ही रंगराजन फार्मूला भी विवादित रहा| अतः वास्तविक गरीबी रेखा के आकलन के वर्ष 2015 में अरविन्द पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक 14 सदस्यीय टास्कफ़ोर्स का गठन किया गया|किन्तु यह दल गरीबी रेखा के निर्धारण के संदर्भ में अनिर्णीत रहा| तथापि टास्कफ़ोर्स ने नई निर्धनता रेखा के निर्धारण तक नीति आयोग/सरकार द्वारा तेंदुलकर समिति द्वारा प्रदत्त निर्धनता रेखा मानदंडों को अपनाने की सलाह दी है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि चूँकि गरीबी रेखा निर्धारण मामले के व्यापक राजनीतिक एवं राजकोषीय निहितार्थ हैं| अतः गरीबी रेखा निर्धारण का मामला भारत में लगातार विवादित रहा है|साथ ही गरीबी रेखा के संदर्भ में सर्वसम्मति का अभाव है| अतः वास्तविक गरीबी रेखा की पहचान के लिए भारत सरकार को विश्व के अन्य देशों में अपनाई जा रही विधियों का अध्ययन एवं शोध पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए|
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प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में गुरुकुल पद्धति से आप क्या समझते हैं? प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए इसकी सीमाओं को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Gurukul system in ancient Indian education system? Explain the nature of ancient Indian education system and clarify its limitations. (150-200 words, 10 अंक)
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दृष्टिकोण भूमिका में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की संक्षिप्त जानकारी देते हुए गुरुकुल पद्धति की सामान्य विशेषताएं बताइये प्रथम भाग में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप स्पष्ट करते हुए प्रमुख विशेषताएं बताइये प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये अंतिम में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये| भारत में शिक्षा पद्धति का क्रमशः विकास हुआ, भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में हमें अनौपचारिक तथा औपचारिक दोनों प्रकार के शैक्षणिक केन्द्रों का उल्लेख प्राप्त होता है। प्राचीन भारत में सामान्य औपचारिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र आश्रम, गुरुकुल, मंदिर, मठ और विहार आदि थे| दूसरी ओर परिवार, पुरोहित, पण्डित, सन्यासी और त्यौहार आदि के माध्यम से अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त होती थी| कालान्तर में शिक्षा प्रणाली के विकास के साथ भारत मे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ संस्थाएं सक्रिय दिखाई देती हैं जैसे तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला विश्वविद्यालय आदि । इससे स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे सामाजिक विकास हुआ वैसे-वैसे शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित होने लगी। गुरुकुल पद्धति तत्कालीन शिक्षण पद्धतियों में सर्वाधिक प्रचलित पद्धति थी| गुरुकुल पद्धति प्रारम्भिक चरण में प्रचलित गुरुकुल पद्धति के अंतर्गत सामान्य औपचारिक शिक्षा दी जाती थी| यह शिक्षा की सबसे लोकप्रिय पद्धति थी, इसमें गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण की जाती थी| प्रायः गुरु का आश्रम ग्रामीण या शहरी आबादी से दूर होता था| प्रायः छात्र आश्रम में गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे लेकिन ऐसे छात्रों की भी जानकारी मिलती है जो प्रतिदिन आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया करते थे| आश्रम में छात्र अत्यंत ही अनुशाषित जीवन व्यतीत करते थे, गुरु का सम्मान करते थे और गुरु भी छात्रों का ध्यान रखते थे| यहाँ प्रायः निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता था, जीवन से जुड़े सभी विषयों की जानकारी दी जाती थी, भिक्षाटन छात्रों के प्रशिक्षण का भाग होता था| गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षा की औपचारिक शुरुआत उपनयन संस्कार से जबकि औपचारिक समापन समावर्तन संस्कार के साथ होता था| औचारिक तौर शिक्षा के लिए शुल्क की व्यवस्था आज की तरह नहीं थी प्रायः छात्रों एवं उनके अभिभावकों के द्वारा गुरु को दान-दक्षिणा एवं उपहार दिए जाते थे| शिक्षा प्रणाली में वर्तमान की तरह शैक्षिक उपाधियों का भी प्रावधान नहीं था लेकिन शिक्षा के अंतिम चरण में विद्वानों की मण्डली के समक्ष छात्रों को उपस्थित होना पड़ता था, लेकिन यह औपचारिकता अधिक होती थी, अंतिम रूप से छात्रों के संदर्भ में गुरु के निर्णय को ही महत्त्व दिया जाता था| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य व्यक्ति का मानसिक, शारीरिक एवं नैतिक रूप से सर्वांगीण विकासकरना था| उत्तम चरित्र के निर्माण एवं और इसके माध्यम से संस्कृति का संरक्षण और बेहतर समाज निर्माण के प्रयास किये जाते थे| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, व्याकरण, दर्शन एवं विभिन्न प्रकार के शिल्प आदि अध्ययन अध्यापन के प्रमुख विषय थे| शिल्पों में धनुर्विद्या, आयुर्वेद, नृत्य और संगीत का विशिष्ट स्थान था| महिलाओं के लिए विशेष तौर पर पाक-कला, सिलाई, नृत्य और संगीत आदि विषयों की शिक्षा को महत्व दिया जाता था बुद्ध एवं जैन धर्म की लोकप्रियता के साथ विहारों, मठों एवं उच्च शिक्षा केन्द्रों में इन धर्मों से सम्बन्धित विषयों का भी अध्ययन कराया जाता था दस्तकारी से सम्बन्धित विषयों की शिक्षा व्यावहारिक तौर पर जाति विशेष के लोग, संगठनों एवं कारीगरों से जुड़ कर ग्रहण की जाती थी| यह शिक्षण और प्रशिक्षण की अनौपचारिक प्रणाली थी| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाएं प्राचीन शिक्षा प्रणाली में जाति एवं लिंग के आधार पर भेदभाव ने इसे लोकतांत्रिक शिक्षा प्रणाली के रूप में विकसित नही होने दिया, धार्मिक विषयों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, इससे भौतिक विज्ञानों एवं व्यावहारिक अध्ययन की परम्परा कमजोर होती गयी, शिक्षा का बुद्धिवादी स्वरुप अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, गुप्तकाल तक आते-आते धार्मिक शिक्षा पर प्रश्न चिन्ह उठाने की परम्परा कमजोर पड़ गयी और जो भी ज्ञान था उसके प्रति आत्म संतुष्टि का भाव था और इसके प्रसार पर ही बल दिया जाने लगा| इससे उदारीकृत शिक्षा का विकास अवरुद्ध होने लगा और वैज्ञानिक चिंतन की परम्परा अवरुद्ध हुई| इसका प्रभाव समाज पर भी दिखाई देता है| उपरोक्त सीमाओं से स्पष्ट होता है कि यद्यपि प्राचीन भारतीय शिक्षण प्रणाली अभी समग्रता को नही प्राप्त कर पायी थी तथापि प्राचीन भारत में विज्ञान, ज्योतिष, गणित, बीजगणित और इनके माध्यम से खगोल शास्त्र आदि धाराओं में पर्याप्त विकास दिखाई देता है| इसके अतिरिक रसायन शास्त्र , धातुविज्ञान, स्थापत्य आदि के साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि विभिन्न प्रायोगिक विज्ञानों का भी पर्याप्त विकास हुआ था जो प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के पर्याप्त रूप से विकसित होने के प्रमाण के रूप में ग्रहण किया जा सकता है|
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##Question:प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में गुरुकुल पद्धति से आप क्या समझते हैं? प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए इसकी सीमाओं को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Gurukul system in ancient Indian education system? Explain the nature of ancient Indian education system and clarify its limitations. (150-200 words, 10 अंक)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की संक्षिप्त जानकारी देते हुए गुरुकुल पद्धति की सामान्य विशेषताएं बताइये प्रथम भाग में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप स्पष्ट करते हुए प्रमुख विशेषताएं बताइये प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये अंतिम में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये| भारत में शिक्षा पद्धति का क्रमशः विकास हुआ, भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में हमें अनौपचारिक तथा औपचारिक दोनों प्रकार के शैक्षणिक केन्द्रों का उल्लेख प्राप्त होता है। प्राचीन भारत में सामान्य औपचारिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र आश्रम, गुरुकुल, मंदिर, मठ और विहार आदि थे| दूसरी ओर परिवार, पुरोहित, पण्डित, सन्यासी और त्यौहार आदि के माध्यम से अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त होती थी| कालान्तर में शिक्षा प्रणाली के विकास के साथ भारत मे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ संस्थाएं सक्रिय दिखाई देती हैं जैसे तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला विश्वविद्यालय आदि । इससे स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे सामाजिक विकास हुआ वैसे-वैसे शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित होने लगी। गुरुकुल पद्धति तत्कालीन शिक्षण पद्धतियों में सर्वाधिक प्रचलित पद्धति थी| गुरुकुल पद्धति प्रारम्भिक चरण में प्रचलित गुरुकुल पद्धति के अंतर्गत सामान्य औपचारिक शिक्षा दी जाती थी| यह शिक्षा की सबसे लोकप्रिय पद्धति थी, इसमें गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण की जाती थी| प्रायः गुरु का आश्रम ग्रामीण या शहरी आबादी से दूर होता था| प्रायः छात्र आश्रम में गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे लेकिन ऐसे छात्रों की भी जानकारी मिलती है जो प्रतिदिन आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया करते थे| आश्रम में छात्र अत्यंत ही अनुशाषित जीवन व्यतीत करते थे, गुरु का सम्मान करते थे और गुरु भी छात्रों का ध्यान रखते थे| यहाँ प्रायः निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता था, जीवन से जुड़े सभी विषयों की जानकारी दी जाती थी, भिक्षाटन छात्रों के प्रशिक्षण का भाग होता था| गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षा की औपचारिक शुरुआत उपनयन संस्कार से जबकि औपचारिक समापन समावर्तन संस्कार के साथ होता था| औचारिक तौर शिक्षा के लिए शुल्क की व्यवस्था आज की तरह नहीं थी प्रायः छात्रों एवं उनके अभिभावकों के द्वारा गुरु को दान-दक्षिणा एवं उपहार दिए जाते थे| शिक्षा प्रणाली में वर्तमान की तरह शैक्षिक उपाधियों का भी प्रावधान नहीं था लेकिन शिक्षा के अंतिम चरण में विद्वानों की मण्डली के समक्ष छात्रों को उपस्थित होना पड़ता था, लेकिन यह औपचारिकता अधिक होती थी, अंतिम रूप से छात्रों के संदर्भ में गुरु के निर्णय को ही महत्त्व दिया जाता था| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य व्यक्ति का मानसिक, शारीरिक एवं नैतिक रूप से सर्वांगीण विकासकरना था| उत्तम चरित्र के निर्माण एवं और इसके माध्यम से संस्कृति का संरक्षण और बेहतर समाज निर्माण के प्रयास किये जाते थे| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, व्याकरण, दर्शन एवं विभिन्न प्रकार के शिल्प आदि अध्ययन अध्यापन के प्रमुख विषय थे| शिल्पों में धनुर्विद्या, आयुर्वेद, नृत्य और संगीत का विशिष्ट स्थान था| महिलाओं के लिए विशेष तौर पर पाक-कला, सिलाई, नृत्य और संगीत आदि विषयों की शिक्षा को महत्व दिया जाता था बुद्ध एवं जैन धर्म की लोकप्रियता के साथ विहारों, मठों एवं उच्च शिक्षा केन्द्रों में इन धर्मों से सम्बन्धित विषयों का भी अध्ययन कराया जाता था दस्तकारी से सम्बन्धित विषयों की शिक्षा व्यावहारिक तौर पर जाति विशेष के लोग, संगठनों एवं कारीगरों से जुड़ कर ग्रहण की जाती थी| यह शिक्षण और प्रशिक्षण की अनौपचारिक प्रणाली थी| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाएं प्राचीन शिक्षा प्रणाली में जाति एवं लिंग के आधार पर भेदभाव ने इसे लोकतांत्रिक शिक्षा प्रणाली के रूप में विकसित नही होने दिया, धार्मिक विषयों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, इससे भौतिक विज्ञानों एवं व्यावहारिक अध्ययन की परम्परा कमजोर होती गयी, शिक्षा का बुद्धिवादी स्वरुप अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, गुप्तकाल तक आते-आते धार्मिक शिक्षा पर प्रश्न चिन्ह उठाने की परम्परा कमजोर पड़ गयी और जो भी ज्ञान था उसके प्रति आत्म संतुष्टि का भाव था और इसके प्रसार पर ही बल दिया जाने लगा| इससे उदारीकृत शिक्षा का विकास अवरुद्ध होने लगा और वैज्ञानिक चिंतन की परम्परा अवरुद्ध हुई| इसका प्रभाव समाज पर भी दिखाई देता है| उपरोक्त सीमाओं से स्पष्ट होता है कि यद्यपि प्राचीन भारतीय शिक्षण प्रणाली अभी समग्रता को नही प्राप्त कर पायी थी तथापि प्राचीन भारत में विज्ञान, ज्योतिष, गणित, बीजगणित और इनके माध्यम से खगोल शास्त्र आदि धाराओं में पर्याप्त विकास दिखाई देता है| इसके अतिरिक रसायन शास्त्र , धातुविज्ञान, स्थापत्य आदि के साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि विभिन्न प्रायोगिक विज्ञानों का भी पर्याप्त विकास हुआ था जो प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के पर्याप्त रूप से विकसित होने के प्रमाण के रूप में ग्रहण किया जा सकता है|
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What do you understand by the Heat Budget? Briefly explain the processes through which the earth-atmosphere system maintains heat balance. (150 words/10 marks)
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Brief Approach Define heat budget briefly explain how the earth maintains heat balance Answer The earth as a whole does not accumulate or lose heat. It maintains its temperature. This can happen only if the amount of heat received in the form of insolation equals the amount lost by the earth through terrestrial radiation. This balance between the insolation and the terrestrial radiation of earth is termed as the heat budget or heat balance of the earth. For example , if insolation received at the top of the atmosphere is 100 per cent. While passing through the atmosphere some amount of energy is reflected, scattered and absorbed. Only the remaining part reaches the earth surface. Roughly 35 units are reflected back to space even before reaching the earth’s surface. Of these, 27 units are reflected back from the top of the clouds and 2 units from the snow and ice-covered areas of the earth. The reflected amount of radiation is called the albedo of the earth. The remaining 65 units are absorbed, 14 units within the atmosphere and 51 units by the earth’s surface. The earth radiates back 51 units in the form of terrestrial radiation. Of these, 17 units are radiated to space directly and the remaining 34 units are absorbed by the atmosphere (6 units absorbed directly by the atmosphere, 9 units through convection and turbulence and 19 units through latent heat of condensation). 48 units absorbed by the atmosphere (14 units from insolation +34 units fromterrestrial radiation) are also radiated back into space. Thus, the total radiation returning from the earth and the atmosphere respectively is 17+48=65 units which balance the total of 65 units received from the sun. This is termed the heat budget or heat balance of the earth. This also explains, why the earth neither warms up nor cools down despite the huge transfer ofheat that takes place. there is a surplus of net radiation balance between 40 degrees north and south and the regions near the poles have a deficit. The surplus heat energy from the tropics is redistributed polewards and as a result, the tropics do not get progressively heated up due to the accumulation of excess heat or the high latitudes get permanently frozen due to excess deficit. INCOMING SHORT WAVE RADIATION 35 units - radiation reflected is called the albedo of the earth * 27% reflected by clouds * 2 % reflected by the earth * 6 % scattered to space 14 units absorbed within the atmosphere 51 units absorbed by the earth’s surface. Total of 65 units absorbed by earth needs to be returned. LONG WAVE RADIATION 51 units - earth’s surface radiates back in the form of short wave terrestrial radiation. 17 units are radiated to space directly 34 units radiated, are absorbed by the atmosphere (6 directly, 9 through convection and turbulence and 19 through latent heat of condensation) Now, 48 units are absorbed by the atmosphere (14 units from insolation (short wave) +34 units from terrestrial radiation) is radiated back into space. Total radiation = 17 (radiated to space directly) + 48 (radiated by atmosphere) = 65 unit Thus, Total 65 units is returned by the earth, which balances the absorbed incoming short wave radiation. "Student is expected to draw a diagram for the answer"
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##Question:What do you understand by the Heat Budget? Briefly explain the processes through which the earth-atmosphere system maintains heat balance. (150 words/10 marks)##Answer:Brief Approach Define heat budget briefly explain how the earth maintains heat balance Answer The earth as a whole does not accumulate or lose heat. It maintains its temperature. This can happen only if the amount of heat received in the form of insolation equals the amount lost by the earth through terrestrial radiation. This balance between the insolation and the terrestrial radiation of earth is termed as the heat budget or heat balance of the earth. For example , if insolation received at the top of the atmosphere is 100 per cent. While passing through the atmosphere some amount of energy is reflected, scattered and absorbed. Only the remaining part reaches the earth surface. Roughly 35 units are reflected back to space even before reaching the earth’s surface. Of these, 27 units are reflected back from the top of the clouds and 2 units from the snow and ice-covered areas of the earth. The reflected amount of radiation is called the albedo of the earth. The remaining 65 units are absorbed, 14 units within the atmosphere and 51 units by the earth’s surface. The earth radiates back 51 units in the form of terrestrial radiation. Of these, 17 units are radiated to space directly and the remaining 34 units are absorbed by the atmosphere (6 units absorbed directly by the atmosphere, 9 units through convection and turbulence and 19 units through latent heat of condensation). 48 units absorbed by the atmosphere (14 units from insolation +34 units fromterrestrial radiation) are also radiated back into space. Thus, the total radiation returning from the earth and the atmosphere respectively is 17+48=65 units which balance the total of 65 units received from the sun. This is termed the heat budget or heat balance of the earth. This also explains, why the earth neither warms up nor cools down despite the huge transfer ofheat that takes place. there is a surplus of net radiation balance between 40 degrees north and south and the regions near the poles have a deficit. The surplus heat energy from the tropics is redistributed polewards and as a result, the tropics do not get progressively heated up due to the accumulation of excess heat or the high latitudes get permanently frozen due to excess deficit. INCOMING SHORT WAVE RADIATION 35 units - radiation reflected is called the albedo of the earth * 27% reflected by clouds * 2 % reflected by the earth * 6 % scattered to space 14 units absorbed within the atmosphere 51 units absorbed by the earth’s surface. Total of 65 units absorbed by earth needs to be returned. LONG WAVE RADIATION 51 units - earth’s surface radiates back in the form of short wave terrestrial radiation. 17 units are radiated to space directly 34 units radiated, are absorbed by the atmosphere (6 directly, 9 through convection and turbulence and 19 through latent heat of condensation) Now, 48 units are absorbed by the atmosphere (14 units from insolation (short wave) +34 units from terrestrial radiation) is radiated back into space. Total radiation = 17 (radiated to space directly) + 48 (radiated by atmosphere) = 65 unit Thus, Total 65 units is returned by the earth, which balances the absorbed incoming short wave radiation. "Student is expected to draw a diagram for the answer"
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How social influence can be used for effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan? (150 words/10 marks)
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Approach Define social influence Briefly explainSwachh Bharat Abhiyaan Discuss how social influence can be used for effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan Answer Social Influence is defined as a process by which the change agent tries to direct the behaviour of a target group in the desired direction. In order to ensure efficiency in the process of social influence, the need is to overcome various barriers between the change agent and the target group. Swachh Bharat Abhiyan or Swachh Bharat Mission is a nation-wide campaign in India for the period 2014 to 2019 that aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India"s cities, towns, and rural areas. Swachh Bharat Mission was launched throughout the length and breadth of the country as a national movement. The campaign aims to achieve the vision of a ‘Clean India’ by 2nd October 2019. KEY IS TO FOCUS ON USING CONCEPTS AND IDEAS OF ETHICSFOREFFECTIVEIMPLEMENTATIONOF SWACHH BHARAT ABHIYAAN Semantic Barriers: It refers to the science of meanings and it arises because words and symbols can have more than one meaning. It also arises due to the use of foreign or technical words. Steps to overcome barriers Use of symbols which are receiver friendly. No discrepancy between the verbal and non-verbal aspect of the message. By making communication idea-centric rather than word-centric. Use of illustrations and relevant examples to support the message. (Students are encouraged to come up with innovative ideas to achieve the above) Psychological Barriers : It arises because of incompatibility between the attitude and values of the change agent and the target group. It also arises because of an emotional disconnect between the source and the receiver. The greater is the power distance, the stronger would be the psychological barrier. Lack of trust is also responsible for it Steps to remove barrier- a climate of trust and understanding needs to be established through advertisement and involvement of local leaders Physical Barriers It arises because of disturbances in the environment that obstructs the flow of communication or accessibility to services. Steps to remove barrier: It can be overcome by redesigning the physical environment by providing dust-bins at public places etc. Use of Social Power Reward Power: Rewarding people who confirm on their own to make an example Coercive Power: Use of force of law/rules and regulations Legitimate Power: Using people who enjoy legitimacy e.g. Government officials, Panchayat members, teachers etc. Expert Power: Bringing in experts to help explain the pros and cons of various practices. Conformity pressure: creating social pressure in various ways… Social boycott, shaming etc Liking: creating liking about the idea, by use of celebrities or people who are revered. Commitment and consistency: Creating commitment among people eg by making them take a pledge, mass oath, religious oath etc Reciprocity: by providing money to construct Toilets (eg government grants) Above are just few examples of what can be done. Students may come up with various different ideas which should be appreciated by the evaluator.
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##Question:How social influence can be used for effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan? (150 words/10 marks)##Answer:Approach Define social influence Briefly explainSwachh Bharat Abhiyaan Discuss how social influence can be used for effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan Answer Social Influence is defined as a process by which the change agent tries to direct the behaviour of a target group in the desired direction. In order to ensure efficiency in the process of social influence, the need is to overcome various barriers between the change agent and the target group. Swachh Bharat Abhiyan or Swachh Bharat Mission is a nation-wide campaign in India for the period 2014 to 2019 that aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India"s cities, towns, and rural areas. Swachh Bharat Mission was launched throughout the length and breadth of the country as a national movement. The campaign aims to achieve the vision of a ‘Clean India’ by 2nd October 2019. KEY IS TO FOCUS ON USING CONCEPTS AND IDEAS OF ETHICSFOREFFECTIVEIMPLEMENTATIONOF SWACHH BHARAT ABHIYAAN Semantic Barriers: It refers to the science of meanings and it arises because words and symbols can have more than one meaning. It also arises due to the use of foreign or technical words. Steps to overcome barriers Use of symbols which are receiver friendly. No discrepancy between the verbal and non-verbal aspect of the message. By making communication idea-centric rather than word-centric. Use of illustrations and relevant examples to support the message. (Students are encouraged to come up with innovative ideas to achieve the above) Psychological Barriers : It arises because of incompatibility between the attitude and values of the change agent and the target group. It also arises because of an emotional disconnect between the source and the receiver. The greater is the power distance, the stronger would be the psychological barrier. Lack of trust is also responsible for it Steps to remove barrier- a climate of trust and understanding needs to be established through advertisement and involvement of local leaders Physical Barriers It arises because of disturbances in the environment that obstructs the flow of communication or accessibility to services. Steps to remove barrier: It can be overcome by redesigning the physical environment by providing dust-bins at public places etc. Use of Social Power Reward Power: Rewarding people who confirm on their own to make an example Coercive Power: Use of force of law/rules and regulations Legitimate Power: Using people who enjoy legitimacy e.g. Government officials, Panchayat members, teachers etc. Expert Power: Bringing in experts to help explain the pros and cons of various practices. Conformity pressure: creating social pressure in various ways… Social boycott, shaming etc Liking: creating liking about the idea, by use of celebrities or people who are revered. Commitment and consistency: Creating commitment among people eg by making them take a pledge, mass oath, religious oath etc Reciprocity: by providing money to construct Toilets (eg government grants) Above are just few examples of what can be done. Students may come up with various different ideas which should be appreciated by the evaluator.
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Define Social Influence. How social influence can be used for the effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan? Answer using French and Raven Perspective (150 words/10 Marks)
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Approach Define social influence Briefly explainSwachh Bharat Abhiyaan Discuss how social influence can be used for effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan Answer Social Influence is defined as a process by which the change agent tries to direct the behaviour of a target group in the desired direction. In order to ensure efficiency in the process of social influence, the need is to overcome various barriers between the change agent and the target group. Swachh Bharat Abhiyan or Swachh Bharat Mission is a nation-wide campaign in India for the period 2014 to 2019 that aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India"s cities, towns, and rural areas. Swachh Bharat Mission was launched throughout length and breadth of the country as a national movement. The campaign aims to achieve the vision of a ‘Clean India’ by 2nd October 2019. KEY IS TO FOCUS ON USING CONCEPTS AND IDEAS OF ETHICSFOREFFECTIVEIMPLEMENTATIONOF SWACHH BHARAT ABHIYAAN Semantic Barriers : It refers to science of meanings and it arises because words and symbols can have more than one meaning. It also arises due to use of foreign or technical words. Steps to overcome barriers Use of symbols which are receiver friendly. No discrepancy between verbal and non verbal aspect of message. By making communication idea centric rather than word centric. Use of illustrations and relevant examples to support the message. (Students are encouraged to come up with innovative ideas to achieve the above) Psychological Barriers : It arises because of incompatibility between the attitude and values of the change agent and the target group. It also arises because of emotional disconnect between the source and the receiver. The greater is the power distance, the stronger would be the psychological barrier. Lack of trust is also responsible for it Steps to remove barrier- a climate of trust and understanding needs to be established through advertisement and involvement of local leaders Physical Barriers It arises because of disturbances in the environment that obstructs the flow of communication or accessibility to services. Steps to remove barrier: It can be overcome by redesigning the physical environment by providing dust-bins at public places etc. Use of Social Power Reward Power: Rewarding people who conform on their own to make example Coercive Power: Use of force of law/rules and regulations Legitimate Power: Using people who enjoys legitimacy e.g. Government officials, Panchayat members, teachers etc. Expert Power: Bringing in experts to help explain the pros and cons of various practices. Conformity pressure: creating social pressure in various ways… Social boycott, shaming etc Liking: creating liking about the idea, by use of celebrities or people who are revered. Commitment and consistency: Creating commitment among people eg by making them take pledge, mass oath, religious oath etc Reciprocity: by providing money to construct Toilets (eg government grants) Above are just few example of what can be done. Students may come up with various different ideas which should be appreciated by evaluator.
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##Question:Define Social Influence. How social influence can be used for the effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan? Answer using French and Raven Perspective (150 words/10 Marks)##Answer:Approach Define social influence Briefly explainSwachh Bharat Abhiyaan Discuss how social influence can be used for effective implementation of Swachh Bharat Abhiyaan Answer Social Influence is defined as a process by which the change agent tries to direct the behaviour of a target group in the desired direction. In order to ensure efficiency in the process of social influence, the need is to overcome various barriers between the change agent and the target group. Swachh Bharat Abhiyan or Swachh Bharat Mission is a nation-wide campaign in India for the period 2014 to 2019 that aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India"s cities, towns, and rural areas. Swachh Bharat Mission was launched throughout length and breadth of the country as a national movement. The campaign aims to achieve the vision of a ‘Clean India’ by 2nd October 2019. KEY IS TO FOCUS ON USING CONCEPTS AND IDEAS OF ETHICSFOREFFECTIVEIMPLEMENTATIONOF SWACHH BHARAT ABHIYAAN Semantic Barriers : It refers to science of meanings and it arises because words and symbols can have more than one meaning. It also arises due to use of foreign or technical words. Steps to overcome barriers Use of symbols which are receiver friendly. No discrepancy between verbal and non verbal aspect of message. By making communication idea centric rather than word centric. Use of illustrations and relevant examples to support the message. (Students are encouraged to come up with innovative ideas to achieve the above) Psychological Barriers : It arises because of incompatibility between the attitude and values of the change agent and the target group. It also arises because of emotional disconnect between the source and the receiver. The greater is the power distance, the stronger would be the psychological barrier. Lack of trust is also responsible for it Steps to remove barrier- a climate of trust and understanding needs to be established through advertisement and involvement of local leaders Physical Barriers It arises because of disturbances in the environment that obstructs the flow of communication or accessibility to services. Steps to remove barrier: It can be overcome by redesigning the physical environment by providing dust-bins at public places etc. Use of Social Power Reward Power: Rewarding people who conform on their own to make example Coercive Power: Use of force of law/rules and regulations Legitimate Power: Using people who enjoys legitimacy e.g. Government officials, Panchayat members, teachers etc. Expert Power: Bringing in experts to help explain the pros and cons of various practices. Conformity pressure: creating social pressure in various ways… Social boycott, shaming etc Liking: creating liking about the idea, by use of celebrities or people who are revered. Commitment and consistency: Creating commitment among people eg by making them take pledge, mass oath, religious oath etc Reciprocity: by providing money to construct Toilets (eg government grants) Above are just few example of what can be done. Students may come up with various different ideas which should be appreciated by evaluator.
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साम्राज्यवाद आर्थिक परिघटना ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक परिघटना भी थी | कथन पर टिप्पणी कीजिये | (200 शब्द )
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प्रश्न - साम्राज्यवाद आर्थिक परिघटना ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक परिघटना भी थी | कथन पर टिप्पणी कीजिये | (200 शब्द ( उत्तर का दृष्टिकोण – साम्राज्यवाद को परिभाषित करते हुये संक्षेप मी भूमिका लिखिए | साम्राज्यवाद की आर्थिक परिघटना के कुछ बिन्दुओं पर चर्चा कीजिये | साम्राज्यवाद की राजनीतिक परिघटना के मुख्य बिन्दु को लिखिए | प्रश्न के मांग के अनुसार संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - साम्राज्यवाद क्या है -किसी राष्ट्र के द्वारा दूसरे राष्ट्र के प्रति आक्रामक नीति साम्राज्यवाद कहलाती है | जैसे –धमकी देना ,साम्राज्य विस्तार से भूमि पर नियंत्रण ,शोषण के रास्ते प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण करना | साम्राज्यवाद की आर्थिक परिघटना के कुछ प्रमुख बिन्दु - उपनिवेशवाद का यह चरण त्रिकोणीय व्यापार के लिए चर्चित है | यूरोप से व्यापारी शराब एवं बंदूक अफ्रीकी देशों को निर्यात करते थे | अफ्रीका से दासों को खरीद कर अत्यंत ही अमानवीय परिस्थितियों मे अमेरिकी महादेशों मे ले जया जाता था | अमेरिका से कृषि एवं वन उत्पादों तथा सोना -चाँदी लेकर यूरोपियन व्यापारी यूरोप जया करते थे |प्रारम्भ मे इस व्यापार पर पुर्तगालियों का नियंत्रण था और आगे चल कर होलन्द फ़्रांस तथा ब्रिटेन ने भी इससे मुनाफा कमाया | इसी चरण मे दक्षिण पूर्व एशिया से कपड़ों एवं मशालों का व्यापार के कारण यूरोपियन व्यापारी समुद्री मार्ग से इस क्षेत्र मे पहुँच बनाई ,व्यापारी केन्द्रों की स्थापना की तथा सीमावर्ती क्षेत्रों के कुछ भू भागों पर नियंत्रण भी किया | मोटे तौर पर व्यापार संतुलन भारत चीन इत्यादि राष्ट्रो के पक्ष मे बना रहा ,इसी को अनुकूल बनाने के लिए प्रारम्भिक दौर मे उपनिवेशों की स्थापना की गयी | साम्राज्यवाद की राजनीतिक परिघटना के मुख्य बिन्दु - साम्राज्यवादी शक्तियाँ -ब्रिटेन ,फ़्रांस ,हौलण्ड ,पुर्तगाल ,बेल्जियम ,इटली ,जर्मनी ,जापान ,संयुक्त राज्य अमेरिका | इन राष्ट्रों को पुरानी शक्ति भी कहते है | औद्योगिक क्रांति - बाजार एवं कच्चे माल को ध्यान मे रख कर पुरानी एवं नयी साम्राज्यवादी शक्तियाँ उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा मे शामिल | निवेश को ध्यान मे रख कर - इस चरण मे उपनिवेशों की स्थापना पूंजी निवेश के उदेश्य से भी की गयी | जैसे -साम्राज्यवादी शक्तियों ने बैंक ,खनन इत्यादि मे पूंजी का निवेश कर अधिकाधिक मुनाफा अर्जित किया ,जैसे ब्रिटेन का भारत मे निवेश | मुख्य उपनिवेशों की सुरक्षा - इस कारण से साम्राज्यवादी शक्तियों ने उपनिवेशों की स्थापना की जैसे ब्रिटेन ने भारत की सुरक्षा के नाम पर मिस्त्र ,यमन ,साइप्रस इत्यादि क्षेत्रों पर नियंत्रण किया | उग्र राष्ट्रवादीभावनाओं का उग्र होना - उग्र राष्ट्रवाद ने भी नव साम्राज्यवादी चरण को प्रभावित किया |-इटली जर्मनी जापान इत्यादि राष्ट्र उपनिवेशों की स्थापना मे पीछे थे |अतः उपनिवेशों की स्थापना को प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखा गया और जब कभी उपनिवेशों की स्थापना मे असफल हुये तब तब राष्ट्रवादी भावनाए आहात हुयी | स्वेत व्यक्तियों पर भार ,जर्मन सिविलाईजेसन का बढ़ता प्रभाव इत्यादि | ईसाई मिशनरी का प्रभाव -कभी कभी ईसाई मिशनरियों ने भी धर्म प्रचार के माध्यम से स्थानीय सरकारों से टकराव एवं प्रतिशोध स्वरूप साम्राज्यवादी शक्तियों के द्वारा उपनिवेशों पर आक्रमण इत्यादि | एशिया एवं अफ्रीका की परिस्थितियाँ -राजनीतिक अस्थिरता ,भ्रस्ट्टाचर ,तकनीकी पिछड़ापन ,राष्ट्रीय चेतना का अभाव जैसे कारकों ने साम्राज्यवादी अभियानों को सुगम बनाया | अल्जीरिया ,मोरक्कों ,टूनीसिया ,मेडागास्कर इत्यादि राष्ट्रों पर फ्रांस का नियंत्रण | तंजानिया नामिम्बिया तथा कैमरून पर जर्मनी का नियंत्रण | लीबिया ,सोमालिया इत्यादि पर इटली का नियंत्रण | अफ्रीका पर नियंत्रण के लिए कुछ नियम भी बनाए गए | जैसे -1885 मे बर्लिन मे एक सम्मेलन का आयोजन किया गया | इस सम्मेलन मे अफ्रीकी बटवारे के संबंध मे नीतियों पर सहमति बनी जैसे - जिंसका सीमावर्ती इलाके पर नियंत्रण है उन राष्ट्रो पर अंदरूनी इलाको पर भी दावा होगा और वे पड़ोसी शक्तियों को दावे के संदर्भ मे सूचित करेंगे | हालाँकि कागजो पर बटवारा हुआ लेकिन अफ्रीका के नियंत्रण के लिए यूरोपीय शक्ति के मध्य तनाव तथा अफ्रीकी शक्ति के साथ संघर्ष भी हुये जैसे -सुडान के नियंत्रण को लेकर ब्रिटेन एवं फ्रांस मे तनाव | एशिया के विभिन्न देशों पर विश्व का अधिकार चीन पर साम्राज्यवादी शक्तियों का नियंत्रण/ चीनी तरबूज का बटवारा साम्राज्यवाद आर्थिक के साथ राजनीतिक परिघटना भाई है ,जिसकी शुरुवात तो आर्थिक थी लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक हुयी |
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##Question:साम्राज्यवाद आर्थिक परिघटना ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक परिघटना भी थी | कथन पर टिप्पणी कीजिये | (200 शब्द )##Answer:प्रश्न - साम्राज्यवाद आर्थिक परिघटना ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक परिघटना भी थी | कथन पर टिप्पणी कीजिये | (200 शब्द ( उत्तर का दृष्टिकोण – साम्राज्यवाद को परिभाषित करते हुये संक्षेप मी भूमिका लिखिए | साम्राज्यवाद की आर्थिक परिघटना के कुछ बिन्दुओं पर चर्चा कीजिये | साम्राज्यवाद की राजनीतिक परिघटना के मुख्य बिन्दु को लिखिए | प्रश्न के मांग के अनुसार संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - साम्राज्यवाद क्या है -किसी राष्ट्र के द्वारा दूसरे राष्ट्र के प्रति आक्रामक नीति साम्राज्यवाद कहलाती है | जैसे –धमकी देना ,साम्राज्य विस्तार से भूमि पर नियंत्रण ,शोषण के रास्ते प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण करना | साम्राज्यवाद की आर्थिक परिघटना के कुछ प्रमुख बिन्दु - उपनिवेशवाद का यह चरण त्रिकोणीय व्यापार के लिए चर्चित है | यूरोप से व्यापारी शराब एवं बंदूक अफ्रीकी देशों को निर्यात करते थे | अफ्रीका से दासों को खरीद कर अत्यंत ही अमानवीय परिस्थितियों मे अमेरिकी महादेशों मे ले जया जाता था | अमेरिका से कृषि एवं वन उत्पादों तथा सोना -चाँदी लेकर यूरोपियन व्यापारी यूरोप जया करते थे |प्रारम्भ मे इस व्यापार पर पुर्तगालियों का नियंत्रण था और आगे चल कर होलन्द फ़्रांस तथा ब्रिटेन ने भी इससे मुनाफा कमाया | इसी चरण मे दक्षिण पूर्व एशिया से कपड़ों एवं मशालों का व्यापार के कारण यूरोपियन व्यापारी समुद्री मार्ग से इस क्षेत्र मे पहुँच बनाई ,व्यापारी केन्द्रों की स्थापना की तथा सीमावर्ती क्षेत्रों के कुछ भू भागों पर नियंत्रण भी किया | मोटे तौर पर व्यापार संतुलन भारत चीन इत्यादि राष्ट्रो के पक्ष मे बना रहा ,इसी को अनुकूल बनाने के लिए प्रारम्भिक दौर मे उपनिवेशों की स्थापना की गयी | साम्राज्यवाद की राजनीतिक परिघटना के मुख्य बिन्दु - साम्राज्यवादी शक्तियाँ -ब्रिटेन ,फ़्रांस ,हौलण्ड ,पुर्तगाल ,बेल्जियम ,इटली ,जर्मनी ,जापान ,संयुक्त राज्य अमेरिका | इन राष्ट्रों को पुरानी शक्ति भी कहते है | औद्योगिक क्रांति - बाजार एवं कच्चे माल को ध्यान मे रख कर पुरानी एवं नयी साम्राज्यवादी शक्तियाँ उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा मे शामिल | निवेश को ध्यान मे रख कर - इस चरण मे उपनिवेशों की स्थापना पूंजी निवेश के उदेश्य से भी की गयी | जैसे -साम्राज्यवादी शक्तियों ने बैंक ,खनन इत्यादि मे पूंजी का निवेश कर अधिकाधिक मुनाफा अर्जित किया ,जैसे ब्रिटेन का भारत मे निवेश | मुख्य उपनिवेशों की सुरक्षा - इस कारण से साम्राज्यवादी शक्तियों ने उपनिवेशों की स्थापना की जैसे ब्रिटेन ने भारत की सुरक्षा के नाम पर मिस्त्र ,यमन ,साइप्रस इत्यादि क्षेत्रों पर नियंत्रण किया | उग्र राष्ट्रवादीभावनाओं का उग्र होना - उग्र राष्ट्रवाद ने भी नव साम्राज्यवादी चरण को प्रभावित किया |-इटली जर्मनी जापान इत्यादि राष्ट्र उपनिवेशों की स्थापना मे पीछे थे |अतः उपनिवेशों की स्थापना को प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखा गया और जब कभी उपनिवेशों की स्थापना मे असफल हुये तब तब राष्ट्रवादी भावनाए आहात हुयी | स्वेत व्यक्तियों पर भार ,जर्मन सिविलाईजेसन का बढ़ता प्रभाव इत्यादि | ईसाई मिशनरी का प्रभाव -कभी कभी ईसाई मिशनरियों ने भी धर्म प्रचार के माध्यम से स्थानीय सरकारों से टकराव एवं प्रतिशोध स्वरूप साम्राज्यवादी शक्तियों के द्वारा उपनिवेशों पर आक्रमण इत्यादि | एशिया एवं अफ्रीका की परिस्थितियाँ -राजनीतिक अस्थिरता ,भ्रस्ट्टाचर ,तकनीकी पिछड़ापन ,राष्ट्रीय चेतना का अभाव जैसे कारकों ने साम्राज्यवादी अभियानों को सुगम बनाया | अल्जीरिया ,मोरक्कों ,टूनीसिया ,मेडागास्कर इत्यादि राष्ट्रों पर फ्रांस का नियंत्रण | तंजानिया नामिम्बिया तथा कैमरून पर जर्मनी का नियंत्रण | लीबिया ,सोमालिया इत्यादि पर इटली का नियंत्रण | अफ्रीका पर नियंत्रण के लिए कुछ नियम भी बनाए गए | जैसे -1885 मे बर्लिन मे एक सम्मेलन का आयोजन किया गया | इस सम्मेलन मे अफ्रीकी बटवारे के संबंध मे नीतियों पर सहमति बनी जैसे - जिंसका सीमावर्ती इलाके पर नियंत्रण है उन राष्ट्रो पर अंदरूनी इलाको पर भी दावा होगा और वे पड़ोसी शक्तियों को दावे के संदर्भ मे सूचित करेंगे | हालाँकि कागजो पर बटवारा हुआ लेकिन अफ्रीका के नियंत्रण के लिए यूरोपीय शक्ति के मध्य तनाव तथा अफ्रीकी शक्ति के साथ संघर्ष भी हुये जैसे -सुडान के नियंत्रण को लेकर ब्रिटेन एवं फ्रांस मे तनाव | एशिया के विभिन्न देशों पर विश्व का अधिकार चीन पर साम्राज्यवादी शक्तियों का नियंत्रण/ चीनी तरबूज का बटवारा साम्राज्यवाद आर्थिक के साथ राजनीतिक परिघटना भाई है ,जिसकी शुरुवात तो आर्थिक थी लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक हुयी |
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आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास में अंतर स्पष्ट करते हुए समावेशी विकास के घटकों की विस्तार से चर्चा कीजिये| (200 शब्द)
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अप्रोच :- भूमिका में आर्थिक विकास की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये। उत्तर के प्रथम भाग में समवेशी विकास को परिभाषित कीजिये। उत्तर के दूसरे भाग मे समवेशी विकास के घटको की चर्चा कीजिये। उत्तर के अंतिम भाग में महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये । आर्थिक विकास, आर्थिक वृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है|आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| समावेशी विकास से तात्पर्य ऐसे विकास से है जिसमे न सिर्फ रोजगार के अवसर उत्पन्न हों और जो गरीबी के समापन में सहायक हो बल्कि लोगो की प्रभावी सहभागिता सुनिचित करे | दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों का सृजन करे बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग एवं व्यक्ति की इन सृजित अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित करे और सामान रूप से लाभ पहुचाये| वस्तुपरक दृष्टि से समावेशी विकास उस स्थिति को स्पष्ट करता है जहाँ सकल घरेलू उत्पाद की उच्च वृद्धि दर, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च वृद्धि दर के रूप में परिवर्तित हो जाए तथा आय एवं धन के वितरण की असमानताओं में कमी आये | समावेशी विकास निम्नलिखित घटकों से सुनिश्चित होता है- क्षमता संवर्धन भारत को अपने जनकीकीय लाभांश प्राप्त करने के लिए पर्याप्त कौशल विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योकि कौशल युक्त श्रम बल समवेशी विकास में सहायक होता है। भारत के 64% जनसंख्या 15-59 वर्ष के बीच में है, जिनके कौशल विकास में स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है । प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने से व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| इससे व्यक्ति उपलब्ध अवसरों तक अपनी पहुँच सुनिश्चित कर पाता है| सभी की समान अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित होने से व्याक्ति आर्थिक प्रक्रियाओं में अपना योगदान देने सक्षम हो पाता है| शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं/ सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुँच से, कौशल युक्त एवं स्वस्थ मानव संसाधन का विकास होता है| इस प्रकार व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| क्षमता संवर्धन अर्थव्यवस्था में उसकी भागीदारी की प्रायिकता को बढाता है| महिला सशक्तिकरण से महिलायें सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी बढ़ती है जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है| स्वच्छ वातावरण स्वस्थ मानव संसाधन के विकास में सहायक होता है जिससे नागरिकों की क्षमता में सुधार आता है और वे अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका का बेहतर निष्पादन करने में सक्षम हो पाते हैं इससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है| रोजगार सृजन अर्थव्यवस्था में निवेश वृद्धि से रोजगार सृजन में सहायता मिलती है| अधिक रोजगार सृजन अधिक लोगों को रोजगारयुक्त बनाएगा जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी|जैसे भारत सरकार ने विविध क्षेत्रकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा कर निवेश में वृद्धि के प्रयास किये हैं| सूक्ष्म, लघु एवं माध्यम उद्योग अधिकतम रोजगार सृजन करते हैं| इससे समावेशी विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है| अतः MSME को प्रोत्साहन देना समावेशी विकास की दिशा में उठाया गया कदम होगा| प्रायः उद्यमियों के समक्ष अनेकों बाधाओं की उपस्थिति उनकी उद्यमिता को बाधित करती है| इससे वृद्धि , विकास और रोजगार सृजन पर प्रभाव पड़ता है| इसके परिणामस्वरुप समावेशी विकास बाधित होता है| अतः समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए उद्यमिता प्रोत्साहन आवश्यक होता है| जैसे स्टैंडअप इंडिया एवं स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम| पूँजीगहन क्षेत्रो को प्रभावी प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है | ऑटोमेशन रोजगार सृजन को बाधित करता है| अतः पर्याप्त रोजगार सृजन करने के लिए श्रम गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| जैसे कपडा उद्योग, कृषि, चमड़ा उद्योग, बागवानी आदि| सरकार को निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसे मनरेगा आदि योजनायें समावेशी विकास को सुनिश्चित करने में प्रभावशाली भूमिका निभाती हैं| चूँकि समावेशी विकास न केवल समाज के सभी व्यक्तियों के विकास को सुनिश्चित करता है बल्कि यह अधिक प्रभावी एवं धारणीय विधि से लाभ के वितरण को सुनिश्चित करता है और इस प्रकार आर्थिक असमानताओं को कम करने में सहायक होता है| इसलिए भारत को अपने एसडीजी लक्ष्यों ( लक्ष्य नंबर 1 , 5 व 10 ) की प्राप्ति के इस दिशा में बढ़ाना अति आवश्यक है ।
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##Question:आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास में अंतर स्पष्ट करते हुए समावेशी विकास के घटकों की विस्तार से चर्चा कीजिये| (200 शब्द)##Answer:अप्रोच :- भूमिका में आर्थिक विकास की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये। उत्तर के प्रथम भाग में समवेशी विकास को परिभाषित कीजिये। उत्तर के दूसरे भाग मे समवेशी विकास के घटको की चर्चा कीजिये। उत्तर के अंतिम भाग में महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये । आर्थिक विकास, आर्थिक वृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है|आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| समावेशी विकास से तात्पर्य ऐसे विकास से है जिसमे न सिर्फ रोजगार के अवसर उत्पन्न हों और जो गरीबी के समापन में सहायक हो बल्कि लोगो की प्रभावी सहभागिता सुनिचित करे | दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों का सृजन करे बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग एवं व्यक्ति की इन सृजित अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित करे और सामान रूप से लाभ पहुचाये| वस्तुपरक दृष्टि से समावेशी विकास उस स्थिति को स्पष्ट करता है जहाँ सकल घरेलू उत्पाद की उच्च वृद्धि दर, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च वृद्धि दर के रूप में परिवर्तित हो जाए तथा आय एवं धन के वितरण की असमानताओं में कमी आये | समावेशी विकास निम्नलिखित घटकों से सुनिश्चित होता है- क्षमता संवर्धन भारत को अपने जनकीकीय लाभांश प्राप्त करने के लिए पर्याप्त कौशल विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योकि कौशल युक्त श्रम बल समवेशी विकास में सहायक होता है। भारत के 64% जनसंख्या 15-59 वर्ष के बीच में है, जिनके कौशल विकास में स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है । प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने से व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| इससे व्यक्ति उपलब्ध अवसरों तक अपनी पहुँच सुनिश्चित कर पाता है| सभी की समान अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित होने से व्याक्ति आर्थिक प्रक्रियाओं में अपना योगदान देने सक्षम हो पाता है| शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं/ सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुँच से, कौशल युक्त एवं स्वस्थ मानव संसाधन का विकास होता है| इस प्रकार व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| क्षमता संवर्धन अर्थव्यवस्था में उसकी भागीदारी की प्रायिकता को बढाता है| महिला सशक्तिकरण से महिलायें सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी बढ़ती है जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है| स्वच्छ वातावरण स्वस्थ मानव संसाधन के विकास में सहायक होता है जिससे नागरिकों की क्षमता में सुधार आता है और वे अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका का बेहतर निष्पादन करने में सक्षम हो पाते हैं इससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है| रोजगार सृजन अर्थव्यवस्था में निवेश वृद्धि से रोजगार सृजन में सहायता मिलती है| अधिक रोजगार सृजन अधिक लोगों को रोजगारयुक्त बनाएगा जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी|जैसे भारत सरकार ने विविध क्षेत्रकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा कर निवेश में वृद्धि के प्रयास किये हैं| सूक्ष्म, लघु एवं माध्यम उद्योग अधिकतम रोजगार सृजन करते हैं| इससे समावेशी विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है| अतः MSME को प्रोत्साहन देना समावेशी विकास की दिशा में उठाया गया कदम होगा| प्रायः उद्यमियों के समक्ष अनेकों बाधाओं की उपस्थिति उनकी उद्यमिता को बाधित करती है| इससे वृद्धि , विकास और रोजगार सृजन पर प्रभाव पड़ता है| इसके परिणामस्वरुप समावेशी विकास बाधित होता है| अतः समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए उद्यमिता प्रोत्साहन आवश्यक होता है| जैसे स्टैंडअप इंडिया एवं स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम| पूँजीगहन क्षेत्रो को प्रभावी प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है | ऑटोमेशन रोजगार सृजन को बाधित करता है| अतः पर्याप्त रोजगार सृजन करने के लिए श्रम गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| जैसे कपडा उद्योग, कृषि, चमड़ा उद्योग, बागवानी आदि| सरकार को निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसे मनरेगा आदि योजनायें समावेशी विकास को सुनिश्चित करने में प्रभावशाली भूमिका निभाती हैं| चूँकि समावेशी विकास न केवल समाज के सभी व्यक्तियों के विकास को सुनिश्चित करता है बल्कि यह अधिक प्रभावी एवं धारणीय विधि से लाभ के वितरण को सुनिश्चित करता है और इस प्रकार आर्थिक असमानताओं को कम करने में सहायक होता है| इसलिए भारत को अपने एसडीजी लक्ष्यों ( लक्ष्य नंबर 1 , 5 व 10 ) की प्राप्ति के इस दिशा में बढ़ाना अति आवश्यक है ।
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What do you understand by Citizen Charter? Discuss the issues associated with the effective implementation of the Citizen"s Charter in India. Suggest measures for its effective implementation. (10 Marks/150 Words)
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Basic Approach : (a) explain what is citizencharter (b) highlight the challenges (c) bring a way forward for addressing the challenges. Conclusion- A reference to sevottam and citizen centric government can be Given. ANSWER The Citizen’s Charter is an instrument which seeks to make an organization transparent, accountable and citizen-friendly. A Citizen’s Charter is basically a set of commitments made by an organization regarding the standards of service which it delivers. Every Citizen’s Charter has several essential components to make it meaningful: (a) The Vision and Mission Statement of the organization. This gives the outcomes desired and the broad strategy to achieve these goals and outcomes. This also makes the user aware of the intent of their service provider and helps in holding the organization accountable. (b) The organization must clearly state in its Citizen’s Charter what subject it deals with and the service areas it broadly covers. This helps the user to understand the type of services they can expect from a particular service provider (c) The Citizen’s Charter should also stipulate the responsibilities of the citizens in the context of the Charter. The commitments/promises at (a) and (b) constitute the heart of a Citizen’s Charter. Even though these promises are not enforceable in a court of law, each organization should ensure that the promises made are kept and, in case of default, a suitable compensatory/remedial mechanism should be provided. Problems with citizen charter 1. Poor design and content : Most organizations do not have adequate capability to draft meaningful and succinct Citizens’ Charter. Most Citizens’ Charters drafted by government agencies are not designed well. Critical information that end-users need to hold agencies accountable are simply missing from a large number of charters. Thus, the Citizens’ Charter programme has not succeeded in appreciably empowering end-users to demand greater public accountability. 2. Lack of public awareness: While a large number of public service providers have implemented the Citizens’ Charter, only a small percentage of end-users are aware of the commitments made in the Citizens’ Charter. Effective efforts of communicating and educating the public about the standards of delivery promise have not been undertaken. 3 . Inadequate groundwork: Government agencies often formulate Citizens’ Charters without undertaking adequate groundwork in terms of assessing and reforming its processes to deliver the promises made in the Charter. 4 Charters are rarely updated: Charters reviewed for this report rarely showed signs of being updated even though some documents date back from the inception of the Citizens’ Charter programme nearly a decade ago. Only 6% of Charters reviewed even make the assurance that the document will be updated sometime after release. In addition, few Charters indicate the date of release. Needless to say, the presence of a publication date assures end-users of the validity of a Charter’s contents. 5. End-users and NGOs are not consulted when Charters are drafted: Civil society organizations and end-users are generally not consulted when Charters are being formulated. Since a Citizens’ Charter’s primary purpose is to make public service delivery more citizen-centric, agencies must investigate the needs of end-users when formulating Charters by consulting with ordinary citizens and civil society organizations. 6. The needs of senior citizens and the disabled are not considered when drafting Charters : Just one Charter reviewed for this report assured equitable access to disabled users or senior citizens. Many agencies actually do cater to the needs of the disadvantaged or elderly but do not mention these services in their charter. 7 . Resistance to change : The new practices demand significant changes in the behaviour and attitude of the agency and its staff towards citizens. At times, vested interests work for stalling the Citizens’ Charter altogether or in making it toothless. Recommendation Citizen’s Charters should be made effective by adopting the following principles: i. One size does not fit all. ii. Citizen’s Charter should be prepared for each independent unit under the overall umbrella of the organization’s charter iii. Wide consultation which includes civil society in the process iv. Firm commitments to be made v. Internal process and structure should be reformed to meet the commitments given in the Charter vi. Redress mechanism is a case of default vii. Periodic evaluation of Citizen’s Charters viii. Benchmark using end-user feedback ix. Hold officers accountable for results The ARC Seven Step Model for Citizen Centricity a. Define all the services which you provide and identify your clients b. Set standards and norms for each service c. Develop the capability to meet the set standards d. Perform to achieve the standards e. Monitor performance against the set standards. f. Evaluate the impact through an independent mechanism g. Continuous improvement based on monitoring and evaluation of results Citizen charter is a way to effectively deliver services. Effective implementation of the citizen charter and sevottam model is few of Government effort to make government citizen-centric and ensure Good governance is delivered.
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##Question:What do you understand by Citizen Charter? Discuss the issues associated with the effective implementation of the Citizen"s Charter in India. Suggest measures for its effective implementation. (10 Marks/150 Words)##Answer:Basic Approach : (a) explain what is citizencharter (b) highlight the challenges (c) bring a way forward for addressing the challenges. Conclusion- A reference to sevottam and citizen centric government can be Given. ANSWER The Citizen’s Charter is an instrument which seeks to make an organization transparent, accountable and citizen-friendly. A Citizen’s Charter is basically a set of commitments made by an organization regarding the standards of service which it delivers. Every Citizen’s Charter has several essential components to make it meaningful: (a) The Vision and Mission Statement of the organization. This gives the outcomes desired and the broad strategy to achieve these goals and outcomes. This also makes the user aware of the intent of their service provider and helps in holding the organization accountable. (b) The organization must clearly state in its Citizen’s Charter what subject it deals with and the service areas it broadly covers. This helps the user to understand the type of services they can expect from a particular service provider (c) The Citizen’s Charter should also stipulate the responsibilities of the citizens in the context of the Charter. The commitments/promises at (a) and (b) constitute the heart of a Citizen’s Charter. Even though these promises are not enforceable in a court of law, each organization should ensure that the promises made are kept and, in case of default, a suitable compensatory/remedial mechanism should be provided. Problems with citizen charter 1. Poor design and content : Most organizations do not have adequate capability to draft meaningful and succinct Citizens’ Charter. Most Citizens’ Charters drafted by government agencies are not designed well. Critical information that end-users need to hold agencies accountable are simply missing from a large number of charters. Thus, the Citizens’ Charter programme has not succeeded in appreciably empowering end-users to demand greater public accountability. 2. Lack of public awareness: While a large number of public service providers have implemented the Citizens’ Charter, only a small percentage of end-users are aware of the commitments made in the Citizens’ Charter. Effective efforts of communicating and educating the public about the standards of delivery promise have not been undertaken. 3 . Inadequate groundwork: Government agencies often formulate Citizens’ Charters without undertaking adequate groundwork in terms of assessing and reforming its processes to deliver the promises made in the Charter. 4 Charters are rarely updated: Charters reviewed for this report rarely showed signs of being updated even though some documents date back from the inception of the Citizens’ Charter programme nearly a decade ago. Only 6% of Charters reviewed even make the assurance that the document will be updated sometime after release. In addition, few Charters indicate the date of release. Needless to say, the presence of a publication date assures end-users of the validity of a Charter’s contents. 5. End-users and NGOs are not consulted when Charters are drafted: Civil society organizations and end-users are generally not consulted when Charters are being formulated. Since a Citizens’ Charter’s primary purpose is to make public service delivery more citizen-centric, agencies must investigate the needs of end-users when formulating Charters by consulting with ordinary citizens and civil society organizations. 6. The needs of senior citizens and the disabled are not considered when drafting Charters : Just one Charter reviewed for this report assured equitable access to disabled users or senior citizens. Many agencies actually do cater to the needs of the disadvantaged or elderly but do not mention these services in their charter. 7 . Resistance to change : The new practices demand significant changes in the behaviour and attitude of the agency and its staff towards citizens. At times, vested interests work for stalling the Citizens’ Charter altogether or in making it toothless. Recommendation Citizen’s Charters should be made effective by adopting the following principles: i. One size does not fit all. ii. Citizen’s Charter should be prepared for each independent unit under the overall umbrella of the organization’s charter iii. Wide consultation which includes civil society in the process iv. Firm commitments to be made v. Internal process and structure should be reformed to meet the commitments given in the Charter vi. Redress mechanism is a case of default vii. Periodic evaluation of Citizen’s Charters viii. Benchmark using end-user feedback ix. Hold officers accountable for results The ARC Seven Step Model for Citizen Centricity a. Define all the services which you provide and identify your clients b. Set standards and norms for each service c. Develop the capability to meet the set standards d. Perform to achieve the standards e. Monitor performance against the set standards. f. Evaluate the impact through an independent mechanism g. Continuous improvement based on monitoring and evaluation of results Citizen charter is a way to effectively deliver services. Effective implementation of the citizen charter and sevottam model is few of Government effort to make government citizen-centric and ensure Good governance is delivered.
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Discuss the various features of the Indian economy. (10marks/150 words)
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Approach: . Introduce by mentioning the status of Indian economy at the global level . Elaborate on the features of the Indian Economy . Conclude the answer in the futuristic form Answer: Indian economy, being one of the fastest growing economies in the world, is the world"s seventh largest economy in terms of Nominal GDP and the third-largest in terms of purchasing power parity (PPP). Following are the features of the Indian Economy: 1. Low per capita Income:In India, the national income and per capita income is very low and it is considered as one of the basic features of underdevelopment. As per World Bank estimates, India fares at a quite lower position when compared to other developed countries in terms of per capita income when calculated on Purchasing power parity or exchange rates statistics. 2. The scarcity of capital: Itis one of the characteristic features of the Indian economy where the amount of capital available per head and the present rate of capital formation in India is very low. This leads to reduced capital availability for infrastructural development. 3. Unemployment: The rapid growth of population coupled with inadequate growth in other sectors of the economy are responsible for the occurrence of chronic unemployment and under-employment problem in our country. 4. Poverty: High prevalence of poverty despite various interventions to reduce its incidence is also one of the basic features as per World Bank almost half of the world"s poor live in India. 5. Inequality:Another important characteristic of the Indian economy is the inefficient distribution of wealth which has resulted in not only in regional inequality but also in the intro and inter-sectoral inequality in different sections of society. 6.A high rate of population growth:India has experienced a very high rate of growth of population since 1950 which has resulted in increasing the pressure of population on the country"s scarce resources. Increasing population growth rates has resulted from a very high level of birth rates coupled with a falling level of death rates prevailing in our country. This increasing population growth rate has not kept pace with the growth rate on employment generation in the economy which further aggravates the situation. 7.Pre-Dominance of Agriculture and contribution of other sectors in GDP: Being an agricultural economy, India"s dependence on Agriculture is quite high where almost 50 per cent of the population is dependent upon agriculture for livelihood. Also, the contribution of agriculture in the country"s GDP stands at around 16 per cent which is quite low as compared to services sector contribution in GDP which stands at more than 50 per cent. Similarly, the contribution of Industries and manufacturing in the country"s GDP stands at 28 per cent only. 8.Low level of living: The low standard of living of the people is quite evident in the poor performance of India in Human Development Index where it stands at a 130th position at the global level. 9. Dualistic Nature of Economy: where the features of both a modern economy, as well as the traditional economy are seen in the Indian scenario. Thus, Indian economy largely shows features of an underdeveloped economy butconsidering its rate of economic growth in the last few years and its developmental strategy followed during last few decades Indian economy can be safely considered as a developing economy and with consistent efforts, it can become a developed country in the coming future.
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##Question:Discuss the various features of the Indian economy. (10marks/150 words)##Answer:Approach: . Introduce by mentioning the status of Indian economy at the global level . Elaborate on the features of the Indian Economy . Conclude the answer in the futuristic form Answer: Indian economy, being one of the fastest growing economies in the world, is the world"s seventh largest economy in terms of Nominal GDP and the third-largest in terms of purchasing power parity (PPP). Following are the features of the Indian Economy: 1. Low per capita Income:In India, the national income and per capita income is very low and it is considered as one of the basic features of underdevelopment. As per World Bank estimates, India fares at a quite lower position when compared to other developed countries in terms of per capita income when calculated on Purchasing power parity or exchange rates statistics. 2. The scarcity of capital: Itis one of the characteristic features of the Indian economy where the amount of capital available per head and the present rate of capital formation in India is very low. This leads to reduced capital availability for infrastructural development. 3. Unemployment: The rapid growth of population coupled with inadequate growth in other sectors of the economy are responsible for the occurrence of chronic unemployment and under-employment problem in our country. 4. Poverty: High prevalence of poverty despite various interventions to reduce its incidence is also one of the basic features as per World Bank almost half of the world"s poor live in India. 5. Inequality:Another important characteristic of the Indian economy is the inefficient distribution of wealth which has resulted in not only in regional inequality but also in the intro and inter-sectoral inequality in different sections of society. 6.A high rate of population growth:India has experienced a very high rate of growth of population since 1950 which has resulted in increasing the pressure of population on the country"s scarce resources. Increasing population growth rates has resulted from a very high level of birth rates coupled with a falling level of death rates prevailing in our country. This increasing population growth rate has not kept pace with the growth rate on employment generation in the economy which further aggravates the situation. 7.Pre-Dominance of Agriculture and contribution of other sectors in GDP: Being an agricultural economy, India"s dependence on Agriculture is quite high where almost 50 per cent of the population is dependent upon agriculture for livelihood. Also, the contribution of agriculture in the country"s GDP stands at around 16 per cent which is quite low as compared to services sector contribution in GDP which stands at more than 50 per cent. Similarly, the contribution of Industries and manufacturing in the country"s GDP stands at 28 per cent only. 8.Low level of living: The low standard of living of the people is quite evident in the poor performance of India in Human Development Index where it stands at a 130th position at the global level. 9. Dualistic Nature of Economy: where the features of both a modern economy, as well as the traditional economy are seen in the Indian scenario. Thus, Indian economy largely shows features of an underdeveloped economy butconsidering its rate of economic growth in the last few years and its developmental strategy followed during last few decades Indian economy can be safely considered as a developing economy and with consistent efforts, it can become a developed country in the coming future.
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Elaborating the recent attemps of Pakistan to federally integrate Gilgit-Baltistanregion within its territory, discuss India"s concerns. (200 words)
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Brief Approach Brief introduction about IWT Explain significantaspects of the treaty Mention recent incidents related to it State the options available to India and its implications Suggest way forward Answer: The Indus Waters Treaty is a water sharing arrangement between India and Pakistan, signed on September 19, 1960, in Karachi. It covers the water distribution and sharing rights of six rivers — Beas, Ravi, Sutlej, Indus, Chenab and Jhelum. The agreement was brokered by the World Bank. SignificantAspectsof the Treaty The treaty administers how river Indus and its tributaries that flow in both the countries will be utilised. According to the treaty, Beas, Ravi and Sutlej are to be governed by India, while, Indus, Chenab and Jhelum are to be taken care by Pakistan. However, since Indus flows from India, the country is allowed to use 20 per cent of its water for irrigation, power generation and transport purposes. A Permanent Indus Commission was set up as a bilateral commission to implement and manage the Treaty. The Commission solves disputes arising over water sharing. The Treaty also provides arbitration mechanism to solve disputes amicably. Recent incidents In 2010, Pakistan appealed to the Hague’s Permanent Court of Arbitration (CoA), complaining that the Kishanganga Hydroelectric Plant violates the IWT by increasing the catchment of the Jhelum River and depriving Pakistan of its water rights. India maintained that Run-of- the-river projects are permitted by the Indus treaty within defined limits. The International Court of Arbitration gave its final award on 20 December 2013, wherein it allowed India to go ahead with the construction of the Kishanganga dam. Both India and Pakistan are at loggerheads over various issues since Partition, but there has been no fight over water after the Treaty was ratified. In the wake of the Uri attack in 2016, several experts have demanded that India withdraw from the IWT whose terms are considered generous to Pakistan. If India revokes IWT Revoking it would threaten regional stability and India’s credibility globally. It remains unclear what India intends to do with the “western” rivers in question beyond the short-term plan to irrigate Jammu and Kashmir’s fields better. Dams required holding the course of the tributaries of the Indus to alter water levels to Pakistan dramatically would take more than a decade to build. Given the environmental and geopolitical consequences of such actions, they are unlikely to elicit any international funding. Though Indus originates from Tibet, China has been kept out of the Treaty. If China decides to stop or change the flow of the river, it will affect both India and Pakistan. Climate change is causing melting of ice in Tibetan plateau, which scientists believe will affect the river in future. India would lose her voice if China, decides to do something similar. Utilization of existing mechanism Centre drew up a list of measures to optimize use of the Indus waters that India has so far failed to do: Setting up an inter-ministerial committee to study India’s further options on the IWT Building more run-of- the-river hydropower projects on western rivers, to exploit the full potential of 18,600 MW (current projects come to 11,406 MW). Review restarting the Tulbul navigation project that India had suspended after Pakistan’s objections in 1987. Way forward India can make use of the waters of the western rivers for irrigation, storage, and even for producing electricity, in the manner specified India also needs to engage with Afghanistan on the development of the Kabul River that flows into Pakistan through the Indus basin. It can create pressure on Pakistan The Technical aspects of the treaty should be answered through bilateral meetings and discussion involving experts from both the countries. Thereby reaching consensual solutions to complicated situations.
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##Question:Elaborating the recent attemps of Pakistan to federally integrate Gilgit-Baltistanregion within its territory, discuss India"s concerns. (200 words)##Answer:Brief Approach Brief introduction about IWT Explain significantaspects of the treaty Mention recent incidents related to it State the options available to India and its implications Suggest way forward Answer: The Indus Waters Treaty is a water sharing arrangement between India and Pakistan, signed on September 19, 1960, in Karachi. It covers the water distribution and sharing rights of six rivers — Beas, Ravi, Sutlej, Indus, Chenab and Jhelum. The agreement was brokered by the World Bank. SignificantAspectsof the Treaty The treaty administers how river Indus and its tributaries that flow in both the countries will be utilised. According to the treaty, Beas, Ravi and Sutlej are to be governed by India, while, Indus, Chenab and Jhelum are to be taken care by Pakistan. However, since Indus flows from India, the country is allowed to use 20 per cent of its water for irrigation, power generation and transport purposes. A Permanent Indus Commission was set up as a bilateral commission to implement and manage the Treaty. The Commission solves disputes arising over water sharing. The Treaty also provides arbitration mechanism to solve disputes amicably. Recent incidents In 2010, Pakistan appealed to the Hague’s Permanent Court of Arbitration (CoA), complaining that the Kishanganga Hydroelectric Plant violates the IWT by increasing the catchment of the Jhelum River and depriving Pakistan of its water rights. India maintained that Run-of- the-river projects are permitted by the Indus treaty within defined limits. The International Court of Arbitration gave its final award on 20 December 2013, wherein it allowed India to go ahead with the construction of the Kishanganga dam. Both India and Pakistan are at loggerheads over various issues since Partition, but there has been no fight over water after the Treaty was ratified. In the wake of the Uri attack in 2016, several experts have demanded that India withdraw from the IWT whose terms are considered generous to Pakistan. If India revokes IWT Revoking it would threaten regional stability and India’s credibility globally. It remains unclear what India intends to do with the “western” rivers in question beyond the short-term plan to irrigate Jammu and Kashmir’s fields better. Dams required holding the course of the tributaries of the Indus to alter water levels to Pakistan dramatically would take more than a decade to build. Given the environmental and geopolitical consequences of such actions, they are unlikely to elicit any international funding. Though Indus originates from Tibet, China has been kept out of the Treaty. If China decides to stop or change the flow of the river, it will affect both India and Pakistan. Climate change is causing melting of ice in Tibetan plateau, which scientists believe will affect the river in future. India would lose her voice if China, decides to do something similar. Utilization of existing mechanism Centre drew up a list of measures to optimize use of the Indus waters that India has so far failed to do: Setting up an inter-ministerial committee to study India’s further options on the IWT Building more run-of- the-river hydropower projects on western rivers, to exploit the full potential of 18,600 MW (current projects come to 11,406 MW). Review restarting the Tulbul navigation project that India had suspended after Pakistan’s objections in 1987. Way forward India can make use of the waters of the western rivers for irrigation, storage, and even for producing electricity, in the manner specified India also needs to engage with Afghanistan on the development of the Kabul River that flows into Pakistan through the Indus basin. It can create pressure on Pakistan The Technical aspects of the treaty should be answered through bilateral meetings and discussion involving experts from both the countries. Thereby reaching consensual solutions to complicated situations.
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प्रथम विश्वयुद्ध यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा तथा राष्ट्रवाद के उदय का परिणाम था | कथन का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द)
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प्रथम - विश्वयुद्ध यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा तथा राष्ट्रवाद के उदय का परिणाम था | कथन का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर का संक्षिप्त दृष्टिकोण – प्रथम विश्व –युद्ध की संक्षेप मे चर्चा कीजिये | प्रथम विश्व –युद्ध के मध्य प्रतिस्पर्धा के बिन्दु को समझाइए | प्रथम विश्व –युद्ध के संदर्भ मे राष्ट्रवाद के बिन्दु को लिखिए | दोनों कथनो के संदर्भ मे संतुलित निष्कर्ष लिखिए | प्रथम विश्व युद्ध एक ऐसी घटना है जिसमे यूरोप के साथ विश्व के अन्य देश भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध मे शामिल हो गए |लगभग 52 माह चले इस युद्ध के कारण और परिणाम दोनों अभूतपूर्व रहे इसीलिए विश्व इतिहास मे इसको इतना महत्व दिया जाता है | प्रथम विश्व -युद्ध के कारण प्रथम विश्व -युद्ध के मध्य उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्धा के बिन्दु - प्रथम विश्व -युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्धा | औद्योगिक क्रांति विशेषकर नाव साम्राज्यवादी चरण मे उपनिवेशों को लेकर अंतराष्ट्रीय राजनीति मे क्षेत्रीय युद्ध तनाव जैसे प्रविरतीय दिखाई पड़ती है | जैसे एशिया मे रूस एवं जापान के बीच तनाव ,अफ्रीका मे जर्मनी एवं फ्रांस के बीच तनाव इत्यादि |अक्सर तनावों का कोई तार्किक समाधान नहीं हुआ बल्कि शक्तिशाली राष्ट्रों के द्वारा ब्रिटेन फ्रांस इत्यादि अपेक्षाकृत नए साम्राज्यवादी शक्तियों को शक्ति के डैम पर पीछे हटने पrर बाध्य किया गया | परिणाम ये हुआ की साम्राज्य विस्तार प्रतिष्ठा का विषय बन गया | प्रतिष्ठा का प्रश्न - राष्टों की प्रतिष्ठा विशेषकर हमेशा ही अंतराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती रही है | प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व भी बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिष्ठा से जुड़े हुये थे जैसे -फ्रांस एवं जर्मनी के बीच अलशास लौरेंस का क्षेत्र | जर्मनी एवं ब्रिटेन के बीच नौ -सैनिक प्रतिद्वंदिता | दक्षिण -पूर्वी यूरोप मे अस्त्रीय एवं रूस मे प्रतिद्वंदिता | बोस्निया संकट - इस दौरान रूस के मांगों का महत्व न मिलना |उपरोक्त मुद्दे अंतराष्ट्रीय राजनीति मे स्थायी तौर पर तनाव को बनाए रखा प्रथम विश्व –युद्ध के संदर्भ मे राष्ट्रवाद के बिन्दु - जर्मन एकीकरण के पश्चात जर्मनी की सुरक्षा को ध्यान मे रख कर बिस्मार्क ने अस्त्रीय और इटली के साथ सैन्य संधि की | 1890 के दशक मे जब यूरोपीय राष्ट्रों को जब इस संधि की जानकारी हुयी तब तब एक प्रतिगुट का भी निर्माण हुआ | 1894 रूस और फ्रांस का समझौता ,1904 मे ब्रिटेन और फ्रांस के बीच समझौता ,1907 मे ब्रिटेन और रूस के साथ संबंध | इन तीनों गुट को ट्रिपल एतांत कहा गया | यह सैनिक गुट नहीं था बल्कि अपने -अपने हितो के मध्य था | शस्त्रीकरण /सैन्यावाद-1870 से 1914 का काल यूरोप मे षष्टर शांति का काल माना जाता है | विभिन्न मुद्दों के कारण विभिन्न राष्ट्रों ने सैन्य तैयारी पर अत्यधिक व्यय किया जैसे उपनिवेशों के कारण तथा प्रतिष्ठा एवं गुटबंदी के कारण | इसने प्रतिद्वंदी गुटों ने प्रतिस्पर्धा को जनम दिया तथा अंतराष्ट्रीय राजनीति मे तनाव को बनाए रखा | अखबारों की भूमिका - प्रथम विश्व -युद्ध मे अखबारों की भूमिका अहम है | इसने अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रवाद को प्रभावित किया | अखबारों के द्वारा भी उपरोक्त मुद्दों पर पक्ष -विपक्ष मे लेख लिख कर राष्ट्रीय भावनाओं को उकेरा गया | सेरोजीवों हत्याकांड- तात्कालिक कारण के रूप मे इसका अहम योगदान है | अस्त्रीय के युवराज फ़्रांडिनेंद सेराजीवों शहर की यात्रा पर था ,स्थानीय क्रांतिकारी प्रिंसेप ने फ़्रांडिनेंद की हत्या कर दी | आस्ट्रिया ने इसके लिए सर्बिया को जिम्मेदार माना ,सर्बिया को अल्टिमेटम देते हुये यह कहा की दोषी व्यक्ति एवं संघथनों पर अविलंब कारवाई तथा मामलों की जाँच के लिए आस्ट्रेलियाई अधिकारी सर्बिया जाएंगे | जर्मनी ने आस्ट्रिया को पूर्ण सहयोग का आसवशन दिया तो रूस ने सर्बिया को | राष्ट्रवाद का और पड़ोसी देशो की प्रतिस्पर्धा ने प्रथम विश्वयुद्ध मे अहम भूमिका निभाई |इस आधार पर कहा जा सकता है की समकालीन दौर मे इन घटनाओं से सीख लेते हुये हमे मानवता की ओर ध्यान देना चाहिए |
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##Question:प्रथम विश्वयुद्ध यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा तथा राष्ट्रवाद के उदय का परिणाम था | कथन का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द)##Answer: प्रथम - विश्वयुद्ध यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा तथा राष्ट्रवाद के उदय का परिणाम था | कथन का परीक्षण कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर का संक्षिप्त दृष्टिकोण – प्रथम विश्व –युद्ध की संक्षेप मे चर्चा कीजिये | प्रथम विश्व –युद्ध के मध्य प्रतिस्पर्धा के बिन्दु को समझाइए | प्रथम विश्व –युद्ध के संदर्भ मे राष्ट्रवाद के बिन्दु को लिखिए | दोनों कथनो के संदर्भ मे संतुलित निष्कर्ष लिखिए | प्रथम विश्व युद्ध एक ऐसी घटना है जिसमे यूरोप के साथ विश्व के अन्य देश भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध मे शामिल हो गए |लगभग 52 माह चले इस युद्ध के कारण और परिणाम दोनों अभूतपूर्व रहे इसीलिए विश्व इतिहास मे इसको इतना महत्व दिया जाता है | प्रथम विश्व -युद्ध के कारण प्रथम विश्व -युद्ध के मध्य उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्धा के बिन्दु - प्रथम विश्व -युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्धा | औद्योगिक क्रांति विशेषकर नाव साम्राज्यवादी चरण मे उपनिवेशों को लेकर अंतराष्ट्रीय राजनीति मे क्षेत्रीय युद्ध तनाव जैसे प्रविरतीय दिखाई पड़ती है | जैसे एशिया मे रूस एवं जापान के बीच तनाव ,अफ्रीका मे जर्मनी एवं फ्रांस के बीच तनाव इत्यादि |अक्सर तनावों का कोई तार्किक समाधान नहीं हुआ बल्कि शक्तिशाली राष्ट्रों के द्वारा ब्रिटेन फ्रांस इत्यादि अपेक्षाकृत नए साम्राज्यवादी शक्तियों को शक्ति के डैम पर पीछे हटने पrर बाध्य किया गया | परिणाम ये हुआ की साम्राज्य विस्तार प्रतिष्ठा का विषय बन गया | प्रतिष्ठा का प्रश्न - राष्टों की प्रतिष्ठा विशेषकर हमेशा ही अंतराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती रही है | प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व भी बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिष्ठा से जुड़े हुये थे जैसे -फ्रांस एवं जर्मनी के बीच अलशास लौरेंस का क्षेत्र | जर्मनी एवं ब्रिटेन के बीच नौ -सैनिक प्रतिद्वंदिता | दक्षिण -पूर्वी यूरोप मे अस्त्रीय एवं रूस मे प्रतिद्वंदिता | बोस्निया संकट - इस दौरान रूस के मांगों का महत्व न मिलना |उपरोक्त मुद्दे अंतराष्ट्रीय राजनीति मे स्थायी तौर पर तनाव को बनाए रखा प्रथम विश्व –युद्ध के संदर्भ मे राष्ट्रवाद के बिन्दु - जर्मन एकीकरण के पश्चात जर्मनी की सुरक्षा को ध्यान मे रख कर बिस्मार्क ने अस्त्रीय और इटली के साथ सैन्य संधि की | 1890 के दशक मे जब यूरोपीय राष्ट्रों को जब इस संधि की जानकारी हुयी तब तब एक प्रतिगुट का भी निर्माण हुआ | 1894 रूस और फ्रांस का समझौता ,1904 मे ब्रिटेन और फ्रांस के बीच समझौता ,1907 मे ब्रिटेन और रूस के साथ संबंध | इन तीनों गुट को ट्रिपल एतांत कहा गया | यह सैनिक गुट नहीं था बल्कि अपने -अपने हितो के मध्य था | शस्त्रीकरण /सैन्यावाद-1870 से 1914 का काल यूरोप मे षष्टर शांति का काल माना जाता है | विभिन्न मुद्दों के कारण विभिन्न राष्ट्रों ने सैन्य तैयारी पर अत्यधिक व्यय किया जैसे उपनिवेशों के कारण तथा प्रतिष्ठा एवं गुटबंदी के कारण | इसने प्रतिद्वंदी गुटों ने प्रतिस्पर्धा को जनम दिया तथा अंतराष्ट्रीय राजनीति मे तनाव को बनाए रखा | अखबारों की भूमिका - प्रथम विश्व -युद्ध मे अखबारों की भूमिका अहम है | इसने अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रवाद को प्रभावित किया | अखबारों के द्वारा भी उपरोक्त मुद्दों पर पक्ष -विपक्ष मे लेख लिख कर राष्ट्रीय भावनाओं को उकेरा गया | सेरोजीवों हत्याकांड- तात्कालिक कारण के रूप मे इसका अहम योगदान है | अस्त्रीय के युवराज फ़्रांडिनेंद सेराजीवों शहर की यात्रा पर था ,स्थानीय क्रांतिकारी प्रिंसेप ने फ़्रांडिनेंद की हत्या कर दी | आस्ट्रिया ने इसके लिए सर्बिया को जिम्मेदार माना ,सर्बिया को अल्टिमेटम देते हुये यह कहा की दोषी व्यक्ति एवं संघथनों पर अविलंब कारवाई तथा मामलों की जाँच के लिए आस्ट्रेलियाई अधिकारी सर्बिया जाएंगे | जर्मनी ने आस्ट्रिया को पूर्ण सहयोग का आसवशन दिया तो रूस ने सर्बिया को | राष्ट्रवाद का और पड़ोसी देशो की प्रतिस्पर्धा ने प्रथम विश्वयुद्ध मे अहम भूमिका निभाई |इस आधार पर कहा जा सकता है की समकालीन दौर मे इन घटनाओं से सीख लेते हुये हमे मानवता की ओर ध्यान देना चाहिए |
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प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में प्लेटों की विभिन्न प्रकार की सीमाओं से निर्मित स्थलाकृतियों की चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द) In the plate tectonics theory discuss the topographies made by different types of boundaries of plates. (150-200 words)
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Approach: प्रश्न के प्रथम भाग में प्लेट विवर्तनिकी की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। बीच विभिन्न प्रकार की सीमाओं की चर्चा कीजिए। प्लेटों के बीच विभिन्न प्रकार की सीमाओं की चर्चा कीजिए। इनसीमाओं से निर्मित स्थलाकृतियों की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: प्लेट शब्दका प्रयोग सर्वप्रथम 1965 में टूजो विल्सन द्वारा रूपान्तरण भ्रंश की परिभाषा में किया गया, परंतु प्लेट विवर्तनिकी की परिकल्पना सर्वप्रथम 1967 में डबल्यू. जे. मोर्गन केद्वारा प्रतिपादित की गयी। मैकेजी, पार्कर और मॉर्गन ने स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किए गए विचारों को समन्वित कर एक अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा को न्यू ग्लोबल टेक्क्तोनिक्स के नाम से जाना गया, परंतु कुछ समय पश्चात यह अवधारणा प्लेट विवर्तनिकी के रूप में प्रचलित हुई। इस सिद्धान्त के अनुसार प्लेटों की संकल्पना प्रस्तुत की गयी। प्लेटों का संचलन होता है जिससे विभिन्न प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है। तीन प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है अभिसारी सीमा – इस सीमा का निर्माण दो प्लेटों के एक दूसरे के पास आने पर होता है। इसमें क्रस्ट का विनाश होता है। इसलिए विनाशकारी सीमा भी कहते हैं यह तीन प्रकार की होती है - महासागरीय- महाद्वीपीय - प्लेट के मध्य जैसे प्रशांत और अमेरिकी प्लेट। रॉकीज़ एंडीज़ पर्वतों की उत्पत्ति इसी के कारण हुई है। महासागरीय- महासागरीय - प्लेटों के मध्य जैसे प्रशांत एवं यूरेशियाई प्लेट। जापान फिलीपींस इन्डोनेशिया आदि का निर्माण इसी का परिणाम है। जैसे गौंडवानालैंड और लौरेंशिया प्लेट। महाद्वीपीय-महाद्वीपी य प्लेटों के मध्यहिमालय की उत्पत्ति इसी का परिणाम है। अपसारी सीमा – इस सीमा का निर्माण दो प्लेटों के एक दूसरे से दूर जाने पर होता है। इससे नए क्रस्ट का निर्माण होता है। इसलिए रचनात्मक सीमा भी कहते हैं। मध्य अटलांटिक कटक का निर्माण इसी सीमा पर हो रहा है। इससे जुड़ी भूगर्भीक घटनाओं में - सामान्य भ्रंशन, कटक निर्माण, गैर-विनाशकारी भूकंप एवं मंद ज्वालामुखी उद्गार प्रमुख है। संरक्षी सीमा – प्लेटों की गति एक दूसरे के समानान्तर होती है। प्लेटें एक दूसरे के सापेक्ष क्षतिज दिशा में गति करती है। यहाँ ना तो क्रस्ट का निर्माण होता है ना ही विनाश सैन एंडरियाज भ्रंश इसका उदाहरण है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त पृथ्वी की सतह पर स्थलाकृतियों के निर्माण की व्याख्या करता है। इसमें स्थलाकृतियों का निर्माण एवं विनाश दोनों शामिल है। महादीपों के क्रस्ट के विनाश के साथ ही नए महासागरीय क्रस्ट का निर्माण होता है।
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##Question:प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में प्लेटों की विभिन्न प्रकार की सीमाओं से निर्मित स्थलाकृतियों की चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द) In the plate tectonics theory discuss the topographies made by different types of boundaries of plates. (150-200 words)##Answer:Approach: प्रश्न के प्रथम भाग में प्लेट विवर्तनिकी की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। बीच विभिन्न प्रकार की सीमाओं की चर्चा कीजिए। प्लेटों के बीच विभिन्न प्रकार की सीमाओं की चर्चा कीजिए। इनसीमाओं से निर्मित स्थलाकृतियों की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: प्लेट शब्दका प्रयोग सर्वप्रथम 1965 में टूजो विल्सन द्वारा रूपान्तरण भ्रंश की परिभाषा में किया गया, परंतु प्लेट विवर्तनिकी की परिकल्पना सर्वप्रथम 1967 में डबल्यू. जे. मोर्गन केद्वारा प्रतिपादित की गयी। मैकेजी, पार्कर और मॉर्गन ने स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किए गए विचारों को समन्वित कर एक अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा को न्यू ग्लोबल टेक्क्तोनिक्स के नाम से जाना गया, परंतु कुछ समय पश्चात यह अवधारणा प्लेट विवर्तनिकी के रूप में प्रचलित हुई। इस सिद्धान्त के अनुसार प्लेटों की संकल्पना प्रस्तुत की गयी। प्लेटों का संचलन होता है जिससे विभिन्न प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है। तीन प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है अभिसारी सीमा – इस सीमा का निर्माण दो प्लेटों के एक दूसरे के पास आने पर होता है। इसमें क्रस्ट का विनाश होता है। इसलिए विनाशकारी सीमा भी कहते हैं यह तीन प्रकार की होती है - महासागरीय- महाद्वीपीय - प्लेट के मध्य जैसे प्रशांत और अमेरिकी प्लेट। रॉकीज़ एंडीज़ पर्वतों की उत्पत्ति इसी के कारण हुई है। महासागरीय- महासागरीय - प्लेटों के मध्य जैसे प्रशांत एवं यूरेशियाई प्लेट। जापान फिलीपींस इन्डोनेशिया आदि का निर्माण इसी का परिणाम है। जैसे गौंडवानालैंड और लौरेंशिया प्लेट। महाद्वीपीय-महाद्वीपी य प्लेटों के मध्यहिमालय की उत्पत्ति इसी का परिणाम है। अपसारी सीमा – इस सीमा का निर्माण दो प्लेटों के एक दूसरे से दूर जाने पर होता है। इससे नए क्रस्ट का निर्माण होता है। इसलिए रचनात्मक सीमा भी कहते हैं। मध्य अटलांटिक कटक का निर्माण इसी सीमा पर हो रहा है। इससे जुड़ी भूगर्भीक घटनाओं में - सामान्य भ्रंशन, कटक निर्माण, गैर-विनाशकारी भूकंप एवं मंद ज्वालामुखी उद्गार प्रमुख है। संरक्षी सीमा – प्लेटों की गति एक दूसरे के समानान्तर होती है। प्लेटें एक दूसरे के सापेक्ष क्षतिज दिशा में गति करती है। यहाँ ना तो क्रस्ट का निर्माण होता है ना ही विनाश सैन एंडरियाज भ्रंश इसका उदाहरण है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त पृथ्वी की सतह पर स्थलाकृतियों के निर्माण की व्याख्या करता है। इसमें स्थलाकृतियों का निर्माण एवं विनाश दोनों शामिल है। महादीपों के क्रस्ट के विनाश के साथ ही नए महासागरीय क्रस्ट का निर्माण होता है।
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How can the role of NGOs strengthen the socio-political fabric and development in the country? Discuss and also throw light on the major constraints. (10 marks/150 words)
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Basic Approach: · Define NGO Mention a few cases when NGO"s contributed to socio-political dimensions Give issues faced Suggest way forwars. Answer A non-governmental organization (NGO) is any non-profit, voluntary citizens" group which is organized on a local, national or international level. Task-oriented and driven by people with a common interest, NGOs perform a variety of service and humanitarian functions, bring citizen concerns to Governments, advocate and monitor policies and encourage political participation through the provision of information Their primary objective is to provide social justice, development and human rights. This further strengthens the socio-political fabric of a country. Socio-Political Dimension – 1. NGO improve the s livelihood of India’s poor by creating employment (e.g. SEWA), forming and helping SHGs (e.g. Myrada), Capacity building of farmers etc. 2. They reach out to the vulnerable sections of the society e.g. Nanhi kali for girl child, Shakti Vahini for women trafficking, Bachpan Bachao Aandolan for Child Labour etc. 3. They work for the conservation of flora and fauna e.g. PETA 4. They plan y advisory role for government and engage in policy dialogue e.g. Naz Foundation with respect to LGBT Rights and Section 377. 5. They act as a bridge between the State and its citizens. They also voice the concern of citizens, form public opinion and facilitate people’s participation which helps strengthen the process of good governance and participative democracy. 6. They review the efficacy of development projects and laws thus acting as a feedback channel to the government leading to better outcomes. Development Dimension – 1. They act as a development arm of the government, providing services in those sectors and areas which are left out and/or are difficult to reach and provide extension services in insurgency affected areas and areas in which government commands low credibility. 2. They are involved in the implementation of various government schemes and infrastructure e.g. many NGOs constructing toilets under the Swachh Bharat Programme. 3. Being sector focused, they often bring about well planned and innovative development solutions e.g. Concepts of Biotoilets by Green Sanitation Campaign NGO. Constraints – 1. Structural – a. Lack of Funding and Credibility in the initial stages makes it difficult for many well meaning NGOs to sustain operations and they end up shutting down. b. Inadequate availability of trained manpower. c. Single person heading undermining the principles of internal democracy. 2. Functional – a. Opposition and lack of support from society e.g. Sexual assault on NGO workers in Pathalgadi in Jharkhand. b. Duplication of work – Many NGOs working in the same sectors which have better funding leads to duplication of work and inefficient resource utilization. This also leads to the neglect of many vulnerable sectors e.g. Old Age. c. Regional Divide – more than half the NGOs in India are concentrated in few States where acceptability is better and funding is available. d. Unwillingness to operate in rural areas by employees present a critical challenge. e. Misappropriation of funds by certain NGOs leads to blotting of many others. Way forward A regulatory mechanism to keep a watch on the financial activities of NGOs and voluntary organizations is the need of the hour..The government should frame guidelines for their accreditation, the manner in which these organizations should maintain their accounts and the procedure for recovery in case they fail to submit their balance sheets. Also, there is a need to avoid tussle between the Home Ministry and Finance Ministry by bringing the regulation of NGOs under one head. General Financial Rules, 2005 have mandated a regulatory mechanism for the NGOs and a comprehensive law in line with these rules should be framed in no time.
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##Question:How can the role of NGOs strengthen the socio-political fabric and development in the country? Discuss and also throw light on the major constraints. (10 marks/150 words)##Answer:Basic Approach: · Define NGO Mention a few cases when NGO"s contributed to socio-political dimensions Give issues faced Suggest way forwars. Answer A non-governmental organization (NGO) is any non-profit, voluntary citizens" group which is organized on a local, national or international level. Task-oriented and driven by people with a common interest, NGOs perform a variety of service and humanitarian functions, bring citizen concerns to Governments, advocate and monitor policies and encourage political participation through the provision of information Their primary objective is to provide social justice, development and human rights. This further strengthens the socio-political fabric of a country. Socio-Political Dimension – 1. NGO improve the s livelihood of India’s poor by creating employment (e.g. SEWA), forming and helping SHGs (e.g. Myrada), Capacity building of farmers etc. 2. They reach out to the vulnerable sections of the society e.g. Nanhi kali for girl child, Shakti Vahini for women trafficking, Bachpan Bachao Aandolan for Child Labour etc. 3. They work for the conservation of flora and fauna e.g. PETA 4. They plan y advisory role for government and engage in policy dialogue e.g. Naz Foundation with respect to LGBT Rights and Section 377. 5. They act as a bridge between the State and its citizens. They also voice the concern of citizens, form public opinion and facilitate people’s participation which helps strengthen the process of good governance and participative democracy. 6. They review the efficacy of development projects and laws thus acting as a feedback channel to the government leading to better outcomes. Development Dimension – 1. They act as a development arm of the government, providing services in those sectors and areas which are left out and/or are difficult to reach and provide extension services in insurgency affected areas and areas in which government commands low credibility. 2. They are involved in the implementation of various government schemes and infrastructure e.g. many NGOs constructing toilets under the Swachh Bharat Programme. 3. Being sector focused, they often bring about well planned and innovative development solutions e.g. Concepts of Biotoilets by Green Sanitation Campaign NGO. Constraints – 1. Structural – a. Lack of Funding and Credibility in the initial stages makes it difficult for many well meaning NGOs to sustain operations and they end up shutting down. b. Inadequate availability of trained manpower. c. Single person heading undermining the principles of internal democracy. 2. Functional – a. Opposition and lack of support from society e.g. Sexual assault on NGO workers in Pathalgadi in Jharkhand. b. Duplication of work – Many NGOs working in the same sectors which have better funding leads to duplication of work and inefficient resource utilization. This also leads to the neglect of many vulnerable sectors e.g. Old Age. c. Regional Divide – more than half the NGOs in India are concentrated in few States where acceptability is better and funding is available. d. Unwillingness to operate in rural areas by employees present a critical challenge. e. Misappropriation of funds by certain NGOs leads to blotting of many others. Way forward A regulatory mechanism to keep a watch on the financial activities of NGOs and voluntary organizations is the need of the hour..The government should frame guidelines for their accreditation, the manner in which these organizations should maintain their accounts and the procedure for recovery in case they fail to submit their balance sheets. Also, there is a need to avoid tussle between the Home Ministry and Finance Ministry by bringing the regulation of NGOs under one head. General Financial Rules, 2005 have mandated a regulatory mechanism for the NGOs and a comprehensive law in line with these rules should be framed in no time.
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What are the reasons for income inequality in Indian society? Enumerate the steps taken by the government of India to address this issue. [200 words, 10 marks]
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Approach: .Introduce with the state of income inequality existing in India. .Mention the reasons for existing income inequality. .Explain the steps taken by the government in this regard. .Conclude the answer with a way forward to reduce this income inequality. Answer: As per the Oxfam India Inequality Report 2018, almost 73 per cent of the wealth generated last year in India went to the richest one per cent, while 67 crore Indians who comprise the poorest half of thepopulation saw only one per cent increase in their wealth. This shows the stark inequality which exists in India. Reasons for existing income inequality in India: 1. Unequal distribution of land and wealth among the masses. 2. Inheritance laws: The low tax applied while the property is inherited keeps the incidence of inequality almost unchanged as was one generation ago. 3. Inadequate infrastructure both the social and physical infrastructure,where due to unavailability or scarcity has led to less/reduced developmental opportunities for the masses. 4. Access to education and training also affects the overall development where the unavailability, especially in rural areas, has widened the divide further. 5. Access to credit facilities: Accessibility of credit to establish their own businesses is also one of the causes. 6. Leakages in government developmental expenditure: Inefficient distribution of scarce resources and an insufficient amount of money allocated for welfare programmes are the major reason which further increases the inequality gap. 7. Increasing unemployment: The generation of new jobs has not kept pace with the increasing population growth rate which is evident in the jobless growth witnessed in the last few years. Steps taken by the Government in this regard: 1. Abolition of Zamindari system, enaction of Tenancy Act and ceiling on land ownership etc aimed at reducing the existing inequality in terms of land ownership. 2. Giving reservation to SC/STs and OBC in government educational institutions in admissions and in job opportunity. 3. Nationalisation of Banks to reduce the regional inequality in access to credit facilities and provide banking facilities to the last mile connecting nook and corner of the country. 4. Progressive taxation system which imposes higher taxes on the rich as compared to the poor. 5. Focus on development and growth of MSMEs: Schemes like MUDRA yojana etc which focussed on providing credit facilities to the MSMEs which provide huge employment opportunities to a large section of the people especially in rural areas. 6. Government is focussing on many developmental programmes and initiatives through various channels which are aimed at reducing the inequality gap in society, such as: a) Poverty alleviation Program: MGNREGA b) Rural Developmental initiatives: PMGSY, NABARD c) Urban developmental initiative: AMRUT, JNNUM, HRIDAY d) Skill development: USTAD, PMKVY e) Social Security Programmes: PMJJBY, APY f) Nutritional programmes: NNM, Poshan Abhiyan g) Educational initiatives: RTE Act, Mid Day Meal, Eklavya Schools h) Health: PM-JAY, NHP, Ayushman Bharat i) Women empowerment: Maternity Benefit Act Though India is experiencing income inequality to a very high level as is evident from the Oxfam report but with proper implementation of government initiatives and consolidated efforts of all the stakeholders can help in fighting this major issue which is incident in the Indian society.
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##Question:What are the reasons for income inequality in Indian society? Enumerate the steps taken by the government of India to address this issue. [200 words, 10 marks]##Answer:Approach: .Introduce with the state of income inequality existing in India. .Mention the reasons for existing income inequality. .Explain the steps taken by the government in this regard. .Conclude the answer with a way forward to reduce this income inequality. Answer: As per the Oxfam India Inequality Report 2018, almost 73 per cent of the wealth generated last year in India went to the richest one per cent, while 67 crore Indians who comprise the poorest half of thepopulation saw only one per cent increase in their wealth. This shows the stark inequality which exists in India. Reasons for existing income inequality in India: 1. Unequal distribution of land and wealth among the masses. 2. Inheritance laws: The low tax applied while the property is inherited keeps the incidence of inequality almost unchanged as was one generation ago. 3. Inadequate infrastructure both the social and physical infrastructure,where due to unavailability or scarcity has led to less/reduced developmental opportunities for the masses. 4. Access to education and training also affects the overall development where the unavailability, especially in rural areas, has widened the divide further. 5. Access to credit facilities: Accessibility of credit to establish their own businesses is also one of the causes. 6. Leakages in government developmental expenditure: Inefficient distribution of scarce resources and an insufficient amount of money allocated for welfare programmes are the major reason which further increases the inequality gap. 7. Increasing unemployment: The generation of new jobs has not kept pace with the increasing population growth rate which is evident in the jobless growth witnessed in the last few years. Steps taken by the Government in this regard: 1. Abolition of Zamindari system, enaction of Tenancy Act and ceiling on land ownership etc aimed at reducing the existing inequality in terms of land ownership. 2. Giving reservation to SC/STs and OBC in government educational institutions in admissions and in job opportunity. 3. Nationalisation of Banks to reduce the regional inequality in access to credit facilities and provide banking facilities to the last mile connecting nook and corner of the country. 4. Progressive taxation system which imposes higher taxes on the rich as compared to the poor. 5. Focus on development and growth of MSMEs: Schemes like MUDRA yojana etc which focussed on providing credit facilities to the MSMEs which provide huge employment opportunities to a large section of the people especially in rural areas. 6. Government is focussing on many developmental programmes and initiatives through various channels which are aimed at reducing the inequality gap in society, such as: a) Poverty alleviation Program: MGNREGA b) Rural Developmental initiatives: PMGSY, NABARD c) Urban developmental initiative: AMRUT, JNNUM, HRIDAY d) Skill development: USTAD, PMKVY e) Social Security Programmes: PMJJBY, APY f) Nutritional programmes: NNM, Poshan Abhiyan g) Educational initiatives: RTE Act, Mid Day Meal, Eklavya Schools h) Health: PM-JAY, NHP, Ayushman Bharat i) Women empowerment: Maternity Benefit Act Though India is experiencing income inequality to a very high level as is evident from the Oxfam report but with proper implementation of government initiatives and consolidated efforts of all the stakeholders can help in fighting this major issue which is incident in the Indian society.
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"सल्तनत कालीन स्थापत्य , इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला में विद्यमान विशेषताओं का समाहार थी |" स्पष्ट कीजिये |(200 शब्द )
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दृष्टिकोण : सल्तनत कल का एक संक्षेप परिचय दीजिये (कालक्रम और शासक के सन्दर्भ में ) इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला के मिश्रण( इंडो –इस्लामिक स्थापत्य) के विकास का सामान्य परिचय दीजिये प्रारंभिक तुकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये खिलजी शासकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये भारतीय इस्लामिक स्थापत्य की महत्ता का संक्षेप में उल्लेख कीजिये 13 वीं सदी के अंत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक नए चरण के सूत्रपात के रूप में देखा जाता है | मुख्यतः सल्तनत कालीन तुर्क शासकों के द्वारा अपने साथ लाये गए इस्लामिक स्थापत्य कला के विशेषताओं को भारतीय स्थापत्य की लक्षणों के साथ मिलाकर एक नविन स्थापत्य कला का विकास किया गया जिसे इतिहास में भारतीय इस्लामिक स्थापत्य के रूप में जाना जाता है| भारतीय ईस्लामी स्थापत्य या इंडो इस्लामिक स्थापत्य भारतीय इस्लामी स्थापत्य को इंडो इस्लामिक स्थापत्य के रूप में भी जाना जाता है भारत में स्थापित तुर्क शासकों के द्वारा लाये गए इस्लामिक स्थापत्य के साथ-साथ सल्तनत कालीन इमारतों में हिन्दू स्थापत्य सम्बंधित विशेषताओं के भी साक्ष्य मिलते हैं जैसे अलंकरण में कमल ,कलश आदि का प्रयोग ;इमारतों में खम्भों का प्रयोग जो इससे पूर्व भारतीय शैली में विहारों और प्रसादों के मुख्य लक्षणों में से एक थे भारतीय इस्लामी स्थापत्य में प्रमुख इमारतों में मुख्य तौर पर धार्मिक स्थल जैसे- मकबरा और मस्जिद शामिल थे वहीँ राजशाही आवास जैसे-महल शामिल थे इनके निर्माण सामग्री के रूप में स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग हुआ जो पूर्व में भी स्थापत्य का मुख्य हिस्सा थे जैसे- पत्थर के द्वारा -लाल बलुआ पत्थर के प्रयोग परन्तु आगे चलकर संगमरमर के प्रयोग में वृद्धि प्रारंभिक तुर्कों के काल में स्थापत्य ( 1206 से 1290) इस्लामिक स्थापत्य से सम्बंधित विशेषताओं एवं इमारतों के साक्ष्य मिलने लगते हैं जैसे - कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद तथा कुतुब मीनार ; इल्तुतमिश के समय नसीरिया मदरसा ,नसीरुद्दीन महमूद का मकबरा एवं बलबन के समय लाल महल ; इन इमारतों में इस्लामिक विशेषताएं जैसे कि- गुम्बद ,मीनार, अरबेस्क के स्थापत्य के साथ-साथ हिन्दू स्थापत्य की विशेषताएं जैसे- खम्भों का उपयोग आदि भी दिखाई पड़ते हैं जैसे कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद में दोनों लक्षण मिलते हैं इंडो इस्लामिक स्थापत्य के विकास का प्रमुख कारण , स्थानीय कारीगरों एवं स्थानीय संसाधनों का प्रयोग किया जाना एवं पूर्व निर्मित इमारतों में परिवर्तन या बदलाव कर उन्हें नवीन रूप दिया जाना था ; खिलजी कालीन स्थापत्य प्रारंभिक तुर्कों की तुलना में संख्यात्मक दृष्टिकोण से कुछ कम साक्ष्य मिलते हैं ,हालाँकि कलात्मक दृष्टि से प्रारंभिक तुर्कों की तुलना इस काल के स्थापत्य नमूनों को बेहतर मन जाताहै; प्रमुख इमारतें -अलाई दरवाजा , हौज ख़ास ,जमात खाना मस्जिद आदि इन इमारतों पर भी इंडो इस्लामिक विशेषताओं का प्रभाव देख सकते हैं जैसे - अलाई दरवाजा में उलटे कमल की आकृति मेहराव - घोड़े की नाल की तरह जिसे प्राचीन मंदिरों में देखे जा सकते थे कलात्मक दृष्टिकोण से प्रारंभिक तुर्कों की इमारतें उतना महत्त्व नहीं रखती हैं जितना खिलजी कालीन स्थापत्य का था | संभवतः इसका कारण प्रारंभ के राजनीतिक अस्थिरता एवं राज्य के आर्थिक आधार को कमजोर होने के रूप में देखा जा सकता है खिलजी के स्थापत्य में एक वैभव और आत्म विश्वास के रूप में दीखता है |अर्थात भारतीय इस्लामिक स्थापत्य में कलात्मक दृष्टि से समय के साथ विकास को देखा जा सकत है जिसमे भारतीयों परिस्थितयों के साथ सामंजस्य और समाहार की भी मुख्य भूमिका थी |
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##Question:"सल्तनत कालीन स्थापत्य , इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला में विद्यमान विशेषताओं का समाहार थी |" स्पष्ट कीजिये |(200 शब्द )##Answer:दृष्टिकोण : सल्तनत कल का एक संक्षेप परिचय दीजिये (कालक्रम और शासक के सन्दर्भ में ) इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला के मिश्रण( इंडो –इस्लामिक स्थापत्य) के विकास का सामान्य परिचय दीजिये प्रारंभिक तुकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये खिलजी शासकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये भारतीय इस्लामिक स्थापत्य की महत्ता का संक्षेप में उल्लेख कीजिये 13 वीं सदी के अंत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक नए चरण के सूत्रपात के रूप में देखा जाता है | मुख्यतः सल्तनत कालीन तुर्क शासकों के द्वारा अपने साथ लाये गए इस्लामिक स्थापत्य कला के विशेषताओं को भारतीय स्थापत्य की लक्षणों के साथ मिलाकर एक नविन स्थापत्य कला का विकास किया गया जिसे इतिहास में भारतीय इस्लामिक स्थापत्य के रूप में जाना जाता है| भारतीय ईस्लामी स्थापत्य या इंडो इस्लामिक स्थापत्य भारतीय इस्लामी स्थापत्य को इंडो इस्लामिक स्थापत्य के रूप में भी जाना जाता है भारत में स्थापित तुर्क शासकों के द्वारा लाये गए इस्लामिक स्थापत्य के साथ-साथ सल्तनत कालीन इमारतों में हिन्दू स्थापत्य सम्बंधित विशेषताओं के भी साक्ष्य मिलते हैं जैसे अलंकरण में कमल ,कलश आदि का प्रयोग ;इमारतों में खम्भों का प्रयोग जो इससे पूर्व भारतीय शैली में विहारों और प्रसादों के मुख्य लक्षणों में से एक थे भारतीय इस्लामी स्थापत्य में प्रमुख इमारतों में मुख्य तौर पर धार्मिक स्थल जैसे- मकबरा और मस्जिद शामिल थे वहीँ राजशाही आवास जैसे-महल शामिल थे इनके निर्माण सामग्री के रूप में स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग हुआ जो पूर्व में भी स्थापत्य का मुख्य हिस्सा थे जैसे- पत्थर के द्वारा -लाल बलुआ पत्थर के प्रयोग परन्तु आगे चलकर संगमरमर के प्रयोग में वृद्धि प्रारंभिक तुर्कों के काल में स्थापत्य ( 1206 से 1290) इस्लामिक स्थापत्य से सम्बंधित विशेषताओं एवं इमारतों के साक्ष्य मिलने लगते हैं जैसे - कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद तथा कुतुब मीनार ; इल्तुतमिश के समय नसीरिया मदरसा ,नसीरुद्दीन महमूद का मकबरा एवं बलबन के समय लाल महल ; इन इमारतों में इस्लामिक विशेषताएं जैसे कि- गुम्बद ,मीनार, अरबेस्क के स्थापत्य के साथ-साथ हिन्दू स्थापत्य की विशेषताएं जैसे- खम्भों का उपयोग आदि भी दिखाई पड़ते हैं जैसे कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद में दोनों लक्षण मिलते हैं इंडो इस्लामिक स्थापत्य के विकास का प्रमुख कारण , स्थानीय कारीगरों एवं स्थानीय संसाधनों का प्रयोग किया जाना एवं पूर्व निर्मित इमारतों में परिवर्तन या बदलाव कर उन्हें नवीन रूप दिया जाना था ; खिलजी कालीन स्थापत्य प्रारंभिक तुर्कों की तुलना में संख्यात्मक दृष्टिकोण से कुछ कम साक्ष्य मिलते हैं ,हालाँकि कलात्मक दृष्टि से प्रारंभिक तुर्कों की तुलना इस काल के स्थापत्य नमूनों को बेहतर मन जाताहै; प्रमुख इमारतें -अलाई दरवाजा , हौज ख़ास ,जमात खाना मस्जिद आदि इन इमारतों पर भी इंडो इस्लामिक विशेषताओं का प्रभाव देख सकते हैं जैसे - अलाई दरवाजा में उलटे कमल की आकृति मेहराव - घोड़े की नाल की तरह जिसे प्राचीन मंदिरों में देखे जा सकते थे कलात्मक दृष्टिकोण से प्रारंभिक तुर्कों की इमारतें उतना महत्त्व नहीं रखती हैं जितना खिलजी कालीन स्थापत्य का था | संभवतः इसका कारण प्रारंभ के राजनीतिक अस्थिरता एवं राज्य के आर्थिक आधार को कमजोर होने के रूप में देखा जा सकता है खिलजी के स्थापत्य में एक वैभव और आत्म विश्वास के रूप में दीखता है |अर्थात भारतीय इस्लामिक स्थापत्य में कलात्मक दृष्टि से समय के साथ विकास को देखा जा सकत है जिसमे भारतीयों परिस्थितयों के साथ सामंजस्य और समाहार की भी मुख्य भूमिका थी |
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विश्व पटल पर मार्क्स के उदय ने ना केवल समाजवादी विचारधारा को एक धरातल प्रदान किया अपितु पूँजीवादी विचारधारा में भी व्यापक परिवर्तन ला दिया | कथन का विश्लेषण कीजिये |
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उत्तर का दृष्टिकोण समाजवादी विचारधारा क्या है समाजवाद का विश्व पटल पर उदय और उसके कारण समाजवाद से पूंजीवादी विचारधारा मे आए परिवर्तन की समीक्षा कीजिये | संतुलित निष्कर्ष समाजवाद एक आर्थिक सामाजिक दर्शन है ,इसका अर्थ धन सम्पति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियंत्रण मे होता है | कार्लमार्क्स नामक विचारक के द्वारा प्रतिपादत विचारधारा -इसका लक्ष्य मज़दूरों एवं वंचित तबकों को सामाजिक आर्थिक न्याय दिलाना था ,लेकिन समाजवादियों के विपरीत मजदूरों के द्वारा जबरन या संगठित होकर सत्ता पर नियंत्रण जिससे इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके | कार्ल मार्क्स का अंतिम लक्ष्य साम्यवाद की स्थापना थी | अर्थात राज्य एवं वर्ग विहीन समाज की स्थापना | इन विचारधारा को मानने वाले लोग वामपंथी कहते है | मार्क्सवाद के लिए वैज्ञानिक समाजवाद शब्द का भी प्रयोग किया जाता है | चुकी मार्क्स ने एक वैज्ञानिक के भाँति ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर मजदूरों की क्रांति का समर्थन किया| समाजवाद का विश्व पटल पर उदय और उसके कारण - समाजवाद का उदय संसाधनों के अनियंत्रित बटवारें से है | इसका लक्ष्य वर्ग विहीन समानता युक्त समाज बनाना है | औद्योगिक क्रांति के साथ ही समाज मे दो नए वर्गो का उदय– पूंजीवाद और मजदूर वर्ग के उदय न समाज के असमानता को बढ़ाया | संसाधनों पर नियंत्रण के कारण– औद्योगिक क्रांति के बाद संसाधनो का नियंत्रण पूंजीवाद का हो गया जो वर्ग संघर्ष का कारण बना | मजदूरों की स्थिति का दयनीय होना–नीतियों मे प्रभावी बदलाव का ना होना | इतिहास के अलग अलग काल खंडो मे विभिन्न वर्गो के बीच संघर्ष को मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के रूप मे पेश किया है | विभिन्न वर्गों का प्रमुख कारण आर्थिक असमानता है ,इसे मार्क्स ने द्वंदात्मक भौतिकवाद के रूप मे पेश किया | इस सिद्धांत का प्रयोग एतिहासिक विकास के संदर्भ मे किया है ,इसीलिए मार्क्स के विचारों मे इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या को अत्यधिक महत्व दिया गया है | समाजवाद से पूंजीवादी विचारधारा मे आए परिवर्तन - औद्योगिक क्षेत्रों मे मजदूरो के लिए कानून बनाना | ब्रिटेन मे मजदूरों को मत देने एवं ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार | फ्रांस मे भी ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार| जर्मनी मे मजदूरों को बीमा ,साप्ताहिक छुट्टी इत्यादि का प्रावधान | ट्रेड यूनियनों पर मार्कस्वाद का बढ़ता प्रभाव 1864 मे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल नामक संस्था की स्थापना ,इसका उदेश्य क्रांति को संगठित करना था | 1971 मे फ्रांस मे पेरिस कम्यून के नाम से कुछ सप्ताहों के लिए मार्क्सवादी सरकार का गठन इस अवधि मे मार्क्स के अनुयायियों की संख्या बढ़ी| समाजवाद को परिभाषित करना कठिन है क्योकि यह सिद्धांत एवं आलोचना दोनों है | मूलतः यह वह आंदोलन है जो उत्पादन के मुख्य साधनों के समाजीकरण पर आधारित वर्गहीन समाज स्थापित करने की वकालत करता है जिसका नियंत्रण राज्य के संसाधनों पर हो |
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##Question:विश्व पटल पर मार्क्स के उदय ने ना केवल समाजवादी विचारधारा को एक धरातल प्रदान किया अपितु पूँजीवादी विचारधारा में भी व्यापक परिवर्तन ला दिया | कथन का विश्लेषण कीजिये |##Answer: उत्तर का दृष्टिकोण समाजवादी विचारधारा क्या है समाजवाद का विश्व पटल पर उदय और उसके कारण समाजवाद से पूंजीवादी विचारधारा मे आए परिवर्तन की समीक्षा कीजिये | संतुलित निष्कर्ष समाजवाद एक आर्थिक सामाजिक दर्शन है ,इसका अर्थ धन सम्पति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियंत्रण मे होता है | कार्लमार्क्स नामक विचारक के द्वारा प्रतिपादत विचारधारा -इसका लक्ष्य मज़दूरों एवं वंचित तबकों को सामाजिक आर्थिक न्याय दिलाना था ,लेकिन समाजवादियों के विपरीत मजदूरों के द्वारा जबरन या संगठित होकर सत्ता पर नियंत्रण जिससे इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके | कार्ल मार्क्स का अंतिम लक्ष्य साम्यवाद की स्थापना थी | अर्थात राज्य एवं वर्ग विहीन समाज की स्थापना | इन विचारधारा को मानने वाले लोग वामपंथी कहते है | मार्क्सवाद के लिए वैज्ञानिक समाजवाद शब्द का भी प्रयोग किया जाता है | चुकी मार्क्स ने एक वैज्ञानिक के भाँति ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर मजदूरों की क्रांति का समर्थन किया| समाजवाद का विश्व पटल पर उदय और उसके कारण - समाजवाद का उदय संसाधनों के अनियंत्रित बटवारें से है | इसका लक्ष्य वर्ग विहीन समानता युक्त समाज बनाना है | औद्योगिक क्रांति के साथ ही समाज मे दो नए वर्गो का उदय– पूंजीवाद और मजदूर वर्ग के उदय न समाज के असमानता को बढ़ाया | संसाधनों पर नियंत्रण के कारण– औद्योगिक क्रांति के बाद संसाधनो का नियंत्रण पूंजीवाद का हो गया जो वर्ग संघर्ष का कारण बना | मजदूरों की स्थिति का दयनीय होना–नीतियों मे प्रभावी बदलाव का ना होना | इतिहास के अलग अलग काल खंडो मे विभिन्न वर्गो के बीच संघर्ष को मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के रूप मे पेश किया है | विभिन्न वर्गों का प्रमुख कारण आर्थिक असमानता है ,इसे मार्क्स ने द्वंदात्मक भौतिकवाद के रूप मे पेश किया | इस सिद्धांत का प्रयोग एतिहासिक विकास के संदर्भ मे किया है ,इसीलिए मार्क्स के विचारों मे इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या को अत्यधिक महत्व दिया गया है | समाजवाद से पूंजीवादी विचारधारा मे आए परिवर्तन - औद्योगिक क्षेत्रों मे मजदूरो के लिए कानून बनाना | ब्रिटेन मे मजदूरों को मत देने एवं ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार | फ्रांस मे भी ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार| जर्मनी मे मजदूरों को बीमा ,साप्ताहिक छुट्टी इत्यादि का प्रावधान | ट्रेड यूनियनों पर मार्कस्वाद का बढ़ता प्रभाव 1864 मे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल नामक संस्था की स्थापना ,इसका उदेश्य क्रांति को संगठित करना था | 1971 मे फ्रांस मे पेरिस कम्यून के नाम से कुछ सप्ताहों के लिए मार्क्सवादी सरकार का गठन इस अवधि मे मार्क्स के अनुयायियों की संख्या बढ़ी| समाजवाद को परिभाषित करना कठिन है क्योकि यह सिद्धांत एवं आलोचना दोनों है | मूलतः यह वह आंदोलन है जो उत्पादन के मुख्य साधनों के समाजीकरण पर आधारित वर्गहीन समाज स्थापित करने की वकालत करता है जिसका नियंत्रण राज्य के संसाधनों पर हो |
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Discuss the Objectives and Guiding Principles of Vienna Congress. (200 words)
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Congress of vienna • After defeat of Napoleon in battle of leipzig 1813, victorpowers assembled at vienna, under the leadership ofaustrian chancellor von metternich.The Vienna Congress was an assembly of reactionary forces.It was a conference of the old regime and represented theforces of continuity in europe. OBJECTIVE • It despised the liberal and progressive ideas of frenchrevolution and made every possible effort to reverse thechanges brought about by forces of french revolution. THREE PRINCIPLES The work of VC was based upon three principles: 1.The principle of balance of power 2.Principle of legitimate rule 3.The principle of rewarding victor powers. 1. Principle of balance of powers : leaders believed that france had become very powerfulafter the outbreak of revolution under napoleon and this upstaged the balance of powe in europe and was a source of instability. In accordance with this principle france was forced to cede the territories it acquired after1789 and france was surrounded by a ring of strong states from all sides– Prussia was strengthened by giving it control of the rhine confederation– Belgium was integrated with holland to check its northward expansion.– Italian states of peidmont and sardinia were strengthened by giving it the control of Geneva. 2Principle of legitimate rule : by using the principle of legitimate rule, the congress aimed to reinstate dynastic rule replaced by the forces of revolution.– Thus the rule of Bourbon dynasty was reinstated in france, spain, naples – House of orange was restored in holland – Rule of pope was restored in central Italy. 3.Principle of rewarding victor powers: in accordancewith this principle of rewarding victor powers – Prussia was given a part of poland and about 2/5th of saxony.– Russia was given control of finland and most of poland.– Austria was given the control of North Italian territories of Lombardy and venetia.– The 39 states of german confederation were placed underthe sovereign control of austria. CONCLUSION Impact of Congress of Vienna • Positive: it ushered in an era of relative peace in europe that lasted for more than a century. . • A number of steps taken at the congress of vienna which resulted in the commencement of a new age. – By continuing with the germanic confederation of 39 states initiated by Napoleon, the VC unconsciously accepted the first step of completion of german unification. • In its effort to reestablish the conservative order and suppress the forces of change unleashed by french revolution, VC imposed unnatural alliances .
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##Question:Discuss the Objectives and Guiding Principles of Vienna Congress. (200 words)##Answer: Congress of vienna • After defeat of Napoleon in battle of leipzig 1813, victorpowers assembled at vienna, under the leadership ofaustrian chancellor von metternich.The Vienna Congress was an assembly of reactionary forces.It was a conference of the old regime and represented theforces of continuity in europe. OBJECTIVE • It despised the liberal and progressive ideas of frenchrevolution and made every possible effort to reverse thechanges brought about by forces of french revolution. THREE PRINCIPLES The work of VC was based upon three principles: 1.The principle of balance of power 2.Principle of legitimate rule 3.The principle of rewarding victor powers. 1. Principle of balance of powers : leaders believed that france had become very powerfulafter the outbreak of revolution under napoleon and this upstaged the balance of powe in europe and was a source of instability. In accordance with this principle france was forced to cede the territories it acquired after1789 and france was surrounded by a ring of strong states from all sides– Prussia was strengthened by giving it control of the rhine confederation– Belgium was integrated with holland to check its northward expansion.– Italian states of peidmont and sardinia were strengthened by giving it the control of Geneva. 2Principle of legitimate rule : by using the principle of legitimate rule, the congress aimed to reinstate dynastic rule replaced by the forces of revolution.– Thus the rule of Bourbon dynasty was reinstated in france, spain, naples – House of orange was restored in holland – Rule of pope was restored in central Italy. 3.Principle of rewarding victor powers: in accordancewith this principle of rewarding victor powers – Prussia was given a part of poland and about 2/5th of saxony.– Russia was given control of finland and most of poland.– Austria was given the control of North Italian territories of Lombardy and venetia.– The 39 states of german confederation were placed underthe sovereign control of austria. CONCLUSION Impact of Congress of Vienna • Positive: it ushered in an era of relative peace in europe that lasted for more than a century. . • A number of steps taken at the congress of vienna which resulted in the commencement of a new age. – By continuing with the germanic confederation of 39 states initiated by Napoleon, the VC unconsciously accepted the first step of completion of german unification. • In its effort to reestablish the conservative order and suppress the forces of change unleashed by french revolution, VC imposed unnatural alliances .
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मानव विकास सूचकांक को समझाते हुए, भारत की वर्तमान रैंकिंग को बताइये । मानव विकास को मापने में इसके द्वारा शामिल किए गए घटको की विस्तार से चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the Human Development Index, state the current ranking of India. Discuss in detail the components involved in measuring human development. (150-200 words, 10 marks)
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अप्रोच :- भूमिका में मानव विकास और मानव विकास सूचकांक को समझाइए । उत्तर के पहले भाग में मानव सूचकांक को बताते हुए भारत की रैंकिंग की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में मानव विकास सूचकांक गणना में शामिल घटको की चर्चा कीजिये । अंतिम भाग में भारत के मानव विकास सूचकांक को बेहतर करने के कुछ उपायो के साथ निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- मानव विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनसामान्य के विकल्पो का विस्तार किया जाता है और इनके द्वारा उनके कल्याण के उन्नत स्तर को प्राप्त किया जाता है । मानव विकास की स्थिति तीन आधारों पर निर्धारित की जा सकती है – मानव विकास सूचकांक (HDI), लिंग असमानता सूचकांक ( GII ), बहुआयामी गरीबी सूचकांक ( MPI ) । मानव विकास सूचकांक ( HDI ) , मानव जीवन की गुणवत्ता और अवसरों की उपलबद्धता मापने की सूचकांक है जिसमे जीवन प्रत्याशा , शिक्षा की दर और प्रति व्यक्ति आय शामिल की जाती है । यूएनडीपी द्वारा मानव विकास सूचकांक की शुरुवात 1990 में की गई। इसका विकास यूएनडीपी द्वारा पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूल हक की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा किया गया ।भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन भी इस समिति के सदस्य थे । यह वार्षिक आधार पर प्रकाशित की जाती है , जिसमे विश्व के लगभग सभी देशो को शामिल किया जाता है । 2017 के मानव विकास सूचकांक में 189 देशो में भारत की रैंकिंग जहां 131 थी , वहीं 2018 में भारत की रैंकिंग में थोड़ा सुधार हुआ और यह 1 89 देशो में 130 हो गई ।मानव विकास सूचकांक में सम्पूर्ण विश्व के देशो को चार वर्गो में बाटा गया है । अत्यधिक उच्च मानव विकास वाले देश ( 0.800 और इससे अधिक अंक वाले देश ) उच्च मानव विकास वाले देश ( 0.700 – 0.799 के बीच अंक वाले देश ) मध्यम मानव विकास वाले देश ( 0.550 – 0.699 अंक वाले देश ) निम्न मानव विकास वाले देश ( 0.549 और उससे कम वाले देश ) भारत की गणना मध्यम विकास वाले देशो के रूप में की जाती है । भारत का विकास सूचकांक में 0.624 प्राप्तांक के साथ 130 नंबर पर है । मानव विकास सूचकांक में शामिल तीन घटको यथा जीवन प्रत्याशा , ज्ञान ( शिक्षा ) के वर्ष और प्रति व्यक्ति आय GNI पर शामिल किया जाता है जिसमे भारत के संदर्भ में आकणों का विवरण निम्न प्रकार है :- एचडीआई के संदर्भ में जीवन प्रत्याशा 20-85 वर्ष के बीच लिया जाता है , जिसमे भारत की औसत जीवन प्रत्याशा 68.8 वर्ष है । शिक्षा के संदर्भ में दो तरह के आकणे लिए जाते है , पहला स्कूल जाने के औसत वर्ष ( 25 वर्ष से ऊपर वालों के लिए) और दूसरा स्कूल जाने के संभावित वर्ष (25 वर्ष से छोटी आयु वालों के लिए )। भारत में स्कूल जाने के औसत वर्ष की संख्या 6.4 वर्ष है , जबकि स्कूल जाने के संभावित वर्ष 12.3 वर्ष है । पीपीपी पर आधारित प्रति व्यक्ति GNI के संदर्भ में एचडीआई में न्यूनतम 100 डॉलर और अधिकतम 107721 डॉलर रखा गया है । जिसमे भारत के संदर्भ में पीपीपी पर प्रति व्यक्ति GNI 6353 डॉलर है । उपरोक्त सूचकांको को एक साथ लाने के लिए इनका गुणवोत्तर माध्य निकालते है ।उपरोक्त आकणों से भारत का गुणवोत्तर माध्य 0.624 है और भारत मध्यम मानव विकास वाले देशो की कतार में आता है । हालांकि भारत की रैंकिंग में 2017 की अपेक्षा एक अंक का सुधार हुआ है लेकिन यह सुधार नाकाफी है और भारत को लगातार अपने मानव विकास के तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है । भारत को सकारात्मक निवेश नीति के साथ प्रभावी नीतिगत फैसले लेने की आवश्यकता है जिससे आर्थिक विकास के साथ साथ सहभागिता से अवसर बढ़ाए जा सके और कुशल प्रशिक्षण के द्वारा मानव संसाधन को बढ़ाकर मानव विकास रैंकिंग में सुधार किया जा सके ।
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##Question:मानव विकास सूचकांक को समझाते हुए, भारत की वर्तमान रैंकिंग को बताइये । मानव विकास को मापने में इसके द्वारा शामिल किए गए घटको की विस्तार से चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the Human Development Index, state the current ranking of India. Discuss in detail the components involved in measuring human development. (150-200 words, 10 marks)##Answer:अप्रोच :- भूमिका में मानव विकास और मानव विकास सूचकांक को समझाइए । उत्तर के पहले भाग में मानव सूचकांक को बताते हुए भारत की रैंकिंग की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में मानव विकास सूचकांक गणना में शामिल घटको की चर्चा कीजिये । अंतिम भाग में भारत के मानव विकास सूचकांक को बेहतर करने के कुछ उपायो के साथ निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- मानव विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनसामान्य के विकल्पो का विस्तार किया जाता है और इनके द्वारा उनके कल्याण के उन्नत स्तर को प्राप्त किया जाता है । मानव विकास की स्थिति तीन आधारों पर निर्धारित की जा सकती है – मानव विकास सूचकांक (HDI), लिंग असमानता सूचकांक ( GII ), बहुआयामी गरीबी सूचकांक ( MPI ) । मानव विकास सूचकांक ( HDI ) , मानव जीवन की गुणवत्ता और अवसरों की उपलबद्धता मापने की सूचकांक है जिसमे जीवन प्रत्याशा , शिक्षा की दर और प्रति व्यक्ति आय शामिल की जाती है । यूएनडीपी द्वारा मानव विकास सूचकांक की शुरुवात 1990 में की गई। इसका विकास यूएनडीपी द्वारा पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूल हक की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा किया गया ।भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन भी इस समिति के सदस्य थे । यह वार्षिक आधार पर प्रकाशित की जाती है , जिसमे विश्व के लगभग सभी देशो को शामिल किया जाता है । 2017 के मानव विकास सूचकांक में 189 देशो में भारत की रैंकिंग जहां 131 थी , वहीं 2018 में भारत की रैंकिंग में थोड़ा सुधार हुआ और यह 1 89 देशो में 130 हो गई ।मानव विकास सूचकांक में सम्पूर्ण विश्व के देशो को चार वर्गो में बाटा गया है । अत्यधिक उच्च मानव विकास वाले देश ( 0.800 और इससे अधिक अंक वाले देश ) उच्च मानव विकास वाले देश ( 0.700 – 0.799 के बीच अंक वाले देश ) मध्यम मानव विकास वाले देश ( 0.550 – 0.699 अंक वाले देश ) निम्न मानव विकास वाले देश ( 0.549 और उससे कम वाले देश ) भारत की गणना मध्यम विकास वाले देशो के रूप में की जाती है । भारत का विकास सूचकांक में 0.624 प्राप्तांक के साथ 130 नंबर पर है । मानव विकास सूचकांक में शामिल तीन घटको यथा जीवन प्रत्याशा , ज्ञान ( शिक्षा ) के वर्ष और प्रति व्यक्ति आय GNI पर शामिल किया जाता है जिसमे भारत के संदर्भ में आकणों का विवरण निम्न प्रकार है :- एचडीआई के संदर्भ में जीवन प्रत्याशा 20-85 वर्ष के बीच लिया जाता है , जिसमे भारत की औसत जीवन प्रत्याशा 68.8 वर्ष है । शिक्षा के संदर्भ में दो तरह के आकणे लिए जाते है , पहला स्कूल जाने के औसत वर्ष ( 25 वर्ष से ऊपर वालों के लिए) और दूसरा स्कूल जाने के संभावित वर्ष (25 वर्ष से छोटी आयु वालों के लिए )। भारत में स्कूल जाने के औसत वर्ष की संख्या 6.4 वर्ष है , जबकि स्कूल जाने के संभावित वर्ष 12.3 वर्ष है । पीपीपी पर आधारित प्रति व्यक्ति GNI के संदर्भ में एचडीआई में न्यूनतम 100 डॉलर और अधिकतम 107721 डॉलर रखा गया है । जिसमे भारत के संदर्भ में पीपीपी पर प्रति व्यक्ति GNI 6353 डॉलर है । उपरोक्त सूचकांको को एक साथ लाने के लिए इनका गुणवोत्तर माध्य निकालते है ।उपरोक्त आकणों से भारत का गुणवोत्तर माध्य 0.624 है और भारत मध्यम मानव विकास वाले देशो की कतार में आता है । हालांकि भारत की रैंकिंग में 2017 की अपेक्षा एक अंक का सुधार हुआ है लेकिन यह सुधार नाकाफी है और भारत को लगातार अपने मानव विकास के तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है । भारत को सकारात्मक निवेश नीति के साथ प्रभावी नीतिगत फैसले लेने की आवश्यकता है जिससे आर्थिक विकास के साथ साथ सहभागिता से अवसर बढ़ाए जा सके और कुशल प्रशिक्षण के द्वारा मानव संसाधन को बढ़ाकर मानव विकास रैंकिंग में सुधार किया जा सके ।
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"सल्तनत कालीन स्थापत्य, इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला में विद्यमान विशेषताओं का समाहार थी |" स्पष्ट कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द ) "Sultanate period architecture was a collection of features existing in Islamic and Indian architecture." Explain (10 marks / 150-200 words)
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दृष्टिकोण : सल्तनत कल का एक संक्षेप परिचय दीजिये (कालक्रम और शासक के सन्दर्भ में ) इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला के मिश्रण( इंडो –इस्लामिक स्थापत्य) के विकास का सामान्य परिचय दीजिये प्रारंभिक तुकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये खिलजी शासकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये भारतीय इस्लामिक स्थापत्य की महत्ता का संक्षेप में उल्लेख कीजिये ans. प्रस्तावना 13 वीं सदी के अंत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक नए चरण के सूत्रपात के रूप में देखा जाता है | मुख्यतः सल्तनत कालीन तुर्क शासकों के द्वारा अपने साथ लाये गए इस्लामिक स्थापत्य कला के विशेषताओं को भारतीय स्थापत्य की लक्षणों के साथ मिलाकर एक नविन स्थापत्य कला का विकास किया गया जिसे इतिहास में भारतीय इस्लामिक स्थापत्य के रूप में जाना जाता है| भारतीय ईस्लामी स्थापत्य या इंडो इस्लामिक स्थापत्य भारतीय इस्लामी स्थापत्य को इंडो इस्लामिक स्थापत्य के रूप में भी जाना जाता है भारत में स्थापित तुर्क शासकों के द्वारा लाये गए इस्लामिक स्थापत्य के साथ-साथ सल्तनत कालीन इमारतों में हिन्दू स्थापत्य सम्बंधित विशेषताओं के भी साक्ष्य मिलते हैं जैसे अलंकरण में कमल ,कलश आदि का प्रयोग ;इमारतों में खम्भों का प्रयोग जो इससे पूर्व भारतीय शैली में विहारों और प्रसादों के मुख्य लक्षणों में से एक थे भारतीय इस्लामी स्थापत्य में प्रमुख इमारतों में मुख्य तौर पर धार्मिक स्थल जैसे- मकबरा और मस्जिद शामिल थे वहीँ राजशाही आवास जैसे-महल शामिल थे इनके निर्माण सामग्री के रूप में स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग हुआ जो पूर्व में भी स्थापत्य का मुख्य हिस्सा थे जैसे- पत्थर के द्वारा -लाल बलुआ पत्थर के प्रयोग परन्तु आगे चलकर संगमरमर के प्रयोग में वृद्धि प्रारंभिक तुर्कों के काल में स्थापत्य ( 1206 से 1290) इस्लामिक स्थापत्य से सम्बंधित विशेषताओं एवं इमारतों के साक्ष्य मिलने लगते हैं जैसे - कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद तथा कुतुब मीनार ; इल्तुतमिश के समय नसीरिया मदरसा ,नसीरुद्दीन महमूद का मकबरा एवं बलबन के समय लाल महल ; इन इमारतों में इस्लामिक विशेषताएं जैसेकि- गुम्बद ,मीनार, अरबेस्क के स्थापत्य के साथ-साथ हिन्दू स्थापत्य की विशेषताएं जैसे- खम्भों का उपयोग आदि भी दिखाई पड़ते हैं जैसे कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद में दोनों लक्षण मिलते हैं इंडो इस्लामिक स्थापत्य के विकास का प्रमुख कारण , स्थानीय कारीगरों एवं स्थानीय संसाधनों का प्रयोग किया जाना एवं पूर्व निर्मित इमारतों में परिवर्तन या बदलाव कर उन्हें नवीन रूप दिया जाना था ; खिलजी कालीन स्थापत्य प्रारंभिक तुर्कों की तुलना में संख्यात्मक दृष्टिकोण से कुछ कम साक्ष्य मिलते हैं ,हालाँकि कलात्मक दृष्टि से प्रारंभिक तुर्कों की तुलना इस काल के स्थापत्य नमूनों को बेहतर मन जाताहै; प्रमुख इमारतें -अलाई दरवाजा , हौज ख़ास ,जमात खाना मस्जिद आदि इन इमारतों पर भी इंडो इस्लामिक विशेषताओं का प्रभाव देख सकते हैं जैसे - अलाई दरवाजा में उलटे कमल की आकृति मेहराव - घोड़े की नाल की तरह जिसे प्राचीन मंदिरों में देखे जा सकते थे निष्कर्ष कलात्मक दृष्टिकोण से प्रारंभिक तुर्कों की इमारतें उतना महत्त्व नहीं रखती हैं जितना खिलजी कालीन स्थापत्य का था | संभवतः इसका कारण प्रारंभ के राजनितिक अस्थिरता एवं राज्य के आर्थिक आधार को कमजोर होने के रूप में देखा जा सकता है खिलजी के स्थापत्य में एक वैभव और आत्म विश्वास के रूप में दीखता है |अर्थात भारतीय इस्लामिक स्थापत्य में कलात्मक दृष्टि से समय के साथ विकास को देखा जा सकत है जिसमे भारतीयों परिस्थितयों के साथ सामंजस्य और समाहार की भी मुख्य भूमिका थी |
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##Question:"सल्तनत कालीन स्थापत्य, इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला में विद्यमान विशेषताओं का समाहार थी |" स्पष्ट कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द ) "Sultanate period architecture was a collection of features existing in Islamic and Indian architecture." Explain (10 marks / 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : सल्तनत कल का एक संक्षेप परिचय दीजिये (कालक्रम और शासक के सन्दर्भ में ) इस्लामिक और भारतीय स्थापत्य कला के मिश्रण( इंडो –इस्लामिक स्थापत्य) के विकास का सामान्य परिचय दीजिये प्रारंभिक तुकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये खिलजी शासकों के शासन काल में भारतीय और इलामिक स्थापत्य के महत्वपूर्ण लक्षणों का उदहारण सहित उल्लेख कीजिये भारतीय इस्लामिक स्थापत्य की महत्ता का संक्षेप में उल्लेख कीजिये ans. प्रस्तावना 13 वीं सदी के अंत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक नए चरण के सूत्रपात के रूप में देखा जाता है | मुख्यतः सल्तनत कालीन तुर्क शासकों के द्वारा अपने साथ लाये गए इस्लामिक स्थापत्य कला के विशेषताओं को भारतीय स्थापत्य की लक्षणों के साथ मिलाकर एक नविन स्थापत्य कला का विकास किया गया जिसे इतिहास में भारतीय इस्लामिक स्थापत्य के रूप में जाना जाता है| भारतीय ईस्लामी स्थापत्य या इंडो इस्लामिक स्थापत्य भारतीय इस्लामी स्थापत्य को इंडो इस्लामिक स्थापत्य के रूप में भी जाना जाता है भारत में स्थापित तुर्क शासकों के द्वारा लाये गए इस्लामिक स्थापत्य के साथ-साथ सल्तनत कालीन इमारतों में हिन्दू स्थापत्य सम्बंधित विशेषताओं के भी साक्ष्य मिलते हैं जैसे अलंकरण में कमल ,कलश आदि का प्रयोग ;इमारतों में खम्भों का प्रयोग जो इससे पूर्व भारतीय शैली में विहारों और प्रसादों के मुख्य लक्षणों में से एक थे भारतीय इस्लामी स्थापत्य में प्रमुख इमारतों में मुख्य तौर पर धार्मिक स्थल जैसे- मकबरा और मस्जिद शामिल थे वहीँ राजशाही आवास जैसे-महल शामिल थे इनके निर्माण सामग्री के रूप में स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग हुआ जो पूर्व में भी स्थापत्य का मुख्य हिस्सा थे जैसे- पत्थर के द्वारा -लाल बलुआ पत्थर के प्रयोग परन्तु आगे चलकर संगमरमर के प्रयोग में वृद्धि प्रारंभिक तुर्कों के काल में स्थापत्य ( 1206 से 1290) इस्लामिक स्थापत्य से सम्बंधित विशेषताओं एवं इमारतों के साक्ष्य मिलने लगते हैं जैसे - कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद तथा कुतुब मीनार ; इल्तुतमिश के समय नसीरिया मदरसा ,नसीरुद्दीन महमूद का मकबरा एवं बलबन के समय लाल महल ; इन इमारतों में इस्लामिक विशेषताएं जैसेकि- गुम्बद ,मीनार, अरबेस्क के स्थापत्य के साथ-साथ हिन्दू स्थापत्य की विशेषताएं जैसे- खम्भों का उपयोग आदि भी दिखाई पड़ते हैं जैसे कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद में दोनों लक्षण मिलते हैं इंडो इस्लामिक स्थापत्य के विकास का प्रमुख कारण , स्थानीय कारीगरों एवं स्थानीय संसाधनों का प्रयोग किया जाना एवं पूर्व निर्मित इमारतों में परिवर्तन या बदलाव कर उन्हें नवीन रूप दिया जाना था ; खिलजी कालीन स्थापत्य प्रारंभिक तुर्कों की तुलना में संख्यात्मक दृष्टिकोण से कुछ कम साक्ष्य मिलते हैं ,हालाँकि कलात्मक दृष्टि से प्रारंभिक तुर्कों की तुलना इस काल के स्थापत्य नमूनों को बेहतर मन जाताहै; प्रमुख इमारतें -अलाई दरवाजा , हौज ख़ास ,जमात खाना मस्जिद आदि इन इमारतों पर भी इंडो इस्लामिक विशेषताओं का प्रभाव देख सकते हैं जैसे - अलाई दरवाजा में उलटे कमल की आकृति मेहराव - घोड़े की नाल की तरह जिसे प्राचीन मंदिरों में देखे जा सकते थे निष्कर्ष कलात्मक दृष्टिकोण से प्रारंभिक तुर्कों की इमारतें उतना महत्त्व नहीं रखती हैं जितना खिलजी कालीन स्थापत्य का था | संभवतः इसका कारण प्रारंभ के राजनितिक अस्थिरता एवं राज्य के आर्थिक आधार को कमजोर होने के रूप में देखा जा सकता है खिलजी के स्थापत्य में एक वैभव और आत्म विश्वास के रूप में दीखता है |अर्थात भारतीय इस्लामिक स्थापत्य में कलात्मक दृष्टि से समय के साथ विकास को देखा जा सकत है जिसमे भारतीयों परिस्थितयों के साथ सामंजस्य और समाहार की भी मुख्य भूमिका थी |
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What do you understand by the phenomenon of temperature inversion? How does it affect the weather of the place? (150 words/10 marks)
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Basic approach define temperature inversion list down conditions suitable for temperature inversion examine types of temperature inversion mention effects of temperature inversion ANSWER Temperature inversion is a reversal of the normal behaviour of temperature in the troposphere, in which a layer of cool air at the surface is overlain by a layer of warmer air. (Under normal conditions, the temperature usually decreases with height- 6.5 degrees Celcius per km; called Normal Lapse Rate). There are certain conditions for temperature Inversion: 1. Long Nights, so that outgoing radiation is greater than incoming. 2. Clear Skies, which allow the unobstructed escape of radiation. 3. Calm and stable air, so that there"s no vertical mixing of air at lower levels Types of Temperature Inversion:- 1) Temperature Inversion in Inter-montane Valley (Air Drainage Type of Inversion) • Here, the surface radiates heat back to space rapidly and cools down at a faster rate than the upper layers. As a result, the lower cold layers get condensed and become heavy. • The sloping surface underneath makes them move towards the bottom where the cold layer settles down as a zone of low temperature while the upper layers are relatively warmer. • This kind of temperature inversion is very strong in the middle and higher latitudes. It can be strong in regions with high mountains or deep valleys also. 2) Ground Inversion (Surface Temperature Inversion) • A ground inversion develops when air is cooled by contact with a colder surface until it becomes cooler than the overlying atmosphere; this occurs most often on clear nights when the ground cools off rapidly by radiation. If the temperature of surface air drops below its dew point, fog may result. • This kind of temperature inversion is very common in higher latitudes. 3) Subsidence Inversion (Upper Surface Temperature Inversion) • A subsidence inversion develops when a widespread layer of air descends. • The layer is compressed and heated by the resulting increase in atmospheric pressure, and as a result, the lapse rate of temperature is reduced. • If the air mass sinks low enough, the air at higher altitudes becomes warmer than at lower altitudes, producing a temperature inversion. • Subsidence inversions are common over the northern continents in winter (dry atmosphere) and over the subtropical oceans; these regions generally have subsiding air because they are located under large high-pressure centres. 4) Adiabatic Inversion: Updrafts in clouds(thunderstorms) can lead to inversion due to the release of latent heat which leads to an increase in temperature, not in line with the normal lapse rate. 5) Frontal Inversion (Advectional type of Temperature Inversion ) • A frontal inversion occurs when a cold air mass undercuts a warm air mass (Cold and Warm Fronts: we will study in detail later) and lifts it aloft; the front between the two air masses then has warm air above and cold air below. • This kind of inversion has a considerable slope, whereas other inversions are nearly horizontal. In addition, humidity may be high, and clouds may be present immediately above it. Effects of Temperature Inversion: • Inversions play an important role in determining cloud forms, precipitation, and visibility. • An inversion acts as a cap on the upward movement of air from the layers below. As a result, convection produced by the heating of the air from below is limited to levels below the inversion. Diffusion of dust, smoke, and other air pollutants is likewise limited. • In regions where a pronounced low-level inversion is present, convective clouds cannot grow high enough to produce showers. • Visibility may be greatly reduced below the inversion due to the accumulation of dust and smoke particles. Because air near the base of an inversion tends to be cool, fog is frequently present there. (Smog) • Inversions also affect diurnal variations in temperature. Diurnal variations tend to be very small. . It also facilitates habitation and cultivation along higher slopes. The lower slopes may face the wrath of inversion damaging crops and impacting settlement.
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##Question:What do you understand by the phenomenon of temperature inversion? How does it affect the weather of the place? (150 words/10 marks)##Answer:Basic approach define temperature inversion list down conditions suitable for temperature inversion examine types of temperature inversion mention effects of temperature inversion ANSWER Temperature inversion is a reversal of the normal behaviour of temperature in the troposphere, in which a layer of cool air at the surface is overlain by a layer of warmer air. (Under normal conditions, the temperature usually decreases with height- 6.5 degrees Celcius per km; called Normal Lapse Rate). There are certain conditions for temperature Inversion: 1. Long Nights, so that outgoing radiation is greater than incoming. 2. Clear Skies, which allow the unobstructed escape of radiation. 3. Calm and stable air, so that there"s no vertical mixing of air at lower levels Types of Temperature Inversion:- 1) Temperature Inversion in Inter-montane Valley (Air Drainage Type of Inversion) • Here, the surface radiates heat back to space rapidly and cools down at a faster rate than the upper layers. As a result, the lower cold layers get condensed and become heavy. • The sloping surface underneath makes them move towards the bottom where the cold layer settles down as a zone of low temperature while the upper layers are relatively warmer. • This kind of temperature inversion is very strong in the middle and higher latitudes. It can be strong in regions with high mountains or deep valleys also. 2) Ground Inversion (Surface Temperature Inversion) • A ground inversion develops when air is cooled by contact with a colder surface until it becomes cooler than the overlying atmosphere; this occurs most often on clear nights when the ground cools off rapidly by radiation. If the temperature of surface air drops below its dew point, fog may result. • This kind of temperature inversion is very common in higher latitudes. 3) Subsidence Inversion (Upper Surface Temperature Inversion) • A subsidence inversion develops when a widespread layer of air descends. • The layer is compressed and heated by the resulting increase in atmospheric pressure, and as a result, the lapse rate of temperature is reduced. • If the air mass sinks low enough, the air at higher altitudes becomes warmer than at lower altitudes, producing a temperature inversion. • Subsidence inversions are common over the northern continents in winter (dry atmosphere) and over the subtropical oceans; these regions generally have subsiding air because they are located under large high-pressure centres. 4) Adiabatic Inversion: Updrafts in clouds(thunderstorms) can lead to inversion due to the release of latent heat which leads to an increase in temperature, not in line with the normal lapse rate. 5) Frontal Inversion (Advectional type of Temperature Inversion ) • A frontal inversion occurs when a cold air mass undercuts a warm air mass (Cold and Warm Fronts: we will study in detail later) and lifts it aloft; the front between the two air masses then has warm air above and cold air below. • This kind of inversion has a considerable slope, whereas other inversions are nearly horizontal. In addition, humidity may be high, and clouds may be present immediately above it. Effects of Temperature Inversion: • Inversions play an important role in determining cloud forms, precipitation, and visibility. • An inversion acts as a cap on the upward movement of air from the layers below. As a result, convection produced by the heating of the air from below is limited to levels below the inversion. Diffusion of dust, smoke, and other air pollutants is likewise limited. • In regions where a pronounced low-level inversion is present, convective clouds cannot grow high enough to produce showers. • Visibility may be greatly reduced below the inversion due to the accumulation of dust and smoke particles. Because air near the base of an inversion tends to be cool, fog is frequently present there. (Smog) • Inversions also affect diurnal variations in temperature. Diurnal variations tend to be very small. . It also facilitates habitation and cultivation along higher slopes. The lower slopes may face the wrath of inversion damaging crops and impacting settlement.
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मौद्रिक नीति संचरण क्या है ? मौद्रिक नीति के प्रमुख घटकों को स्पष्ट करते हुये इसके उदेश्यों की चर्चा कीजिये | (200 शब्द )
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प्रश्न - मौद्रिक नीति संचरण क्या है ? मौद्रिक नीति के प्रमुख घटकों को स्पष्ट करते हुये इसके उदेश्यों की चर्चा कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर का दृष्टिकोण – मौद्रिक नीति संचरण को संक्षेप मे परिभाषित कीजिये | मौद्रिक नीति के प्रमुख घटक के बिन्दु को बताए | मौद्रिक नीति के प्रमुख घटकों के उदेश्य पर चर्चा कीजिये | उत्तर – मौद्रिक नीति संचरण का अर्थ है किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा लिए गए मौद्रिक नीतिगत निर्णयों का सम्पूर्ण वित्तीय व्यवस्था मे संचार होता है | इसके कारण ब्याज दर ,मुद्रास्फीति जैसे कारको के माध्यम से परिलक्षित होता है | रिजर्व बैंक द्वारा इसके लिए नीतिगत संकेतों का प्रयोग भी किया जाता है | इनमे रेपों रेट सर्वप्रमुख संकेतक है | एक अध्ययन के अनुसार वित्तीय प्रणाली मे घर्षण कम होने पर मौद्रिक नीति संचरण मे सुधार होता है | मौद्रिक नीति के घटक – रेपों रेट रिर्वस रेपों रेट नकद आरक्षित अनुपात सांविधिक चलनिधि अनुपात सीमांत स्थायी सुविधा बैंक रेट रेपों रेट – रिजर्व बैंक एक दिन और एक रात की तात्कालिक आवश्यकता के लिए बैंको को नकदी उपलब्ध कराता है | कई बार अपने रोज़मर्रा के कामकाज के लिए बैंको को भी बड़ी बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है | ऐसी स्थिति मे वह देश के केन्द्रीय बैंक से ऋण लेते है | रिवर्स रेपों रेट – यह रेपों रेट से अलग होता है | अर्थात जब किसी बैंक के पास दिन भर के कामकाज की बची राशि रिजर्व बैंक मे जमा किया जाता है | रिजर्व बैंक इस रकम पर जिस ब्याज से दर देता उसे रिवर्स रेपों रेट कहते है | नकद आरक्षित अनुपात – बैंक को अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना ही होता है ,जिसे नकद आरक्षित कहते है | सीमांत स्थायी सुविधा – यह वह दर है जिससे रिजर्व बैंक से एक रात के लिए कर्ज लिया जा सकता है | यह 2011 -12 मे आरबीआई की मौद्रिक नीति के बाद अस्तित्व मे आया | बैंक रेट – जिस सामान्य ब्याज दर पर रिजर्व बैंक द्वारा अन्य बैंकों को पैसा उधार दिया जाता है , उसे बैंक दर कहते है | इसके द्वारा रिजर्व बैंक साख नियंत्रण करने का काम करता है |
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##Question:मौद्रिक नीति संचरण क्या है ? मौद्रिक नीति के प्रमुख घटकों को स्पष्ट करते हुये इसके उदेश्यों की चर्चा कीजिये | (200 शब्द )##Answer:प्रश्न - मौद्रिक नीति संचरण क्या है ? मौद्रिक नीति के प्रमुख घटकों को स्पष्ट करते हुये इसके उदेश्यों की चर्चा कीजिये | (200 शब्द ) उत्तर का दृष्टिकोण – मौद्रिक नीति संचरण को संक्षेप मे परिभाषित कीजिये | मौद्रिक नीति के प्रमुख घटक के बिन्दु को बताए | मौद्रिक नीति के प्रमुख घटकों के उदेश्य पर चर्चा कीजिये | उत्तर – मौद्रिक नीति संचरण का अर्थ है किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा लिए गए मौद्रिक नीतिगत निर्णयों का सम्पूर्ण वित्तीय व्यवस्था मे संचार होता है | इसके कारण ब्याज दर ,मुद्रास्फीति जैसे कारको के माध्यम से परिलक्षित होता है | रिजर्व बैंक द्वारा इसके लिए नीतिगत संकेतों का प्रयोग भी किया जाता है | इनमे रेपों रेट सर्वप्रमुख संकेतक है | एक अध्ययन के अनुसार वित्तीय प्रणाली मे घर्षण कम होने पर मौद्रिक नीति संचरण मे सुधार होता है | मौद्रिक नीति के घटक – रेपों रेट रिर्वस रेपों रेट नकद आरक्षित अनुपात सांविधिक चलनिधि अनुपात सीमांत स्थायी सुविधा बैंक रेट रेपों रेट – रिजर्व बैंक एक दिन और एक रात की तात्कालिक आवश्यकता के लिए बैंको को नकदी उपलब्ध कराता है | कई बार अपने रोज़मर्रा के कामकाज के लिए बैंको को भी बड़ी बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है | ऐसी स्थिति मे वह देश के केन्द्रीय बैंक से ऋण लेते है | रिवर्स रेपों रेट – यह रेपों रेट से अलग होता है | अर्थात जब किसी बैंक के पास दिन भर के कामकाज की बची राशि रिजर्व बैंक मे जमा किया जाता है | रिजर्व बैंक इस रकम पर जिस ब्याज से दर देता उसे रिवर्स रेपों रेट कहते है | नकद आरक्षित अनुपात – बैंक को अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना ही होता है ,जिसे नकद आरक्षित कहते है | सीमांत स्थायी सुविधा – यह वह दर है जिससे रिजर्व बैंक से एक रात के लिए कर्ज लिया जा सकता है | यह 2011 -12 मे आरबीआई की मौद्रिक नीति के बाद अस्तित्व मे आया | बैंक रेट – जिस सामान्य ब्याज दर पर रिजर्व बैंक द्वारा अन्य बैंकों को पैसा उधार दिया जाता है , उसे बैंक दर कहते है | इसके द्वारा रिजर्व बैंक साख नियंत्रण करने का काम करता है |
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खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रक, ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन की दृष्टि से असीम संभावनाओं से युक्त है। उक्त कथन को स्पष्ट करते हुए भारत में खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने हेतु अपनाये गए प्रमुख सरकारी उपायों की चर्चा कीजिये।(10अंक / 150-200 शब्द) The food processing sector is full of immense potential in terms of rural development and employment generation. Explain the above statement and discuss the major government measures adopted to promote food processing in India. (10 Marks / 150-200 words)
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दृष्टिकोण : प्रस्तावना में भारत के सन्दर्भ में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के महत्त्व की चर्चा कीजिये खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ,ग्रामीण विकास में कैसे सहायक है इस पहलू पर चर्चा कीजिये उन अवसरों पर चर्चा कीजिये जो रोजगार सृजन में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के द्वारा प्रदान किये जाते हैं खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने हेतु अपनाये गए प्रमुख सरकारी उपायों की चर्चा कीजिये खाद्य प्रसंस्करण एक आधुनिक गतिविधि है जिसमे खाद्य पदार्थों का रूपांतरण कर उनका मूल्य वर्धन व उनके शेल्फ लाइफ में वृद्धि करना शामिल है| इसके अंतर्गत कच्चे खाद्य द्वारा शीघ्र खराब होने वाली कृषि उपज की बर्बादी में कमी करना एवं उन्हें संरक्षित कर वितरण व विपणन करने योग्य बनाया जाता सकता है| इसका प्रत्यक्ष लाभ कृषि के वाणिज्यीकरण एवं विविधिकरण के रूप में देखा जा सकता है जिससे अतिरिक्त रोजगार सृजन एवं उससे होने वाले कृषकों की आय में वृद्धि के रूप में देख सकते हैं | भारत में ग्रामीण विकास में कैसे सहायक है ? कृषि का विविधिकरण व वाणिज्यीकरण –खाद्य प्रसंस्करण के द्वारा पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के निर्माण हेतु कच्चे कृषि उत्पादों जैसे-खाद्यान्न,सब्जियां ,फल व फूलों की मांग में वृद्धि होगी | अतिरिक्त आय में वृद्धि – विकसित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ,भारतीय कृषि के लिए घरेलु और अंतर्राष्ट्रीय दोनों प्रकार के बाज़ारों के लिए अनुकूल व्यापार संबंधों की स्थापना करने में सहायता उत्पन्न कर सकता है | इससे कृषि उपज के मूल्य वर्धन और संरक्षण करने की विधियों का विकास होगा| इससे कृषि उत्पादों का विपणन व संरक्षण करना संभव होगा जो कृषकों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर सृजित करेंगे| ग्रामीण स्तर पर औद्योगीकरण को बढ़ावा –यह क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्र यथा-कृषि और उद्योग के मध्य महत्वपूर्ण संपर्क स्थापित करेगा| इसका महत्वपूर्ण प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र में कृषि के औद्योगीकरण के रूप में देखा जा सकता है जो ग्रामीण विकास का एक मुख्य पहलू है | खाद्य प्रसंस्करण रोजगार सृजन में कैसे सहायक है? आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन – यह उद्योग खाद्य उत्पाद को खेतों से उपभोक्ता तक पहुँचाने हेतु एक दक्ष आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करता है जिसमेखाद्य पदार्थों के क्रय , विपणन ,भण्डारण, परिवहन तथा रिटेलिंग जैसे विविध गतिविधियों में वृद्धि होगी| इसका प्रमुख प्रभाव अतिरिक्त रोजगार सृजन के रूप में देखा जा सकता है| संभावित क्षेत्र –खाद्य प्रसंस्करण उद्योग प्रमुख रोजगार गहन क्षेत्रों में से एक है जो 2012-13 में पंजीकृत सभी कारखाना क्षेत्रक में सृजित रोजगार में 13.04% का योगदान कर रहा है| उच्च मांग स्तर – नगरीय और ग्रामीण भरतीय परिवारों के लिए भोजन पर किया जाने वाला व्यय सबसे अधिक होता है ,जो वर्ष 2011-12 में परिवारों के कुल व्यय का क्रमशः 38.5% और 48.6% भाग रहा है मुख्य सरकारी पहल विनियमन पक्ष – सरकार के द्वारा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के सम्बन्ध में पूर्व में चल रहे विभिन्न कानूनों के स्थान पर एकल सन्दर्भ बिंदु के रूप में कार्य करने हेतु खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम,2006 पारित किया गया है | विदेशी निवेश – सरकार के द्वारा इस क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष निवेश की मंजूरी देदी गयी है अवसंरचना – मेगा फ़ूड पार्क ,समेकित कोल्ड चैन सुविधा ,विपणन सुविधाएँ आदि बाज़ार – ए .पी. एम.सी (APMC) कानून के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में स्थानीय स्तर पर कृषि बाजारों व मंडियों की व्यवस्था के सम्बन्ध में प्रावधान किये गए हैं | राष्ट्रीय मिशन –राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण मिशन को 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान प्रारंभ किया गया | इसका मुख्य उद्येश्य खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का आधुनिकीकरण ,मेगा फ़ूड पार्कों की स्थापना ,कोल्ड चेन, सुविधा ,बुचड खानों का आधुनिकीकरण को सुनिश्चित करना है | मेक इन इंडिया – देश में विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु प्रारंभ किये गए मेक इन इंडिया मिशन में खाद्य प्रसंस्करण मुख्य भाग है जिसके लिए देश में व्यापारिक वातावरण निर्मित करना सरकार का मुख्य लक्ष्य है| ज्ञातव्य है कि भारत खाद्य उत्पादों(अनाज ,फल,सब्जी ,फूल दूध ) के उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है ,भारत सरकार के द्वारा इन्हीं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में अगले कुछ वर्षों में विदेशी निवेश में वृद्धि व अतिरिक्त रोजगार सृजन के लक्ष्य रखे गए हैं|
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##Question:खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रक, ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन की दृष्टि से असीम संभावनाओं से युक्त है। उक्त कथन को स्पष्ट करते हुए भारत में खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने हेतु अपनाये गए प्रमुख सरकारी उपायों की चर्चा कीजिये।(10अंक / 150-200 शब्द) The food processing sector is full of immense potential in terms of rural development and employment generation. Explain the above statement and discuss the major government measures adopted to promote food processing in India. (10 Marks / 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : प्रस्तावना में भारत के सन्दर्भ में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के महत्त्व की चर्चा कीजिये खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ,ग्रामीण विकास में कैसे सहायक है इस पहलू पर चर्चा कीजिये उन अवसरों पर चर्चा कीजिये जो रोजगार सृजन में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के द्वारा प्रदान किये जाते हैं खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने हेतु अपनाये गए प्रमुख सरकारी उपायों की चर्चा कीजिये खाद्य प्रसंस्करण एक आधुनिक गतिविधि है जिसमे खाद्य पदार्थों का रूपांतरण कर उनका मूल्य वर्धन व उनके शेल्फ लाइफ में वृद्धि करना शामिल है| इसके अंतर्गत कच्चे खाद्य द्वारा शीघ्र खराब होने वाली कृषि उपज की बर्बादी में कमी करना एवं उन्हें संरक्षित कर वितरण व विपणन करने योग्य बनाया जाता सकता है| इसका प्रत्यक्ष लाभ कृषि के वाणिज्यीकरण एवं विविधिकरण के रूप में देखा जा सकता है जिससे अतिरिक्त रोजगार सृजन एवं उससे होने वाले कृषकों की आय में वृद्धि के रूप में देख सकते हैं | भारत में ग्रामीण विकास में कैसे सहायक है ? कृषि का विविधिकरण व वाणिज्यीकरण –खाद्य प्रसंस्करण के द्वारा पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के निर्माण हेतु कच्चे कृषि उत्पादों जैसे-खाद्यान्न,सब्जियां ,फल व फूलों की मांग में वृद्धि होगी | अतिरिक्त आय में वृद्धि – विकसित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ,भारतीय कृषि के लिए घरेलु और अंतर्राष्ट्रीय दोनों प्रकार के बाज़ारों के लिए अनुकूल व्यापार संबंधों की स्थापना करने में सहायता उत्पन्न कर सकता है | इससे कृषि उपज के मूल्य वर्धन और संरक्षण करने की विधियों का विकास होगा| इससे कृषि उत्पादों का विपणन व संरक्षण करना संभव होगा जो कृषकों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर सृजित करेंगे| ग्रामीण स्तर पर औद्योगीकरण को बढ़ावा –यह क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्र यथा-कृषि और उद्योग के मध्य महत्वपूर्ण संपर्क स्थापित करेगा| इसका महत्वपूर्ण प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र में कृषि के औद्योगीकरण के रूप में देखा जा सकता है जो ग्रामीण विकास का एक मुख्य पहलू है | खाद्य प्रसंस्करण रोजगार सृजन में कैसे सहायक है? आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन – यह उद्योग खाद्य उत्पाद को खेतों से उपभोक्ता तक पहुँचाने हेतु एक दक्ष आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करता है जिसमेखाद्य पदार्थों के क्रय , विपणन ,भण्डारण, परिवहन तथा रिटेलिंग जैसे विविध गतिविधियों में वृद्धि होगी| इसका प्रमुख प्रभाव अतिरिक्त रोजगार सृजन के रूप में देखा जा सकता है| संभावित क्षेत्र –खाद्य प्रसंस्करण उद्योग प्रमुख रोजगार गहन क्षेत्रों में से एक है जो 2012-13 में पंजीकृत सभी कारखाना क्षेत्रक में सृजित रोजगार में 13.04% का योगदान कर रहा है| उच्च मांग स्तर – नगरीय और ग्रामीण भरतीय परिवारों के लिए भोजन पर किया जाने वाला व्यय सबसे अधिक होता है ,जो वर्ष 2011-12 में परिवारों के कुल व्यय का क्रमशः 38.5% और 48.6% भाग रहा है मुख्य सरकारी पहल विनियमन पक्ष – सरकार के द्वारा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के सम्बन्ध में पूर्व में चल रहे विभिन्न कानूनों के स्थान पर एकल सन्दर्भ बिंदु के रूप में कार्य करने हेतु खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम,2006 पारित किया गया है | विदेशी निवेश – सरकार के द्वारा इस क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष निवेश की मंजूरी देदी गयी है अवसंरचना – मेगा फ़ूड पार्क ,समेकित कोल्ड चैन सुविधा ,विपणन सुविधाएँ आदि बाज़ार – ए .पी. एम.सी (APMC) कानून के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में स्थानीय स्तर पर कृषि बाजारों व मंडियों की व्यवस्था के सम्बन्ध में प्रावधान किये गए हैं | राष्ट्रीय मिशन –राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण मिशन को 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान प्रारंभ किया गया | इसका मुख्य उद्येश्य खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का आधुनिकीकरण ,मेगा फ़ूड पार्कों की स्थापना ,कोल्ड चेन, सुविधा ,बुचड खानों का आधुनिकीकरण को सुनिश्चित करना है | मेक इन इंडिया – देश में विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु प्रारंभ किये गए मेक इन इंडिया मिशन में खाद्य प्रसंस्करण मुख्य भाग है जिसके लिए देश में व्यापारिक वातावरण निर्मित करना सरकार का मुख्य लक्ष्य है| ज्ञातव्य है कि भारत खाद्य उत्पादों(अनाज ,फल,सब्जी ,फूल दूध ) के उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है ,भारत सरकार के द्वारा इन्हीं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में अगले कुछ वर्षों में विदेशी निवेश में वृद्धि व अतिरिक्त रोजगार सृजन के लक्ष्य रखे गए हैं|
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What is the significance of Iran for India? Highlight areas where the potential between India and Iran remains unfulfilled? (150 words/10 marks)
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Approach- Introduce answer taking into a bit of background of India and Iran relationship. Body of the Answer -Proceed by highlighting key areas where Iran can be a country of significance especially in the context of Pakistan,Afghanistan and in the context of India"s energy security.Highlight key projects where the Potential remains Untapped. Try to give a way forward. Conclusion- Try to give a contextual conclusion. you can give reference to other countries and their interest involved as such. ANSWER India-Iranrelation span a Millenia Marked by meaningfulInteractions. Thetwo countries shared a border until 1947 thus have several common features in theirlanguage culture and traditions 1. Iran with its energy resources is a key supplier of oil for India. 2. Iran is also considered as the gateway to central Asia, Chabahar and Bandar Abbas port are important nodes in the major connectivity route such as INTC in which India participate. With the long term interest to develop and invest in Chabahar port India is looking at utilizing the location of Iran to connect with Afganistan. 3, In order to circumvent the restrictions posed by Pakistan. India has also committed itself to invest $500 million to build berths at Chabahar"s Shahid Beheshti port and 2 Billion to build a rail line through Zahedan province to Afghanistan. 4. Iran and India have converging views on the stability of Afganistan and Tehran can be valuable allies in stabilizing Afghanistan. 5. Iran is also an emerging regional power with wide-ranging influence in West Asia. it can contribute to regional stability . which serves India"s national interest. Economy 1. India -Irancommercial ties have traditionally been dominated by Indian Import of Indian Import of Iranian Crude oil 2. Iran has a populationof 80 million which provide an attractive market for the Indian exports 3. Bilateral Trade during 2016-17 stood at Usd 12.89 billion. Unfulfilled Potential The Iran-Pakistan-India (IPI) gas pipeline project: in 1993, Pakistan and Iran announced a plan to build a Gas Pipeline, which wasIaterproposedto be extended into India dubbed the "Peace Pipeline". It had succumbed to the sanctions regime as well as fierce opposition from the USA, with Washington pushing for the rival Turkmenistan- Afghanistan -Pakistan -India (Tapi) project. New Delhi has not participated in the talks on the 1,036 km Iran-Pakistan-India gas Pipeline Since 2007 citing security and commercial concerns but has never officially pulled Out of the $7.6 billion Project The Farzad -B gas field, according to India holds a reserve of almost 19 trillion cubic feet of gas. The consortim, which includes Indian oil Corp and oil india Ltd has been trying to secure Development Rights to this field. However, the Talks are stuck. Mn may 8,2018 President Trump announced that the United States would withdraw from the JCPOA and reinstate U.s Nuclear sanctions on the Iranian regime .which can further hamper Indo-Iran Trade Ties. Way forward Iranian crude is cheaper and Iran provide longer credits India and Iran have worked out for alternative payment arrangement for payment in Rupee. The decisionto establishan Iranian Banks of Pasargad branch in Mumbai is also important in this context Both countries also need to work on the issue of shipping and insurance . They need to work with European countires, USA and Russia to find a way forward India has consistently worked to sustain relationships with Iran. However, this require a delicate balancing act given the friction that iran has with GCC countries, Isreal and United States all of whom arefriendly towards India
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##Question:What is the significance of Iran for India? Highlight areas where the potential between India and Iran remains unfulfilled? (150 words/10 marks)##Answer:Approach- Introduce answer taking into a bit of background of India and Iran relationship. Body of the Answer -Proceed by highlighting key areas where Iran can be a country of significance especially in the context of Pakistan,Afghanistan and in the context of India"s energy security.Highlight key projects where the Potential remains Untapped. Try to give a way forward. Conclusion- Try to give a contextual conclusion. you can give reference to other countries and their interest involved as such. ANSWER India-Iranrelation span a Millenia Marked by meaningfulInteractions. Thetwo countries shared a border until 1947 thus have several common features in theirlanguage culture and traditions 1. Iran with its energy resources is a key supplier of oil for India. 2. Iran is also considered as the gateway to central Asia, Chabahar and Bandar Abbas port are important nodes in the major connectivity route such as INTC in which India participate. With the long term interest to develop and invest in Chabahar port India is looking at utilizing the location of Iran to connect with Afganistan. 3, In order to circumvent the restrictions posed by Pakistan. India has also committed itself to invest $500 million to build berths at Chabahar"s Shahid Beheshti port and 2 Billion to build a rail line through Zahedan province to Afghanistan. 4. Iran and India have converging views on the stability of Afganistan and Tehran can be valuable allies in stabilizing Afghanistan. 5. Iran is also an emerging regional power with wide-ranging influence in West Asia. it can contribute to regional stability . which serves India"s national interest. Economy 1. India -Irancommercial ties have traditionally been dominated by Indian Import of Indian Import of Iranian Crude oil 2. Iran has a populationof 80 million which provide an attractive market for the Indian exports 3. Bilateral Trade during 2016-17 stood at Usd 12.89 billion. Unfulfilled Potential The Iran-Pakistan-India (IPI) gas pipeline project: in 1993, Pakistan and Iran announced a plan to build a Gas Pipeline, which wasIaterproposedto be extended into India dubbed the "Peace Pipeline". It had succumbed to the sanctions regime as well as fierce opposition from the USA, with Washington pushing for the rival Turkmenistan- Afghanistan -Pakistan -India (Tapi) project. New Delhi has not participated in the talks on the 1,036 km Iran-Pakistan-India gas Pipeline Since 2007 citing security and commercial concerns but has never officially pulled Out of the $7.6 billion Project The Farzad -B gas field, according to India holds a reserve of almost 19 trillion cubic feet of gas. The consortim, which includes Indian oil Corp and oil india Ltd has been trying to secure Development Rights to this field. However, the Talks are stuck. Mn may 8,2018 President Trump announced that the United States would withdraw from the JCPOA and reinstate U.s Nuclear sanctions on the Iranian regime .which can further hamper Indo-Iran Trade Ties. Way forward Iranian crude is cheaper and Iran provide longer credits India and Iran have worked out for alternative payment arrangement for payment in Rupee. The decisionto establishan Iranian Banks of Pasargad branch in Mumbai is also important in this context Both countries also need to work on the issue of shipping and insurance . They need to work with European countires, USA and Russia to find a way forward India has consistently worked to sustain relationships with Iran. However, this require a delicate balancing act given the friction that iran has with GCC countries, Isreal and United States all of whom arefriendly towards India
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What do you mean by Re-usable launch veichle? How are they different from conventional launch veichles. What advantage India will have in using RLV? (150 words)
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APPROACH - In introduction define Reusable Launch Vehicle - Differentiate between RLV and conventional launch vehicle - Mention about the advantages India will have using RLV - Brief conclusion mentioning recent testing of RLV-TD ANSWER A reusable launch vehicle or RLV is a launch system which is capable of launching a launch vehicle into space more than once. This contrasts with expendable launch systems, where each launch vehicle is launched once and then discarded. Comparison of RLV with Conventional Launch Vehicle: - Reduction in Launch Costs - RLV is expected to bring down the overall payload delivery coast drastically by almost 80% or more in comparison to conventional launch vehicles. - In RLV, there is a use of critical technologies such as autonomous navigation, guidance & control, reusable thermal protection system and re-entry mission management which is not present in the conventional launch vehicle. - Structural Difference: RLV prototype is structurally very different in which there is a winged structure for soft landings like an aeroplane, which is not present in conventional vehicles which gets exhausted after one usage. - Source of Energy: Vehicles like PSLV rely on solid strap-on boosters whereas RLV rely on thrusters. Advantages India will have using RLV: - Cost of access to Space: It will bring down the costs of satellite launches into the earth"s polar and geostationary orbits in future. - There will be an increase in the frequency of launches to deliver satellites into space due to less time needed in launch preparation. - On-demand space access: It will carry astronauts and logistics to mobile space stations like International space station. - Enhanced commercial capabilities: RLV will greatly enhance ISRO"s commercial capabilities, like that of SpaceX. Conclusion ISRO has successfully flight tested the Reusable Launch Vehicle-Technology Demonstrator (RLV-TD). Even though testing of a prototype is a small step in the realization of fully operational RLV, it is an important milestone for ISRO.
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##Question:What do you mean by Re-usable launch veichle? How are they different from conventional launch veichles. What advantage India will have in using RLV? (150 words)##Answer:APPROACH - In introduction define Reusable Launch Vehicle - Differentiate between RLV and conventional launch vehicle - Mention about the advantages India will have using RLV - Brief conclusion mentioning recent testing of RLV-TD ANSWER A reusable launch vehicle or RLV is a launch system which is capable of launching a launch vehicle into space more than once. This contrasts with expendable launch systems, where each launch vehicle is launched once and then discarded. Comparison of RLV with Conventional Launch Vehicle: - Reduction in Launch Costs - RLV is expected to bring down the overall payload delivery coast drastically by almost 80% or more in comparison to conventional launch vehicles. - In RLV, there is a use of critical technologies such as autonomous navigation, guidance & control, reusable thermal protection system and re-entry mission management which is not present in the conventional launch vehicle. - Structural Difference: RLV prototype is structurally very different in which there is a winged structure for soft landings like an aeroplane, which is not present in conventional vehicles which gets exhausted after one usage. - Source of Energy: Vehicles like PSLV rely on solid strap-on boosters whereas RLV rely on thrusters. Advantages India will have using RLV: - Cost of access to Space: It will bring down the costs of satellite launches into the earth"s polar and geostationary orbits in future. - There will be an increase in the frequency of launches to deliver satellites into space due to less time needed in launch preparation. - On-demand space access: It will carry astronauts and logistics to mobile space stations like International space station. - Enhanced commercial capabilities: RLV will greatly enhance ISRO"s commercial capabilities, like that of SpaceX. Conclusion ISRO has successfully flight tested the Reusable Launch Vehicle-Technology Demonstrator (RLV-TD). Even though testing of a prototype is a small step in the realization of fully operational RLV, it is an important milestone for ISRO.
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What do you mean by Green Economy? How SDGs can promote Green Economy?List important govenment programmes to promote Green Economy in India. (150 words)
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Answer: Green Economy: Green economy is set of activities which include the reducing the consumption of resources, harmful emission, and minimizing all forms of environmental impact. The green economy is alligned with the sustainable development, which also include theuse of renewable energy, organic farming, climate resistance agriculture etc. How SDGs can promote the green economy: 1. Goal 6 of SDG- Clean Water and Sanitation 2. Goal 7: Affordable and Clean Energy 3.Goal 11: Sustainable Cities 4.Goal 13:
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##Question:What do you mean by Green Economy? How SDGs can promote Green Economy?List important govenment programmes to promote Green Economy in India. (150 words)##Answer:Answer: Green Economy: Green economy is set of activities which include the reducing the consumption of resources, harmful emission, and minimizing all forms of environmental impact. The green economy is alligned with the sustainable development, which also include theuse of renewable energy, organic farming, climate resistance agriculture etc. How SDGs can promote the green economy: 1. Goal 6 of SDG- Clean Water and Sanitation 2. Goal 7: Affordable and Clean Energy 3.Goal 11: Sustainable Cities 4.Goal 13:
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यद्यपि मुद्रास्फीति किसी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होती है लेकिन सरकारें मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए तत्पर रहती है| कथन की सकारण समीक्षा कीजिये | (200 शब्द)
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दृष्टिकोण- भूमिका में मुद्रास्फीति को परिभाषित कीजिये प्रथम भाग में किसी अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रास्फीति की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में मुद्रास्फीति पर नियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये अंतिम में कुछ उदाहरणों के साथ निष्कर्ष दीजिये| किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य स्तर में लम्बे समय तक निरंतर होने वाली वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं| इसके कारण मुद्रा की प्रत्येक इकाई के माध्यम से पहले की अपेक्षा कम वस्तुएं एवं सेवायें खरीदी जाती हैं अर्थात मुद्रास्फीति मुद्रा की क्रय क्षमता अथवा मुद्रा के मूल्य को घटा देती है| दूसरे शब्दों में वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ने पर उस बढ़ी हुई मांग की मात्रा के सापेक्ष पूर्ति के न बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि होती है| यह वृद्धि दीर्घकाल तक बनी रहती है तो इस स्थिति को मुद्रास्फीति कहते हैं| किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव देखे जा सकते हैं| इसके सकारात्मक प्रभाव मुद्रास्फीति को अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक बनाते हैं| अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रास्फीति की आवश्यकता मध्य स्तर की मुद्रास्फीति आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करती है| इससे उत्पादकों/विक्रेताओं के लाभ में वृद्धि होती है जो उन्हें उत्पादन/पूर्ति बढाने हेतु प्रोत्साहित करती है| मुद्रास्फीति यह संकेत देती है कि अर्थव्यवस्था में मांग का अभाव नहीं है| जिससे फर्मों की लाभ प्रत्याशा/व्यावसायिक वातावरण में सुधार होता है, इससे निवेश प्रोत्साहित होता है| बेरोजगारी दर और मुद्रास्फीति दर के वास्तविक आंकड़ों पर आधारित A. W. फिलिप द्वारा दिया गया फिलिप वक्र यह स्पष्ट करता है कि अल्पकाल में मुद्रास्फीति के अधिक होने पर आर्थिक वृद्धि अधिक होती है हालांकि आधुनिक मान्यता है की फिलिप वक्र केवल अल्पकाल में होने वाले परिवर्तनों की सूचना देता है, फिर भी लाभ की प्रेरणा और उसके उपप्रभावों के कारण मुद्रास्फीति किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होती है| ध्यातव्य है कि अपस्फीति, मूल्यस्तर में निरंतर गिरावट को सूचित करता है, अर्थात यहाँ ऋणात्मक मुद्रास्फीति की स्थिति होगी| इस स्थिति में मूल्य स्तर में गिरावट आने के साथ ही उत्पादन-रोजगार आदि में भी गिरावट आती है, इससे आर्थिक मंदी उत्पन्न होती है| इससे भी स्पष्ट होता है कि वहनीय स्तर तक मुद्रास्फीति किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होती है| फिर भी मुद्रास्फीति के नकारात्मक प्रभावों के कारण इस पर नियंत्रण बनाए रखना आवश्यक होता है| मुद्रास्फीति के नकारात्मक प्रभाव और नियंत्रण की आवश्यकता मुद्रास्फीति के कारण जनता की वास्तविक आय में गिरावट आने के कारण सामान्य जीवन स्तर पर दुष्प्रभाव पड़ता है, निर्धनों पर अधिक दुष्प्रभाव के कारण मुद्रास्फीति प्रतिगामी स्वरुप की होती है, क्योंकि निर्धनों के लिए मुद्रा की सीमान्त उपयोगिता अधिक होती है, इससे असमानताएं बढती हैं, इससे व्यावसायिक इकाइयों के लाभ में वृद्धि होती है किन्तु वेतनभोगी वर्ग(विशेषकर अनौपचारिक श्रमबल) की वास्तविक आय में गिरावट आती है, अधिक मुद्रास्फीति से निवेश/पूँजी निर्माण हतोत्साहित होता है| इससे जनता की वास्तविक आय घट जाती है, जिससे जनता की बचत करने की क्षमता कम हो जाती है, अधिक मुद्रास्फीति से वास्तविक देय ब्याजदर में गिरावट आती है जिससे बचत करने की प्रेरणा में कमी आती है इससे निवेश में कमी आती है, वास्तविक ब्याज दर में गिरावट आती है जिससे बचत एवं निवेश की प्रेरणा में कमी आती है,निवेश में कमी आने पर आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इससे भुगतान संतुलन की स्थिति पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है| क्योंकि स्वदेशी वस्तुओं का मूल्य बढ़ने से निर्यात हतोत्साहित होता है जबकि आयात बढ़ते हैं| जिससे व्यापार घाटा बढ़ता है और विदेशी पूँजी भंडार में कमी आती है इसका प्रभाव मुद्रा के मूल्यह्रास के रूप में देखा जाता है, अधिक मुद्रास्फीति से आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट आती है| क्योंकि सरकार/केन्द्रीय बैंक द्वारा संकुचित मौद्रिक/राजकोषीय नीतियाँ अपनाई जाती हैं जिससे वित्तीय निवेश में कमी आती है और पूँजी निर्माण घटता है, इससे जमाखोरी एवं सट्टेबाजी को प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि विक्रेताओं को भविष्य में मूल्यवृद्धि की आशा होती है, मुद्रास्फीति के कारण संसाधनों के आवंटन में त्रुटि उत्पन्न होती है| मुद्रास्फीति की स्थिति में अधिकाँश फर्में उन वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहित होती हैं जिनके मूल्य बढ़ रहे हों, इस स्थिति में अकुशल फर्मों को भी लाभ होता है जिससे उत्पादकता पर दुष्प्रभाव पड़ता है| मुद्रास्फीति की स्थिति में कर देयता बढ़ जाती है इससे कर अनुपालन पर दुष्प्रभाव पड़ता है और कर अपवंचन बढ़ता है जिससे कालाधन सृजन को प्रोत्साहन मिलता है| अधिक मुद्रास्फीति की स्थिति में जनता भौतिक वस्तुओं जैसे स्वर्ण आदि में निवेश करने को प्राथमिकता देती है इससे सोने के मूल्यों में वृद्धि होती है और सोने का आयात बढ़ता है जिसका व्यापार घाटा बढ़ता है और फोरेक्स में कमी आती है, ऐसा भारत में 2011 से 2013 के मध्य हुआ था| मुद्रास्फीति के उपरोक्त नकारात्मक प्रभाव मुद्रास्फीति को नियंत्रित स्तर तक बनाए रखने की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं| इन्ही नकारात्मक प्रभावों के कारण सरकारें मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए तत्पर रहती हैं जैसा कि 2011 के बाद मुद्रास्फीति के कारण भारत में स्वर्ण आयातों में होने वाली वृद्धि और उसके प्रभावों को रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा मुद्रास्फीति इंडेक्स बांड, संप्रभु स्वर्ण बांड और स्वर्ण मौद्रीकरण योजना आदि के माध्यम से हस्तक्षेप किया था|
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##Question:यद्यपि मुद्रास्फीति किसी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होती है लेकिन सरकारें मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए तत्पर रहती है| कथन की सकारण समीक्षा कीजिये | (200 शब्द)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में मुद्रास्फीति को परिभाषित कीजिये प्रथम भाग में किसी अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रास्फीति की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में मुद्रास्फीति पर नियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये अंतिम में कुछ उदाहरणों के साथ निष्कर्ष दीजिये| किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य स्तर में लम्बे समय तक निरंतर होने वाली वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं| इसके कारण मुद्रा की प्रत्येक इकाई के माध्यम से पहले की अपेक्षा कम वस्तुएं एवं सेवायें खरीदी जाती हैं अर्थात मुद्रास्फीति मुद्रा की क्रय क्षमता अथवा मुद्रा के मूल्य को घटा देती है| दूसरे शब्दों में वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ने पर उस बढ़ी हुई मांग की मात्रा के सापेक्ष पूर्ति के न बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि होती है| यह वृद्धि दीर्घकाल तक बनी रहती है तो इस स्थिति को मुद्रास्फीति कहते हैं| किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव देखे जा सकते हैं| इसके सकारात्मक प्रभाव मुद्रास्फीति को अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक बनाते हैं| अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रास्फीति की आवश्यकता मध्य स्तर की मुद्रास्फीति आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करती है| इससे उत्पादकों/विक्रेताओं के लाभ में वृद्धि होती है जो उन्हें उत्पादन/पूर्ति बढाने हेतु प्रोत्साहित करती है| मुद्रास्फीति यह संकेत देती है कि अर्थव्यवस्था में मांग का अभाव नहीं है| जिससे फर्मों की लाभ प्रत्याशा/व्यावसायिक वातावरण में सुधार होता है, इससे निवेश प्रोत्साहित होता है| बेरोजगारी दर और मुद्रास्फीति दर के वास्तविक आंकड़ों पर आधारित A. W. फिलिप द्वारा दिया गया फिलिप वक्र यह स्पष्ट करता है कि अल्पकाल में मुद्रास्फीति के अधिक होने पर आर्थिक वृद्धि अधिक होती है हालांकि आधुनिक मान्यता है की फिलिप वक्र केवल अल्पकाल में होने वाले परिवर्तनों की सूचना देता है, फिर भी लाभ की प्रेरणा और उसके उपप्रभावों के कारण मुद्रास्फीति किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होती है| ध्यातव्य है कि अपस्फीति, मूल्यस्तर में निरंतर गिरावट को सूचित करता है, अर्थात यहाँ ऋणात्मक मुद्रास्फीति की स्थिति होगी| इस स्थिति में मूल्य स्तर में गिरावट आने के साथ ही उत्पादन-रोजगार आदि में भी गिरावट आती है, इससे आर्थिक मंदी उत्पन्न होती है| इससे भी स्पष्ट होता है कि वहनीय स्तर तक मुद्रास्फीति किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होती है| फिर भी मुद्रास्फीति के नकारात्मक प्रभावों के कारण इस पर नियंत्रण बनाए रखना आवश्यक होता है| मुद्रास्फीति के नकारात्मक प्रभाव और नियंत्रण की आवश्यकता मुद्रास्फीति के कारण जनता की वास्तविक आय में गिरावट आने के कारण सामान्य जीवन स्तर पर दुष्प्रभाव पड़ता है, निर्धनों पर अधिक दुष्प्रभाव के कारण मुद्रास्फीति प्रतिगामी स्वरुप की होती है, क्योंकि निर्धनों के लिए मुद्रा की सीमान्त उपयोगिता अधिक होती है, इससे असमानताएं बढती हैं, इससे व्यावसायिक इकाइयों के लाभ में वृद्धि होती है किन्तु वेतनभोगी वर्ग(विशेषकर अनौपचारिक श्रमबल) की वास्तविक आय में गिरावट आती है, अधिक मुद्रास्फीति से निवेश/पूँजी निर्माण हतोत्साहित होता है| इससे जनता की वास्तविक आय घट जाती है, जिससे जनता की बचत करने की क्षमता कम हो जाती है, अधिक मुद्रास्फीति से वास्तविक देय ब्याजदर में गिरावट आती है जिससे बचत करने की प्रेरणा में कमी आती है इससे निवेश में कमी आती है, वास्तविक ब्याज दर में गिरावट आती है जिससे बचत एवं निवेश की प्रेरणा में कमी आती है,निवेश में कमी आने पर आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इससे भुगतान संतुलन की स्थिति पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है| क्योंकि स्वदेशी वस्तुओं का मूल्य बढ़ने से निर्यात हतोत्साहित होता है जबकि आयात बढ़ते हैं| जिससे व्यापार घाटा बढ़ता है और विदेशी पूँजी भंडार में कमी आती है इसका प्रभाव मुद्रा के मूल्यह्रास के रूप में देखा जाता है, अधिक मुद्रास्फीति से आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट आती है| क्योंकि सरकार/केन्द्रीय बैंक द्वारा संकुचित मौद्रिक/राजकोषीय नीतियाँ अपनाई जाती हैं जिससे वित्तीय निवेश में कमी आती है और पूँजी निर्माण घटता है, इससे जमाखोरी एवं सट्टेबाजी को प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि विक्रेताओं को भविष्य में मूल्यवृद्धि की आशा होती है, मुद्रास्फीति के कारण संसाधनों के आवंटन में त्रुटि उत्पन्न होती है| मुद्रास्फीति की स्थिति में अधिकाँश फर्में उन वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहित होती हैं जिनके मूल्य बढ़ रहे हों, इस स्थिति में अकुशल फर्मों को भी लाभ होता है जिससे उत्पादकता पर दुष्प्रभाव पड़ता है| मुद्रास्फीति की स्थिति में कर देयता बढ़ जाती है इससे कर अनुपालन पर दुष्प्रभाव पड़ता है और कर अपवंचन बढ़ता है जिससे कालाधन सृजन को प्रोत्साहन मिलता है| अधिक मुद्रास्फीति की स्थिति में जनता भौतिक वस्तुओं जैसे स्वर्ण आदि में निवेश करने को प्राथमिकता देती है इससे सोने के मूल्यों में वृद्धि होती है और सोने का आयात बढ़ता है जिसका व्यापार घाटा बढ़ता है और फोरेक्स में कमी आती है, ऐसा भारत में 2011 से 2013 के मध्य हुआ था| मुद्रास्फीति के उपरोक्त नकारात्मक प्रभाव मुद्रास्फीति को नियंत्रित स्तर तक बनाए रखने की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं| इन्ही नकारात्मक प्रभावों के कारण सरकारें मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए तत्पर रहती हैं जैसा कि 2011 के बाद मुद्रास्फीति के कारण भारत में स्वर्ण आयातों में होने वाली वृद्धि और उसके प्रभावों को रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा मुद्रास्फीति इंडेक्स बांड, संप्रभु स्वर्ण बांड और स्वर्ण मौद्रीकरण योजना आदि के माध्यम से हस्तक्षेप किया था|
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“भारत में स्वतंत्रता काल में किये गए भूमि सूधार नीति का सम्बन्ध जहाँ पूर्व से चले आ रहे भू स्वामित्व प्रणाली को पुनः परिभाषित करने से था वहीँ उनके पीछे कुछ आर्थिक तर्काधार भी उपस्थित थे |" उक्त कथन की समीक्षा कीजिये |(200 शब्द )
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दृष्टिकोण : प्रस्तावना में भूमि सुधार की संकल्पना की चर्चा करते हुए भारत में इसे लागू किये जाने के कारणों का उल्लेख कीजिये पूर्व से चले आ रहे भू स्वामित्व प्रणाली को पुनः परिभाषित करने की दृष्टि से भूमि सुधार नीति में शामिल मुख्य तत्वों की चर्चा कीजिये भूमि सुधार नीति के लिए जिम्मेदार मुख्य आर्थिक तर्काधारों की चर्चा कीजिये इसकी महता और प्रभावों के संदर्भ पर चर्चा कीजिये स्वतंत्रता काल में भूमि वितरण व्यवस्था जटिल थी जिसमे केवल 7 % भू स्वामियों,जमींदारों,सामंतों के पास कुल भूमि का लगभग 53% हिस्सा था और जबकि 28 % छोटे और सीमांत किसानों के अधिकार में केवल 6% भूमि थी| इस प्रकार इस पृष्ठभूमि के विपरीत भूमि के औचित्यपूर्ण वितरण को सुनिश्चित कर सामाजिक समानता प्राप्त करना और आथिक वृद्धि सुनिश्चित करने जैसे दो मुख्य लक्ष्य सरकार के लिए महत्वपूर्ण थी | परंपरागत भू स्वामित्व प्रणाली बनाम भूमि सुधार नीति इस प्रकार स्वतंत्रता पूर्व से चले आ रहे जमींदारी व्यवस्था में सुधार हेतु यह आवश्यकता थी, की भूमि का पुनर्वितरण किये जाये | इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 39 के अंतर्गत यह प्रावधान हैं की देश के भौतिक संसाधन (मुख्यतः भूमि) के स्वामित्व और नियंत्रण का सामान्य हित संवर्धन के लिए पुनः वितरण किया जाये जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन एवं जोतों की सीमा निर्धारण करना बड़े किसानों व जमींदारों के पास उपस्थित अधिशेष भूमि को लेकर भूमिहीन और सीमांत किसानों के मध्य भूमि का पुनर्वितरण करना जबकि व्यापक ऄथों में इसके अंतर्गत - स्वामित्व संचालन , पट्टा, बिक्री और बटाई दरों के भूस्वामित्व के अधिकारों का विनियमन करना मूल उद्येश्य आय और संपत्ति आधारित असमानता को कम करना है जिसके अंतर्गत पट्टेदारों और काश्तकारों को सुरक्षा प्रदान करने एवं शोषण मुक्त करने हेतु जमींदारों व बिचौलियों को ख़त्म करना मुख्य रूप से शामिल था विकास की पहल में सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु सभी वर्गों के लिए सामान परिस्थितियां उपलब्द्ध करवाना एक लक्ष्य था जिसके लिए जोतों की ऊपरी सीमा का निर्धारण किया गया भूमि सुधार नीति के लिए जिम्मेदार मुख्य आर्थिक तर्काधार आवश्यक बुनियादी संसाधन की उप्लब्धत्ता – भूमि कृषि पर आश्रित परिवार के लिए जीवन निर्वाह हेतु एक आवश्यक संसाधन है | अतः भूमि सुधार नीति के लागू होने से बहुत से कृषि पर आश्रित परिवारों को भूमि संसाधन उपलब्ध करवाए गए जो उनके जीवन स्तर में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है| कृषि उत्पादकता और निवेश में वृद्धि- जमींदारी प्रथा में अनुपस्थित भू स्वामित्व(Absantee landlord) की समस्या के रूप में देखा जाता है |परन्तु नवीन भू-सुधार नीति ने बड़े जमींदारों से भूमि को लेकर बटाईदारों या काश्तकारों को दी गयी जिससे भूमि पर खेती करने वाला ही भू स्वामी हो गया और उसने कृषि उत्पादकता के विकास हेतु निवेश को प्रेरित करेगा तथा इसके अंतर्गत मुख्यतः मृदा उपजाऊपन व सिंचाई व्यवस्था जैसे तत्वों पर ध्यान दिए जायेंगे | कृषि अधिशेष – स्वाभाविक रूप से पूर्व की तुलना में अधिक भूमि पर कृषि प्रारंभ किये जाने एवं स्वयं के लाभ के लिए काश्तकारों के द्वारा अधिशेष पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा | गरीबी निवारण- जोतों की ऊपरी सीमा के निर्धारण से प्राप्त अधिशेष भूमि को समाज के छोटे व सीमांत किसानों तथा भूमिहीनों के मध्य वितरिण करना भूमि सुधार में शामिल में मुख्य तत्व है | इसलिए पहले से बेरोजगार भूमिहीन ,व छोटे किसानों के परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भूमि के कारण अकुशल कृषि श्रम का सृजन होगा जो उनके लिए आय के अवसर सृजित करेगा जो उन्हें गरीबी के दुश्चक्र से निकलने में सहायता करेगा| निष्कर्ष हालाँकि कुछ राज्यों में अभी भी पूर्णतः यह सुधार नहीं किये जा सके हैं परन्तु देश में सामाजिक और आर्थिक समानता के संवैधानिक मूल्य को स्थापित करने में भू सुधार नीति ने वैचारिक स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव संभव किये हैं | सरकार के द्वारा भू अभिलेखों को आधुनिक रूप से रिकॉर्ड बनाना और भूमि बैंक जैसे उपायों को इस दिशा में किये जा सकने वाले मुख्य उपायों के सन्दर्भ में देखा जा सकता है|
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##Question:“भारत में स्वतंत्रता काल में किये गए भूमि सूधार नीति का सम्बन्ध जहाँ पूर्व से चले आ रहे भू स्वामित्व प्रणाली को पुनः परिभाषित करने से था वहीँ उनके पीछे कुछ आर्थिक तर्काधार भी उपस्थित थे |" उक्त कथन की समीक्षा कीजिये |(200 शब्द )##Answer:दृष्टिकोण : प्रस्तावना में भूमि सुधार की संकल्पना की चर्चा करते हुए भारत में इसे लागू किये जाने के कारणों का उल्लेख कीजिये पूर्व से चले आ रहे भू स्वामित्व प्रणाली को पुनः परिभाषित करने की दृष्टि से भूमि सुधार नीति में शामिल मुख्य तत्वों की चर्चा कीजिये भूमि सुधार नीति के लिए जिम्मेदार मुख्य आर्थिक तर्काधारों की चर्चा कीजिये इसकी महता और प्रभावों के संदर्भ पर चर्चा कीजिये स्वतंत्रता काल में भूमि वितरण व्यवस्था जटिल थी जिसमे केवल 7 % भू स्वामियों,जमींदारों,सामंतों के पास कुल भूमि का लगभग 53% हिस्सा था और जबकि 28 % छोटे और सीमांत किसानों के अधिकार में केवल 6% भूमि थी| इस प्रकार इस पृष्ठभूमि के विपरीत भूमि के औचित्यपूर्ण वितरण को सुनिश्चित कर सामाजिक समानता प्राप्त करना और आथिक वृद्धि सुनिश्चित करने जैसे दो मुख्य लक्ष्य सरकार के लिए महत्वपूर्ण थी | परंपरागत भू स्वामित्व प्रणाली बनाम भूमि सुधार नीति इस प्रकार स्वतंत्रता पूर्व से चले आ रहे जमींदारी व्यवस्था में सुधार हेतु यह आवश्यकता थी, की भूमि का पुनर्वितरण किये जाये | इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 39 के अंतर्गत यह प्रावधान हैं की देश के भौतिक संसाधन (मुख्यतः भूमि) के स्वामित्व और नियंत्रण का सामान्य हित संवर्धन के लिए पुनः वितरण किया जाये जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन एवं जोतों की सीमा निर्धारण करना बड़े किसानों व जमींदारों के पास उपस्थित अधिशेष भूमि को लेकर भूमिहीन और सीमांत किसानों के मध्य भूमि का पुनर्वितरण करना जबकि व्यापक ऄथों में इसके अंतर्गत - स्वामित्व संचालन , पट्टा, बिक्री और बटाई दरों के भूस्वामित्व के अधिकारों का विनियमन करना मूल उद्येश्य आय और संपत्ति आधारित असमानता को कम करना है जिसके अंतर्गत पट्टेदारों और काश्तकारों को सुरक्षा प्रदान करने एवं शोषण मुक्त करने हेतु जमींदारों व बिचौलियों को ख़त्म करना मुख्य रूप से शामिल था विकास की पहल में सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु सभी वर्गों के लिए सामान परिस्थितियां उपलब्द्ध करवाना एक लक्ष्य था जिसके लिए जोतों की ऊपरी सीमा का निर्धारण किया गया भूमि सुधार नीति के लिए जिम्मेदार मुख्य आर्थिक तर्काधार आवश्यक बुनियादी संसाधन की उप्लब्धत्ता – भूमि कृषि पर आश्रित परिवार के लिए जीवन निर्वाह हेतु एक आवश्यक संसाधन है | अतः भूमि सुधार नीति के लागू होने से बहुत से कृषि पर आश्रित परिवारों को भूमि संसाधन उपलब्ध करवाए गए जो उनके जीवन स्तर में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है| कृषि उत्पादकता और निवेश में वृद्धि- जमींदारी प्रथा में अनुपस्थित भू स्वामित्व(Absantee landlord) की समस्या के रूप में देखा जाता है |परन्तु नवीन भू-सुधार नीति ने बड़े जमींदारों से भूमि को लेकर बटाईदारों या काश्तकारों को दी गयी जिससे भूमि पर खेती करने वाला ही भू स्वामी हो गया और उसने कृषि उत्पादकता के विकास हेतु निवेश को प्रेरित करेगा तथा इसके अंतर्गत मुख्यतः मृदा उपजाऊपन व सिंचाई व्यवस्था जैसे तत्वों पर ध्यान दिए जायेंगे | कृषि अधिशेष – स्वाभाविक रूप से पूर्व की तुलना में अधिक भूमि पर कृषि प्रारंभ किये जाने एवं स्वयं के लाभ के लिए काश्तकारों के द्वारा अधिशेष पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा | गरीबी निवारण- जोतों की ऊपरी सीमा के निर्धारण से प्राप्त अधिशेष भूमि को समाज के छोटे व सीमांत किसानों तथा भूमिहीनों के मध्य वितरिण करना भूमि सुधार में शामिल में मुख्य तत्व है | इसलिए पहले से बेरोजगार भूमिहीन ,व छोटे किसानों के परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भूमि के कारण अकुशल कृषि श्रम का सृजन होगा जो उनके लिए आय के अवसर सृजित करेगा जो उन्हें गरीबी के दुश्चक्र से निकलने में सहायता करेगा| निष्कर्ष हालाँकि कुछ राज्यों में अभी भी पूर्णतः यह सुधार नहीं किये जा सके हैं परन्तु देश में सामाजिक और आर्थिक समानता के संवैधानिक मूल्य को स्थापित करने में भू सुधार नीति ने वैचारिक स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव संभव किये हैं | सरकार के द्वारा भू अभिलेखों को आधुनिक रूप से रिकॉर्ड बनाना और भूमि बैंक जैसे उपायों को इस दिशा में किये जा सकने वाले मुख्य उपायों के सन्दर्भ में देखा जा सकता है|
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Kashmir has proven to be an unsolvable challenge for the Indian govt and therefore needs a fresh approach. Comment( 10 Marks/ 150 words)
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Approach Brief introduction about the Kashmir issue or can write about recent incidents in the valley. Briefly discuss why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government. Mention present strategies of the government to deal with it and issues with these strategies. Suggest a way forward for the same. The insurgency in Kashmir started way back in 1989 when the state assembly election was rigged. This has contributed to anti-government sentiment. The Kashmir insurgency is mainly a conflict between various Kashmiri separatists and nationalists. Why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government There has been increase in local recruitment which shows the changing nature of militancy. Earlier most of the militants were of foreign origin. Mass participation in protest especially at encounter sites and funerals. Mass-level indoctrination provided by the terrorist groups and narratives supplied by Pakistan Large number of unemployment youth (40-50 per cent unemployment rate) is an easy target for terrorist recruitment agencies. A large number of youth not getting modern education (getting education in madrasas) Large-scale corruption in administration and politics Less industrial and regional development In the absence of a political and reconciliation process, asking security forces to show restraint in the face of constant stoning is not feasible. Strategies of the Government The Kashmir insurgency offers no ready solutions. There are two broad approaches to dealing with an insurgency. one is the conventional military approach, also called the anti-insurgency or enemy-centric approach, which focuses on targeting the insurgents.The government has initiated “ Operation All out ” to deal with militant and violent activities in the valley. The operation involves the killing of Militants in the Kashmir region to instil terror in the minds of Kashmiri Youth. The other is a Population-Centric Counter Insurgency (COIN) approach , which is aimed at cutting off the insurgents’ supply lines by either providing incentives to the population for supporting the counterinsurgent forces or imposing costs on the population for supporting the insurgents. The general bias of the population-centric COIN perspectives is to give prominence to winning the hearts and minds of the population, which essentially means convincing the people that the advantages of supporting the government against the insurgents outweigh the advantages of supporting the insurgents. The ultimate goal of both approaches is to restore stability and the population’s support for the government forces. Issues with government strategies A hybrid policy of appeasing separatists along with stop-start counter-terror operations won’t work. More civilians, militants and security forces have died in the first five months of 2018 than in corresponding periods for the previous decade. Government is not able to change the narratives set by the terrorist groups and youth alienation is still prevalent. Measures to be taken as a fresh approach Internal Governance, employment generation, poverty reduction, infrastructure, Emphasis on the deradicalisation program Revise its surrender and rehabilitation policy Development into focus again: Tourism, health; education etc. People-to-people contacts, trust-building measures, periodic dialogues with all groups, Speedy disposal of cases against armed forces, sensitisation of armed forces Lethal force should be the last resort External Border infrastructure, resolution of LoC issue, diplomatic pressure on Pakistan, Internationalisation of issue of terrorism, Cross border trade The Need of the hour is to understand that Kashmir is an integral part of India. Although they have their own set of problems and issues it is the main task of the Government to address their Issues to provide a peaceful and dignified life for them.
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##Question:Kashmir has proven to be an unsolvable challenge for the Indian govt and therefore needs a fresh approach. Comment( 10 Marks/ 150 words)##Answer:Approach Brief introduction about the Kashmir issue or can write about recent incidents in the valley. Briefly discuss why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government. Mention present strategies of the government to deal with it and issues with these strategies. Suggest a way forward for the same. The insurgency in Kashmir started way back in 1989 when the state assembly election was rigged. This has contributed to anti-government sentiment. The Kashmir insurgency is mainly a conflict between various Kashmiri separatists and nationalists. Why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government There has been increase in local recruitment which shows the changing nature of militancy. Earlier most of the militants were of foreign origin. Mass participation in protest especially at encounter sites and funerals. Mass-level indoctrination provided by the terrorist groups and narratives supplied by Pakistan Large number of unemployment youth (40-50 per cent unemployment rate) is an easy target for terrorist recruitment agencies. A large number of youth not getting modern education (getting education in madrasas) Large-scale corruption in administration and politics Less industrial and regional development In the absence of a political and reconciliation process, asking security forces to show restraint in the face of constant stoning is not feasible. Strategies of the Government The Kashmir insurgency offers no ready solutions. There are two broad approaches to dealing with an insurgency. one is the conventional military approach, also called the anti-insurgency or enemy-centric approach, which focuses on targeting the insurgents.The government has initiated “ Operation All out ” to deal with militant and violent activities in the valley. The operation involves the killing of Militants in the Kashmir region to instil terror in the minds of Kashmiri Youth. The other is a Population-Centric Counter Insurgency (COIN) approach , which is aimed at cutting off the insurgents’ supply lines by either providing incentives to the population for supporting the counterinsurgent forces or imposing costs on the population for supporting the insurgents. The general bias of the population-centric COIN perspectives is to give prominence to winning the hearts and minds of the population, which essentially means convincing the people that the advantages of supporting the government against the insurgents outweigh the advantages of supporting the insurgents. The ultimate goal of both approaches is to restore stability and the population’s support for the government forces. Issues with government strategies A hybrid policy of appeasing separatists along with stop-start counter-terror operations won’t work. More civilians, militants and security forces have died in the first five months of 2018 than in corresponding periods for the previous decade. Government is not able to change the narratives set by the terrorist groups and youth alienation is still prevalent. Measures to be taken as a fresh approach Internal Governance, employment generation, poverty reduction, infrastructure, Emphasis on the deradicalisation program Revise its surrender and rehabilitation policy Development into focus again: Tourism, health; education etc. People-to-people contacts, trust-building measures, periodic dialogues with all groups, Speedy disposal of cases against armed forces, sensitisation of armed forces Lethal force should be the last resort External Border infrastructure, resolution of LoC issue, diplomatic pressure on Pakistan, Internationalisation of issue of terrorism, Cross border trade The Need of the hour is to understand that Kashmir is an integral part of India. Although they have their own set of problems and issues it is the main task of the Government to address their Issues to provide a peaceful and dignified life for them.
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National Action Plan on Climate Change (NAPCC) which encompasses eight national missions representing multipronged, long-term and integrated strategies for achieving key goals in the context of climate change. Critically examine. (10marks/150 words)
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Brief Approach : Introduce answer by referring to the origin and objective of the NAPCC in brief Explain eight national missions incorporated in NAPCC with their targets. Conclude the answer by referring to the expanded domain of the NAPCC. Answer : The Government of India released in 2008 India’s first National Action Plan on Climate Change (NAPCC) outlining existing and future policies and programs addressing climate mitigation and adaptation. The plan identifies eight core “national missions” running through 2018. Emphasizing the overriding priority of maintaining high economic growth rates to raise living standards, the plan “identifies measures that promote our development objectives while also yielding co-benefits for addressing climate change effectively.” National Missions 1. National Solar Mission - The NAPCC aims to promote the development and use of solar energy for power generation and other uses with the ultimate objective of making solar competitive with fossil-based energy options. The plan includes - • Specific goals for increased use of solar thermal technologies in urban areas, industry, and commercial establishments; • A goal of increasing production of photovoltaic to 1000 MW/year; and • A goal of deploying at least 1000 MW of solar thermal power generation. However, the weakest part of a campaign for going solar is the generation from rooftop sources. To achieve its target of 40 GW installed capacity by 2022, India should have an installed capacity of 10,000 MW by 2017-18. However, only 1,222 MW of rooftop capacity has been installed till July 31, 2018. 2. National Mission for Enhanced Energy Efficiency - Initiatives based on increasing the energy use efficiency was expected to yield savings of 10,000 MW by 2012. Building on the EnergyConservation Act 2001, the plan recommends - • Mandating specific energy consumption decreases in large energy-consuming industries, with a system for companies to trade energy-savings certificates; • Energy incentives, including reduced taxes on energy-efficient appliances; and • Financing for public-private partnerships to reduce energy consumption through demand-side management programs in the municipal, buildings and agricultural sectors. However, a 2018 report by Delhi-based non-profit Centre for Science and Environment (CSE) highlights Niti Aayog’s concern related to the fulfilment of the mission’s goal and it"s poor inter-sectoral linkages. 3. National Mission on Sustainable Habitat - To promote energy efficiency as a core component of urban planning, the plan calls for - • Extending the existing Energy Conservation Building Code; • A greater emphasis on urban waste management and recycling, including power production from waste; • Strengthening the enforcement of automotive fuel economy standards and using pricing measures to encourage the purchase of efficient vehicles; and • Incentives for the use of public transportation. But even eight years after its launch, NMSH has no specific funds. In fact, it did not seek any such support from ministries concerned. 4 . National Water Mission - With water scarcity projected to worsen as a result of climate change, the plan sets a goal of a 20% improvement in water use efficiency through pricing and other measures. Though goals have been set, the strategy to achieve them has not been prepared. States are supposed to formulate State Specific Action Plans (SSAPs) to mitigate and adapt to the impacts of climate change. SSAPs are action plans made by states for this mission only. But no state has prepared SSAP for this mission. According to an August 2018 reply given by the Union minister of state for water resources, so far Rs 2.8 crore has been spent on preparation of these SSAPs in 16 states. In late 2017, only a model template for SSAP was adopted by all the states. 5. National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem and National Mission on Strategic Knowledge for Climate Change - The plan aims to conserve biodiversity, forest cover, and other ecological values in the Himalayan region, where glaciers that is a major source of India’s water supply are projected to recede as a result of global warming.To gain a better understanding of climate science, impacts and challenges, the plan envisions a new Climate Science Research Fund, improved climate modelling, and increased international collaboration. It also encourages private sector initiatives to develop adaptation and mitigation technologies through venture capital funds. Both missions suffer from budgetary and workforce constraints. And funding remains unclear because both the missions have been lumped together in a broad Research and Development head in the budget. What’s worse, no money has been earmarked as capital expenditure for NMSHE, which explains why no adaptation or sustainability project has been taken up by DST under the mission. 6. National Mission for a “Green India” - Goals include the afforestation of 6 million hectares of degraded forest lands and expanding forest cover from 23% to 33% of India’s territory. In 2015-16, the plantations undertaken were 34 per cent short of the targets. The following year the shortfall was more than 40 per cent. The mission has also lagged in providing alternative fuel technology to households to reduce emissions from burning of fuelwood and other similar fuels. 7. National Mission for Sustainable Agriculture - The plan aims to support climate adaptation in agriculture through the development of climate-resilient crops, expansion of weather insurance mechanisms, and agricultural practices. However, The government has not been able to spend the budget on SHM. In February 2015, the government allocated Rs 568 crore to be spent in the next two years, but it has been able to spend only Rs 208 crore till August 2018, as per data on the agriculture ministry website. Similar is the case with RAD. About 86 million hectares of net sown land in India (or 68 per cent of the country’s farmland) is rainfed. Of this, only 1.7 million hectares have been developed or brought under an integrated farming system in the last six years. Keeping the ecological sustainability at the core, the government of India increases the ambit of the programme by including National mission on Wind Energy, National mission on Waste to energy, National mission on coastal areas and National mission on health impacts due to climate change in order to achieve sustainable ecosystem.
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##Question:National Action Plan on Climate Change (NAPCC) which encompasses eight national missions representing multipronged, long-term and integrated strategies for achieving key goals in the context of climate change. Critically examine. (10marks/150 words)##Answer:Brief Approach : Introduce answer by referring to the origin and objective of the NAPCC in brief Explain eight national missions incorporated in NAPCC with their targets. Conclude the answer by referring to the expanded domain of the NAPCC. Answer : The Government of India released in 2008 India’s first National Action Plan on Climate Change (NAPCC) outlining existing and future policies and programs addressing climate mitigation and adaptation. The plan identifies eight core “national missions” running through 2018. Emphasizing the overriding priority of maintaining high economic growth rates to raise living standards, the plan “identifies measures that promote our development objectives while also yielding co-benefits for addressing climate change effectively.” National Missions 1. National Solar Mission - The NAPCC aims to promote the development and use of solar energy for power generation and other uses with the ultimate objective of making solar competitive with fossil-based energy options. The plan includes - • Specific goals for increased use of solar thermal technologies in urban areas, industry, and commercial establishments; • A goal of increasing production of photovoltaic to 1000 MW/year; and • A goal of deploying at least 1000 MW of solar thermal power generation. However, the weakest part of a campaign for going solar is the generation from rooftop sources. To achieve its target of 40 GW installed capacity by 2022, India should have an installed capacity of 10,000 MW by 2017-18. However, only 1,222 MW of rooftop capacity has been installed till July 31, 2018. 2. National Mission for Enhanced Energy Efficiency - Initiatives based on increasing the energy use efficiency was expected to yield savings of 10,000 MW by 2012. Building on the EnergyConservation Act 2001, the plan recommends - • Mandating specific energy consumption decreases in large energy-consuming industries, with a system for companies to trade energy-savings certificates; • Energy incentives, including reduced taxes on energy-efficient appliances; and • Financing for public-private partnerships to reduce energy consumption through demand-side management programs in the municipal, buildings and agricultural sectors. However, a 2018 report by Delhi-based non-profit Centre for Science and Environment (CSE) highlights Niti Aayog’s concern related to the fulfilment of the mission’s goal and it"s poor inter-sectoral linkages. 3. National Mission on Sustainable Habitat - To promote energy efficiency as a core component of urban planning, the plan calls for - • Extending the existing Energy Conservation Building Code; • A greater emphasis on urban waste management and recycling, including power production from waste; • Strengthening the enforcement of automotive fuel economy standards and using pricing measures to encourage the purchase of efficient vehicles; and • Incentives for the use of public transportation. But even eight years after its launch, NMSH has no specific funds. In fact, it did not seek any such support from ministries concerned. 4 . National Water Mission - With water scarcity projected to worsen as a result of climate change, the plan sets a goal of a 20% improvement in water use efficiency through pricing and other measures. Though goals have been set, the strategy to achieve them has not been prepared. States are supposed to formulate State Specific Action Plans (SSAPs) to mitigate and adapt to the impacts of climate change. SSAPs are action plans made by states for this mission only. But no state has prepared SSAP for this mission. According to an August 2018 reply given by the Union minister of state for water resources, so far Rs 2.8 crore has been spent on preparation of these SSAPs in 16 states. In late 2017, only a model template for SSAP was adopted by all the states. 5. National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem and National Mission on Strategic Knowledge for Climate Change - The plan aims to conserve biodiversity, forest cover, and other ecological values in the Himalayan region, where glaciers that is a major source of India’s water supply are projected to recede as a result of global warming.To gain a better understanding of climate science, impacts and challenges, the plan envisions a new Climate Science Research Fund, improved climate modelling, and increased international collaboration. It also encourages private sector initiatives to develop adaptation and mitigation technologies through venture capital funds. Both missions suffer from budgetary and workforce constraints. And funding remains unclear because both the missions have been lumped together in a broad Research and Development head in the budget. What’s worse, no money has been earmarked as capital expenditure for NMSHE, which explains why no adaptation or sustainability project has been taken up by DST under the mission. 6. National Mission for a “Green India” - Goals include the afforestation of 6 million hectares of degraded forest lands and expanding forest cover from 23% to 33% of India’s territory. In 2015-16, the plantations undertaken were 34 per cent short of the targets. The following year the shortfall was more than 40 per cent. The mission has also lagged in providing alternative fuel technology to households to reduce emissions from burning of fuelwood and other similar fuels. 7. National Mission for Sustainable Agriculture - The plan aims to support climate adaptation in agriculture through the development of climate-resilient crops, expansion of weather insurance mechanisms, and agricultural practices. However, The government has not been able to spend the budget on SHM. In February 2015, the government allocated Rs 568 crore to be spent in the next two years, but it has been able to spend only Rs 208 crore till August 2018, as per data on the agriculture ministry website. Similar is the case with RAD. About 86 million hectares of net sown land in India (or 68 per cent of the country’s farmland) is rainfed. Of this, only 1.7 million hectares have been developed or brought under an integrated farming system in the last six years. Keeping the ecological sustainability at the core, the government of India increases the ambit of the programme by including National mission on Wind Energy, National mission on Waste to energy, National mission on coastal areas and National mission on health impacts due to climate change in order to achieve sustainable ecosystem.
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जनतंत्र से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख गुणों की व्याख्या कीजिए। (200 शब्द)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर का प्रारम्भ लोकतन्त्र के परिचय से कीजिए। इसके पश्चात गुणों की व्याख्या कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। लोकतंत्र का मूल अर्थ है जनसाधारण या जनता का शासन। इसमें जनता स्वयं शासक वर्ग का चुनाव करती है। जनतांत्रिक प्रणाली में शासन या सत्ता का अंतिम सूत्र जनता के हाथों में रहता है ताकि सार्वजनिक नीति जनता की इच्छा के अनुसार और जनता के हित-साधन के उद्देश्य से बनाई जाए और कार्यान्वित की जाए। इसलिए कहा गया है कि लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन प्रणाली है। इसमें शासन चलाने का काम जनसाधारण के प्रतिनिधियों को सौंपा जा सकता है, परंतु उन्हे निश्चित अंतराल के बाद फिर से जनसाधारण का विश्वास प्राप्त करना होगा। जनतंत्र के प्रमुख गुण: विधि का शासन : ब्रिटिश न्यायवादी डायसी के अनुसार यह जनतंत्र का प्रमुख गुण है। जिसके अंतर्गत कई पक्ष शामिल हैं: विधि के समक्ष समता आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति कानून के ऊपर नहीं है। जनाधिकारों को महत्व। इसकी रक्षा के लिए संविधान में आवश्यक प्रावधान उपलब्ध होते हैं। निरंकुशता का विरोध अर्थात सरकार के इच्छाधीन शक्तियों की अनुपस्थिति लोक संप्रभुता: जनता द्वारा चुनाव के माध्यम से प्रतिनिधियों का चयन। इसमें लोगों की सहमति से संचालन किया जाता है। जनता नियमित अंतराल में होने वाले चुनाओं के माध्यम से सरकार स्थापित करती है। प्रत्याभूत अधिकार: जनतंत्र में लोगों को कुछ निश्चित अधिकार सदैव प्राप्त रहते हैं। राज्य इन्हे खत्म नहीं कर सकता है। भारत में देखें तो सभी नागरिकों को मूल अधिकार प्राप्त हैं। इनकी रक्षा उच्चतम न्यायालय करता है। इस प्रकार जनतंत्र शासन की ऐसी प्रणाली है जिसमें जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी होती है। यह लोगों की भावनाओं को जगाकर उनका समर्थन जुटाने का प्रयास करता है। इसमें एक ओर लोक संप्रभुता महत्वपूर्ण है तो दूसरी ओर लोगों के अधिकारों की रक्षा के भी उपाय किए जाते हैं। इसके साथ ही भौतिक, आर्थिक, और आध्यात्मिक संसाधनों को सामान्य हित के लिए नियोजित किया जाता है।
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##Question:जनतंत्र से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख गुणों की व्याख्या कीजिए। (200 शब्द)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर का प्रारम्भ लोकतन्त्र के परिचय से कीजिए। इसके पश्चात गुणों की व्याख्या कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। लोकतंत्र का मूल अर्थ है जनसाधारण या जनता का शासन। इसमें जनता स्वयं शासक वर्ग का चुनाव करती है। जनतांत्रिक प्रणाली में शासन या सत्ता का अंतिम सूत्र जनता के हाथों में रहता है ताकि सार्वजनिक नीति जनता की इच्छा के अनुसार और जनता के हित-साधन के उद्देश्य से बनाई जाए और कार्यान्वित की जाए। इसलिए कहा गया है कि लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन प्रणाली है। इसमें शासन चलाने का काम जनसाधारण के प्रतिनिधियों को सौंपा जा सकता है, परंतु उन्हे निश्चित अंतराल के बाद फिर से जनसाधारण का विश्वास प्राप्त करना होगा। जनतंत्र के प्रमुख गुण: विधि का शासन : ब्रिटिश न्यायवादी डायसी के अनुसार यह जनतंत्र का प्रमुख गुण है। जिसके अंतर्गत कई पक्ष शामिल हैं: विधि के समक्ष समता आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति कानून के ऊपर नहीं है। जनाधिकारों को महत्व। इसकी रक्षा के लिए संविधान में आवश्यक प्रावधान उपलब्ध होते हैं। निरंकुशता का विरोध अर्थात सरकार के इच्छाधीन शक्तियों की अनुपस्थिति लोक संप्रभुता: जनता द्वारा चुनाव के माध्यम से प्रतिनिधियों का चयन। इसमें लोगों की सहमति से संचालन किया जाता है। जनता नियमित अंतराल में होने वाले चुनाओं के माध्यम से सरकार स्थापित करती है। प्रत्याभूत अधिकार: जनतंत्र में लोगों को कुछ निश्चित अधिकार सदैव प्राप्त रहते हैं। राज्य इन्हे खत्म नहीं कर सकता है। भारत में देखें तो सभी नागरिकों को मूल अधिकार प्राप्त हैं। इनकी रक्षा उच्चतम न्यायालय करता है। इस प्रकार जनतंत्र शासन की ऐसी प्रणाली है जिसमें जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी होती है। यह लोगों की भावनाओं को जगाकर उनका समर्थन जुटाने का प्रयास करता है। इसमें एक ओर लोक संप्रभुता महत्वपूर्ण है तो दूसरी ओर लोगों के अधिकारों की रक्षा के भी उपाय किए जाते हैं। इसके साथ ही भौतिक, आर्थिक, और आध्यात्मिक संसाधनों को सामान्य हित के लिए नियोजित किया जाता है।
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ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स को परिभाषित कीजिये । इसके निर्धारक कारको को बताते हुए , भारत की रैंकिंग सुधार के लिए उपायों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द )
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अप्रोच ;- भूमिका में ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स को समझाइए। उत्तर के प्रथम भाग में इसके निर्धारक कारको को समझाते हुए , भारत की वर्तमान रैंकिंग की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में इस सूचकांक के सुधार के लिए किए जा सकने वाले उपायों को बताइये । अंतिम से निष्कर्ष में बेहतर सूचकांक के महत्व को समझाइए । उत्तर :- ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स , विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी किया जाता है । इसकी शुरुवात 2006 से हुई थी और 2018 के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स के सर्वे में 149 विकसित और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को शामिल किया गया था ।ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स वैश्विक आधार पर लिंग समानता को मापता है ।जहां प्राप्तांक 1 पूर्ण महिला की पुरुषों से समानता को दर्शाता है , वहीं 0 प्राप्तांक उच्च असमानता को दर्शाता है । ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स द्वारा चार आधारों पर सूची तैयार की जाती है , जिसमे शैक्षिणिक उपलब्धता , स्वास्थ्य और उत्तरजीविता , आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक सशक्तिकरणशामिल है ।ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स वर्तमान में 149 देशो के साथ विश्व की 93 % जनसंख्या के सर्वे पर आधारित है जिसमे :- शैक्षिक उपलब्धता में प्राथमिक और उच्च शिक्षा में इनकी भागीदारी का आकलन शामिल है । स्वास्थ और उत्तरजीविता से तात्पर्य है महिलाओ के संदर्भ में औसत जीवन प्रत्याशा और महिला लिंगानुपात ( भारत के संदर्भ में 943 प्रति 1000 पुरुष ) । यदि पैरिटी की मात्र 6 % से कम हो तो पैरिटी को शामिल नहीं किया जाता और अगर 6 % से ज्यादा है तो पैरिटी को शामिल किया जाता है । पैरिटी से तात्पर्य है की यह माना जाता है की महिलाएं औसतन पुरुषो से ज्यादा लंबे समय तक जीवित रहती है । आर्थिक भागीदारी से तात्पर्य है की अवसरो में समानता के साथ साथ , समान वेतन , भागीदारी का स्तर और उच्च तकनीकी कौशलों में उनकी भागीदारी । राजनीतिक सशक्तिकरण से तात्पर्य है की फैसले लेने वाली संस्थागत ढांचो में उनका प्रतिनिधित्व और उनकी भागीदारी जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र शामिल हैं । भारत द्वारा 149 देशो की रैंकिंग में 108 वां स्थान प्राप्त किया गया । इसके साथ ही भारत के संदर्भ में इसकी 2017 की रैंकिंग से वर्तमान रैंकिंग में कोई सुधार नही हुआ है ।भारत द्वारा पिछले साल की अपेक्षा इस साल अपनी रैंकिंग में कोई सुधार नही किया गया । भारत के संदर्भ में लिंग आधारित असमानता लगभग 33 % के करीब है । इसके साथ ही भारत द्वारा ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स के सभी आयामों पर अत्यंत ही निम्न स्तर का प्रयास किया गया । स्वास्थ्य और उत्तरजीविता से संदर्भ में तो यह स्थिति और खराब है और इस संदर्भ में भारत 149 देशो में अंतिम तीन देशो में शामिल है ।स्वास्थ और उत्तरजीविता में भारत 147 वें स्थान पर हैं और आर्मेनिया 148 तथा चीन 149 वें स्थान है । भारत के पड़ोसी देशो में महिला स्वास्थ और उत्तरजीविता के संदर्भ में श्रीलंका सबसे आगे और उसके बाद बांग्लादेश का स्थान है ।अर्थात भारत दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशो से भी पीछे है । भारत द्वारा ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में बेहतर प्रदर्शन करने और अपने आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में सुधार के साथ साथ सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी ढांचे में सुधार की आवश्यकता है ।जिसके निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- महिला स्वास्थ्य सुरक्षा पर विशेष प्रयास किया जाना चाहिए और सरकार को अपने स्वास्थ्य बजट को बढ़ाना चाहिए । जिससे प्राथमिक , द्वितीयक और तृतीयक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर किया जा सके ।भारत में उच्च MMR लचर स्वास्थ्य सेवाओ का सूचक है । सरकार द्वारा चलायी जा रही योजना जैसे- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना, जननी सुरक्षा योजना , महिला स्वास्थ और विकास कार्यक्रम आदि योजनओं को प्रभावी तरीके से संचालित करने की आवश्यकता है । महिलाओं की प्राथमिक और उच्च शिक्षा में प्रभावी भागीदारी को बढ़ाना चाहिए । इसके लिए विभिन्न सरकारी योजनाएँ जो विशेषकर महिलाओं को ध्यान रखकर चलायी जा रही है जैसे सबला योजना , महिला शिक्षा के लिए साक्षर भारत मिशन , कस्तूरबा गांधी विद्यालय योजना आदि कार्यक्रमों के साथ साथ शिक्षा के अधिकार को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने की अवश्यकता है । श्रमबल में महिला भागीदारी बढ़ाने के लिए तथा महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए , उनकी कार्यस्थल पर सुरक्षा के साथ-साथ लिंग संवेदनशील ( जेंडर सेनसेटिव ) वातावरण तैयार करने की आवश्यकता है । इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओ के माध्यम से महिलाओं में उद्यमशिलता का विकास करने की अवश्यकता है । सरकारी योजनाए जैसे स्टेप ( STEP ) , स्टैंड अप इंडिया , महिला ई-हाट जैसे कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से क्रियान्वित करने की अवश्यकता है । इसके साथ ही महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और उनका सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की अवश्यकता है । राजनीतिक भागीदारी में विभिन्न आयामो को शामिल किए जाने की आवश्यकता है ,जिसमे निर्णय निर्माण सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रो के साथ साथ समाज सेवाओ में भीं उनकी भागीदारी को बढ़ाने की अवश्यकता है । 73 वें व 74 वें संविधान संसोधन द्वारा ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं को 33 % आरक्षण देना इस दिशा में सकारात्मक प्रयास था । हालांकि कुछ राज्यों में इसे बढ़ाकर 50 % तक कर दिया गया है जो एक सराहनीय प्रयास है । इसके साथ ही सरकार को जल्द से जल्द महिला आरक्षण बिल को पास करवाकर उच्च सदनो में भी उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। उपरोक्त उपायों को अपनाकर सरकार द्वारा देश की आधी आबादी की देश के विकास में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है । क्योंकि एक सर्वे के अनुसार भारत में महिलायो को 33 % श्रमबल में भागीदारी भारत के सकल घरेलू अनुपात में 2 % की वृद्धि कर सकता है । इसके साथ ही भारत अपने एसडीजी लक्ष्यों में लक्ष्य नंबर 4 , 5 और 10 को प्रभावी तरीके से प्राप्त कर सकता है ।
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##Question:ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स को परिभाषित कीजिये । इसके निर्धारक कारको को बताते हुए , भारत की रैंकिंग सुधार के लिए उपायों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द )##Answer:अप्रोच ;- भूमिका में ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स को समझाइए। उत्तर के प्रथम भाग में इसके निर्धारक कारको को समझाते हुए , भारत की वर्तमान रैंकिंग की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में इस सूचकांक के सुधार के लिए किए जा सकने वाले उपायों को बताइये । अंतिम से निष्कर्ष में बेहतर सूचकांक के महत्व को समझाइए । उत्तर :- ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स , विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी किया जाता है । इसकी शुरुवात 2006 से हुई थी और 2018 के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स के सर्वे में 149 विकसित और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को शामिल किया गया था ।ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स वैश्विक आधार पर लिंग समानता को मापता है ।जहां प्राप्तांक 1 पूर्ण महिला की पुरुषों से समानता को दर्शाता है , वहीं 0 प्राप्तांक उच्च असमानता को दर्शाता है । ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स द्वारा चार आधारों पर सूची तैयार की जाती है , जिसमे शैक्षिणिक उपलब्धता , स्वास्थ्य और उत्तरजीविता , आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक सशक्तिकरणशामिल है ।ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स वर्तमान में 149 देशो के साथ विश्व की 93 % जनसंख्या के सर्वे पर आधारित है जिसमे :- शैक्षिक उपलब्धता में प्राथमिक और उच्च शिक्षा में इनकी भागीदारी का आकलन शामिल है । स्वास्थ और उत्तरजीविता से तात्पर्य है महिलाओ के संदर्भ में औसत जीवन प्रत्याशा और महिला लिंगानुपात ( भारत के संदर्भ में 943 प्रति 1000 पुरुष ) । यदि पैरिटी की मात्र 6 % से कम हो तो पैरिटी को शामिल नहीं किया जाता और अगर 6 % से ज्यादा है तो पैरिटी को शामिल किया जाता है । पैरिटी से तात्पर्य है की यह माना जाता है की महिलाएं औसतन पुरुषो से ज्यादा लंबे समय तक जीवित रहती है । आर्थिक भागीदारी से तात्पर्य है की अवसरो में समानता के साथ साथ , समान वेतन , भागीदारी का स्तर और उच्च तकनीकी कौशलों में उनकी भागीदारी । राजनीतिक सशक्तिकरण से तात्पर्य है की फैसले लेने वाली संस्थागत ढांचो में उनका प्रतिनिधित्व और उनकी भागीदारी जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र शामिल हैं । भारत द्वारा 149 देशो की रैंकिंग में 108 वां स्थान प्राप्त किया गया । इसके साथ ही भारत के संदर्भ में इसकी 2017 की रैंकिंग से वर्तमान रैंकिंग में कोई सुधार नही हुआ है ।भारत द्वारा पिछले साल की अपेक्षा इस साल अपनी रैंकिंग में कोई सुधार नही किया गया । भारत के संदर्भ में लिंग आधारित असमानता लगभग 33 % के करीब है । इसके साथ ही भारत द्वारा ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स के सभी आयामों पर अत्यंत ही निम्न स्तर का प्रयास किया गया । स्वास्थ्य और उत्तरजीविता से संदर्भ में तो यह स्थिति और खराब है और इस संदर्भ में भारत 149 देशो में अंतिम तीन देशो में शामिल है ।स्वास्थ और उत्तरजीविता में भारत 147 वें स्थान पर हैं और आर्मेनिया 148 तथा चीन 149 वें स्थान है । भारत के पड़ोसी देशो में महिला स्वास्थ और उत्तरजीविता के संदर्भ में श्रीलंका सबसे आगे और उसके बाद बांग्लादेश का स्थान है ।अर्थात भारत दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशो से भी पीछे है । भारत द्वारा ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में बेहतर प्रदर्शन करने और अपने आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में सुधार के साथ साथ सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी ढांचे में सुधार की आवश्यकता है ।जिसके निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- महिला स्वास्थ्य सुरक्षा पर विशेष प्रयास किया जाना चाहिए और सरकार को अपने स्वास्थ्य बजट को बढ़ाना चाहिए । जिससे प्राथमिक , द्वितीयक और तृतीयक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर किया जा सके ।भारत में उच्च MMR लचर स्वास्थ्य सेवाओ का सूचक है । सरकार द्वारा चलायी जा रही योजना जैसे- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना, जननी सुरक्षा योजना , महिला स्वास्थ और विकास कार्यक्रम आदि योजनओं को प्रभावी तरीके से संचालित करने की आवश्यकता है । महिलाओं की प्राथमिक और उच्च शिक्षा में प्रभावी भागीदारी को बढ़ाना चाहिए । इसके लिए विभिन्न सरकारी योजनाएँ जो विशेषकर महिलाओं को ध्यान रखकर चलायी जा रही है जैसे सबला योजना , महिला शिक्षा के लिए साक्षर भारत मिशन , कस्तूरबा गांधी विद्यालय योजना आदि कार्यक्रमों के साथ साथ शिक्षा के अधिकार को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने की अवश्यकता है । श्रमबल में महिला भागीदारी बढ़ाने के लिए तथा महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए , उनकी कार्यस्थल पर सुरक्षा के साथ-साथ लिंग संवेदनशील ( जेंडर सेनसेटिव ) वातावरण तैयार करने की आवश्यकता है । इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओ के माध्यम से महिलाओं में उद्यमशिलता का विकास करने की अवश्यकता है । सरकारी योजनाए जैसे स्टेप ( STEP ) , स्टैंड अप इंडिया , महिला ई-हाट जैसे कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से क्रियान्वित करने की अवश्यकता है । इसके साथ ही महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और उनका सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की अवश्यकता है । राजनीतिक भागीदारी में विभिन्न आयामो को शामिल किए जाने की आवश्यकता है ,जिसमे निर्णय निर्माण सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रो के साथ साथ समाज सेवाओ में भीं उनकी भागीदारी को बढ़ाने की अवश्यकता है । 73 वें व 74 वें संविधान संसोधन द्वारा ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं को 33 % आरक्षण देना इस दिशा में सकारात्मक प्रयास था । हालांकि कुछ राज्यों में इसे बढ़ाकर 50 % तक कर दिया गया है जो एक सराहनीय प्रयास है । इसके साथ ही सरकार को जल्द से जल्द महिला आरक्षण बिल को पास करवाकर उच्च सदनो में भी उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। उपरोक्त उपायों को अपनाकर सरकार द्वारा देश की आधी आबादी की देश के विकास में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है । क्योंकि एक सर्वे के अनुसार भारत में महिलायो को 33 % श्रमबल में भागीदारी भारत के सकल घरेलू अनुपात में 2 % की वृद्धि कर सकता है । इसके साथ ही भारत अपने एसडीजी लक्ष्यों में लक्ष्य नंबर 4 , 5 और 10 को प्रभावी तरीके से प्राप्त कर सकता है ।
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What do you understand by Winds? Discuss the forces affecting the velocity and direction of wind. (10 Marks/150 words)
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Brief approach- Define winds briefly mentions forces affecting the speed and direction of winds Provide a rough diagram for the same ANSWER Wind is the movement of air which is caused by the uneven heating of the Earth by the sun and also due to its own rotation. It is the winds mechanism which helps in the global distribution of low and high pressure, also being an integral part of the thermodynamic mechanism of atmosphere it helps in the transfer of heat, moisture and other properties from one place to another. Sun is the ultimate driving force which creates pressure difference while unevenly heating the earth"s surface. This pressure difference results in movement of wind from the region of high pressure to theregion of low pressure. There are various factors which affect the velocity and direction of the wind: 1) Pressure gradient force: The rate of change of pressure with respect to distance is the pressure gradient. It results from the generation of a horizontal movement of winds and operates from the region of high pressure to low pressure. The pressure gradient is strong where the isobars are close to each other, hence implies a strong wind speed and the pressure gradient is weak where the isobars are apart implying a weak wind speed. The direction of wind follows the direction of change of pressure, i.e. perpendicular to the isobars. 2) Frictional Force: The unevenness in earth"s surface provides resistance to the movement of wind in the form of friction. This frictional force affects the speed of the wind. It is greatest at the surface and its influence generally extends up to an elevation of 1 - 3 km. Over the sea surface, the friction is minimal so the air moves at low angles to the isobars and at a greater speed. However, an uneven terrain offers high friction and hence the wind direction makes high angles with the isobars and its speed gets retarded. 3) Coriolis Force: The rotation of the earth about its axis affects the direction of the wind. This force is called the Coriolis force which is maximum at the poles and is absent at the equator. It deflects the wind to the right direction in the northern hemisphere and to the left in the southern hemisphere. The deflection is more when the wind velocity is high. The Coriolis force is directly proportional to the angle of latitude. The Coriolis force acts perpendicular to the pressure gradient force. The higher the pressure gradient force, the more is the velocity of the wind and the larger is the deflection in the direction of the wind. (students should draw the map of earth showing deflection of wind with the action of Coriolis force) 4) Centripetal acceleration: Because of the inward acceleration of air towards the centre of rotation on the rotating earth, it produces a circular pattern of flow around centres of high and low pressure which is directed at right angles to the wind movement and inwards towards the centres of rotation. 5) Gravitational force: It is the force of attraction towards Earth’s surface and acts similarly on wind/atmosphere as it works on any other object.
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##Question:What do you understand by Winds? Discuss the forces affecting the velocity and direction of wind. (10 Marks/150 words)##Answer:Brief approach- Define winds briefly mentions forces affecting the speed and direction of winds Provide a rough diagram for the same ANSWER Wind is the movement of air which is caused by the uneven heating of the Earth by the sun and also due to its own rotation. It is the winds mechanism which helps in the global distribution of low and high pressure, also being an integral part of the thermodynamic mechanism of atmosphere it helps in the transfer of heat, moisture and other properties from one place to another. Sun is the ultimate driving force which creates pressure difference while unevenly heating the earth"s surface. This pressure difference results in movement of wind from the region of high pressure to theregion of low pressure. There are various factors which affect the velocity and direction of the wind: 1) Pressure gradient force: The rate of change of pressure with respect to distance is the pressure gradient. It results from the generation of a horizontal movement of winds and operates from the region of high pressure to low pressure. The pressure gradient is strong where the isobars are close to each other, hence implies a strong wind speed and the pressure gradient is weak where the isobars are apart implying a weak wind speed. The direction of wind follows the direction of change of pressure, i.e. perpendicular to the isobars. 2) Frictional Force: The unevenness in earth"s surface provides resistance to the movement of wind in the form of friction. This frictional force affects the speed of the wind. It is greatest at the surface and its influence generally extends up to an elevation of 1 - 3 km. Over the sea surface, the friction is minimal so the air moves at low angles to the isobars and at a greater speed. However, an uneven terrain offers high friction and hence the wind direction makes high angles with the isobars and its speed gets retarded. 3) Coriolis Force: The rotation of the earth about its axis affects the direction of the wind. This force is called the Coriolis force which is maximum at the poles and is absent at the equator. It deflects the wind to the right direction in the northern hemisphere and to the left in the southern hemisphere. The deflection is more when the wind velocity is high. The Coriolis force is directly proportional to the angle of latitude. The Coriolis force acts perpendicular to the pressure gradient force. The higher the pressure gradient force, the more is the velocity of the wind and the larger is the deflection in the direction of the wind. (students should draw the map of earth showing deflection of wind with the action of Coriolis force) 4) Centripetal acceleration: Because of the inward acceleration of air towards the centre of rotation on the rotating earth, it produces a circular pattern of flow around centres of high and low pressure which is directed at right angles to the wind movement and inwards towards the centres of rotation. 5) Gravitational force: It is the force of attraction towards Earth’s surface and acts similarly on wind/atmosphere as it works on any other object.
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भारत में सूफी आन्दोलन का बहुआयामी प्रभाव दिखाई देता है लेकिन इसके प्रभाव सीमाओं से मुक्त नहीं थे | संगत तर्कों के साथ कथन की समीक्षा कीजिये| (150-200 शब्द;10 अंक) The multidimensional influence of the Sufi movement is visible in India but its influences were not free from limitations. Review the statement with relevant arguments. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण- भूमिका में सूफी आन्दोलन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये, प्रथम भाग में भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभावों को स्पष्ट कीजिये, दूसरे भाग में सूफी आन्दोलन की प्रमुख सीमाओं की चर्चा कीजिये अंतिम में सूफी आन्दोलन के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| सूफी शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द सफा से हुई है जिसके दो अर्थ हैं; पहला, ऐसे व्यक्ति जो ऊनी वस्त्र पहनते हैं और दूसरे अर्थ में इसको शुद्धता और पवित्रता और पवित्रता से सम्बन्धित किया जाता है | सूफीवाद कुरान की उदार व्याख्या( तरीकत) से सम्बन्धित है। ध्यातव्य है कि शरीयत में कुरान की रूढ़िवादी व्याख्या की गई है। वस्तुतः सूफीवाद इस्लाम के भीतर अपेक्षाकृत उदारवादी धारा है जो गुरु के निर्देशन में ईश्वर के साथ एकाकार या जुड़ने पर बल देती है| सामाजिक-धार्मिक जीवन में रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, इस्लामिक शासकों का विलासिता युक्त जीवन, और गैर-इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव आदि कारणों ने सूफी आन्दोलन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| भारत में सूफी आन्दोलन का प्रवेश महमूद गजनी के आक्रमणों के साथ माना जाता है| कालान्तर में भारत में सूफी वाद की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ जिन्होंने भारत पर बहुआयामी प्रभाव डाला| सूफी आन्दोलन का प्रभाव धार्मिक दृष्टिकोण से धर्म के रुढ़िवादी तत्वों के स्थान पर दया, सहिष्णुता, प्रेम जैसे तत्वों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया सूफी आन्दोलन ने धर्म की जटिलता और कर्मकांडों का विरोध करते हुए धर्म का सरलीकरण किया भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि इनके आचरण से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाया गृहस्थ जीवन अपनाना, एकेश्वरवाद, कर्मकांडों की आलोचना, गुरु को महत्त्व देने जैसी विशेषताएं निर्गुण संतों की गतिविधियों में देखी जा सकती हैं, इस तरह भक्ति आन्दोलन पर भी सूफी संतों का प्रभाव भी दिखाई देता है सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से सूफी संतों ने समाज के सभी वर्गों के साथ एक जैसा व्यवहार किया,इससे समाज के लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली या समानता के विचार को महत्त्व मिला खानकाहों में विविध धर्म, जाति एवं वर्गों के लोग आते थे, इससे सामाजिक संश्लेषण की प्रक्रिया को मजबूती मिली सूफी संतों द्वारा शारीरिक श्रम को महत्त्व दिया जाता था, इनकी दरगाहों के आस-पास क्रमशः बड़े पैमानों पर आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ जैसे अजमेर जैसे नगरों का विकास आदि सूफी संतों की शिक्षाओं ने आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया जैसे सूफियों ने धन संचय एवं कालाबाजारी की आलोचना की राजनीतिक प्रभाव प्रायः सूफी संतों ने राजनीति से दूरी बनाए रखी फिर भी समकालीन राजनीति इनके प्रभाव से अछूती नहीं रही जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव रहा उनकी नीतियों में उदारता एवं सहिष्णुता के तत्व देखे जा सकते हैं जैसे मुहम्मद बिन तुगलक, अकबर आदि इस्लामिक शासक वर्ग को भारतीय समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता दिलाने में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत में भाषा के रूप में उर्दू की उत्पत्ति एवं उसके विकास में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| ध्यातव्य है कि सूफी कवि अमीर खुशरो को उर्दू भाषा का प्रथम महत्वपूर्ण कवि माना जाता है उर्दू के साथ ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में सूफी संतों का योगदान देखा जा सकता है, जैसे पंजाबी के विकास में बाबा फरीद, अवधी भाषा के विकास में मालिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउदके योगदानों को देख सकते हैं संगीत के विकास में सूफी संतों विशेषकर चिश्ती संतों ने समा(सामूहिक संगीत) को लोकप्रिय बनाया| भारत सहित मध्य एवं पश्चिम एशिया में आज भी सूफी संगीत लोकप्रिय बना हुआ है| गायन की विधा के रूप में कव्वाली, विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे सितार आदि की शुरुआत सूफी साधकों द्वारा की गयी थी| हालाँकि स्थापत्य के विकास में सूफी संतों का प्रत्यक्षतः विशेष योगदान नहीं है क्योंकि ये सरल जीवन जीने में विश्वास रखते थे लेकिन इनकी मृत्यु के पश्चात इनके अनुयायियों और शासकों ने दरगाहों एवं खानकाहों का निर्माण करवाया| ये दरगाहें और खानकाह आज भी सामासिक संस्कृति का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं| उपरोक्त विन्दुओं से स्पष्ट होता है कि सूफी आन्दोलन ने भारतीय इतिहास पर व्यापक एवं बहुआयामी प्रभाव डाले किन्तु सूफी आन्दोलन के प्रभाव कुछ सीमाओं से भी युक्त थे जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है सूफी आन्दोलन की सीमाएं इनका प्रभाव मुख्यतः नगरीय एवं निम्न वर्गों के मध्य तक ही सीमित था अर्थात इनका सामाजिक आधार समावेशी नहीं था| सूफियों की गतिविधियों से धर्मांतरण को बढ़ावा मिला जिससे यदा-कदा यह सामाजिक तनाव का भी कारण बना| सूफी संतों के प्रयासों के बाद भी राजनीति और समाज पर रुढ़िवादी उलेमावर्ग का प्रभाव बना रहा| सूफियों के प्रभाव के बाद भी शासक वर्ग में विलासितापूर्ण जीवन शैली अपनाने तथा धार्मिक नीतियों में कटुता के उदहारण देखे जा सकते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में सूफी आन्दोलन के मिश्रित प्रभाव पड़े तथापि सूफी आन्दोलन की सीमाएं इसके सकारात्मक प्रभावों के सापेक्ष कम महत्त्व की प्रतीत होती हैं | व्यापक संदर्भों में सूफी आन्दोलन ने भारत में धर्मों के मध्य सामंजस्य का स्थापना कर तथा भारत के मुख्य धर्मों के मध्य आपसी समझ का विस्तार कर सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
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##Question:भारत में सूफी आन्दोलन का बहुआयामी प्रभाव दिखाई देता है लेकिन इसके प्रभाव सीमाओं से मुक्त नहीं थे | संगत तर्कों के साथ कथन की समीक्षा कीजिये| (150-200 शब्द;10 अंक) The multidimensional influence of the Sufi movement is visible in India but its influences were not free from limitations. Review the statement with relevant arguments. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में सूफी आन्दोलन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये, प्रथम भाग में भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभावों को स्पष्ट कीजिये, दूसरे भाग में सूफी आन्दोलन की प्रमुख सीमाओं की चर्चा कीजिये अंतिम में सूफी आन्दोलन के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| सूफी शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द सफा से हुई है जिसके दो अर्थ हैं; पहला, ऐसे व्यक्ति जो ऊनी वस्त्र पहनते हैं और दूसरे अर्थ में इसको शुद्धता और पवित्रता और पवित्रता से सम्बन्धित किया जाता है | सूफीवाद कुरान की उदार व्याख्या( तरीकत) से सम्बन्धित है। ध्यातव्य है कि शरीयत में कुरान की रूढ़िवादी व्याख्या की गई है। वस्तुतः सूफीवाद इस्लाम के भीतर अपेक्षाकृत उदारवादी धारा है जो गुरु के निर्देशन में ईश्वर के साथ एकाकार या जुड़ने पर बल देती है| सामाजिक-धार्मिक जीवन में रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, इस्लामिक शासकों का विलासिता युक्त जीवन, और गैर-इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव आदि कारणों ने सूफी आन्दोलन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| भारत में सूफी आन्दोलन का प्रवेश महमूद गजनी के आक्रमणों के साथ माना जाता है| कालान्तर में भारत में सूफी वाद की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ जिन्होंने भारत पर बहुआयामी प्रभाव डाला| सूफी आन्दोलन का प्रभाव धार्मिक दृष्टिकोण से धर्म के रुढ़िवादी तत्वों के स्थान पर दया, सहिष्णुता, प्रेम जैसे तत्वों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया सूफी आन्दोलन ने धर्म की जटिलता और कर्मकांडों का विरोध करते हुए धर्म का सरलीकरण किया भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि इनके आचरण से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाया गृहस्थ जीवन अपनाना, एकेश्वरवाद, कर्मकांडों की आलोचना, गुरु को महत्त्व देने जैसी विशेषताएं निर्गुण संतों की गतिविधियों में देखी जा सकती हैं, इस तरह भक्ति आन्दोलन पर भी सूफी संतों का प्रभाव भी दिखाई देता है सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से सूफी संतों ने समाज के सभी वर्गों के साथ एक जैसा व्यवहार किया,इससे समाज के लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली या समानता के विचार को महत्त्व मिला खानकाहों में विविध धर्म, जाति एवं वर्गों के लोग आते थे, इससे सामाजिक संश्लेषण की प्रक्रिया को मजबूती मिली सूफी संतों द्वारा शारीरिक श्रम को महत्त्व दिया जाता था, इनकी दरगाहों के आस-पास क्रमशः बड़े पैमानों पर आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ जैसे अजमेर जैसे नगरों का विकास आदि सूफी संतों की शिक्षाओं ने आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया जैसे सूफियों ने धन संचय एवं कालाबाजारी की आलोचना की राजनीतिक प्रभाव प्रायः सूफी संतों ने राजनीति से दूरी बनाए रखी फिर भी समकालीन राजनीति इनके प्रभाव से अछूती नहीं रही जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव रहा उनकी नीतियों में उदारता एवं सहिष्णुता के तत्व देखे जा सकते हैं जैसे मुहम्मद बिन तुगलक, अकबर आदि इस्लामिक शासक वर्ग को भारतीय समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता दिलाने में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत में भाषा के रूप में उर्दू की उत्पत्ति एवं उसके विकास में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| ध्यातव्य है कि सूफी कवि अमीर खुशरो को उर्दू भाषा का प्रथम महत्वपूर्ण कवि माना जाता है उर्दू के साथ ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में सूफी संतों का योगदान देखा जा सकता है, जैसे पंजाबी के विकास में बाबा फरीद, अवधी भाषा के विकास में मालिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउदके योगदानों को देख सकते हैं संगीत के विकास में सूफी संतों विशेषकर चिश्ती संतों ने समा(सामूहिक संगीत) को लोकप्रिय बनाया| भारत सहित मध्य एवं पश्चिम एशिया में आज भी सूफी संगीत लोकप्रिय बना हुआ है| गायन की विधा के रूप में कव्वाली, विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे सितार आदि की शुरुआत सूफी साधकों द्वारा की गयी थी| हालाँकि स्थापत्य के विकास में सूफी संतों का प्रत्यक्षतः विशेष योगदान नहीं है क्योंकि ये सरल जीवन जीने में विश्वास रखते थे लेकिन इनकी मृत्यु के पश्चात इनके अनुयायियों और शासकों ने दरगाहों एवं खानकाहों का निर्माण करवाया| ये दरगाहें और खानकाह आज भी सामासिक संस्कृति का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं| उपरोक्त विन्दुओं से स्पष्ट होता है कि सूफी आन्दोलन ने भारतीय इतिहास पर व्यापक एवं बहुआयामी प्रभाव डाले किन्तु सूफी आन्दोलन के प्रभाव कुछ सीमाओं से भी युक्त थे जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है सूफी आन्दोलन की सीमाएं इनका प्रभाव मुख्यतः नगरीय एवं निम्न वर्गों के मध्य तक ही सीमित था अर्थात इनका सामाजिक आधार समावेशी नहीं था| सूफियों की गतिविधियों से धर्मांतरण को बढ़ावा मिला जिससे यदा-कदा यह सामाजिक तनाव का भी कारण बना| सूफी संतों के प्रयासों के बाद भी राजनीति और समाज पर रुढ़िवादी उलेमावर्ग का प्रभाव बना रहा| सूफियों के प्रभाव के बाद भी शासक वर्ग में विलासितापूर्ण जीवन शैली अपनाने तथा धार्मिक नीतियों में कटुता के उदहारण देखे जा सकते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में सूफी आन्दोलन के मिश्रित प्रभाव पड़े तथापि सूफी आन्दोलन की सीमाएं इसके सकारात्मक प्रभावों के सापेक्ष कम महत्त्व की प्रतीत होती हैं | व्यापक संदर्भों में सूफी आन्दोलन ने भारत में धर्मों के मध्य सामंजस्य का स्थापना कर तथा भारत के मुख्य धर्मों के मध्य आपसी समझ का विस्तार कर सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
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Currently, less than one-fourth of the female population is a part of the labor force in India. Suggest the reasons why the LFPR for females in so low in our country. (150 words I 10 marks)
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APPROACH: - INTRODUCTION: Definition of the LFPR with some data to corroborate the issue presented in the question. - THE REASONS WHY THE LFPR IS SO LOW FOR WOMEN IN INDIA - CONCLUSION Finding from the Economic Survey quoted with the way forward. ANSWER:- Labour Force Participation Rate is defined as the ratio of the labour force to the total population (multiplied by 100 to arrive at the percentage figure). The labour force participation rate (hereafter referred to as LFPR) is around 75% for men while around 23.75% for women. Therefore, only around 1/4th of the female population are in the labour force. THE REASONS WHY THE LFPR IS SO LOW FOR WOMEN IN INDIA 1) PAID VERSUS UNPAID HOURS As per the Time Use Survey, quoted by the Economic Survey, the share of women devoted to unpaid hours in India is around 9.6 times the hours devoted by men (in India). This figure is only 3 times when taken for the worlds average-i.e. share of women in unpaid work hours is around 3 times that of the hours devoted by men in the world. 2) INCREASE IN THE INCOME LEVEL IN SOCIETY As per the Economic Survey, an increase in the income level in society has been a discouraging factor. When the income levels were low, people/ families were forced to send their women for work. However, with the rise in income level, people do not prefer to send their women for work. 2.1) All the gender gap indices like the Gender Development Index show huge disparities among men and women in India. India ranks low in most of such indices. 3) META-SON PREFERENCE It means that people in India prefer to have children until they produce the desired number of boys. For example, if a family wants to have 2 boys, then they will keep on having children until they have 2 boys. This has created two problems 3.1) THE PROBLEM OF UNWANTED GIRLS Unwanted girls are discriminated against. For example, they will not care about the health of the girl child etc. 3.2) MISSING WOMEN The unwanted girl children are aborted. As stated, they will not care about the health and nutrition of their girl children. Thus, the mortality rate of women is much higher than that for men in India. 4) PATRIARCHAL SOCIETY Women are not preferred to work in India. Contrary to popular perception, this issue is more widespread among the more well off families and in the urban areas. ( This is so as women are forced to work on agricultural fields etc. due to poverty in the rural areas). 5) HOUSEHOLD ACTIVITIES Women are mainly engaged in household work. 6) LOWER LITERACY RATE Lower literacy rate means that they are unable to find suitable jobs. 6.1) Lower literacy rate implies that their level of skill development is less. Therefore, their chances of finding skilled employment are also low. 7) CONSTRAINING FACTORS Women require safety. The cases of eve-teasing, molestation, rapes are quite high. This makes them and their families feel unsafe to send them out of their homes. Also, women prefer convenience because they give prime importance to their families. Development implies that gender disparities should decrease. The Economic Survey compared gender parity on 15 parameters. It was found that, in India, with development, there was an improvement in 13 out of 15 indicators. However, there was worsening on 2 parameters. One was that the employment rate for women was very low. Also, there was a gap in pay parity of around 14%. The way forward here is that the labour laws should not be too rigid. For example, due to the maternity benefit act, firms do not want to hire women, as they have to provide them 26 weeks of paid leave. Laws should be more facilitative than rigid. Therefore, labour laws require more reform.
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##Question:Currently, less than one-fourth of the female population is a part of the labor force in India. Suggest the reasons why the LFPR for females in so low in our country. (150 words I 10 marks)##Answer:APPROACH: - INTRODUCTION: Definition of the LFPR with some data to corroborate the issue presented in the question. - THE REASONS WHY THE LFPR IS SO LOW FOR WOMEN IN INDIA - CONCLUSION Finding from the Economic Survey quoted with the way forward. ANSWER:- Labour Force Participation Rate is defined as the ratio of the labour force to the total population (multiplied by 100 to arrive at the percentage figure). The labour force participation rate (hereafter referred to as LFPR) is around 75% for men while around 23.75% for women. Therefore, only around 1/4th of the female population are in the labour force. THE REASONS WHY THE LFPR IS SO LOW FOR WOMEN IN INDIA 1) PAID VERSUS UNPAID HOURS As per the Time Use Survey, quoted by the Economic Survey, the share of women devoted to unpaid hours in India is around 9.6 times the hours devoted by men (in India). This figure is only 3 times when taken for the worlds average-i.e. share of women in unpaid work hours is around 3 times that of the hours devoted by men in the world. 2) INCREASE IN THE INCOME LEVEL IN SOCIETY As per the Economic Survey, an increase in the income level in society has been a discouraging factor. When the income levels were low, people/ families were forced to send their women for work. However, with the rise in income level, people do not prefer to send their women for work. 2.1) All the gender gap indices like the Gender Development Index show huge disparities among men and women in India. India ranks low in most of such indices. 3) META-SON PREFERENCE It means that people in India prefer to have children until they produce the desired number of boys. For example, if a family wants to have 2 boys, then they will keep on having children until they have 2 boys. This has created two problems 3.1) THE PROBLEM OF UNWANTED GIRLS Unwanted girls are discriminated against. For example, they will not care about the health of the girl child etc. 3.2) MISSING WOMEN The unwanted girl children are aborted. As stated, they will not care about the health and nutrition of their girl children. Thus, the mortality rate of women is much higher than that for men in India. 4) PATRIARCHAL SOCIETY Women are not preferred to work in India. Contrary to popular perception, this issue is more widespread among the more well off families and in the urban areas. ( This is so as women are forced to work on agricultural fields etc. due to poverty in the rural areas). 5) HOUSEHOLD ACTIVITIES Women are mainly engaged in household work. 6) LOWER LITERACY RATE Lower literacy rate means that they are unable to find suitable jobs. 6.1) Lower literacy rate implies that their level of skill development is less. Therefore, their chances of finding skilled employment are also low. 7) CONSTRAINING FACTORS Women require safety. The cases of eve-teasing, molestation, rapes are quite high. This makes them and their families feel unsafe to send them out of their homes. Also, women prefer convenience because they give prime importance to their families. Development implies that gender disparities should decrease. The Economic Survey compared gender parity on 15 parameters. It was found that, in India, with development, there was an improvement in 13 out of 15 indicators. However, there was worsening on 2 parameters. One was that the employment rate for women was very low. Also, there was a gap in pay parity of around 14%. The way forward here is that the labour laws should not be too rigid. For example, due to the maternity benefit act, firms do not want to hire women, as they have to provide them 26 weeks of paid leave. Laws should be more facilitative than rigid. Therefore, labour laws require more reform.
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भारत में सूफी आन्दोलन का बहुआयामी प्रभाव दिखाई देता है लेकिन इसके प्रभाव सीमाओं से मुक्त नहीं थे | संगत तर्कों के साथ कथन की समीक्षा कीजिये| (200 शब्द)
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दृष्टिकोण- भूमिका में सूफी आन्दोलन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये, प्रथम भाग में भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभावों को स्पष्ट कीजिये, दूसरे भाग में सूफी आन्दोलन की प्रमुख सीमाओं की चर्चा कीजिये अंतिम में सूफी आन्दोलन के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| सूफी शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द सफा से हुई है जिसके दो अर्थ हैं; पहला, ऐसे व्यक्ति जो ऊनी वस्त्र पहनते हैं और दूसरे अर्थ में इसको शुद्धता और पवित्रता और पवित्रता से सम्बन्धित किया जाता है | सूफीवाद कुरान की उदार व्याख्या( तरीकत) से सम्बन्धित है। ध्यातव्य है कि शरीयत में कुरान की रूढ़िवादी व्याख्या की गई है। वस्तुतः सूफीवाद इस्लाम के भीतर अपेक्षाकृत उदारवादी धारा है जो गुरु के निर्देशन में ईश्वर के साथ एकाकार या जुड़ने पर बल देती है| सामाजिक-धार्मिक जीवन में रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, इस्लामिक शासकों का विलासिता युक्त जीवन, और गैर-इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव आदि कारणों ने सूफी आन्दोलन के उदय में पूर्ण भूमिका निभायी| भारत में सूफी आन्दोलन का प्रवेश महमूद गजनी के आक्रमणों के साथ माना जाता है| कालान्तर में भारत में सूफी वाद की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ जिन्होंने भारत पर बहुआयामी प्रभाव डाला| सूफी आन्दोलन का प्रभाव धार्मिक दृष्टिकोण से धर्म के रुढ़िवादी तत्वों के स्थान पर दया, सहिष्णुता, प्रेम जैसे तत्वों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया सूफी आन्दोलन ने धर्म की जटिलता और कर्मकांडों का विरोध करते हुए धर्म का सरलीकरण किया भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि इनके आचरण से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाया गृहस्थ जीवन अपनाना, एकेश्वरवाद, कर्मकांडों की आलोचना, गुरु को महत्त्व देने जैसी विशेषताएं निर्गुण संतों की गतिविधियों में देखी जा सकती हैं, इस तरह भक्ति आन्दोलन पर भी सूफी संतों का प्रभाव भी दिखाई देता है सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से सूफी संतों ने समाज के सभी वर्गों के साथ एक जैसा व्यवहार किया,इससे समाज के लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली या समानता के विचार को महत्त्व मिला खानकाहों में विविध धर्म, जाति एवं वर्गों के लोग आते थे, इससे सामाजिक संश्लेषण की प्रक्रिया को मजबूती मिली सूफी संतों द्वारा शारीरिक श्रम को महत्त्व दिया जाता था, इनकी दरगाहों के आस-पास क्रमशः बड़े पैमानों पर आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ जैसे अजमेर जैसे नगरों का विकास आदि सूफी संतों की शिक्षाओं ने आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया जैसे सूफियों ने धन संचय एवं कालाबाजारी की आलोचना की राजनीतिक प्रभाव प्रायः सूफी संतों ने राजनीति से दूरी बनाए रखी फिर भी समकालीन राजनीति इनके प्रभाव से अछूती नहीं रही जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव रहा उनकी नीतियों में उदारता एवं सहिष्णुता के तत्व देखे जा सकते हैं जैसे मुहम्मद बिन तुगलक, अकबर आदि इस्लामिक शासक वर्ग को भारतीय समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता दिलाने में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत में भाषा के रूप में उर्दू की उत्पत्ति एवं उसके विकास में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| ध्यातव्य है कि सूफी कवि अमीर खुशरो को उर्दू भाषा का प्रथम महत्वपूर्ण कवि माना जाता है उर्दू के साथ ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में सूफी संतों का योगदान देखा जा सकता है, जैसे पंजाबी के विकास में बाबा फरीद, अवधी भाषा के विकास में मालिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउदके योगदानों को देख सकते हैं संगीत के विकास में सूफी संतों विशेषकर चिश्ती संतों ने समा(सामूहिक संगीत) को लोकप्रिय बनाया| भारत सहित मध्य एवं पश्चिम एशिया में आज भी सूफी संगीत लोकप्रिय बना हुआ है| गायन की विधा के रूप में कव्वाली, विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे सितार आदि की शुरुआत सूफी साधकों द्वारा की गयी थी| हालाँकि स्थापत्य के विकास में सूफी संतों का प्रत्यक्षतः विशेष योगदान नहीं है क्योंकि ये सरल जीवन जीने में विश्वास रखते थे लेकिन इनकी मृत्यु के पश्चात इनके अनुयायियों और शासकों ने दरगाहों एवं खानकाहों का निर्माण करवाया| ये दरगाहें और खानकाह आज भी सामासिक संस्कृति का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं| उपरोक्त विन्दुओं से स्पष्ट होता है कि सूफी आन्दोलन ने भारतीय इतिहास पर व्यापक एवं बहुआयामी प्रभाव डाले किन्तु सूफी आन्दोलन के प्रभाव कुछ सीमाओं से भी युक्त थे जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है सूफी आन्दोलन की सीमाएं इनका प्रभाव मुख्यतः नगरीय एवं निम्न वर्गों के मध्य तक ही सीमित था अर्थात इनका सामाजिक आधार समावेशी नहीं था| सूफियों की गतिविधियों से धर्मांतरण को बढ़ावा मिला जिससे यदा-कदा यह सामाजिक तनाव का भी कारण बना| सूफी संतों के प्रयासों के बाद भी राजनीति और समाज पर रुढ़िवादी उलेमावर्ग का प्रभाव बना रहा| सूफियों के प्रभाव के बाद भी शासक वर्ग में विलासितापूर्ण जीवन शैली अपनाने तथा धार्मिक नीतियों में कटुता के उदहारण देखे जा सकते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में सूफी आन्दोलन के मिश्रित प्रभाव पड़े तथापि सूफी आन्दोलन की सीमाएं इसके सकारात्मक प्रभावों के सापेक्ष कम महत्त्व की प्रतीत होती हैं | व्यापक संदर्भों में सूफी आन्दोलन ने भारत में धर्मों के मध्य सामंजस्य का स्थापना कर तथा भारत के मुख्य धर्मों के मध्य आपसी समझ का विस्तार कर सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
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##Question:भारत में सूफी आन्दोलन का बहुआयामी प्रभाव दिखाई देता है लेकिन इसके प्रभाव सीमाओं से मुक्त नहीं थे | संगत तर्कों के साथ कथन की समीक्षा कीजिये| (200 शब्द)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में सूफी आन्दोलन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये, प्रथम भाग में भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभावों को स्पष्ट कीजिये, दूसरे भाग में सूफी आन्दोलन की प्रमुख सीमाओं की चर्चा कीजिये अंतिम में सूफी आन्दोलन के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये| सूफी शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द सफा से हुई है जिसके दो अर्थ हैं; पहला, ऐसे व्यक्ति जो ऊनी वस्त्र पहनते हैं और दूसरे अर्थ में इसको शुद्धता और पवित्रता और पवित्रता से सम्बन्धित किया जाता है | सूफीवाद कुरान की उदार व्याख्या( तरीकत) से सम्बन्धित है। ध्यातव्य है कि शरीयत में कुरान की रूढ़िवादी व्याख्या की गई है। वस्तुतः सूफीवाद इस्लाम के भीतर अपेक्षाकृत उदारवादी धारा है जो गुरु के निर्देशन में ईश्वर के साथ एकाकार या जुड़ने पर बल देती है| सामाजिक-धार्मिक जीवन में रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, इस्लामिक शासकों का विलासिता युक्त जीवन, और गैर-इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव आदि कारणों ने सूफी आन्दोलन के उदय में पूर्ण भूमिका निभायी| भारत में सूफी आन्दोलन का प्रवेश महमूद गजनी के आक्रमणों के साथ माना जाता है| कालान्तर में भारत में सूफी वाद की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ जिन्होंने भारत पर बहुआयामी प्रभाव डाला| सूफी आन्दोलन का प्रभाव धार्मिक दृष्टिकोण से धर्म के रुढ़िवादी तत्वों के स्थान पर दया, सहिष्णुता, प्रेम जैसे तत्वों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया सूफी आन्दोलन ने धर्म की जटिलता और कर्मकांडों का विरोध करते हुए धर्म का सरलीकरण किया भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि इनके आचरण से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाया गृहस्थ जीवन अपनाना, एकेश्वरवाद, कर्मकांडों की आलोचना, गुरु को महत्त्व देने जैसी विशेषताएं निर्गुण संतों की गतिविधियों में देखी जा सकती हैं, इस तरह भक्ति आन्दोलन पर भी सूफी संतों का प्रभाव भी दिखाई देता है सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से सूफी संतों ने समाज के सभी वर्गों के साथ एक जैसा व्यवहार किया,इससे समाज के लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली या समानता के विचार को महत्त्व मिला खानकाहों में विविध धर्म, जाति एवं वर्गों के लोग आते थे, इससे सामाजिक संश्लेषण की प्रक्रिया को मजबूती मिली सूफी संतों द्वारा शारीरिक श्रम को महत्त्व दिया जाता था, इनकी दरगाहों के आस-पास क्रमशः बड़े पैमानों पर आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ जैसे अजमेर जैसे नगरों का विकास आदि सूफी संतों की शिक्षाओं ने आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया जैसे सूफियों ने धन संचय एवं कालाबाजारी की आलोचना की राजनीतिक प्रभाव प्रायः सूफी संतों ने राजनीति से दूरी बनाए रखी फिर भी समकालीन राजनीति इनके प्रभाव से अछूती नहीं रही जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव रहा उनकी नीतियों में उदारता एवं सहिष्णुता के तत्व देखे जा सकते हैं जैसे मुहम्मद बिन तुगलक, अकबर आदि इस्लामिक शासक वर्ग को भारतीय समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता दिलाने में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत में भाषा के रूप में उर्दू की उत्पत्ति एवं उसके विकास में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| ध्यातव्य है कि सूफी कवि अमीर खुशरो को उर्दू भाषा का प्रथम महत्वपूर्ण कवि माना जाता है उर्दू के साथ ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में सूफी संतों का योगदान देखा जा सकता है, जैसे पंजाबी के विकास में बाबा फरीद, अवधी भाषा के विकास में मालिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउदके योगदानों को देख सकते हैं संगीत के विकास में सूफी संतों विशेषकर चिश्ती संतों ने समा(सामूहिक संगीत) को लोकप्रिय बनाया| भारत सहित मध्य एवं पश्चिम एशिया में आज भी सूफी संगीत लोकप्रिय बना हुआ है| गायन की विधा के रूप में कव्वाली, विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे सितार आदि की शुरुआत सूफी साधकों द्वारा की गयी थी| हालाँकि स्थापत्य के विकास में सूफी संतों का प्रत्यक्षतः विशेष योगदान नहीं है क्योंकि ये सरल जीवन जीने में विश्वास रखते थे लेकिन इनकी मृत्यु के पश्चात इनके अनुयायियों और शासकों ने दरगाहों एवं खानकाहों का निर्माण करवाया| ये दरगाहें और खानकाह आज भी सामासिक संस्कृति का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं| उपरोक्त विन्दुओं से स्पष्ट होता है कि सूफी आन्दोलन ने भारतीय इतिहास पर व्यापक एवं बहुआयामी प्रभाव डाले किन्तु सूफी आन्दोलन के प्रभाव कुछ सीमाओं से भी युक्त थे जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है सूफी आन्दोलन की सीमाएं इनका प्रभाव मुख्यतः नगरीय एवं निम्न वर्गों के मध्य तक ही सीमित था अर्थात इनका सामाजिक आधार समावेशी नहीं था| सूफियों की गतिविधियों से धर्मांतरण को बढ़ावा मिला जिससे यदा-कदा यह सामाजिक तनाव का भी कारण बना| सूफी संतों के प्रयासों के बाद भी राजनीति और समाज पर रुढ़िवादी उलेमावर्ग का प्रभाव बना रहा| सूफियों के प्रभाव के बाद भी शासक वर्ग में विलासितापूर्ण जीवन शैली अपनाने तथा धार्मिक नीतियों में कटुता के उदहारण देखे जा सकते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में सूफी आन्दोलन के मिश्रित प्रभाव पड़े तथापि सूफी आन्दोलन की सीमाएं इसके सकारात्मक प्रभावों के सापेक्ष कम महत्त्व की प्रतीत होती हैं | व्यापक संदर्भों में सूफी आन्दोलन ने भारत में धर्मों के मध्य सामंजस्य का स्थापना कर तथा भारत के मुख्य धर्मों के मध्य आपसी समझ का विस्तार कर सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
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"प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों ने फासीवाद और नाजीवाद के उदय का मार्ग प्रशस्त किया जिनके द्वारा लोकतंत्र,स्वतंत्रता और समाजवादी मूल्यों का दमन किया गया | " उक्त कथन का उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिये |
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दृष्टिकोण प्रस्तावना में फासीवाद की आधारभूत परिभाषा देते हुए यूरोप की तत्कालीन परिस्थितियों की चर्चा कीजिये फासीवाद और नाजीवाद की परिस्थितियों को जन्म देने वाली राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख कीजिये साथ ही आर्थिक परिस्थितियों का भी उल्लेख कीजिये फासीवाद और नाजीवाद ने अपने प्रभाव को स्थापित करने हेतु या बनाये रखने के लिए कुछ एक्शन प्लान को अपनाया जिसकी चर्चा कीजिये फासीवाद और नाजीवाद के कुछ मुख्य प्रभावों की चर्चा कीजिये जैसे- युद्ध को प्रेरणा और लोकतान्त्रिक मूल्यों का दमन आदि फासीवाद कोई विचारधारा नहीं है ,मूलतः यह एक प्रकार की कार्य योजना ( एक्शन प्लान) है जहाँ अवसर मिलते ही कोई व्यक्ति या समूह सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करता है साथ ही सत्ता का केन्द्रीकरण भी करता है|इसके साथ ही इसके द्वारा जीवन के विविध क्षेत्रों के विनियमन करने का प्रयास किया जाता है|इसे अधिनायक वाद एवं सर्वसत्तावाद (Totalitarian) के भी नाम से भी जाना जाता है |प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सर्वप्रथम इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में तथा 1933 में , जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में फासीवादी सरकारों का गठन हुआ इसके अतिरिक्त स्पेन ,पुर्तगाल ,अर्जेंटीना में भी फासीवादी शक्तियों का उदय हुआ| हालाँकि यह घटना यूरोप की तत्कालीन राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों की देन थी परन्तु इनके उभार में बहुत हद तक मुसोलिनी और हिटलर के व्यक्तित्व की भी भूमिका थी जिसका आधार लोकतंत्र और समाजवाद विरोध के साथ साथ सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था| फासीवाद एवं नाजीवाद के उदय के लिए जिम्मेदार आर्थिक परिस्थितियां आर्थिक संकट - प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली में व्यापक पैमाने पर आर्थिक संकट देखे गए | साथ ही जर्मनी में भी आर्थिक संकट के दौरान बेरोजगारी में वृद्धि हुई और इस दौर में हिटलर की लोकप्रियता में भी वृद्धिहुए | 1919 से 1924 तक जर्मनी की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी और 1929 से 1932 के महामंदी के दौरान ही हिटलर की पार्टी ने चुनावोंमें अच्छा प्रदर्शन किया 1932 हिटलर की पार्टी सबसे बड़े पार्टी के रूप में उभर कर आई | प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव - इटली को व्यापक क्षति हुई जैसेकि- 7 लाख लोगों की मृत्यु हुई और 12 लाख अरब डॉलर का नुकसान हुआ जिससे महंगाई एवं बेरोजगारों की संख्या में वृद्धिहुई| इसके साथ ही विश्वयुद्ध के पश्चात थोपी गयी वर्साय की संधि के प्रावधानों से जर्मनी को बेहद आर्थिक नुकसान और दवाब झेलना पड़ा जैसेकि- आर्थिक जुर्माना फासीवाद एवं नाजीवाद के उदय के लिए जिम्मेदार राजनीतिक परिस्थितियां साम्यवाद का प्रसार -प्रथम विश्वयुद्ध के बाद आर्थिक संकट एवं रुसी क्रांति की सफलता ने इटली में साम्यवादी विचारधारा को गति प्रदान की| साम्यवादियों के बढ़ते प्रभाव से जमींदारों एवं उद्योगपतियों का चिंतित होना स्वाभाविक था | तत्कालीन सरकार सुरक्षा को लेकर इन्हें आश्वस्त नहीं कर पा रही थी| लगभग कुछ ऐसी ही परिस्थितियां जर्मनी में भी निर्मित हुई| अतः मुसोलिनी और हिटलर ने इस असुरक्षा की भावना को व्यापक स्तर पर अपने पक्ष में प्रयोग किया | सरकार की विफलता – इटली में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अस्थिर सरकारों का गठन हुआ जैसे- 1922 तक 5 प्रधानमंत्री बदले गए तथा सरकार राष्ट्रवाद ,आर्थिक संकट एवं साम्यवाद जैसे मुद्दों पर कोई ठोस कदम उठाने में सक्षम थी| कमोबेश यही स्थिति जर्मनी में भी विद्यमान थी जहाँ सरकार कुछ अन्तर्निहित कमजोरियों से गुजर रही थी, जैसे-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त हो पा रहा था| साथ ही सरकारों को लोकतान्त्रिक संचालन का अनुभव नहीं था तथा वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर के कारण सरकार की छवि अच्छी नहीं थी| वर्साय की संधि से असंतोष - वर्सायमें एक तरह से जर्मन राष्ट्रवाद को अपमानित किया गया था और हिटलर ने लगातार इन्हीं भावनाओं को आधार बनाकर अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया | पेरिस सम्मलेन से असंतोष - प्रथम विश्वयुद्ध में इटली ब्रिटिश गुट में शामिल था| इटली को तायिरोल ,tryste ,इस्त्रिया,डोल्मेशियन आदि क्षेत्र दिए जाने के वायदे किये गए थे | शांति सम्मलेन में इतालियन बहुल क्षेत्र तो दिया गया लेकिन डोलमेसिया फ्यूम जैसे क्षेत्र उन्हें नहीं दिए गए | इससे इटालियनराष्ट्रवादीयों की भावना आहत हुई | लोकतंत्र ,स्वतंत्रता और समाजवादी मूल्यों का दमन इटली में रजनीतिक - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन ,मुख्य पदों पर अपने लोगों को स्थापित करना आर्थिक क्षेत्र में - उद्योगपतियों और मजदूरों के मध्य विवादों का समाधान , उत्पादकता बढ़ाने के लिए निगमों का गठन जिसमें उद्योग पतियों एवं श्रमिकों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ फासीवादी दल की प्रतिनिधि भी होते थे | सामाजिक क्षेत्र में - शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सैन्य शिक्षा एवं मुसोलोनी के महिमामंडन पर बल दिया गया| उच्च शिक्षा पर कठोर नियंत्रण रखा गया तथा फासीवाद विरोधी साहित्य को प्रतिबंधित कर दिया गया | धार्मिक -1929 में पॉप के साथ एक समझौता किया और कैथोलिक धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित किया और पोप ने भी इटली को मान्यता दी गई| जर्मनी में राजनीतिक क्षेत्र -चार वर्षों तक अध्यादेश से शासन करने सम्बंधित कानून पारित किया गया , विरोधियों की हत्या व राजनितिक दलों पर प्रतिबन्ध , महत्वपूर्ण पदों पर अपने दल के व्यक्तियों को स्थापित करना ,प्रेस पर प्रतिबन्धआदि | सामाजिक क्षेत्र में - शिक्षा पर पूर्णतयः सरकारी नियंत्रण ,सैन्य शिक्षा पर बल ,हिटलर का महिमामंडन आदि |महिलाओं को स्वस्थ और मजबूत बच्चों को पैदा करने के लिए प्रेरित करना ;वृद्धों एवं अपंगों को राष्ट्र पर बोझ मानना ,एवं सबसे घृणित कार्य यहूदी विरोधी नीति थी | प्रारंभ में यहूदियों को नागरिकता एवं सरकारी सेवा से वंचित किया गया | गैर यहूदियों से या जर्मन से विवाह को प्रतिबंधित किया गया तथा इनकी संपत्तियों को लूटा गया और इन्हें अलग बस्तियों में रहने के लिए बाधित किया गया | द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लाखों की संख्या में यहूदियों का नरसंहार किया गया | धार्मिक क्षेत्र - कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट से समझौते का प्रयास , परन्तु जब कैथोलिक संगठनों से इसे चुनौती मिली तब इसने बड़े संख्या में पादरियों को भी मौत के घाट उतार दिया | आर्थिक क्षेत्र - आधारभूत ढाँचे पर बल ,अर्थव्यवस्था को युद्ध के दृष्टिकोण से तैयार रखने की योजना ,जिन राष्ट्रों से व्यापारिक सम्बन्ध थे उन्हें जर्मन वस्तुओं को खरीदने के लिए दवाब बनाना , अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना आदि हड़ताल को प्रतिबंधित किया जाना | प्रकृति के आधार पर देखें तो हम पाएंगे की हिटलर का नाजीवाद ,मुसोलिनी के फासीवाद का ही एक उन्नत संस्करण था जिसने राष्ट्रीय परिस्थितियों पर तो नियंत्रण स्थापित करने का कार्य किया ही और साम्राज्यवादी नीति से प्रेरित होकर युद्ध को बढ़ावा दिया जिसके परिणाम अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में देखने को मिले |
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##Question:"प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों ने फासीवाद और नाजीवाद के उदय का मार्ग प्रशस्त किया जिनके द्वारा लोकतंत्र,स्वतंत्रता और समाजवादी मूल्यों का दमन किया गया | " उक्त कथन का उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिये |##Answer:दृष्टिकोण प्रस्तावना में फासीवाद की आधारभूत परिभाषा देते हुए यूरोप की तत्कालीन परिस्थितियों की चर्चा कीजिये फासीवाद और नाजीवाद की परिस्थितियों को जन्म देने वाली राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख कीजिये साथ ही आर्थिक परिस्थितियों का भी उल्लेख कीजिये फासीवाद और नाजीवाद ने अपने प्रभाव को स्थापित करने हेतु या बनाये रखने के लिए कुछ एक्शन प्लान को अपनाया जिसकी चर्चा कीजिये फासीवाद और नाजीवाद के कुछ मुख्य प्रभावों की चर्चा कीजिये जैसे- युद्ध को प्रेरणा और लोकतान्त्रिक मूल्यों का दमन आदि फासीवाद कोई विचारधारा नहीं है ,मूलतः यह एक प्रकार की कार्य योजना ( एक्शन प्लान) है जहाँ अवसर मिलते ही कोई व्यक्ति या समूह सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करता है साथ ही सत्ता का केन्द्रीकरण भी करता है|इसके साथ ही इसके द्वारा जीवन के विविध क्षेत्रों के विनियमन करने का प्रयास किया जाता है|इसे अधिनायक वाद एवं सर्वसत्तावाद (Totalitarian) के भी नाम से भी जाना जाता है |प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सर्वप्रथम इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में तथा 1933 में , जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में फासीवादी सरकारों का गठन हुआ इसके अतिरिक्त स्पेन ,पुर्तगाल ,अर्जेंटीना में भी फासीवादी शक्तियों का उदय हुआ| हालाँकि यह घटना यूरोप की तत्कालीन राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों की देन थी परन्तु इनके उभार में बहुत हद तक मुसोलिनी और हिटलर के व्यक्तित्व की भी भूमिका थी जिसका आधार लोकतंत्र और समाजवाद विरोध के साथ साथ सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था| फासीवाद एवं नाजीवाद के उदय के लिए जिम्मेदार आर्थिक परिस्थितियां आर्थिक संकट - प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली में व्यापक पैमाने पर आर्थिक संकट देखे गए | साथ ही जर्मनी में भी आर्थिक संकट के दौरान बेरोजगारी में वृद्धि हुई और इस दौर में हिटलर की लोकप्रियता में भी वृद्धिहुए | 1919 से 1924 तक जर्मनी की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी और 1929 से 1932 के महामंदी के दौरान ही हिटलर की पार्टी ने चुनावोंमें अच्छा प्रदर्शन किया 1932 हिटलर की पार्टी सबसे बड़े पार्टी के रूप में उभर कर आई | प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव - इटली को व्यापक क्षति हुई जैसेकि- 7 लाख लोगों की मृत्यु हुई और 12 लाख अरब डॉलर का नुकसान हुआ जिससे महंगाई एवं बेरोजगारों की संख्या में वृद्धिहुई| इसके साथ ही विश्वयुद्ध के पश्चात थोपी गयी वर्साय की संधि के प्रावधानों से जर्मनी को बेहद आर्थिक नुकसान और दवाब झेलना पड़ा जैसेकि- आर्थिक जुर्माना फासीवाद एवं नाजीवाद के उदय के लिए जिम्मेदार राजनीतिक परिस्थितियां साम्यवाद का प्रसार -प्रथम विश्वयुद्ध के बाद आर्थिक संकट एवं रुसी क्रांति की सफलता ने इटली में साम्यवादी विचारधारा को गति प्रदान की| साम्यवादियों के बढ़ते प्रभाव से जमींदारों एवं उद्योगपतियों का चिंतित होना स्वाभाविक था | तत्कालीन सरकार सुरक्षा को लेकर इन्हें आश्वस्त नहीं कर पा रही थी| लगभग कुछ ऐसी ही परिस्थितियां जर्मनी में भी निर्मित हुई| अतः मुसोलिनी और हिटलर ने इस असुरक्षा की भावना को व्यापक स्तर पर अपने पक्ष में प्रयोग किया | सरकार की विफलता – इटली में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अस्थिर सरकारों का गठन हुआ जैसे- 1922 तक 5 प्रधानमंत्री बदले गए तथा सरकार राष्ट्रवाद ,आर्थिक संकट एवं साम्यवाद जैसे मुद्दों पर कोई ठोस कदम उठाने में सक्षम थी| कमोबेश यही स्थिति जर्मनी में भी विद्यमान थी जहाँ सरकार कुछ अन्तर्निहित कमजोरियों से गुजर रही थी, जैसे-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त हो पा रहा था| साथ ही सरकारों को लोकतान्त्रिक संचालन का अनुभव नहीं था तथा वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर के कारण सरकार की छवि अच्छी नहीं थी| वर्साय की संधि से असंतोष - वर्सायमें एक तरह से जर्मन राष्ट्रवाद को अपमानित किया गया था और हिटलर ने लगातार इन्हीं भावनाओं को आधार बनाकर अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया | पेरिस सम्मलेन से असंतोष - प्रथम विश्वयुद्ध में इटली ब्रिटिश गुट में शामिल था| इटली को तायिरोल ,tryste ,इस्त्रिया,डोल्मेशियन आदि क्षेत्र दिए जाने के वायदे किये गए थे | शांति सम्मलेन में इतालियन बहुल क्षेत्र तो दिया गया लेकिन डोलमेसिया फ्यूम जैसे क्षेत्र उन्हें नहीं दिए गए | इससे इटालियनराष्ट्रवादीयों की भावना आहत हुई | लोकतंत्र ,स्वतंत्रता और समाजवादी मूल्यों का दमन इटली में रजनीतिक - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन ,मुख्य पदों पर अपने लोगों को स्थापित करना आर्थिक क्षेत्र में - उद्योगपतियों और मजदूरों के मध्य विवादों का समाधान , उत्पादकता बढ़ाने के लिए निगमों का गठन जिसमें उद्योग पतियों एवं श्रमिकों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ फासीवादी दल की प्रतिनिधि भी होते थे | सामाजिक क्षेत्र में - शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सैन्य शिक्षा एवं मुसोलोनी के महिमामंडन पर बल दिया गया| उच्च शिक्षा पर कठोर नियंत्रण रखा गया तथा फासीवाद विरोधी साहित्य को प्रतिबंधित कर दिया गया | धार्मिक -1929 में पॉप के साथ एक समझौता किया और कैथोलिक धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित किया और पोप ने भी इटली को मान्यता दी गई| जर्मनी में राजनीतिक क्षेत्र -चार वर्षों तक अध्यादेश से शासन करने सम्बंधित कानून पारित किया गया , विरोधियों की हत्या व राजनितिक दलों पर प्रतिबन्ध , महत्वपूर्ण पदों पर अपने दल के व्यक्तियों को स्थापित करना ,प्रेस पर प्रतिबन्धआदि | सामाजिक क्षेत्र में - शिक्षा पर पूर्णतयः सरकारी नियंत्रण ,सैन्य शिक्षा पर बल ,हिटलर का महिमामंडन आदि |महिलाओं को स्वस्थ और मजबूत बच्चों को पैदा करने के लिए प्रेरित करना ;वृद्धों एवं अपंगों को राष्ट्र पर बोझ मानना ,एवं सबसे घृणित कार्य यहूदी विरोधी नीति थी | प्रारंभ में यहूदियों को नागरिकता एवं सरकारी सेवा से वंचित किया गया | गैर यहूदियों से या जर्मन से विवाह को प्रतिबंधित किया गया तथा इनकी संपत्तियों को लूटा गया और इन्हें अलग बस्तियों में रहने के लिए बाधित किया गया | द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लाखों की संख्या में यहूदियों का नरसंहार किया गया | धार्मिक क्षेत्र - कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट से समझौते का प्रयास , परन्तु जब कैथोलिक संगठनों से इसे चुनौती मिली तब इसने बड़े संख्या में पादरियों को भी मौत के घाट उतार दिया | आर्थिक क्षेत्र - आधारभूत ढाँचे पर बल ,अर्थव्यवस्था को युद्ध के दृष्टिकोण से तैयार रखने की योजना ,जिन राष्ट्रों से व्यापारिक सम्बन्ध थे उन्हें जर्मन वस्तुओं को खरीदने के लिए दवाब बनाना , अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना आदि हड़ताल को प्रतिबंधित किया जाना | प्रकृति के आधार पर देखें तो हम पाएंगे की हिटलर का नाजीवाद ,मुसोलिनी के फासीवाद का ही एक उन्नत संस्करण था जिसने राष्ट्रीय परिस्थितियों पर तो नियंत्रण स्थापित करने का कार्य किया ही और साम्राज्यवादी नीति से प्रेरित होकर युद्ध को बढ़ावा दिया जिसके परिणाम अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में देखने को मिले |
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सतत विकास लक्ष्यों से आप क्या समझते है ? सतत विकास लक्ष्यों को सूचीबद्ध करते हुए प्रमुख लक्ष्यों की विस्तार से चर्चा कीजिये। (150 - 200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by the Sustainable Development Goals? List the Sustainable Development Goals and discuss the major goals in detail. (150 - 200 words / 10 Marks)
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एप्रोच :: 1. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)को बताते हुए प्रारंभ कीजिये। 2. इसके बाद सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (MDGs)को संक्षिप्त में स्पष्ट कीजिये। 3. MDGs की तुलना में SDGs में हुए विस्तार को बताते हुए SDGs के विभिन्न लक्ष्यों पर क्रमबद्धता में चर्चा कीजिये। 4. SDGs का महत्व बताते हुए निष्कर्ष लिखिये। उत्तर प्रारूप :: सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किये गए महत्वकांक्षी वैश्विक विकास लक्ष्य है जो सार्वभौमिक जन कल्याण से संबंधित है। ये लक्ष्य विभिन्न सामाजिक- आर्थिक ,सांस्कृतिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से संबंधित है तथा इनमें विकास के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय आयामों को शामिल किया गया है। संयुक्त राष्ट्र का एजेंडा 2030 के तहत 17 सतत विकस लक्ष्य तथा 169 टारगेट तय किये गए है। सहस्राब्दी विकास लक्ष्य : संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्ष 2000 के सहस्त्राब्दि शिखर सम्मेलन में 2015 तक के लिये 8 वैश्विक विकास लक्ष्य निर्धारित किये गये थे जिन्हें सहस्राब्दी विकास लक्ष्य" (Millennium Development Goals (MDGs)) कहा जाता है। जो कि अग्रलिखित है: • भूखमरी तथा गरीबी को समाप्त करना • सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा • लिंग समानता तथा महिला शसक्तीकरण • शिशु-मृत्यु दर घटाना • मातृत्व स्वास्थ्य को बढ़ावा देना • HIV/AIDS, मलेरिया तथा अन्य बीमारियों से छुटकारा पाना। • पर्यावरण सततता। • वैश्विक विकास के लिए साझेदारी स्थापित करना। MDGs व SDGs के मध्य तुलना :: 1. अधिक व्यापक व विस्तृत लक्ष्य :- MDGs में जहाँ 8 लक्ष्य तय किये गए थे, वहीं SDGs में इससे बढ़कर 17 लक्ष्यों को शामिल किया गया है। यह स्थिरता, शांति , मानवाधिकार और सुशासन जैसे महत्वपूर्ण आयामों को समेटे हुए है। 2. जीरो लक्ष्य सुनिश्चित करना :- MDGs में जहाँ भुखमरी और गरीबी को आधा करने का लक्ष्य रखा गया था, वहीं SDGs में गरीबी के सभी रूपों की पूर्ण रूप से समाप्ति का लक्ष्य रखा गया है। 3. भुखमरी और गरीबी के लिए पृथक दृष्टिकोण:- MDGs में दोनों को एक ही लक्ष्य MDG 1 के अंतर्गत रखा गया था, वहीं SDGs में इनको वर्गीकृत करते हुए समाधान हेतु विशेषीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया है। 4. गुणवत्तायुक्त शिक्षा :- MDGs जहाँ संख्या ( ex. उच्च नामांकन दर) पर ध्यान केंद्रित करता है, वहीं SDGs विश्व समुदाय द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करने के पहले प्रयास का प्रतिनिधित्व करते हैं । सतत विकास और स्थायी जीवन शैली, मानव अधिकारों, लिंग समानता, शांति और अहिंसा की संस्कृति, वैश्विक नागरिकता, और सांस्कृतिक विविधता की सराहना आदि की प्राप्ति में गुणवत्तायुक्त शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। 5. पीस बिल्डिंग :- सामान्यतः यह देखा जाता है कि शांतिपूर्ण, उचित रूप से अच्छी तरह से शासित देश समृद्ध हैं जबकि संघर्ष प्रभावित राज्यों में अत्यधिक गरीबी से प्रभावित लोग रहते है । शांति-निर्माण का समावेश इस प्रकार भूख और गरीबी को समाप्त करने की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है - अभी तक एमडीजी में पूरी तरह से अनदेखा किया गया था। 6. सतत विकास :- यह जलवायु परिवर्तन, संसाधनों के संरक्षण से लेकर विविध पारिस्थितिकीय प्रणालियों को सुरक्षित रखने हेतु व्यापक दृष्टिकोण को अपनाता है। सतत विकास लक्ष्यों के तहत निम्नलिखित 17 लक्ष्यों को अपनाया गया है। 1. गरीबी के सभी रूपों की पूरे विश्व से समाप्ति. 2. भूख की समाप्ति, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा. 3. सभी आयु के लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा. 4. समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही सभी को सीखने का अवसर देना. 5. लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करना. 6. सभी के लिए स्वच्छता और पानी के सतत प्रबंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना. 7. सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना. 8. सभी के लिए निरंतर समावेशी और सतत आर्थिक विकास, पूर्ण और उत्पादक रोजगार, और बेहतर कार्य को बढ़ावा देना. 9. लचीले बुनियादी ढांचे, समावेशी और सतत औद्योगीकरण को बढ़ावा. 10. देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना. 11. सुरक्षित, लचीले और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण. 12. स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना. 13. जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करना. 14. स्थायी सतत विकास के लिए महासागरों, समुद्र और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उपयोग. 15. सतत उपयोग को बढ़ावा देने वाले स्थलीय पारिस्थितिकीय प्रणालियों, सुरक्षित जंगलों, भूमि क्षरण और जैव विविधता के बढ़ते नुकसान को रोकने का प्रयास करना. 16. सतत विकास के लिए शांतिपूर्ण और समावेशी समितियों को बढ़ावा देने के साथ ही सभी स्तरों पर इन्हें प्रभावी, जवाबदेही बनना ताकि सभी के लिए न्याय सुनिश्चित हो सके. 17. सतत विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्ति कार्यान्वयन के साधनों को मजबूत बनाना. सतत् विकास लक्ष्य , बहुआयामी उद्देश्यों को लेकर सभी समाजों में सामाजिक न्याय व पूर्ण समानता स्थापित करने तथा पर्यावरणीय संरक्षण को लेकर आगे बढ़ता है। इस संदर्भ में नीति आयोग का 15 वर्षीय विज़न डॉक्यूमेंट एक अच्छा कदम है।
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##Question:सतत विकास लक्ष्यों से आप क्या समझते है ? सतत विकास लक्ष्यों को सूचीबद्ध करते हुए प्रमुख लक्ष्यों की विस्तार से चर्चा कीजिये। (150 - 200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by the Sustainable Development Goals? List the Sustainable Development Goals and discuss the major goals in detail. (150 - 200 words / 10 Marks)##Answer:एप्रोच :: 1. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)को बताते हुए प्रारंभ कीजिये। 2. इसके बाद सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (MDGs)को संक्षिप्त में स्पष्ट कीजिये। 3. MDGs की तुलना में SDGs में हुए विस्तार को बताते हुए SDGs के विभिन्न लक्ष्यों पर क्रमबद्धता में चर्चा कीजिये। 4. SDGs का महत्व बताते हुए निष्कर्ष लिखिये। उत्तर प्रारूप :: सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किये गए महत्वकांक्षी वैश्विक विकास लक्ष्य है जो सार्वभौमिक जन कल्याण से संबंधित है। ये लक्ष्य विभिन्न सामाजिक- आर्थिक ,सांस्कृतिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से संबंधित है तथा इनमें विकास के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय आयामों को शामिल किया गया है। संयुक्त राष्ट्र का एजेंडा 2030 के तहत 17 सतत विकस लक्ष्य तथा 169 टारगेट तय किये गए है। सहस्राब्दी विकास लक्ष्य : संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्ष 2000 के सहस्त्राब्दि शिखर सम्मेलन में 2015 तक के लिये 8 वैश्विक विकास लक्ष्य निर्धारित किये गये थे जिन्हें सहस्राब्दी विकास लक्ष्य" (Millennium Development Goals (MDGs)) कहा जाता है। जो कि अग्रलिखित है: • भूखमरी तथा गरीबी को समाप्त करना • सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा • लिंग समानता तथा महिला शसक्तीकरण • शिशु-मृत्यु दर घटाना • मातृत्व स्वास्थ्य को बढ़ावा देना • HIV/AIDS, मलेरिया तथा अन्य बीमारियों से छुटकारा पाना। • पर्यावरण सततता। • वैश्विक विकास के लिए साझेदारी स्थापित करना। MDGs व SDGs के मध्य तुलना :: 1. अधिक व्यापक व विस्तृत लक्ष्य :- MDGs में जहाँ 8 लक्ष्य तय किये गए थे, वहीं SDGs में इससे बढ़कर 17 लक्ष्यों को शामिल किया गया है। यह स्थिरता, शांति , मानवाधिकार और सुशासन जैसे महत्वपूर्ण आयामों को समेटे हुए है। 2. जीरो लक्ष्य सुनिश्चित करना :- MDGs में जहाँ भुखमरी और गरीबी को आधा करने का लक्ष्य रखा गया था, वहीं SDGs में गरीबी के सभी रूपों की पूर्ण रूप से समाप्ति का लक्ष्य रखा गया है। 3. भुखमरी और गरीबी के लिए पृथक दृष्टिकोण:- MDGs में दोनों को एक ही लक्ष्य MDG 1 के अंतर्गत रखा गया था, वहीं SDGs में इनको वर्गीकृत करते हुए समाधान हेतु विशेषीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया है। 4. गुणवत्तायुक्त शिक्षा :- MDGs जहाँ संख्या ( ex. उच्च नामांकन दर) पर ध्यान केंद्रित करता है, वहीं SDGs विश्व समुदाय द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करने के पहले प्रयास का प्रतिनिधित्व करते हैं । सतत विकास और स्थायी जीवन शैली, मानव अधिकारों, लिंग समानता, शांति और अहिंसा की संस्कृति, वैश्विक नागरिकता, और सांस्कृतिक विविधता की सराहना आदि की प्राप्ति में गुणवत्तायुक्त शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। 5. पीस बिल्डिंग :- सामान्यतः यह देखा जाता है कि शांतिपूर्ण, उचित रूप से अच्छी तरह से शासित देश समृद्ध हैं जबकि संघर्ष प्रभावित राज्यों में अत्यधिक गरीबी से प्रभावित लोग रहते है । शांति-निर्माण का समावेश इस प्रकार भूख और गरीबी को समाप्त करने की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है - अभी तक एमडीजी में पूरी तरह से अनदेखा किया गया था। 6. सतत विकास :- यह जलवायु परिवर्तन, संसाधनों के संरक्षण से लेकर विविध पारिस्थितिकीय प्रणालियों को सुरक्षित रखने हेतु व्यापक दृष्टिकोण को अपनाता है। सतत विकास लक्ष्यों के तहत निम्नलिखित 17 लक्ष्यों को अपनाया गया है। 1. गरीबी के सभी रूपों की पूरे विश्व से समाप्ति. 2. भूख की समाप्ति, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा. 3. सभी आयु के लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा. 4. समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही सभी को सीखने का अवसर देना. 5. लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करना. 6. सभी के लिए स्वच्छता और पानी के सतत प्रबंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना. 7. सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना. 8. सभी के लिए निरंतर समावेशी और सतत आर्थिक विकास, पूर्ण और उत्पादक रोजगार, और बेहतर कार्य को बढ़ावा देना. 9. लचीले बुनियादी ढांचे, समावेशी और सतत औद्योगीकरण को बढ़ावा. 10. देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना. 11. सुरक्षित, लचीले और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण. 12. स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना. 13. जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करना. 14. स्थायी सतत विकास के लिए महासागरों, समुद्र और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उपयोग. 15. सतत उपयोग को बढ़ावा देने वाले स्थलीय पारिस्थितिकीय प्रणालियों, सुरक्षित जंगलों, भूमि क्षरण और जैव विविधता के बढ़ते नुकसान को रोकने का प्रयास करना. 16. सतत विकास के लिए शांतिपूर्ण और समावेशी समितियों को बढ़ावा देने के साथ ही सभी स्तरों पर इन्हें प्रभावी, जवाबदेही बनना ताकि सभी के लिए न्याय सुनिश्चित हो सके. 17. सतत विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्ति कार्यान्वयन के साधनों को मजबूत बनाना. सतत् विकास लक्ष्य , बहुआयामी उद्देश्यों को लेकर सभी समाजों में सामाजिक न्याय व पूर्ण समानता स्थापित करने तथा पर्यावरणीय संरक्षण को लेकर आगे बढ़ता है। इस संदर्भ में नीति आयोग का 15 वर्षीय विज़न डॉक्यूमेंट एक अच्छा कदम है।
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संविधान से आप क्या समझते हैं? इसके साथ ही, लिखित तथा अलिखित संविधान की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by constitution? Along with this, describe the features of written and unwritten constitution. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर का प्रारम्भ संविधान का परिचय देते हुए कीजिए। इसके पश्चात क्रमिक रूप से लिखित तथा अलिखित संविधान की विशेषताओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। संविधान एक ऐसा दस्तावेज़ है जो शासन के विभिन्न अंगों की शक्तियों, कार्यों, दायित्यों, अंतरसंबद्धों का उल्लेख करता है। यह स्पष्ट करता है कि समाज में निर्णय लेने कि शक्ति किसके पास होगी, यह भी तय करता है कि सरकार कैसे निर्मित होगी। इसके अतिरिक्त वह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करता है जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थितियों का निर्माण कर सके। लिखित संविधान: जैसे भारत, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों का संविधान। विशेषताएँ: इसका निर्माण संविधान सभा, प्रमुख उद्घोषणा आदि के माध्यम से होता है। प्रायः लिखित संविधान में अंतिम वैधानिक शक्ति न्यायपालिका में निहित होती है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख होता है। जैसे- भारत के संविधान में मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। राज्य तार्किक कारणों के आधार पर ही प्रतिबंध लगा सकती है। लिखित संविधान में सरकारी नीतियों की प्रासंगिकता अधिक होती है। इसका कारण है कि ये नीतियाँ संवैधानिक दायरे के अंतर्गत आती हैं तथा किसी भी प्रकार के उल्लंघन में न्यायपालिका इनकी पृथक रूप से जांच भी करती है। अलिखित संविधान: ब्रिटेन का संविधान विशेषताएँ: अलिखित संविधान एक स्पष्ट रूप से निर्मित ग्रंथ नहीं होता बल्कि विभिन्न समय काल में राष्ट्र द्वारा अपनाए गए नियमों, नीतियों, रीति-रिवाजों आदि का संग्रह होता है। इसमें अंतिम संवैधानिक सत्ता संसद/ विधायिका में निहित होती है। संसद की सर्वोच्चता इसकी एक प्रमुख विशेषता है। जनता को प्राप्त होने वाले अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता है। किसी भी कानून के संशोधन के लिए संसद के साधारण बहुमत की आवश्यकता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकार स्वयं भी बदलाव कर सकती है। सरकारी नीतियों की कम प्रासंगिकता होती है क्योंकि संविधान, न्यायपालिका द्वारा कोई स्पष्ट सीमा आरोपित नहीं किया जाता है। सरकार अपने हितों के अनुरूप नीतियाँ बना सकती है। इस प्रकार संविधान शक्तियों, कार्यों आदि उल्लेख करता है। यह लिखित तथा अलिखित दोनों रूपों में हो सकता है। लिखित संविधान में जहां न्यायपालिका की भूमिका, नागरिकों के अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं तो दूसरी ओर अलिखित संविधान में संसद को अधिक शक्ति प्राप्त होती है।
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##Question:संविधान से आप क्या समझते हैं? इसके साथ ही, लिखित तथा अलिखित संविधान की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by constitution? Along with this, describe the features of written and unwritten constitution. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर का प्रारम्भ संविधान का परिचय देते हुए कीजिए। इसके पश्चात क्रमिक रूप से लिखित तथा अलिखित संविधान की विशेषताओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। संविधान एक ऐसा दस्तावेज़ है जो शासन के विभिन्न अंगों की शक्तियों, कार्यों, दायित्यों, अंतरसंबद्धों का उल्लेख करता है। यह स्पष्ट करता है कि समाज में निर्णय लेने कि शक्ति किसके पास होगी, यह भी तय करता है कि सरकार कैसे निर्मित होगी। इसके अतिरिक्त वह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करता है जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थितियों का निर्माण कर सके। लिखित संविधान: जैसे भारत, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों का संविधान। विशेषताएँ: इसका निर्माण संविधान सभा, प्रमुख उद्घोषणा आदि के माध्यम से होता है। प्रायः लिखित संविधान में अंतिम वैधानिक शक्ति न्यायपालिका में निहित होती है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख होता है। जैसे- भारत के संविधान में मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। राज्य तार्किक कारणों के आधार पर ही प्रतिबंध लगा सकती है। लिखित संविधान में सरकारी नीतियों की प्रासंगिकता अधिक होती है। इसका कारण है कि ये नीतियाँ संवैधानिक दायरे के अंतर्गत आती हैं तथा किसी भी प्रकार के उल्लंघन में न्यायपालिका इनकी पृथक रूप से जांच भी करती है। अलिखित संविधान: ब्रिटेन का संविधान विशेषताएँ: अलिखित संविधान एक स्पष्ट रूप से निर्मित ग्रंथ नहीं होता बल्कि विभिन्न समय काल में राष्ट्र द्वारा अपनाए गए नियमों, नीतियों, रीति-रिवाजों आदि का संग्रह होता है। इसमें अंतिम संवैधानिक सत्ता संसद/ विधायिका में निहित होती है। संसद की सर्वोच्चता इसकी एक प्रमुख विशेषता है। जनता को प्राप्त होने वाले अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता है। किसी भी कानून के संशोधन के लिए संसद के साधारण बहुमत की आवश्यकता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकार स्वयं भी बदलाव कर सकती है। सरकारी नीतियों की कम प्रासंगिकता होती है क्योंकि संविधान, न्यायपालिका द्वारा कोई स्पष्ट सीमा आरोपित नहीं किया जाता है। सरकार अपने हितों के अनुरूप नीतियाँ बना सकती है। इस प्रकार संविधान शक्तियों, कार्यों आदि उल्लेख करता है। यह लिखित तथा अलिखित दोनों रूपों में हो सकता है। लिखित संविधान में जहां न्यायपालिका की भूमिका, नागरिकों के अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं तो दूसरी ओर अलिखित संविधान में संसद को अधिक शक्ति प्राप्त होती है।
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What are the major planetary winds and pressure belts? What are their main characteristics?(200 words)
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Basic Approach: - Introduce with the planetary winds and pressure belts on earth - Explain planetary winds with their characteristics - Explains pressure belts and their characteristics Answer: The primary winds and the pressure belts play a major role in deciding the atmospheric phenomena of any region.Our idealized model of global atmospheric circulation includes six wind belts, or zones, in addition to the seven pressure zones. Primary or planetary winds blow from high-pressure belts to low-pressure belts in the same direction throughout the year.Trade winds, Westerlies and polar easterlies together form the planetary wind circulation. These are described below: i. Easterlies/Tropical easterlies/Trade wind: As the name suggests they blow from east to west. The easterlies from either side of the equator converge in the Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ). Thus, winds originated at ITCZ come back in a circular fashion. Such a cell in the tropics is called the Hadley Cell. Because of Coriolis force, their direction becomes north-east and south-east in northern and southern hemisphere respectively. ii. Westerlies: They blow from west to east. In the middle latitudes (300 -600) the circulation is that of sinking cold air that comes from the poles and the rising warm air that blows from the subtropical high-pressure belt. These winds are deflected due to Coriolis force and become westerly in both the hemispheres. These winds meet along the sub-polar low-pressure belt to raise high in the troposphere. From here, air moves away in both directions – towards pole and equator. These winds start descending down above the sub-tropical high-pressure belt and polar high-pressure belt to form cells. These cells are called Ferrel cell and Polar cell respectively. The Westerlies are stronger in the cold. In the southern hemisphere, Westerlies are so powerful and persistent due to the absence of land between 400 -600 S that these are called ‘roaring forties’, ‘furious fifties’ and ‘screaming sixties’ along 400 S, 500 S and 600 S latitudes iii. Polar Easterlies: Winds move away from polar high pressure to sub-polar low pressure along the surface of the earth in Polar cell. Their direction becomes easterlies due to Coriolis force. These are called polar easterlies As our idealized model suggests, the atmosphere tends to form belts of high and low pressure along the east-west axis in areas where there are no large bodies of land. These belts are arranged by latitude and generally maintain their band like pattern. However, where there are continental landmasses, belts of pressure are broken and tend to form cellular pressure systems. The landmasses affect the development of belts of atmospheric pressure in several ways. Most influential is the effect of the differential heating of land and water surfaces. In addition, landmasses affect the movement of air and consequently the development of pressure systems through friction with their surfaces. Landform barriers such as mountain ranges also block the movement of air and thereby affect atmospheric pressure. Pressure belts and their characteristics : i. Equatorial low-pressure belt: It extends from 00 to 50 latitudes North and South of the Equator. This zone is also called Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ) because of vertical rays of Sunlight and intense heating. This region is also called doldrums because of calm conditions developed due to very low pressure. ii. Sub-tropical high-pressure belt : It extends from around 250 - 30° latitudes North and South of Equator. Wind from ITCZ rises due to convection up to an altitude of around 14 km and blows towards the equator. Because of cooling it accumulates at around 300 thus forms the sub-tropical high-pressure belt. It is also called as the Horse latitude. Winds near surface blow from sub-tropical region towards the Equator as Trade winds or Easterlies and another wind blows towards Sub-Polar Low-Pressure as Westerlies. This circulation which is formed is called Hadley Cell. iii. Sub-polar low-pressure belt: It extends along 550 - 650 latitudes in both the hemisphere. These belts are not thermally induced instead the winds coming from the sub-tropics and the Polar Regions converge in this belt and rise upward. The great temperature contrast between the subtropical and the Polar Regions gives rise to cyclonic storms in this belt. In Southern hemisphere, this low-pressure belt is more pronounced due to the vast presence of the ocean and also referred to as the sub-Antarctic low. But in the northern hemisphere, there are large land masses along 600 latitudes which are very cold. Therefore, the pressures over these landmasses are increased. Thus, the continuity of the belt is broken. iv. Polar high-pressure belt: Because of low temperature, air compresses and its density increases. Hence, high pressure is found here throughout the year. This is more marked over the land area of the Antarctic continent than overcontinent than over the ocean of the North Pole. In the northern hemisphere, high pressure is not centred at the pole, but it extends from Greenland to Islands situated in the northern part of Canada. (Students should draw the Schematic diagram of the planetary winds and pressure belts)
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##Question:What are the major planetary winds and pressure belts? What are their main characteristics?(200 words)##Answer:Basic Approach: - Introduce with the planetary winds and pressure belts on earth - Explain planetary winds with their characteristics - Explains pressure belts and their characteristics Answer: The primary winds and the pressure belts play a major role in deciding the atmospheric phenomena of any region.Our idealized model of global atmospheric circulation includes six wind belts, or zones, in addition to the seven pressure zones. Primary or planetary winds blow from high-pressure belts to low-pressure belts in the same direction throughout the year.Trade winds, Westerlies and polar easterlies together form the planetary wind circulation. These are described below: i. Easterlies/Tropical easterlies/Trade wind: As the name suggests they blow from east to west. The easterlies from either side of the equator converge in the Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ). Thus, winds originated at ITCZ come back in a circular fashion. Such a cell in the tropics is called the Hadley Cell. Because of Coriolis force, their direction becomes north-east and south-east in northern and southern hemisphere respectively. ii. Westerlies: They blow from west to east. In the middle latitudes (300 -600) the circulation is that of sinking cold air that comes from the poles and the rising warm air that blows from the subtropical high-pressure belt. These winds are deflected due to Coriolis force and become westerly in both the hemispheres. These winds meet along the sub-polar low-pressure belt to raise high in the troposphere. From here, air moves away in both directions – towards pole and equator. These winds start descending down above the sub-tropical high-pressure belt and polar high-pressure belt to form cells. These cells are called Ferrel cell and Polar cell respectively. The Westerlies are stronger in the cold. In the southern hemisphere, Westerlies are so powerful and persistent due to the absence of land between 400 -600 S that these are called ‘roaring forties’, ‘furious fifties’ and ‘screaming sixties’ along 400 S, 500 S and 600 S latitudes iii. Polar Easterlies: Winds move away from polar high pressure to sub-polar low pressure along the surface of the earth in Polar cell. Their direction becomes easterlies due to Coriolis force. These are called polar easterlies As our idealized model suggests, the atmosphere tends to form belts of high and low pressure along the east-west axis in areas where there are no large bodies of land. These belts are arranged by latitude and generally maintain their band like pattern. However, where there are continental landmasses, belts of pressure are broken and tend to form cellular pressure systems. The landmasses affect the development of belts of atmospheric pressure in several ways. Most influential is the effect of the differential heating of land and water surfaces. In addition, landmasses affect the movement of air and consequently the development of pressure systems through friction with their surfaces. Landform barriers such as mountain ranges also block the movement of air and thereby affect atmospheric pressure. Pressure belts and their characteristics : i. Equatorial low-pressure belt: It extends from 00 to 50 latitudes North and South of the Equator. This zone is also called Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ) because of vertical rays of Sunlight and intense heating. This region is also called doldrums because of calm conditions developed due to very low pressure. ii. Sub-tropical high-pressure belt : It extends from around 250 - 30° latitudes North and South of Equator. Wind from ITCZ rises due to convection up to an altitude of around 14 km and blows towards the equator. Because of cooling it accumulates at around 300 thus forms the sub-tropical high-pressure belt. It is also called as the Horse latitude. Winds near surface blow from sub-tropical region towards the Equator as Trade winds or Easterlies and another wind blows towards Sub-Polar Low-Pressure as Westerlies. This circulation which is formed is called Hadley Cell. iii. Sub-polar low-pressure belt: It extends along 550 - 650 latitudes in both the hemisphere. These belts are not thermally induced instead the winds coming from the sub-tropics and the Polar Regions converge in this belt and rise upward. The great temperature contrast between the subtropical and the Polar Regions gives rise to cyclonic storms in this belt. In Southern hemisphere, this low-pressure belt is more pronounced due to the vast presence of the ocean and also referred to as the sub-Antarctic low. But in the northern hemisphere, there are large land masses along 600 latitudes which are very cold. Therefore, the pressures over these landmasses are increased. Thus, the continuity of the belt is broken. iv. Polar high-pressure belt: Because of low temperature, air compresses and its density increases. Hence, high pressure is found here throughout the year. This is more marked over the land area of the Antarctic continent than overcontinent than over the ocean of the North Pole. In the northern hemisphere, high pressure is not centred at the pole, but it extends from Greenland to Islands situated in the northern part of Canada. (Students should draw the Schematic diagram of the planetary winds and pressure belts)
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The nature of economic growth in India is described as jobless growth. Do you agree with this view? Give arguments in favor of your answer. (150 words/10 marks)
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APPROACH Introduce by background on LPG reforms which induced higher economic growth but has not created enough jobs. Give arguments for jobless growth in India. Conclude the answer. Answer: The process of liberalization, which began in the 1990s is seen as a milestone in the economic history of India. Since the liberalization, the economic condition gradually started improving and today India is one of the fastest growing economies in the world with an average yearly growth rate of around 6-7 per cent. Theoretically, acceleration in GDP growth of a labour-abundant country characterised by the market regime should push employment growth rate as well. However, the impact of liberalisation on the growth of employment in India is not as per the expectations. Arguments which support jobless growth : 1. Even during the high economic growth phase of 2005-12, the employment growth rate was just 0.4%with the addition of just 13 million jobs. There has been a continuous decline in employment elasticity as well. It declined sharply from 0.3 during 2000-05 to 0.05 during 2005-12. 2. Most of the new jobs were located in the informal sector with low earnings and no social protection resulting in casualization of jobs. 3. In the economy as a whole, the worker-population ratio declined in the 1990s for men and women in rural and urban areas in most age groups in the range 5-59. 4. Amongst the young, school participation has increased as the child and youth labour have declined. 5. There is an across-the-board improvement in the growth rate of labour productivity and wages and it is estimated that average per capita earnings per annum increased. However, the liberalization process has mainly benefited the top 10 per cent of wage earners who now make 12 times more than the bottom 10 per cent, up from a ratio of six in the 1990s. 6. As per the NSSO data, only 18% of working people have regular wage salary employment. Roughly 30% are casual labourers, dependent on daily or periodic renewal of job opportunities. The remaining 52% are self-employed. Most of them are in agriculture, working as helpers in family-owned businesses without salary. 7. Employment share of the public sector has gradually reduced as the public sector withdrew from many areas. A healthy growth rate in employment has been registered in the private sector. The liberalisation and globalisation process brought in more technological upgrades in the manufacturing sector which increased the mechanisation and reduced the employment. 8. In the case of the service sector, the employment growth has not matched the growth in GDP contribution. The sector presently contributes nearly 55% of total GDP but has employed a mere 27%. The problem of skill development enabling labour migration to services remains inadequately addressed. 9. The conditions of employment in the unorganised sector have not improved. The middlemen and employer continue to enjoy the benefits derived from their labour. The need of the hour is to create employment opportunities in labour-intensive sectors, support the MSMEs which offer livelihood opportunities to a large section of the population and encouraging people’s entrepreneurial instincts which will result in tackling the issue of jobless growth.MUDRA scheme should also be expanded as it can be a game changer for the MSME sector and this sector has the potential to create required jobs in India.
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##Question:The nature of economic growth in India is described as jobless growth. Do you agree with this view? Give arguments in favor of your answer. (150 words/10 marks)##Answer:APPROACH Introduce by background on LPG reforms which induced higher economic growth but has not created enough jobs. Give arguments for jobless growth in India. Conclude the answer. Answer: The process of liberalization, which began in the 1990s is seen as a milestone in the economic history of India. Since the liberalization, the economic condition gradually started improving and today India is one of the fastest growing economies in the world with an average yearly growth rate of around 6-7 per cent. Theoretically, acceleration in GDP growth of a labour-abundant country characterised by the market regime should push employment growth rate as well. However, the impact of liberalisation on the growth of employment in India is not as per the expectations. Arguments which support jobless growth : 1. Even during the high economic growth phase of 2005-12, the employment growth rate was just 0.4%with the addition of just 13 million jobs. There has been a continuous decline in employment elasticity as well. It declined sharply from 0.3 during 2000-05 to 0.05 during 2005-12. 2. Most of the new jobs were located in the informal sector with low earnings and no social protection resulting in casualization of jobs. 3. In the economy as a whole, the worker-population ratio declined in the 1990s for men and women in rural and urban areas in most age groups in the range 5-59. 4. Amongst the young, school participation has increased as the child and youth labour have declined. 5. There is an across-the-board improvement in the growth rate of labour productivity and wages and it is estimated that average per capita earnings per annum increased. However, the liberalization process has mainly benefited the top 10 per cent of wage earners who now make 12 times more than the bottom 10 per cent, up from a ratio of six in the 1990s. 6. As per the NSSO data, only 18% of working people have regular wage salary employment. Roughly 30% are casual labourers, dependent on daily or periodic renewal of job opportunities. The remaining 52% are self-employed. Most of them are in agriculture, working as helpers in family-owned businesses without salary. 7. Employment share of the public sector has gradually reduced as the public sector withdrew from many areas. A healthy growth rate in employment has been registered in the private sector. The liberalisation and globalisation process brought in more technological upgrades in the manufacturing sector which increased the mechanisation and reduced the employment. 8. In the case of the service sector, the employment growth has not matched the growth in GDP contribution. The sector presently contributes nearly 55% of total GDP but has employed a mere 27%. The problem of skill development enabling labour migration to services remains inadequately addressed. 9. The conditions of employment in the unorganised sector have not improved. The middlemen and employer continue to enjoy the benefits derived from their labour. The need of the hour is to create employment opportunities in labour-intensive sectors, support the MSMEs which offer livelihood opportunities to a large section of the population and encouraging people’s entrepreneurial instincts which will result in tackling the issue of jobless growth.MUDRA scheme should also be expanded as it can be a game changer for the MSME sector and this sector has the potential to create required jobs in India.
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What do you mean by Emotional Intelligence? How can it be developed? (150 words)
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APPROACH -INTRODUCTION Definition of the term emotional intelligence -THE COMPONENTS OF EMOTIONAL INTELLIGENCE - THE WAYS AND MEANS TO DEVELOP EMOTIONAL INTELLIGENCE - CONCLUSION [NOTE: An alternate structure, of discussing ‘the ways and means to develop EI’ together with ‘the components’ part simultaneously can also be followed, as the two are directly related] Answer: The term emotional intelligence was given by Wayne Paynes. The concept was formulated by Salovey and then finally popularised by Daniel Goleman. The scholarly definition of emotional intelligence (EI) is that it is the ability of the individual to perceive common emotions and assimilate these emotions in thought, understand and reason with emotions and regulate emotions in oneself and the others (Mayers and Salorey) THE COMPONENTS OF EMOTIONAL INTELLIGENCE As per Daniel Goleman, the following are the perspectives of EI: 1) SELF AWARENESS :-It means being aware of one’s own strengths and weaknesses. According to Aristotle, self-awareness is the beginning of all wisdom. 2) SELF MOTIVATION: A passion to work for reason that go beyond money or status; a propensity to pursue goals. 3) SELF REGULATION :-It means not being a prisoner of one’s own feelings 4) EMPATHY :-It means the ability to be able to understand the perspective of others 5) SOCIAL SKILLS :-These refer to those skills which help one to handle their relationships effectively. THE WAYS AND MEANS TO DEVELOP EMOTIONAL INTELLIGENCE For developing emotional intelligence one must reason with emotions and use emotions in reasoning (A)REASON WITH EMOTIONS We must understand two situations here: (i) Impending Threat Here one assumes that there is a threat. However, there might not actually be one. It is natural to have anxiety here. (Anxiety, thus, is the natural emotion here). (ii) Actual Threat Here the threat is real. For example, a lion might be standing in front of you. Here, fear is the natural emotion. There is no harm in having emotions. However, it must be in congruence with the situation at hand. For example, if anxiety goes out of control, then it implies that one is not being emotionally intelligent. (B)USE OF EMOTIONS IN REASONING Take the case of administration, use of emotions is very important in any reasoning here. In fact this is true for any work that involves a human interface. The Ways to inculcate each component of EI are: 1) REALISTIC GOAL SETTING Awareness of strengths and weaknesses implies realistic goal setting. This leads to the frequent achievement of goals, which further leads to positive goal discrepancy. (Positive goal discrepancy means that every accelerated goal will be achieved by the person. This automatically leads to self- motivation. 2) CONSCIOUSLY REGULATING ONE’S EMOTIONS AND FEELINGS One should not be the prisoner of one’s own feelings. If someone is self –regulated, it will automatically create a climate of trust and fairness. This, in turn, fosters team spirit and facilitates a collaborative approach. For example, when someone is self-regulated, with respect to their emotions, they will take decisions on the basis of merit rather than on the basis of emotions or obliging towards someone who has favoured them for years through their times of thick and thin. 3) INCULCATE EXPERIENCE AND SYMPATHY The both will enable one to develop empathy regarding the perspective and suffering of others. It results in the display of unconditional positive regard and the non-judgemental acceptance of others. This helps in reflecting and recognizing the feelings of others. 4) CONSCIOUS DEVELOPMENT OF SOCIAL SKILLS Tolerance, effective listening, patience, sense of humour, self-confidence, tactfulness, social memory are the social skills which one must develop in order to strengthen their emotional intelligence. For example, an administrator should remember the important dates regarding the historical events that took place in the village for which he is responsible. This will enable him to emotionally bond with the people and win their trust. They will feel that they and their culture are important to the administrator. As per Daniel Goleman, 80% EQ and 20% IQ (Intelligence Quotient) determines the success of any organisation. Therefore, developing and inculcating emotional intelligence is very important both is personal and professional life.
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##Question:What do you mean by Emotional Intelligence? How can it be developed? (150 words)##Answer:APPROACH -INTRODUCTION Definition of the term emotional intelligence -THE COMPONENTS OF EMOTIONAL INTELLIGENCE - THE WAYS AND MEANS TO DEVELOP EMOTIONAL INTELLIGENCE - CONCLUSION [NOTE: An alternate structure, of discussing ‘the ways and means to develop EI’ together with ‘the components’ part simultaneously can also be followed, as the two are directly related] Answer: The term emotional intelligence was given by Wayne Paynes. The concept was formulated by Salovey and then finally popularised by Daniel Goleman. The scholarly definition of emotional intelligence (EI) is that it is the ability of the individual to perceive common emotions and assimilate these emotions in thought, understand and reason with emotions and regulate emotions in oneself and the others (Mayers and Salorey) THE COMPONENTS OF EMOTIONAL INTELLIGENCE As per Daniel Goleman, the following are the perspectives of EI: 1) SELF AWARENESS :-It means being aware of one’s own strengths and weaknesses. According to Aristotle, self-awareness is the beginning of all wisdom. 2) SELF MOTIVATION: A passion to work for reason that go beyond money or status; a propensity to pursue goals. 3) SELF REGULATION :-It means not being a prisoner of one’s own feelings 4) EMPATHY :-It means the ability to be able to understand the perspective of others 5) SOCIAL SKILLS :-These refer to those skills which help one to handle their relationships effectively. THE WAYS AND MEANS TO DEVELOP EMOTIONAL INTELLIGENCE For developing emotional intelligence one must reason with emotions and use emotions in reasoning (A)REASON WITH EMOTIONS We must understand two situations here: (i) Impending Threat Here one assumes that there is a threat. However, there might not actually be one. It is natural to have anxiety here. (Anxiety, thus, is the natural emotion here). (ii) Actual Threat Here the threat is real. For example, a lion might be standing in front of you. Here, fear is the natural emotion. There is no harm in having emotions. However, it must be in congruence with the situation at hand. For example, if anxiety goes out of control, then it implies that one is not being emotionally intelligent. (B)USE OF EMOTIONS IN REASONING Take the case of administration, use of emotions is very important in any reasoning here. In fact this is true for any work that involves a human interface. The Ways to inculcate each component of EI are: 1) REALISTIC GOAL SETTING Awareness of strengths and weaknesses implies realistic goal setting. This leads to the frequent achievement of goals, which further leads to positive goal discrepancy. (Positive goal discrepancy means that every accelerated goal will be achieved by the person. This automatically leads to self- motivation. 2) CONSCIOUSLY REGULATING ONE’S EMOTIONS AND FEELINGS One should not be the prisoner of one’s own feelings. If someone is self –regulated, it will automatically create a climate of trust and fairness. This, in turn, fosters team spirit and facilitates a collaborative approach. For example, when someone is self-regulated, with respect to their emotions, they will take decisions on the basis of merit rather than on the basis of emotions or obliging towards someone who has favoured them for years through their times of thick and thin. 3) INCULCATE EXPERIENCE AND SYMPATHY The both will enable one to develop empathy regarding the perspective and suffering of others. It results in the display of unconditional positive regard and the non-judgemental acceptance of others. This helps in reflecting and recognizing the feelings of others. 4) CONSCIOUS DEVELOPMENT OF SOCIAL SKILLS Tolerance, effective listening, patience, sense of humour, self-confidence, tactfulness, social memory are the social skills which one must develop in order to strengthen their emotional intelligence. For example, an administrator should remember the important dates regarding the historical events that took place in the village for which he is responsible. This will enable him to emotionally bond with the people and win their trust. They will feel that they and their culture are important to the administrator. As per Daniel Goleman, 80% EQ and 20% IQ (Intelligence Quotient) determines the success of any organisation. Therefore, developing and inculcating emotional intelligence is very important both is personal and professional life.
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14वीं से 16वीं सदी के मध्य भारत में उदित क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था| स्थापत्य सम्बन्धी उदाहरणों और विशेषताओं के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) The regional states that emerged in India between the 14th to the 16th century had a diverse approach to architecture. Justify the statement with the help of architectural examples and features. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण- भूमिका में उस काल उदित क्षेत्रीय राज्यों और उनकी स्थापत्य में रूचि के बारे में जानकारी दीजिये मुख्य भाग में इन राज्यों में विकसित स्थापत्य के उदाहरण एवं उनकी विशेषताओं को खंडवार बताइए अंतिम में विशेषताओं में विविधता का संदर्भ देकर निष्कर्ष में कथन की पुष्टि कीजिये मुहम्मद तुगलक के शासन के समय से ही दिल्ली सल्तनत का विघटन प्रारम्भ होता है| दिल्ली सल्तनत के विघटन से विभिन्न स्वतंत्र प्रांतीय/क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ| इन क्षेत्रीय राज्यों में बंगाल, जौनपुर, मालवा, बहमनी राज्य, विजयनगर एवं गुजरात आदि प्रमुख थे| इन्होने स्थापत्य के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की| सल्तनत कालमेंभारतीय स्थापत्य कलाके क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ वह भारतीय तथा इस्लामी शैलियों का सम्मिश्रिण थी। इसलिए स्थापत्य कला की इस शैली को इण्डो इस्लामिक शैली कहा गया। प्रांतीय राज्यों द्वारा इण्डो इस्लामिक शैली की मूलभूत विशेषताओं को शामिल करते हुए अनेक विशिष्टताओं से युक्त विविध क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इन क्षेत्रीय राज्यों में विकसित स्थापत्य की विविधता को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत देख सकते हैं क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य बंगाल यहाँ की स्थानीय शैली के अंतर्गत निर्मित अधिकांश इमारतों में पत्थर के स्थान पर ईंटों का अधिकाधिक प्रयोग किया गया, छोटे-छोटे खम्भों पर नुकीली मेहराबों का निर्माण तथा कमल जैसे सजावट के प्रतीक चिन्हों को अपनाना बंगाली स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विशेषता थी, भवनों में काले संगमरमर का प्रयोग करते हुए बड़ी संख्या में गुम्बदों का निर्माण बंगाली स्थापत्य की महत्वपूर्ण विशिष्टता है, इन विशिष्टताओं को बड़ा सोना मस्जिद, छोटा सोना मस्जिद, अदीना मस्जिद, कदमरसूल मस्जिद, लोटन मस्जिद आदि उदाहरणों में देखा जा सकता है जौनपुर जौनपुर के शासक कला एवं विद्या के महान संरक्षक थे, इन्होने हिन्दू-मुस्लिम निर्माण कला शैली के विचारों का वास्तविक एवं प्रारंभिक समन्वय करते हुए स्थापत्य का विकास किया, जौनपुर के स्थापत्य में इस्लामिक स्थापत्य की प्रतिनिधि विशेषता होते हुए भी मीनारों का अभाव देखा जा सकता है, यहाँ जालियों का अधिकतम प्रयोग किया गया है,शर्की शासकोण की रूचिविशाल भवनों का निर्माण में थी, जौनपुर की कुछ मस्जिद में लगे फव्वारों में भारतीय शैली का प्रभाव देखा जा सकता है जामा मस्जिद, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद आदि उदाहरणों से जौनपुर स्थापत्य की विशेषताओं को देख सकते हैं, मालवा मालवा पर अफगान शासकों का अधिकार था, मालवा की स्थापत्य शैली दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य शैली से प्रभावित थी| मालवा राज्य में स्थापत्य सम्बन्धी अधिकाँश उदहारण धार और मांडू से मिलते हैं, धार में दिलावर खां मस्जिद और लाट मस्जिद स्थित है जबकि मांडू में हुशंगशाह का मकबरा, जहाज महल एवं हिंडोला महलआदि का निर्माण करवाया गया था, यद्यपि मालवा स्थापत्य सल्तनत शैली से प्रभावित थी तथापि यहाँ भी मीनारों का अभाव दिखता है| भवनों के निर्माण में रंगीन पत्थरों का प्रयोग, नुकीले मेहराब तथा ढालदार दीवारें मालवा स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं हैं, गुजरात गुजरात की वास्तुकला शैली, प्रांतीय शैलियों में सबसे अधिक विकसितथी गुजरात शैली में पत्थर की कटाई का काम बड़ी कुशलता से किया जाता था, गुजरात शैली में बनी इमारतों में अहमदबाद की जामा मस्जिद, बशीर की मस्जिद तथा चम्पानेर में जामी मस्जिद आदि प्रमुख उदाहरण हैं. गुजराती शैली में छतों को रोकने के लिए अधिकाधिक स्तम्भों का प्रयोग किया जाता था जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है की गुजरात के शासक स्थापत्य में नक्काशी पर अधिक बल दिया करते थे , भवनों में जालियों का बहुतायत में प्रयोग दिखाई देता है राजस्थान चित्तौड़ में चित्तौड़गढ़ किला तथा राणा कुम्भा द्वारा निर्मित कीर्ति स्तम्भ, जोधपुर में उम्मेद पैलेस एवं मेहरानागढ़ किला तथा आमेर/जयपुर में आमेर का किला, नाहरगढ़ किला, हवा महल आदिराजस्थानी स्थापत्य के प्रमुख उदहारण हैं राजस्थान/राजपूत शैली में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का बहुतायत में प्रयोग किया जाता था, भवन निर्माण में नक्काशी में कीमती पत्थरों का प्रयोग राजपूत शैली की प्रमुख विशेषता है, राजस्थानी स्थापत्य में छतरी एवं जालियों का अधिकाधिक प्रयोग तथा भवनों में झूलती हुई बालकनी का निर्माण एक महत्वपूर्ण विशिष्टता है| बहमनी एवं उत्तराधिकारी राज्यों का स्थापत्य बहमनी राज्य ने दक्षिण और उत्तर के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। इस प्रकार जिससंस्कृतिका विकास हुआ, उसमें कुछ ऐसी निजी विशेषताएँ थीं, जो उसे उत्तर की संस्कृति से अलग करती थीं। बहमनी राज्य और उसके उत्तराधिकारी राज्यों ने स्थापत्य कला के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की, इस काल में बीदर में महमूद गवां के मदरसे का निर्माण हुआ, बीजापुर में गोल गुम्बद, गोलकुंडा का किला और हैदराबाद का चारमीनार तत्कालीन स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदहारण हैं, बहमनी स्थापत्य में प्याज के आकार का गुम्बद बनाया जाता था, ध्यातव्य है कि गुम्बद निर्माण कला में प्याज के आकार का गुम्बद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यहाँ की मीनारों पर अधिकाधिक अलंकरण किया जाता था| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत के उत्तरार्ध में उदित प्रांतीय राज्यों ने कला एवं स्थापत्य के न केवल संरक्षण में बल्कि स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया| विविध विशिष्टताओं से युक्त अनेक क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था|
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##Question:14वीं से 16वीं सदी के मध्य भारत में उदित क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था| स्थापत्य सम्बन्धी उदाहरणों और विशेषताओं के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) The regional states that emerged in India between the 14th to the 16th century had a diverse approach to architecture. Justify the statement with the help of architectural examples and features. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में उस काल उदित क्षेत्रीय राज्यों और उनकी स्थापत्य में रूचि के बारे में जानकारी दीजिये मुख्य भाग में इन राज्यों में विकसित स्थापत्य के उदाहरण एवं उनकी विशेषताओं को खंडवार बताइए अंतिम में विशेषताओं में विविधता का संदर्भ देकर निष्कर्ष में कथन की पुष्टि कीजिये मुहम्मद तुगलक के शासन के समय से ही दिल्ली सल्तनत का विघटन प्रारम्भ होता है| दिल्ली सल्तनत के विघटन से विभिन्न स्वतंत्र प्रांतीय/क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ| इन क्षेत्रीय राज्यों में बंगाल, जौनपुर, मालवा, बहमनी राज्य, विजयनगर एवं गुजरात आदि प्रमुख थे| इन्होने स्थापत्य के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की| सल्तनत कालमेंभारतीय स्थापत्य कलाके क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ वह भारतीय तथा इस्लामी शैलियों का सम्मिश्रिण थी। इसलिए स्थापत्य कला की इस शैली को इण्डो इस्लामिक शैली कहा गया। प्रांतीय राज्यों द्वारा इण्डो इस्लामिक शैली की मूलभूत विशेषताओं को शामिल करते हुए अनेक विशिष्टताओं से युक्त विविध क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इन क्षेत्रीय राज्यों में विकसित स्थापत्य की विविधता को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत देख सकते हैं क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य बंगाल यहाँ की स्थानीय शैली के अंतर्गत निर्मित अधिकांश इमारतों में पत्थर के स्थान पर ईंटों का अधिकाधिक प्रयोग किया गया, छोटे-छोटे खम्भों पर नुकीली मेहराबों का निर्माण तथा कमल जैसे सजावट के प्रतीक चिन्हों को अपनाना बंगाली स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विशेषता थी, भवनों में काले संगमरमर का प्रयोग करते हुए बड़ी संख्या में गुम्बदों का निर्माण बंगाली स्थापत्य की महत्वपूर्ण विशिष्टता है, इन विशिष्टताओं को बड़ा सोना मस्जिद, छोटा सोना मस्जिद, अदीना मस्जिद, कदमरसूल मस्जिद, लोटन मस्जिद आदि उदाहरणों में देखा जा सकता है जौनपुर जौनपुर के शासक कला एवं विद्या के महान संरक्षक थे, इन्होने हिन्दू-मुस्लिम निर्माण कला शैली के विचारों का वास्तविक एवं प्रारंभिक समन्वय करते हुए स्थापत्य का विकास किया, जौनपुर के स्थापत्य में इस्लामिक स्थापत्य की प्रतिनिधि विशेषता होते हुए भी मीनारों का अभाव देखा जा सकता है, यहाँ जालियों का अधिकतम प्रयोग किया गया है,शर्की शासकोण की रूचिविशाल भवनों का निर्माण में थी, जौनपुर की कुछ मस्जिद में लगे फव्वारों में भारतीय शैली का प्रभाव देखा जा सकता है जामा मस्जिद, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद आदि उदाहरणों से जौनपुर स्थापत्य की विशेषताओं को देख सकते हैं, मालवा मालवा पर अफगान शासकों का अधिकार था, मालवा की स्थापत्य शैली दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य शैली से प्रभावित थी| मालवा राज्य में स्थापत्य सम्बन्धी अधिकाँश उदहारण धार और मांडू से मिलते हैं, धार में दिलावर खां मस्जिद और लाट मस्जिद स्थित है जबकि मांडू में हुशंगशाह का मकबरा, जहाज महल एवं हिंडोला महलआदि का निर्माण करवाया गया था, यद्यपि मालवा स्थापत्य सल्तनत शैली से प्रभावित थी तथापि यहाँ भी मीनारों का अभाव दिखता है| भवनों के निर्माण में रंगीन पत्थरों का प्रयोग, नुकीले मेहराब तथा ढालदार दीवारें मालवा स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं हैं, गुजरात गुजरात की वास्तुकला शैली, प्रांतीय शैलियों में सबसे अधिक विकसितथी गुजरात शैली में पत्थर की कटाई का काम बड़ी कुशलता से किया जाता था, गुजरात शैली में बनी इमारतों में अहमदबाद की जामा मस्जिद, बशीर की मस्जिद तथा चम्पानेर में जामी मस्जिद आदि प्रमुख उदाहरण हैं. गुजराती शैली में छतों को रोकने के लिए अधिकाधिक स्तम्भों का प्रयोग किया जाता था जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है की गुजरात के शासक स्थापत्य में नक्काशी पर अधिक बल दिया करते थे , भवनों में जालियों का बहुतायत में प्रयोग दिखाई देता है राजस्थान चित्तौड़ में चित्तौड़गढ़ किला तथा राणा कुम्भा द्वारा निर्मित कीर्ति स्तम्भ, जोधपुर में उम्मेद पैलेस एवं मेहरानागढ़ किला तथा आमेर/जयपुर में आमेर का किला, नाहरगढ़ किला, हवा महल आदिराजस्थानी स्थापत्य के प्रमुख उदहारण हैं राजस्थान/राजपूत शैली में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का बहुतायत में प्रयोग किया जाता था, भवन निर्माण में नक्काशी में कीमती पत्थरों का प्रयोग राजपूत शैली की प्रमुख विशेषता है, राजस्थानी स्थापत्य में छतरी एवं जालियों का अधिकाधिक प्रयोग तथा भवनों में झूलती हुई बालकनी का निर्माण एक महत्वपूर्ण विशिष्टता है| बहमनी एवं उत्तराधिकारी राज्यों का स्थापत्य बहमनी राज्य ने दक्षिण और उत्तर के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। इस प्रकार जिससंस्कृतिका विकास हुआ, उसमें कुछ ऐसी निजी विशेषताएँ थीं, जो उसे उत्तर की संस्कृति से अलग करती थीं। बहमनी राज्य और उसके उत्तराधिकारी राज्यों ने स्थापत्य कला के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की, इस काल में बीदर में महमूद गवां के मदरसे का निर्माण हुआ, बीजापुर में गोल गुम्बद, गोलकुंडा का किला और हैदराबाद का चारमीनार तत्कालीन स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदहारण हैं, बहमनी स्थापत्य में प्याज के आकार का गुम्बद बनाया जाता था, ध्यातव्य है कि गुम्बद निर्माण कला में प्याज के आकार का गुम्बद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यहाँ की मीनारों पर अधिकाधिक अलंकरण किया जाता था| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत के उत्तरार्ध में उदित प्रांतीय राज्यों ने कला एवं स्थापत्य के न केवल संरक्षण में बल्कि स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया| विविध विशिष्टताओं से युक्त अनेक क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था|
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14वीं से 16वीं सदी के मध्य भारत में उदित क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था| स्थापत्य सम्बन्धी उदाहरणों और विशेषताओं के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (200 शब्द)
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दृष्टिकोण- भूमिका में उस काल उदित क्षेत्रीय राज्यों और उनकी स्थापत्य में रूचि के बारे में जानकारी दीजिये मुख्य भाग में इन राज्यों में विकसित स्थापत्य के उदाहरण एवं उनकी विशेषताओं को खंडवार बताइए अंतिम में विशेषताओं में विविधता का संदर्भ देकर निष्कर्ष में कथन की पुष्टि कीजिये मुहम्मद तुगलक के शासन के समय से ही दिल्ली सल्तनत का विघटन प्रारम्भ होता है| दिल्ली सल्तनत के विघटन से विभिन्न स्वतंत्र प्रांतीय/क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ| इन क्षेत्रीय राज्यों में बंगाल, जौनपुर, मालवा, बहमनी राज्य, विजयनगर एवं गुजरात आदि प्रमुख थे| इन्होने स्थापत्य के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की| सल्तनत कालमेंभारतीय स्थापत्य कलाके क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ वह भारतीय तथा इस्लामी शैलियों का सम्मिश्रिण थी। इसलिए स्थापत्य कला की इस शैली को इण्डो इस्लामिक शैली कहा गया। प्रांतीय राज्यों द्वारा इण्डो इस्लामिक शैली की मूलभूत विशेषताओं को शामिल करते हुए अनेक विशिष्टताओं से युक्त विविध क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इन क्षेत्रीय राज्यों में विकसित स्थापत्य की विविधता को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत देख सकते हैं क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य बंगाल यहाँ की स्थानीय शैली के अंतर्गत निर्मित अधिकांश इमारतों में पत्थर के स्थान पर ईंटों का अधिकाधिक प्रयोग किया गया, छोटे-छोटे खम्भों पर नुकीली मेहराबों का निर्माण तथा कमल जैसे सजावट के प्रतीक चिन्हों को अपनाना बंगाली स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विशेषता थी, भवनों में काले संगमरमर का प्रयोग करते हुए बड़ी संख्या में गुम्बदों का निर्माण बंगाली स्थापत्य की महत्वपूर्ण विशिष्टता है, इन विशिष्टताओं को बड़ा सोना मस्जिद, छोटा सोना मस्जिद, अदीना मस्जिद, कदमरसूल मस्जिद, लोटन मस्जिद आदि उदाहरणों में देखा जा सकता है जौनपुर जौनपुर के शासक कला एवं विद्या के महान संरक्षक थे, इन्होने हिन्दू-मुस्लिम निर्माण कला शैली के विचारों का वास्तविक एवं प्रारंभिक समन्वय करते हुए स्थापत्य का विकास किया, जौनपुर के स्थापत्य में इस्लामिक स्थापत्य की प्रतिनिधि विशेषता होते हुए भी मीनारों का अभाव देखा जा सकता है, यहाँ जालियों का अधिकतम प्रयोग किया गया है,शर्की शासकोण की रूचिविशाल भवनों का निर्माण में थी, जौनपुर की कुछ मस्जिद में लगे फव्वारों में भारतीय शैली का प्रभाव देखा जा सकता है जामा मस्जिद, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद आदि उदाहरणों से जौनपुर स्थापत्य की विशेषताओं को देख सकते हैं, मालवा मालवा पर अफगान शासकों का अधिकार था, मालवा की स्थापत्य शैली दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य शैली से प्रभावित थी| मालवा राज्य में स्थापत्य सम्बन्धी अधिकाँश उदहारण धार और मांडू से मिलते हैं, धार में दिलावर खां मस्जिद और लाट मस्जिद स्थित है जबकि मांडू में हुशंगशाह का मकबरा, जहाज महल एवं हिंडोला महलआदि का निर्माण करवाया गया था, यद्यपि मालवा स्थापत्य सल्तनत शैली से प्रभावित थी तथापि यहाँ भी मीनारों का अभाव दिखता है| भवनों के निर्माण में रंगीन पत्थरों का प्रयोग, नुकीले मेहराब तथा ढालदार दीवारें मालवा स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं हैं, गुजरात गुजरात की वास्तुकला शैली, प्रांतीय शैलियों में सबसे अधिक विकसितथी गुजरात शैली में पत्थर की कटाई का काम बड़ी कुशलता से किया जाता था, गुजरात शैली में बनी इमारतों में अहमदबाद की जामा मस्जिद, बशीर की मस्जिद तथा चम्पानेर में जामी मस्जिद आदि प्रमुख उदाहरण हैं. गुजराती शैली में छतों को रोकने के लिए अधिकाधिक स्तम्भों का प्रयोग किया जाता था जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है की गुजरात के शासक स्थापत्य में नक्काशी पर अधिक बल दिया करते थे , भवनों में जालियों का बहुतायत में प्रयोग दिखाई देता है राजस्थान चित्तौड़ में चित्तौड़गढ़ किला तथा राणा कुम्भा द्वारा निर्मित कीर्ति स्तम्भ, जोधपुर में उम्मेद पैलेस एवं मेहरानागढ़ किला तथा आमेर/जयपुर में आमेर का किला, नाहरगढ़ किला, हवा महल आदिराजस्थानी स्थापत्य के प्रमुख उदहारण हैं राजस्थान/राजपूत शैली में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का बहुतायत में प्रयोग किया जाता था, भवन निर्माण में नक्काशी में कीमती पत्थरों का प्रयोग राजपूत शैली की प्रमुख विशेषता है, राजस्थानी स्थापत्य में छतरी एवं जालियों का अधिकाधिक प्रयोग तथा भवनों में झूलती हुई बालकनी का निर्माण एक महत्वपूर्ण विशिष्टता है| बहमनी एवं उत्तराधिकारी राज्यों का स्थापत्य बहमनी राज्य ने दक्षिण और उत्तर के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। इस प्रकार जिससंस्कृतिका विकास हुआ, उसमें कुछ ऐसी निजी विशेषताएँ थीं, जो उसे उत्तर की संस्कृति से अलग करती थीं। बहमनी राज्य और उसके उत्तराधिकारी राज्यों ने स्थापत्य कला के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की, इस काल में बीदर में महमूद गवां के मदरसे का निर्माण हुआ, बीजापुर में गोल गुम्बद, गोलकुंडा का किला और हैदराबाद का चारमीनार तत्कालीन स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदहारण हैं, बहमनी स्थापत्य में प्याज के आकार का गुम्बद बनाया जाता था, ध्यातव्य है कि गुम्बद निर्माण कला में प्याज के आकार का गुम्बद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यहाँ की मीनारों पर अधिकाधिक अलंकरण किया जाता था| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत के उत्तरार्ध में उदित प्रांतीय राज्यों ने कला एवं स्थापत्य के न केवल संरक्षण में बल्कि स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया| विविध विशिष्टताओं से युक्त अनेक क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था|
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##Question:14वीं से 16वीं सदी के मध्य भारत में उदित क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था| स्थापत्य सम्बन्धी उदाहरणों और विशेषताओं के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (200 शब्द)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में उस काल उदित क्षेत्रीय राज्यों और उनकी स्थापत्य में रूचि के बारे में जानकारी दीजिये मुख्य भाग में इन राज्यों में विकसित स्थापत्य के उदाहरण एवं उनकी विशेषताओं को खंडवार बताइए अंतिम में विशेषताओं में विविधता का संदर्भ देकर निष्कर्ष में कथन की पुष्टि कीजिये मुहम्मद तुगलक के शासन के समय से ही दिल्ली सल्तनत का विघटन प्रारम्भ होता है| दिल्ली सल्तनत के विघटन से विभिन्न स्वतंत्र प्रांतीय/क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ| इन क्षेत्रीय राज्यों में बंगाल, जौनपुर, मालवा, बहमनी राज्य, विजयनगर एवं गुजरात आदि प्रमुख थे| इन्होने स्थापत्य के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की| सल्तनत कालमेंभारतीय स्थापत्य कलाके क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ वह भारतीय तथा इस्लामी शैलियों का सम्मिश्रिण थी। इसलिए स्थापत्य कला की इस शैली को इण्डो इस्लामिक शैली कहा गया। प्रांतीय राज्यों द्वारा इण्डो इस्लामिक शैली की मूलभूत विशेषताओं को शामिल करते हुए अनेक विशिष्टताओं से युक्त विविध क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इन क्षेत्रीय राज्यों में विकसित स्थापत्य की विविधता को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत देख सकते हैं क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य बंगाल यहाँ की स्थानीय शैली के अंतर्गत निर्मित अधिकांश इमारतों में पत्थर के स्थान पर ईंटों का अधिकाधिक प्रयोग किया गया, छोटे-छोटे खम्भों पर नुकीली मेहराबों का निर्माण तथा कमल जैसे सजावट के प्रतीक चिन्हों को अपनाना बंगाली स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विशेषता थी, भवनों में काले संगमरमर का प्रयोग करते हुए बड़ी संख्या में गुम्बदों का निर्माण बंगाली स्थापत्य की महत्वपूर्ण विशिष्टता है, इन विशिष्टताओं को बड़ा सोना मस्जिद, छोटा सोना मस्जिद, अदीना मस्जिद, कदमरसूल मस्जिद, लोटन मस्जिद आदि उदाहरणों में देखा जा सकता है जौनपुर जौनपुर के शासक कला एवं विद्या के महान संरक्षक थे, इन्होने हिन्दू-मुस्लिम निर्माण कला शैली के विचारों का वास्तविक एवं प्रारंभिक समन्वय करते हुए स्थापत्य का विकास किया, जौनपुर के स्थापत्य में इस्लामिक स्थापत्य की प्रतिनिधि विशेषता होते हुए भी मीनारों का अभाव देखा जा सकता है, यहाँ जालियों का अधिकतम प्रयोग किया गया है,शर्की शासकोण की रूचिविशाल भवनों का निर्माण में थी, जौनपुर की कुछ मस्जिद में लगे फव्वारों में भारतीय शैली का प्रभाव देखा जा सकता है जामा मस्जिद, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद आदि उदाहरणों से जौनपुर स्थापत्य की विशेषताओं को देख सकते हैं, मालवा मालवा पर अफगान शासकों का अधिकार था, मालवा की स्थापत्य शैली दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य शैली से प्रभावित थी| मालवा राज्य में स्थापत्य सम्बन्धी अधिकाँश उदहारण धार और मांडू से मिलते हैं, धार में दिलावर खां मस्जिद और लाट मस्जिद स्थित है जबकि मांडू में हुशंगशाह का मकबरा, जहाज महल एवं हिंडोला महलआदि का निर्माण करवाया गया था, यद्यपि मालवा स्थापत्य सल्तनत शैली से प्रभावित थी तथापि यहाँ भी मीनारों का अभाव दिखता है| भवनों के निर्माण में रंगीन पत्थरों का प्रयोग, नुकीले मेहराब तथा ढालदार दीवारें मालवा स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं हैं, गुजरात गुजरात की वास्तुकला शैली, प्रांतीय शैलियों में सबसे अधिक विकसितथी गुजरात शैली में पत्थर की कटाई का काम बड़ी कुशलता से किया जाता था, गुजरात शैली में बनी इमारतों में अहमदबाद की जामा मस्जिद, बशीर की मस्जिद तथा चम्पानेर में जामी मस्जिद आदि प्रमुख उदाहरण हैं. गुजराती शैली में छतों को रोकने के लिए अधिकाधिक स्तम्भों का प्रयोग किया जाता था जिनके अवलोकन से स्पष्ट होता है की गुजरात के शासक स्थापत्य में नक्काशी पर अधिक बल दिया करते थे , भवनों में जालियों का बहुतायत में प्रयोग दिखाई देता है राजस्थान चित्तौड़ में चित्तौड़गढ़ किला तथा राणा कुम्भा द्वारा निर्मित कीर्ति स्तम्भ, जोधपुर में उम्मेद पैलेस एवं मेहरानागढ़ किला तथा आमेर/जयपुर में आमेर का किला, नाहरगढ़ किला, हवा महल आदिराजस्थानी स्थापत्य के प्रमुख उदहारण हैं राजस्थान/राजपूत शैली में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का बहुतायत में प्रयोग किया जाता था, भवन निर्माण में नक्काशी में कीमती पत्थरों का प्रयोग राजपूत शैली की प्रमुख विशेषता है, राजस्थानी स्थापत्य में छतरी एवं जालियों का अधिकाधिक प्रयोग तथा भवनों में झूलती हुई बालकनी का निर्माण एक महत्वपूर्ण विशिष्टता है| बहमनी एवं उत्तराधिकारी राज्यों का स्थापत्य बहमनी राज्य ने दक्षिण और उत्तर के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। इस प्रकार जिससंस्कृतिका विकास हुआ, उसमें कुछ ऐसी निजी विशेषताएँ थीं, जो उसे उत्तर की संस्कृति से अलग करती थीं। बहमनी राज्य और उसके उत्तराधिकारी राज्यों ने स्थापत्य कला के विकास में पर्याप्त रूचि प्रदर्शित की, इस काल में बीदर में महमूद गवां के मदरसे का निर्माण हुआ, बीजापुर में गोल गुम्बद, गोलकुंडा का किला और हैदराबाद का चारमीनार तत्कालीन स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदहारण हैं, बहमनी स्थापत्य में प्याज के आकार का गुम्बद बनाया जाता था, ध्यातव्य है कि गुम्बद निर्माण कला में प्याज के आकार का गुम्बद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यहाँ की मीनारों पर अधिकाधिक अलंकरण किया जाता था| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत के उत्तरार्ध में उदित प्रांतीय राज्यों ने कला एवं स्थापत्य के न केवल संरक्षण में बल्कि स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया| विविध विशिष्टताओं से युक्त अनेक क्षेत्रीय स्थापत्य शैलियों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन क्षेत्रीय राज्यों का स्थापत्य के संदर्भ में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण था|
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धर्मनिरपेक्षतावाद की भारतीय संकल्पना, धर्मनिरपेक्षतावाद के पाश्चात्य मॉडल से कई अर्थों में भिन्न है। टिप्पणी कीजिए। (200 शब्द)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में धर्मनिरपेक्षतावाद का परिचय दीजिए। इसके बाद भारतीय और पश्चिमी व्याख्या में अंतर पर विचार व्यक्त कीजिए। निष्कर्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपना पक्ष रखिए। धर्मनिरपेक्षतावाद एक विचारधारा है जो राजनीति से धर्म के पृथक्करण का समर्थन करता है। यह सरकारी संस्थाओं एवं राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिदेशित अधिकारियों को धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक पदाधिकारिओं से पृथक करने संबंधी सिद्धांत है। यह समाज को अनुभव कराने का प्रयास करता है कि किसी भी व्यक्ति को धार्मिक वर्चस्व से रहित होना चाहिए। गौरतलब है कि धर्मनिरपेक्षतावाद की यह अवधारणा भारतीय एवं पाश्चात्य संदर्भ में अलग-अलग अर्थों में स्वीकार की जाती है। जिसके कई आधार हैं, इसे निम्न रूपों में समझ सकते हैं: भारतीय संदर्भ में सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। इसके विपरीत पाश्चात्य संदर्भ में राज्य का धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में राज्य किसी धर्म के साथ अपनी पहचान स्थापित नहीं कर सकता है। सभी धर्मों को समान रूप से नीतियों में लाभ दिये जाते हैं। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य न तो किसी धर्म को प्रोत्साहित कर सकता है न ही भेदभाव। भारत में राज्य के लिए जरूरी नहीं कि धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान प्रदान करे। यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दर्शाने कि अनुमति भी देता है जैसे- सामाजिक बुराइयों। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य कि कोई भूमिका नहीं है। चर्च अपने नियमों से धार्मिक मामलों को देखता है। निष्कर्षतः भारत के संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षतावाद की अवधारणा पश्चिम से प्रेरित है। परंतु उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पश्चिम में, यह चर्च और राज्य के मध्य कठोर पृथक्करण पर केन्द्रित है , जबकि भारत में सभी धर्मों के शांतिपूर्ण-अस्तित्व को केंद्र में रखा गया है।
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##Question:धर्मनिरपेक्षतावाद की भारतीय संकल्पना, धर्मनिरपेक्षतावाद के पाश्चात्य मॉडल से कई अर्थों में भिन्न है। टिप्पणी कीजिए। (200 शब्द)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में धर्मनिरपेक्षतावाद का परिचय दीजिए। इसके बाद भारतीय और पश्चिमी व्याख्या में अंतर पर विचार व्यक्त कीजिए। निष्कर्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपना पक्ष रखिए। धर्मनिरपेक्षतावाद एक विचारधारा है जो राजनीति से धर्म के पृथक्करण का समर्थन करता है। यह सरकारी संस्थाओं एवं राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिदेशित अधिकारियों को धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक पदाधिकारिओं से पृथक करने संबंधी सिद्धांत है। यह समाज को अनुभव कराने का प्रयास करता है कि किसी भी व्यक्ति को धार्मिक वर्चस्व से रहित होना चाहिए। गौरतलब है कि धर्मनिरपेक्षतावाद की यह अवधारणा भारतीय एवं पाश्चात्य संदर्भ में अलग-अलग अर्थों में स्वीकार की जाती है। जिसके कई आधार हैं, इसे निम्न रूपों में समझ सकते हैं: भारतीय संदर्भ में सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। इसके विपरीत पाश्चात्य संदर्भ में राज्य का धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में राज्य किसी धर्म के साथ अपनी पहचान स्थापित नहीं कर सकता है। सभी धर्मों को समान रूप से नीतियों में लाभ दिये जाते हैं। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य न तो किसी धर्म को प्रोत्साहित कर सकता है न ही भेदभाव। भारत में राज्य के लिए जरूरी नहीं कि धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान प्रदान करे। यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दर्शाने कि अनुमति भी देता है जैसे- सामाजिक बुराइयों। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य कि कोई भूमिका नहीं है। चर्च अपने नियमों से धार्मिक मामलों को देखता है। निष्कर्षतः भारत के संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षतावाद की अवधारणा पश्चिम से प्रेरित है। परंतु उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पश्चिम में, यह चर्च और राज्य के मध्य कठोर पृथक्करण पर केन्द्रित है , जबकि भारत में सभी धर्मों के शांतिपूर्ण-अस्तित्व को केंद्र में रखा गया है।
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"पेरिस शांति सम्मेलन 20 वर्षों का युद्ध विराम मात्र था"। इस कथन के संदर्भ मे द्वितीय विश्व युद्ध के सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक कारणों का विश्लेषण कीजिये । (250 शब्द )
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एप्रोच :: 1. पेरिस शांति सम्मेलन पर संक्षिप्त भूमिका लिखिये। 2. इसके बाद "20 वर्षों के युद्ध विराम को" पेरिस शांति सम्मेलन की कमियों को बताते हुए प्रस्तुत कीजिये। 3. द्वितीय विश्वयुद्ध के कारणों पर वर्गीकृत रूप से आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक कारकों को स्पष्ट करें। 4. पेरिस सम्मेलन की गलतियों को ना दोहराते हुए किये प्रयासों को बताते हुए निष्कर्ष लिखिये। उत्तर- प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद पेरिस में विजयी देशों का जो सम्मेलन हुआ उसे पेरिस शांति सम्मेलन कहते हैं। इसमें पराजित देशों पर लागू की जाने वाली "शांति की शर्तों" का निर्माण हुआ। यह सम्मेलन 1919 में पेरिस में हुआ था इसमें लिये गये मुख्य निर्णय थे- राष्ट्र संघ का निर्माण तथा पराजित देशों के साथ पाँच शान्ति-संधियाँ। इस सम्मेलन की कमियाँ : 1. वर्साय की प्रतिशोधपूर्ण संधि- इसने ना सिर्फ जर्मन राष्ट्रवाद का अपमान किया बल्कि कठोर आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए गए जिससे जर्मनी में तीव्र मुद्रास्फीति का प्रसार हुआ। वार्साय की संधि द्वारा जर्मनी को छिन्न-भिन्न कर दिया गया, उपनिवेश छीन लिए गए, आर्थिक संसाधनों पर दूसरे राष्ट्रों का स्वामित्व स्थापित कर दिया गया और सैनिक दृष्टि से उसे अपंग बना दिया गया। वस्तुतः विजेता राष्ट्र ने प्रतिशोध के तहत कठोर शर्तों को जर्मनी पर लादा। संधि की शर्ते इतनी कठोर थी कि कोई भी स्वाभिमानी, सुसंस्कृत राष्ट्र इसे सहन नहीं कर सकता था। चर्चिल के शब्दों में “इसकी आर्थिक शर्तें इस हद तक कलंकपूर्ण तथा निर्बुद्ध थी कि उन्होंने इसे स्पष्टतया निरर्थक बना दिया।” 2. वुडरो विल्सन के 14 सूत्रीय सिद्धान्तों का पालन न होना - आत्मनिर्णय का अधिकार, विभिन्न देशों के मध्य समानता का अधिकार आदि पर विचार ना करते हुए ब्रिटेन व फ्रांस का प्रभुत्व छाया रहा। 3. राष्ट्रसंघ की स्थापना में पराजित देशों को शामिल ना करने से इसे विजयी देशों का गुट समझा गया। इसके साथ ही इसकी स्थापना में प्रभावी भूमिका निभाने वाला देश अमेरिका के स्वयं शामिल ना होने से इसकी नींव कमजोर हो गयी। 4. इटली को उचित स्थान न मिलना- 1915 की लंदन की गुप्त संधि के तहत इटली को किये गए वादों का पेरिस शांति सम्मेलन में पूरा ना होने से इटली ने अपमानित महसूस किया। इसने इटली में उग्रराष्ट्रवाद को बढ़ाया, जिसका परिणाम फासीवाद के रूप में सामने आता है। उपरोक्त कमियों के कारण यह द्वितीय विश्वयुद्ध को नही रोक सका , बल्कि सहायक के रूप में सामने आया। द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण :- आर्थिक कारण :- पेरिस की संधियों द्वारा विभिन्न राष्ट्रों पर लगाए गए कठोर आर्थिक प्रतिबंधों के कारण कई राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था खराब हुई। इससे तीव्र मुद्रास्फीति हुई जिसने जनसामान्य को उद्देलित किया। इसके साथ ही 1929 की महामंदी से आर्थिक संकट और गहराया । सामाजिक कारण :- पेरिस की संधि में पराजित राष्ट्रों के अपमान से जहाँ उग्र राष्ट्रवाद की भावना बलबती हुई, वहीं आर्थिक संकटों से बेरोजगारी बढ़ी। इसने युवाओं को फासीवादी शक्तियों की ओर मोड़ दिया। राजनैतिक कारण :- साम्यवाद विरोधी नीति अपनाते हुए पूँजीवादी राष्ट्रों ने फासीवादी राष्ट्रों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाई। जिसने उनकी आकांक्षाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके साथ ही उपनिवेशों के लिए प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रसंघ की कमजोरियाँ आदि कारणों ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर मार्ग प्रशस्त किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पेरिस शांति सम्मेलन की गलतियों को ना दोहराते हुए पराजित राष्ट्रों के साथ कठोर संधियाँ नहीं की गयी । इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्रसंघ को भी प्रभावी संस्था बनाया गया जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आये है।
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##Question:"पेरिस शांति सम्मेलन 20 वर्षों का युद्ध विराम मात्र था"। इस कथन के संदर्भ मे द्वितीय विश्व युद्ध के सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक कारणों का विश्लेषण कीजिये । (250 शब्द )##Answer:एप्रोच :: 1. पेरिस शांति सम्मेलन पर संक्षिप्त भूमिका लिखिये। 2. इसके बाद "20 वर्षों के युद्ध विराम को" पेरिस शांति सम्मेलन की कमियों को बताते हुए प्रस्तुत कीजिये। 3. द्वितीय विश्वयुद्ध के कारणों पर वर्गीकृत रूप से आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक कारकों को स्पष्ट करें। 4. पेरिस सम्मेलन की गलतियों को ना दोहराते हुए किये प्रयासों को बताते हुए निष्कर्ष लिखिये। उत्तर- प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद पेरिस में विजयी देशों का जो सम्मेलन हुआ उसे पेरिस शांति सम्मेलन कहते हैं। इसमें पराजित देशों पर लागू की जाने वाली "शांति की शर्तों" का निर्माण हुआ। यह सम्मेलन 1919 में पेरिस में हुआ था इसमें लिये गये मुख्य निर्णय थे- राष्ट्र संघ का निर्माण तथा पराजित देशों के साथ पाँच शान्ति-संधियाँ। इस सम्मेलन की कमियाँ : 1. वर्साय की प्रतिशोधपूर्ण संधि- इसने ना सिर्फ जर्मन राष्ट्रवाद का अपमान किया बल्कि कठोर आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए गए जिससे जर्मनी में तीव्र मुद्रास्फीति का प्रसार हुआ। वार्साय की संधि द्वारा जर्मनी को छिन्न-भिन्न कर दिया गया, उपनिवेश छीन लिए गए, आर्थिक संसाधनों पर दूसरे राष्ट्रों का स्वामित्व स्थापित कर दिया गया और सैनिक दृष्टि से उसे अपंग बना दिया गया। वस्तुतः विजेता राष्ट्र ने प्रतिशोध के तहत कठोर शर्तों को जर्मनी पर लादा। संधि की शर्ते इतनी कठोर थी कि कोई भी स्वाभिमानी, सुसंस्कृत राष्ट्र इसे सहन नहीं कर सकता था। चर्चिल के शब्दों में “इसकी आर्थिक शर्तें इस हद तक कलंकपूर्ण तथा निर्बुद्ध थी कि उन्होंने इसे स्पष्टतया निरर्थक बना दिया।” 2. वुडरो विल्सन के 14 सूत्रीय सिद्धान्तों का पालन न होना - आत्मनिर्णय का अधिकार, विभिन्न देशों के मध्य समानता का अधिकार आदि पर विचार ना करते हुए ब्रिटेन व फ्रांस का प्रभुत्व छाया रहा। 3. राष्ट्रसंघ की स्थापना में पराजित देशों को शामिल ना करने से इसे विजयी देशों का गुट समझा गया। इसके साथ ही इसकी स्थापना में प्रभावी भूमिका निभाने वाला देश अमेरिका के स्वयं शामिल ना होने से इसकी नींव कमजोर हो गयी। 4. इटली को उचित स्थान न मिलना- 1915 की लंदन की गुप्त संधि के तहत इटली को किये गए वादों का पेरिस शांति सम्मेलन में पूरा ना होने से इटली ने अपमानित महसूस किया। इसने इटली में उग्रराष्ट्रवाद को बढ़ाया, जिसका परिणाम फासीवाद के रूप में सामने आता है। उपरोक्त कमियों के कारण यह द्वितीय विश्वयुद्ध को नही रोक सका , बल्कि सहायक के रूप में सामने आया। द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण :- आर्थिक कारण :- पेरिस की संधियों द्वारा विभिन्न राष्ट्रों पर लगाए गए कठोर आर्थिक प्रतिबंधों के कारण कई राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था खराब हुई। इससे तीव्र मुद्रास्फीति हुई जिसने जनसामान्य को उद्देलित किया। इसके साथ ही 1929 की महामंदी से आर्थिक संकट और गहराया । सामाजिक कारण :- पेरिस की संधि में पराजित राष्ट्रों के अपमान से जहाँ उग्र राष्ट्रवाद की भावना बलबती हुई, वहीं आर्थिक संकटों से बेरोजगारी बढ़ी। इसने युवाओं को फासीवादी शक्तियों की ओर मोड़ दिया। राजनैतिक कारण :- साम्यवाद विरोधी नीति अपनाते हुए पूँजीवादी राष्ट्रों ने फासीवादी राष्ट्रों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाई। जिसने उनकी आकांक्षाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके साथ ही उपनिवेशों के लिए प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रसंघ की कमजोरियाँ आदि कारणों ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर मार्ग प्रशस्त किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पेरिस शांति सम्मेलन की गलतियों को ना दोहराते हुए पराजित राष्ट्रों के साथ कठोर संधियाँ नहीं की गयी । इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्रसंघ को भी प्रभावी संस्था बनाया गया जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आये है।
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मांग और पूर्ति को स्पष्ट करते हुए , उनके बीच के संबंधो को समझाइए । इनको निर्धारित करने वाले कारकों की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द )
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अप्रोच :- भूमिका में मांग और पूर्ति को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के पहले भाग में उनके बीच संबंधो को परिभाषित कीजिये । उत्तर के उत्तर के दूसरे भाग में इनके निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- किसी वस्तु या सेवाओ की वह मात्रा जिसको ग्राहक एक निश्चित कीमत पर अपनी क्षमता के अनुसार खरीदने की चाहत रखता है , मांग कहलाती है ।मांग द्वारा किसी वस्तु या सेवा की बाज़ार में उपलब्धता का आकलन किया जाता है, साथ प्रभावी प्रयास द्वारा उसकी आम जनता तक पहुँच सुनिश्चित की जाती है ।पूर्ति से तात्पर्य वस्तु या सेवाओ की उस मात्रा से है जिसको कोई फ़र्म या उत्पादक किसी निश्चित कीमत पर बेचना चाहता है।अन्य कारकों के साथ साथ पूर्ति मांग पर भी निर्भर करती है । यदि मांग ज्यादा होने पर , वस्तु या सेवाओ का उत्पादन बढ़ा दिया जाता है तो मांग और पूर्ति में संतुलन कायम किया जा सकता है और यदि उत्पादन में वृद्धि नही की जाती है तो मांग बढ़ने के साथ साथ पूर्ति में कमी आ जाती है । मांग और पूर्ति आपस में एक दूसरे के साथ परस्पर रूप से जुड़े हुए हैं ।मांग और पूर्ति एक दूसरे पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हों के साथ- साथ कुछ अन्य कारकों पर भी निर्भर करते है ।जिसको निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- मांग के निर्धारक कारक/ तत्व :- मूल्य :- यह एक प्रभावी कारक है । अन्य कारको के स्थिर रहने पर ,मूल्य बढ़ने के साथ मांग घटती है और मूल्य घटने के साथ समान्यतः मांग बढ़ती है । उपभोक्ता की आय :- किसी वस्तु या सेवाओ की मांग , प्रमुख रूप से उपभोक्ता की आय पर निर्भर करती है , क्योकि उपभोक्ता की ज्यादा आय , ज्यादा मांग उत्पन्न करने में सहायक होती है । कभी कभी ऐसा देखा जाता है कि किसी वस्तु या सेवाओ की मांग में कमी आ जाती है जब उपभोक्ता की आय में कमी देखी जाती है । प्रतिस्थापित वस्तुएं व पूरक वस्तुयों के मूल्य:- किसी वस्तु विशेष की मांग ज्यादा होने पर उसकी मांग को संभावित वस्तुओ या पूरक वस्तुओ द्वारा विस्थापित कर दिया जाता है । जैसे चाय की मांग ज्यादा होने पर उसे कॉफी द्वारा विस्थापित कर दिया जाना। मौसम का प्रभाव :- ज़्यादातर वस्तुयों के उत्पादन के लिए , कच्चा मटिरियल कृषि से प्राप्त होता है । इसलिए उनके मांग मौसमी परिघटनाओ से प्रभावित होती है । इसके अतिरिक्त उन वस्तुओ की मांग भी मौसम से प्रभावित होती हैं जिनका उपयोग मौसम पर आधारित होता है ।जैसे गर्मी या सर्दी के कपड़े आदि । अभिरुचि में परिवर्तन:- उपभोक्ता की किसी वस्तु या सेवा में अभिरुचि भी उस वस्तु या सेवा की मांग बढ़ाने या घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । इसी प्रकार पूर्ति का सुनिश्चितता , निम्न लिखित कारकों पर निर्भर करती है :- मूल्य :- मांग की ही तरह पूर्ति के संदर्भ में भी मूल्य के प्रमुख कारक है । किसी वस्तु का ज्यादा मूल्य उसके मांग को कम करता है , जिससे उसकी बाज़ार में पूर्ति भी प्रभावित होती है ।उत्पादक कम उत्पादन करता है , जिससे उसकी पूर्ति घटती है । लागत :- किसी वस्तु या सेवा की उच्च लागत उसकी मांग को कम करता है , जिससे उसकी बाज़ार में पूर्ति भी प्रभावित होती है ।उत्पादक कम उत्पादन करता है , जिससे उसकी पूर्ति घटती है । कर में परिवर्तन :- सरकार द्वारा किसी वस्तु या सेवा पर लगाया गया कर , यदि कम है तो वस्तु सस्ती होगी , उसकी मांग बढ़ेगी , मांग में हुए वृद्धि को अधिक उत्पादन करके संतुलित किया जाएगा ।अगर उत्पादन नही बढ़ा तो मांग बढ़ने से पूर्ति कम हो जाएगी । तकनीक में पिछड़ापन:- किसी वस्तु या सेवाओ के उत्पादन में तकनीक में पिछड़ापन लागत मूल्य को बढ़ाता है , जिससे वस्तु की मांग कम होती है और पूर्ति प्रभावित होती है । प्राकृतिक कारक:- मांग की तरह पूर्ति भी प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करती है ।क्योकि अंतिम वस्तुओ के लिए कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है । उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि मांग और पूर्ति एक दूसरे से परस्पर संबन्धित तो है ही , इनका मान अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है ।मांग और पूर्ति का बाज़ार के संतुलन में बहुत ही महत्व पूर्ण योगदान होता है तथा सामान्यतः विश्व की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था इन्ही आधारों पर नियंत्रित होती है ।
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##Question:मांग और पूर्ति को स्पष्ट करते हुए , उनके बीच के संबंधो को समझाइए । इनको निर्धारित करने वाले कारकों की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द )##Answer:अप्रोच :- भूमिका में मांग और पूर्ति को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के पहले भाग में उनके बीच संबंधो को परिभाषित कीजिये । उत्तर के उत्तर के दूसरे भाग में इनके निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- किसी वस्तु या सेवाओ की वह मात्रा जिसको ग्राहक एक निश्चित कीमत पर अपनी क्षमता के अनुसार खरीदने की चाहत रखता है , मांग कहलाती है ।मांग द्वारा किसी वस्तु या सेवा की बाज़ार में उपलब्धता का आकलन किया जाता है, साथ प्रभावी प्रयास द्वारा उसकी आम जनता तक पहुँच सुनिश्चित की जाती है ।पूर्ति से तात्पर्य वस्तु या सेवाओ की उस मात्रा से है जिसको कोई फ़र्म या उत्पादक किसी निश्चित कीमत पर बेचना चाहता है।अन्य कारकों के साथ साथ पूर्ति मांग पर भी निर्भर करती है । यदि मांग ज्यादा होने पर , वस्तु या सेवाओ का उत्पादन बढ़ा दिया जाता है तो मांग और पूर्ति में संतुलन कायम किया जा सकता है और यदि उत्पादन में वृद्धि नही की जाती है तो मांग बढ़ने के साथ साथ पूर्ति में कमी आ जाती है । मांग और पूर्ति आपस में एक दूसरे के साथ परस्पर रूप से जुड़े हुए हैं ।मांग और पूर्ति एक दूसरे पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हों के साथ- साथ कुछ अन्य कारकों पर भी निर्भर करते है ।जिसको निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- मांग के निर्धारक कारक/ तत्व :- मूल्य :- यह एक प्रभावी कारक है । अन्य कारको के स्थिर रहने पर ,मूल्य बढ़ने के साथ मांग घटती है और मूल्य घटने के साथ समान्यतः मांग बढ़ती है । उपभोक्ता की आय :- किसी वस्तु या सेवाओ की मांग , प्रमुख रूप से उपभोक्ता की आय पर निर्भर करती है , क्योकि उपभोक्ता की ज्यादा आय , ज्यादा मांग उत्पन्न करने में सहायक होती है । कभी कभी ऐसा देखा जाता है कि किसी वस्तु या सेवाओ की मांग में कमी आ जाती है जब उपभोक्ता की आय में कमी देखी जाती है । प्रतिस्थापित वस्तुएं व पूरक वस्तुयों के मूल्य:- किसी वस्तु विशेष की मांग ज्यादा होने पर उसकी मांग को संभावित वस्तुओ या पूरक वस्तुओ द्वारा विस्थापित कर दिया जाता है । जैसे चाय की मांग ज्यादा होने पर उसे कॉफी द्वारा विस्थापित कर दिया जाना। मौसम का प्रभाव :- ज़्यादातर वस्तुयों के उत्पादन के लिए , कच्चा मटिरियल कृषि से प्राप्त होता है । इसलिए उनके मांग मौसमी परिघटनाओ से प्रभावित होती है । इसके अतिरिक्त उन वस्तुओ की मांग भी मौसम से प्रभावित होती हैं जिनका उपयोग मौसम पर आधारित होता है ।जैसे गर्मी या सर्दी के कपड़े आदि । अभिरुचि में परिवर्तन:- उपभोक्ता की किसी वस्तु या सेवा में अभिरुचि भी उस वस्तु या सेवा की मांग बढ़ाने या घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । इसी प्रकार पूर्ति का सुनिश्चितता , निम्न लिखित कारकों पर निर्भर करती है :- मूल्य :- मांग की ही तरह पूर्ति के संदर्भ में भी मूल्य के प्रमुख कारक है । किसी वस्तु का ज्यादा मूल्य उसके मांग को कम करता है , जिससे उसकी बाज़ार में पूर्ति भी प्रभावित होती है ।उत्पादक कम उत्पादन करता है , जिससे उसकी पूर्ति घटती है । लागत :- किसी वस्तु या सेवा की उच्च लागत उसकी मांग को कम करता है , जिससे उसकी बाज़ार में पूर्ति भी प्रभावित होती है ।उत्पादक कम उत्पादन करता है , जिससे उसकी पूर्ति घटती है । कर में परिवर्तन :- सरकार द्वारा किसी वस्तु या सेवा पर लगाया गया कर , यदि कम है तो वस्तु सस्ती होगी , उसकी मांग बढ़ेगी , मांग में हुए वृद्धि को अधिक उत्पादन करके संतुलित किया जाएगा ।अगर उत्पादन नही बढ़ा तो मांग बढ़ने से पूर्ति कम हो जाएगी । तकनीक में पिछड़ापन:- किसी वस्तु या सेवाओ के उत्पादन में तकनीक में पिछड़ापन लागत मूल्य को बढ़ाता है , जिससे वस्तु की मांग कम होती है और पूर्ति प्रभावित होती है । प्राकृतिक कारक:- मांग की तरह पूर्ति भी प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करती है ।क्योकि अंतिम वस्तुओ के लिए कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है । उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट है कि मांग और पूर्ति एक दूसरे से परस्पर संबन्धित तो है ही , इनका मान अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है ।मांग और पूर्ति का बाज़ार के संतुलन में बहुत ही महत्व पूर्ण योगदान होता है तथा सामान्यतः विश्व की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था इन्ही आधारों पर नियंत्रित होती है ।
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The nature of the economy of India in recent times is often described as jobless growth. Do you agree with this view? Give arguments in favor of your answer. (10 marks/150 words)
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APPROACH Introduce by background on LPG reforms which induced higher economic growth but has not created enough jobs. Give arguments for jobless growth in India. Conclude the answer. Answer: The process of liberalization, which began in the 1990s is seen as a milestone in the economic history of India. Since the liberalization, the economic condition gradually started improving and today India is one of the fastest growing economies in the world with an average yearly growth rate of around 6-7 per cent. Theoretically, acceleration in GDP growth of a labour-abundant country characterised by the market regime should push employment growth rate as well. However, the impact of liberalisation on the growth of employment in India is not as per the expectations. Arguments which support jobless growth : 1. Even during the high economic growth phase of 2005-12, the employment growth rate was just 0.4%with the addition of just 13 million jobs. There has been a continuous decline in employment elasticity as well. It declined sharply from 0.3 during 2000-05 to 0.05 during 2005-12. 2. Most of the new jobs were located in the informal sector with low earnings and no social protection resulting in casualization of jobs. 3. In the economy as a whole, the worker-population ratio declined in the 1990s for men and women in rural and urban areas in most age groups in the range 5-59. 4. Amongst the young, school participation has increased as the child and youth labour have declined. 5. There is an across-the-board improvement in the growth rate of labour productivity and wages and it is estimated that average per capita earnings per annum increased. However, the liberalization process has mainly benefited the top 10 per cent of wage earners who now make 12 times more than the bottom 10 per cent, up from a ratio of six in the 1990s. 6. As per the NSSO data, only 18% of working people have regular wage salary employment. Roughly 30% are casual labourers, dependent on daily or periodic renewal of job opportunities. The remaining 52% are self-employed. Most of them are in agriculture, working as helpers in family-owned businesses without salary. 7. Employment share of the public sector has gradually reduced as the public sector withdrew from many areas. A healthy growth rate in employment has been registered in the private sector. The liberalisation and globalisation process brought in more technological upgrades in the manufacturing sector which increased the mechanisation and reduced the employment. 8. In the case of the service sector, the employment growth has not matched the growth in GDP contribution. The sector presently contributes nearly 55% of total GDP but has employed a mere 27%. The problem of skill development enabling labour migration to services remains inadequately addressed. 9. The conditions of employment in the unorganised sector have not improved. The middlemen and employer continue to enjoy the benefits derived from their labour. The need of the hour is to create employment opportunities in labour intensive sectors, support the MSMEs which offer livelihood opportunities to a large section of the population and encouraging people’s entrepreneurial instincts which will result in tackling the issue of jobless growth.MUDRA scheme should also be expanded as it can be a game changer for the MSME sector and this sector has the potential to create required jobs in India.
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##Question:The nature of the economy of India in recent times is often described as jobless growth. Do you agree with this view? Give arguments in favor of your answer. (10 marks/150 words)##Answer:APPROACH Introduce by background on LPG reforms which induced higher economic growth but has not created enough jobs. Give arguments for jobless growth in India. Conclude the answer. Answer: The process of liberalization, which began in the 1990s is seen as a milestone in the economic history of India. Since the liberalization, the economic condition gradually started improving and today India is one of the fastest growing economies in the world with an average yearly growth rate of around 6-7 per cent. Theoretically, acceleration in GDP growth of a labour-abundant country characterised by the market regime should push employment growth rate as well. However, the impact of liberalisation on the growth of employment in India is not as per the expectations. Arguments which support jobless growth : 1. Even during the high economic growth phase of 2005-12, the employment growth rate was just 0.4%with the addition of just 13 million jobs. There has been a continuous decline in employment elasticity as well. It declined sharply from 0.3 during 2000-05 to 0.05 during 2005-12. 2. Most of the new jobs were located in the informal sector with low earnings and no social protection resulting in casualization of jobs. 3. In the economy as a whole, the worker-population ratio declined in the 1990s for men and women in rural and urban areas in most age groups in the range 5-59. 4. Amongst the young, school participation has increased as the child and youth labour have declined. 5. There is an across-the-board improvement in the growth rate of labour productivity and wages and it is estimated that average per capita earnings per annum increased. However, the liberalization process has mainly benefited the top 10 per cent of wage earners who now make 12 times more than the bottom 10 per cent, up from a ratio of six in the 1990s. 6. As per the NSSO data, only 18% of working people have regular wage salary employment. Roughly 30% are casual labourers, dependent on daily or periodic renewal of job opportunities. The remaining 52% are self-employed. Most of them are in agriculture, working as helpers in family-owned businesses without salary. 7. Employment share of the public sector has gradually reduced as the public sector withdrew from many areas. A healthy growth rate in employment has been registered in the private sector. The liberalisation and globalisation process brought in more technological upgrades in the manufacturing sector which increased the mechanisation and reduced the employment. 8. In the case of the service sector, the employment growth has not matched the growth in GDP contribution. The sector presently contributes nearly 55% of total GDP but has employed a mere 27%. The problem of skill development enabling labour migration to services remains inadequately addressed. 9. The conditions of employment in the unorganised sector have not improved. The middlemen and employer continue to enjoy the benefits derived from their labour. The need of the hour is to create employment opportunities in labour intensive sectors, support the MSMEs which offer livelihood opportunities to a large section of the population and encouraging people’s entrepreneurial instincts which will result in tackling the issue of jobless growth.MUDRA scheme should also be expanded as it can be a game changer for the MSME sector and this sector has the potential to create required jobs in India.
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The Constitution of India strikes a good balance between rigidity and flexibility. Discuss this statement in the light of modes of amendment of the constitution of India. (150 words)
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Approach: Explain various modes of amendment of the Constitution. Based on the different types of amendments, discuss how the constitution strikes a balance between rigidity and flexibility. Discuss amenability in the light of the doctrine of “Basic Structure of the Constitution”. Answer: Indian Constitution provides for amendment in order to adjust to the changing conditions and needs of the time. Article 368 provides for two types of amendment, while a third type is not deemed to be amendments for the purpose of Article 368. Thus, the constitution can be amended in the following three ways: 1. Amendment by a simple majority of the two houses of Parliament: It is required to meet the need of the ever-changing socio-political and financial sphere. Formation of new states, acquisition and termination of citizenship, delimitation of constituencies, administration of Scheduled areas and Scheduled tribes, administration of tribal areas etc. may be amended by a simple majority of the two houses of parliament. 2. Amendment by the special majority: Under Article 368, the majority of the provisions in the Constitution need to be amended by a special majority of the Parliament (more than 50% of the total membership of each House and a majority of two-thirds of the members of each House present and voting). FRs and DPSP are amendable by a special majority. 3. Amendment by a special majority of parliament and ratification by half of the state legislatures by simple majority: Under Article 368, it is required to amend those provisions which are related to the federal structure. For example: Election of the President – Article 54 and 55 The extent of the executive powers of the Union and States – Articles 73 and 162. Articles dealing with Judiciary, Supreme Court, High Courts- Articles 124 to 147, 214 to 231 and 241. Distribution of the legislative powers between the Centre and the States. Any of the Lists of the VIIth schedule Representation of the States in Parliament IVth schedule Article 368 itself. Hence, the Constitution strikes a good balance between rigidity and flexibility. It is not very easy to amend as in Britain, nor too difficult as in the USA. The Constitution is not excessively rigid so that it could grow with the growing nation and adapt itself to changing needs and circumstances. At the same time, it is not too flexible to allow ruling parties to change it according to their ideological leanings. Important provisions can be amended with a special majority while federal provisions also need the approval of states. Thus, the government of the day cannot override the will of Parliament, while the Centre cannot override the concerns of states. Moreover, the Supreme Court in the Kesavananda Bharati v. State of Kerala case came up with the Doctrine of the Basic Structure of the Constitution. As per this doctrine, parliament is competent to amend all the provisions of the Constitution provided the basic principles and provisions of the Constitution are not affected. In effect, this doctrine has further ensured the balance between stability and change.
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##Question:The Constitution of India strikes a good balance between rigidity and flexibility. Discuss this statement in the light of modes of amendment of the constitution of India. (150 words)##Answer:Approach: Explain various modes of amendment of the Constitution. Based on the different types of amendments, discuss how the constitution strikes a balance between rigidity and flexibility. Discuss amenability in the light of the doctrine of “Basic Structure of the Constitution”. Answer: Indian Constitution provides for amendment in order to adjust to the changing conditions and needs of the time. Article 368 provides for two types of amendment, while a third type is not deemed to be amendments for the purpose of Article 368. Thus, the constitution can be amended in the following three ways: 1. Amendment by a simple majority of the two houses of Parliament: It is required to meet the need of the ever-changing socio-political and financial sphere. Formation of new states, acquisition and termination of citizenship, delimitation of constituencies, administration of Scheduled areas and Scheduled tribes, administration of tribal areas etc. may be amended by a simple majority of the two houses of parliament. 2. Amendment by the special majority: Under Article 368, the majority of the provisions in the Constitution need to be amended by a special majority of the Parliament (more than 50% of the total membership of each House and a majority of two-thirds of the members of each House present and voting). FRs and DPSP are amendable by a special majority. 3. Amendment by a special majority of parliament and ratification by half of the state legislatures by simple majority: Under Article 368, it is required to amend those provisions which are related to the federal structure. For example: Election of the President – Article 54 and 55 The extent of the executive powers of the Union and States – Articles 73 and 162. Articles dealing with Judiciary, Supreme Court, High Courts- Articles 124 to 147, 214 to 231 and 241. Distribution of the legislative powers between the Centre and the States. Any of the Lists of the VIIth schedule Representation of the States in Parliament IVth schedule Article 368 itself. Hence, the Constitution strikes a good balance between rigidity and flexibility. It is not very easy to amend as in Britain, nor too difficult as in the USA. The Constitution is not excessively rigid so that it could grow with the growing nation and adapt itself to changing needs and circumstances. At the same time, it is not too flexible to allow ruling parties to change it according to their ideological leanings. Important provisions can be amended with a special majority while federal provisions also need the approval of states. Thus, the government of the day cannot override the will of Parliament, while the Centre cannot override the concerns of states. Moreover, the Supreme Court in the Kesavananda Bharati v. State of Kerala case came up with the Doctrine of the Basic Structure of the Constitution. As per this doctrine, parliament is competent to amend all the provisions of the Constitution provided the basic principles and provisions of the Constitution are not affected. In effect, this doctrine has further ensured the balance between stability and change.
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अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्व देखे जा सकते हैं | चर्चा कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द) Elements of progressiveness can be seen in Akbar"s religious, social and political policies. Discuss (10 marks / 150-200 words)
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दृष्टिकोण- भूमिका में अकबर की कुछ उपलब्धियां बता कर नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों की उपस्थिति की सूचना दीजिये धार्मिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को बताइये सामाजिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को बताइये राजनीतिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में कथन के अनुरूप सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये अकबर, मुगल वंश का तीसरा शासक था| यद्यपि अपने शासनकाल के आरम्भ में अकबर को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था तथापि अकबर ने तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक की स्थापना की थी| अकबर एक निरंकुश किन्तु बुद्धिमान शासक था इसलिए अकबर ने साम्राज्य की एकता बनाए रखने के लिए ऐसी प्रगतिशील नीतियां अपनाई जिनसे गैर मुसलमानों की राजभक्ति जीती जा सके और राज्य को सशक्त और दीर्घजीवी बनाया जा सके| अकबर की नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों को अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में देखा जा सकता है | अकबर की धार्मिक नीति अकबर ने सुलहकुल या सहिष्णुता की नीति का पालन किया और सभी धर्मावलम्बियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी| ध्यातव्य है कि मध्यकालीन विश्व में धर्म प्रभावी भूमिका में था| धर्म के आधार पर राज्य के द्वारा कोई भेदभाव नहीं किया गया| राज्य द्वारा भेदभाव पूर्ण करों एवं विभेदक प्रतीकों को भी समाप्त किया गया जैसे युद्ध बंदियों को दास बनाने की प्रथा, तीर्थ यात्रा कर को समाप्त किया गया और 1564 में जजिया कर को भी समाप्त किया गया| इस तरह के प्रयासों से अकबर ने जनता में भेदभाव का समापन करने का प्रयास किया धर्म के क्षेत्र में उलेमा वर्ग के प्रभाव को कम करने के लिए भी अकबर द्वारा कदम उठाये गए जैसे 1575 में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना की स्थापना, यहाँ अकबर विभिन्न विद्वानों के मतों को जानने का प्रयास करता था, इससे अकबर को विद्वानों में उपस्थित मतभिन्नता का बोध हुआ| महजर की घोषणा इसी मतभिन्नता के संदर्भ में की गयी| 1579 में अकबर ने खुतबा पढ़ा एवं महज़र जारी किया, इसके माध्यम से अकबर ने उलेमा वर्ग के प्रभाव को लगभग समाप्त कर दिया, इसके माध्यम से धार्मिक विषयों में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति अकबर के पास आ गयी| अर्थात अब राज्य धर्म पर प्रभावी हो गया था| इसी तरह का प्रगतिशील विकास तत्कालीन यूरोप में भी चल रहा था| 1582 में अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक आचार संहिता जारी की| दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) वस्तुतः दैवी एकेश्वरवाद से सम्बन्धित था| इसमें अकबर ने सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्वों का समावेश करने का प्रयास किया था |इस तरह से यह सर्व धर्म समन्वय का प्रयास दिखता है| अकबर की सामाजिक नीति अकबर ने सती प्रथा, बाल विवाह और बहुविवाह की परंपरा को हतोत्साहित करने का प्रयास किया| इन प्रयासों में व्यक्ति की गरिमा के संरक्षण की अनुगूंज प्राप्त होती है| इसी प्रकार अकबर ने विधवा विवाह का समर्थन किया| भारतीय इतिहास में अकबर प्रथम शासक था जिसने एक छत के नीचे हिन्दू एवं मुस्लिम छात्रों के पढने की व्यवस्था की कला-साहित्य के क्षेत्र में अकबर की नीति समन्वयकारी थी| अकबर कालीन कला और स्थापत्य में सभी धर्मों के तत्व देखे जा सकते हैं| अकबर ने इबादतखाने का विस्तार करते हुए उसमें धर्म-दर्शन की चर्चा के लिए बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों से सम्बन्धित विद्वानों को आमंत्रित करता था| अकबर की राजनीतिक नीति अकबर की राजनीतिक नीति का अध्ययन मुख्यतः अकबर की राजपूत नीति के माध्यम से किया जाता है| अकबर की राजपूत नीति उसकी गहन सूझ-बूझ का परिणाम थी। अकबर की एक स्थायी, शक्तिशाली एवं विस्तृत साम्राज्य की कल्पना को साकार करने में राजपूतों की शक्ति का प्रयोग करना चाहता था| अकबर ने राजपूतों के प्रति आक्रामक एवं उदार दोनों ही नीति का पालन किया| राजपूतों से शत्रुता अकबर के साम्राज्य को अस्थिर बनाती अतः अकबर राजपूतों की शत्रुता से अधिक उनकी मित्रता को महत्व देता था। धार्मिक पूर्वाग्रहों को परे रखते हुए वैवाहिक नीति और प्रगतिशील राजनीतिक नीति अपनाते हुए अकबर नेराजपूतराजाओं से मित्रता कर श्रेष्ठ एवं स्वामिभक्त राजपूतों को अपनी सेवा में लिया, जिससेमुग़ल साम्राज्यकाफ़ी दिन तक जीवित रह सका। इस तरह स्पष्ट होता है कि यद्यपि अकबर मध्यकालीन शासक था किन्तु उसकी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के कुछ आधुनिक तत्वों को देखा जा सकता है| इन्ही कारणों से अकबर को भारतीय इतिहास के कुछ महानतम शासकों के मध्य रखा जाता है|
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##Question:अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्व देखे जा सकते हैं | चर्चा कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द) Elements of progressiveness can be seen in Akbar"s religious, social and political policies. Discuss (10 marks / 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में अकबर की कुछ उपलब्धियां बता कर नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों की उपस्थिति की सूचना दीजिये धार्मिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को बताइये सामाजिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को बताइये राजनीतिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में कथन के अनुरूप सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये अकबर, मुगल वंश का तीसरा शासक था| यद्यपि अपने शासनकाल के आरम्भ में अकबर को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था तथापि अकबर ने तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक की स्थापना की थी| अकबर एक निरंकुश किन्तु बुद्धिमान शासक था इसलिए अकबर ने साम्राज्य की एकता बनाए रखने के लिए ऐसी प्रगतिशील नीतियां अपनाई जिनसे गैर मुसलमानों की राजभक्ति जीती जा सके और राज्य को सशक्त और दीर्घजीवी बनाया जा सके| अकबर की नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों को अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में देखा जा सकता है | अकबर की धार्मिक नीति अकबर ने सुलहकुल या सहिष्णुता की नीति का पालन किया और सभी धर्मावलम्बियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी| ध्यातव्य है कि मध्यकालीन विश्व में धर्म प्रभावी भूमिका में था| धर्म के आधार पर राज्य के द्वारा कोई भेदभाव नहीं किया गया| राज्य द्वारा भेदभाव पूर्ण करों एवं विभेदक प्रतीकों को भी समाप्त किया गया जैसे युद्ध बंदियों को दास बनाने की प्रथा, तीर्थ यात्रा कर को समाप्त किया गया और 1564 में जजिया कर को भी समाप्त किया गया| इस तरह के प्रयासों से अकबर ने जनता में भेदभाव का समापन करने का प्रयास किया धर्म के क्षेत्र में उलेमा वर्ग के प्रभाव को कम करने के लिए भी अकबर द्वारा कदम उठाये गए जैसे 1575 में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना की स्थापना, यहाँ अकबर विभिन्न विद्वानों के मतों को जानने का प्रयास करता था, इससे अकबर को विद्वानों में उपस्थित मतभिन्नता का बोध हुआ| महजर की घोषणा इसी मतभिन्नता के संदर्भ में की गयी| 1579 में अकबर ने खुतबा पढ़ा एवं महज़र जारी किया, इसके माध्यम से अकबर ने उलेमा वर्ग के प्रभाव को लगभग समाप्त कर दिया, इसके माध्यम से धार्मिक विषयों में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति अकबर के पास आ गयी| अर्थात अब राज्य धर्म पर प्रभावी हो गया था| इसी तरह का प्रगतिशील विकास तत्कालीन यूरोप में भी चल रहा था| 1582 में अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक आचार संहिता जारी की| दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) वस्तुतः दैवी एकेश्वरवाद से सम्बन्धित था| इसमें अकबर ने सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्वों का समावेश करने का प्रयास किया था |इस तरह से यह सर्व धर्म समन्वय का प्रयास दिखता है| अकबर की सामाजिक नीति अकबर ने सती प्रथा, बाल विवाह और बहुविवाह की परंपरा को हतोत्साहित करने का प्रयास किया| इन प्रयासों में व्यक्ति की गरिमा के संरक्षण की अनुगूंज प्राप्त होती है| इसी प्रकार अकबर ने विधवा विवाह का समर्थन किया| भारतीय इतिहास में अकबर प्रथम शासक था जिसने एक छत के नीचे हिन्दू एवं मुस्लिम छात्रों के पढने की व्यवस्था की कला-साहित्य के क्षेत्र में अकबर की नीति समन्वयकारी थी| अकबर कालीन कला और स्थापत्य में सभी धर्मों के तत्व देखे जा सकते हैं| अकबर ने इबादतखाने का विस्तार करते हुए उसमें धर्म-दर्शन की चर्चा के लिए बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों से सम्बन्धित विद्वानों को आमंत्रित करता था| अकबर की राजनीतिक नीति अकबर की राजनीतिक नीति का अध्ययन मुख्यतः अकबर की राजपूत नीति के माध्यम से किया जाता है| अकबर की राजपूत नीति उसकी गहन सूझ-बूझ का परिणाम थी। अकबर की एक स्थायी, शक्तिशाली एवं विस्तृत साम्राज्य की कल्पना को साकार करने में राजपूतों की शक्ति का प्रयोग करना चाहता था| अकबर ने राजपूतों के प्रति आक्रामक एवं उदार दोनों ही नीति का पालन किया| राजपूतों से शत्रुता अकबर के साम्राज्य को अस्थिर बनाती अतः अकबर राजपूतों की शत्रुता से अधिक उनकी मित्रता को महत्व देता था। धार्मिक पूर्वाग्रहों को परे रखते हुए वैवाहिक नीति और प्रगतिशील राजनीतिक नीति अपनाते हुए अकबर नेराजपूतराजाओं से मित्रता कर श्रेष्ठ एवं स्वामिभक्त राजपूतों को अपनी सेवा में लिया, जिससेमुग़ल साम्राज्यकाफ़ी दिन तक जीवित रह सका। इस तरह स्पष्ट होता है कि यद्यपि अकबर मध्यकालीन शासक था किन्तु उसकी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के कुछ आधुनिक तत्वों को देखा जा सकता है| इन्ही कारणों से अकबर को भारतीय इतिहास के कुछ महानतम शासकों के मध्य रखा जाता है|
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