Question
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Highlight the conditions necessary for the precipitation. Also, discuss the various types of the rainfall. [150 Words/10 Marks]
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Brief Approach: In Introduction brief write about Precipitation i.e. what does it refer to. Highlight the conditions Necessary for precipitation Discuss the various types of precipitation Answer: The process of continuous condensation in free air helps the condensed particles to grow in size. When the resistance of the air fails to hold them against the force of gravity, they fall on to the earth’s surface. So after the condensation of water vapour, the release of moisture is known as precipitation. This may take place in liquid or solid form. Conditions Necessary for precipitation: A mechanism to Uplift the moist air Saturation and cooling of air below the dew point Presence of dust particles (Hygroscopic nuclei) around which water droplets can form Types of Precipitation: 1. Convectional rainfall It occurs in the regions of the intense heating near the ground surface causing air to expand and rise Often it is accompanied by thunderstorms and lightning Examples: Throughout the year in equatorial regions, in summers in tropical regions 2. Orographic rainfall When a warm and moist air is forced to rise across the mountain slopes, it cools down causing precipitation along the windward sides However, on the leeward side, the descending air will not cause precipitation leading to the precipitation of rain show regions Example: Western Ghats of India 3. Cyclonic or Frontal rainfall It occurs along the zones of the ITCZ and Polar fronts because of the convergence It is best developed along the polar fronts where the warm air rises above the cold air causing precipitation
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##Question:Highlight the conditions necessary for the precipitation. Also, discuss the various types of the rainfall. [150 Words/10 Marks]##Answer:Brief Approach: In Introduction brief write about Precipitation i.e. what does it refer to. Highlight the conditions Necessary for precipitation Discuss the various types of precipitation Answer: The process of continuous condensation in free air helps the condensed particles to grow in size. When the resistance of the air fails to hold them against the force of gravity, they fall on to the earth’s surface. So after the condensation of water vapour, the release of moisture is known as precipitation. This may take place in liquid or solid form. Conditions Necessary for precipitation: A mechanism to Uplift the moist air Saturation and cooling of air below the dew point Presence of dust particles (Hygroscopic nuclei) around which water droplets can form Types of Precipitation: 1. Convectional rainfall It occurs in the regions of the intense heating near the ground surface causing air to expand and rise Often it is accompanied by thunderstorms and lightning Examples: Throughout the year in equatorial regions, in summers in tropical regions 2. Orographic rainfall When a warm and moist air is forced to rise across the mountain slopes, it cools down causing precipitation along the windward sides However, on the leeward side, the descending air will not cause precipitation leading to the precipitation of rain show regions Example: Western Ghats of India 3. Cyclonic or Frontal rainfall It occurs along the zones of the ITCZ and Polar fronts because of the convergence It is best developed along the polar fronts where the warm air rises above the cold air causing precipitation
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लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध के नीतिशास्त्र में सामंजस्य और संघर्ष दोनों अपेक्षित है| लोक एवं निजी सम्बन्धों की पारस्परिक अंतर्निर्भरता को स्पष्ट करते हुए कथन की उदाहरण सहित विवेचना कीजिये| ( 150-200 शब्द; 10 अंक) Both harmony and conflict are required in the ethics of public relations and private relations. Explaining the mutual interdependence of public and private relations, discuss the statement with examples. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोक एवं निजी सम्बन्धों का स्वरुप स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में लोक एवं निजी सम्बन्धों कीपारस्परिक अंतरनिर्भरता को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में लोक एवं निजी सम्बन्धों के नीतिशास्त्र में सामंजस्य एवं अंतर्विरोध दोनों की अपेक्षा को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में लोक एवं निजी सम्बन्ध के मध्य संतुलन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध, दोनों के सन्दर्भ में नीतिशास्त्र का महत्त्व है| परन्तु दोनों सम्बन्धों की प्रकृति में अंतर होने के कारण नैतिक मानकों के अंतर का होना स्वाभाविक है| इसीलिए लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध के बीच के स्पष्ट विभाजन की रेखा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है| कोई सम्बन्ध न तो पूर्णतः लोक सम्बन्ध की संज्ञा को प्राप्त करता है और न ही पूर्णतयः निजी सम्बन्ध की संज्ञा प्राप्त करता है| क्योंकि वास्तविकता में दोनों प्रकार के सम्बन्धों के मध्य परस्पर निर्भरता होती है|लोक सम्बन्ध के अंतर्गत सम्बन्ध की इकाइयों का परस्पर तालमेल स्वतः इकाइयों के द्वारा निर्धारित न हो कर संदर्भ के द्वारा परिभाषित किया जाता हैअतः लोक सम्बन्ध में इकाइयां किसी व्यवस्था का एक भाग होता है न कि व्यवस्था से अलग उसका कोई पृथक अस्तित्व होता है |लोक सम्बन्ध की प्रकृति औपचारिक होती है एवं ऐसे सम्बन्धों के व्यवहार का पूर्वानुमान किया जाना संभव हो पाता है |अतः लोक सम्बन्ध का संचालन नियम और कानून से मार्गदर्शित या प्रभावित होता है|जबकि निजी सम्बन्धों के संदर्भ में पारस्परिक तालमेल को व्यक्ति विशेष के द्वारा परिभाषित किया जाता है| निजी सम्बन्धोंकी प्रकृति अनौपचारिक होती है एवं व्यक्तियों के व्यवहार का पूर्वानुमान किया जाना संभव नहीं हो पाता है लोक एवं निजी सम्बन्धों में पारस्परिक अंतरनिर्भरता लोक एवं निजी सम्बन्धों के मध्य की परस्पर अंतःक्रिया सदैव विद्यमान होती है व्यक्ति के नैतिक मूल्यों का विकास निजी सम्बन्धों पर आधारित होता है जिसका प्रभाव लोक सम्बन्ध पर भी देखने को मिलता है लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध इन दोनों के परस्पर गुण एवं दोष हैं लोक सम्बन्ध के मशीनीकरण कि प्रवृत्ति को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि इसमें मानवीकरण के पहलू को शामिल किया जाए जिसका हस्तांतरण निजी सम्बन्ध से लोक सम्बन्ध में किया जाना संभव हो पाता है लोक सम्बन्ध भी कई अवसरों पर निजी सम्बन्ध में परिवर्तित हो जाता है अतः लोक एवं निजी नीतिशास्त्र के मध्य परस्पर निर्भरता का होना स्वाभाविक है लोक सेवकों के द्वारा स्वनिर्णय की शक्ति का अभ्यास करते समय कहीं न कहीं व्यक्तिगत मानकों का प्रभाव देखने को मिलता है किन्तु इसे लोकसेवक को हतोत्साहित करने का प्रयास करना चाहिए इसे हतोत्साहित करने हेतु लोकसेवकों के व्यवहार में वस्तुनिष्ठता को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है अतः लोकसेवकों के मूल्यों के सन्दर्भ में वस्तुनिष्ठता पर निजी सम्बन्धों का प्रभाव होता है| लोक एवं निजी सम्बन्धों के नीतिशास्त्र मेंसद्भाव और मतभेद लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध के नीति शास्त्र में सामंजस्य एवं अन्तर्विरोध दोनों अपेक्षित है| अतः इन दोनों के मध्य न तो अत्यधिक सामंजस्य हो और न ही अत्यधिक अंतर्विरोध हो| लोक एवं निजी सम्बन्धों में नीतिशास्त्र में सामंजस्य का होना सद्भाव को प्रोत्साहित करता है एवं समाज में शान्ति के साथ-साथ व्यक्तियों को मानसिक एवं भावनात्मक रूप से सुखद स्थिति प्रदान करता है परन्तु यह सामंजस्य नए विचार को उत्पन्न होने से रोकता है जो कि नवाचार एवं सुधारात्मक प्रयासों को लागू करने हेतु उचित नहीं माना गया है लोक एवं निजी सम्बन्धों के नीतिशास्त्र में अंतर्विरोध का होना समाज में एक टकराव एवं असमंजस की स्थिति को उत्पन्न करता है परन्तु परिवर्तन एवं सुधार के प्रोत्साहित करने का एक आधार भी प्रस्तुत करता है| यह अन्तर्विरोध अत्यधिक होने पर समाज का विघटन, कानून एवं व्यवस्था की अनुपस्थिति एवं सरकार की वैधानिकता को चुनौती दे सकता है अतः समय की मांग यह है कि यथासंभव लोक एवं निजी सम्बन्ध के मध्य संतुलन को प्राप्त किया जाए क्योंकि दोनों के मध्य के सामंजस्य एवं अन्तर्विरोध के परस्पर फायदे-नुकसान दोनों हैं|
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##Question:लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध के नीतिशास्त्र में सामंजस्य और संघर्ष दोनों अपेक्षित है| लोक एवं निजी सम्बन्धों की पारस्परिक अंतर्निर्भरता को स्पष्ट करते हुए कथन की उदाहरण सहित विवेचना कीजिये| ( 150-200 शब्द; 10 अंक) Both harmony and conflict are required in the ethics of public relations and private relations. Explaining the mutual interdependence of public and private relations, discuss the statement with examples. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोक एवं निजी सम्बन्धों का स्वरुप स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में लोक एवं निजी सम्बन्धों कीपारस्परिक अंतरनिर्भरता को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में लोक एवं निजी सम्बन्धों के नीतिशास्त्र में सामंजस्य एवं अंतर्विरोध दोनों की अपेक्षा को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में लोक एवं निजी सम्बन्ध के मध्य संतुलन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध, दोनों के सन्दर्भ में नीतिशास्त्र का महत्त्व है| परन्तु दोनों सम्बन्धों की प्रकृति में अंतर होने के कारण नैतिक मानकों के अंतर का होना स्वाभाविक है| इसीलिए लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध के बीच के स्पष्ट विभाजन की रेखा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है| कोई सम्बन्ध न तो पूर्णतः लोक सम्बन्ध की संज्ञा को प्राप्त करता है और न ही पूर्णतयः निजी सम्बन्ध की संज्ञा प्राप्त करता है| क्योंकि वास्तविकता में दोनों प्रकार के सम्बन्धों के मध्य परस्पर निर्भरता होती है|लोक सम्बन्ध के अंतर्गत सम्बन्ध की इकाइयों का परस्पर तालमेल स्वतः इकाइयों के द्वारा निर्धारित न हो कर संदर्भ के द्वारा परिभाषित किया जाता हैअतः लोक सम्बन्ध में इकाइयां किसी व्यवस्था का एक भाग होता है न कि व्यवस्था से अलग उसका कोई पृथक अस्तित्व होता है |लोक सम्बन्ध की प्रकृति औपचारिक होती है एवं ऐसे सम्बन्धों के व्यवहार का पूर्वानुमान किया जाना संभव हो पाता है |अतः लोक सम्बन्ध का संचालन नियम और कानून से मार्गदर्शित या प्रभावित होता है|जबकि निजी सम्बन्धों के संदर्भ में पारस्परिक तालमेल को व्यक्ति विशेष के द्वारा परिभाषित किया जाता है| निजी सम्बन्धोंकी प्रकृति अनौपचारिक होती है एवं व्यक्तियों के व्यवहार का पूर्वानुमान किया जाना संभव नहीं हो पाता है लोक एवं निजी सम्बन्धों में पारस्परिक अंतरनिर्भरता लोक एवं निजी सम्बन्धों के मध्य की परस्पर अंतःक्रिया सदैव विद्यमान होती है व्यक्ति के नैतिक मूल्यों का विकास निजी सम्बन्धों पर आधारित होता है जिसका प्रभाव लोक सम्बन्ध पर भी देखने को मिलता है लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध इन दोनों के परस्पर गुण एवं दोष हैं लोक सम्बन्ध के मशीनीकरण कि प्रवृत्ति को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि इसमें मानवीकरण के पहलू को शामिल किया जाए जिसका हस्तांतरण निजी सम्बन्ध से लोक सम्बन्ध में किया जाना संभव हो पाता है लोक सम्बन्ध भी कई अवसरों पर निजी सम्बन्ध में परिवर्तित हो जाता है अतः लोक एवं निजी नीतिशास्त्र के मध्य परस्पर निर्भरता का होना स्वाभाविक है लोक सेवकों के द्वारा स्वनिर्णय की शक्ति का अभ्यास करते समय कहीं न कहीं व्यक्तिगत मानकों का प्रभाव देखने को मिलता है किन्तु इसे लोकसेवक को हतोत्साहित करने का प्रयास करना चाहिए इसे हतोत्साहित करने हेतु लोकसेवकों के व्यवहार में वस्तुनिष्ठता को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है अतः लोकसेवकों के मूल्यों के सन्दर्भ में वस्तुनिष्ठता पर निजी सम्बन्धों का प्रभाव होता है| लोक एवं निजी सम्बन्धों के नीतिशास्त्र मेंसद्भाव और मतभेद लोक सम्बन्ध एवं निजी सम्बन्ध के नीति शास्त्र में सामंजस्य एवं अन्तर्विरोध दोनों अपेक्षित है| अतः इन दोनों के मध्य न तो अत्यधिक सामंजस्य हो और न ही अत्यधिक अंतर्विरोध हो| लोक एवं निजी सम्बन्धों में नीतिशास्त्र में सामंजस्य का होना सद्भाव को प्रोत्साहित करता है एवं समाज में शान्ति के साथ-साथ व्यक्तियों को मानसिक एवं भावनात्मक रूप से सुखद स्थिति प्रदान करता है परन्तु यह सामंजस्य नए विचार को उत्पन्न होने से रोकता है जो कि नवाचार एवं सुधारात्मक प्रयासों को लागू करने हेतु उचित नहीं माना गया है लोक एवं निजी सम्बन्धों के नीतिशास्त्र में अंतर्विरोध का होना समाज में एक टकराव एवं असमंजस की स्थिति को उत्पन्न करता है परन्तु परिवर्तन एवं सुधार के प्रोत्साहित करने का एक आधार भी प्रस्तुत करता है| यह अन्तर्विरोध अत्यधिक होने पर समाज का विघटन, कानून एवं व्यवस्था की अनुपस्थिति एवं सरकार की वैधानिकता को चुनौती दे सकता है अतः समय की मांग यह है कि यथासंभव लोक एवं निजी सम्बन्ध के मध्य संतुलन को प्राप्त किया जाए क्योंकि दोनों के मध्य के सामंजस्य एवं अन्तर्विरोध के परस्पर फायदे-नुकसान दोनों हैं|
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भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिल प्रकृति, सीमा प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट करती है| इस सन्दर्भ में भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिलता एवं सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The complex nature of the India-Bangladesh border illustrates the need for border management. In this context, discuss the complexity of the India-Bangladesh border and the efforts made by the Government of India in the context of border management. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों एवं सीमा विवादों की सूचना दीजिये प्रथम भाग में सीमाओं की जटिलता को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी दीजिये अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| भारत और बांग्लादेश, सहयोग के नए आयाम स्थापित करने में प्राप्त सफलता के बावजूद दोनों के मध्य विभिन्न कारणों से सीमा विवादों का सामना कर रहे हैं| भारत-बांग्लादेश समा विवाद का प्रमुख कारण सीमा की जटिल प्रकृति को माना जाता है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- सीमा की जटिलता दोनों देशों के मध्य स्थलाकृतियों की जटिलता है अर्थात नदियों की उपस्थिति, अन्तस्थ क्षेत्रों आदि की उपस्थिति के कारण दोनों देशों के मध्य सीमा छिद्रिल(पोरस) प्रकृति की है दोनों देशों के मध्य सीमा रेखा की स्पष्टता का अभाव है जिसके परिणाम स्वरुप उन क्षेत्रों में लोगों को सरकार की सेवाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है नदियों के जल क्षेत्र का निर्धारण न हो पाने से मत्स्ययन सम्बन्धी विवाद निरंतर रूप से बने रहते हैं दोनों देश एक दुसरे की भूमि पर कब्जे के आरोप लगाते रहते हैं सीमा क्षेत्र केदोनों ओर नागरिकों का प्रवास था दोनों देशों के मध्य 54 अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ प्रवाहित होती हैं दोनों देशों में द्वीपनुमा क्षेत्रों (एन्क्लेव) की प्रचुरता पायी जाती है| अन्तस्थ क्षेत्रों में आवागमन के कारण नागरिकों की पहचान नहीं हो पाना एक अलग प्रकार का विवाद है हालांकि इसे सुलझा लिया गया है विषम भौगोलिक परिस्थितियां होने कारण मजबूत बाड़बंदी करना मुश्किल होता है सांस्कृतिक, नृजातीय समानता के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में अवैध अप्रवासन होता है ऐसी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण अवैध अप्रवासन की समस्या विकराल हो गयी है औरभारत को अपनी सीमा की सुरक्षा एवं प्रबंधन में समस्याएं उत्पन हो रही हैं उपरोक्त जटिलताएं भारत बांग्लादेश सीमा विवादों को बढ़ाती हैं अतः बांग्लादेश सीमा पर बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता है| इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने कई कदम उठाये हैं| भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत ने अगस्त 2011 से सीमांकन प्रक्रिया को तेजी प्रदान की है जनवरी 2013 में भारत और बांग्लादेश के मध्य प्रत्यर्पण संधि संपन्न की गयी भारत ऐसे जलीय क्षेत्रों में जहाँ सामान्य बाडबंदी करना संभव नहीं है वहां स्किनमरीन हेज मॉडल के आधार पर बाडबंदी कर रहा है सीमा प्रबंधन के लिए दोनों देशों ने संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं उनका विकास किया है जैसे सितम्बर 2011 में भारत बांग्लादेश संयुक्त सलाहकार आयोग, जुलाई 2011 में समन्वित सीमा प्रबंधन योजना और अगस्त 2014 में BSF एवं बांग्लादेश सेना(BGB) के बीच सहयोगात्मक संगठन का निर्माण किया गया है वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके माध्यम से लगभग 51 अन्तस्थ क्षेत्रों (एन्क्लेव) भारत में शामिल किये गए और 100 से अधिक एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल किये गए हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत सरकार, बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए गंभीर है| इन प्रयासों के साथ ही साथ सीमा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ताकि दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद को नियंत्रित करते हुए पारस्परिक सम्बन्धों को नयी दिशा दी जा सके और भारत की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके|
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##Question:भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिल प्रकृति, सीमा प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट करती है| इस सन्दर्भ में भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिलता एवं सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The complex nature of the India-Bangladesh border illustrates the need for border management. In this context, discuss the complexity of the India-Bangladesh border and the efforts made by the Government of India in the context of border management. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों एवं सीमा विवादों की सूचना दीजिये प्रथम भाग में सीमाओं की जटिलता को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी दीजिये अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| भारत और बांग्लादेश, सहयोग के नए आयाम स्थापित करने में प्राप्त सफलता के बावजूद दोनों के मध्य विभिन्न कारणों से सीमा विवादों का सामना कर रहे हैं| भारत-बांग्लादेश समा विवाद का प्रमुख कारण सीमा की जटिल प्रकृति को माना जाता है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- सीमा की जटिलता दोनों देशों के मध्य स्थलाकृतियों की जटिलता है अर्थात नदियों की उपस्थिति, अन्तस्थ क्षेत्रों आदि की उपस्थिति के कारण दोनों देशों के मध्य सीमा छिद्रिल(पोरस) प्रकृति की है दोनों देशों के मध्य सीमा रेखा की स्पष्टता का अभाव है जिसके परिणाम स्वरुप उन क्षेत्रों में लोगों को सरकार की सेवाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है नदियों के जल क्षेत्र का निर्धारण न हो पाने से मत्स्ययन सम्बन्धी विवाद निरंतर रूप से बने रहते हैं दोनों देश एक दुसरे की भूमि पर कब्जे के आरोप लगाते रहते हैं सीमा क्षेत्र केदोनों ओर नागरिकों का प्रवास था दोनों देशों के मध्य 54 अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ प्रवाहित होती हैं दोनों देशों में द्वीपनुमा क्षेत्रों (एन्क्लेव) की प्रचुरता पायी जाती है| अन्तस्थ क्षेत्रों में आवागमन के कारण नागरिकों की पहचान नहीं हो पाना एक अलग प्रकार का विवाद है हालांकि इसे सुलझा लिया गया है विषम भौगोलिक परिस्थितियां होने कारण मजबूत बाड़बंदी करना मुश्किल होता है सांस्कृतिक, नृजातीय समानता के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में अवैध अप्रवासन होता है ऐसी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण अवैध अप्रवासन की समस्या विकराल हो गयी है औरभारत को अपनी सीमा की सुरक्षा एवं प्रबंधन में समस्याएं उत्पन हो रही हैं उपरोक्त जटिलताएं भारत बांग्लादेश सीमा विवादों को बढ़ाती हैं अतः बांग्लादेश सीमा पर बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता है| इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने कई कदम उठाये हैं| भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत ने अगस्त 2011 से सीमांकन प्रक्रिया को तेजी प्रदान की है जनवरी 2013 में भारत और बांग्लादेश के मध्य प्रत्यर्पण संधि संपन्न की गयी भारत ऐसे जलीय क्षेत्रों में जहाँ सामान्य बाडबंदी करना संभव नहीं है वहां स्किनमरीन हेज मॉडल के आधार पर बाडबंदी कर रहा है सीमा प्रबंधन के लिए दोनों देशों ने संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं उनका विकास किया है जैसे सितम्बर 2011 में भारत बांग्लादेश संयुक्त सलाहकार आयोग, जुलाई 2011 में समन्वित सीमा प्रबंधन योजना और अगस्त 2014 में BSF एवं बांग्लादेश सेना(BGB) के बीच सहयोगात्मक संगठन का निर्माण किया गया है वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके माध्यम से लगभग 51 अन्तस्थ क्षेत्रों (एन्क्लेव) भारत में शामिल किये गए और 100 से अधिक एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल किये गए हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत सरकार, बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए गंभीर है| इन प्रयासों के साथ ही साथ सीमा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ताकि दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद को नियंत्रित करते हुए पारस्परिक सम्बन्धों को नयी दिशा दी जा सके और भारत की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके|
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भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिल प्रकृति, सीमा प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट करती है| इस सन्दर्भ में भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिलता एवं सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The complex nature of the India-Bangladesh border illustrates the need for border management. In this context, discuss the complexity of the India-Bangladesh border and the efforts made by the Government of India in the context of border management. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों एवं सीमा विवादों की सूचना दीजिये प्रथम भाग में सीमाओं की जटिलता को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी दीजिये अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| भारत और बांग्लादेश, सहयोग के नए आयाम स्थापित करने में प्राप्त सफलता के बावजूद दोनों के मध्य विभिन्न कारणों से सीमा विवादों का सामना कर रहे हैं| भारत-बांग्लादेश समा विवाद का प्रमुख कारण सीमा की जटिल प्रकृति को माना जाता है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- सीमा की जटिलता दोनों देशों के मध्य स्थलाकृतियों की जटिलता है अर्थात नदियों की उपस्थिति, अन्तस्थ क्षेत्रों आदि की उपस्थिति के कारण दोनों देशों के मध्य सीमा छिद्रिल(पोरस) प्रकृति की है दोनों देशों के मध्य सीमा रेखा की स्पष्टता का अभाव है जिसके परिणाम स्वरुप उन क्षेत्रों में लोगों को सरकार की सेवाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है नदियों के जल क्षेत्र का निर्धारण न हो पाने से मत्स्ययन सम्बन्धी विवाद निरंतर रूप से बने रहते हैं दोनों देश एक दुसरे की भूमि पर कब्जे के आरोप लगाते रहते हैं सीमा क्षेत्र केदोनों ओर नागरिकों का प्रवास था दोनों देशों के मध्य 54 अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ प्रवाहित होती हैं दोनों देशों में द्वीपनुमा क्षेत्रों (एन्क्लेव) की प्रचुरता पायी जाती है| अन्तस्थ क्षेत्रों में आवागमन के कारण नागरिकों की पहचान नहीं हो पाना एक अलग प्रकार का विवाद है हालांकि इसे सुलझा लिया गया है विषम भौगोलिक परिस्थितियां होने कारण मजबूत बाड़बंदी करना मुश्किल होता है सांस्कृतिक, नृजातीय समानता के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में अवैध अप्रवासन होता है ऐसी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण अवैध अप्रवासन की समस्या विकराल हो गयी है औरभारत को अपनी सीमा की सुरक्षा एवं प्रबंधन में समस्याएं उत्पन हो रही हैं उपरोक्त जटिलताएं भारत बांग्लादेश सीमा विवादों को बढ़ाती हैं अतः बांग्लादेश सीमा पर बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता है| इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने कई कदम उठाये हैं| भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत ने अगस्त 2011 से सीमांकन प्रक्रिया को तेजी प्रदान की है जनवरी 2013 में भारत और बांग्लादेश के मध्य प्रत्यर्पण संधि संपन्न की गयी भारत ऐसे जलीय क्षेत्रों में जहाँ सामान्य बाडबंदी करना संभव नहीं है वहां स्किनमरीन हेज मॉडल के आधार पर बाडबंदी कर रहा है सीमा प्रबंधन के लिए दोनों देशों ने संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं उनका विकास किया है जैसे सितम्बर 2011 में भारत बांग्लादेश संयुक्त सलाहकार आयोग, जुलाई 2011 में समन्वित सीमा प्रबंधन योजना और अगस्त 2014 में BSF एवं बांग्लादेश सेना(BGB) के बीच सहयोगात्मक संगठन का निर्माण किया गया है वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके माध्यम से लगभग 51 अन्तस्थ क्षेत्रों (एन्क्लेव) भारत में शामिल किये गए और 100 से अधिक एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल किये गए हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत सरकार, बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए गंभीर है| इन प्रयासों के साथ ही साथ सीमा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ताकि दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद को नियंत्रित करते हुए पारस्परिक सम्बन्धों को नयी दिशा दी जा सके और भारत की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके|
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##Question:भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिल प्रकृति, सीमा प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट करती है| इस सन्दर्भ में भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिलता एवं सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The complex nature of the India-Bangladesh border illustrates the need for border management. In this context, discuss the complexity of the India-Bangladesh border and the efforts made by the Government of India in the context of border management. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों एवं सीमा विवादों की सूचना दीजिये प्रथम भाग में सीमाओं की जटिलता को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी दीजिये अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| भारत और बांग्लादेश, सहयोग के नए आयाम स्थापित करने में प्राप्त सफलता के बावजूद दोनों के मध्य विभिन्न कारणों से सीमा विवादों का सामना कर रहे हैं| भारत-बांग्लादेश समा विवाद का प्रमुख कारण सीमा की जटिल प्रकृति को माना जाता है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- सीमा की जटिलता दोनों देशों के मध्य स्थलाकृतियों की जटिलता है अर्थात नदियों की उपस्थिति, अन्तस्थ क्षेत्रों आदि की उपस्थिति के कारण दोनों देशों के मध्य सीमा छिद्रिल(पोरस) प्रकृति की है दोनों देशों के मध्य सीमा रेखा की स्पष्टता का अभाव है जिसके परिणाम स्वरुप उन क्षेत्रों में लोगों को सरकार की सेवाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है नदियों के जल क्षेत्र का निर्धारण न हो पाने से मत्स्ययन सम्बन्धी विवाद निरंतर रूप से बने रहते हैं दोनों देश एक दुसरे की भूमि पर कब्जे के आरोप लगाते रहते हैं सीमा क्षेत्र केदोनों ओर नागरिकों का प्रवास था दोनों देशों के मध्य 54 अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ प्रवाहित होती हैं दोनों देशों में द्वीपनुमा क्षेत्रों (एन्क्लेव) की प्रचुरता पायी जाती है| अन्तस्थ क्षेत्रों में आवागमन के कारण नागरिकों की पहचान नहीं हो पाना एक अलग प्रकार का विवाद है हालांकि इसे सुलझा लिया गया है विषम भौगोलिक परिस्थितियां होने कारण मजबूत बाड़बंदी करना मुश्किल होता है सांस्कृतिक, नृजातीय समानता के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में अवैध अप्रवासन होता है ऐसी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण अवैध अप्रवासन की समस्या विकराल हो गयी है औरभारत को अपनी सीमा की सुरक्षा एवं प्रबंधन में समस्याएं उत्पन हो रही हैं उपरोक्त जटिलताएं भारत बांग्लादेश सीमा विवादों को बढ़ाती हैं अतः बांग्लादेश सीमा पर बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता है| इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने कई कदम उठाये हैं| भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत ने अगस्त 2011 से सीमांकन प्रक्रिया को तेजी प्रदान की है जनवरी 2013 में भारत और बांग्लादेश के मध्य प्रत्यर्पण संधि संपन्न की गयी भारत ऐसे जलीय क्षेत्रों में जहाँ सामान्य बाडबंदी करना संभव नहीं है वहां स्किनमरीन हेज मॉडल के आधार पर बाडबंदी कर रहा है सीमा प्रबंधन के लिए दोनों देशों ने संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं उनका विकास किया है जैसे सितम्बर 2011 में भारत बांग्लादेश संयुक्त सलाहकार आयोग, जुलाई 2011 में समन्वित सीमा प्रबंधन योजना और अगस्त 2014 में BSF एवं बांग्लादेश सेना(BGB) के बीच सहयोगात्मक संगठन का निर्माण किया गया है वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके माध्यम से लगभग 51 अन्तस्थ क्षेत्रों (एन्क्लेव) भारत में शामिल किये गए और 100 से अधिक एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल किये गए हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत सरकार, बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए गंभीर है| इन प्रयासों के साथ ही साथ सीमा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ताकि दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद को नियंत्रित करते हुए पारस्परिक सम्बन्धों को नयी दिशा दी जा सके और भारत की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके|
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मुद्रा से आप क्या समझते हैं ? यह बार्टर व्यवस्था की कमियों को दूर करने में किस प्रकार प्रभावी रहा है । चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ,अंक -10 ) What do you understand by currency? How has it been effective in addressing the shortcomings of the barter system? Discuss. (150-200 words, Marks -10)
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दृष्टिकोण : भूमिका में मुद्रा को परिभाषित कीजिये। मुद्रा के इतिहास की बिंदुवत चर्चा कीजिये। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं की चर्चा कीजिये। मुद्रा के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर : मुद्रा से तात्पर्य विनिमय के ऐसे साधन से है जिसका सार्वजनिक स्वीकरण हो। यह धात्विक, सांकेतिक या बैंकिंग मुद्रा हो सकती है।एडम स्मिथ का मानना था कि विनिमय जितना सरल होगा। आर्थिक गतिविधियों में उतनी ही तेजी आएगी। मुद्रा का इतिहास : लेन देन हेतु मुद्रा की आवश्यकता होती है। प्रारम्भ में विनिमय में मुद्रा का चलन नहीं था। सबसे पहले साधारण लेन देन की प्रक्रियाओं की शुरुवात हुई। इसके पश्चात वस्तु विनिमय प्रणाली की शुरुवात हुई। जिसमें वस्तुओं के बदले विनिमय हुआ और आर्थिक गतिविधियों का संचालन संभव हो सका। इसके पश्चात मुद्रा आधारित/मौद्रिक लेन देनशुरुवात हुई। मुद्रा का चलन : वस्तु आधारित मुद्राएँ धातु आधारित मुद्राएँ वित्तीय पत्र की शुरुवात बैंकिंग व्यवस्था की शुरुवात मुद्राएँ एवं विनिमय पत्र की शुरुवात राज्य के हस्तक्षेप वाली मुद्राओं की शुरुवात फिएट करेंसी की शुरुवात- वैधानिक मुद्रा दो प्रकार : सीमित वैधानिक मुद्रा : दोनों पक्षों की स्वीकार्यता हो । उदा. - चेक, डिमांड ड्राफ्ट असीमित वैधानिक मुद्रा : सभी पक्षों की बाध्यता हो। यह सशर्त भी हो सकता है। - 50 पैसे का सिक्का सरकार किसी भी लीगल टेंडर को समाप्त कर सकती है जिसे विमुद्रीकरण कहते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याएँ : परस्पर आवश्यकताओं के सुमेल का अभाव मूल्यों के मानकीकरण की समस्या भंडारण की समस्या भाग देने की समस्या भविष्य भुगतान की समस्या वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों ने मुद्रा के चलन को ना केवल शक्ति दी बल्कि इस दिशा में प्रेरित भी किया। वर्तमान में मुद्रा में भी कई तकनीकी आयाम देखने को मिल रही है। क्रिप्टोकरेंसी की शुरुवात हुई है।
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##Question:मुद्रा से आप क्या समझते हैं ? यह बार्टर व्यवस्था की कमियों को दूर करने में किस प्रकार प्रभावी रहा है । चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ,अंक -10 ) What do you understand by currency? How has it been effective in addressing the shortcomings of the barter system? Discuss. (150-200 words, Marks -10)##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में मुद्रा को परिभाषित कीजिये। मुद्रा के इतिहास की बिंदुवत चर्चा कीजिये। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं की चर्चा कीजिये। मुद्रा के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर : मुद्रा से तात्पर्य विनिमय के ऐसे साधन से है जिसका सार्वजनिक स्वीकरण हो। यह धात्विक, सांकेतिक या बैंकिंग मुद्रा हो सकती है।एडम स्मिथ का मानना था कि विनिमय जितना सरल होगा। आर्थिक गतिविधियों में उतनी ही तेजी आएगी। मुद्रा का इतिहास : लेन देन हेतु मुद्रा की आवश्यकता होती है। प्रारम्भ में विनिमय में मुद्रा का चलन नहीं था। सबसे पहले साधारण लेन देन की प्रक्रियाओं की शुरुवात हुई। इसके पश्चात वस्तु विनिमय प्रणाली की शुरुवात हुई। जिसमें वस्तुओं के बदले विनिमय हुआ और आर्थिक गतिविधियों का संचालन संभव हो सका। इसके पश्चात मुद्रा आधारित/मौद्रिक लेन देनशुरुवात हुई। मुद्रा का चलन : वस्तु आधारित मुद्राएँ धातु आधारित मुद्राएँ वित्तीय पत्र की शुरुवात बैंकिंग व्यवस्था की शुरुवात मुद्राएँ एवं विनिमय पत्र की शुरुवात राज्य के हस्तक्षेप वाली मुद्राओं की शुरुवात फिएट करेंसी की शुरुवात- वैधानिक मुद्रा दो प्रकार : सीमित वैधानिक मुद्रा : दोनों पक्षों की स्वीकार्यता हो । उदा. - चेक, डिमांड ड्राफ्ट असीमित वैधानिक मुद्रा : सभी पक्षों की बाध्यता हो। यह सशर्त भी हो सकता है। - 50 पैसे का सिक्का सरकार किसी भी लीगल टेंडर को समाप्त कर सकती है जिसे विमुद्रीकरण कहते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याएँ : परस्पर आवश्यकताओं के सुमेल का अभाव मूल्यों के मानकीकरण की समस्या भंडारण की समस्या भाग देने की समस्या भविष्य भुगतान की समस्या वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों ने मुद्रा के चलन को ना केवल शक्ति दी बल्कि इस दिशा में प्रेरित भी किया। वर्तमान में मुद्रा में भी कई तकनीकी आयाम देखने को मिल रही है। क्रिप्टोकरेंसी की शुरुवात हुई है।
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मुद्रा से आप क्या समझते हैं ? यह बार्टर व्यवस्था की कमियों को दूर करने में किस प्रकार प्रभावी रहा है । चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ,अंक -10 ) What do you understand by currency? How has it been effective in addressing the shortcomings of the barter system? Discuss. (150-200 words, Marks -10)
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दृष्टिकोण : भूमिका में मुद्रा को परिभाषित कीजिये। मुद्रा के इतिहास की बिंदुवत चर्चा कीजिये। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं की चर्चा कीजिये। मुद्रा के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर : मुद्रा से तात्पर्य विनिमय के ऐसे साधन से है जिसका सार्वजनिक स्वीकरण हो। यह धात्विक, सांकेतिक या बैंकिंग मुद्रा हो सकती है।एडम स्मिथ का मानना था कि विनिमय जितना सरल होगा। आर्थिक गतिविधियों में उतनी ही तेजी आएगी। मुद्रा का इतिहास : लेन देन हेतु मुद्रा की आवश्यकता होती है। प्रारम्भ में विनिमय में मुद्रा का चलन नहीं था। सबसे पहले साधारण लेन देन की प्रक्रियाओं की शुरुवात हुई। इसके पश्चात वस्तु विनिमय प्रणाली की शुरुवात हुई। जिसमें वस्तुओं के बदले विनिमय हुआ और आर्थिक गतिविधियों का संचालन संभव हो सका। इसके पश्चात मुद्रा आधारित/मौद्रिक लेन देनशुरुवात हुई। मुद्रा का चलन : वस्तु आधारित मुद्राएँ धातु आधारित मुद्राएँ वित्तीय पत्र की शुरुवात बैंकिंग व्यवस्था की शुरुवात मुद्राएँ एवं विनिमय पत्र की शुरुवात राज्य के हस्तक्षेप वाली मुद्राओं की शुरुवात फिएट करेंसी की शुरुवात- वैधानिक मुद्रादो प्रकार : सीमित वैधानिक मुद्रा : दोनों पक्षों की स्वीकार्यता हो । उदा. - चेक, डिमांड ड्राफ्ट असीमित वैधानिक मुद्रा : सभी पक्षों की बाध्यता हो। यह सशर्त भी हो सकता है। - 50 पैसे का सिक्का सरकार किसी भी लीगल टेंडर को समाप्त कर सकती है जिसे विमुद्रीकरण कहते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याएँ- परस्पर आवश्यकताओं के सुमेल का अभाव मूल्यों के मानकीकरण की समस्या भंडारण की समस्या भाग देने की समस्या भविष्य भुगतान की समस्या वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों ने मुद्रा के चलन को ना केवल शक्ति दी बल्कि इस दिशा में प्रेरित भी किया। वर्तमान में मुद्रा में भी कई तकनीकी आयाम देखने को मिल रही है। क्रिप्टोकरेंसी की शुरुवात हुई है।
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##Question:मुद्रा से आप क्या समझते हैं ? यह बार्टर व्यवस्था की कमियों को दूर करने में किस प्रकार प्रभावी रहा है । चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ,अंक -10 ) What do you understand by currency? How has it been effective in addressing the shortcomings of the barter system? Discuss. (150-200 words, Marks -10)##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में मुद्रा को परिभाषित कीजिये। मुद्रा के इतिहास की बिंदुवत चर्चा कीजिये। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं की चर्चा कीजिये। मुद्रा के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर : मुद्रा से तात्पर्य विनिमय के ऐसे साधन से है जिसका सार्वजनिक स्वीकरण हो। यह धात्विक, सांकेतिक या बैंकिंग मुद्रा हो सकती है।एडम स्मिथ का मानना था कि विनिमय जितना सरल होगा। आर्थिक गतिविधियों में उतनी ही तेजी आएगी। मुद्रा का इतिहास : लेन देन हेतु मुद्रा की आवश्यकता होती है। प्रारम्भ में विनिमय में मुद्रा का चलन नहीं था। सबसे पहले साधारण लेन देन की प्रक्रियाओं की शुरुवात हुई। इसके पश्चात वस्तु विनिमय प्रणाली की शुरुवात हुई। जिसमें वस्तुओं के बदले विनिमय हुआ और आर्थिक गतिविधियों का संचालन संभव हो सका। इसके पश्चात मुद्रा आधारित/मौद्रिक लेन देनशुरुवात हुई। मुद्रा का चलन : वस्तु आधारित मुद्राएँ धातु आधारित मुद्राएँ वित्तीय पत्र की शुरुवात बैंकिंग व्यवस्था की शुरुवात मुद्राएँ एवं विनिमय पत्र की शुरुवात राज्य के हस्तक्षेप वाली मुद्राओं की शुरुवात फिएट करेंसी की शुरुवात- वैधानिक मुद्रादो प्रकार : सीमित वैधानिक मुद्रा : दोनों पक्षों की स्वीकार्यता हो । उदा. - चेक, डिमांड ड्राफ्ट असीमित वैधानिक मुद्रा : सभी पक्षों की बाध्यता हो। यह सशर्त भी हो सकता है। - 50 पैसे का सिक्का सरकार किसी भी लीगल टेंडर को समाप्त कर सकती है जिसे विमुद्रीकरण कहते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याएँ- परस्पर आवश्यकताओं के सुमेल का अभाव मूल्यों के मानकीकरण की समस्या भंडारण की समस्या भाग देने की समस्या भविष्य भुगतान की समस्या वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों ने मुद्रा के चलन को ना केवल शक्ति दी बल्कि इस दिशा में प्रेरित भी किया। वर्तमान में मुद्रा में भी कई तकनीकी आयाम देखने को मिल रही है। क्रिप्टोकरेंसी की शुरुवात हुई है।
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सामाजिक प्रभाव के एक साधन के रूप में अभिवृत्ति परिवर्तन की प्रक्रिया में अनुनय (पर्सुएशन) की सफलता की शर्तों को स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the conditions of success of the persuasion as a means of social influence in the process of attitutional changes. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में अभिवृत्ति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में इसके निर्माण/परिवर्तन में सहायक कारको स्पष्ट करते हुए अनुनयन को परिभाषित कीजिये 3- दूसरे भाग में इसकी सफलता हेतु आवश्यक शर्तों का उल्लेख करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के सामाजिक वातावरण जैसे किसी वस्तु, घटना,मुद्दे आदि को लेकर एक झुकाव या प्रवृत्ति |जो की सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकता है यह प्रवृत्ति दीर्घकालीन होता है , अतः अभिवृत्ति की प्रकृति मूल्यात्मक है |जब किसी विषयवस्तु पर व्यक्ति का विचार या मत भावना से शामिल होते हुए व्यवहार में परिवर्तित होता है, तो अभिवृत्ति की संज्ञा दी जाती है | दूसरे शब्दों में जब व्यक्ति के विचार या मत भावनात्मक एवं क्रियाशीलता के साथ जुड़ जाते हैं तो यह मात्र विचार ना रहकर व्यक्ति के अभिवृति(Attitude) को दर्शाती है| अभिवृत्ति का निर्माण एवं परिवर्तन के कारक अभिवृत्ति का निर्माण व्यक्ति के द्वारा सीखने की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है प्रत्येक नयी सीख के साथ अभिवृत्ति में परिवर्तन का होना स्वाभाविक है अभिवृत्ति का निर्माण विभिन्न प्रभावों का परिणाम होता है परन्तु इस प्रत्येक प्रभाव में एक बात समान होती है कि प्रत्येक प्रभाव सीखने का अलग-अलग प्रारूप है जैसे प्रत्यक्ष संपर्क व्यक्ति की अभिवृत्ति को निर्मित करने में सहायक होता है( गांधी और आंबेडकर का जातिप्रथा को लेकर अलग अलग अभिवृत्ति होना, इसका कारण संपर्क था) अभिवृत्ति का निर्माण माता-पिता या किसी अन्य के द्वारा जारी किये जाने वाले प्रत्यक्ष निर्देशों का भी एक परिणाम होता है ऐसे किसी व्यक्ति के साथ तालमेल स्थापित करना जो किसी विशिष्ट अभिवृत्ति को रखता है उसका प्रभाव भी व्यक्ति की अभिवृत्ति निर्माण पर देखने को मिलता है(संगति का असर) अभिवृत्ति का निर्माण किसी अन्य की प्रतिक्रिया या अभिवृत्ति को ओबजर्व करने का भी परिणाम होता है( जैसे बच्चे द्वारा कुछ सीखना) अभिवृत्ति का निर्माण सजा एवं पुरस्कार पर भी निर्भर करता है जो कि विशिष्ट कार्य/व्यवहार/क्रियाशीलता से सम्बन्धित होता है अभिवृत्ति का परिवर्तन विविध सामाजिक प्रभावों पर निर्भर करता है जिससे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूहों के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के व्यवहार या अभिवृत्ति के परिवर्तन हेतु किये जाने वाले प्रयासों से हैं सामाजिक प्रभाव के चार प्रारुप हैं यथा अनुसारिता(conformity), पालन/स्वीकृति(compliance), आज्ञाकारिता(obedience) और अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन(persuasion) अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन(persuasion) धारणा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के विश्वास, विचार, स्थिति या तौर-तरीकों में परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन तर्कों के द्वारा, आग्रह के द्वारा या स्पष्टीकरण के द्वारा किया जाता है धारणा के तीन मौलिक तत्व होते हैं यथा सन्देश का स्रोत,स्वतः सन्देशएवं ग्राहक/लक्ष्य समूह अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन की सफलता हेतु शर्तें धारणा की सफलता एक सामाजिक प्रभाव के माध्यम के रूप में सुनिश्चित करने हेतु निम्नलिखित शर्तों का अनुपालन आवश्यक है सन्देश का स्रोत विशेषज्ञ होना चाहिए क्योंकि विशेषज्ञों पर व्यक्तियों का विश्वास अधिक होता है, उसके पास अपनी विषय वस्तु पर अधिक ज्ञान एवं अनुभव होता है, इसके कारण व्यक्तियों के द्वारा उनकी मान्यता अधिक होती है| सन्देश का स्रोत अधिक आकर्षक होना चाहिए (विज्ञापन) आकर्षण अल्पकालीन होने के कारण सन्देश के स्रोत में समय के साथ परिवर्तन किया जाना आवश्यक होता है संदर्श की प्रकृति एवं विषय वास्तविक, परोक्ष एवं सॉफ्ट होनी चाहिए धारणा की सफलता हेतु यह आवश्यक है कि सन्देश वाहक उसी प्रकार की अभिवृत्ति को रखे जैसा वह परिवर्तन की अपेक्षा करता है, ऐसी स्थिति में जन विश्वसनीयता अधिक होती है कुछ अवसरों पर धारणा की सफलता हेतु व्यक्तियों के मस्तिष्क में एक डर या भय को उत्पन्न किया जाना आवश्यक है विशेषकर आपातकालीन या विषम परिस्थितियों में(जैसे मादक पदार्थों के साथ चेतावनी) जिस व्यक्ति के पास बेहतर भावनात्मक समझ होती है उसके प्रभावी संदेशवाहक होने की संभावना अधिक होती है धारणा की सफलता हेतु लक्ष्य समूह की पृष्ठभूमि/व्यक्तित्व को ध्यान में रख कर चलना आवश्यक है जो कि आयुसीमा, लिंग, परिवेश इत्यादि पर निर्भर करता है(कार्टून चैनल पर बच्चों के लिए विज्ञापन आना, महिलाओं से सम्बन्धित विज्ञापन पारिवारिक धारावाहिकों के दौरान आते हैं) धारणा की सफलता उपरोक्त कारकों की अंतःक्रिया के सम्मिलित परिणाम पर निर्भर करती है क्योंकि सन्दर्भ एवं समय के अनुरूप होता है
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##Question:सामाजिक प्रभाव के एक साधन के रूप में अभिवृत्ति परिवर्तन की प्रक्रिया में अनुनय (पर्सुएशन) की सफलता की शर्तों को स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the conditions of success of the persuasion as a means of social influence in the process of attitutional changes. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अभिवृत्ति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में इसके निर्माण/परिवर्तन में सहायक कारको स्पष्ट करते हुए अनुनयन को परिभाषित कीजिये 3- दूसरे भाग में इसकी सफलता हेतु आवश्यक शर्तों का उल्लेख करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के सामाजिक वातावरण जैसे किसी वस्तु, घटना,मुद्दे आदि को लेकर एक झुकाव या प्रवृत्ति |जो की सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकता है यह प्रवृत्ति दीर्घकालीन होता है , अतः अभिवृत्ति की प्रकृति मूल्यात्मक है |जब किसी विषयवस्तु पर व्यक्ति का विचार या मत भावना से शामिल होते हुए व्यवहार में परिवर्तित होता है, तो अभिवृत्ति की संज्ञा दी जाती है | दूसरे शब्दों में जब व्यक्ति के विचार या मत भावनात्मक एवं क्रियाशीलता के साथ जुड़ जाते हैं तो यह मात्र विचार ना रहकर व्यक्ति के अभिवृति(Attitude) को दर्शाती है| अभिवृत्ति का निर्माण एवं परिवर्तन के कारक अभिवृत्ति का निर्माण व्यक्ति के द्वारा सीखने की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है प्रत्येक नयी सीख के साथ अभिवृत्ति में परिवर्तन का होना स्वाभाविक है अभिवृत्ति का निर्माण विभिन्न प्रभावों का परिणाम होता है परन्तु इस प्रत्येक प्रभाव में एक बात समान होती है कि प्रत्येक प्रभाव सीखने का अलग-अलग प्रारूप है जैसे प्रत्यक्ष संपर्क व्यक्ति की अभिवृत्ति को निर्मित करने में सहायक होता है( गांधी और आंबेडकर का जातिप्रथा को लेकर अलग अलग अभिवृत्ति होना, इसका कारण संपर्क था) अभिवृत्ति का निर्माण माता-पिता या किसी अन्य के द्वारा जारी किये जाने वाले प्रत्यक्ष निर्देशों का भी एक परिणाम होता है ऐसे किसी व्यक्ति के साथ तालमेल स्थापित करना जो किसी विशिष्ट अभिवृत्ति को रखता है उसका प्रभाव भी व्यक्ति की अभिवृत्ति निर्माण पर देखने को मिलता है(संगति का असर) अभिवृत्ति का निर्माण किसी अन्य की प्रतिक्रिया या अभिवृत्ति को ओबजर्व करने का भी परिणाम होता है( जैसे बच्चे द्वारा कुछ सीखना) अभिवृत्ति का निर्माण सजा एवं पुरस्कार पर भी निर्भर करता है जो कि विशिष्ट कार्य/व्यवहार/क्रियाशीलता से सम्बन्धित होता है अभिवृत्ति का परिवर्तन विविध सामाजिक प्रभावों पर निर्भर करता है जिससे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूहों के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के व्यवहार या अभिवृत्ति के परिवर्तन हेतु किये जाने वाले प्रयासों से हैं सामाजिक प्रभाव के चार प्रारुप हैं यथा अनुसारिता(conformity), पालन/स्वीकृति(compliance), आज्ञाकारिता(obedience) और अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन(persuasion) अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन(persuasion) धारणा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के विश्वास, विचार, स्थिति या तौर-तरीकों में परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन तर्कों के द्वारा, आग्रह के द्वारा या स्पष्टीकरण के द्वारा किया जाता है धारणा के तीन मौलिक तत्व होते हैं यथा सन्देश का स्रोत,स्वतः सन्देशएवं ग्राहक/लक्ष्य समूह अनुनयन/धारणा/प्रोत्साहन की सफलता हेतु शर्तें धारणा की सफलता एक सामाजिक प्रभाव के माध्यम के रूप में सुनिश्चित करने हेतु निम्नलिखित शर्तों का अनुपालन आवश्यक है सन्देश का स्रोत विशेषज्ञ होना चाहिए क्योंकि विशेषज्ञों पर व्यक्तियों का विश्वास अधिक होता है, उसके पास अपनी विषय वस्तु पर अधिक ज्ञान एवं अनुभव होता है, इसके कारण व्यक्तियों के द्वारा उनकी मान्यता अधिक होती है| सन्देश का स्रोत अधिक आकर्षक होना चाहिए (विज्ञापन) आकर्षण अल्पकालीन होने के कारण सन्देश के स्रोत में समय के साथ परिवर्तन किया जाना आवश्यक होता है संदर्श की प्रकृति एवं विषय वास्तविक, परोक्ष एवं सॉफ्ट होनी चाहिए धारणा की सफलता हेतु यह आवश्यक है कि सन्देश वाहक उसी प्रकार की अभिवृत्ति को रखे जैसा वह परिवर्तन की अपेक्षा करता है, ऐसी स्थिति में जन विश्वसनीयता अधिक होती है कुछ अवसरों पर धारणा की सफलता हेतु व्यक्तियों के मस्तिष्क में एक डर या भय को उत्पन्न किया जाना आवश्यक है विशेषकर आपातकालीन या विषम परिस्थितियों में(जैसे मादक पदार्थों के साथ चेतावनी) जिस व्यक्ति के पास बेहतर भावनात्मक समझ होती है उसके प्रभावी संदेशवाहक होने की संभावना अधिक होती है धारणा की सफलता हेतु लक्ष्य समूह की पृष्ठभूमि/व्यक्तित्व को ध्यान में रख कर चलना आवश्यक है जो कि आयुसीमा, लिंग, परिवेश इत्यादि पर निर्भर करता है(कार्टून चैनल पर बच्चों के लिए विज्ञापन आना, महिलाओं से सम्बन्धित विज्ञापन पारिवारिक धारावाहिकों के दौरान आते हैं) धारणा की सफलता उपरोक्त कारकों की अंतःक्रिया के सम्मिलित परिणाम पर निर्भर करती है क्योंकि सन्दर्भ एवं समय के अनुरूप होता है
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पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| साथ ही,पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Underline the Common Reasons responsible for Insurgent Activities in Northeast India. Also, Write DownIndia"s policy on eradication of extremism in the Northeast. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर को प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- स्वतंत्रता पश्चातअधिकांश पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य के अंतर्गतशामिल था एवं नृजातीय वर्गों द्वारा की जाने वाली विभिन्न हिंसक/अहिंसक गतिविधियों के फलस्वरूप इस क्षेत्र कोजातीय तथा जनजातीय आधार पर छोटे राज्यों में संगठितकिया गया था| पूर्वोत्तर की जातियां/जनजातियाँ दक्षिण एशिया की तुलना मेंदक्षिण-पूर्व एशिया से नृजातीय, भाषाई तथा सांस्कृतिक रूपों में अधिक निकटता से जुड़ीहुयी है| साथ ही, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में परिसीमन के दौरान नृजातीय तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी की गयी थी| इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में असंतोष का जन्म हुआ तथा उग्रवादी एवं विप्लववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला| पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद के सामान्य कारण कठिन भौगोलिक स्थिति तथा दुर्गम पहाड़ियांजिसकी वजह से उग्रवादियों को छिपने का ठिकाना तथा सुरक्षाबलों को निरोधक कार्रवाई करने में मुश्किलों का सामना; निम्नस्तरीय परिवहन एवं संचार संपर्क; विदेशी सीमाओं से जुड़ावके कारण हथियारों की आसान उपलब्धता;उग्रवादियों की सीमापारीय आवाजाही आसान; पड़ोसी देशों/उनके समूहों द्वारा राजनीतिक, नैतिक, सैन्य, आर्थिक, क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन; राष्ट्रीयकृत नेताओं का अभावजिससे भारत से जुड़ाव को कम प्रोत्साहन; राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही में भ्रष्टाचारजिससे विकास योजनाओं का उचित लाभ सभी क्षेत्रों/वर्गों तक पर्याप्त नहीं पहुँच पाना; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो पाना जिससे आम जनता में आक्रोश के साथ-साथ उग्रवादियों/अलगाववादियों द्वारा असंतोष को भड़काने में सहायता; उग्रवादियों को राजनीति में आने की प्रवृति जिससेराजनीति का उग्रवादीकरण; सांस्कृतिक भिन्नता- उनका रहन, सहन, खानपान आदि में व्यापक विविधता जिससे स्वंय उनके बीच भी सामासिक सामंजस्य का अभाव; जनसामान्य का समर्थन- उग्रवादियों द्वारा किसी विशिष्ट नृजातीय समूह/समुदाय के जुड़ाव से जनसामान्य में इनकी वैधता; उपरोक्त कारणों की वजह से उग्रवादी समूहों तथा उनके द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों में तेजी देखी जाती रही है| इन समूहों द्वारा की जाने वालीमांगों में भी व्यापक अंतरहै जैसे- कुछ मामलों में संप्रभु राज्य की मांग तो कुछ मामलों में संबंधित क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग या फिर केवल बेहतर आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग| अलग-अलग मांगो के अनुरूप संबंधित क्षेत्र मेंउग्रवाद उन्मूलन पर सरकार का दृष्टिकोण भी विविधहै| पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति- पूर्वोत्तर क्षेत्र का उग्रवाद पूर्वोत्तर में विद्यामान जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के साथ भिन्न भिन्न परिस्थितियों पर आधारित है| जैसे- नागालैंड में नागालिम के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग;मेघालय में गारो, ख़ासी और जयंतिया पहाड़ों में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संघर्ष; मणिपुर मेंमैती, कूकी और नागा जनजातियों के बीच संघर्ष; मिजोरम मेंजातीय और धार्मिक संघर्ष; असम मेंबांग्लादेश अप्रवासियों और कार्बी आंगलोंग में विद्यमान गरीबी के कारण उग्रवाद आदि| इस प्रकार विद्यमान विविधताओं ने उत्तर-पूर्वी उग्रवाद को अत्यधिक हिंसात्मक और जटिल बना दिया है जिसके उन्मूलन के लिएभारत सरकार ने अपनी नीति को तीन आधारों पर विकसितकिया है- मार्गदर्शी सिद्धांत- शक्ति की आनुपातिकता तथा बल का आनुपातिक प्रयोग; अफ़स्पा का संयमित तथा उचित प्रयोग; संवाद और वार्ता; राजनीतिक स्वायत्तता; हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस; अवैध अप्रवासन के प्रति कठोर नीति; सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति(SRE); पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण; पूर्वोत्तर राज्यों में हेलिकॉप्टर सेवाओं तथा अन्य परिवहन सुविधाओं का विकास; संगठित योजना- एनआरसी लागू किया जाना; ऐसे दलों के साथ वार्ता जो हिंसा को छोड़ चूका है; पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के समर्पण तथा उनके पुनर्वास हेतु योजना; विकासोन्मुखी कार्यक्रम-संरचनात्मक विकास; राजनीतिक संरचनात्मक विकास- पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण; राजनीतिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण; उनके अंदर सामाजिक सुदृढ़ता या सामाजिक संयोजन का निर्माण; निवेश तथा संवर्धन नीति, जापान का सहयोग; सीमा क्षेत्र विकास परियोजना; पहाड़ी क्षेत्र विकास परियोजना; पूर्वोत्तर राज्यों में सिविक एक्शन प्रोग्राम; आदि; उपरोक्त आधारों पर सरकार द्वारा पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन हेतु गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं| साथ ही, हमें आसूचना तंत्र की मजबूती, वैकल्पिक संघर्ष समाधान; शिकायतों का तटस्थ मूल्यांकन तथा उनका समाधान; विरोध, असहमति, प्रदर्शन एवं चर्चा हेतु फोरम का निर्माण जैसे आयामों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है|
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##Question:पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| साथ ही,पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Underline the Common Reasons responsible for Insurgent Activities in Northeast India. Also, Write DownIndia"s policy on eradication of extremism in the Northeast. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर को प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- स्वतंत्रता पश्चातअधिकांश पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य के अंतर्गतशामिल था एवं नृजातीय वर्गों द्वारा की जाने वाली विभिन्न हिंसक/अहिंसक गतिविधियों के फलस्वरूप इस क्षेत्र कोजातीय तथा जनजातीय आधार पर छोटे राज्यों में संगठितकिया गया था| पूर्वोत्तर की जातियां/जनजातियाँ दक्षिण एशिया की तुलना मेंदक्षिण-पूर्व एशिया से नृजातीय, भाषाई तथा सांस्कृतिक रूपों में अधिक निकटता से जुड़ीहुयी है| साथ ही, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में परिसीमन के दौरान नृजातीय तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी की गयी थी| इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में असंतोष का जन्म हुआ तथा उग्रवादी एवं विप्लववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला| पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद के सामान्य कारण कठिन भौगोलिक स्थिति तथा दुर्गम पहाड़ियांजिसकी वजह से उग्रवादियों को छिपने का ठिकाना तथा सुरक्षाबलों को निरोधक कार्रवाई करने में मुश्किलों का सामना; निम्नस्तरीय परिवहन एवं संचार संपर्क; विदेशी सीमाओं से जुड़ावके कारण हथियारों की आसान उपलब्धता;उग्रवादियों की सीमापारीय आवाजाही आसान; पड़ोसी देशों/उनके समूहों द्वारा राजनीतिक, नैतिक, सैन्य, आर्थिक, क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन; राष्ट्रीयकृत नेताओं का अभावजिससे भारत से जुड़ाव को कम प्रोत्साहन; राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही में भ्रष्टाचारजिससे विकास योजनाओं का उचित लाभ सभी क्षेत्रों/वर्गों तक पर्याप्त नहीं पहुँच पाना; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो पाना जिससे आम जनता में आक्रोश के साथ-साथ उग्रवादियों/अलगाववादियों द्वारा असंतोष को भड़काने में सहायता; उग्रवादियों को राजनीति में आने की प्रवृति जिससेराजनीति का उग्रवादीकरण; सांस्कृतिक भिन्नता- उनका रहन, सहन, खानपान आदि में व्यापक विविधता जिससे स्वंय उनके बीच भी सामासिक सामंजस्य का अभाव; जनसामान्य का समर्थन- उग्रवादियों द्वारा किसी विशिष्ट नृजातीय समूह/समुदाय के जुड़ाव से जनसामान्य में इनकी वैधता; उपरोक्त कारणों की वजह से उग्रवादी समूहों तथा उनके द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों में तेजी देखी जाती रही है| इन समूहों द्वारा की जाने वालीमांगों में भी व्यापक अंतरहै जैसे- कुछ मामलों में संप्रभु राज्य की मांग तो कुछ मामलों में संबंधित क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग या फिर केवल बेहतर आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग| अलग-अलग मांगो के अनुरूप संबंधित क्षेत्र मेंउग्रवाद उन्मूलन पर सरकार का दृष्टिकोण भी विविधहै| पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति- पूर्वोत्तर क्षेत्र का उग्रवाद पूर्वोत्तर में विद्यामान जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के साथ भिन्न भिन्न परिस्थितियों पर आधारित है| जैसे- नागालैंड में नागालिम के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग;मेघालय में गारो, ख़ासी और जयंतिया पहाड़ों में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संघर्ष; मणिपुर मेंमैती, कूकी और नागा जनजातियों के बीच संघर्ष; मिजोरम मेंजातीय और धार्मिक संघर्ष; असम मेंबांग्लादेश अप्रवासियों और कार्बी आंगलोंग में विद्यमान गरीबी के कारण उग्रवाद आदि| इस प्रकार विद्यमान विविधताओं ने उत्तर-पूर्वी उग्रवाद को अत्यधिक हिंसात्मक और जटिल बना दिया है जिसके उन्मूलन के लिएभारत सरकार ने अपनी नीति को तीन आधारों पर विकसितकिया है- मार्गदर्शी सिद्धांत- शक्ति की आनुपातिकता तथा बल का आनुपातिक प्रयोग; अफ़स्पा का संयमित तथा उचित प्रयोग; संवाद और वार्ता; राजनीतिक स्वायत्तता; हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस; अवैध अप्रवासन के प्रति कठोर नीति; सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति(SRE); पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण; पूर्वोत्तर राज्यों में हेलिकॉप्टर सेवाओं तथा अन्य परिवहन सुविधाओं का विकास; संगठित योजना- एनआरसी लागू किया जाना; ऐसे दलों के साथ वार्ता जो हिंसा को छोड़ चूका है; पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के समर्पण तथा उनके पुनर्वास हेतु योजना; विकासोन्मुखी कार्यक्रम-संरचनात्मक विकास; राजनीतिक संरचनात्मक विकास- पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण; राजनीतिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण; उनके अंदर सामाजिक सुदृढ़ता या सामाजिक संयोजन का निर्माण; निवेश तथा संवर्धन नीति, जापान का सहयोग; सीमा क्षेत्र विकास परियोजना; पहाड़ी क्षेत्र विकास परियोजना; पूर्वोत्तर राज्यों में सिविक एक्शन प्रोग्राम; आदि; उपरोक्त आधारों पर सरकार द्वारा पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन हेतु गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं| साथ ही, हमें आसूचना तंत्र की मजबूती, वैकल्पिक संघर्ष समाधान; शिकायतों का तटस्थ मूल्यांकन तथा उनका समाधान; विरोध, असहमति, प्रदर्शन एवं चर्चा हेतु फोरम का निर्माण जैसे आयामों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है|
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पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| साथ ही,पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Underline the Common Reasons responsible for Insurgent Activities in Northeast India. Also, Write DownIndia"s policy on eradication of extremism in the Northeast. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर को प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- स्वतंत्रता पश्चातअधिकांश पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य के अंतर्गतशामिल था एवं नृजातीय वर्गों द्वारा की जाने वाली विभिन्न हिंसक/अहिंसक गतिविधियों के फलस्वरूप इस क्षेत्र कोजातीय तथा जनजातीय आधार पर छोटे राज्यों में संगठितकिया गया था| पूर्वोत्तर की जातियां/जनजातियाँ दक्षिण एशिया की तुलना मेंदक्षिण-पूर्व एशिया से नृजातीय, भाषाई तथा सांस्कृतिक रूपों में अधिक निकटता से जुड़ीहुयी है| साथ ही, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में परिसीमन के दौरान नृजातीय तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी की गयी थी| इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में असंतोष का जन्म हुआ तथा उग्रवादी एवं विप्लववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला| पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद के सामान्य कारण कठिन भौगोलिक स्थिति तथा दुर्गम पहाड़ियांजिसकी वजह से उग्रवादियों को छिपने का ठिकाना तथा सुरक्षाबलों को निरोधक कार्रवाई करने में मुश्किलों का सामना; निम्नस्तरीय परिवहन एवं संचार संपर्क; विदेशी सीमाओं से जुड़ावके कारण हथियारों की आसान उपलब्धता;उग्रवादियों की सीमापारीय आवाजाही आसान; पड़ोसी देशों/उनके समूहों द्वारा राजनीतिक, नैतिक, सैन्य, आर्थिक, क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन; राष्ट्रीयकृत नेताओं का अभावजिससे भारत से जुड़ाव को कम प्रोत्साहन; राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही में भ्रष्टाचारजिससे विकास योजनाओं का उचित लाभ सभी क्षेत्रों/वर्गों तक पर्याप्त नहीं पहुँच पाना; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो पाना जिससे आम जनता में आक्रोश के साथ-साथ उग्रवादियों/अलगाववादियों द्वारा असंतोष को भड़काने में सहायता; उग्रवादियों को राजनीति में आने की प्रवृति जिससेराजनीति का उग्रवादीकरण; सांस्कृतिक भिन्नता- उनका रहन, सहन, खानपान आदि में व्यापक विविधता जिससे स्वंय उनके बीच भी सामासिक सामंजस्य का अभाव; जनसामान्य का समर्थन- उग्रवादियों द्वारा किसी विशिष्ट नृजातीय समूह/समुदाय के जुड़ाव से जनसामान्य में इनकी वैधता; उपरोक्त कारणों की वजह से उग्रवादी समूहों तथा उनके द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों में तेजी देखी जाती रही है| इन समूहों द्वारा की जाने वालीमांगों में भी व्यापक अंतरहै जैसे- कुछ मामलों में संप्रभु राज्य की मांग तो कुछ मामलों में संबंधित क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग या फिर केवल बेहतर आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग| अलग-अलग मांगो के अनुरूप संबंधित क्षेत्र मेंउग्रवाद उन्मूलन पर सरकार का दृष्टिकोण भी विविधहै| पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति- पूर्वोत्तर क्षेत्र का उग्रवाद पूर्वोत्तर में विद्यामान जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के साथ भिन्न भिन्न परिस्थितियों पर आधारित है| जैसे- नागालैंड में नागालिम के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग;मेघालय में गारो, ख़ासी और जयंतिया पहाड़ों में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संघर्ष; मणिपुर मेंमैती, कूकी और नागा जनजातियों के बीच संघर्ष; मिजोरम मेंजातीय और धार्मिक संघर्ष; असम मेंबांग्लादेश अप्रवासियों और कार्बी आंगलोंग में विद्यमान गरीबी के कारण उग्रवाद आदि| इस प्रकार विद्यमान विविधताओं ने उत्तर-पूर्वी उग्रवाद को अत्यधिक हिंसात्मक और जटिल बना दिया है जिसके उन्मूलन के लिएभारत सरकार ने अपनी नीति को तीन आधारों पर विकसितकिया है- मार्गदर्शी सिद्धांत- शक्ति की आनुपातिकता तथा बल का आनुपातिक प्रयोग; अफ़स्पा का संयमित तथा उचित प्रयोग; संवाद और वार्ता; राजनीतिक स्वायत्तता; हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस; अवैध अप्रवासन के प्रति कठोर नीति; सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति(SRE); पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण; पूर्वोत्तर राज्यों में हेलिकॉप्टर सेवाओं तथा अन्य परिवहन सुविधाओं का विकास; संगठित योजना-एनआरसी लागू किया जाना; ऐसे दलों के साथ वार्ता जो हिंसा को छोड़ चूका है; पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के समर्पण तथा उनके पुनर्वास हेतु योजना; विकासोन्मुखी कार्यक्रम- संरचनात्मक विकास; राजनीतिक संरचनात्मक विकास- पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण; राजनीतिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण; उनके अंदर सामाजिक सुदृढ़ता या सामाजिक संयोजन का निर्माण; निवेश तथा संवर्धन नीति, जापान का सहयोग; सीमा क्षेत्र विकास परियोजना; पहाड़ी क्षेत्र विकास परियोजना; पूर्वोत्तर राज्यों में सिविक एक्शन प्रोग्राम; आदि; उपरोक्त आधारों पर सरकार द्वारा पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन हेतु गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं| साथ ही, हमें आसूचना तंत्र की मजबूती, वैकल्पिक संघर्ष समाधान; शिकायतों का तटस्थ मूल्यांकन तथा उनका समाधान; विरोध, असहमति, प्रदर्शन एवं चर्चा हेतु फोरम का निर्माण जैसे आयामों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है|
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##Question:पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| साथ ही,पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Underline the Common Reasons responsible for Insurgent Activities in Northeast India. Also, Write DownIndia"s policy on eradication of extremism in the Northeast. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर को प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- स्वतंत्रता पश्चातअधिकांश पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य के अंतर्गतशामिल था एवं नृजातीय वर्गों द्वारा की जाने वाली विभिन्न हिंसक/अहिंसक गतिविधियों के फलस्वरूप इस क्षेत्र कोजातीय तथा जनजातीय आधार पर छोटे राज्यों में संगठितकिया गया था| पूर्वोत्तर की जातियां/जनजातियाँ दक्षिण एशिया की तुलना मेंदक्षिण-पूर्व एशिया से नृजातीय, भाषाई तथा सांस्कृतिक रूपों में अधिक निकटता से जुड़ीहुयी है| साथ ही, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में परिसीमन के दौरान नृजातीय तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी की गयी थी| इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में असंतोष का जन्म हुआ तथा उग्रवादी एवं विप्लववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला| पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद के सामान्य कारण कठिन भौगोलिक स्थिति तथा दुर्गम पहाड़ियांजिसकी वजह से उग्रवादियों को छिपने का ठिकाना तथा सुरक्षाबलों को निरोधक कार्रवाई करने में मुश्किलों का सामना; निम्नस्तरीय परिवहन एवं संचार संपर्क; विदेशी सीमाओं से जुड़ावके कारण हथियारों की आसान उपलब्धता;उग्रवादियों की सीमापारीय आवाजाही आसान; पड़ोसी देशों/उनके समूहों द्वारा राजनीतिक, नैतिक, सैन्य, आर्थिक, क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन; राष्ट्रीयकृत नेताओं का अभावजिससे भारत से जुड़ाव को कम प्रोत्साहन; राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही में भ्रष्टाचारजिससे विकास योजनाओं का उचित लाभ सभी क्षेत्रों/वर्गों तक पर्याप्त नहीं पहुँच पाना; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो पाना जिससे आम जनता में आक्रोश के साथ-साथ उग्रवादियों/अलगाववादियों द्वारा असंतोष को भड़काने में सहायता; उग्रवादियों को राजनीति में आने की प्रवृति जिससेराजनीति का उग्रवादीकरण; सांस्कृतिक भिन्नता- उनका रहन, सहन, खानपान आदि में व्यापक विविधता जिससे स्वंय उनके बीच भी सामासिक सामंजस्य का अभाव; जनसामान्य का समर्थन- उग्रवादियों द्वारा किसी विशिष्ट नृजातीय समूह/समुदाय के जुड़ाव से जनसामान्य में इनकी वैधता; उपरोक्त कारणों की वजह से उग्रवादी समूहों तथा उनके द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों में तेजी देखी जाती रही है| इन समूहों द्वारा की जाने वालीमांगों में भी व्यापक अंतरहै जैसे- कुछ मामलों में संप्रभु राज्य की मांग तो कुछ मामलों में संबंधित क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग या फिर केवल बेहतर आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग| अलग-अलग मांगो के अनुरूप संबंधित क्षेत्र मेंउग्रवाद उन्मूलन पर सरकार का दृष्टिकोण भी विविधहै| पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति- पूर्वोत्तर क्षेत्र का उग्रवाद पूर्वोत्तर में विद्यामान जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के साथ भिन्न भिन्न परिस्थितियों पर आधारित है| जैसे- नागालैंड में नागालिम के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग;मेघालय में गारो, ख़ासी और जयंतिया पहाड़ों में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संघर्ष; मणिपुर मेंमैती, कूकी और नागा जनजातियों के बीच संघर्ष; मिजोरम मेंजातीय और धार्मिक संघर्ष; असम मेंबांग्लादेश अप्रवासियों और कार्बी आंगलोंग में विद्यमान गरीबी के कारण उग्रवाद आदि| इस प्रकार विद्यमान विविधताओं ने उत्तर-पूर्वी उग्रवाद को अत्यधिक हिंसात्मक और जटिल बना दिया है जिसके उन्मूलन के लिएभारत सरकार ने अपनी नीति को तीन आधारों पर विकसितकिया है- मार्गदर्शी सिद्धांत- शक्ति की आनुपातिकता तथा बल का आनुपातिक प्रयोग; अफ़स्पा का संयमित तथा उचित प्रयोग; संवाद और वार्ता; राजनीतिक स्वायत्तता; हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस; अवैध अप्रवासन के प्रति कठोर नीति; सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति(SRE); पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण; पूर्वोत्तर राज्यों में हेलिकॉप्टर सेवाओं तथा अन्य परिवहन सुविधाओं का विकास; संगठित योजना-एनआरसी लागू किया जाना; ऐसे दलों के साथ वार्ता जो हिंसा को छोड़ चूका है; पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के समर्पण तथा उनके पुनर्वास हेतु योजना; विकासोन्मुखी कार्यक्रम- संरचनात्मक विकास; राजनीतिक संरचनात्मक विकास- पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण; राजनीतिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण; उनके अंदर सामाजिक सुदृढ़ता या सामाजिक संयोजन का निर्माण; निवेश तथा संवर्धन नीति, जापान का सहयोग; सीमा क्षेत्र विकास परियोजना; पहाड़ी क्षेत्र विकास परियोजना; पूर्वोत्तर राज्यों में सिविक एक्शन प्रोग्राम; आदि; उपरोक्त आधारों पर सरकार द्वारा पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन हेतु गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं| साथ ही, हमें आसूचना तंत्र की मजबूती, वैकल्पिक संघर्ष समाधान; शिकायतों का तटस्थ मूल्यांकन तथा उनका समाधान; विरोध, असहमति, प्रदर्शन एवं चर्चा हेतु फोरम का निर्माण जैसे आयामों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है|
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Many of the present social conflicts arise due to prejudices and discrimination. Illustrate. What can be done to curb discrimination and handle prejudices? (150 words/10 marks)
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Approach Briefly explain prejudices Discuss how Prejudices can impose barriers on individuals with the help of suitable examples. Brieflymention the ways to dilute Prejudice Answer Prejudices are preconceived opinions that are not based on reason or actual experience. They are examples of negative attitude flowing out of irrational beliefs towards a particular group and is based on stereotypes, arising out of over generalisation of things and ignoring individual differences/attributes. Prejudice is the act of making general assumptions of a person or a community based on limited understanding, Prejudicecreates ignorance about a community and a generalization of a larger demographic. Prejudices are both causes and effects of stereotyping. Prejudice affects the everyday lives of millions of people across the globe. It creates emotions of anger, hatred, hostility, disgust, etc. Prejudice can also lead to discrimination- erect barriers for individuals of a particular group. (behavioural aspect) Someexample of prejudice in everyday life: Role of Women -In our society, a woman is stereotyped as emotional, possessor of soft skills, passive and hence her acceptance, success, and rise in the corporate world are limited in form of glass ceiling phenomena, stereotyping of job profiles (pink-colored jobs) for women like a nurse, receptionist, etc. This obstructs the achievement of her true potential and furthers the stereotype of her being a lesser being as compared to men. The unacceptability of transgenders in society – Transgenders have always been seen in a negative light by society. The prejudice against them is that their physical abnormality leads to the absence of any discernible capability to do any traditional job. They are seen as a threat to society and hence are discriminated against at every stage of life. There is no scientific reasoning against this stereotype but such prejudice further leads to the strengthening of this image of transgenders in society. Racial profiling at airport immigration/security - It is often seen at the airport immigration that non-whites or persons with certain names like Mohammad, Khan, etc are randomly screened for thorough checks while letting others go without any problem. Such racial profiling is a result of prevailing stereotypes that certain races/religions are perpetrators of terrorism and crimes in society. There are many otherexamples- Caste-based; religion based, people from South India/North India, based on education, place of residence, etc. which affect the lives of millions of individuals on a daily basis. Acting on such prejudices, the attacker denies a person who experiences prejudice, a chance to explain who they are and share their story. Strategy to curb prejudices:- We should focus on denying the opportunity to learn about prejudices through- comprehensive education and information dissemination. Focus on changing attitudes of people who exercise such prejudices- the role of civil society becomes important here. Constructive use of social media- it can be used to deemphasize a narrow social identity. Promoting inter-group contacts through direct communication and cultural exchanges. Eg. The recent Eik Bharat Shrestha Bharat initiative. More focus on individual identity creation rather than group identity. Discourage negative tendencies among the victims of prejudice- such as violent outbursts as these actions can further reinforce prejudice.
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##Question:Many of the present social conflicts arise due to prejudices and discrimination. Illustrate. What can be done to curb discrimination and handle prejudices? (150 words/10 marks)##Answer:Approach Briefly explain prejudices Discuss how Prejudices can impose barriers on individuals with the help of suitable examples. Brieflymention the ways to dilute Prejudice Answer Prejudices are preconceived opinions that are not based on reason or actual experience. They are examples of negative attitude flowing out of irrational beliefs towards a particular group and is based on stereotypes, arising out of over generalisation of things and ignoring individual differences/attributes. Prejudice is the act of making general assumptions of a person or a community based on limited understanding, Prejudicecreates ignorance about a community and a generalization of a larger demographic. Prejudices are both causes and effects of stereotyping. Prejudice affects the everyday lives of millions of people across the globe. It creates emotions of anger, hatred, hostility, disgust, etc. Prejudice can also lead to discrimination- erect barriers for individuals of a particular group. (behavioural aspect) Someexample of prejudice in everyday life: Role of Women -In our society, a woman is stereotyped as emotional, possessor of soft skills, passive and hence her acceptance, success, and rise in the corporate world are limited in form of glass ceiling phenomena, stereotyping of job profiles (pink-colored jobs) for women like a nurse, receptionist, etc. This obstructs the achievement of her true potential and furthers the stereotype of her being a lesser being as compared to men. The unacceptability of transgenders in society – Transgenders have always been seen in a negative light by society. The prejudice against them is that their physical abnormality leads to the absence of any discernible capability to do any traditional job. They are seen as a threat to society and hence are discriminated against at every stage of life. There is no scientific reasoning against this stereotype but such prejudice further leads to the strengthening of this image of transgenders in society. Racial profiling at airport immigration/security - It is often seen at the airport immigration that non-whites or persons with certain names like Mohammad, Khan, etc are randomly screened for thorough checks while letting others go without any problem. Such racial profiling is a result of prevailing stereotypes that certain races/religions are perpetrators of terrorism and crimes in society. There are many otherexamples- Caste-based; religion based, people from South India/North India, based on education, place of residence, etc. which affect the lives of millions of individuals on a daily basis. Acting on such prejudices, the attacker denies a person who experiences prejudice, a chance to explain who they are and share their story. Strategy to curb prejudices:- We should focus on denying the opportunity to learn about prejudices through- comprehensive education and information dissemination. Focus on changing attitudes of people who exercise such prejudices- the role of civil society becomes important here. Constructive use of social media- it can be used to deemphasize a narrow social identity. Promoting inter-group contacts through direct communication and cultural exchanges. Eg. The recent Eik Bharat Shrestha Bharat initiative. More focus on individual identity creation rather than group identity. Discourage negative tendencies among the victims of prejudice- such as violent outbursts as these actions can further reinforce prejudice.
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Swadeshi Movement though had elements of anti-colonialism, brought the differences between Moderates and Extremists to the forefront. Analyze. [150 Words | 10 Marks]
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Approach: Briefly discuss the Swadeshi movement along with it"s objectives. Bring out the differences between moderates and extremists created during the swadeshi movement. Conclude accordingly with surat split. Answer: The word ‘ Swadesh’ comes from the Sanskrit words “Swa” meaning “own” and “Desh” meaning “country”. It was launched as a protest movement which also gave led to the Boycott movement in the country. It led to the use of goods produced in India and the burning of British-made goods. Objectives of the Swadeshi movement- To revive the use of domestic Indian goods and promote self-sufficiency. To negatively impact the British Government by causing open manifestations like the burning of British goods to stop the Bengal’s partition. To improve India’s economic conditions without the interference of the British rulers. Differences between moderates and extremists were created during the swadeshi movement: Congress appealed to the people to boycott British goods. The educated Indians knew the economic evils of British rule. The Swadeshi movement, therefore, was a challenge to the British Government. People started burning British cloth and throwing away foreign goods. Along with the Swadeshi movement, there developed the idea of Swaraj or Swarajya meaning self Government. Bal Gangadhar Tilak inspired the people by uttering “Swarajya is my birthright and I shall have it”. A positive idea for action thus emerged for the congress and the nationalists. Extremists- As the anti-partition and the Swadeshi movement spread, the extremists decided for more extreme agitation. The extremist- leader Bipin Chandra Pal told the Congress “the car of Jagannath is the car of progress, it moves slowly but it moves surely to its own destination. Like him, many in Congress wanted to give the movement a militant form. Extremists under Tilak wanted to achieve their goals through struggle. The Congress as a body did not approve of these violent methods but many others believed strongly in revolutionary activities. The extremist leaders like Lajpat Rai and Ajit Singh were arrested and deported to Mandalay. In turn, the extremist turned more radical. To face the challenge some extremist members wanted to elect Lajpat Rai as the President of the Congress in 1907. Moderates - This faction headed by Gokhale opposed the moves of extremists. The methods adopted were petitions to the Government, public meetings, adopted were petitions to the Government, public meetings, memoranda, and propaganda through pamphlets and newspapers such as Hitabadi, Sanjibani, and Bengalee. Their objective was to exert sufficient pressure on the Government through an educated public opinion in India and England to prevent the unjust partition of Bengal from being implemented. Every festival became a reason for people of all religions to gather and spread political messages. It was during this time that Bengal National College was established, with Aurobindo Ghosh as its principal. This phase witnessed brilliant literary works inspired by social conditions as well. Tagore’s “Amar Sonar Bangla” was also written during this time. In this situation, Congress met at Surat. In that Surat Session there took place the split among the members. The Surat split was a threat to the unity of the country yet it did not harm the Swadeshi movement. The moderates captured the Congress organization and the extremists were forced out of it quiet for some years.
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##Question:Swadeshi Movement though had elements of anti-colonialism, brought the differences between Moderates and Extremists to the forefront. Analyze. [150 Words | 10 Marks]##Answer:Approach: Briefly discuss the Swadeshi movement along with it"s objectives. Bring out the differences between moderates and extremists created during the swadeshi movement. Conclude accordingly with surat split. Answer: The word ‘ Swadesh’ comes from the Sanskrit words “Swa” meaning “own” and “Desh” meaning “country”. It was launched as a protest movement which also gave led to the Boycott movement in the country. It led to the use of goods produced in India and the burning of British-made goods. Objectives of the Swadeshi movement- To revive the use of domestic Indian goods and promote self-sufficiency. To negatively impact the British Government by causing open manifestations like the burning of British goods to stop the Bengal’s partition. To improve India’s economic conditions without the interference of the British rulers. Differences between moderates and extremists were created during the swadeshi movement: Congress appealed to the people to boycott British goods. The educated Indians knew the economic evils of British rule. The Swadeshi movement, therefore, was a challenge to the British Government. People started burning British cloth and throwing away foreign goods. Along with the Swadeshi movement, there developed the idea of Swaraj or Swarajya meaning self Government. Bal Gangadhar Tilak inspired the people by uttering “Swarajya is my birthright and I shall have it”. A positive idea for action thus emerged for the congress and the nationalists. Extremists- As the anti-partition and the Swadeshi movement spread, the extremists decided for more extreme agitation. The extremist- leader Bipin Chandra Pal told the Congress “the car of Jagannath is the car of progress, it moves slowly but it moves surely to its own destination. Like him, many in Congress wanted to give the movement a militant form. Extremists under Tilak wanted to achieve their goals through struggle. The Congress as a body did not approve of these violent methods but many others believed strongly in revolutionary activities. The extremist leaders like Lajpat Rai and Ajit Singh were arrested and deported to Mandalay. In turn, the extremist turned more radical. To face the challenge some extremist members wanted to elect Lajpat Rai as the President of the Congress in 1907. Moderates - This faction headed by Gokhale opposed the moves of extremists. The methods adopted were petitions to the Government, public meetings, adopted were petitions to the Government, public meetings, memoranda, and propaganda through pamphlets and newspapers such as Hitabadi, Sanjibani, and Bengalee. Their objective was to exert sufficient pressure on the Government through an educated public opinion in India and England to prevent the unjust partition of Bengal from being implemented. Every festival became a reason for people of all religions to gather and spread political messages. It was during this time that Bengal National College was established, with Aurobindo Ghosh as its principal. This phase witnessed brilliant literary works inspired by social conditions as well. Tagore’s “Amar Sonar Bangla” was also written during this time. In this situation, Congress met at Surat. In that Surat Session there took place the split among the members. The Surat split was a threat to the unity of the country yet it did not harm the Swadeshi movement. The moderates captured the Congress organization and the extremists were forced out of it quiet for some years.
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भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने की दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the causes and consequences of drug trafficking in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India towards curbing drug trafficking. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| 5- अंतिम में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए कुछ सुझाव हुए उत्तर समाप्त कीजिये| मादक पदार्थों की तस्करी एक गैर परम्परागत श्रेणी का संगठित अपराध होता है |अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । इसके विभिन्न कारण हैं| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है।वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है। इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है पडोसी देशों के साथ नकारात्मक सम्बन्ध होने के कारण भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणाम मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । तस्करों को पारगमन मार्ग की प्राप्ति, मादक पदार्थों की तस्करी के कारण सीमायें असुरक्षित होती है| नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है। जनस्वास्थ्य प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| नशाखोरी के कारण कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है मादक पदार्थों की तस्करी के कारण हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है। मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए किये गए प्रयास मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं| नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेन्स अधिनियम 1985 के तहत किसी भी नशीली दवा की कृषि, बिक्री अथवा परिवहन को अपराध घोषित किया गया है वर्ष 2014 में इस कानून के दायरे को बढाते हुए एसेंशियल नारकोटिक्सड्रग्स/दर्द निवारक औषधियों को इस कानून के दायरे में लाया गया है| 2015 में NDPS दवाओं जैसे मोर्फीन, फेंटेनियल, मेथोडॉन, हाइड्रोकोडेन, कोडेन एवं ओक्सी कोडेन को केंद्र के नियंत्रण में ले लिया गया है| नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार इस दिशा में प्रयासरत है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । दवाइयों और रसायनों के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जा रहा है| इसके साथ ही नशीले पदार्थों और सिंथेटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं इसके साथ ही स्वैच्छिक संगठनों को भागीदार बना कर युवा वर्ग को इन पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| गस्त और निगरानी को मजबूत करके सीमाओं एवं तटों की भौगोलिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है| बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
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##Question:भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने की दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the causes and consequences of drug trafficking in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India towards curbing drug trafficking. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| 5- अंतिम में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए कुछ सुझाव हुए उत्तर समाप्त कीजिये| मादक पदार्थों की तस्करी एक गैर परम्परागत श्रेणी का संगठित अपराध होता है |अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । इसके विभिन्न कारण हैं| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है।वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है। इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है पडोसी देशों के साथ नकारात्मक सम्बन्ध होने के कारण भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणाम मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । तस्करों को पारगमन मार्ग की प्राप्ति, मादक पदार्थों की तस्करी के कारण सीमायें असुरक्षित होती है| नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है। जनस्वास्थ्य प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| नशाखोरी के कारण कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है मादक पदार्थों की तस्करी के कारण हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है। मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए किये गए प्रयास मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं| नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेन्स अधिनियम 1985 के तहत किसी भी नशीली दवा की कृषि, बिक्री अथवा परिवहन को अपराध घोषित किया गया है वर्ष 2014 में इस कानून के दायरे को बढाते हुए एसेंशियल नारकोटिक्सड्रग्स/दर्द निवारक औषधियों को इस कानून के दायरे में लाया गया है| 2015 में NDPS दवाओं जैसे मोर्फीन, फेंटेनियल, मेथोडॉन, हाइड्रोकोडेन, कोडेन एवं ओक्सी कोडेन को केंद्र के नियंत्रण में ले लिया गया है| नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार इस दिशा में प्रयासरत है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । दवाइयों और रसायनों के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जा रहा है| इसके साथ ही नशीले पदार्थों और सिंथेटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं इसके साथ ही स्वैच्छिक संगठनों को भागीदार बना कर युवा वर्ग को इन पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| गस्त और निगरानी को मजबूत करके सीमाओं एवं तटों की भौगोलिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है| बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
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भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने की दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the causes and consequences of drug trafficking in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India towards curbing drug trafficking. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| 5- अंतिम में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए कुछ सुझाव हुए उत्तर समाप्त कीजिये| मादक पदार्थों की तस्करी एक गैर परम्परागत श्रेणी का संगठित अपराध होता है |अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । इसके विभिन्न कारण हैं| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है।वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है। इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है पडोसी देशों के साथ नकारात्मक सम्बन्ध होने के कारण भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणाम मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । तस्करों को पारगमन मार्ग की प्राप्ति, मादक पदार्थों की तस्करी के कारण सीमायें असुरक्षित होती है| नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है। जनस्वास्थ्य प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| नशाखोरी के कारण कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है मादक पदार्थों की तस्करी के कारण हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है। मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए किये गए प्रयास मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं| नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेन्स अधिनियम 1985 के तहत किसी भी नशीली दवा की कृषि, बिक्री अथवा परिवहन को अपराध घोषित किया गया है वर्ष 2014 में इस कानून के दायरे को बढाते हुए एसेंशियल नारकोटिक्सड्रग्स/दर्द निवारक औषधियों को इस कानून के दायरे में लाया गया है| 2015 में NDPS दवाओं जैसे मोर्फीन, फेंटेनियल, मेथोडॉन, हाइड्रोकोडेन, कोडेन एवं ओक्सी कोडेन को केंद्र के नियंत्रण में ले लिया गया है| नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार इस दिशा में प्रयासरत है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । दवाइयों और रसायनों के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जा रहा है| इसके साथ ही नशीले पदार्थों और सिंथेटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं इसके साथ ही स्वैच्छिक संगठनों को भागीदार बना कर युवा वर्ग को इन पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| गस्त और निगरानी को मजबूत करके सीमाओं एवं तटों की भौगोलिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है| बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
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##Question:भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने की दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the causes and consequences of drug trafficking in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India towards curbing drug trafficking. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| 5- अंतिम में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए कुछ सुझाव हुए उत्तर समाप्त कीजिये| मादक पदार्थों की तस्करी एक गैर परम्परागत श्रेणी का संगठित अपराध होता है |अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । इसके विभिन्न कारण हैं| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है।वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है। इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है पडोसी देशों के साथ नकारात्मक सम्बन्ध होने के कारण भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणाम मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । तस्करों को पारगमन मार्ग की प्राप्ति, मादक पदार्थों की तस्करी के कारण सीमायें असुरक्षित होती है| नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है। जनस्वास्थ्य प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| नशाखोरी के कारण कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है मादक पदार्थों की तस्करी के कारण हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है। मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए किये गए प्रयास मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं| नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेन्स अधिनियम 1985 के तहत किसी भी नशीली दवा की कृषि, बिक्री अथवा परिवहन को अपराध घोषित किया गया है वर्ष 2014 में इस कानून के दायरे को बढाते हुए एसेंशियल नारकोटिक्सड्रग्स/दर्द निवारक औषधियों को इस कानून के दायरे में लाया गया है| 2015 में NDPS दवाओं जैसे मोर्फीन, फेंटेनियल, मेथोडॉन, हाइड्रोकोडेन, कोडेन एवं ओक्सी कोडेन को केंद्र के नियंत्रण में ले लिया गया है| नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार इस दिशा में प्रयासरत है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । दवाइयों और रसायनों के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जा रहा है| इसके साथ ही नशीले पदार्थों और सिंथेटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं इसके साथ ही स्वैच्छिक संगठनों को भागीदार बना कर युवा वर्ग को इन पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| गस्त और निगरानी को मजबूत करके सीमाओं एवं तटों की भौगोलिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है| बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
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निर्वाचन में राज्य द्वारा वित्तपोषण के पक्ष व विपक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिये । ( 150 - 200 शब्द , अंक - 10 ) Discuss the arguments in favor and opposition of state funding of elections. (150 - 200 words, numeral - 10)
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दृष्टिकोण : निर्वाचन में राज्य के निवेश को समझाते हुये भूमिका लिखिए । निर्वाचन में राज्य के निवेश के पक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिये । निर्वाचन में राज्य के निवेश के विपक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिये । अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये । उत्तर : वर्तमान समय में निर्वाचन के व्यय का वहन राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के द्वारा स्वतः अपने स्तर पर किया जाता हैजो कि निजी योगदान पर आधारित होता है| इसके कारण निर्वाचन प्रक्रिया में धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है जो कि निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु उचित नहीं है| इस समस्या के समाधान के तौर पर निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है| निर्वाचन सुधार पर गठित विविध समितियों के द्वारा जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, इन्द्रजीत गुप्ता समिति आदि ने भी निर्वाचन में राज्य के निवेश का समर्थन किया है| ध्यातव्य है कि इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए किया गया था पक्ष में तर्क : इससे धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव निर्वाचन में कम या प्रतिबंधित होगा इससे निर्वाचन में काले धन के प्रयोग की संभावनाएं सीमित होंगी इसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया में एक सामान स्तर प्राप्त होगा राजनीतिक दलों के द्वारा प्रजातंत्र को बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है अतः राजनीतिक दलों को निर्वाचन हेतु राज्य/सरकार का सहयोग प्राप्त होना चाहिए सरकार जब विकास के लिए NGO को फंड कर सकती है तो उसे राजनीतिक दलों को भी देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र विकास से अधिक महत्वपूर्ण है निर्वाचन में राज्य का निवेश होने पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के द्वारा आम जनता के व्यापक हितों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना संभव हो पायेगा निर्वाचन में राज्य का निवेश राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है| यह नागरिकों के प्रति राजनीतिक दलों की जवाबदेहिता को भी प्रोत्साहित करने का एक माध्यम होगा विपक्ष में तर्क : फंड की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी की संभावना अधिक हो जायेगी जो कि पहले से ही काफी अधिक है अधिकाँश मामलों में राजनीतिक दलों का गठन कुछ चिन्हित/चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिपूर्ति हेतु किया जाता है तब ऐसी स्थिति में उसके व्यय का वहन राज्य या सरकार के द्वारा किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है 1951 से लेकर अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा बिना राज्य के सहयोग के निर्वाचन में भाग लिया जा रहा है एवं कई मामलों में निर्धारित सीमा से अधिक व्यय किया जाता है| अतः राजनीतिक दलों में कोई आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की कमी नहीं है परन्तु सरकार के आर्थिक संसाधन सीमित हैं अतः सरकार के द्वारा सीमित आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकासात्मक प्राथमिकताओं को लागू करने पर किया जाना चाहिए न की निर्वाचन में निवेश करने हेतु किया जाय| निर्वाचन में राज्य का निवेश स्वतः अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता है कि निजी योगदान का प्रभाव/भूमिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी| अतः ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया के अधिक खर्चीला होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी| जो की निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु लाभकारी नहीं होंगी| इस प्रकार स्पष्ट होता है की निर्वाचन में राज्य द्वारा फंडिंग के लाभों के साथ ही अनेक सीमाएं भी हैं| इसके सामाधान के रूप में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप निर्वाचन में राज्य या सरकार का निवेश होना चाहिए परन्तु यह निवेश वस्तु एवं सामग्री के रूप में होना चाहिए| राजनीतिक दलों के पंजीकरण के मानकों और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए एवं निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को गैर-पंजीकृत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि निर्वाचन में राज्य द्वारा किया गया निवेश स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके|
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##Question:निर्वाचन में राज्य द्वारा वित्तपोषण के पक्ष व विपक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिये । ( 150 - 200 शब्द , अंक - 10 ) Discuss the arguments in favor and opposition of state funding of elections. (150 - 200 words, numeral - 10)##Answer:दृष्टिकोण : निर्वाचन में राज्य के निवेश को समझाते हुये भूमिका लिखिए । निर्वाचन में राज्य के निवेश के पक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिये । निर्वाचन में राज्य के निवेश के विपक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिये । अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये । उत्तर : वर्तमान समय में निर्वाचन के व्यय का वहन राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के द्वारा स्वतः अपने स्तर पर किया जाता हैजो कि निजी योगदान पर आधारित होता है| इसके कारण निर्वाचन प्रक्रिया में धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है जो कि निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु उचित नहीं है| इस समस्या के समाधान के तौर पर निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है| निर्वाचन सुधार पर गठित विविध समितियों के द्वारा जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, इन्द्रजीत गुप्ता समिति आदि ने भी निर्वाचन में राज्य के निवेश का समर्थन किया है| ध्यातव्य है कि इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए किया गया था पक्ष में तर्क : इससे धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव निर्वाचन में कम या प्रतिबंधित होगा इससे निर्वाचन में काले धन के प्रयोग की संभावनाएं सीमित होंगी इसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया में एक सामान स्तर प्राप्त होगा राजनीतिक दलों के द्वारा प्रजातंत्र को बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है अतः राजनीतिक दलों को निर्वाचन हेतु राज्य/सरकार का सहयोग प्राप्त होना चाहिए सरकार जब विकास के लिए NGO को फंड कर सकती है तो उसे राजनीतिक दलों को भी देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र विकास से अधिक महत्वपूर्ण है निर्वाचन में राज्य का निवेश होने पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के द्वारा आम जनता के व्यापक हितों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना संभव हो पायेगा निर्वाचन में राज्य का निवेश राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है| यह नागरिकों के प्रति राजनीतिक दलों की जवाबदेहिता को भी प्रोत्साहित करने का एक माध्यम होगा विपक्ष में तर्क : फंड की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी की संभावना अधिक हो जायेगी जो कि पहले से ही काफी अधिक है अधिकाँश मामलों में राजनीतिक दलों का गठन कुछ चिन्हित/चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिपूर्ति हेतु किया जाता है तब ऐसी स्थिति में उसके व्यय का वहन राज्य या सरकार के द्वारा किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है 1951 से लेकर अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा बिना राज्य के सहयोग के निर्वाचन में भाग लिया जा रहा है एवं कई मामलों में निर्धारित सीमा से अधिक व्यय किया जाता है| अतः राजनीतिक दलों में कोई आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की कमी नहीं है परन्तु सरकार के आर्थिक संसाधन सीमित हैं अतः सरकार के द्वारा सीमित आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकासात्मक प्राथमिकताओं को लागू करने पर किया जाना चाहिए न की निर्वाचन में निवेश करने हेतु किया जाय| निर्वाचन में राज्य का निवेश स्वतः अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता है कि निजी योगदान का प्रभाव/भूमिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी| अतः ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया के अधिक खर्चीला होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी| जो की निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु लाभकारी नहीं होंगी| इस प्रकार स्पष्ट होता है की निर्वाचन में राज्य द्वारा फंडिंग के लाभों के साथ ही अनेक सीमाएं भी हैं| इसके सामाधान के रूप में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप निर्वाचन में राज्य या सरकार का निवेश होना चाहिए परन्तु यह निवेश वस्तु एवं सामग्री के रूप में होना चाहिए| राजनीतिक दलों के पंजीकरण के मानकों और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए एवं निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को गैर-पंजीकृत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि निर्वाचन में राज्य द्वारा किया गया निवेश स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके|
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Briefly discuss the reasons for the 1857 revolt against the Britishers in India.(10 marks/150 words).
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Question:- Briefly discuss the reasons for the 1857 revolt against the Britishers in India.(10 marks/150 words). Approach- Give a brief introduction of 1857 Revolt Discuss Military and Economic reasons of the 1857 Revolt Answer 1857 in the history of Modern India marked the beginning of a new era and the end of an era. It witnessed the culmination of a century-long tradition of fierce, popular, resistance to the British Administration to the British domination in the form of a great revolt that nearly swept away the British rule from India. The causes of the revolt are inextricably woven together that it is difficult to determine the sequence in which they arose. There was a fateful combination of circumstances in 1857 which did not appear in the past and nor tended to recur in the future. Causes of the revolt Military reasons The replacement of the old Brown Bess musket with the new Enfield rifle was its longer range and greater accuracy. The sepoys had to load the rifle after biting off a paper on the cartridge. It was alleged that paper was smeared with cow and pig fat. It provoked the religious sentiment of Hindus and Muslims alike. To bring about a united resistance against the British. Enlistment order of 1856 The enlistment order of 1856 made it obligatory on the part of sepoys to go on duty wherever ordered. It led the sepoys to suspect that Britishers intended to force them all to embrace Christianity . On a professional level, an Indian Sepoy was paid 1/3 rd of the salary compared to a European Sepoy. Moreover, there was racial discrimination and they were roughly treated abused and humiliated. 1854 Post Office Act In 1854 Post Office Act was passed which withdrew the free postage privilege of the sepoys The majority of the recruits in the British Army were from Awadh, Bengal, and NWFP. Many of them belonged to high caste Brahmin Rajput, Pathan families who did not like to be treated on par with low caste recruits. Initially, soldiers were paid Bhatta (allowance). When they were posted far away from Home. But by 1850 it was also withdrawn. Economic Cause of Revolt The various land revenue settlements like Permanent, Ryotwari, and Mahalwari introduced by the British meant a loss of land for many landholders and heavy taxation for Cultivators. The land revenue assessmen t under all the systems was heavy and oppressive. Even in the case of crop failure relief was not given to the peasants. Many of these peasants were caught in a vicious cycle of debt, moreover at some places land became a commodity to be sold and purchased in the Market. Destruction of indigenous industry and Handicrafts The company traders enjoyed various privileges such as duty-free trade which made their goods comparatively cheaper as compared to the Indian produce. Though the Indian Goods can still compete with the British good they will charge heavy duties when they entered European markets. Confiscation of rent-free estates In the 1850s the government set up a tribunal to inquire into the title deeds of rent-free estates. In between 1852 to 1857 near about 21000 cases were brought before the Inam commission which pronounced confiscation of all rent-free estates . Those who were highly disaffected with this, included Maulvis, Ulemas, Priestly class, etc, who later actively participated in the 1857 revolt.
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##Question:Briefly discuss the reasons for the 1857 revolt against the Britishers in India.(10 marks/150 words).##Answer:Question:- Briefly discuss the reasons for the 1857 revolt against the Britishers in India.(10 marks/150 words). Approach- Give a brief introduction of 1857 Revolt Discuss Military and Economic reasons of the 1857 Revolt Answer 1857 in the history of Modern India marked the beginning of a new era and the end of an era. It witnessed the culmination of a century-long tradition of fierce, popular, resistance to the British Administration to the British domination in the form of a great revolt that nearly swept away the British rule from India. The causes of the revolt are inextricably woven together that it is difficult to determine the sequence in which they arose. There was a fateful combination of circumstances in 1857 which did not appear in the past and nor tended to recur in the future. Causes of the revolt Military reasons The replacement of the old Brown Bess musket with the new Enfield rifle was its longer range and greater accuracy. The sepoys had to load the rifle after biting off a paper on the cartridge. It was alleged that paper was smeared with cow and pig fat. It provoked the religious sentiment of Hindus and Muslims alike. To bring about a united resistance against the British. Enlistment order of 1856 The enlistment order of 1856 made it obligatory on the part of sepoys to go on duty wherever ordered. It led the sepoys to suspect that Britishers intended to force them all to embrace Christianity . On a professional level, an Indian Sepoy was paid 1/3 rd of the salary compared to a European Sepoy. Moreover, there was racial discrimination and they were roughly treated abused and humiliated. 1854 Post Office Act In 1854 Post Office Act was passed which withdrew the free postage privilege of the sepoys The majority of the recruits in the British Army were from Awadh, Bengal, and NWFP. Many of them belonged to high caste Brahmin Rajput, Pathan families who did not like to be treated on par with low caste recruits. Initially, soldiers were paid Bhatta (allowance). When they were posted far away from Home. But by 1850 it was also withdrawn. Economic Cause of Revolt The various land revenue settlements like Permanent, Ryotwari, and Mahalwari introduced by the British meant a loss of land for many landholders and heavy taxation for Cultivators. The land revenue assessmen t under all the systems was heavy and oppressive. Even in the case of crop failure relief was not given to the peasants. Many of these peasants were caught in a vicious cycle of debt, moreover at some places land became a commodity to be sold and purchased in the Market. Destruction of indigenous industry and Handicrafts The company traders enjoyed various privileges such as duty-free trade which made their goods comparatively cheaper as compared to the Indian produce. Though the Indian Goods can still compete with the British good they will charge heavy duties when they entered European markets. Confiscation of rent-free estates In the 1850s the government set up a tribunal to inquire into the title deeds of rent-free estates. In between 1852 to 1857 near about 21000 cases were brought before the Inam commission which pronounced confiscation of all rent-free estates . Those who were highly disaffected with this, included Maulvis, Ulemas, Priestly class, etc, who later actively participated in the 1857 revolt.
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भू -तुल्यकालिक व सूर्य तुल्यकालिक कक्षा में अंतर स्पष्ट करते हुए इन कक्षाओं के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Clarify the difference between geo-synchronous and sun synchronous orbit and discuss the applications of these orbits. (150-200 words / 10 Marks)
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एप्रोच - अंतरिक्ष में कक्षाओं(Orbit) का एक संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, भू -तुल्यकालिक व सूर्य तुल्यकालिक कक्षा में अंतर स्पष्ट कीजिए| अंतिम भाग में, इन कक्षाओं के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए| उत्तर - कक्षा किसी खगोलीय पिंड(जैसे - ग्रह, चंद्रमा आदि) अथवा मानवनिर्मित अंतरिक्ष यान व उपग्रह का काल्पनिक पथ होता है, जिसके माध्यम से अन्य खगोलीय पिंड का परिक्रमण किया जाता है| पृथ्वी के संदर्भ में अंतरिक्ष यान अथवा उपग्रह के उपयोग के लिए अलग-अलग प्रकार के कक्षाओं का उपयोग किया जाता है जैसे - कक्षा के आकार के आधार पर ---> दीर्घ वृताकार कक्षा(Elliptical Orbit) - इसमें पृथ्वी से दूरी एकसमान नहीं यानि दूरी में लगातार परिवर्तन; पृथ्वी से दूर(Apogee) - धीमी गति; पृथ्वी से नजदीक(Perigee) - तेज गति वृताकार/गोलकार कक्षा(Circular Orbit) - उपग्रह का पृथ्वी से दूरी एकसमान दूरी के आधार पर कक्षाएं ---> निम्न पृथ्वी कक्षा(LEO) - 100-2000 किमी मध्य पृथ्वी कक्षा(MEO) - 2000 किमी से लेकर 35784 किमी तक उच्च पृथ्वी कक्षा(HEO) - 36000 किमी से अधिक उपग्रह के पृथ्वी के परिक्रमण के आधार पर ---> भू-तुल्यकालिक कक्षा(Geo Synchronous Orbit) सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun Synchronous Orbit) भू-तुल्यकालिक कक्षा(Geo Synchronous Orbit) - ऐसी कक्षा जिसमें उपग्रह पृथ्वी का चक्कर पृथ्वी के घूर्णन के आधार पर करता है अर्थात उपग्रह का इस कक्षा में परिक्रमण पृथ्वी के घूर्णन के आधार पर होता है| यह विषुवतीय कक्षा/भूमध्यरेखीय समतल कक्षा होता है| दीर्घ वृत्ताकार कक्षा उपग्रह की परिक्रमण गति पृथ्वी के घूर्णन गति के समान नहीं होती है| सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun Synchronous Orbit) - इसमें उपग्रह पृथ्वी का चक्कर उत्तर से दक्षिण दिशा में पृथ्वी के सूर्य के परिक्रमण के आधार पर करता है अर्थात उपग्रह का इस कक्षा में परिक्रमण पृथ्वी के सूर्य के परिक्रमण के आधार पर होता है| यह ध्रुवीय समतल कक्षा होता है| यह वृत्ताकार कक्षा होती है| उपग्रह के ध्रुवीय कक्षा का समतल प्रतिदिन 0.8 डिग्री का घूर्णन होता है| भू-तुल्यकालिक कक्षा(Geo Synchronous Orbit) के अनुप्रयोग - नौवहन क्षेत्र में दूरसंचार के क्षेत्र में - दूरसंचार के लिए उपग्रह को हर समय "देखने" की आवश्यकता होती है और इसलिए इसे पृथ्वी की सतह के सापेक्ष समान स्थिति में स्थिर रहना चाहिए| इस कारण दूरसंचार हेतु उपग्रहों को भू-तुल्यकालिक कक्षा में रखा जाता है| पृथ्वी से, भू-तुल्यकालिक कक्षा में एक उपग्रह भूमध्य रेखा पर एक स्थान पर मंडराता प्रतीत होता है जिससे यह जमीन पर से दूरसंचार में बेहतर सिग्नल में मदद करता है| यह आकाश में सिर्फ एक बिंदु पर स्थिर प्रतीत होकर उपग्रह से उस क्षेत्र की जानकारी प्राप्त कर सकता है| नासा अंतरिक्ष यान, जैसे स्पेस शटल और हबल स्पेस टेलीस्कोप, और पृथ्वी पर नियंत्रण केंद्रों के बीच संचार और डेटा को आगे और पीछे भेजने के लिए भू-तुल्यकालिक कक्षा उपग्रहों का भी उपयोग करता है| भू-स्थिर कक्षा (Geo-Stationary Orbit) भी एक प्रकार का भू-तुल्यकालिक कक्षा है| (कक्षा की दूरी - 35,784 किमी.) एक स्थिर उपग्रह सुदूर संवेदन के लिए यह लाभ प्रदान करता है कि वह हमेशा पृथ्वी को एक ही एंगल से देखता है, जिसका अर्थ है कि वह एक ही छवि को संक्षिप्त अंतराल पर रिकॉर्ड कर सकता है| मौसम की स्थिति के अवलोकन के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी है| वैश्विक दृश्य प्रदान करने के लिए दुनिया भर में भूस्थैतिक कक्षा में समान रूप से वितरित कई मौसम उपग्रह हैं। सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun Synchronous Orbit) के अनुप्रयोग - पृथ्वी के अवलोकन में(दूरसंवेदी/रिमोट-सेंसिंग) - सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा को ज्यादातर पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के लिए चुना जाता है, जिनकी ऊंचाई आमतौर पर पृथ्वी की सतह पर 600 और 1000 किमी के बीच होती है| एक सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा में स्थित उपग्रह इमेजिंग, टोही उपग्रह और मौसम उपग्रहों के लिए उपयोगी है, क्योंकि हर बार जब उपग्रह ओवरहेड होता है, तो उसके नीचे के ग्रह पर सतह रोशनी कोण लगभग समान होगा जिससे बेहतर इमेजिंग सुनिश्चित हो सकेगा| किसी स्थान पर लगातार इमेजिंग उन उपग्रहों के लिए एक उपयोगी विशेषता है जो दृश्य या अवरक्त तरंगदैर्ध्य में पृथ्वी की सतह की छवि बनाते हैं, जैसे कि मौसम और जासूसी उपग्रह और अन्य रिमोट-सेंसिंग उपग्रहों के लिए, जैसे कि समुद्र और वायुमंडलीय रिमोट-सेंसिंग उपकरणों को ले जाने वाले जिन्हें सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है| इस प्रकार इन कक्षाओं के अलग-अलग अनुप्रयोगों को देखते हुए उसके अनुसार संबंधित कक्षा में उससे संबंधित उपयोग को रखना संभव हो पाता है|
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##Question:भू -तुल्यकालिक व सूर्य तुल्यकालिक कक्षा में अंतर स्पष्ट करते हुए इन कक्षाओं के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Clarify the difference between geo-synchronous and sun synchronous orbit and discuss the applications of these orbits. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:एप्रोच - अंतरिक्ष में कक्षाओं(Orbit) का एक संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, भू -तुल्यकालिक व सूर्य तुल्यकालिक कक्षा में अंतर स्पष्ट कीजिए| अंतिम भाग में, इन कक्षाओं के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए| उत्तर - कक्षा किसी खगोलीय पिंड(जैसे - ग्रह, चंद्रमा आदि) अथवा मानवनिर्मित अंतरिक्ष यान व उपग्रह का काल्पनिक पथ होता है, जिसके माध्यम से अन्य खगोलीय पिंड का परिक्रमण किया जाता है| पृथ्वी के संदर्भ में अंतरिक्ष यान अथवा उपग्रह के उपयोग के लिए अलग-अलग प्रकार के कक्षाओं का उपयोग किया जाता है जैसे - कक्षा के आकार के आधार पर ---> दीर्घ वृताकार कक्षा(Elliptical Orbit) - इसमें पृथ्वी से दूरी एकसमान नहीं यानि दूरी में लगातार परिवर्तन; पृथ्वी से दूर(Apogee) - धीमी गति; पृथ्वी से नजदीक(Perigee) - तेज गति वृताकार/गोलकार कक्षा(Circular Orbit) - उपग्रह का पृथ्वी से दूरी एकसमान दूरी के आधार पर कक्षाएं ---> निम्न पृथ्वी कक्षा(LEO) - 100-2000 किमी मध्य पृथ्वी कक्षा(MEO) - 2000 किमी से लेकर 35784 किमी तक उच्च पृथ्वी कक्षा(HEO) - 36000 किमी से अधिक उपग्रह के पृथ्वी के परिक्रमण के आधार पर ---> भू-तुल्यकालिक कक्षा(Geo Synchronous Orbit) सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun Synchronous Orbit) भू-तुल्यकालिक कक्षा(Geo Synchronous Orbit) - ऐसी कक्षा जिसमें उपग्रह पृथ्वी का चक्कर पृथ्वी के घूर्णन के आधार पर करता है अर्थात उपग्रह का इस कक्षा में परिक्रमण पृथ्वी के घूर्णन के आधार पर होता है| यह विषुवतीय कक्षा/भूमध्यरेखीय समतल कक्षा होता है| दीर्घ वृत्ताकार कक्षा उपग्रह की परिक्रमण गति पृथ्वी के घूर्णन गति के समान नहीं होती है| सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun Synchronous Orbit) - इसमें उपग्रह पृथ्वी का चक्कर उत्तर से दक्षिण दिशा में पृथ्वी के सूर्य के परिक्रमण के आधार पर करता है अर्थात उपग्रह का इस कक्षा में परिक्रमण पृथ्वी के सूर्य के परिक्रमण के आधार पर होता है| यह ध्रुवीय समतल कक्षा होता है| यह वृत्ताकार कक्षा होती है| उपग्रह के ध्रुवीय कक्षा का समतल प्रतिदिन 0.8 डिग्री का घूर्णन होता है| भू-तुल्यकालिक कक्षा(Geo Synchronous Orbit) के अनुप्रयोग - नौवहन क्षेत्र में दूरसंचार के क्षेत्र में - दूरसंचार के लिए उपग्रह को हर समय "देखने" की आवश्यकता होती है और इसलिए इसे पृथ्वी की सतह के सापेक्ष समान स्थिति में स्थिर रहना चाहिए| इस कारण दूरसंचार हेतु उपग्रहों को भू-तुल्यकालिक कक्षा में रखा जाता है| पृथ्वी से, भू-तुल्यकालिक कक्षा में एक उपग्रह भूमध्य रेखा पर एक स्थान पर मंडराता प्रतीत होता है जिससे यह जमीन पर से दूरसंचार में बेहतर सिग्नल में मदद करता है| यह आकाश में सिर्फ एक बिंदु पर स्थिर प्रतीत होकर उपग्रह से उस क्षेत्र की जानकारी प्राप्त कर सकता है| नासा अंतरिक्ष यान, जैसे स्पेस शटल और हबल स्पेस टेलीस्कोप, और पृथ्वी पर नियंत्रण केंद्रों के बीच संचार और डेटा को आगे और पीछे भेजने के लिए भू-तुल्यकालिक कक्षा उपग्रहों का भी उपयोग करता है| भू-स्थिर कक्षा (Geo-Stationary Orbit) भी एक प्रकार का भू-तुल्यकालिक कक्षा है| (कक्षा की दूरी - 35,784 किमी.) एक स्थिर उपग्रह सुदूर संवेदन के लिए यह लाभ प्रदान करता है कि वह हमेशा पृथ्वी को एक ही एंगल से देखता है, जिसका अर्थ है कि वह एक ही छवि को संक्षिप्त अंतराल पर रिकॉर्ड कर सकता है| मौसम की स्थिति के अवलोकन के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी है| वैश्विक दृश्य प्रदान करने के लिए दुनिया भर में भूस्थैतिक कक्षा में समान रूप से वितरित कई मौसम उपग्रह हैं। सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun Synchronous Orbit) के अनुप्रयोग - पृथ्वी के अवलोकन में(दूरसंवेदी/रिमोट-सेंसिंग) - सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा को ज्यादातर पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के लिए चुना जाता है, जिनकी ऊंचाई आमतौर पर पृथ्वी की सतह पर 600 और 1000 किमी के बीच होती है| एक सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा में स्थित उपग्रह इमेजिंग, टोही उपग्रह और मौसम उपग्रहों के लिए उपयोगी है, क्योंकि हर बार जब उपग्रह ओवरहेड होता है, तो उसके नीचे के ग्रह पर सतह रोशनी कोण लगभग समान होगा जिससे बेहतर इमेजिंग सुनिश्चित हो सकेगा| किसी स्थान पर लगातार इमेजिंग उन उपग्रहों के लिए एक उपयोगी विशेषता है जो दृश्य या अवरक्त तरंगदैर्ध्य में पृथ्वी की सतह की छवि बनाते हैं, जैसे कि मौसम और जासूसी उपग्रह और अन्य रिमोट-सेंसिंग उपग्रहों के लिए, जैसे कि समुद्र और वायुमंडलीय रिमोट-सेंसिंग उपकरणों को ले जाने वाले जिन्हें सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है| इस प्रकार इन कक्षाओं के अलग-अलग अनुप्रयोगों को देखते हुए उसके अनुसार संबंधित कक्षा में उससे संबंधित उपयोग को रखना संभव हो पाता है|
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Discuss the concept of air mass and explain its role in macro-climatic changes. [150 Words, 10 Marks]
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Brief Approach: Discuss the concept of Air mass Explain the role of Airmass in macro-climatic changes Answer: An air mass is a large volume of air in the atmosphere that is mostly uniform in temperature and moisture. Air masses can extend thousands of kilometres across the surface of the Earth and can reach from ground level to the stratosphere—16 kilometres (10 miles) into the atmosphere. Air masses form over large surfaces with uniform temperatures and humidity, called source regions. Low wind speeds let air remain stationary long enough to take on the features of the source region, such as heat or cold. Meteorologists identify air masses according to their place of origin. There are four categories of air masses: arctic, tropical, polar and equatorial. Arctic air masses form in the Arctic region and are very cold. Tropical air masses form in low-latitude areas and are moderately warm. Polar air masses take shape in high-latitude regions and are cold. Equatorial air masses develop near the Equator and are warm. Role of Airmass in Macro Climate Changes The properties of an air mass which influence the accompanying weather arevertical distribution temperature(indicating its stability and coldness or warmness) and themoisture content. The air masses carry atmospheric moisture from oceans to continents and causeprecipitationover landmasses. They transportlatent heat,thus removing the latitudinal heat balance. Most of the migratory atmospheric disturbances such as temperate cyclones and storms originate at thecontact zonebetween different air masses and the weather associated with these disturbances is determined by characteristics of the air masses involved.
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##Question:Discuss the concept of air mass and explain its role in macro-climatic changes. [150 Words, 10 Marks]##Answer:Brief Approach: Discuss the concept of Air mass Explain the role of Airmass in macro-climatic changes Answer: An air mass is a large volume of air in the atmosphere that is mostly uniform in temperature and moisture. Air masses can extend thousands of kilometres across the surface of the Earth and can reach from ground level to the stratosphere—16 kilometres (10 miles) into the atmosphere. Air masses form over large surfaces with uniform temperatures and humidity, called source regions. Low wind speeds let air remain stationary long enough to take on the features of the source region, such as heat or cold. Meteorologists identify air masses according to their place of origin. There are four categories of air masses: arctic, tropical, polar and equatorial. Arctic air masses form in the Arctic region and are very cold. Tropical air masses form in low-latitude areas and are moderately warm. Polar air masses take shape in high-latitude regions and are cold. Equatorial air masses develop near the Equator and are warm. Role of Airmass in Macro Climate Changes The properties of an air mass which influence the accompanying weather arevertical distribution temperature(indicating its stability and coldness or warmness) and themoisture content. The air masses carry atmospheric moisture from oceans to continents and causeprecipitationover landmasses. They transportlatent heat,thus removing the latitudinal heat balance. Most of the migratory atmospheric disturbances such as temperate cyclones and storms originate at thecontact zonebetween different air masses and the weather associated with these disturbances is determined by characteristics of the air masses involved.
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अस्पृश्यता की अवधारणा से आप क्या समझते है? अस्पृश्यता पर गांधी और अम्बेडकर के विचारों को प्रस्तुत कीजिये। (150-200 words, 10 अंक) What do you understand by the concept of untouchability? Present the views of Gandhi and Ambedkar on untouchability. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में अस्पृश्यता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में गांधी के विचारों को प्रस्तुत कीजिये 3- दूसरे भाग में अम्बेडकर के विचारों को प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में अस्पृश्यता के शमन के सन्दर्भ में दोनों के दृष्टिकोण को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| अस्पृश्यता का तात्पर्य समाज के वंचित समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव से है| इसकी स्वीकृति धार्मिक सन्दर्भों में दिखाई पड़ती है| 20वीं सदी में ब्रिटिश शासन द्वारा हो रहे प्रयासों जिसके अंतर्गत जाति-व्यवस्था क्रमबद्ध तरीके से विघटित हो रही थी के दो मुख्य घटक- समता आधारित राजनैतिक सोच तथा योग्यता आधारित श्रम विभाजन थें| श्रीनिवास के अनुसार पश्चिमीकरण एवं आधुनिकीकरण के मिले जुले परिणाम ने 20 वीं सदी के प्रारम्भ में अस्पृश्यता के बहाने जाति व्यवस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह उठाये गए| यही कारण है कि इस कालखंड में जाति की प्रासंगिकता पर ही प्रश्न खड़े हुए तथा अस्पृश्यता के माध्यम से जाति के संदर्भ में गांधी एवं अम्बेडकर के निम्नलिखित 2 दृष्टिकोण दिखाई पड़ते हैं अस्पृश्यता : गांधी एवं अम्बेडकर के मत गांधी का मत गांधी के मतानुसार यह अस्पृश्यता वस्तुतः धर्म में फैले भ्रष्टाचार का दुष्परिणाम है| गांधी जी ने वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत किये गए श्रम विभाजन का समर्थन किया| गांधी के अनुसार, श्रम विभाजन स्वयं ने गलत नहीं होता परन्तु उस आधार पर उत्पन्न श्रेणीबद्धता ऐसी कुरीतियों को जन्म देती है जिसके शमन हेतु लोगों को सार्वजनिक जीवन में ऐसी कुरीतियों का त्याग करना चाहिए एवं सहभोज जैसे माध्यमों द्वारा इस कुरीति को अति शीघ्र समाप्त किया जाना चाहिये गांधी जी का यह मानना था कि स्वच्छता दैवीय कार्य है जो इश्वर के अति प्रिय है उन्हें इसकी जिम्मेदारी दी गयी है| गांधी जी ने अस्पृश्यों को हरिजन शब्द की संज्ञा दी तथा लोगों से यह निवेदन किया कि वे स्वैच्छिक रूप से अस्पृश्यता का त्याग करें| इसी संदर्भ में हरिजन नामक पत्रिका भी प्रारम्भ की गयी| अम्बेडकर का मत अम्बेडकर का मानना था कि यह अस्पृश्य वस्तुतः समाज में हो रहे लगातार भेदभाव का दुष्परिणाम हैं| इसमें एक अति वंचित समूह जो समाज में निम्न समझे जा रहे कार्यों में संलग्न हैं इनका उत्थान तभी संभव है जब इन्हें भी राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान की जाए| अम्बेडकर अपनी पुस्तक एनहीलियेशन ऑफ़ कास्ट में यह तर्क प्रस्तुत किया था कि राजनीतिक सशक्तिकरण के द्वारा आर्थिक सामाजिक प्रगति, जाति आधारित भेदभाव को आप्रसंगिक बना देगी जो जाति के शमन में सहयोगी होगा| इस सन्दर्भ में उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अलग इलेक्टोरेट की मांग की पृथक एलेक्टोरेट का गांधी जी द्वारा विरोध किया गया एवं परिणामस्वरुप पूना समझौते (1932) के अंतर्गत दलितों के राजनीतिक सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने के लिए पृथक दलित निर्वाचक मंडल की जगह सुरक्षात्मक आरक्षण प्रणाली लागू की गयी| इस संदर्भ में वर्ष 1934 में एक जाति जनगणना की गयी तथा यह निर्धारित किया गया की वे जातियां जिन्हें सुरक्षात्मक भेदभाव हेतु संदर्भित किया गया उन्हें सूचीबद्ध करते हुए अनुसूचित जाति कहा गया|1934 की इस जाति जनगणना को जाति आधारित सभी सन्दर्भों में एक मुख्य आंकड़ा माना जा रहा है| परन्तु रघुराजन समिति के दिशा निर्देश अनुसार एक सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना वर्ष 2015 में भी की गयी है| वर्तमान में भारत सरकार की विभिन्न कल्याणकारी नीतियों हेतु इसे ही आधार बनाया जा रहा है| स्पष्ट होता है कि यद्यपि गांधी एवं अम्बेडकर दोनों जातिगत कुरीतियों को समाप्त करने के पक्षधर थे परन्तु अम्बेडकर का यह मानन था कि जाति व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को चुनौती दिए बिना जाति को समाप्त नहीं किया जा सकता| अतः जहाँ एक तरफ दलित प्राख्यान के माध्यम से वो दलित सम्मान के नए इतिहास की बात करते थे वहीँ दूसरी तरफ जाति को सम्पूर्ण रूप से शमनित करने की भविष्य की परिकल्पना भी प्रस्तुत करते थे |इससे अलग गांधी का यह मानना था कि श्रम विभाजन में व्यवस्था किसी भी समाज के लिए जरुरी है अतः यह अनिवार्य है कि इसमें व्याप्त कुरीतियों तथा भ्रष्ट सामाजिक सोच को बदला जाए | गांधी वादी दृष्टिकोण में ऐसे कानूनों का होना जैसे अनुच्छेद 17, SC/ST अधिनियम आदि, तथा सामाजिक संवेदीकरण के माध्यम से परिवर्तन विकल्प के तौर पर दिखाई पड़ते हैंवहीँ अम्बेडकरवादी सोच में अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन, सार्वजनिक संदर्भों में जाति के प्रयोग का क्रमबद्ध शमन आदि संभव विकल्प हैं | वर्तमान में भारत सरकार इन दोनों विकल्पों पर एक साथ काम कर रही है
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##Question:अस्पृश्यता की अवधारणा से आप क्या समझते है? अस्पृश्यता पर गांधी और अम्बेडकर के विचारों को प्रस्तुत कीजिये। (150-200 words, 10 अंक) What do you understand by the concept of untouchability? Present the views of Gandhi and Ambedkar on untouchability. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अस्पृश्यता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में गांधी के विचारों को प्रस्तुत कीजिये 3- दूसरे भाग में अम्बेडकर के विचारों को प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में अस्पृश्यता के शमन के सन्दर्भ में दोनों के दृष्टिकोण को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| अस्पृश्यता का तात्पर्य समाज के वंचित समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव से है| इसकी स्वीकृति धार्मिक सन्दर्भों में दिखाई पड़ती है| 20वीं सदी में ब्रिटिश शासन द्वारा हो रहे प्रयासों जिसके अंतर्गत जाति-व्यवस्था क्रमबद्ध तरीके से विघटित हो रही थी के दो मुख्य घटक- समता आधारित राजनैतिक सोच तथा योग्यता आधारित श्रम विभाजन थें| श्रीनिवास के अनुसार पश्चिमीकरण एवं आधुनिकीकरण के मिले जुले परिणाम ने 20 वीं सदी के प्रारम्भ में अस्पृश्यता के बहाने जाति व्यवस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह उठाये गए| यही कारण है कि इस कालखंड में जाति की प्रासंगिकता पर ही प्रश्न खड़े हुए तथा अस्पृश्यता के माध्यम से जाति के संदर्भ में गांधी एवं अम्बेडकर के निम्नलिखित 2 दृष्टिकोण दिखाई पड़ते हैं अस्पृश्यता : गांधी एवं अम्बेडकर के मत गांधी का मत गांधी के मतानुसार यह अस्पृश्यता वस्तुतः धर्म में फैले भ्रष्टाचार का दुष्परिणाम है| गांधी जी ने वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत किये गए श्रम विभाजन का समर्थन किया| गांधी के अनुसार, श्रम विभाजन स्वयं ने गलत नहीं होता परन्तु उस आधार पर उत्पन्न श्रेणीबद्धता ऐसी कुरीतियों को जन्म देती है जिसके शमन हेतु लोगों को सार्वजनिक जीवन में ऐसी कुरीतियों का त्याग करना चाहिए एवं सहभोज जैसे माध्यमों द्वारा इस कुरीति को अति शीघ्र समाप्त किया जाना चाहिये गांधी जी का यह मानना था कि स्वच्छता दैवीय कार्य है जो इश्वर के अति प्रिय है उन्हें इसकी जिम्मेदारी दी गयी है| गांधी जी ने अस्पृश्यों को हरिजन शब्द की संज्ञा दी तथा लोगों से यह निवेदन किया कि वे स्वैच्छिक रूप से अस्पृश्यता का त्याग करें| इसी संदर्भ में हरिजन नामक पत्रिका भी प्रारम्भ की गयी| अम्बेडकर का मत अम्बेडकर का मानना था कि यह अस्पृश्य वस्तुतः समाज में हो रहे लगातार भेदभाव का दुष्परिणाम हैं| इसमें एक अति वंचित समूह जो समाज में निम्न समझे जा रहे कार्यों में संलग्न हैं इनका उत्थान तभी संभव है जब इन्हें भी राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान की जाए| अम्बेडकर अपनी पुस्तक एनहीलियेशन ऑफ़ कास्ट में यह तर्क प्रस्तुत किया था कि राजनीतिक सशक्तिकरण के द्वारा आर्थिक सामाजिक प्रगति, जाति आधारित भेदभाव को आप्रसंगिक बना देगी जो जाति के शमन में सहयोगी होगा| इस सन्दर्भ में उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अलग इलेक्टोरेट की मांग की पृथक एलेक्टोरेट का गांधी जी द्वारा विरोध किया गया एवं परिणामस्वरुप पूना समझौते (1932) के अंतर्गत दलितों के राजनीतिक सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने के लिए पृथक दलित निर्वाचक मंडल की जगह सुरक्षात्मक आरक्षण प्रणाली लागू की गयी| इस संदर्भ में वर्ष 1934 में एक जाति जनगणना की गयी तथा यह निर्धारित किया गया की वे जातियां जिन्हें सुरक्षात्मक भेदभाव हेतु संदर्भित किया गया उन्हें सूचीबद्ध करते हुए अनुसूचित जाति कहा गया|1934 की इस जाति जनगणना को जाति आधारित सभी सन्दर्भों में एक मुख्य आंकड़ा माना जा रहा है| परन्तु रघुराजन समिति के दिशा निर्देश अनुसार एक सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना वर्ष 2015 में भी की गयी है| वर्तमान में भारत सरकार की विभिन्न कल्याणकारी नीतियों हेतु इसे ही आधार बनाया जा रहा है| स्पष्ट होता है कि यद्यपि गांधी एवं अम्बेडकर दोनों जातिगत कुरीतियों को समाप्त करने के पक्षधर थे परन्तु अम्बेडकर का यह मानन था कि जाति व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को चुनौती दिए बिना जाति को समाप्त नहीं किया जा सकता| अतः जहाँ एक तरफ दलित प्राख्यान के माध्यम से वो दलित सम्मान के नए इतिहास की बात करते थे वहीँ दूसरी तरफ जाति को सम्पूर्ण रूप से शमनित करने की भविष्य की परिकल्पना भी प्रस्तुत करते थे |इससे अलग गांधी का यह मानना था कि श्रम विभाजन में व्यवस्था किसी भी समाज के लिए जरुरी है अतः यह अनिवार्य है कि इसमें व्याप्त कुरीतियों तथा भ्रष्ट सामाजिक सोच को बदला जाए | गांधी वादी दृष्टिकोण में ऐसे कानूनों का होना जैसे अनुच्छेद 17, SC/ST अधिनियम आदि, तथा सामाजिक संवेदीकरण के माध्यम से परिवर्तन विकल्प के तौर पर दिखाई पड़ते हैंवहीँ अम्बेडकरवादी सोच में अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन, सार्वजनिक संदर्भों में जाति के प्रयोग का क्रमबद्ध शमन आदि संभव विकल्प हैं | वर्तमान में भारत सरकार इन दोनों विकल्पों पर एक साथ काम कर रही है
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रॉकेट प्रक्षेपण में प्रयोग किए वाले प्रणोदकों की चर्चा कीजिये। साथ ही पीएसएलवी व जीएसएलवी की तुलना कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक ) Discuss the propellants used in rocket launch. Also compare PSLV and GSLV. (150-200 words/10 marks)
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अप्रोच: भूमिका में रॉकेट प्रक्षेपण में प्रणोदक के महत्व कि चर्चा कर सकते हैं। विभिन्न प्रकार के प्रणोदक की चर्चा कीजिए। पीएसएलवी व जीएसएलवी की तुलना कीजिये निष्कर्ष में प्रमोचन यान के महत्व को इंगित कर सकते हैं। उत्तर - रॉकेट का प्रयोग उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के लिए जाता है। रॉकेट को थ्रस्ट प्रदान करने के लिए प्रणोदन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है जिसमें विभिन्न प्रकार के प्रणोदकों का प्रयोग किया जाता है। प्रणोदक - ठोस प्रणोदक HTPB - Hydroxy Tetra poly butadien लाभ- आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। पहले चरण में स्थिरता प्रदान करता है। हानि स्थान अधिक लेता है। वजन अधिक होता है द्रव प्रणोदक - UDMH- unsymmetric di methyl hydrazine लाभ आसानी से दहन होता है। जगह कम लेता है हानि अति ज्वलनशील होता है। विशेष कंटेनर में रखा जाता है। पीएसएलवी व जीएसएलवी की तुलना पीएसएलवी ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान सुदूर संवेदी उपग्रहों के प्रमोचन के लिए 2 टन से 4 टन के उपग्रहों के लिए 1350 किलो के उपग्रह के उपग्रह को भू तुल्य स्थानांतरण कक्षा में स्थापित करने में भी सक्षम यह चार चरण वाला प्रक्षेपण यान। पहला व तीसरा - ठोस ईंधन आधारित द्वितीय व चतुर्थ - द्रव ईंधन आधारित 3 प्रकार - स्टैन्डर्ड, कोर अलोन, एक्स एल जीएसएलवी भू तुल्यकालिक उपग्रह प्रमोचन यान भू -तुल्यकालिक कक्षा में भारी संचार उपग्रहों (2 टन-4 टन ) को प्रक्षेपित करने हेतु उपयोगी। यह तीन चरण का होता है। पहला चरण- ठोस ईंधन आधारित, द्वितीय चरण द्रव ईंधन आधारित होता है। तीसरा चरण क्रायोजनिक ईंधन आधारित होता है। तीन प्रकार - MARK -I (1 टन) , MARK II(2 टन), MARK III(4 टन) उपग्रह प्रणाली देश की संचार व्यवस्था व संसाधनों की खोज के लिए महत्वपूर्ण है। यह आपदा प्रबंधन में भी उपयोगी होती है। भारत एक विश्वसनीय उपग्रह प्राणली के युक्त है।
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##Question:रॉकेट प्रक्षेपण में प्रयोग किए वाले प्रणोदकों की चर्चा कीजिये। साथ ही पीएसएलवी व जीएसएलवी की तुलना कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक ) Discuss the propellants used in rocket launch. Also compare PSLV and GSLV. (150-200 words/10 marks)##Answer:अप्रोच: भूमिका में रॉकेट प्रक्षेपण में प्रणोदक के महत्व कि चर्चा कर सकते हैं। विभिन्न प्रकार के प्रणोदक की चर्चा कीजिए। पीएसएलवी व जीएसएलवी की तुलना कीजिये निष्कर्ष में प्रमोचन यान के महत्व को इंगित कर सकते हैं। उत्तर - रॉकेट का प्रयोग उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के लिए जाता है। रॉकेट को थ्रस्ट प्रदान करने के लिए प्रणोदन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है जिसमें विभिन्न प्रकार के प्रणोदकों का प्रयोग किया जाता है। प्रणोदक - ठोस प्रणोदक HTPB - Hydroxy Tetra poly butadien लाभ- आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। पहले चरण में स्थिरता प्रदान करता है। हानि स्थान अधिक लेता है। वजन अधिक होता है द्रव प्रणोदक - UDMH- unsymmetric di methyl hydrazine लाभ आसानी से दहन होता है। जगह कम लेता है हानि अति ज्वलनशील होता है। विशेष कंटेनर में रखा जाता है। पीएसएलवी व जीएसएलवी की तुलना पीएसएलवी ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान सुदूर संवेदी उपग्रहों के प्रमोचन के लिए 2 टन से 4 टन के उपग्रहों के लिए 1350 किलो के उपग्रह के उपग्रह को भू तुल्य स्थानांतरण कक्षा में स्थापित करने में भी सक्षम यह चार चरण वाला प्रक्षेपण यान। पहला व तीसरा - ठोस ईंधन आधारित द्वितीय व चतुर्थ - द्रव ईंधन आधारित 3 प्रकार - स्टैन्डर्ड, कोर अलोन, एक्स एल जीएसएलवी भू तुल्यकालिक उपग्रह प्रमोचन यान भू -तुल्यकालिक कक्षा में भारी संचार उपग्रहों (2 टन-4 टन ) को प्रक्षेपित करने हेतु उपयोगी। यह तीन चरण का होता है। पहला चरण- ठोस ईंधन आधारित, द्वितीय चरण द्रव ईंधन आधारित होता है। तीसरा चरण क्रायोजनिक ईंधन आधारित होता है। तीन प्रकार - MARK -I (1 टन) , MARK II(2 टन), MARK III(4 टन) उपग्रह प्रणाली देश की संचार व्यवस्था व संसाधनों की खोज के लिए महत्वपूर्ण है। यह आपदा प्रबंधन में भी उपयोगी होती है। भारत एक विश्वसनीय उपग्रह प्राणली के युक्त है।
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गैर-तरफदारी(Impartiality) एवं भेदभावरहित(Non-Partisanship) व्यवहार सम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है| चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) ImpartialityandNon-Partisanship behavior, together, reflects the value of Neutrality of Public Servants. Discuss (150–200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - लोकसेवकों के संदर्भ में, तटस्थता को संक्षिप्ततः बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, उन मानकों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार पर लोकसेवकों की तटस्थता का आकलन किया जा सकता है| मुख्य भाग में,गैर-तरफदारी(Impartiality) एवं भेदभावरहित(Non-Partisanship) व्यवहार को समझाते हुए यह बताईये कि कैसे ये मूल्यसम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है| एक संतुलित निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - सबके प्रति लोकसेवकों के समान व्यवहार से तटस्थता का आकलन किया जाता है| अतः लोकसेवक का व्यवहार बिना किसी पक्षपात के या पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वस्तुनिष्ठ(Objective) मानकों के आधार पर निर्धारित होनी चाहिए| अतः यह लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा का मूल आयाम भी है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली में तटस्थता को निम्न रूप से दर्शाया गया है -लोकसेवक सत्तारूढ़ दल/सरकार के राजनीतिक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध/वचनबद्ध नहीं होगा| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं- भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अनामिता(Anonymity) के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति, राजनीतिक दलों के प्रति) समान व्यवहार से है| गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवक का तटस्थ होना निम्नाकित सिद्धांतों/मानकोंपर आधारित संसदीय शासन प्रणालीमेंलोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहराजनीति के प्रति तटस्थहो| तटस्थ लोकसेवक के मूल्य का महत्त्वबहुदलीय प्रणाली के विचारधारा पर आधारित; तटस्थ लोकसेवक व्यापक दृष्टिकोण के महत्त्व को दर्शाती है जोकिसामान्यज्ञप्रशासकों की भूमिका पर बलदेती है| तटस्थ लोकसेवकयोग्यता आधारित भर्ती एवंपदोन्नतिके महत्त्वको दर्शाती है| लोकसेवक की तटस्थता एक मनोवैज्ञानिक अवधारणाहोने के कारणमात्रात्मक तरीके से इसका आकलन/मापन किया जाना संभव नहीं है अर्थात तटस्थता एकगुणवत अवधारणा है| अतः, लोकसेवक की तटस्थता को स्थापित करने हेतु नैतिक मूल्यों को विकसित करने पर बल दिया जाना आवश्यक है| गैर-तरफदारी(Impartiality) एवं भेदभावरहित(Non-Partisanship) व्यवहार तथा तटस्थता भेदभावरहित का आशय सबके प्रति लोकसेवकों के समान व्यवहारसे है| साथ ही, समान व्यवहार को सार्थक बनाने हेतु परिस्थितियों की समानता का होना भी आवश्यक है| लोकसेवक का व्यवहार बिना किसी पक्षपात के याबिना पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वस्तुनिष्ठ(Objective) मानकों के आधारपर निर्धारित होना चाहिए| भेदभावरहित परिक्षण दो स्तरों पर किया जाता है - जनता के स्तर पर तथा राजनीतिक दलों के स्तर पर; जनता के प्रतिलोकसेवकों के व्यवहार में समानता का होना समान परिस्थितियों के महत्व परआधारित; परिस्थितियों में अंतर होने पर व्यवहार में भी अंतर का होना आवश्यक ताकि अंततः सबके प्रति समान व्यवहार को सुनिश्चित किया जा सके| गैर-तरफदारी(Impartiality) सकारात्मक भेदभाव के महत्त्व को स्वीकार करती है| सरकार के द्वारा किए जाने वालेसकारात्मक भेदभाव को विधिक एवं नैतिक दोनों प्रकारों से उचित माना जा सकता है| गैर-तरफदारी(Impartiality)- लोकसेवकों केराजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध राजनीति के प्रति लोकसेवकों के गैर-तरफदारी मूल्य का विकास करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए; लोकसेवक को राजनीतिक दलों के प्रति गैर-तरफदारी को बना कर रखा जाना चाहिए ताकि लोकसेवक द्वारा आचरण संहिता के अनुरूप प्रत्येक सतारूढ़ राजनीतिक दल को अपने अधिकतम क्षमता के अनुसार/न्यायपूर्णसेवाएँ प्रदान करना संभव हो| लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक स्तर पर भी भेदभावरहित व्यवस्था को बनाए रखा जाना आवश्यक है| किसी भी सतारूढ़ पार्टी के प्रति लोकसेवकों की प्रतिबद्धता उस दल के राजनीतिक विचारधारा के प्रति नहीं होना चाहिए| लोकसेवक का यह दायित्व होना चाहिए कि मंत्रियों के विश्वास को प्राप्तकरेएवं उसी प्रकार का विश्वास/संबंध आगामी मंत्रियों के साथ भी सुनिश्चित करे| अतः, राजनीतिक भेदभावरहित एवं गैर-तरफदारी के मूल्य द्वारा सम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य कोदर्शाया जा सकता है| दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना चाहिए जबकि नीति राजनीति/विकासीय अनिवार्यताओं के प्रति लोकसेवक कोवचनबद्ध होना चाहिए| समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों के राजनीतिकरण की मात्रा बढ़ती जा रही है जोकि लोकसेवकों के तटस्थता के महत्त्व को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है|
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##Question:गैर-तरफदारी(Impartiality) एवं भेदभावरहित(Non-Partisanship) व्यवहार सम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है| चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) ImpartialityandNon-Partisanship behavior, together, reflects the value of Neutrality of Public Servants. Discuss (150–200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - लोकसेवकों के संदर्भ में, तटस्थता को संक्षिप्ततः बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, उन मानकों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार पर लोकसेवकों की तटस्थता का आकलन किया जा सकता है| मुख्य भाग में,गैर-तरफदारी(Impartiality) एवं भेदभावरहित(Non-Partisanship) व्यवहार को समझाते हुए यह बताईये कि कैसे ये मूल्यसम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है| एक संतुलित निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - सबके प्रति लोकसेवकों के समान व्यवहार से तटस्थता का आकलन किया जाता है| अतः लोकसेवक का व्यवहार बिना किसी पक्षपात के या पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वस्तुनिष्ठ(Objective) मानकों के आधार पर निर्धारित होनी चाहिए| अतः यह लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा का मूल आयाम भी है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली में तटस्थता को निम्न रूप से दर्शाया गया है -लोकसेवक सत्तारूढ़ दल/सरकार के राजनीतिक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध/वचनबद्ध नहीं होगा| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं- भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अनामिता(Anonymity) के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति, राजनीतिक दलों के प्रति) समान व्यवहार से है| गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवक का तटस्थ होना निम्नाकित सिद्धांतों/मानकोंपर आधारित संसदीय शासन प्रणालीमेंलोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहराजनीति के प्रति तटस्थहो| तटस्थ लोकसेवक के मूल्य का महत्त्वबहुदलीय प्रणाली के विचारधारा पर आधारित; तटस्थ लोकसेवक व्यापक दृष्टिकोण के महत्त्व को दर्शाती है जोकिसामान्यज्ञप्रशासकों की भूमिका पर बलदेती है| तटस्थ लोकसेवकयोग्यता आधारित भर्ती एवंपदोन्नतिके महत्त्वको दर्शाती है| लोकसेवक की तटस्थता एक मनोवैज्ञानिक अवधारणाहोने के कारणमात्रात्मक तरीके से इसका आकलन/मापन किया जाना संभव नहीं है अर्थात तटस्थता एकगुणवत अवधारणा है| अतः, लोकसेवक की तटस्थता को स्थापित करने हेतु नैतिक मूल्यों को विकसित करने पर बल दिया जाना आवश्यक है| गैर-तरफदारी(Impartiality) एवं भेदभावरहित(Non-Partisanship) व्यवहार तथा तटस्थता भेदभावरहित का आशय सबके प्रति लोकसेवकों के समान व्यवहारसे है| साथ ही, समान व्यवहार को सार्थक बनाने हेतु परिस्थितियों की समानता का होना भी आवश्यक है| लोकसेवक का व्यवहार बिना किसी पक्षपात के याबिना पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वस्तुनिष्ठ(Objective) मानकों के आधारपर निर्धारित होना चाहिए| भेदभावरहित परिक्षण दो स्तरों पर किया जाता है - जनता के स्तर पर तथा राजनीतिक दलों के स्तर पर; जनता के प्रतिलोकसेवकों के व्यवहार में समानता का होना समान परिस्थितियों के महत्व परआधारित; परिस्थितियों में अंतर होने पर व्यवहार में भी अंतर का होना आवश्यक ताकि अंततः सबके प्रति समान व्यवहार को सुनिश्चित किया जा सके| गैर-तरफदारी(Impartiality) सकारात्मक भेदभाव के महत्त्व को स्वीकार करती है| सरकार के द्वारा किए जाने वालेसकारात्मक भेदभाव को विधिक एवं नैतिक दोनों प्रकारों से उचित माना जा सकता है| गैर-तरफदारी(Impartiality)- लोकसेवकों केराजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध राजनीति के प्रति लोकसेवकों के गैर-तरफदारी मूल्य का विकास करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए; लोकसेवक को राजनीतिक दलों के प्रति गैर-तरफदारी को बना कर रखा जाना चाहिए ताकि लोकसेवक द्वारा आचरण संहिता के अनुरूप प्रत्येक सतारूढ़ राजनीतिक दल को अपने अधिकतम क्षमता के अनुसार/न्यायपूर्णसेवाएँ प्रदान करना संभव हो| लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक स्तर पर भी भेदभावरहित व्यवस्था को बनाए रखा जाना आवश्यक है| किसी भी सतारूढ़ पार्टी के प्रति लोकसेवकों की प्रतिबद्धता उस दल के राजनीतिक विचारधारा के प्रति नहीं होना चाहिए| लोकसेवक का यह दायित्व होना चाहिए कि मंत्रियों के विश्वास को प्राप्तकरेएवं उसी प्रकार का विश्वास/संबंध आगामी मंत्रियों के साथ भी सुनिश्चित करे| अतः, राजनीतिक भेदभावरहित एवं गैर-तरफदारी के मूल्य द्वारा सम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य कोदर्शाया जा सकता है| दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना चाहिए जबकि नीति राजनीति/विकासीय अनिवार्यताओं के प्रति लोकसेवक कोवचनबद्ध होना चाहिए| समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों के राजनीतिकरण की मात्रा बढ़ती जा रही है जोकि लोकसेवकों के तटस्थता के महत्त्व को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है|
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इसरो की उपलब्धियों पर चर्चा कीजिए। भारत द्वारा अंतरिक्ष बाजार में साझेदारी बढ़ाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं? (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Discuss the achievements of ISRO. What efforts are being made by India to increase participation in the space market? (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण: इसरो का संक्षिप्त परिचय देकर उत्तर की शुरुआत कीजिए। इसरो की उपलब्धियों को बिन्दुवार लिखिए। भारत द्वारा अंतरिक्ष बाजार में साझेदारी बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों को बताइए। अंत में, कुछ सुझाव देकर उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर: वर्ष 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) की स्थापना हुई। यह भारत सरकार की अंतरिक्ष एजेंसी है और इसका मुख्यालय बंगलुरू में है। इसे अंतरिक्ष अनुसंधान के लिये देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके करीबी सहयोगी और वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के प्रयासों से स्थापित किया गया। इसे भारत सरकार के ‘स्पेस डिपार्टमेंट’ द्वारा प्रबंधित किया जाता है, जो सीधे भारत के प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। इसरो अपने विभिन्न केंद्रों के देशव्यापी नेटवर्क के माध्यम से संचालित होता है। इसरो की उपलब्धियों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं:- स्थापना के पश्चात् भारत के लिये इसरो ने कई कार्यक्रमों एवं अनुसंधानों को सफल बनाया है। इसने भारत को विश्व के समक्ष सॉफ्ट पॉवर के रूप में स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश में दूरसंचार, प्रसारण और ब्रॉडबैंड अवसंरचना के क्षेत्र में विकास के लिये इसरो ने उपग्रह संचार के माध्यम से कार्यक्रमों को चलाया। इसमें प्रमुख भूमिका INSAT और GSAT उपग्रहों की रही। वर्तमान में भारत संचार सेवाओं के लिये 200 से अधिक ट्रांसपोंडरों (Transponders) का उपयोग हो रहा है। इन उपग्रहों के माध्यम से भारत में दूरसंचार, टेलीमेडिसिन, टेलीविज़न, ब्रॉडबैंड, रेडियो, आपदा प्रबंधन, खोज और बचाव अभियान जैसी सेवाएँ प्रदान कर पाना संभव हुआ है। भारत में इसरो की दूसरी महत्त्वपूर्ण भूमिका भू-पर्यवेक्षण (Earth Observation) के क्षेत्र में रही है। भारत में मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, संसाधनों की मैपिंग करना तथा भू-पर्यवेक्षण के माध्यम से नियोजन करना आदि के लिये भू-पर्यवेक्षण तकनीक की आवश्यकता होती है। मौसम की सटीक जानकारी के द्वारा कृषि और जल प्रबंधन तथा आपदा के समय वक्त रहते बचाव कार्य इसी तकनीक के द्वारा संभव हो सका। भारत में वन सर्वेक्षण रिपोर्ट भी इसी तकनीक द्वारा तैयार होती है। तीसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र उपग्रह आधारित नौवहन (Navigation) है। नौवहन तकनीक का उपयोग भारत में वायु सेवाओं को मज़बूत बनाने तथा इसकी गुणवत्ता को सुधारने के लिये होता है। भारत ने गगन (GPS-aided GEO augmented-GAGAN) कार्यक्रम की शुरुआत की है। भारत ने स्वयं की नौवहन प्रणाली स्थापित करें की ओर कदम बढ़ाते हुए IRNSS (Indian Regional Navigation Satellite System) लॉन्च किया है जो 7 उपग्रहों पर आधारित है। भारत ने वर्ष 2016 में IRNSS के नाम में परिवर्तन करके इसे नाविक (Navigation with Indian Constellation-NAVIC) कर दिया है। भारत द्वारा अंतरिक्ष बाजार में साझेदारी बढ़ाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए जा रहे हैं:- मौज़ूदा समय में विश्व की कई कंपनियाँ अंतरिक्ष की वाणिज्यिक दौड़ में शामिल हुई हैं। वर्तमान में वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग का आकार 350 बिलियन डॉलर है। इसके वर्ष 2025 तक बढ़कर 550 बिलियन डॉलर होने की संभावना है। भारत ने इसके लिए Antrix निगम लिमिटेड की स्थापना की है। भारत ने अंतरिक्ष बाजार में इसरो की भारत की भागीदारी बढ़ाने के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड की स्थापना की है। भारत द्वारा आंतरिक बाजार में डीटीएच सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए कम दरों पर स्पेक्ट्रम को उपलब्ध कराया है। वर्ष 2030 तक भारत द्वारा अंतरिक्ष में अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किया जायेगा। यह परियोजनाएँ भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के आर्थिक उपयोग की संभावनाओं में वृद्धि करेंगी। इसरो के प्रयासों से प्रमोचनों के बढ़ने से उद्योगों को अंतरिक्ष कार्यक्रमों में बड़े पैमाने पर भाग लेने के लिए बढ़िया अवसर प्रदान किया गया है। अब तक, उद्योगों की भागीदारी हार्डवेयर, घटकों या छोटे प्रणालियों तक ही सीमित थी और अब ये पूरी तरह से एकीकृत और परीक्षण प्रणाली जैसे कि नियंत्रण एक्ट्यूएशन प्रणाली, द्रव इंजन और चरण, ठोस मोटर्स आदि में भी कर रहे हैं। आज, इसरो की मदद से इन उद्योगों को नए छोटे उपग्रह लांचर और छोटे उपग्रह प्रदान करने की योजना बना रहा है। इससे उद्योगों को अंतरिक्ष को भविष्य के कारोबारी क्षेत्र में देखने में मदद मिलेगी और भविष्य में बाजार को कैप्चर करने के लिए वहां निवेश करने पर विचार कर रहा है। लेकिन,भारत में अंतरिक्ष के लिये निजी क्षेत्र की भूमिका को सीमित रखा गया है। सिर्फ कम महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिये ही निजी क्षेत्र की सेवाएँ ली जाती रहीं हैं। उपकरणों को बनाना और जोड़ना तथा परीक्षण ( Assembly, Integration and Testing-AIT) जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य अभी भी इसरो ही करता है। अब समय आ गया है जब अंतरिक्ष के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को स्थान देकर इस क्षेत्र की संभावनाओं में वृद्धि की जा सकती है।
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##Question:इसरो की उपलब्धियों पर चर्चा कीजिए। भारत द्वारा अंतरिक्ष बाजार में साझेदारी बढ़ाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं? (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Discuss the achievements of ISRO. What efforts are being made by India to increase participation in the space market? (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: इसरो का संक्षिप्त परिचय देकर उत्तर की शुरुआत कीजिए। इसरो की उपलब्धियों को बिन्दुवार लिखिए। भारत द्वारा अंतरिक्ष बाजार में साझेदारी बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों को बताइए। अंत में, कुछ सुझाव देकर उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर: वर्ष 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) की स्थापना हुई। यह भारत सरकार की अंतरिक्ष एजेंसी है और इसका मुख्यालय बंगलुरू में है। इसे अंतरिक्ष अनुसंधान के लिये देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके करीबी सहयोगी और वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के प्रयासों से स्थापित किया गया। इसे भारत सरकार के ‘स्पेस डिपार्टमेंट’ द्वारा प्रबंधित किया जाता है, जो सीधे भारत के प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। इसरो अपने विभिन्न केंद्रों के देशव्यापी नेटवर्क के माध्यम से संचालित होता है। इसरो की उपलब्धियों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं:- स्थापना के पश्चात् भारत के लिये इसरो ने कई कार्यक्रमों एवं अनुसंधानों को सफल बनाया है। इसने भारत को विश्व के समक्ष सॉफ्ट पॉवर के रूप में स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश में दूरसंचार, प्रसारण और ब्रॉडबैंड अवसंरचना के क्षेत्र में विकास के लिये इसरो ने उपग्रह संचार के माध्यम से कार्यक्रमों को चलाया। इसमें प्रमुख भूमिका INSAT और GSAT उपग्रहों की रही। वर्तमान में भारत संचार सेवाओं के लिये 200 से अधिक ट्रांसपोंडरों (Transponders) का उपयोग हो रहा है। इन उपग्रहों के माध्यम से भारत में दूरसंचार, टेलीमेडिसिन, टेलीविज़न, ब्रॉडबैंड, रेडियो, आपदा प्रबंधन, खोज और बचाव अभियान जैसी सेवाएँ प्रदान कर पाना संभव हुआ है। भारत में इसरो की दूसरी महत्त्वपूर्ण भूमिका भू-पर्यवेक्षण (Earth Observation) के क्षेत्र में रही है। भारत में मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, संसाधनों की मैपिंग करना तथा भू-पर्यवेक्षण के माध्यम से नियोजन करना आदि के लिये भू-पर्यवेक्षण तकनीक की आवश्यकता होती है। मौसम की सटीक जानकारी के द्वारा कृषि और जल प्रबंधन तथा आपदा के समय वक्त रहते बचाव कार्य इसी तकनीक के द्वारा संभव हो सका। भारत में वन सर्वेक्षण रिपोर्ट भी इसी तकनीक द्वारा तैयार होती है। तीसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र उपग्रह आधारित नौवहन (Navigation) है। नौवहन तकनीक का उपयोग भारत में वायु सेवाओं को मज़बूत बनाने तथा इसकी गुणवत्ता को सुधारने के लिये होता है। भारत ने गगन (GPS-aided GEO augmented-GAGAN) कार्यक्रम की शुरुआत की है। भारत ने स्वयं की नौवहन प्रणाली स्थापित करें की ओर कदम बढ़ाते हुए IRNSS (Indian Regional Navigation Satellite System) लॉन्च किया है जो 7 उपग्रहों पर आधारित है। भारत ने वर्ष 2016 में IRNSS के नाम में परिवर्तन करके इसे नाविक (Navigation with Indian Constellation-NAVIC) कर दिया है। भारत द्वारा अंतरिक्ष बाजार में साझेदारी बढ़ाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए जा रहे हैं:- मौज़ूदा समय में विश्व की कई कंपनियाँ अंतरिक्ष की वाणिज्यिक दौड़ में शामिल हुई हैं। वर्तमान में वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग का आकार 350 बिलियन डॉलर है। इसके वर्ष 2025 तक बढ़कर 550 बिलियन डॉलर होने की संभावना है। भारत ने इसके लिए Antrix निगम लिमिटेड की स्थापना की है। भारत ने अंतरिक्ष बाजार में इसरो की भारत की भागीदारी बढ़ाने के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड की स्थापना की है। भारत द्वारा आंतरिक बाजार में डीटीएच सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए कम दरों पर स्पेक्ट्रम को उपलब्ध कराया है। वर्ष 2030 तक भारत द्वारा अंतरिक्ष में अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किया जायेगा। यह परियोजनाएँ भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के आर्थिक उपयोग की संभावनाओं में वृद्धि करेंगी। इसरो के प्रयासों से प्रमोचनों के बढ़ने से उद्योगों को अंतरिक्ष कार्यक्रमों में बड़े पैमाने पर भाग लेने के लिए बढ़िया अवसर प्रदान किया गया है। अब तक, उद्योगों की भागीदारी हार्डवेयर, घटकों या छोटे प्रणालियों तक ही सीमित थी और अब ये पूरी तरह से एकीकृत और परीक्षण प्रणाली जैसे कि नियंत्रण एक्ट्यूएशन प्रणाली, द्रव इंजन और चरण, ठोस मोटर्स आदि में भी कर रहे हैं। आज, इसरो की मदद से इन उद्योगों को नए छोटे उपग्रह लांचर और छोटे उपग्रह प्रदान करने की योजना बना रहा है। इससे उद्योगों को अंतरिक्ष को भविष्य के कारोबारी क्षेत्र में देखने में मदद मिलेगी और भविष्य में बाजार को कैप्चर करने के लिए वहां निवेश करने पर विचार कर रहा है। लेकिन,भारत में अंतरिक्ष के लिये निजी क्षेत्र की भूमिका को सीमित रखा गया है। सिर्फ कम महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिये ही निजी क्षेत्र की सेवाएँ ली जाती रहीं हैं। उपकरणों को बनाना और जोड़ना तथा परीक्षण ( Assembly, Integration and Testing-AIT) जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य अभी भी इसरो ही करता है। अब समय आ गया है जब अंतरिक्ष के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को स्थान देकर इस क्षेत्र की संभावनाओं में वृद्धि की जा सकती है।
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प्रस्तावना की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के संदर्भ में चर्चा कीजिए किक्या प्रस्तावना संविधान का भाग है? (150-200 शब्द, 10 अंक) Mention the features of the preamble. With reference to the decisions of the Supreme Court, discuss whether the Preamble is part of the Constitution? (150-200 words, 10 Marks)
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Approach: भूमिका में प्रस्तावना का स्त्रोत लिखिए। प्रमुख विशेताओं का वर्णन कीजिए। इसके बाद उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए प्रमुख निर्णयों को स्पष्ट कीजिए समग्रता में एक निष्कर्ष लिखिए उत्तर - प्रस्तावना संविधान के परिचय या भूमिका को कहते हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान सभा द्वारा अपनाए गए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है। प्रस्तावना की विशेषताएँ: स्रोत: प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति ग्रहण करता है। भारत की प्रकृति: यह घोषणा करती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक विशेषताओं वाला देश है। इसमें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान है। प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों की व्याख्या करती है जैसे-सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा लोगों के साथ भेदभाव न करना बंधुत्व की भावना, एकता अखंडता को बनाए रखना। प्रस्तावना संविधान लागू होने की तिथि 26 नवम्बर, 1949 का उल्लेख करती है। गौरतलब है कि प्रारम्भ से ही यह विवाद उत्पन्न होता रहा है कि क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है। इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय ने निम्न प्रकार व्याख्या की है: बेरुबाड़ी संघ मामले, 1960: इसमें न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है। इसके पीछे तर्क यह था कि प्रस्तावना संविधान में निहित प्रयोजनों को दर्शाता है, इसी उद्देश्य को प्रस्तावना में शामिल किया गया है। केशवानन्द भारतीय मामले, 1973: इस वाद में न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को अस्वीकार कर दिया और यह व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है। यह संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें वर्णित महान विचारों को ध्यान में रखकर संविधान का अध्ययन किया जाना चाहिए। एलआईसी ऑफ इंडियामामले, 1995 में पुनः उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तावना सविधान का आंतरिक हिस्सा है। इस प्रकार प्रस्तावना संविधान को लागू करने के लिए दिशा प्रदान करता है। न्यायालय के निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यह संविधान का एक प्रमुख भाग है अर्थात इसमें भी संशोधन किया जा सकता है परंतु मूल विशेषताओं में बदलाव नहीं होना चाहिए।
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##Question:प्रस्तावना की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के संदर्भ में चर्चा कीजिए किक्या प्रस्तावना संविधान का भाग है? (150-200 शब्द, 10 अंक) Mention the features of the preamble. With reference to the decisions of the Supreme Court, discuss whether the Preamble is part of the Constitution? (150-200 words, 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में प्रस्तावना का स्त्रोत लिखिए। प्रमुख विशेताओं का वर्णन कीजिए। इसके बाद उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए प्रमुख निर्णयों को स्पष्ट कीजिए समग्रता में एक निष्कर्ष लिखिए उत्तर - प्रस्तावना संविधान के परिचय या भूमिका को कहते हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान सभा द्वारा अपनाए गए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है। प्रस्तावना की विशेषताएँ: स्रोत: प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति ग्रहण करता है। भारत की प्रकृति: यह घोषणा करती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक विशेषताओं वाला देश है। इसमें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान है। प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों की व्याख्या करती है जैसे-सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा लोगों के साथ भेदभाव न करना बंधुत्व की भावना, एकता अखंडता को बनाए रखना। प्रस्तावना संविधान लागू होने की तिथि 26 नवम्बर, 1949 का उल्लेख करती है। गौरतलब है कि प्रारम्भ से ही यह विवाद उत्पन्न होता रहा है कि क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है। इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय ने निम्न प्रकार व्याख्या की है: बेरुबाड़ी संघ मामले, 1960: इसमें न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है। इसके पीछे तर्क यह था कि प्रस्तावना संविधान में निहित प्रयोजनों को दर्शाता है, इसी उद्देश्य को प्रस्तावना में शामिल किया गया है। केशवानन्द भारतीय मामले, 1973: इस वाद में न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को अस्वीकार कर दिया और यह व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है। यह संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें वर्णित महान विचारों को ध्यान में रखकर संविधान का अध्ययन किया जाना चाहिए। एलआईसी ऑफ इंडियामामले, 1995 में पुनः उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तावना सविधान का आंतरिक हिस्सा है। इस प्रकार प्रस्तावना संविधान को लागू करने के लिए दिशा प्रदान करता है। न्यायालय के निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यह संविधान का एक प्रमुख भाग है अर्थात इसमें भी संशोधन किया जा सकता है परंतु मूल विशेषताओं में बदलाव नहीं होना चाहिए।
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What characteristics can be assigned to monsoon climate that succeeds in feeding more than 50 percent of the world population residing in Monsoon Asia? [200 Words, 10 Marks]
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Brief Approach: In Introduction briefly write about Monsoon i.e. what does it refers to, in which regions it is best developed etc. Discuss salient characteristics of Monsoon Climate Conclude your answer briefly by highlighting the importance of the Monsoon climate. Answer: Some parts of the world experience seasonal winds like land and sea breezes but do so, on a much larger scale. There are tropical lands with on-shore wet monsoons in the summer and off-shore dry monsoons in the winter. They are best developed in Indian sub-continent, Myanmar, Thailand, Laos, Cambodia, parts of South China, and Northern Australia. Characteristics of Monsoon Climate Temperature: Monthly mean temperature in Monsoon climate is above 18°C but temperature ranges from 15-45°C in summer and 15-30°C in winters. This temperature range helps in cultivating various crops such as wheat and rice,staplecrop for the large population in the world. Precipitation: Monsoon is associated with high precipitation. Annual mean rainfall ranges from 200-250cm but varies according to the intensity of seasonal winds. It also helps in paddy cultivation. Distinct season: Seasons are chief characteristics of monsoon climate. Distinct seasons have been observed with the movement of the sun between the Tropic of Cancer and Capricorn. It facilitates the cultivation of various types of crops. The Cool dry season: Out blowing dry winds, the North-East Monsoon, bring little or no rain to the Indian sub-continent. It has been observedfromOctober to February. The Hot dry season: The temperature rises sharply with the sun’s northward shift to the Tropic of Cancer. Coastal regions are a little relieved by sea breezes. The Rainy season: Rainy season has been observed frommid-Juneto September. With the burst of the South-west monsoon inmid-June, torrential downpours sweep across the country. Almost all the rain for the year falls within this rainy season. This pattern of concentrated heavy rainfall in summer is a characteristic feature of the Tropical Monsoon climate. The Retreating Monsoon: The amount and frequency of raindecreasetowards the end of the rainy season. It retreats gradually southwards aftermid-Septemberuntil it leaves the continent altogether. The role of monsoon is vital in the economy of major parts of the world because it is the main source of irrigation in rain-fed areas and facilitates in feeding more than 50 percent of the world population residing in Monsoon Asia.
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##Question:What characteristics can be assigned to monsoon climate that succeeds in feeding more than 50 percent of the world population residing in Monsoon Asia? [200 Words, 10 Marks]##Answer:Brief Approach: In Introduction briefly write about Monsoon i.e. what does it refers to, in which regions it is best developed etc. Discuss salient characteristics of Monsoon Climate Conclude your answer briefly by highlighting the importance of the Monsoon climate. Answer: Some parts of the world experience seasonal winds like land and sea breezes but do so, on a much larger scale. There are tropical lands with on-shore wet monsoons in the summer and off-shore dry monsoons in the winter. They are best developed in Indian sub-continent, Myanmar, Thailand, Laos, Cambodia, parts of South China, and Northern Australia. Characteristics of Monsoon Climate Temperature: Monthly mean temperature in Monsoon climate is above 18°C but temperature ranges from 15-45°C in summer and 15-30°C in winters. This temperature range helps in cultivating various crops such as wheat and rice,staplecrop for the large population in the world. Precipitation: Monsoon is associated with high precipitation. Annual mean rainfall ranges from 200-250cm but varies according to the intensity of seasonal winds. It also helps in paddy cultivation. Distinct season: Seasons are chief characteristics of monsoon climate. Distinct seasons have been observed with the movement of the sun between the Tropic of Cancer and Capricorn. It facilitates the cultivation of various types of crops. The Cool dry season: Out blowing dry winds, the North-East Monsoon, bring little or no rain to the Indian sub-continent. It has been observedfromOctober to February. The Hot dry season: The temperature rises sharply with the sun’s northward shift to the Tropic of Cancer. Coastal regions are a little relieved by sea breezes. The Rainy season: Rainy season has been observed frommid-Juneto September. With the burst of the South-west monsoon inmid-June, torrential downpours sweep across the country. Almost all the rain for the year falls within this rainy season. This pattern of concentrated heavy rainfall in summer is a characteristic feature of the Tropical Monsoon climate. The Retreating Monsoon: The amount and frequency of raindecreasetowards the end of the rainy season. It retreats gradually southwards aftermid-Septemberuntil it leaves the continent altogether. The role of monsoon is vital in the economy of major parts of the world because it is the main source of irrigation in rain-fed areas and facilitates in feeding more than 50 percent of the world population residing in Monsoon Asia.
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पितृसत्तात्मकता को उसके प्रकारों सहित परिभाषित कीजिये? साथ ही पितृसत्तात्मकता के परिणाम स्वरुप उत्पन्न चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक ) Define patriarchy with its types? Also, clarify the challenges arising as a result of patriarchy. (150 to 200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में जेंडर भूमिका को परिभाषित करते हुए पितृसत्तावाद की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में पितृसत्तात्मकता को उसके प्रकारों सहित परिभाषित कीजिये 3- दुसरे खंड में पितृसत्तात्मकता के परिणामस्वरुप उत्पन्न चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में पितृसत्तात्मकता के समापन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान होती है वहीँ जेंडर एक व्यक्ति की सामाजिक पहचान होती है| जेंडर की अवधारणा के अंतर्गत विकास के क्रम में पुरुषों में पुरुषत्व एवं महिलाओं में नारीत्व की भावना का समाजीकरण किया जाता है जिससे वे जेंडर भूमिका को समझ सकें तथा यथानुसार सामाजिक व्यवहार करें| जेंडर भूमिका से तात्पर्य, जेंडर आधारित श्रम विभाजन से है जिसमें पितृसत्तात्मकता के कारण महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है|पितृसत्तात्मकता से तात्पर्य ऐसे सामाजिक संस्थान से है जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से उच्च मानते हुए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सन्दर्भों में वरीयता दी जाती है| सामाजिक विकास के क्रम में विभिन्न कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे गए जबकि महिलायें बोझ मानी गयीं जिसके फलस्वरूप आर्थिक असमानता प्रारम्भ हुई| कालान्तर में पितृवंशात्मक विश्वास के सन्दर्भ में शिक्षा एवं धर्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तिकरण करते हुए महिलाओं को सांस्कृतिक स्तर पर असमान व्यवहार को स्वीकृति दी गयीइन दोनों के परिणाम स्वरुप राजनीतिक क्रम में भी महिलाओं को निम्न समझते हुए निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया|इन सबका मिला जुला परिणाम पितृसत्तात्मकता को जन्म देता है| पितृसत्तात्मकता के प्रकार पितृसत्तात्मकतादो प्रकार की हो सकती है यथा सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताएवं व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत सामान्यतः पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ माने जाते हैं एवं सामाजिक श्रेणीबद्धता में उन्हें उच्च स्थान दिया जाता है व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत जहाँ परिचित महिलाओं के सन्दर्भ में पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है भारतीय परिप्रेक्ष्य में विगत कुछ दशकों में व्यक्तिगत पित्रसत्तात्मकता में तो कमी आई है लेकिन सार्वजनिक पित्रसत्तात्मकता में वृद्धि हुई है इसका मुख्य कारण महिलाओं का रोजगार के लिए मुख्य धारा में अंशधारिता का बढना है जिससे सार्वजनिक स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति का बढनाहै| इसके साथ ही सोशल मीडिया आदि ने भी सार्वजनिक सम्प्रेषण के माध्यम बढाए हैं पितृसत्तात्मकता से उत्पन्न चुनौतियां शिक्षा स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दो शिफ्ट में काम करना सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण शिक्षा के सन्दर्भ में यद्यपि प्रथम(NGO) कि रिपोर्ट प्रारम्भिक शिक्षा के आंकड़ों को महिला सशक्तिकरण के पक्ष में बता रही है जहाँ पर प्रारम्भिक शिक्षा में 96 % स्कूल पंजीकरण पाया जा रहा है परन्तु चिंताजनक स्थिति यह है कि 5 वीं कक्षा के बाद स्कूल उपस्थिति में बालिकाओं के सन्दर्भ में 60 % से अधिक की गिरावट दर्ज की जा रही है| इसके साथ ही कौशल प्रशिक्षण में महिलाओं की प्रतिशतता चिंताजनक है|NSO के आंकड़ों के अनुसार भारत में 83 % महिलायें या तो अकुशल हैं अथवा अल्प कौशल प्रशिक्षण वाली हैं जिसका दुष्परिणाम निकलता है कि इनके लिए आय के स्रोत सीमित हो जाते हैं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम आयरन जैसे पोषक तत्वों की कमी है जिसका दुष्परिणाम उनके प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ रहा है साथ ही गर्भवती एवं स्तनपान करा रही महिलाओं में पोषण तत्वों की कमी भी चिंता का विषय है लैंसेट ने यह भी पाया कि संस्थागत प्रसवों की संख्या उपयुक्त न होने के कारण शिशु एवं मातृत्व मृत्युदर भी अधिक मात्रा में पाया जा रहा है इस तरह से देखते हैं कि पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| अतः समाज को समतामूलक बनाने के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है|
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##Question:पितृसत्तात्मकता को उसके प्रकारों सहित परिभाषित कीजिये? साथ ही पितृसत्तात्मकता के परिणाम स्वरुप उत्पन्न चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक ) Define patriarchy with its types? Also, clarify the challenges arising as a result of patriarchy. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जेंडर भूमिका को परिभाषित करते हुए पितृसत्तावाद की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में पितृसत्तात्मकता को उसके प्रकारों सहित परिभाषित कीजिये 3- दुसरे खंड में पितृसत्तात्मकता के परिणामस्वरुप उत्पन्न चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में पितृसत्तात्मकता के समापन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान होती है वहीँ जेंडर एक व्यक्ति की सामाजिक पहचान होती है| जेंडर की अवधारणा के अंतर्गत विकास के क्रम में पुरुषों में पुरुषत्व एवं महिलाओं में नारीत्व की भावना का समाजीकरण किया जाता है जिससे वे जेंडर भूमिका को समझ सकें तथा यथानुसार सामाजिक व्यवहार करें| जेंडर भूमिका से तात्पर्य, जेंडर आधारित श्रम विभाजन से है जिसमें पितृसत्तात्मकता के कारण महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है|पितृसत्तात्मकता से तात्पर्य ऐसे सामाजिक संस्थान से है जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से उच्च मानते हुए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सन्दर्भों में वरीयता दी जाती है| सामाजिक विकास के क्रम में विभिन्न कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे गए जबकि महिलायें बोझ मानी गयीं जिसके फलस्वरूप आर्थिक असमानता प्रारम्भ हुई| कालान्तर में पितृवंशात्मक विश्वास के सन्दर्भ में शिक्षा एवं धर्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तिकरण करते हुए महिलाओं को सांस्कृतिक स्तर पर असमान व्यवहार को स्वीकृति दी गयीइन दोनों के परिणाम स्वरुप राजनीतिक क्रम में भी महिलाओं को निम्न समझते हुए निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया|इन सबका मिला जुला परिणाम पितृसत्तात्मकता को जन्म देता है| पितृसत्तात्मकता के प्रकार पितृसत्तात्मकतादो प्रकार की हो सकती है यथा सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताएवं व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत सामान्यतः पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ माने जाते हैं एवं सामाजिक श्रेणीबद्धता में उन्हें उच्च स्थान दिया जाता है व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत जहाँ परिचित महिलाओं के सन्दर्भ में पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है भारतीय परिप्रेक्ष्य में विगत कुछ दशकों में व्यक्तिगत पित्रसत्तात्मकता में तो कमी आई है लेकिन सार्वजनिक पित्रसत्तात्मकता में वृद्धि हुई है इसका मुख्य कारण महिलाओं का रोजगार के लिए मुख्य धारा में अंशधारिता का बढना है जिससे सार्वजनिक स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति का बढनाहै| इसके साथ ही सोशल मीडिया आदि ने भी सार्वजनिक सम्प्रेषण के माध्यम बढाए हैं पितृसत्तात्मकता से उत्पन्न चुनौतियां शिक्षा स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दो शिफ्ट में काम करना सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण शिक्षा के सन्दर्भ में यद्यपि प्रथम(NGO) कि रिपोर्ट प्रारम्भिक शिक्षा के आंकड़ों को महिला सशक्तिकरण के पक्ष में बता रही है जहाँ पर प्रारम्भिक शिक्षा में 96 % स्कूल पंजीकरण पाया जा रहा है परन्तु चिंताजनक स्थिति यह है कि 5 वीं कक्षा के बाद स्कूल उपस्थिति में बालिकाओं के सन्दर्भ में 60 % से अधिक की गिरावट दर्ज की जा रही है| इसके साथ ही कौशल प्रशिक्षण में महिलाओं की प्रतिशतता चिंताजनक है|NSO के आंकड़ों के अनुसार भारत में 83 % महिलायें या तो अकुशल हैं अथवा अल्प कौशल प्रशिक्षण वाली हैं जिसका दुष्परिणाम निकलता है कि इनके लिए आय के स्रोत सीमित हो जाते हैं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम आयरन जैसे पोषक तत्वों की कमी है जिसका दुष्परिणाम उनके प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ रहा है साथ ही गर्भवती एवं स्तनपान करा रही महिलाओं में पोषण तत्वों की कमी भी चिंता का विषय है लैंसेट ने यह भी पाया कि संस्थागत प्रसवों की संख्या उपयुक्त न होने के कारण शिशु एवं मातृत्व मृत्युदर भी अधिक मात्रा में पाया जा रहा है इस तरह से देखते हैं कि पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| अतः समाज को समतामूलक बनाने के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है|
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गगन के लाभों की चर्चा करते हुए गगन का वायु यातायात के अलावा और क्या अनुप्रयोग हो सकता है? उदाहरण सहित समझाइए। (150-200 शब्द / 10 अंक) Discussing the benefits of Gagan, what other application can Gagan have other than air traffic? Explain with examples. (150-200 words / 10 Marks)
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एप्रोच - गगन का परिचय एवं पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, गगन के लाभों तथा विशेषकर नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में लाभों पर चर्चा कीजिए| अगले भाग में, वायु यातायात के अलावा गगन के अन्य अनुप्रयोगों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, इसकी महता को भारतीय संदर्भ में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - जीपीएस सहायक भू-संवर्धित नौवहन उपग्रह प्रणाली(GAGAN/GPS Aided GEO Augmented Navigation) एक उपग्रह आधारित आवर्धन प्रणाली है जो नागरिक उड्डयन सेवा में सहायक है| इस प्रणाली को इसरो एवं भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण(AAI) के द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है| गगन एक उपग्रह आधारित संचार प्रणाली/Satellite-based Augmentation System (SBAS) है जिसमें हवाई जहाज के पायलट को जीपीएस "सिग्नल इन स्पेस(Signal in Space)" प्रदान किया जाता है| इसमें 3 संचार उपग्रहों(जीसैट-8, जीसैट-10, जीसैट-15) की सहायता से जीपीएस सिग्नल एवं एयर ट्रैफिक कंट्रोलर सिग्नल को बेहतर तरीके से पायलट तक पहुँचाया जाता है| यह ऑस्ट्रेलिया से लेकर अफ्रीका तक के क्षेत्र में कार्य करता है| गगन के लाभ तथा उद्देश्य ---> गगन के कार्यान्वयन से विमानन क्षेत्र के लिए कई फायदे हैं, जैसे -> नागरिक उड्डयन सेवा के लिए विमानपत्तनों में एयर ट्रैफिक का बेहतर नियंत्रण एवं प्रबंधन ताकि बेहतर सिग्नल हवाई जहाज को प्रदान किया जाए अर्थात ऑपरेटरों के लिए काम के बोझ में कमी ईंधन की बचत उपकरणों की लागत में बचत उड़ान सुरक्षा अर्थात हवाई सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए अंतरिक्ष क्षमता में वृद्धि क्षमता, विश्वसनीयता की वृद्धि हवाई यातायात के लिए समुद्री क्षेत्र की कवरेज पर नियंत्रण उच्च सटीकता की स्थिति आदि| विमानन क्षेत्र में लाभ की मात्रा इस तरह के सुविधा के उपयोग के स्तर पर निर्भर करेगा| नागरिक उड्डयन क्षेत्र के लिए गगन के कुछ संभावित लाभ हैं ---> सुरक्षा लाभ - कार्यक्षेत्र मार्गदर्शन से विशेष रूप से प्रतिकूल मौसम की स्थिति में, सुरक्षा में सुधार चक्कर काटने में कमी पर्यावरणीय लाभ - कार्यक्षेत्र गाइडेंस प्रक्रियाओं के सुगम्यता के साथ बेहतर ऊर्जा और अंतिम अवरोहण प्रोफ़ाइल प्रबंधन में मदद मिलेगी आगमन, प्रस्थान, समुद्रीय और मार्ग सहित उड़ान के सभी चरणों के लिए वैश्विक निरंतरायुक्त नौसंचालन एयरलाइनों को सीधा मार्ग, एकाधिक दृष्टिकोण से काफी ईंधन बचत और हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र की क्षमता में वृद्धि गगन को विमानन के लिए विकसित किया गया है किंतु यह अन्य क्षेत्रों जैसे- परिवहन, सर्वेक्षण, समुद्री क्षेत्र, राजमार्ग, दूरसंचार उद्योग एवं सुरक्षा एजेंसियों को भी लाभ प्रदान करेगा| जैसे - इस प्रणाली में 3 भू-तुल्यकालिक उपग्रह GSAT-8, GSAT-10 एवं GSAT-15 शामिल हैं जो 24*7 समय हिंद महासागर क्षेत्र की निगरानी करते हैं| भूमध्यीय आयनोस्फेरिक क्षेत्र के लंबबत निर्देश संचालन के लिए इसे विश्व की प्रथम प्रणाली के रूप में स्वीकृत किया गया है| रेलवे, रोडवेज, जहाजों, अंतरिक्ष यान में नौसंचालन और सुरक्षा संवर्धन भौगोलिक डेटा संग्रहन वायुमंडलीय अध्ययन के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान भूगतिकी प्राकृतिक संसाधन और भूमि प्रबंधन स्थान आधारित सेवाएं, मोबाइल, पर्यटन, आदि कर्नाटक वन विभाग ने अपने वनभूमि का एक नया, सटीक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध उपग्रह आधारित डेटाबेस बनाने के लिए गगन का उपयोग किया है| ब्रह्मोस सहित विभिन्न भारत निर्मित मिसाइलें मार्गदर्शन के लिए गगन का उपयोग करेंगी| हाल ही में, भारत सरकार के द्वारा गहन महासागरीय गतिविधि में संलग्न मछुआरों हेतु परामर्श सेवा प्रदान करने हेतु जेमिनी/GEMINI(Gagan Enabled Mariner’s Instrument for Navigation and Information) का शुभारम्भ किया गया है| जेमिनी(Gemini) यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा एक पहल है जिसमें मछुआरों को एक जेमिनी यंत्र दिया जा रहा है जिससे सागर में मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्रों(Potential Fishing Zone/PFZ) , खराब मौसम की पूर्व जानकारी, चक्रवातों की पूर्व चेतावनी दिया जा सकता है| यह गगन आधारित सेवा है| इसकी नोडल संस्था भारतीय राष्ट्रीय सागरीय सूचना सेवा केंद्र/INCOIS है| भारत में ग्लोबल नेवीगेशन सेटेलाइट सिस्टम (GNSS) सेवाओं के विकास में यह एक लंबी छलांग है और इससे उड्डयन एवं अन्य क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा और आने वाले दिनों में वृद्धि होगी| गगन प्रणाली निकट भविष्य में भारतीय भूमि परिदृश्य के ऊपर सटीक सेवाएं प्रदान करने में एक मील का पत्थर साबित होगा|
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##Question:गगन के लाभों की चर्चा करते हुए गगन का वायु यातायात के अलावा और क्या अनुप्रयोग हो सकता है? उदाहरण सहित समझाइए। (150-200 शब्द / 10 अंक) Discussing the benefits of Gagan, what other application can Gagan have other than air traffic? Explain with examples. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:एप्रोच - गगन का परिचय एवं पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, गगन के लाभों तथा विशेषकर नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में लाभों पर चर्चा कीजिए| अगले भाग में, वायु यातायात के अलावा गगन के अन्य अनुप्रयोगों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, इसकी महता को भारतीय संदर्भ में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - जीपीएस सहायक भू-संवर्धित नौवहन उपग्रह प्रणाली(GAGAN/GPS Aided GEO Augmented Navigation) एक उपग्रह आधारित आवर्धन प्रणाली है जो नागरिक उड्डयन सेवा में सहायक है| इस प्रणाली को इसरो एवं भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण(AAI) के द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है| गगन एक उपग्रह आधारित संचार प्रणाली/Satellite-based Augmentation System (SBAS) है जिसमें हवाई जहाज के पायलट को जीपीएस "सिग्नल इन स्पेस(Signal in Space)" प्रदान किया जाता है| इसमें 3 संचार उपग्रहों(जीसैट-8, जीसैट-10, जीसैट-15) की सहायता से जीपीएस सिग्नल एवं एयर ट्रैफिक कंट्रोलर सिग्नल को बेहतर तरीके से पायलट तक पहुँचाया जाता है| यह ऑस्ट्रेलिया से लेकर अफ्रीका तक के क्षेत्र में कार्य करता है| गगन के लाभ तथा उद्देश्य ---> गगन के कार्यान्वयन से विमानन क्षेत्र के लिए कई फायदे हैं, जैसे -> नागरिक उड्डयन सेवा के लिए विमानपत्तनों में एयर ट्रैफिक का बेहतर नियंत्रण एवं प्रबंधन ताकि बेहतर सिग्नल हवाई जहाज को प्रदान किया जाए अर्थात ऑपरेटरों के लिए काम के बोझ में कमी ईंधन की बचत उपकरणों की लागत में बचत उड़ान सुरक्षा अर्थात हवाई सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए अंतरिक्ष क्षमता में वृद्धि क्षमता, विश्वसनीयता की वृद्धि हवाई यातायात के लिए समुद्री क्षेत्र की कवरेज पर नियंत्रण उच्च सटीकता की स्थिति आदि| विमानन क्षेत्र में लाभ की मात्रा इस तरह के सुविधा के उपयोग के स्तर पर निर्भर करेगा| नागरिक उड्डयन क्षेत्र के लिए गगन के कुछ संभावित लाभ हैं ---> सुरक्षा लाभ - कार्यक्षेत्र मार्गदर्शन से विशेष रूप से प्रतिकूल मौसम की स्थिति में, सुरक्षा में सुधार चक्कर काटने में कमी पर्यावरणीय लाभ - कार्यक्षेत्र गाइडेंस प्रक्रियाओं के सुगम्यता के साथ बेहतर ऊर्जा और अंतिम अवरोहण प्रोफ़ाइल प्रबंधन में मदद मिलेगी आगमन, प्रस्थान, समुद्रीय और मार्ग सहित उड़ान के सभी चरणों के लिए वैश्विक निरंतरायुक्त नौसंचालन एयरलाइनों को सीधा मार्ग, एकाधिक दृष्टिकोण से काफी ईंधन बचत और हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र की क्षमता में वृद्धि गगन को विमानन के लिए विकसित किया गया है किंतु यह अन्य क्षेत्रों जैसे- परिवहन, सर्वेक्षण, समुद्री क्षेत्र, राजमार्ग, दूरसंचार उद्योग एवं सुरक्षा एजेंसियों को भी लाभ प्रदान करेगा| जैसे - इस प्रणाली में 3 भू-तुल्यकालिक उपग्रह GSAT-8, GSAT-10 एवं GSAT-15 शामिल हैं जो 24*7 समय हिंद महासागर क्षेत्र की निगरानी करते हैं| भूमध्यीय आयनोस्फेरिक क्षेत्र के लंबबत निर्देश संचालन के लिए इसे विश्व की प्रथम प्रणाली के रूप में स्वीकृत किया गया है| रेलवे, रोडवेज, जहाजों, अंतरिक्ष यान में नौसंचालन और सुरक्षा संवर्धन भौगोलिक डेटा संग्रहन वायुमंडलीय अध्ययन के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान भूगतिकी प्राकृतिक संसाधन और भूमि प्रबंधन स्थान आधारित सेवाएं, मोबाइल, पर्यटन, आदि कर्नाटक वन विभाग ने अपने वनभूमि का एक नया, सटीक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध उपग्रह आधारित डेटाबेस बनाने के लिए गगन का उपयोग किया है| ब्रह्मोस सहित विभिन्न भारत निर्मित मिसाइलें मार्गदर्शन के लिए गगन का उपयोग करेंगी| हाल ही में, भारत सरकार के द्वारा गहन महासागरीय गतिविधि में संलग्न मछुआरों हेतु परामर्श सेवा प्रदान करने हेतु जेमिनी/GEMINI(Gagan Enabled Mariner’s Instrument for Navigation and Information) का शुभारम्भ किया गया है| जेमिनी(Gemini) यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा एक पहल है जिसमें मछुआरों को एक जेमिनी यंत्र दिया जा रहा है जिससे सागर में मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्रों(Potential Fishing Zone/PFZ) , खराब मौसम की पूर्व जानकारी, चक्रवातों की पूर्व चेतावनी दिया जा सकता है| यह गगन आधारित सेवा है| इसकी नोडल संस्था भारतीय राष्ट्रीय सागरीय सूचना सेवा केंद्र/INCOIS है| भारत में ग्लोबल नेवीगेशन सेटेलाइट सिस्टम (GNSS) सेवाओं के विकास में यह एक लंबी छलांग है और इससे उड्डयन एवं अन्य क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा और आने वाले दिनों में वृद्धि होगी| गगन प्रणाली निकट भविष्य में भारतीय भूमि परिदृश्य के ऊपर सटीक सेवाएं प्रदान करने में एक मील का पत्थर साबित होगा|
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Discuss the conditions favorable for the formation of Tropical Cyclones. Also highlight the key characteristics of tropical cyclones. (150 words, 10 marks)
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Approach: Briefly define tropical cyclone Mention the factors responsible for their formation Mention the characteristics of Tropical Cyclones Answer: Tropical cyclones are violent storms that originate over oceans in tropical areas and are accompanied by irregular wind movements and storm surges involving the closed circulation of air around low pressure. They have a thermal origin (formed around ITCZ) and develop over tropical seas during late summers (August to mid-November in the northern hemisphere). At these locations, the strong local convectional currents acquire a whirling motion because of the Coriolis force. Favourable conditions for the formation of tropical cyclones- Large sea surface with a temperature higher than 27° C Presence of the Coriolis force enough to create a cyclonic vortex Small variations in the vertical wind speed A pre-existing weak low-pressure area or low-level-cyclonic circulation Upper divergence above the sea level system Characteristics of Tropical Cyclones- Origin - Tropical cyclones always originate in large water bodies Location - Tropical cyclones form along the 5 to 10-degree latitude Structure -Tropical cyclones have a definite structure of formation having a front end followed by a zone of calmness called “eye” and ends with a tail (rear end). Size and speed - Tropical cyclones range from 150-200 km with high velocity Movement direction - Tropical direction moves from east to west direction under the influence of trade winds Weather condition - Tropical cyclones are associated with heavy rainfall and high velocity of winds for a short duration in a small area, sometimes the rain and associated winds are so high that they can cause damage to life and property mostly in eastern coastal areas. (The student must draw a diagram of a Tropical Cyclone).
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##Question:Discuss the conditions favorable for the formation of Tropical Cyclones. Also highlight the key characteristics of tropical cyclones. (150 words, 10 marks)##Answer:Approach: Briefly define tropical cyclone Mention the factors responsible for their formation Mention the characteristics of Tropical Cyclones Answer: Tropical cyclones are violent storms that originate over oceans in tropical areas and are accompanied by irregular wind movements and storm surges involving the closed circulation of air around low pressure. They have a thermal origin (formed around ITCZ) and develop over tropical seas during late summers (August to mid-November in the northern hemisphere). At these locations, the strong local convectional currents acquire a whirling motion because of the Coriolis force. Favourable conditions for the formation of tropical cyclones- Large sea surface with a temperature higher than 27° C Presence of the Coriolis force enough to create a cyclonic vortex Small variations in the vertical wind speed A pre-existing weak low-pressure area or low-level-cyclonic circulation Upper divergence above the sea level system Characteristics of Tropical Cyclones- Origin - Tropical cyclones always originate in large water bodies Location - Tropical cyclones form along the 5 to 10-degree latitude Structure -Tropical cyclones have a definite structure of formation having a front end followed by a zone of calmness called “eye” and ends with a tail (rear end). Size and speed - Tropical cyclones range from 150-200 km with high velocity Movement direction - Tropical direction moves from east to west direction under the influence of trade winds Weather condition - Tropical cyclones are associated with heavy rainfall and high velocity of winds for a short duration in a small area, sometimes the rain and associated winds are so high that they can cause damage to life and property mostly in eastern coastal areas. (The student must draw a diagram of a Tropical Cyclone).
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संचार या संप्रेषण से आप क्या समझते हैं? सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| साथ ही, सरकार में सूचनाकेआदानप्रदान एवं पारदर्शिता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए|(150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Communication? Describe the role of communication to make the exchange of information more effective. Also, Explain the importance ofexchange of information and transparency in government. (150–200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- संचार/संप्रेषण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,सरकार में सूचना के आदानप्रदान एवं पारदर्शिता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए| उत्तर- संचार/सम्प्रेषण का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों/ईकाईयों के बीच सूचनाओं/विचारों/भावनाओं के आदान-प्रदानसे है| परंतु संचार का मौलिक भाव समझ या साझेदारी है| अतः संचार उद्देश्य उन्मुखी होता है| संचार हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरुरी है| संचार सांकेतिक होता है - मौखिक, अमौखिक, लिखित संचार|संचार प्रक्रिया में निम्नांकित तथ्यों को देखा जा सकता है-सेंडर, इनकोडिंग, संदेश, चैनल, प्राप्तकर्ता,डिकोडिंग,फीडबैक/प्रतिपुष्टि, नॉइज़(Noise)| सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका विभिन्न शासी निकायों, संगठनों और आम जनता के मध्य विभिन्न सूचनाओं तथा डाटा का साझाकरण बहुत आवश्यक है| सरकार/शासन द्वारा प्रत्येक दायित्वों जैसे- कानून एवं व्यवस्था; राजस्व प्रशासन, न्याय प्रशासन, कल्याण एवं विकास हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है तथा, सूचना का आदान-प्रदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मूल है| इसके माध्यम से सरकार को जनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है| शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु भी सूचना का आदन-प्रदान होना बहुत जरुरी है| यह शासन प्रणाली में जन भागीदारी को प्रोत्सहित करती है| सूचना का स्थानांतरण अंततः शक्ति का स्थानांतरण है जो कि शासन प्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करता है एवं जन सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती है| उपरोक्त सभी उद्देश्यों का मूललक्ष्य तभी प्राप्त हो सकेगा जब सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी रूप से हुआ हो| इस संदर्भ में संचार निम्नलिखित तरीके से अपनी भूमिका निभाता है - जब संचार स्पष्ट होगा तभीवांक्षित सूचना सही एवं व्यवस्थित तरीके से संबंधित स्रोत तकपहुँच सकेगी| व्यक्ति/संगठन/सरकार सूचनाओं के माध्यम से जो बातें कहना चाहते होंगे वह तभी सामने वाले पक्ष को बेहतर तरीके से समझ में आएगी जब सूचनाओं के कहने का माध्यम अर्थात संचार पारदर्शी एवं स्पष्ट हो| सूचनाओं केसाझाकरण को त्वरित बनाने हेतुतीव्र एवं सरल संचार प्रभावी भूमिका निभा सकता है| सूचनाओं को लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी बनाने में मनोरंजक एवं रोचक संचार अच्छा रोल अदा कर सकता है| सरकार में सूचना का आदान प्रदान एवं पारदर्शिताका महत्त्व सरकार के द्वारा जिन कर्तव्यों का निर्वहन किया जाता है वह प्रत्येक कर्तव्य के संदर्भ में सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है जैसे - कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना; आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा; कल्याण एवं विकास आदि; विकास एवं कल्याण के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु सरकार के द्वारा नीतियों का निर्माण, परिपालन एवं मूल्यांकन किया जाता है| नीति प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में सूचना का होना अतिआवश्यक; सूचनाओं के माध्यम से सरकार के द्वाराजनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है एवं सूचनाओं के माध्यम से सरकार के द्वाराजनअपेक्षाओं को वास्तविक स्वरुपदिया जाता है जोकि जनअपेक्षाओं की परिपूर्ति में सहायक सिद्ध होती है| शासन मेंजनभागीदारी एवं जनविश्वसनीयता को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदानप्रदान का होना आवश्यक है| यहशासन प्रणाली को अधिक पारदर्शी एवं जबावदेह बनाती है| सूचना का आदानप्रदान सरकार एवं नागरिकों के बीच के पारस्परिक संबंध को अधिक सुचारू बनाता है| सूचना के आदानप्रदान के द्वारा सरकार एवं नागरिकों को अपने-अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों की जानकारी प्राप्तहोती है| लोकसेवकों के व्यवहार में वस्तुनिष्ठता को प्राप्त करने हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है| सूचनाओं के माध्यम से जनता अपनी प्रतिपुष्टि/फीडबैक सरकार को प्रदान करती है ताकि इस आधार पर सरकार के द्वारा सुधार एवं नवाचार को लागू किया जा सके| सूचना के हस्तानांतरणके माध्यम सेसरकार के द्वारा शक्तियों का भी हस्तानांतरणकिया जाता है जोकि शासन प्रणाली को अधिक प्रजातांत्रिक बनाती है एवं नैतिक शासन का यह एक महत्वपूर्ण आयाम है| यहशासन को अधिक नागरिक केंद्रित बनाती है| सरकार ने इसी दृष्टिकोण के साथ शासन में पारदर्शिता एवं जबावदेहिता को प्रोत्साहित करने हेतु 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया है जिसके माध्यम से उपरोक्त आयामों को व्यवहारिक रूप में दिखने में मदद की है|
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##Question:संचार या संप्रेषण से आप क्या समझते हैं? सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| साथ ही, सरकार में सूचनाकेआदानप्रदान एवं पारदर्शिता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए|(150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Communication? Describe the role of communication to make the exchange of information more effective. Also, Explain the importance ofexchange of information and transparency in government. (150–200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- संचार/संप्रेषण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,सरकार में सूचना के आदानप्रदान एवं पारदर्शिता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए| उत्तर- संचार/सम्प्रेषण का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों/ईकाईयों के बीच सूचनाओं/विचारों/भावनाओं के आदान-प्रदानसे है| परंतु संचार का मौलिक भाव समझ या साझेदारी है| अतः संचार उद्देश्य उन्मुखी होता है| संचार हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरुरी है| संचार सांकेतिक होता है - मौखिक, अमौखिक, लिखित संचार|संचार प्रक्रिया में निम्नांकित तथ्यों को देखा जा सकता है-सेंडर, इनकोडिंग, संदेश, चैनल, प्राप्तकर्ता,डिकोडिंग,फीडबैक/प्रतिपुष्टि, नॉइज़(Noise)| सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका विभिन्न शासी निकायों, संगठनों और आम जनता के मध्य विभिन्न सूचनाओं तथा डाटा का साझाकरण बहुत आवश्यक है| सरकार/शासन द्वारा प्रत्येक दायित्वों जैसे- कानून एवं व्यवस्था; राजस्व प्रशासन, न्याय प्रशासन, कल्याण एवं विकास हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है तथा, सूचना का आदान-प्रदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मूल है| इसके माध्यम से सरकार को जनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है| शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु भी सूचना का आदन-प्रदान होना बहुत जरुरी है| यह शासन प्रणाली में जन भागीदारी को प्रोत्सहित करती है| सूचना का स्थानांतरण अंततः शक्ति का स्थानांतरण है जो कि शासन प्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करता है एवं जन सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती है| उपरोक्त सभी उद्देश्यों का मूललक्ष्य तभी प्राप्त हो सकेगा जब सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी रूप से हुआ हो| इस संदर्भ में संचार निम्नलिखित तरीके से अपनी भूमिका निभाता है - जब संचार स्पष्ट होगा तभीवांक्षित सूचना सही एवं व्यवस्थित तरीके से संबंधित स्रोत तकपहुँच सकेगी| व्यक्ति/संगठन/सरकार सूचनाओं के माध्यम से जो बातें कहना चाहते होंगे वह तभी सामने वाले पक्ष को बेहतर तरीके से समझ में आएगी जब सूचनाओं के कहने का माध्यम अर्थात संचार पारदर्शी एवं स्पष्ट हो| सूचनाओं केसाझाकरण को त्वरित बनाने हेतुतीव्र एवं सरल संचार प्रभावी भूमिका निभा सकता है| सूचनाओं को लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी बनाने में मनोरंजक एवं रोचक संचार अच्छा रोल अदा कर सकता है| सरकार में सूचना का आदान प्रदान एवं पारदर्शिताका महत्त्व सरकार के द्वारा जिन कर्तव्यों का निर्वहन किया जाता है वह प्रत्येक कर्तव्य के संदर्भ में सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है जैसे - कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना; आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा; कल्याण एवं विकास आदि; विकास एवं कल्याण के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु सरकार के द्वारा नीतियों का निर्माण, परिपालन एवं मूल्यांकन किया जाता है| नीति प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में सूचना का होना अतिआवश्यक; सूचनाओं के माध्यम से सरकार के द्वाराजनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है एवं सूचनाओं के माध्यम से सरकार के द्वाराजनअपेक्षाओं को वास्तविक स्वरुपदिया जाता है जोकि जनअपेक्षाओं की परिपूर्ति में सहायक सिद्ध होती है| शासन मेंजनभागीदारी एवं जनविश्वसनीयता को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदानप्रदान का होना आवश्यक है| यहशासन प्रणाली को अधिक पारदर्शी एवं जबावदेह बनाती है| सूचना का आदानप्रदान सरकार एवं नागरिकों के बीच के पारस्परिक संबंध को अधिक सुचारू बनाता है| सूचना के आदानप्रदान के द्वारा सरकार एवं नागरिकों को अपने-अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों की जानकारी प्राप्तहोती है| लोकसेवकों के व्यवहार में वस्तुनिष्ठता को प्राप्त करने हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है| सूचनाओं के माध्यम से जनता अपनी प्रतिपुष्टि/फीडबैक सरकार को प्रदान करती है ताकि इस आधार पर सरकार के द्वारा सुधार एवं नवाचार को लागू किया जा सके| सूचना के हस्तानांतरणके माध्यम सेसरकार के द्वारा शक्तियों का भी हस्तानांतरणकिया जाता है जोकि शासन प्रणाली को अधिक प्रजातांत्रिक बनाती है एवं नैतिक शासन का यह एक महत्वपूर्ण आयाम है| यहशासन को अधिक नागरिक केंद्रित बनाती है| सरकार ने इसी दृष्टिकोण के साथ शासन में पारदर्शिता एवं जबावदेहिता को प्रोत्साहित करने हेतु 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया है जिसके माध्यम से उपरोक्त आयामों को व्यवहारिक रूप में दिखने में मदद की है|
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भारत की विकासात्मक परिस्थितियों को देखते हुए सुशासन एक अपरिहार्यता है किन्तु विद्यमान बाधाओं ने इसके क्रियान्वयन को अवरुद्ध किया है| ऐसी स्थिति में भारत में सुशासन की स्थापना में सुशासन सूचकांक कितना कारगर साबित हो सकेगा? चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) In view of the developmental circumstances of India, good governance is an inevitability, but existing obstacles have blocked its implementation. In such a situation, how effective will the Good Governance Index be in establishing good governance in India? Discuss. (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिए| प्रथम भाग में भारत मे सुशासन का महत्व की चर्चा कीजिए| द्वितीय भाग में सुशासन की स्थापना में बाधक तत्वों की चर्चा कीजिए| तृतीय भाग में सुशासन की स्थापना में सुशासन सूचकांक का महत्व स्पष्ट कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर कीजिए| उत्तर: सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है। समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है। सुशासन की अवधारणा को सर्वप्रथम विश्व बैंक के द्वारा 1992 में प्रतिपादित किया गया। सुशासन का महत्व: शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है | शासन में सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है| शासन में उद्यमशीलता के विकास के लिए सुशासन की आवश्यकता है शासन में औपनिवेशिक चरित्र बना हुआ है जिसके कारण शासन में औपनिवेशिक अभिवृत्ति बनी हुई है अतः प्रशासन लोकप्रिय नहीं हो पाया है, सुशासन प्रशासन को लोकप्रिय बनाने में सहायक है शासन में पारदर्शिता का अभाव पाया जता है, शासन में पारदर्शिता लाने के लिए सुशासन की आवश्यकता है| संवैधानिक समीक्षा की उपयुक्त व्यवस्थाओं का अभाव पाया जाता है जिसके लिए सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की स्थापना में बाधक तत्व: लोकसेवकों के अंदर अभिवृतिमूलक समस्या उत्तरदायित्व का अभाव लालफीताशाही जागरूकता का अभाव सरकार के समुचित आकार की कमीसंस्थागत समस्याएँ प्रक्रियागत जटिलताएं कानूनों का बोझ/ कानूनों की बहुलता तकनीक के उपयोग का अभाव राजनीतिक हस्तक्षेप सुशासन सूचकांक का महत्व: सुशासन सूचकांक विभिन्न केंद्रशासित प्रदेशों एवं राज्यों में सरकारों द्वारा जनता के हित में उठाए गए कदम, निर्मित नीतियों का प्रभाव एवं शासन की स्थिति को दर्शाने हेतु जारी किया जाता है| सुशासन के प्रति लोगों में जागरूकता लाने हेतु देश भर में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा कई क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किये गए| सूचकांक में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन अलग-अलग समूहों: (1) बड़े राज्य, (2) उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्य एवं (3) संघ राज्य क्षेत्र में विभक्त किया गया है| सुशासन सूचकांक में 10 क्षेत्रकों को शामिल किया गया है- कृषि और संबद्ध क्षेत्र वाणिज्य और उद्योग मानव संसाधन विकास सार्वजनिक स्वास्थ्य सार्वजनिक अवसंरचना और उपयोगिताएँ आर्थिक शासन समाज कल्याण और विकास, एल न्यायिक और सार्वजनिक सुरक्षा वातावरण/पर्यावरण नागरिक केंद्रित शासन समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है| सुशासन सूचकांक मे विभिन्न क्षेत्रकों को शामिल कर एक सर्वांगीण एवं समावेशी सुशासन की अवधारणा को साकार करने का प्रयास किया गया है|
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##Question:भारत की विकासात्मक परिस्थितियों को देखते हुए सुशासन एक अपरिहार्यता है किन्तु विद्यमान बाधाओं ने इसके क्रियान्वयन को अवरुद्ध किया है| ऐसी स्थिति में भारत में सुशासन की स्थापना में सुशासन सूचकांक कितना कारगर साबित हो सकेगा? चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) In view of the developmental circumstances of India, good governance is an inevitability, but existing obstacles have blocked its implementation. In such a situation, how effective will the Good Governance Index be in establishing good governance in India? Discuss. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिए| प्रथम भाग में भारत मे सुशासन का महत्व की चर्चा कीजिए| द्वितीय भाग में सुशासन की स्थापना में बाधक तत्वों की चर्चा कीजिए| तृतीय भाग में सुशासन की स्थापना में सुशासन सूचकांक का महत्व स्पष्ट कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर कीजिए| उत्तर: सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है। समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है। सुशासन की अवधारणा को सर्वप्रथम विश्व बैंक के द्वारा 1992 में प्रतिपादित किया गया। सुशासन का महत्व: शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है | शासन में सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है| शासन में उद्यमशीलता के विकास के लिए सुशासन की आवश्यकता है शासन में औपनिवेशिक चरित्र बना हुआ है जिसके कारण शासन में औपनिवेशिक अभिवृत्ति बनी हुई है अतः प्रशासन लोकप्रिय नहीं हो पाया है, सुशासन प्रशासन को लोकप्रिय बनाने में सहायक है शासन में पारदर्शिता का अभाव पाया जता है, शासन में पारदर्शिता लाने के लिए सुशासन की आवश्यकता है| संवैधानिक समीक्षा की उपयुक्त व्यवस्थाओं का अभाव पाया जाता है जिसके लिए सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की स्थापना में बाधक तत्व: लोकसेवकों के अंदर अभिवृतिमूलक समस्या उत्तरदायित्व का अभाव लालफीताशाही जागरूकता का अभाव सरकार के समुचित आकार की कमीसंस्थागत समस्याएँ प्रक्रियागत जटिलताएं कानूनों का बोझ/ कानूनों की बहुलता तकनीक के उपयोग का अभाव राजनीतिक हस्तक्षेप सुशासन सूचकांक का महत्व: सुशासन सूचकांक विभिन्न केंद्रशासित प्रदेशों एवं राज्यों में सरकारों द्वारा जनता के हित में उठाए गए कदम, निर्मित नीतियों का प्रभाव एवं शासन की स्थिति को दर्शाने हेतु जारी किया जाता है| सुशासन के प्रति लोगों में जागरूकता लाने हेतु देश भर में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा कई क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किये गए| सूचकांक में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन अलग-अलग समूहों: (1) बड़े राज्य, (2) उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्य एवं (3) संघ राज्य क्षेत्र में विभक्त किया गया है| सुशासन सूचकांक में 10 क्षेत्रकों को शामिल किया गया है- कृषि और संबद्ध क्षेत्र वाणिज्य और उद्योग मानव संसाधन विकास सार्वजनिक स्वास्थ्य सार्वजनिक अवसंरचना और उपयोगिताएँ आर्थिक शासन समाज कल्याण और विकास, एल न्यायिक और सार्वजनिक सुरक्षा वातावरण/पर्यावरण नागरिक केंद्रित शासन समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है| सुशासन सूचकांक मे विभिन्न क्षेत्रकों को शामिल कर एक सर्वांगीण एवं समावेशी सुशासन की अवधारणा को साकार करने का प्रयास किया गया है|
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To what extent Mercantilism was responsible for Colonialism? Analyze. (150 words/10 marks)
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Approach: Briefly define Mercantilism. Explain it as a system of state-regulated exploitation. Under Mercantilism: colonies were supposed to send to the mother country, etc. factors. With examples of British, Spanish, etc. exploitations, explain mercantilism vis-a-vis colonialism. Conclude with how far Mercantilsim shaped the Colonial empires of Europe. Answer: Mercantilism is a system of state-regulated exploitation through trade or the economic policy of the age of primitive accumulation. The term mercantilism usually applied to the policies and measures that the European states adopted between the 15th & 18th centuries to acquire wealth and power. Mercantilism being responsible for Colonialism: Mercantilism provided capital for European wealth. Under mercantilism, the colonies were supposed to send to the mother country raw natural resources. Colonies were not supposed to manufacture any goods, e.g. India was exploited. By mercantilism, nations frequently engaged their military might to ensure local markets and supply sources were protected, to support the idea that a nation’s economic health heavily relied on its supply of capital. Unjust and exploitative laws- England introduced fiscal policies that discouraged colonists from buying foreign products while creating incentives to only buy British goods. The sugar Act of 1764 raised duties on foreign refined sugar and molasses imported by the colonies. Mercantilism of East India Company- The Company wanted to sell its goods at high prices and buy Indian products at low rates to make maximum profits. After 1800, India began to absorb textiles from English mills. Spain used Mercantilism for Colonialism- Spain attempted to expand the possibilities for trade within the empire, by allowing commerce between all ports in the empire and took other measures to revive economic activity to the benefit of Spain. Mercantilism helped the French in their colonial aspirations- French firms were authorized to ship to the colonies without further restrictions. 19th Century France controlled its colonies in Morocco, Algeria, Tunisia, Ivory Coast, Porto-Novo, French Guinea Mauritania, etc. Hence, with the above examples, we can see that Mercantilism and the associated policies of British imperial powers led to the spread of Colonialism. However, various revolutions, like the American Revolution, Rise of Nationalism in Africa and Asian nations led to the demise of these mercantilist motives and eventually the grip of colonial powers over Asian and African nations.
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##Question:To what extent Mercantilism was responsible for Colonialism? Analyze. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: Briefly define Mercantilism. Explain it as a system of state-regulated exploitation. Under Mercantilism: colonies were supposed to send to the mother country, etc. factors. With examples of British, Spanish, etc. exploitations, explain mercantilism vis-a-vis colonialism. Conclude with how far Mercantilsim shaped the Colonial empires of Europe. Answer: Mercantilism is a system of state-regulated exploitation through trade or the economic policy of the age of primitive accumulation. The term mercantilism usually applied to the policies and measures that the European states adopted between the 15th & 18th centuries to acquire wealth and power. Mercantilism being responsible for Colonialism: Mercantilism provided capital for European wealth. Under mercantilism, the colonies were supposed to send to the mother country raw natural resources. Colonies were not supposed to manufacture any goods, e.g. India was exploited. By mercantilism, nations frequently engaged their military might to ensure local markets and supply sources were protected, to support the idea that a nation’s economic health heavily relied on its supply of capital. Unjust and exploitative laws- England introduced fiscal policies that discouraged colonists from buying foreign products while creating incentives to only buy British goods. The sugar Act of 1764 raised duties on foreign refined sugar and molasses imported by the colonies. Mercantilism of East India Company- The Company wanted to sell its goods at high prices and buy Indian products at low rates to make maximum profits. After 1800, India began to absorb textiles from English mills. Spain used Mercantilism for Colonialism- Spain attempted to expand the possibilities for trade within the empire, by allowing commerce between all ports in the empire and took other measures to revive economic activity to the benefit of Spain. Mercantilism helped the French in their colonial aspirations- French firms were authorized to ship to the colonies without further restrictions. 19th Century France controlled its colonies in Morocco, Algeria, Tunisia, Ivory Coast, Porto-Novo, French Guinea Mauritania, etc. Hence, with the above examples, we can see that Mercantilism and the associated policies of British imperial powers led to the spread of Colonialism. However, various revolutions, like the American Revolution, Rise of Nationalism in Africa and Asian nations led to the demise of these mercantilist motives and eventually the grip of colonial powers over Asian and African nations.
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उत्पादन से आप क्या समझते हैं? उत्पादन के विभिन्न साधनों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by production? Discuss various factor of production. (150-200 words/10 marks)
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Approach उत्पादन को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। उत्पादन के विभिन्न साधनों को सूचीबद्ध कीजिए। उत्पादन के विभिन्न साधनों की चर्चा कीजिए। उत्पादन के महत्व को लिखते हुए निष्कर्ष लिख सकते है। उत्तर : उत्पादन Input (कच्चे माल) को तैयार माल में परिवर्तित करने की एक प्रक्रिया है। उत्पादन का अर्थ है माल और सेवाओं का निर्माण। यह मानव की इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। उत्पादन के विभिन्न साधन - भूमि यह उन सभी प्राकृतिक संसाधनों को संदर्भित करता है जो प्रकृति के मुफ्त उपहार हैं। इसलिए, भूमि में मानव जाति के लिए उपलब्ध प्रकृति के सभी उपहार शामिल हैं। सतह पर और सतह के नीचे, जैसे, मिट्टी, नदियाँ, जल, जंगल, पहाड़, खदान, रेगिस्तान, समुद्र, जलवायु, वर्षा, वायु, सूर्य, आदि। श्रम आय अर्जित करने के उद्देश्य से मानसिक या शारीरिक रूप से किए गए मानवीय प्रयासों को श्रम के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार, श्रम उत्पादन की प्रक्रिया में मानव का शारीरिक या मानसिक प्रयास है। पूंजी पूंजी, तीसरा एजेंट या कारक पिछले श्रम का परिणाम है और इसका उपयोग अधिक माल का उत्पादन करने के लिए किया जाता है। उद्यमशीलता एक उद्यमी वह व्यक्ति होता है जो अन्य कारकों को व्यवस्थित करता है और उत्पादन में शामिल जोखिमों और अनिश्चितताओं को पूरा करता है। वह अन्य तीन कारकों को काम पर रखता है, उन्हें एक साथ लाता है, उन्हें व्यवस्थित करता है और उनका समन्वय करता है ताकि अधिकतम लाभ कमाया जा सके। उत्पादन के चारों कारक से मिलकर जो लागत आती है उसे कारक लागत कहा जाता है। उत्पादन प्रक्रिया से अर्थव्यवस्था गतिशील होती है।
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##Question:उत्पादन से आप क्या समझते हैं? उत्पादन के विभिन्न साधनों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by production? Discuss various factor of production. (150-200 words/10 marks)##Answer:Approach उत्पादन को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। उत्पादन के विभिन्न साधनों को सूचीबद्ध कीजिए। उत्पादन के विभिन्न साधनों की चर्चा कीजिए। उत्पादन के महत्व को लिखते हुए निष्कर्ष लिख सकते है। उत्तर : उत्पादन Input (कच्चे माल) को तैयार माल में परिवर्तित करने की एक प्रक्रिया है। उत्पादन का अर्थ है माल और सेवाओं का निर्माण। यह मानव की इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। उत्पादन के विभिन्न साधन - भूमि यह उन सभी प्राकृतिक संसाधनों को संदर्भित करता है जो प्रकृति के मुफ्त उपहार हैं। इसलिए, भूमि में मानव जाति के लिए उपलब्ध प्रकृति के सभी उपहार शामिल हैं। सतह पर और सतह के नीचे, जैसे, मिट्टी, नदियाँ, जल, जंगल, पहाड़, खदान, रेगिस्तान, समुद्र, जलवायु, वर्षा, वायु, सूर्य, आदि। श्रम आय अर्जित करने के उद्देश्य से मानसिक या शारीरिक रूप से किए गए मानवीय प्रयासों को श्रम के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार, श्रम उत्पादन की प्रक्रिया में मानव का शारीरिक या मानसिक प्रयास है। पूंजी पूंजी, तीसरा एजेंट या कारक पिछले श्रम का परिणाम है और इसका उपयोग अधिक माल का उत्पादन करने के लिए किया जाता है। उद्यमशीलता एक उद्यमी वह व्यक्ति होता है जो अन्य कारकों को व्यवस्थित करता है और उत्पादन में शामिल जोखिमों और अनिश्चितताओं को पूरा करता है। वह अन्य तीन कारकों को काम पर रखता है, उन्हें एक साथ लाता है, उन्हें व्यवस्थित करता है और उनका समन्वय करता है ताकि अधिकतम लाभ कमाया जा सके। उत्पादन के चारों कारक से मिलकर जो लागत आती है उसे कारक लागत कहा जाता है। उत्पादन प्रक्रिया से अर्थव्यवस्था गतिशील होती है।
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सूचना के अधिकार अधिनियम की कमियों को इंगित करते हुए इन कमियों को दूर करने के लिए सुझाव प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Pointing out the shortcomings of the Right to Information Act, give suggestions to overcome these shortcomings. (150-200 words / 10 Marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में सूचना के अधिकार अधिनियम के बारे में संक्षेप में परिचय दीजिये| मुख्य भाग में सूचना के अधिकार अधिनियम की कमियों की चर्चा कीजिए| इन कमियों को दूर करने हेतु सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: लोकतंत्र को एक सूचित नागरिकता और सूचना की पारदर्शिता की आवश्यकता होती है, जो उसके कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होती है| शासितों के प्रति उत्तरदायी सरकारों और उनके उपकरणों का विशिष्ट महत्त्व होता है। RTI इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण उपकरण है| सूचना का अधिकार (RTI) आमतौर पर लोकतंत्र के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह नागरिकों की संप्रभुता को मजबूत करने का एक उपकरण है। यह मानव अधिकारों के मुख्य घटकों में से एक है। अधिनियम की सीमायें: प्रक्रिया की जटिलता के कारण सूचना प्राप्त करने के लिए किए गए आवेदन अधिकतर निरस्त हो जाते हैं। समय पर आयुक्तों की नियुक्ति नया होने के कारण सूचना याचनाओं को समय पर समायोजित करने की जटिलता उत्पन्न होती है। इससे प्रकरण लंबित होने लगते हैं। सतर्क नागरिक संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार सूचना आयोगों में लगभग 9 लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं। हालांकि सूचना अधिकार अधिनियम 2019 के द्वारा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को स्थिर करने का प्रावधान किया गया है। किन्तु अभी तक इसे व्यावहारिकता प्राप्त नहीं हो सकी है। आरटीआई 2019 के द्वारा केन्द्रीय सरकार की शक्ति में अधिक वृद्धि हुई है। यहाँ तक कि अब आयुक्तों की नियुक्ति और पदमुक्ति संघ सरकार की इच्छा पर निर्भर करेगी। सेवा निवृति की निश्चित आयु ना रखने के कारण आयुक्तों द्वारा असक्षम हो जाने के बावजूद पद पर बने रहने की इच्छाएं प्रबल होंगी। केन्द्रीय सूचना आयोगों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों का दर्जा दिया गया है किन्तु उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इससे आयुक्तों के अंदर हीन भावना व्याप्त होती है। शासकीय गोपनीयता का अधिकार और सूचना के अधिकार में कोई विभाजन रेखा निर्धारित नहीं की गई है। सुझाव: आरटीआई की प्रक्रिया को सरल और सामान्य लोगों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। लंबित प्रकरणों के समायोजन हेतु समय समय पर अतिरिक्त आयुक्तों की व्यवस्था होनी चाहिए। अर्थात जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में कार्यकारी न्यायदधीशों का उपबंध है। वैसे ही सूचना आयुक्त में भी प्रावधान होना चाहिए। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि जानकारी देने से केवल तभी मना किया जा सकता है जब दी जाने वाली जानकारी से सम्बद्ध प्राधिकरण या संगठन की संचालन प्रणाली में बाधा उत्पन्न हो या ऐसी जानकारी से देश की संप्रभुता एकता अखंडता या लोक व्यवस्था आदि में बाधा उत्पन्न होने की आशंका हो। श्रीकृष्ण आयोग ने संगठनात्मक जानकारी व व्यक्तिगत जानकारी के लिए अलग उपबंध करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। आयोग ने कहा कि डाटा सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किया जाए ताकि व्यक्तिगत गोपनीयता संबंधी जानकारी प्रसारित ना की जा सके। ऐसी स्थिति को देखते हुए श्री कृष्ण समिति ने वर्ष 2018 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि - "गोपनीयता का अधिकार और सूचना का अधिकार में विद्यमान द्वन्द्व को समाप्त करने की उपयुक्त व्यवस्था की जानी चाहिए। "
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##Question:सूचना के अधिकार अधिनियम की कमियों को इंगित करते हुए इन कमियों को दूर करने के लिए सुझाव प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Pointing out the shortcomings of the Right to Information Act, give suggestions to overcome these shortcomings. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में सूचना के अधिकार अधिनियम के बारे में संक्षेप में परिचय दीजिये| मुख्य भाग में सूचना के अधिकार अधिनियम की कमियों की चर्चा कीजिए| इन कमियों को दूर करने हेतु सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: लोकतंत्र को एक सूचित नागरिकता और सूचना की पारदर्शिता की आवश्यकता होती है, जो उसके कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होती है| शासितों के प्रति उत्तरदायी सरकारों और उनके उपकरणों का विशिष्ट महत्त्व होता है। RTI इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण उपकरण है| सूचना का अधिकार (RTI) आमतौर पर लोकतंत्र के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह नागरिकों की संप्रभुता को मजबूत करने का एक उपकरण है। यह मानव अधिकारों के मुख्य घटकों में से एक है। अधिनियम की सीमायें: प्रक्रिया की जटिलता के कारण सूचना प्राप्त करने के लिए किए गए आवेदन अधिकतर निरस्त हो जाते हैं। समय पर आयुक्तों की नियुक्ति नया होने के कारण सूचना याचनाओं को समय पर समायोजित करने की जटिलता उत्पन्न होती है। इससे प्रकरण लंबित होने लगते हैं। सतर्क नागरिक संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार सूचना आयोगों में लगभग 9 लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं। हालांकि सूचना अधिकार अधिनियम 2019 के द्वारा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को स्थिर करने का प्रावधान किया गया है। किन्तु अभी तक इसे व्यावहारिकता प्राप्त नहीं हो सकी है। आरटीआई 2019 के द्वारा केन्द्रीय सरकार की शक्ति में अधिक वृद्धि हुई है। यहाँ तक कि अब आयुक्तों की नियुक्ति और पदमुक्ति संघ सरकार की इच्छा पर निर्भर करेगी। सेवा निवृति की निश्चित आयु ना रखने के कारण आयुक्तों द्वारा असक्षम हो जाने के बावजूद पद पर बने रहने की इच्छाएं प्रबल होंगी। केन्द्रीय सूचना आयोगों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों का दर्जा दिया गया है किन्तु उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इससे आयुक्तों के अंदर हीन भावना व्याप्त होती है। शासकीय गोपनीयता का अधिकार और सूचना के अधिकार में कोई विभाजन रेखा निर्धारित नहीं की गई है। सुझाव: आरटीआई की प्रक्रिया को सरल और सामान्य लोगों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। लंबित प्रकरणों के समायोजन हेतु समय समय पर अतिरिक्त आयुक्तों की व्यवस्था होनी चाहिए। अर्थात जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में कार्यकारी न्यायदधीशों का उपबंध है। वैसे ही सूचना आयुक्त में भी प्रावधान होना चाहिए। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि जानकारी देने से केवल तभी मना किया जा सकता है जब दी जाने वाली जानकारी से सम्बद्ध प्राधिकरण या संगठन की संचालन प्रणाली में बाधा उत्पन्न हो या ऐसी जानकारी से देश की संप्रभुता एकता अखंडता या लोक व्यवस्था आदि में बाधा उत्पन्न होने की आशंका हो। श्रीकृष्ण आयोग ने संगठनात्मक जानकारी व व्यक्तिगत जानकारी के लिए अलग उपबंध करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। आयोग ने कहा कि डाटा सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किया जाए ताकि व्यक्तिगत गोपनीयता संबंधी जानकारी प्रसारित ना की जा सके। ऐसी स्थिति को देखते हुए श्री कृष्ण समिति ने वर्ष 2018 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि - "गोपनीयता का अधिकार और सूचना का अधिकार में विद्यमान द्वन्द्व को समाप्त करने की उपयुक्त व्यवस्था की जानी चाहिए। "
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महिला सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं ? महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयासरत विभिन्न महिला संगठनों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by women empowerment? Discuss the example of various women"s organizations striving towards women"s empowerment. (150–200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में महिला सशक्तिकरण को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयासरत विभिन्न महिला संगठनों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। 3- अंतिम में इन महिला संगठनों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण भी महिलाओं के संदर्भ में उसी क्षमता क्षमता का विकास करना है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो। महिलाओं का यह सशक्तिकरण उनके जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों में अपेक्षित होता है। इसमें सामाजिक सशक्तिकरण, आर्थिक सशक्तिकरण के साथ साथ राजनैतिक सशक्तिकरण भी शामिल होता है। सामाजिक सशक्तिकरण में महिलाओं की सामाजिक प्रस्थिति में सुधार किया जाता है जिसमें सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता, सुरक्षा स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों में वृद्धि, वेतन समानता द्वारा किया जाता है। राजनैतिक सशक्तिकरण में लोकतान्त्रिक संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में वृद्धि की जाती है। महिला संगठन महिला संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनों से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महिलाओं की सहभागिता को प्रोत्साहित कर रहे हैं यह सहभागिता उनके आर्थिक सशक्तिकरण, अधिकारों को सुनिश्चित करने, सामाजिक सोच को बदलने इत्यादि सन्दर्भों में हो सकती है सैद्धांतिक रूप से निम्न तीन प्रकार के महिला संगठन पाए जाते हैं यथा पहले- ऐसे महिला संगठन जो केंद्र या राज्य सरकारों का अंग होते हुए सशक्तिकरण हेतु प्रतिबद्ध हैं उदाहरणार्थ राष्ट्रीय महिला आयोग, आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस आदि दूसरे- वे महिला संगठन जो स्ववित्तपोषित होते हुए या CSR द्वारा दिए गए अंशदान इत्यादि के सहयोग से सशक्तिकरण को सुनिश्चित कर रहे हैं उदाहरणार्थ SEWA, आपन समाचार, गुलाबी गैंग, रेड रिबन समूह आदि तीसरे, वे नारी संगठन हैं जो स्वउद्यमिता द्वारा सार्वजनिक दृष्टिकोण को बदलने में सफल सिद्ध हो रहे हैं| उदाहरणार्थ कॉर्पोरेट जगत में अपनी पहचान बनाती हुई महिलायें, पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं का बढ़ता प्रभाव इत्यादि| छवि राजावत जो राजस्थान में पंचायती राज में आधारभूत परिवर्तन लाने में सफल रही हैं महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयासरत विभिन्न महिला संगठन SEWA(सेल्फ एम्पलॉयड वीमेन एसोसिएशन)- यह संस्थान महिलाओं को कौशल-प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहयोग द्वारा सशक्तिकृत कर रहा है आपन समाचार- यह महिलाओं के संदर्भ में जागरूकता हेतु संकल्पित टीवी चैनल है जो सशक्तिकरण की दिशा में एक दबाव समूह की भूमिका भी निभा रहा है गुलाबी गैंग- यह महिला संगठन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को ना सिर्फ आश्रय अपितु साथ ही रोजगार आदि के विकल्प द्वारा सशक्तिकृत करने के प्रयास कर रहा है| खादी ग्रामोद्योग- यह संगठन ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहायता सुलभ करवाता है तथा उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों हेतु बाजार भी उपलब्ध करवाता है रेड रिबन ग्रुप- यह महिला संगठन HIV एवं गर्भनिरोधकों के संदर्भ में जागरूकता तथा सेक्स-वर्कर्स के पुनर्स्थापना की दिशा में कार्यरत है| भारतीय संदर्भ में 2007 में उज्जवला स्कीम के अंतर्गत ऐसी वंचित महिलाओं के बचाव एवं उनके पुनर्स्थापन हेतु अतिरिक्त प्रयास किये जाने की दिशा में कार्यरत है| वर्तमान में ऐसी वंचित महिलाओं हेतु करीब 220 स्वआधार केंद्र बनाए गए हैं| तथा इन्हें मुख्य महिला हेल्पलाइन से जोड़ा गया है महिला संगठन महिलाओं की एक संयुक्त आवाज़ बनकर महिला अधिकारों के लिए प्रयास करते हैं। ये ना केवल महिलाओं से सीधे जुड़कर उनके विकास के लिए कार्य करते हैं बल्कि सरकार पर दबाव बनाकर महिला उन्मुख योजनाओं कार्यक्रमों के संचालन हेतु प्रेरित भी करते हैं।
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##Question:महिला सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं ? महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयासरत विभिन्न महिला संगठनों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by women empowerment? Discuss the example of various women"s organizations striving towards women"s empowerment. (150–200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में महिला सशक्तिकरण को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयासरत विभिन्न महिला संगठनों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। 3- अंतिम में इन महिला संगठनों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण भी महिलाओं के संदर्भ में उसी क्षमता क्षमता का विकास करना है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो। महिलाओं का यह सशक्तिकरण उनके जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों में अपेक्षित होता है। इसमें सामाजिक सशक्तिकरण, आर्थिक सशक्तिकरण के साथ साथ राजनैतिक सशक्तिकरण भी शामिल होता है। सामाजिक सशक्तिकरण में महिलाओं की सामाजिक प्रस्थिति में सुधार किया जाता है जिसमें सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता, सुरक्षा स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों में वृद्धि, वेतन समानता द्वारा किया जाता है। राजनैतिक सशक्तिकरण में लोकतान्त्रिक संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में वृद्धि की जाती है। महिला संगठन महिला संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनों से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महिलाओं की सहभागिता को प्रोत्साहित कर रहे हैं यह सहभागिता उनके आर्थिक सशक्तिकरण, अधिकारों को सुनिश्चित करने, सामाजिक सोच को बदलने इत्यादि सन्दर्भों में हो सकती है सैद्धांतिक रूप से निम्न तीन प्रकार के महिला संगठन पाए जाते हैं यथा पहले- ऐसे महिला संगठन जो केंद्र या राज्य सरकारों का अंग होते हुए सशक्तिकरण हेतु प्रतिबद्ध हैं उदाहरणार्थ राष्ट्रीय महिला आयोग, आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस आदि दूसरे- वे महिला संगठन जो स्ववित्तपोषित होते हुए या CSR द्वारा दिए गए अंशदान इत्यादि के सहयोग से सशक्तिकरण को सुनिश्चित कर रहे हैं उदाहरणार्थ SEWA, आपन समाचार, गुलाबी गैंग, रेड रिबन समूह आदि तीसरे, वे नारी संगठन हैं जो स्वउद्यमिता द्वारा सार्वजनिक दृष्टिकोण को बदलने में सफल सिद्ध हो रहे हैं| उदाहरणार्थ कॉर्पोरेट जगत में अपनी पहचान बनाती हुई महिलायें, पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं का बढ़ता प्रभाव इत्यादि| छवि राजावत जो राजस्थान में पंचायती राज में आधारभूत परिवर्तन लाने में सफल रही हैं महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रयासरत विभिन्न महिला संगठन SEWA(सेल्फ एम्पलॉयड वीमेन एसोसिएशन)- यह संस्थान महिलाओं को कौशल-प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहयोग द्वारा सशक्तिकृत कर रहा है आपन समाचार- यह महिलाओं के संदर्भ में जागरूकता हेतु संकल्पित टीवी चैनल है जो सशक्तिकरण की दिशा में एक दबाव समूह की भूमिका भी निभा रहा है गुलाबी गैंग- यह महिला संगठन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को ना सिर्फ आश्रय अपितु साथ ही रोजगार आदि के विकल्प द्वारा सशक्तिकृत करने के प्रयास कर रहा है| खादी ग्रामोद्योग- यह संगठन ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहायता सुलभ करवाता है तथा उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों हेतु बाजार भी उपलब्ध करवाता है रेड रिबन ग्रुप- यह महिला संगठन HIV एवं गर्भनिरोधकों के संदर्भ में जागरूकता तथा सेक्स-वर्कर्स के पुनर्स्थापना की दिशा में कार्यरत है| भारतीय संदर्भ में 2007 में उज्जवला स्कीम के अंतर्गत ऐसी वंचित महिलाओं के बचाव एवं उनके पुनर्स्थापन हेतु अतिरिक्त प्रयास किये जाने की दिशा में कार्यरत है| वर्तमान में ऐसी वंचित महिलाओं हेतु करीब 220 स्वआधार केंद्र बनाए गए हैं| तथा इन्हें मुख्य महिला हेल्पलाइन से जोड़ा गया है महिला संगठन महिलाओं की एक संयुक्त आवाज़ बनकर महिला अधिकारों के लिए प्रयास करते हैं। ये ना केवल महिलाओं से सीधे जुड़कर उनके विकास के लिए कार्य करते हैं बल्कि सरकार पर दबाव बनाकर महिला उन्मुख योजनाओं कार्यक्रमों के संचालन हेतु प्रेरित भी करते हैं।
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जब विधि के द्वारा नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में नैतिक दुविधा का निराकरण संभव ना हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है| इस संदर्भ में, नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि और अंतरात्मा के महत्व को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) When it is not possible to resolve the ethical dilemma through law as a source of moral guidance, one looks to the conscience. In this context, explain the importance of law and conscience as sources of ethical guidance. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच नैतिक मार्गदर्शन के विभिन्न स्रोत का उल्लेख करते हुए उत्तर का आरंभ कीजिए| मुख्य भाग में,नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि और अंतरात्मा के महत्व को स्पष्ट कीजिए| इस संदर्भ में, एक प्रभावी निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - नैतिक दुविधा के समाधान हेतु नैतिक मार्गदर्शन का होना आवश्यक है| नैतिक मार्गदर्शनके स्रोत के रूप मेंआचरण संहिता(कोड ऑफ कंडक्ट) एवं नीतिपरक आचार संहिता(कोड ऑफ एथिक्स) के साथ-साथविधि एवं अंतरात्मा को रखा जाता है| विधि का आशय समाज/संगठन में विद्यमान परंपराओं, प्रथाओं, मान्यताओं एवं नियम और विनियम के समुच्चय से है जोकि समाज/संगठन के प्रत्येक सदस्य के लिए बाध्यकारी होता है| विधिसंहिताकृत या गैर-संहिताकृत हो सकती है| प्रत्येक विधिनैतिक मूल्यों का एक संहिताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियमितकरता है एवं सामाजिक व्यवस्था स्वतः अपने आप में समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर करती है| अतः विधि नैतिकता को विनियमितकरती है एवंनैतिकता स्वतः अपने आप में विधि को विनियमितकरती है| नीतिशास्त्र मानकों का एक समुच्चय है जोकि विशिष्ट संदर्भ में व्यक्ति के व्यवहार, क्रियाशीलता या चयन को नियमित करती है| अतःनीतिशास्त्र मानकों का एक समुच्चय होने के कारण अंततः विधि को दर्शातीहै| नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि औरअंतरात्माका महत्व विधि और नीतिशास्त्र के बीच सामंजस्य और अंतर्विरोध इन दोनों प्रकार के परिस्थितियों को देखा जा सकता है| विधि के अंतर्गत कोई व्यक्ति दोषी करार तब होता है जब वह किसी के अधिकारों का उल्लंघन करता है जबकि नीतिशास्त्र में व्यक्ति दोषी तब होता है जब वह किसी अन्य के अधिकारों के उल्लंघन के बारे में सोचता है| विधि का अनुपालन व्यक्ति को एक अच्छा नागरिक बनाता है जबकि किसी व्यक्ति केअच्छा मानव प्राणी बनने हेतु नीतिशास्त्र या नैतिकता का विशेष महत्त्व है| अतः, अच्छा इंसान तथा अच्छा नागरिक के मानक एक दूसरे से भिन्न हैं परंतु एक अच्छे नागरिक के अच्छे इंसान बनने की संभावनाएं अधिक हैं| एवं इसी प्रकार से एक अच्छे इंसान के अच्छे नागरिक बनने की संभावनाएं अधिक हैं| विधि के उचित या अनुचित होने का चर्चा करने का कोई औचित्य नहीं हैक्योंकि कानून तो कानून होता है| कानून का निर्माण लोकप्राधिकारी के द्वारा किया जाता है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है| अतः विधि/कानून का अनुपालन कोई सुझाव ना होकर यह बाध्यकारी होता है| न्यायालय के द्वारा विधि काविश्लेषणकरते समय वैधानिकता एवं नैतिकता इन दोनों पहलुओं पर बल दिया जाता है| मौजूदा विधि का संशोधन भी समाज के परिवर्तनशील नैतिक मूल्यों के अनुरूप होती है| विभिन्न देशों में विभिन्न कानूनों का होना स्वतः अपनेआप में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के प्रभाव को दर्शाती है| प्रत्येक विधि के 2 भाग/आयाम हैं - विधि को मान्य होना चाहिए - वैधानिकता का पक्ष; विधि का मूल्य होना चाहिए - नैतिकता का पक्ष; प्रत्येक विधि सैद्धांतिक एवं नीतिगत पहलुओं को शामिलकरती है जोकि क्रमशः वैधानिकता एवं नैतिकता को दर्शाती है| जब विधि नैतिक दुविधा के समाधान हेतु नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में अपना योगदान नहीं दे पाता है तो व्यक्तिअंतरात्मा की ओर देखता है | विधि नैतिक मार्गदर्शन का एक बाहरी स्रोत है जबकि अंतरात्मा नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्रोत है| अंतरात्मा कोई भावना/अनुभूति ना होकर तार्किक विश्लेषण एवं बुद्धिमता पर आधारित होती है जिसका विकासएक लंबे समय का परिणाम होता है| मानवीय आचरण या क्रियाशीलता की नैतिकता का बाहरीआंकलनविधि के अनुपालन के आधार पर किया जाता है जबकि आंतरिक रूप से यह अंतरात्मा के आधार प रकिया जाता है जोकि व्यक्ति के अंदर होता है| विधि का आशय मानवीय क्रियाशीलताओं से संबंधित सामान्य नियम से है जबकि अंतरात्मा विशिष्ट क्रियाशीलता हेतु व्यवहारिक नियम को प्रस्तावित करती है| अतःविधि की तुलना में अंतरात्मा आधिक व्यापकहोती है| महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से कोई उच्चतर अपील का न्यायालय नहीं होता है| अंतरात्मा मानव-प्राणी का मूलभूत लक्षणहै अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा की आवाज सुने क्योंकि अंतरात्मा नैतिक कानून के अनुरूप होती है ताकिइसके माध्यम से उसे नैतिक मार्गदर्शनप्राप्त हो सके| यह अंतरात्मा की आवाज को दर्शाती है जिसे विकसित करने हेतु अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना आवश्यक है जोकि नैतिक मूल्यों के विकास पर निर्भरकरती है और यह समाजीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अनाग है| व्यक्ति की मानसिक अवस्था मुख्यतः 3 स्तरों पर संचालितहोती है - चेतन अवस्थाजोकि वास्तविकता के सिधांत पर आधारित है| अचेतन अवस्थाजोकि सपनों के सिद्धांत पर आधारित है| अवचेतन अवस्थाजोकि अंतरात्मा को दर्शाती है और यह नैतिक मूल्यों पर आधारित होती है| जब व्यक्ति के द्वारा अपने अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना संभव नहीं हो पाता है तोव्यक्ति के लिए अंतरात्मा नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में कार्य नहीं कर पाती है एवं व्यक्तिअंतरात्मा के माध्यम से नैतिक दुविधाओं का निराकरण करने की स्थिति में नहीं हो पाता है जोकि अंतरात्मा के संकट को दर्शाती है| लोकसेवकों के लिए अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना अतिआवश्यकहै ताकि उनके द्वारा सही कार्य को सही तरीके से किया जाए| अंतरात्मा की आवाज को विकसित करने हेतु नैतिक मूल्यों को विकसित किया जाना आवश्यक है जोकि समाजीकरण की प्रक्रिया का एक परिणाम होता है जिसमें परिवार, शैक्षणिक संस्थान एवं समाज का विशेष योगदान होता है| नीतिशास्त्र कामूलभूत सिद्धांत यह है कि अच्छा बनो और अच्छा करो| यह स्वतः अपने आप में नैतिक मार्गदर्शन हेतु अंतरात्मा का भी आधार है|
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##Question:जब विधि के द्वारा नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में नैतिक दुविधा का निराकरण संभव ना हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है| इस संदर्भ में, नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि और अंतरात्मा के महत्व को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) When it is not possible to resolve the ethical dilemma through law as a source of moral guidance, one looks to the conscience. In this context, explain the importance of law and conscience as sources of ethical guidance. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच नैतिक मार्गदर्शन के विभिन्न स्रोत का उल्लेख करते हुए उत्तर का आरंभ कीजिए| मुख्य भाग में,नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि और अंतरात्मा के महत्व को स्पष्ट कीजिए| इस संदर्भ में, एक प्रभावी निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - नैतिक दुविधा के समाधान हेतु नैतिक मार्गदर्शन का होना आवश्यक है| नैतिक मार्गदर्शनके स्रोत के रूप मेंआचरण संहिता(कोड ऑफ कंडक्ट) एवं नीतिपरक आचार संहिता(कोड ऑफ एथिक्स) के साथ-साथविधि एवं अंतरात्मा को रखा जाता है| विधि का आशय समाज/संगठन में विद्यमान परंपराओं, प्रथाओं, मान्यताओं एवं नियम और विनियम के समुच्चय से है जोकि समाज/संगठन के प्रत्येक सदस्य के लिए बाध्यकारी होता है| विधिसंहिताकृत या गैर-संहिताकृत हो सकती है| प्रत्येक विधिनैतिक मूल्यों का एक संहिताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियमितकरता है एवं सामाजिक व्यवस्था स्वतः अपने आप में समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर करती है| अतः विधि नैतिकता को विनियमितकरती है एवंनैतिकता स्वतः अपने आप में विधि को विनियमितकरती है| नीतिशास्त्र मानकों का एक समुच्चय है जोकि विशिष्ट संदर्भ में व्यक्ति के व्यवहार, क्रियाशीलता या चयन को नियमित करती है| अतःनीतिशास्त्र मानकों का एक समुच्चय होने के कारण अंततः विधि को दर्शातीहै| नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि औरअंतरात्माका महत्व विधि और नीतिशास्त्र के बीच सामंजस्य और अंतर्विरोध इन दोनों प्रकार के परिस्थितियों को देखा जा सकता है| विधि के अंतर्गत कोई व्यक्ति दोषी करार तब होता है जब वह किसी के अधिकारों का उल्लंघन करता है जबकि नीतिशास्त्र में व्यक्ति दोषी तब होता है जब वह किसी अन्य के अधिकारों के उल्लंघन के बारे में सोचता है| विधि का अनुपालन व्यक्ति को एक अच्छा नागरिक बनाता है जबकि किसी व्यक्ति केअच्छा मानव प्राणी बनने हेतु नीतिशास्त्र या नैतिकता का विशेष महत्त्व है| अतः, अच्छा इंसान तथा अच्छा नागरिक के मानक एक दूसरे से भिन्न हैं परंतु एक अच्छे नागरिक के अच्छे इंसान बनने की संभावनाएं अधिक हैं| एवं इसी प्रकार से एक अच्छे इंसान के अच्छे नागरिक बनने की संभावनाएं अधिक हैं| विधि के उचित या अनुचित होने का चर्चा करने का कोई औचित्य नहीं हैक्योंकि कानून तो कानून होता है| कानून का निर्माण लोकप्राधिकारी के द्वारा किया जाता है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है| अतः विधि/कानून का अनुपालन कोई सुझाव ना होकर यह बाध्यकारी होता है| न्यायालय के द्वारा विधि काविश्लेषणकरते समय वैधानिकता एवं नैतिकता इन दोनों पहलुओं पर बल दिया जाता है| मौजूदा विधि का संशोधन भी समाज के परिवर्तनशील नैतिक मूल्यों के अनुरूप होती है| विभिन्न देशों में विभिन्न कानूनों का होना स्वतः अपनेआप में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के प्रभाव को दर्शाती है| प्रत्येक विधि के 2 भाग/आयाम हैं - विधि को मान्य होना चाहिए - वैधानिकता का पक्ष; विधि का मूल्य होना चाहिए - नैतिकता का पक्ष; प्रत्येक विधि सैद्धांतिक एवं नीतिगत पहलुओं को शामिलकरती है जोकि क्रमशः वैधानिकता एवं नैतिकता को दर्शाती है| जब विधि नैतिक दुविधा के समाधान हेतु नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में अपना योगदान नहीं दे पाता है तो व्यक्तिअंतरात्मा की ओर देखता है | विधि नैतिक मार्गदर्शन का एक बाहरी स्रोत है जबकि अंतरात्मा नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्रोत है| अंतरात्मा कोई भावना/अनुभूति ना होकर तार्किक विश्लेषण एवं बुद्धिमता पर आधारित होती है जिसका विकासएक लंबे समय का परिणाम होता है| मानवीय आचरण या क्रियाशीलता की नैतिकता का बाहरीआंकलनविधि के अनुपालन के आधार पर किया जाता है जबकि आंतरिक रूप से यह अंतरात्मा के आधार प रकिया जाता है जोकि व्यक्ति के अंदर होता है| विधि का आशय मानवीय क्रियाशीलताओं से संबंधित सामान्य नियम से है जबकि अंतरात्मा विशिष्ट क्रियाशीलता हेतु व्यवहारिक नियम को प्रस्तावित करती है| अतःविधि की तुलना में अंतरात्मा आधिक व्यापकहोती है| महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से कोई उच्चतर अपील का न्यायालय नहीं होता है| अंतरात्मा मानव-प्राणी का मूलभूत लक्षणहै अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा की आवाज सुने क्योंकि अंतरात्मा नैतिक कानून के अनुरूप होती है ताकिइसके माध्यम से उसे नैतिक मार्गदर्शनप्राप्त हो सके| यह अंतरात्मा की आवाज को दर्शाती है जिसे विकसित करने हेतु अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना आवश्यक है जोकि नैतिक मूल्यों के विकास पर निर्भरकरती है और यह समाजीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अनाग है| व्यक्ति की मानसिक अवस्था मुख्यतः 3 स्तरों पर संचालितहोती है - चेतन अवस्थाजोकि वास्तविकता के सिधांत पर आधारित है| अचेतन अवस्थाजोकि सपनों के सिद्धांत पर आधारित है| अवचेतन अवस्थाजोकि अंतरात्मा को दर्शाती है और यह नैतिक मूल्यों पर आधारित होती है| जब व्यक्ति के द्वारा अपने अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना संभव नहीं हो पाता है तोव्यक्ति के लिए अंतरात्मा नैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में कार्य नहीं कर पाती है एवं व्यक्तिअंतरात्मा के माध्यम से नैतिक दुविधाओं का निराकरण करने की स्थिति में नहीं हो पाता है जोकि अंतरात्मा के संकट को दर्शाती है| लोकसेवकों के लिए अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना अतिआवश्यकहै ताकि उनके द्वारा सही कार्य को सही तरीके से किया जाए| अंतरात्मा की आवाज को विकसित करने हेतु नैतिक मूल्यों को विकसित किया जाना आवश्यक है जोकि समाजीकरण की प्रक्रिया का एक परिणाम होता है जिसमें परिवार, शैक्षणिक संस्थान एवं समाज का विशेष योगदान होता है| नीतिशास्त्र कामूलभूत सिद्धांत यह है कि अच्छा बनो और अच्छा करो| यह स्वतः अपने आप में नैतिक मार्गदर्शन हेतु अंतरात्मा का भी आधार है|
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए इसमें उल्लेखित समाजवाद व पंथ निरपेक्षता को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) While presenting a brief introduction to the Preamble of the Indian Constitution, clarify the socialism and secularism mentioned in it. (150-200 words / 10 Marks)
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Approach: भूमिका में प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। समाजवाद एवं पंथ निरपेक्षता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में प्रस्तावना के महत्व की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान की प्रस्तावना संप्रभुत्व सम्पन्न स्वतंत्र भारत की पहचान कराती है।यह भारतीय संविधान का दर्शन है। यह संविधान की मूल संरचना और भावना का प्रतिनिधित्व करती है, प्रस्तावना - 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा रखा गया इसे उद्देश्य प्रस्ताव कहा गया। इसमें संशोधन करते हुए 42 वें संशोधन द्वारा इसमें पंथ निरपेक्ष, समाजवादी व अखंडता शब्द जोड़े गए। संविधान की शक्ति का स्रोत - भारत की जनता भारत की प्रकृति - समाजवादी संविधान के उद्देश्य - सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय संविधान लागू होने की तिथि - 26 नवम्बर 1949 उद्देश्य, लक्ष्य और अंतिम परिणाम यह देश की समस्याओं के समाधान की कुंजी है। प्रस्तावना का महत्व यह संविधान की मूल संरचना और आत्मा को दर्शाती है। संविधान को दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है। समाजवाद : भारतीय समाजवाद एक ऐसा लोकतान्त्रिक समाजवाद है जो समाज की फेबियन विचारधारा व गाँधीवाद से जुड़ी है। फेबियन समाजवाद लोकतान्त्रिक तरीके से वृहद उद्योगों के साथ आर्थिक विकास पर बल देता है। इसमें समय के साथ शांतिपूर्ण तरीकों से सुधार के कार्यक्रम लागू किए जाते है। गांधी वादी समाजवाद आत्मनिर्भर समाज की स्थापना करता है। इसलिए लिए ग्रामीण स्तर पर लघु एवं कुटीर उद्योगों के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल पर बल देता है। लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में जिस उदार लोकतान्त्रिक समाजवाद को अपनाया है। उससे संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14,16 38, 39(b) 39(c) आदि में दिए गए हैं। उनके अलावा 31(a) व 31(b) के माध्यम से भी समाजवाद पर बल दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1946 में एयर इंडिया विधिक संगठन बनाम भारत संघ के वाद में भारतीय समाजवाद की व्याख्या की। विधि के शासन के आधार पर समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना संविधान की आधारभूत विशेषता है। इसी प्रकार जी. वी पंत केस में लोकतान्त्रिक समाजवाद पर बल दिया। लोकतान्त्रिक समाजवाद भारत में गरीबी, असमानता को दूर करने के लिए लाया गया है। पंथनिरपेक्षता/धर्म निरपेक्षता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19, 21, 25-28, व 44 मुख्यतया पंथनिरपेक्षता से जुड़े। भारतीय धर्मनिरपेक्षता एक सकारात्मक अवधारणा है जिसे जीवन दर्शन से जोड़ा गया है। इनमें मानवाधिकार तथा मानवीय मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अनुसार राज्य न तो किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देगा और ना ही व्यवधान उत्पन्न करेगा। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सहिष्णुता व मानवता पर आधारित है। इसमें धर्म की स्वतन्त्रता व धर्म से स्वतंत्रता दोनों को ही स्वीकार गया है। भारतीय व पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की तुलना। 1994 के बोममाई केस में धमनिरपेक्षता को आधार बहुत लक्षण घोषित किया। धर्मनिरपेक्षता को संविधान के दर्शन का हिस्सा माना। इन सभी वास्तविकताओं के बावजूद भारत में छद्म धर्म निरपेक्षता का मुद्दा विवाद का केंद्र सैद्धांतिक दूरी प्रारूप अपनाए जाने के बावजुद धर्म निरपेक्षता की अवधारणा विवादों में आती है। हज यात्रा, कैलाश मानसरोवर यात्रा आदि विवाद को जन्म देती है। कभी कभी न्यायपालिका के निर्णय भी विवाद में योगदान देते हैं। -प्रभु बनाम कुंते वाद देश के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु एक कुंजी के रूप में कार्य करती है।
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##Question:भारतीय संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए इसमें उल्लेखित समाजवाद व पंथ निरपेक्षता को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) While presenting a brief introduction to the Preamble of the Indian Constitution, clarify the socialism and secularism mentioned in it. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। समाजवाद एवं पंथ निरपेक्षता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में प्रस्तावना के महत्व की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान की प्रस्तावना संप्रभुत्व सम्पन्न स्वतंत्र भारत की पहचान कराती है।यह भारतीय संविधान का दर्शन है। यह संविधान की मूल संरचना और भावना का प्रतिनिधित्व करती है, प्रस्तावना - 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा रखा गया इसे उद्देश्य प्रस्ताव कहा गया। इसमें संशोधन करते हुए 42 वें संशोधन द्वारा इसमें पंथ निरपेक्ष, समाजवादी व अखंडता शब्द जोड़े गए। संविधान की शक्ति का स्रोत - भारत की जनता भारत की प्रकृति - समाजवादी संविधान के उद्देश्य - सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय संविधान लागू होने की तिथि - 26 नवम्बर 1949 उद्देश्य, लक्ष्य और अंतिम परिणाम यह देश की समस्याओं के समाधान की कुंजी है। प्रस्तावना का महत्व यह संविधान की मूल संरचना और आत्मा को दर्शाती है। संविधान को दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है। समाजवाद : भारतीय समाजवाद एक ऐसा लोकतान्त्रिक समाजवाद है जो समाज की फेबियन विचारधारा व गाँधीवाद से जुड़ी है। फेबियन समाजवाद लोकतान्त्रिक तरीके से वृहद उद्योगों के साथ आर्थिक विकास पर बल देता है। इसमें समय के साथ शांतिपूर्ण तरीकों से सुधार के कार्यक्रम लागू किए जाते है। गांधी वादी समाजवाद आत्मनिर्भर समाज की स्थापना करता है। इसलिए लिए ग्रामीण स्तर पर लघु एवं कुटीर उद्योगों के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल पर बल देता है। लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में जिस उदार लोकतान्त्रिक समाजवाद को अपनाया है। उससे संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14,16 38, 39(b) 39(c) आदि में दिए गए हैं। उनके अलावा 31(a) व 31(b) के माध्यम से भी समाजवाद पर बल दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1946 में एयर इंडिया विधिक संगठन बनाम भारत संघ के वाद में भारतीय समाजवाद की व्याख्या की। विधि के शासन के आधार पर समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना संविधान की आधारभूत विशेषता है। इसी प्रकार जी. वी पंत केस में लोकतान्त्रिक समाजवाद पर बल दिया। लोकतान्त्रिक समाजवाद भारत में गरीबी, असमानता को दूर करने के लिए लाया गया है। पंथनिरपेक्षता/धर्म निरपेक्षता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19, 21, 25-28, व 44 मुख्यतया पंथनिरपेक्षता से जुड़े। भारतीय धर्मनिरपेक्षता एक सकारात्मक अवधारणा है जिसे जीवन दर्शन से जोड़ा गया है। इनमें मानवाधिकार तथा मानवीय मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अनुसार राज्य न तो किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देगा और ना ही व्यवधान उत्पन्न करेगा। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सहिष्णुता व मानवता पर आधारित है। इसमें धर्म की स्वतन्त्रता व धर्म से स्वतंत्रता दोनों को ही स्वीकार गया है। भारतीय व पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की तुलना। 1994 के बोममाई केस में धमनिरपेक्षता को आधार बहुत लक्षण घोषित किया। धर्मनिरपेक्षता को संविधान के दर्शन का हिस्सा माना। इन सभी वास्तविकताओं के बावजूद भारत में छद्म धर्म निरपेक्षता का मुद्दा विवाद का केंद्र सैद्धांतिक दूरी प्रारूप अपनाए जाने के बावजुद धर्म निरपेक्षता की अवधारणा विवादों में आती है। हज यात्रा, कैलाश मानसरोवर यात्रा आदि विवाद को जन्म देती है। कभी कभी न्यायपालिका के निर्णय भी विवाद में योगदान देते हैं। -प्रभु बनाम कुंते वाद देश के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु एक कुंजी के रूप में कार्य करती है।
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए इसमें उल्लेखित समाजवाद व पंथ निरपेक्षता को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) While presenting a brief introduction to the Preamble of the Indian Constitution, clarify the socialism and secularism mentioned in it. (150-200 words / 10 Marks)
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Approach: भूमिका में प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। समाजवाद एवं पंथ निरपेक्षता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में प्रस्तावना के महत्व की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान की प्रस्तावना संप्रभुत्व सम्पन्न स्वतंत्र भारत की पहचान कराती है।यह भारतीय संविधान का दर्शन है। यह संविधान की मूल संरचना और भावना का प्रतिनिधित्व करती है, प्रस्तावना - 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा रखा गया इसे उद्देश्य प्रस्ताव कहा गया। इसमें संशोधन करते हुए 42 वें संशोधन द्वारा इसमें पंथ निरपेक्ष, समाजवादी व अखंडता शब्द जोड़े गए। संविधान की शक्ति का स्रोत - भारत की जनता भारत की प्रकृति - समाजवादी संविधान के उद्देश्य - सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय संविधान लागू होने की तिथि - 26 नवम्बर 1949 उद्देश्य, लक्ष्य और अंतिम परिणाम यह देश की समस्याओं के समाधान की कुंजी है। प्रस्तावना का महत्व यह संविधान की मूल संरचना और आत्मा को दर्शाती है। संविधान को दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है। समाजवाद : भारतीय समाजवाद एक ऐसा लोकतान्त्रिक समाजवाद है जो समाज की फेबियन विचारधारा व गाँधीवाद से जुड़ी है। फेबियन समाजवाद लोकतान्त्रिक तरीके से वृहद उद्योगों के साथ आर्थिक विकास पर बल देता है। इसमें समय के साथ शांतिपूर्ण तरीकों से सुधार के कार्यक्रम लागू किए जाते है। गांधी वादी समाजवाद आत्मनिर्भर समाज की स्थापना करता है। इसलिए लिए ग्रामीण स्तर पर लघु एवं कुटीर उद्योगों के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल पर बल देता है। लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में जिस उदार लोकतान्त्रिक समाजवाद को अपनाया है। उससे संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14,16 38, 39(b) 39(c) आदि में दिए गए हैं। उनके अलावा 31(a) व 31(b) के माध्यम से भी समाजवाद पर बल दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1946 में एयर इंडिया विधिक संगठन बनाम भारत संघ के वाद में भारतीय समाजवाद की व्याख्या की। विधि के शासन के आधार पर समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना संविधान की आधारभूत विशेषता है। इसी प्रकार जी. वी पंत केस में लोकतान्त्रिक समाजवाद पर बल दिया। लोकतान्त्रिक समाजवाद भारत में गरीबी, असमानता को दूर करने के लिए लाया गया है। पंथनिरपेक्षता/धर्म निरपेक्षता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19, 21, 25-28, व 44 मुख्यतया पंथनिरपेक्षता से जुड़े। भारतीय धर्मनिरपेक्षता एक सकारात्मक अवधारणा है जिसे जीवन दर्शन से जोड़ा गया है। इनमें मानवाधिकार तथा मानवीय मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अनुसार राज्य न तो किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देगा और ना ही व्यवधान उत्पन्न करेगा। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सहिष्णुता व मानवता पर आधारित है। इसमें धर्म की स्वतन्त्रता व धर्म से स्वतंत्रता दोनों को ही स्वीकार गया है। भारतीय व पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की तुलना। 1994 के बोममाई केस में धमनिरपेक्षता को आधार बहुत लक्षण घोषित किया। धर्मनिरपेक्षता को संविधान के दर्शन का हिस्सा माना। इन सभी वास्तविकताओं के बावजूद भारत में छद्म धर्म निरपेक्षता का मुद्दा विवाद का केंद्र सैद्धांतिक दूरी प्रारूप अपनाए जाने के बावजुद धर्म निरपेक्षता की अवधारणा विवादों में आती है। हज यात्रा, कैलाश मानसरोवर यात्रा आदि विवाद को जन्म देती है। कभी कभी न्यायपालिका के निर्णय भी विवाद में योगदान देते हैं। -प्रभु बनाम कुंते वाद देश के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु एक कुंजी के रूप में कार्य करती है।
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##Question:भारतीय संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए इसमें उल्लेखित समाजवाद व पंथ निरपेक्षता को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) While presenting a brief introduction to the Preamble of the Indian Constitution, clarify the socialism and secularism mentioned in it. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में प्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। समाजवाद एवं पंथ निरपेक्षता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में प्रस्तावना के महत्व की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान की प्रस्तावना संप्रभुत्व सम्पन्न स्वतंत्र भारत की पहचान कराती है।यह भारतीय संविधान का दर्शन है। यह संविधान की मूल संरचना और भावना का प्रतिनिधित्व करती है, प्रस्तावना - 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा रखा गया इसे उद्देश्य प्रस्ताव कहा गया। इसमें संशोधन करते हुए 42 वें संशोधन द्वारा इसमें पंथ निरपेक्ष, समाजवादी व अखंडता शब्द जोड़े गए। संविधान की शक्ति का स्रोत - भारत की जनता भारत की प्रकृति - समाजवादी संविधान के उद्देश्य - सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय संविधान लागू होने की तिथि - 26 नवम्बर 1949 उद्देश्य, लक्ष्य और अंतिम परिणाम यह देश की समस्याओं के समाधान की कुंजी है। प्रस्तावना का महत्व यह संविधान की मूल संरचना और आत्मा को दर्शाती है। संविधान को दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है। समाजवाद : भारतीय समाजवाद एक ऐसा लोकतान्त्रिक समाजवाद है जो समाज की फेबियन विचारधारा व गाँधीवाद से जुड़ी है। फेबियन समाजवाद लोकतान्त्रिक तरीके से वृहद उद्योगों के साथ आर्थिक विकास पर बल देता है। इसमें समय के साथ शांतिपूर्ण तरीकों से सुधार के कार्यक्रम लागू किए जाते है। गांधी वादी समाजवाद आत्मनिर्भर समाज की स्थापना करता है। इसलिए लिए ग्रामीण स्तर पर लघु एवं कुटीर उद्योगों के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल पर बल देता है। लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में जिस उदार लोकतान्त्रिक समाजवाद को अपनाया है। उससे संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14,16 38, 39(b) 39(c) आदि में दिए गए हैं। उनके अलावा 31(a) व 31(b) के माध्यम से भी समाजवाद पर बल दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1946 में एयर इंडिया विधिक संगठन बनाम भारत संघ के वाद में भारतीय समाजवाद की व्याख्या की। विधि के शासन के आधार पर समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना संविधान की आधारभूत विशेषता है। इसी प्रकार जी. वी पंत केस में लोकतान्त्रिक समाजवाद पर बल दिया। लोकतान्त्रिक समाजवाद भारत में गरीबी, असमानता को दूर करने के लिए लाया गया है। पंथनिरपेक्षता/धर्म निरपेक्षता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19, 21, 25-28, व 44 मुख्यतया पंथनिरपेक्षता से जुड़े। भारतीय धर्मनिरपेक्षता एक सकारात्मक अवधारणा है जिसे जीवन दर्शन से जोड़ा गया है। इनमें मानवाधिकार तथा मानवीय मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अनुसार राज्य न तो किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देगा और ना ही व्यवधान उत्पन्न करेगा। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सहिष्णुता व मानवता पर आधारित है। इसमें धर्म की स्वतन्त्रता व धर्म से स्वतंत्रता दोनों को ही स्वीकार गया है। भारतीय व पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की तुलना। 1994 के बोममाई केस में धमनिरपेक्षता को आधार बहुत लक्षण घोषित किया। धर्मनिरपेक्षता को संविधान के दर्शन का हिस्सा माना। इन सभी वास्तविकताओं के बावजूद भारत में छद्म धर्म निरपेक्षता का मुद्दा विवाद का केंद्र सैद्धांतिक दूरी प्रारूप अपनाए जाने के बावजुद धर्म निरपेक्षता की अवधारणा विवादों में आती है। हज यात्रा, कैलाश मानसरोवर यात्रा आदि विवाद को जन्म देती है। कभी कभी न्यायपालिका के निर्णय भी विवाद में योगदान देते हैं। -प्रभु बनाम कुंते वाद देश के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु एक कुंजी के रूप में कार्य करती है।
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अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के महत्त्व को रेखांकित कीजिए| साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के समक्ष किस तरह की समस्याएं या चुनौतियाँ विद्यमान हैं ? (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the importance of international ethics. Also, what kind of problems or challenges exist before international ethics. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में,अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के महत्त्व को बिंदुबार रेखांकित कीजिए| अंतिमभाग में,अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के समक्षविद्यमानसमस्याएं या चुनौतियों का उल्लेख कीजिए| उत्तर - अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परंपरागत अर्थव्यवस्था 3 तत्वों पर आधारित माना गया - स्वतंत्रता; विधिक समता एवं पारस्परिक| नवीन अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था तीन मूलभूत सिद्धांतों पर बल देती है -विकासशील देशों के हितों का संरक्षण; विकासशील देशों के प्रति प्राथमिकता पूर्ण व्यवहार; विकसित एवं विकासशील देशों के बीच या उनकेसंबंधमें गैर पारस्परिकता का होना| इन्हीं आयामों पर अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को देखा जाता है| अंतर्राष्ट्रीय संबंध के 2 आयाम हैं - परस्पर सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा/मतभेद/संघर्ष/अंतर्विरोध| अंतर्राष्ट्रीय संबंध में सहयोग का आधार भी मतभेद या संभावित मतभेद को कम करने का एक आधार होता है|सहयोग के संदर्भ में टिकाऊ विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना, आतंकवाद की चुनौती का सामना करना, जलवायु परिवर्तन एवं अन्य पर्यावरण संबंधी समस्या का निराकरण करना, मानवाधिकार का संरक्षण एवं प्रोत्साहन किया जाना आदि आयाम शामिल हैं| इन्हीं सहयोग के आयामों के साथ अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता का भी संदर्भ आता है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र निम्नांकित सिद्धांतों/मूल्यों के महत्त्व को उजागर करती है - प्रत्येक राष्ट्र की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का परस्पर सम्मान; परस्पर गैर आक्रामकता; एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का ना होना; समता एवं पारस्परिक लाभ; शांतिपूर्ण सहअस्तित्व; अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र का महत्त्व अंतर्राष्ट्रीय स्तर परविभिन्न राष्ट्रों के द्वारा अपने-अपने सकारात्मक योगदान को दिया जानातभी संभव होगा जब अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र पर विशेष बल दिया जाए| प्रत्येक राष्ट्र का कुछ भाग अन्य राष्ट्रों के संदर्भ में देखने को मिलता है| अतः प्रत्येक राष्ट्र के द्वारा अन्य राष्ट्रों के संदर्भ मेंउसी प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए जो वह राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अपेक्षाकरती है | यह प्रत्येक राष्ट्र के हित में है किअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समता, न्याय, शांति एवं सद्भाव को बनाकररखा जाए जोकि अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के महत्त्व को उजागर करती है विशेषकर विश्वव्यापीकरण के प्रभाव/परिणामस्वरूप; विभिन्न राष्ट्रों के बीच के फंडिंग को अधिक न्यायपूर्ण बनाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नैतिक मानकों का होना आवश्यकहै| जब विकसित देशों के द्वारा विकासशील देशोंमें निवेश किया जाता है तो यह निवेश दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होना चाहिए परंतु इसका अधिक लाभ विकासशील देशों को प्राप्त होना चाहिए| द्विपक्षीय सहयोग की तुलना में बहुलपक्षीय परस्पर सहयोग एवं फंडिंग पर ध्यानदिया जाना चाहिए क्योंकि इस प्रकार के फंडिंग मेंपारदर्शिता एवं जबावदेहिता की संभावनाएं अधिकहोती है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र व्यक्तियों कीपरिकल्पना एक विश्व नागरिक के रूप में करता है विशेषकर विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया में| जीवन के प्रति सम्मान अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र का एक आधारभूत लक्षण/विशेषता है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र प्रत्येक जीवन के सम्मान को लेकर विचार, व्यक्तव्य एवं व्यवहार में एकीकरण पर बल देती है जोकि सत्यनिष्ठा को दर्शाती है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के समक्ष समस्याएं/चुनौतियाँ विभिन्न राष्ट्रों के बीच नैतिक मूल्यों को लेकर एक मजबूत/प्रभावी सर्वसम्मति का अभाव/कमी का होना; नैतिकता वास्तविक होने पर भी इसकेमानक/मानदंडों को लेकर सर्वसम्मति का अभाव/कमी का होना; विभिन्न राष्ट्रों के द्वारा अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जाना विशेषकर राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखना;अगर राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता कर भी लिया जाए तो तो कोई देश राष्ट्रीय पहचान के साथ समझौता करने की स्थिति में नहीं आ पाता है| राष्ट्रीय पहचान प्रत्येक देश की मूलभूत मूल्यों को दर्शाती है| अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां घरेलू परिस्थितियों की तुलना में अधिक जटिल है जोकिअंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को अधिक चुनौतीपूर्णबनाती है| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी विश्व सरकार का न होना जिसके द्वारा नैतिक मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सके|इससंदर्भमें अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में UNO से इस भूमिका की अपेक्षा की जाती है| परंतु UNO की संरचना एवं कार्य प्रणाली स्वतः अपने आप में प्रजातांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है| अंतर्राष्ट्रीय स्तर परनैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि की तुलना में अंतरात्मा का विशेष महत्त्वहै परंतु इस संदर्भ में अंतरआत्मा की भूमिका भी सीमित हो जाती है क्योंकि विभिन्न राष्ट्रों के सामाजिक और नैतिक मूल्यों में भिन्नता का होना ; अतःअंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को मार्गदर्शित करने हेतु प्रभावी स्रोत की कमी का होनाइस समस्या को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाती है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के संदर्भ मेंप्रभुत्व का प्रभावदेखने को मिलता है| इसके परिणामस्वरूपअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नैतिक आचरण/व्यवहार के मानकों को सर्वसम्मति के आधार पर विकसित किया जाना संभव नहींहो पाता है| अंतर्राष्ट्रीय मानकों/मूल्यों के सामंजस्य को देश के आंतरिक सिद्धांतों एवं मूल्यों के साथ के सामंजस्य को स्थापित करना अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के लिए एक चुनौती है| उपर्युक्त चुनौतियों के बावजूद भी अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्त्व है|
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##Question:अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के महत्त्व को रेखांकित कीजिए| साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के समक्ष किस तरह की समस्याएं या चुनौतियाँ विद्यमान हैं ? (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the importance of international ethics. Also, what kind of problems or challenges exist before international ethics. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में,अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के महत्त्व को बिंदुबार रेखांकित कीजिए| अंतिमभाग में,अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के समक्षविद्यमानसमस्याएं या चुनौतियों का उल्लेख कीजिए| उत्तर - अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परंपरागत अर्थव्यवस्था 3 तत्वों पर आधारित माना गया - स्वतंत्रता; विधिक समता एवं पारस्परिक| नवीन अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था तीन मूलभूत सिद्धांतों पर बल देती है -विकासशील देशों के हितों का संरक्षण; विकासशील देशों के प्रति प्राथमिकता पूर्ण व्यवहार; विकसित एवं विकासशील देशों के बीच या उनकेसंबंधमें गैर पारस्परिकता का होना| इन्हीं आयामों पर अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को देखा जाता है| अंतर्राष्ट्रीय संबंध के 2 आयाम हैं - परस्पर सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा/मतभेद/संघर्ष/अंतर्विरोध| अंतर्राष्ट्रीय संबंध में सहयोग का आधार भी मतभेद या संभावित मतभेद को कम करने का एक आधार होता है|सहयोग के संदर्भ में टिकाऊ विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना, आतंकवाद की चुनौती का सामना करना, जलवायु परिवर्तन एवं अन्य पर्यावरण संबंधी समस्या का निराकरण करना, मानवाधिकार का संरक्षण एवं प्रोत्साहन किया जाना आदि आयाम शामिल हैं| इन्हीं सहयोग के आयामों के साथ अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता का भी संदर्भ आता है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र निम्नांकित सिद्धांतों/मूल्यों के महत्त्व को उजागर करती है - प्रत्येक राष्ट्र की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का परस्पर सम्मान; परस्पर गैर आक्रामकता; एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का ना होना; समता एवं पारस्परिक लाभ; शांतिपूर्ण सहअस्तित्व; अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र का महत्त्व अंतर्राष्ट्रीय स्तर परविभिन्न राष्ट्रों के द्वारा अपने-अपने सकारात्मक योगदान को दिया जानातभी संभव होगा जब अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र पर विशेष बल दिया जाए| प्रत्येक राष्ट्र का कुछ भाग अन्य राष्ट्रों के संदर्भ में देखने को मिलता है| अतः प्रत्येक राष्ट्र के द्वारा अन्य राष्ट्रों के संदर्भ मेंउसी प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए जो वह राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अपेक्षाकरती है | यह प्रत्येक राष्ट्र के हित में है किअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समता, न्याय, शांति एवं सद्भाव को बनाकररखा जाए जोकि अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के महत्त्व को उजागर करती है विशेषकर विश्वव्यापीकरण के प्रभाव/परिणामस्वरूप; विभिन्न राष्ट्रों के बीच के फंडिंग को अधिक न्यायपूर्ण बनाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नैतिक मानकों का होना आवश्यकहै| जब विकसित देशों के द्वारा विकासशील देशोंमें निवेश किया जाता है तो यह निवेश दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होना चाहिए परंतु इसका अधिक लाभ विकासशील देशों को प्राप्त होना चाहिए| द्विपक्षीय सहयोग की तुलना में बहुलपक्षीय परस्पर सहयोग एवं फंडिंग पर ध्यानदिया जाना चाहिए क्योंकि इस प्रकार के फंडिंग मेंपारदर्शिता एवं जबावदेहिता की संभावनाएं अधिकहोती है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र व्यक्तियों कीपरिकल्पना एक विश्व नागरिक के रूप में करता है विशेषकर विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया में| जीवन के प्रति सम्मान अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र का एक आधारभूत लक्षण/विशेषता है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र प्रत्येक जीवन के सम्मान को लेकर विचार, व्यक्तव्य एवं व्यवहार में एकीकरण पर बल देती है जोकि सत्यनिष्ठा को दर्शाती है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के समक्ष समस्याएं/चुनौतियाँ विभिन्न राष्ट्रों के बीच नैतिक मूल्यों को लेकर एक मजबूत/प्रभावी सर्वसम्मति का अभाव/कमी का होना; नैतिकता वास्तविक होने पर भी इसकेमानक/मानदंडों को लेकर सर्वसम्मति का अभाव/कमी का होना; विभिन्न राष्ट्रों के द्वारा अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जाना विशेषकर राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखना;अगर राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता कर भी लिया जाए तो तो कोई देश राष्ट्रीय पहचान के साथ समझौता करने की स्थिति में नहीं आ पाता है| राष्ट्रीय पहचान प्रत्येक देश की मूलभूत मूल्यों को दर्शाती है| अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां घरेलू परिस्थितियों की तुलना में अधिक जटिल है जोकिअंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को अधिक चुनौतीपूर्णबनाती है| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी विश्व सरकार का न होना जिसके द्वारा नैतिक मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सके|इससंदर्भमें अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में UNO से इस भूमिका की अपेक्षा की जाती है| परंतु UNO की संरचना एवं कार्य प्रणाली स्वतः अपने आप में प्रजातांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है| अंतर्राष्ट्रीय स्तर परनैतिक मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में विधि की तुलना में अंतरात्मा का विशेष महत्त्वहै परंतु इस संदर्भ में अंतरआत्मा की भूमिका भी सीमित हो जाती है क्योंकि विभिन्न राष्ट्रों के सामाजिक और नैतिक मूल्यों में भिन्नता का होना ; अतःअंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र को मार्गदर्शित करने हेतु प्रभावी स्रोत की कमी का होनाइस समस्या को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाती है| अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के संदर्भ मेंप्रभुत्व का प्रभावदेखने को मिलता है| इसके परिणामस्वरूपअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नैतिक आचरण/व्यवहार के मानकों को सर्वसम्मति के आधार पर विकसित किया जाना संभव नहींहो पाता है| अंतर्राष्ट्रीय मानकों/मूल्यों के सामंजस्य को देश के आंतरिक सिद्धांतों एवं मूल्यों के साथ के सामंजस्य को स्थापित करना अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र के लिए एक चुनौती है| उपर्युक्त चुनौतियों के बावजूद भी अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्त्व है|
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लोकसेवकों की जवाबदेहिता से आप क्या समझते हैं?लोकसेवकों के जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा मेंआने वाली बाधाओं पर चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by accountability of public servants? Discuss the hurdles in the direction of ensuring accountability of public servants. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - लोकसेवकों की जवाबदेहिता को परिभाषित करते हुए एवं उसका औचित्य स्पष्ट करते हुए उत्तर का आरंभ कीजिए| मुख्य भाग में,लोकसेवकों के जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में आने वाली बाधाओं पर बिंदुबार चर्चा कीजिए| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में कुछ सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - जब व्यक्ति को कोई कार्य दिया जाता है तो उसकार्य को सम्पन्न करना उस व्यक्ति नैतिक उत्तरदायित्वहोता है और जब कोई उत्तरदायित्व विधिक हो तब उसे जवाबदेहिता कहते हैं| जवाबदेहिता के तीन आधार होते हैं- दायित्व(रेस्पोंसिवनेस), उत्तरदायित्व (रेस्पोंसिबिलिटी) और संवेदनशीलता(एकाउंटेबिलिटी); जवाबदेहिता का औचित्य सरकार/लोकसेवक के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है, वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित/प्रत्यायोजित होती है| अतः यह आवश्यक है कि लोकसेवक/सरकार को जनता के प्रति जबावदेह होना चाहिए| लोकसेवकों के द्वारा शक्तियों का अभ्यास समाज के एक संरक्षक के रूप मेंकिया जाता है ताकि जनअपेक्षाओं की बेहतर परिपूर्ति की जा सके| शक्ति के दुरूपयोग को सीमित करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों को जबावदेह होना चाहिए| जबावदेहिता सुशासन/नैतिक शासन की एक मूलभूत विशेषता है अतः बिना सरकार की जबावदेहिता के नैतिक शासन के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो सकता है| सरकार/शासन को नागरिक केंद्रित बनाने हेतु जबावदेहिता का होना आवश्यक है| जबावदेहिता प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली की एक मूलभूत विशेषता है अतःसरकार का जबावदेह होना प्रजातांत्रिक मूल्यों के अनुरूपहै| लोकसेवकोंके जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में बाधाएं लोकसेवक शासन के कार्यों में तकनीकी रूप से दक्ष एवं विशेषज्ञ होते हैं परन्तु जिन निकायों के द्वारा लोकसेवकों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जाताहै उन्हें शासन की विषयवस्तु पर पूर्णतः तकनीकी ज्ञान एवं दक्षता नहीं होती है| अतः जबावदेहिता सुनिश्चित करने में बाधा आती है| लोक सेवक पूर्णकालिक आधार पर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं परन्तु जिन संस्थानों के द्वारा लोकसेवकों पर नियंत्रण किया जाना है उनके पास समयाभाव बना रहता है जो कि लोकसेवकों की जवाबदेहिता को बाधित करती है लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि शासन की कार्यप्रणालीसे जुड़ीसूचनाएं नागरिकों के पास हो जबकि वास्तविकता में अधिक महत्वपूर्ण सूचनाओं पर लोकसेवकों का नियंत्रण होता है|अतःसूचना के अभाव के कारण नागरिकों के द्वारा लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित किया जाना संभव नहींहो पाता है| सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 को लागू करने के उपरांत इस स्थिति में सुधार देखने को मिलता है परंतु इसअधिनियम के व्यवहारिक सीमाओं के कारण यह पूर्णतया संभव नहींहो पाया है| समय के परिवर्तन के साथ सरकार के कार्यों की मात्रा में विस्तारीकरण/बढ़ोतरी देखने को मिलता है जोकिलोकसेवकोंके कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को अधिक जटिलता प्रदानकरती है एवं इस कारण से लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| लोकसेवकों की जबावदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु कई प्रकार के अभिकरणों/निकायों का गठन किया गया है एवं इन निकायों के बीच प्रभावी समन्वयकी कमी का होना लोकसेवकों की जवाबदेहिता को बाधित करती है| लोकसेवकों कीसत्यनिष्ठा एवं कार्यकुशलता को प्रोत्साहित करने हेतु उन्हें संवैधानिकएवं विधिक संरक्षण प्राप्त है जैसे- अनुच्छेद 310, अनुच्छेद 311 एवं व्हिसिल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम 2011| इन्ही संवैधानिक एवं वैधानिक संरक्षणों के कारण कई अवसरों पर अनैतिक गतिविधियों केसंदर्भमें भी आरोपी लोकसेवक के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही किया जाना संभव नहीं हो पाता है अतः द्वितीय ARC के द्वारा संवैधानिक संरक्षणों को समाप्त करने की अनुशंसा की गयी है ताकि शासन में नैतिकता को प्रोत्साहित किया जा सके| लोकसेवकों के द्वारा बहुल भूमिका एवं दायित्वों का निर्वहन किया जाता है अतःउनके दायित्वों की सही व्याख्या किया जाना संभव नहीं हो पाता है| इन बहुल भूमिकाओं के परिणामस्वरूप हितों के संघर्ष/मतभेद की स्थिति भी लोकसेवकों के समक्ष उत्पन होती है| अधिकाँश मामलों में लोकसेवक स्वकेंद्रितहोते हैं या समूहकेंद्रितहोते हैं या फिर संगठनकेंद्रितहोते हैं न कि जन केंद्रित| ऐसी स्थिति में लोकसेवकों के द्वारा अनैतिक व्यवहार की संभावना अधिक हो जाती है जो कि जनहित के विरुद्ध होता है| लोकसेवक अपने संगठन के प्रति वफादार होते हैं अतः लोकसेवकों के द्वारासरकार या शासन की खामियों को उजागर करने पर बल नहीं दिया जाता है| लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु आचरण संहिता का निर्माण किया गया है परंतु आचरण संहिता स्वतः अपनेआप में कई व्यवहारिक सीमाओं से ग्रसित है जोकि लोकसेवकों के वास्तविक जबावदेहिता को सुनिश्चित करने में समस्याएं उत्पन करती हैं| अधिकांश मामलों में लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में कर्मचारी संघों की भूमिका भी बाधाएं उत्पन करती हैं| अतः यह आवश्यक है कि संगठन की कार्यप्रणाली में कर्मचारी संघों की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित किया जाए| अतः नैतिक शासन/नैतिकता और जवाबदेहिता दोनों एक साथ चलती है| शासन की प्रक्रिया में नैतिक मानकों को प्राप्त करने हेतु एक प्रभावी जबावदेहिता का होना आवश्यक है जोकि एक प्रभावी नियंत्रण की प्रणाली की मांग करती है| बाहरी जवाबदेहिता का महत्त्व तब अधिक हो जाता है जब आंतरिक जवाबदेहिता की कमी हो एवं आंतरिक जवाबदेहिता को प्रोत्साहित करने हेतु लोकसेवकों को अपने नैतिक दायित्वों पर अधिक बल दिया जाना आवश्यक है| लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित करने केकुछउपायों पर भी ध्यान दिया जा सकता है जैसे - पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट के तहत प्रशासन को कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए ताकि वे निर्भयतापूर्वक लोकहित में निर्णय कर सकें;जिम्मेदारी को निभाने की प्रतिबद्धता और निष्पादन के आधार पर समुचित पुरस्कारों तथा दंडों की वस्तुनिष्ठ व्यवस्था;भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कारवाई होनी चाहिए ताकि सभी कर्मचारियों के पास भ्रष्ट न होने की स्पष्ट वजह हो आदि|
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##Question:लोकसेवकों की जवाबदेहिता से आप क्या समझते हैं?लोकसेवकों के जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा मेंआने वाली बाधाओं पर चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by accountability of public servants? Discuss the hurdles in the direction of ensuring accountability of public servants. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - लोकसेवकों की जवाबदेहिता को परिभाषित करते हुए एवं उसका औचित्य स्पष्ट करते हुए उत्तर का आरंभ कीजिए| मुख्य भाग में,लोकसेवकों के जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में आने वाली बाधाओं पर बिंदुबार चर्चा कीजिए| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में कुछ सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - जब व्यक्ति को कोई कार्य दिया जाता है तो उसकार्य को सम्पन्न करना उस व्यक्ति नैतिक उत्तरदायित्वहोता है और जब कोई उत्तरदायित्व विधिक हो तब उसे जवाबदेहिता कहते हैं| जवाबदेहिता के तीन आधार होते हैं- दायित्व(रेस्पोंसिवनेस), उत्तरदायित्व (रेस्पोंसिबिलिटी) और संवेदनशीलता(एकाउंटेबिलिटी); जवाबदेहिता का औचित्य सरकार/लोकसेवक के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है, वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित/प्रत्यायोजित होती है| अतः यह आवश्यक है कि लोकसेवक/सरकार को जनता के प्रति जबावदेह होना चाहिए| लोकसेवकों के द्वारा शक्तियों का अभ्यास समाज के एक संरक्षक के रूप मेंकिया जाता है ताकि जनअपेक्षाओं की बेहतर परिपूर्ति की जा सके| शक्ति के दुरूपयोग को सीमित करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों को जबावदेह होना चाहिए| जबावदेहिता सुशासन/नैतिक शासन की एक मूलभूत विशेषता है अतः बिना सरकार की जबावदेहिता के नैतिक शासन के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो सकता है| सरकार/शासन को नागरिक केंद्रित बनाने हेतु जबावदेहिता का होना आवश्यक है| जबावदेहिता प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली की एक मूलभूत विशेषता है अतःसरकार का जबावदेह होना प्रजातांत्रिक मूल्यों के अनुरूपहै| लोकसेवकोंके जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में बाधाएं लोकसेवक शासन के कार्यों में तकनीकी रूप से दक्ष एवं विशेषज्ञ होते हैं परन्तु जिन निकायों के द्वारा लोकसेवकों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जाताहै उन्हें शासन की विषयवस्तु पर पूर्णतः तकनीकी ज्ञान एवं दक्षता नहीं होती है| अतः जबावदेहिता सुनिश्चित करने में बाधा आती है| लोक सेवक पूर्णकालिक आधार पर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं परन्तु जिन संस्थानों के द्वारा लोकसेवकों पर नियंत्रण किया जाना है उनके पास समयाभाव बना रहता है जो कि लोकसेवकों की जवाबदेहिता को बाधित करती है लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि शासन की कार्यप्रणालीसे जुड़ीसूचनाएं नागरिकों के पास हो जबकि वास्तविकता में अधिक महत्वपूर्ण सूचनाओं पर लोकसेवकों का नियंत्रण होता है|अतःसूचना के अभाव के कारण नागरिकों के द्वारा लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित किया जाना संभव नहींहो पाता है| सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 को लागू करने के उपरांत इस स्थिति में सुधार देखने को मिलता है परंतु इसअधिनियम के व्यवहारिक सीमाओं के कारण यह पूर्णतया संभव नहींहो पाया है| समय के परिवर्तन के साथ सरकार के कार्यों की मात्रा में विस्तारीकरण/बढ़ोतरी देखने को मिलता है जोकिलोकसेवकोंके कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को अधिक जटिलता प्रदानकरती है एवं इस कारण से लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| लोकसेवकों की जबावदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु कई प्रकार के अभिकरणों/निकायों का गठन किया गया है एवं इन निकायों के बीच प्रभावी समन्वयकी कमी का होना लोकसेवकों की जवाबदेहिता को बाधित करती है| लोकसेवकों कीसत्यनिष्ठा एवं कार्यकुशलता को प्रोत्साहित करने हेतु उन्हें संवैधानिकएवं विधिक संरक्षण प्राप्त है जैसे- अनुच्छेद 310, अनुच्छेद 311 एवं व्हिसिल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम 2011| इन्ही संवैधानिक एवं वैधानिक संरक्षणों के कारण कई अवसरों पर अनैतिक गतिविधियों केसंदर्भमें भी आरोपी लोकसेवक के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही किया जाना संभव नहीं हो पाता है अतः द्वितीय ARC के द्वारा संवैधानिक संरक्षणों को समाप्त करने की अनुशंसा की गयी है ताकि शासन में नैतिकता को प्रोत्साहित किया जा सके| लोकसेवकों के द्वारा बहुल भूमिका एवं दायित्वों का निर्वहन किया जाता है अतःउनके दायित्वों की सही व्याख्या किया जाना संभव नहीं हो पाता है| इन बहुल भूमिकाओं के परिणामस्वरूप हितों के संघर्ष/मतभेद की स्थिति भी लोकसेवकों के समक्ष उत्पन होती है| अधिकाँश मामलों में लोकसेवक स्वकेंद्रितहोते हैं या समूहकेंद्रितहोते हैं या फिर संगठनकेंद्रितहोते हैं न कि जन केंद्रित| ऐसी स्थिति में लोकसेवकों के द्वारा अनैतिक व्यवहार की संभावना अधिक हो जाती है जो कि जनहित के विरुद्ध होता है| लोकसेवक अपने संगठन के प्रति वफादार होते हैं अतः लोकसेवकों के द्वारासरकार या शासन की खामियों को उजागर करने पर बल नहीं दिया जाता है| लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु आचरण संहिता का निर्माण किया गया है परंतु आचरण संहिता स्वतः अपनेआप में कई व्यवहारिक सीमाओं से ग्रसित है जोकि लोकसेवकों के वास्तविक जबावदेहिता को सुनिश्चित करने में समस्याएं उत्पन करती हैं| अधिकांश मामलों में लोकसेवकों की जबावदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में कर्मचारी संघों की भूमिका भी बाधाएं उत्पन करती हैं| अतः यह आवश्यक है कि संगठन की कार्यप्रणाली में कर्मचारी संघों की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित किया जाए| अतः नैतिक शासन/नैतिकता और जवाबदेहिता दोनों एक साथ चलती है| शासन की प्रक्रिया में नैतिक मानकों को प्राप्त करने हेतु एक प्रभावी जबावदेहिता का होना आवश्यक है जोकि एक प्रभावी नियंत्रण की प्रणाली की मांग करती है| बाहरी जवाबदेहिता का महत्त्व तब अधिक हो जाता है जब आंतरिक जवाबदेहिता की कमी हो एवं आंतरिक जवाबदेहिता को प्रोत्साहित करने हेतु लोकसेवकों को अपने नैतिक दायित्वों पर अधिक बल दिया जाना आवश्यक है| लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित करने केकुछउपायों पर भी ध्यान दिया जा सकता है जैसे - पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट के तहत प्रशासन को कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए ताकि वे निर्भयतापूर्वक लोकहित में निर्णय कर सकें;जिम्मेदारी को निभाने की प्रतिबद्धता और निष्पादन के आधार पर समुचित पुरस्कारों तथा दंडों की वस्तुनिष्ठ व्यवस्था;भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कारवाई होनी चाहिए ताकि सभी कर्मचारियों के पास भ्रष्ट न होने की स्पष्ट वजह हो आदि|
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नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लाभ एवं हानि की चर्चा कीजिए। भारत में नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the advantages and disadvantages of nuclear science and technology. Discuss the socio-economic applications of nuclear science and technology in India. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण: भारत में नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बताते हुए परिचय लिखिए। नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लाभ एवं हानि को बिन्दुवार लिखिए। भारत में नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों को बिन्दुवार लिखिए। अंत में एक संतुलित निष्कर्ष दीजिए। उत्तर: भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत नाभिकीय प्रौद्योगिकी का प्रयोग भविष्य के ऊर्जा संबंधी चुनौतियों, कृषि क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, उद्योगों, अवशिष्ट निपटान, आदि समस्या के समाधान के लिए अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है| नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लाभ को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:- कृषि क्षेत्र में नाभिकीय प्रौद्योगिकी के माध्यम खाद्य प्रसंस्करण में, उच्च उत्पादन वाले बीजों आदि का निर्माण किया जा सकता है। चिकित्सा क्षेत्र में विभिन्न रोगों का पता लगाने और उनका उपचार करने में इसका प्रयोग किया जा सकता है। उद्योग क्षेत्र में रिसाव आदि का पता लगाने में इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा के माध्यम से ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़ी हानि को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:- परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से आने वाला रेडियोधर्मी कचरा/अवशिष्ट प्रकृति एवं मनुष्यों के लिए बड़ा खतरा होता है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा तथा परमाणु युद्ध की ओर बढ़ना संभव हो जाएगा। जैसे- अमेरिका-रूस शीत युद्ध के समय क्यूबा मिसाईल संकट आदि। चिकित्सा क्षेत्र मेंस्वस्थ उत्तकों को नुकसान; कभी-कभी दिल/फेफड़ों जैसे अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव होता है| विकिरण तकनीक के माध्यम से जीएम फसलों के निर्माण से मानव स्वास्थ्य पर भविष्य में प्रतिकूल प्रभाव संभव है। भारत में नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:- चिकित्सा क्षेत्र में - रेडियो ट्रेसर द्वारा रोगों का पता लगाना | उदहारण - कैंसर का पता लगाना, उदर अल्सर, ह्रदय रोग, थायरायड रोग, हड्डियों का रोग, आदि | PET- पॉज़िट्रान एमिसन टोमोग्राफी तथा सिंगल फोटोन एमिसन कंप्यूटेड टोमोग्राफी, स्कैनिंग मशीनों की सहायता से कैंसर अथवा अन्य रोगों का पता लगाना | कैंसर के इलाज के लिए भाभाट्रोंन टेली -थेरेपी मशीन जोकि कोबाल्ट-60 रेडियो आइसोटोप के माध्यम से गामा-विकिरण उत्पन्न करता है | ग्रीन लेजर द्वारा डायबेटिक रेटिनोपैथी का इलाज | कृषि क्षेत्र में- गामा- विकिरण द्वारा खाद्य प्रसंस्करण | इससे लाभ- खाद्य खराब नहीं होता, कीटाणुनाशक होता है, लम्बे समय तक संग्रह किया जा सकता है | उदहारण - गरम मसाला, रवा, सूजी, आम, मांस, मछली, आदि | उच्च पैदावार/उत्पादन फसलों को विकिरण तकनीक द्वारा विकसित करना | उदाहरण- मूंगफली, दूबराज, चावल, सरसों, जूट, दाल, आदि | सेस्बनिया रोस्ट्राटा - दलहनी पौधा है, जिसकी जड़ों की गांठों में सहजीवी राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है | इसका उपयोग जैव-उर्वरक के रूप में किया जाता है | उद्योग क्षेत्र में - रोलि कैमरा के उपयोग द्वारा धातुओं में किसी प्रकार का छोटा से छोटा क्षिद्र अथवा कच्चा तेल एवं गैस पाइपलाइन में रिसाव का पता लगाना | लेजर का औद्योगिक उपयोग | त्वरक एवं साइक्लोट्रोंन द्वारा इलेक्ट्रान/प्रोटान बीम उत्पन्न करना | रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की सहायता से धातुओं अथवा धातु रसायन/ रसायन मिश्रण का अध्ययन | साथ ही बंदरगाह में अवसाद/गाद का निक्षेपण का अध्ययन किया जाता है | पर्यावरण के क्षेत्र में - IREMON - इंडियन रेडिएशन मोनिटरिंग नेटवर्क (भारतीय विकिरण निगरानी नेटवर्क) - नाभिकीय रिएक्टरों के आस-पास विकिरण सम्बंधित आंकड़ों का संग्रह करना एवं जानकारी उपलब्ध कराना | निसर्ण रूणा - नगरपालिका जैविक ठोस अपशिष्ट शुद्धिकरण - बायो-मिथिनेशन प्लांट जिससे मीथेन गैस बनता है, जिसका खाना पकाने में, पानी गर्म करने में, भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादन, आदि में उपयोग किया जा सकता है | इसके आलावा मीथेन गैस को वाहन के ईंधन के लिए उपयोग किया जा सकता है | शुद्धिकरण के बाद बचे हुए अवशिष्ट मलबा का खेती में खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है | नाभिकीय प्रौद्योगिकी का विकास तथा अनुसंधान सावधानीपूर्वक करने से भविष्य की कई समस्यायों का समाधान किया जा सकता है। किन्तु शर्त यह है कि अनुसंधान कार्य मानव कल्याण के लिए किये जाए न कि अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण कार्य में।
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##Question:नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लाभ एवं हानि की चर्चा कीजिए। भारत में नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the advantages and disadvantages of nuclear science and technology. Discuss the socio-economic applications of nuclear science and technology in India. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भारत में नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बताते हुए परिचय लिखिए। नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लाभ एवं हानि को बिन्दुवार लिखिए। भारत में नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों को बिन्दुवार लिखिए। अंत में एक संतुलित निष्कर्ष दीजिए। उत्तर: भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत नाभिकीय प्रौद्योगिकी का प्रयोग भविष्य के ऊर्जा संबंधी चुनौतियों, कृषि क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, उद्योगों, अवशिष्ट निपटान, आदि समस्या के समाधान के लिए अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है| नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लाभ को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:- कृषि क्षेत्र में नाभिकीय प्रौद्योगिकी के माध्यम खाद्य प्रसंस्करण में, उच्च उत्पादन वाले बीजों आदि का निर्माण किया जा सकता है। चिकित्सा क्षेत्र में विभिन्न रोगों का पता लगाने और उनका उपचार करने में इसका प्रयोग किया जा सकता है। उद्योग क्षेत्र में रिसाव आदि का पता लगाने में इस प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा के माध्यम से ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़ी हानि को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:- परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से आने वाला रेडियोधर्मी कचरा/अवशिष्ट प्रकृति एवं मनुष्यों के लिए बड़ा खतरा होता है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा तथा परमाणु युद्ध की ओर बढ़ना संभव हो जाएगा। जैसे- अमेरिका-रूस शीत युद्ध के समय क्यूबा मिसाईल संकट आदि। चिकित्सा क्षेत्र मेंस्वस्थ उत्तकों को नुकसान; कभी-कभी दिल/फेफड़ों जैसे अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव होता है| विकिरण तकनीक के माध्यम से जीएम फसलों के निर्माण से मानव स्वास्थ्य पर भविष्य में प्रतिकूल प्रभाव संभव है। भारत में नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:- चिकित्सा क्षेत्र में - रेडियो ट्रेसर द्वारा रोगों का पता लगाना | उदहारण - कैंसर का पता लगाना, उदर अल्सर, ह्रदय रोग, थायरायड रोग, हड्डियों का रोग, आदि | PET- पॉज़िट्रान एमिसन टोमोग्राफी तथा सिंगल फोटोन एमिसन कंप्यूटेड टोमोग्राफी, स्कैनिंग मशीनों की सहायता से कैंसर अथवा अन्य रोगों का पता लगाना | कैंसर के इलाज के लिए भाभाट्रोंन टेली -थेरेपी मशीन जोकि कोबाल्ट-60 रेडियो आइसोटोप के माध्यम से गामा-विकिरण उत्पन्न करता है | ग्रीन लेजर द्वारा डायबेटिक रेटिनोपैथी का इलाज | कृषि क्षेत्र में- गामा- विकिरण द्वारा खाद्य प्रसंस्करण | इससे लाभ- खाद्य खराब नहीं होता, कीटाणुनाशक होता है, लम्बे समय तक संग्रह किया जा सकता है | उदहारण - गरम मसाला, रवा, सूजी, आम, मांस, मछली, आदि | उच्च पैदावार/उत्पादन फसलों को विकिरण तकनीक द्वारा विकसित करना | उदाहरण- मूंगफली, दूबराज, चावल, सरसों, जूट, दाल, आदि | सेस्बनिया रोस्ट्राटा - दलहनी पौधा है, जिसकी जड़ों की गांठों में सहजीवी राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है | इसका उपयोग जैव-उर्वरक के रूप में किया जाता है | उद्योग क्षेत्र में - रोलि कैमरा के उपयोग द्वारा धातुओं में किसी प्रकार का छोटा से छोटा क्षिद्र अथवा कच्चा तेल एवं गैस पाइपलाइन में रिसाव का पता लगाना | लेजर का औद्योगिक उपयोग | त्वरक एवं साइक्लोट्रोंन द्वारा इलेक्ट्रान/प्रोटान बीम उत्पन्न करना | रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की सहायता से धातुओं अथवा धातु रसायन/ रसायन मिश्रण का अध्ययन | साथ ही बंदरगाह में अवसाद/गाद का निक्षेपण का अध्ययन किया जाता है | पर्यावरण के क्षेत्र में - IREMON - इंडियन रेडिएशन मोनिटरिंग नेटवर्क (भारतीय विकिरण निगरानी नेटवर्क) - नाभिकीय रिएक्टरों के आस-पास विकिरण सम्बंधित आंकड़ों का संग्रह करना एवं जानकारी उपलब्ध कराना | निसर्ण रूणा - नगरपालिका जैविक ठोस अपशिष्ट शुद्धिकरण - बायो-मिथिनेशन प्लांट जिससे मीथेन गैस बनता है, जिसका खाना पकाने में, पानी गर्म करने में, भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादन, आदि में उपयोग किया जा सकता है | इसके आलावा मीथेन गैस को वाहन के ईंधन के लिए उपयोग किया जा सकता है | शुद्धिकरण के बाद बचे हुए अवशिष्ट मलबा का खेती में खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है | नाभिकीय प्रौद्योगिकी का विकास तथा अनुसंधान सावधानीपूर्वक करने से भविष्य की कई समस्यायों का समाधान किया जा सकता है। किन्तु शर्त यह है कि अनुसंधान कार्य मानव कल्याण के लिए किये जाए न कि अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण कार्य में।
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भारत-चीन सीमा विवाद के पश्चिमी क्षेत्र का सामान्य परिचय देते हुए, इस क्षेत्र में वर्तमान गतिरोध के कारणों का संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a general introduction to the western region of the India-China border dispute, briefly discuss the reasons for the current deadlock in the region. (150-200 words / 10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत चीन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत के पश्चिमी क्षेत्र में चीन के साथ सीमा-विवाद की स्थिति को स्पष्ट कीजिये | अंत में भारत-चीन के बीच वर्तमान गतिरोध के विभिन्न आयामों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सामान्य परिचय :चीन एशिया में भारत तथा चीन दो प्राचीन सभ्यताएँ हैं तथा दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी देश भी हैं | भारत-चीन लगभग 3380 किमी लंबीविस्तृत सीमा साझा करते हैं | साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से भारत जहाँ 1947 में आजाद हुआ वहीँ चीन ने 1949 में साम्यवादी व्यवस्था को अपनाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की | भारत- चीन संबंधों की प्रारंभिक पृष्ठभूमि पंचशील तथा हिंदी-चीनी भाई-भाईजैसे सिद्धांतों के साथ खुशनुमें माहौल में प्रारंभ हुयी थी | लेकिन तिब्बत परचीनी आक्रमण, दलाईलामा को भारत द्वारा शरण देना तथा 1 962 के चीनीआक्रमण के पश्चात संबंधों में कटुता विद्यमान हो गयी; आदि | सीमा-विवाद का व्यापक मुद्दा पश्चिमी क्षेत्र: इसके अंतर्गत लद्दाख से उत्तराखंड तक का क्षेत्र आता है | जानसन रेखा - यहाँ पर सीमा विवाद 1860 के दशक में अंग्रेजों द्वारा प्रस्तावित जानसन रेखा से सम्बन्धित है; जो कुनलुन पर्वत तक विस्तृत थी तथा अक्साई चिन को जम्मू और कश्मीर की तत्कालीन रियासत में शामिल करती थी | मैकडोनाल्ड रेखा - इसको स्वीकार करता है, जो अक्साई चिन को उसके नियंत्रण में दर्शाती है | वास्तविक नियंत्रण रेखा-LAC - जम्मू-कश्मीर के भारतीय प्रशासित क्षेत्रों को अक्साई चिन से अलग करने वाली लाइन को LAC के रूप में जाना जाता है | इस क्षेत्र में सबसे प्रमुख विवादित क्षेत्रअक्साई चिन काहै | भारत के लद्दाख व चीन के झिंझियांग प्रांत के बीच अवस्थित यह क्षेत्र मानव निवास विहीन है तथापि सामरिक दृष्टिकोण से इसका महत्व है और 1962 से यह चीन के कब्जे में है ;इस क्षेत्र में अन्य प्रमुख विवादित क्षेत्र चुमार व दौलत वेग ओल्डी है | वर्तमान/हालिया गतिरोध के कारण LAC से संलग्न क्षेत्र में अवसंरचना का विकास- भारत द्वारा LAC के क्षेत्र BRO द्वारा लगातार सड़क निर्माण किया जा रहा है, जिसके चलते भारत -चीन गतिरोध बना रहता है | डोकलाम प्रकरण का प्रभाव ;- इस प्रकरण से भारत की रणनीतिक और सामरिक बढ़त ने चीन की चिंता की लकीरों को अवश्य बढ़ाया है | जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन भी वर्तमान सीमा विवाद का एक कारण माना जा सकता है- चूंकि अक्साई चिन से लगा हुआ यह क्षेत्र है तथा भारत द्वारा यहाँ आक्रामक कार्य किया जा रहा है, इससे भी चीन अपने हितों के विपरीत मान रहा - OBOR और CPEC के नजरिये से | नई चीनी आक्रमकता के संकेत -हांगकांग, दक्षिण-चीन सागर, मई सीमा विवाद -2020;- हालिया गलवान घाटी और पेंगोंग झील पर चीन द्वारा घुसपैठ से अभी भी माहौल गरम बना हुआ है | कोविड-19 के कुप्रबंधन पर चीन के विरुद्ध वैश्विक प्रतिक्रिया ;- इस संदर्भ में अमेरिका द्वारा खुलकर चीन का विरोध करने से चीन का विश्वास विश्व पटल पर ख़राब हुआ है | भारत-अमेरिकी सम्बन्धों मेंबढती घनिष्ठता- - इसने भी चीन के एशियाई हितों को प्रभावित किया है , हिन्द महासागर, दक्षिण चीन सागर, आदि पर चीन अपना प्रभुत्व लगातार बढ़ाता जा रहा है , अमेरिका-भारत गठजोड़ कहीं न कहीं चीन को नागवार गुजर रही है , इसी संदर्भ में भारत ने अमेरिका से कई प्रकार के रणनीतिक और सामरिक समझौता किया है, जो चीन को बेचैन कर रहा है |
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##Question:भारत-चीन सीमा विवाद के पश्चिमी क्षेत्र का सामान्य परिचय देते हुए, इस क्षेत्र में वर्तमान गतिरोध के कारणों का संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a general introduction to the western region of the India-China border dispute, briefly discuss the reasons for the current deadlock in the region. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत चीन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत के पश्चिमी क्षेत्र में चीन के साथ सीमा-विवाद की स्थिति को स्पष्ट कीजिये | अंत में भारत-चीन के बीच वर्तमान गतिरोध के विभिन्न आयामों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सामान्य परिचय :चीन एशिया में भारत तथा चीन दो प्राचीन सभ्यताएँ हैं तथा दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी देश भी हैं | भारत-चीन लगभग 3380 किमी लंबीविस्तृत सीमा साझा करते हैं | साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से भारत जहाँ 1947 में आजाद हुआ वहीँ चीन ने 1949 में साम्यवादी व्यवस्था को अपनाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की | भारत- चीन संबंधों की प्रारंभिक पृष्ठभूमि पंचशील तथा हिंदी-चीनी भाई-भाईजैसे सिद्धांतों के साथ खुशनुमें माहौल में प्रारंभ हुयी थी | लेकिन तिब्बत परचीनी आक्रमण, दलाईलामा को भारत द्वारा शरण देना तथा 1 962 के चीनीआक्रमण के पश्चात संबंधों में कटुता विद्यमान हो गयी; आदि | सीमा-विवाद का व्यापक मुद्दा पश्चिमी क्षेत्र: इसके अंतर्गत लद्दाख से उत्तराखंड तक का क्षेत्र आता है | जानसन रेखा - यहाँ पर सीमा विवाद 1860 के दशक में अंग्रेजों द्वारा प्रस्तावित जानसन रेखा से सम्बन्धित है; जो कुनलुन पर्वत तक विस्तृत थी तथा अक्साई चिन को जम्मू और कश्मीर की तत्कालीन रियासत में शामिल करती थी | मैकडोनाल्ड रेखा - इसको स्वीकार करता है, जो अक्साई चिन को उसके नियंत्रण में दर्शाती है | वास्तविक नियंत्रण रेखा-LAC - जम्मू-कश्मीर के भारतीय प्रशासित क्षेत्रों को अक्साई चिन से अलग करने वाली लाइन को LAC के रूप में जाना जाता है | इस क्षेत्र में सबसे प्रमुख विवादित क्षेत्रअक्साई चिन काहै | भारत के लद्दाख व चीन के झिंझियांग प्रांत के बीच अवस्थित यह क्षेत्र मानव निवास विहीन है तथापि सामरिक दृष्टिकोण से इसका महत्व है और 1962 से यह चीन के कब्जे में है ;इस क्षेत्र में अन्य प्रमुख विवादित क्षेत्र चुमार व दौलत वेग ओल्डी है | वर्तमान/हालिया गतिरोध के कारण LAC से संलग्न क्षेत्र में अवसंरचना का विकास- भारत द्वारा LAC के क्षेत्र BRO द्वारा लगातार सड़क निर्माण किया जा रहा है, जिसके चलते भारत -चीन गतिरोध बना रहता है | डोकलाम प्रकरण का प्रभाव ;- इस प्रकरण से भारत की रणनीतिक और सामरिक बढ़त ने चीन की चिंता की लकीरों को अवश्य बढ़ाया है | जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन भी वर्तमान सीमा विवाद का एक कारण माना जा सकता है- चूंकि अक्साई चिन से लगा हुआ यह क्षेत्र है तथा भारत द्वारा यहाँ आक्रामक कार्य किया जा रहा है, इससे भी चीन अपने हितों के विपरीत मान रहा - OBOR और CPEC के नजरिये से | नई चीनी आक्रमकता के संकेत -हांगकांग, दक्षिण-चीन सागर, मई सीमा विवाद -2020;- हालिया गलवान घाटी और पेंगोंग झील पर चीन द्वारा घुसपैठ से अभी भी माहौल गरम बना हुआ है | कोविड-19 के कुप्रबंधन पर चीन के विरुद्ध वैश्विक प्रतिक्रिया ;- इस संदर्भ में अमेरिका द्वारा खुलकर चीन का विरोध करने से चीन का विश्वास विश्व पटल पर ख़राब हुआ है | भारत-अमेरिकी सम्बन्धों मेंबढती घनिष्ठता- - इसने भी चीन के एशियाई हितों को प्रभावित किया है , हिन्द महासागर, दक्षिण चीन सागर, आदि पर चीन अपना प्रभुत्व लगातार बढ़ाता जा रहा है , अमेरिका-भारत गठजोड़ कहीं न कहीं चीन को नागवार गुजर रही है , इसी संदर्भ में भारत ने अमेरिका से कई प्रकार के रणनीतिक और सामरिक समझौता किया है, जो चीन को बेचैन कर रहा है |
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Explain various types of the majority that are exercised in India with suitable examples.(150 words/10 marks)
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Approach Introduction In the introduction write about parliament and its role in law-making etc In the body of the answer Explain types of majority Conclude with the significance of such types and relate with the constitution. Answer India is a parliamentary form of government in which parliament is the law-making body and real executive power lies with the council of ministers headed by the prime Minister. India believes in rule of law and constitutionalism and hence there is a limit on the power of the government. such control of government is also reflected through the majority required for passage of any law or for the sustenance of government or for amending the constitution. Types of majority Simple majority This majority is required in a No-confidence motion and for the passing of an ordinary like the right to information act, Lokpal and Lokayukta Act, Crpc Amendment, RTI act, Indian penal code amendment, etc. This means the majority of the person present and voting must support or vote in favour. Example-total strengths 100, vacancy 5 (Death, resignation, disqualification), Effective strength 95, Present 90, Voted 80 , Majority required is 41. Absolute majority It is normally in use as part of a special majority but not independently, Total strength100, Absolute majority 51, Special majority, This is to amend the constitution of India (Article 368), Total strength 100, Vacancy 5, Effective strength 95, Present 90, Voted 90 The majority required to amend the constitution shall be the absolute majority (static 51) and 2/3rd of the members present and voting that is 60. Both the conditions should be fulfilled and a higher number shall be taken into account. Special majority with ratification by states. Whenever the constitution is amended to alter the federal structure that is changed ithe n relation between center and state (101st constitutional amendment act GST and 42nd Connotational amendment act shifting 5 subjects from the state list to the concurrent list.) All such constitutional amendment must be ratified by half of the states. (At least 14 out of 28 states) The majority required though in state legislature shall be simple (while in parliament shall be special) The views of the state legislative assembly matter over the state legislative council. Impeachment. Highest form of majority In the Indian constitution is to impeach the president, Total membership 100. 2/3rd of total membership that is 67(irrespective of vacancy, effective strength, present, and voting) Effective majority This majority is required to remove the vice president in Rajya Sabha while in Lok Sabha simple majority is required Total strength is 100 vacancy is 10 due to death resignation and disqualification, Effective strength is 90, Effective majority is 46 Such a mix of provisions makes the Indian constitution blend of flexible as well rigid provisions. That"s why India is considered a Quasi-federal country.
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##Question:Explain various types of the majority that are exercised in India with suitable examples.(150 words/10 marks)##Answer:Approach Introduction In the introduction write about parliament and its role in law-making etc In the body of the answer Explain types of majority Conclude with the significance of such types and relate with the constitution. Answer India is a parliamentary form of government in which parliament is the law-making body and real executive power lies with the council of ministers headed by the prime Minister. India believes in rule of law and constitutionalism and hence there is a limit on the power of the government. such control of government is also reflected through the majority required for passage of any law or for the sustenance of government or for amending the constitution. Types of majority Simple majority This majority is required in a No-confidence motion and for the passing of an ordinary like the right to information act, Lokpal and Lokayukta Act, Crpc Amendment, RTI act, Indian penal code amendment, etc. This means the majority of the person present and voting must support or vote in favour. Example-total strengths 100, vacancy 5 (Death, resignation, disqualification), Effective strength 95, Present 90, Voted 80 , Majority required is 41. Absolute majority It is normally in use as part of a special majority but not independently, Total strength100, Absolute majority 51, Special majority, This is to amend the constitution of India (Article 368), Total strength 100, Vacancy 5, Effective strength 95, Present 90, Voted 90 The majority required to amend the constitution shall be the absolute majority (static 51) and 2/3rd of the members present and voting that is 60. Both the conditions should be fulfilled and a higher number shall be taken into account. Special majority with ratification by states. Whenever the constitution is amended to alter the federal structure that is changed ithe n relation between center and state (101st constitutional amendment act GST and 42nd Connotational amendment act shifting 5 subjects from the state list to the concurrent list.) All such constitutional amendment must be ratified by half of the states. (At least 14 out of 28 states) The majority required though in state legislature shall be simple (while in parliament shall be special) The views of the state legislative assembly matter over the state legislative council. Impeachment. Highest form of majority In the Indian constitution is to impeach the president, Total membership 100. 2/3rd of total membership that is 67(irrespective of vacancy, effective strength, present, and voting) Effective majority This majority is required to remove the vice president in Rajya Sabha while in Lok Sabha simple majority is required Total strength is 100 vacancy is 10 due to death resignation and disqualification, Effective strength is 90, Effective majority is 46 Such a mix of provisions makes the Indian constitution blend of flexible as well rigid provisions. That"s why India is considered a Quasi-federal country.
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सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं, इस संदर्भ में भारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये (150-200 शब्द, 10 अंक) Cultural pattern are made up of various cultural elements, in this context, underline the key features of Indian social diversity (150-200 words, 10 marks).
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में संस्कृति को परिभाषित करते हुए उसके घटकों को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग मेंभारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये 3- अंतिम में विविधता की प्रकृति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी भी समाज की संस्कृति से तात्पर्य उन सभी घटकों के एकीकरण से होता है जो दिए गए समाज के सामाजिक जीवन को संभव बनाते हैं| दूसरे शब्दों में संस्कृति से आशय किसी भी समाज के उन सभी घटकों के मिले जुले स्वरुप से है जो उस क्षेत्र विशेष का सामाजिक जीवन संभव बनाते हैं तथाप्रत्येक सदस्य उस दिए गए समाज के नियमों का अनुपालन करते हुए उसे एक संभव दिशा निर्देश का स्रोत मानता है | यह संस्कृति मूलतः एवं सोच के रूप में परिलक्षित होती है| इस संस्कृति के भौतिक(मूर्त) एवं वैचारिक(अमूर्त) एवं घटक हो सकते हैं | कोई भी दी गयी संस्कृति विभिन्न सांस्कृतिक विन्यासों से मिल कर बनती है तथा ये सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं| भारतीय समाज स्वयं में एक अति विविध समाज है भारतीय संदर्भ में समाज की विविधता को चार सांस्कृतिकतत्वों में देखा जा सकता है यथा नृजातीय, धार्मिक, भाषाई तथा भौगोलिक विविधता से उत्पन्न सामाजिक विन्यास विविधता| जिनका विश्लेषण निम्नलिखित है- नृजातीय विविधता भारत में नृजातीय विविधता का सन्दर्भ इतना व्यापक है कि भारत को नृजातियों का संग्रहालय कहा जाता है गुहा के मतानुसार भारत में निम्नलिखित 6 मुख्य नृजातियां पायी जाती हैं यथाप्रोटो आस्ट्रलायड, नीग्रेटो, मंगोलायड(पैलियो एवं तिब्बतोमंगोलायड), भू मध्य सागरीय(पैलियो एवं भू मध्य सागरीय उप प्रकार, ओरिएण्टल ) वेस्टर्न ब्रेकी सेफ्लस (अल्पनायड, अर्मेनायड, डीनारिक) एवं नोर्डिक भाषाई विविधता गियरसन के मतानुसार भारत में एक हजार 652 भाषाएँ एवं बोलियाँ पायी जाती हैं |परन्तु शुद्ध व्याकरणीय शब्दों में 1971 की जनगणना के अंतर्गत 189 भाषाओं को रेखांकित किया गया जो निम्नलिखित 5 भाषाई परिवारों से सम्बन्धित हैं यथा (1) इंडो पर्सियन, ये भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में बोली जाती है, तथा अधिकतम हिस्सा (39.5 %) हिंदी का है (2) द्रविड़, इसमें दक्षिण भारत के राज्यों में बोली जाने वाली भाषाएँ सम्मिलित हैं तथा अधिकतम हिस्सा तेलगू और तमिल का है (3) आस्ट्रो-एशियाटिक, यह छोटा नागपुर की नृजातियों में पाए जाने वाली भाषा है (4) तिब्बतो-बर्मन, यह तिब्बत और म्यांमार के क्षेत्र में बोली जाती है (5) ओंजेस, यह तटवर्ती क्षेत्र के जनजातीय समाजों में बोली जाने वाली भाषा है धार्मिक विविधता धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह की उस विचारधारा से है जिसमें किसी दिए गए सन्दर्भ में आस्था रखते हुये जीवन के लक्ष्यों एवं उसकी सार्थकता को सिद्ध किया जाता है भारत वर्ष में हजारों सम्प्रदाय एवं पंथ पाए जाते हैं जिन्हें जनगणना 2011 में मुख्य धार्मिक समुदायों में बाटा गया है जिसमें हिन्दू (79.8 %) इस्लाम (14.2 %) इसाई (2.3%) सिख (1.7 %) बौद्ध (0.77 %) जैन (0.37 %) तथा अन्य धर्म (0.9 % )हैं| इसके साथ ही भारत का बहुगोलिक विन्यास भी विभिन्नताओं भरा हुआ है जहाँ पर्वतीय, मैदानी, रेगिस्तानी क्षेत्रों के साथ ही साथ तटवर्ती क्षेत्रों के रूप में देखा जा सकता है| यह भौगोलिक विविधता सांस्कृतिक विविधता का आधार बनती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किभारतीय संदर्भ में सांस्कृतिक बहुलतावाद के अनेकों साक्ष्य मिलते हैं|
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##Question:सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं, इस संदर्भ में भारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये (150-200 शब्द, 10 अंक) Cultural pattern are made up of various cultural elements, in this context, underline the key features of Indian social diversity (150-200 words, 10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संस्कृति को परिभाषित करते हुए उसके घटकों को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग मेंभारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये 3- अंतिम में विविधता की प्रकृति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी भी समाज की संस्कृति से तात्पर्य उन सभी घटकों के एकीकरण से होता है जो दिए गए समाज के सामाजिक जीवन को संभव बनाते हैं| दूसरे शब्दों में संस्कृति से आशय किसी भी समाज के उन सभी घटकों के मिले जुले स्वरुप से है जो उस क्षेत्र विशेष का सामाजिक जीवन संभव बनाते हैं तथाप्रत्येक सदस्य उस दिए गए समाज के नियमों का अनुपालन करते हुए उसे एक संभव दिशा निर्देश का स्रोत मानता है | यह संस्कृति मूलतः एवं सोच के रूप में परिलक्षित होती है| इस संस्कृति के भौतिक(मूर्त) एवं वैचारिक(अमूर्त) एवं घटक हो सकते हैं | कोई भी दी गयी संस्कृति विभिन्न सांस्कृतिक विन्यासों से मिल कर बनती है तथा ये सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं| भारतीय समाज स्वयं में एक अति विविध समाज है भारतीय संदर्भ में समाज की विविधता को चार सांस्कृतिकतत्वों में देखा जा सकता है यथा नृजातीय, धार्मिक, भाषाई तथा भौगोलिक विविधता से उत्पन्न सामाजिक विन्यास विविधता| जिनका विश्लेषण निम्नलिखित है- नृजातीय विविधता भारत में नृजातीय विविधता का सन्दर्भ इतना व्यापक है कि भारत को नृजातियों का संग्रहालय कहा जाता है गुहा के मतानुसार भारत में निम्नलिखित 6 मुख्य नृजातियां पायी जाती हैं यथाप्रोटो आस्ट्रलायड, नीग्रेटो, मंगोलायड(पैलियो एवं तिब्बतोमंगोलायड), भू मध्य सागरीय(पैलियो एवं भू मध्य सागरीय उप प्रकार, ओरिएण्टल ) वेस्टर्न ब्रेकी सेफ्लस (अल्पनायड, अर्मेनायड, डीनारिक) एवं नोर्डिक भाषाई विविधता गियरसन के मतानुसार भारत में एक हजार 652 भाषाएँ एवं बोलियाँ पायी जाती हैं |परन्तु शुद्ध व्याकरणीय शब्दों में 1971 की जनगणना के अंतर्गत 189 भाषाओं को रेखांकित किया गया जो निम्नलिखित 5 भाषाई परिवारों से सम्बन्धित हैं यथा (1) इंडो पर्सियन, ये भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में बोली जाती है, तथा अधिकतम हिस्सा (39.5 %) हिंदी का है (2) द्रविड़, इसमें दक्षिण भारत के राज्यों में बोली जाने वाली भाषाएँ सम्मिलित हैं तथा अधिकतम हिस्सा तेलगू और तमिल का है (3) आस्ट्रो-एशियाटिक, यह छोटा नागपुर की नृजातियों में पाए जाने वाली भाषा है (4) तिब्बतो-बर्मन, यह तिब्बत और म्यांमार के क्षेत्र में बोली जाती है (5) ओंजेस, यह तटवर्ती क्षेत्र के जनजातीय समाजों में बोली जाने वाली भाषा है धार्मिक विविधता धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह की उस विचारधारा से है जिसमें किसी दिए गए सन्दर्भ में आस्था रखते हुये जीवन के लक्ष्यों एवं उसकी सार्थकता को सिद्ध किया जाता है भारत वर्ष में हजारों सम्प्रदाय एवं पंथ पाए जाते हैं जिन्हें जनगणना 2011 में मुख्य धार्मिक समुदायों में बाटा गया है जिसमें हिन्दू (79.8 %) इस्लाम (14.2 %) इसाई (2.3%) सिख (1.7 %) बौद्ध (0.77 %) जैन (0.37 %) तथा अन्य धर्म (0.9 % )हैं| इसके साथ ही भारत का बहुगोलिक विन्यास भी विभिन्नताओं भरा हुआ है जहाँ पर्वतीय, मैदानी, रेगिस्तानी क्षेत्रों के साथ ही साथ तटवर्ती क्षेत्रों के रूप में देखा जा सकता है| यह भौगोलिक विविधता सांस्कृतिक विविधता का आधार बनती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किभारतीय संदर्भ में सांस्कृतिक बहुलतावाद के अनेकों साक्ष्य मिलते हैं|
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सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं, इस संदर्भ में भारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये (150-200 शब्द, 10 अंक) Cultural pattern are made up of various cultural elements, in this context, underline the key features of Indian social diversity (150-200 words, 10 marks).
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में संस्कृति को परिभाषित करते हुए उसके घटकों को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग मेंभारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये 3- अंतिम में विविधता की प्रकृति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी भी समाज की संस्कृति से तात्पर्य उन सभी घटकों के एकीकरण से होता है जो दिए गए समाज के सामाजिक जीवन को संभव बनाते हैं| दूसरे शब्दों में संस्कृति से आशय किसी भी समाज के उन सभी घटकों के मिले जुले स्वरुप से है जो उस क्षेत्र विशेष का सामाजिक जीवन संभव बनाते हैं तथाप्रत्येक सदस्य उस दिए गए समाज के नियमों का अनुपालन करते हुए उसे एक संभव दिशा निर्देश का स्रोत मानता है | यह संस्कृति मूलतः एवं सोच के रूप में परिलक्षित होती है| इस संस्कृति के भौतिक(मूर्त) एवं वैचारिक(अमूर्त) एवं घटक हो सकते हैं | कोई भी दी गयी संस्कृति विभिन्न सांस्कृतिक विन्यासों से मिल कर बनती है तथा ये सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं| भारतीय समाज स्वयं में एक अति विविध समाज है भारतीय संदर्भ में समाज की विविधता को चार सांस्कृतिकतत्वों में देखा जा सकता है यथा नृजातीय, धार्मिक, भाषाई तथा भौगोलिक विविधता से उत्पन्न सामाजिक विन्यास विविधता| जिनका विश्लेषण निम्नलिखित है- नृजातीय विविधता भारत में नृजातीय विविधता का सन्दर्भ इतना व्यापक है कि भारत को नृजातियों का संग्रहालय कहा जाता है गुहा के मतानुसार भारत में निम्नलिखित 6 मुख्य नृजातियां पायी जाती हैं यथाप्रोटो आस्ट्रलायड, नीग्रेटो, मंगोलायड(पैलियो एवं तिब्बतोमंगोलायड), भू मध्य सागरीय(पैलियो एवं भू मध्य सागरीय उप प्रकार, ओरिएण्टल ) वेस्टर्न ब्रेकी सेफ्लस (अल्पनायड, अर्मेनायड, डीनारिक) एवंनोर्डिक भाषाई विविधता गियरसन के मतानुसार भारत में एक हजार 652 भाषाएँ एवं बोलियाँ पायी जाती हैं |परन्तु शुद्ध व्याकरणीय शब्दों में 1971 की जनगणना के अंतर्गत 189 भाषाओं को रेखांकित किया गया जो निम्नलिखित 5 भाषाई परिवारों से सम्बन्धित हैं यथा (1) इंडो पर्सियन, ये भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में बोली जाती है, तथा अधिकतम हिस्सा (39.5 %) हिंदी का है (2) द्रविड़, इसमें दक्षिण भारत के राज्यों में बोली जाने वाली भाषाएँ सम्मिलित हैं तथा अधिकतम हिस्सा तेलगू और तमिल का है (3) आस्ट्रो-एशियाटिक, यह छोटा नागपुर की नृजातियों में पाए जाने वाली भाषा है (4) तिब्बतो-बर्मन, यह तिब्बत और म्यांमार के क्षेत्र में बोली जाती है (5) ओंजेस, यह तटवर्ती क्षेत्र के जनजातीय समाजों में बोली जाने वाली भाषा है धार्मिक विविधता धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह की उस विचारधारा से है जिसमें किसी दिए गए सन्दर्भ में आस्था रखते हुये जीवन के लक्ष्यों एवं उसकी सार्थकता को सिद्ध किया जाता है भारत वर्ष में हजारों सम्प्रदाय एवं पंथ पाए जाते हैं जिन्हें जनगणना 2011 में मुख्य धार्मिक समुदायों में बाटा गया है जिसमें हिन्दू (79.8 %) इस्लाम (14.2 %) इसाई (2.3%) सिख (1.7 %) बौद्ध (0.77 %) जैन (0.37 %) तथा अन्य धर्म (0.9 % )हैं| इसके साथ ही भारत का बहुगोलिक विन्यास भी विभिन्नताओं भरा हुआ है जहाँ पर्वतीय, मैदानी, रेगिस्तानी क्षेत्रों के साथ ही साथ तटवर्ती क्षेत्रों के रूप में देखा जा सकता है| यह भौगोलिक विविधता सांस्कृतिक विविधता का आधार बनती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किभारतीय संदर्भ में सांस्कृतिक बहुलतावाद के अनेकों साक्ष्य मिलते हैं|
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##Question:सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं, इस संदर्भ में भारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये (150-200 शब्द, 10 अंक) Cultural pattern are made up of various cultural elements, in this context, underline the key features of Indian social diversity (150-200 words, 10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संस्कृति को परिभाषित करते हुए उसके घटकों को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग मेंभारतीय सामाजिक विविधता के प्रमुख अभिलक्षणों को रेखांकित कीजिये 3- अंतिम में विविधता की प्रकृति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी भी समाज की संस्कृति से तात्पर्य उन सभी घटकों के एकीकरण से होता है जो दिए गए समाज के सामाजिक जीवन को संभव बनाते हैं| दूसरे शब्दों में संस्कृति से आशय किसी भी समाज के उन सभी घटकों के मिले जुले स्वरुप से है जो उस क्षेत्र विशेष का सामाजिक जीवन संभव बनाते हैं तथाप्रत्येक सदस्य उस दिए गए समाज के नियमों का अनुपालन करते हुए उसे एक संभव दिशा निर्देश का स्रोत मानता है | यह संस्कृति मूलतः एवं सोच के रूप में परिलक्षित होती है| इस संस्कृति के भौतिक(मूर्त) एवं वैचारिक(अमूर्त) एवं घटक हो सकते हैं | कोई भी दी गयी संस्कृति विभिन्न सांस्कृतिक विन्यासों से मिल कर बनती है तथा ये सांस्कृतिक विन्यास विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बनते हैं| भारतीय समाज स्वयं में एक अति विविध समाज है भारतीय संदर्भ में समाज की विविधता को चार सांस्कृतिकतत्वों में देखा जा सकता है यथा नृजातीय, धार्मिक, भाषाई तथा भौगोलिक विविधता से उत्पन्न सामाजिक विन्यास विविधता| जिनका विश्लेषण निम्नलिखित है- नृजातीय विविधता भारत में नृजातीय विविधता का सन्दर्भ इतना व्यापक है कि भारत को नृजातियों का संग्रहालय कहा जाता है गुहा के मतानुसार भारत में निम्नलिखित 6 मुख्य नृजातियां पायी जाती हैं यथाप्रोटो आस्ट्रलायड, नीग्रेटो, मंगोलायड(पैलियो एवं तिब्बतोमंगोलायड), भू मध्य सागरीय(पैलियो एवं भू मध्य सागरीय उप प्रकार, ओरिएण्टल ) वेस्टर्न ब्रेकी सेफ्लस (अल्पनायड, अर्मेनायड, डीनारिक) एवंनोर्डिक भाषाई विविधता गियरसन के मतानुसार भारत में एक हजार 652 भाषाएँ एवं बोलियाँ पायी जाती हैं |परन्तु शुद्ध व्याकरणीय शब्दों में 1971 की जनगणना के अंतर्गत 189 भाषाओं को रेखांकित किया गया जो निम्नलिखित 5 भाषाई परिवारों से सम्बन्धित हैं यथा (1) इंडो पर्सियन, ये भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में बोली जाती है, तथा अधिकतम हिस्सा (39.5 %) हिंदी का है (2) द्रविड़, इसमें दक्षिण भारत के राज्यों में बोली जाने वाली भाषाएँ सम्मिलित हैं तथा अधिकतम हिस्सा तेलगू और तमिल का है (3) आस्ट्रो-एशियाटिक, यह छोटा नागपुर की नृजातियों में पाए जाने वाली भाषा है (4) तिब्बतो-बर्मन, यह तिब्बत और म्यांमार के क्षेत्र में बोली जाती है (5) ओंजेस, यह तटवर्ती क्षेत्र के जनजातीय समाजों में बोली जाने वाली भाषा है धार्मिक विविधता धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह की उस विचारधारा से है जिसमें किसी दिए गए सन्दर्भ में आस्था रखते हुये जीवन के लक्ष्यों एवं उसकी सार्थकता को सिद्ध किया जाता है भारत वर्ष में हजारों सम्प्रदाय एवं पंथ पाए जाते हैं जिन्हें जनगणना 2011 में मुख्य धार्मिक समुदायों में बाटा गया है जिसमें हिन्दू (79.8 %) इस्लाम (14.2 %) इसाई (2.3%) सिख (1.7 %) बौद्ध (0.77 %) जैन (0.37 %) तथा अन्य धर्म (0.9 % )हैं| इसके साथ ही भारत का बहुगोलिक विन्यास भी विभिन्नताओं भरा हुआ है जहाँ पर्वतीय, मैदानी, रेगिस्तानी क्षेत्रों के साथ ही साथ तटवर्ती क्षेत्रों के रूप में देखा जा सकता है| यह भौगोलिक विविधता सांस्कृतिक विविधता का आधार बनती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किभारतीय संदर्भ में सांस्कृतिक बहुलतावाद के अनेकों साक्ष्य मिलते हैं|
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प्रवाल भित्ति को परिभाषित करते हुए इनके पारितंत्रीय महत्व को रेखांकित कीजिये|(150-200 शब्द/ 10 अंक) Defining coral reefs and underline their ecological importance.(150-200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में प्रवाल भित्ति का संक्षिप्त परिचय दीजिए| मुख्य भाग में प्रवाल भित्ति के पारितंत्रीय महत्वों की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष में वर्तमान में प्रवाल भित्तियों के विरंजन एवं कारण की संक्षिप्त चर्चा कीजिए| उत्तर: प्रवाल भित्ति जैव विविधतापूर्ण अंतः सागरीय स्थलाकृति हैं । ये विश्व के प्रमुख विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है । जैव विविधता से समृद्ध होने के कारण ही इन्हें सामुद्रिक वर्षावन कहा जाता है । प्रावाल भित्तियों का निर्माण कोरल पॉलिप या जन्तु प्रवाल के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन से होता है । ये अस्थिपंजर कैल्शियम कार्बोनेट के बने होते हैं| प्रवाल भित्ति के पारितंत्रीय महत्व: कोरल रीफ सामान्यतः पृथ्वी का सबसे मूल्यवान और विविधतापूर्ण भरा इकोसिस्टम है। प्रवाल भित्ति किसी अन्य समुद्री वातावरण की तुलना में प्रति वर्ग क्षेत्रफल में सर्वाधिक स्पीसीज को आश्रय प्रदान करती है। न केवल कोरल रीफ पारिस्थितिक तंत्र जैविक रूप से समृद्ध और प्राकृतिक सुंदरता का स्रोत हैं, वे तटीय समुदायों को अनगिनत सेवाएं प्रदान करते हैं, जिनका वे समर्थन करते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में कोरल रीफ का अत्यधिक महत्व है। कैंसर, बैक्टिरियल संक्रमण, अर्थ्राइटिसआदि बीमारियों की दवाओं का निर्माण इससे होता है। कोरल रीफ पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल के 1% से भी कम क्षेत्रफल पर है लेकिन यह प्रतिवर्ष 375 मिलियन $ से अधिक की वस्तुएँ और सेवाएँ हमें प्रदान करती है। पर्यटन को बढ़ावा देती है जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। कोरल रीफ अपरदन को नियंत्रित करती है और समुद्री तूफानों के लिए प्राकृतिक अवरोधक का काम करती है , जिससे संम्पति और जीवन की रक्षा भी होती है। विश्व की लगभग आधा बिलियन जनसंख्या कोरल रीफ के 100 किलोमीटर के दायरे में रहती है और जीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी पर निर्भर है। कोरल रीफ्स स्पॉइंग और नर्सरी आधार प्रदान करते हैं जो कि आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मछली आबादी को पनपने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र दुनिया के कई क्षेत्रों में सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण स्थल हैं, और लाखों लोगों के लिए सांस्कृतिक परंपराएं प्रवाल भित्तियों के लिए महत्वपूर्ण रूप से बंधी हुई हैं| प्रवाल भित्तियाँ मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं; लेकिन इनको अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए कई प्रकार के प्राकृतिक और मानव जनित खतरों से जूझना पड़ रहा है। अतः हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हमें ऐसे कार्यों को बंद करना होगा जिससे कोरल रीफ को नुकसान पहुँचता है। हमें इनको संरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। कोरल रीफ का संरक्षण समय की माँग है। अतः हमें प्रदूषित जल को समुद्र में छोड़ने से बचना चाहिए। साथ ही सजावट के लिए कोरल के प्रयोग को हतोत्साहित करना चाहिए।
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##Question:प्रवाल भित्ति को परिभाषित करते हुए इनके पारितंत्रीय महत्व को रेखांकित कीजिये|(150-200 शब्द/ 10 अंक) Defining coral reefs and underline their ecological importance.(150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में प्रवाल भित्ति का संक्षिप्त परिचय दीजिए| मुख्य भाग में प्रवाल भित्ति के पारितंत्रीय महत्वों की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष में वर्तमान में प्रवाल भित्तियों के विरंजन एवं कारण की संक्षिप्त चर्चा कीजिए| उत्तर: प्रवाल भित्ति जैव विविधतापूर्ण अंतः सागरीय स्थलाकृति हैं । ये विश्व के प्रमुख विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है । जैव विविधता से समृद्ध होने के कारण ही इन्हें सामुद्रिक वर्षावन कहा जाता है । प्रावाल भित्तियों का निर्माण कोरल पॉलिप या जन्तु प्रवाल के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन से होता है । ये अस्थिपंजर कैल्शियम कार्बोनेट के बने होते हैं| प्रवाल भित्ति के पारितंत्रीय महत्व: कोरल रीफ सामान्यतः पृथ्वी का सबसे मूल्यवान और विविधतापूर्ण भरा इकोसिस्टम है। प्रवाल भित्ति किसी अन्य समुद्री वातावरण की तुलना में प्रति वर्ग क्षेत्रफल में सर्वाधिक स्पीसीज को आश्रय प्रदान करती है। न केवल कोरल रीफ पारिस्थितिक तंत्र जैविक रूप से समृद्ध और प्राकृतिक सुंदरता का स्रोत हैं, वे तटीय समुदायों को अनगिनत सेवाएं प्रदान करते हैं, जिनका वे समर्थन करते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में कोरल रीफ का अत्यधिक महत्व है। कैंसर, बैक्टिरियल संक्रमण, अर्थ्राइटिसआदि बीमारियों की दवाओं का निर्माण इससे होता है। कोरल रीफ पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल के 1% से भी कम क्षेत्रफल पर है लेकिन यह प्रतिवर्ष 375 मिलियन $ से अधिक की वस्तुएँ और सेवाएँ हमें प्रदान करती है। पर्यटन को बढ़ावा देती है जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। कोरल रीफ अपरदन को नियंत्रित करती है और समुद्री तूफानों के लिए प्राकृतिक अवरोधक का काम करती है , जिससे संम्पति और जीवन की रक्षा भी होती है। विश्व की लगभग आधा बिलियन जनसंख्या कोरल रीफ के 100 किलोमीटर के दायरे में रहती है और जीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी पर निर्भर है। कोरल रीफ्स स्पॉइंग और नर्सरी आधार प्रदान करते हैं जो कि आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मछली आबादी को पनपने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र दुनिया के कई क्षेत्रों में सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण स्थल हैं, और लाखों लोगों के लिए सांस्कृतिक परंपराएं प्रवाल भित्तियों के लिए महत्वपूर्ण रूप से बंधी हुई हैं| प्रवाल भित्तियाँ मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं; लेकिन इनको अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए कई प्रकार के प्राकृतिक और मानव जनित खतरों से जूझना पड़ रहा है। अतः हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हमें ऐसे कार्यों को बंद करना होगा जिससे कोरल रीफ को नुकसान पहुँचता है। हमें इनको संरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। कोरल रीफ का संरक्षण समय की माँग है। अतः हमें प्रदूषित जल को समुद्र में छोड़ने से बचना चाहिए। साथ ही सजावट के लिए कोरल के प्रयोग को हतोत्साहित करना चाहिए।
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कौटिल्य के द्वारा सुशासन/नैतिक शासन के संदर्भ में दी गई विचारधारा समकालीन प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में भी प्रासंगिक एवं उपयोगी है| चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) The ideology given by Kautilya in the context of good governance / moral governance is still relevant and useful in contemporary democratic governance. Discuss. (150–200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - सुशासन को परिभाषित करते हुए एवं उसकी विशेषताओं को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में,सुशासन या नैतिक शासन के संदर्भ में कौटिल्य के द्वारा दिए गए विचारों को आज केसमकालीन प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था के संदर्भ में जोड़ते हुए दिखाईये| एक संतुलित निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - विश्व बैंक के अनुसार, वैसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं|वर्तमान समय में, सुशासन की अवधारणा को प्रतिपादित करने का श्रेय विश्व बैंक को जाता है| विश्व बैंक के द्वारा 1992 में प्रस्तुत प्रतिवेदन में सुशासन की अवधारणा पर विशेष बल दिया गया परंतुसुशासन का महत्व प्राचीन समय सेदेखने को मिलता है| इस संदर्भ में कौटिल्य के द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का विशेष महत्त्व है| विश्व बैंक केअनुसार, सुशासन की 8 मौलिक विशेषताएं है -सर्वसम्मति; भागीदारी; विधि का शासन; प्रभावशीलता एवं कार्यकुशलता; समता एवं समावेशन; उत्तरदायित्व;पारदर्शिता; जवाबदेहिता; सुशासन एवं प्रजातंत्र एक-दूसरे का पूरक हैं, अतः सुशासन का मूलभूत आधार प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था कोमाना गया है| सुशासन के 4 मौलिक स्तंभ(4 Es) हैं - Ethos(भावना); Equity(समता); Efficiency(कार्यकुशलता); Ethics(नीतिशास्त्र/नैतिकता); सुशासन का महत्त्व कुशासन के कारण है क्योंकि शासन में सुशासन निहित है| सुशासन के लिए प्रजातंत्र को आवश्यक माना गया है परंतुकई अवसरों पर सुशासन एवं प्रजातंत्र के बीच के अंतःविरोधको देखा जा सकता है| सुशासन एवं कौटिल्य की विचारधारा कौटिल्य के द्वारा सुशासन या नैतिक शासन के संदर्भ में दी गईविचारधारा राजतंत्र के संदर्भ मेंहै परंतु यहसमकालीन प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में भी प्रासंगिक एवं उपयोगी है| कौटिल्य का दृष्टिकोण सुशासन/नैतिक शासन की विशेषताओं के अनुरूप है एवं सुशासन/नैतिक शासन के मानकों के रूप में जिन पहलुओं को उजागर किया गया वह वर्तमान संदर्भ में भी उतना ही महत्वपूर्ण है| कौटिल्य के द्वारा लोकसंबंधोंके नैतिक मूल्यों पर बल देते हुए निजीसंबंधोंके नैतिक मानकों को प्रस्तुत करने पर भी बल दिया गया है जोकि कौटिल्य के दृष्टिकोण को अधिक व्यापकता प्रदान करती है| कौटिल्य के अनुसार, राजा राज्य का सेवक होता है| अतः राजा को जनअपेक्षाओं के अनुसार मार्गदर्शितहोना चाहिए | राजा को अपनेप्रजा के इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए| राजा की प्राथमिकता/इच्छा जनता के मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए| राजा को अपनेव्यक्तित्व का विलय अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व के साथ कर देना चाहिए| कौटिल्य का यह दृष्टिकोण जन सेवा के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाता है एवं राजा के व्यवहार से वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करता है। जनकल्याण को सुनिश्चित करने हेतु एक सुचारू प्रशासनिक व्यवस्था का होना आवश्यक है एवं प्रशासन को लोकसेवा के प्रति वचनबद्ध होना चाहिए| इसके लिए यह आवश्यक है कि लोक अधिकारियों का व्यवहार जनता के सेवक के रूप में होना चाहिए नाकि स्वामी के रूप में; नैतिक शासन अतिवादी परित्याग पर आधारित होनी चाहिए, अतः लोकसेवकों के द्वारा मध्यमार्ग का अनुसरण करना चाहिए| राजा एवं मंत्रियों के द्वारा एक अनुशासित जीवन व्यतीतकिया जाना चाहिए| अतःराजा एवं मंत्रियों को आचरण संहिता का अनुपालन करना चाहिए ताकि समाज के लिए वो आदर्श प्रतिमान/प्रतिरूप प्रस्तुत करसके| कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखना राजा का प्राथमिक दायित्व होता है ताकि व्यक्ति के जीवन एवं स्वतंत्रता का संरक्षण किया जा सके| राजा, मंत्रियों एवं लोकसेवकों के वेतन एवं भत्तों को निश्चित रूप से निर्धारितकिया जाना चाहिए| राजा को राज्य की संपत्ति का संरक्षक माना गया एवं राजा निर्धारित वेतन से अधिक किसी आर्थिक लाभ को प्राप्त नहीं कर सकता था| भ्रष्टाचार के रोकथाम हेतु कौटिल्य के द्वारा निवारक एवं दंडात्मक इन दोनों उपायों पर बल दिया गया| कौटिल्य के द्वारा भ्रष्टाचार के रोकथाम हेतु बहुल एवं विविध उपायों का उल्लेख/वर्णन किया गया है एवं एक ईमानदार दृष्टिकोण अपनाया गया है| भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु निवारक उपायों पर बल दिया जाना आवश्यक है जोकि कौटिल्य के दृष्टिकोण में उजागर किया गया है| कौटिल्य के अनुसारसारी गतिविधियाँ/उद्यम राजकोष/वित्त पर निर्भरकरती हैं, अतः राजकोष के समुचित प्रबंधन पर अधिकतम ध्यान देना चाहिए ताकि लोकनिधि का उपयोग अधिक कार्यकुशलता एवं मितव्ययता के आधार पर हो| कौटिल्य के अनुसार मंत्रियों का फेरबदल समय के साथ किया जाना चाहिएताकि मंत्रियों के गुणवता एवं शासन प्रणाली की गुणवत्ताको प्रोत्साहित करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली में सुधार किया जा सके| इसके साथ-साथ लोक अधिकारियों का तबादला भी किया जाना आवश्यक है जोकि अपने आप में भ्रष्टाचार की रोकथाम में सहायक सिद्ध होते हैं| कौटिल्य के द्वारा सरकारी तंत्र में आंतरिक जवाबदेहीता को सुनिश्चित करने पर भी विशेष बल दिया गया है| अगर किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध कोई आरोप हो तो उसकी पुष्टि करने हेतु उसकेअधिकारीएवं अधीनस्थ से सवाल-जवाब किया जाए एवं आरोप सिद्ध होने पर सजा का प्रावधान किया जाए| कौटिल्य के द्वारा सरकार के कार्यप्रणाली के उच्चतर स्तर पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है ताकिस्वाभाविक रूप से निम्न स्तरों की सत्यनिष्ठा एवं योग्यता को प्रोत्साहितकिया जा सके| कौटिल्य के द्वारा राजा के संदर्भ में बुद्धिमता, ऊर्जा, नेतृत्व की क्षमता के साथ-साथ शुभ-नैतिक आचरण पर विशेष बल दिया गया है| राजा के उत्तरधिकारी को योग्यता एवं सत्यनिष्ठा के आधार पर परिभाषित किया गया है| कौटिल्य केअर्थशास्त्र में एक मुख्य भाग अनुशासन के विषय परकेंद्रित है जो अपने आप में नैतिक शासन के महत्व को दर्शाता है| कौटिल्य के द्वारा प्रस्तुतदृष्टिकोण सुशासन/नैतिक शासन के व्यवहारिक पक्ष पर विशेष बल देता है| अतः इसका अनुप्रयोग अधिक संभव हो पाता है| हालाँकि, सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है| समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है| परंतु फिर भी वर्तमानप्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में भी कौटिल्य के उपरोक्त विचार उतने हीप्रासंगिक एवं उपयोगी दिखाई देते हैं जितने वे उस समय थें(राजतंत्र के समय)|
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##Question:कौटिल्य के द्वारा सुशासन/नैतिक शासन के संदर्भ में दी गई विचारधारा समकालीन प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में भी प्रासंगिक एवं उपयोगी है| चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) The ideology given by Kautilya in the context of good governance / moral governance is still relevant and useful in contemporary democratic governance. Discuss. (150–200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - सुशासन को परिभाषित करते हुए एवं उसकी विशेषताओं को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में,सुशासन या नैतिक शासन के संदर्भ में कौटिल्य के द्वारा दिए गए विचारों को आज केसमकालीन प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था के संदर्भ में जोड़ते हुए दिखाईये| एक संतुलित निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - विश्व बैंक के अनुसार, वैसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं|वर्तमान समय में, सुशासन की अवधारणा को प्रतिपादित करने का श्रेय विश्व बैंक को जाता है| विश्व बैंक के द्वारा 1992 में प्रस्तुत प्रतिवेदन में सुशासन की अवधारणा पर विशेष बल दिया गया परंतुसुशासन का महत्व प्राचीन समय सेदेखने को मिलता है| इस संदर्भ में कौटिल्य के द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का विशेष महत्त्व है| विश्व बैंक केअनुसार, सुशासन की 8 मौलिक विशेषताएं है -सर्वसम्मति; भागीदारी; विधि का शासन; प्रभावशीलता एवं कार्यकुशलता; समता एवं समावेशन; उत्तरदायित्व;पारदर्शिता; जवाबदेहिता; सुशासन एवं प्रजातंत्र एक-दूसरे का पूरक हैं, अतः सुशासन का मूलभूत आधार प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था कोमाना गया है| सुशासन के 4 मौलिक स्तंभ(4 Es) हैं - Ethos(भावना); Equity(समता); Efficiency(कार्यकुशलता); Ethics(नीतिशास्त्र/नैतिकता); सुशासन का महत्त्व कुशासन के कारण है क्योंकि शासन में सुशासन निहित है| सुशासन के लिए प्रजातंत्र को आवश्यक माना गया है परंतुकई अवसरों पर सुशासन एवं प्रजातंत्र के बीच के अंतःविरोधको देखा जा सकता है| सुशासन एवं कौटिल्य की विचारधारा कौटिल्य के द्वारा सुशासन या नैतिक शासन के संदर्भ में दी गईविचारधारा राजतंत्र के संदर्भ मेंहै परंतु यहसमकालीन प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में भी प्रासंगिक एवं उपयोगी है| कौटिल्य का दृष्टिकोण सुशासन/नैतिक शासन की विशेषताओं के अनुरूप है एवं सुशासन/नैतिक शासन के मानकों के रूप में जिन पहलुओं को उजागर किया गया वह वर्तमान संदर्भ में भी उतना ही महत्वपूर्ण है| कौटिल्य के द्वारा लोकसंबंधोंके नैतिक मूल्यों पर बल देते हुए निजीसंबंधोंके नैतिक मानकों को प्रस्तुत करने पर भी बल दिया गया है जोकि कौटिल्य के दृष्टिकोण को अधिक व्यापकता प्रदान करती है| कौटिल्य के अनुसार, राजा राज्य का सेवक होता है| अतः राजा को जनअपेक्षाओं के अनुसार मार्गदर्शितहोना चाहिए | राजा को अपनेप्रजा के इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए| राजा की प्राथमिकता/इच्छा जनता के मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए| राजा को अपनेव्यक्तित्व का विलय अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व के साथ कर देना चाहिए| कौटिल्य का यह दृष्टिकोण जन सेवा के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाता है एवं राजा के व्यवहार से वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करता है। जनकल्याण को सुनिश्चित करने हेतु एक सुचारू प्रशासनिक व्यवस्था का होना आवश्यक है एवं प्रशासन को लोकसेवा के प्रति वचनबद्ध होना चाहिए| इसके लिए यह आवश्यक है कि लोक अधिकारियों का व्यवहार जनता के सेवक के रूप में होना चाहिए नाकि स्वामी के रूप में; नैतिक शासन अतिवादी परित्याग पर आधारित होनी चाहिए, अतः लोकसेवकों के द्वारा मध्यमार्ग का अनुसरण करना चाहिए| राजा एवं मंत्रियों के द्वारा एक अनुशासित जीवन व्यतीतकिया जाना चाहिए| अतःराजा एवं मंत्रियों को आचरण संहिता का अनुपालन करना चाहिए ताकि समाज के लिए वो आदर्श प्रतिमान/प्रतिरूप प्रस्तुत करसके| कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखना राजा का प्राथमिक दायित्व होता है ताकि व्यक्ति के जीवन एवं स्वतंत्रता का संरक्षण किया जा सके| राजा, मंत्रियों एवं लोकसेवकों के वेतन एवं भत्तों को निश्चित रूप से निर्धारितकिया जाना चाहिए| राजा को राज्य की संपत्ति का संरक्षक माना गया एवं राजा निर्धारित वेतन से अधिक किसी आर्थिक लाभ को प्राप्त नहीं कर सकता था| भ्रष्टाचार के रोकथाम हेतु कौटिल्य के द्वारा निवारक एवं दंडात्मक इन दोनों उपायों पर बल दिया गया| कौटिल्य के द्वारा भ्रष्टाचार के रोकथाम हेतु बहुल एवं विविध उपायों का उल्लेख/वर्णन किया गया है एवं एक ईमानदार दृष्टिकोण अपनाया गया है| भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु निवारक उपायों पर बल दिया जाना आवश्यक है जोकि कौटिल्य के दृष्टिकोण में उजागर किया गया है| कौटिल्य के अनुसारसारी गतिविधियाँ/उद्यम राजकोष/वित्त पर निर्भरकरती हैं, अतः राजकोष के समुचित प्रबंधन पर अधिकतम ध्यान देना चाहिए ताकि लोकनिधि का उपयोग अधिक कार्यकुशलता एवं मितव्ययता के आधार पर हो| कौटिल्य के अनुसार मंत्रियों का फेरबदल समय के साथ किया जाना चाहिएताकि मंत्रियों के गुणवता एवं शासन प्रणाली की गुणवत्ताको प्रोत्साहित करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली में सुधार किया जा सके| इसके साथ-साथ लोक अधिकारियों का तबादला भी किया जाना आवश्यक है जोकि अपने आप में भ्रष्टाचार की रोकथाम में सहायक सिद्ध होते हैं| कौटिल्य के द्वारा सरकारी तंत्र में आंतरिक जवाबदेहीता को सुनिश्चित करने पर भी विशेष बल दिया गया है| अगर किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध कोई आरोप हो तो उसकी पुष्टि करने हेतु उसकेअधिकारीएवं अधीनस्थ से सवाल-जवाब किया जाए एवं आरोप सिद्ध होने पर सजा का प्रावधान किया जाए| कौटिल्य के द्वारा सरकार के कार्यप्रणाली के उच्चतर स्तर पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है ताकिस्वाभाविक रूप से निम्न स्तरों की सत्यनिष्ठा एवं योग्यता को प्रोत्साहितकिया जा सके| कौटिल्य के द्वारा राजा के संदर्भ में बुद्धिमता, ऊर्जा, नेतृत्व की क्षमता के साथ-साथ शुभ-नैतिक आचरण पर विशेष बल दिया गया है| राजा के उत्तरधिकारी को योग्यता एवं सत्यनिष्ठा के आधार पर परिभाषित किया गया है| कौटिल्य केअर्थशास्त्र में एक मुख्य भाग अनुशासन के विषय परकेंद्रित है जो अपने आप में नैतिक शासन के महत्व को दर्शाता है| कौटिल्य के द्वारा प्रस्तुतदृष्टिकोण सुशासन/नैतिक शासन के व्यवहारिक पक्ष पर विशेष बल देता है| अतः इसका अनुप्रयोग अधिक संभव हो पाता है| हालाँकि, सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है| समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है| परंतु फिर भी वर्तमानप्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में भी कौटिल्य के उपरोक्त विचार उतने हीप्रासंगिक एवं उपयोगी दिखाई देते हैं जितने वे उस समय थें(राजतंत्र के समय)|
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राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कृषक आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द , अंक - 10 ) Briefly discuss the salient features of the agrarian movement during the national movement. (150-200 words, Marks - 10)
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किसान आंदोलन : प्रथम चरण : प्रथम चरण में किसान विद्रोह मुख्यतः नागरिक विद्रोह का ही अंग था । अतः किसानों के आंदोलन से संबन्धित विशेषताओं को नागरिक विद्रोह के साथ संबंधित किया जा सकता है । दूसरा चरण : 1. नील विद्रोह : 1859-60 , क्षेत्र- बंगाल के नदिया जिले से प्रारम्भ । कारण : स्थायी बंदोबस्त से असंतोष । किसानों से जबरन नील की खेती कराना । कम कीमत पर उत्पादों को खरीदना । बेगार लेना और 1859 के बंगाल के कास्तकारी अधिनियम की सुविधाओं से किसानों को वंचित करना । प्रमुख नेता : दिगंबर एवं विष्णु विश्वास । हिंसक एवं अहिंसक दोनों ही मोर्चों पर संघर्ष , जैसे- अधिकारों के कानूनी लड़ाई । बुद्धिजीवियों के द्वारा किसानों को समर्थन , जैसे- हरिश्चंद्र मुखर्जी की हिन्दू पेट्रिओट ने किसानों का समर्थन किया । दीनबंधु मित्र के नील दर्पण में ( 1860 ) में भी किसानों की दयनीय दशा का जिक्र है । सरकार ने नील आयोग का गठन किया और इसकी अनुसंशा पर यह आदेश जारी हुआ कि किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा । 2. पवना विद्रोह : स्थायी बंदोबस्त से संबंधित असंतोष , भूराजस्व की दरों में वृद्धि तथा किसानों को बेदखल करने की कोशिश । नेता- शंभू पाल , खुड्डी मुल्ला । इंडियन एसोशिएसन ने किसानों का समर्थन किया । 1885 में बंगाल कास्तकारी अधिनियम के द्वारा किसानों को राहत देने की कोशिश की गयी । 3. दक्कन उपद्रव : अहमदनगर , पुना । रैयतवारी बंदोबस्त से असंतोष , भूराजस्व में वृद्धि , कपास की कीमतों में गिरावट । महाजनों के द्वारा किसानों का शोषण । पुना सार्वजनिक सभा ने किसानों का समर्थन किया । 1879 में दक्कन कृषक राहत अधिनियम पारित हुआ । दूसरे चरण के किसान आंदोलन की विशेषताएँ : नील , पवना एवं दक्कन में किसानों के विद्रोह के पीछे पारंपरिक कारणों के साथ-साथ , तात्कालिक कारण भी जिम्मेदार थे । जैसे- नदिया जिले में करार के बिना किसानों से जबरन नील की खेती कराना , बेगार लेना । वहीं दक्कन में महाजनों के द्वारा शोषण । आंदोलन का लक्ष्य पुरानी व्यवस्था की स्थापना न होकर शोषण से मुक्ति थी । अर्थात तीनों ही विद्रोह में किसानों ने शोषण का विरोध किया न कि ब्रिटिश पूर्व व्यवस्था की मांग की । विद्रोह के दौरान किसानों ने संगठित होकर शोषक वर्गों का विरोध किया । जैसे - कानूनी मोर्चे पर लड़ाई लड़ी गयी । साथ ही शोषक वर्गों का सामाजिक बहिष्कार किया गया । अहिंसक प्रतिरोध के साथ-साथ परिस्थितियों के अनुसार हिंसक संघर्ष भी किए गए । इन विद्रोहों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है बुद्धिजीवियों के द्वारा समर्थन । ये विद्रोह वर्गीय चेतना पर आधारित थे । तीनों ही विद्रोहों में प्रत्यक्ष तौर पर सरकार को चुनौती नहीं दी गयी , साथ ही तीनों विद्रोहों को सरकार से कुछ न कुछ रियायतें भी मिली । इन विद्रोहों में राष्ट्रीय चेतना का प्रभाव दिखाई नहीं देता है । बुद्धिजीवियों ने आगे चलकर इन विद्रोहियों में राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया । तीसरा चरण : चंपारण - 1917 खेड़ा- 1918 मोपला विद्रोह - 1921 बारदोली सत्याग्रह - 1927-28 अखिल भारतीय किसान सभा ( लखनऊ ) - 1936 । वर्ली विद्रोह - ( महाराष्ट्र ) - 1945 । पुनद्र वायलर विद्रोह ( केरल ) - 1946 । तेभागा आंदोलन - ( बंगाल ) - 1946 । तेलंगाना विद्रोह - 1946-51 । तृतीय चरण की विशेषताएँ : शोषण के विरुद्ध होने के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना से युक्त एवं संगठित । इस चरण में आंदोलन की मुख्यतः दो धाराएँ दिखाई पड़ती है । एक कांग्रेसी नेतृत्व में तथा दूसरा मार्क्सवादियों के नेतृत्व में । कांग्रेसी नेतृत्व में आंदोलन अहिंसात्मक एवं वर्ग समन्वय पर आधारित था । यहाँ दो प्रकार से कांग्रेस की भूमिका आंदोलन में दिखाई पड़ती है । एक क्षेत्रीय स्तर पर , जैसे- खेड़ा , चंपारण , बारदोली । दूसरा अखिल भारतीय स्तर पर जैसे - असहयोग , सविनय अवज्ञा आंदोलन । कांग्रेसी नेतृत्व में विशेष कर गांधीवादी चरण में किसानों के बीच संगठन का प्रसार हुआ । न केवल व्यक्तिगत तौर पर कांग्रेसी नेता किसानों के बीच सक्रिय थे बल्कि संगठित होकर भी तथा कांग्रेस के मंच से भी किसानों के मुद्दे उठाकर उन्हें जोड़ने की कोशिश की गयी । जैसे- रचनात्मक कार्यों के द्वारा । भूराजस्व में कटौती की मांग , कर न देने की मांग , 1931 के कराची कांग्रेस में किसानों के हितों पर पारित प्रस्ताव । 1920 के दशक से मार्क्सवादी भी किसानों के बीच सक्रिय तथा 1930 व 1940 के दशक में इनका प्रभाव बढ़ता गया । ये वर्ग संघर्ष द्वारा किसानों के हितों को प्राप्त करने की बात कहते थे । 1935 के पश्चात कांग्रेस : 1935 के अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय चुनावों में भाग लेना है या नहीं इसको लेकर कांग्रेस में दो दृष्टिकोण दिखाई पड़ते हैं । एक तरफ राजगोपालाचारी , अंसारी एवं सत्यमूर्ति जैसे नेता जो चुनावों में भाग लेने के पक्ष में थे तो दूसरी तरफ सुभाष चंद्र बोस , पुरुषोत्तम दास टंडन व अन्य समाजवादी नेता चुनाव में भाग लेने का विरोध कर रहे थे । इसी पृष्टभूमि में 1936 में लखनऊ में कांग्रेस का 50वां अधिवेशन , अध्यक्ष - जवाहर लाल नेहरू , चुनाव में भाग लेने पर प्रस्ताव पारित हुआ । 1936 में कांग्रेस का अधिवेशन महाराष्ट्र के फैजपुर में अधिवेशन ( ग्रामीण क्षेत्र में पहला अधिवेशन ) , अध्यक्ष - जवाहर लाल नेहरू , कृषि सुधारों पर एक व्यापक प्रस्ताव पारित ।
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##Question:राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कृषक आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द , अंक - 10 ) Briefly discuss the salient features of the agrarian movement during the national movement. (150-200 words, Marks - 10)##Answer:किसान आंदोलन : प्रथम चरण : प्रथम चरण में किसान विद्रोह मुख्यतः नागरिक विद्रोह का ही अंग था । अतः किसानों के आंदोलन से संबन्धित विशेषताओं को नागरिक विद्रोह के साथ संबंधित किया जा सकता है । दूसरा चरण : 1. नील विद्रोह : 1859-60 , क्षेत्र- बंगाल के नदिया जिले से प्रारम्भ । कारण : स्थायी बंदोबस्त से असंतोष । किसानों से जबरन नील की खेती कराना । कम कीमत पर उत्पादों को खरीदना । बेगार लेना और 1859 के बंगाल के कास्तकारी अधिनियम की सुविधाओं से किसानों को वंचित करना । प्रमुख नेता : दिगंबर एवं विष्णु विश्वास । हिंसक एवं अहिंसक दोनों ही मोर्चों पर संघर्ष , जैसे- अधिकारों के कानूनी लड़ाई । बुद्धिजीवियों के द्वारा किसानों को समर्थन , जैसे- हरिश्चंद्र मुखर्जी की हिन्दू पेट्रिओट ने किसानों का समर्थन किया । दीनबंधु मित्र के नील दर्पण में ( 1860 ) में भी किसानों की दयनीय दशा का जिक्र है । सरकार ने नील आयोग का गठन किया और इसकी अनुसंशा पर यह आदेश जारी हुआ कि किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा । 2. पवना विद्रोह : स्थायी बंदोबस्त से संबंधित असंतोष , भूराजस्व की दरों में वृद्धि तथा किसानों को बेदखल करने की कोशिश । नेता- शंभू पाल , खुड्डी मुल्ला । इंडियन एसोशिएसन ने किसानों का समर्थन किया । 1885 में बंगाल कास्तकारी अधिनियम के द्वारा किसानों को राहत देने की कोशिश की गयी । 3. दक्कन उपद्रव : अहमदनगर , पुना । रैयतवारी बंदोबस्त से असंतोष , भूराजस्व में वृद्धि , कपास की कीमतों में गिरावट । महाजनों के द्वारा किसानों का शोषण । पुना सार्वजनिक सभा ने किसानों का समर्थन किया । 1879 में दक्कन कृषक राहत अधिनियम पारित हुआ । दूसरे चरण के किसान आंदोलन की विशेषताएँ : नील , पवना एवं दक्कन में किसानों के विद्रोह के पीछे पारंपरिक कारणों के साथ-साथ , तात्कालिक कारण भी जिम्मेदार थे । जैसे- नदिया जिले में करार के बिना किसानों से जबरन नील की खेती कराना , बेगार लेना । वहीं दक्कन में महाजनों के द्वारा शोषण । आंदोलन का लक्ष्य पुरानी व्यवस्था की स्थापना न होकर शोषण से मुक्ति थी । अर्थात तीनों ही विद्रोह में किसानों ने शोषण का विरोध किया न कि ब्रिटिश पूर्व व्यवस्था की मांग की । विद्रोह के दौरान किसानों ने संगठित होकर शोषक वर्गों का विरोध किया । जैसे - कानूनी मोर्चे पर लड़ाई लड़ी गयी । साथ ही शोषक वर्गों का सामाजिक बहिष्कार किया गया । अहिंसक प्रतिरोध के साथ-साथ परिस्थितियों के अनुसार हिंसक संघर्ष भी किए गए । इन विद्रोहों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है बुद्धिजीवियों के द्वारा समर्थन । ये विद्रोह वर्गीय चेतना पर आधारित थे । तीनों ही विद्रोहों में प्रत्यक्ष तौर पर सरकार को चुनौती नहीं दी गयी , साथ ही तीनों विद्रोहों को सरकार से कुछ न कुछ रियायतें भी मिली । इन विद्रोहों में राष्ट्रीय चेतना का प्रभाव दिखाई नहीं देता है । बुद्धिजीवियों ने आगे चलकर इन विद्रोहियों में राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया । तीसरा चरण : चंपारण - 1917 खेड़ा- 1918 मोपला विद्रोह - 1921 बारदोली सत्याग्रह - 1927-28 अखिल भारतीय किसान सभा ( लखनऊ ) - 1936 । वर्ली विद्रोह - ( महाराष्ट्र ) - 1945 । पुनद्र वायलर विद्रोह ( केरल ) - 1946 । तेभागा आंदोलन - ( बंगाल ) - 1946 । तेलंगाना विद्रोह - 1946-51 । तृतीय चरण की विशेषताएँ : शोषण के विरुद्ध होने के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना से युक्त एवं संगठित । इस चरण में आंदोलन की मुख्यतः दो धाराएँ दिखाई पड़ती है । एक कांग्रेसी नेतृत्व में तथा दूसरा मार्क्सवादियों के नेतृत्व में । कांग्रेसी नेतृत्व में आंदोलन अहिंसात्मक एवं वर्ग समन्वय पर आधारित था । यहाँ दो प्रकार से कांग्रेस की भूमिका आंदोलन में दिखाई पड़ती है । एक क्षेत्रीय स्तर पर , जैसे- खेड़ा , चंपारण , बारदोली । दूसरा अखिल भारतीय स्तर पर जैसे - असहयोग , सविनय अवज्ञा आंदोलन । कांग्रेसी नेतृत्व में विशेष कर गांधीवादी चरण में किसानों के बीच संगठन का प्रसार हुआ । न केवल व्यक्तिगत तौर पर कांग्रेसी नेता किसानों के बीच सक्रिय थे बल्कि संगठित होकर भी तथा कांग्रेस के मंच से भी किसानों के मुद्दे उठाकर उन्हें जोड़ने की कोशिश की गयी । जैसे- रचनात्मक कार्यों के द्वारा । भूराजस्व में कटौती की मांग , कर न देने की मांग , 1931 के कराची कांग्रेस में किसानों के हितों पर पारित प्रस्ताव । 1920 के दशक से मार्क्सवादी भी किसानों के बीच सक्रिय तथा 1930 व 1940 के दशक में इनका प्रभाव बढ़ता गया । ये वर्ग संघर्ष द्वारा किसानों के हितों को प्राप्त करने की बात कहते थे । 1935 के पश्चात कांग्रेस : 1935 के अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय चुनावों में भाग लेना है या नहीं इसको लेकर कांग्रेस में दो दृष्टिकोण दिखाई पड़ते हैं । एक तरफ राजगोपालाचारी , अंसारी एवं सत्यमूर्ति जैसे नेता जो चुनावों में भाग लेने के पक्ष में थे तो दूसरी तरफ सुभाष चंद्र बोस , पुरुषोत्तम दास टंडन व अन्य समाजवादी नेता चुनाव में भाग लेने का विरोध कर रहे थे । इसी पृष्टभूमि में 1936 में लखनऊ में कांग्रेस का 50वां अधिवेशन , अध्यक्ष - जवाहर लाल नेहरू , चुनाव में भाग लेने पर प्रस्ताव पारित हुआ । 1936 में कांग्रेस का अधिवेशन महाराष्ट्र के फैजपुर में अधिवेशन ( ग्रामीण क्षेत्र में पहला अधिवेशन ) , अध्यक्ष - जवाहर लाल नेहरू , कृषि सुधारों पर एक व्यापक प्रस्ताव पारित ।
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What factors were responsible for the dispatch of the Cabinet Mission? Do you think that it represented a change of attitude on the part of the British Government? [250 Words, 15 Marks]
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Approach : Introduction: Start with the definition of Cabinet Mission Body: write down the factors that were responsible for the dispatch of the Cabinet Mission and also mention the change of attitude on the part of the British Government. Conclusion : Conclude accrodigly. Answer: A Cabinet Mission came to India in 1946 in order to discuss the transfer of power from the British government to the Indian political leadership, with the aim of preserving India"s unity and granting its independence. Formed at the initiative of Clement Attlee, the mission contained as its members, Lord Pethick-Lawrence, Sir Stafford Cripps, and A.V. Alexander. The Viceroy of India Lord Wavell participated in some of the discussions. Factors were responsible for the dispatch of the Cabinet Mission are: 1. To resolve the Congress–Muslim League deadlock and, thus, of transferring British power to a single Indian administration. 2. By the end of the war, the nationalist forces had gained an upper hand in their struggle against the British, the whole country rallied behind national leaders in a highly politically charged atmosphere. 3. Bureaucracy was also leaning towards nationalistic cause due to the paucity of British ICS recruits. 4. Policy of Indianisation in civil services had eroded British hegemony in Bureaucracy. 5. The British strategy of conciliation and repression had its own constraints and limitations. 6. After the Cripp"s Offer, there was little left to offer except full freedom. 7. Due to the brutal repression of the Quit India Movement and non-violent resistance, the Government stood exposed and people s anger was growing against the British Raj and demands of leniency for INA prisoners from within the army and revolt of the RIN ratings had made the British suspicious of the loyalty of the army itself. 8. The British civil services and armed forces did not have the necessary numbers and strength so the British were wary of the congress launching another 1942 type mass movement and had realized that in the interest of good Indo-British relations in the future and to bury the ghost of a mass movement, complete transfer of power was the only option available now. Change of attitude on the part of the British Government : 1) In the meantime, Lord Mountbatten was sent as the Viceroy to India. He put up his plan in June 1947 which included the partition of India. 2) In spite of strong opposition by Gandhi, all the parties agreed to the partition, and the Indian Independence Act, of 1947 came into being. 3) It created two independent states in the Indian sub-continent, i.e. Indian Union and Pakistan. The main objective of the Cabinet Mission was to find out ways and means for the peaceful transfer of power in India, to suggest measures for the formation of Constitution-making machinery, and also to set up the Interim Government.
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##Question:What factors were responsible for the dispatch of the Cabinet Mission? Do you think that it represented a change of attitude on the part of the British Government? [250 Words, 15 Marks]##Answer:Approach : Introduction: Start with the definition of Cabinet Mission Body: write down the factors that were responsible for the dispatch of the Cabinet Mission and also mention the change of attitude on the part of the British Government. Conclusion : Conclude accrodigly. Answer: A Cabinet Mission came to India in 1946 in order to discuss the transfer of power from the British government to the Indian political leadership, with the aim of preserving India"s unity and granting its independence. Formed at the initiative of Clement Attlee, the mission contained as its members, Lord Pethick-Lawrence, Sir Stafford Cripps, and A.V. Alexander. The Viceroy of India Lord Wavell participated in some of the discussions. Factors were responsible for the dispatch of the Cabinet Mission are: 1. To resolve the Congress–Muslim League deadlock and, thus, of transferring British power to a single Indian administration. 2. By the end of the war, the nationalist forces had gained an upper hand in their struggle against the British, the whole country rallied behind national leaders in a highly politically charged atmosphere. 3. Bureaucracy was also leaning towards nationalistic cause due to the paucity of British ICS recruits. 4. Policy of Indianisation in civil services had eroded British hegemony in Bureaucracy. 5. The British strategy of conciliation and repression had its own constraints and limitations. 6. After the Cripp"s Offer, there was little left to offer except full freedom. 7. Due to the brutal repression of the Quit India Movement and non-violent resistance, the Government stood exposed and people s anger was growing against the British Raj and demands of leniency for INA prisoners from within the army and revolt of the RIN ratings had made the British suspicious of the loyalty of the army itself. 8. The British civil services and armed forces did not have the necessary numbers and strength so the British were wary of the congress launching another 1942 type mass movement and had realized that in the interest of good Indo-British relations in the future and to bury the ghost of a mass movement, complete transfer of power was the only option available now. Change of attitude on the part of the British Government : 1) In the meantime, Lord Mountbatten was sent as the Viceroy to India. He put up his plan in June 1947 which included the partition of India. 2) In spite of strong opposition by Gandhi, all the parties agreed to the partition, and the Indian Independence Act, of 1947 came into being. 3) It created two independent states in the Indian sub-continent, i.e. Indian Union and Pakistan. The main objective of the Cabinet Mission was to find out ways and means for the peaceful transfer of power in India, to suggest measures for the formation of Constitution-making machinery, and also to set up the Interim Government.
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"हिन्द महासागर न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ,बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ भी है |" इस कथन के आलोक में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) "The Indian Ocean is not only important from an economic point of view, but it also has strategic implications." In light of this statement, discuss its importance for India and the world. (150-200 Words/10 Marks)
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अप्रोच उत्तर की शुरुआत हिन्द महासागर के आर्थिक महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात हिन्द महासागर के सामरिक महत्व को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - आर्थिक महत्त्व भारत पूरे महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है ; भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं ; नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, लम्बी समुद्री सीमा से सुरक्षा चुनौतियां भी उत्पन्न होती है; हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है ; सामरिक महत्त्व इसके अतिरिक्त हिंद महासागर का सामरिक महत्त्व भी है; इससे सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं अतः इसका विवाद मुक्त एवं विसैन्यीकृत रहना आवश्यक है| हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है ; हिंद महासागर पर चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण यह एक नवीन संभावित युद्ध मैदान में परिवर्तित हो सकता है; पश्चिमी एशिया विश्व के लिए ऊर्जा आपूर्तिकर्ता क्षेत्र है, यहाँ से यूरोप, चीन, जापान, भारत आदि देशों को समुद्र के रास्ते तेल की आपूर्ति होती है, लेकिन अमेरिका का हित यहाँ ऊर्जा सुरक्षा के सन्दर्भ में नहीं है, 2005 से पूर्व अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखा था| डीआगो गार्शिया में अमेरिका का नौसैनिक अड्डा है, अब अमेरिका ऊर्जा के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र पर कम निर्भरता है अतः हिंद महासागर की सुरक्षा वर्तमान में अमेरिका की प्राथमिकता नहीं है, इससे एक पॉवर वैक्यूम की स्थिति उत्पन्न हुई थी, जिससे चीन ने यहाँ अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था|अमेरिका इस क्षेत्र में चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए भारत को प्रोत्साहित कर रहा है| विभिन्न सैन्य अभ्यासों को इसी दृष्टि से प्रासंगिक माना जा सकता है| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत व विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है ; विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है, श्रीलंका के गृहयुद्ध के कारण इस क्षेत्र में अशांति का वातावरण बना है एवं पाकिस्तान में चीन द्वारा ग्वादर पोर्ट का विकास इस क्षेत्र में अमेरिका और भारतीय हितों को प्रभावित करता है, ग्वादर पोर्ट रूस के हितों के अनुरूप है क्योंकि उसके पास आल वीदर पोर्ट्स की कमी है, अतः रूस ने इसका समर्थन किया है जिससे अमेरिका चिंतित है|" भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि इसी दृष्टिकोण से हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न देश एवं क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं; अफगानिस्तान में आपूर्ति रेखा को बनाए रखने के लिए हिंद महासागर का महत्त्व है; हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा जबकि भारत की स्थिति इस सन्दर्भ में कमजोर है| इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| दूसरी ओर अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जिससे भारत का महत्त्व बढ़ रहा है ,आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं|
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##Question:"हिन्द महासागर न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ,बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ भी है |" इस कथन के आलोक में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) "The Indian Ocean is not only important from an economic point of view, but it also has strategic implications." In light of this statement, discuss its importance for India and the world. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:अप्रोच उत्तर की शुरुआत हिन्द महासागर के आर्थिक महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात हिन्द महासागर के सामरिक महत्व को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - आर्थिक महत्त्व भारत पूरे महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है ; भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं ; नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, लम्बी समुद्री सीमा से सुरक्षा चुनौतियां भी उत्पन्न होती है; हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है ; सामरिक महत्त्व इसके अतिरिक्त हिंद महासागर का सामरिक महत्त्व भी है; इससे सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं अतः इसका विवाद मुक्त एवं विसैन्यीकृत रहना आवश्यक है| हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है ; हिंद महासागर पर चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण यह एक नवीन संभावित युद्ध मैदान में परिवर्तित हो सकता है; पश्चिमी एशिया विश्व के लिए ऊर्जा आपूर्तिकर्ता क्षेत्र है, यहाँ से यूरोप, चीन, जापान, भारत आदि देशों को समुद्र के रास्ते तेल की आपूर्ति होती है, लेकिन अमेरिका का हित यहाँ ऊर्जा सुरक्षा के सन्दर्भ में नहीं है, 2005 से पूर्व अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखा था| डीआगो गार्शिया में अमेरिका का नौसैनिक अड्डा है, अब अमेरिका ऊर्जा के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र पर कम निर्भरता है अतः हिंद महासागर की सुरक्षा वर्तमान में अमेरिका की प्राथमिकता नहीं है, इससे एक पॉवर वैक्यूम की स्थिति उत्पन्न हुई थी, जिससे चीन ने यहाँ अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था|अमेरिका इस क्षेत्र में चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए भारत को प्रोत्साहित कर रहा है| विभिन्न सैन्य अभ्यासों को इसी दृष्टि से प्रासंगिक माना जा सकता है| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत व विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है ; विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है, श्रीलंका के गृहयुद्ध के कारण इस क्षेत्र में अशांति का वातावरण बना है एवं पाकिस्तान में चीन द्वारा ग्वादर पोर्ट का विकास इस क्षेत्र में अमेरिका और भारतीय हितों को प्रभावित करता है, ग्वादर पोर्ट रूस के हितों के अनुरूप है क्योंकि उसके पास आल वीदर पोर्ट्स की कमी है, अतः रूस ने इसका समर्थन किया है जिससे अमेरिका चिंतित है|" भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि इसी दृष्टिकोण से हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न देश एवं क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं; अफगानिस्तान में आपूर्ति रेखा को बनाए रखने के लिए हिंद महासागर का महत्त्व है; हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा जबकि भारत की स्थिति इस सन्दर्भ में कमजोर है| इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| दूसरी ओर अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जिससे भारत का महत्त्व बढ़ रहा है ,आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं|
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"हिन्द महासागर न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ,बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ भी है |" इस कथन के आलोक में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) "The Indian Ocean is not only important from an economic point of view, but it also has strategic implications." In light of this statement, discuss its importance for India and the world. (150-200 Words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत के सन्दर्भ में हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बारे में बताते हुए इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत के लिए एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संकल्पना के तौर पर स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| हिंद महासागर क्षेत्र में भारत भारत के आर्थिक-सामरिक हित हैं| इसी सन्दर्भ में हिंद महासागर के लिए भारत की एक स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा रहती है| भारत ने हिंद महासागर में अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए विविध पहलें की हैं, आशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर इन्ही में से एक है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर एवं उसका महत्त्व · भारत जापान के मध्य सहयोग समझौता है जो एशिया अफ्रीका के सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है| यह मांग आधारित समझौता है इसका आधार शोषण नहीं बल्कि पारस्परिक सहयोग है| · दोनों देशों ने निवेश प्राप्तकर्ता देशों में चार आयामों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट की है यथा क्षमता(उद्योगों की स्थापना) और कौशल विकास(चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है), बुनियादी ढांचे का विकास(OBOR को संतुलित करने के लिए) एवं संस्थागत कनेक्टिविटी(अंतरमंत्रालयी, अंतरविभागीय कनेक्टिविटी), विकास और सहयोग परियोजना(मांग आधारित विकास) तथा पीपल टू पीपल साझेदारी · स्वास्थ्य एवं औषधि उद्योग, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन तथा कौशल विकास को भारत एवं जापान ने इस समझौते के प्राथमिकता क्षेत्र में रखा है| ये सभी क्षेत्रक अफ्रीका की आवश्यकता के अनुरूप हैं तथा मांगजनित हैं| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का रणनीतिक महत्त्व · इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एशिया अफ्रिका के हिंद महासागरीय देशों में निवेश करेंगे और निवेश के माध्यम से चीन की चेक बुक डिप्लोमेसी को प्रतिसंतुलित करेंगे| · यह चीन के मॉडल से अलग है क्योंकि चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है जिससे उन राष्ट्रों में रोजगार का सृजन नहीं हो पाता, चीन पर्यावरणीय पहलू को भी नजरअंदाज करता है, चीन अपने निवेश के माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है, चीन ने अपने प्रोजेक्ट्स का ब्लूप्रिंट प्रकाशित नहीं करता है जिससे उन प्रोजेक्ट्स में देशों की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पाती, चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है| · चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है जबकि सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन की सुरक्षा भारत एवं जापान की प्राथमिकता है · चीन का OBOR दोनों देशों के हितों को प्रभावित करता है, एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर OBOR को संतुलित करने का एक माध्यम है · इस समझौते के माध्यम से भारत और चीन मिलकर हिन्दमहासागर में चीन और उसकी OBOR जैसी परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित कर सकेंगे · मलक्का डिलेमा(दुविधा) से निकलने के लिए चीन CPEC, मलेशिया में क्रा कैनाल एवं इंडोनेशिया में रेल मार्ग विकास पर कार्य कर रहा है| चीन द्वारा क्रा कैनाल का प्रस्ताव, आसियान के देशों के आपसी मित्रता(सॉलिडेरिटी) को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है अतः आसियान के देश भी यही चाहते हैं कि OBOR को काउंटर करने के लिए जापान एवं भारत को आगे आना चाहिए| इसी लिए आसियान देशों से एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का स्वागत किया है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का लाभ · इससे समुद्री व्यापार का विकास होगा इससे जहाँ एक ओर लागत में कमी आएगी वहीँ कार्बन फूटप्रिंट में कमी आएगी · एशिया अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, इससे एशिया अफ्रीका का एक यूनियन बन सकता है · सामूहिक रूप से वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक ब्लाक के रूप में उभर सकेगा · सामाजिक आर्थिक विकास की परियोजनाओं के माध्यम से P2P संपर्क बढेगा, इस सन्दर्भ में भारत द्वारा सोलर मम्मी जैसी पहले जन सम्पर्क बढाने में उपयोगी होंगी| इससे जहाँ एक ओर सशक्तिकरण होगा वहीँ भारत के लिए गुडविल बनाने में आसानी होगी · भारत की ACT EAST POLICY और जापान की गुणवत्ता बुनियादी ढाँचे के लिए विस्तारित साझेदारी(सहयोगात्मक निवेश की नीति, जैसे DMRC फ्रेट कॉरिडोर आदि में निवेश) नीतियों के बीच एक अभिसरण क्षेत्र है · इस समझौते में यह प्रतिबद्धता प्रकट की गयी है आकांक्षी देश अपनी आवश्यकता को समझ कर अपनी मांग स्पष्ट करेगा तब उसी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा अर्थात यह एक लोकतांत्रिक मॉडल है · चीन की अर्थव्यवस्था इस समय ढलान पर है और यह भारत के लिए एक मौक़ा है, AAGC इस सन्दर्भ में भारत के लिए कुंजी का काम कर सकता है · AAGC के माध्यम से भारत अपने व्यापार का विस्तार कर सकेगा इससे विश्व व्यापार में भारत अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा सकेगा और भुगतान संतुलन को संतुलित कर सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया अफ्रिका ग्रोथ कॉरिडोर का आर्थिक सामरिक महत्त्व है और यह विभिन्न अर्थों में भारत के ल्लिये लाभदायी संकल्पना है|
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##Question:"हिन्द महासागर न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ,बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ भी है |" इस कथन के आलोक में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) "The Indian Ocean is not only important from an economic point of view, but it also has strategic implications." In light of this statement, discuss its importance for India and the world. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत के सन्दर्भ में हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बारे में बताते हुए इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत के लिए एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संकल्पना के तौर पर स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| हिंद महासागर क्षेत्र में भारत भारत के आर्थिक-सामरिक हित हैं| इसी सन्दर्भ में हिंद महासागर के लिए भारत की एक स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा रहती है| भारत ने हिंद महासागर में अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए विविध पहलें की हैं, आशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर इन्ही में से एक है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर एवं उसका महत्त्व · भारत जापान के मध्य सहयोग समझौता है जो एशिया अफ्रीका के सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है| यह मांग आधारित समझौता है इसका आधार शोषण नहीं बल्कि पारस्परिक सहयोग है| · दोनों देशों ने निवेश प्राप्तकर्ता देशों में चार आयामों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट की है यथा क्षमता(उद्योगों की स्थापना) और कौशल विकास(चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है), बुनियादी ढांचे का विकास(OBOR को संतुलित करने के लिए) एवं संस्थागत कनेक्टिविटी(अंतरमंत्रालयी, अंतरविभागीय कनेक्टिविटी), विकास और सहयोग परियोजना(मांग आधारित विकास) तथा पीपल टू पीपल साझेदारी · स्वास्थ्य एवं औषधि उद्योग, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन तथा कौशल विकास को भारत एवं जापान ने इस समझौते के प्राथमिकता क्षेत्र में रखा है| ये सभी क्षेत्रक अफ्रीका की आवश्यकता के अनुरूप हैं तथा मांगजनित हैं| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का रणनीतिक महत्त्व · इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एशिया अफ्रिका के हिंद महासागरीय देशों में निवेश करेंगे और निवेश के माध्यम से चीन की चेक बुक डिप्लोमेसी को प्रतिसंतुलित करेंगे| · यह चीन के मॉडल से अलग है क्योंकि चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है जिससे उन राष्ट्रों में रोजगार का सृजन नहीं हो पाता, चीन पर्यावरणीय पहलू को भी नजरअंदाज करता है, चीन अपने निवेश के माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है, चीन ने अपने प्रोजेक्ट्स का ब्लूप्रिंट प्रकाशित नहीं करता है जिससे उन प्रोजेक्ट्स में देशों की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पाती, चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है| · चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है जबकि सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन की सुरक्षा भारत एवं जापान की प्राथमिकता है · चीन का OBOR दोनों देशों के हितों को प्रभावित करता है, एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर OBOR को संतुलित करने का एक माध्यम है · इस समझौते के माध्यम से भारत और चीन मिलकर हिन्दमहासागर में चीन और उसकी OBOR जैसी परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित कर सकेंगे · मलक्का डिलेमा(दुविधा) से निकलने के लिए चीन CPEC, मलेशिया में क्रा कैनाल एवं इंडोनेशिया में रेल मार्ग विकास पर कार्य कर रहा है| चीन द्वारा क्रा कैनाल का प्रस्ताव, आसियान के देशों के आपसी मित्रता(सॉलिडेरिटी) को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है अतः आसियान के देश भी यही चाहते हैं कि OBOR को काउंटर करने के लिए जापान एवं भारत को आगे आना चाहिए| इसी लिए आसियान देशों से एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का स्वागत किया है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का लाभ · इससे समुद्री व्यापार का विकास होगा इससे जहाँ एक ओर लागत में कमी आएगी वहीँ कार्बन फूटप्रिंट में कमी आएगी · एशिया अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, इससे एशिया अफ्रीका का एक यूनियन बन सकता है · सामूहिक रूप से वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक ब्लाक के रूप में उभर सकेगा · सामाजिक आर्थिक विकास की परियोजनाओं के माध्यम से P2P संपर्क बढेगा, इस सन्दर्भ में भारत द्वारा सोलर मम्मी जैसी पहले जन सम्पर्क बढाने में उपयोगी होंगी| इससे जहाँ एक ओर सशक्तिकरण होगा वहीँ भारत के लिए गुडविल बनाने में आसानी होगी · भारत की ACT EAST POLICY और जापान की गुणवत्ता बुनियादी ढाँचे के लिए विस्तारित साझेदारी(सहयोगात्मक निवेश की नीति, जैसे DMRC फ्रेट कॉरिडोर आदि में निवेश) नीतियों के बीच एक अभिसरण क्षेत्र है · इस समझौते में यह प्रतिबद्धता प्रकट की गयी है आकांक्षी देश अपनी आवश्यकता को समझ कर अपनी मांग स्पष्ट करेगा तब उसी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा अर्थात यह एक लोकतांत्रिक मॉडल है · चीन की अर्थव्यवस्था इस समय ढलान पर है और यह भारत के लिए एक मौक़ा है, AAGC इस सन्दर्भ में भारत के लिए कुंजी का काम कर सकता है · AAGC के माध्यम से भारत अपने व्यापार का विस्तार कर सकेगा इससे विश्व व्यापार में भारत अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा सकेगा और भुगतान संतुलन को संतुलित कर सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया अफ्रिका ग्रोथ कॉरिडोर का आर्थिक सामरिक महत्त्व है और यह विभिन्न अर्थों में भारत के ल्लिये लाभदायी संकल्पना है|
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"हिन्द महासागर न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ,बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ भी है |" इस कथन के आलोक में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) "The Indian Ocean is not only important from an economic point of view, but it also has strategic implications." In light of this statement, discuss its importance for India and the world. (150-200 Words/10 Marks)
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अप्रोच उत्तर की शुरुआत हिन्द महासागर के आर्थिक महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात हिन्द महासागर के सामरिक महत्व को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - आर्थिक महत्त्व भारत पूरे महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है ; भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं " नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, लम्बी समुद्री सीमा से सुरक्षा चुनौतियां भी उत्पन्न होती है" हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है " सामरिक महत्त्व इसके अतिरिक्त हिंद महासागर का सामरिक महत्त्व भी है" इससे सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं अतः इसका विवाद मुक्त एवं विसैन्यीकृत रहना आवश्यक है| हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है हिंद महासागर पर चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण यह एक नवीन संभावित युद्ध मैदान में परिवर्तित हो सकता है" पश्चिमी एशिया विश्व के लिए ऊर्जा आपूर्तिकर्ता क्षेत्र है, यहाँ से यूरोप, चीन, जापान, भारत आदि देशों को समुद्र के रास्ते तेल की आपूर्ति होती है, लेकिन अमेरिका का हित यहाँ ऊर्जा सुरक्षा के सन्दर्भ में नहीं है, 2005 से पूर्व अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखा था| डीआगो गार्शिया में अमेरिका का नौसैनिक अड्डा है, अब अमेरिका ऊर्जा के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र पर कम निर्भरता है अतः हिंद महासागर की सुरक्षा वर्तमान में अमेरिका की प्राथमिकता नहीं है, इससे एक पॉवर वैक्यूम की स्थिति उत्पन्न हुई थी, जिससे चीन ने यहाँ अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था|अमेरिका इस क्षेत्र में चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए भारत को प्रोत्साहित कर रहा है| विभिन्न सैन्य अभ्यासों को इसी दृष्टि से प्रासंगिक माना जा सकता है| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत व विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है " विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है, श्रीलंका के गृहयुद्ध के कारण इस क्षेत्र में अशांति का वातावरण बना है एवं पाकिस्तान में चीन द्वारा ग्वादर पोर्ट का विकास इस क्षेत्र में अमेरिका और भारतीय हितों को प्रभावित करता है, ग्वादर पोर्ट रूस के हितों के अनुरूप है क्योंकि उसके पास आल वीदर पोर्ट्स की कमी है, अतः रूस ने इसका समर्थन किया है जिससे अमेरिका चिंतित है|" भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि इसी दृष्टिकोण से हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न देश एवं क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं" अफगानिस्तान में आपूर्ति रेखा को बनाए रखने के लिए हिंद महासागर का महत्त्व है" हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा जबकि भारत की स्थिति इस सन्दर्भ में कमजोर है| इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| दूसरी ओर अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जिससे भारत का महत्त्व बढ़ रहा है ,आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं|
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##Question:"हिन्द महासागर न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ,बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ भी है |" इस कथन के आलोक में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) "The Indian Ocean is not only important from an economic point of view, but it also has strategic implications." In light of this statement, discuss its importance for India and the world. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:अप्रोच उत्तर की शुरुआत हिन्द महासागर के आर्थिक महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात हिन्द महासागर के सामरिक महत्व को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत व विश्व के लिए इसके महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - आर्थिक महत्त्व भारत पूरे महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है ; भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं " नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, लम्बी समुद्री सीमा से सुरक्षा चुनौतियां भी उत्पन्न होती है" हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है " सामरिक महत्त्व इसके अतिरिक्त हिंद महासागर का सामरिक महत्त्व भी है" इससे सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं अतः इसका विवाद मुक्त एवं विसैन्यीकृत रहना आवश्यक है| हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है हिंद महासागर पर चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण यह एक नवीन संभावित युद्ध मैदान में परिवर्तित हो सकता है" पश्चिमी एशिया विश्व के लिए ऊर्जा आपूर्तिकर्ता क्षेत्र है, यहाँ से यूरोप, चीन, जापान, भारत आदि देशों को समुद्र के रास्ते तेल की आपूर्ति होती है, लेकिन अमेरिका का हित यहाँ ऊर्जा सुरक्षा के सन्दर्भ में नहीं है, 2005 से पूर्व अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखा था| डीआगो गार्शिया में अमेरिका का नौसैनिक अड्डा है, अब अमेरिका ऊर्जा के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र पर कम निर्भरता है अतः हिंद महासागर की सुरक्षा वर्तमान में अमेरिका की प्राथमिकता नहीं है, इससे एक पॉवर वैक्यूम की स्थिति उत्पन्न हुई थी, जिससे चीन ने यहाँ अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था|अमेरिका इस क्षेत्र में चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए भारत को प्रोत्साहित कर रहा है| विभिन्न सैन्य अभ्यासों को इसी दृष्टि से प्रासंगिक माना जा सकता है| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत व विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है " विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है, श्रीलंका के गृहयुद्ध के कारण इस क्षेत्र में अशांति का वातावरण बना है एवं पाकिस्तान में चीन द्वारा ग्वादर पोर्ट का विकास इस क्षेत्र में अमेरिका और भारतीय हितों को प्रभावित करता है, ग्वादर पोर्ट रूस के हितों के अनुरूप है क्योंकि उसके पास आल वीदर पोर्ट्स की कमी है, अतः रूस ने इसका समर्थन किया है जिससे अमेरिका चिंतित है|" भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि इसी दृष्टिकोण से हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न देश एवं क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं" अफगानिस्तान में आपूर्ति रेखा को बनाए रखने के लिए हिंद महासागर का महत्त्व है" हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा जबकि भारत की स्थिति इस सन्दर्भ में कमजोर है| इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| दूसरी ओर अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जिससे भारत का महत्त्व बढ़ रहा है ,आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं|
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं। भारतीय संविधान के तहत प्रदत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द /10 अंक) What do you understand by freedom of expression. Analyze in the present context the fundamental right to freedom of expression conferred under the Indian Constitution. 150-200 words / 10 Marks)
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Approach: भूमिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुच्छेद 19 की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इसके तहत प्रदत मूल अधिकारों को सूचीबद्ध कीजिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। इस मूल अधिकार के महत्व को इंगित करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान किया गया है। इसमें स्वतंत्रता के साथ साथ युक्तियुक्त निर्बंधनों की भी चर्चा की गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19(1) में प्राप्त 6 अधिकारों में से पहला अधिकार अर्थात बोलने व विचार अभिव्यक्ति का अधिकार उत्तरदायित्व पूर्ण स्वतंत्रता की प्रथम शर्त के रूप में माना जाता है।अन्य सभी स्वतंत्रताओं की जननी कहा जाता है। यह स्वतंत्रता बोलने वाले से अधिक सुनने वालों के लिए लाभप्रद मानी जाती है। किसी भी लोकतान्त्रिक सरकार की प्राचीर के रूप में इस अधिकार को देखा गया है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने 1950 में ही रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के केस में इस स्वतन्त्रता पर बल दिया। 1993 में LIC बनाम प्रोफेसर मनु भाई डी शाह के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा की कार्यपालिका के कार्यों की आलोचना का अधिकार नागरिकों को है। इस पर कोई भी प्रतिबंध राज्य द्वारा आरोपित नहीं हो सकता। 2004 में भारत संघ एवं नवीन जिंदल के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय तिरंगा फहराने को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता माना। देश के प्रति अभिव्यक्ति श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका माना। 1988 में सर्वोच्च न्यायालय ने बोलने के अधिकार को जानने के अधिकार से जोड़ा। 1997 में जानने के अधिकार को प्रतिबंधित करने का समर्थन किया। आर राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया- सरकार केवल इस आधार पर की प्रकाशित सूचनाओं से सरकार की बदनामी होगी इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। लेकिन 2011 में संजय नारायण बनाम इलाहाबाद मुख्य न्यायालय के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया- मीडिया या प्रेस की स्वतंत्रता को यह ध्यान में रखना होगा की न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में लोगों का विश्वास क्षतिग्रस्त ना हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण अनुच्छेद 19 के तहत मीडिया, सेना इत्यादि की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार अभिव्यक्ति के माध्यम अर्थात मीडिया और सिनेमा जगत के अधिकारों को भी शामिल किया जाता है। प्रकाश झा production भारत संघ के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि सेंसर बोर्ड के द्वारा इसे स्वीकृति दे दी गई है । तो इसे राज्य द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने एस रंगराजन बनाम जगजीवन के केस में कहा कि चलचित्र हालांकि मनोरंजन का साधन है किन्तु यह लोगों को उद्वेलित कर सकता है इसलिए सेंसर बोर्ड को भारत की सांस्कृतिक विरासत, नैतिकता और सभ्यता को ध्यान में निर्णय देना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने टाटा प्रेस केस 1995 में यह स्पष्ट किया - व्यावसायिक विचार भी स्वतंत्रता के दायरे में आता है और इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। न्यायपालिका ने 1994 में राजा गोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में यह स्पष्ट किया - प्रेस की स्वतंत्रता पर केवल इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकताकि वह सूचना सरकार के विरुद्ध है। संजय नारायण बनाम इलाहबाद उच्च न्यायालय प्रेस को न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में जनता के विश्वास को क्षति पहुंचाने वाला कोई विचार नहीं दिया जाना चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से अभिव्यक्ति के संदर्भ में धारा 66 a पर सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में कहा - यह धारा अत्यंत अस्पष्ट है तथा 19 व 21 के विरुद्ध है, इसलिए स्वीकार्य नहीं है। इस धारा का संबंध विश्वनाथन समिति की सिफारिश से है जिसका गठन online घृणा फैलाने वाले वक्तव्य से था। 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ - सर्वोच्च न्यायालय ने कहा इंटरनेट की सुविधा अनु 19 का अभिन्न यंग है। इस केस को कश्मीर इंटरनेट केस भी कहते हैं। राजद्रोह से संबंधित मुद्दा 1870 के दशक में लार्ड मैकले द्वारा प्रारूपित राजद्रोह का प्रावधान लाया गया। यह आईपीसी की धारा 124 a में है। केदारनाथ बनाम बिहार राज्य 1962- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजद्रोह का मामला तब बनता है जब हिंसा फैलने की संभावना हो। शंकर मराठा बनाम महाराष्ट्र राज्य - असीम त्रिवेदी केस भी कहते हैं। कार्टूनिस्ट को राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम के तहत, आईटी एक्ट की धारा 66 a के तहत आरोपी बनाया गया। क्यूंकि उसने संसद पर टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा राजद्रोह शब्द संविधान में नहीं है इसकी व्याख्या लोक व्यवस्था के संदर्भ में की जा सकती है। कोई कार्यपालिका की आलोचना करता है तो वह देशद्रोह के दायरे में नहीं आएगा। धरना प्रदर्शन का मुद्दा अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त एवं अन्य धरना प्रदर्शन के अधिकार को अनु 19 के तहत जायज ठहराया। विरोध करने या प्रदर्शन करने का अधिकार सार्वजनिक स्थानों को लंबे समय तक बाधित करके नहीं किया जा सकता। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह अतिक्रमित क्षेत्र को खाली करवाए। विरोध प्रदर्शन करने वालों व स्थानीय निवासियों व सामान्य लोगों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया। प्रशांत भूषण व विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा जून 2020 में प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की। महक माहेश्वरी की ओर से अनुज सक्सेना ने याचिका दायर करते हुए न्यायपालिका से प्रार्थना कि प्रशांत भूषण पर मानहानि का मुकदमा दायर किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं पहल करते हुए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण किया। पृष्ठभूमि में 2009 का केस भी शामिल था जिसमें प्राशन भूषण ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा इंगित किया था। इसे न्यायपालिका की घोर अवमानना माना व प्रशांत भूषण के खिलाफ निर्णय दिया। हालांकि प्राशन भूषण की तरफ से यह सवाल उठाया गया था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को उजागर करना मानहानि की श्रेणी में आता है कि नहीं। क्या किसी एक न्यायाधीश के विरुद्ध की गई टिप्पणी सम्पूर्ण न्यायपालिका पर मानी जाएगी। पहली बार न्यायपालिका ने कहा कि प्रशांत भूषण माफी मांगे इनकार किये जाने पर एक रुपये का दंड दिया गया । अनुच्छेद 19 एक विस्तृत अधिकार है जो स्वर्णिम मूल अधिकारों की त्रयी में शामिल है।
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##Question:अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं। भारतीय संविधान के तहत प्रदत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द /10 अंक) What do you understand by freedom of expression. Analyze in the present context the fundamental right to freedom of expression conferred under the Indian Constitution. 150-200 words / 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुच्छेद 19 की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इसके तहत प्रदत मूल अधिकारों को सूचीबद्ध कीजिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। इस मूल अधिकार के महत्व को इंगित करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान किया गया है। इसमें स्वतंत्रता के साथ साथ युक्तियुक्त निर्बंधनों की भी चर्चा की गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19(1) में प्राप्त 6 अधिकारों में से पहला अधिकार अर्थात बोलने व विचार अभिव्यक्ति का अधिकार उत्तरदायित्व पूर्ण स्वतंत्रता की प्रथम शर्त के रूप में माना जाता है।अन्य सभी स्वतंत्रताओं की जननी कहा जाता है। यह स्वतंत्रता बोलने वाले से अधिक सुनने वालों के लिए लाभप्रद मानी जाती है। किसी भी लोकतान्त्रिक सरकार की प्राचीर के रूप में इस अधिकार को देखा गया है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने 1950 में ही रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के केस में इस स्वतन्त्रता पर बल दिया। 1993 में LIC बनाम प्रोफेसर मनु भाई डी शाह के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा की कार्यपालिका के कार्यों की आलोचना का अधिकार नागरिकों को है। इस पर कोई भी प्रतिबंध राज्य द्वारा आरोपित नहीं हो सकता। 2004 में भारत संघ एवं नवीन जिंदल के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय तिरंगा फहराने को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता माना। देश के प्रति अभिव्यक्ति श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका माना। 1988 में सर्वोच्च न्यायालय ने बोलने के अधिकार को जानने के अधिकार से जोड़ा। 1997 में जानने के अधिकार को प्रतिबंधित करने का समर्थन किया। आर राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया- सरकार केवल इस आधार पर की प्रकाशित सूचनाओं से सरकार की बदनामी होगी इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। लेकिन 2011 में संजय नारायण बनाम इलाहाबाद मुख्य न्यायालय के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया- मीडिया या प्रेस की स्वतंत्रता को यह ध्यान में रखना होगा की न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में लोगों का विश्वास क्षतिग्रस्त ना हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण अनुच्छेद 19 के तहत मीडिया, सेना इत्यादि की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार अभिव्यक्ति के माध्यम अर्थात मीडिया और सिनेमा जगत के अधिकारों को भी शामिल किया जाता है। प्रकाश झा production भारत संघ के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि सेंसर बोर्ड के द्वारा इसे स्वीकृति दे दी गई है । तो इसे राज्य द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने एस रंगराजन बनाम जगजीवन के केस में कहा कि चलचित्र हालांकि मनोरंजन का साधन है किन्तु यह लोगों को उद्वेलित कर सकता है इसलिए सेंसर बोर्ड को भारत की सांस्कृतिक विरासत, नैतिकता और सभ्यता को ध्यान में निर्णय देना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने टाटा प्रेस केस 1995 में यह स्पष्ट किया - व्यावसायिक विचार भी स्वतंत्रता के दायरे में आता है और इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। न्यायपालिका ने 1994 में राजा गोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में यह स्पष्ट किया - प्रेस की स्वतंत्रता पर केवल इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकताकि वह सूचना सरकार के विरुद्ध है। संजय नारायण बनाम इलाहबाद उच्च न्यायालय प्रेस को न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में जनता के विश्वास को क्षति पहुंचाने वाला कोई विचार नहीं दिया जाना चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से अभिव्यक्ति के संदर्भ में धारा 66 a पर सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में कहा - यह धारा अत्यंत अस्पष्ट है तथा 19 व 21 के विरुद्ध है, इसलिए स्वीकार्य नहीं है। इस धारा का संबंध विश्वनाथन समिति की सिफारिश से है जिसका गठन online घृणा फैलाने वाले वक्तव्य से था। 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ - सर्वोच्च न्यायालय ने कहा इंटरनेट की सुविधा अनु 19 का अभिन्न यंग है। इस केस को कश्मीर इंटरनेट केस भी कहते हैं। राजद्रोह से संबंधित मुद्दा 1870 के दशक में लार्ड मैकले द्वारा प्रारूपित राजद्रोह का प्रावधान लाया गया। यह आईपीसी की धारा 124 a में है। केदारनाथ बनाम बिहार राज्य 1962- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजद्रोह का मामला तब बनता है जब हिंसा फैलने की संभावना हो। शंकर मराठा बनाम महाराष्ट्र राज्य - असीम त्रिवेदी केस भी कहते हैं। कार्टूनिस्ट को राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम के तहत, आईटी एक्ट की धारा 66 a के तहत आरोपी बनाया गया। क्यूंकि उसने संसद पर टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा राजद्रोह शब्द संविधान में नहीं है इसकी व्याख्या लोक व्यवस्था के संदर्भ में की जा सकती है। कोई कार्यपालिका की आलोचना करता है तो वह देशद्रोह के दायरे में नहीं आएगा। धरना प्रदर्शन का मुद्दा अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त एवं अन्य धरना प्रदर्शन के अधिकार को अनु 19 के तहत जायज ठहराया। विरोध करने या प्रदर्शन करने का अधिकार सार्वजनिक स्थानों को लंबे समय तक बाधित करके नहीं किया जा सकता। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह अतिक्रमित क्षेत्र को खाली करवाए। विरोध प्रदर्शन करने वालों व स्थानीय निवासियों व सामान्य लोगों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया। प्रशांत भूषण व विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा जून 2020 में प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की। महक माहेश्वरी की ओर से अनुज सक्सेना ने याचिका दायर करते हुए न्यायपालिका से प्रार्थना कि प्रशांत भूषण पर मानहानि का मुकदमा दायर किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं पहल करते हुए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण किया। पृष्ठभूमि में 2009 का केस भी शामिल था जिसमें प्राशन भूषण ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा इंगित किया था। इसे न्यायपालिका की घोर अवमानना माना व प्रशांत भूषण के खिलाफ निर्णय दिया। हालांकि प्राशन भूषण की तरफ से यह सवाल उठाया गया था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को उजागर करना मानहानि की श्रेणी में आता है कि नहीं। क्या किसी एक न्यायाधीश के विरुद्ध की गई टिप्पणी सम्पूर्ण न्यायपालिका पर मानी जाएगी। पहली बार न्यायपालिका ने कहा कि प्रशांत भूषण माफी मांगे इनकार किये जाने पर एक रुपये का दंड दिया गया । अनुच्छेद 19 एक विस्तृत अधिकार है जो स्वर्णिम मूल अधिकारों की त्रयी में शामिल है।
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं। भारतीय संविधान के तहत प्रदत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द /10 अंक) What do you understand by freedom of expression? Analyze in the present context the fundamental right to freedom of expression conferred under the Indian Constitution. 150-200 words / 10 marks)
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Approach: भूमिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुच्छेद 19 की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इसके तहत प्रदत मूल अधिकारों को सूचीबद्ध कीजिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। इस मूल अधिकार के महत्व को इंगित करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान किया गया है। इसमें स्वतंत्रता के साथ साथ युक्तियुक्त निर्बंधनों की भी चर्चा की गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19(1) में प्राप्त 6 अधिकारों में से पहला अधिकार अर्थात बोलने व विचार अभिव्यक्ति का अधिकार उत्तरदायित्व पूर्ण स्वतंत्रता की प्रथम शर्त के रूप में माना जाता है।अन्य सभी स्वतंत्रताओं की जननी कहा जाता है। यह स्वतंत्रता बोलने वाले से अधिक सुनने वालों के लिए लाभप्रद मानी जाती है। किसी भी लोकतान्त्रिक सरकार की प्राचीर के रूप में इस अधिकार को देखा गया है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने 1950 में ही रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के केस में इस स्वतन्त्रता पर बल दिया। 1993 में LIC बनाम प्रोफेसर मनु भाई डी शाह के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा की कार्यपालिका के कार्यों की आलोचना का अधिकार नागरिकों को है। इस पर कोई भी प्रतिबंध राज्य द्वारा आरोपित नहीं हो सकता। 2004 में भारत संघ एवं नवीन जिंदल के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय तिरंगा फहराने को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता माना। देश के प्रति अभिव्यक्ति श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका माना। 1988 में सर्वोच्च न्यायालय ने बोलने के अधिकार को जानने के अधिकार से जोड़ा। 1997 में जानने के अधिकार को प्रतिबंधित करने का समर्थन किया। आर राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया- सरकार केवल इस आधार पर की प्रकाशित सूचनाओं से सरकार की बदनामी होगी इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। लेकिन 2011 में संजय नारायण बनाम इलाहाबाद मुख्य न्यायालय के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया- मीडिया या प्रेस की स्वतंत्रता को यह ध्यान में रखना होगा की न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में लोगों का विश्वास क्षतिग्रस्त ना हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण अनुच्छेद 19 के तहत मीडिया, सेना इत्यादि की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार अभिव्यक्ति के माध्यम अर्थात मीडिया और सिनेमा जगत के अधिकारों को भी शामिल किया जाता है। प्रकाश झा production भारत संघ के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि सेंसर बोर्ड के द्वारा इसे स्वीकृति दे दी गई है । तो इसे राज्य द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने एस रंगराजन बनाम जगजीवन के केस में कहा कि चलचित्र हालांकि मनोरंजन का साधन है किन्तु यह लोगों को उद्वेलित कर सकता है इसलिए सेंसर बोर्ड को भारत की सांस्कृतिक विरासत, नैतिकता और सभ्यता को ध्यान में निर्णय देना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने टाटा प्रेस केस 1995 में यह स्पष्ट किया - व्यावसायिक विचार भी स्वतंत्रता के दायरे में आता है और इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। न्यायपालिका ने 1994 में राजा गोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में यह स्पष्ट किया - प्रेस की स्वतंत्रता पर केवल इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता कि वह सूचना सरकार के विरुद्ध है। संजय नारायण बनाम इलाहबाद उच्च न्यायालय प्रेस को न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में जनता के विश्वास को क्षति पहुंचाने वाला कोई विचार नहीं दिया जाना चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से अभिव्यक्ति के संदर्भ में धारा 66 a पर सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में कहा - यह धारा अत्यंत अस्पष्ट है तथा 19 व 21 के विरुद्ध है, इसलिए स्वीकार्य नहीं है। इस धारा का संबंध विश्वनाथन समिति की सिफारिश से है जिसका गठन online घृणा फैलाने वाले वक्तव्य से था। 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ - सर्वोच्च न्यायालय ने कहा इंटरनेट की सुविधा अनु 19 का अभिन्न यंग है। इस केस को कश्मीर इंटरनेट केस भी कहते हैं। राजद्रोह से संबंधित मुद्दा 1870 के दशक में लार्ड मैकले द्वारा प्रारूपित राजद्रोह का प्रावधान लाया गया। यह आईपीसी की धारा 124 a में है। केदारनाथ बनाम बिहार राज्य 1962- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजद्रोह का मामला तब बनता है जब हिंसा फैलने की संभावना हो। शंकर मराठा बनाम महाराष्ट्र राज्य - असीम त्रिवेदी केस भी कहते हैं। कार्टूनिस्ट को राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम के तहत, आईटी एक्ट की धारा 66 a के तहत आरोपी बनाया गया। क्यूंकि उसने संसद पर टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा राजद्रोह शब्द संविधान में नहीं है इसकी व्याख्या लोक व्यवस्था के संदर्भ में की जा सकती है। कोई कार्यपालिका की आलोचना करता है तो वह देशद्रोह के दायरे में नहीं आएगा। धरना प्रदर्शन का मुद्दा अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त एवं अन्य धरना प्रदर्शन के अधिकार को अनु 19 के तहत जायज ठहराया। विरोध करने या प्रदर्शन करने का अधिकार सार्वजनिक स्थानों को लंबे समय तक बाधित करके नहीं किया जा सकता। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह अतिक्रमित क्षेत्र को खाली करवाए। विरोध प्रदर्शन करने वालों व स्थानीय निवासियों व सामान्य लोगों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया। प्रशांत भूषण व विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा जून 2020 में प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की। महक माहेश्वरी की ओर से अनुज सक्सेना ने याचिका दायर करते हुए न्यायपालिका से प्रार्थना कि प्रशांत भूषण पर मानहानि का मुकदमा दायर किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं पहल करते हुए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण किया। पृष्ठभूमि में 2009 का केस भी शामिल था जिसमें प्राशन भूषण ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा इंगित किया था। इसे न्यायपालिका की घोर अवमानना माना व प्रशांत भूषण के खिलाफ निर्णय दिया। हालांकि प्राशन भूषण की तरफ से यह सवाल उठाया गया था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को उजागर करना मानहानि की श्रेणी में आता है कि नहीं। क्या किसी एक न्यायाधीश के विरुद्ध की गई टिप्पणी सम्पूर्ण न्यायपालिका पर मानी जाएगी। पहली बार न्यायपालिका ने कहा कि प्रशांत भूषण माफी मांगे इनकार किये जाने पर एक रुपये का दंड दिया गया । अनुच्छेद 19 एक विस्तृत अधिकार है जो स्वर्णिम मूल अधिकारों की त्रयी में शामिल है।
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##Question:अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं। भारतीय संविधान के तहत प्रदत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द /10 अंक) What do you understand by freedom of expression? Analyze in the present context the fundamental right to freedom of expression conferred under the Indian Constitution. 150-200 words / 10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुच्छेद 19 की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इसके तहत प्रदत मूल अधिकारों को सूचीबद्ध कीजिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण कीजिए। इस मूल अधिकार के महत्व को इंगित करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान किया गया है। इसमें स्वतंत्रता के साथ साथ युक्तियुक्त निर्बंधनों की भी चर्चा की गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19(1) में प्राप्त 6 अधिकारों में से पहला अधिकार अर्थात बोलने व विचार अभिव्यक्ति का अधिकार उत्तरदायित्व पूर्ण स्वतंत्रता की प्रथम शर्त के रूप में माना जाता है।अन्य सभी स्वतंत्रताओं की जननी कहा जाता है। यह स्वतंत्रता बोलने वाले से अधिक सुनने वालों के लिए लाभप्रद मानी जाती है। किसी भी लोकतान्त्रिक सरकार की प्राचीर के रूप में इस अधिकार को देखा गया है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने 1950 में ही रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के केस में इस स्वतन्त्रता पर बल दिया। 1993 में LIC बनाम प्रोफेसर मनु भाई डी शाह के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा की कार्यपालिका के कार्यों की आलोचना का अधिकार नागरिकों को है। इस पर कोई भी प्रतिबंध राज्य द्वारा आरोपित नहीं हो सकता। 2004 में भारत संघ एवं नवीन जिंदल के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय तिरंगा फहराने को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता माना। देश के प्रति अभिव्यक्ति श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका माना। 1988 में सर्वोच्च न्यायालय ने बोलने के अधिकार को जानने के अधिकार से जोड़ा। 1997 में जानने के अधिकार को प्रतिबंधित करने का समर्थन किया। आर राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया- सरकार केवल इस आधार पर की प्रकाशित सूचनाओं से सरकार की बदनामी होगी इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। लेकिन 2011 में संजय नारायण बनाम इलाहाबाद मुख्य न्यायालय के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया- मीडिया या प्रेस की स्वतंत्रता को यह ध्यान में रखना होगा की न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में लोगों का विश्वास क्षतिग्रस्त ना हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का वर्तमान संदर्भों में विश्लेषण अनुच्छेद 19 के तहत मीडिया, सेना इत्यादि की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार अभिव्यक्ति के माध्यम अर्थात मीडिया और सिनेमा जगत के अधिकारों को भी शामिल किया जाता है। प्रकाश झा production भारत संघ के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि सेंसर बोर्ड के द्वारा इसे स्वीकृति दे दी गई है । तो इसे राज्य द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने एस रंगराजन बनाम जगजीवन के केस में कहा कि चलचित्र हालांकि मनोरंजन का साधन है किन्तु यह लोगों को उद्वेलित कर सकता है इसलिए सेंसर बोर्ड को भारत की सांस्कृतिक विरासत, नैतिकता और सभ्यता को ध्यान में निर्णय देना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने टाटा प्रेस केस 1995 में यह स्पष्ट किया - व्यावसायिक विचार भी स्वतंत्रता के दायरे में आता है और इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। न्यायपालिका ने 1994 में राजा गोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में यह स्पष्ट किया - प्रेस की स्वतंत्रता पर केवल इस आधार पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता कि वह सूचना सरकार के विरुद्ध है। संजय नारायण बनाम इलाहबाद उच्च न्यायालय प्रेस को न्यायपालिका की गरिमा और प्रशासन में जनता के विश्वास को क्षति पहुंचाने वाला कोई विचार नहीं दिया जाना चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से अभिव्यक्ति के संदर्भ में धारा 66 a पर सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में कहा - यह धारा अत्यंत अस्पष्ट है तथा 19 व 21 के विरुद्ध है, इसलिए स्वीकार्य नहीं है। इस धारा का संबंध विश्वनाथन समिति की सिफारिश से है जिसका गठन online घृणा फैलाने वाले वक्तव्य से था। 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ - सर्वोच्च न्यायालय ने कहा इंटरनेट की सुविधा अनु 19 का अभिन्न यंग है। इस केस को कश्मीर इंटरनेट केस भी कहते हैं। राजद्रोह से संबंधित मुद्दा 1870 के दशक में लार्ड मैकले द्वारा प्रारूपित राजद्रोह का प्रावधान लाया गया। यह आईपीसी की धारा 124 a में है। केदारनाथ बनाम बिहार राज्य 1962- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजद्रोह का मामला तब बनता है जब हिंसा फैलने की संभावना हो। शंकर मराठा बनाम महाराष्ट्र राज्य - असीम त्रिवेदी केस भी कहते हैं। कार्टूनिस्ट को राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम के तहत, आईटी एक्ट की धारा 66 a के तहत आरोपी बनाया गया। क्यूंकि उसने संसद पर टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा राजद्रोह शब्द संविधान में नहीं है इसकी व्याख्या लोक व्यवस्था के संदर्भ में की जा सकती है। कोई कार्यपालिका की आलोचना करता है तो वह देशद्रोह के दायरे में नहीं आएगा। धरना प्रदर्शन का मुद्दा अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त एवं अन्य धरना प्रदर्शन के अधिकार को अनु 19 के तहत जायज ठहराया। विरोध करने या प्रदर्शन करने का अधिकार सार्वजनिक स्थानों को लंबे समय तक बाधित करके नहीं किया जा सकता। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह अतिक्रमित क्षेत्र को खाली करवाए। विरोध प्रदर्शन करने वालों व स्थानीय निवासियों व सामान्य लोगों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया। प्रशांत भूषण व विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा जून 2020 में प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की। महक माहेश्वरी की ओर से अनुज सक्सेना ने याचिका दायर करते हुए न्यायपालिका से प्रार्थना कि प्रशांत भूषण पर मानहानि का मुकदमा दायर किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं पहल करते हुए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण किया। पृष्ठभूमि में 2009 का केस भी शामिल था जिसमें प्राशन भूषण ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा इंगित किया था। इसे न्यायपालिका की घोर अवमानना माना व प्रशांत भूषण के खिलाफ निर्णय दिया। हालांकि प्राशन भूषण की तरफ से यह सवाल उठाया गया था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को उजागर करना मानहानि की श्रेणी में आता है कि नहीं। क्या किसी एक न्यायाधीश के विरुद्ध की गई टिप्पणी सम्पूर्ण न्यायपालिका पर मानी जाएगी। पहली बार न्यायपालिका ने कहा कि प्रशांत भूषण माफी मांगे इनकार किये जाने पर एक रुपये का दंड दिया गया । अनुच्छेद 19 एक विस्तृत अधिकार है जो स्वर्णिम मूल अधिकारों की त्रयी में शामिल है।
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अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 के तहत दिए गए अधिकार की चर्चा करते हुए इसके संदर्भ में न्यायपालिका का दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Discussing the right given under Article 20 regarding protection of conviction for offences, explain the view of the judiciary in its context. (150-200 words/10 marks)
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Approach: भूमिका मेंअपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 की चर्चा कीजिए । इस मूल अधिकार पर विस्तार से चर्चा कीजिय। मूल अधिकार के संबंध में न्यायालय के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट कीजिए। अनुच्छेद 20 के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर - अनुच्छेद 20 का सीधा संबंध आपराधिक प्रक्रियाओं से है।इस अनुच्छेद के प्रथम भाग में आपराधिक जिम्मेदारी और दंड से संबंधित व्यवस्था है।किसी व्यक्ति के द्वारा जिस व्यक्त अपराध किया गया है उसी व्यक्त के प्रभावी कानून के अनुसार उसे दंड दिया जाएगा।अर्थात अपराध करने के बाद यदि कोई नया कानून बनता है तो नए कानून के अनुसार दंड नहीं दिया जाएगा। अनुच्छेद 20(2) और (3) का संबंध प्रक्रियाओं से है। इन दो अनुच्छेदों के तहत प्रक्रियागत स्पष्टीकरण दिया गया है। दोहरी आपराधिकता के विरुद्ध संरक्षण तथा स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण दिया गया है। दोहरी आराधिकता से संबंधित प्रावधान केवल न्यायपालिका या न्यायाधिकरणों पर लागू होता है। इसका प्रशासनिक प्रक्रिया से या प्रशासनिक कार्यवाही से कोई संबंध नहीं होता। यद्यपि स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण प्रदान किया गया है। परंतु अभियुक्त के लिए यह आवश्यक है कि वह जांच प्रक्रिया में सहायक हो। यदि आवश्यक हुआ तो अंगूठे का निशान या खून का नमूना या रक्त का नमूना या हस्तक्षर का नमूना या शरीर का प्रस्तुतीकरण भी संभव है। इस तरह का कदम CrPC के तहत निर्धारित आपराधिक प्रक्रियाओं या कार्यवाही से है दीवाली प्रक्रियाओं से नहीं। अनुच्छेद 20(1) केवल आपराधिक मामलों से संबंध रखता है दीवानी मामलों से नहीं। यह अनुच्छेद नागरिकों के साथ साथ लोगों और विधिक व्यक्ति को भी प्राप्त है। न्यायालय का दृष्टिकोण सूबा सिंह बनाम देवेन्द्र कौर 2011 यदि किसी व्यक्ति को गैर इरादतन हत्या से संबंधित भारतीय दंड संहिता के अनुसार दंड दिया गया है तो मृतक व्यक्ति की पत्नी यदि क्षतिपूर्ति की मांग करती है तो वह दोहरी आपराधिकता के दायरे में नहीं आएगा। झारखंड बनाम लालू प्रसाद केस इसमें भी न्यायपालिका ने दोहरी आपराधिकता के सिद्धांत से संबंधित उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित करके अन्याय या परेशान नहीं किया जा सकता। रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2013 सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जांच के संदर्भ में यदि आवाज का सैम्पल या नमूना मांगा जाता है तो यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य 2010 किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध पॉलीग्राफीक या नार्को टेस्ट उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं कराया जा सकता। अन्यथा यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण होगा। अनुच्छेद 20 ना केवल दोहरे दंड से व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि यह आपराधिक प्रक्रिया के दौरान भी कुछ अधिकारों की वकालत करता है।
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##Question:अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 के तहत दिए गए अधिकार की चर्चा करते हुए इसके संदर्भ में न्यायपालिका का दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Discussing the right given under Article 20 regarding protection of conviction for offences, explain the view of the judiciary in its context. (150-200 words/10 marks)##Answer:Approach: भूमिका मेंअपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 की चर्चा कीजिए । इस मूल अधिकार पर विस्तार से चर्चा कीजिय। मूल अधिकार के संबंध में न्यायालय के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट कीजिए। अनुच्छेद 20 के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर - अनुच्छेद 20 का सीधा संबंध आपराधिक प्रक्रियाओं से है।इस अनुच्छेद के प्रथम भाग में आपराधिक जिम्मेदारी और दंड से संबंधित व्यवस्था है।किसी व्यक्ति के द्वारा जिस व्यक्त अपराध किया गया है उसी व्यक्त के प्रभावी कानून के अनुसार उसे दंड दिया जाएगा।अर्थात अपराध करने के बाद यदि कोई नया कानून बनता है तो नए कानून के अनुसार दंड नहीं दिया जाएगा। अनुच्छेद 20(2) और (3) का संबंध प्रक्रियाओं से है। इन दो अनुच्छेदों के तहत प्रक्रियागत स्पष्टीकरण दिया गया है। दोहरी आपराधिकता के विरुद्ध संरक्षण तथा स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण दिया गया है। दोहरी आराधिकता से संबंधित प्रावधान केवल न्यायपालिका या न्यायाधिकरणों पर लागू होता है। इसका प्रशासनिक प्रक्रिया से या प्रशासनिक कार्यवाही से कोई संबंध नहीं होता। यद्यपि स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण प्रदान किया गया है। परंतु अभियुक्त के लिए यह आवश्यक है कि वह जांच प्रक्रिया में सहायक हो। यदि आवश्यक हुआ तो अंगूठे का निशान या खून का नमूना या रक्त का नमूना या हस्तक्षर का नमूना या शरीर का प्रस्तुतीकरण भी संभव है। इस तरह का कदम CrPC के तहत निर्धारित आपराधिक प्रक्रियाओं या कार्यवाही से है दीवाली प्रक्रियाओं से नहीं। अनुच्छेद 20(1) केवल आपराधिक मामलों से संबंध रखता है दीवानी मामलों से नहीं। यह अनुच्छेद नागरिकों के साथ साथ लोगों और विधिक व्यक्ति को भी प्राप्त है। न्यायालय का दृष्टिकोण सूबा सिंह बनाम देवेन्द्र कौर 2011 यदि किसी व्यक्ति को गैर इरादतन हत्या से संबंधित भारतीय दंड संहिता के अनुसार दंड दिया गया है तो मृतक व्यक्ति की पत्नी यदि क्षतिपूर्ति की मांग करती है तो वह दोहरी आपराधिकता के दायरे में नहीं आएगा। झारखंड बनाम लालू प्रसाद केस इसमें भी न्यायपालिका ने दोहरी आपराधिकता के सिद्धांत से संबंधित उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित करके अन्याय या परेशान नहीं किया जा सकता। रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2013 सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जांच के संदर्भ में यदि आवाज का सैम्पल या नमूना मांगा जाता है तो यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य 2010 किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध पॉलीग्राफीक या नार्को टेस्ट उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं कराया जा सकता। अन्यथा यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण होगा। अनुच्छेद 20 ना केवल दोहरे दंड से व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि यह आपराधिक प्रक्रिया के दौरान भी कुछ अधिकारों की वकालत करता है।
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अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 के तहत अधिकार पर विस्तृत चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Discuss the rights under Article 20 in relation to the protection of convictions for offenses.(150-200 words / 10 Marks)
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Approach: भूमिका मेंअपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 की चर्चा कीजिए । इस मूल अधिकार पर विस्तार से चर्चा कीजिय। मूल अधिकार के संबंध में न्यायालय के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट कीजिए। अनुच्छेद 20 के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर - अनुच्छेद 20 का सीधा संबंध आपराधिक प्रक्रियाओं से है।इस अनुच्छेद के प्रथम भाग में आपराधिक जिम्मेदारी और दंड से संबंधित व्यवस्था है।किसी व्यक्ति के द्वारा जिस व्यक्त अपराध किया गया है उसी व्यक्त के प्रभावी कानून के अनुसार उसे दंड दिया जाएगा।अर्थात अपराध करने के बाद यदि कोई नया कानून बनता है तो नए कानून के अनुसार दंड नहीं दिया जाएगा। अनुच्छेद 20(2) और (3) का संबंध प्रक्रियाओं से है। इन दो अनुच्छेदों के तहत प्रक्रियागत स्पष्टीकरण दिया गया है। दोहरी आपराधिकता के विरुद्ध संरक्षण तथा स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण दिया गया है। दोहरी आराधिकता से संबंधित प्रावधान केवल न्यायपालिका या न्यायाधिकरणों पर लागू होता है। इसका प्रशासनिक प्रक्रिया से या प्रशासनिक कार्यवाही से कोई संबंध नहीं होता। यद्यपि स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण प्रदान किया गया है। परंतु अभियुक्त के लिए यह आवश्यक है कि वह जांच प्रक्रिया में सहायक हो। यदि आवश्यक हुआ तो अंगूठे का निशान या खून का नमूना या रक्त का नमूना या हस्तक्षर का नमूना या शरीर का प्रस्तुतीकरण भी संभव है। इस तरह का कदम CrPC के तहत निर्धारित आपराधिक प्रक्रियाओं या कार्यवाही से है दीवाली प्रक्रियाओं से नहीं। अनुच्छेद 20(1) केवल आपराधिक मामलों से संबंध रखता है दीवानी मामलों से नहीं। यह अनुच्छेद नागरिकों के साथ साथ लोगों और विधिक व्यक्ति को भी प्राप्त है। न्यायालय का दृष्टिकोण सूबा सिंह बनाम देवेन्द्र कौर 2011 यदि किसी व्यक्ति को गैर इरादतन हत्या से संबंधित भारतीय दंड संहिता के अनुसार दंड दिया गया है तो मृतक व्यक्ति की पत्नी यदि क्षतिपूर्ति की मांग करती है तो वह दोहरी आपराधिकता के दायरे में नहीं आएगा। झारखंड बनाम लालू प्रसाद केस इसमें भी न्यायपालिका ने दोहरी आपराधिकता के सिद्धांत से संबंधित उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित करके अन्याय या परेशान नहीं किया जा सकता। रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2013 सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जांच के संदर्भ में यदि आवाज का सैम्पल या नमूना मांगा जाता है तो यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य 2010 किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध पॉलीग्राफीक या नार्को टेस्ट उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं कराया जा सकता। अन्यथा यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण होगा। अनुच्छेद 20 ना केवल दोहरे दंड से व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि यह आपराधिक प्रक्रिया के दौरान भी कुछ अधिकारों की वकालत करता है।
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##Question:अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 के तहत अधिकार पर विस्तृत चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Discuss the rights under Article 20 in relation to the protection of convictions for offenses.(150-200 words / 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका मेंअपराधों के लिए दोषसिद्धि के संरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 20 की चर्चा कीजिए । इस मूल अधिकार पर विस्तार से चर्चा कीजिय। मूल अधिकार के संबंध में न्यायालय के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट कीजिए। अनुच्छेद 20 के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर - अनुच्छेद 20 का सीधा संबंध आपराधिक प्रक्रियाओं से है।इस अनुच्छेद के प्रथम भाग में आपराधिक जिम्मेदारी और दंड से संबंधित व्यवस्था है।किसी व्यक्ति के द्वारा जिस व्यक्त अपराध किया गया है उसी व्यक्त के प्रभावी कानून के अनुसार उसे दंड दिया जाएगा।अर्थात अपराध करने के बाद यदि कोई नया कानून बनता है तो नए कानून के अनुसार दंड नहीं दिया जाएगा। अनुच्छेद 20(2) और (3) का संबंध प्रक्रियाओं से है। इन दो अनुच्छेदों के तहत प्रक्रियागत स्पष्टीकरण दिया गया है। दोहरी आपराधिकता के विरुद्ध संरक्षण तथा स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण दिया गया है। दोहरी आराधिकता से संबंधित प्रावधान केवल न्यायपालिका या न्यायाधिकरणों पर लागू होता है। इसका प्रशासनिक प्रक्रिया से या प्रशासनिक कार्यवाही से कोई संबंध नहीं होता। यद्यपि स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संबंधित संरक्षण प्रदान किया गया है। परंतु अभियुक्त के लिए यह आवश्यक है कि वह जांच प्रक्रिया में सहायक हो। यदि आवश्यक हुआ तो अंगूठे का निशान या खून का नमूना या रक्त का नमूना या हस्तक्षर का नमूना या शरीर का प्रस्तुतीकरण भी संभव है। इस तरह का कदम CrPC के तहत निर्धारित आपराधिक प्रक्रियाओं या कार्यवाही से है दीवाली प्रक्रियाओं से नहीं। अनुच्छेद 20(1) केवल आपराधिक मामलों से संबंध रखता है दीवानी मामलों से नहीं। यह अनुच्छेद नागरिकों के साथ साथ लोगों और विधिक व्यक्ति को भी प्राप्त है। न्यायालय का दृष्टिकोण सूबा सिंह बनाम देवेन्द्र कौर 2011 यदि किसी व्यक्ति को गैर इरादतन हत्या से संबंधित भारतीय दंड संहिता के अनुसार दंड दिया गया है तो मृतक व्यक्ति की पत्नी यदि क्षतिपूर्ति की मांग करती है तो वह दोहरी आपराधिकता के दायरे में नहीं आएगा। झारखंड बनाम लालू प्रसाद केस इसमें भी न्यायपालिका ने दोहरी आपराधिकता के सिद्धांत से संबंधित उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित करके अन्याय या परेशान नहीं किया जा सकता। रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2013 सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जांच के संदर्भ में यदि आवाज का सैम्पल या नमूना मांगा जाता है तो यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य 2010 किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध पॉलीग्राफीक या नार्को टेस्ट उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं कराया जा सकता। अन्यथा यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण होगा। अनुच्छेद 20 ना केवल दोहरे दंड से व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि यह आपराधिक प्रक्रिया के दौरान भी कुछ अधिकारों की वकालत करता है।
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना- 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके महत्त्व तथा कमियों पर भी प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of the National Disaster Management Plan- 2016. Also, highlight its importance and shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारी विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप सेआपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्धकिया गया है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्कसेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओंको शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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##Question:राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना- 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके महत्त्व तथा कमियों पर भी प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of the National Disaster Management Plan- 2016. Also, highlight its importance and shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारी विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप सेआपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्धकिया गया है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्कसेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओंको शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना- 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके महत्त्व तथा कमियों पर भी प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of the National Disaster Management Plan- 2016. Also, highlight its importance and shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारीय विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप सेआपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्धकिया गया है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्कसेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओंको शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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##Question:राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना- 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके महत्त्व तथा कमियों पर भी प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of the National Disaster Management Plan- 2016. Also, highlight its importance and shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारीय विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप सेआपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्धकिया गया है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्कसेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओंको शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना- 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके महत्त्व तथा कमियों पर भी प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of the National Disaster Management Plan- 2016. Also, highlight its importance and shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारीय विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप सेआपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्धकिया गया है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्कसेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओंको शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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##Question:राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना- 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके महत्त्व तथा कमियों पर भी प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of the National Disaster Management Plan- 2016. Also, highlight its importance and shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारीय विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप सेआपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्धकिया गया है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्कसेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओंको शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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जैव-विविधता के मापन का क्या महत्व है? जैव-विविधता मापन के अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/ 10 अंक) What is the importance of measuring biodiversity? Discuss the applications of biodiversity measurement. (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये| प्रथम भाग में जैव विविधता के मापनके महत्त्वको स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में जैव-विविधता मापन के अनुप्रयोगों को स्पष्ट कीजिये| निष्कर्ष में जैव विविधतासंरक्षणकी आवश्यकताकोबताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता: प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातीय विविधता: प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता: पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता के मापन के महत्त्व: जैव विविधता, जीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है| जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| जैव विविधता के मापन की विधियां: प्रजातीय प्रचुरता/समृद्धता/बहुलता: किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के जैव विविधता के अध्ययन के लिए उसकीसमृद्धता/बाहुल्यता और समरूपता का मानचित्रीकरण किया जाता है| किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र में अलग-अलग प्रकार की प्रजातियों की संख्या को प्रचुरता कहते हैं| यहाँ जनसंख्या नहीं बल्कि प्रजातियों की उपस्थिति के आधार पर प्रचुरता का मापन किया जाता है| किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है| प्रजातीय समता/समरूपता: इसमें भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवासस्थल में पाई जाने वाली प्रजातियों के वितरण का मापन किया जाता है| किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है लेकिन समरूपता अलग अलग हो सकती है| जिस पारितंत्र में प्रचुरता और समता दोनों अधिक होगी उसे अधिक जैव विविधतापूर्ण पारितंत्र माना जाएगा| जैव विविधता मानचित्रिकरण: जैव विविधता मानचित्रीकरण के लिए सिम्पसंस सूचकांक का प्रयोग किया जाता है| सिम्पसंस सूचकांक में विविधता(D), किसी एक प्रजाति की संख्या(n) एवं सभी प्रजातियों की कुल संख्या(N) चरों का प्रयोग किया जाता है अल्फा विविधता किसी आवासस्थल में पायी जाने वाली प्रजातियों की विविधता अल्फा विविधता कहलाती है, बीटा विविधता बीटा विविधता में किन्ही दो आवास्स्थालों के मध्य प्रजातियों की विविधता अर्थात समानता एवं विषमता का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है गामा विविधता समस्त आवासस्थलों की कुल विविधता को गामा विविधता कहते हैं| मानव सभ्यता के विकास की धुरी जैव-विविधता मुख्यतः आवास विनाश, आवास विखण्डन, पर्यावरण प्रदूषण, विदेशी मूल के वनस्पतियों के आक्रमण, अतिशोषण, वन्य-जीवों का शिकार, वनविनाश, अति-चराई, बीमारी आदि के कारण खतरे में है। अतः पारिस्थितिक संतुलन, मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एवं प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, भू-स्खलन आदि) से मुक्ति के लिये जैव-विविधता का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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##Question:जैव-विविधता के मापन का क्या महत्व है? जैव-विविधता मापन के अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/ 10 अंक) What is the importance of measuring biodiversity? Discuss the applications of biodiversity measurement. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये| प्रथम भाग में जैव विविधता के मापनके महत्त्वको स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में जैव-विविधता मापन के अनुप्रयोगों को स्पष्ट कीजिये| निष्कर्ष में जैव विविधतासंरक्षणकी आवश्यकताकोबताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता: प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातीय विविधता: प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता: पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता के मापन के महत्त्व: जैव विविधता, जीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है| जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| जैव विविधता के मापन की विधियां: प्रजातीय प्रचुरता/समृद्धता/बहुलता: किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के जैव विविधता के अध्ययन के लिए उसकीसमृद्धता/बाहुल्यता और समरूपता का मानचित्रीकरण किया जाता है| किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र में अलग-अलग प्रकार की प्रजातियों की संख्या को प्रचुरता कहते हैं| यहाँ जनसंख्या नहीं बल्कि प्रजातियों की उपस्थिति के आधार पर प्रचुरता का मापन किया जाता है| किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है| प्रजातीय समता/समरूपता: इसमें भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवासस्थल में पाई जाने वाली प्रजातियों के वितरण का मापन किया जाता है| किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है लेकिन समरूपता अलग अलग हो सकती है| जिस पारितंत्र में प्रचुरता और समता दोनों अधिक होगी उसे अधिक जैव विविधतापूर्ण पारितंत्र माना जाएगा| जैव विविधता मानचित्रिकरण: जैव विविधता मानचित्रीकरण के लिए सिम्पसंस सूचकांक का प्रयोग किया जाता है| सिम्पसंस सूचकांक में विविधता(D), किसी एक प्रजाति की संख्या(n) एवं सभी प्रजातियों की कुल संख्या(N) चरों का प्रयोग किया जाता है अल्फा विविधता किसी आवासस्थल में पायी जाने वाली प्रजातियों की विविधता अल्फा विविधता कहलाती है, बीटा विविधता बीटा विविधता में किन्ही दो आवास्स्थालों के मध्य प्रजातियों की विविधता अर्थात समानता एवं विषमता का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है गामा विविधता समस्त आवासस्थलों की कुल विविधता को गामा विविधता कहते हैं| मानव सभ्यता के विकास की धुरी जैव-विविधता मुख्यतः आवास विनाश, आवास विखण्डन, पर्यावरण प्रदूषण, विदेशी मूल के वनस्पतियों के आक्रमण, अतिशोषण, वन्य-जीवों का शिकार, वनविनाश, अति-चराई, बीमारी आदि के कारण खतरे में है। अतः पारिस्थितिक संतुलन, मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एवं प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, भू-स्खलन आदि) से मुक्ति के लिये जैव-विविधता का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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World War I was an outcome of European imperial rivalries. Discuss(10 marks /150 words)
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"World War I was an outcome of European imperial rivalries". Critically discuss? (10 marks/150 words) BRIEF APPROACH: Introduction: try to highlight major events that show the European rivalries, which led to the First World War Body: Try to highlight events like the formation of Entente Cordial 1904, the First Morrocon crisis, First Bosnian crisis, Tripple Entente etc. Conclusion: ( The entire content has been taken from what sir taught during class. Providing a conclusion is not necessary (since it is an answer of history) Answer:- The background to the First World War was set in 1894 , itself, with the budding of the Franco Prussian alliance First World War took place between 1914 and 1918. This war was partly an outcome of European imperial rivalries, which created the foundation for the war. The formation of the Entente Cordiale, between Britain and Francein 1904 , the Moroccan crises, the Bosnian crisis can be stated to be the cases of such imperial rivalries between the European powers. FORMATION OF THE ENTENTE CORDIALE IN 1904 As per the Cordiale, both sides (Britain and France) agreed to maintain cordial relationships. They agreed that they would try to overcome their historical rivalry. This formation of entente was triggered by: The desire to contain/ resist the rise of Germany. To prevent the emergence or renewal of the rivalry between Britain and France over colonial gains in North Africa. In North Africa, Britain and France were the two most powerful states. This led to competition over resources. The Entente Cordiale was a mutual understanding between the two powers to divide northern Africa into their spheres of influence . As per this mutual understanding, France was to expand westwards in North Africa and Britain, eastwards in North Africa. For example, France was to colonise Morocco, Tunisia, Algeria etc. and Britain was to colonize Egypt, Ghana etc. Both would not interfere in each other’s territories. They wanted to contain conflicts and establish cordial relationships to contain Germany . However, Germany was also interested in colonising Northern Africa. Northern Africa was so desirable because it was adjoining the Mediterranean Sea. Thus, the area was suitable for growing various citrus fruits like grapes etc., which were in huge demand in Europe. Also, Germany was emerging militarily and economically, thus, it needed more colonies. THE FIRST MOROCCAN CRISIS Morocco was an independent kingdom . As per the Entente Cordiale, France expressed its desire to colonise Morocco. However, the Moroccan king did not like this desire of France to colonise the kingdom and Germany declared support for Moroccan independence. However, Britain extended its support to the French position over the Moroccan question. Therefore, Britain and France called a conference to discuss the fate of the Moroccan question. Germany was also invited to this conference. Ultimately, Germany backed out as Britain and France joined hands. Thus, a settlement was reached between Britain, France and Germany, following the deliberations in the conference. According to the settlement, France would receive policing powers in Morocco. It would be allowed to keep its troops there. However, the Moroccan king would be retained (but he would be at the mercy of France). France would also have trading rights in Morocco. Germany was given some gains, while France was given the predominant gains. Morocco was humiliated. TRIPLE ENTENTE FORMED-1907 Britain and Russia signed a treaty of friendship. Thus, Russia became a part of the British and French friendship and the Triple Entente was formed. This convinced Germany about the aims of the European powers to contain its strides. THE FIRST BOSNIAN CRISIS- 1908 Bosnia was contested between Austria-Hungary in the north and Serbia in the south. It had a significant Serbian population and Serbia had claimed Bosnia a long time ago. Also, Serbians belonged to the Slavic race and the Russian rulers of the czarist regime also belonged to the same race. Therefore, there were ethnic links between Serbia and Russia. Russia always supported the Serbian position and its claims over Bosnia. (But Serbia was under the loose political control of the Austro-Hungarian Empire.) In 1908, Austria went ahead and annexed Bosnia. Serbia protested and expected that Russia would support it over the Bosnian question. However, such support never came. This was a huge setback for Serbian nationalism. This also contributed to the falling status of Russia in Europe. It showed that Russia, who also lost to a small Asian nation Japan, was no more a major power because it could not defend Serbia. SECOND MOROCCAN CRISIS/ AGADIR CRISIS- 1912 It broke out because France completely annexed Morocco and Germany was forced to back down again as Britain extended support to France. Thus, Germany’s colonial ambition remained unmet as it was offered minor colonial gains in central Africa by France. This again was a humiliation for Germany. SECOND BOSNIAN CRISIS OF 1914 The Austrian crowned prince, Franz Ferdinand was assassinated by a group of Serbian militants on June 28 th , 1914. Between, June 28 th to July 28 th , there were intense accusations in Europe, against Serbia. But Serbia declined these accusations, stating that it was the work of the militant groups based in Serbia. Austria threatened Serbia with serious consequences unless it accepted full responsibility for the assassination of Franz Ferdinand. Germany strongly supported Austria and Serbia looked towards Russia for mobilising its troops. All this happened in one month. On June 28 th , Austria declared war on Serbia and Germany declared war on France and Russia. World War I thus began and soon all the countries joined in the war. Conclusion Thus, due to the above-mentioned issues, it can be safely said that the First World War was partly an outcome of European imperial rivalries. The other main reason was the humiliation caused to the European nations on account of these rivalries.
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##Question:World War I was an outcome of European imperial rivalries. Discuss(10 marks /150 words)##Answer:"World War I was an outcome of European imperial rivalries". Critically discuss? (10 marks/150 words) BRIEF APPROACH: Introduction: try to highlight major events that show the European rivalries, which led to the First World War Body: Try to highlight events like the formation of Entente Cordial 1904, the First Morrocon crisis, First Bosnian crisis, Tripple Entente etc. Conclusion: ( The entire content has been taken from what sir taught during class. Providing a conclusion is not necessary (since it is an answer of history) Answer:- The background to the First World War was set in 1894 , itself, with the budding of the Franco Prussian alliance First World War took place between 1914 and 1918. This war was partly an outcome of European imperial rivalries, which created the foundation for the war. The formation of the Entente Cordiale, between Britain and Francein 1904 , the Moroccan crises, the Bosnian crisis can be stated to be the cases of such imperial rivalries between the European powers. FORMATION OF THE ENTENTE CORDIALE IN 1904 As per the Cordiale, both sides (Britain and France) agreed to maintain cordial relationships. They agreed that they would try to overcome their historical rivalry. This formation of entente was triggered by: The desire to contain/ resist the rise of Germany. To prevent the emergence or renewal of the rivalry between Britain and France over colonial gains in North Africa. In North Africa, Britain and France were the two most powerful states. This led to competition over resources. The Entente Cordiale was a mutual understanding between the two powers to divide northern Africa into their spheres of influence . As per this mutual understanding, France was to expand westwards in North Africa and Britain, eastwards in North Africa. For example, France was to colonise Morocco, Tunisia, Algeria etc. and Britain was to colonize Egypt, Ghana etc. Both would not interfere in each other’s territories. They wanted to contain conflicts and establish cordial relationships to contain Germany . However, Germany was also interested in colonising Northern Africa. Northern Africa was so desirable because it was adjoining the Mediterranean Sea. Thus, the area was suitable for growing various citrus fruits like grapes etc., which were in huge demand in Europe. Also, Germany was emerging militarily and economically, thus, it needed more colonies. THE FIRST MOROCCAN CRISIS Morocco was an independent kingdom . As per the Entente Cordiale, France expressed its desire to colonise Morocco. However, the Moroccan king did not like this desire of France to colonise the kingdom and Germany declared support for Moroccan independence. However, Britain extended its support to the French position over the Moroccan question. Therefore, Britain and France called a conference to discuss the fate of the Moroccan question. Germany was also invited to this conference. Ultimately, Germany backed out as Britain and France joined hands. Thus, a settlement was reached between Britain, France and Germany, following the deliberations in the conference. According to the settlement, France would receive policing powers in Morocco. It would be allowed to keep its troops there. However, the Moroccan king would be retained (but he would be at the mercy of France). France would also have trading rights in Morocco. Germany was given some gains, while France was given the predominant gains. Morocco was humiliated. TRIPLE ENTENTE FORMED-1907 Britain and Russia signed a treaty of friendship. Thus, Russia became a part of the British and French friendship and the Triple Entente was formed. This convinced Germany about the aims of the European powers to contain its strides. THE FIRST BOSNIAN CRISIS- 1908 Bosnia was contested between Austria-Hungary in the north and Serbia in the south. It had a significant Serbian population and Serbia had claimed Bosnia a long time ago. Also, Serbians belonged to the Slavic race and the Russian rulers of the czarist regime also belonged to the same race. Therefore, there were ethnic links between Serbia and Russia. Russia always supported the Serbian position and its claims over Bosnia. (But Serbia was under the loose political control of the Austro-Hungarian Empire.) In 1908, Austria went ahead and annexed Bosnia. Serbia protested and expected that Russia would support it over the Bosnian question. However, such support never came. This was a huge setback for Serbian nationalism. This also contributed to the falling status of Russia in Europe. It showed that Russia, who also lost to a small Asian nation Japan, was no more a major power because it could not defend Serbia. SECOND MOROCCAN CRISIS/ AGADIR CRISIS- 1912 It broke out because France completely annexed Morocco and Germany was forced to back down again as Britain extended support to France. Thus, Germany’s colonial ambition remained unmet as it was offered minor colonial gains in central Africa by France. This again was a humiliation for Germany. SECOND BOSNIAN CRISIS OF 1914 The Austrian crowned prince, Franz Ferdinand was assassinated by a group of Serbian militants on June 28 th , 1914. Between, June 28 th to July 28 th , there were intense accusations in Europe, against Serbia. But Serbia declined these accusations, stating that it was the work of the militant groups based in Serbia. Austria threatened Serbia with serious consequences unless it accepted full responsibility for the assassination of Franz Ferdinand. Germany strongly supported Austria and Serbia looked towards Russia for mobilising its troops. All this happened in one month. On June 28 th , Austria declared war on Serbia and Germany declared war on France and Russia. World War I thus began and soon all the countries joined in the war. Conclusion Thus, due to the above-mentioned issues, it can be safely said that the First World War was partly an outcome of European imperial rivalries. The other main reason was the humiliation caused to the European nations on account of these rivalries.
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नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा सम्बन्धी तकनीकों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही भारत में सौर ऊर्जा की संभावनाओं को रेखांकित करते हुए, इस सन्दर्भ में भारत सरकार के प्रयासों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss solar energy technologies as a renewable energy source. Along with this, mention the possibilities of solar energy in India and clarify the efforts of the Government of India in this regard. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में नवीकरणीय ऊर्जा को परिभाषित करते हुए इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 2- दूसरे भाग में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा सम्बन्धी तकनीकों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम भाग में भारत में सौर ऊर्जा की संभावनाओं को रेखांकित करते हुए इस सन्दर्भ में भारत सरकार के प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जीवाश्म ईंधन की अत्यधिक खपत ने कई चुनौतियों को जन्म दिया जिसके कारण दुनिया इसके प्रतिस्थापन के बारे में सोचने को मजबूर हो गई। पर्यावरणविदों ने जीवाश्म ईंधन से हमारी निर्भरता को कम करने और उसके प्रतिस्थापन के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा को स्वीकृति देना शुरू किया।नवीकरणीय ऊर्जा ऐसी ऊर्जा है जो प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती है। इसमें सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, पवन, ज्वार, जल और बायोमास के विभिन्न प्रकारों को शामिल किया जाता है।उल्लेखनीय है कि यह कभी भी समाप्त नहीं हो सकती है और इसे लगातार नवीनीकृत किया जाता है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के अंतर्गत वायु ऊर्जा, सौर ऊर्जा, हाइड्रोपावर, बायोमास, जियोथर्मल को शामिल किया जाता है| सौर ऊर्जा तकनीक सोलर फोटो वोल्टिक इसमेंअर्ध चालाक जैसे सिलिकॉन अथवा जर्मेनियम आधारित सोलर सेल से निर्मित पैनलों का उपयोग किया जाता है इसमें सौर/प्रकाशीय ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में बदल कर उसको सोलर बैटरी में संग्रहीत किया जाता है, यह ऊर्जा प्रत्यक्ष धारा DC होती है सोलर इन्वर्टर के माध्यम से इस DC को AC करेंट में बदला जा सकता है जिसे ग्रिड के माध्यम से वितरित किया जा सकता है रूफ टॉप सोलर पैनल से हुए अधिशेष ऊर्जा उत्पादन को ग्रिड में भेजी गयी इकाई का मापन करने के लिएनेट मीटरिंग का प्रयोग किया जाता है सोलर थर्मल कंसेंट्रेटिंग तकनीक इसके माध्यम से सौर ऊर्जा को एक स्थान पर केन्द्रित किया जाता है सौर विकिरण में इन्फ्रारेड तरंगों द्वारा सरू विकिरण को केन्द्रित कर उष्मा अथवा ताप का उपन्न किया जाता है |इसमें दो तरह की सतह का उपयोग किया जाता है यथा समतल सतह-इसमें ताप को अवशोषित करने वाली कोटिंग का उपयोग किया जाता है सिका सबसे बेहतर उदाहरण सोलर वाटर हीटर, सोलर कुकर है अवतल सतह इसका अनुप्रयोग भोजन निर्माण,विद्युत् उत्पादन आदि में किया जा सकता है इस तकनीक के द्वारा विद्युत् उत्पादन के लिए टरबाइन जेनेरेटर का उपयोग किया जाता है जिससे AC धारा के रूप में विद्युत् उत्पादन करता है जिसे सहजता से ग्रिड के माध्यम से वितरित किया जा सकता है| भारत में सौर ऊर्जा की संभावनाएं एवं सरकार के प्रयास भारत एक उष्णकटिबंधीय राष्ट्र है, भारत का बड़ा भौगोलिक क्षेत्र कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित है अतः यहाँ सौर ऊर्जा की मात्रा बहुत अधिक होती है इस सौर ऊर्जा को उपयोग में लाया जा सकता है इस संभावना को देखते हुए भारत सरकार द्वारानवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत विकास एवं अनुसंधान कार्यक्रम चलाया जा रहा है मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (गुरुग्राम) सौर ऊर्जा के विकास में संलग्न है सौर ऊर्जा संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के मुख्यालय के रूप में भी कार्य करता है सौर ऊर्जा के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सौर मिशन चलाया जा रहा है जिसके अंतर्गत वर्ष 2022 तक 100 गीगावाट सौर विद्युत् उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है| इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सौर शहर का विकास (लुधियाना, गया), सोलर पार्क का विकास (पावागढ़,रीवा) कैनाल टॉप परियोजनाएं, कुसुम योजना आदि अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं|
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##Question:नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा सम्बन्धी तकनीकों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही भारत में सौर ऊर्जा की संभावनाओं को रेखांकित करते हुए, इस सन्दर्भ में भारत सरकार के प्रयासों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss solar energy technologies as a renewable energy source. Along with this, mention the possibilities of solar energy in India and clarify the efforts of the Government of India in this regard. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नवीकरणीय ऊर्जा को परिभाषित करते हुए इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 2- दूसरे भाग में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा सम्बन्धी तकनीकों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम भाग में भारत में सौर ऊर्जा की संभावनाओं को रेखांकित करते हुए इस सन्दर्भ में भारत सरकार के प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जीवाश्म ईंधन की अत्यधिक खपत ने कई चुनौतियों को जन्म दिया जिसके कारण दुनिया इसके प्रतिस्थापन के बारे में सोचने को मजबूर हो गई। पर्यावरणविदों ने जीवाश्म ईंधन से हमारी निर्भरता को कम करने और उसके प्रतिस्थापन के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा को स्वीकृति देना शुरू किया।नवीकरणीय ऊर्जा ऐसी ऊर्जा है जो प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती है। इसमें सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, पवन, ज्वार, जल और बायोमास के विभिन्न प्रकारों को शामिल किया जाता है।उल्लेखनीय है कि यह कभी भी समाप्त नहीं हो सकती है और इसे लगातार नवीनीकृत किया जाता है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के अंतर्गत वायु ऊर्जा, सौर ऊर्जा, हाइड्रोपावर, बायोमास, जियोथर्मल को शामिल किया जाता है| सौर ऊर्जा तकनीक सोलर फोटो वोल्टिक इसमेंअर्ध चालाक जैसे सिलिकॉन अथवा जर्मेनियम आधारित सोलर सेल से निर्मित पैनलों का उपयोग किया जाता है इसमें सौर/प्रकाशीय ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में बदल कर उसको सोलर बैटरी में संग्रहीत किया जाता है, यह ऊर्जा प्रत्यक्ष धारा DC होती है सोलर इन्वर्टर के माध्यम से इस DC को AC करेंट में बदला जा सकता है जिसे ग्रिड के माध्यम से वितरित किया जा सकता है रूफ टॉप सोलर पैनल से हुए अधिशेष ऊर्जा उत्पादन को ग्रिड में भेजी गयी इकाई का मापन करने के लिएनेट मीटरिंग का प्रयोग किया जाता है सोलर थर्मल कंसेंट्रेटिंग तकनीक इसके माध्यम से सौर ऊर्जा को एक स्थान पर केन्द्रित किया जाता है सौर विकिरण में इन्फ्रारेड तरंगों द्वारा सरू विकिरण को केन्द्रित कर उष्मा अथवा ताप का उपन्न किया जाता है |इसमें दो तरह की सतह का उपयोग किया जाता है यथा समतल सतह-इसमें ताप को अवशोषित करने वाली कोटिंग का उपयोग किया जाता है सिका सबसे बेहतर उदाहरण सोलर वाटर हीटर, सोलर कुकर है अवतल सतह इसका अनुप्रयोग भोजन निर्माण,विद्युत् उत्पादन आदि में किया जा सकता है इस तकनीक के द्वारा विद्युत् उत्पादन के लिए टरबाइन जेनेरेटर का उपयोग किया जाता है जिससे AC धारा के रूप में विद्युत् उत्पादन करता है जिसे सहजता से ग्रिड के माध्यम से वितरित किया जा सकता है| भारत में सौर ऊर्जा की संभावनाएं एवं सरकार के प्रयास भारत एक उष्णकटिबंधीय राष्ट्र है, भारत का बड़ा भौगोलिक क्षेत्र कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित है अतः यहाँ सौर ऊर्जा की मात्रा बहुत अधिक होती है इस सौर ऊर्जा को उपयोग में लाया जा सकता है इस संभावना को देखते हुए भारत सरकार द्वारानवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत विकास एवं अनुसंधान कार्यक्रम चलाया जा रहा है मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (गुरुग्राम) सौर ऊर्जा के विकास में संलग्न है सौर ऊर्जा संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के मुख्यालय के रूप में भी कार्य करता है सौर ऊर्जा के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सौर मिशन चलाया जा रहा है जिसके अंतर्गत वर्ष 2022 तक 100 गीगावाट सौर विद्युत् उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है| इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सौर शहर का विकास (लुधियाना, गया), सोलर पार्क का विकास (पावागढ़,रीवा) कैनाल टॉप परियोजनाएं, कुसुम योजना आदि अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं|
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भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के प्रयासों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss wildlife conservation efforts in India with examples. (150-200 words / 10 marks).
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दृष्टिकोण: भूमिका मेंवन्यजीवों के संरक्षण के प्रयासों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख कर सकते हैं| मुख्य भाग मेंभारत में वन्यजीवों के संरक्षणहेतु किये जा रहेप्रयासों की चर्चा कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: स्वतंत्रता उपरांत 1952 में, भारतीय वन्यजीव बोर्ड का गठन भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रासंगिक सभी नियमों और विनियमों को केंद्रीयकृत करने के लिए किया गया था, जोकि तब तक एक राज्य से दूसरे राज्य मेंभिन्न-भिन्नथा। 1956 में, इस बोर्ड ने एकऐतिहासिक निर्णयपारित किया जिसने सभी मौजूदा गेम पार्कों को एक अभयारण्य या एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया। जैव-विविधता संरक्षण: स्व-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों में संरक्षण|उदा.- राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, जीव मंडल रिजर्व, सामुदायिक रिजर्व, सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन आदि| पर-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों के बाहर संरक्षण|उदा.- वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान, हर्बेरियम, बीज बैंक- क्रायो प्रिजर्वेशन, प्रजनन केंद्र आदि| भारत में वन्यजीवों के संरक्षण हेतु प्रयास: वन्यजीव अभ्यारण्य: एक वन्यजीव अभ्यारण्य ऐसा क्षेत्र होता है, जहाँ जीव-जंतुओं के पर्यावास और उनके इर्द-गिर्द के क्षेत्र किसी भी प्रकार के बाह्य गतिविधियों से संरक्षित होते हैं| सीमित मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने का अधिकार प्रदान करता है|साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 500 से अधिक वन्यजीव अभ्यारण्य हैं| राष्ट्रीय उद्यान: संरक्षण उद्देश्यों के लिए राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की जाती है| ये वन्यजीव अभ्यारण्यों के संरक्षण की तुलना में अधिक संरक्षित क्षेत्र होते हैं| इनमे मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होती है| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने का अधिकार भी प्रदान करता है| साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं| जीवमंडल रिजर्व: जीवमंडल रिजर्व यूनेस्को द्वारा प्रदत्त एक अंतर्राष्ट्रीय पदनाम है, जिसमें स्थलीय, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं| एक जीवमंडल रिजर्व को संरक्षण के अनुसार कोर, बफर एवं संक्रमण क्षेत्र में विभाजित किया जाता है| इसकी घोषणा केंद्र सरकार द्वारा की जाती ही| वर्तमान समय में भारत में 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्र हैं जिनमें 11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र: प्रथम बार इसे डाक्टर गाडगिल समिति की रिपोर्ट में इसकी अनुशंषा की गई| इसकी घोषणा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 के अंतर्गत की जाती है| अभ्यारण्य या राष्ट्रीय उद्यान से 10 किमी. तक के क्षेत्र में इसकी घोषणा की जाती है| इसमें-प्रतिबंधित गतिविधियाँ- खनन, प्रदूषणकारी इकाई की स्थापना आदि| विनियमित गतिविधियाँ- होटल, रेस्तरां, बिजली केबल आदि| अनुमत गतिविधियाँ- पारंपरिक कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा आदि| यूनेस्को: मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम, 1971:जीवमंडल रिजर्व का वैश्विक नेटवर्कभारत के 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्रमें से11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| विश्व विरासत संधि-1972 : प्राकृतिकमहत्व के विरासतस्थल-काजीरंगा, मानस, सुंदरबन, पश्चिमी घाट, फूलों की घाटी आदि| मिश्रितमहत्व के विरासतस्थल-कंचनजंगा सामुदायिक रिजर्व और संरक्षित रिजर्व: वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत इन दोनों आरक्षित क्षेत्रों को अधिसूचित किया जाता है। यह प्रावधान वन्य जीव सुरक्षा संसोधन - 2002 के अंतर्गत किया गया है । सामुदायिक रिजर्व: दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन्यजीव गलियारे जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्व भी समुदाय या निजी व्यक्ति के पास है तब उसे सामुदायिक रिजर्व घोषित किया जाता है| संरक्षित रिजर्व: दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच का क्षेत्र जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्वकेंद्र सरकारके पास है किन्तु समुदाय उस भूमि का प्रयोग अपनी आजीवका के लिए करता है तब उसेसंरक्षितरिजर्व घोषित किया जाता है| भारतीय वन अधिनियम, 1927: वनों के आर्थिक उपयोग का नियमन काष्ठ एवं गैर-काष्ठ/ लघु वनीय उत्पादमें विभाजित किया जाता है| संशोधन द्वारा बांस को गैर-काष्ठ वनीय उत्पाद में शामिल किया गया है| वन संरक्षण अधिनयम, 1980: वनों का वर्गीकरण वनों के संरक्षण संबंधी प्रावधान वन क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक परियोजनाओं के लिए आरक्षित या अनारक्षित किया जा सकता है| वनीकरण संबंधी प्रावधान वन अधिकार अधिनियम, 2006: अनुसूचित जनजाति एवं वनवासियों को भू-स्वामित्व अधिकार आजीविका का अधिकार इसके साथ ही विभिन्न वन्यजीवों जैसे- बाघ, हाथी, एशियाई शेर, एक श्रृंगी गैंडा आदि के संरक्षण एवं विकास के लिए विशेष रिजर्व क्षेत्रों की भी स्थापना की गई है|
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##Question:भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के प्रयासों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss wildlife conservation efforts in India with examples. (150-200 words / 10 marks).##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका मेंवन्यजीवों के संरक्षण के प्रयासों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख कर सकते हैं| मुख्य भाग मेंभारत में वन्यजीवों के संरक्षणहेतु किये जा रहेप्रयासों की चर्चा कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: स्वतंत्रता उपरांत 1952 में, भारतीय वन्यजीव बोर्ड का गठन भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रासंगिक सभी नियमों और विनियमों को केंद्रीयकृत करने के लिए किया गया था, जोकि तब तक एक राज्य से दूसरे राज्य मेंभिन्न-भिन्नथा। 1956 में, इस बोर्ड ने एकऐतिहासिक निर्णयपारित किया जिसने सभी मौजूदा गेम पार्कों को एक अभयारण्य या एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया। जैव-विविधता संरक्षण: स्व-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों में संरक्षण|उदा.- राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, जीव मंडल रिजर्व, सामुदायिक रिजर्व, सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन आदि| पर-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों के बाहर संरक्षण|उदा.- वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान, हर्बेरियम, बीज बैंक- क्रायो प्रिजर्वेशन, प्रजनन केंद्र आदि| भारत में वन्यजीवों के संरक्षण हेतु प्रयास: वन्यजीव अभ्यारण्य: एक वन्यजीव अभ्यारण्य ऐसा क्षेत्र होता है, जहाँ जीव-जंतुओं के पर्यावास और उनके इर्द-गिर्द के क्षेत्र किसी भी प्रकार के बाह्य गतिविधियों से संरक्षित होते हैं| सीमित मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने का अधिकार प्रदान करता है|साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 500 से अधिक वन्यजीव अभ्यारण्य हैं| राष्ट्रीय उद्यान: संरक्षण उद्देश्यों के लिए राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की जाती है| ये वन्यजीव अभ्यारण्यों के संरक्षण की तुलना में अधिक संरक्षित क्षेत्र होते हैं| इनमे मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होती है| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने का अधिकार भी प्रदान करता है| साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं| जीवमंडल रिजर्व: जीवमंडल रिजर्व यूनेस्को द्वारा प्रदत्त एक अंतर्राष्ट्रीय पदनाम है, जिसमें स्थलीय, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं| एक जीवमंडल रिजर्व को संरक्षण के अनुसार कोर, बफर एवं संक्रमण क्षेत्र में विभाजित किया जाता है| इसकी घोषणा केंद्र सरकार द्वारा की जाती ही| वर्तमान समय में भारत में 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्र हैं जिनमें 11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र: प्रथम बार इसे डाक्टर गाडगिल समिति की रिपोर्ट में इसकी अनुशंषा की गई| इसकी घोषणा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 के अंतर्गत की जाती है| अभ्यारण्य या राष्ट्रीय उद्यान से 10 किमी. तक के क्षेत्र में इसकी घोषणा की जाती है| इसमें-प्रतिबंधित गतिविधियाँ- खनन, प्रदूषणकारी इकाई की स्थापना आदि| विनियमित गतिविधियाँ- होटल, रेस्तरां, बिजली केबल आदि| अनुमत गतिविधियाँ- पारंपरिक कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा आदि| यूनेस्को: मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम, 1971:जीवमंडल रिजर्व का वैश्विक नेटवर्कभारत के 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्रमें से11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| विश्व विरासत संधि-1972 : प्राकृतिकमहत्व के विरासतस्थल-काजीरंगा, मानस, सुंदरबन, पश्चिमी घाट, फूलों की घाटी आदि| मिश्रितमहत्व के विरासतस्थल-कंचनजंगा सामुदायिक रिजर्व और संरक्षित रिजर्व: वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत इन दोनों आरक्षित क्षेत्रों को अधिसूचित किया जाता है। यह प्रावधान वन्य जीव सुरक्षा संसोधन - 2002 के अंतर्गत किया गया है । सामुदायिक रिजर्व: दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन्यजीव गलियारे जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्व भी समुदाय या निजी व्यक्ति के पास है तब उसे सामुदायिक रिजर्व घोषित किया जाता है| संरक्षित रिजर्व: दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच का क्षेत्र जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्वकेंद्र सरकारके पास है किन्तु समुदाय उस भूमि का प्रयोग अपनी आजीवका के लिए करता है तब उसेसंरक्षितरिजर्व घोषित किया जाता है| भारतीय वन अधिनियम, 1927: वनों के आर्थिक उपयोग का नियमन काष्ठ एवं गैर-काष्ठ/ लघु वनीय उत्पादमें विभाजित किया जाता है| संशोधन द्वारा बांस को गैर-काष्ठ वनीय उत्पाद में शामिल किया गया है| वन संरक्षण अधिनयम, 1980: वनों का वर्गीकरण वनों के संरक्षण संबंधी प्रावधान वन क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक परियोजनाओं के लिए आरक्षित या अनारक्षित किया जा सकता है| वनीकरण संबंधी प्रावधान वन अधिकार अधिनियम, 2006: अनुसूचित जनजाति एवं वनवासियों को भू-स्वामित्व अधिकार आजीविका का अधिकार इसके साथ ही विभिन्न वन्यजीवों जैसे- बाघ, हाथी, एशियाई शेर, एक श्रृंगी गैंडा आदि के संरक्षण एवं विकास के लिए विशेष रिजर्व क्षेत्रों की भी स्थापना की गई है|
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"ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था |" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 -200 शब्द/10 अंक) "Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution". Verify the statement through relevant arguments. (150- 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर - 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटेन ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी; नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया; इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया ; स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई ; 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं; इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तर दायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इनमें सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ; हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्थाओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी; 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि ; आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया |इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था| सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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##Question:"ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था |" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 -200 शब्द/10 अंक) "Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution". Verify the statement through relevant arguments. (150- 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर - 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटेन ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी; नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया; इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया ; स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई ; 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं; इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तर दायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इनमें सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ; हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्थाओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी; 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि ; आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया |इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था| सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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"ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था |" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 -200 शब्द/10 अंक) "Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution". Verify the statement through relevant arguments. (150- 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटेन ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं” इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तर दायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण · 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । · अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । · ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इनमें सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्थाओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि · आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण · अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। · एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था · 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ · जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि · यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। · बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध · इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | · इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था| सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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##Question:"ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था |" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 -200 शब्द/10 अंक) "Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution". Verify the statement through relevant arguments. (150- 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटेन ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं” इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तर दायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण · 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । · अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । · ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इनमें सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्थाओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि · आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण · अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। · एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था · 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ · जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि · यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। · बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध · इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | · इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था| सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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"ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था |" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 -200 शब्द/10 अंक) "Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution". Verify the statement through relevant arguments. (150- 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये | अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटे न ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी | नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया | इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया | स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई | 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं ”| इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तर दायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इन में सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ | हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्था ओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी; 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि यूरोपीय विचारकों जैसे - लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अ मेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था ; सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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##Question:"ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था |" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 -200 शब्द/10 अंक) "Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution". Verify the statement through relevant arguments. (150- 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये | अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटे न ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी | नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया | इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया | स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई | 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं ”| इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तर दायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इन में सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ | हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्था ओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी; 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि यूरोपीय विचारकों जैसे - लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अ मेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था ; सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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महासागरीय ऊर्जा के विभिन्न उपयोगों की चर्चा करते हुए इसके लाभ एवं हानिकीसंक्षेप में जानकारी दीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discussing the different uses of ocean energy, briefly explain its advantages and disadvantages. (150-200 words/ 10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में महासागरीय ऊर्जा का परिचय दीजिए| उत्तर के मुख्य भाग में इसके उपयोग, लाभ एवं हानियों की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष में भारत में इसकी संभावनाओं पर संक्षिप्त जानकारी दीजिए| उत्तर: महासागरीय ऊर्जा: महासागर पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत भाग है| महासागरों के लहर, ज्वार, समुद्री तापमान आदि का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जा सकता है, इसे ही महासागरीय ऊर्जा कहा जाता है | महासागरीय ऊर्जा के उपयोग: ज्वारीय ऊर्जा: ज्वार सूर्य एवं चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण प्रत्येक 12 घंटों में होता है | निम्न ज्वार और उच्च ज्वार में जल की ऊँचाई में अन्तर्निहित ऊर्जा क्षमता होती है | जिस प्रकार नदियों में बांधों से जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है, उसी प्रकार नदी के मुहाने में ज्वारीय बाँध द्वारा बिजली उत्पादन किया जा सकता है | ज्वारीय बाँध में टरबाइन की सहायता से बिजली उत्पादन किया जाता है | जब उच्च ज्वार होता है , समुद्र के जल का स्तर, नदी के जल के स्तर से ऊंचा होता है, जिसके कारण समुद्री जल का नदी की तरफ प्रवाह होता है | इस दौरान जल को ज्वारीय बाँध में एक जलशाय में संगृहीत कर लिया जाता है | निम्न ज्वार के दौरान इस जलाशय से जल को समुद्र की ओर छोड़ा जाता है, जो टरबाइन जनरेटर से बिजली उत्पादन करने में सहायक होता है | ओटेक(OTEC) भारत में ओटेक की 1 लाख 80 हजार MW की क्षमता है | पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय समुद्री प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) चेन्नई के वैज्ञानिकों द्वारा ओटेक तकनीकि विकसित किया गया है | ओटेक तकनीक में समुद्री सतह का गर्म पानी तथा 1 हजार मीटर की गहराई के ठन्डे जल के तापमान अंतर का उपयोग किया जाता है | इस तकनीक में एक तरल पदार्थ जैसे कि अमोनिया को हीट एक्सचेंजर के माध्यम से वाष्पीकृत किया जाता है | अमोनिया गैस द्वारा टरबाइन जेनेरटर चलाया जाता है, जिससे विद्युत उत्पादन होता है | इस अमोनिया गैस को पुनः तरल में परिवर्तित कंडेंसर में किया जाता है, जिसे ठंडा गहरे जल से किया जाता है | इस तरल को वापस हीट एक्सचेंजर में भेज दिया जाता है | तरंग ऊर्जा: समुद्र तट के निकट विशाल तरंगों की गतिज ऊर्जा को भी विद्युत उत्पन्न करने के लिये ट्रेप किया जा सकता है। महासागरों के पृष्ठ पर आर-पार बहने वाली प्रबल पवन तरंगें उत्पन्न करती है। तरंग ऊर्जा का वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों। तरंग ऊर्जा को ट्रेप करने के लिये विविध युक्तियाँ विकसित की गई हैं ताकि टरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करने के लिये इनका उपयोग किया जा सकें। तरंग ऊर्जा एक उपकरण की गति से उत्पन्न होती है जो या तो समुद्र की सतह पर बहती है या समुद्र तल तक जाती है। तरंग ऊर्जा को विद्युत शक्ति में परिवर्तित करने की कई विभिन्न तकनीकों का अध्ययन किया गया है। तरंग रूपांतरण उपकरण जो सतह पर तैरते हैं, जोड़ों में एक साथ टिका होता है जो लहरों के साथ झुकता है। यह गतिज ऊर्जा टरबाइनों के माध्यम से द्रव को पंप करती है और विद्युत शक्ति बनाती है। महासागरीय ऊर्जा के लाभ एवं हानि: महासागरीय ऊर्जा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह एक नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोत है| पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित है क्योंकि इसमें ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया में प्रदुषणकारी तत्वों का उत्सर्जन नहीं होता है| साथ ही भारत जैसे देश जो कि अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए अन्य देशों पर निर्भर हैं, के लिए आत्मनिर्भर बनने में भी सहायक है| महासागरीय ऊर्जा में संधारणीयता का गुण विद्यमान है| महासागरीय ऊर्जा के हानि/सीमायें: आर्थिक बाधा: महासागरीय ऊर्जा के दोहन के लिए प्लांट स्थापित करना एक बेहद ही खर्चीला कार्य है एवं सीमित आर्थिक शक्ति वाले देशों के लिए यह व्यवहार्य नहीं हो पाता| तकनीकी बाधा:महासागरीय ऊर्जा के दोहन के लिए प्लांट स्थापित करने हेतु आवश्यक उपकरणों का विकास अभी अनुसंधानरत है क्योंकि उपलब्ध उपकरणों की दक्षता अधिक नहीं है| पर्यावरणीय बाधा: गहरे महासागरों एवं तटीय क्षेत्रों में महासागरीय ऊर्जा के दोहन की प्रक्रिया में स्थानिक जीवो एवं वनस्पति दुष्प्रभावित होते हैं| भारत में ज्वारीय ऊर्जा की कुल पहचान क्षमता 9000 मेगावाट, तरंग ऊर्जा की कुल उपलब्ध क्षमता 40,000 मेगावाट होने का अनुमान है| भारत सरकार ने अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्यों के सन्दर्भ में 2022 तक कई ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के रणनीति पर कार्य कर रहा है| 100 से अधिक विभिन्न महासागर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के 30 से अधिक देशों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं|
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##Question:महासागरीय ऊर्जा के विभिन्न उपयोगों की चर्चा करते हुए इसके लाभ एवं हानिकीसंक्षेप में जानकारी दीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discussing the different uses of ocean energy, briefly explain its advantages and disadvantages. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में महासागरीय ऊर्जा का परिचय दीजिए| उत्तर के मुख्य भाग में इसके उपयोग, लाभ एवं हानियों की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष में भारत में इसकी संभावनाओं पर संक्षिप्त जानकारी दीजिए| उत्तर: महासागरीय ऊर्जा: महासागर पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत भाग है| महासागरों के लहर, ज्वार, समुद्री तापमान आदि का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जा सकता है, इसे ही महासागरीय ऊर्जा कहा जाता है | महासागरीय ऊर्जा के उपयोग: ज्वारीय ऊर्जा: ज्वार सूर्य एवं चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण प्रत्येक 12 घंटों में होता है | निम्न ज्वार और उच्च ज्वार में जल की ऊँचाई में अन्तर्निहित ऊर्जा क्षमता होती है | जिस प्रकार नदियों में बांधों से जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है, उसी प्रकार नदी के मुहाने में ज्वारीय बाँध द्वारा बिजली उत्पादन किया जा सकता है | ज्वारीय बाँध में टरबाइन की सहायता से बिजली उत्पादन किया जाता है | जब उच्च ज्वार होता है , समुद्र के जल का स्तर, नदी के जल के स्तर से ऊंचा होता है, जिसके कारण समुद्री जल का नदी की तरफ प्रवाह होता है | इस दौरान जल को ज्वारीय बाँध में एक जलशाय में संगृहीत कर लिया जाता है | निम्न ज्वार के दौरान इस जलाशय से जल को समुद्र की ओर छोड़ा जाता है, जो टरबाइन जनरेटर से बिजली उत्पादन करने में सहायक होता है | ओटेक(OTEC) भारत में ओटेक की 1 लाख 80 हजार MW की क्षमता है | पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय समुद्री प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) चेन्नई के वैज्ञानिकों द्वारा ओटेक तकनीकि विकसित किया गया है | ओटेक तकनीक में समुद्री सतह का गर्म पानी तथा 1 हजार मीटर की गहराई के ठन्डे जल के तापमान अंतर का उपयोग किया जाता है | इस तकनीक में एक तरल पदार्थ जैसे कि अमोनिया को हीट एक्सचेंजर के माध्यम से वाष्पीकृत किया जाता है | अमोनिया गैस द्वारा टरबाइन जेनेरटर चलाया जाता है, जिससे विद्युत उत्पादन होता है | इस अमोनिया गैस को पुनः तरल में परिवर्तित कंडेंसर में किया जाता है, जिसे ठंडा गहरे जल से किया जाता है | इस तरल को वापस हीट एक्सचेंजर में भेज दिया जाता है | तरंग ऊर्जा: समुद्र तट के निकट विशाल तरंगों की गतिज ऊर्जा को भी विद्युत उत्पन्न करने के लिये ट्रेप किया जा सकता है। महासागरों के पृष्ठ पर आर-पार बहने वाली प्रबल पवन तरंगें उत्पन्न करती है। तरंग ऊर्जा का वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों। तरंग ऊर्जा को ट्रेप करने के लिये विविध युक्तियाँ विकसित की गई हैं ताकि टरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करने के लिये इनका उपयोग किया जा सकें। तरंग ऊर्जा एक उपकरण की गति से उत्पन्न होती है जो या तो समुद्र की सतह पर बहती है या समुद्र तल तक जाती है। तरंग ऊर्जा को विद्युत शक्ति में परिवर्तित करने की कई विभिन्न तकनीकों का अध्ययन किया गया है। तरंग रूपांतरण उपकरण जो सतह पर तैरते हैं, जोड़ों में एक साथ टिका होता है जो लहरों के साथ झुकता है। यह गतिज ऊर्जा टरबाइनों के माध्यम से द्रव को पंप करती है और विद्युत शक्ति बनाती है। महासागरीय ऊर्जा के लाभ एवं हानि: महासागरीय ऊर्जा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह एक नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोत है| पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित है क्योंकि इसमें ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया में प्रदुषणकारी तत्वों का उत्सर्जन नहीं होता है| साथ ही भारत जैसे देश जो कि अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए अन्य देशों पर निर्भर हैं, के लिए आत्मनिर्भर बनने में भी सहायक है| महासागरीय ऊर्जा में संधारणीयता का गुण विद्यमान है| महासागरीय ऊर्जा के हानि/सीमायें: आर्थिक बाधा: महासागरीय ऊर्जा के दोहन के लिए प्लांट स्थापित करना एक बेहद ही खर्चीला कार्य है एवं सीमित आर्थिक शक्ति वाले देशों के लिए यह व्यवहार्य नहीं हो पाता| तकनीकी बाधा:महासागरीय ऊर्जा के दोहन के लिए प्लांट स्थापित करने हेतु आवश्यक उपकरणों का विकास अभी अनुसंधानरत है क्योंकि उपलब्ध उपकरणों की दक्षता अधिक नहीं है| पर्यावरणीय बाधा: गहरे महासागरों एवं तटीय क्षेत्रों में महासागरीय ऊर्जा के दोहन की प्रक्रिया में स्थानिक जीवो एवं वनस्पति दुष्प्रभावित होते हैं| भारत में ज्वारीय ऊर्जा की कुल पहचान क्षमता 9000 मेगावाट, तरंग ऊर्जा की कुल उपलब्ध क्षमता 40,000 मेगावाट होने का अनुमान है| भारत सरकार ने अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्यों के सन्दर्भ में 2022 तक कई ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के रणनीति पर कार्य कर रहा है| 100 से अधिक विभिन्न महासागर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के 30 से अधिक देशों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं|
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Discuss the Portuguese efforts to establish power in India? Also, highlight the reasons that paved the way for the same? (150 words/10 marks)
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Approach: Briefly introduce the Portuguese arrival in India Highlight efforts by the Portuguese to establish power in India Provide the reasons which led to their success Portuguese were the first to arrive in India as traders , among the Europeans. During the regime of King John II, Bartholomew Diaz crossed the Cape of Good Hope . This particular event gave impetus to the European seafarers in general, and to the Portuguese in particular. Efforts by the Portuguese to establish power in India : During the regime of Emmanuel, Vasco Da Gama reached the coast of Calicut in May 1498 and was welcomed by local Zamorins of Kerala. Vasco Da Gama came back to India again in 1501 establishing trading centers at Calicut, Cochin, and Cannanore In 1505, De Almedia was appointed as the first Portuguese Viceroy in India. He started the "Blue Water Policy" to control the entire trade route of the Indian Ocean and the Arabian Sea. In 1509, Albuquerque was appointed as the next Viceroy. He conquered Goa in 1510 and created a fort at Cochin. He also covered Hormuz in the Persian Gulf and eclipsed the influence of Arab traders in India. He also built a fort at Cochin with the permission of the local ruler. Ninu Da Cunha acquired Diu and Bassein with Gujrati ruler Bahadur Shah Reasons that paved the way for their success: Spirit of adventure in the Portuguese: The spirit of adventure that led to the foundation of the modern world promoted geographical discoveries to the far-flung areas. The primary objectives of these voyages were earning profit from trade with eastern countries. Political support: Prince Henry the Navigator, who was the ruler of Portugal, took the lead among European nations and promoted seafaring activities. Blue Water Policy of De Almeida helped the Portuguese to control the entire trade route of the Indian Ocean and the Arabian Sea. The promotion of cash crops in India like cotton, silk, spices, and tobacco helped them gain significant economic power i n India. Thus, the arrival of the Portuguese in India had far-reaching consequences on the shape and course of Indian history, paving the way for its eventual colonization.
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##Question:Discuss the Portuguese efforts to establish power in India? Also, highlight the reasons that paved the way for the same? (150 words/10 marks)##Answer:Approach: Briefly introduce the Portuguese arrival in India Highlight efforts by the Portuguese to establish power in India Provide the reasons which led to their success Portuguese were the first to arrive in India as traders , among the Europeans. During the regime of King John II, Bartholomew Diaz crossed the Cape of Good Hope . This particular event gave impetus to the European seafarers in general, and to the Portuguese in particular. Efforts by the Portuguese to establish power in India : During the regime of Emmanuel, Vasco Da Gama reached the coast of Calicut in May 1498 and was welcomed by local Zamorins of Kerala. Vasco Da Gama came back to India again in 1501 establishing trading centers at Calicut, Cochin, and Cannanore In 1505, De Almedia was appointed as the first Portuguese Viceroy in India. He started the "Blue Water Policy" to control the entire trade route of the Indian Ocean and the Arabian Sea. In 1509, Albuquerque was appointed as the next Viceroy. He conquered Goa in 1510 and created a fort at Cochin. He also covered Hormuz in the Persian Gulf and eclipsed the influence of Arab traders in India. He also built a fort at Cochin with the permission of the local ruler. Ninu Da Cunha acquired Diu and Bassein with Gujrati ruler Bahadur Shah Reasons that paved the way for their success: Spirit of adventure in the Portuguese: The spirit of adventure that led to the foundation of the modern world promoted geographical discoveries to the far-flung areas. The primary objectives of these voyages were earning profit from trade with eastern countries. Political support: Prince Henry the Navigator, who was the ruler of Portugal, took the lead among European nations and promoted seafaring activities. Blue Water Policy of De Almeida helped the Portuguese to control the entire trade route of the Indian Ocean and the Arabian Sea. The promotion of cash crops in India like cotton, silk, spices, and tobacco helped them gain significant economic power i n India. Thus, the arrival of the Portuguese in India had far-reaching consequences on the shape and course of Indian history, paving the way for its eventual colonization.
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जैव-विविधता संरक्षण के लिए हॉट स्पॉट, हॉप स्पॉट एवं महाविविधता वाला राष्ट्र की संकल्पनाओं की चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the concepts of a hot spot, hop spot and megadiversecountries for biodiversity conservation. (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में जैव-विविधता संरक्षण की विधियों की चर्चा कीजिए| मुख्य भाग मेंहॉट स्पॉट, हॉप स्पॉट एवं महाविविधता वाला राष्ट्र की संकल्पनाओं की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष में जैव-विविधता संरक्षणकी अन्य महत्वपूर्णपहलोंकोसंक्षेप में व्यक्त कीजिए| उत्तर: जैव-विविधता संरक्षण दो विधियों के तहत किया जाता है, यथा- स्व-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों में संरक्षण|उदा.- राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, जीव मंडल रिजर्व, सामुदायिक रिजर्व, सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन आदि| पर-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों के बाहर संरक्षण|उदा.- वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान, हर्बेरियम, बीज बैंक- क्रायो प्रिजर्वेशन, प्रजनन केंद्र आदि| जैव विविधता तप्त स्थल/हॉट स्पॉट: जैव विविधता तप्त स्थल ऐसे जैव-भौगौलीक क्षेत्र होते हैं जिसमें जैविक विविधता की बहुलता पायी जाती है| यह परिकल्पना वर्ष 1988 में ब्रिटिश पर्यावरणविद डॉ नॉर्मन मेयर्स के द्वारा दिया गया| जैव विविधता तप्त स्थल की घोषणा दो शर्तों के आधार पर किया जाता है:स्थानिकता: कम से कम 1500 स्थानीय पादप प्रजाति| संकट अवबोधन : 70% से अधिक मूल वनस्पति का विनाश हो चुका है| जैव विविधता तप्त स्थल की घोषणा, संरक्षण एवं प्रबंधन का कार्यकंजर्वेशनइंटरनेशनल (Conservation International) द्वारा किया जाता है । कॉन्जर्वेशन इंटरनेशनल एक गैर सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1989 में किया गया था| CEPF(क्रिटिकल इकोसिस्टम पार्टनरशिप फंड): यह कॉन्जर्वेशन इंटरनेशनल के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय कोष है जो जैव विविधता तप्त स्थल के संरक्षण से संबंधित है| वर्तमान में विश्व में कुल 36 जैव विविधता तप्त स्थल हैं जबकि भारत में कुल 4 तप्त स्थल है| भारत में स्थित जैव विविधता तप्त स्थल: हिमालय इंडो-बर्मा पश्चिमी घाट सुंडालैंड होप स्पॉट: यह संकल्पना सर्वप्रथम वर्ष 2009 में अमेरिकी समुद्र वैज्ञानिक डॉ सिल्विया अर्ल के द्वारा दिया गया| होप स्पॉट सागरीय अथवा महासागरीय संरक्षित क्षेत्र है ( MPAs ) जिसमें जैव विविधता अत्यधिक पायी जाती है| इन होप स्पॉट के संरक्षण के लिए मिशन ब्लू संस्था की स्थापना की गयी है| वर्तमान में विश्व में 70 से अधिक होप स्पॉट शामिल किया गया है, जिसमें भारत में दो हैं : अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप| महाविविधता वाला राष्ट्र: इसकी संकल्पना 1988 में UNEP की विशेषज्ञ एजेंसी विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र द्वारा दी गई| महाविविधता वाले राष्ट्र का चयन दो शर्तों पर किया जाता है-5000स्थानिक अथवा देशज पादप प्रजाति हो| सागर/महासागर से जुडा हुआ तटीय क्षेत्र अथवा महासागरीय पारितंत्र होना चाहिए| भारत 17 महाविविधता वाले राष्ट्रों में से एक है| वर्ष 2002 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता अभिसमय का कानकुन सम्मेलन के दौरान 18 राष्ट्रों द्वारा LMMCs(Like minded megadiverse countries) समूह का गठन किया गया| यह अन्य राष्ट्रों को जैव-विविधता से संबंधित महत्वपूर्ण संधि एवं समझौतों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है|
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##Question:जैव-विविधता संरक्षण के लिए हॉट स्पॉट, हॉप स्पॉट एवं महाविविधता वाला राष्ट्र की संकल्पनाओं की चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the concepts of a hot spot, hop spot and megadiversecountries for biodiversity conservation. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में जैव-विविधता संरक्षण की विधियों की चर्चा कीजिए| मुख्य भाग मेंहॉट स्पॉट, हॉप स्पॉट एवं महाविविधता वाला राष्ट्र की संकल्पनाओं की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष में जैव-विविधता संरक्षणकी अन्य महत्वपूर्णपहलोंकोसंक्षेप में व्यक्त कीजिए| उत्तर: जैव-विविधता संरक्षण दो विधियों के तहत किया जाता है, यथा- स्व-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों में संरक्षण|उदा.- राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, जीव मंडल रिजर्व, सामुदायिक रिजर्व, सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन आदि| पर-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों के बाहर संरक्षण|उदा.- वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान, हर्बेरियम, बीज बैंक- क्रायो प्रिजर्वेशन, प्रजनन केंद्र आदि| जैव विविधता तप्त स्थल/हॉट स्पॉट: जैव विविधता तप्त स्थल ऐसे जैव-भौगौलीक क्षेत्र होते हैं जिसमें जैविक विविधता की बहुलता पायी जाती है| यह परिकल्पना वर्ष 1988 में ब्रिटिश पर्यावरणविद डॉ नॉर्मन मेयर्स के द्वारा दिया गया| जैव विविधता तप्त स्थल की घोषणा दो शर्तों के आधार पर किया जाता है:स्थानिकता: कम से कम 1500 स्थानीय पादप प्रजाति| संकट अवबोधन : 70% से अधिक मूल वनस्पति का विनाश हो चुका है| जैव विविधता तप्त स्थल की घोषणा, संरक्षण एवं प्रबंधन का कार्यकंजर्वेशनइंटरनेशनल (Conservation International) द्वारा किया जाता है । कॉन्जर्वेशन इंटरनेशनल एक गैर सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1989 में किया गया था| CEPF(क्रिटिकल इकोसिस्टम पार्टनरशिप फंड): यह कॉन्जर्वेशन इंटरनेशनल के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय कोष है जो जैव विविधता तप्त स्थल के संरक्षण से संबंधित है| वर्तमान में विश्व में कुल 36 जैव विविधता तप्त स्थल हैं जबकि भारत में कुल 4 तप्त स्थल है| भारत में स्थित जैव विविधता तप्त स्थल: हिमालय इंडो-बर्मा पश्चिमी घाट सुंडालैंड होप स्पॉट: यह संकल्पना सर्वप्रथम वर्ष 2009 में अमेरिकी समुद्र वैज्ञानिक डॉ सिल्विया अर्ल के द्वारा दिया गया| होप स्पॉट सागरीय अथवा महासागरीय संरक्षित क्षेत्र है ( MPAs ) जिसमें जैव विविधता अत्यधिक पायी जाती है| इन होप स्पॉट के संरक्षण के लिए मिशन ब्लू संस्था की स्थापना की गयी है| वर्तमान में विश्व में 70 से अधिक होप स्पॉट शामिल किया गया है, जिसमें भारत में दो हैं : अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप| महाविविधता वाला राष्ट्र: इसकी संकल्पना 1988 में UNEP की विशेषज्ञ एजेंसी विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र द्वारा दी गई| महाविविधता वाले राष्ट्र का चयन दो शर्तों पर किया जाता है-5000स्थानिक अथवा देशज पादप प्रजाति हो| सागर/महासागर से जुडा हुआ तटीय क्षेत्र अथवा महासागरीय पारितंत्र होना चाहिए| भारत 17 महाविविधता वाले राष्ट्रों में से एक है| वर्ष 2002 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता अभिसमय का कानकुन सम्मेलन के दौरान 18 राष्ट्रों द्वारा LMMCs(Like minded megadiverse countries) समूह का गठन किया गया| यह अन्य राष्ट्रों को जैव-विविधता से संबंधित महत्वपूर्ण संधि एवं समझौतों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है|
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"फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |" इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution." Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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##Question:"फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |" इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution." Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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"फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |" इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution." Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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##Question:"फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |" इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution." Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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नैनो मिशन कार्यक्रम के उद्देश्यों की चर्चा कीजिए| साथ ही, भारत में नैनो प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुए विकास को उदाहरण सहित वर्णन कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the objectives of the Nano Mission Program. Also, Describe, with suitable examples, the development in the field of nanotechnology in India. (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका मेंनैनो मिशन कार्यक्रम से संबंधित जानकारी दीजिए| नैनो मिशन कार्यक्रम के उद्देश्यों को रेखांकित कीजिए| नैनो मिशन कीउपलब्धियोंकोउदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए| उत्तर: नैनो मिशन और प्रौद्योगिकी पहल (एनएसटीआई) के तहत प्रारंभ किये गए प्रोत्साहन गतिविधियों के आधार पर भारत सरकार ने मई, 2017 में नैनो विज्ञान व प्रौद्योगिकी पर मिशन (नैनो मिशन) कार्यक्रम की शुरुआत की। नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी अत्यधिक आशाजनक और प्रतिस्पर्धी क्षेत्र है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग नैनो मिशन को लागू करने के लिए नोडल एजेंसी है। नैनो मिशन के उद्देश्य: यह एक अम्ब्रेला क्षमता निर्माण कार्यक्रम है। मूलभूत अनुसंधान को प्रोत्साहन देना नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान के लिए बुनियादी ढाँचे का विकास नैनो अनुप्रयोग और प्रौद्योगिकी विकास कार्यक्रम मानव संसाधन विकास अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: उत्कृष्टता के संयुक्त केंद्र स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक-उद्योग भागीदारी को प्रोत्साहित करने की भी योजना बनाई गई है। नैनो मिशन की उपलब्धियां: हाल ही में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्तशासी संस्थान, नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) के वैज्ञानिकों ने मिरगीरोधी दवा ‘रुफिनामाइड‘ के उत्पादन के लिए एक नैनो प्रौद्योगिकी आधारित, उद्योग अनुकूल किफायती पद्धति विकसित की है। सेंसर (स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा आदि) का विकास कार्बनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण कम्प्यूटेशनल नैनोइलेक्ट्रॉनिक का विकास उपकरणों / उत्पादों की एक श्रृंखला के लिए प्रोटोटाइप और ऊष्मायन सुविधाएं स्थापित करना| अवसंरचना, मानव संसाधनों तथा नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सीडिंग में डीएसटी की कई नैनो प्रौद्योगिकी पहलें अब धीरे-धीरे अधिक उपयोगी प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों का उत्पादन कर रही हैं जो आत्म निर्भर भारत को योगदान दे रहे हैं।
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##Question:नैनो मिशन कार्यक्रम के उद्देश्यों की चर्चा कीजिए| साथ ही, भारत में नैनो प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुए विकास को उदाहरण सहित वर्णन कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the objectives of the Nano Mission Program. Also, Describe, with suitable examples, the development in the field of nanotechnology in India. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका मेंनैनो मिशन कार्यक्रम से संबंधित जानकारी दीजिए| नैनो मिशन कार्यक्रम के उद्देश्यों को रेखांकित कीजिए| नैनो मिशन कीउपलब्धियोंकोउदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए| उत्तर: नैनो मिशन और प्रौद्योगिकी पहल (एनएसटीआई) के तहत प्रारंभ किये गए प्रोत्साहन गतिविधियों के आधार पर भारत सरकार ने मई, 2017 में नैनो विज्ञान व प्रौद्योगिकी पर मिशन (नैनो मिशन) कार्यक्रम की शुरुआत की। नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी अत्यधिक आशाजनक और प्रतिस्पर्धी क्षेत्र है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग नैनो मिशन को लागू करने के लिए नोडल एजेंसी है। नैनो मिशन के उद्देश्य: यह एक अम्ब्रेला क्षमता निर्माण कार्यक्रम है। मूलभूत अनुसंधान को प्रोत्साहन देना नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान के लिए बुनियादी ढाँचे का विकास नैनो अनुप्रयोग और प्रौद्योगिकी विकास कार्यक्रम मानव संसाधन विकास अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: उत्कृष्टता के संयुक्त केंद्र स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक-उद्योग भागीदारी को प्रोत्साहित करने की भी योजना बनाई गई है। नैनो मिशन की उपलब्धियां: हाल ही में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्तशासी संस्थान, नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) के वैज्ञानिकों ने मिरगीरोधी दवा ‘रुफिनामाइड‘ के उत्पादन के लिए एक नैनो प्रौद्योगिकी आधारित, उद्योग अनुकूल किफायती पद्धति विकसित की है। सेंसर (स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा आदि) का विकास कार्बनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण कम्प्यूटेशनल नैनोइलेक्ट्रॉनिक का विकास उपकरणों / उत्पादों की एक श्रृंखला के लिए प्रोटोटाइप और ऊष्मायन सुविधाएं स्थापित करना| अवसंरचना, मानव संसाधनों तथा नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सीडिंग में डीएसटी की कई नैनो प्रौद्योगिकी पहलें अब धीरे-धीरे अधिक उपयोगी प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों का उत्पादन कर रही हैं जो आत्म निर्भर भारत को योगदान दे रहे हैं।
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भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए की गई महत्वपूर्ण पहलों की चर्चा कीजिए| वन्यजीवों के संरक्षण में किन चुनौतियों का सामना किया जा रहा है? चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the important initiatives taken for the conservation of wildlife in India. What are the challenges being faced in conservation of wildlife? Discuss. (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका मेंवन्यजीवों के संरक्षण के प्रयासों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख कर सकते हैं| प्रथमभाग मेंभारत में वन्यजीवों के संरक्षणहेतु किये जा रहेप्रयासों की चर्चा कीजिए| उत्तर के द्वितीय भाग मेंवन्यजीवों के संरक्षण में सामना की जा रहीचुनौतियों की चर्चा कीजिए| सुझावात्मक संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: स्वतंत्रता उपरांत 1952 में, भारतीय वन्यजीव बोर्ड का गठन भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रासंगिक सभी नियमों और विनियमों को केंद्रीयकृत करने के लिए किया गया था, जोकि तब तक एक राज्य से दूसरे राज्य मेंभिन्न-भिन्नथा। 1956 में, इस बोर्ड ने एकऐतिहासिक निर्णयपारित किया जिसने सभी मौजूदा गेम पार्कों को एक अभयारण्य या एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया। जैव-विविधता संरक्षण: स्व-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों में संरक्षण|उदा.- राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, जीव मंडल रिजर्व, सामुदायिक रिजर्व, सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन आदि| पर-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों के बाहर संरक्षण|उदा.- वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान, हर्बेरियम, बीज बैंक- क्रायो प्रिजर्वेशन, प्रजनन केंद्र आदि| भारत में वन्यजीवों के संरक्षण हेतु प्रयास: वन्यजीव अभ्यारण्य: एक वन्यजीव अभ्यारण्य ऐसा क्षेत्र होता है, जहाँ जीव-जंतुओं के पर्यावास और उनके इर्द-गिर्द के क्षेत्र किसी भी प्रकार के बाह्य गतिविधियों से संरक्षित होते हैं| सीमित मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने का अधिकार प्रदान करता है|साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 500 से अधिक वन्यजीव अभ्यारण्य हैं| राष्ट्रीय उद्यान: संरक्षण उद्देश्यों के लिए राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की जाती है| ये वन्यजीव अभ्यारण्यों के संरक्षण की तुलना में अधिक संरक्षित क्षेत्र होते हैं| इनमे मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होती है| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने का अधिकार भी प्रदान करता है| साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं| जीवमंडल रिजर्व: जीवमंडल रिजर्व यूनेस्को द्वारा प्रदत्त एक अंतर्राष्ट्रीय पदनाम है, जिसमें स्थलीय, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं| एक जीवमंडल रिजर्व को संरक्षण के अनुसार कोर, बफर एवं संक्रमण क्षेत्र में विभाजित किया जाता है| इसकी घोषणा केंद्र सरकार द्वारा की जाती ही| वर्तमान समय में भारत में 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्र हैं जिनमें 11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र: प्रथम बार इसे डाक्टर गाडगिल समिति की रिपोर्ट में इसकी अनुशंषा की गई| इसकी घोषणा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 के अंतर्गत की जाती है| अभ्यारण्य या राष्ट्रीय उद्यान से 10 किमी. तक के क्षेत्र में इसकी घोषणा की जाती है| इसमें-प्रतिबंधित गतिविधियाँ- खनन, प्रदूषणकारी इकाई की स्थापना आदि| विनियमित गतिविधियाँ- होटल, रेस्तरां, बिजली केबल आदि| अनुमत गतिविधियाँ- पारंपरिक कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा आदि| यूनेस्को: मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम, 1971:जीवमंडल रिजर्व का वैश्विक नेटवर्कभारत के 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्रमें से11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| विश्व विरासत संधि-1972: प्राकृतिकमहत्व के विरासतस्थल-काजीरंगा, मानस, सुंदरबन, पश्चिमी घाट, फूलों की घाटी आदि| मिश्रितमहत्व के विरासतस्थल-कंचनजंगा सामुदायिक रिजर्व और संरक्षित रिजर्व: वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत इन दोनों आरक्षित क्षेत्रों को अधिसूचित किया जाता है। यह प्रावधान वन्य जीव सुरक्षा संसोधन - 2002 के अंतर्गत किया गया है । सामुदायिक रिजर्व :दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन्यजीव गलियारे जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्व भी समुदाय या निजी व्यक्ति के पास है तब उसे सामुदायिक रिजर्व घोषित किया जाता है| संरक्षित रिजर्व: दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच का क्षेत्र जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्वकेंद्र सरकारके पास है किन्तु समुदाय उस भूमि का प्रयोग अपनी आजीवका के लिए करता है तब उसेसंरक्षितरिजर्व घोषित किया जाता है| भारतीय वन अधिनियम, 1927: वनों के आर्थिक उपयोग का नियमन काष्ठ एवं गैर-काष्ठ/ लघु वनीय उत्पादमें विभाजित किया जाता है| संशोधन द्वारा बांस को गैर-काष्ठ वनीय उत्पाद में शामिल किया गया है| वन संरक्षण अधिनयम, 1980: वनों का वर्गीकरण वनों के संरक्षण संबंधी प्रावधान वन क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक परियोजनाओं के लिए आरक्षित या अनारक्षित किया जा सकता है| वनीकरण संबंधी प्रावधान वन अधिकार अधिनियम, 2006: अनुसूचित जनजाति एवं वनवासियों को भू-स्वामित्व अधिकार आजीविका का अधिकार वन्यजीवों के संरक्षण में सामना की जा रही चुनौतियां: वन्यजीवों का अवैध व्यापार| मानव-वन्यजीव संघर्ष| खुली सीमाओं का होना जहाँ से वन्यजीवों का अवैध व्यापार होता है| स्वास्थ्य के लिए किए जाने वाले अनुसंधान के आड़ में अवैध व्यापार भी बड़ी चुनौती है क्योंकि कई देशों में अनुसंधान की वैज्ञानिक छूट प्राप्त है और वे इसका दुरुपयोग करते हैं| वन्यजीवों के प्रति लोगों का जागरूक न होना भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि आम लोग इनके महत्व को सही तरीके से नही समझ पाते हैं और अवैध व्यापार में अपना योगदान देते हैं| बढ़ती जनसंख्या के कारण वन आधारित उद्योगों एवं कृषि के विस्तार के लिए किये जाने वाले अतिक्रमण की वजह से वन भूमि पर भारी दबाव है| पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के निर्माण के लिए वन संरक्षण और विकास परियोजना के पथांतरण के बीच बढ़ते संघर्ष वन संसाधनों के प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है| मानव सभ्यता के विकास की धुरी जैव-विविधता मुख्यतः आवास विनाश, आवास विखण्डन, पर्यावरण प्रदूषण, विदेशी मूल के वनस्पतियों के आक्रमण, अतिशोषण, वन्य-जीवों का शिकार, वनविनाश, अति-चराई, बीमारी आदि के कारण खतरे में है। अतः पारिस्थितिक संतुलन, मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एवं प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, भू-स्खलन आदि) से मुक्ति के लिये जैव-विविधता एवं वन्यजीवों का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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##Question:भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए की गई महत्वपूर्ण पहलों की चर्चा कीजिए| वन्यजीवों के संरक्षण में किन चुनौतियों का सामना किया जा रहा है? चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the important initiatives taken for the conservation of wildlife in India. What are the challenges being faced in conservation of wildlife? Discuss. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका मेंवन्यजीवों के संरक्षण के प्रयासों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख कर सकते हैं| प्रथमभाग मेंभारत में वन्यजीवों के संरक्षणहेतु किये जा रहेप्रयासों की चर्चा कीजिए| उत्तर के द्वितीय भाग मेंवन्यजीवों के संरक्षण में सामना की जा रहीचुनौतियों की चर्चा कीजिए| सुझावात्मक संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: स्वतंत्रता उपरांत 1952 में, भारतीय वन्यजीव बोर्ड का गठन भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रासंगिक सभी नियमों और विनियमों को केंद्रीयकृत करने के लिए किया गया था, जोकि तब तक एक राज्य से दूसरे राज्य मेंभिन्न-भिन्नथा। 1956 में, इस बोर्ड ने एकऐतिहासिक निर्णयपारित किया जिसने सभी मौजूदा गेम पार्कों को एक अभयारण्य या एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया। जैव-विविधता संरक्षण: स्व-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों में संरक्षण|उदा.- राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य, जीव मंडल रिजर्व, सामुदायिक रिजर्व, सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन आदि| पर-स्थाने संरक्षण: प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थलों के बाहर संरक्षण|उदा.- वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान, हर्बेरियम, बीज बैंक- क्रायो प्रिजर्वेशन, प्रजनन केंद्र आदि| भारत में वन्यजीवों के संरक्षण हेतु प्रयास: वन्यजीव अभ्यारण्य: एक वन्यजीव अभ्यारण्य ऐसा क्षेत्र होता है, जहाँ जीव-जंतुओं के पर्यावास और उनके इर्द-गिर्द के क्षेत्र किसी भी प्रकार के बाह्य गतिविधियों से संरक्षित होते हैं| सीमित मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने का अधिकार प्रदान करता है|साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 500 से अधिक वन्यजीव अभ्यारण्य हैं| राष्ट्रीय उद्यान: संरक्षण उद्देश्यों के लिए राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की जाती है| ये वन्यजीव अभ्यारण्यों के संरक्षण की तुलना में अधिक संरक्षित क्षेत्र होते हैं| इनमे मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होती है| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राज्य सरकार को कुछ क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने का अधिकार भी प्रदान करता है| साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी घोषणा कर सकती है| भारत में 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं| जीवमंडल रिजर्व: जीवमंडल रिजर्व यूनेस्को द्वारा प्रदत्त एक अंतर्राष्ट्रीय पदनाम है, जिसमें स्थलीय, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं| एक जीवमंडल रिजर्व को संरक्षण के अनुसार कोर, बफर एवं संक्रमण क्षेत्र में विभाजित किया जाता है| इसकी घोषणा केंद्र सरकार द्वारा की जाती ही| वर्तमान समय में भारत में 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्र हैं जिनमें 11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र: प्रथम बार इसे डाक्टर गाडगिल समिति की रिपोर्ट में इसकी अनुशंषा की गई| इसकी घोषणा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 के अंतर्गत की जाती है| अभ्यारण्य या राष्ट्रीय उद्यान से 10 किमी. तक के क्षेत्र में इसकी घोषणा की जाती है| इसमें-प्रतिबंधित गतिविधियाँ- खनन, प्रदूषणकारी इकाई की स्थापना आदि| विनियमित गतिविधियाँ- होटल, रेस्तरां, बिजली केबल आदि| अनुमत गतिविधियाँ- पारंपरिक कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा आदि| यूनेस्को: मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम, 1971:जीवमंडल रिजर्व का वैश्विक नेटवर्कभारत के 18 जीवमंडल रिजर्व क्षेत्रमें से11 यूनेस्को मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम(MAB) के तहत "वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ़ बायोस्फीयर रिजर्व" के अंतर्गत शामिल हैं| विश्व विरासत संधि-1972: प्राकृतिकमहत्व के विरासतस्थल-काजीरंगा, मानस, सुंदरबन, पश्चिमी घाट, फूलों की घाटी आदि| मिश्रितमहत्व के विरासतस्थल-कंचनजंगा सामुदायिक रिजर्व और संरक्षित रिजर्व: वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत इन दोनों आरक्षित क्षेत्रों को अधिसूचित किया जाता है। यह प्रावधान वन्य जीव सुरक्षा संसोधन - 2002 के अंतर्गत किया गया है । सामुदायिक रिजर्व :दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन्यजीव गलियारे जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्व भी समुदाय या निजी व्यक्ति के पास है तब उसे सामुदायिक रिजर्व घोषित किया जाता है| संरक्षित रिजर्व: दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच का क्षेत्र जिसमें एक समुदाय रहता है और भूमि पर स्वामित्वकेंद्र सरकारके पास है किन्तु समुदाय उस भूमि का प्रयोग अपनी आजीवका के लिए करता है तब उसेसंरक्षितरिजर्व घोषित किया जाता है| भारतीय वन अधिनियम, 1927: वनों के आर्थिक उपयोग का नियमन काष्ठ एवं गैर-काष्ठ/ लघु वनीय उत्पादमें विभाजित किया जाता है| संशोधन द्वारा बांस को गैर-काष्ठ वनीय उत्पाद में शामिल किया गया है| वन संरक्षण अधिनयम, 1980: वनों का वर्गीकरण वनों के संरक्षण संबंधी प्रावधान वन क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक परियोजनाओं के लिए आरक्षित या अनारक्षित किया जा सकता है| वनीकरण संबंधी प्रावधान वन अधिकार अधिनियम, 2006: अनुसूचित जनजाति एवं वनवासियों को भू-स्वामित्व अधिकार आजीविका का अधिकार वन्यजीवों के संरक्षण में सामना की जा रही चुनौतियां: वन्यजीवों का अवैध व्यापार| मानव-वन्यजीव संघर्ष| खुली सीमाओं का होना जहाँ से वन्यजीवों का अवैध व्यापार होता है| स्वास्थ्य के लिए किए जाने वाले अनुसंधान के आड़ में अवैध व्यापार भी बड़ी चुनौती है क्योंकि कई देशों में अनुसंधान की वैज्ञानिक छूट प्राप्त है और वे इसका दुरुपयोग करते हैं| वन्यजीवों के प्रति लोगों का जागरूक न होना भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि आम लोग इनके महत्व को सही तरीके से नही समझ पाते हैं और अवैध व्यापार में अपना योगदान देते हैं| बढ़ती जनसंख्या के कारण वन आधारित उद्योगों एवं कृषि के विस्तार के लिए किये जाने वाले अतिक्रमण की वजह से वन भूमि पर भारी दबाव है| पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के निर्माण के लिए वन संरक्षण और विकास परियोजना के पथांतरण के बीच बढ़ते संघर्ष वन संसाधनों के प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है| मानव सभ्यता के विकास की धुरी जैव-विविधता मुख्यतः आवास विनाश, आवास विखण्डन, पर्यावरण प्रदूषण, विदेशी मूल के वनस्पतियों के आक्रमण, अतिशोषण, वन्य-जीवों का शिकार, वनविनाश, अति-चराई, बीमारी आदि के कारण खतरे में है। अतः पारिस्थितिक संतुलन, मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एवं प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, भू-स्खलन आदि) से मुक्ति के लिये जैव-विविधता एवं वन्यजीवों का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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Give a brief account of land revenue collection system undertaken during the Mughals. (150 words/10 marks)
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Approach : Introduce your answer by briefly explaining Land revenue Try to explain the different types of land revenue collection systems undertaken during the Mughals. Conclude the answer Answer : Land Revenue is revenue earned on the agricultural production over the Land. It can be collected on a percentage basis or a fixed amount of the total crop. During the time of the Mughals, it has been an important source of income for emperors and they used different methods for land revenue collection. Different types of land revenue collection systems undertaken during the Mughals : a) Zamindars Intermediary Zamindars - They were responsible for Land revenue collection from bigger units of Land. Primary Zamindars - They are responsible for LR collection at the grassroots. They shared a bond with the peasantry. Territory Zamindars - Local Rajas who co-opted into Mansabdars b) Ijaradari System It implied auctioning of revenue of an area from the highest bidder to the highest bidder. On failure to agree to the appealed amount, this right could be reauctioned. The Ijaradar may pay the revenue in advance and later collect it from the area. Revenue is mainly land revenue but may include taxes on shopkeepers, merchants etc. Therefore under the Ijaradari system land was farmed out to the highest bidder. c) Khalisa Lands It represented royal lands. Land revenue from these lands was the income of emperors. During the time of Aurangzeb 4/5th of the land was part of Zagirdari and 1/5th of the land was Khalisa land. Via Watan Jagirs, a Mansabadar got hereditary rights and autonomy over his Zagir but in return, he gave his loyalty to the kind and Peshkash i.e Fixed annual payment to the King. All this led to ordinary conditions of farmers during the Mughal rule and post-famine they faced serious distress major rebates or help was provided by the Mughal administration.
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##Question:Give a brief account of land revenue collection system undertaken during the Mughals. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce your answer by briefly explaining Land revenue Try to explain the different types of land revenue collection systems undertaken during the Mughals. Conclude the answer Answer : Land Revenue is revenue earned on the agricultural production over the Land. It can be collected on a percentage basis or a fixed amount of the total crop. During the time of the Mughals, it has been an important source of income for emperors and they used different methods for land revenue collection. Different types of land revenue collection systems undertaken during the Mughals : a) Zamindars Intermediary Zamindars - They were responsible for Land revenue collection from bigger units of Land. Primary Zamindars - They are responsible for LR collection at the grassroots. They shared a bond with the peasantry. Territory Zamindars - Local Rajas who co-opted into Mansabdars b) Ijaradari System It implied auctioning of revenue of an area from the highest bidder to the highest bidder. On failure to agree to the appealed amount, this right could be reauctioned. The Ijaradar may pay the revenue in advance and later collect it from the area. Revenue is mainly land revenue but may include taxes on shopkeepers, merchants etc. Therefore under the Ijaradari system land was farmed out to the highest bidder. c) Khalisa Lands It represented royal lands. Land revenue from these lands was the income of emperors. During the time of Aurangzeb 4/5th of the land was part of Zagirdari and 1/5th of the land was Khalisa land. Via Watan Jagirs, a Mansabadar got hereditary rights and autonomy over his Zagir but in return, he gave his loyalty to the kind and Peshkash i.e Fixed annual payment to the King. All this led to ordinary conditions of farmers during the Mughal rule and post-famine they faced serious distress major rebates or help was provided by the Mughal administration.
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Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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##Question:Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)##Answer:Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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##Question:Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)##Answer:Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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##Question:Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)##Answer:Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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##Question:Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)##Answer:Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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##Question:Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)##Answer:Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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##Question:Terrorism is emerging as a competitive industry over the last few decades. Analyse the above statement.(10 marks/150 words)##Answer:Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups The initial terror groups were free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a vital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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Approach-: Introduction of terrorism and how it is becoming a competitive industry Reasons for the industry to become competitive Measures to curb this menace Wayforward Answer: Terrorism can be defined as, “ Calculated use of violence or threat of violence to inculcate fear to intimidate or coerce government or societies to generally pursue the goals which are generally, political, religious or ideological”. Global terrorism has become the biggest threat in the present times. In recent years many new terrorist organizations have emerged like ISIS, Boko haram. This implies that groups are trying to distinguish from each other through the higher aggravated forms of violence and larger disastrous impacts. The objective is to make themselves heard and attract a large number of youths to their agenda by outdoing each other through high-intensity violent acts. That is in competition to get over the control of the natural resources, networks of human and drug trafficking, drug cartels, cultivation of opium and arms dealing, etc. Some of the reasons for terrorism becoming a competitive industry are-: Fear of losing power- Terrorism provides individuals and groups to gather power and influence and rule over territories like legitimate government. They develop the ability to control activities in a region, which will act as a motivator for getting competitive. If they fail to evolve competitively, they fear losing their territory and power. Religious - Wrong interpretation of religious texts and ideology of extremism to achieve their political gains Technology enhancements - Modern use of weapons and research, growth of new technologies this is also leading to an increase in competition. The emergence of new groups- The initial terror groups was free from competition due to a lack of opposition. But in recent times terrorism has become popular and a large number of splinter groups have emerged out that threaten to occupy the void created due to the failure of existing terror groups. This competition has kept the existing terror groups to keep evolving Social media influence - The various groups have deployed different channels, like WhatsApp, Facebook to circulate their agenda and lure the youth into the traps. ISIS is famous for this, which also sets a precedent for other terrorist organizations to find new ways to recruits, new people, into their program. Measures to curb this growing terrorism industry are-: Better coordination between different nations and organizations about sharing information and knowledge of counter-terrorist activities. Capacity building of the security forces, with the integration of AI and keeping a track of the cyber activities and real-time analysis of the data generated over the internet. Stricter enforcement of law and order, with the usage of modern techniques, is necessary to maintain peace and order. Developing social infrastructure, better education, and health facilities in tribal, underdeveloped, and backward areas, generating employment opportunities can play a ital role in the curbing of this menace. Wayforward To tackle the menace of terrorism, a multi-pronged approach is needed. In this context, socio-economic development is a priority so that vulnerable sections of society do not fall prey to the propaganda of terrorists promising them wealth and equity; and the administration, particularly the service delivery mechanisms need to be responsive to the legitimate and long-standing grievances of people so that these are redressed promptly and cannot be exploited by terrorist groups.
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वर्ष 1992 में रियो में संपन्न पृथ्वी सम्मलेन की उपलब्धियों एवं उनके महत्त्व पर चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the achievements and importance of the Earth Conference held in Rio in the year 1992. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में रियो पृथ्वी सम्मलेन के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- मुख्य भाग में रियो पृथ्वी सम्मलेन की उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा कीजिये 3- अंतिम में सम्मलेन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी देशों और नव स्वतंत्र अथवा विउपनिवेशीकृत देशों में तीव्र औद्योगिक विकास का माडल अपनाया गया| इससे जहाँ एक ओर संसाधनों का अतिदोहन शुरू हुआ तो दूसरी ओर प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन की समस्या ने विश्व का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर आकर्षित किया| पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रथम प्रयास वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में हुआ था| इसके 20 वर्षों के बाद वर्ष 1992 में पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन "पृथ्वी सम्मेलन" के नाम से जाना जाता है।पृथ्वी सम्मेलन ब्राजील की राजधानी रिओ डि जेनेरियों में3 जून1992से14 जून1992 तक चला इसीलिए यह सम्मेलन रिओ सम्मेलन के रूप में प्रसिद्ध हैं | इस सम्मलेन में विश्व के 182 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।| पृथ्वी सम्मेलन में विश्व को प्रदूषण से बचाने के लिए वित्तीय प्रबन्ध, प्रदूषण एवं पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में तकनीक अन्तरण, वनों का धारणीय प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में संस्थागत प्रबन्ध, जैव विविधता का संरक्षण एवं सतत् विकास आदि विषयों पर विचार किया गया था| इस सम्मलेन द्वारा पर्यावरण के समग्र संरक्षण के संदर्भ में विभिन्न प्रयास किये गए| पृथ्वी सम्मलेन में प्रस्तुत किये गए उपाय रिओ घोषणा रिओ घोषणा या पृथ्वी चार्टर को अपनाया जाना पृथ्वी सम्मेलन की महान उपलब्धि हैं। इस घोषणा पर 182 देशों द्वारा हस्ताक्षर किये गये। इस घोषणा में 27 सिद्धान्त हैं। यह घोषणा भविष्य में विश्व के धारणीय विकास के लिए निर्देशक सिद्धांतों और निर्देशों का समुच्चय है| यह घोषणा औद्योगिक देशों के उत्तरदायित्वों और विकासशील देशों की विकासात्मक आवश्यकताओं के मध्य एक समझौता थी। इस घोषणा में प्रदूषक द्वारा भुगतान की संकल्पना प्रस्तुत की गयी है| एजेण्डा 21 रिओ सम्मलेन में अपनाया गया एजेण्डा 21 एक अन्तर्राष्ट्रीय दस्तावेज है| इसे 21वीं सदी में धारणीय विकास के लिए होने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की रणनीति के सन्दर्भ में अपनाया गया है| इसे सम्मेलन के 182 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया है| यह एजेण्डा गरीबी उन्मूलन, संसाधन का धारणीय उपभोग , स्वास्थ्य, वित्तीय संसाधनों का एकत्रण एवं वितरण, पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी तकनीकों का विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आदि विषयों पर बल दिया गया है| यद्यपि यह एजेण्डा बाध्यकारी नहीं है, तथापि देशों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रमों को एजेण्डा 21 को ध्यान में रखकर बनाने का प्रयास करेंगे| संस्थागत उपलब्धियां रिओ सम्मलेन में निरंतर होते जलवायु परिवर्तन की समस्या को ध्यान में रखते हुये संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) नामक संधि की गयी| यह संधि ग्रीन हाउस गैसों के निष्कासन और गहनता को धारणीय स्तर पर बनाये रखने और उस पर नियंत्रण के संदर्भ में की गयी थी| इसी सम्मलेन में जैव विविधता संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता अभिसमय(CBD) को स्थापित किया गया| यह एक बहुपक्षीय संधि है| इस अभिसमय का उद्देश्य जैव-विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का धारणीय उपयोग और जैविक संसाधनों से प्राप्त लाभों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना है| इनके अतिरिक्त निरंतर होते वन ह्रास को देखते हुए रिओ सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र वन घोषणापत्र को जारी किया गया था| इसका उद्देश्य न केवल वन ह्रास को रोकना था बल्कि वनों की पुनर्स्थापना और वनों का धारणीय उपयोग सुनिश्चित करना है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 1992 में संपन्न रिओ पृथ्वी सम्मलेन ने जलवायु, पर्यावरण, जैव-विविधता, और धारणीय विकास के संदर्भ में बहुविध उपाय प्रस्तुत किये थे| इसी सम्मलेन द्वारा प्रस्तुत आधार पर क्योटो प्रोटोकाल, नागोया प्रोटोकाल, धारणीय विकास लक्ष्य आदि बाध्यकारी समझौतों और संकल्पनाओं का विकास हुआ है|
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##Question:वर्ष 1992 में रियो में संपन्न पृथ्वी सम्मलेन की उपलब्धियों एवं उनके महत्त्व पर चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the achievements and importance of the Earth Conference held in Rio in the year 1992. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में रियो पृथ्वी सम्मलेन के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- मुख्य भाग में रियो पृथ्वी सम्मलेन की उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा कीजिये 3- अंतिम में सम्मलेन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी देशों और नव स्वतंत्र अथवा विउपनिवेशीकृत देशों में तीव्र औद्योगिक विकास का माडल अपनाया गया| इससे जहाँ एक ओर संसाधनों का अतिदोहन शुरू हुआ तो दूसरी ओर प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन की समस्या ने विश्व का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर आकर्षित किया| पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रथम प्रयास वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में हुआ था| इसके 20 वर्षों के बाद वर्ष 1992 में पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन "पृथ्वी सम्मेलन" के नाम से जाना जाता है।पृथ्वी सम्मेलन ब्राजील की राजधानी रिओ डि जेनेरियों में3 जून1992से14 जून1992 तक चला इसीलिए यह सम्मेलन रिओ सम्मेलन के रूप में प्रसिद्ध हैं | इस सम्मलेन में विश्व के 182 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।| पृथ्वी सम्मेलन में विश्व को प्रदूषण से बचाने के लिए वित्तीय प्रबन्ध, प्रदूषण एवं पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में तकनीक अन्तरण, वनों का धारणीय प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में संस्थागत प्रबन्ध, जैव विविधता का संरक्षण एवं सतत् विकास आदि विषयों पर विचार किया गया था| इस सम्मलेन द्वारा पर्यावरण के समग्र संरक्षण के संदर्भ में विभिन्न प्रयास किये गए| पृथ्वी सम्मलेन में प्रस्तुत किये गए उपाय रिओ घोषणा रिओ घोषणा या पृथ्वी चार्टर को अपनाया जाना पृथ्वी सम्मेलन की महान उपलब्धि हैं। इस घोषणा पर 182 देशों द्वारा हस्ताक्षर किये गये। इस घोषणा में 27 सिद्धान्त हैं। यह घोषणा भविष्य में विश्व के धारणीय विकास के लिए निर्देशक सिद्धांतों और निर्देशों का समुच्चय है| यह घोषणा औद्योगिक देशों के उत्तरदायित्वों और विकासशील देशों की विकासात्मक आवश्यकताओं के मध्य एक समझौता थी। इस घोषणा में प्रदूषक द्वारा भुगतान की संकल्पना प्रस्तुत की गयी है| एजेण्डा 21 रिओ सम्मलेन में अपनाया गया एजेण्डा 21 एक अन्तर्राष्ट्रीय दस्तावेज है| इसे 21वीं सदी में धारणीय विकास के लिए होने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की रणनीति के सन्दर्भ में अपनाया गया है| इसे सम्मेलन के 182 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया है| यह एजेण्डा गरीबी उन्मूलन, संसाधन का धारणीय उपभोग , स्वास्थ्य, वित्तीय संसाधनों का एकत्रण एवं वितरण, पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी तकनीकों का विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आदि विषयों पर बल दिया गया है| यद्यपि यह एजेण्डा बाध्यकारी नहीं है, तथापि देशों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रमों को एजेण्डा 21 को ध्यान में रखकर बनाने का प्रयास करेंगे| संस्थागत उपलब्धियां रिओ सम्मलेन में निरंतर होते जलवायु परिवर्तन की समस्या को ध्यान में रखते हुये संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) नामक संधि की गयी| यह संधि ग्रीन हाउस गैसों के निष्कासन और गहनता को धारणीय स्तर पर बनाये रखने और उस पर नियंत्रण के संदर्भ में की गयी थी| इसी सम्मलेन में जैव विविधता संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता अभिसमय(CBD) को स्थापित किया गया| यह एक बहुपक्षीय संधि है| इस अभिसमय का उद्देश्य जैव-विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का धारणीय उपयोग और जैविक संसाधनों से प्राप्त लाभों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना है| इनके अतिरिक्त निरंतर होते वन ह्रास को देखते हुए रिओ सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र वन घोषणापत्र को जारी किया गया था| इसका उद्देश्य न केवल वन ह्रास को रोकना था बल्कि वनों की पुनर्स्थापना और वनों का धारणीय उपयोग सुनिश्चित करना है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 1992 में संपन्न रिओ पृथ्वी सम्मलेन ने जलवायु, पर्यावरण, जैव-विविधता, और धारणीय विकास के संदर्भ में बहुविध उपाय प्रस्तुत किये थे| इसी सम्मलेन द्वारा प्रस्तुत आधार पर क्योटो प्रोटोकाल, नागोया प्रोटोकाल, धारणीय विकास लक्ष्य आदि बाध्यकारी समझौतों और संकल्पनाओं का विकास हुआ है|
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वायु प्रदूषण के परिणाम के रूप में स्माग, अम्ल वर्षा एवं ब्राउन क्लाउड को परिभाषित करते हुए वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य, वनस्पतियों एवं वातावरण पर प्रभाव स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Defining smog, acid rain and brown cloud as a result of air pollution, explain the effect of air pollution on human health, flora and environment (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण- 1- भूमिका में वायु को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग मेंस्माग, अम्ल वर्षा एवं ब्राउन क्लाउड को परिभाषित कीजिये 3- दूसरे भाग मेंवायु के प्रमुख दुष्प्रभावों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में वायु प्रदुषण पर नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न पर्यावरण(वायु, जल एवं मृदा) के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशाओं में अवांछनीय परिवर्तन को कहते हैं| वायु का अर्थ होता है वायु में अनावश्यक रूप से कुछ तत्वों के मिल जाने से वायु का प्रदूषित हो जाना| जब किसी भी तरह के हानिकारक पदार्थ जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे गैसीय प्रदूषक, धूल कण, PM 2.5, PM 10 जैसे कणिकीय पदार्थ, विभिन्न रसायन, सूक्ष्म पदार्थ या फिर जैविक पदार्थ वातावरण में मिलते हैं तो वायु होता है| वायु मानव और और पर्यावरण पर अनेक प्रभाव उत्पन्न करता है| अम्ल वर्षा वायु प्रदुषण का सबसे घातक प्रभाव अम्ल वर्षा के रूप में देखा जाता है| अम्ल वर्षा वायु में सल्फर डाईऑक्साइड एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड के मिश्रण के कारण होती है| इसमें जल का PH 3 से 4 के मध्य हो जाता है इससे पारितंत्र की उत्पादकता में कमी आती है, मृदा के अमलीकरण से कृषि पर प्रभाव पड़ता है नाइट्रोजन स्थिरिकारक जीवाणु निष्क्रिय हो जाते है और चूना पत्थर से बने भवन पीले हो जाते हैं| वायुमंडलीय भूरा बादल (ब्राउन क्लाउड) ब्राउन क्लाउड; एरोसोल, ब्लैक कार्बन(जीव भार के अपूर्ण दहन से निकलने वाली कालिख/सूट) तथा ग्रीन हॉउस गैस के द्वारा वायुमंडल में बनता है| ब्लैक कार्बन को अल्पावधिक जलवायु प्रदूषक कहा जाता है| ब्राउन क्लाउड के हॉट स्पॉट दक्षिण एशिया, अमेजन बेसिन, मध्य अफ़्रीकी देशों में देखे गए हैं, ब्राउन क्लाउड से सौर ऊर्जा/प्रकाश पृथ्वी तक कम पहुच पायेगा( dimming) इससे मानसून पर प्रभाव पडेगा और वर्षा में कमी आएगी जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी इससे वायुमंडलीय तापन बढेगा जिससे हिमालयी हिमनद पिघलने लगेंगे जिससे गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, चीन की नदियाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न करेंगी स्मोग (धुंध/कोहरा) यह दो प्रकार का होता है सर्दियों के समय में धुंध होता है| इसमें धुंआ और कोहरा मिश्रित हो जाते हैं जैसे लन्दन स्मोग का उदाहरण, दिल्ली का प्रदूषण गर्मियों में जो स्मोग होता है उसे प्रकाश रासायनिक स्मोग कहा जाता है| इससे धरातलीय ओजोन एवंपरऑक्सीएसाटायल नाइट्रेट (PAN) का निर्माण होता है परऑक्सीएसाटायल नाइट्रेट (PAN) एरोसोल के रूप में धुंध बनाता है उदाहरण के रूप में लॉसएंजलिस धुंध वायु के दुष्प्रभाव स्वास्थ्य पर प्रभाव वायु मानव में विभिन्न बीमारियों के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण होता है| अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सिलिकोसिस, एस्बेस्टोसिस, ब्लैक लंग डिसीज, कैंसर जैसी बीमारियों का कारण मुख्यतः वायु ही होता है| वनों एवं वनस्पतियों पर प्रभाव पौधो में नेक्रोसिस(पत्तियों का पीला हो जाना) का प्रमुख कारण वायु प्रदूषण होता है वायु से वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया मंद हो जाती है| वातावरण पर प्रभाव वायु प्रदुषण ओजोन परत का क्षरण करने वाले कारकों का वाहक होता है, इसी प्रकार वायु से ग्रीन हरित प्रभाव उत्पन्न होता है एवं जलवायु परिवर्तन की संभावना बढती है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि वायु प्रदुषण मनुष्य एवं उसके पर्यावरण के लिए गंभीर प्रभाव उत्पन्न करता है| वायु प्रदुषण के नकारात्मक प्रभावों एवं उनकी प्रभावशीलता को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किये गए हैं| वायु प्रदुषण पर नियंत्रण के लिए जन जागरूकता को बढाना, अधिकाधिक वन रोपण, धारणीय विकास को अपनाना आदि उपायों पर भी कार्य किये जाने की आवश्यकता है|
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##Question:वायु प्रदूषण के परिणाम के रूप में स्माग, अम्ल वर्षा एवं ब्राउन क्लाउड को परिभाषित करते हुए वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य, वनस्पतियों एवं वातावरण पर प्रभाव स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Defining smog, acid rain and brown cloud as a result of air pollution, explain the effect of air pollution on human health, flora and environment (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में वायु को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग मेंस्माग, अम्ल वर्षा एवं ब्राउन क्लाउड को परिभाषित कीजिये 3- दूसरे भाग मेंवायु के प्रमुख दुष्प्रभावों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में वायु प्रदुषण पर नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न पर्यावरण(वायु, जल एवं मृदा) के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशाओं में अवांछनीय परिवर्तन को कहते हैं| वायु का अर्थ होता है वायु में अनावश्यक रूप से कुछ तत्वों के मिल जाने से वायु का प्रदूषित हो जाना| जब किसी भी तरह के हानिकारक पदार्थ जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे गैसीय प्रदूषक, धूल कण, PM 2.5, PM 10 जैसे कणिकीय पदार्थ, विभिन्न रसायन, सूक्ष्म पदार्थ या फिर जैविक पदार्थ वातावरण में मिलते हैं तो वायु होता है| वायु मानव और और पर्यावरण पर अनेक प्रभाव उत्पन्न करता है| अम्ल वर्षा वायु प्रदुषण का सबसे घातक प्रभाव अम्ल वर्षा के रूप में देखा जाता है| अम्ल वर्षा वायु में सल्फर डाईऑक्साइड एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड के मिश्रण के कारण होती है| इसमें जल का PH 3 से 4 के मध्य हो जाता है इससे पारितंत्र की उत्पादकता में कमी आती है, मृदा के अमलीकरण से कृषि पर प्रभाव पड़ता है नाइट्रोजन स्थिरिकारक जीवाणु निष्क्रिय हो जाते है और चूना पत्थर से बने भवन पीले हो जाते हैं| वायुमंडलीय भूरा बादल (ब्राउन क्लाउड) ब्राउन क्लाउड; एरोसोल, ब्लैक कार्बन(जीव भार के अपूर्ण दहन से निकलने वाली कालिख/सूट) तथा ग्रीन हॉउस गैस के द्वारा वायुमंडल में बनता है| ब्लैक कार्बन को अल्पावधिक जलवायु प्रदूषक कहा जाता है| ब्राउन क्लाउड के हॉट स्पॉट दक्षिण एशिया, अमेजन बेसिन, मध्य अफ़्रीकी देशों में देखे गए हैं, ब्राउन क्लाउड से सौर ऊर्जा/प्रकाश पृथ्वी तक कम पहुच पायेगा( dimming) इससे मानसून पर प्रभाव पडेगा और वर्षा में कमी आएगी जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी इससे वायुमंडलीय तापन बढेगा जिससे हिमालयी हिमनद पिघलने लगेंगे जिससे गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, चीन की नदियाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न करेंगी स्मोग (धुंध/कोहरा) यह दो प्रकार का होता है सर्दियों के समय में धुंध होता है| इसमें धुंआ और कोहरा मिश्रित हो जाते हैं जैसे लन्दन स्मोग का उदाहरण, दिल्ली का प्रदूषण गर्मियों में जो स्मोग होता है उसे प्रकाश रासायनिक स्मोग कहा जाता है| इससे धरातलीय ओजोन एवंपरऑक्सीएसाटायल नाइट्रेट (PAN) का निर्माण होता है परऑक्सीएसाटायल नाइट्रेट (PAN) एरोसोल के रूप में धुंध बनाता है उदाहरण के रूप में लॉसएंजलिस धुंध वायु के दुष्प्रभाव स्वास्थ्य पर प्रभाव वायु मानव में विभिन्न बीमारियों के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण होता है| अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सिलिकोसिस, एस्बेस्टोसिस, ब्लैक लंग डिसीज, कैंसर जैसी बीमारियों का कारण मुख्यतः वायु ही होता है| वनों एवं वनस्पतियों पर प्रभाव पौधो में नेक्रोसिस(पत्तियों का पीला हो जाना) का प्रमुख कारण वायु प्रदूषण होता है वायु से वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया मंद हो जाती है| वातावरण पर प्रभाव वायु प्रदुषण ओजोन परत का क्षरण करने वाले कारकों का वाहक होता है, इसी प्रकार वायु से ग्रीन हरित प्रभाव उत्पन्न होता है एवं जलवायु परिवर्तन की संभावना बढती है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि वायु प्रदुषण मनुष्य एवं उसके पर्यावरण के लिए गंभीर प्रभाव उत्पन्न करता है| वायु प्रदुषण के नकारात्मक प्रभावों एवं उनकी प्रभावशीलता को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किये गए हैं| वायु प्रदुषण पर नियंत्रण के लिए जन जागरूकता को बढाना, अधिकाधिक वन रोपण, धारणीय विकास को अपनाना आदि उपायों पर भी कार्य किये जाने की आवश्यकता है|
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सामाजिक सुरक्षा को परिभाषित करते हुए वृद्धजनों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए विविध प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Defining social security, discuss the various efforts made by the Government of India to provide social security to the elderly people. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सामाजिक सुरक्षा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत में वृद्धजनों की स्थिति स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग मेंवृद्धजनों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए विविध प्रयासों की चर्चा कीजिये| 4- अंतिम में वृद्धजनों की सामाजिक सुरक्षा का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सैद्धांतिक रूप से सामाजिक सुरक्षा से आशय उन सभी घटकों के सम्मिलित रूप से है जिसके अंतर्गत समाज या राजव्यवस्था अपने सदस्यों को एक मर्यादित जीवन जीने के संसाधन सुलभ कराती है| सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य उन सभी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष घटकों से है जो व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के साझा जीवन एवं प्रगति के अवसरों को सुनिश्चित करते हों|सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की परिभाषा के अनुसार सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य आवश्यकता आधारित कल्याण के बजाय अधिकार आधारित सशक्तिकरण से है| इस सामाजिक सुरक्षा के निम्नलिखित दो आयाम होते हैं यथासामाजिक न्याय द्वारा सभी के लिए विकास सुनिश्चित करना एवंसदस्यों के बीच परस्पर विश्वास एवं भ्रातृत्व| भारत में वृद्धजन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार वृद्धजनों से तात्पर्य 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों से है| 1961 में वृद्ध जनों की जनसंख्या लगभग 6.2% थी वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार वृद्ध जनों की जनसंख्या 8.6 % है तथा लिंगानुपात 972 है परन्तु 2026 में ये जनसंख्या बढ़ कर 12.4 % के लगभग हो जायेगी, अर्थात वृद्ध जनों की संख्या तेजी से बढ़ी है संविधान के अनुच्छेद 41 में वृद्धजनों हेतु दिशा निर्देश दिए गए हैं जिसके अनुपालन में वृद्ध जनों की सामाजिक सुरक्षा के लिए विविध प्रयास किये गए हैं| वृद्धजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु किए गए प्रयास वृद्धजनों के लिए राष्ट्रीय नीति (NPOP) 1999 में NPOP के रूप में वृद्ध जनों हेतु राष्ट्रीय नीति लायी गयी इस नीति के अंतर्गत आर्थिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, आश्रय तथा सुरक्षा (प्रोटेक्शन) चार लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं इस नीति के अनुसार वृद्धजनों के लिए राष्ट्रीय परिषद का गठन किया गया है जिसमें सरकार, NGO, वृद्धजनों एवं सम्बन्धित हितधारकों द्वारा इस सन्दर्भ में रूपरेखा तय करना है वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन कानून वर्ष 2007 में माता पिता एवं वृद्ध जनों की देखभाल के लिए कानून लाया गया है इसके अंतर्गत माता पिता एवं सम्बन्धित वृद्धजन जिनसे किसी प्रकार की संपत्ति प्राप्त हुई हो, को उचित देखभाल को नैतिक एवं वैधानिक जिम्मेदारी बनाया गया है इसके निर्वहन न करने की स्थिति में दंड का प्रावधान किया गया है साथ ही यह कानून राज्यों को वृद्धाश्रमों को अवसंरचनात्मक रूप से विकसित करने एवं वृद्ध जनों को स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करने की बात भी करता है प्रोजेक्ट बागवान वर्ष 2007 में प्रोजेक्ट बागवान के अंतर्गत रिवर्स मोर्टगेज की प्रक्रिया द्वारा अचल संपत्ति पर वृद्ध जनों को ऋण की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है साथ ही कर में अतिरिक्त लाभ, रेलवे द्वारा यात्रा किराए में छूट, वृद्ध जनों पर किये गए स्वास्थ्य खर्च में कर लाभ आदि का प्रावधान किया गया है वृद्ध जन कल्याण कोष वर्ष 2015 में 3 हजार करोड़ PPF एवं 5 हजार करोड़ EPF की धनराशि, जिसे बैंकों द्वारा लावारिश घोषित किया गया था, को मिला कर वृद्ध जन कल्याण कोष बनाया गया है वृद्धवस्था के संदर्भों का अध्ययन जोरांटोलोजी के अंतर्गत किया जाता है| जिसके अंतर्गत सक्रिय भागीदारी का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है, जिसके अंतर्गत वृद्धजनों को संस्कृति के परिचायक एवं संरक्षक एवं अनुभव के महत्त्व स्रोत के रूप में समाज का एक अति महत्वपूर्ण स्रोत समझा जाता है|अतः वृद्ध जनों के साथ सामाजिक न्याय अपरिहारी है|
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##Question:सामाजिक सुरक्षा को परिभाषित करते हुए वृद्धजनों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए विविध प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Defining social security, discuss the various efforts made by the Government of India to provide social security to the elderly people. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सामाजिक सुरक्षा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत में वृद्धजनों की स्थिति स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग मेंवृद्धजनों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए विविध प्रयासों की चर्चा कीजिये| 4- अंतिम में वृद्धजनों की सामाजिक सुरक्षा का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सैद्धांतिक रूप से सामाजिक सुरक्षा से आशय उन सभी घटकों के सम्मिलित रूप से है जिसके अंतर्गत समाज या राजव्यवस्था अपने सदस्यों को एक मर्यादित जीवन जीने के संसाधन सुलभ कराती है| सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य उन सभी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष घटकों से है जो व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के साझा जीवन एवं प्रगति के अवसरों को सुनिश्चित करते हों|सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की परिभाषा के अनुसार सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य आवश्यकता आधारित कल्याण के बजाय अधिकार आधारित सशक्तिकरण से है| इस सामाजिक सुरक्षा के निम्नलिखित दो आयाम होते हैं यथासामाजिक न्याय द्वारा सभी के लिए विकास सुनिश्चित करना एवंसदस्यों के बीच परस्पर विश्वास एवं भ्रातृत्व| भारत में वृद्धजन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार वृद्धजनों से तात्पर्य 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों से है| 1961 में वृद्ध जनों की जनसंख्या लगभग 6.2% थी वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार वृद्ध जनों की जनसंख्या 8.6 % है तथा लिंगानुपात 972 है परन्तु 2026 में ये जनसंख्या बढ़ कर 12.4 % के लगभग हो जायेगी, अर्थात वृद्ध जनों की संख्या तेजी से बढ़ी है संविधान के अनुच्छेद 41 में वृद्धजनों हेतु दिशा निर्देश दिए गए हैं जिसके अनुपालन में वृद्ध जनों की सामाजिक सुरक्षा के लिए विविध प्रयास किये गए हैं| वृद्धजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु किए गए प्रयास वृद्धजनों के लिए राष्ट्रीय नीति (NPOP) 1999 में NPOP के रूप में वृद्ध जनों हेतु राष्ट्रीय नीति लायी गयी इस नीति के अंतर्गत आर्थिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, आश्रय तथा सुरक्षा (प्रोटेक्शन) चार लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं इस नीति के अनुसार वृद्धजनों के लिए राष्ट्रीय परिषद का गठन किया गया है जिसमें सरकार, NGO, वृद्धजनों एवं सम्बन्धित हितधारकों द्वारा इस सन्दर्भ में रूपरेखा तय करना है वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन कानून वर्ष 2007 में माता पिता एवं वृद्ध जनों की देखभाल के लिए कानून लाया गया है इसके अंतर्गत माता पिता एवं सम्बन्धित वृद्धजन जिनसे किसी प्रकार की संपत्ति प्राप्त हुई हो, को उचित देखभाल को नैतिक एवं वैधानिक जिम्मेदारी बनाया गया है इसके निर्वहन न करने की स्थिति में दंड का प्रावधान किया गया है साथ ही यह कानून राज्यों को वृद्धाश्रमों को अवसंरचनात्मक रूप से विकसित करने एवं वृद्ध जनों को स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करने की बात भी करता है प्रोजेक्ट बागवान वर्ष 2007 में प्रोजेक्ट बागवान के अंतर्गत रिवर्स मोर्टगेज की प्रक्रिया द्वारा अचल संपत्ति पर वृद्ध जनों को ऋण की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है साथ ही कर में अतिरिक्त लाभ, रेलवे द्वारा यात्रा किराए में छूट, वृद्ध जनों पर किये गए स्वास्थ्य खर्च में कर लाभ आदि का प्रावधान किया गया है वृद्ध जन कल्याण कोष वर्ष 2015 में 3 हजार करोड़ PPF एवं 5 हजार करोड़ EPF की धनराशि, जिसे बैंकों द्वारा लावारिश घोषित किया गया था, को मिला कर वृद्ध जन कल्याण कोष बनाया गया है वृद्धवस्था के संदर्भों का अध्ययन जोरांटोलोजी के अंतर्गत किया जाता है| जिसके अंतर्गत सक्रिय भागीदारी का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है, जिसके अंतर्गत वृद्धजनों को संस्कृति के परिचायक एवं संरक्षक एवं अनुभव के महत्त्व स्रोत के रूप में समाज का एक अति महत्वपूर्ण स्रोत समझा जाता है|अतः वृद्ध जनों के साथ सामाजिक न्याय अपरिहारी है|
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गैर सरकारी संगठन (NGO) से आप क्या समझते हैं। भारत में एनजीओ की प्रमुख भूमिका को इंगित करते हुए सामना की जा रही चुनौतियों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by an NGO? Discuss the challenges being faced while pointing out the major role of NGOs in India. (150-200 words / 10 Marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में गैर सरकारी संगठन को परिभाषित कीजिए| प्रथम भाग में भारत में एनजीओ की प्रमुख भूमिका की चर्चा कीजिए| द्वितीय भाग में एनजीओ द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों की चर्चा कीजिये। संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: यह निजी व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिसके विशिष्ट सामाजिक सिद्धांत होते हैं। यह निर्धारित किए गए विकासात्मक क्षेत्र के लिए विशिष्ट प्रक्रिया का निर्धारण करते हैं। अनिवार्यत: इनका लक्ष्य सामाजिक विकास होता है। इनका लक्ष्य सामाजिक रूप से वंचित लोगों का सशक्तिकरण होता है एवं एनजीओ के लिए अनिवार्य है कि वह किसी भी राजनैतिक दल से सहबद्ध ना हो। एनजीओ की प्रमुख भूमिका: एनजीओ गैर लाभकारी संगठन हैं जो सामाजिक समस्याओ और जरूरतों के आधार पर जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं। जनता की चिंताओं को आवाज देते हैं। एनजीओ सरकार की गतिविधियों में सुधार को प्रोत्साहित करते हैं और संकीर्ण सांप्रदायिक हितों की बजाय नागरिकों के प्रति सरकार को उत्तरदायी बनाते हैं। क्षेत्रीय निवासियों की भागीदारी के माध्यम से दूर दराज क्षेत्रों तक सेवाओं की डिलिवरी करते हैं। एनजीओ रचनात्मक क्षेत्रों में सरकार का सहयोग करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रैक 2 डिप्लोमेसी को व्यावहारिकता प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2019 में WEF ने बढ़ रहे साइबर क्राइम को रोकने के लिए विश्व के सभ्य राष्ट्रों को मंच प्रदान किया। अनेक एनजीओ भारत के विविध संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए काम करते हैं। उदाहरण के लिए स्पाइस मेसी विश्व के युवाओं को भारतीय शास्त्रीय संगीत से अवगत कराने में भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग करता हैं। उदाहरण के लिए सूचना के अधिकार को व्यापक बनाने में नागरिक समाज का महत्वपूर्ण योगदान है। पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, वन्य जीवों की सुरक्षा और संधारणीय विकास के प्रोत्साहन में एनजीओ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस क्षेत्र में ग्रीन पीस WWF व वर्ल्ड लाइफ इंटरनेशनल जैसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। NGO के समक्ष चुनौतियाँ: भारत में NGO के पास पर्याप्त निधि का अभाव है। जिससे उन्हें अपने दायित्वों के निर्वहन में असुविधा होती है। वर्ष 2020 में FCRA कानून में हुए संशोधन में इस जटिलता को और बढ़ा दिया है। NGO के तहत कार्यरत कर्मियों के प्रशिक्षण की उपयुक्त व्यवस्था का अभाव है। देश के अधिकतर NGO को जुटाई गई धनराशि के दुरुपयोग एवं हेराफेरी के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ता है। भारत में अधिकतर NGO शहरी क्षेत्रों में पनपे हैं। अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों के अभावग्रस्त नागरिक गैर सरकारी संगठनों के कार्यों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। विद्यमान बेरोजगारी युवाओ को सेवा भाव से दूर ले जाती है। परिणामत: NGO को हमेशा कर्मियों के अभाव का सामना करना पड़ता है। सामाजिक विकास में गैर सरकारी संगठनों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है| वर्तमान में आवश्यकता है कि उपरोक्त चुनौतियों के समाधान हेतु उचित कदम उठाये जाएँ साथ ही गैर सरकारी संगठन भी अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी पूर्वक करें|
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##Question:गैर सरकारी संगठन (NGO) से आप क्या समझते हैं। भारत में एनजीओ की प्रमुख भूमिका को इंगित करते हुए सामना की जा रही चुनौतियों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by an NGO? Discuss the challenges being faced while pointing out the major role of NGOs in India. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में गैर सरकारी संगठन को परिभाषित कीजिए| प्रथम भाग में भारत में एनजीओ की प्रमुख भूमिका की चर्चा कीजिए| द्वितीय भाग में एनजीओ द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों की चर्चा कीजिये। संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: यह निजी व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिसके विशिष्ट सामाजिक सिद्धांत होते हैं। यह निर्धारित किए गए विकासात्मक क्षेत्र के लिए विशिष्ट प्रक्रिया का निर्धारण करते हैं। अनिवार्यत: इनका लक्ष्य सामाजिक विकास होता है। इनका लक्ष्य सामाजिक रूप से वंचित लोगों का सशक्तिकरण होता है एवं एनजीओ के लिए अनिवार्य है कि वह किसी भी राजनैतिक दल से सहबद्ध ना हो। एनजीओ की प्रमुख भूमिका: एनजीओ गैर लाभकारी संगठन हैं जो सामाजिक समस्याओ और जरूरतों के आधार पर जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं। जनता की चिंताओं को आवाज देते हैं। एनजीओ सरकार की गतिविधियों में सुधार को प्रोत्साहित करते हैं और संकीर्ण सांप्रदायिक हितों की बजाय नागरिकों के प्रति सरकार को उत्तरदायी बनाते हैं। क्षेत्रीय निवासियों की भागीदारी के माध्यम से दूर दराज क्षेत्रों तक सेवाओं की डिलिवरी करते हैं। एनजीओ रचनात्मक क्षेत्रों में सरकार का सहयोग करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रैक 2 डिप्लोमेसी को व्यावहारिकता प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2019 में WEF ने बढ़ रहे साइबर क्राइम को रोकने के लिए विश्व के सभ्य राष्ट्रों को मंच प्रदान किया। अनेक एनजीओ भारत के विविध संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए काम करते हैं। उदाहरण के लिए स्पाइस मेसी विश्व के युवाओं को भारतीय शास्त्रीय संगीत से अवगत कराने में भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग करता हैं। उदाहरण के लिए सूचना के अधिकार को व्यापक बनाने में नागरिक समाज का महत्वपूर्ण योगदान है। पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, वन्य जीवों की सुरक्षा और संधारणीय विकास के प्रोत्साहन में एनजीओ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस क्षेत्र में ग्रीन पीस WWF व वर्ल्ड लाइफ इंटरनेशनल जैसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। NGO के समक्ष चुनौतियाँ: भारत में NGO के पास पर्याप्त निधि का अभाव है। जिससे उन्हें अपने दायित्वों के निर्वहन में असुविधा होती है। वर्ष 2020 में FCRA कानून में हुए संशोधन में इस जटिलता को और बढ़ा दिया है। NGO के तहत कार्यरत कर्मियों के प्रशिक्षण की उपयुक्त व्यवस्था का अभाव है। देश के अधिकतर NGO को जुटाई गई धनराशि के दुरुपयोग एवं हेराफेरी के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ता है। भारत में अधिकतर NGO शहरी क्षेत्रों में पनपे हैं। अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों के अभावग्रस्त नागरिक गैर सरकारी संगठनों के कार्यों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। विद्यमान बेरोजगारी युवाओ को सेवा भाव से दूर ले जाती है। परिणामत: NGO को हमेशा कर्मियों के अभाव का सामना करना पड़ता है। सामाजिक विकास में गैर सरकारी संगठनों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है| वर्तमान में आवश्यकता है कि उपरोक्त चुनौतियों के समाधान हेतु उचित कदम उठाये जाएँ साथ ही गैर सरकारी संगठन भी अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी पूर्वक करें|
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Briefly explain the Provincial style of Indo-Islamic architecture. (150 words/ 10 marks)
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Approach: Introduce an answer by referring to the beginning of Indo-Islamic architecture. List different types of Indo-Islamic architecture. Discuss the Provincial style of Indo-Islamic architecture. "Islam came along with the migration of Muslim merchants, traders, the saints, and finally the conquest of Muslim rulers. The early Islamic architectural activity was visible as back as the 8th century in some parts such as Sindh and Gujarat, yet the large-scale building activity began only in the early 13th century by the Turkish state after the Turkish conquest of north India. Although the Mughal architecture of north India is famous, the fascinating richness of Islamic architectural heritage in other parts of the country is not so well known. India has a more beautiful medieval Islamic architectural heritage than any other country. Islamic architecture is characterized by a few visible symbols. One is the arch, which frames the space; the second symbol is the dome, which looms over the skyscape; and the third is the minaret, which pierces the skies. Minarets were actually symbols in the middle of deserts. They represented fire, which was lit atop them to guide travelers. The dome represents the infinite and also the sky. Indo-Islamic architecture is conventionally categorized into the following four categories: • Imperial Style (Delhi Sultanate) • Provincial Style (Mandu, Gujarat, Bengal, and Jaunpur) • Mughal Style (Delhi, Agra, and Lahore) • Deccani Style (Bijapur, Golconda) Provincial Style During Islamic Era in India Bengal School of Architecture Islamic monuments of Bengal are consistent in design as of other regions, with distinguishing features such as the material used & designs execution. Brick was the chief building material with the use of stone being limited largely to pillars for trabeate/Arcuate construction, mainly obtained from demolished temples. The so-called “Bengal” roof with sloping cornices, which originated from the bamboo construction, was adopted by the Muslims, and later it spread widely, even in other regions. Covered brick and glazed tiles were usually pressed into service for decoration. Malwa School of Architecture (MP & Rajasthan) Followed arcuate style majorly with elegant use of arch with pillar and beam; Lofty terraces approached by well-proportioned stairways, The impressive size of buildings, the use of various colored stones & marbles with minor use of bright colored glazed tiles. A minaret is absent in this style Notable Examples are Rani Rupmati pavilion (Mandu), Ashrafi Mahal (Mandu), Hindola Mahal (Mandu), Jahaz Mahal (Mandu) Jaunpur School of Architecture (UP) Developed by Sharqui Dynasty hence also called as sharqui style. It was influenced by the buildings of the Tughlaq period Prominent feature →Huge imposing pro-pylon screens, filling the central and side bays of prayer hall Notable Example is Atalla Masjid (Built during the reign of Shamsuddin Ibrahim) Amongst provincial styles, the architecture of Bengal and Jaunpur is regarded as distinct, while the style of Gujarat was marked with borrowed elements from regional temple traditions such as toranas, lintels in mihrabs, carvings of bell and chain motifs, and carved panels depicting trees, for tombs, mosques, and dargahs. From the seventeenth century onward, bricks were also used for construction and these imparted greater flexibility to the structures. In this phase, there was more reliance on local materials.
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##Question:Briefly explain the Provincial style of Indo-Islamic architecture. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach: Introduce an answer by referring to the beginning of Indo-Islamic architecture. List different types of Indo-Islamic architecture. Discuss the Provincial style of Indo-Islamic architecture. "Islam came along with the migration of Muslim merchants, traders, the saints, and finally the conquest of Muslim rulers. The early Islamic architectural activity was visible as back as the 8th century in some parts such as Sindh and Gujarat, yet the large-scale building activity began only in the early 13th century by the Turkish state after the Turkish conquest of north India. Although the Mughal architecture of north India is famous, the fascinating richness of Islamic architectural heritage in other parts of the country is not so well known. India has a more beautiful medieval Islamic architectural heritage than any other country. Islamic architecture is characterized by a few visible symbols. One is the arch, which frames the space; the second symbol is the dome, which looms over the skyscape; and the third is the minaret, which pierces the skies. Minarets were actually symbols in the middle of deserts. They represented fire, which was lit atop them to guide travelers. The dome represents the infinite and also the sky. Indo-Islamic architecture is conventionally categorized into the following four categories: • Imperial Style (Delhi Sultanate) • Provincial Style (Mandu, Gujarat, Bengal, and Jaunpur) • Mughal Style (Delhi, Agra, and Lahore) • Deccani Style (Bijapur, Golconda) Provincial Style During Islamic Era in India Bengal School of Architecture Islamic monuments of Bengal are consistent in design as of other regions, with distinguishing features such as the material used & designs execution. Brick was the chief building material with the use of stone being limited largely to pillars for trabeate/Arcuate construction, mainly obtained from demolished temples. The so-called “Bengal” roof with sloping cornices, which originated from the bamboo construction, was adopted by the Muslims, and later it spread widely, even in other regions. Covered brick and glazed tiles were usually pressed into service for decoration. Malwa School of Architecture (MP & Rajasthan) Followed arcuate style majorly with elegant use of arch with pillar and beam; Lofty terraces approached by well-proportioned stairways, The impressive size of buildings, the use of various colored stones & marbles with minor use of bright colored glazed tiles. A minaret is absent in this style Notable Examples are Rani Rupmati pavilion (Mandu), Ashrafi Mahal (Mandu), Hindola Mahal (Mandu), Jahaz Mahal (Mandu) Jaunpur School of Architecture (UP) Developed by Sharqui Dynasty hence also called as sharqui style. It was influenced by the buildings of the Tughlaq period Prominent feature →Huge imposing pro-pylon screens, filling the central and side bays of prayer hall Notable Example is Atalla Masjid (Built during the reign of Shamsuddin Ibrahim) Amongst provincial styles, the architecture of Bengal and Jaunpur is regarded as distinct, while the style of Gujarat was marked with borrowed elements from regional temple traditions such as toranas, lintels in mihrabs, carvings of bell and chain motifs, and carved panels depicting trees, for tombs, mosques, and dargahs. From the seventeenth century onward, bricks were also used for construction and these imparted greater flexibility to the structures. In this phase, there was more reliance on local materials.
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पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन(EIA) से आप क्या समझते हैं? भारत में पर्यावरणीय मंजूरी के सन्दर्भ में EIA नियम-2006 की चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by Environmental Impact Assessment (EIA)? Discuss the EIA Rules-2006 with reference to environmental clearance in India. (150-200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण: भूमिका में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को परिभाषित कीजिए| मुख्य भाग में EIA नियम-2006 की चर्चा कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: EIA एक ऐसा साधन है जो पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन में सहायक है| EIA इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि प्रस्तावित विकास प्रक्रियाओं एवं मानवीय प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं और चुनौतियों को जाना जा सके तथा प्राप्त ज्ञान के आधार पर पर्यावरणीय प्रभावों के न्यूनीकरण के लिए सुझाव दिए जा सकें| EIA अनुमति दिए जाने से पूर्व निर्णय निर्माण सुनिश्चित किये जाने में सहायक होता है| EIA के तीन महत्वपूर्ण आयाम हैं यथा; जोखिम की समीक्षा, पर्यावरणीय प्रबंधन, प्रबंधन के बाद निगरानी| भारत में EIA प्रक्रिया पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अंतर्गत की जाती है| EIA नियम-2006: ईआईए अधिसूचना सभी प्रकार की विकासात्मक परियोजनाओं को वर्गीकृत करती है। परियोजना के प्रस्तावक / निवेशक को यह पहचानना होगा कि उसकी प्रस्तावित परियोजना किस अनुसूची से संबंधित है। अनुसूची 1 के तहत आने वाली सभी परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता है। अनुसूची 1 में दो श्रेणियां हैं ए और बी, श्रेणी बी को आगे संबंधित राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा बी 1 और बी 2 के रूप में वर्गीकृत किया गया है। पर्यावरण मंजूरी प्राप्त करने के लिए ईआईए अधिसूचना चार चरणों की स्थापना करती है- स्क्रीनिंग स्कोपिंग सार्वजनिक सुनवाई मूल्यांकन स्क्रीनिंग: यह चरण यह तय करता है कि किन परियोजनाओं को पूर्ण या आंशिक मूल्यांकन की आवश्यकता है। स्कोपिंग: यह चरण तय करता है कि किन प्रभावों का आकलन किया जाना आवश्यक है। यह कानूनी आवश्यकताओं, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, विशेषज्ञ ज्ञान और सार्वजनिक सहभागिता के आधार पर किया जाता है। यह चरण वैकल्पिक समाधानों का भी पता लगाता है जो परियोजना के प्रतिकूल प्रभावों को कम करते हैं। सार्वजनिक सुनवाई: स्थानीय लोगों की शिकायतों एवं सुझावों को आमंत्रित करने हेतु| मूल्यांकन: अंतिम EIA रिपोर्ट का चयन कर उसे मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है| ईआईए के आधार पर, एक पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) तैयार की जाती है, जो उन साधनों का विवरण है जिनके द्वारा ईआईए में वर्णित पर्यावरणीय परिणामों को कम किया जाएगा। एक साथ पूरे मसौदे को ईआईए-ईएमपी रिपोर्ट कहा जाता है।
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##Question:पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन(EIA) से आप क्या समझते हैं? भारत में पर्यावरणीय मंजूरी के सन्दर्भ में EIA नियम-2006 की चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by Environmental Impact Assessment (EIA)? Discuss the EIA Rules-2006 with reference to environmental clearance in India. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को परिभाषित कीजिए| मुख्य भाग में EIA नियम-2006 की चर्चा कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: EIA एक ऐसा साधन है जो पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन में सहायक है| EIA इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि प्रस्तावित विकास प्रक्रियाओं एवं मानवीय प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं और चुनौतियों को जाना जा सके तथा प्राप्त ज्ञान के आधार पर पर्यावरणीय प्रभावों के न्यूनीकरण के लिए सुझाव दिए जा सकें| EIA अनुमति दिए जाने से पूर्व निर्णय निर्माण सुनिश्चित किये जाने में सहायक होता है| EIA के तीन महत्वपूर्ण आयाम हैं यथा; जोखिम की समीक्षा, पर्यावरणीय प्रबंधन, प्रबंधन के बाद निगरानी| भारत में EIA प्रक्रिया पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अंतर्गत की जाती है| EIA नियम-2006: ईआईए अधिसूचना सभी प्रकार की विकासात्मक परियोजनाओं को वर्गीकृत करती है। परियोजना के प्रस्तावक / निवेशक को यह पहचानना होगा कि उसकी प्रस्तावित परियोजना किस अनुसूची से संबंधित है। अनुसूची 1 के तहत आने वाली सभी परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता है। अनुसूची 1 में दो श्रेणियां हैं ए और बी, श्रेणी बी को आगे संबंधित राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा बी 1 और बी 2 के रूप में वर्गीकृत किया गया है। पर्यावरण मंजूरी प्राप्त करने के लिए ईआईए अधिसूचना चार चरणों की स्थापना करती है- स्क्रीनिंग स्कोपिंग सार्वजनिक सुनवाई मूल्यांकन स्क्रीनिंग: यह चरण यह तय करता है कि किन परियोजनाओं को पूर्ण या आंशिक मूल्यांकन की आवश्यकता है। स्कोपिंग: यह चरण तय करता है कि किन प्रभावों का आकलन किया जाना आवश्यक है। यह कानूनी आवश्यकताओं, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, विशेषज्ञ ज्ञान और सार्वजनिक सहभागिता के आधार पर किया जाता है। यह चरण वैकल्पिक समाधानों का भी पता लगाता है जो परियोजना के प्रतिकूल प्रभावों को कम करते हैं। सार्वजनिक सुनवाई: स्थानीय लोगों की शिकायतों एवं सुझावों को आमंत्रित करने हेतु| मूल्यांकन: अंतिम EIA रिपोर्ट का चयन कर उसे मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है| ईआईए के आधार पर, एक पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) तैयार की जाती है, जो उन साधनों का विवरण है जिनके द्वारा ईआईए में वर्णित पर्यावरणीय परिणामों को कम किया जाएगा। एक साथ पूरे मसौदे को ईआईए-ईएमपी रिपोर्ट कहा जाता है।
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भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन और प्रशासन तंत्र को सक्रिय करने के लिए अनेक संगठन एवं संस्थाएं सृजित की गई हैं। ऐसी स्थिति में नए-नए संगठनों का निर्माण कहाँ तक तर्कसंगत होगा। कारणों का उल्लेख करते हुए अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Many organizations and institutions have been created to eradicate corruption in India and activate the governance system. In such a situation, how far it would be logical to build new organizations. Confirm your answer citing the reasons. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण: भारत में भ्रष्टाचार की विद्यमान समस्या को संक्षेप में बताकर उत्तर का परिचय लिखिए। भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए किए गए प्रयासों का बिन्दुवार उल्लेख कीजिए। भारत में अभी तक भ्रष्टाचार उन्मूलन में आ रही बाधाओं का उल्लेख कीजिए। अंत में, नए संगठनों के निर्माण की प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर: भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है। CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है। वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है। जबकि डेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है। इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है। भ्रष्टाचार की चुनौती को रोकने हेतु उठाये गये कदम इस प्रकार हैं:- विधिक प्रयास: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत कदम; बेनामी संपति अधिनियम; संथानम समिति के सिफारिशों पर केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर सतर्कता आयोग; केंद्रीय जांच ब्यूरो; सूचना का अधिकार कानून; व्हिसल ब्लोयर एक्ट, 2014; लोकपाल तथा लोकायुक्त; सरकारी कर्मचारियों की आचरण नियमावलियां जैसे- अखिल भारतीय सेवा(आचरण) नियमावली आदि; प्रशासनिक सुधार: ई-अभिशासन जैसे- जाति/आवासीय/आय प्रमाणपत्रों, रेलवे टिकट, पासपोर्ट/डीएल/आधार कार्ड बनवाने में तकनीक का प्रयोग; नागरिक घोषणापत्र लाने का प्रयास; सेवोत्तम मॉडल; आचारसंहिता में बदलाव की कोशिश; लोकसेवकों द्वारा संपति की घोषणा करना; कुछ राज्यों में भ्रष्ट लोकसेवकों द्वारा क्षतिपूर्ति करने का दायित्व तथा भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त की गयी गैर-क़ानूनी संपतियों को जब्त करना जैसे- बिहार तथा ओड़िसा का इस संबंध में कानून; लेकिन उपरोक्त प्रयासों के बावजूद भारत में भ्रष्टाचार की समस्या बनी हुई है। भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन में आ रही बाधाएं इस प्रकार है:- भ्रष्टाचार की प्रकृति आवश्यकता आधारित ना होकर अधिकांशतः लालच या लोभ पर आधारित है। भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए बनाई गई संस्थाओं के कार्यों में अतिव्यापन है। अर्थात भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए अनेक संस्थाएं विद्यमान है। सीपीआई के अनुसार विश्व का कोई भी देश भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। भ्रष्टाचार के संदर्भ में व्यापक जन-जागरूकता की कमी है। यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि एक प्रकार से समाज ने भ्रष्टाचार की मान्यता को स्वीकार कर लिया है। भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु समय के परिवर्तन के साथ जिन संस्थानों का गठन किया गया वह स्वतः भ्रष्टाचार से प्रभावित हो गया। सीबीआई, ईडी जैसी संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव अधिक रहता है। भ्रष्टाचार का प्रवाह निम्न स्तर से ऊपर की ओर और उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर है जो कि भ्रष्टाचार को चुनौती बनाता है। हालांकि भारत ने भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए अनेक संस्थाओं का निर्माण किया है। एक पुरानी संस्था में सुधार करने और उसे अद्यतन बनाने से बेहतर है एक नई संस्था का निर्माण करना। लेकिन इसके साथ ही पुरानी संस्था को समाप्त किया जाना भी आवश्यक है। अन्यथा भ्रष्टाचार उन्मूलक संस्थाओं का एक पहाड़ बन जाएगा और कोई भी संस्था बेहतर ढंग से अपने कार्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाएगी और भ्रष्टाचार उन्मूलन का उद्देश्य परास्त होता प्रतीत होगा। अतः अब समय की मांग है कि संस्थाओं के कार्यों में अतिव्यापन को समाप्त करते हुए एक सशक्त संस्था का निर्माण किया जाना चाहिए। वर्तमान में लोकपाल ऐसी संस्था की भूमिका निभाने में सक्षम एवं योग्य प्रतीत होता है।
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##Question:भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन और प्रशासन तंत्र को सक्रिय करने के लिए अनेक संगठन एवं संस्थाएं सृजित की गई हैं। ऐसी स्थिति में नए-नए संगठनों का निर्माण कहाँ तक तर्कसंगत होगा। कारणों का उल्लेख करते हुए अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Many organizations and institutions have been created to eradicate corruption in India and activate the governance system. In such a situation, how far it would be logical to build new organizations. Confirm your answer citing the reasons. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भारत में भ्रष्टाचार की विद्यमान समस्या को संक्षेप में बताकर उत्तर का परिचय लिखिए। भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए किए गए प्रयासों का बिन्दुवार उल्लेख कीजिए। भारत में अभी तक भ्रष्टाचार उन्मूलन में आ रही बाधाओं का उल्लेख कीजिए। अंत में, नए संगठनों के निर्माण की प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर: भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है। CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है। वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है। जबकि डेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है। इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है। भ्रष्टाचार की चुनौती को रोकने हेतु उठाये गये कदम इस प्रकार हैं:- विधिक प्रयास: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत कदम; बेनामी संपति अधिनियम; संथानम समिति के सिफारिशों पर केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर सतर्कता आयोग; केंद्रीय जांच ब्यूरो; सूचना का अधिकार कानून; व्हिसल ब्लोयर एक्ट, 2014; लोकपाल तथा लोकायुक्त; सरकारी कर्मचारियों की आचरण नियमावलियां जैसे- अखिल भारतीय सेवा(आचरण) नियमावली आदि; प्रशासनिक सुधार: ई-अभिशासन जैसे- जाति/आवासीय/आय प्रमाणपत्रों, रेलवे टिकट, पासपोर्ट/डीएल/आधार कार्ड बनवाने में तकनीक का प्रयोग; नागरिक घोषणापत्र लाने का प्रयास; सेवोत्तम मॉडल; आचारसंहिता में बदलाव की कोशिश; लोकसेवकों द्वारा संपति की घोषणा करना; कुछ राज्यों में भ्रष्ट लोकसेवकों द्वारा क्षतिपूर्ति करने का दायित्व तथा भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त की गयी गैर-क़ानूनी संपतियों को जब्त करना जैसे- बिहार तथा ओड़िसा का इस संबंध में कानून; लेकिन उपरोक्त प्रयासों के बावजूद भारत में भ्रष्टाचार की समस्या बनी हुई है। भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन में आ रही बाधाएं इस प्रकार है:- भ्रष्टाचार की प्रकृति आवश्यकता आधारित ना होकर अधिकांशतः लालच या लोभ पर आधारित है। भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए बनाई गई संस्थाओं के कार्यों में अतिव्यापन है। अर्थात भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए अनेक संस्थाएं विद्यमान है। सीपीआई के अनुसार विश्व का कोई भी देश भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। भ्रष्टाचार के संदर्भ में व्यापक जन-जागरूकता की कमी है। यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि एक प्रकार से समाज ने भ्रष्टाचार की मान्यता को स्वीकार कर लिया है। भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु समय के परिवर्तन के साथ जिन संस्थानों का गठन किया गया वह स्वतः भ्रष्टाचार से प्रभावित हो गया। सीबीआई, ईडी जैसी संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव अधिक रहता है। भ्रष्टाचार का प्रवाह निम्न स्तर से ऊपर की ओर और उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर है जो कि भ्रष्टाचार को चुनौती बनाता है। हालांकि भारत ने भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए अनेक संस्थाओं का निर्माण किया है। एक पुरानी संस्था में सुधार करने और उसे अद्यतन बनाने से बेहतर है एक नई संस्था का निर्माण करना। लेकिन इसके साथ ही पुरानी संस्था को समाप्त किया जाना भी आवश्यक है। अन्यथा भ्रष्टाचार उन्मूलक संस्थाओं का एक पहाड़ बन जाएगा और कोई भी संस्था बेहतर ढंग से अपने कार्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाएगी और भ्रष्टाचार उन्मूलन का उद्देश्य परास्त होता प्रतीत होगा। अतः अब समय की मांग है कि संस्थाओं के कार्यों में अतिव्यापन को समाप्त करते हुए एक सशक्त संस्था का निर्माण किया जाना चाहिए। वर्तमान में लोकपाल ऐसी संस्था की भूमिका निभाने में सक्षम एवं योग्य प्रतीत होता है।
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Sufism on the Indian soil did not represent a novelty and its postulates had been nurtured for long by hermits, ascetics, philosophers, and wanderers? Do you agree with the statement? (10 marks/150 words)
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Approach : Introduction: Briefly mention about the Sufism Body: Write about how it does not represent a novelty and its postulates had been there for long in India . Conclusion: Agree positively with the Statement and conclude appropriately. Answer: Sufism represents a mystical trends in Islam which arose around 1 millenium after the birth of Islam. It came to stand for the purity of conduct and character with simple and moral life as per the Quranic concept of Piety. Though Sufistic trends originated in West Asia and Central Asia but it came in India it was heavily influenced by the Bhakti movement and traditions of hermits, philosophers and wanderers already prevelant in India. This Influence can be seen by the postulates and practices of Sufism which were in the long tradition of Indian philosophical and devotional thought. 1. The ultimate objective in Sufism is to realize the unity of Being which is called Wahadat-ul-Wajood. Through establishment of communion with God (Haq or Reality). This thought was already prevelant in India in the form of Aham Brahm asmi ( Unity of Being). This objective was also propogated by the philosophers like Shankaracharya (Advaitavada) 2. The recitation of name of God incessantly or repeatedly. This trends can be seen from the Rig Vedic times when the emphasis was laid on the recitation of hymns and also in Bhakti movement where devotees recitates the name of the God for example Kirtans popularized by Chaitanya Mahaprabu. 3. Meditation and contemplation related to the nature of God. It was also popular among the Indian ascetics from the times of Upanishads , Sharamana tradition and also form Buddha and Mahavira. 4. Love , Surrender and Devotion. It was the main theme of Bhakti movement in India from the early medieval times and also from the times of Mahayana Buddhism. 5. Services to the Humanity (Khidmat-I-Khalq) like Langar or community services. It was also prevelant from the local tradition like in Jagannath temple and also popularized by the Bhakti saints like Guru Nanak. 6. Simple life with insistence upon poverty. It also included a secluded lifestyle. Such lifestyle was also popularized by ascetics from the time of later Vedic period and also propogated in the 5 vows of the Mahavira. 7. Yoga - It was an Indian practice from the early times and also an school of philosophy in Indian subcontinent. 8. Self Torture and Self Mortification - Mahavira and Buddha and other ascetics had popularized it as a means to acheive ultimate reality. 9. Tantrism - It was also an Indian tradition of mainstream Hinduism and also in Vajrayana Buddhism. Thus it can be said that Sufism was heavily influenced by the traditions, thoughts and practices established in India by philosophers, hermits and wanderers from early times and also those like Bhakti saints who were contemporary of the Sufis.
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##Question:Sufism on the Indian soil did not represent a novelty and its postulates had been nurtured for long by hermits, ascetics, philosophers, and wanderers? Do you agree with the statement? (10 marks/150 words)##Answer:Approach : Introduction: Briefly mention about the Sufism Body: Write about how it does not represent a novelty and its postulates had been there for long in India . Conclusion: Agree positively with the Statement and conclude appropriately. Answer: Sufism represents a mystical trends in Islam which arose around 1 millenium after the birth of Islam. It came to stand for the purity of conduct and character with simple and moral life as per the Quranic concept of Piety. Though Sufistic trends originated in West Asia and Central Asia but it came in India it was heavily influenced by the Bhakti movement and traditions of hermits, philosophers and wanderers already prevelant in India. This Influence can be seen by the postulates and practices of Sufism which were in the long tradition of Indian philosophical and devotional thought. 1. The ultimate objective in Sufism is to realize the unity of Being which is called Wahadat-ul-Wajood. Through establishment of communion with God (Haq or Reality). This thought was already prevelant in India in the form of Aham Brahm asmi ( Unity of Being). This objective was also propogated by the philosophers like Shankaracharya (Advaitavada) 2. The recitation of name of God incessantly or repeatedly. This trends can be seen from the Rig Vedic times when the emphasis was laid on the recitation of hymns and also in Bhakti movement where devotees recitates the name of the God for example Kirtans popularized by Chaitanya Mahaprabu. 3. Meditation and contemplation related to the nature of God. It was also popular among the Indian ascetics from the times of Upanishads , Sharamana tradition and also form Buddha and Mahavira. 4. Love , Surrender and Devotion. It was the main theme of Bhakti movement in India from the early medieval times and also from the times of Mahayana Buddhism. 5. Services to the Humanity (Khidmat-I-Khalq) like Langar or community services. It was also prevelant from the local tradition like in Jagannath temple and also popularized by the Bhakti saints like Guru Nanak. 6. Simple life with insistence upon poverty. It also included a secluded lifestyle. Such lifestyle was also popularized by ascetics from the time of later Vedic period and also propogated in the 5 vows of the Mahavira. 7. Yoga - It was an Indian practice from the early times and also an school of philosophy in Indian subcontinent. 8. Self Torture and Self Mortification - Mahavira and Buddha and other ascetics had popularized it as a means to acheive ultimate reality. 9. Tantrism - It was also an Indian tradition of mainstream Hinduism and also in Vajrayana Buddhism. Thus it can be said that Sufism was heavily influenced by the traditions, thoughts and practices established in India by philosophers, hermits and wanderers from early times and also those like Bhakti saints who were contemporary of the Sufis.
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Probity is an essential condition of good governance. Explain. (150 words/10 marks)
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Approach: Define probity. Briefly discuss the relationship between probity and good governance. Explain how probity is essential for good governance. Conclude suitably. Answer: Probity is the quality of adhering to strong moral principles such as honesty and integrity as well as uprightness, good character, and decency. It is the act of following the highest principles and ideals rather than merely avoiding corrupt or dishonest conduct. It balances service to the community against the self-interest of individuals. Probity and Good Governance Governance is the act and manner of managing the public office. A working paper of the National Commission to Review the Working of the Constitution noted that probity in governance is an essential and vital requirement for an efficient and effective system of governance and for socio-economic development. While the constitution and laws provide a legal framework for governance, probity is part of the ethical framework that determines the nature of governance and the relationship between the government and the governed. Probity is essential for good governance as it: Enhances the credibility of the state apparatus: Since probity is concerned with procedures, processes, and systems rather than outcomes, it ensures the procedural integrity of the institutions. Thus, an efficient and effective system of governance leads to socioeconomic development. Ensures institutional integrity: Probity maintains the ethicality and legality of institutions regardless of the individuals manning them. It involves adopting an ethical and transparent approach, allowing the process to withstand scrutiny. Minimizes individual discretions: Strict adherence to the highest moral standards allows institutions as well as individuals to deal with everyone impartially. Curbs corrupt behaviour: Aspects of probity such as - accountability and transparency - prevents abuse of public resources or position in public life for private gain. Upholds public confidence: Probity in governance preserves public confidence in the government and governmental processes. It eases the way authority is exercised by public officials. The creation of a strong moral framework in governance is essential for good governance. However, procedural probity should not be at the cost of the humane aspect of the administration. To ensure probity in public life, a robust culture of integrity and moral standards need to be cultivated.
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##Question:Probity is an essential condition of good governance. Explain. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: Define probity. Briefly discuss the relationship between probity and good governance. Explain how probity is essential for good governance. Conclude suitably. Answer: Probity is the quality of adhering to strong moral principles such as honesty and integrity as well as uprightness, good character, and decency. It is the act of following the highest principles and ideals rather than merely avoiding corrupt or dishonest conduct. It balances service to the community against the self-interest of individuals. Probity and Good Governance Governance is the act and manner of managing the public office. A working paper of the National Commission to Review the Working of the Constitution noted that probity in governance is an essential and vital requirement for an efficient and effective system of governance and for socio-economic development. While the constitution and laws provide a legal framework for governance, probity is part of the ethical framework that determines the nature of governance and the relationship between the government and the governed. Probity is essential for good governance as it: Enhances the credibility of the state apparatus: Since probity is concerned with procedures, processes, and systems rather than outcomes, it ensures the procedural integrity of the institutions. Thus, an efficient and effective system of governance leads to socioeconomic development. Ensures institutional integrity: Probity maintains the ethicality and legality of institutions regardless of the individuals manning them. It involves adopting an ethical and transparent approach, allowing the process to withstand scrutiny. Minimizes individual discretions: Strict adherence to the highest moral standards allows institutions as well as individuals to deal with everyone impartially. Curbs corrupt behaviour: Aspects of probity such as - accountability and transparency - prevents abuse of public resources or position in public life for private gain. Upholds public confidence: Probity in governance preserves public confidence in the government and governmental processes. It eases the way authority is exercised by public officials. The creation of a strong moral framework in governance is essential for good governance. However, procedural probity should not be at the cost of the humane aspect of the administration. To ensure probity in public life, a robust culture of integrity and moral standards need to be cultivated.
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विधि अनुकूल शासन को स्थापित करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास पर्याप्त नहीं हैं| कथन का विश्लेषण करते हुए इस संदर्भ में अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) The efforts made by the Government of India to establish law-friendly governance are not sufficient. Analyze the statement and give your suggestions in this context. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1-भूमिका में विधि के शासन को परिभाषित कीजिये 2-मुख्य भाग में विधि अनुकूल शासन को स्थापित करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों को सविस्तार स्पष्ट कीजिये 3-दूसरे भाग में उपरोक्त प्रयासों की अपर्याप्तता को स्पष्ट कीजिये 4-अंतिम भाग में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये ऐसा शासन जो विधि के अनुसार, विधि के अधीन एवं मानवीय मूल्यों के अनुरूप एवं उनका संवर्धन करने वाली उच्च विधियों के आधार पर संचालित होता है उसे विधि का शासन कहते हैं|| मानवीय मूल्यों के अनुरूप एवं उनका संवर्धन करने वाली उच्च विधियां, सुशासन की अवधारणा द्वारा प्रस्तुत विशेषता है| विधि के शासन का आशय है विधि के अनुसार शासन, विधि के तहत शासन और उच्च विधियों के अधीन शासन यहाँ उच्च विधि का आशय मानवीय विधियों के अनुसार शासन है| विधि का शासन एक अस्थिर अवधारणा है जो समय और परिस्थितियों के साथ परिवर्तित होती रहती है| विधि अनुकूल शासन को स्थापित करने के लिए भारत सरकार द्वारा अनेक प्रयास किये गए हैं| विधि के शासन को स्थापित करने के लिए सरकार द्वारा उठाये गए कदम हालांकि संविधान को समाज अनुकूल बनाए रखने की व्यवस्था स्वयं संविधान में की गयी है, अनुच्छेद 13 जैसे अनेक उपबंध न्यायपालिका को यह दायित्व सौंपते हैं कि वह संविधान का पुनरीक्षण कर उसे समय अनुकूल बनाने की सिफारिश विधानमंडल को करे वर्ष 2000 में वेंकट चेलैया की अध्यक्षता में एक संविधान समीक्षा आयोग भीगठित किया गया ताकि संवैधानिक उपबन्धों को वर्तमान समाज के अनुकूल बनाया जा सके वर्ष 2014 के पश्चात भारतीय संसद ने पुराने पड़ गए अनेक कानूनों को निरसित किया है नागरिक सेवकों के ऊपर पड़ने वाले राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रभाव को रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार उनकी नियुक्ति को स्थिर करने सबंधी कदम उठाये गए हैं ताकि अप्रासंगिक स्थानान्तरण को रोका जा सके| उल्लेखनीय हैं कि द्वितीय ARC ने यह कहा था की स्थानान्तरण ने आज उद्योग का रूप धारण कर लिया है जिस पर लगाम लगाना न केवल प्रशासन की कुशलता के लिए अनिवार्य है बल्कि भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए भी आवश्यक है| वर्ष 2014 में प्रशासनिक अधिकारियों को सुशासन के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से नागरिक सेवा आचरण संशोधन नियम 2014 पारित कर अनेक नए उपबंध किये गए जो नागरिक सेवकों को सुशासन के अनुकूल बनाते हैं जो निम्नलिखित हैं नागरिक सेवक उच्च नैतिक मानदंडो, अखंडता एवं इमानदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे नागरिक सेवक लोगों के साथ विनम्रतापूर्वका अच्छा व्यवहार करते हुए शिष्टाचार और नैतिकता की रक्षा करेंगे प्रत्येक नागरिक सेवक प्रतिभा निष्पक्षता जवाबदेहिता पारदर्शिता, विधि अनुकूलता और आवश्यक गोपनीयता के साथ दायित्वों का निर्वहन करेंगे प्रत्येक नागरिक सेवक राजनीतिक रूप से तटस्थ रहेगा संविधान एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के अधीन रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करेगा निजी हितों से अलग रहते हुए कुशलता और प्रभाविता के साथ अपने दायित्व का निर्वहन करेगा एक नागरिक सेवक उच्चतम पेशेवर की तरह व्यवहार करेगा प्रयासों की अपर्याप्तता हालांकि भारतीय संविधान कभी सुषुप्त और अप्रासंगिक नहीं हुआ, 1950 से लेकर अब तक विधि के अनुकूल या विधि के अधीन शासन व्यवस्था को संचालित किया गया किन्तु कुछ समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं जो निम्नवत हैं भ्रान्तिमय शासन और उच्च विधियों के निर्माण की कमी महसूस की गयी |भ्रान्तिमय शासन की विद्यमानता और उच्च विधियों के अभाव ने भ्रष्टाचार को निरंतर बनाए रखा है| यहाँ तक कि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व का 80 वां और एशिया का सर्वाधिक भ्रष्ट देश है भ्रष्टाचार उन्मूलन की अनेक विधियों यथा IPC 1860, PCA 1988, प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लांड्रिंग एक्ट 2002, CVC, RTI और लोकपाल एवं लोकायुक्त जैसी संस्थाओं के बावजूद भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाई जा सकी भ्रष्टाचार को नियंत्रित न कर पाने का सबसे बड़ा कारण द्वितीय ARC के अनुसार नैतिकता का अभाव है भारतीय प्रशासन लम्बे समय से पुरानी विधियों के अधीन संचालित किया जा रहा है, ऐसी स्थिति में प्रशासनतंत्र और अधिकारी निरुत्साहित हो जाते हैं क्योंकि उन्हें समाज की मांग और विधि अनुकूल शासन में समन्वय स्थापित करना जटिल हो जाता है पुरानी विधियां वर्तमान आधुनिक और उत्तर आधुनिक समाज में प्रासंगिक साबित नहीं हो पा रही हैं| अतः अन्य प्रयासों को करने की आवश्यकता है| शासनतंत्र के द्वारा उठाये गए उपरोक्त क़दमों के साथ यह आवश्यक है कि विधि निर्माता उच्च विधियों को निर्मित करने के लिए आगे बढ़ें अर्थात ऐसी विधियों का निर्माण किया जाए जो भावी पीढ़ियों के लिए तर्कसंगत साबित करें, मानवाधिकार, पर्यवारण एवं जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए निर्मित की जाएँ साथ ही समाज में विद्यमान विकृतियों को समाप्त करते हुए समरसता को विकसित करें |विधि निर्माण से दलीय हस्तक्षेप को समाप् करना चाहिए |लोकतांत्रिक नौकरशाही को प्रोत्साहित किया जाए विधयों का क्रियान्वयन या निर्णय निर्माण उचित एवं तर्कसंगत हो सके और सुशासन स्थापित किया जा सके|
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##Question:विधि अनुकूल शासन को स्थापित करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास पर्याप्त नहीं हैं| कथन का विश्लेषण करते हुए इस संदर्भ में अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) The efforts made by the Government of India to establish law-friendly governance are not sufficient. Analyze the statement and give your suggestions in this context. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1-भूमिका में विधि के शासन को परिभाषित कीजिये 2-मुख्य भाग में विधि अनुकूल शासन को स्थापित करने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों को सविस्तार स्पष्ट कीजिये 3-दूसरे भाग में उपरोक्त प्रयासों की अपर्याप्तता को स्पष्ट कीजिये 4-अंतिम भाग में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये ऐसा शासन जो विधि के अनुसार, विधि के अधीन एवं मानवीय मूल्यों के अनुरूप एवं उनका संवर्धन करने वाली उच्च विधियों के आधार पर संचालित होता है उसे विधि का शासन कहते हैं|| मानवीय मूल्यों के अनुरूप एवं उनका संवर्धन करने वाली उच्च विधियां, सुशासन की अवधारणा द्वारा प्रस्तुत विशेषता है| विधि के शासन का आशय है विधि के अनुसार शासन, विधि के तहत शासन और उच्च विधियों के अधीन शासन यहाँ उच्च विधि का आशय मानवीय विधियों के अनुसार शासन है| विधि का शासन एक अस्थिर अवधारणा है जो समय और परिस्थितियों के साथ परिवर्तित होती रहती है| विधि अनुकूल शासन को स्थापित करने के लिए भारत सरकार द्वारा अनेक प्रयास किये गए हैं| विधि के शासन को स्थापित करने के लिए सरकार द्वारा उठाये गए कदम हालांकि संविधान को समाज अनुकूल बनाए रखने की व्यवस्था स्वयं संविधान में की गयी है, अनुच्छेद 13 जैसे अनेक उपबंध न्यायपालिका को यह दायित्व सौंपते हैं कि वह संविधान का पुनरीक्षण कर उसे समय अनुकूल बनाने की सिफारिश विधानमंडल को करे वर्ष 2000 में वेंकट चेलैया की अध्यक्षता में एक संविधान समीक्षा आयोग भीगठित किया गया ताकि संवैधानिक उपबन्धों को वर्तमान समाज के अनुकूल बनाया जा सके वर्ष 2014 के पश्चात भारतीय संसद ने पुराने पड़ गए अनेक कानूनों को निरसित किया है नागरिक सेवकों के ऊपर पड़ने वाले राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रभाव को रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार उनकी नियुक्ति को स्थिर करने सबंधी कदम उठाये गए हैं ताकि अप्रासंगिक स्थानान्तरण को रोका जा सके| उल्लेखनीय हैं कि द्वितीय ARC ने यह कहा था की स्थानान्तरण ने आज उद्योग का रूप धारण कर लिया है जिस पर लगाम लगाना न केवल प्रशासन की कुशलता के लिए अनिवार्य है बल्कि भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए भी आवश्यक है| वर्ष 2014 में प्रशासनिक अधिकारियों को सुशासन के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से नागरिक सेवा आचरण संशोधन नियम 2014 पारित कर अनेक नए उपबंध किये गए जो नागरिक सेवकों को सुशासन के अनुकूल बनाते हैं जो निम्नलिखित हैं नागरिक सेवक उच्च नैतिक मानदंडो, अखंडता एवं इमानदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे नागरिक सेवक लोगों के साथ विनम्रतापूर्वका अच्छा व्यवहार करते हुए शिष्टाचार और नैतिकता की रक्षा करेंगे प्रत्येक नागरिक सेवक प्रतिभा निष्पक्षता जवाबदेहिता पारदर्शिता, विधि अनुकूलता और आवश्यक गोपनीयता के साथ दायित्वों का निर्वहन करेंगे प्रत्येक नागरिक सेवक राजनीतिक रूप से तटस्थ रहेगा संविधान एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के अधीन रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करेगा निजी हितों से अलग रहते हुए कुशलता और प्रभाविता के साथ अपने दायित्व का निर्वहन करेगा एक नागरिक सेवक उच्चतम पेशेवर की तरह व्यवहार करेगा प्रयासों की अपर्याप्तता हालांकि भारतीय संविधान कभी सुषुप्त और अप्रासंगिक नहीं हुआ, 1950 से लेकर अब तक विधि के अनुकूल या विधि के अधीन शासन व्यवस्था को संचालित किया गया किन्तु कुछ समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं जो निम्नवत हैं भ्रान्तिमय शासन और उच्च विधियों के निर्माण की कमी महसूस की गयी |भ्रान्तिमय शासन की विद्यमानता और उच्च विधियों के अभाव ने भ्रष्टाचार को निरंतर बनाए रखा है| यहाँ तक कि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व का 80 वां और एशिया का सर्वाधिक भ्रष्ट देश है भ्रष्टाचार उन्मूलन की अनेक विधियों यथा IPC 1860, PCA 1988, प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लांड्रिंग एक्ट 2002, CVC, RTI और लोकपाल एवं लोकायुक्त जैसी संस्थाओं के बावजूद भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाई जा सकी भ्रष्टाचार को नियंत्रित न कर पाने का सबसे बड़ा कारण द्वितीय ARC के अनुसार नैतिकता का अभाव है भारतीय प्रशासन लम्बे समय से पुरानी विधियों के अधीन संचालित किया जा रहा है, ऐसी स्थिति में प्रशासनतंत्र और अधिकारी निरुत्साहित हो जाते हैं क्योंकि उन्हें समाज की मांग और विधि अनुकूल शासन में समन्वय स्थापित करना जटिल हो जाता है पुरानी विधियां वर्तमान आधुनिक और उत्तर आधुनिक समाज में प्रासंगिक साबित नहीं हो पा रही हैं| अतः अन्य प्रयासों को करने की आवश्यकता है| शासनतंत्र के द्वारा उठाये गए उपरोक्त क़दमों के साथ यह आवश्यक है कि विधि निर्माता उच्च विधियों को निर्मित करने के लिए आगे बढ़ें अर्थात ऐसी विधियों का निर्माण किया जाए जो भावी पीढ़ियों के लिए तर्कसंगत साबित करें, मानवाधिकार, पर्यवारण एवं जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए निर्मित की जाएँ साथ ही समाज में विद्यमान विकृतियों को समाप्त करते हुए समरसता को विकसित करें |विधि निर्माण से दलीय हस्तक्षेप को समाप् करना चाहिए |लोकतांत्रिक नौकरशाही को प्रोत्साहित किया जाए विधयों का क्रियान्वयन या निर्णय निर्माण उचित एवं तर्कसंगत हो सके और सुशासन स्थापित किया जा सके|
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"उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा से शुरू हुआ युद्ध, सराजेवो हत्याकांड से विश्व युद्ध में बदल गया |" इस कथन के आलोक में प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) The war started with the competition of the colonies changed from the Sarajevo massacre to the world war. In light of this statement, discuss the main causes of the First World War. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच उत्तर की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के कारण के रूप में उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा की चर्चा कीजिए | पुनः प्रथम विश्व युद्ध के अन्य कारणों की संक्षेप में चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सराजेवो हत्याकांड को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- प्रथम विश्व युद्ध का सामान्य परिचय प्रथम विश्व युद्ध का प्रारम्भ 1914 में हुआ जो 1918 तक चला। इस युद्ध में एक तरफ मित्र राष्ट्र जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, रूस और अमेरिका शामिल थे तो दूसरी तरफ जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की शामिल थे । जिसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए। प्रथम विश्व युद्ध के कारण उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा : एकीकरण के पश्चात जर्मनी व इटली एक महान शक्ति के रूप में उभरे एवं इन्हे उपनिवेशों की आवश्यकता पड़ी। नए गुटों के निर्माण से रूसी साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता आई। औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात बाजार, कच्चे माल, पूँजी निवेश इत्यादि के लिए उपनिवेशों को लेकर तीव्र प्रतिस्पर्द्धा हुई, इस प्रतिस्पर्धा ने कई बार बड़ी शक्तियों के बीच तनाव व युद्ध की स्थिति उत्पन्न की तथा कभी क्षेत्रीय युद्ध भी हुए, अक्सर युद्ध टलता रहा और बड़ी शक्तियों के बीच असंतोष पनपता रहा; अंततः इसकी परिणति प्रथम विश्व युद्ध रुपी व्यापक विस्फोट में हुई | तनाव या टकराव के उदहारण -अफ्रीका में ट्यूनीशिया को लेकर फ़्रांस व् इटली में तनाव, मोरक्को के मुद्दे पर एक तरफ जर्मनी तो दूसरी तरफ ब्रिटेन व् फ़्रांस, दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश नीतियों का जर्मनी के द्वारा विरोध, इसी प्रकार एशिया -प्रशांत में भी साम्राज्यवादी सहक्तियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा; आदि | कुछ क्षेत्रीय युद्ध के उदहारण - बोअर युद्ध, इटली व् इथोपिया के बीच युद्ध, चीन-जापान एवं रूस -जापान युद्ध, आदि | प्रतिष्ठा का प्रश्न: जर्मनी ने फ्रांस से अल्सास-लॉरेन का क्षेत्र लेकर क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित किया। फ्रांस अपने आप को कमजोर साबित नहीं होने देना चाहता था। इसके अतिरिक्त रूस और आस्ट्रिया ने के बीच प्रतिष्ठा को लेकर मतभेद जारी रहे। बाल्कन क्षेत्र में रूस व तुर्की के बीच थोड़े-थोड़े अंतराल पर युद्ध व् ब्रिटेन के द्वारा रूस को बार-बार पीछे हटने के लिए बाध्य करना, एक प्रकार से र्रूस का अपमान ही था; आदि | गुटबंदी : आस्ट्रिया, जर्मनी और इटली ने आपस में मिलकर एक गुप्त संधि की। इसके माध्यम से वे फ्रांस को अलग-थलग रखना चाहते थे; इसके जवाब में एक प्रतिगुट का निर्माण हुआ जिसका नेतृत्व इंग्लैंड, फ्रांस व रूस ने किया। सैन्यवाद: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में चाहे प्रतिष्ठा का प्रश्न हो या फिर उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा या फिर गुटबंदी, सभी प्रश्नों के समाधान में शस्त्रीकरण को अहम माना जा रहा था; कई अवसरों पर बड़ी शक्तियों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची थी, जैसे-रूस, जर्मनी, फ़्रांस; पुनः ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो इसके लिए भी सैन्य तैयारियां जोरों पर थी; प्रत्यक्ष रूप से सैन्यवाद विभिन्न यूरोपीय गुटों से जुड़ा था; इन गुप्त संधियों ने एक दूसरे के प्रति शंका व अविश्वास में और वृद्धि की; फ्रांस की क्रांति, जर्मनी-इटली के एकीकरण के पश्चात सैन्य प्रसार की आवश्यकता हुई; आदि | अखबारों की भूमिका: प्रथम विश्व युद्ध के लिए अखबारों की भूमिका को भी एक सहायक कारक के रूप में माना गया है, राष्ट्रों के मध्य टकराव के प्रश्न को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते थे और उग्र-राष्ट्रीयता को उभारते थे, दूसरे शब्दों में युद्ध का वातावरण निर्मित करते थे, हालाँकि सरकारें यदि चाहती तो अख़बारों पर अंकुश लगा सकती थी; लेखों के माध्यम से विभिन्न देशों के बारे में दुष्प्रचार को प्रसारित कर दिया। इसके पूर्वा विभिन्न क्रांतियों में भी इन समाचार पत्रों की भूमिका अतिव्यापक थी जिसके कारण लोगों ने इनके द्वारा प्रसारित संदेशों पर विश्वास किया; आदि | तात्कालिक कारण :सेराजेवो हत्याकांड : बोस्निया के शहर सेराजेवो में आस्ट्रियाई युवराज फर्डीनेन्ड की हत्या कर दी गयी; आस्ट्रिया ने इसे सर्बिया की कार्यवाही माना ; और सर्बिया को एक अल्टीमेटम भी दिया, जिसमे निम्नलिखित शर्ते भी शामिल थी -दोषियों के विरुद्ध कारवाई, क्रन्तिकारी संगठनों पर प्रतिबन्ध तथा आस्ट्रियाई अधिकारी पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए सर्बिया जायेंगे, इत्यादि | जर्मनी ने प्रत्येक स्थिति में आस्ट्रिया को सहयोग का आश्वासन दिया और 28 जुलाई 1914 को आस्ट्रिया ने सर्बिया पर आक्रमण किया; इसके पश्चात रूस ने सेना को तैयार होने का आदेश दिया, जर्मनी ने रूस को सैन्य तैयारी रोकने को कहा तो फ़्रांस ने रूस का समर्थन किया; जर्मनी पर पहले रूस पर फिर बेल्जियम के रास्ते फ़्रांस पर आक्रमण किया, बेल्जियम सुरक्षा कारणों से ब्रिटेन से जुड़ा हुआ था, अतः ब्रिटेन भी युद्ध में शामिल हुआ; हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की ने रूस के विरुद्ध या जर्मनी के पक्ष में युद्ध में शामिल होने की घोषणा की; 1915 में इटली, ब्रिटिश गुट में शामिल हुआ; 1917 में अमेरिका ब्रिटिश गुट में शामिल हुआ तथा 1917 में ही रूस मार्क्सवादी क्रांति के कारण विश्व युद्ध से अलग हुआ; आदि |
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##Question:"उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा से शुरू हुआ युद्ध, सराजेवो हत्याकांड से विश्व युद्ध में बदल गया |" इस कथन के आलोक में प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) The war started with the competition of the colonies changed from the Sarajevo massacre to the world war. In light of this statement, discuss the main causes of the First World War. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच उत्तर की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के कारण के रूप में उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा की चर्चा कीजिए | पुनः प्रथम विश्व युद्ध के अन्य कारणों की संक्षेप में चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सराजेवो हत्याकांड को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- प्रथम विश्व युद्ध का सामान्य परिचय प्रथम विश्व युद्ध का प्रारम्भ 1914 में हुआ जो 1918 तक चला। इस युद्ध में एक तरफ मित्र राष्ट्र जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, रूस और अमेरिका शामिल थे तो दूसरी तरफ जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की शामिल थे । जिसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए। प्रथम विश्व युद्ध के कारण उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा : एकीकरण के पश्चात जर्मनी व इटली एक महान शक्ति के रूप में उभरे एवं इन्हे उपनिवेशों की आवश्यकता पड़ी। नए गुटों के निर्माण से रूसी साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता आई। औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात बाजार, कच्चे माल, पूँजी निवेश इत्यादि के लिए उपनिवेशों को लेकर तीव्र प्रतिस्पर्द्धा हुई, इस प्रतिस्पर्धा ने कई बार बड़ी शक्तियों के बीच तनाव व युद्ध की स्थिति उत्पन्न की तथा कभी क्षेत्रीय युद्ध भी हुए, अक्सर युद्ध टलता रहा और बड़ी शक्तियों के बीच असंतोष पनपता रहा; अंततः इसकी परिणति प्रथम विश्व युद्ध रुपी व्यापक विस्फोट में हुई | तनाव या टकराव के उदहारण -अफ्रीका में ट्यूनीशिया को लेकर फ़्रांस व् इटली में तनाव, मोरक्को के मुद्दे पर एक तरफ जर्मनी तो दूसरी तरफ ब्रिटेन व् फ़्रांस, दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश नीतियों का जर्मनी के द्वारा विरोध, इसी प्रकार एशिया -प्रशांत में भी साम्राज्यवादी सहक्तियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा; आदि | कुछ क्षेत्रीय युद्ध के उदहारण - बोअर युद्ध, इटली व् इथोपिया के बीच युद्ध, चीन-जापान एवं रूस -जापान युद्ध, आदि | प्रतिष्ठा का प्रश्न: जर्मनी ने फ्रांस से अल्सास-लॉरेन का क्षेत्र लेकर क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित किया। फ्रांस अपने आप को कमजोर साबित नहीं होने देना चाहता था। इसके अतिरिक्त रूस और आस्ट्रिया ने के बीच प्रतिष्ठा को लेकर मतभेद जारी रहे। बाल्कन क्षेत्र में रूस व तुर्की के बीच थोड़े-थोड़े अंतराल पर युद्ध व् ब्रिटेन के द्वारा रूस को बार-बार पीछे हटने के लिए बाध्य करना, एक प्रकार से र्रूस का अपमान ही था; आदि | गुटबंदी : आस्ट्रिया, जर्मनी और इटली ने आपस में मिलकर एक गुप्त संधि की। इसके माध्यम से वे फ्रांस को अलग-थलग रखना चाहते थे; इसके जवाब में एक प्रतिगुट का निर्माण हुआ जिसका नेतृत्व इंग्लैंड, फ्रांस व रूस ने किया। सैन्यवाद: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में चाहे प्रतिष्ठा का प्रश्न हो या फिर उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा या फिर गुटबंदी, सभी प्रश्नों के समाधान में शस्त्रीकरण को अहम माना जा रहा था; कई अवसरों पर बड़ी शक्तियों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची थी, जैसे-रूस, जर्मनी, फ़्रांस; पुनः ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो इसके लिए भी सैन्य तैयारियां जोरों पर थी; प्रत्यक्ष रूप से सैन्यवाद विभिन्न यूरोपीय गुटों से जुड़ा था; इन गुप्त संधियों ने एक दूसरे के प्रति शंका व अविश्वास में और वृद्धि की; फ्रांस की क्रांति, जर्मनी-इटली के एकीकरण के पश्चात सैन्य प्रसार की आवश्यकता हुई; आदि | अखबारों की भूमिका: प्रथम विश्व युद्ध के लिए अखबारों की भूमिका को भी एक सहायक कारक के रूप में माना गया है, राष्ट्रों के मध्य टकराव के प्रश्न को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते थे और उग्र-राष्ट्रीयता को उभारते थे, दूसरे शब्दों में युद्ध का वातावरण निर्मित करते थे, हालाँकि सरकारें यदि चाहती तो अख़बारों पर अंकुश लगा सकती थी; लेखों के माध्यम से विभिन्न देशों के बारे में दुष्प्रचार को प्रसारित कर दिया। इसके पूर्वा विभिन्न क्रांतियों में भी इन समाचार पत्रों की भूमिका अतिव्यापक थी जिसके कारण लोगों ने इनके द्वारा प्रसारित संदेशों पर विश्वास किया; आदि | तात्कालिक कारण :सेराजेवो हत्याकांड : बोस्निया के शहर सेराजेवो में आस्ट्रियाई युवराज फर्डीनेन्ड की हत्या कर दी गयी; आस्ट्रिया ने इसे सर्बिया की कार्यवाही माना ; और सर्बिया को एक अल्टीमेटम भी दिया, जिसमे निम्नलिखित शर्ते भी शामिल थी -दोषियों के विरुद्ध कारवाई, क्रन्तिकारी संगठनों पर प्रतिबन्ध तथा आस्ट्रियाई अधिकारी पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए सर्बिया जायेंगे, इत्यादि | जर्मनी ने प्रत्येक स्थिति में आस्ट्रिया को सहयोग का आश्वासन दिया और 28 जुलाई 1914 को आस्ट्रिया ने सर्बिया पर आक्रमण किया; इसके पश्चात रूस ने सेना को तैयार होने का आदेश दिया, जर्मनी ने रूस को सैन्य तैयारी रोकने को कहा तो फ़्रांस ने रूस का समर्थन किया; जर्मनी पर पहले रूस पर फिर बेल्जियम के रास्ते फ़्रांस पर आक्रमण किया, बेल्जियम सुरक्षा कारणों से ब्रिटेन से जुड़ा हुआ था, अतः ब्रिटेन भी युद्ध में शामिल हुआ; हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की ने रूस के विरुद्ध या जर्मनी के पक्ष में युद्ध में शामिल होने की घोषणा की; 1915 में इटली, ब्रिटिश गुट में शामिल हुआ; 1917 में अमेरिका ब्रिटिश गुट में शामिल हुआ तथा 1917 में ही रूस मार्क्सवादी क्रांति के कारण विश्व युद्ध से अलग हुआ; आदि |
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You are posted as an SDM in a division of a district which is undergoing ethnic turbulence for some time. There has been a substantial loss of lives and property due to the disturbance, following which you are given implicit orders by the ruling party of the area to move a certain section of the population, belonging to a particular ethnic group, out of the area to control the situation. This order has put you in a difficult position as it goes against your own ethical values of targeting a section of the population and moving them out of their homes. However, not following the orders will be taken as a dereliction of duty and will put the onus on you for the loss of lives. A. In this situation, what are the options available to you? B. In your opinion, what can be the most appropriate course of action and why? (250 words/25 Marks)
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Approach Explain the given case and the ethical dilemma faced. Mention the options available with their merits and demerits. Mention a course of action with an explanation. The given case poses a challenge to choose between political orders of evicting a particular ethnic group against personal ethical values of targeting a section of the population and moving them out of their homes. It highlights the ethical dilemma between duty ethics and social justice. Answer - This is a classic case of a challenge to choose between the political order of evicting a particular ethnic group against personal ethical values of targeting a section of the population Options available - 1) Follow the orders and evict the particular group of people - Merits - It will lead to following the given orders. Political expectations met. May control the situation. Demerits - Communal issues may become matters of concern. Personal beliefs getting subsided. 2) Do not follow the order - Merits - Personal beliefs getting affected. Demerits - political backlash. Lives may be lost which can lead to further disturbance and a guilty conscious. 3) Inform higher authority and request for intervention - Merits - Accountability will be on the government now. Avoiding political conflict. Demerits - shows escapism. 4) Wait for some time to control the situation and assess whether there is a need to remove them - Merits - shows leadership and administrative skills. No personal bias or guilt conscious. Demerits - delayed decisions. Anti-social elements can use this to spread violence. Option 4 seems to be the best choice here as evicting a particular ethnic group in a diverse country like India may lead to fodder for communal and anti-social elements to instigate violence. Also, the order can be a political agenda without rationality. Eviction is not only against individual dignity and morality but also against the civil services code of conduct. The course of Action - Perform first-hand investigation of the ground reality and keep the political leadership informed about the gravity of the situation. The foremost priority should be to control the law & order situation. Ensure the safety/security of the people by - Increased patrolling, and deployment of force. Adopting zero-tolerance against wrongdoers. Persuade the political leaders to give some time to control the situation and convince them that forced eviction of the group could further deteriorate the conditions. Social influence can also be used by talking to the community, here help of some influential people in the community can be taken. Show empathy towards the people of the community. Long-term measure - Ensuring communal harmony so such situations do not arise again. Strict vigilance of anti-social elements. Taking the help of PRIs to ensure communal empathy and fraternity. Thus, by taking into confidence the political leaders, and controlling the law and order situation could prevent loss of lives and property. This way one can fulfil his/her administrative duty without neglecting social justice simultaneously showing the objectivity and non-partisan attitude of the administration.
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##Question:You are posted as an SDM in a division of a district which is undergoing ethnic turbulence for some time. There has been a substantial loss of lives and property due to the disturbance, following which you are given implicit orders by the ruling party of the area to move a certain section of the population, belonging to a particular ethnic group, out of the area to control the situation. This order has put you in a difficult position as it goes against your own ethical values of targeting a section of the population and moving them out of their homes. However, not following the orders will be taken as a dereliction of duty and will put the onus on you for the loss of lives. A. In this situation, what are the options available to you? B. In your opinion, what can be the most appropriate course of action and why? (250 words/25 Marks)##Answer:Approach Explain the given case and the ethical dilemma faced. Mention the options available with their merits and demerits. Mention a course of action with an explanation. The given case poses a challenge to choose between political orders of evicting a particular ethnic group against personal ethical values of targeting a section of the population and moving them out of their homes. It highlights the ethical dilemma between duty ethics and social justice. Answer - This is a classic case of a challenge to choose between the political order of evicting a particular ethnic group against personal ethical values of targeting a section of the population Options available - 1) Follow the orders and evict the particular group of people - Merits - It will lead to following the given orders. Political expectations met. May control the situation. Demerits - Communal issues may become matters of concern. Personal beliefs getting subsided. 2) Do not follow the order - Merits - Personal beliefs getting affected. Demerits - political backlash. Lives may be lost which can lead to further disturbance and a guilty conscious. 3) Inform higher authority and request for intervention - Merits - Accountability will be on the government now. Avoiding political conflict. Demerits - shows escapism. 4) Wait for some time to control the situation and assess whether there is a need to remove them - Merits - shows leadership and administrative skills. No personal bias or guilt conscious. Demerits - delayed decisions. Anti-social elements can use this to spread violence. Option 4 seems to be the best choice here as evicting a particular ethnic group in a diverse country like India may lead to fodder for communal and anti-social elements to instigate violence. Also, the order can be a political agenda without rationality. Eviction is not only against individual dignity and morality but also against the civil services code of conduct. The course of Action - Perform first-hand investigation of the ground reality and keep the political leadership informed about the gravity of the situation. The foremost priority should be to control the law & order situation. Ensure the safety/security of the people by - Increased patrolling, and deployment of force. Adopting zero-tolerance against wrongdoers. Persuade the political leaders to give some time to control the situation and convince them that forced eviction of the group could further deteriorate the conditions. Social influence can also be used by talking to the community, here help of some influential people in the community can be taken. Show empathy towards the people of the community. Long-term measure - Ensuring communal harmony so such situations do not arise again. Strict vigilance of anti-social elements. Taking the help of PRIs to ensure communal empathy and fraternity. Thus, by taking into confidence the political leaders, and controlling the law and order situation could prevent loss of lives and property. This way one can fulfil his/her administrative duty without neglecting social justice simultaneously showing the objectivity and non-partisan attitude of the administration.
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To what extent has the urban planning and culture of the Indus Valley Civilization provided inputs to present-day urbanization? Discuss. (10 Marks/150 Words)
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Approach : Write a brief introduction on IVC and link it to town planning. Mention the inputs provided in terms of town planning and culture. Highlight the extent we can learn from them and also show the need for incorporating modern ideas. Answer Indus Valley Civilization (IVC) was excavated in the 1920s with the first site being Harappa. Town planning was one of the most remarkable features of this newly excavated site. With more efforts towards studying the ruins and recovered artefacts, we have been able to understand the culture as well. Le Corbusier"s plan for Chandigarh is said to have been inspired by the IVC. Inputs with respect to Town planning: On studying the ruins excavated many scholars had the opinion that the settlement was first planned and then implemented accordingly. This is evident by Citadel and Lower town:- The division of the city in two parts- Citadel and lower town, the standardised ratio of bricks, etc. Streets:- Roads and streets were laid out along an approximate “grid” pattern, intersecting at right angles. It seems that streets with drains were laid out first and then houses were built along with them. Houses:- Every house had its own bathroom paved with bricks, with drains connected through the wall to the street drains. Further, the houses were designed with concern regarding privacy. Drainage System:- The drains in the IVC connected every house which dumped their waste directly into them. These drains were covered and were also connected to a common outlet. Manholes were also constructed for maintenance purposes. We have incorporated some of the above features in cities like Chandigarh and Bhubaneshwar. With regard to the culture, IVC has shown high regard to town planning, hygiene, and sanitation, open culture and society, non-discriminatory society, nature worship. While we have many similarities in terms of culture like giving importance to nature and open culture and society, there are many facets where we are still lagging. The urbanization observed in India has been haphazard with minimal regard to hygiene and sanitation both at the planning level as well at the individual level. Further, in the modern era we are aided by technology and at the same time hampered by the side effects of this technology. Our learning from IVC will not help us tackle the menace created by the use of plastic, increasing extreme weather events and induced disasters, excessive vehicular traffic, incorporating modern technology in planning such as the use of GPS, solid waste management, etc. The onus lies on us to devise a sustainable planning infrastructure as well as develop a habit of cleanliness in both spheres of life- tangible and intangible, as has been rightly said by our Prime Minister with regards to the Swachh Bharat Abhiyan.
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##Question:To what extent has the urban planning and culture of the Indus Valley Civilization provided inputs to present-day urbanization? Discuss. (10 Marks/150 Words)##Answer:Approach : Write a brief introduction on IVC and link it to town planning. Mention the inputs provided in terms of town planning and culture. Highlight the extent we can learn from them and also show the need for incorporating modern ideas. Answer Indus Valley Civilization (IVC) was excavated in the 1920s with the first site being Harappa. Town planning was one of the most remarkable features of this newly excavated site. With more efforts towards studying the ruins and recovered artefacts, we have been able to understand the culture as well. Le Corbusier"s plan for Chandigarh is said to have been inspired by the IVC. Inputs with respect to Town planning: On studying the ruins excavated many scholars had the opinion that the settlement was first planned and then implemented accordingly. This is evident by Citadel and Lower town:- The division of the city in two parts- Citadel and lower town, the standardised ratio of bricks, etc. Streets:- Roads and streets were laid out along an approximate “grid” pattern, intersecting at right angles. It seems that streets with drains were laid out first and then houses were built along with them. Houses:- Every house had its own bathroom paved with bricks, with drains connected through the wall to the street drains. Further, the houses were designed with concern regarding privacy. Drainage System:- The drains in the IVC connected every house which dumped their waste directly into them. These drains were covered and were also connected to a common outlet. Manholes were also constructed for maintenance purposes. We have incorporated some of the above features in cities like Chandigarh and Bhubaneshwar. With regard to the culture, IVC has shown high regard to town planning, hygiene, and sanitation, open culture and society, non-discriminatory society, nature worship. While we have many similarities in terms of culture like giving importance to nature and open culture and society, there are many facets where we are still lagging. The urbanization observed in India has been haphazard with minimal regard to hygiene and sanitation both at the planning level as well at the individual level. Further, in the modern era we are aided by technology and at the same time hampered by the side effects of this technology. Our learning from IVC will not help us tackle the menace created by the use of plastic, increasing extreme weather events and induced disasters, excessive vehicular traffic, incorporating modern technology in planning such as the use of GPS, solid waste management, etc. The onus lies on us to devise a sustainable planning infrastructure as well as develop a habit of cleanliness in both spheres of life- tangible and intangible, as has been rightly said by our Prime Minister with regards to the Swachh Bharat Abhiyan.
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"रूसी क्रांति ने मार्क्सवादी विचारधारा को पहली बार यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया" | इस कथन के आलोक में रूसी क्रांति के महत्व पर चर्चा कीजिये | साथ ही फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति की तुलना भी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The Russian Revolution implemented Marxist ideology on the ground of reality for the first time". In light of this statement, discuss the importance of the Russian Revolution. Also, compare the French Revolution and the Russian Revolution. (150-200 words / 10 Marks)
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रूसी क्रांति का महत्व मार्क्सवादी विचारधारा को पहली बार यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया गया; बोल्शेविक क्रांति की सफलता से न केवल यूरोप बल्कि वैश्विक स्तर पर इस विचारधारा का प्रसार हुआ और कई राष्ट्रों में साम्यवादी क्रांति की सफल -असफल कोशिश भी; राजनीतिक दृष्टिकोण से भी रूस में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गए जैसे- वयस्क मताधिकार लागू किया गया, महिलाओं को भी मत देने का अधिकार दिया गया, इन सुधारों का यूरोपीय राष्ट्रों पर प्रभाव दिखा , विशेषकर वंचित तबको व् महिलाओं के मताधिकार के सम्बन्ध में; औद्योगिक देशों में मार्क्सवादी पार्टी का गठन तथा ट्रेड यूनियन आन्दोलन में अधिक तीव्रता दिखी; उपनिवेशों पर भी इसका व्यापक प्रभाव दिखा, सर्वप्रथम यह प्रेरणा कि एकजुट होकर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी जा सकती है; इस विचारधारा का तेजी से प्रसार और रूस के द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलनों को प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया जाने लगा; उपनिवेशवाद की आलोचना तथा रूस के द्वारा उपनिवेश छोड़े जाने की घोषणा से औपनिवेशिक राष्ट्रों को रूस से सहयोग की उम्मीद बंधी; आर्थिक दृष्टिकोण से इस दृष्टि से भी इसने पूंजीवादी पद्धति का एक विकल्प प्रस्तुत किया ; जैसे- संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण, नियोजित विकास, आर्थिक न्याय इत्यादि ; विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की आर्थिक नीतियों पर इसका प्रभाव दिखा तथा पूंजीवादी राष्ट्रों को भी सामाजिक सुरक्षा और लोक कल्याण के लिए कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा; आदि | सामाजिक दृष्टिकोण से सामाजिक क्षेत्र में भी कई क्रन्तिकारी परिवर्तन रूस में किये गए जिसका वैश्विक महत्व था, जैसे- समाज में सबके लिए एक समान शिक्षा व् सुविधाएं - यहाँ तक कि महिलाओं के लिए भी; आर्थिक गतिविधियों में भी पुरुषों के समकक्ष महिलाओं को महत्व दिया गया तथा बच्चों के देख-रेख के लिए केंद्र खोले गए; धार्मिक गतिविधियों पर प्रहार की कोशिश (अत्यधिक सफलता नहीं) शिक्षा एवं साहित्य पर भी इस विचारधारा का व्यापक प्रभाव दिखा; आदि | फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति में तुलना फ्रांसीसी और रूसी क्रान्तियों में समानता दोनों ही क्रांतियाँ राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक असमानता का परिणाम थी; दोनों में निरंकुश शासन व्यवस्था और विचारधारा जैसे कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखी; दोनों राष्ट्रों में क्रान्ति के दौरान आंतरिक स्तर पर गृहयुद्ध तथा बाह्य स्तर पर पडोसी देशों के द्वारा प्रतुत चुनौतियों का सामना करना पड़ा; दोनों क्रांतियों का लक्ष्य सामानता की स्थापना करना था; दोनों क्रांतियों में निम्नवर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी और दोनों का विश्व्यापी महत्त्व भी है; फ्रांसीसी और रूसी क्रान्तियों में अंतर कारणों के दृष्टिकोण से देखें तो फ्रांस की आर्थिक स्थिति रूस की अपेक्षा बेहतर थी; फ़्रांसीसी समाज पर प्रबोधन युगीन चिंतकों का व्यापक प्रभाव था जबकि रूस में यह प्रभाव नहीं था; फ्रांसीसी क्रान्ति औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भिक चरण के साथ जबकि रूसी क्रान्ति द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात हुई ; फ्रांसीसी क्रांति का मुख्य लक्ष्य सीमित राजनीतिक समानता थी वहीँ रूसी क्रान्ति का मुख्य बल सामाजिक आर्थिक न्याय पर केन्द्रित था; फ्रांसीसी क्रान्ति का मध्यवर्ग का अत्यधिक प्रभाव दिखता है वहीँ रूसी क्रान्ति पर निम्नवर्ग का प्रभाव दिखता है; फ्रांस में क्रान्ति समर्थकों को राजतंत्र एवं धर्मतंत्र के समर्थकों से संघर्ष करना पड़ा वहीँ रूस में इनके साथ साथ लोकतंत्र समर्थकों से भी संघर्ष करना पड़ा; फ़्रांसीसी क्रान्ति में स्वतःस्फूर्तता के तत्व अधिक दिखाई पड़ते हैं जबकि रूसी क्रान्ति एक नियोजित क्रान्ति थी; दोनों ही क्रांतियों ने विश्व को भी अलग अलग तरीके से प्रभावित किया; फ्रांसीसी क्रान्ति ने राजनीतिक परिवर्तनों को अधिक प्रभावित किया तो रूसी क्रान्ति ने सामाजिक आर्थिक परिवर्तनों को प्रभावित किया;
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##Question:"रूसी क्रांति ने मार्क्सवादी विचारधारा को पहली बार यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया" | इस कथन के आलोक में रूसी क्रांति के महत्व पर चर्चा कीजिये | साथ ही फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति की तुलना भी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The Russian Revolution implemented Marxist ideology on the ground of reality for the first time". In light of this statement, discuss the importance of the Russian Revolution. Also, compare the French Revolution and the Russian Revolution. (150-200 words / 10 Marks)##Answer:रूसी क्रांति का महत्व मार्क्सवादी विचारधारा को पहली बार यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया गया; बोल्शेविक क्रांति की सफलता से न केवल यूरोप बल्कि वैश्विक स्तर पर इस विचारधारा का प्रसार हुआ और कई राष्ट्रों में साम्यवादी क्रांति की सफल -असफल कोशिश भी; राजनीतिक दृष्टिकोण से भी रूस में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गए जैसे- वयस्क मताधिकार लागू किया गया, महिलाओं को भी मत देने का अधिकार दिया गया, इन सुधारों का यूरोपीय राष्ट्रों पर प्रभाव दिखा , विशेषकर वंचित तबको व् महिलाओं के मताधिकार के सम्बन्ध में; औद्योगिक देशों में मार्क्सवादी पार्टी का गठन तथा ट्रेड यूनियन आन्दोलन में अधिक तीव्रता दिखी; उपनिवेशों पर भी इसका व्यापक प्रभाव दिखा, सर्वप्रथम यह प्रेरणा कि एकजुट होकर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी जा सकती है; इस विचारधारा का तेजी से प्रसार और रूस के द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलनों को प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया जाने लगा; उपनिवेशवाद की आलोचना तथा रूस के द्वारा उपनिवेश छोड़े जाने की घोषणा से औपनिवेशिक राष्ट्रों को रूस से सहयोग की उम्मीद बंधी; आर्थिक दृष्टिकोण से इस दृष्टि से भी इसने पूंजीवादी पद्धति का एक विकल्प प्रस्तुत किया ; जैसे- संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण, नियोजित विकास, आर्थिक न्याय इत्यादि ; विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की आर्थिक नीतियों पर इसका प्रभाव दिखा तथा पूंजीवादी राष्ट्रों को भी सामाजिक सुरक्षा और लोक कल्याण के लिए कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा; आदि | सामाजिक दृष्टिकोण से सामाजिक क्षेत्र में भी कई क्रन्तिकारी परिवर्तन रूस में किये गए जिसका वैश्विक महत्व था, जैसे- समाज में सबके लिए एक समान शिक्षा व् सुविधाएं - यहाँ तक कि महिलाओं के लिए भी; आर्थिक गतिविधियों में भी पुरुषों के समकक्ष महिलाओं को महत्व दिया गया तथा बच्चों के देख-रेख के लिए केंद्र खोले गए; धार्मिक गतिविधियों पर प्रहार की कोशिश (अत्यधिक सफलता नहीं) शिक्षा एवं साहित्य पर भी इस विचारधारा का व्यापक प्रभाव दिखा; आदि | फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति में तुलना फ्रांसीसी और रूसी क्रान्तियों में समानता दोनों ही क्रांतियाँ राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक असमानता का परिणाम थी; दोनों में निरंकुश शासन व्यवस्था और विचारधारा जैसे कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखी; दोनों राष्ट्रों में क्रान्ति के दौरान आंतरिक स्तर पर गृहयुद्ध तथा बाह्य स्तर पर पडोसी देशों के द्वारा प्रतुत चुनौतियों का सामना करना पड़ा; दोनों क्रांतियों का लक्ष्य सामानता की स्थापना करना था; दोनों क्रांतियों में निम्नवर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी और दोनों का विश्व्यापी महत्त्व भी है; फ्रांसीसी और रूसी क्रान्तियों में अंतर कारणों के दृष्टिकोण से देखें तो फ्रांस की आर्थिक स्थिति रूस की अपेक्षा बेहतर थी; फ़्रांसीसी समाज पर प्रबोधन युगीन चिंतकों का व्यापक प्रभाव था जबकि रूस में यह प्रभाव नहीं था; फ्रांसीसी क्रान्ति औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भिक चरण के साथ जबकि रूसी क्रान्ति द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात हुई ; फ्रांसीसी क्रांति का मुख्य लक्ष्य सीमित राजनीतिक समानता थी वहीँ रूसी क्रान्ति का मुख्य बल सामाजिक आर्थिक न्याय पर केन्द्रित था; फ्रांसीसी क्रान्ति का मध्यवर्ग का अत्यधिक प्रभाव दिखता है वहीँ रूसी क्रान्ति पर निम्नवर्ग का प्रभाव दिखता है; फ्रांस में क्रान्ति समर्थकों को राजतंत्र एवं धर्मतंत्र के समर्थकों से संघर्ष करना पड़ा वहीँ रूस में इनके साथ साथ लोकतंत्र समर्थकों से भी संघर्ष करना पड़ा; फ़्रांसीसी क्रान्ति में स्वतःस्फूर्तता के तत्व अधिक दिखाई पड़ते हैं जबकि रूसी क्रान्ति एक नियोजित क्रान्ति थी; दोनों ही क्रांतियों ने विश्व को भी अलग अलग तरीके से प्रभावित किया; फ्रांसीसी क्रान्ति ने राजनीतिक परिवर्तनों को अधिक प्रभावित किया तो रूसी क्रान्ति ने सामाजिक आर्थिक परिवर्तनों को प्रभावित किया;
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What are applications of space station? Discuss importance of space station for India. (150 words/10 marks)
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Approach Introduction Define space station. Body Applications of the space station. Importance of space station. Conclusion. Conclude with steps taken by India Answer A space station is a spacecraft capable of supporting crewmembers, designed to remain in space for an extended period of time and for other spacecraft to dock. Currently, there is only one fully functional space station on the Earth"slower orbit, the International Space Station and astronauts conduct different experiments in it. The first component of the ISS was launched into orbit in 1998, and the first long-term residents arrived in November 2000. The International Space Station is a partnership between European countries represented by the European Space Agency, the United States (NASA), Japan (JAXA), Canada (CSA), and Russia (Roscosmos). It is the world"s largest international cooperative program in science and technology. China also plans to build a space station of its own. Application For conducting microgravity research such as biological experiments. Act as a space terminal for placing space modules and for space voyages.Repair of satellites that are in LEO or astronomical telescope. Can be used for refueling. Astronomical observation such as comets, meteorites Space tourism. Surveillance purpose and info gathering Importance of space station for India Earth observation, observation of pollution, climate, etc India going to launch GAGANYAAN Mission for conducting the space experiments such as microgravity experiments, astronomical observation. Military applications such as keeping watch on Borders we share with Pakistan and China. India has a plan on having its own space station project. The mission will also be an extension of the Gaganyaan project. Our space station is going to be very small. We will be launching a small module that will be used for carrying out microgravity experiments. The weight of the space station is likely to be 20 tonnes. First Gaganyaan mission by 2022 and it is looking at 5-7 years time frame for execution of the program. The space station will not only help India with various applications mentioned above but also make India the country to reckon with
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##Question:What are applications of space station? Discuss importance of space station for India. (150 words/10 marks)##Answer:Approach Introduction Define space station. Body Applications of the space station. Importance of space station. Conclusion. Conclude with steps taken by India Answer A space station is a spacecraft capable of supporting crewmembers, designed to remain in space for an extended period of time and for other spacecraft to dock. Currently, there is only one fully functional space station on the Earth"slower orbit, the International Space Station and astronauts conduct different experiments in it. The first component of the ISS was launched into orbit in 1998, and the first long-term residents arrived in November 2000. The International Space Station is a partnership between European countries represented by the European Space Agency, the United States (NASA), Japan (JAXA), Canada (CSA), and Russia (Roscosmos). It is the world"s largest international cooperative program in science and technology. China also plans to build a space station of its own. Application For conducting microgravity research such as biological experiments. Act as a space terminal for placing space modules and for space voyages.Repair of satellites that are in LEO or astronomical telescope. Can be used for refueling. Astronomical observation such as comets, meteorites Space tourism. Surveillance purpose and info gathering Importance of space station for India Earth observation, observation of pollution, climate, etc India going to launch GAGANYAAN Mission for conducting the space experiments such as microgravity experiments, astronomical observation. Military applications such as keeping watch on Borders we share with Pakistan and China. India has a plan on having its own space station project. The mission will also be an extension of the Gaganyaan project. Our space station is going to be very small. We will be launching a small module that will be used for carrying out microgravity experiments. The weight of the space station is likely to be 20 tonnes. First Gaganyaan mission by 2022 and it is looking at 5-7 years time frame for execution of the program. The space station will not only help India with various applications mentioned above but also make India the country to reckon with
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संपत्ति का अधिकार एक सामान्य विधिक अधिकार या संवैधानिक अधिकार है जिसके बारे में सुप्रीमकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा है कि संपति का अधिकार मानवाधिकार है| इस संदर्भ में, संपत्ति के अधिकार की मौजूदा स्थिति पर चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) The right to property is a general legal right or constitutional right of which the Supreme Court has stated in its observation that the right to property is a human right. In this context, discuss the current state of the right to property . (150–200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - मूल अधिकार के रूप में पहले विद्यमान संपति के अधिकार को दर्शाते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिए| संपति के अधिकार से उत्पन संसद एवं न्यायालय के बीच के गतिरोध के संदर्भ में, इस हेतु हुए संविधान संशोधनों का जिक्र कीजिए| 44वें संशोधन से परिवर्तित किए गए इस अधिकार पर चर्चा कीजिए| एक संगत निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - भारत के मौलिक संविधान में, मौलिक अधिकार संबंधी अध्याय में, मौलिक अधिकारों को 7 भागों में बांटा गया था जिसमें से एक संपति का अधिकार था और उसे अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 में स्थान दिया गया था| अनुच्छेद 19(1)(f) प्रत्येक नागरिक को संपति का अधिग्रहण करने, उसको रखने एवं निपटाने की गारंटी देता था वहीँ अनुच्छेद 31 प्रत्येक व्यक्ति(चाहे वह नागरिक हो या गैर-नागरिक) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपति से बेदखल करने के खिलाफ अधिकार प्रदान करता है| इसमें यह व्यवस्था है कि बिना विधि सम्मत कानून के कोई भी संपति पर अधिकार नहीं जताएगा| संपति के अधिकार से संबंधित 2 अपवाद थें - लोकहित या जनहित में निजी संपति का अधिग्रहण हो सकता है| संपति लिए जाने की स्थिति में क्षतिपूर्ति की जाएगी| संविधान लागू होने के बाद कृषि क्षेत्र में सुधार, भूमि सुधार और आर्थिक सुधार के माध्यम से समतामूलक समाज की स्थापना के उद्देश्य से जब प्रयास प्रारंभ हुयें तो यह अधिकार सर्वाधिक विवादास्पद बना तथा न्यायपालिका एवं संसद के बीच संघर्ष का कारण बना| भारतीय संसद ने अनेक संविधान संशोधनों(जैसे- पहला, चौथा, सातवाँ, पच्चीसवां, 42वां, 44वां संशोधन आदि) के माध्यम से संपति के अधिकार में व्यापक बदलाव किया| इन संशोधनों के द्वारा मौलिक अधिकारों के अपवादस्वरुप अनुच्छेद 31(A), अनुच्छेद 31(B) और अनुच्छेद 31(C) शामिल किया गया तथा समय-समय पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को इस विवादास्पद अधिकार के संबंध में कम किया गया| इनमें से अधिकतर मामलें निजी संपति के लिए अनुरोध, उनके अधिग्रहण एवं उनके क्षतिपूर्ति के भुगतान के संबंध में थें| 44वें संविधान संशोधन(1978) तथा संपति के अधिकार की मौजूदा स्थिति 44वें संविधान संशोधन(1978) के माध्यम से संपति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के अध्याय से बाहर करके(अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 को निरसित करके) संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 300(A) के अंतर्गत रख दिया गया| तथा विधिक अधिकार के रूप में संपति का अधिकार निम्नलिखित तरीके से लागू होता है - संपति का अधिकार मौलिक अधिकार ना होकर विधिक अधिकार बन गया जिसके प्रावधानों में संसद के सामान्य विधि के द्वारा आवश्यक बदलाव लाया जा सकता है| साथ ही, यह संविधान के मूल ढांचे का भी हिस्सा अब नहीं है| इसे बिना संविधान संशोधन के संसद के साधारण कानून के तहत नियमित, कम अथवा पुनर्निर्धारित किया जा सकता है| यह कार्यकारी क्रिया के खिलाफ निजी संपति की रक्षा करता है लेकिन विधायी कार्य के खिलाफ नहीं| इस अधिकार के उल्लंघन की स्थिति में अनुच्छेद 32 के तहत संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा लेकिन अनुच्छेद 226 के तहत HC में संरक्षण की याचिका दायर की जा सकती है| राज्य के द्वारा संपति अधिगृहित करने की स्थिति में क्षतिपूर्ति देने की कोई प्रत्याभूति नहीं होगी सिवाय 2 परिस्थितियों के -- अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं की संपति यदि अर्जित की जाती है तो राज्य क्षतिपूर्ति करेगा लेकिन उसकी मात्रा क्या होगी यह राज्य द्वारा निर्धारित होगा| अनुच्छेद 31(A) के तहत 17वें संविधान संशोधन(1964) के माध्यम से यह प्रावधान दिया गया कि यदि राज्य के द्वारा कृषि हेतु प्रयुक्त हो रही कोई जमीन/भूमि किसानों से ली जा रही है और किसान स्वंय उसपर खेती कर रहा है तथा चकबंदी की सीमा के तहत ही वह भूमि है तो राज्य को बाजारी मूल्य के आधार पर क्षतिपूर्ति करनी होगी| इस तरह संपति का अधिकार एक सामान्य विधिक अधिकार या संवैधानिक अधिकार है जिसके बारे में SC ने अपने अवलोकन में कहा है कि संपति का अधिकार मानवाधिकार है|
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##Question:संपत्ति का अधिकार एक सामान्य विधिक अधिकार या संवैधानिक अधिकार है जिसके बारे में सुप्रीमकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा है कि संपति का अधिकार मानवाधिकार है| इस संदर्भ में, संपत्ति के अधिकार की मौजूदा स्थिति पर चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) The right to property is a general legal right or constitutional right of which the Supreme Court has stated in its observation that the right to property is a human right. In this context, discuss the current state of the right to property . (150–200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - मूल अधिकार के रूप में पहले विद्यमान संपति के अधिकार को दर्शाते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिए| संपति के अधिकार से उत्पन संसद एवं न्यायालय के बीच के गतिरोध के संदर्भ में, इस हेतु हुए संविधान संशोधनों का जिक्र कीजिए| 44वें संशोधन से परिवर्तित किए गए इस अधिकार पर चर्चा कीजिए| एक संगत निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - भारत के मौलिक संविधान में, मौलिक अधिकार संबंधी अध्याय में, मौलिक अधिकारों को 7 भागों में बांटा गया था जिसमें से एक संपति का अधिकार था और उसे अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 में स्थान दिया गया था| अनुच्छेद 19(1)(f) प्रत्येक नागरिक को संपति का अधिग्रहण करने, उसको रखने एवं निपटाने की गारंटी देता था वहीँ अनुच्छेद 31 प्रत्येक व्यक्ति(चाहे वह नागरिक हो या गैर-नागरिक) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपति से बेदखल करने के खिलाफ अधिकार प्रदान करता है| इसमें यह व्यवस्था है कि बिना विधि सम्मत कानून के कोई भी संपति पर अधिकार नहीं जताएगा| संपति के अधिकार से संबंधित 2 अपवाद थें - लोकहित या जनहित में निजी संपति का अधिग्रहण हो सकता है| संपति लिए जाने की स्थिति में क्षतिपूर्ति की जाएगी| संविधान लागू होने के बाद कृषि क्षेत्र में सुधार, भूमि सुधार और आर्थिक सुधार के माध्यम से समतामूलक समाज की स्थापना के उद्देश्य से जब प्रयास प्रारंभ हुयें तो यह अधिकार सर्वाधिक विवादास्पद बना तथा न्यायपालिका एवं संसद के बीच संघर्ष का कारण बना| भारतीय संसद ने अनेक संविधान संशोधनों(जैसे- पहला, चौथा, सातवाँ, पच्चीसवां, 42वां, 44वां संशोधन आदि) के माध्यम से संपति के अधिकार में व्यापक बदलाव किया| इन संशोधनों के द्वारा मौलिक अधिकारों के अपवादस्वरुप अनुच्छेद 31(A), अनुच्छेद 31(B) और अनुच्छेद 31(C) शामिल किया गया तथा समय-समय पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को इस विवादास्पद अधिकार के संबंध में कम किया गया| इनमें से अधिकतर मामलें निजी संपति के लिए अनुरोध, उनके अधिग्रहण एवं उनके क्षतिपूर्ति के भुगतान के संबंध में थें| 44वें संविधान संशोधन(1978) तथा संपति के अधिकार की मौजूदा स्थिति 44वें संविधान संशोधन(1978) के माध्यम से संपति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के अध्याय से बाहर करके(अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 को निरसित करके) संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 300(A) के अंतर्गत रख दिया गया| तथा विधिक अधिकार के रूप में संपति का अधिकार निम्नलिखित तरीके से लागू होता है - संपति का अधिकार मौलिक अधिकार ना होकर विधिक अधिकार बन गया जिसके प्रावधानों में संसद के सामान्य विधि के द्वारा आवश्यक बदलाव लाया जा सकता है| साथ ही, यह संविधान के मूल ढांचे का भी हिस्सा अब नहीं है| इसे बिना संविधान संशोधन के संसद के साधारण कानून के तहत नियमित, कम अथवा पुनर्निर्धारित किया जा सकता है| यह कार्यकारी क्रिया के खिलाफ निजी संपति की रक्षा करता है लेकिन विधायी कार्य के खिलाफ नहीं| इस अधिकार के उल्लंघन की स्थिति में अनुच्छेद 32 के तहत संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा लेकिन अनुच्छेद 226 के तहत HC में संरक्षण की याचिका दायर की जा सकती है| राज्य के द्वारा संपति अधिगृहित करने की स्थिति में क्षतिपूर्ति देने की कोई प्रत्याभूति नहीं होगी सिवाय 2 परिस्थितियों के -- अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं की संपति यदि अर्जित की जाती है तो राज्य क्षतिपूर्ति करेगा लेकिन उसकी मात्रा क्या होगी यह राज्य द्वारा निर्धारित होगा| अनुच्छेद 31(A) के तहत 17वें संविधान संशोधन(1964) के माध्यम से यह प्रावधान दिया गया कि यदि राज्य के द्वारा कृषि हेतु प्रयुक्त हो रही कोई जमीन/भूमि किसानों से ली जा रही है और किसान स्वंय उसपर खेती कर रहा है तथा चकबंदी की सीमा के तहत ही वह भूमि है तो राज्य को बाजारी मूल्य के आधार पर क्षतिपूर्ति करनी होगी| इस तरह संपति का अधिकार एक सामान्य विधिक अधिकार या संवैधानिक अधिकार है जिसके बारे में SC ने अपने अवलोकन में कहा है कि संपति का अधिकार मानवाधिकार है|
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राज्य के नीति निर्देशक तत्वों व मौलिक अधिकारों के बीच अंतरसंबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) Briefly comment on the interrelations between the Directive Principles of State Policy and Fundamental Rights. (150-200 words, Marks -10)
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दृष्टिकोण : मौलिक अधिकार व नीति निर्देशक तत्वों के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुये भूमिका लिखिए । दोनों से संबन्धित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिये । न्यायिक निर्णयों द्वारा वर्तमान समय में दोनों के बीच के संबधों को दर्शाइए । उत्तर : भारतीय संविधान के भाग - 3 में न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में मौलिक अधिकारों की चर्चा मिलती है और भाग - 4 में गैर-प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में नीति निर्देशक तत्वों की चर्चा मिलती है । एक ओर मौलिक अधिकारों की न्यापालिका द्वारा गारंटी और निदेशक तत्वों की गैर न्यायोचितता तथा दूसरी ओर निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए राज्य की नतिक बाध्यता ने दोनों के मध्य टकराव को जन्म दिया है । इससे मौलिक अधिकारों व निदेशक तत्वों के परस्पर सम्बन्धों को लेकर एक विवाद व असपष्टता की स्थिति बनी रही है जिसे न्यायपालिका द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से समय - समय पर दूर करने का प्रयास किया गया है । यद्यपि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों के बीच प्रमुखता से अंतर स्थापित किया जाता है लेकिन राष्ट्रीय एवं सामाजिक हितों में समय के साथ हो रहे बदलाव को ध्यान में रखते हुये न्यायपालिका ने अपने निर्णयों से सह-संबंध स्थापित करने पर बल दिया है । इसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : चंपक्कम दोरइराजन बनाम 1951 और गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 के केस में न्यायपालिका ने मौलिक अधिकार को प्राथमिकता दी लेकिन संविधान के सौहार्दपूर्ण व्याख्या के सिद्धांत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हुये गोलकनाथ के केस में न्यायपालिका ने माना कि मौलिक अधिकारों को कमजोर किए बगैर एक ऐसी व्यवस्था का विकास होना चाहिए जिसमें पर्याप्त लचिलापन हो और समरसतापूर्वक दोनों के बीच में सह-संबंध स्थापित किया जा सके । इसके बाद 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के केस में और वर्ष 2007 में किल्हों बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में न्यायपालिका ने सौहार्द और संतुलन तथा माध्यम मार्ग का समर्थन किया । केशवानंद भारती के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इन दोनों के बीच में विरोधी तत्व नहीं हैं । जबकि मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ के केस में 1980 में न्यायपालिका ने कहा कि मौलिक अधिकार साध्य नहीं हैं बल्कि ये साध्य प्राप्ति के साधन हैं । साध्य तो नीति निर्देशक तत्वों में लिखे गए हैं । उपर्युक्त निर्णयों के आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है कि नीति निर्देशक तत्व मौलिक अधिकारों से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है तथा इन दोनों के बीच में सौहार्द और संतुलन स्थापित करके संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय को प्राप्त करना संभव हो सकता है तथा मानवाधिकार के रूप में विकास का अधिकार देश की जनता को दिया जा सकता है ।
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##Question:राज्य के नीति निर्देशक तत्वों व मौलिक अधिकारों के बीच अंतरसंबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) Briefly comment on the interrelations between the Directive Principles of State Policy and Fundamental Rights. (150-200 words, Marks -10)##Answer:दृष्टिकोण : मौलिक अधिकार व नीति निर्देशक तत्वों के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुये भूमिका लिखिए । दोनों से संबन्धित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिये । न्यायिक निर्णयों द्वारा वर्तमान समय में दोनों के बीच के संबधों को दर्शाइए । उत्तर : भारतीय संविधान के भाग - 3 में न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में मौलिक अधिकारों की चर्चा मिलती है और भाग - 4 में गैर-प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में नीति निर्देशक तत्वों की चर्चा मिलती है । एक ओर मौलिक अधिकारों की न्यापालिका द्वारा गारंटी और निदेशक तत्वों की गैर न्यायोचितता तथा दूसरी ओर निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए राज्य की नतिक बाध्यता ने दोनों के मध्य टकराव को जन्म दिया है । इससे मौलिक अधिकारों व निदेशक तत्वों के परस्पर सम्बन्धों को लेकर एक विवाद व असपष्टता की स्थिति बनी रही है जिसे न्यायपालिका द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से समय - समय पर दूर करने का प्रयास किया गया है । यद्यपि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों के बीच प्रमुखता से अंतर स्थापित किया जाता है लेकिन राष्ट्रीय एवं सामाजिक हितों में समय के साथ हो रहे बदलाव को ध्यान में रखते हुये न्यायपालिका ने अपने निर्णयों से सह-संबंध स्थापित करने पर बल दिया है । इसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : चंपक्कम दोरइराजन बनाम 1951 और गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 के केस में न्यायपालिका ने मौलिक अधिकार को प्राथमिकता दी लेकिन संविधान के सौहार्दपूर्ण व्याख्या के सिद्धांत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हुये गोलकनाथ के केस में न्यायपालिका ने माना कि मौलिक अधिकारों को कमजोर किए बगैर एक ऐसी व्यवस्था का विकास होना चाहिए जिसमें पर्याप्त लचिलापन हो और समरसतापूर्वक दोनों के बीच में सह-संबंध स्थापित किया जा सके । इसके बाद 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के केस में और वर्ष 2007 में किल्हों बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में न्यायपालिका ने सौहार्द और संतुलन तथा माध्यम मार्ग का समर्थन किया । केशवानंद भारती के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इन दोनों के बीच में विरोधी तत्व नहीं हैं । जबकि मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ के केस में 1980 में न्यायपालिका ने कहा कि मौलिक अधिकार साध्य नहीं हैं बल्कि ये साध्य प्राप्ति के साधन हैं । साध्य तो नीति निर्देशक तत्वों में लिखे गए हैं । उपर्युक्त निर्णयों के आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है कि नीति निर्देशक तत्व मौलिक अधिकारों से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है तथा इन दोनों के बीच में सौहार्द और संतुलन स्थापित करके संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय को प्राप्त करना संभव हो सकता है तथा मानवाधिकार के रूप में विकास का अधिकार देश की जनता को दिया जा सकता है ।
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राज्य के नीति निर्देशक तत्वों व मौलिक अधिकारों के बीच अंतरसंबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) Briefly comment on the interrelations between the Directive Principles of State Policy and Fundamental Rights. (150-200 words, Marks -10)
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दृष्टिकोण : मौलिक अधिकार व नीति निर्देशक तत्वों के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुये भूमिका लिखिए । दोनों से संबन्धित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिये । न्यायिक निर्णयों द्वारा वर्तमान समय में दोनों के बीच के संबधों को दर्शाइए । उत्तर : भारतीय संविधान के भाग - 3 में न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में मौलिक अधिकारों की चर्चा मिलती है और भाग - 4 में गैर-प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में नीति निर्देशक तत्वों की चर्चा मिलती है । एक ओर मौलिक अधिकारों की न्यापालिका द्वारा गारंटी और निदेशक तत्वों की गैर न्यायोचितता तथा दूसरी ओर निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए राज्य की नतिक बाध्यता ने दोनों के मध्य टकराव को जन्म दिया है । इससे मौलिक अधिकारों व निदेशक तत्वों के परस्पर सम्बन्धों को लेकर एक विवाद व असपष्टता की स्थिति बनी रही है जिसे न्यायपालिका द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से समय - समय पर दूर करने का प्रयास किया गया है । यद्यपि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों के बीच प्रमुखता से अंतर स्थापित किया जाता है लेकिन राष्ट्रीय एवं सामाजिक हितों में समय के साथ हो रहे बदलाव को ध्यान में रखते हुये न्यायपालिका ने अपने निर्णयों से सह-संबंध स्थापित करने पर बल दिया है । इसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : चंपक्कम दोरइराजन बनाम 1951 और गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 के केस में न्यायपालिका ने मौलिक अधिकार को प्राथमिकता दी लेकिन संविधान के सौहार्दपूर्ण व्याख्या के सिद्धांत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हुये गोलकनाथ के केस में न्यायपालिका ने माना कि मौलिक अधिकारों को कमजोर किए बगैर एक ऐसी व्यवस्था का विकास होना चाहिए जिसमें पर्याप्त लचिलापन हो और समरसतापूर्वक दोनों के बीच में सह-संबंध स्थापित किया जा सके । इसके बाद 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के केस में और वर्ष 2007 में किल्हों बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में न्यायपालिका ने सौहार्द और संतुलन तथा माध्यम मार्ग का समर्थन किया । केशवानंद भारती के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इन दोनों के बीच में विरोधी तत्व नहीं हैं । जबकि मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ के केस में 1980 में न्यायपालिका ने कहा कि मौलिक अधिकार साध्य नहीं हैं बल्कि ये साध्य प्राप्ति के साधन हैं । साध्य तो नीति निर्देशक तत्वों में लिखे गए हैं । उपर्युक्त निर्णयों के आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है कि नीति निर्देशक तत्व मौलिक अधिकारों से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है तथा इन दोनों के बीच में सौहार्द और संतुलन स्थापित करके संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय को प्राप्त करना संभव हो सकता है तथा मानवाधिकार के रूप में विकास का अधिकार देश की जनता को दिया जा सकता है ।
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##Question:राज्य के नीति निर्देशक तत्वों व मौलिक अधिकारों के बीच अंतरसंबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) Briefly comment on the interrelations between the Directive Principles of State Policy and Fundamental Rights. (150-200 words, Marks -10)##Answer:दृष्टिकोण : मौलिक अधिकार व नीति निर्देशक तत्वों के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुये भूमिका लिखिए । दोनों से संबन्धित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिये । न्यायिक निर्णयों द्वारा वर्तमान समय में दोनों के बीच के संबधों को दर्शाइए । उत्तर : भारतीय संविधान के भाग - 3 में न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में मौलिक अधिकारों की चर्चा मिलती है और भाग - 4 में गैर-प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में नीति निर्देशक तत्वों की चर्चा मिलती है । एक ओर मौलिक अधिकारों की न्यापालिका द्वारा गारंटी और निदेशक तत्वों की गैर न्यायोचितता तथा दूसरी ओर निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए राज्य की नतिक बाध्यता ने दोनों के मध्य टकराव को जन्म दिया है । इससे मौलिक अधिकारों व निदेशक तत्वों के परस्पर सम्बन्धों को लेकर एक विवाद व असपष्टता की स्थिति बनी रही है जिसे न्यायपालिका द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से समय - समय पर दूर करने का प्रयास किया गया है । यद्यपि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों के बीच प्रमुखता से अंतर स्थापित किया जाता है लेकिन राष्ट्रीय एवं सामाजिक हितों में समय के साथ हो रहे बदलाव को ध्यान में रखते हुये न्यायपालिका ने अपने निर्णयों से सह-संबंध स्थापित करने पर बल दिया है । इसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : चंपक्कम दोरइराजन बनाम 1951 और गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 के केस में न्यायपालिका ने मौलिक अधिकार को प्राथमिकता दी लेकिन संविधान के सौहार्दपूर्ण व्याख्या के सिद्धांत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हुये गोलकनाथ के केस में न्यायपालिका ने माना कि मौलिक अधिकारों को कमजोर किए बगैर एक ऐसी व्यवस्था का विकास होना चाहिए जिसमें पर्याप्त लचिलापन हो और समरसतापूर्वक दोनों के बीच में सह-संबंध स्थापित किया जा सके । इसके बाद 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के केस में और वर्ष 2007 में किल्हों बनाम तमिलनाडु राज्य के केस में न्यायपालिका ने सौहार्द और संतुलन तथा माध्यम मार्ग का समर्थन किया । केशवानंद भारती के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इन दोनों के बीच में विरोधी तत्व नहीं हैं । जबकि मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ के केस में 1980 में न्यायपालिका ने कहा कि मौलिक अधिकार साध्य नहीं हैं बल्कि ये साध्य प्राप्ति के साधन हैं । साध्य तो नीति निर्देशक तत्वों में लिखे गए हैं । उपर्युक्त निर्णयों के आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है कि नीति निर्देशक तत्व मौलिक अधिकारों से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है तथा इन दोनों के बीच में सौहार्द और संतुलन स्थापित करके संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय को प्राप्त करना संभव हो सकता है तथा मानवाधिकार के रूप में विकास का अधिकार देश की जनता को दिया जा सकता है ।
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"विरासत" से आप क्या समझते हैं? भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासतों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by "heritage"? Discuss the heritage of the national movement of India. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में विरासत को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में राजनीति सामाजिक एवं आर्थिक विरासतों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में वर्तमान सन्दर्भ में विरासतों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विरासत भौतिक तत्वों और अमूर्त विशेषताओं का एक समूह है जो एक व्यक्ति या समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे पूर्वजों के सामाजिक विरासत द्वारा हासिल किया गया है। इस विरासत में इमारतों और स्मारकों, वस्तुओं और कला का प्रतिनिधित्व करने वाले मूर्त सांस्कृतिक तत्व शामिल हैं| जबकि अमूर्त विरासत में विश्वास, ज्ञान, कलात्मक अभिव्यक्ति, मानदंड और मूल्य, सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं और रीति-रिवाजों, स्थानों, वस्तुओं और संस्कृति की अन्य विविध अभिव्यक्तियां शामिल हैं| विरासतें हमारे वर्तमान के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| भारत को स्वतंत्रता संग्राम की विरासतें प्राप्त हुई हैं जो निम्नवत हैं| राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे समानता स्वतंत्रता आदि के प्रति आस्था लोकतांत्रिक कार्यशैली का व्यापक अनुभव तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन का अनुभव नागरिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता जैसे प्रेस की स्वतंत्रता अहिंसात्मक रणनीति के कारण समाज का लोकतांत्रिकरण अखिल भारतीय दृष्टिकोण को आत्मसात करना एवं अखिल भारतीय दृष्टिकोण से युक्त नेतृत्व एवं राजनीतिक दल भविष्य की सरकार की एक स्पष्ट रूपरेखा जैसे बॉम्बे प्लान, कराची अधिवेशन में प्रस्तुत प्रस्ताव आदि संवैधानिक निर्माण एवं उसके प्रावधानों के सन्दर्भ में भी व्यापक अनुभव विविधता में एकता का सम्मान, समाज के सभी वर्गों के उत्थान का लक्ष्य, भाषाई विविधता का सम्मान आदि विदेश नीति के क्षेत्र में साम्राज्यवाद फ़ासीवाद एवं रंगभेद के विरोध की विरासत आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत आत्मनिर्भरता का मूल्य, नियोजित विकास कृषि सुधार की प्रेरणा औद्योगिक विकास की प्ररेणा विदेशी पूँजी पर नियंत्रण करने की मनोदशा आदि सामाजिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत समाज के कमजोर एवं वंचित वर्गों के उत्थान का महत्त्व समझा गया सभी को शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराने की प्रेरणा समतामूलक समाज बनाने के लिए उपाय जैसे महिलाओं की स्थिति में सुधार भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में विकास कर रहा है| भारतीय नागरिकों को सामाजिक आर्थिक राजनीति न्याय दिलाना भारत का उद्देश्य है इसके साथ ही भारतीय संविधान विविध नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित करता है| भारत की वर्तमान स्थिति एवं उसके आदर्शों का निर्धारण भारत को प्राप्त राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासतों एवं ब्रिटिश सत्ता की विरासतों के आधार पर हुआ है|
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##Question:"विरासत" से आप क्या समझते हैं? भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासतों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by "heritage"? Discuss the heritage of the national movement of India. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विरासत को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में राजनीति सामाजिक एवं आर्थिक विरासतों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में वर्तमान सन्दर्भ में विरासतों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विरासत भौतिक तत्वों और अमूर्त विशेषताओं का एक समूह है जो एक व्यक्ति या समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे पूर्वजों के सामाजिक विरासत द्वारा हासिल किया गया है। इस विरासत में इमारतों और स्मारकों, वस्तुओं और कला का प्रतिनिधित्व करने वाले मूर्त सांस्कृतिक तत्व शामिल हैं| जबकि अमूर्त विरासत में विश्वास, ज्ञान, कलात्मक अभिव्यक्ति, मानदंड और मूल्य, सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं और रीति-रिवाजों, स्थानों, वस्तुओं और संस्कृति की अन्य विविध अभिव्यक्तियां शामिल हैं| विरासतें हमारे वर्तमान के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| भारत को स्वतंत्रता संग्राम की विरासतें प्राप्त हुई हैं जो निम्नवत हैं| राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे समानता स्वतंत्रता आदि के प्रति आस्था लोकतांत्रिक कार्यशैली का व्यापक अनुभव तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन का अनुभव नागरिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता जैसे प्रेस की स्वतंत्रता अहिंसात्मक रणनीति के कारण समाज का लोकतांत्रिकरण अखिल भारतीय दृष्टिकोण को आत्मसात करना एवं अखिल भारतीय दृष्टिकोण से युक्त नेतृत्व एवं राजनीतिक दल भविष्य की सरकार की एक स्पष्ट रूपरेखा जैसे बॉम्बे प्लान, कराची अधिवेशन में प्रस्तुत प्रस्ताव आदि संवैधानिक निर्माण एवं उसके प्रावधानों के सन्दर्भ में भी व्यापक अनुभव विविधता में एकता का सम्मान, समाज के सभी वर्गों के उत्थान का लक्ष्य, भाषाई विविधता का सम्मान आदि विदेश नीति के क्षेत्र में साम्राज्यवाद फ़ासीवाद एवं रंगभेद के विरोध की विरासत आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत आत्मनिर्भरता का मूल्य, नियोजित विकास कृषि सुधार की प्रेरणा औद्योगिक विकास की प्ररेणा विदेशी पूँजी पर नियंत्रण करने की मनोदशा आदि सामाजिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत समाज के कमजोर एवं वंचित वर्गों के उत्थान का महत्त्व समझा गया सभी को शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराने की प्रेरणा समतामूलक समाज बनाने के लिए उपाय जैसे महिलाओं की स्थिति में सुधार भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में विकास कर रहा है| भारतीय नागरिकों को सामाजिक आर्थिक राजनीति न्याय दिलाना भारत का उद्देश्य है इसके साथ ही भारतीय संविधान विविध नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित करता है| भारत की वर्तमान स्थिति एवं उसके आदर्शों का निर्धारण भारत को प्राप्त राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासतों एवं ब्रिटिश सत्ता की विरासतों के आधार पर हुआ है|
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किस प्रकार से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीतियाँ भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास में सहयोग प्रदान कर सकती हैं| चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) How Science and Technology Policies can support science and technology development in India. Discuss (150–200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास से किसी राष्ट्र को होने वाले लाभों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का आरंभ कीजिए| भारत में आज़ादी के बाद से बनी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीतियों का उल्लेख करते हुए उनके माध्यम से इस क्षेत्र में विकास की रूपरेखा का उल्लेख कीजिए| इन नीतियों के साथ-साथ, कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का भी उल्लेख कीजिए| विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास को और बढ़ावा देने हेतु कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - आधुनिक समय में वही राष्ट्र दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है जो तकनीक एवं विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी हो| अमेरिका, रूस, जापान, कोरिया आदि देशों की श्रेष्ठता उनके द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में निवेश से ही बनी है| विज्ञान एवं तकनीकी विकास से उस देश में निवेश को बढ़ावा मिलता है, बेहतर मानव पूंजी का विकास होता है, औद्योगिक विकास से वह देश सैन्य श्रेष्ठता भी हासिल करने हेतु अग्रसर होता है एवं साथ ही, संबंधित देश के निवासियों में उच्च आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा मिलता है| औद्योगीकरण के पश्चात एक ओर जहाँ पश्चिमी देश विज्ञान एवं तकनीक क्षेत्र में नए अनुसंधान के माध्यम से आगे बढ़ते गयें वहीँ भारत गुलामी की दासता से निकलने में ही बना रहा| इस संदर्भ में आज़ादी मिलने के बाद सरकार के द्वारा विज्ञान एवं तकनीक को बढ़ावा देने हेतु नीतियों का निर्माण किया गया| भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित नीतियाँ विज्ञान नीति संकल्प/प्रस्तावना(1958) मौलिक एवं अनुप्रयोग आधारित विज्ञान में शोध एवं अनुसंधान पर बल; विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहन; कुशल/प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को भारत में अनुसंधान या शोध के अवसर प्रदान करना; सामरिक क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य; विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान व विकास द्वारा सामाजिक-आर्थिक विकास; प्रौद्योगिकी नीति वक्तव्य(1983) भारत में तकनीकी आत्मनिर्भरता पर बल; प्रौद्योगिकीय स्वदेशीकरण; अधिक उत्पादन, विनिर्माण तकनीकी विकास द्वारा रोजगार सृजन को बढ़ावा; खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, पर्यावरण आदि क्षेत्रों को प्राथमिकता; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति(2003) उन्नत प्रौद्योगिकी शोध एवं विकास पर बल; बौद्धिक सम्पदा अधिकार को बढ़ावा देना; अनुसंधान एवं विकास कार्यों में निजी कंपनियों/संस्थाओं की भागीदारिता को बढ़ावा देना; प्रयोगशाला से बाजार तक पहुँच को बढ़ावा; महिला वैज्ञानिकों की संख्या अधिक करना तथा उनको बढ़ावा देना; विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति(2013) प्रत्येक स्तर पर नवाचार को बढ़ावा देना; सरकारी एवं निजी क्षेत्रों के द्वारा सहयोग से कार्य; स्टार्ट-अप को बढ़ावा देना; लक्ष्य - भारत को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान में शीर्ष 5 राष्ट्रों में शामिल होना; शोधकार्य में अंतर्राष्ट्रीय साझा सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यक्रम INSPIRE कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति; पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद शिक्षण कार्य एवं अनुसंधान के अवसर; मानक(MANAK) कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; विद्यालय में 10-15 वर्ष आयु के छात्रों में नवोन्मेष/नवाचार एवं रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना; भारतीय राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान द्वारा सर्वोत्तम आईडिया का चयन; अटल नवाचार मिशन(AIM) - नीति आयोग के द्वारा संचालित; अटल टिंकरिंग लैब(ATL) ; मेंटर इंडिया कार्यक्रम; स्व-रोजगार एवं प्रतिभा को बढ़ावा देना( SETU ); किरण(KIRAN) कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; कार्यरत महिला वैज्ञानिकों को सहयोग एवं अवसर प्रदान करना; महिला वैज्ञानिकों के पदोन्नति के अवसर प्रदान करना; ऐसे महिला वैज्ञानिक जिन्होंने नौकरी निजी कारणों से छोड़ चुकी हों वे पुनः नौकरी कर सकती हैं| IMPRINT - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) एवं HRD मंत्रालय के द्वारा संचालित; IITs एवं IISc. के द्वारा उन्नत तकनीकी पर शोधकार्य किया जाना; IIT कानपुर के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को किया जाना; निधि(NIDHI) कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; स्वरोजगार को बढ़ावा देना; उद्यमिता को बढ़ावा देना; सरकार के द्वारा इस क्षेत्र में उपरोक्त नीतियों के लाने जाने से निःसंदेह विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र को बढ़ावा मिला है| इस संदर्भ में कुछ अन्य उपाय किए जाने पर भी बल देने की आवश्यकता है जैसे - INSPIRE कार्यक्रम का और विस्तार तथा ज्यादा से ज्यादा प्रतिभाशाली युवाओं को इस क्षेत्र में शोध तथा अनुसंधान हेतु स्कूल के समय से ही प्रोत्साहन; शोध एवं अनुसंधान कार्य में लगे युवाओं को छात्रवृत्ति की रकम को बढ़ाना ताकि वे नौकरी इतना ही प्राथमिकता शोध एवं अनुसंधान कार्य को भी दें| और ज्यादा से ज्यादा शोध एवं अनुसंधान संस्थानों की स्थापना; इस संदर्भ में उच्चतर राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा इन संस्थानों का नियमित दौरा जिससे इनका मीडिया कवरेज बढ़ना; स्कूल लेवल से ही शोध संस्थानों को जोड़ना ताकि बच्चों में इस क्षेत्र में रूचि हो| उद्योग तथा शोध एवं अनुसंधान संस्थानों के मध्य लिंकेज को बढ़ावा देना ताकि शोध एवं अनुसंधान संस्थान उद्योग की जरूरतों के अनुसार कार्य कर सकें|
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##Question:किस प्रकार से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीतियाँ भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास में सहयोग प्रदान कर सकती हैं| चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) How Science and Technology Policies can support science and technology development in India. Discuss (150–200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास से किसी राष्ट्र को होने वाले लाभों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का आरंभ कीजिए| भारत में आज़ादी के बाद से बनी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीतियों का उल्लेख करते हुए उनके माध्यम से इस क्षेत्र में विकास की रूपरेखा का उल्लेख कीजिए| इन नीतियों के साथ-साथ, कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का भी उल्लेख कीजिए| विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास को और बढ़ावा देने हेतु कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - आधुनिक समय में वही राष्ट्र दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है जो तकनीक एवं विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी हो| अमेरिका, रूस, जापान, कोरिया आदि देशों की श्रेष्ठता उनके द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में निवेश से ही बनी है| विज्ञान एवं तकनीकी विकास से उस देश में निवेश को बढ़ावा मिलता है, बेहतर मानव पूंजी का विकास होता है, औद्योगिक विकास से वह देश सैन्य श्रेष्ठता भी हासिल करने हेतु अग्रसर होता है एवं साथ ही, संबंधित देश के निवासियों में उच्च आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा मिलता है| औद्योगीकरण के पश्चात एक ओर जहाँ पश्चिमी देश विज्ञान एवं तकनीक क्षेत्र में नए अनुसंधान के माध्यम से आगे बढ़ते गयें वहीँ भारत गुलामी की दासता से निकलने में ही बना रहा| इस संदर्भ में आज़ादी मिलने के बाद सरकार के द्वारा विज्ञान एवं तकनीक को बढ़ावा देने हेतु नीतियों का निर्माण किया गया| भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित नीतियाँ विज्ञान नीति संकल्प/प्रस्तावना(1958) मौलिक एवं अनुप्रयोग आधारित विज्ञान में शोध एवं अनुसंधान पर बल; विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहन; कुशल/प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को भारत में अनुसंधान या शोध के अवसर प्रदान करना; सामरिक क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य; विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान व विकास द्वारा सामाजिक-आर्थिक विकास; प्रौद्योगिकी नीति वक्तव्य(1983) भारत में तकनीकी आत्मनिर्भरता पर बल; प्रौद्योगिकीय स्वदेशीकरण; अधिक उत्पादन, विनिर्माण तकनीकी विकास द्वारा रोजगार सृजन को बढ़ावा; खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, पर्यावरण आदि क्षेत्रों को प्राथमिकता; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति(2003) उन्नत प्रौद्योगिकी शोध एवं विकास पर बल; बौद्धिक सम्पदा अधिकार को बढ़ावा देना; अनुसंधान एवं विकास कार्यों में निजी कंपनियों/संस्थाओं की भागीदारिता को बढ़ावा देना; प्रयोगशाला से बाजार तक पहुँच को बढ़ावा; महिला वैज्ञानिकों की संख्या अधिक करना तथा उनको बढ़ावा देना; विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति(2013) प्रत्येक स्तर पर नवाचार को बढ़ावा देना; सरकारी एवं निजी क्षेत्रों के द्वारा सहयोग से कार्य; स्टार्ट-अप को बढ़ावा देना; लक्ष्य - भारत को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान में शीर्ष 5 राष्ट्रों में शामिल होना; शोधकार्य में अंतर्राष्ट्रीय साझा सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यक्रम INSPIRE कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति; पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद शिक्षण कार्य एवं अनुसंधान के अवसर; मानक(MANAK) कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; विद्यालय में 10-15 वर्ष आयु के छात्रों में नवोन्मेष/नवाचार एवं रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना; भारतीय राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान द्वारा सर्वोत्तम आईडिया का चयन; अटल नवाचार मिशन(AIM) - नीति आयोग के द्वारा संचालित; अटल टिंकरिंग लैब(ATL) ; मेंटर इंडिया कार्यक्रम; स्व-रोजगार एवं प्रतिभा को बढ़ावा देना( SETU ); किरण(KIRAN) कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; कार्यरत महिला वैज्ञानिकों को सहयोग एवं अवसर प्रदान करना; महिला वैज्ञानिकों के पदोन्नति के अवसर प्रदान करना; ऐसे महिला वैज्ञानिक जिन्होंने नौकरी निजी कारणों से छोड़ चुकी हों वे पुनः नौकरी कर सकती हैं| IMPRINT - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) एवं HRD मंत्रालय के द्वारा संचालित; IITs एवं IISc. के द्वारा उन्नत तकनीकी पर शोधकार्य किया जाना; IIT कानपुर के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को किया जाना; निधि(NIDHI) कार्यक्रम - DST(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) के द्वारा संचालित; स्वरोजगार को बढ़ावा देना; उद्यमिता को बढ़ावा देना; सरकार के द्वारा इस क्षेत्र में उपरोक्त नीतियों के लाने जाने से निःसंदेह विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र को बढ़ावा मिला है| इस संदर्भ में कुछ अन्य उपाय किए जाने पर भी बल देने की आवश्यकता है जैसे - INSPIRE कार्यक्रम का और विस्तार तथा ज्यादा से ज्यादा प्रतिभाशाली युवाओं को इस क्षेत्र में शोध तथा अनुसंधान हेतु स्कूल के समय से ही प्रोत्साहन; शोध एवं अनुसंधान कार्य में लगे युवाओं को छात्रवृत्ति की रकम को बढ़ाना ताकि वे नौकरी इतना ही प्राथमिकता शोध एवं अनुसंधान कार्य को भी दें| और ज्यादा से ज्यादा शोध एवं अनुसंधान संस्थानों की स्थापना; इस संदर्भ में उच्चतर राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा इन संस्थानों का नियमित दौरा जिससे इनका मीडिया कवरेज बढ़ना; स्कूल लेवल से ही शोध संस्थानों को जोड़ना ताकि बच्चों में इस क्षेत्र में रूचि हो| उद्योग तथा शोध एवं अनुसंधान संस्थानों के मध्य लिंकेज को बढ़ावा देना ताकि शोध एवं अनुसंधान संस्थान उद्योग की जरूरतों के अनुसार कार्य कर सकें|
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What are the forces dominant in the Youth stage of river flow? Enumerate the landforms associated with the youthful stage. (150 Words/10 Marks)
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APPROACH: Introduction: Mention landforms created by running water. Body: Firstly mention the forces dominant in the Youthful stage of the river. In the second part, mention the landforms associated with the youthful stage of the river. Conclusion: ANSWER: Landforms are created by the various process, which involves an endogenic and exogenic process. Running water is an exogenic agent which creates various landforms in various stages of its travel, i.e. youthful, mature and old stages. The youthful stage is that stage which is the 1st stage and the river is having an immense force to create various landforms. Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and youthful rivers flowing over steep gradients. Forces dominant during the youthful stage of a river: High Velocity: Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and high velocity. Steep gradients: This increases the potential energy of water and enhances the erosional features. High Erosion : With time, stream channels over steep gradients turn gentler due to continued erosion. Deposition: Eroded materials get transported because of the flow of the river. Landforms associated with the youthful stage of the river: V-shaped valley - Valleys start as small and narrow rills; the rills will gradually develop into long and wide gullies; the gullies will further deepen, widen and lengthen to give rise to valleys. Gorge - A gorge is a deep valley with very steep to straight sides and Canyon - A canyon is characterized by steep step-like side slopes and maybe as deep as a gorge. A gorge is almost equal in width at its top as well as its bottom. In contrast, a canyon is wider at its top than at its bottom. In fact, a canyon is a variant of the gorge. Valley types depend upon the type and structure of rocks in which they form. For example, canyons commonly form in horizontal bedded sedimentary rocks and gorges form in hard rocks. Potholes - Over the rocky beds of hill-streams more or less circular depressions called potholes form because of stream erosion aided by the abrasion of rock fragments. Once a small and shallow depression forms, pebbles and boulders get collected in those depressions and get rotated by flowing water and consequently the depressions grow in dimensions. A series of such depressions eventually join and the stream valley gets deepened. Plunge Pools - At the foot of waterfalls also, large potholes, quite deep and wide, form because of the sheer impact of water and rotation of boulders. Such large and deep holes at the base of waterfalls are called plunge pools. These pools also help in the deepening of valleys. Waterfalls - Waterfalls are transitory like any other landform and will recede gradually and bring the floor of the valley above waterfalls to the level below. After the youth stage, the river forms various landforms in the mature and old stages. In these stages erosion is the dominant feature, landforms are like meanders, flood plains, delta, etc. Note: A diagram of the landform will be appreciated. Reference: NCERT
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##Question:What are the forces dominant in the Youth stage of river flow? Enumerate the landforms associated with the youthful stage. (150 Words/10 Marks)##Answer:APPROACH: Introduction: Mention landforms created by running water. Body: Firstly mention the forces dominant in the Youthful stage of the river. In the second part, mention the landforms associated with the youthful stage of the river. Conclusion: ANSWER: Landforms are created by the various process, which involves an endogenic and exogenic process. Running water is an exogenic agent which creates various landforms in various stages of its travel, i.e. youthful, mature and old stages. The youthful stage is that stage which is the 1st stage and the river is having an immense force to create various landforms. Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and youthful rivers flowing over steep gradients. Forces dominant during the youthful stage of a river: High Velocity: Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and high velocity. Steep gradients: This increases the potential energy of water and enhances the erosional features. High Erosion : With time, stream channels over steep gradients turn gentler due to continued erosion. Deposition: Eroded materials get transported because of the flow of the river. Landforms associated with the youthful stage of the river: V-shaped valley - Valleys start as small and narrow rills; the rills will gradually develop into long and wide gullies; the gullies will further deepen, widen and lengthen to give rise to valleys. Gorge - A gorge is a deep valley with very steep to straight sides and Canyon - A canyon is characterized by steep step-like side slopes and maybe as deep as a gorge. A gorge is almost equal in width at its top as well as its bottom. In contrast, a canyon is wider at its top than at its bottom. In fact, a canyon is a variant of the gorge. Valley types depend upon the type and structure of rocks in which they form. For example, canyons commonly form in horizontal bedded sedimentary rocks and gorges form in hard rocks. Potholes - Over the rocky beds of hill-streams more or less circular depressions called potholes form because of stream erosion aided by the abrasion of rock fragments. Once a small and shallow depression forms, pebbles and boulders get collected in those depressions and get rotated by flowing water and consequently the depressions grow in dimensions. A series of such depressions eventually join and the stream valley gets deepened. Plunge Pools - At the foot of waterfalls also, large potholes, quite deep and wide, form because of the sheer impact of water and rotation of boulders. Such large and deep holes at the base of waterfalls are called plunge pools. These pools also help in the deepening of valleys. Waterfalls - Waterfalls are transitory like any other landform and will recede gradually and bring the floor of the valley above waterfalls to the level below. After the youth stage, the river forms various landforms in the mature and old stages. In these stages erosion is the dominant feature, landforms are like meanders, flood plains, delta, etc. Note: A diagram of the landform will be appreciated. Reference: NCERT
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As the Housing society in Faircity, an older community in Honestopolis is in a dilapidated state, the Municipal Corporation of Honestopolis (MCH) has declared the area appropriate for redevelopment appointing you as project director. You have a team of two specialists, Prateek and Tarun, and the mandate is to determine which of the houses should be rehabilitated and which must be demolished. Prateek and Tarun, report to you about Mrs. Sudha, who has lived in project area 1 for thirty years. Mrs. Sudha is now eighty-five years old, her husband is deceased and the little money her husband left her with has been so battered by inflation that it barely meets her basic living expenses. She has been neglecting the repairs on her home, which is now in pretty bad shape. They sum up the condition of the house by admitting that according to the standards they have been applying elsewhere in the first project area, Mrs. Sudha’s home should be demolished and she be relocated somewhere else. However, Prateek cannot bring himself to recommend the destruction of the old woman’s home. He tells you that he knows what the law requires and what the MCH project guidelines specify, but it seems wrong. He argues that “Elderly people, when relocated often lapse into senility and sometimes death. We should not treat decent people who have worked hard all their lives as though they were disposable trash just because they do not fit in certain guidelines. ” But, Tarun does not agree. He feels as strongly as Prateek but not in the same way. “It is too bad about Mrs. Sudha, and all the Mrs. Sudhas who get caught in her predicament, but there is nothing we can do about it,” says Tarun. He tells you that MCH’s job is to rehabilitate the houses when it can and demolish when it cannot, and there are laws and rules, and standards that must govern those decisions. He insists that we cannot go around making exceptions; we have to be fair with everyone and that means treating everyone equally. There must be no special favors, or everyone will demand an exception, and nothing will get done. The only way is to follow the rules. 1. What would be your objective responsibility in this case? Also, clarify what is your subjective responsibility? 2. What would be your future course of action? Is there any other essential information that you would need in order to arrive at a suitable decision? If yes, what could be this information? (250 words/ 20 Marks)
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Approach to an Answer: Objective responsibility • People in the same situation should be treated alike. But, if people are not in the same situation then treating them alike shall amount to discrimination. • Another responsibility is towards the law, in this case, the law regarding the relocation. I have to follow it because it is in the interest of people only. If the old and weak house of Mrs. Sudha breaks due to earthquakes etc, it will be detrimental to the lady. • My responsibility lies with Municipal Corporation which appointed me. For every action, I am answerable to it. • My responsibility lies with my subordinates – Tarun and Prateek. I should not do anything which can make them unlawful or unsympathetic toward the people. • My responsibility also lies towards the citizens of the country. I have to be responsible for all the stakeholders involved in this case – the lady, her neighbor, etc. Subjective responsibility My value system is such that I uphold the goodness of society. I have learned from my training and experience, the marginalized sections like old age people deserve special care. I also believe that I follow the law very strictly but exceptions can be made for compelling reasons. What reasons should be such that I can defend myself if any penal action is followed against me? Other essential information that I need • What are the provisions in which any exceptions to the law can be made? • Which is the authority that can grant the exceptions? • How the extra benefits can be given to the lady at the place of relocations? • Who are the other stakeholders involved in the case? • Is there a way by which her house can be strengthened without breaking it? • What are the actions that can be imposed on me if the law is violated? The future course of action I will consult with all the stakeholders involved and try to assess the net benefit and loss for all the alternatives. If an exception is possible in the law, I shall not demolish the house because the lady has to suffer in old age. If an exception is not possible then what are the actions for the exception? If the punishment is not major then also I will not demolish the house. If these are not there, then I will demolish the house and relocate her. But at the same time, I will also try that she can get extra benefits so that she can sustain herself for the rest of her life. I will also teach Tarun and Prateek that law shall never be violated except in very compelling situations. The compelling situations can be assessed with empathy toward the society esp. the disadvantaged sections. I will also convey to them that for the violation, they should be ready for the administrative actions. Thus, they should assess their defense as well.
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##Question:As the Housing society in Faircity, an older community in Honestopolis is in a dilapidated state, the Municipal Corporation of Honestopolis (MCH) has declared the area appropriate for redevelopment appointing you as project director. You have a team of two specialists, Prateek and Tarun, and the mandate is to determine which of the houses should be rehabilitated and which must be demolished. Prateek and Tarun, report to you about Mrs. Sudha, who has lived in project area 1 for thirty years. Mrs. Sudha is now eighty-five years old, her husband is deceased and the little money her husband left her with has been so battered by inflation that it barely meets her basic living expenses. She has been neglecting the repairs on her home, which is now in pretty bad shape. They sum up the condition of the house by admitting that according to the standards they have been applying elsewhere in the first project area, Mrs. Sudha’s home should be demolished and she be relocated somewhere else. However, Prateek cannot bring himself to recommend the destruction of the old woman’s home. He tells you that he knows what the law requires and what the MCH project guidelines specify, but it seems wrong. He argues that “Elderly people, when relocated often lapse into senility and sometimes death. We should not treat decent people who have worked hard all their lives as though they were disposable trash just because they do not fit in certain guidelines. ” But, Tarun does not agree. He feels as strongly as Prateek but not in the same way. “It is too bad about Mrs. Sudha, and all the Mrs. Sudhas who get caught in her predicament, but there is nothing we can do about it,” says Tarun. He tells you that MCH’s job is to rehabilitate the houses when it can and demolish when it cannot, and there are laws and rules, and standards that must govern those decisions. He insists that we cannot go around making exceptions; we have to be fair with everyone and that means treating everyone equally. There must be no special favors, or everyone will demand an exception, and nothing will get done. The only way is to follow the rules. 1. What would be your objective responsibility in this case? Also, clarify what is your subjective responsibility? 2. What would be your future course of action? Is there any other essential information that you would need in order to arrive at a suitable decision? If yes, what could be this information? (250 words/ 20 Marks)##Answer:Approach to an Answer: Objective responsibility • People in the same situation should be treated alike. But, if people are not in the same situation then treating them alike shall amount to discrimination. • Another responsibility is towards the law, in this case, the law regarding the relocation. I have to follow it because it is in the interest of people only. If the old and weak house of Mrs. Sudha breaks due to earthquakes etc, it will be detrimental to the lady. • My responsibility lies with Municipal Corporation which appointed me. For every action, I am answerable to it. • My responsibility lies with my subordinates – Tarun and Prateek. I should not do anything which can make them unlawful or unsympathetic toward the people. • My responsibility also lies towards the citizens of the country. I have to be responsible for all the stakeholders involved in this case – the lady, her neighbor, etc. Subjective responsibility My value system is such that I uphold the goodness of society. I have learned from my training and experience, the marginalized sections like old age people deserve special care. I also believe that I follow the law very strictly but exceptions can be made for compelling reasons. What reasons should be such that I can defend myself if any penal action is followed against me? Other essential information that I need • What are the provisions in which any exceptions to the law can be made? • Which is the authority that can grant the exceptions? • How the extra benefits can be given to the lady at the place of relocations? • Who are the other stakeholders involved in the case? • Is there a way by which her house can be strengthened without breaking it? • What are the actions that can be imposed on me if the law is violated? The future course of action I will consult with all the stakeholders involved and try to assess the net benefit and loss for all the alternatives. If an exception is possible in the law, I shall not demolish the house because the lady has to suffer in old age. If an exception is not possible then what are the actions for the exception? If the punishment is not major then also I will not demolish the house. If these are not there, then I will demolish the house and relocate her. But at the same time, I will also try that she can get extra benefits so that she can sustain herself for the rest of her life. I will also teach Tarun and Prateek that law shall never be violated except in very compelling situations. The compelling situations can be assessed with empathy toward the society esp. the disadvantaged sections. I will also convey to them that for the violation, they should be ready for the administrative actions. Thus, they should assess their defense as well.
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