Kanda stringclasses 7
values | Sarga int64 1 131 | shlok_no int64 1 8.28k | shlok stringlengths 29 818 | translation stringlengths 7 1.33k ⌀ |
|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 78 | 9 | भ्रातरं सुरथं राज्ये ह्यभिषिच्य महीपतिम् । इदं सरः समासाद्य तपस्तप्तं मया चिरम् ।। 7.78.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 10 | सो ऽहं वर्षसहस्राणि तपस्त्रीणि महावने । तप्त्वा सुदुष्करं प्राप्तो ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ।। 7.78.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 11 | तस्य मे स्वर्गभूतस्य क्षुत्पिपासे द्विजोत्तम । बाधेते परमोदार ततो ऽहं व्यथितेन्द्रियः । गत्वा त्रिभुवनश्रेष्ठं पितामहमुवाच ह ।। 7.78.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 12 | भगवन्ब्रह्मलोको ऽयं क्षुत्पिपासाविवर्जितः । कस्यायं कर्मणः पाकः क्षुत्पिपासानुगो ह्यहम् ।। 7.78.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 13 | आहारः कश्च मे देव तन्मे ब्रूहि पितामह ।। 7.78.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 14 | पितामहस्तु मामाह तवाहारः सुदेवज । स्वादूनि स्वानि मांसानि तानि भक्षय नित्यशः ।। 7.78.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 15 | स्वशरीरं त्वया पुष्टं कुर्वता तप उत्तमम् । अनुप्तं रोहते श्वेत न कदाचिन्महामते ।। 7.78.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 16 | तृप्तिर्न ते ऽस्ति सूक्ष्मा ऽपि वने सत्वनिषेविते । पुरा तु भिक्षमाणाय भिक्षा वै यतये नृप । न हि दत्ता त्वयेन्द्राभ यस्मादतिथये ऽपि वै ।। 7.78.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 17 | दत्तं न ते ऽस्ति सूक्ष्मो ऽपि तप एव निषेवसे । तेन स्वर्गगतो वत्स बाध्यसे क्षुत्पिपासया ।। 7.78.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 18 | स त्वं सुपुष्टमाहारैः स्वशरीरमनुत्तमम् । भक्षयित्वामृतरसं तेन तृप्तिर्भविष्यति ।। 7.78.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 19 | यदा तु तद्वनं श्वेत अगस्त्यः सुमहानृषिः । आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा कृच्छ्राद्विमोक्ष्यते ।। 7.78.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 20 | स हि तारयितुं सौम्य शक्तः सुरगणानपि । किं पुनस्त्वां महाबाहो क्षुत्पिपासावशं गतम् ।। 7.78.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 21 | सो ऽहं भगवतः श्रुत्वा देवदेवस्य निश्चयम् । आहारं गर्हितं स्वशरीरं द्विजोत्तम ।। 7.78.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 22 | बहून्वर्षगणान्ब्रह्मन्भुज्यमानमिदं मया । क्षयं नाभ्येति ब्रह्मर्षे तृप्तिश्चापि ममोत्तमा ।। 7.78.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 23 | तस्य मे कृच्छ्रभूतस्य कृच्छ्रादस्माद्विमोचय । अन्येषां न गतिर्ह्यत्र कुम्भयोनिमृते द्विजम् ।। 7.78.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 24 | इदमाभरणं सौम्य तारणार्थं द्विजोत्तम । प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। 7.78.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 25 | इदं तावत्सुवर्णं च धनं वस्त्राणि च द्विज । भक्ष्यं भोज्यं च ब्रह्मर्षे ददात्याभरणानि च ।। 7.78.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 26 | सर्वान्कामान्प्रयच्छामि भोगांश्च मुनिपुङ्गव । तारणे भगवन्मह्यं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। 7.78.26 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 27 | तस्याहं स्वर्गिणो वाक्यं श्रुत्वा दुःखसमन्वितम् । तारणायोपजग्राह तदाभरणमुत्तमम् ।। 7.78.27 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 28 | मया प्रतिगृहीते तु तस्मिन्नाभरणे शुभे । मानुषः पूर्वको देहो राजर्षेर्विननाश ह ।। 7.78.28 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 29 | प्रनष्टे तु शरीरे ऽसौ राजर्षिः परया मुदा । तृप्तः प्रमुदितो राजा जगाम त्रिदिवं सुखम् ।। 7.78.29 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 30 | तेनेदं शक्रतुल्येन दिव्यमाभरणं मम । तस्मिन्निमित्ते काकुत्स्थ दत्तमद्भुतदर्शनम् ।। 7.78.30 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 31 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे ऽष्टसप्ततितमः सर्गः ।। 78 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 1 | तदद्भुततमं वाक्यं श्रुत्वागस्त्यस्य राघवः । गौरवाद्विस्मयाच्चैव पुनः प्रष्टुं प्रचक्रमे ।। 7.79.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 2 | भगवंस्तद्वनं घोरं तपस्तप्यति यत्र सः । श्वेतो वैदर्भको राजा कथं स्यादमृगद्विजम् ।। 7.79.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 3 | तद्वनं स कथ राजा शून्यं मनुजवर्जितम् । तपश्चर्तुं प्रविष्टः स श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। 7.79.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 4 | रामस्य वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम् । वाक्यं परमतेजस्वी वक्तुमेवोपचक्रमे ।। 7.79.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 5 | पुरा कृतयुगे राम मनुर्दण्डधरः प्रभुः । तस्य पुत्रो महानासीदिक्ष्वाकुः कुलनन्दनः ।। 7.79.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 6 | तं पुत्रं पूर्वंकं राज्ये निक्षिप्य भुवि दुर्जयम् । पृथिव्यां राजवंशानां भव कर्तेत्युवाच ह ।। 7.79.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 7 | तथैवेति प्रतिज्ञातं पितुः पुत्रेण राघव । ततः परमसन्तुष्टो मनुः पुत्रमुवाच ह ।। 7.79.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 8 | प्रीतो ऽस्मि परमोदार त्वं कर्ता ऽसि न संशयः । दण्डेन च प्रजा रक्ष मा च दण्डमकारणे ।। 7.79.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 9 | अपराधिषु यो दण्डः पात्यते मानवेषु वै । स दण्डो विधिवन्मुक्तः स्वर्गं नयति पार्थिवम् ।। 7.79.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 10 | तस्माद्दण्डे महाबाहो यत्नवान्भव पुत्रक । धर्मो हि परमो लोके कुर्वतस्ते भविष्यति ।। 7.79.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 11 | इति तं बहु सन्दिश्य मनुः पुत्रं समाधिना । जगाम त्रिदिवं हृष्टो ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। 7.79.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 12 | प्रयाते त्रिदिवं तस्मिन्निक्ष्वाकुरमितप्रभः । जनयिष्ये कथं पुत्रानिति चिन्तापरो ऽभवत् ।। 7.79.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 13 | कर्मभिर्बहुरूपैश्च तैस्तैर्मनुसुतस्सुतान् । जनयामास धर्मात्मा शतं देवसुतोपमान् ।। 7.79.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 14 | तेषामवरजस्तात सर्वेषां रघुनन्दन । मूढश्चाकृतविद्यश्च न शुश्रूषति पूर्वजान् ।। 7.79.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 15 | नाम तस्य च दण्डेति पिता चक्रे ऽल्पमेधसः । अवश्यं दण्डपतनं शरीरे ऽस्य भविष्यति ।। 7.79.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 16 | अपश्यमानस्तं देशं घोरं पुत्रस्य राघव । विन्ध्यशैवलयोर्मध्ये राज्यं प्रादादरिन्दम ।। 7.79.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 17 | स दण्डस्तत्र राजाभूद्रम्ये पर्वतरोधसि । पुरं चाप्रतिमं राम न्यवेशयदनुत्तमम् ।। 7.79.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 18 | पुरस्य चाकरोन्नाम मधुमन्तमिति प्रभो । पुरोहितं तूशनसं वरयामास सुव्रतम् ।। 7.79.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 19 | एवं स राजा तद्राज्यमकरोत्सपुरोहितः । प्रहृष्टमनुजाकीर्णं देवराजं यथा वृषा ।। 7.79.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 20 | ततः स राजा मनुजेन्द्रपुत्रः सार्धं च तेनोशनसा तदानीम् । चकार राज्यं सुमहान्महात्मा शक्रो दिवीवोशनसा समेतः ।। 7.79.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 79 | 21 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकोनशीतितमः सर्गः ।। 79 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 1 | एतदाख्याय रामाय महर्षिः कुम्भसम्भवः । अस्यामेवापरं वाक्यं कथायामुपचक्रमे ।। 7.80.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 2 | ततः स दण्डः काकुत्स्थ बहुवर्षगणायुतम् । अकरोत्तत्र दान्तात्मा राज्यं निहतकण्टकम् ।। 7.80.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 3 | अथ काले तु कस्मिंश्चिद्राजा भार्गवमाश्रमम् । रमणीयमुपाक्रामच्चैत्रे मासि मनोरमे ।। 7.80.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 4 | तत्र भार्गवकन्यां स रूपेणाप्रतिमां भुवि । विचरन्तीं वनोद्देशे दण्डो ऽपश्यदनुत्तमाम् ।। 7.80.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 5 | स दृष्ट्वा तां सुदुर्मेधा अनङ्गशरपीडितः । अभिगम्य सुसंविग्नां कन्यां वचनमब्रवीत् ।। 7.80.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 6 | कुतस्त्वमसि सुश्रोणि कस्य वा ऽसि सुता शुभे । पीडितो ऽहमनङ्गेन गच्छामि त्वां शुभानने ।। 7.80.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 7 | तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य मोहोन्मत्तस्य कामिनः । भार्गवी प्रत्युवाचेदं वचः सानुनयं नृपम् ।। 7.80.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 8 | भार्गवस्य सुतां विद्धि देवस्याक्लिष्टकर्मणः । अरजां नाम राजेन्द्र ज्येष्ठामाश्रमवासिनीम् ।। 7.80.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 9 | मा मां स्पृश बलाद्राजन्कन्या पितृवशा ह्यहम् । गुरुः पिता मे राजेन्द्र त्वं च शिष्यो महात्मनः । व्यसनं सुमहत्क्रुद्धः स ते दद्यान्महातपाः ।। 7.80.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 10 | यदि वान्यन्मया कार्यं धर्मदृष्टेन सत्पथा । वरयस्व नरश्रेष्ठ पितरं मे महाद्युतिम् ।। 7.80.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 11 | अन्यथा तु फलं तुभ्यं भवेद्घोराभिसंहितम् । क्रोधेन हि पिता मे ऽसौ त्रैलोक्यमपि निर्दहेत् ।। 7.80.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 12 | दास्यते चानवद्याङ्ग तव मा याचितः पिता ।। 7.80.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 13 | एवं ब्रुवाणामरजां दण्डः कामवशं गतः । प्रत्युवाच मदोन्मत्तः शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ।। 7.80.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 14 | प्रसादं कुरु सुश्रोणि न कालं क्षेप्तुमर्हसि । त्वत्कृते हि मम प्राणा विदीर्यन्ते वरानने ।। 7.80.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 15 | त्वां प्राप्य मे वधो वा स्याच्छापो वा यदि दारुणः । भक्तं भजस्व मां भीरु भजमानं सुविह्वलम् ।। 7.80.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 16 | एवमुक्त्वा तु तां कन्यां दोर्भ्यां गृह्य बलाद्बली । विस्फुरन्तीं यथाकामं मैथुनायोपचक्रमे ।। 7.80.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 17 | एतमर्थं महाघोरं दण्डः कृत्वा सुदारुणम् । नगरं प्रययावाशु मधुमन्तमनुत्तमम् ।। 7.80.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 18 | अरजा ऽपि रुदन्ती सा आश्रमस्याविदूरतः । प्रतीक्षन्ति सुसंत्रस्ता पितरं देवसन्निभम् ।। 7.80.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 80 | 19 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे ऽशीतितमः सर्गः ।। 80 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 1 | स मुहूर्तादुपश्रुत्य देवर्षिरमितप्रभः । स्वमाश्रमं शिष्यवृतः क्षुधार्तः सन्न्यवर्तत ।। 7.81.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 2 | सो ऽपश्यदरजां दीनां रजसा समभिप्लुताम् । ज्योत्स्नामिव ग्रहग्रस्तां प्रत्यूषे न विराजतीम् ।। 7.81.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 3 | तस्य रोषः समभवत्क्षुधार्तस्य विशेषतः । निर्दहन्निव लोकांस्त्रीञ्छिष्यांश्चैतदुवाच ह ।। 7.81.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 4 | पश्यध्वं विपरीतस्य दण्डस्याविजितात्मनः । विपत्तिं घोरसङ्काशां क्रुद्धामग्निशिखामिव ।। 7.81.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 5 | क्षयो ऽस्य दुर्मतेः प्राप्तः सानुगस्य दुरात्मनः । यः प्रदीप्तां हुताशस्य शिखां वै स्प्रष्टुमिच्छति ।। 7.81.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 6 | यस्मात्स कृतवान्पापमीदृशं घोरसंहितम् । तस्मात्प्राप्स्यति दुर्मेधाः फलं पापस्य कर्मणः ।। 7.81.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 7 | सप्तरात्रेण राजासौ सभृत्यबलवाहनः । पापकर्मसमाचारो वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः ।। 7.81.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 8 | समन्ताद्योजनशतं विषयं चास्य दुर्मतेः । धक्ष्यते पांसुवर्षेण महता पाकशासनः ।। 7.81.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 9 | सर्वसत्वानि यानीह स्थावराणि चराणि च । महता पांसुवर्षेण विलयं सर्वतो ऽगमन् ।। 7.81.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 10 | दण्डस्य विषयो यावत्तावत्सर्वसमुच्छ्रयम् । पांसुवर्षमिवालक्ष्यं सप्तरात्रं भविष्यति ।। 7.81.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 11 | इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षस्तदाश्रमनिवासिनम् । जनं जनपदान्तेषु स्थीयतामिति चाब्रवीत् ।। 7.81.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 12 | श्रुत्वा तूशनसो वाक्यं सो ऽ ऽश्रमावसथो जनः । निष्क्रान्तो विषयात्तस्मात्स्थानं चक्रे ऽथ बाह्यतः ।। 7.81.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 13 | स तथोक्त्वा मुनिजनमरजामिदमब्रवीत् । इहैव वस दुर्मेधे आश्रमे सुसमाहिता ।। 7.81.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 14 | इदं योजनपर्यन्तं सरः सुरुचिरप्रभम् । अरजे विज्वरा भुङ्क्ष्व कालश्चात्र प्रतीक्ष्यताम् ।। 7.81.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 15 | त्वत्समीपे च ये सत्त्वा वासमेष्यन्ति तां निशाम् । अवध्याः पांसुवर्षेण ते भविष्यन्ति नित्यदा ।। 7.81.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 16 | श्रुत्वा नियोगं ब्रह्मर्षेः सा ऽरजा भार्गवी तदा । तथेति पितरं प्राह भार्गवं भृशदुःखिता । इत्युक्त्वा भार्गवो वासमन्यत्र समकारयत् ।। 7.81.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 17 | तच्च राज्यं नरेन्द्रस्य सभृत्यबलवाहनम् । सप्ताहाद्भस्मसाद्भूतं यथोक्तं ब्रह्मवादिना ।। 7.81.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 18 | तस्यासौ दण्डविषयो विन्ध्यशैवलयोर्नृप । शप्तो ब्रह्मर्षिणा तेन वैधर्म्ये सहिते कृते ।। 7.81.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 19 | ततः प्रभृति काकुत्स्थ दण्डकारण्यमुच्यते । तपस्विनः स्थिता ह्यत्र जनस्थानमतो ऽभवत् ।। 7.81.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 20 | एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि राघव । सन्ध्यामुपासितुं वीर समयो ह्यतिवर्तते ।। 7.81.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 21 | एते महर्षयः सर्वे पूर्णकुम्भाः समन्ततः । कृतोदका नरव्याघ्र आदित्यं पर्युपासते ।। 7.81.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 22 | स तैर्ब्राह्मणमभ्यस्तं सहितैर्ब्रह्मवित्तमैः । रविरस्तं गतो राम गच्छोदकमुपस्पृश ।। 7.81.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 81 | 23 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः ।। 81 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 1 | ऋषेर्वचनमाज्ञाय रामः सन्ध्यामुपासितुम् । उपाक्रमत्सरः पुण्यमप्सरोगणसेवितम् ।। 7.82.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 2 | तत्रोदकमुपस्पृश्य सन्ध्यामन्वास्य पश्चिमाम् । आश्रमं प्राविशद्रामः कुम्भयोनेर्महात्मनः ।। 7.82.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 3 | तस्यागस्त्यो बहुगुणं कन्दमूलं तथौषधिम् । शाल्यादीनि पवित्राणि भोजनार्थमकल्पयत् ।। 7.82.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 4 | स भुक्तवान्नरश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । प्रीतश्च परितुष्टश्च तां रात्रिं समुपाविशत् ।। 7.82.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 5 | प्रभाते काल्यमुत्थाय कृत्वा ऽ ऽह्निकमरिन्दमः । ऋषिं समुपचक्राम गमनाय रघूत्तमः ।। 7.82.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 6 | अभिवाद्याब्रवीद्रामो महर्षिं कुम्भसम्भवम् । आपृच्छे स्वां पुरीं गन्तुं मामनुज्ञातुमर्हसि ।। 7.82.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 7 | धन्यो ऽस्म्यनुगृहीतो ऽस्मि दर्शनेन महात्मनः । द्रष्टुं चैवागमिष्यामि पावनार्थमिहात्मनः ।। 7.82.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 8 | तथा वदति काकुत्स्थे वाक्यमद्भुतदर्शनम् । उवाच परमप्रीतो धर्मनेत्रस्तपोधनः ।। 7.82.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 9 | अत्यद्भुतमिदं वाक्यं तव राम शुभाक्षरम् । पावनः सर्वभूतानां त्वमेव रघुनन्दन ।। 7.82.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 10 | मुहूर्तमपि राम त्वां ये च पश्यन्ति केचन । पाविताः स्वर्गभूताश्च पूज्यास्ते सर्वदैवतैः ।। 7.82.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 11 | ये च त्वां घोरचक्षुर्भिः पश्यन्ति प्राणिनो भुवि । हतास्ते यमदण्डेन सद्यो निरयगामिनः ।। 7.82.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 12 | ईदृशस्त्वं रघुश्रेष्ठ पावनः सर्वदेहिनाम् । भुवि त्वां कथयन्तो ऽपि सिद्धिमेष्यन्ति राघव ।। 7.82.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 13 | गच्छ चारिष्टमव्याग्रः पन्थानमकुतोभयम् । प्रशाधि राज्यं धर्मेण गतिर्हि जगतो भवान् ।। 7.82.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 14 | एवमुक्तस्तु मुनिना प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः । अभ्यवादयत प्राज्ञस्तमृषिं पुण्यशालिनम् ।। 7.82.14 ।। | null |
Subsets and Splits
No community queries yet
The top public SQL queries from the community will appear here once available.