Kanda stringclasses 7
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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 82 | 15 | अभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं तांश्च सर्वांस्तपोधनान् । अध्यारोहत्तदव्यग्रः पुष्पकं हेमभूषितम् ।। 7.82.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 16 | तं प्रयान्तं मुनिगणा ह्याशीर्वादैः समन्ततः । अपूजयन्महेन्द्राभं सहस्राक्षमिवामराः ।। 7.82.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 17 | स्वस्थः स ददृशे रामः पुष्पके हेमभूषिते । शशी मेघसमीपस्थो यथा जलधरागमे ।। 7.82.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 18 | ततो ऽर्धदिवसे प्राप्ते पूज्यमानस्ततस्ततः । अयोध्यां प्राप्य काकुत्स्थो मध्यकक्ष्यामवारुहत् ।। 7.82.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 19 | ततो विसृज्य रुचिरं पुष्पकं कामगामि तत् । विसर्जयित्वा गच्छेति स्वस्ति ते ऽस्त्विति च प्रभुः ।। 7.82.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 20 | कक्षान्तरविनिक्षिप्तं द्वास्स्थं रामो ऽब्रवीद्वचः । लक्ष्मणं भरतं चैव गत्वा तौ लघुविक्रमौ ।। ममागमनमाख्याय शब्दापयत मा चिरम् ।। 7.82.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 82 | 21 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे व्द्यशीतितमः सर्गः ।। 82 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 1 | तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य रामस्याक्लिष्ट कर्मणः । द्वास्स्थः कुमारावाहूय राघवाय न्यवेदयत् ।। 7.83.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 2 | दृष्ट्वा तु राघवः प्राप्तौ प्रियौ भरतलक्ष्मणौ । परिष्वज्य तदा रामो वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.83.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 3 | कृतं मया यथा तथ्यं द्विजकार्यमनुत्तमम् । धर्मसेतुमथो भूयः कर्तुमिच्छामि राघवौ ।। 7.83.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 4 | अक्षय्यश्चाव्ययश्चैव धर्मसेतुर्मतो मम । धर्मप्रसाधकं ह्येतत् सर्वपापप्रणाशनम् ।। 7.83.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 5 | युवाभ्यामात्मभूताभ्यां राजसूयमनुत्तमम् । सहितो यष्टुमिच्छामि तत्र धर्मो हि शाश्वतः ।। 7.83.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 6 | इष्ट्वा तु राजसूयेन मित्रः शत्रुनिबर्हणः । सुहुतेन सुयज्ञेन वरुणत्वमुपागमत् ।। 7.83.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 7 | सोमश्च राजसूयेन इष्ट्वा धर्मेण धर्मवित् । प्राप्तश्च सर्वलोकेषु कीर्तिस्थानं च शाश्वतम् ।। 7.83.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 8 | अस्मिन्नहनि यच्छ्रेयश्चिन्त्यतां तन्मया सह । हितं चायतियुक्तं च प्रयतौ कर्तुमर्हथः ।। 7.83.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 9 | श्रुत्वा तु राघवस्यैतद्वाक्यं वाक्यविशारदः । भरतः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.83.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 10 | त्वयि धर्मः परः साधो त्वयि सर्वा वसुन्धरा । प्रतिष्ठिता महाबाहो यशश्चामितविक्रम ।। 7.83.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 11 | महीपालाश्च सर्वे त्वां प्रजापतिमिवामराः । निरीक्षन्ते महात्मानं लोकानाथं यथा वयम् ।। 7.83.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 12 | पुत्राश्च पितृवद्राजन्पश्यन्ति त्वां महाबल । पृथिव्या गतिभूतो ऽसि प्राणिनामपि राघव ।। 7.83.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 13 | स त्वमेवंविधं यज्ञमाहर्तासि कथं नृप । पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो यत्र दृश्यते ।। 7.83.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 14 | पृथिव्यां ये च पुरुषा राजन्पौरुषमागताः । सर्वेषां भविता तत्र सङ्क्षयः सर्वकोपजः ।। 7.83.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 15 | स त्वं पुरुषशार्दूल गुणैरतुलविक्रम । पृथिवीं नार्हसे हन्तुं वशे हि तव वर्तते ।। 7.83.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 16 | भरतस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा ऽमृतमयं तदा । प्रहर्षमतुलं लेभे रामः सत्यपराक्रमः ।। 7.83.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 17 | उवाच च शुभं वाक्यं कैकेय्यानन्दवर्धनम् । प्रीतो ऽस्मि परितुष्टो ऽस्मि तवाद्य वचने ऽनघ ।। 7.83.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 18 | इदं वचनमक्लीबं त्वया धर्मसमाहितम् । व्याहृतं पुरुषव्याघ्र पृथिव्याः परिपालनम् ।। 7.83.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 19 | एष्यदस्मदभिप्रायाद्राजसूयात्क्रतूत्तमात् । निवर्तयामि धर्मज्ञ तव सुव्याहृतेन च ।। 7.83.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 20 | लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणैः । बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्य लक्ष्मणपूर्वज । तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महामते ।। 7.83.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 83 | 21 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे त्र्यशीतितमः सर्गः ।। 83 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 1 | तथोक्तवति रामे तु भरते च महात्मनि । लक्ष्मणो ऽथ शुभं वाक्यमुवाच रघुनन्दनम् ।। 7.84.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 2 | अश्वमेधो महायज्ञः पावनः सर्वपाप्मनाम् । पावनस्तव दुर्धर्षो रोचतां रघुनन्दन ।। 7.84.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 3 | श्रूयते हि पुरावृत्तं वासवे सुमहात्मनि । ब्रह्महत्यावृतः शक्रो हयमेधेन पावितः ।। 7.84.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 4 | पुरा किल महाबाहो देवासुरसमागमे । वृत्रो नाम महानासीद्दैतेयो लोकसम्मतः ।। 7.84.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 5 | विस्तीर्णो योजनशतमुच्छ्रितस्त्रिगुणं ततः । अनुरागेण लोकांस्त्रीन्स्नेहात्पश्यति सर्वतः ।। 7.84.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 6 | धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च बुद्ध्या च परिनिष्ठितः । शशास पृथिवीं स्फीतां धर्मेण सुसमाहितः ।। 7.84.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 7 | तस्मिन्प्रशासति तदा सर्वकामदुघा मही । रसवन्ति प्रभूनानि मूलानि च फलानि च ।। 7.84.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 8 | अकृष्टपच्या पृथिवी सुसम्पन्ना महात्मनः । स राज्यं तादृशं भुङ्क्ते स्फीतमद्भुतदर्शनम् ।। 7.84.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 9 | तस्य बुद्धिः समुप्तन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् । तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत्सुखम् ।। 7.84.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 10 | स निक्षिप्य सुतं ज्येष्ठं पौरेषु मधुरेश्वरम् । तप उग्रं समातिष्ठत्तापयन्सर्वदेवताः ।। 7.84.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 11 | तपस्तप्यति वृत्रे तु वासवः परमार्तवत् । विष्णुं समुपसङ्क्रम्य वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.84.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 12 | तपस्यता महाबाहो लोकाः वृत्रेण निर्जिताः । बलवान्स हि धर्मात्मा नैनं शक्ष्यामि शासितुम् ।। 7.84.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 13 | यद्यसौ तप आतिष्ठेद्भूय एवासुरेश्वर । यावल्लोका धरिष्यन्ति तावदस्य वशानुगाः ।। 7.84.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 14 | तं चैनं परमोदारमुपेक्षसि महाबलम् । क्षणं हि न भवेद्वृत्रः क्रुद्धे त्वयि सुरेश्वर ।। 7.84.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 15 | यदा हि प्रीतिसंयोगं त्वया विष्णो समागतः । तदाप्रभृति लोकानां नाथत्वमुपलब्धवान् ।। 7.84.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 16 | स त्वं प्रसादं लोकानां कुरुष्व सुसमाहितः । त्वत्कृतेन हि सर्वं स्याप्रशान्तमरुजं जगत् ।। 7.84.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 17 | इमे हि सर्वे विष्णो त्वां निरीक्षन्ते दिवौकसः । वृत्रघातेन महता तेषां साह्यं कुरुष्व ह ।। 7.84.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 18 | त्वया हि नित्यशः साह्यं कृतमेषां महात्मनाम् । असह्यमिदमन्येषामगतीनां गतिर्भवान् ।। 7.84.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 84 | 19 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः ।। 84 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 1 | लक्ष्मणस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा शत्रुनिबर्हणः । वृत्रघातमशेषेण कथयेत्याह सुव्रत ।। 7.85.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 2 | राघवेणैवमुक्तस्तु सुमित्रानन्दवर्धनः । भूय एव कथां दिव्यां कथयामास सुव्रतः ।। 7.85.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 3 | सहस्राक्षवचः श्रुत्वा सर्वेषां च दिवौकसाम् । विष्णुर्देवानुवाचेदं सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ।। 7.85.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 4 | पूर्वं सौहृदबद्धो ऽस्मि वृत्रस्य ह महात्मनः । तेन युष्मत्प्रियार्थं हि नाहं हन्मि महासुरम् ।। 7.85.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 5 | अवश्यं करणीयं च भवतां सुखमुत्तमम् । तस्मादुपायमाख्यास्ये येन वृत्रो निहन्यते ।। 7.85.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 6 | त्रिधाभूतं करिष्यामि ह्यात्मानं सुरसत्तमाः । तेन वृत्रं सहस्राक्षो वधिष्यति न संशयः ।। 7.85.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 7 | एकांशो वासवं यातु द्वितीयो वज्रमेव तु । तृतीयो भूतलं शक्रस्तदा वृत्रं वधिष्यति ।। 7.85.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 8 | तथा ब्रुवति देवेशे देवा वाक्यमथाब्रुवन् । एवमेतन्न सन्देहो यथा वदसि दैत्यहन् ।। 7.85.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 9 | भद्रं ते ऽस्तु गमिष्यामो वृत्रासुरवधैषिणः । भजस्व परमोदार वासवं स्वेन तेजसा ।। 7.85.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 10 | ततः सर्वे महात्मानः सहस्राक्षपुरोगमाः । तदारण्यमुपाक्रामन्यत्र वृत्रो महासुरः ।। 7.85.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 11 | ते पश्यंस्तेजसा भूतं तप्यन्तमसुरोत्तमम् । पिबन्तमिव लोकांस्त्रीन्निर्दहन्तमिवाम्बरम् ।। 7.85.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 12 | दृष्ट्वैव चासुरश्रेष्ठं देवास्त्रासमुपागमन् । कथमेनं वधिष्यामः कथं न स्यात्पराजयः ।। 7.85.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 13 | तेषां चिन्तयतां तत्र सहस्राक्षः पुरन्दरः । वज्रं प्रगृह्य पाणिभ्यां प्राहिणोद्वृत्रमूर्धनि ।। 7.85.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 14 | कालाग्निनेव घोरेण तप्तेनैव महार्चिषा । पतता वृत्रशिरसा जगत्ऺत्रासमुपागमत् ।। 7.85.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 15 | असम्भाव्यं वधं तस्य वृत्रस्य विबुधाधिपः । चिन्तयानो जगामाशु लोकस्यान्तं महायशाः ।। 7.85.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 16 | तमिन्द्रं ब्रह्महत्या ऽ ऽशु गच्छन्तमनुगच्छति । अपतच्चास्य गात्रेषु तमिन्द्रं दुःखमाविशत् ।। 7.85.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 17 | हतारयः प्रनष्टेन्द्रा देवाः साग्निपुरोगमाः । विष्णुं त्रिभुवनेशानं मुहुर्मुहुरपूजयन् ।। 7.85.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 18 | त्वं गतिः परमेशान पूर्वजो जगतः पिता । रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ।। 7.85.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 19 | हतश्चायं त्वया वृत्रो ब्रह्महत्या च वासवम् । बाधते सुरशार्दूल मोक्षं तस्या विनिर्दिश ।। 7.85.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 20 | तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरब्रवीत् । मामेव यजतां शक्रः पावयिष्यामि वज्रिणम् ।। 7.85.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 21 | पुण्येन हयमेधेन मामिष्ट्वा पाकशासनः । पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयम् ।। 7.85.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 22 | एवं सन्दिश्य तां वाणीं देवानाममृतोपमाम् । जगाम विष्णुर्देवेशः स्तूयमानस्त्रिविष्टपम् ।। 7.85.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 85 | 23 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः ।। 85 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 1 | तदा वृत्रवधं सर्वमखिलेन स लक्ष्मणः । कथयित्वा नरश्रेष्ठः कथाशेषं प्रचक्रमे ।। 7.86.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 2 | ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयङ्करे । ब्रह्महत्यावृतः शक्रः सञ्ज्ञां लेभे न वृत्रहा ।। 7.86.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 3 | सो ऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसञ्ज्ञो विचेतनः । कालं तत्रावसत्कञ्चिद्वेष्टमान इवोरगः ।। 7.86.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 4 | अथ नष्टे सहस्राक्षे उद्विग्नमभवज्जगत् । भूमिश्च ध्वस्तसङ्काशा निःस्नेहा शुष्ककानना ।। 7.86.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 5 | निःस्रोतसश्च ते सर्वे तु ह्रदाश्च सरितस्तथा । सङ्क्षोभश्चैव सत्त्वानामनावृष्टिकृतो ऽभवत् ।। 7.86.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 6 | क्षीयमाणे तु लोके ऽस्मिन्सम्भ्रान्तमनसः सुराः । यदुक्तं विष्णुना पूर्वं तं यज्ञं समुपानयन् ।। 7.86.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 7 | ततः सर्वे सुरगणाः सोपाध्यायाः सहर्षिभिः । तं देशं समुपाजग्मुर्यत्रेन्द्रो भयमोहितः ।। 7.86.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 8 | ते तु दृष्ट्वा सहस्राक्षमावृतं ब्रह्महत्यया । तं पुरस्कृत्य देवेशमश्वमेधमुपाक्रमन् ।। 7.86.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 9 | ततो ऽश्वमेधः सुमहान्महेन्द्रस्य महात्मनः । ववृधे ब्रह्महत्ययाः पावनार्थं नरेश्वर ।। 7.86.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 10 | ततो यज्ञे समाप्ते तु ब्रह्महत्या महात्मनः । अभिगम्याब्रवीद्वाक्यं क्व मे स्थानं विधास्यथ ।। 7.86.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 11 | ते तामूचुस्तदा देवास्तुष्टाः प्रीतिसमन्विताः । चतुर्धा विभजात्मानमात्मनैव दुरासदे ।। 7.86.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 12 | देवानां भाषितं श्रुत्वा ब्रह्महत्या महात्मनाम् । सन्निधौ स्थानमन्यत्र वरयामास दुर्वसा ।। 7.86.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 13 | एकेनांशेन वत्स्यामि पूर्णोदासु नदीषु वै । चतुरो वार्षिकान्मासान्दर्पघ्नी कामवारिणी ।। 7.86.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 14 | भूम्यामहं सर्वकालमेकेनांशेन सर्वदा । वसिष्यामि न सन्देहः सत्येनैतद्ब्रवीमि वः ।। 7.86.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 15 | यो ऽयमंशस्तृतीयो मे स्त्रीषु यौवनशालिषु । त्रिरात्रं दर्पपूर्णासु वशिष्ये दर्पघातिनी ।। 7.86.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 16 | हन्तारो ब्राह्मणान्ये तु मृषापूर्वमदूषकान् । तांश्चतुर्थेन भागेन संश्रयिष्ये सुरर्षभाः ।। 7.86.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 17 | प्रत्यूचुस्तां ततो देवा यथा वदसि दुर्वसे । तथा भवतु तत्सर्वं साधयस्व यदीप्सितम् ।। 7.86.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 18 | ततः प्रीत्या ऽन्विता देवाः सहस्राक्षं ववन्दिरे । विज्वरः स च पूतात्मा वासवः समपद्यत ।। 7.86.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 19 | प्रशान्तं च जगत्सर्वं सहस्राक्षे प्रतिष्ठिते । यज्ञं चाद्भुतसङ्काशं तदा शक्रो ऽभ्यपूजयत् ।। 7.86.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 20 | ईदृशो ह्यश्वमेधस्य प्रसादो रघुनन्दन । यजस्व सुमहाभाग हयमेधेन पार्थिव ।। 7.86.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 21 | इति लक्ष्मणवाक्यमुत्तमं नृपतिरतीव मनोहरं महात्मा । परितोषमवाप हृष्टचेता निशमय्येन्द्रसमानविक्रमौजाः ।। 7.86.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 86 | 22 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ।। 86 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 1 | तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणेनोक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः । प्रत्युवाच महातेजाः प्रहसन्राघवो वचः ।। 7.87.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 2 | एवमेव नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण । वृत्रघातमशेषेण वाजिमेधफलं च यत् ।। 7.87.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 3 | श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः । पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमानिलो नाम महाशयाः ।। 7.87.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 4 | स राजा पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा सुधार्मिकः । राज्यं चैव नरव्याघ्र पुत्रवत्पर्यपालयत् ।। 7.87.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 5 | सुरैश्च परमोदारैर्दैतेयैश्च महाधनैः । नागराक्षसगन्धर्वैर्यक्षैश्च सुमहात्मभिः ।। 7.87.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 6 | पूज्यते नित्यशः सौम्य भयार्तै रघुनन्दन । अबिभ्यंश्च त्रयो लोकाः सरोषस्य महात्मनः ।। 7.87.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 7 | स राजा तादृशो ह्यासीद्धर्मे वीर्ये च निष्ठितः । बुद्ध्या च परमोदारो बाह्लीकेशो महायशाः ।। 7.87.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 87 | 8 | स प्रचक्रे महाबाहुर्मृगयां रुचिरे वने । चैत्रे मनोरमे मासि सभृत्यबलवाहनः ।। 7.87.8 ।। | null |
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