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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 71 | 6 | उवाच च मुनिर्वाक्यं लवणस्य वधाश्रितम् । सुदुष्करं कृतं कर्म लवणं निघ्नता त्वया ।। 7.71.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 7 | बहवः पार्थिवाः सौम्य हताः सबलवाहनाः । लवणेन महाबाहो युध्यमाना महाबलाः ।। 7.71.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 8 | स त्वया निहतः पापो लीलया पुरुषर्षभ । जगतश्च भयं तत्र प्रशान्तं तव तेजसा ।। 7.71.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 9 | रावणस्य वधो घोरो यत्नेन महता कृतः । इदं तु सुमहत्कर्म त्वया कृतमयत्नतः ।। 7.71.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 10 | प्रीतिश्चास्मिन्परा जाता देवानां लवणे हते । भूतानां चैव सर्वेषां जगतश्च प्रियं कृतम् ।। 7.71.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 11 | तच्च युद्धं मया दृष्टं यथावत्पुरुषर्षभ । सभायां वासवस्याथ उपविष्टेन राघव ।। 7.71.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 12 | ममापि परमा प्रीतिर्हृदि शत्रुघ्न वर्तते । उपाघ्रास्यामि ते मूर्ध्नि स्नेहस्यैषा परा गतिः ।। 7.71.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 13 | इत्युक्त्वा मूर्ध्नि शत्रुघ्नमुपाघ्राय महामुनिः । आतिथ्यमकरोत्तस्य ये च तस्य पदानुगाः ।। 7.71.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 14 | स भुक्तवान्नरश्रेष्ठो गीतमाधुर्यमुत्तमम् । शुश्राव रामचरितं तस्मिन्काले यथाकृमम् ।। 7.71.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 15 | तन्त्रीलयसमायुक्तं त्रिस्थानकरणान्वितम् । संस्कृतं लक्षणोपेतं समतालसमन्वितम् । शुश्राव रामचरितं तस्मिन्काले पुरा कृतम् ।। 7.71.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 16 | तान्यक्षराणि सत्यानि यथावृत्तानि पूर्वशः । श्रुत्वा पुरुषशार्दूलो विसञ्ज्ञो बाष्पलोचनः ।। 7.71.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 17 | स मुहूर्तमिवासञ्ज्ञो विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः । तस्मिन् गीते यथावृत्तं वर्तमानमिवाशृणोत् ।। 7.71.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 18 | पदानुगाश्च ये राज्ञस्तां श्रुत्वा गीतिसम्पदम् । अवाङ्मुखाश्च दीनाश्च ह्याश्चर्यमिति चाब्रुवन् ।। 7.71.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 19 | परस्परं च ये तत्र सैनिकाः सम्बभाषिरे । किमिदं क्व च वर्तामः किमेतत्स्वप्नदर्शनम् ।। 7.71.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 20 | अर्थो यो नः पुरा दृष्टस्तमाश्रमपदे पुनः । शृणुमः किमिदं स्वप्नो गीतबन्धं श्रियो भवेत् ।। 7.71.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 21 | विस्मयं ते परं गत्वा शत्रुघ्नमिदमब्रुवन् । साधु पृच्छ नरश्रेष्ठ वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ।। 7.71.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 22 | शत्रुघ्नस्त्वब्रवीत्सर्वान्कौतूहलसमन्वितान् । सैनिका न क्षमो ऽस्माकं परिप्रष्टुमिहेदृशः ।। 7.71.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 23 | आश्चर्याणि बहूनीह भवन्त्यस्याश्रमे मुनेः । न तु कौतूहलाद्युक्तमन्वेष्टुं तं महामुनिम् ।। 7.71.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 24 | एवं तद्वाक्यमुक्त्वा च सैनिकान्रघुनन्दनः । अभिवाद्य महर्षिं तं स्वं निवेशं ययौ तदा ।। 7.71.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 71 | 25 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे एकसप्ततिमः सर्गः ।। 71 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 1 | तं शयानं नरव्याघ्रं निद्रा नाभ्यागमत्तदा । चिन्तयन्तमनेकार्थं रामगीतमनुत्तमम् ।। 7.72.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 2 | तस्य शब्दं सुमधुरं तन्त्रीलयसमन्वितम् । श्रुत्वा रात्रिर्जगामाशु शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।। 7.72.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 3 | तस्यां निशायां व्युष्टायां कृत्वा पौर्वाह्णिकं क्रमम् । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं शत्रुघ्नो मुनिपुङ्गवम् ।। 7.72.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 4 | भगवन्द्रष्टुमिच्छामि राघवं रघुनन्दनम् । त्वया ऽनुज्ञातुमिच्छामि सहैभिः संशितव्रतैः ।। 7.72.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 5 | इत्येवंवादिनं तं तु शत्रुघ्नं शत्रुतापनम् । वाल्मीकिः सम्परिष्वज्य विससर्ज च राघवम् ।। 7.72.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 6 | सो ऽभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं रथमारुह्य सुप्रभम् । अयोध्यामगमत्तूर्णं राघवोत्सुकदर्शनः ।। 7.72.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 7 | स प्रविष्टः पुरीं रम्यां श्रीमानिक्ष्वाकुनन्दनः । प्रविवेश महाबाहुर्यत्र रामो महाद्युतिः ।। 7.72.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 8 | स रामं मन्त्रिमध्यस्थं पूर्णचन्द्रनिभाननम् । पश्यन्नमरमध्यस्थं सहस्रनयनं यथा ।। 7.72.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 9 | सो ऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं रामं सत्यपराक्रमम् ।। 7.72.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 10 | यदाज्ञप्तं महाराज सर्वं तत्कृतवानहम् । हतः स लवणः पापः पुरी चास्य निवेशिता ।। 7.72.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 11 | द्वादशैते गता वर्षास्त्वां विना रघुनन्दन । नोत्सहेयमहं वस्तुं त्वया विरहितो नृप ।। 7.72.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 12 | स मे प्रसादं काकुत्स्थ कुरुष्वामितविक्रम । मातृहीनो यथा वत्सो न चिरं प्रवसाम्यहम् ।। 7.72.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 13 | एवं ब्रुवाणं शत्रुघ्नं परिष्वज्येदमब्रवीत् । मा विषादं कृथाः शूर नैतत्क्षत्रियचेष्टितम् ।। 7.72.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 14 | नावसीदन्ति राजानो विप्रवासेषु राघव । प्रजा नः परिपाल्या हि क्षत्रधर्मेण राघव ।। 7.72.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 15 | काले काले तु मां वीर अयोध्यामवलोकितुम् । आगच्छ त्वं नरश्रेष्ठ गन्तासि च पुरं तव ।। 7.72.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 16 | ममापि त्वं सुदयितः प्राणैरपि न संशयः । अवश्यं करणीयं च राज्यस्य परिपालनम् ।। 7.72.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 17 | तस्मात्त्वं वस काकुत्स्थ सप्तरात्रमिहावस । ऊर्ध्वं गन्तासि मधुरां सभृत्यबलवाहनः ।। 7.72.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 18 | रामस्यैतद्वचः श्रुत्वा धर्मयुक्तं मनोगतम् । शत्रुघ्नो दीनया वाचा बाढमित्येव चाब्रवीत् ।। 7.72.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 19 | सप्तरात्रं च काकुत्स्थो राघवस्य यथाज्ञया । उष्य तत्र महेष्वासो गमनायोपचक्रमे ।। 7.72.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 20 | आमन्त्र्य तु महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । भरतं लक्ष्मणं चैव महारथमुपारुहत् ।। 7.72.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 21 | दूरमाभ्यामनुगतो लक्ष्मणेन महात्मना । भरतेन च शत्रुघ्नो जगामाशु पुरं ततः ।। 7.72.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 72 | 22 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ।। 72 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 1 | प्रस्थाप्य तु स शत्रुघ्नं भ्रातृभ्यां सह राघवः । प्रमुमोद सुखी राज्यं धर्मेण परिपालयन् ।। 7.73.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 2 | ततः कतिपयाहःसु वृद्धो जानपदो द्विजः । मृतं बालमुपादाय राजद्वारमुपागमत् ।। 7.73.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 3 | रुदन्बहुविधा वाचः स्नेहदुःखसमन्विताः । असकृत्पुत्र पुत्रेति वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.73.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 4 | किं नु मे दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम् । यदहं पुत्रमेकं त्वां पश्यामि निधनं गतम् ।। 7.73.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 5 | अप्राप्तयौवनं बालं पञ्चवर्षसहस्रकम् । अकाले कालमापन्नं मम दुःखाय पुत्रक ।। 7.73.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 6 | अल्पैरहोभिर्निधनं गमिष्यामि न संशयः । अहं च जननी चैव तव शोकेन पुत्रक ।। 7.73.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 7 | न स्मराम्यनृतं ह्युक्तं न च हिंसां स्मराम्यहम् । सर्वेषां प्राणिनां पापं कृतं नैव स्मराम्यहम् ।। 7.73.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 8 | केनाद्य दुष्कृतेनायं बाल एव ममात्मजः । अकृत्वा पितृकार्याणि गतो वैवस्वतक्षयम् ।। 7.73.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 9 | नेदृशं दृष्टपूर्वं मे श्रुतं वा घोरदर्शनम् । मृत्युरप्राप्तकालानां रामस्य विषये यथा ।। 7.73.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 10 | रामस्य दुष्कृतं किञ्चिन्महदस्ति न संशयः । यथा हि विषयस्थानां बालानां मृत्युरागतः ।। 7.73.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 11 | नह्यन्यविषयस्थानां बालानां मृत्युतो भयम् । त्वं राजञ्जीवयस्वैनं बालं मृत्युवशं गतम् ।। 7.73.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 12 | राजद्वारि मरिष्यामि पत्न्या सार्धमनाथवत् । ब्रह्महत्यां ततो राम समुपेत्य सुखी भव ।। 7.73.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 13 | भ्रातृभिः सहितो राजन्दीर्घमायुरवाप्स्यसि । उषिताः स्म सुखं राज्ये तवास्मिन्सुमहाबल ।। 7.73.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 14 | इदं तु पतितं तस्मात्तव राम वशे स्थिताः । कालस्य वशमापन्नाः स्वल्पं हि नहि नः सुखम् ।। 7.73.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 15 | सम्प्रत्यनाथो विषय इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् । रामं नाथमिहासाद्य बालान्तकरणं ध्रुवम् ।। 7.73.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 16 | राजदोषैर्विपद्यन्ते प्रजा ह्यविधिपालिताः । असद्वृत्ते तु नृपतावकाले म्रियते जनः ।। 7.73.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 17 | यद्वा पुरेष्वयुक्तानि जना जनपदेषु च । कुर्वते न च रक्षा ऽस्ति तदा कालकृतं भयम् ।। 7.73.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 18 | सुव्यक्तं राजदोषो हि भविष्यति न संशयः । पुरे जनपदे चापि ततो बालवधो ह्ययम् ।। 7.73.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 19 | एवं बहुविधैर्वाक्यैरुपरुध्य मुहुर्मुहुः । राजानं दुःखसन्तप्तः सुतं तमुपगूहते ।। 7.73.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 73 | 20 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ।। 73 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 1 | तथा तु करुणं तस्य द्विजस्य परिदेवनम् । शुश्राव राघवः सर्वं दुःखशोकसमन्वितम् ।। 7.74.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 2 | स दुःखेन च सन्तप्तो मन्त्रिणस्तानुपाह्वयत् । वसिष्ठं वामदेवं च भ्रातरौ सह नैगमान् ।। 7.74.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 3 | ततो द्विजा वसिष्ठेन सार्धमष्टौ प्रवेशिताः । राजानं देवसङ्काशं वर्धस्वेति ततो ऽब्रुवन् ।। 7.74.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 4 | मार्कण्डेयो ऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च काश्यपः । कात्यायनो ऽथ जाबालिर्गौतमो नारदस्तथा । एते द्विजर्षभाः सर्वे आसनेषूपवेशिताः ।। 7.74.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 5 | महर्षीन्समनुप्राप्तानभिवाद्य कृताञ्जलिः । मन्त्रिणो नैगमांश्चैव यथार्हमनुकूलतः ।। 7.74.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 6 | तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां दीप्ततेजसाम् । राघवः सर्वमाचष्टे द्विजो ऽयमुपरोधते ।। 7.74.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 7 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञो दीनस्य नारदः । प्रत्युवाच शुभं वाक्यमृषीणां सन्निधौ नृपम् ।। 7.74.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 8 | शृणु राजन्यथाकाले प्राप्तो बालस्य सङ्क्षयः । श्रुत्वा कर्तव्यतां राजन्कुरुष्वरघुनन्दन ।। 7.74.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 9 | पुरा कृतयुगे राजन्ब्राह्मणा वै तपस्विनः । अब्राह्मणस्तदा राजन्न तपस्वी कथञ्चन ।। 7.74.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 10 | तस्मिन्युगे प्रज्वलिते ब्रह्मभूते त्वनावृते । अमृत्यवस्तदा सर्वे जज्ञिरे दीर्घदर्शिनः ।। 7.74.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 11 | ततस्त्रेतायुगं नाम मानवानां वपुष्मताम् । क्षत्रियास्तत्र जायन्ते पूर्णेन तपसा ऽन्विताः ।। 7.74.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 12 | वीर्येण तपसा चैव ते ऽधिकाः पूर्वजन्मनि । मानवा ये महात्मानस्त्वत्र त्रेतायुगे युगे ।। 7.74.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 13 | ब्रह्मक्षत्रं च तत्सर्वं यत्पूर्वमपरं च यत् । युगयोरुभयोरासीत्समवीर्यसमन्वितम् ।। 7.74.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 14 | अपश्यंस्तु न ते सर्वे विशेषमधिकं ततः । स्थापनं चक्रिरे तत्र चातुर्वर्ण्यस्य सम्मतम् ।। 7.74.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 15 | तस्मिन्युगे प्रज्वलिते धर्मभूते ह्यनावृते । अधर्मः पादमेकं तु पातयत्पृथिवीतले ।। 7.74.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 16 | अधर्मेण हि संयुक्तस्तेजो मन्दं भविष्यति ।। 7.74.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 17 | आमिषं यच्च पूर्वेषां राजसं च मलं भृशम् । अनृतं नाम तद्भूतं पादेन पृथिवीतले ।। 7.74.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 18 | अनृतं पातयित्वा तु पादमेकमधर्मतः । ततः प्रादुष्कृतं पूर्वमायुषः परिनिष्ठितम् ।। 7.74.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 19 | पतिते त्वनृते तस्मिन्नधर्मे च महीतले । शुभान्येवाचरँल्लोकः सत्यधर्मपरायणः ।। 7.74.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 20 | त्रेतायुगे च वर्तन्ते ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च ये । तपो ऽतप्यन्त ते सर्वे शुश्रूषामपरे जनाः ।। 7.74.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 21 | स धर्मः परमस्तेषां वैश्यशूद्रं समागमत् । पूजां च सर्ववर्णानां शूद्राश्चक्रुर्विशेषतः ।। 7.74.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 22 | एतस्मिन्नन्तरे तेषामधर्मे चानृते च ह । ततः पूर्वे भृशं ह्रासमगमन्नृपसत्तम ।। 7.74.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 23 | ततः पादमधर्मस्स द्वितीयमवतारयत् । ततो द्वापरसञ्ज्ञा ऽस्य युगस्य समजायत ।। 7.74.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 24 | तस्मिन्द्वापरसञ्ज्ञे तु वर्तमाने युगक्षये । अधर्मश्चानृतं चैव ववृधे पुरुषर्षभ ।। 7.74.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 25 | तस्मिन्द्वापरसङ्ख्याते तपो वैश्यान्समाविशत् । त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन्वर्णान्क्रमाद्वै तप आविशत् ।। 7.74.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 26 | त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन्वर्णान्धर्मश्च परिनिष्ठितः । न शुद्धो लभते धर्मं युगतस्तु नरर्षभ । हीनवर्णो नृपश्रेष्ठ तप्यते सुमहत्तपः ।। 7.74.26 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 27 | भविष्यच्छूद्रयोन्यां वै तपश्चर्या कलौ युगे । अधर्मः परमो राजन्द्वापरे शूद्रजन्मनः ।। 7.74.27 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 28 | स वै विषयपर्यन्ते तव राजन्महातपाः । अद्य तप्यति दुर्बुद्धिस्तेन बालवधो ह्ययम् ।। 7.74.28 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 29 | यो ह्यधर्ममकार्यं वा विषये पार्थिवस्य तु । करोति चाश्रीमूलं तत्पुरे वा दुर्मतिर्नरः । क्षिप्रं च नरकं याति स च राजा न संशयः ।। 7.74.29 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 30 | अधीतस्य च तप्तस्य कर्मणः सुकृतस्य च । षष्ठं भजति भागं तु प्रजा धर्मेण पालयन् ।। 7.74.30 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 31 | षङ्भागस्य न भोक्ता ऽसौ रक्षते न प्रजाः कथम् ।। 7.74.31 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 32 | स त्वं पुरुषशार्दूल मार्गस्व विषयं स्वकम् । दुष्कृतं यत्र पश्येथास्तत्र यत्नं समाचर ।। 7.74.32 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 33 | एवं चेद्धर्मवृद्धिश्च नृणां चायुर्विवर्धनम् । भविष्यति नरश्रेष्ठ बालस्यास्य च जीवितम् ।। 7.74.33 ।। | null |
Uttara Kanda | 74 | 34 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ।। 74 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 1 | नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा ऽमृतमयं तदा । प्रहर्षमतुलं लेभे लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ।। 7.75.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 2 | गच्छ सौम्य द्विजश्रेष्ठं समाश्वासय सुव्रतम् । बालस्य तु शरीरं तत्तैलद्रोण्यां निधापय ।। 7.75.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 3 | गन्धैश्च परमोदारैस्तैलैश्चापि सुगन्धिभिः । यथा न क्षीयते बालस्तथा सौम्य विधीयताम् ।। 7.75.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 4 | यथा शरीरो बालस्य गुप्तः सन् शिष्टकर्मणः । विपत्तिः परिभेदो वा न भवेच्च तथा कुरु ।। 7.75.4 ।। | null |
Subsets and Splits
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