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|---|---|---|---|---|
Uttara Kanda | 75 | 5 | एवमादिश्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । मनसा पुष्पकं दध्यावागच्छेति महायशाः ।। 7.75.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 6 | इङ्गितं स तु विज्ञाय पुष्पको हेमभूषितः । आजगाम मुहूर्तेन समीपे राघवस्य वै ।। 7.75.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 7 | सो ऽब्रवीत्प्रणतो भूत्वा अयमस्मि नराधिप । वश्यस्तव महाबाहो किङ्करः समुपस्थितः ।। 7.75.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 8 | भाषितं रुचिरं श्रुत्वा पुष्पकस्य नराधिपः । अभिवाद्य महर्षींस्तान् विमानं सो ऽध्यरोहत ।। 7.75.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 9 | धनुर्गृहीत्वा तूणी च खड्गं च रुचिरप्रभम् । निक्षिप्य नगरे वीरौ सौमित्रिभरतावुभौ ।। 7.75.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 10 | प्रायात्प्रतीचीं हरितं विचिन्वंश्च ततस्ततः । उत्तरामगमच्छ्रीमान्दिशं हिमवता वृताम् ।। 7.75.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 11 | अपश्यमानस्तत्रापि स्वल्पमप्यथ दुष्कृतम् । पूर्वामपि दिशं सर्वामथो ऽपश्यन्नराधिपः ।। 7.75.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 12 | प्रविशुद्धसमाचारामादर्शतलनिर्मलाम् । पुष्पकस्थो महाबाहुस्तदापश्यन्नराधिपः ।। 7.75.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 13 | दक्षिणां दिशमाक्रामत्ततो राजर्षिनन्दनः । शैवलस्योत्तरे पार्श्वे ददर्श सुमहत्सरः ।। 7.75.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 14 | तस्मिन्सरसि तप्यन्तं तापसं सुमहत्तपः । ददर्श राघवः श्रीमाँल्लम्बमानमधोमुखम् ।। 7.75.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 15 | राघवस्तमुपागम्य तप्यन्तं तप उत्तमम् । उवाच स तदा वाक्यं धन्यस्त्वमसि सुव्रत ।। 7.75.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 16 | कस्यां योन्यां तपोवृद्ध वर्तसे दृढविक्रम । कौतूहलात्त्वां पृच्छामि रामो दाशरथिर्ह्यहम् ।। 7.75.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 17 | को ऽर्थो मनीषितस्तुभ्यं स्वर्गलाभः परो ऽथवा । वराश्रयो यदर्थं त्वं तपस्यसि सुदुष्करम् । यमाश्रित्य तपस्तप्तं श्रोतुमिच्छामि तापस ।। 7.75.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 18 | ब्राह्मणो वा ऽसि भद्रं ते क्षत्रियो वा ऽसि दुर्जयः । वैश्यस्तृतीयवर्णो वा शूद्रो वा सत्यवाग्भव ।। 7.75.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 19 | इत्येवमुक्तः स नराधिपेन ह्यवाक्छिरा दाशरथाय तस्मै । उवाच जातिं नृपपुङ्गवाय यत्कारणे चैव तपःप्रयत्नः ।। 7.75.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 75 | 20 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ।। 75 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 1 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः । अवाक्छिरास्तथाभूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। 7.76.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 2 | शूद्रयोन्यां प्रसूतो ऽस्मि शम्बूको नाम नामतः । देवत्वं पार्थये राम सशरीरो महायशः ।। 7.76.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 3 | न मिथ्या ऽहं वदे राम देवलोकजिगीषया । शूद्रं मां विद्धि काकुत्स्थ तप उग्रं समास्थितम् ।। 7.76.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 4 | भाषतस्तस्य शूद्रस्य खड्गं सुरुचिरप्रभम् । निष्कृष्य कोशाद्विमलं शिरश्चिच्छेद राघवः ।। 7.76.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 5 | तस्मिञ्छूद्रे हते देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः । साधु साध्विति काकुत्स्थं प्रशशंसुर्मुहुर्मुहुः ।। 7.76.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 6 | पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद्दिव्यानां सुसुगन्धिनाम् । पुष्पाणां वायुमुक्तानां सर्वतः प्रपपात ह ।। 7.76.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 7 | सुप्रीताश्चाब्रुवन्रामं देवाः सत्यपराक्रमम् । सुरकार्यमिदं सौम्य सुकृतं ते महामते ।। 7.76.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 8 | गृहाण च वरं सौम्य यत्त्वमिच्छस्यरिन्दम । स्वर्गभाङ्नहि शूद्रो ऽयं त्वत्कृते रघुनन्दन ।। 7.76.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 9 | देवानां भाषितं श्रुत्वा राघवः सुसमाहितः । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सहस्राक्षं पुरन्दरम् ।। 7.76.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 10 | यदि देवाः प्रसन्ना मे द्विजपुत्रः स जीवतु । दिशन्तु वरमेतं मे इप्सितं परमं मम ।। 7.76.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 11 | ममापचाराद्यातो ऽसौ ब्राह्मणस्यैकपुत्रकः । अप्राप्तकालः कालेन नीतो वैवस्वतक्षयम् ।। 7.76.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 12 | तं जीवयथ भद्रं वो नानृतं कर्तुमर्हथ । द्विजस्य संश्रुतो ऽर्थो मे जीवयिष्यामि ते सुतम् ।। 7.76.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 13 | राघवस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा विबुधसत्तमाः । प्रत्युचू राघवं प्रीता देवाः प्रीतिसमन्वितम् ।। 7.76.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 14 | निर्वृतो भव काकुत्स्थ सो ऽस्मिन्नहनि बालकः । जीवितं प्राप्तवान्भूयः समेतश्चापि बन्धुभिः ।। 7.76.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 15 | यस्मिन्मुहूर्ते काकुत्स्थ शूद्रो ऽयं विनिपातितः । तस्मिन्मुहूर्ते बालो ऽसौ जीवेन समयुज्यत ।। 7.76.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 16 | स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते साधु याम नरर्षभ । अगस्त्यस्याश्रमपदं द्रष्टुमिच्छाम राघव ।। 7.76.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 17 | तस्य दीक्षा समाप्ता हि ब्रह्मर्षेः सुमहाद्युतेः । द्वादशं हि गतं वर्षं जलशय्यां समासतः ।। 7.76.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 18 | काकुत्स्थ तद्गमिष्यामो मुनिं समभिनन्दितुम् । त्वं चाप्यागच्छ भद्रं ते द्रष्टुं तमृषिसत्तमम् ।। 7.76.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 19 | स तथेति प्रतिज्ञाय देवानां रघुनन्दनः । आरुरोह विमानं तं पुष्पकं हेमभूषितम् ।। 7.76.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 20 | ततो देवाः प्रयातास्ते विमानैर्बहुविस्तरैः । रामो ऽप्यनुजगामाशु कुम्भयोनेस्तपोवनम् ।। 7.76.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 21 | दृष्ट्वा तु देवान्सम्प्राप्तानगस्त्यस्तपसां निधिः । अर्चयामास धर्मात्मा सर्वांस्तानविशेषतः ।। 7.76.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 22 | प्रतिगृह्य ततः पूजां सम्पूज्य च महामुनिम् । जग्मुस्ते त्रिदशा हृष्टा नाकपृष्ठं सहानुगैः ।। 7.76.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 23 | गतेषु तेषु काकुत्स्थः पुष्पकादवरुह्य च । ततो ऽभिवादयामास ह्यगस्त्यमृषिसत्तमम् ।। 7.76.23 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 24 | सो ऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा । आतिथ्यं परमं प्राप्य निषसाद नराधिपः ।। 7.76.24 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 25 | तमुवाच महातेजाः कुम्भयोनिर्महातपाः । स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तो ऽसि राघव ।। 7.76.25 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 26 | त्वं मे बहुमतो राम गुणैर्बहुभिरुत्तमैः । अतिथिः पूजनीयश्च मम नित्यं हृदि स्थितः ।। 7.76.26 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 27 | सुरा हि कथयन्ति त्वामागतं शूद्रघातिनम् । ब्राह्मणस्य तु धर्मेण त्वया जीवापितः सुतः ।। 7.76.27 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 28 | उष्यतां चेह रजनी सकाशे मम राघव । प्रभाते पुष्पकेण त्वं गन्ता ऽसि पुरमेव हि ।। 7.76.28 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 29 | त्वं हि नारायणः श्रीमांस्त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । त्वं प्रभुः सर्वदेवानां पुरुषस्त्वं सनातनः ।। 7.76.29 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 30 | इदं चाभरणं सौम्य निर्मितं विश्वकर्मणा । दिव्यं दिव्येन वपुषा दीप्यमानं स्वतेजसा । प्रतिगृह्णीष्व काकुत्स्थ मत्प्रियं कुरु राघव ।। 7.76.30 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 31 | दत्तस्य हि पुनर्दाने सुमहत्फलमुच्यते । भरणे हि भवान् शक्तः सेन्द्राणां मरुतामपि ।। 7.76.31 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 32 | त्वं हि शक्तस्तारयितुं सेन्द्रानपि दिवौकसः । तस्मात्प्रदास्ये विधिवत्तत्प्रतीच्छ नराधिप ।। 7.76.32 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 33 | दिव्यमाभरणं चित्रं प्रदीप्तमिव भास्करम् ।। 7.76.33 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 34 | अथोवाच महात्मानमिक्ष्वाकूणां महारथः । रामो मतिमतां श्रेष्ठः क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ।। 7.76.34 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 35 | प्रतिग्रहो ऽयं भगवन्ब्राह्मणस्याविगर्हितः । गृह्णीयां क्षत्रियो ऽहं वै कथं ब्राह्मणपुङ्गव ।। 7.76.35 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 36 | ब्राह्मणेन विशेषेण दत्तं तद्वक्तुमर्हसि । एवमुक्तस्तु रामेण प्रत्युवाच महानृषिः ।। 7.76.36 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 37 | आसन्कृतयुगे राम ब्रह्मभूते पुरायुगे । अपार्थिवाः प्रजाः सर्वाः सुराणां तु शतक्रतुः ।। 7.76.37 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 38 | ताः प्रजा देवदेवेशं राजार्थं समुपाद्रवन् । सुराणां स्थापितो राजा त्वया देव शतक्रतुः ।। 7.76.38 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 39 | प्रयच्छ नो हि लोकेश पार्थिवं नरपुङ्गवम् । यस्मै पूजां प्रयुञ्जाना धूतपापाश्चरेमहि । न वसामो विना राज्ञा एष नो निश्चयः परः ।। 7.76.39 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 40 | प्रजानां वचनं श्रुत्वा निश्चयित्वा ऽर्थमुत्तमम् ।। 7.76.40 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 41 | ततो ब्रह्मा सुरश्रेष्ठो लोकपालान्सवासवान् । समाहूयाब्रवीत्सर्वांस्तेजोभागान्प्रयच्छत ।। 7.76.41 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 42 | ततो ददुर्लोकपालाः सर्वे भागान्स्वतेजसः । अक्षुपच्च ततो ब्रह्मा यतो जातः क्षुपो नृपः ।। 7.76.42 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 43 | तं ब्रह्मा लोकपालानां सहांशैः समयोजयत् । ततो ददौ नृपं तासां प्रजानामीश्वरं क्षुपम् ।। 7.76.43 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 44 | तत्रैन्द्रेण च भागेन महीमाज्ञापयन्नृपः । वारुणेन तु भागेन वपुः पुष्यति पार्थिवः ।। 7.76.44 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 45 | कौबेरेण तु भागेन वित्तमासां ददौ तदा । यस्तु याम्यो ऽभवद्भागस्तेन शास्ति स्म स प्रजाः ।। 7.76.45 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 46 | तत्रैन्द्रेण नरश्रेष्ठ भागेन रघुनन्दन । प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते तारणार्थं मम प्रभो ।। 7.76.46 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 47 | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ऋषेः परमधार्मिकम् । तद्रामः प्रतिजग्राह मुनेराभरणं वरम् ।। 7.76.47 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 48 | प्रतिगृह्य ततो रामस्तदाभरणमुत्तमम् । आगमं तस्य दीप्तस्य प्रष्टुमेवोपचक्रमे ।। 7.76.48 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 49 | अत्यद्भुतमिदं दिव्यं वपुषा युक्तमुत्तमम् । कथं वा भगवता प्राप्तं कुतो वा केन वा हृतम् ।। 7.76.49 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 50 | कुतूहलितया ब्रह्मन्पृच्छामि त्वां महायशः । आश्चर्याणां बहूनां हि निधिः परमको भवान् ।। 7.76.50 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 51 | एवं ब्रुवति काकुत्स्थे मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् । शृणु राम यथावृत्तं पुरा त्रेतायुगे युगे ।। 7.76.51 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 52 | रमणीयप्रदेशे ऽस्मिन् वने यद्दृष्टवानहम् । आश्चर्यं मे महाबाहो दानमाश्रित्य केवलम् ।। 7.76.52 ।। | null |
Uttara Kanda | 76 | 53 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ।। 76 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 1 | पुरा त्रेतायुगे राम बभूव बहुविस्तरम् । समन्ताद्योजनशतं विमृगं पक्षिवर्जितम् ।। 7.77.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 2 | तस्मिन्निर्मानुषे ऽरण्ये कुर्वाणस्तप उत्तमम् । अहमाक्रमितुं सौम्य तदरण्यमुपागमम् ।। 7.77.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 3 | तस्य रूपमरण्यस्य निर्देष्टुं न शशाक ह । फलमूलैः सुखास्वादैर्बहुरूपैश्च पादपैः ।। 7.77.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 4 | तस्यारण्यस्य मध्ये तु सरो योजनमायतम् । हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् ।। 7.77.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 5 | पद्मोत्पलसमाकीर्णं समतिक्रान्तशैवलम् । तदाश्चर्यमिवात्यर्थं सुखास्वादमनुत्तमम् ।। 7.77.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 6 | अरजस्कं तथा ऽक्षोभ्यं श्रीमत्पक्षिगणायुतम् । समीपे तस्य सरसो महदद्भुतमाश्रमम् ।। 7.77.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 7 | पुराणं पुण्यमत्यर्थं तपस्विजनवर्जितम् । तत्राहमवसं रात्रिं नैदाघीं पुरुषर्षभ ।। 7.77.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 8 | प्रभाते काल्यमुत्थाय सरस्तदुपचक्रमे । अथापश्यं शवं तत्र सुपुष्टमजरं क्वचित् ।। 7.77.8 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 9 | पङ्किभेदेन पुष्टाङ्गं समाश्रितसरोवरम् । तिष्ठन्तं परया लक्ष्म्या तस्मिंस्तोयाशये नृप ।। 7.77.9 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 10 | तमर्थं चिन्तयानो ऽहं मुहूर्तं तत्र राघव । उषितो ऽस्मि सरस्तीरे किन्न्विदं स्यादिति प्रभो ।। 7.77.10 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 11 | अथापश्यं मुहूर्तेन दिव्यमद्भुतदर्शनम् । विमानं परमोदारं हंसयुक्तं मनोजवम् ।। 7.77.11 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 12 | अत्यर्थं स्वर्गिणं त विमाने रघुनन्दन । उपास्ते ऽप्सरसां वीर सहस्रं दिव्यभूषणम् ।। 7.77.12 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 13 | गायन्ति दिव्यगेयानि वादयन्ति तथा ऽपराः । क्ष्वेलयन्ति तथा चान्या नृत्यन्ति च तथा ऽपराः ।। 7.77.13 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 14 | अपराश्चन्द्ररश्म्याभैर्हेमदण्डैश्च चामरैः । दोधूयुर्वदनं तस्य पुण्डरीकनिभेक्षणम् ।। 7.77.14 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 15 | ततः सिंहासनं त्यक्त्वा मेरुकूटमिवांशुमान् । पश्यतो मे तदा राम विमानादवरुह्य च । तं शवं भक्षयामास स स्वर्गी रघुनन्दन ।। 7.77.15 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 16 | तथा भुक्त्वा यथाकामं मांसं बहु सुपीवरम् । अवतीर्य सरः स्वर्गी संस्प्रष्टुमुपचक्रमे ।। 7.77.16 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 17 | उपस्पृश्य यथान्यायं स स्वर्गी रघुपुङ्गव । आरोढुमुपचक्राम विमानवरमुत्तमम् ।। 7.77.17 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 18 | तमहं देवसङ्काशमारोहन्तमुदीक्ष्य वै । अथाहमब्रुवं वाक्यं स्वर्गिणं पुरुषर्षभ ।। 7.77.18 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 19 | को भवान्देवसङ्काश आहारश्च विगर्हितः । त्वयेदं भुज्यते सौम्य किमर्थं वक्तुमर्हसि ।। 7.77.19 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 20 | कस्य स्यादीदृशो भाव आहारो देवसम्मतः । आश्चर्यं वर्तते सौम्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। 7.77.20 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 21 | नाहमौपयिकं मन्ये तव भक्ष्यमिदं शवम् ।। 7.77.21 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 22 | इत्येवमुक्तः स नरेन्द्र नाकी कौतूहलात्सूनृतया गिरा च । श्रुत्वा च वाक्यं मम सर्वमेतत्सर्वं तथा चाकथयन्ममेति ।। 7.77.22 ।। | null |
Uttara Kanda | 77 | 23 | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमदुत्तरकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ।। 77 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 1 | श्रुत्वा तु भाषितं वाक्यं मम राम शुभाक्षरम् । प्राञ्जलिः प्रत्युवाचेदं स स्वर्गी रघुनन्दन ।। 7.78.1 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 2 | शृणु ब्रह्मन्पुरा वृत्तं ममैतत्सुखदुःखयोः । अनतिक्रमणीयं हि यथा पृच्छसि मां द्विज ।। 7.78.2 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 3 | पुरा वैदर्भको राजा पिता मम महायशाः । सुदेव इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।। 7.78.3 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 4 | तस्य पुत्रद्वयं ब्रह्मन्द्वाभ्यां स्त्रीभ्यामजायत । अहं श्वेत इति ख्यातो यवीयान्सुरथो ऽभवत् ।। 7.78.4 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 5 | ततः पितरि स्वर्याते पौरा मामभ्यषेचयन् । तत्राहं कृतवान्राज्यं धर्म्यं च सुसमाहितः ।। 7.78.5 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 6 | एवं वर्षसहस्राणि समतीतानि सुव्रत । राज्यं कारयतो ब्रह्मन्प्रजा धर्मेण रक्षतः ।। 7.78.6 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 7 | सो ऽहं निमित्ते कस्मिंश्चिद्विज्ञातायुर्द्विजोत्तम । कालधर्मं हृदि न्यस्य ततो वनमुपागमम् ।। 7.78.7 ।। | null |
Uttara Kanda | 78 | 8 | सो ऽहं वनमिदं दुर्गं मृगपक्षिविवर्जितम् । तपश्चर्तुं प्रविष्टो ऽस्मि समीपे सरसः शुभे ।। 7.78.8 ।। | null |
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